ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१८ (विदेह-सदेह १८, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक १९१-२००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ३०००/- संस्करण: २०१८, २०२२ Videha Sadeha 18: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 191-200 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-८३३) गजेन्द्र ठाकुर- जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल”, सम्पादकीय (पृ. २-१६) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्म कथा) खण्ड ०-२९ (जारी..), जगदानन्द झा 'मनु' जे त्रुटिक उल्लेख केलनि तकर परिणाम थिक ‘संशोधित गजल-गंगा’, मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’, रामक ‘अम्बरा’, प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल , अरविन्दजीक आजाद गजल , कोरांटी – एकांकी (पृ. १७-४८४) विनीत उत्पल- नव दिशाक कथा (जगदीश प्रसाद मंडलक गामक जिनगी)(पृ. ४८५-४८८) कामिनी कामायनी- नोम्पेंह, सेयाम रेयापक स्वर्णिम अतीत, भागमंती (पृ. ४८९-५१४) रतन झा- मैथिलीक किछु समकालीन उपन्यासक विविध स्वरूप (पृ. ५१५-५१८) डॉ विद्यानाथ झा- डेंगू बीमारीक भयावह परिदृश्य (पृ. ५१९-५२७) कामिनी- गीत-गंगा (पृ. ५२८-५३५) जगदानन्द झा 'मनु'- "गजल गंगा" (पृ. ५३६-५४४) डॉ. अजीत मिश्र- मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’(पृ. ५४५-५५०) आशीष अनचिन्हार- धारक "अइ" पार, पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण, गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो- (आलोचना),सभ्य लोक, जँ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि, ब्रम्हपिशाच (पृ. ५५१-५८१) परमानन्द प्रभाकर- कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा (पृ. ५८२-५८५) छत्रानंद सिंह झा- ‘गीत-गंगा’मे सब किछु अछि (पृ. ५८६-५८७) केदार कानन- गीत गंगामे अनिल, हमर सबहक पंडितजी, सहज आ मिलनसार छलाह रेणुजी (पृ. ५८८-५९७) डा.अमर नाथ ठाकुर- ‘गीत-गंगा’क प्रवाह (पृ. ५९८-६११) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- अनिलजी – व्यक्तित्त्व आ कृतित्त्व (पृ. ६१२-६३७) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”आ सुप्रिया बेबी कुमारी- भूकम्प- (बाल विज्ञान कथा) (पृ. ६३८-६७४) सृजन शेखर 'अज्ञेय' (मूल नाम गंगानंद झा)- जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, विहनि कथा- अशुभ इच्छा (पृ. ६७५- ६७८) बाल मुकुंद पाठक- मैथिलीक गजलक सशक्त हस्ताक्षर 'अनिल' (पृ. ६७९-६८३) अरविन्द ठाकुर- ’गीत-गंगा’ के बहाने किछु बतकही (पृ. ६८४-६९७) मुन्नाजी- (विदेहक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक लेल मुन्नाजी द्वारा अनिल जी सं लेल ई-साक्षात्कार), सेल्फी, बखरा, करोट , धीया-पुता लेल प्रेरक अछि देवीजी, अधिकार लेल छटपटाइत मोहन दास (पृ. ६९८-७१६) राम लोचन ठाकुर- रमानंद रेणु के मन पाड़ैत (पृ. ७१७-७२४) योगेन्द्र पाठक “वियोगी”- एकसरुआ सिपाही (पृ. ७२५-७२९) नबो नारायण मिश्र- युगपुरुष श्री राजनंदन लाल दास (पृ. ७३०-७३८) ओम प्रकाश झा- विछोहक नोर, - मातृवत परदारेषु (पृ. ७३९-७४०) अनिल झा- अनटोटल गप्प (पृ. ७४१-७४२) रवि भूषण पाठक- दोस आ दोसक चालि प्रकृति बेमेय, दोस यौ दोस, फलनमा.. चिलनमा... ठेकनमा (पृ. ७४३-७६३) पत्राचार खंड— जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’द्वारा प्राप्त पत्र (पृ. ७६४-७८६) राजदेव मण्डल- अवाक (पृ. ७८७-७९१) विन्देश्वर ठाकुर- राजनैतिक विहनि कथा, प्रेम विहनि कथा (पृ. ७९२-७९३) अब्दुर रज्जाक- किछु प्रेम बिहैन कथा, राजनैतिक बिहैन कथा, कतारक मौसम आ बिन मौसम क बर्षा, दोहा-कतारमे साँझक चौपारिपर कें आठम मासक बैसार सम्पन्न! (पृ. ७९४-८००) उमेश मण्डल- मुड़नक मुर, रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल, 88म कथा-साहित्य गोष्ठी डखराममे सम्पन्न भेल (पृ. ८०१-८१६) अखिलेश कुमार- बाबू भोला लाल दासक जयंती मनल (८१७-८१९) राम विलास साहु- ई छी हमर मजबूरी, चोर-सिपाही, जाति (प्. ८२०-८२५) लक्ष्मी दास- बापक धरम (पृ. ८२६-८२९) ललन कुमार कामत- बाबाक लोटा (पृ. ८३०-८३३) पद्य- खण्ड (पृ.८३४-१२५६) जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- गीत, कविता, दोहा, चतुष्पदी, गजल, आत्म-गीत आ किछु बाल कविता (पृ. ८३५-९४७) जगदानंद झा मनु- गजल (पृ. ९४८-९४८) दिलीप कुमार साह- अहाँ हमर..., मिथिला हमर..., क्षण भरि..., हमरा याद अबैए... (पृ. ९४९-९५७) मुन्ना जी- गजल, कविता ऐब की बेरिया (पृ. ९५८-९६१) रमेश- ताजीवन हमर नहि (पृ. ९६२-९६३) नन्द विलास राय- नैतिकता आ इमान, नेताजी, हमर सपनाक बिहार (पृ. ९६४-९७५) कामिनी कामायनी- अंकोरवट मंदिर (पृ. ९७६-९७८) किशन कारीगर- इस्कूल जाइत छी हम (पृ. ९७९-९८०) आशीष अनचिन्हार- किछु बाल गजल, किछु गजल (पृ. ९८१-९९२) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- मारिते रास बाल कविता (वन्य आधारित), फागुनक पानि, माघ, सोझ बाट, मंगलमय हो नव वर्ष, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ , परिवर्तन, सहनशीलता, ई की भेल !?!?!, छठि गीत - १-२, लेखकक जिनगीक छन्द, श्री गणपति वन्दना (पृ. ९९३-१२१५) असरफ राईन- किछु गजल, परदेशी मनक भावना (पृ. १२१६-१२१८) ओम प्रकाश झा-किछु गजल (पृ. १२१९-१२२१) रवि भूषण पाठक- तीनटा कविता (पृ. १२२२-१२२४) विजयनाथ झा- नव वर्षक एहि मधुर पहरमे, हमर नाम परिचय सादर सुरत हम, चेतना केर नव सृजनमे (पृ. १२२५-१२२७) सृजन शेखर ’अज्ञेय’ (मूल नाम गंगानंद झा)- गीत सँ पहिने, हऽम, जिनगी के दस्तावेज़, सभ मैथिल के लेल, प्रेम के गीत-सृजन, हमर गाम, जिनगी के गीत, गीत एगो सपना (पृ. १२२८-१२४५) अब्दुर रज्जाक- चरिपतिया, किछु गजल, एकटा कता (पृ.१२४६-१२५०) महेश डखरामी- रंग रास (पृ. १२५१-१२५२) विन्देश्वर ठाकुर- गजल (पृ. १२५३-१२५३) बिनीता झा- रखबार राघव (पृ. १२५४-१२५४) विकास झा- एलै फागुन मास सखी हे (पृ. १२५५-१२५५) नीरज कर्ण- गजल (प्. १२५६-१२५६) 2
गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल” जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ जी मूलतः कवि छथि, ओना गद्य समालोचनापर सेहो हिनकर लिखना लिखाएल अछि/ पद्यक पद्यमय हेबाक् गप, गीत हेबाक गप किछु कविक मुंहसं बहराइत रहैत अछि/ ओ पद्यक गीतमय, गेयमय नै हेबापर कन्नारोहट करै छथि/ फेर आगां जा कऽ पद्यक गेय नै हेबा लेल नव खाढ़ीकें दोष दैत एकरा पुरान आ नवक बीच संघर्ष बना दै छथि/ तं की पद्यक गेयता ओकर पुरान शैलीक हेबाक परिचय दैए? एतऽ किछु नव खाढ़ीक लोक ऐ झपासामे आबियो जाइ छथि आ पद्यमे गेयता भेने भाव कम भऽ जाइए, इत्यादि बाजि-लिखि कऽ पुरान पीढ़ीक किछु गोटेक तर्ककें काटबाक बदला दृढ़ करै छथि/ मूल गप जे झांपल जाइए से अछि पुरान पीढ़ीक किछु कविक गेय मुदा भावहीन रचनाकें समालोचक द्वारा दबाड़लापर ओ एकरा नव आ पुरानक संघर्ष कहि दै छथि आ अपन रचना लेल अपने स्थान निर्धारित करबाक चेष्टा करै छथि/ एतऽ जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’क रचना जे गीत हुअए बा गजल बा कविता, एकटा उदाहरण बनि सोझां अबैत अछि, जतऽ तुकमिलानी मात्र पद्य हेबाक माणदण्ड नै अछि/ जतऽ पद्यक गेयता एकर अवगुण नै बनैत अछि/ जतऽ अकवितामे सेहो तारतम्य अछि/ जतऽ नव आ पुरानक कृत्रिम भेद मेटा जाइत अछि आ दोषकें गुण कहेबा लेल नव आ पुरानक सोंगरक खगता नै पड़ैए/ २ भगवानक अस्तित्वक उत्तर उपनिवेशवादी रचनाकार लेल एकटा बुझौअलि अछि/ जं भगवानक अस्तित्व मानल जाए तं समस्या आ नै मानल जाए तं विश्वरूपी फोटोक फ्रेमे खतम, नाटकक मंचे निपत्ता/ ई सुरुज, ई चान, ई कोटि तरेगन, अकास, सांझ-प्रात, रौद-बसात, गाछक फड़नाइ, पानिक तपब, भाप उड़ब, मेघ बनब-बरसब, गहूम धान उपजब, फलक फूलब, सागर-पर्वत, ई सभ ककरा लेल? हमरे लेल ने/ आ हमरा लेल ई सभ कियो तं बनेनहिये हएत/ आ साइंस हमरा सभक मगजमे ढुकल अछि, से बिनु बनेने किछु बनि जाएत से सोचबो कठिन/ आ जं ई बनेनहार देखाइत अछि तं फलनां-चिलनां नाम दै छी/ आ जं बनेनहार नै देखाइत अछि तं ओ बना कऽ नुका गेल/ आ से भेल भगवान/ सभटा हमरहि लेल बना कऽ नुका गेल भगवान/ ३ नारी चेतनाक स्वरमे सेहो कन्नारोहटक अभाव अछि/ मुदा ई आशा सेहो समाजमे बालिकाका आगमनपर भऽ रहल शोकक परिचायक अछि, नै तं बालक लेलई पद्य किए नै लिखाएल, जखनकि बालकक बेरोजगारी सेहो पैघ समस्या अछि/ मुदा कन्नारोहट नै अछि, आ वास्तविकतासं लड़बाक लेल रस्ता अछि; हमरा चिन्ता कथी के/ कारण बुच्ची बढ़ती, पढ़ती-लिखती/ दहेज दानवक विरुद्ध खड्ग उठेती/ साइंसक संपैत अर्जित करती/ संगी अप्पन अपने चुनती/ अपन बाट अपने श्रमसं बनेती आ दुखसं लड़ती/ ४ हमरा चिन्ता कथी के, कऽ बाद मम्मी तों चिन्ता जुनि कर, मे बच्चा मम्मीकें चिन्ता नै करबाक अनुरोध करैए आ ई बच्चा बुच्ची छी सेहो स्पष्ट भऽ जाइए, कारण ओ दहेज लैबला सं बिआह नै करत/ ओना मिथिलामे लड़कीबला सेहो पहिने दहेज लै छला, मुदा तखनो से स्त्रीक श्रेष्ठताक प्रमाण नै छल वरन् तखन बूढ़ वरक विवाह छोट बचियासं पाइ दऽ कऽ भऽ जाइ छलै/ आ से आर भयंकर छल/ आत्मविश्वासपर बल देल गेल अछि, कारण जं बुच्चीमे आत्मविश्वास रहतन्हि, आ से रहतन्हि तं सभटा समस्या खतम/ ५ पद्यक मूल गुण गेय हएब आ लयमे हएब, माने निअमबद्ध/ पद्यक ई जे तथाकथित पुरान अवधारणाक मूल विशेषता बतौनिहार छथि, आ ओइ सोंगरसं अपन पद्यक स्थान-निर्धारण कनेक ऊंच ठाम करऽ चाहै छथि, तिनका लेल गजलक नव-जागरण, जइमे बहरपर बेस घमर्थनक बाद निअम निर्धारण भेल, सेहो मारकेश जकां आएल/ कारण ऐ गजल सभमे तारतम्य आएल, लय आएल, तीक्ष्णता आएल/ जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ ऐ नवजागरणमे गजल लिखनाइ शुरु केलनि आ सिद्ध केलनि जे प्रतिभावान लोक नीक गेययुक्त-भावयुक्त गीत-गजल, किछु निअमपर ध्यान दऽ कऽ, आर नीक जकां लिखि सकै छथि/ रदीफ आ काफियाक जे प्रयोग अनिलजी केने छथि से लौलवश लिखल गजल नै वरन् झोंकमे लिखल गजल अछि/ ६ धीरेन्द्र प्रेमर्षिकें देल वीडियो इण्टरव्यूमे सियाराम झा सरस कहै छथि जे मंचस्थ रचनाक फेरमे अनिल जी रचनाक गुणपर ध्यान देब बिसरि गेला, आ एक तरहें हुनकर रचनाकें साहित्यिक कसौटीपर ओ खारिज करै छथि/ किछु रचनाक विषयमे ई सही सेहो लागैत अछि/ मुदा अनिल जीक दोसर इनिंगमे बहरयुक्त गजल आएल, आ अनिल जी पुरान अनिलसं फराक देखाइ पड़ऽ लगला/ चेतना समितिक मंचक आब नीक जकां पतन भऽ चुकल छल, नव-पुरान भूप एकरा नीक जकां मैरेज (बैंकट) होल बना देने रहथि/ से मंचस्थ रचना पड़सबाक जोगारो खतमे छल/ आरम्भमे ओ बहरक विरुद्ध बुझना गेलथि- बहरक झंझटिसं हमरा आजाद करू हम गजल छी हमरा नै बरबाद करू मुदा प्रतिभाकें ललकारा दियौ तं ओ ललकारा स्वीकार करै छी, मैदान छोड़ि भागै नै छै/ आ जखन अनिलजीक गजल गंगा आएल तं ओकर सभटा गजल अरबी बहर/ सरल वार्णिक बहरमे छल/ आ जइ गजलक पहिल शेर उपराका शेर छल ओइ गजलकें सेहो सरल वार्णिक बहरमे पुनर्लेखन भेल छल आ नीचांमे लिखल छल- (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१७) आ बहरक झंझटिमे पड़लाक बाद जे कविताक/ बाल कविताक पद्यमय रूप आएल, नारी-स्वरक तीक्ष्णता आएलसे कविक क्रमिक गुणात्मक विकास छल, ऐमे सं किछु कविताक चर्चा हम ऊपरमे केने छी/ मुदा रदीफ आ काफिया जे नूतनता, विचारक जे तीक्ष्णता गजल सभमे आएल तकर कोनो जोड़ नै/ आ मात्र यएह गजल सभ हुनकर स्थान मैथिली साहित्यमे उच्चतम स्थानपर रखबा लेल पर्याप्त सिद्ध भेल/ ७ पढ़ब आ लिखब की भेल/ ई भेल सिखब- निरन्तर सिखैतरहब/ जकरा लिखबाक आ पढ़बाक मोन होइ छै तकरा बुझु जे सिखबाक हिस्सक छै/ अनिल जी द्वारा रदीफ सभक जे प्रयोग भेल अछि से अद्भुत/ किछु उदाहरण देखू- छी अछि कऽ राखू मोन होइए बाटपर जहां-तहां की करू थिक गजल गेल अछि कोना-कोना लियऽ बुझैए अहां छी करैए आदमी नीक लागल मे कहां जीवन भरि राम-राम कतेक बेर चाही अहिना कोना भेलै बहुत अछि छी जखन-तखन अहां गेलहुं छी हम रहल छी देखलौं जीवनमे छै बाबा जीवनमे कियो नै छै छी हम-अहां एलौं दुनिया देखै छी सभठां अछि सभठां सभ गाम आ शहरमे जाइए बुझलियै कऽ देखू रहल अछि मे बेर-बेर देखै छी हम राखू ने पूछू करै छी भरि गामक रहल अछि की करियौ नै जाइए छी अहां हमर गाम बनौने बैसल छी मे छी बदलल रहल बहुत अछि अहां की करबै हम जरूरी छै कऽ हम छै की करबै हमर गामक चौकपर भेलौं गेल छी तकै छी बुझै छी छी तंइ गजल कहै छी अहां रहलौं रहल छी छी भोरे-भोरे छै की करबै आ तें बहरकें झंझट माननिहार आगां जा कऽ कहै छथि- खिड़की, केबार किछु नै, महल कोना भेलै ने रदीफ आ ने काफिया, गजल कोना भेलै सम्पादकीय साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक विषयमे किछु कहनाइ अपन समए खराप केनाइ हएत। २०१५ मे एकटा बिर्रो उठल, जइमे सभ भाषामे किछु गोटे अकादेमी पुरस्कार घुरेलन्हि, आ जे नै घुरेलन्हि सेहो अकादेमीक किछु खास बिंदुपर गुमकी लाधलापर प्रश्न उठेलन्हि। मुदा ऐ बिर्रोमे जइ भाषाक विभाग साहित्य अकादेमीक सभसँ बेसी कृतज्ञ/ वफादार रहल से छल मैथिली विभाग। पुरस्कार घुरेनाइ तँ दूर, कोनो तरहक कोनो-प्रश्न, कोनो सिम्बोलिक विरोध धरि नै। आ ओइ कृतज्ञता/ वफादारी लेल ओकरा निर्लज्जतापूर्ण कार्य करबाक लाइसेंस, जे ओकरा लग पहिनहियेसँ रहै, केर पुनः नवीनीकरण भ’ गेलै, साहित्य अकादेमी तकर नवीनीकरण क’ देलकै। आब मात्र ‘सगर राति दीप जरय’ आ ‘समानांतर साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक विरुद्ध ठाढ़ अछि। ‘सगर राति दीप जरय’ पर साहित्य अकादेमीक ग्रहण क्षणिक रूपसँ लागिते रहैए, ओहुना ग्रहण क्षणिके होइ छै। भारतक साहित्य अकादेमीक उद्देशय की छै? जँ एकर मैथिली विभागक कार्यक हिसाबसँ कोनो छात्रकेँ एकर उत्तर देबा लेल कहल जाए तँ एकर उत्तर ओ एना देत- -साहित्यमे एकटा खास जातिक खास परिवार/ ग्रुपक प्रतिक्रियावादी आ मेडियोकर रचना/ रचनाकारकेँ पुरस्कृत करब -सेमीनार, अनुवाद आदि कार्यक्रम/ असाइनमेण्टमे अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिली लिखैबला तथाकथित लेखक सभकेँ मुख्यतया सम्मिलित करब -साहित्यमे एकटा खास जातिक किछु खास परिवारकेँ मुख्यतया ई पुरस्कार बाँटब -अनुवाद पुरस्कार आदि तकरा देब जे मात्र पुरस्कार लेल एकटा अनुवाद अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीमे केने होथि -दोसर जातिक किछु लेखककेँ आशा दिअबैत रहब जइसँ ओ ‘स्टेटस को’ मे बाधा नै बनथि -सुच्चा मैथिलीक उत्कृष्ट रचनाकेँ सरकारी तंत्रसँ दूर राखब आ अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीकेँ आगू बढ़ाएब -मैथिलीक सिलेबसमे जमींदार आदिक जीवनी अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीमे देब जइसँ जनसामान्य आ सुच्चा मैथिलीक उत्कृष्ट साहित्यक प्रशंसक अपन बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर करएबला अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीक पढ़ाइसँ दूर राखथि, आ जइसँ सरकारी तंत्रक मैथिलीपर हुनकर कब्जा काएम रहन्हि। एकर निम्नलिखित सुखद आ दुखद परिणाम भेलै:- -भारतीय संविधानक अष्टम सूचीमे गेलाक बादो प्राइमरी शिक्षा धरिमे मैथिलीक पढ़ाइ लेल कोनो तरहक इच्छा जनसामान्यमे नै एलै। एकर विपरीत किछु ठाम अवहट्ठ-सन कृत्रिम मैथिलीक पढ़ाइक विरोध भेल, सिलेबसक विरोध भेल। -मैथिलीक समानांतर परम्पराक प्रारम्भ भेलै, जइसँ उत्कृष्ट कोटिक मैथिली साहित्यसँ संसारक परिचए भेलै। -साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागकेँ ओकर कृतज्ञता लेल निर्लज्जतापूर्ण कार्य करबाक लाइसेंसक साहित्य अकादेमी द्वारा नवीनीकरण कएल गेलै। -मूल धाराक साहित्यक स्तर निरंतर नूतन अधम स्तरकेँ प्राप्त करैत गेल। -स्कूल कॉलेजमे मैथिली विभाग छात्र विहीन भ’ गेल, ओतुक्का शिक्षककेँ एन.सी.सी., स्काउट गाइड, प्रोटोकॉल आदि कार्य लेल प्रयोग कएल जेबाक मजबूरी प्रशासन लेल भ’ गेलै। -साहित्य अकादेमी आदि द्वारा प्रकाशित पोथी कृत्रिम मैथिलीमे रहबाक कारणेँ गोदाममे सड़ि गेलै। -मूल धाराक कृत्रिम मैथिलीक पत्र-पत्रिका आ पोथी लोक अपने छापि पुरस्कार लेल अपने पढ़ए लगला। -‘सगर राति दीप जरय’ पर साहित्य अकादेमीक ग्रहण लाग’ लगलै। -सम्पूर्ण सरकारी संरक्षणक बादो मूल धाराक कृत्रिम मैथिली भाषा, ओकर सिलेबस आ ओकर एजेण्डा जनसामान्यसँ दूरे रहल आ ओकरा अपने मध्य कन्नारोहट बढ़ैत गेल। -मैथिली भारतक एकमात्र भाषा भेल जत’ सामानांतर धार फौदाइत रहल आ मूल धार घी-मलीदा खाइत रहलाक बादो मरनासन्न भ’ गेल। साहित्य अकादेमी संपोषित कृत्रिम मैथिली आ ओइमे देल जाएबला पुरस्कारक अवमूल्यनक पाछाँ मैथिलीकेँ मारबाक, आ मैथिलीक माध्यमसँ भेटैबला नोकरी-चाकरी, सुविधा, पुरस्कार आदिपर एकक्षत्र राज्य करबाक, सरकारी-एनजी.ओ.- संस्थाक पाइपर घुमैत-फिरैत खाइ-पिबैक आकांक्षाक पूर्ति करबाक साकांक्ष उद्देशय रहल। आ ई सभ मैथिलीक बदलामे भेल। विहनि (बिहैन) कथाक विश्व परिदृश्य: अपन एक पांति-दू पांति, एक पाराग्राफ- दू पाराग्राफक अति-लघुकथा लेल अंग्रेजी साहित्यक एकटा नव विधाक आविष्कार करएवाली लिडिया डेविसक लेखनी लघुकथा, उपन्यास आ कविताक जेनेरिक वर्गीकरणकें नै मानैत अछि आ लेखकीय स्वतंत्रताक समर्थक अछि/ हुनकर किछु लघुकथा कविता सन अछि तं किछु निबन्ध सन/ हुनकर अति- लघुकथा चुट्टीकट्टा नै अछि आ इलियटक ’आबजरवेशन’ सन अछि, बिनु भावक, जइमे भावनाक हिलकोर पाठमे पैसल अछि, बाहरमे नै/ लिडिया डेविससं जखन एकटा इंटरव्यूमे ई पूछल गेल जे ’फ्लैश फिक्शन’, ’लघ-लघुकथा’, ’अति लघुकथा’ ’गद्य कविता (प्रोज-पोएम)’ बा ’प्रोएम’ आदिक ढेर रास वर्गीकरण साहित्यमे पसरल घोर-मट्ठाक समाधान अछि तं ओ कहलनि जे जं नव वर्गीकरणक आवश्यकताक अनुभव हएत तं से बनबे करत आ स्वीकार्य हेबे करत, ओना ओइमे किछु समए लागि सकैए/ ओ कथाकें कवितासं बेसी लचक बला वर्गीकरण मानै छथि आ गद्य कविताकें कथा कहैत छथि/ लिडिया डेविसकें २०१३ ई. क मैन बूकर अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारसं सम्मानित कएल गेल/ सैमुएल बेकिट, फ्रैन्ज काफका आ जोर्ज लुइस बोर्गेसक कथा सभ सेहो एक पैराग्राफसं सं सए पन्ना धरिक अछि/ मुदा ऐ तीनू गोटे सं भिन्न छथि फेलिक्स फेनिअन, जिनकर हजार सं बेशी तीन पांतिक उपन्यास सभक संग्रहक फ्रेंचमे १९४० ई. मे सोझां आएल आ जकर अंग्रेजी अनुवाद २००७ मे ’तीन पांतिक उपन्यास (नोवेल्स इन थ्री लाइन्स)’ क नामसं प्रकाशित भेल/ फ्रेंचमे एकर अर्थ ’लघु उपन्यास’ आ ’समाचार’ दुनु होइए आ ओ अपन समएक न्यूजक संकलन अछि/ अरन्स्ट हेमिंग्वेक ६ शब्दक कथा:”फॊर सेल: बेबी शूज, नेवर वोर्न” मे प्रारम्भ (फॊर सेल), मध्य (बेबी शूज) आ अन्त (नेवर वोर्न) तीनू छै, ई फ्लैश फिक्शनक अति रूप अछि आ हेमिंग्वेसं एकर सम्बन्ध छलैहो आकि नै, सेहो विवादक विषय अछि, कारण हुनकर मृत्युक ३० बर्खक बाद १९९१ मे हुनकासं एकर सम्बन्ध जोड़ल गेल/ ओना ऐ तरहक किछु अति प्रयोग जेना सिक्स वर्ड मेमोइर्स सीरीज (ऒनलाइन स्मिथ मैगजीन) लोकप्रिय रहल/ मैथिलीक विहनि कथा मैथिलीमे एकटा स्थापित होइत गेल विधाक लेल नव नववर्गीकरणक आवश्यकताक अनुभवक बाद बनल आ स्वीकृत भेल आ ’फ्लैश फिक्शन’, ’लघ-लघुकथा’, ’अति लघुकथा’ ’गद्य कविता (प्रोज-पोएम)’ बा ’प्रोएम आ ’आबजरवेशन’ सन ’सीड स्टोरी’क रूपमे बेशी चिन्हार भेल अछि/ साहित्य अकादेमीक ’बी’ टीम: पटना आ दिल्लीमे चेतना समितिक तर्जपर दू टा आर संस्था खुजल अछि, मैथिली लेखक संघ, पटना आ मैथिली साहित्य महासभा, दिल्ली/ चेतना समिति जकां ई दुनू सेहो नव-ब्राह्मण्वादी वार्षिक विद्यापति पर्व समारोह करैत अछि जकर नाम क्रमसं मैथिली लिटेरेचर फेस्टिवल आ वार्षिक संगोष्ठी छिऐ/ तीनूमे बहुत रास समानता छै, मैथिली साहित्यमे जे कट्टरता छै तकर ई सभ पोषण करैत अछि, साहित्यिक चोरिक जातिक नामपर ई दुनू समर्थन करैत अछि चाहे ओ पंकज झा पराशर हुअए वा सुशीला झा, चेतना समिति चोर सभकें युग-युग जियाबैत अछि आ शेष दुनू संस्था तकरा टानिक दैत अछि/ तीनू संस्था साहित्य अकादेमीसं सांइठ-गांइठ केने अछि आ चेतना समिति जकां शेष दुनू ओकरासं मान्यता प्राप्त करबा लेल लालायित आ प्रयासरत अछि, मैथिली लेखक संघ ’सगर राति दीप जरय’ कें साहित्य अकादेमी द्वारा गीड़ि लेबाक प्रयासक पूर्ण समर्थन केलक आ समानान्तर धाराक विरोधक बाद कने काल लेल ओइ प्रयासमे थमकल अछि, ओकरा द्वारा साहित्यिक चोरकें प्रश्रय देलाक कारण आ नव-ब्राह्मणवादक समर्थनक कारण समानान्तर धाराक साहित्यकार मैथिली लिटेरेचर फेस्टिवलक बायकाट केलन्हि/ जाबे ई तीनू संस्था (पहिल अछि मैरेज हाल आ शेष दुनू अछि पोस्ट मैरेज रिसेप्सन कमिटी) अपन कार्य आ उद्देश्यमे परिवर्तन नै करैत अछि, समानान्तर धाराक लोककें साहित्य अकादेमीक संग ऐ तीनूसं सेहो सावधान रहबाक चाही/ श्रद्धांजलि: मैथिलीक प्रसिद्ध नाटककार श्री गुणनाथ झा स्वर्गीय भऽ गेला। मैथिली पत्रिका कर्णामृतक सम्पादक श्री राजनंदन लाल दासजीक पत्नी सेहो स्वर्गीय भऽ गेली । विदेह परिवार दिससँ श्रद्धांजलि। प्रबोध साहित्य सम्मान:श्री केदार नाथ चौधरीकेँ प्रबोध साहित्य सम्मान देल गेलन्हि। बधाइ। विदेहक २०० म अंक: १५ अप्रैल २०१६: विदेहक २००म अंक मे विदेह सम्मानसं सम्मानित कृति आ कृतिकारक समीक्षाक प्रारम्भ भेल अछि जे आगां किछु अंक धरि चलत/ समानान्तर साहित्यक ई सम्मान सरकारी साहित्य अकादेमीक सम्मानकें जाइ तरहें ध्वस्त केलक अछि, मैथिली साहित्य आ साहित्यकारक संख्या आ गुणमे जेना वृद्धि केलक अछि से पाइबला पुरस्कारक तुलनामे आन्तरिक मोटीवेशनक विजय मात्र देखबैत अछि/ पहिने साहित्यकार मात्र जीबै लेल काज करै छल, फेर पुरस्कार लेल आ आब ओ अपन साहित्य लेल एकटा उद्देश्य संग काज कऽ रहल अछि, जतऽ ओकरा मोटीवेट केनहार ओ स्वयं अछि/ आ ओकर मोटीवेशन छै ओकरा सोझां एकटा उद्देश्य/ ड्राइव- द सरप्राइजिंग ट्रुथ अबाउट ह्वाट मोटीवेट्स अस (लेखक- डेनियल एच. पिंक) कम्प्यूटर जकाँ समाज सेहो अपन ऑपरेटिंग सिस्टम (अदृश्य दिशा आ निर्देश) सँ चलैए। पहिल मानव ऑपरेटिंग सिस्टम (मोटीवेशन 1.0) मात्र अस्तित्व रक्षा लेल छलै। तकर बाद आएल मोटीवेशन 2.0 ऑपरेटिंग सिस्टम जे बाहरी पुरस्कार आ प्रतारणापर आधारित छलै। मोटीवेशन 2.0 बीसम शताब्दीक लीखपर चलैत रहैबला काज लेल सफल छलै। मुदा 21म शताब्दीमे ऐ ऑपरेटिंग सिस्टममे बहुत रास बग आब’ लगलै, ई बेर-बेर क्रैश हेब’ लगलै। 21म शताब्दीमे हम जे करै छी तकरा केना सजबै छी, हम जे करै छी तकरा केना सोचै छी आ हम जे करै छी तकरा केना करै छी ऐ सभ लेल 2.0 ऑपरेटिंग सिस्टम ओतेक कारगर नै रहल। आ तै लेल नव ऑपरेटिग सिस्टम आवश्यकताक अनुभव भेल। मोटीवेशन 2.0 ऑपरेटिंग सिस्टमक पुरस्कार आ प्रतारणाक मॉडल आंतरिक मोटीवेशनकेँ मिझब’ लागल, परिणाम (मात्रा आ गुण दुनू) केँ घटब’ लागल, रचनाशीलताकेँ थकुच’ लागल, आ नीक व्यवहारकेँ घटब’ लागल। ई ऑपरेटिंग सिस्टम अनावश्यक बौस्तु, जे हमरा नै चाही,सेहो देब’ लागल, अनैतिक व्यवहारकेँ प्रोत्साहित कर’ लागल, लोककेँ एडिक्ट बनब’ लागल आ छोट आ क्षणिक परिणाम बला सोचकेँ प्रोत्साहित कर’ लागल। मोटीवेशन 2.0 क ई सभ बग अछि जे ओइ ओपरेटिंग सिस्टमकेँ अनुपयोगी बनब’ लागल। ओना ए ऑपरेटिंग सिस्टम आइयो रुटीनबला काज लेल ओप्रभावकारी अछि मुदा रचनात्मक काज लेल ई अनुपयोगी आ विपरीत परिणाम देब’ लागल। 21म शताब्दी लेल मोटीवेशन 3.0 ऑपरेटिंग सिस्टम आइ काल्हि बाहरी पुरस्कार आ प्रतारणाक बदला कोनो काज केलासँ अहाँकेँ की आंतरिक संतोष भेटैए, ई मूल बात भ’ गेल अछि। ई व्यवहार ठोस नैतिक परिणाम द’ रहल अछि। 21म शताब्दीक ऐ व्यवहारक तीनटा मूलभूत तत्व अछि:- (1) स्वायत्तता (ई डिफाउल्ट सेटिंग अछि,आ स्वयं निर्देशित अछि) (2) मास्टरी (पलानि क’ पड़ला सँ ओइमे मास्टरी भेटैए) आ (3) उद्देश्य (अपना लेल सँ विपरीत आ वृहद, उद्देश्यक वृहदता पुरस्कारक आ अपना लेल काजक स्थान घटब’ लागल)। माने मोटीवेशन 3.0 ऑपरेटिंग सिस्टम सिखब, नव सृजन करब आ ऐ विश्वकेँ आर नीक बनाएब ऐ तीन बिंदुपर बनल। मोटीवेशन 2.0 सँ मोटीवेशन 3.0 क बीच प्रस्थान एना छल- “जँ एना करब तँ ई हएत” सँ आगाँ “ई काज अहाँ सम्पन्न केलौँ तेँ ई हम मानै छी”। मोटीवेशन 2.0 काज सम्पन्न केलासँ पूर्व पुरस्कारक लोभ बा प्रतारणाक डर देखबै छल, मुदा मोटीवेशन 3.0 मे पुरस्कारक लोभ बा प्रतारणाक डरक स्थान खतम भ’ गेल। कोनो काज लोक करैए बा नै करैए ओइ लेल पुरस्कारक लोभ बा प्रतारणाक डरक स्थान पर आंतरिक मोटीवेशन आ समाज आ विश्वक लेल किछु करबाक उद्देश्य सोझाँ आब’ लागल। एत' एकटा सुखद समाचार ई अछि जे मोटीवेशन 3.0 क व्यवहार जन्मना नै कर्मणा अछि। मैथिली साहित्य आ साहित्यकार आ मोटीवेशन 1.0, मोटीवेशन 2.0 आ मोटीवेशन 3.0 ऑपरेटिंग सिस्टम मैथिली साहित्यमे मोटीवेशन 1.0 ऑपरेटिंग सिस्टम साहित्य अकादेमीमे मैथिलीक प्रवेश सँ पूर्वक स्थितिक समानांतर अछि। किरण, अमर, जीवन झा, हरिमोहन झा, यात्री, रेणु आदि ऐ पहिल ऑपरेटिंग सिस्टमक अंतर्गत कार्य केलनि। ऐमे सँ किछु जेना अमरजी मोटीवेशन 2.0 क चाँगुरमे फँसि गेला। मोटीवेशन 2.0 क अंतर्गत विभूति आनंद, तारानंद वियोगी, प्रदीप बिहारी आदिकेँ राखल जा सकैए जे अपनाकेँ आइयो मोटीवेशन 3.0 क साहित्यकारक विरोध करबा लेल अभिशप्त पबै छथि। मोटीवेशन 3.0 क प्रारम्भ 21म शताब्दीक पहिल दशकक समानांतर मैथिली साहित्य आंदोलनक संग प्रारम्भ भेल, ऐ मे जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, संदीप कुमार साफी आदि नाम अबैत अछि। मोटीवेशन 1.0क मशीन तँ आब मृतप्राय अछि मुदा मोटीवेशन 2.0 क किछु मशीन अखनो समानांतर रूपेँ चलि रहल अछि, किछु रुटीन गद्य आ पद्य रचना लेल एकर आवश्यकता अछि। किछु पुरस्कारक लोभ आ किछु प्रतारणाक डर देखा क' रुटीन काज घुसकि-घुसकि क' चलि रहल अछि। मुदा मोटीवेशन 3.0 क उत्पाद चारू दिस छिड़िया गेल अछि। मोटीवेशन 2.0 मे कन्नारोहट बढ़ि गेल अछि जे मशीनमे ढेर रास बग केर सूचक अछि, मोटीवेशन 3.0 वाइरस विहीन अछि। जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ आँखिमे चित्र हो मैथिली केर (आत्म कथा)- खण्ड ०-२९ (जारे…) (०) आत्मकथासँ पहिने किछु दुटप्पी किए लिखै छी? नेनहिसं स्वभाव प्रगट हुअ’ लागल। हमरा खेल-कूदमे मोन नै लागल, फटक्का फ़ोड़ैमे मोन नै लागल। खेती-पथारीमे मोन नै लागल। कोनो व्यवसाय दिस ध्यान नै गेल। दोसर कोनो व्यसनसं आकर्षित नै भेलहु। ताम-झाम आ तडक-भड़कसं प्रभावित नै भेलहु। पढ़बामे मोन लागल,लिखबामे मोन लागल। अनका पढैत-पढैत अपनहुँ लिखबाक सिहंता भेल। तकर कामना केलहुँ। लीखब शुरू केलहुँ। लिखबाक अभ्यास केलहुँ। पढैत गेलहुँ।लिखैत गेलहुँ। लीखब आदति बनल। लीखब संस्कार बनल।लीखब हमर संस्कारमे शामिल अछि। लीखब हमर मजबूरी नै अछि। लीखब हमर पेशा नै अछि। लिखबामे आनंद अबैए, तें लीखै छी। जे स्वयं लिखैत छथि, हुनका एहि आनंदक अनुभव हेतनि। दोसर लेल ई आनंद महत्वहीन भ’ सकैए। लीखब जीवनमे छोट-छोट वस्तुमे आनंदक अनुभव करबैत अछि। लिखबा काल आनंद, लीखब पूरा भेल त आनंद, कतहु छपि गेल त आनंद,कियो पढ़िक’ प्रशंसा केलक त आनंद,आकाशवाणी बजौलक त आनंद, दूरदर्शन बजौलक त आनंद,कोनो मंच पर गेलहुँ त आनंद, लोक थपरी बजौलक त आनंद, पारिश्रमिक भेटल त आनंद, अपन लीखल दोसरक मूहें सुनलहुँ त आनंद। लीखब हमरा लेल सत्य अछि। सत्य वएह थीक जे काल्हियो छल, आइयो अछि आ काल्हियो रहत। किशोरावस्थामे लिखलहुँ, युबावस्थामे लिखलहुँ, एखनहुँ लीखि रहल छी, आगाँ सेहो लिखैत रहब। छात्र छलहुँ, तखनो लिखलहुँ। बेरोजगार रहलहुँ, तखनो लिखलहुँ।नोकरीमे रहलहुँ तखनो लिखलहुँ, सेवानिवृतिक बादो लीखि रहल छी। लीखब हमर सत्य अछि। हमर लीखब हमर घोषणा थीक। घोषणा जे हम प्रेमक पक्षमे छी, हिंसाक विरोधमे छी। घोषणा जे हम इजोतक पक्षमे छी, अन्हारक विरोधमे छी। गीत किए लिखै छी? एक लयमे चलैत अछिे जीवन। जीवनमे लय नीक लगैत अछि। लेखनमे सेहो लय नीक लगैत अछि। ओकर सस्वर पाठ क’ सकैत छी। गीत गाबि सकैत छी। आनो कियो अहाँक लिखल गाबि सकैए। ओकरा संगीतबद्ध कएल जा सकैए। गीत स्मरण राखब आसान होइत अछि। नेनहिसं स्त्रीगणक मूहें विभिन्न अवसर पर विभिन्न प्रकारक गीत सुनैत आएल छी। कोनो काज प्रारम्भ होइत अछि गीतसं आ ओकर समापन सेहो गीतसं होइत अछि। गीत नीक लागल। गीत लिखबाक सौख भेल। लिखब शुरू केलहु। गीत सुनैत रहलहुँ। गुनैत रहलहुँ । अभ्यास करैत रहलहुँ। गीत लिखाइत गेल। गजल किए? रदीफ़, काफिया आ बहरक आकर्षणक कारणें गजलक संरचना अधिक आकर्षक होइत अछि। हिन्दीमे दुष्यंत कुमारक ‘साये में धूप’ पढलाक बाद मैथिलीमे गजल लिखबाक धुन सबार भेल। अभ्यास कर’ लगलहुँ। मैथिलीमे लिखलहुँ, हिंदीमे लिखलहुँ। लिखैत गेलहुँ। पत्रिका सभमे छपबो कएल। मैथिलीमे गजलक लेल विशिष्ट साइट ‘अनचिन्हार आखर’पर गजलक व्याकरणसं तीन साल पहिने परिचित भेलहुँ। हमर अधिकाँश गजल एहेन अछि जकरा गाबि सकैत छी। गजलक सस्वर पाठ हमरा नीक लगैए। हमर तीर्थयात्रा-गीतसं गजल धरि हम गीत लिखलहुँ।बहुत बेशी नै लिखलहुँ।किछुए कथा लिखलहुँ।एकटा एकांकी लिखलहुँ । एकटा नाटक लिखलहुँ। किछु कविता लिखलहुँ ।किछु दोहा लिखलहुँ। अंतमे किछु गजल लिखलहुँ। हमर एकटा गजलक एकटा शेर अछि : प्रेमक दीप जरै छल जै ठाँ सभकें तीर्थस्थान बुझलियै। गीतसँ गजल धरिक यात्रामे हम जाहि-जाहि तीर्थसँ होइत आएल छी तकर संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करबामे हमरा हर्ष भ’ रहल अछि। (१) हमर बाबा बाबाक नाम छलनि अनंत लाल ठाकुर।हुनका औपचारिक शिक्षा नै छलनि। मुदा, संस्कृतक बहुत रास श्लोक याद छलनि। रामायण, महाभारतक खिस्सा सभ याद छलनि। हमरा यदा-कदा सुनबैत छलाह। रातिमे सुतबासं पहिने हुनकासं ई गीत कतेक बेर सुनने छलहुँ : ---आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागत हे। ---ब्याह चलल शिव शंकर---- अहिना भोरमे पराती----- सखिरी,तीन देखन जात, अरुण नयन विशाल मूरत, सुंदरी एक साथ। (२) दाइ --- दाइ बात-बातमे लोकोक्तिक प्रयोग करैत छलीह,से हमरा बहुत नीक लगैत छल।ओ समूहमे जे गीत गबैत छलीह तकर शब्द बुझबामे नै अबैत छल मुदा, सुनबामे नीक लगैत छल। (३) माए—माएकें गीतक संस्कार नैहरसं भेटल छलनि।विभिन्न अवसरपर स्त्रीगणक संग गीत गबैत छलीह। सपता –विपताक कथा कहैत-कहैत आखिसं नोर बह’ लगैत छलनि। (४) पिता—पिता प्रेसमे कम्पोजीटरक काज केने छलाह। किताब पढ़ब,कविता रटब,कोनो विषय पर चर्चा करबाक लेल प्रेरित करैत छलाह। हमरा बच्चामे सिखौने छलाह : ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय औरन को शीतल करे, आपुहि शीतल होय। ओ जे चिट्ठी लिखैत छलाह, ओहिमे साहित्यक पुट रहैत छल। (५) हमर आँगन,हमर टोल, हमर गाम : आंगनमे चारि घरबासी छलाह।आंगन आ टोल मिलाक’ ककरो ओत’ कोनो ने कोनो काज रहिते छलैक।तें अवसरक अनुसार स्त्रीगण सभ मिलि क’ सोहर, लगनी,बटगवनी, खेलौना,डहकन,बारहमासा,विद्यापतिक गीत,महेशवाणी,उदासी,समदाउन आदि गबैत रहैत छलीह।विना कोनो वाद्य-यंत्र के एहि गीत सभमे अद्भुद आकर्षण रहैत छलैक।जमाए वा समधिक भोजन काल गीत होइ छल।गीत ख़तम भेल त भोजन करैवलाक हाथ रुकि जाइत छलनि। फेर गीत शुरू भेल त भोजन शुरू।टोलमे कीर्तन होइत छल। ओहिमे स्नेहलताक गीत गबैत जाइ छलहुँ : ‘अपन किशोरीजीकें चरण दबेबै हे मिथिलेमे रह्बै, घरेमे हमरा चारू धाम हे मिथिलेमे रह्बै।’ ‘जखन राघव लला छथि सहाय, तखन परबाहे की’ टोलमे भैयाजीक कीर्तन कए बेर भेल। भैयाजी डबहारीक छलाह। ओ कीर्तनयुक्त कथा कहैत छलाह। कथा बहुत रोचक ढंगसं प्रस्तुत करैत छलाह।हुनका कथामे ककरो औंघी नै लगैत छलैक।बाबू शिव नंदन सिंह ओत’ राम नवमी आ कृष्णाष्टमीक अवसर पर दरबारी दास आ नेबति दास अबैत छलाह। ई लोकनि बहुत नीक जकां विद्यापति, दिनकर,नेपाली आ मधुपजीक गीत गबैत छलाह। ‘के पतिया लय जायत रे मोरा प्रियतम पास’ ‘मोरा रे अंगनमा चाननक गछिया, ताहि चढि कुड़रय काग रे’ ‘मानिनि, आब उचित नहि मान’ ‘माधव, ई नहि उचित विचार’ ‘बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे’ आदि गीत हिनका लोकनिक मूहें सुनबाक मधुर स्मृति अछि। (६) मामा गाम : मामा गाममे रवि दिनक’ सांझमे रामचरित मानसक कीर्तनक रूपमे पाठ होइत छल। अष्टियाम अधिक काल होइत रहैत छल।तकर बाद विवाह कीर्तन होइत छल।हमर बड़का मामा जे मिडिल स्कूलमे प्रधानाध्यापक छलाह,विवाह कीर्तन कहैत छलाह। हमर ममियौत सभ आ टोलक लोक सभ पाछू-पाछू संग दैत छलखिन।मझिला मामा सेहो संग दैत छलखिन। छोटका मामा पढबामे तेज छलाह आ किछु भक्ति गीत सेहो लिखने छलाह जकरा अंतमे ‘दास महेंद्र’ लिखैत छलाह।हुनका देखि क’ हमरो होइत छल जे लोककें पढ़ाइक संग-संग गीत सेहो लीखक चाही। (७) मधुपजी :हाई स्कूलमे पढल मधुपजीक कविता ‘घसल अठन्नी’बहुत प्रभावकारी छल। ‘ओ घसल अठन्नी बाजि उठल हम कत’ जाउ’ जखन-तखन मोन पड़ि जाइत छल।एखनो मोन पड़ैत अछि। मधुपजीक गीत नटुआ सबहक मूहें सुनबामे नीक लगैत छल। ओ फ़िल्मी धुनपर गीत सभ लीखि क’ ‘टटका जिलेबी’ आ ‘अपूर्व रसगुल्ला’नामक अठपेजी पुस्तिकामे कनिएँ पाइमे लोककें उपलब्ध करा दैत छलथिन।हुनकर प्रभाव पडल। हमहूँ अपन नाममे ‘अनिल’ उपनाम जोड़लहुँ।किछु गीत फ़िल्मी धुन पर लिखलहुँ। (८) रवीन्द्रजी : यमसममे दुर्गापूजामे सभ साल तीन-चारि राति नाटक होइत छलैक।महेंद्र झाक घर यमसम छलनि। ओ दुर्गापूजामे अवश्य गाम अबैत छलाह।ओ नाटकक बीच-बीचमे आबि एक बेरमे रवी न्द्रजीक चारि-पांचटा गीत गाबिक’ लोक कें आनंदित क’ दैत छलाह।रवीन्द्रजीक आकर्षक शब्द आ महेन्द्रजीक सुन्दर स्वर श्रोताकें आनंद-विभोर क’ दैत छल। दूनू गोटे जखन संगे गबैत छलाह तखन जे आनंदक वर्षा होइत छल तकर वर्णन जतेक करब से कमे हएत। रवीन्द्रजीक बहुत रास गीत बहुत लोकप्रिय भेलनि। ओ मैथिली अकादमीमे छलाह त एकटा गोष्ठीमे राधा कृष्ण प्रकाशनक प्रतिनिधिसं परिचय करौलनि। ओ हमर टटका प्रकाशित पोथी ‘तोरा अंगनामे’क २५ टा पोथीक आदेश पठा देलनि आ ओकर भुगतान सेहो आसानीसं प्राप्त भ’ गेल। हुनक निम्नलिखित गीत सभ हमरा बहुत नीक लगैत अछि : ‘चारि पांती सुनू राम के नामसं पत्र लिखलनि जे सीता धरा धामसं’ ‘कियो लिखि दे दू पांती सिपहिया के नाम’ ‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’ और कतेक गीत। हमर किछु रचना पर रवीन्द्रजीक गीतक प्रभाव देखल जा सकैछ, जेना – १.पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’। २.बुढ़बा मारल जेतै बेटाके बियाहमे। ३.अलख निरंजन भोला बाबू जेबीमे छूरी, मुंह सियाराम अरे राम राम राम। (९) आर के रमण : ‘रमण’जीकें आर के कॉलेज, मधुबनीमे विद्यापति पर्वमे सुनने छलहुँ।हुनक एकटा रचना बादमे सुनलहुँ ‘अहाँ केर इजोरिया कहाँ हम मँगै छी, अन्हारोमे हमरो जीब’ त दीय’। एहिसं प्रभावित भेलहुँ। हमर एकटा गीतक अंतिम पांती रहय ‘दुःख केर ई राति बौआ बीतत अबस्से, असरा गरीबक भगवान रे ...’ एहि पांती पर रमणजी टिप्पणी देलनि : ‘असरा गरीबक भगवान रे’ के बदला ‘ जहिया तों हेबही जुआन रे ...’ हमरा नीक लगैत। ओ एक दिन दरभंगामे भेटलाह।कतहु जाइत रहथि। कहलनि, अहाँ हमरा ‘मिथिला टाइम्स’लेल एकटा कविता लीखि क’ केबारक नीचां द’क’ रूममे खसा देब,तखन जाएब। हमरा कठिन लागल। हमरा संग छलाह कलिगामक मनोजजी। ओ कहलनि, आब त कहुना क’ लीख’क देबाक कोशिश कर’ पडत लहेरियासरायक एकटा रेस्टोरेंटमे बैसि क’ चाहक चुस्कीक संग कविता लिखबाक सलाह देलनि। से संभव भेल। ‘जकरे घाम तकरे रोटी’ कविता ‘मिथिला टाइम्स’मे प्रकाशित भेल। हम जखन अपन ई गीत देखैत छी त ‘रमण’जी मोन पड़ि जाइत छथि : ‘से फगुआ खेलायत कोना क’ जकरा आंगन वसंत नहि आयल।’ (१०) हरिमोहन बाबू : ‘चर्चरी’क कथा सभ पढ़ि क’ कथा लिखबाक प्रेरणा भेटल। किछु कथा लिखलहुँ। हमर लिखल विनोद कथा ‘मोने अछि एखन धरि सासुरक यात्रा’ आकाशवाणी, पटनासं प्रसारित भेल। हरिमोहन बाबूक कथा पढलासं ई भेल जे मैथिली साहित्यसं सटि गेलहुँ ।’मिथिला मिहिर’क नियमित पाठक भ’ गेलहुँ। हमर गीतक पहिल पोथी ‘तोरा अंगनामे’ छपल रहय त हुनक आशीर्वचन प्राप्त भेल।ओ कहने रहथि, अखबार देखैत रहब, लाइब्रेरी सभमे सप्लाइ हेतु स्वीकृतिक लेल पोथीक दू प्रतिक संग आवेदन पठा देबै। सएह केलहुँ। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी संस्थान सिन्हा लाइब्रेरीक माध्यमसं ३४० पोथी ल’ लेलक।पोथी छपयबामे जे खर्च भेल छल तकर अधिकांश भाग प्राप्त भ’ गेल, से उत्साहवर्धक भेल। (११) मनोज बाबू : मनोज बाबू कलिगामक छलाह।फिल्ममे काज करक हेतु बम्बईमे संघर्षरत छलाह।दूनू गोटेक सासुर एके गाममे छल। हुनकासं ओतहि भेंट भेल छल। हम मैथिलीमे लिखै छी, से हुनका नीक लगलनि। ओ हमरा कहलनि जे मैथिलीमे एहेन गीत लीखि सकैत छी त लिखू जेहेन मुकेश गबैत छथि आ जेहेन मो. रफी आ लता संगे गबैत छथि। हम निम्नलिखित गीतक रचना हुनके इच्छानुसार केलहुँ : (१) कल्पनाक गगनमे मधुवन सजा रहल छी दुनियामे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी। (२) ---- अहाँ नीलगगनकेर चंदा, हम मृत्युभुवनक चकोर। ----- हम विरह्क राति अन्हरिया,पिया अहाँ वसंतक भोर। (३)----लग आउ ने, हम नेहोरा करै छी। ----दूर जाउ ने, हम नेहोरा करै छी। (३) चल हम बनि जाइ छी किसुन कन्हैया,तों बनि जो राधा। (१२) शशिकांत-सुधाकांत : हिनका सभसं सकरीमे विद्यापति पर्वक अवसर पर भेंट भेल।हम एकटा रचनाक सस्वर पाठ केलहुँ : ‘तीन कोटि मैथिल ताल ठोकि क’ कहैए ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए।’ हम जखन मंचसं बाहर एलहुँ त ई लोकनि सोझां एलाह, अपन परिचय देलनि। ओ सभ रवीन्द्रजीक लीखल गीत गबैत छलाह, कहलनि, ई गीत हमरा सभकें लीखि क’ द दीय’, हम सभ अभ्यास क’क’ चेतना समितिक मंचपर और आनो मंच सभ पर एकर उपयोग करब।हम लीखि क’ द’ देलियनि।ओ सभ अभ्यास क’क’ मंच सभ पर एकरा प्रस्तुत केलनि। प्रशंसा भेटलनि।फेर हमरा सं संपर्क केलनि। हम दूटा और रचना देलियनि : (क) पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’। (ख) कक्का मारल गेला सौराठक मैदानमे, पहिले कन्यादानमे। इहो दूनू गीत हिनका सभकें उपयुक्त लगलनि। हिनका सभसं संपर्क बढ़ैत गेल।हिनका सबहक मूहें कयटा हमर गीत लोकप्रिय भेल : --------तोरा अंगनामे वसंत नेने आएब सजना। --------बौआ दूनू हाथ जोड़ि करू ऐ माटिकें प्रणाम। --------फगुआ आएल,फगुआ गेल,फगुआ चलिए गेल। --------बौआ जुनि कान रे। --------आएल केहेन समैया,यौ बाबू यौ भैया। --------समधि एला बनि-ठनि क’ धोती-कुरता पहिरि क’ एला डहकन सून’ बेटाके बियाहमे। --------आँखिमे चित्र हो मैथिली केर हृदयमे हो माटिक ममता माएक सेवामे जीवन बिता दी अछि बस इएह एकटा सिहंता। ----------मोन होइए अहाँकें देखिते रही किछु बाजी अहाँ,हम सुनिते रही। (१३) जीवकान्तजी : जीवकान्तजीक रचना मिथिला-मिहिरक लगभग सभ अंकमे रहैत छल। से कविता सभ शुरूमे हमरा आकर्षित नै करैत छल। ‘वस्तु’क कथा सभ हम दू दिनमे पढ़ि गेलहुँ। नीक लागल। आकृष्ट केलक। सबसँ बेशी नीक लागल ‘नानी’।बादमे जखन ‘तकैत अछि चिड़ै’ प्रकाशित भेलनि त पढलहुँ।बहुत कविता नीक लागल। ओ हमर दीर्घ कविताक पांडुलिपि पढ़ि क’ उत्साहवर्द्धक टिप्पणी सेहो पठौलनि। पत्राचार करबामे अद्वितीय छलाह। पत्रक माध्यमसं अपन सुझाव आ मैथिली जगतक सूचना प्रेषित करैत रहैत छलाह। हम नोकरीमे बिहारसं दूर गेलहुँ, मैथिलीक गतिविधिसं दूर भेलहुँ। हमर हिन्दीमे रचना बेशी हुअ’ लागल, मैथिलीमे कम।मुदा जीवकान्तजी पत्रक माध्यमसं मैथिली दिस आकृष्ट करैत रहलाह, जाहिसं हम ‘भारती-मंडन’,’कणामृत’ आ ‘आरम्भ’सं जुड़ल रहलहुँ आ एहि पत्रिका सभमे हमर रचनो छपल। वापस पटना एलापर सुझाव देने छलाह : गोष्ठी सभमे भाग लीय’। कियो बजाबय त जाउ, नहियों बजाबय तैयो जाउ। (१४) यात्री-नागार्जुन : हाई स्कूलमे यात्रीजीक कविता पढने छलहुँ।बादमे हिनक उपन्यास ‘पारो’ पढ़लहुँ।एहिसं प्रभावित भेलहुँ। आकाशवाणी,पटनाक मैथिली कार्यक्रममे आ विद्यापति-पर्वक मंच पर हिनकासं कविता सुनलहुँ। हिनक बहुत हिंदी रचना सभ सेहो पढ़लहुँ।हिनक कवितामे विविधता आ नव-नव प्रयोग आकृष्ट केलक। (१५) डा. गंगेश गुंजन :कॉलेजमे गेलाक बाद आकाशवाणी, पटनासं प्रसारित होइवला मैथिली कार्यक्रम ‘ भारती’सून’ लगलहुँ। बहुत नीक लगैत छल।रवि दिन आ मंगल क’ एहि कार्यक्रमक प्रतीक्षा करैत छलहुँ।गुंजनजी संचालित करैत छलाह।कार्यक्रम सुनैत-सुनैत मोनमे सपना सजौलहुँ, हमहूँ किछु एहेन लिखी जे आकाशवाणीसं प्रसारित भ’ सकय। गद्य लिखबाक अभ्यास केलहुँ। तेसर प्रयासमे सफल भेलहुँ।नीक लागल।और लिखबाक लेल प्रोत्साहित भेलहुँ। दू सालक बाद फेर एकटा रचना ‘भारती’कें प्रेषित केलहुँ। स्वीकृति आएल। हम कृषि महाविद्यालय, ढोलीमे पढैत रही।हमरा बजाओल नै गेल रहय। ओ कथा हमर छात्रावासक जीवनसं सम्बंधित रहै, तें हमर किछु मित्र जोर केलनि जे हम अपने जा क’ ई कथा पढ़ी। हमरो ई सलाह नीक लागल। जहिया प्रसारित होम’वला रहै, हम चल गेलहुँ पटना।गुंजनजी सं भेंट केलहुँ ।हुनका कहलियनि जे हम अपने कथाक पाठ कर’ चाहैत छी। ओ एक बेर पढ़’ कहलनि। कथा लेल दस मिनट समय निर्धारित छलैक।हम हबर-हबर पढ़’ लगलहु त गुंजनजी कहलनि, हड़बड़ी करबाक काज नै छै, अहाँ स्थिरसं पढू, एक-आध मिनट बेशीयो भ’ जेतै त कोनो बात नै।हम तहिना पढलहुँ, ओ संतुष्ट भेलाह।कहलनि, कॉन्ट्रैक्टमे यात्रा-खर्च स्वीकृत नै अछि, तें, से त नै भेटत,मुदा आबि गेल छी त अहाँ पढ़ि सकैत छी, कार्यक्रमसं आधा घंटा पहिने आबि जाउ।हम पांच बजे पहुचलहुँ। हमर कथा प्रेम लता मिश्र ‘प्रेम’क हाथमे छल।ओहो तखन ‘भारती’मे योगदान करैत छलीह।प्रसारणक बाद जे टिप्पणी दूनू गोटे केलखिन से हमरा बड़ नीक लागल।एकटा नवविवाहित नवयुवकक मनोदशाक चित्रण छलैक ओहि कथामे।ई घटना हमरा लेल महत्वपूर्ण भेल। हम कथाक नाम रखने छलहु ‘इंटरवल’। एकर अतिरिक्त कय ठाम अंग्रेजी शब्द सभ रहै।गुंजनजी सुधारि क’ उपयुक्त मैथिली शब्द सभ लीखि देने छलखिन।कथाक शीर्षक ‘धारक ओइ पार’ क’ देने छलखिन जे एकदम कथाक अनुकूल छलै।मतलब ई जे कथाकें प्रसारण योग्य बनेबाक लेल मेहनति कएल गेल छलै।से अनुभव करैत हमरा गुंजनजीक प्रति श्रद्धा बढल। हम भविष्यमे एहेन त्रुटिसं बचबाक लेल मोनमे निश्चय केलहुँ। गुंजनजीक उपन्यास ‘पहिल लोक’ हमरा बहुत नीक लागल। हुनकर गीत ‘हमरा नहि सोर करू, हमर हाथ बाझल अछि, गामक सीमान जकां हमर मोन बाँटल अछि’ हमरा बहुत नीक लगैए। (१६) छत्रानंद सिंह झा (बटुक भाइ): आकाशवाणी,पटनाक चौपाल कार्यक्रमक बटुक भाइक चहटगर गप सभकें नीक लगैत छलैक। ओ व्यस्त रहितो नव रचनाकारक लेल सहज आ सुलभ छलाह, सभकें हिनक स्नेह आ सहयोग भेटैत छलैक, से हमरो भेटैत आएल अछि। गीत-संग्रह ‘तोरा अंगनामे’ प्रकाशनक समय एकर भूमिका लिखबाक हमर अनुरोध ओ सहजतासं स्वीकार क’क’ हमरा प्रोत्साहित केलनि। हिनक लीखल ‘सुनू जानकी’ हमरा बहुत नीक लागल। (१७) डा.भीम नाथ झा : भीम भाइसं पहिल बेर राँटीमे एकटा गोष्ठीमे कविता सुनने छलहुँ जे नीक लागल छल।हिनकासं कविता सुनबाक आनंद हमरो प्रभावित केलक। भाइ मिथिला मिहिर’मे छलाह। हमर पोथी ‘तोरा अंगनामे’ छपि रहल छल।हम प्रूफ देखयबाक लेल मुसल्लहपुरसं अबैत छलहुँ। भाइ बहुत व्यस्त रहितो हमरा सहयोग दैत रहलाह,से हमरा आनंदित केलक। हिनक पोथी ‘मन आंगनमे ठाढ़’ बहुत नीक लागल। (१८) उदय चन्द्र झा ‘विनोद’जी : विनोदजीक गीत ‘ लोक एक्के छै सभ ठाँ, अनेक छैक गाम, अहाँ करबै जँ नीक त अबस्स लेत नाम’ आ बहुत रास कविता हमरा नीक लगैत अछि। ओ ‘माटि-पानि’मे सम्पादक रहथि त हमर कएटा रचना छपलनि। हमर दीर्घ कविताक पांडुलिपि देखि क’ विनोदजी महत्वपूर्ण टिप्पणी देलनि आ हम हिनक सुझावक अनुसार आवश्यक संशोधन करबाक निर्णय केलहुँ, से नीक भेल। (१९) प्रो. गंगानंद झा : हमर पोथी ‘तोरा अंगनामे’ छपि गेल रहय आ हमर स्थानान्तरण सीवान भेल। ओत’ हिनकासं भेंट भेल।कॉलेजमे बॉटनीक प्राध्यापक छलाह। बंगला साहित्यक बहुत अध्ययन केने छलाह। गप-शपमे सेहो बंगलाक कोनो-ने-कोनो साहित्यिक कृतिक कोनो अंशक चर्चा अवश्य करैत छलाह।से हमरा आकृष्ट करैत छल। हुनकेसं जानिक’ बंगलाक साहित्यकार विमल मित्र,आशापूर्णा देवी,शंकर आ रवीन्द्र नाथ ठाकुरक कृति सभ पढ़लहुँ।ओ ‘गीतांजलि’क गीत सभकें देवनागरीमे लिखि दैत छलाह आ मैथिली/ हिन्दीमे ओकर अर्थ कहैत छलाह। रवीन्द्रनाथक गीत : ‘जगते आनंद यज्ञे आमार निमंत्रण धन्य हलो धन्य हलो मानव जीवन।’ हमरा बहुत प्रभावित केलक। ई गीत हमरा और रचना करबाक लेल प्रेरित करैत रहल। हम मध्य प्रदेश चल गेलहुँ, ओतहु पत्र द्वारा संपर्क रखैत रचना-कर्म लेल जगौने रहलाह।ओ मैथिली पत्रिका विदेह-ईक सूचना देलनि आ २०१०मे हमर सेवा-निवृतिसं पहिने हमरा कहलनि जे आब ‘विदेह’मे अहाँक नाम, अहाँक रचना देख’ चाहैत छी। (२०) गजेन्द्र ठाकुर : इन्टरनेट पर पाक्षिक मैथिली पत्रिका ‘विदेह-ई’ देखि क’बहुत आनंदित भेलहुँ। गजेंद्रजीसं हमरा भेंट नै अछि। मोने-मोन हुनका एहि लेल धन्यवाद देलियनि। ओ अपनो खूब लिखलनि आ एकटा विशाल लेखक-पाठक वर्ग तैयार केलनि। हम अवकाश प्राप्तिक बाद फरवरी २०११ मे पटना एलहुँ।पत्रिका नियमित रूपसं निकलि रहल छल। हम एहिमे नियमित रूपसं लीख’ लगलहुँ : गीत, गजल। लिखबाक गति बढल।हमर अधिकांश गजल विदेहमे छपल। विदेहकें सदेह सेहो देखल। (२१) आशीष अनचिन्हार :नेट पर मैथिलीमे गजल लेखनक लेल एकटा स्वतंत्र वेबसाईट बना क’, ओहि पर गजल शास्त्र प्रस्तुत क’क’, बहुत लोककें गजल लेखन लेल प्रेरित करब, मार्ग-दर्शन देब, पुरस्कारक योजना चलायब,बाल-गजल, भक्ति-गजल आदि विशेषांक प्रस्तुत करब,गजलकारक परिचय-श्रृंखला प्रस्तुत करब आदि काज कठिन छल से आशीषजी केलनि आ हमरा सबहक आलोचनाक पात्र बनलाह। कएटा हिंदी,मैथिली पत्रिकामे गजल छपि चुकल छल। कतहु कियो एना आंगुर नहि उठौने छल।साठि बरखक उमेरमे जहिया ई सुनल जे व्याकरणक दृष्टिसं कएटा गजल दोखपूर्ण अछि त अहंकारकें चोट लागल।बहुत दिन धरि एहि बात पर कान देब आवश्यक नहि बुझलहुँ।मुदा, जखन-तखन ई बात ध्यानमे आबि जाइत छल।अंततः अहंकार पराजित भेल। जे नै जान’ चाहैत छलहुँ, से जनबाक इच्छा भेल, जे नै पढ़’ चाहैत छलहुँ, से पढ़बाक मोन भेल। ‘अनचिन्हार आखर’क साइट पर गजलक व्याकरणक एतेक सामग्री देखि हर्ष भेल। मैथिलीक लेल गौरवक बात बुझाएल। हम सभ रदीफ़ आ काफिया पर ध्यान दैत छलहुँ, एकटा वस्तु छुटि रहल छल। ओ अछि बहर। हम सभ बहरक झंझटिसँ मुक्ति चाहैत छी, किएक त ओकर अभ्यास नै अछि। जिनका ई बूझल भ’ गेलनि जे बहरक की भूमिका छै शेरमे, हुनका लगैत छनि जे बहरक बिना गजल कोना हेतै।स्वीकार आ विरोधक बीच बहरयुक्त बहुत रास गजल लिखा रहल अछि। आउ, नीक भविष्यक लेल तकर स्वागत करी। (२२) प्रेम लता मिश्र ‘प्रेम’ : प्रेमलताजी २००८मे सेवा निवृतिक बाद मासे-मासे एकटा साहित्यिक गोष्ठीक आयोजन अपन आवास पर करैत आबि रहल छथि आ सालमे एकटा पत्रिका सेहो प्रकाशित करैत छथि ‘सांध्य गोष्ठी’। सभ मासक अंतिम शनि दिन ई गोष्ठी होइत छैक।हम २०१२ मे एहि गोष्ठीसं जुड़लहुँ। गोष्ठीमे नियमित रूपसं भाग लैत आबि रहल छी। एहि गोष्ठीक लेल सभ मास कम-स-कम दूटा नव गीत अथवा गजल लिखबाक कोशिश करैत छी।गोष्ठीमे बहुत साहित्यकारसँ भेंट भ’ जाइत अछि आ हुनको सबहक रचनासँ लाभान्वित होइत छी।हम जे अनुभव करैत छी से हमर एहि दोहामे प्रगट भेल अछि : मनकें आनंदित करय, दिअए शान्ति, विश्राम गीत, गजल, कविता,कथा हमर इ चारू धाम। (१) जन्म-स्थान : मधुबनीसं चारि किलोमीटर दक्षिण आ पंडौलसं पांच किलोमीटर उत्तर। गामक नाम सलेमपुर। लोक सलमपुर कहैत छलै। सलमपुर नामक गाम और छलै, तें स्पष्ट करबा लेल भिट्ठी सलमपुर कहल जाइत छलै। भिट्ठी हमर पडोसी गामक नाम अछि, तें भेल भिट्ठी सलमपुर। बहुत बादमे पता चलल जे जमीनक नक्शाक अनुसार हमर गाम अछि शम्भुआड। सलमपुर हमर पडोसी गाम भेल। अही गाममे करीब चारि सय बर्ष पहिने भेल छलाह बेनी ठाकुर। बेनी ठाकुरक पुत्र भेलथिन हरिहर ठाकुर। हरिहर ठाकुरकें चारि पुत्र भेलथिन : मेबा लाल ठाकुर, जय कृष्ण ठाकुर, जयमंत ठाकुर आ भगलू ठाकुर। मेबा लाल ठाकुरकें दू पुत्र भेलथिन : अनंत लाल ठाकुर आ अशर्फी लाल ठाकुर। अनंत लाल ठाकुरकें दू पुत्र भेलथिन :राम नारायण ठाकुर आ दोसर पञ्च लाल ठाकुर जे अविवाहिते मरि गेलाह।जय कृष्ण ठाकुरक एकमात्र पुत्र छलथिन महावीर ठाकुर। जयमंत ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : मोतीलाल ठाकुर, अलीक लाल ठाकुर आ भोगी लाल ठाकुर। भोगीलाल ठाकुरकें दू पुत्र भेलथिन आ ओ अपने कमे बयसमे मरि गेलाह। भगलू ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : राम रूप ठाकुर, गंगा दत्त ठाकुर आ राम स्वरुप ठाकुर। राम रूप ठाकुरक पुत्र भेलथिन महेंद्र नारायण ठाकुर। हिनक अलग घरारी छलनि। गंगा दत्त ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : राज नारायण ठाकुर, सुबुध नारायण ठाकुर आ ईश्वर नारायण ठाकुर। तीनू भाइक परिवार एक घरारी पर एक आंगनमे रहैत छल। राम स्वरुप ठाकुरकें तीन पुत्र भेलथिन : देव नारायण ठाकुर, हीरा लाल ठाकुर आ लक्ष्मी नारायण ठाकुर। तीनू परिवार एक आंगनमे रहैत छल।एक घरारी पर। मेबा लाल ठाकुर आ जयमंत ठाकुरक परिवार एक आंगनमे एक घरारी पर रहैत छल। अही आँगनमे अनंत लाल ठाकुरक पौत्र आ राम नारायण ठाकुरक पहिल संतानक रूपमे हमर जन्म भेल।ओहि दिन विजयादशमी रहै।भोरे हमर जन्म भेल गाममे। बाबा सीमान्त कृषक छलाह।खुट्टा पर एक जोड़ा बरद आ एकटा महिंस छल। खेतमे धान, मडुआ, अल्हुआ, राहरि,मसूरी, खेसारी आ कुसियार होइत छल। बहुत बादमे गहूम आ मकई सेहो हुअ’ लगलै। घर-आंगन : परिवारमे माए, बाबू (पिता), दाइ (पितामही), बाबा(पितामह) छलाह। हमरा बाद घरमे तीन बहिन आ दू भाए एलाह। आंगनमे दोसर घर छलनि अशर्फी लाल ठाकुरक जे हमर बाबाक छोट भाए छलाह। हुनका दोकान बला बाबा सेहो लोक कहैत छलनि। ओ खेतीक अतिरिक्त किरानाके दोकान सेहो करैत छलाह। जाडक मासमे दरबज्जा पर कल्हुआर सेहो चलैत छलै।कुसियारकें पेड़ क’ गुड़ बनाओल जाइत छल। तेसर घर छलनि मोतीलाल ठाकुरक आ भोगीलाल ठाकुरक। भोगीलाल ठाकुरक दू बालक छलथिन। चारिम घर छलनि अलीक लाल ठाकुरक। आंगनमे उत्तर कात मोतीलाल ठाकुर आ भोगी लाल ठाकुर,दच्छिन कात अनंत लाल ठाकुर (हमर पितामह) पूब दिस दच्छिनसं अलीक लाल ठाकुरक घर छलनि,उत्तरमे एकटा छोट घर अशर्फी लाल ठाकुरक हिस्सामे छलनि। एहि दुनूक बीच चारि फीटक रास्ता छलै जाहि द’ क’ लोक आँगनसं दरबज्जा आ दरबज्जासं आँगन अबैत छल। पच्छिम दिस उत्तरसं अशर्फी लाल ठाकुरक घर छलनि आ दच्छिनमे अनंत लाल ठाकुरक हिस्सामे एकटा छोट-छीन घर छलनि जाहिमे भगवतीक घर आ भनसा-घर दुनू छल। आँगनमे एकेटा घर छल जे नीचांमे ईंटा आ उपर खपड़ा छलै। ई अशर्फी लाल ठाकुर बनबौने छलाह। शेष सभक घर फूसक छल। चारु घरबासीक लेल एकटा सझिया दरबज्जा छल जे खूब नमहर छल। दरबज्जा पर सभ घरक चौकी कि खाट रहैत छल।अशर्फी लाल ठाकुरक एकटा संदूक सेहो छलनि। दुपहरियामे आ रातिमे दरबज्जा भरल रहैत छल। दुपहरमे ताशक खेल होइत छल। दुर्गा पूजासं दीयाबाती तक पचीसी सेहो लोक खेलैत छल। भरि गाममे पांचे-छओ टा घर ईंटाक छल, और सभ फूसक फूसक घर लकड़ी, बांस, खढ, खरही, पतोइ आ साबेक जौडसं बनैत छल। जखन हवा चलैत छलै,लोक अगिलगीक आशंकासं डेराएल रहैत छल। एक शुभ दिनमे हम सभ अगिलगीक दुःख कोना भोगलहु, से आगू कहब। आंगनक पच्छिम एकटा इनार छल। टोल भरिक लोक एकर उपयोग करैत छल। इनारक पानिक उपयोग पीबा लेल, नहेबा लेल आ कपडा खिचबाक लेल कएल जाइत छल। नवकनिया सभ लेल घरक पाछू टाट सं घेरक’ बाल्टीमे पानि राखि देल जाइत छल। टोलक दच्छिन एकटा पोखरि छलै। हेलि क’ जाइठतक जाएब आ ओत’ सं हेलि क’ आएब नीक लगैत छलै। बूढ़ लोक सभकें पोखरिमे नहाएब नीक लगैत छलनि। लोक माल-जालकें सेहो पोखरिमे नह्बैत छल। पनिभरनी डोलसं घैलमे पानि इनारसं भरि क’ अंगने-अंगने द’ अबैत छलीह। ओकरा सभ घरसं अन्न देल जाइत छलै आ पावनि-तिहार अथवा मूडन, उपनयन,विवाह आदि अवसरपर कपडा सेहो। पैखाना जेबाक लेल बसबिटटी अथवा खेत दिस लोक जाइत छल। नवकनियाँ सबहक लेल बाड़ीमे खाधि खुनि क’ तात्कालिक व्यवस्था कएल जाइत छल। हाथ माइटसं धोल जाइत छल। परंपरा पुत्र जन्म लेल लोक देवी-देवताक कबुला करैत छल। पुत्र भेला पर बड ख़ुशी मनबैत छल। बच्चा एक-दू सालक होइत छल त नीक दिन तका क’ बड विधि-विधानसं मूडन कराओल जाइत छल। सभ सम्बन्धीकें नोत-हकार देल जाइत छल। पाहुन सभ अबैत छलाह। गामक लोककें भोज खुआएल जाइत छल। स्त्रीगण सभ गीत गबैत छलीह। हजाम कैंचीसं बच्चाक माथक केश कटइत छल। हजामकें पारिश्रमिक आ कपडा देल जाइत छल। परंपराक अनुसार हमरहु मूडन भेल। ई उत्सव बेटीक लेल नै कएल जाइत छलै। बच्चा आठ बरखक होइत छल त उपनयनक बात शुरू भ’ जाइत छल। नीक दिन तकाएल जाइत छल। एक दिन उद्योग-मरबठटठी होइत छल। बांस काटल जाइत छल आ मरबा बन्हाइत छल। भराइत छल। नीपल-पोतल जाइत छल। गीत-नाद होइत छलैक।भोज होइत छलैक। उपनयनक दोसर चरण होइत छल कुमरम।सर-कुटुंब सब अबैत छलाह। बच्चाक विवाहित बहिन,दीदी,मामी,नानी,मौसी आदि विदागरी भ’क’ अबैत छलीह। पंडितजी अबैत छलाह।पूजा-पाठ होइत चल।गीत-नाद होइत छल। भोज होइत छल। तेसर चरण होइत छल उपनयन। छागर कटाइत छल।गीत-नाद होइत छल। पूजा-पाठ होइत छल।एक आदमी गुरु बनैत छलाह। एक आदमी ब्रह्मा बनैत छलाह। बालकक माथक केश अस्थुरा ल’क’ हजाम द्वारा काटल जाइत छल। बालककें गायत्री मन्त्र पढ़ाओल जाइत छल। जनउ धारण कराओल जाइत छल। पानि ल’क’ लघुशंका करब सिखाओल जाइत छल।छुआछूत मानब सिखाओल जाइत छल। लघुशंका आ दीर्घशंका करैत काल जनउ कान पर राखब सिखाओल जाइत छल।रातिमे फेर भोज होइत छल। चारिम चरण होइत छल रातिम जे उपनयनक चारिम दिन होइत छल। एकर संग सत्य नारायण भगवानक पूजा होइत छल। पाहुन सभ जे कुमरम दिन अबैत छलाह से रातिमक बादे मुक्त भ’ पबैत छलाह। बिदागरीवाली सभ सेहो रातिम अथवा पूजाक बादे वापस होइत छलीह। पाहुन सभ बरुआक लेल कपडा आ आशीर्वादक रूपमे किछु टाका खर्च करैत छलाह। जाइत काल हुनका विदाईमे धोती, जनउ-सुपाड़ी देल जाइत छलनि। स्त्रीगण सभ सेहो बरुआ लेल, बरुआक माए लेल कपडा आ पाइ अनैत छलीह। हुनको सभकें जाय काल साडी,साया,ब्लाउज आदि देल जाइत छलनि। उपनयनक प्रक्रियामे घरवारीकें १५ दिन सं २५ दिन समय लागि जाइत छलनि आ बहुत अन्न-पानि आ टाका खर्च होइत छलनि।मुदा बहुत उत्साहसं ई खर्च लोक करैत छल। जिनका अपना घरमे अन्न-पानि आ टाका नहि रहैत छलनि ओ कर्जा ल’क’, खेत भरना ध’ क’ व्यवस्था करैत छलाह। परम्पराक अनुसार हमरहु उपनयन भेल। बेटीक लेल ई सभ नै होइत छल। बेटीकें लोक स्कूल नै पठबैत छल।लोक चाहैत छल जे बेटीकें अक्षरक ज्ञान भ’ जाइ, घरवलाकें चिट्ठी लिखैक अवगति भ’ जाइ।बेटी दस-बारह बरखक भेलै त कतहु ओकर विवाह करा क’ लोक निश्चिन्त होइत छल। बेटाकें लोक स्कूल पठबैत छल। गाममे पुबाई टोलमे छलै स्कूल, पाँचमा तक पढाइ होइत छलैक। कोनो-कोनो शिक्षक सभ विद्यार्थीक संग बहुत कठोर व्यवहार करैत छलाह। उद्देश्य नीक छलनि। जे छात्र सबक याद क’क’ नै जाइत छलाह हुनका मारि खाए पडैत छलनि। मारबाक लेल बांसक करची अथवा खजूरक छड़ी अथवा रोलक उपयोग कएल जाइत छल। जकरा पर मास्टर साहेब खिसियाइत छलाह, ओकरा मारैत-मारैत ओध-बाध क’ दै छलथिन। पीठ पर दाग भ’ जाइत छलै। विद्यार्थी स्कूल जेबासं छीह काट’ लगैत छल।ओकरा और कठोर दंड भेटैत छलै। शिक्षक बुझैत छलाह जे मारिक डरसं विद्यार्थी पढ़त, पाठ याद क’ क’ आएत मुदा परिणाम होइत छल जे बहुत विद्यार्थी स्कूल एनाइ बंद क’ दैत छल। माए-बाबू सेहो सोच’ लगैत छलाह जे जीतै त बीस टा उपाए हेतै।एहन बच्चा खुरपी-कोदारि ध’ लैत छल। प्राइमरी पाठशाला घरसं एक किलोमीटर पर छल स्कूल। बाल मुकुंद बाबू छलाह प्रधानाध्यापक।दूटा और शिक्षक छलाह। बाल मुकुंद बाबूक डर बहुत होइ छलै विद्यार्थी सभकें। जे हुनका डरसं पाठ याद क’क’ गेल से बांचल, जे नै याद केलक ओकरा छड़ी अथवा रोलसं बड मारि खाए पडैत छलैक। भरिसके कियो हुनकासं मारि नै खेने हएत। मारि नै खाए पडय, ताही डरसं पाठ याद क’ क’ जाइत छलहुँ। तकर लाभ भेल। हमर संगी छलाह राजेंद्र ठाकुर। हुनकर बाबू हुनका गायक बनब’ चाहैत छलथिन। ओ सांझ क’कैटोला स्थानपर एकटा गबैयाजीसं गायन सीख’ जाइत छलाह। हुनका संगे एकदिन हमहूँ गेलहुँ। हरमुनियाँ पर ‘सा रे ग म प ध नी सा,सा नी ध प म ग रे सा’ क अभ्यास करब आकर्षित केलक। बाबूकें नीक नै लगलनि। ओ हमरा बुझौलनि जे बी ए पास केलाक बाद और जे किछु करबाक हुअ’ से करिह’, एखन नै। ओ स्कूलमे मास्टर साहेबकें सेहो कहि देलखिन। मास्टर साहेब तेहेन छौंकी लगेलनि जे हमर गायन सिखबाक लेल उत्साह ख़तम भ’ गेल। स्कूलमे एकटा सज्जन मास्टर साहेब एलाह। ओ ककरो नै मारैत छलखिन। ओ साइकिलसं गामसं अबैत छलाह। साइकिलसं अबैत काल हुनका लोक बेर-बेर पुछैत रहै छलनि, मास्टर साहेब कते बजलैए? ओ खौंझाइत छलाह। लोक दौड़ि क’ लग जा क’ पूछि दैत छल। ओ कहैत छलखिन ‘दस’, चाहे कतबो बाजल होइ। स्कूलमे प्रार्थना होइत छलै, से हमरा सबसँ बेशी नीक लगैत छल। सरस्वतीक पूजाक अवसर पर स्कूलक आगाँ नाटक होइ छलै,सेहो देखब नीक लगैत छल।नाटक ओही टोलक नवयुवक सभ करैत छलाह। न’हमे दूरदर्शन दाइक सुइत हेरा गेलनि।वियाहमे भेटल रहनि। चानीक छलै। धन्हारीक खोधलीमे रखने छलीह।बहुत खोज भेल। नै भेटलनि। आठ बरख के भीतरक दू टा बच्चाकें ल’क’ दाइ भौड़ा पहुँचलीह। एकटा हम रही।दोसर छलाह बाबू नारायण। ओ हमरासं दू बरखक नम्हर छलाह। हमरा सभक दहिना औंठामे काजर लगाक’ मौलबी साहेब मोने-मोने किछु पढ़लनि आ कनी कालक बाद हमरा औंठाकें सोझां राखि पुछ्लनि देखियौ त किछु देखाइए। हम किछु नै देखलियै। बाबू नारायण कहलखिन, हं,हम त देखै छियै, ई त कैला छै। दाइ कहलखिन, हे, ठीकसं देखही, कैला नै हेतै, दोसर कियो हेतै। बाबू नारायण कहलखिन, हम ठीकसं देखै छियै, ई कैले छै। मौलबी साहेब फेर आँखि मूनि क’ किछु मोने-मोने पढ़ि क’ कहलखिन, आब देखियौ त की सभ ओ करै छै। बाबू नारायण बाजय लगलाह : ओ घरमे गेलैए .....धनहारीमे हाथ देलकैए ......ओइमे स’ किछु निकालिक’ फाँड़मे रखलकैए .....आब घरसँ निकलि गेलै....आब आँगनसं बाहर आबि गेलै.....कतौ जाइ छै .........एक ठाम पोखरि खुनाइ छै....ओत’ ठाढ़ भ’क’ ककरोसं गप्प करै छै.....जकरासं गप्प करै छै ओकरा नै चिन्है छियै......आब बिदा भेलै.....जा रहल छै....आब घर सभ छै.....एकटा आंगनमे एलै......एकटा मौगीकें गोर लगै छै ....ओकरा संगे एकटा घरमे गेलैए....किछु देलकैए ओकरा ...आब घरसं बाहर आबि गेलै....फेर ककरो गोर लगैछै, हम नै चिन्है छियै..... मौलबी साहेब पुछलखिन, ई कैला के अछि? दाइ कहलखिन, नै मौलबी साहेब, कैला हमर वस्तु नै चोरा सकैए। मौलबी साहेब कहलखिन, वएह लेलक-ए, ओकरे पुछिऔ। घर अबै गेलहु।घरमे ककरो मोन नै मानै जे कैला चोरौने हेतै। कैला सबहक विश्वास पात्र छल।महींसक चरबाही करैत छल। कियो पुछलखिन त कैला सोझे नठि गेल। बाबा चिराकी चाउरक प्रयोगक घोषणा केलनि। चोर पकड़बा लेल चिराकी चाउरक प्रयोग : चिराकी चाउरक नाम सुनिते कैला बाज’ लागल, हम त एक किलो चाउर चिबा जेबै, हमरा कोनो डर अछि, हम चोरेने छियैहे ने त हमरा कथीक डर। सांझमे टोलक बहुत लोक सभ जमा भेल। एकटा थारीमे अरबा चाउर आएल। बाबा किछु मन्त्र पढ़िक’ कनी-कनी क’ सभकें देलखिन चिबाब’। सभ कनिएँ कालमे चिबाक’ घोंटि गेल, कैलाकें घोंटल हेबे नै करै। कतेक काल धरि चिबबैत रहल कैला, एक मुट्ठी चाउर नै भेलै चिबाएल। पक्का भ’ गेलै जे कैले चोर अछि। बाबाक आँखिमे नोर भरि एलनि।कैला दिस तकलनि। कैला बाबाक पएर पर खसल, हमरा माफ़ क’ दिय’ गिरहत, हमही चोर छी। कैला चोर नै छल। घरमे बेगरता छलै। तें एहेन केलक। ओ गछलक जे हम त ओकरा बेचि लेलहुँ, मुदा हम ओकर पाइ सधा देब।कैलाकें कोनो दंड नै देल गेलै। ओकरा फ़ज्झति नै कएल गेलै। ओकरासं घृणा नै कएल गेलै। कैला दू-तीन सालमे कर्जसं मुक्त भ’ गेल। बादमे ओ नोकरी कर’ आसाम चल गेल। ओत’ सं सालमे एक बेर अपन गाम अबैत छल त हमरो गाम आबि बाबा-दाइक भेंट कर’ अवश्य अबैत छल। कैला हमरो नीक लगैत छल। गहना रखबाक एहेन उपाय, एहेन चोरी, चोर पकड़बाक एहेन उपाय, चोरक प्रति एहेन भाव आ पकड़ा गेलाक बाद चोरक संग एहेन व्यवहार हमरा प्रभावित केलक। हमर व्यक्तित्वक निर्माणमे एकर महत्व अछि।हम मानैत्त छी जे जीवनमे ककरोसं कोनो क्षति भ’ जाइ त ओकरा दंड देबाक बात नै सोचबाक चाही, ओकर स्थितिक अनुमान करक चाही,ओकरा प्रति करुणाक भाव रखैत क्षति कम करबाक प्रयास करबा पर ध्यान देबाक चाही, क्षति और ने भ’ जाए से होश राखब जरुरी होइत छैक।भ’ सकैछै जकरा अहाँ अपराधी बुझैत छी से अपराधी नै हो, ओ मात्र एकटा उपकरण हो आ अहाँक क्षति अहीं द्वारा निर्मित एकटा परिस्थितिक परिणाम हो। तें अपराधक जड़ि तकबाक प्रयास करब आ ओकर निदान ताकब बेशी उपयुक्त भ’ सकैत अछि। अधिक काल एना होइत छैक जे कोनो दुर्घटना भेला पर लोक अपनाकें निर्दोष आ शेष सभकें अपराधी बुझैत अछि, जकर परिणाम शुभ नहि होइत अछि। मिडिल स्कूल पाँचमा पास केलाक बाद मिडिल स्कूल, भिट्ठीमे हमर नाम लिखाएल गेल। ई स्कूल घरसं दू किलोमीटर पर छल। ओइ स्कूलमे सोहरायके हमर पीसा सेहो शिक्षक छलाह। पीसाक सुझावक अनुसार हम गाम परसं चारि एक्सरसाइज हिंदीसं अंग्रेजी ट्रांसलेशन बना क’ ल’ जाइत छलहुँ। दुपहरमे टिफिन टाइममे हुनका लग ल’ जाइ छलहुँ। ओ सही क’ दै छलाह। गलती दोबारा नै हो से ध्यान रखैत छलहुँ। गणित आ अंग्रेजी पढबामे नीक लगैत छल।अन्य विषयमे कम मोन लगैत छल। स्कूलमे प्रतियोगिताक वातावरण नै छलै। नेतरहाटमे नाम लिखेबाक लेल परीक्षामे सम्मिलित भेलहुँ। सफल नै भेलहुँ। मुदा,सातमामे कक्षामे सबसँ बेशी प्राप्तांक आएल। शान्तिक खोजमे अशांति : आंगनमे चारि घरवासी रहबाक कारण सदिखन टोना-मेनी होइत रहै छलै।जखन-तखन हल्ला-गुल्ला होइत रहब सामान्य बात भ’ गेलै। हमर पिता घरारी अलग करबाक विकल्प चुनि लेलनि। एहि निर्णयसं लाभ ई भेलै जे हम सभ हल्ला-गुल्लासं अलग भ’ गेलहुँ। हानि ई भेल जे रहबा लेल कहुना घर त ठाढ़ भ’ गेल मुदा तीन साल तक भराइ चलैत रहल।ओ खेत छलै, गहींर छलै।बहलमान बड़द जोति क’कटही गाड़ी टोलसं दक्षिण बाध ल’ जाइ छल। ओत’ कोदारिसं माटि काटि क’गाडी पर लादि क’ घर अबैत छल। बाबा गाड़ीक संग जाइ छलाह, अबै छलाह। खेतमेसं माटि उठाक’ गाडी पर रखैत छलाह। कहियो क’ बाबाक संग हमहूँ जाइत छलहुँ । घर बनयबामे जतेक खर्चक अनुमान कएल गेल छलै ताहिसं बहुत बेशी खर्च भेलै। दू टा घर बनल। पछबारी कात एकटा भनसा घर जाहिमे पूब दक्षिण कोनमे भगवती रहलीह, पूब दिस चिनुआर भेल। घरमे किछु कोठी बनाक’ राखल गेल। बीच घरमे सेहो भोजन करबा लेल जगह छल।दुआरि पर सेहो भोजन कएल जाइत छल। दुआरि पर घैलची बनल जाहिमे पीय’वला पानिक दूटा घैल रखबाक जगह छल। दक्षिण कात घर बनल जाहिमे किछु कोठी सभ राखल गेल, एकटा पलंग राखल गेल। ओकर दुआरिपर जाँत छल। उत्तरसं एकटा दरबज्जा बनल। ताहिमे पच्छिम दिससं एकटा छोट-छीन कोठली निकालल गेल जाहिमे लकड़ीक एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी राखल गेल।पूब उत्तर कोनमे एकटा चक्का बनाओल गेल। आँगनमे एकटा ढेकी गराएल।आँगन नमहर बनल।घर सभ बांस, लकड़ी, खढ आ साबेक जौडसं बनल।समय बहुत लगलै। खर्च बहुत लगलै। एकर प्रभाव जीवन-यापन पर पडलै। एहि बीच हमर पढ़ाइ-लिखाइ जेना-तेना चलैत रहल। कान त सोन नहि : जे कर्पूरा एकटा बच्चाक बाट १२ बरख तकलनि, हुनका ६ टा बच्चा भेलनि, तीन टा बेटा, तीन टा बेटी। मुदा आब घरक आर्थिक स्थिति एहेन भ’ गेलनि जे पहिलो बेटीक बियाहक लेल सक्षम नहि रहलीह। पहिल बेटी शान्तिक पढाई ओतबे भेलनि जते अपन छलनि। १२ बरख पुरैत-पुरैत शांतिक लेल बरक तलाश शुरू भेल। सभकें चिंता भेलनि। सासुकें सेहो पोतीक विवाह देखबाक तेहेन अभिलाषा जागृत भ’ गेलनि जे एकटा अशिक्षित द्वितीय बरमे सेहो सभ गुण देखाय लगलनि। किछु लोको सभ प्रशंसा केलकनि, माथपर दू बीघा खेत छै, खुट्टापर महींस-बरद छै, पोखरि छै, पोखरिमे माँछ खूब होइछै। हमर पिता कलकत्तामे प्रेसमे काज केने छलाह, दरभंगामे नोकरी केने छलाह।हमरा विवाहक लेल बहुत दिन धरि अडल रहलाह मुदा बेटीक विवाह लेल किए एतेक धडफडा गेलाह, हमरा बहुत दिन धरि नहि बुझाएल। ओना जे कियो बाहर नहि गेल छलाह, हुनका सभ लेल ई सामान्य बात छलै। ओइ समयमे लोक बेटीकें पढ़ाएब ठीक नै बुझैत छल। लगमे स्कूल नै छलै।पढ़बा लेल बेटीकें दूर पठाएब अनुचित मानल जाइत छलै।बेटीक बियाहक लेल उपयुक्त वयस १२ वर्ष धरि मानल जाइत छलै।कोनो शाश्त्रमे लिखल छलै (हम नै पढ़ने छी ) जे बेटीक विवाह १२ वर्षसं पहिने करा देबाक चाही ने त पिता पापक भागी हेताह। लोक शाश्त्रक एहि आदेशक पालन करब कर्तव्य बुझैत छल। मान्यता ई छलै जे बेटी पराया धन थीक, कहुना सकुशल अपन सासुर चल जाए से लोकक लक्ष्य होइत छलै। बियाहक विधि-व्यवहार महत्वपूर्ण होइत छलै। विधि-व्यवहार आसान नै छलै। विवाहमे वरियाती एतै। वरियातीक भोजनक व्यवस्था करब सबसँ महत्वपूर्ण काज होइत छलै।रंग-विरंगक २१ टा कि ३१ टा तरकारी बनतै।तौलाक तौला दही पौडल जेतै।रसगुल्ला जबरदस्ती पचास-पचास टा खुआएल जेतै।चारि-पांच दिन पर चतुर्थी हेतै।बीचमे सभ दिन मौह्क हेतै।गीत-नाद होइत रह्तै। चतुर्थीक बाद नीक दिनमे जमाएकें बिदाई द’क’ विदा कएल जेतनि। जमाए १० दिन कि १५ दिन पर अबैत रहताह। हुनका सासुरमे जबरदस्ती १०-१०, २०-२० दिन राखल जेतनि। ओकर बाद पंचमी हेतै। तखन मधुश्रावनी हेतै। मधुश्रावनीमे १५ दिन धरि बेटी फूल लोढ़तीह।कथा-पूजा हेतै।गीत-नाद होइत रह्तै।लड़कावला नोत पूरय एताह।चारि-पांच दिन रहताह।हुनका ओहिना भोजन कराओल जेतनि जेना वरियातीकें कराओल जाइत छनि।हुनका नीक बिदाईक संग विदा कएल जेतनि। तकर बाद कोजगरा हेतै। कोजगरामे लड़कीवला मखान,दही,केरा,चूडाक भारक संग लड़काक ओत’ एताह।हुनको चारि दिन राखल जेतनि।तकर बाद गंजी,धोती,कुरता,डोपटा, पाग आदि द’ क’ विदा कएल जेतनि। तकर बाद जराउर हएत। सभ पावनिमे दुनू दिससं भार-चंगेराक आदान-प्रदान होइत रहत। तीन अथवा पांच साल पर द्विरागमन हएत। एहि बीच लड़का अपन सासुर अबैत-जाइत रहताह। विवाहक सम्पूर्ण कार्यक्रममे एहि तरहें तीन सं पांच साल लागि जाइत छलै। ई छलै परम्परा। एकरा संग छलै बहुत रास विधि-व्यवहार जकरा आगाँ बेटीक इच्छा-आकांक्षाकें कोनो महत्व नै देल जाइत छलै। कोनो बेटी अपन इच्छा-आकांक्षाकें कहियो प्रगट नै करैत छलीह।दू-तीन टा बच्चा भेलाक बादे बेटी किछु बजबाक साहस जुटा पबैत छलीह। पन्द्रहम बरख पुरैत-पुरैत शान्ति अपन सासुरक परिवारमे शामिल भ’ गेलीह। राम नारायण ठाकुर एक बेटीक विवाहसं निश्चिंत भेलाह। बाल-मण्डली : हमर संगी छलाह राजेंद्र ठाकुर,आशानन्द ठाकुर,बैद्यनाथ ठाकुर, खेलानन्द ठाकुर ( बाबू नारायण ),राम परीक्षण झा, फ़क़ीर चन्द्र दास, नगेन्द्र भूषण मल्लिक आ किछु और गोटे। एहिमे किछु गोटे हमरासँ एक किलास आगू छलाह। सभ गोटे सांझक’ फुट-बौल खेलाइत छलहुँ। बादमे सभ गोटेक निर्णय भेल जे हम सभ गाममे स्वच्छता अभियान चलाएब। टोलमे पोखरिकें साफ़ करबाक काज शुरू भेल। पोखरिक भीड़ पर भरि टोलक लोक छठि पूजा करैत छल। छठि पूजाक बाद एकर चिंता लोक नै करैत छल। से पोखरिमे कुम्भी बड़ भ’ गेल रहै।बाल मंडली एकर सफाइमे लागि गेल। दस-बारह दिनमे पोखरि साफ़ भ’ गेल। आब पोखरिक भीड़ पर एकटा पुस्तकालय बनेबाक काज शुरू भेल। भूषणजीक अक्षर बहुत सुन्दर होइत छलनि। पुस्तका लयक लेल ओ एकटा नियामावली बनौलनि, लोक सभसं एकटा-दूटा क’ बांस मांगल गेल।हम सभ अपनेसं बांस काटि क’ अनैत छलहुँ। पोखरिक दछिनबरिया भीड़ पर जमा कर’ लगलहुँ। लोक सभसं चंदा मागल गेल। जन राखल गेल। अपनो सभ भिडलहुँ।माटिक देबाल ठाढ़ हुअ’ लागल। हमर सबहक पढ़ाइ बाधित भ’ रहल छल। हमरा सभमे एक गोटे तमाकुल खाइत छलाह। हमर पिता एकदिन हमरा कहलनि जे जाहि मंडलीक सदस्य तमाकुल खाइत छथि ओ मण्डली समाज-सुधार की करत। ई बात हमरा ठीक लागल। हम मण्डलीक सदस्यकें नहि बदलि सकैत छलहुँ। हम इएह कारण लिखैत मण्डलीसं अलग भ’ गेलहुँ। मण्डली किछु दिनक बाद भंग भ’ गेल आ पुस्तकालयक काज पूरा नै भेल।मण्डलीसं अलग भेला पर हम अपन ध्यान अपन पढाइ पर केन्द्रित केलहुँ। शेष सदस्य सभ सेहो अपन-अपन पढाइमे लागि गेलाह। हमरा फुट-बौल सेहो पसंद नै आएल। हमरा एक बेर गेंदसं जांघमे तेहेन चोट लागल जे सभ दिन लेल खेलसं विरक्ति भ’ गेल। पिता कागजसं खेल केनाइ सिखौलनि। कागज़सं खेल ! कागजक दुआति बनौनाइ, कागज़क नाओ बनेनाइ। हमरा ई खेल सुरक्षित लागल। गाममे हमर कक्का आ हुनक समवयस्की सभ नाटक खेलाइत छलाह, से हमरा नीक लगैत छल। पुबाइ टोलमे जगदीश बाबू ओत’ कोनो अवसर पर बेलाहीवला नौटंकी एलै।सत्य हरिश्चंद्र, वनदेवी और कोनो-कोनो नौटंकी देखैत खूब नीक लगैत छल।एक बेर सांझ तक पता छल जे नै हेतै, त हमसब खा क’ सूति रहलहुँ। बहुत रातिमे निन्न टूटल त नगाराक आवाज सुनाइ पडल। हमरा नै रहल भेल। हम चुपचाप एसगर ओते रातिमे गाछी द’ क’ चल गेलहुँ नौटंकी देख’ आ ख़तम भेलै त और लोक सभ संगे चल एलहुँ। अथ महराजजी कथा : नारायणपट्टीमे हमर पिताक एकटा बहिन छलथिन।हुनका एकमात्र पुत्र रहथिन शंकर। शंकरक उपनयन भ’ गेल रहैक। दुर्योगसं एक राति घरमे सुतलमे शंकरकें सांप काटि लेलकनि। ओ नहि जीबि सकलाह।बडका शोकमे दीदीक परिवार डूबि गेल। सभ सम्बन्धी लोकनि दुःखमे पड़ि गेलाह।हमर पिता सेहो बहुत चिंतित भेलाह।घरमे सभ बहुत दुखी रहथि।एहि दुर्घटनासं पहिने एक बच्चाक जन्मक समय दीदीक ई स्थिति भ’ गेलनि जे देहमे खून बहुत कम बचलनि, खून चढ़ाबक आवश्यकता भ’ गेलै।बाबू अपन खून देलखिन। जान बँचलनि। आब ई पुत्र-शोक। बाबूकें भेलनि घरक जगहकें कोनो गुनी-महात्मासं जांच करबियैक। एकटा महात्माजी कतहु भेटलखिन। हुनका ओ घरारी देखब’ लेल अनलनि। नारायणपट्टी जेबासं पहिने चारि-पांच दिन महात्माजी हमरा सबहक पाहुन भेलाह।ओ अपन किछु करतब देखौलनि।एकदिन ओ कहलखिन हम कागज़सं रुपैया बना देब। लोक अचंभित भेल। लोक जमा भ’ गेल। महात्माजी एकटा कागजक पन्ना लेलनि, एक लोटा पानि लेलनि।कागजपर किछु लीखि क’ सभकें देखाक’ ओकरा टुकड़ी-टुकड़ी क’ देलनि। ओकरा मुंहमे ध’ लेलनि। चिबाक’ लोटामे रखलनि। हाथ लोटामे ध’ क’ बाहर निकाललनि त ओहिमेसं एकटा दसटकही रुपैया निकललनि। ओइ पर ओहिना सभ चित्र आ चेन्ह सभ रहै जेना आन रुपैया सभमे रहै छै।सभ आश्चर्यचकित भ’ गेल। महात्माजी कहलखिन जे किछु घंटाक बाद ई रुपैया पुनः कागज भ’ जाएत, तें जतेक शीघ्र हो एकर उपयोग क’ लिय’।एक आदमी सायकिलसं गेल पंडौल ओ रुपैया ल’क’ आ ओकर मोतीचूरके लड्डू किनने आएल। सभ कियो लड्डू खेलक। सभ हुनका महाराजजी कह’ लगलनि। महाराजजी कहलखिन, जे कियो सिमरिया जाए चाहैछी से तैयार होउ, हम सांझमे गाछ पर चढ़ा क’ ल’ चलब, ओत’ स्नान क’क’ सभ गोटे घूरि आएब।दिनमे त’ कए गोटे तैयार भेलाह, मुदा सांझ होइते सभ डेरा गेलाह, कियो नै तैयार भेलाह। बाबू हमरा सिखौलनि जे महाराजजी जौं पुछथि ‘की चाही?’ त कहबनि जे कोट-पेंट चाही। दोसर दिन महाराजजी पुछ्लनि, ‘की चाही?’ हमरा नै कहल भेल जे कोट-पेंट चाही।हम किछु नै मांगि सकलहुँ।ई हमर स्वभाव छल।बाबू बहुत दिन तक हमर एहि स्वभावकें हमर कमजोरी मानैत रहलाह। मुदा,हमर ई स्वभाव हमर शक्ति छल,से बहुत बादमे पता चलल। महाराजजी और लोक सभकें पुछलखिन, की चाही त नवयुवक सभ कहलखिन हमरा सभ गोटेकें सिनेमा देखा दिय’। महाराजजी सभकें ल’क’ मधुबनी गेलाह।रस्तामे कागजसं एकटा नमरी बना क’ द’ देलखिन। सभ गोटे रातिमे घुरलाह त उदास रहथि। बजै गेलाह जे सिनेमा हॉलसं निकलैत काल महाराजजी कत’ बिला गेलखिन जे सभ गोटे तकैत-तकैत रहि गेलाह, नै भेटलखिन। हमर हाई स्कूलक शिक्षा : १९६१ मे आठमाँमे हमर नाम पंडौल हाई स्कूलमे लिखाएल गेल।हमरा गणितमे नीक लगैत छल।तें विज्ञान लेलहु। फिजिक्स,केमिस्ट्री आ मैथमेटिक्स। प्रधानाध्यापक छलाह श्री अशर्फी सिंह। गणित पढ़बैत छलाह महावीर बाबू। गुप्तेश्वर बाबू अलजेब्रा आ बैद्यनाथ बाबू ज्यामिति पढ़बैत छलाह। बच्चा बाबू मैथिली पढबैत छलाह।ओ हमरा मामा गामक छलाह। हुनका हाथमे ‘मिथिला मिहिर’ रहिते CHHALANIEE छलनि।बादमे हुनक पुत्र राम सेवक बाबू सेहो मैथिली पढ़ौलनि। बमबम मास्टर साहेब केमिस्ट्री पढ़ौलनि। पढाइ बड सुंदर होइत छलैक।खूब मोनसं मास्टर साहेब सभ पढबैत छलाह। हम बहुत कुशाग्र बुद्धिक बालक नै छलहुँ जे कोनो विषय एक बेर पढलासं याद भ’ जाए।हम अभ्यास खूब करैत छलहुँ। क्लासमे जे पढ़ाइ होइत छलै, तकरा घुरती काल रस्तामे याद करैत अबैत छलहु।गामपर सांझमे फेर एक बेर याद करैत छलहुँ। गणित आ विज्ञानमे काल्हि जे पढाइ हेतै तकरा एक बेर पढ़ि जाइत छलहुँ।अइसं लाभ ई होइत छल जे क्लासमे जखन पढाइ होइत छलै त ठीकसं बुझि जाइत छलिऐक। जौं कतहु नै बुझाएल त ठाढ़ भ’क’ पुछि लैत छलियनि।मास्टर साहेब बुझा दैत छलाह, फेर कोनो दिक्कत नै रहि जाइत छल। पढाइक ई तरीका बाबू सिखौने छलाह।एहिसं बहुत लाभ भेल। स्कूलमे प्रतियोगिताक वातावरण नै छलैक। आठमा-नौमामे हमर संगी छलाह राजेंद्र झा, मुनीन्द्र नारायण दास,मोद नारायण झा, शमीम अहमद आदि। आठमाक अर्ध-वार्षिक परीक्षामे एडवांस्ड मैथमेटिक्समे चारिटा सवाल रहै, तीनटाक जवाब देबाक छलैक। महावीर बाबू नंबर सुनौलथिन ---जगदीश चन्द्र ठाकुर –९९ हाईएस्ट। ओ हमर बचपनक सभसं बेशी आनंद दायक दिन छल। एलीमेंट्री मैथमेटिक्समे सेहो बहुत नीक अंक आएल।फिजिक्स आ केमिस्ट्रीमे बहुत नीक नै रहय। सब विषय मिलाक’ क्लासमे हमर स्थान प्रथम रहल। पाठ्य-पुस्तकमे मैथिली कथा-कविता सभ पढ़ब नीक लगैत छल, तथापि, गणित हमर सभसं प्रिय विषय भ’ गेल छल। कोनो भारी सवाल जखन बनि जाइत छल त बडड आनंद अबैत छल। हमर सबसं छोट मामा सेहो ओही स्कूलमे पढैत छलाह, हमरासं दू क्लास आगाँ। मामा बहुत तेज छलाह, क्लासमे प्रथम अबैत छलाह।मामा दसम कक्षामे प्रथम एलाह, हम आठम कक्षामे। गर्मीक अवकाशमे मामा गाम जाइत छलहुँ आ जे सवाल सब अपना कठिन लगैत छल से हुनकासं बुझि लैत छलहुँ। नवम कक्षामे सेहो हमर स्थान प्रथम रहल। दसम कक्षामे कोनो दोसर स्कूलसं एलाह नागेन्द्रजी। हुनकासं हमर प्रतियोगिता भेल। हम अपन स्थान प्रथम रखबा लेल बहुत प्रयास केलहुँ।हमरा लाज होइत छल इ सोचि क’ जे क्लासमे हमर स्थान छिना ने जाए। हमरा जतेक गणितमे मोन लगैत छल ततेक फिजिक्स आ केमिस्ट्रीमे नहि। दसमीक अर्द्ध-वार्षिक परीक्षाक समय हमरा अबोग्राडोक परिकल्पना याद नै होइत छल आ ओ प्रश्न एबे करतै से लगैत छल। हम एकटा चलाकी केलहुँ। घरे पर एकटा पन्नापर संभावित प्रश्नक जबाब लीखिक’ ओहि विषयक परीक्षाक दिन संगे नेने गेलहुँ आ और प्रश्नक जबाब लीखिक’ एहि पन्नाकें प्राप्त कॉपीमे नाथि देलिऐ।परीक्षा द’ क’ चल एलहुँ।दूनू कागजक रंग भिन्न छलै तें चोरी पकड़ाएब निश्चित छल।एकदिन राम सेवक बाबू मास्टर साहेब हमरा फूटमे बजाक’ पुछलनि, हुनका बमबम मास्टर साहेब कहने छलखिन।हम अपन गलती स्वीकार करैत हुनका कहलियनि जे जीवनमे फेर कहियो एहेन गलती नै करब। कॉपी बमबम मास्टर साहेब देखने रहथिन। ओ आ राम सेवक बाबू लगभग एके समय स्कूलमे आएल छलाह। राम सेवक बाबू हमर मामा गामक छलाह। बमबम मास्टर साहेब नागेन्द्रजीक गामक छलाह।दूनू गोटे आपसमे गप केलनि आ बमबम मास्टर साहेब राम सेवक बाबूक माध्यमसं हमरा समझा देलनि, से हमरा नीक लागल। हमरा क्लासमे सबहक सोझाँ नै कहल गेल, से हमरा लेल बहुत पैघ बात छल।एहि घटनाक सकारात्मक प्रभाव हमरा पर पडल। अपन दूनू शिक्षक महोदयक प्रति हमर श्रद्धा बढि गेल। हम एसगरमे कनलहुँ। मोनसं पाश्चाताप केलहुँ आ फेर एहेन गलती कहियो जीवनमे नै करबाक संकल्प लेलहुँ। हम आइयो श्रद्धासं दूनू मास्टर साहेबकें स्मरण करैत सोचैत छी जे विद्यार्थीकें कोनो गलतीपर ओकरा बिना अपमानित केने, एसगरमे बजाक’ ओकरासं मित्रवत बात क’क’ गलतीक निराकरणक विधि कतेक कारगर भ’ सकैत अछि। एहि घटनाक बाद हमर मोन हल्लुक भ’ गेल। आब दोसर स्थान पर रहब सरल भ’ गेल। नागेन्द्रजीक लेल मोनमे मित्रता आ सहयोगक भाव उत्पन्न भेल। ओ स्वयं बहुत सरल आ नीक स्वभावक छलाह। हमरा जतेक अंक भेटब उचित छल, से भेटल। नागेन्द्रजी प्रथम एलाह, हम दोसर स्थानपर रहलहुँ।दसमी-एगारहमीमे इएह स्थिति रहल। १९६५ मे मैट्रिकक परीक्षामे हमरा ६४८ अंक आएल, नागेन्द्रजीकें ६६५, हमरासं १७ अंक बेशी। गणितमे दू पेपर छलै। हमरा दुनूमे ९९-९९ आएल। हुनका एकमे १०० मे १०० एलनि। फिजिक्स, केमिस्ट्रीमे हमरासं बेशी अंक रहनि। कॉलेज नागेन्द्रजी सी एम कालेज, दरभंगामे नाम लिखौलनि ।हमहूँ ओतहि नाम लिखाब’ चाहैत रही,मुदा बाबू नै तैयार भेलाह।हमर नाम आर के कालेज, मधुबनीमे लिखाएल।हमर मोन छोट भ’ गेल। आर्थिक कारण छलैक। दरभंगामे नाम लिखयबाक मतलब छलै ओत’ डेरा राखब।मेसक खर्च। समय-समय पर गामसं जेबा-एबाक खर्च। मधुबनीमे नाम लिखयबाक मतलब भेल घरसं खा’क’ साइकिलसं जाएब-आएब।बहुत खर्चसं मुक्ति। बाबू नोकरीमे नै छलाह। खेतीसं ओते लाभ नै होइत छलै। जाहि सेक्शनमे हम छलहुँ ओकर क्लास ६ बजे सं शुरू होइत छलैक। घरसं भुखले कोना जाएब, तें माए अन्हरोखे भानस चढ़ा दैत छलीह। हम सवेरे जागिक’ स्नान-भोजन क’क’ साइकिल ल’क’ विदा होइत छलहुँ । घरसं ६- ७ किलोमीटरक दूरी तय करैत-करैत पहिल क्लास ख़तम हेबाक बादे पहुँचि पबैत छलहुँ। दुखी भ’ जाइत छलहुँ। गणित आ केमिस्ट्रीक पढाइसं संतुष्ट नहि होइत छलहुँ। प्री-साइंसमे हमर तैयारी नीक नहि भेल। हम सेकेण्ड डिवीज़नमे उत्तीर्ण भेलहुँ। गणितमे नीक अंक नै आएल। अही साल परिवारमे अशुभ घटना भेलै। दाइक हाथमे दर्द भेलनि। किछु दिन गर्म पानिसं सेकलनि। कनी काल दर्द नै बुझाइन त होइन जे ठीक भ’ गेल। फेर कखनो दर्द उठनि त वएह इलाज। ककरो पूछि क’ कोनो गोटी खेलनि ओहूसं जखन हारि गेलीह आ दर्द बर्दाश्त नै भेलनि त हमरा संगे मधुबनी गेलीह। डा.शिवानीसं देखौलनि त पुछलकनि, कतहु खसल छलहुँ की? दाइकें मोन पडलनि। किछु मास पहिने बेटीक ओत’ गेल छलीह नारायणपट्टी। पानि भेल रहै। आंगनमे पिच्छड़ भ’ गेल छलै।अइ घरसं ओइ घर जेबामे पिछड़ि क’ खसि पडलीह। हाथ रोपलनि से हाथमे किछु भ’ गेलनि जे दर्द कर’ लगलनि। एत’ एलीह ककरो लग ई बात नै बजलीह। कखनो-कखनो दर्द उठनि त पानि गर्म क’क’ सेक लैत छलीह।सभ बात डाक्टरनीकें कहलखिन त ओ कहलखिन, बहुत देरी क’ देलियै,हमरा होइए जे सेप्टिक भ’ गेल अछि, जतेक जल्दी हो दरभंगा हॉस्पिटलमे देखाउ। बाबू डी एम सी एच ल’ गेलखिन।डाक्टर कहलकनि सेप्टिक भ’ गेलनि, जान बचाबक लेल हाथ काटब जरूरी छनि। बामा हाथ काटल गेलनि। अस्पतालमे दाइकें देख’ गेलहुँ त दाइ ह्बोढेकार भ’क’ कान’ लगलीह। हमरो कना गेल। ओइ दिन हमरा तीन चारि साल पहिनेक एकटा घटना मोन पड़ि गेल। दाइ संगे कलम गेल गेलहुँ। कलकतिया आमक जे गाछ छलै ताहिमे हमरा सबहक हिस्सा वलामे कम फड़ल छलै, कक्का वलामे बेशी छलै फड़ल। दाइकें की फुड़लनि, हबर-हबर चारि-पांचटा आम हुनका गाछमेसं तोड़ि लेलखिन। हमरा ओ दृश्य मोन पड़ि गेल जखन हुनकर ओ हाथ अस्पतालमे नै देखलियनि। एहि घटनाक प्रभाव हमरा पर पडल। जीवनमे कय बेर ई दूनू घटना मोन पड़ल। अस्पतालसं घर एलीह दाइ त जीवनसं मोह भंग भ’ गेल छलनि। जिजीविषा नै रहलनि। मृत्युक कामना कर’ लगलीह। एकटा पोतीक वियाह देखि लेबाक एखनहु कामना करय लगलीह।हुनकर ई कामना पूरा भेलनि। हमर छोट बहिनकें हमर मामा गाममे लड़काक पिता देखि क’ अपन पुत्रक विवाह करयबाक बात शुरू केलनि। ककरो लग चर्च केलखिन। हुनकर बहिनक विवाह छलनि ओत’। बात आगू बढ़लै। लड़का सभकें पसंद एलखिन। विवाह भ’ गेलै। दाइक कामना पूर्ण भेलनि। मधुश्रावणीक बाद दाइक देहांत भ’ गेलंनि। मरबासं किछु दिन पूर्व मोहिनारायण कक्का देख’ एलखिन त दाइ कानि क’ कहलखिन, बौआ, देखबै कनी, राम नारायण उजड़ि ने जाए। कक्का भरोस देलखिन, अहाँ चिंता नै करू। दाइकें आब एतबे चिंता छलनि जे अस्पतालमे खर्च भेलैए, बेटीक वियाहमे खर्चा भेलैए, आब क्रिया-कर्ममे खर्च हेतै, बाहरी आमदनीक कोनो स्रोत छै नै। खेत बेचतै कि भरना रखतै। भरना रखतै त जेहो उपजा होइछै सेहो नै हेतै त नओ आदमीक गुजर कोना हेतै। दाइक चिंता स्वाभाविक छलनि। इएह होइत एलैए।इएह भ’ रहल छै।इएह भरिसक होइत रहतै। सरल चीजकें कतेक कठिन बना देल गेल छैक। कर्मकांडमे भोजक परंपरा : एकादशा, द्वादशा,माछ-मासु,फेर मासे-मासे ब्राह्मण-भोजन। श्राद्धक बाद ओहि तिथिक’ पाँच साल तक बरखी। केश कटाउ,ब्राह्मण भोजन कराउ। श्राद्धक समय त लोक कहैत छैक, जीवन भरि त ओ अहीं सभ लेल सभ किछु केलनि, आब अहाँ सबहक कर्तव्य होइत अछि जे नीक जकां श्राद्ध क’ दियनु जाहिसं हुनका सद्गति होइन, आब ओ अहाँ सभसं किछु लेब’ थोड़े एताह।बिना भोज-भातके क्रिया-कर्मक कोनो मोजर लोक नै दै छै। जकरा गरदनिमे उतरी रहैत छैक ओ भावनामे बहि जाइत अछि, होइछै जे आब जे हेतै देखल जेतै, करब त नीके जकां। बी.एस.सी. पार्ट-१ मे स्थिति और ख़राब भेल। कॉलेजमे पढाईक स्थिति ख़राब भेल। परीक्षाक फॉर्म भरलहु। परीक्षा देब’ लगलहुँ। गणितक परीक्षा दिन बुझाएल जे ६५ सं बेशी अंक नै आएत। गणितक परीक्षामे नीक अंक नै आएत माने प्रथम श्रेणीक अंक नै आएत। एकर मतलब छलै जे नीक टेक्निकल कॉलेजमे एडमिशनमे कठिनाइ। हम परीक्षा ड्राप केलहुँ, शेष विषयक परीक्षा नै देलहुँ। हमर लक्ष्य भेल बी.एस.सी.पार्ट-१ मे प्रथम श्रेणीक अंक प्राप्त करब। (२) सांस्कृतिक परिवेश टोलमे मूडन, मरबठटठी, कुमरम, उपनयन, विवाह, मधुश्रावनी, कोजागरा, जराउर, द्विरागमन आदि अवसर पर कोनो-ने-कोनो आंगनसं स्त्रीगनक मूहें गीत सूनब आकर्षित करैत छल। फगुआ,रामनवमी,कृष्णाष्टमी,दुर्गा पूजा,दीयाबाती, छठि आदि अवसर पर राम-कथा, कृष्ण-कथा,सुदामाक कथा,महाभारतक कथा सुनबाक अवसर भेटैत छल। गाममे कैटोला स्थानपर आ शिवनंदन बाबूक ओत’ सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलै। बाबा संगे जाइत छलहुँ। नेवत दास आ दरबारी दासक मूहें दिनकर,नेपाली,विद्यापतिक आ मधुपजीक गीत सुनबाक अवसर भेटल। दुर्गा पूजा,दीयाबाती, आदि अवसर पर गाममे नौटंकी आ नाटक देखबाक अवसर भेटल।एहि मंच सभ पर नटुआ सबहक मूहें मधुपजी आ रवीन्द्रजीक गीत सुनलहुँ। डबहारीक भैयाजीक मूहें विवाह कीर्तन सूनब बहुत आनंददायक होइत छल। ओ कोनो प्रसंगकें बहुत रोचक बना दैत छलाह। कोनो खुशीक अवसर पर हुनका बजाओल जाइत छल। दुर्गास्थानमे मास-मास दिन धरि राम-लीला होइत छल। पोखरिशामक महंथजीक राम-लीला पार्टी छल। गाममे ई सभ मनोरंजनक साधन छलै। कैटोला स्थानपर, शिव नंदन सिंहजीक ओत’, पुबाई टोलमे जगदीश बाबू ओत’ राम चरित मानसक समूह-गायन,समय-समय पर अष्टियाम आ नवाह सेहो होइत छल।हमरो टोलमे ई सभ होइत छल। कोनो गीतक टुकड़ीक संग रामचरितमानसक गायन नीक लागैत छल। कीर्तनमे स्नेहलताक गीत : जखन राघव लला छथि सहाय तखन परवाहे की, अपन किशोरीजीके चरण दबेबै हे मिथिलेमे रह्बै आदि बहुत प्रेमसँ लोक गबैत छल। अहिना बिंदुजीक हिंदी गीत सभ सेहो खूब लोकप्रिय छल : जीवन का मैंने सौप दिया सब भार तुम्हारे हाथों में, प्रवल प्रेम के पाले पड कर प्रभु का नियम बदलते देखा। मामा गाम जाइत छलहुँ त ओतहु रवि दिन सांझमे रामचरितमानसक समूह-गायन देखैत-सुनैत छलहुँ। समय-समय पर अष्टियाम आ नवाह सेहो होइत छल। हमर बड़का मामा मिडिल स्कूल मे प्रधानाध्यापक छलाह आ विवाह कीर्तन सेहो करैत छलाह। मास्टर साहेब बच्चा बाबू पंडौल हाई स्कूलमे सहायक प्रधानाध्यापक छलाह, ओहो विवाह कीर्तन करैत छलाह। हिनका सबहक विवाह कीर्तनमे गंभीरता बेशी रहैत छल। प्री-साइंसमे एक पेपर मैथिली रखने छलहुँ। प्रो.बुद्धि धारी सिंह ‘रमाकर’ बहुत नीक पढबैत छलाह। मैथिली पढ़ब नीक लगैत्त छल। कॉलेजमे विद्यापति पर्व मनाओल गेलै। ओहिमे रमानाथ बाबू आएल छलाह। भाषण भेलै, कविता पाठ भेलै, गीत-नाद भेलै। रामपट्टीक आर के ‘रमण’ बहुत सुन्दर गीत रचना सस्वर प्रस्तुत केलनि। बहुत नीक लागल। सपना भेल जे हमहूँ एहन रचना लिखी आ मंच पर प्रस्तुत करी। बाबाक मूहें महादेवक गीत, विद्यापतिक गीत आ पराती सुनैत छलहुँ। दाइक मूहें रंग-विरंगक फकरा सुनैत छलहुँ। किताबक कविता सभ पढ़ब आ ओकरा याद करब नीक लगैत छल। इएह सभ देखैत-सुनैत हमहूँ तुकबंदी कर’ लगलहुँ आ ओकर उपयोग दरबज्जा पर साप्ताहिक रामचरितमानसक समूह-गायनमे कर’ लगलहुँ। पारंपरिक धुनमे किछु गीत लिखलहुँ जकर पहिल पाती ई सभ अछि – ------भरल सभामे आबि जनकजी प्रण केने छथि भारी हे। ------गौरी लीलाविहारी तोहर भंगिया। ------कन्हैया यौ अहाँ आएब कहिया। मधुपजीक ‘अपूर्व रसगुल्ला’ आ ‘टटका जिलेबी’ देखलहुँ। नीक लागल। हुनक अनुकरण केलहुँ। ‘अनिल’ उपनाम रखलहुँ। फ़िल्मी गीतक धुनपर किछु गीत लिखलहुँ। -------यार कहू की बियाह केने हम सदिखन पछताय रहल छी, आब होयत की माहुर खेने कहुना जीवन बिताय रहल छी। ------वाइफ बैजन्ती माला अपने राजेंद्र कुमार महमूद हम्मर चेला, जानीवाकर हमर भजार। ------प्रीतम छोड़ि गेला परदेश हमरा होइए कते कलेश ककरा कह्बै जखन विधिए भेल बाम। ------देखिते अमत बर सखी सभ पड़ेली कहिते बाप रे बाप बरकें सोहरै सगरो देहियामे साप रे साप। अहिना और किछु। प्रो. बुद्धिधारी सिंह ‘रमाकर’जीकें देख’ देलियनि। हुनकर शुभकामना लैत ओकरा छपा क’ जहां-तहां बेचबाक योजनामे लागि गेलहुँ। बाबूजीकें जखन पता चललनि त बहुत दुखी भेलाह। हुनका हमर कैरियरक चिंता भेलनि।ओ हमरा अपन पाठ्य-पुस्तक सं प्रेम करबाक सलाह देलनि। हम हुनक चिंता पर विचार केलहुँ। साहित्य-प्रेमसं जीविकोपार्जन असंभव छल। घरक आर्थिक स्थिति चिंताजनक होइत गेल। हमरासं छोट तीनू बहिन आ दूनू भाए छलाह। निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ। साहित्यकें शौखक रूपमे राखब।इंजीनियरिंग अथवा एग्रीकल्चर पढ़ब। ताहि लेल बी.एस.सी.पार्ट-१ मे नीक अंक आनक लेल पूरा प्रयास करब। मोने मोन निर्णय केलहुँ जे आब दू साल धरि ने त साहित्यक कोनो वस्तु पढ़ब ने लीखब। मुदा हम अपन निर्णय पर बहुत दिन धरि अटल नहि रहि सकलहुँ। बाबूजीक नजरि बचा क’ मैथिली पत्रिका ‘मिथिला मिहिर’ पढ़ि लैत छलहुँ ,नीक लगैत्त छल। अपनो लिखबाक मोन होइत छल। अपन लिखल मिथिला मिहिरमे छपल देखबाक सिहंता होइत छल। आकाशवाणी,पटनासं प्रसारित मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ कतहु सुनि लैत छलहुँ।गंगेश गुंजन जी द्वारा प्रस्तुत भारती कार्यक्रम बहुत नीक लगैत छल। रवि आ मंगल दिन नियमित रूपसं सुनैत छलहुँ। अपन लीखल रचना आकाशवाणीसं प्रसारण हेबाक कल्पना करय लगलहुँ। मैथिली पढ़ब आ सूनब हमरा लेल सबसँ बेशी आनंद दायक भ’ गेल छल.। एहि बीच हरिमोहन बाबूक ‘चर्चरी’ मामा गामक लाइब्रेरीसं आनि क’ पढ़ि गेलहुँ। एहि सबहक असरि ई भेल जे जखन रातिमे सभ क्यो सूति रहै छल, हम किछु ने किछु लीख’ लगैत छलहुँ। किछु कथा लिखलहुँ।’मिथिला मिहिर’ मे पठौलियैक। एकटा कथा आकाशवाणीकें पठौलियैक। घूरि आएल। दू-तीन दिन धरि उदास रहलहुँ। फेर दोसर पठौलियैक। एक मासक बाद ओहो घुरि आएल। किछु दिनक बाद एकटा हास्य-कथा लिखलहुँ।’रमाकर’जीकें देख’ देलियनि। हुनकासं सुधार कराक’ फेर ओकरा फेयर क’क’ आकाशवाणी पठौलियैक। एहि बेर स्वीकृतिक सूचना भेटल। स्वीकृतिक सूचना पाबि एतेक ख़ुशी भेल जे बाबूकें सेहो कहि देलियनि। ओ नाराज त भेलाह मुदा, हुनका ख़ुशी सेहो भेलनि, से हम अनुभव केलहुँ । १९६८ मे हमर रचना / विनोद वार्ता ‘मोने अछि एखन धरि सासुरक यात्रा’आकाशवाणी,पटनासं मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’मे प्रसारित भेल। कार्यक्रमक संचालन गुंजनजी करैत छलाह। बटुक भाइ बहुत नीक जकां पढ़लनि। हम सभ गामपर रेडियोसं सुनलहुँ। बाबाकें हर्ष भेलनि। हमरा पच्चीस टाका भेटैत। छात्रवृत्तिक अतिरिक्त हमर ई पहिल कमाइ होइत। बाबा कें पुछलियनि ‘अहाँ ले’ की नेने आएब?’ बाबा कहलनि ‘दू आना के सुपारी नेने अबिह’। बाबा सुपारी ले’ नहि रुकलाह। जहिया पच्चीस टाकाक चेक आएल, बाबाक एकादशा रहनि। (३) घरक आर्थिक स्थिति कमजोर भ’ गेलै। दू टा कन्यादानक बाद ६५ मे दाइक अस्पतालक खर्च आ तकर बाद हुनक देहांत। ६५ मे हुनक श्राद्ध। ६६ मे पहिल बरखी। ६७ मे दोसर बरखी। फेर बाबाक क्रिया-कर्मक खर्च। खेतीसं साल भरिके खर्चक लेल अन्न नै भ’ पबैत छलैक। आवश्यकतानुसार जमीन भरना राख’ पडैत छलनि आ पाई सेहो कर्ज लेब’ पडैत छलनि। बाबूक स्वभावमे तामस बेशी प्रगट हुअ लगलनि। हमरा गाममे नीक नै लागय। जेना-तेना बी.एस सी.पार्ट१ के परीक्षा भेल। परीक्षा बहुत सुंदर त’ नहि भेल, मुदा अनुमान केलहुँ जे साठि प्रतिशतसं बेशी अंक आबि जेबाक चाही जे एग्रीकल्चर कॉलेजमे एडमिशन लेल आवश्यक बुझाइत छल। हम गाम पर असहज होमय लगलहुँ। आ एक दिन कलकत्ता जेबाक निश्चय क’ लेलहुँ। हमरा एकटा कुटुंबक पता छल। ओ एक बेर कहने छलाह जे अहाँकें मैट्रिकमे तेहेन सुंदर नम्बर अछि जे कतहु नोकरी भेट जाएत। हम मोने मोन निश्चय केलहुँ जे नोकरी भेटत त करब। एकटा पिसिऔत भाए सेहो ओत’ छलाह। हुनको पता छल। हम दीदी ओत’ नारायणपटटी जाइछी, से कहि क’ घरसं विदा भेलहुँ। दीदी ओत’ गेलहुँ। हुनका अपन विचार कहलियनि। हुनका ख़राब नै लगलनि। पढल-लिखल लोक नोकरी कर’ कलकत्ता जाइत छल। ओ हमरा संगमे तीन-चारि किलो चाउर आ किछु चूड़ा आ गुड द’ देलनि। किछु पाइ हमरा लग छल। ओइ समय आरक्षण जरुरी नै होइत छलै। हम राजनगर स्टेशनसं गाडी पकडलहु समस्तीपुरक लेल। प्लेटफार्म पर बेंच पर बैसल एकटा सज्जनकें देखलियनि। ओ बहुत सुंदर मैथिली बजैत छलाह। बीच- बीच मे अंग्रेजीमे सेहो बजैत छलाह। हुनक अंग्रेजी बाजब सेहो आकृष्ट केलक। हमहूँ ठाढ़ भ’ क’ हुनक बात सून’ लगलहुँ। ओ देशक स्थिति पर बात करैत छलाह। बेरोजगारी पर बात करैत छलाह। एक –दू आदमी कखनो क’ किछु टोक दैत छलनि , ओ ओइ पर बाज’ लगैत छलाह। एतेक सुंदर मैथिली आ अंग्रेजी हम एहिसं पहिने नहि सुनने छलहुँ। हमरा नीक लगैत छल। थोड़े काल बाद एक आदमी उठलाह त’ हम ओत’ बैसि गेलहुँ। एकटा ट्रेन एलै त और दू टा व्यक्ति चल गेलाह। ओ हमरा दिस तकलनि। .विद्यार्थी, अहाँ हावड़ा चलब? हं। हम कहलियनि। ओत’ कोनो काज करै छी की? फेर वैह पुछलनि ‘पहिले बेर जा रहल छी? हं। हम कहलियनि। गप्प हुअ’ लागल। ओइ ठाम के रहैत छथि?पिसिऔत भाए छथि। और एकटा कुटुंब छथि। भाइ साहेब कत’ रहै छथि? शाम बाजार लग। की करै छथि? ट्यूशन करैत छलाह। एखन और किछु करैत छथि की नहि से नै बुझल अछि। हुनका बूझल छनि जे अहाँ आबि रहल छी? एखन त नै कहने छियनि। दोसर कुटुंब कत’ रहै छथि? हम हुनकर पता देख’ देलियनि। हुनको पता नै हेतनि जे अहाँ आबि रहल छी? हुनको नै कहने छियनि। एखन अहाँ घूम’ जा रहल छी पांच-दस दिन लेल कि और किछु उद्देश्य अछि? हम चाहै छी कोनो नोकरी अथवा ट्यूशन भेट जाए। मैट्रिकमे कतेक प्राप्तांक छल? ६४८. माने ७२ %? हं। साइंस सब्जेक्टमे? ७७ % प्री-साइंसमे? सेकंड डिवीज़न। ५५ %। बी एस सी पार्ट १ मे की उमीद अछि? आशा अछि ६० % सं उपर नंबर आबि जाय। आगू पढ़बाक विचार नै अछि? बी एस सी (ए जी ) मे नाम लिखा जाइत तखन पढ़ितहुँ । मुदा ६०% सं बेशी अंक आएत तखने संभव अछि। ओ अपन परिचय देलनि। हम डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग केने छी। एक सालसं कलकत्तामे ट्यूशन क’ रहल छी। हम ट्यूशन एही लेल क’ रहल छी जे अप्लाइ करबालेल आ कतहु जेबा-एबा लेल गार्जियनसं मांग’ नै पडय। हमरा विचारसं अहाँकें नीक होइत जे पोलिटेकनिकमे सिविल ब्रांचमे जाक’ एडमिशन ल’ लितहुँ, बी.एस.सी. पार्ट १ के रिजल्ट भेलापर बी.एस.सी.(एजी)मे अप्लाइ क’ दितियै, भ’ गेला पर पालीटेकनिक छोड़ि दितियै आ नै भेल त पोलीटेकनिक जारी रखितहुँ। सिविलमे स्कोप छै। हम दुविधामे पड़ि गेलहुँ। ओ सुझाव देलनि जे अहाँ एकटा काज क’ सकैत छी।कलकत्ता विदा भ’ गेल छी त चलू, किछु दिन घुमि-फिरि क’ सोचि लिय’ जे अहाँ एत’ रहि सकै छी कि नै। अहाँ अपने निर्णय लेब त ठीक रहत। हुनकर ई बात हमरा बेशी नीक लागल। हवड़ा जंक्शन पर उतरि ई बता देलनि जे अपेक्षित जगह पर पहुँचबा लेल कोन बस कि ट्राम पकड़ब ठीक रहत। एहि संगे इहो कहलनि जे चारिम दिन रवि छै, हम दू बजे तक गिरीश पार्क पहुँचब।अहाँ आबि सकी त ओहि दिन ओत’ आउ, अहाँक निर्णय सुनबामे नीक लागत। ओ इहो कहलनि जे जौं अहाँ इएह तय करब जे एतहि रहब त हम तत्काल एक-दूटा ट्यूशन पकड़यबामे मदति करबाक कोशिश करब। जाहि दू गोटेक पता हमरा लग छल, हुनका लोकनिसं भेंट भेल। हुनका सबहक आवास देखलाक बाद हमर दुविधा समाप्त भ’ गेल।हम रविदिन गिरीश पार्क पहुंचि हुनका अपन निर्णय कहलियनि जे हम तुरत गाम वापस जाएब, पोलिटेकनिकमे एडमिशन लेब, बी.एस.सी.पार्ट १ के रिजल्ट निकललापर जौं हमरा एग्रीकल्चरमे एडमिशन भ’ जाएत त पोलिटेकनिक छोड़ि क’ एग्रीकल्चरमे एडमिशन ल’ लेब। ओ बहुत प्रसन्न भेलाह। गिरीश पार्क लग कोनो होटल रहै ओत’ दूटा रसगुल्ला आ एकटा समोसा खुआक’ हमरा विदा क’ देलनि।हमरा पाइ नै देब’ देलनि।कहलनि एखन अहाँ नै कमाइ छी, हम त कमाइ छी। (४) हम दरभंगा पोलिटेकनिकमे सिविलमे एडमिशन ल’ एलहुँ। गामसँ बससँ जाए-आब’ लगलहुँ। एत’ किछु क्लास एकटा हॉलमे होइ छलै जे सड़क के बगलेमे छहरदेबालीक अंदर छलै।दू कात खूजल। ओकर देख-रेख ठीकसं नै होइत छलै। डेस्क पर चिड़ै सभक चट्टक देखि लागल जे हम एतहु नहि रहि सकैत छी। पढ़ाइ सेहो नीक नै लागल। हम मनब’ लगलहुँ जे एग्रीकल्चरमे एडमिशन भ’ जाए आ एहि ठामसँ मुक्ति भेटय। २८ दिन क्लास केलहुँ। बी.एस.सी.पार्ट १ के रिजल्ट निकललै। हमरा ६१.२ % अंक आएल। एग्रीकल्चरमे अप्लाइ क’ देलियै। एडमिशन भ’ गेल। ६० % सं उपर अंक वला हमही रही। ई हमरा लेल चिंताक विषय भ’ गेल। हम सोचय लगलहुँ जे ६० % सं उपर अंक वला और लोक सभ किए ने अप्लाइ केलकै। हम विचलित भेलहुँ। किछु लोक कहलनि अहाँकें नीक होइत जे एक साल सिंगल सब्जेक्ट बायोलॉजी पढ़ितहुँ, साठियो नंबर आबि जाए, त मेडिकलमे एडमिशन भ’ जाएत। हम लोभमे पड़ि गेलहुँ। निश्चितकें छोड़ि अनिश्चित दिस दौड़ि गेलहुँ। हम तिरहुत कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर,ढोली,मुजफ्फरपुर सँ अपन नाम कटाय पुनः आर.के.कॉलेज, मधुबनी आबि गेलहुँ। ओत’बी.एस.सी.पार्ट २ मे नाम लिखाओल आ सिंगल सब्जेक्ट बायोलॉजीक तैयारी करबामे लागि गेलहुँ।हमरा प्री-साइंसमे बायोलॉजीमे कम सं कम पास मार्क्स आनब जरूरी छल मुदा बी.एस.सी.पार्ट १ मे बायोलॉजीमे कमसं कम साठि अंक आनब जरूरी छल। एके विषयक परीक्षा देबाक छल। हमरा आसान लगैत छल। मुदा जे आसान लगैत छल, कठिन साबित भेल। हमर शिक्षक हमरा ट्यूशन पढबाक सलाह देलनि। एखन धरि ट्यूशन नहि पढने छलहुँ। ट्यूशन पढब ख़राब बुझैत छलहुँ।हम नै बुझैत छलिऐक जे ट्यूशन पढलासं प्रैक्टिकलमे नीक अंक आनब आसान भ’जाइत छैक। हमर एहि अज्ञानतासँ हानि भेल। बायोलॉजी हमरा लेल एकदम नव विषय छल। ओकरा शुरूसं पढ़क छल। हमरा बायोलॉजीक प्रैक्टिकल क्लासमे दिक्कत भेल। चालीकें,झींगुरकें, बेंगकें चीरिक’ ओकर अध्ययन करबामे दिक्कत भेल। फोटो बनाएब, लेबलिंग करबामे दिक्कत भेल। शिक्षक हमरा दिक्कतकें हल करबामे रुचि नै लैत छलाह। हम प्राचार्य महोदय लग शिकायत केलहुँ। प्राचार्य महोदय हुनका बजा क’ किछु कहलथिन। ओ भीतर सं नाराज भ’ गेलाह। हमर कठिनाई बढि गेल। हम बाबूकें कहलियनि। बाबू ओकील साहेबकें कहलखिन। ओकील साहेब ओहि कॉलेजक छात्र रहल छलाह। हुनकर धाख छलनि। ओ हमरा सोझेमे हुनका कहलखिन। ओ यथासंभव मदति करबाक आश्वासन देलनि।मुदा व्यवहारमे हमरा तकर अनुभव नहि भेल। हम अपन तैयारी करैत रहलहुँ। चित्र बनेबाक अभ्यास,लेबेलिंग करबाक अभ्यास करैत रहलहुँ। एके विषयक परीक्षा देबाक छल। मुदा विषय एकदम नव छल। आ कॉलेजक पढ़ाइक भरोसे नै रहि सकै छलहुँ। शिक्षक हमर शिकायतसं अपमानित अनुभव केलनि।परिणाम ओही दिन निर्धारित भ’चुकल छल। प्री-साइंसक परीक्षासं चारि दिन पहिने बोखार लागि गेल। डा.सं संपर्क केलहुँ।कहलियनि एहेन दबाई दिय’ जे हमर परीक्षा नहि छूटय। बोखार उतरि गेल। हम परीक्षा देलहुँ।मुदा,ओही राति हमर आबाज बंद भ’ गेल। मुंहमे कांट जकां गरय लागल। हमरा लादि क’ मधुबनी अस्पताल ल’ गेलाह बाबू। हम कागत पर लीखिक’ देलियंनि जे हम बोखार उतारक लेल अमुक दबाई सभ खेने छलहुँ। तीन दिन तक कोनो सुधार नहि भेल।डा.कहलखिन जे ड्रग रिएक्शन भेल छनि, ठीक हेबामे समय लगतनि। पांच दिनक बाद एक सप्ताह तक खाली दालिके पानि पर रहलहुँ।करीब सत्रह दिन अस्पतालमे भर्ती रहय पडल। नीक बात ई भेल जे बी.एस.सी.पार्ट-१ के परीक्षा हेबासं पहिने हम ठीक भ’ गेलहुँ। अस्वस्थ हेबाक परिणाम परीक्षा-फल पर पडल। बी.एस.सी.पार्ट-१ के परीक्षाक परिणाम ई भेल जे १% माने ५ अंक कम रहबाक कारण मेडिकलमे हमर नामांकन नहि भ’ सकल।हमरा फेर मोन पडल ‘तिरहुत कृषि महाविद्यालय,ढोली,मुजफ्फरपुर’। एहि बेर मेधा सूचीमे हमर स्थान सोलहम छल।५० टा सीट छलै। हम तय केलहुँ जे आब अन्यत्र कतहु नहि जाएब। हॉस्टलमे हमरा संग भेलाह सहरसाक बनगामक नारायण मिश्र। पहिल दिन सबेरे ७ बजे प्रैक्टिकल क्लासमे सभकें कोदारि पकड़ा देल गेलै।१ धुर खेतमे गहूमक खेतीक लेल माटि तैयार करबाक छलै। प्रैक्टिकल ९० मिनट चललै। नीक नै लागल। मुदा आब आन कोनो विकल्प नै छल। आब नीक-अधलाह सोचबाक समय सेहो नै रहल। ७ सं ८.३० तक प्रैक्टिकल।१ घंटामे स्नान, जलपान क’क’ ९.३० पर क्लास शूरू।१.३० बजेसं २.३० बजेक बीच भोजन क’क’ पुनः क्लासमे जाउ। ५ बजे फाइल हॉस्टलमे ध’क’ १ घंटा घुमि-फिरिक’ आउ, ८.३० बजे तक पढू-लिखू। ओकर बाद भोजन मेसमे जा क’ करू।ओकर बाद किछु काल आपसमे गप-सप करै जाउ। दोसर कि तेसर दिन छलै। भोजनक बाद हम सभ अपन-अपन कोठलीमे सूत’ गेलहुँ। पहिल निन्न छलै सबहक। हल्ला उठलै।सभ रुमक केबार बाहरसं बंद क’क’ बेरा-बेरी केबार पीट-पीट क’केबार खोलब’ लगलै। एक रूम खोलाक’ ओहिमे जे दू छात्र छलाह,हुनका पर प्रश्नक बौछार होम’ लगैत छल, २०-२५ के संख्यामे छलाह आक्रमणकारी।लगैत छल जेना डकैती भ’ रहल हो। एक रूममे ५-७ मिनट समय दैत छलाह। निकल’ लगैत छलाह त रूम कें बाहरसं बंद क’ दैत छलाह। हमरो सबहक नंबर आयल। केबार पीट’ लगलाह। हनुमानजी मोन पडलाह। केबार खोललहुँ। आक्रमण ! किछु हमरा लग एलाह, किछु मिसरजीकें घेरलनि। क्या नाम है? कहाँ घर है? कितना मार्क्स था? एग्रीकल्चर पढ़कर क्या करोगे? सीनियर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना है? ये टीकी क्यों रक्खा है? कौन सी हिरोइन अच्छी लगती है? क्या अच्छी लगती है? और बहुत रास ऊंटपटांग सवाल। हमर टीक नै भेटलनि। मिसरजीक टीकपर आक्रमण केलनि। मिसरजी बहुत नेहोरा क’क’ टीकक रक्षा केलनि। हमरा आज्ञाकारी बालक जकां सबहक पएर छूब’ पडल। सीनियरक समक्ष शिष्टाचारक पालन करबाक सलाह आ प्रतिक्रियामे किछु नै करबाक चेतावनी दैत ओ सभ रूमकें बाहरसं बंद कय दोसर रूम दिस जाइ गेलाह।पच्चीसटा रूम करीब एक घंटामे निपटबैत गेलाह। हम सभ बड़ी काल धरि गुमसुम बैसल रहलहुँ।बेर-बेर इएह सोचै छलहुँ, आब कत’ जाएब? एना फेर नै हो से के कहत? किछु कालक बाद कियो एकटा रूम बाहरसं खोलि देलकै। बस सब रूम खुजि गेल। लोक जेना जेलसं निकलल हो तेना उत्साहमे हो हल्ला करैत एकठाम जमा भ’ क’ अपन-अपन रूमक घटनाक वर्णन करय लागल। बड़ी काल आलोचना होइत रहल। रातिमे निन्न नै भेल। बहुत दिनक बाद किछु लिखबाक मोन भेल। एहि घटनाकें रचनामे अनबाक प्रयास केलहुँ। तैयार भेल एकटा रचना जकर किछु पाँती प्रस्तुत अछि : सुनो यार मैं करता हूँ रैगिंग का भंडाफोड़ रात अचानक आये जाने- पहचाने चोर। आए वो ऐसे जैसे लुटेरा तोड़के हॉस्टल का नादर्ण घेरा, कुछ नीचे कुछ उपर जाकर लगे मचाने शोर रात अचानक आये जाने-पहचाने चोर। रात अँधेरी, हम सोये हुए थे मीठे-मीठे ख्वाबों में खोए हुए थे तभी सुनाई पड़ी कानमें, खोल कोठरी खोल रात अचानक आये जाने-पहचाने चोर। मिश्रजी देखलनि, किछु और गोटे देखलनि। दोसर दिन खूब एहिपर गाना-बजाना भेल। एहिसं किछु कलाकार सभ प्रगट भेलाह। एहि कांडसं लाभ ई भेलै जे नव छात्र सभ जल्दी एक दोसरसं परिचित भेलाह। गडबड ई भेलै जे सेकेण्ड इयरक हॉस्टलमे ई बात पता चललै जे हुनके सभकें लक्ष्य क’ क’ ई गाना-बजाना भ’ रहल छै। सेकेण्ड इयरक हॉस्टलमे बजाओल गेल। अनिष्टक आशंका भेल। नै जाएब त आदेशक अपमान मानल जाएत। सोचलहुँ जे देखबनि नाराज त माफ़ी मांगि लेबनि। कहने रहय झाजी बुलाये हैं,से नीको लागल। विदा भेलहुँ। मिश्रजी सेहो संग भेलाह। ‘सुना है तुमने हमलोगों पर कोई गाना-उना लिखा है? जरा सुनाओ तो।’ हम गाबि क’ सुना देलियनि। ‘फ़िल्मी गीत कोई गाते हो? कोई सुनाओ तो।’ हमरा मुकेशक गाओल गीत ‘आप से हमको बिछड़े हुए एक ज़माना बीत गया’ अबैत छल, सुना देलियनि। ‘ओ एक पाँती गुनगुनाक’ कहलनि ‘इसको ऐसे गानेसे और अच्छा लगेगा। ’हुनक स्वर नीक लागल। ओतहि बैसल एक गोटे पुछ्लनि ‘अहाँ मैथिलीमे नै लिखै छी?’ आब हम आनंदित भेलहुँ। हमरा भेल भरिसक इहो लिखैत हेताह, तें पुछ्लनि अछि। ओ पुछलनि ‘जीवकांतजीकें जनै छियनि?’ ‘आ हा हा, हुनका कोना ने जनबनि? मिथिला मिहिरक सभ अंकमे हुनकर रचना रहिते छनि। मुदा अहाँ कोना ....?’ ‘हमर जेठ भाइ साहेब छथि।’ हम आनंदमे ड़ुबि गेलहुँ। बड़ी काल गप भेल। घुरैत काल प्रसन्न रही। चलैत काल ओ आश्वस्त केलनि जे आब कोनो समस्या नै हैत, हुअए त कहब। मोन हल्लुक भेल।डर ख़तम भेल। परंपराक अनुसार रैगिंगक पश्चात् एकदिन सीनियर द्वारा वेलकम पार्टी देल गेलै जाहिमे किछु प्राध्यापक लोकनि सेहो आमंत्रित भेलाह। भाषण-भूषण भेलै। सांस्कृतिक कार्यक्रम भेल जाहिमे हमरासं रैगिंगवला ओ गीत सेहो सुनल गेल। सीनियर द्वारा जूनियर छात्रसं अनुशासनमे रहबाक आ परम्पराक पालन करबाक अपेक्षा कयल गेल आ बदलामे जूनियरकें सभ तरहें सुरक्षा आ सहायता देबाक आश्वासन देल गेल। थोड़े दिन त ई कठिन लगैत छल जे रस्तामे जते सीनियर भेटथि तिनका झुकि क’ ‘प्रणाम सर’ कही,मुदा किछु दिनक बाद हम सभ अभ्यस्त भ’ गेलहुँ आ ई आदति बनि गेल। सीनियर सभसं पता चलल जे हम परुका कॉलेज नै छोड़ने रहितहुँ त हमरा आई सी एस ए आर सं १०० रु.मासिकक स्कालरशिप भेटैत आ हॉस्टलमे रहबा लेल सिंगल सीटवला रूम जे मेरिट लिस्टक अनुसार दू टा छात्रकें भेटैत छलै। ई हानि भेल मुदा लाभ ई भेल जे एक साल जे बायोलॉजी पढलहुँ से काज देलक। स्कालरशिपक एकटा अवसर छल कॉलेज दिससं जे एडमिशन भेलाक एक मासक बाद एकटा परीक्षाक परिणामक अनुसार चारिटा छात्रकें कॉलेज दिससं देल जाइत छलैक। हम एहि परीक्षामे दोसर स्थान पर रहलहुँ। पहिल स्थान पर छलाह दुलार चन्द्र मिस्त्री।बोटनीक प्राध्यापक श्रीवास्तवजी मिस्त्रीजीक वर्णन आ हमर बनाओल चित्र आ ओकर आकर्षक लेबेलिंगक प्रशंसा केलनि।एक साल जे बायोलॉजी पढ़लहुँ, तकरे परिणाम छल ई।हमर अनुभव केलहुँ जे कएल श्रम जँ एक ठाम काज नै आयल त एकर मतलब ई नै जे ओ व्यर्थ भ’ गेल, ओ कोनो दोसर ठाम काज आबि जाएत। एहि परीक्षाक आधार पर ५० रु. मासिकके स्कालरशिप भेटल। मिस्त्रीजीकें बादमे मेडिकलमे एडमिशन भ’ गेलनि, तें ओ कॉलेजसं चलि गेलाह।आब एहि परीक्षाक परिणामक अनुसारे यदि हमर तैयारी चलैत रहैत त हम कॉलेजक टॉपर रहितहुँ, मुदा एकटा विचलन सभटा गडबडा देलक।एहि विचलनक कथा आगाँ कहब। कॉलेजमे खूब मोन लाग’ लागल। कॉलेजक भवन नीक। रंग-विरंगक फूल सभ नीक। हॉस्टलक व्यवस्था नीक, भोजन-जलपानक व्यस्था नीक, शिक्षक सबहक व्यवहार नीक, पढ़ाई नीक। शिक्षक सभ ठीक समय पर अबैत छलाह, एकोटा क्लास खाली नै जाइत छल। ओहि समय अधिकतर सामान्य कॉलेजमे पढाइक स्थिति बहुत नीक नै रहि गेल छलैक। हमरा विषय सेहो नीक लगैत छल। गाम पर बाबा आ बाबू खेतीमे नै भिड़बैत छलाह ई सोचिक’ जे पढाइमे बाधा हेतनि मुदा आब खेतीए हमर पढ़ाइक विषय भ’ गेल छल। खेतीक वैज्ञानिक पक्षसं परिचित भ’ रहल छलहुँ। माटिमे की सभ छै जे पौधा सभक लेल भोजनक काज अबैत छै, कोन फसिल ले’ केहन माटि काज अबैत छै,पौधा सबहक विकासमे कोन तत्वक की भूमिका छै,कोन तत्वक कमीसं पौधा सभ पर की प्रभाव पड़ैत छै, नाइट्रोजन-फॉसफोरस-पोटाशक की उपयोगिता छै,कोन फसिल ले’ खेतक तैयारी केहेन हेबाक चाही,कोन खाद कखन आ कतेक मात्रामे आ कोना देबाक चाही। पानि कतेक आ कखन-कखन देबाक चाही, कोन कीड़ा कोन फसिलकें कोना क्षति पहुँचबैत छै, ओइसं कोना फसिलक रक्षा करबाक चाही आदि कतेक वस्तुक ज्ञान प्राप्त कराओल जा रहल छल। जखन गाम जाइ छलहुँ त दरभंगामे ‘मिथिला मिहिर’ कीनि क’ नेने अबैत छलहुँ। पढाइक संग-संग ‘मिथिला मिहिर’पढ़ब सेहो दिनचर्यामे आबि गेल छल। भाषाक आ स्वभावमे अधिक समन्वक कारण तीन गोटे सं बेशी अपनत्वक अनुभव करय लगलहुँ।नारायण मिश्र जे हमर रूमक संगी छलाह, बनगाम (सहरसा)क छलाह आ हुकर जेठ भाइ साहेब एल एस कॉलेजमे फिजिक्सक प्राध्यापक छलथिन।मिश्राजी समय निकालिक’ गीताक पाठ सेहो क’ लैत छलाह। जखन-तखन ओ बुझबैत छलाह जे गीतामे कृष्ण भगवान अर्जुनकें की कहलखिन आ किए कहलखिन।नन्द कुमार झा मोहना (झंझारपुर)क छलाह, हुनक बाबूजी रेलवेमे समस्तीपुरमे काज करैत छलथिन आ जेठ भाइजी इंजिनियर छलथिन।अशोक कुमार ठाकुर पूर्णियांक छलाह, हुनक जेठ भाइजी हुनका पढ़ाइक लेल बहुत परिश्रम करैत छलथिन। हम सभ संगे टहल’ जाइ छलहुँ ।गप सप करैत छलहुँ। विवाहक गप सेहो होइत छल।सभ कियो कहैत छलहुँ जे अविवाहित छी।हमरा सभमे अपेक्षाकृत सभसं नीक कपड़ा नन्द कुमार झाजी पहिरैत छलाह।ओहो कहैत छलाह जे विवाह नै भेल अछि।हम सब इएह बुझैत छलहुँ। एक दिन ई झूठ साबित भेल।ओहि दिन हम भोजन क’क’ पहिने हॉस्टल आबि गेलहुँ। झाजी नै आएल छलाह।पोस्टमैन हुनकर चिट्ठी ल’क’ हुनकर नाम बाजल। हम कहलियै, हमरा द’ दैह हम द’ देबनि। पोस्ट कार्ड रहै। हमरा द’ देलक।हमर नजरि अटकि गेल ‘प्रिय ओझाजी’। हम अपनाकें रोकि नै सकलहुँ अनकर चिट्ठी नै पढबाक चाही, से ध्यान नै रहल। चिट्ठीसं पता चलि गेल जे हिनक विवाह कोन गाम भेल छनि।हमरा लेल ओ चिट्ठी मनोरंजनक लेल महत्वपूर्ण भ’ गेल। चिट्ठीमे एहेन कोनो बात नै रहै जे तत्काल नै भेटलासं हुनका कोनो क्षति होइतनि। तें हम चिट्ठीकें चोराक’ राखि लेलहुँ। मिश्राजीकें देख’ देलियनि।फेर ठाकुरजीकें देख’ देलियनि। हम सभ और ककरो ई बात नै कहलियै।घुमा-फिरा क’ झाजीकें पुछै गेलियनि। हुनका संदेह भेलनि। हमरा एसगरमे पुछ्लनि,’हमर कोनो चिट्ठी आयल अछि ठाकुरजी?’ हमरा हंसी लागि गेल। ‘अहाँ परेशान किए होइछी?’ ‘नै ठाकुरजी, हम नेहोरा करैछी, और ककरो नै कह्बै।’ हमरामे बैसल कलाकार बाजि उठल ‘अहाँ एसगर थोड़े छी? विवाह त हमरो भ’ गेल अछि।ऐमे डरबाक की प्रयोजन?’ हमरो विवाह भ’ गेल अछि से जानि हुनका जानमे जान एलनि। ‘सभ बूझत त मजाक कर’ लागत, पूछि-पूछि क’ परेशान क’ देत।’ ‘अच्छा अहूँ हमरा विषयमे नै ककरो कह्बै।’ ‘ठीक छै।’ हम दूनू तय केलहुँ जे चारि के अतिरिक्त ककरो ई सूचना नै भेटबाक चाही। हम त तीन गोटेकें कहने छलियनि। बात तीनसं तेरह तक पहुंचि गेलै। किछु लोक घुमा-फिरा क’ आ बादमे सोझे मजाक कर’ लगलनि जाहिसं झाजी एकरा ब्रीच ऑफ़ कॉन्ट्रैक्ट मानलंनि आ प्रतिक्रियामे ओहो हमर विवाहक (?) पोल खोलि देलनि मिश्राजी आ ठाकुरजी लग। हम हिनका सभकें कहलियनि जे ई बात झूठ छै मुदा ई दूनू गोटे नहि मानलनि। अंतमे हमही मौन भ’ गेलहुँ। आब हिनका सबहक संदेह पक्का भ’ गेलनि। शुरू भेल एकटा नाटक।हम पर्दाक पाछू भ’ गेलहुँ।नटकिया अनिलजी प्रगट भेलाह। गाममे नाटकमे भाग नेने रही। फैसला नाटकमे नायकक भूमिका आ उगना नाटकमे विद्यापतिक भूमिकाक निर्वाह क’ चुकल छलहुँ ।से अनिलजी नवविवाहित नवयुवकक भूमिकामे आबि गेलाह।अपनहि लिखलनि अपन पटकथा।विवाह भेल छनि।लोकक दवाबमे विवाह कर’ पडलनि।कनियाँसं मतान्तर रहैत छनि। घरक आनो लोक सबहक व्यवहार पसंद नै छनि।ककरोसं पत्राचार नै होइत छनि। सासुर नै जाइत छथि।आरो बहुत रास बात। परिणाम ई भेलै जे हम सबहक सहानुभूतिक पात्र भ’ गेलहुँ। मिश्रा जी हमरा सुनब’ लगलाह जे गीतामे कृष्ण भगवान अर्जुन कें की सभ कहलखिन।हम पढ़ाइक संग-संग गीता सेहो बुझ’ लगलहुँ।कृष्ण भगवान अर्जुनकें बुझेलखिन। मिश्राजी हमरा बुझबै छलाह।ओ हमर कथाकें ध्यानपूर्वक सूनिक’ ओकरा पर गंभीरतासं विचार करैत छलाह आ बुझबैत छलाह जे हमरा की करबाक चाही।हमहूँ अपन कल्पनाक संग आगू बढ़ल जा रहल छलहुँ।सभ संगी सभ सेहो अपन-अपन अनुभवक आधार पर उचित सुझाव दैत जा रहल छलाह।सभक ह्रदयमे हमर पत्नी(?)क लेल करुणा उमरि रहल छलैक:’ ओइ बेचारीक कोन दोख?’ सुनै छियै जे रामक जन्मसं पहिने रामायण लिखा गेल छल अर्थात जे वाल्मीकि लिखि देलखिन ओएह रामक जीवनमे घटित भ’ गेलनि। रामक कथाक संग-संग वाल्मीकिजी अपनो भविष्यक कथा लिखलनि। हमहूँ सभ जे सोचैत छी, जे बजैत छी, जकर अभ्यास करैत छी, वएह हमर भविष्य नहि बनि जाइत अछि? ओहि समय हमहूँ कहाँ सोचै छलहुँ जे हम जे नाटक क’ रहल छी सएह हमर वास्तविक जीवनक कथा बनय जा रहल अछि। एकटा छलाह ननू कका तैतालिस बरख पहिलुक बात थिक। हम ओहि समय एग्रीकल्चर कॉलेजमे अंतिम वर्षमे पढैत रही। हमर तेसर आ सबसँ छोट बहिनक विवाहक बात घरमे चलैत रहै। माए एकटा कथाक प्रसंगमे चर्च केलनि- ‘होइतै त बहुत सुंदर होइतै।’ ‘ओ नै हएत।’ बाबू कहलथिन। ‘से किए?’ हम पूछलियनि। बाबू कहलनि जे हुनका सात हजार द’ जाइ छनि से त ओ करैले’ तैयारे नै भेलथिन, आ हम सभ ओतबो कत’ सं देबै? हम कनी काल गुम्म रहलहु। हम लड़काकें जनैत छलियनि। हमर दोसर बहिनक विवाह जिनकासं भेल छलनि हुनकर पितिऔत भाए छलथिन। हिनक माए नै छलथिन। बहुत दिन भ’ गेलनि। पिता दोसर विवाह नै केलथिन। दूनू भाइ पढैत छलाह। आंगनमे एकटा दोसर पितिऔत छलथिन हुनके आश्रममे ई दूनू भाई रहैत छलाह। हुनक पत्नी हिनका सभकें अपने पुत्र जकां मानैत छलथिन। हिनक पिता विराटनगर लग मोरंगमे रहैत छलथिन। ओत’ पटुआक खेती बहुत दिनसं करैत आबि रहल छलथिन।हुनकासं हमरा बेशी भेंट-घांट नै छल किन्तु लड़का जे छथि हुनका नीक जकां जनैत छलियनि। हुनक पढाई-लिखाइ आ बुद्धि-विचार हमरा नीक लगैत छल, तें हम मोने-मोन तय केलहुं जे हमरा सभकें ऐ कथापर जोर देबाक चाही। बाबू कें कहलियनि, ‘हम एक बेर प्रयास कर’ चाहैत छी,मुदा एक विन्दुपर विचार कर’ पडत।’ ‘की?’ बाबू पुछलनि। हम कहलियनि जे पाइ लेथीन त ओकर हिस्सा खेत बेचि क’ द’ देबै, भाए रहैत त ओकरो हिस्सा त हेबे करितै। बाबू किछु सोच’ लगलाह। फेर कहलनि ‘जखन तोरे ई विचार छ’ त जाह-देखहक़।’ हम विदा भेलहु। हमर मझिली बहिन ओतहि छलि।ओकरो विचार नीक लगलइ। पहिने लड़कासं भेंट केलियनि। हुनका पुछलियनि ‘यदि अहांक पिता हमरा ओत’ विवाह तय क’ लेथि त अहाँकें कोनो आपत्ति त ने हएत?’ ओ कहलनि, ‘ननू कक्का (बाबूजी)क बात हम नै काटि सकैत छियनि, मुदा ओ त’ चारिए दिन पहिने गेलाहे’ गामसं, अइ साल विवाह नै हेतै, इएह निर्णय क’क’ गेलाहे’।’ हम कहलियनि, ‘हम हुनकासं भेंट कर’ चाहैत छी एक बेर, निर्णय त जे हेतनि, हुनके हेतनि।’ ओ विराटनगर लग मोरंगमे रहैत छलाह। सकरी जंक्शनसं निर्मली, निर्मलीसं जोगबनी आ ओत’सं तीनटा धार टपि क’ चारि-पांच कोस पएरे जाय पडैत छलैक। हुनका गामक किछु आदमी हमरा एकांतमे कहलनि, ‘ओ पाइ नै छोड़ताह। ओ त बीमारो पडैत छथि त दबाइमे खर्च नै करैत छथि।एत’ कयटा कथा एलनि, सात हजार तक द’ गेलनि मुदा नाकपर मांछी नै बैस’ देलखिन, से सोचि लिय’।’ हम सबहक बात सुनियो क’ विदा भ’ गेलहु। मनीगाछी स्टेशन लग लड़काक मामाक घर छलनि। हुनकासँ भेंट केलहु। ओहो मना केलनि। कहलनि, ‘अहाँ बेकार हरान होइ छी। हम ओते सुंदर कथा ल’ गेल छलहु से त सुनबे नै केलनि जखन कि कन्यागत सात हजार देब’ ले’ तैयार छलथिन। अहाँ खेत बेचि क’ की पाइ देबनि, की बरियातीक सम्मान करबै आ की विदाई देबनि? अहाँ घुरि जाउ। एसगर जाइ छी। अहाँ एखन विद्यार्थी छी। रस्तामे तीन टा धार छै। चारि कोस पएरे जाए पडै छै। बेकार हरान हएब। ओना अइ साल त विवाह हेबे नै करतै, ओ इएह तय क’क’ एखन गेलाहे।’ हम तैयो चल गेलहु। पहिने अपन बहिनो कें भेंट केलियनि। ओ नेपाल सरकारक स्वास्थ्य विभागमे काज करैत छलाह। एकटा फूसक घरमे ननू ककासं अलग जेठ भाएक संग रहैत छलाह। ओ सभ कहलनि- ‘ननू कक्काकें अहाँ अपने कहियनु।’ ननू कक्का ओत’ पहुंचलापर हुनका प्रणाम क’क’ अपन अभिप्राय कहलियनि।ओ सभटा बात ध्यानपूर्वक सुनि क’ कहलनि जे एकर जबाब हम परसू सांझमे देब। हुनके सबहक ओत’ रहलहु। हुनके अनुसार दू दिन एहि विषयपर कोनो बात नै केलहु। तेसर दिन नियत समयपर जखन पूजा क’क’ उठलाह त पुछलियनि। ओ कहलनि जे हम तय केलहु जे विवाह अहींक ओत’ हेतै मुदा हमर एकटा बड़का शर्त अछि तकर पालन करबाक वचन दिय’। हम कहलियनि, ‘अपने स्पष्ट करियौ। हम जे तय क’क’ आयल छी से कहिये देने छी। अहांक मांग हमरा सामर्थ्य सीमा धरि हयत त हम अवश्य पूरा करब।’ ओ कहलनि, ‘हमर मांग अहांक सामर्थ्य सीमाक अनुकूले अछि मुदा हमरा भरोस नै अछि जे अहाँ पूरा करब, तें अहाँ हमरा वचन दिय’ जे अवश्य पूरा करब।’ हम कनेक भयभीत होइत कहलियनि- ‘ठीक छै, हम अवश्य पूरा करब।’ ओ तखन कहलनि, ‘हमर शर्त ई अछि जे विवाह ताहि रूपें हुअए जे विवाहसं द्विरागमन धरिक खर्चले’ अहाँकें ने एको धुर खेत बेच’ पडय ने भरना राख’ पडय, ने ककरोसं कर्ज लेब’ पडय।इएह हमर शर्त अछि। अहाँ वचन देलहु अछि, आब अहाँकें एकर पालन कर’ पडत।’ हमरा अपना कानपर विश्वास नै भ’ रहल छल। ख़ुशीसं हम कान’ लगलहु। हम सोचै छलहु हिनका द’ लोक सभ की की कहने छल आ ई की कहि रहल छथि। एकदम साधारण बगएमे रह’वला लोकक भीतर एहेन श्रेष्ट पुरुष विद्यमान भ’ सकैत छथि, एकर हम कल्पना नै क’ सकैत छलहु। हमरा गुम्म देखि ओ कहलनि, ‘अहाँकें खेत बेचबा क’, कर्जाक त’रमे द’ क’, अहाँक ओत’ कुटमैती करब? राम-राम।’ फेर ओ अपन जीवन,दिन-चर्या, मनोरथ सबहक चर्च विस्तारसं केलनि। कहलनि हमर एकेटा मनोरथ छल जे नीक लोकक संग होइन, से हमरा नै भेटैत छल, पाइवला त बहुत अबैत छलाह मुदा कतहु हमर मोन नै मानलक, तें गाममे कहलियै जे अइ साल नै करब। ओत’ एक बीघामे पटुआक खेती करैत छलाह आ संगहि पंडित-पुरोहितक काज सेहो। कहलनि जे पाइ त दुनू भाइले’ एते छनि जे मनुक्ख जकां खर्च करताह त कोनो चीजक अभाव नै हेतनि आ हमरो क्रिया-कर्मले’ सोच’ नै पडतनि, जखन एते पाइसं नै काज चलतनि आ अपन पुरुषार्थसं नै हेतनि त अहाँकें कंगाल बनाक’हेतनि? ओ अपने दिन तकलनि। करीब डेढ मॉस आगांक दिन। दूटा छोट-छोट चिट्ठी लिखलनि, एकटा पुत्रक नामे आ दोसर अपन जेठ भाएक नामे। पुत्रकें लिखलथिन-हम हिनका ओत’ एकदम आदर्श विवाह तय क’ लेलियनि।फलां तारीख क’ नीक दिन छै। आशा अछि अहाँकें हमर निर्णय पसंद हएत। शेष भेंट भेला पर। हम चारि दिन पहिने एबाक कोशिश करब। जेठ भाएकें लिखलथिन—हिनका ओत’ हम एकदम आदर्श विवाह तय क’ लेलियनि।फलां तारीख क’ नीक दिन छै। ओही दिन विवाह हेतै। हम एबे करब। यदि कोनो कारणसं ओइ दिन धरि नै पहुचि पाबी त हम अहाँकें ई अधिकार दै छी जे अहाँ जा क’ विवाहक काज संपन्न करा देबनि जाहिसं विवाहमे कोनो बाधा नै होइन। दूनू चिट्ठी हमरा हाथमे द’ देलनि। चलै काल पुनः शर्तक स्मरण करौलनि। हम कहलियनि ‘मात्र एते आजादी दिय’ जे प्रसन्नतापूर्वक जे क’ सकी से करी।’ कहलनि –नै,ककरोसं कर्ज ल’क’ वा खेत-पथार भरना राखिक’ वा बेचिक’ नै, ने त हमरा आत्माकें चोट पहुंचत। हुनक चरण स्पर्श करैत विदा भेलहु। हम बहिनो आ हुनक जेठ भाएकें कहलियनि त हुनको सभकें आश्चर्य भेलनि आ प्रसन्नता सेहो। ओ लोकनि सुझाव देलनि जे जखन एतेक उदारता देखौलनिहें त विदाई आदिक ध्यान राखब जरुरी हएत। मोनमे ततेक आनंद भरल छल जे होइत छल जे कतेक जल्दी गाम पहुचि जाइ आ सभकें ई समाद कहि दियै। रस्तामे हुनकर कहल रामचरितमानसक इ दोहा बेर-बेर मोन पडैत रहल : ‘तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला एक अंग तूल न ताही सकल मिली, जो सुख लव सत्संग।’ हम शिशवा पहुँचलहु आ दूनूकें पत्र द’ देलियनि। बात तुरंत भरि टोलमे पसरि गेलै आ सभ लोक हमरासं तरह-तरहक सवाल कर’ लागल। ककरो विश्वास नै होइ। सभ क्यो अपना-अपना ढंगसं चिट्ठीक अर्थ लगब’ लगलाह। हम भोजन क’क’ थोड़े काल पडलहु कि कियो जगा देलक। देखलहु लड़काक मामा ( जे जाइत काल मनीगाछीमे भेटल छलाह )पहुंचल छलाह।हुनको कोना-ने-कोना खबरि भ’ गेलनि। ओ साइकिलसं एलाह।तारमतोर हमरासं सवाल कर’ लगलाह : ‘अहाँ अबैत काल हमर भेंट किए ने केलहु?’ ‘अहाँ हुनका की सभ कहलियनि?’ ‘ओ अहाँकें और की कहलनि?’ ‘हमरा त कहलनि जे अइ साल करबे नै करब तखन कोना अहाकें गछि लेलनि?’ ‘भाएकें किए लिखलखिनहें जे हम नै आबि सकी त अहाँ जा क’ विवाह करा’ देबै?’ हम सविनय हुनक प्रश्नक उत्तर देत गेलियनि मुदा ओ हमर उत्तर सुन’ नै चाहैत छलाह। हुनक तामस बढल जा रहल छलनि। हमरा ओ रामलीलाक परसुराम जकां लगैत छलाह। हम चुप्प भ’ गेलहु। ओ बजलाह ‘हुनकर माथा ख़राब भ’ गेलनिहें।’ क्यो किछु नै बजलै। ओ भागिनकें बजा क’ कहलथिन, ‘तोरा बापक माथा ख़राब भ’ गेलनि। हमरा संग चलह आ साफ-साफ़ कहुन जे हम एत’ विवाह नै करब।’ ओ कहलखिन ‘मामा,इ त जाए काल हमरासं पूछि नेने छलाह जे ननूकका यदि स्वीकार क’ लेथि त अहाँकें कोनो एतराज त ने हएत,हम हिनका कहने छलियनि जे ननूककाक बात हम नै काइट सकै छी। एहेन स्थितिमे हम ओत’ जा क’ कहियनि जे हम एत’ विवाह नै करब, अइसं त हिनको अपमान हेतनि आ ननू ककाक सेहो।हम एहेन काज नै क’ सकैत छी।’ हम कहलियनि –‘ यदि अहाँ इ सोचैत होइ जे अहाँक पिताक निर्णय सही नै छनि आ अहाँक इच्छाक विरुद्ध अछि ई निर्णय त ओते दूर जेबाक कोन काज, ई त हमरे कहलासं भ’ जाएत। अहाँक इच्छाक विरुद्ध विवाहक कोनो अर्थ नै छै।’ मुदा ओ मामाजीक सुझावकें साफ अस्वीकार करैत कहलथिन- ‘मामा हम नै जाएब, अहाँ जाए चाही त जाउ, अहाँक कहलासं यदि ननू कका हमरा दोसर आदेश देताह त हम ओकरे पालन करब।’ मामाजी कहलथिन ‘तोरो माथा ख़राब भ’ गेलह।’ मामाजी स्वयं मोरंग जेबाक निर्णय सुनबैत साइकिल ल’क’ विदा भ’ गेलाह। एम्हर हमरा किछु लोक कह’ लगलाह-‘विद्यार्थी, अहाँ किए हल्ला क’ देलियै? बुझै नै छियै? आब ई की जा क’ कहथिन की ने आ भेलो काज गडबडा सकैए।’ हमर उत्साह ठंडा भ’ गेल। फेर ई विचार मोनमे आएल जे नहिये हेतै त की हेतै, दोसर ठाम प्रयास करब। मामाजीक बात मोन पडैत छल त निराश होइत छलहु आ ननू ककाक बात मोन पडैत छल त प्रसन्न भ’ जाइत छलहु। अही उहापोहक स्थितिमे ओत’सं अपन गाम आबि गेलहु। गाममे आबिक’ फेर वएह केलियै।लोक जे पुछलक तकरा मोरंगसं शिशवा धरिक बात साफ़-साफ़ कहि देलियै। एतहु लोक हंस’ लागल –‘तोरा हल्ला करबाक कोन काज छलह? आब हुनकर मामा जेथिन त ओ बात बदलियो सकैत छथि।’ हमर पडोसी पुछलनि जे जत’ लडकाक पितासं गप भेल’ तत’ और कियो रहै? हम कहलियनि –‘ओत’ त कियो नै रहै।’ लोक बाजय—‘अही दुआरे ने चारि आदमीक बीच बात कयल जाइ छै जे कोनो हेर-फेर होइ त चारि आदमी पूछि सकै छनि, मुदा जखन कियो रहबे नै करै त काल्हि कहत’ जे हम नै कहने रहियनि त की क’ लेबहक?’ हमरा एकर जबाब किछु नै फुरय। मुदा, हमरा मोनमे ई विश्वास रहय जे ओ निर्णय बदल’वला लोक नै छथि। माए पुछ्लनि, ‘तोरा मोनमे भरोस छ’?’ हम कहलियनि ‘ हं।’ ओ कहलनि ‘तखन हेबे करतै, तखन चिंता नै करह।’ माए-बाबूकें हुनकासं भेल सभटा बात जखन सुनौलियनि तखन हमरा पिताकें सेहो भरोस भेलनि, ओना हमरा पिताकें पढाई-लिखाईक अतिरिक्त आन कोनो काजमे हमरा सफल हेबाक संभावना क्षीण बुझाइत छलनि। विना पाई के एहेन ठाम विवाह ठीक हएब घरमे एकटा तेहेन आनंदक वातावरण बना देलकै जे सभकें ख़ुशीसं होइ जे की करी की ने। तय भेलै जे विवाहसं पहिने घडी, ट्रांजिस्टर, एकटा औंठी, पांचो टूक कपडा आ जूता लड़काकें द’ देल जाए, तें ई सभ पहिने कीनि क’ राखि लेल जाए। बाबू प्रसन्न मोनसं कोनो खेत भरना रखबाक विचार केलनि। हम रोकि देलियनि। हम कहलियनि-‘ओ हमरा सोझां ठाढ़ छथि। कहै छथि हमरा आत्माकें चोट पहुँचत। हमरा हुनक शर्तक पालन कर’क अछि।’ ‘तखन कोना हेतै?’ बाबू पुछ्लनि। हम कहलियनि ‘हमरा सासुरसं आब’ दिय’।’ हमर विवाह एक साल पहिने भेल छल। द्विरागमन नै भेल छल।हमर ध्यान कनियाँक गहनापर गेल। हम सासुकें विस्तारपूर्वक सभ बात कहि देलियनि।ओ कहलनि-‘गहना-गुडिया एहने समयले’ रहै छै, ओहो त हिनके छनि।भरना राखि क’ एखन काज चलि जेतनि। बादमे नोकरी हेतनि त छोड़ा लिहथि।’ सएह केलियै। सभटा सामान कीनि क’ घरमे राखि लेल गेल। वरियातीक खर्चक व्यवस्था ले’ सेहो निश्चिन्त भ’ गेलहु। हम हुनका एकटा चिट्ठी लिखि क’ पठा देलियनि। हुनका गामपर जे-जे प्रतिक्रिया भेलै, से सभटा लिखैत इहो लीखि देलियनि जे मामाजी गेल हेताह, ओ किछु सुझाव देने हेताह। ओना हमरा पूरा विश्वास अछि, मुदा यदि अपनेकें लागय जे गलतीसं निर्णय लिया गेल अछि त अपने एखनो स्वतंत्र छी निर्णय बदलक लेल, हमर एतबे अनुरोध जे यदि कोनो कारणसं अपनेकें परिवर्तन आवश्यक बुझाए त जल्दीए हमरा सूचित करबाक कष्ट करब जाहिसं हमरा अन्यत्र कतौ प्रयास करबा ले’ समय भेट सकय। चिट्ठीक जबाब नै आएल। ओत’ चिट्ठी बहुत-बहुत दिन पर पहुचैत छलै। फोनक सुविधा त छलैहे नै। जे दिन तय रहै ओइसं चारि दिन पहिने सबेरे-सबेरे एक व्यक्ति साइकिलसं एलाह आ कहलनि –‘ननू कका काल्हि गाम एलाह,अहाँकें बजबैत छथि।’ ओ रुकलाह नै। हम तुरंते तैयार भेलहु। बैगमे सभ किनल सामान लेलहु। रिक्शासं विदा भेलहु। दरबज्जापर एकदम प्रसन्न मुद्रामे भेटलाह। प्रणाम केलियनि। ‘एकदम प्रसन्न रहू।’ ख़ुशीसं बजलाह। हम पुछलियनि-‘हमर चिट्ठी भेटल रहय?’ ‘हं।’ ओ कहलनि। ‘हम उताराक बाट तकैत छलहु।’ ‘किए? हमरा बातपर भरोस नै छल?’ ओ हंसैत कहलनि। ‘भरोस त छल, मुदा कखनो-कखनो ई होइत छल जे मामाजीक कारण अपनेकें निर्णय बदलबाक लेल बाध्य ने हुअ पडल हुअए।’ ओ कहलनि- ‘गेल रहथि। कहलनि, अहांक माथा खराब भ’गेल अछि। कहलियनि अहाँ निश्चिन्त रहू, सेहो हएत त अहाँकें कोनो कष्ट नै देब। हमरा समझाब’ लगलाह। पुछलियनि अहाँ हमरासं जेठ छी कि छोट, कहलनि से त छोटे छी। त कहलियनि जे हम अहाँकें समझाएब कि अहाँ हमरा समझाब’ आएल छी। रहू, भोजन करू, हमरा ख़ुशीमे शामिल होउ। कहलनि जे हमर बात नै मानब त हम वरियातियोमे नै जाएब। हम कहलियनि जे हमरा ख़ुशीमे अहाँकें दुःख हुअए त दुखी मोनसं वरियाती जेबो नै करू। भगला ओत’सं, ओ नै जेताह वरियाती। हम एतहु लोक सभकें कहि देलियनिहें, जे ख़ुशी मोनसं चलि सकथि सएह वरियाती चलथि ने त नै जाथि। जे मनुक्ख जकां भोजन करथि से चलथि, जिनका राक्षस जकां भोजन करबाक होइन से नै जाथि।’ भरल दलान लोक आ एतेक स्पष्ट रुपें बात करब-हमरा लेल एकदम अप्रत्याशित छल। ओ हमरा कहलनि-‘पंद्रह आदमी रहब। अहाँ तरकारी दूटासं बेशी नै करब, दू तौला दही पौरबा लिय’,मात्र एकटा मिठाई राखब, और किछु नै करक अछि।परेशान हेबाक काज नै करब, जएह रहत ताहीमे यश-यश भ’ जाएत।’ हम कहलियनि –‘ अपनेक शर्तक पालन करैत हम सभ आनंदपूर्वक किछु चीजक इन्तिजाम क’क’ अनने छी से ग्रहण करबाक आज्ञा देबनि?’ हम बैगमे राखल सामान सभ निकाललहु त ओ नाराज होइत कहलनि- ‘ई आदर्श भेलै? जखन एते चीज अहाँसं लैए लेताह तखन कोन आदर्श?’ हम कतेक तरहें विश्वास दियौलियनि जे एहिमे हमर परिवारक आनंद आ उल्लास अछि, एहि लेल ने खेत भरना राख’ पडल अछि ने ककरोसं कर्ज लेब’ पडल अछि। ओ बालककें बजाक’ कहलथिन –‘ई विद्यार्थी जे किछु ल’ अनने छथि तकरा हिनक आशीर्वाद आ भगवानक प्रसाद बूझि सहर्ष ग्रहण क’ लिय’।’ हम बरजोरी हुनका सभ सामान द’ देलियनि। तेहेन हर्ष आ उल्लासक वातावरण ओ बनौने रहलखिन जे विवाहसं द्विरागमन धरि आनंदपूर्वक सभटा काज संपन्न भ’ गेलै। दुसबाक कोन कथा, साधारण-सं-साधारण चीजक प्रशंसा तेना करैत छलथिन जे सबहक मोन हर्षसं भरि जाइत छलैक। हुनक पुत्र सेहो हुनके लीखपर चलैत कहियो कोनो समस्या नै उत्पन्न होम’ देलथिन। ओ मित्र जकां सदैब रहलाह। हमरा पिताकें अपने पिता समान प्रेम आ आदर दैत रहलथिन।हमर पिता अपन अंतिम दू बरख हमरा लग छलाह परन्तु ओइसं पहिने किछु साल दिल्लीमे हिनके संग आनंदपूर्वक स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त केलनि।दिल्लीमे हमर अनुज लोकनि सेहो हिनक सानिध्य आ प्रेम प्राप्त क’ चुकल छथि। २००३ मे ननू कका ओछाइन ध’ नेने छलाह। २ मार्च क’ भेंट कर’ गेलियनि। कहलियनि –‘आशीर्वाद दियौ, ७ मार्च क’ कन्यादान करक अछि।’ कहलनि-‘सहर्ष आशीर्वाद दै छी, निर्विघ्न सभ काज पूर्ण हएत।’ ननू कका अंतिम समयमे सेहो अपन बात पर अडिग रहलाह। विवाह भेलै, चतुर्थी भेलै, जमाएकें विदा केलियनि। ओकर प्रात ननू कका देह त्यागि देलनि। ननू कका अइ संसारसं विदा भ’ गेलाह, मुदा हम जाधरि जीब, हमरा मोनसं कहियो नै विदा भ’ सकैत छथि ननू कका। (५) एकटा नाटकक अन्त : एक टा कथाक जन्म दिन भरि हम सभ क्लासक पाछाँ व्यस्त रहैत छलहुँ। साँझमे पाँच बजेसं सात बजे धरि समय रहैत छल घुमै लेल अथवा मनोरंजनक लेल। घुमैले’ हम सभ बान्ह पर जाइत छलहुँ। अधिक काल चारू गोटे संगे रहैत छलहुँ। गप कतहु सं शुरू होइ मुदा आबिक’ सभ दिन ओही ठाम पहुंचि जाइ छलै। एकटा झूठ सत्यक स्थान प्राप्त क’ नेने छल। मिश्र जी गीताक कोनो श्लोक द्वारा हमर स्थितिक विवेचन करैत छलाह आ समाधानक सूत्र कहैत छलाह। झाजी और ठाकुरजी सेहो अपन-अपन विचार दैत छलाह। सभ गोटे हमर तथाकथित समस्याकें सोझराबय चाहैत छलाह। निर्णय भेल जे पन्द्रह दिन बाद दू दिनक जे छुट्टी छै तकर उपयोग करैत हम शनि दिन क्लासक बाद बस पकडब। एहि सं पहिने हम एकटा चिट्ठी लीखि पठा दिऐ। मिश्र जी हमरा रजोगुण आ तमोगुणक त्यागक लाभ बुझबैत रहलाह।एकटा चिट्ठी हमरासं लिखबाओल गेल। निर्धारित दिन, जेबाक लेल हमर यथोचित तैयारी नहि देखि, हम नीक जकाँ जाइ तकर तत्काल प्रबन्ध भेल। झाजी अपन बला आयरन कएल सुन्दर पैंट-शर्ट पहीरिक’ जाए लेल देलनि, जे हमरा फिट सेहो भ’ गेल। ठाकुर जी अपन बला नबका बैग देलनि। एक बेर फेर हम अपन स्थिति स्पष्ट करबाक कोशिश केलहुँ, मुदा झूठ ततेक आकर्षक भ’ गेल छलैक जे सत्य प्रभावहीन भ’ गेल छल। क्लासक बाद, भोजनक बाद बस स्टैंड आबि हमरा दरभंगा बला बस पकड़ा देल गेल । बसमे सीट भेटि गेल। बैगसं ‘मिथिला मिहिर’ निकाललहुँ। पढ़’ लगलहुँ। कोनो कथा पढ़ैत-पढैत एकाएक ध्यानमे आएल, हम जाहि स्थितिक अभिनयमे बाझल छी, ईहो त’ एकटा कथा भ’ सकैत छै। हम कल्पनामे डूबि गेलहुँ। एकटा नव विवाहित युवक- पत्नीक कोनो व्यवहारसं दुखी भेल अछि – कतेक नीक-अधलाह कल्पना करैत अछि –बहुत दिनसं एकटा चिट्ठीक बाट तकैत अछि –चिट्ठीक बिना डेग नहि उठब’ चाहैत अछि- परीक्षाक अंतिम दिन छै-कॉलेज सं घुरैत अछि –चाहैत अछि कोनो चिट्ठी आएल रहितै त’ आइ अवश्य विदा होइत सासुर.......। अपने संग संवाद चलि रहल छल। धुर, एहेन झूठ कतहु कथा भेलैए। त’ की कथा सत्य हेबाक चाही? कथा कोनो अखबारक समाचार थोड़े होइछै? त की सभटा जे कथा पढैत छी, झूठ छै? से नहि त की? कनी सत्य आ बेशी झूठ। मगर झूठ किए? बिना झूठ के कथा नै भ’ सकै छै? बिना झूठक कथा माने कोनो अखबारक समाचार। नै, अखबार ओ कहै छै जे भेलैए, जे हेबाक चाही से कथा कहतै। कथा लोकक सम्वेदनाकें जगबैत छै। अखबारमे एकटा तथ्य रहैत छै,कथा एकटा सत्य दिस लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि। कथासं एकटा सन्देश निकलैत छै, जकर उद्देश्य कल्याण होइ छै, सुख आ शान्ति होइ छै। कथ्य, तथ्य आ सत्य मे की अंतर? की तीनू एके नै भ’ सकैत अछि? किछु कथा सुखान्त होइत अछि, किएक त जीवनक लक्ष्य होइत अछि सुख-शान्ति, अन्त नीक त सभटा नीक। किछु कथाक अन्त दुखमे होइत अछि...एकटा प्रश्न छोडि जाइत अछि...एहि दुखसं उबरबाक प्रश्न। हमरा नीक लगैत अछि सुखान्त कथा। हमर कथा सेहो एहने हेबाक चाही। लिखलाक बाद मोन हल्लुक लागय। हम अपन कथाक अन्त तकैत छी .....हम सिनेहसं किरण दिस तकैत छी.....तकिते रहैत छी .....बड़ी काल धरि....नीक लगैत अछि एना ताकब ....बहुत दिनक बाद। बस रुकल। हमर कल्पनाक उड़ान बन्द भेल। आबि गेल छलहुँ लहेरियासराय। लहेरियासराय सं दरभंगा, दरभंगासं सकरी –पंडौल होइत कैटोला चौक धरि पहुँचैत-पहुँचैत कथा मोनमे जन्म ल’ नेने छल आ कागत पर उतरबा लेल लालटेमक इजोत, कागत आ पेनक प्रतीक्षा करय लागल। सबेरे स्नान क’ क’ सायकिल लेलहुँ, विदा भेलहुँ भवानीपुर। संगे छलाह आशा भाइ आ भगवान बाबू। ईहो स्थान एकटा कथाक कारणें आकर्षित केने अछि। उगना नाटकमे एकर वर्णन अछि। महाकवि विद्यापति राजा शिव सिंह ओत’ जा रहल छलाह, संगमे छलनि खबास उगना। एतहि एलाक बाद बड्ड जोर पियास लगलनि। उगना कनिए कालमे जल आनिक’ देलकनि पीबाक लेल। पीलनि त गंगाजलक आभास भेलनि। पुछलखिन कत’ सं जल अनलें त जे जबाब भेटनि, ताहिसं संतुष्ट नहि होइत छलाह। लगमे कतहु जलाशय हेबाक सम्भावना नहि बुझाइत छलनि। कोनो अलौकिक शक्तिक आभास भेलनि। ध्यान केलनि त’ महादेव सोझां आबि गेलखिन। उगनामे महादेवक दर्शन भेलनि।पएर पकड़ि लेलखिन। महादेव किछु पल लेल दर्शन दैत कहलखिन जे ई रहस्य जहिए ककरो लग प्रकट करब, हम अलोपित भ’ जाएब। कथा कहैत अछि जे महादेव विद्यापतिक गीतसं एतेक प्रभावित भेलाह जे हुनका संग रहबाक लेल धरतीपर एलाह आ हुनकर खबास बनिक’ बहुत दिन धरि रहलाह। काव्य-कर्मकें प्रतिष्ठा देब’ बला ई अदभुत कथा अछि। एहि कथाक कारण ई स्थान मिथिलाक प्रमुख धार्मिक स्थलक रूपमे लोकक आस्थाक केन्द्रमे रहल अछि। भव्य मन्दिर आ जलाशय लोककें आकृष्ट करैत अछि। शिव रात्रिमे एहि ठामक दृश्य मनोहर रहैत अछि, ओना रवि दिनक’ सेहो सालो भरि दर्शक आ शिव-भक्त लोकनि अबैत रहैत छथि। हमहूँ सभ कतेक रविक’ एत’ आएल छलहुँ। ढोली जेबासं पहिने नियमित रूपसं रवि दिनक’ अबैत छलहुँ। पूजाक बाद मुरही-कचरी कीनि कतहु बैसिक’ गप-शप करैत खेबाक आ फेर साइकिलसं घर घुरैत आनन्दक अनुभव करैत छलहुँ। से बहुत दिनक बाद आइयो भेल। आइयो विद्यापति आ उगनाक कथापर विचार करैत आनन्द अबैत अछि। पुराण सभमे भगवानक विभिन्न अवतारक कथाक वर्णन अछि। कहल गेल अछि जे धरतीपर जखन-जखन अन्याय-आतंक-अत्याचार बहुत बढ़ि जाइत अछि त धर्मक स्थापनाक लेल भगवान विभिन्न रूपमे प्रकट होइत छथि। कोनो महाकवि अपन विशिष्ट रचना द्वारा सामूहिक चेतनाक आविष्कार करैत छथि। यैह चेतना जन-मनमे नव संकल्प-शक्ति आ संस्कार भरैत अछि जे अपेक्षित सामाजिक, आर्थिक आ राजनीतिक आन्दोलनक सूत्रपात करैत अछि जे अन्याय-आतंक आ अत्याचारक अन्त करैत अछि। एहि चेतनाकें भगवानक रूपमे देखल जा सकैत अछि। महाकवि विद्यापतिक समयमे समाजमे जे असमानता अथवा विद्रूपता छलै, तकरा मधुर गीतक माध्यमसं लोकक समक्ष आनि लोककें जागृत कएल गेल जे एकटा सांस्कृतिक आंदोलनक रूपमे देश-विदेश सभ ठाम प्रतिष्ठित भेल अछि। विद्यापति आ उगनाक कथाकें जखन एहि दृष्टिसं देखैत छी त कथाकारक प्रति असीम श्रद्धा होइत अछि। ई शोधक विषय भ’ सकैत अछि जे टेलिफ़ोन-मोबाइलक आविष्कारमे ‘के पतिया लय जायत रे मोरा प्रियतम पास....’ अथवा एहने कोनो रचनाक की आ कतेक योगदान अछि, अनमेल विवाहकें रोकबामे ‘पिया मोर बालक......’ गीतक हस्तक्षेपक की प्रभाव पडल। साँझमे बैगसं कापी आ पेन निकालि लालटेम ल’ क’ बैसि गेलहुँ। सबेरमे मोन प्रसन्न लगैत छल। कागतपर कथाक जन्म भ’ चुकल छलै। आनंदक अनुभव करैत गामसँ प्रस्थान केलहुँ ढोलीक लेल। हमर मोन प्रसन्न छल, से देखि हमर शुभेच्छु संगी सभ सेहो प्रसन्न भेलाह। हमर कथा पढ़िक’ मिश्रजीकें नीक लगलनि आ आगू किछु पुछबाक आवश्यकता नहि रहि गेलनि। कह्लनि कथा आकाशवाणीकें पठा दियौ। तीनू गोटेक यैह सुझाव छलनि। फेयर क’ क’ कथाकें आकाशवाणी,पटना कें मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ ले पठा देलहुँ । एक मासक भीतरे आकाशवाणीसं सूचना भेटल जे कथा ‘भारती’मे प्रसारण हेतु स्वीकृत कएल गेल अछि, अतिरिक्त सूचना बादमे भेटत। नीक लागल। फेर किछु दिनक बाद प्रसारणक तिथि, समय आ पारिश्रमिक-राशिक सूचना भेटल। आनंदित भेलहुँ। संगी सबहक सुझाव जे हम अपनहि जा क’ कथाक पाठ करी, कल्पना ई जे कथाक नायिका सेहो सुनतीह त आनन्दित हेतीह। प्रसारणक समय ५.३० छलै। हम करीब ११ बजे आकाशवाणी पहुँचलहुँ। गुंजनजीक आवाज त सुनने छलहुँ, भेंट आइ पहिल बेर भेल छल, से नीक लागल। अपन एबाक उद्देश्य कहलियनि।सम्पादित कथा देख’ देलनि। देखलिऐ, किछु ठाम अंगरेजीक शब्द छलै, तकरा बदला मैथिली शब्द राखल गेल छलै, किछु और सुधार कयल गेल छलै। हम आगाँ ध्यानमे रखबाक संकल्प केलहुँ। कथा-पाठ लेल १० मिनट निर्धारित छलै। हमरा पढ़’ कहलनि। कहलनि, हडबडी करबाक काज नै छै, एक-आध मिनट बेशीयो लागि जाइ त कोनो बात नै। कार्यक्रम साढ़े पाँच सं शुरू होइत छलै, हमरा पाँच बजे आबि जाय कहलनि। हम पाँच बजे गेलहुँ, त कथा प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’क हाथमे देखलियनि। प्रेमलता जी सेहो ‘भारती’ मे रहैत छलीह। गुंजन जी आ प्रेमलताजीक स्वर सुनने रही,मुदा सोझां देखबाक-सुनबाक ई पहिल अवसर छल, से आनंदित भेलहुँ। कथा पर दुनू गोटेक टिप्पणी नीक लागल। एकटा नव विवाहित नवयुवकक मनःस्थितिक चित्रण छलै कथामे। मिश्र जी कहैत छलाह जे ई जिनगी दू टा जिनगीक बीच ओहिना अछि जेना सिनेमाक बीचमे इन्टरवल होइ छै। हम कथाक नाम ‘इन्टरवल’ रखने रही, तकरा स्थान पर ‘धारक ओइ पार’ कयल गेल रहै, से हमरा कथाक अनुरूप ठीक लागल आ एहिसं शीर्षक चुनबाक लेल नव दृष्टि भेटल। नीक अनुभवक संग घुरल रही पटनासं। पटनासं घुरैत काल सोचैत रही जे कथामे की रहै -सन्देहक एकटा धार छलै, जकरा ओइ पार तथ्य छलै, से सुन्दर छलै, कल्याणकारी छलै। मुदा छलै त एकटा कल्पना आ कल्पना मात्र। हमर त विवाहो नै भेल अछि । अपनहि मोन उतारा देलक, रोगीक दुःख दूर करबाक लेल कोनो जरुरी छै जे डॉक्टर कें बिमारीक अनुभव होइ? त की जतेक कथा पढैत छी, से कल्पनाक कमाल मात्र थिक? सीता आ रामक कथा – रामक चरण रजसं अहिल्याक उद्धारक कथा, आइ रामक राजतिलकक निर्णय आ काल्हि चौदह बरखक लेल वनबासक कथा, सीता-हरण आ रावणक मृत्युक पश्तात रामक अयोध्या आगमन आ राज्याभिषेक –एहिमे कतेक सत्य आ कतेक कल्पनाक उड़ान से के कहि सकत। मुदा कथा विभिन्न परिस्थितिमे स्वस्थ जीवन जीवाक लेल मार्ग-दर्शनक रूपमे एकटा उपकरण बनिक सोझां अबैत अछि। हमरा ‘कन्यादान’क बुच्ची दाइक कथा मोन पडैत अछि। बुच्ची दाइक वियाहक कथा –सी सी मिश्रक कथा – अनमेल विवाहक परिणाम –एकटा सामाजिक समस्या –समस्याक निदान देखबैत ‘द्विरागमन’ –की एना सम्भव छै.......मुदा, हम ई सभ किएक सोच’ लगलहुँ - हमरा जीवनमे बुच्ची दाइ नहि आबि सकैत छथि- हमरा सावधान रहबाक अछि ...एकदम सावधान .... हमरा लगैत अछि जे जीवनक आनन्द लेल जीविकोपार्जनक व्यवस्था आ साहित्यसं प्रेम दूनू जरूरी अछि आ साहित्यसं प्रेमक लेल आवश्यक अछि जे पत्नी सेहो पढ़लि-लिखलि होथि .... आ से किएक ने भ’ सकैत अछि ...एकटा कल्पनामे विचरण करैत ढोली पहुँचलहुँ। होस्टल पहुंचि आनन्दित भेलहुँ। हमर प्रिय संगी सभ सुनने छलाह कार्यक्रम। सबहक कल्पना ई जे कनियाँ सेहो सुनने हेतीह त कते आनन्दित भेल हेतीह। आब चर्चाक केन्द्र ई कथा बन’ लागल। हम कागज़ पर दू टा टुकड़ीमे लिखलहुँ जे एहि नाटककें एतहि समाप्त कर’ चाहैत छी आ ठाकुरजी आ झाजीक कोठलीमे एक-एक टा टुकड़ी नीचाँ द’ क’ रातिमे खसा देलहुँ। मिश्रजीकें मौखिक रूप सं कहि देलियनि, मुदा कियो मान’ लेल तैयार नहि भेलाह। हमरा कखनो क’ हुअ’ लागल की पता इहो सभ बुझियोक’ नहि बुझबाक नाटक क’ रहल छथि। तिला संक्रान्तिक बाद हमर पिता गामसं किछु सनेश नेने एलाह त कोनो तरहें मिश्रजी पूछि क’ सत्यकें स्वीकार करबाक स्थितिमे अबैत एक दिन कहलनि, हम सभ गोटे एहि सृष्टिमे कोनो-ने-कोनो भूमिकामे रहैत जीवन भरि अभिनय करैत रहैत छी, कखनो बालक-बालिकाक रूपमे, कखनो माता-पिताक रूपमे अथवा छात्र-गुरु,पोता-दादा, मित्र-शत्रु अथवा आन कोनो संबन्धमे, ई संसार एकटा रंगमंच अछि आ हम सभ अभिनेता, अभिनेता मंचसं दूर भ’ जाइत अछि,मुदा अभिनयक स्मृति शेष रहि जाइत अछि ; अभिनेता बदलि जाइत अछि, रंगमंचपर अभिनय चलैत रहैत अछि.......... (६) मृगतृष्णा आ कि पशुपतिनाथक दर्शन उन्हत्तरिमे प्रथम वर्षमे पचास गोटेक नामांकन भेल रहनि। ओहिमे सं दुलार चन्द्र मिस्त्रीकें मेडिकलमे भ’ गेलनि, त ओ चल गेलाह। शेष उनचास गोटे उत्तर बिहारक विभिन्न जिलाक, भिन्न-भिन्न सामाजिक, आर्थिक आ शैक्षणिक पृष्ठभूमिक छलाह। विभिन्न स्वभाव आ संस्कारसं युक्त सभ गोटेक एक अनुशासनमे एकहि छत तर-छात्रावासमे रहब, एक संग भोजन-जलखै करब, एक संग कक्षामे जाएब सभ दिन उत्सव जकाँ लगैत छलै। मोन पडैत छथि नारायण मिश्र,अशोक कुमार ठाकुर, नन्द कुनार झा, रामाधीन ठाकुर, अवधेश प्रसाद, राम नरेश प्रसाद,कंचन साह, कृष्ण मुरारी, कृष्ण कुमार, बृज किशोर सिंह, समरेन्द्र नारायण सिंह, सत्येन्द्र प्रसाद सिंह, ब्रज भूषण शर्मा, प्रेमचन्द केसरी आ और बहुत गोटे जिनकर नाम एखन नहि मोन अछि। अपनामे मैथिलीएमे गप करबाक कारणे नारायण मिश्रजी आशोक कुमार ठाकुरजी नन्द कुमार झाजी आ रामाधीन ठाकुरजीक संग हम बेशी सहज अनुभव करैत छलहुँ। नारायण मिश्र जी बनगाम (सहरसा)क छलाह, अशोक कुमार ठाकुर जी डुमरिया (पूर्णियां) आ नन्द कुमार झा जी मोहना, झंझारपुर ( मधुबनी)क छलाह। हिनका सभसं सम्पर्क बादहुमे रहल। मोन पडैत छथि आदरणीय श्री अयोध्या प्रसाद मिश्र, प्राचार्य आ प्राध्यापकगणमे श्री एन.के.सिन्हा, श्री के.पी.सिंह, श्री एस. श्रीवास्तव, श्री टी. डी. सिंह, श्री एस.एन. ओझा, श्री एन.के. सिंह, श्री बी.डी. सिंह। कॉलेजमे पढ़ाइ नीक होइत छलै। एकोटा क्लास खाली नै जाइ छलै। समय-समयपर नाटक आ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो होइ छलै। कॉलेज आ छात्रावास सभ ठाम हम सभ नीक अनुभव क’ रहल छलहु। तैयारी नीक चलि रहल छल। वार्षिक परीक्षाक समय सेहो निकट अबैत जा रहल छल। एकटा अन्हड़ एलै। कॉलेजमे कृषि राज्य मन्त्री एलाह। हॉलमे हुनकर भाषण भेलनि। ओ कहलखिन जे सरकार निर्णय ल’ रहल अछि जे कृषि स्नातक लोकनिकें आब नोकरीक बदलामे १० एकड़ खेत देल जेतनि, बैंकसं जरुरतिक अनुसार कर्ज देल जेतनि। बैज्ञानिक ढंगसं खेती करताह, आनन्दसं जीवन-यापन करताह। भाषण सूनि बहुत गोटे निराश भेलाह। हमहूँ निराश भेलहुँ। हम सभ चाहैत छलहुँ नोकरी जाहिमे रौदी-दाहीक प्रभाव नहि पडैत छलै। बाबा गृहस्थ छलाह। पिता गृहस्थ छलाह। खेतीक अनुभव नीक नहि छलनि।चारि-पांच बीघा खेतक उपजसं घरक आवश्यकतानुसार अन्न नहि प्राप्त होइत छलैक। कर्ज लेब’ पडैत छलै। खेत भरना धर’ पडैत छलै।लोक विपन्नतामे जीवन-यापन करैत छल। कियो नहि चाहैत छल जे ओकर धिया-पूता सभ सेहो अहिना अभावमे जीबए। रातिमे निन्न नहि भेल। आब की करब। इंजीनियरिंग पढ़िक’ लोक बैसल रहैत छल से जानि ओम्हर नहि गेलहुँ। मेडिकलमे नामांकन भेल नै। ई पढ़िक’ नोकरी भेटत नै। त’ आब की करब? पढ़ाईसं मोन उचटि गेल। अगिला शनि दिन सांझमे गाम पहुँचलहुँ । तेसर दिन एकटा कन्यागत पहुँचलाह। हुनका नेपालक नागरिकता छलनि। बायोलॉजी विषयक संग हमर प्राप्तांकक आधारपर कहलनि जे नेपाल सरकार द्वारा अहांक नामांकन मेडिकलमे कराओल जा सकैत अछि, एहि लेल हमरा हुनक कन्यासं विवाह करबाक स्वीकृति देब’ पडत। हुनक कन्या दस बरखक छलथिन, पाचमामे पढैत छलखिन। ई प्रस्ताव हमरा सभ गोटेकें चिन्तामे ध’ देलक। निर्णय लेब कठिन लगैत छल। कन्यागत एकटा विचार देलनि। विचार भेल जे हुनका संगे काठमांडू जाइ। देखी जे ऐ साल की भ’ सकै छै। तखन जे विचार हो से करी। अपन कन्याकें ओ देखा देलनि। चारि दिनक बाद हम सभ काठमांडूमे रही। हमर मार्क्स शीट ल’ क’ ओ गेलीह। हुनकर निकटक कोनो सम्बन्धी छलखिन नेपाल सरकारमे। हुनकासं भेंट क’ क’ एलीह। दू दिनक बाद परिणाम सुनौलनि जे ऐ साल मेडिकलक कोटा समाप्त भ’ गेल छै, इंजीनियरिंगमे जाए चाही त भ’ सकैए, करांची आ अफ्रीकाक लेल सीट खाली छै। मेडिकलमे जेबाक लेल एक साल प्रतीक्षा कर’ पडत। हमरा निर्णय लेबामे सुविधा भेल। हम निर्णय लेलहुँ। मेडिकल लेल एक साल प्रतीक्षा नहि करब। इंजीनियरिंग पढ़बा लेल करांची आ कि अफ्रीका नहि जाएब। बाबा पशुपतिनाथक दर्शन क’ क’ गाम घुरि एलहुँ। बाबूकें-माएकें सभ बात कहि देलियनि। दू-तीन दिनक बाद ढोलीक लेल प्रस्थान केलहुँ। ढोली अबैत काल अपन अभिभावक स्वयं बनल एलहु : की हेतै, एकठाम पाँच-दस एकड़ खेत रहै आ वैज्ञानिक विधिसं खेती कएल जाइ त किए ने लोक नीक जकाँ जीवन-यापन क’ सकैए? गामक स्थिति नीक एहि लेल नै छै जे ओत’ सिचाईक उपयुक्त साधनक अभाव छै आ वैज्ञानिक ढंगसं खेती नै भ’ रहल छै। नोकरीमे ट्रान्सफरक झंझट लागल रहै छै, तैसं त बांचल रहब। ढोली पहुँचलाक बाद ई अनुभव भेल जे पन्द्रह दिन कॉलेजसं अनुपस्थित रहिक’ हम बहुत पैघ गलती क’ चुकल छी। आब एहि गलतीक परिणाम सेहो एतैक। मुदा आब हमरा हाथमे की छल, जे संभव भ’ सकैत छैक से करब ठनलहुँ। परीक्षाक तिथिक घोषणा भ’ चुकल छलै। पच्चीस दिन शेष छलैक आ पढाई समाप्त भ’ गेल छलैक।एतबे दिनमे जतेक पढाई भ’ गेल छै, तकर तैयारी कोना करब, से समस्या छल। हमर जे निकटतम संगी सभ छलाह हुनका सबहक नोट बुक देखिक’, हिनका सभसं पूछि-पाछिक’ जे पढाई भ’गेल छलै, तकर तैयारीमे लागि गेलहुँ। ठाकुर जीक तैयारी नीक छलनि, मदति केलनि, क्षतिकें कम-सं-कम करबाक प्रयासमे लागि गेलहुँ। प्रैक्टिकल क्लासमे अनुपस्थित रहबासं भेल क्षतिकें कम करब बहुत कठिन छल। ईहो बूझल छल जे ऐ सालक परीक्षा-परिणामक प्रभाव तीनू सालक औसत परिणामपर पडत। ऐ साल जौं प्रथम श्रेणीमे नै एलहुँ, त अंतिम परिणाम प्रथम श्रेणी नै भ’ सकत। मोनकें मजबूत बनाक’ जे क’ सकैत छलहु, ताहिमे लागि गेलहुँ। एग्रोनोमीक प्रोफेसर एस.एन.ओझाजी कहलनि,’तुम्हारे भाग्य में यही लिखा हुआ है,कहाँ भाग-भाग कर जा रहे हो?’ एक-दू दिन स्वयंसं लडैत रहलहुँ। एके स्थिति छलै सबहक लेल, मुदा हम किए एतेक प्रभावित भ’ गेलहुँ? ठाकुर जी एम.एस.सी.(एजी ) करबाक निर्णय केने छलाह। झाजी सेहो विचलित नहि भेलाह। मिश्रजी सेहो स्थिर छलाह। किछु गोटे सोचि नेने छल ‘जे हेतै देखल जेतै।’ हमहीं किए एते चिन्तित भ’ गेलहुँ? एक गलती पहिने केलहुँ जे एडमिशन ल’क’ फेर नाम कटाक’ बायोलॉजी पढ़’ चल गेलहुँ । दोसर ई जे मेडिकल पढबाक लोभमे एकटा अप्रिय समझौता करबाक लेल तैयार भ’ गेलहुँ आ सलमपुरसं काठमांडू पहुंचि गेलहुँ । एहि निर्णयक लेल हमरापर कोनो दबाब त नहि छल। एहिमे हमर पिता-माताक त कोनो दोख नहि छलनि। ओझाजीक टिप्पणी सोझा आबि जाइत छल ‘ तुम्हारे भाग्य में .......’ त की नेपाल जेबाक निर्णय लेब आ फेर वापस एबाक निर्णय - इहो सभ भाग्यमे लिखल छल हेतै? भाग्यक बात सही होइ कि नै होइ मुदा हतोत्साहित हेबासं बचबाक लेल ई पैघ मन्त्र जकाँ काज करैत अछि। अहाँ अपन बुद्धि आ विवेकक उपयोग करैत सभ काज करैत चलू आ परिणाम जे आबय तकरा यैह सोचिक’ मोनकें मजबूत बना लिय’ जे यैह हेबाक छलै तें चिन्तामे डूबल रहबाक काज नै छै। एहिमे संगी-साथी सभक सहयोग सेहो महत्वपूर्ण होइत अछि। हमरा संगी-मित्र सबहक सहयोग भेटल जाहिसं जे समय बांचल छलै परीक्षाक लेल, ताहिमे संभावित क्षतिकें कम-सं-कम करबामे दिन-राति लागि गेलहुँ। अपना मोनकें मजबूत बनाक’ राखब सेहो हल्लुक काज नै छै, मुदा जीवनमे कतेक बेर एकर आवश्यकता पडैत छैक। सुनने रही कतेक गोटेक मूँहें ‘नेपाल जाएब, कपार संगे जाएत।’ एहि उक्तिक सकारात्मक पक्षपर विचार केलहुँ। हमर मोन आब मानि गेल रहय जे बाबा पशुपतिनाथ अपन दर्शनसं लाभान्वित करबाक लेल हमरा कोनो लाथे बजा लेलनि आ मोन स्थिर करबाक लेल उचित सलाह दैत घुरा देलनि। ओहि समयमे हम सभ एहि तथ्यसं एकदम अनभिज्ञ रही जे चौदह टा बैंकक राष्ट्रीयकरण भ’ गेल छै आ निकट भविष्यमे कृषि स्नातक सबहक लेल एहि बैंक सभमे भर्ती-अभियान शुरू होइ बला छै। (७) गुरुर्विष्णुः परीक्षा शुरू भेलै। हॉलमे भ’ रहल छलै। बडकी टा हॉल, उनचास टा परीक्षार्थी, सभकें एक-एक टा कुर्सी-टेबुल, सबहक बीच पर्याप्त दूरी। मंचपर सिंह साहेब, हुनका सोझां एक-एक छात्रक गतिविधि एकदम साफ़,कतहु कोनो गड़बड़ीक आशंका नहि, परीक्षा-हॉलमे एकदम शान्ति। सिंह साहेब सुनिश्चित केलनि जे सभटा ठीक चलि रहल अछि,अखबार पढ़’ लगलाह। किछु काल बीतल हेतै कि शान्ति भंग भेलै। ‘क्या बात है?’ ‘हम बाहर जाना चाहते हैं।’ ‘कहाँ?’ ‘हॉस्टल’ “क्यों?’ ‘किताब लाने के लिए’ ‘क्यों?’ ‘देखकर लिखने के लिए’ ‘क्या बकते हो?’ ‘सही कह रहा हूँ।’ ‘गेट आउट .......’ ‘हम वृक्ष के सूखे पत्ते नहीं हैं कि हवा के एक झोंके में गिर जाएंगे...’ हॉल गनगना गेलै। प्राचार्य महोदय दौगल एलाह, हुनका संग किछु और प्रोफेसर हल्ला सुनिक’ दौगल एलाह। मंच पर ठाढ़ छलाह सिंह साहेब, नीचांमे ठाढ़ छलाह मिश्र जी, हमर रूम-मेट मिश्र जी। ‘क्या नाम है तुम्हारा?’ ‘मुझे नारायण कहते हैं,सर।’ ‘क्या बात हुई है नारायण?’ ‘सर,मैं तो यही चाहता हूँ कि सभी को समान सुविधा मिलनी चाहिए।’ ‘थोडा और स्पष्ट करो।’ ‘सर,इससे ज्यादा मै कह भी नहीं सकता हूँ।’ प्राचार्य महोदय श्रीवास्तवजी दिस ताकि किछु कहलखिन, खोज शुरू भेल। एक-एक क’ सभ छात्रक शर्ट, पैंट, मौजा, जूता सबहक तलाशी भेल, एक ठाम जा क’ सभ रुकि गेलाह। ओ छात्र लजा गेल छल।एकटा पन्ना ओकर मौजामे भेटलै। जाहि प्रश्नक उत्तर ओहिमे छलै, तकर मिलान भेलै, ओकरा समझा-बुझाक’ ओ उत्तर कटबा देल गेलै,दोसर कॉपी देल गेलै आ फेर एहेन गलती नै करबाक चेतौनी देल गेलै। मिश्रजीसं पूछल गेलनि जे हुनका हिसाबसं और की दंड देल जाइ। मिश्रजी कहलखिन ‘मुझे किसी को दंड देने या दिलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है,मैं अपने साथी को दंड क्यों दिलाना चाहूँगा,मैं तो सिर्फ यह चाहता था कि सबको समान सुविधा मिले। सभ छात्र चुपचाप ई दृश्य देखि रहल छल। सबहक कलम रुकि गेल छलै। सभ प्राध्यापक चुप छलाह। एकटा अज्ञात भय व्याप्त छलै। वातावरणमे। ‘सभी को पन्द्रह मिनट अतिरिक्त समय दिया जाएगा।’ प्राचार्य महोदय बजलाह। ओ मिश्रजी लग एलाह। ‘ठीक है नारायण अब लिखना शुरू करो।’ ‘हम अब क्या परीक्षा देंगे सर, हम नहीं लिख पाएंगे।’ ‘तुमको अतिरिक्त आधा घंटा समय मिलेगा।’ ‘नहीं सर, मैं बिल्कुल असंतुलित हो गया हूँ, मैं क्या परीक्षा दूंगा।’ ‘ऐसा नहीं कहते, साल बर्बाद नहीं करना है, चलो तुम जितनी देर चाहो लिखो, मगर परीक्षा मत छोडो।’ मिश्रजीक पीठ थपथपबैत प्राचार्य महोदय निकलि गेलाह। फेर मिश्रजी सेहो बैसलाह, सभ शुरू केलक लिखनाइ। परीक्षा हॉल सं निकलैत काल सभ छत्रक ठोरपर मिश्रजीक नाम छल। ‘मिश्रजी को ऐसे नहीं बोलना चाहिए।’ ‘अब इनका निकलना तो मुश्किल है।’ ‘प्रोफेसर से ऐसे बात करना बहुत मंहगा पड़ेगा।’ ‘हाँ भाई, प्रैक्टिकल तो इन्हीं लोगों के हाथ में रहता है, ये लोग पास होने देंगे?’ हम वस्तुस्तितिकें बुझबाक प्रयास करैत रहलहुँ। मिश्रजी जखन एलाह तखन बुझलियै जे एकटा स्टाफ-सदस्य आबिक’ चुपचाप ओकरा एकटा कागज़ द’क’ चलि गेलै,सिंह साहेब नै देखलखिन, मिश्र जी देखि लेलखिन आ अपना ढंगसं एकर विरोध केलखिन।एकटा अनुभवी प्राध्यापकक समक्ष फर्स्ट इयरक एकटा छात्रक एना विरोध प्रगट करब ककरो पचि नै रहल छलै। ककरोमे एतेक साहस नै छलै, जतेक मिश्र जी देखौने छलाह। हमहूँ देखने रहितौं त एना विरोध प्रगट नै क’ सकैत छलहुँ।कियो नै क’ सकैत छल।हम सोचि नै पबैत छलहुँ जे मिश्रजीकें की कहियनि। मिश्र जी सेहो कॉलेज सं एलाक बाद मौन भ’ गेल छलाह। साँझमे हॉस्टलमे ओझाजी एलाह। रुमक सोझां आबि ठाढ़ भेलाह। ‘कौन है नारायण?’ ‘प्रणाम सर।’ मिश्र जी सोझां एलाह।ओझाजी तेना देखलखिन जेना पहिल बेर देखि रहल होथिन। ‘जो कुछ सुना है, क्या यह सत्य है?’ हम चुप्प छलहुँ। मिश्र जी सेहो चुप्प छलाह। ‘मै नहीं था, अगर मैं रहता, तो आज या तो तुम रहते इस संस्था में या मैं रहता, मैं तो वर्दाश्त नहीं कर पाता।’ कियो किछु नै बाजल। ओझाजी विदा भेलाह, पाछाँ बहुत छात्र सेहो चलल। हम सेहो ओहि मध्य रही। मिश्र जी रूमेमे रहि गेलाह। छात्र सभ उत्सुक छल जान’ लेल जे कोन दण्ड मिश्र जीकें देल जेतनि।किछु गोटे सिंह साहेबक प्रति अपन आदर प्रदर्शित क’ रहल छल : सर बहुत बुरा हुआ, सिंह साहेब के साथ मिश्र जी को ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। किछु गोटे चुप्प छल। हमहूँ चुप छलहुँ। हम किछु दूर संगे जाक’ घुरि एलहुँ। मिश्र जी गुम्म छलाह। किछु कालक बाद हॉस्टल मे हल्ला भ’ गेलै जे महाविद्यालयक समस्त स्टाफक मीटिंग भेलैए जाहिमे मिश्रजी पर अनुशासनिक कारर्बाई करबाक निर्णय लेल गेलैए। ईहो हल्ला भेलै जे ओझाजी स्वयं ई बात कहलखिनहें। किछु गोटे हमरा रूम मे आबिक’ ई बात कहि गेल। किछु गोटे मिश्रजीकें सेहो सलाह देब’ एलनि : अब आपके लिए यहाँ रहना अच्छा नहीं होगा। एक गोटे एलनि : मिश्र जी, आप तो जा रहे हैं, अपना बॉटनी की किताब मुझे दे दीजिए, इसकी क्या जरूरत होगी आपको। ‘चलू, भोजन क’क’ अबै छी।’ हमरा मुंह सं निकलल। जेना-तेना हम सभ भोजनमे सम्मिलित भेलहुँ। ओतहु किछु गोटे यैह सुझाव देलकनि। मिश्र जी मौन छलाह। हमहूँ मौन छलहुँ। किछु फुरा नै रहल छल जे हम की सलाह दीयनि आ हमर सलाह हुनका लेल कतेक उपयोगी हेतनि सेहो स्पष्ट नहि छल। थोड़े काल पडल रहलाक बाद एकाएक मिश्र जी उठलाह, अपन किताब आ कपडा आदि सभ सामान समेटलनि आ हमरा कहलनि ‘ कहल-सुनल माफ़ करब ठाकुरजी, हम जा रहल छी।’ ‘कत?’ हमरा लागल आब हमरा किछु बाज’ पडत, किछु करब अनिवार्य लागल। ‘कोनो दोसर बाट पकड’ पडत।’ ‘से किए?’ ‘सुनै नै छिऐ? आब हमरा या त’ निकालि देत या पास नै कर’ देत, तैसं नीक हमहीं छोडि दी।’ ‘त एखन रातिमे किए? सोचि-बिचारिक’ काल्हि निर्णय लेब, दोसर विषयक परीक्षा त एक सप्ताहक बाद छै ने?’ ‘नै,हम सोचि लेलहुँ, हमरा जाए दिय’।’ ‘की अहाँ सोचैत छी जे अहाँसं कोनो अपराध भेल अछि? हमरा त नै लगैए जे अहाँ अपराधी छी। आ अहाँ अपराधी नै छी त दण्ड अहाँ किए भोगब?’ ‘मुदा, सुनलिऐ नै ओझाजी की कहैत छलाह, सभ प्रतिष्ठाक प्रश्न बना लेलकैए, हमरा पास नै कर’ देत।’ ‘त हमर एकटा बात मानि लिय’, एखन जाएब त’सभ कहत डरसं भागि गेलाह, जेबे करब त काल्हि ओझाजी सं भेंट क’क’ जाउ?’ ‘की हमरा माफ़ी मांग’ कहै छी?से हम नै कए सकै छी’ ‘नै, माफ़ी कथीक? अहांक गलती एतबे ने जे तेज आवाजमे सिंह साहेबसं गप केलहुँ, मुदा एहि लेल जं ओझाजी एतेक नाराज छथि त हुनका कहबनि जे राखू अपन कॉलेज, अहीं सभ रहू, हमहीं जा रहल छी।’ हमर ई प्रस्ताव मिश्रजी मानि लेलनि। बान्हल बेडिंग खोलि आरामसं पड़लाह मिश्र जी, हमरा लागल जेना हमरा बूते अनायास एकटा नीक काज भ’ गेल अछि। सबेरे स्नान-जलखै क’ क’ दुनू गोटे विदा भेलहुँ ओझाजी ओत’। बहुत गोटे कें भेलै जे मिश्र जी आइ कॉलेज छोडि देताह। हम सभ ओझाजीक डेरा पहुँचलहुँ त पता लागल जे ओ कतहु कोनो काजे निकलल छथि। पता लागल जे कनिएँ दूर पर छनि सिंह साहेबक डेरा। ‘चलू, सिंह साहेब ओत’ चलै छी।’ हमरा मुंहसं निकलल। ‘नै, हम ओत’ नै जाएब, हम माफ़ी सेहो नै मांगि सकै छी।’ ‘अहाँ किछु नै कहबनि, हमहीं कहबनि जे ओझाजी ई बजलखिनहें, तें अहाँ कॉलेजसं जा रहल छी।’ हम सभ पहुँचलहुँ त सिंह साहेब स्नान कर’ जाइ छलाह। हमरा सभकें बैस’ कहलनि आ पाँच मिनट बाद स्नान क’क’ लग मे एलाह। मैडम तीन ठाम प्लेटमे कचौड़ी,तरकारी आ जिलेबी राखि गेलीह। सिंह साहेब हमरा दिस तकलनि। ‘सर, मिश्रजी रात ही कॉलेज छोडकर जा रहे थे, मैंने कहा कि कल सर से भेंट करके प्रस्थान करना ठीक होगा, हमलोग एक ही रूम में रहते हैं।’ हमरा मुंह सं निकलल। ‘इसमें कॉलेज से जाने की बात कहाँ से आ गयी?’ ‘सर, कल शाम में ओझा जी हॉस्टल पहुंचे थे, कुछ लड़के बता रहे थे कि ओझा जी कह रहे थे, पास नहीं करने देंगे।’ ‘और मैं तुम्हें कहता हूँ कि कोई तुम्हें फेल नहीं करा सकता है, नारायण, मेरी ओर देखो,मैं देखने में काला हूँ, दिल का काला नहीं हूँ।’ मिश्र जी मोम भ’ गेलाह : सर मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया, आपका तो कसूर था नहीं। ‘तुम्हारा भी कसूर नहीं था, मैं तुम्हारी पीड़ा समझ सकता हूँ।तुम अगर कॉलेज से चले गए तो जिन्दगी भर मेरी आत्मा मुझे कोसती रहेगी कि मेरे चलते एक लड़के की जिन्दगी खराब हुई।मैं ऐसा होने नहीं दूंगा।’ मिश्र जीक आँखिमे नोर, सिंह साहेबक आँखिमे नोर। ई दृश्य देखि हमरो कना गेल। ‘लो खाओ और मुझे वचन दो कि जाने की बात कभी नहीं करोगे।’ सिंह साहेब अपने हाथसं प्लेट मिश्रजीक आगाँ बढ़ा देलखिन। आइ ओ दृश्य मोन पड़ल त बशीर बद्र साहेबक एकटा शेर मोन पड़ि आएल : ‘पत्थर मुझे कहते हैं मेरे चाहने वाले मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा’ खाइत-खाइत सिंह साहेब गीताक एकटा श्लोक मिश्रजीकें लक्ष्य क’क’ कहलखिन। गीताक बहुत श्लोक मिश्र जी कें याद छलनि। सिंह साहेब कें ई जानि क’ अतिरिक्त ख़ुशी भेलनि। फेर किछु काल धरि गीताक रसधार बहल। हम मिश्र जी कें हुनका लग नेने गेलियनि, एहि लेल सिंह साहेब हमरा आशीर्वाद देलनि आ कहलनि दू-तीन दिन मिश्रजीक संग हुनका ओत’ आबक लेल। हम सभ सिंह साहेबक चरण स्पर्श क’क’ हुनका ओत’सं विदा भेलहुँ। हॉस्टल पहुंचिते एकटा छात्र पुछलकनि ‘कब जा रहे हैं मिश्र जी?’ मिश्र जी मुस्कुराइत पुछलखिन ‘और तुम कब जा रहे हो?’ आरामसं कुर्सीपर बैसैत मिश्र जी बजलाह, ‘मुझे तो अभी आराम करना है, जिसको जहां जाना हो, जाए।’ बहुत गोटे कें मिश्र जी कें प्रफुल्लित देखि आश्चर्य भ’ रहल छलै। हम ठाकुर जी आ झा जी कें ई बात कहलियनि त हिनको सभकें नीक लगलनि। एहि घटनामे हमर भूमिका बहुत थोड़ छल, मुदा हमरा जे अनुभव भेल से हमरा लेल महत्वपूर्ण सिद्ध भेल। हमरा समस्याक समाधानक एकटा नीक आ सरल सूत्र हाथ लागि गेल छल जकर उपयोग हम जीवनमे कय बेर केलहुँ आ सभ बेर परिणाम शुभ रहल। (८) स्वयंसं साक्षात्कार सिंह साहेबक बात सत्य सिद्ध भेल। मिश्र जी कें कोनो क्षति नै भेलनि। एक मासक बाद रिजल्ट निकललै। सभकें अपन-अपन तपक अनुसार परीक्षा-फल प्राप्त भेलनि।ठाकुर जी (अशोक कुमार ठाकुर) प्रथम श्रेणी मे प्रथम स्थान पौलनि। झाजी आ मिश्र जीक संग हमहूँ द्वितीय श्रेणीमे उतीर्ण भेलहुँ। हमरा लगभग छप्पन प्रतिशत अंक प्राप्त भेल। अंतिम वर्षक परिणाम एहिसं अधलाह नहि हो, से ध्यानमे राखि दोसर वर्षमे पढ़ाइ-लिखाइ प्रारंभ भेल। आब मात्र एकटा लक्ष्यपर ध्यान केन्द्रित केलहुं।आब गामो जाएब कम क’ देलहुं।गामसं मासे-मासे आवश्यकतानुसार पाइ मनीआर्डर द्वारा प्राप्त भ’ जाइ छल।किछु मास पछिला सालक छात्रवृतिक पाइ सेहो संग देलक। मुदा ओ पर्याप्त नहि छल, तें गामसं सेहो मनीआर्डरक प्रतीक्षा रहैत छल। गाममे पाइक व्यवस्था कोना होइत छल,से हम नहि बुझि पबैत छलहुँ।पिता नै चाहैत छलाह जे घरक समस्यासं हम अवगत होइ। गाममे छलहुँ त देखने छलहुँ जे समय-समयपर भार-चंगेरा, ब्राह्मण-भोजन चलैत रहैत छलै। मुदा, ओकर व्यवस्था कोना होइत छलै, ताहि तथ्यसं अनभिग्य छलहुँ। एक बेर गामसं मनीआर्डर एबामे बहुत देरी भ’ गेल। मिश्रजीसं तत्काल किछु पैंच ल’ क’ काज चला लेलहुं आ फेर गाम चिट्ठी लिखलहुँ। तकर बादो बहुत देरी भेलै, तखन चिन्ता भेल, पैंच सधाबक छल आ दोसर मासक खर्च लेल सेहो आवश्यकता छल। गाम पहुँचलहुँ। पता चलल जे दू कट्ठा खेत भरना ध’ क’ पाइक व्यवस्थामे लागल छलाह, मुदा नै भ’ रहल छलनि। एहि बेर बाबूकें बहुत असहाय देखलियनि। एक ठाम पाँच कट्ठामे गहुम लागल छलनि। गहूम दू मासमे कटितै, अहीपर साल भरिक खर्च निर्भर करतैक। ई कोना भरना लगा देल जाए। एकरा भरना राख’ चाहथि, त तुरत पाइक व्यवस्था भ’ सकै छनि, मुदा दू मासक बाद फेर सात आदमीक लेल भोजनक व्यवस्थाक प्रश्न छै। पता लागल जे लगभग अधिक खेत भरना लागल छनि, किछु टाका पाँच प्रतिशत मासिक सूदिपर नेने छथिन माने साठि प्रतिशत सालाना ब्याजपर। हित-अपेक्षितक दू टा गहना सेहो बंधक राखि क’ काज कएल गेल छै। बाबू साँझमे लगमे बैसाक’ कहलनि : हम आब हिम्मत हारि चुकल छी, हमर विचार जे आब बियाह क’ लैह, दोसर कोनो रस्ता नै देखाइए। हम चिन्तित भ’ गेलहुँ। हमरा की करबाक चाही? बाबू त पहिने बजैत छलाह जे पढ़ि-लिखिक’ अपना मोने वियाह करता, मुदा हुनका सोझां सात आदमीक परिवार छलनि, हमर पढ़ाइक खर्च छलनि। मूडन,उपनयन,श्राद्ध आ बरखीक भोज देखिक’ ई नहि पता चलैत छलै जे घरमे कोनो आर्थिक समस्या छै, आर्थिक स्थितिक पता पढाइक खर्च जुटयबाकाल चलैत छलै। भोजक समय सर-कुटुम्ब सभक सेहो सहयोग प्राप्त हेबाक परम्परा छलै, मुदा समुचित शिक्षाक लेल ई परम्परा नै छलै। समुचित शिक्षा अनिवार्य नहि मानल जाइत छल। टोलमे दू-चारि परिवार छोडिक’ सभ परिवारक मोटा-मोटी यैह स्थिति छलै,तें हमरा बयसक कय गोटे पढाइ छोडि चुकल छलाह आ गृहस्थ बनि चुकल छलाह, रोजी-रोटीक जोगारमे लागि गेल छलाह। भरिसक एहने स्थितिमे हमर पिता सेहो हाई स्कूलमे पढाइ छोडिक’ नोकरीक लेल कलकत्ताक बाट पकड़ने छल हेताह। मुदा ओ अपनासं नीक जीवनक सपना देखि रहल छलाह आ ताहि लेल हमर पढाई नहि छोडब’ चाहैत छलाह। तखन यैह एकमात्र समाधान देखाइत छलनि जे हमर विवाह करा देथि। ओहि समय बैंक द्वारा शिक्षा ऋण नहि देल जाइत छलै, तें गरीब परिवारक विद्यार्थीक पढाईक खर्चक लेल विवाह कराएब एकमात्र लोकप्रिय समाधान छलै। बहुत कन्यागत ई सोचिक’ एहेन कन्यादान करैत छलाह जे लड़का पढ़ि-लिखिक’ नीक नोकरी कर’ लगतै त’ कन्याक जीवन सुखमय भ’ जेतनि। अधिक कन्यागतक मनोकामना पूर्ण होइत छलनि। जिनकर मनोकामना पूर्ण नहि होइत छलनि, हुनका देखिक’ दोसर कन्यागत सभ एहेन निर्णय लेबासं डेराइत छलाह। हमरा पिताक सलाह मानबाक अतिरिक्त कोनो दोसर उपाय नहि सूझल। तय भ’ गेलै जे हमर विवाह हैत। तत्काल बहुत अधिक ब्याजपर किछु पाइ ल’क’ हम ढोली विदा भ’ गेलहुँ। रस्तामे चिन्तन चलि रहल छल। ओहि समय कोनो लड़का अपन विवाहक सम्बन्धमे अपने नहि किछु बजैत छल। बाबू-बाबा,कक्का-मामा यैह सभ बजैत छलाह। लड़का ओकर पालन करैत छल। हमरा ई सुविधा छल जे हम अपन विचार प्रगट क’ सकैत छी। हम सोचलहुँ, जखन विवाह करब आब निश्चित भ’ गेल अछि त किएक ने एकर प्रयास करी जे एहेन ठाम हो जतय लड़कीक विषयमे हमरो बूझल हो। हम मोन पाड़’ लगलहुँ एहेन लड़की जकरा देखने होइऐक। समय-समय पर कतहु कोनो गाम जाइत छलहुँ।एक ठाम देखने रही एकटा लड़की, नौमामे पढ़ि रहल छलीह, देखबामे नीक छलीह। मुदा कहियो ने हुनकासं गप भेल छल ने हुनका घरक कोनो आन लोकसं सम्पर्क छल।तकर कोनो आवश्यकता सेहो नहि बुझाएल छल मुदा, हमरा विषयमे हुनका बूझल हेतनि,से सोचैत रही। ओहि समय यैह अवस्था लड़कीक विवाहक लेल उपयुक्त मानल जाइत छलै। तें हम सोचलहुँ, यदि हुनका सभकें पता चलनि जे हमर विवाह होम’ जा रहल अछि, त अवश्य ओ सभ हमरा ओत’ प्रस्ताव ल’ क’ जा सकैत छथि। बेटाबलाक दिससं पहल करबाक चलन नै छलै। बेटाबला गम्भीर रहैत छलाह, एहिसं बेशी लाभ हेबाक आशा रहैत छलनि। हमरा होइत छल जे लड़का दिससं सेहो पहल करबाकें कोनो अनुचित नै मानल जेबाक चाही। बेटीबलाकें लड़का आ ओकर परिवारक विषयमे जे किछु पता लगाबक रहै छै से सभटा स्पष्ट सुचित करबैत लड़कीक पिताक नामसं एकटा पत्र लिखि हम पठा देलियनि। हुनका लिखलियनि जे जौं अपने हमरा परिवारमे अपन कन्याक विवाह करेबाक हेतु उत्सुक होइ, त एक मासक भीतर हमरा अथवा हमर पिताजीसं सम्पर्क करी। ईहो लिखि देलियनि जे एक मास धरि जौं अपनेक कोनो सूचना नहि प्राप्त हैत त हम मानि लेब जे अपनेकें ई कथा पसन्द नहि अछि। एक मासक बाद एहि कथाक विषयमे हमर सोचब बन्द भेल। बादमे हम गाम गेलहुँ त पता लागल जे ओतहु दू टा कन्यागत आएल छलाह। एकटा प्रस्ताव आकर्षित केलक। लडकी दसमामे पढैत छलीह। ओहि प्रस्तावक जे अगुआ छलाह, से हमर गामक हमर एकटा संगीक मित्र छलथिन। ओ हमरा मधुबनीमे भेटलाह।ओ हमर पिताक निर्णयमे किछु संशोधन आ हमरासं अपन प्रस्ताव आ सलाहपर स्वीकृति मंगलनि। हम स्वीकार क’ लेलियनि। गामपर एलहुँ त बाबूक सोझां हम कन्यागतक आजुक प्रस्तावपर अपन सहमतिक सूचना देलियनि। संयोग सं मामा सेहो ओहि दिन आएल छलाह। बाबू हमर स्वीकृतिक समर्थन क’ देलनि। हमरा नीक लागल। मामा सेहो प्रसन्न भेलाह। दोसर दिन हमरा ढोली घुरबाक रहय। प्रस्तावक अनुसार हमर गामक संगी आ हुनक मित्र सेहो हमरा संगे लहेरियासराय तक एलाह। लडकीवलाक डेरापर हमरा नेने गेलाह। ओत’ लडकीक मा-बाबूजी नै छलखिन। हमरा कहल गेल जे साँझ धरि आबि जेथिन। लड़की हमरा सोझां एलीह। पढाई-लिखाई द’ किछु पुछलियनि। नीक लागल। हम कहि देलियनि जे हम प्रसन्न छी। साँझ धरि घरक अभिभावक नहि एलखिन। हमरा चिन्ता भेल। हमरा रातिमे रहबाक अनुरोध केलनि हमर संगीक मित्र। रातिमे ओत’ रहब हमरा अनुचित लागल। ओहि समयमे लड़कीकें लड़का द्वारा देखल जाएब सेहो चलनमे नहि छलै, विवाहसं पहिने लड़की ओत’ रहबाक लेल त कियो सोचियो नहि सकैत छल,हमरहु विवेक हमरा अनुमति नहि द’ रहल छल। मुदा, ओ रुकबाक लेल जिद्द कर’ लगलाह। हम कोनो लाथे घरक बाहर सड़कपर आबि रिक्शापर बैसि गेलहुँ, हमर एकटा सम्बन्धीक आवास छलनि बहुत दूर, ओतहि चल गेलहुँ। राति भरि ओतहि रहि भोरे हुनका डेरा पर गेलहुँ। अपन बैग लेलहुँ जे राति ओतहि रहि गेल रहय। हमरा कहल गेल जे घरक अभिभावक लोकनि बेशी रातिक’ एलाह। हम कहलियनि जे हमर स्वीकृति अछि, हम एखन चलैत छी, चिट्ठीसं अथवा व्यक्तिगत रुपें हमरासं अथवा हमर पिताजी सं सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। रस्ता भरि हम काल्हिक अपन आ हुनका सबहक कर्मक समीक्षा करैत गेलहुं। स्वयंसं सेहो लडैत गेलहुं। हम एना किए केलिऐ? ओ हमरा रहबाक लेल जिद्द किए करैत छलाह? हम राति रहिए जैतिऐ त की भ’ जैतै? हमरा कथीक डर भेल? हम लघुशंकाक लाथे सड़क पर आबि रिक्सासं निकलि गेलहुँ, हम स्पष्ट हुनका किए नहि कहलियनि जे हम रातिमे नै रहब? हमरा विषयमे ओ सभ की सोचने हेताह? हम हुनका सभकें नीक लगलियनि की नहि, से किए ने पुछलियनि? हम एहि निष्कर्षपर पहुँचलहुँ जे ईहो हमरा लेल एकटा परीक्षा छल जाहिमे हमर असफलता सुनिश्चित भ’ गेल अछि। किछुए दिनक बाद पता चलल, हमरा जे लड़की देखब’ अनने छलाह, हुनके सौभाग्य भेलनि ओहिठाम ललका धोती आ पाग पहिरबाक। (९) शुभे हो शुभे हमर शुभचिन्तकगणमे प्रमुख हमर मामा सभ छलाह। मझिला मामा रहिका हाई स्कूलमे अध्यापक छलाह। हुनक परिचयक क्षेत्र व्यापक छलनि। ओ हमर घरक स्थितिसं अवगत छलाह।शनि दिन गाम जाइत काल हमरा गामक कैटोला चौक पर हमर सबहक समाचार प्राप्त करैत आ आवश्यक लगै छलनि त हमरा ओत’ सबहक भेंट-घांट करैत अपन गाम रुचौल जाइत छलाह। मामा हमरा घरक समस्याकें दूर करबाक प्रयासमे लोकप्रिय समाधान ताक’मे लागल छलाह। सभ साल कोनो-ने-कोनो परिचित लोकक कन्यादान अथवा वरदानमे मदति करैत छलाह। तें एकर नीक अनुभव छलनि। रहिकासं सौराठक दूरी कम छै। सभ साल सौराठ-सभाक आयोजन ओहि समय होइत छलै जखन गाछमे आम पाक’ लगैत छलै। दस दिनक ई आयोजन दर्शनीय रहैत छल। मिथिलाक कोनो कोनमे बसैत मैथिल ब्राह्मण, सभ साल एको दिनक लेल एत’ अवश्य एबाक कोशिश करैत छलाह। ई सुनैत आएल छलहुँ जे जाहि दिन सबा लाख मैथिल जमा भ’ जाइ छथि, ओहि दिन ओत’ उपस्थित बरक गाछ मौला जाइ छै। इहो एकटा आकर्षणक विषय होइत छल। हमहूँ कय सालसं ककरो-ने-ककरो संगे एक दिन जाइत छलहुँ। कन्यादान एकटा पैघ समस्या छलै। लोक कन्याक शिक्षाक लेल चिन्ता नहि करैत छल, एतबे शिक्षा जरूरी बुझैत छल जे चिट्ठी लीख’ आबि जाइ जे नोकरी करबा लेल कलकत्ता गेल अपन घरबलाकें चिट्ठी लिखि सकय। लोक कन्याक बियाहक लेल परिश्रम करैत छल। गामे-गामे अपनासं भिन्न गोत्रक उपयुक्त लड्काक तलाश करैत छल। एहिमे सालो लागि जाइ छलै। सौराठ सभाक महत्वपूर्ण भूमिका छलै लोकक समस्याक निदानमे। एहि ठाम विभिन्न गामक लोकसभसं एकेठाम भेंट भ’ जाइ छलै। विकल्प बहुत भेटि जाइ छलै। मोन कें एकठाम स्थिर करबाक लेल अनुभवी लोकक आवश्यकता होइ छलै, सेहो एतय भेटि जाइ छलखिन। एहेन लोकक भूमिका सेहो महत्वपूर्ण होइत छलनि जे दुनू पक्षकें जनैत होथि अथवा दुनू पक्षकें अपन तर्कसं संतुष्ट क’ सकथि।सेहो एत’ भेटि जाइ छलखिन। एहि सूत्रक उपयोग खूब कएल जाइत छलै जे कन्यादानमे कतहु झूठो बजलासं पाप नहि होइत छैक। कन्यादानमे कोनो तरहें मदति करब धर्म मानल जाइत छलै। तें कन्यागतक कोनो त्रुटिकें लोक झाँपि दैत छल। परिणामस्वरुप कयठाम अनमेल विवाह सेहो भ’ जाइत छलै। दिव्यांग लड़कीक सेहो विवाह भ’ जाइ छलै, मुदा विवाह भेलाक बाद कोनो लड़का कोनो लड़कीक त्याग नहि करैत छल आ ने स्वयं आत्महत्या करैत छल, ई छलै मिथिलाक संस्कृति। एहेन उदाहरण अछि जे एहेन परिवारमे सेहो एक-सं-एक विद्वान आ पुरुषार्थी लोक सभ भेलाह अछि। कय बेर दिव्यांग लड़का सबहक सेहो विवाह भ’ जाइत छलै नीक लडकीक संग आ लड़की परम्पराक अनुरूप सभ पावनि करैत वरक दीर्घायु हेबाक कामना आ नीक संततिक प्रतीक्षा करैत छलीह। कियो हुनक पतिक शिकायत करनि त ओकरासं गप केनाइ बन्द क’ लैत छलीह। विवाह भ’ गेलाक बाद सभ ई सोचि संतोष क’ लैत छल जे ओकरा भाग्यमे यैह लिखल छलै। लोक एकरा भगवानक निर्णय मानि लैत छल, तें मोन स्थिर भ’ जाइत छलै, पाछू नहि तकैत छल, आगाँ जे काज रहैत छलै, ताहिमे लागि जाइत छल। मधुश्रावनी कोना हेतै, कोजगरा कोना हेतै, जराउर कोना हेतै ई सभ सोच’ लगैत छल। ई पैघ बात छलै। घरसं बाहर जे युवक पढ़’ जाइत छलाह अथवा जिनका शहरक हावा लागि जाइत छलनि हुनका इच्छानुकूल विवाह नै भेलापर मोन स्थिर करबामे समय लगैत छलनि। शहरमे सिनेमा छलै। उपन्यास छलै। सिनेमा सिखबैत छलै, विवाहसं पहिने लड़की-लड़काक बीच प्रेम हेबाक चाही। संस्कृति सिखबैत छलै, जकरासं विवाह होइ, ओकरासं प्रेम करक चाही। परम्परा कहैत छलै, प्रेम-त्रेम नै करक चाही, स्त्रीकें जरूरतिसं बेशी महत्व नै देबाक चाही, ओकरा अपना काबूमे जातन द’ क’ राखक चाही। हमरा सोझां कखनो क’ ‘कन्यादान’क बेचारा सी सी मिश्र आबि जाइत छलाह आ कखनो काल दूर, बहुत दूरसं दोसर बुच्ची दाइक स्वर सुनाइ देब’ लगैत छल : ‘तोरा अंगनामे वसन्त नेने आएब ........ एकदिन मामाक समाद पहुंचल, काल्हि अहाँ सभ तैयारे भ’ क’ अबै जाउ। वरियातीकें ध्यानमे राखि किछु गोटेकें तैयार भ’क’ चल’ लेल अनुरोध कएल गेलनि। सभाक समय सभ घरमे नील-टिनोपाल द’ क’ लोक धोती-कुरता तैयार रखैत छलाह , की पता काल्हि ककर विवाह ठीक भ’ जाइ आ वरियाती जाए पडनि। हमर शर्ट लोककें नीक नै लगलै। बच्चू भाइ झट द’ अपना घरसं प्रेस कएल एकटा शर्ट नेने एलाह। विवाह भेलाक बादे लोक नीक कपड़ा पहिरैत छल। वयसमे बच्चू भाइ हमरासं छोट छलाह, मुदा विवाह भ’ चुकल छलनि। टोलक किछु गोटेक संग हम सभ पहुँचलहुँ सौराठ सभा। भुस्कौलक एकटा परिचित भेटलाह। हमरे तुरिया छलाह। गप भेल। हिनकासं मामा गाममे कए बेर भेंट भेल छल। ओ हमरा नीक जकां जनैत छलाह। हुनका हमर पढाइक विषयमे सभ किछु बूझल छलनि। ओ एक गोटेसं परिचय करौलनि। हुनकर मुंह चिन्हार लगैत छल। आर. के. कॉलेज, मधुबनीमे प्री-साइंसमे दोसर सेक्शनमे छलाह। देखने रहियनि मुदा गप-शप नै भेल छल। आइ गप भेल। लदारी घर छनि। बहिनक विवाहक प्रयासमे छथि। हुनकर बड़का भाए आ बाबू सेहो गामक किछु गोटेक संग आएल छलखिन। दोसर दिससं मामा एलाह, बाबू संग छलखिन। मामा अपन स्कूलक सचिव भिनाइ बाबू द्वारा अनुमोदित एकटा प्रस्तावक सूचना देलनि। पता चलल एखने जाहि व्यक्तिक संग परिचय भेल छल,हुनके बहिन छथिन कन्या। मामा कन्या पक्षक बहुत गुणगान करैत हमरा आ हमर बाबूजीकें स्वीकार करबाक हेतु तैयार कर’ लगलाह। बाबू हमरा दिस तकैत छलाह, हमरा पर दबाब देब’ नै चाहैत छलाह। हम कन्याक पिताकें देखलाक बाद मामाकें कहि देलियनि जे ई कथा हमरा पसन्द नै अछि। हमरा बुझा गेल जे लड़की पढ़ल-लिखल नै छै। मामा लड़कीक पढाइ-लिखाइक सम्बन्धमे किछु नै कहैत छलाह। मामाक किछु और परिचित लोक सभ आबि गेलाह। सभ हमरा बुझब’ लगलाह जे कुमरजी जे कहैत छथि ताहिपर आँखि मूनिक’ विश्वास कएल जा सकैत अछि, कथा काट’ योग्य नै छै। जे सभ कहियो लदारी नै गेल हेताह, सेहो सभ लडकीक शिक्षित हेबाक गारन्टी देब’ लगलाह। हमरा बूझल छल जे कन्याक विवाह लेल झूठो बाजब लोक धर्मक काज बुझैत छल। तें हम लोकक बातसं प्रभावित नै भ’ रहल छलहुँ। बाबूजी गुम्म भ’ गेल छलाह। मामा दुखी भ’ गेल छलाह। बरियाती जाइ लेल जे गामपरसं तैयार भेल आएल छलाह ओहो सभ अगुता रहल छलाह, जल्दी नौ-छौ होइ। कन्यागतकें होइ छलनि जे कियो लड़की द’ गलत बात कहिक’ लड़काकें भड़का देलकैए। ओ सभ हमरा संतुष्ट करबाक लेल जोर लगा रहल छलाह। सहसा मामा कहलनि तों तीन बेर हमरा कहि दैह जे हम एहि ठाम विवाह नै करब त आइ दिनसं हम एहि विवाहक चर्चे नै करब। ‘की?’ ‘नै’ ‘नै?’ ‘नै’ बाबू कहलखिन, छोडि दियौ देविन्दर, अहाँ परेशान नै होउ, हम किछु खेत बेचि देबै पढ़ाइक लेल, जबरदस्ती विवाह नै हेतै। तखने देखलियनि एकटा मास्टर साहेबकें। हाइ स्कूलमे हमरा पढौने छलाह।चारि बरखक बाद आइ सभामे देखलियनि। प्रणाम केलियनि। मास्टर साहेब कहलनि, हमर बेटी पढ़ितो अछि आ घरक काज करबामे सेहो दक्ष अछि। हम आकर्षित भेलहुँ। मधुबनीक एकटा डॉक्टर साहेब जे हमरा आ मास्टर साहेब दूनू गोटेकें जनैत छलाह, मास्टर साहेबसं किछु विवरण प्राप्त कर’ लगलाह। अही बीच एकाएक दुर्गा बाबू प्रगट भेलाह। मिडिल स्कूलमे पढौने छलाह। हमरा कने कात ल’ जाक’ कहलनि, कुमरजीक बात काटिक’ ठीक नै क’ रहल छह। हुनका कतेक दुःख भ’ रहल छनि, से नै सोचै छहक, आखिर तोरा किए ई कथा पसन्द नै छह? हम कहलियनि जे हमरा लगैत अछि जे लड़कीक शिक्षा शून्य छै, तें हमरा पसन्द नै अछि। मास्टर साहेब कह’ लगलाह : ई तोहर भ्रम छह, जकरा पास एतेक सम्पति रह्तै तकर बेटी कतहु अशिक्षित होइ, हमरा पता अछि ओइ ठाम मिडिल स्कूल छै, हाइ स्कूल छै, ओहि गामक लड़की अशिक्षित भइए नै सकैत छै। तों व्यर्थ कुमरजी कें दुखी क’ रहल छहुन, आखिर जेठ-श्रेष्ठक आशीर्वाद प्राप्त करबाक चाही। तेसर बेर मामा हमरासं पुछ्लनि : बाजह, की? हमर बकार बन्द भ’ गेल। दुर्गा बाबू बजलाह : जाइ जाउ, सिद्धान्त लिखाउ। चहल-पहल शुरू भ’ गेल। सभ गोटे विभिन्न दिशामे अलग-अलग काज लेल सक्रिय भ’ गेलाह। एक गोटे, जिनका वरियाती नहि जेबाक छलनि, से अपन साइकिलसं समाद ल’क’ गाम पठाओल गेलाह। पन्द्रह गोटे वरियाती जाइ लेल तैयार कएल गेलाह। जे गामसं साइकिलसं आएल छलाह, से अपने साइकिलसं विदा भेलाह। शेष गोटेक लेल रिक्शाक व्यवस्था भेल। लदारीसं जे सभ साइकिलसं आएल छलाह, से निकलि गेलाह गाम समाद ल’क’ विधि-व्यवहार आ और वस्तुक ओरिआओन करयबा लेल। एकटा रिक्शापर हमरा संगे लड़कीक पिता विदा भेलाह जे पचास बीघाक मालिक, सात बहिनक एकमात्र भाए आ दूटा शिक्षित पुत्र, तीन टा अशिक्षित कन्याक पिता छलाह। सौराठसं रहिका, कपिलेश्वर स्थान, बसौली, औंसी, केवटी, दड़िमा होइत लदारी पहुँचबामे दू घंटासं बेशी लागल हेतै। बाटेमे रही त अन्हार भ’ गेल रहै। हाजीपुर चौकसं थोड़े दूर पूब आबि आमक गाछी सबहक बीच होइत एकटा पोखरिक कात द’ क’ दरबज्जापर पहुंचलापर आंगनसं किछु हूलि-मालि सुनाइ पडल। एकर अतिरिक्त कोनो और आयोजन देखबामे नहि अबैत छल जाहिसं बुझाइ जे एत’ कोनो लड़कीक विवाह होम’ वला छै। हमरा मोनक भीतर एकटा सी सी मिश्र परेशान भ’ रहल छलाह। हम एकटा स्वचालित मशीन भ’ गेल छलहुँ। हमरा किछु मधुर खुआक’ परिक्षण क’ क’ आंगन ल’ जाइ गेलीह, त हमरा भीतरक सी सी मिश्र और व्यथित भ’ गेलाह। बलि-वेदीपर चढ़बासं पहिने हम मामासं एक बेर सम्पर्क कर’ चाहलहुँ। कोठलीक गेटक एक कात हम छलहुँ, दोसर कात मामा छलाह। हम मामाकें कहलियनि जे लड़कीक विषयमे हमर अनुमान सही छल। मामा न्यायाधीशक आसन धेलनि,’आब लड़की कनाहि होइ, घेघाहि होइ, चिन्ता करबाक काज नै छै। सभटा भगवानपर छोडि दहुन।’ आंगनमे लोक सभ चिन्तित छलाह जे कियो हमरा कहि देलक अछि जे लड़की कनाहि छै। हम जे मामासं गप करैत छलहुँ त कियो नुकाक’ सुनबाक कोशिश केलनि आ हमरा मूंहसं एकटा शब्द ‘लड़की’ आ मामाक एकटा शब्द ‘कनाहि’, यैह दूटा शब्दकें मिलाक’ उपस्थित लघु कथाकार सभ तुरंत एकटा लघु कथा तैयार क’ लेलनि जे कियो लड़काकें भड़का देलकैए जे लडकी कनाहि छै। सी बी आइ तुरंत रिपोर्ट द’ देलकै जे ई काज फल्लाँ गामक लोकक अछि, ओ सभ एत’ विवाह कर’ चाहै छलै, नै भेलै तें ई उडा देलकै जे लड़की कनाहि छै, जाहिसं लड़का कहै जे हम वियाह नै करब। दरबज्जापर हमर पिता चिन्तित छलाह। चिन्तित छलाह वरियातीमे आएल किछु लोक, हुनका होइ छलनि जे लड़का कहीं भागि ने जाइ अथवा कहीं ई ने कहि दै जे हम नै करब विवाह। एहेन स्थितिमे हुनकर सबहक की हाल हेतनि, एहि आस-पासमे कोनो कुटुम्ब नै छथिन जत’ जाक’ रहताह आ एते रातिमे पन्द्रह-बीस किलोमीटर गाम कोना घुरताह। हुनका सोझां कयटा सूनल कथा छलनि जे लड़का बेदीतरसं भागि गेलै अथवा भगा देल गेलै आ वरियाती सभ जेना-तेना अपन जान बचाक’ पडेलाह। हमरा सोझां प्रगट भेलाह एकटा बड़का कल्लावला लोक मार्कंडेय ठाकुर,’ ठाकुरजी अहाँ पहिने हमरा कन्याकें देखि लिय’, कोनो त्रुटि बुझाय त नै करू विवाह।’ हम कहलियनि जे काज आगू बढ़ाउ, हमरा आब कोनो आपत्ति नै अछि। तुरंत दृश्य बदलि गेलै। गीत-नाद शुरू भेल। पंडित जुगेश्वर झा अपन पोथी-पतरा ल’क’ आसन धेलनि, हजाम अपन काजमे लागि गेलाह। बुच्ची दाइ, क्षमा करब,बच्ची दाइ अपने एतेटा घोघ तनने हमरा बगलमे छलीह। हमरा भीतर एकटा बच्चा छल जकर बैलून फूटि गेल छलै आ ओ कानि रहल छल। हमरा भीतर एकटा सी सी मिश्र छलाह जे एहि विवाहक आलोचना क’ रहल छलाह : जकर-जकर विवाह भ’ रहल छै ओ एक-दोसरकें देखबो ने केने अछि तखन एहि गीत-नाद आ मंत्रोच्चारक की प्रयोजन? हमरा भीतर अनिलजी छलाह जे गीत सुनबामे आ ओकर अर्थ बुझबामे लागल छलाह, ओहि गीत सभमे सुधार कर’ चाहैत छलाह, ओकरा स्थानपर नव रचनामे लागल छलाह। हमरा भीतर रहिका हाइ स्कूलक उप-प्रधानाध्यापक श्री देवेन्द्र कुमरक एकटा आज्ञाकारी भागिन छलाह जे पंडितजी जेना-जेना कहैत छलखिन, तेना-तेना केने जा रहल छलाह, जे-जे पढ्बैत छलखिन, से-से पढने जा रहल छलाह। हमरा भीतर तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोलीक द्वितीय वर्षक एकटा छात्र छल जे पढ़ाइक खर्चक चिन्तासं मुक्त भ’ गेल छल किन्तु अपना चारुकात एकटा देबाल देखि रहल छल। हमरा भीतर क्यो छल जे हमरा बुझा रहल छल, यैह कहबैत छै ‘भावी’, देखि लेलहुं ने, अहाँकें कुदला आ फनलासं की भेल, वैह भ’ रहल छै जे अस्तित्व चाहै छै। आब हमरा आ हुनका स्थितिमे एतबे अंतर रहि गेल छल जे हम घोघ नहि तनने छलहुँ, ओ घोघ तनने छलीह। (१०) कल्पना-गगनमे वरियातीक प्रस्थान करबाक समय बाबू हमरा लग आबि कहलनि कनियाँक पढाइक व्यवस्था कएल जेतै। हुनका चलि गेलाक बाद लागल जे आब एसगरे हमरा अपन समस्याक समाधान ताक’ पडत। हमरा इहो लागल जे मोनसं अथवा बेमोनसं जखन हम पूर्ण सचेत अवस्थामे विवाह स्वीकार क’ लेलहुं त आब अनका ककरो दोख देब उचित नहि, एकर जिम्मेदार हम स्वयं छी। ‘कन्यादान’क सी सी मिश्र जकाँ सासुरसं भागि जाएब उचित नै बुझाएल। हम समाधानक लेल ‘द्विरागमन’क कथाक चिन्तन कर’ लगलहुँ। बुच्ची दाइकें ठीकसं बुझबाक प्रयास कर’ लगलहुँ। मोनक बातकें शब्दमे बान्ह्बाक प्रयास केलहुं। गीत कल्पना-गगनमे मधुवन सजा रहल छी दुनियाँमे जीबाक अछि, तें मन लगा रहल छी। अछि आइ ने कोनो सपना अछि आइ ने कोनो धारा मोनो ह्रदयक प्रश्नक नहि दैत अछि उतारा उमड़ल जे बात मनमे, कहितो लजा रहल छी दुनियाँमे जीबाक अछि, तें मन लगा रहल छी। किछु पांती बादमे जोडायल : चोट’छि ह्रदयमे लागल नहि नोर टा बहैए मरियोक’ हम जिबै छी हंसि ठोर टा कहैए रूसल जे भाव मनमे, तकरे मना रहल छी दुनियाँमे जीबाक अछि,तें मन लगा रहल छी। जिनगीसं सीख भेटल हंसिक’ समय बितायब सुखमे ने मुंह खसायब दर्दमे ने छटपटायब बाजल जे तार तनमे, तकरे बजा रहल छी दुनियाँमे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी। शास्त्र कहैत अछि जे विवाह, जन्म आ मृत्यु जहिया, जत’ जेना हेबाक रहैत छै तहिना होइत छैक। शास्त्रमे हजारो बरखक अनुभवपर आधारित ज्ञान अछि। ई ज्ञान लोककें निराशासं बंचबैत अछि। अपन स्थितिक समीक्षा केलहुं त लागल जे हमरा जते नहि भेटल अछि ताहिसं बहुत बेशी ओ अछि जे भेटल अछि। हमरा जे भेटल अछि ओहिपर ध्यान केन्द्रित क’ क’ प्रसन्न रहबाक चाही आ जे प्रयास केलासं और नीक भ’ सकैछै,ताहि लेल प्रसन्नतापूर्वक प्रयास करबाक चाही। हमरा सोझां एखन द्वितीय बर्षक परीक्षा अछि, जल्दीए ढोली जाए पडत। सासुरमे सासु छलीह जजुआरक। ससुर छलाह, दू टा जेठ सार छलाह, दुनू सरहोजि छलीह, चारिटा छोट-छोट सरबेटा छलाह। दूटा जेठ सारि छलीह जे नहि आएल छलीह। एकटाक सासुर डुमरा (बेनीपट्टी) छलनि, दोसरक सासुर कोरियाही (सीतामढ़ी ) छलनि। एकटा साढ़ू आएल छलाह जे दरभंगामे बी.ए.मे पढ़ैत छलाह। दिनमे कते गोटे भेंट कर’ अबैत छलाह। अधिक लोक पीसा कहैत छलाह। चारि दिन भरि घर-दरबज्जा भरि रहैत स्त्रीगण सभक मूँहें गीत सुनैत छलहुँ अथवा नव-नव लोक सभसं परिचय होइत छल। गीत सभक भास मनमोहक लगैत छल किन्तु शब्द सभमे सुधारक/परिवर्तनक आवश्यकता लगैत छल। एहेन एकटा गीत तैयार भेल : घुमा दियनु हे ससुर अंगनामे। नहूँ-नहूं चलियौ दुलहा जोरसं ने चलियौ एखनेसं कनियांकेर हाथ ने छोड़ियौ धरा दियनु हे ससुर अंगनामे। देखब दुलहा कहियो हुए ने गलती अपने चलबै आगाँ कनियाँ पाछाँ-पाछाँ चलती सिखा दियनु हे ससुर अंगनामे। पोथी मे ने भेटत दुलहा एहेन गियान जिनगी भरिमे संगी एहेन भेटत क्यो ने आन लिखा दियनु हे ससुर अंगनामे। देखब दुलहा कहियो ई संगी नहि छुटय सासुरक बान्हल प्रेमक डोरी ने ई टूटय बन्हा दियनु हे ससुर अंगनामे। देलहु अमोल धन राखब जोगाकय बड पछ्तायब एकरा गमाकय बुझा दियनु हे ससुर अंगनामे। वर-कनियाँ होइए एके गाड़ीके दू पहिया हैत बड कचोट बिसरबै ई जहिया रटा दियनु हे ससुर अंगनामे। चारि दिनक बाद साँझमे हाजीपुर अथवा खिरमा जाइत छलहुँ। संगमे सार आ टोलक किछु गोटे रहैत छलाह। सबेरेसं साँझ धरि पान खेबाक अभ्यास जोर पकडलक। बहुत गोटेसं भेंट-घाँट नियमित होइत रहैत छल, मुदा एक गोटेसं भेंट करक लेल अठारह घंटा प्रतीक्षा कर’ पडैत छल।पूरा वाक्य सुनबाक लेल दस दिन प्रतीक्षा कर’ पडल। ओ वाक्य छल ‘ आब कहिया एबै?’ भरिसक अही छोट-छीन वाक्यमे छिपल छल जकरासं विवाह हो, तकरासं प्रेम करबाक दर्शन। ढोली पहुंचलाक बाद परीक्षाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। किछुए दिनक बाद सासुरसं चिट्ठी आएल। ठाकुरजी सोझांमे छलाह। हम पढ़लिऐ त’ हंसी लागल। ठाकुरजीकें कहलियनि पढ़िक’ अर्थ हमरा बुझा दिय’। ठाकुरजी पढ़’ लगलाह एके दममे हंसैत पढ़ने जा रहल छलाह, कहलनि पूर्ण विराम त छैहे नै,रुकू कत’। कनेक ख़ुशी भेल जे अक्षरक ज्ञान त छन्हि। एकर मतलब किछु सुधारक आशा कयल जा सकैत अछि। चिट्ठीसं ई बुझबामे आयल जे मधुश्रावणीमे हमर आएब सुनिश्चित करबाक अनुरोध कएल गेल अछि। अनुमान कएल गेल जे ओइ समय तक परीक्षा पूर्ण नै भेल रह्तै तें जाएब संभव नहि अछि। परीक्षा शुरू भ’ गेल त एकटा चिट्ठी पठा देलियंनि। ई जुनि बुझू झूठ कहै छी। कहिया दर्शन हैत अहाँसं आंगुरपर हम दिन गनै छी। सासुर अएबाक होइतछि इच्छा मुदा चलैतछि एखन परीक्षा बितत कोना ई मिलन-प्रतीक्षा कखनो-कखनो खूब सोचै छी, ई जुनि बुझू झूठ कहै छी। हैत परीक्षा-फल जं ने बढ़ियाँ लोक कहत जे अभागलि कनियाँ चुटकी लेत हमरा भरि दुनियाँ मोन मारि तें एखन पढै छी, ई जुनि बुझू झूठ कहै छी। जुनि बूझब जे अहाँकें बिसरलौं ककरहु माया-जालमे फंसलौं हम त अहाँकेर हाथ पकड़लौं अहींकेर प्रेम-गगनमे उडै छी, ई जुनि बुझू झूठ कहै छी। बीतत परीक्षा शीघ्रे आयब तखन अपन हम कुशल सुनायब अहाँ कथू ले’ ने गाल फुलायब चिट्ठी एखन बस एतबे लिखै छी, ई जुनि बुझू झूठ कहै छी। एखन विदेहमे भाइ राम लोचन ठाकुर जी पर जे विशेषांक आएल अछि, ताहिमे वंदना किशोरजी द्वारा जे साक्षात्कार प्रस्तुत कएल गेल अछि ताहिमे एक प्रश्नक जबाब दैत भाइ कहैत छथि जे हमरा पत्नीकें अक्षरक ज्ञान छलनि, मात्राक नहि। हमरा लगैत अछि जे इहो प्रश्न पूछल जेबाक चाही जे ओहि स्थितिमे परिवर्तनक हेतु अहाँ द्वारा की प्रयास कएल गेलै। मुदा, बड्ड देरी भ’ गेल अछि, आब ई प्रश्न ककरासं पूछब? ओहि समयमे ई स्थिति सामान्य रहैक। ‘कन्यादान’क बाद ‘द्विरागमन’ उपन्यासमे हरिमोहन बाबू जे समाधानक एकटा ‘मॉडल’ देने रहथि तकर कतेक उपयोग भेल अथवा ओकर की प्रभाव ओहि समयक लोकपर पडल, से एकटा शोधक विषय भ’ सकैत अछि। शास्त्र ईहो कहैत अछि जे हमर एकटा निर्णय हमरा कत’सं कत’ पहुंचा सकैत अछि तकर ठेकान नहि, तें सभ काज सोचिक’ करक चाही। बहुत काज अज्ञानतावश लोक करैत अछि, जाधरि ज्ञान होइ ताबत बहुत देरी भ’ गेल रहै छै। गलतीसं जे अनुभव होइत छैक से सीढ़ीक काज क’ सकैत अछि। मुदा किछु गलती एहेन होइछ जकर परिणाम ई अवसर नहि दैछ जे ओ सीढ़ीक काज क’ सकय। हमर एकटा कवि-मित्र छलाह आर. के. रवि। हमरा छत्तीसगढ़मे २८ साल पहिने परिचय भेल छल। हजारीबाग जिलासं गेल छलाह। ६ साल धरि प्रायः प्रतिदिन भेंट होइत छलाह। ओकर बाद मोबाइलसं सम्पर्क बनल छल। सालमे दू-चारि बेर मोबाइल पर गप नीक जकाँ भ’ जाइत छल। हिन्दीमे गीत-गजल लिखैत छलाह। गजलक दू टा पोथी प्रकाशित छनि : ‘सुबह की धूप’ आ ‘धूप और छांव’। ओ कोलियरीमे काज करैत छलाह। किछु साल पहिने सेवा निवृत भेल छलाह। बिलासपुरमे घर बनौलनि। बेटी-बेटा इंजिनियर छथिन, बंगलोरमे काज करै जाइ छथि, मुदा किछु माससं घरेसं काज करैत छथिन। पत्नी शिक्षिका छथिन बिलासपुरसं दूर एकटा ग्रामीण विद्यालयमे। संगे रहैत छलाह। दू साल पहिने गप भेल छल त कहलनि जे उच्च-रक्त चापक नियंत्रणक हेतु अंग्रेजी दबाइ जे खाइ छलाह से छोडि देलनि, छओ मास दुनू साँझ दू-दू टा मुक्तावटी खाक’ आब ओहो छोड देलनि आ रक्त-चाप सामान्य रहैत छनि। ओ उच्च रक्त-चापक समस्यासं अपनाकें मुक्त मानैत छलाह। बीस जुलाई २०२० क’ गप भेल त कहलनि जे पत्नीक ट्रान्सफर बिलासपुर करेबाक प्रयासमे लागल छी, नै भ’ रहल अछि। गत २६ मार्चक’ बाथ रूममे खसि पडलाह, ब्रेन हेमरेज भ’ गेलनि। अपोलो अस्पतालमे भर्ती कएल गेलनि। चारि दिन वेंटीलेटरपर रहलाह। फगुआक प्रात ३० मार्चक’ एहि जगतकें नमस्कार कहि गेलाह। हुनक पुत्र हिमांशुसं सम्पर्क भेल छल। चिरमिरी कोलियरीक अवकाश प्राप्त इंजिनियर आ गायक-मित्र दादा पल्टू मुखर्जी सर्वप्रथम ई सूचना देलनि आ समय-समयपर स्थितिसं अवगत करबैत रहलाह अछि । दादा सेहो बिलासपुरमे रहैत छथि। दादा रविजीक आ हमर दस-दस टा गीत-गजलकें शास्त्रीय धुनमे संगीतबद्ध क’क’ कैसेट उपलब्ध करौने छलाह जकरा हमसभ एखन धरि सुरक्षित नहि राखि सकलहुँ। दादाकें आब डॉक्टर जोरसं गीत गेबासं मना क’ देने छनि। तें अपने अपन गायनसं संतुष्ट नै होइत छथि। दादा रविजीक बेटी नेहाकें गायनक किछु अभ्यास करौने छलथिन। नेहा नोकरीमे बंगलोर चलि गेलीह त दादाक प्रशिक्षण छुटि गेलनि। नेहा इंजिनियर छथि मुदा गीत-संगीतसं लगाव आ शौक छनि, स्वर नीक छनि। आब नेहा अपन पिताक गीत-गजलकें स्वर द’ क’ हुनक शब्द सभकें जीवन्त राखि सकैत छथि। ई रविजीक प्रति उचित श्रद्धांजलि हेतनि। लगैत अछि जे उच्च-रक्त चापक नियंत्रण हेतु दबाइ छोड़बाक निर्णय ओत’ पहुंचा देलकनि जत’ हुनका लेल आब किछु नहि कएल जा सकैत छै। हुनकहि दू टा शेरसं हुनका श्रद्धांजलि अर्पित करबाक प्रयास क’ रहल छी : ‘बेखुदी मे जो कभी गीत गुनगुनाते हैं आंसू छलकाते हुए गम भी चले आते हैं’ ‘वक्त बिगड़े, तो बदल जाता है सारा आलम खुद के साये भी खुद से दूर नजर आते हैं’ ‘विदेह’मे प्रकाशित विशेषांकमे अग्रज राम लोचन ठाकुर जीक मैथिली साहित्य मे योगदानक विषयमे बहुत किछु जनलाक बाद आश्चर्य होइत अछि जे एतेक कर्मठ लोक एतेक जल्दी कोना अदृश्य भ’ गेलाह? कोन एहेन गलती कोन स्तरसं भेलै जे स्थिति ककरो नियंत्रणमे नहि रहि सकलै? १२ मार्चक’ घरसं निकलला आ एके बेर ६ अप्रैलक’ मृत अवस्थामे पाओल गेलाह। बीचक स्थितिक कल्पनासं मोन बेकल भ’ जाइत अछि। भाइ कत’ खसल-पडल हेताह—कोना दीन-हीन अवस्थामे की भेल हेतनि, एहि जिज्ञासाक समाधान कठिन अछि। आदरणीय राम लोचन जी एहेन साहित्यकारकें एहि तरहें जाएब सभकें व्यथित केलकनि। कते गोटे हुनका खोजमे डेढ़ माससं लागल छलाह। मुदा अहू प्रश्नक उत्तर लेल शास्त्रक सुनय पडत : विवाह आ जन्म-मरण ..........। ओना भाइ बहुत किछु मैथिली साहित्य जगतकें द’ गेल छथि जाहिसं ओ युग-युग धरि चर्चामे सभ ठाम उपस्थित रहताह। अपन अनुभव यैह कहैत अछि जे बहुत स्थितिक स्पष्टीकरण लोक अपनहु नै द’ सकैत अछि। गत पन्द्रह मार्च क’ हम अपने बाथरूममे कोना खसि पडलहुँ से नै बुझि सकलिऐ। ने पिच्छर छलै, ने चप्पल स्लिप करबाक कोनो आन कारण बूझ’ मे आएल आ ने बी पीक दबाइ छोड़ने रही। देबालसं टकरयबाक कारण माथक अगिला भागमे चोट बेशी बुझाएल। बेहोश नै भेलहुँ आ ने ब्लीडिंग भेलै। तत्काल बर्फ सं ओहि ठाम थोड़े काल सेकाई क’ क’ बादमे डॉक्टरसं सम्पर्क केलहुं। दस दिनक हेतु चारि टा दबाइ लिखलनि।दर्द त नै होइ छल तैयो दर्दक दबाइ सेहो कम-सं-कम तीन दिन ल’ लेब’ कहलनि। पाँच दिनक बाद दुपहरमे भोजनक बाद दीवानपर बैसल-बैसल औंघी लागि गेल आ नीचां खसि पडलहुँ। ऐ बेर केहुनीमे बेशी चोट लागल। एम्स गेलहुँ। हड्डी विभागमे सम्पर्क केलहुँ। डॉक्टर दू सप्ताहक लेल दबाइ लीखि देलनि। जेनरल मेडिसिन विभागमे सेहो सम्पर्क केलहुं। ओहि ठाम बी.पी.क दबाइ बदलि लेबाक सलाह भेटल। पहिने टेलमा ४० लै छलहुँ, आब टेलमा ए एम लेब’ कहलनि। सूगरसं एखन धरि दुनू गोटे बचल छी। आँखिक ऑपरेशनक स्थिति एखनधरि नै आएल अछि, समय-समयपर आइ-ड्रापसं काज चलि जाइत अछि। हम डॉक्टरक सलाहक अनुसार चारि सालसं हाई बी पी आ चारि माससं प्रोस्टेटक दबाइ यूरिमक्स-डी ल’ रहल छी। पत्नी पच्चीस सालसं बी पीक दबाइ ल’ रहल छथि। दुनू गोटे कोरोनाक टीकाक दुनू डोज ल’ नेने छी। यात्रासं बचैत छी। घरसं बाहर मास्कक उपयोग करैत छी। भोजनमे संयम रखैत छी। तथापि मृत्यु देवताकें जखन एबाक हेतनि, हुनका के मनाक’ सकैत छनि? मुदा वैज्ञानिक अथवा सरकारी आदेश अथवा सुझावक अवहेलना करैत स्वयं मृत्युकें आमंत्रित करी, ई त कोनो दृष्टिसं उचित नहि कहल जा सकैत अछि। गाममे लोक कोरोनासं नहि डेराइत अछि। एखनहु बहुत लोक एकरा फूसि बुझैत छथि। शहरोमे किछु लोक सरकारी सुझावक पालन करब आवश्यक नहि बुझैत छथि। परिणाम चिन्तित करबा योग्य अछि। सौभाग्यसं हमरा सबहक बीच ८०-९० बरखसं उपरक लोक सभ सेहो छथि जे सक्रिय छथि। हमरा लगैत अछि जे बेरा-बेरी हुनका सबहक स्वाथ्य-प्रबंधनक जानकारी सार्वजनिक होइत त नीक बात होइत। हुनका सभक अनुभवसं बहुत किछु सीखल जा सकैत अछि। दू बरखक दुनू नातिन धीया, यानवी आ तीन बरखक पोता आर्षभ एखन नै जागल अछि, तें लिखबाक काजक लेल भोरक समय हमरा लेल उपयुक्त रहैत अछि। आब जे घडी ने तीनू जागत । पहिने धीया कि यानवी जगतीह आ सोझे हमरा लग आबिक’ लैपटॉपक की-बोर्ड पर आक्रमण करतीह। प्रातसं राति दस बजे धरि तीनू गोटे हमरा सबहक मनोरंजन आ उपयोग करैत रहैत छथि जे एहि अवस्थामे बहुत ठाम दुर्लभ रहैत अछि। पटना / १४.०४.२०२१ (११) चरैवेति-चरैवेति-एक चारि बीघा वला परिवारक दुःख-सुखसं परिचित छलहुँ। विवाह भेलाक बाद पचास बीघावला परिवारक दुःख-सुखसं परिचय होम’ लागल। मधुश्रावणीमे हम एक दिन लेल सासुर जा सकलहुँ। वापस ढोली गेलहुँ त किछुए दिनक बाद सूचना भेटल जे हमर जेठसारि कलकत्ताक एकटा अस्पतालमे अंतिम सांस लेलनि। तीनटा पुत्र बारह बरखसं उपरक छलखिन। एकटा पुत्री तीन सालक आ एकटा छओ मासक छलखिन। किछुए मास पहिने गेल छलीह कलकत्ता। दांतक पीड़ा भेलनि। ऑपरेशनक बाद खाँसी भेलनि।ब्लीडिंग भेलनि। नहि बचि सकलीह। अपने गाममे सासुक सेवामे लागल रहलीह आ चारिटा दियर आ दूटा पुत्रक पढाई-लिखाई कलकत्तामे चलैत रहलनि तकर प्रबन्धमे हिनक प्रशंसनीय भूमिकाक चर्चा हुनकासं भेंटक उत्कंठा जगबैत छल, मुदा आब तकर कोनो संभावना नहि रहि गेल छल। आब यैह इच्छा रहि गेल जे साढ़ू कोना प्रबन्ध क’ रहल छथि, से देखी । हम सभ अंतिम वर्षमे गेलहुँ त आल इन्डिया टूर प्रोग्राम कॉलेज दिससं तैयार कएल गेलै। डेढ़ मासक प्रोग्राम छलै। एकटा बोगी सुरक्षित रह्तै, ट्रेन आ बसक माध्यमसं यात्रा पूर्ण हेबाक छलै। हम एहि यात्राकें नहि छोड़’ चाहैत छलहुँ। समस्या छलै जे छात्रकें अपना दिससं चारि सै टाका अग्रिम जमा कर’ पडैत छलै। हम एकटा अनुशासन अपनाले’ बनौने रही जे ससुरसं कोनो मांग नहि करबनि आ ने कोनो अपेक्षा करब। एकदिन ओ अपने कहलनि, ठाकुर हिनकाले’ एकटा साइकिल लेबाक अछि, तें दरभंगा चलब। हम पुछलियनि कोन साइकिल लेबाक विचार छनि, त कहलनि सेन रेले।ओहि समयमे यैह सभसं नीक साइकिल होइत छलै। पुछलियनि कते दामक छै, कहलनि चारि सै। हम चुप्प भ’ गेलहुँ, पुछलनि त कहलियनि जे साइकिलक बदला हमरा दोसर चीज बेशी उपयुक्त लगैए। कहलियनि जे आल इण्डिया टूर प्रोग्राम लेल एतबे राशि जमा करबाक छै। कहलनि हमरा कोनो आपत्ति नै अछि। हमर समस्याक निदान भ’ गेल। समस्तीपुर जंक्शनसं यात्रा आरम्भ भेल १२.०४.१९७२ क’ बुध दिन । हम साढ़ूकें पत्र द्वारा सुचित क’ देने छलियनि। सबेरे हावड़ा जंक्शन गाड़ी पहुँचलै। साढ़ू उपस्थित छलाह।पहिल भेंट छल तथापि असौकर्य नहि भेल। दुनू गोटे जलखै केलहुं। संक्षिप्त गप-शप भेल। हम कहलियनि कोन नम्बरक बस अथवा ट्रामसं पहुंचब, से बता दिय’, हम साँझमे डेरापर आबि जाएब। पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार दिनभरि सबहक संग घुमैत रहलहुं। बोटैनिकल गार्डन, चिड़ियाखाना, अजाएब-घर,विक्टोरिया मेमोरियल, धर्मतल्ला होइत साँझमे साढ़ूक डेरा पहुंचि गेलहुँ। एकटा कोठलीमे साढ़ूक गृहस्थीक सभ सामान छलनि। यैह हिनक तपस्या-स्थल छलनि। एतहि रहि चारिटा अनुज आ बादमे तीनटा पुत्रक शिक्षाक संग अपन नोकरीक प्रबन्धन करैत आबि रहल छलाह। भोजन अपने बनबैत छलाह। भोजन बनबैत काल बच्चाकें पढाइमे मदति सेहो करैत छलाह। ओहि समयमे एकटा बालक संगे छलखिन। रूममे दूटा चौकी छलै। भोजनक बाद एकटा चौकीक उपर दोसर चौकी राखिक’ नीचांमे ओछाइन भेल। ओहिपर फ़ैलसं हम दुनू साढ़ू बड़ी राति धरि गप-शप करैत रहलहुं। साढ़ू अपन पारिवारिक जीवनक कथा कहैत-कहैत पत्नीक योगदानक चर्च करैत भावुक भ’ जाइत छलाह। ककरो संग अपन दुःख-सुख बँटलासं मोन किछु हल्लुक होइत छैक। हमरा बहुत किछु बूझल छल तथापि हुनका मूँहें सूनि नीक लागल। बडकी दाइक तपस्याक परिणाम कते दिन बाद आएत, से सोचैत रहलहुं। दोसर दिन साढ़ूक अनुज बिन्दु जीक संग किछु महत्वपूर्ण स्थान जेना कलकत्ता यूनिवर्सिटी इंडस्ट्रियल एंड टेक्नोलॉजिकल म्यूजियम, कालीघाट, प्लानाटोरियम आदि देखि एलहुं। साँझमे साढ़ू हबर-हबर भोजन बनाक’ हमरा भोजन करा देलनि। बिन्दुजी हमरा हावड़ा जंक्शन पहुंचा देलनि। राति सबा आठ बजे पुरीक लेल प्रस्थान करै गेलहुँ। राति बर्थपर पडल-पडल बड़ी काल धरि सोचैत रहलहुं साढ़ू, बडकी दाइ, दू टा अबोध पुत्री आ तीन टा पुत्रक भविष्यक विषयमे। एक पीढ़ीक तपस्याक फल दोसर पीढ़ीकें प्राप्त होइत छैक। लगभग पचास साल भ’ गेलै। आइ बडकी दाइ आ साढ़ूक तपस्या आ आशीर्वादक प्रमाण बनल छथि सम्मानित सेवासं भारमुक्त भेल हुनक दू टा पुत्र आ जर्मनी, अमेरिका, बंगलोर, जमशेदपुरमे हिनका सबहक इंजीनियर, डॉक्टर पुत्र, पुत्री, पुत्रवधू आ जमाए लोकनि। अपन पूर्वजक प्रति सम्मान व्यक्त करबाक संस्कृति अनमोल अछि। हम सभ आइ जाहि ठाम छी ओहिठाम पहुचबामे हमर पूर्वज लोकनिक की योगदान रहल छनि, से जानबाक चाही। सबेरे हम सभ पुरी पहुँचलहुँ। सभ गोटे बंगालक खाड़ीमे ज्वार-भाटाक आनन्द लैत फेर चापा कलपर स्नान क’ क’ भगवान् जगन्नाथक दर्शन करबाक लेल मन्दिर जाइ गेलहुँ। ज्वार-भाटाक आनन्द लोककें पानिमे उतरबाक लेल आकर्षित करैत छैक। पानिक प्रवल प्रवाह कखनो लोककें ऊपर ल’ जाक’छोडि अबैत अछि त कखनो नेने-नेने बीचमे पहुंचा दैत अछि जत’सं लोक घुरियो सकैए, नहियों घुरि सकैए। दू साल पहिने हमर परिचित एकटा पति-पत्नी विवाहक बाद यात्रापर गेल छलाह। ज्वार-भाटा आकर्षित केलकनि। पानिमे उतरै गेलाह। थोड़े काल आनन्दमे रहलाह। किछुए कालमे आनन्द शोकमे परिवर्तित भ’ गेलनि । दुनू गोटेकें पानिक प्रवल प्रवाह झिकने चल गेलनि मुदा वापस एके गोटेकें केलकनि। कनियाँ कनैत रहि गेलीह, पति वापस नै एलखिन। एहेन दुर्घटना कम होइछै, मुदा होइछै। तें हमरा दूरेसं ज्वार-भाटाक आनन्द लेब ठीक लगैए। बत्तीस बरखक बाद फेर पुरी जेबाक अवसर आएल त होटलमे स्नान क’क’ आरती देख’ मन्दिर गेलहुँ। बादमे दूरेसं ज्वार-भाटाक आनन्द लै गेलहुँ। शास्त्रमे द्रष्टा बनिक’ संसारक सौन्दर्य देखबाक सन्देश अछि। मुदा, लोक डूबिक’ आनन्द लेबाक चक्करमे बहुत किछु गमा बैसैत अछि। भोजनक बाद गाड़ी वाल्टेर लेल प्रस्थान केलक। दोसर दिन भोरे वाल्टेर (आन्ध्र प्रदेश) पहुंचै गेलहुँ। स्नान-जलखैक बाद सिटी भ्रमण कय विशाखापत्तनमक बंदरगाह देखि अबै गेलहुँ। एकटा मन्दिर सेहो देखि एलहुं। साढ़े चारि बजे साँझमे गाड़ी मद्रास लेल प्रस्थान केलक। सभ स्टेशनपर लोकक भीड़ अपन लोकप्रिय अभिनेत्री जय ललिताक स्वागत पुष्प-बृष्टिसं क’ रहल छल। सामान्य कद-काठीक अभिनेत्री हाथ जोडि अपन प्रशंसक सबहक अभिवादन स्वीकार क’ रहल छलीह। यैह लोकप्रिय अभिनेत्री बादमे तामिल नाडूक लोकप्रिय मुख्य मन्त्री सेहो भेलीह। मद्रास सेंट्रल २.३० बजे दूपहरमे पहुंचल रही। मूर मार्केट, पेरिस कार्नर, चाइना मार्केट आ जेमिनी स्टूडियो घूमि अबैत गेलहुँ। एक ठाम एकटा धूप चश्माक दाम पुछलियै, कहलक पचास रुपया। बढ़’ लगलौं त बिना नेने जाए नै देब’ चाहैत छल। कहलियै पाँच रुपया से ज्यादा नहीं देंगे। तुरत द’ देलक। तैयो भेल जे ठका गेलहुँ। एहने सन अनुभव बहुत गोटेकें भेलनि। फेर कतहु कोनो वस्तुक दाम नै पुछलियै। राति ८ बजे गाड़ी मद्रास सेंट्रलसं प्रस्थान करैत दोसर दिन सबेरे पाँच बजे इरोड जंक्शन पहुंचल। इरोडसं ६.३० बजे प्रस्थान क’ क’ साढ़े बारह बजे दूपहरमे तिरुचिरापल्ली पहुचै गेलहुँ। ओहि ठाम एकटा मन्दिर देख’ जाइ गेलहुँ। रातिमे साढ़े बारह बजे प्रस्थान क’ क’ दोसर दिन साढ़े बारह बजे दूपहरमे रामेश्वरम पहुँचै गेलहुँ। हिन्द महासागरमे स्नान कय पाँच बजे बाइस टा कुण्डमे सेहो स्नान करै गेलहुँ। महासागर देखि मोन पडल कतेक कथा जे नान्हिटासं सुनैत आबि रहल छलहुँ। दस हजार साल पहिने भेल सीता-हरणक कथा, हनुमानजी द्वारा समुद्र फानिक’ विभीषणक सहयोगसं सीता माताक पता लगयबाक कथा, लंका दहनक कथा, बानर सेनाक सहयोगसं एहि महासागरपर बनल सेतुक कथा, ओइपार कतेक दिन तक चलल युद्धक कथा, राम द्वारा रावणक संहारक कथा। आब विचार करैत छी त लगैत अछि जे रावण आइ कोरोनाक रूपमे आबि चुकल अछि जे सम्पूर्ण विश्वकें आतंकित केने अछि। ओहि समय दस टा मुंह ल’क’ आएल छल, एखन हजारो-लाखो मुंह ल’क’ उपस्थित अछि। ओ रावण देखाइ दैत छल, तें ओकरा हनुमानजी आ अंगद सेहो लुलुआ लेलखिन, एखन त ओ देखाइए नै दैत अछि। एहेन स्थितिमे ओकर नाभि कत’ छै,से के कहत? ओइ बेर त बेर-बेर गरदनि काइटक’ भगवान अपने परेशान भ’ गेल छलाह। संयोग देखियौ ओम्हर अयोध्यामे रामक आगमनक हल्ला भेलै, एम्हर अदृश्य भेषमे रावण सौंसे दुनियामे त्राहि-त्राहि मचा देलक। युद्ध चलि रहल अछि। रामक सेनामे लाखो प्रतिभाशाली विशेषग्य- चिकित्सकक टीम दिन-राति पुल तैयार करबामे लागल अछि। किछु लोक रावणक ख़ुफ़ियाक रूपमे काज क’ रहल छथि। पुल बनबामे देरी करबा रहल छथि। कुर्सी पयबाक, कुर्सी बचयबाक अथवा कुर्सी हथियेबाक प्रोजेक्टपर सेहो काज संगहि चलि रहल अछि। किछु गोटे रंग-विरंगक डहकन तैयार क’ रहल छथि। काज बहुत भेलैए। करोडो लोककें दुनू खोराक टीका पड़लनि। जान बचयबाक लेल सुझाव देल गेल छनि जे घरेमे रहू। एकटासं काज नै चालत, दू टा मास्क लगाक’ रहू। बेर-बेर हाथ धोइत रहू। दूनू डोज लेलाक बादो संक्रमण हो त चिन्ता नहि करब। डॉक्टरसं संपर्क क’ क’ सभटा दबाइ ल’ लिय’ आ जांच सेहो करबा लेब। सभटा प्रोटोकाल सुनिश्चित राखब त मरब नै। शेष लोक सभ ले’ सेहो अभियान शुरू भ’ चुकल अछि। हमहूँ दुनू गोटे १२ अप्रैलक’ दोसर डोज लेलहुं। चारिम दिन माने १५ क’ हम भरि राति बोखारमे रहलहुं। बोखार १०२ तक रहल। पानिक पट्टी मात्रसं ठीक भ’ गेल, मुदा फेर दस दिनक बाद बोखार आएल। डॉक्टरसं सम्पर्क केलहुँ। डॉक्टर साहेब सभटा दबाइ लीखि देलनि जे अखबारमे प्रकाशित कएल गेल छलै। कोरोना वला तीनू नै भेटल। यैह दबाइ भेटल : १.पेरासिटामोल ६५० २.अज़िथ्रोमायसिन ५०० ३.विटामिन सी दू दिनक बाद आब बोखार नहि अछि। अज़िथ्रोमायसिन तीन दिन ल’ चुकल छी। पाँच दिनक सुझाव छल, तें दू दिन और लइए लेब, से सोचैत छी। हिनका पेरासिटामोलसं काज चलि गेलनि। परसू रातिमे नाक जाम भ’ गेल। राति भरि निन्न नहि भेल। चिन्ता भेल, मुदा सरिसोक तेलक प्रयोगसं लाभ भेल। ऐसं नै होइत तखन फेर डॉक्टर- अस्पताल-सिलिंडर की-की कर’ पडैत आ की-की होइत से के जानय ! एम्हर तरह-तरहक प्रयोग व्यक्तिगत स्तरपर सेहो लोक क’ रहल अछि। हमर मित्र सुधाकान्तजी सुचित केलनि अछि जे शहरक अस्पताल सभमे ओक्सिजनक कमी सूनि एक गोटे, जिनकर ओक्सिजन स्तर कम भ’ रहल छलनि, गाम आबि गेलाह आ एकटा पीपड़क गाछक जड़ि लग साफ़ क’क’ ओतहि सात दिनसं रहै छथि आ एकदम स्वस्थ छथि। एमहर नारद जी द्वारा कतहु ईहो प्रसारित कएल गेल अछि जे जहिया आ जखने ई रावण कोनो चुनावक रैलीमे चलि गेल अथवा गाम दिस गेल, ओही क्षण ई जरिक’ भस्म भ’ जाएत,कारण एहि बेर ब्रह्माजीसं वरदान मंगैत काल अही दुनू ठाम अपन सुरक्षाक आश्वासन मांगब बिसरि गेल। तें देखै नै छिऐ जे गाममे मूडन, उपनयन, एकादशीक यग्य, विवाहक भोज-भात आदि अबाधित चलि रहल अछि आ पटना,दिल्ली, मुंबई और जहां-तहांसं आबि लोक एहिमे सम्मिलित भ’ क’ अपन योगदान दैत अयशसं बचि रहल छथि। शहरमे प्रति दिन आत्मा सभ देह छोडैत जा रहल छथि। कुमार गगनकें नहि बचा सकलियनि। मनोज मनुज नहि बचि सकलाह। अदभुत लेखक नरेन्द्र कोहली नै रहलाह। अदभुत गीतकार-गजलकार कुँवर बेचैन चल गेलाह। कतेक घरक खाम्ह खसि पडल। कतेक घरक दीप मिझा गेल। लोक आतंकित अछि। किनकर कहिया आ कखन नंबर आबि जेतनि, से निश्चित नहि अछि। एखन क्यो खोंखी करैत अछि, त डेरा जाइ छी। क्यो छीकै छै, त डर भ’ जाइए। आपातकालमे लिखल गेल दुष्यंत कुमार जीक ई शेर मोन पड़ि रहल अछि : ‘सैर करने के लिए सड़कों पे निकल जाते थे अब तो आकाश से पथराव का डर होता है’ नीरज जी सेहो कहने छथि : ‘ मित्रो हर पल को जिओ अंतिम पल ही मान अंतिम पल है कौन-सा कौन सका है जान’ एकटा स्वामी जी कहैत छलाह, जतेक पवित्र आत्मा सभ एखन जा रहल छथि, से किछुए सालक बाद वापस आबि जेताह आ हिनके सभसं हैत सतयुगक स्थापना। स्वामी जीक बातसं मरबाक डर कम भेल अछि। पटना /३०.०४.२०२१ (१२) चरैवेति-चरैवेति-दू रामेश्वरमसं गाड़ी २० अप्रैल क’ रातिमे साढ़े दस बजे प्रस्थान केलक। २१ क’ ६ बजे सबेरे मदुरै पहुंचल। मीनाक्षी मन्दिर जा क’ दर्शन क’क’ ९ बजे प्रस्थान -४ बजे तीरू जंक्शन पहुंचै गेलहुँ। ओत’सं ११.५० बजे रातिमे प्रस्थान - ६ बजे ईरोड आ ओत’ सं ७ बजे प्रस्थान क’ २ बजे जल्लारपेट पहुचै गेलहुँ। ओत’ सं ९ बजे रातिमे प्रस्थान -२३ क’ भोरे आर्कोनम पहुँचलहुँ। २४ क’ ३.२० बजे दुपहरमे जनता एक्सप्रेससं पुणे लेल प्रस्थान क’ २५ क’ साँझमे ७ बजे पुणे पहुँचै गेलहुँ। २७ क’ ४.३० बजे भोरे बॉम्बे वी टी पहुँचलहुँ। ८.३० बजे खेलानन्दक डेरा गेलहुँ। हमरासं एक कक्षा आगाँ पढैत छलाह। गामसं एक साल पहिने आएल छलाह खेलानन्द। मामा गामक किछु गोटे काज करै छलखिन, हुनके सभ लग रहै छलाह। कहलनि जे आब दुःख होइए जे कम-सं-कम मैट्रिक पास क’ क’ आएल रहितहुँ त ढंगक नोकरी भेटल रहैत। नीक लागल ई देखि जे अपन पूर्व परिचित लोक सबहक संग नीक ठाम रहैत छथि। बिना भोजन केने नहि आब’ देलनि। ओत’सं घूरिक’ १०.३० बजे स्टेशन एलहुँ। फेर अजायब घर, शंताकृज़ हबाई अड्डा घूमि अबै गेलहुँ। २८ क’ हबाई अड्डा, ओत’सं हैंगिंग गार्डन घुमैत साँझमे ८.३० बजे समुद्रक किछेरमे चौपाटी जाइ गेलहुँ। ३ मईक’ आगरा किला,ताजमहल,फतेहपुर सिकरी घूमि स्टेशन आबि गेलहुँ। ४ क’ आगरासं मथुरा, वृन्दावन घूमि मथुरा जंक्शनसं राति ११.४० बजे दिल्लीक लेल प्रस्थान। ५ क’ सबेरे नई दिल्ली जंक्शन पहुँचै गेलहुँ। आइ. ए. आर. आइ., जंतर-मंतर, जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल, क़ुतुब मीनार,राष्ट्रपति भवन, संसद भवन,लाल किला,राजघाट समाधि, शान्ति घाट, विजय घाट घुमै गेलहुँ। कृष्ण कान्त जीसं भेंट करबाक प्रयास केलहुँ। पता चलल जे तीन दिन पहिने गाम चलि गेलाह। हमर प्रिय लोक छलाह। पढैमे खूब मेधावी। मुदा गाममे नीक वातावरण नहि भेटबाक कारण पढ़ाइ छोडि दिल्ली चलि गेल छलाह। हम हुनकासं भेंट कर’ चाहैत छलहुँ। हुनक स्थिति देख’ चाहैत छलहुँ। नहि भेटलाह त सोचलहुँ आब गामे जाएब त भेंट करबनि। ६ क’ इंडिया गेट, ललित बाबू ओत’, राष्ट्रपति भवन घूमि सहरसाक सांसद चिरंजीव झा जी ओत’ भोजन हम आ मिश्रजी केलहुँ। सी पी आइ नेता-सांसद भोगेन्द्र बाबू ओत’ गेलहुँ। हुनका संगे संसद भवन गेलहुँ। हुनकासँ पहिल बेर भेंट भेल छल मुदा ओ से भान नै हुअ’ देलनि।संगे नेने गेलाह संसद भवन, कत’ की होइ छै से जानकारी भेटल, हुनका संगे सी पी आइ कार्यालय गेलहुँ। हुनका संगे फोटो खिचबै गेलहुँ। तीन-चारि घंटा हुनका संग रहलहुँ हम दूनू गोटे, नीक लागल। बादमे स्टेशन आबि पुरानी दिल्ली स्टेशन गेलहुँ। राति ९.४५ बजे लुधियानाक लेल गाड़ी प्रस्थान केलक। ७ क’ रवि रहै। हम आ मिश्रजी ओहिना घूमय निकललहुँ। एक ठाम ऊनक फैक्ट्रीक शाइन बोर्ड देखलिऐ। गेट कीपरकें कहलिऐ जे हम सभ फैक्ट्री घूम’ चाहै छी। कहलक, साहब से जाकर पूछो। गेलहुँ। कहलियनि, हम लोग बिहार के एग्रीकल्चर कॉलेज से टूर पर आए हैं, फैक्ट्री घूमना चाहते हैं। कहलनि, पहले से कोई अनुमति लिये हैं, कोई पत्राचार किया गया था? कहलियनि, नहीं। त कहलनि, फिर मुश्किल है। हम मिश्र जी कें कहलियनि, चलू-चलू, हम सभ यूनिवर्सिटी चलै छी। हम सभ मैथिलीमे गप करैत वापस हुअ’ लगलहुँ, त ओ सोर पाडलनि। हम सभ घुमलहुँ। एहि बेर ओ बहुत आदरसँ कुर्सीपर बैसौलनि। दू-दू टा सिंघारा आ दू-दू टा रसगुल्ला मंगबौलनि। नाम-गाम सभ मैथिलीमे पुछलनि। फेर कहलनि जे हमहूँ सभ दरभंगे जिलाक विभिन्न गामक छी, हमर गाम झंझारपुर लग अछि। बहुत आनन्दित भेलहुँ। एक गोटे एलाह, हुनका हमरा सबहक परिचय देलखिन। ओ हमरा सभकें संग ल’ गेलाह आ सभ किछु देखा देलनि। एक घंटा घूमि-फीरि एलाक बाद एलहुँ त हुनका धन्यवाद दैत बिदा हुअ’ लगलहुँ त रोकि लेलनि, कहलनि, अहाँ सभले’ भोजन तैयार अछि, बिना भोजन केने नै जा सकै छी। हमरा सभकें आश्चर्य भेल जे पहिल परिचयमे एतेक अपनापन हमरा सभकें कोना उपलब्ध भ’ गेल। हम सभ कहलियनि जे साँझमे हमरा सबहक गाड़ी खूजत। ओ कहलनि जे भोजन क’ क’ थोड़े काल आराम करब, समयसं एक घंटा पहिने स्टेशन पहुचायब हमर काज थिक। ओ बड्ड आग्रह केलनि जे आबि गेल छी त सभ गोटेसं भेंट-घाँट क’ लिय’, हुनको सभकें नीक लगतनि। नहि मानलनि, ल’ गेलाह डेरा। ओत’ जाइत लागल जेना पहिल बेर समधियान पहुँचल होइ। पयर धोब’ सं ल’ क’ भोजन –आराम धरिमे बहुत पैघ पाहुनक सत्कार जकाँ व्यवस्था देखि चकित भ’ गेलहुँ। बडकी टा हॉल छलै। सत्ताइस गोटे रहैत छलाह। विभिन्न शिफ्टमे ड्यूटी रहैत छलनि। शिफ्टक अनुसार जे उपलब्ध रहैत छलाह हुनके देख-रेखमे भोजन बनैत छल। एक आदमी सहायताक लेल रखने छलाह। भोजनक सँचार देखि गुम्म भ’ गेलहुँ।हमरा सबहक आग्रहपर एकटा थारी उपलब्ध भेल। हम सभ जते भोजन क’ सकैत छलहुँ ततेक राखि शेष भात,तडुआ, तरकारी वापस केलहुँ। एहि लेल बहुत संघर्ष कर’ पड़ल। रंग-विरंगक मुट्ठी काटल आम एकटा बाल्टीमे रखने छलाह, से चलब’ लगलाह। दही आ रसगुल्ला बेरमे फेर बड़का लीला भेल। हम दूनू गोटे मध्यम कोटिक खौकार छलहुँ। ओ सभ बरियाती जकाँ जोर करैत छलाह। कहुना-कहुनाक’ हम दूनू गोटे भोजन समाप्त केलहुँ। पान-सुपारी आएल।ओहो सभ जे ओइ दिन छलाह से भोजन केलनि आ तकर बाद आराम करैत-करैत मिथिलाक संस्कृति, भोज, बरियाती आदि विषयपर गप्प आ ठहक्काक कार्यक्रम प्रारम्भ भेल से बड़ी काल धरि चलल। न्यू एरा वूलेन फैक्ट्री, ओसवाल फैक्ट्री आ एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी कैंपस घूमि साँझमे हम सभ स्टेशन पहुंचि गेलहुँ। रातिमे बर्थपर पडल-पडल बड़ी काल धरि सोचैत रहलहुँ जे अपन भाषामे गप करबाक कारणे हमरा सभकें एकदम नव स्थानमे अपरिचित लोक सभसं अप्रत्यासित सम्मान प्राप्त भेल मुदा की बहुत आवेशसं भोजने कराएब मात्र मिथिलाक संस्कृति छै। कतहु किछु कमीक आभास भेल। किनको मैथिली साहित्यसं रूचि किएक नहि देखलियनि। चारि आनामे मिथिला मिहिर भेटैत छलै,मुदा एतेक मैथिलक बीच एकटा ‘मिथिला मिहिर’ किए नहि उपलब्ध छल। भाषाक प्रति जागरूकताक अभाव किएक छल, ई प्रश्न बेर-बेर मोनमे उठैत रहल। मुदा हिनका सभकें की कह्बनि जखन गाम-घरमे सेहो स्थिति एहने अछि, लोक भोज करबामे ओतेक खर्च क’ लैत अछि,किन्तु चारि आनाक एकटा पत्रिका कियो कीनैत होथि से ताकब कठिन अछि। पत्रिका कीनब आवश्यक नहि मानल जाड़त अछि। जखन मधुबनी-दरभंगाक इएह स्थिति अछि त एतेक दूर चाकरी कर’ आएल लुधियानाक मैथिलकें की कहबनि। ८ क’ ३ बजे दिनमे पठानकोट जंक्शन पहुँचलहुँ। रात्रि विश्राम एतहि करै गेलहुँ। ९ क’ ७.३० बजे श्रीनगर लेल प्रस्थान करै गेलहुँ। २.४५ बजे ३४००० फीट ऊंचाइपर पत्नी टॉप पहुंचलहुँ। कूदमे भोजन करै गेलहुँ। ९.३० बजे रातिमे श्रीनगर पहुंचलहुँ। एकटा अप्रिय घटना एत’ घटि गेलै। किछु गोटे होटलमे अपन सामान राखि बाहर निकलि गेलाह। हम ठाकुरजी (अशोक कुमार ठाकुर) आ मिश्र जी फ्रेश भ’ क’ चाह पीबि बाहर निकललहुँ। घूमि-फीरिक’ भोजन क’ क’ राति ११.४० बजे एम्बेसी होटल पहुंचलहुँ। हमरा सभकें देखिते हमर सबहक एकटा संगी जोर-जोरसं अप्रिय शब्द सभ मूँहसं उगिल’ लगलाह, जकरा लोक गारि कहैत छैक। हम सभ सोच’ लगलहु जे की भ’ गेलै। गपसं लगैत छल जे ओ विशेष स्थितिमे छथि। किछु कालक बाद पता चलल जे हम सभ चाह पीबि क’ निकलि गेलिऐ घूम’ ले’ बाहर, ई सभ तखन बाहरसं आबि गेलाह। होटलक बैरा नहि बुझलकै जे ई सभ नहि पीने छलाह, हिनका सभकें देखि हिनके हाथमे बिल द’ देलकनि। ई किछु विशेष स्थितिमे छलाहे, पाइ द’ क’ झगडा करबाक तैयारी केलनि आ हमरा सभकें देखिते शुरू भ’ गेलाह। हमरा मोन पडल रस्तामे एकठाम कहने छलाह, हमारी हंगामा पार्टी किसी से कहीं भी और कभी भी उलझ सकती है। पुछने रहियनि, बिना कारण के भी आप किसी से उलझ जाएंगे त कहलनि, कारण हम ढूढ लेंगे न। हमरा लागल जे एखन धरि हम सभ बांचल छलहुँ मुदा आब हिनका कारण भेटि गेलनि। हमरा एखन पाइ चुकता क’ चुप रहि जाएब उचित बुझाएल। हम एहेन स्थितिमे कमजोर भ’ जाइ छलहुँ। अशोक कुमार ठाकुरजीकें अनर्गल बात बर्दाश्त नै होइत छलनि। ओ डांटिक’ गारि नै पढबाक लेल चेतौनी देलखिन। ओ ढूसि लडबाक लेल तैयार छल। आगू बढल। हम सभ ठाकुरजीकें रोकि लेलियनि। मिश्र जी ओकरा सामने ठाढ़ भ’ गेलखिन। ओ चिकरल, आप हमारे सामने आनेबाले कौन हैं। मिश्र जी कहलखिन, मैं तुम्हारा पैगम्बर हूँ। दू गोटे ओकरो पकड़िक’ ओकरा शांत करबाक कोशिश केलक। ओ शांत होइते नहि छल। ठाकुर जी कहलखिन, तुमने हमें गाली दी है, मैं तुम्हें शाप देता हू कि तुम फेल कर जाओगे। बड़ी काल पर लोक सूतल। सबेरे ओ एलाह, रात की गलती के लिए मुझे माफ़ कर दीजिए। कहलियनि, ठाकुरजी से कहिये। ठाकुरजी सं सेहो माफ़ी मंगलनि। सभ यज्ञमे व्यवधान होइत अछि, से भेलै। यात्रा आगाँ बढ़ल। १० क’ ९.४५ बजे होटलसं प्रस्थान क’ १२.३० बजे दुपहरमे सोनमर्ग पहुंचै गेलहुँ। २.३० बजे ओत’सं प्रस्थान क’ ५ बजे होटल वापस आबि जाइ गेलहुँ। ६ बजे चाह पीबि बजार घूमय गेलहुँ। ९.३० बजे होटल घूरि अबै गेलहुँ। ११ क’ ७.३० बजे बससं प्रस्थान क’ चश्मेशाही, निसाद्बाग,आदि रमणीय स्थान सभ देखैत १२.३० बजे ८७ किलोमीटरपर स्थित पहलगाम पहुंचै गेलहुँ। भोजन क’ घोडासं पहलगामसं २ मीलपर स्थित बेईशरण गेलहुँ। आधा घंटा ओत’ ठहरि ओइठामक मनोहर दृश्य देखैत घोडासं घूरि अबै गेलहुँ। ६ बजे घूरि क’ आबिक’, जलखै क’ क’ सिंकारासँ डल झीलमे ७ बजेसँ १० बजे धरि विचरण करैत झीलक मध्यसं चारू कात पहाडक मनमोहक दृश्यक अवलोकन करैत नेहरू पार्क, कबूतरखाना, चार चिनार आदि महत्वपूर्ण स्थानक आनन्ददायक दृश्यसं लाभान्वित होइत गेलहुँ। श्रीनगरक ओ साँझ, गार्डन बुलबुल (सिंकाराक )क मांझी नूर अहमदक मस्ती भरल प्रेम गीत ‘ ओलाइश्चिगो गाइश्चे दिलदार मे .......’ अविस्मरनीय रहल। १२ क’ साढ़े नौ बजे होटलसँ प्रस्थान क’ साढ़े बारह बजे गुलमर्ग, डेढ़ बजे खिलनमर्ग पहुंचि क’, ओतहि भोजन क’ पुनः गुलमर्ग होइत घूरि आबि डल झील, बाजार घुमैत, भोजन करैत साढ़े दस बजे होटल आबि गेलहुँ। १३ क’ टूरिस्ट सेंटरसँ प्रस्थान क’, पौने दू बजे बाटमे भोजन क’ साढ़े नौ बजे पठानकोट जंक्शन पहुँचैत गेलहुँ। १४ क’ १.४० बजे पठानकोट जंक्शनसँ प्रस्थान क’ ६ बजे जल्लारपेट जंक्शन, १० बजे लुधियाना जंक्शन आ ओत’सँ हरिद्वार लेल प्रस्थान करै गेलहुँ। १५ क’ ११ बजे हरिद्वार पहुंचि स्नान क’,मन्दिरमे दर्शन-पूजाक बाद भोजन क’ क’ बोगीमे चलि एलहुँ। १६ क’ सबेरे ऋषिकेश लेल प्रस्थान करै गेलहुँ। ९.३० बजे ऋषिकेश पहुंचि साढ़े दस वला ट्रेनसं पुनः हरिद्वार आबि संध्या ३.४५ बजे हरिद्वारसं देहरादून लेल प्रस्थान क’ साढ़े पाँच बजे देहरादून पहुंचै गेलहुँ। १७ क’ सबेरे आठ बजे मसूरीक लेल प्रस्थान क’ पौने दस बजे मसूरी पहुँचै गेलहुँ। रोप-वे पर यात्रा केलहुं। लाल टिब्बा गेलहुँ, जतय टेलिस्कोपसं हिमालय, तिलायनामाक गौतम मन्दिर, दुर्गा मन्दिर, बद्रीनाथ, केदारनाथ, सेंट जेवियर्स कॉलेज देखिक’ डेढ़ बजे बससं विदा भ’ क’ साढ़े तीन बजे स्टेशन पहुँचै गेलहुँ। १८ क’ भोरे साढ़े तीन बजे बरेलीसं प्रस्थान क’ काठगोदाम आ ओत’ सं साढ़े नौ बजे बससं नैनीताल लेल प्रस्थान करै गेलहुँ। साढ़े ग्यारह बजे नैनीताल पहुँचै गेलहुँ। साँझमे नावसं झीलमे विचरण करै गेलहुँ। बजार घूमि, भोजन क’ क’ दस बजे रातिमे वापस अबै गेलहुँ। १९ क’ साढ़े दस बजे नैनीतालसँ प्रस्थान क’ काठगोदाम होइत सबा बारह बजे पन्तनगर पहुँचै गेलहुँ। साढ़े तीन बजे पन्तनगर कृषि कॉलेज पहुँचै गेलहुँ। साँझमे सबा छौ बजे पन्तनगरसँ ट्रेनसँ बरेली लेल प्रस्थान करै गेलहुँ। २० क’ २.३० बजे भोरमे बरेलीसं लखनऊ लेल प्रस्थान क’ सबा नौ बजे लखनउ पहुँचै गेलहुँ। छोटा इमामबाडा, बड़ा इमामबाडा, भूल भुलैया, चिड़ियाखाना, म्यूजियम, बोटैनिकल गार्डन घूमै गेलहुँ। २१ क’ भोरे ४ बजे लखनउसँ कानपुर लेल प्रस्थान कएल गेल। ७ बजे कानपुर पहुँचै गेलहुँ। बड गरमी छलै। दिन भरि ओतहि विश्राम करै गेलहुँ। २२ क’ भोरे २.३० बजे कानपुरसँ वनारसक लेल प्रस्थान कएल गेल। सबेरे आठ बजे इलाहाबाद पहुँचै गेलहुँ। ९.३० बजे ओत’सँ प्रस्थान क’ तीन बजे वनारस पहुँचै गेलहुँ। हिन्दू यूनिवर्सिटी, बिडला मन्दिर,संकट मोचन,श्री सत्य नारायण तुलसी मानस मन्दिर, दुर्गा मन्दिर, बाबा विश्वनाथ मन्दिर घूमै गेलहुँ। गंगामे स्नान क’, बाबा विश्वनाथक पूजा क’ क’ राति पौने नौ बजे स्टेशन घूरि अबै गेलहुँ। २३ क’ १२.१५ बजे वनारससँ प्रस्थान कय मुग़लसराय होइत तीन बजे अपराह्नमे पटना जंक्शन पहुँचै गेलहुँ। आकाशवाणी,पटना गेलहुँ। साढ़े नौ बजे रातिमे पटना जंक्शनसँ प्रस्थान कय राति बारह बजे बरौनी जंक्शन पहुँचलहुँ। २४ क’ भोरे पाँच बजे बरौनीसँ प्रस्थान क’ सात बजे समस्तीपुर जंक्शन पहुँचै गेलहुँ। समस्तीपुर जंक्शनसं आठ बजे प्रस्थान क’ सबा नौ बजे दरभंगा पहुँचलहुँ। दरभंगासँ बससँ एगारह बजे गाम सलमपुर –शम्भुआड (मधुबनी)पहुँचि गेलहुँ। टूर प्रोग्रामक समाप्तिपर एक सप्ताहक विशेष अवकाश स्वीकृत भेल छलै, से तीन दिन गाममे बीतल आ तीन दिन सासुरमे। ढोली पहुंचि फेर सभ गोटे पढाइमे लागि गेलहुँ। दू मासक बाद परीक्षा भेलै। ठाकुरजीक श्राप फलित भेलनि। अशोक कुमार ठाकुर प्रथम श्रेणीमे प्रथम एलाह। हम, मिश्र जी, नन्द कुमार झाजी द्वितीय श्रेणीमे उतीर्ण भेलहुँ। हमरा संतोष भेल जे प्राप्तांक ५६.२ % आएल, एहि आधारपर बैंकमे बहालीक लेल होइबला प्रतियोगिता परीक्षामे सम्मिलित भ’ सकै छी। ठाकुरजी ओही कॉलेजमे एम्.एस.सी.(ए जी) कर’ लगलाह। हम सभ बैंकमे नोकरीक लेल प्रतियोगिता परीक्षाक प्रतीक्षा कर’ लगलहुँ। (१३) कल्पना आ यथार्थ ढोलीसँ गाम जाइत काल दरभंगामे टैक्सी स्टैंड पर भेटलाह रामपट्टीक आर के रमण जी। हुनकासँ किछु गीत सुनने रही आर के कॉलेजमे भेल विद्यापति पर्वमे। बहुत नीक लागल रहय। हुनकासँ गप भेल। हुनको दरभंगासँ मधुबनीबला टैक्सी पकड़बाक रहनि। रस्तामे हुनका जना देलियनि जे हमहूँ लिखै छी। ओ पुछलनि जे कोनो रचना संगमे अछि। हम हुनका एकटा रचना देख’ देलियनि। कविता रहै ‘रूपांतरण’ ओ कहलनि, हम ई राखि लै छी, वैदेहीक अगिला अंकमे छपि जाएत (आदरणीय सोमदेवजी छलाह ‘वैदेही’क सम्पादक)। पुछ्लनि, और की लिखै छी, त कहलियनि जे एखन किछु गीत सेहो लीखि रहल छी। ओ कहलनि फल्लाँ तारीक क’ कोइलखमे विद्यापति पर्व मनाओल जेतै, अहूँ आउ, किछु और साहित्यकार सभसँ परिचय हैत। कोइलख गेलहुँ। नीक लागल। मधुपजी, किरणजी, सोमदेवजीकें सेहो देखलियनि। पहिल बेर हुनका सभसँ कविता सुनबाक अवसर भेटल छल, से बड्ड नीक लागल। हमरो काव्य पाठ लेल प्रस्तुत कएल गेल। दूटा रचना सुनौलियनि। श्रोता सबहक प्रतिक्रिया आ साहित्यकार लोकनिक आशीषसँ हमर उत्साहवर्धन भेल। तकर बाद रामपट्टी, कथवार आ रहिका सेहो विद्यापति पर्वमे भाग लेलहुँ। कमलाकान्तजी, ‘अकेला’ जी, शंकपियाजी, प्रदीपजी आ प्रवासी साहित्यालंकारजीसँ सेहो परिचय भेल। रहिकामे आदरणीय रवीन्द्रजी आ उदय चन्द्र झा ‘विनोद’जीसँ परिचय भेल। एकठाम एकटा गीत प्रस्तुत केने रही जकर अंतिम पांती ई रहै : ‘दुख केर इ राति बौआ बीतत अबस्से, असरा गरीबक भगवान् रे, जुनि कान रे बौआ जुनि कान रे।’ आर के रमणजी कहलनि जे ‘असरा गरीबक भगवान रे’ के बदला ‘जहिया तों हेबही जुआन रे’ हमरा बेशी नीक लगैत। पूरा गीत ई अछि : जुनि कान जुनि कान जुनि कान रे बौआ जुनि कान रे। नै तँ कौआ ल’ जेतौ तोहर कान रे।। बौआ ....... खा ले जल्दी, सूति रह चुप-चाप नहि तँ भकौआँ धरतौ, सुनहिन हे जंगलमे गीदड़ बजै छै टाङ पकड़ि ल’ जेतौ एतौ लकड़सुंघा धोकड़ीमे कसिक’ नेने चल जेतौ अपन गाम रे।।...... काल्हि अबै छै बौआके बाबू नेने कते बस्तुनमा हमरा बौआ ले’ अंगा - टोपी रंग-विरंगक खेलौना सायकिल के घंटी बौआ टुनटुन बजेतै देखि जुड़ायत हमर प्राण रे। ..... बुचिया रधिया बड़ बदमास’छि बौआ हमर बुधियार भोरे बौआक बाबाकें कहिक’ मङबा देबै कुसियार काल्हि खन नानीक गामसँ अबै छै, चंङेरा भरल पूरी -पकवान रे। ..... भोरे बौआले’ भानस करबै भात- दालि- तरकारी बुचियाकें कनिञो नै देबै बौआकें भरि थारी दुखकेर ई राति बौआ बीतत अबस्से असरा गरीबक भगवान रे। .... १९७८ मे प्रकाशित गीत-संग्रह ‘तोरा अंगनामे’क पृष्ठ चारि आ पाँचपर ई गीत छपल अछि। इन्टरनेट पत्रिका ‘विदेह’क साइटपर पोथी सेहो ई पोथी उपलब्ध अछि। १०.०५.२०२१ क’ यू-ट्युब पर ‘नीलम मैथिली’ द्वारा अशोक चंचल जीक स्वरमे ई गीत प्रस्तुत कयल गेल अछि जाहि मे ‘वस्तुनमा’क स्थानपर ‘वस्तुनामा’ कहल गेल अछि, जे ठीक नै लागि रहल छै। विडियो तैयार करबा काल प्रस्तुतकर्ता आ गायक दुनू गोटेकें मूल गीतक शब्दक शुद्ध उच्चारण सुनिश्चित करबाक चाहियनि। एहि प्रस्तुतिमे एकटा और त्रुटि भेल अछि जे गीतकारक नाम रवीन्द्र नाथ ठाकुर अंकित अछि। हमरा द्वारा सुचित केलापर एकठाम त सुधार कयल गेलै, मुदा फ्रंट पर एखनो सुधार बांकी अछि। आब दुनू नाम आबि रहल अछि। आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गीतकार छथि। लोकप्रियताक लेल हुनक नामक उपयोग हुनक सहमतिक बिना नहि कयल जेबाक चाही। आर के रमणजीक एकटा गीत ‘अहांकेर इजोरिया कहाँ हम मँगै छी, अन्हारोमे हमरो जीब’ त दीय’..... बहुत नीक लागल रहय। प्रवासी साहित्यालंकारजीक ‘अन्नपूर्णा’ सेहो सभकें बहुत नीक लागल रहनि। प्रदीपजीक कयटा गीत बहुत लोकप्रिय भेल छलनि। रहिकामे कवि सम्मलेन खूब नीक होइत छलैक । रवीन्द्रजी पहिने कवि सम्मलेनमे सुन्दर कविता अथवा गीत प्रस्तुत करैत छलाह, सांस्कृतिक कार्यक्रममे एसगर अथवा महेन्द्र झा जीक संग रंग-विरंगक मनोरंजक गीत प्रस्तुत करैत छलाह जे लोककें चारि-चारि घंटा धरि मंत्र मुग्ध केने रहैत छल। रहिकाक कार्यक्रमक विशेषता ई छलै जे सांस्कृतिक कार्यक्रमसँ कवि-सम्मेलन प्रभावित नहि होइत छलैक। बड़ी-बड़ी राति धरि लोक कवि सम्मेलनक आनन्द लैत रहैत छल। आदरणीय उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ जीक देख-रेखमे कवि-सम्मेलनक आयोजन होइत छल, जे अपने त खूब सुन्दर कविता प्रस्तुत करिते छलाह, अन्त धरि कवि-सम्मेलनकें आकर्षक बनबौने रहैत छलाह। आदरणीय सुमनजी, किरणजी,मनिपद्मजी, अमरजी, सोमदेवजी, प्रो. मायानन्द बाबू, विनोदजी, रवीन्द्र जी ,अर्जुन कविराज आदि कविक कविता लोककें भाव-विभोर क’ दैत छलैक। हमरा एहि मंचसँ बहुत किछु सिखबाक अवसर भेटल। आदरणीय रवीन्द्र जीसँ नीक जकाँ गप भेल। कहने छलाह जे रचनाकारकें प्रतिदिन कम-सँ -कम एकटा रचना करबाक चाही। यदि कोनो गीतकार प्रतिदिन एकटा गीत लिखैए त सालमे तीन सय पैसठिटा गीत भेलै। एहिमे यदि तीन सय रचनाकें ठीक नै मानैत छी आ ओकरा फाड़िक’ फेकियो दैत छी तैयो पैसठिटा त नीक रचना अवश्य हैत। जँ दस साल ई क्रम चलल त छ सय पचासटा रचना त नीक हैत, एतबो पर्याप्त छै। सुझाव त नीक लागल, मुदा एकर क्रियान्वयन नहि कयल भेल। आदरणीय सोमदेवजी, विनोद जीसँ सेहो मार्ग-दर्शन प्राप्त भेल। हमर लेखन कार्य बढल। किछु दिनक बाद सासुर (लदारी)मे कलिगामक मनोजानंद झा जीसँ भेंट भेल। हुनको सासुर ओतहि छलनि, ओही टोलमे। हमरासँ पहिने हुनकर विवाह भेल छलनि। ओहि समयमे हुनकर गिनती सभसँ नीक जमाएक रूपमे होइ छलनि। हमहूँ हुनक बहुत प्रशंसा सुनने रही। भेंट भेल त नीक लागल। सम्बन्धक अनुसार हम सभ साढ़ू नै छलहुँ, किन्तु एकहि ठाम सासुर छल,तें हम सभ साढ़ूएक संबोधन चुनलहुँ। हुनका हमर गीत लेखन द’ बुझल छलनि, हमरा हुनक फिल्म-जगतमे अपन जीवन तलाश करबाक प्रयासक विषयमे सूनल छल। बड़ी काल गप भेल। कय बेर गप भेल। हुनका साहित्यिक विषय पर चर्चा नीक लगैत छलनि, से हमरो नीक लगैत छल। एक दिन दूनू गोटे साइकिलसँ दरभंगा गेलहुँ। बस स्टैंड लग आर के रमण जी भेटि गेलाह, रिक्शासँ कतहु जा रहल छलाह। झाजीसँ परिचय करौलियनि। रमणजी कहलनि, सासुर घुरबासँ पहिने एकटा कविता हमर पत्रिका ( मिथिला टाइम्स ) लेल हमर कार्यालय (अजय छात्रावास)मे छोड़ने जाएब। रमनजी त आगू निकलि गेलाह, हम मुश्किलमे पड़ि गेलहुँ। एकटा कविता तुरन्त लीखू, साफ़ कागजपर उतारू आ अजय छात्रावास जाक’ जमा क’ आउ, ई काज हमरा लेल बहुत कठिन लागल। पहिनेसँ कोनो कविता लीखल नहि छल जे वैह द’ दितियंनि आ गीत त हुनका पत्रिका जोगर हमरा लग नहि छल । झाजी कहलनि, हुनका भरोस छलनि, तें अहाँकें कहलनि, आब एकरा पूरा हेबाक छै, चलू कोनो होटलमे चाह पिबैत छी आ तकर बाद भ’ सकै छै अहाँकें लिखबाक प्रेरणा भेटि जाय। लहेरियासराय टावर चौक लग कोनो होटलमे बैसलहुँ। दू ताव कागज बगलक स्टेशनरी दोकानसँ अनलहुँ । एक कोनमे खाली टेबुल छलै। हमरा ओहि कोनमे बैसाक’ झाजी दूरक टेबुल लग चल गेलाह आ दू टा चाहक आदेश द’ देलखिन। हम कलम नेने कागज दिस थोड़े काल तकैत रहलहुँ। हमर परीक्षा छल। हमरा बूझल छल जे कम्युनिस्ट पार्टीक पत्रिका छै। विषयक लेल मंथन केलहुँ। किछु-किछु लिखाय लागल। आगू बढैत गेलहुँ। थोड़े काल लेल लागल जे हम एसगर ओत’ छी, और कियो नै छै। एक बेर फेर चाह आएल। लिखनाइ चालू छल। एकठाम आबि रुकल। एक घंटा बीति चुकल छलै। हमरा आब एकरा संक्षिप्त क’ क’ दोसर कागजपर उतरबाक छल। झाजी फेर किछु मंगयबाक लेल पुछलनि। मना क’ देलियनि। हम जहाँ ठाढ़ भेलहुँ त झाजी कहलनि, आउ हिनकासँ परिचय कराबी। झाजी एते कालसँ एक गोटेसँ गप करैत छलाह जे एकटा हिन्दीक पत्रिका ‘पूर्वांचल’ निकालैत छलाह। ओ अपन परिचय दैत हमरासँ एकटा हिन्दी कविताक मांग केलनि ‘पूर्वांचल’ लेल। हम कहलियनि जे हम मैथिलीमे लिखैत छी त ओ कहलनि, एकहुटा त अवश्य लिखने हेबै, हमरा केह्नो कविता देब, चलतै। हमरा लागल जे झाजी हमर प्रशंसा क’ देने हेथिन तें हुनका भरोस भ’ गेल छनि जे हम जे देबनि से ठीके हेतै। हम बहुत पहिने एकेटा तुकबन्दी बला कविता हिन्दीमे लिखने रही, सेहो एखन पूरा मोन नै छल। फेर कनी काल बैसलहुँ।लीख’ लगलहुँ त मोन पडैत गेल। हुनका द’ देलियंनि। हमर ढोली छात्रावास बला पता ल’ क’ ओ प्रस्थान केलनि। हमहूँ सभ बिदा भेलहुँ। अजय छात्रावासमे मिथिला टाइम्सक कोठली बन्द छलै। केबारक नीचाँ द’ क’ कोठलीमे राखिक’ हम सभ विदा भ’ गेलहुँ। दोसर दिन झाजीक संग फेर बैसार भेल आ आजुक प्रसंगपर बड़ी काल गप भेल। झाजी फिल्ममे अवसरक तलाशमे छलाह, कहलनि जे फिल्ममे विविध तरहक गीतक उपयोग होइत छै, मैथिलीयोमे एहेन रचना सभ हेबाक चाही जे काल्हि मैथिली फिल्म बन’ लगै त ओहि लेल रचना सभ उपलब्ध होइ, एहि लेल और रवीन्द्र नाथ ठाकुरक आवश्यकता हेतैक। झाजी हमरा कयटा विषय द’ देलनि गीत रचनाक लेल : गीत जेहेन मुकेश गबै छथि, जेहेन लता आ रफ़ी गबैत छथि, प्रेमक गीत, मिलन आ बिछुड़नक गीत। दुनू गोटे अपन-अपन गामक बाट धेलहुँ। गाम त आबि गेलहुँ, मुदा मनोज बाबूक देल विषय सब रहि-रहिक’ स्मृतिमे आबि जाइत छल। कालान्तरमे किछु गीत हुनक देल विषय आ परिस्थितिकें ध्यानमे रखैत लिखा गेल, मुदा हुनकासँ व्यक्तिगत रुपमे कोनो नियमित सम्पर्क नहि रहल। हुनकासँ पहिल भेंट अंतिम भेंट सिद्ध भेल। तीन बरखक बाद एकदिन ई खबरि सूनि बहुत आहत भ’ गेलहुँ जे हमर प्रिय मनोजानंद झाजीक ह्रदय-गति रुकि गेलनि। लदारीसँ कलिगाम धरि शोकक लहरि व्याप्त भ’ गेल छलै। दू बरखक एकटा बेटी आ किछुए दिनक एकटा पुत्र शांतीकें द’ क’ एहि जगतसँ प्रस्थान क’ गेलाह। कोनो रोजगारक खगता छल हमरा, से आंशिक रूपसँ प्राप्त भेल। प्रशिक्षु-पर्यवेक्षकक रूपमे छओ मासक अवधि लेल डेढ़ सय रूपया स्टाइपेंडपर पौधा संरक्षण केन्द्र, मधुबनीमे काज करबाक अवसर भेटल। राज्य सरकार द्वारा बहुत गोटेकें ई अवसर विभिन्न जिलामे देल गेलनि । जाधरि बैंकमे भर्तीक विज्ञापन नहि अबैत छै, ताधरि ई हमहूँ स्वीकार क’ लेलहुँ। बादमे स्टाइपेंड राशि दू सय क’ देल गेलै। मासमे जिला भरिक प्रशिक्षु सबहक मीटिंग होइ छलै दरभंगामे जिला पौधा संरक्षण पदाधिकारीक कार्यालयमे। किछुए मासक बाद एक दिन मीटिंगमे नन्द कुमार झाजी ( मोहना, झंझारपुर ) कहलनि जे टाइम्स ऑफ़ इंडियामे बैंकमे बहालीक विज्ञापन आबि गेलैए, जल्दिए पठा दियौ। दोसर दिन मधुबनी पुस्तकालय जाक’ टाइम्स ऑफ़ इंडियामे छपल विज्ञापन देखि तदनुसार आवेदन पठा देलिऐ। दू मासक बाद लिखित परीक्षा भेलै पटनामे। तीन मासक बाद परीक्षामे उतीर्ण हेबाक सूचनाक संग साक्षात्कारमे भाग लेबाक आदेश भेटल। बैंकमे आवेदन पठा देलाक बाद साक्षात्कारक अवधि धरि लेखन कार्य एकदम छोडि देलहुँ, कतहु जाएब सेहो बन्द क’ देने छलहुँ। मुख्य काज छल परीक्षाक तैयारी आ तैयारी मात्र। साक्षात्कारक बाद फेर पौधा संरक्षण केन्द्र जाएब, घरक कोनो छोट-मोट काज रहैत छल से करैत, पुस्तकालय होइत घर आबि जाइत छलहुँ आ मिथिला मिहिर अथवा मैथिलीक कोनो किताब पढ़ब, कतहु गोष्ठीमे जाएब, साहित्यकार लोकनिक सम्पर्कमे रहब नीक लगैत छल। हमरा होइत छल जे जीवन जीबाक लेल जहिना नोकरीक आवश्यकता अछि, तहिना साहित्यसँ लगाव सेहो आवश्यक अछि। हम देखैत छलिऐक जे लोक स्वस्थ जिनगी नहि जीबि रहल अछि, लोककें सामान्य जिनगी जीबाक लेल जे वस्तु सभ हेबाक चाही, तकर अभाव छै। दोसर दिस अस्वस्थ परम्परा सबहक त्याग करबाक साहसक अभाव सेहो छै। हमरा लगैत छल जे जाधरि साहित्यसँ लगाव नहि रह्तै, ताधरि जीवनमे संतुलन नहि आबि सकैत अछि। हमरा होइ छल जे एहि लेल स्त्री, पुरुष सभकें समान रूपसँ शिक्षित हेबाक चाही। मुदा हम तँ अपने घरमे हारल छी। हमर पत्नी जँ शिक्षित नहि भेलीह त हमहूँ स्वस्थ जीवन नहि जीबि सकैत छी। तें हमरा लगैत छल जे एतेक योग्यता त अवश्य भ’ जेबाक चाहियनि जे ओ कोनो पोथी अथवा पत्रिका पढ़ि लेथि। हमरा ई बुझल भ’ गेल छल जे अक्षरक ज्ञान छन्हि, तें हम जे चाहैत छी, से संभव भ’ सकैत अछि। एहने विश्वास नेने हम एक बेर सासुर गेलहुँ आ रातिमे भेंट भेल त मिथिला मिहिरक एकटा पेज सामने राखि पढबाक लेल कहलियनि। बड़ी काल अनुरोध करैत रहि गेलहुँ, ओ टस-सँ -मस नहि भेलीह। हमरा एकदम ‘कन्यादान’क बुच्ची दाइ जकाँ लाग’ लगलीह। हम कहलियनि, तखन अहाँ बाहर जाउ। ओ बाहर जाक’ माए लग जाक’ सूति रहलीह। हमरा भेल जे काल्हि अवश्य हमर बात मानि लेतीह, मुदा से नहि भेल। हमर सासु सेहो प्रयास केलनि हमरा तरफसँ मुदा सफल नहि भेलीह। आ लगातार तीन दिन धरि यैह चलैत रहल। ओ अबैत छलीह, हम पढ़’ कहैत छलियनि, ओ ओहिना तकैत रहि जाइत छलीह, फेर हम कहैत छलियनि बाहर जाए लेल, ओ निकलिक’ माए लग जाक’ सुति रहैत छलीह। चारिम दिन सबेरे जलखै क’ क’ अपन बैग ल’ क’ बाहर निकलि गेलहुँ। दरबज्जापर जेठ सार छलाह। ओहो संगे विदा भेलाह। हुनका अपन स्थिति नै कहलियनि, एतबे कहलियनि जे जा रहल छी, जाएब जरूरी अछि। सासु रोकने छलीह, हुनकर बात नै मानने छलहुँ। हम सभ किछु-किछु गप करैत जा रहल छलहुँ। हम तय क’ नेने छलहुँ जे आब किन्नहु नहि घूरब। टोलसँ निकलि गाछीक बीच पहुँचल छलहुँ। चौदह-पन्द्रह सालक एकटा लड़की ह्कमैत आबि आगूमे ठाढ़ भ’ गेलि, हुनका पाछू एकटा अधवयसू महिला सेहो छलीह। हम अकबका गेलहुँ। ओ हमरा दूनू गोटेकें झुकिक’ प्रणाम केलनि। पाछाँ हुनकर माए छलथिन। ओ कहलनि जे हम सभ अहींसँ भेंट कर’ जाइ छलहुँ त पता चलल जे अहाँ जा रहल छी, तें दौडल एलहुँ, अहाँकें आइ नै जाए देब हम सभ। ओ हमरा हाथसँ हमर बैग ल’ लेलनि आ दुनू माइ-धी हमरा सभकें घुरबाक लेल जिद्द क’ देलनि। हमरा लेल दुनू अपरिचित छलीह। हमर सार जनैत छलखिन। हुनका सबहक बीच जे गप भेलनि ताहिसँ पता चलल जे ई बच्ची अपन माए संगे मामा गाम आएल छथि आ हिनकर मामाक घर सटले छैन्हि, ई सभ काल्हि साँझमे एलीह, एखन हमरासँ भेंट कर’ गेल छलीह, हमर सासुसँ किछु गप भेलनि आ दौड़लीह हमरा घुरयबाक लेल। हम किछु बहन्ना बनेलहुँ गाम जेबाक लेल, मुदा ओ सभ किछु सुनबाक लेल तैयार नहि भेलीह। कहलनि जे आइ हम सभ नहि मानब, हम सभ अहाँसँ बिना गीत सुनने अहाँकें नहि छोडि सकैत छी। हुनकर माए कहलनि जे अहूँकें सूनब आ इहो सुनाएत, चलू आइ नै जाउ। हुनका सभकें देखि-सूनि हमरो पयर आगू नै बढ़’ चाहैत छल। लागल जेना हमरे समस्याक समाधानक लेल भगवान हिनका सभकें पठा देलखिनहें। ओ हमर बैग नै द’ रहल छलीह। हमर सार निर्णय सुनौलनि। हमरा कहलनि, आइ यात्रा स्थगित करू, काल्हि देखल जेतै, प्राचीकें कहलखिन दाइ तों बैग नेने जा, हम हिनका चौकपर घुमाक’ नेने आबि रहल छी। अही बातपर सहमति भेल। प्राची हमर बैग ल’क’ माए संगे घुरि गेलीह। हम सभ हाजीपुर चौकपर पान ख़ाक’ घुरलहुँ। प्राची आ हुनक माएक उपस्थिति वातावरणकें रसमय बना देने छल। वस्तुतः साहित्य आ संगीतक प्रेम जीवनकें आनन्ददायक बना दैत छैक अन्यता लोक ककरो खिधांस करबामे अपन अधिक समय बितबैत रहैत अछि अथवा अपन बड़ाइ करबामे। हिनका दुनू गोटेमे जे ई चेतना छल से हमरा अद्वितीय लागल। प्राची अपन पाठ्य-पुस्तकसँ सेहो कोनो-कोनो कविता सुनबैत छलीह आ हमरो सूनि खूब आनन्दित होइत छलीह। बच्चन जीक कविता ‘ जो बीत गयी सो बात गयी...’ बहुत नीक जकाँ सुनबैत छलीह। दिनमे भोजनक बाद बड़ी काल आ रातिमे भोजनक बाद थोड़े काल बैसकी चलैत छल : गीत-नाद, कविता-संस्मरण, हंसी-ठहक्का चलैत रहैत छल। एकटा नियमक पालन प्राची करैत छलीह जे ओ कखनो एसगर नै अबैत छलीह, हुनकर माए संगे अबैत छलखिन। कखनो-कखनो हुनकर मामी सभ सेहो अबैत छलखिन, हमर दूनू सरहोजि त रहिते छलीह। किछु पुरुष लोकनि सेहो आबि जाइत छलाह। प्राची बच्चीकें मौसी कहैत छलखिन आ हिनको गोष्ठीमे सम्मिलित करबाक प्रयास करैत छलीह, मुदा बच्चीकें ओहो सभ परिवर्तित नहि क’ सकलीह। एकदिन कहलनि जे द्विरागमनक बाद अहाँक संग रह’ लगतीह त देखबै सभ बदलि जेतनि, नैहरमे लाज होइ छनि। हुनकर माए पुछ्लनि, ‘अहाँक बहिन सभ तँ पढल-लिखल हेतीह ने?’ हम निरुत्तर भ’ गेल रही। हमरो तीनटा छोट बहिन अछि। ओकरो सबहक पढाइक स्थिति त यैह छै। हमर चित्त शांत भ’ गेल रह्य। हमर सभ प्रश्नक जबाब हमरा भेटि गेल छल। चमत्कार भेलै जे बच्चीकें बदलबाक हमर प्रयास बन्द भ’ गेल। हम फेर हुनका पढबाक जिद्द नै केलियनि, फेर घरसँ बाहर जेबाक लेल नै कलियनि। हम सोचि नेने रही जे हमरा संग जखन रह’ लगतीह तखन हम प्रयास करब, आ जँ तैयो संभव नै भेल त अपना बेटीकें खूब पढयबाक लेल बच्चेसँ प्रयास करब। हमरा लागल जेना अस्तित्व हमरा वैह देलक अछि जे हमरा आ हमरा परिवारक लेल जरूरी अछि, अस्तित्वकें हमरा संग हमर परिवारोक लेल व्यवस्था करबाक छैक। एकदिन जखन एसगर रही त अपनेसँ गप होइत रह्य। ‘जँ बियाहसं पहिने प्राचीकें देखने रहितियनि त ....?’ ‘त की? वैह होइतै जे भेलैए। बच्चा जे-जे मंगेत छैक से सभटा ओकर माए-बाप नै दै छै, बच्चाकें वैह देल जाइ छै जे माए-बाप ओकरा लेल ठीक बुझैत छै। अहाँ जान’ चाहैत छी त कखनो पुछियौ प्राचीकें जे हुनका सभकें केहेन लड़का पसन्द हेतनि।’ एक दिन हुनका पुछलियनि जे अहाँ लेल केहेन वरक खोज भ’ रहल अछि, त प्राची चुप रहि गेलीह, हुनक माए कहलनि, काल्हि अबिते छथिन, कहबे करताह। प्राचीक पिता कलाकार छथिन, कहलनि जे लड्काक लेल हमरा मोनमे कृष्णक छवि आबि रहल अछि, आँखि, नाक,मूँह,केश सभ एहेन जेना हम सभ कृष्णक फोटोमे देखैत छियनि, इंजिनियर अथवा डॉक्टर होथि, हँसमुख होथि, घर-दुआरि- पक्का मकान होनि, खेत-पथार होइन। हमर सार पुछलखिन जे गनबै कत्ते त कहलखिन, से हमर स्थिति त जनिते छी अहाँ सभ जे किछु गनबाक ओकादि नै अछि हमरा, तखन भगवाने कोनो उपाय लगेथिन त हेतै। किछु गोटेकें हँसी लागि गेल रहै। हमरा हुनक कल्पना,आस्था आ विश्वासपर आश्चर्य भेल रह्य, मुदा पैंतीस बरखक बाद जखन प्राचीसँ भेंट भेल त बड़ी राति धरि हम सभ गोटे हुनके मूँहें हुनक पिताक सपना साकार हेबाक कथा सुनैत रहि गेलहुँ आ विश्वास भेल रह्य जे अस्तित्वक लेल सभ संभव छै। पटना / १४.०६.२०२१ (१४) दर्शन : अग्निदेवक एकटा खुशीक समाचार प्राप्त भेल जे बैंकक प्रतियोगिता परीक्षामे सफल भेलहुँ। मुजफ्फरपुर क्षेत्रमे पन्द्रह गोटेक चयन भेल रहै, पन्द्रहममे हमर नाम रह्य। बहुत हर्षक बात छलै। थोड्बे दिनमे एकटा दुखद समाचार भेटल जे एकटा बेटी जन्म लेलनि आ छठिहारक प्रात देह छोडि देलनि। द्विरागमन नहि भेल छल, विवाहक तेसर साल हेबाक परम्परा छलै। ओहि समय धरि हमरा नोकरी भेटि जेबाक आशा छल। द्विरागमनक दिन तय भ’ गेलैक, मुदा बहालीक चिटठी नहि आयल। हमरासं छोट तीनटा बहिन छथि। दू गोटेक बिदागरी भ’ गेल छलनि,आबि गेल छलीह। सभसं छोट बहिनक द्विरागमन नहि भेल छलनि। किछु और बिदागरी होयब शेष छलैक। द्विरागमन दिन किछु फोटो लेबक हेतु मधुबनीसँ बीस रुपैया भाड़ापर एकटा कैमरा अनलहुँ। हमरा संग हमर अनुज जाएबला छलाह। सासुर जेबासँ पहिने एकटा दसटकही भजेबाक लेल गामक चौक पर गेल छलहुँ। हाइ स्कूल लग चाहक दोकानपर चाह पीबि रहल छलहुँ। संगमे एकटा भाइ साहेब छलाह जे हाइ स्कूलमे शिक्षक छलाह। हम सभ द्विरागमनक विषयमे गप क’ रहल छलहुँ। सडकसं पच्छिम पोखरिक भीड़पर किछु गोटेकें दौड़ैत देखलिऐ। किछु हल्ला सेहो शुरू भेलै। ‘आगि लागि गेलै’ हल्ला करैत लोक भागल जा रहल छल। हम सभ सडकपर आबि देखलिऐ पूब दिस त आगिक प्रचण्ड रूपक आभास भेल। भाइ साहेब कहलनि, हौ,लगैए ई आगि भरिसक ककनामे छै। कहलियनि, हमरा त लगैए जेना लगेमे होइ। भाइ साहेब कहलनि, अपन सबहक भगबती एते कमजोर नै छथि, चलह,चाह पीबह। चाह पीबि जखन सडकपर आबि फेर तकलिऐ पूब दिस त ऐ बेर धधरा बहुत लग स्पष्ट भेल। कहलियनि, भाइ साहेब, ई त बहुत लग बुझाइए। ओम्हरसँ एक आदमी दौड़ैत आबि रहल छल, ओ कहलक, आगि अहीं सबहक टोलमे अछि। भाइ साहेब हमरा साइकिलक पाछाँ कैरियरपर बैसलाह। हम सभ भगलहुँ टोल दिस। पछबाइ टोलमे रही त एक गोटे कहलनि, अहीं सबहक घरमे धेने अछि। साइकिल परसँ उतरि गेलहुँ। कहलियनि भाइ साहेब, आब स्थिर भ’ जाह, आब जखन घरमे आगि पकड़ि लेलकै, त हम सभ की क’ सकैत छी। साइकिल गुड़कबैत हम सभ झटकारने टोलमे पहुँचलहुँ। एक गोटेक दरबज्जापर साइकिल राखि अपन घर दिस तकलहुँ। एहेन दृश्य एतेक लगसँ ऐसँ पहिने कहियो नहि देखने रही। एक पतियानीसँ घर सभ जरि रहल छल। लोक असहाय भेल दूर हटिक’ अपन-अपन घर जरैत देखि रहल छल। जकर घर बाँचल छलै, ओ सभ अपन-अपन चारपर पानि छिटबाक जोगारमे लागल छल। भाइ साहेबक पत्नी नैहर गेल छलथिन। घरमे जंजीर आ ताला लागल छलै, किछु नहि बँचि सकलनि। हुनका दुआरिपर किछु कपड़ा छलै, हुनकर भगिनी कपड़ा समेटिक’ बगलक खेतमे फेकि देलकै। कपड़ामे एकटा बच्चा छलै, से चिचिया उठल तखन देखलकै त चिन्हलकै जे बच्ची( हमर छोट बहिन )क एक बरखक बच्चा अशोक छलै। बच्ची ओहि आंगन बच्चाकें खेलबैत गेल छल, सूति रहलै, त हुनके दुआरिपर कपड़ासं ढँकिक’ अपना आंगन आबि गेल छल। एत’ आगि लगबासँ पहिने घरक सामान सभ निकालिक’ बाहर फेक’ लागल छल, बच्चा मोन पड़लै त भागल ओहि आंगन, हुनका दुआरिपर बच्चाकें नहि देखि बेचैन भेल, मुदा किछुए पलमे खेतमे बच्चाकें पाबि ओकरा नेने भागल अपना आंगन दिस। अपना आंगन जेबाक रस्ता अग्नि देवता बन्द क’ देने छलथिन त घरक सभ गोटेक संग घरक पूब परती खेतमे स्थिर भ’ गेलीह। भाइ साहेब बहुत उद्विग्न छलाह। घरमे की कत’ राखल छलनि,से हुनको नहि बूझल रहनि। आब कोनो उपाय नहि छलनि किछु बचा सकबाक। घरसँ किछु दूर हटिक’ खेते-खेते अपना घरक पूब पहुँचलहुँ त सभ गोटेकें सुरक्षित देखि संतोष भेल। घरपर हमर छोट दू टा अनुज छलाह, एकटा बारह बरखक, दोसर पाँच बरखक। हमरासँ छोट तीनू बहिन छलीह, माए छलीह, बाबू छलाह। ई सभ गोटे बहुत सामानकें घर आ दरबज्जासँ निकालिक’ खेतमे फेकि देने छलाह। टेबुल, कुरसी,पेटी,बाकस, कपड़ा, वर्तन आ किछु अनाज बचा लैत गेल छलाह। सभसँ नीक बात हमरा लागल जे लोक सभ सुरक्षित छल, भागिन सेहो बचि गेल छल। मधुबनीसँ पानिबला टैंकर अयबासँ पहिने घर सभ जरि गेल छल। टैंकर आएल त जरल खाम्ह सबहक आगि मिझौलक। से होइत-होइत साँझ भ’ गेलै। कय टा समस्या ठाढ़ भ’ गेलै। ओकर प्राते द्विरागमन आब संभव नै छलै। बारह दिन बाद एकटा दिन छलै। ओकर बाद दिन नै छलै। मुदा, काल्हि द्विरागमन नै हेतै, ई समाद ल’ क’ ककरा पठाओल जाए लदारी। एक गोटे गेलाह रहिका। मामा रहिका हाइ स्कूलमे सहायक प्रधानाध्यापक छलाह। हुनका सुचित कएल गेलनि। मामा साइकिलसँ गेलाह लदारी। ओत’ गीत-नाद चलि रहल छलै। लोक हमर सबहक प्रतीक्षा क’ रहल छल। मामाकें देखिक’ लोक चिन्तामे पड़ि गेल। मामा सभ समाचार कहलखिन। मामा दोसर दिनक सूचना दैत रहिका घूमि गेलाह। सबेरे किछु बांस, खढ़, साबेक जौर आ किछु खाद्य सामग्री ल’क’ एकटा टायर गाड़ी आएल लदारीसँ। मामा गामसँ सेहो किछु आएल। हमर छोट बहिनक सासुर लखनपट्टीसँ श्रम दान करय किछु गोटे एलाह। अपन बँसबिट्टीसँ सेहो किछु बाँस कटाओल गेल। जल्दी-सँ-जल्दी दूटा घर तैयार करबाक प्रयास भेल। मधुबनीसँ शफीकुल्लाह अंसारी,कांग्रेस पार्टीक विधायक घरक सभ सदस्य लेल हैंडलूमक कपड़ा ल’क’ एलाह। किछु आर्थिक मदति सेहो केलखिन। पुबाइ टोलसँ बलदेव बाबू ओकील साहेब, पछ्बाइ टोलसँ हरी बाबू, मास्टर साहेब आ और लोक सभ ओहि दुरदिनमे मदति करबाक लेल सोझाँ आबि गेलाह। बहुत गोटेक सहयोगसँ दुरदिन काटब आसान भ’ गेल। जत’ पन्द्रह हाथक दरबज्जा छल ओहि ठाम एकटा एकचारी ठाढ़ भेल। जेना-तेना एकटा भनसा घर तैयार भेल। जत’ गठुल्ला छल ओत’ ओतबहि टा कोहबर घर तैयार भेल। बारह दिनक बाद कोठाबला घरसँ आबि बच्चीकें अही कोहबरमे मास दिन बिताब’ पड़लनि। मास दिनक बाद दच्छिन दिस एकटा नमहर घर रहबालेल तैयार भेल आ ओहिमे द्विरागमनमे भेटल पलंग राखल गेल त’ ओहि घरमे जेबाक आ ओहि पलंगपर विश्राम करबाक अवसर भेटलनि। अगिलगीसँ हानि ई भेलै जे छओ मास धरि लोक घरहटमे लागल रहल, लाभ ई भेलै जे पहिल बेर लोक गम्भीरतासँ ईंटाबला घरक कल्पना केलक। आ एकर श्रेयक हकदार वैह अबोध धिया-पूता सभ छल जे चारि घरवासीबला हमर पुरना आंगनक पतोइसँ छाड़ल गठुल्लामे भगवानक पूजा करैत काल सलाइ खरडिक’ अगरबत्ती लेसि रहल छल, जे समयपर कियो देखि नहि सकलै। ओ अबोध सभ नै जनैत छल जे भगवानक पूजा केलासँ आगि पकडि लेतै आ एतेक घर जरि जेतै। सत कही त बहुत चेतन लोक सभ, बहुत पढल-लिखल लोक सभ त सभटा जानियो क’ एकर चिन्ता नहि करैत छथि जे पूजाक नामपर जे प्रदर्शन कएल जा रहल अछि ओइसँ ककरो किछु क्षति त ने भ’ रहल छै। धिया-पूता त जैह देखैत अछि, सैह सिखैत अछि, वैह करैत अछि। (१५) आगिक बाद आगि बच्ची किछुए दिनमे हमरा परिवारक आवश्यकताक अनुरूप अपनाकें बना लेलनि। माएकें काजुल पुतोहु भेटि गेलनि। गृहस्थ परिवारक काजसँ पूर्ण परिचित छलीह बच्ची। नैहरमे माए,बाबू,दू टा भाए,दू टा भाउज,चारिटा भातिज आ एकटा भतीजीक संग छलीह, एत’ सासु,ससुर,पति, छओ आ चौदह बरखक दू टा दीय’र आ एकटा विवाहित ननदिक बीच प्रसन्न रहब जल्दी सीख गेलीह। अगिलगीक दुख क्रमशः कम होइत गेलै। जीवन सामान्य हुअ’ लगलै। हिनक पढाइ-लिखाइक लेल जे किछु सोचने रही, से स्थगित भ’ गेल । हम यथास्थितिकें स्वीकार क’ लेलहुँ आ अपन नोकरीक प्रतीक्षा करय लगलहुँ। एक दिन अपन दरबज्जापर हम एसगर बैसल रही। पछ्बाइ टोलक बटोही कका कतहुसँ जा रहल छलाह। ह्मरा सोर पाड़लनि। कहलनि, अहाँक घराड़ीक सटले पूब खेत बिका रहल छै, अहाँकें कोनो व्यवस्था हुए त’ सामनेबला सबा दू कट्ठा भेटि सकैए, बिचारिक’ जल्दी कहू, ने त बिका जेतै। एकटा नव समस्या सोझाँमे उपस्थित छल, बिनु समस्याक समस्या। हम सोचय लगलहुँ, हमरा बैंकमे नोकरी त भेटबे करत, कते देरी हेतै, दू मास...चारि मास यैह ने। हम एखन कोनो तरहें जँ पाइक व्यवस्था क’ लै छी त खेत कीनि सकैत छी। समाधान छनि बच्ची लग। जँ हुनक गहना बन्धक ध’ क’ पाइक व्यस्था क’ लै छी त संभव अछि, अन्यथा नहि। घराड़ीबला जमीन छै, तें ल’ लेब जरूरी लागल। हमरा मोन पडल, दू साल पहिने ई गहना बन्हकी ध’ क’ छोट बहिनक विवाहमे उपयोग केने रही, बादमे पौधा संरक्षणमे नियोजित भेलापर एक बेर छओ मासक पाइ भेटल त गहना छोड़ा लेलहुँ । हम बच्चीसँ पुछलियनि ओ तैयार भ’ गेलीह। हम बाबूकें कहलियनि सभ बात। ओ पुछ्लनि जे ककरा नामे लिखबिऐ। हम हुनका अपने नामपर लिखा लेब’ कहलियनि। सैह भेलै। गहना मधुबनीमे बन्हक राखल गेल। दू कट्ठा सबा पाँच धुर खेत पुबाइ टोलक बुधन ठाकुरसँ बाबूक नामपर ०८.०५.१९७४ क’ मधुबनीमे रजिस्ट्री भेल। हमर पड़ोसीक सामनेबला खेत ओ लिखौलनि। बच्चीकें विश्वास रहनि जे पहिने जकाँ फेर सातो अठन्नी हमरा लग वापस आबि जाएत, जँ हुनका बूझल रहितनि जे आब ई गहना हमरा वापस नहि भेटत, त ओ एत्ते आसानीसँ अपन पेटीसँ निकालिक’ सहर्ष नहि दीतथि। ओ नहि जनैत रहथि जे ओ गहना आब माटिमे परिवर्तित भ’ गेल अछि। हमहीं कहाँ जनैत रहिऐक जे हमरा नोकरी भेटबामे एत्ते देरी भ’ जाएत आ परिवारक स्थितिक कारण हमर प्राथमिकतामे गहना नहि रहि जाएत । क्यो नहि जनैत रहै जे देशक स्थिति एहेन भ’ जेतै, उत्तर प्रदेशक चुनावमे इन्दिरा गांधी एहेन नेताक जीतकें राजनारायण द्वारा चुनौती देल जेतै, इलाहाबाद हाई कोर्ट हुनक जीतकें अबैध घोषित क’ देतै, प्रधान मन्त्री इन्दिरा गांधीसँ इस्तीफ़ा मांगल जेतै, सौंसे देशमे हंगामा शुरू भ’ जेतै आ प्रधान मन्त्री द्वारा इस्तीफ़ा देबाक स्थानपर देशमे आपातकाल लागू भ’ जेतै आ बैंकमे बहाली सेहो स्थगित भ’ जेतै। क्यो नै जनैत रहै, मुदा सभ भेलै। नोकरीक प्रतीक्षामे मास पर मास बीतल चल गेल। हम एक बेर सेंट्रल बैंकक क्षेत्रीय कार्यालय मुजफ्फरपुर गेलहुँ पता लगब’। एकटा झाजी छलाह ए.एफ.ओ.। कहलियनि, हमरा सेलेक्शन भेना दस मास भ’ गेल, एखन धरि बहालीक चिट्ठी नै भेटल अछि। झाजी मुस्किआइत कहलनि,ठीक कहै छी, दस मासमे त बच्चो भ’ जाइ छै। झाजी एते कहिक’ अपन काजमे व्यस्त भ’ गेलाह। हम यूनियनक सेक्रेटरीसँ सम्पर्क केलहुँ, ओ ककरोसँ गप केलनि, हमरा कहलनि, टाइम लगेगा मगर होगा निश्चित ये भरोसा रखिए। हमरा सचिव महोदयक वचनपर भरोस भेल, घर एलहुँ आ जहिना प्रतीक्षा करैत छलहुँ, तहिना फेर प्रतीक्षा कर’ लगलहुँ। घर, कैटोला चौक,मधुबनी वाचनालय यैह हमर ठेकाना छल। हमर गामक मुखियाजी एकदिन परम शुभचिन्तक जकाँ बुझौलनि, विद्यार्थी, एना गाममे निश्चिन्त भ’क’ बैसलासँ आइ के समयमे नोकरी नै हैत, नोकरी बिना दौड़-धूपके नै होइछै, एक बेर पटना जाउ, एम एल ए सँ भेंट करू, मुख्य मन्त्रीसँ भेंट करू, जरूरत हेतै त हमहूँ जैब, कोना ने हेतै मुदा एना बैसलासँ त बैसले रहि जाएब। हम निश्चिन्त रही जे नोकरी भेटबे करत, सभकें छोड़िक’ खाली हमर बहाली क’ देतै से त संभव नै छै। मुदा मुखियाजी एहि सभकें फ़ालतू बात बुझै छलाह। हमर पिताजीकें सेहो कहलखिन। हमर पिताजी सेहो मुखियाजीक सुझावपर मोहित भेलाह। अंततः पटनाक प्रोग्राम बनल। हमर परोसी अमिरीलाल ठाकुर ( हुनको लोक सभ मुखियाजी कहैत छलनि ) सेहो अपन जेठ बेटाक नोकरी लेल प्रयासमे मुखियाजीक संग भेलाह। पटना गेलहुँ। शफीकुल्लाह अंसारी, कांग्रेसक एम एल ए साहेब सँ भेंट केलहुँ। एकटा कागजपर संक्षेपमे लिखिक’ देब’ कहलनि। देलियनि। कहलनि, मुख्य मन्त्री महोदय से बात करता हूँ, वो अगर बुलाएंगे तो बताऊंगा तब जाइएगा मिलने। साँझमे एलाह त कहलनि, उनका कहना है कि बैंक के मामलेमे हमलोग कुछ नहीं कर सकते हैं, सिलेक्शन हो गया है तो देर-सबेर नोकरी तो मिलेगी ही। मुखियाजी कहलनि, चलू आब मोनमे ई नहि ने हैत जे प्रयास नै केलियै आ मुख्य मन्त्री महोदय कहि देलनि तखन चिन्ता करबाक काज नै छै। घर आबि फेर हम ओहिना नोकरीक लेल प्रतीक्षा कर’ लगलहुँ जेना पहिने करैत रही। खेत कीनब एखन हमर परिवारक आवश्यकता नहि छलैक। परिवारक आवश्यकता छलैक पाँच-छओ आदमीक जलखै, भोजन,कपड़ाक खर्च,समय-समयपर पाहुनक उचित सत्कार,सर-कुटुम्बमे आवश्यकतानुसार समय-समयपर भार-चंगेराक व्यवस्था, समय-समयपर ब्राह्मण-भोजनक व्यवस्था आदिमे आवश्यक खर्चक लेल टाकाक जोगार। ई जोगार हथपैंचसँ शुरू होइत-होइत खेत भरना तक जाइत छल।खेतक उपजासँ तीन-चारि मासक काज चलैत छल। फेर खेतीक लेल वैह जोगार होइत छल। टोलमे दू-तीन घर छोड़िक’ सभ घरक स्थिति मोटा-मोटी एहने छलै। एहनो स्थितिमे मूड़न, उपनयन,विवाह,श्राद्ध,बरखी आदि काजमे लोक नीक भोजनक व्यवस्था करिते छल चाहे एहि लेल खेत भरना देब’ पड़ै अथवा बेच’ पड़ै। भोजेमे अथवा वरियातीमे लोककें जी-भरि नीक-निकुत खेबाक मौका भेटैत छलैक। तें लोक भोजक नामपर सब तरहक सहयोग देबा लेल तैयार रहैत छल। श्राद्धक भोज दू दिन होइ छलै, तें एकर आकर्षण बेशी छलै। भोज लोककें एतेक आकर्षित करैत छलै जे कोनो बृद्ध लोककें देखिते लोकक सोझाँ दू दिनक भोजक दृश्य उपस्थित भ’ जाइ छलै-पूड़ी-जिलेबी,खाजा-मुंगबा, रंग-विरंगक तड़ुआ-तरकारी आ चटनी, ब’ड़-ब’ड़ी, दही-चिन्नी-सकरौड़ी आदिक संग हाथ जोड़ने पाँते-पाँते घुमैत कर्ताक विनीत भाव- ‘अपने लोकनि संतुष्ट हेबै, तखने हमरो उद्धार हैत।’ सबजाना भोज कम होइ छलै। खाली पुरुखे सभ जखन भोज खाए जाइ छलाह त स्त्रीगण सभ अपनाले’ भोजन नै बनबैत छलीह, दिनका किछु बाँचल रहै छलनि से अथवा घरमे चूड़ा अथवा और किछु रहै छलनि त नून,गुड़ अथवा मूर संगे ख़ाक’ सूति रहै छलीह। पुरुख सभ एकर चिन्ता नहि करैत छलाह जे स्त्रीगण सभ की खेलनि। स्त्रीगण सभकें भोजन नै बनब’ पड़ैत छलनि, एतबेसँ प्रसन्न रहैत छलीह। सबजाना भोज दिन त हुनको सभले’ पावनि भ’ जाइत छलनि। घरक स्त्रीगणकें भोजे दिन भानस-भातसँ अवकाश भेटैत छलनि। सामान्य दिनमे सेहो कोनो घरमे स्त्री-पुरुखक भोजन एक बेर नहि होइत छलै। सभ पुरुख आ धिया-पुताकें परसन द’ द’ क’ खुआक’ जे किछु बचि जाइ छलै, से नून,मूर आकि गुड़ संगे खाक’ रहि जाइत छलीह स्त्रीगण सभ। बेशी घरमे भात तखने बनै छलै जखन कोनो पाहुन अबै छलखिन। पाहुनक लेल भात,दालि,तरकारी,तडुआ,कने घी आ दहीक व्यवस्था कोनो तरहें अवश्य कएल जाइत छलनि। पाहुनकें खुआक’ घरबारी भोजन करैत छलाह। घरबारीक भोजनमे बेशी काल रोटी,दालि,अल्हुआक प्रधानता रहैत छलै। रोटी गहुम,मड़ुआ,खेसारीक बनैत छलै। जकरा खुट्टापर महींस रहैत छलै, ओकरे दूध-दही भेटै छलै। जकरा खुट्टापर महींस नै छलै, ओकरा घरमे क्यो दुखित पड़ि जाइ छलै तखने अथवा कोनो पाहुन अबै छलखिन तखन दूध कीनल जाइ छलै।धिया-पुताकें सेहो ओहीमे सँ बचाक’ द’ देल जाइ छलै। हमर बाबा महींस पोसैत छलाह। हमर मझिली बहिनक द्विरागमनक समय महींस खुट्टापर सँ गेल, फेर कहियो खुट्टापर महींस नै आएल। बहुत दुखित पड़लेपर ककरो समतोला खेबाक अवसर भेटैत छलैक, ने त कीनिक’ फल खैब संभव नै छलै। बाड़ीमे केरा ककरो-ककरो रहैत छलै, त माटितर गाड़ि क’ डाबा ल’ क’ धूकिक’ पकाक’ खाइत छल।हमरो सबहक बाड़ीमे केरा, नेबो आ अरड़नेबा छल। केराक उपयोग कतहु भार पठेबामे कएल जाइत छल, एकटा चंगेरामे एक कात पाकल केरा, दोसर कात दहीक भार लोकप्रिय छल। पाकल केराक उपयोग चौठचन्द्र पावनिमे आ केरा घौड़ अथवा हत्थाक उपयोग छठि पावनिमे सेहो होइत छल।आमक मासमे अपना गाछक आम खेबाक आनन्द भेटैत छलैक। हमरो सबहक आमक गाछ दुर्गास्थानमे छल,पुरना घराड़ी लग सेहो किछु गाछ छलै। नबका घराड़ीपर सेहो बाबा कलकतिया आ कृष्णभोग आमक किछु गाछ लगौने छलाह जे फड़ै छलै। दुर्गास्थानमे एकटा बेलक गाछ सेहो छलै। गरीबी एहि लेल छलै जे घरमे छओ-सात आदमीक सामान्य जलखै-भोजनक अतिरिक्त समय-समय पर घरक मरम्मति,खेतीमे लागत आ भोज-भातक परम्पराक निर्वाह करैत सभ साल किछु खेत भरना पड़बाक कारणे जोत योग्य खेत कम भेल जा रहल छलै आ जे खेत छलै ताहिसँ आवश्यकतानुसार उपज नै प्राप्त होइत छलै। बाहरी आमदनी नै रहबाक कारणे लोक सभ किछु लेल खेतपर आश्रित रहैत छल आ खेती भगवान भरोसे चलैत छलै। नोकरीक प्रतीक्षा धीरे-धीरे कठिन भेल जा रहल छल। एकदिन एक पाँती लिखा गेल : ‘कहिया तोहर मूँह देखबौ गे, बहालीक चिट्ठी।’ आ एकटा गीत और जकर किछु पाँती द’ रहल छी : मोटका-मोटका पोथी पढ़लौं पोथी केर सभ पन्ना रटलौं से सभ रटिक’ किछु नै भेल। पहिने जोड़ी जोड़ दशमलव आब जोड़ै छी नून आ तेल।। मोटका-मोटका पोथी ........ ईहो टुकड़ी देखू : पहिने छल डिगरीक सिहन्ता आब अछि नोकरी केर चिन्ता खेतो सभ अछि पड़ि गेल भरना बिका गेलनि कनियाँ केर गहना हम छगुन्तामे पडले छी हे परमेश्वर ई की भेल?? मोटका-मोटका पोथी...... अंतिम टुकड़ी : पहिने बिपति पड़ै त लोकक मदति करैत छला भगवान आब कतबो हर-हर बम-बम कहू देथि ने शिवशंकरजी ध्यान आइ कृष्ण गोवर्धनधारीक चक्र-सुदर्शन कत्त’ गेल?? मोटका-मोटका पोथी .......... समस्या मात्र हमरे लेल नहि छल। हमरो सभसँ बदतर स्थितिमे बहुत लोक कहुना जीबि रहल छल। समाजमे अधिक लोकक आर्थिक स्थिति दयनीय छलै। बहुत नवयुवक बेरोजगारीक कष्ट भोगि रहल छलाह। कतेक लोक एहेन छल जकरा रहबाक लेल घर नहि छलै, पहिरबाक लेल आवश्यक कपड़ा नै रहै छलै, भोजन लेल चाउर-दालि-आँटा नै छलै। एहेन लोक सबहक लेल फगुआक कोनो आकर्षण नै रहैत छलै। एहेन स्थितिक लेल जे गीत लिखाएल तकर चारि पाँती देखू : छै जेबी जकर खाली-खाली आ खरची घरक लटपटायल से फगुआ खेलायत कोनाक’ जकरा आंगन वसन्त नहि आयल ......... ईहो चारि पांती : जकरा सोझाँमे नेना कनैछै माँ, की खैब भूख अछि लागल? से पूआ पकाओत कोनाक’ जकरा आंगन वसन्त नहि आयल ......... पटना / ३०.०७.२०२१ (१६) दृश्य परिवर्तन बेरोजगारीक अवधि बढ़ल जा रहल छल। गामक वातावरणमे हम सहज अनुभव नहि करैत छलहुँ। एक बेर पटनामे अपन हाइ स्कूलक संगी नागेन्द्र कुमार झासँ भेंट केलहुँ। हुनका संगे दू दिन रहलहुँ। ओ बी.एस.सी. केलाक बाद इंडियन नेशन प्रेसमे काज क’रहल छलाह,एसगर रहैत छलाह। हुनकासँ बहुत गप-शप भेल। हुनका ओहि ठामसँ एकटा नव उर्जाक संग गाम घुरलहुँ। हमर साढ़ूक जेठ भाइ साहेब आरामे रहैत छलखिन, सिविल इंजिनियर (एस. डी.ओ.)छलखिन। छोट भाए (हमर साढ़ू ), दुनू छोट बहिन,अपन दूटा छोट बच्चा-बच्चीक संग अपने दुनू गोटे रहैत छलाह। दोसर छोट भाए चीनू बाबू सेहो पटनासँ कहियो-कहियो अबैत छलाह। इंजिनियर साहेब हमरो छोट भाए जकाँ मानैत छलाह। हुनका सभ लग हम सहज रहैत छलहुँ। साँझ क’ अथवा रातिमे भोजनक बाद गीत-नाद होइत छलैक। कहियो क’ अपना संगे जीपपर हमरो घुमा दैत छलाह साइटपर। हमरा नोकरी लेल सेहो सोचैत छलाह,मुदा बैंकमे हमर नोकरी पक्का अछि, से जनैत छलाह। मधुर स्मृतिक संग हुनका ओत’सँ गाम घुरलहुँ। हमर छोटका मामा डाक-तार विभागमे जमशेदपुरमे काज करैत छलाह। अपन भतीजी आ एकटा सारक संग अपने दुनू गोटे साकचीमे रहैत छलाह। हुनको ओत’ गेलहुँ। रवि दिन क’ जुबली पार्क घूम’ सभ गोटे जाइत छलहुँ। जमशेदपुर शहर नीक लगैत छल। जमशेदपुरसँ गामक जे दृश्य हमरा सोझाँ अबैत छल तकरा हम अतुकांत कवितामे व्यक्त करबाक कोशिश कर’ लगलहुँ।मामाकें अतुकांत कविता नीक नहि लगैत छलनि, ककरो नीक नहि लगैत छलैक।हमरा नीक लगैत छल। लिखैत गेलहुँ। वैह कविता सभ पच्चीस बरखक बाद आ दू संशोधनक बाद ‘धारक ओइ पार’ नामक दीर्घ कविताक आकार ग्रहण केलक। जमशेदपुर अथवा एहने कोनो जगह नोकरी पयबाक कामना करैत गाम घुरल रही। बेरोजगारीक अवधि एखनो समाप्त नहि भेल छल।आब होइत छल जे किछु करक चाही। आब बहालीक चिट्ठीक प्रतीक्षामे बैसल रहब उचित नहि। मुजफ्फरपुरमे सेनाक भर्ती भ’ रहल छलै, एकटा संगी आशा भाइक संग चलि गेलहुँ। मैट्रिकक प्राप्तांकक आधारपर कहलक, जाना चाहते हो तो ओरिजिनल सर्टिफिकेट जमा करो। हम सोचलहुँ जे हमरा त बैकमे हेबे करत, तखन ऐ ठाम मूल प्रमाण-पत्र जमा करब उचित नहि, नै जमा केलिऐ, दुनू गोटे घूरिक’ गाम चलि गेलहुँ। भूमि विकास बैंकक विज्ञापन निकललै, ओइमे आवेदन पठा देलिऐ, लिखित परीक्षा देब’ पटना गेलहुँ। आकाशवाणी लग कोनो होटलमे ठहरलहुँ। एक दिनक भाड़ा जमा करबा लेलक, रातिमे भोजनक बाद हमरा लग बीस रुपैया बाँचल रह्य, से कतहु रखलिऐ। सबेरे स्नान क’ क’ जलखै कर’ बिदा भेलहुँ, त रुपैया हमरा नै भेटल। परीक्षा-केन्द्र कंकडबागमे रहै, पयरे विदा भेलहुँ बिना किछु खेने। जाइत रही ई सोचैत जे गाम वापस कोना हएब। चिड़ियाटांड़ पुल लग गेलहुँ त सुनाइ पडल ‘यौ अनिल जी’। रामपट्टीक रमणजी छलाह, आर. के. रमण, रिक्शासँ एक गोटेक संग कतहु जा रहल छलाह। रिक्शा रोकबाक’ कहलनि कलकत्ता चलबाक अछि विद्यापति पर्वमे, समय हो त तीन बजे आउ आर ब्लाक लग एम एल ए फ्लैटमे हम एखन रहै छी, ओत’ आएब त विस्तृत गप हयत। पता बताक’ ओहो रिक्शासँ बढि गेलाह, हमहूँ किछु ख़ुशीक संग परीक्षा केन्द्र दिस बढलहुँ। परीक्षा बारह बजे समाप्त भेलापर भूख बड्ड जोर लागल,मुदा संगमे पाइ त नै छल। एखन भोजन लेल तत्काल दू टाका चाही आ गाम घुरबा लेल स्टीमर आ ट्रेन-बसक किराया करीब आठ टाका माने दस टाकाक आवश्यकता अछि। हमरा गामक वर्माजीक डेराक पता बूझल रहय, पयरे हुनका ओत’ गेलहुँ त पता चलल जे ओ काल्हि गाम चल गेलाह। भूख आर जोर केलक। हम आर ब्लाक लग जायसवाल होटल लग गेलहुँ। होटल बलाकें अपन हाथक घडी खोलिक’ दैत कहलिऐ, अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं, ये घडी आप अपने पास रखिए, खाने का जो भी बिल होगा, दे देनेपर आप मुझे घडी लौटा देंगे। काउंटरपर जे बैसल छलाह, से कहलनि, मुझे आपपर विश्वास है, आप खाना खाइए, अपनी घडी अपने साथ रखिए, इसकी कोई जरूरत नहीं है। कहलियनि,मगर मेरा मन तैयार नहीं हो रहा है, मैं कल घडी ले जाऊँगा। हमर जिद्दपर ओ घडी सम्हारिक’ राखि लेलनि, हमरा नीक जकाँ भोजन करौलनि। हम भोजन करैत रही तखने रमणजी सेहो ओही व्यक्तिक संग होटलमे प्रवेश केलनि आ दोसर दिस जेम्हर कुरसी खाली छलै, ओम्हर चलि गेलाह।ओ हमरा नै देखलनि। ओ सभ भोजन करिते रहथि, हम उठिक’ पुछलिऐ, कते भेल, त कहलनि,एक रुपैया नब्बे पाइ। हम पान खाइ लेल दस पाइ और हुनकासँ ल’ क’ पान खाक’ आगाँ बढ़ि गेलहुँ। हुनकासँ पहिने हम हुनका डेरापर पहुँचि गेलहुँ। कम्युनिस्ट पार्टीक एम एल ए साहेबक डेरा छलनि।एकटा कोठलीमे रमण जी रहैत छलाह।ऐ बेर विद्यापति पर्वमे कलकत्ता जेबाक कार्यक्रमपर चर्च भेल। किछु गीत नाद सेहो भेलै। गीत लिखबाक विषयक चयनपर चर्च भेल। हम कहलियनि, हमरा साँझ बला स्टीमर पकडबाक अछि, विदा भेलहुँ त पुछलनि, संगमे पाइ-ताइ अछि ने? हम कहलियनि, दस टाका अछि अपन जरुरतिसँ अधिक त द’ दिय’। नोकरकें बजाक’ कहलखिन, जो त मलिकिनीकें कहिहनु, कविजीकें दस टाका दियनु त। नोकर भीतर गेल आ तुरत एकटा दसटकही आनिक’ हुनका देलकनि, ओ हमरा दैत कहलनि, और के आवश्यकता हो त कहू। हम कहलियनि,नै,पुछलियनि गाम कहिया एबै,त कहलनि, एक मासक बाद आएब, मुदा अहाँ ई वापस करबा लेल आएब त हम भेंट नै देब। हमरा बूझल छल ओहो नोकरीमे नै छथि। हुनका ओत’सँ जायसवाल होटल गेलहुँ, हुनका दू टाका द’ क’ धन्यवाद दैत अपन घड़ी ल’क’ रिक्शासँ बाँसघाट जाक’ प्राइवेट स्टीमर पकड़ि पह्लेजाघाट, ओत’सँ ट्रेन पकड़िक’ दरभंगा आ ओत’सँ बससँ गाम पहुंचि गेलहुँ। एक मासक बाद साइकिलसँ रामपट्टी जाक’ रमणजीकें दस टाका बहुत-बहुत धन्यवादक संग द’ देलियनि। बिना जलखै करौने वापस नै आब’ देलनि। केन्द्र सरकार द्वारा बेरोजगार युवक सबहक लेल राष्ट्रीयकृत बैंक सबहक माध्यमसँ रिटेल कण्ट्रोल क्लॉथक व्यवसाय लेल पाँच हजार रुपैयाक ऋणक योजना चालू भेलै। हमर स्वभाव एहि व्यवसाय लेल उपयुक्त नहि छल, तथापि हम अपनाकें तैयार केलहुँ। हमरा टोलक मुखियाजी (अमीरी लाल ठाकुर ) कहलनि जे हम एहिमे मदति करबह, शुरू करह। आवेदन देलिऐ भारतीय स्टेट बैंक, मधुबनीमे। दौड़-धूप केलहुँ। ऋण स्वीकृत भेल। जिला उद्योग केन्द्र,मधुबनीसँ मार्जिन मनी सेहो स्वीकृत भेल। आब बैंक ऋण वितरणक प्रक्रिया करितै। बैंक रुपैया नहि दैत छलै, कपडाक लेल कोनो संस्थाकें आदेश दितै, कपडा हम किनलिऐ कि नै, तकर निरीक्षण होइतै, तखन बैंक ओइ संस्थाकें बिलक भुगतान करितै। ई प्रक्रिया होइतै, मुदा दृश्य बदलि गेलै। मुजफ्फरपुर जिलामे मुशहरी प्रखण्डमे किछु क्षेत्र नक्सल आन्दोलनसँ एक समय बहुत प्रभावित भेल रहै। चर्चित नेता जय प्रकाश नारायण ओइ क्षेत्रमे भ्रमण कय ओहि ठामक समस्याकें दूर करबाक प्रयास केने छलाह। हुनका आह्वान पर हजारो युवक आत्मसमर्पण केलनि। मुख्य धारामे एलाह। ओहि इलाकाक भूमिकें शत प्रतिशत सिंचित करबाक योजना बनल, तकर क्रियान्वयन भेल। लोक सभकें रोजगार दिययबाक किछु व्यवस्था कयल गेल छल। एहि योजना सबहक प्रभावसँ की परिवर्तन भेलै, तकर अध्ययन करबाक लेल नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ कम्युनिटी डेवलपमेंट, हैदराबाद द्वारा पच्चीसटा फील्ड इन्वेस्टिगेटरक बहाली कराओल जा रहल छल। जाहि कृषि स्नातककें एग्रीकल्चर एक्सटेंशन विषयमे साठि प्रतिशतसं अधिक अंक प्राप्त भेल छलनि, हुनकर सिलेक्शन भ’ रहल छलनि। ई काज हमर पसन्दक छल, तें हम ई नोकरी स्वीकार क’ लेलहुँ। एहिमे पन्द्रह टाका प्रतिदिन भेटब निश्चित छल यद्यपि नोकरी एकदम अस्थायी छल। हम ढोली चल गेलहुँ। रिटेल कण्ट्रोल क्लॉथक व्यवसायबला योजनाकें बिसरि गेलहुँ। ढोलीमे दू दिनक प्रशिक्षण प्राप्त केलहुँ। करीब बीस पेजक प्रश्नावालीक पुस्तिका छलै। एहिमे बहुत तरहक सूचना सीधे परिवारक मुखियासँ सम्पर्क क’ क’ भरबाक छलै। प्रतिदिन कम-सँ-कम पाँचटा परिवारसँ सूचना प्राप्त करबाक लक्ष्य देल गेल छलै। दोसर दिनक प्रशिक्षण समाप्त भ’ रहल छल, तखने एकटा अधिकारी खबरि ल’ क’ एलाह जे पूरा मुशहरी ब्लाक बाढ़िमे डूबि गेल अछि, तें एखन ई कार्यक्रम स्थगित कयल जा रहल अछि। आगाँ कहिया शुरू होयत तकर सूचना सभकें प्रेषित कयल जाएत। बाढ़ि ततेक भयंकर एलै जे ढोलीसँ गाम घूरिक’ आएब बहुत कठिन भ’ गेल। ट्रेन, बस सभ टा बन्द भ’ गेलै। सात दिन ढोलीएमे छात्रावासमे रहि जाए पड़ल। संगी अशोक कुमार ठाकुर जी ओतहि एम. एस. सी. (ए जी ) क’ रहल छलाह, तें ओत’ रहबामे असौकर्य नहि भेल। बस-ट्रेन चालू भेलै, तखन गाम घूरि एलहुँ आ फेर नव सूचनाक प्रतीक्षा कर’ लगलहुँ। दुर्गा पूजा शुरू भेलै। गाममे हलचल शुरू भेल। दुर्गास्थानमे हूलि-मालि बढल। चौकपर आ दुर्गास्थान दुनू ठाम दुर्गा पूजाक आयोजन होइत छल। दुनू ठाम सांस्कृतिक आयोजन होइत छलै। चौकपर जे आयोजन होइत छल तकर प्रमुख छलाह मुखिया जी श्री राम लखन सिंह। दुर्गास्थानमे आयोजनक प्रमुख छलाह देबू बाबू अर्थात श्री देवेन्द्र प्रताप सिंह। दुर्गास्थानमे एहिबेर देबू बाबूक आग्रहपर एक दिन सांस्कृतिक कार्यक्रममे हमहूँ रूचि लेलहुँ। बैद्यनाथ बाबू मास्टर साहेब संग देलनि। यमसम गेलहुँ। प्रसिद्द गायक महेन्द्र झा जीसँ भेंट केलहुँ। एक दिन दू-तीन घंटा समय देबाक अनुरोध केलियनि। भरिसक नवमी दिन रहै। महेन्द्रजी, जेना कहने रहथि, साँझमे सासुरसँ घुरैत काल एलाह दुर्गास्थान। महेंद्रजीक कार्यक्रमक लेल हम सभ बहुत गोटेसँ व्यक्तिगत रूपें सेहो सम्पर्क केने रही। हम सभ जेना चाहैत रही, नीक संख्यामे लोक सभ महेन्द्रजीकें सून’ आएल छलाह। रामपट्टीक कवि-गीतकार आर. के. रमण जी सेहो आएल छलाह। रमणजीक स्वर सेहो बहुत मधुर छलनि, ओ चारि-पाँचटा अपन रचना सुनौलखिन, लोककें बहुत नीक लगलनि। अन्तमे महेन्द्रजी माइक पकड़लनि त दू घंटा धरि लोक मंत्रमुग्ध भेल हुनका सुनैत रहल। जेहने आदरणीय रवीन्द्रजी ( श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर, धमदाहा, पूर्णिया )क सरल,आकर्षक आ अनमोल शब्द सभ, तहिना महेन्द्र जीक अदभुत आ अनमोल स्वर परमानन्दक अनुभव करबैत छल। देबू बाबूक पिता स्व. प्रताप भानु वर्मा, जे हमरा इलाकामे चर्चित लोक छलाह, ओहो पहिल बेर महेन्द्रजीकें एना सुनने छलाह, सुनैत-सुनैत भावुक भ’ गेलाह, मंचपर आबि जे उदगार व्यक्त केलनि, से सभ गोटेकें भावुक क’ देलकनि। कार्यक्रम बहुत दिन धरि चर्चाक विषय बनल रहल। कार्यक्रमक आयोजन लेल हमरो मंगनीमे प्रशंसा भेटि रहल छल। हमरो नीक लागल आ नोकरीक चिट्ठीक बाट ताकब आसान भ’ गेल। करीब एक मासक बाद ढोलीसँ एबाक सूचना प्राप्त भेल। ढोली पहुँचलहुँ। पाँच-पाँच गोटेक समूह बनाक’ अलग-अलग गाम निर्धारित क’ हमरा सभकें मुशहरी ब्लाक लेल विदा क’ देल गेल। हमर सबहक निदेशक हमरा सभकें सहायता आ सुझाव देबाक लेल आवश्यकतानुसार उपलब्ध रहैत छलाह। हमर सबहक समूह पहिने सुस्ता गाम गेल। ओहि गामक काज पूर्ण भेलाक बाद गेल माधोपुर। माधोपुरमे मुखियाजीसँ सम्पर्क भेलापर एकटा खूब नमहर दलानपर हमरा पाँचो गोटेक रहबाक व्यवस्था भेल। लक्ष्मी सिंह नामक एक अविवाहित सज्जन छलाह, वैह हमरा सभ लेल भोजन, जलखै बनेबाक भार उठेलनि। पता चलल जे हिनका बाहरसँ अबैबला हाकिम-कर्मचारी सबहक सेवा करब नीक लगैत छनि, सेहो बिना कोनो लोभ-लालचके। हमरा सबहक समूहमे एकटा मुस्लिम भाइ सेहो छलाह। सिंह जी माए जकाँ सभ गोटेक देख-भाल करैत छलाह। सभकें बड्ड जिद्द क’क’ परसन द’ क’ प्रेमसँ केराक पातपर भोजन करबैत छलाह। साँझमे दलानपर बहुत गोटे जमा होइत छलाह जिनका सभसँ हम सभ गामक इतिहास सुनैत छलहुँ। अपने गामक लोक जकाँ लगैत छलाह सभ गोटे। एक दिन हम सभ कोनो गाममे साढ़े पाँच बजेक बाद तक रहि गेल रही। सिंहजी गमछामे चूड़ा भूजल आ मुरही ल’क’ पहुंचि गेलाह। हुनका भेलनि जे सभकें भूख लागि गेल हेतै आ चिन्ता सेहो भेलनि जे कोनो अनहोनी त’ ने हमरा सबहक संग भेल। से बादमे कहलनि आ अभिभावक जकाँ हिदायत देलनि जे हम सभ पाँच बजे अवश्य बिदा भ’ जाइ। सिंहजी पहिने गामक जे स्थिति रहै तकरे अनुभवसँ हमरा सभकें सलाह दैत छलाह। हम सभ करीब बीस दिन ओइ गाममे रहलहुँ। जहिया ओत’सँ विदा भेलहुँ,सिंहजी एना उदास भेलाह जेना अपन कोनो निकटतम सम्बन्धी सभसँ बिछुडन भ’ रहल होनि। हम सभ सिंहजीसँ ई कहियो नै पुछलियनि जे ओ विवाह किए नहि केलनि। डर होइत छल जे पता नहि पुछलासँ ओ भावुक भ’ जाथि। एहि संसारमे कतेक लोक केहेन-केहेन कष्टकें भोगैत-भोगैत चुप-चाप प्रस्थान क’ जाइत अछि, तकर हिसाब के करत? कोना करत? तकर बाद जाहि गाममे काज करबाक छल से मुजफ्फरपुरसँ लग छलै। ओत’ सँ शनि दिन मुजफ्फरपुर गेलहुँ, सेंट्रल बैंकक क्षेत्रीय कार्यालय। कार्मिक विभागमे जाक’ सम्पर्क केलहुँ त कहलनि, जल्द ही आदेश आनेबाला है,अगले सप्ताह आइए। दोसर शनि दिन गेलहुँ त कहलनि, सिविल सर्जन से फिटनेस सर्टिफिकेट लेकर तीन दिन के भीतर आ जाइए। मेडिकल सर्टिफिकेट ल’ क’ पहुँचलहुँ। दस दिसम्बरक’ सिवान जिलामे बसंतपुर शाखामे योगदान करबाक लेल आदेश प्राप्त भेल। हमरा कहल गेल जे मुजफ्फरपुरसँ बस पकडिक’ मोहम्मदपुर तक जाएब, मोहम्मदपुरसँ मलमलियाक लेल बस पकड़ब आ ओत’सँ सिवानबला बस अथवा रिक्शासँ बसंतपुर जाएब, कुल पाँच-छओ घंटाक रस्ता अछि। ईहो सूचना भेटल जे मुजफ्फरपुरक कोनो शाखासँ रामेश्वर ठाकुर डेपुटेशनपर गेल छथि जे बसंतपुरमे हेड केशियरक रूपमे कार्य क’ रहल छथि। अपन निदेशककें कहलियनि जे हम आठ तक काज क’ क’ चल जाएब। हमरा जतेक भेटबाक चाही से आठ समयपर भेटि गेल। हम नओ तारीखक’ मुजफ्फरपुर बस स्टैंडपर गोपालगंज होइत सिवान जाइबला बसमे बैसलहुँ। करीब चारि घंटामे मोहम्मदपुर, ओत’सँ एक घंटामे मलमलिया आ ओत’सँ रिक्शासँ दस-बारह मिनटमे बसंतपुर पहुंचि गेलहुँ। साँझ भ’ गेल छलै। बैंकक गेटक सामने थोड़े काल ठाढ़ भेलहुँ त ठाकुरजी (रामेश्वर ठाकुर) एलाह, अपन परिचय देलियनि। गेट खोललनि। भीतर गेलहुँ। ठाकुर जी रातिमे शाखा प्रबंधकबला टेबलपर अपन बेडिंग पसारैत छलाह। हमरा एग्रीकल्चर विभाग बला टेबलपर अपन बेडिंग रखबाक सुझाव देलनि। थोड़े काल गप भेल। फेर फ्रेश भ’ क’ हम सभ बत्तक साहक होटलमे भोजन कर’ गेलहुँ। भोजन क’ क’ एलहुँ त थोड़े काल फेर गप-शप भेल, ओकर बाद ओ शाखा प्रबंधक बला टेबलपर अपन बेडपर पड़ि रहलाह। हम एग्रीकल्चर विभाग बला टेबलपर अपन ओछाइन ओछाक’ पड़ि रहलहुँ। बड़ी काल धरि निन्न नहि भेल। अतीतक दृश्य सभ सोझाँमे आबि गेल : पटनामे नागेन्द्रजीसँ भेंट, आरामे साढ़ूक भैयाक डेरा, जमशेदपुरमे मामाक डेरा, रिटेल कण्ट्रोल क्लॉथक व्यवसायक लेल दौड़-धूप, फील्ड इन्वेस्टिगेटरक प्रशिक्षण, मुशहरी ब्लाकमे बाढ़ि, गामक दुर्गा-पूजा, दुर्गास्थानमे महेन्द्र झाजीक कार्यक्रम,फेर मुशहरी ब्लाक आगमन,सुस्ता गाम, माधोपुर गामक लक्ष्मी सिंह, सेंट्रल बैंकक क्षेत्रीय कार्यालय, बहालीक चिट्ठी, मुजफ्फरपुरसँ बसंतपुरक यात्रा। लगैत छल जेना धीरे-धीरे एहि पहाड़पर बहुत दूरसँ आबि रहल छी, बहुत दूरसँ। मोन पड़ल अपन गाम। मोन पड़ल अपन घर। मोन पड़लाह पिता, मोन पड़लीह माए, मोन पड़लाह दुनू अनुज, मोन पड़लीह पत्नी मोने मोन सभकें कहलियनि, आब अहाँ सभ चिन्ता नहि करू, जकर प्रतीक्षा कतेक माससँ करैत आबि रहल छलहुँ, से नोकरी हमरा भेटि गेल अछि। पटना / १४.०८.२०२१ (१७) नोकरीक साढ़े चारि साल बैंकमे पहिल दिन मलमलियासं सिवान जाइबला सड़कक दहिना कातमे प्रथम तलपर पूब दिससं सेंट्रल बैंकक शाखा छलै जे छओ मास पहिने खूजल छलै, पच्छिम दिस भूमि विकास बैंकक कार्यालय छलै। सड़कक बामा कात प्रखंड-अंचल कार्यालय छलै। एहि ठामसं सिवान बत्तीस किलोमीटरपर छै। बैंकक हाल खूब नमहर छलै। स्वीपर छल महेन्दर बांसफोर। ओ सबेरे आबिक’ हमरा सभकें पानि आ चाह पियाक’, हमर सबहक ओछाइन स्टेशनरी रूममे राखि, बैंकक सफाइ क’ क’ चल गेल। हम सभ फ्रेश भ’ क’ नीचां चापा-कलपर स्नानकय तैयार भ’क’ बजारसं किछु जलखै क’ क’ एलहुं। वाटर बॉय छल राम नरेश, बाल्टीमे पीबैबला पानि भरिक’ रखलक। दफ्तरी छलाह राम अयोध्या पंडित, मशरक घर छलनि,सोम दिन गामसं अबैत छलाह, बैंकक हॉलमे दू टा टेबल जोडिक’ सुतैत छलाह, होटलमे खाइत छलाह, शनि दिन गाम चल जाइत छलाह। दस बजे बैंकमे आबि हम सभ बैसलहुँ। साढ़े दस बजे बैंकमे बहुत लोक आबि गेलाह। सिवानसं शाखा प्रबंधक एलाह, दास बाबू ( श्री निरंजन दास ) आ श्री गौरी शंकर सिंह, कृषि वित्त अधिकारी। दुनू गोटे सिवानसं सभ दिन बससं अबैत छलाह। शाखामे कृषि विभागक काज एखन धरि सिंहजी देखैत छलाह, सिवानसं अबैत छलाह आ साँझमे सिवान घूरि जाइत छलाह। एगारह बजैत-बजैत हालमे लोकक भीड़ लागि गेलै। हम त घबरा गेलहुँ। सिंहजी कहलनि, ई सभ गोटे गहूमक खेतीक लेल लोन लेबय आएल छथि, ब्लाक ऑफिस सं आवेदन फॉरवर्ड भ’ क’ आएल छै, अंचल अधिकारी द्वारा जमीनक प्रमाण पत्र देल गेल छै , प्रति एकड़ छः सौ रूपैयाक लोन स्वीकृत करबाक छै, दू सै बीयाक लेल आ चारि सै खादक लेल। स्वीकृतिक लेल हमसभ अनुशंसा क’ क’ शाखा प्रबंधक लग पठबैत छियनि, शाखा प्रबंधकक हस्ताक्षरक बाद हमसभ बैंकक दस्ताबेज सभपर आवेदक आ दूटा गारंटरक हस्ताक्षर ल’क’ बीज निगम कें बीजक लेल आ खाद डिपो कें खादक लेल डिलीवरी आर्डर देल जाइ छै । यैह भेल हमर प्रशिक्षण। दफ्तरी दस्ताबेजक सेट बनाक’ दै छलाह। सिंह साहेब एक-दूटा आवेदनक निष्पादनक प्रक्रिया देखा देलनि आ तकर बाद दस्ताबेज सभ पर आवेदक आ दू-दूटा जमानतदारक हस्ताक्षर लेब’ कहलनि। ठाकुर जी कैश विभागक काज देखि रहल छलाह। बीचमे ठाकुर जी संगे भोजन कर’ बजार गेलहुँ, सिंहजी एसगरे थोड़े काल काज करैत रहलाह। ठाकुरजी कहलनि, आज त लगैए रात भ’ जेतै, जत्ते लोक दू तीस तक बैंकमे आबि गेल छथि, हुनकर काज त हेबे करतै। हम घबरा गेलहुँ। लगातार एते काल बैसबाक अभ्यास नहि छल। साढ़े चारि बजे पेट्रोमक्स जड्बैत देखलिऐ तखन ठाकुरजी जे कहने छलाह तकर पुष्टि भ’ गेल। जाड़क मास छलै, बैंक बन्द होइत-होइत नौ बाजि गेलै। बड्ड थाकि गेल रही। होटलमे खेबाक लेल जे किछु भेटल, से ख़ाक’ जखन सूत’ गेलहुँ त मोनमे भेल जे नोकरी ठीक नै भेल, मुदा आब कोनो विकल्प शेष नहि रहि गेल अछि, से सोचि मोनकें स्थिर करबाक प्रयासमे लागि गेलहुँ। दू दिनक बाद सिंह साहेब सिवानसं एनाई बन्द क’ देलनि। हुनका जेना-जेना देखने छलियनि, तहिना आवेदन पत्र देखिक’ कते खेत हिस्सामे छै जाहिमे गहूमक खेती करबाक छै, से देखिक’ कते आ कोन-कोन खादक आवश्यकता छै,से गणना क’क’ ऋण स्वीकृतिक लेल अनुशंसा करैत अपन लघु हस्ताक्षर कय शाखा प्रबंधककें दै छलियनि। ओ हस्ताक्षर करैत छलाह। एकर बाद दस्ताबेज सभपर आबेदक आ जमानतदार सबहक हस्ताक्षर लैत छलहुँ। तकर बाद बीज निगमकें बीज लेल आ खाद डिपोकें खाद लेल डिलीवरी आर्डर भरिक’ ओइपर अपन लघु हस्ताक्षर कय शाखा प्रबंधकक हस्ताक्षर लैत आवेदककें द’ दैत छलियनि। आवेदक कृषक निगम आ डिपोसं बीज आ खाद ल’ क’ चलि जाइत छलाह, निगम अथवा डिपो किसानकें बीज अथवा खाद द’ क’ बैंक शाखामे बिल पठा दैत छलैक। बिलमे सूचना रहैत छलै जे बैंक शाखाक आदेशपर कोन कृषककें कतेक राशिकेर बीज अथवा खादक आपूर्ति कयल गेलैए। डिलीवरी चलानपर कृषकक हस्ताक्षर रहैत छलैक। बैंकक बही(लेजर)मे कृषकक खाता खोलल जाइ छलै, बिलक राशिसं सम्बन्धित कृषकक खाता नामे (डेबिट) होइ छलै। एतबे राशिक धनादेश (पे आर्डर ) अथवा ड्राफ्ट आपूर्तिकर्ताक नामे बनाक’ बिलक भुगतान क’ देल जाइत छलै। एकर विवरण जाहि छपल कागतपर लिखल जाइत छल तकरा डेबिट आ क्रेडिट भाउचर कहल जाइत छलै। भाउचरपर हमर लघु आ शाखा प्रबंधकक पूर्ण हस्ताक्षर होइत छलनि, भाउचर दिन भरिक अन्य भाउचरक संग अभिलेख(रिकॉर्ड) लेल सुरक्षित राखल जाइत छलैक। भाउचरपर विवरण कोना लिखी, से पछिला कोनो तिथिक सिंहजीक बनाओल भाउचर देखिक’ सिखैत छलहुँ – महाजनो येन गतः स पन्थाः। तकरा बाद : भीड़ क्रमशः कमैत गेल। रामेश्वर ठाकुर जीक ट्रान्सफर मुजफ्फरपुर भ’ गेलनि, हुनका स्थानपर मधुबनी शाखासं गणेश ठाकुरजी एलाह स्थायी हेड केशियर बनिक’। गणेश ठाकुरजी डेरा ताकि लेलनि आ परिवार संगे रह’ लगलाह। हमरो लगेमे डेरा भेटि गेल। एसगर रह’ लगलहुँ। दफ्तरी राम अयोध्या पंडित ऑफिसमे रातिमे सुतैत छलाह, सबेरे आ साँझक’ हमरे संगे भोजन बनबैत छलाह आ करैत छलाह। शनि दिन ऑफिसक काजक बाद अपन गाम चलि जाइत छलाह आ सोम दिन अबैत छलाह। शाखा प्रबंधक दास बाबू ( श्री निरंजन दास ) सभ दिन सिवानसं बससं अबैत छलाह। डेरा भाड़ा प्रसंग हमरा आवासक किराया पचास रुपैया छल। सभ मास एक तारीकक’ पछिला मासक किराया मकान मालिककें खातामे जमाक’ दैत छलियनि। एक दिन मकान मालिकक भातिज एलाह आ कहलनि जे ऐ माससं किराया हमरा देब’ पड़त। हम कारण जान’ चाह्लहु त कहलनि, हमर पारिवारिक समस्या अछि, एकर किराया हमरा भेटक चाही, तें हमरा देब’ पड़त। हमर कोनो अनुरोध ओ सुनबा लेल तैयार नै भेलाह। हम सोचलहुँ जे हिनकासं झगड़ा करबासं नीक अछि दोसर डेरा ताकि लेब। हम कहलियनि, ठीक छै, जाउ ऐ महिनामे अहाँकें किराया भेटि जाएत। ओ कहलनि जे ओ आबथि त कह्बनि जे हुनका द’ देलियनि, अहाँ हुनकासं गप करू। हम कहलियनि, अहाँकें किराया भेटि जाएत, आब हमर चिन्ता अहाँ छोडि दिय’। ओ प्रसन्न भ’ क’ चल गेलाह। ओही दिन साँझमे ओ एलाह जिनका पहिनेसं किराया दैत आबि रहल छलहुँ। ओहो अपन परिवारक समस्याक चर्च करैत कहलनि, अहाँ हमर पारिवारिक झगडामे नै पडू, अहाँ जहिना हमरा किराया दैत आएल छी, तहिना दैत रहू, ककरोसं डरबाक काज नै छै। ईहो अपने बातपर अड़ल रहलाह, हमर कोनो बात नै सून’ चाहैत छलाह। हम सोचलहुँ जे दोसर डेरा ताकि लेब ठीक रहत, ताबत ऐ मासक किराया हिनको द’ देबनि। कहलियनि. ठीक छै, अहाँकें जेना दैत छलहुँ से अवश्य भेटत। ओहो प्रसन्न भ’ क’ गेलाह। हमरा पंडित दफ्तरी कहलक, अहाँ ई ठीक नै केलहुं, दुनू गोटेकें किराया देबनि? हम कहलियनि, एक मास द’ देबनि, दोसर मासमे हम ई डेरे छोडि देब। झगड़ा केलासं अपनो अशांत भ’ जाएब, ऐसं नीक पचास रुपैयाक नोकसान, बूझब जे पचास रुपैया जेबीसं कतहु खसि पडल। तीस तारीखक’ एक गोटे सबेरे आबिक’ किराया ल’ गेलाह। दोसर साँझमे एलाह। ओहो अपन किछु अनिवार्य आवश्यकताक चर्च करैत किराया ल’ गेलाह। हम दोसर डेराक खोज तेज क’ देलहुं। एक सप्ताहक बाद एकदिन मुखियाजीकें हिनका दुनू गोटेक संग अबैत देखलियनि त चिन्ता भेल। मुखियाजी कहलनि, हम अहांसं एकटा जानकारी प्राप्त कर’ आएल छी ठाकुरजी। हम कहलियनि, अवश्य, पूछल जाए। मुखिया जी पुछलनि, ई कहैत छथि जे ठाकुरजी हमरा किराया देलनि आ ई कहैत छथि जे किराया हमरा भेटल, ऐमे सही के अछि? हम कहलियनि, मुखियाजी, दुनू गोटे सही छथि, गलत कियो नहि छथि। मुखिया जी आ ओहो दुनू गोटे हमरा दिस ताक’ लगलाह। मुखिया जी बजलाह, अजीब बात अछि , एक आदमी दुनू गोटेकें किराया देलाक बादो शांत छथि, कोनो शिकायत नै आ ई दुनू आदमी किराया लेलाक बादो अशांत अछि , लड़ाइ-झगड़ा करबा पर उतारू अछि ! मुखिया जी अपनापन जनबैत दुनू गोटेकें बुझौलखिन जे ई लाजक बात थिक। दुनू गोटे मुखियाजीक कहलापर पचास-पचास रुपैया हमरा वापस क’ देलनि। मुखिया जी हमरा कहलनि, अहाँ एखन राखू पाइ,दू-तीन दिनमे फैसला भ’ जेतै, तखन जकरा कहब तकरा द’ देबै। दुनू गोटेक गेलाक बाद मुखिया जी कहलनि तखन बुझलिऐ जे दुनू गोटे एके आँगनमे रहैत छथि, एक आदमी हमरासं किराया ल’क’ गेलाह आ अपना घरमे बजलाह, हुनकर पत्नी दोसरकें सुनाक’ कहलखिन जे लोककें बजलासं की हेतै, किरायादार हमरा मालिक बुझलक तखन ने किराया देलक। दोसर पक्षकें ई बुझेलनि जे ई हमरा खौंझबैए, किएक त हमरा त किराया आबि गेल अछि। प्रतिक्रियामे दोसर पक्ष सेहो किछु बजलीह, दुनू पक्षमे कहा-सुनी भ’ गेलनि, बात पुरुष सभमे सेहो भ’ गेलनि। झगडा ततेक बढ़ि गेलै, जे मुखियाजीकें हस्तक्षेप कर’ पड़लनि। हमरा दुख भेल जे हमर जे क्रिया भेल तकर परिणाम अशुभ भ’ गेलै, तें हमरा किछु दोसर तरहें समाधान ताकब उचित छल। तीन दिनक बाद मुखियाजी कहलनि, फैसला भ’ गेलै, अहाँ जिनका दैत छलियनि, हुनके देबनि, दोसर कियो आब कहियो किराया मांगय नै एताह। सैह भेलै। तकर बाद फेर कहियो डेरा ल’ क’ समस्या नहि भेल। लंबित आवेदन प्रसंग आपात काल चलिए रहल छलै। सभ ठाम शान्ति। सभ ठाम पोस्टर छलै, ‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है।’ बैंकमे किसान सबहक ऋण आवेदन अबैत छलै प्रखण्ड कार्यालयसं अग्रसारित भ’क’। आवेदन पत्र कोनो स्थितिमे पन्द्रह दिनसं अधिक अवधि लेल लंबित नहि रहबाक चाही, से स्पष्ट आदेश छलैक। आवेदन-पत्र सबहक निष्पादनक समीक्षा हेतु टास्क फ़ोर्सक साप्ताहिक मीटिंग होइत छलैक जिला स्थित कलेक्टरक सभा कक्षमे। मीटिंगमे प्रखण्ड विकास पदाधिकारी सभ रहैत छलाह आ बैंक दिससं जिला स्थित मुख्य शाखाक कृषि वित्त अधिकारी रहैत छलाह। बसंतपुरक प्रखण्ड विकास पदाधिकारी रिपोर्ट केलखिन जे सेंट्रल बैंक बसंतपुरमे बोरिंगक सत्तरिटा आवेदन तीन माससं लंबित अछि। कलेक्टर बहुत नाराज भेलाह आ गौरी शंकर सिंह, सिवान शाखाक कृषि वित्त अधिकारीकें कहलखिन जे ओहि ठाम जे स्टाफ काज करैत अछि, तकरा ससपेंड क’ क’ हमरा खबरि करू। दोसर दिन सिवानसं गौरी बाबू एलाह आ ई समाचार कहलनि। हमरा त ओत’ तीन मास भेलो नै छल, हमरासँ पहिने वैह सिवानसं आबिक’ एहि शाखाक काजक निष्पादन करैत छलाह। हम एहि बीचमे फसल-ऋणक आवेदनक निष्पादन करैत जा रहल छलहुँ। किछु सर्कुलर सभ जे आएल छलै, से पढने छलहुँ। हम ओहि सर्कुलरकें निकाललहुँ। गौरी बाबूकें बूझल छलनि। सर्कुलरक अनुसार जाहि किसानकें अपना पंप-सेट नै छै अथवा ओकरा आसानीसं उपलब्ध नै छै तकरा खाली बोरिंग लेल ऋण नै देबाक छै। विचार-विमर्श भेल। हमरा अगिला सप्ताहक टास्क फ़ोर्सक मीटिंगमे उपस्थित हेबाक लेल कहिक’ गौरी बाबू चल गेलाह। अगिला मीटिंगमे हमहूँ गेलहुँ। बसंतपुर प्रखण्डक चर्चा शुरू भेल त कलेक्टर साहेब पुछलखिन सेंट्रल बैंक बसंतपुरसं के एलाहे। हम ठाढ़ भेलहुँ। कलेक्टर पुछ्लनि लम्बित आवेदन पत्रक विषयमे। हम बैंकक ओहि सर्कुलरक चर्च करैत कहलियनि, अढ़ाइ मास पहिने आवेदन पत्र सभ प्रखण्ड कार्यालयकें वापस कएल जा चुकल छै। हम शाखा प्रबंधकक हस्ताक्षरसं गेल लगभग अढ़ाइ मास पहिलुक पत्रक प्रति देख’ देलियनि, गौरी बाबू सेहो एकर समर्थन केलखिन। कलेक्टर साहेब प्रखण्ड विकास पदाधिकारीपर बिगड़ि गेलखिन। कहलखिन, हमरा लगैत छल जे बैंक एहेन गलती नहि क’ सकैत अछि, मिस्टर पी वी पी, गलत सूचना ल’क’ नै आउ। अहाँक ठीक सामने अछि बैंक शाखा, अहाँ बैंकसं ताल-मेल किए नै रखैत छी? आब बैंक स्टाफक संगे मीटिंगमे आउ। दोसर दिन पी वी पी हमरा शाखामे एलाह आ कहिया वापस भेलै आ के प्राप्त केने रहै, से जान’ चाह्लनि। दफ्तरी पिउन बुक देख’ देलकनि। प्राप्तकर्ताक हस्ताक्षर नहि चीन्हि सकलाह, पी वी पी गुम्म भ’ गेलाह, कहलखिन, आब यदि कोनो आवेदन वापस रही त कोनो आन अधिकारीकें देब। तकरा बाद फेर कहियो कोनो रिपोर्ट मे कोनो त्रुटि हेबाक अवसर नै एलै। पी वी पी कोनो मीटिंगमे जेबासं एक दिन पहिने बैंक शाखामे अपने आबिक’ अथवा कोनो अधिकारीकें पठाक’ बैंकक रिपोर्टसं अपना रिपोर्टक मिलान करा लैत छलाह आ जहिया टास्क फ़ोर्सक मीटिंग रहै छलै त हमरो संग क’ लैत छलाह। पिताक अस्वस्थता प्रसंग १९० रु. मूल वेतनपर हमर बहाली भेल छल, डी. ए. मिलाक’ ५०३ रु. होइ छलै। शुरूमे किछु मास धरि किछु ओवरटाइम सेहो भ’ जाइ छलै। एकर अतिरिक्त मीटिंगमे सिवान जाइ छलहुँ त ओकरा लेल डाईम अलाउंस सेहो एक दिनक बारह रु. भेटि जाइत छल। हम संतुष्ट छलहुँ। अपना लेल कम-सं-कम खर्च करैत पाइ गाम पठा दैत छलहुँ अथवा नेने जाइ छलहुँ। आमदनी भेल त खर्चक नव रस्ता सभ सेहो बन’ लागल। किछुए मासक बाद बाबूक स्वास्थ्य बहुत ख़राब भ’ भेलनि, जांचक बाद टी.बी. प्रगट भेलनि।बहुत खतरनाक बिमारी छलै ओहि समयक लेल। दबाइ, पथ्य आदिमे बहुत खर्चक आवश्यकता होइत छलैक। हमर प्राथमिकतामे सभसं ऊपर भ’ गेल बाबूजीक इलाज आ पथ्य। दरभंगामे नीक डॉक्टरसं इलाज चल’ लगलनि। लगातार छौ मास इलाज आ पथ्यपर बाबूक स्वास्थ्य सामान्य भेलनि। तकर बादो बहुत दिन धरि डॉक्टरक सलाहक अनुसार दिनचर्या चलैत रह्लनि। एक मास पुरलापर एक दिनक आकस्मिक अवकाश भेटैत छल। शनि दिन दू बजेक बाद विदा होइत छलहुँ, रातिमे गाम पहुँचैत छलहुँ, रवि दिन रहिक’ सोम दिन विदा भ’ जाइत छलहुँ। बादमे किछु मास लेल परिवार ल’क’ सेहो रहलहुं। किछु मास बाबूकें सेहो अपना संग रखलियनि। छोट भाए सभ गामक मिडिल आ हाइ स्कूलमे पढ़ै छलाह। घरमे आवश्यकतानुसार माएकें लोकसं कर्ज ल’ लेब’ पडैत छलैक, ओ ओकर सूदिक गणना करैत छलीह। बाबूक हाथक कर्ज सभकें बूझल रहैत छलै। हम दुनू तरहक कर्जसं धीरे-धीरे मुक्तिक प्रयास क’ रहल छलहुँ। बच्चीक गहना छोड़यबाक बात ध्यानसं हटि गेल। एक सालक बाद को –ऑपरेटिवसं लोन ल’क’ गहना छोड़यबाक बात सोचलहुँ त कहलक जे गला देल गेलै। हम तखन ओइ दिस सोचनाइए छोड़ि देलहुं। शाखामे नव-नव सदस्य सबहक आगमन शाखाक व्यवसायमे वृद्धि भेलैक त सदस्यक संख्यामे सेहो वृद्धि भेलै। कृषि वित्त अधिकारीक पदपर एलाह श्री शिव शंकर सिंह जी। सिंह जी सभसं लम्बा-तगड़ा छलाह, खांटी इमानदार आ स्पष्टवक्ता छलाह। परिवारक संग रहैत छलाह, पिता सेहो संग रहैत छलखिन। दफ्तरी राम अयोध्या पंडित लिपिक सह खजांची भ’ क’ गेलाह डुमरा ( सीतामढ़ी), हुनका स्थान पर मदन प्रसाद एलाह। किछु अंतरालक बाद एकटा और कृषि सहायक एलाह चितरंजन शर्मा जी। दिघवारासं श्रीवास्तवजी एलाह चीफ केशियर भ’ क’। किछु मासक बाद शाखा प्रबंधक दास बाबूक स्थानान्तरण मुजफ्फरपुर भ’ गेलनि, हुनका स्थानपर चौबे जी एलाह आरासं। चौबेजी बहुत हंसमुख स्वभावक छलाह। लोक जे हुनका चैम्बरमे कोनो काजे जाइत छल, से प्रसन्न मुद्रामे निकलैत छल। सामान्यतया कृषि विभागसं सम्बन्धित आवेदन पत्र पर कृषि सहायक, कृषि वित्त अधिकारीक अनुशंसापर शाखा प्रबंधक स्वीकृतिपर हस्ताक्षर करैत छलाह। कोनो-कोनो आवेदन जे बैंकक सर्कुलरक अनुसार उपयुक्त नै रहै छलै, ओहिमे हमरा सबहक अनुशंसा नहियों रहलापर, यदि हुनका ठीक लगै छलनि, त स्वीकृत क’ दैत छलखिन। हमरा सभ जकाँ ओ नै डेराइत छलाह। कन्हैया लाल श्रीवास्तव लिपिक सह खजांचीक पद पर आ छपरासं बी.पी. शर्मा एलाह लेखापालक पदपर। शर्मा जी एसगरे रहैत छलाह। ओहो नियमक अनुसारे सभटा काज करैत छलाह, नियमसं कनियों विचलन पसन्द नै करैत छलाह। ओ कतेक सदस्यकें बैंक सेवामे भेल दुर्गति देखने छलाह अथवा सुनने छलाह, तकर चर्च समय-समयपर करैत छलाह आ सर्कुलरेक अनुसार सभ काज करबापर जोर दैत छलाह। ओ रस्तोपर चलैत काल यदि सड़कपर कोनो धिया-पूताकें देखि लैत छलाह त ओकर घरक अभिभावककें बजाक’ धिया-पूताकें सम्हारिक’ रखबाक उपदेश द’ दैत छलखिन। हम सभ एक बेर पुछलियनि जे अहाँकें कोन मतलब अछि आनक एते चिन्ता करबाक त कहलनि जे एक त सभ जिम्मेदार नागरिकक काज छै जे ककरोसं किछु चूक भ’ रहल छै, त ओकरा सतर्क क’ दियौ, दोसर जे कोनो दुर्घटना भ’ जाइ त पुलिस हमरो सभसं पुछ-ताछ क’ सकैए। एतेक सावधान रहैबला आ दोसरोकें सावधान करैबला शर्माजी ककरोसं अपन परिवारक विषयमे कखनो किछु नै कहैत छलखिन। एक दिन ऑफिसमे कोनो बात पर शर्माजी शाखा प्रबंधक महोदयकें कहलखिन जे कहियो अहाँ अपनो फसब आ हमरो सभकें फसाएब। जबाबमे शाखा प्रबंधक कहलखिन जे कपारमे लिखल हैत फसब त कियो बचा नै सकत आ लिखल हैत बचब त कियो किछु बिगाड़ि नै सकैए। शर्माजीकें ई बात नीक नै लगलनि, पान खाए बिदा भ’ गेलाह। हुनका ककरो बात पसन्द नै पड़ैत छलनि त पान खाए निकलि जाइत छलाह आ पाँच मिनटक बाद शांत भ’ क’ घुरैत छलाह। एक दिन एक गोटेक गपसं हुनका एतेक दुख भेलनि जे उठिक’ रोडपर एलाह, एकटा बस मुजफ्फरपुर जाइत रहै, ओहीमे चढ़ि गेलाह आ एक सप्ताहक बादे मुजफ्फरपुरसं घुरलाह। दुखक बात ई भेलै जे दस बरखक बादे शर्माजी शाखा प्रबंधक भेलाक किछुए दिनक बाद बैंक छोडि देलनि आ चौबेजी तीनटा शाखामे शाखा प्रबंधक रहलाक किछुए बरख बाद संसारे छोडि देलनि। शर्माजी किए बैंक छोडि देलनि, से पता नै चलि सकल। चौबेजी द’ पता चलल जे बिमारीक कारणे नै ठहरि सकलाह। डायबिटीज छलनि, मुदा अपेक्षित परहेज नहि करैत छलाह। बहुत पहिने एक दिन ऑफिसमे शर्माजी आ चौबेजीक मुंहसं जे निकलल रहनि से कोना एक-दोसरक लेल सत्य भ’ गेलै अथवा एक दोसरक लेल श्राप सिद्ध भेलनि,से चिन्तनमे आबि जाइत अछि। शर्माजीक कहब छलनि जे असावधान रहलासं अनिष्ट भ’ सकैत अछि, से चौबेजी लेल सत्य सिद्ध भेलनि। चौबेजीक कहब छलनि जे कतबो सावधान रहब, यदि भाग्यमे अनिष्ट लिखल अछि त कियो बचा नै सकैए—ई शर्माजीक लेल सत्य सिद्ध भेलनि। शर्माजी एतेक सावधान रहैत छलाह, कोनो अपराध नै केने छलाह तखनो स्वयं शाखा प्रबंधकक पद छोड़िक’ भागि पड़यलाह। चिन्तक लोकनि कहैत छथि – आवर वर्ड्स क्रिएट आवर वर्ल्ड, सोचिक’ कोनो बात बजबाक चाही, मुदा से कहाँ होइत छैक, पता नहि दिन भरिमे हम सभ अपन चिन्तन अथवा अपन शब्दसं किनका-किनका श्राप दैत रहैत छियनि अथवा किनकर-किनकर चिन्तन अथवा शब्द सभसं शापग्रस्त होइत रहैत छी। किछु मासक बाद अंचल निरीक्षकक पर पर एलाह रामजी लाल दास जी जे हमरे जिलाक छलाह। हुनकासं मैथिलीमे गप होइत छल,से हमरा लेल अतिरिक्त ख़ुशीक बात छल। दास जी हिन्दीमे लिखैत छलाह, त्रिकालदर्शी उपनामक संग कार्टून सेहो नीक बनबैत छलाह, एखनो फेस बुक पर हुनकर कार्टून अधिक काल देखैत रहैत छी। विज्ञानपर आधारित हुनक विलक्षण कथा संग्रह प्रकाशित भेल छनि, हमहूँ पढने छी। एकटा और पोथी प्रकाशित भेलनि अछि। दास जी छलाह त अंचल कार्यालयक स्टाफ मुदा बैंकक स्टाफ सभसं ततेक घुलल-मिलल छलाह जे बहुत गोटे हुनको बैंकेक स्टाफ बुझैत छलनि। हम सभ संगे साँझमे कहियो मलमलिया दिस त कहियो कन्हौली दिस पयरे घूमय जाइ छलहुँ। हम मिथिला मिहिर मंगबैत छलहुँ, मैथिली आ हिन्दीक किताब पढैत छलहुँ आ मैथिलीमे गीत लिखैत छलहुँ। हिन्दीमे काका हाथरसीक एकटा किताब पढ़लहुँ, हिन्दी मे सेहो किछु छोट-छोट कविता लिखय लागल छलहुँ। कन्हैया लाल श्रीवास्तव जी सेहो भोजपुरीमे गीत गबैत छलाह आ लिखबो करैत छलाह। हमरा संगे किछु मैथिली गीत सेहो गाबि लैत छलाह। मोटर साइकिल प्रसंग एक दिन आंचलिक प्रबंधक एलाह। कृषि विभागमे दू गोटे रही- हम कृषि सहायक आ सिंह जी, कृषि वित्त अधिकारी। हमरा सभकें पुछ्लनि जे हम सभ एखन धरि मोटर साइकिल किए ने किनने छी, बिना मोटर साइकिलके फील्डमे कोना जाएब इंस्पेक्शन अथवा वसूली लेल। हम सभ कहलियनि जे चलब’ नै अबैए त कहलनि जे सीखि लिय’, बिना सिखने काज नै चलत। हम ईहो कहलियनि जे पन्द्रह प्रतिशत मार्जिन मनी जमा करब सेहो एकटा समस्या अछि। ओ तुरत लैटर पैडपर शाखा प्रबंधककें आदेश द’ देलखिन जे मोटर साइकिल के जतेक दाम छै, ततेक ऋण स्वीकृत क’ देल जाए, मार्जिन मनी नै जमा कराओल जाए। पुछ्लनि, और कोनो समस्या? हम सभ आश्वस्त क’ देलियनि जे एक मासक भीतर मोटर साइकिल ल’ लेब। जाइत- जाइत आंचलिक प्रबंधक महोदय कहलनि, हम एक मासक बाद फेर आएब अहाँ सबहक मोटर साइकिल देखबाक लेल, से ध्यान राखब। हम सभ अपनामे विचार केलहुं जे आंचलिक प्रबंधक कें एते पलखति कत’ हेतनि जे एक मासक बाद फेर एहि शाखामे एताह। हम सभ निश्चिंत भ’ गेलहुँ। असलमे मोटर साइकिल चढ़बासं हम सभ डेराइत रही। सिंह जी हमरासं बेशी मोटर साइकिल चढ़बासं डेराइत छलाह, हुनकर देहो बेशी भारी छलनि,खसबाक डर बेशी होइ छलनि। हम सिखबाक लेल तैयार भेलहुँ, एक आदमी तैयार भेला अपन पुरान मोटर साइकिल देबाक लेल कहियो-कहियो थोड़े कालक’ सीख’क लेल। तीन-चारि दिनमे लागल जे हम आब चला लेब। एक दिन हुनकर मोटर साइकिलसं सात-आठ किलोमीटर दूर कोनो गाम गेलहुँ एसगरे। घुरती काल की भेलै से नै बुझलिऐ, गाड़ी रोक’ चहिऐ त रुकबे नै करै, ब्रेक फेल भ’ गेलै, हम नर्वस भ’ गेलहुँ, आब कोना-की करू। भेल जे आब कतहु ठोकर लागि जेतै, तखने एकटा विचार आएल आ झट द’ चाभी निकालि लेलिऐ, एकटा हाथ हैंडलसं हटलाक कारणे गाड़ी असंतुलित भेलै आ थोड़बे दूर पर रुकलै आ एक कात खसियो पड़लै। गति कम भ’क’ खसलै, तें बेशी चोट नै लागल। अपने उठिक’ गाड़ीकें गुड़कौने किछु दूर गेलहुँ त एकटा साइकिल मरम्मति बला दोकान भेटल ओकरा कहलियै त कहलक जे हम एते क’ दै छी जे धीरे-धीरे चलाक’ अहाँ बसंतपुर चल जाएब, ओत’ ठीक करा लेब। ओ मिस्त्री जहिना कहने रह्य तहिना धीरे-धीरे चलाक’ बसंतपुर सकुशल पहुंचि गेलहुँ। जिनकर गाड़ी छलनि हुनका कहलियनि त कहलनि जे आधा अहाँ सीखि गेलहुँ, एक दिन एक बेर और खसब तखन पूरा सीखि जाएब। हमरा एक सप्ताह तक गाड़ी चलयबाक हिम्मति नै भेल, मोने मोन सोचलहुँ जे पुरान गाड़ी पर आब नै चढब। खसबाक कल्पनासं डर भ’ जाइ छल। सिंहजी सेहो नै सीखि सकलाह। कखनो-कखनो ईहो बात ध्यानमे आबि जाइत छल जे आंचलिक प्रबंधक महोदय यदि आबिए जाथि त हम सभ की कह्बनि। एक दिन सिवानक राजकमल एजेंसीमे पता लगेलहुँ त कहलक जे एखन स्टॉकमे राजदूत मोटर साइकिल नै अछि, बस, हमरा सभकें एकटा बहाना भेटि गेल, आब यदि आंचलिक प्रबंधक महोदय आबियो जेताह त कहबनि जे हम सभ राजदूत मोटर साइकिल लेब’ चाहैत छी जे एखन स्टॉकमे नै छै। ठीके जहिना कहिक’ गेल रहथि, आंचलिक प्रबंधक महोदय मास दिनक बाद शाखामे आबि गेलाह आ हमरा सभकें देखिते पूछि बैसलाह, मोटर साइकिल ल’ लै गेलहुँ ने। जबाब हमरा सभ लग तैयार छल, कहलियनि जे राजदूत स्टॉक मे एखन नै छै। ओहि समयमे मोबाइल आ शाखामे फोनक सुविधा त रहबे नै करै जे ओकरा फोनसं पुछितथिन। कहलनि, हमरा संगे पटना चलू ओत’सं ल’ क’ चल आएब। हम सभ कहलियनि जे हम सभ आब गाड़ी लेलाक बादे चलेनाइ सीखब, तें पटनासं अनबाक विचार छोडि देल जाए, सिवानमे उपलब्ध भ’ जेतै त हम सभ ककरो मदति ल’क’ आनि लेब। साहेब कहलनि जे गाड़ी चलेनाइ सीखि लेब त फील्डमे जाएब त टी ए सेहो भेटत, तें आर्थिक दृष्टिसं सेहो अहाँ सबहक लेल मोटर साइकिल लाभदायक अछि आ एहिसं बैंककें सेहो काज बेशी हेतै। जेड.एम.साहेब सिवान पहुंचिक’ राजकमल एजेंसीमे पता लगबौलनि त कहलकनि जे एखन गाड़ी छै स्टॉकमे। ओकरा कहल गेलै जे दू टा राजदूत मोटर साइकिल बसंतपुर शाखाक दू टा फील्ड स्टाफ लेल राखि दियौ आ हमरा शाखाकें टेलीग्रामसं सुचित कएल गेल जे अहाँ सभ लेल गाड़ी राखल अछि, अविलम्ब आबिक’ ल’ जाउ। आब हमरा सभ लग कोनो बहाना नै रहि गेल छल। बैंकमे डॉक्यूमेंटेशन क’ क’ पूरा दामक राशिक ड्राफ्ट बनाक’ ल’ गेलहुँ आ तीन अप्रैल १९७९ क’ हम दूनू गोटे सिवानक राजकमल एजेंसीसं राजदूत मोटर साइकिल कीनिक’ आबि गेलहुँ। दुनू गोटे एक-एक चालककें संग ल’क’ गेल छलहुँ जे हमरा सभकें सकुशल सिवानसं बसंतपुर पहुंचा देलनि। नवका गाड़ीपर एक-दू बेर कनी-मनी चोट लागल मुदा हम एक सप्ताहमे नीक जकाँ अपन काज जोगर गाड़ी चलेनाइ सीखि गेलहुँ। तकर बाद करीब तेरह साल बिहारमे रहलहुं, मोटर साइकिलसं कोनो दुर्घटनाक शिकार नहि भेलहुँ। धरना प्रसंग : आपात काल समाप्त भेलै,चुनाव भेलै, केन्द्र मे जनता पार्टीक सरकार आबि गेलै, सभ गाममे नव-नव नेता सभ भेलाह। सभ क्यो जनता सबहक बीच अपन नीक छबि बनयबा लेल परिश्रम करैत छलाह। ओ सभ बैंक शाखामे सेहो लोकक काजक पैरवीमे अबैत छलाह। बैंकक नियमानुसार शाखा आवेदन पत्र सबहक इमानदारीपूर्वक निष्पादन करैत छल, नेता लोकनिक बहुत आदर करबाक ध्यान नै रखैत छल। से बात नव नेता लोकनिकें पसन्द नै छलनि। बैंक द्वारा जे ऋण स्वीकृत कएल जा रहल छलैक, से मुख्यतः कृषि विभागसं सम्बन्धित रहै छलै। कृषि वित्त अधिकारी छलाह शिव शंकर सिंह जी जे पक्का ईमानदार आ स्पष्टवक्ता छलाह। स्थानीय नेता सभ हुनकासं जे अपेक्षा करैत छलाह से नै होइत छलनि। परिणाम ई भेलै जे सभ नेता मिलिक’ हुनका लक्ष्य क’क’ एकटा अभियान चलौलनि। शाखा प्रबंधककें लिखिक’ देलखिन जे आपके ए.एफ.ओ. के अमानवीय व्यवहार के कारण अमुक तिथि को बैंक शाखा के समक्ष धरना देंगे। पहिने त सभकें भेलै जे ओहिना धमकी द’ क’ डेरा रहल छथि, मुदा तारीख लग एलै त भेलै जे यदि सत्ये ई सभ एहेन किछु करथि त की करबाक चाही। ऐ तरहक परिस्थितिक अनुभव किनको नै छलनि। स्टाफ मीटिंगमे शाखा प्रबंधकक सुझाव भेलनि जे ओहि दिन सिंहजी ऑफिस नहि आबथि, कतहु फील्डमे कोनो काजसं निकलि जाथि, सिंह जीकें डेराक’ ऑफिस नै आएब पसन्द नै भेलनि। तखन हुनका ई सुझाव देल गेलनि जे ऑफिसमे रहथि, बाहर नै निकलथि। निर्णय भेलै जे शाखा प्रबंधक आ गणेश ठाकुर, प्रधान खजांची (जे हमरा सबहक यूनियनक सेक्रेटरी सेहो छलाह ) जाक’ गप करताह, शेष सभ गोटे बैंकक भीतरे रहताह। निर्धारित तिथिक’ करीब सै आदमीकें जुटाक’ धरना शुरू भ’ गेल, मुदा कोनो हल्ला नै रहै शुरूमे। २.३० के बाद शाखा प्रबंधक आ गणेश ठाकुर गेलाह गप करै लेल। ओ सभ कहलकै जे सभ गोटेकें लोन देब’ पड़त। शाखा प्रबंधक से स्वीकार करबामे डेराइत छलाह। हम चाहैत रही जे आजुक भीड़ कहुना ख़तम भ’ जाइ,तें एकटा स्लिपपर लिखिक’ शाखा प्रबंधककें अनुरोध केलियनि जे एखन स्वीकार क’ लियौ, स्लिप वाटर बॉय द्वारा पठा देलियनि, शाखा प्रबंधक कहलखिन, ठीक छै, हमर स्टाफ अहाँ सबहक बात मानक हेतु तैयार छथि। तखन ओ सभ कह’ लगलै जे सात दिनक भीतर ऋण देब’ पड़त। हम फेर दोसर स्लिप पर लिखिक’ देलियनि जे कहि दियौ जे प्रखंड कार्यालयसं आवेदन पठा दिय’, हम सभ सात दिनमे स्वीकृत क’ देब। शाखा प्रबंधक गछि लेलखिन जे प्रखंड कार्यालयसं आवेदन पठा दियौ, सात दिनमे स्वीकृत भ’ जेतै। ओ सभ झगड़ा करबा लेल दोसर कोनो उपाए ताक’ लगलाह। एकटा नेता बजलाह जे अहाँक स्टाफ एत्ते उदार छथि त सामने आबिक’ किए ने बजैत छथि। सिंहजी एते काल तक चुप छलाह, मुदा ई बात सूनिक’ नै रहल गेलनि, हमरो सबहक कहने नै रुकलाह आ बैंक हॉलसं निकलि कहलखिन, अहाँ सबहक दुश्मन हमहीं छी ने, त हम सोझां मे छी हमरा मारि दिय’। भीड़मे हिंसाक प्रवृति होइ छै। किछु लोक हो-हो करैत ऊपर सीढ़ीपर चढ़’ लगलै, मुदा तत्काल मकान मालिक आ हाइ स्कूलक एक शिक्षकक हस्तक्षेपसं ओ सभ उपर नै जा सकलाह आ कोनो अप्रिय घटना नै घटलै। मुदा जतेक भेलै, सेहो हमरा सभ गोटेक लेल बहुत अप्रिय आ अपमानजनक छल। तकरा बाद आगू की करी, से विचार करबाक लेल ओहि ठामक वरिष्ठ पदाधिकारी सी. ओ. साहेब ओत’ गेलहुँ। ओ कहलनि जे अहाँ सबहक लेल ई नव घटना अछि, हमरा सबहक विरुद्ध त जखन-तखन इनकिलाब-जिंदाबाद होइते रहैत अछि। ओ विचार देलनि जे अपन उच्च अधिकारीकें जानकारी द’ दियनु आ ओ जे कहथि,सैह करू। हम सभ गोटे एकटा जीपसं सिवान क्षेत्रीय कार्यालय गेलहुँ। क्षेत्रीय प्रबंधक कतहु गेल छलाह। हम सभ काल्हि एबाक अनुरोध करैत लिखित शिकायत जमा क’क’ बसंतपुर घुरि एलहुं। प्रात भेने क्षेत्रीय प्रबंधक पेंडसे साहेब एलाह। ओ सभटा घटनाक विवरण सूनि क’ कहलखिन जे यैह नेता सभ किछु दिनमे एम एल ए भ’ सकैत छथि, मन्त्री भ’ सकैत छथि, चीफ मिनिस्टर भ’ सकैत अछि, हिनका सभसं झगडा करब उचित नै अछि, बैंकक राष्ट्रीयकरण भेलै, आम आदमीक सुविधाक लेल बैंक छै, ओही बीचसं नेता सभ अबैत छथि, हुनका सभकें बैंक एबासं कोना मना करबनि, ओ सभ आबथि त प्रेमसं बैसाक’ चाह पियबियनु, आदर करियनु मुदा करू अपने मोनक माने बैंकक नियमानुसार। सी ओ साहेब सेहो एलाह। हमर क्षेत्रीय प्रबंधक हुनकोसं गप केलनि। फेर सी ओ साहेबक माध्यमसं एकटा मुखर नेताकें बजाओल गेलनि। नेताजी हमरा क्षेत्रीय प्रबंधककें कहलखिन जे बैंकक सभ सदस्य ईमानदार छथि, हमरा सबहक एकेटा शिकायत अछि जे अहाँक अधिकारीक व्यवहार पब्लिक आ नेता सभसं नीक नै होइ छनि। आर एम साहेब कहलखिन जे हमर स्टाफ यदि इमानदार अछि त इमानदार स्टाफ सभसं अहाँ सभ एहेन व्यवहार किए करै छी, यदि एहेन घटनाक पुनरावृति हैत त हम सभ एहि ठामसं बैंक शाखा हटा लेबाक लेल मजबूर भ’ जाएब, अहाँ सभकें कोनो शिकायत हो त सिवान आबिक’ हमरा कहू, मुदा हमरा स्टाफ सभसं नीक व्यवहार करू। पेंडसे साहेब गांधीवादी तरीकासं सभकें मेल करौलनि, सभकें एक दोसरसं हाथ मिलबौलनि, आपसमे एक-दोसरक बीच रसगुल्लाक आदान-प्रदान करबौलनि आ सभकें पीठ थपथपाक’ सीवान घुरि गेलाह। तकरा बाद फेर कहियो शाखामे अथवा शाखाक बाहर कोनो अप्रिय दृश्य नहि उपस्थित भेल। ई घटना हमरा जीवनमे कय बेर पथ प्रदर्शकक काज केलक। पिता बनलहुँ : बसंतपुरमे रही, ओही अवधिमे लगभग दू बरखक अन्तरालपर दूटा कन्याक जन्म भेलनि। पहिल बसंत ऋतुमे आएल छलीह, मधुबनी अस्पतालमे जन्म भेल छलनि, हिनकर नाम वसन्त कुमारी भेलनि, बादमे बदलिक’ वन्दना भ’ गेलनि। दोसरक जन्म दुर्गापूजाक मध्य अस्पताल पहुँचबासं पहिने भ’ गेलनि, हिनकर नाम मैथिली भेलनि आ मैथिलीए रहलनि। शशिकान्तजी-सुधाकान्तजीसं सम्पर्क : एक बेर गाम गेलहुँ त सकरीमे विद्यापति पर्वक कार्यक्रममे भाग लेबाक अवसर भेटल। कवि गोष्ठीमे हम अपन रचना पढलहुँ ‘ तीन कोटि मैथिल ताल ठोकिक’ कहैए / ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए।’ हम जखन मंचसं नीचां एलहुं त शशिकान्तजी,सुधाकान्तजी हमरा लग एलाह आ अपन परिचय दैत हमरा ई गीत लीखिक’ देबाक अनुरोध केलनि। हमरा पहिने हिनका सबहक नाम सूनल छल, भेंट नहि भेल छल। दुनू भाइक स्वर बहुत मधुर छलनि आ दुनू गोटे मिलिक’ रवीन्द्र नाथ ठाकुरजीक गीत सभ गबैत छलाह। ओहू दिन कार्यक्रममे देखलियनि, बहुत आकर्षक प्रस्तुति भेल रहनि। हुनका सबहक अनुरोधपर हम ओ रचना लीखिक’ द’ देलियनि। ओ रचना पटना आ आनो ठाम ओ सभ प्रस्तुत केलनि आ श्रोता-आयोजकक नीक प्रतिक्रिया देखि हमरासं पत्र द्वारा सम्पर्क केलनि आ अनुरोध केलनि जे गाम आबी त हुनको सभकें सुचित क’ दियनि जाहिसं ओ सभ हमरासं और गीत सभ ल’ सकथि। तहिना भेलै आ पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार दुनू गोटे हमरा गामपर एलाह आ हमरा और गीत सभ लीखिक’ देबाक अनुरोध केलनि। हम फेर दूटा रचना देलियनि। ई क्रम कय मास धरि चलल। हिनके सबहक माध्यमसं हमर मैथिली-सेवा चलि रहल छल। हिनके सबहक स्वरमे हमर और कते गीत सभ लोकप्रिय भेल जेना : १. ‘तोरा अंगनामे वसन्त नेने आएब सजना’ २. ‘फगुआ आएल फगुआ गेल फगुआ चलिए गेल’ ३. ‘पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’ ४. ‘आएल केहेन समैया यौ बाबू यौ भैया दुनियाँसं उठि गेल धरम-करम बूझैए के धरतीक मरम मिथिला केर की बात पुछै छी सौंसे भारत भेल बदलाम, अरे राम-राम-राम।’ ५. ‘कक्का मारल गेला सौराठक मैदानमे पहिले कन्यादानमे ना।’ ६. ‘तिलक प्रथाकें बन्द करू’ ७. ‘आइ धरतियो लगैछ नव कनियाँ जेना’ ८. ‘आइ ने छोड़ब भौजी, लेपब गालमे लाल अबीर’ ९. ‘आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ह्रदयमे हो माटिक ममता, माएक सेवामे जीवन बितादी अछि बस यैह एकटा सिहन्ता।’ १०. ‘मोन होइए अहाँकें देखिते रही’ ११. ‘जुनि कान, जुनि कान,जुनि कान रे बौआ जुनि कान रे।’ १२ . ‘हम देशकेर सिपाही, हम एक बात जानी ऐ देशकेर पूत हम, थिक नाम हिन्दुस्तानी।’ १३. ‘आइ धरतियो लगैछ नव कनियाँ जकाँ’ १४. ‘छोटे-मोटे टूटल मड़ैयामे गौरी कोनाक’ रहती हे।’ शशिकान्तजी, सुधाकान्तजी देशमे जहाँ-जहाँ विद्यापति पर्व होइत छलै, ताहिमे अधिक ठाम बजाओल जाइत छलाह। गीत शुरू करबासं पूर्व ओ गीतकारक नाम लेब नहि बिसरैत छलाह। ई हुनक अपन विवेक-जन्य स्वभाव छलनि। हम अपने नहि जाइत छलहुँ,मुदा कोनो-ने-कोनो श्रोतसं ज्ञात होइत छल त नीक लगैत छल आ और लिखबाक लेल उत्साहित होइत छलहुँ। अखबार-पत्रिका सभमे सेहो विवरण पढ़ि आनन्दित होइत छलहुँ। हम मानैत छी जे हमरा गीत सभकें जे लोकप्रियता भेटै छलै, ताहिमे हिनका दुनू भाइक मधुर-मनोहर स्वरक योगदान बेशी छलनि। तोरा अङना मे हमर साहित्य साधनामे कन्हैया लाल श्रीवास्तव, बी पी शर्मा, रामजी लाल दास जीक सहयोग रहैत छलनि। जखन-तखन विचार-विमर्श होइ छलै आ गीतक पोथी छपयबाक विचार सेहो अबैत छल। श्रीवास्तवजी हमरा संगे कतेक बेर तोरा अंगनामे वसन्त नेने आएब सजना गेने छलाह आ गीत संग्रहक नाम ‘तोरा अंगनामे’ रखबाक विचार भेल छल। शर्माजी एक बेर भरिसक ट्रेनिंगमे पटना गेल छलाह। कतहु एकटा चित्र देखलनि जाहिमे एकटा स्त्री अपना आंगनमे अरिपन द’ क’ दीप सजा रहल अछि। शर्माजी हमरा गीतक पोथीक कवर पृष्ठक लेल ओ फोटो नेने एलाह आ हमरा देलनि। हम हुनक पसन्दकें स्वीकार क’ लेलहुं, मुदा पोथी छपयबाक निर्णय नहि भेल रहय। खैर, जहिया छपतैक, तहिया एकर उपयोग करबाक लेल राखि लेलहुं। हमर ढोलीक संगी अशोक कुमार ठाकुर जी एम. एस. सी. (ए जी) केलाक बाद बिहार एग्रीकल्चरल मार्केटिंग बोर्ड केर ट्रेनिंग सेन्टर, पटनामे नोकरी करैत छलाह। पुनाइ चकमे आवास छलनि। हुनकासं पत्राचार होइ छल, कय बेर विचार होइ छल पटना जाएब त एक दिन रहब संगे। ओहो कहैत छलाह। एहि बेर विद्यापति पर्वमे पटना जाएब आ हुनकोसं भेंट करबाक विचार भेल। निर्धारित तिथिक’ पटना पहुँचलहुँ। ठाकुर जीक डेरापर ठहरलहुँ। हुनका संगे गेलहुँ विद्यापति पर्व देख’। सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू भेलै। हम सभ पाछाँमे ठाढ़ भ’ क’ देखि-सूनि रहल छलहुँ। शशिकान्तजी, सुधाकान्तजी मंचपर एलाह त गीतकारक नाम लैत हमर तीन-चारिटा गीत प्रस्तुत केलनि। श्रोता-दर्शकक प्रतिक्रिया बहुत आनन्दित करैबला भेलनि। बादमे ध्यान गेल हमरा सबहक लगेमे हमर साढ़ूक अनुज चीनू बाबू ( कृष्ण चन्द्र झा, डुमरा,बेनीपट्टी, मधुबनी ) छलाह। ओ देखलनि त अपन मित्रकें कहलखिन जे शशिकान्त-सुधाकान्तजी एखन जाहि गीतकारक नाम नेने छलाह से अनिलजी यैह छथि। हमरो परिचय भेल। ई छलाह चतरा, बेनीपट्टी निवासी डा. हेम चन्द्र लाल कर्ण जे एम. बी. बी. एस. क’ क’ इंटर्नशिपमे छलाह, डॉक्टर्स हॉस्टलमे रहैत छलाह, हमर साढ़ूक अनुज हुनके अनुरोधपर हुनके डेरामे रहिक’ यू.पी.एस.सी./बी. पी. एस. सी.क तैयारी क’ रहल छलाह। ओ अपना डेरापर ल’ जेबाले’ बहुत अनुरोध कर’ लगलाह। हम अपन मित्र ठाकुर जीसं परिचय करबैत कहलियनि जे हम हिनका संगे आइ काल्हि छी, काल्हि साँझ धरि अहाँक डेरा आएब। दोसर दिन हुनका ओत’ पहुंचलहुँ त ओ जिद्द क’ देलनि जे आब अहाँ पटनासं अपन गीतक किताब बिना छ्पौने नहि जाएब। स्टेट बैंकक लोकल हेड ऑफिसमे डरहार(दरभंगा)क स्टाफ ऑफिसर छलाह बी.के.चौधरी, ओहो एलाह हुनका डेरापर। किछु मैथिल आ किछु अमैथिल डॉक्टर सभ सेहो एलाह। ओ सभ हमरासं किछु गीत सूनय चाहैत छलाह, सेहो भेलै। ओही हालमे एकटा सीट खाली छलै। डॉक्टर साहेब हमरा ओहि सीटपर स्थान दैत कहलनि जे अहाँ अपन पाण्डुलिपि तैयार क’ लिय’। हम छुट्टी दुइए दिनक ल’क’ आएल रही, डॉक्टर साहेब कहलनि, हम मेडिकल सर्टिफिकेट द’ देब। हम पाइक व्यवस्था क’ क’ नै आएल रही, डॉक्टर साहेब कहलनि जे ओकर व्यवस्था भ’ जेतै, अहाँ दू-तीन दिनमे पांडुलिपि तैयार क’ क’ चलू मुसल्लहपुर, द’ देबै छप’ लेल। डॉक्टर साहेब नोकरीमे नै छलाह तें हुनकर आर्थिक सहयोग लेब हमरा उचित नै लगैत छल। पता चलल जे धनबादसं कोनो इंजिनियर आएल छलाह अपना पत्नीक इलाज करेबाक लेल, हुनका ई बहुत मदति केने छलखिन, हुनका पता चललनि जे ई पटनामे अपन क्लिनिक खोलबाक लेल स्टेट बैंकमे आवेदन देने छथि, जाहिमे मार्जिन मनी किछु जमा कर’ पडैत छैक, ओ ऐ ठाम त नै किछु बजलखिन, धनबाद जाक’ ओत’ सं तीन हजारके ड्राफ्ट पठा देलखिन, वैह पाइ हिनका पास छनि। लोनमे एखन समय लगतै, तें तत्काल एकर उपयोग क’ क’ बादमे पठा देबै, से भ’ सकैए। डॉक्टर साहेबक मैथिली प्रेम देखि आनन्दित भेलहुँ। हम ३१ टा गीतक पांडुलिपि तैयार केलहुं। डॉक्टर साहेबक संग मुसल्लहपुर गेलहुँ, भवानी प्रकाशन। देवेन्द्र झा जीक प्रेस छलनि। पांडुलिपि देखिक’ एक हजार एक सय प्रतिक लेल लगभग तेरह सय खर्च आ लगभग दस दिनक समय कहलखिन। डॉक्टर साहेब आधा पाइ द’ देलखिन। हम मुख पृष्ठक लेल शर्माजीक पसन्द बला चित्र द’ देलियनि ब्लाक बनबयबा लेल। हम बसंतपुर शाखामे शर्माजीकें पत्र लिखलियनि जे हमरा आवश्यकतानुसार ड्राफ्ट पठा देथि, किताब छपि जेबाक संभावित तिथि सुचित क’ देलियनि। बटुक भाइसं भेंट क’ क’ भूमिका लिखबाक अनुरोध केलियनि। एक दिन तीनू गोटे हरिमोहन बाबू ओत’ गेलहुँ। हुनका अनुरोध केलियनि अपन आशीर्वचनक रूपमे किछु लिखिक’ देबाक हेतु। ओ एकटा गीत सुनब’ कहलनि। सुनौलियनि। ओ संकल्प-लोक लहेरियासरायक कार्यक्रममे गीत शशिकान्त-सुधाकान्तक मूहें सुनने छलाह से कहलनि। हुनकर आशीर्वचन ल’क’ विदा भेलहुँ त कहलनि जे मार्च धरि अखबारमे निकलतै पुस्तकालय सभ लेल पोथीक क्रयक सम्बन्धमे विज्ञापन त दूटा प्रति पठा देबै, अहाँक पोथी स्वीकृत भ’ जाएत तखन जतेक पोथी मांगत, से पठा देबै त पाइ त भेटबे करत, पोथी सभ सेहो सुठाममे चलि जाएत। डेरामे सभ साँझक’ उत्सव जकाँ वातावरण भ’ जाइत छलैक। डॉक्टर साहेब बहुत गोटेसं परिचय करौलनि। सभ ठाम किछु गीत-नाद होइत रहै छलै। मुरलीधर प्रेससं मिथिला मिहिर कार्यालय अबैत छलहुँ। आदरणीय भीमनाथ बाबू प्रूफ रीडिंग कय सुधार क’ क’ दैत छलाह, हम फेर मुरलीधर प्रेस, मुसल्लहपुर जाइत छलहुँ। एना क’ क’ पोथी छपल। बटुक भाइक लिखल भूमिका एलै। अंतिममे कवर पृष्ठपर हरिमोहन बाबूक लिखल आशीर्वचन छलनि। एहि बीच बहुत साहित्यकार लोकनिसं परिचय भेल। सभकें पोथीक प्रति भेंट केलियनि। समीक्षाक लेल दू-दू प्रति आकाशवाणी, मिथिला मिहिर, आर्यावर्त आ इंडियन नेशन कार्यालयमे सेहो प्रस्तुत केलहुं। एक दिन मैथिली अकादमी कार्यालय गेलहुँ। आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी ओहि समय अकादमीमे छलाह। ओ दिल्लीसं आएल ‘राधाकृष्ण प्रकाशन’क प्रतिनिधिसं परिचय करौलनि। हुनको दू प्रति देलियनि। बाद मे राधाकृष्ण प्रकाशन,दिल्लीसं पच्चीसटा पोथीक मांगपत्र आएल, पठा देलियै, समयपर ओकर भुगतान सेहो प्राप्त भ’ गेल। जहिना आदरणीय हरिमोहन बाबू कहने रहथि, अखबारमे विज्ञापन एलै, दू टा प्रति पठा देलियै। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी संस्थान ( कलकत्ता ) सिन्हा लाइब्रेरी,पटनाक माध्यमसं ३४० पोथीक मांग केलक आ शीघ्रहि ओकर भुगतान सेहो क’ देलक। किछु पोथी शशिकान्तजी-सुधाकान्तजीक माध्यमसं सेहो बिका गेल। एहि प्रकारें पोथीक लागत मूल्य लगभग प्राप्त भ’ गेल। बादमे एहि पोथीक दोसर संस्करण उर्वशी प्रकाशन, पटनासं प्रकाशित भेल, गोपीकान्त बाबू हमरा पच्चीसटा प्रति उपलब्ध करा देलनि। ज्ञात भेल जे भवानी प्रकाशन,पटना द्वारा गीतक फुलवाड़ी प्रकाशित भेल जाहिमे हमरा सहित छओटा गीतकारक रचना सभ छलनि। ओकर एकोटा प्रति नै प्राप्त भेल, देवेन्द्र बाबू कहलनि जे एकोटा नहि बांचल अछि, ओकर बदला ओ एकटा दोसर पोथी द’ देलनि। कतहु देखबो ने केलिऐ। बहुत दिनक बाद एक गोटे सुचित केलनि जे काठमांडूमे गीतक फुलवारीमे अहाँक गीत पढ़लौं। संतोष केलहुं। एहि गीत संग्रह “तोरा अङना मे’ केर किछु गीत सभक ऑडियो कैसेट आएल। कोनो कैसेटमे भाइ चन्द्रमणि जीक बहुत सुन्दर स्वरमे आ एकदम शुद्ध-शुद्ध सुनने रही ‘कक्का मारल गेला सौराठक मैदानमे, पाहिले कन्यादानमे।’ आब अलोपित भ’ गेल अछि। ‘आइ ने छोडब भौजी,लेपब गालमे लाल अबीर’ टी-सीरीजक कोनो कैसेटमे छल, ओहो नै देखि रहल छी। महादेव ठाकुरक कैसेटबला गीत सभ सेहो अदृश्य अछि। एखन जतेक गीत सभ यू-ट्यूब पर अछि ओहि सभमे अधिकमे किछु-ने-किछु अनियमितता अछि। अनियमितता अछि कतहु-कतहु उच्चारणमे, कतहु-कतहु शब्दक हेर-फेरमे, अपूर्ण गायनमे, पोस्टरपर गीतकारक नाम त किछुए ठाम देखबामे अबैत अछि। पदोन्नति : १० दिसम्बर १९७५ क’ हम बैंकमे योगदान केने रही। १९८० मे पदोन्नतिक लेल लिखित परीक्षामे सफल भेलाक बाद मौखिक परीक्षा द’ क’ एलाक बाद क्षेत्रीय प्रबंधक महोदय शाखामे एलाह त पुछ्लनि जे कत’ पोस्टिंग चाहैत छी त हम जयनगर शाखाक नाम कहलियनि, मधुबनीमे ए. एफ. ओ. छलाहे, जयनगरमे नै छलाह तें पता लगाक’ कहने रहियनि, मुदा जखन पदस्थापनक पत्र आएल त ओहिमे हमरा सिवान शाखामे योगदान करबाक आदेश छल। निदेशानुसार १८ अगस्त १९८० क’ सिवान शाखामे कृषि वित्त अधिकारीक रूपमे कार्य भार ग्रहण केलहुं। पटना / ३१.८.२०२१ (१८) पाँच बरख सिवानमे १८ अगस्त १९८० क’ हम सिवान शाखामे पद भार ग्रहण केलहुं। सिवान पैघ शाखा छलैक, लगभग बीसटा सदस्य काज करैत छलाह। श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह वरिष्ठ शाखा प्रबंधक छलाह। ओ अधिक काल भोजपुरीमे सभसं गप करैत छलाह। ओना भोजपुरी साहित्यसं कोनो लगाव हम नहि देखलियनि। हुनका बाद मध्य प्रदेशसं सी.एल.व्यास एलाह आ हुनका बाद वैद्यजी एलाह। सुरक्षा प्रहरी छलाह जनार्दन सिंह। अन्य अधिकारी-कर्मचारी सभ छलाह रामेश्वर सिंह, लक्ष्मण तिवारी,ओ.पी. जग्गी, एम पी दुबे, एच.पी. शाही,नेफरे साहेब,श्री नारायण झा, जय राम शाही, अन्सारी जी, राम चरण सिंह आदि। अपना जिलाक अपन भाषा-भाषी एक गोटे भेटलाह श्री नारायण झा। झाजी घोंघौर गामक छलाह, ओत’ हमर मौसी छलीह। झाजीसं परिचय भेल त नीक लागल। बादमे मधुबनी शाखासं अधिकारीक रूपमे एलाह एम एन झा (मोद नारायण झा ) जे कलिगामक छलाह। झाजी बचत खाता विभागमे अधिकारी छलाह। कृषि विभाग ओही बिल्डिंगमे एकटा अलग हॉलमे छलैक। ओहिमे एकटा ए. एफ. ओ.( कृषि वित्त अधिकारी ) छलाह श्री शंभू शरण द्विवेदी जी आ दूटा कृषि सहायक छलाह सुधीर कुमार जी आ अरुण कुमार वर्मा जी। द्विवेदीजीक स्थानान्तरण मुजफ्फरपुर, क्षेत्रीय कार्यालयमे हेबाक छलनि। बादमे एलाह अंजनी कुमार सिन्हा(ए एफ ओ), कमलेश कुमार (ए एफ ओ), एन. पी. सिंह, डी सी ओ (आर डी) ओवरटाइम बन्द भेलाक बाद शाखामे बैलेंसिंग ( शेष मिलान)क काज बाधित भ’ गेल छलैक। बचत खाताक संख्या आ बही बहुत छलै, ओकर बैलेंसिंग बहुत कठिन भ’ गेल छलैक, कृषि विभागमे सेहो गत तीन सालसं लंबित छलै आ आब असंभव जकाँ लगैत छलै। शाखामे कृषि विभागमे बी आर सी, आइ आर डी पी, आइ डी ए, डी आर आइ, अन्त्योदय आदि योजनान्तर्गत ऋण स्वीकृति-वितरण, पूर्वमे देल गेल ऋणक वसूली लेल नोटिस जारी करब आ व्यक्तिगत सम्पर्क करब, दस्ताबेज सबहक समयानुसार नवीनीकरण कराएब , नियमानुसार वसूली हेतु कानूनी कार्यवाही करब, मीटिंग सभमे भाग लेब आ नियंत्रक कार्यालय सभकें समयपर मासिक,तिमाही,अर्ध वार्षिक आ वार्षिक विवरणी बनाक’ प्रस्तुत करब, ऑडिट रिपोर्टक जबाब तैयार करब आ अपेक्षित सुधारक लेल आवश्यक काज करब, आदि कार्य सभसं समय नहि बचैत छलै जे शेष मिलानलेल समय निकालि सकय। हमरा एहिसं पूर्वक शाखामे ई समस्या नै रहै कारण शाखा नव रहै। एहि ठामक ई स्थिति हमरा ठीक नहि लागल। हम चाह्लहुँ जे ई अनियमितता दूर भ’ जाए, द्विवेदीजी सेहो एहिमे सहयोग करय चाहैत छलाह किन्तु ओ कोनो-ने-कोनो व्यवधानमे रहि जाइत छलाह। द्विवेदीजीक गेलाक बाद हम तय केलहुँ जे हम दुनू कृषि सहायकक संगे एहि कार्यकें अवश्य पूर्ण करब। हम अपना विभागकें स्वच्छ राखब,ई ठानि लेलहुं आ काज शुरू क’ देलहुं। बीचमे लोक दोसर काज लेल आबि जाइत छल त बाधित भ’ जाइ छल। ऑफिस-समयक बाद ई काज करब शुरू केलहुं। एकदिन एम एन झा कहलनि, हम अहाँकें एहि कार्यमे मदति क’ सकैत छी, मुदा एहि लेल शाखा प्रबंधककें कहिक’ दस दिन लेल बचत खाता विभागक कार्यसं हमरा मुक्त करबाब’ पड़त। शाखा प्रबंधककें अनुरोध केलियनि त ओ प्रसन्नतापूर्वक झाजीकें कृषि विभागक बैलेंसिंग हेतु अनुमति द’ देलखिन। झाजी एलाह कृषि विभागमे। मुदा एके घंटामे हॉलमे बचत खाता विभागमे ततेक समस्या भ’ गेलै जे झाजीकें शाखा प्रबंधक बजा लेलखिन बचत खाता विभागक काजक लेल। हमरा सभकें झाजी कहलनि जे एकटा निर्णय ली त ऑफिसक निर्धारित समयक बाद हम मदति क’ सकैत छी। निर्णय लेल गेल जे दिन भरि आन काजक संग जतेक संभव हो हम सभ बैलेंसिंग लेल जे किछु क’ सकी से करी, तकर बाद झाजी सेहो संग देताह आ एक तिमाहीक बैलेंस मिलाक’ डेरा लेल प्रस्थान करै जाएब। ओहि समय चारू गोटेक डेरा एकहि दिस रहय। सुधीर बाबू आ वर्माजी दिनमे आन काज करैत एक तिमाहीक अंतिम दिनक शेष उतारि लेथि, हम आ झाजी साँझमे बैसी बैलेंस मिलाबक हेतु। बिजलीक लाइन चलि जाइ त पेट्रोमैक्स जराओल जाइ। बीच मे सुधीर बाबू, वर्माजी आ झाजी बगलमे मारवाड़ी भोजनालयसं भोजन क’ अबैत छलाह। हम परिवारक संग रहैत रही, तें जखन घर जाइ, घरेमे भोजन करी। निर्णयक अनुसार सुधीर बाबू आ वर्माजीकें औंघी लागि जाइन त टेबुलपर माथ झुकाक’ पड़ि रहथि मुदा डेरा जाथि संगे। हम आ झाजी एक तिमाहीक बैलेंस मिलाइएक’ सीट छोड़ी। लगभग बारह बाजि जाइ एक तिमाहीक बैलेंस मिलाब’मे। यदि बारहो बजे नै होइ त छोडि दिऐ। क्षेत्रीय कार्यालय लगेमे छलै। क्षेत्रीय प्रबंधक एलाह एल.एन.भाटिया। बनर्जी साहेब ए आर एम छलाह। डी सी ओ (आर डी) सिंह जी छलाह। ग्रामीण विकास विभागमे अन्य अधिकारी छलाह एस एस पी सिंह,मंजुल मोहन, कमलेश प्रसाद आदि। अन्य अधिकारी छलाह बी एम त्रिपाठी, एच सी पी दत्ता, सुनील कुमार श्रीवास्तव आदि। सुभाष नामक स्टाफ सेहो छलाह। क्षेत्रीय प्रबंधक भाटिया साहेब एक साँझ एलाह आ हमरा सबहक प्रयासक प्रशंसा करैत पुछ्लनि जे क्षेत्रीय कार्यालयसं एहि कार्यमे अहाँ सभ कोन तरहक सहयोगक अपेक्षा करै छी। हम सभ कहलियनि जे संभव होइ त एकटा चपरासीकें हमरे सबहक लेल उपलब्ध करा देथि जे आवश्यकतानुसार वाउचर हमरा सभकें उपलब्ध करबैत रहथि। भाटिया साहेब क्षेत्रीय कार्यालयसं एकटा चपरासीक ड्यूटी हमरा सबहक विभागमे लगा देलनि। हमरा सभहक रूटीन भ’ गेल जे सभ दिन साढ़े दस बजे ऑफिस आबी आ राति बारह बजेक बादे ऑफिससं प्रस्थान करी। लगातार सत्रह दिन लागल रहलापर शेष मिलानक काज अद्यतन भ’ गेल। शाखा प्रबंधक रामेश्वर बाबू सेहो प्रसन्न भेलाह, आब बाहरसं कोनो उच्च अधिकारी अबथिन त कहथिन जे हमर एग्रीकल्चर विभागक शेष मिलान अद्यतन अछि। क्षेत्रीय कार्यालयसं शाखाकें आ कृषि विभागक सभ सदस्य आ झाजीक लेल सेहो प्रशंसा पत्र निर्गत भेल। क्षेत्रीय प्रबंधकक नजरिमे हमर सबहक नीक छवि बनल। एक बेर डी सी ओ (आर डी )क स्थानपर अस्थायी रुपें हमरा क्षेत्रीय कार्यालयमे बजा लेलनि जखन हमरासं सीनियरो ए एफ ओ उपलब्ध छलखिन। हम किछु दिन ओहि पदपर काज केलहुं, फेर वापस अपन स्थानपर सिवान शाखामे आबि गेलहुँ। एक बेर शेष मिलान अद्यतन भेलापर नियमित रूपसं बही सभ संतुलित होइत रहल। एम एन झा जी ऑफिस एबा काल घडी देखैत छलाह, जेबा काल नै, मुदा हुनका जकाँ बहुत कम स्टाफ छलाह। तें बचत खाता विभागक बही-संतुलन असंभव भ’ गेल छलैक। सभ पैघ शाखा एहि समस्यासं ग्रस्त रहैत छल। बही सबहक असंतुलनसं कपट अथवा धोखाघड़ीक आशंका बनल रहैत छलैक। किछु शाखामे बहीक संतुलन भेलाक बाद कपट प्रकाशमे अबैत छलैक। सभ साल ऑडिट रिपोर्टमे एहि अनियमितताक चर्च रहैत छलै, सभ शाखा एहि अनियमितताकें दूर करय चाहैत छल, किछु शाखामे एहि काज लेल दोसर शाखासं अथवा नियंत्रक कार्यालयसं स्टाफ सभ पठाओल जाइत छलाह। तथापि पैघ शाखा सभमे एहि समस्याक समाधान नै भ’ पबैत छलै। कंप्यूटरीकरण भेलाक बाद बही संतुलनक समस्या इतिहासक बात भ’ गेलै। ऋण वितरण समारोह : जनता पार्टीक सरकार समाप्त भ’ गेल छलै, श्रीमती इन्दिरा गाँधी भारी बहुमतसं पुनः सत्तामे एलीह नव बीस सूत्री कार्यक्रम तीव्र गतिसं चलय लागल। आइ आर डी पी कार्यक्रम राष्ट्रीयकृत बैंक सबहक लेल आ सरकारी विभाग लेल सेहो मुख्य कार्यक्रम भ’ गेल छल। जिलामे जतेक राष्ट्रीयकृत बैंकक शाखा छलै, सभकें गाम निर्धारित क’ देल गेल छलै, सभ शाखाकें लक्ष्य सेहो निर्धारित क’ देल गेल छलै। सभ गामसं पर्याप्त संख्यामे आवेदन सम्बन्धित बैंक शाखाकें प्रेषित कएल जाइत छलै, शाखा सभ युद्ध स्तर पर आवेदन निष्पादन लेल स्थल निरीक्षण आ स्वीकृतिक तैयारी करैत छल। शिविर लगाओल जाइत छलै जाहिमे सभ सम्बन्धित बैंक शाखाक अधिकारी / शाखा प्रबंधक, स्थानीय नेता लोकनि आ प्रखंड आ जिला स्तरक शासकीय अधिकारी लोकनि उपस्थित होइत छलाह। कलेक्टर महोदय सेहो अधिक शिविरमे उपस्थित होइत छलाह। शिविरमे विभिन्न बैंक शाखा द्वारा विभिन्न उत्पादक क्रियाकलापक लेल लाभार्थीकें स्वीकृति पत्र प्रदान कएल जाइत छल। बादमे लाभार्थी सम्बन्धित बैंक शाखामे उपस्थित भ’ क’ बैंकक निर्धारित दस्ताबेज सभपर हस्ताक्षर करैत छलाह, जे सामान जाहि दोकानसं लेबाक मोन होइ छलनि ओकर कोटेशन प्रस्तुत करैत छलाह, बैंक द्वारा आपूर्तिकर्ताकें आदेश देल जाइ छलै जे हिनका अमुक सामान द’ दियनु। आपूर्तिकर्ता लाभार्थीकें सामान द’ क’ बैंक शाखामे बिल प्रस्तुत करैत छलाह। बैंक अधिकारी / कर्मचारी द्वारा स्थल निरीक्षण क’ क’ लाभार्थीकें संतुष्ट भेला पर बैंक बहीमे लाभार्थीक खाता खोलि हुनकर खाताकें नामे करैत आपूर्तिकर्ताकें पे-आर्डर अथवा ड्राफ्ट द्वारा बिलक भुगतान क’ देल जाइत छलै। शिविरमे कतेक गोटेकें ऋण स्वीकृत कएल गेलै आ ओहिमे सं कतेक गोटेकें बैंक द्वारा ऋण वितरित कएल गेलै, एकर समीक्षाक लेल विभिन्न स्तरपर मीटिंग होइ छलै। सभ जिलामे अग्रणी बैंकक जिम्मा कोनो खास बैंककें निर्धारित छलै। अग्रणी बैंकक काज होइ छलै सम्पूर्ण जिलाक लेल वार्षिक कार्य योजना तैयार करब, सभ बैंक शाखा आ शासकीय विभागक सहयोग प्राप्त करब आ कलेक्टरक अध्यक्षतामे जिला स्तर पर विभिन्न मीटिंगक आयोजन क’ क’ उपस्थित समस्या सबहक निराकरण सुनिश्चित करब । सिवानमे सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया लीड बैंक छल। पहिने क्षेत्रीय कार्यालयमे एकटा डी सी ओ (आर डी ) आ एकटा कृषि सहायक अथवा ए एफ ओ (कृषि वित्त अधिकारी ) द्वारा एहि विभागक काज चलैत छल, बादमे लीड बैंकक अलग कार्यालय बनल, लीड बैंक अधिकारीक पदस्थापन भेल । श्री आर पी शर्मा लीड बैंक अधिकारी भ’ क’ एलाह। जिलास्तर पर मीटिंगमे सभ बैंकक प्रतिनिधि आ भारतीय रिज़र्व बैंकक अधिकारी सेहो भाग लैत छलाह आ कखनो-कखनो बैंक आ शासकीय कार्यालयक बीच मध्यस्थक भूमिकाक निर्वाह सेहो करैत छलाह। बैंक आ सरकारी मशीनरीक सम्मिलित प्रयाससं जिलाक अन्तर्गत समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रमक संग वार्षिक कार्य योजनाक अनुसार जिलाक विकासक यग्य चलैत छलैक। कखनो-कखनो एहिमे बाधा उपस्थित होइतो छलैक त आपसमे बैसक क’ क’ निराकरण क’ लेल जाइत छलै। एक बेर एकटा ऋण शिविरमे कोनो स्थानीय नेता द्वारा शिकायत कएल गेलै जे स्टेट बैंकमे ऋण सम्बन्धी काजक लेल बहुत दौड़’ पडैत छैक। कलेक्टर साहेब अपन भाषणमे कहलखिन जे हमर ध्यान आब बैंक दिस गेल अछि आ बैंकके सेहो ठीक करब कोनो बड कठिन बात नै अछि। एहिपर स्टेट बैंकक जिला शाखाक वरिष्ठ प्रबंधक उठिक’ कहलखिन जे हम एहि सन्दर्भमे किछु स्पष्टीकरण देब’ चाहैत छी। कलेक्टर साहेब हुनका ‘ बैसू, ऐ ठाम कोनो डिबेट थोड़े भ’ रहल छै।’ –ई कहैत चुप हेबाक लेल बाध्य क’ देलखिन। स्टेट बैंकक वरिष्ठ प्रबंधक की करितथि, चुप भ’क’ बैसि गेलाह, मुदा ई बात शिविरमे उपस्थित सभ बैंकक प्रतिनिधिकें अपमानजनक लगलनि। लीड बैंक कार्यालयमे सभ बैंकक आपात बैसक भेल आ कलेक्टर द्वारा शिविरक मध्य स्टेट बैंकक सम्मानित प्रतिनिधिकें अपमानित करबाक बातकें गंभीरतासं लैत आगामी निर्धारित सभ शिविरक बहिष्कार करबाक निर्णय लेल गेल आ एहि निर्णयक सूचना कलेक्टर कार्यालय, भारतीय रिज़र्व बैंक आ सभ बैंकक नियंत्रक कार्यालयकें देल गेल। ओकर बाद निर्धारित तिथिक’ शिविरमे कोनो बैंकक प्रतिनिधि उपस्थित नै भेलाह, तखन कलेक्टर साहेब लीड बैंकसं सम्पर्कक’क’ सभ स्थानीय बैंक प्रतिनिधिक बैसक अपना सभा कक्षमे बजौलनि। आपसी गप-शपसं स्थिति सामान्य भेल आ तकर बाद जे शिविर सभ निर्धारित छलै ताहिमे कोनो व्यवधान नै भेलै आ जे शिविर नै भेल छलै सेहो सफल भेलै। तकरा बाद बैंक प्रतिनिधिकें कोनो शिकायतक अवसर नै देल गेलनि। यैह कलेक्टर साहेब सिवान शहरक सभ सर्विस लैट्रिनकें सेप्टिक टैंक लैट्रिनमे बदलबाक एकटा स्कीम बनौलनि आ सभ बैंककें लक्ष्य निर्धारित करबाक’ नियत समयमे एहि लक्ष्यकें पूरा करबाक भार देलखिन। नगरपालिका द्वारा सभ बैंक शाखाकें वार्ड आबंटित क’ क’ पर्याप्त संख्यामे आवेदनपत्र उपलब्ध करा देल गेलै। तीन मासक बाद जखन कलेक्टर साहेब एहि योजनामे उपलब्धिक जानकारी मंगलखिन त उपलब्धि शून्य सूनिक’ बहुत दुखी भेलाह। कारण पुछलखिन त बेरा-बेरी सभ बैंक प्रतिनिधि द्वारा सुचित कएल गेलनि जे हुनक नियंत्रक कार्यालय द्वारा एहि योजनाक स्वीकृति नै देल गेलनि, कलेक्टर साहेब बहुत नाराज भेलाह। कलेक्टर साहेब कहलखिन ‘ हम बेसीकली इंजिनियर छी, हम सोचि समझिक’ ई स्कीम बनेने छी, एकरा कोना कोनो बैंक रिजेक्ट क’ सकैए।’ अपन पी ए कें बजाक’ तुरत एकर शिकायत विभिन्न स्तर पर पठेबाक आदेश देलनि आ एजेंडाक अगिला विन्दु ‘वसूली’ सुनिते सभा कक्षसं बाहर चलि गेलाह। तीन मासक बाद दोसर-तेसर विषय सभ प्राथमिकतामे ऊपर अबैत गेलै आ ई विषय नीचां भ’ गेल। फेर स्थिति सामान्य भ’ गेलै। एक बेर दोसर कलेक्टर साहेब एकटा बैंक शाखामे गेलाह। शाखा प्रबंधक ठाढ़ भ’ क’ हुनका नमस्कार केलखिन। कलेक्टर साहेब कहलखिन जे एम्हर जे ऋण वितरण केने छी ताहिमे सं किछु प्रकरण हमरा देखाउ, शाखा प्रबंधक आलमारीमे सं किछु दस्ताबेज आन’ गेलाह त कलेक्टर महोदय हुनका कुरसीपर बैसि गेलाह। शाखा प्रबंधक जखन किछु फाइल हुनका सोझा रखलनि त किछु उनटा-पुनटा क’ कलेक्टर साहेब कहलखिन जे एहि सभमे बहुत अनियमितता अछि आ अपना संगे गेल अधिकारीकें दस्ताबेज जप्त करबाक लेल कहलखिन। शाखा प्रबंधक डरि गेलाह, किछु नहि बजलाह, कलेक्टर साहेब किछु दस्ताबेज शाखा प्रबंधककें बिना कोनो सीजर लिस्ट देने जप्त क’ क’ ल’ गेलाह। साँझमे ओ शाखा प्रबंधक अपन कोनो दोसर अधिकारी संगे लीड बैंक कार्यालय एलाह आ घटनाक लिखित सूचना दैत ओ अपन नियंत्रक कार्यालयकें सेहो सुचित क’ देलखिन। किछुए दिनमे जिला स्तरीय मीटिंग होम’ बला रहै, ओकर एजेंडाक अन्य विषयमे ई विषय सम्मिलित क’ लेल गेलै। जहिया मीटिंग रहै, रिज़र्व बैंकक प्रतिनिधिकें एहि घटनाक पूर्ण जानकारी द’ देल गेलनि। मीटिंगमे जखन अन्य विषयपर चर्चा शुरू भेलै, मीटिंगक संयोजक लीड बैंकक तरफसं कलेक्टर महोदयसं पूछल गेलनि, ‘सर, ई हाउस जान’ चाहैत अछि जे की सरकें कोनो बैंक शाखामे जाक’ शाखाक दस्ताबेज जप्त करबाक अधिकार छनि।’ कलेक्टर महोदय ओहि शाखा प्रबंधकपर अपन खीझ प्रगट करैत कहलखिन ‘ हमरा अपन अधिकारक ज्ञान अछि, हम जिलामे कतहु कोनो ठाम जाक’, कोनो ऑफिस मे कोनो चीजक जांच क’ सकैत छी।’ रिज़र्व बैंकक प्रतिनिधि कहलखिन जे कलेक्टर महोदयकें अपन अधिकारक उपयोग जिलाक विकासक कार्यक्रममे बैंककें सहयोग करबामे लगेबाक चाहियनि बैंकक कार्यमे बाधा उपस्थित करबामे नहि। ओ इहो कहलखिन जे कलेक्टर महोदयकें कोनो बैंकक शाखा प्रबंधकसं कोनो शिकायत छनि त सम्बन्धित बैंकक नियंत्रक कार्यालयकें सुचित करथि, ओ हुनका विरुद्ध जे करबाक हेतनि से अवश्य करताह लेकिन बैंकक दस्ताबेजकें जप्त करबाक आ सीजर लिस्ट नै देबाक क्रियाकें कोनो दृष्टिसं उचित नहि कहल जा सकैत अछि। कलेक्टर महोदय आवेशमे कहलखिन, देखू हमरा अपन अधिकार बूझल अछि, हम चाही त जिलामे ट्रेन चलनाइ बन्द करा सकैत छी, प्लेनकें उड़नाइ बन्द करा सकै छी, हम चाही त अहाँ सभ गोटेकें ऐ हॉलमे चौबीस घंटाक लेल बन्द क’ द’ सकैत छी। हॉलमे सबहक मूँहसं हंसी छुटलै। कलेक्टर साहेब सभा कक्षसं निकलि गेलाह। किछुए दिनमे सम्बन्धित शाखाकें सभ दस्ताबेज भेटि गेलै। फेर अगिला मीटिंगसं पहिने सभ किछु सामान्य भ’ गेलै। एक बेर वी एम एच ई स्कूलमे विशाल ऋण वितरण शिविर आयोजित भेलै, कलेक्टर महोदय सिवानक विश्व स्तरीय इतिहासकार स्व. बांके बिहारी मिश्र जीकें मुख्य अतिथिक रूपमे बजौने रहथिन। मिश्रजी ई देखि बहुत हर्षित भेल रहथि जे समाजक जरूरतमंद लोक सभकें एते सम्मानपूर्वक ऋण देबाक लेल एहि तरहक उत्सव मनाओल जा रहल अछि। ओ ई दृश्य देखिक’ भावुक होइत उदगार व्यक्त केने रहथि जे जाहि उद्देश्यसं बैंकक राष्ट्रीयकरण भेल, से प्रशासन आ बैंकक संयुक्त प्रयाससं फलीभूत भ’ रहल अछि। महान साहित्यकार प्रेमचन्दक कथा सभमे जाहि समाजक उल्लेख छल, नागार्जुन जे लिखने छलाह –जहां न भरता पेट / देश वह कैसा भी हो / महा नरक है - से समाज आब बदलि रहल छल, रिक्शाबला, ठेलाबला, पान दोकानबला, हजाम, दर्जी, मोची,चाहक दोकानबला, साइकिल मरम्मति दोकानबला, दोसर कोनो छोटो-छिन रोजगार करैबला सबहक लेल बैंकक सम्पर्क आसान भ’ गेलै, महाजनक शरणमे जेबाक आ अनियंत्रित ब्याजक पीड़ासं मुक्तिक समय आबि गेल छलैक। हमरा सबहक लेल ई हर्षक विषय छल जे एहि परिवर्तनमे हमहूँ सभ किछु योगदान देबाक स्थितिमे भेलहुँ। तें निष्ठापूर्वक एहि यग्यमे भाग लेब अपन सौभाग्य मानैत छलहुँ आ बैंकमे अबैबला लोक सबहक संग स्नेहपूर्वक व्यवहार करब अपन धर्म बुझैत छलहुँ। वसूली : बैंकमे नव ऋण देबाक संगहि पूर्वमे देल गेल ऋणक वसूली सेहो बड़ महत्वपूर्ण काज होइ छै। नव ऋण त एके-दू ब्लाकमे देबाक लेल गाँव आबंटित छलै, किन्तु पुरान ऋण सभ कयटा ब्लाकमे स्थित छलै जेना सिवानक अतिरिक्त आंदर, पचरुखी, सिसवन, रघुनाथपुर, दरौली आदि जकर वसूलीक लेल व्यक्तिगत सम्पर्क कठिन होइत छलैक। वसूलीक सम्बन्धमे हमर सबहक अनुभव यैह छल जे किछु लोक समयपर ऋणक किश्त बैंकमे जमा करैत छलाह, किछु लोक जमा करैत छलाह मुदा निश्चित समयपर नहि, किछु लोक ई मानैत छलाह जे ऋण ल’क’ नहि जमा केलासं मुक्ति नहि भेटतनि, किछु लोक बैंक ऋण सरकारी मदति बूझिक’ चुकाएब आवश्यक नहि बुझैत छलाह। मुख्य रूप सं नै चुकबैबलाक दूटा श्रेणी छल- बहुत मजबूरीक कारण नै चुकब’ बला आ जानि-बूझिक’ नै चुकब’ बला। हम सभ नियमानुसार ऋणक किश्त जमा करबाक लेल नोटिस पठबै छलिऐ, स्मरण पत्र सेहो जारी कएल जाइत छलै, व्यक्तिगत रूपसं सम्पर्क कएल जाइत छलै, पर्याप्त समय देल जाइ छलै, तैयो जे नै जमा करै छलाह हुनका विरुद्ध लोक मांग वसूली एक्टक अन्तर्गत कार्यवाही कएल जाइत छलै। चपरासीक नै रहलापर हम सभ अपने पोस्ट ऑफिस जाक’ पावती पत्रक संग पंजीकृत डाकसं नोटिस पठयबाक काज करैत छलहुँ। सालमे जखन ऑडिट होइ छलै त ई देखल जाइ छलै जे वसूलीक लेल शाखा द्वारा की की प्रयास कएल गेल छै अर्थात बैंक द्वारा निर्धारित सभ कार्यवाही कएल गेल छै कि नै। वसूलीक सम्बन्धमे हमरा दूटा घटना मोन पडैत अछि। एक दिन एकटा मुस्लिम महिला एलीह आ कहलनि जे हुनकर पति बैंकसं रिक्शा कीन’ लेल लोन नेने छथिन, हुनकर देहान्त भ’ गेल छनि, ओ हुनकर बकाया जमा कर’ चाहैत छथि, हिसाब जोड़िक’ कहि दीय’ जे कते जमा करबाक छै। हम सभ खाता देखलिऐ, खातामे समयपर किश्त जमा होइत आएल छलै। हम सभ हुनका पुछलियनि जे हुनकर बेटा जवान छनि की नै। बेटा जवान नै छलनि। हम सभ कहलियनि जे ओ एखन चिन्ता नहि करथि, मुदा ओ मानक लेल तैयार नै भेलीह। हुनकर कहब छलनि जे जाधरि पूरा कर्ज ख़तम नै भ’ जेतनि, हुनका जन्नत नै भेटि सकैत छनि। हम सभ भावुक भ’ गेल रही, ओ पूरा पाइ चुकाक’ प्रसन्न भ’ गेल छलीह। लगभग चालीस बरख भ’ गेलै, ओहि महिलाक अविस्मरनीय छाप हमरा सबहक स्मृतिमे अछि। एकर विपरीत एकटा उदाहरण सेहो मोन अछि। एक दिन हम सभ एकटा जीपसं एक आदमी ओत’ गेल रही जे किछु साल पहिने ट्रैक्टर किनबाक लेल ऋण नेने छलाह आ नियमानुसार किश्त नै जमा करैत छलाह। दूरेसं देखि ओ हमरा सभ लग दौगल एलाह आ कहलनि जे आइ हमरा दरबज्जापर नै जाउ, पौत्रक विवाह लेल घटक सभ आएल छथि। हम सभ हुनका दरबज्जापर नै जाक’ आन-आन ठाम गेलहुँ। मास दिनक बाद जखन फेर हम सभ गेलहुँ त ओ अपने असहाय जकाँ कहलनि जे हमरापर केसक’ क’ हमरा जहलमे ध’ देब तखने हमरा घरक लोक ऋण चुकयबाक लेल तैयार हैत। ओ कहलनि सबेरे सभ खा-पी क’ अपन-अपन मोटर साइकिल ल’क’ घरसं निकलि जाइए, ककरो चिन्ता नै छै बैंकक ऋण चुकयबाक। कोठाबला बड़का घर आ घरक मालिकक विवशता सेहो नहि कहियो बिसराएल। हुनका अंतिम नोटिस द’क’ पी डी आर एक्टक शरणमे जाए पडल। एखनो दुनू तरहक लोक समाजमे विद्यमान छथि। किछु लोक त नै चुकयबाक लेल देशोसं भागि जाइ छथि, हुनका नरक जेबाक भय नै होइ छनि। किछु गोटेक कहब छनि जे चार्वाक दर्शनमे कहल गेल छै जे ऋण लिय’ आ घी पीबू माने सुखसं रहू। हुनकर कहब छनि जे चार्वाक दर्शनमे ऋण चुकयबाक बात नहि लीखल छै। बैंक आ साहित्य : नया बीस सूत्री कार्यक्रम पूरा देशमे पावनि जकाँ मनाओल जा रहल छल। हम हिन्दीमे ओहिसं सम्बन्धित एकटा कविता लिखलहुं : आया है नव सपने लेकर और नए आयाम श्रीमती गांधी का नूतन बीस सूत्री प्रोग्राम। आकाशवाणी,पटनामे चौपाल अथवा मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ मे भाग लेबय सालमे एक-दू बेर जाइ छलहुँ। क्षेत्रीय प्रबंधककें से बूझल छलनि। एक दिन हमरा बजाक’ कहलनि जे डी ए वी कॉलेजमे सेंट्रल बैंकक एक्सटेंशन काउंटर खुज’ बला छै। ओकर उद्घाटन दिनले’ एकटा कविता तैयार करबाक भार हमरा देलनि। दू-तीन दिन लागल। सस्वर पाठ कर’बला एकटा कविता तैयार भेल : क्या है सेंट्रल बैंक हमारा क्यों इसके गुण गाते हैं सुनो साथियो हम इसका इतिहास तुम्हें बतलाते हैं। भाटिया साहेब प्रसन्न भेलाह। हमरासं ओहि दिन एकर सस्वर पाठ करबाओल गेल। ओहि दिनक बाद हमरा लागल जे बैंकक क्रिया-कलापक अन्तर्गत अबैबला बहुत विषय छै जैपर रचना कएल जा सकैत अछि। ओहि समयमे बैंकमे बैलेंसिंग, दस्ताबेजक नवीनीकरण, वसूली, ऋण वितरण आदि काज सबहक जे तनाव भोगल जा रहल छल ताहि लेल एकटा रचना भेल : ‘यह बैंक का चक्कर है, चक्कर में रहना है जिन्दगी और कुछ भी नहीं तबाही से गुजरना है’............... आइ आर डी पी पर दू टा रचना भेल : (१) रिक्शा बाला तांगा बाला पान बीडी और ठेले बाला होटल सैलून चाय बाला बैल भैंस और गाय बाला आज ब्लाकमे लगा है मेला मेला आइ आर डी पी बाला।........ (२) आइ आर डी पी की न टूटे लड़ी लोन देते चलो हर घडी। बैंकमे ऑडिट होइत रहै छलै, ओहिपर एकटा व्यंग्य रचना : ए ऑडिटर साहेब कब जाएगा तू यहाँ कब तक माथा खपाएगा तू और कब तक डाइम बनाएगा तू चला जा..तू चला जा .......... कतहु-कतहु कोनो अधिकारीक अथवा कर्मचारीक कदाचार प्रकाशमे अबैत छलैक। एहि सम्बन्धमे एकटा पैरोडी : एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो ये कोट तेरे नोट से भरा है दोस्तो ....... नव शाखाक शाखा प्रबंधक सबहक समस्या पर एकटा कविता : खुद ही रिसीट भी लेना है, खुद ही करना पेमेंट खुद को ही निर्मित करने हैं सारे एस्टेटमेंट सारे एस्टेटमेंट कभी कुछ तार यूं आते अनुशासनिक कार्र्बाई की धमकी दे जाते धमकी दे जाते नेतागण पेंडिंग आवेदन को लेकर सुचित करेंगे श्रीमती इन्दिरा गांधी को लेटर देकर बड़ी मुसीबत दे जाता पेंशन पेमेन्ट का काम रात गयी सर्कुलर उलटते कभी नहीं आराम देख व्यस्तता श्रीमतीजी यूँ झल्लाती इससे तो अच्छा होता जो मैं मर जाती एक दिन लगी बुखार भाग्य से तो मैंने मौका पाया बड़े प्रेम से पास बिठाकर मैंने उन को समझाया प्यारी दीदी इन्दिरा गांधी का है ये अभियान कल हम कहाँ रहेंगे प्रियतम मत करना अनुमान मत करना अनुमान जेल का द्वार खुला है अभी-अभी मोतिहारी का समाचार मिला है हो जाएंगे बिष-सूत्री पर हम बैंकर कुर्वान कृपा करो जल्दी आकर हे बेकटेश्वरम भगवान। (ओहि समय बेकटेश्वरम साहेब हमर सबहक आंचलिक प्रबंधक छलाह, मोतिहारी शाखाक एकटा फील्ड स्टाफकें मेलामे पशु-खरीदक विधिमे कोनो आपत्ति लगाक’ जेलमे ध’ देल गेल छलै ) अही अवधिमे हम दुष्यंत कुमारक गजल संग्रह ‘साये मे धूप’ आ हरिवंश राय बच्चनजीक आत्म कथाक दू भाग ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ और ‘नीड़ का निर्माण फिर’ पढने छलहुँ। किछु दिनक बाद प्रशिक्षणमे आंचलिक प्रशिक्षण केन्द्र, राजेंद्रनगर पटना गेलहुँ। ओहि कार्यक्रममे पटना जोनल ऑफिससं एन के झा आ दरभंगासं नवेन्द्र झा सेहो आएल छलाह। एक दिन जोनल ऑफिससं मुख्य प्रबंधक एन सी मित्रा साहेब क्लास लेब’ एलाह। मित्रा साहेब देशक आजादीक लेल महापुरुष सबहक बलिदानक चर्च करैत सभकें भावुक क’ देलनि, फेर बैंकक राष्ट्रीयकरणक उद्देश्य आ तकर बाद आइ आर डी पीक आवश्यकता आ समाजक गरीबी दूर करबामे बैंकक योगदान आ ताहि लेल सम्बन्धित स्टाफ सबहक निष्ठापूर्ण कर्तव्यक बोध करौलनि। तकरा बाद वातावरणकें आनंदपूर्ण बनयबाक लेल प्रशिक्षु लोकनिसं योगदान देबाक लेल कहलनि। एक गोटे कोनो फ़िल्मी नीक गजल सस्वर सुनौलखिन। एन के झा हमर लेखनक चर्च केलखिन। मित्रा साहेब हमरा किछु सुनाबय कहलनि। हम कहलियनि जे हम मैथिलीमे लिखैत छी। मित्रा साहेब हमरा मैथिलीए रचना सुनबय कहलनि। हम कोनो रचना सुनौलियनि। कहलनि जे हम बुझै छी मैथिली मुदा बाजि नहि सकब। ओ पुछ्लनि, हिन्दीयोमे किछु सुना सकै छी। हम सुनौलियनि - ‘ क्या है सेंट्रल बैंक हमारा क्यों इसके गुण गाते हैं सुनो साथियो हम इसका इतिहास तुम्हें बतलाते हैं ‘ मित्रा साहेब पूरा रचना सूनिक’ भावुक भ’ गेलाह। ओ बजलाह, हम चाहैत छी जे बैंकक सभ सदस्य ई गीत सुनथि, तें ट्रेनिंग समाप्त हेबासं दू दिन पहिने एकटा भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमक घोषणा केलनि जाहिमे पटनामे स्थित सभ कर्यालयक अधिक सं अधिक स्टाफ रहथि। हमरा कहलनि जे अहाँ और किनको एहि कार्यक्रममे बजाबय चाही त बजा सकै छी एन के झा आ नवेन्द्र झा जी एहि कार्यक्रमक व्यवस्थाक भार लेलनि। हिनके सबहक संग हम आकाशवाणी,पटना गेलहुँ, बटुक भाइकें अनुरोध केलियनि जे वैह ऐ कार्यक्रमक उदघाटन करथि आ कोनो कलाकारकें सेहो संगे नेने आबथि। निर्धारित तिथिक’ साँझमे लगभग छओ बजेक बाद पटना स्थित क्षेत्रीय कार्यालय, आंचलिक कार्यालय आ शाखा कार्यालयसं पर्याप्त संख्यामे अधिकारी-कर्मचारी लोकनि अबै गेलाह। मित्रा दादा कार्यक्रमक विषयमे संक्षेपमे अपन विचार रखलनि। बटुक भाइ आइ आर डी पी मे बैंकक योगदानक चर्च केलनि। बटुक भाइ मैथिली गायक कृष्णानन्द जीकें हारमोनियम आ एकटा तबलाबादक संगे नेने आएल छलाह। कृष्णानन्द जी हमर नाम लैत हमरहु किछु मैथिली गीत रचना प्रस्तुत केलनि जे गीत सभ ‘तोरा अंगना मे’ गीत संग्रहमे छल। अन्तमे हम अपन एकटा मैथिली गीत आ तकर बाद सेंट्रल बैंकक परिचय गीत सुनौलियनि : क्या है सेंट्रल बैंक हमारा क्यों इसके गुण गाते हैं सुनो साथियो हम इसका इतिहास तुम्हें बतलाते हैं। आते हैं जब याद वो दिन भर आता आँखों में पानी अपने ही घर में थे खोए हम सारे हिन्दुस्तानी शान्तिप्रिय यह देश हमारा बेबस था परतंत्र था यहाँ की अर्थ व्यवस्था में अंग्रेजों का षड्यंत्र था उनके दमन-नीति से घायल तेजस्वी लोग अनेक थे सर सोरावजी पोचखानावाला उनमें से एक थे उन महान देश-प्रेमी ने देखा एक सुन्दर सपना भारत में एक बैंक बने जो भारतियों का हो अपना ये देते हैं ताने हमको, हम इनको दिखलाएंगे आलोकित होगा भारत हम ऐसा दीप जलाएंगे चला बहादुर अपने पथपर निश्छल कदम बढ़ा करके अपनी प्रतिभा से पाए ओहदे को भी ठुकरा करके उनके देश-प्रेम के आगे फिर-फिर शीश झुकाते हैं सुनो साथियो हम इससे आगे की कथा सुनाते हैं। सच है शूरों के राहों में रोड़े कितने आते हैं पर विश्वास अटल हो जिनका कभी नहीं घवराते हैं विपदाओं को गले लगाते आगे बढ़ते जाते हैं और किसी दिन निश्चित ही मंजिल अपनी पा जाते हैं इसी तरह भारतमे भैया एक दिन जय-जयकार हुआ सन उनीस सौ ग्यारह में जब यह सपना साकार हुआ पोचखानावाला ने भारत को अनुपम उपहार दिया भारत वासी के दिल में आजादी का संचार किया एक अनोखा एक निराला एक नया आयाम दिया सचमुच ही कितना सुन्दर और कितना प्यारा नाम दिया पलते लाखों लोग निरंतर इस बरगद की छांव मे तीन हजार शाखाएं जिसकी हैं शहरों और गांव मे प्रस्तुत करती कार्य प्रणाली झांकी हिन्दुस्तान की गाँवों के आधुनिकीकरण की बातें जन कल्याण की राष्ट्रीयकरण हुआ फिर इसने एक अनोखा मोड़ लिया कल तक थे जो लोग दूर अब सबसे नाता जोड़ लिया प्रथम स्वदेशी बैंक हमारा हम जिसके गुण गाते हैं इसीलिए सब बैंकों से हम इसे महान बताते हैं। एहि प्रस्तुतिक प्रशंसामे किछु वरिष्ठ अधिकारी सभ अपन-अपन उदगार व्यक्त केलनि। हमर दोसर प्रस्तुति छल नव बीस सूत्री कार्यक्रम पर लिखल कविता : ‘आया है नव सपने लेकर और नए आयाम श्रीमती गांधी का नूतन बीस-सूत्री प्रोग्राम।’ फेर किछु वरिष्ठ अधिकारी सभ प्रशंसाक रूपमे अपन-अपन उदगार व्यक्त केलनि। करीब दू घंटा धरि कार्यक्रम चललै। बैंकक क्रिया-कलापसं सम्बन्धित हमर बहुत रचना सुनै गेलाह। टिप्पणी एतेक धरि भेलै जे बैंकक पी. आर. ओ. पद लेल हम एकदम उपयुक्त छी। बहुत गोटे ई बूझय लगलाह जे हम बहुत जल्दी पी. आर. ओ. होमय जा रहल छी। कखनो-कखनो हमरो भ्रम हुअ’ लागय जे हम पी.आर.ओ. बन’ जा रहल छी। ओहि समय तक सेंट्रल बैंक में पी. आर. ओ. पद नहि छलैक, तें ई उत्सुकता भेल जे ओहि पद पर कोन-कोन काज करय पडैत छै, से बूझि ली। बटुक भाइ एक आदमीक पता देलनि जे दोसर कोनो बैंक में पी. आर. ओ. छलाह। हम हुनकासं भेंट कर’ गेलहुँ मुदा हुनकासं भेंट नै भेल, ओ पटनामे ओहि समय नहि छलाह। एक दिन हम नवेन्द्र झा जीक संग एन.के.झा जीक कंकड़बाग़ स्थित डेरापर सेहो गेलहुँ। नवेन्द्र जी कहैत छथि जे ओतहु किछु गीत-नाद भेल रहै। प्रशिक्षण कार्यक्रमसं घुरिक’ सिवान एलहुं आ फेर अपन वर्तमान काजमे एतेक तल्लीन भ’ गेलहुँ जे हमरा सही समय पर पतो नहि चलि सकल जे बैंक में पी.आर.ओ.पद लेल विज्ञापन एलै,जिनका जेबाक छलनि,से आवेदन पठा देलनि आ साक्षात्कारक तिथि सेहो आबि गेलै। हम जेना एहि उमेदमे रही जे हमरा लेल विशेष आमंत्रण पत्र आएत। सभ किछु बिहित नियमक अनुसार भेलै। सिवाने शाखाक श्री नारायण झा जी पटना आंचलिक कार्यालयमे पी.आर.ओ. पदपर गेलाह। झा जी बैंकक सी.ए.आइ.आइ.बी. क परीक्षा उत्तीर्ण छलाह, बैंकक एकटा यूनियनक नेता छलाह आ नीक वक्ता छलाह, मैथिलीमे एकटा पोथी सेहो प्रकाशित भेलनि। जे अपन प्रशंसक वरिष्ठ अधिकारी सभसं सेहो सम्पर्क रखबाक कला नहि जनैत हो, ओकरा जन सम्पर्क अधिकारी पद लेल उपयुक्त हमहूँ कोना मानि सकै छी? ओकरा लेल अस्तित्व किछु और तय केने छलैक। हम सोचैत छी यदि हम आवेदन देनहु रहितिऐ आ गेलो रहितहुं साक्षात्कारमे त सफल नहि होइतहुं किएक त हम सी ए आइ आइ बीक परीक्षा पास नहि केने छलहुँ आ एकर महत्व बेशी छलै। हम अपन मोनक शान्तिक लेल एहि दर्शनकें आत्मसात क’ लेलहुं : ‘’जे भेटल सैह अहाँक लेल सर्वोत्तम अछि आ जे आगाँ भेटत से और सुन्दर होयत आ जे नहि भेटल से बूझू जे अहाँक लेल उपयुक्त नहि छल’’ मैथिली साहित्य परिषद आ हमर मैथिलीमे लेखन : मैथिली साहित्य परिषदक सम्पर्कमे एलापर बहुत गोटेसं परिचय भेल जे कलेक्टरिएट, बैंक, कोर्ट, जेल, डी. ए. वी. कॉलेज आदि ठाम विभिन्न पदपर काज करैत छलाह। नरेश कुमार दत्त, अचुतानंद कंठ कलेक्टरिएटमे छलाह। दत्त जी लिखैत सेहो छलाह। सेंट्रल बैंक शाखामे हम रही, मोद नारायण झा, श्री नारायण झा छलाह। सेंट्रल बैंकक क्षेत्रीय कार्यालयमे अरुण झा आ अरुण कुमार झा छलाह, बादमे बिन्दुजी (बिन्दु प्रसाद कर्ण ) एलाह राजभाषा अधिकारीक पद पर। स्टेट बैंकमे चौधरी जी छलाह। कोर्टमे लाल साहेब मजिस्ट्रेट छलाह। जेल अधिकारी पी. के. झा छलाह। जेलमे डॉक्टर छलाह चौधरी जी। डी.ए.वी. कॉलेजमे प्राध्यापक छलाह संस्कृत विभागमे कमलोद्भव शर्मा आ डा. अमर नाथ ठाकुर, बनस्पति विज्ञान विभागमे गंगानंद झा, हिन्दी विभागमे सोमेश्वर झा, राजनीति विज्ञान विभागमे उपेन्द्र मिश्र आ इतिहासमे छलाह आर.एन. चौधरी। इंजिनियर रमेश झा छलाह, हुनका संग उमेशजी छलाह, टनटन जी छलाह। उपेन्द्र चौधरी कुसियार विभागमे छलाह। बी. डी. ओ. छलाह शिव देव सिंह आ सी.ओ. छलाह धीरेन्द्र मोहन झा। प्रो. गंगानंद झा मैथिली, हिन्दी आ बंगला साहित्यक नीक अध्येता छलाह। हुनक साहित्यिक समझसं हमरा बहुत लाभ भेल। हुनकहि अनुशंसा पर हम बंगला लेखक शंकर आ आशापूर्णा देवीक किछु महत्वपूर्ण पोथीक हिन्दी अनुवाद पढलहुं। रवीन्द्र नाथ ठाकुरक गीतांजलि पढ़िक’ बुझबामे हुनकासं बहुत सहयोग भेटल। हुनकासं सूनल रवीन्द्र नाथ ठाकुरक कविता ‘पुरस्कार’ आ गीत ‘ जगते आनन्द यज्ञे आमार निमंत्रण / धन्य होलो धन्य होलो मानव जीवन’ मोन-प्राणमे बसि गेल काजी नजरूल इस्लामक रचना सबहक रसास्वादन करबाक सेहो अवसर भेटल। सर्वप्रथम हुनकहिसं नजरूल इस्लामक प्रसिद्द कविता ‘विद्रोही’ सुनने छलहुँ। हुनक संघर्षमय, संयमित आ संतुलित जीवनसं हमहूँ प्रेरित भेलहुँ। एक दिन दैनिक जनशक्तिक सम्पादक सिवान एलाह त हुनकासं परिचय करौलनि, ओ किछु मैथिली गीत सुनलनि आ १४.१०.८४ क’ जनशक्तिक रविवारीय अंकमे ‘तीन मैथिली गीत शीर्षकसं हमर तीनटा गीत छपलनि। १९८३ मे मिथिला मिहिरक ३-९ अप्रैलक अंकमे दूटा गजल आ माटि-पानिक दिसम्बर अंकमे तीनटा गीत प्रकाशित भेल। १९८४ मे मिथिला मिहिरक १५ सं २१ जनवरी बला अंकमे एकटा कविता ‘दुख’, २६ फरबरीबला अंकमे गीत ‘ तीन कोटि मैथिल ताल ठोकिक’ कहैए / ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए’ आ २० सितम्बरबला अंकमे गीत ‘ मैथिलीले’ अहाँ की करै छी’ प्रकाशित भेल। माटि-पानिक फरबरी अंक मे दूटा गजल प्रकाशित भेल : (१) ‘रौदीक मारिसं कुहरैत हमर गाम हमरा करैछ सोर बिलटैत हमर गाम’ (२) ‘चालनिमे पानिसभ दिन भरैत रहल लोक करबाक नामपर किछु करैत रहल लोक’ विद्यापति पर्व दिन एकटा रचना लिखाएल : आजुक राति कथीले’ भैया, आजुक राति कथीले’ माटिक ममता सोर करैए, सैह समाद सुनैले’। ( गीत संग्रह गीत- गंगामे रचना सम्मिलित अछि ) दूटा रचना एहि तरहक लिखाएल : पहिल : ‘विकास हो कि नै हो परचार होना चाही वाह रे वाह एहने सरकार होना चाही’ दोसर : ‘ई की भेल ई की भेल हे गै बुढ़िया ई की भेल जानि ने कत’ चोराक’ रखलें चिन्नी और किरासन तेल।’...... साढ़ू-मित्र मनोजानन्द झाक असामयिक निधनक दुखद समाचारसं मर्माहत भेल रही। ओना ओ दूटा शिशुकें छोडिक’ गेल छलाह जे शान्तीक जीवनक लेल पैघ संबल छल। शान्ती नीक परिवारक पुतोहु छलीह, जतय हुनका सम्मानित जीवन जीबाक लेल सबहक सिनेह आ आशीर्बाद प्राप्त छलनि। मुदा समाजमे बहुत एहनो शान्ती रहैत छथि जिनका लेल सम्मानित जीवन सुलभ नै होइत छनि। एहि समस्यापर गम्भीर चिन्तन-मनन चलल आ ओहीसं निकलल एकटा एकांकी ‘कोरांटी’ आ एकटा गीत ‘एना गे सुगिया कतेक दिन रहबें ( जे गीत संग्रह ‘गीत-गंगा’ मे सम्मिलित अछि। मैथिली साहित्य परिषद निष्क्रिय जकाँ छल, मुदा सिवानक स्थायी निवासी बनल बड़का आवास-परिसरक स्वामी आ प्रतिष्ठित चिकित्सक डा. बी. एल. दास आ श्रीमती आशा दास जीक सिनेहसं पुनः सक्रिय भेल, निर्धारित समयपर डा. दास ओत’ बैसक होमय लागल। डा. साहेब संरक्षक छलाह। बैसकमे सभ गोटेकें पर्याप्त सिनेह आ सत्कारक संग डा. दम्पतिक उपस्थिति आ सलाह सुलभ होइत छलनि। बैसकमे विभिन्न विषयपर चर्चाक संग काव्य-पाठ सेहो होइत छलै। हम मिथिला मिहिर पढैत छलहुँ। पटनासं ‘माटि - पानि’ प्रकाशित होमय लगलै त ओहो दस प्रति मंगब’ लगलहुं, परिषदक किछु सदस्य सभ लैत छलाह, पढैत छलाह, गोष्ठीमे ओहिपर सेहो चर्चा होइत छल। हमर अनुरोधपर प्रो. गंगा नन्द झा मैथिलीमे किछु लेख लिखलनि- एकटा लेख ‘मिथिलामे दीयाबातीक परम्परा’ हुनकहि द्वारा आकाशवाणी,पटनाक मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ मे दिनांक २५.१०.१९८४ क’ प्रसारित भेलनि, दोसर लेख ‘प्रवासी मैथिल : बैद्यनाथ धामक पंडा’ मासिक पत्रिका ‘माटि-पानि’मे प्रकाशित-प्रशंसित भेलनि। ‘बंगला भाषा आन्दोलन आ मैथिलीपर ओकर प्रभाव’ आ ‘मैथिली आंदोलनक दिशा’पर सेहो हुनक विचार बहुत स्वस्थ आ सुन्दर छलनि। प्रो. अमर नाथ ठाकुरक दू टा लेख ‘सूतल नहि अछि सिवान’ आ ‘जागल अछि बासोपट्टी’ माटि-पानिमे प्रकाशित भेलनि। हुनकहु लेखनीक गति तेज भेलनि। किछु साल नरेश कुमार दत्त आ किछु साल रमेश झा परिषदक सचिव छलाह। हम रही त दू बेर विद्यापति स्मृति पर्व मनाओल गेल छल। ओकर बादो परिषद सक्रिय छल। कवि गोष्ठीमे मार्कंडेय प्रवासी, उदय चन्द्र झा ‘विनोद’, विभूति आनन्द,छत्रानंद सिंह झा, रवीन्द्र नाथ ठाकुर सेहो भाग नेने छलाह। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रममे रवीन्द्र नाथ ठाकुर, महेन्द्र झा, अवनींद्र नाथ ठाकुर, शारदा झा,अशर्फी अजनवी, अमिय हलाहल,महादेव ठाकुर आदि भाग नेने छलाह। रवीन्द्र-महेन्द्रक कार्यक्रम अमैथिल लोक सभकें सेहो बहुत आकर्षित करैत छलनि। दुनू गोटे मंचपर अबै छलाह त एक बेरमे लगातार छओटा गीत गाबि लैत छलाह। छक्का कय बेर चलैत रहैत छल। एक बेर गरमीमे कार्यक्रम भेल रहै। रवीन्द्र आ महेन्द्र जखन मंच पर एलाह आ गाबय लगलाह ‘ हवा रे चल मिथिलामे चल’ त लोक आनन्दसं ततेक भरि गेल जे लगै छलै जेना ठीके शीतल बसात बहय लागल हो। बहुत दिन धरि कार्यक्रमक चर्चा चलैत रहैत छल। जिला कार्यालयक किछु अधिकारी सभ सेहो ओहि कार्यक्रमक प्रतीक्षा करैत छलाह। डा.बी.एल.दास ओत’ अतिथि सबहक ठहरबाक व्यवस्था रहैत छलनि। एक बेर कार्यक्रमक प्रात सेहो सबेरे-सबेरे डा. साहेब ओत’ बहुत गोटे जमा भ’ गेलाह। रवीन्द्रजी आ महेन्द्र जी लोकक आग्रहपर ‘पञ्च कन्या’क पाठ गीते जकाँ दुनू गोटे मिलिक’ बड़ी काल धरि प्रस्तुत करैत रहलाह आ सभ श्रोता आनंदक सागरमे डूबल रहलाह, बड्ड आकर्षक रहल ओहो कार्यक्रम। लगभग एहि समय तक गीतकार चन्द्रमणि जी सेहो अपन शब्द आ स्वर ल’क’ मैथिली गीत-मंचपर अपन स्थान जमा चुकल छलाह, से हरिमोहन बाबूक अभिनन्दन समारोहक मंचपर पटनामे देखने छलहुँ। १९८४ मे १९ फरबरी क’ आर्यावर्तमे प्रकाशित लेख “ मिथिला राज्य क्यों’’ पढ़लहुं। २० फरबरीक’ मिथिला-मिहिर दैनिक शुरू भेल। २३ फरबरीक’ तीन बजे भोरमे दरभंगा मेडिकल कॉलेज-अस्पतालमे ७६ बरखक अवस्थामे हास्य सम्राट हरिमोहन बाबूक देहान्त भ’ गेलनि, दाह संस्कार सिमरियाघाटमे भेलनि। २४ क’ आर्यावर्त्तमे खबरि प्रकाशित भेलै, श्री मार्कंडेय प्रवासीक वक्तव्य प्रकाशित भेलनि : मैथिली साहित्याकाशक सूर्यास्त भ’ गेल। हरिमोहन बाबूकें श्रद्धांजलि अर्पित करबाक हेतु २६ क’ एकटा शोक सभा जेल अधिकारी पी. के. झाक आवासीय परिसरमे आयोजित भेल। १९८५ मे २३ फरबरी क’ हरिमोहन बाबूक स्मृति – संध्या स्थानीय आ आदरणीय अधिवक्ता श्री सुभाष्कर पाण्डेय जीक आवासीय परिसरमे हॉलमे मनाओल गेल जाहिमे मैथिल आ अमैथिल विद्वान् लोकनि द्वारा हरिमोहन बाबूक स्मृतिमे हुनक साहित्यिक कृतिक पाठ कएल गेल आ हुनक साहित्य संसारक चर्चा भेल। गोष्ठी श्री आर. एन. मिश्र, एस.डी. जी. एम. क अध्यक्षतामे भेल। स्वागत भाषण केलनि श्री राम चन्द्र त्रिपाठी। श्रद्धांजलि अर्पित करयबलामे देवेन्द्र झा,प्रो. आर.एन. चौधरी, डा. अमरनाथ ठाकुर, शिवदेव सिंह आ प्रो. गंगानंद झा सेहो छलाह। डा. ठाकुर एकटा लेख प्रस्तुत केलनि आ हरिमोहन बाबूक कथा ‘टोटमा’क पाठ केलनि। श्रीमती कान्ति पाण्डेय हरिमोहन बाबूक कथा-संग्रह ‘रंगशाला’क एक कथा ‘रसमयीक ग्राहक’क पाठ केलनि। नीलांजना आ सुदीप्ता द्वारा प्रस्तुत कएल गेल गीत ‘ तोरा अंगनामे ...’ आ ‘जोगिया मोर जगत सुखदायक .....’ काव्य पाठ केलनि नरेश कुमार दत्त, डा. ए. के. घोष आ मानस मुख़र्जी। श्री सुभाष्कर पाण्डेय जी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन कएल गेल। एहि कार्यक्रमक अध्यक्ष श्री आर एन मिश्र, एस डी जी एम सं १३ मार्च क’ साँझमे सड़केपर भेंट आ संक्षिप्त गप भेल। दुखक बात ई भेल जे १५ मार्चक’ रस्तोगीजी (अधिवक्ता) सं पता चलल जे ४.३० बजे भोरमे आर एन मिश्र जीक ह्रदय गति रुकि गेलनि। पत्नी, सार आ चारिटा बच्चा छलखिन डेरामे। ऑफिससं छुट्टी ल’ लेलहुं। बहुत गोटेकें सुचित केलियनि, अबै गेलाह। मिश्र जीक शव देखि लगैत छल जे सूतल होथि। कातमे ठाढ़ पाँच बरखक अबोध नेनाक चेहरापर शून्य ह्रदय विदारक छल। सिवानमे अही अवधिमे हरिमोहन बाबूक किछु पोथी आ व्यासजीक पोथी ‘दू पत्र’ सेहो पढबाक अवसर भेटल। बच्ची सेहो ‘रंगशाला’ पढ़िक’ आनन्दित भेलीह। जीवकांत जीक कथा संग्रह ‘वस्तु’ पढ़लहुँ। ‘नानी’ कथा एखनो स्मृतिमे अछि। अरुणजीसं नानी कथाक भूमिका सूनि नीक लागल। बेरोजगारीक अवधिमे जमशेदपुरमे लीखल अपन दीर्घ कथाकें फेरसं लीखिक’ अरुणजी ( जीवकान्त जीक सुपुत्र )क माध्यमसं आदरणीय जीवकान्त जीकें पठौलियनि आ हुनक सुझाव प्राप्त भेल। बहुत बादमे ई दीर्घ कविता ‘धारक ओइ पार’ नामसं प्रकाशित भेल। जीवकान्त जीसं पत्राचार होइत रहल। हुनकासं सुझाव प्राप्त भेल जे किछु गद्यो लिखी, नीक रचनाकार सबहक रचना पढ़ी आ पोथी छपयबाक लक्ष्य बनाबी। प्रो. गंगानंद झाजीक सुपुत्र अपूर्वानन्द जीसं नागार्जुनक बहुत रास रचना एहि अवधिमे सुनबाक अवसर भेटल। ‘उत्तरशती’ मे छपल अपूर्वानंदजीक कविता सभ सेहो सुनबाक अवसर भेटल। गंगा बाबूक ओत’सं ‘निशा निमंत्रण’( बच्चन जीक ), भवप्रीत्यानंद पदावली आ ‘अंधा युग’ आनि पढ़लहुँ। १९८५ मे २२ अगस्तक’ आकाशवाणी,पटनाक मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’ मे संध्या ५.३० बजे कवि गोष्ठीमे भाग लेलहुं जाहिमे श्री आरसी प्रसाद सिंह, प्रो. श्याम नारायण चौधरी आ श्री पूर्णेंदु चौधरी सेहो छलाह। हमर पारिवारिक स्थिति : सिन्धुजीक जन्म भेलनि। बादमे हिनक नाम शैलेन्द्र आ फेर बादमे विवेक आनन्द भेलनि । आरम्भमे वसन्त, मैथिली आ शैलेन्द्रक संग बच्ची किछु मास गाम आ किछु मास सिवान रहैत छलीह। आरम्भमे स्टेशन रोडमे एकटा मुनीमजीक मकानमे रही। बाबूक स्वास्थ्यमे परिवर्तन होइत रहै छलनि आ समय-समयपर डॉक्टरक सम्पर्क आवश्यक रहै छलनि। ओहो एक-दू बेर सिवान एलाह आ किछु दिन रहिक’ गाम चलि गेलाह। लहेरियासराय शाखामे जे ए एफ ओ छलाह हुनकासं म्यूच्यूअल ट्रान्सफरक लेल आवेदन देलिऐ। शुरूमे ओ तैयार छलाह, मुदा बादमे ओ तैयार नै भेलाह तें स्थानान्तरणक प्रयास विफल भ’ गेल। एक बेर दुर्गा पूजामे गाम गेलहुँ आ २२.१०.८२ क’ बाबूकें दरभंगामे कोनो डॉक्टरसं सम्पर्क हेतु बैदिक ककाक संगे गेलहुँ। घुरती काल बाबू गामक कैटोला चौकपर बससं उतरि सोझे घर चलि गेलाह, ओ दोकानपर चाह ओहि समय नहि पिबैत छलाह, हम दुनू गोटे चौकपर चाह पीबाक हेतु रुकि गेलहुँ। पानि भेल रहै, बाट सभ पिछराह भ’ गेल छलै। हाथमे बैग आ जूता नेने बढल जाइत रही। पुरना आँगन लग द’क’ कनी लग होइत, से सोचि पुरने आंगन बला रस्तासं बिदा भेलहुँ। चापा कल लग पिछड़ि गेलहुँ, एकटा पैर सोझे नब्बे डिग्री घूमि गेल। खसबाक आबाज सूनि मौसी ( हमर काकी मौसी सेहो छलीह, तें हम सभ मौसिए कहै छलियनि ) लालटेम ल’क’ दौड़लीह। कक्का हाथसं एक झटकामे पैर सोझ क’ देलनि। कहुनाक’ आंगन गेलहुँ। कक्का ओहि पैरकें पातर रस्सीसं बान्हि देलनि। रातिमे दर्दसं नीन ठीकसं नै भेल। सबेरे आबि कक्का जखने रस्सी खोललनि त पैर फूलि गेल। छूलासं दर्द होइ छल। मधुबनी गेलहुँ। एक्स-रे भेल। फ्रैक्चर भ’ गेल छलै। २३.१०.८२ सं ६.१२.८२ धरि डेढ़ मास प्लास्टर भेल पैर नेने गामपर इलाजमे रहलहुं। ओही अवधिमे आँगनमे एकटा चापा-कल गड़ाएल। ओही बीच शैलेन्द्रक मूड़न सेहो भेलनि। बहुत दिनक छुट्टीक बाद सिवान घुरलहुं आ यात्रासं परहेज करैत बहुत दिन धरि ओइ पैरमे एंकलेट लगाक’ रहलहुं। खसबाक सिलसिला ओही समयसं चलैत आबि रहल अछि। एहि बेर गत मार्चमे १५ आ २२ क’ खसलहुं आ दहिना केहुनीमे सूजन भेल, २९ जूनक’ एम्समे एस्पिरेशन द्वारा अतिरिक्त द्रब्य पदार्थकें सूईसं निकालि देल गेल। डेढ़ मासक बाद फेर ओहिना ओही ठाम सूजन भेल आ गत ८ सितम्बरक’ पुनः वैह एस्पिरेशन द्वारा सूईसं अतिरिक्त द्रब्य पदार्थकें निकालि देल गेल। निदेशानुसार क्रेप बैंडेज लगबैत छी, दुनू समय बर्फसं सेकाइ करैत छी आ दुनू समय एकटा टेबलेट थ्राइज ल’ रहल छी, कहल गेल अछि जे पुनः यदि सूजन होइत अछि त स्टेरॉयडक उपयोग कएल जाएत। पता नहि अहू बेर की होइत अछि। की पता दहिना हाथ कखन काज केनाइ बन्द क’ दिए, तें जल्दी-जल्दी कथाक संग जा रहल छी। हं, १९८४ मे छलहुँ। सभसं छोट भाए रतनजी दसमी उत्तीर्ण भेलाह, ६५० अंक एलनि। ओ एक-दू बेर एलाह सिवान मुदा, आर. के. कॉलेज,मधुबनीमे आगाँक पढ़ाइ केलनि। २२.०६.१९८४ क’ बसंती आ मैथिलीक नाम गिरिधर लाल स्मारक मोंटेसरी स्कूलमे लिखाएल गेलनि। ओहि दिन सिन्धुजी सेहो स्कूल गेलाह। एक सालक बाद मकान मालिक एहि मकानमे आबि गेलाह आ हम सभ हुनक दच्छिन टोला स्थित मकानमे रहय लगलहुं। रतनजीक जांघमे एकटा गिल्टी भ’ गेल रहनि। सिवानमे डा. बी.एल.दास ऑपरेशनक सलाह देलखिन। डा. श्याम बालक सिंह सेहो दरभंगामे डा. द्विवेदीसं ऑपरेशनक सलाह देलखिन। १७.०७.१९८४ क’ दरभंगामे जांघक ऑपरेशन भेलनि। हम सिवानसं ३ अगस्तक’ देखय गेलहुँ दरभंगा। द्विवेदी जीक क्लिनिकमे पता चलल जे रतनजी ठीक भ’ क’ बाबूक संगे काल्हिए गाम चलि गेलाह। मिश्र जी,उमाकांतजी, शशिकान्तजीसं गप-शप भेल। क्लिनिकमे एक घंटा गीत-नाद भेलै। रातिमे मिश्रजीक आग्रहपर हम आ शशिकान्तजी हुनके डेरापर रहलहुं। बड़ी राति धरि खिस्सा आ गीत-नाद होइत रहलै। शशिकान्तजीकें तीनटा गीत लीखिक’ देलियनि : १. ‘भरि गाम चोरे त चोर कहू ककरा’ २. ‘जखन घरेबला छथि कसाइ, तखन सुख की बुझबै’ ३. ‘जे सोचैत छी से बजबाक समय आएल अछि’ ४ क’ गाम गेलहुँ, रतनजी ठीक छलाह। ६ क’ गामसं सिवान वापस आबि गेलहुँ। ०४.९.१९८४ क’ गामसं बाबू एलाह। १२.०९ क’ १७०० रु. मे गैस बला चुल्हा किनलहुं। १७.०९ सं गैसबला चुल्हापर भोजन बनब प्रारंभ भेल। एक अन्तरालक बाद बच्चीकें एकटा डॉक्टरक अनुसार उच्च रक्त-चापक समस्या भेलनि। पटनामे प्रसिद्द चिकित्सक डा. शिव नारायण सिंह जी जांचक उपरान्त कहलनि उच्च रक्त चाप नहि छनि, एकटा दबाई लिखलखिन डिस्प्रिन, कहलनि बहुत माथ दर्दक शिकायत कहथि त दू टा टेबलेट एक गिलास पानिमे द’क’ पी लेबय कहबनि। एकटा और सुझाव देलनि जे भ’ सकय त नीक परिसरमे डेरा स्थानांतरित क’ लेब। सिवान घुरलाक किछुए दिन बाद ३०.०९.१९८४ क’ कचहरी रोडमे प्रतिष्ठित अधिवक्ता श्री सुभाष्कर पाण्डेय जी क परिसरमे हुनक सभसं छोट अनुजक हिस्सा बला मकानमे आबि गेलहुँ। मकान मालिक पटना हाई कोर्टमे प्रैक्टिस करैत छलाह। सम्पूर्ण आवासीय परिसर बहुत आकर्षक छल आ ओहि परिसरमे श्रीमती कान्ति पाण्डेयक देख-रेख मे सदिखन उत्सव जकाँ माहौलमे रहैत छल। श्रीमती पाण्डेय स्थानीय हाई स्कूलमे प्रधानाध्यापिका छलीह। एतय मजिस्ट्रेट लाल साहेब,जेल अधिकारी पी के झा, अधिवक्ता रस्तोगी साहेब सभ गोटेक परिवारक आवागमन होइत रहैत छलनि। पी के झा जीक पत्नी सेहो गीत गबैत छलखिन। कान्तिजीक छोट दियादिनी किरणजीकें सेहो बहुत सुन्दर स्वर छलनि, समय-समयपर लोक अनुरोध करैत छलनि त सुनबैत छलखिन। हुनका हॉलमे टी वी सेहो लागल छलै। हुनका सबहक संग बच्ची सेहो आनन्दित रहय लगलीह आ पटनासं जे डिस्प्रिन ल’क’ आएल रही तकर उपयोग कहियो नहि कर’ पड़ल। एहि परिसरमे सप्ताहमे दू दिन संगीतक कक्षा सेहो चलैत छलै। एक बेर कान्ति जी अपना स्कूल लेल पन्द्रह अगस्तक अवसर लेल एकटा गीत हमरासं लिखबौलनि आ एतहि ओकर समूह गानक अभ्यास बालिका लोकनिसं करबौलनि : ‘ पन्द्रह अगस्त का शुभ दिन हमको करता है आह्वान हमें बनाना है बलशाली हिन्दुस्तान।’ ओकील साहेबक परिचयक क्षेत्र बहुत व्यापक छलनि। कैंपसमे साँझक’ बहुत गोटे सभक जुटान होइत रहैत छल। हमरा एलाक बाद कॉलेजक मैथिल प्राध्यापक आ बैंक स्टाफ सभ सेहो कहियो-कहियो अबैत रहैत छलाह, सभ गोटेक स्वागत होइत छलनि ओकील साहेबक परिसरमे। हमरासं छोट भाए ललनजी सिवानमे संगे रहिक’ डी ए वी कॉलेजसं जूलॉजीमे प्रतिष्ठाक संग बी.एस.सी. उतीर्ण भए आइ आइ बी एम पटनामे एम बी ए कोर्समे दिनांक २०.०८.१९८४ क’ नाम लिखौलनि। सिवानमे हमरा सबहक सभसं प्रिय छलाह झा जी। स्पष्टवक्ता छलाह। हुनक तामसोमे बाजल बातमे मनोरंजनक सामग्री खूब रहैत छल। सिवानमे भांग आ रसगुल्लाक भोज सेहो एक-दू बेर केने छलाह। हम सभ एक दोसरक डेरापर जाइत-अबैत रहै छलहुँ। हमरा ककरो नोत द’क’ खुएबाक अभ्यास नै छल, आइयो नै अछि। मुदा, झाजी समय-समयपर नोत द’ दैत छलाह। एक-दू बेर हमहूं सभ गोटे गेल छी। मुदा, अधिक काल हमर अनुज ललनजी जाइत छलाह। झाजी सभ गोटेक स्वभाव बहुत नीक छलनि, बड्ड आग्रह क’क’ खुअबैत छलखिन जेना गाममे लोक खुअबैत छै। ललनजी सिवानेमे छलाह त एक दिन झाजी डेरा पर एलाह आ ललनजीक विवाहक सम्बन्धमे चर्चा करैत कहलनि, हम अपना सारिसं ललनजीक विवाह करब’ चाहैत छिऐ, अहाँ अपन स्वीकृति द’ दियौ त भ’ जेतै। हम कहलियनि जे ललनजीक विचार हेतनि त हमरा स्वीकार करबामे कोनो दिक्कत नै हैत। झाजी कहलनि जे ललनजी अस्वीकार नै करत, अहाँ ‘हं’ त कहियौ। हम कहलियनि जे ललनजीकें स्वीकार छै त हमरो स्वीकार अछि। झाजी तुरत ललनजीकें बजेलखिन आ पुछ्लखिन जे ठाकुरजी तैयार छथि, अहाँ तैयार छी ने ललनजी? ललनजी कहलखिन जे हम एखन विवाह नै करब, हमरा ऐ विषयमे त कहियो कोनो गप नै भेल अछि। झाजी कहलखिन ‘ आ, हमर कनियाँ जे ओते तरि-तरिक’ तडुआ खुअबैत छलीह से अहाँ नै बुझै छलिऐ?’ सभकें हंसी लगलै। हमरो झाजीक बातसं ओहू दिन हंसी लागल रह्य। इहो भेल जे झाजीक सोचब गलत नै कहल जा सकैछ। कियो अहाँकें ओतेक प्रेमसं भोजन कराबय त अहूँक कर्तव्य किछु भ’ जाइत अछि। हरिमोहन बाबूक ‘खट्टर ककाक तरंग’मे एक गोटेकें अबैत देखि कक्का तमसाक’ कहैत छथिन ‘ हे..हे..कनी घूमिक’ आबह, ओम्हर भांटाक गाछ रोपल अछि,’ मुदा जखन ओ कहैत छनि, ‘कका नोत दैले’ आएल छी’ त कहै छथिन ‘ तखन सोझे चलि आबह, दू-चारिटा धंगेबे करतै त की हेतै।’ मतलब जे नोत दैबलाक प्रति सम्वेदनशील हेबाक चाही। हरिमोहन बाबू दोसर गोटेक चर्च केने छथि जिनकर कहब छलनि, जकर खेबै, तकर गेबै; जेहेन खेबै, तेहेन गेबै आ जाधरि खेबै ताधरि गेबै। अहूमे भोजन करैबलाक प्रतिबद्धताक बात अछि। अर्थात नोत खाइबलामे कृतज्ञताक भाव रहबाक चाही। मुदा अधिक ठाम यैह होइछै जे भोजनक बाद लोक ऐ भोजनकें बिसरि जाइए। खेबा काल जे आनन्द अबैछै से एक दिनक बाद कहाँ? सुनलिऐ जे एक गोटे कोनो अवसरपर अपना गामक लोककें लगातार दस दिन धरि दुनू समय भोजन करबैत रहलखिन, सभकें अपना घरमे भानस बन्द क’ देबाक अनुरोध केने छलखिन। भोज खाएबला सभ गोटेकें एक जोड़ धोती, एक सेट थारी,लोटा,बाटी, गिलास आ दक्षिणा एक सै एक टाका सेहो देलखिन, पंडित जीकें हीरो हौंडा मोटर साइकिल देलखिन। लोक ओहि समय त गुणगान करै छलनि, मुदा एको बरख धरि मोन नहि रखलकनि। मुखियाक चुनावमे ठाढ़ भेलाह आ हारि गेलाह। दुख भेलनि, स्वाभाविक छै। एना नै हेबाक चाही। जे कियो नोत अथवा भोज खुएबाकें निवेश मानि लै छथि, से दुखी भ’ सकैत छथि कखनो नहियो भ’ सकैत छथि। मुदा, रिस्क त छै। हमरा लगैए अही दुआरे बहुत अवसरपर लोक जे कतहु भोजन करै छथि, से चलबा काल एकावन वा एक सै एक अथवा अपना विवेकसं किछु राशि आशीर्वाद कहिक’ कोनो धिया-पुताकें अथवा कोनो नव कनियाँकें द’ दैत छथि आ कृतग्यताक भावसं अपनाकें मुक्त क’ लैत छथि। भ’ गेल सद्धम-बद्धम। मुदा की ई सभ नोतमे संभव छै? किछु गोटे एहि सिद्धान्तकें मानैबला छथि : ‘खेबै त खुएबै’ बात ख़तम। किछु गोटेक कहब छनि : ‘जे खुएतै सबहक खेबै करबै अपनहि मोनकेर’ एहि सिद्धांतक उपयोग बहुत गोटे चुनावक समय करैत छथि। किछु गोटे एहि सिद्धान्तक समर्थक छथि : ‘ने खेबै ने गेबै’ किछु गोटे ईहो मानैत छथि : ‘ने खेबै ने ककरो खाए देबै’ की उचित, की अनुचित हम बड़ी काल धरि सोचैत रहि गेलहुँ। आइयो सोचैत छी। गुत्थी एखन धरि नहि फ़रिआएल अछि। ओइ दिन झाजी हमरा बड़का टास्क द’ क’ चलि गेलाह। हमरा आइयो कियो नोत दैए त झाजी आ हुनक ओ गप मोन पड़ि जाइए आ स्वीकार अथवा अस्वीकार करबामे सुविधा होइए। नोत आ भोजसं बचबाक कोशिश करैत छी आ तडुआसं त एकदम परहेज करिते छी। भगवानक कृपासं हुनक सारिक विवाह अहूसं नीक दोसर ठाम भ’ गेलनि। आ किछुए दिनक बाद हमरा सबहक बीच स्थिति सामान्य भ’ गेल। ललनजी पटना रह्य लगलाह। ओत’ मामाक डेरामे रह्बाक व्यवस्था भ’ गेलनि। ओतहिसं क्लास कर’ जाइत छलाह। ओत’ हमर ममिऔत मिथिलेश पहिनेसं रहिक’ नोकरी करय जाइत छलाह। हुनकहि कोठलीमे इहो रह’ लगलाह। मामाक बच्चा सभ छोट छलनि। बच्चा सभक कारणे असुविधाक अनुभव करैत ललनजी एकबेर दोसर ठाम डेरा ठीक केलनि मुदा ओत’ जे असुविधा भेलनि त ओहि ठामसं पड़ेलाह आ फेर मामाक डेरा आबि गेलाह, फेर जाधरि कोर्स पूर्ण भेलनि, ओही ठाम रहलाह। बसन्ती, मैथिली आ शैलेन्द्र तीनूक नाम १८.१०.१९८४ (वृहस्पति दिन )क’ सूर्या अकादमी (स्कूल)मे लिखाएल गेलनि। अही साल ३१ अक्टूबरक’ दुर्भाग्यसं प्रधान मन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधीक हत्याक खबरि एलै, १ नवम्बरक’ शहरमे लूट-पाट भेलै आ तकरा बाद तीन-चारि दिन धरि कर्फ्यूमे लोक घेराएल रहल। हमर माए कोनो अवसरपर हमर पितिऔत दिलीप संगे मिनी बससं नैहर (रुचौल ) जा रहल छलीह। कैटोला आ तारसरायक बीचमे बस पलटि गेलै, सामान्य चोट लगलनि, मुदा ठीक भ’ गेलीह। सिवानमे दरबार टाकीज कंपाउंडमे एकटा भांगक पेड़ाबला दोकान छलै। साँझक’ ओत’ भीड़ रहैत छलै। हमहूँ झाजी संगे ओत’ साँझक’ जाइ छलहुँ, एकटा पेड़ा खाइत छलहुँ। एक दिन ओत’ एक आदमीकें देखलियनि, एक दर्जन पेड़ा ल’क’ टुप-टुप खाए लगलाह। हम हुनका दिस आश्चर्यसं तकैत रहलहुँ। हम एकटा पेड़ा लेबामे डेराइत छी, ई महाशय एक दर्जन सामान्य ढंगे ल’ रहल छथि। हमरा आश्चर्यमे डूबल देखि ओ कहलनि, क्या देख रहे हैं? हम चुप छलहुँ। ‘यही न कि मैं एक दर्जन कैसे पचा लेता हूँ?’ फेर कहलनि, ‘बहुत दिन हो गया’ ‘साहब, जिसके घर छः-छः जवान अविवाहित लड़कियां हों, उसे नींद के लिए एक दर्जन भी कम पड़ जाते हैं।’ बादमे पता चलल ओ शासकीय अधिकारी छलाह। मुदा दोसर एहेन लोक हमरा फेर नहि भेटलाह। भांगक पेड़ा बैंकक किछु सदस्य नियमित रूपसं लैत छलाह, किन्तु एक अथवा दूटासं बेशी नहि लैत छलाह। हमहूँ बहुत दिन धरि साँझमे एकटा पेड़ा लैत छलहुं। भांगक व्यवस्था लाल साहेब आ पी के झाक ओत’ सेहो रहैत छलनि। गाम जाइ छलहुँ त ओतहु भांगक व्यवस्था भ’ जाइत छल। हम सी ए आइ आइ बीक पहिल पार्टमे पाँचमेसं एकटा विषय ‘बुक कीपिंग’ मे उतीर्ण नहि भ’ सकलहुं। दोसर पार्टक कथे की? बहुत कठिन काज सभ क’ चुकल छलहुँ, मुदा ई काज हमरा लेल असंभव भ’ गेल, एहि कारण एकटा और हानि भेल। हम आंचलिक प्रशिक्षण केन्द्रमे फैकल्टी मेम्बरक लेल साक्षात्कारमे सम्मिलित भेलहुँ, मुदा असफल भ’ गेलहुँ। १९८५ क अन्तमे मुख्य धारामे एबाक लेल साक्षात्कारमे सम्मिलित भेलहुँ। पूर्वी चम्पारण जिलाक आदापुर शाखामे शाखा प्रबंधकक कार्य भार ग्रहण करबाक आदेश प्राप्त भेल आ तदनुसार २३ नवम्बर क’ सिवान शाखासं भारमुक्त भेलहुँ। पटना / १२.०९.२०२१ (१९) तीन बरख आदापुरमे २५ नवम्बर १९८५ क’ हम आदापुर शाखामे प्रवेश केने रही। आदापुर रेलवे स्टेशनक दोसर कात छल शाखा। ई स्टेशन नरकटियागंज-सीतामढ़ी-दरभंगा लाइनपर अछि । शाखामे निम्नलिखित सदस्य सभ छलाह अथवा बादमे एलाह : रामजी चौबे जी – शाखा प्रबंधक अरुण कुमार –कृषि वित्त अधिकारी सुरेन्द्र कुमार द्विवेदी –कृषि वित्त अधिकारी राम एकबाल प्रसाद –मुख्य खजांची श्याम बिहारी प्रसाद’प्रमोद’-अधिकारी त्रिलोकी नाथ प्रसाद-विशेष सहायक नलिन विलोचन-लिपिक सह खजांची वीरेंद्र कुमार –लिपिक सह खजांची डी. बी. अधिकारी-सुरक्षा प्रहरी हरिमोहन ठाकुर –चपरासी शमीम अहमद-चपरासी बीर बहादुर साह –अंश कालीन कर्मचारी शाखामे कृषि ऋण बेशी छलैक। कृषि वित्त अधिकारी ओहि विभागक काज सभ देखि रहल छलाह। पेंशन-भुगतान काज सेहो बहुत छलै, त्रिलोकी बाबू ओकर भार उठौने छलाह। खजाना विभागक काजक जिम्मेदारी राम इकबाल प्रसाद जीकें छलनि। शाखामे जतेक सदस्य छलाह से दैनिके काजमे एतेक बाझल रहैत छलाह जे शेष-मिलानक काज नहि क’ पबैत छलाह। मियादी ऋणक शेष-मिलान सेहो तीन सालसं लंबित छल। एहिसं मांग ऋण आ डी आर आइ ऋणक शेष सेहो सामान्य बहीसं मिलल नै छल। शाखा कार्यालय तारा बाबू (तारा चन्द प्रसाद )क मकानमे छल। तारा बाबू अपने बिजली विभागमे काज करैत छलाह। हुनक भ्राता अनूठा बाबू (अनूठा लाल प्रसाद ) स्थानीय उच्च विद्यालयमे प्रधानाध्यापक छलाह आ हुनके मकानमे शाखा प्रबंधकक आवास छल। शाखा प्रबंधक चौबेजी पूर्वमे हमर शाखा प्रबंधक रहि चुकल छलाह बसंतपुर शाखामे। हुनक स्थानान्तरण सिवान जिलामे गोरियाकोठी शाखामे भेलनि। हुनका गेलाक बाद ओही आवासमे हमहूँ रह’ लगलहुं। हमरा अनुरोधपर मास्टर साहेब ओहि आवासमे एकटा कोठली और बढ़ा देलनि, ओही अनुपातमे किराया राशिमे सेहो वृद्धि कएल गेलनि। मास्टर साहेब लग कहियोक’ साँझमे बैसैत छलहुँ त बहुत तरहक जानकारी सेहो भेटैत छल जाहिसं बैंकक काज करबामे सेहो सहयोग भेटैत छल। मास्टर साहेब पान खेबाक शौकीन छलाह। हमरो सभकें नीक पान खुअबैत छलाह। मास्टर साहेब अपन एक पुत्रीक विवाह मधुबनी ठीक केलनि। लड़का बला सभ लडकी देखय आएल रहथिन त हमरो सभकें बजौलनि। बहुत शालीनताक संग सभ प्रक्रिया भेलै, से अनुकरणीय लागल। मास्टर साहेबक सलाहपर हमर बेटीक नाम बसंत कुमारीसं वंदना कुमारी भेलनि। मास्टर साहेब बहुत अनुशासनप्रिय छलाह आ व्यवहारमे अदभुत शालीनता रखैत छलाह। ओहि ठामसं स्थानान्तरणक बादो बहुत बरख धरि पत्राचार होइत रहल। शाखामे किछु बरख पहिने शाखा प्रबंधक, कृषि सहायक आ चपरासी- तीनटा सदस्य बैंकसं बाहर भ’ गेल छलाह। ओहिमे सं एक गोटे (जे शाखा प्रबंधक छलाह ) दोसर कोनो नोकरी कर’ लगलाह, शेष दू गोटे उच्च न्यायालयमे अपील केने छलाह। केस चलि रहल छलै। ओहि सिलसिलामे एक बेर ओहि समयक बादक शाखा प्रबंधक आ ओहि समयमे नियंत्रक कार्यालय मुजफ्फरपुरमे स्थित ग्रामीण विकास विभागक अधिकारीक संग हमरो ( वर्तमान शाखा प्रबंधक ) पटना बजाओल गेल छल। दू सप्ताह धरि सी बी आइ एस.पी.ऑफिस, सी बी आइक ओकील साहेबक ऑफिस आ उच्च न्यायालय दौडय पडल रह्य। बहुत रास कागज सभ सेहो जमा करय पडल रहय। पता नहि ओकर परिणाम की भेलै। सी बी आइ ऑफिसमे सेहो अधिकारी लोकनिकें बड़ी-बड़ी राति धरि काज करैत देखने छलियनि। हमरो सभकें बहुत-बहुत राति धरि आ छुट्टीक दिन सेहो काज करबाक अभ्यास भ’ गेल छल। मुदा, शेष मिलानक काज तैयो संभव नहि भ’ पबैत छलैक। एक रविक’ ( २४ अगस्त १९८६) किछु काज करय बैसल रही। किछु और सदस्य छलाह। किछु कालक बाद पता चलल जे कोनो बाँध टूटि गेलै आ नेपालसं पानि आबि रहल छै। दूरसं पानिक आभास भ’ रहल छलै। जे सभ बैंक आएल छलाह, चलि गेलाह। हमरा मोनमे संकल्प भेल जे आइ टर्म लोनक बैलेंस मिलाइए क’ शाखासं जाएब। बीर बहादुरकें तीन सालक वाउचरक बंडल हमरा लग राखि देबय कहलिऐ आ भीतरसं गेट बन्द कए हम एसगरे लागि गेलहुँ शेष मिलान कर’। बैलेंस बुकमे एक तिमाहीक अंतिम तिथिक शेष उतारैत छलहुँ, टोटल करैत छलहुँ। जनरल लेजरसं मिलान करैत छलहुँ, अंतर नोट करैत छलहुँ। बहीक अनुसार जाहि-जाहि तिथिक’ डेबिट-क्रेडिट भेल रहै छलै, ओहि तिथिक वाउचर देखैत छलहुँ, जाहि दिन जे गलती देखाइत छल से नोट क’ लैत छलहुँ। एक तिमाहीमे भेल गलतीक समायोजन हेतु उपयुक्त वाउचर बना’ क’ देखैत छलहुँ। एहि गलती सबहक समायोजनसं बैलेंस मिलि जाइत छलै, तखन दोसर तिमाहीक लेल यैह प्रक्रिया अपनबैत छलहुँ। ऑफिसक पाछाँ सड़क छलै। सड़कपर चलैत लोक बाढ़िक स्थितिपर टिप्पणी करैत छल, जाहिसं स्थितिक पता चलैत छल। करीब तीन बजे हम हाथ धोबय गेलहुँ त रस्तापर पानि अबैत देखलिऐ। टिफ़िनमे जे अनने रही, से जलखैक’ क’ पुनः लागि गेलहुँ शेष मिलानमे। शेष मिलानमे आनन्द सेहो अबैत छै जखन गलती सभ पकडा जाइत छै आ शेष मिलान होमय लगैत छै । करीब साढ़े आठ बजे रातिमे तीन सालक बैलेंस मिलि गेल। बहुत ख़ुशी भेल। सावधि ऋणक बैलेंस मिललासं मांग ऋण आ डी आर आइ ऋणक बैलेंस सेहो मिलि गेलै। भीतरसं देखलिऐ पानि बैंकक हॉलमे प्रवेश करय बला छल। हम सभटा वाउचरकें ऊंच स्थानपर राखिक’ सुनिश्चित केलहुं जे कोनो बहुमूल्य चीज पानिमे नै भीजै। सडकपर भरि डांड पानि रहै। पैंट निकाललहुं, ब्रीफ़केसमे रखलहुं। गेट खोलि बाहरसं ताला लगाय ब्रीफ़केस हाथसं ऊपर उठाय जंघिया पहिरने सडकपर उतरि गेलहुँ। डांड धरि पानि छलै। डेरा पहुँचलहुं त देखलहुं डेरामे सेहो पानिक प्रवेश भ’ चुकल छल। भोजन पहिने बनि चुकल छल। फ्रेश भ’क’ भोजन क’क’ बड़ी राति धरि जगले रहै गेलहुँ। पानिक प्रकोप दू दिन धरि रहल मुदा बैलेंस मिलबाक ख़ुशी बहुत दिन धरि रहल, एखनो सोचिक’ आनन्द अबैत अछि। बाढ़ि लगभग सभ साल अबैत छलै। एक बेर सिवानसं अबैत रही। मोतिहारी पहुँचलहुं त पता चलल बाढिक कारणे आगूक रस्ता बन्द छै आ अनुमान छै जे चारि-पाँच दिन अहिना रह्तै। मोतिहारीमे बैंक शाखाक लग एकटा होटलमे टिकलहुं। चारि-पाँच दिन होटलमे पडल रहब ठीक नै लागल। ब्रांच गेलहुँ। शाखा प्रबंधककें कहलियनि जे हम होटलमे टिकल छी, अहाँकें कोनो काज लंबित हो त कहू हम क’ दैत छी। हुनका पेंशनराशिक पुनर्भुगतान प्राप्त करबाक लेल दाबा प्रस्तुत करबाक काज बहुत दिनसं लंबित रहनि। मुदा मंगनीमे हमरासं काज कराएब ठीक नै लगलनि। क्षेत्रीय प्रबंधककें फोनसं पुछ्लखिन। ओ आदेश द’ देलखिन। ओ स्टाफ हाजिरी-बहीमे हमर नाम लिखि देलखिन, हमर उपस्थिति बनल। माने हमरा छुट्टी नै लेब’ पडल। हम अपना शाखाक बदला मोतिहारी शाखामे काज केलहुं चारि दिन। शाखाक एकटा लंबित काज पूर्ण भ’ गेलै। हम चारि दिन बाद बस चल’ लगलै त मोतिहारीसं आदापुर चलि गेलहुँ। स्टेशन मास्टर छलाह डी के झा ( देव कान्त झा ) जे सीतामढ़ीक छलाह, मैथिलीयो बजै छलाह मुदा हिन्दीसं प्रेम छलनि। हिन्दीमे पहिने किछु-किछु लिखैत छलाह। दिनकर जीक कृति ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘उर्वशी’ आ ‘संस्कृति के चार अध्याय’क प्रशंसक छलाह। झाजीक ओत’ प्रो. हरीन्द्र हिमकर जीसं परिचय भेल जे रक्सौल कॉलेजमे हिन्दीक प्राध्यापक छलाह। हिमकर जीक एकटा बाल गीतक पोथी सेहो प्रकाशित भेल छलनि। हिनका लोकनिक संगतिमे हमरो साहित्यिक भोजन सेहो भेटि जाइत छल। हिन्दी दिवस अथवा आनो अवसरपर हिन्दीमे कवि गोष्ठी हुअ’ लागल। दिनकर स्मृति पर्व सेहो मनाओल गेल। हमरा शाखाक सदस्य सभ सेहो काव्य-पाठमे रूचि लैत छलाह। प्रमोदजी, वीरेंद्र जी, द्विवेदी जी सभ गोटे विभिन्न अवसरपर कोनो साहित्यिक रचना अवश्य सुनबैत छलाह। द्विवेदी जी गीत सेहो नीक गबैत छलाह। दुष्यन्त कुमारक किछु गजल सेहो ई सभ प्रस्तुत करैत छलाह। डी के झा जी आ हिमकर जीक संगतिमे हमहूँ दिनकर जीक कृति ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ आ ‘उर्वशी’क विषयमे बहुत किछु जानि सकलहुं। हिमकरजी बच्चा सभकें सेहो कविता पढनाइ आ मंच संचालन केनाइ सिखबैत छलाह। दिनकर स्मृति पर्वमे हमरा ओत’ शैलेन्द्रकें कहलथिन जे अहाँक नाम हम कार्यक्रममे द’ देने छी, अहूँकें एकटा कविता मंचपर पढ़’ पडत। शैलेन्द्र रश्मिरथीक चारिम कि पांचम सर्गक किछु भाग तैयार केलनि आ कार्यक्रम दिन जखन हिमकर जी शैलेन्द्रक नाम लेलखिन त मंचपर जाक’ खूब सुन्दर काव्य-पाठ केलनि। डी के झा जी सं वर्तमानमे सम्पर्क नै अछि। प्रो. हिमकर जीक रचना त फेस-बुकपर देखि लैत छी। बहुत नीक लगैए। आशा करैत छी झाजी सेहो अहिना कतहु भें ट भ’ जेताह। आदापुरसं किछु दूर बेलदरबा गाममे छलाह शिवजी बाबू। हारमोनियमपर सुन्दर भजन गबैत छलाह। हुनकर गाएल गीत ‘ भरत भाई, कपिसौं उरिन हम नाहीं’ एखनो मोन पडैत अछि। हुनकोसं सम्पर्क नहि राखि सकलहुं। सीतामढ़ीमे कतहु मोरारी बापूक कार्यक्रम भेल रहै। ‘राम बन गमन’ केर कैसेट उपलब्ध करौने छलाह ग्रामीण बैंकक शाखा प्रबंधक मिश्रजी। आह ! आनन्दक बरखा क’ दै छल ओ कैसेट। ओहि अवधिमे दूरदर्शनपर शुरू भेलै अत्यन्त लोकप्रिय धारावाहिक ‘रामायण’। बहुत गोटे ‘रामायण’ देखबाक लेल टी. वी. किनलनि। हमहूँ एकटा श्वेत-श्याम टी.वी. नेल्को किनलहुं। लगभग ओही समय ‘रामायण’पर आधारित ‘दीक्षा‘ आ अन्य अदभुत उपन्यास सभ एलनि नरेन्द्र कोह्लीक। बहुत प्रेरणा भेटल एहि तरहक उपन्यास सभ पढलासं। एहि अवधिमे हम मैथिलीमे कोनो नव रचना नहि क’ सकलहुं, पहिलुक लिखल एकटा रचना ‘एना गे सुगिया कतेक दिन रहबें’ मिथिला मिहिरमे जून १९८७ केर पहिल पक्षमे प्रकाशित भेल ( ‘मिथिला मिहिर’ पाक्षिक भ’ गेल रहै)। किछु नीक पोथी सभ पढबाक अवसर अवश्य भेटल। हमर अनुभव अछि जे तन-मनकें स्वस्थ राखक लेल नीक साहित्यक अध्ययन करैत रहबाक चाही। तन-मन स्वस्थ रह्य तखने नोकरी सेहो नीक जकाँ क’ सकैत छी आ पारिवारिक जिम्मेदारीक सेहो नीक जकाँ निर्वाह कएल जा सकैत अछि। नीक चिट्ठी सेहो नीक साहित्यक काज क’ सकैत अछि। सिवानसं प्रो. गंगानंद झाक एकटा पत्र भेटल : सीवान ३०.०४.८७ प्रिय ठाकुरजी, नमस्कार। पत्र भेटल, पत्र नहियों भेटलापर अहाँ स्मृतिसं विच्छिन्न नहि होइत छी। हमरा लोकनिक इच्छा रहैत अछि जे डिवीज़नल ऑफिस अयबाक प्रत्येक अवसरक उपयोग अहाँ अवश्य करी। उपर्युक्त पांती स्पष्ट क’ देने हएत जे अहाँ किएक महत्व रखैत छी। गंगानंद झा बिना ककरो आग्रहें, निस्संकोच मैथिलीमे लिखबाक प्रयास क’ रहल छथि, ई संभव भ’ गेल, जकर प्रमाण ई पत्र स्वयम अछि. अपन एहि लगनशील व्यक्तित्वक रक्षा अहाँ निश्चय करैत रहब जाहिसं परिवेश सकारात्मक तरीकासं प्रभावित हुए। ई बात प्रायः अहाँकें आकर्षित नहि करत जे एहि पत्रक पूर्वहु हम एक कथाक प्रसंगमे मैथिलीमे पत्राचार कयलहुं और हमर स्थिति हास्यास्पद नहि भेल. हमरा मोन पडैत अछि जे पृथ्वी राज कपूर अपना सम्बन्धमे कहैत छलाह जे हम हिन्दी नहि पढल रही, किन्तु तुलसी-जयन्तीक अवसरपर हमरा अध्यक्ष बना देल गेल. ओहि अवसरपर हमरा लागल जेना तुलसीदासक तस्वीर हमरा कहैत अछि जे अहाँ हिन्दी सीखू. तस्वीरसं,किताबसं सिखनाइ अपेक्षाकृत सोझ छै, ई नहि बुझि पडैत छै जे कियो हमरापर अपनाकें स्थापित करबाक प्रयास क’ रहल अछि. जीवित मनुष्य सेहो अपनासं उमेरमे छोट, एहन लोकसं सिखलापर अहम (ego) कें चोट लगै छै, तें लोक लोकसं नहि सीखि पबैत अछि. अहाँ एकरो संभव क’ देलिऐ, हमर अहमकें बिना आहत केने. अहाँ हमरा एक उपलब्धिसं युक्त करबामे सफल भेलहुँ. आब हमरा मैथिलीमे लिखैत काल ई संकोच बाधा नहि दैत अछि जे भाषा-व्याकरणक त्रुटिसं भरल अभिव्यक्ति हएत. हमर साधुवाद और धन्यवाद दुनू ग्रहण करब। अहाँ जीवन संग्रामक आह्वानक स्वीकार और अंगीकार करैत रहब परन्तु अपन व्यक्तिगत विशिष्टतासं साहित्यक माध्यमसं जीवन देवताकें आहुति दैत रही,एकरो प्रति सजग रही, से हमर अनुरोध और आकांक्षा. संसारमे क्षुद्रता बहुत छैक और क्षुद्रताक वृद्धिक अनुकूल परिवेशो बराबर भेटैत रहैत छैक, तें अपनामे यदि किछु उच्चता, विशिष्टता पबैत छी त ओकरा जिएबाक भरिसक कोशिश अवश्य करी. हमरा लोकनि ठीक-ठाक छी . कन्यादानक प्रयास सफलता मण्डित नहि भेल अछि. हम जुटल छी. अप्पू पटनेमे छथि.एहि सालक पटना प्रगतिशील लेखक संघक सम्मेलन कयने छलाह. पूर्ण रिपोर्ट एखन हमरो उपलब्ध नहि भेल अछि. बब्बू-बेबी स्वस्थानमे छथि. बसन्ती, मैथिली और बौआजी नीके छथि ने? हुनका सभकें तथा हुनका सबहक मायकें हमरा दुनूक आशीर्वाद कहबनि. आब अहाँ खुश छी ने? हमर ई मैथिलीक पत्र अहाँक अन्दर की प्रतिक्रिया उत्पन्न कयलक, जान’ चाहब. पत्र देब. शुभेच्छु गंगानंद झा. हम सौभाग्यशाली छी जे हमरा जगौने रखबाक लेल एहि तरहक संवादक प्रसाद एखनो धरि भेटैत आबि रहल अछि। मोन पडैत अछि रवीन्द्र नाथ टैगोरक गीतक ओ पांती : ‘ अहाँ हमरा जगौने रहू, हम नीक-नीक गीत सुनबैत रहब।’ साहित्यक काज होइत छैक जागल लोककें जगाक’ राखब। जागल लोककें सूति रहबाक बहुत सम्भावना बनल रहैत छैक। शहडोल ( मध्य प्रदेश )क पारस मिश्र जीक एकटा कविताक दू पांती मोन पडैत अछि : ‘अच्छे भले चले थे घर से लेकर नेक ईरादा लोग जाने क्यों हो गए अचानक बिकने पर आमादा लोग’ आदापुरमे एकटा और बैंक छलै। एकदिन ओहि बैंकक लिपिक एलाह आ हमरा कहलनि जे हमर शाखा प्रबंधक अंधा-धुंध लोन देने जा रहल छथि, हम बुझै छिऐ जे बहुत गलती क’ रहल छथि आ हमरासं वाउचर बनबा रहल छथि, हम नै चाहैत छी जे एहिमे हमहूँ शामिल होइ मुदा हमरा वाउचर बनयबा लेल ओ दबाब दैत छथि। हम कहलियनि जे किछु दिन पहिने हमरा भेटल छलाह आ कय बेर भेटल छलाह, हमरा हुनकामे कोनो आपत्तिजनक बात नहि बुझाएल छल। ओ कहलनि जे ई कलकत्ताक रह’बला छथि, एते दिन एसगर रहैत छलाह त ठीक छलाह, दू सप्ताह पहिने हिनक परिवार एलनि अछि, तकर बादे हिनक ई नव रूप प्रगट भेल छनि। हम कहलियनि जे अहाँक स्थानपर हम रहितहुं त अपन यूनियनक नेतासं एहि विषयमे उचित सलाह देब’ कहितियनि। ओ चलि गेलाह आ फेर की भेलै से हम नै बुझलिऐ। करीब दस दिनक बाद एक दिन स्टेशन मास्टर झा जी कहलनि जे हम त फेरीमे पड़ि गेल छी। झाजी कहलनि जे गाड़ी चल’ लगलै तखन ओ मैनेजर साहेब हमरा आगाँ एकटा तौलियामे बैंकक बहुत रास हस्ताक्षर कएल डॉक्यूमेंट राखिक’ ई कहैत गाड़ीपर चढि गेलाह : ‘ हमारा दिमाग खराब हो गया है,हम ईलाज कराने कलकत्ता जा रहे हैं, हमारे बैंक से कोई आएगा तो दे दीजिएगा।’ बादमे पता चलल जे नव शाखा प्रबंधक ओत’ आबि गेल छथि आ जांच चलि रहल छै। ओकर बाद की भेल हेतै से अनुमान कएल जा सकैत अछि। संतोषक बात यैह अछि जे बैंकमे एहि तरहक घटना-दुर्घटनाक प्रतिशत बहुत थोड़ होइत अछि। हमर पारिवारिक स्थिति : हमर स्वास्थ्य मोटा-मोटी सामान्य रहल। पत्नीकें यदा-कदा किछु चिकित्साक आवश्यकता पडैत छलनि। अधिक बेर ओतहि रामाश्रय बाबूक सलाह लैत छलहुँ, एक बेर दरभंगा डा.सत्यवती आ डा.ए.एम. झाक देख-रेखमे किछु दिन रहलीह। छोट भाय ललनजी आइ आइ बी एम पटनासं एम बी ए क’ क’ दिल्लीमे अपन जीविकाक तलाशमे लागि गेलाह, जत’ हमर छोट बहिन,बहिनो, दू टा भागिन आ एकटा भगिनी रहैत छलीह। रतनजी आर के कॉलेज मधुबनीसं आइ एस सी क’ क’ बी एस सी मे गेलाह। कहियोक’ आदापुर अबैत छलाह आ दू-चारि दिन रहिक’ चलि जाइत छलाह। बाबू दरभंगाक डॉक्टरक सलाहसं चलि रहल छलाह। बच्चा सबहक नाम चिल्ड्रेन स्कूलमे लिखाएल गेलनि। माएक स्वास्थ्य सेहो लगभग सामान्य रहलनि। हमर छोट भाए ललनजीक विवाह, लखनपट्टीमे हमर भगिनी कविताक विवाह आ हमर मामा गाममे हमर ममियौत बहिन मंजूक विवाह आदि शुभ अवसरक लेल विभिन्न काज सभ हुनका व्यस्त रखबाक लेल पर्याप्त छल। हम बैंकसं आवास-ऋण लेबाक हेतु मधुबनी-दरभंगामे कतहु उपयुक्त भूमि अथवा बनल आवासक खोज केलहुं। बाबूजी मधुबनीमे कय ठाम पता लगौलनि, मुदा जमीनक कागज ठीक-ठाक नै भेटलनि। दरभंगामे बेता चौक लग कोनो मकान बिकयबाक सूचना भेटल, मुदा ओ नीक नै लागल। गामपर धीरे-धीरे एकटा कोठली आ बाथ रूम बनेबाक मोन बनेलहुं। गामपर कोठलीयोसं बेशी जरूरी छल बाथ-रूम बनेबाक। किछु-किछुक’ एहि दिशामे प्रयास शुरू केलहुं। बच्ची किछु दिन आदापुर आ किछु दिन हमरा गाममे रहैत छलीह। शैलेन्द्र एक बेर गाममे रहथि त संगी सबहक संग खेलैत-दौड़ैत पडोसीक आंगनमे ऐंठारपर खसि पड़लाह। माथसं खून बह्य लगलनि। बाबू डिटोल आ टिंचरक उपयोग केलनि त खून बहनाइ बन्द भेलनि। भोला डॉक्टर लग ल’ जाइ गेलखिन। उपचार किछु दिन चललनि। हमरा शनि दिन ई समाचार बाबूक चिट्ठीसं प्राप्त भेल। बैंक बन्द भेलाक बाद चिट्ठी पढने रही। सभ गोटे चलि गेल छलाह। तुरंत गाम जेबाक मोन भ’ गेल। मुदा चावी लेबाक लेल कोनो अधिकारी उपलब्ध नै छलाह। निर्णय लेलहुं जे आइए जाएब आ काल्हि गामसं चलि देब। स्टेशनपर गाड़ी सीतामढ़ी जाए बला लागल छलै। ब्रीफ़केस लेलहुं, जल्दी-जल्दी बैंकक गेट बन्द केलहुं, स्टेशन पहुंचि टिकट ल’क’ गाड़ीमे चढलहुं कि गाड़ी चल’ लगलै जेना हमरे लेल रूकल छल होइ। सीतामढ़ीमे एकटा टैक्सी लेलहुं। साढ़े आठ बजे रातिमे घर पहुंचि गेलहुँ। शैलेन्द्रकें हंसैत-बजैत देखिक’ नीक लागल। दोसर दिन स्नान-भोजन क’ क’ मधुबनी गेलहुँ, सीतामढ़ी बला बससं सीतामढ़ी आ ओत’ सं ट्रेनसं आदापुर रातिमे पहुंचि गेलहुँ। ललनजीक विवाह : ललनजीक विवाहक लेल कन्यागत सभ बाबू लग गाममे पहुँचैत छलाह। किछु कथाकें ओ अपनहि लग निष्पादन क’ दैत छलाह, किछु कथाकें हमरा लग पठा दैत छलाह। हम चाहैत छलहुँ जे ललनजी स्वयं अपन विवाहमे निर्णय लेथि, मुदा एहि लेल ओ तैयार नै छलाह। कयटा प्रस्ताव कटि चुकल छल। एकरा लोक कहैत छैक जे जत’ नै लिखल छलै तत’ नै भेलै, भावी एखन नै एलैए। हम चाहैत रही जे हमर विवाह जेना भेल ताहिसं नीक जकाँ हिनक विवाह होनि। २९ अप्रैलक’ ११.३० बजे रातिमे दू गोटे आदापुर पहुँचलाह। कन्यागत छलाह कटैया (बेनीपट्टी)क डा.ताराकांत मिश्र जे दानापुर कॉलेजमे हिन्दीक प्राध्यापक छलाह। हुनका संग एक गोटे हुनके टोलक छलखिन जिनका लोक गांधीजी कहै छलनि, ओ हमर ससुरक भागिन छलखिन। दुनू गोटे कहलनि जे भोजन नै करब, भोजन क’ क’ आएल छी। कतबो कहलियनि, नै मानलंनि। दोसर दिन प्रोफेसर साहेबसं बहुत गप-शप भेल। हमरासं कथा स्वीकार करबाक अनुरोध करैत रहलाह। हुनकासं हम पुछलियनि जे अपनेकें ई कथा किए पसन्द अछि। ओ कहलनि, ‘हमरा मामाजीसं ( हमरा ससुर कें ओ मामा कहैत छलखिन)अहाँ सबहक विषयमे सभ बूझल अछि, हम हुनका संगे अहांक गामपर एक बेर गेलहुँ त सभसं पहिने अहाँक अनुजकें देखलियनि, दरबज्जापर छलाह, हमरा ओहो नीक लगलाह, हमर जेठ जमाए सेहो एम बी ए क’ क’ नीक नोकरीमे छथि, अहू दृष्टिसं हमरा ई कथा पसन्द अछि।’ मिथिलामे ओहि समय लडकी देखबाक परम्परा नै छलै। ई कतेक उचित आ कतेक अनुचित, एहि विषयपर बहुत गप्प भेल। विवाहमे भावी प्रवल होइछै, लोक कोनो आन माध्यमसं लडकीक विषयमे पता लगबैत अछि, कतेक ठाम लडकी देखयबाक क्रममे बहुत अनियमितता सेहो देखल जा रहल छै, एहि सभ विषयपर हमरा सबहक बीच गप्प भेल। हमर जिग्यासाक समाधान करबाक प्रयास केलनि प्रोफेसर साहेब। प्रोफेसर साहेब ईहो कहलनि जे शास्त्रमे लिखल छै जे तीन ठाम झूठ बजलासं पाप नै होइछै : जखन जानपर संकट हो तखन, कियो गायकें मार’ जाइत हो तखन आ कन्यादानक प्रसंगमे। ओ अपन विचार कहलनि जे लोककें परिवारकें प्रधानता देबाक चाही, परिवारसं संस्कारक पता चलैछै, संस्कारसं आगांक जेनरेशन प्रभावित होइछै। प्रोफेसर साहेब हमरासं बहुत बेशी अनुभवी छलाह, विचारवान छलाह, हमर सभ संदेह्क निराकरण करैत छलाह। हमरा ललनजी आ बाबूसं विचार करब आवश्यक लगैत छल तें हम किछु समय चाहैत छलहुँ। हमरासं ओ स्वीकारोक्ति चाहैत छलाह। हम कहलियनि जे एहि लेल हमरा किछु समय चाही। हम ‘हं’ नहि कहलियनि तें ओ हमरा डेरापर पानि आ चाहक अतिरिक्त किछुओ ग्रहण नै केलनि आ ३० क’ १.३० बजे बला ट्रेन पकडि लेलनि। हुनक संगे आएल गांधीजी रहि गेलाह। हमरा डेरापरसं हुनक भुखले जाएब हमरा बहुत कचोट देलक, मुदा हम बिना सभसं विचार केने कोना गछि लितियनि। गांधीजी चारि-पाँच दिन रहलाह। गांधीजी प्रोफेसर साहेबक कन्याक प्रशंसा करैत एक दिन बच्चीकें कहलखिन जे तोरासं सै गुणा नीक छै। गांधी जी प्रोफेसर साहेबक परिवारक सभ गोटेसं खूब नीक जकाँ परिचित छलाह, सबहक प्रशंसा जाधरि रहलाह, करैत रहलाह। गांधीजी हमरा ससुरक अपन भागिन छलखिन आ प्रोफेसर साहेबक निकटतम पडोसी छलखिन। ओहि समय अही तरहक लोकक माध्यमसं लोक कन्या आ कन्यागतक परिवारक विषयमे पता लगबैत छल। प्रत्यक्ष रूपसं पता लगेबाक परम्परा मैथिल ब्राह्मणमे नै छलै। कन्याक विवाहक लेल किछु झूठो बाजक आवश्यकता होइ त से करब लोक धर्म बुझैत छल। आ विवाह भ’ गेलाक बाद लोक एकरा भावीक बात मानि संतोष क’ लैत छल। हमर एकटा मित्र कहैत छलाह जे विवाहमे जौं किछु झूठ नै बाजल जाइ त एकोटा विवाह ठीक हएब असंभव भ’ जेतै। गांधीजी ४ मइ क’ चलि गेलाह। हम सभ किछु दिन धरि प्रोफेसर साहेब आ गांधीजीक बातक समीक्षा अपना स्तरसं करैत रहलहुं, फेर गाममे बाबूजी आ दिल्लीमे ललनजी आ ओझाजीसं सम्पर्क कय हुनका सबहक विचारसं ताल-मेल बैसयबाक प्रयास करय लगलहुं। एक दिन भोरे-भोर हमर ससुर एकटा सज्जनक संग पहुँचलाह। ट्रेन एबाक समय नहि छलै, तखन एते भोरे कोना एलाह, से पुछलियनि त कहलनि जे दुइए बजे रातिमे एलहुं, ओते रातिक’ जगाएब उचित नै लागल तें स्टेशनपर अखबार ओछाक’ सूति रहै गेलहुँ। ई जे कहलनि, से प्रोफेसर साहेबक सुपुत्र छलाह अशोक कुमार झा जे नागपुरमे कोलियरीमे इंजिनियर छलाह। हमरा सभकें परेशानी नै हो, से सोचिक’ रातिमे अखबार ओछाक’ स्टेशनपर रहि जाएब, ई सोचिक’ आ दू दिन धरि संगमे रहलापर हुनक आचार-विचार देखिक’ हम सभ हुनक बुद्धि आ विवेकसं ततेक प्रभावित भेलहुँ जे मोने मोन हम हुनक प्रस्तावक स्वीकृति द’ देलियनि। हमरा लागल जे एहि परिवारक धिया-पूता सभ अवश्य नीक संस्कारसं युक्त हेथिन आ विवाहमे एहि पक्षकें प्रधानता देबाक चाही। अशोक जीक विचार भेलनि जे दानापुर हुनका घरपर चलिक’ कन्याक निरीक्षण क’ लेल जाए। ओ कहलनि, ‘हमरा विश्वास अछि जे अहाँकें अवश्य पसन्द भ’ जाएत, आ यदि नै पसन्द भेल त अहाँ एकरा रिजेक्ट क’ सकै छी, हम सभ मानि लेब जे एत’ लिखल नै छलै, हम सभ दोसर ठाम प्रयास करब।’ अशोक बाबूक प्रस्ताव सूनि हमरा मोनमे दू टा ओकील अपन-अपन तर्क देब’ लागल : ‘मैथिल ब्राह्मण समाजमे एना कतहु सुनलिऐए? लड़कीकें कोनो सार्वजनिक स्थानपर देखबाक कार्यक्रम बनाउ।’ ‘घरपर गेलासं किछु और जानकारी प्राप्त भ’ सकैए, सार्वजनिक स्थानपर देखलासं और की बुझबै?’ ‘अहाँ लड़का बला छी, अहाँ किए जेबनि हुनका ओत’? हुनका जत’ जै बेर बजेबनि, हुनका आब’ पडतनि।’ ‘हमरो जाहि घरसं लडकी अनबाक अछि, से देखबाक चाही ने? ओ तीन बेर हरान भेलाहए, एको बेर हमरो सभकें कष्ट करक चाही ने?’ अशोक बाबूक जीत भेलनि। हम तीनू गोटे दानापुरस्थित मिथिला कॉलोनीमे प्रोफेसर साहेबक अपन आवासपर छलहुँ। शैलकें देखलियनि। ऊंचाइक दृष्टिसं जोड़ी बेमेल हएत, से साफ़ बुझाएल। चर्चा भेल। प्रोफेसर साहेब, इंजिनियर साहेब सभ गोटे कतेक उदाहरण द्वारा एहि अन्तरकें सामान्य अंतर मानैत एहि बातकें ओतेक महत्व नहि देबाक अनुरोध केलनि। अशोक बाबू हमरा संतुलित करबाक लेल एक बेर फेर देखौलनि मुदा हमर राय वैह रहल। हमरा मोनक भीतर दूटा ओकील फेर जिरह कर’ लागल। ‘लोक देखतै त अहींकें दोख देत।‘ ‘बुद्धि-विवेक नमहर रहक चाही।’ ‘आ जौं ओहो छोटे होइन तखन?’ ‘एना भइए ने सकै छै, ककरोमे ने सभटा गुणे रहैत छै, ने सभटा अवगुणे रहैत छै।’ ‘एहेन जोड़ी ककरो देखलिऐए?’ ‘अवश्य, गामोमे कय गोटे छथि।’ ‘धोखामे भ’ जाइ छै तकर छोडू, देखि-सूनिक’ कियो एना करै छै?’ ‘अवश्य।’ ‘उदाहरण?’ ‘महानायक अमिताभ बच्चन आ जया भादुड़ी।’ विरोधी पक्ष हारि गेल। ‘अपने कोना कर’ चाहैत छी?’ हम स्वीकारक स्वरमे पुछलियनि। तकर बाद पाँच मिनटमे सभ बात तय भ’ गेल। पंडित जी बजाओल गेलाह। दिन तकाओल गेल। तय भेल २४ मइ। पैंतीसटा वरियाती। खान –पीन ख़तम। जे बर-वरियाती आन’ जेताह, हुनकहिसं खान-पीन मानल जाएत। २४ मइक’ सलमपुरसं वरियाती दानापुर आएल। शुभ-शुभक’ विवाह भेलै। आइ प्रोफेसर साहेब नै छथि, इंजिनियर साहेब छथि, हुनक सुपुत्र सेहो नीक इंजिनियर छथिन । शैल आ ललनजीकें एकटा पुत्र आ एकटा पुत्री छथिन। रश्मि आ शुभमकें देखिक’ लगैत अछि जे निर्णय सही छल। आदापुरमे तीन साल पूर्ण होमय जा रहल छल त ई सोचलहुं जे लगातार तीन सालसं बेशी लोककें शाखा प्रबंधकक कुरसीपर नै बैसबाक चाही। तीन साल पूर्ण भेलापर फेर कोनो शाखाक प्रबंधक बना देल जाएत। डिवीज़नल ऑफिस गेल रही कोनो मीटिंगमे त पता चलल जे मध्यम शाखा पचरुखीमे लेखापाल ( एम )क पोस्ट खाली छै, हम तुरंत ओत’ अनुरोधपर स्थानान्तरण लेल आवेदन पठा देलिऐ। स्थानान्तरण आदेश प्राप्त भेल। छपरा शाखासं आएल अशोक कुमार जीकें शाखाक कार्य-भार सौंपिक’ १७ जनवरी (१९८९) क’ शाखासं भार मुक्त भए पचरुखी शाखामे लेखापाल ( मध्यम शाखा ) बनबाक लेल आदापुरसं १८ क’ विदा भ’ गेलहुँ। पटना / ३०.०९.२०२१ (२०) गोली-बारूदक मौसममे हम १८ .०१.१९८९ क’ साँझमे सीवान आबि गेलहुं आ बैंकसं सटले राज होटलमे टिकलहुं। १९ क’ जीपसं पचरुखी गेलहुँ आ शाखामे योगदान केलहुं। शाखा प्रबंधक छलाह आर. एन. मिश्र जी। और सदस्य सभ जे ताहि समयमे छलाह अथवा बाद मे एलाह से छलाह : पी.दुबे ,ए. के. सहाय, मो.आलम,जे.बी. उपाध्याय, ओम प्रकाश स्वर्णकार,एस.के.तिवारी, आर. एम. प्रसाद आ मोहन राम। ७ अगस्त ९१ क’ तीनटा नव लिपिक एलाह : चन्द्रमा मांझी, जमादार मांझी आ राजेन्द्र दास। बाद मे एकटा अधिकारी एलाह एस.डी.राम। आर.एन.मिश्र जीक ट्रान्सफरक बाद किछुए दिन लेल एलाह एस.बी.तिवारीजी आ हुनका बाद १९.०२.९१ क’एलाह जनार्दन मिश्र जी। शाखामे ऋण आवेदन सबहक निष्पादन हेतु क्षेत्रीय कार्यालयक आदेश पर ए.एफ.ओ. रामजीत सिंह जी किछु दिन लेल एलाह। ई शाखा बहुत दृष्टिसं नीक छल मुदा अहू ठाम बैलेंसिंगबला समस्या छलै, आइ.आर.डी.पी. मे तीनटा लेजर छलै आ जून १९८४ तक बैलेंसक मिलान भेल छलै, फसल ऋणक दूटा लेजर छलै आ जून १९८२ तक बैलेंसक मिलान भेल छलै। ई दुनू पहिने मिलयबाक प्रयास केलहुं। १० मार्च तक फसल ऋणक शेष मिलान दिसम्बर १९८८ तक भ’ गेल। आइ.आर.डी.पी. बहीक मिलान दिसम्बर १९८४ तक भेल। सभ गोटेक सहयोगसं बही मिलान स्थितिकें क्रमशः नीक सं नीक बनयबाक प्रयास करैत रहलहुं। बचत खातामे ३३ आ सावधि जमामे १० टा लेजर छलै। पेंशनक काज सेहो बहुत छलै। सीवानसं लगभग १० किलोमीटरपर पचरुखी शाखा छलै, हम सीवानमे आवास राखक लेल क्षेत्रीय प्रबंधकक अनुमति हेतु आवेदन पठा देलिए। प्रतिदिन सीवानसं पचरुखी जाए लगलहुं। साँझमे घुरिक’ सीवानमे राज होटल पहुंचि जाइ छलहुँ। सीवानमे पाँच साल रहि चुकल छलहुँ, बहुत गोटे पूर्व परिचित छलाह। डी ए वी कॉलेज सीवानक प्राध्यापक डा. अमर नाथ टाकुर, प्रो. गंगानंद झा, आर एन चौधरी आ ओकील साहेब सुभाष्कर पाण्डेयजी सभ गोटेकें डेरा तकबामे सहयोग हेतु कहि देलियनि आ निश्चिन्त छलहुँ जे डेरा जल्दिए कतहु अवश्य भेटत। यैह सोचिक’ परिवार संगे आबि गेल छलहुँ। चारि-पाँच दिन भ’ गेल छल। कतहुसं कोनो डेराक पता नहि भेटल छल। एक दिन सबेरे होटलक बालकोनीसं नीचां तकलहुं त बाबूकें देखलियनि चल अबैत, आश्चर्य भेल, कत’ सं आबि रहल छथि एते सबेरे, नीचां जाक’ हाथसं सामान सभ ल’ लेलियनि आ हुनका संगे ऊपर गेलहुँ। गप-शप भेल त पता चलल, तिला संक्रान्तिक किछु सनेश ल’क’ ट्रेनसं आदापुर एलाह, ओत’ पता चललनि जे हम सीवान चल गेलहुँ। आदापुर शाखाक ए एफ ओ द्विवेदीजी हुनका अपना घरपर रक्सौल ल’ गेलखिन, ओत’ एकदिन राखिक’ बस पर चढ़ा देलखिन आ कहलखिन जे बैंक लग जाक’ होटलमे अथवा बैंक शाखामे पता करबै त भेंट भ’ जेताह। बस स्टैंडसं पता लगाक’ बैंक लग आबि गेल छलाह त हम देखि लेलियनि। बाबू एलाह त’ रस्तेसं हमर डेरा ठीक केने एलाह। जेबीमे सं एकटा कागजक टुकड़ी निकाललनि, कहलनि जे ई सज्जन रक्सौलसं हमरा संगे बसमे एलाहे आ कहलनिहें जे हमर डेरा बैंकक लगेमे अछि आ हमहूँ कोनो बैंके स्टाफकें मकान भाड़ापर देब’ चाहैत छी। किछु काल बाद ठाकुरजी एलाह त कहलनि जे हम जनैत छियनि रामचंद्र सिंहकें, चलू ने एखने चलैत छी। सभ गोटे गेलहुँ। घर देखलिऐ, शास्त्री नगरमे काली मन्दिरसं कनिएँ दूरपर सड़कक कातेमे। राम चन्द्र सिंह जी सं भेंट भेल, गप भेल, डेरा ठीक भ’ गेल। हम सभ गोटे होटल छोड़ि डेरामे आबि गेलहुँ। स्टोव संगमे अनने रही, एकटा डेकची आ किछु थारी-बाटी-गिलास सेहो रह्य, डेरामे भोजन बनाएब शुरू भ’ गेल। डेरामे एकटा कमी छलै। कम वोल्टेज रहबाक कारणे पानि सदिखन ऊपर नै चढ़ि पबैत छलै, सबेरे एक बेर ऊपर आबि जाइत छलै। तें नहाए बला पानि स्टोर क’क’ रखबाक लेल बाबूक संगे जाक’ एकटा बड़का ड्रम किनलहुं आ एकटा पाइप सेहो। ड्रम लेल ढक्कन बनबौलहुं। बाबू किछु दिन रहिक’ गाम वापस चल गेलाह। हम सभ १४ फरबरीक’ आदापुरसं ट्रकमे सामान सभ ल’क’ सीवानक डेरामे चलि एलहुं। आदापुरसं चलबासं पहिने द्विवेदीजीक बहुत आग्रहक कारण रक्सौलमे हुनका घरमे चारि दिन पहुनाइ कर’ पडल,से बहुत नीक लागल। जहिया सीवान सभ गोटे सभ सामान ल’क’ एलहुं, ओही दिन रातिमे ओकील साहेब सुभाष्कर पाण्डेय जीक प्रथम पुत्रीक विवाहक उत्सवमे सभ गोटे शामिल भेलहुँ। वसन्त आ मैथिलीक नाम राजवंशी बालिका उच्च विद्यालयमे आ शैलेन्द्रक नाम सरस्वती शिशु मन्दिरमे लिखाएल गेलनि। आब शैलेन्द्र भ’ गेलाह विवेक आनन्द। सीवानमे क्षेत्रीय कार्यालय हमरा डेराक बहुत लग छल। ओत’ राजभाषा अधिकारी कर्णजी आ सुरक्षा अधिकारी मिश्र जी सं निकटता भेल। कर्ण जी और मिश्र जी दुनू गोटे दू यूनियनक सदस्य छलाह मुदा दुनू गोटेमे अदभुत सामंजस्य छलनि । हम दोसर यूनियनक सदस्य छलहुँ, हमरापर कर्णजीक सहयोगसं यूनियन बदलबाक लेल बहुत दबाब पडल आ कर्णजी ई कहिक’ एकर समापन केलनि जे ई दबाबपर एक मकानक किराया दू आदमीकें दैबला लोक छथि, तें हिनका दिक नै करै जैयनु। मिश्र जी सभकें भोरे जगबाक आ टहलबाक अभ्यास लगौलनि। अपना डेरासं अबैत छलाह , रस्तामे जकर-जकर डेरा छलै, सभकें जगबैत संग क’ क’ वी. एम. एच . ई. स्कूलक मैदानमे ल’ जाइत छलाह। ओत’ सभकें व्यायाम करबैत छलाह। हमरो भोरे जगबाक आ व्यायाम करबाक अभ्यास लागल। मिश्र जी साहित्यिक अभिरूचि सेहो रखैत छलाह। अपन आवासमे दिनकर स्मृति संध्या २३ सितम्बरक’ मनबैत छलाह।साहित्यिक गोष्ठी सभमे उपस्थित होइत छलाह आ भाग लैत छलाह। हमर साहित्यिक क्रिया कलाप : एहि बेर सीवानमे हमर साहित्यिक गतिविधि सीमित रहल। कॉलेजक पूर्व परिचित प्राध्यापक लोकनिसं सम्पर्क बनल रहल। आदरणीय प्रो. गंगा नन्द झाक सलाहसं बंगला लेखक आशापूर्ण देवीक प्रथम प्रतिश्रुति,सुवर्ण लता आ बकुल कथा, शंकरक ए पार बांगला ओ पार बांगला, सीमाबद्ध आ विमल मित्रक इकाई दहाई सैकड़ा आ खरीदी कौड़ियों के मोल पढलहुं। एकर अतिरिक्त हरिवंश राय बच्चन, दिनकर आ नागार्जुनक किछु पोथी सेहो पढलहुं। ओशोक किछु पोथी सेहो पढलहुं। ओशो टाइम्स पत्रिका सेहो पढैत छलहुँ। १९९२मे २६ जनबरी क’ सीवान क्लब द्वारा आयोजित कवि सम्मलेनमे, २३फरबरीक’ डी ए वी कॉलेजमे आयोजित कवि सम्मेलनमे आ शास्त्री जयन्तीक अवसरपर २ अक्टूबरक’ सीवानक मिडिल स्कूलक प्रांगणमे आयोजित कवि सम्मलेनमे किछु मैथिली आ हिन्दीक रचना प्रस्तुत केलहुं। क्लबक कार्यक्रममे क्षेत्रीय कार्यालयक सुरक्षा अधिकारी, हरि शंकर मिश्र जी सेहो नजरुल इस्लामक रचना ‘विद्रोही’क पाठ बहुत सुन्दर केने छलाह। कतहु साहित्यिक कार्यक्रम होइत छलै, त अवश्य जाइत छलहुँ। १९९२ मे २६ जनवरी क’ पचरुखी मे इप्टाक नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ देखलहुं। २८ जनवरीक’ सीवानमे इप्टा द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’ बहुत नीक लागल। एहि साल ९-१० नवम्बर क’ पटनामे विद्यापति पर्वक अवसरपर सियाराम झा ‘सरस’ सं हुनक किछु रचना सुनलहुं, ‘डिगरी भ’ गेलै झुनझूना साढ़े छबे आनामे’ नीक लागल रह्य।ई रचना ओहि समयमे बिहारमे शिक्षा आ परीक्षाक स्थितिक पोल खोलैत छल। सीवान मे कवि सम्मेलन आ मुशायरा देखब नीक लगैत छल। एक बेर तंग इनायतपुरी( जे असलमे श्रीवास्तव छलाह )क संग डेरापर बैसार भेल। ओ एकटा पांती देलनि : ‘लोग पहचाने गए हैं काम से किरदार से’ एहि पांतीकें ल’क’ एकटा गजल तैयार करबाक लेल कहलनि। हम तैयार त केलहुं,मुदा ओहिसं अपनो संतुष्टि नै भेल। हम गजल लिखबाक कोशिश त करै छलहुं, मुदा गजलक व्याकरणक ज्ञान नै भ’ सकल छल। बच्चन जीक ‘मधुशाला’ बहुत पहिने पढने रही आ ‘की भेटल आ की हेरा गेल’ –आत्म गीत लिखबाक विचार मोनमे आएल छल, ताहि लेल किछु पहिनहुं लिखने रही आ किछु अहू समयमे लिखलहुं। ओहि समय बिहारक जे स्थिति रहै, ताहिपर हमरासं एकटा रचना लिखाएल जे बादमे मैथिली पत्रिका ‘भारती मंडन’ मे प्रकाशित भेल : गीत गोली बारूदक मौसममे हम कविता केहेन सुनाबी हाल देखि बेहाल भेल छी, गीत कोनाक’ गाबी? गाम-गाम आ शहर-शहरमे आतंकक अछि छाया ठोहि पारिक’ कानि रहल अछि गौतम बुद्धक काया शब्द-शब्दमे चिनगी-चिनगी, शब्द-शब्दमे धधरा अपनहि घर हम जरा रहल छी अप्पन-अप्पन बखरा गामक गाम जरैए धह-धह ककरा कोना बचाबी एहेन हालमे कानि सकै छी, गीत कोनाक’ गाबी? टूटल सरस्वती केर वीणा केर संगीतक धारा मनुखक छुद्र स्वार्थ पर कनइत अछि विज्ञान बेचारा पत्रहीन सभ गाछ नग्न अछि जेम्हरे देखू तेम्हर कत’ अलोपित भेल गामसं बरक गाछ झमटगर थाकल-हारल लोक सोचैए कत’ कने सुस्ताबी एहेन हालमे अहीं कहू त गीत कोनाक’ गाबी? बेर-बेर उठबैए हाबा एखनहु वैह सवाल बुद्ध –महावीरक ई धरती एहेन किए कंगाल द्रोण -भीष्मकेर चुप्पी आ धृतराष्ट्रक कुत्सित सपना बेर-बेर दोहराएल जाइत अछि लाक्षागृह केर घटना उचित यैह जे आमक खातिर आमक गाछ लगाबी चलै-चलू हम सभ हिलि-मिलिक’ अपन बिहार बचाबी। शिशवा गामक महादेव ठाकुर हारमोनियमपर नीक गीत गबैत छलाह, हमरासं किछु गीत लिखबौने छलाह, करीब दसटा गीतक कैसेट बनबौलनि, एकटा प्रति हमरो देलनि। ओहिमे निम्नलिखित गीत सभ छल : ‘आउ आइ हम सभ हिलि मिलिक’ मांक उतारी आरती’ ‘एना गे सुगिया कतेक दिन रहबें’ ‘बौआ बनि गेल नेता दाढ़ी बढ़ाक’ ‘आइ धरतियो लगैछ नव कनियाँ जेना’ ‘सजाउ हे यै बहिना, मैथिलीक प्रतिमा सजाउ’ ‘आजुक राति कथीले’ रे भैया, आजुक राति कथीले’ ‘छोटे-मोटे टूटल मडैयामे गौरी कोनाक’ रहती हे’ आ किछु और गीत। बादमे स्थानान्तरणपर बिहारसं बाहर जेबाक कारणे ने शशिकान्तजी-सुधाकान्तजीसं सम्पर्क राखि सकलहुं ने महादेवजीसं। रामचंद्र बाबूक मकानमे : मकान फ़ैल छलै, एकेटा कमी छलै, पानिक व्यवस्था नियमित नहि छलै, जाहि कारण असुविधा होइत छल तथापि एहि बेर सीवानमे जाधरि रहलहुं, अही मकानमे रहलहुं। द्विरागमनक बाद एक बेर किछु दिन एहि ठाम हमर अनुज ललनजी सपत्नी रहलाह। एक बेर दू सप्ताह लेल हमर ससुर आ डुमरा बला साढू पत्नी आ छोट बालक नीरजक संग रहलाह। ओहि समय हम सभ स्नान करबाक लेल विशेष उपाय करैत छलहुँ। सड़कक पच्छिम प्रथम तलपर हमर आवास छल आ सडकक पूब अवकाशप्राप्त प्राचार्य महेन्द्र बाबूक पैघ हातामे एकटा इनार छलै, आदमी बढलापर पुरुष लोकनि स्नान करबाक लेल ओहि इनारपर जाइत छलाह। ओहि हातामे एकटा चापा कल सेहो छलै, हम अधिक काल चापा कलक उपयोग करैत छलहुँ। एक बेर पटनासं मामा सेहो सपरिवार दस दिन लेल एलाह आ जेना-तेना काज चलि गेल। पान आ तमाकुल : सीवानमे पान बहुत खाए लगलहुं। काली मन्दिर लग पानक दोकान तेहेन सुन्दर पान खुअबैत छलै जे बेर-बेर खेबाक लेल प्रेरित करै छलै। दिन-दिन आदति पुष्ट भेल जा रहल छल। क्षेत्रीय कार्यालयक सुरक्षा अधिकारी लोकक स्वास्थ्यक सेहो चिन्ता करैत छलाह। ओ कय बेर कहैत छलाह पान छोडि देबाक लेल। एक बेर बहुत दृढ़ संकल्प ल’क’ छोडि देबाक निर्णय लेलहुं आ पान खाएब छोडि देलहुं, मुदा मोन विचलित होमय लागल। मोनकें ठकबाक लेल तमाकुल कखनोक’ खाए लगलहुं। मुदा मोन कनीसं मानैत नै छल , तकर परिणाम भेल जे जेना पहिने पान खाइ छलहुँ, तहिना तमाकुल खाए लगलहुं। ई और खतरनाक छल। एक दिन प्रो. गंगा नन्द झाजी कहलनि, ‘अहाँसं शिकायत अछि, अहाँ पान खाएब छोडि देलहुं त तमाकुल किए खाए लगलहुं।’ हम बहुत गंभीरतासं विचार करैत एक दिन तमाकुल सेहो छोडि देलहुं। तमाकुलक सेवन हमर पूर्वज सभ सेहो केने छलाह। हमरा टोलमे एक-दू घर छोडिक’ सभ घरमे जवान आ बूढ़ लोक सभ द्वारा तमाकुलक सेवन चलैत छल। हमर बाबा (दादा) सेहो अपने बाड़ीमे तमाकुल उपजबैत छलाह, ओकरा सरियाक’ रखैत छलाह आ साल भरि ओकर सेवन करैत छलाह। बाबू कलकत्तासं एलाह त ओहो एकर सेवन करय लगलाह। हम बी.एस.सी. पार्ट एक तक पान-सुपारी-तमाकुलसं दूर रहैत छलहुं। ढोली एग्रीकल्चर कॉलेजमे एक बेर एक संगीक जोरपर सिगरेट मुंहमे लेलहुं, मुदा चक्कर जकाँ आबि गेल। ओही दिन सिगरेटसं मुक्ति भेटि गेल। बहुत पहिने एक बेर रातिमे हमरा दांतमे दर्द उठल। बेचैन भेलहुँ। रातिमे और कोनो उपाय नहि देखि हमर पिता कनी तमाकुल चुनाक’ देलनि आ कहलनि जत’ दर्द करैछह ओत’ राखि दहक। हमरा तेहेन निशा लागल जे सबेरे तक सूतल रहि गेलहुँ। तकरा बाद बहुत दिन धरि ने दांतमे दर्द भेल आ ने तमाकुल दिस तकबाक हिम्मति भेल। बादमे जखन कखनो दांतमे दर्द हुए त हम तमाकुलक उपयोग करय लगलहुं। धीरे-धीरे पानक विकल्प तमाकुल आ तमाकुलक विकल्प पान भ’ गेल। क्यो एकर अधलाह पक्ष दिस सचेत नहि क’ सकलाह। बहुत दिन बाद मिश्र जी आ प्रो. गंगानंद झा एहेन लोक भेटलाह जे पान आ तमाकुलसं मुक्तिक लेल प्रेरित केलनि आ हम अपनापर नियंत्रण क’ सकलहुं। किछु दिन त निमाहि लेलहुं, मुदा एकटा सम्बन्धी एलाह आ कहलनि जे एक-दू बेर खेबामे हर्ज नै छै, ओ खाइत छलाह, हमरासं ओ प्रभावित नहि भेलाह, हमहीं हुनक प्रभावमे आबि गेलहुं आ कखनो-कखनोक’ लेब’ लगलहुं। धीरे-धीरे फेर पूर्ववत तमाकुलक अधीन भ’ गेलहुँ। एहिसं मुक्तिक लेल आवश्यक मंत्र तकबामे चौदह बरख लागि गेल। जबलपुर पहुंचलापर कारगर मंत्र भेटल जे एक संग पान, तमाकुल, माछ-मांस, पियाजु-लहसुन सभसं मुक्ति दिया देलक। ओहि मंत्रक चर्चा आगाँ समय एलापर करब। देश आ प्रान्तक राजनीति : १९८९ मे २ दिसम्बरक’ केन्द्रमे राष्ट्रीय मोर्चाक सरकारमे विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधान मन्त्री भेलाह। १९९० मे ७ अगस्तक’ प्रधानमन्त्री द्वारा मंडल आयोगक अनुशंसाकें क्रियान्वित करबाक घोषणा भेल। एहि घोषणाक विरोधमे पूरा देशमे छात्र-आन्दोलन शुरू भ’ गेल , कतेक युवक द्वारा आत्मदाहक घोषणा हुअ’ लागल। २५ सितम्बरक’ अयोध्यामे विवादास्पद बाबरी मस्जिद –राम जन्मभूमिपर मन्दिर निर्माण हेतु भाजपाध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा गुजरातमे सोमनाथ मन्दिरसं रथ-यात्रा आरम्भ भेल। २३ अक्टूबरक’ लाल कृष्ण आडवानीकें समस्तीपुरमे गिरफ्तार क’ लेल गेलनि, भाजपा राष्ट्रीय मोर्चा सरकारसं समर्थन वापस ल’ लेलक आ ७ नवम्बरक’ राष्ट्रीय मोर्चा सरकार खसि पड़लै। १९९१मे २१ मइक’ राजीव गांधी बमसं मारल गेलाह, २१ जूनक’ पी. वी, नरसिंहा राव प्रधान मन्त्री भेलाह। बिहारक स्थिति दयनीय भ’ गेल छल। जे सरकार छलै से सरकार लेल छलै। अशान्ति आ असुरक्षाक वातावरण उपस्थित छलै। सीवानमे ई स्थिति बेशी कष्टकर भ’ गेल छलै।शिक्षाक मन्दिर सभ अनाथ जकाँ भ’ गेल छल। स्थिति एतेक जबदाह भ’ गेल छलै जे पीड़ित लोक अस्पताल जेबासं, लोक लोकक जिज्ञासामे जेबासं आ अखबार सभ सही बात लोकक सोझाँ अनबासं डेराइत छल। आर्यावर्त, इंडियन नेशन बन्द भ’ गेल छल। माटि-पानि सेहो बन्द भ’ गेल छल। सरकार द्वारा लोक सेवा आयोगसं मैथिली विषयकें हटा देल गेल। राज्यमे विरोधक स्वर दबल रहल। असामान्य स्थितिक प्रभाव बैंक सभपर नहि छलै, तथापि सीवानक हवा विषाक्त लगैत छल। तैपर बिजलीक संकट आ ओहि सं उत्पन्न अनेक असुविधा बेर-बेर ई सोचबापर विवश क’ रहल छल जे कतहु एहेन ठाम स्थानान्तरण होइत जत’ बिजली सदिखन रहैत होइ आ वातावरणमे शान्ति होइ। पारिवारिक स्थिति : परिवार तीन ठाम भ’ गेल छल, गाममे माए-बाबू छलाह, सीवानमे हम पाँच गोटे छलहुँ आ दिल्लीमे अनुज ललनजी आ रतनजी छलाह। बादमे ललनजीक पत्नी सेहो पहुँचलखिन। हम गामपर एकटा बाथ रूमक आवश्यकताक अनुभव करैत छलहुँ, से ललनजीक द्विरागमनसं पूर्व भ’ गेल, दूटा कोठली सेहो हुनक द्विरागमनसं पहिने बनबाओल गेल।एहि लेल बैंकसं ऋण सेहो लेब’ पडल। ललनजी दिल्लीमे आजादपुर मंडीमे काज पकडलनि। बहुत दिन धरि ओत’ एसगरे रहलाह। रतनजी बी एस सी फिजिक्स प्रतिष्ठामे प्रथम श्रेणीमे उतीर्ण भेलाह। बाबूक विचार छलनि जे एम एस सी सेहो क’ लेथि, मुदा हुनका दिल्लीमे जीविकोपार्जन दिस ध्यान छलनि। माए आ बाबू बेरा -बेरी अस्वस्थ रहैत गेलाह। बाबू मधुबनीमे डा.के. के. मिश्रसं देखौलनि, २५ दिनमे किछु लाभ नै भेलनि त दरभंगा जाक’ डा. आर.बी.ठाकुरसं देखौलनि। माएकें सूतलमे कोनो जंतु पैरमे नछोरि लेलकनि, इलाज भेलनि। माए ठीक भेलीह त बाबू दुखित पडलाह। १९९२ के सितम्बरमे रतनजी एक बेर पटना मे कोनो परीक्षा दैत गाम गेलाह त बाबूक स्वास्थ्य ठीक नै लगलनि, १६ सितम्बर क’ हुनका नेने दिल्ली चल गेलाह। दिल्लीमे बाबू हमर सभसं छोट बहिन-बहिनोक घरमे रहलाह। ललनजी आ रतनजी सेहो लगेमे रहैत छलखिन। ललनजी किछु मास एसगरे रहलाह,किछु दिन दुनू गोटे बहिन-बहिनो ओत’ रहलाह आ फेर बादमे शैल संगे आदर्श नगर बला मियानीमे रह’ लगलाह। पटेल अस्पतालक डा. पालसं बाबूक इलाज शुरू भेलनि, एकटा आयुर्वेदक आ एकटा यूनानी डा.सं सेहो सम्पर्क कएल गेल। बाबू किछु मास दिल्लीमे रहिक’ स्वस्थ भ’क’ गाम घुरलाह। दिल्लीमे रतनजी सेहो पीलियाक शिकार भेल छलाह। सीवानमे एक राति बच्चीकें बिच्छू डंक मारि देलकनि। डॉक्टरसं देखब’ पडलनि, दबाइ खाए पडलनि। मैथिलीकें एक बेर भरल गमला पैरपर खसि पडलनि। एक बेर माता निकलि गेलखिन। विवेक सेहो अस्वस्थ भेलाह। दरभंगाक डा. वीरेंद्र प्रसादक इलाजमे आ बादमे सीवानमे डा. डी. एन. श्रीवास्तवक इलाजमे रहलाह। हमरा सेहो बोखार भेल, मिश्रजीक सलाहपर डा.निजामुल हसनसं सम्पर्क केलहुं। कहलनि फैलेरिअल फीवर अछि,पन्द्रह दिन दबाइ खाए पडल। हमरा डेराक बगलमे एकटा आँखिक विशेषज्ञ एलाह डा. लाल बहादुर सिंह, हुनकासं आँखिक जांच कराय चश्माक उपयोग करय लगलहुं। परम्परा आ आधुनिकताक समन्वय : अही अवधिमे १९९० मे प्रो.गंगा नन्द झाजीक दुनू बालकक विवाह भेलनि। हमरा सभसं सभ बातक चर्च करैत छलाह। हुनक जेठ बालकक विवाह १ फरबरीक’ जमालपुरमे भेलनि जाहि ठाम वरियातीमे सीवानसं डा.अमर नाथ ठाकुर जीक संग हमहूँ गेल रही। ओहि वरियातीमे किछु विशेषताक संग परम्परागत विवाह जेना मधुबनी-दरभंगाक गाम सभमे होइछै,तहिना अनुभव भेल, नीक लागल। हुनक दोसर बालकक विवाह आधुनिक ढंगसं भेलनि जाहिमे वरियातीक स्थानपर दुनू दिससं किछु मित्र लोकनि उपस्थित भेलखिन आ दुनू दिससं माता-पिताक उपस्थितिमे आ हुनका लोकनिक आशीषक संग दू-तीन घंटामे विवाहसं द्विरागमनधरिक सभ कार्यक्रम आ सभ पावनि-तिहार पटनामे संपन्न भेल। हमरा एहि दुनू विवाहसं सिखबाक लेल बहुत किछु भेटल। माता-पिताकें अपन बालकक अनुरूप पुतोहु तकबामे कोन-कोन बातकें प्राथमिकता देबाक चाही आ कोन-कोन बातपर अपन सहमति आ आशीर्वाद देबाक लेल अपनाकें तैयार रखबाक चाही, से हमरा सिखबाक अवसर भेटल। अपनो मोने विवाह करब त माता-पिता आ मित्र-बन्धुक आशीर्वाद आ शुभकामनाक संग करब, ईहो उदाहरण नव लोक सभ लेल बहुत अनुकरणीय आ प्रशंसनीय लागल। एकमात्र योग्य पुत्रक पिता विश्व प्रसिद्द किडनी विशेषज्ञ डा.विवेकानंद झा आ एकमात्र योग्य पुत्रीक पिता साहित्यकार-चिन्तक आ दिल्ली विश्वविद्यालयक चर्चित प्रोफ़ेसर अपूर्वानन्द आधुनिक भारतीय समाज लेल सफल आ सबल दाम्पत्य जीवनक संग संतुलित पारिवारिक आ सामाजिक जीवनक अदभुत उदाहरण प्रस्तुत करैत छथि। हमरा हर्ष अछि जे हिनका लोकनिकें लगसं देखबाक आ जनबाक अवसर प्राप्त भेल अछि। माएक संग तीर्थाटन : १९९१ के अक्टूबरमे रतनजी शान्ती बहिनकें गामपर राखि माएकें सीवान नेने एलाह। एल.टी.सी.क सुविधाक उपयोग करबाक विचार भेल। सिवानसं सभ गोटे दिल्ली गेलहुँ, बहिन-बहिनोक घर पर रहलहुं। एक दिन दू टा ऑटो रिक्शा ल’क’ सभ गोटे दिल्लीमे लाल किला,इंडिया गेट,राजघाट,विजय घाट,शक्ति स्थल,शान्ति वन,चिड़िया खाना,लोटस मन्दिर आदि बहुत ठाम घूमै गेलहुँ। किछु दिनक बाद एक दिन एकटा गाड़ी ल’क’ सभ गोटे हरिद्वार आ ऋषिकेशमे कय ठाम घूमै गेलहुँ। ऋषिकेशमे लक्ष्मण झूलापर द’ क’ दोसर कात मन्दिर सभ घूमैत रातिमे पुनः हरिद्वार पहुंचि श्री राम धर्मशालामे विश्राम करै गेलहुँ। दोसर दिन हरकी पौरी गेलहुँ,ट्रालीसं मनसा देवी मन्दिर गेलहुँ। ओत’सं भारत माता मन्दिर,राम हनुमान मन्दिर देखैत पाँच बजे गाड़ीसं विदा भ’ गेलहुँ। फेर किछु दिन बाद एकटा गाड़ी ल’क’ सभ गोटे आगरा, मथुरा, वृन्दावनमे कए ठाम घूमि अबै गेलहुँ। ई यात्रा सभ गोटेक लेल बहुत आनन्द प्रदान करैबला रहल। रतनजी नोकरीक लेल ओतहि रहि गेलाह आ हम सभ माए संग सीवान घूरि माएकें गाम पहुंचा देलियनि। १९९२ मे वसन्त (वंदना )क दसमी बोर्डक परीक्षा भेलनि। द्वितीय श्रेणीमे उतीर्ण भेलीह,९०० मे ५३३ अंक एलनि, ५९.२ प्रतिशत। पदोन्नति : १९९२ मे स्केल II मे पदोन्नतिक प्रक्रियामे १७ जुलाइ क’ साक्षात्कार भेलै, २१ अक्टूबर क’ परिणाम घोषित भेलै, हमहूँ सफल भेलहुँ। ओहि बेर किछु गोटेकें मध्य प्रदेश जाए पड़लनि, पैंतालीस बरखसं बेशी वयसबलाकें बाहर नै जाए पडलनि। हम पैंतालीसक भीतरे रही, तें आंचलिक कार्यालय,रायपुरमे योगदान देबक लेल जिनका सभकें आदेश भेटल रहनि, ओहिमे हमहूँ रही।३० नवम्बरक’ हमरा सभकें रायपुर आंचलिक कार्यालय पहुँचबाक छल। अही बीचमे जमशेदपुरसं वीणाक विवाहक सूचना भेटल। वीणा आ ममता दुनू बहिन नान्हिए टा रहथि त माए दुनियाँ छोडि देलखिन, किछु दिन गाममे रहलाक बाद दुनू गोटे जमशेदपुरमे जेठ भाए,भौजी,भातिज आ भतीजी सबहक संग रह्य लगलीह। साढ़ू समय-समयपर कलकत्तासं आबिक’ भेंट क’ जाइत छलखिन। वैह वीणा, हमर साढूक जेठ पुत्री वीणाक विवाह भ’ रहल छनि जमशेदपुरमे आ हमरा जमशेदपुर होइत जेबाक अछि रायपुर। कार्यक्रममे कनी सामंजस्य केलासं हम विवाह दिन त नहि, विवाहक तेसर दिन भेंट क’ सकैत छी हुनका सबहक।बच्ची अपन पिता लेल स्वेटर आ मफलर बुनने छथि सेहो द’ देबनि आ सभ गोटे सं भेंट-घाँट सेहो भ’ जाएत। तदनुसार कार्यक्रम बनल जे पटनासं जमशेदपुर भोरे पहुंचब, सरोज स्टेशनसं हमरा डेरापर ल’ जेताह, ओत’ दिन भरि सभसं भेंट-गप करैत वर-कनियाँ कें आशीर्वाद दैत साँझमे जमशेदपुरसं रायपुर बला ट्रेन पकड़ि लेब। अही अनुसार ट्रेनमे आरक्षण कराओल। २७ नवम्बरक’ पचरुखी शाखासं भारमुक्त भए रायपुर जेबाक लेल सीवानसं २८ क’ एसगरे प्रस्थान केलहुं। सीवान स्टेशनपर तंग इनायतपुरी भेटलाह, हमरा विदा करैत ओ अपन कोनो मित्र-शायरक एकटा शेर सुनौलनि : ‘मुझे थकने नहीं देता है जरूरतों का पहाड़ मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा होने नहीं देते’ ई शेर भरि रस्ता हमरा बझेने रहल। पटना / १४.१०.२०२१ (२१) हम पहाड़पर सीवान –जमशेदपुर-रायपुर : पटनासं रातिमे ट्रेनसं चललहुं, सबेरे टाटानगर पहुँचलहुं। हमर साढूक पुत्र सरोज स्कूटर ल’क’ आएल छलाह।हुनका संग थोड्बे कालमे आदित्यपुर हुनक डेरा पहुंचि गेलहुँ। हमर सासुरक लोक सभ भेटलाह-ससुर,सार, सरबेटा। साढ़ू भेटलाह, सरोजक अनुज अशोक भेटलाह,साढ़ूक पुत्री वीणा आ जमाए मिश्रजीकें देखलियनि, दोसर पुत्री ममताकें देखलियनि। ससुरकें बच्चीक देल स्वेटर आ टोपी द’ देलियनि। सभसं परिचय आ गप-शप करैत, खाइत-पिबैत चारि बाजि गेल, हमर ट्रेनक समय निकट आएल त मिश्रजी भिलाइक अपन पता लिखा देलनि आ २ दिसम्बर क’ ओत’ रिसेप्शनक उत्सव दिन हमरा एबाक लेल आग्रह केलनि, अशोक बाबू हमरा स्कूटरसं स्टेशन पहुंचा देलनि। ट्रेनमे हमरे बर्थ लग भेटि गेलाह हरे कृष्ण वर्मा जे मोतिहारीसं जा रहल छलाह आ हमरे जकाँ रायपुर आंचलिक कार्यालय जेबाक छलनि। नीक लागल जे एकटा संगी भेटलाह। दोसर दिन रायपुर पहुंचि हम सभ आंचलिक कार्यालयक लगेमे मयूरा होटलमे रूम ल’ लेलहुं। पता रह्य जे हमर यूनियनक महासचिव एम. के. अग्रवाल सदर बाज़ार शाखामे छथि, हुनकासं सम्पर्क केलहुं। आंचलिक कार्यालय गेलहुँ। आंचलिक प्रबंधक महोदय सभकें बजाक’ कहलखिन जे अहाँ सभ बिहारसं छी, अहाँ सबहक सुविधाक ध्यान रखैत बिहारसं सटल शहडोल क्षेत्रक शाखा सभमे पोस्टिंग कएल गेल अछि अनूपपुर, मनेन्द्रगढ़,चिरमिरी आ डोमनहिल। हमरा सबहक लेल त सभ स्थान अपरिचिते छल, नीक-अधलाह सोचबाक समय नहि रहि गेल छल, सभटा तय भ’ गेल छलै, तें सभ गोटे अपन-अपन आदेश-पत्र लेलहुं जाहिमे तीन दिसम्बरक’ शाखामे योगदान करबाक आदेश छल। दू तारीखक’ वर्माजीक संग भिलाइक स्मृति नगरमे मिश्रजीक ओत’ गेलहुँ, द्विरागमन भ’ गेल छलै, वीणा जमशेदपुरसं भिलाई आबि गेल छलीह। जमशेदपुरसं अशोक आ हुनकर एकटा पितिऔत भाए संजय सेहो आएल छलखिन। हुनका सभसं गप भेल त सूचना देलनि जे हुनक एकटा सम्बन्धी चिरमिरी लगमे सेंट्रल बैंकक कोनो शाखामे काज करैत छथिन, ओ पिंडारुचक छथि आ नाम सभापति चौधरी छनि। ई सूनिक’ नीक लागल जे अपरिचित स्थानमे एक गोटे त मैथिली भाषी भेटलाह अपना दिसक। मिश्रजीक पिता आ अनुजसं सेहो गप भेल, ई जानि नीक लागल जे भिलाई स्टील प्लांटमे मिश्रजीक पिता सेहो काज करैत छथिन आ मिश्रजी दुनू भाइ सेहो,दोसर भाए हिनकासं छोट छथिन, हिनका सबहक गाम कुशेश्वरस्थान लग छनि। रिसेप्शनक उत्सव त रातिमे होइतइ,मुदा रातिए हमरा सभकें सारनाथ एक्सप्रेससं प्रस्थान करबाक छल, तें दिनेमे भोजनक बाद हुनका सभसं आज्ञा लए विदा भ’ गेलहुँ रायपुर। रायपुर–अनुपपुर-चिरमिरी-डोमनहिल : रातिमे रायपुर स्टेशनसं सारनाथ एक्सप्रेससं हम सभ पाँच गोटे विदा भेलहुँ। अनूपपुर जंक्शनपर दू गोटे उतरि गेलाह,सिंह जी आ वर्माजी। सिंह जी कें अनूपपुर शाखामे रहबाक छलनि, दोसर छलाह वर्माजी जिनका ओतसं बस अथवा जीपसं दस-पन्द्रह किलोमीटर दूर शाखामे ज्वाइन करबाक छलनि। ओत’ चिरमिरी बला ट्रेन लागल रहै,हम सभ तीन गोटे ओहिमे जाक’ बैसि गेलहुँ। ट्रेन भोरमे खुजलै आ किछु स्टेशनक बाद मनेन्द्रगढ़ पहुँचलै त ए.के. सरकार ओत’ उतरि गेलाह,हुनका मनेन्द्रगढ़सं किछु दूर रामनगर कॉलरी शाखामे ज्वाइन करबाक छलनि । हम आ आर.पी.शर्माजी अंतिम स्टेशन चिरमिरी तक गेलहुँ। चिरमिरी स्टेशनसं पहाड़ जकाँ चढ़ाइ देखबामे आएल। ब्रीफ़केस ल’क’ चढ़ब कठिन लागल। भरिया सभकें देखलिऐ। दूर जेबाक लेल जीप जाइ छै, मुदा एखन त हमरा दुनू गोटेकें कोनो होटलमे एतहि रहबाक छल, तें भार बलाकें ब्रीफकेस द’क’ पयरे धीरे-धीरे ऊपर चढ़लहुं। दीपक लॉजमे डेरा लेलहुं। शर्माजीकें त ओही ठाम रहबाक छलनि,हमरा ओत’सं जीपसं और चारि-पाँच किलोमीटर दूर जेबाक छल। पता छल जे डोमनहिलमे होटल नै छै, तें जाधरि आवासक व्यवस्था नै हएत ताधरि अही ठाम रहिक’ एतहिसं गेनाइ आ साँझमे वापस एनाइ कर’ पडत। गर्म जलसं स्नान कए एकटा होटलमे दू टा सोन पापड़ी,एकटा समोसा आ एक कप चाह ल’क’ एकटा जीपपर बैसलहुं, शर्माजी ओतहि अपन शाखा गेलाह। जीप पन्द्रह-बीस मिनटमे पहाड़पर घूम-घुमौआ रस्तापर चलैत डोमनहिल स्टैंड पहुंचा देलक, ओत’सं पयरे घुमैत आ पुछैत पाँच मिनटमे बैंक शाखा पहुंचि गेलहुँ। हमरा हाथमे बैंकबला डायरी देखिक’ सुरक्षा प्रहरी खडग सिंह अनुमान केलनि आ नव शाखा प्रबंधक बूझिक’ नमस्कार केलनि, शाखामे खबरि त फोनसं पहिने आबिए गेल छलै। खडग सिंह सभ सदस्यसं परिचय करौलनि। जाएबला शाखा प्रबंधक पाण्डेय जी छलाह,अधिकारी छलाह प्रदीप सिंह पाल,लिपिक छलाह सोना लाल यादव आ योगेन्द्र सिंह सोरी,अंशकालीन कर्मचारी छलाह राम कृपाल। यादवजी कें छोडिक’ सभ गोटे मध्य प्रदेशक छलाह। यादवजी बिहारक छलाह। शाखामे किछु दिन बाद दूटा और लिपिक एलाह तेज राम साहु आ टी. हेम्ब्रोम।एकटा अधिकारी आलोक कुमार बनर्जी सेहो एलाह। शाखामे करीब एक हजार एक सय कालरी कर्मचारी-अधिकारी सबहक बचत खाता, सावधि जमा खाता आ मांग ऋणक खाता छलनि । मुख्यतः एस.ई.सी.एल.केर कर्मचारी-अधिकारी सबहक लेल ई शाखा खूजल छलै। ओहि ठामक अस्पताल,स्कूल आ अन्य सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था सबहक स्टाफक विभिन्न खाता सेहो छलै। शाखा भवन कॉलरी द्वारा मंगनीमे देल गेल छलै। मंगनीमे सभ बैंक स्टाफकें आवासक सुविधा सेहो देल गेल छलै। शाखा प्रबंधक आ एकटा अन्य अधिकारीक लेल आवास कनिए दूरपर सेंट्रल स्कूल कैंपसमे देल गेल छलै, शेष सदस्य लेल आवास दोसर ठाम देल गेल छलनि। सभ सदस्य लेल पानि आ बिजलीक सुविधा मंगनीमे उपलब्ध छलनि। खुशीमे रहबाक लेल एते सुविधा पर्याप्त छलै। दुखी रहबाक सेहो पर्याप्त कारण उपस्थित छलै। पीबै बला पानि कीन’ पडैत छलैक, भारपर दू टिन इनारक पानि प्रतिदिन लोक मंगबैत छल जकर दाम तीन रु. होइत छलैक। ओइ पानिकें पीबाक योग्य बनयबाक लेल ओकरा उबालिक’ तखन फ़िल्टरमे छानब आवश्यक होइत छलैक। एकर मतलब ई जे स्वास्थ्यपर खर्च बेशी छलैक। दोसर बात ई जे बाहर कतहु जेबाक लेल पहिने चिरिमिरी स्टेशन जाएब, ओत’सं ट्रेनसं अनूपपुर जंक्शन जाएब आवश्यक होइत छलैक आ चिरिमिरीसं उपलब्ध ट्रेनक संख्या बहुत कम छलैक। स्थानीय भ्रमण हेतु अपन सवारी आवश्यक होइत छलैक। एकर अतिरिक्त नीक शिक्षण संस्था सबहक अभाव छलैक। बारह्बीं तक के लेल सेंट्रल स्कूल नीक छलै, मुदा और नीक संस्था सबहक कमी छलैक। चिकित्सा –व्यवस्था सेहो बहुत नीक नै छलै। मुदा अही सभ सुविधा आ असुविधाक बीच देशक विभिन्न प्रांतसं एत’ आबिक’ हजारो लोक कते-कते बरखसं अपन परिवार संगे जीवन-यापन करिते आबि रहल छलाह आ जिनका एत’ समाधान नहि भेटैत छलनि ओ जबलपुर, बिलासपुर,रायपुर,भिलाई अथवा भोपाल दौड़ैत छलाह। भिलाइमे जाहि चौधरीजीक विषयमे पता चलल छल, हुनकर चर्चा केलहुं त पता चलल जे ओ नार्थ चिरमिरी कॉलरी शाखामे काज करैत छथि। पता चलल जे एहि एरियामे सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडियाक सातटा शाखा छै : चिरिमिरी, नार्थ चिरिमिरी, वेस्ट चिरिमिरी,कुरासिया कॉलरी,डोमनहिल कॉलरी,कोरिया कॉलरी आ खडगवां। इहो पता चलल जे सेंट्रल स्कूल कैंपसमे नार्थ चिरिमिरी शाखाक शाखा प्रबंधक आ एकटा अन्य अधिकारी लेल सेहो आवासीय सुविधा प्रदान कएल गेल छै जाहिमे शाखा प्रबंधक खुन्तवाल साहेब आ अधिकारी मिश्रजी एखन रहैत छथि, एतहिसं जाइत-अबैत छथि, ओहि शाखाक दूटा लिपिक चौधरीजी आ मिश्रजी सेहो डोमनहिलमे रहैत छथि आ सभ दिन सबेरे स्कूटरसं जाइत छथि आ साँझमे आबि जाइत छथि। ओ मिश्रजी सेहो मधुबनी जिलाक छथि, से पता चलल। साँझमे हमरा शाखाक अधिकारी पी.एस.पाल अपन स्कूटरसं चिरिमिरी पहुंचा देलनि। ओत’ दीपक लॉजमे शर्माजीसं गप-शप भेल, ओ सीतामढ़ी जिलाक छलाह। आब हमर परिवार चारि ठाम भ’ गेल छल, गाममे कोनो नातिन संगे माए छलीह,बाबू छलाह। दिल्लीमे ललनजी दुनू गोटे आ रतनजी छलाह, सीवानमे पत्नी, दुनू पुत्री आ पुत्र छलाह आ चिरिमिरीमे हम छलहुँ। दिनमे कोनो होटलमे जलखै क’ क’ चिरिमिरीसं डोमनहिल जाएब, दिनका भोजन ओतहि करब आ साँझमे घूरिक’ चिरिमिरी आएब, रातिक भोजन चिरिमिरीक होटलमे करब, करीब दू सप्ताह धरि अहिना चलल। ओहि ठाम पहाडपर दीपक लॉजमे बैसि ई गीत लिखाएल : कोना कहू जे कोन हालमे जीबि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। पर्वत केर कायासं निकलय कोयला कारी-कारी घूम-घुमौआ रस्तापर अछि चलइत मोटर गाड़ी कारी-कारी गाछ-पात सभ देखि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। ठाम-ठाम पर्वतक आँखिसं नोरक बहय टघार जहां-तहां मजदूर चलैए नेने पानिक भार एत’ आबिक’ पानि कीनिक’ पीबि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। अछि पहाड़पर जहां-तहां माटिक सुन्दर घर मुदा जखन नीचां तकैत छी होइए सरिपहुं ड’र आगाँ निहुरि-निहुरिक’ ससरब सीखि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। एत’ आबिक’ मोन पड़ैए सीवानक संसार मोन पड़ैए गाम-घ’र आ हरियर खेत-खम्हार हम कल्पना केर डारिपर झूलि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। मोन पड़ैए चूड़ा-दही चीनी आओर अंचार कविता-गीत-गजल केर खातिर जहां-तहां बैसार एत’ तपस्वी केर भोग हम भोगि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। बिजली रानी सतत रहै छथि तें त अछि किछु मौज साधू केर कुटी-सन लागय अनमन दीपक लॉज एतहि ठाढ़ भए एस्टेसन दिस देखि रहल छी हम पहाड़पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी। पूर्व शाखा प्रबंधक पाण्डेय जी अंबिकापुर चलि गेलाह आ २७ दिसम्बरक’ हम लॉज छोडिक’ डोमनहिलमे सेंट्रल स्कूल कैंपसमे शाखा प्रबंधक लेल निर्धारित आवासमे चलि गेलहुँ। पानि लेल बड़का तौला आ भोजन लेल किछु बर्तन आदि किनलहुं। कृपाल पहिने पूर्व शाखा प्रबंधक पाण्डेयजीक भोजन बनबैत छल, आब हमर भोजन बनब’ लागल। १४ जनबरीक हम सीवान पहुँचलहुं। राजवंशी देवी वालिका उच्च विद्यालयसं मैथिलीक आ महावीरी सरस्वती विद्या मन्दिरसं विवेकक स्थानान्तरण प्रमाण पत्र, वसन्त लेल पटना बोर्ड ऑफिससं प्रवजन प्रमाण-पत्र आ प्रोविजिनल प्रमाण-पत्र लेल दौड़-धूप केलहुं,डी.एस.ओ. कार्यालयमे राशन कार्ड जमा क’क’ राशन कार्डक समर्पण प्रमाण-पत्र प्राप्त केलहुं,गैस कनेक्शन ट्रान्सफर करबौलहुं। टी. सी.आइ.बला ट्रक ठीक भेल। एकटा कमी रहि गेल जे महावीरी सरस्वती विद्या मन्दिरवला विवेकक स्थानान्तरण प्रमाण-पत्रपर डी. ई.ओ. साहेब हस्ताक्षर नहि केलनि। चिरमिरीमे स्थानान्तरण प्रमाण-पत्रपर डी. ई. ओ.क हस्ताक्षर अनिवार्य कहल गेल छल। वनगमन : हमर अनुज रतनजी दिल्लीसं सीवान आबि गेल छलाह। हुनका सामान संगे ट्रकसं पठाय हम सभ बनारससं ट्रेनसं जेबाक कार्यक्रम बनौलहुं। तदनुसार वनारस जाक’ ट्रेनमे आरक्षण करा आएल छलहुँ। १० फरवरीक’ हम सभ बनारसमे ट्रेन पकड़बाक लेल सीवानसं बससं भोरे विदा भेलहुँ। जीरादेइ लग बसक एक्सिल टूटि गेलै त घूरि अबै गेलहुँ। ओही दिन साँझमे ट्रकपर सामान लोड भेल। ११ क’ भोरे ट्रकपर सामानक संग अपनो सभ गोटे बैसि गेलहुँ। १० बजे मनेरमे जलखै क’ क’ विदा भेलहुँ। दूपहरक बाद घनघोर जंगलसं निकलैत अनुभव भेल जे हम सभ वनबासमे जा रहल छी। मुनहारि साँझक बाद घनघोर जंगल होइत जखन एकटा पुलपर गाड़ी रूकल त चेकिंग हुअ’ लागल। रतनजी मैथिलीमे किछु हमरा कहलनि कि चेकिंग अधिकारीक स्वर मधुर भ’ गेलनि। गप-शप भेल त कहलनि, अहाँ सभ बहुत रिस्क ल’क’ एहि समयमे आबि रहल छी, एहि रस्तामे एते अबेरक’ एबामे बहुत खतराक आशंका रहै छै, अहाँ सभ भागवंत छी जे सकुशल आबि गेलहुँ। मातृभाषाक चमत्कारसं प्रभावित भेलहुँ। नाहर घर छलनि चेकिंग अधिकारी सिंह जीक। हुनका मूँहसं खतरोक बात मैथिलीमे सूनिक’ आनन्दित भेलहुं। सिंह जी कहलनि, अहाँ सभ खतरा बला क्षेत्र पार क’ गेल छी, आगाँ आब कतहु चल जाएब त कोनो खतराक आशंका नहि अछि। हम सभ रामानुजगंज पहुंचि गेल रही, सिंह जीक बातसं आश्वस्त त भेल रही, मुदा राति ओतहि शिवम् लॉजमे विश्राम करै गेलहुँ, आगाँ बढबाक साहस नहि भेल। १२ क’ भोरे रामानुजगंजसं प्रस्थान कए अम्बिकापुर होइत एक बजे नागपुरमे भोजन कए ३.१५ बजे दिनमे डोमनहिल पहुंचि जाइ गेलहुँ। सीवानमे रहथि त बच्ची सोचथि जे नीचां बला डेरा रहितै त किछु फूल, गाछ अपना पसन्दसं लगबितहुं, एत’ नीचां बला डेरा, पाछाँमे फूल आ अररनेबाक गाछ, आगाँमे आंगन देखि चकित भेलीह, मुदा पानि पीबाक लेल एतेक ताल-भजार करबाक बातसं व्यथित भ’ गेलीह। मुदा ई दुनियाँ अहिना बनल छै जे कतहु जाउ, किछु वस्तु अहाँक मनोनुकूल भेटत आ किछु प्रतिकूल सेहो भेटत। अनुकूल आ प्रतिकूल स्थितिक बीच ताल-मेल बैसयबाक आवश्यकता होइत छैक जीवनमे। जंगलमे मंगल : जहिया परिवार संगे डोमनहिल पहुँचलहुं,ओकरा प्राते पिंडारूचक सभापति चौधरीजी परिवार संगे डेरापर एलाह, सभकें सभसं परिचय भेलनि। चौधरीजी जाहि शाखामे काज करैत छलाह,ओही शाखामे बेनीपट्टी लगक नवीन मिश्र जी छलाह, ओहो लिपिक छलाह, हुनकोसं भेंट भेल। बैंकमे एक दिन खाता खोलब’ लेल आएल एकटा आवेदन पत्रमे नामपर ध्यान गेल-चक्रधर झा, सेंट्रल स्कूलमे शिक्षक छलाह, घर दुलहा छलनि, डेरा सेंट्रल स्कूल कैंपसमे हमर डेराक लगे मे छलनि, हुनका परिवारमे हमर सरबेटीक बियाह भेल छलनि। परिचय भेल, नीक लागल। झंझारपुर लगक ए.एन. झा सं परिचय भेल, जे कॉलरी ऑफिसमे काज करैत छलाह। झंझारपुर लगक एकटा मंडलजी सेहो भेटलाह, जे कॉलरी ऑफिसमे चपरासी छलाह। तरौनी गामक के.एन.झा भेटलाह, जे ठीकेदार छलाह। विजय सलमपुर गामक एकटा झाजी भेटलाह जे कपड़ाक दोकान करैत छलाह। हजारीबागक आर.के.रवि भेटलाह जे कॉलरी ऑफिसमे काज करैत छलाह संगहि कवि सेहो छलाह। पलामूक दुबेजी भेटलाह जे स्कूलमे शिक्षक छलाह आ काव्य-प्रेमी सेहो छलाह। सहारनपुरक रामेश्वर काम्बोज हिमांशु भेटलाह, जे सेंट्रल स्कूलक प्राचार्य छलाह आ नीक साहित्यकार सेहो छलाह , हिनक हिन्दी मे प्रकाशित काव्य संकलन छलनि ‘अंजुरी भर आशीष’, लघु कथापर सेहो बहुत काज क’ चुकल छलाह। हिनका स्कूलक एकटा शिक्षक चन्द्र भूषण पासवानजी, जे बिहारेक छलाह, हिनके प्रभावमे काव्य सृजन सेहो करैत छलाह। एकटा शिक्षिका ‘भारती’ सेहो नीक कविता लिखैत छलीह,ओ बिलासपुरक छलीह। सेंट्रल बैंकक छोटा बाज़ार शाखामे शाखा प्रबंधक छलाह महेश प्रसाद शुक्ल, जे जबलपुरक छलाह आ हिन्दीमे नीक व्यंग्य रचना करैत छलाह। मध्य प्रदेशक विभिन्न ठामक रहनिहार आ कॉलरी स्थित विबिन्न विभागमे काज करैबला किछु गोटे छलाह जे साहित्यकार सेहो छलाह, जाहिमे प्रमुख छलाह नरेन्द्र मिश्र ‘धड्कन’, राजेन्द्र ‘धुरंधर’, राजेंद्र तिवारी ‘राही’,सी.एल.मिश्र ‘साहिल’, इरशाद अहमद सिद्दीकी,अब्दुल सत्तार भारती आदि। उत्तर प्रदेशक शफीक ‘इलाहाबादी’ छलाह जे कॉलरी कर्मी छलाह आ बहुत नीक गजल लिखैत छलाह। डोमनहिल कॉलरीक अधिकारी अशोक दादा छलाह जे संगीत प्रेमी छलाह, हिनक पत्नी हारमोनियमपर बहुत सुन्दर रवीन्द्र संगीत, नजरूल गीत,लोक गीत आदि गबैत छलीह आ तबलापर अपने छोट बेटी संग दैत छलखिन। चिरिमिरी कॉलरीमे इंजिनियर छलाह पलटू मुख़र्जी जे शास्त्रीय संगीतक प्रसिद्द गायक छलाह, हिनकोसं परिचय भेल। छपराक रामजी सिंह भेटलाह जे कॉलरीमे काज करैत छलाह। कोनो ठाम गेलापर यदि मैथिली भाषी क्यो भेटि जाथि,त मोन आनन्दित भ’ जाइत अछि। यदि मैथिल नहि भेटथि, कोनो बिहारी भेटि जाथि, तैयो मोन प्रसन्न होइत अछि। यदि ओहो नहि भेटथि, कोनो प्रान्तक रह्यबला कोनो साहित्यकार अथवा गुणी कलाकार भेटथि, तैयो आनन्दित होइत छी। आ सेहो यदि नहि भेटथि, कोनो बैंक स्टाफ भेटि जाथि, तखनो आनन्दमे रहैत छी। संयोगसं एहि ठाम मैथिली भाषी लोक सभ सेहो भेटलाह, अमैथिल बिहारी सेहो भेटलाह, विभिन्न प्रान्तक साहित्यकार-कलाकार सेहो भेटलाह, पूर्व परिचित एग्रीकल्चर पृष्ठभूमिक प्रिय वरिष्ठ अधिकारी सेहो भेटलाह आ सज्जन बैंक स्टाफ सभ सेहो भेटलाह। सीवानमे हम ए. एफ. ओ.( कृषि वित्त अधिकारी) रही, त आर.पी. शर्माजी एल.बी.ओ.(लीड बैंक अधिकारी ) छलाह , वैह शर्माजी हमर सबहक शहडोल क्षेत्रक क्षेत्रीय प्रबंधक छथि, से हमरा बूझल छल। एकदिन ऑफिसमे ओ अनायास आबि गेलाह, बड़ी काल बैसलाह, सीवानक सभ परिचित लोकक हाल पुछैत गप-शप केलनि, मंगल दिन रहै,उपास केने छलाह, हमरा अनुरोधपर एकटा सेव आ एकटा केरा लेलनि, ऑफिसक लेल किछु जरूरी चीज खरीदक हेतु तुरत स्वीकृति-पत्र सेहो द’ देलनि। ओ क्षेत्रीय कार्यालयक राजभाषा अधिकारीकें हमर साहित्य सृजनसं सेहो अवगत करौलखिन आ हमरा ‘सेंट्रल रश्मि’ पत्रिका लेल रचना पठयबाक लेल सेहो कहैत गेलाह। हुनका गेलाक बाद शाखाक सभ गोटे आश्चर्य प्रगट केलनि जे क्षेत्रीय प्रबंधक एते मिलनसार कोना भ’ गेलाह। हमरा अपना लेल किछु मांग करबाक हिम्मति नहि भेल। हमरा संगे जे हरे कृष्ण वर्माजी बिहारसं आएल छलाह से शर्माजीसं पैरवी क’ क’ अपन स्थानान्तरण शहडोल मुख्य शाखामे करा लेलनि आ हमरो सुचित केलनि जे कोनो आवश्यकता हो त कहब। हम एक दिन छुट्टी ल’क’ शहडोल गेलहुँ जे हमहूँ अपना लेल कोनो नीक शाखामे स्थानान्तरणक जोगार धराएब। ओत’ गेलहुँ त पहिने शहडोल शाखामे वर्माजीसं सलाह लेब’ गेलहुँ। वर्माजीकें चिन्तित आ परेशान देखलियनि। पता चलल जे शर्माजी जे ट्रान्सफर आदेश देने छलखिन से यूनियनक दबाबपर वापस लेब’ पडलनि आ वर्माजी पुनः ओही शाखामे वापस जा रहल छथि। हमर बात मूँहेंमे रहि गेल। कथी लेल रुकितहुं। क्षेत्रीय प्रबंधकसं बिना भेंट केनहि डोमनहिल घूरि गेलहुँ। किछु दिनक बाद, अम्बिकापुरक क्षेत्रीय प्रबंधक संगे शहडोलक क्षेत्रीय प्रबंधक शर्माजी एलाह त कहलनि, ‘मैं बहुत नाराज हूँ ठाकुर, तुम शहडोल गए और बिना हमसे मिले चले आए?’ हम कहलियनि,’वर्माजी की हालत देखकर मैंने आपसे कुछ याचना करना उचित नहीं समझा सर।’ कहलनि, ‘क्यों, वैसे नहीं मिल सकते थे?’ कहलियनि, ‘वैसे मिलते और आप कहीं पूछ देते कि बिना आदेश प्राप्त किए क्यों मिलने आ गए, तों मैं क्या जबाब देता?’ कहलनि,’सीवान में जिन लोगों के साथ काम कर चुका हूँ,उनसे ऐसा क्यों पूछूँगा, वो तो यहाँ के लिए नियम है, यहाँ अगर छूट दे दूँ तो लोग शाखामे काम करने के बदले क्षेत्रीय कार्यालयमे ही जमा होने लगेंगे।’ बादमे हमर सबहक शाखा अंबिकापुर क्षेत्रमे आबि गेल। हमरा मोन मारिक’ ओतहि रहि जेबाक अतिरिक्त कोनो आन नीक विकल्प नहि रहि गेल।एक सालक बाद अनुरोधपर स्थानान्तरण लेल आवेदन पठा देलिऐ, आदेश एबामे ततेक देरी भ’ गेलै जे हमरा लेल काजक नहि रहल। कॉलरीक किछु शाखा प्रबंधक सभ कृषि पृष्ठभूमिक छलाह। कहियो चिरिमिरी शाखामे, कहियो मनेन्द्रगढ़, शहडोल अथवा अम्बिकापुरमे मीटिंग होइत छलैक। अधिक काल सभ शाखा प्रबंधक एकहि जीपसं जाइत छलाह आ घुरैत छलाह। सभ शाखामे फोन छलै, सभ शाखा प्रबंधक फ़ोनपर एक-दोसरसं सम्पर्कमे रहैत छलाह। एहि ठाम विभिन्न प्रान्तक लोक छलाह, तें विभिन्न तरहक आयोजन होइत रहैत छलै। बंगाली लोकनि द्वारा दुर्गा पूजाक बहुत उत्कृष्ट आयोजन होइत छल। रावण-दहनक उत्सवमे अपार भीड़ रहैत छलैक। बिहारी तथा किछु अन्य प्रान्तक लोक सभ सेहो छठि पावनिक बहुत नीक आयोजन करैत छलाह। कॉलरी द्वारा कृत्रिम जलाशयक व्यवस्था कएल गेल छलै।छपराक रामजी सिंह आ तरौनीक के.एन.झा ओत’ छठि पावनिमे खरना दिन प्रसाद पबैत छलहुँ। १५ अगस्त आ २६ जनवरीक’ कवि सम्मलेन होइत छलै। सन्त सम्मेलनक आयोजन सेहो भेल छलै। प्रपन्नाचार्यजी महाराजक मुखसं भागवत कथाक प्रवचन सेहो सुनबाक अवसर भेटल। हल्दीबाड़ी स्थित काली मन्दिर सेहो कहियोक’ जाइत छलहुँ। कोरिया कॉलरीमे एकटा अवकाशप्राप्त कॉलरीकर्मी द्वारा योगासन सिखाएल जाइत छलै, सेहो सीख’ रवि दिनक’ कहियो-कहियो जाइत छलहुँ। हल्दीबाड़ीमे ओशोक शिष्य स्वामी आनन्द सिद्धार्थक आगमन भेलनि, तीन दिनक लेल आयोजित ध्यान-शिविरमे सेहो भाग लेबाक अवसर भेटल। कहियोक’ अशोक चक्रवर्ती दादा ओत’ हुनक श्रीमतीजीक गायन-रवीन्द्र संगीत,नजरुल संगीत, लोकगीत सुनबाक अवसर भेटैत छल। कहियोक’ रविजी आ दुबेजीक संग चिरिमिरीमे पलटू मुखर्जी दादा ओत’ हुनक गायन सुनबाक लेल जाइत छलहुं। पलटू दादा रविजी आ हमर किछु रचनाकें उपयुक्त रागमे अपन स्वर दय कैसेट तैयार केलनि। हुनक प्रस्तुति बहुत मनमोहक लागल। ओहि कैसेटकें करीब बारह साल सुरक्षित रखलहुं। दुर्भाग्यवश आब ओ कैसेट किनको लग सुरक्षित अछि। एक राति एकटा सूफी सन्तक आगमन पर आयोजित उत्सवमे पलटू दादाक आकर्षक गायन सुनबाक सौभाग्य भेटल। साहित्यिक गतिविधि : कादंबरी साहित्य परिषद्क सदस्य बनलहुं। कहियो सेंट्रल स्कूल, कहियो गुदरीपारा, चिरिमिरी ,छोटा बाज़ार अथवा अन्यत्र कतहु कवि गोष्ठीमे सम्मिलित हुअ’ लगलहुं। पहिने किछु गोष्ठीमे हम अपन मैथिली रचना प्रस्तुत केलहुं। बादमे हुनका सबहक संग देखैत-सुनैत हमरोसं किछु रचना हिन्दीमे लिखाए लागल। हम ३ दिसम्बरक’ डोमनहिल शाखामे ज्वाइन केने रही, ६ दिसम्बरक’ अयोध्यामे बाबड़ी मस्जिद ध्वस्त हेबाक समाचार अखबार सबहक मुख्य जगह नेने छलैक। हमरापर जे प्रतिक्रिया भेल ताहिसं धीरे-धीरे एकटा गीतक जन्म भेल : मैं कभी मन्दिर न जाता और न चन्दन लगाता मंदिरों-से लोग मिल जाते जहां पर बस वहीं पर सर झुकाता देर थोड़ी बैठ जाता मुस्कुराता गुनगुनाता, गीत गाता, मैं कभी मन्दिर न जाता। ई रचना ‘नवनीत’क दीपावली विशेषांकमे प्रकाशित भेल, एहि लेल किछु पाठकक मधुर प्रतिक्रिया सेहो प्राप्त भेल। एकटा बैंक प्रबंधकक रूपमे हम की अनुभव करैत छलहुँ से किछु अंशमे एहि गीतमे प्रगट भेल : काजल की कोठरी में मैं और मेरे साथ मेरा मन। किछु और गीत सबहक पहिल दू पांती एना अछि : ‘मै जगा तो आज सूर्योदय हुआ डालियों पे फूल भी खिलने लगे।’ ‘रास्ते दुकान हो गए लोग परेशान हो गए।’ ‘तुम पहनो तो शब्दों के कुछ हार गूँथ कर लाऊं मैं।’ ‘जिन्दगी जब हुई जिन्दगी के लिए हर घड़ी शुभ घड़ी आदमी के लिए।’ ‘मैं कहता हूँ चीज पुरानी घर के अन्दर मत रखो वो कहती है कौन जानता बादल कब घिर आ जाए।’ ‘जंगलों के पार हो गई मालती विचार हो गई।’ ‘ सो गए तुम मैं जगा था रात भर।’ दैनिक भास्कर(बिलासपुर)मे रवि दिनक’ एक पृष्ठमे एक कात साहित्यिक रचना रहैत छलैक। ओहिमे रचना पठबैत छलिऐक। कहियो-कहियो ओहिमे रचना प्रकाशित होमय लागल। कहानी लेखन महाविद्यालय, अम्बाला छावनी द्वारा मासिक पत्रिका ‘शुभतारिका’ निकलैत छलैक। ओहिमे दू-तीन प्रयासक बाद दूटा लघु कथा ‘रात और दिन’,’चन्द्रमा’ और किछु गीत प्रकाशित भेल। ‘हंस’ पत्रिकामे सेहो एकटा लघुकथा ‘संसार’ प्रकाशित भेल। इंदौरसं प्रकाशित ‘वीणा’, मुंबईसं प्रकाशित ‘नवनीत’ आ लखनऊसं प्रकाशित पत्रिका ‘सानुबंध’मे सेहो किछु रचना प्रकाशित भेल। मैथिलीमे रचनाक सृजन बाधित भेल। मैथिलीक प्रसिद्द साहित्यकार जीवकान्त जी सं पत्राचार चलैत रहल।ओ मैथिलीक स्मरण दिअबैत रहैत छलाह। सुपौलसं प्रकाशित मैथिली पत्रिका ‘भारती मंडन’ मे किछु रचना प्रकाशित भेल। पहिनेक लिखल एकटा दीर्घ कविता छल, तकरामे किछु संशोधन केलहुं, ओ ‘धारक ओइ पार’ नामसं सुपौलसं प्रकाशित भेल। आदरणीय जीवकान्तजी ओकर भूमिका लिखने छलाह। ओही अवधिमे किछु गजल हिन्दीमे लिखाएल आ ‘तिरंगे के लिए’ नामसं गजल संग्रह संवेदना प्रकाशन, अलीगढसं प्रकाशित भेल। सीवानक प्रोफेसर गंगानंद झा जी सेहो अवकाशप्राप्तिक बाद चंडीगढ़सं पत्राचारक माध्यमसं अपन पढ़ल कोनो प्रिय रचना आ ओहिपर अपन प्रतिक्रिया शेयर करैत छलाह, ताहूसं साहित्यसं जुडल रहबामे आनन्द प्राप्त होइत रहल। बैंकक काज : बैंक शाखाक मुख्य काज छलै कॉलरीक कर्मचारी-अधिकारी सबहक वेतन भुगतान। सभ मास एकसं पन्द्रह तारीख धरि बड्ड भीड़ रहैत छलै। बैंक बन्द होइत-होइत मुनहारि साँझ भ’ जाइत छलै। शेष पन्द्रह दिन साँझमे ६ बजे धरि जरुरी काज भ’ जाइत छलै। सप्ताहमे एक दिन गैर-बैंकिंग कार्य दिवस होइत छलै, जाहिमे सभ लंबित कार्यक निपटान क’ लेल जाइत छलै। बही सभ संतुलित रहैत छलै। किछु विवरण आदि बनयबाक लेल कहियो-कहियो अवकाशक दिन सेहो बैस’ पडैत छलै। शासकीय योजनान्तर्गत ऋण वितरणक किछु लक्ष्य सेहो रहैत छलै, ओहो पूर्ण करबाक रहैत छलै। कॉलरीक करीब एक हजार एक सै कर्मचारी-अधिकारी लोकनिक वेतन भुगतान बैंक द्वारा होइत छलै। करीब ९०० कर्मचारी और बांचल छलाह जिनकर वेतन भुगतान बैंकक माध्यमसं करेबाक लेल कॉलरी प्रबन्धन द्वारा अनुरोध कएल जा रहल छलै। शाखा द्वारा ई कहल जाइत छलै जे हमरा और स्टाफ भेटि जाएत तखने भ’ सकैत अछि। कॉलरी प्रबन्धन दुखी छल जे बैंक भवन, सभ स्टाफक लेल आवास,बिजली,पानि सभ निःशुल्क उपलब्ध करेबाक बादो बैंक शत प्रतिशत कर्मचारीक वेतन भुगतान करबामे सहयोग नहि क’ रहल अछि। हम स्टाफक बीच ई सुझाव देलिऐ जे हम सभ पाँच-पाँचटा कर्मचारीक खाता प्रतिदिन खोलि कॉलरी प्रबन्धनकें मदति करबाक आश्वासन द’ सकैत छियनि, मुदा हमर अधिकारी एकरा उचित नहि बुझैत छलाह। कॉलरी प्रबन्धन द्वारा खिसियाक’ एकदिन हमर आ हमर अधिकारीक आवासक बिजली आ पानिक कनेक्शन कटबा देल गेल। अस्थायी किछु जोगार लगाक’ हम सभ दू दिन काज चलेलहुं,मुदा कॉलरी प्रबन्धनसं टकराव सेहो उचित नहि लागल, हमर अधिकारी सेहो कॉलरीक जी.एम.सं सम्पर्क करबाक सलाह देलनि। हुनका संगे जी.एम. साहेबक आवासपर गेलहुँ। जी. एम. साहेब एहेन डेग उठ्यबाक लेल दुख प्रगट करैत अपनो समस्याक निराकरणक अनुरोध केलनि जाहिसं बैंक द्वारा शत प्रतिशत कर्मचारीक वेतन भुगतानक लक्ष्य पूर्ण भ’ सकनि। अन्तमे यैह निष्कर्ष निकलल जे हम सभ प्रतिदिन कम-सं-कम पाँचटा नव खाता खोलि दियनि,जाहिसं ओहो अपन उच्चाधिकारीकें सूचित क’ सकथि जे शत प्रतिशत भुगतान बैंक द्वारा करबाक दिशामे सहयोग प्राप्त भ’ रहल अछि। मैत्रीपूर्ण गप भेल आ हमरा सभकें डेरा घुरबासं पहिने डेरामे बिजली आ पानिक सुविधा आबि चुकल छल। ओकर बाद फेर कहियो कोनो तरहक व्यवधान नै उपस्थित भेल। बैंकमे चोरी : शाखाक स्ट्रांग रुमक दरबाजा बैंकक नियमानुकूल नहि छलैक। ई अनियमितता आरम्भेसं आबि रहल छलैक मुदा सक्षम अधिकारीक समुचित आदेशक अभावमे ओ कमी दूर नहि भेल छलैक। एक राति चोर ताला तोड़ि स्ट्रांग रूममे प्रवेश क’ गेल आ तिजोड़ीकें खोलबाक प्रयासमे तिजोड़ीक हैंडिल तोड़ि देलक,मुदा तिजोड़ी नहि खुजलै। नगद राशिक चोरी नहि भेलै, मुदा चोर सुरक्षा प्रहरी द्वारा राखल बन्दूक ल’क’ भागि गेल। सबेरे हमरा पता चलल त क्षेत्रीय प्रबंधककें सूचित केलियनि, थानामे एफ. आइ. आर. आ और जे किछु करबाक चाही, से शाखा द्वारा कएल गेलै। जांच अधिकारी सभ एलाह, खोजी कुकुर आएल, नियमानुसार सभ किछु भेलै। बन्दूक त नहि भेटलै, मुदा ओकर बीमाक नवीनीकरण भेल छलै, तें बीमित राशि शाखाकें भेटि गेलै। तकरा बाद नियंत्रक कार्यालयक मार्गदर्शनमे बजटमे उचित संशोधन क’क’ स्ट्रांग रूममे बैंकक नियमानुसार गेट लागि गेलै। फेर कोनो अप्रिय घटना बैंक शाखामे नहि भेलै। हमर दुपहिया वाहनक चोरी : हमरा लग १९७९ क राजदूत मोटर साइकिल छल। ठीक रहैत छल त नीक जकाँ चलैत छल। तें एकरा हटबैत नै छलहुँ। तें नव गाड़ी नै कीनैत छलहुँ। भ’ सकैत अछि जे लोककें हमर गाड़ी नीक नै लगैत होइ, भ’ सकैए जे ककरो बर्दाश्त नै भेल होइ आ ओ हमर दुविधा समाप्त करबाक उद्देश्यसं एहेन डेग उठेने हो। एक दिन हम स्नान करैत रही त पाल साहेबक पत्नीक आवाज सुनाइ पड़ल,’मैथिली,तुम्हारे पापा कल गाड़ी कहीं दूसरे जगह रख दिए थे क्या? हमरा बुझैमे आबि गेल जे गाड़ी क्यो ल’ गेल। हम आरामसं स्नान-भोजन क’ क’ ऑफिस गेलहुँ।ओहिठाम किछु जरूरी काज सभ क’क’ गेलहुँ थाना। एफ. आइ. आर. केर औपचारिकता पूर्ण क’क’ आबि गेलहुँ। हमरा विश्वास छल जे हमर गाड़ी भेटि जाएत कारण दोसर क्यो ओकरा बहुत दूर धरि नै ल’ जा सकैए। एक बेर हम खडगवां गेल रही सरप्राइज चेकिंगमे। साँझमे वापस एबा काल ओहि शाखाक शाखा प्रबंधक सेहो संग भ’ गेलाह, हुनका चिरिमिरी जेबाक छलनि। रस्तामे सात किलोमीटर लगभग जंगल आ पहाड़ी क्षेत्र छै, ओही ठाम आबिक’ चढ़ाइपर गाड़ी बन्द भ’ गेल, ओहो बेचारे पाछूसं बहुत दूर धरि ठेललनि मुदा गाड़ी नै चलल। अन्तमे ओ थाकिक’ घूरि गेलाह, एकटा बस जाइत रहै, ओहीसं चलि गेलाह। हम कहुना क’ ओकरा गुडकेने-गुड़केने बहुत देरीसं घर पहुँचलहुं। सभकें चिन्ता हुअ’ लागल छलै, किछु गोटे हमरा तकैत आबि रहल छलाह,रस्तामे भेटलाह। दोसर दिन मिस्त्री ठीक क’ देलक त फेर चल’ लागल। एक सप्ताह बाद बिजली मिस्त्री कहलक जे रस्तामे एकटा पुलियाक नीचाँ कोनो गाड़ी खसल छै,लोक सभक भीड़ लागल छै। हम बैंक गेलहुँ त थानासं सूचना भेटल जे गाड़ी भेटि गेल अछि, मुदा गाड़ी लेबाक लेल कोर्टमे किछु औपचारिकता करब’ पडत। ओकील साहेबक माध्यमसं किछु औपचारिकता पूर्ण करेलाक बाद गाड़ी हमरा भेटि गेल, किछु पार्ट्स ख़राब भ’ गेल रहै से ठीक कराक’ गाड़ी ल’ अनलहुं। ओ गाड़ी भेटि गेल ताहिसं लाभ ई भेल जे हमरा तत्काल दोसर गाड़ी लेबाक आवश्यकता नहि रहल आ हानि ई भेल जे नव गाड़ी नहि किनाएल आ बादमे ई गाड़ी एकबेर हमर बामा हाथक फ्रैक्चरक गबाह बनल। ओ गाड़ी एखनो हमरा लग अछिए। यद्यपि कए बरखसं एकर उपयोग नै करैत छी आ गाड़ीपर चढ़ितो नै छी, मुदा कबाड़ी बला हाथें बेचियो नै पबैत छी, डर होइए जे कतहु कियो एकर दुरूपयोग क’ क’ हमरा जबाबदेहीमे ने फंसा दिए’। २०.१०.२१ माएक संसार : माएक संसारमे तीनटा बेटा,दूटा पुतोहु,एकता पोता,दूटा पोती,तीनटा बेटी,पाँचटा नाति आ सातटा नातिन, तीनटा भाए,तीनटा भाउज,आठटा भतीजी, आठटा भतीजा, एकटा बहिन,पाँचटा बहिनपूत आ दूटा बहिनधी, ननदि,दूटा भागिन आ भगिनी सभ आ फेर हिनका सबहक आगू पीढ़ीक लोक सभ आ किछु पड़ोसिन सभ छलखिन। माएक संसार सलमपुर,रुचौल,लखनपट्टी, शिशवा,घोंघौर,सोहराय ,नारायणपट्टीक अतिरिक्त दिल्ली आ मध्य प्रदेश धरि पसरल छलनि। जेठकी पुतोहु बहुत दिन धरि संगे छलखिन, फेर सालमे तीन-चारि बेर किछु-किछु दिन लेल आबि जाइत छलखिन। छोटकी पुतोहु सेहो थोड़े दिन संग रहलखिन। बादमे एसगर भेलीह त कोनो नातिनकें लखनपट्टी अथवा शिशवासं बजा लैत छलीह। आब बेटा-पुतोहुक संगे रहती त गाममे बूढ़ा एसगर कोना रहथिन आ दुनू गोटे बेटा-पुतोहु संगे रहै जेताह त गामपर के रहत, घर-दुआरि के की हेतनि,ककरापर छोडिक’ जाइ जेतीह। घरमे सांझो दै बला के रहतनि? आब एसगर दिन बितयबाक समय आबि गेल छलनि। रातिमे बड़ी राति धरि मोन बौआइत रहैत छलनि दिल्ली, मध्य प्रदेश,गाम-गाम, भगवान-भगवतीसं प्रार्थना करैत रहैत छलीह, सभ धिया-पूता नीके ना रहै जाइ। कखनो काल पेट आ कि माथ दुखाइत छलनि त चौकपर दबाइ दोकानसं दबाइ मंगाक’ खा लैत छलीह। दू-चारि दिन ठीक रहै छलनि, फेर पुनरावृत्ति होइत छल। एक दिन दोकान बला कहलकनि बाबूकें जे आब दबाइ ओना नै दियनु, जांच करबा दियनु बेर-बेर पेटमे दर्द किए भ’ जाइत छनि। जखन जांच भेल त भ’ गेल शुरू दैया-मैया, दौड़-धूप, चिट्ठी-पतरी,फ़ोन-फान। हमरा ९ नवम्बर क’ दिल्लीसं अनुज ललनजी द्वारा प्रेषित भागिन अशोकक लिखल चिट्ठीसं आ तकरा बाद बाबूक चिट्ठीसं पता चलल जे माएक देह लीवर कैंसरक चपेटमे आबि गेल छनि आ गोरखपुरमे हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल एवं शोध संस्थानमे इलाज सेहो शुरू भ’ चुकल छनि। मधुबनी शिक्षक संघक प्रेसमे प्रबंधक छलाह आशा भाइ, ओ गामसं समाचार पटना हमरा मामाकें दैत छलाह आ मामा हमरा ऑफिसमे फ़ोनपर सुचित क’ दैत छलाह। गोरखपुरमे माए लग हमर दूटा बहिन सच्ची आ बच्ची, दुनू छोट भाए ललनजी आ रतनजी और ललनजीक पत्नी छलखिन। बाबू गाम चल गेल छलाह, गाममे हुनक देख-रेख लेल नातिन विभा छलनि। किछुए मास पहिने हमरा टोलक एक गोटे अही बिमारीसं देह छोडि चुकल छलाह, माए हुनकर कष्ट देखिक’ बहुत दुखी भेल छलीह, आब अपने एहि डकूबा बिमारीक चपेटमे आबि गेल छलीह। हमहूँ एसगरे गोरखपुर पहुँचलहुं। डा.ए.के. चतुर्वेदी सं सम्पर्क केलहुं, कहलनि जे एहि ठामसं नीक इलाज आनो ठाम कतहु नहि भ’ सकैत अछि, तें टाटा मेमोरियल (मुंबइ) गेलासं कोनो विशेष लाभ नै भेटत। सेकाइ चलैत छलैक। एकर प्रभाव सेहो देखाइत छल। पटनासं मामी संग मामा सेहो आबि गेल छलाह। माएक संग गोरखनाथ मन्दिर गेलहुँ। ललनजी दुनू गोटेक संग हम गामो गेलहुं। वरंडापर माएक लेल एकटा कोठलीक व्यवस्था केलहुं। घुरिक’ हम फेर गोरखपुर एलहुं। माएकें खून चढ़लनि। डॉक्टर साहेब ११ जनबरीक’ आब’ कहलकनि। माएक संग सभ गोटे गाम गेलहुँ। हम डोमनहिल वापस गेलहुँ। एहि बीच माएकें ल’क’ निर्धारित तिथिक’ रतनजी गोरखपुर जाक’ फेर गाम घूरि गेलाह। १८ फरबरी क’ पटनासं मामाक सन्देश भेटल जे माएक हालत खराब भ’ गेल छनि। २० क’ जीपसं परिवार संग विदा भेलहुँ। २१ क’ साँझमे ७ बजे गाम पहुँचलहुं। दिल्लीसं ललनजी एलाह, सच्ची एलीह। दिन-दिन माएक हालत खराब होइत गेलनि आ ३ मार्चक’ रातिमे लगभग ९ बजे देह छोडि देलनि। वसन्तक १२ वींक परीक्षाक तिथि १२.०३ सं ४.४ धरि छलनि, ओ परीक्षा नहि द’ सकलीह। ओ अपन माएक संग गामेमे रहि गेलीह। मैथिली आ विवेकक परीक्षाक तिथि निकट छलनि। हिनका दुनू गोटेक संग हम २९ मार्चक’ डोमनहिल पहुँचलहुं। मैथिलीक बोर्ड परीक्षा भेलनि। परीक्षा केन्द्रपर जे अनुशासन देखलहुं, से ओहि समय बिहारमे दुर्लभ छल। नीक लागल। बहुत दिन धरि पढ़ाइ –लिखाइमे बाधा उपस्थित हेबाक अधलाह प्रभाव धिया-पुताक परीक्षा आ ओकर परिणामपर पडलै। धिया-पुतापर कोनो प्रभाव नहि पड़ै ताहि लेल कोनो दोसर व्यवस्था करब हमरा बूते नहि पार लागल। २०/१०/२१ माएक बाद : बच्ची नैहरमे भातिजक उपनयनमे सम्मिलित भेलाक बाद अपन बहिनपूत राजू कें संग क’क’ वसन्त संगे १५ जूनक’ डोमनहिल पहुंचि गेलीह। गाममे बाबू आ रतनजीक संग बहुत दिन धरि हमर भावहु नहि रहि सकलीह, २४ जूनक’ भाएक संग कहुनाक’ सलमपुरसं दानापुर पहुंचि गेलीह। गाममे बाबू आ हमर अनुज रतन जी रहि गेलाह। हमर तीनू बहिन अपन-अपन संसारमे बाझल छल, ककरो पलखति नै छलै जे हिनका सबहक देख-रेख गाम आबिक’ क’ सकितनि। हमहूँ ओहि स्थितिमे नहि छलहुँ जे पत्नीकें गाममे छोड़ि दितियनि। हमरा गामसं किछु लोक पत्र द्वारा सुचित केलनि जे हिनका सभ लेल कोनो व्यवस्था सुनिश्चित करू। हम कोनो आदमी राखि लेबाक सुझाव देलियनि, मुदा गाममे से व्यवस्था नहि भ’ सकलनि। हमरा लग वसन्त अस्वस्थ भ’ गेल छलीह, टाइफाइड भ’ गेलनि,ओत’ नहि ठीक भेलनि त हम पटना ल’ गेलियनि। ओही समयमे हम गाम जाक’ बाबू आ रतनजीक हाल देखि एलहुं। दुनू गोटे दुखित पड़ि गेल छलाह, मुदा ठीक भ’ भेल छलाह। हम पुनः गाममे कोनो आदमी तकबाक सुझाव दैत घूरि गेल छलहुँ। माएक पहिल बरखीमे एक बेर फेर जुटान भेलै,मौसी एलीह, मामी एलीह,ललनजी एलाह, घर भरलै किछु दिन लेल, भोज-भात भेलै आ फेर चारि-पाँच दिन बाद स्थिति पूर्ववत भ’ गेलै। सभ क्यो अपन-अपन दुनियाँक दुख-सुखमे ओझरा गेल आ बाबू गाममे कोनो आदमीक समूल्य सेवा नहि प्राप्त क’ सकलाह। एकटा एहेन समय एलै जे अपना संसारमे बाबू एसगर रहि गेलाह। बच्चीक स्वास्थ्य : एक दिन बच्चीकें बहुत घबराएल देखलियनि, कहलनि,’हमरा धिया-पूताकें देखब।’ डॉक्टरसं सम्पर्क केलहुं। बी. पी. बढल छलनि। हिनका लेल दौड़-धूप शुरू भेल, किछु दिन होमियोपैथीसं आ तकर बाद अंगरेजी दबाइसं उपचार हुअ’ लगलनि। कहियो डोमनहिलक अस्पताल त कहियो रीजनल अस्पताल दौड़’ लगलहुं। बादमे पटना आबि डा. अरुण तिवारीसं सलाह लेलहुं। ओ बी.पी.क दबाइ एमटास- ५ लीखि देलखिन। हुनकहि सलाहसं दबाइ लेलासं लाभ भेलनि। कय साल धरि अही दबाइसं ठीक रहलीह। बाबूक संग डोमनहिलमे : बाबू अपन अस्वस्थ शरीरक संग घरक ओगरबाही करबासं ऊबि गेलाह। हुनका लग दू टा विकल्प छलनि डोमनहिल चल जाथि जत’ हम सभ छलहुँ अथवा दिल्ली जाथि जत’दुनू छोट पुत्र ललनजी, रतनजी छलखिन आ एकटा बेटीक परिवार छलनि। दिल्लीमे एक बेर पहिनहुं रहि चुकल छलाह, ओहि ठामक रस्ता सेहो जानल छलनि, तें ओतहि जेबाक निर्णय लेलनि। कैला खेतक काज क’ दैत छलनि, ओकरा दरबज्जापर सुतबाक लेल कहलखिन। हमर पितिऔत भाए दिलीपकें कहलखिन, हमरा कहुनाक’ दिल्ली पहुंचा दैह। बाबू दिलीप संगे दिल्ली पहुंचि गेलाह। फेर आश्रय-स्थल भेलनि छोट बेटीक घर जत’ बेटी,जमाए,नाति,नातिन आ दूटा पुत्र सेहो छलखिन। मोन ठीक रहै छलनि त ओशोक प्रवचन सुनैत छलाह, अस्वस्थ रहै छलाह त डा.पाल अथवा चड्ढा नर्सिंग होम जाक’ किछु दिनमे ठीक भ’क’ आबि जाइत छलाह। हमरा सभटा पता रहैत छल। हम हुनक इलाज हेतु आर्थिक आवश्यकताक प्रतिपूर्ति करबाक प्रयास करैत छलहुँ। बहुत दिन धरि एहि तरहें चलल। मुदा, एकटा समय एलै जे चड्ढा नर्सिंग होम सेहो इलाज करबासं असमर्थ भ’ गेल। हमरा सूचना भेटल जे आब स्थिति ठीक नहि छनि आ कखन की भ’ जेतनि तकर कोनो ठीक नहि। फेर हमरा समक्ष प्रश्न ठाढ़ भ’ गेल जे दिल्ली एसगर जाउ कि सभ गोटेक संग जाउ। एसगर जाएब त हिनका सबहक सुरक्षाक की हेतनि आ सभकें संग ल’ जाउ त हिनका सबहक पढ़ाइक की हेतनि। जीवनमे कय बेर एहेन समय अबैत छैक जे लगैत छैक जेना परिवार समेत कोनो नावपर कोनो नदी पार क’ रहल छी आ नाव ड़ूब’ लागल अछि आ तत्काल निर्णय लेबाक अछि जे ककरा-ककरा आ कोन-कोन चीजकें बचाएब सुनिश्चित करू। हम ओहि समय सभसं बेशी अपनाकें बचयबाक कोशिश करैत छी, परिणाम किछु नीक आ किछु अधलाह होइत अछि, किछु चीज बचि जाइत अछि, किछु चीज नहि बचि पबैत अछि, परिणाम जे अबैत अछि,तकरा अस्तित्वक निर्णय मानि संतोष क’ लैत छी। हम बैंकक नोकरीमे छलहुँ, खाजानाक एक सेट कुंजी हमरो लग रहैत छलैक। बिना क्षेत्रीय प्रबंधकक आदेशक ने हम ककरो ओ कुंजी द’ सकैत छलहुँ ने ओ स्थान छोडि सकैत छलहुँ। हम पिताक समुचित इलाजक हेतु दिल्ली जेबाक लेल क्षेत्रीय प्रबंधकसं अनुमति हेतु प्रार्थना केलहुं किन्तु अनुमति भेटि नहि रहल छल। क्षेत्रीय प्रबंधक महोदयकें कोनो अधिकारी उपलब्ध नहि भ’ रहल छलखिन जिनका हमरासं चार्ज लेबाक लेल पठा देथिन। एना कय दिन चलल। एक दिन हमर बहिनो फोनपर सुचित केलनि जे डॉक्टरक अनुसार आब किछु घंटाक मेहमान छथि। हम दुखी भ’क’ क्षेत्रीय प्रबंधक महोदयकें कहलियनि जे एहि स्थितिमे हमरा की आदेश दै छी,तखन ओहो कहलनि जे कोनो सीनियर क्लर्क कें चावी द’क’ अहाँ निकलि जाउ, हम कोनो –ने-कोनो अधिकारीकें आइ पठा देबै। हम सपरिवार निकलि गेलहुँ विना आरक्षण के ट्रेनसं दिल्ली जेबाक लेल। संयोग भेलै जे अनुपपुर जं. पर हमरा पाँचो गोटेक लेल आरक्षण भेटि गेल। हम सभ ४ मइ ( १९९६)क’ साँझमे दिल्ली पहुंचि गेलहुँ, बाबू अचेत नहि भेल रहथि। हमरा सभकें देखि किछु सकारात्मक परिवर्तन भेलनि,से सभकें अनुभव भेलनि। कहुना राति बीतल। सबेरे ऑटो रिक्शासं चड्ढा नर्सिंग होम ल’ गेलियनि। डा. ई. सी. जी. रिपोर्ट देखि कहलनि हम सभ किछु नहि क’ सकैत छी। पुछलियनि, ई विचार कहू जे कत’ ल’ जइयनु जत’ सुधारक किछुओ आशा क’ सकी, त कहलनि, सेंट स्टीफेंसमे देखि सकैत छी, ओना हिनका लग समय बहुत कम छनि। तत्काल हम सभ ओही ऑटो रिक्शासं सेंट स्टीफेंस अस्पताल बिदा भ’ गेलहुँ। हमर बहिनो स्कूटरसं चललाह,बहिन सेहो पाछाँ बैसलि। सभ गोटे जल्दी-सं-जल्दी अस्पताल पहुंच’ चाहैत रही। दुर्घटना भ’ गेलै, कोनो स्पीड ब्रेकर लग हमर बहिन स्कूटरसं नीचां खसि पडलीह, सड़क पर घिसिया गेलीह,हाथ बहुत छिला गेल छलनि। बाबू आ सच्ची दुनू गोटेकें इमरजेंसी वार्डमे भरती कराओल गेलनि। चिन्ता दुगुना भ’ गेल। सच्ची कें फ्रैक्चर नै भेल छलनि, तें प्लास्टरक’क’ किछु दबाइ सभ द’क’ छोड़ि देलकनि। बाबू द’ कहल गेल जे हिनका लेल २४ घंटा भारी छनि, २४ घंटा रहि गेलाह त बूझू एखन बचि जेताह। बाबू बचि गेलाह। १५ तारीखक’ बाबू अस्पतालसं मुक्त भेलाह। मुदा चलबा-फिरबा योग्य हेबामे समय लागि गेलनि। दू बेर पुनः जांच लेल जाए पडलनि। डॉक्टर दबाइ लीखि देलखिन आ कतहु ल’ जेबाक सह्मति सेहो देलनि। १७ जूनक’ बाबूक संग हम सभ गोटे दिल्लीसं डोमनहिल वापस पहुंचि गेलहुँ। ओत’ बाबूकें आँखिक कष्ट भ’ गेलनि। आंखिक डोक्टरसं सम्पर्क कय ड्रेसिंग लेल किछु दिन ल’ गेलियनि। तकर बाद किछु दिन डेरापर रहथि आ किछु दिन अस्पतालमे। डेरापर रहथि त साँझक’ बहुत गोटे भेंट करय अबैत छलखिन, रविजी आ दुबेजी नियमित रूपसं अबैत छलाह आ बाबू गीत-गजलक आनन्दमे लीन भ’ जाइत छलाह। हमरो लिखबा लेल प्रतिदिन तगादा करैत छलाह, रविजीकें सेहो तगादा करैत छलखिन, रचनापर अपन प्रतिक्रिया सेहो दैत छलखिन। बाबू कैसेटमे पलटू दादा द्वारा गाओल हमर लिखल गीत सभ सेहो सुनैत छलाह। चक्रधर झा,सभापति चौधरी,नवीन मिश्र,रामजी सिंह सेहो सभ अबैत रहैत छलखिन जिज्ञासामे। एस ई सी एल केर क्षेत्रीय अस्पतालक डा.उमेश मिश्र जीक दबाइसं ठीक रहैत छलाह, हुनक प्रशंसक भ’ गेल छलाह। कखनो डा. साहेब बजबैत छलखिन, कखनो हम जाक’ स्थिति कहैत छलियनि त दबाइ लीखि दैत छलाह, से कीनिक’ देब’ लगैत छलियनि। आवश्यकतानुसार डा.साहेबक सुझावपर किछु दिन लेल अस्पतालमे भर्ती सेहो कर’ पडैत छल। अपन लोक : अपन दुख : एक दिन बाबू प्रसन्न स्थितिमे पोता-पोती सबहक संग गप करैत रहथि। छुट्टीक दिन छलै। हमहूँ डेरेमे दोसर कोठलीमे रही, किछु लिखैत-पढैत रही। बाबू अपन किछु संस्मरण सुनबैत धिया-पूता लग बजलखिन जे एकटा समय छलै जे एम एल ए आ एम पी हमरा जेबीमे रहै छल। बच्ची साल भरिसं बाबूक लेल , धिया-पूताक लेल आ हमरा लेल एसगरे बहुत रास काज करैत छलीह, कोनो काज लेल डेरामे नोकर –चाकर राखब नीक नहि लगैत छलनि। एसगरे भोजन,जलखै, पथ्य, झाड़ू-पोछा, कपड़ा साफ़ करब आदि काजमे परेशान रहैत छलीह, बारह बजेसं पहिने चाह छोडि किछु मुंहमे नै दैत छलीह , बी.पी.क दबाइ सेहो समयपर नहि खाइत छलीह। क्यो पूछि देलकनि, ‘हं गे माए, एम.एल.ए.-एम.पी. बाबाक जेबी मे रहै छलनि?’ बच्ची जोरेसं कहलखिन,’ऊंह....हमरा सभटा देखल अछि।’ हम दूनू बात सुनने छलहुँ : ‘एमेले एम पी हमरा जेबीमे रहै छल।’ ‘ऊंह....हमरा सभटा देखल अछि।’ हमरा हरिमोहन बाबूक कथा ‘अलंकार–शिक्षा’ मोन पड़ि गेल छल। बच्चीक बात अप्रिय हमरो लागल, मुदा हम ओहि एक पांती ‘ ऊंह...हमरा सभटा देखल अछि’ मे बच्चीक मोनक वेदनाकें देखलहुं...एकटा अभावक इतिहास...गोठुल्ला एतेक टा घरमे द्विरागमन, भरि टोलक लोकक करजा, घर लेल गहना बिकाएब,आवश्यकताक पहाड़ आ एकटा नोकरीपर सभटा व्यवस्थाक भार .....। मुदा बाबूक लेल ई वाक्य एखन बड्ड असह्य पीड़ाक कारण बनि गेल छलनि,एकटा हलचल मोनमे उठि गेल छलनि, की करथि,एको पल आब एत’ रहब कठिन लाग’ लगलनि, अपन सभ कपड़ा,दबाइ आदि झोडामे रखलनि आ विदा भ’ गेलाह। पोता-पोती रोकलकनि, नहि रुकलाह, डेरासं बाहर निकलि गेलाह। हम उठलहुं, बाहर गेलहुँ, झटकारिक’ हुनका लग पहुँचलहुं। पुछलियनि, ‘कत’ जेबै?’ कहलनि,’ हम दिल्ली जा रहल छी, हमरा नहि रोकू।’ पुछलियनि, ‘ककरा संगे जेबै दिल्ली?’ कहलनि, ‘विजय बला झाजी कहने छथि, हम दिल्ली जाइत –अबैत रहै छी...हुनके संग जेबै, हमरा आब नै रोकू।’ हम कहलियनि,’दिल्ली जेबाक हएत त हमहीं पहुंचा देब, मुदा एखन किए? अपने संसारसं रूसिक’ जाएब?’ हम जनैत छी अहाँ आहत छी, मुदा ईहो त देखू जे साल भरिसं अहाँक सेवा जे क’ रहल अछि तकरा एकटा वाक्य लेल क्षमा नहि क’ सकैत छिएक? बाबू ठाढ़ भ’ गेलाह। हम कहलियनि, ओकर की त्याग आ योगदान छै घरमे , से अहाँ त जनैत छी। बाबूक आँखि डबडबा गेलनि। ‘अहाँ देखै छिऐ जे आइ धरि नोकर –चाकर नहि राखि, मोनो खराब रहै छै तैयो अपने सभ काज करिते रहै छै,बी.पी.क दबाइ सेहो समयपर नहि खाइत छै, एहेन स्थितिमे ओकर एकटा अप्रिय वाक्यक कारण ओकरा एतेक पैघ अपयश,एतेक पैघ दंड देबै, से उचित लगैए?’ बाबू कान’ लगलाह। कहलनि, ‘हमरा अहाँ बड़का अपराधसं बचा लेलहुं।’ बाबू घूरि एलाह। घरमे बच्ची सेहो दुखी भेल पड़लि छलीह, हमरा सबहक आहट पाबि उठलीह, चाह बनौलनि। सभ गोटे प्रसन्न मोनसं चाह पिबै गेलहुँ। तकर बाद फेर कहियो एहेन स्थिति नहि आएल। दुर्घटना : बाबूक लेल निरन्तर डा.साहेबक सम्पर्कमे रहय पड़ैत छल। एक बेर साँझक’ डा.साहेबसं सम्पर्क क’ क’ घुरैत रही, रस्तामे मोटर साइकिलक आगाँ एकटा सुगर आबि गेलै, हमर गाड़ी खसि पड़ल आ हम सड़कपर गाडीक संग किछु दूर घिसिआइत गेलहुँ जाहिसं हमर बामा हाथमे फ्रैक्चर भ’ गेल। एक आदमी हमरा डोमनहिल अस्पताल पहुंचा देलक। बिलासपुर जाक’ प्लास्टर कराब’ पडल आ डेढ़ मास छुट्टीमे रह्य पड़ल। बाबूक इलाजमे दौड़-धूप लेल अनुज रतनजीकें बजब’ पड़ल। जाधरि हमरा हाथमे प्लास्टर रहल रतनजी डेरा आ अस्पतालक चक्कर लगबैत रहलाह। विवेकक उपनयन : विवेकक उपनयन हेबाक छलनि। गाममे जेना उपनयनक विधि-विधान छै, तेना करबामे बहुत खर्च आ बहुत समयक आवश्यकता छलै। गाम जाक’ करू त कम-सं-कम पन्द्रह दिनक छुट्टी ल’क’ जाउ, ओते दिन सभ धिया-पुताक स्कूल-कॉलेजक पढ़ाइ सेहो छुटतै, से जानि हम विकल्पक खोज कर’ लगलहुं। हरिवंश राय ‘बच्चन’क आत्म-कथा पढने रही, ओहिमे ओ लिखने छलाह जे तेजीक नैहरमे केश कटयबाक चलन नहि छलनि, मुदा बच्चन जीक परिवारमे बहुत विधि-विधानसं पहिल बेर लड़काक केश कटाएल जाइत छलैक, बच्चन जी हजामकें आवासपर बजाक’ अमिताभ आ अजिताभक केश उतरबा देलखिन। बच्चन जीक आत्मकथा पढ़िक’ लागल रह्य जे समय आ परिस्थितिक अनुसार परम्परामे किछु परिवर्तन कएल जा सकैत अछि। हम विचार केलहुं त लागल जे एखन जाहि तरहें गाममे उपनयन भ’ रहल छै, आरम्भमे अथवा बहुत दिन पहिने एहेन नहि छल हेतै, ओहि समय स्र्त्रीक शिक्षा आवश्यक नहि मानल गेल हेतै अथवा गुरूक आश्रममे जाक’ पढबाक चलन लड़केक लेल आवश्यक मानल गेल हेतै, तें लड़कीक उपनयन नहि करबाक आ लडकेक लेल गुरूक आश्रममे विद्याध्ययन करबाक लेल पूर्व तैयारीक ध्येयसं किछु विधि कएल गेल हेतै जाहिमे किछु-किछु समय-समय पर जुटैत चल गेलै आ वर्तमानमे जे स्वरूप, जे विधि-विधान चलि रहल अछि ताहिमे आवश्यक कम आ अनावश्यक बेशी भ’ गेल छै। कोनो एहेन संस्था नहि छैक जे अध्ययन करै जे कोन-कोन अवसरपर चालू विधि-विधानमे कतेक आ कोन प्रकारक संशोधनक आवश्यकता छै आ तदनुसार अपन सुझाव दै आ लोक ओकर पालन करय। एहेन स्थितिमे व्यक्तिगत रूपसं कियो आवश्यकतानुसार कोनो परिवर्तन करैत जाए, सैह व्यवहारिक लगैत छैक। एक दिन दुबेजी आचार्य श्री राम शर्माक विषयमे किछु सूचना देलनि, से नीक लागल। श्री राम शर्माक कहब छलनि जे विवाह आ अन्य संस्कारक विधि-विधानमे अनावश्यक बहुत खर्च करब भ्रष्टाचारकें जन्म दैत अछि। ओ कहैत छलाह जे कम-सं-कम खर्चमे सभ संस्कारक पालन करू। ओ एकरा व्यावहारिक रूपमे कोना कएल जाए सेहो देखबैत छलाह। हुनक अनुयायीक संख्या सेहो संतोषप्रद छलनि। जहां-तहां शिविर लगबैत छलाह,लोककें जगबैत छलाह,किछु लोक और जुटि जाइत छल। सीवानमे सेहो एक बेर हुनक कार्यक्रमक झलक देखने रही, मुदा ओहि समय ओतेक गंभीरतापूर्वक एहि विषयपर विचार नहि केने रही। एक दिन दुबेजी सुचित केलनि जे आचार्य श्रीराम शर्मा जीक शिविर चिरिमिरीमे लागि रहल छनि। शिविरमे जाक’ देखलहुं। नीक लागल। बच्चीकें सेहो ल’ जाक’ देखेलियनि। हुनको नीक लगलनि। बाबू त पहिने विरोध केलनि, मुदा जखन अपनो जाक’ देखलखिन त नीक लगलनि। ओहिठामक व्यवस्थापकसं गप केलहुं।उपनयनक तिथि सेहो निर्धारित रहै। घरमे सभ गोटेक बीच सहमति भ’ गेल। सभ गोटे जीपसं गेलहुँ। ओही शिविरमे ४ जनवरी १९९८ क’ विवेकक उपनयन भ’ गेलनि।ज्ञानक सभ बातक समावेश भेलै। अनावश्यक कोनो बात नहि भेलै। दान-पात्रमे स्वेच्छासं जे देलिऐ सैह, कोनो बन्धन नहि रहै, घर आबि साँझमे लगक पाँच-सात आदमीक संग भोजन करै गेलहुँ। बहुत दिनक बाद गाम गेलहुँ त एक गोटे आबि सुचित केलनि जे अहाँ द’ सुनलहुं त हमरो साहस भेल आ हमहूँ मधुबनीमे गायत्री शिविरमे उपनयनक संस्कार पूर्ण केलहुं। हमरा नीक लागल। लीखसं हटिक’ चलबामे अपन मोने नै मानैत रहै छै, मोनकें मजबूत बनयबाक लेल सत्संग अथवा महापुरुषक जीवनी अथवा आत्मकथा पढबाक चाही। जे समस्या हमरा सोझाँ अछि से पूर्वमे सेहो किनको सोझां अवश्य आएल हेतै, ओहि स्थितिमे ओ कोन रस्ता पकड़लनि, से जनलासं मोन मजबूत होइत छैक। गाममे अधिक ठाम भोजकें प्रधानता देल जाइत छैक, ब्राह्मण भोजनक प्रधानता।एहिमे मुख्य उद्देश्य गौण भ’ जाइत अछि।किछु गोटे करजा ल’क’ अथवा खेत भरना ध’ क’ अथवा बेचियोक’ भोजक परम्पराक पालन करब धर्म बुझैत छथि। शास्त्र और परम्पराकें ठीकसं बुझबाक आवश्यकता छै। जाहि समयमे ब्राह्मण लोकनि विद्याध्ययन आ विद्यादान मात्र करैत छलाह, भविष्य लेल संचय नहि करैत छलाह, पाँच घर भीख मांगिक’ जीवन-यापन करैत छलाह, ओहि समय ब्राह्मण भोजनक औचित्य आ महत्व बूझल जा सकैत अछि। वर्तमान समयमे ओ स्थिति नहि अछि, तें अपन-अपन विवेकसं आ परिस्थितिक अनुकूल नीक परम्पराक समावेश कएल जा सकैत अछि। जीवनकें सरल, सहज आ स्वस्थ बनयबाक प्रयास होइत रहबाक चाही।कोनहु आयोजनमे अनावश्यक भीड़सं आ अनावश्यक खर्चसं बचबाक चाही। चिन्तक लोकनि कहैत छथि जे बच्चाकें तन-मनकें स्वस्थ रखबाक विधि सिखयबाक चाही, खूब श्रम करब आ सदिखन इमानदारी आ सत्यक मार्गपर चलबाक आ केहनो स्थितिमे गलत मार्गपर नहि चलबाक बात सिखेबाक आयोजनक उत्सव हेबाक चाही उपनयन। बाबूक अंतिम अध्याय : बाबू दिल्लीसं एलाक बाद डेढ़ सालसं बेशी धरि कहुना रहलाह। फेर एक बेर रीजनल हॉस्पिटलमे भर्ती भेलाह। पलटू मुखर्जी दादा आएल रहथिन भेंट कर’ त अस्पतालेमे हुनका बाबू गीत सुनयबाक लेल जिद्द कर’ लगलखिन। दादा हुनका भरोस देलखिन जे अहाँ अस्पतालसं डेरापर जाएब त हम अहाँकें एक दिन अवश्य आबिक’ गीत सभ साज-बाजक संग सुनाएब। बाबू अस्पताल सं डेरापर आबियो गेलाह। अस्पतालमे ग्लूकोज बहुत चढल रहनि, बाबूकें भेलनि जे आब एकदम ठीक भ’ गेल छी। डॉक्टर कहने छलाह जे यदि एहि अवस्थामे फ्रैक्चरसं बाँचल रहथि त किछु मास अथवा सालो जेना-तेना जीबैत रहि सकैत छथि। हम सभ सतर्क रहैत छलहुँ जे ओहेन स्थिति नहि आबनि, मुदा मृत्यु त कोनो-ने-कोनो रस्ता ताकिए लैत अछि, ओकरा के सभ दिन रोकि सकैत अछि ! एक दिन अपनेसं कुरसी ल’क’ बाबू कोठलीसं बाहर निकलि गेलाह आ कुरसी नेने खसि पड़लाह। कमजोर देह, बिमारीसं टूटल देह छलनि, डांडमे फ्रैक्चर भ’ गेलनि। ओहि दिन जे बाबू खसलाह से फेर उठिक’ ठाढ़ नहि भ’ सकलाह, बिलासपुरमे डॉक्टरसं सम्पर्क केलहुं। डॉक्टर सड़नसं रक्षाक लेल किछु दबाइ लीखि देलनि आ कहलनि, आब पैघ सपना देखब छोडू। बाबू सेहो हिम्मति हारि गेलाह। ३० अप्रैलक’ रातिमे स्थिति ख़राब देखि रीजनल अस्पताल ल’ गेलियनि। हमरा संगे सेंट्रल स्कूलक किछु शिक्षक सेहो छलाह। डॉक्टर आला ल’क’ जांचिक’ कहलनि, ‘अब नहीं हैं।’ घर घुरबाक लेल साधनक व्यवस्था नहि भ’ रहल छल। अस्पतालक निदेशक मोहन्ती साहेब उडीसाक छलाह। हमरा संग सेंट्रल स्कूलक शिक्षक छलाह शीत सर, ओहो उडीसाक छलाह। ओ कहलनि, रुकिए मैं मोहन्ती साहब को कहता हूँ, मेरा उनसे अच्छा सम्बन्ध है। शीत सर मोहन्ती साहेबकें फोन क’क’ कहलखिन सभ बात आ एम्बुलेंसक व्यवस्थाक अनुरोध केलखिन। मोहन्ती साहेब कहलखिन,आपने मुझे सूचित कर दिया, अब तो नियमानुसार कल पोस्टमार्टम के बाद ही डेड बॉडी दी जा सकती है, कल शाम हो जाएगा। सभ विभागक अपन-अपन नियम होइ छै। मोहन्ती साहेब मजबूर छलाह, शीत सरकें कहलखिन, मुझे बिना कहे ले गये रहते तो अलग बात थी, मुझे कह दिया तब तो नियमानुसार चलना होगा। शीत सर अपनाकें दोखी मानैत हमरासं क्षमा याचना कर’ लगलाह। हम कहलियनि, अहाँ त हमरा मदति कर’ चाहैत छलहुँ,अहाँ अपनाकें दोखी किए मानैत छी, भ’ सकैत अछि हमर पिता मरियोक’ हमरा किछु सिखयबाक कोशिश क’ रहल होथि। डेड बॉडीकें आइस रूममे सुरक्षित रखबाक लेल शुल्क जमाक’ क’ बैसिक’ भोरक प्रतीक्षा कर’ लगलहुं। शीत सर सेहो भरि राति हमरे संग रहलाह। भोरे हम डेरामे खबरि क’ क’ रविजी ओत’ गेलहुं। रविजी दुबेजी ओत’ ल’ गेलाह। दुबेजी गिरिजी ओत’ ल’ गेलाह। गिरिजी कहलनि, चलै चलू अस्पताल। तीनू गोटे विदा भेलहुँ। रीजनल अस्पताल लग गिरिजी कहलनि, आप लोग चलिए,हम तुरंत आ रहे हैं। हम सभ अस्पताल गेलहुँ। किछुए कालमे कतहुसं फोन एलै। डॉक्टर साहेब कहलनि, आप ले जा सकते हैं, एम्बुलेंस भी आ रहा है। हम पुछलियनि,’और पोस्टमॉर्टेम?’ कहलनि, आदेश मिल गया है, आप ही चार लाइन लिख दीजिए कब से बीमार थे,अब पोस्टमॉर्टेम की जरुरत नहीं है। हम संक्षेप मे लिखिक’ देलियनि, रवि जी,दुबेजी,गिरि जी तीनू गोटे गबाहक रूपमे हस्ताक्षर केलखिन। गिरिजी सभ बात कहलनि। ओ कोनो नेताजी लग गेल छलाह, हुनका सभ बात कहलखिन,ओ अस्पतालक सम्बन्धित अधिकारी सभकें कहलखिन, ठाकुर साहब से विवरण लिखाकर, उस पर गवाहों का हस्ताक्षर लेकर डेड बॉडी सुपुर्द कर दीजिए, प्रबन्धन आ थाना मानि गेलै। एम्बुलेंस सेहो उपलब्ध भ’गेल। किछु गोटे लकड़ीक प्रबन्ध केलनि। रविजी,दुबेजी,गिरिजी – ई तीनू गोटे त गत लगभग दू बरखसं बाबूक जिज्ञासामे अधिक काल अबिते रहैत छलाह, अस्पतालोमे जाक’ देखैत रहैत छलखिन, ई सभ त रहबे करथि, विवेक छलाहे, नवीन मिश्रजी,चक्रधर झा जी,मायाकांत झा जी,दुबे जीक छोट भाए,दीक्षित जी,मुखिया जी, राजेंद्र अग्रवाल,अशर्फी मंडल,सुरेश प्रसाद साहु,विजय कुमार श्रीवास्तव, दल प्रताप,श्याम किशोर, मथुरा नाई, बैंकक स्टाफमे बालाकृष्णनजी,तिग्गाजी,खडग सिंह,राम कृपाल और बहुत गोटे संग आबि गेलाह। मुखिया जीक नेतृत्वमे औपचारिकता हुअ’ लागल। सभ औपचारिकताक संग आवाससं किछुए दूरपर अन्त्येष्ठिक प्रबन्ध कएल गेल। साँझमे नवीन मिश्रजी हल्दीबाड़ी गेलाह। पी.सी.ओ.सं दिल्लीमे दुनू भाए, बहिन-बहिनोकें आ पटनामे मामाकें फोनसं सूचना द’ देल गेलनि। गयामे श्राद्धक व्यवस्था : दिल्लीसं दुनू अनुज ललनजी आ रतनजी एलाह, बहिन सच्ची बुच्चीक संग एलीह। बसंतक बी.ए.अंतिम वर्षक परीक्षा लग आबि गेल छलनि। चारि साल पहिने मायक श्राद्धक समय गाम मे रहबाक कारण हिनकर परीक्षा छूटि गेल रहनि आ दोसर साल बारहवींक परीक्षा देबामे बहुत कष्ट भेल रहनि। आब एहि बेर यदि गाम जाक’ श्राद्धक सभ काज करै छी त फेर बहुत झंझट उपस्थित हएत, तें विकल्पपर विचार करै गेलहुँ। कय गोटेसं विचार-विमर्श भेल। अन्तमे गयामे श्राद्ध क्रिया संपन्न कय डोमनहिल आबि जते गोटे कठियारी गेल छलाह हुनका सभकें आमंत्रित कय भोजक औपचारिकता पूर्ण करबापर सहमति भेल। अस्थि सेहो ओतहि विसर्जित करबाक निर्णय लेल गेल। पटनामे छोटका मामा छलाह, हुनका सभ बात कहि देल गेलनि। हम सभ गोटे डोमनहिलसं एकटा जीप आरक्षित क’ क’ अंबिकापुर होइत गरबा रोड जंक्शन पहुँचलहुं। हम अपने संगमे अस्थि सेहो ल’ नेने रही। पटनासं मामा सेहो एलाह। गयामे फल्गू नदी छथिन, हुनका गुप्त गंगा कहल जाइ छनि। किछुए माटि हटेलासं जल निकलि जाइत छैक। ओना ओ नदी सूखल रहैत छैक। विद्यापतिक ओ कथा पढने रही, सिमरियासं बहुत पहिनहि कहार सभकें रोकि देलखिन, सभ थाकि गेल छल, कहलखिन जे हम एतेक दूर धरि आबि गेल छी त माए अपन पुत्र लेल किछु दूर नहि आबि सकैत छथि? चमत्कार भेलै, भोरे सभ क्यो जागल त देखलक गंगा ओत’ धरि पहुंचि गेल छलखिन। हमहूँ ओहि घटनाक स्मरण करैत मोने मोन कहलियनि, हे माँ गंगे, हमरा बूते से संभव भ’ सकल से क’ रहल छी, जे त्रुटि भेल होइ तकरा अहाँ पूर्ण क’ देबै। हम सभ ओतहि रही त एक आदमी एलाह कहैत, अहाँ सभ जल्दी हटू ओत’ सं, गंगा हहाएल आबि रहल छथि। हम सभ ऊपर चलि गेलहुँ आ थोड्बे कालमे ओ सूखल नदी लबालब भरि गेलै। ओहि ठामक पंडा सभ कहलनि जे कहियो-कहियो एना होइ छै, फेर धीरे-धीरे पानि कम होमय लगैत छैक। गया धाममे सभ गोटेक रहबाक व्यवस्था भ’ गेल छल। नीक जकाँ सभ काज संपन्न क’क’ ट्रेनसं गरबा रोड जंक्शन आ ओत’ सं बससं अम्बिकापुर आ ओत’सं बससं डोमनहिल पहुंचि जाइ गेलहुँ। डोमनहिलमे जे सभ दाह क्रियामे सम्मिलित भेल छलाह, हुनका सभ गोटेकें निमंत्रण दए भोजनक व्यवस्था कएल गेल। बसंत बी.ए. अंतिम वर्षक परीक्षामे सम्मिलित भेलीह, तैयारीमे बाधा त भेबे केलनि, मुदा साल बर्बाद नै भेलनि, बी.ए.उतीर्ण भेलीह। गत कए बरखसं हमर प्राथमिकतामे अपने छलहुँ, हमर नोकरी छल,हमर पिता छलाह। धिया-पुताक शिक्षाक समुचित व्यवस्था करबामे हम असफल रहलहुं, एकर परिणाम हुनका सभकें भोग’ पड़लनि। बाबूक प्रस्थानक बाद हमर प्राथमिकतामे धिया-पुताक शिक्षाक समुचित व्यवस्था करब आएल, मुदा ताधरि बहुत देरी भ’ चुकल छलै। मैथिली आ विवेक भिलाइ गेलाह, कोचिंग संस्थानमे एक सत्र रहै गेलाह। वसन्त एम.ए. (अर्थ शास्त्र )मे नाम लिखौलनि। स्थानान्तरण : हमरा डोमनहिलमे पाँच सालसं बेशी भ’ गेल छल। अनुरोधपर स्थानान्तरणक आदेश एक बेर तेहेन समय आएल छल जखन बी.ए.अंतिम वर्षमे छलीह। पता चलल जे एखन यदि बिहार जाइ छी त ओत’ बी.ए.प्रथम वर्षसं शुरू कर’ पड़तनि, अही कारण ओहि स्वीकृतिकें अस्वीकार कर’ पड़ल। तकर बाद एक बेर पदोन्नतिक अवसर आएल, मुदा हम सफल नहि भेलहुँ। पाँच साल बाद हमरा मध्य प्रदेशक सिवनी जिलाक एकटा शाखामे स्थानान्तरणक आदेश प्राप्त भेल। हम चाहैत रही जे एहेन स्थानपर होइतय जाहि ठामसं बिहार जेबाक लेल ट्रेनक सुविधा रहितइ। रायपुर गेलहुँ। यूनियन क महासचिव एम.के.अग्रवाल साहेबसं सम्पर्क केलहुं। आंचलिक कार्यालय गेलहुँ। हमरा एकटा विकल्प देल गेल ‘कोतमा’ शाखा। कोतमामे रेलवे स्टेशन छै, ओत’सं अनूपपुर आ अनूपपुर जंक्शनसं पटनाक लेल ट्रेन उपलब्ध होइत छै। हम स्वीकार क’ लेलहुं। चिरिमिरी आ कोतमाक बीच मनेन्द्रगढ़मे नीक कॉलेज छै आ नीक आवास सेहो उपलब्ध भ’ सकैए, तें निर्णय लेलहुं जे परिवार मनेन्द्रगढ़मे राखि अपने मनेन्द्रगढ़सं कोतमा जाएब। जेबा-एबाक लेल ट्रेन छै, से पता चलल। कोतमा शाखाक लेल स्थानान्तरण आदेश ल’ क’ रायपुरसं डोमनहिल घुरलहुं। १५.०६.१९९९ क’ हम डोमनहिल कोलियरी शाखा सं भारमुक्त भेलहुँ। पटना / १३.१२.२०२१ (२२) एत’ आबिक’ १५ जून १९९९ क’ हम चिरिमिरीसं ट्रेनसं कोतमा आबि सेन्ट्रल बैंकक कोतमा शाखामे योगदान केलहुं। पूर्व शाखा प्रबंधक छलाह मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव, ओ किछु दिनक बाद शहडोल स्थानांतरित भ’ क’ गेलाह। शाखामे निम्नलिखित सहयोगी सबहक संग काज करबाक अवसर भेटल : बी.एल.मीना,अधिकारी, जे छओ मासक बाद स्थानांतरित भ’क’ जयपुर चल गेलाह आ दोसर शाखासं दिलावर सिंह एलाह उप-प्रबंधक भ’ क’। के.एन.कुमरे जी सेहो अधिकारीक रूपमे संग देलनि। हिनका सबहक अतिरिक्त नेल्सन लकड़ा जी आ रंजीत बक्सला जी सेहो लिपिक-सह-खजांचीक रूपमे छलाह। विनोद कुमार सोंधिया वरिष्ठ लिपिक सह खजांची छलाह। दफ्तरी छलाह अशोकजी। सुरक्षा प्रहरी सेहो छलाह। शाखा बजार क बीचमे छल। रेलवे स्टेशन सेहो बहुत दूर नै छलै। किछु दिन धरि डोमनहिलसं संपर्क बनल रहल। ओत’सं बस अथवा ट्रेनसं चिरिमिरी,मनेन्द्रगढ़ होइत कोतमा जाइत छलहुं। वापसीक लेल सेहो यैह बाट छल। करीब एक मासक बाद डोमनहिलसं घरक सामान सभ मनेन्द्रगढ़मे खेड़िया काम्प्लेक्समे एकटा डेरामे स्थानान्तरित केलहुं। मनेन्द्रगढ़मे कोतमाक तुलनामे नीक कॉलेज छलै, तें मनेन्द्रगढ़मे आवास राखब उपयुक्त छल। हम किछु अवधि तक बससं मनेन्द्रगढ़सं कोतमा जाइत छलहुं आ सांझमे ट्रेनसं मनेन्द्रगढ़ घूरि जाइत छलहुं। मनेन्द्रगढ़मे जगदीश पाठक जी भेटलाह। ओ कोतमामे भारतीय स्टेट बैंकमे काज करैत छलाह, घर मनेन्द्रगढ़मे छलनि, मनेन्द्रगढ़सं बससं कोतमा आ कोतमासं ट्रेनसं मनेन्द्रगढ़ जाइत-अबैत छलाह। ओ हिन्दीमे व्यंग्य लिखैत छलाह। बस आ ट्रेनमे हम सभ बहुत दिन धरि संग भ’ जाइत छलहुं आ कोनो साहित्य-चर्चामे प्रसन्नतापूर्वक समय बिता लैत छलहुं। मनेन्द्रगढ़मे काशीम फूलवाला भेटलाह जे उर्दू आ हिन्दीमे गीत-गजल लिखैत छलाह। किछु और साहित्यकार सभसं परिचय भेल। ओत’ श्रीराम मन्दिरक प्रांगनमे समय-समयपर कवि गोष्ठीमे भाग लेबाक अवसर भेटल। किछु अंतरालक बाद हमरा प्रतिदिन यात्रा कठिन लाग’ लागल। कोतमामे एकटा छोट-छीन डेरा लेलहुं। भोजन जैन भोजनालयमे करैत छलहुं। शनि दिनक’ मनेन्द्रगढ़ जाइ आ सोम दिन कोतमा आबि जाइ छलहुं। ओहि ठाम हमरा बगलक डेरामे भारतीय स्टेट बैंकक प्रबंधक कुमार साहेब सेहो रहैत छलाह। हुनक परिवार जबलपुरमे छलनि, एत’ एसगर रहैत छलाह आ अपने भोजन बनबैत छलाह। हुनकासं प्रेरित भ’ क’ हमहूँ अपन डेरामे भोजन बनेबाक व्यवस्था केलहुं। हमरा दूधवला दलिया बनाएब आ खाएब नीक लगैत छल। से एक दिन हमरा भारी भ’ गेल। ऑफिससं घुरैत रही। मोटर साइकिलसं रही, हमरा पाछाँ उप-प्रबंधक दिलावर सिंह सेहो छलाह। किछु दूर गेलाक बाद हमरा चक्कर आबि गेल। हम तुरंत गाड़ी रोकि उतरि गेलहुं, सिंहजी सेहो उतरि गेलाह। एकटा किरानाक दोकान छलै ओत’। दोकानपर जाक’ पड़ि रहलहुं आ एकटा टेबुल पंखा हमरा माथ लग चला देब’ कहलियनि। हम बेसुधि भेल बड़ी काल धरि रहि गेलहुं। आँखि खूजल त उठबाक कोशिश केलहुं। उठबामे असौकर्य भ’ रहल छल। हमरा एकटा डॉक्टर लग ओ सभ ल’ गेलाह। डॉक्टर बी.पी. चेक केलनि। बी. पी. बहुत कम भ’ गेल छल। हमरा मनेन्द्रगढ़ जाक’ चिकित्सा करेबाक आ आराम करबाक सुझाव भेटल। सिंह जी तुरत एकटा जीप भाड़ापर ल’क’ हमरा मनेन्द्रगढ़ ल’ गेलाह, डॉक्टरसं संपर्क कराक’, दबाइ ल’क’ हमरा डेरापर पहुंचा देलनि। करीब डेढ़ मास धरि हमरा डॉक्टरक परामर्शक अनुसार दबाइ, पथ्य आ आरामक अधीन रह’ पडल। बाइस दिन अवकाश मे रहलहुं। एहि अवधिमे किछु पत्रिका सभ कहुना पढ़ि लैत छलहुं। पाठकजी आ किछु और साहित्यकार लोकनि अबैत रहैत छलाह। अही बीच हम मैथिली दीर्घ कविताक एक अंशकें हिन्दीमे अनुवाद क’ क’ समकालीन भारतीय साहित्यकें पठा देलिऐ। साहित्यिक परिवेश : कोतमामे सेहो साहित्यिक कार्यक्रम सभ होइत रहै छलै। प्रगतिशील लेखक संघक मासिक बैसकमे कवि गोष्ठी होइत छलै। किछु लोक सभ एखनो खूब मोन छथि आ किछु गोटेसं एखनो संपर्क अछि। जगदीश पाठकजी व्यंग्य लिखैत छलाह, एखनो लिखैत छथि, एखन फेस बुकपर हुनक व्यंग्य रचना आ कार्टून सेहो नीक लगैत अछि। नीहार स्नातक सेवा निवृत अध्यापक छलाह। नीक रचना करैत छलाह, गोष्ठीक आयोजन करैत छलाह, किछु पत्रिका मंगबैत छलाह, ओ सभकें किछु दिन लेल उपलब्ध करबैत छलाह आ ओहिपर गोष्ठीमे कोनो आलेख अथवा मौखिक प्रतिक्रिया देबाक लेल आमंत्रित करैत छलाह। हुनक स्मरण शक्ति एतेक तीक्ष्ण छलनि जे गप-शपमे सेहो परिलक्षित होइत छल। दस बरख पहिने कोनो साहित्यकारसं भेंट भेलनि तकर स्मरण करैत ओ इहो कहैत छलाह जे ओ साहित्यकार कोन रंगक वस्त्र पहिरने छलाह आ कोन मूहें बैसल छलाह आ की करैत छलाह। हुनकहि जोर पर ११ नवम्बर २००० क’ रीवाक महाविद्यालयमे आयोजित कवि गोष्ठीमे भाग नेने छलहुं जाहिमे प्रख्यात गीतकार सोम ठाकुर जी सेहो आएल छलाह,शैलेश जी सेहो छलाह,नीहारजी गोष्ठीक संचालन केलनि। १२ नवम्बर क’ हम सभ सतनामे साहित्यकार शैलेशजीक ओत’ सेहो आयोजित गोष्ठीमे भाग नेने छलहुं। एक दिन साहित्यिक टीम अमरकंटक गेल। ओत’ एक दिन रहै गेलहुं। जैन मुनि सभक संग एकटा नीक कवि सम्मेलन भेल। हमहूँ ओहिमें सम्मिलित रही। नीहार जीसं जबलपुर आ सिवनीमे सेहो भेंट भेल। किछु मास पूर्व एकटा साहित्यकार मित्र कैलाश पाटकरक माध्यमसं नीहार जी सं संम्पर्क भेल। आब पचासी बरखसं बेशीक छथि, स्वाभाविक शारीरिक स्थितिक अधीन छथि। धर्मेन्द्रजी नवगीत लिखैत छलाह। हुनकासं संपर्क नै अछि। भरिसक आब ओ नै छथि। शिव कुमार सिंह जी हास्य-व्यंग्य लिखैत छलाह। हुनकोसं संपर्क नै अछि। कैलाश पाटकर जी सेहो नीक लिखैत छलाह। किछु मास पूर्व हुनकासं फेस-बुकक माध्यमसं संपर्क भेल। कोतमा आ यमुना कोलियरीमे काज केनिहार रावजी आ किछु और साहित्यकार सभ सम्पर्कमे छलाह। कोतमामे हमरा आवासपर एक जनवरी क’ कवि गोष्ठीमे स्थानीय साहित्यकारक अतिरिक्त शहडोलसं प्रख्यात कवि पारस मिश्रजी सेहो एलाह। २२ नवम्बर २००० क’ शहडोलमे पारस मिश्रजी ओत’ कवि गोष्ठीमे हमहूँ सभ भाग लेलहुं। १९९९ मे १४ अगस्तक’ क्षेत्रीय कार्यालय, शहडोलमे आयोजित काव्य गोष्ठीमे भाग लेलहुं। हम प्रस्तुत केने छलहु गीत ‘मैं कभी मन्दिर न जाता...’ ५ सितम्बर २००० क’ आकाशवाणी,शहडोलसं मंजुल वर्माजी फोनपर संपर्क क’ क’ बहुत आनन्दित भेल टेप कएल हमर ओहि गीतक बहुत प्रशंसा केलनि आ कह्लनि जे कोनो काजसं जहिया शहडोल आबी त आकाशवाणी एबाक कष्ट करब, हम ओही दिन अहांक किछु रचना टेप करबाक’ कार्यक्रम लेल राखि लेब। आदरणीय वर्माजीक उद्गार हमरा आनन्दित केलक। हम अपन कार्यक्रम तेना नै बना सकलहुं, मुदा हुनक अनायास फोन क’ क’ रचनाक प्रति अपन सम्मान व्यक्त करबाक भाव हमरा सुख दैत रहल अछि। चिन्तक लोकनि कहैत छथि जे किनकहु कोनो काज अथवा कोनो व्यवहार अहाँकें जं नीक लागल अछि तं एहि लेल हुनका प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपसं धन्यवाद देब अथवा हुनक प्रशंसा करब सेहो मानवीय धर्म थिक। २००० मे २२ सितम्बर क’ रातिमे कोतमा कन्या विद्यालयमे कवयित्री सम्मेलनक आयोजन भेलै। एहिमे डा. राजकुमारी ‘रश्मि’, जया जादवानी, डा. माधुरी शुक्ला आ डा. प्रेमलता नीलमक योगदान उल्लेखनीय आ स्मरणीय रहल। मैथिली पत्रिका ‘अंतिका’ आ ‘आरम्भ’ अबैत छल। आरम्भमे हमर निम्नलिखित छोट-छोट किछु कविता छपल। समकालीन भारतीय साहित्यक मैथिली विशेषांकमे हमर एहि कविताक अनुवाद प्रकाशित भेल : एत’ आबि क’ एत’ आबि क’ हम देखय लागल छी मनुक्खक हड्डी कोना चिबबैत अछि मनुक्ख आ मनुक्ख कोना मनुक्खक शोणित पीबि जाइत अछि हम सोचय लागल छी कोना चोराओल जा सकैत अछि सूर्य आ चन्द्रमा कोना कएल जा सकैत अछि ग्रह आ नक्षत्रक संग बलात्कार आ कोना भ’ सकैत अछि कोनहु स्वर्गक अपहरण। एत’ आबि क’ हम बूझ’ लागल छी किए कोनो लोकसं लोक डेरा जाइत अछि किए कोनो लोकमे लोक हेरा जाइत अछि, हम स्वीकार कर’ लागल छी एकटा चम्मचक महत्व एकटा हथगोलाक कमाल अश्रु-गैसक महिमा, हमहूँ सम्मिलित भ’ जाइत छी एकटा नव आविष्कारमे – ‘कोना अनका पयरपर लोक ठाढ़ भ’ सकैत अछि (!)’ पटना / ३१.१२.२०२१ (२३) परिवर्तन हम एसगर कोतमामे छलहुँ, पत्नी तीनू बच्चा सभ संगे मनेन्द्रगढ़मे रहैत छलीह,दुनू छोट भाए दिल्लीमे लगेमे किन्तु अलग-अलग रहै छलाह, गाममे क्यो नहि छल। हमरा दाँतक कष्ट भेल। मैथिलीके सेहो दाँतक कष्ट भेलनि। मनेन्द्रगढ़मे डा. केशरवानीसँ आ बादमे पटनामे डा. ज्योति प्रसादसँ इलाज भेल। बच्चीकें मनेन्द्रगढ़ आ बैकुंठपुरमे प्राप्त इलाज सँ लाभ नहि भेलनि। पटना गेलहुँ, डा.अरुण तिवारीसँ संपर्क केलहुँ। तिवारीजी तेल-नून-मसल्लाक न्यूनतम उपयोग करबाक आ रातिक’ नून नहि खेबाक सलाह दैत प्रतिदिन एकटा Amtas-५ (Amlodipin ५ mg) लेबाक सलाह देलखिन। यैह दबाइ किछु बरख धरि बच्चीक रक्षा करैत रहलनि। एहि यात्रामे हम बच्चीक संग गाम सेहो गेलहुँ। बहिनक सासुर शिशवा आ अपन सासुर लदारी सेहो गेलहुँ। रतनजीक विवाह : हम सभ गाम-घरसँ दूर छलहुँ। पटनामे मामा छलाह जिनकासँ जूनमे पता चलल जे मौसा-मौसी रतनजीक वियाह ठीक क’ देने छथिन, अगहनमे विवाह हेतै। दिसम्बरमे रतनजी दिल्लीसँ पत्र द्वारा सूचित केलनि जे ओ सभ सम्पर्क नहि क’ रहल छलखिन तें गोरलगाइ जे भेटल छलनि से मौसाके वापस क’ देलखिन, आब ओत’ विवाह नै कर’ चाहैत छथि। किछु दिनक बाद कन्याक नाना दिल्ली पहुँचि विवाहक गपपर जोर देलखिन। हमर बहिन-बहिनो अभिभावकक रूपमें सहयोग केलखिन। २००० मे १२ मार्चक’ विवाहक दिन निश्चित भेल,से सूचना भेटल। पाँचो गोटे लेल आरक्षण करौलहुँ। पाँच दिन पहिने विवेक टाइफाइडसँ पीड़ित भ’ गेलाह। १० क’ चिकन पॉक्स निकलि गेलनि। हम अपन यात्रा स्थगित कर’ चाहलहुँ, रतनजी सुचित केलनि जे हम सभ नै जेबै त विवाह नै हेतै। अंततः यात्रा-कार्यक्रममे किछु सुधार कर’ पड़ल। तीनटा टिकट रद्द करौलहुँ। विवेकके डॉक्टरसँ देखौलियनि। डॉक्टर ५ दिन लेल दबाइ लिखलखिन। बच्चीकें आवश्यक सुझाव दैत हम ११ क’ वसन्तके संग नेने विदा भ’ गेलहुँ। गाममे घोंघौरसँ हमर मौसी आएल छलीह। हमर दुनू छोट बहिन शान्ती आ बच्ची आएल छलीह आ दिल्लीसँ ललनजी अपन परिवारक संग आएल छलाह। १२ क’ १२.३० बजे रातिमे वरियाती गेलै। विवाह भेलनि। १६ क’ चतुर्थीक भार साँठल गेल। १७ क’ द्विरागमन भेलनि। २० क’ भरफोरी भेलनि। रातिमे भगवानक पूजा कएल गेल। फगुआ सेहो छलै। हम २२ क’ गामसँ विदा भेलहुँ। २४ क’ रातिमे मनेन्द्रगढ़ पहुँचलहुँ। विवेकक स्थितिमे सुधार भेल छलनि। आवास परिवर्तन : मनेन्द्रगढ़क कॉलेजक पढ़ाइसँ मैथिली आ विवेक संतुष्ट नहि छलाह। ओहिसँ नीक विकल्पक खोज शुरू भेल। हम कोतमामे पहिनेसँ नमहर एकटा आवास तकलहुँ। परिवार सेहो मनेन्द्रगढ़सँ कोतमा आबि गेल। भिलाइसँ वीणाक संग मिश्र जी एलाह, हुनका सबहक संग अमरकंटक सेहो गेलहुँ। ओहो सभ हमर सबहक खोजमे सहयोग केलनि। तय भेल जे बिलासपुरमे एकटा आवास लेल जाए। ओत’ रहिक’ वसंत, मैथिली आ विवेक प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी करथि, हम शनि दिनक’ मनेन्द्रगढ़क बदला बिलासपुर जाइ। वैह भेल। बिलासपुरमे विवेक पी.ई.टी.क तैयारी लेल अक्षय गुरुकुल जाए लगलाह। मैथिली पी.एम.टी.क तैयारीक लेल सचदेवा कोचिंग सेन्टर जाए लगलीह। वसन्त बैंकिंग परीक्षाक तैयारीक लेल श्री कोचिंग सेन्टर जाए लगलीह। एकटा आवासक प्रबन्ध भेल। एकटा लैंडलाइन फोन लेल गेल। कोतमामे हमरा आवास लग एकटा कालिंग बूथ छल। ओहि ठाम जाक’ हिनका सभसँ सम्पर्क करैत छलहुँ। शनि दिन रातिमे कोतमामे गाड़ी पकड़ैत छलहुँ। भोरे बिलासपुर पहुँचैत छलहुँ। दिन भरि बिलासपुरमे रहि रातिमे ट्रेन धरैत छलहुँ। सोम दिन भोरे कोतमा पहुँचि जाइत छलहुँ। कतेक मास धरि अहिना कोतमासँ बिलासपुर आ बिलासपुरसँ कोतमा करैत रहलहुँ। पदोन्नति : पदोन्नति हेतु २००१ मे २७ मइक’ रायपुरमे लिखित परीक्षामे सम्मिलित भेलहुँ। ७ जुलाइक’ सेन्ट्रल बैंक अधिकारी प्रशिक्षण केन्द्र, भोपालमे साक्षात्कारमे सम्मिलित भेलहुँ। २७ जुलाइक’ पता चलल जे हमहूँ सफल भेलहुँ आ हमर पोस्टिंग सदर बाजार, रायपुर शाखामे भेल अछि। हम शनि दिन ४ अगस्तक’ दिलावर सिंह, प्रबन्धककें शाखाक प्रभार सौंपिक’ शाखासँ भारमुक्त भेलहुँ। ५ क’ कोतमासँ विदा भेलहुँ आ रातिमे रायपुर पहुँचि गेलहुँ। होटल आलनियरमे तत्काल रहबाक व्यवस्था भेल। ओत’ जबलपुरसँ आर.के. साहू जी सेहो आएल छलाह, भेंट भेलाह। पटना / १२ जनवरी २०२२ (२४) स्वर्गक दुख : दुखसँ मुक्ति २००१ मे ६ अगस्त क’ हम वृहत शाखा सदर बाजार,रायपुरमे वरिष्ठ प्रबंधकक पदपर कार्य भार ग्रहण केलहुँ। जबलपुरसँ जे साहू जी आएल छलाह, से आंचलिक कार्यालयमे वरिष्ठ प्रबंधकक पदपर कार्य भार ग्रहण केलनि। शाखाक वरिष्ठ प्रबंधक जी. एल.राठी साहेब ८ क’ भारमुक्त भेलाह। कर्मचारी-अधिकारी सभक संख्या २० सँ बेशी छलै, एहिमे पाँचटा महिला छलीह। दूटा प्रबंधक छलाह। परिचालनमे एन. के.ब्राहा आ अग्रिममे आर. शंकर प्रबंधक छलाह।अग्रिममे दूटा और अधिकारी छलाह। शेष अधिकारी-कर्मचारी सभ परिचालन विभागमे छलाह। अधिकारी यूनियनक महासचिव एम.के.अग्रवाल साहेब सेहो ओही शाखामे छलाह। रायपुरमे हमर अभिभावक छलाह क्षेत्रीय कार्यालयमे क्षेत्रीय प्रबंधक आ आंचलिक कार्यालयमे दूटा मुख्य प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधक महोदय। जहिया शाखामे योगदान देने रही, ओही दिन औपचारिकताक निर्वाह करैत क्षेत्रीय प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधक महोदयसँ भेंट कर’ गेलहुँ। आंचलिक प्रबंधक महोदय पुछलनि, ‘एम.के.अग्रवालसँ अहाँकें कोन सम्बन्ध अछि? हम कहलियनि, ओ हमरा यूनियनक महासचिव छथि। फेर पुछ्लनि, अग्रवाल जे कहता से अहाँ करब आकि जे बैंक कहत से करब। हम कहलियनि, हमरा त हुनको सहयोग लैत बैंकक काज करबाक अछि। बादमे पता चलल जे सदर बाजार, रायपुर शाखामे हमर पदस्थापनमे हमरा यूनियनक महासचिव अग्रवाल साहेबक जोर छलनि। हमरा मोनमे जिज्ञासा भेल छल जे जखन अग्रवाल सहेबक जोरपर ओ हमर पदस्थापन कोनो शाखामे क’ सकैत छथि तखन ई पुछबाक की अभिप्राय छलनि जे अग्रवाल साहेब जे कहता से अहाँ करब आकि जे बैंक कहत से करब। बहुत बादमे हमरा एकर समाधान भेटल। आवासक व्यवस्था : साहूजी जबलपुरसँ अबैत काल एकटा डेराक चाभी ल’क’ आएल छलाह। देवांगन जी जे जबलपुर क्षेत्रीय कार्यालयमे अधिकारी छलाह, हुनकर घर रायपुरमे समता कॉलोनीमे छलनि, ओही आवासक चाभी देवांगनजी हुनका द’ देने छलखिन। एक साँझ दुनू गोटे गेलहुँ देख’। साहूजी के ई डेरा आंचलिक कार्यालयसँ दूर लगलनि, ओ आंचलिक कार्यालयसँ कम दूरीपर अपना लेल आवास तकलनि आ ई आवास देवांगनजीसँ बात क’ क’ हमरा दिया देलनि। एहि तरहें समता कॉलोनीमे आसानीसँ हमर आवासक व्यवस्था भ’ गेल। ओहि आवासमे हम दिसम्बर २००३ धरि रहलहुँ। देवांगन जीक स्थानान्तरण जबलपुरसँ रायपुर भेलनि त ओ हमरा सुचित केलनि, हुनका अपने अपन आवासमे रहबाक छलनि। दोसर आवास तकबामे ओ सहयोग केलनि आ ओही मोहल्लामे सेन्ट्रल बैंकक अवकाशप्राप्त अधिकारी सोनकर जीक नवनिर्मित मकानमे रायपुरमे शेष समय धरि रहबाक लेल आवासक व्यवस्था भ’ गेल। चाकरीक दुख-सुख : शाखाक दैनिक कार्यक निराकरण परिचालन आ अग्रिम विभागक प्रबंधक लोकनिक देख-रेखमे चलैत छल। अग्रवाल साहेब सेहो अपन काज नियमित रूपसँ करैत छलाह। ओ शाखामे सभसँ पहिने आबि जाइत छलाह। यूनियनक काज ओ डेरेपर करैत छलाह। हमर मुख्य काज छल क्षेत्रीय कार्यालय, आंचलिक कार्यालयक निदेशानुसार मीटिंग सभमे भाग लेब,क्षेत्रीय प्रबंधक,आंचलिक प्रबंधक महोदयसँ निरंतर सम्पर्क राखब,दुनू कार्यालयक कोनो पत्रक तुरन्त जबाब देब,ऑडिट रिपोर्टक अनुसार अनियमितताक निराकरण निर्धारित अवधिमे सुनिश्चित करब, कैश क्रेडिट खाता सबहक संचालनपर निगरानी राखब,कोनो अनियमितता देखलापर ओकर मालिक/पार्टनर/ निदेशक आदिसँ संपर्ककय खाताकें नियमित रखबाक लेल फोन-फान, दौड़-धूप करब,अपन निर्धारित सीमाक अंतर्गत कोनो प्रकारक ऋण स्वीकृत करबाक लेल जांच-पड़ताल आदि सुनिश्चित करब, शाखाक विरुद्ध कोनो शिकायतक शीघ्र निराकरण सुनिश्चित करब, पैघ-पैघ खाताधारक सभसँ सम्पर्क राखब आदि। एहि काज सभमे मदति करबाक लेल प्रबंधक आ सहायक प्रबंधक सभ छलाह। अंततः शाखाक कोनो त्रुटिक लेल जबाबदेही हमरेपर छल। एहि शाखामे बहुत एहेन काज छलै जे हमरा लेल नव छल, एहि लेल अतिरिक्त समय देब’ पड़ल। हम दोसरेक भरोसपर नहि रह’ चाहैत छलहुँ, तें लागि-भीड़िक’ सिखबामे आनन्द अबैत छल। एत’ कंप्यूटरक उपयोग करब सेहो सिखलहुँ। सभ शाखासँ सभ शुक्र दिनक’ शाखाक स्थितिक जानकारीसँ नियंत्रक कार्यालय सभकें अवगत करयबाक विधान छैक। शाखामे एकटा खाता एहेन छलै जाहिमे कोनो सप्ताहमे दस-बारह करोड़ तक पाइ जमा भ’ जाइ छलै त पूरा रायपुर क्षेत्र आ रायपुर अंचलक आँकड़ा बढि जाइ छलै आ कोनो सप्ताहमे दस-बारह करोड़ निकलि जाइ छलै त पूरा क्षेत्र आ अंचलक आँकड़ा कम भ’ जाइ छलै। बढि जाइ छलै त ठीक मुदा जखन घटि जाइ छलै त आंचलिक प्रबंधक आ क्षेत्रीय प्रबन्धकक फोन आब’ लगैत छल, स्पष्टीकरण माङल जाइ छल, कोनो तर्कसँ सहमत नै होइत छलाह, तामस अन्तरित होइत रहैत छल।।हुनको सभ लग एकर निदान नै छलनि। सम्बंधित खाताक संचालककें अनुरोध करैत छलियनि त कहैत छलाह, हमरा खातामे त अहिना लेन -देन चलत, अहाँ सभकें नै नीक लगैए त कहू हम सभ दोसर बैंक खाता ल’क’ चलि जाइत छी। एहि महत्वपूर्ण खाताकें दोसर बैंक जाए देब सेहो ठीक नै छलै। शाखामे एक-दूटा एहेन खाता छलै जाहिमे निर्धारित समयसँ किछु पहिने बहुत मात्रामे नकद राशि बड़का मोटामे आबि जाइत छलैक जमा करबाक लेल। बैंकक नियमक अनुसार ओकरा मना नहि कयल जा सकैत छलै। नोट गनबाक एकटा मशीन रहितो पूरा नकद गनबामे बहुत समय लागि जाइत छलै आ बैंक निर्धारित समयसँ दू-चारि घंटा बादो धरि खूजल रहैत छलै। प्रबंधक,परिचालन अपन टीम संगे लागल रहैत छलाह, हमरा कहैत छलाह अहाँ चलि जाउ। ई एकटा परम्परा जकाँ बनि गेल छलै। हमरा चिंता होइ छल जे एतेक काल धरि बैंक खुजल रहबाक कारण कहियो कोनो अप्रिय घटना ने घटि जाइ, से हेतै त हमहूँ जबाबदेहीसँ बचि नहि सकब। हम एकर निदान तकबाक प्रयास केलहुँ मुदा निदान नहि भेटल। शाखाक गेट भीतरसँ बन्द क’ क’ नोट गिनतीक काज करैत जाइत छलाह, तें सुरक्षाक दृष्टिसँ त खतरा नै छलै, मुदा एहिसँ किछु आन समस्या उत्पन्न होइत छलैक। एक त नोटक गिनती मशीनसँ होइत छल मुदा पैकेट बहुत रहबाक कारण किछु गोटे हाथसँ सेहो गिनती करैत छलाह जाहिमे त्रुटिक आशंका रहैत छलैक। दोसर समस्या ई छलै जे शाखामे धारित नगदी (Cash in hand) निर्धारित सीमासँ बहुत बेशी भ’ जाइत छलैक कारण बहुत देरी हेबाक कारण आ किछु आन कारणसँ अतिरिक्त राशि करेंसी चेस्टमे ओहि दिन जमा नहि भ’ पबैत छलै। निर्धारित राशिसँ बेशी नकद राशि शाखामे रहि जेबाक खबरि क्षेत्रीय प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधककें सेहो पहुँचि जाइत छलनि आ ओकर परिणाम हमरा धरि पहुचैत छल से अप्रिय रहैत छल। एक दिन एहि अनियमितताक एकटा परिणाम आएल। एक आदमी (ग्राहक) नोटक एकटा पैकेट नेने आएल जे हमरे शाखा द्वारा देल गेल छलै, ओहिपर हमरे शाखाक दू गोटेक हस्ताक्षर छलनि। ओहि सौ के पैकेटमे किछु पचास आ किछु दसक नोट छलैक जे गिनती करबा काल सम्बंधित अधिकारी –कर्मचारीक ध्यानमे नहि आएल छलनि। एना लगैत छलै जे ओ पैकेट कोनो दोसर बैंकसँ जारी भेल छलै आ हमरा शाखामे जमा भेल छलै। एत’ अपना शाखाक स्लिप लगाक’ हस्ताक्षर करबा काल चूक भेल छलै, फेर दोसर व्यक्तिकें देबा काल सेहो चूक भेलै आ ग्राहक सेहो ओहि दिन ई नहि बूझि सकलाह। हम तुरन्त सम्बंधित प्रबंधककें कहलियनि जे खजाना विभाग द्वारा ओहि ग्राहककें सही पैकेट दिया देथिन, ओ कहलनि जे प्रधान खजांची एकटा दोसर शाखामे गेल छथि, अबै छथि त हिनका दोसर सही पैकेट दिया दैत छियनि। हम ओहि ग्राहककें हुनकहि लग बैसाक’ निश्चिन्त भ’ क’अपना स्थानपर आबि दोसर काजमे लागि गेलहुँ। दोसर दिन स्थानीय दैनिक पत्रमे ई समाचार प्रकाशित भेलै तखन सम्बंधित प्रबंधकसँ हमरा पता चलल जे खजांचीकें दोसर शाखासँ एबामे देरी भेलनि, ओ ग्राहक कखन चल गेलाह से हुनको नहि पता चललनि। बात अखबारमे आबि गेलासँ भारी भ’ गेलै। क्षेत्रीय कार्यालय हस्तक्षेप केलक। जाँच भेलै। ग्राहककें तत्काल बजाक’ हुनका दोसर पैकेट दियाओल गेलनि। पैकेटपर हमरा शाखाक जाहि अधिकारी-कर्मचारीक हस्ताक्षर छलनि हुनका सभसँ स्पष्टीकरण लेल गेल। स्ट्रांग रूम बंद करबामे निर्धारित समय-सीमाक पालन सुनिश्चित करबाओल गेल। सम्बंधित खातेदार सभकें एहि निर्णयसँ अवगत कराओल गेलनि। हमर तनाव किछु कम भेल। एक दिन स्ट्रांग रूम बंद भेलाक किछु कालक बाद एकटा चपरासी आबि कहलक जे स्ट्रांग रूमक भीतरसँ किछु आवाज आबि रहल अछि। हमहूँ लग जाक’ यैह अनुभव केलहुँ। प्रबंधक,परिचालनकें पुछलियनि जे अन्तमे लाकरक परिचालन लेल के आएल छलाह, त रजिस्टरमे देखल गेल जे एकटा अपने बैंकक सेवानिवृत अधिकारी आएल छलाह, हुनकर जेबाकालक समयक विवरण सम्बंधित रजिस्टरमे अंकित नै छलै। तुरन्त स्ट्रांग रूम खोलल गेल त ओ सज्जन घामे-पसीने तर-बतर भेल निकललाह। हुनका अपना चैम्बरमे बड़ी काल बैसौलियनि, सामान्य भेलाह तखन पुछलियनि जे जखन बंद हुअ’ लगलै तखन ओ किए ने बजलखिन त कहलनि जे हमरा किछु ने बुझाएल कोना की भेलै। ओहि दिनक बाद दू दिन बैंक बंद रहबाक छलै। ओहि दिन यदि हुनका नहि निकालल गेल रहैत त की होइतै, से सोचि बड़ी काल धरि हम किछु-किछु सोचैत रहि गेलहुँ। प्रबंधक,परिचालन सतर्क भेलाह। एहेन घटना दोबारा कहियो नहि घटलै। हमरा ऋण स्वीकृत करबाक लेल कोनो दबाबक अनुभव नहि भेल, किन्तु जल्दी निर्णय लेबाक लेल अपनाकें आ अपना टीमके तैयार रखबाक आवश्यकता लगैत छल।अपन पवित्रताकें बचाक’ रखबाक आ यथासंभव शीघ्र निर्णय लेबाक क्षमतासँ अपनाकें तैयार रखबाक लेल सतर्क रहैत छलहुँ। एक बेर छप्पन लाखक एकटा प्रस्ताव क्षेत्रीय कार्यालयसँ हमरा शाखामे आएल। प्रबंधक, अग्रिम किछु दिनक अवकाशमे छलाह। हुनका एबा तक प्रतीक्षा करितहुँ त देरी भ’ जैतै। हम एकटा जीप भाड़ापर लेलहुँ। दिन भरि समय द’ क’ प्रस्तावित कार्यस्थलपर जाक’ आवश्यक जाँच-पड़ताल केलहुँ। ओ स्थान करीब चालीस किलोमीटरसँ बेसी दूर छलै, ओहि ठाम लगेमे भारतीय स्टेट बैंकक एकटा शाखा छलै, आवेदककें सम्बंधित काज करबाक लेल कोनो योग्यता अथवा अनुभव नै छलनि। हमरा लागल जे एते दूरसँ गतिविधिपर नियंत्रण राखब सेहो संभव नै छै। कोनो तरहें हमरा ई प्रस्ताव स्वीकृतियोग्य नहि लागल। हम अपन निरीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करैत ओहि प्रस्तावक अस्वीकृतिक सूचना क्षेत्रीय कार्यालयकें सात दिनक भीतरे पठा देलियनि। क्षेत्रीय प्रबंधक हमरा बजौलनि। हमरा लागल जे ओ हमर अस्वीकृतिसँ संतुष्ट नहि छथि। ओ टेबुलपर तबला बजबैत शोले फ़िल्मक एकटा डायलाग बजलाह : ‘ठाकुर .......... ‘ हम कहलियनि, हमरा जे ठीक लागल से हम रिपोर्ट केलहुँ, अहाँ चाही त हमरा अपन इच्छा अनुसार सलाह अथवा आदेश द’ सकैत छी, हम ओकर पालन करब। मुदा, फेर कहियो ओहिपर कोनो गप नै भेल। अग्रिम बढ़तै त शाखाक लाभ बढ़तै आ अग्रिमक लक्ष्य पूर्ण हेतै तें नियंत्रक कार्यालय सेहो अपना स्तरसँ नीक प्रस्ताव कोनो शाखाकें उपलब्ध करयबामे सहयोग करैत छल, मुदा शाखा द्वारा प्रस्तावक गुणवत्ता सुनिश्चित करब अनिवार्य रहैत छलैक। एक बेर हमर ओहि ठामक सभसँ पैघ अभिभावक कहलनि, हमर मकान मालिकक भागिनकें व्यवसायक लेल दस लाखक ऋणक आवश्यकता छनि, से जाथि त देखि लेबनि। ईहो कहलनि जे देखि-सूनिक’ निर्णय लेब, आँखि मूनिक’ ऋण स्वीकृत करबाक लेल हम नै कहैत छी। हम कहलियनि, ठीक छै सर, जल्दीए भ’ जेतै। हम अपन शाखाक अग्रिम विभागक प्रबंधककें कहलियनि ई बात। दू-तीन दिनक बाद ओ व्यक्ति अपन आवश्यक कागज़ सभ ल’ क’ एलाह। हुनकासँ आवश्यक पूछ-ताछ,जाँच-पड़ताल क’ क’ हुनक पछिला तीन सालक लाभ-हानि आ तुलन पत्रक अध्ययन क’ क’ हुनका ओकर प्रातहि दू लाखक स्वीकृति-पत्र उपलब्ध करबैत कहि देल गेलनि, यदि अहाँ स्वीकृत ऋणक उपभोग कर’ चाहैत छी त बैंकक दस्ताबेज सभपर हस्ताक्षर करू। ओ सज्जन चल गेलाह, फेर नै एलाह। किछु दिनक बाद हमरासँ ओहि विषयमे पूछल गेल त सभटा बात कहि देलियनि। कहलनि, हुनका दस लाखक आवश्यकता छलनि।कहलियनि, बैंकक नियमानुसार हुनका दू लाखसँ बेसीक स्वीकृति नै प्रदान कएल जा सकैत छलनि। ओ आगू नै किछु पुछलनि आ ओहि कारणसँ हमर कोनो अहित भेल हो से हमरा नै अनुभव भेल। एक दीयाबाती दिन साहेब फोन केलनि :’ हैप्पी दीपावली।’ हम फोनपर नमस्कार केलियनि। ओ नाराज भ’ गेलाह। कहलनि, तुम्हारे माँ-बाप ने यह संस्कार नहीं दिया कि अपने बड़े को ‘हैप्पी दीपावली’ बोलो? हम ‘सॉरी सर !’ कहैत कहलियनि, सर हमें तो बुजुर्गों के चरण-स्पर्श करना, नमस्कार या प्रणाम कहना सिखाया गया है, फिर भी अगली बार से हम वही कहेंगे जो आप चाहते हैं। ओकर बाद ओ सामान्य स्थितिमे आबि गेलाह आ पारिवारिक हाल-समाचार पूछ’ लगलाह। ओकरा बाद नियत तिथिक’ सभसँ पहिल काज हुनका फोनपर ‘हैप्पी होली’ आ ‘हैप्पी दीपावली’ आदि कहब नै बिसरैत छलहुँ। मुदा ताहिसँ की ! नाराज हेबाक लेल दोसर कारण भेटि जाइत छलनि। उच्च अधिकारी लोकनिक डाँट-फटकार सुनबाक लेल बहुत तरहक स्थिति उत्पन्न होइत रहैत छलैक। एन.पी.ए.मे वृद्धि, लाभ-जमा-अग्रिम आदि मदमे लक्ष्यक पूर्तिमे असफलता, कोनो विवरण प्रस्तुतिमे देरी, कोनो खातासँ बेशी मात्रामे निकासी, निर्धारित सीमासँ बेशी धारित नगदी (Cash in Hand ) आदि किछु एहेन विषय छलै जे ऊपरसँ वरिष्ठ प्रबंधक धरि क्रोधक प्रवाहकें बल प्रदान करैत रहैत छलै। एक दिन हमरासँ पूछल गेल जे हमरा शाखाक कोनो ग्राहक द्वारा हुनका विरुद्ध शिकायत किए कएल गेल छनि। हमरा एकर किछु अर्थ नै लागल। हमरा कहल गेल जे हमहीं ई शिकायत करबौने हेबनि। हम कहलियनि जे हमरा शाखाक कोनो ग्राहककें हमरासँ शिकायत भ’ सकैत छै, हुनकासँ किए हेतनि। ओ पुछ्लनि, तखन हुनका विरुद्ध शिकायत किए कएल गेल छनि। हम कहलियनि जे हमरा किछु नै बूझल अछि, हमरा कही त पता लगाक’ एकर सूचना दी। हुनकासँ शिकायतकर्ताक नाम पूछि हम तत्काल ओहि ग्राहकसँ संपर्क केलहुँ। हुनका पुछलियनि जे हमरा शाखासँ भेल कोनो त्रुटिक लेल हमरा विरुद्ध शिकायत क’ सकैत छी, हमरा उच्च अधिकारीक विरुद्ध शिकायत किए केलियनि। ओ कहलनि, बिना कारण हम त एकटा चुट्टी तककें दुख नै द’ सकैत छी, कोनो व्यक्तिकें दुख देबाक प्रश्ने नै उठैत छैक, हमरा अहाँक शाखासँ कोनो शिकायत नै अछि, त अहाँक विरुद्ध किए शिकायत करब, जिनकासँ दुख भेटल अछि, हुनका विरुद्ध कएल गेल छनि। ओ आगाँ कहलनि, हमर प्रतिनिधि हुनकासँ कय बेर भेंट करय गेलाह मुदा सभ बेर ओ मना क’ देलखिन,एहेन बात नै छै जे ओ ककरोसँ भेंट नै करैत छथि, यैह हमर शिकायत अछि। ओत’सँ अपना शाखामे आबि हम अपन उच्चाधिकारीकें फोनपर कहि देलियनि। ओ कहलनि, हमरा एते समय नै अछि जे हम सभसँ भेंट करैत रहू। हम कहलियनि, ओ हमरा शाखाक सम्मानित ग्राहक छथि, बहुत नीक लोक छथि,हुनका होइ छनि जे हमरे संग एना कएल जा रहल अछि तें दुखी छथि, हमरा लगैत अछि जे एक बेर किछु समय निकालिक’ हुनकासँ भेंट क’ लियनु त अहूँकें नीक लागत आ हुनकर सभ शिकायत खतम भ’ जेतनि। साहेब गेलाह। भेंट केलखिन। शिकायतकर्तासँ गप भेलनि। शिकायतकर्ताक दुख दूर भ’ गेलनि। साहेबकें सेहो नीक लगलनि। हमरा फोनपर सुचित केलनि आ कहलनि जे हुनकासँ भेंट क’ क’ शिकायत निवारणक एकटा पत्र लिखबाक’ हमरा फैक्स करबाउ। हम तुरन्त गेलहुँ। ग्राहकसँ भेंट केलहुँ। ओ प्रसन्न छलाह। हुनकासँ उपयुक्त पत्र लिखबाक’ साहेबकें फैक्स द्वारा उपलब्ध करबा देलियनि। हम लोक सभसँ, शाखाक अधिकारी-कर्मचारी सभसँ गप-सप आ व्यवहारमे शालीनता रखैत छलहुँ, ऋण स्वीकृत करबामे बेशी देरी नै करैत छलहुँ, जिनका बैंकक नियमानुसार ऋण स्वीकृत नै कएल जा सकैत छलनि, हुनका विनम्रतापूर्वक अपन असमर्थता कहि दैत छलियनि, तें लोकक अथवा कोनो स्टाफकें हमरासँ शिकायत नै रहै छलै किन्तु हमरा उच्च अधिकारीक विचारक दर्पणमे अपन छवि नीक नहि लगैत छल। मोबाइलक ज़माना आबि गेल छलै, किन्तु पैघे लोक सभ लग ओहि समय उपलब्ध छलै। मोबाइल साहेब सभकें दिव्य दृष्टि प्रदान करैत छलनि। साहेब कतहु रहैत छलाह त हुनका पता चलि जाइत छलनि जे कोन शाखामे की भ’ रहल छै। एक दिन एकटा खातासँ खातेदार अपन व्यवसाय हेतु पाँच करोड़ राशि अन्तरित करबौलनि। साहेबक मुँहसँ आगि निकल’ लगलनि। धधरा मोबाइलक माध्यमसँ हमरा कान धरि आएल। सभ दिन एहि आगिसँ अपना मोनकें बचयबाक प्रयास करय पड़ैत छल। ‘कुछ तो रहम करो यार, जरा ठीक-ठाक ब्रांच चलाओ, मैं समझता हूँ तुम शरीफ आदमी हो, मगर पिउनसे, क्लर्क से डरने की क्या जरूरत है,मैं हूँ न !’ ‘मुझे दुख होता है जब लोग कहने आते हैं कि तुम पिउन से भी डरते हो-ऐसे मैनेजरी से अच्छा है वी. आर. एस. ले लो। ज़माना बदल गया है, अब रिजल्ट अच्छा नहीं देनेवालों को बैंक लात मार कर बाहर कर देगा- मैं थोड़ा हार्स जरूर बोलता हूँ पर मैं जो कहता हूँ उसे अकेले में बैठकर सोचो।’ एकटा नीक बात ई छल जे सार्वजनिक रूपसँ कहियो कोनो अप्रिय बात नै बजैत छलाह, जे कहैत छलाह से फोनपर। तें ई लगैत छल जे सभ वरिष्ठ प्रबंधक सभकें हड़काक’ राखब अथवा जगाक’ राखब ओ अपन धर्म बुझैत छलाह, बैंकक हितमे बुझैत छलाह। हुनक धर्मक समय निश्चित नै रहैत छलनि। कहियो १० बजे रातिमे, कहियो ८ बजे सबेरे अथवा दिनमे कखनो। हम अपना कें संयमित आ संतुलित रखबाक लेल किछु काल साहित्यक शरणमे जाइत छलहुँ। ओशोक कोनो पोथीक एक-दू पृष्ठ अथवा हरिमोहन बाबूक कोनो रचना पढ़ब अथवा कैसेटमे दादा पल्टू मुखर्जी द्वारा गाओल अपन किछु गीत सूनब हमरा लेल संजीवनीक काज करैत छल। हमर आत्मबल बढ़ि जाइत छल।एहि लेल हमरा कहियो शराबक शरणमे जाएब पसन्द नहि पड़ल। हम एसगरमे बैसिक’ सोचलहुँ, हमरा हुनक टिप्पणीक कोनो अर्थ नै लागल। हम निर्णय लेलहुँ जे साहेबसँ हुनका डेरा पर जाक’ कहियनि जे हमरा कोनो अर्थ नै लगैए, अहीं हमरा कनी बुझा दिय’ जे हमरासँ की गलती भ’ रहल अछि आ हमरा की करबाक चाही। हम एक दिन दू किलो सेव ल’क’ साहेबसँ भेंट कर’ विदा भेलहुँ। ओ जत’ रहैत छलाह ओहि मोहल्लामे एकटा परिचित अधिकारीक आवाससँ हम फोन क’क’ कहलियनि जे हम भेंट कर’ आबि रहल छी। साहेब कहलनि जे आइ किछु सम्बन्धी सभ आएल छथि तें आइ नै आउ। हम घुरि गेलहुँ। फेर कहियो डेरा पर भेंट करबाक नियारक सुयोग नै बनल। एक दिन हमरा ज्ञान भेल। हम सोचलहुँ, साहेब जे सोचैत छथि ताहीमे बैंकक हित हेतै। मुदा ओ की चाहैत छथि? एक दिस कहैत छथि तुम आदमी अच्छे हो, दोसर दिस कहैत छथि रिजल्ट अच्छा नहीं देनेवालों को बैंक लात मारकर बाहर कर देगा। मतलब ओ हमरा नीक वरिष्ठ प्रबंधक नै मानैत छथि, मतलब हुनका नजरिमे अवश्य कोनो एहेन लोक छनि जे हुनका मनोनुकूल आ बैंकक हितक लेल उपयुक्त रहतनि। हम ईहो अनुभव केलहुँ जे जहिया हमरा अवकाशमे जेबाक होइए त ओ प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृति द’ दैत छथि, हम एहिमे हुनक उदारता अथवा कृपाक अनुभव करैत छलहुँ। कखनो-कखनो ईहो सोचैत छलहुँ जे हमर छुट्टीमे रहब बैंकक हितक कतेक अनुकूल होइत हेतैक। हम कल्पना केलहुँ जे यदि हम एहि शाखामे एहि पदपर नै रही त शाखाकें कतेक लाभ हेतैक। हमरा शाखाक कल्याणक सूत्र हाथ लागि गेल। २००१ मे ६ अगस्तक’ हम शाखामे आएल रही। २००२ मे २० दिसम्बर क’ हम ऑफिसमे अग्रवाल साहेबकें कहलियनि जे हमरा मदति करथि आ जहिना जोर लगाक’ हमर पोस्टिंग एत’ करबौने छलाह तहिना एत’सँ स्थानान्तरण करयबामे हमर सहयोग करथि,हम आभारी रह्बनि। अग्रवाल साहेब हमरा बुझौलनि, एना किए परेशानीक अनुभव क’ रहल छी, हम छी एहि ठाम, कियो अहाँक किछु नै बिगाड़ि सकैए, अहाँ निश्चिन्त भ’ क’ रहू। हम जखन कहलियनि जे बैंकक हितमे आ अपनो हितमे ई हमरा आवश्यक लगैए, तखन अग्रवाल साहेब पुछ्लनि जे कत’ जाएब, राजनन्दगाँवमे वरिष्ठ प्रबन्धकक पद खाली छै,ओत’ जाएब? हम कहलियनि जे रायपुरमे कोनो दोसर ब्रांच अथवा कोनो आन कार्यालयमे होइत त हमरा डेरा बदलबाक काज नै पड़ैत। अग्रवाल साहेब कहलनि जे तखन जोनल ऑफिसमे भ’ सकैए, मुदा ओत’ त फेर हुनकासँ भेंट हैत। हम कहलियनि जे हमरा हुनकासँ कोनो परेशानी नै अछि, ओहो हमरा नीक लोक त कहिते छथि, एहि शाखाक लेल नीक वरिष्ठ प्रबंधक नै मानैत छथि, हम अपने जखन एहि ठामसँ हट’ चाहैत छी त ओ जे चाहैत छथि से पूर भ’ जेतनि आ ई बैंकक हितमे हेतै, हमरा जतेक वेतन एत’ भेटैए से त भेटबे करत, एकटा मानसिक तनावसँ हम मुक्त भ’ जाएब-से हमरो लाभ हैत। २३ दिसम्बरक’ अग्रवाल साहेब सूचित केलनि जे हमर स्थानान्तरण आंचलिक कार्यालयमे करबापर सहमति भेटि गेल अछि। हम बहुत आनन्दित भेलहुँ। २६ दिसम्बर क’ हमरा स्थानान्तरण आदेश प्राप्त भ’ गेल। २००३ मे २ जनबरी क’ आंचलिक कार्यालयसँ बनर्जी साहेब एलाह हमरा स्थानपर काज करबाक लेल। ४ जनबरी क’ हम सदर बाजार, रायपुर शाखासँ भारमुक्त भए ६ जनबरीक’ आंचलिक कार्यालय, रायपुरमे योगदान केलहुँ। पटना / २७.०१.२०२२ (२५) सपता-विपताक कथा जिनगी (?) रायपुरमे मैथिली : समता कॉलोनीमे हमर आवासक लगेमे श्रीचन्द्र झाजीक आवास छलनि। झाजी बरदेपुर गामक छलाह, सासुर कटैया छलनि। शासकीय विभागमे इंजिनियर छलाह। हुनका सभसँ अधिक काल भेंट-घाँट भ’ जाइत छल। झाजीक बहिन-बहिनो कुशालपुर मोहल्लामे रहैत छलखिन। बहिनो छलखिन शोभाकान्त झा। शोभाकान्त बाबू सेवानिवृत शिक्षक छलाह आ साहित्यकार सेहो छलाह।हुनक मैथिली गीतक पोथी ‘राजा जनक जी के बाग़मे’ प्रकाशित छलनि। ओ मैथिली पत्रिका ‘मिथिलायतन’क सम्पादक सेहो छलाह। मैथिलीक कार्यक्रम सबहक आयोजन करैत छलाह शोभाकान्त बाबू। हुनक पुत्र संदीपजी जे भिलाइमे इंजिनियर छलखिन सेहो मैथिली कार्यक्रम सभमे रूचि लैत छलाह। शोभाकान्त बाबूक एकटा बेटी-जमाय सेहो ओही मोहल्लामे रहैत छलखिन आ ओहो सभ मैथिली कार्यक्रममे रूचि लैत छलाह। हुनका सभसँ परिचय भेल, नीक लागल। पुरानी बस्तीमे बहुत मैथिल छलाह। ओत’ सरयूकान्त झा जीसँ परिचय भेल। ओ सभ मधुबनी लगक भरिसक हरिपुर गामसँ बहुत पहिने गेल छलाह, ओ अवकाशप्राप्त प्राचार्य छलाह। हुनकर सबहक भाषा मैथिली नहि रहि गेल छलनि। ओ सभ छत्तीसगढ़ी आ हिन्दीमे गप करैत छलाह। विधि-व्यवहारमे मिथिलाक संस्कार बचाक’ रखने छलाह आ अपनाकें मैथिल कहैत-बुझैत छलाह। गणेश मन्दिरपर सप्ताहमे एक दिन भरिसक रविदिनक’ साँझमे कीर्तन, रामचरित मानसक पाठ होइत छलैक, बहुत गोटे जुटैत छलाह, हरमुनियाँ, ढोलक,झालि बजैत छलै।कहियोक’ अष्टियाम सेहो होइ छलै। एक बेर हमहूँ सम्मिलित भेल छी। रायपुरमे बहुत मैथिल छलाह जिनकर पूर्वज बहुत पहिने आएल छलखिन, हुनकर मातृभाषा मैथिली नहि रहि गेल छलनि, ओ सभ छत्तीसगढ़ी,हिन्दी, अंग्रेजी बजैत छलाह। २००२ मे २४ फरबरीक’ छत्तीसगढ़ मैथिल ब्राह्मण सभाक सम्मेलनमे हमहूँ उपस्थित छलहुँ। ओहि सभामे विद्यापतिक नामपर एकटा इंजीनियरिंग कॉलेज खोलबाक प्रस्ताव पारित भेल रहै। अशोक चौधरी अध्यक्ष चुनल गेल छलाह। ओ राजनन्दगाँवक छलाह। ओहि सभामे क्यो कविवर सीताराम झाक कविताक उल्लेख केने छलाह : ‘पढ़ि-लिखिक’ जे नहि बजै छथि मातृभाषा मैथिली मोन होइछ झुटकासँ हुनकर कान दूनू ऐंठ ली।’ सरयू कान्त बाबू कहलखिन ‘ इसे ठीक से समझने की जरूरत है,यह उनके लिए कहा गया है जिनकी मातृभाषा मैथिली है और मैथिली नहीं बोलते हैं।’ हुनका सभकेँ मैथिली बाजब आब बहुत कठिनाह लगैत छनि, तथापि ओ सभ अपनाकें मैथिल कहनाइ नै छोड़ने छथि, बल्कि ताहिसँ गौरवान्वित अनुभव करैत छथि। तें ‘मिथिलायतन’ पत्रिकामे मैथिली आ हिन्दी दुनू भाषामे रचना सभ छपैत छलै। विद्यापति पर्वमे कार्यक्रम मैथिली आ हिन्दी दुनूमे चलैत छलै।एक बेर आकाशवाणी दरभंगाक गीत आ नाटक प्रभाग द्वारा मैथिलीमे बहुत आकर्षक कार्यक्रम प्रस्तुत भेल छलै। ई टीम भिलाइमे सेहो अपन प्रस्तुति देलक। पंजाब नेशनल बैंकक प्रबन्धक छलाह उमा शंकर झा जे दुल्हा गामक छलाह। हुनकासँ परिचय भेल। ओ विशुद्ध मैथिलीमे एकटा पत्रिका निकालबाक विचार केलनि, किछु काज भेलै मुदा बादमे मैथिली भाषी आ अमैथिली भाषी सबहक बीच एकता प्रभावित हेबाक आशंकासँ ई कार्यक्रम स्थगित भ’ गेल। एत’ मैथिल लोकनि पुत्र-पुत्री सभकें शिक्षाक समान अबसर दैत भेटलाह। पुत्रीक इच्छा-आकांछाक आदर करैत लोक भेटलाह। पुत्रीक इच्छानुसार विवाहक स्वीकृति देबामे उदारता देखबैत लोक सभ भेटलाह। एकटा प्रतिष्ठित परिवारक मुखिया कहलनि जे हुनकर छोट पुत्री जे कृषि महाविद्यालयमे व्याख्याता छलखिन, एकटा बंगाली ब्राह्मण परिवारक लड़काक संग विवाहक अनुमति मंगलखिन, लड़का बिल्डर छलाह, कन्याकें ठीकसँ सोचि-विचारि लेबाक सलाह देलखिन आ अन्ततः कन्याक परिपक्व निर्णयकें स्वकृति द’ क’ सभकें सही सूचना दैत शुभ-शुभक’ विवाह करा देलखिन। ओ कहलनि जे दुनू परिवारक सलाहसँ बेटी जाधरि नैहरमे छलीह ताधरि मैथिल ब्राह्मणक रीतिसँ आ जखन सासुर गेलीह त ओहि समाजक रीतिसँ सभ कार्यक्रम भेलै। हुनक जेठ कन्या इंजिनियर छलखिन। बादमे हुनकर विवाह भेलनि। ओ मैथिले ब्राह्मण परिवारमे विवाह कर’ चाहैत छलीह, तें बिहारेक एकटा मैथिल ब्राह्मण इंजिनियर लड़कासँ हुनकर विवाह भेलनि। ओहि विवाहमे हमहूँ उपस्थित रही। दूधाधारी मठक सत्संग भवनमे २० जून २००२क’ ओ समारोह आयोजित भेल छलै। बहुत विधि-व्यवहार परिचित लागल छल।लड़का पक्षक लोक सभ मैथिली भाषी छलाह। एकटा डेंटिस्टसँ सम्पर्क केलहुँ, मैथिल ब्राह्मण छलाह, नाममे झा जोड़ल छलनि। पत्नी सेहो डेंटिस्ट छलखिन, हुनकर नाममे दोसर किछु जोड़ल छलनि। डॉक्टर साहेब कहलनि जे दुनू गोटे एके कॉलेजमे पढैत छलाह, बादमे पति-पत्नी बनि गेलाह,पत्नी गुजराती छथिन। हमरा अपन जेठ कन्याक लेल ओतहु लड़का तकबाक मोन भेल। एक दिन शरद बाबूक संग प्रसन्न कुमार ठाकुरजी ओत’ गेल रही। हुनकर पुत्र एम आर छलखिन, अपने कोनो नोकरीसँ सेवामुक्त छलाह। ओ कहलनि जे अगिला साल बालकक विवाह करताह। हुनक टिप्पणी रहनि जे अधिकतर बिहारक मैथिल ब्राह्मण सभ अपन बेटाक विवाह बिहारेमे कर’ चाहैत छथि, मुदा बेटीक विवाह एमहर कर’ चाहैत छथि। एक गोटे भेटलाह जे शिक्षक छलाह,हुनक पत्नी सेहो शिक्षा-सेवामे छलखिन। हुनक पुत्र कोनो खदानमे अधिकारीक पदपर काज करैत छलखिन। ओ अपने हिन्दी भाषी मैथिल ब्राह्मण छलाह, पत्नी ओही ठामक अग्रवाल परिवारसँ आएल छलखिन। हुनका ओत’ गेल रही। नीक लागल रह्य। हुनका फोटो आ बायोडाटा देने रहियनि। बादमे मैथिली-हिन्दीक कारण हमरा घरमे मतैक्य नहि भ’ सकल। हुनका कहि देलियनि। ओहो फोटो आ बायोडाटा घुरा देलनि। हमरा अनुभव भेल जे मैथिली-हिन्दी ल’क’ आपसमे ठीकसँ गप नै भ’ पबैत अछि। असलमे जत’ प्रेम उपस्थित भ’ जाइत छैक,ओत’ भाषा सेहो बाधा नै बनैत छै,मुदा प्रेम हेबाक लेल भाषाक योगदानक सेहो अधिक ठाम नीक भूमिका रहैत छैक। रायपुरक निकट भिलाइ आ राजनंदगाँवमे सेहो मैथिल सभ रहैत छथि। एक बेर रायपुरसँ बरियातीमे राजनंदगाँव गेल रही। ओहि बरियातीमे जे सभ गेल छलाह ओहिमे किछु गोटे ओहि ठामक चलनक अनुसार नचैत छलाह,से हमरा नीक नै लागल रह्य किएक त हम एना अपना सभ दिस नै देखने रहिऐ। भोजनमे दुराग्रह एम्हरे जकाँ देखल। विद्यापति भवनमे आयोजित सभामे दू बेर गेलहुँ। बहुत गोटेसँ परिचय भेल। ओतहु वैह। किछु गोटे मैथिली भाषी, किछु अमैथिली भाषी। अमैथिली भाषीमे मनीष कुमार झा युवा आ चर्चित नाम छलाह। मैथिली भाषी सबहक इच्छा होइत छलनि जे शेष मैथिल सभ सेहो मैथिली सीखथि, लीखथि आ बाजथि, मुदा हुनका सबहक लेल ई काज ओतबे कठिन भ’ गेल छलनि जतेक कठिन हमरा सभमेसँ अधिक लोकक लेल आब मिथिलाक्षरमे लीखब भ’ गेल अछि। राधा कृष्ण झा,अरुण कुमार झा,जयेश झा(अरेड़क),अरविन्द कुमार मिश्र (भवानीपुरक),कवीन्द्र झा, विभाकर ठाकुर (समौलक), शशिकांत झा, कार्तिकेश झा, प्रफुल्लजी, सत्येन जी आदि लोकनि सभसँ सेहो भेंट-घाँट आ परिचय भेल। राधा कृष्ण बाबू संगीतक क्षेत्रमे पैघ नाम छलाह आ शासकीय सेवासँ अवकाश प्राप्त केने छलाह, तथापि दूरदर्शनमे सेवा दैत छलाह। अरुण कुमार झा जी रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेजमे प्रोफेसर छलाह। अरविन्द कुमार मिश्रजी इंजिनियर छलाह। कवीन्द्र झाजी इंगलिश स्पोकन कोर्स चलबैत छलाह। कार्तिकेश झा शिक्षा सेवामे छलाह, बादमे मुख्य मंत्रीक कार्यालयमे चर्चित नाम भेलाह। विभाकर ठाकुरजी भिलाइमे सेन्ट्रल बैंकक कोनो शाखामे काज करैत छलाह। जयेशजी सभ सामाजिक काजमे सक्रिय रहैत छलाह, कोनो नोकरीमे छलाह आ एकटा पुत्र इंजीनियरिंगक पढाइ क’ रहल छलखिन। प्रफुल्लजी साहित्यकार-पत्रकार छलाह। रायपुरमे किछु भोजमे सेहो सम्मिलित हेबाक अवसर भेटल। १४,१५ अगस्त २००५ क’ सुमनजीक पिताक एकादशा-द्वादशा छलनि, जयेश जी नोत द’ गेल छलाह। उमाशंकरजीक संग भोजमे सम्मिलित भेलहुँ। ओत’ मेघौलक चौधरीजी आ पनिचोभक चौधरी जीसँ सेहो परिचय भेल। मेघौलक चौधरीजी पंजाब एंड सिन्ध बैंकमे सहायक प्रबंधक छलाह। अरुण कुमार झाजीक आवासपर सेहो कोनो भोजमे सम्मिलित भेल छी। भोज सबहक विन्यास परिचित लागल,आकर्षक लागल। हमरा गामक अनिल कुमार ठाकुरजी ओरिएण्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्समे हेड केशियर छलाह,भेंट भेल, बहुत नीक लागल। ओ रायपुरमे घर बनौलनि, पिताजी एत’ रहिक’ बहुत सहयोग केलखिन। समय-समयपर हमरा सबहक भेंट-घाँट होइत रहैत छल। वीर सावरकर नगरमे रतन मिश्रजीसँ भेंट भेल,परिचय भेल।ओ एक समय सिवान मे नोकरीमे छलाह,वर्तमानमे वूलवर्थ कम्पनीमे काज करैत छलाह। आंचलिक कार्यालयमे हम : आंचलिक कार्यालयमे हमरा दू टा विभागक देख-रेखक काज देल गेल छल : ग्रामीण विकास आ योजना-विकास। दुनू विभागमे आरम्भमे दू-दू टा अधिकारी छलाह। दूनू विभागक मुख्य काज छलै : केन्द्रीय कार्यालयसँ प्राप्त सर्कुलरक अनुसार विभिन्न योजनाक क्रियान्वयन शाखा स्तरपर सुनिश्चित करबाक लेल क्षेत्रीय कार्यालय सभकें आ अग्रणी बैंक कार्यालय सभकें उचित दिशा-निर्देश जारी करब, क्षेत्रीय कार्यालय सबहक माध्यमसँ शाखा सबहक प्रगतिक आँकड़ा प्राप्त कय ओहिसँ सम्पूर्ण अंचलक आँकड़ा तैयार क’ क’ केन्द्रीय कार्यालयकें प्रेषित करब, राज्य स्तरपर दुनू विभागसँ सम्बंधित बैसक सभमे ( जाहिमे नाबार्ड द्वारा आयोजित बैसक सेहो छल ) भाग लेब आ बैसकमे लेल गेल निर्णयसँ सम्बंधित सभ कार्यालय आ अधिकारी लोकनिकें सूचित करब आ ओकर क्रियान्वयन सुनिश्चित करबाक लेल आवश्यक पत्राचार आ सम्पर्क करब। दू टा मुख्य प्रबंधक आ आंचलिक प्रबंधक महोदय हमर अभिभावक छलाह। हुनका लोकनिक मार्गदर्शनमे सभ काज करबाक छल। आंचलिक कार्यालयमे हमर समकक्ष तीन गोटे और छलाह जे कार्मिक,परिचालन आ विधि विभागमे छलाह। रायपुर अंचलमे पाँचटा क्षेत्रीय कार्यालय छलै : रायपुर, शहडोल, अम्बिकापुर,जबलपुर आ छिंदवाड़ा। एत’ एलाक बाद वर्मा साहेबक मधुर पक्षसँ परिचित भेलहुँ। सभ अधिकारी-कर्मचारी लग जाक’ हाथ मिलबैत छलाह, कुशल-क्षेम पुछैत छलाह। सेवा निवृतिक समय लग आबि गेल छलनि,मुदा अनुशासनप्रियता एखनहुँ ओतबे छलनि। एक साँझ हुनका सम्मानमे आंचलिक कार्यालय स्टाफ मनोरंजन क्लब दिससँ छत्तीसगढ़ क्लबमे आयोजित भोजमे आंचलिक कार्यालयक अधिकारी लोकनिक संग हमहूँ रही। ठाढ़ भ’ क’ सभ गोटे प्लेटमे ल’क’ भोजन करैत छलाह। सभ गोटेक भोजन समाप्त भ’ गेल छलनि, हमरा आ साहूजी ( वरिष्ठ प्रबंधक,कार्मिक विभाग)क हाथमे प्लेट रहबे करय। वर्मा साहेब आनन्दित भए चुटकुला सुना रहल छलाह। सभ गोटे चुटकुलापर ठहक्का मारिक’ हँसैत छलाह। वर्मा साहेब हमरा आ साहूजीकें कहलनि, नजदीक आओ यार, चुटकुला सुनो और अच्छा नहीं लगे तब भी जोर से हँसो। हम सभ कनी लग गेलहुँ। हुनकर बातक समर्थनमे अति उत्साहमे आबि गेलाह वरिष्ठ प्रबंधक,राजभाषा आ हमरा हाथक प्लेट छीनिक’ नीचाँ पटकैत बजलाह, ‘हाँ सर, प्लेट तोड़कर हँसा जाय।’ प्लेट नीचाँ खसलै आ फूटि गेलै, खाए जोग्य त कनिएँ वस्तु बाँचल छलै, जे छलै से नीचाँ छिड़िया गेलै। तकरा बाद वर्मा साहेबक तामस जागि गेलनि। बड्ड गन्जन केलखिन हुनका। सभ कियो अबाक ! हम कहलियनि जे हम भोजन क’ चुकल छलहुँ, हुनकर कहब रहनि ‘ये लोग क्या समझेंगे कि इतने असभ्य होते हैं ये लोग !’ वरिष्ठ प्रबंधक,राजभाषा नीक लोक छलाह, मुदा चुटकुला सुनैत-सुनैत भावावेशमे आबि गेल छलाह आ एक छण लेल बिसरि गेलाह जे चुटकुला सुनबै बला एखनो हमर आंचलिक प्रबंधक महोदय छथि। ओ माफी मँगलखिन तथापि बड़ी काल धरि डाँट-फटकार सून’ पड़लनि। जहिना सभ ठहक्का मारिक’ हँसैत छलाह, तहिना ओत’ एकदम मरघटक शान्ति उपस्थित भ’ गेलै। मुख्य प्रबंधक महोदय हुनका कार लग ल’ गेलाह आ चुपचाप सभ कियो अपन-अपन घर गेलाह। आंचलिक कार्यालयमे कंप्यूटरपर वर्ड आ एक्सेलमे काज केनाइ सीखि लेलहुँ। अपनेसँ चिट्ठी टाइप केनाइ आ क्षेत्रीय कार्यालय सभसँ प्राप्त कोनो विवरणक समेकित विवरण तैयार केनाइ सिखलहुँ। एहि लेल ऑफिस समयक बादो एक घंटा अथवा बेशी रहि जाइत छलहुँ। एक दिन दूरदर्शनमे एकटा बैसकमे भाग लेबय गेलहुँ। गुप्ताजी, निदेशक महोदयसँ परिचय भेल। ओ भरिसक सहरसा जिलाक छलाह, रायपुरमे अपन घर बना नेने छलाह, मैथिलीमे हमरासँ गप केलनि त बहुत नीक लागल। हुनका अपन प्रकाशित पोथी देलियनि।ओ हिन्दी कार्यक्रमक लेल हमरा एकटा कॉन्ट्रैक्ट देबाक इच्छा व्यक्त केलनि। हमरा नीक लागल, मुदा हम कहलियनि जे हम त एखन तीन साल रहब, हमरा अवसर बादमे देब, हमर आंचलिक प्रबंधक महोदय अही मासमे सेवानिवृत होम’ जा रहल छथि, हुनकासँ साक्षात्कारक एकटा कार्यक्रमक व्यवस्था करबाबी त हमरा नीक लागत। ओ कहलनि जे अहाँक आंचलिक प्रबंधक दूरदर्शन लेल सेहो महत्वपूर्ण भ’ सकैत छथि जँ ओ शासकीय योजनामे बैंक सभक योगदानपर बात करबाक लेल तैयार होथि। हम कहलयनि, तैयार भ’ जेताह। ओ कहलनि जे एकटा महिला हुनकासँ छत्तीसगढ़ीमे प्रश्न पुछथिन, ओ हिन्दीमे जबाब द’ सकै छथिन। निदेशक महोदय आ सहगल मैडम २३ जनवरीक’ साक्षात्कारक कार्यक्रमक रिकॉर्डिंगक तिथि निर्धारित केलनि। मैडम हमरा एकटा रसीद पर हस्ताक्षर करबाक’ पहिने जमा क’ देबाक सलाह देलनि जाहिसँ चेक बनिक’ तैयार रहनि आ साक्षात्कारक बाद हुनका उपलब्ध भ’ जाइन। हम जखन ऑफिसमे अपन साहेबकें एहि कार्यक्रमक सूचना देलियनि त हुनका नीक त लगलनि कारण भरिसक पहिल बेर एकर अनुभव होइबला रहनि। मुदा हमरा चेतावनी देलनि जे एहि कार्यक्रमक तैयारीक लेल अहीं जबाबदेह हएब। जखन खाली रसीदपर हस्ताक्षर लेल कहलयनि त तमसा गेलाह। कहलनि, अहाँ बैंकमे वरिष्ठ प्रबंधक छी आ हमरा ब्लैंक रसीदपर हस्ताक्षर कर’ कहैत छी। हुनकर कहब छलनि जे बिना प्राप्त केने किए लीखिक’ दियौ जे पन्द्रह सौ रुपैया प्राप्त केलहुँ। हम साहेबकें नै समझा सकलियनि जे किए आवश्यक छै। सभ ऑफिसक विधि-व्यवहार, परम्परा आ संस्कृतिमे किछु-किछु अन्तर होइत छैक। हम कतबो कहलियनि, ओ हस्ताक्षर नै केलनि। हम ओ पेपर दूरदर्शनकें घुरा देलिऐ। साहेबकें साक्षात्कारक तैयारीक हेतु ग्रामीण क्षेत्रक सभ योजनाक सार कागजपर लीखिक’ द’ देलियनि। बहुत किछु त बुझले रहनि, फेरसँ देखिक’ किछु चर्चा क’ क’ संतुष्ट भ’ गेलाह। रिकॉर्डिंग दिन हमरो चल’ कहलनि। संगे गेलहुँ। स्टूडियोमे रिकॉर्डिंगसँ पहिने किछु मेक-अप सेहो कएल जाइत छै, से सभ भेलनि। साक्षात्कार आरम्भ भेलै। प्रसन्न मुद्रामे छलाह। हम कातमे रही, सुनैत रही जे की पूछल जाइ छनि आ की जबाब दैत छथिन। मुदा सभ किछु ठीक रह्लै। साक्षात्कार नीक रहलनि। हमरो नीक लागल। कार्यक्रममे कोनो व्यवधान नै होइ, से चिंता छल। मगर एकटा व्यवधान त भइए गेलनि जे साहेबकें एक हजार पांच सय रुपैयाक चेक ओहि दिन नै भेटलनि। कार्यक्रम अधिकारी कहलकनि जे पेपरपर हस्ताक्षर क’क’ पहिने द’ देने रहितिऐ त आइ चेक भेटि जाइत। जाधरि चेक भेटलनि, साहेब कतेक बेर पुछलनि, ‘दूरदर्शन को मुझे पंद्रह सौ देने के लिए पैसे नहीं हैं?’ वर्मा साहेब हिमाचल प्रदेशक छलाह। अवकाश प्राप्तिक बाद घर जेबाक लेल तिथि निश्चित भ’ गेल छलनि, तें चिन्ता होइ छलनि। जहिया चेक आबि गेलनि, हुनकासँ बेशी ख़ुशी हमरा भेल। वर्मा साहेब ३१जनवरीक’ सेवा निवृत भेलाह, ३० क’ हुनक साक्षात्कारक कार्यक्रम दूरदर्शनपर प्रसारित भेलनि। अंचलमे सभ शाखाकें एहि कार्यक्रमक सूचना द’ देल गेल छलै। बादमे हमरा दूरदर्शनमे एकटा कवि गोष्ठीमे भाग लेबाक अवसर सेहो भेटल जाहिमे तीनटा और साहित्यकार छलाह। गोष्ठीक संचालनक भार सेहो हमरे देल गेल छल। ओहिमे सभ कियो हिन्दी रचना प्रस्तुत केने छलाह। वसन्तक विवाह : वसन्त अर्थशास्त्रमे एम. ए. क’क’ लाइब्रेरी साइंसमे स्नातक भ’ गेल छलीह आ ओहीमे एम.ए.क’ तैयारी क’ रहल छलीह। बाहर रहबाक कारण गाम-घरसँ सम्पर्क नीक नहि रहि गेल छल। रायपुरमे सेहो उपयुक्त कथाक व्यवस्था नहि भ’ सकल। २००२ मे दू-तीन सप्ताहक लेल गाम, सासुर आ किछु आन ठामक यात्राक विचार केलहुँ। हमर नेताजी अग्रवाल साहेब एल.टी.सी.क उपयोग करबाक सुझाव देलनि,क्षेत्रीय प्रबंधक कतहु आन ठाम गेल छलाह,हुनकासँ फोनपर स्वीकृति प्राप्त करबाय रायपुरसँ दिल्ली आ दिल्लीसँ पटनाक प्लेनक टिकट उपलब्ध करबा देने छलाह। परिवारक संग पहिने दिल्ली गेलहुँ। ओत’ हमर बहिन-बहिनो लक्ष्मीनगर आ किछु आन ठाम संपर्क करबाक सुझाव देलनि, ओत’ ओझाजीक संग गेलहुँ। दिल्लीसँ पटना आ ओत’सँ गाम गेलहुँ। गामसँ सासुर लदारी गेलहुँ।ओत’सँ राजू (हमर साढ़ूक पुत्र ) संगे मोटर साइकिलसँ डुमरा, देपुरा,बेलौंजा,मुरलिया चक घूमि साँझमे लदारी गेलहुँ। लदारीसँ छोट सार, जे शिक्षक छलाह,हुनका संग दरभंगा गेलहुँ। दरभंगामे भारतीय स्टेट बैंकक सिटी ब्रांचमे सुशील कुमार झासँ संपर्क केलहुँ, हुनक बालक छत्तीसगढ़क भाटापारा शाखामे पी.ओ.छलखिन। ओ बायोडाटा आ फोटो राखि लेलनि, मुदा संतोषप्रद गप नै भेल। मास्टर साहेब बिन्देजीक संग मोटर साइकिलसँ नभहत आ मधुबनी गेलहुँ। गाम घुरलहुँ त हमर कक्का कहलनि जे एकटा कथा जँ अहाँके पसंद हो त भ’ सकैए। हमरा ई अनुभव भेल अछि जे हम सभ जखन अनकहु पसन्दक सम्मान कर’ लगैत छी त काज कठिन नहि रहि जाइत अछि। हम जखन पी. ओ. तकैत छलहुँ त कठिन छल, क्लर्क पर विचार कर’ लगलहुँ त आसान भ’ गेल। हम सोचलहुँ हमहूँ त कहियो बैंकमे कृषि सहायकक काज केने छी। हम सभ गेलहुँ राघोपुर। संगमे ककाक अतिरिक्त पितिऔत दिलीप,भातिज सुशील आ मास्टर साहेब बिन्देजी सेहो छलाह। ककाक एक पुत्रीक विवाह सेहो ओहि टोलमे भेल छलनि। सुशीलक एकटा भौजी सेहो ओही टोलक छलखिन। घर-दरबज्जा आदि देखि सभ गोटेकें कथा पसंद भेलनि। लड़का द’ पता चलल जे बी. एस.सी. क’ क’ एस.एस.सी.क परीक्षा पास क’ क’ कर्मचारी भविष्य निधि संगठनमे मुंबइमे नोकरी करैत छथि। पिता शासकीय सेवामे छ्लखिन । हुनकासँ गप भेल। कहलनि जे दुर्गा पूजामे बालक एताह तखने किछु गप भ’ सकैत अछि। हमरो सभकें हुनका सबहक विषयमे जानब आसान भेल आ हुनको सभकें हमरा सभक विषयमे आसानीसँ बहुत जानकारी प्राप्त भ’ गेलनि। दुर्गा पूजाक समय हमर अनुज रतनजी राघोपुर जाक’ लड़काकें देखि एलाह। हम मुंबईमे एकटा परिचित लोकक माध्यमसँ लड़काक विषयमे जानकारी प्राप्त केलहुँ, फेर अपनो जाक’ देखि एलहुँ। डोमनहिलमे रही त गुदरीपाड़ाक मनीषसँ परिचय भेल छल, ओ अँधेरीमे रहैत छलाह, कोनो सीरियलक लेल लीखि रहल छलाह। हुनके संगे गेलहुँ नवी मुंबइमे वाशी स्टेशनसँ जूइनगर स्टेशन लग। अपना बैचक किछु गोटेक संग झाजी एक ठाम रहैत छलाह। सभ गोटेक पोस्टिंग सेहो लगे-लगेमे छलनि। रवि दिन छलै।मनीष संगे पहुँचल रही। जलखै आ भोजन एतेक करबै गेलाह जे अगिला दू दिन धरि किछु खेबाक इच्छा नहि भेल। हमर छोट सार बिन्देजी आ हुनक छोट पुत्र आशुतोष राघोपुर जाक’ शेष गप क’क’ हमरा जना देलनि, विवाह तय भ’ गेलै। विवाहक तिथिसँ किछु दिन पहिने २००३ मे २५ फरबरीक’ दरभंगा काली मन्दिरस्थानमे भेंट-घाँटक कार्यक्रम निश्चित भेल। राघोपुरसँ ओझाजीक माए आ बाबू आएल छलखिन। एमहरसँ वसन्तक संग हम दुनू गोटे रही,हमर छोट सार, सरहोजि आ आशुतोष छलाह। ओकरा प्रात हमरा सूचना भेटल जे झाजीक माए बहुत दुखी छथिन। वसन्तक मुँहपर बर्रेक चेन्ह छलै, ओइ दिन ब्लीचिंग भेल रहै से कनी और पसरल लगै छलै, से हुनक चिन्ताक कारण भ’ गेल छलनि जे बेटा ई ने कहय जे तों सभ की देखलहिन। हम हुनका फोन क’ क’ कहलियनि जे चिन्ता नै करू, ई ठीक भ’ जाइबला छै। हुनका ईहो कहि देलियनि जे मोन स्थिर क’ लिय’, एखन देरी नै भेल छै, एत’ नै हेतै त दोसर ठाम हेतै विवाह, अहाँ सबहक मोन नै हएत त नै हेतै। हमरा कहलनि जे एक बेर हमरा बेटीकें सेहो देखा देबाक व्यवस्था करू। सैह भेलै। मधुबनीमे हुनक पुत्री एलखिन। वसन्तक संग हम रही आ आशुतोष छलाह। वसन्तकें कृष्णादाइसँ भेंट-घाँटक संग खूब गप-सप भेलनि। कृष्णादाइक स्वीकृतिसँ सभ गोटे संतुष्ट भ’ गेलाह। विवाहक तिथि ओहिना रहलै। विवाहसँ पहिने ६ मार्चक’ किछु सामान सभ ल’क’ नौ गोटे गेलहुँ खान-पीनक औपचारिकतामे। बैंकसँ हम आवास ऋण नहि नेने छलहुँ। पी. एफ. आ एल.आइ.सी. पालिसीक विरुद्ध ऋण प्राप्त केने रही।एन.एस.सीक विरुद्ध ओ डी स्वीकृत छल। हमर छोट भाए रतनजी गाममे छलाह। ओ शामियाना,टेबल,कुर्सी, हलुआइ आ अन्य बहुत रास सामानक व्यवस्था केने छलाह। बर आ बरियाती अनबाक लेल हमर ससुर आ हमर अनुज ललनजी गेल छलाह। २००३ मे ७ मार्चक’ विवाह कार्य संपन्न भेलै। ११ क’ चतुर्थी भेलै,१३ क’ ओझाजी विदा भेलाह। द्विरागमन दू सालक बाद हेबाक छलै। हम सभ वसन्तक संग २२ क’ गामसँ रायपुर लेल प्रस्थान केलहुँ। रायपुरमे ४ अप्रैल क’ ओझाजी मुंबइसँ एलाह आ २१ क’ गेलाह। ३० मइक’ बट-सावित्री पावनि भेलै। ओइ दिन हमरा गामक अनिल ठाकुरजी परिवारक संग डेरापर एलाह। पंचमीसँ कोजगरा धरि : बच्चीक (हमर पत्नीक ) स्वास्थ्य ठीक नहि रहैत छलनि। सोनोग्राफी रिपोर्ट देखि चिकित्सक लोकनि ऑपरेशनक सलाह देलकनि। १ जुलाइक’ पाण्डेय नर्सिंग होममे बच्चीक ऑपरेशन भेलनि। पटनासँ हमर साढ़ूक माझिल पुत्र राजू आएल छलाह। बच्चीक ब्लड ग्रुपसँ राजूक ब्लड ग्रुप मिलैत छलनि। ओ एहि लेल २७ जूनक’ माएक संग आबि गेल छलाह। हुनका संगे ब्लड बैंक गेलहुँ, राजू ३५० cc ब्लड देलखिन। ऑपरेशन २.३० बजे शुरू भेलै ४.१५ तक चललै। १८ जुलाइक’ पंचमी पावनि भेलै। २६ क’ ओझाजी मुंबइसँ एलाह। राजू ९ जुलाइक’ एसगरे पटना चलि गेलाह। साढ़ू २९ जुलाइक’ एलाह आ ४ अगस्तक’ पत्नीक संग पटना गेलाह। १ अगस्तक’ मधुश्रावणी पावनि भेलै। ९ अक्टूबर क’ कोजगरा छलै, ६ क’ गाम पहुँचलहुँ। ७ आ ८ क’ रतनजीक संग मधुबनी जाक’ बजारक सामान कीनै गेलहुँ। ९ क’ साँझमे ६ बजे राघोपुर पहुँचलहुँ। १२ क’ राघोपुरसँ गाम गेलहुँ। १४ क’ गामसँ चलिक’ १५ क’ रातिमे ९ बजे रायपुर पहुँचलहुँ। मुंबइ आ चंडीगढ़ देखल : ओझाजीक सहमतिसँ २००४ मे २६ जनवरीक’ रायपुरसँ प्रस्थान कय वसन्त २७ क’ मुंबइ पहुँचलीह। ३ मार्चक’ दुखित पड़ि गेलीह। ३ स ६ धरि अस्पतालमे रहलीह। बेर-बेर दुखित पड़बाक समाचार आब’ लागल। सभ गोटे चिंतित भेलहुँ। ओझाजीक नव नोकरी। बेर-बेर छुट्टी ल’क’ इलाज करेबाक व्यवस्थामे हुनकर परेशानीक अनुमान करैत हम अपन छुट्टी स्वीकृत कराय ९ अप्रैलक’ मुंबइ लेल रायपुरसँ प्रस्थान केलहुँ। १० क’ नवी मुंबईमे जूइनगर आवासपर पहुँचलहुँ। एम जी एम हॉस्पिटलमे डा.सुमित मेहतासँ संपर्क करै गेलहुँ। डॉक्टरक सलाहक अनुसार वसन्त १३ क’ अस्पतालमे भर्ती भेलीह।१४ क’ किछु जाँच भेलनि। १५ क’ डॉक्टर रीनोग्राम टेस्ट करब’ कहलखिन। १९ क’ हिन्दूजा अस्पतालमे रीनोग्राम टेस्ट भेलनि। २३ क’ एम.जी.एम. अस्पतालमे पुनः भर्ती भेलीह। डा. कहलनि जे गर्भाशय लग एकटा नली टेढ़ भ’ गेल छै,ओहि कारण बेर-बेर इन्फेक्शन भ’ जाइ छनि आ तें बोखार आबि जाइत छनि, साधारण ऑपरेशन द्वारा ओकरा ठीक क’ देल जेतै। की भेलै, कोना भेलै आ किए भेलै ई सोचबाक समय नहि रहि गेल छल, समस्या सामने छल, समाधान आवश्यक छल। डा, सुमित मेहता कहलनि जे मामूली खर्चमे सभ किछु भ’ जाएत। २४ क’ वसन्तक ऑपरेशन भेलनि। २९ क’ रायपुरसँ विवेकक संग बच्ची ( हमर पत्नी ) सेहो मुंबइ पहुँचि गेलीह। ५ मइक’ वसन्त अस्पतालसँ डेरापर एलीह। १८ क’ पुनः बोखारक कारण अस्पतालमे भर्ती भेलीह। अस्पतालमे कय बेर मलेरियाक जाँच भेलनि, जाँचमे मलेरियाक पुष्टि नै होइत छलैक। २४ क’ वसन्त अस्पतालसँ डेरा एलीह। फेर बोखार एलनि, डॉक्टरसँ संपर्क करैत छलहुँ त कहैत छलाह, मलेरिया की दवा दे दीजिए। डॉक्टर लिखितमे ई आदेश नै दैत छलाह, मुँहसँ कहैत छलाह, जाँचमे नहीं आ रहा है,मगर मुझे लगता है कि मलेरिया है,इसलिए मलेरिया की दवा दे दीजिए। हमरा सभकें आब अस्पतालपर विश्वास नहि रहि गेल छल। डॉक्टर आरम्भमे कहने छलाह मामूली ऑपरेशन होगा, से सही नै भेल। कहने छलाह जे मामूली खर्चमे सभ भ’ जाएत सेहो गलत सिद्ध भेल। तें आब जे ओ विना जाँचक आधार नेने मलेरियाक दबाइ द’ देब’ कहैत छलाह, ई सलाह विश्वसनीय नै लागल। नोकरी आ अस्पतालक चक्करमे जमाए सेहो परेशान भ’ गेल छलाह। हम सभ मुंबइ छोड़ि देबाक निर्णय लेलहुँ आ २९ मइक’ वसन्तक संग हम दुनू गोटे मुंबइसँ प्रस्थान कय ३० क’ रायपुर पहुँचि गेलहुँ। राघोपुर आ मुंबइसँ वसन्तक समाचार जनबाक लेल संपर्क होइत रहल। बोखार कहियोक’ आबिए जाइत छलनि। रायपुरमे १५ जूनक’ डा. गोयलसँ संपर्क कएल गेल। ओहो मलेरियाक दबाइक प्रयोगक सलाह नै देलनि। १७ जून क’ यूरिन कल्चर टेस्ट तिवारी पैथोलॉजीमे भेलनि। २१ क’ यूरोलोजिस्ट डा.शाहसँ संपर्क कएल गेल। चंडीगढ़मे छलाह प्रो.गंगानंद झा, हुनक जेठ बालक डा. विवेकानंद झा पी.जी.आइ.मे छलखिन। हुनका सभसँ सेहो संपर्क करैत रहलहुँ। गंगा बाबू अधिक काल समाचार पूछैत रहैत छलाह आ प्रगतिक जिज्ञासा करैत छलाह। डा.साहेबक सलाहसँ नोर्फ्लोक्स देल गेलनि। बोखार कम भ’ क’ फेर बढि जाइत छलैक। रायपुरक डॉक्टर दिलीप झा आ डा. संदीप जैनसँ सेहो संपर्क कएल गेल। डा.सांत्वना दास ओत’ १ जुलाइक’ मलेरियाक लेल जाँच भेलनि।रिपोर्ट निगेटिव एलै। ११ जुलाईक’ रूपरेला एक्स-रे क्लिनिकमे आइ.वी.यू.टेस्ट कराओल गेलनि। एहि टेस्टसँ ई पता चलल जे मुंबइमे भेल ऑपरेशन सफल नै भेलनि आ जे समस्या छलै से ओहिना रहि गेल छै। आब एना किए भेलै, से विचार करबाक समय नहि रहि गेल छल। अस्पतालक दोख ताकिक’ किछु समाधान नहि भ’ सकैत छल। शीघ्र विकल्पक खोज करबाक छल। १४ क’ गंगा बाबूसँ संपर्क केलहुँ आ अविलम्ब चंडीगढ़ जेबाक निर्णय लेलहुँ। हमरा लागल जे निदान लेल चंडीगढ़ पहुँचब आवश्यक अछि। हम अपन मुख्य प्रबंधक आ नव आंचलिक प्रबंधक महोदयकें सभ बात कहलियनि, अवकाश स्वीकृत भ’ गेल। मुख्य प्रबंधक आर.जी.अग्रवाल सर चंडीगढ़सँ किछु दिन पूर्व आएल आ कटनी शाखामे पदस्थापित प्रबंधक सरदारजीसँ गप क’ क’ किछु अवधि हेतु चंडीगढ़मे हमरा सभक आवासक व्यवस्था करबा देलनि। हम सभ १८ जुलाइक’ रायपुरसँ प्रस्थान क’ क’ २० क’ चंडीगढ़ पहुँचि गेलहुँ। हम सर्व प्रथम आवासपर जाक’ गंगा बाबूसँ भेंट केलहुँ। हुनकासँ भेंट भेलाक बाद हम चिन्तामुक्त भ’ गेलहुँ। ओ हमरा संगहि पी. जी. आइ. गेलाह। अपन पुत्र डा.विवेकानंद झासँ भेंट करौलनि। डॉक्टर साहेब एकटा पत्र देलनि यूरोलोजिस्ट डॉक्टर सिंहजीसँ संपर्क करबाक हेतु।२२ क’ डॉक्टर सिंहसँ संपर्क भेल। ओ सभ रिपोर्ट देखलनि आ सही निदानक दिशामे उपचार आरम्भ भ’ गेल। १३ अगस्तक’ वसन्त अस्पतालमे भर्ती भेलीह। २३ क’ ऑपरेशन हेबाक छलनि किन्तु सबेरे १०३ डिग्री बोखार रहबाक कारण ओहि दिन ऑपरेशन स्थगित कएल गेलनि। ३ सितम्बरक’ ऑपरेशन भेलनि। ४ क’ दुपहरमे डॉक्टर मंडल एलाह त कहलनि,’समस्या का निदान हो चुका है।’ चंडीगढ़ अस्पतालमे कम-सँ-कम लोकसँ काज चलाब’ चाहैत छलहुँ। तें किनको एबाक लेल नहि कहैत छलियनि, तथापि दिल्लीसँ हमर भागिन पवन आ अमन बेरा-बेरी चंडीगढ़ पहुँचि हमरा सबहक सहायता केलनि। हम २६ सितम्बरक’ एसगर चंडीगढ़सँ प्रस्थान कय २८ क’ रायपुर पहुँचलहुँ। ७ अक्टूबर क’ वसन्त आ हुनक माए ट्रेनसँ अमनक संग चंडीगढ़सँ दिल्ली गेलीह आ १३ क’ पवन संगे दिल्लीसँ रायपुर पहुँचैत गेलीह। डॉक्टर साहेबक सलाहक अनुसार हम सभ फेर एक बेर चेक करयबाक हेतु २४ नवम्बरक’ पी जी आइ चंडीगढ़ गेलहुँ, २५ क’ डॉक्टर साहेबसँ संपर्क कएल गेल, आइ वी यू टेस्ट भेलनि। रिपोर्टक अनुसार दुनू किडनीक फंक्शन नार्मल छलनि। २७ क’ पी जी आइमे डॉक्टर मंडल ६ मास प्रिगनेंसी रोकबाक आ नीक डॉक्टरक देख-रेखमे बच्चाक जन्म सुनिश्चित करबाक सलाह दैत रायपुर घुरबाक अनुमति देलखिन। हम २९ क’ एसगर रायपुर पहुँचि गेलहुँ। बसन्त माएक संग दिल्लीमे दू-तीन दिन सच्चीक (हमर बहिन) ओत’ आ करीब एक मास हमर अनुज ललनजीक डेरापर रहलीह। २० दिसम्बर क’ ललनजीक पुत्रक जन्म भेलनि। विवेक(पुत्र) २२ क’ भोपालसँ दिल्ली गेलाह आ २००५ मे २ जनवरीक’ माए आ बहिनक संग रायपुर पहुँचलाह। वसन्त जाहि समस्यासँ गत आठ माससँ पीड़ित छलीह ओहिसँ मुक्ति भेटलनि। बोखार एनाइ बंद भ’ गेलनि आ बहुत जल्दी सामान्य स्वास्थ्य प्राप्त क’ लेलनि। अपन दुख लोककें बड़ भारी लगैत छैक, लोक सोचैत अछि ई दुख हमरे किएक भेल, मुदा जखन अनकर दुख लोक देखैत अछि तखन अपन दुख छोट लाग’ लगैत छै। हमर सबहक दुख एहेन छल जकर निदान भेल, मुदा कतेक परिचित लोकक संग एहेन दुर्घटना भेलनि जे ककरो किछु करबाक अवसरे नहि भेटलै। रायपुरक क्षेत्रीय प्रबन्धक अपन पत्नीक हड्डी सम्बन्धी रोगक इलाज हेतु भेलूर गेल छलाह, अस्पतालक वरंडापर पत्नीकें व्हील चेयरसँ नीचाँ खसैत देखि हुनक ह्रदय गति बंद भ’ गेलनि, नहि बचि सकलाह (३०.५.२००३)। पुत्र मेडिकलमे पढैत छलखिन, एकटा बेटी कुमारि छलखिन। आंचलिक कार्यालयमे चपरासी छलाह मोहन यादव। एक दिन ऑफिस नै एलाह, पता चलल बीमार भ’ क’ अस्पताल गेल छथि। दोसर दिन पता चलल नै बँचलाह(१३.०८.२००५)।घरमे पत्नी आ अबोध बच्चा सभ छलनि। आंचलिक कार्यालयमे एकटा अधिकारी छलाह लाल मोहन पटेल। नीक कवि छलाह,चित्रकार छलाह,हमर प्रिय मित्र छलाह। भिलाइमे आवास छलनि, ओतहिसँ मोटर साइकिलसँ रायपुर अबैत छलाह आ साँझमे भिलाइ घुरि जाइत छलाह। एक साँझ एकटा बसक चपेटमे आबि गेलाह, नहि बाँचि सकलाह। हमर साढूक छोट भाए उदय चन्द्र झा रांचीमे डी.एस.पी. छलखिन। एकटा आक्रोशित भीड़कें शान्त करबाक प्रयासमे गेल छलाह। क्यो पाथर चला देलकनि, माथमे लगलनि, नहि बाँचि सकलाह। २६ दिसम्बर(२००४)क’ सबेरे ६.३० बजे हिन्द महासागरमे विनाशकारी भूकंप एलै। एहिसँ उठल तूफानी लहरिक कारण दक्षिण पूर्व एशियाक भारत सहित आठटा देशमे तबाही मचि गेलै। सोलह हजारसँ बेसी लोक मरि गेलाह आ हजारो लापता भ’ गेलाह। ४० फीट तक ऊँच समुद्री लहरि ७५० किलोमीटर प्रति घंटाक रफ़्तारसँ तटीय शहरमे घुसि गेलै। जाहि समयमे हम सभ कोनो कष्टमे रहैत छी, ओही समय कतेक लोक केहेन-केहेन कष्टमे रहैत अछि तकर पता कहाँ चलि पबैत छै। किछु पता चलितो छै त ओहने लोकक जिनकासँ कोनो सम्बन्ध रहैत छैक। किछु लोकक स्थितिक पता अखबार आदिसँ चलैत छैक। बहुत लोकक दुर्दिनक विषयमे कमे लोककें पता चलि पबैत छैक। सपता-विपताक कथा आ वसन्तक जीवन : माएकें सपता-विपताक कथा कहैत सुनने छियनि। कथा कहैत-कहैत कतेक बेर कनैत छलीह। सुननिहारि सबहक सेहो एहने हाल रहै छलनि। राजा-रानीक जीवनमे हर्ष-विषाद-हर्ष, सुख-दुख-सुख, सम्मान-अपमान-सम्मानक कथा अछि। कथा कहै वाली कथाक अन्तमे ईहो कहैत छथि जे राजा-रानीक जीवनमे जे आरम्भमे आ अन्तमे भेलनि से सभकें होइ आ जेहेन बीचमे भेलनि तेहेन ककरो नहि होइ। कथा ई कहैत अछि जे दुर्दिनमे अपनो लोक सभ संग छोड़ि दैत छैक। मुदा हमरा लगैत अछि जे दुर्दिनसँ निकलबामे अपन आत्मबलक संग बहुत लोकक स्नेह,शुभकामना,सहयोग आ आशीर्वादक आवश्यकता होइत छैक। मुंबइमे एक राति हमरा सभकें कना गेल, बोखार कम होइते ने छलै, भेल जे बेटी आब नै बाँचत। जमाए सेहो कान’ लगलाह, मुदा फेर वैह हमरा सभकें भरोस देलनि, ई सभ किए कनैत छथि, हम हिनका मर’ नै देबनि चाहे जे खर्च होइ। जमाएक बातसँ बल त भेटल, मुदा चिन्ताक बात छल जे जखन ऑपरेशन भेलाक बादो बोखार अबिते छै आ डॉक्टरकें सेहो नहि बुझा रहल छनि तखन ठीक हेतै कोना,ओहि राति दू बेर स्पोंजिंगक बाद बोखार कम भेलापर खून चढ़’ लगलै। ओहि राति हम सभ अस्पतालेमे रहलहुँ, ओझाजीक दूटा संगी सेहो अस्पतालमे रहि हमरा सभकें सहयोग करैत रहलाह। ओझाजी दिनमे ऑफिस आ रातिमे अस्पतालमे रहैत छलाह। पाइ सेहो बहुत खर्च भेलनि। चंडीगढ़ जेबाक निर्णय लेलहुँ त बीस हजार रुपैया पठा देलनि। किछु अवधिक बाद फेर पन्द्रह हजार पठा देलनि। अधिक काल संपर्क करैत हाल-समाचार पुछैत रहैत छलाह। राघोपुरसँ समधि, समधिन,वसन्तक ननदि-ननदोसि सभ सेहो संपर्क करैत रहैत छलाह। समधि-समधिन बाबा धामक कबुला सेहो केलनि। हमर माझिल भाए ललनजी दिल्लीमे आजादपुर मंडीमे एकटा साधारण नोकरी करैत छलाह। छओ बरखक एकटा कन्या आ पत्नी संग रहैत छलाह। पत्नीकें सेहो मदतिक आवश्यकता छलनि, ताहि लेल माए आबि गेल छलखिन। ललनजी शारीरिक रूपसँ मदति कर’ चाहैत छलाह, मुदा हम बुझैत छलिऐक जे ओ मदति करबाक स्थितिमे नहि छलाह। फोनपर समाचारसँ अवगत करबैत रहैत छलियनि। सभसँ छोट भाए रतनजीक जीवन अस्त-व्यस्त भ’ गेल छलनि। विवाह क’क’ पत्नीक संग दिल्लीमे जीवन-यापन कर’ चाहैत छलाह। फिजिक्ससँ एम.एस.सी. आ बी. एड. केने छलाह। माएक नामपर एकटा कोचिंग सेण्टर खोलने छलाह। एक बेर रस्तामे किछु बदमास सभ किछु टाका छीनि लेलकनि।एक दिन पियासलमे कोनो फोटोकॉपीबला दोकानपर धोखासँ कोनो तेहेन चीज पिया गेलनि जे अस्पतालमे किछु दिन भर्ती हुअ’ पड़लनि। एहि सभसँ उबरलाह त पत्नी ख़तम भ’ गेलखिन। दिल्लीसँ मोह भंग भ’ गेलनि। किछु मास हमरा सबहक संग रायपुरमे रहि बादमे गाम ध’ लेलनि। अपनेसँ भानस-भात करैत जीवन-यापन लेल शिक्षकक नोकरीक प्रयासमे लागि गेल छलाह। बादमे दोसर ठाम विवाह भेलनि, ओहो पत्नी छतपरसँ खसि पड़लखिन। अपन दुखसँ उबरलाह त वसन्तक दुखक जानकारी प्राप्त भेलापर शारीरिक रूपसँ मदति करबाक इच्छा प्रगट केलनि। हम हुनका अपनहि लक्ष्य दिस सक्रिय रह’ कहलियनि। ओहो सभ अधिक काल हमरा सभ लेल चिन्तित रहैत छलाह, वसन्त स्वस्थ भ’ जाथि ताहि लेल दुर्गा महरानीसँ कबुला केने छलाह। हमर मामा पटनामे नोकरी करैत छलाह, अपने तीनटा पुत्र-पुत्रीक पढ़ाइक खर्चमे परेशान रहैत छलाह, तथापि जेना-तेना पन्द्रह हजार रुपैया पठा देलनि। फोनसँ लगातार संपर्क रखैत शुभकामना, सहयोग आ आशीर्वाद प्रेषित करैत रहलाह। पटनासँ साढ़ू, जेठ सारि, हुनक पुत्र,पुतोहु सभ गोटे सेहो संपर्क करैत रहैत छलाह। लदारीसँ हमर ससुर, सार ,सरहोजि,हुनक पुत्र-पुत्री सभक शुभकामना प्राप्त होइत रहैत छल। प्रो. गंगा बाबू अपन बैंकक ए. टी. एम. कार्ड द’ देलनि, पासवर्ड कहि देलनि। ओ अपन आ अपन पुत्र डा.विवेकानंद झाक प्रत्यक्ष आ अप्रत्यक्ष सहायतासँ निरंतर हमर आत्मबल बढबैत रहलाह। यूरोलोजिस्ट डा. सिंह आ डा.मंडल द्वारा विशेष ध्यान रखबयबामे सदैब हुनक सहयोग प्राप्त होइत रहल। ओ सभ दिन अस्पताल आबि वसन्तकें देखि जाइत छलाह, स्थितिक समीक्षा करैत छलाह आ वसन्तक मनोबल बढबैत रहैत छलाह। हुनक पुत्र डा. विवेकानंद झा एखन विश्व प्रसिद्द किडनी रोग विशेषग्य छथिन। हमर सबहक सौभाग्य अछि जे हुनका लोकनिक स्नेह, सहायता आ शुभकामना सदैव हमरा सभकें भेटैत रहल अछि आ एखनहुँ भेटैत अछि। हमर आंचलिक प्रबंधक महोदय सेहो आवश्यकतानुसार अवकाश स्वीकृत करबामे उदारता देखौलनि। कहने छलाह, बेटी ठीक हो जाय तभी आना, यहाँ हम देख लेंगे। ओ उदारता नहि देखौने रहितथि त मुंबइमे ५२ दिन आ चंडीगढ़मे ७२ दिन अवकाशमे रहब संभव नहि होइत। आंचलिक कार्यालयमे एकटा लिपिक छलीह प्रतिभा, हुनका भेलनि जे हमर बेटीक स्थिति असामान्य छनि, त हमरा फोन केलनि, ‘सर बेटी को बचाने के लिए आपको पैसे की जरूरत हो तो मुझे कहिए।’ हम प्रतिभाकें धन्यवाद देलियनि, मुदा हमरा हुनक आर्थिक सहयोगक आवश्यकता नहि पडल। आंचलिक कार्यालयमे हमर मुख्य प्रबन्धक आर. जी. अग्रवाल सर कटनी शाखाक प्रबंधककें कहिक’ चंडीगढ़मे हमर आवासक व्यवस्था सुनिश्चित करा देने छलाह। सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया,चंडीगढ़ शाखाक वरिष्ठ प्रबंधक किछु दिन लेल एक कोठलीक आवास उपलब्ध करबामे सहयोग केलनि। मधुबनीसँ मोद नारायण झाजी सेहो सम्पर्क केने छलाह। एहि तरहें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूपसँ बहुत गोटेक स्नेह,सहायता आ शुभकामना प्राप्त भेल। एहिसँ सपता-विपताक कथाक ओ सन्देश जे दुर्दिनमे अपनो लोक सभ दूरी बना लैत छैक, हमरा सही नहि लगैत अछि। हमरा लगैत अछि जे ओहि कथाक अभिप्राय ई भ’ सकैत अछि जे यदि एहनो स्थिति जीवनमे आबय त निराश नहि हेबाक चाही, अपन कर्ममे लागल रही आ नीक दिनक आशा आ प्रतीक्षा करी। बच्चन जीक एकटा गीत छनि, ‘साथी, साथ न देगा दुख भी।’ चिन्तक लोकनिक एहि कथ्यक हम समर्थन करैत छी जे जखन एकटा कोनो रस्ता बन्द होइत छैक त अस्तित्व कोनो दोसर रस्ता खोलि दैत छैक। वसन्तक इलाज हेतु एम.जी.एम. हॉस्पिटलक चुनावक निर्णय गलत सिद्ध भेल, मुदा पी. जी.आइ. चंडीगढ़ जेबाक निर्णय एकदम सही सिद्ध भेल। वसन्तक दिन घुरलनि। माए संगे ६.५.२००५ क’ गाम पहुँचलीह। सवा लाख महादेवक पूजाक आयोजन २२.०३.२००५ क’ पूर्ण भेल। रतनजी जे कबुला केने छलाह से पूर्ण कएल गेल। मुम्बइसँ ओझाजी गाम गेलाह आ वसन्तकें संग नेने १४.०५.२००५ क’ मुंबइ पहुँचलाह। ओही साल १५ अक्टूबरक’ रायपुरमे दुनू गोटेकें प्रसन्न देखलियनि त हर्ष भेल। दीयाबातीक प्रात २ नवम्बरक’ भिलाइसँ वीणा आ मिश्रजीक संग अशोक बाबू (हमर जेठ साढ़ूक छोट पुत्र) पत्नी नीलम आ पुत्र अमनक संग डेरापर एलाह। ५ नवम्बरक’ ओझाजी मुम्बइ गेलाह। विवेक भोपाल गेलाह। हमर साहित्यिक गतिविधि : हमर साहित्यिक गतिविधि रायपुरमे बहुत सीमित रहल। राधाकृष्ण बाबू ओत’ ३ फरबरी २००२ क’ ‘मिथिलायतन’ गोष्ठीमे भाग लेलहुँ। मैथिलीमे एकटा गीत लिखलहुँ जे ‘मिथिलायतन’ पत्रिकामे छपल। २०.०९.२००३ क’ प्रगतिशील लेखक संघक सभाक उदघाटन डा.नामवर सिंह द्वारा भेल छलै। हम उपस्थित भेल रही। आदरणीय नामवरजीक दू पाँती मोन अछि : ‘भाईचारा का तो मतलब ये न होना चाहिए हम उन्हें भाई कहें और वे चारा मुझे।’ २१ क’ सेहो कोनो सन्दर्भमे कहने छलाह : ‘ सब हमारे चाहने वाले हैं, मेरा कोई नहीं मैं रह रहा हूँ देश में उर्दू की तरह।’ ३०.०१.२००५ क’ शोभाकान्त बाबू ओत’मैथिली दिवस मनाओल गेलै। सरयूकांत बाबू मुख्य अतिथि आ जीवेन्द्र नाथ ठाकुर अध्यक्ष छलाह। प्रो. अरुण कुमार झा,शोभाकान्त बाबू आ हम काव्य-पाठमे भाग लेलहुँ। हम प्रस्तुत केने रही गीत : घरेकें मन्दिर बनाउ बनाउ हे यै कनियाँ घरेकें मन्दिर बनाउ। कखनहु घर अन्हार रह्य नहि अखण्ड ज्योति प्रेमक जराउ। गमकय भरि घर-आङन गम-गम बातेकें बेली बनाउ। हो सिनेह मनमे सभ जन लय आसक अछिजल चढ़ाउ। धूप-दीप-नैवेद्य हो करुणा सेवाकें पूजा बनाउ। सासु-ससुर छथि देवी-देवता श्रद्धासँ माथा झुकाउ। अध्यक्ष जी उद्गार व्यक्त केलनि जे एहि गीतक एक हजार प्रति छपाक’ बेटीक द्विरागमन काल देबाक हेतु राखक व्यवस्था कएल जाएत। १३ फरबरी २००५ क’ सरस्वती पूजाक अवसरपर शोभाकान्त बाबूक ओत’ हम दुनू गोटे गेलहुँ। हम आ शोभाकान्त बाबू कविता पढ़लहुँ, इंद्रकान्त जी गीत गौलनि। १६ क’नेताजी सुभाष स्टेडियममे आयोजित पुस्तक मेलाक उदघाटनमे लेखिका तसलीमा नसरीनसँ अंग्रेजीमे हुनक भाषणक बाद हुनक बंगला कविता आ ओकर हिन्दी अनुवाद सुनलहुँ। १८ जुलाइक’ प्रफुल्लजी सपरिवार एलाह आ तीनटा पोथी देलनि जे दरभंगासँ अनने छलाह : केदार नाथ चौधरी लिखित ‘चमेली रानी’ आ सोमदेवजी लिखित ‘सहसमुखी चौकपर’ और ‘सोम पदावली’। नीक लागल। ‘चमेली रानी’पर समीक्षा लिखलहुँ आ प्रफुल्लजीक माध्यमसँ लेखककें पठौलियनि। हुनकासँ ३.९.२००५क’ फोनपर गप सेहो भेल। ओ हमर समीक्षा पढ़िक’ आ सूनिक’ कहलनि, ‘हमरा पुरस्कार भेटि गेल।’ जगन्नाथ धामक दर्शन : ८ जुलाइ २००५ क’ करीब ३४ बरखक बाद प्राचीक शब्द सुनलहुँ।काठमांडूमे एकटा गीतक पोथी (गीतक फुलवारी)मे हमर गीत सभ देखलनि।बड़ौदामे रहै जाइ छथि। इंजिनियर पति अधिक काल विदेशमे रहैत छथिन। हुनक प्रथम विवाहक एकटा बालक आइ आइ टी क’क’ हिन्दुस्तान लीवरमे शिकागोमे छथिन, अविवाहित छथिन। इंजिनियर कल्याणी विवाहित छथिन। किछु दिनक बाद हुनक पति झाजीसँ सेहो गप भेल। पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार प्राची १७.०९.२००५ क’ १२.१५ बजे रायपुर जंक्शनपर उतरलीह। संगक यात्री सभ सामान उतारि देलकनि। कपारपर त्रिपुण्ड चानन, बाँहिमे रुद्राक्ष,केसरिया रंगक वस्त्रमे नीक लगलीह प्राची। दू पुत्री आ एक पुत्रक माए प्राची, भगवानक भक्तिक रंगमे रंगल प्राची। जेठ पुत्री नन्दिनी विशाखापतनममे कोनो बैंकमे काज करैत छथिन। रायपुरसँ पुरी होइत विशाखापतनम जेबाक छनि। आठटा ज्योतिर्लिंग दर्शन भ’ गेल छनि। कखनो अयोध्या, कहियो नीलकंठ घुमैत रहैत छथि। मैथिली सेहो स्टेशन गेल छलीह। बड़ी राति धरि सभ गोटे गपमे बाझल रहलहुँ। ४ बजे भोरे उठि स्नान आदि कए पूजापर बैसि गेलीह। रवि दिन रहै। १० बजेसँ हुनक पुत्री रागिनीक भरत नाट्यमक कार्यक्रम सी डी प्लेयरक सहायतासँ देखै गेलहुँ। प्राचीक संगमे बड़का झोड़ा छलनि जाहिमे पूजा-पाठक बहुत सामानक संग एकटा हरमुनियाँ सेहो छलनि, ओहिपर गीत गाबि क’ सेहो सुनौलनि। दोसर दिन मौनमे रहलीह भरि दिन। ऑफिससँ एलहुँ तकर बाद साँझमे बाजब शुरू केलनि आ २.३० बजे राति धरि गप होइते रहल। २०क’ स्नान कए पूजा पर छलीह त हमरो सभकें अपन पुरी यात्रामे संग चलबाक आग्रह केलनि। दिव्यताक तेहेन आकर्षण प्राचीमे विद्यमान छलनि जे किछुए घंटामे आकर्षणक केन्द्र भ’ गेल छलीह। एकटा पत्रकार सेहो आबिक’ साक्षात्कार आ फोटो लेलकनि। हमरा डी.जी.एम. साहेब धमतरी शाखा कोनो काजसँ किछु दिन लेल जेबाक हेतु कहने छलाह, हम प्राचीकें कहलियनि जे हमरा दोसर ठाम ऑफिसक काजसँ जेबाक अछि। प्राची कहलनि,अहाँ फोन करियौ, छुट्टी भेटि जाएत। हम वरिष्ठ प्रबंधक,कार्मिककें फोन केलियनि, ओ कहलनि अहाँ जा सकैत छी,हम कोशिश करब जे अहाँकें धमतरी नै जाए पड़ए।हमरा जे काज असंभव लगैत छल से एते आसान कोना भ’ गेलै, पता नहि।एहिमे प्राचीक पूजा-पाठक अथवा विचार-तरंगक कतेक योगदान छल से नहि बूझि सकलहुँ। ट्रेनमे आरक्षण नै भेल। प्राची कहलनि,कोनो बात नै, हमर एकटा टिकट अछि, ट्रेनमे जगह भेटि जाएत। हम सभ हुनका आग्रहपर ट्रेनमे चढ़ि त गेलहुँ, मुदा डर रह्य जे बर्थ नै भेटत त कोना जाएब। मुदा प्राचीक भेष-भूषाक कमाल छल जे बिना कोनो पूर्व तैयारीके हम सभ आरामसँ पुरी पहुँचि गेलहुँ। पूरीसँ पहिने एकटा पंडाजीसँ गपक’क’ प्राची ओत’रहबाक, आरती देखबाक, दर्शन, प्रसाद,बिना प्याज-लहसुनके भोजन आदिक व्यवस्था सुनिश्चित क’ लेलनि। नरेन्द्र कोना लग स्वस्तिक लॉजमे रहबाक व्यवस्था भेल। दोसर दिन बससँ कए ठाम घूमै गेलहुँ। तेसर दिन भोरे उठि स्नान आदिक बाद मन्दिर जाक’ आरती देखलहुँ,लगसँ जगन्नाथ भगवान,सुभद्रा माता आ बल्ररामजीक दर्शन भेल। ९.३० बजे नीलांचल एक्सप्रेससँ खुरदा स्टेशन गेलहुँ। मठ होटलमे बिना प्याज-लहसुनक भोजन नीक लागल। बच्ची ओहि दिन खीरा खाक’ रहलीह। ८ बजे रातिमे प्राची विशाखापतनम लेल ट्रेन पकड़लनि। हम सभ बिलासपुर बला गाड़ी पकड़ि २४ क’ रायपुर पहुचि गेलहुँ। हम त एक बेर पुरी गेल रही, बच्ची नै गेल छलीह। भरिसक हुनके लेल इ यात्राक अकस्मात आयोजन भेल। अस्तित्वक लेल कखनो कोनो आयोजन असंभव नहि छैक। प्राची कहने छलीह आब अहाँ अपन पुत्र आ दोसर पुत्रीक विवाहक चिन्ता छोड़ि दिय’ किन्तु से कहाँ भेल। बादमे चारि-पाँच बरख पहिने सेहो संपर्क केने रहथि,मुदा तकर बाद कए बरखसँ संपर्क नहि अछि। की पता कोन स्थितिमे छथि प्राची, कोना छथिन झाजी आ सभ धिया-पूता। नीकक आशा करबाक चाही। आशा करैत छी सभ गोटे जत’ छथि, नीके छथि,जहिया भेटतीह, प्रसन्न देखबनि। रायपुरसँ जबलपुर : रायपुरमे चारि बरख आ आंचलिक कार्यालयमे लगभग तीन बरख भ’ गेल छल। हमर स्थानान्तरणक समय आबि गेल छल। हमरा जबलपुरमे मिलौनीगंज शाखा अथवा अग्रणी बैंक कार्यालय दुनूमे एकटा चुनबाक छल। शाखाक काजक अनुभव त भेल छल, अग्रणी बैंक अधिकारीक काजक व्यावहारिक अनुभव नहि छल। एकटामे शाखाक जमा-अग्रिम-लाभक लक्ष्यक पूर्ति सुनिश्चित करबाक काज दोसरमे वार्षिक साख योजना तैयार करब, जिलास्तरीय समीक्षा बैसक सबहक आयोजन करब, प्रखण्ड स्तरीय बैसक सभमे भाग लेब, सभ बैंक आ जिला कलेक्टरक बीच समन्वय सुनिश्चित करैत विभिन्न योजना अंतर्गत जिलाक लक्ष्य प्राप्तिमे बाधा दूर करबाय लक्ष्य प्राप्ति सुनिश्चित करब आदि कार्य। संयोगसँ जबलपुर अग्रणी बैंक प्रबंधकक विरुद्ध जबलपुरक बहुत गोटेक शिकायतक प्रति आंचलिक कार्यालयमे आएल छल से देखि हमरा ई अनुमान भेल जे जबलपुरमे ई पद झंझटिया अछि। आंचलिक कार्यालयमे एकटा पूर्व परिचित अधिकारी छलाह मिश्र जी। ओ कहलनि जे एक शाखाको अपने हिसाब से चलाना आसान होगा, जिले के सभी बैंकों का संयोजन जबलपुरमे कठिन होगा। हमरा हुनक सलाह ठीक लागल। हम मिलौनीगंज शाखाक वरिष्ठ प्रबंधकक पद चुनि लेलहुँ। ई पद कतेक झंझटिया सिद्ध हएत से त बहुत बादमे पता चलल। जबलपुर स्थित मिलौनीगंज शाखामे २४.११.२००५ क’ वरिष्ठ प्रबंधकक पद भार ग्रहण करबाक लेल आंचलिक कार्यालयसँ भारमुक्त भेलहुँ। एहि अवधिमे वसन्त एम.लिब.क’ नेने छलीह, मैथिली बी.एस.सी.क’क’ पी.जी.डी.सी.ए. केलनि, एम. बी.ए. करबाक तैयारी क’ रहल छलीह। विवेक भोपालक एन आर आइ इंस्टिट्यूटसँ कंप्यूटर साइंसमे इंजीनियरिंग केलनि। धिया-पूताक शिक्षाक लेल त हमर सक्रियता रहल किन्तु आत्मनिर्भरताक लेल सेहो आरम्भसँ ध्यान रखबाक दिशामे हम उचित व्यवस्था नहि सुनिश्चित क’ सकलहुँ, एकर परिणाम धिया-पूताकें भोग’ पड़लै। हमरा लगैत अछि, हम जे क’ सकलहुँ से हमर सीमा छल। सभकें आँखिसँ देखैत छिऐक हमरा ईहो एकटा उपलब्धि लगैत अछि, ओहिसँ बेशी जे किछु देखैत छी तकरा अस्तित्वक प्रसाद बुझैत छी। पटना / १४.०२.२०२२ (२६) मिलौनीगंजसँ गोरखपुर धरि २४.११.२००५ क’ हम जबलपुर स्थित मिलौनीगंज शाखामे कार्य- भार ग्रहण केलहुँ। पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक पी.जी.कांगे दू दिन पहिने भारमुक्त भ’क’ चलि गेल छलाह। शाखामे दूटा सहायक प्रबन्धक(कर्ण जी आ गोपालजी ) एकटा प्रधान खजांची(वीरेंद्र सिंह),तीनटा सी.टी.ओ.( रीना चक्रवर्ती,प्रतिभा पटेल आ अनीता जाधव )आ कुशल सिंह राठौर सहित तीनटा अधीनस्थ कर्मचारी छलाह। गोपालजीक स्थानान्तरणक बाद बी.पी.पटेल, प्रबंधकक पदपर एलाह आ कर्णजीक स्थानपर आर.के.कपूर एलाह।कर्णजी बिहारेक छलाह, पटेलजीक घर जबलपुरसँ किछुए दूर छलनि।कपूरजीक घर जबलपुरमे छलनि।सी टी ओ सभ सेहो जबलपुरमे रहैत छलीह। शाखा बजारक बीच प्रथम तलपर छलैक। क्षेत्रीय कार्यालय गेलहुँ। गोरखपुरमे छलै। चाहर साहेब (क्षेत्रीय प्रबंधक), जैन साहेब (सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक) और अन्य अधिकारी ओझाजी,नन्देश्वरजी,वर्माजी,चमोली जी,अनिल सिन्हा सभ गोटेसँ भेंट भेल। ओझाजी हमर पूर्व परिचित अधिकारी छलाह। सदर बाजार रायपुर शाखासँ स्थानान्तरित भ’ क’ आएल छलाह। जबलपुरमे बैंकक अन्य शाखा सभ छलै नेपियर टाउन, गढ़ा, सिटी,एम.आइ.सी.आइ.,एम.पी.एच.बी.गोकलपुर,बिलहरी आदि। समय-समयपर समीक्षा बैसकमे सभ शाखा प्रबंधक एक ठाम जमा होइत छलाह। पन्द्रह अगस्त आ छब्बीस जनवरीक’ क्षेत्रीय कार्यालयमे सभ शाखाक प्रबंधक आ अन्य अधिकारी-कर्मचारी सभ सेहो जमा होइत छलाह आ झंडोत्तोलनमे भाग लैत छलाह। आवास व्यवस्था : हम एसगर पन्द्रह दिन रसल चौक लग होटल समदरियामे रहलहुँ। दिनमे भोजन मिलौनीगंज लग कोनो होटलमे आ रातिमे होटल समदरियामे अथवा पंचवटीमे करैत छलहुँ। बादमे दमोह नाका लग शान्तिनगरमे एक कोठलीक एकटा डेरा लेलहुँ। ई डेरा बैंकक गढ़ा शाखाक प्रबन्धक अग्रवाल साहेबक बहिन-बहिनोक छलनि। परिवार रायपुरमे छल,हमरा एसगर जाधरि रहबाक छल, ताधरि अही आवासमे रहलहुँ। बादमे विजयनगरमे परिवारक संग रह’ लेल एकटा घर भेटल। ओ घर भारतीय स्टेट बैंकक सदस्य ओम राज बुलबुलक छलनि। ओ डुप्लेक्स छलैक। जबलपुरमे जाधरि रहलहुँ ओही घरमे रहलहुँ। ओहि ठाम कनिए दूरपर महादेवक एकटा विशाल मूर्ति छनि। कहियोक’ ओहि ठाम जाइत छलहुँ, नीक लगैत छल। ओहि घरसँ किछु दूरपर हमरा शाखाक प्रधान खजांची वीरेंद्र सिंह जीक अपन घर छलनि। एसगर छलहुँ त ओ अधिक काल अपने ओत’ भोजन करा दैत छलाह, होटल नै जाए दैत छलाह।भोजनक बदला कोनहुँ रूपमे हम हुनका उपकृत कर’ चाहलहुँ त ओ विनम्रताक संग अस्वीकार क’ देलनि। प्रथमेशक जन्म : रायपुरमे पाण्डेय नर्सिंग होममे २००६ मे २४ जनवरीक’ वसन्त भर्ती भेलीह। २६ क’ ५ बाजिक’ एक मिनटपर सांझमे प्रथमेशक जन्म भेलनि। हम जबलपुरमे रही। ओहि समय रायपुरमे प्रफुल्लजी आ हुनक पत्नी आवश्यकतानुसार उपस्थितिसँ सहायता केलखिन। ३१ जनवरीक’ बच्चाक छठिहार भेलै। हमहूँ जबलपुरसँ रायपुर पहुचलहुँ। जमाए मुंबइसँ एलाह। विवेक भोपालसँ एलाह। ओहि अवसरपर ओझाजीक खर्चसँ आ प्रफुल्लजीक निदेशनमे आवासक छतपर भोजक आयोजन भेल जाहिमे ५२ गोटे सम्मिलित भेलाह। वसन्तक द्विरागमन : हमरा पुत्रीक द्विरागमनक अवसरपर गाम जेबाक लेल अवकाश स्वीकृत नहि भेल। हम नहि जा सकलहुँ। विवेक शेष सभ गोटेक संग गाम गेलाह। हमर अनुज रतनजी गाममे छलाह। हुनका किछु पाइ पठा देलियनि, ओ फर्नीचर आदिक व्यवस्था क’ नेने छलाह। हम मास्टर साहेब (अपन छोट सार ) कें कहलियनि जे आवश्यतानुसार किछु पाइ उपलब्ध करा देथिन, बादमे प्रतिपूर्ति भ’ जेतनि। ओ सहयोग केलखिन। हमरा मोबाइलसँ संपर्क होइत छल। जेना-तेना ६ मार्चक’ वसन्त प्रथमेशक संग सासुर गेलीह। संगमे विवेक गेलखिन। मैथिलीक स्थिति : मैथिली जबलपुरक शाम्भवी कॉलेजसँ बी.एड. केलनि। एम. बी. ए. करबाक लेल भोपालमे मैट(MAT) मे सम्मिलित भेलीह। बैंकसँ ऋण स्वीकृत करौलहुँ। संग गेलहुँ। पुणेमे आइ.बी.एस.ए.आर मे २००७-२००९ सत्रमे नामांकन भेलनि। विवेकक स्थिति : विवेक कंप्यूटर साइंसमे इंजीनियरिंग केलाक बाद सी-डैक कोर्स केलनि। मुंबईमे वेब एक्सेस कम्पनीमे सेलेक्शन भेलनि। नोकरीसँ पहिने जबलपुर एलाह।ओही राति पेटमे बहुत दर्द भेलनि, बेचैन भ’ गेलाह। एकटा नर्सिंग होम ल’ गेलियनि, किछु दबाइसँ तत्काल दर्द बंद भेलनि, मुदा आइ वी यू जाँचसँ पता चललै जे युरेटर आ ब्लैडर के जॉइंट पर ७ mm के स्टोन छनि। डॉक्टर ऑपरेशनक सलाह देलनि। दिल्लीसँ हमर बहिन आ भागिन दिल्लीक एकटा होमियोपैथ डा.डोगरासँ सम्पर्क करबाक सलाह देलनि, सम्पर्क नम्बर देलनि आ फोनपर सलाह ल’क’ दबाइ लेब’ कहलनि। सैह केलहुँ। ऑपरेशन नहि भेलनि। फोनपर डॉक्टर डोगरासँ संपर्क भेल। डॉक्टर साहेब पुछ्लनि लड़का पतला है कि मोटा, स्टोन बाएं साइडमे है कि दाएं साइडमे, सभ विवरण देलियनि। दबाइ सबहक नाम लिखा देलनि : (१)licopodium ३० (liquid) (२ ) Ocimum Can -३० दुनूक पांच-पांच बूंद आधा कप पानिमे मिलाक’ दिनमे चारि बेर दस दिन तक देबा लेल कहलनि। दस दिनक बाद Epigea mother tincture दस दिन देबा लेल कहलनि। भात बंद करबाक सलाह देलनि आ प्रतिदिन पानि कम-सँ-कम २-३ लीटर देब’ कहलनि। एक सप्ताहमे प्रगतिक सूचना देब’ कहलनि। जबलपुरक दोकानसँ दबाइ कीनिक’ देब’ लगलियनि। लाभ भेलनि। बादमे दू टा दबाइ (१)licopodium ३० (liquid) (२ ) Ocimum Can -३० और पन्द्रह दिन देब’ कहलनि, सेहो लेलनि। स्वस्थ भेलाह। मुंबई जाक’ वेब एक्सेसमे नोकरी शुरू केलनि। नोकरी अन्धेरीमे छलनि। ओत’ लगमे कतहु डेरा नहि भेटलनि। नवी मुंबइमे कोपरखैरना स्थित बहिन-बहिनोक डेरासँ भोरे जाइ छलाह, जाएमे तीन घंटा लगैत छलनि रातिमे दस बजे घुरैत छलाह। ई जाएब-आएब ततेक कष्टप्रद भेलनि जे तीनो मास नोकरी नहि क’ सकलाह। ओ नोकरी छोडिक’ लगमे दोसर कोनो नोकरी ताक’ लगलाह। बादमे किछु अवधि धरि एकटा पॉलिटेक्निक कॉलेजमे आ तकर बाद ओतहि एकटा इंजीनियरिंग कॉलेजमे अध्यापनक काज केलनि। ललनजीक स्थिति : ललनजी दिल्लीमे आजादपुर सब्जी मंडीमे नोकरी करैत छलाह। पत्नी, पुत्री रश्मि आ पुत्र शुभमक संग रहैत छलाह। रतनजीक स्थिति : सबसँ छोट भाए रतनजी २८.०२.२००७ क’ मिडिल स्कूल,बेलाही (जिला मधुबनी) मे शिक्षकक नोकरी शुरू केलनि। दू टा पुत्र ऋतुराज आ धनञ्जय आ पत्नीक संग गाममे रहैत छलाह। किछु मास साइकिलसँ गामसँ स्कूल जाइत छलाह। बहुत बादमे एकटा मोटर साइकिल लेलनि। रोग-शोक-संताप : दिनकर जीक ‘उर्वशी’मे एक ठाम अछि : ‘रोग-शोक-संताप धरा पर आते ही रहते हैं पृथ्वी के प्राणी विषाद नित पाते ही रहते हैं।’ भरिसके कोनो परिवार एकर अपवाद हुए। हमहूँ सभ एकर अपवाद नहि छलहुँ। अपने दाँतक पीड़ा जखन-तखन भोगैत छलहुँ। दहिना गालपर मसुबृद्धि जकाँ भेल। दाढ़ी बनबैत काल बेर-बेर कटि जाइत छल, खून बह’ लगैत छल। दबाइसँ ठीक नै भेल। बादमे एक बेर गाम गेलहुँ त रतनजी कहलनि जे गाममे ककरो भेल छलै आ ठीक भ’ गेलै। ओ जेना कहलनि तहिना जरैत अगरबत्ती ल’क’ दू-तीन दिन ओइमे सटा देलिऐ। ओ मसुबृद्धि अलोपित भ’ गेल।फेर कहियो नै भेल। पत्नी उच्च रक्त चापसँ पीड़ित छलीह। अधिक काल डॉक्टरक संपर्कमे जाए पड़ैत छल। जबलपुरमे डा. बहरानीक इलाजसँ लाभ भेलनि। पुत्र थोड़े दिन पथरीक उपचारमे बाझल छलाह। २००७ मे हमर ससुर सेहो कोनो बिमारीक चपेटमे पड़लाह आ ५ अप्रैलक’ हुनक देहान्त भ’ गेलनि। एहिसँ भारी दुखक बात ई भेलै जे हमर छोट सार मास्टर साहेबक छोट बालक आशुतोषकें कष्ट भेलनि। पहिने संदेहपर बबासीरक दबाइ करौलनि, बहुत बादमे कैंसरक पहचान भेलनि। मुंबइ टाटा मेमोरियल अस्पताल गेलाह, मुदा लाभ नहि भेलनि, बादमे पटना आबि किछु दिन इलाजमे रहलाह, गाम गेलाह आ ओही साल अक्टूबरक अन्तमे हुनकहु देहान्त भ’ गेलनि। हुनक देहावसान हुनक परिवार आ शुभचिंतक लोकनिक लेल बज्रपातसँ कम नहि छल। हुनक पिता एतेक प्रभावित भेलाह जे बहुत कष्टकर स्थितिमे मोनकें चौदह बरख धरि कहुनाक’ घिसियबैत रहलाह। आशुतोष अपन बुद्धि-व्यवहारसँ ह्मरहु सभकें अपन प्रशंसक बना नेने छलाह। हुनक देहावसान ह्मरहु सभकें बहुत व्यथित केलक। हमर पत्नीक स्वास्थ्यपर सेहो एहि दुनू देहान्तक असरि पड़लनि। दुखक बात ई छलै जे हम सभ फोनेपर संवेदना व्यक्त क’ सकैत छलहुँ,ओत’ उपस्थित हएब संभव नहि भ’ सकल कारण हमर प्रबंधन हमरा कोनो स्थितिमे तीन दिन सँ अधिक अवकाशमे रहबाक अनुमति देबाक लेल तैयार नहि छल आ हमर पत्नी एसगर यात्रा करबाक लेल तैयार नहि छलीह। हमर जीवनलेल नोकरी परम आवश्यक छल आ ताहिलेल प्रबंधनक आदेशक पालन करब आवश्यक छल, तें हम अपना लेल ई अनुशासन सुनिश्चित केलहुँ जे आब ओतहि जाएब जाहि ठाम हमर जाएब अनिवार्य होइ। हम बेटीक द्विरागमनमे गाम नहि जा सकलहुँ। जेठ सारक पौत्रक उपनयनमे सासुर नै जा सकलहुँ। हमर साढ़ूक पौत्रीक विवाह भेलनि जमशेदपुरमे, हम नहि गेलहुँ। गाममे भातिजक मूड़न आ यमसम गाममे भागिनक विवाहमे नै गेलहुँ। ससुरक श्राद्ध-कर्मक समय सासुर नहि गेलहुँ। आशुतोषकें मुंबइमे टाटा मेमोरियल अस्पतालमे देखने रहियनि, ओत’सँ घुरैत काल जबलपुर स्टेशनपर भेंट केने रहियनि,फोनसँ संपर्क करैत छलहुँ, मुदा हुनक देहान्त भेलापर संवेदना प्रगट करबाक लेल सासुर नहि गेलहुँ। बच्चीकें एसगर जेबाक साहस नहि भेलनि, तें ईहो नहि गेलीह। बिहाड़िक बाद : समधियानमे नातिक मूड़नमे आ मैथिलीक विवाहक प्रसंगमे जमशेदपुर जाएब अनिवार्य भेल त गेलहुँ। २००८ मे १८ अप्रैलक’ राघोपुरमे नाति प्रथमेशक मूड़नक अवसरपर हम दूनू गोटे १७ क’ गाम पहुँचलहुँ, १८ क’ हम भातिज विकासक संग राघोपुर गेलहुँ, १९ क’ ओत’सँ गाम पहुँचि बहिन सबहक सासुर लखनपट्टी, शिशवा घूमिक’ गाम पहुँचलहुँ। २० क’ गामसँ विदा भ क’ हम दुनू गोटे मधुबनी स्टेशनपर ‘गंगासागर एक्सप्रेस’ पकड़ि आसनसोल होइत २१ क’ टाटानगर पहुँचलहुँ। ओत’ साढ़ूपुत्र सरोजक आवासपर रहलहुँ। मैथिलीक विवाहक प्रसंगमे एकठाम संपर्क करबाक उद्देश्यसँ पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार ओत’ गेल रही। सरोजक संग टाटा स्टील ऑफिसमे प्रशांतजीसँ भेंट केलहुँ, हुनक आवासपर हुनक पिताजीसँ सेहो संपर्क कएल। २२ क’ जुबली पार्कमे पुनः कुमरजीसँ गप-सप भेल आ २३ क’ हम सभ जमशेदपुरसँ प्रस्थान कय २४ क’ जबलपुर पहुचै गेलहुँ। नोकरीक दुख-सुख : हम जबलपुरमे बहुत झंझटसँ बचबाक लेल एकटा शाखाक वरिष्ठ प्रबंधकक पद चुनने रही। मुदा जाही डरे भीन भेलौं सैह पड़ल बखरा बला स्थिति भ’ गेल। शाखाक मुख्य काज छलै जमा, अग्रिममे बृद्धि आ एन पी ए मे कमी करबाक लक्ष्य पूर्ण करब। जाहि ऋण खातामे ऋणक किश्त जमा नहि होइत छैक तकरा एन. पी. ए. ( नन परर्फोर्मिंग एसेट माने गैर-निष्पादित आस्ति ) कहल जाइ छै।जे खाता सभ एन पी ए भ’ गेल छलै, ताहिमे वसूली आ जे खाता नव छै तकरा एन पी ए हेबासँ बचयबाक काज आसान नहि होइत छै। ई काज बहुत सावधानी,समय आ समर्पण मंगैत छैक। शाखामे सेहो एहेन खाता सभ छलै आ बहुत ठामसँ जे कपट आ धोखाधडीक समाचार प्रकाशमे अबैत छलैक से आतंकित करैत छल। सभ ठाम सभ समाजमे नीक आ अधलाह दुनू तरहक लोक रहैत छथि, ऋण लेबाक समयमे सभ कियो बहुत शालीनता देखबैत छलाह, किन्तु एक साल बाद हुनक असली रूप प्रगट होइत छलनि। किछु लोक एहनो होइ छथि जे आकस्मिक विकट परिस्थितिक कारण समयपर ऋणक वापसी करबामे असमर्थ भ’ जाइत छथि।किछु लोक समयपर बैंकक ऋण-क़िस्त जमा करैत अपन उन्नति करबाक प्रयास करैत छथि। विभिन्न योजनामे लक्ष्य प्राप्त करब आवश्यक छलैक, किन्तु कपट आ धोखाधड़ीसँ बचब सेहो आवश्यक छलैक तें बैंकक दिशा-निर्देशक पालन सुनिश्चित करब अनिवार्य छलै। एतहु हम निश्चित केलहुँ जे बैंकक दिशा-निर्देशक पालन करब, कखनहुँ ककरो दबाबमे कोनो निर्णय नहि लेब, अपन पवित्रता बचाक’ राखब आ ककरो कटु वचन नहि कहब। कोनो प्रस्तावपर शीघ्र निर्णय लेबाक आदति छल। आवश्यकतानुसार जाँच-पड़तालमे कोनो अधिकारीक संग अपनहुँ संलग्न होइत छलहुँ।अवकाश दिन सेहो बैंकक काजमे लगबैत छलहुँ। एतेक समय आ सावधानीमे तनाव सेहो अनुभव करैत छलहुँ। तनावसँ मुक्तिक उपाय साहित्यमे तकैत छलहुँ। ओहि समयमे बाबा रामदेवक जबलपुर आगमनसँ हमहूँ लाभान्वित भेलहुँ। भिलाइसँ हमर साढ़ूक पुत्री वीणा आ जमाए मिश्र जी आएल छलाह योग-शिविरमे भाग लेबाक हेतु। हमहूँ सभ शामिल भ’ गेलहुँ। चारि बजे भोरसँ सात बजे धरि होइत छलै, तें बैंकसँ छुट्टी लेबाक काज नै पड़ल। २००६ के नवम्बरमे २५ सँ ३० धरि शिविर चललै। ओहि शिविरमे भाग लेबाक बाद भोरे उठबाक, आसन-प्राणायाम करबाक तेहेन अभ्यास लागल जे संकल्प-शक्ति दृढ़ भ’ गेल आ आत्मबल और मजबूत भेल। एहिसँ बड़का लाभ ई भेल जे कतेक बरखसँ कखनो–कखनो तमाकुल लेबाक अभ्यास छल, से सभ दिन लेल छुटि गेल। कहियो-कहियो अशाकाहारी भोजन क’ लैत छलहुँ, सेहो दुनू गोटेक छुटि गेल। सबेरे ३० मिनटमे ९०० बेर कपालभाति आ १०० बेर अनुलोम-बिलोम करय लगलहुँ। सूर्य नमस्कार सेहो करैत छलहुँ। एकर नीक असरि स्वास्थ्यपर पड़ल। जे नीक अभ्यास सभ लागल से एखनो अछि आ सभ परिस्थितिमे अपनाकें संतुलित रखबामे सहयोग करैत आबि रहल अछि। बाबा रामदेव आसन-प्राणायाम सिखबैत-सिखबैत नैतिक, शारीरिक आ मानसिक अनुशासनक लेल यम आ नियमक जे पाठ पढबैत छलाह, से अद्भुत छल। यमक अंतर्गत अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह आ नियमक अन्तर्गत शौच,सन्तोष,तप,स्वाध्याय,ईश्वर-प्राणिधानक हुनक व्याख्या प्रशंसनीय छल। उपनयनक समय भोजक स्थानपर जँ एहि ज्ञान दिस ध्यान देल जाए त समाज आ देशमे अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन भ’ सकैत अछि। बच्ची ओही साल अगस्तमे २१ सँ २७ धरि ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’क कार्यक्रममे भाग नेने छलीह,मुदा हिनका ओहिसँ कोनो लाभ नहि भेल छलनि। ऋण-वसूली कथा : जाहि ऋण-खातामे समयपर किश्त जमा हएब बंद भ’ जाइत छैक तकरा गैर निष्पादक आस्ति ( Non-performing Asset ) कहल जाइत छैक। एहि तरहक खाताबला लोक सभ दू तरहक होइत छथि : किछु लोक एहि तरहक होइत छथि जे किछु परिस्थितिक कारण ऋणक किश्त जमा करबामे असमर्थ भ’ जाइत छथि आ किछु एहन होइत छथि जे लाचार नहि रहैत छथि अथवा ई बूझल जाए जे ओ जानि-बूझिक’ किश्त नै जमा करैत छथि। किछु ऋणक खातेदारक लगमे कोनो संपत्ति नै रहैत छनि जाहिकें जप्त क’क’ आ बेचिक असूली क’ लेल जाए, किछु लोक लग संपत्ति रहै छनि जाहिसँ ऋणक असूली क’ लेल जाए। सभ तरहक स्थितिक लेल अलग-अलग प्रक्रियाक विधान छैक। शाखामे एहि तरहक खातामे बृद्धिसँ बैंकक लाभमे कमी अबैत छैक। तें एहि तरहक खाता बैंकक लेल चिंताक विषय होइत छैक, ओहि खातामे वसूली करबाक लेल बैंक द्वारा समय-समयपर विभिन्न उपाय करबाक लेल निर्देश देल गेल छैक। एकरा अंतर्गत सम्बंधित खातेदारकें नोटिस पठाएब, व्यक्तिगत रूपसँ सम्पर्क करब आ एहि सभसँ काज नै चलै त कानूनी प्रक्रियाक पालन सुनिश्चित करबाक नियम छै। कानूनी प्रक्रियामे लोक मांग वसूली एक्टक अन्तर्गत तहसीलदार कार्यालयमे सम्बंधित खातेदारक आवश्यक विवरणक संग प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करब आ विशेष स्थितिमे अधिवक्ताक सलाहसँ न्यायालयमे मोकदिमा दायर करब अबैत छैक। लोक मांग असूली अधिनियमक अंतर्गत सम्बंधित तहसीलदार राजस्व वसूली अधिकारी होइत छथि। शासकीय नियमानुसार तहसीदार कार्यालयमे विभिन्न बैंकसँ प्राप्त केसमे वसूलीक लेल नोटिस जारी करब आ साधारण प्रयाससँ काज नै चलै त असूलीक लेल कठोर उपाय कएल जाइत अछि। समय-समयपर बैंक अधिकारी सबहक संग तहसीलदार साहेबक बैसक आयोजित होइत अछि। तहसीलदार लोकनिकें सेहो बैंक ऋण वसूलीक लक्ष्य देल जाइत छनि, जिला स्तरपर एकर समीक्षा सेहो होइत छैक। तहसीलदार साहेब सब कोनो चूककर्ताक संग वसूलीक लेल कठोर कारबाइ करबाकाल स्थानीय प्रभावशाली लोक सभसँ बचबाक प्रयास करैत छथि। एक बेर हमरा शाखाक एकटा एहेन चूककर्ताकें चुनलनि जे कते बरखसँ ऋण नै जमा करैत छलाह। शाखासँ हुनका कयटा नोटिस देल गेल छलनि, ओ कोनो संतोषजनक जबाब नै दैत छलाह। हुनक दबाइक दोकान खूब चलै छलनि, बैंकक अधिकारी तगादामे जाइत छलाह त किछु कहिक’ घुरा दैत छलखिन। हम स्वयं एक बेर गेलहुँ, मुदा कोनो लाभ नै भेल। तहसीलदार साहेबकें कहलियनि। ओ कहलनि, अहाँ सभ दूटा ताला आ जीपक व्यवस्था केने रहू, हम जखन फोन करी त जल्दी आबि जाएब ताला ल’ क’। हम सभ से व्यवस्था केलहुँ। किछु दिनक बाद एक दिन ओ फोन केलनि। हम एकटा अधिकारीक संग जीपसँ गेलहुँ ताला ल’क’। तहसीलदार किछु सिपाही सबहक संग दोसर जीपसँ विदा भेलाह। ओहि दोकान पर सभ सिपाहीक संग पहुँचिक’ दोकानपर जे स्टाफ छलाह सभकें बाहर क’क’ दोकानमे ताला लगाक’ दोकानके सील क’ क’ ओत’सँ बहुत तेजीसँ निकलि गेलाह। बादमे एकटा प्रभावशाली व्यक्तिक नाम कहलनि जे ओ हबाइ जहाजसँ कतहु निकलि गेलाह,तें एहि कार्यवाहीक लेल ई उपयुक्त समय छल। साँझमे बैंक बन्द भेलाक बाद हम सभ अपन-अपन डेरा चल गेल रही। हमरा फोन आयल, हम पाइ एखन जमा कर’ चाहैत छी, हमरा दबाइ दोकान बंद भेलासँ बहुत नोकसान हएत, कृपया पाइ जमा करबा लेल जाए। हम कहलियनि जे हमरा संगमे खजानाक कुंजी नहि रहैत अछि, जिनका संग छनि ओ काल्हि दस बजे भेंट हेताह, काल्हि दस बजे आबि जाउ,सभसँ पहिने अहींक काज कएल जाएत। दोसर दिन ओ बैंक आबि सभटा बकाया जमा क’ क’ बैंकसँ अदायगीक रसीद ल’क’ तहसीलदार साहेब कें देखाक’ अपन दोकानक सील हटबौलनि। एहि तरहें कए बरखसँ बाँकी राशिक असूली भ’ गेल। एकटा दोसर तहसीलदार एलाह जे दोसर तरहक प्रयोग केलनि। ओ सभ बैंकसँ किछु एहेन चूककर्ता सबहक सूची तैयार करबौलनि जिनका लग दोकान अथवा दोसर चल संपत्ति छलनि। ओ एहि सूचीकें अखबारमे प्रकाशित करबा देलनि। प्रकाशित सूचीमे हमरा शाखाक एकटा एहेन चूककर्ताक नाम छलनि जिनकर नीक दोकान छलनि आ हुनकर दूर धरि पहुँच सेहो छलनि। सबेरेसँ फोन आब’ लागल। हमरा आएल, हमरा क्षेत्रीय प्रबंधक कें एलनि। अखबारमे चूककर्तामे नाम प्रकाशित भेलासँ अपमानित अनुभव क’ रहल छलाह। भरिसक एकर असरि हुनका सबहक सम्बन्धी लोकनिक राजनीतिक भविष्यपर पड़ैबला लगैत छलनि। सांझमे कलेक्टर साहेब हमरा बजौलनि, हुनको लग किनको फोन प्राप्त भेल छलनि। हम एकटा अधिकारी संगे सम्बंधित फाइल ल’क’ गेलहुँ। कलेक्टर साहेब पूरा फाइल देखलनि। शाखा द्वारा कयटा नोटिस देल गेल छलनि, हम व्यक्तिगत रूपसँ सेहो संपर्क केने रहियनि। सभटा रिपोर्ट फाइलमे छलै। कलेक्टर साहेब कहलनि ‘गो अहेड’। दोसर दिन हुनका घरक एक टा सदस्य एक गोटेकें संग क’क’ एलाह, अपन परिवारक विशिष्टतासँ परिचय करौलनि, ईहो कहलनि जे हम सभ चाहितहुँ त अपन गाड़ीसँ अहाँकें ठोकर लगाक’ निकलि जैतहुँ, ककरो पतो नै चलितै, मुदा अहाँक विषयमे जे लोक सभ कहलक ताहिसँ हम सभ ओइ स्तरधरि नहि गेलहुँ।फेर ओ ऋण चुकयबाक लेल एकटा चेक देलनि आ ऋण अदायगीक प्रमाणपत्र जारी कर’ कहलनि। हम ओहि चेकक विवरण दैत अदायगीक प्रमाण पत्र द’ देलियनि। हुनका कहलियनि जे बैंक अपन ग्राहककें अपमानित करबाक उद्देश्यसँ कोनो डेग नहि उठबैत अछि,बैंक अपन ग्राहकक सुख आ समृद्धिक कामना करैत अछि, सामर्थ्य रहैत कर्जक अदायगी नहि करब पाप थीक, बैंक अपन ग्राहककें पापसँ बचयबाक प्रयास करैत अछि, हम सभ त अपन कर्तव्यक पालन मात्र करैत छी। हुनका दुनू गोटेकें चाह पियाक’ विदा केलियनि। एहि तरहें ओहि बकाया ऋणक असूली बैंककें प्राप्त भ’ गेलै। एहि तरहक कारबाइक असरि किछु और चूककर्ता लोकनिपर सेहो पड़लनि। बादमे पता लागल जे सम्बंधित तहसीलदार साहेबक बदली भ’ गेलनि। पूर्व जन्मक कर्जक अदायगी : धर्म शास्त्र कहैत अछि, जे किछु नीक-अधलाह हमरा भोग’ पड़ैत अछि,से हमरे एहि जन्मक अथवा पूर्व जन्मक कर्मक फल थिक। बहुत किछु त साफ देखाइत अछि जे अपने कर्मक फल थिक, किछु साफ-साफ नहि देखाइत अछि। शास्त्रमे हजारो बरखक अनुभवक ज्ञान अछि। शास्त्र कहैत अछि जे अज्ञान थिक सभ दुखक जड़ि। अज्ञानताक कारणे समयपर लोक उचित निर्णय नै ल’ पबैत अछि आ जे निर्णय लैत अछि से अंततः दुखमे परिवर्तित भ’ जाइत छैक। अपन कर्ममे पूर्व जन्मक संस्कारक कतेक योगदान रहैत छैक आ एहि जन्ममे घटैत घटना सभकें देखि-सूनिक’ जे अनुभव करैत अछि ताहिसँ की निर्णय लैत अछि अथवा ओहि सबहक जे असरि ओकर जीवनपर पड़ैत छैक से गम्भीर चिन्तनक विषय अछि। अपना जीवनमे एहि सबहक खोद-बेद करबाक चाही। हमरा अपनहु जीवनमे अज्ञानताक दुष्परिणामक प्रमाण भेटैत अछि। हम जखन तिरहुत कृषि महाविद्यालयमे पहिल बेर नामांकन लेलहुँ त हमरा नहि बूझल छल जे हमरा आइ.सी.ए.आर. द्वारा एक सय टाका मासिकबला छात्रवृति भेटत। हम जनैत रहितहुँ त ओ छोड़िक’ नै जैतहुँ आ हमरा पढ़ाइक लेल विवाह करब आवश्यक नै होइतय। मधुबनीमे बायोलॉजी पढबाक लेल गेलहुँ त ट्यूशन पढ़ि नेने रहितहुँ त प्रैक्टिकल मे कम-स-कम पांच अंक अवश्य बेशी आएल रहैत आ मेडिकलमे हमर नामांकन भ’ गेल रहितय। एहि पोस्टिंगक समय हम अग्रणी बैंक प्रबंधकक पदपर काज कर’ चाहितहुँ त हमरा भेटि जाइत किएक त हम आंचलिक कार्यालयमे छलहुँ आ हमरासँ पूछल गेल छल । पूर्व अग्रणी जिला प्रबंधकक विरुद्ध किछु लोकक शिकायत देखि हम डेरा गेलहुँ।मुख्य बात ई छलैक जे हमरा अग्रणी जिला प्रबंधकक पदक कार्यक जानकारीक अभाव छल। आब जत’ आएल छलहुँ ओतहु अज्ञानताक कारण एकटा गलती भ’ गेल। शाखाक एकटा नीक ग्राहक छलाह। अनाजक व्यवसाय करैत छलाह। ओ एक दिन एन.एस.सी.क विरुद्ध ऋण लेबाक लेल पुछलनि। ओ कहलनि कतेक ब्याज आदि लागत। हम कहलियनि जे ब्याज मात्र लागत, कोनो सर्विस चार्ज नै लागत। हुनक ऋण स्वीकृत भेलनि। हुनका ऋण खातामे पांच हजार सर्विस चार्ज डेबिट भ’ गेलनि। ओ अपन खाता देखलनि त परेशान भ’ गेलाह। दोसर दिन दौगल एलाह। हमरा कहलनि, हमरा रातिमे नीन नै भेल, हम एक-एकटा रुपैयाक हिसाब रखैत छी, हमरा बूझल रहैत जे पाँच हजार सर्विस चार्ज लागि जाएत त हम किन्नहु लोन नै लीतहुँ, अहाँ कहलहुँ जे नै लागत तें हम लोन लेलहुँ। हमर अधिकारी हमरा सर्कुलर देखौलनि,हम पहिने नै देखने छलिऐ। ओ कहलखिन, नियमानुसार चार्ज लागल अछि। ग्राहकक कहब रहनि जे मैनेजर साहेब पहिने नै कहने छलाह ने त हम लोन लेबे नै करितहुँ। हम परीक्षा छल। हम देखलहुँ नियमानुसार सर्विस चार्ज लागल छलनि आ हम हुनका नै कहने छलियनि जे सर्विस चार्ज लागत दूनू बात ठीक छलै। एहिमे दोखी हमहीं छलहुँ।हमर जानकारी अद्यतन नहि छल। हमरा लागल जे दोख हमर अछि,तें दण्ड हमरे भोगक चाही। हम सोचलहुँ भ’ सकैए पछिला कोनो जन्ममे हिनकासँ किछु उधार नेने हेबनि आ वापस नै केने हेबनि, आइ वापस करबाक समय आबि गेल अछि, एहिमे विलम्ब करब उचित नहि। हम पाँच हजार के चेक द’क’ हुनका चिन्तासँ मुक्त क’ देलियनि आ एकरा पूर्व जन्ममे लेल कर्जक अदायगी मानिक’ हमहूँ दुखी नै भेलहुँ आ ने हुनका प्रति मोन मे कोनो शिकायत रहल। एहेन स्थितिमे प्रसन्न रहबाक लेल चिन्तक लोकनि द्वारा देल गेल सूत्र बड काजक अछि : ‘ध’न गेल त किछु नै गेल बूझू करजा चुकता भेल’ सावधानीपूर्वक काज करबाक चाही, कोशिश करबाक चाही जे गलती नै हुअए, मुदा जँ गलती भइए जाए त परिणाम जे आबय ताहिसँ सन्तोष करबाक चाही, ओहिसँ शिक्षा ग्रहण करैत आगाँ बढ़ि जेबाक चाही, यैह त धर्मशास्त्र सभक सन्देश अछि। जे एहि सन्देशक पालन नहि करैत छथि से भारी गलती करैत छथि कारण ओहिसँ स्वास्थ्य आ चरित्रक क्षरण हेबाक संभावना बढि जाइत छैक। स्वास्थ्य आ चरित्रक क्षरण अशान्ति उत्पन्न करैत अछि। शास्त्र कहैत अछि जे मोनक शान्ति सभसँ बड़का धन थिक। जबलपुरमे मैथिल आ मैथिली : जबलपुरमे सेहो मैथिल सभ छलाह, मुदा हमरा किछुए गोटेसँ परिचय भेल। आरम्भमे जखन होटलमे रहैत रही त होटलक हेल्थ-क्लबमे अरविन्द झा नामक व्यक्तिसँ भेंट भेल। ओ नोकरी करैत छलाह। हम मैथिलीमे हुनकासँ गप कर’ चाहलहुँ। पता चलल ओ मैथिली नै बुझैत छथि। हमरा शाखामे कर्णजी मैथिल छलाह, हुनकासँ मैथिलीमे बात करबामे आनन्द अबैत छल। हुनका ओत’ कोनो बच्चाक जन्मदिनक भोजमे गेल रही, ओत’ सेहो किछु मैथिल सभ भेटलाह,गप भेल, नीक लागल। विजयनगरक आवाससँ कनिए दूरपर डी. के. झाक आवास छलनि। हुनक पुत्री आ जमाए लन्दनमे रहैत छलखिन। पुत्र सेहो लन्दन कि अमेरिकामे रहै छलखिन। झाजी पत्नीक संग लन्दन गेल छलाह। ओहि ठामक विधि-व्यवस्थाक वर्णन करैत छलाह। समय बदलि गेल छैक, हमरा सबहक भूमिक लोक लन्दन जाक’ गौरवक अनुभव करैत छथि। एक बेर कोनो अवसरपर सभ गोटे जुटल छलखिन त बहुत गोटेकें भोज खुएबाक आयोजन केने छलाह। ओहि अवसरपर किछु गोटेसँ परिचय भेल। हमर बैंक शाखामे एकटा खातेदार छलाह जय कान्त झा। हुनकासँ ज्ञात भेल जे जबलपुरक सभ मन्दिरपर एक समय मिथिलाक पंडित लोकनि छलाह, एखन कम छथि। ओहो पंडित छलाह। एक दिन कोनो अवसरपर हमरा आ डी.के.झाजी कें नोत द’ क’ बहुत विन्याससँ भोजन करौने छलाह, पुतहु सभ सेहो मिथिलेक छथिन। छठि पावनिमे ग्वारीघाटपर मैथिल लोकनिक बहुत भीड़ देखबामे अबैत छल। ओहि ठामक राजन झा आ मनीष झासँ सेहो परिचय भेल। एक बेर राजन झा जी सेहो अपना ओत’ नोत द’ क’ विलक्षण भोजन करौलनि। मैथिलीक कोनो आयोजन कतहु नहि देखलिऐ। हमहूँ अपना काजमे एतेक बाझल रहैत छलहुँ जे स्वयं कोनो आयोजन नहि करबा सकलहुँ। साहित्य पढ़ि लैत छलहुँ, किछु लिखल नहि भेल। एक बेर जमाए एकटा सी डीमे नेपालमे बनल मैथिली फिल्म अनने छलाह, से देखलहुँ। आदरणीय प्रो. गंगानंद झाजीसँ पत्राचारक क्रममे साहित्य–संसारक माधुर्य आकर्षित करैत छल। पदोन्नति-स्थानान्तरण : पदोन्नतिक लेल भेल साक्षात्कारमे सम्मिलित भेलहुँ।कार्य निष्पादन द्वारा पदोन्नतिक लेल अपन योग्यता प्रमाणित नहि क’ सकल छलहुँ, तें सफल नहि भेलहुँ। २००८ मे ३१ मार्चक’ जबलपुरक अग्रणी जिला प्रबंधक थावरानी साहेब सेवानिवृत भ’ रहल छलाह। मार्चक अंतिम सप्ताहमे हमरासँ क्षेत्रीय प्रबंधक महोदय पुछ्लनि जे हम अग्रणी जिला प्रबंधकक पदपर काज करबा लेल इच्छुक छी कि नहि, हम अपन सहमति प्रगट केलियनि। ७ अप्रैलसँ १० मई धरि जबलपुर अग्रणी बैंक कार्यालयमे अग्रणी जिला प्रबंधकक पदपर रहलहुँ। ओही अवधिमे एक सप्ताहक अवकाश भेटल जाहिमे नातिक मूड़नमे गाम आ राघोपुरक यात्रा करैत छोट पुत्रीक विवाहक प्रसंगमे एकठाम संपर्क करबा लेल जमशेदपुर गेलहुँ। जबलपुरमे अग्रणी जिला प्रबंधकक पदपर काज करैत अनुभव भेल जे मनपसन्द वस्तुक आकर्षण सेहो किछुए दिनमे समाप्त भ’ जाइत छैक। बैंक शाखा सभमे स्टाफ-शक्ति कम रहबाक कारण बैंक सभ जिला कलेक्टर आ जिला पंचायतक सी. ई. ओ.क अपेक्षाक अनुसार चलबामे असमर्थ छल तें ओ सभ बैंक सभपर खबखबाएल रहैत छलाह आ बैंक सभकें अपना वशमे करबाक लेल अग्रणी जिला प्रबन्धकक सहयोग चाहैत छलाह। बैंक प्रबंधन सभ अग्रणी जिला प्रबंधककें अपन बुझैत छलाह तें हुनकासँ अपेक्षा करैत छलाह जे बैंकक सहयोग करथि आ कलेक्टर-सी.ई.ओ.कें हाबी नै होम’ देथि। जिला बैंक प्रबन्धकक काज छलनि जे जिला प्रशासन आ बैंकक बीच मजबूत कड़ीक काज करथि आ विभिन्न शासकीय योजनाक अन्तर्गत जिलाक निर्धारित लक्ष्य प्राप्तिक हेतु दुनूक सहयोग प्राप्त करथि। कोनो योजनाक अंतर्गत प्रगतिक आंकड़ा प्राप्त करबाक लेल जिला भरिक सभ बैंक सबहक नियंत्रक कार्यालय सभसँ निरन्तर सम्पर्कक आवश्यकता होइत छैक। फोनपर संपर्क करैत रहबाक अतिरिक्त व्यक्तिगत रूपसँ सेहो संपर्क करब आवश्यक होइत छैक। ओहि समय अग्रणी जिला प्रबंधक कार्यालयकें जीप नहि उपलब्ध कराओल गेल छलैक, जिला स्तरपर समीक्षाक लेल किसान क्रेडिट कार्ड आ अन्य योजनाक अन्तर्गत बैंक सबहक प्रगतिक आंकड़ा प्राप्त करबामे मास दिनक मोटर साइकिलसँ दौड़-धूपक अनुभव कटु रहल। ओही पदपर १२ मइसँ मध्य प्रदेशक सिवनी जिलामे काज करबाक लेल १० मइक’ जबलपुर कार्यालयसँ भारमुक्त भेलहुँ। पटना / २८.०२.२०२२ (२७) बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे २००८ मे १२ मइक’ हम एसगरे जबलपुरसँ बस पकड़ि करीब तीन घंटामे सिवनी पहुचलहुँ। होटल आनन्दमे अपन संगक सामान सभ राखि बैंक गेलहुँ। एकटा पुरान मकानमे बैंक छलै। बैंक भवनक एक कातमे एकटा नमहर कोठलीमे लीड बैंक सेल छलै। लीड बैंक सेलमे एकटा कंप्यूटर, नमहर टेबुल, किछु कुर्सी,तीन टा आलमारी छलै। एकर अतिरिक्त एकटा वाहन आ ड्राइवर सेहो छलै। किछुए अवधिक बाद बैंक आ अग्रणी जिला प्रबंधक कार्यालय नवनिर्मित भवनक प्रथम तलपर स्थानांतरित भेल। ओहू भवन आरम्भेमे एकटा कोठलीमे अग्रणी बैंक कार्यालय आबि गेल। बैंकक हॉल फ़ैल छलै। बैंकमे शाखा प्रबंधक बी.एम.अग्रवाल हमर पूर्व परिचित छलाह, ओ जबलपुरक गढ़ा शाखासँ स्थानांतरित भ’ क’ गेल छलाह। शाखामे पी.ओ. अर्चना मैडम छलीह जे बिहारक छलीह, हुनकर पिता पटनामे प्राध्यापक छलखिन। दोसर अधिकारी श्रीनिवासजी छलाह। और सदस्य सभ छलाह गौतमजी,शर्माजी,राम नारायण,इमरान आदि। सिवनी मध्य प्रदेशक एकटा जिला छलै। सेन्ट्रल बैंकक रायपुर जोनक छिंदवाडा क्षेत्रमे सिवनी, बालाघाट आ छिन्द्वाडा तीन टा जिला छलैक। छिंदवाडामे अग्रणी जिला प्रबंधक छलाह विजय कुमार जे बिहारक छलाह। समय-समयपर छिंदवाड़ा क्षेत्रक सभ शाखा प्रबंधक आ तीनू अग्रणी जिला प्रबंधक छिंदवाड़ा क्षेत्रीय कार्यालयमे समीक्षा बैसकमे जमा होइत छलाह। सिवनी जिलामे सेन्ट्रल बैंकक आठ टा शाखा छलै : सिवनी, अर्री, कान्हीवाडा, छुई, केवलारी, डुंगरिया छपारा,गणेशगंज आ लखनादौन। सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडियाक आठ शाखाक अतिरिक्त निम्नलिखित बैंक सबहक ८२ टा शाखा छलै : भारतीय स्टेट बैंकक ८, बैंक ऑफ़ महाराष्ट्रक ९,यूनियन बैंक ऑफ़ इंडियाक ५,केनरा बैंकक १, इलाहाबाद बैंकक १, बैंक ऑफ़ इंडियाक १,पंजाब नेशनल बैंकक४ ,सतपुरा नर्मदा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकक २६, जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकक १६, जिला सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंकक ७,आइ सी आइ सी आइ बैंकक एकटा आ एच डी एफ सी बैंकक एकटा शाखा छलै। जिलाक लेल वार्षिक साख योजना तैयार करब, ओकरा जिला स्तरीय समन्वय समितिमे स्वीकृत कराएब, ओकर क्रियान्वयनक हेतु जिलाक सभ बैंक शाखा आ जिला प्रशासनक सहयोग प्राप्त करैत विभिन्न योजनान्तर्गत जिलाक वार्षिक लक्ष्य प्राप्त करबाक लेल जिला स्तरपर तिमाही बैसकक संयोजन करब अग्रणी जिला प्रबन्धकक मुख्य काज छलनि।एकर अतिरिक्त आवश्यकतानुसार क्षेत्रीय प्रबन्धकक सलाह अथवा आदेशसँ ऋण शिविर, वसूली,जाँच अथवा ऋण माफ़ी योजनासँ सम्बंधित कार्य सेहो समय-समयपर करबाक रहैत छलैक। आरम्भमे क्षेत्रीय प्रबंधक छलाह श्री शिवेश प्रसाद, हुनका बाद एलाह दिनेश चन्द्र आ हुनका बाद एलाह खंडेलवाल साहेब। जिला स्तरीय बैसकमे सभ बैंकक जिला अथवा क्षेत्रीय स्तरक नियन्त्रक अधिकारी, अग्रणी जिला प्रबंधक, भारतीय रिज़र्व बैंकक प्रतिनिधि,नाबार्डक प्रतिनिधि आ कलेक्टर समेत विभिन्न विभागक जिला स्तरक अधिकारी रहैत छलाह। विभिन्न योजनाक अंतर्गत विभिन्न बैंकक लक्ष्य आ उपलब्धिपर चर्चा होइत छलै। जाहि ठाम आवश्यकता होइत छलैक, कलेक्टर अथवा भारतीय रिज़र्व बैंकक प्रतिनिधि आवश्यक सलाह दैत छलाह। अग्रणी जिला प्रबंधक संयोजक आ कलेक्टर अध्यक्ष होइत छलाह। बैसकक कार्यवाही नोट कयल जाइत छल, ओकर कार्यवाही-विवरण तैयार क’क’ अग्रणी बैंक कार्यालय द्वारा विभिन्न बैंकक नियंत्रक कार्यालय आ विभिन्न शासकीय कार्यालयकें प्रेषित कयल जाइत छलै। बैसकमे लेल गेल निर्णयक क्रियान्वयनक समीक्षा अगिला तिमाही बैसकमे होइत छलै। कलेक्टर कार्यालय सभा कक्षमे सप्ताहमे एक दिन टी एल मीटिंग होइत छलै जाहिमे विभिन्न विभागसँ सम्बंधित शिकायतक निवारणक समीक्षा होइत छलै। बैंकसँ सम्बंधित शिकायतक निराकरण हेतु अग्रणी जिला प्रबंधक द्वारा सम्बंधित बैंकक सक्षम पदाधिकारीसँ संपर्क कयल जाइत छल। एकटा नियत अवधिमे शिकायतक निराकरण सुनिश्चित कयल जाइत छल। समय-समय पर जिला स्तरपर उद्योग कार्यालयमे आ जिला पंचायत कार्यालयमे सेहो स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना, प्रधान मन्त्री रोजगार योजना, स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजनाक क्रियान्वयन आ प्रगतिक लेल बैसकक आयोजनमे सेहो अग्रणी जिला प्रबन्धक उपस्थित रहैत छलाह। सिवनी जिलामे सिवनी,बरघाट, कुरइ, छपारा, गणेशगंज, लखनादौन, धनोरा,घन्सोर,केवलारी आदि जनपदमे तिमाही बैसक आयोजित होइत छलै जाहिमे अग्रणी जिला प्रबंधक अध्यक्ष होइत छलाह। ओहि बैसकमे जिला स्तरक शासकीय अधिकारी परियोजना पदाधिकारी अथवा सहायक परियोजना पदाधिकारी सेहो उपस्थित होइत छलाह। हमरा समयमे परियोजना पदाधिकारी छलाह टी. गणेश कुमार आ सहायक परियोजना पधाधिकारी छलाह एम. के. जैन। हम सभ सिवनीसँ अपन-अपन विभागक वाहनसँ अथवा एकहि वाहनसँ सिवनीसँ जाइत छलहुँ आ संगहि घुरैत छलहुँ। ओहि बैसक सभमे जे निर्णय लेल जाइत छलै, तकर सूचना कार्यवाही विवरण द्वारा सभ सम्बंधित अधिकारी सभकें ओहि बैसकक संयोजक द्वारा प्रेषित कयल जाइत छलै।ओहि बैसक सभक संयोजक लीड बैंकक स्थानीय शाखा प्रबंधक होइत छलाह। जिला स्तरीय समीक्षा समिति एवं जिला परामर्शदात्री समितिक बैसकक सूचना जिलाक विधायक आ सांसद लोकनिकें सेहो देल जाइत छलनि जाहिसँ हुनको सभक माध्यमसँ क्षेत्रक समस्या सभ प्रकाशमे आबय, ओहि पर चर्चा होइ आ ओकर निराकरणक लेल समुचित समाधान ताकल जाए। विभिन्न योजनाक अंतर्गत वार्षिक लक्ष्यक प्राप्ति आ शिकायतक निराकरण हेतु जनपद आ जिला स्तरपर बैसक सभक आयोजन होइत छल। हमरा समयमे आरम्भमे सिवनी जिलाक कलेक्टर छलाह पी. नरहरि जी। हुनक स्थानान्तरणक बाद एलाह मनोहर दुबे जी। जिला पंचायतक मुख्य कार्यपालन पदाधिकारी छलाह राकेश सिंह जी। सामान्य लोककें सरकारी अथवा बैंकक अधिकारी-कर्मचारी सबहक प्रति की धारणा बनैत छलैक से पता नहि, मुदा जनपद पंचायतसँ जिला पंचायत धरि आ कलेक्टर सभा कक्षमे विभिन्न बैसकमे भाग लैत हम अनुभव करैत छलहुँ जे गाम आ शहर सभ ठाम लोकक जीवन-स्तर ऊपर उठाबक लेल, देशक समृद्धिक हेतु विकासक यज्ञमे सरकार आ बैंकक विभिन्न योजना चलि रहल छल : स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना, स्वर्ण जयन्ती शहरी रोजगार योजना, प्रधानमन्त्री रोजगार योजना, दीन दयाल रोजगार योजना,किसान क्रेडिट कार्ड योजना, आर्टीजन क्रेडिट कार्ड,लघु उद्यमी क्रेडिट कार्ड आदि। शासकीय अनुदानक प्रक्रिया सरल भेल जा रहल छलैक, गामे-गामे स्वयं सहायता समूह बनि रहल छल, महिला लोकनि सेहो एहि विकास यज्ञमे सक्रिय योगदान द’ रहल छलीह। बैंकमे भीड़ बढ़ि रहल छलै। बैंकक अधिकारी-कर्मचारी बैंकसँ आवास घुरबाक लेल घड़ी देखनाइ छोडि देने छलाह। सभ बैंक प्रबंधन अपन-अपन लक्ष्य पूर्ण करबाक लेल बहुत श्रम क’ रहल छल। जाहि उद्देश्यसँ १९६९ आ १९८० मे बैंक सबहक राष्ट्रीयकरण भेल छलै से पूर्ण भ’ रहल छलै। हम जतेक दूर धरि देखैत छलहुँ, हमरा बैंक कदाचारमुक्त देखाइत छल। असंयमी लोक सभ कतेक तरहक अशांति आ मानसिक अथवा आर्थिक प्रताड़नाक शिकार होइत छलाह। देशक एहि विकास-यज्ञमे एकटा छोट-छीन किन्तु महत्वपूर्ण भूमिकामे अपनाकें संलग्न पाबि हर्षक अनुभव क’ रहल छलहुँ। ऑफिसमे रहैत छलहुँ त काजमे लागल रहैत छलहुँ। किछु काज डेरोपर करबालेल ब्रीफ़केसमे नेने अबैत छलहुँ। सुतबासँ पहिने अथवा सबेरे डेरापर सेहो किछु काज क’ लैत छलहुँ। काजकें अपन धर्म बूझिक’ करैत छलहुँ, ओहिमे डूबि जाइत छलहुँ, तें थकानक अनुभव नहि होइत छल। ऑफिसक काज करैत घर, बजार,अस्पताल आदिक काज सेहो करैत छलहुँ। आवास आ अध्यात्म : सिवनीमे आरम्भमे किछु दिन होटल आनन्दमे, किछु दिन सिवनीक शाखा प्रबंधक बी.एम. अग्रवालजीक आवासमे आ तकर बाद जखन परिवारक संग रह’ लगलहुँ त बारापत्थरमे बाबूजीनगरमे नामदेवजीक मकानमे प्रथम तलपर आवास छल। नामदेवजी भूतलपर एकटा शिव मन्दिर बनौने छलाह। बच्ची सभ दिन पूजा करैत छलीह। ऑफिससँ आवासक बाटमे ब्रम्हाकुमारी संस्थान छलैक। दूरदर्शनपर बी.के.शिवानीक कार्यक्रम देखि उत्सुकता भेल। एक दिन दुनू गोटे गेलहुँ। सात दिनक कोर्स केलहुँ। एक दिस समाजमे लोक कन्यादानक लेल गामे-गाम कि एहि शहरसँ ओइ शहरक यात्रा करैत रहैत छथि, कन्या सभ मन पसंद घर-बर लेल महादेवक पूजा करैत छथि, बूढ़ी सभ कबुला-पाती करैत रहैत छथि, दोसर दिस एहि संस्थानमे कुमारि कन्या सभ उज्जर दप-दप वस्त्रमे सात्विक जीवन जीबैत लोककें सात्विक जीवन जीवाक प्रेरणा दैत ज्ञान-दान मंगनीमे क’ रहल छथि आ जीवन भरि सात्विक जीवन जीवाक व्रत नेने छथि। हिनका सबहक मूहें एहि संस्थानक संस्थापक दादा लेखराजक पवित्र जीवन आ एहि संस्थानक स्थापनाक कथा अद्भुत लागल। ई सभ बुझबैत छथि जे हम सभ आत्मा छी आ दिन भरिमे जिनका-जिनकासँ भेट होइत अछि सभ आत्मा छथि आ सभ हमरे जकाँ ओही परम पिता परमात्माक संतान छथि, हम सभ परम धामसँ आएल छी, फेर ओतहि घुरिक’ जेबाक अछि, ककरोसँ राग आ द्वेष नहि राखू, संसारमे एना रहू जेना थालमे कमल रहैत अछि, सृष्टिक एक चक्र पांच हजार बरखमे पूर्ण होइत अछि, सतयुग-त्रेता-द्वापर-कलियुग सभयुग एक हजार दू सय पचास बरखक, कलियुगक अन्त लग आबि गेल अछि,सतयुगक आगमनक तैयारी चलि रहल अछि, एहि ज्ञान यज्ञमे सभ क्यो शामिल होथि से आह्वान क’ रहल छथि ई साध्वी लोकनि। एहि संस्थानक प्रधान कार्यालय राजस्थानक माउंट आबूमे अछि आ दुनियाँक बहुत देशमे हजारो शाखाक माध्यमसँ दिव्य ज्ञानक बरखा भ’ रहल अछि, उल्लेखनीय बात ई जे सभ शाखाक मुख्य बहिने लोकनि छथि। ई बहिन लोकनि सभ ठाम निर्भय रहैत छथि, हिनका सबहक सोच ई छनि जे सभसँ शक्तिशाली परमात्मा पिता सदिखन संगमे रहै छथिन तखन भय कथीक। एहि संस्थानक विशेषता इहो अछि जे ई लोकनि ककरोसँ चन्दा नै मंगैत छथि, जे हिनका सबहक ज्ञान नहि प्राप्त करैत छनि ओ स्वेच्छासँ किछु देबय चाहैत छथि त स्वीकार नहि कएल जाइत छनि। हम ओशोक किछु पोथी पढने छलहुँ, हुनक तर्क सभ बहुत प्रभावित करैत छल। जबलपुर स्थित देवताल गढ़ामे ओशो संन्यास आश्रममे तीन दिनक एकटा आयोजनमे सम्मिलित भेल छलहुँ, चिरिमिरीमे सेहो तीन दिनक शिविरमे भाग नेने छलहुँ, पुणेमे हुनक संस्थानमे गेल रही, देखने-सुनने रही। हमरा नीक लागल, मुदा हमरा शिष्य बनबाक मोन नहि भेल। एखनहु कोनहु रूपमे हुनका पढ़ब नीक लगैत अछि।छोट-छोट कथाक माध्यमसँ ज्ञानक पैघ-पैघ बात कहबाक अद्भुत कौशल हुनक वक्तव्यमे रहैत अछि। हुनका माध्यमसँ संसारक विभिन्न धर्मक अनेक दार्शनिक लोकनिक परिचय प्राप्त करबाक आनन्द उपलब्ध होइत अछि। जबलपुरमे बाबा रामदेवक शिविरमे भाग नेने छलहुँ, देह आ मोनकें शुद्ध रखबाक लेल आसन-प्राणायाम आ यम-नियमक पालन करबाक लाभसँ परिचित भेल छलहुँ, टी.भी.पर हुनक कार्यक्रम सेहो देखबामे-सुनबामे नीक लगैत अछि। वैदिक चैनलक माध्यमसँ सनातन धर्मक अंतर्गत योग आ आयुर्वेदकें केन्द्रमे रखैत ऋषि लोकनिक ज्ञानसँ लोककें लाभान्वित करबाक हुनक प्रयास प्रशंसनीय अछि। हमहूँ वैदिक चैनलपर वेद आ उपनिषदक ज्ञानक गंगामे स्नान कय आनन्दित होइत छी। ब्रम्हाकुमारी संस्थान सेहो नीक लगैत अछि। सिवनीमे जाधरि रही, समय-समयपर जाइत छलहुँ। मुरली सुनैत छलहुँ। संस्थानमे बहिन द्वारा प्रतिदिन मुरलीक माध्यमसँ लोककें भगवानक ज्ञानक प्रसादक वितरण नियमित रूपसँ होइत रहैत अछि। समय-समयपर संस्थानक प्रधान कार्यालय माउंट आबूमे आयोजित कार्यक्रममे भाग लेबाक अवसर सेहो भेटैत छैक। हम कोनो कार्यक्रममे माउंट आबू त नहि गेलहुँ, मुदा टी.भी.पर ओहिठामक कार्यक्रम आ ‘पीस ऑफ़ माइंड’ चैनलपर बहुत रास कार्यक्रम देखलहुँ, नीक लागल। पटनामे सेहो एहि संस्थानसँ परिचित भेलहुँ। कहियो-कहियो जाइत छी। नियमित रूपसँ जाएब नहि पार लगैत अछि। टी.भी.पर सभ कार्यक्रम उपलब्ध भेलासँ केन्द्रपर जाएब आवश्यक सेहो नहि लगैत अछि। ओशो, रामदेव बाबा आ ब्रम्हाकुमारी संस्थान सभ ठाम ‘परमात्मा आ पुरुषार्थ’क महिमाक प्रचार-प्रसार अलग-अलग ढंगसँ भ’ रहल अछि। सबहक शिक्षा अछि जे तन आ मोनकें पवित्र राखू, तखने जीवनक आनन्द प्राप्त भ’ सकैत अछि। हमरा लगैत अछि जे तन आ मोनकें पवित्र रखबाक लेल कतहु बौएबाक काज नहि छैक, जतहि जे छी, से यम आ नियमक पालन करैत रही, सैह पर्याप्त अछि आनन्दित जीवन जीबाक लेल। मैथिलीक विवाह : मैथिलीक विवाहक उद्देश्यसँ कय ठाम यात्रा करबाक अवसर भेटल। जमशेदपुर,पटना, राँची, बिलासपुर, नवसारी, अहमदाबाद गेलहुँ। गाम जाक’ छोट भाए रतनजीक संगे सेहो चानपुरा,पंडौल डीह टोल, गनौली आदि गामक यात्रा कयलहुँ। दिल्लीसँ हमर छोट बहिन आ बहिनो एकटा सूचना देलनि। फोनपर अरविन्द जीसँ संपर्क भेल, डेरी टेक्नोलॉजीमे बी.टेक. छलाह, गुजरातमे पालनपुरमे ‘अमूल’मे काज करैत छलाह। गाम गेलहुँ। गनौली गेलहुँ। ओतहु हुनक पिता, कक्का आ किछु अन्य लोक सभसँ संपर्क केलहुँ। दिल्लीमे हमर बहिन-बहिनोक पड़ोसी छलखिन हुनक जेठ भाए आनन्दजी, ओत’ कोनो व्यवसाय करैत छलाह। ओहि ठाम अरविन्दजीक आवागमन होइत छलनि, सभ क्यो देखने छलखिन। हुनका सभकें पसंद छलनि। हमरा फोनपर गप भेल, हमहूँ संतुष्ट भेलहुँ। २००९ मे मैथिलीक विवाहक संयोग बनलनि। हमर छोट भाए ललनजी पत्नी आ दू पुत्र-पुत्रीक संग दिल्लीमे छलाह, पूर्व परिचित ज्योतिषी जीक ओत’ कोनो पूजाक लेल सुझाव देने छलखिन। हुनके सबहक सलाहपर मैथिली पुणेसँ दिल्ली गेल छलीह। ललनजीक डेरासँ मैथिली दीदीक घर गेलीह। ओत’ आनन्दजीक बहिनो मैथिलीकें देखलखिन, गप केलखिन,ओ कोनो कम्पनीमे काज करैत छलाह। हुनका सभकें विवाहक प्रस्ताव स्वीकार भेलनि। आनन्दजी निर्णायक छलखिन। दिल्लीमे बैसार भेलै। हमर छोट भाए ललनजी, हमर बहिन-बहिनो हुनकासँ गप केलनि। हम फोनपर छलहुँ। विवाह तय भ’ गेलै। विवाहक दिन आदि तय भेलै। गाम गेलहुँ। निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार विवाहसँ चारि दिन पहिने मधुबनी स्टेशनपर अरविन्द जी आ हुनक अग्रज आनन्द जीसँ पहिल बेर भेंट भेल। रतनजी बहुत रास व्यवस्था क’ क’ रखने छलाह। २६ क’ ललनजी आ हमर छोट सार बिन्देजी गनौली गेलाह। पटनासँ हमर साढ़ू, जेठ सारि आ प्रमोद बाबू एलाह। दिल्लीसँ हमर छोट बहिन सच्ची आ भगिनी पूनम आएल छलीह। लखनपट्टी आ शिशवासँ दुनू बहिन शान्ती आ बच्ची एलीह। रुचौलसँ हमर मझिला मामा एलाह,छोटका मामा पटनासँ कोइलख गेल छलाह, कोइलखसँ हमरा गाम एलाह।लदारीसँ गोपालजी सेहो एलाह। नारायणपट्टीसँ हमर दीदी एलीह। २७ क’ गनौलीसँ भरिसक ६० गोटे बरियातीमे एलाह। विवाह भेलै। चारि बजे भोरमे बरियाती प्रस्थान केलनि। ३० क’ चतुर्थी भेलै। २ क’ द्विरागमन भेलै। ५ क’ हम सभ गामसँ प्रस्थान केलहुँ, ६ क’ १० बजे रातिमे सिवनी पहुँचलहुँ। सिवनीमे मैथिल आ मैथिली : सिवनीमे भारतीय स्टेट बैंकक मंगलीपेठ शाखाक प्रबंधक देवघरक छलाह। हुनका सँ परिचय भेल। ओ एक गोटेसँ परिचय करौलनि। ओ जजुआरक छलाह। ओ सिवनी अस्पतालमे एकटा मैथिलसँ परिचय करौलनि।हुनका सभसँ कहियोक’ भेट होइत छल। बैंक ऑफ़ महाराष्ट्रक शाखामे मुंगेर जिलाक सिंहजी छलाह। ओ जबलपुरमे सेहो हमर पड़ोसी छलाह, एतहु भेटलाह। बैंक ऑफ़ इंडियाक एक शाखाक प्रबन्धक मिश्र जी सहरसाक छलाह, ओ जबलपुरमे सेहो भेटल छलाह। हुनका सभक संग सिवनी लग बैनगंगाक तटपर छठि पावनिमे जाइत छलहुँ। छठि पावनिमे सिवनी शाखाक पी.ओ. मैडम अर्चना सेहो परिवारक संग बैनगंगाक तटपर गेल छलीह। एकटा होटलक मालिक सेहो छठिमे संग रहैत छलाह, ओ गोरखपुरक छलाह। सिवनीमे हमर साहित्यिक गतिविधि : सिवनीमे हमर साहित्यिक गतिविधि लगभग शून्य रहल। क्षेत्रीय कार्यालयमे राजभाषा विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रममे भाग लैत छलहुँ। अधिक काल रातिएमे घर घुरैत छलहुँ। टेप रिकॉर्डरपर चिरिमिरीक पल्टू दादाक स्वरमे अपन रचना सुनैत छलहुँ : ‘जिन्दगी जब हुई जिन्दगी के लिए हर घड़ी शुभ घड़ी आदमी के लिए’ ............................................... ‘सूर्य बनकर जियो उनकी खातिर जियो जो तड़पते अभी रोशनी के लिए।’ थकान दूर होइत छल, आनंदित होइत छलहुँ। पल्टू दादा मोन पड़ैत छलाह। सिवनीक साहित्यिक समाजसँ हम नुकाएल रहलहुँ। एक बेर एकटा कवि गोष्ठीमे श्रोताक रूपमे उपस्थित भेल छलहुँ। अवकाश प्राप्तिक बाद ८ जनवरीक’ नटराज होटलमे शाखा प्रबंधक अग्रवाल साहेब एकटा कवि गोष्ठीक आयोजन करौलनि जाहिमे अरविन्द मानवक संग और किछु साहित्यकार उपस्थित भेलाह। काव्य पाठमे हमहूँ भाग लेलहुँ। रोग-शोक–संताप : मइ २००८ सँ नवम्बर २०१० धरि हम सिवनीमे पदस्थापित छलहुँ। एहि अवधिमे स्वास्थ्य सम्बन्धी किछु समस्याक समाधानक लेल डा. बघेलसँ संपर्क करैत छलहुँ, दाँतक कष्टक निदान डा. चौधरीजीसँ प्राप्त होइत छल। २००९ मे १९ जनवरीक’ बडका मामाक देहान्तक सूचना भेटल, २५ दिसम्बरक’ हमर सारक पुत्री नीलमक दुर्घटनाक पता चलल, आइ सी यू मे भर्ती भेल छलीह, सामान्य स्थितिमे एबामे समय लगलनि। २९ दिसम्बरक’ बड़का साढ़ू कोरियाही गाममे देह त्यागि देलनि, से पता चलल। १३ दिसम्बरक’ फोनपर संपर्क भेल छल। देश-दुनियाँक विषयमे सेहो अखबारक माध्यमसँ किछु सूचना भेटैत छल। अपन दुख सभकें भारी लगैत छै किन्तु कतेक ह्रदय विदारक घटना देखि-सूनि लगैत छै जे हमर दुख त बहुत कम अछि। २०१० मे १२ जनवरीक’ ‘हैती’मे भूकंपसँ करीब दू लाख लोक ख़तम भ’ गेलाह। ११ अप्रैलक’ हबाइ दुर्घटनामे पोलैंडक राष्ट्रपति आ हुनक पत्नी समेत सभ ९६ गोटे समाप्त भ’ गेलाह। सेवानिवृति : २९ नवम्बर(२०१०)क’ हमरा द्वारा कलेक्टर सभा कक्षमे अंतिम जिला स्तरीय समन्वय आ समीक्षा समितिक बैसकक संयोजन भेल। बी.एम.अग्रवाल,शाखा प्रबंधक आ नाबार्डक प्रतिनिधि श्रीराम अप्पुलिंगम द्वारा ३० क’हमर सेवानिवृतिक सूचना देल गेलनि, कलेक्टर महोदयक हाथें हमरा शाल आ श्रीफलक संग शुभकामना प्रदान कयल गेल। ३० क’ बैंकमे नोकरीक हमर अंतिम दिन छल। बैंकमे ६ बजे साँझमे हमर बिदाइक औपचारिकताक कार्यक्रम भेल। ९ बजे होटल ‘वाटिका’मे कार्यक्रम आयोजित छल। बैंकक शाखा प्रबंधक आ अन्य अधिकारी सभ छलाह।वीरेन्द्र सिंह जी लखनादौन शाखासँ आएल छलाह। क्षेत्रीय कार्यालयसँ किछु अधिकारी लोकनि शेखरजी,मंडलजी,सत्येन्द्रजी, साहूजी आ सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक डे साहेब आएल छलाह। जिला पंचायतक मुख्य कार्य पालन पदाधिकारी राकेश सिंह साहेब सेहो छलाह। शुभकामनाक संग हमरा दुनू गोटेकें शाल आ श्रीफलसँ सम्मानित कएल गेल। बैंक द्वारा अवकाश नगदीकरण आ मोमेंटोक चेक ओही दिन भेटि गेल। हमर विदाइ समारोहमे अग्रवाल जी चर्चा केलनि जे हम बैंकमे पैंतीस बरख नोकरीक अवधिमे अपन आवासक व्यवस्था नहि क’ सकल छलहुँ। बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे : ओहि साँझ हम स्मरण केलहुँ जे दस दिसम्बर १९७५ क’ बैंक ज्वाइन केने रही, हमरा परिवारकें ओहि समय हमर नोकरीक बहुत खगता छलैक। बैंकमे समयपर वेतन भेटबामे कहियो कोनो व्यवधान नहि भेल, हमरा निरीक्षण,वसूली,मीटिंग आदिमे भाग लेब’ जेबाक अवसर भेटैत छल, एहि लेल नियंत्रक कार्यालयसँ यात्रा-बिलक स्वीकृतिमे कोनो व्यवधान नहि होइत छल। वेतन वृद्धि, स्थानान्तरण,पदोन्नति आदिमे सेहो पारदर्शिता आ पवित्रताक स्वस्थ परम्परा बैंकमे भेटल। नोकरी भेटल त माएक लेल जे कर्ज छलनि, से ब्याज सहित सभकें द’ देल गेलनि, बाबूक लेल जे कर्ज छलनि, से वापस कएल गेल।खेत सभ जे भरना छल से छूटल, बाबूक बिमारीमे गाम,दिल्ली आ डोमनहिल-चिरिमिरीमे इलाज आ पथ्य-पानिक व्यवस्था भेल, दूटा छोट भाए छलाह,हुनका सभक पढाइक व्यवस्था भेल, गाममे दू कोठलीक घर, चापा-कल आ लेट्रिनक व्यवस्था भेल। दू पुत्री आ एकटा पुत्रक शिक्षा आ दुनू पुत्रीक विवाहक आयोजन भेल। अपन जे साहित्यिक सौख छल ताहू लेल पत्रिका सभ मंगयबाक आ तीन टा पोथी छपयबाक व्यवस्था भेल। हमर साहित्यक गतिविधिक लेल सेहो हमरा बैंकमे समय-समयपर प्रशंसा आ अतिरिक्त सम्मान भेटल। बैंक सेवामे एल.टी.सी. ल’क’ माएक संग मथुरा,वृन्दावन,आगरा,हरिद्वार,ऋषिकेश आदि ठाम तीर्थाटनक अवसर भेटल। परिवारक संग एल.टी.सीक अन्तर्गत रायपुरसँ दिल्ली आ दिल्लीसँ पटना हबाइ जहाजसँ यात्रा करबाक अवसर भेटल। बैंकक नोकरीक कारण बिहारक सीवान आ पूर्वी चंपारण,छत्तीसगढ़क अम्बिकापुर आ रायपुर और मध्य प्रदेशक शहडोल, जबलपुर आ सिवनी जिलाक बहुत रास गाम आ शहर घुमबाक अवसर भेटल आ रंग-विरंगक लोक, अधिकारी आ साहित्यकार लोकनिसँ परिचय आ आत्मीयता भेल। समय-समयपर बैंक द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रममे पटना, मुंबई, भोपाल आ लखनऊमे देशक विभिन्न प्रान्तक रहनिहार आ विभिन्न शाखामे काज केनिहार लोक सभक संग रहबाक आ विभिन्न प्रतिभासँ परिचित हेबाक अवसर भेटैत छल। स्थानातरणसँ किछु परेशानी त होइत छलै, मुदा विभिन्न परिस्थितिमे रहबाक आ विभिन्न स्वभावक लोक सबहक संग काज करबाक अनुभवक लाभ छलै। बैंकक सेवामे छलहुँ, तें हजारो लोककें बैंकक नियमानुसार ऋण उपलब्ध करयबामे अपन विवेकक उपयोग करबाक आ अपनामे स्थित छुद्रता अथवा दिव्यताक अनुभव करबाक अवसर भेटल। हमरा विश्वास छल जे सेवा निवृतिक बाद जे राशि प्राप्त हएत ताहिसँ आवश्यकता भरि आवासक व्यवस्था सेहो भ’ जाएत। एहेन प्रियतम संस्थासँ पृथक हेबाक कारण दुख त भ’ रहल छल, मुदा पेंशनक माध्यमसँ बैंकसँ जीवन भरि जुड़ल रहबाक एकटा आश्वस्ति सेहो छल। आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर : हमर ममियौत डा. शशिधर कुमर ‘मिथिला दर्शन’ पत्रिकाक जुलाई-अगस्त आ सितम्बर-अक्टूबर (२०१० ) अंकमे हमरासँ सम्बंधित लेखक विषयमे सुचित केलनि। बादमे देखलहुँ। जुलाई-अगस्त अंकमे भाइ सियाराम झा ‘सरस’क लेख छपल छलनि जाहिमे हमर रचनाक उपेक्षा कएल गेल छल। सितम्बर-अक्टूबर अंकमे पाठकीय प्रतिक्रियामे भाइ उमाकान्तजी द्वारा ‘संकल्प लोक’ आ ‘शशिकान्तजी-सुधाकान्तजी’क चर्चा करैत हमर रचना सभक प्रशंसा कएल गेल छल, से जानिक’ नीक लागल। सेवा निवृतिक बाद मैथिली दिस उन्मुख हेबाक प्रेरणा सेहो भेटल। चंडीगढ़सँ आदरणीय प्रो. गंगानन्द झा जीक शुभेच्छा प्राप्त भेल : आब इन्टरनेटपर मैथिली पत्रिका ‘विदेह’मे अहाँक रचना देखय चाहैत छी। हमरा ‘विदेह’मे अपन रचना देखबाक आ एकटा नव जीवनमे प्रवेश करबाक कल्पना आनन्दित केलक। मोन पड़ल ‘मिथिला मिहिर’,’माटि-पानि’, ‘भारती-मंडन’,’आरम्भ’, ‘मिथिला दर्शन’, ‘कर्णामृत’ आ मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’। मोन पड़लाह हरिमोहन बाबू, मधुपजी,किरणजी,शेखरजी,जीवकान्तजी, सोमदेवजी,गुंजनजी,रमणजी,रवीन्द्रजी,उदय चन्द्र झा’विनोद’जी,विभूति आनन्द जी,छत्रानंद सिंह झाजी,प्रदीपजी। मोन पड़लाह महेन्द्रजी,शशिकान्तजी, सुधाकान्तजी,उमाकान्तजी,कमलाकान्तजी। मोन पड़ल कोइलख,रामपट्टी,रहिका,हाजीपुर,सीवानक विद्यापति-पर्व। मोन पड़ल शशिकान्तजी-सुधाकान्तजीक स्वरमे अपन गीतक ई पाँती : ‘आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर ह्रदयमे हो माटिक ममता माएक सेवामे जीवन बितादी अछि बस यैह एकटा सिहन्ता।’ ओहि राति एकटा मीठ-मीठ दर्दक अनुभव भेल। पटना / १३.०३.२०२२ (२८) घर घुरबाक सुख आवास यज्ञ : २०१० मे ३० नवम्बरक’ हम सेवा निवृत भेल रही, ३ दिसम्बरक’ भविष्य निधिमे जमा राशि एगारह लाख छियासठि हजारक चेक भेटि गेल। तखन आवास लेल सोचब प्रारम्भ केलहुँ। हमरासँ छोट भाए ललनजी दिल्लीमे एकटा छोट छीन घर ल’क’ एक पुत्री,एक पुत्र आ पत्नीक संग रहैत छलाह,एखनहु ओतहि रहैत छथि। सभसँ छोट भाए दूटा पुत्र आ पत्नीक संग गाममे रहि ओतहिसँ स्कूल जाइत-अबैत छलाह,एखनहु गामेमे रहि स्कूल जाइत-अबैत छथि। हम नोकरीमे बिहारक सिवान,पूर्वी चम्पारण, छत्तीसगढ़क सरगुजा,रायपुर आ मध्य प्रदेशक शहडोल,जबलपुर आ सिवनी जिलामे रहैत आबि रहल छलहुँ। विवेक नवी मुंबइक कोपरखैरनामे रहिक’ किछु मास पॉलिटेक्निक कॉलेजमे नोकरी केलनि, तकर बाद इंजीनियरिंग कॉलेजमे पढौनी क’रहल छलाह। हमरा सोझाँ तीनटा विकल्प छल : पहिल, मुंबइ चल जाइ,दोसर मधुबनी,दरभंगा अथवा पटना जाइ; तेसर, गाम जाक’ रही। बुढ़ारीमे चिकित्सा-सुविधाक आवश्यकता बेशी होइत छैक आ धिया-पूता लगमे नै रहत,से ध्यानमे राखि निर्णय लेबाक छल। विवेक, वसन्त आ बड़का जमाएसँ सम्पर्क केलहुँ। हुनका सभ गोटेक सलाह भेलनि जे हम पटनामे रहबाक व्यवस्था करी, दिल्ली,मुंबइ आ गामक बीच रहत पटना। यैह निर्णय भेल। पटनामे साहित्यकार लोकनिसँ संपर्क नै छल। फुलवारी शरीफ लग साढ़ू रहैत छलाह,सगुना मोड़,दानापुर लग मामा रहैत छलाह आ मिथिला कॉलोनी,दानापुरमे छोट भाएक ससुर रहैत छलाह। तीनू गोटेकें कहलियनि जे पटनामे कतहु एक कट्ठा जमीन लेबामे सहयोग करथि। सभसँ पहिने साढ़ूक ओत’सँ सूचना प्राप्त भेल : बिक्री योग्य पन्द्रह धुर जमीन कनिए दूरपर छै। ७ दिसम्बरक’ गप भेल, ८ क’हम सहमति देलियनि आ जमीनबलाकें अग्रिम देबाक लेल किछु राशि पठा देलियनि। २३ क’ पटना पहुचलहुँ, २४ क’ प्लाट देखलिऐ। राजूक निर्देशनमे हमर आवास यज्ञ चलय लागल। लगमे एकटा डेरा ताकिक’ रखबाक भार हुनका सभकें द’क’ २९के रातिमे पटनासँ प्रस्थान कए ३० क’ सिवनी पहुँचि गेलहुँ। ३ जनवरीक’ ग्रेच्युटीक दस लाखक चेक भेटि गेल। सिवनी छोड़बासँ पहिने दूनू बेटी आ जमाए ओत’सँ घूमि एबाक विचार भेल। १० जनवरीक’ जबलपुरसँ सोमनाथ एक्सप्रेस पकड़ि ११ क’ ८.५० बजे अहमदाबाद आ १ बजे पालनपुर (गुजरात) पहुचलहुँ।पालनपुरमे छोटका जमाए अमूल कम्पनीमे काज करैत छलाह, मैथिली ओतहि छलीह। १५ क’ बनास डेरी १,२,३ घुमलहुँ, २.३० बजे बससँ यात्रा कए ४ बजे गब्बर आ ६.३० बजे अम्बाजीक दर्शनार्थ पहुचलहुँ। १६ क’ १ बजे माउंट आबू पहुचलहुँ। ओत’ घूमिक’ रातिमे ८.३० बजे पालनपुर वापस भेलहुँ। १७ क’ रातिमे रणकपुर एक्सप्रेससँ पालनपुरसँ प्रस्थान कए १८ क’ २ बजे बड़का जमाएक नवी मुंबइमे कोपरखैरना स्थित आवास पहुचलहुँ। २२ क’ मुंबइसँ प्रस्थान कए २३ क’ ११ बजे सिवनी पहुचलहुँ। २४ क’ विवेकक शिक्षा ऋण खातामे ८५०३४ रु. जमाक’क’ ऋण खाता बंद करौलहुँ। मैथिलीक शिक्षा ऋण खातामे ३५००० रु. जमा केलहुँ। ३० क’ सबेरे ट्रक आएल। ट्रकपर सामान सभ लदाएल। ३१ जनवरीक’ हम दुनू गोटे ११.१५ बजे सिवनीसँ प्रस्थान कए जबलपुरसँ ट्रेन पकड़ि १ फरबरीक’ ११ बजे दिनमे फुलवारी शरीफ लग वृन्दावन कॉलोनी आवास पहुचलहुँ।ट्रकसँ सामान सभ ओही दिन बादमे आएल। ९ क’ इन्डेन ऑफिस जाक’ कागज आ ९५० रु. कौशन मनीक संग कुल २०७४ रु. जमा केलहुँ। १० क’ दू टा गैस सिलिंडर आबि गेल। राजूक निर्देशनमे हमर आवास-यज्ञ चलि रहल छल। शहरमे जमीन कीनब सेहो एकटा पैघ यज्ञ थिक। एहि यज्ञमे आवश्यकतासँ बहुत बेशी समय,श्रद्धा, विश्वास, साहस आ धैर्यक आवश्यकता होइत छैक। ई हमरा लेल एकटा नव आ नीक अनुभव छल। भूमि किनबा काल महग लगैत छैक, बादमे ओकर मूल्य बढि जाइत छैक। साढ़ू, राजू, प्रमोद बाबू, रंजीतजी,रामजनम महतो आ मंजू देवी आदि लोकक सहयोगसँ हमर ई यज्ञ २२ फरबरीक’ दानापुर रजिस्ट्री ऑफिसमे संपन्न भेल। वृन्दावन कॉलोनीक रोड न.१ ईमे लाल बहादुर सिंह जीक घरमे किरायाक आवासमे रह’ लगलहुँ। किछु दूरपर स्थित छलै जमीन। २०११ मे १४ जूनक’ इंजिनियर रामजी सिंहजीक माध्यमसँ मंजूर ठीकेदारसँ संपर्क भेल आ हुनका द्वारा ८३ रु.प्रति वर्गफीटक दरसँ घर बनयबाक काज शुरू भेल। पानिक व्यवस्था भेल। तकर बाद छओ मास धरि चिन्तनक मुख्य विषय छल ईंटा,बालु,सीमेंट,गिट्टी,लोहक छड़ आदि। दौड़-धूपमे दस बरखक स्कूटी काज दैत छल। २०१२ मे १६ जनवरीक’ छत ढलायल,२९ फरबरीक’ गृह प्रवेश भेल। ओहि दिन विवेक सेहो मुंबइसँ आबि गेल छलाह। गृह प्रवेशक अवसर पर संक्षिप्त भोजक व्यवस्था कयल गेल, साढ़ूक पुतोहु सभ भोजनक व्यवस्था केलनि। ओही दिन हम सभ किरायाबला घर छोड़ि नव घरमे सामान सभ आनिक’ रह’ लगलहुँ आ रहिएक’ शेष काज पूर्ण करेलहुँ। १५ अप्रैलक’ बिजलीक काज आ ८ मइक’ बड़हीक काज संपन्न भेल। घरक निर्माण काज सेहो बड़का यज्ञ थिक। हम तय केने छलहुँ जे कोनो स्थितिमे कखनो ककरोपर बिना तामस केने काज पूर्ण करब, से पार लागल।एहिस लाभ अपने होइ छै। शान्त चित्तस काज करबामे आनन्द अबैत छैक। अशान्त चित्तक परिणाम शुभ नै भ’ सकैत छैक, काज भारी लाग’ लगै छै, मोन उबि जाइ छै। काज करबाक लक्ष्य शुभ चिन्तनक संग पूर्ण भ’ सकय से सुनिश्चित करबाक चाही। गाम-घरक यात्रा : पिसिऔत भाएक पुत्रीक कन्यादानमे सम्मिलित हेबाक लेल २७ फरबरीक’ गाम गेलहुँ। २८ क’ गामसँ सोहराय गेलहुँ।बर आ बरियातीक अगवानीमे सात गोटेक समूहमे मौआही (बाबू बरही लग )गेलहुँ। रातिमे बरियाती एलै सोहराय (पंडौल लग )। एक गोटे मोटर साइकिलसँ आबि रहल छलाह, दुर्घटनाग्रस्त भ’क’ दरभंगासँ पटना गेलाह इलाजक लेल। बरक पिता आ दादा दुख आ चिन्तासँ भोजन नहि ग्रहण केलनि। बरियातीक ई रूप हमरा लेल नव छल। एतेक संख्यामे बरियाती, एतेक फटक्का छोड़ब हमरा असहज केलक। एहि असहजतासँ बादमे एकटा गीत जन्म लेलक : नब्बेटा बरियाती एलै, हल्ला भेलै गाममे ......। गामक एहि यात्रामे रतनजी (छोट भाए)क संग मामा गाम रुचौल, बहिनक सासुर शिशवा, समधियान राघोपुर आ गोनौली, दीदीक सासुर नारायणपट्टी सेहो गेलहुँ। घुरती काल अपन सासुर लदारी होइत पटना मामाक घर पहुचलहुँ। हुनका संगे विजेता (ममियौत बहिन)क विवाहक प्रसंगमे १३ मार्चक’ टाटानगर गेलहुँ। विजेता बायो इन्फार्मेटिक्समे बी टेक छलीह,नोकरी करैत छलीह। लड़का सेहो इंजिनियर छलखिन। बिना कोनो दहेजक माँगक विवाह तय भेलै, से नीक लागल। एहि विवाह सँ ई भावना दृढ़ भेल जे बेटीकें समुचित शिक्षा द’क’ सबल आ सक्षम बनाओल जा सकैत अछि जाहिसँ ओ अपना बलपर उचित सम्मान प्राप्त क’ सकय।एहि चिन्तनसँ एकटा गीत जन्म लेलक : बुच्ची बढती, लिखती-पढ़ती हमरा चिन्ता कथी के, भाग्य अपन अपनेसँ गढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। रेप-दहेजक दानवकेर उत्पात मचल अछि भारतमे, महिषासुरलय दुरगा बनती हमरा चिन्ता कथी के। ज्ञान और विज्ञानक सम्पति अर्जित करती जीवनमे, नव सुरुज आ चान बनेती हमरा चिन्ता कथी के। लोकक मोल बुझै छै एखनो लोक बहुत छै दुनियाँमे, संगी अप्पन अपने चुनती हमरा चिन्ता कथी के। अपनहि श्रमसँ बाट बनेती एहि बबूरकेर जंगलमे, ‘किरण’ ‘सुनीता’’मीरा’ बनती हमरा चिन्ता कथी के। हमरा भरोस भेल जे जतेक चिन्ता लोक बेटीक बियाहक लेल करैत अछि, से बेटीक समुचित शिक्षा दिस लागि जाइ त युग-युगसँ चल अबैत ई ‘पराधीन सुख सपनहु नाही’ बला धारणाक अन्त भ’ सकैत अछि। सेवा,अनुसन्धान,राजनीति आदि सभ क्षेत्रमे बेटी लोकनिक प्रशंसनीय काज हमरा सभकें आश्वस्त करैत अछि। १७ जूनक’ मामाक सगुना मोड़ लगक आवासमे कन्या निरीक्षणक औपचारिता भेलै आ १० जूनक’ मामाक गाम रुचौलमे विजेताक विवाह भेलनि, हमहूँ दुनू अवसरपर उपस्थित भेलहुँ। गाम-गाम घुमैत बहुत रास पोखरि, दारूक दोकान आ आनो कतेक देखल आ सूनल बात सभ मोनमे घुरिआइत रहल आ चिन्तनक विषय बनल जाहिसँ एकटा गीत जन्म लेलक : पोखरिमे मखान गामे-गामे दारूके दोकान गामे-गामे। दिनक’ पूजा राति बिताबय चोरीमे रावणकेर खरुहान गामे-गामे। कबुला केलक पूर मनोरथ भेलै लोकक गेल छागरक जान गामे-गामे। ठाढ़े-ठाढ़े लोक मुतैए बाटेपर टाका के मचान गामे-गामे। परिणयकें उद्योग बनौलक मिथिलामे अयाचीक संतान गामे-गामे। कि हेतै अइ बेर बाढ़िमे के जानय छटपट कोटि परान गामे-गामे। बाट-घाटसँ काँट-कूशकें दूर करू अन्नाकेर अभियान गामे-गामे। (ओहि समय बिहारोमे शराब-बंदी नहि छलै )। मैथिली जगतसँ सम्पर्क : विजेताक विवाहमे मामा मैथिलीमे कार्ड छपयबाक भार देलनि। हमरा लेल पटना नव छल। तीस बरख पहिने मुसल्लहपुरमे मुरलीधर प्रेस देखने छलहुँ, ओत’ पहिल पोथी ‘तोरा अङनामे’ छपल छल। ओहि स्थानपर गेलहुँ त पता चलल जे बहुत पहिने बंद भ’ गेलै, घुरि एलहुँ। जीवकान्तजीसँ संपर्क भेल त ओ शेखर प्रकाशनक पता कहलनि आ शरदिंदु चौधरीजीक मोबाइल न. देलनि। चौधरीजीसँ संपर्क भेल, न्यू मार्केट गेलहुँ। कार्डक काज हुनका देलियनि। हुनकासँ मैथिली जगतक पर्याप्त सूचना प्राप्त भेल। हुनका लग मैथिली पोथीक भण्डार देखि नीक लागल। हुनका लग हमर पोथी ‘तोरा अङनामे’क एक प्रति सेहो भेटल जे तीस बरख पहिने मिथिला मिहिर / आर्यावर्तमे समीक्षाक लेल जमा केने रही, हमरा लग एकहुटा प्रति नहि रहि गेल छल, नीक स्थितिमे हुनका ओत’ भेटल,से नीक लागल। ओ पढबाक लेल तीनटा पोथी सेहो देलनि जाहिमे एकटा आदरणीय मन्त्रेश्वर झाजीक ‘चिनवार’ उपन्यास सेहो छल। ‘चिनवार’ पढलहुँ, नीक लागल, ओहिपर समीक्षा सेहो कवितामे लिखलहुँ जे ‘पूर्वोत्तर मैथिल’पत्रिकामे प्रकाशित भेल। शेखर प्रकाशनमे मैथिलीक सभ पत्रिकाक अद्यतन स्थितिसँ परिचित भेलहुँ, बहुत साहित्यकार लोकनिसँ सेहो संपर्क भेल। डा. कमल मोहन ‘चुन्नू’, डा.योगानन्द झा,श्याम दरिहरे,मधुकान्त झा, वैद्यनाथ’विमल’,डा. बासुकी नाथ झाजीसँ परिचय भेल, बच्चा ठाकुर आ बटुक भाइ भेटलाह। दूरदर्शनपर एकटा कार्यक्रममे बटुक भाइ डा.बासुकी नाथ झा आ शरदिंदु चौधरीक सङ हमरो सम्मिलित केलनि,हम प्रस्तुत केने रही : पोखरिमे मखान गामे-गामे दारू के दोकान गामे-गामे। बादमे ‘समय-साल’ पत्रिकाक सम्पादकीयमे एहि गीतक चर्च भेल, आदरणीय जीवकान्तजी सुचित केलनि। ई रचना ‘विदेह’क १ जून २०११ केर अंकमे प्रकाशित भेल छल। ‘शेखर प्रकाशन’सँ बहुत रास पोथी पढबाक लेल सहजतासँ उपलब्ध भ’गेल। विजय नाथ झाक गीत-गजल संग्रह ‘अहींक लेल’क अतिरिक्त हुनक मैथिली पोथी ‘कन्दर्प कानन’ आ ‘कामायनी’(छन्दानुवाद) सँ परिचय भेल। बच्चा ठाकुरक ‘मैथिली आलोचना साहित्यक दिशाबोध’ आ मैथिली गीत-कविता संग्रह ‘गौरी-गिरामृता’देखल। मधुकान्त झाक पोथी ‘क्रान्ति-रथी’ आ ‘ममता-जोगी’, वैद्यनाथ ‘विमल’क पोथी ‘खण्ड-खण्ड पाखण्ड’,मन्त्रेश्वर झाक पोथी ‘शिरोधार्य’,’द्रुत विलंबित’ ‘टोंटानाथक चिट्ठी’ और ‘कतेक डारि पर’, कामिनीक पोथी ‘समयसँ संवाद करैत’,’परती परहक फूल’आ ‘खण्ड-खण्डमे बँटैत स्त्री’,डा.बासुकी नाथ झाक ‘बोध संकेतन’,कीर्ति नारायण मिश्रक ‘ध्वस्त होइत शान्ति स्तूप’,जीवकान्त जीक ‘छाह सोहाओन’,’खीखिरिक बीअरि’,’गाछ झूल-झूल’,’अधरतियामे चान’,’हमर अठन्नी खसलइ वनमे’ आ ‘पंजरि प्रेम प्रकासिया’,सुधांशु ‘शेखर’ चौधरीजीक ‘भफाइत चाहक जिनगी’,‘जिनगीक बाट’,’निवेदिता’,’लेटाइत आँचर’,’हस्ताक्षर’,’अंगरेजी फूलक चिट्ठी’,’साक्षात्कारक दर्पणमे’,’गीत ओ गजल’ और ’हम साहित्यकार ओ सम्पादक’,शरदिंदु चौधरी जीक ‘जँ हम जनितहुँ’,’बड़ अजगुत देखल’,’गोबरगणेश’,’करिया कक्काक कोरामिन’,’बात-बातपर बात’,’हमर अभाग : हुनक नहि दोष’,’साक्षात्’,उषा किरण खानक पोथी ‘काँचहि बाँस’,’गोनू झा क्लब’आ ‘भामती’,डा. शेफालिका वर्माक ‘मोहपाश’,गोविन्द झा कृत ‘सुबोध मैथिली व्याकरण’,भीमनाथ झाक ‘भनहि भीम कर जोड़ि’,मधुप जीक ‘मधुप गीतिका’,मणिपद्मजीक ‘अनंग कुसुमा’,अशोक कुमार दत्तक ‘झिझिरकोना’,डा.योगानन्द झा द्वारा संकलित –संपादित ‘गहबर गीत’, किशोर केशव आ वंदना किशोर द्वारा संपादित पोथी ‘अक्षर पुरुष’ आदि सेहो शेखर प्रकाशनसँ उपलब्ध भेल। शेखर प्रकाशनसँ ‘घर-बाहर’ अनलहुँ। पाण्डेयजीसँ ‘मिथिला दर्शन’ अनलहुँ। इन्टरनेट पत्रिका ‘विदेह’कें ३० मइक’ एकटा गीत आ एकटा गजल पठौलियनि। रातिमे आशीष अनचिन्हारजीसँ गप भेल। ३१ मइ क’ निर्मलीसँ उमेश मंडलजी गप केलनि। ‘अनचिन्हार आखर’ साइटपर गजलपर पर्याप्त सामग्री देखि हर्ष भेल, लागल जेना हम कते बरखसँ जे तकैत छलहुँ, से भेटि गेल। गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार द्वारा प्रस्तुत गजल शास्त्रक अध्ययन मैथिलीमे गजल लेखन दिस आकर्षित केलक। हमरा गजेन्द्र ठाकुर द्वारा प्रस्तुत सरल वार्णिक बहर सोझ लागल, गजल लिखय लगलहुँ आ ‘विदेह’कें प्रेषित करय लगलहुँ। ‘विदेह’कें सदेह सेहो देखल। विदेह मैथिली शिशु उत्सव,विदेह मैथिली विहनि कथा,विदेह मैथिली पद्य सेहो प्रकाशित भेल जाहिमे गजेन्द्र ठाकुर द्वारा महत्वपूर्ण आलेख ‘शिशु,बाल आ किशोर साहित्य आ ओकर समीक्षाशास्त्र’,’गद्य साहित्य मध्य विहनि कथाक स्थान आ विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र’ और ‘पद्य साहित्य आ ओकर समीक्षा शास्त्र’क संग अनेक नव-पुरान साहित्यकार लोकनिक रचना प्रकाशित भेल। अंगरेजी-मैथिली शब्द कोष प्राप्त भेल। ‘विदेह’ अपना ढंगक एसगर पत्रिका अछि मैथिलीमे। एकर कोनो अंक देखिएक’ ककरो आश्चर्य लगैत छैक जे कतेक विविधता आ कतेक विषय समेटने रहैत अछि ई पत्रिका। सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर अपनो खूब लिखलनि। हिनक चर्चित पोथी ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ सेहो अपना ढंगक एसगर पोथी अछि जाहिपर सेहो मैथिली साहित्य गर्व क’ सकैत अछि। हमर बेसी गजल ‘विदेह’मे छपल। ’विदेह’ लेखक आ पाठक वर्गक विस्तार बहुत सुन्दर ढंगसँ क’ रहल छल। हाइकू, गजल,विहनि कथा,बाल साहित्य,नाटक,बाल गजल,भक्ति गजल,आलोचना-समालोचना-समीक्षा आदि विशेषांक ‘विदेह’मे प्रकाशित भेल। १ जनवरी २०१५ क’मधुपजीपर विशेषांक निकलल, १ नवम्बर २०१५ क’अरविन्द ठाकुर विशेषांक निकलल। १ दिसम्बर २०१५ क’ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ विशेषांक निकलल। राजनन्दन लाल दास आ रामलोचन ठाकुर विशेषांक निकलि चुकल अछि। आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर आ केदार नाथ चौधरी विशेषांक निकल’बला अछि। आगाँ और विशेषांक सभ विदेहमे प्रकाशित हएत। बहुत चर्चित लेखकक बहुत रास चर्चित पोथी सभ उपलब्ध अछि ‘विदेह’क साइटपर, क्यो कखनो अपना सुविधानुसार एहि सभक मङनीमे उपयोग क’ सकैत छथि। आशीष अनचिन्हार ‘अनचिन्हार आखर’नामक मैथिली गजलक प्रथम स्वतन्त्र वेबसाइट बनाक’ ओहि पर गजल शास्त्र प्रस्तुत क’क’ बहुत लोककें गजल लेखन लेल प्रेरित करैत, मार्गदर्शन दैत, पुरस्कारक योजना चला रहल छलाह,बाल-गजल,भक्ति-गजल आदि विशेषांक प्रस्तुत क’ रहल छलाह, गजलकारक परिचय श्रृंखला प्रस्तुत क’ रहल छलाह। अपनो बहुत रास गजल लिखलनि। हिनक गजल संग्रह ‘कुमारि इच्छा’,’जंघाजोड़ी’,’अनचिन्हार आखर’ आदि आ पोथी ‘मैथिली गजलक व्याकरण आ इतिहास’,’मैथिली वेब पत्रिकाक इतिहास’,’मैथिली गजलक रेडी रेकोनर’,’शब्द-अर्थ-शक्ति’ आदि उल्लेखनीय अछि। मैथिली गजलक सामर्थ्य,दिशा आ दशा आदि जनबाक लेल ई पोथी सभ पढ़ब आवश्यक अछि। एहि अभियानसँ बहुत गोटे लाभान्वित भेल छथि। किछु झिझकके बाद हमहूँ एहि अभियानमे शामिल भेलहुँ।हमर गीत लेखनक प्रयास गजल लेखन दिस अग्रसर भेल। हमरा जे कहबाक अछि से गजलक रूपमे कहबामे सुविधाजनक लागय लागल। आशीष अनचिन्हार जी हमरो काफिया बुझबामे आ अरबी बहरमे गजल लिखबामे बहुत सहयोग केलनि।गजलक सम्बन्धमे हुनका द्वारा प्रस्तुत आलेख सभक मनन केलहुँ।’विदेह’मे प्रकाशित गजल सभक अध्ययन केलहुँ। हमर ममियौत भाए डा.शशिधर कुमर हमरा लेल दू टा ब्लॉग बना देलनि : १.आँखिमे चित्र हो मैथिली केर : मैथिली रचना सबहक लेल। २.तिरंगे के लिए : हिन्दी रचना सबहक लेल। हमर मैथिली रचना सभकें मैथिली ब्लॉगपर पोस्ट करबामे सेहो मदति केलनि। हरिमोहन बाबूक आत्मकथा पढ़ल छल। सुधांशु शेखर चौधरी,जीवकान्त आ मन्त्रेश्वर झाजीक आत्मकथा पढ़लहुँ। जीवकान्तजीसँ पटनामे हुनक छोट पुत्र वरुणजीक आवासपर भेंट केलहुँ। आदरणीय जीवकान्तजी कहने छलाह जे पटना आबि गेल छी, त गोष्ठी सभमे जाउ, बजाबय त जाउ, नहियो बजाबय तैयो जाउ। गोष्ठी सभमे जाए लगलहुँ। गणेश झा,विजय नाथ झा,बच्चा ठाकुर आदि साहित्यकार सभक संग मैथिली गोष्ठीक अतिरिक्त हिन्दी गोष्ठीमे सेहो जाए लगलहुँ। हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवनमे बड्ड गोष्ठी होइत छलैक। दूरसँ जेबाक कारणे किछुए दिनमे हम हिन्दी गोष्ठीमे जेबासँ थाकि गेलहुँ। मध्य प्रदेशमे रही, तखने हिन्दीमे लिखबाक अभ्यास भेल छल, आब हिन्दीमे लिखब हमरा लेल कठिन भ’ गेल छल। हम मैथिलीपर ध्यान केन्द्रित केलहुँ, हिन्दीक गोष्ठी सभमे जाएब बंद भ’ गेल। मैथिलीक गोष्ठी सभमे जाएब पटना धरि सीमित रखलहुँ। २०१८ मे मिथिला विभूति पर्वमे दरभंगा गेलहुँ जाहिमे १४ गोटेकें मिथिला विभूति सम्मान देल गेलनि जाहिमे हमहूँ छलहुँ। आदरणीय उदय चन्द्र झा ‘विनोद’जीक अध्यक्षतामे आयोजित कवि सम्मेलनमे हमहू एकटा गजल प्रस्तुत केलहुँ। चेतना समिति द्वारा आयोजित आ राजीवनगरक विद्यापति पर्वक कवि गोष्ठी सभक अतिरिक्त अकादमी आ मैथिली लेखक संघ द्वारा पटनामे आयोजित गोष्ठी सभमे भाग लेलहुँ। चेतना समितिक आयोजनमे आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर,उदय चन्द्र झा ‘विनोद’, बुद्धिनाथ मिश्र,तारानंद वियोगी,मधुकान्त झा,अशोक,रमानंद झा ‘रमण’,विद्या नाथ झा’विदित’,गणेश ठाकुर,बच्चा ठाकुर,छत्रानंद सिंह झा (बटुक भाइ),डा. गंगेश गुंजन,सरस,चंद्रमणि,कामिनी,सदरे आलम गौहर,कमल मोहन ‘चुन्नू’, स्वयंप्रभा झा,कुमार मनीष अरविन्द,रमेश,शारदा झा, मनोज शांडिल्य,मेनका मल्लिक,रानी झा,संस्कृति मिश्र,रघुनाथ मुखिया, नवलश्री पंकज,गुंजनश्री आदि पुरान आ नव साहित्यकार लोकनिकें देखबाक आ सुनबाक अवसर भेटल। ‘क्यो नहि दै अछि आगि’ बुद्धि नाथ मिश्र जीक नीक गीत–संग्रह छनि। हिन्दी आ मैथिली दुनूमे लीखि रहल छथि। चन्द्रमणिजीक सैकड़ो गीत सभ अनेक पोथीमे छनि, करीब पचास बरखसँ मैथिली मंचपर लोकप्रियता प्राप्त करैत आएल छथि।गीतक अतिरिक्त आनो विधामे सक्रिय छथि। ‘काव्य-द्वीपक ओहि पार’,’यथास्थितिक बादक लेल’,’निकती’ आदि रमेश जीक पोथी छनि। ‘निकती’मे रमेशजी द्वारा मैथिलीक गजल शास्त्रपर असंतुलित टिप्पणी कयल गेल अछि। कुमार मनीष अरविंदक पोथी ‘निछ्च्छ बताह भेल’नीक कविता संग्रह अछि। राजीवनगरक गोष्ठीमे विनोद कुमार झा, गणेश झा,किशोर केशवजी,अखिलेश कुमार झा आ जीवानंद ‘निराला’जीसँ सेहो परिचय भेल। अखिलेशजी आकाशवाणी,पटनामे छलाह, आकाशवाणीक लेल ‘आधुनिक कविता एबं ओकर उपयोगिता’ विषयपर १७.१२.२०११ क’ विजयनाथ झा जीक आवासपर गोष्ठीक आयोजन केलनि जाहिमे डा. इंद्र कांत झा, दिनेश झाक संग हमहूँ छलहुँ। अखिलेशजी ‘नवतुरियाक हाथमे मैथिली साहित्यक भविष्य’ विषयपर ६ जून २०१२ क’ हमरा आवासपर गोष्ठीक आयोजन केलनि जाहिमे विजयनाथ झा, अखिलेश कुमार झा, दिनेश झाक अतिरिक्त हमर साढ़ू शुभ चन्द्र झा आ हुनक पुत्र कुमार प्रमोद चन्द्र,राजीव कुमार झाक संग मिथिलेश झाजी सेहो छलाह। प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’ २००८ सँ अपना आवासपर मासे-मासे कवि गोष्ठी आयोजित करैत छलीह,हुनका ओत’ सेहो जाए लगलहुँ।हुनका ओत’ डा.इंद्र कान्त झा, बटुक भाइ,डा. रमानंद झा ‘रमण’, गणेश झा, बच्चा ठाकुर,विजय नाथ झा,अजित आजाद, मनोज ‘मनुज’,बैद्य नाथ मिश्र,कमलेन्द्र झा ‘कमल’, धीरेन्द्र नाथ झा, राम नारायण सिंह,कुमार गगन,गायक आशुतोष मिश्र, रवीन्द्र बिहारी’राजू’ आदि साहित्यकार आ रंग कर्मी लोकनिसँ भेंट भेल, किछु नव लोक सभसँ सेहो परिचय भेल। गणेश झाक काव्य संग्रह ‘नवाद्या’ देखलहुँ। ओत’ हिन्दीक किछु रचनाकार मृत्युन्जय मिश्र’करुणेश’,आर.पी.घायल,नगेन्द्र मेहता,श्री राम तिवारी आ अन्य साहित्यकार सभसँ सेहो परिचय भेल।करुणेश जी आ घायल जीक हिन्दी गजल नीक लागल, मेहताजी पर्यावरण सम्बन्धी नीक रचना सुनबैत छलाह। प्रेमलता जीक नीक कथाकारक रूप हुनक पोथी ‘ओ दिन ओ पल’,’एगो छली सिनेह’ आ ‘शेखर प्रसंग’मे भेटल।ओ पावनि जकाँ सांध्य गोष्ठीक आयोजन मासे-मासे अपना ओत’ करैत आबि रहल छथि। सालमे एकटा पत्रिका ‘सांध्य गोष्ठी’क प्रकाशनक लेल आनन्द आ उत्साहसँ सभसँ रचना प्राप्त करैत छथि, छपबैत छथि आ बिलहैत छथि। धीरेन्द्र कुमार झाक कविता संग्रह ‘अपनाकें अकानैत’, ‘कनिए टा बात’,’अही सभमे कतहु’, कथा संग्रह ‘एहि मोड़ पर’ आ उपन्यास ‘उत्तरार्ध’ पढलहुँ।हिनक कविता,कथा,उपन्यास सभ नीक लगैत अछि। हम मैथिलीमे गीत आ गजल प्रस्तुत करैत छलहुँ। हमर गीत लेखन कम भ’ गेल, गजल सिखबाक आ लिखबाक प्रवृति बढल गेल। सरल वार्णिक बहरमे गजल लिखैत छलहुँ आ ‘विदेह’मे पठबैत छलहुँ। ‘विदेह’ एकटा नव लेखक आ पाठक वर्ग तैयार क’ रहल छल, से उत्साहबर्धक लागल, ओहिमे जगदीश प्रसाद मंडलक रचना बहुत नीक लगैत छल। बादमे पटनामे एक बेर ‘सगर राति दीप जरय’ कार्यक्रममे मंडल जी, हुनक पुत्र उमेश मंडल जीसँ भेट भेल, हुनक पोथी ‘गामक जिनगी’ भेटल। ‘गामक जिनगी’अद्भुत कथा संग्रह लागल। मंडलजीक कथा सभक संग हुनक परिवारक समर्पण कहैत अछि ‘मैथिली अमर रहतीह’। ओहि गोष्ठीमे नव-नव कथाकार लोकनिक कथा सुनबाक आनन्द भेटल। ओत’ विशिष्ट पाठक आदरणीय श्यामानंद चौधरीजी भेटलाह जे ‘तोरा अङनामे’ मे प्रकाशित गीत ‘छोटे-मोटे टूटल मड़ैयामे गौरी कोनाक’ रहती हे’क स्मरण केलनि। ओहिठाम तारानन्द ‘वियोगी’जी सेहो भेटलाह। हुनक पोथी ‘तुमि चिर सारथि’ पढने छलहुँ,एकटा गीत मिथिला दर्शनमे पढलहुँ ‘मदना माएकें रहै सिहन्ता खैतहुँ पूरी खीर,मगर मन लगले रह्लै’-से नीक लागल। ओहो बहुत विधामे लिखबाक सामर्थ्य रखैत छथि। उमेश जी ‘सगर राति दीप जरय’क आयोजनक सूचना दैत छलाह,किन्तु ई आयोजन हमरा स्वास्थ्यक अनुकूल नहि लगैत छल,तें आन ठाम कतहु एहि आयोजनमे नहि जा सकलहुँ, मुदा पता रहैत छल जे एहि कार्यक्रमसँ बहुत काज भ’ रहल अछि, खूब लीखल जा रहल अछि,खूब प्रकाशित सेहो भ’ रहल अछि। पटनामे आयोजित मैथिली साहित्य उत्सवक आयोजनमे सेहो कवि गोष्ठीमे शामिल भेलहुँ। ओहि अवसरपर आदरणीय उदय चन्द्र झा ‘विनोद’जीसँ बहुत रास कविता सुनवाक सौभाग्य प्राप्त भेल। हुनक कविता-संग्रह ‘अथ उत्तरकथा’क रचना सभ बहुत आकर्षक अछि। हुनक एकटा गीत हमरा नीक लगैत अछि ‘ लोक एके छै सभठाँ अनेक छैक गाम, अहाँ करबै जँ नीक त अबस्स लेत नाम।’ २५.११.२०१२ क’ आइ एम ए हॉलमे गौरीनाथक उपन्यास ‘दाग’पर विचार गोष्ठी आ नाटक देखलहुँ। विद्यापति भवनमे यात्री जयंती,मधुप जयंती,हरिमोहन झा जयंती,मणिपद्म जयंतीमे भाग लेलहुँ।२७.११.२०१२ क’ मणिपद्मजीपर विचार गोष्ठीमे भाग लेलहुँ।आदरणीय रामानंद झा ‘रमण’जीक समर्पण आकर्षित केलक।हुनका द्वारा संकलित–संपादित बहुत रास पोथी सबहक पता चलल। गांधी संग्रहालय परिसरमे १८अगस्त २०१३क’ आ डाक बंगला चौराहा लग ‘झा एसोसिएट्स’मे ४ जनवरी २०१४ क’अजित आजादक एकल काव्य पाठ कार्यक्रममे उपस्थित भेलहुँ।’पेन ड्राइवमे पृथ्वी’ हिनक चर्चित कविता संग्रह अछि। पटनासँ मधुबनी गेलाक बाद हिनक बहुमुखी प्रतिभाक चमत्कार लोक देखि रहल अछि। लेखन,सम्पादन,प्रकाशन,आयोजन आदि सभ दिशामे प्रशंसनीय काज क’ रहल छथि। बहुत बादमे ए.एन कॉलेजक सभागारमे सुकान्त सोमक एकल पाठ सेहो सुनबाक अवसर प्राप्त भेल। ओ एकल पाठ आब हुनक स्मृति भ’गेल। रवीन्द्र नाथ ठाकुर, केदार नाथ चौधरी आ कीर्ति नारायण मिश्रक प्रबोध साहित्य सम्मान समारोहमे उपस्थित भेलहुँ। ‘प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’,कामिनीक लेल ‘आखर’द्वारा आयोजित कार्यक्रम देखलहुँ। श्याम दरिहरे जीक पोथी ‘घुरि आउ मान्या’क विमोचन समारोह देखलहुँ। किछु पोथी सभ पढ़लहुँ।हिनक पोथी ‘बड़की काकी एट हॉट मेल डॉट कॉम’ नीक कथा-संग्रह अछि। जगदीश प्रसाद मंडल, उषा किरण खान,श्याम दरिहरे,प्रदीप बिहारी,अशोक,शिव शंकर श्रीनिवास,अमरनाथ मिश्रजीक बहुत रास कथा हमरा आकर्षक लागल। मंडल जीक ‘गामक जिनगी’ अशोकजीक ‘डैडीगाम’, शिवशंकर श्रीनिवासक ‘गुण कथा’,अमरनाथ मिश्र जीक ‘इजोत दिस’,प्रदीप बिहारीक ‘सरोकार’ आदि विलक्षण कथा संग्रह अछि। विद्यापति पर्वक अवसरपर आ आनो अवसरपर मैथिली नाटक देखिक’ आनन्दित भेलहुँ।कुशल रंगकर्मी कुमार गगन और मनोज’मनुज’ आब नहि छथि, हिनका लोकनिक कृतिकें अमरता प्रदान करबाक लेल किशोर केशवक नेतृत्वमे ‘भंगिमा’ द्वारा हिनके सबहक लिखल नाटक ‘सपथ ग्रहण’ आ ‘नदी गोंगियाएल जाय’क उत्कृष्ट प्रस्तुति द्वारा बहुत स्मरणीय कार्यक्रमक आयोजन ३० आ ३१ दिसम्बर २०२१ क’ कयल गेल। मैथिली साहित्य उत्सवमे किरण जीक कथा ‘मधुरमनि’ कें लघु फिल्मक रूपमे देखब नीक लागल। विद्यापति भवनमे फिल्म ‘बबितिया’ देखलहुँ जकर बहुत रास काज मधुबनीएमे भेल छै। चेतना समिति द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी देखबाक-सुनबाक अवसर भेटल। ८ अगस्त २०१५ क’ पटनामे आरम्भ भेल ‘साहित्यिक चौपाड़ि’ कार्यक्रममे दू बेर भाग लेबाक सुअवसर भेटल जाहिमे नव लेखक-कवि सभकें देखबाक-सुनबाक आनन्द प्राप्त भेल,नवलश्री पंकज आ बालमुकुन्दक सम्पादनमे एकटा पोथीक रूपमे सेहो ‘साहित्यिक चौपाड़ि’मे दू बरखक मध्य प्रस्तुत रचना सभकें देखल। नवलश्री पंकज आ बालमुकुन्दक संग सुमित मिश्र गुंजन,पंकज प्रियांशु,श्याम झा,मनीष झा बौआभाइ,आनन्द मोहन झा,अमित पाठक,प्रियंका मिश्र,सुमित झा,अनिमेष मिश्र,रजनीश प्रियदर्शी,सत्यम कुमार झा,विकास वत्सनाभ,नारायण झा,इंद्रकांत लाल,अशोक कुमार दत्त,दयाशंकर मिथिलांचली,मुकुंद मयंक,अखिलेश कुमार झा,घनश्याम घनेरो,अविनाश श्रोत्रिय,सागर नवदिया,रंजीत राज आ और बहुत गोटेक सहभागिता आ सक्रियता नीक भविष्यक सूचना दैत अछि। ‘उपमान’क गोष्ठीमे श्याम दरिहरे, अशोक,प्रदीप बिहारी,अमरनाथ मिश्र आदि कथाकारसँ हुनक बहुत नीक-नीक कथा सभ सुनबाक-गुनबाक लेल अवसर भेटल। विजयनगरमे दरिहरे जीक आवासपर आयोजित गोष्ठीमे अनिल कुमार सिंह जीक गजल सूनल। धीरेन्द्र नाथ झा आ मोहन भारद्वाजजीक आवासपर सेहो गोष्ठीक आयोजन भेल। कोरोनाक कारणे स्थगित ‘उपमान’क गोष्ठी आब पुनः शुरू भेल अछि आ स्थान विद्यापति भवन भेल अछि। दरिहरेजी नहि छथि मुदा, ‘उपमान’हुनक मधुर स्मृति अछि। जनकपुरसँ प्रकाशित पत्रिका ‘आँजुर’,हैदराबाद-सिकंदराबादसँ प्रकाशित ‘प्रवासी’,पटनासँ ‘भंगिमा’द्वारा प्रकाशित छमाही पत्रिका ‘भंगिमा’ आ पटनासँ प्रकाशित ‘पकठोस’सँ सेहो परिचित भेलहुँ। भावना मिश्र ‘हैप्पी फॉर यू’क माध्यमसँ मैथिलीक सेहो सेवा क’ रहल छथि। हुनकहु द्वारा आयोजित साक्षात्कार कार्यक्रममे शामिल हेबाक अवसर भेटल अछि। दीपा मिश्र सेहो बहुत सक्रिय छथि। पत्रिका ‘वाची’क माध्यमस हिनक मैथिली सेवा आनन्दित करैत अछि। और बहुत गोटेक सक्रियता फेस बुक,यू-ट्यूब आदिपर देखैत छी रंग-विरंगक कार्यक्रमक आयोजनक माध्यमसँ। फेस-बुक पर आदरणीय उदय चन्द्र झा ‘विनोद’जीक समसामयिक रचना प्रतिदिन पढैत आबि रहल छी। बिनोद कुमार झाक नीक-नीक कविता सभ सेहो पढबा लेल उपलब्ध भ’ रहल अछि।किछु माससँ दीपा मिश्रक नीक कविता सभ पढबाक लेल भेटैत अछि। भाइ विजय नाथ झा जी खूब लीखि रहल छथि,हुनकासँ रचना सुनबाक अवसर भेटैत रहैत अछि। अजय नाथ झा शास्त्री द्वारा पत्रिका ‘मैथिल पुनर्जागरण प्रकाश’क माध्यमसँ मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसारक अभियान चलैत आबि रहल अछि, अही नामसँ दैनिक अखबारक प्रकाशन सेहो गत २६ दिसम्बरसँ भ रहल अछि। हम साढ़ूक परिवारक सक्रियता सेहो एहि अभियानमे देखि रहल छी। अखबारक पटनाक संस्करण लेल बहुत श्रम क’ रहल छथि प्रमोद बाबू। प्रकाशन आ प्रसारण : हमर रचना सभ इन्टरनेट पत्रिका ‘विदेह’मे १ जून २०११ ( ८३ म) अंकसँ प्रकाशित होमय लागल। ‘मिथिला दर्शन’मे पहिल बेर सितम्बर-अक्टूबर२०११मे रचना प्रकाशित भेल, एहिमे दूटा गीत आ दूटा गजल छपल छल। फेर बादमे किछु और अंकमे गजल प्रकाशित भेल। ’समय-साल’क मइ-जून २०११, जुलाई-अगस्त२०१३,सितम्बर-दिसम्बर २०१३अंकमे, ’पूर्वोत्तर मैथिल’,’अंतिका’क अक्टूबर २०११- मार्च २०१२ अंकमे सेहो रचना सभ छपल। ‘सांध्य गोष्ठी’ पत्रिकाक २०१२के अंकसँ रचना सभ प्रकाशित भेल। ‘कर्णामृत’, ‘घर-बाहर’मे सेहो जनवरी-मार्च २०१३ अंकमे दूटा गजल प्रकाशित भेल आ तकर बादो समय-समयपर किछु रचना प्रकाशित भेल। ‘एजिंग नेपाल’ द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह ‘पियर आमक अमृत रस’मे दूटा कविता ‘हमर संसार’ आ ‘लत्ती’ प्रकाशित भेल। २०१३ मे डा. रामानन्द झा ‘रमण’द्वारा संपादित पोथी ‘मणिपद्म चेतना’मे हमर कविता ‘मणिपद्मक काव्य-संसार एक झलक’ प्रकाशित भेल। आकाशवाणी,पटनाक मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’मे २०१२ मे २३ मार्चक’ रिकॉर्डिंग भेल आ सालमे दू बेर ई अवसर प्राप्त होइत रहल। पटना दूरदर्शनमे २१.०६.२०११ आ ०२.०१.२०१४ क’ रिकॉर्डिंग भेल,कार्यक्रमक प्रसारण क्रमशः ०४.०७.२०११ आ १४.०१.२०१४ क’ भेलै। गीत गंगा : नवम्बर २०१३ मे शेखर प्रकाशनसँ ९६ पृष्ठक पोथी ‘गीत-गंगा’ प्रकाशित भेल। एहि संकलनकेर निम्नलिखित गीत सभ शशिकान्त-सुधाकान्तजीक स्वरमे विभिन्न मंचपर प्रस्तुत कएल गेल छल आ लोकप्रिय भेल छल : ‘तीन कोटि मैथिल ताल ठोकिक’ कहैए ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए।’ ‘सजाउ हे यै बहिना, मैथिलीक प्रतिमा सजाउ’ ‘समधि एला बनि-ठनिक’ धोती-कुरता पहिरिक’ एला डहकन सून’ बेटाके बियाहमे’ ‘आँखिमे चित्र हो मैथिली केर ह्रदयमे हो माटिक ममता माएक सेवामे जीवन बितादी अछि बस यैह एकटा सिहन्ता।’ ‘पटनाक मजा लीय’ दिल्लीक मजा लीय’ बेकार छी अहाँ त बम्बइक मजा लीय’..... किछु गीत महादेव ठाकुरक स्वरमे कैसेटमे आबि चुकल छल : ‘आउ आइ हम सब हिलि-मिलिक’ माँक उतारी आरती, गाउ जय मिथिला,जयति मैथिली,जय भारत जय भारती।’ ‘नोरेके जिनगी कतेक दिन उघबें एना गे सुगिया कतेक दिन रहबें’ किछु गीत आदरणीय उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ आ विभूति आनन्द द्वारा संपादित पत्रिका ‘माटि-पानि’मे प्रकाशित भेल छल। ‘चल घूमैलय मेला, दुरगाजीके मेला’ ‘आउ बाउ आउ, रूसिक’ ने जाउ.....’ ‘उठ-उठ बौआ भेल परात’ ‘देशज’२००१मे ई गीत छपल छल : (१) ‘भरि गाम चोरे त चोर कहू ककरा कोतबालो सैह तखन सोर करू ककरा’ (२) ‘करजेमे जीवें आ करजेमे मरबें एना रे बिल्टू कतेक दिन रह्बें’ ‘मिथिला मिहिर’ मे ई गीत सभ प्रकाशित भेल छल : २६.०२.१९८४ ‘तीन कोटि मैथिल ताल ठोकिक’ कहैए ई प्रवाह मैथिलीक कियो रोकि ने सकैए।’ २०.०९.१९८४ गूर-चाउर मोने-मोने फँकै छी बात लाखो करोड़क करै छी राखि छाती पर हाथ कनी सोचू अहाँ मैथिलीले’ अहाँ की करै छी। जून ८७ पहिल पक्ष ‘नोरेके जिनगी कतेक दिन उघबें एना गे सुगिया कतेक दिन रहबें’ ‘भारती-मंडन’ मे निम्नलिखित गीत सभ प्रकाशित भेल छल : (१) (अंक जुलाइ९६–जून९७) ‘गोली-बारूदक मौसममे हम कविता केहेन सुनाबी हाल देखि बेहाल भेल छी गीत कोनाक’ गाबी’ ( एहि गीतमे नब्बेक दशकक बिहारक स्थितिक वर्णन छल ) (२) (अंक जुलाइ९६–जून९७) ‘हम नहि जायब मास करैलय, हम नहि करब उपास अपनहि मन मन्दिर बनि पाबय तकरहि करब प्रयास’ (३) (अंक ५ ) ‘आएल पानि, गेल पानि,बाटहि बिलाएल पानि’ ‘समय-साल’ मइ–जून २०११ मे निम्नलिखित गीत सभ प्रकाशित भेल छल : (१) ओहिना त मोन धह-धह जरिते रहैत अछि फाटि जाए करेज तेहेन बात नै कहू। (२) पाथरकें भगवान बुझै छी धन्य अहाँ, भगवानक अपमान करै छी धन्य अहाँ। (३) पत्रिका नै किनै छी अखबार नै पढै छी बुझिएक’ हम की करबै समाचार नै सुनै छी। ‘विदेह’मे पोथीक ई गीत सभ प्रकाशित भेल छल : (१) ‘बुच्ची बढती, लिखती-पढ़ती हमरा चिन्ता कथी के? भाग्य अपन अपनेसँ गढती हमरा चिता कथी के?’( विदेह मैथिली शिशु उत्सव/विदेह-सदेह ९ ) (२) ‘मम्मी, तों चिन्ता जुनि कर’( विदेह मैथिली शिशु उत्सव/विदेह-सदेह ९ ) (३) हमरहि खातिर सुरुज उगै छथि हमरहि खातिर चान हमरहि खातिर कोटि तरेगन हमरहि ले’ आसमान।( विदेह मैथिली शिशु उत्सव/विदेह-सदेह ९ ) (४) ‘पोखरिमे मखान गामे-गामे दारूके दोकान गामे-गामे’ (१.६.२०११) (ओहि समय बिहारमे शराब-बन्दी नहि भेल छल ) (५) भूख अशिक्षा आ अन्हार अछि मिथिलामे गर्म बहुत ब्याहक बजार अछि मिथिलामे। (१५.०१.२०१२) निम्नलिखित गीत रायपुरसँ प्रकाशित पत्रिका ‘मिथिलायातन’क दिसम्बर २००५ अंकमे प्रकाशित भेल छल : ‘बनाउ हे यै कनियाँ घ’रेकें मन्दिर बनाउ।’ ‘गीत-गंगा’ संकलनक आदिमे आत्म-गीत देल गेल अछि जे हमरा विषयमे बहुत किछु कहैत अछि। एहि संग्रहक निम्नलिखित सहित किछु और गीत हमरा नीक लगैत अछि : ‘हम आङन छी अहाँ अरिपन छी’ १६.११ क’ विद्यापति पर्वक अवसरपर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमक मंचपर पोथीक विमोचन भेल। १४ दिसम्बरक’ फ्रेजर रोडमे मैथिली लेखक संघक बैसारमे पोथीपर चर्चा भेल। डा.कमल मोहन चुन्नू पोथी पर समीक्षा-आलेख पढलनि। चर्चामे कथाकार अशोक, सुकान्त सोम,डा.रामानंद झा ‘रमण’,अजित आजाद आ मोहन भारद्वाज आ किछु और साहित्यकार लोकनि अपन-अपन विचार रखलनि। रमनजीक कहब छलनि जे हमर पहिल पोथी’तोरा अङनामे’क तुलनामे ‘गीत-गंगा’मे गाम कम अछि। सुकान्त सोमक कहब छलनि जे रवीन्द्रजीक गीत सूनिक’ जेना लगैत अछि जे ई मैथिली गीत अछि, से आकर्षणक कम अछि एहि संग्रहक गीत सभमे। अजित आजाद गोष्ठीक संचालन केलनि, आदरणीय मोहन भारद्वाज अध्यक्ष छलाह। अध्यक्षजी मैथिली आन्दोलनक दृष्टिसँ पोथीकें देखबाक विचार रखलनि। डा.कमल मोहन चुन्नू जी एहि संकलनक रचना सबहक किछु दुर्बल पक्षक सेहो चर्च केने छलाह। हम चाहलहुँ जे हुनक आलेख प्रकाशित होइ कोनो पत्रिकामे, आ हम आगाँ रचनामे ओहि दुर्वलतासँ बचबाक ध्यान राखि सकी, परन्तु चुन्नू जीसँ ओ आलेख प्राप्त नहि भ’ सकल। ओहि गोष्ठीमे हम आत्मगीतक किछु भाग प्रस्तुत केने छलहुँ।हमहूँ किछु ‘होम वर्क’क’क’ नहि गेल रही, तें अपन गीत सभक नीक पक्षकें सबहक सोझाँ नहि राखि सकलहुँ। ‘विदेह’मे विशेषांक : ‘विदेह’क १९१ म (१.१२.२०१५) अंक जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ विशेषांक छल। हमर मैथिलीक प्रकाशित तीनू पोथीक पी.डी.एफ.विदेहक साइटपर छल। विशेषांकमे तीनू पोथीपर समालोचना प्रकाशित भेल। ’तोरा अङनामे’क समीक्षक छलाह डा.अजित मिश्र, दीर्घ कविताक पोथी ‘धारक ओइ पार’क समीक्षक छलाह आशीष अनचिन्हार। ‘गीत-गंगा’क समीक्षा डा.अमरनाथ ठाकुर, कामिनी, छत्रानंद सिंह झा, परमानन्द प्रभाकर आ केदार कानन केने छलाह,अरविन्द ठाकुरजीक आलेख सेहो छनि। विशेषांकमे ‘गजल गंगा’क अंतर्गत सरल वार्णिक बहरमे ६१ टा आ अरबी बहरमे २० टा गजल प्रकाशित भेल। एहिपर जगदानंद ‘मनु’जीक समीक्षा सेहो प्रकाशित भेल। बालमुकुन्दजीक आलेख सेहो सम्मिलित छल। अपन सम्पादकीयमे गजेन्द्र ठाकुर सेहो गजल-गंगाक रचना सभ पर सेहो टिप्पणी केने छलाह। हमर जीवनीक रूपमे डा. शशिधर कुमरक आ संस्मरणक रूपमे प्रो. गंगानंद झाजीक आलेख सेहो छल विशेषांकमे। हमर आत्मकथाक किछु अंश, संस्मरण’एकटा छलाह ननू कका’, एकांकी ‘कोराँटी’, आलेख ‘हमर तीर्थ यात्रा गीतसँ गजल धरि’,किछु दोहा आ चतुष्पदी, किछु चिट्ठी आ किछु अप्रकाशित रचना सभ सेहो छल एहि विशेषांकमे। ‘गजल-गंगा’क रचना सभ पर जगदानंद ‘मनु’क समीक्षामे जे त्रुटि सभ देखाओल गेल छल, ओहि सभक निराकरण कय हम संशोधित ‘गजल-गंगा’ ‘विदेह’क बादक अंकमे प्रस्तुत केलहुँ, मुदा ओहो सुधार अंतिम नहि छल। फेस बुकपर : १५ दिसम्बर २०१७ सँ २७ मार्च २०१८ धरि प्रतिदिन पोस्ट करैत १०१ टा गजल आ किछु गीत फेस बुकपर पोस्ट केलहुँ। पाठकीय प्रतिक्रियाकें ध्यानमे रखैत पुनः किछु गजलमे सुधार केलहुँ। यू-ट्युबपर : हमर गीत संग्रह ‘तोरा अङनामे’क निम्नलिखित गीत सभ यू-ट्युबपर विभिन्न गायक लोकनिक स्वरमे विभिन्न तिथिक’ प्रसारित कयल गेल अछि, तकर संक्षिप्त विवरण देल जा रहल अछि : गीतक नाम गायक अन्य सूचना मोन होइए अहाकें देखिते रही (i)सुरेश पंकज (ii)हेमकांत झा बौआ दुनू हाथ जोरि करू माटिकें प्रणाम सुरेश पंकज भौजी आइ ने छोड़ब सुरेश पंकज एवं अन्य ई जुनि पूछू अहाँ बिना (i) हरिनाथ झा (ii) बिजय सिंह तोरा अङनामे वसन्त नेने आएब सजना राजेश ठाकुर फगुआ आएल,फगुआ गेल राजेश ठाकुर आधा अंगक मालिक छी अहीं सुरेश पंकज जुनि कान जुनि कान जुनि कान रे अशोक चंचल छोटे-मोटे टूटल मड़ैयामे गौरी (i) मैथिली ठाकुर गीतकारक नाम अंकित नै केने छथि, सूचना देल गेल छनि। (ii) रजनी पल्लवी गीतकार महाकवि विद्यापति अंकित केने छथि। गीत संग्रह ‘गीत-गंगा’क निम्नलिखित गीत सेहो यू-ट्युबपर देखल अछि : गीत : समधि एला बनि-ठनिक’ स्वर : अरविन्द कुमार झा ‘कविता कोष’ पर प्रकाशित हिन्दीमे लिखल हमर दस टा गीत- गजल राजा शर्माक स्वरमे काव्य पाठक रूपमे यू-ट्युबपर अछि। गीत : ‘मैं कभी मन्दिर न जाता’ ‘मालती विचार हो गई’ ‘मैं जगा तो आज सूर्योदय हुआ’ ‘काजल की कोठरी में मैं और मेरे साथ मेरा मन’ ‘मै कहता हूँ चीज पुरानी घर के अन्दर मत रखो’ गजल : हर जगह बस दीनता-ही-दीनता है / एक भिखारी दूसरे से छीनता है अपनी इच्छाओं का ही विस्तार है / जिन्दगी जैसी भी है स्वीकार है कभी ख़ुशी मिली तो कभी गम कहीं मिला/ जो भी मिला किसी से कभी कम नहीं मिला गुल ही गुल है खार नहीं है / ऐसा तो संसार नहीं है यूं दिल में अरमान बहुत हैं / अक्षत कम भगवान बहुत हैं ई हिन्दी रचना सभ १९९३ स १९९९के बीच डोमनहिल, चिरिमिरी(मध्य प्रदेश/ छत्तीसगढ़)मे रही, तखने लिखाएल रह्य। पर्यावरण गीत : किशोर केशव जीक सूचनापर वन विभाग द्वारा पर्यावरण गीत-मालाक लेल प्रेषित रचनामे ह्मरहु एकटा मैथिली आ एकटा हिन्दी गीत चुनल गेल, २०१४ मे १३ फरबरी आ १७ जूनक’ सी.डी. प्राप्त भेल। अनुवाद कार्य : कन्नड़ भाषाक छओटा संत सभक चौरानवेटा ( १३७५-१४६९) वचनक अनुवाद कार्य हमरा किशोर केशव जीक माध्यमसँ भेटल छल, से पूर्ण कएल। ‘वचन’ नामक संकलनमे विभिन्न कन्नड़ सन्त सभक २५०० वचनक अनुवाद लेल १४ टा मैथिली साहित्यकारमे हमहू शामिल भेलहुँ। अनुवाद कार्य लेल दिल्लीक कर्नाटक भवनमे आयोजित कार्यशालामे भाग लेबाक हेतु पटनासँ किशोर केशव जीक संगे गेल रही, ओत’ उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’,प्रो.देव शंकर नवीन,प्रो.विद्यानंद झा,अरुणाभ सौरभ आ चन्दन कुमार झा भेटलाह। ‘वचन’क मैथिली अनुवादक सम्पादक आदरणीय नचिकेता जी छलाह। मूल कन्नड़ सम्पादक छलाह स्व.डा.एम.एम.कलबुर्गी। बसव शताब्दी(१९१३-२०१२) जयंतीक अवसर पर ई कार्य भेल छलै। समीक्षा आ आलोचना : आदरणीय मन्त्रेश्वर झा लिखित ‘चिनवार’ उपन्यासपर कविताक रूपमे समीक्षा लिखलहुँ जे ‘पूर्वोत्तर मैथिल’ पत्रिकामे छपल। चन्दन कुमार झाक काव्य-संकलन ‘धरती सँ अकास धरि’केर समीक्षा सेहो ‘समय-साल’ अथवा कोनो दोसर पत्रिकामे छपल। ‘विदेह’मे प्रकाशित अरविन्द ठाकुर विशेषांक लेल अरविन्द ठाकुर जीक गजल संग्रह ‘बहुरुपिया प्रदेशमे’ पर समीक्षा प्रस्तुत केलहुँ : अरविन्द जीक आजाद गजल। सियाराम झा ‘सरस’जीक गजल संग्रह ‘थोड़े आगि थोड़े पानि’ पर प्रस्तुत केलहुँ : प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल। शरदिंदु चौधरीजीक पोथी ‘गोबर गणेश’ आ मधुकान्त झाजीक पोथी ‘क्रान्ति रथी’पर सेहो समीक्षा लिखलहुँ। डा.कमल मोहन चुन्नूजीक गजल संग्रह ‘आबि रहल एक हाहि’ आ एहिपर आशीष अनचिन्हारजीक आलोचनापर पाठकीय प्रतिक्रिया फेस-बुकपर प्रस्तुत कयल गेल। अरविन्द ठाकुरजीक गजल संग्रह ‘मीन तुलसी पातपर’ आ एहिपर आशीष अनचिन्हारजीक आलोचनापर पाठकीय प्रतिक्रिया सेहो हमरा द्वारा फेस-बुकपर प्रस्तुत कयल गेल अछि। आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जीक गीतक लेल समीक्षात्मक आलेख ‘भरि नगरीमे सोर’ आ हुनक गजलक पोथी ‘लेखनी एक रंग अनेक’क लेल समीक्षा ‘विदेह’ द्वारा प्रस्तावित ‘रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक’लेल प्रस्तुत कयल गेल अछि। समय-समयपर फेसबुकपर सेहो किछु पोथी सभपर अपन उद्गार प्रगट करैत आएल छी। पटना / ३१ मार्च २०२२ (२९) प्रीति-विवेक-आर्षभ हमर विचार छल जे विवाहमे लड़का-लडकीक पसंदकें प्राथमिकता देल जाए, दूनू एक-दोसरकें पसिन्न क’ लेथि त कन्याक पिताकें स्वतंत्रता देल जाइन, हुनका कोनो लक्ष्य नहि देल जाइन,वरियातीमे कम-सँ-कम लोक रहथि,द्विरागमन जतेक जल्दी संभव हो,से ध्यान राखल जाए। ‘गीत-गंगा’क प्रकाशनक समय शेखर प्रकाशन कए दिन गेलहुँ। चौधरीजीसँ गप होइत छल। साहित्यिक चरचाक अतिरिक्त पारिवारिक गप सेहो होइत छल। एक दिन चौधरीजी कहलनि जे एकटा कन्यादान करबाक अछि, कोनो उपयुक्त कथा ध्यानमे आबय त कहब। हम कहलियनि, हमरा फोटो आ बायोडाटा द’ दिय’, हमरा ध्यानमे आएत त अवश्य कहब। हमरा चौधरीजी फोटोयुक्त बायोडाटा देलनि। हम घर आबि पत्नीकें कहलियनि जे चौधरीजी सेहो कन्यादान करताह, फोटो आ बायोडाटा देलनिहें। बच्ची सेहो फोटो आ बायोडाटा देखलनि आ किछु सोच’ लगलीह। हम सभ विवेक लेल ई कथा उपयुक्त हेतनि कि नहि, एहिपर विचार केलहुँ। विवेककें सेहो फोनपर एहि सम्बन्धमे पुछलियनि। प्रीति राजनीति विज्ञानमे एम.ए. छलीह आ पटनेमे कोनो नोकरीमे छलीह। विवेक नवी मुंबइमे एकटा प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज मे कंप्यूटर विज्ञानमे सहायक प्राध्यापक छलाह। बादमे शेखर प्रकाशन गेलहुँ त चौधरी जीकें कहलियनि जे एखन यदि बहुत पाइ कमाए बला लड़काक प्राथमिकता नहि हो त एहि प्रस्तावपर विचार क’ सकैत छी। दीयाबातीक अवसरपर विवेककें एबाक छलनि। हम चौधरीजीकें कहलियनि जे आबि जेताह त हम सुचित करब, अहाँ आबिक’ देखिक’ गप करू,यदि ठीक लागय त बात आगू बढाएब हम सभ। विवेक दीयाबातीमे एलाह। चौधरीजीकें सुचित केलियनि। चौधरीजी अपन साढ़ूक संगे ५.११.२०१४ क’ हमरा आवासपर एलाह। दुनू गोटे दू घंटा करीब समय देलनि। बात आगाँ बढयबाक संकेत देलनि। हम प्रस्ताव देलियनि जे एक दिन हम दूनू गोटे अपन-अपन परिवारक संग कतहु भेंट-घाँट करी, सभ गोटे एक दोसरसँ परिचित होथि। १० क’ पटनामे महावीर मन्दिरक आङनमे हम सभ जमा भेलहुँ। ओत’ गप केनाइ कठिन छल। ओत’ सँ इको पार्क जाइ गेलहुँ। हम दूनू गोटे, हमर साढ़ू दुनू गोटे आ साढ़ूक माझिल पुत्र राजू छलाह। राजूक गाड़ीसँ हम सभ गोटे गेल छलहुँ। चौधरीजी सेहो अपने दुनू गोटे दुनू पुत्रीक संग छलाह,हुनक साढ़ू दुनू गोटे सेहो छलखिन। करीब चारि घंटा सभ गोटे ओहि ठाम छलहुँ। सभ गोटे एक दोसरसँ गप केलनि। विवेक १३ क’ मुंबइ गेलाह। दुनू गोटेक परिवार सहमत भेल। आगाँक काज आसान भ’ गेल। ७ दिसम्बरक’ चौधरी जी अपन साढ़ूक संग २.३० बजे एलाह। हमहूँ अपन साढ़ूकें बजा नेने रहियनि। ओ २ बजे आबि गेल छलाह। हुनका संग हम विचार क’ नेने छलहुँ। निम्नलिखित बातपर सहमति भेल : ५ मार्चक’ विवाह हएत। हमरा बजार-हाट करबाक काज नै रहत। हुनका बेटी-जमाएक लेल जे पार लगतनि, से करताह, हुनका कोनो लक्ष्य नै देल गेलनि, कोनो शर्त नहि राखल गेल। वरियातीमे करीब २५ गोटे रहताह। वरियातीक भोजन शाकाहारी आ पियाजु-लहसुन रहित रहतनि। ६.१५ बजे धरि गप भेलै। १७ फरबरीक’ शेखर प्रकाशन जाक’ कार्ड ल’ एलहुँ। १८ क’ एकटा कार्डपर श्री सीताराम आ दोसरपर भगवती लीखिक’ पूजा घरमे राखल गेल। २४ क’ चौधरीजीसँ कोबरक चित्र आ गाड़ीपर साट’ लेल नामबला कागत अनलहुँ। ३ मार्चक’ गुआ माला आ पाग-घुनेशल’ एलहुँ। ५ क’ चौधरी जीक इन्द्रपुरी आवास परिसरमे विवाह-कार्य संपन्न भेल। वरियातीमे २६ गोटे छलाह। गामसँ ८ गोटे आएल छलाह जाहिमे हमर छोट भाए अपन दुनू पुत्रक संग छलाह,दूटा भातिज बच्चा बाबू आ मिथिलेश,एकटा पित्ती शिव नारायण कका,एकटा ग्रामीण सिंहजी आ ड्राइवर छलाह। हम दुनू बेटी,दुनू जमाए,एकटा नातिक संग छलहुँ, साढ़ू तीनू पुत्र, दू पुत्रबधू, दू पौत्री आ एक पौत्रक संग छलाह। ३ बजे भोरमे दिल्लीसँ हमर सबसँ छोट बहिन,बहिनो आ भगिनी एलीह। हुनका सभकें स्टेशनसँ आनल गेलनि, ओहो सभ इन्द्रपुरी गेलीह आ विवाह देखलनि। १० मार्चक’ द्विरागमन भेलनि। रिसेप्शनक जे आयोजन शहर सभमे होइ छै, से हमरा उपयुक्त नहि लगैत अछि। हमरा लगैत अछि जे दाम्पत्य जीवनक बाटपर हँसी-ख़ुशीसँ चलबाक लेल एकटा मार्ग दर्शक आयोजन हो जाहिमे अनुभवी लोक सभ अपन अनुभवक आधारपर किछु सूत्र देथि वर-बधूकें जे हुनका जीवनमे काज अबनि। हमरा मोनमे ई विचार त छल मुदा, कोनो रूपरेखा स्पष्ट नहि छल जे कोना हो। हम एकटा प्रयोगक रूपमे पाँचटा साहित्यकार सभकें एहि लेल मित्रवत आमंत्रित केलियनि। एहिमे कोनो भोजक आयोजन नहि भेलै। एकर नाम आशीर्वाद गोष्ठी रखलहुँ। ११ क’ आशीर्वाद गोष्ठी भेल। गोष्ठीमे आदरणीय बटुक भाइ,प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’ ,रमानन्द झा ‘रमण’, कथाकार अशोकजी,आ किशोर केशव जी शामिल भेलाह। चौधरीजी अपन पुत्र राजा शेखर, दुनू पुत्री स्वाती शेखर आ दीप्ति शेखर और जमाए सुशीमजीक संग एलाह। हमरा दिससँ हमर साढ़ूक परिवारक अतिरिक्त जेठ साढ़ूक पुत्र अशोक कुमार झा , हमर दुनू बेटी-जमाए आ राघोपुरबला समधि सेहो छलाह। एकर आयोजन अपनहि घरक छतपर भेल। आदरणीय बटुक भाइ, प्रेमलता जी, अशोक जी, रमणजी,किशोर केशव जी, सुशीमजी, चौधरीजी, हमर राघोपुर बला समधि वैद्यनाथ झाजी, जमाए राजीव रंजन झाजी, हमर साढ़ू,हमर पड़ोसी मास्टर साहेब गोपी सिंहजी, आ जेठ साढ़ूक पुत्र अशोक बाबू सभ गोटे अपन-अपन सफल दाम्पत्य जीवनक अनुभवसँ किछु सूत्र आ मार्गदर्शनक संग शुभकामनाक प्रसाद वर-बधूकें देलखिन से हमरो नीक लागल। हमरा लागल जे कार्यक्रम नीक रहल। ओना हम इहो समीक्षा केलहुँ जे कार्यक्रमक समापनमे हमर कंजूसी उचित नहि छल। एहि कार्यक्रमक प्रभाव वर-बधू पर कतेक पड़लनि से कहब एखन कठिन अछि, किन्तु एखन धरि ई देखलहुँ जे कखनहुँ मतान्तर भेबो केलनि त बहुत जल्दी स्थिति सामान्य भ’ गेलनि। सिद्ध पुरुषक आशीर्वाद कोनो-ने-कोनो रूपमे जीवनमे अवश्य काज अबैत छैक। २८ मइ क’ बट-सावित्री पूजा भेलै। ७ जुलाइक’ विवेक प्रीतिक संग पटनासँ प्रस्थान कए ८ क’ मुंबइ पहुँचलाह। १६ जुलाइक’ पंचमी पावनि भेलै, प्रीति मुंबइमे वसन्तक घरमे पूजा शुरू केलनि। ३० क’ ओतहि मधुश्रावणी पावनि भेलनि। ७ अक्टूबरक’ कोजगरा छलै। विवेक नोकरीक विवशताक कारण पटना एबासँ असमर्थ छलाह। हुनक विचार भेलनि जे मुंबइएमे घरमे किछु संगी सभकें ओहि राति भोजन कराक’ कोजगरा ओतहि मना लेताह, हम सोचलहुँ जे परम्परा सभ लोकक हितक लेल बनल छै, तें यदि बदलल परिस्थितिमे परम्परामे किछु संशोधनक आवश्यकता होइ त करबामे कोनो हर्ज नै छै। विवेक आ प्रीतिक सुविधाकें ध्यानमे रखैत कोनो पावनिक कोनो विधिमे जखन जत’ जे किछु परिवर्तनक आवश्यकता भेलै से होइत चल गेलै। चौधरीजी सभ पावनिमे अपन तन-मन-धनक संग अवश्य उपस्थित होइत रहलाह। २०१७ मे १२ नवम्बरक’ पटनाक सहयोग अस्पतालमे प्रीति माए बनलीह। ओहि समय नैहरेक संरक्षणमे छलीह। हम सभ सेहो उपस्थित भेल रही। हम छठिहार दिन पौत्रकें आशीर्वाद देबाक लेल इन्द्रपुरी गेल छलहुँ। विवेकक चुनल किछु नाममे ‘आर्षभ’ नामपर हमहूँ सहमत भेलहुँ। विवेक ५ दिसम्बरक’ सासुर गेलाह। चौधरीजी ओत’ ९ दिसम्बरक’ पूजा आ भोज केलनि। विवेक १७ क’ एसगरे मुंबइ गेलाह। २४ जनवरी २०१८ क’ प्रीति बच्चाक संग सासुर एलीह। ४ फरबरीक’ एकटा छोट-छीन भोजक आयोजन भेल जाहिमे मात्र साढ़ूक परिवारक सभ सदस्य छलाह, कनियाँ सभ भोजनक तैयारीमे सेहो सहयोग केलखिन। १९ मइक’ प्रीति हाजीपुरसँ ट्रेनसँ मुंबइक लेल प्रस्थान केलनि। ओही ट्रेनसँ वसन्त सेहो अपन धिया-पूताक संग मुंबइ जा रहल छलीह। विवेक कुर्लासँ बोईसर ल’ गेलखिन। विवेक किछु बरख बोईसरक इंजीनियरिंग कॉलेजमे सहायक प्राध्यापक रहलाह। बादमे कोनो कम्पनीमे नोकरीक लेल तैयारी कर’ लगलाह, परिवार पटना छोड़ि गेलाह। २०२० मे २६ जनवरीक प्रीति नैहर गेलीह। ११ फरबरीक’ ए.एन. कॉलेजक सामने डा. के.के.कंठक अस्पतालमे गाल ब्लैडरमे पथरी हटयबाक लेल ऑपरेशन भेलनि। तकर बाद कोरोनाक कारणे नैहरमे तेना घेरा गेलीह जे आर्षभक मूड़न सेहो ओतहि करब’ पड़लनि। २९ अप्रैलक’ भेलनि आर्षभक मूड़न। चौधरी जी ओत’ भगवानक पूजा भेलनि। हम अपना घरमे रामायणक सुन्दर काण्डक पाठ केलहुँ। आवश्यतानुसार प्रीति सासुर आ नैहर जाइत-अबैत रहलीह। विवेक कोनो कम्पनीमे किछु दिन काज केलनि, मुदा मुंबइमे कोरोनाक कारण २३ दिसम्बरक’ पटना आबि गेलाह। विवेक पटनामे नोकरीक प्रयास केलनि, नै ताकि सकलाह। २०२१ मे २० नवम्बरक’ विवेक नोकरीक लेल पुनः पटनासँ मुंबइ लेल प्रस्थान केलनि,२२ क’ ओत’ पहुँचलाह। २७ मार्च २०२२ क’ प्रीति सेहो आर्षभक संग मुंबइ गेलीह। आर्षभ एहि ठाम किछु मास स्कूल गेल छलाह, शेष समयमे हमरो सबहक मनोरंजन करैत रहैत छलाह, दादीसँ बेशी निकटता छलनि। मुम्बइ गेलाह त एहि ठामक स्मृति कम भ’ गेलनि। पटना / १४.०३.२०२२ (क्रमशः) -जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ (सम्पर्क : ८७८९६१६११५) जगदानन्द झा 'मनु' जे त्रुटिक उल्लेख केलनि तकर परिणाम थिक ‘संशोधित गजल-गंगा’ 'विशेषांक’क (१९१ म अंक) आयोजनक लेल समस्त विदेह परिवारकें धन्यवाद। हमर गजल-लेखन अन्हारसं इजोत दिस यात्रा अछि। अहाँक सम्पादकीयसँ लागल जे हमर यात्राक दिशा सही अछि। से नीक लागल| भाइ सरसजीक वकतव्यमे आत्मीयताक अनुभव भेल हमर रचनामे सुधार हो,से उद्देश्य रहल हेतनि। हमहूँ चाहैत छी जे सुधार हो। ओहि लेल प्रयास केलहुँ आ एखनो क' रहल छी। भाइ जगदानन्द झा 'मनु' जे त्रुटिक उल्लेख केलनि से नीक लागल। नीक लागल,तकर प्रमाण अछि जे हम त्रुटि सभकें दूर करबाक निर्णय केलहुँ। आशीष अनचिन्हार जी व्याकरण-सामग्री उपलब्ध करौलनि। 10 -12 दिन समय लगौलहुँ। दोष-मुक्ति हमर लक्ष्य अछि। ‘संशोधित गजल-गंगा’ उपलब्ध करा रहल छी। हम चाहब जे 'मनु'जी देखथि, और कियो देखथि। हमरा कहथि। हमरा नीक लागत| कतहु कोनो त्रुटि रहि गेल हेतै त हम फेर सुधार करब। डा.अजीत मिश्रजी जाहि दोख दिस ध्यान दियौलनि अछि से लगैत अछि जे नेट पर जे प्रति (तोरा अंगनामे) उपलब्ध छै ताहिमे छै। मूल पोथीमे ओ दोख नै छै। भाइ केदार कानन 'गीत गंगा' पर चर्च करैत जे अपेक्षा केलनि अछि से किछु दूर धरि 'गजल गंगा'मे आएल अछि । भाइ अरविन्द ठाकुरक आलेख विस्तृत आ विद्वतापूर्ण छनि | हम देखि रहल छी आ ओहिपर विचार क’ रहल छी | दीर्घ कविता ‘धारक ओइ पार’पर आशीष अनचिन्हारजीक आलोचनामे नवीनता अछि | प्रो.गंगा नन्द झाक संस्मरण आ ‘गीत गंगा’पर आदरणीय श्री छ्त्रानंद सिंह झा आ डा.अमर नाथ ठाकुरक समीक्षा/ आलोचनामे बेशी आत्मीयताक अनुभव भेल | ‘गीत गंगा’पर कामिनीजी आ परमानन्द प्रभाकरजीक समीक्षा-आलोचना आ ‘गजल गंगा’पर बाल मुकुंद पाठकजीक आलेखसँ आनंदित भेलहुँ | डा.शशिधर कुमरक आलेखमे उत्साह आ मैथिलीमे लेखनक प्रति प्रतिबद्धता झलकैत अछि, से प्रशंसनीय अछि| सभ रचनाकार सहित समस्त ‘विदेह’परिवारकें एहि आयोजनक लेल धन्यवाद ज्ञापित करैत हमरा हर्ष भ’ रहल अछि | मैथिली गजलक संसारमे ‘अनचिन्हार आखर’ मैथिली गजल आ शेरो-शाइरीक लेल ‘अनचिन्हार आखर’ बहुत महत्वपूर्ण नाम अछि | 2008 मे इन्टरनेट पर मैथिली गजल आ शेरो-शाइरीक स्वतंत्र अभियान ल’क’ ‘अनचिन्हार आखर’ नामक ब्लागक संग उपस्थित भेलाह युवा रचनाकार आशीष अनचिन्हार | पहिल बेर गजेन्द्र ठाकुर द्वारा तेरह खंडमे गजल शास्त्र प्रस्तुत कएल गेल आ एतहिसं शुरू भेल मैथिलीमे सरल वार्णिक बहर | स्वयं आशीष अनचिन्हार सेहो एहि ब्लॉगपर मैथिलीमे गजल लिखबाक लेल व्याकरण प्रस्तुत करैत कतेक गजल लिखलनि आ आनो रचनाकार सभसं संपर्क कए हुनका सभकें प्रेरित केलनि गजल लिखबाक लेल |बहुत रचनाकार एहि अभियानमे सम्मिलित भेलाह | इन्टरनेट पत्रिका ‘विदेह’क एक अंकमे सरल वार्णिक बहरमे आशीष अनचिन्हारक बहुत रास गजल प्रकाशित भेल |आशीषजीक एहेन 78 टा गजल 32 टा कता आ किछु रुबाइक संग वर्ष2011 मे एक पोथीमे आएल जकर नाम अछि ‘अनचिन्हार आखर’जे हमरा जनैत मैथिलीमे पहिल एहेन पोथी अछि जाहिमे सरल वार्णिक बहरमे 78 टा गजल अछि | एहि पोथीकें दू बेर पढलाक बाद हमर जे मंतव्य अछि से निम्नलिखित शब्दमे व्यक्त कएल जा रहल अछि : 1) एहि पोथीक आरम्भमे गजलक इतिहास आ मैथिली गजलक व्याकरण प्रस्तुत भेल अछि | शेर, मतला, रदीफ़, काफिया, मकता आ बहरसं नीक जकां परिचय कराओल गेल अछि | 2) पोथीमे 78 टा गजलक अतिरिक्त 32 टा कता आ 2 टा रुबाइ अछि | 3) 76 टा गजलमे रदीफ़ आ काफिया दूनू अछि | 2 टामे काफिया मात्र अछि | 4) 2 टा गजलमे 6 टा शेर अछि | शेषमे पांच-पांचटा शेर अछि | 5) वर्णक संख्याक अनुसार गजलक संख्या एहि तरहें अछि : 8 वर्णक 1 टा गजल अछि 9 वर्णक 1 टा गजल अछि 10 वर्णक 2 टा गजल अछि 11 वर्णक 4 टा गजल अछि 12 वर्णक 8 टा गजल अछि 13 वर्णक 3 टा गजल अछि 14 वर्णक 11 टा गजल अछि 15 वर्णक 12 टा गजल अछि 16 वर्णक 13 टा गजल अछि 17 वर्णक 7 टा गजल अछि 18 वर्णक 6 टा गजल अछि 19 वर्णक 4 टा गजल अछि 20 वर्णक 6 टा गजल अछि 21 वर्णक 1 टा गजल अछि (6 ) मतला : मतला सभमे रदीफ़/ काफियाक पालन नीक भेल अछि | अपवादमे निम्नलिखित गजल सभ अछि : गजल क्रमांक--56 बुझाइत / मिझाइत गजल क्रमांक--71 तबीयत / रैयत गजल क्रमांक--77 ओन्नी / मुन्नी (7 ) काफिया : मतलाक काफिया आ आन शेर सभक काफियामे मिलान अछि | अपवादमे निम्नलिखित गजल सभकें देखल जाए : गजल क्रमांक मतलाक काफिया आन शेर सबहक काफिया 10 दुराचार / भ्रष्टाचार बेकार, सरकार,अन्हार, अनचिन्हार 20 भड़ुएक / पहरुएक मालिएक, निशबदीएक 29 अदना/ पदना विपदा,तगमा,भगवा,सुगवा 35 रोकब/ ठोकब फ़ोड़ब,तोडब 36 बहन्ना / सन्ना जुन्ना 43 राति / पांति आँखि, माटि, हडाहि 55 टूटैत / छूटैत लुटैत, कटैत,खसैत 65 जरैत / डरैत भरतैक, बजैत, रहैत 67 खसा/ बसा बना,सजा,नचा 71 तबीयत / रैयत किस्मत 73 मानू / जानू बेकाबू (8) मकता : बत्तीस टा गजलमे मकताक प्रयोग भेल अछि, से नीक भेल अछि | (9) भाषा आ भाव पक्ष : गजलकारक अनुसार गजलकें प्रेमी-प्रेमिका ( आत्मा-परमात्मा )क गप्प-सप्प सेहो मानल जाइत छैक आ गप्प-सप्प सदिखन गद्यमे होइत छैक, तें गजल लेल गद्यात्मक भाषा हेबाक चाही | से गद्यात्मक भाषाक नीक स्तरक आकर्षण सभ रचनामे अछि | गजलकार कहैत छथि : “हम अपन गजलमे (किछु शब्दक ) अपूर्ण रूपकें प्रधानता देने छी | पूर्ण रूपक प्रयोग हम खाली वर्ण आ मात्रा मिलेबाक लेल करैत छी |अपूर्ण भाषा गजलक लेल बेसी नीक |” ‘नहि’ के स्थानपर ‘नै’, ‘जाहिठाम’क बदला ‘जै ठाम’, ‘कतेक’ के बदला ‘कते’, हेतैक के बदला ‘हेतै’क प्रयोग शेर सभमे नीक लगैत्त छैक | गजलमे मुख्य तत्व प्रेम होइत अछि |प्रेम कोनो मनुक्ख, प्रकृति,माटि-पानि, संस्कृति, भाषा, देश-दुनियासं भ’ सकैत अछि | प्रेमक अभिव्यक्ति कतेक रूपमे भेल अछि : नोंक-झोंक, उलहन, उपराग,आक्रोश,आवेश आदि तत्व जहां-तहां विभिन्न गजलक शेर सभमे सुच्चा मैथिल दृष्टि नेने भेटल अछि | बानगीक रूपमे देखल जाए निम्नलिखित शेर सभ : ‘भूखक दर्द होइत छैक प्रकाशोसँ तेज देखू पेटक खातिर दलाल बनल लोक’ ‘चुप्प रहत मनुख गिदर भुकबे करतै निर्जीव तुलसी चौरा कुकुर मुतबे करतै’ ‘हरेक समय बितैए दुःख आ दर्दमे गरीब लेल नव-पुरान की साल हेतै’ ‘देहे जिन्दा भावना मरि गेलै जग लगैए समसान सन’ ‘नहि बनत केओ राम मुदा सेवक चाही हनुमान सन ’ ‘रामक आदर्श तँ मरि गेल हुनके संगे बुझू आब तँ खाली हुनक नाम चलैए’ ‘ जे नै कमा सकए टका बेसीसं बेसी लोक तँ ओकरे बुझैछै बेकार सन ‘ ‘घोघक रहस्य त एना बुझियौ झरकल मूंह झपनहि नीक.’ ‘लोक जहर दैए मुस्किया कए आब त हँसीसँ डरनहि नीक’ ‘हाथ सटेलासँ मोन केना भरतै अहाँ करेजसं सटा लिअ हमरा’’ ‘जाइ छी मुदा जेबाक मोन नै अछि कोनो सप्पतसं घुरा लिअ हमरा’ ‘नून नै चटबए पड़तै बेटीकें आब तँ गर्भपात लेल युद्ध’ ‘बुड़िबक देवी कुरथी अक्षत हम एहने विकास करैत छी’ ‘अहाँक दरस-परस बड्ड महग अछि सटि जैतहुँ अहाँक देहमे बसात भेने’ ‘सबहक घरमे एकटा अगत्ती जन्मए सरकारक निन्न टुटै छै खुरफात भेने ‘ ‘हमरा अहाँ नीक लगै छी सभ दिनसं मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी’ अहाँकें प्रभावित करबाक लेल, चुप्प करबाक लेल, सोचबाक लेल, विचार करबाक लेल आ बेरपर मोन रखबाक लेल सैकडो शेरसं भरल अछि एहि पोथीक गजल सभ | पोथीक सम्बन्धमे अपन टिप्पणी प्रस्तुत करैत गजेन्द्र ठाकुरजी कहैत छथि : “मैथिलीक पुनर्जागरणक ऐ समएमे ऐ पोथीक आगमन मैथिली आ मात्र मैथिलीक पक्षमे एकटा सार्थक हस्तक्षेप सिद्ध हएत | स्वतः स्फूर्त गजलमे जे गेयता आ प्रवाह होइ छै से ऐ संग्रहक सभ गजल, रुबाइ आ कतामे अहाँकें भेटत |” हम एहि टिप्पणीक समर्थन करैत छी | रामक ‘अम्बरा’ ‘अम्बरा’ श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसं 2010 मे प्रकाशित राजदेव मण्डल जीक पचहत्तरि टा विलक्षण कविता सबहक संग्रहक नाम थिक | एहि पोथीक सन्दर्भमे गजेन्द्र ठाकुरजीक टिप्पणी अछि जे ‘अम्बरा’ एकैसम शताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह बनि आएल अछि | कविता सभमे प्रखर मानवीय संवेदनाक विस्तार अछि |कविता निकलैत अछि घरसँ ,आंगनसँ,समाजसँ, देश-दुनियासँ |कविता देखैत अछि भाषा आ संस्कृतिक हाल,सभ्यताक बिहाड़िमे लोक कोना बनल अछि कंगाल |कविता भेंट करबैत अछि राक्षस सभसँ | राक्षस अछि अज्ञानक,अशिक्षाक,आर्थिक आ सामाजिक असमानताक,अन्हारक, अंधविश्वासक | कविता कहैत अछि : विज्ञानक शक्ति, विज्ञानपर निर्भरता बढ़ल अछि | आत्माक शक्ति कम भेल अछि |परिणाम अछि जे जन-जीवनमे तनाव बढ़ल अछि | कविता नहि चाहैत अछि ककरो आँखिमे नोर | ककरो आँखिमे नोर नहि रहय, चाहे ओ बच्चा हो, जुआन हो, बूढ़ हो, स्त्री हो, पुरुख हो, चाहे ओ खेतमे पसेना बह्बैत हो आ कि आन ठाम | पुरान बाट सभ पर काँट-कूश बढि गेल अछि | कविता नव बाट दिस तकैत अछि | लोक नहि चाहैत अछि बाढ़ि आबय आ जीवन नष्ट भ’ जाए, मुदा बाढ़ि बेर-बेर अबैत अछि | लोक असहाय भ’ जाइत अछि | लोक धूम-धामसँ बेटीक बियाह करैत अछि |बेटी सासुर जाइत अछि, मुदा सबहक ध्यान बेटीपर टांगल रहैत छैक | सासु चलाबै ठुनका पति भाँजैत अछि डांग केकरा कहबै मोनक बात ससुर पीबैत अछि भांग पहिने बचत जान तखन राखब कुलक मान चाहे किछो बितइ आब नहि जाएब ओहि घर .... (कविता : रूसल धीया) लोक चाहैत अछि हमर देश जोरगर हुअए | एकता रहै |मुदा नहि होइत छैक | घरमे एकता नहि होइत छैक |हमसभ भाए सँ अलग होइत छी |किछु बरखक बाद हमर सबहक पुत्र भैयारीमे बाँट-बखरा करैत छथि | इएह क्रम चलैत रहै छै | आइ हमरो दुनू बेटा भ’ रहल अछि भिन्न बाँट-बखरा क’ रहल गिन-गिन ... ( कविता : अढाइ हाथक सांगि ) एक भिखमंगा दोसर भिखमंगापर हँसैत अछि | लोक संस्कृति आ सभ्यताक बीच त्रिशंकु बनल अछि : कखनहुँ कानैत अछि लोक कखनहुँ गबैत अछि गीत किछु काल करैत झगडा किछु काल करैत अछि प्रीत ... ( कविता : अनमोल जिनगी ) कविता करैत अछि जीवन-मूल्यक बात | बच्चा जनमि गेल, बेटा भेल सुनितहि घर खुशीसँ भरि गेल सौंसे टोल खबरि पसरि गेल बढ़ए लागल उछाह कहलक लोक वाह-वाह मुनियाँ अछि लछमिनियाँ तखने एकरा परसँ जनमल छौंडा... ( बाल कविता: मुनियाँक चिन्ता ) कविता मानव-मनमे व्याप्त छुद्रताक सूचना दैत अछि | ई झगड़लगौना पिशाच नै आबए देलक अपनापर आँच रखने सभसँ मेल, खेलैत रहल झाँपल खेल जकरा संग करै ई कनफुसकी तेकरा मुखसँ उड़ि जाइछ मुसकी ... ( कविता : झगड़लगौना पिशाच ) प्रकृति लोकक रक्षा करैत अछि, मुदा लोक ओकर आदर नहि करैत अछि | लोकक अशुभ-चिन्तनक असरि प्रकृतिपर पडैत छैक आ फेर तकर असरि लोकपर | गाछसँ घेरल चारू भर मध्यमे छल दू टा घर चारू भरक गाछ झडकि गेल तैयो आगि नै बहरा भेल ईश्वर केहेन रचना रचि गेल दू टा घर जडल सौंसे गाम बचि गेल ..... ( कविता : गाछक वलिदान ) बिरिछ पर कुडहरि दन-दना रहल अछि दूनू भाँइ भन-भना रहल अछि यएह गाछ छिऐ झगडाक जड़ि एकरा देबै आइए काटि ....... ( कविता: गाछक हिस्सा ) भौतिकवादी प्रवृति लोककें आंतरिक रूपसँ कंगाल बना दैत छैक | सोनाक घर ...... मनोरथ पूरा भेल किन्तु यएह आइ जहल भ’ गेल .... ( कविता : पत्रोत्तर ) अंतिम कविता ‘आँखिक प्रतीक्षा’ ह्रदयक पियासक बात करैत अछि | शरद पूर्णमाक ई राति देखबाक अछि उत्कट इच्छा हम करैत रहब जिनगी भरि प्रतीक्षा | ई प्रतीक्षा कथीक ? कहिया धरि ? ई जनबाक लेल राम ( राजदेव मण्डल )क ‘अम्बरा’ अहाँक प्रतीक्षा करैत अछि | प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल ‘थोडे आगि थोडे पानि’2008 मे प्रकाशित प्रसिद्ध गीतकार भाइ सियाराम झा ‘सरस’क 80 टा गजल संकलन थीक।सरसजी गजलक पोथीक भूमिकामे कविता,कथा,निबन्ध आदि विधामे आबि रहल रचना सभक स्तरपर सवाल उठौलनि अछि। लेखक,कवि,नाटककार कें की की पढबाक चाही,से सलाह देल गेल अछि.लेखक लोकनिमे प्रतिबद्धताक अभाव पर आक्रोश व्यक्त कएल गेल अछि। अपन समाज,अपन भाषाक प्रति अपन लेखकीय प्रतिबद्धताक वर्णन सरसजी जाहि तरहें केलनि अछि से बेर-बेर पढबाक आ मोनहि मोन हुनक चरण स्पर्श करबाक लेल बाध्य क’ देत। मुदा जँ अहाँ ताकब जे गजलकारकें की की पढबाक अथवा कथीक अभ्यास करबाक चाही से एहिमे नहि भेटत। गजलकार स्वयं गजलक सम्बन्धमे की-की पढने छथि तकर उल्लेख नहि कएल गेल अछि। गजलक व्याकरणक कतहु चर्च नहि अछि.गजलकारकें मोन पडैत छनि दक्षिण अफ्रीकाक कवि मोलाइशक क्रान्तिगीत आ फिलीस्तीनी कविक कविता,कोनो शायरक कोनो महत्वपूर्ण शेरक उल्लेख नहि केलनि अछि। एहिसँ गजल लेखनक लेल आवश्यक प्रतिबद्धताक आभास नहि होइत अछि। पोथीक 80 टा गजलमे 62 टा गजलमे रदीफ आ काफियाक प्रयोग कएल गेल अछि जाहिमे 5 टा गजलमे रदीफ अथवा काफिया अथवा दूनूक निर्वाह सभ शेरमे नहि भ’ सकल अछि।16 टा गजलमे काफिया अछि, रदीफ नहि। 2टामे रदीफ अछि,काफिया नहि। अहूमे एकटामे सभ शेरमे रदीफक निर्वाह नहि भ’ सकल अछि। कोनो गजल एहन नहि अछि जकर सभ शेरमे वर्ण अथवा मात्राक एकरूपता हो।तें बहरमे त्रुटि साफ दृष्टिगोचर होइत अछि। एहि दिस गजलकारक ध्यान किएक नहि गेलनि से नहि जानि। सरसजीसँ लोककें बहुत अपेक्षा रहैत छैक, मुदा एहि सम्बन्धमे हुनक कोनहु स्पष्टीकरण सेहो कतहु नहि अछि। आशा अछि गजलकारक अगिला गजल-संग्रहमे आवश्यक औपचारिकताक निर्वाह होयत। ई पढि क’ नीक लगैत अछि जे ‘.....धीरू भाइ तं एते धरि कहने रहथि जे खैयाम कें मैथिलीमे सुनबाक हो तं सरस कें सूनल जा सकैछ...’ तें सरसजीसँ अपेक्षा आर बढि जाइत अछि। सरसजी कहैत छथि,‘एहि संकलनक गजल सभ तं सहजहिं अपन लोकवेदक,माटि-पानिक,भाशा-साहित्यक आ संस्कार-संस्कृतिक प्रतिबिम्ब तं थिके,संगहि अनेक ठाम अनेक तरहें तकरा नब सं परिभाषित आ व्याख्यायित सेहो करैछ । नब-नब संस्कारक स्थापना सेहो करैछ ।.......’ सरसजीक उक्तिकें तकैत विभिन्न गजलक एहि शेर सभ पर विचार करू- जै पाइने पैनछूआ कैरतै ने लोक, छीः छीः छीः सेहो पाइन घटर-घटर घटघटा रहल,ई मैथिल छौ जौं-जौं अहंक खसैए पिपनी,धप-धप तेना खसै छी हम रसे-रसे उठबी तं सरिपहुं, होइए देव-उठान हमर थप्पा समधिन देल समधि केर अंगा मे उजरो मोंछ पिजाएल,फागुनक दिन आयल अइ समुद्रक किन्हेरमे बड चक्रवातक जोर रहलै बालु पर तैयो अपन हम नाम तकने जा रहल छी बिज्झो कराओल बैसले रहि गेल नोथारी गलियाक’ कियो खाइत आ उगलि रहल छलै हम मरब,बेटा लडत,बेटा मरत-पोता लडत कटब-काटब,जे बुझी-सदभावना-दुर्भावना हवा-पानिक बिना एमहर भेलैए दूभि सब पीयर ओम्हर बोडामे कसि-कसि,स्विस खातामे ढुकाबै छै व्याकरण पक्षकें जँ उपेक्षित क’ देल जाए तँ कएटा गजलमे किछु शेर महत्वपूर्ण अछि जे पाठकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि किछु शेर जे पढबामे नीक नहि लगैत अछि, भ’ सकैए जे हुनका स्वरमे सुनबामे नीक लागय. मैथिली गजलक भण्डारकें भरबामे सरसजीक योगदानकें महत्वपूर्ण मानैत हम गीतकार सरसजीक प्रशंसक, मैथिलीक सुधी पाठक आ नव-पुरान गजलकार सभसँ अनुरोध करबनि जे कम-सँ-कम तीन बेर अवश्य पढि जाथि सरसजीक ‘थोडे आगि थोडे पानि’। नीक लगतनि। अरविन्दजीक आजाद गजल मैथिलीयोमे गजल पर खूब काज भेल अछि आ एखनो भ’ रहल अछि। गजेन्द्र ठाकुर गजलक व्याकरण विस्तार सँ प्रस्तुत केलनि आ अपनो बहुत गजल लिखलनि. आशीष अनचिन्हार मैथिली गजल ले’ स्वतंत्र साइट बनाक’ व्याकरण कें स्थापित करबामे अपनो योगदान करैत अपनो बहुत गजल लिखलनि आ आओर बहुत गोटे सँ गजल लिखबौलनि आ से काज एखनो क’ रहल छथि हिनका दूनू गोटेक अतिरिक्त आर बहुत गोटे मैथिली गजलकें समृद्ध करबामे योगदान क’ रहल छथि।ई प्रसन्नताक बात थिक। हमरा जनैत गजलकारक मुख्य तीनटा वर्ग अछि। एक वर्ग ओ अछि जाहिमे रचनाकार पहिने गजलक व्याकरण पढलनि आ तकरा बाद ओही अनुसारे गजल लिख’ लगलाह. दोसर वर्गमे ओ गजलकार सभ छथि जे पहिने गजल लिख’ लगलाह , बादमे गजलक व्याकरण दिस घ्यान गेलनि आ ओहि अनुसारे लिखबाक प्रयास कर’ लगलाह. तेसर वर्गमे ओ लोकनि छथि जे गजल सूनि क’, पढि क’ लीख’ लगलाह आ लीखैत चल गेलाह, पाछां उनटि क’ नहि तकलनि.ओ मात्रा अथवा वर्ण गनि क’ षेर लिखबाक-कहबाक चक्करमे नहि पडि अपन बातकें केंन्द्रमे राखि धडाधड लिखैत चल गेलाह आ लिखैत जा रहल छथि। ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’ मात्र 24 दिनमे लीखल गेल 66टा गजलक संग्रह थीक जाहिमे गजलकार अरविन्द ठाकुरजीक कथन पर ध्यान देल जाए: ‘हम जे कहय चाहैत छी से महत्वपूर्ण छैक,ताहि लेल व्याकरण टूटय कि विधा विशेषक मापदंड,तकर हमरा परवाहि नहि अछि। ओकरा भल चाही त’हमर सहायक हुअए,बाधा ठाढ नहि करए ।’ गजलकारक एहि कथनकें ध्यानमे राखि जँ हिनक गजल पढब त नीक लागत। 66 टा गजलमे 10टा गजल एहेन अछि जाहिमे रदीफ अछि,काफिया नहि. 16 टा एहेन अछि जाहिमे काफिया अछि,रदीफ नहि. 40 टा गजलमे रदीफ आ काफिया दूनू अछि. किछुए गजल एहेन हएत जाहिमे बहरसँ सम्बन्धित दोष नहि हो.मुदा,बहुत रास शेर सभमे जे बात कहल गेल अछि से व्याकरणक त्रुटिकें झांपन देबामे बहुत समर्थ लगैत अछि.सभ गजलक अंतिम शेरमे गजलकारक नामक प्रयोगक प्राचीन परंपराक निर्वाह नीक जकाँ कएल गेल अछि जे बहुत गजलकार नहि क’ पबैत छथि. गजलकारक समक्ष सामाजिक,राजनीतिक आ सांस्कृतिक चेतनाक अवमूल्यनक विषाल क्षेत्रक अनुभवक संपदा छनि जे जहां-तहां विभिन्न गजलक विभिन्न शेर सभमे प्रगट भेल छनि।एकर बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि निम्नलिखित किछु शेर: दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोस करत नै जखन गाममे मालक बथान रहत एहि समाजक रूढि भेल अछि घोडनक ओछाओन सन प्रेममे भीजल बतहबा ताहिपर ओंघरा रहल अछि गाममे डिबिया जरल अछि रातिसं लडबाक लेल मेट्रोपॉलिटन टाउनमे अछि राति दुपहरिया बनल पात बिछैबाक बेर लोकक करमान छल यार सभ अलोपित भेल ऐंठ उठेबाक बेर रातिक जे एकबाल बढल दुर्लभ सगर इजोरिया भेल संसद केर फोटोमे किछुओ नहि हेर-फेर सांपनाथ, नागनाथ,इएह दुनू बेर-बेर कार खोजै छै एम्हर फूटपाथ पर सूतल षिकार यम अबै छथि एहि नगर विभिन्न वाहन पर सवार संसदमे घुसिआयल जे सात जनम लेल केलक जोगार गजलकारक भयंकर आत्मविष्वास एहि षेर सभमे देखू: धन्य ‘अरबिन’तों एलह गजलक जगतमे फेर केओ ‘खुसरो’की तोहर बाद हेताह नै पाठक के चिन्ता अरबिन नीक गजल के पढबे करतै एहने आर बहुत रास नीक-नीक शेर वला गजल पढबाक लेल देखू श्री अरविन्द ठाकुरक रचल आ ‘नवारंभ’ द्वारा 2011 मे प्रकाशित आ बहुत सुंदर कागतपर ‘प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स’, नई दिल्ली द्वारा बहुत सुंदर मुद्रित गजल संग्रह ‘बहुरूपिया प्रदेशमे’। अन्तमे हम गजलकारक उक्तिक उल्लेख कर’ चाहब: ‘.......हाथक जेना सभ बान्ह टूटि गेल । एहन धारा-प्रवाह जे गजलक मिसरा,शेर,रदीफ,काफिया,बहर,गिरह सभकें सम्हारब कठिन....’ भरिसक, इएह कारण थीक जे गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा हिनक गजल सभकें आजाद गजल कहल गेल अछि। हम एहि विचारसँ सहमत छी। कोरांटी - एकांकी पहिल दृश्य (साँझक समय, घूरतर चारि गोटे बैसल छथि) पहिल: राधे ! कथीक हल्ला होइ छलै जोतखीजी ओत’ ? दोसर: वएह, मसोमतियावला बात छलै । तेसर: की ? कोनो नव बात भेलैए ? चारिम: ईह ! बाप रे, भरि गाममे हल्ला भ’ गेलै आ तोरा पता नै ? तों कि इंगलैण्ड गेल छल’ हए ? तेसर: हम त एखने बजारसं आबि रहल छी, हम की जाने गेलिऐ की भेलैए ? की भेलैए राधे ? दोसर: जोतखीजी आमिल पीने छलाह । भरि टोलक छौंडाकें गरियबै’ छलथिन जे हमरा आंगन किए अबै जाइए ? तेसर: से पुतोहुकें नै हंटि होइ छनि ? पुतोहु हुनका सक्कमे छथिन जे अनका दोख दै छथिन ? चारिम : पुतोहु त कहांदन कहै छथिन जे हम ताहि दिनका विधवा नै छी जे मोने मोन कुहरैत रहब, कोठलीमे बन्द भ’ क’ रहब आ जिनगी भरि फज्जति सहैत रहब । पहिल: आ जोतखीजीक आंगनसं की बजैत छथिन ? दोसर: ओ त बेटाक सोगें गलल जाइत छथि ।की बाजथि ? ककरापर बाजथि ? तेसर: ई घर गेले छथि । हमर बात सुनि लएह । ई मसोमात जोतखीजीकें नाके सूतें पानि पिया देतनि । हुनका चानिपर खापडि नै फोडनि त हमरा नामे कुकुर पोसि लीह’ा पहिल: ;दोसरकें -राधे, तों नै जोतखीजीकें बुझौलहुन ? दोसर : हम की कहितियनि ? हमरा कोन मतलब अछि ? पहिल : त तों खाली तमाशा देख’ गेल छलह ? दोसर : त की हम हुनकासं मारि करितहुं ? पहिल : हम पुछैत छियह, जोतखीजीक घरमे आगि लागि जेतनि त तों नै मिझब’ले’ जेबहक ? दोसर : ओ दोसर गप्प भेलै । अहां त सभ गप्पमे अहिना रेड दै छिऐ । पहिल : हमहीं रेड दै छिऐ ? दोसर: त अहीं किए ने बुझा द’ अबै छियनि ? अहांक त नंगौटिया छथि । पहिल: आ तों सभ खाली वरियातीए जाइले’ आ रसगुल्ले चोभैले’ अवतार नेने छह ? एकरे कुसंस्कार कहैत छैक । (किछु काल धरि क्यो किछु नै बजैत अछि) तेसर : ;तमाकुल चुनबैत आ थपडी मारैत कहथिन लाल कक्का जे जाहि घरमे मसोमात भ’ जाए ओकर सत्यानाश निश्चित । देखिहक ई घर आइने काल्हि ... चारिम: ठीके कहै छिऐ । भगवान एहेन लोककें जन्मे बेकार दै छथिन । पहिल : बात कटैत आ ई किए ने सोचै छह जे भगवान एहेन लोककें किए जन्म दै छथिन जे भरि जिनगी खाली लोकक कौचर्ये टा करैत रहैए ?.... (किछु थमि क’) ई किए ने सोचैत छह जे ई बात जं ककरो घरमे .. अपने कपारपर बिसा जाह त की करक चाही ? (सभ चुप्प) कहै छियह जे बिना बुझने ककरो कलंक नै देबाक चाही ....सत्यानाश त भरि गामेक भ’ रहल अछि ; उत्तेजित होइत के अछि पागवला ? चारिम : (उठैत, अंगैठी मोड करैत) बैसै जाइ जाउ । हम पोखरि दिससं अबै छी । दोसर: (उठैत) ओह, हमरो महींस दूहक अछि । आगि कोढि होइए । (दोसर आ चारिम फुसफुसाइत चलि जाइत अछि) पहिल : (एक कोन दिस तकैत) के छिया ? गोपालजी ? आउ, आउ । (युवक प्रवेश करैत अछि । घूर लग ठाढ अछि । बैसबाक उपक्रम करैत अछि) युवक : कक्का, आइ जाड बढि गेल अछि । तेसर : अहां बैसू । हम बडी कालसं छी । (तेसर उठैत अछि । युवक ओकरा स्थानपर बूढाक सोझां बैसि जाइत अछि) युवक : कक्का, घूर धुंआइए, धधरा क’ दिऐ ? पहिल : क’ दियौ धधरा । अहां सभ जुआन छी । अहां सभ धधरा क’ सकैत छी । आब हम सभ देखब । नीक लागत । (युवक फुकैत अछि । धधरा होइत अछि । दूनू एक दोसर दिस तकैत छथि) दृश्य -२ (ज्योतिषीजी चैकीपर बैसल छथि । सोझांमे कुर्सीपर गोपाल गम्भीर मुद्रामे बैसल किछु सोचि रहल छथि) ज्योतिषीजी: गोपाल ! (गोपाल ओहिना गम्भीर बनल रहैत छथि) ज्योतिषीजी: आइ भोला कहैत छलाह, चालीस तक दैले’ छथि ओ सभ । फगुआक प्रात अबै जेताह गप्प कर’। हमरा होइए जे ई कथा क’ लितहुं ।(गोपाल ओहिना गम्भीर बनल रहैत छथि) ज्योतिषीजी: कन्या सेहो सुनै छी पवित्र छथिन । कहै छला पांचमा पास छथिन । हमहूं कहलियनि हमरा सबहक घरमे बेशी पढलि-लिखलि कनियां एक बेर केलहुं, नै धारलक । (गोपाल ओहिना गम्भीर बनल रहैत छथि) ज्योतिषीजी: अहां किछु बजैत नहि छी । की सोचि रहल छी ? (गोपाल पिता दिस तकैत छथि) ज्योतिषीजी: की सोचि रहल छी ? बाजू ने । गोपाल : बाबूजी, सोचै छी लोकक हृदय कोना पाथर भ’ जाइत छैक । ज्योतिषीजी: से की ? गोपाल: इएह जे भैयाकें गेना दू बरख भ’ गेलनि । हमरा सभकें पहिने बुझाए जे भैयाक बिना जीबे नै करब, हमहूं सभ सोगसं मरि जाएब । आइ हम सभ एना भ’ गेल छी जेना अइ घरमे किछु भेले नै होइ ।ठीके, बाबू हम सभ पाथर नै भ’ गेल छी ? ज्योतिषीजी: की करबैक ? करेजकें पाथर बनब’ पडैत छैक । समय सभ घाओ कें मलहम जकां ठीक क’ दैत छैक । गोपाल: अहांक घाओ ठीक भ’ गेल हएत, हमरा सोझां भैयाक छोडल किछु प्रश्न नचैत रहैत अछि ।हम सदिखन सोचैत रहैत छी । लगैए जेना भैया सोझांमे ठाढ होथि आ कहैत होथि ‘देखै जइहक, हुनका कष्ट नै होइन ।’ ज्योतिषीजी: हुनकर चर्च नै करू ।ओ अलच्छ छथि । हुनकर चर्च होइते देहमे आगि लेसि दैत अछि । गोपाल: आगि लेसि दैत अछि अही दुआरे ने जे आइ भैया नै छथि, भौजी अनाथ छथि .... ज्योतिषीजी: उत्तेजित होइत गोपाल ! गोपाल: हं बाबूजी, आइ भैया रहितथि, मासे-मासे पाइ अबैत रहैत त भौजी पूज्या बनल रहितथि । आइ भौजी छुतहर भ’ गेलीह । ज्योतिषीजी: अहां आखिर की कह’ चाहैत छी ? हम की क’ सकैत छियनि ? गोपाल : अहां सोचि त सकैत छी । ज्योतिषीजी: की ? गोपाल : इएह जे भौजीयो एकटा युवती छथि, सुन्नरि छथि, पढलि-लिखलि छथि, आंखिक आगां अन्हार छनि पसरल । हुनको एकटा जीवन जीबाक अधिकार छनि । ज्योतिषीजी: त अहां की कह’ चाहैत छी ? गोपाल: हम अहांसं पूछ’ चाहैत छी । ज्योतिषीजी: की ? गोपाल: भैयाक असामयिक मृत्युक लेल भौजी दण्डक भागी छथि ? ज्योतिषीजी: ओ पूर्व जन्ममे कोनो पाप केने हेतीह, तकर दण्ड त भोगहि पडतनि । गोपाल: हम जनैत छलहुं, एखन अहांक उत्तर इएह हएत । आइ भौजीकें किछु भेल रहितनि त अहांक तर्क दोसर होइत । ज्योतिषीजी: अहांकें शास्त्रक ज्ञान नै अछि ,ताहि दिनक समाज बकलेल नै छलै जे एहेन-एहेन नियम बनौलकैक । गोपाल: बाबूजी, ताहि दिनक परिस्थिति भिन्न छलैक । स्त्री पुरुषक लेल उपयोगक लेल एकटा वस्तु मात्र होइत छलैक । आजुक परिस्थिति भिन्न छैक । ज्योतिषीजी: त एकर मतलब जे अहां भौजीकें नचाब’ चाहैत दियनि ? गोपाल: नै--नै । जीबाक अधिकार दियाब’ चाहैत छियनि । ज्योतिषीजी: कोना ? अहां की कर’ चाहैत छी ? गोपाल : जे अहां नै सुन’ चाहैत छी । ज्योतिषीजी: मतलब ? गोपाल: बाबूजी, हम भौजीसं विवाह कर’ चाहैत छी । (ज्योतिषीजी सन्न रहि जाइत छथि । बेटा दिस एकटक तकैत रहि जाइत छथि ।) तेसर दृश्य (दरबज्जाक दृश्य। ज्योतिषीजी चैकीपर चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि । गोपालक संगी संभू सेहो एकटा कुर्सीपर बैसल छथि । पहिनेसं किछु गप्प भ’रहल छै ।) संभू: कक्का । भौजीक जीवन, भरि गाम आ सौंसे समाजक सोझां प्रश्नचिन्ह बनि क’ ठाढ अछि ।ई एकटा स्त्री नहि, कतोक स्त्रीक वर्तमान आ भविश्यक समस्याक प्रश्न अछि । एकर समाधान आवश्यक छैक । (ज्योतिषीजीकें औल लगैत छनि । कुरता आ गंजी क्रमशः बाहर करैत छथि । गंजीकें बीयनि जकां घुमाक’ हवा करैत छथि) ज्योतिषीजी: (नेपथ्य दिस तकैत) हे यै सुनै छी, कने बीयनि नेने आउ त । संभू : काकी नै छथि आंगनमे । थम्हू, हमहीं नेने अबै छी । (उठिक’ नेपथ्य दिस जाइत छथि आ बीयनि ल’क’ अबैत छथि आ ज्योतिषीजीकें हौंक’ लगैत छथि ।) ज्योतिषीजी: आ काकी कत’ गेल छथुन ? कहब’ ? संभू: पंडितजीक आंगनमे भरि टोलक स्त्रीगण जमा छथि । इएह गप्प होइ छै । ज्योतिषीजी: एकर मतलब जे हुनको विचार छनि ? संभू: कक्का, स्त्रीगणक समर्थनक बिना कोनो डेग निस्सन नहि भ’ सकै छै । स्त्रीगणक तरबामे गरल ई कोरांटी निकलि जाइ, से सभ चाहैए । ओना ककरो नहियो चाहने कोनो अन्तर नै हेतै । बात बहुत आगां बढि गेल छै । ज्योतिषीजी: (तामसे थर-थर कपैत) भाग’ हमरा लगसं । हमरा लग एलाहे भाषण देब’ ।समाजक ठीकेदार बन’ चललाहे’ ! हमरे घरसं शुरू करताह क्रान्ति ! संभू: हम त जाइते छी । बेकारे बैसि गेलहुँ । हम त खाली सूचना देब’ आएल छलहुं जे परसू विवाह हेतै । (प्रस्थान) ज्योतिषीजी: विवाह हेतै ? परसू ? नहि, नहि, हम ई बर्दास्त नहि क’ सकै छी । हम आब एक क्षण अइ घरमे नै रहि सकै छी । सभ मिलिक’ हमरा बताह बना देत ।सत्यानाश क’ देत । हे भगवान ! हे भगवान ! अइ बुढारीमे नै जानि की-की देख’ पडत ! (कतहु जेबाले’ तैयार तैयार होम’ लगैत छथि । गंजी, कुरता पहिरैत छथि ।) (मंचपर आस्ते-आस्ते पहिल बूढ गोपी बाबूक आगमन) गोपी बाबू : जोतखी भाइ ! कतहु निकलै छी की ? हडबडाएल देखै छी ? ज्योतिषीजी: गोपी बाबू, हम आब अइ घरमे एक क्षण नै रहि सकै छी । गोपी बाबू : कत’ जाएब पडाक’ ? ज्योतिषीजी: बडकी टा दुनियां छै । काशी चल जाएब । मथुरा चल जाएब । वृन्दावन चल जाएब । कतहु चल जाएब । एहि कुपात्र सभ लग नै रहब । बाप रे ...अहांकें बूझल अछि जे हमरा घरमे की सभ...... गोपी बाबू: (बात कटैत) सभटा बूझल अछि । प्रसन्न छी । जोतखी भाइ ! एकरा हम, अहां कियो रोकि नै सकै छियै । रोकबाको नै चाही । (ज्योतिषीजी बकर-बकर गोपी बाबू क मुंह तकैत छथि।) ज्योतिषीजी: गोपी बाबू, अहूं ?.. गोपी बाबू : हं जोतखी भाइ ! अहांक बालक ज्ञानी छथि । सभसं विचार केलनिहें। हुनक विचारमे दम छनि । की करबै ? भागि जाएब ? भागि जाउ । के रोक’ अबैए ? हमरा-अहांकें भागियो गेलासं आब कोनो पहाड नै टूट’वला छै । जे बन्धन कमजोर छै, से टुटि जेतै । जोतखी भाइ ! समाजेक हितक लेल षास्त्र बनल छलै । समाजेक कल्याण लेल संविधान बनलै । षास्त्र बहुत घोखलहुं । आब संविधान पढू । (दूनू गोटे एक-दोसर दिस तकैत छथि धीरे-धीरे पर्दा खसैत अछि) रचना: सीवान /11.02.1984 विनीत उत्पल नव दिशाक कथा (जगदीश प्रसाद मंडलक गामक जिनगी) मैथिली साहित्यमे पिछला डेढ दशकसं जे कथाकारक कलम ग्रामीण परिवेश कअ लअ पाठकक आगू मुखर अछि, ओहिमे जगदीश प्रसाद मंडलक नाम सबसं आगू अछि। गामक घटना आ परिघटनाके जहि रूपमे ओ अप्पन कथामे प्रतिष्ठित करैत छथिन, ओ आजुक बाजारवादक कालमे विलक्षण अछि आ ओ लीकसं हटि अप्पन नव बाट बनाबैत अछि। हुनकर कथाक नायक आ नायिका गामक ओ लोक अछि जे पारंपरिक समाज सं बारल अप्पन मजूरी आ जीवनयापनमे लागल रहैत अछि। चूंकि मैथिली साहित्य सब दिन सवर्णक थाती रहल अछि ताहिसं नहि ते एहन पात्र पर आय धरि कोनो कथा लिखल गेल, नहि कोनो एहन रचनाकार बहरायल जे समाजक ओहि हिस्साक कथाक दृष्टिसं देखय। यहि कारण अछि जो दू दर्जनसं बेसी पोथी लिखलाक बादो मैथिली साहित्यक समानांतर धरासं फराक गणमान्य विद्वान लोक हुनका एक तरहे बारने अछि। ओना बारने शब्द जगदीश प्रसाद मंडल लेल गलत होयत। सत गप ई अछि जे मैथिली साहित्यक एखुनका तथाकथित सवर्ण मानसिकता बला विद्वान लोक पढ़ब बिसुरि गेल अछि आ ओ भीखमे मांगल पोथी या मुफ्तमे भेटल पोथीक पढ़बाक उचित बुझैत अछि। एहन कालमे जगदीश प्रसाद मंडलक कथा ओहि समाज पर एकटा थापड़ अछि, जे पढ़ब लिखबसं दूर पोथी प्रकाशित करबाक आ ओ ओहि पोथी पर कोनो पुरस्कार भेटबाक तिकड़ममे लागल रहैत अछि। हिंदीमे प्रेमचंद आ फणीश्वरनाथ रेणु ग्रामीण परिवेशक सबसं पैग कथाकार अछि आ ग्रामीण परिवेशक चित्रण करयमे हुनका आगू कियो नहि टिकय अछि, मुदा जौं ओहि बेस पर जगदीश प्रसाद मंडलक कथा देखल जाय ते हुनकर बेसी कथा ओहि जमीन पर ई दूनू गोटा सं बड़ रास आगू अछि। ओ गामक चित्रण संग-संग ओहि परिस्थितिक सेहो चित्रण करैत अछि जहि दशामे गाम-घरक लोक रहैत अछि। मैथिलीक कथाक दृष्टिसं देखल जाय ते राजकमल चौधरी, यात्राीजी, मायानंद मिश्र, ललित, धीरेंद्र, धूमकेतु सं लअ कअ सामानांतर साहित्यक कथाकार सुभाष चंद्र यादव, दुर्गानंद मंडल, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मंडल, बेचन ठाकुर, राम प्रवेश मंडल, मानेश्वर मनुज, उमेश मंडल, मुन्नाजी, गजेंद्र ठाकुर, कुमार मनोज कश्यप, मुन्नी कामत जेहन कथाकार सेहो अपन कथामे गामक परिवेश कअ परिलक्षत करैत अछि। जगदीश प्रसाद मंडलक कथा संग्रह गामक जिनगीमे कुल 19 टा कथा अछि जे पूर्णतया गामक कथा अछि आ गामक वातावरणमे उपस्थित सब रास गुण व अवगुण कअ पाठकक आगू राखल गेल अछि। कथा लिखयमे जगदीश जीक कोनो जोड़ नहि अछि, यै कारण अछि जे कोना कोनो कथा यू-टर्न लैत अछि, ओ हिनकर सबटा कथामे देखल जा सकैत अछि। कोनो कथाक पात्रा कखनो लागैत अछि जे ओ निराश भावसं भरल अछि आ हुनकर जिनगीमे कहियो इजोत नहि हेतय। ओ जिनगी भरि संघर्ष करैत रहतय, ताहि ठाम पात्राक जिंदगी टर्न लैत अछि आ ओकर जिनगी मे एकटा किरणक प्रवेश होयत अछि आ जिनगी बदैल जायत अछि। जिनगी उमंग सं भरि जायत अछि। यहि टर्निंग प्वाइंट आनब कथाकारक सफलता अछि आ ओहिमे जगदीश मंडलक आगू कोनो समकालीन कथाकार ठहरय नहि अछि। ई कथासंग्रहमे 'भैंटक लाबा', बाढ़ि कअ लअ कअ, 'बिसांढ़' अकालक या रौदक जमीन पर आ 'पिरारक फड़' आन दिना खानपानक बेगरता कअ लअ कअ लिखल गेल अछि। तीनो परिस्थितिमे पति-पत्नी कोना सामंजस्य बनाकअ चलैत अछि आ जीवन सं आ जीवनमे संघर्ष करैत अछि, एकर प्रामाणिकता कथामे लखाह दैत अछि। अहि बाजारवाद जुगमे जखन संबंधक बिखराव एकटा नव मोड़ पर ठाड़ अछि, तहि कालमे एहेन कथाक लिखब कोनो क्रांतिसं कम नहि अछि। ताहिना 'अनेरुआ बेटा'ई समाजक लेल सीख अछि जे कोनो एकटा दंपत्ति एकटा नेना के पोसैत अछि, जेकरा अप्पन कोनो संतान नहि अछि आ ओकरा पढ़ा-लिखाकअ ओहि ठाम पर पहुंचाबैत अछि, जे कियो सपनोमे सोचि नहि सकैत अछि। 'ठेलाबला' नामक कथा अहि समाजक मुंह पर तमाचा अछि, जे अप्पन कमाई केर दम पर नेना कअ कतय धरि पहुंचैलक। ताहिना 'रिक्शाबला', 'डाॅक्टर हेमंत', 'पंचपरमेश्वर', 'घरदेखिया', 'बहीन', 'बोनिहारिन मरनी', 'चूनवाली', 'डीहक बंटवारा' कथाक पाट कथाक नव इतिहास रचयमे सक्षम भेल अछि। अहि तथ्य सं इंकार नहि करल जा सकैत अछि जे जगदीश प्रसाद मंडल लग जे गामक शबदक संग कहबी अछि, संवादक संग-संग चरित्रा अछि जे कोनो समकालीन कथाकार लग नहि अछि। हुनकर यहि गुण आन कथाकार सं हुनका परछाबय अछि आ यहि हुनका कथाकारक भीड़ सं पफराक करैत अछि। ई गप दृष्टिव्य अछि जे हुनकर बेसी रास कथाक पात्र समाजक ओ लोक अछि जे आय धरि कहियौ कोनो भाषामे मुख्य पात्राक तौर पर कोनो कथामे नहि आयल अछि। हुनकर पात्रा सेहो गामक परिचय कराबैत अछि जेना, दुखनी, लुखिया, पफेकुआ, रघुनी, बुचाई, भुलिया आदि। ताहि सं कथाकार गजेंद्र ठाकुर एकठाम लिखैत छैथ जे जगदीश प्रसाद मंडलक कथा मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि तथा हिनक कथा मैथिली कथाके एक भगाह होएबासं बचा लैत अछि। ई समानांतर मैथिली साहित्यक देन अछि जे जगदीश प्रसाद मंडल जेहन कथाकारके पाठकक आगू आनलक। ओना जगदीश प्रसाद मंडलक कथा विदेह सं पहिने मिथिला दर्शनमे छपल छल। गामक जिनगी कथा संग्रह आजुक दौरक एहन कथा संग्रह अछि, जे पाठक कअ कथ्यक नव धरातल पर लअ जायत अछि आ गाम-घरक शब्दसं सेहो आत्मसात कराबैक अछि। हम सब ओहि कालसं गुजैर रहल छी जतय अंग्रेजीक आगू दुनिया भरिके बड़ रास भाषा खत्म भअ रहल अछि आ अंग्रेजी एकटा वैश्विक भाषा जना उभरि रहल अछि। जना पैग माछ छोट माछ कअ निगैल जायत अछि, तहिना अंग्रेजीक आगू आन भाषके भअ रहल अछि। आहि कालमे जगदीश प्रसाद मंडलक कथा एकटा इजोत देखा दैत अछि, जे भाष की छी आ ओ कोना जीवित रहत। अहि दशामे जगदीश प्रसाद मंडल एकटा नव दिशा दैत अछि जे शहरीकरण काल मे गाम-घर बचबाक चाहि आ ओतौका परिवेश तखने बचल रहत जखन गाम-घरक संस्कार, संस्कृति आ भाषा बचत। अहि मे हुनकर सभ रास कथा सन्देश दै मे सफल अछि, जे कथाकारक सेहो सफलता अछि। कामिनी कामायनी नोम्पेंह भोरे करीब पाँच बजे आंखि खुजल त अपना के मेकोंग नदी के तीर प ठाढ़ पयलों।कनी कनी निनियायल ,कनी कनी यात्रा स झमाराल ,उपर चितिर बीतिर आसमानदेख् क ,आ प्रातः के प्रमुदित समीरक स्पर्श स मोन प्रफुल्लित भ उठल।दूर नदी मे नाव चलि रहल छल।बड़का विशाल नदी [तीन नदी ,मेकोंग ,बास्साक,टोनलसप,जाहि मे मेकोंग सबस पईघ अछि ],जे अनेकों देशक माटीसींचने आबिरहल छल ,अपन लंबाई मे ओतय बहि रहल छल ,एकरे चाकर चौरस छाती प बसलछै ,कोनो समय एशिया के मोती कहाबय बाला ,ओहि देश क राजधानी ,नोम्पेंह । मन के उद्दाम वेग के लगाम दईत पहिने स बुक होटल जाकय,स्नान ,खान पान केबाद तुरतही शहर भ्रमण के लिए निकसबा के छल समय बड़ कम छल ,दर्शनीय स्थान बेशी । मुख्य मुख्य स्थान के लिस्ट कैब ड्राईवर के पकड़ा देलिए। सेयाम रेयाप स कनी बिशेष स्थिति ।देशक राजधानी अछि ,त स्वाभाविके छै ,जे देशक सबटा गणमान्य ,ओहदादार, पाग वाला लोक सब अहि ठाम रहैत छथी।सुंदर भवन ,प फ्रांसीसी स्थापत्य कला के बेसी प्रभाव छैक।[ कोनो समय मे फ्रांसीसी उपनिवेश जे छल] ठाम ठाम प नगरक रच्छा करैत जेना ,विश्रामक मुद्रा मे , पाछा के दु पैर मोड़ने ,अगुलका दु पैर ठाढ़ शेरक मूर्ति सब विगत के राजसी वैभव के प्रदर्शित करिरहलछल। शहर के सड़क चौड़ा चौड़ा,साफ सुथरा सुचिक्कन सुंदर छै । कतेक ठाम ओकर सब के नेता के मूर्ति सेहो ठाढ़। फूल ,फव्वारा स सुसज्जितमैदान ,सड़क ,दोग,दाग । पहिलुक पड़ाव छल म्यूजियम ,बड़ दिव्य , प्राचीन खमेर कालक बस्तु आ कलाकृति स ऊबडुब। अँकोर काल स पहिनुक ,[चौथी सदी ]स ,अंकोर काल धरि[चौदहवी सदी के ] सबटा प्रमुख इतिहास जेना अहिठाम रेखांकित कयल गेल अछि । ओहिठाम स किछुए दूरी प राजभवन व राजकीय महल अछि ,जे अहि शहरक गौरव और बढ़ा दईत अछि । अहि विस्तृत भवन परिसर मे अनेकों दिव्य आआकर्षक महल सब अछि ,जेना दरबार हौल ,नृत्य कक्ष ,राजा के निवास ,रानी के निवास ,नेपोलियन पैवेलियन ,आ भव्य पेगोडा। अहि ठाम अंकोरवट जेका बड़भीड़ छल । शहर मोटा मोटी चारि भाग मे विभक्त छै –उत्तर दक्षिण आकर्षक आवासीयक्षेत्र ,आ फैक्ट्री ,पश्चिम बहू मूल्य आवासीय आ आर्थिक क्षेत्र{विशेष}आ मध्यव हृदय अहि शहर के फ्रांसीसी भाग ,जतय मिनिस्ट्री ,बैंक ,उपनिवेश मकान ,बाजार आ होटल सब छै । पीयर रंगक सेंट्रल मार्केट ,खरीदवैया सभक अड्डा बनल रहैतअछि ,ओहि ठाम अनेक प्रकारक स्वर्ण आ रजतक आभूषणक स्टौल लगल अछि एकरा संग संग पुरानसिक्का ,कपड़ा लत्ता ,घड़ी ,फूल ,पेंटिंग आ खेनाय के सामाग्री स भरल पड़ल अछि । दोसर प्रसिद्ध बाजार अछि टुओल टॉम पोंग मार्केट ई रसियन बाजार के नाम स से विशेष जानल जाइत अछि । अनेक ठाम नाईट मार्केट सेहो लिखल देखाय पड़ल । ओतुक्का समय जीएमटी स सात घंटा आगा छैक। स्थानीय करेंसी रिएल छै,मुदा यू स डी निधोक भ क चलै छैक । अहि ठाम रायल यूनिवर्सिटी ,यूनिवर्सिटी ऑफफाइन आर्ट ,रॉयल यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रिकल्चर आदि अवस्थित छैक । शहर स कनिक फराक विश्व प्रसिद्ध किरीरोम नेशनल पार्क छै, जेकरा घूमबा लेल पर्याप्त समय चाही। अहि ठाम प्रत्येक वर्ष बड़ भव्य जलोत्सव होईत ,छैक, जेकरओरियौन कएक मास पहिनहि स प्रारम्भ भ जाईत छैक । एक सुंदर ,एक स्वप्न मयी राजधानी के दोसर हृदय विदारक पहलू ओकर किलिंग फील्ड सेहो छैक ,जे कोनो भीषण तानाशाहक ,लोम हर्षक ,नृशंस ,नरसंहार कजीवित दस्तावेज़ अछि । सन 1975 स 1989 धरि तानाशाह पोलपोट आ ओकर मंडली द्वारा सृजित कंपूचिया के रक्त रंजीत इतिहासक खुजल पृष्ठ । वार म्यूजियमके हथियारक ,आयुधक क्रूरता के कथा अहि ठाम अखन धरि सिसकी रहल अछि । ओहि विशाल परिसर के घेर क पर्यटक स्थल बनाओल गेल अछि ,जतय करीब20,000 स बेसी लोक के{जाहि मे स्त्री आ दु बरखक बच्चा सब सेहो रहैक } अमानुषिक हत्या कयल गेल छल ।ओकर सबहक खोपड़ी ,ओकर सबहक हड्डी ,ओकरसबहक पहिरल वस्त्र के एक गोट स्मारक बना क सुरक्षित राखल गेल अछि । ठाम ठाम लिखल छैक ,जे कृपया मैदानक घास प पैर नहीं राखू,के जाने ककर मृत शरीर अहि ठाम खसल छैक । ओहि भयानक त्रासदी के खिस्सा सुनि क ,आ प्रमाण देखि क ,मन अथाह वेदना स भरि गेल छल । गाईड बाजि रहल छल ,लोककहत्या करबा मे कोनो गोली व बारूद नहि खर्च भेलए,खजूरक काँटेदार जड़ि मे पटैक क ,बच्चा सब के मारल गेलै,आओर दुर्दांत वर्णन सुनि क मन खराप हुए लगल ,ततुरते ओहि ठाम स प्रस्थान कयलहू । आब शहरक बीच ओहि बड़का स्कूल मे अनलक ,जे ओहि नरसंहारक पहिल पृष्ठ छल ।औचक एक दिन जे सब स्कूल गेलाओ फेर आपस नै घुरला । कक्षा सब के जेल बनादेल गेल छल ,चारहु दिस कंटीली तार स तुरत घेरल गेल , आनन फानन मे एक एक कक्षा मे तीन तीन टा ईंट कदेवार ,अलग अलग सेल ,पॉल पॉट के जे जतय विरोध केलकै, ओकरा ओहिठाम निबटाबय के खूनी प्रयास । स्कूल के अन्य कमरा सब संग्रहालय बनल ,ओहि समयके साहित्य ,पत्रिका ,हत्या मे उपयोगी सामाग्री सब के समेटने सून आंखि स संसार के हेर रहल अछि ।हजारो हजार पन्ना अहि खूनी खेल प लिखल गेल ,फिल्म बनलदुनिया त्राहि त्राहि करि उठल छल । अहि विभीषिका के पार निकलबाक प्रयास मे आय धरि ई देश लागल अछि ,गरीबी ,बेरोजगारी ,बाल मजदूरी अनेकों विपत्ति छैक ,दुनिया भरी के स्वयम सेवीसंस्था त छैक ,मुदा काज की भ रहल छै भगवान जानै थ [, कतेकों मास धरि ई दृश्य हमर मन मस्तिष्क के तिरोहित करैत रहल छल ।] कहुना करि इमहर उमहर तकैत ,शहरक मनभावन चाकर चौरस बाट प मटर गस्ती करैत एक एक क्षणक आनंद उठाबैत रहलहू । स्थानीय समयानुसार करीब तीन बजे हम सब मंदिर पहुचलहु ,अनेक सीढ़ी चढ़ि क महात्मा बुद्धक मंदिर ,अहि ठाम ओ अमिताभ रूप मे छथी। सम्मुख पाँच पाँचफुट स बेशी उंच मोट मोट मोमबत्ती सब ,एक दु टा जरि रहल छल ।ओहि परिसर मे कीछु और मूर्ति सब छैक,कनी नीचा सीढ़ी स उतरि क एक नीक जलपान गृहसेहो छैक ,एक ठाम बाहर मे सेहो किछू पूजनीय मूर्ति सब के सजा संवारि क राखल गेल छल।ओहि ठाम स नीचा के दृश्य बड़ा रमणीय लगैक। नोम्पेंह के नाम अहि मंदिर प अछि ,पहाड़ी मंदिर ।एकर किस्सा सेहो बड़ मनोहर छैक । शहर मे नदी कातक दृश्य अति मनोहारिणी ,जल मे छोट पैघ जहाज पर पर्यटकक आवाजही ,संध्या समय भोरे जका भ्रमण करैत लोक ,अपन अपन छोट मोटसमान बेचैत फेरीवाला ,सायकिल के एक दीस अपन ठेला व टोकरी बान्हने फल ,सूखल माछ आ दि बेचैत लोक ।कत्तों बड़ तीव्र ध्वनि लगा क नब पीढ़ीनाचि रहल छल । नदी के कात म पाथरक बेंच प बैसल लोग भाव विभोर सन देखाई पड़े छल । कनी आगा एक टा बड़का विश्रामालय सन बनल [रौद वपानि स रक्षा करबा लेल’] ओहि ठाम फुटपाथ प एक टा छोट छिन मंडिल अछि ,जाहि मे मोंछ बाला तीन टा देवता विराजमान छलाह,ओहि के छोट प्रांगण मेआगि जरि रहल छल,,एक पूजैगिरि सन लोक बैसल,फूल बिकाय,लोक अपन श्रद्धा सुमन सफ़ेद कमल के रूप मे अर्पित करैक। सड़क के दोसर कात पार्क ,आ भव्य पैघ पैघ होटल ,मकान,दोकान सब । सोझा मे एक टा भारतीय होटल छल ,नीक अपन स्वादक शाकाहारी भोजन भेटल । दोकान्दार बतौलक ,बाहरी आगंतुक सबभारतीय भोजन पसीन्न करैक छै। ओतुक्का बाजार सब पाँच बजे बन्न भ जाय छै राति मे होटल ,बार एहने सन स्थान खुजल रहे छै । सड़क कात बेचय वाला सेहोअपन समय व गांहकि देखि व्यापार करैत अछि । भिनसरे स ,झाड पोछ करि दोकान सब खुजय लगे छै । बड़का बड़का ,फूल ,फल स सजल बाजार केटपैत ,आखिरी नजर स सलाम करैत,भोरे भोर हम दुनु गोटे एयर पोर्ट लेल प्रस्थान भ चुकल छी। शहर स नौ किलो मीटर प एयर पोर्ट छै ,टैक्सी के किराया सात यूसडी। अनेक सुंदर ,इमारत ,सरकारी सस्थान ,विभिन्न देशक सहयोग स चलैत संस्थान सबहकविशाल भवन सब स सजल सड़क एक गोट आधुनिक देशक झलक प्रस्तुति करि रहल छल । हाँ ,पॉल पौट के तानाशाही के यादगार सन एक ठाम{कत्तोंऔर ,भरिसक किलिंग फील्ड दिस ज़ेबा काल ] बड़का टा के होर्डिंग सन लागल,कोनो अंगरेजी अखबारमे युद्धक समय के छपल लोग सबहक फोटो छै,जाहि मे असंख्य लोग ,,शरणार्थी ,अपन प्राण बचबय लेल माथ प समान सब उठा क भागि रहल छै । जे किन्स्यातभविष्य के पीढ़ी लेल एक टा बड़का टा के चेतावनी छैक । बड़ मार्मिक छल । शहर के अधिकांश आबादी नवयुवक आ छोट बच्चा सब के छैक। समय के संग ,मुंह उठेबा के प्रयास मे लागल ,मुदा धूर्त वाणिज्यिक सभ्यताक युग मे मददिगारपहिने अपन स्वार्थ तकैत अछि ,रक्षक भक्षक अहिने अहिने ठाम बनि जाय छै। बड़का कंपनी अपन सामान बेचबा मे तल्लीन ,बड़का छोटका मौल के बिक्री बिशेख। तखन “समरथ के नहिं दोख गोसाई’ अहिना चलैत एलै है संसार । अनेक विसंगति के उपरांत , ई सुंदर शहर अपना संग ढेर रास खिस्सा पिहानी नेने बड़ दिन धरि ऊहापोह मे रखने छल । सेयाम रेयापक स्वर्णिम अतीत (यात्रा वृत्तान्त) धन धान्य स लबालब ,ऊंच ऊंच ,मोटका मोटका विशाल बिरिछ सबहक छाहरि मे ,नदी सब के मृदु जलक मध्य ,सुस्ताति, अलसायल ,कनी सुतल ,कनी जागल,प्राचीन सभ्यता के अतुल्य भार अपन छाती प रखने ,धरती के ई टुकड़ा ,विश्व के समक्ष अपन सबटा रहस्य खोलबा के लेल बेकल , विह्वल भ यात्री सभक प्रतीक्षा करि रहल अछि,यात्रीगण पर्याप्त संख्या मे अबितौ छथी । चारहू दिस पसरल,कुहरैत,विभत्स, निर्धनता ,अपन देशक कोनो रेलवे स्टेशन सन एयर पोर्ट ,लोकक आंखि मे संहियायल सन्नाटा, कोनो गहीड़ व्यथा के अकथ भूमिका मे डूबल सन लागल,त मोन मे हठात सहस्त्रों प्रश्न उठब स्वाभाविक छल ,अतेक पिछड़ल ,एहेन सकुचल वर्तमान वाला भूमि ,आखिर अजस्त्र प्रकृतिक सम्पदा स परिपूर्ण कोना ? अनेकों अही भांति के प्रश्न के मोन के कोनो कोन मे विराम दइत ,होटल आबि कनी विश्राम करबा लेल विवश भेलहू। दिन के साढ़े चारि बाजि रहल छल । अन्य पर्यटकक पसंदीदा सवारी टुकटुक लेलहू,आ गाईड के सलाह अनुसार मंदिरक एक छोट सन परिक्रमा लेल अग्रसर भेलहू। मंदिर के गेट धरि पहुंचैत पहुंचैत पाँच बजबा मे दस मिनट बाकी ।टिकट 40 डौलर प्रति व्यक्ति ,,मुदा तीन दिन धरि भ्रमण करब के अनुमति । पाँच बजे भोर स पाँच बजे सांझ धरि मंदिर के समय निर्धारित छैक। अहि धरती प पएर रखबा स पहिनहि स बूनि पड़ी रहल छल ,से जिद्दी बालक सन ठुमकैत रहि गेल छल भरि दिन ,ओहि मौसम मे टुकटुक प बइसल बइसल पघिलैत मेघ मे भिजैत अतीत के भव्यता स्मरण करैत मंदिर मंदिर देखैत रहलहू । शाकाहारी भोजन लेल शहरि के चीरेत,महाराजा होटल पहुचय मे परंपरागत दोकान सबहक भव्य झांकी बड़ सुखमय दृश्य प्रस्तुत करि रहल छल । हिन्दी भाषि होटल मालिक के हर्षित भ पुछलिय भारतीय छी? “ नई पाकिस्तान,पंजाब केर”। एक क्षण लेल विचलित मोन भेल ,पाकिस्तान त भारते छलय नै,खेनाय पिनाय सेहो एके । जे से । दोसर दिन अंकोरवट मंदिर आ म्यूजियम के कार्यक्रम बनल । मंदिरक टिकट कीनिए नेने रहि ,समय बचल ,विशाल अँकोरवट परिसर के परिक्रमा करबा लेल विश्व के प्राय सब कोना के लोग जुटल। [किछूयात्री त कएक दिन ,बल्कि महीनों स ओत्तय डेरा जमौने छल, अहि सभ्यता आ इतिहासक अनुसंधान करयवाला ,लेखक ,विद्यार्थी छथी ।] खमेर युग के स्वर्णिम कालक प्रतिनिधित्व करैत भीषण अरण्य मे ठाढ़ ,विश्व हेरिटेज मे शामिल ,अहि परिसर मे अंकोरवट मंदिर विश्व के सबस विशाल आ विस्तृत मंदिर अछि .सरिपहू मे अजगुत अछि , ,वास्तु,शिल्प कला के बेजोड़ प्रमाण ।नीक जका सुरक्षित रखल गेल अछि राजा सूर्य बर्मन द्वितीय द्वारा ,1,950,000,स्क्वायर मीटर, आने कि195 हेक्टेयर जमीन प बनाओल ई मंदिर प्रारम्भ मे हिन्दू देवता विष्णु के समर्पित कएल गेल छल,कालांतर मे बौद्ध धर्मक शरण मे चलि गेल । दोसर पईघ मंदिर अछि ,बायोन टैम्पल –महायान बौद्ध मंदिर सब मे ई सबस पैघ,अछि ,एकरा अँकोर थोम के मध्य मे बनाओल गेल छल ।तेसर ता प्रोम टैम्पल ,पर्यटकक सबस बेसी ध्यान आकर्षित करैत अछि ।समय व काल द्वारा उपेक्षित रहलाक कारणे मोटका मोटका विशाल बृक्ष सब मंदिरभवन ,आँगन के चीर क अपन प्रभाव स्थापित कय नेने अछि ।अहि मे मोट मोट ,लंबा लंबा अजोध साँप सब सेहो अड्डा जमौने अछि । आब एकर देख भाल बड़ सावधानी स कयल जा रहल अछि ,जाहि स मंदिर ढांचा के कोनो क्षति नहि पहुचे। बेकोंग मंदिर पिरामिडक शक्ल मे बनल भगवान शिव के समर्पित अछि ।मंदिर के प्रवेश द्वार सात मुंह वाला नाग सब स संरक्षित अछि । अनेकों देश एकर पुनरुत्थान लेल मददि कय रहल अछि । अहि क्रम मे भारत सरकारक पुरातत्व विभागक बोर्ड सेहो लागल देखल जा सकैत अछि । अनेकों ठाम यूनिसेफ के मददि स जीर्णोद्धार के काज भ रहल छै। किछू मंदिरक सिडही बड्ड उंच उंच ,नहि जानि ओहि प लोक कोना आराम स चढ़ैत होयत ,पर्यटकक सुविधा लेल अनेक ठाम लकड़ी के सुविधा जनक सिडही बनाओल गेल अछि । कतेको भूमिगत छिड़ियायल पाथरि कोनो समय मे भरल पूरल उल्लसित पूजनीय देव स्थल छल। अनेक ठाम ओहि प्राचीन पाषाण ईट के जोडि क कोनो प्राचीन ढांचा के रूप देल जा रहल छल । भवन के छत ,छज्जा प मोट मोट हरियर हरियर मखमली काही जमल छल , बड़ सोहनगर लगैत छल ।एक ठाम पुलक दुनु कात अनेकों यक्ष यक्षिणी के डाढ़ धरि मूर्ति सब, किछू साबूत,किछू भांगल ,किन्स्यात ओ कोनो किला के मुख्य दरवाजा रहल हेतैक। अप्सरा ,नाग ,हाथी ,शेर ,कमल दानव आदि के मूर्ति ,व भित्ति चित्र स कोना कोना आच्छादित अछि ।किछू मंदिर मे महात्मा बुद्ध के पीत वस्त्र पहिरा क हुनका समक्ष पुष्प अगरबत्ती राखल छल । किछू स्त्रीगण सब ,पर्यटक स फूल अगरबत्ती खरीदबा के अनुग्रह सेहो करैतछल । एक मंडिल के प्रांगण मे एक पुजारी सन लोक चादरि प बैस क किछू कन्या सभक हाथ मे ताग बन्हि रहल छल । मंदिर आ स्तूपक ई स्थान जादू ,टोना ,तंत्र ,मंत्र के आधिपत्य मे सेहो बड़ बेशी समाहित छल“[किन्स्यात एखनों] हिन्दू धर्म के प्रायः गणमान्य देवी देवता साबहक पाथरि प उत्खनन ,आ मूर्ति ,ई साबित करबा लेल पर्याप्त अछि जे एक समय ओतय हिन्दू धर्म के डंका बाजि रहल छल ,तदुपरान्त बौद्ध धर्म के प्रधानता भ गेल ॥महात्मा बुद्ध के जन्म स निर्वाण धरिक कथा ,जातक कथा ,के बड़ निक जका अनेक ठाम भित्तिचित्र मे ,प्राचीर मे दर्शाओल गेल अछि ।तीन दिन पर्याप्त अछि नीक जका घुमबा लेल ,ताही स तीन दिनक टिकट दईत छैक । मुदा हमारा सब लग समयक अभाव छल । सेयाम रेयप कोनो समय खमेर राज्य क राजधानी छल । हजारों हजार स्वर्ण मुद्रा खर्च करि क एकर निर्माण भेल छल ,आय अहि देशक अर्थ व्यवस्था एकरे काँध प अछि ,कंबोडिया लोक अँकोरवट के मंदिरे देखय अबैत अछि ,आ पर्यटन उद्योग स आम जन जीवन अपन जीवन यापन करैत अछि । अन्य देशक बनिस्पत ई देश बड़ सस्त,चीज बोस्त,गाड़ी ,होटल ,खेनाय ,स्पा ,मालिश ,सब किछू । बेशी संख्या धिया पूता के ,जवान लोक के ,बुढ़बड्ड कम ,देखाय पड़ल । तेसर दिन सेयाम रेयप के दोसर धरोहरि फ्लोटिंग विलेज के लेल प्रस्थान कएल। ड्राईवर चेन के गाम उमहरे छल ,ओ अप्पन गाम सेहो देखेबाक चाहैत छल । ओतुका गाम के देखबा के लालसा हमरो उद्दाम भ चुकल ,अविलंब ओकर प्रस्ताव स्वीकार कयलहू ।गाम एखनहु अपन अतीत के गरा लगौने ठाढ़ छै। कच्ची सड़क ,[जेकरा पक्की बनेबाक सरकारी प्रयास भ रहल छैक]के दुनु कात लहलह करैत धान क फ़सील रोपल जा रहल छल,सड़क पर कनिए दूर निकलला प ओकर भाय एक गोट स्कूटर प बइसल अपन संगी संग विपरीत दिस स आबि रहल छल ।चेन के दिस तकैत,मुसकैत । गाड़ी रोकि क ओ अप्पन पहिरलहा चमड़ा के नीकहा चप्पल भाई के दैत हमारा सब स बाजल ,ई हमर छोट भाय अछि’ ,आ अप्पन पर्स खोलि किछू टाका सेहो देलके।हमहु सब किछू ओतुका करेंसी देलियै। कनिए दूर आगु चलला के बाद ,बीच खेत स ,नितांत कच्ची {पुरना जमाना के बैल गाड़ी वाला रास्ता}देखा ,चेन कहलक पंदरह बीस मिनट पैदल चलय पड़त हम्मर गाम धरि,ओतय गाड़ी नहि जा सकैत अछि । ओहि ऊब्बड खाबड़ सड़क पर अहिना हमर मोंन परेशान ,शरीर अशोथकित भ गेल छल । आब हिम्मत नहिं,पैदल चलबा के । हमर मना केला के बाद ओ बाट घाट के घर सब देखबैत जेना गाईड बनि गेल । सड़क बनि रहल छै,जे प्रगति के सूचक छै ,बिजली के खंभा दूर दूर धरि नजरि आबैत छै ।अपना सब दिस के मचान सनक छोट छोट फूसक घर ,नीचा लकड़ी वला गाड़ी ,माल जाल ,,ऊपर सीढ़ी चढ़ि लोकवेद रहैत अछि ।घरक ,देवाल चार ,किछू फूसक ,किछू ताड़क खजूरक पत्ता के । किछू पक्का के सेहो । कहलक ओ “ अहि ठाम बड़ बारिस होय छैक ।,बरसा के मौसम मे ई सब ईलाका पानि मे डुबि जाय छै ।,ताहि लेल अहि ठाम बांसक,लकड़ीक एहेन घर बनाओल जाय छैक ।किछू खेत मे मिरचाई के पौधा लागल छल,कत्तेक ठाम बत्तकक फार्म छल ।किछूघर मे बइसल ज़नानी सब बांस के ,खजूरके पात स सामान बनबै छल ,जे खुजल दरबज्जा स ओहिना देखाय पड़ी रहल छल । दूर दूर धरि पसरल बाध ,एक टा खेत मे किछू स्त्रीगण पुरुख बड़का बड़का हैट पहिरने धान रोपि रहल छल । हमरा फोटो झिकैत देखि क ठठा क हंसल छल । कच्ची सड़क पाँच दस कोशक बाद पक्की सड़क मे एकाकार भ चुकल छल ।सड़क क कात वएह झोपड़ी सन घर व दोकान ,मुदा सब ठाम पानिक बोतल ,भांति भांति के लाल ,पियर,हरियर ,चिप्स व बिस्कुट के पैकेट । पर्यटकक सुविधा के चीज सब ।,हाँ , कतेको ठाम दु लीटर, पाँच लीटर के बोतल मे पेट्रोल ,डीजल बिकाईत छल । आगा ,जंगल झाड स बढ़ैत गाड़ी एकटा,गुमती लग रोकलक ,जतय25 डौलरक प्रति टिकट खरीदय पड़ल। जाबैत चेन टिकट लैत छल ,पाँच सात टा, सात स दस बरखक बच्चा सब गाड़ी के चारो कात स घेर लेलक ,हम एक टा फोटो खिचलिये ,त सब फटाफट गाल प,माथ प हाथ राखि ,पोज बना क ठाढ़ भ गेल । एक टा कन्या के हाथ मे पारदर्शी प्लास्टिक मे जीवित कछुआ छले,हॅलो हॅलो करैत ओ खरीदबा के ईसारा करय लगल ,आन बच्चा सब सेहो तरहत्थी पसारि देलके।चेन बड्बड़ाय लागले ,बाहरि आदमी सब केकरा सब के भिखमंगा बना देलके । कनिए दूर स नदी के सोर सुनाई पडैट छल । नदी के कात खूब चहल पहल ,नाव ,जहाज ,मल्लाह पैलवार ,पर्यटक सब । एक टा जहाज मे बैस क नदी के लंबाई मे यात्रा सुरू भेल । करीब आधा घंटा लागल ,फ्लोटिंग विल्लेज मे प्रवेश कयलहू ।आजूक युग मे इहो संभव छैक की? पानि के ऊपर बसल संसार ,बांस ,लकड़ी ,सब के बन्हि छिन्ह क बनल ,जल प तैरेत घर ,दोकान,पुरातनता के संग ,आधुनिकता सेहो घेंट मे घेंट मिलौने । जहाज क कैप्टन अपन जहाज के ओहि ठाम रोकलक ,जे एक टा पइघ दोकान सन छल,खेबा पीबा के ,चीज बोस्त खरीदबा के ,बाथरूम आदि के सुविधा स परिपूर्ण ।ओहि घर स सटल लकडी के पोखरा पाटन घर सन दू मंज़िला घर छल ,जाहि मे नीचा जाल स घेरल छल ,कतेक रास छोट पइघ मगरमच्छ सब ओतय विश्राम के मुद्रा मे निढाल भ पड़ल छल । एक टा दोसर घर मे नाइलोनक जाल सन दु टा बांस के खंभा मे बांहल छल ,जाहि प एक गोट स्त्री सुतल छली ,कत्तों कोनो स्त्री अपन आठ नौ मासक तंदुरुस्त बच्चा के लोईक लोईक क खेला रहल छल ॥ कियो रस्सी बुनेत ,कोनो कोनो दिनचर्या मे लगल ।एक ठाम दु घरक़ बीच पानि प जाफरी सन बनल ,ओहि मे मच्छरदानी लागल ,बत्तक ,आदि मजा स तैर रहल छल ।कुकुर सेहो छल । आवागमन के लेल प्राय सब के अपन अपन नाव ,छैक,चर्च ,स्कूल ,हेयर कटिंग सैलून ,अस्पताल सेहो सब छैक । टूटल भांगल अंगरेजी बाजिक अपन रोजी रोटी कमा रहल अछि । कोनो समय मे ई ईलाका कोनो राजा के नुकेबाक स्थान छल। नदी प डोलैत ओ गाम आदिम मनुखक कथा जेना कही रहल हो। पानी मे रहनाय कष्ट कारक त छइए। ओतुका पानि बड़ गंद,शिक्षा के स्तर त पूरे देशे मे खराप छै,तखन ओतुक्का गप्पे की । आपसी मे बड़ कम समय{12मिनट} पाँच बजवा मे बचल रहे ।सब किछू पाँच बजे बन्न भ जाय छै। बाटे मे वार म्यूजियम छल , काउंटर प ठाढ़ लड़की साढ़े पाँच तक खुलल रहबा के कही क टिकट काटि देने छल । वार मेमोरियल – हमरा सब के अलावा दस टा आर पर्यटक अहि धोका मे भीतर चली गेल रही ,सरकारी गाईड अपन टुटल,तोतराईल अंगरेजी मे देशक भीषण दुर्भाग्यक बखान करैत[,युद्ध के बाद इमहर ओमहार छितरायल सबटा लड़ाकु विमान ,हथियार सबके एक ठाम एक टा घेरल मैदान मे राखी देल गेल अछि ,आ एक कात किछू एकचारी जका बनल घर मे युद्ध के विभीषिका के जीवित तस्वीर सब ,लगाओल गेल छै]कोन बम के कतेक मारक क्षमता छल ,माईनिंग ब्लास्ट मनुक्ख लेल कतेक खतरनाक ,छोटका बम ,बड़का बम ,सैनिक के वस्त्र , क्रांति करि सबके कारी कारी परिधान । ओ बाजि रहल छल ,हमर देशक सीधा सादा किसान ,जे अतुका उर्वर माटि पानि मे अन्न उपजा क हंसी खुसी अपन जीवन जीबैत छल ,मुदा ओकर मुंहक अन्न छीन क ई सब हथियार ,टैंक ,प्रशिया ,रसिया ,चीन स मंगाओल गेल ,जखन युद्ध समाप्त भेल अतुका जंगल ,झाड ,बियाबाँ ,खेत ,मे लावारिस एकरा सब के आनि राखल गेल ,ई हमर देशक बरबादी के ,कथा कहि रहल अछि ।ओ सब जतेक नर संहार केलक धनक अपव्यय केलक ,देशक डाढ़ टुटले अछि । बिशेख किछू देखबा स पहिनहि समय समाप्त भ चुकल छल । तेसर दिन कल्चरल विल्लेज देखल -15 डालर प्रति व्यक्ति ,प्राचीन वास्तु शिल्प के प्रदर्शित करैत । सबटा कार्यक्रम दुपहर ढाई बजे स प्रारम्भ होईत छैक। एखन साढ़े एगारहे बाजि रहल छल।अहि स्वर्णिम समय के ओहि भव्य इमारत परिसरक परिक्रमा मे लगेबाक प्रयास मे आगा बढ़लहू त देखलहून ,हमारा सब संग संसार ससरि रहल अछि ,पर्यटकक बड़ निक उपस्थिति छल । चारि पाँच टा त थिएटरे छल ,न्यू थियेटर ,मिलेनियम थियेटर आदि । सांस्कृतिक गाँव ,जेना कि ओकर शब्दार्थ मे निहित अछि ,अपन सबटा ऐतिहासिक संपदा के एक ठाम सहेजने विश्व समुदाय के आश्चर्य चकित करबा के लेल उत्सुक अछि ।सन 2001 मे बनल आ 2003 मे जनता के लेल खुजल अहि थीम पार्क के 210,000 स्क्वेयर मीटर मे बनाओल गेल अछि जाहि मे एगारह टा ग्राम ,सब युगक अपन अपन रीति रिवाजक संग । संग्रहालय मे ,बुद्ध,के अनेक प्रतिमा ,शिवलिंग ,विष्णु ब्रम्हा ,अप्सरा हाथी ,बाघ ,प्राचीन जनजाति ,आदि के भव्य मूर्ति बड़ नीक प्रकार स लगाओल गेल अछि । चीनी विलेज ,खमेर विलेज आदि के नङ्घैत हम सब फ्लोटिंग विलेज पहुंचलहू। जलाशय मे बनल काष्ठ के विस्तृत घर ,पुल,भवन आदि ,मूल स बड़ बेशी सौन्दर्य वान लागि रहल छल । ठामे ठाम नयनाभिराम ,मनोरम मूर्ति ,मनुक्ख ,जानवर सब के बनल जे ओहि देशक संस्कृति के उद्योतक अछि । एक ठाम धरती मे छाती धरि धंसल,दुनु हाथ ऊपर उठौने दु टा भीमकाय पुरुषक मूर्ति छल ,जेकर एकटा के मुंह पर असीम वेदना ,आ दोसर के प्रकांड प्रसन्नता बड़ आकर्षित करि रहल छल ।बड़का गुरिल्ला जेकर झूला सन बनल दुनु गोलाकार हाथ प बईस क लोक सब फोटो खिचवा रहल छल, कत्तों बारह पंदरह फीट उंच सुपर मैन आदि इत्यादि । परिक्रमा करबा लेल बैटरी जनित गाड़ी सेहो सुलभ छल ,मुदा एक्का दुग्गी के छोड़ि सब पैरे बुलैत छल । देखैत देखैत ढाई बाजि गेल ,न्यू थिएटर मे प्रोग्राम देखवा लेल लोक सब अपन अपन स्थान ग्रहण कायल , भव्य कक्ष ,उत्तम साज सज्जा हाल पईघ रहे त आधे भरल लागै ।कलाकार सब आबि क अपन परंपरागत नृत्य प्रस्तुत कैल । ,बांस के ,मल्लाह के ,कमलक फूल के ,अप्सरा के आदि । मल्लाहक नाच देखि अपन देशक नाच मोन पड़ लागल ,ओहिना पाँच सात टा स्त्री सब ,घइल ल क पानि भरय नदी मे जाय अछि ,मल्लाह के पानि मे ज़ेबा स मलाहीन बरजै त अछि ,, उखड़ि समाट मे धान कुटैत अछि । बांस वला नृत्य मणिपुरक मोन पाड़ल। अप्सरा नृत्य ओतय के बड़ प्रसिद्ध छै॥एक थियेटर मे एके टा प्रो ग्राम ,दोसरि लेल दोसर ठाम ।मिलेनियम थियेटर बड़ निक ,लकड़ी के उत्कृष्ट कलाकृति अछि ।ओतय ,खमेर राजा सब के कोना विवाह होय छल एकर प्रस्तुति छल ।चीनी गाम मे चीनी नृत्य के मनोहारी मंचन कतेक रास कार्यक्रम देखैत हम सब बड़ थाकि गेल रही ,त कनी पहिनहि ओत स प्रस्थान कयलहू। अँकोर राष्ट्रीय स्ंग्रहालय अहि देशक सभ्यता संस्कृति के संग्रहण ,संरक्षण करबा के पुरातत्व विभाग के एक गोट अतीव सुंदर स्थान अछि । फ्रांसीसी स्थापत्य कला स ओत प्रोत, अहि प आधुनिक आ पुरातन दुनु शैली के प्रभाव अछि । अहि ठाम अनेक गैलरी अछि ,जाहि मे बुद्धा गैलरी मे बुद्ध के एक हजार दुर्लभ मूर्ति सब संग्रहीत अछि । आन गैलरी सब मे खमेर के स्वर्णिम इतिहासक ,मूर्ति ,राजा रानी ,परिधान ,आभूषण ,कलाकृति ,पाषाण के कथा , आदि के बड़ मनोहारिणी प्रस्तुति अछि । प्रायः सब प्रमुख भाषा मे [हिन्दी छोड़िए क] ऑडियो गाईड उपलब्ध अछि । फोटो झिकनाय निषेध छल ,ताहि लेल कानी मोन मलिन सेहो भ गेल । बहरेलों त आकाशक रंग बदलल छल सांझ उतरय लागल ,चारहु कात बिजली मुसैकमुसैक क अपन मुंह देखबय लगलै। आजूक राति एतय लेलअंतिम छल ,काल्हि कत्तों और ठेकान । शहर मे इमहर ओमहर बौवाबैत ढहनाबैत, घड़ी मे आठ बाजि गेले ,तखन पहिनहि स बुक कराओल होटल मे जा कए ओहि संस्कृति के महान अप्सरा नृत्य के आनंद मे डूबि गेल रही । लघुकथा- भागमंती बड़ दिनक बाद आइ ओइ घरक खुजल पुबरिया खिड़की दिस मानो दायके धियान गेल । जाफरीसं घेरल, चुहचुही सं भरल , सुरूजक किरीनमे उमकैत, फूल पत्तीसं खिल खिलाइत एक तल्ला घर । डबडबा गेलन्हि आंखि, हुलकय लागलै अतीत । तहिया ई इलाका एक्दम्मे सुन मसान छलै। राति के कोन गप्प ,दिन दहाड़ों ओमहर ज़ेबा क नाम प कोढ़ हहरि उठैक । रिक्शा वाला सेहो उमहर के यात्री के मूड़ी झूला क बरजै लगैक । महाराजी पूल के अहि पार पंचानाथ के पूजा करय बला लोक ,जनी जाति सेहो झुंडे में आबेथ, आ पुल के ओहि पार कनी दूरस्थ सती स्थान के पूजा करि क हाली हाली घूरि जाईथ। मुदा शहरीकरण के तीव्र आँधी बसात के चपेट मे एला के कारण इमहरका जमीन तहिए सं मोटगर पाय मे बिकै लागल छल।आ लगिच क गाम के महेश बाबू दू कट्टा जमीन किनी क अहि ठाम चारि टा कोठरी,किचन आ बाथरूम बना क बाकी जमीन के जाफरी स घेर लेने छलैथ।कंपाउंड मे छहर द ,आम लताम,शरीफा , नेबो,केरा के गाछ संग जाफरी प लतरल लत्ती सब में लुधकल करेल ,सजमनि ,घेरा लगवा देलंहि। जे से तोड़ि क ल जाय,आ महेश बाबू खुश होथि,केकरो काज त भेल हमर परिश्रम । हुनक साबिकक पोखरा पाटन घर बड़ नीक खेती पथारी भरल पूरल पैलवार क दालान सेहो शहरक टुनमुनिया कोठरी के ड्योढ़ स बेसिए छलेंह । तखन राति बिराति , कोर्ट मुकदमा ,डाक्टर अस्पताल क फेरि लगला प राति कटबा लेल एक टा अपन छत त भ गेल छल । ओहि घर क चौखटि प तहिया स नियमित दीप जरलै ,जखन महेश बाबू के बड़का पोता क विवाह दुरागमन भेल ।कनिया के सीथ में सिंदूर पड़ितै मातर महेश बाबू के कहिया कत्त स कतेको अटकल काज सुनैट गेलैन। पिपरौलिया वाला जमीन के केस जीत गेला ,छोटका बाबा विधानसभा के चुनाव मे भारी बहुमत स विजयी घोसीत भेला ,तेसर पोता के आर्मी में नौकरी लागि गेलेन्ह,सत्तरह साल स संतान के बाट तकैत ,सुरूज़ देव के अरघ प अरघ चढ़बैत बेटी के बेटा भेलैंह,गाय के बाछी भेलय ,सासुर में कन्या सुमंगली मानल गेली ।चतुर्थी के परते दुरागमन करि कनिया के ल आयल गेल । ददिया सौस पहिनहि स मुनादी करबा देलखिन जे सब गोटे हुनका भागमंती नाम स सोर पाड़ेथ । हुनका होयन्हि कि पोत्पुतौह के माथ प राखी कि हाथ मे राखी ,कि करेज चीर क ओहि मे स्थापित करी ली ।दाय नौड़ी सब सेहो भागमंती भौजी अथवा बौवासिन कहनाए प्रारम्भ करि देने छल । कनिया अपन गाम में इंटर में पढ़ैत छली,त हुनक नाम कालेज में लिखा क किछू दिन सासुओ अपन खबासिन,भनसीया मुनेसरा संग आबी क रहलखीन । मुदा ओत्त गाम प राज काज में बड़ हर्ज होमय लागल छलै। बड़ सोचि विचरि क पैल वारक सबस अरामतलबी प्राणी बूलन पीसी के गाम स उठा क शहरि मे राखि देल गेल । छोटका ककाक बेटा श्रीहर जे मैट्रिक के परीक्षा गाम के स्कूल स देने छले,मेडिकल के तैयारी केलेल आईएसी में नाम लिखा ओहो डेरा प जाकय रहय लागला । बड़का पोता कत्तों बाहर नौकरी करैत छल । एक गोट नब रिक्शा कीन क कनी दूरस्थ पड़ोसी लकड़ी के दोकान बलाके भातिज बिपिन के अही शर्त प देल गेल जे कनिया के कत्तों जेबा एबा मे कोनो फिरिसानी नै होय ,तेकरा बाद मोन हो त भाड़ो कमा लै। किछू पाय महिनवारी सेहो बन्हि देल गेल ओकर । डेरा प के सब इंतजाम करि घरवैया निफीकीर भ गेल छला । कनिया सुभासिनी अपन दियर संग कओलेज जाईथ,आ रिक्शा हुनका उतारि श्रीहरि के कओलेज छोड़ैत।घूरती काल में सुभासनी एसगरे रिक्शा स जाईथ ।श्री हरी उमहरे स ट्यूशन चलि जायथ ,कखनों कोनो सवारी नै भेटैय त हुनका पैरे डेरा प आबय पड़ेंह। श्री देखबा में सोरगर पोरगर गोर आकर्षक युवक भैयो क ततेक लजकोटर जे सदिखन धड़ खसौने ,धरती मे सटल ,गुम सुम गुमसुम,मुदा मेहनतिया बड़।आ राति दिनुक दिमागक घिसाई स स्थानीय मेडिकल कओलेज में अपन स्थान निश्चित करवा लेलन्हि। बरस छौ मास लगलै मेडिकल कओलेजक परिमार्जित वातावरण श्री के व्यक्तित्व के धो मांजि क दर्पण सन चमका देलकेंन्ह। सीना तनि गेलय, पोशाक बदलि गेलय आ आब केकर नजरि एहेन छल जे हुनका प नहिं अटकै । लोकल भेला क कारने हॉस्टल नहिं नेने छलथि। सुहासिनी के खुशी के ठेकान नहिं ,कत्तो जाईथ त हुनका होन्हि श्री हुनका संग रहैथ।हुनको भरि माथक सिंदूर घटि क आध आंगुरक भ गेलन्ह,केश स तेल उड़ि गेल, पार्लर के फेरी लगा केश छोट करबा ,भौं छिलबय लागल छली । एक दू बेर घरबला लग जा बड़का शहरक हाव डीव ल लेने छलिह । गामक धाख छुटबा संग , अंगेजी के दू चारि शब्द सेहो बाजि लईत , आब ओ माथ झूका क नै,माथ उठा क निधोक भ चलैत फिरैथ ,त आर सुन्नर लगैथ। विषय सेहो कोनो तेहने सन छल जाहि में कोनो तरहक दिमाग नहि लगाओल जायछै।हुनका कोन नौकरी के बेगरता छल,ओ त ओहिना सख स पढ़ि रहल छली ,दुणु कुल में पहिल स्त्री ,जे कओलेजक मुंह देखलेंन । पति देव दू तीन मास प अबैत छला। आब हिनक बीए के अंतिम बरख चलि रहल छल ,परीक्षा द माघ फागुन में ई अपन घरवाला के डेरा प जाय वाली छलिह। इमहर श्री कतेक बेर महिला कओलेज सुभासिनी संग जायत अबैत रहला ,मुदा आब हुनको लाल दुपट्टा अपन गिरह मे बांधी नेने छल। एना बुझि पडलै जे कियो हुनक टिकी काटि के महिला विद्यालय के सोझा ठाढ़ नीमक गाछ क नीचा गाड़ि देने होय । कतेक बेर अपन किलास छोडिओ क ओ ओतय ठाढ़ रहैथ। सखी बहिनपा के टोंट सुनैत, मने मन मुसकेत सुहासिनी कखनों राज ,कखनों मनो कामना मंदिर, कखनों टावर घूमय जायथी,कखनों सिनेमा ।अपन पति के लिखल चिट्ठी हुनका पढ़ि पढ़ि क सुनाबैथ,आ हुनक आंखि में उपजल ईरखा देखि अंतस करन धरि मुग्ध होईथ । गाम स नीत दिन किओ नै कियो, मइयाँ क हाथ क बनल किछू विशेष पकवान ल क आबि जाय।पीसी के शहर में मोन औनाय त ओ इमहर उमहर के सखी बहिनपा स गप्प लड़ा क ,फेर बिपिन के रिक्शा स दु चारी दिन लेल गाम घुरि आबेथ।मानो दाय स आगा खसि क गप्प करय बाली वएह स्नेहिल स्त्री छलिह। एहने सुखक सुवासित मलयानिल सँग जिनगी कटि रहल छल। गोतिया नाता के बड़का लत्ती,आवा जाही , सेहो समय के सुगंधित बना रहल छल। भदवारि मास आबि गेल त बरखा बूनि,सँग कारी कचोर मेघ अपन लट छिटकौने ,आकाश मे छिरहरा खेलाय लागल।एक गोट एहने मनोरम साँझमे जखन ओ अपन बरंडा मे असगर बैसल गर्जइत मेघ आ चमकैत बिजूरी के जुगल बंदी देख रहल छली,हठात ओ श्री के बजबय लेल हुनक कोठरी दिस बढ़ली। कुर्सी प बैसल ,दुनू टांग टेबुल प धेने पेट प धैल कोनो किताब मे डूबल ओ मुसैक रहल छल। हिनका देखि किछू घबडायल सन,किछू अनसोहात भावना के शिकार सन झट दनी किताब बंद करि देलथी। सुहासिनी झपटलखीन “,किएहेन पढ़े छलहू,जे हमारा देखि क बन्न करय पडल,एहेन बैरि हम भ गेलहू”।मुदा श्री हुनका किछू जबाव नै द क ,हुनक हाथ झिकैत कोठरी स बहरा गेल छलथी। ई सामान्य सन गप्प सुहासिनी के बड़ व्यथित करि देने छल ।दालि मे किछू कारी नजरि अयलन्ही। भरि राति मोन मे भांति भांति के गप्प बाईस्कोप मे देखाओल दृश्य जका घूरियाति रहल । परात भेने श्री जलपान करि क कओलेज चलि गेला ,मुदा ओ बहन्ना करल ओछोन प पड़ल रहली ,अपन कॉलेज सेहो नहिं गेली । पीसी गाम गेल छली ,आ भनसिया के माछ आनय लेल पठा क ओ श्री के कोठरी पईसी टेबल प रखल ओकर एक एक किताब झाड़ली।इमहार सूंघली ओमहार कनखिएली ,कत्तों किछू नै हाथ अयलन्ही। दोसर तेसर दिन सेहो प्रयास कयल,मुदा अहू बेर निरर्थक । मोने मोन ठेकाने लगली कोनो फोटो जका अवश्य छल । मुदा केकर ? इमहर दुर्गा पूजा के लेल कओलेज मे तातील घोसित करि देल गेल ।घरवाला परसूँ आबि रहल छला।दू तीन दिन मे ओ हुनका संग हुनक डेरा प चलि जयति । गाम स जतरा करि डेरा अयली।भोरका ट्रेन छले। चीज वोस्त कोनो बेसि नै ,मात्र दस दिन लेल एक टा अटैची आ एयर बैग काफी छले । दुनू भाई गप्प करैत करैत कोनो समान आनय टाबर दिस गेला ,भनसिया भानस बनबय मे लिन तखन ओ एक बेर फेर हुलकी मारलैन श्री के कोठरी में। ताख प रखल एक टा मोटका किताब हाथ मे लेलथी ।सबूत भेट गेलन । चुप चाप सबूत सहित अपन कोठरी मे आपस आबी गेली । दस दिनक छुट्टी ,बड़ विलंब स बीतल । पति के हुनक मुरुझायाल ,मुंह देखि आश्चर्य होयन्ह कि भेल जा रहल अछि ? किछू त कहू,डाक्टर स गप्प करी।मुदा ओ कहैथ परीक्षा के डर गारा मोकि रहल अछि । “छोडु परीक्षा ,तरीक्षा अहा के कोण नोकरी करबा के अछि” ।पति के अहि गप्प प ओ सहमि क बजैथ “ अतेक मेहनत अकारज भ जायत,मात्र दू मास आर छैक बस”। छठी के परना के उपरांत ,नवंबर के कानी मोलायम मोलायम सान रौद में कओलेज खुजल त ,चारहू दिस किशोर ,युवा किल्लोल प्रस्फुटित होय लगलै।लाल पियर,परिधान ,कंधा प झुलैत पर्स ,पैर में ऊंचका एड़ी के सैंडील,सखी सहेली ठिठिया ठिठिया क अपन हिय के उल्लास प्रकट करि रहल छल।छात्र सभक संग शिक्षिका सब सेहो जेना प्रसन्नताक महाकाव्य बांचि रहल होयथू । एना बुझी पड़ेक जेना वसंत आबि क ओहि ठाम रमि रहल छल । मुदा सुहासिनी के आंखिक नीचा क करि कारी गोला किछूआओर कहबा लेल व्यग्र छल । ओ गुमसुम ,मुरुझैल सन काकरो बड़ उद्विग्नता स प्रतीक्षा करि रहल छली। सखी सब ठिठौली करेन्ह। “जीजाजी मोंन पड़ी रहल छथीन,तै हमार सखी अटेक उदास ,आ ‘के पतिया लय जायत रे मोरे प्रियतम पास” ।किओ कहे ‘कोन काज छल पढ़े के ,हम रहितौं त किन्नों नहि अबितौं ,प्रियतम के छोड़िक,पढ़ाई जाए चूल्हीमें”। सुहासिनी के किछू नै सुनाई पड़ल,व्याकुल हिरणी सन ओ ओहिना इमहर उमहर तकैत रहली । ओहि दिन ओ लाल नूआ लाल आंगी ,लाल चूड़ी ,आ लाल सैंडील पहिरने छलिह,। हठात हुनक नजरि लाल पियर बेलबौटम वाली कन्या प टिकल। “पुष्पा” मस्तिष्क में नाम अनुगुंजित होमय लगल । ओकर पछोर धेलथी। तबैत कओलेजक प्रथम घंटी बाजि चुकल छल ,सब कियो धड़ फड़ धड़ फड़ करैत अपन अपन कक्षा दिस बढ़ै लागल छल ।क्लास मे प्रवेश करय स पहिनहि ओ पुष्पा के पाछा स हाथ खिंचलक “रुक तोरा स बड़ जरूरी गप्प करबक अछि”। प्रथम वर्षक छात्रा अपना सोझा अंतिम वर्ष के छात्रा के देखि घबड़ा गेल । ओ ओकरा खींचने खींचने बाथरूम दिस सुनसान मे ला आयल । ओकर लिखल चिट्ठी ,ओकर फोटो देखबैत बाजल “प्रेम करब के बड़ सख छलो, पूरा कओलेज के देखबिओ तोहर किरदानी”। आ अपन पैरक सैंडील उतारि ओकरा प पेशेवर अपराधी सन टूटि पडले । पहिने त पुष्पा सकपका गेल छली ,मुदा बादमे ओहो सीना तानि अड़ी गेली,की करबें। तखनेएक सेंडिल ओकर आंखि प लगले आ ओ बफारि कटैत नीचा खसि पदल ।“म्या गै म्या” एक त महा भयौन ध्वनि स सम्पूर्ण बाथरूम काँपि गेले । सुहासिनी प जेना अनेकों चुड़ैल असवार छल,ओ नीचा खसल पुष्पा प लात घुस्सा के बरसा करैत,भांति भांति के गारि पढ़ि रहल छल । ओकर पीठ प किओ डंडा मरलकै ‘राक्षसी” ओ मुंह उठौलक बड़का भीड़ संग गीता मैडम छलिह । बेसुध पुष्पा के उठा पुठा क बगल के क्लीनिक ल गेल ,जतय ओकरा मृत घोसीत करी डेल गेल छल । कनी काल मे पुलिस आबी क सुहासिनी के अपन जीप मे बैसा क ल जायत रहलै।कियो अनेरे घंटी टनटना देलके। चारहू कात सोर सराबा ,हो हल्ला होमय लागल छल ।कतेको प्रकारक नारा लगायल जाय लागल।आनन फानन मे सूचना बोर्ड प एक सप्ताह के छुट्टी के नोटिस चिपका देल गेल छल । मानो दाय हुनके द्लान प बैसल छलिह,जखन पुलिसक गाड़ी पिपियाती ,घिघियाति गर्द उड़बैत हुनका दरवज्जा प आयल छल।बरदी धारी पुलिस सब के देखिते मातर चारहू दिस जेना घनगर अनहार भ गेल छल ,सबहक करेज बेतहासा धुकधुकै लागल ,हे विधाता ,ई किए आयल हमरा दुआरे । जीपक सोअर सुनी श्री कोठरी सा बहरैला । पुलिस के गप्प सुनी ओ तुरत ओकर जीप मे बइसी क जायत रहला । ओहि भम्म पडल सन्नाटा के चीरैत इमहर “दाय गै दाय आब हम केकरा की मुंह देखेबै गे दाय’ घिघियाती ,अस्पस्ट स्वर स कलपैत बुलन पीसी ओहि ठाम बेहोस भ क खसि पड़ल छलिह ।। रतन झा मैथिलीक किछु समकालीन उपन्यासक विविध स्वरूप समकालिन मैथिली उपन्यासक विषयमे चर्चासँ पहिने समकालिन शब्दक अर्थ स्पष्ट करब आवश्यक अछि। समकालीनक अर्थ होइत अछि ई-काल अथवा वर्तमान-काल। मुदा ई कालखण्ड तँ सवयं परिवर्तनशील अछि ई सतत् आगू दिस घुसकैत रहैत अछि। ई-कालखण्डक अन्तिम क्षणकेँ तँ अखुनका क्षण सेहो कहि सकै छी अर्थात कहबाक तात्पर्य ई जे आब अखन जे उपन्यास लिखल गेल अछि, मोटा-मोटी वएह समकालीन उपन्यास छी। मुदा प्रश्न उठैत अछि जे ऐसँ पहिने उपन्यास लिखल गेल, ओहो तँ ओइ समैयक समकालीन उपन्यास छल। अर्थात् प्रत्येक युगक उपन्यास ओइ युगक समकालीन उपन्यास छी। मैथिली साहित्यमे उपन्यास विधाकेँ समृद्ध करबामे अनेक उपन्यासकार शिल्प, शैली एवं कथानक व वातावरण आ तथा सामाजिक परिवेशक वर्णनमे सफल भेल छैथ। डा. विदित एकटा प्रयोगधर्मी उपन्यास ‘मानवकल्प’ 2008 ई.मे प्रकाशित करौलैन। मैथिली उपनरूास लेखनक पारम्परिक प्रवृतिसँ भिन्न ऐ उपन्यासमे एकटा गामकेँ पात्र बनौल गेल अछि। आन उपन्यासक नायकक उमेरसँ बहुत बेसी उमेर ऐ उपन्यासक नायक अछि। ऐ उपन्यासक नायकक उमेर तीन सए पचास बर्ख अछि। बनवासी जनजीवनपर लिखल मैथिलीक प्रथम उपन्यास ‘विप्लवी बसेरा’ छी तँए मिथिलाक द्रविड समुदायक उत्थानक कथा ‘कोसिलिया’ उपन्यासमे अछि। एकटा अनाथ कन्याक संघर्ष ओ ओकर आत्मबलक चित्रण ‘करपुरिया’ उपन्यासमे केने छैथ। संयोग आ चमत्कारक अपूर्व समन्वय विदितजी ‘विधकरी’ उपन्यासमे देखेने छैथ। साहित्य ओ समाजक बीच जे खाधि बनल अछि तेकरा भरबाक लेल एकटा समाधान प्रस्तुत केने छैथ ‘परिक्रमा’ उपन्यासमे माए-बापक पीड़ाकेँ नीक जकॉं उभारि ओकर एकटा समाधान प्रस्तुत केने छैथ- ‘केकरो कहबै नहि’ उपन्यासमे। वीणा ठाकुरक 2009 इस्वीमे प्रकाशित उपन्यास ‘भारती’ अछि। मंडन मिश्रक पत्नी ओ कुारिल भट्टक बहिन भारतीसँ सम्बद्ध अनेको किंवदति आइयो मिथिलामे सुनल जाइत अछि। वीणा ठाकुर ओइ विद्धान दम्पतिमे सुनल जाइत अछि। वीणा ठाकुर ओइ विद्वान दम्पतिक आधारपर बनल आलोच्च उपन्यासक लेखन केलैन अछि। ऐ उपन्यासमे ऐतिहासिक तथ्यकेँ गौण राखि अपन कल्पनाकेँ आधार बनौलैन अछि। मुदा उपन्यासक लेले जे तदनुकूल वातावरण चाही तेकर निर्माण दिस लेखिका सचेष्ट छैथ आ उपन्यासक भाषा,शब्दक चयन ओ ठाम-ठाम दार्शनिक मंथन युक्त व्याख्या सभ ऐमे सहायक भेल अछि। एकरा दार्शनिक दम्पतिपर केन्द्रित उपन्यासमे दर्शनक झॉंस रहब स्वभाविक अछि। मुरारि मधुसूदन ठाकुरक ‘देवव्रतक आत्मकथा’ 2010 इस्वीमे प्रकाशित भेल। ऐ उपन्यासक नायक भीष्म पितामह छैथ, जिनकर आदि देवव्रत छेलैन। आत्म कथात्कक शैलीमे लिखित ऐ उपन्याससँ एकर लेखकक गहन अध्ययन ओ विद्वत सहजे परिलक्षित भऽ जाइत अछि। महाभारतक गम्भीर अध्ययनक पश्चात लिखित ऐ उपन्यासमे लेखक वातावरणक निर्माण ओयुगक अनुकूल पत्रोचित भाषाक प्रयोगमे अत्यन्त सफल भेल छैथ। देवव्रत अर्थात द्वापरयुगीन महाभारतक एक आबाल ब्रह्मचारी जे अपन पितृ भक्तिमे आजीवन ब्रह्मचारी रहबाक तथा हस्तिनापुरक चक्रवर्ती सम्राटक पदपर नहि बैसबाक भीषण प्रतिज्ञा करबाक कारण महामना भीष्म नामसँ विख्यात भेला। अविवाहित रहबाक कारणें पुत्र प्राप्तिक सम्भावनो केना होइतैन। तथापि ओ भीष्म पितामह संज्ञासँ आइयो इतिहासमे प्रसिद्ध छैथ। ओहन भीषण प्रतिज्ञाक प्रतिफल की भेटलैन एक जन्मेसँ आन्हर, दोसर पुत्रक मोहमे विवेको ऑंखिसँ अन्ध अपन एक भातिजकेँ राजगदीपर बैसा ओकर अन्न खाइत रहलाक दुआरे उद्वण्ड दुर्योधन, दुश्शासन सदृस पौत्र सबहक द्वारा होइत अनीति-अत्याचारकेँ ऑंखि मुनि सहैत रहबाक लेल बाध्य होमए पड़लैन। की भीष्मक प्रतिज्ञा करब उचित छेलैन? की प्रतिज्ञा करबाक समए भविष्यक प्रति जे सुख-समृद्धि मानसिक शान्ति प्राप्तिक कल्पना छेलैन से फलीभूत भेलैन? मधुकान्त झाक ‘स्वेदजीवी’ 2008 इस्वीमे प्रकाशित भेल। स्वेदजीवी वस्तुत: मील मजदूर समुदायक जीवन,ओकर सामाजिक परिदृश्य, चिन्ता–समस्या,ओकर राग-विराग,ओकर अपेक्षा-उपेक्षाक कथा कहैत अछि। मार्क्स जइ श्रमिक वर्गक अधिकार लेल अबाज उठौने रहैथ आ तकर बाद ‘दुनियॉंक मजदूरएक हौउ’क जे विश्वव्यापी नारा पड़ल छल ताइ परिपेक्ष्यमे कार्य केनिहार प्रवासी मैथिल श्रमिक वर्गक जीवनक आरोह-अवरोहक तानी-भरनीसँई उपन्यास-कथा बूनल गेल अछि। आ स्वेदक अमूल्यता स्थापित कएल गेल अछि। अपन विषय-वस्तु, विस्तृत फलक एवं संवेदनापूर्ण लेखकीय दृष्टिक संगे एकर भाषा, शिल्प, अभिव्क्ति कौशल प्रवाहपूर्ण गद्य और सम्प्रेषणीयता एकरा हृदयग्राही आ चिर स्मरणीय बना दइ छै। अन्तमे कहि सकै छी जे जहियासँ समकालीन इतिहास अस्तित्वमे आएल अछि तहियासँ प्रत्येक उपन्यासकेँ ऐतिहासिक उपन्यास कहल जा सकैत अछि। कारण कोनो नीक उपन्रूासमे सामाजिकता आ समकालीनता दुनू रहै छै। सन्दर्भ सूची :- 1. झा विद्यानाथ ‘विदित’ मानव-कल्प, प्रस्तुति प्रकाशन दुमका- 2008 2. झा विद्यानाथ ‘विदित’ विप्लवी बसेरा, दुमका- 2009 3. झा विद्यानाथ ‘विदित’ करपुरिया, प्रस्तुति प्रकाशन दुमका- 2009 4. ठाकुर वीणा, भारती, मिथिला रिसर्च सोसाइटी कविलपुर, दरभंगा- 2009 5. ठाकुर मुरारि मधुसूदन, देवव्रतक आत्मकथा, नवरत्न गोष्ठी दरभंगा- 2010 सम्पर्क : पति- श्री विकास कुमार झा, गाम : घोघरडीहा, पत्रालय : घोघरडीहा, जिला : मधुबनी डॉ विद्यानाथ झा- प्रधानाचार्य, एम आर एम कॉलेज, दरभंगा डेंगू बीमारीक भयावह परिदृश्य
भारत मे डेंगू बीमारी एहि बेर वर्ष 2015 मे एक भयावह रूप ल’ लेलक अछि। दिल्ली मे अविनाष राउत नामक एक स्कूली बच्चाक एहि रोग सॅं आक्रान्त भ’ पॉंच-पॉंच अस्पताल मे भर्त्ती हेतु बौअयबाक वृत्तान्त अखबार सभ मे छपल। समय पर भर्त्ती नहि भ’ सकलाक कारणे अन्ततः ओकर मृत्यु भ’ गेल। बेटाक अन्तिम संस्कार भेलाक बाद ओकर माय-बाप बहुमंजिला भवन सॅं कूदि क’ अपन प्राणत्याग क’ देलनि किएक त’ पुत्रक मृत्यु असह्य भ’ गेलनि। आमजन केॅं स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहि रहबाक ई एक बानगी अछि। सम्प्रति हजारो हजार लोक दिल्ली सहित सम्पूर्ण देष मे एहि रोग सॅं आक्रान्त भ’ अस्पताल सभ मे पड़ल छथि। प्रायः पन्द्रह वर्ष पूर्व ई रोग पहिल बेर देष में सांघातिक रूप मे पसरल छल। एडिस एजिप्टाइ (Aedes aegypti) नामक एक मच्छरक माध्यमे पसरयवला ई एक विषाणुजन्य रोग अछि जकर वैज्ञानिक नाम फ्लैवीवायरस (Flavivirus) अछि। जन्तु जगत् मे सामान्यतः पाओल जायवला द्विसंस्तरीय नाभिकीय अम्लDouble stranded Deoxyribonucleic Acid) केर बदला एहि विषाणु मे एकस्तरीय नाभिकीय अम्ल (Single stranded Ribonucleic Acid)होइछ। ई रोग विषाणु अपन चारि स्वरूप मे अवस्थित होइछ। एहिबेर एकर टाइप IV एतेक सांघातिक भेल अछि। प्रायः 15 सितम्बर सॅं 15 अक्टूबर केर मध्य एकर उत्पात बढि़ जाइछ। बरिसकालक ठीक बाद यत्र-तत्र जमकल पानि एहि विषाणुक वाहक मच्छर के आश्रय प्रदान कय ओकर जनन केन्द्र बनि जाइछ। अधिक तापक्रम ओ सापेक्ष आर्द्रता मच्छरक जनन हेतु अनुकूल परिस्थिति प्रदान करैछ। एक अनुमानक अनुसार सम्पूर्ण विष्व मे प्रायः 40 करोड़ लोक पर एकर आक्रमण होइछ। उष्ण ओ उपोष्ण कटिबन्धीय प्रायः 100 देषक 2.5 अरब लोक एहि सॅं प्रभावित होइत छथि। विष्व भरि मे प्रति वर्ष प्रायः 5 लाख लोक मे एहि रोगक लक्षण प्रकट होइछ आ प्रायः 25 हजार लोक एहि सॅं कालकवलित होइत छथि। ई मानल जाइछ जे डेंगू मूल रूपे अफ्रीका करे स्वाहीली भाषाक शब्द अछि। केन्या ओ तन्जानिया मे एकर उच्चारण ‘‘डिंगी पेपो’’ केर रूप मे कयल जाइछ। एहि रोगक आक्रमणक इतिहास 1780 ई0 मे एषिया, अफ्रीका ओ उत्तरी अमेरिका सॅं उपलब्ध अछि। डेंगू सॅं 2004 ई0 मे इन्डोनेषिया मे 800 लोक मुइलाह जतय प्रायः 80,000 लोक एहि सॅं प्रभावित भेल छलाह। एहि सॅं पूर्व 2002 ई0 मे ब्राजील में सेहो प्रायः 10 लाख लोक एहि सॅं प्रभावित भेल छलाह। 2006 ई0 में फिलीपिन्स मे 14 हजार लोक प्रभावित भेल छलाह। एही वर्ष पाकिस्तान मे सेहो प्रायः 5 हजार लोक प्रभावित भेलाह। सिंगापुर, आस्टेªलिया ओ चीन सेहो डेंगू सॅं प्रभावित रहल अछि। पर्यावरण विषेषज्ञ लोकनिक मानब अछि जे डेंगूक ई महामारी कतहु ने कतहु जलवायु परिवर्त्तन सॅं सेहो जुटल अछि। वैष्विक तापवृद्धिक कारण मच्छरक प्रजनन हेतु वातावरण अधिक अनुकूल भेल जा रहल अछि। पानि मे देल मच्छरक अंडा सुखा गेला पर समुद्री मालक संग देष-विदेष पहुचि जाइछ जतय कतेको मास बाद पानिक सम्पर्क मे अयला पर मच्छर के जन्म दैछ। एहि तरहे विश्वक कतेको भाग मे पहॅुचि उत्पात मचबैछ। एहि बेर दिल्लीक आस-पास पहिने थोड़ेक-थोड़ेक अन्तराल पर वर्षा होइत रहल आ तकर बाद प्रचण्ड गर्मी पड़ल। मच्छर कटलाक पॉंच-छह दिनुका भीतर लक्षण प्रकट होमय लगैछ। ज्वर सात सॅं दस दिन धरि रहैछ। तीव्र ज्वर 103 डिग्री फारैनहाइट धरि पहचि जाइछ। माथ ओ ऑंखिक दर्द बढ़बाक संग मांसपेषी मे असह्य दर्द होइछ, उल्टी सेहो होइछ। मसकूर, नाक ओ कान सॅं रक्त स्त्राव होमय लगैछ ओ चकत्ता सेहो निकलैछ। अपन मिथिला क्षेत्र मे सेहो राज्यक बाहर सॅं आबि कतेको रोगी दरभंगा चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल में भर्त्ती भय चिकित्सा करबा रहल छथि। एकर जॉंच हेतु आवश्यक ELISA Test केर सुविधा उपलब्ध नहि होयबाक खबरि बरोबरि समाचार पत्र सभ मे छपि रहल अछि। एहि रोग सॅं शोणित मे पाओल जायवला प्लेटलेट्स (Platelets) केर संख्या मे कमी आबि जाइछ। प्लेटलेट्स वस्तुतः रक्त के जमबा (Blood Clotting) मे मदति कय रक्तस्त्राव के रोकैछ। मनुष्यक रक्त मे सामान्यतः प्लेटलेट्सक संख्या प्रति माइक्रोलीटर डेढ़ लाख सॅं साढ़े चारि लाख धरि होइछ। ई संख्या कम भेला पर आन्तरिक रक्तस्त्राव होइछ जे अधिक भ’ गेला पर अन्ततः रोगीक मृत्युक कारण बनैछ। प्लेटलेट्सक संख्या डेढ़ लाख सॅं कम भेला पर रोग सॅं आक्रान्त व्यक्ति केंॅ प्रति दू दिन पर गिनती करयबाक चाही। एक लाख धरि भय गेला पर प्रतिदिन ओ साठि हजार सॅं कम Platelet Count पर दिन मे दू बेर जॉंच करयबाक चाही आ पचास हजार सॅं कम भेला पर अस्पताल मे भर्त्ती भय चिकित्सा करयबाक चाही। इण्डियन मेडिकल एसोसियेसन केर कहब अछि जे स्थूलकाय लोकक संग उच्च रक्तचाप, मधुमेह ओ हृदय रोग सॅं ग्रस्त होमयवला लोक के अधिक सावधान रहबाक चाहियनि। डेंगूक कारणे रोगीक रक्तचाप कम भय जाइछ। मोट लोक मे रक्तनलिका (Capillary) फाटि जयबाक संभावना बेसी होइछ। आपात् स्थिति मे डेंगूक रोगी के अस्पताल मे भर्त्ती करबा सॅं मना करयबला अस्पताल ओ नर्सिंग होम क विरूद्ध कार्रवाई करबाक निदेष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा पूर्वहि केन्द्र ओ सरकार के देल गेल अछि। एम्हर राजधानी दिल्ली मे डेंगूक प्रसार सॅं चिन्तित भय भारतक नियन्त्रक ओ महालेखा परीक्षक (CAG) मच्छर वाहित बीमारी सॅं लड़बाक दिल्ली सरकार ओ स्थानीय प्रषासनक तैयारीक ऑंडिट करबाक आदेष देलनि अछि। डेंगू रोग सॅं त्राण पयबाक लेल आवष्यक उपाय सम्बन्धी विज्ञापन सरकारी स्तर पर प्रकाषित कयल जा रहल अछि। एहि रोग सॅं मरयबला लोकक संख्या मात्र 0.3 प्रतिषत होइछ। 99.7 प्रतिषत रोगीक लेल ई आवष्यक नहि जे ओ अस्पताल मे भर्त्तीये होथि। चिकित्सकक सलाह केर अनुपालन कय डेंगूक रोगी शीध्र ठीक भय सकैत छथि। एहि रोग मे ई आवष्यक अछि जे शरीर मे जलक मात्रा मे कमी नहि होअय। एहि हेतु ORS घोल, नारियल पानि, फलक जूस आदि पर्याप्त मात्रा मे लेल जयबाक चाही। ज्वरक नियन्त्रण हेतु माथक संग शरीरक आन भाग पर ठंढा पानिक पट्टी लैत रहबाक चाही। दिनुका समय मे मच्छरक कटबा सॅं बचबाक हेतु सम्पूर्ण शरीर केॅं झॉंपयवला कपड़ा पहिरबाक चाही। घर ओ अस्पताल मे मच्छरदानीक उपयोग नितान्त आवष्यक अछि। घर मे कूलर रखनिहार लोक ओकरा खाली कय रगडि़क आ फेर सुखा कय ओहि मे पानि भरथि। पानिक वर्त्तन ओ टंकी आदि केॅं नीक जकॉं झॉंपि कय राखथि ओ आन अनुपयोगी डिब्बा, टायर, नारियलक खपरोइया आदि के नष्ट करथि किएक त’ ओहि सभ मे जमकल पानि मे डेंगूक मच्छर उत्पन्न होइछ। रोगग्रस्त व्यक्ति रोगक निदान हेतु प्राकृतिक उपचार सेहो करबैत छथि। अररनेबाक पातक रस गिलोय (गुरीच) क पात ओ लत्तीक रस, घृतकुमारीक इस, अनारक रस, बकरीक दूध आदि के गुणकारी पाओल गेल अछि। ई सभ औषधि गामघर मे आसानी सॅं उपलब्ध होमयवला अछि। परन्तु विषेषज्ञ लोकनिक कहब अछि जे एहि वैकल्पिक चिकित्सा के मानकीकृत कयल जयबाक आवष्यकता अछि जे एहि दिषा मे व्यापक शोधे सॅं सम्भव अछि। अखवार सभ मे ई खबरि छपल अछि जे कोना दिल्ली मे एहि बेर बकरीक दूध दू हजार रूपया लीटर ओ अररनेवा (पपीता) क पात पॉंच सय टाका प्रति पातक दर सॅं बिकायल। डेंगू ओ डेंगू सदृष आन मच्छर वाहित रोग सॅं बचबाक हेतु आवष्यक अछि जे घरक लगीच मे जतय कतहु पानि जमकय ताहि सॅं परहेज करी। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ क अन्तर्गत एहू काज के प्राथमिकता देल जयबाक चाही। राजधानी दिल्ली सहित देषक अधिकांष भाग मे एहि हेतु रासायनिक मारकनाषी ;(Chemical Insecticide) क धूम्राच्छादन (Fogging) कयल जाइछ। परन्तु ईहो ध्यान राखय पड़त जे किछु अन्तराल क वाद मच्छर एकरा प्रति रोधी (Resistant) सेहो भय जाइछ। ओना केन्द्र सरकार द्वारा एहि दिषा मे जारी दिषा निर्देषक पालन सुनिष्चित करबाक दृष्टिये फॉंगिगंक क्रम मे निकलय वला धुऑंक मच्छर पर प्रभाविता ओ मनुक्ख सहित आन जीव पर एहि मे प्रयुक्त होमयवला इन्सेक्टीसाइड केर घातक प्रभाव के सेहो ध्यान मे राखल जाइछ। आने रोग जकॉं डेंगूक कारगर निदान तकबा मे विष्व भरि मे वैज्ञानिक अहर्निष लागल छथि। यद्यपि आजुक तिथि मे एकर कोनो सटीक टीका (Vaccine) बाजार मे नहि आबि सकल अछि परन्तु वैज्ञानिक लोकनि द्वारा एहि दिषा मे विकसित टीकाक परीक्षण विभिन्न चरण मे कयल जा रहल अछि। ‘‘हड्डी तोड़य वला रोग (Break bone Disease)” क नामें जानल जाय वला डेंगू कें शहरीकरण सॅं जुटल रोग (Disease of urbanization) सेहो कहल जा रहल अछि। वैज्ञानिक लोकनिक मानब अछि जे जौ उचित निदान नहि ताकल गेल त स्थिति आरो भयावह होइत जायत किएक त 2030 ई0 धरि विश्वक 70 प्रतिशत भागक शहरीकृत भय जयबाक अनुमान लगाओल गेल अछि। एहि बेर चीन मे सेहो डेंगूक भयावह आक्रमण भेल अछि जतय गुआंगडोंग (Guangdong) राज्य मे 47,000 लोक एहि रोग सॅं ग्रस्त भेलाह अछि। ओतय डेंगूक वाहक मच्छर कें वोल्बाचिया (Wolbachia) नामक एक जीवाणु (Bacterium) सॅ संक्रमित करौला सॅं बनल नपुंसक नर मच्छर कें प्रकृति मे छोड़ल गेल अछि। एहि अभियान सॅं ई आषा कयल जाइछ जे मच्छरक संख्या नियन्त्रित कयल जा सकत। अफ्रीका, एशिया ओ लैटिन अमेरिका मे रहनिहार विश्वक प्रायः चालीस प्रतिषत जनसंख्या डेंगू रोग सॅं प्रभावित अछि। परन्तु पछिला 2012 ई0 मे अमेरिकाक फ्लोरिडा मे Madeira नामक स्थान पर दू हजार लोक एहि सॅं ग्रस्त भेलाह। ई मानल जा रहल अछि जे अमेरिका आ यूरोपक समृद्ध लोक मे पसरलाक वाद विकसित देष सभ एहि रोगक निदान तकबा दिस अग्रसर होयत। विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O) एक नियन्त्रणक दिषा मे तीन वर्ष पूर्व प्रयास प्रारंभ कयलक आ 2020 ई0 धरि एहि सॅं आक्रान्त होमय वला लोक केर संख्या मे कम सॅं कम 25 प्रतिषत ओ मुइनिहारक संख्यामे 50 प्रतिशत कमी अनबाक लक्ष्य निर्धारित कयलक अछि।W.H.O. केर तिरस्कृत उष्ण कटिबन्धीय रोग नियन्त्रण विभाग (Department of Control of Neglected Tropical Diseases) डेंगू रोग क समस्याक समाधान तकबा मे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रियाशील अछि। सनोफी पाश्चर (Sanofi Pasteur) नामक दवाइ कम्पनी द्वारा बनाओल डेंगू टीका (Vaccine) पर तेसर चरण (Phase Three) केर परीक्षण सम्पन्न भय गेल अछि आ ई कम्पनी एशिया ओ लैटिन अमेरिकी देश सभ मे निबन्धन हेतु आवेदन कयलक अछि। ई आषा कयल जाइछ जे एहि वर्षक अन्त धरि एहि टीकाक पहिल खेप बाजार मे आबि जायत। बायोटेक्नोलोजीक एहि युग मे आनुवंषिक अभियांत्रिकी पद्धति सॅं मच्छर मे घातक जीन क समावेष कय वयस्क होयबा सॅं पूर्वहि मरि जयबाक स्थिति उत्पन्न करब संभव भेल अछि। एहि जैव तकनीकी के RIDL (Release of Insects carrying a Dominant Lethal) टेक्नोलोजी कहल गेल अछि। इंगलैण्डक ऑंक्सफोर्ड स्थित बायोटेक्नोलोजी कम्पनी Oxitecक संग भारत GBIT (Gangabishan Bhikulal Investment and Trading Ltd) एक एहन सांघातिक मच्छर तैयार कयलक अछि। कम्बोडिया एंव लाओस मे डेंगूपर नियन्त्रण करबाक हेतु लार्बा के खायवला माछक प्रयोग कयल जा रहल अछि। सिंगापुर मे सेहो एक वैक्सीन बनाओल जा रहल अछि। मच्छर के दूर भगयबाक हेतु एक नवोन्मेषी उपाय केर रूपमे हाथ पर घड़ी जकॉं बान्हयवला विकर्षक Wrist band क रूपमे कयल गेल अछि। एहि रिस्टबैन्ड मे सिट्रोनेला क तेल रहैछ जे बान्हयवला व्यक्ति कें कोनो हानि नहि पहुंचयबैछ। ई एक कार्ट्रिज मे रहैछ-जकरा दोबारा भरल जा सकैछ। चारि मास धरि असर करयवला एहि बैण्ड क दाम सम्प्रति दू सय टकाक आसपास अछि। स्टिकर ओ बॉंडी स्प्रे केर रूप मे सेहो ई सभ उपलब्ध अछि। कीटनाशी सॅं सम्पृक्तImpregnated Bed सेहो उपलब्ध अछि। वैज्ञानिक लोकनिक कहब अछि जे पहिल डेंगू विषाणुक संक्रमण ओतेक मारूक नहि होइछ जखन कि दोसर बेरका संक्रमण प्राणघातक भय जाइछ। अनुसन्धानकर्त्ता लोकनि कहैत छथि जे संक्रमणक प्रत्युत्तर मे मनुष्यक शरीर मे प्रतिरक्षी उत्पन्न होइछ लेकिन एहि कारणेॅं किछु आन विषाणु सेहो चुपचाप कोषिका मे प्रवेष कय जाइछ जाहि सॅं हमर प्रतिरोधक प्रणाली अनभिज्ञ बनल रहैछ। अवसर भेटला पर बाद मे ई विषाणु सक्रिय भय उठैछ। एहि नव विषाणुक प्रति शरीर मे प्रतिरक्षी नहि बनि पवैछ आ रोग प्राणघातक बनि जाइछ। डेंगू सदृष रोगक नियन्त्रण हेतु हमरा लोकनिक समक्ष सिंगापुरक उदाहरण अछि जे अपन बहुआयामी नीतिक अन्तर्गत निवारक निगरानी ओ नियन्त्रण सार्वजनिक स्तर पर जामरूकता ओ सामुदायिक सहयोग क संग शोध कं सम्मिलित कड कड प्राप्त कयलक गेल। ओतुक्का नेषनल इनवायरनमेन्ट एजेन्सीक निर्देषन मे वर्ष 2001 सॅं सिंगापुर सरकार स’ कन्सट्रक्षन साइट हेतु एक नियन्त्री पदाधिकारी केर नियुक्ति अनिवार्य कय देलक अछि जे कीट-मच्छर सभकॅं नियन्त्रित करय। कामिनी गीत-गंगा मैथिलीक सुपरिचित गीतकार श्री अनिलजीक नाम आइ के नहि जनैत अछि |एकर एकमात्र कारण अछि अनिलजीक सौम्यतासं पूर्ण भाषा, जकरा ल’क’ ओ पैघ सं पैघ बातकें बड सहजतासं राखि पाठकक हृदय धरि प्रवेश क’ जाइत छथि | पाठक अनिलजीक विचार, भाव, समर्थन,विरोधसं अपनाकें अलग नहि क’ पबैत अछि |पानिमे घुलल चीनी जकां पाठक आ गीतकार एकाकार भ’जाइत अछि |अनिलजीक भाषा सहज रहितहु संवेदनासं परिपूर्ण अछि जे हृदयकें स्पर्श करैत दूर धरि ल’ जाइत अछि जतय पाठक सोचबाक लेल विवश भ’ जाइत अछि |ओ अपन सम्पूर्ण जीवनक सार कें एहि रूपमे अभिव्यक्त करैत छथि : ई देह अतिथि ई प्राण अतिथि सम्मान अतिथि अपमान अतिथि अछि लोभ मोह आ माया केर अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि | जीवनक नश्वरता आ लोभ-मोहक विराटता दुनूकें अनिलजी अतिथि कहि लोककें धैर्यवान हेबाक सन्देश देलनि अछि |ओ कहैत छथि जीवनमे कोनो बात शाश्वत सत्य नहि |परिवर्तन जीवनक नियम थीक|समय-चक्र बदलिते रहैत अछि |अतिथि जकां सुख-दुःख दुनू अल्पायु होइत अछि |अतिथि शब्द अपना आपमे यायावरी अछि |अर्थात कोनो परिस्थितिमे मनुक्खकें अपन धैर्य नहि गमेबाक चाही |ओ कहैत छथि : ‘हम सोचि रहल छी जीवनमे, की भेटल आ की हेरा गेल |’ आत्मगीतक माध्यमसं ओ अपन सम्पूर्ण जीवनक मूल्यांकन करबाक प्रयास केलनि अछि | अनिलजीक दृष्टिकोण एकटा स्त्री,एकटा बेटीक लेल सेहो आत्म गौरवसं परिपूर्ण अछि |ओ बड निश्चिन्तता आ सहजतासं कहैत छथि : ‘बुच्ची बढती पढ़ती लिखती हमरा चिंता कथी के’ ओहि समाजमे जतय भ्रूण हत्या सन पाप करैमे लोक संकोच नहि करैत अछि, पेटमे बेटीकें मारबासं डेराइत नहि अछि,ओतय बेटीकें दुर्गा रूपमे प्रतिष्ठापित कय महिषासुर सन दानव के संहार करबामे सक्षम बतौलनि अछि |स्त्री-शक्ति एतय सर्वोपरि रूपमे आयल अछि | ई स्त्री कखनो बेटी,कखनो पत्नी,कखनो माय बनि बनि पुरुषक जीवनकें परिपूर्ण करैत अछि | अनिलजीक ‘गीत गंगा’मे ई स्त्री परिपूर्ण रुपमे सर्वत्र विद्यमान अछि | ओ कहैत छथि : ‘ माइक कोरा सिनेहक सरोवर अही सरोवरमे जी भरि नहाउ ....’ सरिपहु मायक कोरा सिनेहक सरोवरे होइत अछि जाहिमे डूब देलाक बादे ओ स्वाद भेटैत अछि जे कतहु आरो नहि भेटैत अछि |मायक छत्रछाया, ओकर आँचर बच्चाक लेल छितवनक छाँह जकां शीतल आ सुखद ओइत अछि |शायद दुनियामे कोनो आरो एहन सम्बन्ध होइत होइ जे मायक कोराक बराबरी करैत हो | अनिलजी सब संबंधक महत्व जनैत छथि | ओ जनैत छथि मायक ममताक बेगरता | ओ जनैत छथि ओकर त्याग,तपस्याक महिमा | अनिलजीक ‘गीत गंगा’ सामाजिक विषमता पर सेहो प्रहार करैत अछि | ओ कहैत छथि : ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें एना रे बिलटू कतेक दिन रह्बें’ ? सरिपहु बिलटू करजेमे जन्म लइत अछि आ करजेमे मरियो जाइत अछि | ई बिलटूक व्यक्तिगत त्रासदी नहि | बिलटू ओहि निम्न वर्गक प्रतिनिधिक रूपमे उपस्थित अछि जे जीवन भरि अथक प्रयास केलाक बादो भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र लेल तडपैत अछि, तरसैत अछि | जकर परिश्रमसं देशक सब उन्नति होइत अछि ओ जीवन भरि विकासक एको सीढ़ी नहि चइढ़ पबैत अछि |ई बिडम्बने कहल जा सकैत अछि जे आइ धरि समाजक सबसँ निचला वर्ग तक विकासक एको बूंद गंगाजल नहि पहुँचल अछि ,जे दुःख भोगबाक लेल विवश अछि,जकर जीवन कचरेसं शुरू होइत अछि आ कचरेमे मिलियो जाइत अछि, जकर नेना शर्दी-गर्मी जीवनक सब तापकें भोगबाक लेल अभिशप्त अछि | भलेही हम चान पर जेबाक दाबा करैत होइ,ओतय घर बनेबाक लेल सोचैत होइ, आम आदमीक लेल भरि पेट अन्न आ भरि माथ छाहरि आइयो सपने बनल अछि | एक दिस हमर बखारीमे अन्न सडबाक दाबा होइत अछि, दोसर दिस एहि देशक किसान हताश भ’,प्रकृतिक समक्ष निराश भ’, पारिवारिक पैघ बेगड़ताक समक्ष नग्न आ लाचार भ’आत्महत्या करैत अछि | ई बिडम्बना नहि त और की थीक ? अनिलजी एहि बिडम्बनासं बाहर निकलबाक लेल ओहि आम वर्गक प्रतिनिधि बिलटूकें जगबैत छथि,ललकारैत छथि | भारतीय समाजमे आइ जाति-व्यवस्था एकटा घोर समस्याक रूपमे उपस्थित भेल अछि | जतय देखू एके झुनझुना लोक बजबैत अछि, हम हिन्दू छी,हम मुसलमान छी,हम सिख छी, हम ईसाई |लोक एक-दोसराकें नोचि लेबा पर आतुर अछि |जाति के नाम पर सब किछु गमा देबाक लेल ब्याकुल अछि |ई जाति की थिक ? सजमनि, कदीमा, भाटा सन अलग-अलग तरकारी त नहि जकर स्वाद अलग-अलग होइत अछि |रूप-रंग अलग-अलग होइत अछि | एना त किन्नहु नहि |फेर एहि जातिकें चीन्हबाक कोन आधार ? टीक कटयलासं, दाढ़ी बढयलासं, पगडी बन्हलासं की नस महक खूनक रंगो बदलि जाइत अछि ? अगर नहि त’ ई जाति-पांतिक मारा-मारी किए’? अनिलजी कहैत छथि : ‘की हिन्दू आ की मुसलमान एके शोणित एके परान....’ सरिपहुं एके शोणित,एके परान रहैत अछि सबहक देहमे | फेर ई अलग-अलग खेमा तैयार करबाक कोन प्रयोजन ? की हम एक देशमे एक भ’ क’ नहि रहि सकैत छी ?हमर जाति मात्र भारतीय नहि भ’ सकैत अछि ?अगर एना नहि त मानव हेबापर हमरा शर्म महसूस करक चाही | मानवीय संवेदना मनुक्खक प्रथम जाति हेबाक चाही, वैमनस्यता नहि | अनिलजीक ‘गीत गंगा’ मैथिल जीवनक आधार एतुक्का पर्व-त्यौहार दिस सेहो ध्यान आकर्षित करैत अछि |ओ कहैत छथि : ‘पथिया लीय’ बासन लीय’ कूरा कोसिया ढकन लीय’ चलू-चलू पोखरि मोहार दिनकर दुःख हरता .....’ दिनकरकें समांगक देवता कहल गेल अछि | शारीरिक कष्टसं मुक्तिक खातिर लोक छठि पावनि मनबैत अछि | सूर्यकें अर्घ्य दैत अछि | परिवारक सुख-शांतिक खातिर लोक प्रार्थना करैत अछि |पोखरिक घाट पर छठि पुजैत अछि | मैथिल समाजक विविधतामे एकता एतय सम्पूर्ण रूपमे उजागर होइत अछि | ‘गीत गंगा’ स्त्री-पुरुखक नोक-झोंक दिस सेहो ध्यान आकृष्ट करैत अछि |पारिवारिक जीवनक आधार बनैत अछि स्त्री-पुरुखक आपसी सम्बन्ध | पति-पत्नीक लाड-दुलार | दुनूक बीच कखनो मुंहो फुला-फूली होइत अछि, कखनो मानो-मनौवल जे जीवनक सरसता, जीवन्तताकें बड सहजतासं अभिव्यक्त करैत अछि | ओ कहैत छथि : ‘जखन घरेवला छथि कसाइ तखन सुख की बुझबै ?...’ एतय कसाइ शब्द उलहनक अर्थमे आयल अछि, हत्याराक लेल नहि | जकरासं लोककें नेह रहैत छै ओकरापर ओ अपन विशेष अधिकार बुझैत अछि आ ओकरा लेल ओ कोनहु शब्दक प्रयोग करैसं हिचकिचाइत नहि अछि |इएह कारण अछि जे मानवती पत्नी अपना पतिकें कसाइ कहि अपना दुःखक लेल जिम्मेवार ठहरौलनि अछि | माँ कालीसं गोहारि लगौलनि अछि |लोककें जखन अपन शक्तिपरसं विश्वास उठि जाइत छै तखन ईश्वरीय शक्तिकें आह्वान करैत अछि |सुख-दुःखक सागरसं पार उतरबाक लेल मनबैत अछि | एक दिस जतय स्त्री पुरुषसं शिकायत करैत छथि जे ओ हुनक इच्छा-आकांक्षाक पूर्ति नहि क’ हुनक उपेक्षा करैत छथिन, दोसर दिस वएह स्त्री पुरुषकें अपना जीवनक आधार बनाक’ कहैत छथि : ‘हम एके निन्नक दू सपना हम आगि थिकहु अहाँ धूमन छी |’ एतय पति-पत्नी एक-दोसराक परिपूरक रूपमे आयल अछि जतय एक के बिना दोसर आधा अछि |सरिपहु स्त्री-पुरुषक सम्बन्धे एहिना होइत अछि जतय कोनो लाग-लपेट नहि | कोनो परदा नहि |सुच्चा सम्बन्धक महकैत फुलवारी जतय विविध रंगी फूल दमकइत अछि,चमकैत अछि| आजुक विकसित युगमे विकटतम समस्याक रूपमे जे किछु उभरल अछि ओ थीक आतंकवाद | ई कोनो शर्दी-खांसी नहि,ज्वर-वात नहि जाहिसं एक मनुक्ख पीड़ित होइत अछि, प्रभावित रहैत अछि | ई एहन रोग अछि जे महामारी जकां एके बेरमे गाम-गाम, नगर-नगर के सुडडाह क’ दैत अछि, बम-बारूदसं उड़ा दैत अछि, जतय विनाशे-विनाश देखाइत अछि,आहे-आह सुनाइत अछि | ई एहन ह्रदय-विदारक घटना घटबैत अछि जतय शायद पत्थरो पसीझ जाएत | ई आतंकवाद आदिम युगक राक्षसी हमला नहि, आधुनिक युगक दुष्प्रवृत्ति जतय आदमीक विरुद्ध आदमी षड्यंत्र रचैत अछि,अमानवीय व्यवहार कें अंजाम दैत अछि, जे देखि क’ समाजक सब वर्गक लोक क्षुब्ध होइत अछि, शोक मनबैत अछि | साहित्यकारो एकटा सामाजिक जीव होइत अछि, ओकरो लोकक सुख-दुःख माजैत अछि,तोडैत अछि | ‘गीत गंगा’क रचयिता अनिलजी सेहो क्षुब्ध छथि, कहैत छथि : ‘गोली-बारूदक मौसममे हम कविता केहेन सुनाबी हाल देखि बेहाल भेल छी, गीत कोना क’ गाबी |’ सरिपहु एहन भयावह समयमे ककरो मुंहसं गीत कोना निकलत |जखन कि गीतक सम्बन्ध मोनक उमंग- तरंगसं अछि, ख़ुशी-उल्लासक संग अछि | अगर हम एहन स्थितिमे गीत गेबो करैत छी, कविता लिखबो करैत छी त ई अनर्गल प्रयास सन मात्र हास्यास्पद हएत | एतेक के बावजूदो अगर कवि कविता लिखैत छथि, साहित्यकार गीत रचैत छथि त मात्र ‘स्वान्तः सुखाय’| जे लोक ककरो कहि नहि पबैत अछि,ककरो बुझा नहि पबैत अछि, ओ लिखि लैत अछि, शब्दक माध्यमसं दुःख बांइट लैत अछि |एकटा रचनाकारक हाथमे मात्र एकटा कलम टा रहैत अछि जे आदिसं अंत धरि ओकर संग दैत अछि, संग निभबैत अछि | ‘गीत-गंगा’क रूपमे स्वयं अनिलजी मानवीय संवेदनाक संग हमरा अहाँक समक्ष उपस्थित भेलाह अछि, जतय एकटा साहित्यकारक ह्रदय सब सुख-दुःखक अनुभव करैत अछि, गहराइसं सोचैत अछि,भावपूर्ण भाषामे लिखैत अछि | ई ‘गीत-गंगा’ सरिपहु गंगेक भांति निर्मल अछि,पवित्र अछि जाहिमे डुबकी लगेलाक बादे ओकर महत्त्व बूझल जा सकैत अछि, गूनल जा सकैत अछि| जगदानन्द झा 'मनु' "गजल गंगा" सभसँ पहिने अनिल जीकेँ ई गजल संग्रह लिखबाक लेल बहुत बहुत बधाइ आ शुभकामना । मैथिली गजलक आकाश गंगामे एकटा आओर नव गजल संग्रह "गजल गंगा"क आगमन मैथिली गजलक दशा आ दिशा लेल बहुत शुभ संकेत अछि । एक बेर फेरसँ अनिलजी सहित आन सभ गजल प्रेमी मैथिलकेँ बधाइ। हमर अपने गजल ज्ञान बेसी नहि अछि तथापि एहि संग्रहक मादे हम किछु नीक बेजए कहैक चेष्टा कए रहल छी । कुल 81 टा गजल अपना भितर समेटने ई संग्रह बहुते नीक-नीक गजलक सुन्दर गजल गंगा बनल अछि। आब एहि गंगामे असनान कतएसँ शुरू करी अर्थात हम अप्पन गप्पक शुरूआत कतएसँ आरम्भ करी । तँ हम शुरूआत करैत छी; गजलक व्याकरण पक्षसँ :- आ गजलक व्याकरणक अ आ अछि मतला, काफिया, रदीफ, बहर आ मकता। सभसँ पहिने मतला, मतला अर्थात गजलक पहिल शेर जे कि काफिया आ रदीफक निर्धारण करैत अछि। एहि संग्रहक सभ गजलमे अनिलजी मतलाक पालन बहुते सुन्दरसँ केने छथि । आब, काफिया आ रदीफ : संग्रहक शुरूआतेमे अनिलजी संग्रहकेँ बहरक भिन्नताकेँ आधारपर दू भागमे बँटैत ई लिखने छथि जे काफिया आ रदीफक पालन भेल अछि । आ ठीके रदीफक पालन एहि संग्रहक सभ गजलमे बड़ नीकसँ भेल अछि । सगरो संग्रहकेँ पढ़ला बाद बुझलौं जे बहुतो गजलमे काफियाक पालन सेहो नीकसँ भेल अछि । ओतए 37% गजलक काफियाकेँ ठीक करैक गुँजाइश अछि । चूँकि ई संग्रह एखन अप्रकाशित अछि तेँ जँ सम्भव होइ तँ अनिलजी किछु संशोधित कएला बाद एकरा आओर बेसी उत्कृष्ट बना सकैत छथि । जेना कि संग्रहक प्रथमे गजलक मतला- "पढ़बाक मोन होइए “लिखबाक” मोन होइए किछु ने किछु सदिखन “सिखबाक” मोन होइए" एहिठाम काफिया भेल "ि0खबाक" मुदा गजलक आन आन शेर सबहक काफिया अछि बिछबाक, झिकबाक, निपबाक, “चिखबाक”, छ्टबाक, छिनबाक । एहिठाम चिखबाक छोरि कए बाद बाँकी ???? एकबेर भाग पहिलकेँ गजल संख्या 5 केर मतला देखू- "काँट फूस अछि “भरल” बाटपर जहाँ-तहाँ नढ़िया कूकुर “मरल” बाटपर जहाँ-तहाँ" आब एहि मतलाक रदीफ भेल "बाटपर जहाँ-तहाँ" जे की दुनू पाँतिमे एकसमान अछि । आब काफिया भरल आ मरलसँ भेल "रल" । मुदा आन शेर सबहक काफिया अछि दखल, पड़ल, जड़ल, महल, उड़ल, गड़ल । एहिमे पड़ल, जड़ल, उड़ल, गड़ल तँ ठीक मुदा दखल आ महल ????? आगू बढ़ैत गजल 14 केर मतला- "बहरक झंझटिसँ हमरा आजाद करु हम गजल छी हमरा नै बरबाद करु" एहि मतलाक काफिया भेल आकार बाद द (ाद) मुदा एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेल गेल अछि याद, फरियाद, अनुवाद, लाज, काज, बात । याद, फरियाद, अनुवाद ठीक तँ लाज, काज, बात ??? एक बेर गजल 16 केर मतला देखल जेए - "कानहापर गंगाजल ल' क' “बढ़लौं”कोना-कोना मोन पड़ैए ऐ पहाड़पर “चढ़लौं”कोना-कोना" एहिठाम काफिया भेल बढ़लौं, चढ़लौंसँ "ढ़लौं" मुदा एहि गजलक आन-आन शेर सबहक काफिया अछि; खसलौं, बचलौं, कटलौं, रखलौं आब ई सबटा कतेक ठीक ???? कनेक आओर आगू बढ़ैत गजल 27 केर मतला- "जुनि पूछू की “करै”छी हम नित्य स्वयंसँ “लड़ै” छी हम" एहि मतलाक काफिया भेल "0रै" वा "0ड़ै" । आब एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया जे लेल गेल अछि- डरै, बुझै, जगै, कनै, बजै, नचै, जनै, तकै । एहिमे "ड़रै"केँ छोरि बाद बाँकी सबटाकेँ की ठीक कहल जेए ?????? गजल संख्या 29 केर मतला- "एतेक बाझल किएक रहै छी “अपनामे” अहाँ अबै छी बड़ी बड़ी राति क' “सपनामे” अहाँ" एहिठाम काफिया भेल अकार संग "पनामे" । मुदा शाइर एहि गजलक आगाँक शेर सभमे काफिया लेने छथि; पटनामे, सतनामे, घटनामे, अयनामे, बधनामे, गहनामे । मतलाक हिसाबे आन आन शेरक काफिया मेल नहि क' रहल अछि । कनिक आगू जा कए गजल संख्या 40 केर मतला- "चिन्ता तनकेँ “दागि” रहल अछि की करियौ मोन कतौ नै “लागि”रहल अछि की करियौ" एहि मतलासँ जँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल, "0ागि"। मुदा शाइर एहि गजलक आन-आन शेरक काफिया देने छथि; भागि, ताकि, मांगि, कानि, आबि, काटि, कहब बेजए नहि जे " भागि"केँ छोरि आन कोनो मतलासँ मेल खाइत नहि अछि । एहि तरहे कम बेसी एहि संग्रहक भाग 1 केर गजल संख्या 6,9,13,30,33,35,37,51,53,54,55 केर काफिया ठीक नहि अछि । आब एहि भागक अन्तिम गजल, गजल 61 केर मतला एक बेर देखल जेए- " नदी छोड़ि क' “नहरमे”एलौं गाम छोड़ि क' “शहरमे”एलौं" आब एहि मतलासँ काफियाक निर्धारण हुए तँ काफिया भेल "हरमे" मुदा शाइर एहि गजलक आगूक शेर सबहक काफिया लेने छथि- कहलमे, जहलमे, महलमे, जूड़शितलमे, सहलमे, गजलमे । मतला आ आन-आन शेरक बिचमे काफियाक कोनो मिलान नहि । आब आबी संग्रहक भाग दूमे । पहिल भाग जकाँ एहि भागमे सेहो शाइर मतला आ रदीफक पालन नीकसँ केने छथि । आब देखी काफिया तँ सबसँ पहिले भाग दू केर गजल संख्या 4 केर मतला- "खेल सभटा “उसरि” जाइए लोक सभटा “बिसरि” जाइए" आब एहि मतलासँ काफिया भेल "सरि", मुदा आगाँक शेर सबहक काफिया अछि झखडि, ससरि, पिछरि, बिगरि, कुतरि, नचरि । मतलासँ मेल खाति एकौटा शेरक काफिया नहि । भाग 2, गजल 6 केर मतला- "जीवनकेँ “आशा” बदलल प्रेमक “परिभाषा” बदलल" एहिठाम काफिया भेल आकार बादक शा, षा अथवा सा । आशा, परिभाषा, बारहमासा, भाषा, अभिलाषा, तक तँ ठीक मुदा अन्तिम दूटा शेरक काफिया मौसा आ पाछाँ । आब एकबेर देखी भाग 2, गजल 17 केर मतला- "सभ जिवइत अछि सुबिधामे हम रहइत छी दुबिधामे" एहिठाम काफिया भेल उकारकेँ बाद "बिधामे" । सुबिधामे, दुबिधामे केँ बाद आगाँक शेरक काफिया अछि, कवितामे, अनकामे, अपनामे, पटनामे, बसुधामे । एहिमे सँ एक्कोटा काफिया मतलासँ ठीक मेल नहि कए रहल अछि । किछु एहने-सन भाग 2 केँ गजल 9,12,18 आ 20 केर काफिया सेहो ठीक नहि अछि । एहि संग्रहक अन्तिम गजलक मतला एकबेर देख लेल जेए- "नीक बात किछु “कहू” अहाँ गीत गजलमे “रहू” अहाँ" कहू/रहूमे समान भेल "हू" । मुदा शाइर आन आन शेरक काफिया लेने छथि; चलू, धरू, करू, बड़ू । खाली ू ू ू ू तँ बिना "ह"केँ ू ू ू ू के की कहल जेए ??? कतेक रास गजल एहनो अछि जाहिठाम काफिया तँ ठीक बनिरहल अछि मुदा काफियामे एक्के आखरक प्रयोग एकसँ बेसी बेर कएल गेल अछि । जेना भाग एकक गजल 9,20,36,42 आ भाग दू केर गजल 10 मे । मतला, रदीफ, काफियाक बाद गजल व्याकरणक एकटा मुख अंग अछि मकता । मकता, अर्थात गजलक अन्तिम शेर जाहिमे शाइर अपन नाम वा उप नामक प्रयोग केने होथि । एहि संग्रहक कोनो गजलमे मकता़क प्रयोग नहि कएल गेल अछि । आब आबी गजलक बहरपर । तँ जेना स्वयं शाइर स्वीकार केने छथि जे भाग 1 केर 61 टा गजलमे ओ सरल वार्णिक बहरक प्रयोग केने छथि । आ जेकर निर्वाह ओ बहुते नीकसँ केने छथि । आब भाग दू जाहिमे कुल 20 टा गजल अछि, कोनो निर्धारित अरबी बहरक प्रयोग तँ नहि कएल गेल अछि, हाँ एहि गप्पक धियान जरूर राखल गेल अछि जे सब पाँतिमे समान मात्रा क्रम रहेए । अर्थात समान मात्रा क्रमक प्रयोग करैक सफल प्रयास केएने छथि । किछु ठाम छोरि दी तँ । सबसँ पहिने तँ चन्द्रविन्दूकेँ जगह विन्दूक (अनुस्वार) प्रयोग कएल गेल अछि । ई शाइद टाइपिंग ग़लती हुए मुदा एहि कारणे बहुतो जगह मात्रा क्रम बिगैड़ गेल अछि । दोसर जतअ जतअ संयुक्ताक्षरक प्रयोग कएल गेल अछि ओतअ ओतअ मात्रा क्रम केर गलती भ गेल अछि । जेना गजल संख्या 5 केर अन्तिम शेरक प्रथम पाँति- "मोन केर प्रश्न अछि कते" 21 21 21 - 2 12 (शाइर द्वारा मानल) 21 22 21 - 2 12 (वास्तविक) एकटा आओर उदाहरण गजल 11 केर तेसर शेर देखल जेए- "देश हमर अछि प्राण भाइजी" 21 12 - 2 21- 212 ( शाइर द्वारा मानल) 21 12- 1 2 21 - 212 (वास्तविक) एहने तरहक दोख गजल 12 केँ दोसर शेरमे आ 18 म' गजलकेँ दोसर शेरमे अछि । भाषा आ भाव पक्ष ; भाषापर जबरदस्त पकड़ लेने सम्पूर्ण संग्रहमे भाषाक एकरूपताक दर्शन होइत अछि । संग-संग नव रचनाकार सभ लेल सिखबाक लेल नीक प्लेटफार्म थिक अनिलजीक ई गजल संग्रह। अनिलजी बिना कोनो बेसाहल शव्दक प्रयोग केने एतेक सरल व्यबहारिक मैथिलीक शव्द सबकेँ गूँथि कए एकता नव शुरूआत केने छथि । समान्यसँ समान्य लोक, एक-एकटा गजलक एक-एकटा शेरक आनन्द ओहि छन अर्थात पढ़ैत वा सुनैत मातर ल' सकैत अछि । भाषा शिल्पक गप्प करी तँ एक-एकटा छोट-छोट शेरमे एतेक बेशी गप्प नुकेएल अछि जे सुनि आ सोचि कए मनक भितर ख़ुशिक लाबा फुटै लगै छैक । एकटा उदाहरण एहि संग्रहक पहिल गजलक एकटा शेर- "दुइ ठोर थिक अथवा तिलकोर केर तडुआ होइए तँ लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए" मिथिलाक भोजनक पाक-कलाक श्रेष्ठताक प्रतिक तिलकोरक तडुआ। जेकर स्वाद, कुड़कूड़ेनाइक जवाव नै, सुनिते मातर मुँहमे पानि एनाइ स्वभाविक । स्वादिष्ट, पातर, कड़कड़ तिलकोरक तुलना पातर ठोरसँ । जबरदस्त उपमेय आ उपमानक प्रयोग । ओकर बादो, लाज होइतो चिखबाक मोन ।एहेन एहेन सरल व पारम्परिक शव्द चयन हिनक गजल कौशलमे चारि चान लगा रहल अछि । सम सामयिक मिथिला मैथिलीक समाजमे जतेक कोनो समस्या वा वाद विवाद अछि सभपर अपन कलम चलबैत सुन्दर-सुन्दर शेरक द्वारा अनिलजी लोकक आ समाजक धियान ओहि दिस दियाबैमे सफल भेल छथि । समाजक अव्यवस्थाकेँ देख संघर्ष आ छिनबाक गप्प एक्के संगे कोना, देखू एहि शेरमे- "आजादीक लेल एखनहुँ संघर्ष अछि जरूरी व्यर्थ गेल सभ मांगब छिनबाक मोन होइए" संग्रहक नामे अनुरूपे एहि "गजल गंगा"मे अनिलजी सभ किछु समेटने एकरा सुन्दर रूप देबैमे सफल भेल छथि । डॉ. अजीत मिश्र मैथिल अङना : ‘तोरा अंगनामे’ “सुस्वरं सरस चैव सरागं मधुराक्षरम्। सालकारं प्रमाणं व षडविधलक्षणम्।।” अमरकोशमे गीतक छओ गोट उक्त लक्षण उद्धृत कएल गेल अछि, जकरहि मूल मानि विभिन्न विचारक - आलोचक लोकनि गीत विधाकेँ छान-पगहामे बान्हल करैत अएलाह अछि। यद्यपि गीत विधा सम्बन्धी उल्लेख सामवेदमे सर्वप्रथम दृष्टिगोचर होइछ। पछाति एक स्पष्ट अवधारणा अमरकोश एवं नाट्यशास्त्रमे कएल गेल। विभिन्न समयमे विभिन्न विचारक द्वारा एहि सन्दर्भमे आएल विचारमे भिन्नता दृष्टिगोचर भए सकैत अछि, मुदा ओहि बीच जाहि एक तत्वपर सभ गोटए एक मत देखबामे अबैत छथि ओ थिक गीतक सम्बन्ध गेयतासँ अछि, गीत काव्य एक स्वतन्त्र विधा थिक, जे काव्य आ सङीतक सुन्दर-संयोगसँ उत्पन्न होइछ। एहि गीत विधाक प्रधान तत्वक प्रतिपादन एहि प्रकारेँ कएल जाए सकैत अछि- · संगीतात्मकता · कल्पनाक प्रभावकेर सौन्दर्यपूर्ण ओ कलापूर्ण चित्रण · रागात्मकता · अन्तर्दर्शन आ आत्मनिष्ठ, जनिक आधार थिक सुख-दुख, राग, द्वेष, आशा-निराशा · लयात्मक अनुभूति, आओर · समाहित प्रभाव। जँ उपर्युक्त तत्वक माध्यमे कोनो गीत विधाक पोथीक मूल्याङन कएल जाए तँ ओएह होएत ओहि पोथीक उचित मूल्याङन। आइ हमहु एकरहि आधार बनाए आदरणीय श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क गीत विधाक पोथी ‘तोरा अंगनामे’ पर किछु विचार करबाक प्रयास कए रहल छी। रमणीयताक कारणेँ सङीत जीवनक अभिन्न अङ थिक आओर थिक हृदयक भाषा आ मनक प्रकाश। गीत प्रथमत: आ अन्तत: अपन स्त्रष्टाक मानस-मुकुट थिक, हुनक व्यक्तित्वक दर्शन थिक। रागात्मक अनुभूति जखन आवेशक क्षणमे रहरहाँ उमड़ि कोनो मधुर सङीतक माध्यममे व्यक्त होएबाक लेल प्रस्तुत होइत अछि, तखन मधुर लयमे कविक आंतरिक सहजानुभूति अपन रूप धारण करए लगैछ आ कवि स्वत: प्रेरित भए अपन भावनाक अनुरूप शब्दाभिव्यक्ति कए बैसैत छथि। ठीके, ‘तोरा अंगनामे’मे संगृहीत प्रत्येक पद कविक आंतरिक सहजानुभूतिक स्पष्ट दर्शन करबैत अछि। एको पाइ सन्देह नहि जे गीतकार बिनु प्रयासहिँ अन्तर्मनसँ आएल अभिव्यक्तिकेँ रूप धारण करौलनि अछि। उदाहरण देखबासँ पूर्व दर्शनीय-पठनीय अछि गीतकारक पोथीमध्य उद्धृत हुनक अभिव्यक्ति- ने कवि छी हम ने गीतकार ने आलोचक ने लेखक छी मानी त मानू अपनहि सन माँ मैथिलीक पद-सेवक छी। एहि उपर्युक्त पदमे नहि तँ कोनो अकृत्रिमता अछि आ नहि अछि प्रगल्भ विचार, ई तँ थिक अन्तर्मनक एकटा स्वरमात्र। आ तेँ ने कहल जाइत छैक जे अन्तर्मनसँ निकलल शब्दमे, विचारमे कोनो लाइ-लपट नहि होइत छैक, कोनो राग-द्वेष नहि होइत छैक, आ ने होइत छैक कोनो लिप्सा। तेँ गीतकार अपनाकेँ मात्र मैथिलीक सेवक घोषित कएने छथि, नहि कि ओकर नियंता। एहि प्रकारेँ उपर्युक्त पोथीक अन्तर्गत देखबामे अबैत अछि जे गीतकार मात्र ओहि विचारकेँ व्यक्त कएलनि जे अन्तर्मनसँ निकलल छनि आ सेहो कोन रूपमे? तँ, लोक-जीवनक सङ बढ़ैत सम्पृक्तिक रूपमे, गीतक स्वरूपपर राजनीतिक चेतनाक प्रभावक रूपमे, चोखगर यथार्थ बोधक स्वरमे, गहन निराशामे मानवीय संबलक रूपमे गीत परिकल्पनाक माध्यमे। ओहूना देखल जाइत छैक जे कोनो गम्भीरसँ गम्भीर विषय जँ मधुमे बोरि व्यक्त होइछ तँ ओ अपन प्रभाव तँ देखबैते अछि, मुदा प्रारम्भिक किछु क्षणमे निश्चये अपूर्व आनन्द अबैत छैक। ठीक, तहिना गीतकार ‘अनिल’ बाबू गम्भीरो विषयकेँ एहन-ने लय-तालमे बद्ध कए व्यक्त कएलनि जे श्रोतापर ओकर प्रारम्भिक प्रभाव अत्यन्त रमनगर होइत छनि, मुदा बादमे ओ अपन प्रभाव सेहो खूब देखबैत अछि। द्रष्टव्य थिक किछु ओहने पाँती- “छथि उदासे बहिन मैथिली आइ जागृतिक भोरमे स्नेह ने पाबि रहलि बेचारी अपनो माइक कोरमे देखि मलिन आकृति निज जनकक डूबल सदिखन नोरमे हो पौरुश तं एहि फन्दासं मिथिलाकें स्वच्छन्द करू चाही जं उद्धार मैथिलीक, तिलक प्रथाकेँ बन्द करू।” के एहन कठोर हृदय होएत जे एहि पदकेँ सुनि-पढ़ि अपन हाथ हृदयपर नहि लए जाएत? के एहन विचारहीन होएत जे एहि पदकेँ सुनि-पढ़ि किछुओ कालक हेतु एहि उचित बाटपर चलबाक दिशामे नहि सोचत? बस, साहित्यक तँ इएह काज थिकैक जे पाठककेँ उचित बाट धराबए, ओहि दिशामे सोचबाक हेतु बाध्य करए। एहि दिशामे उपर्युक्त पोथी पूर्ण रूपेण सफलता प्राप्त कएलक अछि। गीत तँ ओ थिक जे एक कण्ठसँ दोसर कण्ठ होइत जगभरि पाटि जाए। मिथिलाक प्राय: केओ एहन व्यक्ति नहि होएताह जे एहि गीत-संग्रहक कोनो-ने-कोनो गीतक किछु पाँती कखनो-कतहु सुनाए नहि पाबथि। किछु गीत तँ मैथिलीक प्रत्येक मञ्चपर अदौसँ अपन स्थान छेकि चुकल अछि। देखल जाए किछु ओहने पाँती- “हम मुग्ध भेलौं, धरतीक श्रृंगार देखि क’ नव कलष नव मज्जर आ पात देखि क’ बुझि पड़ैछ आबि गेल नव दुनियां जेना आइ धरतीयो लगैछ नव कनियां जेना।” आ “मोन होइए अहांकें देखिते रही, किछु बाजी अहां हम सुनिते रही। आइ आयल मिलन केर मधुर यामिनी बनि बैसलौं अहां मानिनी-कामिनी।” आदि एतावता, कहल जाए सकैत अछि जे ‘तोरा आंगनमे’ एकटा एहन गीत संग्रह भए पैंतीस-चालीस वर्ष पूर्व मैथिली साहित्यिक संसारमध्य पएर रोपने छल, जे शीघ्रहि अपन प्रभाव मिथिलामध्य पसारि बहु प्रशंसित भेल। एक दिस जतए ई अपन व्यङ्यक माध्यमे समाजकेँ शिक्षित करबाक प्रयास कएलक ओतहि दोसर दिस अपन लोक-विचारसँ समाजकेँ जागृति। एतबे नहि, एहि संग्रहक एकटा अपूर्व विलक्षणता ई अछि जे एहिमे व्यवहृत विचार गहन निराशामे मानवीय संबल बनि ठाढ़ भए जाइछ। इएह तँ थिकैक साहित्यक कार्य, इएह तँ थिकैक साहित्य प्रभाव। एहि सभमे ‘तोरा अंगनामे’ मैथिलक प्रत्येक अङनामे ठाढ़ भए एहन-ने विचार, एहन-ने प्रभाव पसारलक जे चहु दिस एकर स्वर कर्णगोचर होअए लगलैक, चहु दिस एकर जाल पसरए लगलैक। हँ, जखन चन्द्रमामे सेहो करिआ दाग छनि तखन ई तँ मात्र एकटा पोथीमात्र थिक। एहिमे व्यवहृत किछु शब्द अपन मूल रूपसँ मेल नहि रखैत अछि। एकर पाछाँ कारण कोन? एकर जिज्ञासा बनले रहल अछि, मुदा ओहि किछु शब्दकेँ देखि अपनहुँ सभसँ विचार प्राप्त भए सकैत अछि। द्रष्टव्य थिक किछु ओहने शब्द- देष, षंकर, सुभाशो, विष्व, आषा, ष्यामल, सृश्टि आदि। एतए ध्यातव्य अछि जे छन्द-ताल आदिक ज्ञान नहि रहबाक कारणेँ भए सकैछ जे उक्त विषय हमर माथक उपरे दनेँ चल गेल हो। ओना इहो सुनल अछि जे कवि लोकनिकेँ विभिन्न क्रममे शब्दकेँ तोड़बाक-जोड़बाक सामर्थ्य प्रदान कएल गेल छनि, तेँ भए सकैछ जे एहि शब्द सभक पाछाँ ओएह कारण हो। मुदा, एहिमे कोनो भाङट नहि जे ‘अनिल’ बाबू अपन पोथी ‘तोरा अंगनामे’क माध्यमे एहन-ने अनिल बहौलनि जे ओकर बिड़ड़ोमे सम्पूर्ण मैथिली गीत विधाक आङन सज्जित-चमत्कृत भए उठल अछि। आशीष अनचिन्हार धारक "अइ" पार सीमान जे शब्द थिक तकर मतलब होइ छै एखन रेखा जाहिसँ अपन-आनक बोध हो। ऐ सीमानक नाम वस्तु बदलिते बदलि जाइत छै। जेना खेतक सीमानकेँ आरि तँ गाछी केर सीमान हत्था भेल। तेनाहिते घर-घड़ारीक सीमान टाट-फरकी भेल। टोलक सीमान "ऐ टोल-ओइ टोल" होइत अछि। तेनाहिते नदी-धार-पोखरि लेल सेहो " ऐ पार- ओइ पार" केर प्रयोग कएल जाइत छै। जखन कियो कहै छै जे "धारक ओइ पार" तँ एकर अर्थ कहनिहारक उल्टा बला दिशाकेँ लेल जाइ छै। मानि लिअ कियो पछबारि पारमे ढ़ाठ भऽ कऽ कहै जे "धारक ओइ पार" तँ एकर मतलब जे कहनिहार "धारक" पुबारि पार बला दिस इशारा कऽ रहल छथि। आब चली असल उद्येश्यपर। मानि लिअ जे हम कहलहुँ- जे "धारक ओइ पार" नीक लोक सभ छथि तँ एकर मतलब मात्र एतबे नै रहै छै जे "धारक ओइ पार" नीक लोक सभ छथि, एकर मतलब ईहो होइ छै जे "धारक" ऐ पार खराप लोक सभ छथि। तेनाहिते मानि लिअ जे हम कहलहुँ- जे "धारक ओइ पार" खराप लोक सभ छथि तँ एकर मतलब मात्र एतबे नै रहै छै जे "धारक ओइ पार" खराप लोक सभ छथि, एकर मतलब ईहो होइ छै जे "धारक" ऐ पार नीक लोक सभ छथि। एकटा आर रोचक प्रसंग बूझि लिअ जे ई सीमान मात्र लोकेँ लेल नै छै बल्कि लोक, प्रकृति आ आन वस्तुसँ सेहो छै। मने ओइ पारक जमीन उपजाउ छै मने ऐ पारक जमीन उस्सर छै। आलोचकक काज मात्र गदगदी आलोचना करब या पूरा किताबक सारांश प्रस्तुत करब नै छै। आलोचकक काज तँ सैद्धांतिक पक्षक सही विवेचनाक संगे ईहो छै जे रचनामे जे किछु अघटित रहि गेल छै तकरा पाठकक सोंझा आनि ओकर रस-स्वादकेँ आर बेसी नीक करब। आब कने विस्तारमे चली--- मानि लिअ एकटा कवि एलाह आ लिखलाह जे "धारक ओइ पार" तँ एकर की मतलब हेतै। एकर मतलब ई छै जे कवि "ओइ" पारक संगे-संग समानांतर रूपें "अइ" पारक सेहो वर्णन कऽ रहल छथि। किछु उदाहरण देखू— "हम बिसरि जाए चाहलहुँ अपन देखल सपना............. मुदा बिसरि ने सकलहुँ" कवि धारक "ओइ" पार लेल ई प्रयुक्त केने छथि मुदा ई कटु सत्य जे धारक "अइ" पार ओ देखल सपना बिसरिए नै गेला बल्कि ऐ दुनियाँसँ ओसपने बिला गेलै। 1947 केर बाद भारत दू बेर आजादीक सपना देखलक। पहिल बेर जयप्रकाशजीक संगे आ दोसर बेर अन्ना हजारेक संग मुदा आश्चर्य जे ओ सपना अजादीक नै रहै सीढ़ी बनेबाक लेल रहै। पहिल बेरमे लालू-नितीश-रामविलास तँ दोसर बेरमे अरविंद केजरीवाल। "जठरानलक दर्दसँ आहत भेल हम थुस्स दऽ बैसि जाइत छी" कवि धारक "ओइ" पार लेल कहै छथि मुदा धारक "अइ" पार बिजनेस सम्राट अनिल अंबानीक बेटा थुल-थुल, मोटापासँ ग्रसित भऽ थुस्ससँ बैसि जाइत अछि। "ओइ" पार लोक भुखले मरै छै तँ "अइ" पार बेसी खा कऽ। "अरे रे रे ई की बहुत रास मूँह तँ चिन्हारे जकाँ लगैत अछि.......... भेल रहय परिचय" कवि धारक "ओइ" पार लेल ई कहने छथि मुदा धारक "अइ" पार तँ भाए-भाएमे झगड़ा छै। बुढ़ारीमे बेटा अनचिन्हार बनि जाइ छै तँ जवानीमे लोक पाइ कमा लेल अपने परिवारसँ अनचिन्हार बनि जाइत अछि। क्यो हमर उपस्थितिक मान्यता नहि दैत अछि ----------- सभहँक मौन स्वीकृति ई धारक "ओइ" पारक कथा अछि मुदा धारक "अइ" पार तँ सभ एक-दोसरकेँ मान्यता दैत अछि। तों महान तँ तों महान। बिना एककेँ मान्यता देने अइ पारमे दोसरक मान्यता भैए ने सकैए। तँए "अइ" पार सभ एक दोसरकेँ मान्यता दैत अछि। आइसँ करीब 5 बर्ख पहिने हम मैथिलीक महान व्यंगकार रूपकांत ठाकुरजीक आलोचना "अन्हार पर इजोतक कहिऒ विजय नहि " शीर्षकसँ केने रही तकर ई अंश देखू-- "आलोचनाक स्तर पर मैथिली व्यंग मे रुपकांत ठाकुर एकटा बिसरल नाम थिक। एकर पुष्टि 2003 मे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित पोथी "मैथिली कथाक विकास" मे प्रो. विद्यापति झा द्वारा लिखित लेख "मैथिली कथा साहित्य मे हास्य-व्यंग" पढ़ि होइत अछि। प्रो.झा पृष्ठ 168 पर 1963 सँ 1967क मध्य प्रकाशित हास्य-व्यंगक व्यौरा दैत रुपकांत ठाकुरक मात्र 6 गोट कथाक चर्च कएलथि अछि ( किछु आलोचक मात्र इएह लीखि कात भए गेलाह जे रुपकांत ठाकुर सेहो नीक व्यंग लिखैत छथि ) ।एहि के अतिरिक्त ने 1963 सँ पहिनेक मे हुनक व्यौरा मे हुनक नाम छन्हि ने 1967क पछाति। अर्थात रुपकांत ठाकुर मात्र 6 गोट हास्य-व्यंगक रचना कए सकलाह। जखन की वास्तविकता अछि जे रुपकांत ठाकुर 1930 मे जन्म-ग्रहण कए 1960क लगीच रचनारत भेलाह एवं 1972 मे मृत्यु के प्राप्त भेलाह। कुल मिला कए ठाकुरजी मात्र बारह बर्ख मे अनेक असंकलित कथा एवं लेख के छोड़ि हुनक पाँच गोट पोथी प्रकाशित छन्हि-- 1) मोमक नाक (व्यंग संग्रह) 2) धूकल केरा (व्यंग संग्रह) 3) लगाम (नाटक) 4) वचन वैष्णव (नाटक) 5) नहला पर दहला (उपन्यास)। मात्र बारह बर्ख मे एतेक रचना आ उल्लेख मात्र 6 गोट कथाक। आब अहाँ सभ के थोड़ेक-थोड़ शीर्षकक अर्थ लागए लागल हएत। मुदा अहाँ सभ घबराउ जुनि । ई शीर्षक ठाकुरेजीक रचना सँ लेल गेल अछि। मने रूपकांत ठाकुरजी अपन भविष्यक बात लीखि गेल छलाह।" तहिना "धार ओइ पार" केर कवि सेहो लीखिए देने छथि- "क्यो हमर उपस्थितिक मान्यता नहि दैत अछि" एकरा मात्र संयोग नै मानल जा सकैए जे आलोचनामे मात्र ओहने लेखक स्थान पबैत छथि जे नाना प्रकारक तिड़कम भिड़बैत छथि। "-----आम जामुन लतामसँ भरल गाछी बिरछी छै बाड़ी झाड़ी छै फूल-फुलवारी छै मंदिर-मस्जिद छै..." ई धारक "ओइ" पार छै मुदा "अइ" पारमे तँ भागलपुर, गोधरा, मुजफ्फरनगर आ दादरी सभ छै। उपरका पाँतिसभ "ओइ" पारसँ बेसी "अइ" पारक बात अछि। "-- गाँधी सुभाष भगत सिंहक खिस्सा" लगैए धारक "ओइ" पारमे ई खिस्सा सभ मोनसँ सूनल जाइत हेतै। धारक "अइ" पार तँ आब नाथूराम गोडसे शहीदक दर्जा पाबि गेल। ओकर मूर्ति आब गाँधीक बराबरमे लागि गेलै। ने तँ हम ऐ जीवनमे धारक "ओइ" पार जा सकै छी आ ने हम धारक "अइ" पारक पूरा व्याख्यान कहि सकै छी। भऽ सकैए जे धारक "ओइ" पार देखाबए लेल जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक बदला आकर कियो आबि जाथि आ धारक "अइ" पारक पूरा व्याख्यान कहबा लेल हमरा बदला कियो आर आबि जाथि मुदा एतेक तँ सत्य जे धारक "ओइ" पारक हाल-चाल बुझलासँ धारक "अइ" पारक हाल-चाल सेहो बुझा जाएत। ई साहित्य केर बड़का गुण छै जे ओ अपना समयसँ आगू हुअए मुदा........................ जे रचना पढ़लापर आगुओकेँ बुझाए आ पाछुओकेँ तखन ओकरा की कहबै। "धारक ओइ पार" नामक रचना आपना समयसँ बहुत आगू समय केर कविता अछि मुदा ओकर आवृत आ पाठक करैत काल ई बहुत नीक जकाँ फड़िच्छ हएत जे ओ अपना समयसँ पाछुओकेँ रचना अछि। जखन अहाँ रमायण की महाभारत पढ़बै तँ ई बेसी स्पष्ट हएत जे ई दूनू ग्रंथ आगू आ पाछू दूनू समयक रचना छै। ई दूनू ग्रंथक जे दृष्टि आ विजन छै से आगू समय केर छै मुदा पाठ ओ आवृति पाछू समयक। हम एतए ई नै कहए चाहै छी जे जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक दीर्घ कविता संग्रह "धारक ओइ पार" रमायण की महाभारते जकाँ अछि मुदा एतेक तँ सत्य जे ई दीर्घ कविता मैथिली साहित्य केर 90 प्रतिशत कवितासँ नीक आ प्रभावी अछि। पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण एगो नदी रहै जकर नाम पद्मा रहै। ओइ नदीक कछेरमे एकटा गरीब ब्राम्हणक निवास रहै। ब्राम्हण गरीब रहथि मुदा विद्यावान सेहो। मुदा विद्यावान रहने की? आ जखनहम ई खिस्सा अहाँकेँ सुनबऽ लेल बैसल छी तखन हमरा अपने एकटा सिनेमाक खिस्सा मोन पड़ि गेल। आमिर खान अभिनीत फिल्म छै "थ्री इडियट" ओना ई मूलतः चेतनभगत केर खिस्सा छै। खएर ओइ फिल्म केर नायक अपन मालिकक बेटाक नामपर पढ़ै छै मने विद्या नायक केर हिस्सामे आ डिग्री मालिकक बेटाक हिस्सामे। हँ, त कहै छलहुँ जे पद्मा नदीक कछेरमे एकटा गरीब ब्राम्हण छलाह जिनका अपने नहि आनो भाषाक रचना अपन भाषामे अनुवाद करबाक सौख-सेहंता रहनि आ समयपाबि करबो करथि। लोक कहै छै बहुभाषी भेनाइ बहुत नीक छै। लोकक मोताबिक जे जते भाषा सीखि सकै तते नीक मुदा हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि (ई अनुभव हमरा मात्र दस सालमे पूरा उत्तर आ उत्तर-पूर्व भारतमे रहबाक दौरान भेल) जे बहुभाषी भेनाइ प्रवासी लोकक लक्षण छै। से चाहे ओ ओ कोनो राज्यक किएक ने हो। मिला लिअ हमर अनुभव गलत नै हएत। फेर हमरा एकटा आर सिनेमा मोन पड़ि गेल जाह सिनेमा नै बल्कि कतेको सुपरहिट सिनेमाक कथा देबए बला आ राजेश खन्नाकेँ सुपर स्टार बनबए बला गुलशन नंदाक एकटा उपन्यास "घाट का पत्थर" मोन पड़ि गेल। ऐ उपन्यासमे नायक-नायिकाक जान बचबै छै। बदलामे नायिकाक बाप ओकरा अपन बिजनेसक साझीदार बनबै छै मुदा नायक केर मोनमे नायिका छै मुदा नायिका ओकरा पसंद नै करै छै। बादमे ई पसंद-नापसंद अपन चरम अवस्थामे पँहुचि जाइ छै। नायक द्वारा जखन बिजनेसक सभ भेद खुजबाक डर होइ छै तखन नायिका नायकसँ बियाह तँ कऽ लै छै मुदा दूनू मतभेद पहिने जकाँ रहै छै। दूनूक मिलनसँ एकटा बेटा जन्मै छै जे बादमे जा कऽ अपन बापकेँ मारि दै छै। आब अहाँ सब अकच्छ भऽ गेल हएब। कहाँ ई साहित्य केर लेख आ कहाँ ई सड़ल फिल्म सभ। ओनाहितो अहाँ सब सोबर लोक छी तँ चलू हम फिल्मक बात बादमे करब। 2009मे ओइ गरीब ब्राम्हणक कोखिसँ एकटा अनुवाद जन्म लेलकै जकर नाम छै " पद्मा नदीक माँझी"। जखन माए-बाप गरीब तखन कोनो बच्चा लेल कियो सोहर की बधैया नै गाबै छै। हँ बेर-बेरपर छठिहारक भोज नै भेटलै से चर्चा जरूर करै छै। ओना कहीं कहींसँ निछाउर रूपी पुरस्कार सेहो छै मुदा जखन बच्चे गरीबक छै तखन खोज कि पुछारी काहँसँ? सरकार बहादुर तीन सालक उमेर धरिक बच्चा सभ लेल प्रयास करै छै मुदा से तँ अहूँ के बूझल हएत ने जे दलालक बच्चा गरीबे केर दाना खा कऽ नमहर होइ छै। तँ देखू तीन सालक आन किछु बच्चाक लिस्ट जिनका सरकार बहादुर पुरस्कार देलखिन-- 2009- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी- सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) 2010- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) 2011- श्री खुशीलाल झा (उपरवास कथात्रयी, रघुवीर चौधरीक गुजराती उपन्यास) 2012- श्री महेन्द्र नारायण राम ("कार्मेलीन" कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) जँ 2009 आ 2010 बला बच्चा के देखबै तँ वर्तमान समय लेल भने संतुष्टि लागए मुदा 2011 आ 2012 देखिते अहाँ अपन माथा फोड़ि लेब से हमरा विश्वास अछि। 2009आ 2010 दूनू अनुवाद मूल ग्रंथसँ भेल अछि मुदा 2011 आ 2012 ????? 2011 आ 2012 केर बच्चासँ गरीब "पद्मा नदीक माँझी" केर तुलना करी तँ पद्मा नदीक माँझी बहुत बलिष्ठ अछि मुदा पहिनेहें कहि देने छी जे दलालक बच्चा गरीबकबच्चाक खोराकी खा कऽ जीबै छै से एहू ठाम छै। आब प्रश्न उठै छै जे ऐ पद्मा नदीक माँझी के पुरस्कार किएक ने भेटल तँ तइ लेल अनुवाद पुरस्कारक शुरूसँ 2012 धरिक लिस्ट देबए पड़त आ से हम परिशिष्टमे देब।ओहि ठामसँ देखलापर पता चलत जे लगभग 70 प्रतिशत ओहनकेँ पुरस्कार भेटल छै जकर अनुवाद कर्ता मूल भाषा जनिते नै छथि उपरे देखू ने 2011मे खुशी लाल झाकेँभेटलनि तिनका गुजराती नै आबै छनि तेनाहिते महेन्द्र नारायण रामकेँ कोंकणी भाषा कतेक आबै छनि से तँ भगवाने जानथि कि जूरी जानथि मुदा जनता तँ जानिए रहलछै। हम पहिनेहों कहलहुँ एखनो कहि रहल छी ई खुशी लाल झा कि महेन्द्र नारायण राम सन झुट्ठा अनुवादक आ एकरा चूनए बला दलाल जूरी सभ गरीबक पुरस्कार खा कऽमहान बनल अछि। आबो अहाँ सभकेँ फिल्म "थ्री इडियट" मोन पड़ल कि नै। विद्या तँ पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण लग छनि मुदा ओकर डिग्रीपर दलाल सभ कब्जा केने अछि। भने पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण मूल भाषासँ अनुवाद केने होथि मुदा सरकार बहादुर तँ दलालक फेरामे छथि। तँए "पद्मा नदीक माँझी" आ ओकरा सन-सनकेँ पुरस्कार नै भेटलै आ ने भेटतै। आब कने फेर गुलशन नंदाक उपन्यासकेँ देखी। ओहिमे नायक तखने जबरदस्ती नायिका संग बियाह करै छै जखन कि नायिकाक बापक बिजनेसक सभ खराप भेद बूझल भऽ जाइत छै। कहीं पुरस्कारोमे एहने तँ नै छै। भऽ सकैए पुरस्कारक महंथक सभ खराप भेद ई चमचा-दलाल सभ बूझि जाइत हो आ ओइ भेदकेँ सुरक्षित रखबाक लेल पुरस्कार थमा देल जाइत हो। हमरा तँ पहिल तर्कक अपेक्षा इएह बेसी समीचीन बुझाइत अछि। महंथ सभ अपन बिजनेस एही तरीकासँ सुरक्षित रखने अछि।मुदा जेना उपन्यासमे बेटा अपन जिद्दी बापकेँ मारि दैत छै तेनाहिते ई दलाल सभ पुरस्कारक महंथ सभकेँ मारबे करतै। धेआन देबाक बात छै जे आन कियो नै अपने दलाल सभ मारि देतै महंथ सभकेँ। से महंथ जीबऽ की मरऽ मुदा ऐ बातपर संदेह नै जे अनेको पद्मा नदीक गरीब ब्राम्हण चलि जेता असगरें। परिशिष्ट--- साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार 1992- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी) 1993- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी) 1994- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू) 1995- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला) 1996- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू) 1997- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़) 1998- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) 1999- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला) 2000- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी) 2001- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी) 2002- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू) 2003- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया) 2004- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी) 2005- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी) 2006- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला) 2007- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) 2008- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू) 2009- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी- सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी) 2010- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी) 2011- श्री खुशीलाल झा (उपरवास कथात्रयी, रघुवीर चौधरीक गुजराती उपन्यास) 2012- श्री महेन्द्र नारायण राम ("कार्मेलीन" कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो) गाम के अधिकारी तोहे बड़का भैया हो- (आलोचना) [18, November 2015केँ भवनाथजी अपन फेसबुक वालपर एकटा बहस शुरू केला जे शारदा सिन्हा द्वारा आओल सामा गीतक पाँति "हाथ दस पोखरि खुना दैह कि चम्पा फुल लगा दैह हे।" गलत अछि जकरा ऐ लिंकपर देखल जा सकैएhttps://www.facebook.com/bhavanath.jha/posts/1004404362949791 एही संदर्भमे प्रस्तुत अछि हमर आलेख जाहिमे ई सिद्ध करबाक प्रयास कएल गेल अछि जे सामा गीतक बोल ठीक छै आ भवनाथजीक तर्क गलत अछि।-आशीष अनचिन्हार] किछु शब्द एहन होइ छै जकर अर्थ भूतकालमे तँ किछु होइत छै मुदा वर्तमान कालमे बदलि जाइत छै। ओना बहुत बेर जबरदस्ती अपन महत्व देखेबाक लेल सेहो बदलि देल जाइत छै। भारतमे जखन भाषाविज्ञानक काज शुरू भेल तँ ओकर कर्ता-धर्ता संस्कृत भाषामे बान्हल लोक सभ छला। जकर परिणामस्वरूप भाषाविज्ञानक सभ अध्याय संस्कृतसँ शुरू भेल आ संस्कृतेपर खत्म। ओ लोक सभ संस्कृत छोड़ि आन भाषाक महत्व नै स्वीकारलथि आ तँए भारतीय भाषाविज्ञान बहुत अर्थमे एकांगी अछि। कोनो कालक भाषा शुद्ध नै होइ छै। हरेक समयमे हरेक आन भाषाक शब्द ओ व्याकरणक प्रभाव एक-दोसरापर पड़ैत रहलैक अछि। मुदा हुनका सभ लेल मात्र संस्कृते सभ किछु। ई सत्य जे संस्कृत भारतक राजकीय ओ धार्मिक (जनताक नै) भाषा छल तँए ओकरो प्रभाव आन भाषापर पड़लै मुदा सभ भाषा संस्कृतेसँ निकलल अछि या सभ भाषाक मूल संस्कृते टा अछि एहन विचार संकुचित विचार अछि। आधुनिक कालमे जखन लोक सभ शब्दक मूल ताकऽ लगला तँ अनयासे किछु लोक संस्कृते टाकेँ मूल मानि लेलनि आ दोषपूर्ण परिणाम निकलैत रहल। मात्र शब्दें नै श्लोकक अनर्थपूर्ण व्याख्या सेहो भेल। दूटा उदाहरण देखू--- एतदेव विपर्यस्तं संस्कार गुण वर्जितम् विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नाना वस्थान्तरात्मकम्। (भरत मुनि) मने जे मूल शब्दक अक्षरकेँ आगू-पाछू कए वा सरलीकृत कए बाजब प्राकृत पाठ कहाइए। ऐठाम मूल शब्द कोनो भाषाक भए सकैए मुदा ओ सभ मूल शब्द मने संस्कृतक शब्द मानि लेलनि। की भरत मुनिक समयमे एकमात्र संस्कृते भाषा छल? स्पष्ट अछि जे भरत मुनि हरेक भाषाक मूल शब्द लेल कहने छथि हँ जेना पहिने कहलहुँ संस्कृत केंद्रीय भाषा छल तँए बेसी शब्दक मूल ओतत्हिसँ भेटत। वर्तमानमे "डरेबर", "इस्कूल", "औड़ी-नौड़ी" आदि सभ बहुत प्राकृत शब्द भेटत मुदा तँए कि ओकरा संस्कृतेसँ निकलल मानि लेबै डरेबर driver शब्दसँ अछि, इस्कूल school शब्दसँ तँ औड़ी-नौड़ी ordinary शब्दसँ। तेनाहिते आर आन शब्द सभ अछि। भाषामे वर्णविपर्य सेहो होइत छै मुदा आधुनिक भाषा वैज्ञानिक मात्र अपन श्रेष्ठता सिद्ध करबाक लेल एकर प्रयोग करै छथि। तेनाहिते आचार्य भर्तृहरि जी प्राकृतक सम्बन्धमे कहै छथि जे-- दैवीवाक् व्यवकीर्णेयम शकतैरभि धातृभिः मने जे दैवीवाक् अशक्त लोकक मूँहमे आबि भिन्न-भिन्न रूपमे आबि जाइ छै। आब ऐठाम प्रश्न उठैए जे दैवीवाक् की? तँ सभहँक मूँहसँ उत्तर भेटत संस्कृत मुदा ई गलत हएत कारण जेना ओइ समयक एकटा पंडित लेल दैवीवाक् संस्कृत रहल हेतै तेनाहिते ओइ समयक आन भाषा सेहो ओकर बजनाहर लेल दैवीवाक् रहल हेतै। तखन फेर संस्कृते टा किएक? या ईहो भऽ सकै छै जे भरत मुनि या भर्तृहरि लेल मूल या दैवीवाक् केर मतलब संस्कृते टा रहल हो। एहन अवस्थामे ई मानए पड़त जे हिनक दूनूक अवधारणा संकुचित छल जैसेँ एकौ डेग आगू वर्तमान ओ आधुनिक भाषावैज्ञानिक नै जा सकलाह अछि। किछु दिन पहिने भवनाथ झाजी फेसबुकपर एकटा पोस्ट देला जे— “सामाक एकटा गीत गबैत छथि शारदा सिन्हा- "हाथ दस पोखरि खुना दैह कि चम्पा फुल लगा दैह हे।" कहू तँ, दस हाथक पोखरि केहन होएत? मुदा एकर बोल कें ठीक कए लिय- हथदह पोखरि खुना दैह..............। हाथी दहाएबला पोखरिक कामना थिकैक” एकर उत्तरमे हम ओहीठाम लिखलहुँ जे— "बीतो भरिक जे खोपड़ी रहितै। एकर मतलब ई थोड़े छै जे एकै बीतक खोपड़ी होइ छै ऐ गीतमे बहीनक आग्रह छै जे नै नमहर तँ कमसँ कम दसे हाथ पोखरि खुना दिअ। साहित्य अभिधामे बेसी नै चलै छै। ओनाहुतो हथदह नै हथिदह हेबाक चाही हाथीक संदर्भमे" एकर बाद बेस घमर्थन चलल आ बहस दह शब्दपर भेल जाहिमे भवनाथजीक कहब छलनि जे दह शब्दकेर निर्माण संस्कृतक "ह्रद" शब्दसँ भेल अछि। मुदा हमर कहब छल जे दह शब्द संस्कृत शब्दक नै आन भाषाक शब्दसँ आएल अछि। बेस घमर्थन चलल आ दूनू पक्ष अपन-अपन खुट्टापर कायम रहला। जँ ओ पूरा बहस देब तँ अनावश्यक रूपें पन्ना बढ़ि जाएत। तँए ओइ बहसकेँ हम ओत्तहि छोड़ी आ आगू चली (मूल बहस भवनाथजीक वालपर छनि, ओना काजक लेल हमहूँ ओकर काँपी-पेस्ट रखने छी)। ऐठाम ई स्पष्ट करी जे हम ऐठाम दूनू पक्ष राखब संस्कृतसँ सेहो दह केर संबंध जोड़ब आ बाहरी भाषासँ सेहो मुदा हमर मूल उद्येश्य अछि शारदा सिन्हा जीक गाओल आ अनाम गीतकारक गीतक रक्षा करब, ओहीक्रममे दह केर विवेचन हएत। बहुत संभव जे दह संस्कृतेसँ निकलल हो मुदा शारदा सिन्हाजीक जै गीतपर भवनाथजीकेँ आपत्ति छनि ताहिमे "ह्रद" बला दह केर कोनो जरूरति नै छै। ऐठाम ईहो देखब जरूरी जे भवनाथजी बिना कोनो विवेचनाकेँ अपन मंतव्य सुना देलनि जे गीतक बोल गलत अछि आ झट ओकर निराकरण सेहो दऽ दै छथि जे गीतक बोल ई हेबाक चाही।हमर ई नै कहब अछि जे लोकगीतक उपर चर्चा नै हेबाक चाही मुदा हम ई जरूर कहब जे बिना तर्क ओ तथ्यकेँ कोनो लोकगीतक बोलकेँ बदलब ओतबे खराप छै जते की कोनो जीवित आदमीकेँ जानसँ मारब। विस्तारमे जेबासँ पहिने जँ एक मिनट लेल भवनाथजीक बात मानि ली हथदह मने हाथी दहाए बला पोखरि भेलै आ हाथीक विशालतासँ पोखरिक विशालता बुझाइत छै तखन हमरा ईहो जनबाक अछि जे मिथिलामे "नागदह" सेहो छै तँ की ओइमे नाग दहाइत हेतै आ ओकर विशलाता नागे जकाँ छोट हेतै? मिथिलामे "कमलदह" सेहो छै तखन सहज जिज्ञासा जे कमल एतेटा पोखरि लैए कऽ की हैतै? हमरा बुझने भवनाथजी कनी बेसिए भावुक भऽ गेल छथि विशालताक लेल। आब चली हम अपन मूल विवेचना दिस आ सभसँ पहिने तँ हमहूँ आने पंडित जकाँ संस्कृत दिस जाइ। संस्कृतमे दहन बला शब्दक संबंध ज्वाला,अग्नि आदिसँ छै। बोखारक गर्मी सेहो दाह कहल छै। मैथिलीमे दाह संस्कृतसँ मानल जा सकैए। द्रोह शब्द दहन केर विस्तार थिक जकर मतलब छै केकरो घृणामे जरि जाएब। तँए भवनाथजी द्वारा उपरमे देखाओल दह शब्द दहन शब्दसँ नै भऽ सकैए कारण एक आगि तँ दोसर पानि। केकनो काल कऽ एकै शब्दक विपरीत अर्थ सेहो भेटि जाइत छै मुदा से ऐठाम नै अछि। आब संस्कृतेक दोसर शब्द "दश" केर हाल देखी। जखन प्राकृत भाषा एकै तखन "दश" "दह"मे बदलि गेलै मुदा अर्थ नै बदलि सकलै। मतलब दश ओ दह दूनू संख्यावाची रूपमे रहल। दसोदिसिया या दहोदिसिया दूनू रूप भेटत। ओना ई रोचक जे जँ प्रचलित शब्द खिया जाइत छै आ ताहीक्रममे दस शब्द दह शब्दमे बदलि गेल हेतै तैयो ओकर अर्थ नै बदलबाक चाही। भवनाथजीक वालपर अमरनाथ झा नामक पाठक कहै छथि जे शब्द प्रचलनमे आबि खिया जाइत छै, ठीम हमहूँ मानलहुँ मुदा अर्थ????????????????????????? अर्थ तँ वएह रहतै जे भाइ हमरा कमसँ कम दसे हाथक पोखरि खुना दिअ। मुदा से तँ ने भवनाथजीकेँ ई काम्य छनि आ ने अमरनाथ झाजीकेँ । फेर संस्कृतक "ह्रद" शब्दपर आबी। "ह्रद" मने जलाशय, सरोवर, ध्वनि, नाद, किरण, मेढ़ा नामक पशु आदि एकर अर्थ भेल। मुदा एकर प्रचलन जलाशय लेल बेसी भेल। किछु अलग विशेषता लेने "ह्रद" सभ लेल अलग नामाकरण भेल जेना कपिला ह्रद, पुंडरीक ह्रद,आदि। ह्रदिनी मने नदी भेल। संस्कृत भाषाक विसर्ग प्राकृतमे "ह" जकाँ ध्वनि दैत छै। बहुत संभव जे ह्रद: केर उच्चारण ह्रदह=हदह=दह भऽ गेल हो। मुदा ऐठाम धेआन रखबाक थिक जे भवनाथजी पाठककेँ एहन कोनो सूचना नै दै छथि। बस ओ मानै छथि जे संस्कृतसँ विकास भेलै तँ भेलै ओकर कोनो विवेचना नै करऽ चाहै छथि। जेना कि हम उपरेमे पुछने छी जे भवनाथजीक हिसाबें जँ हथदह मने हाथी दहाए बला पोखरि भेलै आ हाथीक विशालतासँ पोखरिक विशालता बुझाइत छै तखन हमरा ईहो जनबाक अछि जे मिथिलामे "नागदह" सेहो छै तँ की ओइमे नाग दहाइत हेतै आ ओकर विशलाता नागे जकाँ छोट हेतै? मिथिलामे "कमलदह" सेहो छै तखन सहज जिज्ञासा जे कमल एतेटा पोखरि लैए कऽ की हैतै? आब कने संस्कृतकेँ विराम दैत आन भाषा दिस देखी--- अरबीमे Dahaha मैथिलीमे- दह (دَحَاهَا ई मूल उच्चारण अछि) केर दूटा मतलब होइत छै-- पहिल भेल " पसारनाइ" आ दोसर भेल “पसरल”,अर्थविस्तारक कारणें सभ चीजक पसारनाइ लेल एकर प्रयोग होइत छै ।किछु विद्वान अरबीमे Dahaha केर मतलब अण्डाकार धरती मानै छथि आ तैपर बेस घमर्थन भेल छै। कने हटि कऽ अरबिएमे दोहा (Doha) الدوحة केर मतलब वर्गाकार जलाशय होइत छै। तेनाहिते तुर्कीमे Daha केर मतलब बेसी होइत छै। तुर्कीमे कम-बेसी लेल एकरा उपसर्ग जकाँ प्रयोग कएल जाइत छै जेना- faster लेल daha hızlı slower लेल daha yavaş more intelligent लेल daha zeki more hardworking लेल daha çalışkan more beautiful लेल daha güzel आदि-आदि जँ गौरसँ देखबै तँ पता चलत जे अरबी-तुर्कीमे जे दह केर अर्थ छै सएह अर्थ भवनाथजी द्वारा देल गेल दह शब्दसँ बेसी मेल खाइत अछि। मने ओहन विशाल पोखरि, गहींर जलाशय, सुंदर जलाशय आदि जाहिमे किछु अलग विशेषता हो । मिथिलाक अनेक गामक नाम भेटत जे पोखरिक नामपर या भौगलिक विषेशताक नामपर अछि जेना नागदह, चकदह, कमलदह। आब एकर अर्थपर आबी ।अर्थ हम अरबी-तुर्की केर हिसाबें लऽ रहल छी। दह मने बेसी वा पसरल भेल आ ओइसँ पहिने विशेषण लगा एकरा आर अर्थ विस्तारित कएल गेलै, जेना कमलदह ( ओहन पोखरि वा जगह जाहिमे बहुत रास कमलक फूल हो), जमुनदह (ओहन पोखरि जकर भीड़पर जामुनक गाछ हो वा ओहन जगह जाहि ठाम बेसी जामुनक गाछ हो) नागदह (ओहन पोखरि जकर भीड़पर नाग वा साँपक बिल हो वा ओहन जगह जाहि ठाम बेसी संख्यामे साँप-नाग हो, समान्यतः मिथककेँ रूपमे नागकेँ पानिमे रहब सेहो देखाएल जाइत छै) चकदह ( ओहन पोखरि जकर बनावट चक्राकार हो या ओहन जगह जे चक्रकार हो) आदि, आदि। हमर ऐ विवेचनासँ स्पष्ट अछि जे संस्कृत बला “ह्रद” शब्दसँ बनल दह केर अपेक्षा अरबी-तुर्कीसँ लेल गेल दह बहुअर्थी शब्द अछि। संगे-संग ईहो स्पष्ट अछि जे शारादा सिन्हाजीक द्वारा जे सामा गीतक जे बोल अछि-- "हाथ दस पोखरि खुना दैह कि चम्पा फुल लगा दैह हे" से अपन अर्थमे ठीक अछि। जँ शब्द खिया कऽ "हाथ दस" बदला "हथदह" हेतै तैयो ओकर अर्थ नै बदलतै। ओकर अर्थ संख्येवाची रहतै। मिथिला की हरेक क्षेत्रक जनानी अपन-अपन पंडित वर्गसँ प्रताड़ित रहल अछि। भाषा बदलि गेलै, खान-पान ओ भेष-भूषा धरि बदलि गेलै मुदा पंडित वर्ग द्वारा जनानीपर आक्रमण करबाक प्रवृति नै बदललै। आधुनिक युगमे पंडित सभ आर खुंखार भऽ कऽ आएल अछि। आजुक पंडित सभ कोट-पैंट-टाइ पहिरैए मुदा एतेक आधुनिक भेलाक बादो ओ आन की अपनो घरक जनानीकेँ बढ़ल नै देखऽ चाहैत अछि। बेसी पढ़ल-लिखल आ पाइ बला पंडित वर्गमे ई प्रवृति बेसी देखल जा रहल अछि। मध्यकालीन समयमे जखन पंडित सभ अपन बहीनि, बेटीकेँ बियाहक नामपर नाँगर, लुल्ह आ बौक-बेरोजगार सभहँक हाथें बेचबाक परंपरा चलेलक तकर विरोधमे जनानी सभ "परिछन" नामक बिध चलेलथि। एनाहिते पंडित वर्गक आक्रमण आ जनानी द्वारा तकर विरोध मिथिलाक वैवाहिक परंपरा आ आन क्षेत्रमे ताकल जा सकैए। जेना कहि आएल छी आजुक आधुनिक युगमे पंडित वर्ग नव व्यूह रचनाक संग जनानी सभकेँ प्रताड़ित करबाक लेल तैयार भेल छथि। आजुक पंडित आब संविधान ओ लोकतंत्रक कारणें जनानी सभकेँ वियाहक की आन देखार तरहें प्रताड़ित नै करैए मुदा तकर बदलामे ओ जनानी सभ केर बोल आ ओकर भावनाकेँ बदलि देबाक ओकरा नष्ट करबाक कुच्रक करैए। मैथिली लोकगीतक ई सभसँ बड़का विशेषता छै जे ओहिमे तमाम बदलाब केर बाबजूदो पंडित सभहँक आक्रमण आ तकर मुँहतोड़ जबाब दूनूक सबूत एखन धरि बाँचल छै आ तँइ एखनो धरि पंडित वर्ग लोकगीत मारबाक षड्यंत्र करैत छथि। तँ आउ, हमरा लोकनि ओहन सभ बहीनक पक्षमे ठाढ़ होइ, ओहन सभ जनानी केर पक्षमे ठाढ़ होइ जे पूरा जीवन अपन भावना अपन तर्क अपन शक्तिकेँ लोकगीतमे समाहित कऽ देलनि। आउ, हमरा लोकनि ओहन सभ बहीनक पक्षमे ठाढ़ होइ, ओहन सभ जनानी केर पक्षमे ठाढ़ होइ जे पूरा जीबन मूँह सीबि कऽ रहृत छथि आ अपन सभ इच्छा,सौख-सेहंता आदिकेँ "बीतो भरि", "दसो हाथ", "दसो धूर", "एकौ घोंट"' "दुइयो कौर" सन छोट आ तुच्छ शब्द खंडमे कहि धरतीसँ विदा भऽ जाइत छथि पंडित सभहँक कुच्रककेँ खंडित कऽ कऽ। परिशिष्ट---- शारदा सिन्हा जी द्वारा गाएलल ई मूल गीतक प्रारूप अछि ( वर्तनी गीत गेबाक हिसाबें अछि) गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हो भइया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ चम्पा फूल लगाय दिअ हे गाम के अधिकारी तोहें छोटका भैया हो भइया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ चम्पा फूल लगाय दिअ हे भैया लोढ़ायल भौजो हार गाँथू हे आहे सेहो हार पहीरि बड़की बहिनी साम चकेबा खेलत हे कथी बझाएब बन तितिर हे आहे कहाँ के बझाएब राजा हंस चकेबा खेलब हे जाले बझाएब बन तितिर हे आहे रौब से बझाएब राजा हंस चकेबा खेलब हे गाम के अधिकारी तोहें फलां भइया हे भइया हाथ दस पोखरि बना दैह चम्पा फूल लगा दैह हे सभ्य लोक- (व्यंग्य निबंध) 1 हुनका एकटा बेमारी छनि। सभ्य बनबाक। आब दुनियाँमे ई एहन बेमारी छै जकर कोनो इलाज नै। किछु कऽ लिऽ केहनो कऽ लिअ कोनाहुतो कऽ लिअ, हुनका राति-दिन सभ्यताक अनुसरण चाही। हुनका बुझाइ छनि जे सभ्य बनलासँ दुनियाँ तगमा दै छै। आ ऐ तगमा लेबा लेल ओ किछु करबाक ले तैयार छथि। उदाहरण लेल हुनका एकटाआदमीसँ बड़ शिकायत छनि। एतेक जे ओ परोक्षमे हुनकर माए बहीनिकेँ उकटि दै छथिन मुदा सामने एलापर हुनका प्रणाम करै छथिन। आ हुनका हिसाबें इएह सभ्यता छै....... 2 मिठ बाजब एकटा बड़का कला छै। ऐ कलासँ बड़का-बड़का काज भऽ जाइत छै। लोकेँ सदिखन जश भेटै छै। आदि-आदि। एकटा धोती धारी अति सज्जन महाशय अपनासँ छोटकेँ ई व्याख्यान दऽ रहल छलखिन। ओही ठाम एकटा बच्चा ओहि महा सभ्य लोकसँ पूछि बैसल जे जँ हम अहाँकेँ कही जे "हे कृपालु सभ्य ओ सुशील मानव -"अतिसुंदर बचन बाजऽ बाली जे अहाँक बेटी छथि तिनका संग हम एक राति रतिक्रिया करऽ चाहैत छी" तँ कहू जे हमर काज सिद्ध हएत की नै?...... ओ सभ्य लोक मिठगर बोलीक फेरमे पड़ि आब अवाक् छथि..... 3 सभ्य लोक बहुत बेसी सभ्य बनबाक फेरमे छथि। ओ भरि दिन सुग्गा आ कसाइ बला कथा रटैत रहै छथि जे कसाइ एबे करतै, जाल पसारबे करतै, अनाज फेकबे करतै तों लोभ नै करहिहें। मुदा पता नै सभ्य लोक सभ ई रटैत-रटैत कहिया विचारधाराक लोभमे फँसि जाइ छथि से वएह टा खाली जानै छथि। अहाँकेँ ओ बहुत बेर कहता जेसाहित्यकारक कोनो विचारधारा नै होइ छै मुदा ओ अपन विचारधारा ताकि लै छथि। सभ्य लोक बहुत बेर रामधारी सिंह दिनकरजीक ई पाँति समाजक सामने राखै छथि जे-- "समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध" मुदा जखन कोनो गलत काजक विरोध करबाक समय आबै छै तखन सभसँ पहिने इएह सभ्य लोक सभ भागि जाइ छथि। फेर किछु दिनक बाद आबै छथि बिना लाज शर्मक। कहै छथि जे ई काज भऽ गेल छल तँ ओ काज भऽ गेल। मुदा वास्तविकता ई छै जे ओ तटस्थ रहै छथि। हुनका हिसाबें सभ्यता इएह भेलै। जँ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि- (व्यंग्य निबंध) हमरा भोर कऽ बहुत किछु फुराइत अछि। ताहूमे जखन की हम जागि जाइ। मने कहबी छै ने " जखने जागी तखने भोर" ताही तर्जपर। ताहूमे दिसा-मैदान कालमे हमरा बहुत किछु सोचाइत-फुराइत अछि। अपना देशक बोली-बानीमे ओनाहुतो शौचालय आ सोचालयमे कनिकबे अंतर छै। ओना समानता तँ कने ईहो छै जे कब्ज पेटक हो की दिमागक खतरनाक होइ छै। असलमे जे शुद्ध मैथिल ब्राम्हण हेता तिनका दिसा-मैदान कालमे बहुत किछु फुरेबे करतनि। जँ ओइ कालमे नै फुराइ छनि तँ ओ शुद्ध मैथिल ब्राम्हण नै हेता। कतेको मैथिल ब्राम्हण ऐ कालमे सोचि कऽ दियाद आ दालिकेँ गला देला आ ओहो बिना सबूत छोड़ने। हँ तँ फेर आबी कहबीपर। मने जखने जागी तखने भोर। ऐ कहबीकेँ मैथिल ब्राम्हण सभ कसिया कऽ पकड़ने छथि। तँइ देखैत हेबै जे भरि जीवन ईंटा-पाथर जोड़ए बला रिटायरमेंट भेटिते मोबाइलपर कवि बनि जाइ छथि, मिथिला राज्य अभियानी बनि कऽ नेताक दर्जा पाबि लै छथि। रिटायरमेंटक बाद हुनका मिथिला-मैथिल-मैथिलीक ततेक ने चिंता भऽ जाइत छनि जे ओ दिन-दिन दुबराएल जाइ छथि, एतेक दुबरा जाइ छथि जे हुनका धोतियो नै सम्हारल होइ छनि। आ दुबराइते-दुबराइत काजक बलें भेल अपन सीनियर सभकेँ शिक्षा देबऽ लागै छथि। आ शिक्षाक स्तर की तँ हम उम्रमे नमहर छियौ तँ तों हमर सभ बात मानै, हमरा बुधियार मानि आदर-सत्कार दे आदि-आदि। आब जँ कियौ हुनकासँ पूछै छनि जे सरकार एतेक चिंता पहिने कियैक नै छल एहि काज सभ लेल तँ हुनकर एकैटा उत्तर भेटत- जखने जागी तखने भोर। हुनका ई नै कहल होइ छनि जे ओते दिन परिवारमे फँसल छलहुँ आब समय अछि तँइ करै छी। ओ घुमा-फिरा कऽ कहता जे जखने जागी तखने भोर। दरअसल ई हुनकर या मैथिल ब्राम्हणक एकटा रक्त विकारे बूझू। हुनका बुझाइ छनि जे घुमा-फिरा कऽ कहलासँ लोक महान मानि लेत। संगे-संग ईहो डर होइत छनि जे असल बात कहबै तँ कियो सीनियर नै मानत। आ हमहूँ तँ मैथिल ब्राम्हणे छी ने। एक दिन एनाहिते हम दू बजे दिनमे सूति कऽ जागल रही आ दिसा-मैदान दिस गेल रही। तखने हमरा फुराएल जे जँ कदाचित् भगत सिंह आ महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि आ समाजिक आंदोलन केने रहितथि तँ हुनका सभकेँ की-की सुनबा लेल भेटल रहितनि। मैथिल ब्राम्हण पढ़ल-लिखल होथि की नै होथि, गुणवान, रूपवान, धनवान, बलवान होथि की नै होथि मुदा ओ सभ्य जरूर होइ छथि। सभ्यतामे मैथिल ब्राम्हणक जोड़ा नै। जनमघुट्टी जकाँ सभ्यता पियाएल जाइत छनि मैथिल ब्राम्हण सभकेँ। आन जातिमे सभ्य भेनाइ कोनो जरूरी नै छै मुदा हिनका सभकेँ सभ्यता चाहबे करी। आ सभ्यतो केहन तँ बस बाहरी दिखावा बला। भीतर किछु कऽ लिअ। भाए-भाएमे गारि-मारि भऽ जाए। एक भाए जमीन बँटवारा लेल दोसर भाए के किछु कहबा-करबा लेल तैयार भऽ जाथि लेकिन बाहर धोती-तिलक लगा नमस्कार-प्रणाम जरूर करथि। बाह-बाह जरूर करथि। इएह भेल हिनकर सभहँक सभ्यता। ओनाहुतो मैथिल ब्राम्हण बाह-बाह छोड़ि किछु कइयो ने सकैत छथि। कारण गुणवान, रूपवान, धनवान, बलवान हेबाक लेल जे असल तत्व चाही जे हिनका सभमे होइते नै छनि तँइ ई सभ बाह-बाह छोड़ि किछु कइयो नै सकै छथि। आइ-काल्हि सोशल मीडियाक दौरमे हिनकर सभहँक परिभाषामे विस्तार सेहो भेल अछि। धोती-तिलक लगा बंडी पहीरि कऽ फोटो घिचा लिअ आ ओकरा फेसबुक आदिपर धऽ दिऔ। बस अहाँ परमामेंट सभ्य बनि गेलहुँ। कंप्यूटरक ओहि पार अहाँ अपना घरमे केहन छी से के देखए गेल। हँ तँ पहिने सुनू जे जँ कदाचित् महात्मा गाँधी आइ-काल्हि मिथिलामे जन्मल रहतथि आ समाजिक आंदोलन केने रहितथि तँ हुनका ई सभ्य मैथिल ब्राम्हण सभ शुरूआतमे की कहितनि--- "एना नै लोकक नजरिमे अपन छवि बनाउ। देखार नै होउ। मीठ बात बाजू। सरकारक विरोध केनाइ अपने विरोध केनाइ छै। एना नै। घर-परिवार बला छी। ऐ कूद-फानमे रहब तँ किछु नै हएत। कोनो बात नै ई सभ करबाके अछि तँ पहिने जीवन बना लिअ। केहन नीक ओकालति तँ चलिते अछि। देखियौ फल्लाँ बेटाकेँ टाल लगा देलकै।" आब जखन गाँधी उपरका बात नै मानि अपन काज कऽ कऽ किछु प्रतिष्ठित भऽ जाइ छथि तखन देखू जे ई सभ्य लोक सभ की कहैत छथिन--- " बड्ड भेल। इह इएह करता देशक उद्धार। बाप मरल अन्हारमे पूतक नाम पावर हाउस। आब जखन अहाँकेँ हम सभ महात्मा मानि लेलहुँ तखन फेरसँ ई उपास-अनशन करबाक की जरूरति अछि। केहन बढ़ियाँ स्थापित भइये गेल छी। आब हाथ सेकैत रहू। आब गाँधी ईहो बात नै मानै छथि आ जेल जाइ छथि तखन ई सभ्य लोक सभ कहै छथि--" कहने रहिऐन्ह जे नै करू कूद-फान। एक बेर महात्मा बनिए गेलहुँ तखन बेर-बेर महात्मा बनबाक कोन काज? नै कान देलनि हमर बातकेँ। आब गेलहुँ ने जेल। बनैत रहू सिद्ध-महात्मा-जोगी जेलेमे। हम नै आएब बचबए लेल। दरभंगिया ब्राम्हण की कहै छथि-- " इएह बकरी पोस्सा चलल महात्मा बनऽ। बाप छै बनियाँ आ ई बनत सिद्ध-महत्मा। आन चीजकेँ सौख रहितै तँ कोनो बात नै सौखो केहन तँ महत्मे बनत। एकरा बूझल नै छै जे हमर पिता, हमर बाबा, हमर नाना आ हमर सभ संबंधी दस-दस हाथ चाकर ढ़ेका बान्है छथि। ऐ दुनियाँमे हमर पिता, हमर बाबा, हमर नाना आ हमर सभ संबंधी छोड़ि कियो आन महात्मा बनिए नै सकैए। आ जँ कियो आन बनत तँ ओ ढ़ोंगी हएत। आब देखू जे सहरसा-सुपौलक ब्राम्हण की कहै छथि--" ठीक छै जे अहाँ महात्मा बनि गेलहुँ लेकिन बनेलक के हमहीं ने। आब महात्मा बला जते लाभ अछि से हमरा दऽ दिअ। जँ नै देब तँ सड़ैत रहू जेलमे। पुरैनियाँ, मुंगेरिया, चंपरनियाँ ब्राम्हण-- हम सभ तँ मैथिल छीहे नै तखन अहाँकेँ महात्मा बनाइये कऽ हमरा की हएत। ओना चलू नै मामासँ कनहा मामा नीक। नै ओकालति सम्हरल तँ महात्मागिरीसँ खर्चा चला लेलहुँ। चलू कोनो विधिये परिवार खेपि लेलहुँ ने। आ तीस सालक बाद ब्राम्हण सभ मीलि कऽ गाँधी स्मारकपर बैसि कऽ ताश खेला रहल छल। ब्रम्हपिशाच (व्यंग्य) विद्वान सभ कहि गेल छथि-- रस तीन प्रकारक होइत छै। प्रमाद रस, विषय रस आ भागवत रस। नीककेँ खराप कहि छोड़ि देब आ खरापकेँ नीक कहि ग्रहण कऽ लेब भेल प्रमाद रस। नीककेँ ग्रहण कऽ लेब भेल विषय रस। आ नीककेँ ग्रहण कऽ दुनियाँ लग ओकर सही परिचय देनाइ भेल भागवत रस। मुदा मान्यता अछि जे नीककेँ ग्रहण कऽ ओहिपर अपन नाम लीखि अपन बना संसार लग अपन कहि परिचय देब भागवत रस छै। बहुत पिशाच सभ आजुक समयमे ऐ तरीकासँ भागवत रस लेबामे सभसँ आगू रहैत अछि। जे भागवत रस केकरोसँ छूटि जाइत छै तै लेल दोसर पिशाच सभ बैसल छै। ऐ पिशाच सभ लेल किछु असंभव नै छै। अहाँक सामने अहींक देह निकालि कहत जे ई हमर देह अछि। आब अहाँ चिचिआइत रहू। ओकर संगी सभ सेहो ओइ देहकेँ ओकरे देह कहतै। आ से संगी सभ किए ने कहतै आखिर ओहो तँ ओही पिशाच सभहँक संतति छै ने। अच्छा पिशाचसँ मोन पड़ल ब्रम्हपिशाच आ ईहो मोन पड़ल जे पिशाचकेँ ब्रम्हपिशाचे सभ बेसी तागति दै छै। पिशाचक खुराक ब्रम्हपिशाचे लगसँ भेटै छै। खुराके नै ओकर तरीका, व्यवहार, अस्त्र-शस्त्र सभ किछुक आपूर्तिकर्ता ब्रम्हपिशाचे छै। ठीक अमेरीका आ अलकायदा जकाँ। अमृत लेल जेना देवता आ दानवमे संधि भेल रहै आ अमृत निकललाक बाद देवता सभ दानवकेँ धोखा देने रहै तेहने खेल पिशाच आ ब्रम्हपिशाचक बीचमे छै। जखन पिशाच सभ भगवत रसकेँ अपन कहि दै छै तखने ब्रम्हपिशाचक काज खत्म भऽ जाइत छै कारण ओकर जे उद्येश्य रहै छै पिशाचक बदनामी से पूरा भऽ जाइत छै आ तकर बाद ब्रम्हपिशाच ओइ पिशाचकेँ लात मारि कऽ भगा दै छै। फेर जरूरति पड़ै छै या पुरना पिशाच आँखि देखबै छै तँ दोसर पिशाच राखि लेल जाइत छै। ठीक मालिक- नौकर बला संबंध छै। इतिहास गवाह अछि जे काज भेलाक बाद पिशाच सभकेँ लात लगा भगेबे कएल गेलै आ बदनामी सेहो भेलै। इतिहासे किए वर्तमानो गवाह अछि एकर। आब फेर घुरि आबी रस केर चर्चापर। ई पिशाच-ब्रम्हपिशाच सभ तँ होइते रहलैए, होइते रहतै। एकरा रोकऽ बला कियो नै छै कारण जतऽ ब्रम्ह ततऽ ब्रम्हपिशाच आ पिशाचो तही ठाम।ठीक पिलुए जकाँ खदबद करैत पिशाच आ ब्रम्हपिशाच। तँइ हम कहलहुँ जे फेरसँ रस केर चर्चा आबी। ओना रस केर चर्चासँ पहिने एकटा आर गप्प दानवकेँ धोखासँ अमृत नै भेटलै ओ अमर नै भेलै मुदा भविष्यक हरेक लोककेँ पता चलैत रहलै जे देवता सभ धोखा दऽ कऽ अमृत पी गेलै तेनाहिते भले ही असली भागवत रस बलाकेँ नाम नै होइ मुदा भविष्यक हरेक लोककेँ ईहो पता चलैत रहतै जे पिशाच धोखा दऽ कऽ ओइ भगवत रसकेँ अपन बना लेलकै।जेना देवता सभ अभिशप्त छै जे मोने-मोन गारि सूनऽ लेल, उपराग सूनऽ लेल तेनाहिते पिशाचो सभ पूरा जिनगी अभिशप्त रहतै। संसारकेँ पता चलिते रहतै जे भागवत रसक असली धारा किम्हरसँ निकलै। ई तँ छल पिशाचक हाल ब्रम्हपिशाच सभ तँ सभ दिन जकाँ मौज करैत रहत कारण ओकर सभ काज पिशाचे करै छै। सभ मेहनति आ बदनामी पिशाचक आ मौज ब्रम्हपिशाचक। परमानन्द प्रभाकर कवि अनिलजीक आंतरिक परिचिति : गीत गंगा जहिना पहाड़क आंतरिक विह्वलता झरनाक रूपमे, नदी आ समुद्रक विह्वलता तरंगक रूपमे, मेघक विह्वलता जल-बूंदक रूपमे आ फूलक विह्वलता सुगंधक रूपमे आकार ग्रहण करैत अछि तहिना कोनो संवेदना संपृक्त व्यक्तिक आंतरिक रागात्मक विह्वलता साहित्यक विविध विधाक रूपमे प्रस्फुटित होइत अछि जकरा कविता,गीत,गजल,कथा,लघु कथा,निबंध इत्यादि नामसँ अभिहित कयल जाइत छैक आ तकर मुखर प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक पोथी ‘गीत गंगा’| अनिलजीसं हमरा सदेह त भेंट नै अछि मुदा हुनक एहि पोथीक कविता सभसं हमरा हुनक यथार्थ परिचय भेटल अछि | किएक त हमर ऐकांतिक विश्वास अछि जे कोनो रचना अपन रचनाकारक नैसर्गिक संरचनाक प्रतिविम्ब होइत अछि |एहि अर्थें हमरा ई बुझबामे भांगठ नहि भेल जे अनिलजी संवेदना संपृक्त, सहज ओ सरल व्यक्तित्वक आगार छथि | हुनक ह्रदय-भूमि रेगिस्तानक भूमि नै छनि अपितु हुनक ह्रदय-भूमि सरैसाक उर्बर भूमि छनि | पोथीक कविता सभ सरल ओ खांटी मैथिली भाषामे रहबाक कारण आ छन्दाश्रित होयबाक कारण जेहने आकर्षक अछि तेहने गेय | सामाजिक विभिन्न आ ज्वलंत समस्या सभपर केन्द्रित कविक ई पोथी पाठकक ह्रदयमे स्थिर श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर आदि रसक स्थायी भावक नदीकें तरंगायित करैत अछि | कविकें बूझल छनि जे ---- सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ना ब्रूयात् सत्यमप्रियं | प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एषः धर्मः सनातनः -मनुस्मृतिः (सत्य बाजक चाही, प्रिय बाजक चाही,अप्रिय सत्य नहि बजबाक चाही, संगहि संग प्रिय असत्य सेहो नहि बजबाक चाही) मुदा कविकें सत्यो बजबाक छनि आ अप्रिय सत्य नहि बाजी अहूसं बचबाक छलनि तें ओ नवका बाट धेलनि, सामाजिक वर्तमान सत्यकें कविताक रूपमे रागात्मक (प्रिय) बनाक’ पाठकक सोझाँ रखलनि अछि | हुनका बूझल छनि जे लोक जीवन पर कविताक असरि चिर काल धरि रहैत छैक तें ओ कवितेकें अपन वक्तव्यक वा अभिव्यक्तिक माध्यम बनौलनि | कवि द्वारा कयल गेल छांदिक प्रयोग एहि विश्वासकें मजगूत केलक अछि जे कवि नीक छ्न्दज्ञ टा नहि नीक छंद-प्रयोक्ता सेहो छथि |अपन कवित्वक प्रदर्शनक लौलमे कवि कतौ भसिआएल नै बुझि पडैत छथि |बौद्धिक अराजकताक परिचिति कतौ नै भेटल अछि एहि कृतिमे | कविकें अपन बात रागात्मिका विधामे रखबाक सिद्धहस्तता प्राप्त छनि | ‘नोरे के जिनगी कतेक दिन उघबें ?’ ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?’ ‘पटना घुमलौं दिल्ली घुमलौं’ ‘सभ लोक आकुल’ आदि शीर्षक कवितामे कवि देश ओ समाजक वर्तमान दशाक चित्रण मार्मिक रूपसं केने छथि |‘नब्बे टा बरियाती एलै’ शीर्षक कविता आजुक बरियातीमे पसरल नवका संस्कृति पर चोट करैत अछि | ‘पाथरकें भगवान् बुझै छी’ एहि शीर्षक कविताक ई पांति --- ‘ब्रह्म थिका ओ जे आतुर छथि सुंदर सृष्टि रचैले’ और मनुक्खक जीवनमे आनंदक वृष्टि करैले’ हमरा दिनकरजीक ‘जनतंत्र का जन्म’ कविताक ओ पांति मोन पाड़ि देलक जाहिमे ओ कहलनि अछि ---- ‘आरती लिए तू किसे ढूंढता है मूरख मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानो में देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में’ कवि, विलोपित होइत भारतीय संस्कृतिक लेल चिंतित बुझि पडैत छथि मुदा निराश त कथमपि नहि छथि | हुनका भावनात्मक विश्वास छनि जे हमरा भारतीय संस्कृति पर क्यो कोनो प्रकारक आघात नहि क’ सकत |हमर भारतीय संस्कृति कथमपि नष्ट नहि होयत | तें सविश्वास आ सगर्व कहैत छथि ------ ‘हमर संस्कृतिकें कियो सोखि ने सकैए |’ मुदा एहि ठाम हम कविसं कह’ चाहैत छियनि ---- ‘घर तो अपना जल गया घर के चिराग से |’ पोथीक आरम्भ ‘आत्म-गीत’सं भेल अछि जकरा गीतात्मक आत्मकथ्य कहल जा सकैत अछि | एहिमे कवि अपना द्वारा देखल, सूनल,पढ़ल आ भोगल यथार्थकें रेखांकित केलनि अछि, से बडड नीक लागल | पोथीक अधिकांश कविता भावुकता ओ वैचारिकतामे संतुलन बनाक’ रखबामे सक्रिय त अछिए, अपन सकारात्मक भूमिकाक निर्वाह सेहो करैत अछि | हं, एहि ठाम प्रसंगवश एकटा बात कहि देब आवश्यक बुझैत छी --- ‘नोरेके जिनगी कतेक दिन उघबें ?’ आ ‘करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ?’ एहि दूनू शीर्षक कवितामे किछु पांतिक पुनरावृत्ति भ’ गेल छैक, यदि प्रेसक दोष हो त किछु कहबाक प्रयोजन नहि, यदि से नहि त एकरा लोक पुनरावृत्तिक दोष कहत आ पाठक लोकनि सेहो मानता | जे-से, पोथी व्यक्तिगत रूपसं हमरा सर्वात्मना खूब अरघल अछि, तें हम अपन सीमा आ मर्यादाक ध्यान करैत कविकें धन्यवाद त नहि देबनि मुदा अपन अधिकारो त नहिये छोड़बनि | तें एहि सुंदर आ प्रेरणाप्रद कृतिक लेल भूरि-भूरि प्रशंसा करैत नमन करैत छियनि छत्रानंद सिंह झा ‘गीत-गंगा’मे सब किछु अछि ----- ‘गीत-गंगा’ जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क एक एहन काव्य-संग्रह अछि जकर एक-एक कवितामे विविध मानवीय संस्कृतिक आधारभूत एकताकें कवि परेखबाक चेष्टा करैत अछि | मनुष्यक प्रति व्यापक रागात्मक चेतनाक अभिव्यक्ति स्पष्ट रूपसँ हिनक कविताक विशेषता थिक | कविता सामाजिक यथार्थक बेसी निकट अछि | हिनक रचनामे प्रेम,ओ प्रेम चाहे प्रेयसीक प्रति हो आ कि सर्वहाराक प्रति – परिलक्षित होइत अछि |अधिकांश कवितामे रोमांटिक बेचैनी भेटैत अछि |सौन्दर्यानुभूतिक कोनो गहन क्षणक स्मरण पबैत छी हिनक कवितामे | ‘अनिल’क कविता सुकोमल आ मानवीय चेतनासं संवाद स्थापित करैत बुझाइत अछि |हिनक कविताक चमत्कृत करय बला प्रभाव तखन देखबामे अबैत अछि जखन ओ कविताक पाठ करैत छथि | हिनक कवितामे मानवीय प्रेमक नदी मंद-मंद बहैत प्रतीत होइत अछि | विचारक आडम्बर ठाढ करबाक अपेक्षा ‘अनिल’जीवनक विस्मृत होइत जा रहल स्वाद,गंध,स्पर्शक दिशामे उन्मुख करैत बुझि पडैत छथि | ‘अनिल’क कविता जे किछु कहैत अछि, से बिना लाग-लपेटक - साफ़-साफ़ | हिनक रचना कल्याणकारी होइत अछि |लोक-आस्थाक प्रवलता हिनकर कवितामे ठाम-ठाम भेटैत अछि – ‘भ्रष्टाचारक तिमिर नष्ट हो जन-मनमे सूर्योदय हो कांट-कूशसं मुक्त बाट हो सभ सज्जन-मन निर्भय हो|’ उत्तम कविताक लेल संवेदनाक गहनता,विचारक प्रवलता आ आत्मान्वेषनक जेहन आवश्यकता होइत अछि : प्रेम,सौन्दर्य आ गीतात्मक संवेदना –सब किछु हिनक कवितामे भेटैत अछि | केदार कानन गीत गंगामे अनिल जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" कवि गीतकार छथि। कविता ई लिखैत रहलाह अछि मुदा हिनक गीतकारे बला रूप बेसी प्रखर आ मुग्धकारी अछि।अपन गीत सभमे कोमल भाव चित्र विन्यस्त करबामे हिनक जोड़ नहि अछि। सूक्ष्म आ सांकेतिक अर्थ ग्रहण करयबामे हिनक गीत समर्थ अछि। मैथिलीमे गीत कारकजे श्रृखंला अछि ताहिमे अनिल विशिष्ट छथि। खाहे ओ अभिव्यक्ति कौशल हो वा सहज-सरल ढ़ंगे अपन मनक बातकेँ कहि देबाक आतुरता अनिल निश्चये अपन लक्ष्य प्राप्त करैत देखाइत छथि। 1973 मे हिनक एक गीत संग्रह "तोरा अंगना मे" आ १९९९मे दीर्घ कविता संग्रह "धारक ओइ पार" एलनि आ २०१३मे गीत संग्रह "गीत गंगा"। पहिलसँ दोसर संग्रहमे एक्कैस बर्खक तँ दोसरसँ तेसर संग्रहमे चौदह बर्खक अंतराल। बहुत नमहर अंतराल की हुनक भितरक रचनाकारकेँ सुषुप्तावस्थामे रखने रहल? एतऽ हम कहब नै। पाठकेँ प्रायः बूझल हेतनि जे अनिल हिंदीमे सेहो निरंतर लिखैत छपैत रहलाह अछि। अपन मनक आवामे हुनक शब्द संसार, भाव-संपदा पकैत रहल आ बाहर एबा लेल छटपटाइत रहल। तकरे प्रतिफल थिक "गीत-गंगा", जे हिनक श्रेष्ठ आ मानक गीत संग्रह थिक। एहि संग्रहमे जे गीत सभ अछि से संपूर्ण मिथिलाक तीत-मीठकेँ बहुत सहजता संग कहैत अछि। कतहु हिनक दृष्टि परंपरागत शोषणक औजार दिस जाइत अछि आ आवश्यक परिवर्तन नै देखि गीतकार झूर-झमान होइत छथि आ एक नव बाट देखबैत छथि। आ बाट देखेबाक जे हिनक कुशलता छनि से हमरा विभोर करैत अछि। "दिल्लीसँ दरभंगा धरि अछि "निर्भयाक चित्कार कृष्ण आबि कऽ लाज बचेता से सोचब बेकार" प्रकृतिक समीप जाइत गीतकार प्रकृतिसँ एकमेक होइत जे जयजयकार करै छथि से चित्रमनकेँ मोहैत अछि- जंगल झाड़ पहाड़क जय हो पोखरि धार इनारक जय हो जय हो झरना नदी समुद्रक हरियर खेत खम्हारक जय हो शहरक जय हो गामक जय हो जामुन आम लतामक जय हो जय हो मकइ गहूम आ धानक भूसा नार पुआरक जय हो एहि गीतमे हुक दृष्टिमे जे किछु अबैत अछि से ई सिद्ध करैत अछि जे जीवनक जे आधारभूमि थिक, अस्तित्व बचेबाक वा दैनंन्दिक जीवनमे जकर जकर बेगरता मनुक्खक जीवनमे अछि करा संग हिनक अद्भुत तादात्यम्य अछि। आ एहि सभहँक बहुत सार्थक आ अर्थगर्भ अभिव्यक्ति हिनक गीतमे भेल अछि। गीत गंगामे संकलित हुनक आत्मगीत (जे विषय सूचीमे सम्मिलित नै अछि आ ओ अपन बाबाक समृतिकेँ नमन करैत लिखलनि अछि) एहि संग्रहक श्रेष्ठ गीत मानल जेबाक चाही। आत्मगीतमे स्वभावतः ओ अपन जीवन, जिवनक संपूर्ण परिस्थिति आ परिवेशकेँ चित्रित केलनि अछि आ अतीतक पुनरावलोकन करैत देखाइ छथि। किछु पाँतिकेँ एतऽ उद्धृत करबाक लोभ संवरण नहि कऽ पबैत छी— सपना पाहुन बनि कऽ आयल तन्नुक सन निन्नक आँगनमे हम देखलहुँ दुन्नू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल नागर्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल छल जहाँ जतऽ जे चिड़ै कतहुँ आकाश छोड़ि कऽ पड़ा गेल सभ बाट अहिल्या सन शापित नित बाटे राम केर तकै छली कयटा पिच्छर छल बा जतय खसवासँ हमरा बचा गेल माइक हाथक पाड़ल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल क्षमा करु हे मित्र हमर नहि आँखि मूनि कऽ चलब हम उपरोक्त पाँति सभ गीतकारक जीवनमे घटित अतीत, हुनक संकल्प आ हुनक प्रतिबद्धता आदिकेँ रेखांकित करैत एक विस्तृत फलक अवश्य तैयार करैत देखाइत अछि। मुदा जतऽ ओ कहै छथि जे -नागर्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गड़ा गेल- से हिनक गीत सभमे विरल देखाइत अछि। एतऽ मोन पड़ै छथि हिंदीक गोरख पांडेय। हमरा लगैए गीतकार अनिल लग शब्द संपदा आ विपुल अभिव्यक्ति कौशल छनि। जव ओ जीवनक वास्तविक गीत लिखथि, समाजक अंतिम आदमीक गीत लिखथि, निराला आ नागर्जुनक वैचारिक प्रतिबद्धताक गीत लिखथि तँ ओ निश्चये हिनक गीतकारक व्यक्तित्वकेँ आरो ऊँचाइ आ व्यापकता देतनि आ हुनक गीतकारक एकटा प्रखर रूप मैथिलीकेँ भेटत। उद्बोधन गीत, प्रेरणा गीत, प्रकृतिसँ संबंध गीत, अपन छोट-छोट सुख आ दुखक गीतक जमाना लदि गेल अछि। एहन गीत सभ भारतक सभ भाषा-साहित्यमे ततेक लिखल गेल हछि जे पाठक अपनासँ ओहि गीत सभहँक संग तादात्म्य स्थापित नहि कऽ पबैत अछि। हम व्यक्तिगत रूपें गीतकार अनिलसँ बहुत रास अपेक्षा रखैत छी, जे ओ ओही पंथकेँ चुनथि जे पंथ हुनका बहुत-बहुत ऊँचाइपर लऽ जानि आ हम सभ गौरव बोधसँ भरि उठी। हमर सबहक पंडितजी पंडित गोविन्द झाजीक रचनात्मकता एखनो बनल छनि से मामूली बात नहि थिक। मोन पड़ैत छथि जीवकान्त जे कहैत छलाह जे लेखककेँ नित्तह किछु ने किछु लिखैत रहबाक चाही खाहे ओ रचनाकारक नामे पत्रे किएक ने हो, एहिसँ लेखनक क्रमबद्धता बनल रहैत छैक। ठीक इएह बात पंडितजीमे लागू होइत छनि। हुनक जे वयस छनि ताहि वयसमे गाम-घरक बूढ़ लोकनि खटा धयने रहैत छथि मुदा पंडितजीक भीतर जे रचनात्मकता बनल छनि से हुनका बूढ़ नहि होबऽ दैत छनि। ई बात जहिना हमरा सभकेँ चमत्कृत करैत अछि तहिना ईर्ष्यासँ सेहो भरैत अछि। ओ ने तँ रूकल छथि ने ठमकल। ओ एखनो मैथिली भाषा आ साहित्यकेँ समृद्ध कऽ रहल छथि। मोन पड़ैत अछि 2014क कोनो मासमे एक संध्या हुनका संग बितौने रही। संगमे रघुनाथ मुखिया रहथि, अवकाशक दिन छल आ अक्कू भाइ घरहिमे छलाह। बहुत रास गप-सप भेल छल। ओ बहुत आत्मीयता आ आपकताक संग हमरा कहलनि जे "केदार एकटा बात कहैत छी, अहाँ हमर बातकेँ ध्यानसँ सुनू। हम कहऽ चाहैत छी जे मैथिली बला किसुनजीक संग न्याय नहि कऽ सकलाह अछि आ ओ न्याय अहाँ कऽ सकैत छी।" माने, हुनक कहबाक अर्थ रहनि जे हम अपन पितापर एकाग्र एकटा पोथी लिखी। बात हमरा जँचल छल आ ओही दिन हुनका ओतए, हुनका समक्ष हम संकल्प लेलहुँ जे किसुनजीपर हम एकटा पोथी अवश्ये लिखब। ओ अपन पोथी सभ देखौलनि। एक ठाम सजा कऽ राखल। व्यवस्थित। हुनक ई पोथी सभमेसँ अधिकांश हुनक मौलिक लेखन छल, किछु संपादित आ किछु आन-आन भाषाक सर्वोत्तम कृतिक अनुवाद। सभ किछु व्यवस्थित आ एक ठाम। ई एक लेखकक संसार छल जे कतहुँ छिड़िआएल नहि छल। एकटा पूरा कोठलीमे समाएल छल हुनक लेखकीय दुनियाँ। गोविन्द बाबूक संग लागल छनि पंडितजी। मुदा कतहुँसँ हुनक बगए-बानि देखि ओ पंडित माने मिथिलाक पारंपरिक पंडित सन नहि लगताह। वेश-भूामे ओ सभ दिन पैजामा पहिरलनि। देखबा-सुनबासँ पंडितक विपरीत। मुदा जखन हुनकासँ गप होयत, कोनो विषयपर विमर्श होयत, कोनो सिद्धांतक खंडन-मंडन होयत तखन लागत अरे ई तँ संपूर्ण शात्रक गंभीर अवगाहन केने छथि। तखन लागत जे ई मिथिलाक आत्मा बाजि रहल अछि। साहित्यक लगभग सभ विधामे ओ लिखलनि। आ जे लिखलनि से एकदम ठोकल-पीटल। आ से खूब लिखलनि। जीवंत लिखलनि. जागंत लिखलनि। ओ कोनो युवा रचनाकारसँ बेसी युवा छथि। बेसी सक्रिय छथि। बेसी जागल आ जीवंत छथि। कथा गोष्ठी ( सगर राति दीप जरए) सभमे ओ सभ ठाम जाइत-अबैत रहलाह। कथा पाठ करैत रहलाह। राति भरि जागि कऽ आन कथाकारक कथा सभपर अपन महत्वपूर्ण आ विचारोत्तेजक टिप्पणी करैत रहलाह। हुनक सक्रियता रेखांकित करबा योग्य अछि। भारती मंडनक प्रकाशन क्रममे हमरा मोन अछि जे तीन-चारि टा वरिष्ठ लेखक मात्र ओहन विषयपर लिखलनि जाहिपर एक संपादकक हैसियतसँ रचनाक अनुरोध कएल ताहिमेसँ एक पंडित गोविन्द झा छथि। माने ओ विषय मैथिली लेल एकदम नव आ बेछप छल। गोविन्द बाबू ताहिपर अपन कलम चलौलनि। हमहूँ चमत्कृत आ चमत्कृतसँ बेसी आह्लादित। ओ सदैव व्यस्त रहै छथि। किछु ने किछु करैत रहैत छथि। आ जे करैत रहैत छथि से हमरा सभहँक थाती थिक, गौरव आ विरासत थिक। हुनक सक्रियता, हुनक रचनात्मकता हुनक जीवनक संबल थिक। ओ एक योग्य पिताक योग्य संतान सिद्ध भेलाह अछि। संगहि ओ मिथिला आ मैथिलीक योग्य-सुयोग्य पंडित, महत्वपूर्ण लेखक आ विचारक छथि। सहज आ मिलनसार छलाह रेणुजी ओ रमानंद लाल दास छलाह जे लेखनमे रमानंद रेणु भेलाह। सुपौल जिलासँ सटल उसमामठक निवासी। आरंभिक रचना सभ हुनक गीत विधामे हमरा सभकेँ प्राप्त होइत अछि। बादमे ओ नवकवितासँ जुड़लाह आ एहि विधाकेँ श्रीसंपन्न कएलनि। गद्य लेखनमे जखन उतरलाह तँ कथा आ उपन्यास विधामे प्रचुर लेखन कएलनि। हुनक लेखनक समालोचना तँ समालोचक आ आलोचक करताह मुदा हम मानैत छी जे ओ वास्तविक अर्थमे एक श्रेष्ठ मनुख छलाह। सहज-सरल आ मिलनसार। हुनक व्यक्तित्व आकर्षक छल। रेणुजी मैथिलीमे पहिल एहन लेखक भेलाह जे राजकमल चौधरीक बंगलाक चर्चा कएलनि। 1967 मे, फरवरी मासमे सुपौलमे आयोजित नवकविता सेमिनारमे ओ भाग लेने छलाह। प्रायः हमरा सभकेँ बूझल अछि जे इएह सेमिनार राजकमल चौधरीक अंतिम सेमिनार साबित भेल। फरवरी मासमे सुपौलमे संपन्न भेल ई ऐतिहासिक द्विदिवसीय समारोह अनेक अर्थमे महत्वपूर्ण छल। एहि समारोहक (कविगोष्ठीक) अध्यक्षता राजकमले केने रहथि। एहि वर्षक जूनमे राजकमल हमरा सभकेँ छोड़ि अनंत अकाशमे नुका गेलाह। सुपौलक समारोह समाप्त भेलाक बाद राजकमल अपन कुछु लेखक मित्रकेँ अनुरोधपूर्वक अपन गाम महिसी लऽ गेल छलाह। ओहिमे रमानंद रेणु सेहो रहथि। राजकमलक अपन प्रभामंडल छल। अपन चमक, अपन व्यक्तित्व आ अपन बहुआयामी प्रतिभाक कारणे सभ हुनकासँ जुड़ऽ चाहैत छल। जखन ई लोकनि महिसी पहुँचलाह तँ हिनका सभक भव्य स्वागत कएल गेलनि। रमानंद रेणु, जीवकांत, कीर्तिनारायण मिश्र आदिक संग राजकमल तृप्त रहथि। पहिल बेर ओहि बंगलाक चर्चा रमानंद रेणु कएलनि जे महिसीमे "फूल बाबनूक बंगला' नामे ख्यात छल। ओहि फैघि सन गाममे अपना तरहक ई विशिष्ट आ मनोहारी बंगला राजकमल बहुत मनोयोगसँ बनबौने छलाह। सुनैत छी जे अज्ञेय ओहि भंगलाक गृहप्रवेशक अवसरपर उपस्थित रहथि से राजकमलक इच्छा रहनि। अनेक इच्छा जकाँ राजकमलक ईहो इच्छा हुनका संग चलि गेलनि। तँ कहैत रही जे राजकमलक ओहि बंगलाक चर्चा पहिल बेर रमानंद रेणुजी केने रहथि जखन राजकमलक आतिथत्यक बाद ई लोकनि अपन-अपन गाम घुरल रहथि। ई लेख संस्मरणक रूपमे राजकमलक मृत्यु 19 जून 1967 बाद "आखर" (कलकत्तासँ प्रकाशित)मे प्रकाशित भेल छल। "आखर" प्रकाशनक जड़ि सुपौले छल। एहिठामक सेमिनारमे आखरक प्रकाशनक योजना बनल छल। तकर एक सहभागी रेणुजी सेहो छलाह। महिसीमे, साँझमे तारास्थान दिस टहलैत अपन अतिथि लोकनिकेँ राजकमल बंगट मिसरक गायन सुनाबए चाहैत रहथि। एकरो चर्चा रेणु केने छथि बंगट झाक रूपमे। मुदा ओ बंगट मिसर छथि झा नहि। संयोग जे तारानंद वियोगी एखने दू-तीन सप्ताह पहिने सुपौल आएल रहथि तँ हमरा आ सुभाषचंद्र यादवकेँ बंगट मिसरक गायन ( जकरा ओ अपन मोबाइलमे टेपित केने रहथि) सुनौलनि। बंगट जी जिबैत छथि आ हुनक कार्यस्थल एखन सिंहेश्वर थिकनि जतऽ ओ प्रवचन आदि दैत छथि आ अपन गायन कलाक प्रयोग सेहो करैत छथि। हुनक मूल नाम थिकनि पंडित ताराकांत मिश्र। गामक नाम बंगट मिश्र। मोन पड़ैत अछि जे रेणुजीसँ भेंट करए जाइत रही तँ ओ अपन एक्सचेंज आफिसमे भेटैत छलाह। मोबाइल आ लैपटापक जमाना नहि छल। एक्का-दुक्का लोक लग चोंगा बला फोन रहैत छलनि। ओही एक्सचेंज आफिससँ फोन अथवा तार (टेलीग्राम) कएल जाइत रहै। ओ आफिसमे बहुत लोकप्रिय छलाह आ आनो स्टाफ सभ सम्मानक दृष्टियें हुनका देखैत रहनि। ओ कतबो व्यस्त रहथि, मोन अछि जे आफिससँ निकलि बिनु जलखै आ चाहक घुरए नहि दैत छलाह। कुशल-क्षेम आ हालचाल, गाम-घरक हाल-सूरति पुछैत रचनादिक विषयमे अवश्ये चर्चा करथि। राय साहेबक पोखरि लहेरियासराय, बला घरोपर अनेक बेर हुनका ओतए जयबाक अवसरि हमरा भेटल रहए। ओ जतेक सिनेह आ आतुरताक संगे भेंट आ गप्प करैत छलाह से दुर्लभ छल। अत्यंत स्नेहिल आ मिलनसार। संवेदनशील तेहन जे जखन हुनक हेठ पुत्रक असामयिक निधन भऽ गेल रहनि तँ ओ अत्यंत मर्माहत स्थितिमे दीर्घ कविता ( जे "ओकरे नाम"सँ प्रकाशित भेल) लिखलनि, प्रायः एक्कै रातिमे वा एकै सप्ताहमे। बहुत दिन धरि ओ अवसादमे रहला। स्वाभाविक छल। मुदा साहित्य प्रतिकूलो स्थितिमे मनुखकेँ उबारैत अछि रेणुजी सेहो उबरलाह आ फेर साहित्य सृजनक अनंत श्रृखंलामे जुड़ि गेलाह। मैथिलीमे अथवा कोनो साहित्यमे एकै टा दुख नहि छै। एकैटा समस्या नहि छै। अनेक दुख आ समस्यासँ रचनाकार संघर्षरत रहैत छथि। रेणुजी जतेक लिखलनि, नीक वा बेजाए एहिपर चर्चा के करत? ई एक पैघ प्रश्नचिन्ह थिक। जीवनक सभ किछुकेँ दोसर प्राथमिकता बूझि पहिल प्राथमिकता लेखनकेँ देबए बला लेखककेँ अन्ततः (अन्ततः नामसँ रेणुजीक एक कविता संग्रह सेहो छनि) की भेटैत छनि। आवश्यक अछि जे रमानंद रेणुक साहित्यिक अवगाहन हो, ओकर मूल्याकंन हो, ओहिपर चर्चा ओ विमर्श हो, सेमिनार हो.... तखन पाठक हुनक हुनक रचना संसारक मर्म बूझि सकताह आ रेणुजीकेँ तखने वास्तविक रूपमे चीन्हि सकब। डा.अमर नाथ ठाकुर- प्रोफेसर, पी.जी.संस्कृत विभाग,जे.पी.यू.,छपरा-८४१३०१ ‘गीत-गंगा’क प्रवाह विचित्र विरोधाभासक कवि छथि जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’| ह्रदयसं काव्यक धारा स्वतः प्रसृत होइत रहनि आ मोन लगा क’ पढ़ैत रहथि विज्ञान |किन्तु, पूर्वजन्मार्जित कविताक गुनगुनाहटि हिनका ‘बोटनी’ दिस ल’ अनलक |प्रकृतिक प्रति अनुराग,सस्य श्यामला मातरम्’ के प्रति सहज उद्वेग हिनक ह्रदय आ मोनकें एकीकृत क’ कृषि वैज्ञानिक बना देलक | विज्ञान हिनका बैंकमे चाकरी देलकनि आ रिक्त समयमे ह्दयतोषक कविता कामिनीक सेवाक हेतु प्रभूत समय | कवित्वक सतत उद्रेक हिनका अपन उपनाम ताकक हेतु बाध्य क’ देलक | अपन आत्म-गीतमे एहि उच्छ्वासक उल्लेख करैत गुनगुनाइत छथि : चलिते-चलिते भेटलाह रमण आ भेटि गेला श्री सोमदेव कोइलख विद्यापति पावनिमे भेटल आशीष मधुप,किरणक सस्वर दू रचनाक पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल | यात्री,हरिमोहन,जीवकान्त, शेखर,रवीन्द्र, मणिपद्म,अमर बाबू, कक्का आ भैया सन छल नाम कतेको जोड़ा गेल | एहि कविक संदर्भमे इहो अपन नाम ‘अनिल’ तय कएलनि |अनिल, जकर शाश्वत सम्बन्ध अनलक संग छै |पवन जगावत आग को , एकटा पांती पहिने पढने रही | अपने कविवर की सोचि ई उपनाम चुनलनि| किन्तु, भारतक अध्यात्मक कथन छै जे मोन रूप वायु (अनिल) कायाग्नि रूप अनल पर जखन भावनाक उत्थानसं प्रहार करैत अछि तँ इच्छा कविता भ’क’ निकलै छै |हवाक अर्थे छै जे सतत बहैत रहय आ हिनक कविता ध्वनि अपन प्रथम उद्रेकक क्षणसं सतत प्रवाहमान छनि |सुबोध्य भाषा,ह्रदयावर्जक विषय वस्तु,जीवनक हास-अश्रुक चिंतन,अपन शैली, तुकांत पद संयोजन,गेय पद | जहिना कविता लिखबाक सौख तहिना मधुर स्वरमे गएबाक कला हिनक कवित्वक भास्वर पक्ष अछि अपने कहने रहथि, मैथिली अकादमीक अध्यक्ष व्यासजीक उद्गत भाव | हिनक कविताकें पढि ओ जिज्ञासा प्रकट केलखिन, ई सभ अहाँ गाबि लै छियै ? ई मनोरम स्वरमे मुरलीधर प्रेसमे गाबि उपेन्द्र नाथ झा’व्यास’जी कें अपन स्वर माधुयॅ सं मंत्रमुग्ध क’ देलखिन |ओ प्रहर्षित होइत कहलथिन , तखन त अहाँ अखवारोकें गाबि देबै |ई नैसर्गिक स्वर हिनका जन्मजात प्राप्त छनि | एक बेर सिवानमे फगुआक उपलक्ष्यमे ‘भांगक भोज’क आयोजन भेलै | किन्तु, आयोजनक मुख्य लक्ष्य रहै फगुआमे ठाकुरजीक मादक स्वर आ फगुआक हेतु अभिनव पद-विन्यासक श्रवण |कविवर श्रोता आ आयोजक्क मनोभाव कोना नइ बुझितथिई | इहो एक टा टटका रचना ल’क’ उपस्थित छलाह | भांग पीबाक प्रक्रिया हास-परिहासक संग समाप्त भेल | सब अपन गप्पक खजानासं गोष्ठीकें गेय वातावरणक हेतु तैयार कएलक |आ ‘मधुरेण समापयेत’क अनुरूप ठाकुरजीकें आग्रह केलकनि | ककरो अनुमान नै रहै एहन नूतन पदबंधक स्वर लहरीक : चाह चाही आ पान चाही कलाकारकें कने भांग चाही | घोरि नीक जकां चिन्नी मिला क’ देखि लिय’ रसगुल्ला खुआ क’ मोन पंछी बनय, कतौ उड़ि-उड़ि चलय ...... हाय रे आबि गेल रंगदार फगुआ देखू मौसम बनल अछि अगुआ धरती कनियाँ बनल,कोहबर दुनियां बनल आसमान चाही आ चान चाही से देखै ले’ मोन जुआन चाही | सभ झूमि उठल | भाव-विभोर भेल | अपनाकें बिसरि गेल |ई छनि अनिलजीक काव्य माधुर्य | बरखोसं बैसल मैथिली साहित्य परिषद्, सिवानमे हिनक कविता नवजीवन फूकि देने रहै |अपन एहि अतीव मधुर क्षणक वर्णन करैत आत्मगीतमे स्वयं लिखने छथि : ‘लिखबा आ पढबा केर नशा सूनब आ सुनयबा केर नशा शब्दक सोना,हीरा,मोती देखब आ देखयबा केर नशा सदिखन आनंदित रहबा ले’ जीवनक अर्थ छल बुझा गेल |’ विगत शताब्दीक अष्टम दशकक मध्यमे ‘तोरा अंगनामे वसंत नेने आएब सजना’ क वासंती स्वर नेने कविवर मैथिली साहित्यक क्षितिज पर अवतीर्ण भेल छलाह |युवावस्था, रंगीन दुनिया,चह्कैत वातावरण, श्रृंगार रसक अनुपम समय होइछ |सिवान प्रवासमे श्रृंगार प्रधान गीतक बाहुल्य रहनि | ‘मोन होएए अहाँकें देखिते रही, किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही|’ ‘अहाँ नील गगन केर चंदा,हम मृत्यु भुवनक चकोर हम विरहक राति अन्हरिया,पिया अहाँ वसंतक भोर |’ मैथिलीक विकास क हेतु पल-पल प्रतिबद्ध | अजब ऊर्जा हिनक युवावस्थामे देखने छियनि| गोष्ठीक आयोजन,विद्यापति पर्वक आयोजन,कवि सम्मेलन, कवि सबहक समायोजन हिनक प्रिय विषय रहनि | किन्तु इ त पर्वत केर शिखर पर बैसि ,प्रकृतिक नग्न रूपक अवलोकन करैत मध्यप्रदेशक मध्यमे मैथिलीक स्वर मुखरित करबाक लेल छटपटा इत रहथि, तखने ने मिथिलाक मनोनुकूल विरह व्यथासं छटपटाइत गीत गंगामे लिखैत छथि : ‘कोना कहू जे कोन हालमे जीबि रहल छी |’ “हम पहाड़ पर बैसल चिट्ठी लीखि रहल छी’क रचना करैत ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान’ के चरितार्थ करैत ‘मा निषाद प्रतिष्ठां रूप अचिंतित, अतर्कित पादवद्धः अक्षरसम तंत्रीस्वर समन्वितः’ स्वरक अन्वेषणमे मध्य भारतक उत्तुंग शिखरपर जीवनक उत्तरार्ध व्यतीत करब स्वीकार कयलनि | मैथिलीक भक्तिक प्रवलता त एहिसं स्पष्ट होइछ जे ई अपन दोसर पुत्रीक नामकरनणे ‘मैथिली’क’ देलखिन |गीत गंगामे अनेक स्थान पर मिथिला मैथिलीक प्रति उदगार उच्छलित भेल अछि : ‘आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर, ह्रदयमे हो माटिक ममता माएक सेवामे जीवन बितादी, अछि बस एएह एकटा सिहंता’ ‘मैथिलीक प्रतिमा सजाउ’ ‘आजुक राति कथी ले’ ‘तीन कोटि मैथिल’ ‘ मैथिलीले’ अहाँ की करै छी’ ‘मैथिल केर परिभाषा’ ‘पत्रिका नै किनै छी’ ‘बजबाक समय आएल अछि’ ‘हमरा गाममे’ ‘मिथिलामे’ ‘भूख,अशिक्षा आ अन्हार अछि मिथिलामे’ आदि शीर्षक रचनामे मिथिलाक दशा आ मैथिलीक दुर्गति जीवंत रूपें वर्णित अछि | मैथिलीक विकासक केहन प्रदीप्त आगि हिनका हृदयमे छनि से एही संस्मरणसं स्पष्ट अछि : ‘माटि-पानि’ पटनासं प्रकाशित होइत रहै |’समय-साल’ स्तम्भमे हमर एकटा लेख प्रकाशित भेल छल ‘सूतल नहि अछि सिवान’|मोन गदगद छल |प्रकाशनसं लिखबाक गति तीब्रतर भेल छल |ताबत अगिला शीर्षक पढलौं ‘जगैत जयनगर’| मोनमे प्रतिक्रया उठल, जयनगर पर लेख त वासोपट्टी पर किएक नहि | हम डेरा आबि ओही तर्जपर ‘बैसल वासोपट्टी’ एकहि बैसकीमे लीखि गेलहुँ |किन्तु दोसर दिन विचित्र द्वन्द्वमे ई आलेख पड़ि गेल |एहनो लेख होइत छै ? हम ओकरा संजोगि क’ राखि देलहुँ |तीन मास बीति गेल |एक दिन सांध्यवेलामे ठाकुरजीसं भेंट भेल दरबार परिसरमे |कतहु आवश्यक काजसं जाइत रहथि |अपन आलेख खराब अछि की नीक से निर्णायक द्वंद्व सं तंग आबि गेल रही | हम मंदे स्वरें कहलियनि ,एखन एक घंटा समय अछि? ओ कार्यक जिज्ञासा प्रगट केलानि | अपन हृदयगत द्वंद्व कहलियनि | ठाकुरजी प्रहर्षित होइत कहलनि, एहिसं मुख्य काज की हएत ? चलू पहिने आलेखे पर विमर्श करी | डेरा आबि हम हिनका आलेख सुनाओल | अंतिम पैराग्राफ प्रारम्भे केने रही की ई आलेख हाथसँ झपटि लेलथि | कहलनि अहाँ राति भरिमे अपने फेयर क’लेब त ठीक नै त हमरा द’ दिय’, काल्हि हम पटना जा रहल छी,स्वयं फेयर क’क’हम द’देबै ‘माटि पानि’क कार्यालयमे |ई भोरे-भोर तैयार भेटला | हम आलेख द’ देलियनि |ह्रदयक भार हल्लुक भेल |अगिला अंक प्रकाशित भेलै|सम्पादक शीर्षक बदलिक’ ’पायाक कातमे गाड़ल वासोपट्टी’क’ देलखिन |प्रकाशित अंक ठाकुरेजी कें पहिने भेटल नि |भेटितहि हमरा डेरा पर एलाह सरप्राइज दैत—‘मैथिलीक परिचित युवा लेखक’ संबोधन करैत | हम किछु बुझलियै नहि |तखन ई अंक दैत्त्त सभ कहलनिई सम्पादक आलेख मंताव्यमे ई बात लिखने रहथिन पढि कए रोम-रोम पुलकित भ’ उठल | सब काज छोड़ आलेखकें सूनब,कार्यालय तक पहुँचायब आ प्रकाशित अंक डेरा पर पहुंचा लेखकक अमित आनंदमे सहभागिता करब कतेक व्यक्ति करैत छथि ? मैथिलीक प्रति ई समर्पण सोचि आइयो मोन विह्वल भ’ जाइत अछि |गीत-गंगाक साठि टा कवितामे बारहटा मिथिला-मैथिलीए पर लिखल भेटल | राष्ट्र भक्तिक सेहो प्रभूत-प्रमाण ‘गीत-गंगा’में मुखरित भेल अछि |’हम भारत केर पूत’ शीर्षक रचनामे केहन सुन्दर कहल गेल अछि ----- ‘पुजै छी भारतीकें हम,जपैछी बन्दे मातरम्’ ‘जय जवान, जय जय किसान नारा लगबै छी हम,जपै छी बन्दे मातरम्’ ताल ठोकैए हमर हिमालय,ललकि कहै छथि जमुना गंगा,फहराइते इ रहत अमर भए लाल किला पर हमर तिरंगा,अपन स्वतंत्रता गमा एको क्षण रहि ने सकै छी हम,कही तें वन्दे मातरम्’ ‘जय भारत जय भारती’में भारतकें एकटा गाम कहल गेल अछि |लिखै छथि — हम कल्पना करी एकटा भारतवर्षक गामके ,जै मे हो बस जाति एकटा मात्र भारतीय नामकेर | पुराण साहित्यमे एक पुरुष के रूपमे भारतक वर्णन करैत कहल गेल अछि, भारतक दू टा आँखि छै -दक्षिणक कांची आ उत्तरक काशी | एक पुराणकार आँगनके रूपमे भारतक स्वरुप दृढ़ करैत कहने छथि : तपस्या नर्मदा तट पर, दान गयामे शरीर त्याग गंगाक तट वाराणसीमे करबाक चाही| महर्षिगण त –समुद्र वसने देवि पर्वत स्तन मंडले,विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्षं क्षमस्व मे’ पढैत भारत भूमिक एकत्व प्रदर्शित कैने छथि | एकटा विशाल गामक रूपमे कथन सर्वथा उपयुक्त अछि | ‘स्वतंत्र भारत अमर रहय’ मे कवि कहैत छथि—भारतहु सं प्रियगर भारतवर्षक स्वतन्त्रता,तें हम हुलासि-हुलासि क’ बाजी स्वतंत्र भारत अमर रहय |’ ‘भारतक स्वतंत्रता केर खातिर हम लड़िते टा नै,मरितो छी,तें हम ताल ठोकि क’ बाजी स्वतंत्र भारत अमर रहय |’ ‘जय जय हिन्दुस्तान’ शीर्षक रचनामे केहन नीक पद्य रचल गेल अछि : ‘एकहि मंदिर एकहि पूजा आ एकहिटा ध्यान, एकहि मंत्र जपब जीवन भरि जय जय हिन्दुस्तान |’ राष्ट्रक निर्माता पुरुषक संस्मरण ‘गीत –गंगा’क प्रवल विशेषता अछि| ‘सत्य अहिंसा केर पुजारी मे’ महात्मा गांधीक स्वतंत्रता अभियानक वर्णन करैत कहैत छथि : ‘सत्याग्रह केर केलनि केहन प्रचार इंगलैंडोमे मचि गेल हाहाकार भागल भुल्ला लत्ते-पत्ते सात समुद्रक पार ब्रह्मा,विष्णु और त्रिपुरारी छला महात्मा गांधी | बूझि पड़ैए भव-भय हारी छला महात्मा गांधी | आठम रचनामे कहल गेल अछि : कह जय गांधी जय जय प्रकाश जय जय सुभाष, जय भगत सिंह ओ नै रहला लेकिन अछिए ओइ कर्मवीर केर चरण-चिन्ह | .’की हिन्दू आ की मुसलमान’ शीर्षक रचनामे कहल गेल अछि : ‘एक्के शोणित,एक्के परान’ ‘मंदिर पूजी,मस्जिद पूजी, प्रार्थना करी आ नवाज पढ़ी गीता पढ़ि ली आ कुरान पढ़ी अल्लाह कही, सियाराम कही पोथी अनेक, अछि सूत्र एक, बस एक मन्त्र हम जानै छी |’ एहि प्रकारें भारतक विविधतामे एकताक सूत्रक अन्वेषण, धर्म समरसता दृढीकरण हिनक लेखनक समाधानात्मक आ उत्साहवर्धक पक्ष अछि| विषय-वस्तुक दृष्टिसं विचार कएला पर ‘गीत-गंगा’ शीर्षक अत्यंत उपयुक्त लगैछ | गीतक अर्थ अछि ह्रदयगत भावक उच्छलन | एक कवि ह्रदय वैयक्तिक, सामाजिक,राष्ट्रीय,वैश्विक परिदृश्य पर सतत चिंतन करैत अछि |खराबक यथावत चित्रण क’ समाज आ राष्ट्रक नग्न चित्रक लेखनक समाज के दर्पणभूत साहित्यमे ओकर यथार्थ स्वरुप देखबैत अछि | एकर अनुरूप बेटीक बियाह,पुत्रक गुणवत्ताक प्रयास सन अनेक समस्यासं सीदित समाजक जीवंत चित्र एत’ प्राप्त अछि | ‘बुच्ची बढ़ती,लिखती पढती ‘ शीर्षक रचना नारी शिक्षाक विकास क’ विवाहकें दहेज़ रूप अवसादसं मुक्तिक मार्ग प्रदर्शित करैत अछि |कवि कहैत छथि : भाग्य अपन अपनेसं गढ़ती, हमरा चिंता कथीके रेप,दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि भारतमे महिषासुर ले’ दुर्गा बनती, हमरा चिंता कथीके नव सुरुज आ चान बनेती/संगी अप्पन अपने चुनती/किरण,सुनीता,मीरा बनती | एक मात्र शिक्षाकें अंगीकार कैने संभव होइछ |एहि प्रकारें मुखर समस्याक समाधानक चेष्टा एहि लघुकाय पोथीक प्रबल हुंकार अछि | जेना सभ नदी गंगामे एकाकार भ’ समुद्र पहुँचैत अछि तहिना राष्ट्रक व मानव जातिक समुद्रमे ई गीत-गंगा उच्छलित होइत पहुँचैत अछि | कविकें यथार्थ वक्ता कहल गेल अछि |तें साहित्यमे स्वभावोक्ति एकटा प्रशंसित अलंकार मानल गेल अछि |एहि यथावत वर्णनसं गीत-गंगा व हिनक अन्य काव्यात्मक पोथी आद्यंत व्याप्त अछि |हिनक लेखनक विषय अछि दुर्दिनमे जीवन व्यतीत करैत विपन्न लोक | कतहु बेटीक विवाह्सं चिंतित व्यथित पात्र त’ कतहु कर्जामें डूबल कृषक | कतहु तीसीक तेलमे छानल जिलेबी,झिल्ली खाइत दुर्गापूजा देखैत तरुण,तरुणी | कतहु कन्याक पिताकें व्यथित करैत बरियातीक वाहुल्य | एकटा उद्यमी रहितो विपन्न किसान आ घोटालामे रत संपन्न तथाकथित नेताक साम्य वैषम्य जीवनक केहन जीवंत वर्णन अछि : करजेमें जीबे आ करजेमें मरबे एना रे बिलटू कतेक दिन रहबें ? तोरे पसेनासं हरियर ई भारत ई राकेट ई प्लेन ई उँचका इमारत तों नारे पुआर पर कतेक दिन सूतबें ? तोरा ले’ एखनो ने लोटा ने थारी ओम्हर घोटाला महल हावागाड़ी दोस और दुश्मनके कहिया तों चिन्हबे ? बाट कोनो गांधीक कतेक दिन तकबें ? करजेमे जीबें आ करजेमे मरबें ? आदि पांती सामाजिक विषमताक जीवंत चित्र ल’ प्रस्तुत कएल गेल अछि | ‘चोर कहू ककरा’ शीर्षक रचनामे कविक व्यथा-द्वंद्व केहन जीवंत अछि : ‘भरि गाम चोरे त चोर कहू ककरा कोतवालो सएह तखन सोर करू ककरा ?’ भ्रष्ट्राचार सं त्रस्त भारतवर्षक नग्न चित्र प्रस्तुत करैत अछि | संवेदनहीन समाजक अंतसमे लोभक सफल चित्रण भेल अछि : ‘नब्बे टा वरियाती एलै’ शीर्षक रचना देखू : दस हजार रसगुल्ला बनलै नब्बे टा वरियाती ले’ आ पचास टा छागर कटलै हल्ला भेलै गाममे | दारू पीने टंच रहै सभ छौंडा मोटरसाइकिल पर खाधिमे खसलै, टंगले एलै, हल्ला भेलै गाममे |’ दहेज़क पाईसं टंच भेल लड्काक पिताक उज्ज्वल वर्णन प्रस्तुत करैछ : ‘समधि एला बनि-ठनि क’ कवितामे : लाजो ने भेल जे टाका गनेलिऐ , बेटाकें बेचि क’ खेतो किनलिऐ | समस्याग्रस्त, विपदापूर्ण परिवेशसं त्रस्त कविकें सम-समाधानक रस्ता जखन अवरुद्ध भेटैत छनि त लोकेकें पूछै छथिन : ‘कहू भागि क’ जाएब कहाँ ?’ गीत-गंगामे कविवर समाजक, राज्यक,राष्ट्रक व्यथाक चित्र आ समाधान प्रस्तुत करबाक स्तुत्य प्रयास कएलनि अछि | भाषा सरल,गेय,हृदयसं उच्छलित अछि | हृदयसं उच्छलित भावेकें गीत कहल जाइत अछि |एहि हृदयगत भावक यथावत चित्रणसं पोथी आद्यांत व्याप्त अछि |जेना समुद्र वा गंगामे अनेक प्रकारक झड़ना, जलश्रोत,नद,नदीक संगम होइछ तहिना एहि पोथी रूप गंगामे अव्यक्त माधुर्यसं पाठककें आनंद प्राप्त करबैत,सोचबाक लेल वाध्य करैत, समाजक कुरीतिक दर्शन करबैत,नव,पुरान व्यक्तित्व दर्शन करबैत साठि कविताक संग्रह प्रकाशित भ’ पाठकक हाथमे आएल अछि | कविक वर्णन क्षमता,लेखन सरलता अभिव्यक्त भेल अछि | उक्त गुणगण के आलोकमे अनलपूर्ण अंतसवला ‘अनिल’जीक ई कविता संग्रह गंगा जकां कल-कल निनाद करैत उच्छलित होइत समुद्र दिस बढैत रुचिरा,पवित्र,वेगवान,औषधिभूत कविता रूप जलधारासं व्याप्त अछि | डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ग्राम – रुचौल (दुलारपुर-रुचौल) , पो॰ – मकरमपुर, जिला – दरभंगा, पिन – ८४७२३४, अनिलजी – व्यक्तित्त्व आ कृतित्त्व परिचय - छोटे मोटे टूटल मड़ैया मे गौरी कोना कऽ रहती हे ? गौरी हमर छथि बड़ सहलोला । कोना कऽ पिसती भाङक गोला । हाथो मे पड़तनि लोढ़ीक ठेला, कोना कऽ सहती हे ? एक समय छल जखन ई गीत हमरा गामक हर बेटीक बिदागरी काल किनको ने किनको मूँहेँ अवश्य सुनबामे अबैत छल । ओहि समय हम बहुत छोट रही । सम्भवतः L.K.G. मे पढ़ैत रही । बाद मे आनो गाम-गमाइतमे सुनबामे आयल । एखनहु अबैत अछि । एहिना एकटा डहकन सेहो – सऽमधि (सऽमैध) एला बनि – ठनि कऽ । धोती कुरता पहीरि कऽ । एला डहकन सुनऽ बेटा के(र) बियाहमे ।। हम सब कऽरै छी पुछारि (पुछाइर), बाजू गीत सुनब कि गारि (गाइर), आ कि उलहन सूनब बेटा के(र) बियाहमे । आ कि डहकन सूनब बेटा के(र) बियाह मे ।। एहि डहकनक पहिल दू – चारि पाँती तऽ एहिना रहैत अछि पर अगिला पाँतीसभ गायिका लोकनिक सुविधानुसारेँ घटैत – बढ़ैत रहैत अछि । परञ्च पुरान नञि भेल अछि, एखनो जतऽ - ततऽ सुनबा मे अबैत अछि । एहिना एकटा गीत अछि - कक्का मारल गेला सौराठक मैदान मे । पहिले कन्यादान मे (ना) ।। सौराठक मैदान मरनासन्न भऽ गेल पर ई गीत एखनहु अपन किशोरावस्थहिमे अछि । ई सभ गीत हम अपन नेनपनेसँ सुनैत आबि रहल छी । एखनहु विविध बिधि – बेबहार काल सुनबामे अबैत अछि ई गीत सभ । ओहि समय हम एहि गीत सभकेँ पारम्परिक गीत बुझैत रही, हमरा नञि पता छल कि एकर लेखक के छथि । किछु बादमे बुझबामे आयल कि ई सभ गीत अनिलजीक लेखनीसँ निकलल अछि । अनिलजी माने कि श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ““अनिल”” । छायाचित्र ०१ – श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जी (सन् १९९६-९७ ई॰क छायाचित्र) प्रारम्भिक जीवन आ गीत लेखन - अनिलजीक जन्म २७ नवम्बर १९५० ई॰ कऽ मधुबनी जिलाक सलमपुर (शंभुआर, भिट्ठी – सलमपुर, कैंटोला चौकक लगीच) नामक गाममे एक टा वत्स गोत्रिय ब्राह्मण परिवारमे भेलन्हि । हुनक माएक नाँव स्व॰ कर्पूरा देवी आ बाबूजीक नाँव स्व॰ राम नारायण ठाकुर छलन्हि । अनिलजी ३ भाए आ ३ बहीन छलाह आ तीनू भाएमे अनिलजी सभसँ पैघ रहथि । छायाचित्र ०२ – श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक पिता स्व॰ राम नारायण ठाकुरजी छायाचित्र ०३ – श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’जीक माता स्व॰ कर्पुरा देवी (कुर्सी पर बायाँ कात), मौसी (कुर्सी पर दायाँ कात) आ मामी लोकनि (ठाढ़ भेल) । अनिलजी नेनपनहि सँ बहुत मेधावी छात्र रहथि । हुनक प्रारम्भिक शिक्षा गामहि केर प्राथमिक विद्यालयमे भेलन्हि । तत्पश्चात माध्यमिक विद्यालय - भिट्ठी आ उच्च विद्यालय – पण्डौलक छात्र रहलाह । एहि समय धरि ओ अपन छोटका मामा श्री महेन्द्र कुमरजीसँ शिक्षाक क्षेत्रमे विशेष प्रभावित रहलाह । कहबाक लेल दुनु माम आ भागिन रहथि पर समवयस होयबाक कारण संगी रहथि । मामा पढ़ाईमे एक वा दू बरष सिनियर रहथिन्ह । ओहि समय अनिलजीक छोटका मामा मैथिलीमे किर्तन शैलीक एक – आध दर्जन गीतक रचना कएने रहथिन्ह । मामाक इएह गीत सभ अनिलजीकेँ पहिले – पहिल गीत लिखबा दिशि आकर्षित कएलकन्हि आ किर्तन शैलीक बहुत रास गीतक रचना कएलन्हि । जेना कि, भरल सभामे आबि जनकजी, प्रण कएने छथि भारी हे । जे केओ धनुष उठा कऽ तोड़ता, तनिके देबनि कुमारी हे ।। आओर, गौरी लीला बिहारी तोहर भंगिया । तोहर भंगिया हे, तोहर भंगिया ।। एहि बीच स्व॰ काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’जीक गीत सभ सेहो हुनिका प्रभावित कएलकन्हि । हुनक छोटका मामा आ मधुपजी – दुहु गोटे भनिता मे अप्पन नाँव दैत छलाह तेँ ओ मधुपजीक सदृश अपन एकटा काव्य नाँव ““अनिल”” केर सृजन कएलन्हि । ओहो अप्पन शुरुआती गीत सभक भनितामे अप्पन नाँव जोड़ए लगलाह । कहथि ‘अनिल’, सुनु-सुनु हे मनाइनि । धीया अहाँकेर, छथि जगतारणि । भनहि ‘अनिल’ धनि धरू प्रिय धीर । खट् - मधु लागत विरहक पीड़ । मधुपजीक काव्यसँ प्रेरित भऽ अनिलजी सेहो हिन्दी फिल्मक धुनि पर किछु गीतक रचना कएलन्हि पर से स्वयंकेँ बेस रूचलन्हि नञि । एहि बीच माम – भागिनक जोड़ी सेहो टूटि गेलन्हि । छोटका मामा सी॰ एम॰ साईन्स कॉलेज, दरिभंगा छलि गेलाह जतऽ हुनक काव्य प्रतिभाक अन्त भऽ गेलन्हि । भागिन अर्थात् अनिलजी आर॰ के॰ कॉलेज, मधुबनी चलि गेलाह जाहि ठामसँ ओ प्री-युनिवर्सीटी आ बी॰एस॰सी॰-प्रथम भागक पढ़ाई पुर्ण कएलन्हि । एहि ठामक विद्यापति स्मृति पर्व समारोह हुनिका विशेष आकर्षित कएलकन्हि आ मोनमे मञ्च पर स्वयंकेँ देखबाक लालसा प्रबल होमए लगलन्हि । छायाचित्र ०४ – बायाँसँ दायाँ – श्री रतीश चन्द्र ठाकुर ‘रतनजी’ (अनिलजीक सभसँ छोट भाए), श्री सतीश चन्द्र ठाकुर ‘लल्लनजी’ (अनिलजीक माँझिल भाए), श्री कृष्णकान्त झाजी (अनिलजीक छोटका बहिनोइ), स्वयं ‘अनिल’जी आ पवनजी (अनिलजीक भागिन) । छायाचित्र ०५ – बायाँसँ दहिना – श्रीमति बच्ची देवी (अनिलजीक धर्मपत्नी), श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’, श्रीमति सुष्मा देवी (अनिलजीक छोटकी मामी), श्री महेन्द्र कुमर (अनिलजीक छोटका मामा) – सन् १९९६-९७ ई॰क छायाचित्र छायाचित्र ०६ – श्री अनिलजी – अपन छोटका मामा ‘श्री महेन्द्र कुमर’जीक संग (सन् १९९६-९७ ई॰क छायाचित्र) एहि बीच श्री (डॉ॰) राधाकान्त ‘रमण’जीक गीत संग्रह “एक आँखि गंगा” पढ़बाक अवसरि हाथ लगलन्हि (डॉ॰ रमणजी बादमे दरिभंगा आयुर्वेद महाविद्यालयमे लेक्चरर भेलाह) । एहि संग्रहक निम्न गीतक शब्द अनिलजीकेँ बहुत प्रभावित कएलकन्हि – अहाँ केर इजोरिया कहाँ हम मँगै छी । अन्हारहुमे हमरो जिबऽ तऽ दियऽ ।। एहि बीच मामा गाम रुचौलक (दुलारपुर-रुचौल) पुस्तकालयमे स्व॰ हरिमोहन झाजीक “चर्चरी” पढ़बा लेल भेटलन्हि । एहि किताबक भाषा ओ प्रस्तुति अनिलजीकेँ बड्ड आकर्षक लगलन्हि । ई युग छल श्री रबिन्द्रनाथ ठाकुरजीक । संयोगसँ जमसममे (महेन्द्रजीक पैत्रिक गाम) स्व॰ महेन्द्र झाजीक स्वरमे श्री रबीन्द्रजीक लीखल गीत अनिलजीकेँ सुनबाक मौका भेटलन्हि । ई गीत सभ मधुपजीक गीत सभसँ सर्वथा भिन्न छल, स्वतन्त्र छल आ आत्मनिर्भर छल । मतलब कि कोनहु फिल्मी धुनि पर आधारित नञि छल । तकरा बादो गीतसभ अत्यन्त प्रभावशाली आ आकर्षक छल । ओ निश्चय कएलन्हि जे गीत फिल्मी धुनि पर नञि लिखब । आभास भेलन्हि जे मैथिली मात्र श्रृंगार रसमे लिखबाक भाषा वा किर्तनिञा गीतक भाषा नञि छी । आ अनिलजी शिंगारक अतिरिक्त आन बहुत रास विषयसभ पर लिखए लगलाह । युग कहैत अछि, हम ने कहैत छी अपना जिनगीक अहीं छी मालिक चाहे अपने जेना रही ।। दू – तीन बाउ सँ घर बसाउ बेशी ले मन नञि ललचाउ अपने हाथ लगाम अहाँक अछि, चाहे अपने जेना उड़ी ।। श्रृंगारिक गीत तऽ लिखबे कएलन्हि, संगहि लिखलन्हि मिथिलाक दुरावस्था पर, समाजक कुव्यवस्था पर आ देशक अव्यवस्था पर । मातृभक्ति गीत लिखलन्हि, देशभक्ति गीत लिखलन्हि – आँखि मे चित्र हो मैथिली केर, आ हृदय मे माटिक ममता । माएक सेवा मे जीवन बिता दी, बस इएह एकटा होइए सिहन्ता ।। भूख सभसँ पैघ श्राप (अभिषाप) थिक । ओ मनुक्खकेँ बहुत किछु एहनो करबा पर मजबूर कऽ दैत अछि, जे ओ नञि करए चाहैत अछि । जकर खेत सभ भरना लागल हो, रहबाक लेल माथ पर खढ़ नञि हो, काटए जोग भेल जजाति खेतहिमे लागल बिका जाइत हो, घऽरक जिम्मेदारी मूँह बओने ठाढ़ हो – तकर आदर्शक मुल्य की आ की ओकर अभिलाषा ??? भूखक आगाँ मनुक्खक बहुतो आदर्श दम तोड़ि दैत अछि । आ तेँ अपना बियाहक बाद कतेको साल फेर नञि लिखि सकलाह – हे मिथिला केर भाग्य विधाता, नारा आइ बुलन्द करू । चाही जँ उद्धार मैथिलिक, तिलक-प्रथा केँ बन्द करू ।। कहुखन–कहुखन, किनको–किनको बुझि पड़ैत छन्हि कि अनिलजीक गीतसभ कोनो विशिष्ट राजनैतिक विचारधाराक सम्वाहक वा सम्पोषक थिक । से पाठकक अपन सोच । अनिलजी राजनैतिक गतिविधिसभसँ प्रायः दूरे रहै बला लोक । हाँ बहुतो ठाम हुनक गीत हुनक जिनगीक संघर्षकेँ जरूर रेखांकित करैत अछि । यथार्थमे गरीबी ककरो जाति आ धर्म देखि कऽ नञि अबैत अछि । बाबूजी विशुद्ध कृषक ओ भुतपुर्व स्वतन्त्रता सेनानी (पेन्शनरहित) आ तेँ घरक प्रारम्भिक आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय । खेत सभ भरना लागल आ मूँह पर जाबी । एहेनमे लेखनी तऽ इएह लिखत – छै जेबी जकर खाली – खाली, आ खरची घरक लटपटायल, से फगुआ खेलायत कोना कऽ । जकरा आङन वसन्त नहि आयल, से फगुआ खेलायत कोना कऽ ।। या फेर, काल्हि केर भारत मे चाही ई घोषणा, ई धरती हो तकरे, चुआबय जे घाम । बौआ दुनु हाथ जोड़ि करू , अइ माटि केँ प्रणाम ।। रामकृष्ण महाविद्यालयक मञ्च पर गाबि तऽ नञि सकलाह, कारण साजक संग गएबामे असुविधा होन्हि परञ्च हिनक गीत गाम-घरक विधि-बेबहारसँ लऽ कऽ मैथिलीक समस्त मञ्च पर सुशोभित भेल आ श्रोतालोकनिक प्रशंसा पओलक । मञ्च पर हिनक गीतसभकेँ पहुँचएबाक मुख्य श्रेय श्री शशिकान्तजी आ श्री सुधाकान्तजीक जोड़ीकेँ छन्हि । एकर अतिरिक्त श्री महादेव ठाकुरजी, श्री सुरेश पंकजजी, श्री सुरेन्द्र यादवजी, श्रीमति पुष्पाजी आ स्व॰ नूतनजी आदि आन बहुत रास समकालीन आ बादक गायक–गायिका लोकनिक स्वर हिनक गीतसभकेँ भेटलन्हि । मैथिलीमे लिखबाक लेल अनिलजीकेँ हुनक मँझिला मामा श्री देवेन्द्र कुमरजी (अध्यापक आ बादमे प्रधानाध्यापक, रहिका उच्च विद्यालयसँ सेवानिवृत्त) आ हुनक बाबा स्व॰ अनन्तलाल ठाकुरजीसँ सेहो बेस प्रोत्साहन भेटलन्हि । कथा लेखन आ रेडियो स्टेशन – अकाशवाणी अर्थात् रेडियो – ओहि समयक एकटा अति सशक्त प्रसारण माध्यम छल – दूरदर्शनसँ सेहो बड्ड सशक्त । हर रचनाकार आ गायक – गायिका केर हृदयमे ई इच्छा अवश्य रहैत छल जे कम सँ कम एक बेर रेडियो स्टेशन पर मौका भेटओ । अनिलजीक मोनमे सेहो ई उत्कण्ठा होयब स्वभाविके । चर्चरी पढ़लाक बाद कथा लेखनक इच्छा जागृत भेले रहन्हि, कथा लीखि डाक द्वारा रेडियो स्टेशन पठाए देलन्हि । मुदा कथा आपिस आबि गेल । फेर दोसर कथा पठओलन्हि, पर ई की – ओहो आपिस आबि गेल (दुर्भाग्यसँ ई दुहु कथा आब नहिञे अनिलजी लग छन्हि आ नहिञे कथाक नाँव याद छन्हि) । पर ई हुनिका हतोत्साहित नञि कएलक अपितु आओरो नीक लिखबाक लेल प्रेरित कएलक । फेरो एकटा कथा लिखलन्हि । लिखलाक बाद ई कथा आर॰ के॰ कॉलेजमे श्री बुद्धिधारी सिंह“रमाकर”जीकेँ देखओलन्हि आ हुनक बताओल किछु संशोधन कएलाक बाद डाकसँ पठाए देलन्हि । ई कथा स्वीकार कऽ लेल गेल । स्विकृति पत्रक संग २५ रू॰ केर चेक सेहो डाकसँ भेटलन्हि । कथा वाचन लेल हुनिका रेडियो स्टेशन बजाओल नञि गेल पर श्री छत्रानन्द सिंह झा“बटुक भाई”जीक स्वरमे हुनक कथा प्रसारित आ पुनर्प्रसारित भेल । ई बात १९६८ ई॰क अछि । कथाक नाँव छल “मोन अछि एखन धरि सासुरक यात्रा” । छायाचित्र ०७ – काश्मीरक डल झीलक सोझाँ ‘अनिलजी’ - १९७० ई॰ मे तिरहुत कृषि महाविद्यालयक दिशिसँ आयोजित शैक्षणिक भ्रमण मे तत्पश्चात बी॰एस॰सी॰-कृषिक पढ़ाई केर लेल अनिलजी आर॰के॰कॉलेज सँ तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोली आबि गेलाह । फेर एक गोट कथा रेडियो स्टेशनकेँ प्रेषित कएलन्हि, स्विकृतो भेलन्हि पर वाचन हेतु आमण्त्रन नञि अएलन्हि । बात १९७० ई॰ केर अछि । एक दिन बिनु बजओनहि अनिलजी पटना रेडियो स्टेशन पहुँचि गेलाह आ ओहि ठाम हुनक भेंट श्री गंगेश गुञ्जनजी आ श्रीमति प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’जीसँ भेलन्हि । श्री गंगेश गुञ्जनजीकेँ कथा देखओलन्हि । कथाक नाँव छल “इण्टरभल” । गंगेश गुञ्जनजी कथाक अंग्रेजी शब्दसभकेँ उपयुक्त मैथिली शब्दसभसँ बदलि देलन्हि आ कथाक शिर्षक सुझओलन्हि “धारक ओइ पार” । कथा इएह नाँवसँ लेखकक अप्पन आवाजमे प्रसारित भेल । ओना बहुत बादमे एहि नाँवसँ हुनक एक गोट दीर्घ-कविता सेहो प्रकाशित भेल पर तकर एहि कथासँ कोनहु सम्बन्ध नञि अछि । बादमे हिनक एकटा आओर कथा “प्रश्नवाचक चिन्ह” मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल । परञ्च गीतक लोकप्रियता आ काजक व्यस्तता हिनका कथा-लेखनसँ दूर कऽ देलक । छायाचित्र ०८ – ‘धारक ओइ पार’ नामक पोथीक (मैथिली दीर्घ कविता) मुखपृष्ठ नौकरी-चाकरी आ मैथिली-हिन्दी - जाहि समय अनिलजी बी॰एस॰सी॰-कृषिक पढ़ाई लेल गेल रहथि ताहि दिनमे एहि डिग्रीकेँ सरकारी नओकरीक गारण्टी मानल जाइत छल । पर पढ़ाई पुरा करैत-करैत समय बदलि गेल रहै । किछु दिन बेरोजगारीक मजा लेबए पड़लन्हि आ गाबए पड़लन्हि – मोटका मोटका पोथी पढ़लौं पोथी केर सभ पन्ना रटलौं से सभ रटिकऽ किछु नै भेल । पहिने जोड़ी जोड़ दशमलव आब जोड़ै छी नून आ तेल ।। छायाचित्र ०९ – अपन धर्मपत्नी श्रीमति बच्ची देवीक संग ‘अनिलजी’ (सन् १९८७ ई॰क आस-पासक छायाचित्र); पाछाँमे अनिलजीक सभसँ छोट भाए श्री रतीश चन्द्र ठाकुर ‘रतनजी’ एहि बीच २ जुलाई १९७१ ई॰ कऽ अनिलजीक बियाह लदारी गामक श्री चुल्हाई ठाकुरक सुपुत्री श्रीमति बच्ची देवीक संग भऽ गेलन्हि । ओहि समय ओ स्नातक-कृषि द्वितीय वर्षक छात्र रहथि । स्त्रीगणक समवेत स्वर कर्णगोचर होमए लगलन्हि – नहुँ नहुँ चलियौ दुल्हा जोर सँ ने चलियौ एखने सँ कनियाँ केर हाथ ने छोड़ियौ धरा दियनु हे ससुर अङना मे । घुमा दियनु हे ससुर अङना मे ।। बियाहक प्रसंग अछि तऽ हुनक एक गोट गीत फेर याद आयल । गीतक कोनो सम्बन्ध ओना हुनक बियाह सँ नञि छन्हि । पर प्रसंगवश ई चहटगर गीत मोन पड़ल । ई गीत वास्तवमे गामक सलमपुरक गबैयाजीक (श्री राजेन्द्र ठाकुरजी) टोलीक एक गोट नटुआ(श्री राजकुमारजी) आ जोकर (नाँव-?) विशेष आग्रह पर लिखल गेल छल । अनिलजीसँ हुनक शिकायत छलन्हि जे बाँकी लोकसभक लेल तँऽ ओ बहुत रास लिखए छथि, किछु गीत हुनको सभ लेल लिखल जाए । आ ताही फरमाइशकेँ ध्यानमे राखि ई गीत लिखल गेल छल – वाईफ बैजन्तीमाला, हम अपने राजेन्द्र कुमार । महमुदबा हम्मर चेला, जॉनी वाकर हमर भजार ।। मोहम्मद रफीकेँ हमहीं, सा-रे-ग-म सिखओने छी । मुकेशकेँ हमहीं, भट्ठा धरओने छी । आगाँ – पाछा करैए, नन्दा केर फिएट कार । महमुदबा हम्मर चेला, जॉनी वाकर हमर भजार ।। १० दिसम्बर १९७५ ई॰ कऽ सेण्ट्रल बैंक ऑफ इण्डियामे कार्यभार ग्रहण कएलन्हि तथा नवम्बर २०१० मे अग्रणी जिला प्रबन्धकक पदसँ सेवानिवृत्त भेलाह । एहि क्रममे ओ बिहार, छत्तीसगढ़ आ मध्य प्रदेशक विभिन्न स्थान पर विभिन्न पद पर काज कएलन्हि । बिहारमे बसन्तपुर, अदापुर आ सीवान मे रहलाह आ प्रायः मैथिलीएमे साहित्य सृजन कएलन्हि । सीवानमे २-३ वर्ष विद्यापति पर्व समारोहक आयोजन सेहो कएलन्हि जाहिमे डॉ॰ बी॰ एल॰ दासजीक सहयोग उल्लेखनीय रहलन्हि । छायाचित्र १० – सन् १९७५ ई॰क आस-पासक समय आ ‘अनिलजी’ छत्तीसगढ़मे बिलासपुर, डोमन हिल कॉलियरी, चिरमिरी आ कोतमामे तथा मध्य प्रदेशमे जबलपुरमे काज कएलन्हि । एहि सभ स्थान पर हिनक मैथिली साहित्य सृजन बहुत शिथिल रहल । हिन्दीक वातावरण छल आ अनिलजी ओकरहि धारमे भँसियाइत रहलाह । मैथिलीकेँ निश्चित रूपेँ क्षति भेल । एतहि हिनक हिन्दी गजल संग्रह “तिरंगे के लिए” (सन् १९९७ ई॰मे) आ मैथिली दीर्घ कविता“धारक ओइ पार” (सन् १९९९ ई॰मे) प्रकाशित भेलन्हि । अन्तर्जाल युग आ गजल लेखन - सेवानिवृत्तिक पश्चात अनिलजीक प्रवेश इण्टरनेट युगक मैथिली साहित्यकारक टोलीमे भेलन्हि । जालवृत्त पर ओ “विदेह”नामक मैथिली ई पत्रिकाक सम्पर्क मे अएलाह । एहि ठाम हुनक परिचय मैथिलीक प्रशिद्ध गजल लेखक श्री आशीष अनचिन्हारजीसँ भेलन्हि । हुनकहि सम्पर्कमे ओ गजल दिशि अग्रसर भेलाह आ आइ-काल्हि बेसी गजले लीखि रहल छथि । “गजल गंगा” नामक हुनक अप्रकाशित गजल संग्रह (जे कि “अनचिन्हार आखर” ब्लॉग पर उपलब्ध अछि) मे हुनक कुल ८१ टा गजल संग्रहित अछि जाहिमेसँ पहिल ६१ टा गजल सरल वार्णिक बहरमे (भाग - १) अछि आ शेष २० गोट गजल अरबी बहरमे (भाग - २) अछि । एहि गजल संग्रहक पृष्ठ ८ पर स्वयं अनिलजीक उक्ति छन्हि जे पहिल भागक अधिकांश गजल सभ मिथिला मिहिर ……………….. विदेह-ई पत्रिका मे प्रकाशित गजल सबहकसंशोधित रूप अछि । एहिसँ ई भ्रम उत्पन्न होइत अछि कि अनिलजी बहुत पहिनेसँ गजल लिखैत छथि । पर वास्तवमे ई संशोधित रूप की छी – ताहि पर विचार करब परमावश्यक । गजल गंगाक भाग - १ मे संकलित अधिकांश तथाकथित गजलसभ पहिने विभिन्न पत्र – पत्रिकासभमे गीत वा कविताक रूपमे प्रकाशित भेल अछि । एतबहि नञि बहुत रचनासभ तऽ गीतक रूपमे कतोक मञ्चसभसँ बहुतो बेर गाओल गेल अछि । आइ ओएह गीत आ कविता सभकेँ मात्रादि मे कतिपय एम्हर – ओम्हर कऽ कऽ छन्द-बहर बना गजलक फ्रेममे कसि पुनर्सङ्कलित कयल गेल अछि । होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो। बन जाओ मीत मेरे, मेरा प्रीत अमर कर दो ।। श्री इन्दीवरजीक लिखल आ श्री जगजीत सिंहजी द्वारा हिन्दी फिल्ममे गाओल उपरोक्त गजल कतेक गीत छल आ कतेक गजल से तऽ ओएह लोकनि जानथि । पर किछु बात निर्विवाद रूपेँ सभकेँ बूझल अछि – पहिल ई जे इन्दीवरजी गीतकार रहथि आ दोसर जे जगजीत सिंहजी गजल गायक । जँ उपरोक्त पद्य गजल अछि तऽ ओहिमे ई “गीत” शब्द की कऽ रहल अछि । हमर व्यक्तिगत मानब अछि (जरूरी नञि जे बाँकी लोक एहिसँ सहमति होथि) जे साहित्यमे दुइए टा समूह अछि – गद्य आ पद्य । जँ पद्य गाओल जा सकैत अछि तऽ ओ गीत भेल । आ इएह गीतक एक विशिष्ट प्रकार गजल थिक । जँ अनिलजीक उपरोक्त तथाकथित गीत सभकेँ गजल कहल जाइत अछि तऽ हमर एहि अवधारणाकेँ पुर्ण रूपसँ समर्थन भेटैछ । मैथिलीमे हुनिका द्वारा बादमे लिखल आ सद्यः लिखल गजल निश्चित रूपसँ गजल अछि । ओना हिन्दी मे गजल ओ बहुत पहिनहिसँ लिखैत छथि आ एक गोट हिन्दी गजल संग्रह “तिरंगे के लिए” सन् १९९७ ई॰ मे प्रकाशित भेल छल । ओहि समयक नवोदित हिन्दी गजलकार श्री दुष्यन्त कुमारजीक गजल अनिलजीकेँ विशेष रूचिकर लगैत छलन्हि आ सम्भवतः हुनकहि गजलसभ अनिलजीकेँ गजल लिखबाक हेतु प्रेरित कएलकन्हि । ताहि समयक अपन परिवेशक अनुसारेँ प्रारम्भिक बेशी गजल ओ हिन्दीएमे लिखलन्हि आ छिट-पुट मैथिलीमे लिखलाह । पर बाद मे “विदेह – मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका” आ श्री आशीष अनचिन्हारजीक संगति मैथिलीमे हिनक गजल लेखनकेँ गति प्रदान कएलकन्हि । हम गजलकार नञि छी, आ हमरा गजलक सम्बन्धमे बेशी नञि बुझल अछि पर गजलक सम्बन्धमे अनिलजीक निम्न वक्तव्य (जे पुर्वोत्तर मैथिल, जुलाई-सितम्बर २०१४, अंक-३१ मे छपल छल) अवश्य विचारनीय अछि – बहरक झंझटि सँ, हमरा आजाद करू । हम गजल छी, हमरा नञि बर्बाद करू ।। पोथी प्रकाशन - अनिलजीक पहिल प्रकाशित पोथी मैथिली गीत संग्रह “तोरा अङना मे” छल । ई २२ नवम्बर १९७८ ई॰ कऽ मुरलीधर प्रेस पटनासँ प्रकाशित भेल । एहिमे कुल ३१ टा गीत छल आ पछिला मुखपृष्ठ पर आशिर्वचन स्व॰ हरिमोहन झाजीक छल । एहि संग्रहक प्रायः सभ गीत अति लोकप्रिय भेल । एकर दोसर पुनर्मुद्रण ३ नवम्बर १९८७ ई॰ कऽ उर्वशी प्रकाशन पटनासँ भेल । एहि बीच मुरलीधर प्रेस सँ एक गोट गीत संग्रह “गीतक फुलबारी” प्रकाशित भेल जाहिमे “तोरा अङना मे” गीत संग्रहसँ २४ टा गीत लेल गेल छल । बादमे गीतक फुलबारीक सेहो दोसर संस्करण बहार भेल । जेना कि ऊपर लीखि चुकल छी जे सन् १९९७ ई॰मे हिन्दी गजल संग्रह “तिरंगे के लिए” आ सन् १९९९ ई॰मे मैथिली दीर्घ कविता “धारक ओइ पार” प्रकाशित भेलन्हि । एहि बीच चारि टा गीत संग्रह केर पाण्डुलिपि उर्वशी प्रकाशनक स्व॰ गोपीकान्त बाबूकेँ प्रकाशनार्थ देल गेलन्हि । एहि गीत संग्रह सभक नाँव छल - (१) मैथिलीक प्रतिमा सजाउ, (२) आँखि मे चित्र हो मैथिली केर, (३) हमर गामक चौक पर आ (४) होटल के मजा लियऽ । प्रत्येकमे प्रायः ३१ – ३६ टा गीत छल । पर किछु कारणवश ई सभ प्रकाशित नञि भऽ सकल । बादमे एहि चारू पोथीमेसँ किछु गीतकेँ “गीत अनिलक” नाँव सँ प्रकाशित करएबाक योजना भेल पर नौकरी मे भऽ रहल अत्यधिक स्थानान्तरणक कारण आ माए – बाबूक क्रमशः खराब स्वास्थ्यक कारण से सम्भव नञि भऽ सकल । पाण्डुलिपि आपिस लऽ लेल गेल पर स्थानान्तरण आ प्रवासक क्रममे क्षतिग्रस्त भऽ गेल । बादमे एहि गीत सभकेँ स्मृतिक आधार पर आ आन विभिन्न श्रोतसभसँ पुनः प्राप्त कएल गेल । ताहि कारणेँ कतिपय स्थान पर पुर्वलिखित आखर सभ किछु परिवर्तित भऽ गेल । उपरोक्त चारू अप्रकाशित गीत संग्रहसभक किछु गीत आ किछु नऽव गीतकेँ संग लऽ एक गोट नऽव गीत संग्रह “गीत गंगा” सन् २०१३ ई॰मे शेखर प्रकाशन, पटनासँ प्रकाशित भेल । एहिमे ८० गोट गीत आ “आत्मगीत” नामक एक गोट अति दीर्घ गीत संकलित अछि । ई “आत्मगीत” वास्तवमे ४-५ अनुच्छेदक एक गीत छल जकरा बहुत बादमे एतेक बृहत स्वरूप देल गेल । “आत्मगीत” गीत गंगामे छपबासँ पहिने धारवाहिक रूपमे “अंतिका” नामक मैथिली पत्रिकामे छपब शुरू भेल छल पर एक-दू धारावाहिक छपि कऽ रुकि गेल । तत्पश्चात “विदेह” नामक मैथिली ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूप मे छपल । उपरोक्त चारू अप्रकाशित गीत संग्रहसभक किछु गीत “गजल गंगा” नामक अप्रकाशित मैथिली गजल संग्रहमे (जकर चर्च हम पहिने कऽ चुकल छी) सेहो देखबा मे आयल अछि । ई आत्मगीत वस्तुतः लेखकक अप्पन जिनगीक तीत आ मीठ अनुभवसभ पर आधारित अछि । एहिमे हुनक अपन सोच आ विचारधारा सेहो स्पष्ट रूपेँ ईंगित अछि । अनिलजी एखन किछु पुरणा (विभिन्न पत्र पत्रिकामे प्रकाशित कविता सभ) आ किछु नवका अप्रकाशित कविता सभकेँ मिला-जुला एक गोट नऽव काव्य संग्रह “काव्य गंगा” सेहो छपएबाक उपक्रममे लागल छथि । हिनक मैथिली रचना सभ वैदेही, मिथिला टाइम्स, मिथिला मिहिर, भारती मण्डन, समय साल, पुर्वोत्तर मैथिल, अंतिका, देशज, घर बाहर, सांध्य गोष्ठी, माटि पानि आ विदेह ई पत्रिकाक अतिरिक्त आन समकालीन मैथिली पत्र – पत्रिका सभमे छिड़आएल अछि । हिनक हिन्दी रचनासभ दैनिक भास्कर (बिलासपुर ), नव भारत ( बिलासपुर ), शुभतारिका ( अम्बाला छावनी ), नवनीत, हंस, वीणा, अक्षरा, समान्तर, सानुबंध, समकालीन भारतीय साहित्य, प्रयास, जर्जर कश्ती आदिमे प्रकाशित अछि । अनिलजीक एक गोट एकांकी “कोराँटी”, एक गोट नाटक “अधपहरा” आ एकटा संस्मरण “एकटा छलाह नोनू कक्का”अद्यावधि अप्रकाशित अछि । सम्प्रति ओ पटनामे रहि स्वतन्त्र लेखनमे संलग्न छथि । हुनक मैथिली ब्लॉग “आँखि मे चित्र हो मैथिली केर” आ हिन्दी ब्लॉग “तिरंगे के लिए” अन्तर्जाल पर उपलब्ध अछि । अन्तमे हुनक उक्ति जे ओ “तोरा अङना मे” गीत संग्रहक प्रथम संस्करणक भूमिका मे स्वयम् केर परिचय दैत लिखने रहथि – ने कवि छी हम ने गीतकार ने आलोचक ने लेखक छी । मानी तँऽ मानू, अपनहि सन माँ मैथिलीक पद-सेवक छी ।। आशा अछि अनिलजीक आन बहुत रास गीत–गजल, कथा–पिहानी, नाटक–एकांकी आ संस्मरण–डायरी हमरा आ हमरा सन आन पाठक ओ श्रोतालोकनिकेँ भविष्यमे हुनक लेखनीसँ भेटतन्हि । आइ एतबहि ।। डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” आ सुप्रिया बेबी कुमारी भूकम्प- (बाल विज्ञान कथा) एहि बाल विज्ञान कथाक अधिकांश भाग 18 दिसम्बर 2014 ई॰ (वृहस्पतिदिन आ पूसक अन्हरिया पखक एकादशी तिथि) कऽ जे भूकम्प आयल छल तकर प्रात भने लीखल गेल छल । तेँ एहि कथाक परिप्रेक्ष्य ओही संदर्भ मे ली से पाठकगणसँ निवेदन । ई भूकम्प भारतीय मानक समय केर अनुसार रातिमे 09 बाजि कऽ 02 मिनट आ 10 सेकेण्ड पर आयल छल । एकर आकार रि॰ना॰ पर5.9 जनाओल गेल अछि तथा एकर मूल / केन्द्र नेपालक प्रशिद्ध नामचे बजार सँ 26 कि॰मी॰ उत्तर पच्छिममे आ 10 कि॰मी॰ गँहीर छल । भोरुका समय छल । कुहेस लागल रहै । मुदा धिया - पुतासभ कहाँ मानए बला छल । भोरे भोरे सूति-उठि कऽ लुरू-खुरू करए लागल छल । जिनगीमे शायद पहिलहि बेर एकटा विचित्र पर मजगर घटनासँ साक्षात्कार भेल छलै । — गए प्रीती ! पता छौ, काल्हि रातिमे भूकम्प आएल रहै – प्रीतीकेँ अपना दिशि अबैत देखि सोनी बाजलि । — हँ से तँऽ ठीके । काल्हि हमसभ खाएत रही कि अचानके चौकीसभ जोरसँ हिलए लगलै – सोनी उतारा देलक । — अरे ! बुझलही की, हमरा तँऽ भेल जे भूत आबि गेल अछि, आ हमर चौकीकेँ जोरसँ झमारि रहल अछि । बब्बनक ई बात सुनितहि सभ धिया - पुता संगहि ओहि ठाम बैसल चेतन लोकनि सेहो भभा कऽ हँसि पड़लाह । — तँऽ फेर की केलही ? सीरक सँ मुँह झाँपि हनुमान चलीसा पढ़ए लगलही की ? – रत्तन मुस्किआइत कटाक्ष करैत बाजल । — तोरा तँऽ हमेशा मजाके बुझाइत छौ – बब्बन थोड़ेक खौंझायल मुद्रामे बाजल । सभहक सोझाँ ओकरा अप्पन मान-सम्मान पर बट्टा लगैत बुझि पड़लै । हऽम दलाने पर सुतले रही पर निन्नमे नञि छलहुँ । सीरक तऽरेसँ खरिहानमे भऽ रहल सभ बात सुनैत रही । मूरी उठाए कने जोरसँ कहलियै – बब्बन, तमसाए किए छेँ ? तोरे नहि, बहुतोकेँ से बुझाएल होएतन्हि । पुछहुन्ह गऽ लाल कक्काकेँ, डऽरेँ सुटिया गेल छलाह कि नहि ? लाल कक्का अपन नामक चर्च सुनि घूरे लगसँ चहकैत बजलाह – एँह, नञि पूछह हमरा तँऽ किछु बुझएबे नहि कएल । लागल जे कुकुर चौकी तऽर मे पैसि खड़बड़बैत अछि । एतबा सुनि उपस्थित सभ धिया-पुता हँसए लागल । — अच्छा कहू तँऽ ई भुकम्प किएक अबैत’छि – प्रीती हमरा दिशि तकैत पुछलक । — एतबो नञि बूझल छौ, काछु केर पीठ पर ई धरती टिकल छै । ओकरा जखन भारी लगै छै तँऽ ओ हिलए लगैत अछि आ भूकम्प आबि जाइत अछि – बब्बन तपाक सँ बाजल । — का ……छु ………….. माने की ? – सोनी हिचकिचाइत पुछलक । — अरे काछु माने कछूआ………….टर्टल………….टॉर्ट्वाइज – बब्बन उतारा देलक । — दादी तँऽ कहैत छलथिन्ह जे सीता माए धरतीमे समाए गेल छलीह । हुनक मोन अओनाइत छन्हि तँऽ भुकम्प अबैत अछि – रत्तन बाजल । — अरे नञि । हम्मर बाबा कहैत छलाह जे समुद्रक ऊपर छाल्ही जेकाँ ई धरती अछि । जखन समुद्रक पानिमे हिलोर उठैछ तँऽ भूकम्प अबैछ – सोनी बाजलि । आब सबगोटे अप्पन-अप्पन मोनक बात बाजि चुकल छल । पर, ककरो बात सँ केओ सन्तुष्ट नहि छल वा सभ अपनहि बातकेँ सच मानि रहल छल । तेँ सभ एकाएक चुप भऽ हमरा दिशि ताकए लागल । आँखि मे प्रश्नक भाव आ मोनमे सही उत्तरक उत्कण्ठा नेने । हम कम्मल ओढ़ने उठि कऽ बैसि गेलहुँ । मोनमे कने पश्चाताप सेहो छल जे बेकारे टोकारा देलियै । ने टोकारा दितियै आ ने भोरे-भोरे फँसितहुँ । आब तँऽ भोरुका नित्यकर्म निश्चिते बिलमि गेल । फेर हिम्मत कऽ कऽ बजलहुँ – — देखह ! जे-जे कारण तोँ सभ कहलह से सभ कहबी छै । अपना हिन्दु धर्म ग्रण्थसभमे एहि तरहक किछु खिस्सा भेटैत छै । हँ, जे अन्तिम बात – छाल्ही बला बात – छै, ताहि मे किछु यथार्थक छवि जरूर छै । — से कोना ? – प्रीती जिज्ञासा भरल स्वरमे पुछलक । — छाल्ही बला बात एखनुका विज्ञानसँ कोना मिलए छै – से बादमे कहबह । हम कहलियै । — ठीक छै – प्रीती बाजलि । — भूकम्पक कारण बुझबाक लेल आवश्यक छी जे पहिने अप्पन पृथिवीक आन्तरिक संरचनाक बारे मे किछु जानकारी लऽ लेल जाए । पृथिवीक अन्दरक संरचना आ ओकर गतिविधिक बारे मे बुझने बिना ओकर सतह वा पपड़ी पर महसूस होमए बला घटना अर्थात् भूकम्पक विषयमे जानब असम्भव – उपस्थित सभ धियापुताकेँ सम्बोधित करैत हम कहलियै । — तऽ बताउ ने – प्रीती बाजलि । — ओना तँऽ पृथिवी केर आन्तरिक संरचनाक बारे मे बहुत रास मत – मतान्तर छै, पर जे सभसँ नऽव मत छै ताहि अनुसारेँ सम्पुर्ण पृथिवीकेँ 3 भागमे बाँटल जा सकैत अछि । सभसँ उपरुका भाग भेल भूपर्पटी या पपड़ी (EARTH CRUST / CRUST) । ई भाग हमरा सभकेँ देखाइ दैत अछि आ एही भाग पर सातो महाद्वीप वा महादेश तथा पाँचो महासागर स्थित अछि । सागरक पेनी यानि कि सागरतल पर एकर मोटाई 6 सँ 10 किलोमीटर धरि आ महाद्वीपिय भाग मे 25 सँ 50 किलोमीटर तक होइछ । सभ धियापुता धेआन लगा कऽ सुनि रहल छल । — सभसँ अन्दर केर भागकेँ भूकेन्द्र वा भूक्रोड (CORE / EARTH’S CORE) कहल जाइत अछि । ई पुनः 2 भागमे विभाजित अछि –अन्तः भूकेन्द्र (INNER CORE) आ बाह्य भूकेन्द्र (OUTER CORE) । सम्पुर्ण भूकेन्द्रक मोटाई पृथिवीक केन्द्रविन्दु सँ 3400 कि॰मि॰ धरि मानल गेल अछि । ई लोहा, निकेल आ सिलिकेट मिश्रित भारी धातुपिण्डसँ बनल अछि । एकर आयतन सम्पुर्ण पृथिवीक आयतनक मात्र 16 प्रतिशत पर भार 32 प्रतिशत अछि, अर्थात् भूकेन्द्रक घनत्त्व बहुत बेशी अछि । बाह्य भूकेन्द्रक संहति द्रव स्वरूपक पर अन्तः भूकेन्द्रक संहति ठोस स्वरूपक बूझि पड़ैत अछि । — आ पृथिवीक बिचला भागकेँ की कहैत छियै – बब्बन पुछलक । — भूपर्पटी आ भूकेन्द्रक बीच करीब 3000 कि॰मि॰ मोट भागकेँ भूमध्य वा मैण्टल (MANTLE) कहल जाइत छै । ई भाग पुनः 3उपविभाग मे विभाजित अछि । बाह्य भूकेन्द्र सँ सटल भाग अधोभूमध्य या अधोमैण्टल (LOWER MANTLE) कहबैत अछि जखनि कि भूपर्पटीसँ सटल भाग ऊर्ध्व भूमध्य वा ऊर्ध्व मैण्टल (UPPER MANTLE) कहबैत अछि । मैण्टलक एहि दुनु क्षेत्रक बीच एकटा पातर सनि संक्रमण क्षेत्र (TRANSITION ZONE / AREA) पाओल जाइत अछि । सम्पुर्ण मैण्टल क्षेत्रमे सीलीकेटक अधिकता पाओल जाइत अछि संगहि लोहा आ मैगनेशियम सेहो रहैछ । ऊर्ध्व मैण्टलक संहति अनियमित स्वरूपक रहैछ जखनि कि अधोमैण्टलक संहति द्रवस्वरूपक । — यानि कि धरतीक त्रिज्या या अर्धव्यास (RADIUS / HALF DIAMETER) लगभग 6400 कि॰मि॰क भेलै – रत्तन किछु जोड़ैत - बिचारैत हमरा दिशि देखि कऽ बाजल । — हाँ एकदम सही । आ पृथिवीक संहति केर बारे मे सेहो किछो ध्यान देलहक आ कि नञि ? — अधोमैण्टल आ बाह्य भूकेन्द्र द्रव स्वरूपक अछि, ऊर्ध्वमैण्टल अनियमित संहतिक पर अन्तः भूकेन्द्र ठोस अछि । भूपर्पटी सेहो ठोस अछि पर ओहि परक जलमण्डल द्रव अछि – रत्तन उतारा देलक । — मतलब कि अन्दरसँ द्रव मैण्टल पर पपड़ी या भूपर्पटी ठोस स्वरूपमे जमल अछि - बजैत काल सोनीक ममुखमण्डल पर खुशी छलकि रहल छलै । ओकरा भूकम्पक बारेमे अप्पन बाबाक बताओल बातसँ साम्य प्रतीत भऽ रहल छलै । — हूँऽऽ, बहुत किछु तहिना – हम कहलियै । — से तँऽ ठीक पर द्रव भूमध्यक नीचाँमे ठोस भूकेन्द्र कोना ? --- बब्बन धीरेसँ किछु सोचैत बाजल । — देखह ! भूपर्पटी पृथिवीक सभसँ बाहरी स्तर अछि तेँ अपेक्षाकृत सभसँ बेसी ठण्ढा अछि । जेना – जेना पृथिवी केर भीतर जाइत छी तेना-तेना दाब आ तापमान बढ़ैत जाइत अछि । इएह कारण अछि जे भूमध्य आ बाहरी भूकेन्द्र द्रव स्वरूपमे अछि । भीतरी भूकेन्द्र सेहो द्रव होयबाक चाहैत छल पर आगाँ दाब एतेक बेशी बढ़ि जाइत अछि कि सर्वाधिक तापमान होयबाक बादो भीतरी भूकेन्द्र ठोस अछि । — से कोना बुझै छियै – हमर बात खतमो नञि भेल छल कि रत्तन तपाकसँ बाजि उठल । — सभटा आइए पूछि लेबह …………… काल्हि लए सेहो किछु रहऽ दहक ने – बब्बन रत्तनक हाथ झिकैत बाजल । — हँ, ई सभ बात फेर कहियो कहबऽ, नञि तँऽ भूकम्पक खिस्सा आधे पर छुटि जएतह । एतऽ धरि बुझलहक किने ? ………… आ कि नञि ? — हँ बुझि गेलियै; आगू कहू – सभ धियापुता एक्कहि संगे बाजल । — द्रव केर ऊपर स्थित कोनो चीज स्थिर नञि रहि सकैत अछि । ओ निरन्तर दहाइत रहैत अछि – जेना कि कोनो काठक टुकड़ी, ……… — नाओ आ पनिया जहाज – प्रीती हमर उदाहरणक सुचीकेँ पुर्ण करबाक प्रयास कएलक । — नञि ……… नाओ (नाह या नाव) केँ मनुक्ख करुआड़िसँ चलबैत अछि आ पनिया जहाजमे ई काज ओकर ईञ्जन करैत अछि । ई दुनु दहाइत नञि अछि अपितु हेलैत अछि । हेलब (SWIMMING) सचेष्ट क्रिया अछि, जखनि कि दहाएब (FLOATING) निष्चेष्ट क्रिया ।……… पानि पर काठक टुकड़ी वा कागजक नाओ दहाइत अछि, नञि कि हेलैत अछि । तहिना पृथिवीक सभ महाद्वीप दहाइत रहैत अछि । हमर ई कथन सुनि सभ धियापुता अवाक भऽ विश्मयसँ हमरा दिशि ताकए लागल । बब्बनक चेहरा पर चौअनिञा मुस्की (एकटा कुटिल मन्द हास) सेहो छलै – जेनाकि हमर बात पर ओकरा विश्वास नञि हो वा ओ हमरा मूर्ख बूझि रहल हो । मामिलाकेँ ताड़ैत हम बजलहुँ – की विश्वास नञि होइ छऽ ने ??? — धियापुता पुनः किछु नञि बाजल । — जखन पहिल बेर एहि तरहक बात कहल गेल तँऽ लोकसभकेँ एहिना विश्वास नञि भेलै । बात पर कोनो ध्यान नञि देल गेलै । परञ्चअल्फ्रेड वेगनर (ALFRED WAGNER) नामक जर्मन जलवायुविज्ञानवेत्ता जखन पूरा साक्ष्यक संग ई परिकल्पना छपबओलन्हि तँऽ वैज्ञानिकलोकनिक ध्यान आकर्षित भेलन्हि । सन् 1912 ई॰ मे ई जर्मन भाषामे मूल रूपसँ छपल छल जकर बाद 1924 ई॰ मे एकर अंग्रेजी अनुवाद छपल आ तकरा बादसँ एखन धरि ई पूरा विश्वमे चर्चाक विषय बनल रहल आ बनल अछि । एकरा “वेगनरक महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त” (WAGNER’S CONTINENTAL DRIFT THEORY) कहल जाइत अछि । — पर से कोना सम्भव छै – प्रीती किछु सकुचाइत शब्देँ बाजलि । — एकर समर्थनमे बहुत रास साक्ष्य वेगनर अपने देने रहथि आ बहुत रास आन प्रमाणसभ बादक भूवैज्ञानिक आ जीववैज्ञानिकलोकनि देलन्हि जकर विस्तृत चर्चा आन दिन फेर कहियो करब । — ठीक छै । सभ धियापुता एक स्वरेँ बाजल । — इएह महाद्वीपीय प्रवाह मुख्यरूपसँ भूकम्प आ ज्वालामुखी विस्फोट दुनु प्रकारक प्राकृतिक घटनाक लेल उत्तरदायी मानल जाइत अछि । — भूकम्पक लेल सेहो !!!!! ……. प्रीती किछु विश्मय ओ जिज्ञासाक स्वरमे बाजलि । — हाँ भुकम्पक लेल सेहो – हम आश्वस्त करैत हामी भरलहुँ । वास्तवमे पृथिवीक ऊपरुका भाग या पपड़ी या भूपर्पटी कएक टा छोट-पैघ अलग-अलग टुकड़ीसभक मिलबासँ बनल अछि । एहि टुकड़ीसभकेँ विवर्तन छज्जी या छज्जी या टेक्टोनिक प्लेट (TECTONIC PLATES / PLATES) कहल जाइत अछि । सतत प्रवाहमान होयबाक कारणेँ ई छज्जी सभ भिन्न-भिन्न दिशामे अलग-अलग वेगसँ गतिशील अछि । एहि गतिशीलताक कारण किछु छज्जी एक-दोसराक नजदीक अबैत अछि तँऽ किछु परस्पर दूर भागि रहल अछि । जे छज्जीसभ परस्पर नजदीक आबि रहल अछि तकरसभक किनारी या कोड़ी एक-दोसरासँ टकराइत रहैत अछि आ एक-दोसरा पर जोरगर दबाव आरोपित करैत अछि । — अरे बाप रे ! – बब्बन किछु अकचकाइत बाजल । — बब्बनक बात सुनि सभ हँसए लागल । बुझाइत अछि बब्बनक दिमाग दुखाए लगलै – रत्तन चुटकी लैत बाजल । — नञि, से बात नञि । — तँऽ फेर की ? – हम पुछलियै । — हम सोचैत रही जे एतेक पैघ पैघ छज्जी सभक आपसी टकराहटि केहेन होइत हेतै – बब्बन उतारा देलक । — सही बात । ई टकराहटि एतेक शक्तिशाली होइत अछि जे ओहि ठामक जमीनक पुर्ण स्वरूपहि बदलि जाइत अछि । एहने टकराहटि केर कारण हिमालय पहाड़क निर्माण भेल अछि । वास्तवमे एहि तरहक टकराहटि केर प्रक्रिया – जकरा कि भूवैज्ञानिक लोकनि भू विवर्तनिक प्रक्रिया (PLATE TECTONIC ACTIVITIES) कहैत छथि – भूकम्पक प्रमुख कारण अछि । एहि कारणसँ आयल भूकम्पकेँ विवर्तनिक भूकम्प (TECTONIC EARTHQUAKES) कहल जाइत अछि । एहि प्रकारक भूकम्पक मूल धरतीक भीतर धरातलसँ प्रायः 5 सँ 20कि॰मि॰ नीचाँ रहैत अछि; आ एकरा द्वारा प्रभावित क्षेत्र बहुत विस्तृत रहैत अछि । कोनहु दू-टा महाद्वपीय छज्जी जाहि ठाम एक-दोसरासँ सटैत अछि, धरती पर ओ एक-टा रेखाक रूपमे बुझना जाइत अछि । ई रेखा सरल रेखा नञि भऽ कऽ प्रायः कतेको स्थान पर वक्र या वलित (टेढ़-मेढ़) होइत अछि । एकरा भ्रंश रेखा/रेषा (FAULT LINE) कहल जाइत अछि । — हमरासभकेँ इस्कूलमे बहिनजी कहैत छलथिन्ह जे भूकम्प ज्वालामुखी विस्फोटक कारणेँ अबैत अछि – सोनी हमर बातसँ असमञ्जसक स्वरमे बाजलि । — अपन मिथिला क्षेत्रमे तँऽ दूर-दूर धरि कोनहु ज्वालामुखी पहाड़ नञि अछि तखन फेर भूकम्प किएक अबैत अछि ??? ……………….हम भरियऽबैत पुछलियै । सभ धियापुता चुप्प ! …………… फेर हमही चुप्पी तोड़ैत कहलियै – वास्तवमे मिथिला सहित सम्पुर्ण हिमालय आ हिमालयसँ सटल प्रदेशमे एहि प्रकारक माने कि ज्वालामुखीय विष्फोटक कारण भूकम्प नञि अबैत अछि । एहि क्षेत्रमे विवर्तनिके भूकम्प अबैत अछि । आ अपना एहि ठाँ भूकम्प भारतीय विवर्तन छज्जी ओ यूरेशीय विवर्तन छज्जीक परस्पर टकराहटिक परिणाम थिक । — ओह ! – सोनी किछु पश्चातापक स्वरमे बाजलि – मोनमे ऊहापोहक स्थिति छलैक जे हमर बात मानए कि बहिनजीक । — ज्वालामुखी विस्फोटक कारणेँ सेहो भूकम्प अबैत अछि जकरा ज्वालामुखीजन्य वा ज्वालामुखीय भूकम्प (VOLCANIC EARTHQUAKES) कहल जाइत अछि । एहि तरहक भूकम्प जपान, फिलिपिन्स, मलेशिया, सिंगापुर, इण्डोनेशिया, चिली और पेरू आदि देशसभमे बेसी अबैत अछि । वस्तुतः प्रशान्त महासागरक चारूकातक क्षेत्र भयंकर ज्वालामुखीय गतिविधिक क्षेत्र अछि आ तेँ एहि क्षेत्रकेँ “”अग्नि वलय या “आगिक औंठी (RING OF FIRE) सेहो कहल जाइत अछि । — अरे बाप रे ! बब्बन फेर किछु अचंभित स्वरेँ बाजल । — हाँ । पर एतबहि नञि ई क्षेत्र विभिन्न महादेशीय छज्जी सभक मिलन-स्थल होयबाक कारणेँ भीषण भूकम्पीय गतिविधिक क्षेत्र सेहो अछि आ तेँ तीव्र सुनामीक क्षेत्र सेहो । — ई सुनामी की होइत छै - प्रीती सहज भावेँ पुछलक । — अरे टी॰भी॰ पर समाचारमे नञि सुनने रही की ? - समुद्री तुफान होइत छै । बब्बन टीपलक । — पर सभ टा इएह क्षेत्रमे किएक - रत्तन जिज्ञासा कएलक । — हूँऽऽऽ । नीक प्रश्न छह - हम पैघ साँस छोड़ैत कहलिऐक । एखन तक भेल शोधकार्य ई दर्शाबैत अछि कि धरातल पर ज्वालामुखीय गतिविधि बहुत हद तक महादेशीय छज्जीसभक मिलान केर जगह होइत अछि - हँ, ई बात अलग कि ओ एहि तरहक सब मिलानस्थल पर नञि होइत अछि । समुद्रक पेनी पर या ओकर आस पास होमएबला भूकम्पक कारण समुद्रक ऊपरुका सतह पर पैघ-पैघ आ ऊँच-ऊँच लहरि केर उत्पत्ति होइत अछि । एहि तरंगसभक कारण समुद्रक सतह पर भयंकर तुफान आबि जाइत अछि, जकरा ‘सुनामी’ (TSUNAMI) कहल जाइत अछि । ‘सुनामी’ जपानी भाषाक शब्द अछि जकर अर्थ भेल ‘समुद्री तुफान’ । सन् 1883 ई॰मे समुद्रतल पर क्राकाटोआ ज्वालामुखीक गतिविधिक कारण आयल भूकम्पक परिणामस्वरूप उठल सुनामीमे ओहि क्षेत्रक द्वीपसभ पर लगभग 36,000 लोक मारल गेल छलाह । — ओह ! ई तँ बड्ड विनाशकारी छल । - सोनी किछु दुःखाएल स्वरेँ बाजलि । — हँ से तँऽ अवश्ये । एकर अतिरिक्त भूकम्पक आन बहुत रास कारण अछि किछु प्राकृति आ किछु मनुक्खक द्वारा सृजित । — मनुक्खक द्वारा सृजित - माने ??? - प्रीतीक प्रश्नवाचक स्वर कानमे पड़ल । — मनुक्खक द्वारा सृजित यानि कि मनुक्ख द्वारा बनाओल अर्थात् कृत्रिम कारण सभ; जेना कि - पारमाणु बमक विष्फोट, खदान (खाद्यान्न नञि) केर कारण भेल धँसना या धँसाव आदि । पर प्राकृतिक कारणसँ आबएबला भूकम्पक कारणसभमे सभसँ बेसी उपर कहल गेल कारणेसभसँ आबैत अछि आ ओकर विनाशक क्षमता सेहो आन कारणसभसँ आबएबला भूकम्पसभसँ प्रायः बेशी रहैत अछि । — अच्छा, ई भूकम्पक केन्द्र की होइत अछि ? - ई सोझ प्रश्न रत्तनक दिशिसँ छल । — भूगर्भमे ओ स्थान या केन्द्र जाहि ठाँ चट्टानसभमे होमएबला विशेष परिवर्तनक क्रियासभसँ भूकम्पीय हलचलक प्रारम्भ होइछ ओकराभूकम्प मूल या भूकम्प केन्द्र (FOCUS / CENTRE) कहल जाइछ । एहि केन्द्र सँ लम्बवत, धरातलक (धरतीक उपरुका सतह पर) जाहि विन्दु पर सभसँ पहिने भूकम्पक धक्काक अनुभव होइछ ओहि स्थानकेँ भूकम्पक अधिकेन्द्र (EPICENTRE) कहल जाइछ । जनसामान्यक भाषामे वा बहुधा समाचार पत्र, आकाशवाणी आ दूरदर्शन आदि मिडियासभमे अधिकेन्द्रहिकेँ भूकम्पक केन्द्र वा मूल कहि देल जाइत अछि आ से ……. — आ से तँऽ भ्रम उत्पन्न करएबला भेल कि ने - हमर बातकेँ बीचहिमे लोकैत रत्तन बाजल । — हँ आ ताहि द्वारे आइ-काल्हि भूकम्पविज्ञानी (SEISMOLOGISTS) द्वारा भूकम्प मूल या भूकम्प केन्द्र (FOCUS / CENTRE)हेतु एकटा नऽव शब्द अधोकेन्द्र (HYPOCENTRE) केर प्रयोग भऽ रहल अछि । अधोकेन्द्रसँ अधिकेन्द्र धरिक लम्बवत दूरीकेँ (सभसँ कम दूरीकेँ) भूकम्प मूलक या भूकम्प केन्द्रक गहराई (FOCAL DEPTH OR DEPTH OF FOCUS / CENTRE / HYPOCENTRE)कहल जाइत अछि । “अधि-” माने ऊपर अर्थात् धरतीक सतह पर आ “अधो-” माने नीचाँ माने कि धरातल वा धरतीक सतहसँ नीचाँ । — कोनहु भूकम्पक मूल बेशी सँ बेशी कतेक गँहीर भऽ सकैत अछि - जिज्ञाशा रत्तन कएने छल । — वस्तुतः भूकम्पक केन्द्र (अधोकेन्द्र) ओहि ठामक धरतीक सतहसँ कतेक गँहीर अछि, ताहि आधार पर भूकम्प केर 3 प्रकार कएल गेल अछि । जाहि भूकम्पक केन्द्र धरातलसँ 70 कि॰मि॰ धरिक गहराई पर रहैत अछि ओ उत्थर भूकम्प (SHALLOW EARTHQUAKES)कहल जाइछ । एहि तरहक भूकम्पमे सबसँ बेसी क्षति अधिकेन्द्रसँ किछु किलोमीटरक परीधि मे होइत अछि । एहि प्रकारक भूकम्प विवर्तनिक या आन बहुतो कारणसँ होइत अछि । धरातलसँ 70 सँ 300 कि॰मि॰ धरिक गहराई पर जाहि भूकम्पक केन्द्र वा मूल रहैत अछि से मँझलुका भूकम्प (EARTHQUAKES OF MEDIUM DEPTH) कहबैत अछि । एहेन भूकम्प प्रायः विवर्तनिक भूकम्प होइछ । विवर्तनिक भूकम्पमे भूकम्पक अधिकेन्द्रसँ बेसी दूरक क्षेत्रसभक कमजोर शैल/चट्टानबला जगहमे अधिक नोकशान होइत अछि । अधिकेन्द्रसँ300 सँ 700 कि॰मि॰ गँहीर केन्द्र या मूल बला भूकम्प गँहीर/पताली/पतालीय भूकम्प (PLUTONIC EARTHQUAKES) कहबैत अछि । एहि तरहक भूकम्पक उत्पत्तिक कारण एखन धरि अज्ञात अछि । — यौ ! टी॰भी॰सभमे जे भूकम्पक केन्द्रक - माने कि अधिकेन्द्रक - चारू कात गोल-गोल वृत्त जेकाँ देखबै छै, से किएक ? - ई प्रीतीक प्रश्न छल । — भूकम्प मूलसँ जे ऊर्जा मुक्त होइत अछि (निकसैत / निकलैत अछि) से भूकम्पीय तरंग (SEISMIC WAVES) केर रूपमे हर सम्भावित दिशामे पसरैत अछि । ओकरा भूकम्प-केन्द्रक चारू कात धरतीक भीतर गोलाकार आ सतह पर वृत्ताकार घेरा (घेरेबा) केर रूपमे देखाओल जाइत अछि । एहि तरहक वृत्त या गोला तरंगाग्रक (WAVEFRONT) गमणक दिशामे काल्पनिक रूपेँ बनाओल जाइत अछि । मतलब कि ई वृत्त या गोला सभ आँखिसँ वा कोनहु यण्त्रसँ नञि देखाई दैत अछि, बुझबामे वा आँकलनमे सुविधाक लेल बनाओल जाइत अछि । ई घेरासभ भूकम्पसँ होमएबला हानि केर अनुमान लगएबा मे सहायक होइत अछि । भूकम्पसँ सभसँ बेसी नोकसान अधिकेन्द्रसँ (वृत्तक केन्द्रसँ) हटि कऽ बनए बला भीतरुका वृत्तसभक क्षेत्रसभमे होइत अछि । पृथिवीक सतहसँ नीचाँ ई त्रि-आयामी / त्रिविमीय(THREE DIMENSIONAL) होइत अछि, तेँ गोलाकार (SPHERICAL) बुझना जाइत अछि आ ओहि गोलाक केन्द्र भूकम्पक केन्द्र (अधोकेन्द्र) पर स्थित रहैत अछि । धरातल यानि पृथिवीक सतह पर ई भूकम्पीय तरंगसभ अधिकेन्द्रसँ निकलैत प्रतीत होइत अछि । धरातल चौरस होइत अछि अर्थात् ओकरा मात्र लम्बाई आ चौड़ाई होइत अछि मोटाई या गहराई या ऊँचाई नञि, तेँ ओ द्वि-आयामी/द्विविमीय (TWO DIMENSIONAL) संरचना थिक । धरातल पर गमण करैत काल भूकम्पीय तरंग द्वि-आयामी/द्विविमीय (TWO DIMENSIONAL) बुझि पड़ैत अछि आ तेँ वृत्ताकार (CIRCULAR) होइत अछि । एहि वृत्तसभक केन्द्र भूकम्पक अधिकेन्द्र पर होइत अछि । सामान्य भाषामे इएह वृत्तसभक केन्द्रकेँ भूकम्पक केन्द्र कहि देल जाइत अछि जे कि वास्तवमे भूकम्पक अधिकेन्द्र रहैत अछि । — हूँऽऽऽ, तँऽ ई बात छै - रत्तन गँहीर साँस छोड़ैत बाजल । — अच्छा ई कहह जे भूकम्पक अध्ययन कोन शास्त्रक अन्तर्गत होइत अछि …….. — भूगोलमे - हमर बातकेँ बिच्चँहिमे लोकैत बब्बन बाजल । — आंशिक रूपसँ सही छह । भूकम्पक अध्ययन “भूकम्प विज्ञान” केर अन्तर्गत कएल जाइत अछि जकरा अंग्रेजीमे सिस्मोलॉजी /साइस्मोलॉजी (SEISMOLOGY) कहैत छिऐ । हाँ, कोनहु भूकम्पक कारण धरतीक उपरुका सतह अर्थात धरातलक भौगोलिक संरचनादि पर जे किछु परिणाम घटित होइत अछि तकर अध्ययन भूगोलक एकटा शाखाक अन्तर्गत कएल जाइत अछि जकरा भौतिक भूगोल(PHYSICAL GEOGRAPHY) कहल जाइत अछि । भूकम्प विज्ञानक क्षेत्र भूगोल (GEOGRAPHY), भूगर्भ विज्ञान (GEOLOGY),भू-भौतिकी (GEOPHYSICS) आदि विभिन्न शास्त्रसभसँ सेहो सम्बद्ध अछि । ……………………….. आ भूकम्पक गतिविधिकेँ नपबाक हेतु कोन यण्त्रक प्रयोग होइत अछि ? - हम अपनहि उपरुका प्रश्नक उतारा दैत-दैत एकटा आओर प्रश्न जुमा कऽ धियापुता दिशि फेंकि देलियै । — भूकम्पमापी - रत्तन तपाकसँ जवाब देलक, जेनाकि ओकरा पहिनहिसँ हमर एहि प्रश्नक प्रतिक्षा रहए । — संगहि संग एकटा आओर जाँतल स्वर सुनाइ पड़ल - भूकम्पलेखी । ई स्वर सोनीक छल, शायद ओ पुर्णरूपेँ आश्वस्त नञि छल अपना उत्तरसँ । — देखह हिन्दीमे जकरा “भूकम्पमापी यण्त्र” कहैत छियै से मैथिलीमे “भूकम्पनापी यण्त्र” भेल कारण “मापब वा माप” शब्द मैथिलीमे प्रयोग नञि होइत अछि । हर तरहक नापीक लेल मैथिलीमे “नापब वा नाप वा नापी” शब्द प्रयुक्त होइत अछि - चाहे ओ आयतन हो, लम्बाई हो अथवा आन कोनहु चीज । तेँ अंग्रेजीक “मेजरमेण्ट” (MEASUREMENT) केर लेल मैथिलीमे “नाप या नापी” शब्दक प्रयोगे उचित । तहिना अंग्रेजीक “स्केल” (SCALE) शब्दक लेल मैथिलीमे “नापनी या नप्पा” ग्राह्य थिक जखनि कि “मापनी” अग्राह्य ।भूकम्पनापी यण्त्रकेँ अंग्रेजीमे सिस्मोमीटर या साइस्मोमीटर (SEISMOMETER) कहल जाइत अछि । एहिना, “भूकम्पलेखी” नामक यण्त्रकेँ अंग्रेजीमे सिस्मोग्राफ या साइस्मोग्राफ (SEISMOGRAPH) कहल जाइछ । भूकम्पलेखी यण्त्र भूकम्पीय गतिविधिसँ उत्पन्न विभिन्न तरहक तरंगसभकेँ एकटा विशिष्ट प्रकारक अभिलेख पत्र (GRAPH PAPER) पर अभिलेखित वा अंकित (RECORD) करैत अछि । भूकम्पलेखी द्वारा जे किछु अभिलेख प्राप्त होइत अछि तकरा मैथिलीमे “भूकम्पाभिलेख” ओ अंग्रेजीमे “सिस्मोग्राम या साइस्मोग्राम”(SEISMOGRAM) कहल जाइत अछि आ एकरहि वैज्ञानिक अध्ययनसँ भूकम्पीय गतिविधिक विश्लेषण कएल जाइत अछि । यद्यपि भूकम्पमापी आ भूकम्पलेखीमे किछु सुक्ष्म अन्तर अछि तथापि दुहु शब्द पर्यायी रूपमे व्यवहृत होइत अछि । भूकम्पलेखी वा सिस्मोग्राफ (SEISMOGRAPH) प्रायः पुरना यण्त्रसभक लेल प्रयुक्त होइत अछि जखनि कि नवका यण्त्रसभक लेल प्रायः भूकम्पनापी यासिस्मोमीटर (SEISMOMETER) शब्द प्रयुक्त होइत अछि । भूकम्प अध्ययन केन्द्रसभ पर एहि तरहक यण्त्र सालमे तीन सए पैंसठि दिन आ चौबीसो घण्टा सतत क्रियाशील रहैत अछि । एहि तरहक एकटा आओर यण्त्र अछि - भूकम्पदर्शी या सिस्मोस्कोप(SEISMOSCOPE) । ई यण्त्र धरतीक कम्पनक अभिलेखन सतत रूपमे लगातार नञि करैत अछि पर ई सूचना दैत अछि कि भूकम्प भेल छल आ भूकम्पक अकार केर बारेमे एकटा अपरिष्कृत (मोटा-मोटी) जानकारी दैत अछि । भूकम्पीय तरंगक वा धरतीक कम्पनक अभिलेखन ओ नापी कएनिहार भूकम्प-विज्ञानक ई उपशाखा भूकम्पमिति या सिस्मोमेट्री (SEISMOMETRY) कहबैछ तथा एहि तरहक समस्त यण्त्रसभकेँ भूकम्पमितिक यण्त्र या सिस्मोमेट्रिक इण्स्ट्रुमेण्ट्स (SEISMOMETRIC INSTRUMENTS) कहल जाइत अछि । — कोनहु भूकम्पाभिलेख भूकम्पक बारेमे की सभ बतबैत अछि ? - रत्तनक जानबाक इच्छा आओर बढ़ि गेल रहैक । — भूकम्पाभिलेखक वैज्ञानिक अध्ययनसँ पता चलैत अछि जे भूकम्पीय तरंगसभ मुख्यरूपसँ दू तरहक होइत अछि - पहिल कायिक तरंग आ दोसर सतही या धरातलीय तरंग । कायिक तरंग (BODY WAVES) भूकम्पक अधोकेन्द्रसँ चारू दिशामे पसरैत अछि, पृथिवीक भीतर सेहो । ई फेरो दू प्रकारक होइत अछि - पहिल “प्राथमिक या पी-तरंग” (PRIMARY / P - WAVES) आ दोसर द्वितीयक या एस-तरंग(SECONDARY / S - WAVES) । सतही या धरातलीय तरंग (SURFACE WAVES) भूकम्पक अधिकेन्द्रसँ निकलैत प्रतीत होइत अछि आ मात्र धरातल पर गमण करैछ, धरतीक भीतर नञि । ईहो पुनः मुख्यतः दू तरहक अछि - पहिल लव तरंग (LOVE WAVES)आ दोसर रेले तरंग (RAYLEIGH WAVES) । धरतीक कोनहु स्थान पर सभसँ पहिने प्राथमिक तरंग पहुँचैत अछि, तकरा बाद द्वितीयक आ तकर बादहि आन धरातलीय तरंगसभ । सतही तरंगसभक उत्पत्ति वस्तुतः कायिक तरंगसभसँ होइत अछि । रेले तरंग जलीयपारिस्थितिक तण्त्र (AQUATIC ECOSYSTEMS) आ लव तरंग भवनादि स्थापत्यक नेँओकेँ विशेष रूपसँ नोकशान पहुँचबैत अछि । — अपना मिथिलामे एहेन कोनहु केन्द्र अछि की ? - बब्बनक प्रश्नवाचक स्वर छल । — अछि तँऽ अवश्ये पर सुनबामे आयल अछि कि पछिला दसो बरखसँ ओकर गतिविधि मृतप्राय अछि । पछबारी चम्पारण जिलाक“वाल्मिकीनगर” नामक स्थान पर भारतीय मौसम विज्ञान विभागक ई भूकम्प वेधशाला (SEISMOLOGICAL OBSERVATORY)अवस्थित अछि । एकर स्थापना सन 1960 ई॰मे भेल छल आ 2005 ई॰मे एकर भूकम्पलेखी यण्त्र खड़ाब भ गेल से अद्यावधि ठीक नञि भेल अछि । — ओह ! ई तँऽ बड़ दुःखक गप्प अछि - रत्तन निराशा भरल भारी अवाजमे बाजल । — वाल्मिकीयेनगरमे - महर्षि वाल्मिकीक आश्रम छलन्हि ने - प्रीती पुछलक । — हाँ, ओत्तहि रहन्हि । ओना कानपुर लऽग एकटा स्थान अछि - उन्नाव । ओहि ठामक लोक सेहो एहि तरहक धारणाक दावा करैत अछि । पर सीता कौशल राज्यसँ निर्वासनक बाद वाल्मिकी आश्रममे लव आ कुशकेँ जन्म देने रहथि । आ चुँकि उन्नाव ओहि समय कौशल राज्यक अन्तर्गतहि अबैत छल जखनि कि वाल्मिकीनगर कौशलसँ बाहर मिथिलाक भाग छल, तेँ एहि बातकेँ बल भेटैछ कि वाल्मिकीयेनगरमे हुनक आश्रम छल । उल्लेख ईहो अछि कि शत्रुघ्नजी लवणासुरक वध हेतु अयोध्यासँ मथुरा जएबा काल लव आ कुश केर नामकरण कएलन्हि । ई बात वाल्मिकीनगरक विपक्षमे जाइत अछि । पर ईहो बात विदित होअए कि शत्रुघ्नजी लवणासुरक वध करबाक हेतु अयोध्यासँ मथुरा सोझ रस्तासँ नञि गेल रहथि । सर्वथा विपरीत मार्गक अनुसरण कएने रहथि जाहिसँ लवणासुरकेँ कनिकबहु शंका नञि हो । हुनक रस्ता बीहर जंगल आ पहाड़सँ भऽ कऽ जाइत छल जे कि बाल्मिकीनगर केर पक्षमे जाइत अछि नञि कि उन्नाव केर । बाल्मिकीनगर रेल्वे स्टेशनसँ (जे कि भारतमे अछि) करीब 6 - 7 कि॰मि॰ उत्तर भऽर बाल्मिकी आश्रम (एखन नेपालक चितवन राष्ट्रिय उद्यानमे पड़ैछ) अछि जे कि देखबा योग्य स्थान अछि । हम प्रीतीक बातकेँ फरिछबैत कहलियै । — कोनहु भूकम्प कतेक शक्तिशाली छल से कोना बुझैत छिऐ ? - सोनी पुछलक । — कोनहु भूकम्पक परिमाण अर्थात ओकर आकार बतबैत अछि कि भूकम्प कतेक शक्तिशाली छल । कोनहु भूकम्पक वास्तविक शक्ति वा ओहि भूकम्पसँ उत्पन्न कुल वास्तविक ऊर्जा जाहि युक्तिसँ नापल जाइत अछि तकरा भूकम्पक आकार या परिमाण नापनी(MAGNITUDE SCALE) कहल जाइत अछि । भूकम्पक परिमाण वा आकारक निर्धारणक लेल बहुत रास नापनी या स्केल बनाओल गेल अछि, पर जे सर्वाधिक प्रशिद्ध वा प्रचलित नापनी अछि से अछि “रिक्टर नापनी” या “रिक्टर स्केल (RICHTER SCALE / RICHTER MAGNITUDE SCALE) । अमेरिकी वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर अपन सहयोगी गुटेनबर्गक सहायतासँ सन् 1934 ई॰मे एकरा विकसित कएलन्हि । एहि नापनी या स्केल पर 01 सँ 12 धरिक अंक होइत अछि जे कि भूकम्पक आकारकेँ बतबैत अछि । — कतेक आकारक भूकम्प खतरनाक होइत अछि ? - बब्बनक सीधा प्रश्न छल । — 00 सँ 02 परिमाणक भूकम्पकेँ मात्र भूकम्पलेखी द्वारा बूझल जा सकैत अछि, मनुक्ख ओकर कम्पनक अनुभव नञि कऽ पाबैछ । 02सँ 03 परिमाणबला भूकम्पसँ जमीनमे बहुत हल्लुक कम्पन होइत अछि जे मात्र किछु अतिसंवेदनशील लोकसभ द्वारा अनुभव कएल जा सकैत अछि, जखनि कि बेशीतर लोक ओकर अनुभूतिसँ वञ्चितहि रहैत छथि । 03 सँ 04 धरिक आकारबला भूकम्पसँ किछु-किछु तहिना बुझाइत अछि जेना कोनो ट्रककेँ सोझाँसँ गेला पर कम्पन होइत अछि । 04 सँ 05 आकारक भूकम्पक कम्पनसँ खिड़कीक शीशा चनकि सकैत अछि या देबाल पर टाँगल फोटोफ्रेम आदि खसि सकैत अछि । 05 सँ 06 परिमाणबला भूकम्पसँ घरमे राखल चौकी - पलंग - कुर्सी आदि आन समानसभ हिलए लगैछ, 06 सँ 07 आकारबला भूकम्प घरक नेँओकेँ दड़का सकैत अछि तथा विशेष कऽ बहुमजिला भवनसभक उपरुका घरसभकेँ बेशी नोकशान करैछ । 07 सँ 08 तक आकारबला भूकम्प विनाशकारी होइछ तथा एहिसँ भवन वा आन स्थापत्यसभ ढहि सकैत अछि आओर जमीनक भीतर पाइपसभ फाटि सकैत अछि । 08 सँ 09 परिमाणबला भूकम्प अतिविनाशकारी होइत अछि आ पैघ पैघ दृढ़ स्थापत्यसभकेँ सेहो बेस नोकशान पहुँचा सकैछ, संगहि सामान्यरूपसँ बनल प्रायः सभ भवनादिकेँ सामान्यसँ लऽ कऽ गम्भीर क्षति पहुँचाबैत अछि । रिक्टर नापनी पर 09 सँ बेशी अकारक भूकम्प वस्तुतः प्रलयंकारी वा अतिप्रलयंकारीए (-अहि) बुझू; भूकम्पक अधिकेन्द्र आ ओकर आस-पासक प्रायः समग्र विनाश भऽ जाइत अछि । सामान्य भाषामे रिक्टर नापनी पर मात्र एक अंकक कमी-बेशी भेलासँ भूकम्पक विनाशकारी क्षमतामे क्रमशः दसगुणाक ह्रास या वृद्धि भऽ जाइत अछि । — पर भूकम्पसँ क्षति सभ जगह एक सनि किएक ने होइत अछि ? - सोनीक एहि जिज्ञाशाक हमरा पहिनहिसँ अपेक्षा रहए । — कोनहु स्थान पर भूकम्प द्वारा भेल विनाश भूकम्पक आकारक अतिरिक्त आन बहुत रास बातसभ पर निर्भर करैछ, जेना कि - भूकम्पक अधिकेन्द्रसँ ओहि स्थानक दूरी, ओहि स्थानक धरातलक आन्तरिक सतहक माटि ओ शैलखण्डक संरचना, स्थापत्य ओ निर्माणक मजगूती, जनसंख्या घनत्व आदि । एहि प्रकारेँ एक्कहि परिमाण वा आकारबला भूकम्पक तीव्रता आ तकर कारण होमएबला विनाशकारी प्रभाव भिन्न-भिन्न स्थान पर अलग-अलग होइत अछि, जकरा नपबाक लेल एकटा आन प्रकारक नापनीक प्रयोग होइत अछि । एहि नापनीकेँ भूकम्पक तीव्रता नापनी या सिस्मिक इण्टेन्सिटी स्केल (SEISMIC INTENSITY SCALE) कहल जाइत अछि । विभिन्न देशमे अलग-अलग तीव्रता नापनीक प्रयोग होइत अछि पर मान कमोबेश एकरंगाहे अछि आ प्रायः रोमण अंक पद्धतिमे(I,II,III,IV…….) लिखल जाइत अछि । बेशीतर तीव्रता-नापनीमे एक सँ बारह (I - XII) धरिक श्रेणी होइत अछि । भारतमे भूकम्पक तीव्रता नपबाक लेल पहिने मेद्वेदेव-स्पोनह्युवर-कार्निक नापनी (MEDVEDEV–SPONHEUER–KARNIK SCALE; MSK-64)प्रयुक्त होइत छल पर आइ-काल्हि यूरोपीय वृहत्भूकम्पीय तीव्रता नापनी (EUROPEAN MACROSEISMIC INTENSITY SCALE / EMS-98 ) केर प्रयोग बढ़ि रहल अछि । सं॰ रा॰ अमेरिकामे संशोधित मर्केली नापनी (MODIFIED MERCALLI SCALE) केर प्रयोग कएल जाइत अछि । — अपना क्षेत्रमे 1934 ई॰मे सेहो एकटा बडका भूकम्प आयल रहए ने ? - प्रीती जानए चाहलक । — आ 1988 ई॰मे सेहो - प्रीतीक बात पूरा होइते रहै कि बब्बन बाजि उठल । — हाँ, 1988क भूकम्प विनाशकारी छल जखनि कि 1934क भूकम्प अतिविनाशकारी । 21 अगस्त 1988 कऽ जे भूकम्प आयल छल तकर आकार रिक्टर नापनी पर 6.9 बताओल गेल छल (किछु वेधशाला द्वारा 7.2) जखनि कि भूकम्पक केन्द्र नेपालक उदयपुर शहर लग धरातलसँ 62 कि॰मि॰ गँहीर छल । 15 जनबरी 1934 केर भूकम्पक आकार रि॰ना॰ पर 8.1 (किछु वेधशाला द्वारा 8.4) कहल संगहि भूकम्पक केन्द्र नेपालक सगरमाथा या माउण्ट एवरेस्ट (MOUNT EVEREST) पर्वत शिखरसँ 9.5 कि॰मी॰ दच्छिनमे धरतीक सतहसँ 33कि॰मी॰ गँहीर छल । एकर अतिरिक्त 18 सितम्बर 2011 कऽ सेहो एकटा भूकम्प आयल छल जकर आकार रि॰ना॰ पर 6.9 छल आ केन्द्र भारतक सिक्किम राज्यमे कञ्चनजङ्गा रिजर्व क्षेत्रमे छल जे धरातलसँ 19.7 कि॰मी॰ गँहीर अवस्थित छल । काल्हि (18 दिसम्बर 2014ई॰ कऽ) जे भूकम्प आयल छल तकर आकार रि॰ना॰ पर 5.9 जनाओल गेल अछि तथा एकर मूल नेपालक प्रशिद्ध नामचे बजार सँ 26कि॰मी॰ उत्तर पच्छिममे 10 कि॰मी॰ गँहीर छल । एहि भूकम्पसभक अधिकतम तीव्रता (विनाशक क्षमता) क्रमशः नओ, एगारह, सात ओ पाँच (IX, XI, VII आ V) छल । — अरे, बाप रे ! …………… एगारह तीव्रता रहै …………… रत्तन अचम्भित स्वरेँ बाजल । — हाँ । ई एतेक विनाशकारी छल कि सम्पुर्ण मिथिलाकेँ तहसि-नहसि कऽ देलक । संगहि मिथिलाक चारू कातक परिक्षेत्रमे सेहो भारी तबाही कएलक । निर्मली - भप्तियाहीक बीच रेलपुल टुटलासँ सीधा सम्पर्क टूटि गेल जे अद्यावधि बहाल नञि भऽ सकल अछि । दरभंगा-सहरसा रेल लाइन पुर्णतः टूटि गेल जे दोबारा आइ धरि नञि बनि सकल । राजनगरक नौलक्खा महल सही रूपेण बसबासँ पहिनहि उजड़ि गेल । नेपालक धरहरा स्तम्भ केर सभसँ उपरुका तीन टा तल्ला टूटि गेल जकरा बादमे फेरसँ बनाओल गेल । पच्छिम चम्पारणमे बगहा-छितौनीक बीच रेल पुल टुटलासँ करीब 60 वर्ष धरि रेल सम्पर्क बाधित रहल । कोशी (कोसी) नदीक रस्तामे स्थायी परिवर्तन भऽ गेल - ओ पूबसँ आओर पच्छिम दिशि घुसकि गेल । मिथिलामे प्रायः एहेन कोनहु मकान नञि छल जे क्षतिग्रस्त नञि भेल होअए आ एहि क्षेत्रक प्रायः सब कच्चा मकान ढहि गेल । जान मालक अपार क्षति भेल । एहि भूकम्पक धक्का (झटका) एतेक जोड़गर छल जे उत्तरमे तिब्बतक ल्हासासँ दच्छिनमे बम्बई धरि आ पूबमे बर्मासँ (आब म्यांमार) लऽ कऽ पच्छिममे अमृतसर तक ओकर नीक जेकाँ अनुभव कएल गेल । — बाबा तँऽ कहैत रहथिन्ह जे कऽलसभमे अपने-आप पानि खसए लागल छल - बब्बन टीका कएलक । — एहि भूकम्पक एकटा विशेषता छल कि बहुत विस्तृत भूभागमे धरतीक भीतरसँ पानि आ बालुक बमकल्ला (SAND & WATER VENTS) फूटल छल । धरतीमे बहुतो ठाम पैघ-पैघ दड़ारि (FISSURES) फाटि गेल रहए । ओहि समयक निर्मली रेल्वे स्टेशन भू-द्रावण/ भू-द्रवीभवनक (SOIL LIQUEFACTION) कारण करीब 3 मीटर (10 फीट) नीचाँ जमीनमे धँसि गेल आ तकरा ऊपर बालु भरि गेल । बहुत रास ईनार आ पोखरिक पेनीमे बालु जमा भऽ गेल, बालुक कारण बहुत रास उपजाउ खेत बर्बाद भऽ गेल । बहुतो चापाकऽलसभ बालुक कारण खड़ाब भऽ गेल जखनि कि आन बहुतो ईनार आ चापाकऽल जे पहिनेसँ सुखाएल छल - पानिसँ भरि गेल । अधिकेन्द्रसँ करीब650 सँ 700 कि॰मी॰ धरिक परीधीमे भवनादि स्थापत्यसभ ढहबाक रेकॉर्ड उपलब्ध अछि । सरकारी आँकलनक अनुसार नेपालमे कुल 10800 सँ 12000 लोक आ बिहारमे 7253 लोक मारल गेलाह, पर आन सूत्रसभक अनुसार ई संख्या एहिसँ बहुत बेशी छल । कोनहु भूकम्पक पहिल शक्तिशाली कम्पन वा मुख्य संक्षोभ (MAIN SHOCK) केर बादहु किछु दिन/महिना/साल भरि तक भूकम्पक छोट-मोट झटका आबैत रहैत अछि, जकरा पराकम्पन या पश्च संक्षोभ (AFTER SHOCKS) कहल जाइत अछि । रेकॉर्ड बतबैत अछि कि उनैस सए चौंतीसक एहि भूकम्पक नओ महीना बाद तक (1934 ई॰क अक्टूबर महीना तक) मनुक्खकेँ अनुभव करबा योग्य पराकम्पन अबितहि रहल ।…………….. आ भविष्यमे ईहोसँ पैघ विनाशकारी भूकम्प आबि सकैत अछि - हम कहलियै । हमर ई बात सुनि सभ अचानक शान्त भऽ गेल । सभ धियापुता चुपचाप हमर बातकेँ ध्यानसँ सुनि रहल छल । पुर्ण शान्ति छल । जँ एकटा सुइयो जमीन पर खसैत तँ ओकर अवाज सुनल जा सकैत छल - शुचिपात स्तब्धता। — कहिया ? - सोनीक मन्द स्वर शान्त वातावरणक बीच बहरायल । — से केओ नञि कहि सकैत अछि - भऽ सकैए एखने, आइए, चारि दिन बाद, चारि महीनाक बाद, चारि साल बाद, चारि दशकक बाद, या फेर …………… वास्तवमे एतेक वेज्ञानिक प्रगतिक बादो भूकम्पक समयक भविष्यवानी करब एखन धरि सम्भव नञि भेल अछि । — अपना मिथिलामे एतेक भूकम्प किएक अबैत अछि ? - रत्तन हमरासँ उताराक अपेक्षा रखैत बाजल । — एकर कारण अछि कि भारतीय विवर्तन छज्जी आ यूरेशीय विवर्तन छज्जीक टकराओ केर भ्रंश रेखा मिथिलाक क्षेत्रसँ जरैत अछि जाहि कारण ई भूकम्प सम्भाव्य क्षेत्र सं॰ 5 केर अन्तर्गत आबैत अछि । — ई भूकम्प सम्भाव्य क्षेत्र सं॰ 5 की अछि ? - प्रीतीक सोझ प्रश्न छल । — भारतक कोन क्षेत्रमे भूकम्प अएबाक कतेक सम्भावना अछि ताहि आधार पर समस्त भारतकेँ पाँच गोट क्षेत्रमे बाँटल गेल छल जकरा “भूकम्प क्षेत्र” या “भूकम्प सम्भाव्य क्षेत्र” (SEISMIC ZONES / SEISMOLOGICALLY PRONE AREAS) कहल जाइत अछि आ एकसँ लऽ कऽ पाँच धरिक संख्यासँ निर्देशित कएल जाइत अछि । भू॰सं॰क्षे॰सं॰-1 केँ भूकम्पक संभावनासँ रहित क्षेत्र मानल गेल, भू॰सं॰क्षे॰सं॰-2 केँ अत्यल्प (न्यूनतम) सम्भावनाबला क्षेत्र आ भू॰सं॰क्षे॰सं॰-5 केँ सभसँ बेशी (महत्तम) सम्भावनाबला क्षेत्र मानल गेल । बादमे बुझना गेल जे भारतीय प्रायद्वीप पर कोनहु क्षेत्रविशेषकेँ भूकम्परहित क्षेत्र मानब गलत अछि । वस्तुतः जखन भारतीय विवर्तन छज्जी आगाँ घुसकैत अछि तँऽ छज्जीक माँझ कतहु भ्रंश केर निर्माण भऽ सकैत अछि आ से बादमे भूकम्पक स्वतन्त्र कारण बनि सकैत अछि । एहि प्रकारक भूकम्पकेँ अन्तः-छज्जी / अन्तर्छज्जी भूकम्प (INTRA PLATE / INTRA TECTONIC EARTHQUAKE) कहल जाइत अछि । सन 2001 ई॰मे सूरतमे आयल भूकम्प एहने भूकम्पक उदाहरण छल । तेँ भू॰सं॰क्षे॰सं॰-1 केँ समाप्त कऽ देल गेल आ सम्पुर्ण भारतकेँ भू॰सं॰क्षे॰सं॰-2, 3, 4 आ 5 मे बाँटि देल गेल जे आइ धरि मान्य अछि । अपन मिथिलाक केन्द्रीय भाग भू॰सं॰क्षे॰सं॰-5 मे आबैत अछि जखनि कि परीधीय मिथिला भू॰सं॰क्षे॰सं॰-4 मे आबैत अछि । — तखन तँऽ मिथिलासँ पलायने उचित - बब्बन बाजल । — नञि, हमरा जनैत कथमपि नञि । पलायन कएनिहार व्यक्ति कतहु सफल नञि होइत अछि । हमरालोकनिकेँ एही ठाम रहि विकाशक रास्ता तकबाक चाही । जँ पलायने रस्ता रहैत तँऽ जपानक लोकसभ कहिया ने पलायन कऽ गेल रहैत आ जपान विरान भऽ गेल रहैत । ओहुना हर जगह पर भूकम्प नञि तँऽ कोनहु आनहि प्राकृतिक आफदसभ अवश्य रहैत अछि, सृष्टिमे जीवन-यापन कतहु अतिसुगम नञि अछि । देशक राजधानी दिल्ली सेहो भू॰सं॰क्षे॰सं॰-4मे आबैत अछि । — एहिनामे की करबाक चाही - प्रीतीक प्रश्न कानमे पड़ल पर ई प्रश्न सभ धियापुताक मोनमे चलि रहल छलै । — एहिनामे धैर्य आ विवेकसँ काज लेबाक चाही । समकालीन वैज्ञानिक ज्ञानक यथासम्भव उपयोग करबाक चाही । — ओहिमे तँऽ बेशी खर्च लगैत हेतैक ? - सोनी पुछलक । — जरूरी नञि छै कि हमेशा खर्च बेशीए लागए । 1934 ई॰क भूकम्पमे राजनगरक नौलक्खा महल, दरिभंगामे छत्र निवास महल (पैलेश) आदिकेँ ध्वस्त भेलाक बाद दरिभंगामे नरगओना महल (पैलेश) केर निर्माण भेल जे तत्कालीन वैज्ञानिक ज्ञानक आधार पर बनाओल गेल । ओ एहि समस्त क्षेत्रक पहिल भूकम्परोधी भवन छल । ई महल बाहरसँ बहुत साधारण लगैत अछि, कोनहु तरहक अनावश्यक अलंकरणसँ रहित अछि पर ओहि समयक भूकम्परोधी स्थापत्य अभियान्त्रिक ज्ञानक पुर्ण प्रयोग कएल गेल अछि । नेँओ मजगूत देल गेल अछि, भवनक देबालक उपर देबाल अछि, देबालक या खम्भाकेँ नीचासँ उपर धरि एक सीधमे राखल गेल अछि, कतहु कोनहु बाह्यधऽरनि / बाहुधऽरनि(CANTILEVER) नञि देल गेल अछि, कोनो तरहक तोरण / चाप / मेहराब (ARCH) नञि देल गेल अछि । एकर निर्माणमे ईंटेबाक प्रयोग नञि कएल गेल अछि अपितु सम्पुर्ण महल केर देबाल आ खाम्ह मात्र कंक्रीटसँ बनल अछि । — तहिना चीन तकनीक बल पर तिब्बतक भूकम्प प्रभावित क्षेत्रमे यार्लङ्ग साङ्ग्पो (YARLUNG TSANGPO) नदी (चीनमे ब्रह्मपुत्र नदीक नाँओ) पर एकटा अति महत्वाकांक्षी बान्ह केर निर्माण कएलक अछि । यद्यपि एकर विरोधमे सेहो बहुत स्वर उठल अछि पर एकटा बात विचारणीय अछि कि बिना खतरा मोल नेने सफलता नञि भेटैछ । हाँ आवश्यकता अछि ओहि खतरा वा सम्भावित दुर्घटनासँ बचाओ करबाक हेतु समुचित व्यवस्थाक । तेँ एहि क्षेत्रक समुचित विकाशक लेल दृढ़ ईच्छाशक्तिक संग सभसँ पहिने एहि ठामक लोकसभकेँ आ तकरा संगहि राज्य ओ केन्द्र सरकारकेँ सोझाँ आबए पड़तैक । अपनासभमे कहबीयो छैक कि “बऽडर बुड़िबक तँऽ दहेज के लेत” । एहि कहबीक अर्थ दहेजप्रथाकेँ समर्थन करब नञि थिक आ नहिञे हमरासभकेँ तकर समर्थन करबाक चाही । ओहुना कोनहु कहबीक शब्दार्थ नञि ग्रहण कऽ ओकर भावार्थ ग्रहण कएल जाइत अछि । तेँ एकर गूढ़ अर्थकेँ बुझबाक प्रयास करह ! जँ एहि ठामक लोके एहि ठामक समस्यासँ पलायन करैत रहत, ओकरा लेल अवाज नञि उठाओत, ओकर निराकरणक लेल काज नञि करए चाहत तँऽ राज्य ओ केन्द्र सरकार किएक ने कानमे तूर दऽ कऽ सूतल रहत । — ठीके कहैत छी अहाँ - रत्तन बाजल । — एकदम सही, हम सभ पलायनक बारेमे सोचबो नञि करब - बब्बनक सहमति भरल पाँती छल । — चाहे पढ़बाक-लीखबाक लेल वा कमएबाक लेल जतऽ कतहु जाइ, पर आपिस आबि अपना मिथिला लेल काज करब - प्रीती बाजलि । — हमहूँ - सोनी समर्थन स्वरमे बाजलि । — तँऽ आजुक भूकम्प-कथा आब एत्तहि समाप्त करैत छी । बाकी काजसभ सेहो करबाक अछि ने । आ अहूँसभकेँ तैय्यार भऽ कऽ इस्कूल जएबाक अछि । - हम सीरककेँ कातमे टारैत कहलियै । — हँ , ठीक छै - सभ धियापुता से कहि विदा भेल आङ्गन दिशि। सृजन शेखर 'अज्ञेय' (मूल नाम गंगानंद झा) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ ठाकुरजीक विषयमे लिखब शुरू करैत जे बात सामने अबैत अछि ओ ई अछि जे हमरा सन reluctant मैथिल कें मैथिली भाषामे लिखब,मैथिल समाज आ संस्कृतिक विषयमे जिज्ञासा प्रेरित करबामे हिनक निर्णायक भूमिका | हम वैद्यनाथ धाम देवघरक पंडा समाजसं अबैत छी |मिथिला आ मैथिलीसं हमर परिचय मिथिलाक तीर्थयात्री सभक आइनासं भेल छल | हम मैथिलक रूपमे अपन पह्चानक लेल कतेक प्रश्न सभक जबाब तकैत छलहु | सोझाँवाला व्यक्तिकें सम्मान द’ क’ अपना संग ल’ चलब आ अपन लो प्रोफाइल बनौने रहब ठाकुरजीकें प्रभावकारी बना दैत छलनि | ठाकुरजी हमरा भरोसा दिऔलनि जे हम मैथिलीमे बाजियेटा नहि, लिखियो सकैत छी |हिनके प्रेरणासं हम अपन पहिचानक सम्बन्धमे आलेख ‘वैद्यनाथ धामक पंडा ----प्रवासी मैथिल’ शीर्षकसं लिखने छलहु जकरा ई मैथिलीक मासिक पत्रिका ‘माटि पानि’मे प्रकाशित करबौने छलाह | अहिना आकाशवाणी, पटनासं मैथिली कार्यक्रम ‘भारती’मे हमरा एकटा वार्ता प्रसारित करबाक अनुरोध भेटल | विषय छल ‘मिथिलामे दीयावातीक परंपरा’ | हमरा आश्चर्य भेल मुदा बुझबामे दिक्कत नहि भेल जे हिनके पहलपर ई अनुरोध आयल हैत | हिनका पुछलापर हमर अनुमानक पुष्टि भेल | हमर वाध्यता भ’ गेल जे मिथिलाक जनजीवनक पड़ताल करी आ मैथिलीमे प्रस्तुतिक लेल अपनाकें प्रस्तुत करी | अपना उपर हिनक आस्था हमरा उर्जा प्रदान केलक आ हम सफलतापूर्वक पहिल बेर आकाशवाणीपर लाइव वार्तामे भाग लेलहुँ | हम ठाकुरजीकें अनेक आन मैथिली अनुरागी सभ जकाँ मिथिला और मैथिलीक प्रति स्पर्शकातर नहि पौलहुँ, तें मिथिला आ मैथिलक कमजोर पक्षक सम्बन्धमे सेहो बेवाक विमर्श करब संभव होइत रहल | श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क संग हमर परिचय सिवानक मैथिली साहित्य परिषद्क नियमित मासिक गोष्ठीमे सन १९८०ई. मे भेल | लजकोटर युवकक मधुर स्वरमे स्वरचित गीत सभ मैथिली साहित्य परिषदक गद्यात्मक अड्डाकें प्राणवंत क’ देने छल | सूचना भ’ गेल छलै जे आब नव आयाम उभड़त | ठाकुरजीक गीतमे मधुरताक संग पारिवारिक आ सामाजिक विसंगति, व्यक्तिगत व्यथा-कथाक जोरदार अभिव्यक्ति होइत छल | सिवानमे लोकप्रिय चिकित्सक डा. बी. एल. दास एवं हुनक पत्नी श्रीमती आशा दास सज्जनता, सदाशयता आ मिथिला, मैथिली प्रेमक लेल अलग पहचान रखैत छलाह | ओइ भोजपुरी भाषी अंचलमे हुनकर सानिध्य मैथिली भाषीक लेल घरसं बाहर घरक आश्वासन छल | जगदीश चन्द्र जी आ हिनक दूटा सहकर्मी श्री मोद नारायण झा आ श्री अरुण कुमार झा सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडियाक स्थानीय शाखामे पदस्थापित छलाह | ओइ समय हमरा कॉलेजमे सेहो श्री विमलेन्दु शेखर झा, डा. अमर नाथ ठाकुर,श्री गिरीन्द्र मोहन झा योगदान केने छलाह |हिनका सभक अतिरिक्त स्थानीय समाहरणालयमे वरीय सहायकक पदपर श्री अच्युतानंद कंठ आ श्री नरेश दत्त छलाह | हमर कॉलेजक वरीयतम प्राध्यापक प्रो.सिया शरण सिंह और प्रो. कमलोद्भव शर्मा अपन मैथिली प्रेम आ मैथिली जुमलाक लेल विशिष्ट बनल छलाह | जगदीशजीक गीत सभ गोष्ठीक चरित्रकें बदलि देलक | हिनक गीत संग्रह ‘तोरा अंगनामे’ प्रकाशित भ’ चुकल छलनि | हिनक गीत ख़ास क’ ‘ फगुआ आयल, फगुआ गेल’, ‘तोरा अंगनामे.....’, ‘छोटे-मोटे टूटलि मडैयामे गौरी कोनाक रहती हे’ सूचित करबामे कामयाब भेल जे आब एहि संस्थामे विविधताक सौन्दर्य प्रचुरतामे रहल करत | गोष्ठी जे एखन तक विना कोनो एजेंडाके बस गपशप और डा.दासक मधुर आतिथ्य लाभ तक सीमित रहै छल, आब निर्धारित विषयपर विमर्शसं समृद्ध होम’ लागल | सन १९८१ आ १९८२ मे लगातार विद्यापति पर्व आयोजित कयल गेल जाहिमे रविन्द्र-महेंद्र आ शशिकांत-सुधाकांतक जोड़ी स्थानीय भोजपुरी सुधी जनकें मैथिलीक माधुर्य आ संगीतसं आप्लावित क’ देलक | जट्ट-जट्टीनक गीत-कथाक रसास्वादन करबाक अवसर भेटल | कहबाक प्रयोजन नहि जे एहि आयोजनमे विशिष्ट कलाकार आ विद्वान सबहक भागीदारी जगदीशजीक संपर्कक कारण संभव भ’ सकल छल | मध्य प्रदेशमे स्थानांतरण भ’ गेलाक बादो जगदीशजीक सक्रियता कम नहि भेल | नवीन परिवेशक संग अनुकूलन स्थापित करैत ई मुख्यतः हिंदीमे लीखब जारी रखलनि तथापि मैथिलीयोमे लिखनाइ छुटलनि नहि | अन्य रचना सबहक अतिरिक्त हिंदीमे गजल संग्रह ‘तिरंगे के लिए’ आ मैथिलीमे दीर्घ कविता ‘धारक ओइ पार’ ओही प्रवास अवधिक सृष्टि अछि | नोकरीसं सेवा निवृतिक पश्चात् पटना आबि क’ मैथिली साहित्य एवं संस्कृतिक मुख्य-धारामे सहजहि आबि गेल छथि | हमरा विश्वास अछि जे ई मैथिली साहित्य, संस्कृति आ समाजकें समृद्ध करबामे सकारात्मक योगदान करैत रहताह | विहनि कथा- अशुभ इच्छा दादी माँ के पहिल बरखी नज़दीक आबि गेल छलै।बच्चा में जखन कियो हँसियों में कहि दै छलै जे दादी मरि जेतौ कि हेमों-ढेकार भऽ कानब शुरू ,से दादी माँ के बरखी लगचिआ गेल छलै।साल बितऽ वला छलै लेकिन अखनहुँ फ़ोटो के देख कऽ असग़र में हिचकी उठि जाय छलै,चुपचाप अइंख पोइछ लैतछलए। बिआहक पहिल साल कोजगरा नय भऽ पेलै।बिआह भेलै बीच जेठ में ,ने मधुश्रावनीए के छुट्टी भेटलै ने कोजगरे में।दादी माँ आैर माँ धमकी दऽ देने रहै जे किछ भऽ जाय कोजगरा एय साल हेब्बे टा करतै चाहे नौकरी छोड़ऽ किए नय पड़ै। किछु फुरा ने रहल छलै जे कोना कऽ छुट्टी लेल जाय,फेर अचानक सँ जेना किछ फुरलै गेलै Boss लऽग गेल आ कहलकै जे दादी माँ के तबीयत बहुत ख़राब अछि हमरा तुरंत छुट्टी चाही।कोजगरा बहुत धूमधाम सऽ भेलै ।दादी माँ बड्ड प्रसन्न छलै,ख़ूब मखान बँटलकै।इ पूछला पर जे कोना छुट्टी भेटलै ओ चुप्पेरहि जाए।चारि-पाँच महीना के बाद दादी माँ के सच में बड़ ज़ोर मोन ख़राब भऽ गेलै आ तकर दू-तीन महीना बाद ब्रेन हेमोरेज सऽ हुनक देहांत।अखनहुँ सोचैये जे दादी माँ के मोन ख़राब के बहाना सँ छुट्टी नहिं नेने रहितउँ। बाल मुकुंद पाठक- करियन समस्तीपुर मैथिलीक गजलक सशक्त हस्ताक्षर 'अनिल' अरबी-फारसीसँ आरंभ भेल गजल कहबाक परंपरा उर्दू केर माध्यमसँ हिन्दुस्तानमे आयल आ हिन्दी सहित नेपाली, बंगाली, गुजराती, बुन्देली, मैथिली, मराठी आदि-आदि क्षेत्रीय भाषामे सेहो पसरि गेल आ ओहि भाषाकेँ पद्य साहित्यमे एकटा सशक्त विधाकेँ रूपमे अपनाकेँ स्थापित क' लेलक. मैथिलीमे सर्वप्रथम गजल कहबाक श्रेय पंडित जीवन झा केँ जाइत छनि. हिन्दी पत्रिका अंजुमनमे प्रकाशित आलेख 'मैथिली गजल के बारे में' मे मैथिली गजलक जानकार आशीष अनचिन्हार लिखैत छथि कि 800 ई. सँ- 1905 ई. धरि मैथिली नाटकमे गीत गयबाक प्रचलन छल मुदा 1905 ई. मे नाटक 'सुंदर संयोग' मे पंडित जीवन झा द्वारा पहिल बेर गीत केर स्थान पर गजल प्रयोगमे आयल. मुदा 2008 ई. मे 'अनचिन्हार आखर' केर स्थापनाक उपरांत मैथिली गजल प्रकाशमे आयल आ तकरे प्रभावसँ आइ मैथिलीमे लगभग दू दर्जनसँ बेसी गजलकार एक संगे गजलक माध्यमे अपन बात कहबामे लागल छथि. यैह ओ समय छल जखन मैथिली गजल हमरा सेहो अपना दिस आकृष्ट केने छल. एहि क्रममे विदेह ई-पत्रिकामे छपल गजलक एकटा शेर पर नजरि पड़ल- 'जै खातिर मारा मारी अछि भात दालि तरकारी अछि' शाइर रहथि जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' ई शेर ततेक ने प्रभावित केलक कि तकरा बाद ई नाम हेर-हेर केँ पढ़ लगलहुँ- 'जंगल आ पहाड़ देखलौं जीवनमे गुजगुज राति अन्हार देखलौं जीवनमे' 'जुनि पूछू की करै छी हम नित स्वयंसँ लड़ै छी हम' अनिल जीक गजलक सबसँ पैघ विशेषता ई छैक कि ओ एकदम्म सहज आ सरल भाषाशैलीमे पैघसँ-पैघ बात पाठककेँ मोनमे बहुत सरलतासँ उतारि दैत छथि. मैथिली साहित्यसँ मिथिलाक आमजनकेँ कटबाक एकटा कारण ईहो रहल अछि कि मैथिलीमे अधिकांश लेखक आलोचककेँ ध्यानमे राखि संयुक्ताक्षर बला शब्द भरल रचना करैत रहलाह अछि एहिठाम अनिल जीक रचना सभ आमजनकेँ मैथिलीसँ जोड़बाक एकटा प्रयत्न बुझा पड़ैत अछि. 'अपने छी एत्त आ मोन कतहु टांगल अछि जानि नहि देखबा ले' की की सभ बाँचल अछि' 'ईष्या घृणा कपट आ निन्दा सीखि रहल छी देखू अप्पन भाग्य अपने लीखि रहल छी' मैथिलीमे बिना बहरक गजल कहबाक बहुत पुरान परंपरा रहल अछि आ आइयो बिन बहर गजल कहनाहर गजलकारक एकटा पैघ लिस्ट अछि. एगो समय एहनो छल जखन अनिल जी सेहो एहि बहरक झंझटिसँ अकछि गेल छलाह, अपन शेरक माध्यमसँ ओ स्वयं कहैत छथि- 'बहरक झंझटसँ हमरा आजाद करू हम गजल छी हमरा नहि बरबाद करू' ओतहि बादमे गजलमे बहरक महत्ता बुझलाक बाद कहैत छथि- 'खिड़की केबाड़ किछु नै महल कोना भेलै नै रदीफ आ ने काफिया गजल कोना भेलै' अओर सच तँ ई अछि जे मनुखमे सीखबाक प्रवृति रहबाक चाही, जाहि मनुखमे ई प्रवृति बनल रहतैक ओ अबस्से एक-ने-एक दिन सफलता हासिल करतैक आ से अनिलजी सीखबाक एहि भूखसँ अरबी बहर आधारित गजल कहबामे सेहो सक्षम भेलनि, शाइत एहने स्थितिमे अनिल जी द्वारा ई शेर कहल गेल छल- 'पढ़बाक मोन होइए लिखबाक मोन होइए सदिखन किछु ने किछु सीखबाक मोन होइए' जगदीश चन्द्र ठाकुर जीक जन्म २७.११.१९५० केँ शंभुआर, मधुबनीमे भेलनि. एखनधरि तोरा अङनामे -गीत संग्रह, धारक ओइ पार-दीर्घ कविता आ गीत गंगा-गीत संग्रह प्रकाशित छनि ओतहि गजलक गजल गंगा पहिल पोथी गूगल बूक स्टोर पर ई-बुक मे उपलब्ध छनि. तिरंगे के लिए नामसँ हिनक एकटा गजल संग्रह हिन्दीमे सेहो बहरायल छनि. श्री अनिल वृतिसँ सेवानिवृत बैंक अधिकारी छथि आ मैथिली गजलमे शेर कहबाक एकटा विशिष्ट आ अपन अलग ढंग लेल जानल जाइत छथि. सबूतकेँ रूपमे दू टा शेर उद्धृत अछि- 'अहाँ पूब कहब ओ पश्चिम जाएत अहाँ की करबै अहींकेँ खाएत आ अहींकेँ गरियाएत अहाँ की करबै' नीक वक्ता बनबासँ पहिने नीक श्रोता बनब जरूरी अन्यथा अहाँके देखिकेँ लोक पड़ायत अहाँ की करबै आइ मैथिलीमे युवा गजलकारक एकटा पैघ लिस्ट अछि मुदा ओहि गजलकारक शेर सभमे ओ शेरियत नहि झलकैत अछि जाहि कारण हल्लुक आ झुझुआन शेर सब बेसी सोझाँ आबि रहल अछि. कतेक गजलकारक शेर पढ़लाक बाद तँ एना प्रतीत होइत अछि जे बेकारमे शब्द आ समय बेरबाद कयल जा रहल अछि आ गजलक गर्दनि घोंटल जा रहल अछि. एहनमे अनिल जीक मैथिली गजल एकटा नव ढ़गसँ मैथिली गजलकेँ परिभाषित करैत अछि. हुनका गजलमे एकटा खास चमक अछि, टटकापन अछि आ संगहि खांटी मैथिली शब्दसँ सजाओल सहज कथन- 'भय कुंठा आ संत्रास निराशा जीवनमे तैयो अछि जीवन केर आशा जीवनमे' 'जिनगीकेँ अखबार बनौने बैसल छी हम घरकेँ बाजार बनौने बैसल छी' सत्ताधारी वर्ग द्वारा लगातार उपेक्षित मिथिलामे बंद भेल सभटा कल-कारखाना आ दिनानुदिन बढ़ैत पलायन पर चिन्ताग्रस्त भ' अनिल जी कहैत छथि- 'चिन्ता तनकेँ दागि रहल अछि की करियै मोन कतौ नै लागि रहल अछि की करियै कतौ नै रहल कल कारखाना मिथिलामे लोग गामसं भागि रहल अछि की करियै' मैथिली गजलक मध्ययुगमे जन्मलेनिहार एहि गजलकारकेँ पढ़लाक उपरांत मोनमे कतेको तरहक प्रश्न उठैत अछि. शेर कहबाक अपन अलग ढ़ग ओ शैलीक कारणे जत' कत्तो मैथिली गजलक चर्च होएत जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल जीक चर्चा अबस्स टा कयल जाएत.. मैथिलीक एहि सशक्त गजलकारसँ मैथिली गजलकेँ बहुत रास उमेद छैक, हुनका एखन बहुत पैघ यात्रा करबाक छनि जाहिसँ हम-अहाँ एहिना गजल गंगा मे डुबकी लगबैत रही.. अंतमे अनिल जीक एहि दुनू मतलाक संग आलेख समाप्त क' रहल छी- 'अपने छाँहसँ हम डेरा गेल छी अपने घरमे हम हेरा गेल छी' 'किछु बात सोचि-सोचि क' कना जाइए अहिनामे कौखन मोन औना जाइए' अरविन्द ठाकुर ’गीत-गंगा’ के बहाने किछु बतकही राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर अपन आलेखमे पूर्वमे प्रचलित एहि कहावतकेँ उद्धृत केने छथि-- बिना कोक जो रति करे, बिन गीता भख ज्ञान बिन पिंगल कविता रचै, तीनों पशु समान एहि कहावतक संग दिनकर उल्लेख केने छथि जखन ओ सभ काव्यक क्षेत्रमे आएल छला तँ कवि लोकनिमेपिंगल पढ़बाक रिवाज छल मुदा आब कोय पिंगल नै पढ़ैछ, ने कोय प्रसतार साधैत अछि। ओ क्षोभ व्यक्तकरैत कहैत छथि जे जखन छंदहि बिदा भऽ गेल तखन पिंगल के बेगरता की रहि गेल।ओ व्यंग्य करै छथि पुरना परंपरा सभकेँ टुटलाक बाद जे नवका परंपरा सभ कायम भेल अछि ओहिमेसँ सभसँ प्रमुख परंपरा ई अछि जे स्वतंत्रता कोनो नियमकेँ नै जानैछ आ तैं ओकरा कोनो टा पापक ज्ञान ने अछि। वर्तमानमे "समकालीन", प्रगतिशील आदि शबद्क आग्रह साहित्यमे बढ़ल अछि आ अनेको साहित्य गुरू लोकनि ई फतवा दऽ चुकल छथि जे छंदमुक्त कविते समकाली आ प्रगतिशील अछि किए तँ एहिमे भाव आ विचारकेँ बेसी स्वतंत्रतासँ प्रगट कएल जा सकैत अछि। गीत-गजल-दोहादि आब बाबा आदमक जमानाक वस्तु भेल आ तेँ आउट-आफ-डेट विधा भेल। एहि मान्यतासँ प्रायः प्रत्येक भाषा साहित्य प्रभावित भेल अछि। हिंदीक प्रसंगमे बुद्धिनाथ मिश्र एक ठाम लिखए छथि-"शंभूनाथ सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रमेश रंजक, शिवबहादुर सिंह भदौरिया सन अनेक गीतकारक गीत संग्रह आयल मुदा साहित्य अकादेमी ओहि दिस आँखि मुनने रहल"। मैथिली भाषा मुदा एहि मामिलामे अपवाद जकाँ रहल। आन भाषाक तुलनामे मैथिलि अखनियों परंपरावादी कवि सभहँक बहुमतसँ संपन्न अछि आ मुक्तछंदी कवि सभक तुलनामे बेसी तगतगर आ संगठनबल बद्ध सेहो रहल अछि। मुदा मैथिलीक ई कवि कर्म संख्या बलमे, मात्राबलमे प्रबल होइतो स्तरबलमे बहुत फोंक रहल अछि। विषय-वस्तु, प्रस्तुतिकरण आदिमे समाजिक चेतनाक कोनो ध्यान रखने बिना मात्र तुकबंदीक बलपर जखनि रचनाक पथार लहाए देल गेल हुअए आ ओकरा गुरू-महंथ-आचार्य सभक सुरक्षा-प्रशंसा-सम्मानक त्रयीकेँ कवच सेहो बेट गेल हुअए तखनि एहन साहित्यक अकादेमीक भगवाने मालिक। तखनि ई मेदनी साफे वीर विहीन तँ कहियो ने रहल अछि। हम जहिया स्वान्तः सुखाय लिखैत रही तँ तेकर माध्यम गीत आ गजल रहए। प्रभाव रहए बाबूजी ( पिता स्वॅ बलेन्द्र नारायण ठाकुर "विप्लव")केँ। मैथिली-प्रवेश आ लेखकनक नियमितताक शुरुआती दौरमे हम जाहि मित्र समाजक बीच उठैत-बैसैत रही तकर प्रभावमे मुक्त छंद कविताकेँ अपन अभिव्यक्तिक माध्यम बना लेने रही। तहिया गीत- गजल आदिक विधा दोयम दर्जाक बुझाए लागल रहए। प्रयास रहए जे मंचीय कवि नहि बनी। दर्शक श्रोता वा वातावरणक कतबो दबाब रहए अपन कविताकेँ हेय नहि हुअए दी। एक तँ एहन आयोजनमे जाइ नहि आ जाइ तँ अपन कविता गंभीरताक संग पाठ कऽ दी, कोनो ताली-थपड़ीक अपेक्षा नहि करी। एकर नतीजा ई भेल जे हम एहन आयोजनमे अपन कविता पाठक क्रममे दर्शक-श्रोताक साँती मंचपर उपस्थित कवि लोकनिक दिस बेसी उन्मुख रहल आएल छी। मुदा हमरा ई बात सकारएमे कनियों दुविधा नै जे एहन आयोजनसँ घुरलाक बाद कतेको दिन धरि जे किछु दू-चारिटा पाँति मोन आ स्मृतिमे बेर-बेर आबि घुरिआइत रहल अछि ओ कोनो गीतकार वा गजलकारक गाएल पाँतिए रहल अछि। एहि क्रममे मोन पड़ैत अछि लक्ष्मी नारायण सुधांशुक एकटा लेखक ई अंश---" जतए पदकेँ पहुँच नै होइ छै ओतहि स्वरकेँ कार्य आरंभ होइछ। अज्ञेय आ सूक्ष्म भावकेँ विशद आ तीव्र रूपमे प्रगट करैक शक्ति गानमे पाएल जाइ छै। पद सभहँक साधारण अर्थकेँ विशेष रूपसँ प्रभावशाली बनाबैक लेल स्वरकेँ अतिरिक्त आन कोनो दोसर साधन नहि अछि। काव्यगत प्रभावकेँ विशेष क्षमताशाली बनाबैक अभिप्रायसँ छंदक विधान कएल गेल अछि। धनुषपर चढ़ि कऽ जेना वाण बेसी शक्ति संपन्न आ तीव्र भऽ जाइत छै तहिना राग द्वारा पद विचित्र आकर्षण आ शक्ति प्राप्त करैत अछि। अपन सामर्थ्यक बलपर जतऽ तक पद नहि पहुँचि सकैत अछि रागक सहायतासँ ओ ओहि अज्ञात स्थान तक सेहो पहुँचि जाइत अछि। रागमे मीलि कऽ पद अपन वास्तविक अर्थक प्रतिपादन करए लागैत अछि। ध्वनि सामंजस्यक कारण छंदबद्ध पद सभसँ एक प्रकारक विद्युत प्रकाशित हुअए लागैत अछि जे हृद्यकेँ विमुग्ध कऽ दैत अछि। प्रायः तें वाचिक परंपरामे गीत काव्य महत्वपूर्ण आ अनिवार्य स्थान रहै। चंद विधानसँ परिपूरित हेबाक चलते एकरा स्मरण राखब सहज रहै। लेखन आ मुद्रणक युगमे आबि कऽ मुक्त छंदी रचना सभहँक विकास संभव रहै आ भेलै। मुद्रणक सुविधाक बाद पढ़ब आ पढ़ि कऽ कोनो रचनाक स्वाद लेब सहज भेल अछि। एहन स्थितिमे गेय रचनाक उपयोगिता वा प्रासंगिकता नै रहलै वा नै रहतै से कहब तँ कठिन अछि मुदा अधिकतर गेय रचना सुनयमे जतेक मनोहारी लागैत अछि ततेक पढ़एमे नहि। मंचीय आयोजनमे श्रोता दर्शक उत्सवी माहौलमे रहैत अछि आ तखनि ओ हल्लुक आ मनलग्गू बातक अभिलाषी रहैत अछि। मुदा पढ़ऽ बेरमे ओएह व्यक्ति पाठक बनिते रचनामे गंभीरता आ उपादेयता ताकऽ लागैत अछि। अज्ञेय एकरा एना कहैत छथि--" गजल परफोर्मेंस छै, बज्मकेँ वस्तु छै, बैसल प्रत्यक्ष समाजिक माँगै छै। नज्म यात्रा छै खुलल देशक वस्तु छै धैर्यवान सहयात्रीक अपेक्षा राखै छै"। एतए गजलकेँ छंदयुक्त काव्य आ नज्मकेँ छंदमुक्त काव्यक प्रतिनिधि मानि एहि कथनक आशय बुझल जा सकैत अछि। अज्ञेयक चर्चा आएल तव मन पड़ल जे ओ आ दिनकर दूनू गोटे कविताक लेल पाठक श्रोता अथवा ग्राहककेँ अनिवार्य मानै छथि। दिनकर कहै छथि--जाहि कविकेँ श्रोता वा पाठक नहि भेटै छै ओ असमय मौन भऽ जाइत छै। एकर प्रतिकूल जेकरा नीक पाठक भेटि जाइत छै ओकर उत्साह दूना भऽ जाइत छै आ एहि उमंगमे ओकर भीतरक दबलसँ दबल अनुभूति सभ अभरि कऽ बाहर आबि जाइत छै। बहीर लोकक बीच बैसि कऽ साहित्यिक रचना करएसँ बढ़ि कऽ आर अप्रिय काजक कल्पना हम नहि कऽ सकैत छी"। एहिना अज्ञेयक कथन छनि--" हम स्वानतः सुखाय नहि लिखैत छी। कोनो टा कवि मात्र स्वानतः सुखाय लिखैत अछि वा लीखि सकैत अछि एकरा स्वीकार करऽमे हम स्वयंकेँ सदैव असमर्थ पाबै छी----तें अभिव्यक्तिमे एकटा ग्राहक वा पाठक वा श्रोता हम अनिवार्य मानै छी। एहि कथन सभहँक आलोकमे देखल जाए तँ गीत विधा बेसी लोकप्रिय विधा अछि आ आन (विशेष कऽ मुक्तछंद कविता) विधाक तुलनामे ओकर ग्राहक वा पाठक वा श्रोताक संख्या बेसी अछि। मैथिलीमे विद्यापति पर्वक जे तामझामी अनुष्ठान ठाम-ठाम अफरात मात्रामे आयोजित होइत अछि ताहिसँ मैथिली गीत विधाकँ बल भेटैत रहलैक अछि। ई अलग बात जे एकर एक परिणाम ईहो बेल अछि जे थपड़ी-पिहकारीक लिलसाम रचनाक स्तरीयताक तुलनामे रचनाक लोक-लुभावनतापर बेसी जोर देल जाइत रहल अछि। मुदा दिनकर आ अज्ञेयक कहल एहि तीनू माध्यममे कमसँ कम एक "श्रोता" माध्यमे तँ एहन रचना सभकेँ भेटिए जाइत अछि पाठक वा ग्राहक भेटए नहि भेटए। तें जा धरि मैथिलीकेँ मंचक सरंजाम भेटैत रहतै गीत विधाकेँ उत्साह तँ भेटिते रहतै। एहि सभ बातक किछु निष्कर्षमे पहिल ई जे काव्यक छंदयुक्त विधा गित वाचिक वा श्रुत परंपरासँ प्राप्त विधा अछि। दोसर ई जे अपन गेयताक कारण ई आन विधाक तुलनामे बेसी लोकप्रिय विधा अछि। तेसर ई जे परंपरासँ ई विधा लोक-मनोरंजनक लेल वांछित कोमल-कमनीय (बेसी तर) भावक अभिवयक्ति लेल बेसी उपयुक्त विधा अछि। ई निष्कर्ष एक नहि अनेको जिज्ञासाक समाधान मँगैत अछि। अजुका जीवन जगतमे लोककलेल जतेक भौतिक सुविधा बढ़लैक अछि ततबे असुविधा-असुरक्षाक जंगल घनगर भेल अछि। समाजिक जीवनमे असहजता-जटिलता-कुंठा आदिक नकारात्मक भाव निरंतर घनीभूत भेल जा रहल अछि। लोक समाज प्रत्येक आबए बला दिनमे नित-नित, नव-नव चुनौतीकेँ साक्षात कए रहल अछि। आन-ान जीच सभक संग अभिव्यक्तिक संप्रेषण लेल नव-नव तकनीक, नव-नव पद्धति आ नव-नव औजार सभ सरंजाम भेल अछि। श्रुत वा वाचिक परंपराक तुलनामे आइ अनेकों मूलभूत अंतर आबि गेल अछि। वाचिक परंपराक कविता अखनियो एकटा वस्तु नहि होइछ। छपल कविता वस्तु होइत अछि। वाचिक परंपरामे संप्रेषण स्वंय सहकर्म छलै। छपल कविताक संग पहिने सहयोगक स्थिति उत्पन्न करबाक प्रयोजन होइ छै जाहिसँ संप्रेषभ भऽ सकए। अजुका रचना जगतमे एहनो विरोधाभास समक्षमे ढ़ाठ छै। तँ प्रश्न ई अनिवार्य रूपसँ उठैत अछि जे अजुका कोनो रचना जँ लोकलुभावन अछि तँ की लोकधर्मी सेहो अछि? वर्तमानक कठोर उभर-खाबड़ आ कंटकाकीर्ण लोक जीवनक यथार्थक यथार्थकेँ इमानदार रचनाधर्मिताक संग अभिव्यक्ति करैत अछि की? अपन चौतरफा पसरल-छिड़िआएल परिवेशक मारुक कुहेससँ पलायन कए वायवीयताक शरणमे तँ नहि चलि गेल अछि? दिनकर एतेक सक्षम कलाकार छला जे अपन रचनाधर्मकेँ व्याकरणमे बान्हियो कऽ भाव-विचारक उन्मुक्त उड़ान लऽ सकैत छला। आ साहित्यिक कोनो विधामे अपन विराटक प्रदर्शन कऽ सकैत छला। हुनक पिंगल आ छंदक पैरिकारीक अढ़मे कोनो अजुका कवि मात्र अपन सौख आ देखांउस लेल साहित्यकेँ अपन उपकरण बनाए स्वार्थ साधि रहल अछि की? जँ एहि प्रश्न सभक उत्तर नकारात्मकता लेने अछि तखनि आधुनिक युगमे एहन रचना सभक उपादेयता की? अजुका विकालमे जे किछु जनहितमे नै अछि से सभ जनविरोधी अछि। एहनमे एहन रचना सभक प्रासंगिकता की? अज्ञेय जँ अभिव्यक्तिक लेल एकटा ग्राहक वा श्रोता वा पाठकक अनिवार्यता मानै छथि तँ एहिसँ भ्रमित भए जेबाक कोनो दोग नै छोड़लनि अछि। अपन डायरीमे एक ठाम ओ लिखय छथि " नव काल बोध----कालसँ नव संबंधक बोध--लयः काल प्रत्यय के एक प्रकार --- मात्रपर नहि, तनावपर आधारित लय---कालः तनावकेँ एक प्रणाली---आधुनिक कालः ने निर्झर, ने आवर्त, ने कसल कमानीपर एक दिससँ पड़ैत बल--- पारंपरिक छंदकेँ ढ़ाँचामे आधुनिक काल बोधक अभिव्यक्तिक संभवाना नहि भए सकैत छल"। एतए ई ध्यातव्य जे आधुनिक युगमे जनमियो कए कोय आधुनिक नहि होइछ। आधुनिक हएब ओकर काल बोध आ ग्रह शक्तिपर निर्भर अछि। अजुका युगमे किछु ( मैथिलीमे मारिते रास) नव लेखक छथि जे पुरान छथि जेना कि प्राचीनहु कालमे किछु लेखक छला जे नव लागथि। आइयो किछु तेहन लेखक-कलाकार छथि जे अखनियो संदर्भहिमे जिबैत छथि। परिवेशक हुनक संकल्पना ओही अर्थमे स्थितिशील अछि, गतिशील नहि। मैथिलीमे आइयो एहन तथाकथित साहित्कार लोकनिक आधिक्य अछि जिनकर काल चेतना नष्टप्रायः छनि आ जिनका एतबो भास नै छनि जे अपन मूल्यवान संपतिक संग तिजौरीमे स्वयं बंद भऽ जाएब ने बुद्धिक मार्ग अछि ने जीवनक। एहन संदर्भजीवीक कोनो उत्पाद वर्तनमान समाजक लेल कोन काज के? हमर मान्यता अछि जे टटका रहलापर रोटी सन समान्य वस्तुओ स्वास्थ्यकर आ सुअदगर होइत अछि। जखनि की पायस सन विशिष्ट वस्तुओ बसिया भेला, फुफड़ी पड़लाक बाद जहर अछि, अस्वस्थ्यकर अछि, त्याज्य अछि। सपना कतबो सुंदर हुअए अनुपयोगी अछि। यथार्थ कतबो कठोर वा अप्रिय हुअए जीबाक तँ अछि ओकरे संग। जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक गीत संग्रह "गीत गंगा" मे नहेबाक प्रयास करैत हमरा मोनमे अनेक रास विचार सभहँक आविर्भाव भेल जाहिमे किछुकेँ हम उपर उद्धृत कएल अछि। जतेक आएल से सभ लिखाए गेल वा जे सभ आएल से किए आएल तकर विश्लेषण अखनि आवश्यक नै बुझै छी। साठिक संख्याबला एहि संग्रहक रचना सभमे अपन धरती, गाम घर, आदिक मोह छै मुदा कोनो भाषायी वा क्षेत्रीयताक संकीर्ण क्षुद्र भाव नै छै। हिंदीकेँ बाढ़निसँ झाँटबाक, एकटा मिथकीय राज्यकेँ बकिया देशसँ काटि कऽ रखबाक आ अपन जातीय श्रेष्ठताकेँ बेर-बेर घोसबाक जे एकटा मैथिल दृष्टि बला परिपाटी चलनमे रहल अछि तेकर एहि संग्रहमे अभाव छै। एहि पूर्वाग्रहहीनताक स्वागत अछि। ई मैथिल दृष्टि मैथिलजनकेँ गैर-मैथिल समूहक मोनमे खलनायक जकाँ स्थापित कएलक अछि आ एकर बहुत रास नकारात्मक, तीव्र आ आक्रोशित प्रतिक्रिया भेल अछि, भए रहल अछि। समस्तीपुरक पत्रकार-साहित्यकार गंगाप्रसाद आजाद सतलमपुरी अपन पुस्तकक नामें " मिथिला भारत का अंग नहीं है" राखै छथि आ एहि संदर्भमे अनेकों प्रमाण आ विवरण दै छथि। बिहार राज्य हरिजन आदिवासी विकास मंचक अध्यक्ष डा. बिंदेश्वर राम एकरा पुरहित वर्ग द्वारा पुनः अपन वर्चस्व स्थापित करबाक षड्यंत्रकारी प्रयासक रूपमे देखै छथि। ई तँ भेल समाजिक पक्ष। साहित्यिक पक्ष सेहो एहि बकथोथी आ नाराबाजीसँ क्षतिग्रस्त होइत अछि आ एकर परिणाम स्वरूप "मैथिल आँखि"क पैरोकारी कवि सभहँक रचनामे कवित्व नगण्य आ मैथिलत्व बेसी होइत अछि। अनिलजी एहि मैथिल दृष्टिक प्रकोपसँ शत-प्रतिशत बाँचल छथि से कहब तँ कठिन ( ने हम व्यक्तिगत रूसँ जानै छी आ ने हुनक संपूर्ण रचनाकर्मसँ हम परिचित छी) मुदा गीत गंगाकेँ अनेक रचनामे अनेक ठाम ओ स्वयंकेँ राष्ट्र समाजक संग अखंडतापूर्वक जोड़ै छथि आ गर्वक अनुभव करै छथि। अपन कतिपय रचनामे गाम-घर आ जनपदक प्रति प्रेमक प्रदर्शनक बादो क्षुद्र संकीर्णतासँ दूर रहब एहि संग्रहक विशिष्टता मानल जा सकैछ। "कह गाँधी कह जयप्रकाश", "सत्य अहिंसाक पुजारी", "आकाशक चन्ना आ तारा", "हम भारत के पूत", "की हिंदू आ की मुसलमान", आदि गीत एकर प्रमाण अछि। एहिना "जय भारत भारती"मे मिथिला-भारत आ मैथिली-भारतीक परस्परताक लेल "गाउ जय मिथिला जयति मैथिली / जय भारत, जय भारती" आ " राष्ट्रक सर्वोच्चताक प्रदर्शन लेल " हम कल्पना करी एकटा भारतवर्षक गाम केर / जैमे हो बस जाति एकटा मात्र भारतीय नाम केर" सन पाँति संकुचित "मैथिल आँखि"सँ देखल जाइत दृश्यक लघुतासँ विपरीत दृश्य प्रस्तुत करैत अछि आ एक तरहें मैथिल कट्टरता लेल चुनौती प्रस्तुत करैत अछि। एतऽ ई स्मरण दिआएब विषयांतर नै हएत जे एकटा साहित्यकार नेता अपन कपोल-कल्पित राज्य लेल अलग झंडा बनबा लेने रहथि। "उठ-उठ बौआ भेल परात"मे एकटा मसोमातक हपूर्व भाव चित्रित भेल अछि। पतिक मृत्यु, असहायावस्थोमे अपन आत्मगौरवक रक्षा, पुत्रक प्रति असमीम प्रेम आ ओकर देशक लेल सीमापर लड़बाक मनोकामना बहुत कारुणिक आ रोमांचक अछि। "चिट्ठी लीखि रहल छी" मैथिल परिवेशसँ इतर एकमात्र रचना अछि। ई आधुनिक भाव-बोधक अशेष संभावनासँ भरल-पुरलल रचना बनिस कैत छल मुदा हाय रे मैथिल-मन, एतहुँ गीतकारकेँ पहाड़ी क्षेत्रक संकट-दारिद्रय-संघर्षक दर्शन नहि भऽ सकलनि आ चूड़ा दही अचारक लिलसा जागि उठलनि।"करेजमे जीबें---" गीतमे श्रम आ साहसक प्रति विश्वास प्रगट करैत एकटा आह्वान अछि।"नब्बे टा बरियाती"मे वैवाहिक अवसरपर बरियाती सभहक अराजक व्यवहार, आयोजनमे व्यर्थक देखाँउस, आ फिजूलखर्चीपर समधानल व्यंग अछि। किछु और गीत सभमे व्यंगक खूब धरगर समावेश भेल अछि आ समाजिक विसंगतिकेँ देखार कएल गेल अछि।"मैथिली प्रतिमा सजाउ", "तीन कोटि मैथिल" आ "हमरा गाममे" वायवीयतासँ बरल पारंपरिक आ अतीत मोह केर गीत अछि मुदा "मिथिलामे" आ "दरूक दोकान"मे वर्तमान यथार्थ अछि। "आत्मगीत"मे "क्षमा करू हे पिता हमर / बरखी ओहिना नहि करब हम / नहि केश कटायब बेर-बेर / नहि भोज भातमे पड़ब हम" आ "जय-जय हिंदुस्तान"मे --"चानन ठोप पाग आ डोपटा / जप तप योग धियान / सभ ध्यानमे सुंदर लागय / देश भक्ति केर ध्यान" सन पाँति व्यर्थ आ निरर्थक भेल परंपराक अस्वीकारक घोषणा जकाँ अछि। छप्पन भोगक बीच चटनिएक मात्रामे सही अनिलजीक ई तेवर आ दुस्साहस प्रशंसा जोगर अछि। "मैथिली ले अहाँ की करै छी", "अरे राम-राम-राम", "मैथिल केर परिभाषा", "पाथरकेँ भगवान बुझै छी", " चोर कहू ककरा", आ "हम चालनिमे पानि भरै छी" आदिमे मैथिल दुचित्तापन आ अतीत-मोहकेँ देखार करैत विरोधी स्वर अछि जे मैथिलीमे मंद आ दुष्प्राप्य जकाँ अछि।"गीत-गंगा"क सर्वाधिक आकर्षण अछि "हम आँगन छी हम अरिपन छी" शीर्षक गीत। अपन विषय-वस्तुक संग प्रायः प्रत्येक मापदंड आ दृष्टिकोणसँ न्याय करैत ई अद्भुत मोहक रचना अछि। ई गीत अपन बाह्य आ अभयंतर दूनू संरचनामे एतेक सुडौल आ पूर्ण अछि जे मात्र इएह टा गीत लेल एहि संग्रहकेँ मोन राखल जा सकैत अछि। एहि संग्रहक किछु शब्द संयोग, किछु उपमा सभ बहुत नीक अछि आ अतिरिक्त रूपसँ ध्यान आकृष्ट करैत अछि। "सपना पाहुन बनि कऽ आयल / तन्नुक सन निन्नक आँगनमे", "हिमगिरि समान किछु पुरुष छला / किछु भेटला गंगाजल समान", "एक विपटा कते मदारी छल / सभहँक सभ भैयारी छल / गाड़ी छल ऊपरमे चितंग / नीँचा कुहरैत सवारी छल" , "सभ बाट अहिल्या सन शापित-नित बाट राम केर तकै छली", "हम देखलहुँ सभहँक सोंझामे / बकरीसँ खुट्टा बान्हल अछि / सौंसे अकासक बदलामे / कागत एक टुकड़ी तानल अछि", छल हहरि गेल सभ गाछ मुदा / लत्ती-फत्ती सभ मोटा गेल", छल पथराएल संबंध शेष / कछु वैचारिक अनुबंध शेष" आदि टुकडी एक उदाहरण स्वरूप देखल जा सकैत अछि। गीत-गंगाक शिशु गीत सभ बहुत सहज,सरल आ मनोहर अछि। ई सहजता, सरलता आ मनोहरता अनिलजीक प्रायः प्रत्येक गीतमे अछि आ जँ एक-दूटा गीतकेँ बारि देल जाए तँ एहि संग्रहकेँ बाल साहित्यक कोटिमे राखबोमे कोनो हर्ज नहि। राष्ट्रकवि दिनकर अपन एकटा आलेखमे जयप्रकाश नारायणकेँ ई कहैत देखाबय छथि --"प्रत्येक कलाकार बेसीसँ बेसी लोकक हृद्यकेँ छुबए चाहैत अछि आ बेसीसँ बेसी हृद्य छूबाक लेल ई आवश्यक अछि जे ओ अपन खानगीसँ खानगी अनुभूतियोकेँ समान्य अनुभूतिक स्तरपर उतारि कऽ लिखए।"अपन गीत संग्रहमे अनिलजी एहि स्तरपर उतरि जेबाक संकेत दै छथि आ हुनक रचना सभ हृद्यकेँ छुबैत अछि। गीत-गंगासँ बीछि-बीछि कऽ ओ ओकर सकारात्मक पक्ष सभकेँ सोझाँ अनबाक प्रयासक अछैत ई विचित्र बात अछि जे एहिसँ प्राप्त अनुभूति मुट्ठीक फुक्का जकाँ लगैत अछि। संग्रहमे ठाम-ठाम क्रांतिकारी स्वर, परंपरा विरोधी तेवर, नीक शब्द-संयोग, स्पष्ट व्यंग्य आदि आदिक आंशिकताक छौंकक बादो संपूर्ण व्यंजन संतोष प्रदान नहि कऽ पाबैत अछि। संपूर्ण संग्रह एहन आभास दैत अछि जे पढ़ले चीजकेँ फेरसँ पढ़ि रहल छी। नव काल बोध, लोकधर्मिता, आधुनिक चेतनादिक दूरहुँसँ आबैत हल्लुको सन ध्वनि-प्रतिध्वनि जे संवेदनाक अनुभूतिसँ आपादमस्तक आप्लावित कऽ दिअए से नहि। जे अनिलजी अपन गजल ( जे थोड़-बहुत पत्रिकादिमे पढ़ल भेल)मे आधुनिकता आ समकालीनताक बोधसँ भरल लागै छथि प्रगतिशीलताक पक्षधर बुझाइ छथि जे अनिल एहि गीतसंग्रहमे अनुपस्थित जकाँ छथि। एकैसम शताब्दीक २०१३ ई.मे छपि प्रस्तुत भेल अछि ई पोथी आ एकर रचना बीसम शताब्दियोक गीत रचनासँ प्रतियोगिता किए नै कऽ पाबि रहल अछि? नीरज केर "कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे", वा नेपालीक " दिन गए बरस गए यातना गयी नहीं, रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रही", वा गोपी वल्लभ सहायक " जाने किस साँप ने डँसा है, नस-नस मे जहर का नसा है" आदिक टक्करकेँ कोनो एकौटा गीत संग्रहमे किएक नै अछि। समकालीन गीतकारहुमे बुद्धिनाथ मिश्रक "एक बार जाल और डाल रे मछेरे, जाने किस मछलीमे बंधन की प्यास हो" वा एकटा अत्यंत पिछड़ल गाममे रहिनहार भगवान प्रलयक "मत बिखेरना कोई सुमन मेरे मजार पर " सन गीतक अभाव एहि संग्रहमे किए अछि। कहल जा सकैछ जे हिंदी गीतक उदाहरण एतए अभीष्ट आ प्रासंगिक नै अछि। यात्री-नागार्जुने जकाँ बुद्धिनाथ मिश्र सेहो मैथिलीकेँ अपन दोयम दर्जाक रचनाक आश्रय-स्थल मानै छथि। तखनो हुनक " चारू कात बसल अछि विषधर पोरे-पोर डँसल छी / एहि बिखाह जंगलमे हमहीँ चानन गाछ बनल छी" सन गीतक उद्धरण देल जा सकैत अछि। आरो उदाहरण लेल मार्कण्डेय प्रवासी, शांति सुमन, सियाराम झा सरस, नरेश कुमार विकल सन कतिपय नाम मैथिलीमे उपस्थित अछि। ई अद्भुत संयोग जे अनिलजी समेत उपरोक्त चारू गीतकारक जन्म बीसम सदीक पाँचम दशकहिमे भेल अछि। संभव छै जे गीत-गंगाक गीत सभ सुनि कए ग्रहण करबाक बाद बेसी प्रभावि लागए मुदा मुद्रणक युगमे ने हमरा ई सुविधा प्राप्त भऽ सकैए आ ने आन पाठककेँ। कोय कहि सकैत अछि जे गीत साहित्यक एहन विधा छै जकर कोमल तंतुकेँ कर्कशता, कठोरता आदि नकारसँ बचबैएमे एकर कल्याण छै। मुदा गीतकेँ कोमल विधा कहि यथार्थसँ पलायनक तर्क अजुका युगमे स्वीकार्य नहि अछि। एहि विधामे बहुतों प्रतिष्ठित लोक समकालीन यथार्थक चित्रण बहुत सफलतापूर्वक केलनि अछि। तहिना कोनो कलाकार स्वानतः सुखायकेँ तर्क दऽ कऽ समाजक प्रति अपन लेखकीय दायित्वसँ मुकरि नहि सकैत अछि। प्रश्न उठत जे तखनि एकरा मुद्रित कऽ पुस्तकाकार किए केलहुँ? जीवन-जगतक विराट पसार, विविधता, विभिन्नता आ विरोधाभासकेँ लक्ष्य कैए कऽ पूर्वज विद्वान लोकनि अभिव्यक्ति लेल विभिन्न विधाक सृजन कए ओकर आश्रय लेलनि। आवश्यक नहि जे जीवन जगतक विविध रूपाकारक चित्रण लेल कोनो एकैटा विधापर सभटा छार-भार राखि देल जाए। स्वंय अनिलजी एकटा रचनाकारक रूपमे ई काज केनहि छथि आ तकर उदाहरण लेल हुनक गजल सभमे अभिव्यक्त भाव सभकेँ देखल जा सकैए। जखनि विकल्प मौजूद हुअए तखनि अनेरे लकीर के फकीर बनल रहब आन क्षेत्रक लोक लेल भने स्वीकार्य आ क्षम्य हुअए साहित्यमे एना दिन काटब बुद्धिमताक लक्षण नहि मानल जा सकैए। तखनि जाहि वर्गक घोषित नीति ई हुअए जे ओकरा द्वारा ग्राह्य हेबाक लेल कोनो वस्तु वा रचना दू-चारि सए बर्खक पुरान तँ हेबाके चाही वा नवरचित हुअए तखनो एतबे पुरान जकाँ लागए, ओहि वर्गसँ अजुका कविता वा सहित्यपर बहस वा विमर्शक कोनो अर्थ नहि रहि जाइत अछि आ तखनि कहए-लिखए लेल बैसिते कि अछि। ओना असहमति-आलोचनाक प्रति एहि असहिष्णु मैथिल समाजमे समालोचककेँ "अरसिक" कहि गारि पढ़बाक भाँज तँ सुरक्षित संरक्षित अछिए-- अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शरिरषि मा लिख मा लिख मा लिख। [युगानुसार नियति-- आ युगानुसार दुः शंका सभ। कालिदासक दुःस्वपन छलनि जे कहीं अरसिक सभकेँ कवित्व निवेदन करए ने पड़ि जाए। केशवदास चिन्तित छला जे चंद्रवदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि ने चलि जाए, अज्ञेक संकट अछि जे हम की जानए छलहुँ जे ई गति हएत जे विश्वविद्यालय सभमे हिंदी प्राध्यापक लोकनि द्वारा पढ़ाए जाएब] पाठक आ समालोचक द्वारा हर्षपूर्वक स्वीकार नहि करबाक स्थितिमे बचि जाइत अछि रंगमंचीय आयोजन आ ओकर श्रोता-दर्शक। तँ मैथिली कवि सम्मेलनक रंगमंचपर वएह कवि अधिकार आ रंग जमा सकैत अछि जकरा गलामे मिठास छै, स्वरमे करुणा आ हास्य रसक प्रवाह छै। जे सभाकेँ जतेक करुणासँ गला देत, जतेक हास्यसँ हिला देत ओकर ओतबे गंभीर करतल ध्वनि आ पिहकारिसँ स्वागत कएल जाएत। नतीजा कविताक स्थान गौण आ फकरा-संगीतक प्रधान। जिनका सभमे ई रंगमंचीय मोह-व्याधि जतेक मात्रामे अछि तिनकर रचना ततबे यथार्थसँ दूर आ हल्लुक होइत चलि जाइत अछि। तखनि मैथिलीए छिऐ। एकर की? गोस्वामी तुलसीदास तीर्थवादिक महात्म्य वर्णन करैत काल लिखने छला जे एहिमे स्नान कऽ कऽ काक पिक भऽ जाएल करैत अछि आ बक मयूर भऽ जाइत अछि। मुन्नाजी (विदेहक जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ विशेषांक लेल मुन्नाजी द्वारा अनिल जी सं लेल ई-साक्षात्कार) 1) पद्यक उपविधा गजलमे नीक काज अछि अहाँक। एकर प्रेरणा कतऽसँ आ कोना भेटल। वर्तमान गजल कोन दिशामे अछि? हम गीत लिखैत्त छलहु | दुष्यंत कुमारक ‘साये में धूप’ पढलहु त नीक लागल | ओहिसं प्रभावित भेलहु आ हमहू गजल लेखनक अभ्यास कर’ लगलहु | एकटा मित्र श्री रामजी लाल दास जे आरम्भमे गजलकें बुझबामे मदति केने छलाह | बादमे बशीर बद्र, निदा फाजली,विज्ञान व्रत,ज्ञान प्रकाश विवेक,अशोक अंजुम,डा.उर्मिलेश आदि शायरक रचना पढ़ि क’आ कतेक मंचसं कतेक शायरकें सूनि क’ प्रेरित भेलहु | विदेह-ई सं जुडलाक बाद मैथिलीमे गजल लिखबाक लेल पर्याप्त अवसर भेटल |’अनचिन्हार आखर’ सं जुडलाक बाद श्री गजेन्द्र ठाकुरजी आ आशीष अनचिन्हारजी द्वारा प्रस्तुत व्याकरणसं लाभान्वित भेलहु|अरबी बहरमे गजल लिखबामे आशीषजी व्यावहारिक रुपसं मदति केलनि | गजल लेखनसं बहुत लोक जुडल छथि | सरल वार्णिक बहर बेशी लोकप्रिय भेल अछि |अरबी बहरमे लिखबाक लेल बेशी अभ्यासक आवश्यकता होइत छैक | पुरान लोक सभ कतराइत छथि |नव लोक सभ व्याकरणक अनुसार चलैत छथि, मुदा भाव पक्ष आकर्षक नहि भ’ पबैत छनि | मैथिलीमे गजलक लेल एकटा स्वतंत्र प्लेटफार्म ‘अनचिन्हार आखर’ उपलब्ध अछि, ई शुभ संकेत अछि प्रगतिक लेल| 2) बहुत दिन धरि अहाँ साहित्यिक रूपें कात रहलहुँ। एकर की कारण? हम सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडियाक सेवामे अठारह बरख धरि मध्य प्रदेश आ छत्तीसगढ़क विभिन्न भागमे रहलहु आ मैथिली साहित्यक गतिविधिमे हमर उपस्थिति नगण्य भ’ गेल |3) ओना पुरस्कार तँ प्रोत्साहन लेल होइत छै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति रुकि जाइत छै। एना किएक? सामान्य दिन-चर्याक लेल जतेक उर्जाक आवश्यकता होइत छैक ताहिसं बहुत बेशी उर्जा चाही रचना-कर्म लेल |वयस बढ़ला पर अतिरिक्त ऊर्जा कमैत अछि | एकर प्रभाव रचना-कर्म पर पडब स्वाभाविके कहक चाही | तथापि बहुत साहित्यकार एखनो सक्रिय छथि जेना आदरणीय श्री गोविन्द झा, श्रीमती उषा किरण खान, डा.गंगेश गुंजन, डा. शेफालिका वर्मा, श्री उदय चन्द्र झा ‘विनोद’, श्री तारानंद वियोगी,श्री जगदीश प्रसाद मंडल आदि | स्व.जीवकांतजी सब दिन लिखिते रहलाह | 4) वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक की हाल छै? दैनिक पत्र मिथिला आवाज आ समाद त बंद भ’ चुकल अछि | ई-पत्रिका विदेह, पत्रिका मिथिला दर्शन, मिथिला दर्पण,पूर्वोत्तर मैथिल, घर-बाहर,कर्नामृत आ आंजुर निकलि रहल अछि | समय-साल स्थगित अछि | आकांक्षा अनियमित भेल अछि | ‘अनचिन्हार आखर’ सेहो देखैत छी | 5) चेतना समीतिमे एखनो दलित वर्गक प्रवेश निषेध छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? चेतना समितिमे दलित वर्गक प्रवेश निषेध नै छै | चेतना समिति सब वर्गक लोकक स्वागत करैत अछि | जिनका रूचि छनि ओ छथि |श्री रघुवीर मोचीजी संयुक्त सचिव छथि | श्री बिलट पासवान ‘विहंगम’ उपाध्यक्ष रहि चुकल छथि | अधिक लोककें जोड़बाक प्रयास हेबाक चाही | 6) अहाँ गद्य बहुत कम्मे सन लिखलहुँ। एकर किछु कारण? कोनो विचारकें पद्यमे किछुए पांतिमे व्यक्त करब संभव होइत अछि |अपन रचना गुनगुनायब आ दोसरक मूहें सुनबाक आनंद गद्यमे नहि भेटैत छैक |तें शुरूमे पद्यमे लिखबाक जे अभ्यास लागल से लागल रहि गेल | 7) बहुत दिन धरि मैथिलीमे दलित लेखक केर प्रवेश नै छल। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? एखनुक केहन अवस्था छै? दलित वर्गमे शिक्षाक कमीसं लेखनसं लोक आकर्षित नै भ’ पबैत छलाह |स्थिति बदललैए | एखनो स्थितिमे सुधारक आवश्यकता छैक | शिक्षाक प्रसारसं भविष्यमे अपेक्षित परिणामक आशा कयल जा सकैत अछि | मैथिलीक विकास-यात्रामे दलित लेखकक योगदान महत्वपूर्ण रहत | 8) अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्व प्रेरक आ कोन तत्व बाधक रहल? प्रेरक तत्व : आदरणीय जीवकांतजी आ प्रो. गंगानन्द झाजी सं पत्राचार | बाधक तत्व : नोकरीमे अधिक काल बहुत व्यस्तता | 9) वर्तमान साहित्यकारक मूल्याकंन अहाँ कोना करबै? वर्तमान साहित्यकारक मूल्यांकन हम एहि आधार पर कर’ चाहब जे ओ अपन रचना आ अपन आचरणसं कतेक लोककें साहित्यसं आकर्षित क’ पबैत छथि | 10) अहाँक प्रिय साहित्यकारकेँ छथि? श्री काशी कान्त मिश्र ‘मधुप’,बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’, हरिमोहन झा, जीवकांत, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, जगदीश प्रसाद मंडल, तारानंद वियोगी आ गजेन्द्र ठाकुर | 11) मैथिली गजलमे व्याकरण बारल रहल। अहाँ एकरा कोन रूपमे देखै छिऐ। जखन की बिना व्याकरणक गजल होइते नै छै। मैथिलीमे गजलक व्याकरणक व्यवस्थित रूपक अभाव छलैक | लोक रदीफ़ आ काफिया मात्र बुझैत छलाह आ अधिक लोक ओकरे पालन करैत छलाह | काज कहुना चलि रहल छलैक | शायर सभकें सूनि क’ आ पत्रिका, पोथी आदिमे गजल पढ़ि क’ लोक अभ्यास करैत छल | ‘अनचिन्हार आखर’ गजलक लेल स्वतंत्र प्लेटफार्म प्रदान कयलक | पर्याप्त खोज-बीन क’ क’ गजेन्द्र ठाकुरजी आ आशीष अनचिन्हारजी मैथिली गजलक लेल व्याकरण प्रस्तुत केलनि | बहुत लोककें जोड़लनि | सरल वार्णिक बहरक नव कांसेप्ट देलनि | अरबी बहरमे गजल लिखबाक लेल लोककें प्रोत्साहित केलनि | बहर मुक्त गजलकें आज़ाद गजलक नाम देलनि | बाल गजल आ भक्ति गजलक लेखन करबौलनि | सालमे सर्वश्रेष्ठ गजलकें पुरस्कार देबाक आयोजन केलनि | नव लोक सभ बहुत उत्साहित भेलाह | आब व्याकरणसं लोक परिचित भेल अछि आ आब गजल लेखनमे व्याकरण पर ध्यान देल जा रहल अछि | 12) सरसजी अपना-आपकेँ "साहिर" ओ अरविन्द ठाकुरजी अपनाकेँ "अमीर खुसरो" कहै छथि। अहाँ एकरा कोन रूपमे देखै छिऐ ? हम ने साहिरकें पढ़ने छी ने अमीर खुसरोकें | हम सरसजीकें पढ़ने छी, हम अरविन्द ठाकुरजीकें पढ़ने छी | तें हम एतबे कहब जे सरस जी सरस जी छथि, अरविन्द ठाकुरजी अरविन्द ठाकुरजी छथि | दूनूक अपन-अपन विशिष्टता छनि | 13) मैथिल साहित्यकार बहु विधावादी होइत छथि। मुदा जँ अहाँ एकै विधामे रहितहुँ तँ ओ कोन विधा होइतै ? गीत 14) अधिकांश साहित्य अकादेमी पुरस्कार खाली सवर्णे टा के भेटै छै। ऐपर अपनेक की चिंतन अछि? साहित्य अकादेमी पुरस्कार त कृति पर भेटैत छैक | साहित्य अकादेमीक नियमावली अथवा ओकर क्रियान्वयनमे यदि कतहु कमी होइ, ओइ पर संवाद हेबाक चाही, स्थिति बेहतर हेबाक चाही | 15) अहाँ अपन साहित्यक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रूपें देखै छिऐ? माएक सेवामे जीवन बिता दी अछि बस इएह एकटा सिहंता | 16) पारिवारिक परिचय जनबाक इच्छा अछि। पितामही स्व. दैयो देवी नान्हिए टा रही तखनेसं हिनका मूहें मैथिलीक बहुत रास लोकोक्ति सब सुनने छलहु जे हमरा आकर्षित करैत रहल पितामह स्व.अनंत लाल ठाकुर हिनकासं सूनल महादेवक गीत आ पराती आ बहुत खिस्सा-पिहानी हमरा मैथिलीक प्रति आकर्षण प्रदान केने छल | माए स्व.कर्पूरा देवी गीत आ कीर्तनक प्रति रूचिक संस्कार नैहर रुचौलसं ल’क’ आएल छलीह |सपता-विपताक कथा कहैत-कहैत आँखि नोरा जाइत छलनि | हमर लीखल गीत सूनि आनंदित होइत छलीह | पिता स्व.राम नारायण ठाकुर हाई स्कूलमे पढ़ने छलाह | प्रेसमे कम्पोजीटरक काज कोलकाता आ दरभंगामे केलनि |बादमे सीमांत कृषक भेलाह | अपनो साहित्यमे रूचि छलनि |हमरासं नीक नोकरी आ साहित्य सृजन दूनूक अपेक्षा करैत छलाह | छोट बहिन १ शांती साक्षर मात्र छथि |पति देवेन्द्र झाक संग सासुर लखनपटीमे रहैत छथि | घरमे सभ मैथिलीमे गप करैत छथि | छोट बहिन २ बच्ची साक्षर मात्र छथि | पति चन्द्र कान्त झाक संग शिशवामे रहैत छथि |घरमे सभ मैथिलीमे गप करैत छथि | छोट बहिन ३ सच्ची साक्षर मात्र छथि | पति कृष्ण कान्त झा, दू पुत्र आ एक पुत्रीक संग दिल्लीमे रहैत छथि |घरमे सभ मैथिलीमे गप करैत छथि | अनुज १ सतीश चन्द्र ठाकुर(ललनजी) शिक्षा-बी.एस.सी.,एम.बी.ए.|दिल्लीमे नोकरी करैत छथि आ पत्नी आ दू बच्चाक संग रहैत छथि | घरमे सभसं मैथिलीएमे गप करैत छथि |मिथिला मिहिरमे एकबेर एक रचना छपल रहनि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब ओहि पर विचार करब नीक लगैत छनि | अनुज २ रतीश चन्द्र ठाकुर(रतनजी) शिक्षा-एम.एस.सी.(फ़िजिक्स),बी.एड.-माध्यमिक विद्यालयमे शिक्षक छथि | गामहिमे पत्नी आ दू बालकक संग रहैत छथि |घरमे सभक संग मैथिलीएमे गप करैत्त छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पत्नी बच्ची देवी स्कूल कहियो नहि गेलीह | मैथिलीक पारंपरिक गीत सभ गेबाक संस्कार नैहर लदारीए सं अनने छलीह |हरिमोहन बाबूक रंगशाला पढ़ि क’ मैथिली साहित्यसं रूचि जगलनि | साहित्य पढ़ब, जे बात साहित्यमे कहल जाइत छैक ओहि पर विचार करब, मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब ओहि पर विचार करब नीक लगैत छनि | पुत्री १ वंदना शिक्षा-एम.ए.(अर्थशास्त्र, लाइब्रेरी साइंस), गृहिणीक रूपमे पति आ दू बच्चाक संग मुंबईमे रहैत छथि आ घरमे सभसं मैथिलीएमे गप करैत छथि |घरमे मिथिला दर्पण मनबैत छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पुत्री २ मैथिली शिक्षा—बी.एस.सी.,बी.एड.,एम.बी.ए.,सम्प्रति गृहिणीक रूपमे पतिक संग दिल्लीमे रहैत छथि | घरमे मैथिलीएमे बजैत छथि |मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पुत्र विवेक आनंद शिक्षा-एम.टेक.(कम्पुटर साइंस)| मुंबईमे प्राइवेट इंजिनीयरिंग कॉलेजमे पढ़बैत छथि | घरमे आ मैथिल संगी/ सम्बन्धी सभक संग मैथिलीमे गप करैत छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | पुतोहु प्रीति शेखर शिक्षा-एम.ए.(राजनीति विज्ञान)|मैथिलीक साहित्यकार,संपादक आ प्रकाशक श्री शरदिंदु चौधरीजीक सुपुत्री छथि | सम्प्रति गृहिणीक रुपमे मुंबईमे पतिक संग रहैत छथि | घरमे आ मैथिल संगी/ सम्बन्धी सभक संग मैथिलीमे गप करैत छथि | मैथिली कार्यक्रम देखब,सूनब नीक लगैत छनि | मुन्नाजी- प्रेम विहनि कथा- सेल्फी यौ, अपन मोनक एक टा बात कह' चाहै छी , कहू ? कहू ने एत' कियो दोसर त' छै नै. हमर मोन कहैए- जेना हमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेल ऐछ. यै हमहू फरिछाइए दी, सत्ते अहाँ हमरा हृदय मे समा गेलौं ऐछ मुदा हम अहाँ सँ प्रेम नै करै छी. बुद्धु कहीं के ! प्रेम कएल नै जाइ छै, ओ त' अपने भ' जाइ छै. यै , जे अपने भ' जाइ छै से अनेरूआ कहाइ छै. ओकर कोनो ठौर- ठेकाना नै होइ छै. तहन दुनू गोटे एहिना रह' दियौ. " एक दोसरा क् करेज मे समाएल ." प्रेम विहनि कथा- बखरा उँह........! की भेल. ? अहाँक दाढ़ी गड़ैए . हा....हा....हा !नीक चौल केलौं. पहिने त' बिन काटलो दाढ़ी नै गड़ल कहियो. आ आब.....! आब बौआ भेलै ने . " त' की, बौआ भेने हमर गाल मे काट उगि गेल की ." से नै यौ......! आ की हमरा लेल अहाँक हृदय मे पाथर समा गेल ? नै यौ, सिनेह त' आब बौओ के चाहियै ने . हँ, समय अलग - अलग हेतै . नै , हमरा अहाँक बीचक सिनेह मे सँ आब ओकरो बखरा लगतै. " हे देखियौ, अहाँक किरदानी पर ओहो मुस्कियाइए ." विहनि कथा- करोट यै कनिया, सुनि के दुख हएत, मुदा कहि देब उचित बुझै छी. की कहै छथिन माँ कहौथ ने, हिनकर सबहक बात के दुख किएक हएत. बौआ लाजे नै कहैए.हम सब निर्णय केलहुँ ऐछ जे मयंकक दोसर विआह करा दियै. माँ, ई सब जे निर्णय करथिन सएह उचित हेतै .मुदा दोसर विआहक प्रयोजन की ? " हे , कोनो पुतौह आइ धरि साउस सँ मुह नै लगेने छलीह.बाबूजी, ई कहौथ जे अय सँ पहिने कोन बेटाक दोसर विआह करेने छलखिन्ह ?" यै कनिया, साउस त' जे सुनै छथि जे हमरो दस लोकक बीच कुचेष्टा सुन' पड़ैए. जे महाकान्त बाबू अहाँ दलालक फेर मे बाँझ कनिया उठा अनलौं. बातोत' ठीके छै एतेक दवाई आ जाँचक पछातियो परिणाम शुन्य ऐछ.आब अहीं निर्णय क' कहू हमर वंश कोना बढ़त ? बाबू जी हम लाजे चुप्प छलौं . आ अपन कपारक दोष बुझि तरे तर गलल जाई छी.सत्य त' छै जे दवाई दारू आ जाँच ई विश्वस्त केलक जे कमी हुनके मेछनि! आब ई कहौथ जे कए टा विआह क' कुमारि बेटीक जीवन गार्त करथिन त' मोन भरतैन. ?" कनिया हम लज्जित छी, हमरा माफ क' दौथ.आअपन कपारक दोष बुझि संतोष करौथ. " नै बाबूजी से कोना हेतै ?" से नै, त' और की करब अहाँ ? " बाबूजी हम दोसर विआह करब. ." के करत अहाँ सँ विआह ? कोनो नि: संतान, जे मर्द हएत ! आ कन्यादान ई क' दिह'थिन. धीया-पुता लेल प्रेरक अछि देवीजी धिया-पुताक मोन कचाह होइत छै। जेना बाँसक हरियर करची। ओकरा जिम्हर लिबेबै तिम्हरे लीबि जाएत। ताहि समय बगरता होइ छै ओइ खिज्जा मगज के सजग कऽ ठोस बाट धरेबाक। से जँ सजग रूपे भेल तँ ओ बाट मोकाम धरि स्वतः पहुँचा देबाक कुब्बति रखैए। "देवीजी"केँ समाजिक बदलावक सूत्रधार बना ज्योति चौधरीजी खंडित गिनगीकेँ जोड़बाक सफल प्रयास करबाक चेष्टा कएलनि अछि। ऐ पोतीमे छोट-छोट आलेखक माध्यमें धीया-पुताकेँ प्रेरणा दऽ नव बाटपर चलबाक लेल प्रेरित कएल गेल अछि। धीया-पुता सभ सुग्गाकेँ पकड़ि पिंजड़ामे बंद कऽ रखेए। ओकरा सभ "देवीजी" सिखा देने छै। ओ जखने "देवीजी" बाजए की सभ थपड़ी पाड़ए। देवीजी ओकरा बदला छात्र-छात्रासँ किछु दाना-पानी राखि सुग्गाकेँ पिंजड़ा खोलि उड़ा देलनि। आब सभ चिड़ै ओतऽ दाना-पानी खा-पी कऽ उड़ि जाइत छल। देवीजी ऐसँ धीया-पुताकेँ स्वतंत्र जीवन जीबाक सीख देलनि। परीक्षाक परिणाममे असफल भेल बच्चा सभपर माए-बापक तामस करबापर मना करैत सभ असफल बच्चा सभकेँ दुखी नै भऽ आगू मेहनति आ सफल हेबाक लेल प्रेरित केलनि। आब कोनो बच्चा असफल नै होइए। मैथिलीमे ऐ तरहँक प्रेरक निबंधक पहिल संगोर अछि जे मात्र निबंध नै प्रेरणा आ जे नव बाट सृजनक रूपमे सोंझा आएल अछि। अधिकार लेल छटपटाइत मोहन दास लोकतांत्रिक इकाइक रूपमे गिनल जाए बला जन वा जनमानस ओकर शिकार भऽ जाइए आ शिकारी सभ ओकरा बलें सत्ता सुखासीन भ अपन आधारकेँ बेर-बेर थकुचैत कि चेथड़ी करैत अट्टहास करैए। कियो दुब्बर जन जँ कहियो कत्तौ केखनो माथ उठा अपन अधिकार तकैए तहन ओकरेसँ जाबी बना मुँह जाबि देल जाइए आ कि ओकरे बीनल सीकसँ ओकरे फसँरी दऽ देल जाइए। अभिजात्यवर्गक बीच सर्वहारा वर्ग अपनाकेँ उपर करितों नीचा देखा नीचमे रहबाक लेल बेबस होइए। कत्तौ केखनो पाइसँ नीच तँ कत्तौ, केखनो जातिसँ नीच राखि धोधिगरहा सभ ओकर शक्तिक दोहन करैए। आ निचला पौदानक लोक सदिखन उपरका लोकक कत्तौ जातिसँ तँ कत्तौ पाइसँ ओकरा नीचा दबाइत रहि जाइ लेल बाध्य होइए। एहने उपरोक्तो परिस्थिति मध्य एकटा सर्वहारा वर्गक लोक अछि मोहनदास। जे अपन परिस्थितिक संग-संग समाजिक विषम परिस्थितिसँ लड़बाक असफल प्रयास करैत जिनगी काटि रहल अछि। सभ डेग दूरा-दुरखापर अपन डेग अटकि जाइत देखैए मुदा तइयो हारि नै मानैए। थकैए, खसैए आ फेरो हुब्बा कऽ अपन बाट परहँक एक-एक डेग आगू बढ़बैत जाइए।मोहन दासक कथाककार उदयप्रकाशजी एकर घर-परिवार, समाज आ परिस्थिति मध्य घुसि एकल-एक भोगल यथार्थकेँ जीवंत कऽ चित्रण करबामे सफल देखाइत छथि। एक-एक सोच आ घटनाकेँ एतेक महीन आ निस्सन बोध आ चित्रण कथाकेँ महान बनबैत अछि। मोहन दास ऐ स्वतंत्रताक लड़ाइ एकसर वाहक भऽ चलैत बाटपर पौलक हर्षवर्धन ओकीलकेँ। जिनगीसँ झमारल दोसराइतपर विस्वासे कठिन भऽ गेल छै। बिसनाथ ओकील द्वारा सहयोगक आस संशयग्रस्त बुझैए मुदा एकसँ भल दुइमे विश्वास करैत ओकरा संग देबाक आश्वासनपर विश्वास कऽ जा टिकैए। समय बितैत गेल। मोहनदास कस्तूरी अपन मेहनति-मजूरी आ मलहइया मायक कृपासँ कोनो तरहें दिन गुजारि रहल छल। मोहन दास ओइ दफत्रक आगू ठाढ़ छल जतऽ चारि बरस पहिने ओ अपन सभटा सर्टिफिकेट जमा केने छलाह। ओतऽ काज करऽ बला बाबू भरोसा देने छल- अहाँक नाओं तँ कहियो ने कटि सकैत अछि किएक तँ लिकित आ शारीरिक परीक्षामे अहाँ सूचीमे सभसँ उपर छी। मुदा कतेको बरख धरि परिणाम शून्य।ई वएह काल छल जखन लगातार पंद्रह बरससँ हिंदी भाषाक संबंधित पदक चयन समीतिक सभ सदस्य खाली पदपर अपन जमाए-बेटी, बेटा आ समधिकेँ निर्लज्जतासँ नियुक्त कऽ दैत छल। ओइपर ने कोनो सी.बी.आइ इन्क्वाइरी छल ने राज्य सभा वा लोक सभामे कोनो सवाल उठैत छल। मोहन दास सभ ठाम हारैत रहल.. तहन ओ खाडा गाम जा कऽ सिंहनारायण गोंसाइकेँ बजौलक ओकरा बीस टाका आ दालि चाउर, नून-हरदि सीधा देलक। ओकरासँ मलहइया मायक पूजा करौलक आ शुद्ध बकरीक दूधसँ निकालल गेल पाव भरि मालाइक भोज चढ़ौलक। आइ निभरोस भऽ मोहन दास अट्टहास कऽ रहल अछि " जकरा बनबाक छै मोहनदास, हम नै छी मोहन दास। हम बी.ए नै केलहुँ। हम कहियो कोनो नौकरी काबिल नै रही। हमरा चैनसँ जीबऽ दिअ" ई हिंदीक मोहनदास थिक की मैथिली अंग्रेजी की आन भाषाक से लोककेँ पढ़लेपर पता लगतै कारण हरेक समाज नै हमरा हिसाबें तँ हरेक आदमीमे एक टा ने एकटा मोहनदास रहिते छै। विनीत उत्पलजीकेँ बधाइ ऐ अनुवाद लेल। राम लोचन ठाकुर रमानंद रेणु के मन पाड़ैत मैथिलीमे बड़ प्रचलित कहबी छै- सीता जन्म वियोगे गेल।, दुख छोड़ि सुख कहियो ने भेल। एहि कहबीक सत्यता सिद्ध करबाक प्रयोजन भरिसके केकरो हेतनि। हमरा लोकनि जनैत छी जे 1931 ई. जनगणनामे मैथिली भाषीक संख्या छल 14275000 जकरा 1951मे मात्र 97685 देखाओल गेल। ई काज केलनि मैथिली विरोधी हिंदीक पक्षधर लोकनि। एकर पृष्ठभूमिमे अबस्से दरभंगा महराज लक्ष्मीश्वर सिंहक जुलाइ 1880 ई.क ओ आदेश छल जे अमला लोकनिकेँ तीन मासक भीतर हिन्दी भाषा एवं नागरी लिपि सीखि ताहीमे समस्त काज करबाक लेल कहल गेल छलैक। हिन्दीमे साहित्य सिरजनक लेल कएकटा पुरस्कारक घोषणा कएल गेलै आ ताही संग हिन्दी नहि सिखनिहार लेल नौकरीसँ हटा देबाक धमकी। 1910मे बनल " मैथिल महासभा" जकर सदस्यता मात्र ब्राम्हण आ कायस्थ धरि सीमित राखल गेलैक, बाँकी नब्बे प्रतिशत धरतीपुत्रकेँ बारि देलक। एकर तीव्र प्रतिक्रिया भेलैक फलतः ओ लोकनि घर-आँगनमे मैथिली बजितो तकरा स्वीकार नहि करथि आ तकरे फल छै जे मैथिलि साहित्यकारमे एहि वर्गक उपस्थिति नहिये सन अछि। 1930सँ 1940 धरि जे तीस गोट यशस्वी साहित्यकारक जन्म भेल अछि, जिनका लोकनिक प्रतिभाक प्रभासँ मैथिली साहित्य भास्वर अछि। ताहिमे सभ महराजी मैथिल छथि। ललित, धूमकेतु, लिली रे, डा. धीरेन्द्र, मायानंद मिश्र,राजमोहन झा, सोमदेव. रमानंद रेणु, बलराम, जीवकांत, डा. रामदेव झा, कीर्ति नारायण मिश्र, हंसराज, कुलानंद मिश्र, रामानुग्रह झा, आदिक परिचय देब आवश्यक नहि आ हिनका लोकनिमे अपवाद छोड़ि सभ प्रायः प्रगतिशील विचारक पोषक छथि। स्वाभाविक छै जे कोनो रचनाकारक प्रतिभा-प्रतिबद्धताक, हुनक रचनाधर्मिताक विवेचन-विश्लेषण, आलोचना-समालोचना एहि पृष्ठभूमिकेँ ध्यानमे राखिए कऽ कएलो जा सकैछ। रमानंद रेणुक जन्म 1934मे भेलनि। ई बहुविधावादी रचनाकार चलाह। कथा, कविता, उपन्यास, नबंध सभ विधामे ई लिखैत छलाह। खूबे लिखैत छलाह। हिनक पहिल रचना 1950मे प्रकाशित भेल अछि। उत्तर जनपदक अनुसार हिनक दू गोट उपन्यास, तीन कथा संग्रह, तीन कविता संग्रह एवं दू गोट संपादित पोथी अछि। जँ थोड़ अछि तँ तकर कारण प्रकाशन आ वितरण व्यवस्थाक नहि होयब थिक। ई समस्या प्रायः सकल साहित्यकारक संग रहल अछि आ तँइ मैथिली पोथीक संख्या अपेक्षाकृत थोड़ अछि। स्वाभाविक कारणे एहि दयनीय अवस्थाक लेल किछु लोहक दोष तँ किछु लोहारोक मुदा सर्वाधिक दोषी जँ केयो छल तँ से लक्ष्मीश्वर सिंह जकर दुरभिसंधिक कारणे मिथिलाक्षर तँ उठिए गेल, मैथिली भाषाक अस्तित्व सेहो संकटापन्न भ गेलैक। बिसरबाक नहि थिक जे मैथिल महासभाक कार्यक्रम सेहो हिंदीमे होइत छल। अस्तु। जेना कि कहि चुकल छी जे एहि अवधिक अधिकांश साहित्यकार प्रगतिशील विचारक पोषक छलाह यद्यपि प्रत्यक्षतः तँ ई लोकनि महराजी दुरभिसंधि वा अवधारणाक विरोध नहि कएलनि मुदा प्रकरांतरसँ अपन रचनाक माध्यमें तकर विरोधमे बेस मुखर रहलाह आ तकर प्रमाणमे हिनक लोकनिक रचना उपल्बध अछि।किरणजीक मधुरमनि, यात्रीक बलचनमा किंवा जोड़ा मंदिर, ललितक रमजानी एवं रमानंद रेणुक दूध-फूल एकर प्रमाण थिक। वस्तुतः किरण-यात्राीसँ जाहि प्रगतिशील परंपराक प्रारंभ भेल से हिनका लोकनिक प्रसादात आर बेसी प्रखर, आर बेसी मुखर भेल। मैथिलीमे आद्यावधि जतबा शोध भेल अछि ताहिमे हिनका लोकनिक कृतित्वक कतेक सहभागिता अछि सेहो एकर दृष्टांत स्वरूप उपस्थित कएल जा सकैछ। आ मैथिलि भाषा साहित्यिक भविष्य लेल इएह चिन्ताक कारण अछि। आइयो विद्यालय, विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे मात्र प्राध्यापके लोकनिक रचना पढ़ाओल जाइछ, वएह लोकनि प्रश्नपत्र बनबै छथि, खाता देखै छथि, पुरस्कार देनिहार संस्था सभमे भाइ-भतीजावादक वर्चस्व छैक। आ एहि सभमे जे लोकनि छथि से सभ परंपरावादी महराजी मैथिल। जनकवि यात्रीक नवतुरिया वैश्वीकरणक झंझावातमे उड़िया रहल अछि, लाभ-लोभक लालसामे भसिया रहल अछि। रमानंद रेणुक प्रथम उपन्यास "दूध-फूल" 1967मे प्रकाशित भेल। ई सकलीक व्यथा कथा ओकर संघर्ष आ उपल्बधिक कथा थिक। एकर समापनक एना होइछ " सकलीक अङना मे आइ बड़ चहल-पहल छलैक। भरि गामक छोटका-बड़का सभक नवतुरिया छौंड़ा इम्हर-ओम्हर दौड़ि रहल छलैक। सभकेँ रमदेबा काज हढ़ौती अढ़ा रहल छलैक। आइ ई क्यो नहि कहि सकैत छलैक जे के छोटका आ के बड़का? भोजक पूरा तैयारी छलैक। भरि गामक भोज। सभ क्यो हँसी खुसी सँ खाइत-पिबैत गेल। आ ओहिना हवसैत-खेलाइत ढ़ोल-पिहहीक सङ विदा असली रामसरनक बियाहक लेल। सभ बूढ़-पुरान अपन दरबज्जापर बैसल देखैत रहल। अपन धीया-पूता केँ बरजि सकबाक सामर्थ्य जेना केकरो मे नहि छलैक। मानिजन-सरदारक कान जेना बहीर भऽ गेल छलैक। सभ चप रहल। बरियाती गाम सँ बिदा भऽ गेलैक" एहिमे रेणुजीक प्रगतिशील चिंतन-चेतना, अपन भू-भाषाक उन्नति-विकासक लेल व्याकुलता, हुनक कल्पनामे नवतुरिया लोकनिक स्नेह-सामंजस्य, उत्साह-उद्दीपना आ बूढ़-पूरान अर्थात परंपरावादी लोकनिक बौक-बहीर भेनाइकेँ देखबैत अछि। सत्य कही तँ ई उपन्यास बहुत किछु कहैत अछि मुदा जेना तुलसी दास कहै छथि-- "मूरख हृद्य न चेत जौं गुरू मिलहि विरंचि सम" आ तँइ आइयो मिथिला-मैथिली अवहेलितावस्थाने पड़ल अछि। अपन माटिक गंध, पानिक कान्ति, हवा-बसातक निर्मलता, भाषाक सहजता आ भावक गंभीरताक संग ई एक अद्भुत उपन्यास थिक। 1972मे प्रकाशित भेल हिनक शोककाव्य "ओकरे नाम"। कुल चालिस पृष्ठक ई एक दीर्घ काव्य थिकजे ई अपन दिवंगत पुत्र श्री कृष्ण कुमारक स्मृतिमे, ओकर वियोगमे रचने छथि। स्वीकार करबामे आपत्ति नहि जे एहिसँ पूर्व एहन काव्य हमरा देखबाक अवसर नहि भेटल छल। एक पिताक अपन पुत्रक वियोगमे एहन व्याकुलताकेँ काव्यक रूपमे चित्रित केनाइ अभिनवे कहल जा सकैछ। सत्य कही तँ तँ अपन संतितक शोक ककरा नहि सीदित करैत छैक। मनुख तँ मनुक्खे थिक पशु-पक्षियो अपन संततिक शोकमे विकल भेल विलाप करैछ आ से देखि कोनो भावुक लोक द्रवित भऽ जाइछ। यद्पि पशु-पक्षीकेँ अपन व्यथा व्यक्त करबाक ओ भाषा नहि होइत छैक जे मनुखकेँ उपल्बध छै। रेणु अपन कविताक आरंभ एहि तरहें करैत छथि-- "प्रतिदिन भिनसरे एक टा प्रतिमा बनाउ आ साँझ मे तोड़ि दियौ। ककरो अत्याधिक स्नेह पाप थिक "आत्मज" आत्मज नहि तें दुलार करब दोष थिक समस्त स्त्रीगण आइ बंध्या अछि समस्त माइक कोखि सँ बहराइत छै आगि संपूर्ण धरती पर खेलाइत अछि चित्कार हमरा नहि कहू क्यो "बाप" हम नहि छी केकरो "अपन बाबू जी" आ हम नहि छी अहाँक लग-पास कृष्ण, आइ कोना अङेजि रहल छी अहाँ अपन निस्तेज शरीर जड़ भेल प्रकृति अनुरागहीन वात्सल्य लटपटाइत बोल अपन चुलबुल अस्तित्व खोखसाह व्यक्तित्व आ सयो मोन माटिक चखान? ई कविता एना समाप्त होइछ-- " बन्धु हमरा एकटा विश्वासक डेग उठाबऽ दियऽ हमर अन्वेषी दृष्टि यथार्थक पलड़ा पर आइ बिका गेल। हमरा अनास्थाक भीड़ मे जयबासँ रोकि लियऽ हम मात्र व्यक्ति छी आ व्यथितक संपर्क कैक बरख सँ पीड़ित अछि प्रत्येक पद्धति उपर अछि। हमरा आश्वस्तिक स्वर चीन्हऽ दियऽ। हमरा अपन निजी परिस्थितिमे जीबऽ दियाऽ, बन्धु कतेक विलक्षण अछि ई कविता। आरंभमे व्यक्तिगत विकलताक आभास दैतो शेषमे संपूर्ण मानवताक व्यथा-कथा कहैत "सत्य थिक संसार"केँ चरितार्थ करैत अछि। व्यक्तिक संपर्क जे पीड़ित अछि ताहिसँ उपर उठि मानवीय संपर्क साधनक अप्रितम प्रयास अछि। तँइ कवि विश्वासक डेग उठेबाक आकांक्षी छथि। सत्य थिक मनुखकेँ सार्थक करै चाहै छथि आ इएह महत्वपूर्ण बात थिक।कोनो रचनाकारक व्यक्तित्वक छाप ओकर रचनापर पड़ैत छैक आ एहि व्यक्तित्वक निर्माणमे परिवेशकप्रधानता रहैत छैक। एहि संग निर्विवाद ओकर चिंतन-चेतना संपृक्त रहैछ जे रचनाक दिशा निर्धारणमे अहम भूमिका निर्वाह करैछ। एहि ठाम हम वाल्मीकिक- मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् । केर उदाहरण देबऽ चाहैत छी। ओ मात्र क्रौंच वधक बात लीखि नहि थम्हला अपित व्याधकेँ शापितो केलनि। आ इएह साहित्यकारक दायित्वो होइत छै। मधुपजी अपन "घसलअट्ठनी" कवितामे भाग्याश्रित भऽ दोषमुक्त नहि भऽ सकै छथि। रेणुजी अपन रचनामे बेस इमानदार छलाह ताहिमे केकरो संदेह नहि हेबाक चाही।एहिठाम हम हिनक कथाक चर्च करऽ चाहब। मिथिला सांस्कृतिक परिषद्, कलकत्तासँ 1982मे प्रकाशित भेल हिनक "अन्तहीन आकाश"। एकर पहिल कथा थिक "अग्निजीवी"। अग्निजीवी अर्थात श्रमजीवी, बोनिहार। मैथिलत्वक सीमासँ बाहर। मुदा रेणुजी एहि सीमाकेँ नहि मानैत छलाह। कथाक नायक झरोखी सितलीकेँ लऽ अनैछ। ओकरासँ बियाह करत। मुदा सितली ओकरासँ निम्न जातिक छै आ से सितलीक जातिक माइनजन-देबानकेँ मंजूर नै। "तों हमरा आउरक समाजक मूड़ी छोपि लेलऽ हन। तोरा जरिमाना भरऽ पड़तऽ---- आइ धरि अइ परोपट्टा मे एहन कतहु कुच्छो नहि भेल छलै हन।--- बहार करऽ लड़िकी के। हम आउर अपन समाजक लड़िकी के लऽ जेबै। कि हमरा आउरक समाजक मे लड़िका नहि हइ कऽ जे परजाति मे लड़िकी उठतै गऽ। झरोखी कने सहमि अबस्से जाइत अछि किन्तु सितलीक साहस कनियों झूस नहि होइत छै। ओ निधोख पुछैत छइ-- की मौगी मनुख नइ होइ हइ कऽ? सभ दिना, सभ हालति मे मरद के मालिस करिते रहइ कऽ? आ कुच्छो बोलू तँ गत्तर गत्तर फोड़ि दै ? हमरा लेखे आब माय-बाए, भाय-समाज जे कुच्छो हइ कऽ, एतही हइ। हम आन ठीञा कतहु नइ जेबै। अपना मोन सँ, राजी-खुशी सँ ई घर डेमलिए हन। एक मुट्ठी अन्न आ एक रत्ती सिनेह हमरा ईहे मिलैत हइ कऽ। आब हमरा दोसर कुनो फिकिर नय हइ।" मनुवादी परंपरापर एहन प्रखर प्रहार, नारी विमर्शक एहन ज्वलंत दृष्टांत, प्रगतिशीलताक एहन विलक्षण उदाहरण मैथिलीक साहित्यालोचक लोकनिक दृष्टिपर नहि पड़नि से स्वाभाविके। जाति-गोत्र-संबंधक चकभाउर दैत आलोचनाक लेल ई सभ सोचलो नै जा सकैछ। मुदा प्रगतिशील विचारक सर्जनात्मक साहित्यकार रेणु जीक लेल ई कतेक सहज अछि से सहजहि बूझल जा सकैछ आ इएह थिक रेणु जीक विशेषता। रमानंद रेणु मैथिलीक एक विरल-विलक्षण विभूति छलाह जनिकापर कोनो मैथिलीभाषीकेँ गर्व हेबाक चाही। हिनक कविता संकलन "कतेक रास बात" जे 1197 ई. मे प्रकाशित भेल ताहीपर साहित्य अकादेमी पुरस्कारो प्रदान कएलक। परंच आवश्यक नहि जे हिनक एक-एक रचनापर पृथक-पृथक मंतव्य देल जाए। कोनो पत्रिकाओ लेल सभंव नहि जे ओतेक पैघ निबंध छापत। तँइ हिनक स्मृतिकेँ शत-शत नमन करैत हम एतै विराम लैत छी। सुविधा भेने बेसी दोसर बेर। योगेन्द्र पाठक “वियोगी” एकसरुआ सिपाही प्रायः बीस बर्ष पूर्वक घटना छी। मइ जून के मास रहल हेतैक। हम कलकत्ता मे एकसरे रही। भोजनक समय रहै। हम भोजन केलाक बाद बरतन बासन धोइ लेल तैयार भेलेरही कि घंटी बाजल। एहन कुसमय मे के आएल होएत ? हम उघारे देह रही, लुंगी आधा समेटने। गर्मीक समय हमर बगे बानि एहिना रहैत अछि। ओही बगे मे हम केवाड़ खोलल। सामने मे ठाढ़ छलाह दुब्बर पातर नमगर पिंडश्याम व्यक्ति। पुछलनि – “वियोगीजी छथि ?” हम की उत्तर दियनु ? एतबे कहलिएनि –“भीतर आउ”। हुनका भीतर बैसाए हम हाथ धो लेलहुँ, लुंगी ठीक केलहुँ, हाफ शर्ट पहिरि लेलहुँ आ हुनका सामने उपस्थित भेलहुँ “जी कहल जाए, अपनेक परिचय ?”हमर जिज्ञासा पर हुनकर उनटे जिज्ञासा छल –“अपनहि वियोगीजी छी ?” हम स्वीकारोक्ति मे मूरी हिला देलिएनि। तकर बाद परिचय भेल आ आगन्तुक महाशय कर्णामृत पत्रिकाक बारे मे बतौलनि। एकटा पत्रिका लेने आएल छलाह से देखौलनि आ हमरा एकर आजीवन सदस्य बनबाकआग्रह केलनि। हम तुरत्ते हुनका पाँच सौ टाकाक चेक काटि देलिएनि। हुनका पत्रिकाक पुरान प्रति सब सेहो देबाक अनुरोध केलिएनि। एतहि सॅं शुरू भेल श्री राजनन्दन लाल दासजी सॅं सम्पर्क। तकर किछुए दिनक बाद ओ स्वo अर्जुन लाल करणजीक संग डेरा एलाह। हमरा गाम मे कर्ण कायस्थक बाहुल्य तेंकायस्थ समाज मे प्रायः सब लोक एहि गाम सॅं परिचित। आ करणजीक तs समधियारु सेहो छलनि हमरे गाम। एवम प्रकारें घनिष्टता बढ़ैत गेल, हम चित्रगुप्त पूजा मे सेहोजाए लगलहुँ आ कने मने कलकत्ताक मिथिला मे घोंसिआए लगलहुँ। आ कर्णामृतक नियमित पाठक तs भैए गेलहुँ। ताहि समय राजनन्दन बाबू काकुरगाछीए मे रहैत छलाह। लग रहने एकाध बेर हुनका डेरो गेल रही। बिमारीक बाद ओ बेटी लग चल गेलाह गरफा-संतोषपुर। कने दूर जरूरभs गेलैक तथापि एहू डेरा मे हम कएक बेर गेलहुँ। मैथिली साहित्य मे हुनक साहित्यिक अवदानक मूल्यांकन करबा मे हम अपना कें सक्षम नहि बुझैत छी। ओ मूल्यांकन तs विद्वान लोकनि कैए चुकल छथि तें ने हिनका‘विदेह समानान्तर पुरस्कार’ देल गेलनि। हम मात्र एकटा जन साधारण रूपें, जकरा साहित्य सॅं कने सिनेह छैक, अपन बात कहब। कर्णामृत सम्भवतः मिथिला मिहिरक बादप्रथम पत्रिका होएत जे पैंतीसम वर्ष मे चलि रहल अछि आ नियमित रूपें लोक कें सब अंक भेटि रहलैक अछि। आ एकर श्रेय एकमात्र हुनके। मात्र किछुए दिन एहन भेलछलैक, जखन राजनन्दन बाबू बहुत अस्वस्थ छलाह जे दू अंक कें जोड़ि एक अंक बहराएल छलैक। तें हमर कहब जे ओ एकसरुआ सिपाही छथि। हमरा बुझने एखनहु हुनककोनो स्थायी आ ओहन ऊर्जावान सहयोगी नहि नजरि आबि रहल छथि जिनका साहित्य जगत सॅं परिचय होनि तें कखनहु कए ई डरो होइत रहैत अछि जे राजनन्दन बाबूकबाद कर्णामृतक भविष्य की हेतैक। कर्णामृतक पोषक संस्था छैक कलकत्ताक कर्णगोष्ठी। ई मानल जाए जे एहि भविष्यक चिन्ता एही संस्थाक कर्णधार लोकनि कें हेतनि तेंभविष्यक चर्चा उचित नहि। मैथिली मे पत्र पत्रिका सॅं बेसी अभाव छैक लेखक के। बहुत कम व्यक्ति छथि जे एकटा स्तरीय रचना लीख सकैत छथि। तेहन स्थिति मे कोनो सम्पादक लेल पत्रिकाकन्यूनतम आकार रखैत समय पर लेख जमा कs कए छपबैत रहब बेस कठिनाह काज छैक। मुदा राजनन्दन बाबूक परिचय क्षेत्र एतेक पैघ छनि आ हिनका प्रति लोक मे तेहनेश्रद्धाभाव छनि जे हिनक आग्रह कें कियो टारि नहि सकल अछि। इएह कारण जे पत्रिका मे नीक रचना सब भरल रहैत छैक। हम जतेक कर्णामृत देखल अछि ताहि अनुभव पर कहि सकैत छी जे ई पत्रिका विशेषांक लेल बेसी प्रसिद्ध अछि। बहुतो विषय पर राजनन्दन बाबू पत्रिकाक विशेषांकप्रकाशित करैत रहलाह अछि। विशेषांक साहित्यिक व्यक्ति केन्द्रित सेहो रहलैक आ ज्वलन्त सामाजिक समस्या केन्द्रित सेहो। शारदीय विशेषांकक अतिरिक्त सोलह टा विशेषांकअछि मिथिला विभूति लोकनिक स्मृति मे। एहि मे अछि बाबूसाहेब चौधरी सॅं लs कए श्रीकान्त मंडल आ सुमन जी सॅं लs कए आरसी प्रसाद सिंह आ प्रबोध नारायण सिंहप्रभृति प्रसिद्ध नाम सब। मिथिला मैथिली सॅं सम्बद्ध कोनो आन संस्था एतेक विस्तृत पटल पर विशेषांक बहार केलक से हमरा सन्देह अछि। मौलिक कृतिक रूप मे हिनक मात्र एकटा नाटक ‘सन्तो’ उपलब्ध अछि। मुदा हिनक प्रत्येक सम्पादकीय सेहो मौलिके रहैछ ने। यदि सबटा एहन लेख कें जमा कs कए कियोरिसर्च करए तs हमरा बुझने किछु नव विचार जरूर उजागर हेतैक जे कोन तरहें राजनन्दन बाबू अपना बहीर समाजक कान पर चिचिया चिचिया कए समस्या सब सुनबैतरहलखिन अछि। सन्तो द्वारा सेहो ई मैथिली आन्दोलनक आगि कें बिएनि होंकैत धधरा उठेबाक प्रयास केलनि अछि। हिनक दोसर प्रकाशित पुस्तक अछि‘चित्रा विचित्रा।’एकरा किछु लोक हिनक मौलिक कृति नहि कहैत छनि। हमरा विचारें ई ठीक नहि। एहि मे एक भाग अछि यात्रा कथा जेबहुत रोचक ढंगें लिखल अछि। यदि वित्तक समस्या नहि रहितैक तs हम बुझैत छी राजनन्दन बाबू एहि कथा सबकें अलग सॅं पुस्तकाकार अनितथि आ तखन कोना हम सबओकरा मौलिक नहि कहितियैक ? मौलिक खाली कथे कविता टा तs नहि होइत छैक। निबन्धो मौलिक भs सकैत छैक ने। सम्पादकीय सॅं हटि कए जे लेख, निबन्ध आदिछैक सेहो मौलिक भेबे केलै ने। हिनक अनेक लेख अन्य पत्र पत्रिका मे सेहो छपल अछि। हिनक एकटा आर पुस्तक प्रकाशित अछि – “मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान”। ओना तs एहू मे पुरने बात सब संकलित छैक मुदा ई एकटानीक ‘संदर्भ ग्रन्थ (reference book)’ बनि गेल अछि। मैथिली आन्दोलन, कलकतिया मैथिलक योगदान आ पत्रकारिताक इतिहास सब बुझबा लेल एकटा संग्रहणीय पोथीअछि ई। नवतुरिया लेल कलकत्ताक स्वर्णिम युगक परिचय प्राप्त करबाक नीक स्रोत। नोकरी चाकरी करैत मार्केटिंग सन काज मे व्यस्त रहैत, जाहि मे सदिखन यात्रा करबा लेल झोड़ा टँगनहिं रहैत छलाह, एकसरे राजनन्दन बाबू जतेक करैत गेलाह से कोनोदृष्टिएँ थोड़ नहि कहल जेतैक, ई हमर मान्यता अछि। तखन लोक कें तs हमेशा अपेक्षा रहैत छैक “आर बेसी आर बेसी” के। आशा करैत छी एखनहु कतोक वर्ष धरि ओसक्रिय रहताह आ एहि अपेक्षा कें पूरा करथिन। नबो नारायण मिश्र युगपुरुष श्री राजनंदन लाल दास लगभग तीन दशक पूर्व कलकत्ताक महाजाति सदन प्रेक्षागृहमे मैथिली कार्यक्रमकेँ आयोजन छलै। हम दर्शकदीर्घामे उपस्थित मैथिलीप्रेमी लोकनिक उत्साह देखि रोमांचितभेल छलहुँ। ताहि मध्य एकटा सज्जनकेँ हाथमे मैथिली पत्रिकाक किछु प्रति देखलहुँ। मैथिली पत्र-पत्रिकासँ लगाव हेबाक कारणे हम अपनाकेँ रोकि ने सकलहुँ आ हुनकासँएक प्रति लेलहुँ। विशिष्ट व्यक्ति सभसँ हुनक घनिष्ठ संबंध देखि हम हुनक परिचय पुछने छलहुँ, आ तकर बादसँ आइ धरि निरंतर हुनका संपर्कमे छी। ओ व्यक्ति छथिमैथिलीक त्रैमासिक पत्रिका "कर्णामृत" केर यशस्वी संपादक, मिथिला-मैथिलीक उन्नायक स्वनामधन्य बाबू श्री राजनंदन लाल दास। हिनक जन्म 5 जनवरी 1934 मे अपन मातृक सहरसा जिलाक पटोरी गाममे भेलनि। दरभंगा जिलाक घनश्यामपुर अंचलक गोनौन गाम हिनक पैतृक गाम छनि। ।स्व. विद्या देवी एवं स्व. मनीलाल दासक ई सुपुत्र वर्तमानमे तीन भाइ, एक बहीनिक अतिरिक्त चारि गोट संतान मध्य मिथिला-मैथिलीक हेतु सतत तत्पर रहैत छथि।अत्यंत खेदक विषय जे हिनक पत्नी राजेश्वरी देवीक निधन हालहिमे 74 वर्षक अवस्थामे कोलकाताक गरफाकेँ आवासपर 24 दिसम्बर 2015केँ भऽ भेलनि। राजनंदन जीक प्रारंभिक शिक्षा बिहारसँ प्राप्त केलाक बाद 1949मे कलकत्ता एलाह। राजेन्द्र छात्र निवासमे रहि राजनीति शास्त्रमे एम.ए केलनि। मिथिला-मैथिलीक प्रतिसाकांक्ष रहबाक कारणे हिनक प्रवेश तात्कालीन "मिथिला लोक संघ "मे 1958मे स्वयंसेवक केर रूपमे भेलनि। आगू जा मैथिलीक आन सभ संस्था जकाँ ईहो संस्था दू भागमेबँटि गेल एक "अखिल भारतीय मिथिला संघ" दू मिथिला सांस्कृतिक परिषद् । दासजी "अखिल भारतीय मिथिला संघ" केर सदस्य बनलाह। दासजी भू-भाषाक प्रति सततसजग रहलाह अछि। ओना तँ मिथिला-मैथिलीक प्रति हिनका छात्रे जीवनसँ सिनेह छलनि मुदा कलकत्ता एलापर तात्कालीन मिथिला-मैथिलीक परिवेश आ युग-प्रवर्तक स्व.बाबू साबेह चौधरी, स्व. देवनारायण झा एवं स्व. प्रबोध नारायण सिंह प्रभृति महानायक लोकनिक सानिध्यमे एलापर हिनक रुचिमे विस्तार भेनाइ स्वाभाविके छल। अपन कर्मठताक बलपर श्री दासजी अखिल भारतीय मिथिला संघक सचिव निर्वाचित भेलाह। ई हिनक लोकप्रियताक प्रमाण छल। ई तँ भेल हिनक संगठनकेँ सुचारू रूपें आगू धरि बढ़ेबाक कला। दोसर पक्ष हिनक साहित्यिक-सांस्कृतिक अछि। पत्रकारितासँ आंतरिक लगाव हेबाक कारणे जे अवसर भेटब निश्चिते छलनि आ से भेटलनि जखन किछु साहित्यिक प्रेमी लोकनि "आखर" नामक पत्रिकाक प्रकाशन केलक जकर संपादक छलाह कीर्ति नारायण मिश्र एवं बीरेन्द्र मल्लिक आ स्वयं छलाह संग छलखिन स्व. पीताम्बर पाठक ओ अन्य। अप्प समयमे ई पत्रिका बहुत लोकप्रिय भेल मुदा एकरो ग्रहण लागि गेलै। किछु अपवाद के छोड़ि मैथिलीक सभ पत्रिका अल्पायु होइत रहल अछि आ तकरे शिकार भेल "आखर"। मैथिल बुद्धिजीवी होइत छथि मुदा ई लोकोक्ति "तीन तिरहुतिया तेरह पाक" सदिखन पछोड़ धेने रहैत छनि। किछु घटनासँ दासजी मर्माहत भेला। ताहि समय ओ एहनसंगठनक प्रयासमे छलाह जे कोनो पत्रिका बिना कोनो दिक्कत चलैत रहए ताहिमे अपन योगदान देबाक निश्चय केलनि आ तकरे फलस्वरूप "कर्णामृत"मे हिनक योगदानकआइ छत्तीसम वर्ष चलि रहल अछि। कर्णामृतक संस्थापक संपादक स्व. अर्जुम लाल करणजी जाहि आत्मविश्वासक संग हिनका ई भार देने छलखिन तकरा सफलतापूर्वकनिर्वाह करैत रहलाह अछि। हिनक लग्नशीलता कारणे भारतक प्रत्येक राज्य एवं नेपालक किछु अंचलमे एकर पाठक ओ ग्राहक अछि। धातव्य जे एहि पत्रिका संचालन ओसंपादन पूर्णतः अवैतेनिक अछि। आइ 82 वर्षक अवस्थामे एखनहुँ संपादकीय कार्यसँ जुड़ल छथि। प्रारंभेसँ आइ धरि साहित्य सृजनमे नव लेखककेँ प्रोत्साहन दैत रहलाह अछि। मिथिला चित्रकलाक हेतु सतत नव लोककेँ प्रोत्साहित केनाइ अपन धर्म मानैत छथि। पत्रिकाक आवरण चित्रमे मिथिला चित्रकलाक हएब तकरे परिचायक थिक। हरेक साल अक्टूबर-दिसम्बर अंक जे शारदीय विशेषांक रूपें ख्याति प्राप्त केने अछि से संपूर्ण रूपे साहित्य ओ मिथिला चित्रकलापर केंद्रित रहैत अछि। ई शारदीय विशेषांक संग्रहणीय मानल जाइत अछि। एकर अतिरिक्त कथा अंक, मिथिला लोककला-लोकसंस्कृति आदि प्रकाशित भेल अछि। हमरा नजरिमे सभसँ विशेष महत्वपूर्ण वस्तु ई जे अपना समाजक 18 गोट विभूतिक समृतिकमे मरणोपरान्त विशेषांक निकालबाक श्रेय हिनके छनि। इएह हिनक संपादकीय कुशलताक प्रतिमान अछि। आ हिनक इएह कुशलता मैथिलीक संपादकक भीड़सँ अलग करैत अछि। हालहिमे अथिति संपादक श्री चंद्रेशजीक सहयोगसँ कर्णामृतक नेपाल अंक आएल अछि जे बहु-प्रशंसित भेल अछि। कर्णामृतक संपादकीय "हमर कहब"मे हिनक बहुआयामीक्रियाकलाप आ मैथिलीक प्रति सुच्चा सिनेह देखल जा सकैत अछि। साम्यवादी विचारधारासँ ओतप्रोत रहबाक कारणे मैथिलीमे मौलिक नाटक "सन्तो" लिखलनि जकर सफल मंचन सेहो भेल अछि। नाटकसँ लगावक कारणे कर्णगोष्ठीक तत्वावधानमे कतिपय मैथिली नाटकक मंचन करौने छथि। हिनक लिखल किछु पोथी एना अछि-- १) सन्तो ( नाटक), 2) चित्रा-विचित्रा (कर्णामृतमे प्रकाशित हिनक संपादकीयक संकलन), 3) मिथिला-मैथिलीक विकासमे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान-1974सँ 2011 तक 4) प्रबोध नारायण सिंह ( बिनिबंध-साहित्य अकादेमी) एकर अतिरिक्त अनेको निबंध पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल छनि। वर्तमानमे आत्मकथा, बिनिबंध एवं अन्यान्य महत्वपूर्ण लेखकीय प्रयासमे संलग्न छथि। कतिपय संस्थाद्वारा सम्मानित भऽ चुकलाह अछि। हमरा नजरिमे जतेक सम्मानक ई अधिकारी छथि से एखनहुँ हिनका प्राप्त भेनाइ बाँकी छनि। विडंबना अछि जे हम सभ मरणोपरान्तजेहि व्यक्ति केर गुणगान करैत नहि अघाइत छी तिनके जीवनकालमे उचित सम्मान देबासँ परहेज करैत छी जे घातक अछि। एहन महान विभूतिक विषयमे कतबो लिखबथोड़ हएत। हम अपनाकेँ भाग्यशाली बुझैत छी जे एहन विभूतिक सिनेह सदिखन भेटैत रहल अछि। ओम प्रकाश झा विहनि कथा- विछोहक नोर पछिला साल कोचिंग करै लेल बेटीक नाम कोटामे लिखौने छलौं। जखन ओकरा कोटामे छोड़ि क' आबैत रही तखन ओ बड्ड उदास छल। ओकरा बुझेलियै जे हम नियमित रूप सँ आबि भेंट करैत रहबै। मुदा नौकरीक झमेलामे फुरसति नै भेंटल आ हम कहियो नै जा सकलौं। साल पूरा भेला पर ओ डेढ़ मासक छुट्टी पर गाम आएलछल। ऐ बेर ओकरा कोटा छोड़ै लेल फेर हमहीं गेलियै। ओकरा छोड़लाक उपरान्त जखन वापसीक ट्रेन पकड़बा लेल हम टीसन आबैत रही तखन ओ कातर दृष्टिसँ हमरा दिस ताकि रहल छल एकदम चुपचाप। हमहुँ ओकरासँ नजरि चोरेने औटोमे बैसि गेलौं। ओ हमरा गोर लागलक आ बेछोह कानय लागल। हमर आँखिमे सेहो जेनामेघ उमड़ि गेल मुदा ओइ मेघकेँ रोकैत ओकरा बूझबय लागलौं। रामायणक चौपाई मोन पड़ि गेल:- लोचन जल रहे लोचन कोना जैसे रहे कृपण घर सोना। खैर टीसन आबि ट्रेनमे बैसि गेलौं। जखने ट्रेन टीसनसँ घुसकल तखने ओकर कातर नजरि मोन पड़ि गेल आ लागल जे करेज फाटि जायत। नोरक मेघ ऐ बेर नै मानलक। हम सहयात्री सबसँ नजरि चोरबैत ट्रेनक बाथरूममे ढुकि गेलौं । बाथरूमक भीतर हमर मेघ बान्ह तोड़ि देलक आ हम पुक्की पारि क' कानय लागलौं। विछोहक नोरआवाजक संग पूर्ण गतिसँ बहय लागल मुदा हमर क्रन्दन ट्रेनक धड़धड़ीक आवाजमे विलीन भ' गेल। विहनि कथा - मातृवत परदारेषु इसकूलेक समैसँ ओ पढ़ैत छल "मातृवत परदारेषु"। श्लोकक ई अंश ओ सबकेँ सुनाबैत छल। आब ओ नौकरी करैए। ओ एखनो धरि ई श्लोक अंश दोहराबैत रहैए। मुदा सड़क पर, बसमे वा ट्रेनमे कोनो स्त्री वा बालिकाकेँ देखैत देरी ओकर आँखिमे एकटा चमक आबि जाइ छै आ ओअपन नजरिसँ ओकर सभक देह ऊपरसँ नीचा धरि नापि लैत अछि। कतेको बेर ओ ऐ कलाक प्रदर्शनक बाद स्त्रिगण सभक कोपभाजन सेहो बनि चुकल अछि। मुदा आदतिमे कोनो बदलाव नै। कहल गेल अछि जे चालि, प्रकृति, बेमाय, तीनू संगे लागल जाय। आइ चौक पर जखन ओअपन कलाक प्रदर्शन करैत छल तखन पीड़ित स्त्रीक हल्ला करै पर भीड़ ओकर पूजा क' देलकै लात जूतासँ। जावत किछु लोक ओकरा बचेलकै तावत ओकर मुँह कान फूलि चुकल रहै। हम जखन चौक पर पहुँचलौं तँ ओ अपन पूजा करबा क' चलि आबैत छल। हम पूछलिए कीहाल चाल मीता। ओ कहरैत बाजल हाल देखिये रहल छह आ चालि हमर बूझले छह जे मातृवत परदारेषु। अनिल झा व्यंग्य- अनटोटल गप्प बहुत सोच-विचार केलाक उपरांत हम अहि नतीजापर पहुँचलहुँ जे आब हमरो किछु करहे पड़त। बहुत भेलफेसबुक आ वाट्सएपपर मैथिली लेल आँखिमे आँगुर घुसिया कऽ नोर चुएनाइ। आब सत्ते हमर करेजा फटैया। अहि लेल नहि जे मैथिली के की दशा छनि। अहि लेल फटैया जे जँ हम सोचितेरहि गेलहुँ तँ एहन नहि जे बादमे संस्थाक कोनो नामे नइँ भेटए। जँ नाम भेटिओ गेल त फेर अध्यक्षे टासँ तँकाज नइँ चलि जाएत। ओकर कोषाध्यक्ष, सचिव , मनोरंजन , गुटफोरन आदि आदि सीट लेल सेहो ने मनुखचाही। मिथिलामे जाहि तेजीसँ समीति बनेवाक आंदोलन चलि रहल अछि, निसंदेह किछु दिनक बाद हमराकियो खाली नइँ भेटता। तँइ आइ हम असगरे सर्वसम्मतिसँ ई पास केलहुँ जे जँ सत्तेमे हम मिथिला - मैथिल आ मैथिली केर समुचितविकास होइत देखऽ चाहैत छी तँ आइए एकटा समीति केर गठन करी जँ नहि करब तँ मिथिला आंदोलनमे सभअगुआ जाएत आ हम पछुआ जाएब. हेयौ की नाम राखू हम अपन समीति केर टोलसँ लऽ कऽ अन्तरराष्ट्रिय तक एकौ टा नाम आब बाँचल नइँ। बहुतनियार-भाषक बाद ई नाम फुराएल अपने लोकनि अपन अपन आपति दर्ज करा सकै छी जँ कोनो हुअए तँ-- समीतिक नाम -- ''अंतर-ब्रम्हाण्डीय मैथिल महासभा '' 1. अध्यक्ष-- अनिल कुमार झा 2. कोषाध्यक्ष -- स्वयं 3. सचिव -- सेहो अपने 4. मनोरंजन प्रभाग-- असगरे बेसी छी 5. अन्यमे -- सभटा अपने नोट - अपनेक सलाह आ सुझाव तर्क -वितर्क करवा हेतु स्वीकार्य अछि। ओना अहाँ सब आब अपन - अपन घरधऽ लिय आब हमहीं टा खाली रहब सब भागि जेता। ''जय मिथिला, जय मैथिली रवि भूषण पाठक दोस आ दोसक चालि प्रकृति बेमेय आ जे काज मिश्रा जी नइ केलखिन से झा जी क' देलखिन ।वाह रे झाजी ,एकदम नगाड़ा बजा देलियइ आ सिंह कैम्प मे एकदम नैराश्यक स्थिति ।मिश्राजी जे बाजियो के नइ केलखिन ,से झाजी बिन बाजने सुतारि देलखिन ।एकरा कहै छै आदमी क' मतलब आदमी ,मुंहक मतलब मुंह ,हाथक मतलब हाथ आ जे कैह देलियौ से क' देलियौ ।ई भेलै ने ....आ ईहो देखियौ जे आदमी लोकल नइ ,पचास किलोमीटर दूर दरभंगा के आ मधुबनीक किला पर फहिरा देलकै धूजा ।आ पूरा दरभंगामंडली पुलकित ,पुलकित ब्राह्मण वर्ग आ आशान्वित कलक्टरी क' खबरी-छिनरी सब ।आ रंग-रंगक खिस्सा कि झाजी कैह देलखिन 'केवल अाहीं टा कमायब' कि 'केवल आहींटा क' घर-परिवार' कि 'केवल आहीं के गानै मे मून लागैत अछि ' आ पता नइ की झाजी कहलखिन आ की सिंहजी सुनलखिन ।पता नइ दूनू मे की बात भेलै ,ओना दूनू आदमी अपन-अपन कैम्प बनेबाक प्रयास जरूर केलखिन ,मुदा बहुत सफलता नइ भेलेन ।जे सीरियस आदमी सब रहथिन ,ऊ परिणामक साफ-साफ अनुमान केलखिन आ बहुत दूर नजरि फेकैत साफ-साफ देखलकिखन कि दूनू मे संघर्षक कुनो संभावना नइ आ स्पष्ट बूझल गेलै कि किमहरो गेनै मतलब अपन पहचान डूबेनए आ एहन स्थिति मे गुटनिरपेक्षता सदैव काम्य होइत छैक आ वाह रे कलक्टरीक बुधियार इंस्पेक्टर आ कर्मचारी वर्ग ओ किमहरो नइ गेलै ,ओ किछुओ नइ सुनलकै ,ओ किछु नइ निर्णय लेलकै ।ओ सुनितो आगू निकलि गेलै........... आ बहुत जल्दी सिंह-झा संधिक अघोषित परिणामक लिस्ट बजार मे बिकाइत भेटलै ।तू ले कलुआही आ हम लइ छी जयनगर ,दूनू आदमी भरि मून चर ।अपन-अपन पेट आ अपन-अपन जीभक' रक्षा कर ।तू बाभन सब के पोट हम राजपूत के पोटैत छी ।बहुत जल्दी खुलबाक आवश्यकता नइ ,बहुत दोस्ती देखेबाक जरूरी नइ ,बहुत भेंट करबाक कोन प्रयोजन ।से अपना-अपना खुट्टा पर टीकल रह , अपना खुट्टा पर सँ खूब लथाडि़ मार ,खूब सिंह भांज ।एना के सिंह भांज कि मालिको (हाकिम)तक डराइ ।आ यैह भेलै कि हाकिम तक डराइत रहलखिन कि यदि एकर सबक अधिकारक्षेत्र मे किछु परिवर्तन करबै त' कत्तओ सँ फोन आबि जायत । आ अहां झाजी सँ भेंट करियौ ,त' ओ आनी-मूनी स्टायल मे भांजता 'सिंह जी देखेबो केला' । अहां कहबै 'नइ' तखन फेर हफियाइत पूछता 'ओमहर गेल नइ रहियइ' । अहां यदि फेर कैह देलियइ 'नइ' तखन ओ आश्वस्त होइत कहता 'हां ठीके अछि अप्पन काज सँ मतलब रखबाक चाही ।' मतलब झाजीक साफ छैक 'अहां सब सिंहजी सँ नइ भेंट करियौ ,एकांत मे त' कखनो नइ ।आ नइ भेंट करबै त' बातचित नइ हैत ,बातचित नइ करबै तखन सेटिंग-गेटिंग नइ हैत आ ई सब झाजीक लेल खुशखबरी आ भेंट करबै त' झाजी क' एकटा स्टार कमि जेतै । भेंट करबै त' सिंह-झा -पालिटिक्स केर गोपनीयता संकट मे पड़तै ,ऐ राजनीति क' बौद्धिक पेटेंट खतम भ' जेतै ।' जेना सिंह जी तेहने झाजी जाति-जिला फैक्टरक प्रयोग करैत छथिन ,तें दूनू गोटेक बासन आ औजार अलग-अलग ।झाजी सेहो सिंहजी क' विरोध ऐ अंदाज मे करता कि समस्त ब्राह्मणक लेल सिंहजीक रहनै खतरनाक आ झाजी अपन किछु चलाकी ,किछु क्षुद्रता ,किछु बाताबाती कें एना प्रस्तुत करैत छथिन जेना ब्राह्मण जाति ,दरभंगा जिला ,बहेड़ी प्रखंड आ करेह नदीक उद्धार आब जल्दिए भ' जेतै ।बस अहां सब झाजी जिंदाबाद करैत रहियौ । झाजी अपना आप के बड़का विद्वान मानैत छथिन ।आ अपना सँ नमहर अपना भाय कें आ भाय सँ किछु बेशी अपना बाबा कें ।भाय एकटा विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर छथिन आ बाबा स्वतंत्रता सेनानी रहथिन ।बात कत्तौ सॅं उठलै ,आबि के गिरतै भैया पर ।वेद आ कुरानक लाईन सँ बात शुरू भेल होय ,मुदा खतम हेतै भैया झा पर ।आ ई खतम होय के पावर भैया झा के लिखल समान मे होय भाय नइ होय छोटका झा के ठोरठोरई मे जरूर छैक ।आ सिंह जी के कलुआही लूटबाक छेन ,से ओ बिना शर्त झाजीक बौद्धिकताक समर्थन करैत छथिन ।यदि केओ झाजीक बौद्धिकता पर निशान लगाओत त' सिंह जी ओकर भक्शी झोंकि देथिन ।सिंह जी चाहैत छथिन कि झाजी बौद्धिक बनबाक निशां मे मधुबनी छोडि़ के दरभंगा चलि जाए ,मुदा हाय रे सिंह जी झाजी एकदमे उनैस नइ छथिन ,हुनका कवि नइ बनबा के ,हुनका विद्वान नइ बनबा के ,हुनका अजर-अमर नइ बनबा के ,हुनका कालजयी नइ बनबा के ,आ यदि कालजयी के मतलब किछु होयत होए त' ऊ दू-चारि बिगहा अरजि के ,पटना-दरभंगा मे एक-दूटा घर बनाके हुुअ' चाहैत छथिन ।कालजयी मतलब ई नइ कि अहां के एक-दूटा किताब छपि गेल आ दू-चारि टा लोक अहां पर लिख देलक ।कालजयी मतलब ई जे तीनमहला क' ऊपरका महल पर संगमरमर सँ लिखल फलां झा तीन-चारि पीरही तक जगजगार होयत रहै । आ ऐ ठाम सब अपना-अपना हिसाबें कालजयी भ' रहल अछि । सिंहजी क' दू टा प्लॉट पटना मे एकटा दरभंगा मे आ एकटा समस्तीपुर मे ।मधुबनी मे जइ मकान मे रहि रहल छथि से सारि क'नाम सँ ।दुनिया सारि आ सारिक प्लॉट ...दूनू के सिंहजीक मानैत अछि ,मुदा सिंहजी सन ईज्जतदार आदमी ....च्चचच..झाजी एकटा प्लॉट दरभंगा मे आ एकटा पटना मे आ जल्दिए सिंहजी कें पाछू क' देथिन ।नेबोलाल पटने मे नइ दिल्लीयो मे एकटा मकान खरीदने अछि ,आ ओकरा सन भाग्य आ बहीन त' भगवान सबके देथिन ।बहिनोय एक्साईज विभाग क' बड़का अधिकारी रहथिन आ जीता-जी पचास-साठि करोड़ कमा गेलखिन ।घर-परिवार,स'र-संबंधी ,सबहक नाम सँ बेेनामी संपत्ति ,आ भगवानक लीला ई कि एकदिन दूनू प्राणी मे झगड़ा भेलै आ दूनू प्राणी गोली सँ आत्महत्या क'लेलखिन ।आ सब स'र संबंधी चुप्पी मारि गेलै ,केओ नइ कहलकै कि फलां जी हमरा नामे ई खरीदने रहला ।आ रंजन जी जइ दूमहला कें अपन बाबूजी क' नाम सँ बताबै छथिन ,तइ पर रंजन जी कें होमलोन मिलल छैक ।आ ई सब खिस्सा गोपनीय छैक ,तावते तक जावत तक कि दोसर के पता नइ चलैत छैक ,आ फेर दोसर सँ तेसर आ तेसर सँ चारिम ।आ ई सब खिस्सा तावत तक गोपनीय रहतै ,जावत तक सिंह डरेतै झा से आ झा डरेतै नेबोलाल से ।आ यदि एक्को टा मटकूरी फूटलै ,तखन सब फूटतै .... आब त' नबका-नबका अधिकारी सब सेहो आबि रहल अछि जिला मे ।अइ मे एकटा सिंहजी क' परिचित छथिन ,ईहो सिंह ,हिनका जूनियर सिंहजी कहल जाए ।जेना सिंह जे बाजै मे भटभटिया ,तहिना जूनियर एकदम चुप्पा ।पहिले सब के बूझेलै जे जूनियर मितभाषी ,संकोची छैक ,बाद मे पता चललै कि जूनियर मुंह मे पान,तमाकू आ सुपारी ठूसने रहै छैक ,मुह मे ,गाल मे ,ठोर मे ।बेशीकाल ईशारे से काज चलेला ,बेशी जरूरी होए वा नमहर एमाउंट होए । बेशी काल मुंह खोलै छथिन -तीस ,चालीस या थर्टी , फोर्टी कहबा क' लेल ।आ कखनो कखनो खोलै छथिन नमहरका मुंह -पचास ,प चा स ।जल्दिए जिला बूझि गेलै कि जूनियर किछु मायने मे सीनियरो क' कक्का ।जूनियर रहै सिंहजी क' परिचित ,तें भैया...भैया....कहिते रहै हरदम आ टेक्नीक मे सेहो भैया के नकल करैत ,मुदा ऐ अधपक्कू नकल पर हँसबा के नइ शांति सँ बूझबाक जरूरी छैक । जूनियर क' साथे एकटा आर चुप्पा आयल छैक ,एकर चुप्पी कनेक अभौतिक कनेक भौतिक छैक ।लेबा के, खूब लेबा के ,अहगर लेबाके ,बेर-बेर लेबाके ईच्छा एकरा मोन मे जागै छैक ,मुदा हाय रे ध्वनि तंत्र ,हाय रे बाजै वला सिस्टम सब ।मोन मे रहै छैक किछुआर ,निकलै छैक किछु आर ।मोन मे आबै छैक जल्दी लाऊ आ मुंह से निकलै छैक राखू ने बादे मे देब ।आ कखनो काल त' ईहो नइ निकलै छैक ।एकर ऊलझन सबसँ क्लासिक ।पइसा के सबसे बेशी जरूरी ,मुदा भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन दिस उन्मुखता ।अपनो हाल-चाल उजरल-उपटल ,मुदा दोशर कें फैदा पहुंचेबाक नीयत ,गरीब कें कष्ट नइ देबाक आदर्श ।वौआ दूनू चीज कोना साथ-साथ ल' के चलबहीं ।धनी-मनी सब देतौ नइ किछु आ गरीबहा के संग मे छइ नइ किछु ,त' बाज ने कोना काज चलतै ।जे देनिहार छैक ऊ नेता-मंत्री सब सँ फोन करा के काज करा लेतौ आ जे नइ देनिहार छैक से भुक्खल जिन्न जँका आफिसक बाउंडरी मे हँफिया रहल छैक ।ऊ बस हाथ-पैर जोड़तौ ,ऊ बस आर्शीवाद देतौ ,आ ऊ आर्शीवादो नइ देतौ ।आर्शीवाद देबाक प्रक्रिया मे एकटा हूनर छैक आ ई एत्ते गरीब ,एत्ते हियाक हारल छैक जे आर्शीवादो देबाक हूब एकरा देह मे नइ छैक ।आब बाज ने की करबीहीं । नया किछु नइ होय वला ,या त' बनही सिंहजी ,झाजी ,मिश्रा जी या फेर नेबोलाल ।सफलताक यैह सब किछु मॉडल छैक । सबहक अपन-अपन झूठ-सांच रहै ,सबहक नोकरी आ सबहक परिवार ।सिंह जी कहथिन जे हमर वियाह त' बालपने मे भ' गेल रहै ।माए नइ रहथिन आ सब जिम्मेवारी हमरे पर ।मिश्रा जी कहथिन जे हमर कनियां बूझू जे करीना कपूर ।करीना कपूरक चयन हुनकर ,हम्मर नइ आ यैह हीरोइनक नाम किए ओ लैत छथिन एक्कर सही-सही जबाब वैह देता ।झा जी कहथिन जे हम्मर कनियांक पिता बैंक मे उच्चाधिकारी छलखिन ने ,आ हम्मर कनियां कतेको बेर हवाई जहाजक यात्रा केने छथि ।दोसर सबहक पत्नीक व्यवहार पर प्रश्न करैत अप्प्न कनियांक व्यवहारक उपयुक्तता आ प्रौढ़ता पर दस से पनरह मिनट .....एहन सन कि अहां कि देखायब हमर कनियां दसे-बारह साल सँ सब किछु देखने छथि ।आ जखन ओ अपन कनियांक योग्यता एल0एल0बी0 ,बी0एड0 कहथिन त' हुनकर गरदनिक नस सब हरियर-हरियर होइत पूरा बलक साथ हुनकर समर्थन मे मोट भ' जाइत रहै ।नेबोलालजी क' समस्या किछु आर छलै ओ अपन कनियांक वणिक् पारिवारिक पृष्ठभूमि सँ बेसी परेशान रहथिन आ अप्पन ससुरक लेल विशेष पंचाक्षरी गारिक प्रयोग करैत रहथिन....मादर...केवल अपना बेटी के दोकान पर बैसेनए आ गल्ला सम्हारनए सिखेलकै ।तैयो अप्पन कनियांक गोर-नार चेहरा आ वयस्क-व्यवहार सँ बेस प्रसन्न रहथिन । सब अपना-अपना तरहें डपोरशंखी वृत्तिक परिचय देथिन आ ऐ मे सबसँ आगू सिंहजी रहथिन ।पता नइ अपन परहाई-लिखाईक' समै मे की सब केलखिन ,मुदा हरदम बतेता कि चारि बेर आई0ए0एस0 मे इंटरव्यू देलियै ,सात-आठ बेर बी0पी0एस0सी0 मे ,पता नइ किएक सेलेक्शन नइ भेल ।आ जावत अहां ऐ तथ्य पर विचार करबै ,तावत दू-चारिटा आई0ए0एस0 सबहक नाम गिना देता ,ओइ मे एगो-दूगो त' हिनकर नोटे सँ पास भेल रहै ,आ एगो-दूगो क' फोन एखनो आबै छैक ।आ यदि अहां एखनो ऐ भौकालीक प्रभाव मे नइ एलियै तखन तुरत्ते एगो-दूगो विधायक के फोन लगबैत होलीक शुभकामना डिस्पैच कर' लागत ।मिश्रा जी संस्कृतक दू-चारिटा कठिन श्लोक फेकैत ऐ तथ्य पर बल देता कि आब विश्वविद्यालय खरीद-फरोख्तक अड्डा बनि गेल अछि आ कतेको बेर बस पइसाक अभाव मे हुनकर नियुक्ति विश्वविद्यालय मे नइ भेलै ।आ झा जी जखन आफिस मे कहै छथिन जे हौ हमरो दूरक नइ बूझह' ,बस नदी पार करहक आ .....।ई गर्वोक्ति नव्यन्यायक नइ थिकै ,मुदा आफिसक वातावरण मे खास प्रभाव उत्पन्न करैत घूसक राशि मे अपेक्षित वृद्धि करैत छैक ,यदि वृद्धि नहियो होइत छैक त' अगिला व्यवहारक लेल ई खास भय उत्पन्न् करैत छैक कि झाजियो लोकले छथिन ।
आ सिंह जीक लेबाक टेकनीक अलग ।पहिले खूब हल्ला करता ,हम त’ लइते नइ छी ,हम त’ लइते नइ छी ,फेर ओहियो सँ बेशी जोर सँ चिचियेता कि पागल छहीं की ,बिन देने काज हेतौ ।सिंह जी कहता ‘हम त’ दस-बीस हजार सँ कम नइ लै छियै आ जँखन लेबाक टाईम होइत छैक त’ अठन्नियो उठा लैत छथिन ।दोस सबक बीच मे कहता कि गरीब सँ नइ किछु लेबाक चाही आ गरीब यदि बीस हजार ल’ के आयल छैक आ हिनका पचीस चाही ,त’ ओकरा पचीस दइए के छैक ।आ सिंह जीक रेंज जोरगर ,ओ सब किछु ल’ लेता रूपया-पइसा ,गहना ,दही-दूध ,अनाज ,साड़ी ,आदि ।मुदा रेंजक प्रतियोगिता मे मिश्रा जी सेहो केकरो सँ कम नइ ।हिनकर गिफ्ट मे अन्न-तत्वक विशेष महिमा ।मिश्रा जी ओइ ठाम मकई ,मड़ुआ ,टमाटर ,सीम ,सामा-कौनी सब चलै छैक ।आ यदि रूपया देबाक अछि त’ बाहर मे गणेश-लक्ष्मीक मूर्ति राखल छैक ,ओकरा पर अर्पित क’ दियौ ।ऐ वृत्ति आ घटना कें खास आध्यात्मिक स्वरूप दैत मिश्राजी देनए-लेनए कें भगवाने पर छोड़ैत छथिन ।आ मानि लियौ जे केओ आबि गेलै सांझ मे आ ओकरा साईन करेबाक छैक त’ मिश्रा जी पेन बंद क’ लेथिन ,जावत तक आटा नइ पिसेतइ ओ पेन कोना खोलि सकैत छथिन ।तें आब ओइ व्यक्ति क’ राष्ट्रीय कर्तव्य भ’ गेल छैक कि ओ मिश्रा जी ओत’ दस-बीस किलो आटाक पैक आनि दए ,नइ त’ मिश्रा जी पूरा बजार बौएथिन आ ओकरा दस राति बजेथिन ।आ यदि ओ आदमी पुरान छैक ,मिश्रा जी कें जानै छैक आ मिश्राजी क’ शब्दजाल पर धेयान नइ दैत छैक त’ ओ बिना समै नष्ट केने आटा आनै ले चैल जेतै ।आ मिश्रा जी ओत’ के सब आबि रहल छैक ,मिश्रा जी ओइ ठाम कोन-कोन चीज आबि रहल छैक ,सबहक लिस्ट सिंहजी बना रहल छथिन ।मतलब घर भरा रहल छैक मिश्रा जी के आ लिस्ट भरा रहल छैक सिंह जी क’ ।आ जखन मिश्रा जी मीटिंग मे कहैत छथिन जे ई महीना त’ एकदम खालिए रहल ,सिंह जी आदमी आ लिफाफाक पूरा हूलिया दैत मिश्रा जी कें चित्त क’ दैत छथिन ।सिंह जी के ईहो पता छैन कि मिश्राजी के चिनुआर मे राखल घी बकेन गायक छैक ।मिश्रा जी सिंह जी कें ऐ जानकारी कें विशुद्ध षड्यंत्र कोटि मे राखैत छथिन आ हँसि के उड़ेबाक असफल प्रयास करैत छथिन ।
रंजनजी क’ रेंज सेहो छोट नइ ,मुदा मृदु ,होयबाक नाते आ लोकल नय होयबाक नाते कनेक घाटा मे रहैत छथिन ,मुदा हिनकर चोट वैह जानैत छैक ,जे खेने होय ।गजब रंजन सर ,गजब ,एकदम बौद्धिक मारि .....,बम-फटक्काक अवाज नइ ,बस हृदय दरकबाक ध्वनि ।आ सबसँ तुच्छ ,क्षुद्र आ ठोर मे सँ छिनै वला आंखि केकरो देने होथिन भगवान त’ नेबोलाल के ।आ ल’ त’ लेत सब किछु ,मुदा देनिहार के वैह पंचाक्षरी गारि ,मतलब दियौ तखन आर्शीवाद रूप मे आ नइ दियौ तखन गारिक भंगिमा मे ,मुदा भेटत वैह ।जूनियरक गाड़ी जखन केकरो दलान पर लागि जाइ छैक त’ ओकर तीन पीरही तीन दिनक मूतान एडवांसे मे मूति दैक छैक ।से की कहौं खिस्सा...... आ सब गोटे अपने घर-परिवार त’ छैक ,तें कहबा मे सेहो कोनो दोख नइ ।तें कहियो दैत छी त’ खराब नइ मानब ,किएक त’ अहां सँ की बॉंचल अछि ..... लघु कथा (व्यंग्य)- दोस यौ दोस
ऑफिस मे हमर सबसँ प्रिय (हुनकर प्रिय हम नइ)मित्र रंजन जी के लेल धूस एकटा टेक्निकल मुद्दा छलै । आ घूस पर बतिआइत हुनका हम देखि अभिभूत भ' जाइत रहियै ।इतिहास सँ ल' के ,अर्थशास्त्र सँ ल' के ,समाजशास्त्र सँ ल' के आ भारतीय आयोजन तकक समस्त जानकारी के पता नइ कोन-कोन सूय्या -डोरा ल्ा’ के ओ सी दैत छथिन ,से पूछू नइ ।आ मिथिला के कथित रूप सँ सबसँ विद्वान जगह आ सबसँ नमहर माथ वला जगह सँ होयबाक नाते ओ बतहुत्थनो कम नइ करैत छथिन ।घूस क निशान ओ ऋग्वेद आ इलियड मे ढ़ूरहैत उत्तर आधुनिक साहित्य तक आबि जेता ।चाणक्य ,अदम गोंडवी आ गुन्नार मिड्रल के उद्धृत करैत-करैत ओ एते भावुक भ' जेता कि अहां अपना-आपके घूस नइ लेबाक विभिन्न प्रसंग मे दोषी मान' लागबै । नहू-नहू बाजै वला रंजन जी खुरपी ,कोदारि ,हांसू सब राखै छथिन ।मात्र राखबे नइ करैत छथिन ,कत्त' कोन चीज चलाबी ,सेहो बखूबी जानैत छथिन ।केकरा लग जातिक संदर्भ ,केकरा लग क्षेत्रक ,कत्त' मिथिला वला संदर्भ राखी ,कत्त्ा’ सेक्युलर बनी आ कत्त'राष्ट्रवादी ,एकर सर्वोत्तम प्रयोग देखबाक लेल अहां के दस-पनरह दिन रंजन जीक साथ रहबाक चाही ।आ कखन की बाजी आ कोन मौसम मे केकरा संग रही ,ई अहां हुनके सँ सीखि सकै छी ।ईनकम टैक्स भरबाक समै मिश्राक संग ,भोरे घूमबाक लेल झाजी ,माछ किनबाक लेल यादव जी ,गाम जेबाक लेल कर्णजी साथ आ कुनो तिकड़म होए त' सिंह जीक संग । रंजन जीक संग मे एक सँ एक मशीन ।अहां केखनो भावुक भ' जाएब ,कखनो क्रोध सँ लाल-पीयर आ केखनो रंजन जीक लालित्य सँ अभिभूत ।मुदा रंजन जी ओहने छथिन ,बस काज भेलाक बाद ओ अपन मौलिक अवस्था मे विदा भ' जेता । आ रंजन जी कें पता छैन कि अहां सँ कोन चीज कोना उगलबएल जाए ।ओ नब्ज छूता आ अहां अपन बोखार आ दस्तक पुराण एक्के सांस मे बहार क' देबै ...... 2 रंजन जी क' सबसँ नजदीकी मित्र सिंह जी छथिन ।दू-चारि बेरक शीतयुद्ध छोडि़ दियौ ,दू-चारि प्रकरणक प्रतियोगिता कें बिसरि जाइयौ ,तीन-चारि टा हारजीतक संदर्भ पर धियान नइ दियौ ,तखन ई बात पूरा जिलाके पता छैक कि रंजन जी क' सबसँ प्रिय के आ सिंह जी क' सबसँ प्रिय के ।ई बात केकरो पता नइ छैक कि बेशी जरूरत केकरा छैक दोसर के ,ईहो पता नइ कि के केकरा सँ बेशी फैदा उठबैत छथिन ।ईहो पता नइ कि ऐ दोस्ती के बनेने रहबाक लेल के बेशी प्रयासरत छैक ,आ के एक सीमाक' बाद ऐ चीज कें इग्नोर करैत छैक ।मिला-जुला कें एकरा सामाजिक सहजीविता(सोशल सिम्बायोसिस) कहल जाए ,जीव विज्ञानक छात्र होयबा कें कारण हमरा दिमाग मे लाईकेन आबि रहल छैक ,पूर्णत: शैवाल आ कवक केर घालमेल ।केओ देह देने छैक त' केओ अपन हरियरी ।तहिना ऐ ठाम सेहो एकटाक दिमाग छैक आ दोसरक लंठई आ ऐ कंबिनेशनक परिणाम पूरा जिला भोगैत छैक । सिंहजीक लंठई छोट दिमाग मे नइ घूसि सकैत अछि ,किएक त' सिंह जी ओकील सँ ,किसान सँ आ परिवादक सँ ऐ हिसाब सँ मिलैत छथिन जे केकरो पता नइ चलत कि ऐ लंठक दिमाग मे की चलि रहल छैक ।परहल-लिखल संग परहल जँका आ मोटपसम लोक संग मोटपसम बात ।वाह रे सिंह जी ।बात लिय' त' विद्यापति सँ ल' के ज्ञानेंद्रपति तकक कविताक मानचित्र सामने राखि देता ।इतिहासक बात करब त' ईसवी ,उद्धरण ,पृष्ठ संख्या आ स्टैंजाक बामा कात की दहिना कात सब बात कहि देता ।सौ -दूसौ टकाक कुनो बात होइ तखन अपन पर्स खोलि कें अहांके द' देता ।केकरो ओइ ठाम श्राद्ध होए ,बेटीक बियाह होए त' आदमी अप्पन गाड़ी क' के पहुंच जाए ,मुदा जेखन नमहर डीलिंगक कुनो बात होए तखन अपन पिताजीक पैरवी सेहो नइ सुनत ।एतबे नइ नियम-कानूनक अपन व्याख्या करैत ओ चाहता कि फाईलक क्रिया-कर्म भ' जाए । आ एहन विवादास्पद काज सब करबाक लेल बड़का करेजा केवल सिंहे जी मे भेटत ।आ सिंहजी क' करेजा मे कतेको आदमीक धमनी आ शिरा जुड़ल छैक ।डी0एम0 आफिसक चपरासी ,बाबू ,अधिवक्ता संघक अध्यक्ष्ा -मंत्री,अखबारक संवाददाता-उपसंपादक आदि,आदि ।ऐ सब गोटे कें पता छैन कि सिंह जी की करैत छथिन ,मुदा की कहबै कहियो ने कहियो ई सब सिंह जी सँ उपकृत भेल छथिन ।आ विभागीय अधिकारीक बाते छोड़ू ,सबक फिज मे सिंहजीक रसगुल्ला ,एतबे नइ फ्रिज तक सिंह जी क' खरीदल ।केकरो रेलवे क' टिकस ,केकरो इसकुलक फी ,केकरो डाक्टरीक पर्चा .....सब सिंहजी क' जेबी मे ।एतबे नइ ऊपरका नेता-अधिकारी तक पैरवी करबाक हो ,ट्रांसफर करेबा आ रोकेबाक हो ,सबक हिसाब सिंह जीक संग । विभागीय अधिकारीक पहिल चाय आ अंतिम चाय सिंहजी क' संग ।बाकी टाइम मे सिंह जी की करथिन ,एकरा सँ केकरो लेबा-देबाक नइ ।अहां सिंह जी कें अपना कुरसी पर नइ देखि सकैत छियै ।मोटा-मोटी जातिवाद सँ दूर ,मुदा एहनो नइ कि जातिवादक उपयोग नइ करी ।अप्पन जातिक अफसर मिलि जाइ त' दूहाथ जाति-जाति सेहो खेल ली ।आ अप्पन कुरसी के बचेबाक हो ,केकरो सँ किछु छिनबा क होए त' 'जाति-जाति' किएक ने खेली । आ सिंह जीक बियाह सेहो एहिए जिला मे भेल छलै ,से किसान आ ओकील कें ई बात बताबै मे सिंह जी कंजूसी नइ करथिन आ ओकील साहेब सब आ किसान भाय सब ऐ संकेत के बूझैत सिंह जी कें निराश नइ करैत छथिन ।अहां सिंह जी कें जातिवादी कैह सकैत छियेन ,मुदा हुनकर द्वार पर आंहू केर स्वागत अछि ।अहां क' लेल जाति जाति हैत,हुनका लेल जजाति छैक ,जेकरा मे जत्ते खाद-पानि देबै ,ओत्ते बम्फार फसल हैत ।मात्र खादे-पानि नइ ,सही समै पर कमौनी सेहो जरूरी ।कमौनीक सबसँ नीक समै भोर आ सांझ ।किछु बाजियौ आ किछु बजबाक मौका दियौ ,केखनो चाय-मिठायक संग केखनो खालियो हाथ.........सिंह जी जिंदाबाद ,राजपूत जाति जिंदाबाद ,मधुबनी जिला जिंदाबाद आ आनो जाति सब मुरदाबाद नइ ,बल्कि दम होए त’ करा ले अप्पन जिंदाबाद आ दम नइ हो त’ दम धर। 3 आ सिंहजी क' दहिना हाथ नेबो लाल ।दहिना नइ बामा ,किएक त' सिंहजीक सब घटिया काज नेबोलालक सलाह सँ ।दूनू गोटे एके पद पर आ नेबोलालक ऐ स्थान पर बहाली मे सिंहजीक विशेष योगदान ।कर्णजी क' बेज्जत क' के नेबोलाल कें आनबा मे सिंहजी क' पलानिंग सफल रहलै ।ओना कर्णजी के रहलो सँ सिंहजी क' आसन पर विशेष फर्क नइ रहै ,मुदा कर्ण जी कें बाजबाक बेमारी रहै ,कखनो -कखनो डरितो -डरितो मुंह सँ किछु निकलिए जाए आ तहिए समै मे जिला मे आगमन भेल रहै श्री श्री 108 नेबोलाल जी कें आ बहुत कम्मे दिन मे नबका विभाग आ स्थानक जानकारी .....जानकारी नइ रेकिंग करबा मे सफल रहला श्री नेबोलाल जी ।नेबोलाल जी क' जाति क' विषय मे विशष जिज्ञासा नइ करू ।नेबोलाल जी जातिक मध्य मे छथिन ,ने बेसी ऊपर ने बेसी नीचे ।एकदम मध्यविन्दु कहनै उचित नइ ,मुदा जातिव्यव्स्था क' एकदम संवेदनशील स्थान पर जरूर छथिन ।तें एकदम ऊपरक आ एकदम निचलका क' लेल अद्भुत पंचाक्षरी गारि क' बेशी काल प्रयोग करैत छथिन ।एहन राष्ट्रीय गारि जे कश्मीर सँ ल' के तमिलनाडु तक एहिना हनहनाइत छैक आ जेकर अर्थ बूझबा मे कतौ भाषाक कोनो झंझट नइ ।तें नेबोलाल जी ऐ गारि क' संग बेसी आत्मीय छथिन ।नेबोलाल जी जानै छथिन कि ई गारि जे0एन0यू0 आ आई0आई0टी0 कानपुर सँ ल' के बिसफी आ बीहट तक ओहिना उपलब्ध छैक ।की बाम की दक्षिण ,की साहेब आ की अर्दली ।एकर अर्थक गरिमा सँ सब पराजित ।मुदा ई केकरो नइ पता चललै कि नेबाेलालजी ऐ गारी क' कोन पराक्रम सँ लुबुधल छथिन । आ नेबोलालजी क' नियुक्ति मे हुनकर एकटा सद्य:जात झूठक विशेष योगदान रहलै कि हमरा बच्चा नइ ......बच्चा हेबाक लेल विशेष ओपरेशनक जरूरी ......ऐ ऑपरेशनक लेल सात-आठ लाखक जरूरी.......कनियाक बेडरेस्ट जरूरी......कनियाक हास्पीटल मे बेडरेस्ट जरूरी......।शताधिक बेर कहल ऐ वाक्य मे मात्र यैह टा सत्य छल कि हुनका एको टा बच्चा नइ रहेन आ एकर अतिरिक्त सब बात झूठ ।किएक त' बहालीक बाद नेबोलाल दू टा पुत्ररत्न कें जन्म देलखिन आ दोसर त' एकदम मधुबनिए मे भ' गेलै ।पहिलक लेल पटना प्रवासक एकटा सिचुएशन क्रिएट कैल गेल छलै ,मुदा दोसर बेर एकर जरूरी नइ बूझल गेलै ,किएक त' आब नेबोलालजी स्थापित भ' गेल रहथिन ।मुदा वौआ हम ने बिसरि जेबौ ,सिंह जी थोड़बे बिसरथुन ,हुनका सब किछु यादि छैन ,अपन गर्भ मे एनै सेहो आ एहियो सँ पहिले के बात सभ.......ऊ गिन-गिन के ,गाबि-गाबि के तोरा यादि करेथुन । नेबोलालजी साल दू साल तक सिंह जी क' प्रति कृतज्ञ रहलखिन ,एकर बाद हुनकर धियान न्याय दिस गेल । सिंह जी किएक एते कमेता आ हम किएक कम कमाएब ।हुनका किएक एते मान-सम्मान आ हम की केकरो सँ कम आदि आदि ।ऐ तर्क मे सबसँ बेशी ऐ तथ्य पर बल रहै कि हम किएक कम कमाए छी ।आ ऐ गणितक क्षतिपूर्ति लेल नेबोलाल जी ओकील सबक दारूपार्टी मे बैस' लागला ।स्टाफ सबक सेटिंग शुरूा भ' गेल ।किछु सिंहविरोधी स्टाफ सबकें जातिक कैप्सूल खुआयल गेलै ।पूरा सप्पत आ पूरा ठोस आश्वाशनक संग ।कमीशन आ हिसाबक स्पष्ट उद्घोषणाक संग । आ किछु दिनक लेल सही मे नम्बर एक इंस्पेक्टर भ' गेल नेबोलालजी ।मुदा जातिक काउंटररिएक्शन शुरू भ' गेलै नेबोलालजी ।ऐ राजपूत बहुुुुल क्षेत्र मे राजपूत विरोधी अभियान कत्ते दिन नेबोलालजी ।आ जातिवादक विरोध एकटा नया जातिवाद सँ ।वाह रे वाह नेबोलाल जी..... आ नेबोलाल जी लगभग दरजन बेरि मारि खेबा सँ बचल हेथिन आ ओतबे बेर ठोस शिकायतक संग ओकील साहेब लोग डी0एम0 ओइ ठाम प्रदर्शन केने हेथिन ।अंत मे नेबोलाल सिंहजीक लग सरेंडर केलखिन ।सरेंडरप्रस्ताव क' असली कॉपी हमरा लग नइ अछि ,नइ त' हम हूबहू बतेतौं छल ,मुदा जरूरी सवाल ओइ प्रस्तावक पाठन नइ ,ओइ आदमी क' चिन्हनइ छैक ।ओ आदमी कोन आदमी के नइ गरिएलकै ,कोन जाति के नइ ,मौका मिललै त' किछु क्षेत्र आ राज्य के सेहो ।एकरा लग ओकरा गरिएनए आ ओकरा लग दोसरा के ।ई पालिटिक्स नमहर नइ खिचाइ छैक दोस ।कतबो नेमारबए ,कतबो तीरा-तीरी करबै ,जल्दिए टूटि जायत आ टूटि के अपने मुंह मे लागत टूटलका रब्बर सन । नेबोलालजी कें गारि दैत देखनए एकटा नाटकीय अनुभव छल ।हुनका मुंह सँ रूपैयाक लेल ,नीक समानक लील ,जवान स्त्रीक लेल चूबैत ...।आ नेबोलालजी कोन स्त्री कें कल्पना मे नइ भोगलखिन ।कोन मर्द कें कल्पना मे ईज्ज्त नइ लेलखिन ।कोन दोस कें कल्पना मे भीख मांगैत नइ देखलखिन ।आ नेबोलालक जादू जल्दिए खतम भ' गेलै ।लागै छैक जे नेबोलालक जादूक रहस्य बच्चा-बच्चाक पता चलि गेल छलै ......सिंहविरोधी गीतनाद जल्दिए खतम भ' गेलै ।सिंहजीक परिचित अधिकारी पटना सँ आयल छलखिन ।आपात मीटिंग भेलै आ आन बातक अलावे नेबोलालक रसगर गाम टांसफर भ' गेलै ।ऐ ट्रांसफरक प्रभाव नेबोलाल साल-दू साल बूझलखिन ....बूझै सँ पहिले नेबोलालक टांसफर कैमूर जिला भ' गेल छलै ।नेबोलाल कें प्रोत्साहित कैल गेल छलै कि जाऊ बाबू जाऊ आनंदे मे रहब.....जत्ते पच्छिम तत्ते माल.....मुदा ई एकटा आर कथा छलै । सिंह जी के बूझनै कनेक नइ खूब-खूब कठिन काज ।सिंह जी क’ रूटीन के बूझनै ओहियो सँ कठिन आ ऐ रूटीन सँ होमय वला फैदाक ब्यौरा तैयार केनए एकरो सँ कठिन ।सिंह जी पादितो छथिन पूरा रूटीन आ पूरा उद्देश्य सँ ।वास्तव मे ओ शतरंजक खेलाड़ी छथिन आ अपन अगिला आ चारि-पांच टा आगू वला स्टेप कें आगू –पाछू जोड़ैत चलै वला खेलाड़ी ।हुनकर कुनो स्टेप अहांके बेकुफ वला बुझा सकैत अछि ,मुदा ओकर अंतिम परिणाम की हेतै से बस सिंहे जी जानै छथिन ।सिंहजी क’ विस्तृत सर्किल कें देखि के अहां के आश्चर्य भ’ सकैत अछि या फेर अहां सिंह जी कें अत्यंत व्यर्थ घोषित क’ सकैत छियै ,मुदा एकर परिणाम कनेक देखियौ ।सिंह जी क’ विभाग मे पुलिसक कोनो काज नइ ,मुदा सिंह जी बहुत रास दरोगा सँ हित-मित बनेने ।आ दरोगा सँ काज केकरा नइ पड़ैत छैक ,से जखने कुनो पैरवी वला काज होए सिंह जी थाना पहुंचि जाथिन ।आ ई पैरवी उचित शुल्क आ उचित बेन-तिहारक संग होइत छलै ।सिंह जी कें ड्रग इंस्पेक्टर सँ दोस्ती आ सिंहजी क’ सासुरक दवाचोर ,मिलाबटखोर सब कें एकटा नीक सीरही मिलि गेलै ।आ पाहुन सिंहजी उचित दर सँ एकर निस्तारण शुरू क’ देलखिन ।एतबे नइ सिंह जी कें पंडित-ज्योतिषी सँ परिचय आ सिंह जी एकटा स्पेशल डेट कें गुप्त पूजा ठानि देलखिन ।ज्योतिषी कहने रहै जे ऐ तिथि क’ पता केवल हमरे टा ।
सिंहजी भोर उठिते साहब ओत’ चलि जेता आ भोजन सँ पहिले तक ओतै रहता ,फेर सांझ मे चाह क’ बेर सँ भोजनक समै तक ।ऐ रूटीनक प्रताप ई छलै जे साहेब ओतबे कहैत छलै आ ओतबे करैत छलै जत्ते कि सिंहजी ।साहेबक हरेक भूर आ साहेबक हरेक गुर पर सिंहजी के धियान ।तरकारी ,दूध आ ठंढ़ा क’ बहाने किचन तक पहुंच ।सिनेमाक टिकट ,मिठाई आ जन्मदिन ,विवाहदिन आदि क’ बहाने मैडम तक पहुंच ।चाकलेट ,बैडमिंटन आ कॉमिक्स क’ बहाने वौआ सेहो कब्जा मे ।आब की चाही ।दोसरक घर पर एतेक धियान देला पर की नइ मिलि सकैत छैक ,मुदा सिंह जी कें सब किछु नइ चाही ।हुनकर टारगेट निश्चित छैक ,बस ओ ओमहरे बरहैत छथिन ।एत्ते इंतजाम ,ई अनुशासन आ ई व्यवहार सब ओइ टारगेटक माध्यम बस।
4 आ सिंह जी कें जइ आदमी से सबसँ बेशी डर होइत छलेन से रहथिन मिश्रा जी ।जिला मे मिश्रा जी क' आगमन नया-नया भेल छलै आ संयोग देखियौ जे मिश्रा जी ठहरलखिन सिंहजीक डेरा पर ।आ शुरू-शुरू मे त' मिश्रा जी अपन बड़का भाय आ गुरू बना लेलखिन,आ जेना कि हरेक चलाक आदमी करैत छैक मिश्रा जी अपन माया फैलेनए शुरू क' देलखिन ।अपन मंचोचित अवाज आ थर्ड डिवीजन एम0ए0 मे रटल संस्कृत श्लोकक रस्ते जल्दिए एकटा मिश्रामित्रमंडली बनि गेलै ।आ देखियौ त' हाल जे कि जखन पूरा पटना -दिल्ली दलित-विमर्श आ स्त्री विमर्श सँ भरल रहै ,पूरा अखबार आ टी0वी0 चैनल भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन सँ भरल रहै ,मिश्रा जी हरेक बातक पक्ष मे आ विपक्ष मे एकटा संस्कृतक श्लोक राखि देथिन ।आ कखनो -कखनो त' राखनै क' अंदाज प्रवक्ता बला,वक्ता बला ,मेंटर वला ,दार्शनिक वला ,तीर्थकर वला आ पैगम्बर वला सेहो ।आ बुधियार लोक सब सुनलाक बाद या पाछू मे ऐ श्लोक श्रवण कें किछु अन्य क्रिया सँ -फेंकनए ,ठोकनए आदि सेहो कहै ।जे किछु नइ बूझै वला छलखिन अपन संस्कृत ज्ञानक आधार पर,अपन व्यस्तता आ थेथरई के दुआरे ओ लोकनि सेहो मुसकिया दैत छलखिन ,वाह-वाह क' दैत छलखिन आ कखनो काल मिश्रा जी कें विद्वान सेहो कहैत छलखिन ।आ मिश्रा जी ऐ सब कें भगवानक आर्शीवाद ,माया आदि कैह के आत्ममुग्ध होयबाक असफल प्रयास करैत छलखिन । मिश्राजीक ई मायावाद प्रारंभिक तौर पर सिंह जी कें नया चीज बूझेलेन ,शुरू-शुरू मे ऊहो रस लेबाक प्रयास केलखिन ।धीरे-धीर हुनका बुझेलेन जे ई मिसरबा त' हमरा उखाडि़ केे रहत ,आ जल्दिए हुनकर व्यक्तित्व मे एकटा आलोचनात्मक दृष्टि क' उभार भेलै आ मधुबनी कलक्टरीक विद्वान लोकनि ऐ उभार कें जल्दिए ब्राह्मण बनाम राजपूत आ नया बनाम पुरान कहबाक असफल प्रयास केलखिन ।किछु लोकनि जे बेशी बुधियार रहथिन जे शासन-सत्ता कें बीस-पचीस बरिस सँ देखने रहथिन ओ एकरा अस्थायी प्रवृत्ति कैह प्रतीक्षा कर' लागलखिन ।जेेे शासन आ भ्रष्टाचारक पारस्परिकता कें नीक जँका चिन्हैत रहथिन ,हुनका लागलेन जे ई कोनो प्रवृत्ति नइ थिकै ,मुदा कलक्टरी आ ऐ विभाग कें एकटा नया मसल्ला मिलि गेलै ।बात ई भेलै जे मिश्रा जी क' बजबा क' कला सँ किछु अधिकारी ,किछु प्रोफेसर ,किछु पत्रकार लोकनि बेशीए प्रभावित भ' गेलखिन आ जेना कि होइते छै जे मिथिला त' बजबा क' तेल सँ बरहै छैक तें मधुबनी जिला आ ऐ विभाग कें मिश्रा जी में बेशी विकास देखेलए ।वाह रे मिश्रा जी ,वाह रे कालिदास आ माघक श्लोक आ हाय रे सिंह जी के लंठई ,हे सिंहजी हेे सिंह तोहर लंठई एत्ते कमजोर कि ऐ मिसरबाक अशुद्ध श्लोके सँ पराजित भ' गेलै ।मुदा नइ नइ ,ऐ भ्रम मे नइ रहू ।अशुद्ध श्लोकक दुनिया जल्दिए बेरबाद भ' गेलै ,बरबाद नहियो भेलै त' दीप्ति घैट गेलै ।धीरे-धीरे श्लोकक प्रतिक्रिया ,प्रशंसा ,ताली-थोपड़ी ,मुसकी घटैत गेलै ।आ अशुद्ध श्लोक कें पराजित केलकै शुद्ध घी ,शुद्ध कमीशन रहित घूस आ पहिले सँ पसरल सिंहवाद ।जल्दिए ब्राह्मण अधिकारी ,किसान आ पत्रकार तक सिंहजीक नजदीकी भ' गेलखिन आ आब समै रहै मिश्रा जी कें बदलबा क' ,मिश्रा जी जल्दिए अपना आप के सिंह जी क' छोट भाय कें रूप मे देख' लागलखिन ।आ हवा पलटिते मधुबनी कलक्टरी क' पाया ,कुरसी ,सीरही ,अलमारी आ फाईल सब देख' लागलै सिंहजी क' मुंह । आ धीरे-धीरे मिश्रा जी अपना आपके छब्बीस जनवरी ,पनरह अगस्तक भाषण आ कर्मचारीक विदाय समारोह तक समेट लेलखिन (आफिस मे) फलनमा.. चिलनमा... ठेकनमा (व्यंग्य) ओकरा , ओकरा आ ओकरा आगू बरहा आ एकरा , एकरा आ एकर टांग खीच। ऊ देखही ने बरा नील-टीनोपाल झारने छौ , ओकरा दिस एक लौप कादो फेक , देखही ने कनियो ने कनियो लागबे करतए , नइ लागतै त' डरेबो त' करतौ आ डरा जेतओ त' कमसँ कम साइकिलक हेंडिल जरूरे खसकतै आ खसकतै त' ऊ गिरतौ। ओकरा दिस ई ढ़ेपा , ओकरा दिस ई छौंकी आ ओकरा दिस ई झूटकी फेक। देखही बस खपटिए फेकबाक चाही , डांगक युद्ध नइ थिकै ई , नाहक केकरो लागि गेलौ त' खूनक मोकदमा हेतौ। स्पष्ट प्रशंसा नइ स्पष्ट आलोचना नइ , बस मुसकियाइत रहियौ , बस....। ओकरा सटा लियौ त' ई सब फैदा , ओकरा बजाबियौ त' ओहो आयत। ओकरा हटेने रहू नइ त' ओ सब नराज भ' जेता। ओकरा साथ रखबाक अछि त' रातिक एकांतमे बजाबियौ , केओ देखै नइ , केओ अनुमान तक नइ लगा सकै। ई आदमी अहांके भविष्यमे काज देत, तें एकरा ईग्नोर नइ करियौ , कुनो ने कुनो लेईसँ सटेने रहू। ई बरा लराकू टाईपक अछि , एकरा आगू राखू , ई कलम आ कोदारिसँ साथ रहत आ ई लेखक जेंका त' अछि मुदा अछि बरा चुप्पा , एकरा एकदम पंजियेने रहू , मंच , पुरस्कार आ प्रकाशनक शताधिक अभियानमे एकरा सन खबास पूरा लेखक समुदायमे नइ भेटत। आ यदि फलनमा के धकियेबाक अछि त' चिलनमा के आगू राखू , हम जनै छी जे चिलनमा अहांक प्रिय नइ अछि , मुदा यदि अहां अपन प्रिय ठेकनमा के आगू करबै त' निश्चिते बूझू जे फलनमा आगू भ' जायत तें सब आदमी जोरसँ कहियौ श्रीचिलनमा झा जिंदाबाद। पत्राचार खंड—जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’द्वारा प्राप्त पत्र क्र. नाम पत्र दिनांक १ जीवकान्त १६.१०.८३ २ जीवकान्त १५.०२.८४ ३ शशिकान्त, सुधाकान्त ०७.०३.८४ ४ जीवकान्त १६.०९.८४ ५ जीवकान्त ३०.०९.८४ ६ जीवकान्त ०७.१०.८४ ७ जीवकान्त १४.०१.८५ ८ जीवकान्त ०५.०२.८५ ९ जीवकान्त ३०.०३.८५ १० प्रो.गंगा नन्द झा ३०.०४.८७ ११ जीवकान्त २३.०३.९७ १२ आशा नन्द ठाकुर २३.११.९७ १३ राजमोहन झा २४.०८.९८ १४ जीवकान्त २४.११.९८ १५ बैद्यनाथ सिंह ०५.१२.९८ १६ जीवकान्त १३.०१.९९ १७ जीवकान्त १३.०४.९९ १८ तारानंद झा ‘तरुण’ २०.०५.९९ १९ तारानंद ‘वियोगी’ २२.०५.९९ २० नारायणजी १४.०६.९९ २१ जीवकान्त २५.०८.९९ २२ तारानंद ‘वियोगी’ ०३.०३.२००० २३ अमरजी ३०.०६.२००० २४ अजित आजाद ०६.०७.२००० २५ जीवकान्त २६.०२.२००१ २६ जीवकान्त २९.०४.२००१ २७ जीवकान्त १३.०१.२००४ २८ जीवकान्त २८.०६.२००५ ( १) डेओढ, यात्रा,१६-१०-१९८३ प्रिय अनिलजी, अहाँक पठाओल पांडुलिपि हम मनोयोगसं दू-तीन खेप पढि गेलहुं | नीक लागल | छपबाक योग्य अछि | पटनामे एकरा नीक कागतपर छपाउ | पोथीक आवरण नीक दिऐक | (१)अहाँ एकरा आधुनिक खंड काव्य कहैत छिऐक, से नहि कहि एकरा दीर्घ कविता कहू | (२) औद्योगिक क्रान्तिसं शहर बनल छैक, एकर आधार थिकैक पाइ आ मौद्रिक लाभ |तें ई हृदय-हीन,मानवता-विहीन, ममत्व-शून्य अछि | गामक आधार छल स्नेह | गाम गरीब भेल गेल अछि, शहर धनिक भेल गेल अछि |एक दिन गाम मरि जाएत, |एक-आध शताब्दीक पछाति शहरटा बांचत, स्वाभाविक अछि जे मनुक्ख आ मनुक्खक बीच औपचारिक सम्बन्ध, निष्करुण आ पथरायल सम्बन्ध बांचि जाएत | अहाँ अपन एहि ‘एकालाप’मे औद्योगीकरणक एहि निष्ठुरीकरणक प्रक्रियाकें हृदयक स्तरपर रेखांकित क’ एक पैघ काज कयलहुँ अछि जे मैथिलीमे एखन धरि नहि भेल छल | जीवकान्त १६.१०.१९८३ (२) प्रिय अनिलजी, अपनेक पत्र भेटल |प्रकाशनक लेल नीक सुविधा शहरेटामे छैक | हम देहातमे छी,हमरा असुविधा होयब स्वाभाविक अछि | ताहि अर्थमे अहूँ कुडोरिमे छी | प्रकाशन,पुरस्कार आ आर आनो वस्तुमे थोड़ेक गोलैसी,थोड़ेक प्रयासक गुंजाइश छैक | हमरा सभ ताहूमे बड पछुआयल छी | गामपर रहलासं समय बड़ा ‘अन्प्लैंड वे’मे बीति जाइत छैक |कोनो काज करबा लेल एक गोट रूटीन चाही,से लाभ हमरा नहि अछि | ई लाभ थोड़ेक खजौलीमे छल | ओना खजौली प्रवासक उत्तरार्द्धमे ई लाभ कम होब’लागल छल | अहाँ लेखन लेल कोनो रूटीन बनाउ | थोड़ेक जमि क’ लिखू |साहित्यमे नाम करबा लेल बड मेहनति कर’ पडैत छैक |मैथिलीमे थोड़ेक गद्यो लिखू | ओना लेखककें जे नीक लगैक,सैह लिखबाक चाही | जाहिमे मोन रमि जायत,से रचना नीक अबस्स होयत | नीक लिखबाक लेल नीक लेखक सभक रचनाकें पढ़ब आ ओकरा विचारब बड आवश्यक होइत छैक | कोनो पोथी छपयबाक इच्छा करू | कोनो अगुताइमे किछु नहि छपाउ | मुदा, पोथी छापब अपन लक्ष्य बनाउ | -----जीवकान्त /१५.०२.८४ (३) लहेरियासराय, ०७.०३.८४ प्रिय अनिलजी, जय मैथिली | कुशल छी एवं कुशलापेक्षी | अहाँक पत्र भेटल |पढ़ि बड़ प्रसन्नता भेल जे अहाँ लहेरियासराय आबि रहल छी |आशा अछि जे शीघ्रे भगवतीक कृपासँ अहाँ एहि ठाम आयब |कारण आब एतेक पियास लागल अछि जे जुनि पूछू |पूरा संकल्प लोक परिवार प्रतीक्षामे अछि | आशा अछि अहाँ सपरिवार प्रसन्न होयब | नव-नव गीत एवं लयक संग हम सभ आशा करैत छी जे अहाँ आबि रहल छी अहाँक शशिकान्त,सुधाकान्त,उमाकान्त,कमलाकान्त (४) डेओढ,१६.०९.१९८४ प्रिय ठाकुरजी, ओहि दिन आकाशवाणी,दरभंगामे मैथिलीमे बालगीत,देशभक्ति गीत, प्रेम गीत रचबा लेल आ संगीत बद्ध करबा लेल संगीत विभागक कार्यक्रम प्रभारी जवाहर झाजी सँ गप भेल | अहाँक चर्चा हम कयल | अपने थोड़ेक गीत तीन अंतराक मैथिली गीत विभाग,आकाशवाणी,दरभंगाक पता पर पठा क’ देखू जे ओकरा सभमे एलिमेंट छैक वा की बात छैक ? असलमे हम चाहैत छी जे मैथिलीमे नव-नव गीतक रचना होअए आ ओकरा संगीत-बद्ध कयल जाय | आशा जे अपने नीकें होयब | ---------जीवकान्त (५) डेओढ बेलनौती, ३०.०९.१९८४ भाइ अनिलजी, अहाँक २५.०९. वला चिट्ठी एत’ २९.०९ क’ प्राप्त भेल | अरुण बाबूक १४.०९ वला पोस्टकार्ड २२.०९ क’ प्राप्त भेल, दोसर २०.०९ वला पत्रक बाट देखिये रहल छी | अहाँक पत्रसं आश्वस्त भेल छी आ आब हुनक अयबाक प्रतीक्षा करैत छी | थोड़ेक सौन्दर्य-गीत लिखू | विद्यापति राधाक वयः संधिक गीत लिखलनि आ अमर भेलाह | ई विषय बासि नहि भेल छैक | गीतक सनातन विषय थिक सौन्दर्य आ प्रेम | बाप, भाए, बहिन, पत्नी आ बेटीकें संबोधित थोड़ेक गीत सेहो लिखू | बालगीतक सेहो बड अभाव अछि |अहाँ देश भक्ति गीतमे भारतक संग मिथिलाक चर्चा करैत छी, पुरनो गीतमे, से सजगता बनौने रही | फिराक गोरखपुरीक नज्म आ रुबाइ पढ़ि जाउ | पढैत काल गौर करू जे कोन विषय आ ओहि विषयक कोन प्रकारक उपस्थापन फ़िराककें भीड़सं फराक करैत छैक आ ओकरा कालजयी बनबैत छैक | तहिना विद्यापतिक गीतकें सृजेताक सजगतासं पढू | रवीन्द्र नाथ ठाकुर (मैथिलीवला) आ रवीन्द्र नाथ ठाकुर (बंगलावला)क गीत सभकें सजगताक संग अवलोकन आ मनन करू | थोड़ेक बालगीत,प्रेमगीत,देशगीत पटना आकाशवाणीकें मैथिली कार्यक्रम अधिकारीकें सेहो पठाउ | नीकें छी | चिट्ठीक बाट ताकब | -----जीवकान्त (६). भोला उच्च विद्यालय,ड्योढ़ ०७.१०.१९८४ प्रिय अनिलजी, अहाँक छओटा गीत भेटल |एकरा अपन पत्रक संग डाकसं आकाशवाणी,दरभंगाक पता पर पठा देल अछि | एहिसं पूर्व एक गोट आर पत्र पठा देने छी से भेटल होयत |हमरा विचारकें एक गोट साधारण सलाह बूझब, बहुत गंभीरतासं नहि लेब |गंभीरतासं लेब त अहाँक स्वाभाविक विकासमे ओ बाधक भ’ सकैत अछि | ई गीत सभ बुझायल जे अभ्यस्त लेखनीसं लिखायल अछि, आत्माक अनिवार्य वाध्यतासं स्रवित नहि भेल अछि | चिट्ठी लिखब | चि.अरुण बाबूकें डाक्टरसं देखा लेबा लेल आ भोजन,भोज्यक प्रति सजग होयबा लेल हमरा आग्रहक रक्षा लेल चरिअबियनि | ------जीवकान्त (७). ड्योढ़ १४ जनवरी १९८५ प्रिय भाइ, अहाँक सात जनवरीक लिखल अंतर्देशीय पत्र आइ भेटल अछि | हमर स्वास्थ्यक प्रति जिज्ञासा क’ अहाँ हमरा अनुगृहित बना नेने छी | सदाशयताक हेतु धन्यवाद | परहेज क’ रहल छी |मरबाक डरसं पैघ अछि पेटमे उठैत पीड़ा आ तकरा कारण विकलता | आब ठीक छी |दबाइ खायब छोड़ने छी | दू दिनसं एक सांझ भातो खा रहल छी |लगभग ठीके छी, मुदा अपन अनुभवसं बुझैत छी जे परहेज करैत रहक चाही, कखनो एकर दर्द उठि सकैत अछि | पछिला खेप जखन ई रोग भेल छल, राति-राति भरि बैसिक’ लिखैत रही |एहि खेप लिखब छुटले सं अछि |अख़बार सभ लेल कहियो काल एक-दू पेज खरड़ि लैत छी | सैह | नोकरीक अलाबे अहाँ आर की सभ क’ पबैत छी ? ------जीवकान्त (८). ड्योढ़ ०५.०२.८५ प्रिय अनिलजी, आँक पत्र बेशी आत्मीयतासं भरल अछि |संयोग जे दूनू पत्र भेटल | हेरायल कोनो नहि | जखन ई पत्र भेटल, संयोग जे हम फेर दुखित पड़ि गेल रही |३० जनवरी कें सपत्नीक नवकांत बाबूक डेरा पर लहेरियासराय गेलहु |पहुनाइमे खान-पानमे अनट-बिनट भैये जाइत छैक |से थोड़ेक भेलैक | एक फरवरी कें ड्योढ़ घुरलापर दर्द (पेट दर्द),ज्वर,दस्त सभटा प्रकोप भेल | आइ धरि काज पर नहि जा भेल अछि | ओना आशा करैत छी जे काल्हिसं नोकरी ध’ लेब | अरुण बाबू गाममे बाजल छलाह जे फरवरीमे बम्बइ जायब | से हुनक पत्र बरमहल नहिये भेटल अछि |तें ओहो सूचना दी | हम केहेन सुधंग छी,तकर एक उदाहरण | आँखि देखायब लहेरियासराय यात्राक एक मुख्य उद्देश्य छल |एकटा चश्मा-विक्रेता ढ़ीप-ढ़ाप द’क’रोकि लेलक | ओकरेसं आखि जँचा, चश्मा बनबा क’ आबि गेल छी | स्वस्थ नीक जकां होइत छी, त फेरसं अहाँक पत्रक उत्तर देब | -------जीवकान्त (९). ड्योढ़, रामनवमी, ३०.०३.८५ प्रिय अनिलजी, पत्र भेटल छल | अरुण बाबू पछिला सप्ताह एत’ आयल छलाह | गीत सभ दरभंगा केंद्र घुरा देलक, ई बूझि बड तकलीफ भेल | दरभंगा केन्द्रसं हमरा सभ रारि ठननहि छी | तकरो किछु नहि भ’ रहल अछि | कलानंद भट्टहुक गीत हम आकाशवाणी, दरभंगा केंद्रकें पठौने छिऐक | कलानंदजी बदलि क’ किशनगंज गेल छथि |ओत’सं खोज करैत छथि जे गीत सभक की भेल ? आकाशवाणीक कार्यक्रम सभक बहिष्कार कयने छी, तें ओत’ नहि जाइत छी | हिनका सभकें पत्र लिखैत छियनि, त तकर उत्तरो देबाक आवश्यकता ओ लोकनि नहि बुझैत छथि | पत्रिका सभमे एहि सभक चर्चा करबाक अतिरिक्त आर कोन उपाय अछि | आर एम्हर अहाँ की सभ लिखलहु अछि ? पढैत छी की सभ ? --------जीवकान्त (१०). सीवान ३०-०४-८७ प्रिय ठाकुरजी, नमस्कार |पत्र भेटल | पत्र नहियो भेटला पर अहाँ स्मृतिसं बिच्छिन्न नहि होइत छी | हमरा लोकनिक इच्छा रहैत अछि जे अहाँ डीविजनल ऑफिस एबाक प्रत्येक अवसरक उपयोग अवश्य करी. उपर्युक्त पंक्ति स्पष्ट क’ देने हएत जे अहाँ किएक महत्व रखैत छी.गंगानंद झा बिना ककरो आग्रहें, निस्संकोच मैथिलीमे लिखबाक प्रयास क’ रहल छथि, इ संभव भ’ गेल, जकर प्रमाण ई पत्र स्वयं अछि. अपन एहि लगनशील व्यक्तित्वक रक्षा अहाँ निश्चय करैत रहब जाहिसं परिवेश प्रभावित हुअए सकारात्मक तरीकासं. ई बात प्रायः अहाँकें आकर्षित नहि करत जे एहि पत्रक पहिनो हम एक कथाक प्रसंगमे मैथिलीमे पत्राचार कयलहुँ और हास्यास्पद स्थिति हमर नहि भेल.हमरा मोन पडैत अछि जे पृथ्वीराज कपूर अपना सम्बन्धमे कहैत छलाह जे हम हिंदी नहि पढ़ल रही, किन्तु तुलसी जयंतीक अवसर पर हमरा अध्यक्ष बना देल गेल.ओहि अवसर पर हमरा लागल जेना तुलसीदासक तस्वीर हमरा कहैत अछि जे अहाँ हिंदी सीखू. तस्वीरसं, किताबसं सिखनाइ अपेक्षाकृत सोझ छैक, किएक त अहम पर चोट नहि लगैत छैक.ई नहि बुझि पडैत छैक जे कियो हमरा पर अपनाकें स्थापित करबाक प्रयास क’ रहल अछि. जीवित मनुष्य सेहो अपनासं उमरमे छोट एहेन लोकसं सिखलापर अहमकें चोट लागैत छैक. तें लोक लोकसं नहि सीखि पबैत अछि.अहाँ एकरो संभव क’ देलिऐ. हमर अहमकें बिना आहत केने, अहाँ हमरा एक उपलब्धिसं युक्त करबामे सफल भेलहु. आब हमरा मैथिलीमे लिखै काल इ संकोच बाधा नहि दैत अछि जे भाषा-व्याकरणक भूलसं भरल अभिव्यक्ति हयत. हमर साधुवाद और धन्यवाद दुनू ग्रहण करब. पुस्तक प्रकाशनक संभावना समाचार स्वाभाविके हमरा प्रसन्न केलक. प्रगतिक सूचनाक प्रतीक्षा रहत. अहाँ जीवन संग्रामक आह्वानकें स्वीकार और अंगीकार करैत रहब परन्तु अपन व्यक्तिगत विशिष्टतासं साहित्यक माध्यमसं जीवन देवताकें आहुति दैत रही, एकरो प्रति सजग रही, से हमर अनुरोध और आकांक्षा. संसारमे क्षुद्रता अहुना बहुत छैक और क्षुद्रताक वृद्धिक लेल अनुकूल परिवेशो बराबर भेटैत रहैत छैक, तें अपनामे यदि किछु उच्चता आ विशिष्टता पबैत छी त ओकरा जिएबाक भरिसक कोशिश अवश्य करी. हमरा लोकनि ठीक-ठाक छी. कन्यादानक प्रयास एखनधरि सफलता मंडित नहि भेल अछि, हम जुटल छी. अप्पू पटनेमे छथि. एहि सालक पटना प्रगतिशील लेखक संघक सम्मेलन कयने छलाह. पूर्ण रिपोर्ट एखन हमरो उपलब्ध नहि भेल अछि. बब्बू-बेबी स्वस्थानमे छथि. बसंती, मैथिली और बौआ नीकें छथि ने ? हुनका सभकें तथा हुनका सभक मायकें हमरा दूनूक आशीर्वाद कह्बनि. आब अहाँ खुश छी ने ? हमर ई मैथिलीक पत्र अहाँक अंदर की प्रतिक्रिया उत्पन्न कयलक, जान’ चाहब. पत्र देब. शुभेच्छु गंगानन्द झा (११). डेओढ २३.०३.९७ भाइ अनिलजी, ‘हंस’मे अहाँक लघुकथा ‘संसार’ देखल अछि | ख़ुशी भेल | अहाँ स्वस्थ-सानंद होयब | जीवकान्त (१२) संघ भवन,मधुबनी २३.११.९७ प्रिय जगदीश भाई, अकस्मात् आई बैद्यनाथ बाबू नवनीतक नवम्बर अंक ( दीपावली विशेषांक )क पृष्ठ सं.६० पर तोहर लिखल गीतक अवलोकन करौलनि |ओहि सारगर्भित गीतकें पढ़ि अति प्रसन्नता भेल, संगहि वर्ष ९५ के फगुआक ओ राति मोन पड़ि गेल जखन हम भगवान बाबूक आंगनमे तोरा एकटा गीत सुनेबाक बड़ जिद्द केलियह आ तूँ अगिला साल फगुआमे गीत सुनेबाक बचन देलह |अगिला सालक कोन कथा जे १९९८ के फगुआमे ई आश पूरत की नहि से नहि जानि किन्तु तोहर लिखल गीत पढ़ि ओहि बचनकें पूर्ण मानि लेलहुँ आ एहि हेतु तोरा बहुत-बहुत धन्यवाद | गाम-घरक समाचार ठीक आ पूर्ववत छैक | मिथिलेशक विवाह १४ जुलाई क’ भ’ गेलैक आ हेमक विवाह ५ दिसम्बर क’ हेतैक | हमर गुणा दिल्ली गेल छल | ओहि ठाम ललनजी,रतनजी एवं सच्ची सभ सपरिवार कुशलपूर्वक अछि | अपन समाचार आ चाचाक समाचार लिखबाक कष्ट करिह’| चाचाकें प्रणाम आ कनियाँ तथा तीनू भाइ-बहिनकें हमर आशीष कहि दिहक | ------आशा बाबू /२३.११.९७ (१३) . द्वारा-डा.प्रेमनाथ सावित्री कुटीर,घग्घा घाट रोड, महेन्द्रू,पटना, २४.०८.९८ प्रिय अनिलजी आशा जे सकुशल सानंद होयब |’आरम्भ’क प्रति प्रायः नियमित भेटैत होयत |एखन धरि पांचटा अंक भेटल होयत आ छठम अर्थात आरम्भ-१८ शीघ्र भेटत |ई लगा क’ अहाँक छौ टा अंक पूरि जाइत अछि | तकरा बाद आगाक अंक लेल ७५ टाका एम.ओ.सं पठा देब त आगांक पांच अंक फेर एहिना पठबैत रहब, मुदा से आरम्भ-१८ भेटलाक बाद | बहुत दिन पूर्व अहाँ दूटा कविता पठौने रही से जखन काज भेलापर ताक’ लगलहुँ त नहि भेटल |असलमे डेरा शिफ्ट करबामे बहुत रास वस्तु एम्हर-ओम्हर भ’ गेल | कृपया ओहि कविता सभक दोसर प्रति शीघ्रे पठा दी | नवका पता उपर लीखल अछि | आरंभ-१८ प्रेसमे अछि |कविता शीघ्र चाही | अहाँक ---राजमोहन झा (१४) . २४.११.९८ प्रिय अनिलजी, अहाँक १८.११.९८ क पत्र आयल | नीक लागल | कही त स्मरण रखबा लेल आभारी भेल छी | आरम्भ-१८ मे अहाँक कविता देखल | आर्यावर्तक रविवारी साहित्य पृष्ठ पर नागार्जुनकें श्रद्धांजलिमे अहाँक रचना देखने छलहु | अहाँक लेखकीय सक्रियतासं प्रसन्नता भेल | हम सभ नीकें छी |चि. वरुण बाबू झंझारपुरमे आ चि.अरुण बाबू पूसा रोड (समस्तीपुर)मे पदस्थापित छथि | हम अगिला वर्षक आरम्भमे अवकाश ग्रहण करैत छी | यात्रामे बहरायब आब दुखदायी लगैत अछि | लिखबाक काज घटाओल अछि | सप्रेम, जीवकान्त (१५) . शम्भुआड़ / ५.१२.९८ परम स्नेही जगदीशजी, सप्रेम प्रणाम | कुशलोपरान्त कुशलक कामना | अहाँक गीत नवनीतक दीपावली विशेषांकमे आओर तदुपरांत नवम्बर ९८ मे देखि अतीव प्रसन्नता भेल |गीतक भाव जे हम समझि-बुझि सकलहुँ ताहिसं गदगद भ’ गेलहुँ | मंदिर-मस्जिद अओर धर्मशास्त्रक शाश्वत सत्यक साक्षात्कार किंबा स्वीकार करबाक (धार्मिक ढोंगक निरंतर बढ़ि रहल प्रचार-प्रसार मध्य )सराहनीय एवं अनुकरणीय अछि | गाम-घर ‘नव घर उठे,पुरान घर खसे’ उक्तिकें चरितार्थ करैत नंगराइत-घिसटैत चलि रहल अछि | आशा अछि अहाँ सपरिवार सानंद होयब | अपनेक -------- बैद्यनाथ (१६) १३.०१.९९ प्रिय मित्र, शुभकामना कार्ड भेटल | अहाँक प्रसन्नतासँ अहाँक आत्मीयताक अनुभव केलहुँ | अहाँ गौरव उपलब्ध करी | सादर, जीवकान्त (१७ ) . भाइ, अहाँक पत्र आयल अछि | अहाँक पोथी लेल भूमिका हम केदार काननकें पठा देलियनि अछि | अहाँकें नीक नहि लागत, ओहिमे निम्न मध्यम वर्गीय लेखक सभक लेखनक निंदा भेल अछि | ओकर फोटो मँगा कए देखू | पसिन्न नहि होअए त ओकरा पोथीक संग नहि छापू | जीवकान्त ड़ेयोढ, १३.०४.९९ (१८) . पत्रांक २५४४/२३५ मलाढ़ २०.०५. ९९ आदरणीय भाई,सादर नमस्कार | आगा अपनेक ०५.०५.९९ क’ पठाओल १२०० टाकाक ड्राफ्ट आ पत्र आ १०.०५.९९ क’ लिखल पोस्टकार्ड सेहो प्राप्त भेल अछि | सर्वप्रथम हम अपनेक आभारी छी जे अपने हमरा आग्रह पर भारती-मंडनक सहयोगार्थ विशिष्ट संरक्षक सदस्य बनबाक स्वीकृतिक संग तत्काल सहयोग राशिक ड्राफ्ट पठाओल अछि | भारती-मंडनक पाचम अंक अपनेकें प्राप्त भेल आ अंक बड्ड नीक लागल से जानि श्रम सार्थक बुझना गेल | अपने अपन बिस्तृत प्रतिक्रिया आ अपन फोटो आ बायोडाटा यथाशीघ्र पठाबी से आग्रह | अपनेक सद्यः प्रकाशित दीर्घ कविताक पोथी ‘धारक ओइ पार’ देखबाक आ पढबाक सौभाग्य प्राप्त भेल | वस्तुतः अपनेक ई पोथी एकटा उत्कृष्ट प्रयोग अछि जे पूर्णतः वैचारिक परिपक्वताक परिचय प्रस्तुत करैत अछि | अपने अपन प्रतिभाकें पुनर्जागृत करबाक जे प्रक्रिया प्रारम्भ कयल अछि ई मैथिली साहित्यक सृजनमे उपादेय भूमिकाक निर्वाह करत से हमर विश्वास अछि | भा.म. छठम अंकक प्रकाशनक काजक शुभारम्भ भ’ चुकल अछि | आगामी अंकक कतबा प्रति अपनेकें पठाओल जाय, से सूचना पठाबी, से आग्रह | पत्र दी | अपनेक तारानंद झा ‘तरुण’ (१९) . डा.तारानंद वियोगी रामा पाण्डेय निवास निकट मस्जिद भवानीपुर जिरात मोतिहारी-८४५४०१ २२.०५.९९ प्रिय भाइ, नमस्कार | ‘देशज’ नामसं मैथिली कविताक एक पत्रिका बहार करए जा रहल छी| लोकोन्मुखी स्वभावक पत्रिका हेतै | एकर प्रवेशांकमे अहाँक किछु जनपक्षीय गीत छापबाक अभिलाषा अछि |प्रवेशांक शीघ्रे तैयार होयबा लेल अछि | अनुरोध अछि जे यथाशीघ्र अपन पांच टा गीत हमर उपर्युक्त पता पर पठा कए अनुगृहीत करी | आशा करैत छी जे अहाँ स्वस्थ आ प्रसन्न हेबै | सप्रेम तारानंद ‘वियोगी’ (२०) . १४.०६.९९ मान्यवर, ‘धारक ओइ पार’ पढल | पोथी आकृष्ट कयलक अछि | अहांक कविता मैथिली कवितामे दीर्घ-कविताक परम्पराक स्थापना करैत अछि | अहाँक कविता गामक कविता थिक | ओहि गामक जकर लोप भ’ रहल अछि | आ जे उजडि शहर दिस जा रहल अछि | शहर हृदयहीन अछि | आ मनुक्खकें मशीन बना अनेक तरहें ओकर शोषण क’ रहल अछि |आ से कुरूप शहर गाममे सेहो उगि रहल अछि | आ एकटा सम्पूर्ण आ जीवंत गाम शहरमे विलीन भ’ रहल अछि | एहि पीड़ाकें अहाँक कविता पर्याप्त धैर्यक संग कहैत अछि | बधाइ | --------नारायणजी (२१) . डेओढ २५.०८.९९ भाइ, दहेज़ हत्या पर मैथिलीमे किताब अयबाक चाही | तत्काल अहाँक कविता ‘जंगल’ ( आरम्भ-२० ) एहि प्रसंगमे उल्लेखनीय अछि | एकर प्रसंगक चर्चा हम असमिया मित्रकें पत्रमे कयल अछि | ओ एकर चर्चा हारवार्डमे आयोजित एक सभामे करताह | ------जीवकान्त (२२) . मोतिहारी, ०३.०३.२००० प्रिय भाइ, नमस्कार | अहाँक एक पत्र भेटल अछि,जाहिमे अहाँ ‘तुमि चिर सारथि’ पढलाक बाद अपन प्रतिक्रिया पठौलहुँ अछि | अनुगृहीत छी | हम अपन लघुकथावला पोथी आ किछु आनो पोथी शीघ्रे अहाँकें पठायब | ठीके अहाँ कहै छी जे लिखबाक आ पढबाक सौभाग्य फिफ्टी-फिफ्टी हेबाक चाही | सप्रेम, तारानन्द वियोगी (२३) . आदित्य सदन,मिश्र टोला,दरभंगा दिनांक ३०.०६.२००० स्वस्ति श्री अनिलजी, ‘आरम्भ’ जून २००० अंक २४ मे नान्हि-नान्हिटा चारिटा अहांक कविता पढ़लहु | एतनीटामे एतेक बेशी बात कहि देबाक विशेषता हमरा आनंदान्दोलित क’ देलक आ संवर्द्धना पत्र लिखबाक हेतु उत्प्रेरित सेहो | हमर हार्दिक शुभकामना स्वीकार करी | कल्या.kkकांक्षी श्री अमर (२४) . पटना/०६.०७.२००० आदरणीय विद्याश्रेष्ठ प्रणाम | बहुत दिनक उपरान्त अहांक चारि गोट प्रभावी कविता आरम्भ-२४मे पढबाक अवसर भेटल | नीक लागल अहाँक सभ कविता | ‘गाम आ दिल्ली’ अपन छोट कलेवरमे रहितहु बडकीटा गप कहैत अछि | तहिना ‘डिबिया’ सेहो हमरा प्रभावित करैत अछि | कविता सभक हेतु बधाइ आ धन्यवाद | आब समय आबि गेल छैक जे अपने अपन एक गोट संग्रह प्रकाशित करियैक-विशेष क’ गीतक | अहाँक गीत हमरा अत्यधिक पसिन्न पडैत अछि | तें, अहू दिशामे अहाँ अवश्य विचार करियौक | शेष शुभ | अहींक अजित कुमार आजाद (२५) डेओढ,२६.०२.२००१ प्रिय अनिलजी, अहाँक पत्र आयल अछि | एहि बीच किसुन संकल्प लोक,सुपौलसँ एक संग अनेक पोथी अयबा लेल अछि | भारती मंडनक एक अंक प्रेसमे अछि |एहि अंकमे हमर किछु कविता आबि रहल अछि | एखन मात्र कविते टा लिखैत छी |ओकर हिंदी अनुवाद किछु हिंदी पत्रिकामे प्रकाशनार्थ पठा देल करैत छी | स्वास्थ्य जर्जर भेल जाइत अछि | भोपालक एक हिंदी गोष्ठीमे निमंत्रित भेल छी | ----------जीवकान्त (२६) डेओढ,२९ .०४ .२००१ प्रिय अनिलजी, पहल सम्मान भोपालमे आयोजित छल,१४-१५ अप्रैल कें| एहिमे सम्मिलित भेलहुँ | पहिल बेर मध्य प्रदेशक बंजर भूमि आ जनहीन भूभाग सभकें देखल | अहाँ ओहि क्षेत्रमे छी, से बहुत अर्थमे नीक छी | -------जीवकान्त (२७) जनवरी १३,२००४ जगदीशजी, नव वर्षक पहिल दिनक अहाँक लिखल पत्र काल्हि प्राप्त भेल अछि | नव वर्षमे अहाँ किछु करबा लेल छी, से उत्साह पत्रमे झलकैत अछि | मैथिलीमे पद्य लिखब शुरू कयल २००३ ई.क वसन्तमे | ओहिमे सँ ५७ गोट टुकड़ा संकलित कय प्रकाशनार्थ देल अछि |एहि साल फरवरीक अंत धरि पोथी आबि जायत | मैथिलीसं हिंदी अनुवादमे आयल अछि ‘निशांत की चिड़िया’|प्रकाशक थीक-साहित्य अकादेमी, दिल्ली | पछिला पुस्तक मेला,पटनामे जनता मैथिली पोथी किनबा लेल तकैत छल, से बात शरदूजी(समय साल,पटना)लिखलनि अछि |मैथिली पोथी-पत्रिका संग्रह करू |रायपुरमे मैथिल संस्था अछि |ताहिमे सम्मिलित होउ | -------जीवकान्त (२८) डेओढ,२८.०६ .२००५ अहाँक पत्र भेटल | हमर पठाओल सामग्री अहाँक टेबुल धरि पहुँचि गेल, से जानि हर्ख भेल | राम लोचन ठाकुरकें भाषा भारती सम्मान (बंगलोर भारतीय भाषा परिषद) भेटलनि अछि | ‘समय साल’ ( मनोरमा प्रकाशन,राजीवनगर (दक्षिण)रोड न.६,पटना-२४)क दस-बीस प्रति मँगा कए रायपुरमे वितरण करू |पोथी,पत्रिका बेचने थोड़ेक संगठन मजबूत होइत छैक | मैथिली नाटकक मंचन लेल क्लब बनाउ | मैथिलीओ कोनो तीर्थसँ कम थोड़े अछि। ---------जीवकान्त राजदेव मण्डल अवाक अन्हरिया राति। लगै छेलै जेना आसमान अन्हार उगैल रहल होइ। ऊपरसँ हाँइ-हाँइ बहैत हवा गाछ-बिरिछकेँ झिकझोरि रहल छेलै। तैपर कखनो-काल टिपटिपाइत पानिक बून...। कखैन समए ठक भऽ जेतै आ कखैन अधला तेकरा कोन ठेकान। ऐपर केकर वशो चलि सकै छै? ओ तँ...। जितू ऊपर मुहेँ तकलक। लगलै मेघ उनटल तेना आबि रहल अछि जेना ओकरा टाँगमे पाँखि लगि गेलइ। एहेन खराप समए आ दू कोसक रस्ता! बान्ह-सड़क बनिते छेलै तँए ओइ गाम बस-ट्रक तँ जाइते ने छल। एहेन बिगड़ल समैमे रिक्शा, टेम्पू जेबे नै करतै। पैदले जाए जाए पड़त। केकर कपार खराप हेतै जे एहेन समैमे निकलत। जितू निकलल छल ठीके समैपर। ओकरा की पता छेलै जे बाटमे बस भंगैठ जेतै आबसक डरेबरसँ जातरी सभकेँ झगड़ा-फसाद भऽ जेतै। तइ कारणो बसकेँ दू घण्टा बेमतलब ठाढ़केने रहतै। आ जातरी सभकेँ एते समस्या हेतइ। तइसँ बसबलाकेँ मतलबे की। सभ तँ अपने सुआरथमे डुबकी मारैत अछि। सुआरथ पूर भेल तँ वाह नइ तँ आह। अनकासँ केकरो की मतलब। ओ सोचलक- मुदा हम तँ स्वार्थमे नै छी। बेमार सारि सारि बारम्बार फोन कऽ रहल छेली जे- “हम जीअब की मरब तेकर कोनो ठेकान नहि। एक बेर भेँट कऽ जाउ।” ओइठाम केना नै जाएब, जैठाम जेनाइ कर्तव्य अछि। ‘केतबो लिखब लेख, परेमक रूप अनेक।’ भेँट होएत। ओइ भेँट करबामे नै जानि केतेक सुख छै। केतेक आनन्द छै। सूचना मिललाक उपरान्त जितूकेँ कछमछी लगलै से अखनो धरि लगलै छेलै। ओकरा यादि पड़लै। अँगनासँ निकलैत-काल पत्नी टोकने रहइ। “केतए जाइ छिऐ। कोनो ओइठाम लोक नै छै।” पत्नी जेना तमसाएल रहइ। शंकामे औनाइत मन! तामसे फड़फड़ाइत! जितू मिलबैत बाजल- “कोनो आनठाम जाइ छिऐ जे एना तमसाएल छी। अहींक गाम तँ जाइ छी।” हँसैत जितू निकैल गेल छेलै। सड़पर ऐबते दोस टोकि देने रहइ- “हे यौ, सासुर अछि पछिम जाइ छिऐ उत्तर मुहेँ।” “कनी बैंकसँ टको-पैसा लेबाक अछि। अखैन हम नै रूकब।” कहैत आगू बढ़ि गेल रहइ। जितूकेँ मनमे आएल। जतरा पहर टोकि देने रहए तँए शायद बाटमे एना बाधा भऽ रहल अछि। पुन: सारिक संगे बिताएल समए ओकरा स्मरण हुअ लगलै। हँसी-खेल, फगुआक रंग-अबीर, आमक मास, मधुमास। ओकर रूप, गुण, बोली आ मुस्की मारैत मुख...। किछुकाल-ले जेना ओ स्वर्गक सागरमे डुमकी मारए लगल। सुखकेँ यादि केलासँ लोक किछु पलक लेल पुन: सुखी भऽ जाइत अछि। सुनमसान बाट आ बिकट समए। जेना सभ किछु बिला गेल छेलै। एकाएक मेघक गर्जनासँ जितूकेँ धियान भंग भऽ गेलइ। जेना फेर चारू-भरसँ अन्हार घेर लेलकै। एहने समैमे घटल घटनाक सबहक चित्र आगूमे आबए लगलै। ओकरा मन पड़लै। एकबेर सासुरेमे सारक दोस कहने रहए- “हे यौ, इलाकामे जँ कुसमए केतौ फँसि जाएब तँ हमर नाम सुमैर लेब।” सारक मुहसँ दोसक बड़ाइ खूबे सुनने रहए। जितूकेँ बुझेलै जेना कातमे किछो छेलै। मुदा ओ अन्हारमे किछो नहि देख रहल छल। पएर थरथराए लगलै। कथी छेलै- भूत-प्रेत आकि चोर-डकैत। पता नै ओतए पहुँच सकब आकि बाटेमे प्राण बिला जाएत...। फेर भट्ट दऽ किछो खसल। डेराइते ओम्हर तकलक। देखते जेना मनकेँ भरोस भऽ गेलइ। कियो आगूमे बाट धेने धड़फड़ाइत जा रहल छेलै। जहिना लटछुटु माल दोसर माल-जालकेँ देखते स्थिर भऽ जाइत अछि तहिना जितूकेँ सन्तोख भेलै। शंका सभ मेटाए लगलै। डेग बढ़ौलक जे संगे चलब, लगमे जाइते ओ उनैट कऽ कर्कश अवाजमे पुछलक- “रेऽऽ ठाढ़ रह! केतऽ रहै छी?” तखने बिजली चमकल। ओही इजोतमे जितू ओकर भयंकर रूप देखलक। भागल भय जेना फेरसँ देहम समा गेल। डरे देह थराराए लगल। पेटक हवा निकास लेल गोंगिया उठल मुदा ओहो डरसँअन्दरेमे बिला गेल। अनायासे मुहसँ निकलल- “हौ अही अगिला गाम हमर सासुर अछि। हमहूँ तोरा चिन्हते छिअ आ तहूँ हमरा चिन्हते हेबहक। एना किए करै छहक।” “आ रे तोरी-के, कोनए गेलै रौ, चेला सब, ई तँ सभकेँ चिन्हते छौ। जुलुम भेलौ। सभटा भेद खोलि देतौ। सभ किछो छीन-ले आ सारकेँ साफ कऽ दही।” “हौ बाप, हम केकरो नहि चिन्हैत छी।” “चुप...।” तड़ाक-तड़ाक मुँहपर चमेटा खसए लगल।लगलै जेना बजर गिरैत अछि। जितू धड़फड़ा कऽ भूमिपर खसि पड़ल। “देखै छी पाछूमे इजोत1 पुलिस आबि रहल छौ। सभ किछो छीन-ले आ गरदैन काटि दही। हम आगू निकलै छियो।” एकटा चेला तरूआरि लेने जितू दिश बढ़ल आर सभ तेजीसँ आगाँ बढ़ि गेल। चेला जितू लग आबि सभ जेबीक तलाशी लेलक आ उठैत बाजल- “यौ गुरू ई तँ थप्परेसँ मरि गेलै। मारबै की। आगू जल्दी पुलिसक इजोत लगीच आबि गेल।” सभ पड़ा गेल। जितू चिन्हल अवाज सुनि कुहरैत उठल। मन घृणासँ भरि गेलइ। अचरजमे डुमल स्वर निकललै- “धनक लेल लाक एतेक नीचाँ गिर सकैत अछि। केकरा कहबै के पतिएतै, जेकरे कहबै सएह लतिएतै।” जेना लगलै केतौ किछु नहि, कोनो सम्बन्ध नहि। मनुख केहेन आ जानवर केहेन। के नीक? अनायासे ओकर हाथ ओहइ जेबी दिस गेलै जइमे आठ हजार टका रखने रहए। सभ टका-पैसा सुरक्षिते रहइ। ओ अवाक् भऽ गेल। सोचलक- केतौ आ केकरो लग इमान रहि सकैत अछि। बुढ़-पुराणक बात मोन पड़लै- केतबो काटबहक जड़ि इमानक सोर पताल धरि। विन्देश्वर ठाकुर राजनैतिक विहनि कथा - अहीसब ला' तोरा कहि दै छियौ तऽ कहै छें जे कहै छी ! ई लाई-मुरहीके मोटा बन्हनाइ छोडि क' कतऽगपास्टिंगमे भीरल छले से कह तऽ ! - सब किछो कहै छीयै । पहिने ई शान्त होउक न । आइ पबनीओके दिनमे कैला अते तम्साइ है? - है हम कि शान्त रहूं घण्टा? देखै नै छिही जे दू पहर अहिठाँ बीत गेल आ अते दूरक रास्ता है। कखनी जाइब आ कखनी फेउर घुमि कऽ आइब? ओतऽ बेटीयो तऽ हमर पैरा तकैत होत कि नइ? - अच्छा, ठीक है ! ई भात खाउक ताबे हम बान्हि दै छीयै मोटरी । गेल छलियै भदौरिया काकीके कनी लाई-मुरही दिअ ला' । से उहे बैठा लेलकै ...... - ओह ! भदौरिया काकी लग गेल छलै ई ? केना है ओकर अवस्था अखनी ? - कि कहियै टुनमाके पापा ! बेटाक शोग अते जल्दी कहूं माइ सँ बिसरैतै ? आ ओहो अकालमे मरल लक्का जबान बेटाके ?? भरिदिन कनिते रहै छै ..... - ओह ! हे भगवान ........ रमौलबालीके ई गप्प सुनिते 'दामोदर' भैयाके आँखिमे ३ महिना अगाड़ीके मधेश आन्दोलन आ ओहि आन्दोलनमे पुलिसद्वारा मारल गेल भदौरिया काकीक २० बर्षक बेटा बिरजुके दृष्य फनफन क' घुमऽलगलै ........ प्रेम विहनि कथा -आलोक ! आब त परीक्षाके बाद १ महिनाके छुट्टी होबऽ बला छै । कोना भेट हेतै आब अपना सबके? - एह ! एक्के महिनाके बात तऽ छै सोनी ? १ सालके थोडे छै ? आ बीचमे फेसबूक-स्काइप जिन्दाबाद छै ने !! - हँ रौ मुदा तैयो ... पता नै ब्रेकअप सँ हमरा बड डर लगैए । -धुर बताही तुहू ने ! अनेरे अपना दिमाकके दही बनबैत रहै छें । गे ई फिलीम थोडे छै जे आइ अफेयर्स आ काल्हिए ब्रेकअप भऽ जेतै ? - नै रौ ! तैयो । देखै नै छिही, रियलो जिनगीमे चट्टे अफेयर्स आ पट्टे ब्रेकअप होइ छै से ?? - अच्छा आब बुझलियौ जे तू रणबीर आ कैट्रीना दिस इसारा क' रहल छें । तऽ सून ! ओ फिलीमके जिनगी आ बलिउडके दिनचर्या फराक नै छै । मुदा अपना सबहक जिनगी, व्यवहार, समाज-संस्कार सब ओइसँ अलग छै। तें तो चिन्ता जुनि कर । अब्दुर रज्जाक (धनुषा हरिपुर) प्रेम बिहैन कथा ई बात उइखक आइर पर सं इदिया कहैत रहला की- "हमहूं एक दिन दिबाना रही अहापर आश रखने छलौ। सिहकैत हावा के झोका संग दिलक हाल सुनाबै छलौं।" किछ भितर उइखक खेत सं जुलेखाक आवाज आइल- " अगर अहां मस्त हावा के झोकामे अपन दिलक हाल सुना देलियै लागल हमरो दिल मे एना हमहू दिलक चाभी किनको थमा देलियै" इदिया बाजल- "हमरा एना लगैया अहा ककरो बाट जोहै छी" जुलेखा "ओकर झुठा वादा कऽ के, हरेक ईदक दिन अइठाम आबि कऽ भेटबाक प्रयासरत रहै छी, मुदा उ बेवफा लगैयऽ, मात्र तीन साल भऽ गेल, नै मिलैयऽ/" इदिया- "आइ तऽ ईद छलै, दुनिया के रंगीनता कें छोड़ि कऽ कैला सुनसानमे नुकाइल छी?" जुलेखा कहलनि- "ईदक दुनियाबी रंगीनता दिलक रुखा-सुखापन कें नै रंगीन कऽ सकैयऽ, अगर इहे बात अहां कें पूछी तऽ?" --"दुनिया के रंगीनतासं हमरो खास नौता नै, आइ काइल एकान्तता सेहे मित्र भेल जाइयऽ, अहांक उदासीक कारण पूछू तऽ?" तमसाइल आवाजमे- "अहां हमरा एहन प्रश्न करनिहार के? अहांकें जतऽ जेबाक अछि जाउ, किए हमरा एहन बात सब पुछलौं?" मुदा सुनसान वातावरणकें चिरैत फेन आवाज आइल- "ओकर वादासं बेचैनी अछि/" इदिया- "वादा करऽबला सब बेवफा मात्र किन्नो नै भऽ सकैयऽ, ई सच अछि/ कियो समयसं पैघ आ अटल अछि/ किस्मत ओकरासं किछ आरो अगाअछि/" -" समय के घुंघट आ किस्मत के पर्दा सं बादा कें किए झपने गेल उ/ " बहुत जोर सं चिचिया कऽ आबाज आइल, संगे आवाज कम होइत गेल- "बेवफाइ, वादा-खिलाफी/ भाग्यसं आगां मौत अछि, जं इहे संग लागि गेल तऽआरो की?" जुलेखा उइखसं बाहर भऽ देखऽ चाहलक तऽ इदियाक रूहके हमशकल दूर चलि गेल रहै/ आवाज सुनाइ दैत रहल से -"जन्नतमे जरुर आइब, प्रेम जिबित रहबे करत/" मुदा जुलेखा कें देल घड़ी आइर पर फेकल रहै, जे ता-कयामत तक इन्तजार करैत रहल, संग इदियाकें देल प्रेम-पत्र आइयो ओहने अछि। प्रेम बिहैन कथा -बड़ सुन्दर आइ लगै छें गै -झुठ्ठा गारी दऽ देबौ -है साँचे कहै छियौ -लोक देखै है, अगा चल कनी बाद मे कहबौ - हं तऽ लोक देख कऽ कथी कऽ लेतै देखऽ नऽ दहिन -बादमे देखबे करतै अगां के बात सब तऽ -जो-जो, गे दैया जो न अगां, नै तऽ हल्ला कऽ कऽ बजबौ, से कहिये दै छियौ -कथी बजबें अखैन बाज नऽ -हं, बादमे मुंहगोतिहें नै, हम भखारु मल्लिक (डोम) कें बेटी छी कि डोमिनिया सं प्रेम नै छुयेतौ तऽ कह आ संगे बैस आ प्रेमक बात कर। आब आ नऽ नजदीक/ हिर्दये सं घिर्ना भऽ गेलौ/ चलियौ तोरा घरे जाइ देबहीं, गोसांइ घरमे ,हड्डी तऽ नै छुयेलौ, हमरा संग चलबे तऽ चल हमरा घरे -है, धीरे सं बोल नऽ, बफाइर तोरै छें, हल्ला नै कर, अते दिन सं कहियो कैला नै कहलें से अपन सब कुछो -जो आब, प्रेम हमर अपवित्र रहै तै सऽ ई दिवार जाइतक तोरा सुझा गेलौ राजनैतिक बिहैन कथा हरिपुरक बिजुलिया कमाइला दिल्लीमे १० बर्ष बितौलक। बचपन मे गेल बिजुलिया ओइठाम बिहारक चानन क निबासी सैदुलके छोटकी बेटी अमीनासंनिकाह करा लेलक। बिजुलिया अपना सं बेसी प्रेम अमीनासं करै छल। दिन समयके दोष, घरमे बूढ़ माईबाबूके उमेर बहुत भेलाक कारण फोनपरबिजुलिया कें ’आइब जो बउवा आब नै चल सकैयै छियौ खेत-पथार, जायला बहुत तकलीफ होइए’ नित्ये कहऽ लागल। फैक्ट्रीके चौकीदार के नौकरीकेंछोड़ि कऽ अमीना कें लऽ कऽ बिजुलिया चलल अपना गाम दिस। ओना ओकरा नेपालक कानून सब के जानकारी नै छल मुदा मधेशक आंदोलन संमधेशी के अधिकार ला उठल नाराजुलुश भऽ रहल बात अरुण कहने छल दिल्लीमे। जं- जं दिल्लीके दुरी हरिपुर सं लग होइत गेल मधेशक आन्दोलनक चर्चा-परिचर्चा बिजुलिया के जानकारी बढ़ाबैत गेल। जयनगरक रेल सं उतरैत बिजुलिया अपना देशक नेपाल रेलबे-सेवा देखबैत कनियाँ के कहलक जे येहे अछि हमरा देशक रेलसेवा। बढ़का-बढ़का रेल देखनिहार बिजुलियाक कनियाकें रेल देखते झुझुवाउन तं लागि गेल मुदा जेबाक तं ओही देशमे अछि। जनकपुरक रेलक प्लेटफॉर्म पर जब दुनू बेगैत उतरल तऽ देखलक लोग अनेकन नारा-जुलुशमे। कहैत रहे जे मधेसी एकता, "जिंदाबाद", 'मधेशी के मांग --पूरा कर " नाराजुलुश के एहन आवाज कें सुनि कऽ एगो भला आदमी सन मनुख कें बिजुलिया पुछलक- "हौ कथीक नारा जुलुश अछि?" भला-आदमी कहलक- "अपने के घर कतऽ भेल?" "नेपालमे हरिपुर"/ भला आदमी फेन सं पुछलक " अपने कऽ कनियाँ अछि ई की ?" "हं, हम की पुछ्लौं तेकर जवाफ नै देलियै, खाली हमरे सं पूछै छियै?" -" जेहए, कन्या की भारत के छौ? " बिजुलिया कहलक " हं "/ भला-आदमी जवाब देलैन- "ई अधिकारक आंदोलन अछि, आब अहाँक कनियाँक नागरिकता वैवाहिक अंगकृत भेलेपर नागरिकता पाओत। जेकर परिणाम अहां के जे बउवा हेतै तेकरो अंगकृत नागरिकता मिलतै जै सं नेपालक उच्च पद पर कहियो, कतनो बचबा पढ़ने लिखने रहत तऽ, उ नेपालक पैघ नेता हाकिम नै बैन सकत/ तइ सभक विरोधमे ई आंदोलन जिंदाबाद-मुर्दाबाद भऽ रहल अछि। बिजुलिया कें बिजली सं जेना झटका लगैया, तेना लागल मनमे। कनिया दिस तकैत सोचैत रहल जे आब की करू, फेन दिल्ली लौट जाउ? कनियाँक बैबाहिक अंगकृत नागरिकता आ होमऽ बला बच्चाक अंगकृत नागरिकताक चिन्ता होमऽ लागल। मुदा जुलुश लगैते रहल -अंगकृत नागरिकता खारिज कर। कतारक मौसम आ बिन मौसम क बर्षा बर्षा प्रकृतिक क अनुपम रचना मे सऽ एक अद्भुत प्रकृया अछि। समय आ भौगोलिकताक स्थान संग मौसम क बिशेष संयोग क मिलन सऽ बर्षा क रूप अपने सऽ बनि जाइए। अलग-अलग स्थान अलग अलग तरहक बर्षा देखऽमे आबैए जेना कोनो ठाम झिसी क रूपमे तऽ कोनो ठाम झमकउवा क रूपमे।प्रसंग कतारक बर्षा- बर्तमान समय मे कतारमे बहुत गर्मी रहै छल मुदा अइ साल बर्षा दू दिन सऽ शुरु अछि। दू साल सऽ कतारक गर्मी नेपाल मे नेपाल क बर्षा कतरक भिशा लगाकऽ आइब गेल अछि। नेपाली सब संगे नेपाल क खैनी गुल आ बहुत तरहक अमली सबहक़ चीज आइल अछि, ओनाही मौसमसेहो आइब गेल जेना लगैया। बर्षा सऽ अतुक विभिन्न कीशिमक निर्माण सब काज जेना भवन निर्माण ,पुला निर्माण ,रेल बिभागक निर्माण सब किछ प्रभाबित भs जाइए। प्रकृतिक रूप सऽ अखैन कतार क मौषम मे बहुत गर्मी होबाक चाही मुदा अखैन ठीक उल्टा मौसम मनोरम ठंढा अछि। बिश्व जलबायु परिबर्तनक सीधा असर कतारकमौसम मे देखल जाs रहल अछि। चारु दिश समुद्रक घेरा क तट मे रहल ई देश बहुत सुन्दर अछि। समुद्री हवा संग एकर समुद्री तट मे एगो अनुपम बीअइर आबैत रहैए। ओना प्रकृतिक रूप सऽ दुनियाक हर क्षेत्रक अपने विशेषता अछि। खास कऽ बर्षा सऽ प्रभाबित होमऽबला निमार्ण सऽ जुड़ल कंपनी सब बर्षासऽ नोकसान उठबैए मुदा प्रकृतिक रूप सऽ बर्षाक प्रभाव बहुत उत्तम अछि। काज सब जे बाहर होइत रहैय से सब तऽ किछ देर वा दिनला अवरोध वा प्रभाबित होइए, फेर संचालन भs जाइए। यहन कतारक बातावरण मौसम अइठाम रहनिहार सबहक मन मोहने जा रहल अछि। कतारक धरती पर अपन पसीना बेचैला घर-परिवार क खुशी के खातिर बहुत मनुवा सब खुशी नजर आउत ओहु मे एकर मौसम सोन मे सुगंधा रखबाक काज करैय। दुनियाक उगैत अर्थबेबस्था मे कतारक स्थान बीतल साल सब सऽ उच्च छल मुदा अइ साल सऽ किछ गिरारबट देखा रहल अछि। दुनियाक बहुत देशक मनुवा सब अपन देश छोइर छोइर अइठाम आइब रहल अछि, आइलो अछि अपना देश मे आबऽ लेल छान पगहा तौड़ैत लोग ऐठाम क मौसम सऽ हिचकैत छल मुदा नै, ओना नै अछि अखैन ऐठामक अबस्था। दोहा-कतारमे साँझक चौपारिपर कें आठम मासक बैसार सम्पन्न ! "मातृभाषाक जगेर्णा हमरा सबहक प्रेरणा" मूल नाराके संग बिगत ८ मास सँ निरन्तर रुपमे आयोजना होइत आबि रहल मैथिली काव्य-सन्ध्या अन्तर्गतके कार्यक्रम #साँझक_चौपारि_पर के आठम मासक बैसार २5 मार्च २०१६ बितल शुक्र दिन दोहाक सनैया गरेंड मल्ल क प्रांगणमे भेल । एहिबेरक कार्यक्रम आन बैसारक तुलनामे किछ कम श्रोता आ कबि बिन्देश्वर जी घर गेलाक कारण आ काम बिशेष कबि अशरफ जी अनुपस्थित रहला । बैसारमे नियमित सर्जक सब सँ बहुतो कम नव सर्जक आ श्रोता लोकक कम उपस्थिती रहल । तहिना भाषा-साहित्य प्रति सदैव सजग सचेत युवा कार्यकर्ता श्री मनिष राय जीलगायत एक सँ एक व्यक्तित्व सबहक उपस्थिति छल । कवि शोगार्थ जीक संयोजकत्वमे शुरु भेल ऐ कार्यक्रममे पहिल चरणमे सब गोटे अपन -अपन परिचय देलाह । तकरा बाद दोसर चरणमे सम्पूर्ण स्रष्टा सब द्वारा रचना वाचन कएल गेल । रचना वाचन केर क्रममे बेचन महतो,सोगारथ यादव,प्रणव कान्त झा,अब्दूर रज्जाक जी द्वारा कविता वाचन भेल । तहिना रवीन्द्र उदासी जीक अपना स्वरमे गाओल गीत सँ सब गोटे मन्त्रमुग्ध भऽ गेलाह । एकर अतिरिक्त अँनलाइन सँ पठाओल रचना सबमे कवि प्रयास प्रेमी मैथिल, राजदेव राज जी के होलि बिशेष रचना बाचनकैल गेल । कार्यक्रमके बीचमे मधेशक क्षति के कारणे होली पर्ब नै मनाउल गेल। शहीदक सम्मान सोरुप साहित्यकार लोकेन होलि नै मनौने अबगत करौलनि। संग हेल्प मधेसी होली बिशेषके निमन्त्रणा पर अनुपस्थितिके लेल नै दुख रखबाक अनुरोध कैल गेल। समग्रमे बैसार जय जय रहल । चौपारि-पर उपस्थित सबगोटे बड बेसी उत्साहित भेलाह । कार्यक्रमक अन्तमे प्रमुख अतिथि सब द्वारा प्रवासमे रहियोकऽ अपन भाषा-साहित्य लेल भऽ रहल ऐ प्रयासके बहुते बेसी सराहल गेल । संगे सदैव साथ सहयोग रहत आ उत्तरोत्तर प्रगति होइत रहत से आश्वासन सेहो दियौलनि । उमेश मण्डल विहैन कथा- मुड़नक मुर गोसॉंइ अन्तिम कगनीपर पहुँच डुमैले तैयार रहैथ। मनाइ ठाकुर अपन दिनुका काज उसारि हाथ-पएर धोइ कऽ तमाकुल खा अपन सङ्गैतिया सभकेँ लऽ महावीरजीक स्थान पहुचैक विचारमे दरबज्जापर बैसि पत्नीक प्रतीक्षामे रहैथ जे जखने औती तखने अपन काम-धाम सुमझा विदा हएब। मनाइ ठाकुरक पिता चारि-पान साल पहिनहि ई देश-दुनियॉं छोड़ि अपन देश-दुनियॉंमे पहुँच गेला। वृद्ध माए जीवित छैन आ अपने दुनू परानीक संग तीन-चाइटा धियो-पुता परिवारमे छैन। ओना काज तँ बॉंटल छैन, मुदा एक परिवारक बीच रहै छैथ तँए सभ दिन दुनू परानी मनाइ ठाकुर भरि-दिनुका काजक मुँह-मिलानी करैत, कौल्हुको काजक सूचीबद्ध सभ दिन क’ लइ छैथ। जहिना मनाइ ठाकुरक देश पुरुख-पात्र आ दुनियॉं होइ छैन हुनकर केश-दाढ़ी बनाएब, तहिना अलोधनियोँक देश होइए स्त्रीगण, हुनकर हाथ-पएरक नह काटब दुनियॉं। अर्थात् मनाइ ठाकुर अपना देश-दुनियॉंमे रमल रहै छैथ आ अलोधनी अपना देश-दुनियॉंमे। मुदा एकेठाम, एके परिवारमे, संगे-संग दुनू परानीक काज-रोजगार रहल, खाली काजक देश-दुनियॉं अलग-अलग, तँए एक-दोसरक हिसाव-बाड़ीक मुँह-मिलानीक परोजने नहि पड़ै छैन। किएक तँ देखले आ फड़ियाएले हिसाव दुनू गोरेक बीच रहै छैन। मुदा औझुका काज बँटा गेल छेलैन। सराधक काजमे पुरुख-स्त्रीगण सभकेँ नौआक परोजन पड़ैत अछि, मुदा मुड़नमे तँ से नइ होइए। एकटा बाल-बोधक केश काटल जाइए। अलोधनियोँ आइ दोसरे काजे आनठाम गेल छेली। मनाइ ठाकुर अपन औझुका काजक हिसाव पत्नीकेँ सुमझेनाइ जरूरी बूझि डेढ़ियापर बैसल सोचैत रहैथ- जखैन महावीरजी-स्थानपर सङ्गैतिया सबहक संग कीर्तन-भजन करए जाएब, तखैन कोन ठेकान अछि, जँ कहीं वौराइए जाए,तखैन तँ औझुका हिसाव माथपर लगधले रहत..। पुरना साड़ीमे तीन-चारिटा मोटरी-चोंटरी बन्हने अलोधनी डेढ़ियापर पहुँचलो ने छेली कि मनाइ ठाकुर कहलखिन- “पहिने सुनि लिअ, तखैन अँगना जाएब।” भरि दिन अधोधनी पति विहीन बोनाएल-बोनाएल उबियाएले छेली। तँए मोटरी-चोंटरी ऑंगनमे राखब स्वत: बिसैर गेली। लगमे आबि बजली- “कोन एहेन धड़फड़ी भऽ गेल जे रस्तेसँ रस्ता घुमा लेलौं! कहू की कहै छी?” जहिना अपना धुनमे अलोधनी तहिना अपना धुनमे मनाइयो ठाकुर रहैथ। बजला- “आब अपन धर-अँगनाक हिसाव लेब आकि हम ओकरा कन्हेठने घुमैत रहब!” हाथक मोटरी-चोंटरीकेँ ओसारपर जा कऽ राखि अलोधनी लगमे आबि समान्य रूपे पतिकेँ पुछलकैन- “औझुका मुड़नक कमाइ की सभ भेल अछि।” मने मगन मनाइ ठाकुर रहबे करैथ, बजला- “मुर पलटे तँ नाचए साहु, औझुका कमाइ की तकै छिऐ। आइ तँ एकटा मुड़े बढ़ि गेल, तखैन अनेरे कोन सुइदक भॉंजमे रहितौं।” अपना मने अपना ढंगे जहिना मनाइ ठाकुर बजला तहिना अपना मने आ अपन ढंगे अलोधनियोँ बुझलैन,कनीकालक पछाति अलोधनीक मुहसँ निकलल- “एहनो करम जरूआ पुरुख हुअए!” ‘करम’ शब्दक अर्थ मनाइ ठाकुर अपना हिसावे बुझै छला। मनमे नचलैन जे बाल-बोधक जन्मौटी केश काटि एकटा सम्पतैक मुड़ पूजी बँचिये गेल तखैन अनेरे सूदिखौंक किए बनितौं! सङ्गैतिया लोक छी, राम भजन करै छी, तखैन अपनो मन की कहैत? मुस्कुराइत मनाइ ठाकुर बजला- “ऍंह! बड़ सुन्नर मुड़नी-भोज बनल छेलए। जेहने खीर बनल तेहने पुड़ी।” पतिक खीर-पुड़ी सुनि अलोधनीक मन मिठेलैन नइ बल्की जेना बाइस-तेबाइ खेने मन खटा जाइ छै तहिना खटा गेलैन। बजली- “सिदहा-समर की सभ अनलौं, से ने कहू?” मनाइ ठाकुर कहलखिन- “बॉंकी की रहल जे अनितौं। दिनके तेहेन खेलहा अछि जे मात्र लोटा पानि पीने रतियो कटि जाएत!” अलोधनीकेँ जेना एकेबेर झौं चढ़लैन तहिना पति मनाइ ठाकुरक गट्टा पकैड़, चौकीपर सँ उठबैत कहलखिन- “चलू अखने गिरहत ऐठाम। अपन बक्सीस केना छोड़ि देब।” असबीसमे पड़ल मनाइ ठाकुर कौल्हुका समए मंगैत बजला- “अखैन पहिल सॉंझ छी, हल्ला-फसाद नइ करू, हमहूँ कीर्तन-भजन करए जाइ छी, जतरा नइ भङ्गठाउ।” अलोधनी- “एहेन पुरुखक कोन ठेकान जे...।” दुनू हाथ जोड़ि मनाइ ठाकुर बजला- “हाथ जोड़ि कहै छी जे अखैन जाउ, अहूँ अपन घर-अँगना सम्हारू आ हमहूँ जाइ छी। काल्हि भोरे दुनू गोरे चलि कऽ फरिछा लेब।”◌ रिपोर्ट-- सगर राति दीप जरल ‘कथा गंगा’मे सगर राति दीप जरल- ‘सगर राति दीप जरय’ एक ओहन मंचक नाओं छी, जइ मंचपर सभ वर्गक साहित्यकार भाग लइ छथि, जाइ-अबै छथि तथा भाषा-साहित्यक विकासक लेल विचार-विमर्श करै छथि। तँए ई ‘सगर राति दीप जरय’ मैथिली भाषा-साहित्यक सभसँ श्रेष्ठ मंच कहबैत अछि। एकर आयोजन जगह-जगह प्राय: तीन मासक अन्तरालपर १९९० ई.सँ होइत आबि रहल अछि। ८५म गोष्ठी श्री ओम प्रकाश झाक संयोजकत्व आ मिथिला परिषद केर प्रस्तुतिमे भागलपुरक द्वारिकापुरी स्थित ‘श्याम कुंज’मे आयोजित भेल जेकर उद्धघाटन वरिष्ठ समालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंह, ‘विदेह’ एवं टैगोर सम्मानसँ सम्मानित साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल,तिलकामाझी विश्वविद्यालयक मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ. केष्कर ठाकुर, डॉ. शिव प्रसाद यादव एवं अवकाश प्राप्त शिक्षक दुखमोचन झा संयुक्त रूपे दीप नेसि केलनि। पछाति एक विशिष्ठ अध्यक्ष मण्डल एवं संचालन समितिक निर्माण करि गोसाउनिक गीत, स्वागत गान एवं स्वस्ति वाचनसँ साँझक छह बजे गोष्ठीक शुभारम्भ भेल, रातिक १२:३० बजे घण्टा भरिक भोजनावकाश भेल, जइ शुन्यकालमे, भोजनक पछाति, संयोजक- सह गजलकार ओम प्रकाशजी अपन नव रचित दूटा गजल सुना कथाकार सभ साहित्यकार-साहित्य प्रेमीकेँ साहित्य-रसमे बोरि देलनि। पुन: कथा पाठ आ समीक्षाक क्रमकेँ आगू बढ़ौल गेल। जे चलैत-चलैत भिनसर छह बजेमे आबि अध्यक्षीय उद्बोधनक संग संयोजकक धन्यवाद ज्ञापन तथा दीप-पंजीक हस्तांतरणक पछाति इति भेल। ऐ गोष्ठीमे दूर-दूरसँ आएल साहित्यकार-कथाकार-समीक्षक एवं श्रोताक तथा स्थानीय साहित्यकार-कथाकारक संग कथा प्रेमीक बेस जमघट ताधरि बनल रहल जाधरि अगिला गोष्ठीक निर्णयक संग आयोजित गोष्ठीक समापनक घोषणा नहि कएल गेल। ८६म आयोजन मधुबनी जिला अन्तर्गत फुलपरास प्रखण्डक महिन्दवार पंचायतक ‘लकसेना’ गाममे होएत, जइमे पहुँचैक हकार दैत भावी संयोजक श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’जी कहलनि- ‘अधिक-सँ-अधिक कथाकार-साहित्यकार-समीक्षक सभकेँ लकसेना गामक ८६म कथा गोष्ठीमे सुआगत छन्हि।’ ८५म गोष्ठीक अध्यक्ष मण्डल, संचालन समिति, कथायात्राक मादे दू शब्द, पोथी लोकार्पण, कथा पाठ एवं समीक्षा-टिप्पणीक विवरण निच्चाँमे देल जा रहल अछि- अध्यक्ष मण्डल- डॉ. प्रेम शंकर सिंह, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, डॉ. केष्कर ठाकुर, श्री विवेकानन्द झा ‘बीनू’ श्री राजदेव मण्डल, श्री श्यामानन्द चौधरी। संचालन समिति- श्री दुगानन्द मण्डल, श्री पंकज कुमार झा एवं उमेश मण्डल। कथायात्राक मादे दू शब्द- प्रो. केष्कर ठाकुर, पो. प्रेम शंकर सिंह, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री विवेकानन्द झा ‘बीनू’ गोसाउनिक गीत- श्रीमती निक्की प्रियदर्शनी आ स्वीटी कुमारी। स्वस्ति वाचन- श्री शिव कुमार मिश्र। पोथी लोकापर्ण- अपन मन अपन धन (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक उकड़ू समय (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलक लोकार्पण कर्ता- डॉ. केष्कर ठाकुर डा. प्रेम शंकर सिंह पहिल सत्रमे कथा पाठ- (१) लगक दूरी- निक्की प्रियदर्शनी (२) गहींर आँखिक बेथा- ओम प्रकाश झा (३) डोमक आगि- रामविलास साहु (४) शिवनाथ कक्काक डायरी- अखिलेश मण्डल। समीक्षा-टिप्पणी, पहिल सत्रक- डॉ. शिव कुमार प्रसाद, उमेश मण्डल, डॉ. शिव प्रसाद यादव एवं श्री नन्द विलास राय। दोसर सत्रमे कथा पाठ- (५) हमर बाइनिक विचार- जगदीश प्रसाद मण्डल (६) प्राश्चित- गौड़ी शंकर साह (७) मजाकेमे चलि गेलौं- लक्ष्मी दास। समीक्षा- श्री राम सेवक सिंह, प्रो. केष्कर ठाकुर, श्री श्यामानान्द चौधरी, डॉ. प्रमोद पाण्डेय। तेसर सत्रमे कथा पाठ- (८) जीन्स पेन्ट- नन्द विलास राय (९) लाल नुआँ- शम्भु सौरभ (१०) धोइते-धोइते भगवान बना देबइ- उमेश मण्डल (११) धर्म आ धार्मिक- दुख मोचन झा समीक्षा- श्री ओम प्रकाश झा, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, डा. शिव प्रसाद यादव, श्री राजदवे मण्डल। चारिम सत्रमे कथा पाठ- (१२) अनमेल बिआह- शिव प्रसाद यादव (१३) मुरझाएल फूल- कपिलेश्वर राउत (१४) पुत्रक कर्तव्य- नारायण झा (१५) भूख- पंकज कुमार झा (१६) बेसी भऽ गेल आब नहि- हेम नारयण साहु। समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री विनोदानन्द झा ‘बीनू’, डॉ. शिव कुमार प्रसाद। पाँचिम सत्रमे कथा पाठ- (१७) भीखमंगा- प्रकाश कुमार झा (१८) भोला- ललन कुमार कामत (१९) विधवा बिआह- बेचन ठाकुर (२०) होटलमे पुकार- दुखन प्रसाद यादव (२१) चोंचाक खोंता- उमेश नारायण कर्ण समीक्षा- श्री श्यामानन्द चौधरी, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, राजदेव मण्डल ‘रमण’ छठिम सत्रमे कथा पाठ- (२२) अपन घर- राजदेव मण्डल (२३) चीफ गेष्ट- शिव कुमार मिश्र (२४) मायाक तागत- राजदेव मण्डल ‘रमण’ (२५) आमक ठाढ़ि- शिव कुमार प्रसाद (२६) हेराएल कोदारि- शिव कुमार प्रसाद (२७) डिजाइनवाली कनियाँ- शारदा नन्द सिंह समीक्षा- उमेश मण्डल, नन्द विलास राय, श्यामानन्द चौधरी एवं हेम नारायण साहु। ८४म सगर राति दीप जरय २० दिसम्बरक साँझमे शुरू भ' २१ दिसम्बर २०१४क भिनसरमे सम्पन्न भेल। ८५म आयोजन भागलपुरमे श्री ओम प्रकाश झा केर संयोजकत्वमे मार्च २०१५क अन्तिम शनिकेँ होएत। ई निर्णए अध्यक्ष मण्डल एवं संचालन समिति तथा गोष्ठीमे उपस्थित सबहक विचारसँ भेल। ओना प्रस्ताव श्री राजदेव मण्डल ‘रमण’ जीक सेहो रहनि जे लकसेना (मधुबनी)मे हुअए। मुदा सर्वसम्मति भागलपुरेक रहल। अत: दीप आ पंजी वर्तमान गोष्ठीक संयोजक भावी संयोजककेँ देलखिन। संचालन समितिमे दुर्गानन्द मण्डल, ओम प्रकाश झा तथा उमेश मण्डल छला आ अध्यक्ष मण्डलमे शिव कुमार प्रसाद, श्यामानन्द चौधरी तथा सच्चिदानन्द ‘सचिद’। मो. गुल हसन एवं फिरोज आलम स्वागत गीत गौलनि, एवं स्वतीवाचन शिवकुमार मिश्र। तीन सत्रमे निम्न कार्यक्रमानुसार ऐ गोष्ठीक भरि रातिक यात्रा भेल- उद्घाटन सत्र- परिचए-पात तथा दू शब्द- उद्घाटनकर्ता- श्यामानन्द चौधरी जगदीश प्रसाद मण्डल पं. सच्चिदानन्द मिश्र ‘सचिद’ मिहिर झा महादेव ओम प्रकाश झा शिव कुमार प्रसाद राजदेव मण्डल ‘रमण’ पोथी लोकार्पण सत्र- (१) डीहक जमीन (विहनि/लघु कथा संग्रह) ओम प्रकाश झाजी केर लोकार्पणकर्ता- जगदीश प्रसाद मण्डल, उमेश नारायण कर्ण, राम विलास साहु। (२) समरथाइक भूत (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा सच्चिदानन्द ‘सचिद’ शम्भु सौरभ (३) गामक शकल-सूरत (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- श्यामानन्द चौधरी अनुप कुमार कश्यप राजदेव मण्डल ‘रमण’ उमेश नारायण कर्ण (४) अप्पन-बीरान (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- बेचन ठाकुर फागुलाल साहु मिहिर झा महादेव रामाकान्त मिश्र (५) बाल-गोपाल (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- संजय कुमार मण्डल सूर्य नारायण कामत (सूरज कामत) शम्भु सौरभ शिव कुमार प्रसाद (६) लजबिजी (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- बमभोली झा दुर्गानन्द मण्डल शिव कुमार प्रसाद गांधी प्रसाद (सरपंच) (७) पतझाड़ (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा श्यामानन्द चौधरी राम विलास साहु नन्द विलास राय (८) रटनी खढ़ (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्डलजी केर लोकार्पणकर्ता- अरविन्द चौधरी अनुप कुमार कश्यप कपिलेश्वर राउत मो. गुल हसन (९) शिव दर्शन (पद्य) पं. सच्चिदानन्द मिश्र लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा शम्भु सौरभ शिव कुमार प्रसाद कपिलेश्वर राउत (१०) अभिलाषा (मैथिली भजनमाला) पं. सच्चिदानन्द मिश्र लोकार्पणकर्ता- श्यामानन्द चौधरी बेचन ठाकुर (सरिसव पाही) (११) सीडी लोकार्पण- (१) मैथिली गजल: आगमन ओ प्रस्थान बिंदु (आलोचना संकलन) सं.सं- गजेन्द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्हारजी केर (२) सखुआवाली (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्डलक (३) निर्मल सनेस (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्डलक (४) देवघरक प्रसाद (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्डलक (५) कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा- (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- विदेह- सम्मिलित रूपे लोकार्पण- जगदीश प्रसाद मण्डल शिव कुमार प्रसाद ओम प्रकाश झा राजदेव मण्डल ‘रमण’ कपिलेश्वर राउत। कथा सत्र- कथा पाठ एवं समीक्षा- पहिल पालीमे- लोकतंत्रक माने- ओम प्रकाश झा- टेटरा हीरा- नन्द विलास राय- समीक्षा- श्यामानन्द चौधरी फागुलाल साह शिव कुमार प्रसाद अनुप कुमार कश्यप। दोसर पाली- पवित्र पापी- उमेश नारायण कर्ण- जाति-पाति- दुर्गानन्द मण्डल समीक्षा- राम विलास साहु राजदेव मण्डल ‘रमण’ संयज कुमार मण्डल मिहिर झा महादेव तेसर पाली- एकर उत्तरदायी के?- शम्भु सौरभ कमतिया हवेली- राम विलास साहु समीक्षा- उमेश मण्डल फागुलाल साहु सच्चिदा नन्द झा ‘सचिद’ बेचन ठाकुर (नाटकार) चारिम पाली- खेती-वाड़ी- बेचन ठाकुर डीहक जमीन- ओम प्रकाश झा समीक्षा- शिव कुमार प्रसाद मिहिर कुमार झा बमभोली झा शम्भु सौरभ पाँचिम पाली- बिआह- गौड़ी शंकर साह इन्फेक्शन- फागुलाल साहु समीक्षा- कपिलेश्वर राउत राम विलास साहु शशिकान्त झा उमेश नारायण कर्ण छठिम पाली- पाँच भूत- उमेश नारायण कर्ण जरि गेल माइक आस- विपिन कुमार कर्ण समीक्षा- कपिलेश्वर राउत नन्द विलास राय ओम प्रकाश झा अनुप कुमार कश्यप सातिम पाली- शिव विद्यापति- सच्चिदानन्द ‘सचिद’ भरम- लक्ष्मी दास कलयुगक निर्णए- कपिलेश्वर राउत समीक्षा- शम्भु सौरभ जगदीश प्रसाद मण्डल श्यामानन्द चौधरी। अंतमे अध्यक्षीय भाषण तथा धन्यवाद ज्ञापन। 88म कथा-साहित्य गोष्ठी डखराममे सम्पन्न भेल डखराम (बेनीपुर)क मुखियाजी श्री अमर नाथ झाक आयोजकत्व आ श्री कमलेश झाक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’क 88म कथा-साहित्य गोष्ठी 30 जनवरीक साँझमे शुरू भेल। जेकर उद्घाटन सम्म्लित रूपे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, डॉ. शिवकुमार प्रसाद, श्री राजदेव मण्डल, श्री नन्द विलास राय, श्री फागुलाल साहु, श्री शारदा नन्द सिंह, श्री उमेश पासवान, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री शम्भु सौरभ तथा श्री राम विलास साहु केलैन। उद्घाटनक पछाइत स्वागत गीत सेहो सम्मिलित रूपे समवैत स्वरमे श्री राधाकान्त मण्डल तथा श्री रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार गौलैन आ स्वागत भाषण करैत श्री कमलेश झा कहलैन- ‘1990 इस्वीसँ ‘सगर राति दीप जरय’क आरम्भ यात्रा शुरू भेल जे चलैत-चलैत आब ओइ तहपर चलि आएल अछि जेतए खॉंटी माटिक सुगन्धसँ सुगन्धित कथाक लेखन एवं पठन भऽ रहल अछि...।’ उद्घाटन सत्रक पछाइत लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा पोथी, पहिल एगच्छा आमक गाछ (कथा संग्रह) आ दोसर ठूठ गाछ (उपन्यास)क लोकार्पण सम्मिलित रूपे भेल। तथा ‘खसैत गाछ’ (लघु कथा संग्रह) नामक पोथीक वितरण सेहो भेल। क्रमश: कथा सत्रमे प्रवेश भेल। छह पालीमे कथाक पाठ भेल। जइमे श्री उमेश नारायण कर्ण- ‘मौनी बाबा, अलवत्त छोड़ी’ शीर्षकक दूटा कथा पढ़लैन। श्री राजदेव मण्डल- एडजस्टमेन्ट, श्री राम विलास साहु- जाति, श्री शारदा नन्द सिंह- ‘आशातीत’ तथा‘पलटा माय’, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- ‘एगच्छा आमक गाछ’ तथा हहौती, श्री लक्ष्मी दास- बापक धरम, श्री ललन कुमार कामत- बाबाक लोटा, श्री शम्भू सौरभ- परम्पराक बलि, श्री फागु लाल साहु- अछूत, श्री शिव कुमार मिश्र- व्यवहार तथा प्रौहित्य, श्री कपिलेश्वर राउत- घूर लगक गप, अखिलेश मण्डल- गढ़ैनगर हाथ, तथा अपने (उमेश मण्डल) पढ़लौं- ‘अपने गरदैन कटलौं।’ पठित कथा सभपर एक-सँ-एक समीक्षा सेहो भेल। डॉ. शिव कुमार प्रसाद, पण्डित बाल गोविन्द आर्य ‘गोविन्दाचार्य’, श्री फागु लाल साहु, राधाकान्त मण्डल तथा श्री कमलेश झा विषद रूपे समीक्षा कार्य केलैन। संगे श्री राजदेव मण्डल, श्री शारदा नन्द सिंह,श्री कपिलेश्वर राउत, श्री उमेश पासवान, श्री शिवकुमार मिश्र, श्री राजा राम यादव, श्री नन्द विलास राय, राम विलास साहु, उमेश नारायण कर्ण तथा अपने (उमेश मण्डल) सेहे समीक्षा कार्यमे भाग लेलौं। अगिला गोष्ठीक भार लैत श्री उमेश पासवान कहलैन- 89म सगर राति दीप जरय- लौकही (जिला मधुबनी)मे कराएब। जेकर हकार मंचेसँ दऽ रहल छी जे 89म गोष्ठीमे ‘दलित विषयक कथाक विशेष स्वागत होएत।’ ऐ तरहेँ 88म गोष्ठीक समापन भेल। 89 गोष्ठी लौकहीमे श्री उमेशजी करौता। सम्भव जे मार्चक अन्तिम शनिकेँ होएत। अखिलेश कुमार बाबू भोला लाल दासक जयंती मनल ६ फरवरी २०१६- शनि दिन, मधुबनीक माध्यमिक शिक्षक संघ भवनमे भोला लाल दास लोक संस्कृति एकेडमी द्वारा बाबू भोला लाल दासक जयंती समारोहक आयोजन भेल। समारोहक उद्घाटन विधायक श्री समीर कुमार महासेठ केलैन। स्वागत करैत एकेडमीक संयोजक श्री बी.एन. झा कार्यक्रमकेँ आगू बढ़ौलैन। मंच सजल। दर्शक-दीर्घा भरल। विशिष्ठ अतिथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ आ श्री कमलेश झा मंचासिन भेला। मंचक अध्यक्ष डॉ. सुरेन्द्र लाल दास एवं मुख्य अतिथि विधायकजी सेहो मंचपर आसीन भेला। उद्घाटन भाषणसँ समारोहक कार्यक्रमकेँ आगू बढ़बैत विधायक श्री समीर कुमार महासेठ बजला- बाबू भोला लाल दास मातृभाषा मैथिलीक समर्पित अनुरागी छला। ओ अपन समुच्चा जिनगी मिथिला आ मैथिलीक विकासमे लगेलैन। खगता अछि जे हमरो सबहक कर्तव्य-कर्म ओहन हुअए जे मिथिला-मैथिलीक विकास क्रमकेँ आगू बढ़बैत एकैसम सदीक मथिला बनए। विशिष्ठ अतिथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी कहलैन- मधुबनी, आइ जेतए भोला बाबूक जयंती समारोहमे अपना सभ छी, ई ओ जगह अछि जेतए ग्रियर्सन सन भाषा-विद् रहि काज केलैन, ओ ‘लिग्विष्टिक सर्वे ऑर्फ इण्डिया’मे जे मैथिली भाषा आ भाषाक दिशापर कार्य केलैन ओ अद्भुत अछि, विराट अछि। जेकरा भोला बाबू सेहो अपन सर्वस्व धन-मन लगा आगू बढ़ेबामे अपन भरि जिनगी लागल रहला। पत्रकारिता-कार्यमे अपन घराड़ी तक बेच कऽ लगा देलखिन...। तँए भोला बाबूक योगदानकेँ जँ हम सभ मैथिली मात्रक अनुरागी मानै छिऐन तखन हुनका संग अन्याय हेतैन। ओ मैथिलीक संग हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषामे सेहो अनुपम योगदान केने छैथ। तेतबे नइ, १९२०-२१ ईस्वीमे महात्मा गांधीक संग जहल सेहो कटने छैथ। जमीनी कार्य करबाक जे हुनकामे उत्साह छेलैन,गुण छेलैन ओ अद्भुत, जे औझका साहित्यकारमे विरले देखबामे आबि रहल अछि। भोला बाबूक बेवहारिक पक्षपर जँ हम सभ नजैर दी तँ स्वत: हमरा सबहक मुहसँ बहराएत- भोला बाबू मिथिलाक ओहन सपूत छला जे अपन कर्तव्य-कर्ममे तन-मन-धन सभ किछु अर्पित करैत रहला, कहियो पाछू नै हटला...। समारोहक कार्यक्रमकेँ आगू बढ़बैत श्री उदय चन्द्र झा विनोद भोला बाबूक दधीचिक उपाधिक चर्च करैत कहलैन जे भारती पत्रिकाक प्रकाशन कऽ बाबू भोला लाल दास मैथिली पत्रकारिताक क्षेत्रमे क्रांति आनि देलैन। ओहन आन्दोलनकारी आ सर्जनात्मक क्षमता विरले कोनो आन साहित्यकारमे भेटैए। वृहत व्याकरण ग्रंथक रचना कऽ ओ मैथिलीक जे सेवा केलैन से अतुलनीय अछि...। समरोहकेँ संबोधित करैत विशिष्ठ अतिथि श्री कमलेश झा कहलैन- विश्वविद्यालयमे मैथिलीक पढ़ाइ शुरू करबैमे भोला बाबूक अहम् भूमिका छेलैन। १९३९ ईस्वीमे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक पढ़ाइ भोले बाबूक योगदानसँ भेल तँए बाबू भोला लाल दास साधारण पुरुष नै विराट पुरुष छला...। ऐ तरहेँ समारोहक यात्रा बढ़ैत रहल। दर्शक-दीर्घासँ सेहो संबोधन भेल। श्री सुनील कुमार नायक कहलैन- अपन पूर्वजक उपलब्धिकेँ जानब संगे भावी पीढ़ीकेँ जनाएब हमरा सबहक जिम्मेवारी अछि। तँए ऐ सभ तरहक कार्यक्रम होइत रहए। कहब ने किए,अपने आइसँ पहिने भोला बाबूक कएल कार्यकेँ नै जनैत रही जे आइ जनलौं अछि। तेतबे नै आइये जे ऐ मंचपर साहित्यकार सभ छैथ, तइमे कए गोटेकेँ अखने चिन्हलिऐन अछि। निश्चित रूपेँ पत्र-पत्रिकासँ पाठकक जे सम्बन्ध हेबक चाही से नै रहब एकटा कारण भेल, मुदा पत्र-पत्रिका दोखी नै अछि ईहो नै कहल जा सकैए...। अध्यक्षीय उद्वोधनक पछाइत कार्यक्रमक समापनक घोषणा भेल। ऐ अवसरपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डल अपन स्वरचित पचासम पोथी- ‘खसैत गाछ’ (लघु कथा संग्रह) क वितरण दर्शक-दीर्घामे केलैन। ०६. फरवरी २०१६ राम विलास साहु- लक्ष्मिनियॉं, मधुबनी। ई छी हमर मजबूरी जमुना बाबाक दुआरिपर सतसंग-प्रवचन होइ छेलै। भीड़ देखि हमहूँ ससरि कऽ गेलौं आ बैस सुनए लगलौं। प्रवचनकर्ता सेहो ज्ञानी आ विद्वान बूझि पड़ला। ओ मनुखक जिनगीक समरूपता बतबै छला। कहब रहनि जे सभ मनुख एक समान छी। सभ एके ईश्वरक संतान छी आ सबहक अत्मामे एके परमात्माक अंश रमि रहल-ए। मुदा हम तँ बड़ अंतर देखै छी। सबहक क्रिया-कलाप, रहन-सहन आ खानो-पानमे बड़ पैघ भिन्नता अछि। केकरो बोरे-बोरे नून आ केकरो रोटीओपर ने नून। कोइ खाइते-खाइते मरैए आ कोइ खाइए बिनु मरैए। केकरो बीघा-बीघे कोठा-सोफा केकरो खोपड़ीओपर आफत। कोइ रौदे-वसाते जरि-मरि काज करैए तँ कोइ ए.सी.मे मौजु करैए। कियो उड़न जहाजसँ देश-विदेशक यात्रा करैए तँ कियो पएरे चलि-चलि सड़केपर पराण तियागैए। किनको बिमारीक इलाज करोड़ो रूपैआसँ विदेशमे होइए तँ किनको पराण साधारण इलाज बिनु चलि जाइए। ऐ सभ मुद्दापर सोच-विचार करैत जखनि प्रवचन खतम भेल तखनि हम हुनका लग जा कहलिऐ- “महराज, अपने प्रवचनमे सभ मनुखकेँ समरूप बतौलियनि। मुदा हम तँ बड़ अन्तर देखै छी। से कनी फड़िछा कऽ कहियौ।” प्रवचनकर्ता मधुर स्वरमे बजला- “से तँ ठीके अहूँ कहै छी। हम जे प्रवचनमे कहलौं सेहो ठीक आ अहाँ जे कहै छी सेहो ठीक। सत् ई छै प्राकृति द्वारा जे सुविधा मनुखक लेल उपलब्ध छै ओ समरूप छै। मुदा मनुखक बीचमे जे अन्तर छै से अन्तर बेवस्थामे कमीक कारणे छै। मनुखे मनुखक दुश्मन छिऐ। जे जेते सवल छै ओ ओते दोसराक हक मारि बेवस्थाकेँ दुरूपयोग करै छै। जहिना हाथीकेँ दूटा दाँत होइ छै एकटा खाइबला आ दोसर देखबैबला तहिना बेवस्था करैबलाकेँ दू नजरि होइ छै। कथनी आ करनीमे अन्तर रखने छै। ऐ सभ बातक विचार-अनुभव मनुखकेँ अपने करए पड़तै। ओकर समाधान लेल सघर्ष करए पड़तै। बिनु मांगने तँ भीखो नै मिलै छै। ई तँ अहाँ अधिकारक बात करै छी। जौं हम प्रवचनमे समरूपताक बात नै कहबै तँ बेवस्था हमरा नै ने जीबए देत। अहाँ जकाँ जौं हमहूँ प्रवचनमे बाजब तँ कहिया ने हमरा जमपुरी पहुँचा देने रहितए। यहए छी हमर मजबूरी।” चोर-सिपाही माघ मास अन्हरिया राति। ओस-कुहेससँ हाथो-हाथ ने सुझैत। एकटा चोर चारि कऽ भागल जाइ छल। तखने एकटा सिपाही गस्तीमे आबि रहल छल। चोर सिपाहीकेँ देखिते भागल। चोर बूढ़ छल मुदा सिपाही बलंठ छलै। भागैत चोरकेँ रपटि कऽ पकड़लक सिपाही। पकड़ि हाजति लेने जाइ छल। चोरकेँ डंढ़ासँ देह थरथराइ छल। मने-मन ईहो सोचै छल जे केना ऐ यमराजक हाथसँ बचब। थोड़े आगू चलि कऽ देखल जे सड़कसँ हटि एकटा घूर रहै। आगि देखिते चोर बाजल- “सर, अहाँ एत्तै रहू आ हम ओइ धूरासँ कनी बिड़ी नेसने अबै छी?” सिपाही कने सोचि कऽ बाजल- “अरे, तूँ हमरा मूर्ख बुझै छेँ रे! आ जे तूँ भागि जेमे तँ हम तोरा पतालमे खोजबौ? चूपचाप एतए बैस हम अपनेसँ बीड़ी सुनगेने अबै छी।” जाति आसिन मासक चारिम सप्ताहक समए अछि। बर्खाक पानि आ बाढ़िक पानि सेहो थीर भऽ गेल अछि। मुदा चर-चाँचरमे पानि भरले अछि। जइमे खेतिहर सभ पटुआ, सन्नइ, चन्नी, चन्ना काटि-झाड़ि गोड़ैत अछि। पानि गनहा रहल अछि। दू गामक बीच अछि तँए चर दूर तक पसरल अछि। बहुत पहिनहिसँ दुनू गामक लोकक सेवा सेहो करैए। बुढ़-पुरानक कहब छैन जे पहिने कोसी अही चर देने बोहै छल। पछाइत मुँह भरना भेने दोसर दिस धार घूमि गेल। बरखा आ बाढ़िक समए उनटे कोसीक पानि आबि चरकेँ उपेछाल करि दइए। जखन बाढ़िक पानि घटैए तखन चरोक पानि स्वत: घटि जाइए। चरक पानि करिया समाढ़सँ करियाएल, तइमे भैँटक फूल कोसी धरि फुला शोभा बढ़ेने रहैए। तैबीच सिल्ली, गागन, लालशर, पनिकौआ इत्यादि अनेको रंगक चिड़ै-चुनमुनीक क्रीड़ा स्थलक संग शरण स्थल सेहो बनलए। एक-दोसर गामक लोक जाइ-अबैले केतए-केतए समाढ़ हटा-हटा बीचमे सिरौर बना पानिटपैले रस्ता बनौने अछि। पानि बेसी रहने नाहक साधन सभ अपन-अपन रखने। जे नै रखने अछि ओ भरि डाँड़ भरि जाँघ पानि टपि ऐ-पारसँ ओइ-पार करैत अछि। बेवस्थो कोसी क्षेत्र-ले बेमुखे अछि। ऐ क्षेत्रक नेता सभ क्षेत्रक विकास तँ कमे सन मुदा अपन विकास कऽ गामसँ दूर शहरमे बड़का फ्लैट बना रहै छैथ। तँ गाम बाढ़ि-पानिमे डुमैले किए औता। ई तँ गामबला बुझत जे गाम केकर छी। डीहबासूकेँ आकि बहरबैयाकेँ। नेतासभ तँ पाँच बर्खक पछाइत चुनावी महाकुम्भमे मात्र नहाइले अबै छैथ। सभ पुण्यकेँ मोटरी बान्हि नेने चलि जाइ छैथ। चुनावक समए आएल। नेता सबहक उजैहिया गामे-गाम आबि गेल। क्षेत्रक वोँट बटोरै खातिर ओही कोसी कोसीक चर टपि अगिला गाम जेबाक छैन। सोचलैन पएरे टपने लोक संघर्षशील नेता बुझत। जइसँ अधिक भोँट हएत। नेता आ नेताक पीठलगुआ गामक कार्यकर्ता संगे सभ कियो जाँघर भरि पानि टपि पार हुअ लगला। तही क्रममे नेताजीकेँ एकटा नमहर पलैहिया जोंक धऽ लेलकैन। पार होइते नेताजीक जाँघसँ छरछर खून निकलए लगलैन। छरछर खून बहैत देख नेताजी छटपटा उठला। संगी सभ निहारि देखलक तँ देखैए नम्हरगर जोंककेँ, जे खून पीब मोटागेल अछि। नेताजी जीबठ बान्हि जोंककेँ हाथसँ पकैड़ खींच-तीर कऽ छोड़ौलैन। एक हाथसँ छरछराइत खूनक दाढ़केँ दबने आ दोसर हाथसँ आ दोसर हाथसँ एकटा संगीक लाठीक हूरसँ जोंककेँ थोकैच-थोकैच मारए लगला। जोंक तँ कठजीब होइते अछि। लाठीक हूरसँ नै मरैबला। तमसाएल नेताजीक मुहसँ निकलैन- “तोरा आर कियो ने भेटलौं जे हमरे खून पीबैले एलेँ। तोरा खनू बोकराए मारि देबौ।” छटपटाइत जोंक बाजल- “हमहूँ तँ अहींक जाति छी, जाति जातिये लग ने जाएत। अहाँ जे एहेन निष्ठूर भऽ हमरा मरै छी से जातियोपर ने कनियोँ दया-धरम अछि। अखन हम कोनो अपराधो तँ नहियेँ केलौं अछि। ई तँ जातिक सोभाव छी।” नेताजी डाँटैत बजला- “तूँ जलकीट, असरधे पानिमे रहैबला आ हम श्रेष्ठ मनुख फ्लैटमे रहनिहार, तखन तूँ केना हमर जाति भऽ सकै छेँ?” जोंक कुहरैत बाजल- “जहिना अहाँ जनताक खून पीबै छी तहिना ने हमहूँ खूने पीलौं अछि। अहूँ खूनपीबा आ हमहूँ खूनपीबा। तखन दुनू गोरे जातिये ने भेलौं। जातिक सर्टिफिकेटक चालि-चलनसँ बढ़ि कऽ आरो कोनो नमहर प्रमाण होइ छै जे देब। एक तँ पहिनहिसँ अहाँ सभ हमरापर एतेक अतियाचार केलौं जे हम भागि पड़ा कऽ पानिमे शरण नेने छी...।” नेताजी आँखि लाल-पीअर करैत बजला- “तूँ अपन प्राण बँचबैले ई गुमला हमरा सुनबै छेँ। तोरा बिनु मारनेहम नै छोड़बै।” बाजि नेताजी अनधुन लाठी जोंकक देहपर बरसाबए लगला। अधमरू भेल जोंक बाजल- “अदना सन गलतीपर हमरा सन अब्बल जीवकेँ जानसँ मारै छी आ अहाँ जे लाखक-लाख जनताक खून श्रेष्ठ मनुख भऽ पीबितो एलौं आ पीबितो छी से नीक लगैए।” जोंकक ई बात नेताजीकेँ आरो तरङा देलकैन। तखने जुमलासँ एक गोरे कहलकैन- “नेताजी, चुन लगबैक आदेश देल जाए, अपने खून बोकरए लगत।” चुनक नाओं सुनिते जोंक अपन प्राणक भीख मंगैत बाजल- “जेकर आधार बना अहाँ अपन जीवनक यात्रा करै छी यएह तँ हमहूँ छी। दया करू..! जातिपर दया करू..!” लक्ष्मी दास बापक धरम छोट-खुट्टी देखने झुझुआएब नइ, आदमी हम हण्ड्रेड परसेन्ट पक्का छी, तइमे एको परसेन्ट कम नइ, तँए एहेन धोखा ने हुअए से पहिनहि कहि देलौं अछि। किसानी जिनगी अछि तँए किसान बनि भगवानक भक्ति दिन-राति करै छी। भगवानो खुश रहै छैथ। अठारहम बरख दुरागमन केला भेल अछि, जइमे नअटा धिया-पुता अछि, मनुख कि कोनो अल्लू-भाँटा छी, जे तीनियेँ मासमे फड़ पकैड़ लेत। मनुखकेँ बुधि-विवेक होइ छै तँए ओ बच्चाक हिसाब जोड़ि लइए जे नअ मासक पछाइत बच्चाकेँ माइक दूधक खगता अन्नो पुड़ा सकैए, तैपर नअ मास पेटोमे तँ रहबे करत, तँए दुनू मिला कऽ भेल अठारह मास। दूटा काज भेल तँए तीन-तीन मास जबड़ा दऽ दियौ, चौबीस मास भेल। तइ हिसाबे अहाँ कहू जे हम पक्का छी आकि कच्चा? ओना पक्का बनबैमे भगवानो मदैत केलैन। ओ मदैत ई केलैन जे एकोटा धिया-पुताकेँ ने रोग-वियाधि लगा घिसियौलैन आने अछैते औरूदे केकरो प्राण लेलैन...। आब अहाँ पुछब- “एते धिया-पुता अछि, परिवार नियोजन किए ने करेलौं?” जहिना अहाँ पुछब जे परिवार नियोजन किए ने करा लेलौं तहिना हमहूँ ने कहब- “पैतालीस-पचासक उमेर अपनो दुनू परानीक लगिचाएले जाइए, तइले अनेरे कृत्रिम तरीका अपनाएब उचित हएत। जखन भगवानो दहिन छैथे जे किसानीमे ने कहियो मरहन्ना भेल आ ने कहियो लाही-चुट्टी लगल। किसान छी मनुखसँ लऽ कऽ माल-जाल, सुग्गा-परबा धरि पोसबो करै छी आ उपजेबो करै छी। हमरा कोन मतलब अछि अनकर राज-पाटसँ, जेते भार अछि से करै छी।” अहीं कहू जे मनुख सन धनक उपज रोकब नीक हएत? अच्छा छोड़ू ऐ बातकेँ। नबोटा धिया-पुताकेँ जहिना सिरियली जनम भेलै तहिना सिरियली स्कूलक बाट धड़बैत गेलौं। एकटा बी.ए.सँ आगू बढ़ि गेल बाँकी सभ गामक स्कूलसँ लऽ कऽ कौलेज तक धरियाएल अछि। तइसँ होइए ई जे ने एको मास नागा रहैए आ ने एको दिन, जइ दिन कागज-कलमसँ लऽ कऽ फीस-फासक खगता नइ रहैए। सरकारी कारोबार थोड़े छी जे कहियो छुट्टीए रहत तँ कहियो हाकिमे नइ! अपन जिनगीक बजट अछि। शिक्षा मदमे अनिवार्य खर्च अछि। जेठका बेटा शिक्षा मित्रक रूपमे साल भरिसँ काजरत भेल। एते दिन ने ओकरा खगता भेलै आ ने पुछलक, तइले हमरो दुख नहियेँ भेल। दुखो केना होइत अहाँकेँ हमर खगता नइ हुअए, से की कोनो अधला भेल, नीके भेल किने। मुदा काल्हि जेना ज्ञान भेलै तहिना चेतुआ आबि पुछलक- “बाबू, बापक धरम की भेल?” सभ दिन सोझ-मतिया आ सोझ-चलिया रहलौं, धरम-करमपर विचार नइ केने छेलौं। मुदा एक तँ बेटा पुछलक,तहूमे सरकारी शिक्षक सेहो छी। काल्हि दिन जे कोनो विद्यार्थी ओकरो पुछतै, तखन तँ ओहो ने वएह बात कहतै जे हम सीखेने रहबै। तखन? मन के केतबो पाछूसँ धक्का दिऐ जे भाय इज्जत डुबि रहल अछि। दुनियाँमे पिता छोड़ि दोसर ऐछे के जे एते नमहर हएत। ज्ञानक संग भक्त बना दुनियाँक बीच ठाढ़ करब नान्हिटा बात थोड़े भेल। जँ कियो छुच्छे ज्ञान देलैन आ भोगैक लूरिये ने देलैन, तखन केहेन भक्त हएब से तँ अपनो मन कहबे करैए। मुदा मन घुसकबे ने करए जे बेटाकेँ जवाब दैतिऐ...। मुदा लगले मन फेर धिकारलक- “रे बुड़िबक! कातिक मास जे ब्रह्म स्थानमे भागवतमे सुनने रहेँ, वएह बात दोहरा कऽ बाज ने।” फेर हुअए जे एक तँ कातिक मास, जइमे केते परिवारकेँ मासो दिन दुनू साँझ चुल्हि नइ जरैत, ओ मास जिनगीक पर्व मास छी। इतिहास दर्शन, जिनगीक ओहन बाटक घाट पार करैक मास छी जे मनुखकेँ मानव बनबैक मास छी। तैठाम एकटा शिक्षक बेटाकेँ केना किछु कहि फुसला देबइ। जब फुसलबैबला छल, फुसलैयो कऽ तँ जवान बना काज तक पहुँचाइए देलिऐ। आब अपने एतबो ने बुझतै जे अपनो बिआह-दान भेल, बाल-बच्चा हएत। किछु बात एहेन अछि जे बातेसँ लोक बूझि जाइए, मुदा सभटा तेहने अछि सेहो तँ नहियेँ अछि। ओकरा तँ मथनीमे मोहैन चला मथि कऽ निकालऽ पड़ै छै...। सोचलौं जे जँ बेटा बनि पुछने हएत तँ किए ने पण्डित काकाबला बात दोहरा कऽ कहि दिऐ। खाली एतबे ने बेसी कहए पड़त जे बौआ पण्डित कक्काक वचन छी, हुनके बचपनक अनुसार पोसि-पालि पूछ करै जोकर[1] ने बना देलिऐ। मुदा लगले मनमे सुतरल। कहलिऐ- “बौआ, सभ प्रश्न सभकाल ने पुछले जाइए आ ने ओकर उत्तरे देब उचित होइए। तँए साँझू पहर जखन निचेन हएब तखन नीक जेना हम तेना बुझा देबह, जेना बापक धरम होइ छै।” ◌ [1] पितासँपुछैजोकर ललन कुमार कामत बाबाक लोटा जेठक दुपहरियाक समए, टहटहाएत रौद, उपर ताकैते ऑंखि चोन्हराइत रहिन। कछुआ बाबा दलानपर काठक खुर्शिपर बैसल छथिन्ह आ गामक उफॉंइट नबतुरिया सभकेँ बिखनि-बिखनिक गारि पैर रहल छिथन्ह। गामक दु-चारिटा छौड़ो सभ मारिते बदमाश छेलैन, कछुआ बाबाकेँ देखैते इत्यादि तरहक अमर्यादित बात बाइज ‘झामलाल-बुड़बा घाम किए चुबैछ?’, ‘बाबा झल कटेलहक?’, ‘बाबा ढे़का खसलऽ, ढेका खोंसऽ’, ‘चेशमामे भुड़ छै।’ इत्यादि तरहक बातसँ कछुआ बाबाकेँ पिनकाबैत रहैए आ माजा लुटैत रहैए। मजाकक पात्र बनि, कछुआ ेबाबा, अकट-बकट बाजैत रहै छथिन्ह। कछुआ बाबाक नअ बर्खक पोता, बिरखा सेहो वएह संग तक रिझल-खिझल शैतानक जरि रहिन, बाबाक फुलही लोटामे आगि भरिकेँ अंगनाक ओसािरपर बैस स्कूलक पोसाकमे आइरन करि रहल छल, ताहि समए कछुआ बाबाकेँ जोरसँ मैदान लागि गेल। कछुआ बाबाक ऑंख कमजोर रहिन, अपन झलफलाइत नजैरसँ लोटा तकैत दुआरिपर सँ ऑंगन एलनि, चारू दिशा नजरि घुमेलखिन मुदा कतौ लोटापर नजरि नै पड़ल। कछुआ बाबाक आदैत छेलनि अपन जरूरीक चीज-बीत अपने संग राखैक, मुदा बिरखाक शैतानीसँ अवगत छेलैन, हिनका बुझना गेल जे बिरखे हुनक चीत-बीतमे हाथ लगाबैत अछि। घुरि-फिरकेँ बाबाक नजरि बिरखापर अटकल, जे कछुआ बाबाक लोटामे आगि भरिकेँ कपराक आइरन करैत रहिन। बाबा चिकैरकेँ पुछलखिन- “के छी बिरखाऽऽ? एऽइह बाजे किए नै छै, छिनरीक सॉंए, मँुहक मालगुजारी लागै छौ?” बिरखा उचैककेँ बाजल- “की भेलऽ हौ? देखै नै छहक, काम करै छी? सदिखन बड़-बड़, चड़-चड़ करैत रहैत अछि।” कछुआ बाबा- “ऊँऽहँ! बोलीमे तेना एको रति लैशे नै अछि। पुछै छियौ हमर लोटा देखलीहीं केतौ?” बिरखा लोटा परसँ हाथ ढ़ील्ला करैत बाजल- “कोए तोहर लोटा खेने नै जाइ छऽ। रूकि जा कनी एकला भऽ गेलै।” खिसियाएल कछुआ बाबा छड़ी उपर तानि जोड़सँ बाजलखिन- “देखै छिही ठेंगा, ठॉंए सिन माथपर बजारि देबो? सब खेल-बेल तोहर बाहर करि देबो। हमरा पेखाना जोड़सँ लागल अछि आ तूँ मजाक करै छी?” बिरखाक पोसाकक आइरन पुरा नै भेल रहिन मुदा इहो बुझैत रहिन जे आब लोटा नै देब तँ मारि खाए परत। बिरखा अपन अंगाक आइरन केनाइ छाेरि, भरल लोटा आगि बाबाक हाथमे धराए देलक। “लाए, तोहर प्राण किए छुटल जाए छऽ?” एक दिश जेठक तपैत गर्मी, तैपरसँ आगिसँ भरल लोटा, बाबाक हाथमे परैते सटसीन बैस गेल। कछुआ बाबा जोरसँ हाथ झमारैत लोटा फेकलखिन, आ धुँसि सीन जमीनपर खसल, छरपटाए लागल। कछुआ बाबाक चेशमा हाइ पाबरक रहिन सेहो ऑंखिसँ फेका गेल आ दू टुकरी भऽ गेल। पाकल हाथक लहैर आ तमशएल मन, कछुआ बाबा छड़ी उठा दौरल बारैले, मुदा बिरखा माथपर पैर लेने नऽ दू एगारह भऽ गेल। कछुआ बाबा घोलाइत रहल। कनीए समेक पछाति बाबाक मन हलुक भेल, तब मैदान कैर एलनि, हाथ-मुँह धोए, दलानक नींचा दरबज्जापर छहारिमे बैसल रहिन। तखैने घुटरा, मनुआ आ मखना आएल आ कछुआ बाबाक मजाक उड़ाबे लागल... घुटरा- “चेश्मा कि भेलह बाबा हौ?” कछुआ बाबा- “चेश्माकेँ खेलकैहँ बिरखा, ई छौरा हमरा जिए नै देत! सभ पराणी मारैमे लागल अछि।” मनुआ- “बाबा, धोतीमे कि लागल छऽ हौ? खोखना बाजैत रहै, जे कछुआ बाबा कपड़े-बस्त्रमे पैखाना कऽ देलकै!” ई बात सुनैते मातैर कछुआ बाबा तमताए उठल आ माइए-बहिने उकटे लागल। इहो चारू गाोटे इएह चाहैत रहिन जे बुढबा गैर दिए आ सभ गोटे माजा लुटी। तखैने मखनाकेँ एकटा अटपटाएल बात फुराएल आ कछुआ बाबाक पछारि जाएकेँ जोड़सँ बाजल- “भागऽ बाबा भागऽ, पाछामे नेंगड़ा सड़हा आबि रहल छ!” घुटरा, मनुआ सेहो हँ मे हँ मिलाबैत बाइज उठल- “हँ हौ बाबा भागऽ, फैर हेऽ हुरर्रऽ हुरर्रऽ हे!” कछुआ बाबाकेँ बुझना गेल साइत ठीके सढहा आइब गेल, हाथमे लोटा उठेलक आ भॉंजे लागल। कछुआ बाबा- “तुहे सभ सढहाकेँ रेबाने एलँ कतौसँ। फैर हेऽ भागले किनै? हुल्लेऽ... हुल्लेऽ...” मखना कछुआ बाबाक पछा जाएकेँ जोड़सँ चिकैर बाजल- “बाबा तोरे पाछारिमे छऽ हौ! भागऽ नऽ!” कछुआ बाबा पछा उलटिकेँ फुलहीक लोटा जोड़सँ फेकलक... लोटा सिधा मखनाक मँुहपर जाए थप्प सिन लागल, धुस्सऽ सिन मखना जमीनपर खसल आ तिलमिलाए लागल। मखनाकेँ ऑंखिक आगु अन्हार भऽ गेल आ अधरातिक तारा देखाए लागल। गामक आरो किछु लोक सभ जमा भेल अा बाजे लागल- “नीके भेलौ तोरा सभक संग। जे किओ बुढ-पुरानसँ मसखड़ी करत तकरा मजाकमे एहने सुजाक हेबक चाही।” पद्य खण्ड जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गीत, कविता, दोहा, चतुष्पदी, गजल, आत्म-गीत आ किछु बाल कविता गीत 1.भरल सभामे भरल सभामे आबि जनकजी प्रण केने छथि भारी हे जे क्यो धनुश उठा कय तोरता तिनके देबनि कुमारी हे । रावण,वाणासुर-सन योद्धा षक्ति अपन अजमाय एला एक संग सय गोट फांर बान्हि क’ इष्ट सुमिरि कत बेर धेला किन्तु भेल नहि टस-सं-मस ओ भए गेल अजगुतभारी हे रंग सभाकेर उखडि गेल जनु रहती सिया कुमारी हे । भए अति खिन्न जनकजी बजला सबहक आइ गुमान ढहल हे राजागण जाउ घूरि घर कए प्रण छी पछताय रहल विधि विपरीत भेल कन्याकेर रहती इहो कुमारी हे वीर विहीना धरती भए गेल, भए गेल अजगुत भारी हे । वीर विहीना शब्द बेर-बेर रामानुज नहि सहि सकला चिचिया कए मंचहिसं कुदि कए भरल सभाके बीच एला बजला षत जोजन धरि फेकब तोडि धनुशकें गेंद जकां षब्द ‘अनिल’सं आयल जुडबए सभकें स्वाती बूंद जकां । 2 मैले कुरता मैल पैजामा मैले कुरता मैल पैजामा तैपर मैलका बंडी चढाक’ पैरमे एकटा टूटल चट्टी बनि गेल नेता दाढी बढाक’।.बौआ बनि गेल ....... चाहक कोनो दोकानपर बैसला भेटलनि कोनो मुल्ला पान कचरि सिगरेट धराक’ षुरू करौलनि हल्ला जोर-जोरसं नारा लगाबथि सीओ साहेबकें सुना-सुनाक’। बौआ बनि गेल... मौज उडौलनि एतबा दिन लए गांधीजीकेर नाम..... बेचि रहल छथि आइ बुझू जेपी बाबा केर नोम कथीले’ जेता घाम चुआबय कथीले’ खेता कमा-खटाक’। बौआ ....... लोक बेगरतामे अछि आन्हर भेटि जाइत छनि आसन कतहु ठाढ भए दैत रहै छथि उसिनल-उसिनल भाषण खाली हाथें लोक घुरैए माथ अपन सभ मुडा-मुडाक’। बौआ बनि गेल ........... 3. आब की हेतै जे भेलैक से भेलैक आब की हेतै अछि पुछैत चन्द्रमा आब की हेतै । छैक ई अभाग जे सोहाग चल गेलै मुदा कि अन्न-पानिसं सिनेह टुटि जेतै । मोनकें सम्हारि क’त’ राखि सकै छल देह कोन कोनमे नुकाक’ ध’ एतै । भरि गाम गहुमन सह-सह करैछ जानि ने कखन के कोनाक’ डसि लेतै । छै आंखिकेर आगां अन्हारे अन्हार एहि अन्हारमे आब संग के देतै । चन्द्रमा मंगैत अछि निसाफ स’भसं मूनि लेब आंखि से उचित त नै हेतै । 4. यार कहू की यार कहू की बियाह केने, हम सदिखन पछताय रहल छी हाय करू की माहुर खेने,कहुना जीवन बिताय रहल छी । आठ बजे धरि सुतल रहै छथि,वाइफ हमर बेहरावाली पिक्चर देखबा खातिर बन्हकी राखि लेलनि कानक बाली हाय करू की जारनि नेने,अपनहि आंच प जारि रहल छी । काल्हि कहलियनि झोल पडल अछि देखू त घरमे सगरो चट द’ ओ हमरा कहि देलनि, हम नै छी नोकर ककरो हाय करू की बाढनि नेने,अपनहि घ’र बहारि रहल छी । भानस नै करबाक दुआरे, दर्दक लाथें खाट धेलनि दूधले’ कानल चिल्हका तकरो,मारि पीटिक’ कात केलनि हाय करू की कोरा नेने,अपनहि दूध पिआय रहल छी । 5. चल हम बनि जाइ छी किसुन कन्हैया चल हम बनि जाइ छी किसुन-कन्हैया, तों बनि जो राधा आयल मस्त मास फागुनके, चल खेली ग’ फगुआ गे फगुआ । हम बनि जाइ छी ....... हम मानि लेब पोखरिक मोहार यमुना-तट थिक, यमुना-तट थिक हम मानि लेब आमक गाछी वृन्दावन छी, वृन्दावन छी हम तोरा संग रास रचायब, तों हमरा संग रचबिहें हम बसुरी तोरा सुनेबौ, तों हमरा नाच देखबिहें । चल हम बनि जाइ छी ....... गाए नहि अछि त की हेतै तों मोन छोट नै करिहें हम महिसे अपन चरायब तों बकरी अपन चरबिहें हम तोरा देखि हंसबौ, तों हमरा देखि हंसिहें हम पूआ तोरा खुएबौ, तों हमरा खीर खुअबिहें । चल हम बनि जाइ छी .. निहुरल आमक डारिमे रस्सी बान्हि बनायब हिरला ओइ हिरलापर तोरा बैसाक’ हम झुलाएब झूला हम तोरा आस लगेबौ, तों हमरा आस लगबिहें हम तोरा गीत सुनेबौ, तों हमरा गीत सुनबिहें । चल हम बनि जाइ छी .. ओहि रंगमे बोरब तोरा जे कहियो नै छूटय ओइ डोरीमे बान्हब तोरा जे कहियो नै टूटय हम तोरा अबीर लगेबौ, तों हमरा रंग लगबिहें हम तोरा पान खुएबौ, तों हमरा भांग पिअबिहें । चल हम बनि जाइ छी .. हम जिनगीकेर एक-एक पलकें पावनि जकां मनायब ने तोंही गाल फुलबिहें ने हमहीं गाल फुलायब हम तोहर बाट तकबौ, तों हम्मर बाट तकिहें हम तोहर मान रखबौ, तों हम्मर मान रखिहें । चल हम बनि जाइ छी 6.सीता जं जंगलेमे रहली सौंसे रामायण पढि गेलौं, लेकिन सभटा पढने की सीता जं जंगलेमे रहली , त हनुमानकें फनने की ? चानन, ठोप, पाग आ डोपटा,माला,जप-तप केने की माएक भाशा दबल रहल त चारि कोटिकें रहने की ? हे मैथिल ! सुनु हे मिथिलानी ! सभ संग मिलि चलै चलू फुसुर-फुसुर आ गुदुर-गुदुर किछु बात घूर तर दबने की ? माइक खातिर, माटिक खातिर प्राण जाय त गेने की हम त लंका-दहनक खातिर एसगर डेग उठौने छी 7. मन लगा रहल छी कल्पनाक गगनमे मधुवन सजा रहल छी दुनियामे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी । अछि आइ ने कोनो सपना अछि आइ ने कोनो धारा मोनो हृदयक प्रष्नक नहि दैत अछि उतारा उमडल जे बात मनमे, कहितो लजा रहल छी दुनियामे जीबाक अछि, तें मन लगा रहल छी । चोट अछि हृदयमे लागल नहि नोर टा बहैए मरियो क’हम जिबै छी हंसि ठोर टा कहैए रूसल जे भाव मनमे तकरे मना रहल छी दुनियामे जीबाक अछि तें मन लगा रहल छी । जिनगीसं सीख भेटल हंसिक’ समय बितायब सुखमे ने मुंह खसायब दर्दमे ने छटपटायब बाजल जे तार तनमे, तकरे बजा रहल छी दुनियांमे जीबाक अछि,तें मन लगा रहल छी । 8. विकास हो कि नै हो, परचार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । ओम्हर आर्यभट्ट आ एम्हर बैलगाडी भुखलोमे अहिना ढेकार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । एम्हर रौदी-दाही ओम्हर टेलीविजन नंगटोमे सोलहो श्रृंगार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । परजीवी लोककें चीन्हू आ पकडू सभकेर खुट्टाउपार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । सामंती कुचक्र आ समाजवादी ढोल एहेन व्यवस्थाकें नमस्कार होना चाही बाह रे बाह एहने सरकार होना चाही । 9. गौरी लीला विहारी तोहर भंगिया । देहोमे कनियों तेलो ने लेलक खाली रमौलक तोहर भंगिया । धोती आ कुरता पहिरबो ने केलक बघछाल लपटौलक तोहर भंगिया । फूलक माला पहिरबो ने केलक सर्पमाल लटकौलक तोहर भंगिया । सासु-ससुरकेर लाजो ने केलक नाचि डमरू बजौलक तोहर भंगिया । कहथि अनिल बड भाग इहो गौरी जे बनला दिगंबर तोहर रसिया । 10 चाह चाही आ पान चाही कलाकारकें कनी भांग चाही । घोरि नीक जकां चिन्नी मिलाक’ देखि लिय’ रसगुल्ला खुआक’ मोन पंछी बनय कतौ उडि-उडि चलय आसमान चाही आ चान चाही से देखैले’ मोन जुआन चाही । हे यौ हम,अहां सभ क्यो छी पाहुन जेना होइए लताम,आम,जामुन झडि जाएब एकदिन उडि जाएब एकदिन से ध्यान चाही आ ज्ञान चाही आ जिनगीक धनकेर गुमान चाही । 11.युगल-गीत ---ल’ग आउ ने हम नेहोरा करैछी ---दूर जाउ ने हम नेहोरा करैछी ---अहांक हृदयक छितिज पर उडलौं पकडि प्रेम केर डोरी ---हमरो होइए जे जीवन भरि संग अहांक ने छोडी ---खतम करु ई कथा-पिहानी,आउ हमर हे मोनक रानी एते लजाउ ने,हम नेहोरा करै छी । ----दूर जाउ ने, हम नेहोरा करै छी । ----कतेक दिनसं अहांके मनाबी किन्तु अहां नहि मानी ----अहां पुरुख छी,हमर हृदयकेर बात अहां नहि जानी ---ई त हमरे हृदय जनैए, कोना हमर दिन-राति बितैए एते सताउ ने, हम नेहोरा करै छी । ....दूर जाउ ने, हम नेहोरा करै छी । कविता खंड 1 सभ्यता आ संस्कृति हम कहलियनि हमरा नोकरी भेटि गेल बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि हम अपन विवाह सेहो ठीक क' लेलहुँ बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि विवाहमे दस लाख भेटत बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि रुपैया कनियाँक नाम पर बैकमे जमा रहत बाबूजी नाराज भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो नोकरी करैत छथि बाबूजी प्रसन्न भ' गेलाह हम कहलियनि कनियाँ सेहो संगे आबि गेल छथि बाबूजी सन्न रहि गेलाह ! 2 गाम आ दिल्ली एकेटा घर आ सत्रह टा लोक कहैत छलाह बुच्चुन भाइ गेल छलाह दिल्ली, सात-सात टा घर आ दुइए टा लोक कहैत छलाह एन झा गेल छलाह गाम | (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 3 हमर संसार बेड पर पडल छी अस्पताल अछि सुई अछि, सिरिंज अछि टेबलेट आ कैप्सूल अछि एंजाइम अछि, टॉनिक अछि कतेक असहाय छी हम कतेक दुखद अछि ई क्षण ! हमरा देखै ले’ आबि गेल अछि कतेक लोक बेटी-जमाय बेटा-पुतोहु नाति-नातिन पौत्र-पौत्री मित्र,पडोसी कतेक सामर्थ्यवान छी हम कतेक सुखद अछि ई क्षण ! (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 4 महाभारत आ हम भोरे जागि सभ दिन करैत छी संकल्प विदुर जकां जीबाक अपन जीवन आ दस बजैत-बजैत शुरू भ’ जाइत अछि महाभारत टूटी जाइत अछि हमर संकल्प बिसरि जाइत छी अपन कर्त्तव्य बन्न भ’ जाइत छी हम एकटा छहरदेबालीमे अपनहि कोनो पाखण्डक भ’ जाइत छी दास आ पांच बजैत-बजैत पबैत छी अपनाकें कुरुक्षेत्रक कातमे पडल शरशय्यापर बेचारा भीष्म पितामह सन | (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 5 डिबिया बंगला अछि गाडी अछि टी व्ही अछि फ्रिज अछि कूलर अछि फोन अछि लाकर अछि एफ़ ड़ी अछि कतेक धनीक छी हम सभ, मुदा जीबि नहि सकैत छी बिना घूसक क’ नहि सकैत छी बेटाक बियाह बिना दहेजक कतेक गरीब छी हम सभ ! (प्रकाशित : आरम्भ २४/ जून २०००) 6 जंगल (१) फूल दाइकें जखन-तखन मोन पड़ि अबैत छनि अपन संगी सुजाता परुकें त भेल छलै बियाह गनल गेल छलै दू लाख नोकरी करैत छलै बर बियाहक बाद करैत छलै हल्ला मंगेत छलै दहेजक बहुत रास चीज कलर टी व्ही, वाशिंग मशीन मोटर साइकिल आ फ्रीज, एक मास पहिने पढ़लनि अखवारमे सासुरमे एक राति मारल गेलि सुजाता | तें जखन-जखन घरमे होइत छैक बियाहक चर्च फूल दाइ भ’ जाइत छथि उदास फेर मोन पड़ि अबैत छनि अपन संगी सुजाता | जंगल (२) स्कूलक हातामे दस बजे दिनमे जुमि गेलै छौंडा सभ पीचि देलकै मोटरसं बेचारी प्रीतिकें ओतेक लोकक बीचमे, खबरि ई जहिया निकललै अखबारमे तहियेसं फूल दाइ रहैत छथि चिंतित तें जखन-जखन बिदा होइत छथि कॉलेज फूल दाइ भ’ जाइत छथि उदास मोन पड़ि अबैत छनि प्रीति श्रीवास्तव | ( प्रकाशित –आरम्भ २०/ जून १९९९ ) 7 लत्ती माए करैत छलीह शनि-रवि पावनि बन्हैत छलीह डोरा सुनैत छलीह सपता-विपताक कथा चौठचन्द्रकें उठबैत छलीह हाथ करैत छलीह जितियाक उपास कतेक नियम-निष्ठासं करैत छलीह छठि करैत छलीह कबुला लुरिगरि पुतोहुले’ बेटाक नोकरीले’ पोताले’ कोठाले’ बेटीक बियाहले’| माएक अभिलाषा जखनहि भेलनि पूर भ’ गेलनि अपन सृष्टि सोझाँसं दूर-बहुत दूर सबहक छै अपन-अपन संसार अपन-अपन सपना सपनामे नहि छैक कतहु गाम-घर खेत-पथार | एसगरि आंगनमे माए एखनहु करैत छथि व्रत पोसने छथि कतेक सपना मुदा, कथी ले’? ककरा ले’ ? 9 भोज भोज आंगनमे भोज टोलमे भोज गाममे भोज शहरमे भोज छठिहारक भोज जन्मदिनक भोज मूड़नक भोज उद्योग, मरबठट्ठी- कुमरमक आ उपनयनक भोज विवाह-चतुर्थी-मधुश्रावणी-कोजगरा आ द्विरागमनक भोज नोकरीक भोज प्रोमोशनक भोज रिटायरमेंटक भोज श्राद्धक भोज बरखीक भोज बोफोर्सक भोज चाराक भोज कॉमनवेल्थ गेम्सक भोज टू-जी स्पेक्ट्रमक भोज चूड़ा-दही-चीनीक भोज पूड़ी-जिलेबीक भोज रसगुल्ला-पनितोवाक भोज भात-दालि-तरकारीक भोज माछ-मांस-मदिराक भोज सदाचारक भोज आचार-विचार-शिष्टाचारक भोज मौज-मस्तीक भोज हंसी-ख़ुशीक भोज परंपराक निर्वाह ले’ भोज अपन-अपन देवी-देवताकें खुश करबा ले’ भोज खून-पसेनाक कमाइ पर भोज घूसखोरी आ चोरीक पाइ पर भोज भोजसं आदमीक घटि गेल ओज भोजसं आदमीक बढि गेल रोग भोज खा गेल बच्चाक वर्तमान आ भविष्य जवानक चिंतन आ विवेक बूढक सपना आ सन्देश भोज जे बनबैत अछि लोककें असहाय भोज जे बनबैत अछि लोककें बौक, बहीर आ आन्हर निर्लज्ज, निष्ठुर आ नपुंसक भोज जे करैत अछि लोकक शीलहरण आ चीरहरण, हम घोषणा करैत छी पाप थिक भोज खाएब पाप थिक भोज खुआएब एहि पापसं मुक्तिक विचार करक चाही आ भोजकें दूरेसं नमस्कार करक चाही | (प्रकाशित- ‘अंतिका’/अक्टूबर ११-मार्च २०१२ ) 10 नरक आब एहि घरमे नहि करैछ क्यो ककरोसं प्रेमसं गप सभ गरजैत अछि एक दोसरपर आक्रमण करैत अछि एक दोसरकें अपन शत्रु बुझैत अछि एक दोसरपर संदेह करैत अछि एक दोसरसं प्रश्न पुछैत अछि क्यो ककरो दुलार नहि करैत अछि | आब ई घर घर नहि रहल आब एतय मनुक्ख नहि रहैत अछि एतय रहैत अछि क्रोध,ईर्ष्या,घृणा,कपट आ निंदा आब एहि घरमे रहैत अछि कुकुर-बानर सांप- बिच्छू बाघ-चीता आब ई घर घर नहि रहल ई घर आब भ’ गेल अछि जंगल आ जंगल मात्र | 11 विवाह विवाह थिक बड़का यज्ञ यज्ञमे अबैत अछि राक्षस राक्षसक अछि अनेक नाम राक्षसक अछि अनेक रूप राक्षस अबैत अछि अनेक रस्तासं राक्षस करैत अछि उपद्रव राक्षस भरैत अछि लोकक मोनमे लोभ आ अहंकार करबैत अछि क्षुद्रताक प्रतिस्पर्धा ठाढ़ करबैत अछि अनेक देबाल बढबैत अछि लोकक बीचक दूरी अहाँ राक्षसक सामना नै करय चाहैत छी त अहाँकें विवाह नै करबाक चाही | अहाँ राक्षसक सामना क’सकैत छी अपन बुद्धिसं, विवेकसं त्यागसं, तपस्यासं ज्ञानसं, विज्ञानसं योगसं, धियानसं समर्पणसं, सम्मानसं हृदयमे प्रेम आ ठोरपर मुस्कानसं, अहाँ राक्षसक सामना कर’ चाहैत छी त अहाँ विवाह क’ सकैत छी | विवाह थिक उत्सव एकटा विशिष्ट आयोजन बड़प्पनक प्रतियोगितामे भाग लेबाक अवसर माटि-पानि, देश-कोसक प्रति व्यक्त करबाक लेल कृतज्ञता जीवनकें देबाक लेल प्रेमक सनेश दुनियाकें और सुंदर बनयबामे देबाक लेल अपन योगदान, अहाँ एहि उत्सवमे उपस्थित होम’ चाहैत छी त अहाँकें बधाई ! अहाँ विवाह अवश्य करू | 12 गजेन्द्रजी उपस्थित भेलाह एकटा नव मुदा विशाल लेखक-पाठकवर्ग नेने सह्श्त्रो रचना नेने अनेक विधाक अनेक पोथी नेने नव उर्जासं सराबोर गारि देलनि झंडा हं, मैथिलीक झंडा विश्व-पटलपर | आब कनाडामे बैसल अहांक पुत्र सेहो घरमे बैसल-बैसल ल’ सकैत छथि अपन माटि-पानि आ देश-कोसक सुगंध | भाइ, नहि छैक आसान बनब गजेन्द्र ठाकुर गजेन्द्र ठाकुरक अर्थ भेल एकटा अभियान एकटा संकल्प एकटा आश्वासन जे आब मैथिली नै मरतीह कहियो नै जाधरि रहता सूर्य जाधरि रहती ई पृथ्वी ताधरि रहती मैथिली | दोहा १ सभ क्यो दुनियामे अपन, कतहु कियो नहि आन इएह सोचि सदिखन करी, हम सबहक सम्मान | २ स्नेह-सुधा, शुभकामना, सम्मति सबहक लेब मोन, बचन आ कर्मसं, दुःख ककरो नहि देब | ३ सभटा अपनहि कर्म केर, सोझाँ अछि परिणाम स्वर्ग,नरक, परमातमा , सभटा अछि एहि ठाम | ४ प्राप्त करू पुरुषार्थसं अनुचित-उचितक ज्ञान लेखक अपना भाग्यकेर और कियो नहि आन | ५ स्वर्ण-मृगक पाछाँ अहाँ, नहि दौडू सदिकाल हरण करत सुख-शान्तिकेर दशकंधर तत्काल | ६ हम के छी से जानि ली, राखी सदिखन ध्यान परमानंदक रूपमे, आबि जेता भगवान | ७ नहि ओझा, नहि ज्योतिषी अथवा कोनो यंत्र मनकें आनंदित करय क्षमा थीक ओ मन्त्र | ८ सबहक दुखमे संग हो,राखय सबहक लाज सबहक हित-चिन्तन करय,तकरे नाम समाज | ९ जहिना सगरो विश्वकें ज्योति देथि आदित्य चिंतन सबहक हो जतय, सएह थीक साहित्य | १० जे नहि पोसथि मोनमे कखनहु तुच्छ विचार अनिल एहि संसारमे वएह थिका बुधियार | ११ दुःख नै लेब, देब नै ककरो,जे राखथि ई ध्यान अनिल एहि संसारमे, हुनकें कहब महान | १२ अहाँ आत्मा अविनाशी छी सुख आ शांतिक खान एतबे जानब ज्ञान थिक, नहि जानब अज्ञान | १३ भ’ जायत आसान ओ, करब जकर अभ्यास जीवनमे सुख-शान्तिले’ सदिखन करू प्रयास | १४ सुख-दुःख जीवनमे अबैत अछि,दिन आ राति समान ज्ञानी-जन एहि सत्यकें , राखथि सदिखन ध्यान | १५ थिक कविता केर लक्ष्य की, उल्लासक संसार सबहक जीवनमे बहय, आनंदक रसधार | १६ जीवनमे सुख-शान्ति ले’ सबहक रकटल प्राण गीत,गजल,कविता सुनू, हएत सभक कल्याण | १७ तन मन धन सभ स्वस्थ हो, कविता राखथि ध्यान कविता सूनब थीक करब, गंगामे असनान | १८ कविता त गंगा थिकी, सबहक हरथि कलेश कविक मोनमे बास करथि ब्रह्मा,विष्णु,महेश | १९ कवितामे सामर्थ्य अछि, करय मनक उपचार श्रोता केर मनमे करय, आनंदक संचार | २० भूमि,भवन,लाकर तथा अन्न,जलक भण्डार कविता छथि त ठीक सभ,नै त सभ बेकार | २१ मिथ्या शान-गुमानसं, करै जाउ परहेज कन्यादानक यज्ञमे, राक्षस थीक दहेज़ | २२ हो व्यभिचारक अंत आ सदाचारके जीत सभ मनमे उल्लास आ स’भ ठोर पर गीत | २३ दुखमे,सुखमे,हानि-लाभमे, सभमे एक समान कतहु कियो भेटथि बुझू, इएह थिका भगवान | 24 कहना क’ धन जमा करु, कीनू बंगला, कार भोज खाउ आ अहूँ खुअबियौ,इएह ठीक संसार ? २५ बूझब की थिक परंपरा, पूजा, जप, तप, पर्व ‘खट्टर कक्काक तरंग’ पढू,जिबितहि पहुँचब स्वर्ग | २६ की थिक रामायण आ गीता,की थिक वेड पुराण खट्टर कक्कासं सुनू, रावण कते महान | २७ मनमे हुअए तनाव वा तनमे रहय बोखार अहाँ रंगशाला पढू, होयत सभ दुःख पार | २८ उपन्यास,कविता,कथा,अनुपम पत्राचार जीवकान्तजी छोड़ि गेला,मनमोहक संसार | २९ ओ सुंदर सपना देखू,जे कहि गेला कलाम इएह हमर श्रद्धा-सुमन, ओहि सपूतक नाम | ३० रक्त-चापसँ पीड़ित छी त, मानू हम्मर बात गीत रवीन्द्रक सुनू अहाँ,किछु दिन साँझ-परात | ३१ क’ सकैत छी अहूँ अपन, नव संसारक सृष्टि अहाँ ‘अशोक’क कथा पढू, पायब नूतन दृष्टि | ३२ छली, बली, कामी, कुटिल, सज्जन आ डरपोक अनिल एहि संसारमे, रंग विरंगक लोक | ३३ ककरहुसँ तुलना करब, अनुचित थिक ई बात सबहक अप्पन साँझ छै, सबहक अप्पन प्रात | ३४ अपन दुखक जननी अहीं, नहि अनकर किछु दोख भोगू जे अछि सामने, करइत बस संतोख | ३५ मनकें आनंदित करय, दिअए शान्ति, विश्राम गीत, गजल, कविता, कथा हमर ई चारू धाम | चतुष्पदी १ अपनहि कर्मक सुफल मानि क’ जे आबय सभ दुःख सहि ली, मोन, वचनसं, अपन क्रियासं कखनहु ककरो दुःख नहि दी | २ आवश्यक की अछि की नहि अछि तैपर सतत विचार करू, आनंदित सदिखन रहबा ले’ अपनाकें तैयार करू | ३ जहिना घ’र बहारी सभ दिन तहिना मन निर्मल राखू, रहय प्रदूषण मुक्त चित्त ई से धियान पल-पल राखू | ४ अहाँ कहैछी दुनिया बदलय पहिने अपनाकें बदलू, भांग पीबि खत्त्तामे खसलौं खत्त्तासं बाहर निकलू | ५ माँ दुर्गे संहार केलनि महिषासुरकेर निरभयाक अपमान एखन धरि कमल कहाँ, धू-धू क’ जरि गेल रावण गांधी मैदानक हमरा मोनक रावण एखनो जरल कहाँ ? गजल खंड १ टूटल छी तँइ गजल कहै छी भूखल छी तँइ गजल कहै छी ऑफिस सबहक कथा कहू की लूटल छी तँइ गजल कहै छी घरमे बैसल मगन रही सभ गूगल छी तँइ गजल कहै छी खापड़ि लारनि कते कनौलक भूजल छी तँइ गजल कहै छी उक्खड़ि केलक मदति समाठक कूटल छी तँइ गजल कहै छी बाबूजीकें कहाँ बुझलियनि चूकल छी तँइ गजल कहै छी पुरबा पछबा कते जगौलक सूतल छी तँइ गजल कहै छी मात्रा क्रम 2222 +12 + 122 २ सभ जनकें मतिमान बुझै छी कण कणमे भगवान बुझै छी संकटमे ऐ ठाम पहुँचलह तोरे हम हनुमान बुझै छी छै जकरा सम्पत्ति विवेकक हम तकरे धनवान बुझै छी दोसरकें अपमान करबकें हम अपने अपमान बुझै छी देलक जे सुख शान्ति धरा पर हम तकरे गुणवान बुझै छी हमरा ले उपहार धरणि ई जीवनकें अभियान बुझै छी मात्रा क्रम 222 + 221 + 122 ३ हम नै ककरो बाट तकै छी हम सूतै ले खाट तकै छी बकरी संगे बाघ नहेतै ओ निरमल हम घाट तकै छी हमरा मॉलक बाट धरेलौं हम गामक ओ हाट तकै छी होटल नवका बिहुँसि रहल अछि हम ओ टूटल टाट तकै छी जे जीवनकें नीक बनेलक हम ओ सुन्दर चाट तकै छी मात्रा क्रम 2222+ 21 + 122 ४ खेल सभटा उसरि जाइए लोक सभटा बिसरि जाइए गाछ कहियो मजरि जाइए फेर कहियो झखड़ि जाइए पाइ राखू अहाँ बैंकमे पाइ हाथसँ ससरि जाइए थालमे नित चलय दौड़ि ओ माटिपर जे पिछड़ि जाइए बाट कतबो कतौ नीक हो बाट लोकक बिगड़ि जाइए मूनि राखब कथी कोनठाँ मूस सभटा कुतरि जाइए लोक कतबो हुए जोरगर अन्तमे सभ नचरि जाइए मात्रा क्रम 2122+ 12 +212 ५ दूभि और धान छी अहाँ पान आ मखान छी अहाँ दौड़ि दौड़ि थाकि गेल छी दूर आसमान छी अहाँ बेर बेर गाबि देखलौं वेद आ कुरान छी अहाँ काँट भरल छैक बाटपर फूलके समान छी अहाँ मोन केर प्रश्न अछि कते एकटा निदान छी अहाँ मात्रा क्रम 212121 + 212 ६ जीवनके आशा बदलल प्रेमक परिभाषा बदलल बदलल समदाउन सोहर अछि बारहमासा बदलल किछुए दिन दिल्ली रहलै छै आँखिक भाषा बदलल पैकेजे मूलो बूझू सबहक अभिलाषा बदलल अंकल अंटी भरि दुनिया मौसी आ मौसा बदलल अपनामे सोचै छी हम की बदलल की नै बदलल मात्रा क्रम 2222222 ७ कविता गीत गजल राखू सदिखन मोन विमल राखू चारू धाम रहत सटले सदिखन नयन सजल राखू शान्तिक धार बहय भीतर बाहर चहल पहल राखू आँखिक खेल बुझू सभटा कानो अपन कुशल राखू सत्यक लेल लड़ू सभदिन जीवन अपन सुफल राखू मात्रा क्रम 22 +2112 + 22 ८ रातिकें राति कहब जरूरी छै भोरकें भोर बनब जरूरी छै जीत की लेब अहाँ सुनामीमे मोनके संग लड़ब जरूरी छै माथपर बोझ किए अनेरे ई अपन बस ध्यान करब जरूरी छै छोड़ि कय गाम नगर घुमै छी हम गामके हाल बुझब जरूरी छै प्राणमे गीत रहय भरल सदिखन सत्यके संग चलब जरूरी छै मात्रा क्रम 212 + 2112 + 1222 ९ सदिखन शुभ चिन्तनमे छी हम प्रेमक बन्धनमे छी जीवन आ यौवनमे छी कण कणमे जन जनमे छी अमरितके खगता हमरा तें सागर मन्थनमे छी नै छी मन्दिर मसजिदमे अन्नाके अनशनमे छी छी चूड़ी आ कंगनमे पुरहरमे अरिपनमे छी मात्रा क्रम 2222222 १० नित्य उठै छी भोरे भोरे घूमि अबै छी भोरे भोरे नीक लगै छथि हरियर धरती देखि अबै छी भोरे भोरे आम लतामक गाछी देखी गीत सुनै छी भोरे भोरे पूज्य हमर छथि माँ आ बाबू चरण छुबै छी भोरे भोरे सभक खुशी ले तन मन जीवन मनन करै छी भोरे भोरे मात्रा क्रम 21 + 122 + 2222 ११ मात्रा क्रम : 2 2 2 2—1 2 ---122 किछु कहबाले’ गजल कहै छी किछु जनबाले’ गजल कहै छी अनको सूनब बहुत जरूरी चुप रहबाले’ गजल कहै छी पेटक पीड़ा कते कनाबय से बुझबाले’ गजल कहै छी किछु करबाले’ करू तपस्या तप करबाले’ गजल कहै छी सबहक नीचाँ बहुत-बहुत जन दुःख सहबाले’ गजल कहै छी पड़ले रहबै अहाँ कखन धरि हम चलबाले’ गजल कहै छी रोकत ककरो कियो कतौ नै तँइ बढबाले’ गजल कहै छी देशक बाहर रहब कते दिन घर घुरबाले’ गजल कहै छी १२ मात्रा क्रम :222-221-122 हम काव्यक रसपान करै छी गंगामे असनान करै छी कत्तहु नहि भगवान धरापर हमहूँ ई अनुमान करै छी जिनका बलपर धरणि ई हरियर हम हुनकर सम्मान करै छी जे हमरा बुधियार बुझै छथि हम हुनके गुणगान करै छी खेलौं हम गुटका कि सुपारी हम अपने अपमान करै छी अनकाले’ हम खाधि खुनै छी अपनाकें धनवान करै छी सुन्दर हो सभ लेल ई धरती नव-नव अनुसन्धान करै छी (तेसर आ सातम शेरमे पहिल पांतिमे एक-एक टा दीर्घकें लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि ) १३ मात्रा क्रम : २१---१२२२---२२२ काँट हटयबामे लागल छी बाट बनयबामे लागल छी आठ बजै छै सभ सूतल छै साफ़ करयबामे लागल छी काज कनी करियौ यौ बौआ ढोल बजयबामे लागल छी लोक लगा देने छै झगडा आगि मिझयबामे लागल छी भाइ कनी अनको दिस तकियौ पाइ कमयबामे लागल छी छाँह कमल जाइछ धरतीपर गाछ लगयबामे लागल छी पाप बहुत बढलै दुनियामे प्रेम बढयबामे लागल छी १४ मात्रा क्रम : 22222221 कौआकें कौआ कहि देल बूझू बड़का गलती भेल एके घरमे सबहक बास नै ककरो ककरोमे मेल मरला बहुतो जन महगीसँ आ हुनकर वेतन बढि गेल जुनि पूछू बौआ हमरासँ दालि कते दिन खेना भेल सोचै छी जीवन की थीक सीढी आ साँपक बस खेल धीया पूता बिनु ई महल हमराले’ बूझू अछि जेल (चारिम शेरक दोसर पाँतिमे दूटा लघुकें दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) १५ मात्रा क्रम : 21-12-222 नोर गरम पीबै छी भाग्य अपन लीखै छी टीक अपन नोचै छी माथ अपन पीटै छी सोर करू ककरा हम ठोर अपन सीबै छी गाछ बनत बड़का ई बीज ई जे छीटै छी जोर घटल जाइत अछि बाँस जकाँ लीबै छी बाउ अहाँ करबै की सभक पता टीपै छी गीत गजल सीखू ने गारि किए सीखै छी (चारिम शेरक दोसर पांतिमे एक टा दीर्घकें लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि ) १६ मात्रा क्रम : 2121-22-221 बात एक लागू सभ ठाम चोर और साधू सभ ठाम काज काल पाछू रहताह भोज बेर आगू सभ ठाम पाप थीक माँगब ककरोसँ से धियान राखू सभ ठाम बूढ-सूढ भूखल ने रहथि घूरि-फीरि ताकू सभ ठाम बात-बात पर जुनि तमसाउ मीठ-मीठ बाजू सभ ठाम प्रेम थीक बड़का उपहार बेर-बेर बाँटू सभ ठाम १७ मात्रा-क्रम : 22222222222 सोचै छी हम की की देखल जिनगीमे की की छूटल आ की भेटल जिनगीमे दशरथ कौशल्या आ माता कैकेयी सुख दुःख सभ वनबासक भोगल जिनगीमे अन्हड़ आयल बादरि आ बरखा-बुन्नी सभ छल अपने मांगल कीनल जिनगीमे इर्ष्या देखल निन्दा आ भय भावुकता मोने अछि की की सभ कूटल जिनगीमे कखनो नेहक फूलो हँसइत देखल अछि आ कखनो अपनो सभ रूसल जिनगीमे माइक ममता माटिक ममता छल संगे कखनो ओ डोरी नहि टूटल जिनगीमे १८ मात्रा- क्रम : 22222222 आँखिक भाषा पढ़लौं हम नै जूआ पाशा जनलौं हम नै आयल दुःख जिनगीमे कत्ते लेकिन कहियो कनलौं हम नै माला ककरो हम नै पहिरल माटिक मूरुत बनलौं हम नै देखा-देखी हू –ले –ले -ले पाछाँ-पाछाँ चललौं हम नै लाठी-भाला सन आखर किछु कखनो ककरो कहलौं हम नै तिल आ चाउर जे-जे देलक के बाजत जे बहलौं हम नै १९ मात्रा - क्रम : 2222222 बाहर ताकब कत्ते दिन गामसँ भागब कत्ते दिन न्यायक खातिर करियौ किछु खाली कानब कत्ते दिन अपनापर संयम राखू बहुकें मारब कत्ते दिन बदनामी होयत अपने करजा टारब कत्ते दिन पाछाँ तकने भेटत की बिरहा गायब कत्ते दिन अनको सूनब आवश्यक अपने तानब कत्ते दिन २० मात्रा-क्रम : 2221-12-22 चानन ठोप करी नै हम ककरो छोट कही नै हम जैठाँ लोकक आदर नै तैठाँ पैर धरी नै हम पापक भोग अहाँ भोगू रस्ता टेढ़ चली नै हम दिन विपरीत कते आबय जिबिते भाइ मरी नै हम मोनक बात कहू ककरा ककरो संग उडी नै हम मूँह्क गारि भने सहि ली आँखिक नोर सही नै हम २१ मात्रा-क्रम : 22222222-1212 सभ दिन ओ कूदथि आ फ़ाँनथि घडी-घडी आ तामसमे थर-थर काँपथि घडी-घडी सभ दिन घरमे सभकें राखथि कना-कना आ तहिना अपनो ओ कानथि घडी-घडी पठबनि बेटा मासे-मासे कमा-कमा तैयो सभठाँ दुखडा बाँचथि घडी-घडी बूढ़ी सभटा काजो करथिन कुहरि-कुहरि आ बुढ़ियेकें थापर मारथि घडी-घडी अपने सभदिन भागल रहला जहाँ–तहाँ आ अनका उपदेशो झाडथि घडी-घडी मौगीकें ओ रस्ता नरकक कहै छथिन आ सीता-चालीसा गाबथि घडी-घडी नाचै छी हम सभ दुनियामे ख़ुशी-ख़ुशी भगवानो जहिना जे चाहथि घडी-घडी २२ मात्रा-क्रम : 22222-221 कुदने आ फनने की हैत अपनामे लड़ने की हैत मुरखो अछि सेहो ठकि लेत लिखने आ पढने की हैत बेटो सभ मोजर नै देत ‘हम्मर छी’ जपने की हैत सोचू जे केलनि की राम दोहा सभ रटने की हैत घुरि-फिरि अपने काजो देत अनका लग कनने की हैत लीखल जे छै हेतै सैह टाका टा गनने की हैत यौ बौआ गामो दिस जाउ पटनेमे रहने की हैत २३ मात्रा-क्रम : 222221-122 हमरा मोनक मीत अहाँ छी हमरा ठोरक गीत अहाँ छी हमहीं गोकुलकेर दुलरुआ आ हम्मर नवनीत अहाँ छी धी बेटामे भेद करै छी मानू बालुक भीत अहाँ छी सौंसे दुनिया कोस करोडो बूझू एकहि बीत अहाँ छी दुसलौं हम्मर मूंह अहाँ जे लागल अक्कत तीत अहाँ छी जे छी से छी आब हमर छी खेला जीवन, जीत अहाँ छी २४ मात्रा-क्रम : 2222222 दुनियामे अप्पन क्यो नै दुनियामे दुश्मन क्यो नै धरतीपर अबिते-अबिते बनलै वीरप्पन क्यो नै भेला लाखो कवि जगमे लेकिन ओ बच्चन क्यो नै सभ क्यो छी संतति हुनके हरिजन आ ब्राह्मण क्यो नै सभकें चाही सभ सुविधा मानत अनुशासन क्यो नै संतोषक धन नै जकरा तकरा सन निरधन क्यो नै हम मानै छी जीवनमे साधू छथि सदिखन क्यो नै २५ मात्रा-क्रम : 22222222 सभ जन अछि लागल अपनामे हमराले’ नै क्यो दुनियामे जे सुनतै से थूके देतै गलती किछु नै छै कनियामे वर कनियाँ दिस नै देखलिऐ बाझल हम रहलौं गहनामे सभटा ठकि-ठकि लइए लेलनि देलनि जे किछु मुं हबजनामे दुनियामे किछुओ नै भेटल घुमइत हम रहलौं सपनामे देशक खातिर लड़बै मरबै कतबो झंझटिहो अपनामे २६ मात्रा-क्रम : 2221-222 एत्ते बात सुनतै के एत्ते तूर धुनतै के एत्ते पानि बहितै नै एत्ते खाधि खुनतै के ई रस्ता त सबहक छै एत्ते काँट चुनतै के एत्ते मूस के मारत एत्ते भूर मुनतै के एत्ते चोर के पकड़त एत्ते जाल बुनतै के २७ मात्रा-क्रम : 2222-21-122-222 मोनक बच्चा कानि रहल अछि की करियौ किछु केने नहि मानि रहल अछि की करियौ कखनो चाही चान तथा कखनो चानी मजबूरी नहि जानि रहल अछि की करियौ सदिखन हमरे संग रहै छल नेनामे से हमरे पर फानि रहल अछि की करियौ मोनो नै छै भेल रहै की ककरा ले’ अपने कीर्ति बखानि रहल अछि की करियौ के की ओकर बात करै छै से सूनत सदिखन झगडा ठानि रहल अछि की करियौ सभ जन पहुँचल राम-कथामे मंदिरपर आ ओ सीड़क तानि रहल अछि की करियौ फूटल थारी और अपन कपडा-लत्ता सभ हमरा लग आनि रहल अछि की करियौ ( चारिम शेरक दोसर पांतिमे दूटा अलग-अलग लघुकें दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि ) २८ मात्रा-क्रम : 2222222 सभकें किछु लाचारी छै सबहक दुःख बड भारी छै बाहर आदर अभिनन्दन भीतर मारा-मारी छै कोनोठाँ गोली-बारी आ कत्तहु तैयारी छै भोजक खातिर सभ गेलै बांचल बाड़ी-झाडी छै ककरो लोटा-थारी नै ककरो मोटर गाडी छै देखू अछि गाडी उनटल नीचाँ नर आ नारी छै छै आपसमे झगडा नै चोरोमे भैयारी छै २९ मात्रा-क्रम : 2222-21-12 अमरित वचनक दान करय सभ सबहक सम्मान करय हम नै कोनो काज करी सभ हम्मर भगवान करय छठि महरानी केर कृपा आ किछु चौठी-चान करय बम खसलै पेशावरमे छट-पट हम्मर जान करय अप्पन छल से भेल अलग सेवा-वारी आन करय किछु नै करता पंडितजी खेती आ खरिहान करय ३० मात्रा-क्रम : 2212-1222 कागज़ कलम धरौलनि ओ अपने कथा पढौलनि ओ सबहक घरे-घरे गेला प्रेमक दिया जरौलनि ओ खुरपी बनल कलम हुनकर गाछो कते लगौलनि ओ भूखल बहुत-बहुत रहला हड्डी अपन गलौलनि ओ मोजर कियो कहाँ देलनि उधबा कते उठौलनि ओ अपने जतय-जतय गेला सिक्का अपन चलौलनि ओ ३१ मात्रा-क्रम : 21-12-2222 सत्य-कथा बजतै क्यो नै दोख अपन कहतै क्यो नै यैह चलन छै दुनियामे दोसरले’ मरतै क्यो नै तानि चलै घोघो सदिखन लाज मुदा करतै क्यो नै जन्म-मरण जे नै जनलक कष्ट तकर हरतै क्यो नै साँझ पड़त आ सभ जायत देह वला रहतै क्यो नै नीक लगै सभकें सदिखन बात तखन कटतै क्यो नै ३२ मात्रा-क्रम : 2222222222 अपनामे तकलौं प्रिये हम तोरा सपनामे तकलौं प्रिये हम तोरा गाछीमे तकलौं पोखरिमे तकलौं अङनामे तकलौं प्रिये हम तोरा साडीमे तकलौं चूड़ीमे तकलौं गहनामे तकलौं प्रिये हम तोरा काशीमे तकलौं मथुरामे तकलौं सतनामे तकलौं प्रिये हम तोरा दिल्लीमे तकलौं मुंबइमे तकलौं पटनामे तकलौं प्रिये हम तोरा आखरमे तकलौं शब्दहुमे तकलौं रचनामे तकलौं प्रिये हम तोरा ३३ मात्रा-क्रम : 222-221-12 शिक्षाके सम्मान करू सभ झंझटि आसान करू भोजन वा जलपान करू अन्नक नै अपमान करू छागरके बलिदान किए पाखण्डक बलिदान करू सभकें चाही स्नेह-सुधा सभ जनले’निरमान करू सभ रस्ता हो स्वच्छ सदा नव-नव अनुसंधान करू भरि दुनियामे जाप चलय सुन्दर हिन्दुस्तान करू ३४ मात्रा-क्रम : 2222-21-12 पहिने एके काज करू सभकें बाँटू राज करू किछु-किछु अनको पूछि लियौ किछु अपनो अंदाज करू पचपनमे छी आब अहाँ किछुओ लोकक लाज करू जेले अछि सभ जाति-धरम अप्पन चिन्तन साफ़ करू ई जिनगी थिक गीत गजल पावन सभ सुर साज करू ३५ मात्रा-क्रम : 222-222-122 सुतलोमे खिखिआइत रहल ओ नै बाजल घिघिआइत रहल ओ नै गेलै कत्तौ नोकरीले’ गामेमे घुरिआइत रहल ओ नै सुनलक की कोना कहलिऐ हमरेपर खिसिआइत रहल ओ ककरो ओ जीमे ने लगेलक जिनगी भरि छिछिआइत रहल ओ नै रह्तै महगी आ गरीबी दुनियाले’ चिचिआइत रहल ओ ३६ मात्रा-क्रम : 222-221-221 जायब हम दोकान कोना क’ कीनब हम ओ चान कोना क’ हाबामे छै गंध माहुरक बाँचत सबहक जान कोना क’ जे माथोमे तेल ने लेथि से करता किछु दान कोना क’ किछु दिन भोगू क्लेश जीवनक चीन्हब अप्पन-आन कोना क’ दूना केलक लोभ आ मोह तकरा कहबै ज्ञान कोना क’ सुख सुविधा आनंद जीवनक सभले’ हो आसान कोना क’ ३७ किछु नरमे नारायण देखल बाँकीमे बस रावण देखल सभठाँ सभ घटनामे भैया शकुनी आ दुरयोधन देखल झगडा-झाँटी गामेमे छै बाहरमे अपनापन देखल सबहक अनुमोदन छल पहिने पाछाँ सय संशोधन देखल बड़का टा छल पेटो ओकर भोजन अति साधारण देखल लाठी भालाके बदलामे फूलक हम आयोजन देखल आत्म गीत 1. एक दिन बीतल कय दिन बीतल मासहु बीतल,सालहु बीतल एक युग बीतल,कय युग बीतल कयटा वसन्त भादो बनि क’ अछि समय-सिन्धुमे समा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 2. सपना पाहुन बनि क’ आयल तन्नुक-सन निन्नक आंगनमे ओ फूल जे माला बनि ने सकल छिडिआएल स्मृति केर काननमे से टीस हृदयमे अछि एखनहु किछु तप्पत-सन किछु सेरा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 3. जीवनकेर आंगनमे वसंत आयल कहियो हंसिते-हंसिते किछु कोंढी छल से फूल बनल झडि गेल मुदा छुबिते-छुबिते गुन-धुन करइत मोनक भमरा कांटेक दोगमे घेरा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ 4. बाबा छलाह खिस्सा कहइत सुनि-सुनि क’छल अजगुत लगइत इ झूठ छलै कि सत्ये छल रहि गेल मोन गुन-धुन करइत ओइ बाल-कन्हैया केर हाथें छल नाग कोनाक’ नथा गेल हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ 5. मोने अछि एखनहुं ओ बिहाडि मोने अछि ओ फूही-पाथर मोने अछि ओ रौदी-दाही मोने अछि एखनहुं भनसा-घर चुल्हा लग मायक चुप्पी पर कए बेर आंखि छल नोरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 6. अंगनामे पमरिया नचइत छल सभ कबुला-पाती करइत छल ओ भोज-भात आ भार-दौड पाहुन वरियाती चलइत छल मूडन- उपनयन- बियाहेमे छल सभक चेतना खिया गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 7. मोटका-मोटका पोथी पढलौं पोथी केर सभ पन्ना रटलौं छल प्रष्न कतेको सोझांमे नहि तकर निदान कतहु देखलौं हम पौलहुं एकदिन अपनाकें सय-सय बिर्रोमे घेरा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 8. हमरा सोझांमे छल पर्वत हमरा सोझांमे छल इनार हम कत’ जाउ हम कोम्हर जाउ चहुंदिस पसरल टा छल अन्हार छल अनचिन्हार रस्ता सभटा छल पएर आगि पर धरा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । ऽ 9. छल सुप्त हिमालय बरकि उठल अन्तरमे धधरा धधकि उठल सय-सय कोसी,सय-सय कमला कत घाव मोनमे टहकि उठल हम देखलहुं दूनू हाथ अपन मुट्ठी छल अपनहि कसा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 10 हम थाकि गेलहुं चलइत-चलइत हम कानि गेलहुं हंसइत-हंसइत अनवरत अभावक दुर्दिनसं हम हारि गेलहुं लडइत-लडइत नहि जानि कखन के सूतलमे कविता केर अमृत चटा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 11 च्लिते-चलिते भेटलाह रमण आ भेटि गेला श्री सोमदेव कोइलख विद्यापति पावनिमे भेटल आशीष मधुप,किरणक सस्वर दू रचना केर पाठ छल पीठ हमर थपथपा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 12 कविता अयली जहिया घरमे भ’ गेल पैघ परिवार हमर यात्री,हरिमोहन,जीवकान्त षेखर,रवीन्द्र,मणिपद्म,अमर बाबू,कक्का आ भैया-सन छल नाम कतेको जोडा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 13 कविता संग हम जीबय लगलहुं बूलय लगलहुं,झूलय लगलहुं जीवनकें उत्सव मानि सतत नाचय लगलहुं,झूमय लगलहुं कवितासं प्रेमक बात हमर छल गाम-गाम गनगना गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 14 ‘पारो’कें पढिक’ कना गेल ‘खट्टर कक्कासं हंसा गेल ‘बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम’ चिंतित मनकें गुदगुदा गेल ‘वस्तु’केर पिहानी‘नानी’ पढि नहि जानि कते की सोचा गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 15 लिखबा आ पढबा केर नषा सूनब आ सुनयबा केर नषा षब्दक सोना,हीरा,मोती देखब आ देखयबा केर नषा सदिखन आनन्दित रहबा ले’ जीवनक अर्थ छल बुझा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 16. ळम गाम-गाम घूमय लगलहुं सभठां सभ किछु देखय लगलहुं ‘नवतुरिया’कें ताकय लगलहुं ‘दुखमोचन’कें चीन्हय लगलहुं ‘मरनी’, ‘बिलटू’ केर देखि बगय छल अप्पन सभ दुख पडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 17. कवितामे देखलहुं हिमगिरिकें कवितामे देखलहुं गंगाकें कवितामे देखलहुं अपनहि-सन नहि जानि कते भिखमंगाकें छल नाम,मूल आ गोत्र सभक कवितामे सभटा बुझा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 18. हम आंखि खोलि चलइत रहलहुं घुमइत रहलहुं,देखइत रहलहुं पढइत रहलहुं,सुनइत रहलहुं गुनइत रहलहुं,धुनइत रहलहुं अहिनामे क्रमषः हमरहुसं ‘तोरा अंगनामे’ लिखा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 19. षषिकान्त-सुधाकान्तक जोडी हमरा षब्दहुकें पांखि देलनि उडि गेल षब्द सभ गाम-गाम पटना,दिल्ली आ कोलकाता गुरुजन,प्रियजनक प्रषंसासं छल हमर आतमा जुडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 20. सत नारायणक कथा सुनलहुं सपता-विपताक व्यथा सुनलहुं चैरचनमे खीर आ पूरी तं छठिमे ठकुआ-भुसबा खेलहुं दुर्गापूजामे बलिप्रदान छल प्रष्न मोनमे उठा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 21 चहुंदिस धधरा धधकैत छलै सभहक छाती धडकैत छलै सभ चिडै खेतमे छल कनइत सभहक खोंता उजडैत छलै भ’ जाउ तृप्त हे अग्निदेव कनितो-कनितो छल बजा गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 22. बच्चीकेर अएबासं पहिनहि जरि गेल घ’र जे फूसक छल छल हमर चाकरी केर चिन्ता तैपर कर्जा भरि टोलक छल परिवर्तन केर सुख छलनि बुझू भेटबासं पहिनहि छिना गेल हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 23. छल अति संघर्शक दिन घरमे ओ खटै छली, चुप रहै छली कहबा केर जे किछु रहै छलनि नोरेसं सभटा कहै छली खगताक बाढिमे छलनि अपन गहनो-गुडिया सभ दहा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 24. घूमि गाम-गाम आ शहर-शहर किछु मांगि-चांगि क’ जे अनलहुं फाटल अंगा, फाटल जेबी की कत’खसल से नहि बुझलहुं आगां तकलहुं, पाछां तकलहुं छल जांत पएरमे बन्हा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल 25. अपनहि हाथें हम पत्र लीखि अपनहिकें कयलहुं सम्बोधन अपनहि अर्जुन,अपनहि केषव अपनहि बनि गेलहुं दुर्योधन अपनहि अन्तरमे महाभारत अपनहि लोभें छल ठना गेल हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 26. संघर्श सत्य,थिक क्रान्ति सत्य सत्ये होइ छथि षिव आ सुन्दर जे भेटि गेल से अछि सुन्दर जे नहि भेटल से अति सुन्दर सुन्दरतम तं थिक ओ घृत जे अछि हवन-अग्निमे ढरा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 27. हमरहि खातिर उनहत्तरिमे छल बैंकक राष्ट्रियकरण भेल भेल तपस्या फलीभूत आ लागल जे नव जनम भेल सभ रातिक होइए भोर अपन अस्तित्व पाठ ई पढा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 28. एक दिस चाकरीक सुख-दुख छल दोसर दिस साहित्यक धारा तेसर दिस छूटल गाम-घर छल उडल-उडल मन बेचारा सपनामे छल हरियर धरती आ फूल कते नव फुला गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 29 ओ मूल गोत्र आ गाम हमर बाबाक धएल ओ नाम हमर ओइ माइक शीतल छाहरि केर आठो पल आठो याम हमर कर्तव्यक पावन धारामे क्रमशः सभ किछु छल बिला गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 30. पढलहुं बच्चन आ दिनकरकें नजरूल,विमल आ शंकरकें आशापूर्णा,तसलीमा आ गुरुदेव रवीन्द्रक आखरकें नागार्जुन आओर निराला केर खुट्टा छल मनमे गडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 31. मिथिलाकें देखल मिथिलामे देखल मिथिला सीवानोमे पावनि-तिहार आ भोज-भात भेटल समता परिधानोमे छल एतहु दषानन केर लंका रहिते-रहिते से बुझा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 32. हिमगिरि समान किछु पुरुश छला किछु भेटला गंगाजल समान दुविधामे जखन-जखन पडलहुं हुनकहि चरित्रकें कएल ध्यान हुनकहि सिनेह केर छाहरिमे मोनक सभ दुविधा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 33. आतंकक छाया छल पसरल चहुंदिस अन्हार टा छल लतरल उत्पात मचैने छल दानव पीडा केर पर्वत छल अकडल सरस्वती कुहरैत छली हाथक वीणा छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 34. अपहरण जतय उद्योग बनल चंदाक वसूली रोग बनल मारि-पीट, दंगा-फसाद छल लोकक खातिर भोग बनल छल जहां जत’ जे चिडै कतहु आकाष छोडि क’ पडा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 35. एक बिपटा, कते मदारी छल सबहक सभसं भैयारी छल गाडी छल उपरमे चितंग नीचां कुहरैत सबारी छल हम थहाथही देखइत रहलहुं छल कण्ठ कतेको मोका गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 36. हे मित्र ! बंधु ! परिवार हमर ! हे आंगन आ चिनुआर हमर जीबा केर,बजबा केर देखू क्यो छीनि लेलक अधिकार हमर सोझांमे माइक छाती पर पाथर छल क्यो खसा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 37. मा मिथिले क्षमा करू हमरा संकल्प अपन हम बिसरि गेलहुं हमरहु मुट्ठीमे छल अकाष नहि जानि कत’ हम पिछडि गेलहुं हमरहि चुप्पी केर कारण क्यो अछि आंखि अहांकें देखा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 38. की होयत ई जीवन ल’ क’ की होयत तन-मन-धन ल’ क’ की हएत जोगाक’ आंखि अपन आ की अरण्य-क्रन्दन क’क’ कहइत अछि हमरा पंचबटी मैथिलीक काया सुखा गेल, हम सोचि रहल छी,जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 39 बिजली कखनहु क’ अबै छली किछु हंसै छली,किछु कनै छली सभ बाट अहिल्या सन षापित नित बाट रामकेर तकै छली निषिचरक उपद्रवसं सभठां छल यज्ञस्थल सभ घिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 40 हम थहाथही करइत रहलहुं अन्हड-बिहाडि भोगइत रहलहुं कूकुर,हाथी आ गहुमनसं डरइत रहलहुं,भगइत रहलहुं बतहा हाथी केर तरबातर चुट्टी अनगिनती पिचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 41. हम देखलहुं सभहक सोझांमे बकरीमे खुट्टा बान्हल अछि सौंसे आकाषक बदलामे कागत एक टुकडी तानल अछि निर्वासित रहबाकेर दुख छल मैथिलीक भाग्यमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 42. देखलहुं हम नवगछुलीकें देखलहुं हम पुरना गाछीकें देखलहुं हम गाछक धोधरिकें देखलहुं हम गाछक बांझीकें छल हहरि गेल सभ गाछ,मुदा लत्ती-फत्ती सभ मोटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 43. मनकें जे आलोकित केलक से छल इजोत‘मिथिला मिहिर’क ‘मिथिला दर्षन’आ ‘माटि पानि’ ‘भारती’ आ विद्यापति पर्वक ‘जय जय भैरवि’ केर षंखनाद चेतना-भूमिमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 44. यात्री, हरिमोहन जगा गेला नित न’व पराती सुना गेला आंगन-आंगन आ घर-घरमे मैथिलीक पूजा सिखा गेला ‘जय मैथिली’ कहइत-कहइत छल आंखि हुनक डबडबा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 45 हम गाम,शहर घुमइत रहलहुं भारतक भूमि चुमइत रहलहुं सभ जलकें गंगाजल समान देखइत रहलहुं छुबइत रहलहुं छत्तीसगढक ओइ धरती पर मिथिलाकेर धूआ देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 46 बस नाव-नदी संयोग कहू पूर्वक किछु कर्मक भोग कहू पाप-पुण्यकेर योग कहू अथवा नुकाइले’ दोग कहू सतपुडाक ओ हरियर जंगल हमरहु अदिश्टमे लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 47 रामक वन-गमन जरूरी छल राजाकेर ओ मजबूरी छल सीताक हरणकेर पाछां तं रावणकेर दसटा मूडी छल केकइक माथ पर इ कलंक मन्थराक हाथें लिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 48. छल धोन्हि बहुत लागल ओत्तहु छल लोक बहुत बांटल ओत्तहु देखलहुं स’भठां जंगलमे छल लोक बहुत जागल ओत्तहु नवकलष बहुत देखलहुं लेकिन छल गाछ कतेको सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 49. माएसं भेटल जे षीतलता ओ निर्मलता आ भावुकता पाथेय बनल से हमराले’ ओ लोचकता आ व्यापकता कएटा पिच्छर छल बाट जतय खसबासं हमरा बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 50. संततिक बिछोहक दारूण दुख भरिसक जननी नहि सहि सकली चिंतासं जर्जर कायामे नहि सालो भरि ओ रहि सकली नहि जानि कोन नव दुनियामे प्राणक पंछी उडि पडा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 51 बाबूकें रहै छलनि हमरा बुधियार बनयबाकेर चिंता ओ देखथि लौकिक क्रिया-कर्म आ काज पडल सोझां सभटा पोथीसं हम्मर प्रेम देखि ओ छला बहुत किछु डेरा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 52 से पिता पुत्रसं हारि गेला आ जीत गेल पोथी-पतरा की गाम-घर, की क्रिया-कर्म ओ बिसरि गेला चिंता सभटा, की जन्मभूमि, की सर-कुटुंब सभ दुनियादारी बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 53 हमरहि सोझांमे एक राति बाबूजी अंतिम सांस लेलनि तजि जीर्ण-षीर्ण एहि कायाकें नव कायाले’ प्रस्थान केलनि चलितो-चलितो एहि दुनियासं ओ छला बहुत किछु सिखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 54 घुरलहुं कए मासक बाद गाम उजडल उपटल बिलटल देखलहुं जै घरकें बाबू बना गेला ओइ घरकें खसल-पडल देखलहुं सभटा लताम, सभटा नेबो सभटा गुलाब छल सुखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 55 छल पथरायल संबंध षेश किछु वैचारिक अनुबंध षेश मनकें आनन्दित करबाले’ एखनहुंधरि छल किछु गंध षेश माइक हाथक पारल कोठी माइक सभटा दुख सुना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 56 हम देखलहुं उल्कापात कते हम सहलहुं झंझाबात कते परिजन-प्रियजनसं बिछुडनकेर संताप कते, आघात कते सुख-दुख केर नष्वरताक पाठ अस्तित्व गुरू बनि पढा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 57 हमरहु जीवनकेर उत्सवमे छल श्रीरामक अवतरण भेल हमरहु अन्तरकेर सीताकेर जंगलमे छल अपहरण भेल आ हमरहु हाथें रावणकेर दसटा मूडी छल कटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 58 सोचै छी पिता, पितामह सब हमरा संग एखनहु छथि जिबइत हम देखि रहल छी अपनामे सभकें चलइत, हंसइत-गबइत आइ,काल्हि,परसू सभटा अपनहि अन्तरमे समा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 59 जीवनकें पढलहुं बेर-बेर जीवनकें गुनलहुं बेर-बेर जीवनकें देखलहुं बेर-बेर जीवनकें भोगलहुं बेर-बेर स्वर्ग,नर्क जिबितहिं सभटा अपनहि जीवनमे देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 60 नहि बूझी जीवनकेर मतलब ओहिना जीने चल जाइत छी नहि जानि पियास हटत कहिया ओहिना पीने चल जाइत छी सभ विश षिवषंकर के समान जे जखन जत’ अछि देखा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 61 हम जाहि सुखक कामना करी से दुखमे होइछ परिवर्तित मुष्किल अछि झंझाबातहुमे राखब अपनाकें आनन्दित अपनहि अन्तरमे बैसल क्यो गीताक पाठ अछि पढा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 62 अपनहि हाथें हम छी लिखइत सौभाग्य अपन,दुर्भाग्य अपन अपनहि हस्ताक्षर देखै छी पाछां तकइत छी जखन-जखन हं,किछु हस्ताक्षर एहनो अछि जे अछि लेभरल वा मेटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 63 जे सुख भेटल, जे षांति भेटल अघ्ययन,मनन आ चिन्तनमे दुख-सुखकेर परिभाशा जानल की सफल,सुफल की जीवनमे एक दृश्टि नव,एक सृश्टि नव अपनहु अन्तरमे समा गेल हम सोचि रहन छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 64 सपना छल जे छी देखि चुकल सपना अछि जे छी देखि रहल सपने संगी अछि बनल हमर सपनेसं हम छी सीखि रहल सपनेमे अहिना पडल-पडल हंसिते-हंसिते अछि कना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 65 जीवनक अर्थ तं हर्श भेल दोसर मतलब संघर्श भेल हम ताकि रहल छी अपनामे की बांचल आ की व्यर्थ गेल अछि वएह सुफल दुनियामे जे अपनाकें कहुना बचा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 66 हम के छी,कत’सं आयल छी अछि अएबाकेर प्रयोजन की सुख-दुखक चक्रमे घूमि रहल अनवरत हमर ई जीवन की हमरा अन्तरमे बैसल क्यो अछि प्रष्न कैकटा उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 67 ई देह अतिथि, ई प्राण अतिथि सम्मान अतिथि,अपमान अतिथि अछि लोभ,मोह आ मायाकेर अज्ञान अतिथि, विज्ञान अतिथि हम अहिना रहब स्थिर तहियो जहिया देखब सब बिला गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 68 ई हाथ हमर, ई पएर हमर ई आंखि हमर,ई कान हमर ई देह हमर, ई मोन हमर ई प्राण हमर, ई ध्यान हमर हम छी स्वामी एहि कायाकेर अछि ई रहस्य क्यो बुझा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 69 झंकार उठल, टंकार उठल ओंकार उठल, जयकार उठल जनकक आंगनसं दिल्ली धरि ‘जै मैथिली’ हुंकार उठल प्राप्त कएल अधिकार अपन जे मंगनीमे छल छिना गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 70 नहि द्रोण थिका आदर्ष हमर नहि ष्लोक रटल हम गीताकेर हमरा अन्तस्थलमे एखनहुं अछि नाम एकटा सीताकेर जे स्वयं समाक’ धरतीमे दुनियाभरिकें छथि जगा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 71 जतबाधरि जीवनमे षुभ अछि से अछि प्रसाद सतसंगतिकेर आहार-विहारक नियमितता षुभ चिन्तनकेर आ सदमतिकेर गुरूजन आ प्रियजन आशीषक अनमोल रत्न छथि लुटा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 72 नहि दौडी हम काषी-प्रयाग नहि केलहुं हम कबुला-पाती कयलनि जीवनभरि व्रत-उपव्रत दादी आ माए सबहक साती हुनकहि आशीषक गंगामे भरि पोख मोन अछि नहा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 73 क्षमा करू हे पिता हमर बरखी ओहिना नहि करब ह’म नहि केष कटायब बेर-बेर नहि भोज-भातमे पडब ह’म हम मानब ओकरहि क्रिया-कर्म जे दिनचर्यामे समा गेल, हम सोचि रहल छी, जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । 74 क्षमा करू हे मित्र हमर ! नहि आंखि मूनिक’चलब ह’म जे सहज,सरल आ सुन्दर हो ओही रस्तापर बढब ह’म अपनहि इतिहासक पन्ना किछु आंगुर हमरा पर उठा गेल, हम सोचि रहल छी जीवनमे की भेटल आ की हेरा गेल । किछु बाल कविता १ हमरहि खातिर सुरुज उगइ छथि हमरहि खातिर चान हमरहि खातिर कोटि तरेगन हमरहि ले आसमान। हमरहि खातिर साँझ पड़इए राति सँ होइए प्रात हमरहि खातिर रौद अबैए हमरहि लेल बसात हमरहि खातिर गाछ फड़इए जामुन, आम, लताम। पानि तपैए, भाफ बनैए भाफ उड़इए, मेघ बनैए सेहो हमरे ले ऊपरसँ धरती पर रिमझिम बरसैए हमरहि खातिर धरती मैया देथि गहूम आ धान। हमरहि खातिर फूल फुलाइछ उज्जर- पीयर- लाल कतहु असीमित सागर अछि तँ पर्वत कतहु विशाल सभटा हमरहि लेल बनाकऽ नुका गेला भगवान। २ बुच्ची बढ़ती, लिखती-पढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। तिलक-दहेजक दानव केर उत्पात मचल अछि मिथिलामे, तै लए बुच्ची खडग उठौती हमरा चिन्ता कथी के। ज्ञान आर विज्ञानक संपति अर्जित करती जीवनमे, नव सुरुज आ चान बनौती हमरा चिन्ता कथी के। लोकक मोल बुझै छै एखनहुँ लोक बहुत छै दुनियामे, संगी अप्पन अपनहि चुनती हमरा चिन्ता कथी के। अपनहि श्रम सँ बाट बनौती एहि बबूर केर जंगलमे, दुख सँ लड़ती आगाँ बढ़ती हमरा चिन्ता कथी के। ३ मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर, तोँ तँ हमरा पढ़ा-लिखा दे कर नहि कनियोँ कथूक डर। तिलक-दहेजक बल पर किन्नहु हम कतहु नहि करब बियाह, अज्ञानी, ढोंगी, पाखंडीक संग नहि जीवन करब तबाह अपन पएर पर ठाढ़ होएब हम होएब अपनहि पर निर्भर, मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर। संपति अर्जित करब सतत हम ज्ञान आर विज्ञान केर नाम बढ़ाएब हम दुनियामे सगरो हिन्दुस्तान केर हमर स्वप्नमे ‘किरण’, ‘कल्पना’ सतत कानमे हुनकहि स्वर, मम्मी, ताँे चिंता जुनि कर। हम्मर गहना होएत मम्मी हमर आत्म-विश्वास टा विजय अंध-विश्वासक ऊपर सत्यक दिव्य प्रकाश टा जीयब स्वामिभमान केर संगहि एतबहि अछि अभिलाष हमर, मम्मी, तोँ चिंता जुनि कर । जगदानंद झा मनु गजल रूप मारूक तोहर देखते कनियाँ ख़ून देहक सगर भेलै हमर पनियाँ नै कतौ केर विश्वामित्र छी हमहूँ प्राण लेलक हइर ई तोर चौवनियाँ जरि क' तोहर पजारल आगिमे दुनियाँ माय बापक नजरिमे बनल छै बनियाँ नीक बहुते गजल कहने छलहुँ हमहूँ आइ सभ किछु बिसरि बेचैत छी धनियाँ झाँपि राखू अपन रूपक महलकेँ 'मनु' भेल पागल कतेको देखि यौवनियाँ (बहरे मुशाकिल, मात्रा क्रम; 2122-1222-1222) दिलीप कुमार साह, गाम : इटहरी वार्ड न. १० , पोस्ट : बेलही ,भाया : निर्मली , जिला : सुपौल ,पीन न. ८४७४५२ ,योग्यता : नन मैट्रिक , जीविकोपार्जन : खेती-गृहस्ती, ड्राइविंग अहाँ हमर... अहाँ हमर जीवनक जीवनी बनू पेज उनटा-उनटा पाठ हम पढ़ैत रहब अहाँ हमर कलमक सियाही बनू जिनगीक कागजपर लिखैत रहब। अहाँ हमर...। सौंसे मिथिला जनकपुर घुमलौं महज अहाँ जकाँ कियो मिलल कहाँ गेंदा ने कमल आ गुलाबो कोनो अहाँ जकाँ केतौ खिलल कहाँ अहाँ हमर दीआक एगो वाती बनू प्रेमक घीमे सभ दिन जरबैत रहब। अहाँ हमर...। बाबा सिंहेश्वरकेँ तेसरेँ कबुलने छेलौं ओही मंसाक नीमन परसाद छी अहाँ गेसू गाल मुखराक कैदी छी हम अहाँक अँचरासँ कखनो अजाद छी कहाँ अहाँहमर मनबाक मीत बनू हृदय करेजासँ हम मानैत रहब। अहाँ हमर...। दिलक जागिर किए ई मोहब्बत भेलइ आँखिक मोती गिरइ छै कानैतकाल सभसँ पहिने, हमरासँ नियम बिआहकरू उलैट जाए चाहै ई कलजुग भला अहाँ हमर ऑंगनक डारि बनू पात बनि कऽ हम फड़ैत रहब अहाँ हमर जीवनक जीवनी बनू पेज उनटा-उनटा पाठ हम पढ़ैत रहब। अहाँ हमर...। मिथिला हमर... मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत कहबै छी गमकैत-गमकैत अपने-आपमे देशोक ऑंचर गमकबै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। मिथिलाचलक वादी, रचैताक नक्काशी जे कियो जनमैत, गोट-गोट अभिलाषी संत, अधिकारी, कुशल नेता, कविसँ ऐ नगरक मुकुट सजबै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। मिथिलामे मधुर-मधुर तीन अक्षरक मेल रचैत घड़ी विधाता खेललैन कोनो खेल सौराठक मेला आ सुगना पद्चिन्ह हस्त–शिल्पसँ मान बढ़बै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। गमकैत-गमकैत अपने-आपमे देशोक अँचरा गमकबै छी फल हम अद्भुत कहबै छी मिथिला हमर फुलवारी जेकाँ फूल हम अद्भुत...। क्षण भरि... अहाँ छी बाबू अखन छोट सन्यासी उमेर भरि पहिने एतए टिक लिअ नइ मचाउ शोर अहाँ ‘कहाँ-कहाँ’ नशवर दुनियाँमे अमर दूध पीब लिअ जँए लक्ष्यक खातिर एलौं भुवनमे ठामे-ठाम ओइ बाटकेँ परेख लिअ दौड़ए पड़त खून-पसेना बहा कऽ ओंगरी पकैड़ पहिने चलनाइ सीख लिअ बौआसँ आब बुढ़-बुढ़ानुस भेलिऐ हारल झुटका आबो तँ जीत लिअ रंग-बिरंगक झूठ-साँचक मेलासँ हम तँ कहब चीज कोना नीक लिअ कर्मे गुणे फल भेटै छै यौ बाबा बिछौनापर ओंघरनियाँ, पट चाहे चीत लिअ ताधैर धरि एतुक्का धन जाधैर तन लऽ जइले चारियोटा पुण्य बीछ लिअ अहाँ छी बाबा अखन वृद्ध सन्यासी क्षण भरि और एतए टिक लिअ छोट मुहसँ हम केते फकरब जाइत-जाइत फकरा लिख लिअ क्षण भरि और एतए टिक लिअ। हमरा याद अबैए... बचपन गेलै एलै जुआनी याद पड़ल बिसरल बात गाए चरेलिऐ, बकरी चरेलिऐ कटल केना नदानी, हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। भोरे सुति कऽ उठै जब छेलौं माए कहै छल जो स्कूल चौकपर देखते बानरबला समए खतम खेला देख-देख तीन-तीन दाइल फोड़ै छल बाँसक छौंकीसँ बाबू हमरा देहमे फाटल-फाटल अखनो अछि निशानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। पानि पीबै छेलौं पड़ोसिया कलक कहियो लोटा-कहियो डेकची फेकि दइ छेलए अदहनबला पानिमे आँइठ दऽ दइ छेलए अँइठहा पानिकेँ गंगा समैझ-समैझ पीब-पीब बितेलिऐ जिनगानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। कोयला बीछि-बीछि जरना बीछि-बीछि माए पोसलखिन हमरा मोटियाक काज करि-करि कऽ बाबू पढ़ेलखिन हमरा तीन-तीन साँझ भूखलो छेलौं अन्नक रस्ता देख-देख हम काटलक पेट परेसानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। काँचे नदानीमे हम उपारजन लेल परदेशक मुँह देखलौं गामक गमक शहरमे नइ भेटल उल्टे पएर आबि गेलौं माइक आशिष लऽ कऽ मनसँ स्टेजपर हम चढ़ि गेलौं अपन मिथिलाकेँ मिथिलामे घूमि-घूमि हम गबै छी अपन जिनगानी यौ हमरा याद अबैए...। हमरा याद अबैए...। मुन्ना जी गजल अजीबो गरीबी कहानी क' गेलै बच्चा जे छलै तें नदानी क' गेलै पहिने पता केलकै बाट ओतै छलै बिसरल जे जबानी क' गेलै पछाड़ैत कोना रहितै नढ़िया चढ़ि माथ देहो कटानी क' गेलै कहिया धरि रैहतै आस मे ओ रहि शेख काजो पठानी क' गेलै मंदिरोक शानो छलै जे तहिया ध्वजा के बचेबा अजानी क' गेलै पहिने छलै जे कतिया क' ठाढ़ो भगेबाक काजो मशानी क' गेलै बहर- ए- मुतकारिब. मात्रा क्रम-१२२ १२२ १२२ १२२ कविता ऐब की बेरिया ऐबकी बेरिया आब' ने दियौ, जाइ के बेर हमहू जड़े लागि जेबै. की बुझै छै अपना के ओ ! ओत' एकसरे रहि करैत हेतै रंग- रभस आ हम......, गाम मे एकसरे रहि करू जीवन गार्त. ईह ...! ओ पुरूष भेल त' बड़ चलाक. अय बेर किन्नहु नै छोड़बनि..! जँ जाइ काल मुँह फेरलनि त' धरबनि गट्टा आ की क' लेब फेर सँ गेँठजोड़बा. सुनै छीयै- कहाँ दन ओत' राति दिन एके जकाँ हेइ छै मरदवा आ मौगी मिलि दुनू दिन राति खटै छै. ओइ ठामक खएन पीयन सब दीवगर. ओढ़ना -पहिरना आ लोक, मलूक ! जए दियौ स'ख जाइ चुल्हिमे विआह सँ पहिने लोक रहैए दोसरा परिवारक अंश विआहक पछाति छओंड़ी की छओंड़ा होइए अपन पैलवार वला सत्ते तहने त' होइ छै अपन परिवार . परिवारक संपुर्णता लेल चाही- चिलका मुदा ई मनसा त' हमरा देखिते छिड़ियाइ छै. कहीं मनसा ना मनसा त' नै छै. कहू- आव कोना जएत हमर जीवन, कोना बढ़त.....वंश ! नै ओकर खाँहिस नै....! आव त' हमरा अपने बुत्ते बचा क' राख' पड़त ओकर आ ओकर पुरखाक नाम मुदा ओकर संग नै , कोनो मनसाक दुरखा लागि. अहिवात आ वंशमानिक लेल. नाम बरू ओकरे चलतै. चलू ताकि लेबै नव बाट...! भविष्यक इजोतक लेल मौगिये वलें त' बाँचल रहै छै पुरूषक पुरषा आ वंश मनसा त' दंभ मे रहै छै हेरएल मोछ पर ताव दैत- पुरखैतीक. रमेश ताजीवन हमर नहि कुमारिमे व्यभिचारी समाजक नजरि, कहै छल- ई हमर थिक! सारि बनलौं तऽ बहिनोइया नजरि, बाजल- ई हमर थिक! विवाह भेल तं वर कहलनि- ई सभदिना हमरे टा थिक! सरहोजि बनलौं तऽ ननदोसिया-नजरि बाजल- ई हमर थिक! जनमिते अपन बच्चा कहलक- ई हम्मल छी! मुदा जहियासं डाक्टरनी, कहलनि-’स्तन कैंसर!’ तहियासं हमर अपनेटा भऽ कऽ रहि गेल! तहिये टा सं, ’हम्मर अप्पन’ भऽ सकल! नन्द विलास राय नैतिकता आ इमान खेत बेच देब खलिहान बेच देब तइसँ काज नै चलत तँ कमान बेच देब। जमीन बेच देब आसमान बेच देब अपन आ परिवारक समुच्चा अरमान बेच देब। मान बेच देब सम्मान बेच देब मानवताक रक्षा खातिर कीमती समान बेच देब। आन बेच देब शान बेच देब वतनक लेल हम अपन पराण बेच देब। वचनक तेल अर्जित पहचान बेच देब हरिश्चन्द्र जकाँ अपना संगे पत्नी आओर सन्तान बेच देब। मरियो जाएब या मिटियो जाएब केतबो बच्चा नोर बहाएत वा पत्नी रूसि कऽ नैहर जाएत मुदा ढौआ खातिर की अपन नैतिकता आ इमान बेच देब? नेताजी नेताजी चुनाव जीत गेला पौने पाँच बरख धरि चैनक नीन लेला। अगिला चुनावमे फेरो ठाढ़ भेला जनताक बीच गेला। जनता पुछलकैन- “अहाँपर केना करी बिसवास कहाँ भेल क्षेत्रमे कोनो विकास?” नेताजी कहलखिन- विकासे विकास अछि पहिने हमरा घरमे जरै छल डिबिया आब बिजलीक प्रकाश अछि बुझू एकदम झकास अछि। हमर बेटा जेकर नाओं विकास छी ओ पढ़ैत छल गमैया स्कूलमे आब पढ़ैत अछि देहरादूनक कन्वेन्टमे हम लागल छी ओकर हर तरहेँ इम्प्रूभमेन्टमे ओ पानिकेँ कहैत अछि वाटर आ खेनाइकेँ लंच हमरा बुझना जाइत अछि ओकर अंग्रेजी भऽ गेल अछि बड्ड टंच। फुसि नै बजैत छी करू हमरापर बिसवास हमरा विकास बेटाक भेल खूब विकास। और सुनू, मुदा नेता हमरे चुनू। पहिने हमरा रहैक-ले बकरियो घर ने छल पीबैले नै छल एकटा चप्पोकल अहाँ सबहक कृपासँ आब अछि तीन-तीनठाम आलीशन मकान फ्रिजक मिनरल जल पीबै छी मुदा अपनाकेँ बुझै छी आन चढ़ैले नै छल एकटा कटही साइकिलो आब अछि भी.आइ.पी, ए-सी बला मोटर गाड़ी गाड़ीमे चलै छी तँ लोक हमरो बुझैत अछि नेता बड़का भारी। पहिने अठन्नियो, चौअन्नियो नै रहैत छल जेबीमे आब हजरिया, पचसैयाक रहैत अछि गड्डी दस-टकहिया, पँच-टकहियाकेँ तँ बुझैत छी आब हम, कागज रद्दी पहिने मुरही-कचरीक संग कखनो-काल पीबै छेलौं ताड़ी आब रोज पीबै छी भूजलाहा काजूक संग इंग्लिश वाइन जइसँ रहैत अछि हमर मूड एकदम फाइन। पहिने बसैले नै छल घराड़ी खाइ छेलौं,बेसाह-उधारी आब अछि फर्म हाउस आलीशान खाइत छी सभ दिन नव-नव पकवान यौ, हमरा क्षेत्रक जनता महान अहासँ सभ छी हमरा-ले अखन, साक्षात भगवान करू अपन अमूल्य वोटक हमरे दान जइसँ हमर हएत भाग्यक निर्माण जँ जीत गेलौं हम एमकी तँ बनाएब हम अपन खास पहचान। पटना, दिल्ली, कलकतामे तँ घर भाइये गेल अछि मुम्बइ, चेन्नइमे कीन लेब आलीशान मकान आब होइ छी विदा किएक तँ जेबाक अछि हमरा केतेको गाम अहाँ सभकेँ बहुत-बहुत प्रणाम।” हमर सपनाक बिहार दैहिक, दैविक, भौतिक ताप सपनाक बिहारमे कहियो ने व्याप्त। राष्ट्रपति होइथ वा होइथ भंगीक सन्तान सभकेँ शिक्षा भेटए एक समान। उन्नत खेती हुअए हुअए खुशहाल किसान शहरसँ सुन्नर हुअए गाम। सभसँ नीक हुअए खेती बेटासँ बढ़ि कऽ हुअए बेटी। सभकेँ भेटए रोटी कपड़ा और मकान हर खेतकेँ पानि भेटए आ हर हाथकेँ काम। केतौ केकरोपर ने हुअए अत्याचार कोनो स्तरपर ने हुअए भष्टाचार। निष्ठापूर्वक सभ करैथ कर्म मानव जातिआ मानव धर्म। आतंकवाद केर नै सुनी नाम। सभ करैथ इमानदारी पूर्वक काम। दुनियाँमे बढ़ए बिहारक मान आर भेटए बिहारीकेँ सम्मान। कामिनी कामायनी अंकोरवट मंदिर कत्तेक विशाल / उन्नत प्रकोष्ठ / भीम काय /तना स/ गृह /आवृत । आब छाँह द रहल /वृक्ष /अतेक/ छी खंडहर /कतबो पुरान । दैदीप्यमान /खंडित /तइयो असेवित अछि /मूर्ति /तइयो ई ऊंच ऊंच प्रासाद वृंद / शेर , पद्म अछि भिंदिपाल / नयनाभिराम ओ अप्सरा नृत्य / ओ शांत ताल मे सुतल काल / आह क्षितिज स झांकि कनैत अछि चारु चन्द्र के रश्मि पुंज देखू जन नायक के प्रताप / की मौन /निर्लिप्त /बस सहैत ताप नीचा वसुधा /ऊपर आकाश / अखनों गुंजित अछि ओ स्वर महान / ओ महा यान /ओ महा प्राण / भींजैत पाषाण/कजरी बेहाल / बाचि रहल अछि स्वगत ठाढ़/ दिव्य कतेक ई अंकोरवट । कण कण में इतिहास भरल कतेक शासक के राज छुपल/ गौरव ,गरिमा स ओत प्रोत / घड़ीघण्ट, शंख ,नित दिन बाजल कत्तेक वैष्णव गान भेल / कखनों शंकर आराध्य भेला तांडव रूप अपन धयला । कत्तो विष्णुप्रिया मुस्की मारैत। शिव जटा उमहर फहराय रहल / बड़का विशाल शिवलिंग कहलैथ/ छल हमरो कहियो राज एतय / अहि आनन /कानन मे कहिओ / डमरू के गुंजित गान छल मुदा काल के भय स महाकाल / गेला ओतयस नहिं,कत्तो पड़ाय/ ओ हेरै छथी मानव नियति । अहि यशोधरा पुर के बासी/ ओहि सेयाम रेप के घर आँगनि / ई कथा सुना बैत छै सून में / कि कलाकृत्य /कि चित्र विचित्र कारीगर हेता कत्तेक सज्ञान । अमर अजर ओ राति बनल / देला इन्द्र आदेश जेकर / ओ महाशून्य में ठाढ़ एखन / जोहैत अछि जानै बाट केकर । किशन कारीगर इस्कूल जाइत छी हम झोड़ा में कॉपी किताब नेने स्कूल बैग में टिफिन रखने कूदैत फंगैत हँसैत गबैत स्कूल जाइत छी हम. टेम टेम पर पढ़ब-लिखब अ आ आई हम सीखब पैरे पैरे, स्कूल गाड़ी मे बैसि हमहूँ आई स्कूल जाएब. अपने मने कहियो भिंसरे उठब सभ सं पहिने मुहँ हाथ धोअब भूख लागत ता जलखै करब फेर कनि कल पढ़ै लेल बैसब. इस्कूल के घंटी हमरा शोर पारै मास्टरजी कतेक नीक खिस्सा सुनाबैथ नहा सोना के छी हम तैयार मम्मी डैडी हमरा स्कूल द आबै. किताब मे कतेक नीक डाँरी पारल सीलेट भट्ठा पर लिखब नीक लागल देखि देखि हम डाँरी परलौहं रंग भरल स्केच केहेन हँसी लागल. मास्टरजी हमरा कान मे कहलैन पढ़ बौआ अ आ, सी डी ई आई हहूँ अक्षर सिखलौहं हँसी लागल केहेन खी खी खी आई कतेक लोक इस्कूल एलै धिया-पूता सभ हँसले-कनलै सभ मिली फेर पढ़ै लगलै मास्टरजी के कतेक नीक लगलै. इस्कूल मे नबका ज्ञान सीखब पढहब-लिखब आ खेलब-धूपब दोस महिम संग सलाह आ झगड़ा कतेक नीक किताबी ककहरा. जखैन जेहेन नीक लागल फेर खेलेबो धूपबो करैत छी हम अपने मने आ की होमवर्क बनने इस्कूल जाइत छी हम. आशीष अनचिन्हार बाल गजल अब्बा पीटै अम्मी चाहै हमरा खाला भगबै मामू डाँटै हमरा चुप्पे गेलहुँ घुमि एलहुँ मेला तँइ बड़का भैया मारै पीटै हमरा सभ दिनमे चलि एन्नी ओन्नी चलि जाइ खाली दादा दादी राखै हमरा हमरो आपा आबै गाबै नाचै तँइ ओ सुंदर सुंदर लागै हमरा सुंदर काकी देलथि अरफी बरफी तँइ कक्का हँसुआ लऽ कऽ काटै हमरा सभ पाँतिमे दस टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि। टू टा लघुकेँ एकटा दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। खाला= मौसी आपा=बड़की बहीन बाल गजल
मोइन पोखरि नालामे हेली हम गाछीमे नाची गाबी खेली हम
चोरा जामुन तोड़ी आमो तोड़ी ई बड़का काज कऽ नमहर भेली हम
हेतौ तोरा अँगनामे पिल्ला तै आसामे तोहर आँगन एली हम
तागत छै ज्ञानक हमरो हिस्सामे नहुँ नहुँ धीरे दुनियाँकेँ ठेली हम
बच्चा छी बच्चामे भगवाने छै ने बाभन ने डोमा ने तेली हम
सभ पाँतिमे दस टा दीर्घ अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि बाल गजल बड़ सुंदर गलफुल्लू बौआ घोड़ा गदहा उल्लू बौआ अंगो भीजल पेन्टो भीजल बड़ मूतै छुलछुल्लू बौआ इम्हर कानै उम्हर बाजै बड़ खच्चर गँड़िखुल्लू बौआ हरियर पीयर उज्जर कारी लाल गुलाबी बुल्लू बौआ आमुन जामुन इमली सिमली गाछे गाछे झुल्लू बौआ सभ पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि चारिम शेरक दोसर पाँतिमे अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि बाल गजल बकरी आबै अर्रर कुक्कुर भागै हर्रर बगड़ा मैना बगुला कौआ बाजै कर्रर इम्हर ढन उम्हर ढुन बौआ पादै भर्रर भीजै अंगा पैन्टो बौआ मूतै छर्रर घिरनी नाचै घन घन गुड्डी उड़लै फर्रर सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। गजल
बड़ सरल छै फिजिकल मरनाइ बड़ कठिन छै डिजिटल मरनाइ
जे सिनेहक बेगर मरि गेलै तकरे कहबै क्रिटिकल मरनाइ
बाँहिमे जकरा तागति छै से चाहि रहलै कोस्टल मरनाइ
देह छै संगीतक तैयो तँ बड़ कठिन छै लिरिकल मरनाइ
मरि कऽ हमहूँ जिबिते देखाइ एहने हो मिथिकल मरनाइ
मतलाक काफिया भारत भूषणजीक फेसबुक पोस्टसँ प्रेरित अछि, ई गजल प्रारंभिक स्वरूपमे अछि
सभ पाँतिमे 2122+22221 मात्राक्रम अछि दोसर शेरमे दूटा दीर्घ आ तेसर शेरक एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल
गेलै दरबार अनचिन्हार भेलै उद्धार अनचिन्हार
सभ बनि गेलै सिनेमा नीक खाली परचार अनचिन्हार
जे खा गेलै हमर सपना से बड़का खुंखार अनचिन्हार
ठीके महमह करैए देह छै सिंगरहार अनचिन्हार
अप्पन की आन की ऐठाम पूरा संसार अनचिन्हार
सभ पाँतिमे मात्राक्रम 22221-2221 अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि। गजल बड़ झूकैए जागल लोक बड़ सूतैए जागल लोक छै खन अनुखन सदिखन दर्द बड़ कूथैए जागल लोक हम्मर तोहर ओक्कर नाम बड़ बूझैए जागल लोक अप्पन टेटर आनक घेघ बड़ दूसैए जागल लोक इम्हर खधिया उम्हर भूर बड़ मूनैए जागल लोक हीरा मोती माणिक संग जश लूटैए जागल लोक सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम अछि गजल हम झुट्ठेमे अपसियाँत तों सत्तेमे अपसियाँत नहियें पी सकलै शराब जे चिखनेमे अपसियाँत सभ खा गेलै खेनहार किछु पत्तेमे अपसियाँत जकरा लग सालक हिसाब से महिनेमे अपसियाँत के छै अनचिन्हार लेल सभ अपनेमे अपसियाँत सभ पाँतिमे 222-22-121 मात्राक्रम अछि गजल ओकर रूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा रंग अनूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा पथिया डाला मौनी सुप्ती कनसुप्ती छिट्टा सूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा ऐ पूजा पाठक बदला जिनगी मंत्रक जापे जूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा ओ भेटै की नै भेटै तैयो ओकर छापे छूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा कहियो एतै अनचिन्हार हमर आँगन चुप्पे चूप बहुत दूर लऽ जेतै हमरा सभ पाँतिमे 222+222+222+22 मात्राक्रम अछि दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल कनी अहीँसँ माँगब हम खुशी अहीँसँ माँगब हम गलत लगैत हो तैयो सही अहीँसँ माँगब हम भने कना कऽ दिअ लेकिन हँसी अहीँसँ मागब हम अपन मरण धरिक खाता बही अहीँसँ माँगब हम दियौ बहुत मुदा बाँचल कमी अहीँसँ माँगब हम अहाँ मना किया करबै जदी अहीँसँ माँगब हम सभ पाँतिमे 12-12-1222 मात्राक्रम अछि डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” मारिते रास बाल कविता बागर (बाल कविता) कोना करै छेँ - “बागर” सनि, बागर की होइ छै - से बता । बागर - बागर लोक बाजैए, बागर की - ककरो ने पता ।। जे कहबेँ - पएबेँ ईनाम, सोचै जाइ जो सभ धियापुता । हारि गेलेँ, तखने हम कहबौ, नञि तँऽ छी हमरो ने पता ।। एहिना बहुते शब्द मैथिलीक, हेरा गेल ककरो ने पता । जे बाँचल, पैघो ने बाजए, सीखतै कोना धियापुता ।। नेनपनमे सुनलहुँ, पूछल, पर अर्थ ने बूझल छल ककरो । उत्कण्ठा तकबाक हिलोरल, तेँ किछु बूझल अछि हमरो ।। “बागर” परबा केर प्रजाति, सन्दर्भ भेटल हमरा एक ठाँ ।*१ उकपाती आ बड़ झगड़ौआ, बड़ हल्ला रहितए जाहि ठाँ ।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - CSIR (आब NISCAIR) NEW DELHI द्वारा प्रकाशित पोथी WEALTH OF INDIA : BIRDS केर अनुसार “बागर” परबाक एक प्रजाति छल । कल्याणी कोशक अनुसार “बागर” एक प्रकारक बकरी थिक । सम्भवतः दुहु अपना - अपना अनुसारेँ सही छथि आ “बागर” अनेकार्थी शब्द थिक । *२ - एहि ठाम हम परबाक एकटा प्रजातिक रूपमे बागरकेँ लेल गेल अछि जे स्वभावसँ बहुत झगरौआ, उकपाती आ हल्ला मचबए बला होइत छल आ परबाक प्रतियोगिता (परबाबजी) केर उद्देश्यसँ पोषल जाइत छल । गेंड़ा (बाल कविता) केहेन अजगुत जीव ! − पहिरने “सूट - सफारी” । लागय सेना केर वर्दीमे भागल वर्दीधारी ।।*१ नाकक ऊपर सिंघ एगो या दूगो*२ छै जनमल ।*३ सिंघक*४ वार - प्रहार जेना तरुआरिक सनकल ।।*५ बास ओकर, घास संगहि क्षेत्र दलदली ।*६ देखितहिं देरी सिंहहुमे मचि जाइछ खलबली ।।*५ घासहि खा कऽ जिबैत अछि ई जीव शाकाहारी । निर्मम वध कऽ रहल एकर सिंघ केर व्योपारी ।।*७ भारत केर उत्तर आ पूब दिशि एकरहि राज छै । काजीरंगा - जलदापाड़ा - दुधवामे सोराज छै ।।*८ नेपालक परसा - चितबन - बर्दिया भूटानमे । भारतीय गेंड़ा बाँचल छै, एहने किछु सुठाममे ।।*८ कहियो सौंसे बास छलै - सिन्धुसँ दिहांग धरि ।*९ आब तँऽ बूझू बाँचल छै बङ्ग ओ असाम धरि ।। एकसिंघी भारत - नेपाल - भूटान आ जावा । दूसिंघी - गेंड़ा भेटैतछि अफ्रिका - सुमात्रा ।।*१० संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - गेंड़ाक शरीर पर चमरीक मोट सुरक्षात्मक स्तर होइत अछि जकर मोटाई डेढ़सँ पाँच सेन्टीमीटर धरि भऽ सकैत अछि । *२ - “एगो” आ “दूगो” क्रमशः “एक गोट” आ “दू गोट” केर संक्षिप्त रूप थिक । ठीक तहिना जेना कि अंग्रेजीक RHINO शब्द RHINOCEROS केर संक्षिप्त रूप । *३ - गेंड़ाक नाकक ऊपर एक या दू टा सिंघ होइत अछि । *४ - श्रृंग (तत्सम) > सिंग (अर्ध तत्सम) > सिंघ (तद्भव), संगहि एकसिंगही = एकसिंघी = एक सिंग/सिंघ बला । सिंघ शब्द सिंह केर तद्भव स्वरूपमे सेहो प्रयुक्त होइत अछि । एहि तरहेँ सिंघ शब्द मैथिलीमे तद्भव शब्द भेल आ अनेकार्थक शब्द सेहो कारण एकर दू टा भिन्न अर्थ होइत अछि - पहिल श्रृंग (HORN) आ दोसर सिंह (LION) । *५ - सिंघ केर उपयोग गेंड़ा अपन सुरक्षा लेल करैत अछि । सिंघ जखन पैघ भऽ जाइत अछि तँऽ ओ एतेक मजगूत भऽ जाइत अछि कि ओकर प्रहारसँ गेँड़ा कोनहु मजगूत गाछकेँ सेहो तोड़ि सकैत अछि । एहि सिंघक प्रहारसँ बाघ - सिंह सेहो डऽर मानैत अछि । *६ - गेंड़ा शाकाहारी प्राणी अछि । दलदली क्षेत्र जकर आस - पास घासक प्रचूरता हो − से गेंड़ाक प्राकृतिक आवास क्षेत्र होइत अछि । *७ - गेंड़ाक सिंघ केर तश्करी होइत अछि आ ताहि कारणेँ ओकर निर्मम अवैध हत्या कएल जाइत अछि । *८ - भारतीय गेंड़ा पहिने सम्पुर्ण उतरबारी भारतक जंगलमे पाओल जाइत छल पर आब सिर्फ किछु सुरक्षित अभ्यारण्य या निकुञ्जमे बाँचल अछि । *९ - “दिहांग” नदी - अरुणाचल प्रदेशमे “ब्रह्मपुत्र” नदी केर नाँओ । *१० - भारत, नेपाल, भुटान, म्यांमार आ जावामे प्राकृतिक रूपसँ पाओल जाए बला गेंड़ाक नाकक ऊपर मात्र एक टा सिंघ होइत अछि जखनि कि अफ्रिका महादेश आ सुमात्रामे पाओल जाए बला गेंड़ाक नाकक ऊपर दू टा सिंघ होइत अछि । दू आखर हुनिका लेल जनिका “सिंग” केर एवजमे “सिंघ” नञि रुचैत हो - (एहि अंशकेँ प्रकाशित करबाक वा नञि करबाक पुर्ण अधिकार सम्पादक महोदयकेँ छन्हि । चाहथि तँऽ ओ एहि अंशकेँ बालानां कृतेसँ अलग आन ठाम कतहु स्थान दऽ सकैत छथि ।) Ø “सिंग” सही कि “सिंघ” ? - एहि तरहक प्रश्न करब अनुचित । Ø भाषाशास्त्री लोकनिक एहि तरहक प्रश्न गलत ओ अपुर्ण अछि । Ø प्रश्न होयबाक चाही कि “सिंग” आ “सिंघ” जँ दुहु मैथिलीक शब्द थिक तँ ओहिमे भाषाशास्त्रीय दृष्टिकोणसँ की अन्तर ? Ø अथवा, प्रश्न होयबाक चाही कि ओ दुहु शब्द भाषाशास्त्रक कोन आधार पर मैथिलीक शब्द भेल ? (एहि प्रश्नक उतारा हम ऊपरमे देबाक प्रयास कएल अछि) । Ø हम आओर अहाँ अपना मान्यताक आधार पर के होइत छी सही-गलत केर प्रमाण पत्र देनिहार ? Ø मैथिलीक जँ वास्तवमे हित चाहैत छी तँऽ मैथिलीक भाषाशास्त्री ओ व्याकरणाचार्य लोकनिकेँ आन भाषाक भाषाशास्त्री ओ व्याकरणाचार्य लोकनि जेकाँ “एकहरबा वा एकढ़बा” बनबाक स्थान पर समावेशी होअए पड़तन्हि । ठीक तहिना जेना अंग्रेजी मे COLOUR सेहो सही अछि आ COLOR सेहो सही । LEUCOCYTE सेहो सही अछि सेहो LUCOCYTE सही आ LUKOCYTE सेहो सही । Ø आनहु भाषा यथा हिन्दी, भोजपुरी, मगही, मराठी, बाङ्ग्ला आदिमे ई समावेशी नीति अपनाओल जा रहल अछि । यथा हिन्दीक एकटा उदाहरण नीचाँक दुहु चित्रमे देखू - Ø केओ कहैत छथि हम मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दकेँ मैथिली मानैत छी । केओ कहैत छथि हम मात्र “स” कें मैथिली बुझैत छी “श” आ “ष” केँ नञि । यौ (अओ,औ), अहाँक अहाँक मानब ओ बूझब अहाँक अप्पन मोनक बात छी, ओ सभ पर नञि थोपल जा सकैत अछि । जँ सएह करबाक छल तँऽ कथी लेल “मैथिली वर्णमाला”केँ मैथिली व्याकरणमे स्तान देल आओर किएक किएक पढ़बेत छिऐ जे उद्गमक आधार पर शब्द मुख्यतः चारि प्रकारक होइत अछि - तत्सम, तद्भव, देशज ओ विदेशज । Ø कोनहु जिबैत भाषा सतत प्रवाहमान नदी जेकाँ होइत अछि । ओएह नदी जिबैत अछि जे सतत प्रवाहमान होइत अछि आ अपना दुहु किनाराक माटिकेँ काटि अपनामे भँसिआ, अपना धारक संग बहा आगाँ बढ़बाक सामर्थ्य रखैत अछि । जाहि नदीमे से सामर्थ्य नञि ओ क्रमिक रूपेँ सूखाए जाइत अछि आ अन्ततः मृत भऽ जाइत अछि । Ø कोनहु जिबैत भाषाक व्याकरण सतत समावेशी होइत अछि आ कालक्रमेण धीरे-धीरे ओहिमे किछु-किछु सकारात्मक परिवर्तन होइत रहैत अछि । शेक्सपियरकालसँ एखन धरिक अंग्रेजी व्याकरणक अध्ययन अपने कऽ सकैत छी । सूरा आ फाड़ा (बाल कविता) गहूमक संग देखू “सूरा” पिसाइत छै ।*१ फोकला बना कऽ गहूम खा जाइत छै ।। देखियौ, ई जीव केहेन असञ्जाइत छै ! एकरा पानि ने मिसियो सोहाइत छै ।।*२ गहूमहि टा नञि, आनहु जजाइत छै ।*३ जेहने अन्न रूचए, तेहने प्रजाइत छै ।।*३*४ चाउर, मकई सभ सेहो खा जाइत छै । धानक सूराकेँ उड़बा लए पाँइख छै ।।*३ धानक सूरा - वयस्क भऽ जाइत छै । पाँइख जन्मै छै “फाड़ा” कहाइत छै ।।*३*५ उपजल अन्नक करइत बड़ नाश छै । भेटैछ दबाइ आब तेँ किछु उसास छै ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीक ई एकटा पुरान कहबी थिक जाहिमे सूरा आ ओकर बासस्थानक चर्च अछि । *२ - “सूरा छेँ जे पानि नञि पिबैत छेँ” − मैथिलीक दोसर पुरान कहबी । वास्तवमे सूरा कहियो पानि नञि पिबैत अछि । शरीरमे भोजनक चयापचय क्रियासँ उत्पन्न पानि (METABOLIC WATER) सूराक जीवन निर्वाहक लेल पर्याप्त होइत अछि । *३ - बहुत लोकसभ लिखल वा टंकित मैथिलीक उच्चारण वा पाठ मैथिली जेकाँ नञि कऽ कऽ हिन्दी जेकाँ करैत छथि । तेँ किछु शब्द सभक मैथिली वर्तनी वा उच्चार स्वरूपकेँ उपरोक्त कवितामे स्थान देल गेल अछि । एहि शब्दसभक लिखबाक सही स्वरूप निम्न अछि - क्र॰सं॰ लिखबाक सही स्वरूप मैथिली उच्चार वा वर्तनी १ जजाति जजाइत २ प्रजाति प्रजाइत ३ पाँखि पाँइख नियमानुसार उपरोक्त सब्द सभक सही स्वरूपहि लिखल जएबाक चाही आ पढ़बा काल उच्चार उपरोक्त प्रकारेँ होयबाक चाही । पर पाठक लोकनिक हिन्दीपरक उच्चार कविताक अभिप्रेत उच्चारकेँ विकृत कऽ सकैत छल तेँ एहि कवितामे सीधा अभिप्रेत उच्चारकेँ स्थान देल गेल अछि । *४ - विभिन्न प्रकारक अन्नमे सूराक विभिन्न प्रकार (प्रजाति) लागैत अछि । *५ - धानमे लागए बला सूराकेँ वयस्कावस्थामे पाँखि जनमि जाइत अछि आ तेँ ओ उड़ि सकैत अछि । एहि उड़ए बला सूराकेँ मैथिलीमे फारा (फाड़ा) कहल जाइत अछि । · फारा या फाड़ा - धानमे लागए बला सूरा । · फाँरा या फाँड़ा - अँचार बनएबाक लेल काटल आमक (प्रायः लम्बवत काटल गेल) टुकड़ी । *६ - उपजाक भण्डारण काल ई अन्नक बहुत नाश करैत अछि । यद्यपि एखन सूरा मारबाक बहुत रास दबाई (गोली आ पाउडर) बजारमे उपलब्ध छै जाहिसँ किछु उसास भेल छै तथापि एखनहु ओ उपजल अन्नक बहुत नाश करैत अछि । बगेरी (बाल कविता) पोखरिक भीड़ ई, एम्हर घाट । ओम्हर नञि छी आबरजात ।। ओहि भीड़ पर जंगल - झाड़ । देखू ! पानिमे लटकल गाछ ।।*१ ताहि गाछ पर अजगुत खोंता । कोना बनओलक, होइछ छगुन्ता ।।*२ खोंता डाढ़िसँ लटकि रहल छै । बीच फूलल, मूँह गोल ओकर छै ।। ओहिमे सँ उड़लै जे चिड़ै । बगरा सनि देखबामे छै ।। किछु केर माथ छै सुन्नर पीयर । पर दोसर किछु, नञि छै पीयर ।।*३ झुण्डक - झुण्ड आबै छै, देखू ! खेतहि - खेत घुमै छै, देखू !! जखनि झुण्ड बड़ पैघ रहै छै । फसिलक बड़ नोकशान करै छै ।।*४ चिड़ै-बझौआ जाल बिछओलक । पकड़ि बगेरी पिञ्जरा धएलक ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - एहन स्थान जाहि ठाम मनुक्खक पहुँच सुलभ नञि हो (प्रायः कोनहु जलाशयक परित्यक्त भीड़ परक कोनहु पैघ गाछ पर) ई चिड़ै अपन खोंता लगबैत अछि । *२ - एक खोंता विशिष्ट प्रकारक होइत अछि । खोंताक उपरुका शिर्ष गाछक कोनहु डाढ़िसँ बान्हल रहैत अछि आ निचलुका भाग हावामे झुलैत रहैत अछि । खोंताक बीचक भाग फुलल रहैत अछि जाहिमे चिड़ै केर अएबा - जएबा लेल गोलाकार मूँह बनल रहैछ । प्रायः एक गाछ पर कतेकहु एहि तरहक खोंता रहैत अछि । *३ - बगेरी देखबामे बहुत किछु बगरा सनि लागैत अछि । बरखाक समयमे पुरुष बगेरीक माथक रंग टुहटुह पीयर भऽ जाइत अछि जखनि कि स्त्री बगेरीमे से नञि होइत अछि । *४ - ई चिड़ै खेतमे अन्नक दाना चुनि कऽ अपन पेट भरैत अछि । तेँ बहुत अधिक संख्यामे भेला पर खेतक जजातिकेँ नोकशान सेहो पहुँचबैत अछि । *५ - चिड़ै बझओनिहार लोकनि एकरा जालमे बझाए बजारमे बेचैत छथि । किछु लोक पिञ्जरामे पोषबाक लेल तँऽ किछु लोक एकर मांसु खएबाक लेल एहि चिड़ैकेँ किनैत छथि । टिटही (बाल कविता) टि - टि - टि - टि बाजए टिटही । एम्हर - ओम्हर भागए टिटही ।। माथ - वक्ष - गर्दनि छै कारी । दुहु दिशि उज्जर छै एक धारी ।। टाङ्गक रंग छै टुहटुह पीयर । नाङ्गरि कारी, लोलहु पीयर ।। शेष शरीर पिरौंछे - भूरा । आँखिक परितः लाल कि पिउरा ।।*१ ओना तँऽ बहुतहु छैक प्रकार । विविध रूप ओ रंग - आकार ।।*२ अपना दिशि जे सुलभ भेटैछ । बेसीतर एहेनहि रहैछ ।।*३ कहबी - “टिटही टेकल पर्वत” । कारण चिड़ै ई बहुतहि सजग ।।*४ कनिञो खतरा भेल आभास । उड़ि भागल टिटही ओहि चास ।। जाइत - जाइत ओ करैछ सचेत । टि - टि - टि खतरा - संकेत ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - परितः = चारू कात । आँखिक चारू कात आ गलचर्म लाल अथवा पीयर होइत अछि । *२ - टिटही शब्दसँ बहुत व्यापक चिड़ैसमूहक बोध होइत अछि । एहि शब्दसँ अंग्रेजीक LAPWING आ SANDPIPER समूहक चिड़ैसभक बोध होइत अछि । *३ - एहि कवितामे अपना दिशि बेसी भेटए बला टिटहीक वर्णन अछि जे कि LAPWING समूहक सदस्य अछि । *४ *५ - अपना दिशि कहबी छै - “टिटही टेकल पर्वत” । लोक कहैत छै जे टिटही अपन पएर उपर कऽ कऽ सुतैत अछि आ ओकरा होइत छै कि ओ अपना पएरसँ पर्वतकेँ उठओने अछि । पर ई बात बस सत्य नञि । वास्तवमे टिटही बहुत सजग चिड़ै अछि । कोनहु खतरा केर आभास भेला पर ओ तुरन्त ओहि ठामसँ उड़ि भागैत अछि आ संगहि टि-टि-टि-टि आवाज निकालि आस - पासक आनहु चिड़ैसभकेँ खतरासँ सावधान कऽ दैत अछि । सम्भवतः तेँ उपरोक्त कहबी बनल होयत । किताबी कीड़ा (बाल कविता) घूसल रहैछ किताबहिमे, ओ तँऽ छै “किताबी कीड़ा” ।*१ एहिना नञि ई कहबी बनलै, जञो कहबी, तँऽ कीड़ा ।।*२ बहुतहि दिनसँ राखल जे, पुरना किताब जञो फोलब । फोलितहि उज्जर छोट-क्षिण, कीड़ाकेँ भागैत देखब ।। माछक छी आकार ओकर, माछहि सनि ध्रुव दुहु नोकगर । बीचमे छी फूलल - फूलल, पएरक लगाति छै चौड़गर ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीक एक टा पुरान कहबी । *२ - ओना तँऽ कतेकहु तरहक कीड़ा किताबकेँ नोकशान पहुँचबैत अछि । पर ई विशिष्ट कीड़ा किताबी कीड़ाक नामेँ प्रशिद्ध अछि । *३ - एहि कीड़ाक देह कतेको खण्डमे विभक्त रहैत अछि आ जाहि खण्डसँ खोकर पएर जुड़ल रहैत अछि से सबसँ बेसी चौड़गर होइत अछि । हरियल (बालकविता) परबा गण केर, तेँपर बेसनि, *१ देखबामे ओ लागै छै। हरियर देह आ पीयर पएर छै, बहुते सुन्नर लागैछै।।*२ पर परबा नञि आ ने पोरकी, हरियल नाँओ कहाबै छै। लजकोटरि ओ छै पोरकी सनि, परबा सनि भले लागै छै।। ककरो – ककरो पंख आ मूरी, हरियर रंगक नञि होइ छै।*२ ककरो - ककरो पएर नारंगी, लाल गाढ़, कत्थी होइ छै।। ककरो – ककरो वक्ष नारंगी, पीयर सेहो होइ छै। फेँट – फाँट या अगबे हरियर, हरियल सब कहबै छै।।*३ बऽड़ आ पीपड़ पाकड़ि गुल्लड़ि, फऽड़केँ ओ ताकै छै। अपना काजक फऽड़ने जे से, ओकरा बड़ भावै छै।।*४ ओहने गाछपर खोंता लगबै, प्रेमसँ दुनु परानी। ऊँच डाढ़िपर बिना उछन्नर, रहतै दुहु परानी।।*५ पर मनुक्ख सनि केर अगत्ती, आन जीव नेहोइछै। मारि गुलेती खसबए हरियल, जीह अपन जुड़बै छै।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - प्राणीशास्त्रक “परबागणमे (Order Columbidae)” परबाक (परेबाक) अतिरिक्त मैथिलीमे हरियल ओ पोरकी (पौड़की) नामक चिड़ै सभ सेहो समाविष्ट अछि। हरियल देखबामे परबा सनि लगैत अछि; अन्तर एतबा जरूर जे हरियलक देहक रंगमे कमोबेश हरियर वा हरियर-पीयर रंग अवश्य समाविष्ट रहैत अछि। हरियल पोरकी जेकाँ लजकोटरि होइत अछि आ प्रायः जोड़ामे देखल जाइत अछि। *२ – हरियल शब्द मैथिली, हिन्दी, मराठी, बंगाली आदि भाषामे प्रयुक्त होइत अछि− पर अर्थमे किछु अन्तर अछि - · हरियल (मैथिली आ बंगाली भाषामे) - समस्त GREEN PIGEON केर लेल प्रयोज्य अथवा Treron वंश (Genus) केर समस्तजातिक (Species) लेल प्रयोज्य। चाहे हरियलक पएरक रंग जे हो (पीयर, गाढ़ नारंगी वा कत्थी आदि) अथवा देहक रंगमे हरियर रंगक प्रतिशत जे हो पर ओ मैथिलीमे (आ तहिना बंगालीमे सेहो) हरियलहि कहबैत अछि। · हरियल (मराठी भाषामे) – महाराष्ट्रक राजकीय चिड़ै हरियल अछि तथा ओ मात्र पीयर पएर बला हरियलकेँ (YELLOW FOOTED GREEN PIGEON) हरियलक रूपमे परिभाषित करैत अछि। · हरियल (सामान्य जनक हिन्दी भाषामे) – मैथिली ओ बंगाली भाषा सदृश। · हरियल (अन्तर्जाल / इण्टरनेट ओ आधिकारिक हिन्दी भाषामे) – एखनुका अन्तर्जालक (इण्टरनेट, INTERNET) अनुवाद क्षेत्र तथा प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय (NATURAL HISTORY MUSEUM) पर मराठी भाषा-भाषीक वर्चस्वक कारण तदनुसार अनुदित हिन्दी मराठीसँ प्रभावित अछि आ हरियलकेँ मराठी अहि जेकाँ पारिभाषित करैत अछि। *३ – मैथिली भाषाक हरियलक किछु जाति केर देह वा पाँखिक रंगमे हरियर रंगक अतिरिक्त कत्थी, नारंगी या पीयर आदि चटक रंगक समावेश सेहो भेटैत अछि। *४ - बड़, पीपर, पाकड़ि, गुल्लरि आदि गाछक (FICUS TREES) फऽड़ सभ हरियलकेँ बहुत पसिन्न पड़ैछ आ तेँ ओहि तरहक गाछ सभपर (प्रायः छुपुङ्गीपर बैसल) ओ आसानीसँ देखल जा सकैत अछि। *५ - बड़, पीपर, पाकड़ि, गुल्लरि आदि गाछक उपरुका डाढ़ि सभपर ओ अपन खोंता बनबैत अछि आ प्रायः जोड़ामे देखल जाइत अछि। *६ – मनुक्ख प्रायःगुलेतीसँ (CATAPULT / SLING) एकर शिकार करैत अछि। माटिक चाली या बरसाती चाली (बाल कविता) बरखामे सह-सह करैतअछि, जे बरसाती चाली। भीजल माटि फोड़ि कऽ निकसए, से बरसाती चाली।। नमरैछ, फेर आगाँ बढ़ैत अछि, ई बरसाती चाली। माटिक भीतर छुपल रहैतछि, ई बरसाती चाली।। डरूने बौआ – बुच्ची एहिसँ, काटए नञि ई चाली। बोर बनैछ बंशीमे माछक, से बरसाती चाली।।*१ माटिमे जे जीवांश रहैछ, तकरे खा जीबए चाली। माटिक उपजाशक्ति बढ़ाबए, इएह बरसाती चाली।।*२ विश्वमे भेटए भाँति-भाँति केर, ई बरसाती चाली। ककरो माटि प्रिय या गोबर, या सऽड़ऽल तरकारी।।*३ जैविक कचड़ा अछि जेहने, तेहने तँऽ चाही चाली। हर तरहक जैविक कचड़ाकेँ, खाद बनाबए चाली।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - बंशीसँ (FISHING HOOK) माछ मारए काल बहुत लोक चालीकेँ मारि कऽ ओकर टुकड़ीकेँ बोर (FISHING BAIT) केर रूपमे प्रयोग करैत छथि। *२ – माटिमे जे जीवांश (DEAD ORGANIC MATTER) रहैत अछि तकरे खाऽ कऽ माटिक चाली जिबैत अछि। ई पेटक चाली जेकाँ परजीवी (PARASITE) नञि भऽ कऽ स्वतन्त्रजीवी (FREE LIVING) अछि। एहि जीवांश सभकेँ पचाऽ कऽ ओ जैविक खादमे (BIO FERTILIZER) बदलि दैत अछि। *३ – विश्वमे माटिक चालीक हजारहु जाति – प्रजाति छैक आ प्रायः हर जातिकेँ एक विशिष्ट प्रकारक जीवांशक प्रति रूचि रहैत छै− ककरहु माटिमे उपस्थित गाछक मृत भागक प्रति, ककरहु गोबरक प्रति, ककरहु घऽरमे उत्पन्न तरकारी आदिक जैविक कचड़ाक प्रति … आदि, आदि। *४ – जैविक खाद बनएबाक उपक्रमक लेल जाहि तरहक जैविक कचड़ा उपलब्ध रहैछ ताहि तरहक ताहि तरहक रूचि रखनिहार चालीक चयन कएल जाइत अछि। मयूर या मोर (बाल कविता) कहबए मयूर अथवा मजूर। पर लीखल जाइछ सभठाँ मयूर।।*१ छी मोरक नाम तँऽ सब सुनने। मोरक रंग - रूप सेहो देखने।। “पीकॉक” तँऽ छी हम सभ रटने। “पीहेन” मुदा कम्महि सुनने।।*२ अपना दिशि भेटैछ ने मोर। बसइछ पच्छिम भारतक कोर।।*३ की भेलै जञो नहिञे भेटैछ। छी चित्र सभक मनमे बसैछ।। मोरक सुन्नर सनि पाँखि रहैछ। नञि मोरनीक तेहेन रहैछ।।*४ भारतक मोर छी “नीलमोर” । जावामे हरियर भेटैछ मोर।।*५ उज्जर रंगक जे छैकमोर। से उत्परिवर्तित नील मोर।।*६ अपनहुठाँ भेटैत छल पहिने। वन उपवन से विचरए पहिने।।*३ नञिजंगल आब ने मोरे छी। देखब तखने जँ पोषने छी।। छी मोर चकोर कुलक एक्के।*७ पर मोरक छी बातहि अलगे।। पाँखिक आकर्षण मनमोहक। नरकी - नारायणकेँ रुचिगर।। छी राष्ट्र - चिड़ै भारतवर्षक। मस्तक शोभित छी श्रीकृष्णक।। कार्तिकेय केर छी वाहन। शाहजहाँ केर “मोर-सिंहासन” ।।*८ लागि गेलै मेघो कारी। मोरक मोन मारए किलकारी।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ – मैथिलीमे एहि पक्षीकेँ “मोर” अथवा “मयूर” कहल जाइत अछि। मयूर लिखलापर किछु लोक एकर तत्सम स्वरूपक उच्चारण “मयूर” करैत छथि तँऽ किछु लोक अर्ध तत्सम स्वरूपमे “मजूर” पढ़ैत छथि। उच्चारण भलहि किछु हो पर लीखए काल “मयूर” लीखल जाइत अछि। “मजूर” लिखलासँ ओकर अर्थ “मजदूर” होइत अछि । *२ - अंग्रेजीक PEAFOWL सँ मयूरक दुहु लिङ्गक बोध होइत अछि, जखनि कि PEACOCK सँ मोर आ PEAHEN सँ मोरनीक बोध भेल। *३ – प्राकृतिक रूपसँ मोर एखन पच्छिम भारतक प्रदेश सभमे (राजस्थान आ ओकर सीमासँ सटल आन प्रदेश सभक भू भागमे) पाओल जाइत अछि। बहुत पहिने जहिया अपना दिशि सघन वन छल तहिया सम्भवतः अपनहु दिशि प्राकृतिक रूपसँ भेटैत छल। *४ – मयूरक जे सुन्नर पाँखि प्रशिद्ध थिक आ जकरा कारण संस्कृतमे एकरा “चित्रपत्रक” सेहो कहल गेल अछि से वास्तवमे मात्र “नरमयूर”केँ होइत अछि। “स्त्रीमयूर”केँ ओहेन आकर्षक पाँखि नञि होइत अछि। *५ – भारतक मोरक कण्ठ गाढ़नील (INDIGO / DEEP BLUE) रंगक होइत अछि तेँ एकरा संस्कृतमे “नीलकण्ठ” नाम सेहो देल गेल अछि। एकर मूल क्षेत्र सम्पुर्ण भारतक अतिरिक्त नेपाल, भूटान, बाङ्गलादेश आ श्रीलंकाकेँ मानल जाइत अछि। ते एकरा “भारतीय मोर” (INDIAN PEAFOWL / Pavo cristatus) सेहो कहल जाइत अछि। ई भारत आ श्रीलंकाक राष्ट्रिय चिड़ै (NATIONAL BIRD OF INDIA & SRI LANKA) अछि। *६ - प्राणी (जैविक) उद्यान सभमे (ZOO) जे उजरा मोर देखैत छी से मोरक कोनहु आन प्रकार नञि अछि। वास्तवमे ओ भारतीय नील मोर थिक जे एकटा विरले जैव वैज्ञानिक (RARE BIOLOGICAL PHENOMENON) वा आनुवांशिक परिघटना (RARE GENETIC PHENOMENON) केर फलस्वरूप उत्पन्न भेल अछि। एहि विरले आनुवंशिक परिघटनाकेँ जैव वैज्ञानिक लोकनि उत्परिवर्तन (MUTATION) कहैत छथि। तेँ उजरा मोरकेँ (WHITE PEAFOWL) नीलमोरक उत्परिवर्तित प्रतिरुप (MUTATIONAL VARIANT) कहि सकैत छी। एकर अतिरिक्त विश्वमे मोरक आन दू प्रकार सेहो अछि। पहिल अछि हरियर मोर या जावा मोर (GREEN / JAVA PEAFOWL / Pavo muticus ) आ दोसर अछि कॉङ्गो मोर या अफ्रिकी (CONGO / AFRICAN PEAFOWL / Afropavo congensis) मोर। जावा मोर भारतीय मोर जेकाँ होइत अछि आ म्यांमार, जावा, सुमात्र आदि देश ओ द्वीप समूहमे भेटैछ। एकर गर्दनि केर रंग नील नञि भऽ कऽ हरियर होइत अछि। कॉङ्गो या अफ्रिकी मोर बहुतहु परिप्रेक्ष्यमे भारतीय मोरसँ भिन्न होइत अछि। *७ – मोर आ चको रदुहु मयूर कुल (Family - Phasianidae) केर चिड़ै अछि जँ मोरक आकर्षक पाँखि हटाए देल जाए तँऽ दुहु मिलैत – जुलैत सनि लागत। प्रायः एहि कुलक पक्षी बेसी दूर नञि उड़ि पाबैत अछि। *८ – मोरकेँ अरबी भाषामे “ताऊस” कहल जाइत अछि। मुगल बादशाह शाहजहाँ जाहि सिंहासनपर बैसैत छलाह ओकर नाम छल “तख्त-ए-ताऊस” मतलब कि “मोर सिंहासन” या “मयूर सिंहासन” । एहि सिंहासनक आकृति मोर सनि छल। दू टा मोरक अनुकृतिक बीच बादशाहक गद्दी छल आ गद्दीक पाछाँमे सेहो एकटा मोरक अनुकृति छल। मएना (बाल कविता) पीयर लोल आ पीयर टाङ्गक, चिड़ै नाम छै मएना। दाना चुनबा लेल आबैए, कुदकए-फुदकए भरि अङ्गना।। देह ओकर भूरा रङ्गक छै, माथ आ नाङ्गरि कारी। मनुखक डऽर लेश मात्रे टा, ढीठ चिड़ै बड़ भारी।। बगरा बिलटल, आब रहल बस, घर - आङ्गन कौआ - मएना। इएह चिड़ै दू बाँचल जकरा, चीन्हए पहिने नेना।। एकरहि एक विशेष प्रजाति, छी नाम “पहाड़क मएना” ।*१ एकरा सभसँ छी अलगे, मैथिलीक “पहाड़ी मएना” ।। ओ जे “पहाड़ केर मएना” से, अपना दिशि कहाँ भेटैए ? एहि साधारण मएनासँ ओ, एकदम भिन्न लागैए।। ओना विश्वमे मएना केर छै, बहुतहि विषम समूह। अपना दिशि एहने भेटैछ, सभ जातिक चर्च दुरूह।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ – अंग्रेजीक केर HILL MYNA हिन्दी अनुवाद थिक “पहाड़ी मैना” । परञ्च मैथिलीमे “पहाड़ी मएना” एकटा आन चिड़ै लेल प्रयुक्त होइत अछि जकरा हिन्दीमे “पीलक” कहल जाइत अछि। हिन्दीक “पीलक” चिड़ै लेल मैथिली नाम “पहाड़ी मएना” मएनाक प्रकार होयबाक कारण नञि अपितु मएना सदृश आकार – सुकार होयबाक कारण पड़ल अछि; तेँ एकरा अनुवाद नञि बूझि “रूढ़ि संज्ञक शब्द” बूझबाक चाही। अंग्रेजीक HILL MYNA लेल मैथिली अनुवाद “पहाड़ी मएना” नञि कऽ जञो “पहाड़ीक मएना” या “पहाड़क मएना” कएल जाए तँऽ बेशी उपयुक्त होयत आ कोनहु भ्रमसँ बाँचल रहत। एहि ठाम हम सएह कएल अछि। HILL MYNA केर जैव वैज्ञानिक नाँओ Gracula religiosa अछि। ई अपना दिशि नञि भेटैत अछि। *२ – व्यापक रूपसँ स्टॉर्लिङ्ग कुलक (Starling family or Family - Sturnidae) सभ जातिक (लगभग ३० टा जाति) चिड़ैकेँ “मएना” मानल गेल अछि। हर तरहक मएनाक वर्णन एहि ठाम सम्भव नञि, तेँ मात्र देशी मएना (जे कि अपना ओहि ठाम सालो भरि रहैछ) केर वर्णन कएल गेल अछि। बगुला (बाल कविता) काक चेष्टा बको ध्यानम्। छल जे विद्यार्थीक लक्षण।। से जे बक छल ओएह बगुला, अछि कहाबैत मैथिलीमे।।*१ नमगर आ पातर छै टाङ्ग, पीयर – मटिया कारी टाङ्ग। माथ उज्जर, धऽर उज्जर, लोल कारी या छै पीयर।। माछ छै बड़ प्रिय जकरा, सएह बगुला मैथिलीमे।। बगुला नञि छै एक रंगक, नञि बनावट एक ढंगक। बेसी अगबे साफ उज्जर, या कोनहु फेंटल छै उज्जर।।*२ जेहो, पर छै टाङ्ग नमगर, तेँ छै कहबी मैथिलीमे।।*३ बाध - खेत - पथार सौंसे, भेटए हरदम धार काते। वा कोनहु उत्थर जलाशय, देखब कीड़ा – माछ ताकैत।। ठाढ़ एकटक ध्यान देने, तेँ प्रशिद्ध ओ मैथिलीमे।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - संस्कृतमे “वक” या “बक” शब्दसँ जाहि चिड़ै समूहक बोध होइत अछि से मैथिलीमे “बगुला” कहबैत अछि। *२ – बगुला नामक चिड़ै केर अन्तर्गत विभिन्न आकार प्रकारक बहुत रास चिड़ै आबैत अछि। अंग्रेजीक हेरॉन (HERON) आ एग्रेट (EGRET) शब्दसँ बोध होइबला सब चिड़ै मैथिलीमे “बगुला” कहबैत अछि। बेसीतर बगुला उज्जर रंगक होइत अछि पर किछु आन फेंट-फाँट रंगक सेहो। सब बगुलाक टाङ्ग पातर आ नमगर होइत अछि आ उड़बा काल अपन गर्दनि अन्दर सिकोड़िकऽ (RETRACTED INWARD) रखैत अछि। *३ - “बगुलाटाङ्ग” माने कि नमगर टाङ्ग− ई मिथिलाक प्रशिद्ध कहबी सबमे सँ एक अछि। *४ – माछ पकड़बाक लेल बगुलाक एकटक ध्यान, संयम आ तपस्या मिथिलामे आ तेँ मैथिली साहित्यमे उदाहरणक रूपमे बड़ प्रशिद्ध अछि। “मवेशी बगुला” (CATTLE EGRET) पालतू चौपाया जानवर (जेना कि गाए, महींष) आदिक पीठपर बैसि ओकर चाम परहक बाह्यपरजीवी (ECTOPARASITES) कीड़ा सभकेँ खाए जाइत अछि। ई सहोपकारिता सम्बन्धक (SYMBIOTIC RELATIONSHIP) एकटा नीक उदाहरण थिक। एहिसँ बगुलाकेँ भोजन आ मवेशी सभकेँ परजीवीसँ मुक्ति भेटैत अछि। बगुली (बाल कविता) बगुला कुल केर चिड़ै अछैतहु, ओ बगुलासँ भिन्नछै।*१ देखबै बगुलहि संग जतऽ जे, बास दुहुक अभिन्न छै।। बगुलापेक्षा छोट छै गर्दनि, धऽर मुदा किछु छै भारी। देहक मूल रंग उज्जर पर, कारी - भूरा सनि धारी।।*२ खाइत ईहो छै माछ आ कीड़ा, साँप बेङ्ग आ बेङ्गची। बगुले कुल केर छै, छोट मुदा, कहबइए ओ तेँ बगुली।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीमे “बगुला” केर स्त्रीलिङ्ग “बगुली” नञि थिक। दुहु मे नर (पुरुष) आ मादा (स्त्री) जोड़ि पुलिङ्ग किंवा स्त्रीलिङ्गक निदेश कएल जाइत अछि। अंग्रेजीक HERON आ EGRET मैथिलीमे “बगुला” कहबैतअछि जखनि कि BITTERN “बगुली” । ई दुहु बगुला कुलक (Family - ARDEIDAE) सदस्य रहितहुँ परस्पर किछु भिन्न अछि। Ixobrychus, Botaurus आ Zebrilus वंश सभक (GENERA) चिड़ै सभ “बगुली” केर अन्तर्गत आबैत अछि। *२ - देह उज्जर रंगक होइत अछि पर बगुला सनि नञि। बगुलीक गर्दनिपर भूरा-कारी सनि वा मटियाही धारी होइत अछि आ पंख सेहो उपरसँ ओहने रंगक होइत अछि। *३ – बगुलहि कुल केर मुदा ऊँचाईमे छोट होएबाक कारणेँ एकर नाम ‘बगुली” अछि। दहियल (बाल कविता) खञ्जन आँखि, चंचल आँखि। लोक बूझए, बड़ कारी आँखि।।*१ एक भ्रमसँ दोसर भ्रम। एहिना चलिते रहइछ क्रम।।*२ कारी गर्दनि आँखि आमूरी। खजिन चिड़ैञा भ्रमसँ बूझी।। खजिन चिड़ैञा डोलबए नाङ्गरि। ऊपर - नीचाँ करइछ नाङ्गरि।। ईहो चिड़ैञा डोलबए नाङ्गरि। बसऊपर फहड़ाबए नाङ्गरि।।*३ यूरोपक रॉबिन जे चिड़ै। तकरेसँ आकार मिलए।।*४ तेँ कहलक “मैग्पीरॉबिन” । जुनि बूझू “इण्डियन रॉबिन” ।।*४ अनुवादक भ्रम देल पसारि। लीखलक नीलकंठ अविचारि।।*५ “दहियल” ई कहबैछ चिड़ै। बाङ्गलामे “दोयेल” कहबै।।*६ स्त्री - दहियल कम कारी। छाउरक रंग गर्दनि - मूरी।। पेट सभक भेटत उज्जर। पाँखि ओ नाङ्गरि चितकाबर।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ *२ - “खञ्जन आंखि”केँ मतलब सामान्य जन भ्रमवश “कारी आँखि” बूझए लागल। ई भ्रम कालान्तरमे एकटा आओरहु भ्रमकेँ जन्म देलक− लोक दहियल नामक चिड़ैकेँ सेहो खञ्जने बूझए लागल। ई चिड़ै खञ्ज नहि आ कारकआ चितकाबर रंगक होइत अछि। एकर मूरी आ गर्दनि केर संगहि आँखि सेहो गाढ़ कारी होइत अछि। ईवस्तुतः एकटा क्रमागत त्रुटि वा भ्रम (PROGRESSION OF ERRORS) केर उदाहरण थिक; एक भ्रमसँ दोसर भ्रम, दोसरसँ तेसर आ एहिना आगू सेहो। *३ – ईहो चिड़ै अपन नाङ्गरिकेँ डोलबैत अछि परञ्च ऊपर – नीचाँ या दायाँ – बायाँ नञि अपितु केवल ऊपर दिशि आ सेहो ऊपर दिशि जपानी पंखा जेकाँ खोलि कऽ फहड़ा दैत अछि। *४ – एहि चिड़ै केर आकार यूरोपक रॉबिन नामक चिड़ै सँ मिलैत अछि तेँ अंग्रेजीमे एकरा “मैग्पीरॉबिन” या “ऑरिएण्टल मैग्पाइ रॉबिन” नाम देल गेल अछि। एकरा “नीलकण्ठ” वा “इण्डियन रॉबिन” नञि बूझी। एहि चिड़ैमे लेश मात्रहु “नीलरंग” नञि होइत अछि । *५ – किछु नव सिखुआ अनुवादक सभ अन्तर्जालपर “रॉबिन” देखि नीलकण्ठ अनुवाद कएने छथि से सर्वथा अनुचित ओ भ्रमकारक। लेशमात्रहु नील रंग नञि थिक एहि चिड़ैमे। *६ - “दहियल”केँ बाङ्ग्लाभाषामे “दोयेल” कहल जाइत अछि आ ओ “बाङ्ग्लादेश” केर राष्ट्रिय चिड़ै अछि। कौआ (बाल कविता) का - का, का - का, कोना करै छै, देखही बौआ। कारी रंगक चिड़ै ई देखही, कहबै कौआ।।*१ देह - लोल छै चमकैत कारी, सगरे “कौआ” । गर्दनि छाउरक रंग - सिलेटी, “घरैया कौआ” ।। जकर अबाज छै कम कर्कश, से “घरैया कौआ” । पहिनुक तुलना कम भेटैछ आब “घरैयाकौआ” ।।*२ जकर छै सौंसे देहे कारी, “बनैया कौआ” । एकर अबाज छी बड़ कर्कश, ई छी “कार कौआ” ।। एकरे नाम छै “कागा” सेहो, इएह “कार कौआ” । आब तँऽ घर-आङ्गन बेसी छी इएह कार कौआ।।*३ व्यापक अर्थेँ काक - काग विश्वक सभ कौआ।*४ कोइली मूरुख बनाबए जकरा, सएहई कौआ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - “कौआ” आ “मएना” ई एहेन चिड़ै अछि जकरा अजुक अधिकांश नेना – भुटका सभ अपन जिनगीमे सभसँ पहिने प्रत्यक्ष रूपमे देखैत अछि। पहिलुका सुचीमे “बगरा” सेहो आबैत छल पर आब नञि। *२ – सभ कौआ केर देह आ लोल चमकैत कारी रंगक होइत अछि। पर जकर गर्दनि छाउरक रंगक वा सिलेटी रंगक होइछ से सामान्य मैथिली भाषामे “कौआ” कहबैत अछि अधिक विशिष्ट रूपसँ ओकरा “घरैयाकौआ” (HOUSE CROW) कहि सकैत छियै। *३ – जँ उपरुका कौआकेँ “घरैया कौआ” कहैत छी तँ जाहि कौआ केर पुरा देहे कारी होइत अछि तकरा “बनैया कौआ” (JUNGLE CROW) कहि सकैत छी। सामान्य मैथिलीमे “बनैया कौआ” केर लेल “कागा” अथवा “कार कौआ” शब्द व्यवहृत होइत अछि। पहिने घऽर – आङ्गनमे बेसीतर घरैया कौआ देखाइत छल पर आइ – काल्हि कार कौआ बेसी भेटैत अछि जे कि पछिला किछु दशकमे घरैया कौआ केर घटैत संख्याँ केर परिचायक थिक। *४ – व्यापक अर्थमे “कौआ” या “कागा” शब्दसँ विश्वक सभ तरहक कौआक बोध होइत अछि चाहे ओ अंग्रेजीक कोनहु HOUSE CROW हो, JUNGLE CROW हो, RAVEN हो, CARRION CROW हो या फेर JACKDOW किएक ने हो। *५ - “कौआ” ओएह चिड़ै अछि जे “कोइली” नामक चिड़ै लेल शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि। *६ - कचबचिया (बाल कविता) कचबच - कचबच बड़ी करै छेँ, कहबौ हम “कचबचिया” तोरा। सुन्नर देह, रंग सुन्नर छौ, पर तोर बोल किए छौ रोड़ा।।*१ कौआ कुल केर, तेँ कौए सनि, बोल छै कर्कश ओक्कर।*२ ओना एकटा आओरहु स्वर, जे लागए मीठ - मनोहर।।*३ मुदा जे कर्कश ध्वनि तोहर, से बेसी छैक उजागर। तेँ संस्कृतसँ मैथिली धरि, भेल तोहरनाम केर कारक।।*४ सौंसे भारत भरि भेटैछ, मैदान हो या कि पठार।*५ ऊँच हिमालय पर भेटैत अछि, तोर विशिष्ट प्रकार।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ – कचबचिया केर नाम ओकर कर्कश वा अप्रिय स्वरक (UNPLEASANT SOUND) कारण पड़ल अछि। इएह गुणक कारण उल्लूक पर्यायी नाँओ सेहो कचबचिया अछि। *२ – कचबचिया सेहो कौआकुल (Family - CORVIDAE) केर सदस्य अछि आ तेँ ओकर बोल सेहो किछु – किछु साम्य रखैत अछि। *३ – कचबचिया ऊपर वर्णित स्वरक अलावे एकटा आओरो स्वर निकालैत अछि जे मीठ आ कर्णप्रिय (LOUD MUSICAL CALLS) होइत अछि। *४ – कहबी छै जे नीक गुणके ओ नञि देखैत अछि पर खड़ाब गुण जगजियार भऽ जाइत अछि। सएह एहि चिड़ै लेल सेहो उचित। मैथिली, संस्कृत, बंगाली आदि भाषामे एकर जे नाम पड़ल अछि से एकर खड़ाब बोलक कारण जखनि कि एकर नीक बोल बहुधा लोक आन चिड़ै केर बूझि जाइत अछि। *५ – ई चिड़ै सौंसे भारतमे भेटैत अछि आ भारतहि किएक सौंसे भारतीय उपमहाद्वीपमे भेटैछ। *६ – हिमालय केर अधिक ऊँचाई बला भागमे एकर एक आन प्रकार भेटैत अछि जकरा हिमालयी कचबचिया (GREY TREEPIE / HIMALAYAN TREEPIE) कहल जाइत अछि। एकर जैव वैज्ञानिक नाँओ Dendrocitta formosae अथवा Dendrocitta himalyensis अछि। एकर पेट कनेक बेसी मोट होइत अछि आ पाँखि तथा नाङ्गरिमे उजरा रंग नञि रहैत अछि। चातक (बाल कविता) चातक एलै ! चातक एलै ! संगमे बरखा - बुन्नी लेलै।।*१ धरती तबधल, खेतहु दगधल। मनुक्खक मोन, सेहो छै बगधल। धरतीक प्यास मिझाबऽ एलै।। करिया पीठ, सुरूज दिशि कएने। उजरा पेट, धरा दिशि धएने। जानि कतऽ सँ, कोना कऽ एलै ! ! *२ माथक कलगी, कारी रंगक। परजीवी ओ, कोइली ढंगक।*३ जलदक दूत धरा पर एलै।। लोक कहए, पहिलुक वर्षा जल। पिउबि बिताबए, जिनगी चातक। अर्थ छी एतबहि, पावस एलै।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ – चातक आ पपीहाक आगमन भारतमे (खास कऽ उतबारी भारतमे) मॉनसून वा वर्षाऋतुक आगमनक सूचना दैत अछि। *२ – ई चिड़ै अफ्रिका महादेशक मूल निवासी अछि आ ग्रीष्म ऋतुमे बेसी गर्मी पड़लापर ओ भारत आबि जाइत अछि आ फेर शरदऋतुमे आपिस अफ्रिका चलि जाइत अछि। *३ – कोइली जेकाँ ईहो चिड़ै “शिशु-भरण परजीवी” (BROOD PARASITE) अछि आ कौआ आदि आन चिड़ै केर खोंतामे अण्डा दैत अछि। *४ – कहबी छै कि ई चिड़ै मात्र बरखाक पानि पिउबि (स्वाती नक्षत्रक वर्षाक पानि) रहैत अछि पर ताहिमे कोनहु यथार्थ नञि। मतलब बस एतबहि कि चातकक आकमन वर्षाक अगमनक परिचायक अछि। गाबए बला पक्षी होयबाक कारणेँ आ एक्कहि समयमे भारतमे आगमन होयबाक कारणेँ मैथिलीक संग – संग आन भारतीय साहित्य सभमे बहुधा “पपीहा” ओ “चातक” पर्यायवाचीक रूपमे प्रयुक्त होइत अछि। पर यथार्थमे दुहु एकदम भिन्न चिड़ै अछि। पपीहा परेबा या बाजक आकारक होइत अछि जखनि कि चातक मएनाक आकारक। बंगालीमे चातक शब्द अंग्रेजीक स्काइलार्क (SKYLARK) (Alauda spp.) चिड़ै लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि, जकरा हिन्दीमे “चकता” या “अबाबील” कहल जाइत अछि। एकर मैथिली नाँओ एखनि धरि हमरा नञि बूझल अछि। खञ्जन चिड़ैया खजिन चिड़ैञा आ सोन चिड़ैञा (बाल कविता) “खजिन चिड़ैञा” भारत भरिमे, आँखिक लेल प्रशिद्ध छै।*१ बरखा ऋतुमे आबि शरदरहि, गर्मी एतए निषिद्ध छै।।*२ “खजिन चिड़ैञा” केर आँखिमे, की एहेन से बात छै। कारी आँखिक उपमा लए नञि, आनहि कोनहु बात छै।।*३ साहित्य मैथिली, हिन्दी, संस्कृत, बङ्गाली वा आन कोनो। खञ्जन केर चञ्चल आँखिक छै, दोसर ने उपमान कोनो।।*३ कारी - उज्जर रंग चितकाबर, बगरा सनि आकार छै। अपना दिशि एहने बेसी छै, आनो मुदा प्रकार छै।।*४ किछु नीलाभ पीताभ तँऽ आनक, पीयर – भूरा रंग सेहो। बस जमीन पर, दौड़ैत देखब, कूदैत ने देखब कहियो।।*५ छाती - पेट जकर पीयर हो, तकर ‘पिनाकी’ नाम छै। “सोन चिड़ैञा” इएह मैथिलीक, एकर अलगसँ नाम छै।।*६ चिर-परिचित खञ्जन छै प्रवासी, साइबेरियामे धाम छै।*७ सोन चिड़ै ञाएतहि रहैतअछि, सालो भरि आराम छै।।*७ आँखि तँऽ चञ्चल छैहे ओक्कर, नाङ्गरि सेहो चञ्चल छै। बैसल - बैसल नाङ्गरि डोलबए, तखने बूझू खञ्जन छै।।*८ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ – खजिन चिड़ैञा मैथिली, संस्कृत ओ आन भारतीय साहित्य सभमे अपना आँखिक लेल खूब चर्चित अछि। *२ – अपना दिशि वर्षा ऋतुक अन्तसँ लऽ कऽ शीतकाल धरि ई चिड़ै बेसी देखबामे आबैत अछि। *३ – सामान्य जन “खञ्जनआँखि” केर मतलब “कारी आँखि” बूझैत अछि जखनि कि से बात नञि। साहित्यमे “खञ्जन आँखि” केर उपमान “चञ्चल आँखि” केर रूपमे देल जाइत अछि नञि कि कारी आँखिक लेल। “खञ्जन आँखि” केर मतलब ई नञि थिक कि खञ्जन केर आँखिक समान आँखि (जेना मृगनयन/नी मे होइछ) । “खञ्जन आँखि” केर मतलब थिक स्वयं खञ्जन चिड़ै सनि चञ्चल आँखि। खञ्जन चिड़ै बहुत चञ्चल होइत अछि तुरत्तहि उड़ैत अछि, बैसैत अछि, जमीनपर उतड़ैत अछि, फुदकैत अछि संगहि जखन कोनहु डाढ़िपर बैसैत अछि तँऽ किछु तिरछा भऽ बैसल बूझि पड़ैत अछि। एकर इएह प्रकृतिक कारण सुलभ होइतहुँ एकर छविकर्षण बड़ दुरूह काज थिक। *४ *७ – अपना दिशि जे चिड़ै खञ्जन वा खजिन चिड़ैञा नामसँ प्रसिद्ध अछि से चितकाबर रंगक होइत अछि जाहिमे मुख्यतः ३ टा जाति (SPECIES) आबैत अछि । अंग्रेजीमे एकरा “वैगटेल” (WAGTAIL) कहल जाइत अछि। अंग्रेजीक “वैगटेल” (WAGTAIL) केर अंतर्गत मोटा सिल्लावंशक (Genus - MOTACILLA) सभ जातिक अतिरिक्त आनहु किछु जाति सभ अबैत अछि पर मैथिलीमे प्रायः खजिन चिड़ैञा नाम मात्र Motacilla alba, Motacilla aguimp आ Motacilla madraspatensis धरि सीमित बूझि पड़ैत अछि। ताहूमे जँ एहि बातपर जोड़ देल जाए कि “खजिन चिड़ैञा” केर आगमण वर्षा ऋतुक अन्तमे होइत अछि आ ग्रीष्म ऋतुसँ पहिने ओ आपिस चलि जाइत अछि तँ मात्र “मोटा सिल्ला अल्बा” (Motacilla alba) नामक चिड़ैकेँ खजिन चिड़ैञा मानए पड़त कारण जे मात्र इएहटा चितकाबर रंगक जाति अछि जे वर्षा ऋतुक अन्तमे रूसक साइबेरिया (अति शीत क्षेत्र) क्षेत्रसँ अपना ओहिठाम आबैत अछि आ ग्रीष्म ऋतुसँ पहिने आपिस ओत्तहि चलि जाइत अछि । MONIER - WILLIAMS SANSKRIT ENGLISH DICTIONARY मे सेहो मोटा-सिल्ला-अल्बा” (Motacilla alba) नामक चिड़ैकेँ खञ्जन मानल गेल अछि। शरदमे एहि चिड़ै केर आगमनकेँ आन रूपसँ सेहो देखल जा सकैत अछि। जे जाति भारतक मूल निवासी अछि आ प्रवासी नञि अछि ओकर रहबाक स्थान, खोंता बनएबाक स्थान आदि पहिनेसँ तय रहैत अछि। जे प्रवासी जाति अछि से एहिठाम अएलाक बाद नऽव ढंगसँ रहबाक ओ खोंता लगएबाक लेल भागैत – दौड़ैत बूझि पड़ैत अछि। ओकर बढ़ल संख्या ओ विचरणसँ ई आभास होइत अछि कि शरद ऋतुमे अचानकहि “खजिन चिड़ैञा” केर आगमन भेल अछि। एहि बातकेँ ध्यानमे रखैत हम निम्न ३ गोट जातिकेँ खजिन चिड़ैञाक रूपमे मानलअछि - Ø WHITE WAGTAIL - Motacilla alba Ø AFRICAN PIED WAGTAIL - Motacilla aguimp Ø WHITE BROWED WAGTAIL / LARGE PIED WAGTAIL - Motacilla maderaspatensis चितकाबर रंगक आधारपर निम्न २ टा जातिकेँ सेहो सम्मिलित कएल जा सकैत अछि - Ø JAPANESE WAGTAIL - Motacilla grandis Ø FOREST WAGTAIL - Motacilla indica syn. Dendronanthus indicus *५ – खजिन चिड़ैञा वा अंग्रेजीक वैगटेल (WAGTAIL) नामसँ जाहि चिड़ै केर बोध होइत अछि से सभ जमीनपर दौड़िकऽ नञि चलैत अछि अपितु फुदकि – फुदकि कऽ चलैत अछि। *६ - अंग्रेजीक “वैगटेल” (WAGTAIL) केर अंतर्गत मोटा सिल्ला वंशक (Genus - MOTACILLA) एहेन जाति सभ जकर पेट आ वक्ष पीयर रंगक होइत अछि वा पीयर रंगक धब्बा होइत अछि से मैथिलीमे “सोन चिड़ैञा” कहबैत अछि । “सोनचिड़ैञा” केर अन्तर्गत निम्न जाति सभ आबैत अछि - Ø WESTERN YELLOW WAGTAIL - Motacilla flava Ø EASTERN YELLOW WAGTAIL - Motacilla tschutschensis Ø CITRINE WAGTAIL - Motacilla citreola Ø GREY WAGTAIL - Motacilla cinerea *८ – खजिन चिड़ैञा हो अथवा सोन चिड़ैञा –अंग्रेजीमे वैगटेल कहबए बला सभ चिड़ै बैसल – बैसल अपन नाङ्गरिकेँ सतत ऊपर – नीचाँ डोलबैत रहैत अछि। मात्र “बनैया खजिन चिड़ैञा” अपन नाङ्गरिकेँ ऊपर – नीचाँ नञि डोलाए दायाँ – बायाँ डोलबैत अछि। तेँ एकर निम्न नाम सभ अछि - Ø डुलिका (संस्कृत) – जे नाङ्गरि डोलबए Ø खञ्जन – जे पएरसँ नाङ्गर (खञ्ज) मनुक्ख जेकाँ तिरछा बैसैत हो या जकर नाङ्गरि नाङ्गर (खञ्ज) मनुक्खक पएर जेकाँ डोलैत हो। Ø वैगटेल (WAGTAIL) (अंग्रेजी) – जे नाङ्गरि डोलबए (WAGGING TAIL) Ø मोटासिल्ला (MOTACILLA) (लैटिन) – जे नाङ्गरि डोलबए (MOTILE CILA = MOVING TAIL) हंस (बाल कविता) हंसक बीच ने बगुला शोभए, बड़ पुरान ई कहबी छी ।*१ बगुला खेत - पथार भेटैतछि, हंस केहेन − नञि देखने छी ।।*२ सरस्वती माएक वाहन अछि, चित्रमे हम से देखने छी ।*३ अंग्रेजी केर ‘एस’ सनि गर्दनि, बस किताबमे पढ़ने छी ।।*४ सुनै जो बौआ ! सुनै गे बुच्ची ! एहि ठाँ हंस प्रवासी छी । उत्तर दिशि अतिशीत क्षेत्र जे, ताहि ठामक ओ वासी छी ।।*५ एहि ठाँ जे आबैत हंस छल, देह - पाँखि उज्जर होइ छल । लोलक उद्गम - स्थल कारी, लोल गाढ़ - पीयर होइ छल ।।*६ शीत समयमे छल आबैत, कहियो ओ उड़ैत हिमालयसँ । अपनहुँ ठाँ देखना जाइत छल, सटल जे क्षेत्र हिमालयसँ ।।*७ चर्चा अछि साहित्यमे सौंसे, मानसरोवर - श्वेत हंस केर । करैछ ईशारा टपि हिमगिरि, ने बेसी काल रहैछ हंस फेर ।।*८ विश्वक छै मौसिम बदलि गेल, पहिनुक सभटा छै उनटि गेल ।*९ बीतल कए बरख, कतेक पुस्त, ने हंसक छी आगमण भेल ।।*१० सए बरख - हजार पता नञि से, कहियासँ हंस निपत्ता अछि । साहित्यमे सौंसे धवल - हंस, पर दर्शन हएब सिहन्ता अछि ।।*१० हंसक ई अर्थ विशिष्ट भेल, सामान्य अर्थ बड़ व्यापक अछि । बहुविध जलीय पक्षी शामिल, कलहंस, राज आ जलपद अछि ।।*११ ओना तँऽ अप्पन शास्त्र कहैतछि, हंस होइत अछि उज्जर । मुदा हंस किछु कारी सेहो, भेटैछ एहि धरती पर ।। किछु एहनो छी हंस जकर बस, गर्दनि टा कारी होइए । जँ बूझी अहँ हंस धवल बस, तँऽ विश्मयकारी होइए ।।*१२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - ‘न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये वको यथा’ - संस्कृतहि युगक कहबी छै । *२ - छोटकी बगुला सभ तँऽ बहुतायतमे पानि लागल खेत - पथारसभमे देखबामे आबैत अछि । पर हंस अपना दिशि केओ नञ देखने अछि । जँ केओ देखने अछि तँऽ मात्र चित्रमे वा प्राणी उद्यानमे अथवा जँ केओ कीनि कऽ पोषने हो । *३ - धवल-श्वेत होयबाक कारण हिन्दू धर्म शास्त्रक अनुसार हंसकेँ माए सरस्वतीक वाहन मानल गेल अछि । देवी सरस्वतीक चित्र वा प्रतिमाक संग प्रायः हंसक चित्र वा प्रतिमा सेहो रहैत अछि । यद्यपि ओ चित्र वा प्रतिमा काल्पनिक होइत अछि पर परम्पराक आधारेँ बनैछ तथा ओ परम्परा अति प्राचीन अछि - हजारों वर्ष पुरान । *४ - किताबसभमे वर्णन रहैछ कि हंसक गर्दनि अंग्रेजी वर्णमालाक “एस” (S) आखर सनि होइत अछि । *५ *७ - अतिप्राचीन कालहिसँ भारतीय साहित्यमे हंसक प्रवासी होयबाक बात कहल गेल अछि जे कि हिमालयसँ सटल भू-भागमे हिमालय शिखरसँ उतरि मात्र शीतऋतुमे आबैत छल । *६ - पारम्परिक जनश्रुति ओ संस्कृत आ आन संस्कृतेतर साहित्यसभसँ ज्ञात होइत अछि कि हंसक धऽर आ गर्दनि धवल श्वेत वर्णक होइत छल जखनि कि लोल गाढ़ पीयर रंगक । लोल जाहि ठाम मूरीसँ जुड़ल रहैत छल ओहि ठामसँ आँखि धरिक स्थान कारी होइत छल । *८ - कैलास पर्वत पर मानसरोवरमे हंस रहैत अछि, ओतहिसँ ठण्ढीमे आबैत अछि आ फेर ओतहि चलि जाइत अछि । ई एकटा ईशारा थिक कि हिमालय वा हिमालयसँ आओरो आगाँ (उत्तर वा उत्तर-पच्छिम दिशि) हंस सभक मूल निवास स्थान अछि । *९ - विश्वक जलवायू आ मौसिम निरन्तर बदलैत रहैत अछि । केवल आजुक ‘हरित गृह प्रभाव’ तथा ‘वैश्विक गर्मी’ केर बात नञि अछि । किछु हजार वर्ष पहिनहु मौसिमक बदलावक संकेत आयुर्वेदक महान कृति “सुश्रुत संहिता”मे भेटैछ । जखनि कि हंसक प्रथमोल्लेख ऋग्वेदमे भेटैछ । आयुर्वेद अथर्ववेदक उपांग मानल जाइत अछि जे कि निश्चित रूपेँ ऋग्वेदसँ नऽव अछि । *१० - विगत कतेको सए अथवा हजार वर्षसँ हिमालयक दच्छिनमे आ खास कऽ दच्छिन-पूबमे हंसक प्राकृतिक रूपसँ आगमण नञि भेल अछि । ओहिसँ पहिने सम्भवतः “मूक हंस / म्यूट स्वान” (MUTE SWAN) ठण्ढीमे भारतक हिमालयसँ सटल क्षेत्रसभमे आबैत छल किएक तँऽ भारतीय वाङ्गमयमे वर्णित हंस केर विवरण ओकरहिसँ मेल खाइत अछि । ई हंस विश्व केर आन हंस आ जलपदक अपेक्षा कम हल्ला मचबैत अछि तेँ ओकरा अंग्रेजीमे “म्यूट स्वान”(MUTE SWAN) कहल जाइत अछि जकर मैथिली अनुवाद भेल “मूक हंस” । ई हंस पुर्ण रूपसँ बौक नञि होइत अछि अपितु अपेक्षाकृत कम बजैत अछि । *११ - “हंस” शब्द जखन अगबे प्रयुक्त होइत अछि तँऽ ओहि शब्दसँ जाहि विशिष्ट चिड़ै केर बोध होइत अछि से अंग्रेजीमे “स्वान” (SWAN) कहबैत अछि जकर गर्दनि अंग्रेजीक “एस” आखर सनि होइत अछि । ई “हंस” शब्दक विशिष्ट अर्थ भेल । “हंस” शब्द जखन हंस सदृश समस्त जलीय पक्षीक बोध करबैत अछि तखन ओहि मे हंस केर अलावे आन जलीय पक्षी (जेना कि - हंसक वा जलपद) सेहो आबैत अछि । ई “हंस” शब्दक सामान्य अर्थभेल । जखन हंस शब्द आन कोनहु विशेषण या उपसर्गक संग (यथा - कलहंस, राजहंस आदि) आबैत अछि तँऽ ओहिसँ तदनुरूप आन कोनहु जलीय पक्षीक बोध होइत अछि । *१२ - भारतीय वाङ्गमयमे यद्यपि मात्र धवल-श्वेत हंस केर चर्च भेटैत अछि पर पृथिवीक दच्छिनी गोलार्ध केर महाद्वीप सभमे कारी हंस सेहो भेटैत अछि । दच्छिनी अमेरिका महाद्वीपमे हंसक जे प्रजाति भेटैछ तकर गर्दनि आ मूरी कारी तथा धऽर उज्जर होइत अछि । ऑस्ट्रेलिया महाद्वीपमे भेटए बला हंस केर मूरी, गर्दनि आ धऽर पूरा कारी होइत अछि । चकोर (बाल कविता) अहाँ नील गगन केर चन्दा, हम छी धरतीक चकोर । गाबै छथि ई गीत भाइजी, भऽ कऽ बड़ भाव-विभोर ।।*१ शायद जिनगीमे भैय्या, देखल ने कहियो चकोर । जँ देखता तँऽ फेर ने कहता, हम धरतीक चकोर ।।*२ रातिमे बैसल एकटक चानकेँ, देखल करैछ चकोर । साहित्यक छी कोर−कल्पना, साँच ने एहिमे थोड़ ।।*३ छोट लोल आ छोटकी मूरी, बड़की टा केर पेट छै । छोटकी दूटा पाँखि उड़ए नहि, सौंसे देह बस पेट छै ।।*२ तित्तिर बटेर सनि लड़ैछ ईहो, करैछ मनुक्खक मनोरंजन । इएह कारणेँ राष्ट्र-चिड़ै कहि, पाक करैतछि अभिनन्दन ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ *२ - मैथिली सहित समस्त भारतीय साहित्यमे चान आ चकोरक उपमा-उपमेय रूपी उदाहरण प्रसिद्ध अछि । ओहने एकटा गीत केओ भाइसाहेब गाबैत छलाह आ ताहि पर आँगनक छोट मुदा नटखट भाए-बहीन सभक ई कटाक्ष भरल उक्ति अछि । ओ सभ गीतक भाव नञि बूझि शाब्दिक अर्थकेँ ध्यानमे राखि कटाक्ष कऽ रहल अछि जे चकोरक तँऽ सौंसे देहमे खाली पेटे छै तखन भाइजी ओकरा अपनासँ तुलना कोना कऽ रहल छथि; शायद भाइजी कहियो चकोर नञि देखने छथि । *३ - मैथिली सहित समस्त भारतीय साहित्यमे चान आ चकोरक जे खिस्सा-पिहानी बताओल गेल अछि से बस साहित्यिक प्रलाप थिक । ओहिमे वास्तविकता लेशमात्रो नञि अछि । *४ - बटेर आ तित्तिर जेकाँ चकोर केर लड़ाएब सेहो किछु समुदायमे प्रसिद्ध अछि । तेँ ओ मनोरंजक पक्षीक श्रेणीमे आबैत अछि । पाकिस्तानक ओ राष्ट्रिय चिड़ै अछि । हंसक या जलपद (बाल कविता) हम हंसक, जलपद सेहो कहबी, लोक तँऽ हमरो हंस कहैए ।*१ हंस भेल भारतसँ अलोपित, लोक तँऽ हमरे हंस बुझैए ।।*२ हंस ओ बत्तख दुहुक बीचमे, हमरहि तँऽ स्थान आबैए । की बेजाए हंसहि सनि हमरो, जगमे जञो सम्मान भेटैए ?? ओहुना जगमे कहाँ कतहु छै, “नीर - क्षीर - विवेकी” हंस ? *३ ग्रीवक वक्रता आ आकारकेँ, बिसरि जाइ तँऽ छीहे हंस ।।*४ ओहुना हंसक प्रतिनिधि रूपमे, हमरहि अहँ सब बूझी हंस । ने विशिष्ट तँऽ, व्यापक अर्थमे, हमरा मानि सकै छी हंस ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आकार-सुकार आ आन गुणधर्मक आधार पर “हंसक” समूहक जलीय पक्षी “हंस” तथा “बत्तख” केर बीचक जैव श्रृंखलामे अबैछ । तेँ साहित्यमे बहुधा स्पष्ट नामकरण ओ वर्गीकरणक अभाव देखल जाइछ आ उपरोक्त तीनू शब्द भ्रामक रूपेँ परस्पर पर्यायी जेकाँ प्रयुक्त होइत आयल अछि । *२ - भारतमे (विशेष कऽ पुबारी भारत ओ नेपालमे) कतेको सए किंवा हजार वर्षसँ हंसक प्रवास नञि होयबाक कारण उपरलिखित तथ्य क्रमशः आओरो बलगर होइत गेल अछि । *३ - नीर-क्षीर विवेकी हंस अर्थात दूध आ पानिकेँ फेंटला पर पृथक करएबला हंस विश्वमे कतहु नञि होइत अछि । ई मात्र साहित्यिक गल्प थिक, वास्तविकता नञि । *४ - ग्रीवा सुरेबगर वक्रता आ देहक आकारकेँ जँ छोड़ि देल जाए तँऽ हंस ओ हंसकमे बेसी अन्तर नञि । *५ - ओहुना सम्पुर्ण भारतीय उपमहाद्वीपमे वास्तविक “हंस” केर अनुपस्थितिक कारण सैकड़ों बरखसँ प्रतिनिधिस्वरूप हंसकेकेँ हंस मानल जाइत रहल अछि। चकबा या चकेबा (बाल कविता) साम - चक, साम - चक, चक माने की ? *१ चकसँ चकेबा − से बुझही ।। चकबा - चकेबा एक्कहि बात । संस्कृतमे कहबए चक्रवाक ।।*२ एकरे नाम छी ब्राह्मिणी हंस । कर अबाज जेना करइछ हंस ।।*३ चक्रबद्ध निकसए छै अबाज । तेँ कहबैछ ओ चक्रवाक ।।*४ सामा दाइकेँ पड़लन्हि श्राप । तेँ ओ भए गेलीह चक्रवाक ।।*१ ई छी एकटा चिड़ै केर नाम । बसए चिड़ै जे दोसर ठाम ।।*५ उत्तर - भर ठण्ढा जे प्रदेश । ततहिसँ आबए अपना देश ।।*५ ठण्ढीमे आबए एहि ठाम । शान्त जलाशय कर विश्राम ।। कोशीक कछेड़, कोशी बैराज । एकर प्रिय - स्थली - प्रवास ।।*६ कहुखन बड़का पोखरि बीच । पानिमे बत्तख सनि ई जीव ।।*६ रातिमे विचरए सर्वाहारी । लोल पछलुका पाँखि छै कारी ।।*७ स्वर्णिम बिचला देह आ पाँखि । उज्जर गर्दनि कारी आँखि ।।*७ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - संदर्भ पाँती − “साम-चक, साम-चक अबिहऽ हे” − मिथिलाक विशिष्ट पाबनि “सामा - चकेबा”सँ । एहि पाबनिक कथामे सामा दाइ श्रापक कारण चकेबा चिड़ै भऽ गेल छलीह । *२ - तत्सम “चक्रवाक” केर तद्भव रूप अछि “चकबा” या “चकेबा” । *३ - हंस सनि आबाज निकालबक कारण एकरा संस्कृत साहित्यमे “ब्राम्हिणी हंस” सेहो कहल गेल अछि । *४ - चकेबाक ई हंसवत आबाज चक्रबद्ध रूपमे नकलैत अछि (A SERIES OF LOUD NASAL HONKING NOTES/CALL) तेँ संस्कृतमे एकर नाम पड़ल “चक्रवाक” (चक्र = चक्रबद्ध तथा वाक् = बोल/आवाज) । *५ - मिथिला सहित सम्पुर्ण भारतवर्षमे चकेबा प्रवासी पक्षी (MIGRATORY BIRD) केर रूपमे आबैत अछि । एकर मूल स्थान उतरबारी एशिया (रूसक साइबेरिया क्षेत्र) आ दच्छिन-पूब यूरोप अछि जाहि ठाम सालहु भरि भारतक अपेक्षा मौसिम ढण्ढा रहैत अछि । ठण्ढीक समयमे ओहि क्षेत्रसभमे असहनीय ढण्ढी पड़बाक कारण ई चिड़ै पड़ाए कऽ वा प्रवास कऽ हिमालय केँ नाँघि भारतीय उपमहाद्वीपमे आबैत अछि आ एहि ठामक पैघ ओ मीठ पानिक जलाशयसभमे, वा शान्त बहैत नदीक कछेड़ वा बाढ़िक पानिसँ बनल दलदली क्षेत्रसभमे देखल जा सकैत अछि । नेपाल स्थित कोशी-बैराजमे कोनहु एक समयमे एहि चिड़ै केर उपस्थिति चारि हजार (4000) धरि देखल गेल अछि । *६ - पानिमे हेलैत काल ई स्वर्णाभ-पीयर पाँखियुक्त बत्तख सनि लागैत अछि । कहुखन - कहुखन सिल्ली जेकाँ सेहो लागैत अछि पर चकेबा आ सिल्ली दुहु दू चिड़ै केर नाम थिक । *७ - एकर लोल आ पछिला नाङ्गरि परहक पाँखि कारी होइत अछि । शेष पाँखि ऊपर सँ स्वर्णाभ-पीयर आ भीतरसँ उज्जर होइत अछि । वक्ष तथा उदर सेहो स्वर्णाभ-पीयर रहैत अछि । माथ, गर्दनि आ मुख्य पंखक पछिला हिस्सा प्रायः उज्जर सनि रहैत अछि । नाङ्गरि/लाङ्गरि आ नाङ्गर मैथिलीमे श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द अछि - · नाङ्गरि/लाङ्गरि - पूँछ (TAIL) · नाङ्गर - प्रायः एक पएरसँ विकलाङ्ग (HEMIPARESIS / HEMIPARALYSIS / HEMIPLEGIC); दुहु पएरसँ विगलाङ्ग तथा चलबा वा ठाढ़ हएबामे असमर्थ “लोथ” (PARAPARESIS / PARAPARALYSIS / PARAPLEGIC) कहल जाइत अछि । बत्तख (बाल कविता) हंस आ हंसकसँ हम छोट । ओकरा सभसँ कम्मे मोट । तइयो उड़ि नञि पाबैत छी ।।*१ हमरामे बहुते वैविध्य । बेसीतर नहिञे उड़ैछ । जलक्रीड़ा केर आदति छी ।।*२ नञि उड़ैछ बत्तख संज्ञा । जँ उड़ैछ हंसक उपमा । उड़बासँ हंस कहाबैत छी ।।*३ चितकाबर उज्जर कारी । पीयर भूरा मटियाही । पएर पीयर - नारंगी छी ।।*४ पानिमे हेलएमे माहिर । डुम्मी काटएमे माहिर । उड़बा केर बदला इएह सही ।।*५ अंडा छी कम्मे स्वादिष्ट । पर बूझू बहुते पौष्टिक । तेँ अहँ पोषैत - पालैत छी ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - हंस ओ हंसक केर तुलनामे बत्तख बहुत छोट आ हल्लुक होइत अछि पर तइयो बेसीतर बत्तख उड़ि नञि पाबैत अछि । *२ - अंग्रेजीक DUCK शब्द केर क्षेत्र बहुत व्यापक अछि; तहिना मैथिलीक “बत्तख” केर क्षेत्र सेहो । एकर अन्तर्गत कतेको वंशक जलीय पक्षीक बहुतो जाति ओ प्रजाति आबेत अछि जाहिमे बेसीतर नञि उड़ि सकैत अछि । *३ - DUCK या “बत्तख” शब्दक अन्तर्गत आबए बला बेसीतर चिड़ै उड़ि नञि पाबैत अछि । पर एकरहि अन्तर्गत उपविभाग SHELDUCK मे आबए बला चिड़ै नीक उड़ान भरैत अछि आ प्रवासी प्रकृतिक होइत अछि । मैथिलीमे प्रायः नञि उड़ि सकए बला DUCK केँ “बत्तख” कहल जाइत अछि पर उड़ए बला DUCK केँ व्यापक स्वरूपमे “हंस” कहि देल जाइत अछि । एहेन किछु DUCK केर लेल मैथिलीमे विशिष्ट नाम सेहो अछि, यथा - चकेबा, सिल्ली आदि । *४ - देहक रंग जे हो पर अपना दिशि प्रायः बत्तखक पएरक रंग पीयर वा नारंगी सनि होइत अछि । *५ - ओना तँऽ प्रायः हर बत्तखमे कमोबेश हेलबाक आ गोंता लगएबाक क्षमता होइत अछि, पर समुद्री परिवेशमे भेटए बला बत्तख बहूत गँहीर गोंता लगाबएमे माहिर होइत अछि । *६ - जे केओ अण्डा खाइत छथि तनिका कथनानुसार बत्तखक अण्डा मुर्गीक अण्डाक अपेक्षा कम स्वादिष्ट होइत अछि । यूनानी आ पारम्परिक चिकित्सामे एकरा विशेष पौष्टिक ओ औषधीय गुण सम्पन्न मानल जाइत अछि । पपीहा (बाल कविता) पपीहा, देखू देखि रहल अछि पपीहा । पपीहा, जा कऽ सभसँ कहत पपीहा । पपीहा, देखू चुप नञि रहत पपीहा ।*१ पपीहा, मुदा केहेन होइछ पपीहा ?? कू - कू - कू - कू कोइली गाबए । पी - पी पपीहा राग अलापए । किछु कोइली सनि लागि रहल ओ, लोल बाज केर भ्रम उपजाबए ।।*२ बहुत किछु कोइलीसँ मिलए पपीहा । लागए खन एक्के कोइली - पपीहा । बहुत केओ कह पर्याय पपीहा । मुदा छी अलगे कोइली - पपीहा ।।*३ भरण-परजीवी कोइली सनि ओहो । आन चिड़ैकेँ धोखबै छै ओहो । अपन ने खोंता बनबै छै आ, अनकहि खोंता अण्डा दैछ ओहो ।।*४ बहुत धोखेबाज चिड़ै छै पपीहा । केवल नर गाबए गीत पपीहा ।*५ गीत, धोखा केर गीत पपीहा ।*६ अहाँ देखितहुँ ने चिन्हब पपीहा ।।*७ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - ई तीनू पाँती एक टा पुरान हिन्दी फिल्मी गीतक मैथिली अनुवाद थिक । फिल्मक नाम छल “फरियाद” जे सन १९६४ ई॰मे बनल छल । एहि गीतमे कहल गेल बातकेँ वास्तविकतासँ कोनहु सम्बन्ध नञि थिक । पर मोनमे एक टा जिज्ञासा अवश्य होइत अछि कि आखिर ई “पपीहा” नामक चिड़ै देखबामे केहेन होइत अछि । *२ - कोइली आ पपीहा एक्कहि परिवारक चिड़ै अछि । दुनुकेर आवाज मनुक्खक लेल कर्णप्रिय थिक । पपीहा केर लोल “बाज” नामक चिड़ै जेकाँ आगाँसँ मुड़ल होइत अछि तेँ अंग्रेजीमे एकरा HAWK CUCKOO कहल जाइत अछि । *३ - बहुत लोक कोइली आ पपीहाकेँ एक-दोसराक पर्यायी नाँओ बुझैत छथि पर से नञि - दुहु भिन्न चिड़ै थिक । *४ - सभ प्रकारक कोइली आ पपीहा शिशु-भरण परजीवी (BROODING PARASITE) होइत अछि । ओ अपन अण्डा कौआ, करिया धनछुआ, धनछुआ या एहि तरहक आन चिड़ैसभक खोंतामे दैत अछि जे कि शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि । शिशु-भरण परजीवी अपन अण्डा चोड़ा-नुका कऽ शिशु-भरण पोषकक खोंतामे दऽ दैत अछि आ शिशु-भरण पोषक अपन अण्डाक संग-संग परजीवीक अण्डाकेँ सेहो सऐत अछि, अण्डासँ बच्चाकेँ निखालेत अछि आ खोअबैत-पिउपैत अछि । उड़बा जोकर भेलापर परजीवी कोइली या पपीहाहक बच्चा अपना-अपना झुण्डमे भागि जाति अछि आ ताहि बच्चाकेँ भागि गेला पर स्त्री/मादा कौआकेँ उदास होइत सेहो देखल गेल अछि । *५ - नर/पुरुष कोइली जेकाँ केवल नर/पुरुष पपीहा “पी - पी” केर आवाज निकालैत अछि, मादा/स्त्री पपीहा नञि । *६ - पपीहा “पी - पी” केर आवाज वास्तवमे कौआ आदि केँ खौंझएबाक लेल निकालैत अछि । कौआ खौंझा कऽ अपन खोंता छोड़ि नर/पुरुष पपीहाकेँ खेहाड़ैत अछि आ ताहि बीचमे मादा/स्त्री पपीहा अपन अण्डा ओहि कौआक खोंतामे धऽ दैत अछि । कोइलीक “कू - कू” केर आवाज सेहो इएह तरहक आवाज अछि । *७ - कएक बेर पपीहा सामने रहितो अछि तँऽ साधारण लोक ओकरा नञि चीन्हि पाबैत अछि, ओकरा “बाज” बुझबाक धोखा कऽ बैसैत अछि । पपीहा, कोइली आ मएना भूआ खाए मे माहिर (EXPERT) होइत अछि । ओकरा बूझल रहैत छै कि भूआ (CATERPILLARS / CATERPILLAR LARVAE) केर कोन भाग विषाह छै । भूआक विषाह भागकेँ ओ अपन चाङ्गुरसँ दाबि कऽ आ गाछक ठोस डाढ़ि पर रगरि कऽ हटा दैत छै आ खा जाइत अछि । सिल्ली (बाल कविता) झुण्डक - झुण्ड आबै छै, उतरए पोखरि - डबरा - खत्ता । सर्वेक्षण कऽ पहिने देखैछ, कत्तऽ मनुक्ख निपत्ता ।।*१ जाहि ठाम मनुखक सञ्चर, ने उतड़ए ओ ताहि ठाम । आबादीसँ दूर जलाशय, ठण्ढी - सिल्ली - धाम ।। उतड़ए शान्त जलाशय, खेलए - कूदए - भूख मेटाबए । कनिञे कालमे उड़ए झुण्ड, ताकए फेर नऽव जलाशय ।। बत्तख सनि लागए धरती पर, दूर - गगन पानिकौआ । सिल्ली हेंजक-हेंज आबैछ, एकसरि प्रायः पानिकौआ ।।*२ मिथिलामे बुझले अछि सभकेँ, जीहक बड़ चटकार । मांसु लेल सिल्ली केर होइतछि, गामे - गाम शिकार ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु चिड़ै पानिमे उतड़बासँ पहिने पूरा क्षेत्र केर आकाशीय सर्वेक्षण करैत अछि आ मनुक्खसँ सुरक्षित दूरी देखलाक बादे पानिमे उतरैत अछि । ई सर्वेक्षण एक वा एकाधिक बेर ताहि क्षेत्रविशेषक चक्कर काटि कऽ कएल जाइत अछि । पानिकौआ ई सर्वेक्षण प्रायः एकल स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि सिल्ली सामुहिक रूपसँ । *२ - पानिमे हेलैत काल सिल्ली बत्तख सनि लागैत अछि जखनि कि आकाशमे उड़ैत काल पानिकौआ सनि । पर बत्तख एतेक ऊँच कखनहु नञि उड़ैत अछि आ पानिकौआ एतेक पैघ झुण्डमे कहियो नञि देखाई दैत अछि । पानिकौआ या पानिकौर (बाल कविता) पाछाँ कौआ सनि छै कारी, या कारी नर कोइली सनि । आगाँ ककरो कारी - उज्जर, या छाउरक छै रंग जेहेन ।।*१ कोनो जलाशय, जतऽ मनुक्खक, आबाजाही कम हो । ताहि भीड़*२लग, गाछ बाँस पर, पानिकौआ हरदम हो ।। आँखि गड़ओने, पोखरिक पानिमे, बैसल एकटक ताकए । देखिते माछ, ओ आबए चट दऽ, लूझि लोलमे भागए ।। बहुधा माछ पकड़बा लए ओ, पानिमे गोंता मारए । भीजल पाँखिकेँ, ऊँच गाछ पर, फोलि हवामे सुखाबए ।।*३ पानिमे हेलबासँ पहिने, ओ करैछ क्षेत्र सर्वेक्षण । दूरी उचित मनुक्खसँ तखनहि, पानिक बीच पदार्पण ।।*४ कारी हंस वा बत्तख सनि ओ, पानिमे हेलैत लागैछ । मनुखक आहटि दूरहुसँ जँ, चट दऽ उड़ि कऽ भागैछ ।। जलकर - माछक व्यवसायीकेँ, करैछ बहुत नोकशान । बान्हि छकाबए करिया पन्नी, बूझए उतड़ल आन ।।*५ एहि धरती केर एक द्वीप पर, पानिकौआ छी एहनो । उड़ि ने सकै ओ पंख अछैतो, उड़ै छल पहिने कखनो ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पानिकौआ (उच्चारण - पैनकौआ) या पानिकौर (उच्चारण - पैनकौर) केर पछिला भाग (पीठ दिशका भाग) भीजल रहला पर एकवर्णी कौआ सनि कारी लागैत अछि जखनि कि सुखाएल रहला पर कारी तँऽ अवश्ये रहैत अछि पर कारीक मात्रामे तर-तम भाव बुझना जाइछ । अगिला भाग (पेट दिशका भाग) कोनहु प्रजातिमे कारी, कोनहुमे उज्जर वा कोनहुमे छाउरक रंग सनि कारी होइत अछि । लोल सेहो छाउरक रंग सनि होइत अछि । *२ - भीड़ - ई शब्द मैथिलीमे अनेकार्थक अछि - · भीड़ - पहिल अर्थ भेल “मेला-रेला” या “जनसमूह” · भीड़ - दोसर अर्थ भेल “पोखरिक भिण्डा” एहि ठाम दोसर अर्थ (भिण्डा) अभिप्रेत अछि । *३ - पानिकौरक लेल पानिसँ भीजल अपन पंखकेँ सुखाएब आवश्यक थिक । ताहि हेतु ओ कोनहु गाछक ऊँच डाढ़ि पर वा बाँसक छुपुङ्गी पर अपन पंखकेँ पसारि कऽ बैसि जाइत अछि आ हवामे ओकरा सुखबैत अछि । *४ - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु चिड़ै पानिमे उतड़बासँ पहिने पूरा क्षेत्र केर आकाशीय सर्वेक्षण करैत अछि आ मनुक्खसँ सुरक्षित दूरी देखलाक बादे पानिमे उतरैत अछि । ई सर्वेक्षण एक वा एकाधिक बेर ताहि क्षेत्रविशेषक चक्कर काटि कऽ कएल जाइत अछि । पानिकौआ ई सर्वेक्षण प्रायः एकल स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि सिल्ली सामुहिक रूपसँ । *५ - पानिकौआ आ सिल्ली दुहु माछ खाइत अछि आ तेँ व्यावसायिक रूपेँ माछ पोषनिहार लोकक लेल हानिकर अछि । तेँ ओसभ डोरीमे बीच-बीचमे करिया पन्नीकेँ (पॉलीथीन) बान्हि पोखरिक एक भीड़सँ दोसर भीड़ धरि टाँगि दैत छथि । आकाशीय सर्वेक्षण करए काल पानिकौआ आ सिल्ली एकरा पहिनेसँ उतरल आन पानिकौआ या सिल्लीक समूह बूझि धोखा खाए जाइत अछि आ ओहि जलाशयक पानिमे नञि उतड़ैत अछि । *६ - प्रशान्त महासागरक (GALAPAGOS ISLANDS) गॅलापॅगॉस द्वीपसमूह पर पानिकौरक एक टा एहेन प्रजाति थिक जकरा पाँखि तँऽ छै पर ओ उड़ि नञि सकैत अछि । मतलब कि उड़नाइ बिसरि गेल अछि आ तेँ ओकर पंख बहुत छोट भऽ गेल छै आ देह भारी । एकरा गॅलापॅगॉस पानिकौआ या गॅलापॅगॉस पानिकौर (GALAPAGOS CORMORANTS) कहल जाइत अछि । एकर वैज्ञानिक नाँओ फॅलॅक्रॉकॉरेक्स हॅरीसी (Phalacrocorax harrisi) थिक । कठखोद्धी या कठखोधी (बाल कविता) काठ खोधै छै अपना लोलसँ, कहबै छै तेँ कठखोद्धी । जे धरती पर माटि खोधै छै, से ने बुझियौ कठखोद्धी ।। काठ खोधि बनबइए धोधरि, गाछे - गाछे कठखोद्धी । गाछे नञि लकड़ीक उपस्कर, खाम्हो खोधैछ कठखोद्धी ।। माटिखोद्धी केर पातर लोल, कठखोद्धी केर मोट छै । माटिखोद्धी केर नमगर लोल, कठखोद्धीक किछु छोट छै ।। माटिखोद्धी केर माथक कलगी, पीयर आओर विभक्त छै । कठखोद्धी केर लाले टुहटुह, जँ छै तँऽ संशक्त छै ।।*१ पीठ - पाँखि पर स्वर्णिम पीयर, मूल रंग चितकाबर छै । अपना ठाँ इएह बेसी भेटत, जगक विविधता व्यापक छै ।।*२ चिड़ै छै पर गाछहु पर ओ तँऽ, सरपट दौड़ै - भागै छै ।*३ नाङ्गरिकेँ ओ आड़*४ बना कऽ, टिका गाछ पर बैसए छै ।। लोलसँ ठक-ठक करइत गाछमे, धोधरि सेहो बनाबै छै । अपनहु ओहिमे बास करैए, आ दोसरोकेँ बसाबै छै ।।*५ काठक अन्दरमे जे कीड़ा, परजीवी बनि पैसल छै । तकरा खा कऽ पेट भरए ओ, गाछक जिनगी बढ़बै छै ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - माटिखोद्धी केर माथक कलगी नारंगी-पीयर रंगक ओ अरीय रूपसँ विभक्त होइत अछि । जखनि कि आपना दिशि सामान्य रूपसँ भेटए बला कठखोद्धीक माथक कलगी लाल रंगक होइत अछि आ माटिखोद्धीक कलगीक तुलनामे संशक्त होइत अछि । विश्वक आन भाग मे पाओल जाए बला कठखोद्धीक किछु प्रजातिमे या तऽ कलगी नञि होइत अछि या आन रंगक सेहो होइत अछि । *२ - विश्वमे कठखोद्धीक बहुत तरहक बगए-बानी अछि पर अपना दिशि बेसीतर एहने भेटैछ । *३ - चिड़ै होयबाक बावजूदो ई गाछ पर उदग्र रूपेँ (VERTICALLY) तेजीसँ दौड़ि सकैत अछि । ई एकर विशेषता अछि । *४ - आड़ = गाछ पर अपनाकेछ एक स्थान पर बेसी काल टिकएबाक लेल आ काठ खोधए काल देह हिलए-डोलए नञि ताहि हेतु कठखोद्धी अपन नाङ्गरिकेँ मजगूत आड़ जेकाँ उपयोगमे आनैत अछि । *५ - माटिखोद्धी गाछमे वा काठमे धोधरि नञि बनबैत अछि जखनि कि कठखोद्धी बनबैत अछि । ओहि धोधरिमे पहिने अपने रहैत अछि आ बादमे छोड़ि देला पर ओहि परित्यक्त धोधरिकेँ आन चिड़ै (जेना कि - सुग्गा) वा दोसर कोनहु जीव ओकरा अपन खोंता या घऽरक रूपमे प्रयोग करैछ । *६ - गाछक अन्तः परजीवीक (ENDO PARASITES) रूपमे जे कीड़ा-मकोड़ा गाछमे घुसल रहैत अछि आ गाछक लेल नोकशानदायक होइछ तकरा आ तकर अण्डा ओ बच्चाकेँ कठखोद्धी खा जाइत अछि । एहि तरहेँ कठखोद्धीक पेट भड़ैत अछि आ संगहि गाछ सभक आयुर्दा बढ़ैत अछि । पानिडुब्बी या मछरेंगा (बाल कविता) मत्स्यरंक संस्कृतक छी हम, अंग्रेजीक किंगफिशर । पानिडुब्बी सभ लोक कहैए, मिथिला माटिक ऊपर ।।*१ मछरेंगा सेहो हमरे नाम छी, संस्कृतहिसँ निकलल । दच्छिन-पूब विदेहक भू पर, नाम ईहो अछि भेटल ।।*१ नील-हरित छी पीठ-पंख, आ श्वेत श्याम वक्षोदर । लाल-नारंगी चटक रंग सेहो, बीचमे फेंटल फाँटल ।।*२ लाल-नारंगी-कत्थी-कारी, चटक रंग छी लोलक । कायक तुलना पैघ लोल छी, से अपनहुँकेँ बूझल ।।*३ कएटा जाति-प्रजाति हमर, सौंसे संसारमे पसरल । पर मिथिलासहिते भारतमे, बेशी एहने भेटत ।।*४ माछ प्रिय हमरा छी बहुत, तेँ एहने सभटा नाम । बेरि - बेरि काटी हम डुम्मी, पानिडुब्बी तेँ नाम ।।*१ कोनहु जलाशय नहरि-नदी वा पोखरि-डबरा-खत्ता । काते-काते बैसल देखब, झुकल गाछ वा खुट्टा ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मैथिलीमे एकर दू टा नाम अछि । पहिल अछि “पानिडुब्बी चिड़ै” (उच्चारण - पैनडुब्बी) जे कि माछ पकड़बा लेल बेर - बेर गोंता लगएबाक (वा झपट्टा मारबाक) कारण पड़ल होयत । दोसर पर्यायी नाम अछि “मछरेंगा” जे कि सम्भवतः संसकृत नाम “मत्स्यरंक” केर तद्भव रूप थिक । *२ - एकर किछु प्रजातिमे लालछौंह पीयर वा नारंगी रंग सेहो भेटैछ आन किछु प्रजातिमे नञि । *३ - पूरा शरीरक तुलनामे एकर लोल बेस नमगर, मोट आ ठोसगर बुझना पड़ैछ । *४ - विश्वमे पानिडुब्बी चिड़ै केर कएक टा जाति - प्रजाति पाओल जाइत अछि जाहिमे कोनहु पीयर रंगक तँऽ कोनहु नारंगी, कोनहु भूरा तँऽ कोनहु चितकाबर रंगक सेहो होइत अछि । माटिखोद्धी या माटिखोधी (बाल कविता) बैसल - बैसल माटि खोधै छेँ, माटिमे की तोँ ताकै छेँ ? गाछ लोलसँ ठक - ठक करइत, कठखोद्धी सनि लागै छेँ ।।*१ हम ने अनेरो माटि खोधै छी, कीड़ा − खएबा लेल तकै छी । गाछक छालकेँ खोधि-खाधि कऽ, सेहो अपन आहार तकै छी ।।*२ काठ खोधि ने धोधरि बनबी, कठखोद्धीसँ भिन्न छी हम ।*३ हमर लोल पातर - नमगर छी, माटि खोधक उपयुक्त जेहेन ।।*४ माथ - वक्ष - गर्दनि छी पीयर, पीयर - नारंगी अछि कलगी । खोधए काल माटि − पंखा सनि, शोभए माथ हमर कलगी ।।*५ पछिला भाग पाँखि आ नाङ्गरि, श्वेत - श्याम एकान्तर छी । कठखोद्धी देखब ने माटि पर, हमरा - ओकरामे अन्तर छी ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - नमगर आ पातर लोलसँ माटि वा गाछक अलगल छाल पर बेरि - बेरि आघात करबाक कारण अपना दिशि सामान्य लोक एकरा प्रायः कठखोद्धी बूझि लैत अछि । *२ - माटिखोद्धी माटिक तऽरसँ आ गाछक छालक भीतरसँ कीड़ा-मकोड़ा आ ओकर अण्डा बच्चाकेँ ताकि कऽ खा जाइत अछि । *३ - माटिखोद्धी गाछक छालक भीतरसँ मात्र कीड़ा-मकोड़ाकेँ ताकि भक्षण करैत अछि; कठखोद्धी जेकाँ काठकेँ खोधि कऽ धोधरि नञि बनबैत अछि । *४ - माटिखोद्धीक लोल कठखोद्धीक लोलक अपेक्षा बहुत पातर आ नमगर होइत अछि जे किछु नम (भीजल) माटि आ गाछक अलगल छाल खोधबाक लेल विशेष उपयुक्त अछि नञि कि मजगूत काठ खोधबाक लेल । *५ - माटिखोद्धीक माथ पर नारंगी-पीयर रंगक कलगी (CROWN) होइत अछि । ई कलगी मुर्गाक कलगी जेकाँ अविभक्त नञि भऽ कऽ अरीय ढंगसँ(RADIALLY) विभक्त वा खण्डित रहैत अछि । माटि खोधबा काल ई कलगी पंखा जेकाँ फुजि जाइत अछि (FANNING) वा पसरि जाइत अछि । *६ - माटिखोद्धीक पछिला भाग पर एकान्तर क्रममे कारी आ उज्जर रंगक पट्टी रहैत अछि । माटिखोद्धी जेकाँ कठखोद्धीकेँ माटि खोधैत नञि देखब । भेम्ह या भम्हरा (बाल कविता) कारी भेम्ह, कारी भेम्ह, भम्हरा हमरे नाम छी । हम तँऽ होइ छी आनो रंगक, चर्चित बहुते श्याम छी ।।*१ हमहूँ मधुमाक्षी - बिढ़नी सनि, सामाजिक छी प्राणी । हम ने काटी अनेरो ककरो, करी ने हम मनमानी ।। हमरो समाजमे श्रमिक रहैछ, नेतृत्व करैतछि रानी । हमर आकार पैघ बहुते छी, नञि बिढ़नी केर सानी ।।*२ भम्-भम् केर सुन्नर आबाज छी हम्मर नामक कारण । हमर पंख केर गतिसँ निकसए, ई आबाज मनभाओन ।।*३ कारी पर पीयर, नारंगी, लाल या उज्जर धारी । कखनो फेंट - फाँट रंगक आ कखनो अगबे कारी ।।*१ मधुमाक्षी सनि हमहूँ फूलक, रसहिं बस पीबै छी । पी - पराग मदमस्त रही, आ अपनहि धुनिमे रहै छी ।। पर जँ केओ हमरा खोंतामे, करइछ जाए उकाठी । नानी याद अवश्ये आओतीह, तकरा जँ हम काटी ।। मधुमाक्षी आ आन बन्धु सनि, हमहूँ करी परागण ।*४ फूले-फूले विचरए सटि कऽ, कतेक परागक मधुकण ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - अपना दिशि आ अपना दिशि केर वाङ्गमयमे अगबे कारी रंगक भेम्ह बड़ प्रशिद्ध थिक । पर संसारमे भेम्हक बहुत रास प्रजाति भेटैत अछि जकर रंग निम्न प्रकारेँ भऽ सकैछ - · एकवर्णी कारी, · कारी रंगक देह पर पीयर नारंगी या उज्जर रंगक धारी या धब्बा बला, · पीयर या उज्जर रंगक देह पर कारी धारी या धब्बा बला *२ - मधुमाक्षी (-छी) आ बिढ़नी जेकाँ भेम्हक हरेक झुण्ड या छत्तामे एक टा रानी भेम्ह (QUEEN BUMBLE BEE), किछु पुरुष या नर भेम्ह (DRONE/S BUMBLE BEE) आ बहुत रास श्रमिक या मजूर भेम्ह (LABOUR BUMBLE BEE) रहैत अछि । *३ - इएह अबाज केर कारण प्रायः हरेक भाषामे एकर नामकरण भेल अछि । *४ - भेम्ह सेहो फूलक रस चूसैत अछि । फूलक रस चूसबा काल फूलक पराग कण (POLLEN GRAINS) ओकरा शरीरक विभिन्न भागसँ सटि कऽ एक फूलसँ दोसर फूल पर पहुँचि जाइत अछि । एहि तरहक परागणक (POLLINATION) प्रक्रियाकेँ कीट-परागण(ENTOMOPHILY) कहल जाइत अछि । कीट-परागण वस्तुतः पर-परागणक (CROSS POLLINATION) एक प्रकार छी । हँसुआ दाबी (बाल कविता) बड़की टा केर चिड़ै उड़ै छै, नाम तँऽ “हँसुआ दाबी” छै । लोलक किछु छी बात विशेषें, नाम तेँ “हँसुआ दाबी” छै ।। जञो राखी सोझाँमे परस्पर, दू टा कचिया - हाँसूकेँ । बिनु दाँतक लागत जेहेन, बूझू लोल छै ‘दाबी’ केर ।।*१ नाँओ पहिल बेर सुनल, भेल एहनो होइतछि की नाम ? गौरसँ देखल, तखन बुझल, वाह ! केहेन सुन्नर नाम ।। पर हँसुआ-दाबी किछु एहनो, लोल जकर दुहु सटल रहैछ । किछु तँऽ एक्कहि रंग देखबामे, किछु विशेष ओ अलग रहैछ।।*२ पड़ती - जमकल पानि, नहरि, वा पोखरि - डबरा कातमे । पैघ गाछ पर झुण्डे - झुण्डे, रहैछ बाद बरसातमे ।।*३ ठण्ढी - शीतलहरी पछाति ओ, धीरे - धीरे कम भऽ जाइछ । कादो - पानि सुखाए जाइत छै, तेँ कत्तहु अन्तऽ चलि जाइछ ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - हँसुआ दाबीक दुनु लोल बाहर सँ भीतर दिशि हल्का मुड़ल रहैत अछि, तेँ बन्न भेलाक बादहुँ बीचमे कने रिक्त वा खाली स्थान रहि जाइत अछि । देखला पर एहेन सनि लगैत अछि जे दू गोट कचिया हाँसू (जकर भीतरी भागमे दाँत नञि हो) परस्पर सोझाँ राखल हो । लोलक इएह गुण एहि चिड़ै केर मैथिली नामकरणक कारण बनल होयत । लोलक इएह गुणक कारण अंग्रेजीमे ओ ऑपेन बिल्ल्ड स्टॉर्क(OPEN BILLED STORK) कहबैत अछि । *२ - हँसुआ दाबीक लोलक ई विशिष्ट स्वरूप बाल्यावस्थासँ नञि रहैत अछि । बाल्यावस्थामे बन्न भेला पर ओकर दुहु लोल परस्पर सटि जाइत अछि । लोलमे एहि तरहक वक्रता (अन्तर्वक्रता) किशोरावस्थामे विकसित होइत अछि आ जीवनपर्यन्त रहैत अछि । अंग्रेजीक स्टॉर्क कहाबए बला किछु आओर जाति-प्रजाति जे देखबामे हँसुआ-दाबी सनि लगैत अछि पर जकर लोलकेँ बन्न भेला पर बीचमे रिक्त स्थान नञि रहैछ, सेहो मैथिलीक हँसुआ-दाबीक अन्तर्गत आबैत अछि । यथा - व्हाईट स्टॉर्क (WHITE STORK) आदि । *३ - ई बरसातक अन्तिम समयमे बहुत संख्यामे अपना दिशि देशक आन भाग ओ विदेशसँ अबैत अछि । ऊँच-ऊँच गाछ सभ पर खोंता बनबैत अछि आ पोखरि, डबरा, खत्ता, नहरि, नदीक कछेड़ अथवा कोनहु चऽर-चाँचरि जतऽ पानि जमकल हो आदि ठाम पर झुण्डक-झुण्ड देखाई देत । ओ कीड़ा-मकोड़ा, बेङ्ग आदि खाइत अछि परञ्च डोका (PILA) ओकरा बड़ पसिन्न छै । डोकाकेँ खएबाक लेल प्रायः ओ डोकाक खोलकेँ (कवचकेँ) तोड़ैत नञि अछि । ओ अपन लोलक विशिष्ट आकार आ संरचनाक मदतिसँ खोलकेँ (CONK SHELL / EXOSKELETON) बिना तोड़नहि डोकाक मूँह लऽग पकड़ि भितरुका कोमल भागकेँ बाहर झीकि लैत अछि । *४ - बेशी ठण्ढी वा शीतलहरी केर बाद अपना दिशि क्रमशः जलाशयक पानि कम होमए लगैत अछि, कादो बला स्थान केर कम भेलासँ हँसुआ-दाबी आ एहि तरहक आन चिड़ै लेल भोजनक प्रतिद्वन्द्विता बढ़ि जाइत अछि । तेँ ओ सभ आन जगह पर पलायन कऽ जाइत अछि । पर तइयो पुर्ण अलोपित नञि होइत अछि, थोड़-बहुत सलो भरि देखल जा सकैत अछि । यद्यपि अपना ओहि ठाँ मात्र एशियाई ऑपॅन बिल्ल स्टार्क (ASIAN OPENBILL STORK) पाओल जाइत अछि पर अफ्रिकी ऑपॅन बिल्ल स्टार्क (AFRICAN OPENBILL STORK) सेहो मैथिलीक “हँसुआ दाबी” नामक चिड़ै केर अन्तर्गत आओत । नीलकण्ठ या असली नीलकण्ठ (बाल कविता) “रॉबिन” छी नीलकण्ठ, “आर”सँ होइए “रॉबिन” ।*१ नञि योरोप केर आ ने अमेरिकी, “इण्डियन रॉबिन” ।।*२ हे असली नीलकण्ठ ! अहाँ जा कतऽ छी बैसल । लोक कहैतछि जतरा शुभ, जँ अहाँकेँ देखल ।। बहुतहु लोक बिसरि बैसल अछि, अहँक रूपकेँ । भ्रममे बूझए नीलकण्ठ, कोनहु आन भूपकेँ ।।*३ “नीलकण्ठ” जे शब्द, स्वयं ओ परिचय दैतछि । शेष काय छै आन रंग, ग्रीव नील कहैतछि ।। एक तरफ सब कहथि, अलोपित “नीलकण्ठ” छै । सुलभ “सिरौली” देखि कहए, इएह नीलकण्ठ छै ।।*४ केहेन विरोधाभास छै पसरल, एहि दुनिञामे । जएह बजैछ, उनटे करैछ, सब एहि दुनिञामे ।। नीलकण्ठमे कण्ठ - नील, बस नर केर होइतछि । तेँ शायद हिन्दू - समाज, “शिव-रूप” बुझैतछि ।।*५ साँझक गोधूलि - बेलामे, अक्सर भेटैत छल । जतरा प्रात, तेँ जतरा - दर्शन, शुभ बुझैत छल ।।*६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - आर”सँ होइए “रॉबिन = “R” for “ROBIN” *२ - अंग्रेजीक रॉबिन (ROBIN) शब्द बहुत व्यापक अछि जाहिमे योरोपीय रॉबिन (EUROPEAN ROBIN), अमेरिकी रॉबिन(AMERICAN ROBIN), इण्डियन रॉबिन (INDIAN ROBIN) आ इण्डियन ब्ल्यू रॉबिन (INDIAN BLUE ROBIN) समाविष्ट अछि ।मात्र इण्डियन रॉबिन (INDIAN ROBIN) केर किछु जाति वा प्रजाति (SPECIES / SUB-SPECIES) नीलकण्ठक श्रेणीमे अबैत अछि कारण कि ओकर कण्ठ “नील” रंगक (INDIGO / INDIGO BLUE / ROBIN-BLUE) होइछ आ शेष शरीर कारी, गाढ़ भूरा वा आन रंगक रहैछ । इण्डियन ब्ल्यू रॉबिन (INDIAN BLUE ROBIN) सेहो नीलकण्ठ नञि अछि किएक तँऽ ओकर पूरा शरीर नीला होइत अछि, नञि कि कण्ठमात्र । एहि सन्दर्भमे भारतीय “नील वा लील” शब्द आ अंग्रेजीक “ब्ल्यु” शब्द पर विचार सेहो परमावश्यक अछि - · BLUE (in British Eng.) - प्राचीन भारतमे वा सही रूपेँ कही तँऽ आइसँ ३०-४० वर्ष पहिने इएह अंग्रेजी सम्पुर्ण भारत मे बाजल आ बूझल जाइत छल । एहि अंग्रेजीमे - § INDIGO = नील (तत्सम) वा लील (तद्भव) रंग § BLUE = आसमानी रंग या स्वच्छ आकाशक रंग § यथा इन्द्रधनुषक वर्णपट्टमे (SPECTRUM OF VISIBLE LIGHT) देखू VIBGYOR = बैनीआहपीनाला अर्थात INDIGO = नीला आ BLUE = आसमानी · BLUE (in American Eng.) = पछिला करीब ५० साल सँ धीरे-धीरे अमेरिकी अंग्रेजीक प्रचार-प्रसार बढ़ल अछि । इण्टरनेटक प्रसारक संग-संग अमेरिकी अंग्रेजी सम्पुर्ण भारतमे पसरि गेल अछि आ ओ ब्रिटिश अंग्रेजीकेँ धकिआए बैसल अछि । अमेरिकी अंग्रेजीमे - § BLUE = नील ओ नीलाभ समस्त रंगक परिचायक § ब्रिटिश अंग्रेजीक INDIGO = अमेरिकी अंग्रेजीक INDIGO-BLUE / ROBIN-BLUE § ब्रिटिश अंग्रेजीक BLUE = अमेरिकी अंग्रेजीक SKY-BLUE / LIGHT-BLUE = आसमानी § अमेरिकी अंग्रेजीमे MARINE-BLUE / OCEAN-BLUE = समुद्री नील या हरिताभ नील § अमेरिकी अंग्रेजीमे AQUA-BLUE / MARINE = नीलाभ हरियर, आदि । इएह कारण शब्दार्थमे बहुत बेर भ्रम केर स्थिति उत्पन्न भऽ जाइत अछि । तहिना नीलकण्ठ संगे सेहो भेल अछि । नीलकण्ठक “नील”रंगकेँ ब्रिटिश अंग्रेजीक अनुसार INDIGO बुझबाक चाही आ अमेरिकी अंग्रेजीक अनुसार INDIGO-BLUE / ROBIN-BLUE, तखन कोनहु भ्रम नञि होयत । दोसराक वा दोसर भाषामे कयल गेल अनुवादकेँ सीधे मैथिलीमे नञि उतारि देबाक चाही । *३ - लोक सभ (आ किछु अनुवादक लोकनि सेहो) नील माने आसमानी या चटक नील (फिरोजी) मानि एकटा दोसर चिड़ैकेँ - जकरा मैथिलीमे सिरौली (सिरोली नञि) कहल जाइत अछि - प्रबल रूपसँ नीलकण्ठ वा लीलकण्ठ मानए लगलाह अछि । ई भ्रम इण्टरनेट पर पसरल भ्रमक कारण बहुत तेजीसँ अपन जड़ि जमा चुकल अछि । *४ - अलोपित = एहि ठाम “दुर्लभ” अर्थमे, नञि कि “विलुप्त” अर्थमे प्रयुक्त । एक दिशि कहल जाइत अछि कि “नीलकण्ठ” केर दर्शन आब दुर्लभ अछि (खास कऽ मिथिलामे) आ दोसर दिशि सर्वसुलभ दर्शन देनिहार “सिरौली” केर पहिचान नीलकण्ठक रूपमे करबैत छी - से कोना ? रॉबिनक ओ प्रकारसब जे नीलकण्ठक श्रेणीमे अबैत अछि से पहिने पूरा भारतमे भेटैत छल आब उत्तर भारत दिशि बहुत कम भऽ गेल अछि । *५ - मात्र पुरुष वा नर नीलकण्ठक कण्ठ केर रंग नील होइत अछि । स्त्री वा मादा नीलकण्ठ गौर वर्णक (रंगक) होइत अछि । *६ - नीलकण्ठ प्रायः साँझखन (सूर्यास्तक समयसँ किछु पहिने; गोधूलि बेलामे) उड़ैत कीड़ासभकेँ खएबाक लेल बिजलीक ताड़ पर या कोनहु गाछक पछबरिया ठाढ़िसभ पर बैसल देखल जाइत छल । सिरौली या नकली नीलकण्ठ (बाल कविता) हे नकली नीलकण्ठ ! तोहर छह गजब पिहानी । असली भेल अलोपित, तोँही राजा - रानी ।।*१ नील-हरित तोर पाँखि, तोँहूँ बैसए छऽ ताड़ पर ।*२ गर्दनि छह ने नील तोहर, मटियाही - पीयर ।।*३ नकली अशोक जे, दुनिञा तकरा असली बूझए । सीता-अशोक जे छी असली, से केओ ने चीन्हए ।।*४ तहिना तोहर साम्राज्य बहुत, पसरल छह सौंसे । असली दुर्लभ, नकली सर्वसुलभ, सब लोके ।। नाम “सिरौली” तोहर छियऽह, बूझल से हमरा । अलग “सिरोली मएना” से जानए भरि मिथिला ।।*५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - असली नीलकण्ठ नञि देखाइ देबाक कारण लोक एकरे नीलकण्ठ मानि बैसल अछि । भ्रमक आओरो बहुत रास कारण अछि । *२ - एकर पाँखि नील रंगक होइत अछि जे उड़बा काल चमकैत हरिताभ-नील रंगक बुझि पड़ैछ । मिथिलामे पहिने असली नीलकण्ठ सेहो बिजलीक ताड़ पर बैसल भेटैत छल तहिना ईहो चिड़ै भेटैत अछि । *३ - एकर गर्दनि नील नञि भऽ कऽ पीयर सनि होइत अछि । एहि चिड़ैकेर बिदेशी किछु प्रजातिसभमे (SUB-SPECIES) पीयर गर्दनि पर नील आभा रहैत अछि पर ओ सभ उत्तर भारतमे नञि पाओल जाइछ आ नहिञे कहियो पहिने पाओल जाइत छल । तेँ ओ नीलकण्ठ नञि भऽ सकैछ । तेलुगू भाषामे एकर नाम “पलपित्त” अछि जखनि कि कन्नर भाषामे “नीलकण्ठी” कहबैछ । सम्भवतः कन्नर भाषाक नीलकण्ठीसँ ई भ्रम उपजल कि इएह संस्कृतक नीलकण्ठ अछि । पर जे हो, मैथिलीक नीलकण्ठ ई नञि अछि । *४ - आइ - काल्हि जाहि शोभा वृक्षकेँ अशोक नामसँ जानल जाइत अछि से वस्तुतः नकली अशोक छी । रावणक अशोक वाटिकाक अशोक जकर कि चिकित्सकीय प्रयोग आयुर्वेदमे बताओल गेल अछि, से अलग अछि । ओकरा आइ - काल्हि “सीता अशोक” कहल जाइत अछि आ इएह असली अशोक अछि जकर प्रयोग अशोकारिष्ट आदि बनएबामे होइत अछि । *५ - मिथिलामे एकरा “सिरौली” नामसँ जानल जाइत अछि (सिरोली नञि) । सिरोली एकटा अलग चिड़ै अछि, ओ एक तरहक मएना अछि । मोहखा या मोखा (बाल कविता) खेतमे आ बाड़ी - झाड़ीमे । पड़ती - गाछी - बँसबिट्टीमे । कूदए - फानए एक चिड़ै ।। बेशी ओकरा उड़ल ने होइछ । कूदए - फानए - कने उड़ैछ । लाल आँखिबाला ओ चिड़ै ।। देह आ नाङ्गरि कारी - कारी । कौआ सनि केर बूझू कारी । लाल पाँखिबाला ई चिड़ै ।। कीड़ा - मकोड़ा डोका गिरगिट । बेङ्ग साँप भूआ आ की - की ! खा कऽ पेट भरैछ ओ चिड़ै ।। एतबहिसँ ने पेट भरैत छै । अण्डा - चुज्जा फऽड़ ठुसैत छै । ताड़ - खजूरक शत्रु चिड़ै ।। सौंसे भारतमे भेटैत अछि । पर्वत पठार मैदान फिरैतछि । “मोहखा या मोखा” जे चिड़ै ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - कुक्कू (CUCKOO) गण आ परिवार (Order - Cuculiformes & Family - Cuculidae) केर सदस्य होइतहुँ मोहखा एहि परिवारक आन सदस्यसभ सनि शिशुभरण-परजीवी (BROOD PARASITE) नञि अछि । ओ अपन खोंता बनबैत अछि, अपन अण्डाकेँ अपने सेअइत अछि आ बच्चाक देखभाल सेहो अपनहि करैत अछि । एहि परिवारक आन बहुत रास सदस्य जेना कि कोइली, पपीहा, चातक आदिशिशुभरण-परजीवी (BROOD PARASITE) होइत अछि । पोरकी या पौड़की (बाल कविता) कहियो ने कहियो तोँ सुनने तँऽ हेबही । मारए गेलै परबा, मारि लेलकै पोरकी ।। इएह छियै पोरकी, चिन्हीन्ह बौआ । दूरसँ कखनो कऽ, लागै जेना परबा ।।*१ शान्त स्वभाव छै जेना लजबिज्जी । घोल - अनघोलसँ होइ कछमच्छी ।। ऊँचका गाछ पर, खोंता ओ लगबए । दुहु - प्राणी शान्तसँ, खोंतामे विचरए ।।*२ खेत - खरिहानमे दाना लेल उतरए । मनुक्खक आहटि पबितहिं उड़ि जाए ।। परबाक स्त्रीलिङ्ग बूझू जुनि पोरकी । परबा फराक आ फराके छै पोरकी ।। परबा आ पोरकी − दुहुमे दू लिङ्ग छै । भ्रम दूर भेल, दुहु शब्द उभयलिङ्ग छै ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - दूरसँ देखला पर परबा (परेबा) आ पोरकी (पौड़की) एकरंगाह लगैत अछि पर दुनु अलग - अलग चिड़ै अछि । *२ - ई चिड़ै प्रायः जोड़ामे अपन खोंतामे या कोनहु गाछक डाढ़ि पर बैसल भेटैछ । *३ - पोरकी शब्द परबाक स्त्रीलिङ्ग नञि अछि । एहिसँ नर पोरकी आ मादा पोरकी दुनुक बोध होइत अछि । बगरा/बगड़ा (बाल कविता) बगरा, बगरी आओर बगेड़ी, तीनू अलग चिड़ै छी । बगरी-बगेड़ी बादमे कहियो, बगरा एखन कहै छी ।। घऽर आङ्गन खरिहानमे पहिने, बगरा खूब भेटै छल । बाँसक कोरो - धरणि - बरेड़ी, खोंता ओ लगबै छल ।। धिय-पुता के छल एहेन जे, देखने नञि हो बगरा । नञि देखने बगरा केर खोंता, आ बगरा केर बच्चा ।। एक समय छल जहिया बगरा, चहचहाइत छल सौंसे । घऽर आङ्गनमे जँ कोनो खोंता, बगरा होयत अवश्ये ।। आब तँऽ शहरक क्षेत्रसँ बूझू, बगरा भेल निपत्ता । जञो पथार तखनहि गामहुमे, छोट झुण्डमे बगरा ।।*१ एना किए भेल पता ने ककरहु, पर जँ रहलै एहिना । संग्रहालयमे काल्हि देखत यौ, बगरा सगरो दुनिञा !! *२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - अनाजक पथार सुखएबा काल जे बगरा अबैत अछि से प्रायः “घरैया बगरा” (HOUSE SPARROW) रहैत अछि जखनि कि खेत सभक आढ़ि पर या बाधसँ जाए बला कच्चा सड़क वा बान्ह पर जे बगरा भेटैत अछि से “बनैया बगरा” (TREE SPARROW) रहैत अछि । *२ - बगराक संख्या ताहूमे खास कऽ घरैया बगराक संख्यामे पछिला १० - २० सालमे बहुत कमी भेल अछि जकर कारण पुर्ण रूपसँ नञि ज्ञात अछि । पर ओकर आवास क्षेत्र (HABITAT) केर समाप्त होयब या कम होयब एकर कारण बताओल जा रहल अछि । उड़ीस (बाल कविता) कमला माएकेँ कहियो ठकलन्हि गोनू बाबू । एक सए एक उड़ीसक, बलि देल गोनू बाबू ।।*१ बास ओकर पुरना पलंग, कुर्सी, चौकी आ खाटमे । रातिमे ओ चुटचुट काटए, दिन नुका रहैए फाटमे ।। ओ मनुक्ख केर खून चूसि कऽ, अप्पन पेट भरैए । बदलामे कत’ रोगक संगहि, निन्नमे विघ्न करैए ।।*२ तेँ जल्दीसँ करी उपाए आ ओकरा झट उपटाबी । एहेन चौकी आ खाट पलंगकेँ, चट दऽ रौद लगाबी ।।*३ तोसक, कम्मल, सीरक, सुजनी सभकेँ रौद देखाबी । चद्दरि तकिया-खोल आदिकेँ, पानिमे दऽ खौलाबी ।। गऽह - फाट चौकी - पलंग केर, छीटी उचित दबाई । बौआ - बुच्ची दूर रही, जँ छीटथि केओ दबाई ।। तइयो जँ नञि बात बनए तँऽ अन्तिम करी प्रबन्ध । कमसँ कम छओ मास-बरष धरि, छोड़ू एहेन पलंग ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - मिथिलाक प्रशिद्ध गोनू झाक खिस्सासँ उद्धृत । *२ - उड़ीस केर कटलासँ मनुक्खक रतुका निन्न तँऽ खड़ाब होइते अछि संग - संग त्वचा पर कटबाक निशान बनि जाइत अछि जे नोचए लगैत (ITCHING TENDENCY) अछि । नोचला पर (AFTER SCRATCHING) नऽह लगलासँ ओहि स्थानसभ पर घाओ आ द्वितीयक संक्रमणक (SECONDARY INFECTIONS) संभावना भऽ जाइत अछि । उड़ीसमे मनुक्खकेँ संक्रमित कए रोगग्रस्त करबाक क्षमता रखनिहार कम सँ कम २८ गोट परजीवी (PATHOGENS) पाओल जाइत अछि, जखनि कि एहि क्षेत्रमे एखन बहुत कम्मे काज भेल अछि । *३ - लकड़ीसँ बनल उपस्कर (फर्निचर) ओ बिछाओन आदिकेँ गर्म करब (तेज रौदमे आ जकरा सम्भव हो तकरा खौलैत पानिमे) आ सुखाएब सबसँ नीक घरेलू उपचार थिक । 45°C (113°F) पर एक घण्टा राखब वा -17°C (01°F) पर दू घण्टा राखब उड़ीसकेँ पुर्णतः समाप्त कऽ दैत अछि । पहिल तरीका अपनासभ दिशि गर्मीमे आ दोसर तरीका पहाड़क क्षेत्रमे सर्दीमे बेस प्रभावकारी अछि । जँ 50°°C (122°F) केर तापमान प्राप्त कएल जा सकए फर्निचर ओकरा सहन कऽ सकए तऽ मात्र दू मिनटमे पूरा उड़ीस उपटि जाइछ । चद्दरि आ वस्त्र आदिसँ उड़ीस उपटएबाक लेल आयरनक उपयोग कएल जा सकैछ । चुँकी रौदमे देला पर लकड़ीसँ बनल उपस्करक गऽह आ फाटमे उड़ीस नुका कऽ बचि जाइत अछि, तेँ ओहि ठामसँ ओकरा निकालबाक लेल उचित दबाई केँ गऽह आ फाटसभमे छीटलासँ ई विधि बेशी प्रभावकारी सिद्ध होइछ । दबाई छिटबाक काज घरक कोनो पैघ आ बुझनुक सदस्य सावधानीपुर्वक करैत छथि कारण ई दबाई मनुक्खक साँस द्वारा या मूँह आ आँखिमे पड़लासँ मनुष्यक स्वास्थ्यकेँ सेहो गम्भीर हानि पहुँचा सकैत अछि । धियापुताकेँ एहि काजसँ दूर रहबाक चाही आ अनेरो हुलुक-बुलुक नञि करबाक चाही । कोनहु दुर्घटना भेला पर सीधे यथासिघ्र चिकित्सककेँ देखएबाक चाही । *४ - उड़ीस बिना किछु खएने - पिउने 100 सँ 300 दिन धरि रहि सकैत अछि । ई अवधि वातावरणक तापमान पर निर्भर करैछ । तेँ कोनहु खुला जगह पर बिना उपयोगक छओ महीना वा एक वर्ष धरि उड़ीस लागल लकड़ीक उपस्करकेँ छोड़ि देलासँ सेहो उड़ीसकेँ उपटाओल जा सकैछ । डोकहर (बाल कविता) डोकहर ओ - जे डोका हेरए, या ताकए जे डोका । डोकहर जाहिठाँ देखल जाइए, पसरल सौंसे डोका ।। इएह डोका देखि लोक बुझइए, डोकहरकेँ प्रिय डोका । नाम देलक डोकहर, पर बूझू छी किछु हद से धोखा ।।*१ डोकहर केर आवास - क्षेत्रमे, हँसुआ - दाबी संगे । हँसुआ - दाबीकेँ प्रिय डोका, डोकहर माथ कलंके ।।*१,२ डोकहर पैघ चिड़ै - तइयो ओ, उड़ए अकाशेँ ऊँच । ऊँच गाछ पर खोंता बनबए, उतरए झुण्डक - झुण्ड ।। डोकहर केर मजगूत टाँग आ, लोल सेहो मजगूत । बेङ्ग साँप काँकोड़ डोका सभ, चिबा जाइछ साबूत ।।*२ एकर शिकार वर्ज्य भारत भरि, छी संरक्षित प्राणी । तइयो लोक कहाँ मानैत अछि, करैछ अपन मनमानी ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - डोकहर आ हँसुआ-दाबीक आवास क्षेत्र (HABITAT) एक्कहि होइत अछि । ओहि ठाम जे मुइल डोकाक खोल (EXOSKELETON OF PILA) पसरल रहैत अछि जे वास्तवमे हँसुआ-दाबी द्वारा भक्षण कएल गेल डोकाक अवशेष थिक, नञि कि डोकहर द्वारा खाएल गेल डोकाक । *२ - डोकहर आ हँसुआ-दाबी दुनु डोका (PILA) खाइत अछि पर हँसुआ-दाबीकेँ डोका विशेष पसिन्न छैक । ओकर लोल केर अगिला भाग एना बनल छैक जे ओ डोकाक खोलकेँ बिना तोड़नहि डोकाक अगिला भागकेँ पकड़ि डोकाक भीतरुका कोमल भागकेँ बाहर झीकि लैत अछि आ खा जाइत अछि । डोकहर सेहो डोका खाइत अछि पर हँसुआ-दाबी जेकाँ ओकरा डोकासँ विशेष प्रीति नञि छै । दोसर बात जे डोकहर अपन मजगूत लोलसँ डोकाक उपरुका कवचकेँ तोड़ि कऽ डोका खाइत अछि, तेँ ओकरा द्वारा भक्षण कएल गेल डोकाक कवच टूटल रहैत अछि - साबुत नञि । *३ - एहि चिड़ै केर शिकार करब प्रतिबन्धित थिक पर गामक लोककेँ नियम-कानून कहाँ पता आ जँ बताओल जाइतो अछि तँऽ ओ से कहाँ मानैत छथि । ग्रामीण भागमे - विशेष कऽ जन-जातीय आ अशिक्षित वर्गमे - डोकहरक मांसु विशेष प्रचलित अछि । अंग्रेजीक GREATER ADJUTANT आ LESSER ADJUTANT दुनु मैथिलीक डोकहर शब्दक अन्तर्गत अबैत अछि । आइ काल्हिLESSER ADJUTANT बेशी देखबामे अबैत अछि कारण जे GREATER ADJUTANT केर संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम भऽ गेल अछि । डोकहरक दुनु प्रजाति संकटग्रस्त अछि । LESSER ADJUTANT असुरक्षित (VULNERABLE) श्रेणीमे अबैत अछि जखनि किGREATER ADJUTANT विलुप्तप्राय (ENDANGERED) श्रेणीमे । ढील आ लीख (बाल कविता) ढीलो रानी, ढीलो रानी, कतऽ जाइ छी । सभ केओ मारलक तेँ रूसल जाइ छी ।। आब एहेन फकड़ा पुरान भऽ गेलै । ढील ताकब बात अनजान भऽ गेलै ।।*१ साबुन एलै शैम्पू आ दबाई बहुते । ढीलक करै छै ओ बिदाई तुरुते ।।*१ ढील परजीवी छी आ खून चूसए छै ।*२ माथक जे केश, तकर जड़ि धऽ रहै छै ।। धियापुता केश जे साफ ने करए छै । ओकरहि केशमे ढील सोहड़ै छै ।। ढील केर अण्डा ओ ढील केर बच्चा । मैथिलीमे लीख छै आ संस्कृतमे लिक्षा ।।*३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ - पहिने धियापुता जखन स्थिर भऽ माथमे ढील ताकए नञि दैत छलै तँऽ तकनिहारि दाइ-माए लोकनि एहने फकड़ा सभ सुनाए परतारि कऽ ढील ताकै जाइ छलखिन्ह (-थिन्ह) । आब बहुविध मेडिकेटेड साबुन, शैम्पू आ किछु गोटी ढील मारबाक लेल सद्यः रामबाण जेकाँ काज करैछ तेँ ढील तकबाक प्रथा आ ओहि संगहि एहेन फकड़ा सभ बहुत कम भऽ गेल अछि । पर गाम-घरमे एखनहु से भेंटि जाएत । *२ - परजीवी = PARASITE; रक्तचूसक परजीवी = SANGUIVOROUS PARASITE *३ - ढील (मैथिली) = (संस्कृत) = जूँ (हिन्दी) = HEAD LICE / HEAD LOUSE (अंग्रेजी), तथा लीख (मैथिली) = लिक्षा (संस्कृत) = OVUM (Sing.) / OVA (Pl.) & LARVA (Sing.) / LARVAE (Pl.) / NYMPH OF HEAD LICE / HEAD LOUSE (अंग्रेजी) ढील एकटा परजीवी (PARASITE) थिक । ओ मनुक्खक माथमे रहैत अछि आ मनुक्खक खून चूसि मात्र ओएह पर जीवैत अछि, तेँ ओरक्तचूसक परजीवी (SANGUIVOROUS PARASITE) भेल । ढील केर मात्र एक्कहिटा ज्ञात पोषक अछि तेँ ओ मनुक्खक लेलअधिबद्ध या अविकल्पी पजीवी (OBLIGATE PARASITE) आ मनुक्ख ढीलक लेल अधिबद्ध या अविकल्पी पोषक (OBLIGATE HOST) भेल । आन परजीवी कीड़ासभ जेकाँ ढीलकेँ बहुत मजगूत टांग या पाँखि नञि होइत अछि तेँ ओ एकसँ दोसर मनुक्खमे मात्र माथक सीधा सम्पर्कसँ (DIRECT HEAD TO HEAD CONTACT) - जेना कि सूतए काल, एक्के कंघीक प्रयोग कएलासँ - पसरैत अछि । कोइली (बाल कविता) कोइली कोइली सभ बजैत छी, पर के - के छी देखने ? *१ एक्कहि संगे बाजि उठल सभ, कोइली हम छी देखने ।। जोतला खेतमे वा पड़तीमे, पानि जतए छै लागल । कारी - कारी बहुते कोइली, नाङ्गरि बीचसँ काटल ।।*२ नञि बौआसभ आ बुच्चीसभ, ओ तँऽ छी धनछुआ । कारी - कोइली, कारी - कौआ आ करिया - धनछुआ ।। कोइली चिड़ै प्रवासी छै ओ दूर देशसँ आबए । भरि बसंत रहि, बरखा बादहिं, पुरना देश ओ भागए ।।*३ अबितहिं एहिठाँ गाछीमे ओ कू - कू राग अलापए । मज्जर, टिकला, आमक संग-संग ई आबाज हर्षाबए ।। ऊँच गाछ पर घनगर पातक बीच नुका कऽ बैसए । तेँ मनुक्ख आबाज सुनए बस, कोकिल-छवि ने देखए।। कोइली खोंता नञि बनबए, कौआ बनबैतछि खोंता । कोइली ताहिमे अण्डा पाड़ए, कौआ संग छै धोखा ।।*४ कौआ फरक ने बूझि पाबए, अपना - आनक अण्डामे । अण्डे नञि, ओ पोषए - पालए कोइलीयोक बच्चाकेँ ।। पाँखि उगल बच्चा उड़ि भागल, अपना झुण्डक संगे । कौआ मूर्ख बनल कानैत अछि, दुनिञा रंग - बिरंगे ।।*४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ मैथिलीमे, · कोइली - कारी रंगक चिड़ैविशेष जे कि भारतीय ओ आन वाङ्गमयसभमे अपन मधुर आबाजक लेल प्रशिद्ध अछि । हिन्दीमे एकरा कोयल आ अंग्रजीमे कुक्कू (CUCKOO) कहल जाइत अछि । · कोयली - आमक आँठीक भीतरमे उज्जर रंगक कोमल संरचनाविशेष । · मैथिलीमे “कोइली” आ “कोयली” श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द भेल । मतलब कि एहेन शब्दसभ जे सुनबामे एकरँगाह लगैत अछि पर ओकर अर्थ अलग−अलग होइत अछि । *२ - धियपुता सभ (आ किछु पैघ लोक सभ सेहो) कारी रंगक कारण भ्रमवश “करिया धनछुआ”केँ (BLACK DRONGO) कोइली कहि दैत छथि । *३ - देश = राजनैतिक सीमासँ अलग देश होयब जरूरी नञि = दूरस्थ स्थान वा भिन्न जलवायुबला क्षेत्रक द्योतक *४ - सभ प्रकारक कोइली आ पपीहा शिशु-भरण परजीवी (BROODING PARASITE) होइत अछि । ओ अपन अण्डा कौआ, करिया धनछुआ, धनछुआ या एहि तरहक आन चिड़ैसभक खोंतामे दैत अछि जे कि शिशु-भरण पोषक (BROODING HOST) केर भूमिका निमाहैत अछि । शिशु-भरण परजीवी अपन अण्डा चोड़ा-नुका कऽ शिशु-भरण पोषकक खोंतामे दऽ दैत अछि आ शिशु-भरण पोषक अपन अण्डाक संग-संग परजीवीक अण्डाकेँ सेहो सऐत अछि, अण्डासँ बच्चाकेँ निखालेत अछि आ खोअबैत-पिउपैत अछि । उड़बा जोकर भेलापर परजीवी कोइली या पपीहाहक बच्चा अपना-अपना झुण्डमे भागि जाति अछि आ ताहि बच्चाकेँ भागि गेला पर स्त्री/मादा कौआकेँ उदास होइत सेहो देखल गेल अछि । अंग्रेजीक CUCKOO शब्द बहुत व्यापक अछि । एहि अन्तर्गत कोइली, पपीहा आदि बहुत रास गाबय बला चिड़ै सभ अबैत अछि । एकरा अन्तर्गत अंग्रेजीक KOEL / TRUE CUCKOO आ INDIAN CUCKOO शब्दसभसँ बोध होइबला चिड़ैसभकेँ राखब बेशी उचित होयत जे जीव-विज्ञानमे क्रमशः Eudynamys आ Cuculus वंशसभक (GENERA) सदस्य पक्षी अछि । ई दुनु तरहक चिड़ै भारतमे सेहो प्रायः हर भागमे पाओल जाइत अछि । ऊपरुका चित्रमे देखाओल कोइली Eudynamys वंशक अछि । सभ प्रकारक कोइली मे मात्र नर कोइलीये टा गबैत अछि संगहि पुरुष/नर-कोइलीक रंग कारी या अपेक्षाकृत गाढ़ रंगक होइत अछि तथा मादा/स्त्री-कोइली अपेक्षाकृत हल्लुक या कम गाढ़ रंगक होइत अछि । बेङ्ग (बाल कविता) देखू ! देखू ! ई छै बेङ्ग । टर्र-टेँ, टर्र-टेँ करइछ बेङ्ग ।। हरियर - पीयर ढाबुस बेङ्ग । गाल फुला कोना बाजए बेङ्ग ।। खत्ता - डबरा - पोखरि बेङ्ग । मेघक लगितहि कुदकए बेङ्ग ।। बेङ्गहि सनि देखू ई भेंक । पर ने टर्र - टर्र करइछ भेंक ।। बौआ फेंकलक जुमा कऽ ढेप । डुम्मी काटि कऽ भागल बेङ्ग ।। बेशी सर्दी, बेशी घाम । सहि ने पाबए ओक्कर चाम ।। तेँ बरिसातक पहिने - बाद । माटिक तऽर रहए निर्बाध ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - देखबामे एकरंगाह होएबाक कारण भेंक आ दादुर मैथिली साहित्यमे − विशेषतः काव्य साहित्यमे − बहुधा बेङ्ग केर पर्यायवाचीक रूपमे प्रयुक्त होइत अछि परञ्च ई दुहु वास्तवमे अलग - अलग जीव थिक । बेङ्ग केर त्वचा स्निग्ध आ चिक्कन होइत अछि, ओकर जबड़ामे दाँत होइत अछि, नर बेङ्ग टर्र -टेँ केर अबाज निकालि सकैत अछि जखनि कि भेंक केर त्वचा सुखाएल आ खरखर होइत अछि, ओकरा दाँत नञि होइत अछि तथा ओ बेङ्ग जेकाँ अबाज नञि निकालि सकैत अछि । बेङ्गक बच्चाकेँ “बेङ्गची” आ भेंकक बच्चाकेँ“भेंकशिशु” कहल जाइत अछि जकर प्रारम्भिक अकार माछक बच्चा सनि होइत अछि आ विभिन्न स्तरक कायान्तरण प्रक्रिया(METAMORPHOSIS) केर बाद चिरपरिचित वयस्क स्वरूपकेँ प्राप्त करैत अछि । · बेङ्ग / बेंग (मैथिली) = मेंढक (हिन्दी) = FROG (ENGLISH) = Rana spp. & Others (जैववैज्ञानिक नाम) · भेंक / दादुर (मैथिली) = भेंक / दादुर (हिन्दी) = TOAD (ENGLISH) = Bufo spp. & Others (जैववैज्ञानिक नाम) बेङ्ग आ भेंक - ई दुहु उभयचर वर्गक जन्तु अछि अर्थात पानि आ माटि दुनु स्थानमे विचरण करैछ ( उभय = दुहु / दुनु तथा चर = विचरण कएनिहार / रहनिहार) । उभयचर वर्गकेँ अंग्रेजीमे क्लास एम्फिबिया (Class AMPHIBIA) (Amphi = Both & Bion/Bios = Life) कहल जाइत अछि । उभयचर वर्गक जन्तुसभ शीतरक्तीय / अनियततापी / बाह्यतापी (COLD BLOODED / POIKILOTHERMIC / ECTOTHERMIC) जीव होइत अछि यानि कि ओकरसभक शरीरक तापमान वातावरणक तापक्रमक अनुसार घटैत बढ़ैत अछि । तेँ वातावरणक तापमानक बहुत बेशी कम होएब आ बहुत बेशी बढ़ब एहि तरहक जीव सभक लेल जानमारुक होइत अछि । एहना अवस्थामे ओ सभ जमीनक भीतर नुका जाइत अछि । चुँकि जमीनक भीतरक तापमान जमीनक ऊपर जेकाँ घटैत - बढ़ैत नञि अछि तेँ ओ एतए सुरक्षित रहैत अछि । एहि समय ओ जीवसभ बेशी हलचल नञि करैत अछि आ जिउबाक लेल पुर्व सञ्चित भोजन (चर्बी) पर निर्भर करैछ । गर्मीक समयमे एहेन प्रक्रियाकेँ गृष्मनिद्रा (AESTIVATION / ESTIVATION) आ ठण्ढीक समयमे शीतनिष्क्रियता(HIBERNATION) कहल जाइत अछि । शरीरक तापसन्तुलनक (THERMOREGULATION) एहि तरहक प्रक्रिया सरिसृप वर्ग(Class REPTILIA) केर प्राणीसभमे (यथा - साँप आदिमे) सेहो देखल जाइत अछि । पक्षी आ स्तनपायी वर्ग (Class AVES & MAMMALIA) केर जीव (मनुक्ख सेहो) ऊष्णरक्तीय / नियततापी / स्थिरतापी / अन्तःतापी / अन्तर्तापी (WARM BLOODED / HOMEOTHERMIC / ENDOTHERMIC) होइत अछि अर्थात ओकर सभक शरीरमे एहेन व्यवस्था रहैत छै कि वातावरणक तापक विरुद्ध ओ सभ अपन शरीरक तापमानकेँ एकटा निश्चित सीमामे बनओने रहैछ । धनछुआ (बाल कविता) अपनहि खेत खरिहान रहैए, ई तँऽ छी धानछुआ । उच्चारण करबामे बाजी, एकरे तँऽ धनछुआ ।। तार पर बैसए, मेह पर बैसए, बैसए ओ खुट्टा पर । धानक ढेरी चट छू आबए, बैसए जा ठुट्ठा पर ।। शायद इएह गुणक कारण, ओ धानछुआ कहबैए । गौरसँ देखबै, तखने बुझबै, एना किएक करैए ।। छोट छोट कीड़ा आ फतिङ्गा, धानक ढेरीमे बहुते । खा कऽ तकरा पेट भरैए, छोड़ि धानकेँ अगबे ।। एकरे देखि कऽ कहबी बनलै, अगराहीक धनछुआ । लोक बजैए अर्थ ने बूझए, चीन्हए ने धनछुआ ।। एकरहि एगो छै भैय्यारी, ओ करिया धनछुआ । लोक बुझैए ओकरा कोइली, पर छी ओ धनछुआ ।। भेटत जोतला खेतमे या फेर, जाहिठाँ जमकल पानि । खा कऽ जीबए कीड़ा−मकोड़ा, करए जे उपजा हानि ।। बड़ हल्लुक, खऽढ़क ऊपरमे, देखबै एकरा बैसल । बस कारी भेने की कोइली, गाबैत कहिया देखल ?? संकेत आ किछु रोचक तथ्य - Ø धानछुआ या धनछुआ - धूसर-मटियारी या किछु−किछु छाउरक रंगक चिड़ैविशेष जकरा अंग्रेजीमे ऐशी ड्रोङ्गो (ASHY DRONGO) कहल जाइत अछि । Ø करिया धनछुआ - कारी रंगक चिड़ैविशेष जकरा अंग्रेजीमे ब्लॅक ड्रोङ्गो (BLACK DRONGO) कहल जाइत अछि । सामान्य लोक आ धियापुता कारी रंगक कारण एकरहि कोइली बुझि लैत अछि । संस्कृतमे एहि चिड़ैकेँ धुत्त कारी होएबाक कारण “भृंगराज” नामक पक्षी कहल गेल अछि । Ø कोइली - कारी रंगक चिड़ैविशेष जे कि भारतीय ओ आन वाङ्गमयसभमे अपन मधुर आबाजक लेल प्रशिद्ध अछि । हिन्दीमे एकरा कोयल आ अंग्रजीमे कुक्कू (CUCKOO) कहल जाइत अछि । Ø कोयली - आमक आँठीक भीतरमे उज्जर रंगक कोमल संरचनाविशेष । Ø मैथिलीमे “कोइली” आ “कोयली” श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द भेल । मतलब कि एहेन शब्दसभ जे सुनबामे एकरँगाह लगैत अछि पर ओकर अर्थ अलग−अलग होइत अछि । उल्लू (बाल कविता) रातिमे कचबच कचबच करइछ, नाम ओकर कचबचिया छै ।१,२ ई नञि दूर देश केर प्राणी, अपनहुँ ठाँ बारहमसिया छै ।। आँखि ओकर दुहु गोल - गोल, गोलका भाँटा केर तरुआ सनि । नाक सपाट आ लोल सुकुच्ची, आँखिक सोझाँ मड़ुआ सनि ।। दुनिञा अचरजसँ देखै छै, ओ दुनिञाकेँ अचरजसँ । राति इजोरिया खौंझाएल मन, निन्न जँ टूटल कचबचसँ ।। आँखि एकर किछु खास बनल छै, रातिमे सभ किछु देखबा लए ।३ दिनुका इजोत चोन्हराए आँखि, छै बनल ने दिनमे देखबा लए ।। गर्दनि छै सेहो किछु विशेष, ओ घूमि जाइत छै चारू कात ।४ इएह सब देखि कऽ लोक कहैए, एक्कर भूत - परेतक साथ ।। राति इजोरिया साँझक झलफल, मूँह लागए जेना हो लुच्चा । मूँहक भाव - भंगिमा गजबे, कहबै तेँ ओ मूँहदुस्सा ।।१ अपना सभक समाजमे मूर्खक, उल्लू बनि गेल छै पर्याय । दिन सूतए छै, राति जागए छै, तेँ एहेन कहबी छै भाय ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - १ - मूँहदुस्सा, कचबचिया आदि मैथिलीमे उल्लू (OWL) केर पर्यायी नाम अछि । २ - “कचबचिया” नाम मैथिलीमे उल्लूक अतिरिक्त एकटा आन चिड़ै लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि । एहेन शब्द जकर अलग−अलग स्थान पर अलग−अलग अर्थ हो वा अलग−अलग चीजक बोध करबैत हो मैथिलीमे अनेकार्थक शब्द कहबैत अछि । दू अलग−अलग तरहक चिड़ै केर बोध करएबाक कारण “कचबचिया” शब्द अनेकार्थक भेल । ३ - उल्लूक आँखि बहुत कम प्रकाशमे देखबाक हेतु समायोजित रहैत अछि । तेँ ओकर बनावट किछु विशिष्ट होइत अछि । उल्लूक आँखि कम प्रकाशमे दूरक वस्तुकेँ देखबा लेल बनल अछि आ ताहि कारणेँ ओ अपना लऽगक (आँखिसँ किछु सेन्टीमीटरक परिधिमे) वस्तुसभकेँ एकदम्मे नञि देखि सकैत अछि । ४ - उल्लूक गर्दनि मे १४ टा ग्रीव कशेरुक हड्डी (CERVICAL VERTIBRAE) होइत अछि जखनि कि मनुक्खमे मात्र ७ टा । मनुक्खक गर्दनि मात्र करीब १७० सँ १८० डिग्री धरि घुमि सकैत अछि जखनि कि उल्लूक करीब ३४० सँ ३५० डिग्री धरि । तेँ उल्लू एक ठाम बैसल - बैसल अपना शरीरकेँ बिना हिलएने - डोलओने, बस अपन गर्दनि घुमा कऽ अपन आगाँ आ पाछाँ सेहो देखि सकैत अछि । रातिमे विचरण करबाक कारण रात्रिचर अछिए । इएह अद्भुत गुणसभक कारण मनुक्ख ओकरा भूत-परेतक पर्याय मानैत अछि । सुग्गा (बाल कविता) पोखरिक भीड़, लतामक गाछ । ताहि पर सुग्गा करैए नाच ।। जहिना पात लतामक हरियर । तहिना सुग्गाक रंगो हरियर ।। बैसि नुकाएल खाए लताम । मनुजक आहटि, चौंकल कान ।। हेंजक - हेंज अबैए बेस । खाए लताम ओ खेपक - खेप ।। ककरहु गर्दनि लाल लकीर । केओ बिना लालहि अछि कीर ।। लाल लोल सुन्नर लागैए । खोधि-खाधि सब फऽड़ चीखैए ।। ऊँचगर गाछक बेस क्षुपुङ्ग । धोधरिमे सब रहए उत्तुङ्ग ।। छै स्वतन्त्र उड़बाक सिहन्ता । मनुक्खक हाथ अभागक चिन्ता ।। पकड़ाएल, की करत उपाए ? पिञ्जरा नञि छै रहल सोहाए ।। सुग्गाक विश्वमे बहुत रास जाति ओ प्रजाति पाओल जाइत अछि । एकर रंग हरियर, लाल, पीयर, नील, धूसर-मटियारी आ एहि रंगक विभिन्न प्रकारक फेंट-फाँट भऽ सकैत अछि । एहि कवितामे सामान्य रूपसँ भारत ओ खास कऽ मिथिला क्षेत्रमे पाओल जाएबला सुग्गाक वर्णन कएल गेल अछि । बिढ़नी आ पचहिया (बाल कविता) ई बिढ़नी, ओ बिढ़नीक खोंता, बुझलह की ने बौआ । दूरे रहिहह, काटि लेतह, कटिते बनि जएबह कौआ ।। बिढ़नी कटतह, थुम्हा फुलओतह, करए ने जाह उकाठी । सम्हरि कऽ खहिहह आमक गाड़ा, देखलक बिढ़नी बाटी ।। आमक महिना अबितहि बिढ़नी, जानि कतऽसँ आबए । आमक चोभा लगबए बुच्ची, काटि कऽ तखने भागए ।। मधुमाछी सनि देखबामे अछि, पर नञि मऽध बनाबए । पर खोँतामे एक्कहि रंगक, कोठरी कोना बनाबए !! कम बिषाह पीयर बिढ़नी, कहबए “साधारण बिढ़नी”। लाल आ कारी देहमे धारी, इएह “पचहिया बिढ़नी”।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - · बिढ़नी आ पचहिया दुहु एकरँगाह होइतहुँ एक-दोसरासँ किछु विशिष्ट अन्तर रखैछ । · अंग्रेजीमे वास्प (WASP) शब्दसँ उड़एबला कीड़ाक एकटा बहुत पैघ समुदायक बोध होइत अछि जाहिमे बिढ़नी ओ पचहियाक अतिरिक्त आन बहुत तरहक सम्बन्धित कीड़ासभ अबैत अछि । · बिढ़नी गाछ-पातमे उपस्थित सेल्युलोज (CELLULOSE) नामक पदार्थकेँ अपना थूक या लेरमे (SALIVA) सानि अपन खोंताक (NEST)निर्माण करैछ । सेल्युलोज ओएह पदार्थ अछि जाहिसँ कागत (PAPER) बनैत अछि । तेँ एकरा अंग्रेजीमे पेपर वास्प (PAPER WASP)कहल जाइत अछि । एकर खोंतामे २०० सँ ५०० धरि कोठरी भऽ सकैत अछि आ हरेक कोठरी आकारमे एक समान रूपसँ षटकोणीय(HEXAGONAL) होइत अछि । एकर खोंताकेँ एकटा विशिष्ट छत्ता सनि आकार होइत अछि तेँ एकर खोंताकेँ छत्ता (COMB) आ बिढ़नीकेँ अंग्रेजीमे अम्ब्रेल्ला वास्प (UMBRELLA WASP) सेहो कहल जाइत अछि । · समान्य रूपसँ भेटए बला पीयरका बिढ़नीकेँ अंग्रेजीमे यॅलो पेपर वास्प (YELLOW PAPER WASP) कहल जाइत अछि । एकरअतिरिक्त आन कतेको तरहक बिढ़नी होइत अछि किछु एक रंगक तँऽ किछु पर दोसर रंगक धारी (BANDS) रहैत अछि । · मुख्य रंग (पीयर या नारंगी या आन) पर दोसर रंगक (कारी या भूरा) धारी (BANDS) पचहियामे सेहो भेटैत अछि पर पचहिया सामान्य बिढ़नीसँ आकारमे किछु पैघ होइत अछि । पचहियाकेँ अंग्रेजीमे हॉर्नेट (HORNET) कहल जाइत अछि । ई बिढ़नीएक किछु पैघ आ विशिष्ट रूप मानल जाइत अछि तेँ कतेक ठाम एकरा वास्प (WASP) या हॉर्नेट वास्प (HORNET WASP) कहि सेहो संबोधित कएल जाइत अछि । · सामान्यतः पचहियाक दंश बिढ़नीक दंशसँ बेशी खतरनाक होइत अछि । पचहियाक दँशसँ मनुक्खक मृत्युक घटना बेशी सोझाँ आयल अछि । पहाड़ी मएना (बाल कविता) सोन चिड़ैञा, सोन चिड़ैञा, कोन देशसँ आबैत छी । पीयर देह आ कारी पाँखिमे, बहुतहि सुन्नर लागैत छी ।। आँखि छी कारी, मूरी कारी, लोल गुलाबी सुन्नर छी । ककरो-ककरो पर देखैत छी, मूरी सेहो पीयर छी ।। हमरा दिशि आबी बसन्तमे, ठण्ढी अबितहि भागैत छी । प्रायद्वीप*१ भारत कि अफ्रिका, ठण्ढी जाए बिताबैत छी ।। मएना सनक आकार अहँक, तेँ नाम “पहाड़ी मएना” छी । सोन चिड़ैञा नाम आन केर, अहँ केर तँऽ बस उपमा छी ।।*२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *१ द्वीप (ISLAND / ISLET) ओ स्थलखण्ड थिक जे चारू कात सँ पानिसँ घेरल होअए आ प्रायद्वीप (PENINSULA) ओ स्थल खण्ड थिक जे तीन कातसँ पानिसँ घेरल हो पर एक कातसँ कोनो आन स्थलखण्डसँ जुड़ल हो; जेना कि भारतक दक्षिणी भू भाग । (प्रायद्वीप = प्रायः + द्वीप = जे द्वीप तँऽ नञि अछि पर लगभग द्वीप सदृश अछि = चारि नञि पर तीन भाग पानि हो जाहि स्थलखण्डक) । *२ एहि चिड़ैकेँ मैथिलीमे “पहाड़ी मएना” कहल जाइत अछि, जकर कारण सम्भवतः मएनासँ मिलैत - जुलैत एकर अकार - सुकार छी ।पीयर रंग हएबाक कारण एकरा सोन - चिड़ैञा केर उपमा देल गेल अछि जे कि एकर नाम नञि अछि । “सोन-चिड़ैञा” नामसँ मैथिलीमे एकटा दोसर चिड़ै केर बोध होइत अछि । ई हिन्दीक “पहाड़ी मैना”सँ बिल्कुल भिन्न अछि तेँ दुहु भाषामे एक्कहि नामक कारण भ्रमित नञि होउ । कारी माथबला पीयर रंगक चिड़ै जे ऊपरुका चित्रमे देखाओल गेल अछि तकर अंग्रेजी नाँओ BLACK HEADED GOLDEN ORIOLE थिक आ प्राणिशास्त्रीय या जैववैज्ञानिक (BIOLOGICAL / SCIENTIFIC) नाँओ Oriolus larvatus अछि । एहने चिड़ै जकर माथ सेहो पीयर रंगक होइत अछि से INDIAN GOLDEN ORIOLE कहबैत अछि आ एकर प्राणिशास्त्रीय नाँओ Oriolus kundoo अछि । मैथिलीमे ई दुहु प्रजाति “पहाड़ी मएना” कहल जाइत अछि आ दुहुक लोलक रंग मांसक सदृश गुलाबी होइत अछि । फागुनक पानि फागुनक पानि, अकालक पानि । तइयो लाभ आ किछु छी हानि ।। गहूम पुष्ट, मज्जर मजगूत । मसुरीक छी सद्यः यमदूत ।। धियापुता लए मजगर बात । इस्कूल बन्दी छै बरसात ।। पुरिबा - पछबा बहए बसात । ठिठुराबै - कँपबै छै गात ।। बीतल ठण्ढी पुनि घुरि गेल । सोएटर - कम्मल बाहर भेल ।। मुरही कचड़ी झिल्ली चौप । चाहक चुस्की चौके - चौक ।। गरम जिलेबी, लिट्टी बेस । गरम सिंघारा खेपे - खेप ।। नहिञे गरजय - तरजय मेघ । टिप्-टिप्-टिप्-टिप् बरिसय मेघ ।। बरसाती, छत्ता की भेल ? छोड़ू ! एक दिनक छी खेल ।। माघ सिहकैत बसात, ठिठुरैत माघ । ओसक टप् - टप्, कानए अकास ।। सभ आढ़ि - धूर पर उगल घास । ओसेँ भीजल, पिछड़ैत लात ।। ओसेँ भीजल अछि गाछ - पात । टप् - टप् भू पर पानिक प्रपात ।। पर ओस चाटि की मेटए प्यास ? एकटा अछार एखनो छै आश ।। पछता गहूम केर हो ने नाश । तेँ दमकलसँ अछि पटैत चास ।। नाला - पौती अछि बितल बात । प्लास्टिकक पाइप संबल उसास ।। अजगर सनि पसरल बीच बाध । फक् फक् करैत दमकलक साथ ।। गमछा - मफलर बन्हने गाँती । चद्दरि – सोएटर झँपने छाती ।। निकलल – जकरा भोरे छै काज । काजक बदलामे नञि छै लाथ ।। शीतलहरी पूसहु केर बाद । नञि जानि कते दिन रहत आब ।। कनकनी एहेन कँपबैछ हाड़ । तइयो धड़फड़मे घटकराज ।। एहनोमे धोएबा लेल पाप । जा रहल लोक दौगल प्रयाग ।। सोझ बाट सोचलहुँ बाट ई सोझ, एकर अनुसरण करी । कुटिल वक्र तजि, सरल सोझ केर वरण करी ।। पर दुनिञामे सोझ कहाँ, कत्तहु धरती छै । बिनु किछु उगने साफ कहाँ, रहइछ पड़ती छै । पड़ती जञो छोड़ल, तँऽ उपजै, काँटे अगबे । सरल सोझ आ स्वच्छ सुगम अछि बाटे कतबे । जतेक दूर दुर्गम अगम्य, अछि से अतिपावन । जतेक विलक्षण विश्मयकारी, ततेक सोहाओन । अखड़ल जकरा, कहलक, बाटेँ हवन करी । अति विशिष्ट लए, ओहि कातेँ अहँ गमण करी ।। एहि सृष्टिक तँऽ इएह एक छै, नियम सनातन । सरल सोझ केर एहिठाँ नञि छै, जीवन-यापन । जञो रहितए तँऽ, पृथिवी गोल किए कऽ रहितै ? एकर सतह, पर्बत – पहाड़ - घाटी नञि रहितै । नदी असंख्य, धरती पर सदिखन सोझेँ बहितै । चक्रबात - बिर्रो आ बबण्डर सेहो ने अबितै । आब सोचै छी, हमहूँ वक्रेँ भ्रमण करी । जएह रूचए दुनिञाकेँ, तहिना रमण करी ।। दुर्लभ चीजक दुनिञामे छै - मोल बहूते । सर्वसुलभ धूरा फाँकए, नञि पूछए लोके । सर्वसुलभ छी हवा - पानि, सोचल की अपने ? हीरक मोल - अमोल भेल, नञि भेटए जखने । हीरा सेहो जञो सपाट, होइए कम दामक । गेल तरासल, कुटिल भेल, बूझू बड़ काजक । दुनिञामे जिउबा केर इच्छा वरण करी । दुनिञादारी सीखी, तकरेँ नमण करी ।। वक्र सुलभ, पर सोझ बाट भेटए ने तकने । सोझेँ भेल विशेष, जखन दुर्लभ छी तखने । मुदा सोझ केर जिनगी संकटसँ छी भरले । सोझ बाँस कटि गेल, टेढ़ एखनो छै लगले । दुनिञा सोझक लेल कहाँ कहियो रहलैए । सोझ सरल अनुशासित से गदहा कहबैए । सोझ जौड़केँ गीरह दऽ लगबै सभ ओझड़ी । तहिना सोझ मोनमे सेहो लागल घुरछी । असमञ्जसमे मोन, सोचए की एखन करी । सोझ चली कि वक्र, ककर अनुसरण करी ।। मंगलमय हो नव वर्ष मोन पड़ैतछि, आइ नगद आ काल्हि उधारी । हमरा सभकेँ, लागल किछु एहने बेमारी ।। हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी । विगत् वर्षकेँ, अपना – अपनी, खूब लतारी ।। पिछला साल, सेहो स्वागत छल, एहि नववर्षक । आइ पुनः, स्वागत करैत छी, अगिला वर्षक ।। गओले गीत ओ, पुनि गबैत छी, अछि लाचारी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। विगत् वर्ष, जे छल आगत, से नञि तत् नीके । नव आगत, करी पुनि स्वागत, होयत सब ठीके।। जे ने कटल, से कटि जायत, सब संकट भारी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। आबि रहल अछि, एक जनबरी, नऽव साल छी । पुनि होली, नव वर्षक स्वागत, तेँ बेहाल छी ।। कहिया–कहिया, कतेक–कतेक, नव वर्ष मनाबी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। विगत् वर्ष, कंगाल – दिगम्बर, बुझले अछि से । नवल वर्ष, होयत विश्वम्भर, होइछ भरम से ।। कर्म करू, तजि सभ आडम्बर, औना - पथारी । हरेक साल – मंगलमय हो नव वर्ष – उचारी ।। तमघैला भरि – भरि अनलहुँ (कविता) मिथिला देखए गेल छलहुँ, हम बहुते मिथिला देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। ब्राम्हण केर मिथिला हम देखल, आ हरिजन केर मिथिला । सिक्ख ईसाई मुसलमान केर, बौद्ध – जैन केर मिथिला । पढ़ुआ केर मिथिला हम देखल, मुरूखक देखल मिथिला । गामक मिथिला अलगे भाखल, शहरक अलगे मिथिला । भारत केर मिथिला सेहो देखल, आ नेपालक सेहो देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। बेतिया, मोतीहारी, वैशाली, सीतामढ़ी आ शिवहर । दरिभंगा, मधुबनी, समस्ती – पुर दुहु संग मुजफ्फर । किशनगंज, पुर्णिञा, अररिया, बेगूसराय खगड़िया । बीच कौशिकी अछि सुपौल, मधेपुराक संग सहरसा । कटिहारक मिथिला देखल, हर घाटक पानिकेँ चिखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। दानवीर कर्णक धरती जे, अंगक क्षेत्र रमणगर । ततहु देखल मिथिला माएक, आँचर केर छाँह मनोहर । बाबाधाम ओ आस-पास केर, देखल अलगे मिथिला । मिथिलापुत्रक संग बसल, अगनित प्रवासमे मिथिला । भारत ओ विश्वक हर कोणा, अलगे मिथिला देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। मिथिला केर हर रूप मनोहर, सुन्नर छवि अभिराम । कहाँ केओ छल श्रेष्ठ आ दोसर, दीन – हीन सन्तान । जतऽ कतहु जे छथि मैथिल, से राखथु अप्पन मान । आ प्रवास केर क्षेत्रक सेहो, देथु उचित सम्मान । भारत ओ नेपालमे अलगे, मिथिला केर माँगकेँ देखलहुँ । एक सिक्का लए गेल रही, तमघैला भरि – भरि अनलहुँ ।। ।। नववर्ष मंगलमय हो ।। नववर्ष मंगलमय हो । नववर्ष मंगलमय हो । शुभ भावनाक उदय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। नव प्रेरणाक लय हो । नव सर्जनाक उदय हो । ई विश्व ऊर्जामय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। दुःख - क्लेश केर क्षय हो । नञि वेदना आ भय हो । सभ स्वस्थ ओ निर्भय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। सुख - शान्ति केर जय हो । बस सत्य टा अजेय हो । नव चेतनाक उदय हो । नववर्ष मंगलमय हो ।। परिवर्तन परिवर्तन जिनगीक नियम छी, परिवर्तन होएबे करतै । वर्तमान जे घटित भऽ रहल, से अतीत होएबे करतै ।। परिवर्तन नहि रोकि सकै छी, परिवर्तन तँऽ शाश्वत छै । एकर सिवा सबकिछु धरतीपर, अजर-अमर नञि, नश्वर छै ।। परिवर्तन केर नियम सृष्टि केर, एकमात्र उत्प्रेरक छी । आदि – अन्त, निर्माण – ध्वंश केर, इएहमात्र सम्प्रेरक छी ।। काल बुझू वा समय कहू, एकरहि रूपेँ परिलक्षित अछि । जगत नचाबए इएह नियम, अपने तँऽ अतिसंरक्षित अछि ।। अनुकूलेँ हो वा प्रतिकूलेँ, परिवर्तन नहिञे रुकतै । परमेश्वर केर परमशक्ति ई, अपन राह चलबे करतै ।। मानव जे प्रतिकूलहुमे, अनुकूल बाट एक बना सकए । सएह जीवनक चित्रपटक, सर्वोत्तम अभिनेता कहबए ।। सहनशीलता (कविता) सहबाक गुण छी पुज्य, जा धरि पार ने सीमा करए । तकर बादो जे सहए से, कायरक उपमा पाबए ।। सहनशील मनुक्ख बढ़िञा, जा उचित कारण रहए । जँऽ अकारण आ हो अनुचित, सहल तँऽ पामर बनए ।। ओ युधिष्ठिर आ कि रघुवर, शास्त्रमे सुन्नर लागथि । हर धिया केर माए चाहथि, जमाए शिवशंकर बनथि ।। मिथिलाक बेटी छथि सिया, तेँ पुज्य भरि मिथिलामे ओ । भाग सीता सनि कहए सब, ने हमर ललनाक हो ।। देखि रहलहुँ मूक - चुप, मिथिलाक वैभव लुटि रहल । सहन करबा केर हद, कखन धरि सभ चुप रहब ?? ई की भेल !?!?! अहँ कहैत छी, ई की भेल !? ! हम कहैत छी, किछु नञि भेल ।। फलना जीतल, चिलना हारल । अपन अपन सभ, दुःख केर मारल । अपन बेगरतेँ, सभकेओ भागल । दिन सूतल आ रातिमे जागल । अहँकेँ अचरज लागि रहल अछि । हमरा लए किछु नव नहि भेल ।। ओएह दिन छै, ओएह राति छै । ओएह लोकसभ, ओएह जजाति छै । देखले पाथर, चिन्हले खाधि छै । ओएह हवा छै, ओएह आगि छै । जन्मौटी बच्चा भौंचक अछि । हम कहैत छी, देखले खेल ।। ओएह सृष्टि छै, ओएह प्रलय छै । एक्कहि गति छै, एक्कहि लय छै । ओएह भाव छै, ओएह हृदय छै । नीक−बेजाए, फेर ओएह समय छै । पहिल दृष्टिमे सभ किछु नूतन । दोसर सभटा खेलले खेल ।। कतऽसँ अयलहुँ, कतऽ कऽ जायब । तकनहुँ पर उत्तर नहि पायब । भरि जिनगी, कतबहु बौआएब । घुरि - फीरि पुनि, एहि ठामे आएब । परमेश्वर केर सभ “खेला” छी । “शतक” अपन बूझी बकलेल ।। छठि गीत - १ माँगैत छी वरदान, कनेक अहाँ होइयौ ने सहाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! महिमा अहँक बहुत छी सुनने । हमहूँ छी किछु आशा रखने । कातिक मास इजोरिया पखमे । षष्ठी तिथि हमहूँ छी जपने । हमरो मोनक बात सुनू माँ, हरियौ सकल बलाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! अस्ताचल सह उदित भास्कर । अर्पण अर्घ्य करै छी सादर । तेजोमय भास्वर हे दिनकर ! क्षमा करब गलती सभ हम्मर । हमरो मोनक आश पुरबियौ, करियौ कोनो उपाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! हमहूँ मनुख साधारण छी । आयल आइ किछु कारण छी । सभ ठाँ सँ हम हारल छी । थाकल आओर झमारल छी । खोंइछ हमर खाली जुनि रखियौ, करियौ ने बेजाए । हमरो सुनियौ हे छठि माए !! छठि गीत - २ दीन - हीन पापी मुरूख हम, कएलहुँ बड़ अपराध । क्षमा करू तइयो हे सुरूजदेव दिनकर दिनानाथ !! ठाढ़ पानिमे विनय करै छी । निज अपराधक क्षमा मँगै छी । अरघ नेने छी ठाढ़, करू स्वीकार हे दीनानाथ । क्षमा करू गलती हे सुरूजदेव दिनकर दीनानाथ !! अपना लेल सौभाग्य मँगै छी । अपना खोंइछक लाज मँगै छी । हम अज्ञानी, देव अहाँ छी, होइयौ ने सनाथ । क्षमा करू गलती हे सुरूजदेव दिनकर दीनानाथ !! सिंउथ सिनूरे लाल मँगै छी । कोरा सुन्नर लाल मँगै छी । सिया-धिया अँगना खेलए आ खेलए बाल-गोपाल । क्षमा करू गलती हे सुरूजदेव दिनकर दीनानाथ !! लेखकक जिनगीक छन्द गीत कविता ओ निबन्ध । गजल खिस्सा ओ प्रबन्ध । लेखनीकेँ लोक बूझए, लेखकक जिनगक छन्द ।। बात तँऽ किछु सत्य सेहो, बात किछु फूसियो रहै छै । बात किछु अपना मनक, किछु आन केर सेहो कहै छै । बात किछु अनुभव आधारित, आन किछु देखल−सुनल । बात किछु सहमति मनक, आ बात किछु जे नञि पटल । तेँ कोनहु साहित्यकारक, लेखनी−जिनगी स्वतन्त्र । लेखनीकेँ जुनि बूझू अहँ, लेखकक जिनगीक छन्द ।। लेखनी नञि बान्ह मानए, की परक आ की अपन । लेखनी नञि भेद बूझए, की यथार्थ आ की सपन । लेखनी हर आढ़ि धाँगए, की सुखक आ की दुःखक । लेखनी तँऽ सेन्ह मारए, आन आ अप्पन मनक । तेँ कोनहु लेखक केर जिनगीक, लेखनी ने छी कलण । किछु तँऽ हुनि जिनगीक दर्पण, शेष स्वच्छन्दे फलन ।। अंगूर केर दाना सुकोमल, कोमलहि देखबामे छी । नारिकेरक भीतरी ओ बाहरीक तुलना ने छी । तेँ कोनहु लेखक केर, जीवनवृत्तमे से ध्यान राखी । लेखनीमे दर्प जिनगीक, अछि कतेक अनुमान राखी । सएसँ शुन्ना धरिक प्रतिशत, केर रहैछ सम्बन्ध । आन साक्ष्यक ली सहारा, बूझि पड़ए जँ द्वन्द्व ।। श्री गणपति वन्दना जय गणेश गजवदन विनायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। गौरीसुत हे गिरिजानन्दन । प्रथमपुज्य हे सादर वन्दन । सकल अमंगल विघ्न विनाशक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। भालचन्द्र अहँ एकदन्द । हे शंकरसुवन भवानीनन्दन । सकल कार्य सिद्धी शुभ दायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। पीतवसन, आँजी कर शोभित । महाकाय, मूसहि पर राजित । मोदकप्रिय अँहीँ सिद्धीविनायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। जय हे वक्रतुण्ड लम्बोदर । जय हे गणाध्यक्ष सुरेश्वर । रिद्धि-सिद्धि स्वामी सुखदायक । जय जय हे गणपति गणनायक ।। अशरफ राईन , सिनुरजोडा, धनुषा, हॉल :क़तार गजल दोसरक सुख लेल अपन दुःख चोरा कऽ राखी हृदय भीतर सदैब उज्जवल दीप ज़रा कऽ राखी मानवता केर सदिखन ख्याल राखि समाज में एक दोसर मिल क प्रेमक बस्ती सजा कऽ राखी की जाती धर्मक भेद बिभेद लक लडि रहल छी पहिने बनि मनुष्य हृदय सँ हृदय मिला कऽ राखी मैर रहल छै जरि रहल छै बेटी कुप्रथाक चपेट में दहेजक ठीकेदार सँ अपन बेटी बचा कऽ राखी सभक शोणित एकहि रंग त रहू मिल संग संग प्रेमक डोर बान्हि सब संग मीत लगा कऽ राखी गजल पायक लोभें परिवार सँ मुह मोड़ी रहल छी फेर दू साल लेल अपन देश छोड़ि रहल छी हृदय में अपना नुका देश प्रतिक माया आब रेगिस्तानक मरुभूमी सँ नाता जोड़ी रहल छी मोतीयो सँ बेसी अनमोल पसीना बेचैत हम खेती बारी छोड़िक एत पाथर फोड़ि रहल छी जरि - जरि कऽ कटि रहल जबानी हमर मानु अपने जीवन में अपने बिस घोडि रहल छी मेहनत अशरफ़ रंग लेतै की एह आश लऽ अपन निसबक चाभी बालूमे खोजि रहल छी सरल वार्णिक बहर वर्ण:१८ परदेशी मनक भावना बिगत दू साल सऽ सात समुन्दर पार ई मरुभूमिक देश में अपन श्रम बेच रहल हम आइ हमरा घर जेबाक समय पूरा भऽ गेल मुदा - तैयो मोन पूर्ण सन्तुष्टि नै अछि खटकैत रहैय हर छन मन मस्तिष्क में बस एकहिटा बात की कहीँ ई दू साल के अंतराल में हमरा सब केओ बिसरा त नै गेल हेतै मोह माया हमरा सऽ तेज त नै लेने हेतै अपन प्रेम-स्नेह सँ बन्चित त नै कऽ देने हेतै इएह सोचि-सोचि आइ-काल्हि हमर ई मोन बहुते निरास रहैय। ओम प्रकाश झा गजल ताकै छी, अपन पता चाही जिनगी जे कहै, कथा चाही हम छी खोलने करेजाकेँ छै गुमकी, कनी हवा चाही नै चाही जगतसँ किछु हमरा हमरा बस सभक दुआ चाही लूटलकै मजा बहुत सब यौ हमरो आब ई मजा चाही "ओम"क छै करेज ई पजरल नेहक एकरा सजा चाही मात्राक्रम 2-2-2-1, 2-1-2-2, 2 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर गजल रंगि दिय' हमरा रंग बसंती आब चाही हम अंग बसंती ओकरे नामे लीखल जिनगी भेल छै ओकर संग बसंती ढंग एहन बनिजाय हमर जे सब कहै देखू ढंग बसंती जोश जे नबका फेरसँ चढ़लै विस्मयसँ भेलै दंग बसंती शत्रु "ओम" क रण छोड़ि पड़ायत हम लड़ब एहन जंग बसंती मात्रा क्रम 2-1-2, 2-2-2-1, 1-2-2 सब पाँतिमे एक बेर। गजल आँखिक मस्ती जे अपन ओ पिया देलक बिनु पीने हमरा शराबी बना देलक सम्हारल छल ई करेजा बहुत जतनसँ नैनक संकेतसँ गगनमे उड़ा देलक अनका नचबैमे छलौं मस्त एखन धरि ता ता थैया नाच हमरा करा देलक जे नै बुझतै बात तकरासँ आसे की बेदर्दी दर्दे करेजक बढ़ा देलक कोना भेंटत "ओम"केँ चैन एतय यौ पर्दा प्रेमक आबि अपने हटा देलक 2222-2122-1222 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर रवि भूषण पाठक तीनटा कविता 1 अस्सी के लगभगेने ऊ गाम मे छथिन कानक अस्थि-उपास्थि आ सुनइ वला तंत्रिका तंत्र सब बसिया गेलै आबैत-जाइत ध्वनि सिगनल तोरैत अहां कैह सकै छियै कि जंग लागि गेलै बूरहा के कान मे आ ईहो कि बैटरीक समाप्त भ’ गेलै मिझाइत कानक दम कें सकारैत अहां कहि सकै छियै दू आ दू पांच आ ओ किछु नइ कहता अहां कहहबै करियनक पूब मे बागमत्ती आ ओ बूझता जे अहां सत्ते बाजैत होयब साहस एतबो कि जनक राजा भेला काशी के आ ओ मुसकियेता ऐ आत्मविश्वासक साथ कि अहां झूठ किएक बाजब मुदा बांचब तखने तक जखन तक कि बूरहा थाहता नइ आ थाहैत-थाहैत मुख-भंगिमा के परहैत-परहैत बूरहा यदि बूझि गेला अहांक खेल त’ओ रूकि के अहांक गणित दुरूस्त करता साफ करता अहांक दिशासूचक मानचित्र आ खोंखियाइत कंठ सँ कफ निकालैत क्रमबद्ध करता इतिहासक किछु पन्ना
2 समै भागि रहलै सत्ते आ सत्ते कि भागि रहलै कालक चक्र चक्रक अवाज सब अपना-अपना दम सँ बूझैत गेलै अपना-अपना बूत्ता सँ सब चक्रक कोखि मे दैत गेलै मोबिल-तेल मुदा तेल चक्रक घर्षणात्मक शक्ति कें कम नइ क’ सकलै चक्र चारू कात बरहैत गेलै चारू कातक जमीन जेजाति पर परैत गेलै निशान अइ निशान के राम राम जेंका आ रहीम रहीम जेंका परहलकै 3 एखन त’ इहो नइ निर्णय भेलै कि बूरहाक कान देखायल जाए एखन त’ इहो निर्णय नइ भेलै कि डाकडरक देखेला सँ किछू फैदा भ’ सकै छैक एखन त’ इहो नइ निर्णय नइ भेलै कि बूरहा कें कान सँ की फैदा आ ओइ कान सँ घर-परिवार कें की फैदा आ कहीं बूरहा बेशी सुन’ लागलखिन त’ आ कहीं बूरहाक कानक पावर बेशी तेज भ’ गेलै त’ आ एमहर सबहक कनियां के जोर सँ बजबाक आदत भ’ गेल छलै एमहर सबहक कनियां बात-बात पर मारै ठहक्का एमहर नइ रहलै कुनो ब्रेकर कुनो आडि़ त’ अइ मशीन सँ ओझरेतइ कि नइ आंगनक समीकरण से बूरहाक कानक मशीन के आनतै बेटा-बेटी या कि पोता-नातिन आ एहने सन बहुत रास प्रश्न रहै जेकर उत्तर सबके पासे मे रहै विजयनाथ झा नव वर्षक एहि मधुर पहरमे नव वर्षक एहि मधुर पहरमे समुपस्थित सब बंधु-प्रवरमे अभिनंदन वंदन प्रतिवेदित हास होइ उल्लास नवोदित। भाव-स्वभाव भरल हो समता सुरभि-स्नेह पसरय घर-घरमे। बाटि रहल छी हर्ष समुज्वल- सभक लेल हम गाम-शहरमे। हमर नाम परिचय सादर सुरत हम हमर नाम परिचय सादर सुरत हम नमन कोटिश: देश भारत भरत हम। ललित रूप वैविध्य अछि गाम घर-घर नगर सब समुन्नत क्रिया, कर्म, व्रत हम। हमर सभ्यता अछि पुरातन, सनातन प्रगतिशील तैयो विनयशील नत हम। समर मे शौर्य सिद्धांत संबल तिरंगा हमर प्राण प्रिय प्राणवत हम। सदाचार, सुविचार, संयम, सुरक्षा बहुरूपता लौह, पारद, रजत हम। वैविध्य व्यंजक विविध रूप आखर लालित्य- लावण्य उल्लासरत हम। हमर स्वाभिमानक कथा लोमहर्षक कएल त्याग उत्सर्ग वाणीवरद हम। विविधता हमर धर्म परिचय सुरुचिगर हमर लोक परिवार संयुक्त शत हम। हमर आंकलन क' रहल आय दुनिया समादृत सभक बीच संसारवत हम। चेतना केर नव सृजनमे चेतना केर नव सृजनमे भाव नूतन खास भरिऔ, व्यंजना चमकम मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ। संग पुरबामे अहां केर अछि युवा पीढ़ी सबल, मार्गदर्शन हो सुपथगर मिथक नव इतिहास भरिऔ। शब्द श्रद्धांजलि समर्पण ओ करू जे प्रेरणा प्रद, गूढ़ नहि गुण ग्राह्य सब लए भ्रम रहित विश्वास भरिऔ। ज्ञानकेर देखल अनादर वेदना ई कष्ट भारी, नहि उचित अवहेलना ई द्वेष नहि आवेश भरिऔ। शक्तिपीठक मूल थाती ऋषि मुनिक ई यज्ञशाला, शैव विद्यापति प्रकाशक चहुमुखी विन्यास भरिऔ। शब्द बीथी मे नुकाएल कांट-कुश सब कात केने, शरद सायं भोर फागुन लोक मे उल्लास भरिऔ। पर्व ई गणतंत्र सम्मुख सांस्कृतिक अवदान धएने पुरिऔ संबंध-दृढ़ता लोक हिट सायास भरिऔ। चेतना केर नव सृजन में भाव नूतन खास भरिऔ। व्यंजना चकमक मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ। पर्व ई गणतंत्र सम्मुख सांस्कृतिक अवदान धएने, पूरिऔ संबंध-दृढ़ता लोक हित सायास भरिऔ. चेतना केर नन सृजनमे भाव नूतन खास भरिऔ, व्यंजना चकमक मनोहर भू-भवन आकास भरिऔ. सृजन शेखर ’अज्ञेय’ (मूल नाम गंगानंद झा) गीत सँ पहिने गीत सँ पहिने शब्द छऽल चुप प्रकाश सँ पहिने अन्हार छऽल ..... समय भागि गेल समय भागि रहल समय आगू एत्तै समय सँ पहिने समय छऽल ..... कि कि ने केलौं कि कि ने भेलौं समटि नहिं सकलौं एक मुट्ठी जिनगी जिनगी सँ पहिने साँस छऽल .... अन्हार भेल मंच पर चलि रहल तमाशा नाचि रहल नटुआ टूटल ताल ताशा मेला सऽ पहिने बजार छऽल ...... रूकतैऽ तऽ मरतैऽ मरतैऽ तऽ रूकतैऽ तकतैऽ तऽ भेटतैऽ देखतैऽ तऽ बुझतैऽ चलय सऽ पहिने रूकल छऽल ...... आगू सऽ बढि गेल आगू सऽ बिका गेल रहि गेल से रहि गेल गाड़ी जकर छूटि गेल सपना सऽ पहिने अइंख छऽल ...... बात कि हेतै मुँह जे नय खुजतै ठाढ़ कोना रहतै डोरी जे टूटतै अंत सऽ पहिने आदि छऽल ..... माटिक मुरूत पानि बिनु फाटैत माटिक मुरूत पानि छू भखरैत माटि सऽ पहिने माटि छऽल..... भेंट नय भेलै भीड़ छलै बहुत रूकि नय पेलै जल्दी छलै बहुत प्रेमी सऽ पहिने प्रेम छऽल ..... हऽम हऽम कनी तमसएऽल छी निन्न टूटल अखने तैं ओंघाएऽल छी केलौं बहुत स्वाँग भऽ गेलौं निर्लज्ज देखलौं मुँह एना में तें कनी लजायल छी छोड़ू ओहि बात के दोसर कोनो बात करू टारि-टारि एहिना सच बिसराएऽल छी चलब ने अनचिन्हार बाट अन्हार राइत डरि-डरि एहिना डरे नुकाएऽल छी बचि-बचि के चलैत रहलौं जिनगी भरि सहेजलौं ने एक्कहु साँस तें खलियाएऽल छी लिखैत रहलौं जाहि हाथ सऽ जाली ख़त उसरै ने पुण्य काज तैं कँपकपाएऽल छी माँगैय के अछि आदत खोललौं ने बंद मुट्ठी दै के बेर तें कनी हिचकिचाएल छी हँसि ने पेलौं कानि ने पेलौं बनलौं बुधियार विदा के बेर तें आय नोरे नहाएल छी जिनगी के दस्तावेज़ हऽम तऽ छी टूटल एगो डारि आउर आब टूटब कथी चिट्ठिए हमर हेरेलक डाकिया सनेस हम पायब कथी लागल एहन ऐगलग्गी जे पूरा गाम जरि गेल घऽर अपन बचायब कथी कानय के एहन हिस्सक भेल हँसनाय बिसरि गेलौं गीत आब गायब कथी बेचि रहल छी नित अपना कें खरचि रहल छी हिरदय के जुड़ायब कथी असली किछु नय मुखौटा सभक मुँह पर संगी ककरो बनायब कथी हेरा गेल जे छल झोरी में चोरेलक नय केओ आब कथुके चिंता कथी मारलक नय कियो जिनगीए बिसरि गेलौं मुइल के जिआयब कथी सभ मैथिल के लेल हम सब रने-बने छिछिया रहल छी पीबऽ चाहैत छी अमृत बिख पीने जा रहल छी रस्ता क थाह नहिं अछि छी अगम अथाह में दिशाहीन भटकल अनेरे बौएने जा रहल छी आन के अपन के के अछि हित के अछि दुश्मन चिन्हारो के अनचिन्हार केने जा रहल छी जागल छी कि सूतल बेहोश छी कि होश में जिनगी के टूकड़ा हज़ार केने जा रहल छी चलि रहल साँस तऽ आ भीतर भऽ गेल मुर्दा धक्का सँ गुड़कैत जिनगी गुड़कने जा रहल छी आयल ने मसीहा ने कोनो दुखहर्ता अइंख पथराएल कर्म के भाग के मंदिर-मस्जिद चिचिएने जा रहल छी प्रेम के गीत-सृजन मनुक्ख छी,मनुक्ख में बस मनुक्ख देखैत छी मनुक्ख छी, मनुक्ख के बस मनुक्ख चीन्हैत छी हम तऽ जनै छी प्रेम बस प्रेम करै छी भेंट करै छी जखन किनको सँ चीन्ह पाबी लोक के बस ने जाइत-धर्म रंग आ भाषा ने देश-समाज,कर्म-पैसा मुस्की बुझै छी अइंखक दीप्ति चीन्है छी हम तऽ जनै छी प्रेम बस प्रेम करै छी नै तकै छी ईश्वर ने स्वर्ग ने मोक्ष जिनगी के पुजारी बस जिनगी के सौख जिनगी पबै छी जिनगी बँटै छी जिनगी गबै छी जिनगी हँसै छी जिनगी छी जिनगीक सम्मान करै छी हम तऽ जनै छी प्रेम बस प्रेम करै छी देश कथी विदेश कथी सीमा के लकीर कथी धरती खुजल आकाश खुजल हवा पर कोनो बन्हन नय खूनक रंग एक्के उँच कथी नीच कथी भावना के सागर मनुष्य छुच्छ हाथ आबय-जाय पहिल साँस सऽ आख़िरी के एगो तान कहय छी हम तऽ जनै छी प्रेम बस प्रेम करै छी कि सिखलौं कि बुझलौं नय पढलौं जँ प्रेम पाठ शब्द ने कहिओ कहि सकत कहब जोग जे बात अरजलौं कथी सजेलौं जँ नय पकड़लौं प्रेमक हाथ थारी आगू आ भूखल रहलौं एहिना बीतल सगर बाट प्रेमी छी प्रेमक इएह गान कहै छी हम तऽ जनै छी प्रेम बस प्रेम करै छी हमर गाम खुजल अइंख बंद करी तऽ छुच्छ मोन में सजि जाययै रंग जमि जाययै महफ़िल आ याइद क बड़ ज़ोर पूरबा चलैये हमर गाम हमरा संगे रहैये आकाश जतय अखनहुँ खुजल छै नै बान्हल छै पूरबा-पछबा देखाय पड़ैत अिछ राइत तरेगन भोर क सुरूज आ साँझ क चान पीपरक गाछ भगजोगनी चमकैये हमर गाम हमरा संगे रहैये चीन्है जतय छै सब कियो सब केर भोर में झगड़ा आ साँझ धरि मेल बेमतलब बात पर टोल अनघोल कहै सब एक दोसर के दूधक धोल हित आ दुश्मन जतऽ संगे बसैये हमर गाम हमरा संगे रहैये निर्धन तऽ छै मुदा नीरस कियो नय गुणवान भले नय छै आन कियो नय मीठ छै कखनो तऽ लागय बड़ तीत गाम छै कानब गाम छै गीत गूँज जकर हिरदय में गूंजिते रहैये हमर गाम हमरा संगे रहैये पाबनि-तिहारक हुलास एतय अछि संगी-साथी क संग आ गप्प एतय जीवन-मरणक शोक आ नोर भरि मोन कानय के फ़ुरसत जतय मोनक पर्दा पर रील जेना घूमैये हमर गाम हमरा संगे रहैये हमर गाम के समर्पित हमर अइंखक दू बूँद नोर जिनगी के गीत नोरक उफनैत समुद्र सँ मुस्की के मोती चुइन आनै छी हम जिनगी के गीत गाबय छी अछि सुर सबटा बिखरल जीवन वीणा के तार टूटल चारु दिस अछि अन्हार भरल आलोकक सब दीप मिझल निराशाक अनंत अन्हार ई आशाक दीप जराबै छी हम जिनगी के गीत गाबय छी सिनेहक सब टूटल माला दगधल करेज भोकल भाला अप्पन जे सब आन भेला सब दुआरि एगो ताला चीन्है नै अछि कियो ककरो हम मुस्की के माला पहिराबै छी हम जिनगी के गीत गाबय छी दू मिल भेल एक कहाँ अछि प्रीत जग के रीत कहाँ गीतक अछि मनमीत कहाँ हृदयक अछि संगीत कहाँ मनुक्ख बिकाइके हाट ई हम प्रेमक सितार बजाबै छी हम जिनगी के गीत गाबय छी (०४.०१.२०१६) गीत एगो सपना गीत एगो सपना जाइत-धरम सबटा मेट जाय भेद-भरम सबटा मेट जाय प्रेमक डगरा दै छी हे संगी संगे अहूँ गबियौ ने गीत गूँजै गली-गली कहिया तक लड़ब लड़ि क मरब व्यर्थ के झगड़ा सँ जिनगी के उत्सव किए नय जीयब किए बनल मुइल मुरदा सन होली कने खेला लिअ दीप कने जरा लिअ कनी हँसू ने कने गाबू ने गीत गूँजै गली-गली नुका त जएब दुनियाँ सँ नुकायब कोना मुदा अपना सँ कतेक मोन कारी कतेक अछि उज्जर बचब ने सत के धधरा सँ पवित्र भ जाउ गंगा नहाउ सत्य क स्वर जगाबू ने गीत गूँजै गली-गली चारि दिन बस यएह अछि जिनगी जिनगी जते मना लिअ रहत ने सब दिन टूटि जाएत फुनगी चाहे जते बचा लिअ जिनगी अछि झंकार जिनगी अछि गीत अाउ कने छम-छम नाचू ने गीत गूँजै गली-गली २१.०२.२०१६ अब्दुर रज्जाक (धनुषा हरिपुर) चरिपतिया १ अपनो धरती पराया भेल डेग -डेगपर देखलौं सिमान तिकरम बाजी राजनैतिक संग अपनो धरती बिरान २ उपनिवेश सं निचां गिराकऽ सदा दामासाहीमे रखने अधिकार सत्ता संग जल्लाद बनल अछि जनता कहे अधिकार पुकार ३ बंद, हड़ताल आ चक्काजाम संग निरीह बने गरीबक भाग चलन केहन नियत राजनैतिकर्मी के जे डसाबे ओकरे नाग। ४ कर्म-परधान संसारक रित अछि अइखनो लोक फकीर जं सनजोग समय अनुकुल बने निरधनियोकें हुअए हकदार चाबसिके तकदीर ५ मुस्कानक मोल अनमोल अछि दिलसं निकलल सुस्कानकें दिल दिमाग संग तनाबक मुक्ति परमान ओठपर मुस्कानक ६ निशब्द राइतक मौनतामे बिर्रो उठल याद संग जं करोट फेरकऽ देखलौं तं अदभुत भऽ गेल बर्तमान संग ७ घुर लागल अछि आंगन असोरा पर लोक बैसल घुरा संग बतकहा सुरु पूरब पश्चिम के सुनु आबू अहूं संग। ८ पुर्बा पछिया बियार संग थरथराबे जारक ठार कमब्बल ,सिरक ,आ आइग अखन कबज संग हथियार ९ प्रितमा सड्ग प्रितमके सदखैन प्रेमक साथ गरीबी कष्ट आ दुखक हालमे परीक्षा प्रेमक हाथ १० सूफी संतक सही बाटपर लोक चलैयऽ कम कुपथके संगी सब अगतिया समाजिकतामे राखे बम ११ नियंत्रण करु अन्तर मनक आवाज़ सं भावना;इच्छा भय श्रेष्ठ व्यक्तित्व सब भरल रहत पैघ वैचारिकता पर निश्चय गजल बनल एक सवालक जवाफ छीअहाँ बसन्तमें फुलल एक गुलाब छीअहाँ उठल तूफान भs मोंनक हियासंग साजल हमरा लेल उ सबाब छिअहाँ देखैत हम जागलमें जेना देखलेलौ नहीं सुतल बेरक सुंदर खाब छीअहाँ हमर प्रीत मिलल जंs अहाक नैनासंग देखैत रहलौ एक खाश जनाब छीअहाँ 'अब्दुल'क ह्र्दयमें फुलल फुलबारीस किए तोइरक फूल बनलौ बेताब अहाँ गजल अहाँ सब फूलमें रानी छी किया बनल हमर दिबानी छी बिनअहाँक नही आब हमरा बस एक झलकप धियानी छी झ्ल्कैत रूप संग कहबाक नही बनल बेजोर हरदम मस्तानी छी जं कोई नैन गरा देखलेत देखब जानु अहा ओकर निशानी छी नहीं बस कोई फूल अहा संगे मुदा सजावल सुंदर फूलदानी छी। गजल चलू किछ देर अहिसंग छी नै करु अबेर अहिसंग छी 'लsजाक' अहाँ मुसकेलौं किए हृदयमे हर बेर अहिसंग छि किछ कहबाक छल मुदा की ? मोंनक सब सबेरअहिसंग छी हम देखलौ अपनों दर्पणमें छाँया नै अन्हेर अहिसंग छी 'अब्दुल'के निशब्द बनाक अहा हम प्रेमक अलिसेर अहिसंग छी कता लाठी भराठी लsक नारा दsके भत्ता करैय इसरा लुटीहारा सब हsक एहे चलन अछि जनता बनौने जनता क' हतयारा महेश डखरामी रंग रास ☆ खींचल खूँट कमल उजास उर उत्तान मन मदन वास ☆ सिहकल समीर मन अधीर पकरल डेन रगड़ल अबीर ☆ भावे भरल प्रीति पिचकारी भीजल अङ्ग तीतल साड़ी ☆ रङ्ग लालम रङ्गल गाल माथहि टीका शोभन भाल ☆ मदनक मान निरंतर नेह सकल अर्पण सुधा सिनेह ☆ सजन सुजान बनल महान मन मनमथ वेधन पचवान ☆ मनक वाञ्छा किछु विशेष अंकम गहि गहि अधर श्लेष ☆ सकल प्रकृति राधहि रूप पुरुख प्रवृति कृष्ण स्वरूप विन्देश्वर ठाकुर गजल अपनहि गीत गाबैछी नङ्टे नाच नाचैछी घरमे सब किओ भुखले दुनियाँ नेह बाटैछी भेटत मान कोना ये सदिखन झूठ बाजैछी भेटत के अपन नेही सबके दूर राखैछी काँनब 'विन्दु' बनि जगमे दुख जे देखि भागैछी मात्राक्रम: २२२१ २२२ बिनीता झा रखबार राघव रखबार राघव, रक्षक राघव रसना रमल राघव रस रे l राति, रौदक रचयता राघव रचना रमल राघव रस रे l रग-रगमें रघूवर राघव रग-रग रमल राघव रस रे l राउ राघव, रत्न राघव रत्ती-रत्ती रमल राघव रस रे l रकटल रपटल रने रने रमचेलबा रमल राघव रास रे l राम राम रामदुलरीक रक्षक रेघा रहल रमल राघव रस रे l विकास झा एलै फागुन मास सखी हे एलै फागुन मास सखी हे ,प्रियतम छथि बनबास भीजल अंग रंग सँ दहबह ,तैयो उठए पियास सखी हे एलै फागुन मास ! बिहुसैत आँगन बारी कानन ,खेतक हरियर चास बैरी प्रियतम प्रीत ने परसैथ,सुनगए मोनक आस सखी हे एलै फागुन मास ! कुहुकै कोइली चहुदिश भोरे,महमह मजरक झाँस सिहकि सिहकि टीसे दै पछबा,पिय बिनु रहल उदास सखी हे एलै फागुन मास ! अहु मधुमासे मोन उपासे, नेहक बनल खबास नीपल रंग बहुतो फगुआ ,पिया बिनु रहल उजास सखी हे एलै फागुन मास ! रंग अबीर अंग नहिं लागय ,भाबय ने मधुमास धन्न विधाता आस पुराओल, पहु घर अएला पास सखि हे एलै फागुन मास ! नीरज कर्ण गजल की करबै जौं जिनगी सून भ गेलै बिन कर्मक सुखलाहा चून भ गेलै सुख दुख अछि जिनगीकेँ जोड़ घटाऊ किछु चौगुन भेलै किछु दून भ गेलै रहलै सोअदगर सभ लोग मुदा यौ किछु नुनगर आ किछु मधनून भ गेलै बुझियौ जकरा अप्पन नोर करेजक जग में ऊ नीरक दू बून भ गेलै "नीरज" अछि खूनी कनि माफ क देबै मोनक सेहन्ता के खून भ गेलै प्रत्येक पाँति में मात्राक्रम 222222-21122 1256 || विदेह सदेह:१८ विदेह सदेह:१८|| 1255
A
=, हु अ — 2 AN Stee |, > | : \ 3 जय भर घाइगार ऊपर - oie! डालवबेत ते मैंथिली - खजिन चिड़ैना (-याँ), सज्जन fers हिन्दी - खंजन, धोबन संस्कृत - pow, डुलिका, खज्जरीट, स्विंडरिच, खंडलिच अंग्रेजी - WHITE WAGTAIL & AFRICAN PIED WAGTAIL जैववैज्ञा८ नाम - Motacilla alba (White Wagtail) Motacilla aguimp (African Pied Wagtail) (चित्रमें Motacilla alba alboides) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भर जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
= बज दि J. | . ” है , = y es) Motacilla citreola i eee A = VF अनु c a: = a eee, no | > ee a A कर & Motacilla flava Motacilla cinerea ee ee साझार सौजन्य (तीनू चित्र) - विकिपीडिया पब्लिक मैंथिली - सोन चिड़ैना (-याँ) हिन्दी - wen, पिल्किया संस्कृत - पिनाकी अंग्रेजी - WAGTAIL (GREY + YELLOW + CITRINE) जैंववैज्ञा० नाम - Motacilla flava (wEsTERN YELLOW WAGTAIL) Motacilla cinerea (GREY WAGTAIL) Motacilla citreola (crrRiNE WAGTAIL) M. tschutchensis @AsTERN YELLOW WAGTAIL) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी iat स्वतः मैंथिली ाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
2 2 ae. AE Se ge a *, ee > ees eae) em + ४ न AY She 73.0 a ee ie a oN , sie 5 = ie oc an 2 अर पे सं a क .- “कि Ss 4 Tm Pike? ee a Ga शूट | x a* 2 mae A Fa ही खाक था aN मैथिली - कचबचिया हिल्दी - महालत संस्कृत - कयायिका अंग्रेजी - RUFOUS TREEPIE जैववैज्ञा० नाम - Dendrochitta vagabunda_ syn. (पर्याय) Dendrochitta rufa (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉो या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली झाषामे पर्यायी AT Sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
ed ae, छः oe 4 दरें ( ) ey ] A ne —— 9 \wilt | i —-. ae | , - | xe é Jj rie &« विकिर्प ‘of #7: न ग्यर. | मैथिली - चातक (बंगालीक चातकरसें पृथक), स्वाती fers हिल्दी - चातक संस्कृत -चातक, सारन, मेघजीवन, स्वातीक्रक्त अंग्रेजी - JACOBIN CUCKOO / PIED CRESTED CUCKOO / PIED CUCKOO जैववैज्ञा८ नाम - Clamator jacobinus syn. Coccystes melanoleucos syn. C. hypopinarius syn. Oxylophus jacobinus नोट - संस्कृत भाषामे आयलर हरेक नाँओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैंथिली झाषामे पर्यायी atte जाइत अछि - तत्सम स्वरुपमे)
हा री माटालीतकण्ठ (लेकली) का अर कक cd Fy — i See aan 4 C5 a “2 = = tn ae ee कप ~ oo Ga मैंथिली - जीलकएण्ठ (असली) हिन्दी - जीलकण्ठ (असली) संस्कृत - नीलकण्ठ अंग्रेजी - INDIAN ROBIN (इण्डियन रॉबिन) जैववैज्ञा०८ नाम - Saxicoloides spp. (5, fulicatus, 5. intermedius etc.) tte संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
दुडु लोलक बीचमे खाली स्थान एना बुझि || Ss x * ] A + 7 = _ ©] thar Kui gga = 4 ate हु क्र x, fA, s » : \ है... अल भ जज a कै 2 Rex we के मैथिली - हँसुआ दाबी हिल््दी - बक की एक प्रजाति संस्कृत - dw, सारस अंग्रेजी - oPENBILLS / OPENBILLED STORKS (ASIAN & AFRICAN) जैंववैज्ञा० जाम - Anastomus oscitans (ASIAN) & Anastomus lamellegerus (AFRICAN) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
fa te ca | k. sags 4 tee Kumar Mideha® © tec शशिधर crabs POS fia axa “ficCRe- ' Oe ike - TMS ln 8 2 Ld res od a el ‘i : TY, “7 fA - i > , ‘ 4 om hy \ ८ e/ ee ae मैथिली - कारकौंआ, कागा हिन्दी - जंगली कौवा संस्कृत - वनकाक अंग्रेजी - INDIAN JUNGLE CROW & EASTERN JUNGLE CROW / JUNGLE CROW / LARGE BILLED JUNGLE CROW / THICK BILLED JUNGLE CROW जैववैन्ञा०८ जाम - Corvus culminatus (INDIAN JUNGLE CROW) Corvus macrorhynchos (EASTERN JUNGLE CROW) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ss जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Wy “pf Mh, Py J वि । ? हि ny ee . कै A WGI Lae - \<Z ce BSS डर लि ae oe ye pel 4. मैथिली - चकोर अंग्रेजी - CHUKAR / CHUKAR PARTRIDGE / INDIAN CHUKAR जैंववैज्ञा० जाम - Alectoris chukar (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
कि जी जे ~~ wi 7 हर a @ | ay ‘se we re mat. gf 0 mn ~ जे Sz ey, y na q e by पे ५ . मैथिली - Nase / भग्हरा / शैंवरा / भौंरा हिन्दी - start / भौंरा संस्कृत - श्रमर / अलि / मधुप xfer / मिलिन्द / मधुकर आदि अंग्रेजी - HUMBLE BEE (Old Eng.), BUMBLE BEE, BLACK BEE / BEETEL (New Eng.) जैववैज्ञा० नाम - Bombus spp. are संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वसपमे)
श्र Sa खरिह 35> NS eT tS ae . Sek wa Ly fe “ee ७ P 8 Y So ry ९-6 Dr. Shashidgargumar डॉ. डा << ~ डी . | { 4 ‘ ey J ि 4 - ह a. Se eS ही लि re ier ol मैथिली - दहियल हिन्दी - दहियल / दहियर संस्कृत - दहियक अंग्रेजी - ORIENTAL MAGPIE ROBIN जैंववैज्ञा८ नाम - Copsychus saularis नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्याय नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
if = pe | बाइग्लादेशमे ढाकाक ”दोयेल चटवार” (DOYEL / DOEL SQUARE) पर delet दहियलक जोड़ीक पाषाण प्रतिमा
| पर i, OO Se | ae ™ दर मैथिली - मयूर (उच्चारण - HZ / मजूर), मोर (चित्रमें - भारतीय / नील मोर आ मोरनी) हिन्दी - मोर संस्कृत - मयूर, शिखि, नीलकण्ठ, अर्जुन, नर्तक, चित्रफन्रक आदि अंग्रेजी - PEAFOWL (चित्रमे - INDIAN / BLUE PEAFOWL) PEACOCK (मोर / नर मयूर) & PEAHEN (मोरनी / Sil मयूर) जैववैज्ञा८ नाम - Pavo cristatus लौट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्याय नाँओ as जाइत अछि - तत्सम ETA
; LE © ही. Shashidhar Kumar Le LE Fr) © छा “P44 कक <3 bie: wy | ‘Fallot - संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटेला Seas उतरबारी भारतमे GAL बला नर मयूरक (मोरक) पाँखिक पछिला आकर्षक भाग (TRAIN) हरेक वर्ष अगस्तमे झड़ि जाइत (MOULS) अछि आ फरबरीमे zi बढ़ि जाइत अछि (REGENERATES) | उपरूका छवि एहने सनि मोरक अछि जकर पाँखि झड़ि गेल अछि |
we SAAN GZ op Ol: ae aS थे Ved -- न =a Lay ही खा रे साभार सौँजल्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमैन उजरा मोर (WHITE PEACOCK / LEUCISTIC VARIANT OF BLUE INDIAN PEACOCK) Pavo cristatus (LEUCISTIC VARIANT)
de t, x Se ie i Pd, Pe Be, ? 2, 4 og GREE FZ, J take १ fl ie OM SOS “nk Fe YO De'Shashidhar Kula bhideba” WOES कुमर “विदे” OT cist 84 farce” | | प्र 7. an ex? aR wer iat , ee SS he wy Pgs Dp F भ awe >> मैंथिली - मएना / देशी मएना / सामान्य मएना / साधारण मएना हिन्दी - dion , साधारण Font संस्कृत - सारिका, मदना अंग्रेजी - MYNA / COMMON MYNA / MYNAH (द० आप- भारतीय वर्तली) जैंववैज्ञा०८ जाम - Acridotheres tristis नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्याय नाँओ स्वतः मैथिली ाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
oo aig: ' ‘ ’ ‘ कमी | | मैथिली - छोटकी बगुला (उच्चा० - छोटकी बौगला) हिन्दी - छोटा बगला संस्कृत - वक Was अंग्रेजी - LITTLE EGRET जेववैज्ञा० नाम - Egretta garzetta नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्याय नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
कर ini Ryd Pea i 8\) ¢ ta ० is MF 5 rh A, a Wy aS "TS Si " wee & Dy y 55 PS id ON i SSA te ty oe मैथिली - मवेशी बगुला, खेतक बगुला (उच्चा० - बौगला) हिन्दी - मवेशी बगला संस्कृत - वक Was अंग्रेजी - CATTLE EGRET जेंववैज्ञा० नाम - Bubulcus ibis syn. Ardea ibis syn. Ardeola ibis syn. Egretta ibis syn. Lepterodetis ibis नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
4 =. ae है Z = ae ee pe ; ——= a : है कट i i Paes amie Oe दस न “अदा मैथिली - बड़की बगुला (उच्चा० - बौगला) अंग्रेजी - GREAT EGRET / GREAT WHITE HERON / LARGE EGRET / COMMON EGRET जैंववैज्ञा० नाम - Ardea alba syn. Egretta alba ete संस्कृत भाषामे आयल Reais या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
का. की fa PHOS eis Tn teat ee ek नर, के aie 4 मैथिली - सिरैली cif कि सिरोली) / नकली नीलकण्ठ हिन्दी - नकली नीलकण्ठ संस्कृत - नीलाड्ग, चलपुच्छ अंग्रेजी - INDIAN ROLLER (इण्डियन रॉलिर) / BLUE JAY (ब्ल्यू / ब्लू जे) जैववैज्ञा० नाम - Coracias indica syn. Corvus bengalensis syn. Coracias bengalensis etre - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Wire, Sod a me ८.» हवन ate ate के कर कि हे ayn ) “3620. Shashidhar Kumar "Videha” © डॉ. शशिधर कुमर' ¥% ae GST ननियव 34 faiene : eo > Bae: 2 रा श्र - ee - 2 oa as स्थान - संजय site जैविक sare, 'पटना मैथिली - कौंआ, घंरैया कौआ हिन्दी - कौवा संस्कृत - ग्राम्य काक अंग्रेजी - HOUSE CROW, INDIAN / GREYNECKED / CEYLON / COLOMBO CROW जैंववैज्ञा८ नाम - Corvus splendens नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ ar ee नाँओ स्वतः मैंथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Se one NY SS SS: et हू २-३५ WS “ DS . Sry ONS ? ६४. em BENS ES oe - “Sess! दे £ न कक. © Dr. Shashidh@t Kumar “Videlat “Sen, SN be -—e- “ax y YS NY GS. आदिम “Rar ow va aaa mae SS Se A x ९५३ mA NS 2 wes aS कि के के LAS मैथिली - मोहखा / ear हिन्दी - महोस्त संस्कृत - महोक / काकोल / वनकाक अंग्रेजी - CROW PHEASANT / GREATER COUCAL जैंववैज्ञा८ नाम - Centropus sinensis (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
oe | y / he tf fy ma 4 ( हे ae ae : i es लिन a ROLLER | INDIANROLLER | INDIANROLLER aréfor - आसमाली ‘oréfor - मटियाही पीयर गर्दनि - मटियाही पीयर (ननि कि often (नील रेग लेशो of (संगहि लीलाभ) = = स्थान - यूजेप (योजेप) | प्राप्ति स्थान - पच्छिमी एशिया, |... प्राप्ति स्थान - दच्छिल-पूब समस्त भारत (पच्छिम-उत्तर- एशिया यथा - थाइलैण्ड, 'पूब-दच्छिल आ संगडहि पुर्वोत्तर | म्यांमार, कम्बोडिया, भारतमें BE, लाओस, वियतनाम, सिंगा- प्रजातिः- प्रजातिः- पुर आदि; संगहि सटल i Coracia bengalensis होयबाक कारण पुर्वोत्तिर Coracia garrulus garrulus bengalensis |___भारतक किछु भागमें | & & प्रजातिः- | Coracia garrulus seminowi Coracia bengalensis indicus | | Coracia bengalensis affinis|
कह | “ © Oi Sastidhr Kumar “VWieha” Clee Eager © wr? oat aaa मैथिली - धनछुआ (धानछुआ) अंग्रेजी - एशी ड्रॉन्गो (ASHY DRONGO) * रे. . जैववैज्ञा० नाम - Dicrurus leucophaeus \ \ (डाइक्रुरस ल्युकोफ़ेकस)
ee Pack Gh iy, eae ee करनी H कर te see Re | Og es a ce f नि ,... हक 4 eS me 2७५ २११३ ना SN Ee Sd RO IFS ih ¥ Yeon ay Ros: ८. lg > . fa के paSfishidhar (जि फीक my oe Ages gy, oe | Paes oy ee जी... Oe a Bs Way's, are || मैथिली - करिया धनछुआ (करिया धानछुआ) व नि हिन्दी - भ्रुजंगा _ संस्कृत - भ्रृंगराज ——— al | ह_जैववैज्ञा० नाम - Dicrurus macrocercus (डाइक्रुरस मैक्रोसरकस) डंडा a a a ma
मैथिली - sec, मुँढदुस्सा, कचबचिया हिन्दी - उल्लू... संस्कृत - उलूक अंग्रेजी - आउल (OWL) Piggy ab ’ ny iL be v/ जैतवैज्ञालिक लाम - Tyto, Strix, Otus, Megascopes, Bubo, Ninox, Asio, Glaucidium, आदि 26 वंशसभक (Genus / Genera) करीब 230 जाति (Species) DI सामुहिक जाम |
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बी & * है; ; \ © De. Shashidhar Kumar “Vid PN ST. atte व कर कि aha aa Faery’ मैथिली - सुग्गा हिन्दी - तोता संस्कृत - शुक, कीर अंग्रेजी - पैंट / पैराकीट PARROT / PARACHAET/ PARAKEET) * Gado नाम - सिट्टाकुला आदि (Psittacula spp. & Others) 2 कि... व SS de
Ed r 4 . a ie ra? te i I uw" - ia ‘ a ae .. ies rs ' हू ने री | i #4 nell मे स i ©. | \.\ } nd | at il 9 कि दर ढ़ Dia? ana ऋ '. मैंथिली - विढ़ली (साधारण / पीयरकता आ आन रूंग-रूपक बिढ़ली) ar uaféar (फचडहिया बिढ़ली) हिल्दी - ततैंया, ay, ESI संस्कृत - Ne, Ne, aa, तृषसूक्किनु, विषशूक्त, विषशृड्गिनु, दंशिनु, कोष्ठागारिनू अंग्रेजी - PAPER WASP/S (विढ़ली) & HORNET/S or HORNET WASPS (पचहिया) जैतवैज्ञा० जाम - Polistes spp. , Ropalidia spp. etc. (बिढ़ली) & Vespa spp. (पचहिया)
है, Ke ; a i a ow 2. st BS a "= tg केन रन a "aig कर fie oo. ae “teas - a> के थे बिढ़नीक स्वॉता an sift खॉताक कोठरीक षटकोणीय संरचना मधुमाक्षी (-छी) सँ मिलैत - जुलैत अछि पर ओहिमे ase नजि रहैछ कारण कि fast ase afr बनवबैत अछि |
मैथिली - skews / दादुर मैथिली - बेइग or हिल्दी tes args हिन्दी - मेढक अंग्रेजी -टोड (TOAD) हा जैववै० नाम - बुफो आदि (Bufo spp. & Others) eae नाम - सना आदि (Rana spp. & Others)
stare टिकला केर भाग Hare मैथिली लॉओो है. ह.-कोयली (COTYLEDON/ EMBRYO) _, ia — 3 2.- Reprarefler कोशा (DEVOLOPING SEED COAT) maf ge “fetes ड 3, - गुद्दा या फलमज्जा (MESOCARP / PULP / FLESH) Rou gesaitiere ४.-स्वॉइवा / छिलका (PERICARP /SKIN) कोयली + कोशा - आँठी / अस्थि/ फलास्थि ENDOCARP/ SEED /STONE)
BES “| ८ = ZZ ‘ a S LP AG A ~N “ee Zs मैथिली - ढील, ढीलक अण्डा आ लीस्व हिल्दी - जूँ संस्कृत - यूका (ढील), पिपिलिका / लिक्षा fa) अंग्रेजी - HEAD LICE / HEAD LOUSE (Ie), NYMPH (€f&a) जैंववैज्ञा० जाम - Pediculus humanus capitis ate - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी ना ओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ ats जाइत अछि - तत्सम सवरूपमे)
Beg i cae “ é Pet "सा: लि . \ | wy ee ee Mee tages) | Ee ame |) 3 ie | ee HG ( GF ही | . We a ey ay a ‘el { कं ही +. dich द्वारा गोबरसेँ जैविक खाद बनएबाक उपक्रम (स्थान - लक्ष्मीपुर (गन्हबारि - पाण्डेय टोल), मधुबनी
2 or का 77 & J thr f € eee f me. ft! iP. मैथिली - सिल्ली / सील्ली हिल्दी - सिलाही / सिल्ही / सील्ही _ संस्कृत - प्रस्ौ्यात शरली अंग्रेजी - LESSER WHISTLING DUCK / LESSER WHISTLING TEAL / INDIAN WHISTLING DUCK जैववैज्ञा० नाम - Dendrocygna javanica ete संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
| | 5 eS han <4 i Xi: a a pea . की * © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शशिष्र कुमर eager MPaageaa ‘face? f war किए भरेत्र पता ने ककरहु, पर जैँ we एहिना। ६. संग्रहालयमे काल्हि देखत याँ, बगरा सगरों दुनिजा !! \. "बिहार संग्रहालय” पटनामे "aR केर प्रतिमा
\ 4 fe ही ot रे की कप ५ - मैथिली - उड़ीस हिन्दी - खटमल संस्कृत - मत्कुण अंग्रेजी - BED BUGIS (बेड बैग) जैववैज्ञा० नाम - Cimex lectularis (मुख्यतः) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल Rw लॉंओ या पर्यायी लॉओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी जाओ भर जाइत अछि - तत्सम सवरूपमे)
| TEE ‘ - “$ a ts : लि ¢ Any . . og ret a . मं. iis tll : © Dr. Shashidhar Kumar “Videll a nd : wy. 3 SB - 2“
> ey 2 ग््णया —-«@ _— d ‘ ~ io q © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. orf fe ora tage Ga आ लीख उपटएबाक Yio ओ पारम्परिक तरीका "sla ताकब" | ढील तकाबए काल 'जस्वन RIGA Neto करैत छल वा see चाहित छल तस्वन ढील तकनिडारि लोकनि ओकरा पड़तारि ws, पोल्हा5 ws, स्विस्सा-पिद्ानी सुना ws ढील ताकित Geils | ताहि क्रममे विभिल््न प्रकारक स्वसचित वा स्वसंशोधित गीतसभ Ral ZA छल, यथा - "lei Boil, ढीलो राली, DAS TIS छी .................."। Te ai a
तप we rate ae =, ‘eal 7 सपस ~ Pass =i Ww न efi ey हि, ‘s feaepUlis AP Ufecta? डॉ मेठ i . | Ie vy |) मैथिली - कोइली Cader) हिन्दी - कोयल संस्कृत - कोकिल, पिक आदि अंग्रेजी - cucKOO (INDIAN, ASIAN, AUSTRALIAN, PACIFIC) & KOEL / TRUE CUCKOO, Gaasilo नाम - Eudynamys spp., Cuculus spp. (मुख्यतः) the - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)
के | fy Wiz तय or! Aa re >a <= ’ B \\ y a ‘St बा 22 हक नि Ds Ge — oo ih acon ero "| मैथिली - बगरा या बगड़ा FRA बगरा या बगड़ा) Rosin again संस्कृत - चटक (गृढचटक), कलविड्क अंग्रेजी - स्पैंसे (हाउस AAA - SPARROW (HOUSE SPARROW) जैववैज्ञा० नाम - Passer spp. (Passer domesticus) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामे eats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
ye न —— a = —— मैथिली - चकबा / चकेबा / चकवा हिन्दी -चकवा संस्कृत - चक्रवाक, ब्राह्मिणी हंस अंग्रेजी - RUDDY SHELDUCK / BRAHMINY DUCK जैववैन्ञा० जाम - Tadorna ferruginea नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
re eine Pig sO Aiege 4 हा कद 27 #3 शी सफल न x ig } iy i: a oe Vig, ae ; Ree. BN \ ev iy Ye z Ce ese em i PRE AS Yo sey Ae कि (as See, = ee हद a c in Pa NES OF ee PS iT ERS) 3 ia ie ae San ao gO Re 3 aes a Mei) Seay fe bis =e —— . eee ee AOL SS रन गए मैथिली - मयूर (उच्चारण - HAZ / AG), मोर (चित्रमें - भारतीय / नील मोर आ मोरनी) हिन्दी - मोर संस्कृत - aR, शिस्वि, नीलकण्ठ, अर्जुन, नर्तक, चित्रफ्ज़क आदि अंग्रेजी - PEAFOWL (चित्रमे - INDIAN / BLUE PEAFOWL) PEACOCK (मोर / नर मयूर) & PEAHEN (मोरनी / Sit मयूर) जैववैज्ञा० जाम - Pavo cristatus tte - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
Pay Ayn Pes Se oo es Sf कर ft C VA . el Sr "Rs 2७2 ८ wl Fond V4 2 + मैथिली - arch (उच्चा० - मैंटक arch, माटिक चाली, Rar areit facet - basi संस्कृत - गर्ग, किन्चिलिका, Are, Bifesiog, झ्षितिज कृमि, वर्षा, वर्षाश्वी, दीप्तरस, रक्तजन्तुक, भ्रूलता, क्षितिनाग, PA, अंग्रेजी - EARTHWORM जैववैज्ञा० नाम - करीब २० वंशक १००० 2 ऊपर जाति सभ चित्रमे - Pheretima posthuma नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी aia स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ अर जाइत अछि - तत्सम STI
' a eset ad ou ae | = tnt संस्चनाक रैस्वाचित्र gins Saison, HERTNSCH / ।आनुपालिक नाप हेतु मभि) क्िमप्ययकम्य es AE me a (०९०० / . <_< , a0 EARTH ८ — ‘ (UPPER a i a E (lowe! _—— < a अन्तः केन्द्र = (INNER CORE) a पृथिवीक आन्तरिक ओ वायूमण्डलीय संरचना
हक 2 ue te) Bee छा ! oe i AEE comment % spud ger sen arepheataoe re eS : प्रशाज्त विवर्तन छज्जी. ही Sas Secret | omeansesmecinep tare? — | fa — mind ef Es विश्वक प्रमुख विवर्तन छज्जीसभ
मामा ही oo a पर्वत ग्रेणी a | za केर लि्मोण faudte दिशामे विपरीत दिशामे अपेक्षाकृत कम गतिशील अपेक्षाकृत अधिक गतिशील —_— (यास्थिर) मडाद्धिपीय रूज्जी Bh महाद्धिपीय छज्जी (भास्तीय विवर्तज छज्जी) इज A र्मार विवतेज छज्जी) & छा-गनि-बिदनड् (विकिपीडियासँ संशोधित, हिमालय पर्वत श्रृंखला / श्रेणी केर निर्माण प्रक्रियाक रेसवाचित्र
4 तिब्बत (चीन) भारतीय वि८ छ; न इसे | डी fao Bo => ; - sy 'भास्तीय विवर्तन छज्जी ¢ é यूरेशीय वि० Bo के YS “ केरटकराहटिक y ee) as फलस्वरूप zs y no मी हिमालय पर्वत हर, 50-2 वे श्रेणी केर निर्माण ee 7 है श्रेणी केर 2 गास्तीयवियर्लनंखर्मु/ « -—@ संगहि > 7 ae ge a ——_ < ‘. 4 एहि क्षेत्रमे आवए a? ‘~~. बला विवर्तनिक कि F ~~ भूकम्पसभक Wy gone a 4% | a fepenfafer \e साभार सौजन्यः- आास्तीय विवर्तन छज्जी lead विकिपीडिया मर ae (पब्लिक डोमेन)
कर एन Ee का छः, २ कि. ८. Ge is ee ven oe ee tf roa es By oe me rs “re vy \ Seales Fue oats Pa a S285 a 4 noes BS gy Sak “3 es py Cie a a 8, ony A Sek y pee X | Zs fe Saar aire के के Sy ee Cap Sra: Ot
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* iad बाराएसिंगा) SWAMP DEER lus duvaucelic) श इसके सिर पर बारह छोटे सिंगो के कारण इसे बारह सिंगा कहा जाता है। यह कीचड़ वाले स्थान पर रहना पसंद करता हैं। ~4 अत Videha” Ose शशिधर gar “विदेह” © wl मलियव ORES Lcd डा. है स्थानें -संजय गाँधी जैविक उद्यान, पंटना
a fe ee ©, we’ t DEER SWAN? दर Cerws duvaucelli . V4 Vass 27 es
: a : J NI साभार सौँजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमेन मैथिली - BA (गडूमक, धानक, चाउरक, Hes Wz आदि) WRI या फाड़ा (धानक वयस्क पाँखियुक्त AWD हिल्दी - घुन (गेहूँ का, अनाज का) संस्कृत - ...................८. अंग्रेजी - GRANARY WEEVIL (WHEAT-, RICE-, MAIZE-, GRAIN-) जैववैज्ञा० नाम - Sitophilus granarius (गढूमक सूखा) (उपरुका चित्रमे) Sitophilus zeamais (मकई केर सूखा) Sitophilus oryzae (चाउर आ धालक सूखा आ फाड़ा) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
x, 4 a = ३ 3 WZ, a * IWS मेथिली - बगेरी हिन्दी - बया संस्कृत - पीतमुण्ड wafasa अंग्रेजी - BAYA / BAYA WEAVER / WEAVER BIRD जैववैज्ञा० नाम - Baya philippinus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाओ Sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
पर कर SR by naar Pitas <> il दे ही od - aus mor Win | भ्रूकम्प वेधशाला" diceilfes नगर पच्छिम चम्पारण
एररूररुण/ Te ~~ =o oF er Pes Ske ra Be भर मी RS अर weet dee Sis «अर उस aaa te hy AED py" कै श्र हा a a, A, < \ $ कै मैथिली - टिटही (विशेष ws Lapwincs केर अर्थमि प्रयुक्त) feodt - टिटहरी (विशेष ws sanppirers केर अर्थमि प्रयुक्त) संस्कृत - fetes, कोयष्टि, यष्टिक अंग्रेजी - LAPWINGS & SANDPIPERS जैंववैज्ञा० नाम - LAPWING - Vanellus spp. (लाल गलचर्म - V.indicus, पीयर गलचर्म - V. malabaricus) SANDPIPER - स्कॉलॉपिंसाइडी गण (Order - SCOLOPACIDAE) केर २० वंशक (Genera) सब जाति (Species) हनौट- संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आषामें पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
\ ey ¥= ‘Wan सौजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमेन अंग्रेजी - SILVER FISH जैववैज्ञा० नाम - Lepisma saccharina ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाओ ars जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)
ae ea ee eee of -_ y | ee —) 7 जि 2 & क्र मैंथिली - हरियल अंग्रेजी - GREEN PIGEON (चित्रमे YELLOW FOOTED) जैववैज्ञा० od - Treron spp. (RPIATreron phoenicoptera) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉँओ या ae नॉओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी नॉओ ats जाइत अछि - तत्सम ETT)
mY _ 5 _ } कर ् o> © Or. Shashidhgll ही f डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” 6 छा Pa बूभव rr 7 | ह | Lal Aw _ oF s 4 J & ve \\ gf rd — aa “a " _ पहिने ब्रम्हपुत्र 3 सिन्धु नदी af समस्त उतरबारी भारतक मैदानी भागक दलदली क्षेत्रमे "sist" पाओल जाइत छल | संस्कृतक "गण्डक" नाम ओकर गण्डक नदीक कछेरक दलदली भागमे एहि प्रणीक उपस्थिति दिशि इशारा करैछ | एसव्नडु नेपालक "ORT याष्ट्रिय निकुज्ज" ओ "चितवन या०्नि०"मे sistp उपस्थिति एडि बातक समर्तक अछि | पर भारतक मिथिला क्षेत्रसँ आब ई प्राणी विलुप्न भ5 चुकल अछि | उपयेक्त छायाचित्रमे sigh प्रतिमा आ ताहि ऊपर दू cr मवेशी बगुला (CATTLE EGRET) आ पाछाँमे गेंड़ा GA कएल गेल गोबर देखाओल गेल अछि 3 प्रतिमा "बिहार अंतर्राष्ट्रिय संग्रहालय, पटना" मे अछि जाहिमे प्रतिमाक संगहि ठाढ़ि छथि श्रीमति सुप्रिया कुमारी (हमर धर्मपत्नी) |
wR iON x a = welt sae ae ee ae, ) . ae ee foe. : SS ot A a Pie aie oe 8 ee Bis 6; ba oa ae —— 2 ee. — = :... नहरिक पं लत SS = = = बगेरीक
Piso 7 “ 4 i, i Eee: ‘ oye ही हे ahh भी . 3 ‘= . 4 i St ihr omar i " Osh शशिधर gat “विदेह” © ul xf = co कं | vim ck all ore Be eS घास खाइत एकसिंघी भारतीय sist (Rhinoceros unicornis)
रु बज | दि ae Soe an any HOF (dere) — राजनन्दनस् दिए 4 ro दे (Gre )— कुरर (Rater (HE vo PACH, FOE) ae eens HERS ( SPF pete
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} वि डे ं > ae दर et (40 LT a) Beer (ere rere, TE (e270 A ¢ ae ( sqrrer ecient ng (Pe ait) snags El (i wot) aican गत (0 Ga) gore mer (4? ia) \
; कट oes Os सन eS eee Se om aes दर ee oe. oe es Dr. Shashidhar Kumar “Vide OGIO कमर “Pea” रा ? iy स्थाल-संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना (Rhinoceros unicornis syn. Rhinoceros indicus)
ae न ae, =f ae a y — F ae yes ee Ce } ' a a | लि | 4 ही j i. } + थ की. | 'Y 4 +f : ™ नि ¥ : en = गे. |
croc eit Ae N ES गे हर if (ieee Ve ee eee re —_——_ पर * डा =" *+ se स्थान - संजय गाँधी जैविक उद्यान; पटना मैंथिली - गेंड़ा (चित्रमें एकसिंघी भारतीय sist) हिन्दी - गैंण्डा (चित्रमे एकसिंगी भ्रारतीय गैण्डा) संस्कृत - गण्डक, गण्ड, गण्डाड्ग, तैतिल, खड्ग, रखड्गगिनू आदि अंग्रेजी - RHINOCEROS / RHINO (Short abbreviated form) जेववैज्ञा० नाम - Rhinoceros spp. (चित्रमे Rhinoceros unicornis) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ots जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
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4, ) oe & 4 ही ही . का ¥ 4} r= + \ % “es ४ # CSIR (आब NISCAIR) asa दिल्ली, द्वाय प्रकाशित एडि पोथीक अनुसार "बागर" एक तरहक UAT (GAN) ez नाँओ थिक |
लक्ष्मी दास- बापक धरम (पूं.. ८२६-८२९) ललन कूमार कामत- बाबाक. लोटा (पूं. ८३०-८३३)
662 || विदेह सदेह:१८. AS ra | Spring मम i yi == Regoring fms ye tanh es = ~~~ BVertical Seismograph ell mr a A\ 4 लि a = —. ae विभिन्न प्रकारक पुरान आ afsel भरूकम्पमितिक AA
738 || विदेह सदेह:१८. ihe (te t oe 2 anneet ( alin eres 7 Wirtalett लाए NX on ( eedranche ( a0 BT) TOR ARCIET DS” (BEE Boe ae eos, (ललटह (4 abst on (He PAW anlos लाल दा (भरना, कर्ण (लग ver (प्रेस TAG) SONS nh) Corer) VON CTRL ET हा "सु (caeorz = ie at ( stant; 3a iCTE oe ser J ) Ro धर nei] २०१४८४१
face सदेह:१८|| 993 डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” मारिते रास बाल कविता बागर (बाल कविता) Fr थे हि 4 | व , कै > CSIR (आब NISCAIR) asa दिल्ली, GRI प्रकाशित Ufé पोथीक अनुसार "बागर" एक तरहक UAT (GAN) ez नाँओ थिक |
face सदेह:१८|| 999 WE ही 2 , १ है $ कि e si (oor. Shashidhar Kumar “Videha" © डॉ. शशिधर 'कुमर “fate” © Ul P44 Sag . 3 घास खाइत एकसिंघी भारतीय sist (Rhinoceros unicornis) ee = नम 7] s oS. NY - Spel ry ne अल ie <= = 3 n —— Y a * Se Dr. Shashidhar Kumar “Videha = Sten = aag” OST! ay ay Sf “S s ee ae | कफ —_—— ............ स्थाल - संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना पॉकिमें Ser पएकॉसियों ~ दलदली पॉकिमे विश्राम Id एकसिंघी भारतीय sist (Rhinoceros unicornis syn. Rhinoceros indicus)
006 || fate सदेह:१८. सामार सौजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमेन मैथिली - BA (गडूमक, धानक, चाउरक, मकई Wz आदि) WRI या WISI (धानक वयस्क पाँखियुक्त A अंग्रेजी - GRANARY WEEVIL (WHEAT, RICE-, MAIZE-, GRAIN-) GAAS नाम - Sitophilus granarius (गढूमक सूखा) (उपरुका चित्रमे) Sitophilus zeamais (मकई केर सूखा) Sitophilus oryzae (चाउर आ धालक BA आ फाड़ा) te - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नांओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) गहूमक संग ag “सूरा” पिसाइत 87 फोकला बना BS गहूम खा जाइत छे ।।
00 || विदेह सदेह:१८. बगेरी (बाल कविता) oe 7) SESS Dey if ही hy ae aN Marc} [ 2 jae न Q ५ Sk # ८ | f ~ 4, a >» > \ ft J सामोरे सजल्य - पी; “0 % मैथिली - बगेरी अंग्रेजी - BAYA / BAYA WEAVER / WEAVER BIRD जैववैज्ञा० नाम - Baya philippinus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नांओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नांओ ss जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) पोखरिक भीड़ ई, एम्हर घाट | ऑम्हर नजि छी आबरजात | |
हि | है, कर = + ; = लि f ‘ . ‘ er. y ५ भ * Oy * . f 4 \ , . 4 मैथिली - टिटही (विशेष ws Lapwines केर अर्थमे प्रयुक्त) feoct - टिटहरी (विशेष ps sanppiPers ez अर्थमे प्रयुक्त) संस्कृत - टिट्िप्घ, कोयष्टि, afte अंग्रेजी - LAPWINGS & SANDPIPERS जैववैज्ञा० नाम - LAPWING - Vanellus spp. (लाल गलचर्म - V.indicus, MRR गलचर्म - V. malabaricus) SANDPIPER - स्कॉलेपिंसाइडी गण (Order - SCOLOPACIDAE) केर २० AVI (Genera) सब जाति (Species) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक : नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
028 || विदेह सदेह:१८. 5 Ws | . a श्र )/ सं = a7 = e ‘ <n ¥ A 5 ’ SP आए ti San 2 | दे. Ler al 3 a he FL. a? iy j oy ~ x Pad 2 a ae ae aa Gs. LD sd Se a ek: \ (er REGIS Cpa kate POSES We one 8 hy Ss ~ & o> = mS ‘ ator 2 - Mat’ A * ce ie oF © हे. ज»मीव जि: ते st. aha Haig ow Ot Sintra ie L +S all है : j ss ; < a रद पका a as Dy दि ne ~ As 226 asi a मर “0. - + बिल: \ मी मकर: यही. दिन Se ; 8.2. Whew seciica (दुलौरपुरस्न्वौला ट्रिभेंगों जमीनक भीतरूका चालीक पाचन प्रक्रियाक फलस्वरूप निकलल माटि
विदेह सदेह:१८ || 037 Cede IRE PY PY My Sy HN Ee A DIETER LN SIG, DORN: Cee We Arse ao. Ve RAE a> . = x it oa 7 Ne x : " ale asd Cc = स्थान- संजय गांधी जैंविक उदान;पटेा मैथिली - मयूर (उच्चारण - HAZ / AB), मोर (चित्रमे - भारतीय / नील मोर आ मोरनी) हिन्दी - मोर संस्कृत - मयूर, शिखि, नीलकण्ठ, अर्जुन, नर्तक, चित्रफत्रक आदि अंग्रेजी - PEAFOWL (fepidl - INDIAN / BLUE PEAFOWL) PEACOCK (मोर / नर मयूर) & PEAHEN (मोरनी / Sil मयूर) जैववैज्ञा० नाम - Pavo cristatus हनौट - संस्कृत भाषामो आयल हरेक नांओ या पर्यायी नाँ ओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नांओ sts जाइत अछि - तत्सम EET)
044 || विदेह सदेह:१८. $ » La! oO Dr Shashidhar Kumar *Videha”, © y “विदेह” | OST ans) ‘waa ‘facne’ cm AAAS ES a. <= 4 eee i | स्थान - दुलारपुर(भोरहा बाध), cfzeierr मैथिली - छोटकी बगुला (उच्चा० - छोटकी बौंगला) हिन्दी - छोटा बगला संस्कृत - वक प्रभ्नेद अंग्रेजी - LITTLE EGRET जैंववैज्ञा०८ जाम - Egretta garzetta hte - Sepa भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)
विदेह सदेह:१८ || 045 et aot iw ‘it शा कर ah uj st | » hy . Te me | RUAN a ay 2 hes un | oni है Wek के as मैथिली - मवेशी बगुला, खेतक बगुला (उच्चा० - बौंगला) हिन्दी - मवेशी बगला संस्कृत - वक WG अंग्रेजी - CATTLE EGRET जैंववैज्ञा८ नाम - Bubulcus ibis syn. Ardea ibis syn. Ardeola ibis syn. Egretta ibis syn. Lepterodetis ibis ote - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम रूपमे)
विदेह सदेह:१८|| 2055 है. चर 7 हा के yg = x दि | _ = बाइग्लादेशमे ढाकाक "दोयेल चटवार"” (DOYEL / DOEL SQUARE) पर बनल दहियलक जोड़ीक पाषाण प्रतिमा कौआ (बाल कविता)
विदेह सदेह:१८ || 083 Ce $3 Mae यीयमे weit रूथाल vor afer mR) Usa aif Aon faon claw दूसरा वचिया डॉस्ू पाररूपर सम्मुस्त @iteth trac हो PE t Je दर की a . ae « ES eee A Vi > Pe ie : — Ly ee eee) : * 2 जि Uw Awe 4 nt है | = कक. mE ae मैंथिली - रँसुओ crit 'डिल्दी - बक chi एक प्रजाति खंरूकृत - वक, HRA अंडोजी - oPENBILLS / OPENBILLED STORKS (ASIAN & AFRICAN) Giadsilo Gd - Anastomus oscitans (ASIAN) & Anastomus lamelegerus (AFRICAN) he - संस्कूल set आयल ढंरेक लॉजो या पर्सायी TaN स्वतः सैशिली srry पर्यायी लॉ ors जाइल af - सत्सस TAHT
084 || fate सदेह:१८. ea पुरुष । नर नीलकण्ठ (असली)... ४ a “जी ' a» ry oe aa me, ew CASS & —, म्रेंथिली - नीलकण्ठ (असली) हिन्दी - नीलकण्ठ (असली)... संस्कृत - नीलकण्ठ अंग्रेजी - INDIAN ROBIN (इण्डियल रॉबिन) जैववैन्ञा० नाम - Saxicoloides spp. (5. fulicatus, S. intermedius etc.) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी aa ss जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) चकोर (बाल कविता)
42 || विदेह सदेह:१८ रख कर A! er ie | | | "9 a. : + ‘is ~ 2 at a \ we aréfor - आसमाली गर्दनि - मटियाही पीयर aréfer - मटियाही पीयर (afr कि often (नील रेग clot otf (संगडि often प्राप्ति स्थान - यूज़ेप (योशेप) | प्राप्ति senor - पच्छिमी एशिया, |... प्राप्ति स्थान - दच्छिल-पूब समस्त भारत (पच्छिम-उत्तर- एशिया यथा - थाइलैण्ड, पूब-दच्छिल an Hers पुर्वोत्तर | म्यांमार, कम्बोडिया, भारतमें Be) लाओस, वियतनाम, सिंगा- प्रजातिः- प्जातिः- पुर आदि; were acer el Coracia bengalensis होयबाक कारण पुर्वोत्तिर Coracia garrulus garrulus bengalensis भारतक किछु भागमें Coracia garrulus seminowi Coracia bengalensis indicus | Coracia bengalensis affinis
विदेह सदेह:१८|| 7] TAGS (बाल कविता) = ‘ ¢ 0 sate SE ae मैथिली - धनछुआ == ३ के 4 अंग्रेजी - एशी ड्रॉन्गो (ASHY DRONGO) \ Na जैववैज्ञा० नाम - Dicrurus leucophaeus = (डाइक्रुरस ल््युकोफेकस) दर SIS cy Sar ER & क कह or ee oy oe Sta oF eae rr ० Pe Rd, TAS Ne RN id eA नकिट जि" YS t Ce ‘ oh, AEA es el fable en ise थे Re Paes 4 Tay a eae, Se | मैथिली - करिया धनछुआ (करिया धान्छुआ) ‘ न हिन्दी - भ्रुजंगा = संस्कृत - भ्रृंगयज . अंग्रेजी - BLACK DRONGO §j a जैंववैज्ञा० नाम - Dicrurus macrocercus (SIgsp2a मैंक्रोसर्कस) i Ieee leveatipenceeeenapane निकट कम eaannan
विदेह सदेह:१८|| 83 बिढ़नी आ पचहिया (बाल कविता) ४ ८ उद्ड —_ ? साधारण बिढ़ली ~ दा. नकिमिक सी ipa. कम ma दर ; >) ” “३० ; ? की ~~. ot , 4] 3 कि हक. पचद्विया fad ~— ‘ Pe char aan Vieng Pd AS ; S = pO डॉ. .शशिघर | दे लू (cater मैथिली - विढ़ली (साधारण / पीयरका आ आन रंग-रूपक बिढ़ली) आ पचहिया (पचहिया बिढ़ली) संस्कृत - are, वरटा, av, तृषसूक्किनु, raga, विषशृड्गिन्, Proj, कोष्ठागारिनू अंग्रेजी - PAPER WASPS (बिढ़नी) & HORNET/S or HORNET WaASP/S (फचहिया) GHaadSio जाम - Polistes spp. , Ropalidia spp. ete. (fagofl) & Vespa spp. (फंचहिया) ff > ee y — जल . - ऊन ~~ ga | “7 लड़ने a ae ks ne Loy Jus © मं as कमर, & ~ ¥ 2 ब्रा 5 Ren” - / oa Sy 4 é s “ oe } — ~ es ५. 4 sae “ta पक faces खोंता आ ओहि ware कोठरीक षटकोणीय संरचना मधुमाक्षी (-छी) से मिलैत - जुलैत अछि पर ओहिमै ase नजि रहैछ कारण कि facet ase नजि aada अछि |