SADEHA — 19

Publication: SADEHA · Issue: 19
Open original PDF at Internet Archive

ISSN 2229-547X विदेह सदेह -१९ (विदेह-सदेह १९, विदेह www.videha.co.in पेटार (अंक २०१-२१६) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. ३५००/- संस्‍करण: २०१८, २०२२ Videha Sadeha 19: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 201-216 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-७६४) गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली विकीपीडिया, यूनीकोड तिरहुता आ कैथी, गूगल ट्रांसलेटमे मैथिली, ट्विटरमे मैथिली, अमेजन अलेक्सामे मैथिली, संपादकीय (पृ. २-६४) कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झा जीक टिप्पणी (पृ. ६५-७८) प्रयास प्रेमी मैथिल- जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही (नाटक) (पृ. ७९-१४५) ओम प्रकाश झा- सामंत, जस जस सुरसा बदनु बढ़ाबा (पृ. १४६-१४७) मुन्ना जी- लघुकथा आ विहनिकथा- तुलनात्मक विवेचन, बीहनि कथा (कोठा वाली, बॉस, बहिंगा, झोल, पटकनिया), प्रेम बीहनि कथा (असरा, संगबे, छुच्छ दुलार, दिहलगड़ि, उफाँटि, जुड़बन्हन, निंघेस, बखरा, अन्हरिया मे, सेल्फी, खोंइछक धान, दासीन, प्रतिक, सिनेहक धार, ऐब की बेरिया, परदा पर, पसार....!, आशीर्वाद, आँचर....!, उठल्लू, बाट- घाट, द्वन्द्व, देह, मोन आ प्रेम, परमेश्वर, जिया जरए सगर राति, साढ़े एकैसम सदी, भूख (पृ. १४८-१८७) अब्दुर रज्जाक- बिहैन कथा-१, बिहैन कथा-२ (पृ. १८८-१९०) राजीव कर्ण - बीहनि कथा ( पौस, सिनेह, नेत, देखौवल न्याय, पैघ लोक, ख़ुशी, उल्टा पुल्टा, फोटो कॉपी, जमाना, चक्षु भोजन) (प्. १९१-१९८) नीरज कर्ण- बीहनि कथा ( नोर, फादर्स डे) (पृ. १९९-१९९) राम सोगारथ यादव- बीहनि कथा- सपना सपने अछि (पृ. २००-२०२) नारायण मधुशाला- बीहनि कथा-१, बीहनि कथा-१ (पृ. २०३-२०५) मलय नाथ मण्डन- बीहनि कथा- समीकरण, बेकाजक का'ज, कोढ़िया (पृ. २०६-२१०) जगदानन्द झा ’मनु॒’- बीहनि कथा (बेटाक बाप, रभसल), प्रेम बीहनि कथा (एसगर, प्रेम, सोहागिन, बेगरता, अगिला जनम, मँुह झौँसा)(पृ. २११-२१४) विद्याचन्द्र झा “बमबम”- बीहनि कथा (आबक जमाय, अभगलाहा, आदति, भोंट, इलेक्सन, हेल्लो,नोन, साढ़े बाइस, मोहन भोग, जड़ैत चिमनी छाप, नोटक भोंट, हकार), प्रेम बीहनि कथा (सिनेह, उड़ाँत, जूड़ाएब, पंचैती) (प्. २१५-२३८) घनश्याम घनेरो- बीहनि कथा (जमाना, नफासी, आवारा के ?, पैरबी, खल्लास, पेटक अँटकर, प्रेम पेसगी, समुदाय, धुज्ज़ा, निरमा, रक्तदान, दियाद-ताप,काँट, करता हूँ - स्त्रीलिंग, वर (?) साइत, जानेमन, आशीर्वाद, तेरे सिवा, फिरसान, सहरसाबाली, भठियारा, जिज्ञासा, काम अमर, डेट-तिथि, आवाज, कुकूर, सुपर बाए, शागिर्द, भ्रम, बट सावत्री, गुलबदन, गुणवत्ता, झटहा, होश, सुख-दुःख, भूलचूक-लेनीदेनी) (प्. २३९-२७४) राजदेव मण्डल- एडजस्टमेन्ट (लघुकथा), गंगजलिया पोखैर (बीहनि कथा) (पृ. २७५-२८२) दिनेश रसिया- बीहनि कथा-१, बीहनि कथा-२ बाबा (पृ. २८३-२८४) सत्यनारायण झा- बीहनि कथा- सुटिया, कुमार साहेब, प्रजातंत्र एकटा मजाक (प्. २८५-२९२) मनोज कुमार मंडल- बीहनि कथा (हिलकोर, छुतहर, अध्यापन, अगरजीत, एना किए, उपवास, अवाक, लाल काकी, ठेकनगर, झूठक खेती, पड़ोसिया डाह) युक्ति शक्ति (लघु कथा) (पृ. २९३-३०८) प्रणव कुमार झा- लघु कथा- नव-आशा (पृ. ३०९-३१३) चन्दना दत्त- बाबा लालदास (पृ. ३१४-३१८) नवेंदु कुमार झा- गाम मे समटि रहल प्रभाव आ चर्चा भेल वैश्विक प्रभावक- साहित्य अकादमीक भुसकौल मंडलीक कारनामा (पृ. ३१९-३२५) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- दीर्घ कथा- परिस्थिति लेखिका, सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्य मे, मैथिली लोकगीतमे कौआ सम्बाहक, फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना, मैथिली संस्कृति केर अवयव, मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद, राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण, छागरक बलिप्रदानपर चिन्तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्य, मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास, सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथमे समानता-(लोक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे) (पृ. ३२६-५१५) कुमार गगन- ई-पत्र- डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ मे समानता (पृ. ५१६-५१६) राजेश वर्मा 'भवादित्य'- बीहनि कथा (पृ. ५१७-५१७) रवि भूषण पाठक- फसाद आ आनंद (लघु कथा), दोस्तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य) (प्. ५१८-५२७) विनीत उत्पल- (जानकी नवमीक मौका पर गांधी दर्शन एवं स्मृति समितिक तत्वावधानमे आयोजित परिचर्चा आ संगोष्ठीमे वक्ता सबहक- [पंकज मिश्र, अमरनाथ झा, राजेश झा, सविता खान, अरविंद कुमार झा, मनीन्द्र नाथ ठाकुर, शेफालिका वर्मा, वेदव्यास कुंडू, आर.के. सिंह, प्रभात झा, प्रचंड पौटील्य, माया देवी, कृष्णा प्रसाद] वक्तव्य- ट्रांसस्क्रिप्ट आ अनुवाद: विनीत उत्पल) (पृ. ५२८-५६८) आशीष अनचिन्हार- संशोधन केर मतलब विनाश नै होइ छै (पृ. ५६९-५९२) उमेश मण्डल आ पुनम मण्डल- समाद- सगर राति दीप जरय- 91म सगर राति दीप जरय:गोधनपुर- 24.09.2016, ९०म खेपक दीप सगर राति लक्ष्मीनियाँमे जरल, 86म दीप सरग राति जरल, ८५ म सगर राति दीप जरय, ८४म सगर राति दीप जरय, ८३म सगर राति दीप जरय, ८२म सगर राति दीप जरय, ८१म सगर राति दीप जरय, 80म सगर राति दीप जरय, ७९म सगर राति दीप जरय (पृ. ५९३-६४३) उमेश मण्डल- इतिहास- सगर राति दीप जरय (पृ. ६४४-६८१) विदेह सम्मान समारोह (समानान्तर साह्त्य अकादेमी पुरस्कार सहित)- सचित्र विवरण (पृ. ६८२-७६४) पद्य- खण्ड (पृ. ७६५-१३५८) राम सोगारथ यादव- गरिब, देश प्रति स्नेह, समुन्दर पार, हमर बिनती, हे युवा उठू, रोकू दहेजकेँ, लोभ किए ?, महानुभाव ज्यू !, घूसकें जूस बंद करु", भुत लागल कतेकेँ ?, नोर बिरान भेल, प्रलय अहीं छी, नव मिथिलाक निर्माण करैत चलू, करुवाइल स्वाद, भरिया, प्रवास, दहेजक चपेटा, हेरा गेलै, बंदिमे, नकामी जिनगी, प्रवासीके होली सपनामे, कलंकी प्रथा, बिचलित मन, बेदना, पूज्य आत्मा, फागुन महिना, आत्माक अवाज, समय संग हम, भाग्य बिदेशमे, यात्रामे जिनगी, बटोहिया, सरकार जी, कसैया मोथा, ई किनकर, अछोप किए कहै छी, मिथिला अटल अछि, भावना, महराज ! एना किए? भाव (रचना), बधाइ अछि प्रिये- (भाव रचना), किछु गजल, किछु आजाद गजल (प्. ७६६-८५३) मंगलेश डबराल- (मंगलेश डबरालक सातटा हिंदीक कविताक मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) (पृ. ८५४-८५७) पंकज चतुर्वेदी- [पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविता (अनुवाद-भावानुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा)] (पृ. ८५८-८६६) संतोष चतुर्वेदी- (संतोष चतुर्वेदीक दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) (८६७-८६८) वीरू सोनकर- (वीरू सोनकर केर तीन टा हिंदी कविताक मैथिली भावानुवाद। अनुवादक आशीष अनचिन्हार) (पृ. ८६९-८७३) आशीष अनचिन्हार- बाल गजल, किछु गजल (पृ. ८७४-९०२) मनोज कुमार मंडल- किछु गजल, रिश्ता-नाता, भरदुतीया, मोती, दीप, जानकी, अकरहर, दिपावली, परदेशी, कला, खुशी, पंडित, माय!, भाय!, मायक बदलैत छवि, कलह कली, वीरक पत्नी, देशी कौआ, बताह, भूख, उधारी सामान, भीखमंगा, चुट्टी, आब हमरा दे पोथी कीन, चंदा मामा (पृ. ९०३-९३७) ओम प्रकाश झा- किछु गजल (पृ. ९३८-९३९) बाबा बैद्यनाथ- आजाद बाल गजल, बाल कविता- बाबा-पोताक सिनेह, किछु आजाद गजल (पृ. ९४०-९४९) जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- किछु गजल (पृ. ९५०-९७५) जगदानन्द झा 'मनु'- भक्ति गजल, किछु गजल, कविता (प्. ९७६-९८२) संतोष कुमार झा- सामा-चकेबा, सुजनी शिल्प, अथर्व (प्. ९८३-९९२) अशरफ राईन- गजल (पृ. ९९३-९९३) नारायण मधुशाला- गीत (पृ. ९९४-९९४) दिनेश रसिया- गजल (पृ. ९९५-९९५) सुकोसुत शिशिर- फूइस बाजी त' वज्र खसन्ता (पृ. ९९६-९९८) राजदेव मण्डल- शिशुक स्वर (पृ. ९९९-९९९) सृजन शेखर 'अज्ञेय' (मूल नाम- गंगानन्द झा)- दूटा कविता (पृ. १०००-१००३) डॊ शशिधर कुमर- किछु बाल कविता (पृ. १००४-११७३) अब्दुर रज्जाक राइन- किछु कता, किछु गजल, मुसहर डोम आ चमार (प्. ११७४-११८३) प्रयास प्रेमी मैथिल- किछु कविता, किछु गजल (प्. ११८४-१३१५) राजेश मोहन झा "गुंजन"- बिनु राधाक ब्रज, जनचेतना आ मानव वेदनाक प्रतिनिधि कवि यात्रीजी केर जन्मदिवस पर, बाल कविता- भादवक अन्हरिया, कृष्ण छठिहारक पद (पृ. १३१६-१३२३) मनोज झा मुक्ति- प्रकृतिसँ अनुनय (पृ. १३२४-१३२७) रौशन कुमार झा “गोविन्द"- कसैया दहेज (पृ. १३२८-१३३२) रवि भूषण पाठक- श्री लक्ष्मी चौधरी ,करियनक सम्मान मे, हजार-लाख मे, डहकन, खट्टा चूक्क, मीत्ता-2, हरियर, बहुत किछु विदा भ' गेल रहै, व्यर्थ प्रलापी, झाबाद, बाल कविता- 'क', बाल कविता- मानसून, बाल कविता- सुन वौआ सुन, बाल कविता- ब्‍लेक होल (पृ. १३३३-१३४१) प्रणव कुमार झा- अलर-बलर (पृ. १३४२-१३४६) विन्देश्वर ठाकुर- सामा (पृ. १३४७-१३४८) लालदेव कामत- उर्फ नाम (पृ. १३४९-१३५०) राम प्रीत पासवान- भूतक बाप पिशांच उर्फ आशारामक जोड़ा (पृ. १३५१-१३५४) किशन कारीगर- इस्कूल (पृ. १३५५-१३५६) सुशान्त झा "अवलोकित"- नेनपन (पृ. १३५७-१३५८) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर मैथिली विकीपीडिया, यूनीकोड तिरहुता आ कैथी, गूगल ट्रांसलेटमे मैथिली, ट्विटरमे मैथिली, अमेजन अलेक्सामे मैथिली खण्ड १ तिरहुता (मिथिलाक्षर) यूनीकोड फॉण्ट आ कैथी यूनीकोड फॉण्ट लेल अंशुमन पाण्डेय/ विकीपीडिया (मैथिली) लेल राजेश रंजन, आमिर ई. अहारोनी (इस्रायल), रुना भट्टाचार्य आ मुजम्मिलक योगदान (फेसबुक आ ई-मेल पत्राचार) खण्ड १ उपखण्ड १ तिरहुता (मिथिलाक्षर) यूनीकोड फॉण्ट आ कैथी यूनीकोड फॉण्ट लेल अंशुमन पाण्डेय खण्ड १ उपखण्ड २ विकीपीडिया (मैथिली) लेल राजेश रंजन, आमिर (इस्रायल), रुना भट्टाचार्य आ मुजम्मिलक योगदान खण्ड २ खण्ड १ केर पत्राचारसँ सभ किछु स्पष्ट भऽ गेल हएत। ओइमे देल स्क्रीनशॉटक विवरण निम्न तरहेँ अछि। खण्ड १ उपखण्ड १ तिरहुता (मिथिलाक्षर) यूनीकोड फॉण्ट आ कैथी यूनीकोड फॉण्ट लेल अंशुमन पाण्डेय पहिने खण्ड १ उपखण्ड १ पर आउ। ओइमे देल स्क्रीनशॉटक विवरण निम्न तरहेँ अछि। तिरहुता (मिथिलाक्षर) यूनीकोड फॉण्ट आ कैथी यूनीकोड फॉण्ट लेल अंशुमन पाण्डेय अपन आवेदन देने रहथि। मिथिलाक्षर (तिरहुता) फॉण्ट लेल आवेदन ३० सितम्बर २००९ आ फेर संशोधित आवेदन ५ मई २०११ केँ श्री अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल गेल आ दुनू बेर ऐमे विदेहक सहयोगक वर्णन भेल। १२ मई २०११ केँ अंशुमन पाण्डेय विदेहक फेसबुक ग्रुप https://www.facebook.com/groups/videha पर सदस्यता लेलनि। १७ मईकेँ यूनीकोडक टेकनिकल कमेटी द्वारा आवेदन स्वीकृतिक आ ओकरा आइ.एस.ओ. केँ पठेबाक ओ सूचना विदेहक फेसबुक ग्रुपपर देलन्हि। १० जून केँ आइ.एस.ओ. द्वारा तिरहुता यूनीकोडक स्वीकृतिक सूचना सेहो विदेहक फेसबुक ग्रुपपर ओ देलन्हि जे भारतीय समयानुसार ११ जून छल। आब ई फॉण्ट सभ बनि कऽ तैयार अछि आ नीचाँक लिकपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। तिरहुता आ कैथी फॉण्ट डाउनलोड (Google's Noto Fonts project/ C-DAC) यूनीकोड तिरहुता फॉण्ट डाउनलोड करू मिथिला यूनी कैथी खण्ड १ उपखण्ड २ विकीपीडिया (मैथिली) लेल राजेश रंजन, आमिर ई. अहारोनी (इस्रायल), रुना भट्टाचार्य आ मुजम्मिलक योगदान आब खण्ड १ उपखण्ड २ पर आउ। ओइमे देल स्क्रीनशॉटक विवरण निम्न तरहेँ अछि। फेडोरा प्रोजेक्ट मोजिलामे योगदान देनहार राजेश रंजन आ संगीता कुमारीक चर्चा हम विदेहमे कतेक बेर केने छी, हमर अंग्रेजी-मैथिली कंप्यूटर डिक्शनरीमे सेहो हुनकर नाम आयल अछि। ओ हमरा कहलापर विकीपीडियाक समिटमे मैथिली विकीपीडियाक सम्बन्धमे इस्रायलक आमिरसँ गप सेहो केलन्हि। २००८ क पहिनहियेसँ ऐपर काज शुरू भऽ गेल जकर विस्तृत विवरण खण्ड ३ मे अछि। कोना भोजपुरी आ बिहारीसँ होइत मामिला मैथिली धरि आयल। फेर मीडियाविकी आ अनुवादक कार्यक्रमक प्रारम्भ भेल आ फेर १००० सँ बेशी आलेख ओइमे देल गेल जे-जे विकीपीडिया लैंगुएज कमेटी राजेश रंजन जी केँ अढ़बैत गेलन्हि से ओ हमरा अढ़बैत गेलाह। एतऽ ई बता दी जे ऐ १००० आलेख जे मैथिली विकीपीडिया इनक्यूबेटर (माने ड्राफ्ट) मे रहै, मे १००% विदेहक योगदान छै, बादमे किछु आर योगदान एलै, मुदा जखन मैथिली विकीपीडिया इन्क्यूबेटरसँ लाइव भेलै तखनो ९९% विदेहक आलेख ओइमे रहै, आ अखनो ९५% आलेख विदेहेक सौजन्यसँ ओतऽ छै। १८ फरबरी २०१३ केँ आमिर ई. अहारोनी (इस्रायल) ऐ गपकेँ मानलनि जे प्रोजेक्टक सभ काज पूर्ण भऽ गेल अछि कारण लैंहुएज कमेटीक सदस्य ऐ तरहक बग तखने बनबैत छथि। बगजिलामे हमरा १७ फरबरी २०१३ केँ जोड़ल गेल छल मुदा किएक तँ एक्टिविटी बड्ड कम रहै से लैंगुएज कमेटीक अप्रूवल नै भेटलै। मुदा राजेश रंजन जी तकर विरोध केलन्हि, हम सेहो विदेह आ सोशल मीडियापर विभिन्न आइ.एस.पी.सँ एक्टिविटी बढ़ेबाक अपील केलौं मुदा अत्यंत खेदक संग सूचित करय पड़ि रहल अछि से गएर-विदेह सदस्यक योगदान शून्य रहल। मुदा जे से एक्टिव यूजरक संख्या बढ़ि कऽ १६ आ सम्पूर्ण यूजरक संख्या बढ़ि कऽ ६० भेल (देखू २४ सितम्बर २०१४ क स्क्रीनशॉट)। जखन हम सभ मैथिलीभाषीक संख्या करोड़मे गनबै छी की ई संख्या अहाँकेँ निराश नै करैत अछि? २४ सितम्बर २०१४ केँ आमिर ई. अहारोनी (इस्रायल) राजेश रंजन आ रुना भट्टाचार्यकेँ सूचित केलन्हि जे आलेख १००० सँ ऊपर छै, एक्टिविटी सेहो ठीके-ठाक छै, आ ओ राजेश रंजनक अतिरिक्त आन कोनो मैथिलीभाषीकेँ नै चिन्हैत छथि, से ओ पुछलन्हि जे सूचित करी जे ई सभ मैथिली भाषे मे छै ने। आ जँ से हेतै तँ ओ एकर अप्रूवल लेल प्रोपोजल देता। २४ सितम्बर २०१४ केँ आमिर ई. अहारोनी (इस्रायल) केँ राजेश रंजन सूचित केलन्हि जे ई सभट हजारसँ बेशी आलेख सरिपहुँ मैथिलिये मे छै। राजेश रंजन २५ सितम्बर २०१४ केँ हमरा सभटा मैसेज फॉरवार्ड करैत छथि आ कहैत छथि जे मैथिली विकीपीडियाक सपना आब पूरा होइये बला अछि। आइ हमरा ई देखि आश्चर्य होइत अछि जे जकर कोनो योगदान नै से सभ कूद-फांग कऽ रहल छथि आ राजेश रंजन आ रुना भट्टाचार्य एतेक करितो चुप्पे छथि। मैथिली भाषा भाग्यशाली तँ अछिये! राजेश रंजन ओही ई-पत्रमे लिखै छथि जे मूल प्रश्न अछि जे लोक किए खाली लग्गा-भरि नमगर गप छोड़ै छथि मैथिलीक नामपर मुदा ऐ लेल काज बा एकर उपयोग नै करै छथि। मुजम्मिल सेहो विकीपीडिया दिससँ जुड़ै छथि। हमरा एडमिन बनै लेल राजेश रंजन फोन करै छथि, ओना हुनका बूझल छन्हि जे हम राजरोगसँ दूर रहै छी आ तइ मे मात्र साहित्य अकादेमी सम्मिलित नै अछि। हम बिप्लब आनन्दक नाम मुदा हुनका दैत छियन्हि जे ओ युवा छथि आ नेपाल दिससँ छथि से भऽ सकैये निरपेक्ष व्यवहार करता जे विकीपीडिया लेल आवश्यक अछि, मुदा मैथिलीमे से होइ कहाँ छै। २७ सितम्बर २०१४ केँ राजेश रंजन जी बिप्लब आनन्दक नामक अनुशंसा करैत छथि जे मानि बिप्लब आनन्दकेँ २८ सितम्बर २०१४ केँ मैथिली विकीपीडियाक एडमिन बनाओल जाइत अछि। बिप्लब आनन्दक वर्तनी आ निष्ठा दुनूमे सुधारक खगता हम अनुभव करैत छी, मेहनती धरि ओ छथि, से शुभकामना। खण्ड-३ मैथिली विकीपीडिया, यूनीकोड तिरहुता आ कैथी, गूगल ट्रांसलेटमे मैथिली, ट्विटरमे मैथिली, अमेजन अलेक्सामे मैथिली १ [सम्पादकीय: 'विदेह' ८५ म अंक ०१ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८५)] सूचना: १. कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल आवेदन स्वीकृत भಽ गेल अछि। आब ई दुनू लिपिक यूनीकोड फॉन्ट बनेबाक क्रिया क्यूमे लागि गेल अछि आ जखन एकर सभक बेर एतै ऐ दुनू लिपिक आधारभूत फॉन्ट बनेबाक क्रिया शुरू भऽ जाएत। मिथिलाक्षरक आधारभूत फॉन्टक नाम तिरहुता रहत (जेना देवनागरीक आधारभूत फॉन्टक नाम मंगल आ बांग्लाक आधारभूत फॉन्टक नाम वृन्दा अछि)। मिथिलाक्षरक फॉन्ट लेल तेसर बेर संशोधित आवेदन देल गेल रहए, दोसर आ तेसर आवेदनमे विदेहक योगदानक विस्तृत चर्चा भेल अछि, यथा- [Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22; Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/ ."Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS."-Anshuman Pandey.] । सूचना: २. गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity... ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू। सूचना: ३.विकीपीडिया मैथिली: मीडियाविकीक २६०० संदेश अंग्रेजीसँ मैथिलीमे विदेहक सदस्यगण द्वारा अनूदित कऽ देल गेल अछि। आब http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate... ऐ लिंकपर Group मे जा कऽ ड्रॉपडाउन मेनूसँ अ-अनूदित मैसेज अनूदित करू। जँ अहाँ विकीपीडियाक ट्रान्सलेटर नै छी तँ http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator ऐ लिंकपर मैथिलीमे ट्रान्सलेट करबाक अनुमतिक लेल अनुरोध दियौ, ऐ सँ पहिने ओतै ऊपरमे दहिना कात लॉग-इन (जँ खाता नै अछि तँ क्रिएट अकाउन्ट) कऽ आ प्रेफरेन्समे भाषा मैथिली लऽ अपन प्रयोक्ता खाताक लिंककेँ क्लिक कऽ अपन प्रयोक्ता खात पन्ना बनाउ। किछु कालमे अहाँकेँ ट्रान्सलेट करबाक अनुमति भेट जाएत। तकरा बाद अनुवाद प्रारम्भ करू। विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/.../bihari-wikipedia... ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/.../Requests.../Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate... http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai २ विदेह गोष्ठी: (६ आ ७ दिसम्बर २००८ आ फेर १३ आ १४ दिसम्बर २००८/ फेर ५ आ ६ दिसम्बर २००९ आ १२ आ १३ दिसम्बर २००९/ फेर ४ आ ५ दिसम्बर २०१० आ ११ आ १२ दिसम्बर २०१०/ फेर अन्तिम परिचर्चा १७ आ १८ दिसम्बर २०११ आ २४ आ २५ दिसम्बर २०११ केँ मैथिली लेल गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट, गूगल लैंगुएज टूल, कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक आवेदनक स्वीकृतपर आ विकीपीडिया मैथिली पर परिचर्चा आ तकर सन्दर्भमे प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन निर्मली, जिला सुपौलमे भेल। ओतए ढेर रास सम्बन्धित एक्सपर्ट उपस्थित रहथि। तकर बाद किछु आलेख आ रचना डाक आ ई मेलसँ सेहो आएल। तकर संक्षिप्त विवरण नीचाँ देल जा रहल अछि।) गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट आब सोर्स आ टार्गेट दुनू भाषाक रूपमे मैथिलीकें स्थान देलक . देखू http://support.google.com/translate/toolkit/bin/answer.py... आ http://translate.google.com/toolkit/list?hl=en... विदेहक विरोधक बाद गूगल बिहारी नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक गप मानि लेने अछि, "विकीपीडिया मैथिली "क स्थापना पहिनहिये विदेह द्वारा कैल गेल आ पहिनहिये बिहारी नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक गप विकीपीडिया मानि लेने छल | गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject एतए अंग्रेजीमे भाषामे Bihari चुनू आ अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू; ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity... ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू। [अपडेट: -विदेहक एकटा आर सफलता- गूगल सर्च इन्जिन आब मैथिलीमे -विदेहक एकटा आर सफलता- गूगल सर्च इन्जिन आब मैथिलीमे- पहिने गूगल एकरा बिहारी भाषा मानै छल, मुदा विदेहक विरोधक बाद गूगल मानि लेलक जे मैथिली भाषाक अलग सर्च इन्जिन देल जाए। विदेहक विरोधक बाद विकीपीडिया ई पहिनहिये मानि लेने अछि। https://www.google.com/webhp?hl=bh अछि लिंक [गूगल कम्पनी "बिहारी" नामसँ सर्च इन्जिनक प्रारम्भ केलक, मुदा बिहारी नाम्ना कोनो भाषा अछिये नै। एक गोटे बिहारीक अनुवाद अंगिका कऽ देलन्हि आ से गूगल अंगिका कऽ कए सर्च इन्जिन आबि गेल। फेर विदेहक विनीत उत्पल ऊपर लिखित पत्र लिखलन्हि आ विदेह द्वारा समस्त अनुवादक लगभग सभटा भाग वोलन्टीयर रूपमे कएल गेल, लोको सभसँ अपील कएल गेल मुदा बाहरी लोकक योगदान शून्य रहल, जे एकाध केबो केलन्हि से रोमनमे, ओकरा ठीक कएल गेल। आब गूगल मैथिली रूपमे सर्च इन्जिन देखा रहल अछि, मुदा अखनो ढेर रास काज बाकी अछि।] -ऐ विषयपर विदेह गोष्ठीक चर्चा देखू http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html ऐ लिंकपर। मुदा ई तँ प्रारम्भ अछि। अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत: http://www.google.com/language_tools?hl=bh http://www.google.com/language_tools VINIT UTPAL's LETTER गूगल कम्पनी "बिहारी" नामसँ सर्च इन्जिनक प्रारम्भ केलक, मुदा बिहारी नाम्ना कोनो भाषा अछिये नै। एक गोटे बिहारीक अनुवाद अंगिका कऽ देलन्हि आ से गूगल अंगिका कऽ कए सर्च इन्जिन आबि गेल। फेर विदेहक विनीत उत्पल ऊपर लिखित पत्र लिखलन्हि आ विदेह द्वारा समस्त अनुवादक लगभग सभटा भाग वोलन्टीयर रूपमे कएल गेल, लोको सभसँ अपील कएल गेल मुदा बाहरी लोकक योगदान शून्य रहल, जे एकाध केबो केलन्हि से रोमनमे, ओकरा ठीक कएल गेल। आब गूगल मैथिली रूपमे सर्च इन्जिन देखा रहल अछि, मुदा अखनो ढेर रास काज बाकी अछि। Vikas Thakore commented on your photo. Vikas wrote: "https://www.google.com/webhp?hl=bh Sir, एहि लिंक पर गूगल-मैथिली २००४ सं अस्तित्व में अछि.. फेर इ टटका-टटका.... जश्न (or whatever) कथिलए ?" Gajendra Thakur ट्रान्सलेट बला ऑप्शन लेल लेख पढ़ू.. http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html Vikas Thakore commented on your photo. Vikas wrote: "jee.... Dhanyavaad. बेवजह परेशानी देबए लेल हम क्षमाप्रार्थी छी.." अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत: http://www.google.com/language_tools?hl=bh अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत, पहिने बिहारी एतऽ छल क्लिक केलापर मैथिली अबैत छल| http://www.google.com/language_tools अपडेट २८ मार्च २०१२।] [सूचना: १. कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल आवेदन स्वीकृत भಽ गेल अछि। आब ई दुनू लिपिक यूनीकोड फॉन्ट बनेबाक क्रिया क्यूमे लागि गेल अछि आ जखन एकर सभक बेर एतै ऐ दुनू लिपिक आधारभूत फॉन्ट बनेबाक क्रिया शुरू भऽ जाएत। मिथिलाक्षरक आधारभूत फॉन्टक नाम तिरहुता रहत (जेना देवनागरीक आधारभूत फॉन्टक नाम मंगल आ बांग्लाक आधारभूत फॉन्टक नाम वृन्दा अछि)। मिथिलाक्षरक फॉन्ट लेल तेसर बेर संशोधित आवेदन देल गेल रहए, दोसर आ तेसर आवेदनमे विदेहक योगदानक विस्तृत चर्चा भेल अछि, यथा- [Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22; Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/ ."Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS."-Anshuman Pandey.] । सूचना: २. गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity... ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू। सूचना: ३.विकीपीडिया मैथिली: मीडियाविकीक २६०० संदेश अंग्रेजीसँ मैथिलीमे विदेहक सदस्यगण द्वारा अनूदित कऽ देल गेल अछि। आब http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate... ऐ लिंकपर Group मे जा कऽ ड्रॉपडाउन मेनूसँ अ-अनूदित मैसेज अनूदित करू। जँ अहाँ विकीपीडियाक ट्रान्सलेटर नै छी तँ http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator ऐ लिंकपर मैथिलीमे ट्रान्सलेट करबाक अनुमतिक लेल अनुरोध दियौ, ऐ सँ पहिने ओतै ऊपरमे दहिना कात लॉग-इन (जँ खाता नै अछि तँ क्रिएट अकाउन्ट) कऽ आ प्रेफरेन्समे भाषा मैथिली लऽ अपन प्रयोक्ता खाताक लिंककेँ क्लिक कऽ अपन प्रयोक्ता खात पन्ना बनाउ। किछु कालमे अहाँकेँ ट्रान्सलेट करबाक अनुमति भेट जाएत। तकरा बाद अनुवाद प्रारम्भ करू। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/.../Requests.../Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate... http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि ( http://ultimategerardm.blogspot.com/.../bihari-wikipedia... ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। TIRHUTA UNICODE See the final UNICODE Mithilakshara Application (May 5, 2011) by Sh. Anshuman pandey http://std.dkuug.dk/JTC1/SC2/WG2/docs/n4035.pdf at Page 23 the Videha 80th issue (Tirhuta version) is attached"Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22" and at Page 12 Videha is included in References Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/. and role of Videha's editor is acknowledged on Page 12 "Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS." ] यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण (गजेन्द्र ठाकुर/ अपडेट ३१ मार्च २०१२) डॉ. रमानन्द झा रमण जी द्वारा यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण कएल गेल। ऐसँ मात्र ई स्पष्ट भेल जे पर्चा लिखिनिहारकेँ नहिये यूनीकोडक विषयमे कोनो जानकारी छन्हि आ नहिये वेस्टर्न वा यूनीकोड दुनू फॉन्टक निर्माण कोनो प्रारम्भिक ज्ञान छन्हि। हँ ऐ परचाक ओइ सभ लोक लेल महत्व छै जे सीखय चाहै छथि जे पूर्वाग्रहपूर्ण आ पक्षपातपूर्ण मैथिली साहित्यक इतिहास कोना लिखल जाए। ऐसँ पहिने चेतना समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल चेतना समितिक योगदानक चर्चा देखैत छी! तिरहुता यूनीकोड आवेदनकर्ता अंशुमन पाण्डेय जखन पटना गेल रहथि तँ हम हुनका कहने रहियन्हि जे विद्यापति भवनमे शिव कुमार ठाकुरक दोकान छन्हि, ओतऽ सँ अहाँ मैथिलीक किताब कीनि सकै छी, मुदा दू तीन दिन ओ दोकान आ समिति बन्द रहलाक कारण ओतऽ सँ घुरि गेला, बादमे ओतए एक गोटे कहलकन्हि जे सभ दिन अहाँ अबै छी, से ई समिति अखन कमसँ कम १४-१५ दिन आर बन्द रहत कारण दू ग्रुपमे झगड़ा-झाँटी भऽ गेल छै। ई अनुभव लऽ कऽ ओ घुरल रहथि आ से समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल ओ जे योगदान देलक तकर चर्चा करैत अछि! गोविन्द झा जीक पता मँगलापर एक गोट विद्वान् (!) हुनका कहलखिन्ह जे धुर ओ की बतेता, आ गोविन्द झा जीक पता नै देलखिन्ह आ तखन दोसर ठामसँ हुनका पता उपलब्ध करबाओल गेल। ३ [https://esamaad.blogspot.com/2012/01/blog-post_08.html?fbclid=IwAR2oAS6in4rKo0uC1CK1sX2dM7ivqI_CuF8KFNAbIN7NH12-pTuPKlkdMsE] समदिया ८ जनवरी २०१२ विदेह गोष्ठी: (६ आ ७ दिसम्बर २००८ आ फेर १३ आ १४ दिसम्बर २००८/ फेर ५ आ ६ दिसम्बर २००९ आ १२ आ १३ दिसम्बर २००९/ फेर ४ आ ५ दिसम्बर २०१० आ ११ आ १२ दिसम्बर २०१०/ फेर  अन्तिम परिचर्चा १७ आ  १८  दिसम्बर २०११ आ   २४ आ  २५  दिसम्बर   २०११ केँ  मैथिली लेल गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट, गूगल लैंगुएज टूल, कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक आवेदनक स्वीकृतपर  आ विकीपीडिया मैथिली  पर  परिचर्चा आ तकर सन्दर्भमे  प्रैक्टिकल  लैबोरेटरीक प्रदर्शन निर्मली, जिला सुपौलमे भेल। ओतए ढेर रास  सम्बन्धित एक्सपर्ट उपस्थित रहथि। तकर बाद किछु आलेख आ रचना डाक आ ई मेलसँ सेहो आएल। तकर संक्षिप्त विवरण नीचाँ देल जा रहल अछि।) गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट आब सोर्स आ टार्गेट दुनू भाषाक रूपमे मैथिलीकें स्थान देलक . देखू http://support.google.com/translate/toolkit/bin/answer.py?hl=en&answer=147837 आ http://translate.google.com/toolkit/list?hl=en#translations/active विदेहक विरोधक बाद गूगल बिहारी नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक गप मानि लेने अछि, "विकीपीडिया मैथिली "क स्थापना पहिनहिये विदेह द्वारा कैल गेल  आ पहिनहिये  बिहारी नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक गप  विकीपीडिया  मानि लेने छल |

गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject एतए अंग्रेजीमे भाषामे Bihari चुनू आ अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू; ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity?project=gws&langcode=bh ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू। [अपडेट:  ‎-विदेहक एकटा आर सफलता- गूगल सर्च इन्जिन आब मैथिलीमे -विदेहक एकटा आर सफलता- गूगल सर्च इन्जिन आब मैथिलीमे- पहिने गूगल एकरा बिहारी भाषा मानै छल, मुदा विदेहक विरोधक बाद गूगल मानि लेलक जे मैथिली भाषाक अलग सर्च इन्जिन देल जाए। विदेहक विरोधक बाद विकीपीडिया ई पहिनहिये मानि लेने अछि। https://www.google.com/webhp?hl=bh अछि लिंक [गूगल  कम्पनी "बिहारी" नामसँ सर्च इन्जिनक प्रारम्भ केलक, मुदा बिहारी नाम्ना कोनो भाषा अछिये नै। एक गोटे बिहारीक अनुवाद अंगिका कऽ देलन्हि आ से गूगल अंगिका कऽ कए सर्च इन्जिन आबि गेल। फेर विदेहक विनीत उत्पल ऊपर लिखित पत्र लिखलन्हि आ विदेह द्वारा समस्त अनुवादक लगभग सभटा भाग वोलन्टीयर रूपमे कएल गेल, लोको सभसँ अपील कएल गेल मुदा बाहरी लोकक योगदान शून्य रहल, जे एकाध केबो केलन्हि से रोमनमे, ओकरा ठीक कएल गेल। आब गूगल मैथिली रूपमे सर्च इन्जिन देखा रहल अछि, मुदा अखनो ढेर रास काज बाकी अछि।] -ऐ विषयपर विदेह गोष्ठीक चर्चा देखू http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html ऐ लिंकपर। मुदा ई तँ प्रारम्भ अछि। अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत: http://www.google.com/language_tools?hl=bh http://www.google.com/language_tools VINIT UTPAL's LETTER

गूगल  कम्पनी "बिहारी" नामसँ सर्च इन्जिनक प्रारम्भ केलक, मुदा बिहारी नाम्ना कोनो भाषा अछिये नै। एक गोटे बिहारीक अनुवाद अंगिका कऽ देलन्हि आ से गूगल अंगिका कऽ कए सर्च इन्जिन आबि गेल। फेर विदेहक विनीत उत्पल ऊपर लिखित पत्र लिखलन्हि आ विदेह द्वारा समस्त अनुवादक लगभग सभटा भाग वोलन्टीयर रूपमे कएल गेल, लोको सभसँ अपील कएल गेल मुदा बाहरी लोकक योगदान शून्य रहल, जे एकाध केबो केलन्हि से रोमनमे, ओकरा ठीक कएल गेल। आब गूगल मैथिली रूपमे सर्च इन्जिन देखा रहल अछि, मुदा अखनो ढेर रास काज बाकी अछि।

Vikas Thakore commented on your photo. Vikas wrote: "https://www.google.com/webhp?hl=bh Sir, एहि लिंक पर गूगल-मैथिली २००४ सं अस्तित्व में अछि..  फेर इ टटका-टटका.... जश्न (or whatever) कथिलए ?" Gajendra Thakur ट्रान्सलेट बला ऑप्शन लेल लेख पढ़ू.. http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html Vikas Thakore commented on your photo. Vikas wrote: "jee.... Dhanyavaad. बेवजह परेशानी देबए लेल हम क्षमाप्रार्थी छी.."

अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत: http://www.google.com/language_tools?hl=bh अनुवाद पूर्ण भेलाक बाद मैथिली एतऽ आओत, पहिने बिहारी एतऽ छल क्लिक केलापर मैथिली अबैत छल| http://www.google.com/language_tools अपडेट २८ मार्च २०१२।]

[सूचना: १. कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल आवेदन स्वीकृत भಽ गेल अछि। आब ई दुनू लिपिक यूनीकोड फॉन्ट बनेबाक क्रिया क्यूमे लागि गेल अछि आ जखन एकर सभक बेर एतै ऐ दुनू लिपिक आधारभूत फॉन्ट बनेबाक क्रिया शुरू भऽ जाएत। मिथिलाक्षरक आधारभूत फॉन्टक नाम तिरहुता रहत (जेना देवनागरीक आधारभूत फॉन्टक नाम मंगल आ बांग्लाक आधारभूत फॉन्टक नाम वृन्दा अछि)। मिथिलाक्षरक फॉन्ट लेल तेसर बेर संशोधित आवेदन देल गेल रहए, दोसर आ तेसर आवेदनमे विदेहक योगदानक विस्तृत चर्चा भेल अछि, यथा- [Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22; Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/ ."Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS."-Anshuman Pandey.] । सूचना: २. गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल- http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद ।  http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity?project=gws&langcode=bh ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू।

सूचना: ३.विकीपीडिया मैथिली: मीडियाविकीक २६०० संदेश अंग्रेजीसँ मैथिलीमे विदेहक सदस्यगण द्वारा अनूदित कऽ देल गेल अछि। आब http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai  ऐ लिंकपर Group मे जा कऽ ड्रॉपडाउन मेनूसँ अ-अनूदित मैसेज अनूदित करू। जँ अहाँ विकीपीडियाक ट्रान्सलेटर नै छी तँ http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator ऐ लिंकपर मैथिलीमे ट्रान्सलेट करबाक अनुमतिक लेल अनुरोध दियौ, ऐ सँ पहिने ओतै ऊपरमे दहिना कात लॉग-इन (जँ खाता नै अछि तँ क्रिएट अकाउन्ट) कऽ आ प्रेफरेन्समे भाषा मैथिली लऽ अपन प्रयोक्ता खाताक लिंककेँ क्लिक कऽ अपन प्रयोक्ता खात पन्ना बनाउ। किछु कालमे अहाँकेँ ट्रान्सलेट करबाक अनुमति भेट जाएत। तकरा बाद अनुवाद प्रारम्भ करू। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator

http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili

http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai

http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai

http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai  विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- “विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक “लैंगुएज कमेटी” आब बुझि गेल अछि जे मैथिली “बिहारी नामसँ बुझल जाएबला” भाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि  ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html  ) -“ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे “नै”। ” रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि? उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि। TIRHUTA UNICODE See the final UNICODE Mithilakshara Application (May 5, 2011) by Sh. Anshuman pandey http://std.dkuug.dk/JTC1/SC2/WG2/docs/n4035.pdf at Page 23 the Videha 80th issue (Tirhuta version) is attached"Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22" and at Page 12 Videha is included in References Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/. and role of Videha's editor is acknowledged on Page 12 "Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS." ] यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण (गजेन्द्र ठाकुर/ अपडेट ३१ मार्च २०१२) डॉ. रमानन्द झा रमण जी द्वारा यूनीकोड पर साहित्य अकादेमीक कथागोष्ठीमे पर्चा वितरण कएल गेल। ऐसँ मात्र ई स्पष्ट भेल जे पर्चा लिखिनिहारकेँ नहिये यूनीकोडक विषयमे कोनो जानकारी छन्हि आ नहिये वेस्टर्न वा यूनीकोड दुनू फॉन्टक निर्माण कोनो प्रारम्भिक ज्ञान छन्हि। हँ ऐ परचाक ओइ सभ लोक लेल महत्व छै जे सीखय चाहै छथि जे पूर्वाग्रहपूर्ण आ पक्षपातपूर्ण मैथिली साहित्यक इतिहास कोना लिखल जाए। ऐसँ पहिने चेतना समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल चेतना समितिक योगदानक चर्चा देखैत छी! तिरहुता यूनीकोड आवेदनकर्ता अंशुमन पाण्डेय जखन पटना गेल रहथि तँ हम हुनका कहने रहियन्हि जे विद्यापति भवनमे शिव कुमार ठाकुरक दोकान छन्हि, ओतऽ सँ अहाँ मैथिलीक किताब कीनि सकै छी, मुदा दू तीन दिन ओ दोकान आ समिति बन्द रहलाक कारण ओतऽ सँ घुरि गेला, बादमे ओतए एक गोटे कहलकन्हि जे सभ दिन अहाँ अबै छी, से ई समिति अखन कमसँ कम १४-१५ दिन आर बन्द रहत कारण दू ग्रुपमे झगड़ा-झाँटी भऽ गेल छै। ई अनुभव लऽ कऽ ओ घुरल रहथि आ से समिति अपन स्मारिकामे यूनीकोड लेल ओ जे योगदान देलक तकर चर्चा करैत अछि! गोविन्द झा जीक पता मँगलापर एक गोट विद्वान् (!) हुनका कहलखिन्ह जे धुर ओ की बतेता, आ गोविन्द झा जीक पता नै देलखिन्ह आ तखन दोसर ठामसँ हुनका पता उपलब्ध करबाओल गेल। TWITTER IN MAITHILI  TWITTER IN MAITHILI, PLEASE CLICK http://translate.twttr.com/welcome and go to bottom of this link. You will find[[Don't see your language? We're continually reviewing the list of languages we support, and would love your feedback]] - click feedback and apply for Maithili and submit alongwith reason why you need twitter in Maithili. Seeking your cooperation in large numbers again. खण्ड ४ "विकीपीडिया"मे मैथिलीकबाद मैथिली "गूगल ट्रान्सलेट"मे सेहो.. अगिला लक्ष्य "अमेजन अलेक्सा" गूगल ट्रान्सलेट गूगल ट्रान्सलेटक लिंक https://translate.google.com/?sl=en&tl=mai&op=translate गूगल ट्रान्सलेटकेँ आर पुष्ट करबाक खगता छै तइ लेल अगिला काज अढ़ा रहल छी: https://translate.google.com/about/contribute/ प्रारम्भ: विकीपीडिया ०१ फरबरी २००८ लिंक https://books.google.co.in/books?id=VC-BD5Ad6z4C&lpg=PA1&pg=PA1#v=onepage&q&f=false  (मैथिली देवनागरी) https://books.google.co.in/books?id=cTezCU59bJwC&lpg=PP1&pg=PP1#v=onepage&q&f=false  (मैथिली तिरहुता) https://books.google.co.in/books?id=3zKudz6wAO8C&lpg=PP1&pg=PP1#v=onepage&q&f=false  (मैथिली ब्रेल)  गूगल ट्रन्सलेट २३ जून २०११क लिंक https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/138489416229195/ गूगल ट्रांसलेशन टूलमे "बिहारी" भाषाक बदलामे मैथिली लेल अलग ट्रांसलेशन टूल बनेबाक आवेदन विदेहक सदस्यगण द्वारा देल गेल अछि। अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंटसँ लॉग इन केलाक बाद । http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity?project=gws&langcode=bh (links closed) विकीपीडिया मैथिली लिंक विदेह (पत्रिका) https://mai.wikipedia.org/s/kgv इन्टरनेटक संसारमे मैथिली भाषा https://mai.wikipedia.org/s/s6h भालसरिक गाछ https://mai.wikipedia.org/s/ipm विदेह https://mai.wikipedia.org/s/ie1 विदेहक फेसबुक भर्सन https://mai.wikipedia.org/s/iu1 विदेह सम्मान https://mai.wikipedia.org/s/jc2 विदेह आर्काइभ https://mai.wikipedia.org/s/jc0 विदेह मिथिला रत्न https://mai.wikipedia.org/s/jc3 विदेह मिथिलाक खोज https://mai.wikipedia.org/s/jc4 विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण https://mai.wikipedia.org/s/jc5 श्रुति प्रकाशन https://mai.wikipedia.org/s/iu7 अनचिन्हार आखर https://mai.wikipedia.org/s/ion मैथिली गजल https://mai.wikipedia.org/s/idz मैथिली बाल गजल https://mai.wikipedia.org/s/iex मैथिली भक्ति गजल https://mai.wikipedia.org/s/if1 http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili  http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai अंतिम पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि। एहि लिंक सभ पर जा कय प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ। (links closed) अमेजन अलेक्सा मैथिली (शीघ्र....) "विकीपीडिया"मे मैथिलीकबाद मैथिली "गूगल ट्रान्सलेट"मे सेहो.. अगिला लक्ष्य "अमेजन अलेक्सा" विदेहक तेसर अंकमे (०१ फरबरी २००८) जे खुशखबरी पाठक लोकनिकेँ मैथिली विकीपीडियाक सम्बन्धमे देल गेल छल तकर सुखद परिणति कएक साल पहिने भेटल छल। मैथिली गूगल ट्रान्सलेटक सम्बन्धमे विदेहक फेसबुक पृष्ठपर २०११ मे देल गेल तकर सुखद परिणति ११ मई २०२२ केँ भेटल। मैथिली अमेजन अलेक्साक सेहो आरम्भ शीघ्रे हएत। (लिंक-स्क्रीनचित्र नीचाँ देल जा रहल अछि।) https://books.google.co.in/books?id=VC-BD5Ad6z4C&lpg=PA1&pg=PA2#v=onepage&q&f=false https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/138489416229195/ ओहि समयमे विदेह सम्पादक मण्डलमे ई लोकनि रहथि: सह-सम्पादक: उमेश मंडल । सहायक सम्पादक: शिव कुमार झा आ मुन्नाजी (मनोज कुमार कर्ण) । भाषा सम्पादन: नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा । कला-सम्पादन: वनीता कुमारी आ रश्मि रेखा सिन्हा । सम्पादक-शोध-अन्वेषण: डॉ. जया वर्मा आ डॉ. राजीव कुमार बर्मा । सम्पादका नाटक-रंगमंच-चलचित्र: बेचन ठाकुर। सम्पादक सूचना-सम्पर्क-समाद: पूनम मंडल अ प्रियंका झा। सम्पादक अनुवाद विभाग: विनीत उत्पल । स्पष्ट अछि जे "सम्पादक अनुवाद विभाग" विनीत उत्पल (आब असिस्टेन्ट प्रोफेसर, आइ.आइ.एम.सी. जम्मू) क विशेष सहयोग रहल, आशीष अनचिन्हार सम्पादक मण्डल मे नहियो रहला उत्तर कोनो सम्पादकसँ कम काज नै करैत छथि। मैथिलीेक पाठक वर्ग सेहो अपन यथाशक्ति योगदान देलनि। https://books.google.co.in/books?id=zmIugpjpOKYC&lpg=PA1&pg=PA600#v=onepage&q&f=false https://books.google.co.in/books?id=-U04e5FfnTEC&lpg=PA1&pg=PA405#v=onepage&q&f=false गूगल ट्रान्सलेटकेँ आर पुष्ट करबाक खगता छै तइ लेल अगिला काज अढ़ा रहल छी: https://translate.google.com/about/contribute/ गूगल ट्रान्सलेट कार्यक्रम देखू https://youtu.be/nP-nMZpLM1A Google Translate:04:45to06:25 (24 new languages at 06:00) Detailed Description Tune in to find out about how we're furthering our mission to organize the world’s information and make it universally accessible and useful. To watch this keynote with American Sign Language (ASL) interpretation, please click here: https://youtu.be/PeUXBvRExic   0:00 Opening Film 1:47 Introduction, Sundar Pichai 6:21 Knowledge 15:45 Knowledge&Search 27:15 Skin Tone Equity 32:00 Computing 33:08 Assistant 43:34 Computing: AI Test Kitchen 53:08 Safer with Google 1:04:38 Safer Way to Search 1:11:20 Android: Opening 1:45:45 Android: Wear OS&Tablet 1:25:32 Android: Better Together 1:31:22 Hardware: Opening 1:33:22 Hardware: Pixel Phone&Buds 1:45:44 Hardware: Ambient&Beyond the Phone 1:54:32 Augmented Reality&Close संपादकीय दी ओरिजिनल गीतांजलि’ केर विमोचन: टैगोरक तिरोधानक ७५ वर्षक बाद श्रावण मासक २२ तारीख टैगोर-प्रेमी लोकनिक लेल एकटा महत्वपूर्ण दिवस होई छइ. आइ सं ७५ वर्ष पूर्व हुनकर तिरोधान भेल छलनि आ’ कलकत्ताक राजपथ पर मनुक्खक समुद्र बहि गेल छल; मुदा कम्मे लोग जनैत अछि जे जाहि “गीतांजलि: द’ सोंग ओफ्फेरिंग्स” (इंडिया सोसाईटी द्वारा प्रकाशित, १९१२) केर लेल १९१३ मे एशियाक पहिल साहित्यकार केर रूप मे हुनका नोबेल पुरस्कार भेंटल छलनि, ओ हुनक कवि-रूप मे मर्यादाक सही प्रमाण नइ छलनि, कियेकये त’ मूल ‘गीतांजलि’ (१९१० मे बंगला मे प्रकाशित) केर १५७ मे सं मात्र ५३ गोट कविता एहि कवि-कृत अंग्रेजी अनुवाद मे अंतर्भुक्त भेल छल, बाकी १०४ गोट कविताक अनुवाद टैगोर कहियहु नइ केलनि – जाहि सं हुनकर कविताक प्रेमी पाठक कें ओरिजिनल गीतांजलि’ केर रसास्वादनक कोनो मओका नइ भेंटलनि; आब नचिकेताक अनुवाद मे वैह मूल गीतांजलिक पूर्णांग अनुवाद आ’ ९० पृष्ठ केर विश्लेषण आ’ व्याख्या सहित ई अपूर्व रुपें कविता-प्रेमी पाठक वर्ग लेल उपस्थित अछि; २०१५ मे एहि पुस्तकक मूल इउरोपिय संस्करण चपल छल जर्मनी सं – जकर प्रकाशक छलाह एनिमा विवा मल्टीलिंगुआ – सुदूर एंडोरा देशक; आब तकरहि भारतीय तथा सार्क संस्करण प्रकाशित भेल – जकरा विश्व-भारतीक उपाचार्य प्रो: स्वपन दत्ता विमोचन केलनि आ’ विश्व-भारतीक संग MoU केर उपज स्वरुप एहि पुस्तकक विषय मे बाजली प्रो: तपती मुखोपाध्याय, अध्यक्षा, रवीन्द्र भवन. एहि पुस्तक उपलब्ध भ’ सकैछ ९९९ टाका (१०% केर छूट तथा डाक व्यय फ्री, अर्थात मात्र 900 टाका) मे, जखन कि एकर यूरोपियन एडिशन केर मूल्य छइ ३४ यूरो (प्रायः २५२० टाका). एहि पुस्तकक लेल लिखी: E-LEKHANFoundation Trust: B1&C1, Dakshinayan, Abanpally, Santiniketan 731235 Dt Birbhum, West Bengal बीहनि (विहनि) कथा बा अति लघु कथा [ सीड स्टोरी (फ्लैश फिक्शन) बा वेरी शॉर्ट स्टोरी] मैथिलीमे बेइमान साहित्य अकादेमीक, ओकर बेइमान मैथिली परामर्शदात्री समितिक आ मैथिली साहित्य लेल दइ जाइबला पुरस्कारक बेइमान जूरीक प्रति विदेहक सर्जिकल स्ट्राइक दस सालसँ चलि रहल अछि। ओकर विरोधमे बेइमान लोकनि कखनो गजलक नामपर, कखनो नाटकक नामपर, कखनो वर्तनीक नामपर आ कखनो बीहनि कथाक नामपर भेख बदलि-बदलि छद्म बहस चलेबाक बेइमानी करैत रहल छथि। बेइमान साहित्यकार सभ मुदा दुबराइते गेला, अपन विचारधारक दुर्बलता देखि ओ ऐ छद्म बहसक लेल बाध्य भेला। आ ओइमे बेइमान संस्था आ जूरीक संग हुनकर समर्थन धूर्त मिथिला राज्य अभियानी सभ सेहो केलक। हँ, मैथिलीक साहित्य अकादेमीमे जे बेइजत्ती हिनका सभक कारण कएल जा रहल अछि, तकर ५० साल पूर्ण भेल। मैथिलीकेँ मारि बेइमानीक धंधा विदेहक सर्जिकल स्ट्राइक कारण थम्हल अछि, आ ओइ स्ट्राइकक कारण मूल धारा समानान्तर धाराक सोझाँ चित्त भऽ गेल अछि, गुणात्मके नै मात्रामे सेहो। बीहनि (विहनि) कथा बा अति लघु कथा [ सीड स्टोरी (फ्लैश फिक्शन) बा वेरी शॉर्ट स्टोरी] विदेह विहनि कथा विशेषांकमे विहनि कथाक समीक्षाशास्त्र आएल। विदेह प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना विशेषांकमे साहित्यक समीक्षाशास्त्र आएल। कियो अति लघु कथाकेँ बीहनि कथा नै लिखत तँ तकरा खून तँ नै कऽ देबै। आ कियो बीहनि कथाकेँ अति लघुकथा लिखत तँ ओकरासँ भतबड़ी तँ नै कएल जा सकैए। अंग्रेजीमे अति लघुकथा लेल मुदा अहाँ "शॉर्ट-स्टोरी" नै लिखि सकै छी। ओइ लेल सीड स्टोरी बा फ्लैश फिक्शन बा आन कोनो शब्दावली लिखैये पड़त। ओतऽ ओइपर बहस चलिये रहल अछि। मुदा ओइ लेल "शॉर्ट-स्टोरी" नै लिखि सकै छी, अइपर ओतऽ कोनो विवाद नै अछि। किछु मैथिलीक अंग्रेजी (!!) प्रोफेसर केँ ई गप नै बुझल छन्हि, तइ लेल भारतक विश्वविद्यालयमे चयन कोना होइत अछि से ककरोसँ नुकाएल नै अछि। हँ मैथिलीमे बीआ आ बीहनि सीड आ सैपलिंग दुनूकेँ कहल जाइए। आब आउ बीहनि कथाक गुणात्मक विश्लेषणपर। पद्यक विधा हाइकूकेँ हम ऐमे जोड़ि कऽ देखब। बीहनि कथाक मान्यता कि ओइ बेइमान साहित्य अकादेमीक हाथमे अछि? मानि लिअ काल्हि साहित्य अकादेमीमे सर्जिकल स्ट्राइक होइए आ ओतऽ भुसकोल लोकक अकाल भऽ जाइए। तइयो कि बीहनि कथा (अति लघु कथा) संग्रह बा हाइकू संग्रहकेँ पुरस्कार देल जा सकत? कि बीहनि कथाक नाम अति लघु कथा कऽ देले टा सँ ओइमे गुणात्मक वृद्धि भऽ जाएत बा अति लघु कथाक नाम बदलि बीहनि कथा कऽ दी तँ ओही लेखकक वएह रचना खरापसँ नीक भऽ जाएत। आ मानि लिअ कोनो तेसरे शब्द अति लघु कथा बा बीहनि कथा लेल प्रयुक्त हुअए लागए, बा लघु कथा संग्रहमे एकटा बीहनि (अति लघु) कथा सेहो लेखक सम्मिलित कऽ लेथि तँ की ओकर समीक्षा अहाँ नै करब। आ जँ एकर विषय प्रेम रहए आ किछु युवा लप्रेक (लघु प्रेम कथा) कहि एकरा सम्बोधित करथि तँ की हम ई कहि समीक्षा करब जे लघु बीहिनि प्रेम कथा लिखब तँ ओ लोकनिसमीक्षा करता आ अति लघु प्रेम कथा लिखब तखन ई लोकनि समीक्षा करता। एक पाँतिक गद्य/ पद्य हुअए बा एक लाख पाँतिक, ओ साहित्यिक रचना भेल आ ओकर समीक्षा हेबे टा करत, चाहे ओकर नामकरण अहाँ जे करी। मुदा हाइकू आकि बीहनि कथा संग्रह सभमे एकटा समस्या अछि। बेशी गोटे जे ऐ दुनू विधामे छथि, से गुणक बले नै नामकरणक बले पुरस्कार जीतऽ चाहै छथि। जँ ई कही जे ऐ दुनू विधामे कम प्रतिभावान साहित्यकार सक्रिय छथि तँ असत्य नै हएत। मुदा एकर अर्थ ई नै जे ओ सभ एकोटा नीक बीहनि कथा नै लिखने छथि। हँ जँ हुनकर लेखनीकेँ देखी तँ एक-आधेटा नीक रचना ओ दऽ सकल छथि। आ जाधरि संग्रह भरि नीक बीहनि कथाक संग्रह ओ नै दऽ सकता, बिन पैरवी-पैगामक पुरस्कार भेटब कठिने हेतन्हि। तँ की ई लोकनि पूर्ण लघु-कथा लिखबाक योग्य नै छथि तेँ मजबूरीमे बीहनि कथा लिखै छथि? हँ बुझाइ तँ सएह अछि। राजमोहन झा अपन लघु कथा संग्रहक अन्तमे एकटा बीहनि कथा लिखलन्हि, "चलह"- सनगर बीहनि कथा। किछु नीक बीहनि कथामे परमेश्वर कापड़िक "सतबरती", अमरनाथ झा केर "देह", ज्योति झा चौधरीक "नबका पीढ़ी", उमेश मण्डलक "रुपैआक ढेरी", कपिलेश्वर राउतक "छूआ-छूत", मुन्नाजीक "रेवाज", अनमोल झा केर "प्राथमिकता" आ ओमप्रकाश झा केर "स्पेशल परमिट" अबैत अछि। ऐ सभ बीहनि कथाकेँ एकत्र करी तँ एकटा पुरस्कार पेबा योग्य संग्रह बनत, आ पुरस्कार संयुक्त रूपेँ देल जा सकत। हाइकूमे समस्या आर गम्भीर अछि, बाशो लिखै छथि जे जे कियो १२ टा हाइकू लिखि लेथि तँ ओ महाकवि भेला, तखन मैथिलीमे सभ महाकविये भऽ जेता, आ एकाध टा नीक आ हजारक हजार बीहनि-सन कथा लीखि बहुत गोटे महा-बीहनिकथाकार कहेता। कामिनीजीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झा जीक टिप्पणी जेना की बूझल हएत जे विदेह एकटा नव प्रोजेक्ट केर घोषणा केने छल, जै अन्तर्गत विदेहक संपादक मंडल एकटा कोनो रचनाकर्मीसँ हुनक किछु रचना आमंत्रित कऽ विदेहक एकटा अंकमे देत आ ओइ रचनाकर्मीक संबंधमे कोनो आन रचनाकर्मी टिप्पणी देता। आ ऐ प्रोजेक्ट केर पहिल घोषणामे कामिनी जीक रचना आमंत्रित कएल गेल छल आ कामिनीजीक रचनाधर्मितापर टिप्पणी करबा लेल मधुकांत झा जीकेँ आमंत्रित कएल गेल छल। ऐ अंकसँ ई प्रोजेक्टक शुरूआत भऽ रहल अछि तँ पहिने पढ़ू कामिनीजीक पाँच गोट कविता आ तकर बाद मधुकांतजीक विचार १ छौड़ीक आँखि मे एकटा छोट छीन छौड़ीक आँखिमे समायल छै दुनिया एकटा भरल-पूरल दुनियाँ जाहिमे कतौ नदी बहैत छै कतौ उतरैत छै झरना पहाड़परसँ हनहनाइत छै कतौ बाँसक पैघ पैघ बोन पुरबा पछबाक बसातमे कतौ उड़ान भरै छै प्लेन दूर धरिक यात्रा तय करबाक लेल लगाओल जाइत छै कतौ प्रदर्शनी किछु बेचबाक लेल किछु खरीदबाक लेल छौड़ीक आँखिमे हँसी छै दू बुन्द नोर छै पूरा दुनियाँ छै मुदा छौड़ीक आँखिमे छौड़ी नहि छै कतौ नहि छै ओकर अस्तित्व ओकर इच्छा/ ओकर आकांक्षा ओकरा तँ दौड़ायल जा रहल छै बेटीसँ कनियाँ आ कनियाँसँ माय बनबाक लेल । २ आशाक बान्ह सब बेर ओकर घरबला ओकरा आँखिमे बान्हि जाइत छै आशाक बान्ह की एहि बेर पठेतै ओकरा लेल धराउ रखै लेल नीक नूआ गुदड़ी गुदड़ी भेल आँगीकेँ फेरबाक लेल रेशमी कपड़ा पहिरबाक लेल एक जोड़ा चप्पल कि एहि बेर जाइत देरी पठेतै ओकरा नामसँ मनिआडर आ बच्चन महाजनक पाई गढेतै ओ अपना लेल नाक महक छक कि एहि बेर दूर्गा पूजामे देखा देतै लोककेँ कि ओ परदेशियाक बहु अछि मुदा सब बेर जाइत मातर बिसरि जाइत छै ओकरा आ ओकर सपनाक कतार नोरक धार मे बहि जाइत छै एक-एक कऽ सबटा एकटा तेसरे चिंता घेरि लैत छै नहि जानि की भेलै परदेशमे ओकरा । ३ मीत ! अहाँ एना कहिया धरि बैसल रहब आशामे की अहाँक थारीमे खसायत कियो रोटी आ अहाँक हाथमे सौपि देत कियो अधिकार कहिया धरि ठाढ रहब मुँहथरिपर की अहाँक घरमे टाँग पसारि कऽ सूतल लोक निकलि जायत सहजहि कहिया धरि बैसाखीक सहारे बजबैत रहबै बाहरक घंटी की कियो जागत जकरा अहाँ सुनेबै अपन संपूर्ण व्यथा कथा मीत! कहिया धरि मुनने रहबै कान अभद्र गारि सुनि कऽ की ओ चुप्प भऽ जायत सहजहि आखिर कहिया धरि बनल रहबै अहाँ मीलक पाथर जकरापर जेठक दुपहरिया आ साओनक बरखाक असर नहि परैत छै मीत । ४ पिता एक बेर फेर पिताक सोझाँमे वर्तमान अर्थहीन आ भविष्य अनिश्चित छनि पैरक फाटल बेमाय जकाँ खेतो फाटि गेल एक बेर फेर प्रकृति मुँह मोड़लक आ वर्षा नहि भेल ओ परिवार क पैघ बेगरताक सोझाँमे बड़ छोट महसूस करैत छथि अपनाकेँ घरक खर्चा/ स्कूल कऽ फीस लगानक बोझ बेटीक भावहीन आँखि सबहक सोझाँमे लगैत छथि एहि बेर परास्त भऽ जेता शून्य आकाश दिस तकैत-तकैत हुनकर आँखियो शून्य बुझना जाइत अछि ओ सब दिन जाइत छैथ खेतक आरिपर आ टाँट परल धरती देखि कऽ घुरि अबैत छथि ओ सब दिन इन्द्रसँ करैत छथि प्रार्थना किएक पिताक आँखिमे एखनो पानिक देवता इन्द्रे छथि वर्षा दिय / वर्षा दिय दरारग फाटल खेतकेँ पानि सँ पोहपीत कऽ दिय जे हमर जीवनक आधार अछि सुखक संसार अछि मुदा कोनो प्रतिक्रिया नहि देखा परैत अछि केम्हरो कोनो परिवर्तन नहि बुझना जाइत अछि कतौ निराशा आगु आ आशा पाछू छुटल जाइत अछि खुट्टा पर बान्हल बड़द जकाँ पिता बेबस भेल जाइत छथि समय अछि की तैयो दरकल अयना जकाँ दू भागमे पिताकेँ बाँटि रहल अछि बिना कोनो दोष के । ५ मोन आइ मायासँ मुक्त अछि मोन आइ हँसि रहल अछि मोन आइ नाचि रहल अछि मोन आइ गाबि रहल अछि मोन पाँखि लगा आसमानमे उड़ियो रहल अछि मोन आइ मायासँ मुक्त अछि मोन आइ दर्दसँ वेलग अछि मोन आइ सब बन्धन सब द्वेषकेँ पार कऽ लेलक मोन आइ खुशीकेँ अपना जीवनक आधार बना लेलक मोनक आँगनमे आइ फुलायल अछि भालसरिक फूल मोनक आँगनमे आइ पसरि रहल अछि पारिजातक सुगंध मोनक आँगनमे आइ उतरि रहल अछि चान मोनक आँगन मे आइ गाबि रहल अछि कोइली गुनगुना रहल अछि भौंरा मोनक आँगनमे सजि रहल अछि फूल भरल सेज मोनक आँगनमे उतरि रहल अछि मान सम्मान धीरे धीरे आँखिमे प्रेम भरने हर डेगमे विश्वास लेने अधिकारसँ अपना दिस खिचैत अपनामे समटैत । कामिनीजीक किछु कविता.... एक विमर्श।-(मधुकांत झा) मैथिली साहित्यक काव्य विधामे महिलाक संख्या पर्याप्त नहि। बधाइक पात्र छथि कामिनी जी जे ओ अपन सृजनशीलताक माध्यम कविताकें चुनलनि। हिनकर कविता संग्रह प्रकाशित अछि तथा पत्र पत्रिकामे सेहो प्रकाशित अछि। ई बेस चर्चित तथा अर्चित कवियत्रीमे एक छथि। हमरा समक्ष संयोगवश हिनक किछु कविता भेटल अछि। पढल, गुणल आ तकर परिणामस्वरूप एहि कवितापर दू शब्द लिखबाक लोभ संवरण नहि कs पाबि रहल छी। कामिनी जी शहरमे.रहैत छथि लेकिन मिथिलाक माटि पानि लोकक दशा दुर्दशासँ परिचित छथि आ तकरा आधार बना अपन सरल सहज सुंदर शब्दसँ संवेदनाक एहेन तरंग उत्पति करै छथि जे झकझोरि दैछ। हिनकर पहिल कविता छौंड़ीक आँखि मे, एक बेटी के एहन तस्वीर प्रस्तुत करैछ जकरा आँखिमे प्राकृतिक, कृत्रिम बजार सजल छैक, हँसी नोर छैक परन्तु नहि भेटैछ ओकर अपन अस्तित्वक रेह। ओकर इच्छा आकांक्षाक नहि छैक कोनो जगह। एकर कारण कवियत्री मानैत छथि नारीक ओ यंत्रवत जीवन जे बेटीसँ कनिया, कनियासँ माय बनाबक लेल सदियोंसँ ओकरा दौड़ा रहल छैक। नारीकक एहि दुर्दशासँ सभ भिज्ञ छी तथापि हिनकर कलात्मक प्रस्तुति एहि संवेदनाकें मोतीक चमक प्रदान करैत अछि। हिनकर दोसर कविता, आशाक बान्ह, एक एहेन पत्नीक चित्रांकण अछि जे परदेशी पतिक बातक भरोसपर नव नव साड़ी आँगी, गहना पहीरबाक सपना देखैत अछि, महाजनसँ फराकति भेटबाक आश करैत अछि। अपन शान शौकत के बलपर सबकेँ चकित करबाक लिलसा पालैत अछि। आनन्दमे मगन अछि। लेकिन सभ झूठ । एकदिन हहा कऽ टुटल सपना संग खसैत अछि आ परदेशिया पतिक कुशल क्षेम जनबाक लेल औहरि कटैत अछि। मिथिलाक परदेशी जीवन आ अनाथ प्रेयसीक दुर्दशाक सजीव चित्रण मार्मिक बनि पड़ल अछि। तेसर कविता, मीत,अछि जे मिथिलामे संक्रामक रोग सदृश आलसीपनक रूपमे घरे-घर पसरल अछि। ककरो बैसल ठाम कोना पेट भरत तकरा यादि करबैत कवियत्री एहि बेरोजगार लोकक तुलना ओहि मीलक पाथरसँ करैत छथि जकरा रौद बसात आ बर्षाक नहि होइत छैक कोनों असरि। ओ कहैत छथि जे आबो बहराउ, कहिया धरि रहब बनल मीलक पाथर। ई मैथिल समाज लेल बेस प्रेरणादायक अछि जकरा शारीरिक परिश्रम अपमान सन लगैछ। पाथरक उपमा सटीक लगैछ। चारिम कविता, पिता, जे किसान छथि आ मानसून पर निर्भर किसानी केहेन खुनीमा होइछ तकर हृदयविदारक वर्णन कोनों पाठककें द्रवित कऽ सकैछ। खेतमे फाटल दरारि हुनका अपन जीवन कें दरकल आयना सन दू फाँक करैत छनि। जिम्मेदारीक बोझ आ बेटीक उदास आँखि पिताक आत्माकें छहोछित कऽ दैत अछि। किसान पिताक बहन्ने कामिनी जी भारतीय किसानक आत्महत्याक कारणकें दृढतापूर्वक रेखांकित कयलनि अछि। पाँचम कविता, पहिल कविता छौंड़ीक आँखिमे, के विपरीत एक एहन महिलाक चित्रांकण कयलनि अछि जे अपन बल पर सम्मान पाबि अति हर्षित छथि। हुनका आँगनमे बसंतक सुगंधि, पुनमक चान, साउनक बहार आ कोयलीक गूँजन एक संग उतरि आएल छनि। खुशीमे पाँखि लागि हुनका आसमानमे उड़बाक आनंद प्रदान कs रहल छनि। विश्वासक डेग, अधिकारक सुगंध हुनका जँ अपना दिस आइ घीच रहल छनि तँ संसार अपन आँचरमे समेटि रहल छनि। आनंदक ई पल पाठको केँ आत्मनिर्भर होयबाक लेल प्रेरित करैछ। कामिनी जीक कविता सँ प्रतीत होइछ जे ई कोनो वाद विवादसँ प्रभावित भऽ तरल प्रतिक्रियाक रूपमे ई कोनों रचना नहि करैत छथि। जे देखैत छथि तकरा भावनात्मक पाँखि लगा तेना प्रस्तुत करै छथि जे पाठककें अपन सुख-दुख बुझा जाइछ। हँ, ई तँ जरूर जे ओ समस्या क दुआरि जाइत छथि परन्तु घरक केवाड़ खिड़की नहि खोलैत छथि जे हिनक कविता कें कनी छुछुआन करैत छनि। लेकिन हिनकर कोमल शब्दमे गंभीर भाव आ सहानुभूति हिनकर कविताकेँ मार्मिकता प्रदान करैछ जे हिनकर सफलता थिक। बधाइ। खूब लिखथि,यशक सम्राज्ञी बनथि से कामना रहत। प्रयास प्रेमी मैथिल जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही (नाटक) पात्र परिचय (१) कर्मलाल सिंह ठाकुर:-(राजा'क') (२) सुस्मा:- (रानी 'क') (३) दिक्षा :-(राजाके बेटी जेठ्की) (४) दिभ्या:- (राजाके बेटी मैझली) (५) प्रिति:- (राजाके बेटी सैझली) (६) मेनुका:- (राजाके बेटी छ़ोट्की) (७) बैजु :-(मंत्री 'क') (८) भोला:- (नवधिया 'अपाहिज') (९) बढिया माइ (१०) धर्मपाल सिंह:- (राजा 'ख') (११) सुमैना :-(राजकुमारी) (१२) जीतुराम (मंत्री 'ख') (१३) अन्तरा:- (मलिनियां) (१४) गर्जन :-(राक्षस) (१५) लाँल कनियाँ :-(राक्षसके बेटी) (१६) हात्ती (१७) हाँस बिहुस :-(हात्तीके बेटी) (१८) अमर :-(नव युवराज मेनुकाके बेटा करम के डोर सँ बान्धल अछि जिनगीकऽ एक कथा जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही जीनगी एक अजीब दास्तान छैक जे जन्म तऽ माँ बाप दैत  मुदा करम अपनेही होयत अछि। जे जेहन काज करैत छैकहुनका ओहि अनुसार जिनगी कऽ फल मिलैत अछि। आ संगे विधाता छठी के रातिमें जे विधना लिख दैत छैक ओकरा किओ नै काटि सकैत अछि, आ उ प्रत्येक प्राणी के भोगही टा परैत अछि। इहे विषय पर आधारित रचनाकार प्रयास प्रेमी मैथिलद्वारा लिखित कहानी :करम के डोर सँ बान्धल अछि जिनगीकऽ एक कहानी "जन्म दैत अछि माँ बाप करम तऽ अपनेही" भाग - १ एक राज्यमें एक राजा रहैत छैक। राजा के ४ टा बेटी छथि,दिक्षा, दिव्या, प्रिति आ मेनुका छथि। आ किछ नौकर चाकर सेहो रहैत छैक। राजा कऽ चारु बेटी सब मन जतन सँ अप्पन -अप्पन पढाई लिखाई करैत रहैत अछि। एकदिन चारु बहिन साथमें कॉलेज पढ़ेबाक लेल जाइत छल तऽ बाटमें देखैत अछि के एक लंगड़ा लुल्ला यानी एक अपाहिज़ व्यक्ति भूखसँ तड़पैत बीच बाट पऽ बेहोस नज़र भेटैत छैक। दिक्षा : ए के छे तू रस्ता पर सँ हटबे की नै, तोरा आउर जगह नै भेटलौ जे बीच रस्ता पर आबि के देह ओगड़ने छी ? अपाहिज : हे बहिन हम नै चलि सकैत छी। अहाँ चलि सकैत छी तऽ हमरा कात लगाबि दिय, नै तऽ नाघि कऽ चलि जाऊ ! दिक्षा : तऽ हिनका हम जाइत छी छुएबाक लेल ( चपैट कऽ बजैत अछि आ हुनका दिक्षा नाघिकऽ चलि जाइत अछि )साथे दिव्या आ प्रिति दुनू कोई दिक्षा जका नाघिकऽ चलि जाइत अछि। मेनुका : हे भगवान ! लगैत अछि बिचारा अपाहिज बहुत दिन सँ दाना - पानि सँ व्याकुल छैक। ( मेनुका अप्पन मनमें सोचि रहल छैक )मेनका नै किछ पुछि हुनका अप्पन कोरामें उठाबिकऽ एक बृक्ष के लग लऽ जाइत अछि। अपाहिज : पानि ... पानि .. .(मेनुका सोचैत छैक … दीदी सब कॉलेज पुगि गेल होइथिन। अगर आजु हम कॉलेज नै जाइ छी तऽ पिताजी हमरा बहुत बड़का सजा देताह आ अगर कॉलेज जाइ छी तऽ ई अञ्जान बेसहारा कऽ पानि बिनु मृत्यु भऽ सकैत अछि। नै नै एक वयक्ति के जिनगीसँ बढ़ि हमर पढाई नै छैक बरु हम पिताजीके सजाई भोगि लेबै मुदा हिनका हम एहन हालतमें छोड़ि के नै जेबै पढ़ेबाक लेल। मेनुका पानि लबैत अछि आ अप्पन टिफ़िनकऽ सबटा खाना हुनका अप्पन हाथसँ खुवाबि दैत अछि। तखने मेनुका के दीदी सब कॉलेजसँ छुट्टी भऽ कऽ आबि जाइत अछि। दिक्षा : मेनुका बौवा अहाँ कॉलेज नै गेलौ ? चलू आजु घरे कनीक, हम अहाँक सिकायत पिता जी सँ करैत छी। मेनुका : दीदी देखुने ई बेसहारा पानिसँ तड़पैत छलैथ तबहम हिनका लेल पानि लेब गेलौं ताहिसँ हमरा कॉलेज जाइमें देर भऽ गेल। आब अहिं कहुँ दीदी एक आदमी के जान सँ बढ़िके हमर पढाई तऽ नैने छैक… दीदी ? दिक्षा : आब घरहु चलब की हुनके संगे गठबंधन करेबाक विचार छैक ? आजु घर जाइमें कतेक देरी भऽ गेल से अहाँक पता अछि ? घर जाऽक की जवाब देबै पिताजी के ? भाग ~ २ राजा : बेटी दिक्षा ! अहाँ सबके कॉलेज सँ आबैमें किए देर भऽ गेल बउवा ? दिक्षा : नै पिता जी नै किछ, बाटमें संगी लोकेन सब सँ बतियाई लगलौं ताहि चलते आबैमें देर भ'गेल। ( दिक्षा बात छुपाक कहैत अछि। ) राजा : अच्छा कोई बात नै, बेटी अहाँ सब चारु बहिन आब सियान भ'गेलौं। हम अहाँ सब सँ किछ सवाल कऽ रहल छी। अहाँ चारु बहिन सोचिक जवाब देब। दिक्षा : जी पिता जी हम सब जरूर सही जवाब देबैन। राजा : दिक्षा ! अहाँ कहु तऽ केकरा सिरे पललौं, केकरा सिरे पढ़लौं आ केकरा सिरे कहल मानैत छी ? दिक्षा : पिता जी हम तऽ अहिंक सिरे पललौं, अहिंक सिरे पढ़लौं आ अहिंक सिरे कहल मानैत छी। राजा : अहाँ दिव्या ? दिव्या : पिता जी हम तऽ अहिंक सिरे पललौं, अहिंक सिरे पढ़लौं आ अहिंक सिरे हमहुँ कहल मानैत छी। राजा : अहाँ प्रिति ? प्रिति : पिता जी हम तऽ अहिंक सिरे पललौं, अहिंक सिरे पढ़लौं आ अहिंक सिरे हमहुँ कहल मानैत छी। राजा : अहाँ कहु मेनुका ? मेनुका : पिता जी जन्म तऽ जरूर माँ बाप दैत छथिन मुदा करम अपनेही होइत छैक आ जे जेहन करम करैत छथि ओकरा व्याह अनुसार फल मिलैत अछि। ( राजा क्रोधमें आबि जाइत अछि आ मंत्रीसँ कहैत अछि। ) राजा : मंत्री ! मंत्री .... मंत्री : जी ! जी सरकार .... राजा : मंत्रीजी अपने तुरन्त जाउ तऽ जेहने मिलैय तेहने लड़का खोजि के लाबू चाहे ओ लंगड़ा होय या लुल्हा अपाहिज तुरन्त हिनका बियाह करि ई राजसँ बिदाई करू। ( मंत्री जाइ छैक आ व्हे गाछ तरमें जे अपाहिज छेल्हा, हुनके उठाबि लबैत अछि। ) मंत्री : लिय ! लड़का लाबि देलौं सरकार। राजा : बहुत सुन्दर ! आब देखूँ करम तऽ अपनेही ? जल्दी सँ एकरा बियाह कराबि बिदा करू। ( मेनुका के बियाह व्याह अपाहिज व्यक्ति के संग करि राइतो राति घर सँ निकालि दैत अछि। मेनुका अप्पन पति के जहियो ने सकैय तहियो काँधमें लऽक रोबैत - रोबैत घरसँ निकैल चलि जाइत छथिन। किछ दूर गेलाकऽ बाद एक मसहूर गाछ नज़र अबैत अछि। ) मेनुका : चलैत - चलैत पायर थाकि गेल। जाई छी आ राति भर अहि गाछ के निचा में विश्राम करब आ बिहान होइते रास्ता देख्बैन। ( मेनुका अप्पन पति के गाछ तरमें सुताबिकऽ रोवैत - रोवैत अपनहुँ सुति जाइत छैक व्याह बीचमें आकाशवाणी आवाज़ अबैत अछि। ) आकाशवाणी : बेटी तू नै कान् ! हम तोरा ई दुःखसँ बेरापर होयबाक उपाय बतबै छियौ। ध्यान सँ सुन : एत सँ किछ दूर पूर्व एक माँ दुर्गा के मन्दिर भेटतौ, तू माँ दुर्गा के अप्पन भक्ति पूजापाठ सँ प्रसन्न करि, माँ दुर्गा तोहर भक्तिसँ प्रसन्न भऽक तोहर पति के दुःख हरि लेतौ। नारायण ! नारायण !! नारायण !! भाग - ३ ( बिहान होइबते मेनुका अप्पन पतिके लऽक अप्पन गन्तव्य के तरफ चलि देत छथि। किछ दूर गेलाकऽ बाद आकाशवाणी के अनुसार एक माँ दुर्गा के मन्दिर भेटैत अछि। मेनुका अप्पन पतिके मन्दिर के डेरियाह पर राखि के आकाशवाणीकऽ कहल अनुसार माँ दुर्गा के भक्ति करेमें लागि जाइत छैथि। ) मेनुका : ~~~ गीत ~~~ बिन्ती सुनु हे मईया हमरो पुकार - २ करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार - २ सब के हे मईया अहाँ देखैत छी - २ हमरा किया हे मईया अहाँ तड़पबैत छी - २ आब तऽ हम हे मईया भेलौं लचार , करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार !! सगरोसँ थाकि मईया अहाँकऽ द्वारमें आइल छी - २ ई बिपत के घरीमें हे मईया अहाँ कतऽ गेल छी - २ अहाँ बिनु दोसर हे मईया नै कोनो आधार , करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार !! अहिंकऽ चरणमें हे मईया अछि जिनगी हमर - २ अहिं एक माई हमर नै आउर कोई माई दोसर - २ अहाँ नै करबै हे मईया तऽ के करतै दुलार , करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार !! बिन्ती सुनु हे मईया हमरो पुकार - २ करियौ ने हे मईया हमरो पर बिचार - २ ( मेनुका के पति देवी माँ के कृपा सँ चले - बुले लगैत अछि। मेनुका अप्पन पति के चलैत बुलैत देखिकऽ मनमें बहुत खुशी होइत अछि आ अप्पन पति के माँ दुर्गा के प्रणाम कराब लऽ जाइत अछि। ) मेनुका : चलु माँ के प्रणाम करी। पति : अहाँके छी ? आ हमरा एम्हर के लौलक ? मेनुका : देखू अहाँ हमर पति छी आ हम अहाँके पत्नी, हमर पिता जी अहाँकऽ संग हमर बियाह कऽ देने अछि आ हमरा अहाँक सदा - सदा के लेल हमर पिता जी अप्पन राज्य सँ निकला कऽ देने अछि। आब हमरा लेल जिय के सहारा एकहिटा अहिं छी। एहे सँ जतेक जल्दी होयत अछि ततेक जल्दी ई राज्य सँ दोसर राज्य चलु। केनहायतो के अप्पन जिनगी सुख - दुःख काटैत दिन गुजैर् करब। पति : अच्छा ठीक छैक। हम अहाँके की कैह् कऽ बजाउ ? मेनुका : देखू अहाँ प्रिय कैह् कऽ बजाउ। पति : हेतै ! ( ओइठाँ सँ दुनू व्यक्ति चलि दैत अछि। किछु दूर गेला कऽ बाद रस्तामें एक नदी अबैत अछि। नदी के नजदीक पहुँचैत अछि तऽ देखैत छैक एकदम सँ नदी मे लाल भाँसैत रहैत छैक। मेनुका सोचैत छैक यदि हम ई लाल लैत छी तऽ हौ ने हौ ई काल भऽ सकैत अछि ! ताहि बीचमें हुनकर पति एक हाथमें धरि लैत छैक। आ मेनुका देखि कऽ हुनका कहैत अछि। ) मेनुका : देखू स्वामी अपने ई ल'के की करब ? अहीं सँ नीक अइ के फेक दियौ। ( मेनुका के पति लाल छैक की किछ आउर छैक से नै चिन्हैत छैक। ) पति : लिय प्रिय ! अहाँ कहैत छी तऽ हम फेक दैत छी। ( ओइ जगह सँ दुनू प्राणी बतियाइत आगू बढ़ैत अछि मुदा मेनुका के पति के मनमें ओइ लाल पर सँ मन नहीं  हटैत छै। किछ दूर गेला कऽ बाद उ अप्पन पत्नी मेनुका के कहैत अछि ! ) पति : प्रिय देखू नऽ हमरा बड जोर सँ लहुसंका लागि गेल, अहाँ अईठाँ रूकू हम लहुसंका करि कऽ अबैत छी। मेनुका : हेतै जाऊ जल्दी सँ आइब ! ( मेनुकाकऽ पति जाइ छैथ। उ लहुसंका की करत, ओकरा तऽ उ लाल लेबाक छल। जल्दी सँ एक गोट लाल लऽक अप्पन प्यान्टमें लुकाबि लैत अछि आ फिर सँ वापस आबि जाइत अछि। ) पति : लिय प्रिय आबि गेलौं ! चलु आब !! मेनुका : चलि एलौं ? पति : हँ चलि एलौं। मेनुका : लिय तऽ आब चलू ! ( चलैत - चलैत दुनू व्यक्ति दूसरा राज्य के नजदीक पहुँचैत अछि। मेनुका सोचैत छथि आब हम दोसर के राज्यमें पहुँच गेलौं मुदा हम सब रहब कतऽ ?एक गाछ तऽर बैठ के विचार करैत छथि। ) पति : हम सब ई अन्जान गाउँमें जाऽ रहल छी मुदा हम सब रहब कहाँ प्रिय ? हमरा किछ नै फुराइय ! मेनुका : देखू स्वामीनाथ भगवान के घरमें देर होइत अछि मुदा अंधेर नै होइत अछि। किछ नै किछ उपाय जरूर भेट जाइत। ( ताहि क्षणमें एक बुढ़िया माँ अबैत छथि। ) बुढ़िया माँ : बेटी ! अहाँ के छी आ अहाँक घर कहाँ छैक ? मेनुका : देखू माँ ! हम सब के कोई नै छैक, हम सब बेघर बेसहारा छी, माँ जी। बुढ़िया  माँ : देखू बेटी ! अहाँ हमरा माँ कहलौँ आ कैह् रहल छी की हमरा सब के कोई नै छैक चलू आई सँ अहाँ सब हमरे लग रहब, हमरा कोई अप्पन सन्तान नै अछि मुदा अहाँक देखिकऽ आई भगवान हमर आस पूरा कऽ देलखिन बेटा बेटी के आस पूरा कऽ देलखिन। " भगवान के माया कतौ धुप तऽ कतौ छायाँ " ( ओइ ठामसँ मेनुका अप्पन पति के संग बुढ़िया माँ के घर जाइत छैक। ) भाग - ४ ( मेनुका अप्पन पति के लऽक बुढ़िया माँ संगमें हुन्का घरमें रहे लगैत अछि। मेनुका के पतिके ओई गावँके लोग नवधिया कहिके बजबे लगैत अछि। २/४ दिन के बाद मेनुका के पति नदीमें सँ जे लाल लौने रहैय ओकरा उ नुका कऽ रख्ने रहै छथि। से लाँल लऽके मेनुका के पति बिहाने बिहान गडकावैय फेर उठावैय फेर गडकावैय उठावैय। जाईत जाईत मेनुका के पति ओई राज के राजा के घर के सामने पहुंचैत छथि आ उ लाल गडैक के राजा के द्वारमें चलि जाईत छथि। राजा के बेटी सुमैना दुवारे पर रहैत छथि। आ उ लाल अप्पन हाथमें धऽ लैत अछि। ) सुमैना : बाप रे बाप कतेक सुन्दर लाल छै । ( सुमैना लाल लऽके आँगनमें चलि जाईत छथि । एम्हर मेनुका के पति घुरि के वापस घर चलि जाईत छथि । दोसर दिन राजा के बेटी सुमैना नहाँ सोनाँह् के उ वाली एकटा कान मे पहिर कऽ मल्हिनियाँ के बोलबैत छथि । ) सुमैना : गे मल्हिनियाँ ..! मल्हिनियाँ : जी राजकुमारी जी ! सुमैना : देख्ही तऽ हम तोरा केहन लगैत छियौ देखमें ? मल्हिनियाँ : बड़ सुन्दर लगैत छी राजकुमारी जी मुदा एकर जोडी दोसरो कानमें रहैत तऽ अहु सँ बेसी सुन्दर लैगतौं अपने राजकुमारी जी। सुमैना : साच्चे कहैत छे नै ? मल्हिनियाँ : हँ राजकुमारी जी हम साच्चे कहैत छी । सुमैना : तऽ जो जल्दी सँ पिता जी के बोलाबि कऽ ला ! मल्हिनियाँ : हेतै हम जाईत छी, राजा साहब के बोलेबाक लेल। ( मल्हिनियाँ तुरन्त जाइत अछि राजा साहब के बोलेबाक लेल। ) मल्हिनियाँ : राजा साहब ! राजा साहब !! अहाँ  के राजकुमारी जी तुरन्त बोलाबि रहल छथिन। राजा : कि बात भेलैय से मल्हिनियाँ ? मल्हिनियाँ : से बात तऽ राजकुमारी जी  हमरा नै बतौलखिन। राजा : ले चल हम अबैत छी, देखैत छी जा के कि भेलैन। ( मल्हिनियाँ फेर दौड़ल - दौड़ल राजा आबसँ अगाडिये राजकुमारी लऽ पहुँच जाइत अछि आ  राजकुमारी मल्हिनियाँ सँ पुछैत  अछि। ) सुमैना : मल्हिनियाँ पिता जी आबि रहल छौ। मल्हिनियाँ : हँ राजकुमारी जी आबि रहल छथि, राजा साहब ! ( सुमैना रुसि के चुपचाप घरमें जाऽक सुति रहैत छथि। ) भाग ~ ५ ( राजा महल कऽ भीतर जाइत अछि आ बेटी सँ पुछैत छथि । ) राजा : बेटी सुमैना ! कि भेल किए नै बजैत छी, कोई किछ कहलकऽ  की ? सुमैना : पहिने अहाँ हमरा पिता जी वचन दिय जे हम कहब से अहाँ करि देब । राजा  : बाप बेटी मे कथी के वचन, बेटी हमरा लेल एकटा अहीं सब किछ छी । अगर नै मानव तँ हम वचन दैत छी जे अहाँ कहबै सेह हम करि देब । ( सुमैना उ लाँल निकाएल के राजा के देखवैत कहैत  छैक । ) सुमैना : पिता जी हमरा ई लाँल के जोडी चाही । राजा : ई लाँल आहाँ कतँ से लैलौं ? सुमैना : ई लाँल अपन गावँ के नवधिया काईल खिन गडकावैत - गडकावैत अवैत रहै कि लाँल गडैक के अपन द्वार पर चलि एल आ हम उ लाँल उठा के अपन हाथमें लऽ लेलौं । उ नवधिया हमरा लाँल लैत देख के घुमि के अपन घर चैल गेल । राजा : लिय अहाँ निश्चिन्त भऽ जाउ अहाँ ई लाँलकऽ जोडी लएबाक लेल हम ओई नवधिया के बोलबैत छी । राजा : मंत्री ! मंत्री : जी महाराज ! राजा : जल्दी सँ जाऊ उ गाउँमें जे नवका नवधिया एल छैक हुन्का बोलाबिक लाऊ । मंत्री : हेतै  महाराज ! हम जाइत छी अखुन्ते बोलाबिक लबैत छी । ( मंत्री जाइत छथि  मेनुका के पति नवधिया के बोलेबाक लेल । जब मंत्री नवधिया के घर पहुँचैत अछि तऽ मेनुका के द्वार पर बैसल देखैत छथि । मंत्री लगे जाइत छथि आ मेनुका सँ कहैत छथि । ) मंत्री : अहाँ के छी ? नवधिया केम्हर छैक ? मेनुका : हम हुन्कर पत्नी छी, कहुँ कि बात छैक हम कैह् देबै हुन्का … मंत्री : राजा साहब के अडर अछि की नवधिया के जेना नै तेना महल में अएबाक लेल ! मेनुका : किए, हुन्का सँ कोनो गल्ती भेल अछि की ? मंत्री : से बात हमरा नै अछि पता, मुदा राजा साहेब हमरा तऽ खाली ई कहलक जे अहाँ जाउ आ नवधिया के बोलाबिक लाउ । मेनुका : अच्छा, ओ एतै तऽ हम राजा साहब के महलमें हुनका पठाँदेब । मंत्री : जल्दी पठाबि देबै नवधिया के … मेनुका : होतै । ( किछ देर के बाद मेनुका के पति घर अबैत अछि, तखने मेनुका हुन्का कहैत छथि । ) मेनुका : अहाँ  के राजा साहब के मंत्री बोलेबाक लेल आइल छलाह । जाऊ देख आऊ कि बात छैक । नवधिया : अच्छा ठीक छै हम जाँके देखैत छी की किए हमरा राजा साहब अप्पन महलमें बोलौने अछि । भाग ~ ६ ( नवधिया राजा के घर जाएत छथि। राजा द्वार पर रहै छथि । नवधिया जा के राजा के नमस्कार करैत छथि। ) नवधिया : नमस्कार राजा साहब ! राजा : नमस्कार ! आऊ बैसू ! नवधिया : राजा साहब हमरा किए बोलैलौं ह  ? राजा : अहाँ सँ एकटा जरूरी काज पैड गेल तै ताहि सँ आहाँ के बोलेलौं ह । नवधिया : जी राजा साहब कहुँ ने कि काज पडल ? ( राजा ऊ लाँल निकाईल के देखऽ दैत छैक आ कहैत छथि ) राजा : ई अहाँक अछि ? अहाँ आन्ले छलौं ? नवधिया : जी हम आन्ले छलौं ! राजा : अहाँ ई कऽतऽ सँ आन्लौं ? हमरा अइके जोडा चाही ! अहाँ हमरा अइके जोड़ा लाबि दिय । नवधिया : अच्छा ठीक छैक राजा साहब हमरा एक सप्ताह के समय दिय अइके जोड़ा लाबि देब । राजा : अच्छा ठिक छै अहाँ के हम देलौं एक सप्ताह के समय ... नवधिया : लिय तब हम जाएत छी ।  राजा साहब ! राजा : लिय जाऊ जल्दी आएब । नवधिया : जी हेतै । ( नवधिया घर आवैत अछि तऽ मेनुका हुन्का सँ पुछैत छथि ।) मेनुका : अहाँके राजा साहब अप्पन महलमें किए बजैने छल  ? नवधिया : राजा याह् खातीर बोलैने छल की, जे अपना सब अप्पन राज सँ आबैत काल नदीमें ओ चिज नै बहैत छलै से हुनका चाही, व्याह् के लेल हमरा बोलौने छलाह । मेनुका : मुदा राजा साहब के कोनाकऽ पता चलऽल जे अहाँके उ चीज के बारेमें जानैत छी । नवधिया : हम आवैत खिन अहाँ सँ नुकाकऽ पेंन्में धऽ लेने छलौं कि वेहें पर्सुखिन हम गडकावैत छलौं से गरैक के राजा साहब के द्वार पर चलि गेल आ ओ राजा सहाब के बेटी उठा लेलनि ताहिसँ हुनका मालुम भेल हमरा ओ चिज के बारेमें थाह छैक कहिके ! मेनुका : हम अहाँक कहने छलौं नै लिय फेक दियौ कैह के मुदा अहाँ नै मानिकऽ हमरासँ नुका कऽ आनि लेलौं आब भेल ने फसाद ! अच्छा कोई बात नै  जाउ हुनका हुनकर जोडी आनि दियौ । नवधिया : अच्छा ठीक छै हमरा बटखर्चा के जोगार कऽ के दिय हम जा रहल छी । मेनुका : कनिक रूकु , लिय ऐमें जलखै अछि , बाटमें  भुख लागत तऽ खाऽ लेब । नवधिया : हेतै ! लिय हम जाएत  छी । मेनुका : जाऊ जल्दी आबि  घुरि  कऽ ... नवधिया : अच्छा हेतै ! भाग ~ ७ ( नवधिया चलि दैत छथि ओई लाल के जोडी लएबाक लेल । जाएत - जाएत नवधिया वही नदी लग पहुंचैय । फेर देखैत छैक ऊ लाल एकदम सँ भासैत रहैय । नवधिया  चलैत - चलैत भुखा गेल छल । ओ सोचैत छथि जे पहिने जल्खै खाबि लितौं  तब ई समान लऽकऽ घर जाएब । जल्खै खेलाक बाद नवधिया के मनमें एक सवाल पैदा होईक छै जे ई लाल - लाल गोल समान कतऽ सँ भासैत आबि रहल अछि । ई पता लगावलेल नवधिया नदीके कातेकात सिरा के ओरी चैल दैत छैक । जाएत - जाएत दश कोस उत्तर चलि जाएत छथि । तेकर बाद एक महा घना जंगल आबैत अछि । ओईठाम  नवधिया एक गज़ब दृश्य देखैत छथि । एक गाछी के दुफेरिया ठाँरिमें  एक सुन्दर कुमारी कनियाँ के मुडी काटि के टांगल, ओई मुडी से जतेग बुन्द खुन चुबै सब ओई नदी के पानिमें गिरला कऽ बाद लाल बनि जाएत छलैथ । आ ओई कनियाँ के धर गाछ के जैरमें रहैय संगे बगलमें एक लाल एक हरियर रंग के तलवार राखल रहैत अछि । आउर एक नारियल के माहि भयंकर गाछ सेहो रहैत अछि ।एकाएक नवधिया के नजर वोई सुन्दर कनियाँ के नजर सँ टकराइत अछि । उ सुन्दर कनियाँ नवधिया के देख के खलखल हँसे लागैय आ नवधिया सँ पुछैत अछि ... ) सुन्दर कनियाँ : ह..हा..हा.. सुनु अहाँ के छी ? आउर ऐम्हर कतऽ एलौं ? ( नवधिया डर सँ भागे लगैत अछि । ) सुन्दर कनियाँ : देखु अहाँ नै डराउ, हम अहाँ के किछ नै करब । ( नवधिया रुकि जाएत छथि ) सुन्दर कनियाँ : देखु हम जे - जे कहैत छी से - से अहाँ करु, हमर ई मुडी खोईल के गाछ तरमें धर छैक अहाँ धर आ मुडी बीचमें हरियर रंग के तलवार राखि  दियौं आ फेर उ हरियर रंग के तलवार खीँच लियौं । ( नवधिया सुन्दर कनियां केँ कहल अनुसार मूडी खोईल केँ आनै छैथ आ धँर मूडी केँ बीच मेँ हरिहर तलवार राईख केँ खीँच लै छै । सुन्दर कनियां सुगबुगाँ के उठै छैथ । ओकर नाम रहै छैथ लाँल कनियां । ओ नवधिया सेँ कहै छै । ) लाल कनियाँ : अहाँ ऐम्हर कथी खोज एलौं हँ ? नवधिया : हम ऐम्हर अखन जे नदी लाल ढिक्का भासैत नै छेल हम ओकरे खोजी करेबाक लेल एतऽ तक एलौं । लाल कनियाँ : देखु हमर पिता जी के आवै के समय भेल जाएत छैक । हमर पिता राक्षस छथिन ओ अहाँ के देखत तेअँ  गिर जेता । से नै हम जेना - जेना कहैत छी ओनहायते करब । नवधिया : अच्छा अहाँ जेनहायते कहवै कर लेल हम ओनहायते करब । ( लाल कनियाँ मनेमन बिचार करै छथिन आब फेर कहिया ई मनुष्य सँ भेट हेत आ नै हेत से नै ऐह  मौका छियै हम अपन पिता जी के एकर हाथसँ बध कराबिकऽ एकर संग शादी कऽ लेब । ओकरा सँ ओकर नाम पुछै छथि । ) लाल कनियाँ : अहाँ के नाम कि अछि ? नवधिया : हमरा सब कियो नवधिया कहैत अछि हमर नाम नवधिया अछि । लाल कनियाँ : देखु हम सुतै छी । अहाँ ई लाल तलवार सँ हमर मुडी काटि के पहिने जेना टांगल छल ओनहायते टांगि के अहाँ फूलवारीमें नुका के केनहायतो राति काटि लिय । काईल सवेरे हमर पिता जी फेर शिकार करऽ जेता तेकर बाद हम बोलाईब तब अहाँ आएब। नवधिया : ठीक छैक, हेतै । ( नवधिया, लाल कनियाँ कऽ बात मानि फूलवारी राति गुजारि लैत अछि । ) भाग ~ ८ ( साँझ होइते राक्षस अपन बासस्थान पर वापस आवै छथि आ अपन बेटी के मूडी लाल तलवार सँ जोडैत छथि । लाल कनियाँ उठि के अपन पिता के प्रणाम करैत छैक । ) लाल कनियाँ : प्रणाम पिता जी । राक्षस : खुश रहू ! बेटी आई हमरा एम्हर मनुष्य के गन्ध आबि रहल अछि । लाल कनियाँ : पिता जी ऐठाम तऽ एकटा हम्ही, हम्ही मनुष्य छी हमरे गन्ध अवैत हेत । अहाँक  एम्हर तऽ दोसर कियो नै छथि । पिताजी आई हम अहाँ सँ एकटा बात पुछ चाहैत छी यदी अहाँ सँच - सँच बताईब तेँ हम पुछब । राक्षस : हँ पुछु की बात पुछ चाहैत छी । हम सँच - सँच बता देब । लाल कनियाँ : ई नारियल के गाछमें खोता जे छनि ओईमहक पंक्षी मैना कहियो ने कतौं जाई छैक कि बात छै अईमें पिता जी हमरा अपने सँच - सँच बताबु । राक्षस : देखु बेटी हम अहाँ के बतावै छी ध्यान दऽ के सुनु । ई नारियल के गाछ में जे मैना छै उ हमर प्राण छी । हमरा कोई नै मारि सकै छथि । हमरा मार लेल उ खोताकऽ मैना के मार पडतै तहने हम मरब नै तऽ नै ! एकर लेल ई लाल तलवारसँ नारियल कऽ गाछ के एक छह में  काटि के गिरावे पडतै बादमें ओई मैना के मारतै तब हम मरब नै तऽ हम नै मरि सकैत छी । लाल कनियाँ : लिय पिता जी बहुत  राति भऽ गेल । आब खाना खाऽ के आराम करू । राक्षस : हेतै चलु ! ( खाना खाऽ के दुनु बाप बेटी सुति रहैत छै । बिहान उठि के फेर बेटी के मुडी लट्का दैत अछि आ अपना शिकार मे निकैल जाईत छथि । राक्षस के गेलाकऽ बाद लाल कनियाँ नवधिया के बोलबैत छथिन । ) लाल कनियाँ : कोने छी निकैल के बहार आबू पिता जी चलि गेलैन शिकार पर । ( नवधिया फूलवारी सँ निकैल कऽ आवैत अछि । ) लाल कनियाँ : देखु काईल खिन जै तरिका से हमर मुडी जोड्ने छेलौं तहिना फेर जोडू । ( नवधिया लाल कनियाँ के मुडी आ धर जोडैत छैक आउर लाल कनियाँ फेर उठि के खार भऽ जाइत अछि आ नवधिया सँ कहैत छथि । ) लाल कनियाँ : देखू अहाँ जे चीज लेव लेल एलौं ई सेकरा पाँव लेल अहाँ के ई नारियल के गाछमें खोता छैक ओई में एकटा मैना छैक ओकरा अहाँ के मारे पड़त । नवधिया : देखुँ हम अपन समान पाँव लेल यी काज करेबाक लेल तैयार छी । लाल कनियाँ : तऽ है ई लाल तलवार लिय आएख  छहमें नारियल गाछ के काटि खसाबु । ( ओहिनती नवधिया नरियल गाछ के काटै यऽ तेनहायते राक्षस के पायरमें ठेस लागैत छैक आ राक्षस के मालूम भऽ जाईत अछि कि हमर जान खतरामें छैक से... अप्पन बास स्थान के तर्फ राक्षस तेजी सँ चलि दैत छथि । तही बीचमें नवधिया मैंना के पकैड कऽ ओकर टांग तोरि दैत छथि कि तखने राक्षस लंगड़ा भऽ जाईत छैक, तहियो राक्षस लँगड़ाइत - लँगड़ाइत गडकैत फडकैत अवैत रहै अछि, कि अंतमें नवधिया मैंना के मुड़ी मचोरि दैत छैक आ मैंना के प्राण छुटि जाईत छैक आ राक्षस मरि जाईत छथि । ) नवधिया : लिय आब तऽ हम ई मैंना के मारि देलौं ! आब कहुँ कि कऽर पड़तै । लाल कनियाँ : देखु ई लाल तलवार हरियर तलवार संगमें लिय आ चलू अहाँ अपन घर के ओर ! नवधिया : मुदा हम जे समान लेव लेल एल छेलौं से समान ? लाल कनियाँ : अहाँ पहिने अप्पन घर तऽ चलू ओतै भेट जाइत समान । नवधिया : साँचे कहैत छी नै ? लाल कनियाँ : हँ - हँ साँचे कहैत छी हम,  अहाँ चलू तऽ सही पहिने ! ( ओईठाम सँ दुनू गोटे चलि दैत अछि । जब नवधिया राज के नजदीक पहुंचैत छथि तऽ लाल कनियाँकऽ एक गाछ के निचामें बैठा दैत छथि आ कहैत छैक । ) नवधिया : देखु अहाँ अईठाम कनिक देर बैठु हम घर जाई छी अप्पन कनियाँ सँ हुकुम लेबाक लेल जे अहाँ के घर लऽ जाई कि नै लऽ जाई । लाल कनियाँ : अच्छा ! हेतै जाऊ । ( भाग - ९ ) ( मेनुका अपन पति नवधिया केँ येल देँख केँ पुछै छैथ । ) मेनुका      :-  एलौं ? नवधिया   :-  हँ चैईल ऐलुँ  मुदा एकटा समान तँ । हम बाटे मेँ राईख केँ ऐलु येँ अहाँ  सँ पूछँ जे हुन्का घर मेँ लावी कि नै ? मेनुका      :-  जाऊ आनुँ कियो उठाकेँ ल'जेत। ( नवधिया जाई छैथ लाँल कनियां केँ लाव । ) लाँ.कनियां:- कि कहलs अहाँ केँ कनिया ? देलs हुकुम हमरा लँsजाईलेँ ? नवधिया  :-  हँ हँ कहल्कै जल्दी आँनु । चलूँ जल्दी चलूँ । ( ओईठिन सँ नवधिया लाँल कनियां केँ ल'के घर जाई छैथ । लाँल कनियां मेनुका केँ देखकेँ हुन्का प्रणाम करै छै । ) लाँ.कनियां:- प्रणाम दिदी । मेनुका   :- खुश रहु । ( मेनुका लाँल कनियां सेँ पुछै छैथ ।) मेनुका      :- अहाँ केँ छी ? हमर पति तँ लाँल लाव गेल छेलाँ मुदा हिन्का संग मेँ अहाँ ? लाँ.कनियां:- देखुँ दिदी हम्ही छी ऊ लाँल समय आवतै सब जाईन जेब दिदी । हमर नाम चियै लाँल कनियां । मेनुका     :-  चलूँ ठीक छै । साँझ भsगेल खाना बनावै छी । दुर सँ एलौं अहाँ सब थाकल भूखायल हेब। खाना खाँकेँ आराम करब । लाँ.कनियां:- होइतै दिदी । ( खाना खाँकेँ सब कोई  सुईत जाई छैथ । राजा के मालुम है ये नवधिया आयल सेँ । राजा बिहान सवेरे मंत्री केँ हुकुम करै येँ । ) राजा     :- मंत्री नवधिया केँ जाँके कहुँ जे समान लाव लेँ हम हुन्का पठेनैँ छेलौं सेँ समान लँके तुरन्त आवै लेँ । मंत्री।   :- होइतै महाराज । ( मंत्री जाई छैथ आ नवधिया सेँ कहै छैथ ) मंत्री     :- ये नवधिया राजा सहाब तुरन्त जे समान लाँव लेल पठेनेँ रहे सेँ समान लँके तुरन्त कहलs आवै लेँ अहाँ केँ । ( मंत्री कैह के चैल जाई छैथ । नवधिया मंत्री केँ बात सुईन केँ कपार पँ हाथ धँके बैठ रहै येँ । तही बीच मेँ लाँल कनियाँ आवै छै । नवधिया केँ कपार पँ हाथ ध'केँ बैसल देख केँ पुछै छैथ । ) लाँ.कनियां:- मर अहाँ केँ की भेल कपार पँ हाथ धँके बैसल छी ? नवधिया   :- जे समान लाँव लेँ राजा सहाब पठेनेँ जेल हमरा सेँ समान ल'के जल्दी आवैलेँ खबर पठेल्कै ये । लाँ.कनियां:- धुँ अहाँ अही खातीर चिन्ता करै छी । सुनु अहाँ एकटा कठौत मेँ भैर कठौत पाईन भैर केँ आँनु । ( नवधिया एक कठौत पाईन भोर के आनै छैथ । ) नवधिया :- लियँ आन्लुँ पाईन । लाँ.कनियां:- सुनु हम जेना कहै छी तैहनती करब । यी कठौत के ओल्ती मे राँखु । जैहनती हमर मूडी जंगल मेँ काईट के धर सेँ अलग क'के टांगने रही ओहिनती आईयो हमर मुडी के काईट केँ धर सेँ अलग क'के कठौत सामनेँ चार मेँ टांगु । जब कठौत भैर जेत तँ फेर धर मेँ सटाँ के हरिहर हरिहर तलवार सेँ जोईड देबै । ( नवधिया ओहिनती लाँल तलवार सेँ लाँल कनियां केँ मूडी काईट केँ कठौत सामनेँ चार मेँ टाईगं दैछै ।जतेग खून लाँल कनियां केँ मुडी सेँ कठौत मेँ खसै छै सब लाँल बैइन जाई छै आ कठौत पुरा भैर जाई छै । वाद मेँ फेर नवधिया लाँल कनियां केँ मूडी धर मेँ सँटा केँ हरिहर तलवार सेँ जोईड दै छैथ । लाँल कनियां उठै छै आँ नवधिया केँ कहै छै । ) लाँ.कनियां:- यैँ  कठौत मेँ सेँ एकटा ल'के जाऊ राजा केँ दँsआबु । नवधिया   :- है तै हम जाई जी पूगा आवै छी । ( नवधिया एकटा ल'के राजा केँ दैलेँ जाई छै ।) नवधिया   :- प्रणाम राजा सहाब । राजा    :- प्रणाम । आन्लौं समान ? नवधिया   :- हँ आनलियै । हेँ लियँ । ( राजा उ लाँल लै छैथ आ बेटी केँ दै छै ।) राजा      :- बेटी सुमैना हेँ लियँ लाँल केँ जोडी । सुमैना      :- लाबु पिता जी । ( सुमैना उ लाँल धँ राखै छैथ । बिहान सबेरे नहाँसोनाँ केँ ऊ लाँल दोसरो कान मेँ पहिन केँ मलिनियां के बोलावै छैथ । ) सुमैना      :- गे मलिनियां ? मलिनियां :- जी राजकुमारी जी ! सुमैना      :- हे एत याँ ? मलिनियां :- कहूँ राजकुमारी जी । सुमैना      :- कहँ तेँ मलिनीयां आब हम केहेन लागै छियै देखै मेँ ? ( भाग - १० ) ( मलिनियां सुमैना केँ देखैत कहै छथिन । ) मलिनियां :- वाह राज कुमारी जी कि रुप लागै येँ देखै मेँ संगे यी दुनु लाँल पहिन्लौं तेँ आउर सुन्दर देखै छी मुदा ऐ मेँ एकटा चिज आउर जेँ रहतियेँ तेँ आहाँ सुन्द्रता चन्दा केँ ज्योती केँ मलिन करतियेँ । सुमैना  :-    कुन चिज मलिनियां जल्दी कsह कि चियै उ चिज ? मलिनियां :- उ चीज चियै राज कुमारी जी हाँस बिहुस केँ फूल । आहाँ केँ जुरा मेँ हाँस बिहुस के फूल । आहाँ केँ जुरा मेँ हाँस बिहुस केँ फूल जब रहता तेँ आहाँ केँ सुन्द्रता केँ वर्णन नै पुछु ! सुमैना   :-   मुदा मलिनियां यी भेटत कतेँ ? ( मलिनियां ६ मास आगा आउर ६ मास पाछाँ केँ बात जानैत रहै छैथ । उ राज कुमारी केँ कहै छैथ । ) मलिनियां  :- देखुँ राज कुमारी जी आहाँ केँ बचन देनेँ यैछ आँ येहो समान आहाँ केँ ओहे नवधिया आईन सकत आउर दोसर कियो नै । सुमैना  :-      साच्चे कहै छी तु ? मलिनियां :-   हँ..हँ.. राज कुमारी जी । सुमैना :-      ले तब जल्दी सँ पिता जी केँ बोलाँ केँ आँन । मलिनियां :-  अच्छा हम जाई छी राज कुमारी जी । ( मलिनियां जाई येछ राजा केँ बोलाव लेल । ) मलिनियां :- राजा सहाब राजा सहाब राज कुमारी जी बोलावै छथिन आहाँ केँ । राजा :-     ले..ले.. चल हम आवै छी । ( राजा आवै छैथ आ अपन बेटी सुमैना सूँ पुछै छैथ जे कि भेल । ) राजा    :-   बेटी सुमैना कहुँ कि बात । किये बोलेलौं हमरा कि भेल ? सुमैना  :-      पिता जी हमरा हाँस बिहुस केँ फूल चाही । राजा :-        मुदा यी कतँ भेटत आँ के आनत यी । आहाँ तेँ हमरा बचन मेँ बाईध केँ बडका मुसिबत मेँ फसाँ देलौं । ( बीच मेँ मलिनियां बजै छैथ । ) मलिनियां  :- कोनो मुसीबत नै राजा सहाब येहो काज नवधिया करताँ । आहाँ हुन्का हुकुम तँ करियौं । राजा  :-     लेँ तँ हम बोलवै छियै नवधिया आउर हुकुम करै छी यी हाँस बिहुस केँ फूल आन लेल । राजा :-      मंत्री ..! मंत्री   :-     जी महाराज । राजा  :-     जल्दी सेँ जाऊ आ नवधिया केँ बोलाँऊ । मंत्री:-     होइतै महाराज हम जाई छी । ( मंत्री जाई छैथ नवधिया केँ बोलाव लेल । ) मंत्री      :-  यौं नवधिया ..? नवधिया :-  हँ मंत्री जी कहुँ कि बात ? मंत्री      :-  आहाँ केँ राजा सहाब तुरन्त बोलेलऽ । नवधिया :-   अच्छा चलूँ । (नवधिया मंत्री केँ संगे राज दरवार जाई छैथ।) नवधिया   :- प्रणाम राजा सहाब । राजा      :- प्रणाम ! बैसु । नवधिया   :- कहुँ कथि लेल हमरा बोलेलौं सरकार ? राजा      :- आहाँ हमर कहलाँ करलौं मुदा यैं बेर फेर हमरा आहाँ केँ जरुरी पैड गेल आउर येहो काज अहीं केँ कर पडत । नवधिया   :- कहुँ कि काज ? राजा      :- आहाँ केँ हमरा हाँस बिहुस केँ फूल आइन केँ दियँ पडत । ( नवधिया किछ नै सोईच केँ राजा के देल आढैत स्वीकाईर लै छैथ । ) नवधिया   :- हँ हेतै राजा सहाब हम आईन देब । राजा      :- तँ लियँ जाऊ । ( नवधिया राजा केँ बचन दऽ दैयेँ जे हम हाँस बिहुस केँ फूल आईन देब । जे कि हुन्का हाँस बिहुस केँ फूल केँ बारै मेँ किछ मालुम नेँ छैन । नवधीया चुपचाप अन्हार चेहरा बनाँ घर जाई छैथ । घर नै किन्को सेँ बजै छैथ । ततबे मेँ मेनुका आँ वाँल कनियां आईब जाई छै । मेनुका पुछै छैथ । ) मेनुका    :- कि भेल कि कहलऽ राजा सहाब ? नवधिया :- ओ कहलs हमरा हाँस बिहुस केँ फूल आईन दियँ । मेनुका    :- तँ आहाँ कि कहलियें ? नवधिया :- हम कहलियै हेतै हम आईन देब जे हाँस बिहुस केँ फूल बारै मेँ हमरा किछ मालूम नै छै । ( बीचे मेँ वाँल कनियां बजै छैथ । ) लाँ.कनियां :-चिन्ता जुईन करु आहाँ सब येकर उपाय हमरा लँ छै । मेनुका       :- कि उपाय बताऊ नेँ ? लाँ.कनियां :- हम कहै छी ध्यान दँsकेँ सुनु । ( भाग - ११ ) ( लाँल कनियां हाँस बिहुस फूल केँ बारै मेँ बतावै येँ नवधिया केँ ।) लाँ.कनियां :- देखुँ अहाँ ऐठिन सँ सिधा जाउ जतऽ सेँ हमरा लावलौं तऽते ओईठिन से फेर अहाँ १४ कोष उत्तर जायब । जब अहाँ १४ कोष उत्तर जेब तब माहा भयंकर सुनसान पहाड मेँ जंगल केँ बिच एक पोखैर भेटत ।अगर ओईदिन अहाँ सवेर पुगब तेँ ठिक येँ नै तेँ दोसर दिन अहाँ सवेरे पोखैर केँ चारो महाड केँ घुईमफिर केँ उत्तरबैरिया महाड पँ जाँ केँ कोनो ठिन निक जगह मेँ नुकावै केँ लेल सुरक्षित ठाम बनाईब जै सेँ कोई अहाँ केँ देखँ नै पावै ।जब राईत केँ ११ बजत तेँ अहाँ जाँकेँ नुकाँ जेब । जब पोने १२ राईत हायत तँ आकाशसे एक माहा बिशाल  हात्ती आयत आ उत्तरबैरिया महाड पऽ जाँकेँ उतरत आउर  चारो महाड घुईम केँ फेर उत्तरबैरिये महाड पऽ जाँकेँ पश्चिम मुहे सुईत जायत । तब हात्ती केँ शुर मेँ सँ सुन्दर कनियां निकलत । उ कनियां चारोदिस ताईक केँ पोखैर मेँ स्नान करँ जायत । स्नान कऽके फेर ऊ हात्ती केँ शुर केँ आगु मेँ आईब केँ अपन केश केँ जुराँ खोलत आँ पलथी माईरके झुमर खेल केँ लेल बैठत अही बिच अहाँ  चुपचाप पछाडी सेँ जाँके ओकर मांग मेँ सेनुर धऽदेब । नुका केँ जेब जै सँ ऊ अहाँ केँ देखे नै बुझलौं कि नै । नवधिया   :- जी बुईझ गेलुँ  । मेनुका      :- येकर मतलब येकरा हुन्का संग मेँ शादी करऽ परतै । लाँ.कनियां:- हँ दिदी । मेनुका      :- नै यी नै हुवत । लाँ.कनियां:- देखुँ दीदी एना नै करु ।यी सब करम केँ फल छैथ । हिन्कर भाग्य मेँ येहे लिखल छै हमर अहाँ केँ रोक्ला सेँ किछ नै हेत । बरु हिन्का जल्दी सँ पठा दियौ येकर सिवा दोसर कोनो उपाय भी नै छैथ । मेनुका      :-  जब अहाँ कहै छी तँ जेतै मुदा यी उ कनियां केँ संग मेँ शादी केला सेँ हाँस बिहुस फूल मिल जेतै कि? लाँ.कनियांं :-     देला केँ बाद सब किछ वेह कनियां करतै । ( तेकर बाद लाँल कनियां आउर मेनुका मिल केँ नवधिया केँ बटखर्चा केँ संग मेँ एक बट्टा सेनुर दऽके हाँस बिहुस फूल केँ खोजी मेँ भेज दे येँ । ) मेनुका       :- हे यी लियँ खाई केँ सामान छी जब रस्ता मेँ मुख लागत तेँ खायब आउर यी सेनुर निक सेँ राखब बुझलौं । नवधिया   :-  हँ हँ लाबुँ । मेनुका      :-  लियँ । नवधिया   :- लियँ हम जाई छी । मेनुका      :- लियँ जाउँ । ( नवधिया हाँस बिहुस केँ फूल केँ खोजी मेँ चैईल दै छैथ । जाइत जाईत नवधिया जै ठिन सेँ लाँल कनियां ल'गेल रहै ओई ठाम पहुचै छै आ हुन्का ओइठिन साँझ पेर जाई छै । राईत नवधिया ओहिठिन रैह केँ बितावै येँ । दोसर दिन बिहान सवेरे फेर चैईल दै छै । जब नवधिया पहाड केँ नजदिक पूगै येँ तँ फेर साँझ पैईर जाई छैथ । ओईदिन नवधिया पहाड केँ कात रैह केँ राईत काटै येँ । दोसर दिन फेर बिहाने चैईल दै छै । जब नवधिया १ घण्टा केँ रस्ता काटै येँ तब आवै ये पहाड केँ घंघोर जंगल जेकर बिच मेँ बिशाल पोखैर देखै छैथ । नवधिया पोखैर केँ महाड पँ जाई छैथ तेँ नवधिया केँ लागै येँ जेना चारो दिस सेँ हुन्का किछो झपटै लेँ खोजै येँ ।नवधिया केँ मन मेँ डर समा जाई छैथ । नवधिया जैनंग तेनंग निडर भऽकेँ पोखैर केँ चारो महाड घुईम केँ उत्तरबैरिया महाड पऽ जाई छैथ । चारो दिस खोजै छै जेँ कोईठिन नुकायब । देखै छै कात मेँ माहा झपटगर झार । ओही झार मेँ नवधिया नुकावै केँ जोगार मिलेलक ।जब राईत के ११ बजल तेँ नवधिया जाँ केँ नुका गेल । जब १२ बजै मेँ १५ मिनट बाँकी रहल तेँ आकाश सेँ ऊ तेज हावा मेँ हनहनाईत माहा भयंकर बिशाल हात्ती आवै छै । हात्ती आईब केँ पोखैर केँ चारो महाड घुईम के उत्तरबैरिया महाड पर जाँके पश्चिम मुह भ'के सुतै छैथ । बाद मेँ हात्ती केँ शुर सेँ एक सुन्दर कनियां निक्लै छैथ । जेकर नाम हाँस बिहुस रहै छै । हाँस बिहुस पोखैर मेँ जाँके नहावै छै । नेहाँ केँ आइब केँ हात्ती केँ शुर अगाडी मेँ पलथी माईर केँ बैईठ जाई छै आ झुमर खेल केँ लेल केश केँ जुराँ खोले येँ । जैहनती हाँस बिहुस जुरा खोलै येँ तैहनति नवधिया लाँल कनियां केँ कहल जेहाईत पिछा सेँ आईब केँ हाँस बिहुस केँ मांग मेँ सेनुर ध'दैये । हाँस बिहुस पिछा घुईम केँ देखै छैथ नवधिया केँ । नवधिया डर सँ थरथर काँप लाग्लैन । नवधिया केँ थरथर कापैत देख केँ हाँस बिहुस हँसे लाग्लैन आँ नवधिया सेँ कहै छैथ । ) ( भाग - १२ ) हाँस बिहुस   :- हाँ...हाँ...हाँ...! सुनु नैं डराबु । अहाँ हमर मांग भैर कें हमरा लेल बहुत निक काज केलौं । हमरा आईतक मनुष्य कें दर्शन नै भेल रहें मुदा आई अहाँ ओहो में हमरा अपन अर्धाग्नि बनेलौं । अहाँ तँ हमर प्रमेश्वर छी । ( नवधिया किछ नै बजै छैथ चुपचाप हाँस बिहुस कें बात सुइन रहल यें ।) हाँस बिहुस :-    अहाँ यी कहुँ अहाँ कें घर कतँ भेल ? आब चलु हमरा लsकें घर । नवधिया      :-  हम अहाँ कें लsकें घर जेब मुदा हम अहाँ कें कुन हिसाब सें अपन घर लsजेब ? हाँस बिहुस  :-  देखुं अहाँ हमर सीत में सेनुर भरलौं तैं हिसाब सें हम अहाँ कें पत्नी आउर अहाँ हमर पती । हमर अहाँ कें आब पतीपत्नी कें रिस्ता बैन गेल । नवधिया   :-     मुदा हम तँ एल छेलु हाँस बिहुस फूल कें लेल । हाँस बिहुस :-  देखुं अहाँ कें हाँस बिहुस कें फूल भेटत पहिनें घर तँ चलु । नवधिया     :-   साच्चें कहैं छी ? हाँस बिहुस :-   हँs..हँs..सांचे कहैं छी चलु । ( नवधिया कें थांह नै रहैं यें जे एहे छी हाँस बिहुस एकरे नाम अइछ हाँस बिहुस । ओईठिन सँ दुनोगोटा चैल दै छैथ । अवैत अवैत जब लाँल कनियां कें नहिरा लें आवै यें तँ हाँस बिहुस नवधिया सें कहै छैथ । ) हाँस बिहुस  :- सुनु ! नवधिया     :- कि ! बाजु ? हाँस बिहुस  :- ताबें अहाँ कनिखिन अहिठाम बैसु हम अपन सखीकें भेटकें आवै छी । नवधिया     :-  कि नाम छी अहाँ कें सखी कें ? हाँस बिहुस  :- लाँल कनियां । नवधिया     :-  चलु चलु अहाँ कें सखी ओतैं घर में भेट भsजेत । ( नवधिया कें यी बात सुइन कें हाँस बिहुस बुईझ गेल की यी सब भेद लाँल कनियां हिन्का बतेलs आ सिखेलs यें । फेर ओई ठिन सें दोनोगोटा चैईल दै छैथ । घर पूगै यें तँ लाँल कनियां आउर मेनुका दोनोगोटे मिल कें स्वागत कें साथ हिन्का सब कें घर में प्रवेश करावैयें । राजा कें मालुम हैं यें जे नवधिया अबिगेल सें । तुरन्त मंत्री द्वारा आढैत पठावै यें जे हाँस बिहुस कें फूल लsकें आवै लें । मंत्री जाई छैथ कहैं लें । ) मंत्री           :-  यौं नवधिया ? नवधिया     :-  जी कहुं मंत्री जी । कहूं की ? मंत्री          :-  जे सामान लाव पठेनें रहें राजा झं      सहाब ओं सामान लsकें जल्दी कहलs आवै लें । ( एतेग कही कें मंत्री चैईल जाईछैथ । नवधिया कें तँ किछ नै फुराईयें आं नै खाना खाईयें चुपचाप मन माईर कें सुइत रहैं यें । सें देख कें हाँस बिहुस पुछै यें । ) हाँस बिहुस  :- मर स्वामीनाथ की भेल । नै खाई छी नै पियै छी आँ चुपचाप कियें मन माईर कें सुतल छी ? कहूं हमरा की भेल ? नवधिया     :-  किछ नै भेल । बात कि छै जें जै चिजलें राजा हमरा पठेनें रहें सें तँ हम लावबेनें केलियैं । हाँस बिहुस  :- कुन चीज ? नवधिया     :- हाँस बिहुस कें फूल । हाँस बिहुस  :-तँ अहाँ येतबें खातिर खटपरौन धेनें छी । अहाँ तँ हाँस बिहुस फूलकें गाछी लाबि लेनें छी । नवधिया     :-सें कोना कें ? हाँस बिहुस  :-हमरा जें आनलौं । नवधिया     :-अहाँ तँ मनुष्य छी । फेर फूल केनंग कें......? हाँस बिहुस  :-हम जें जें कहैं छी सें सें करू आँ देखुं । ( भाग - १३ ) ( हाँस बिहुस नवधिया सें कहैं छै । ) हाँस बिहुस  :- अहाँ सब सें पहनें जाउ एक सेट नवका तास आउर एकटा तन्ना लाऊ । तेकर बाद में देखूं कि सब होई छै । ( नवधिया तेजी सँ जाके एक सेट तास आउर एकटा तन्ना लाइब कें दें छै । ताही बीच में हाँस बिहुस मेनुका आउर लाँल कनियां बोलाs कें लावै छैथ ।) नवधिया   :- हें यी लियँ तन्ना आँ तास । ( हाँस बिहुस खटिया पs नवका तन्ना बिछा दैछैथ । लाँल कनियां हाँस बिहुस एक दिस आउर मेनुका नवधिया एक दिस भsकें तास खेलs ले  शुरू कsदै छै । जव कि नवधिया कें तास कें बारें में किछ नैं जानैं छैथ । बेर बेर मेनुका नवधिया के कारण सँ हाईर जाई छैथ । नवधिया आउर मेनुका के बताबती हुव लागै यें । नवधिया आउर मेनुका बिच बताबती हैत देख कें लाँल कनियां कें हसीं लाईग जाई छै । लाँल कनियां कें हसैत देख कें हाँस बिहुस कें रहल नैं जाई यें आँ वोहों हंस लागैं यें । जैं हाँस बिहुस हसैं छै तैं भैर खटिया हाँस बिहुस कें फूल भsजाई छै । अही क्रम में दोनो सखी हँस में लाईग कें हाईर जाई छै आँ नवधिया जीत लैं छैथ ।) नवधिया      :-  देखु त ऐ बेरी जीतलियै कि नैं । हाँस बिहुस  :-  जी स्वामी जी जीत गेलौं तब तँ भैर तन्ना फूल भेल । नवधिया      :-  साच्चे कतेग सुन्दर फूल छैं । हाँस बिहुस  :-  लियँ आब खेल बन्द करू जैं कें खातिर खेल खेल लें शुरू केली रहें सें काज भsगेल । आब जें छै हम अहाँ कें फूल कें माला गुइथ कें दै छी अहाँ राजा कें पुगा आबुं । नवधिया      :-  अच्छा होईतैं । जल्दी गुइथ दिअँ । ( हाँस बिहुस तुरन्त माला गुइथ कें नवधिया कें दै छै । ) हाँस बिहुस  :-  हं यी लिअँ । जाऊ राजा सहाब कें पुगा आबु । ( नवधिया हाँस बिहुस कें फूल कें माला पुगाव जाई छैथ । ) नवधिया      :- राजा सहाब प्रणाम । राजा           :- प्रणाम । आनलियै हाँस बिहुस कें फूल ? नवधिया      :- हँ राजा सहाब हम तँ फूल कें माला बना कें लाईब देलौं । राजा           :- लाबु तँ देख्बै केहेन छै । नवधिया      :- यी लियँ । राजा           :- बड सुन्दर छै । ( राजा सोचै छै हिन्का जें जें कहलियै सें सें अपन जान कें परवाह नैं कैर कें लाईब देलs सें नै हिन्का ओकर बदला में किछ देव कें चाही हमरा आउर नवधिया सें पुछै छै । ) राजा           :- कहुं नवधिया अहाँ हमर कहल सब चिज लाविदेलौं तेकर लदवा में हम अहाँ कें किछ दिअँ चाहै छी । कहुं कि लेब ? नवधिया      :- हम कि मांगब राजा सहाब अहाँ कें इच्छा । राजा           :- लिअँ जाउ हमर पुराना राजमहल में अहाँ सब रहूं आई स उ भवन अहाँसब कें भेल । नवधिया      :- हे तैं हम जाई छी । राजा           :- लिअँ तब जाउ । ( राजा बेटी कें बोलाs कें फूल कें माला दै छै । ) राजा           :- बेटी सुमैना .. सुमैना         :- जी पिता जी । राजा           :-हँ यी लिअँ हाँस बिहुस कें फूल आइन देलक । सुमैना         :- बाs कतेग सुन्दर फूल कें माला । ( सुमैना फूल कें माला राइख छोडैं यें आं बिहान सबेरे सब दिन कें नेहाइत नहां सोनां कें दुनु लाँल पहिर कें अपन जुरा में मलिनियां कें कहल अनुसार उ फूल कें माला लगाs लैयें आउर मलिनियां कें सोईर पारै यें ।) सुमैना         :- गे मलिनियां हे एनें यां । मलिनियां    :- जी राज कुमारी जी एलौं कहुं की कहैं छी ? ( सुमैना मलिनियां दिस घुईम कें कहैं छैथ । ) सुमैना         :- लें आब कहs जे हम केहेन लागै छियैं  ? मलिनियां    :- अहाँ कें सुन्दरता के तँ बयान नैं यें राज कुमारी जी बिलकुल स्वर्ग कें परी लागैं छी अहाँ मुदा....... एक चिज बिन । सुमैना         :-मुदा आब कुन चिज जल्दी कहs ? (भाग - १४) मलिनियाँ:-   राज कुमारी जी यदि अहाँके मांगमे सेनुर जब रहति तब अहाँ के सुन्दरताके बयान मत पुछु जतेक करी ओतेक कम पडति । सुमैना:-       मुदा सेनुर त' शादीसुदा नारीके सृगार अछि । हम तँ अखन कुमारी छी कोनाके पैहिरब सेनुर हम ? मलिनियाँ:-   शादी कऽ लियौं ! सुमैना :-      केकरा संगे ? मलीनियाँ:-  आउर केकरा संगे ओहे नवधिया संगे करू । सुमैना :-      मुदा ओ त' बिलकुल अनपढ गवार छथि ।हम तँ स्विकिरै छी मुदा पिता जी स्विकारतै कह् मलिनियाँ ? मलिनियाँ:- राज कुमारी अहाँ नवधियाके अनपढ गवार कहै छी ? जे पुरुष अप्पन जाँन पऽ खेल कऽ अहाँके हर ख्वाईसके पुरा केलक । हँ  मानैछी हमहुँ जे ओ अनपढ गवार छथि मुदा जे काज किन्को सऽ नही हुववाला काज ओ कऽके देखादेलक आउर संगे ओ नेक पुरा साफ बिचारके ईन्सान अछि । जहातक रहल राजा सहाबके बात , तँ हर बाप अप्पन सन्तानके खुशी चाहै छथि । जही सऽ सन्तान खुश रहें ओहे काज करै छै अप्पन सन्तानक' लेल । एक त' अहाँके पिता जी ओ राजा अछि जे ' जाँन जाए पर बचन नही जाए ' । अहाँ किए बेसी सोचै छी ? जाऊ जाके कहुँ राजा सहाब सऽ अप्पन मोनक' बात । सुमैना:-      त' बोलाए के आन नें पिता जीके। मलिनियाँ:- जरुर हम जाए छी बैलाएके लावै छी । ( मलिनियाँ राजाके बोलाएके लावै छथि ।तेकर बाद.......................................) राजा :-        की बात बेटी सुमैना आब कुन चिजके जरुरी पडल ? सुमैना :-      पिता जी अहाँ आए तक हमरा किछु चिजके कमि मह्सुस नैं हुवें देलौं । हमर मागल हर चिज अहाँ पुर्ति क'देलौं । आए पिता जी हम अहाँ सऽ अन्तिम चिज मांगीरहल छी आ हमरा पुरा बिश्वास अछि जें अहाँ अस्विकार नैं करबै हमर माग पुरा करबैन । ओना त' पिता जी जे चिज हम माग जाँरहल छी से चिज कोनों बेटा आ बेटी अप्पन मातापिता सऽ मुह खोएल नैं मागै छै । अदि यी अहाँके दृष्टीमें गलत देखाएत त' यी अबोध बेटी समैझ माफ करब । राजा :-       बाजू त' सही की माग चाहै छी ? सुमैना :-     पिता जी हम शादी करऽ चाहै छी । राजा :-       अहाँ तऽ जे हम सोचैत रही से खुद बेज देलौं । हम काल्ही खुन मंत्रीके पठावै छी निक लड्का खोजएके लेल । सुमैना :-     पिता जी लड्का खोजी करऽके जरुरी नैं अछि। लड्का अही गाँवमे छै । राजा  :-       लड्का अही गाँवमे अछि, के ? ( बिचेमें मलिनियाँ बजें लिगै छै ।) भाग -१५ मलिनियाँ:- राजा सहाब ओ लड्का आउर दोसर नै किओ नवधिया अछि । राजा :-       मुदा मलिनियाँ ओ त' शादीसुदा पुरुष अछि ।आउर हम सबकिछ जानैत कोनाके हुन्का संगमे अप्पन बेटीके विवाह कऽदी यी असम्भव छै मलिनियाँ यी असम्भव छै । मलिनियाँ:-  राजा साहब अहाँके मालुम नैं अछि ओ शादासुदा नै की ३/३टा पत्नी छै। जे की हुन्कर २टा पत्नी के जोत सँ अप्पन राज कुमारी एतेक सुन्दर लागिरहल अईछ । राज कुमारीके कान महक कुन्डल नवधियाके दोसर पत्नी लाँल कनियाँके जोत अछि तैहनती जुरामे नवधियाके तेसर पत्नी हाँस बिहुसके हँसीके जोत हाँस बिहुस फूल अछि राजा सहाब। हमरा त' लागै यें अप्पन राज कुमारी नवधियाके संगमे बहुत खुश रहति आ एहो बिश्वास छै हमरा जे ओसब राज कुमारीके अस्वीकार नैं करथि , स्वीकारथि छोट बहिन जकाँ प्रेम आ दुलार देथिन । दोसर बात त' यी राजा सहाब अहाँ राज कुमारीके बचन दऽदेनें छी । एहेन मोका फेर-फेर नही आयत माहाराज ! देखुँ ३टा पत्नी हबितो कतेक निमन सुखी संसार छै नवधियाकें । राजा :-       मुदा यी प्रस्ताव नवधियाके पत्नी मेनुका स्वीकारथि तब नें ! मलिनियाँ:- माहाराज अहाँ पहिनें प्रस्ताव त' लऽके जाऊ । अहाँके प्रस्ताव ओ कभियो नें अस्वीकार करथि । हँ देर सही मुदा हैंस हैंसके स्वीकारथि । राजा :-      ले त' मलिनियाँ तु कहै छी त' हम जरुर जायब अप्पन बेटीके खुशीके लेल नवधियाके घर ।जही में सन्तानके खुशी ओहीमे पिताके खुशी । ( राज कुमारी राजाके निर्णय सुनीके खुशी सऽ झुईम उठै छैक आ मलिनियाँके धन्यवाद दैत  सखी संगीके संग नाचे गावें लागै छै ।) सुमैना   :-  मलिनियाँ हम बहुत बहुत आभारी छियौ तोहर हमर बहिन तु जे हमर मनके बात पिता जीके कही देलें । मलिनिया:- धन्यवाद राज कुमारी जी । हमहुँ आई बहुत खुश छी राज कुमारी जी जें अहाँ हमरा अप्पन बहिनके दर्जा देलौं । अहाँके जीनगीमे हरपल सदखिन खुशीके वर्षात हुवैत रहें सें हम भगवती सऽ कामना करै छी । ( सुमैना खुशी सऽ कल्पना संसारमे पुगी जाईत छै ।) सुमैना :-      गीत ﹏ ﹏ ﹏ ﹏ आब त' बनतै दुल्हिन सखी एहो सुमैना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! माथ हमर मन्टीका सजतैं, हाथ दोनो हमर कंगना ! हिरामोती सऽ चम-चम चमकतैं सखी हमर गेहना !! देरी जुनी करू जल्दी आबू यौं हमर सजना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! घरसब नव रंग सऽ रंगतै, मडुवा सजतैं बिच अंगना ! द्वार पऽ गेट मंगल घट़ सऽ सजतैं, बजतैं ढोल बजना !! हम त' लेबैं पिया सऽ नौ लख्खा हार मुह बजना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! आब त' बनतैं दुल्हिन सखी एहो सुमैना ! पियाके मुरत देख लेल ब्याकुल छै हमर नैना !! राजा   :-  बेटी सुमैना जाऊ अहाँ लोकिन महलमे आराम करु हम जाई छी मेनुका सऽ बात करऽ ( सुमैना आ मलिनियाँ आराम करऽ महलके भित्तर जाई छथि आउर राजा चैली दैत छैक नवधियाके घर सुमैनाके शादीके बात करऽ ।) ( भाग - १६ ) ( राजा मेनुकाके घर पंहुचैं अछि । तहीं बखत दुवार पऽ नवधिया बैसल रहै छथि । नवधिया राजाके अप्पन घर आयल देखी कऽ ओ अप्पन हैसियतके मुताविक स्वागत करै छथि । लोटामे पानी लाविके राजाके पाएर पखारीके एक चटाई बिछाकें ओहीं पऽ आसन करावै छथि ।) नवधिया :- नमस्कार राजा साहब राजा :- नमस्कार नवधिया :- कहूँ राजा सहाब की जरुरी पडल जे अहाँ अपनें चलीकें हमर दुवार पऽ एलौं । कही की स्वागत करी हुजुरके ? राजा :- देखूँ पहिनें मेनुकाके बजाके लाबूं । नवधिया :- मेनुका कत छी अहाँ ? देखूँ तँ आई दरबाजा पऽ के एल्खिन यें । मेनुका :- जी हम आबिरहल छी । ( मेनुका दुवार आवै छै तँ राजाके देखै अछि आ जाँके ओ राजाकें प्रणाम करै छथि ।) मेनुका :- प्रणाम राजा सहाब राजा :- सदा सुहागिन रहूँ । बेटी मेनुका हम अहाँ सँ किछ बात करऽ लेल आयल छी । अदि अहाँ इन्कार नै करब तऽ हम कहऽ चाहै छी । मेनुका :- देखूँ राजा सहाब अहाँ हमर पिता सामान अछि आउर अहाँ हमरा बेटी कहलौं तँ किओ बेटी अप्पन पिताके बातकें ईन्कार कsसकै छै की । अहाँ कहूँ की बात अछि पिता जी ? हम अहाँके बातके एकोरति नें ईन्कार करब । राजा :- बेटी आई हम अप्पन घरके ईज्जत अहाँके खौछामें देब लेल आयल छी । मेनुका :- देखूँ पिता जी हम नैं बुझ्लूँ खोईल कs कहूँ ? राजा :- बेटी मेनुका हमर बेटी सुमैना कहै छथि हम शादी करब तँ सिर्फ नवधियासें नहीं तँ नैं । तही सऽ हम अहाँ लोकिन लँ एलौं अप्पन बेटीके खुशीके भीख माग लेल । हमर बेटीके छोट बहिनके रुपमें अपना लियँ  बेटी । ( मेनुका एकछन गुम भऽजाई छै , तेकरबाद ।) मेनुका :- नैं पिता जी एना नैं कहूँ । यी तऽ हमर सौभाग्य अछि जे हमरा आई छोट बहिन भेटल ।हमअहाँकें यी बात स्वीकार करै छी पिता जी । हमर बिचार सँ जतेक जल्दी हुवें ततेक जल्दी शादी करू । राजा :- देखूँ बेटी अहाँ हमरा पिता कहलौं तही लऽके हम दोनों घरकें जीम्मेबारी खुद लै छी । अहाँ लोकिन शादीके बिषयमें कोनो किसिमकें चिन्ता जुनि लियौ । हम स्वंम सब किछकें बन्दोवस्त करै छी । सुमैना :- जे बिचार अहाँके पिता जी । राजा :- लियँ त' आई शुक्रबार छी मंगलबारके शादीके ठिक पक्का बुझूँ । सुमैना :- बहुत निक पिता जी । राजा :- तब हम जाई छी । सुमैना :- होतैं पिता जी । ( राजा शादीके तयारी करऽ लेल अपन घर चलि जाई छथि । एम्हर मेनुका घरमें कहूँ तऽ सबमें एक किसिमके अनौठा खुशीकें महसुस भ'रहल छै । सब किओ खुश छथि । एक तऽ सुमैनाकें आबैके खुशी तऽ छेवें करथि दोसर मेनुकाकें कोखमें पलीरहल बच्चाके आबवाला दिन भी नजदिक आबिरहल अछि । तहीं सs सब किओमें खुशीके रौनक छाऽगेल अछि। ३ दिन कोना बितगेल किन्को मालुम नैं भेला । अन्तिममें मंगल दिन नवधिया सुमैना बियाहे दुल्हा बनिकें बरयातीके साथ राजाके दुवार जाई छथि । आर्य निति नियम अनुसार सुमैनाके शादी नवधियाके संगमें सम्पन्न होई छथि । अन्तबेर जहीं बेटीके राजा माँ आँ बाप दुनोके प्यार आ दुलार दऽके पोसल ओ जीगरके टुक्रा एकाएक अपना सँ दुर जाई बखत राजा अपना आपके सम्हारें नै सकै छथि । आँखी सँ नोर भह् लागै छै  आ बेटी सँ कहै छै ।संगे सब गाम समाजके आँखी नोर आबी जाई छै) समदाउन _______________ हाँ आऽ रे.... बापके दुलारी सुमैना ( पिया घर चललै-२) नहिहर बहैं सब आँखी नोर जाऊ बेटी हँसीखुशी रखियह कुलके मान आब त' पत्तियें छिय तोहर प्रमेश्वर भगवान हाँ आऽ रे... मिलि रे लियो जुली लियौ (सखी रे बहिन्पा-२) सब तकै अछि अहींके ओर जाऊ सखी जाऊ सखी साजन केर हे गाम ! सास-ससुरके  मानियेह बेटी तु  पैध भगवान हाँ आऽ रे.... बापके दुलारी सुमैना ( पिया घर चललैं-२) नहिहर बहैं सब आँखी नोर ( बरात बिदाई भ'जाई छै । जब नवधिया दुल्हीनके लऽके घरके नजदिक पहुचें पऽ  होईत रहै छै आ दुवार पऽ लाँल कनियाँ दुल्हा-दुल्हिनकें आबै के बाट तकैत रहै छै। ताही बिचमे मेनुकाके एका एक ....... ) ( भाग - १७ ) ( बरात बिदाई भ'के चलि जाइ छथि । ओम्हर लाँल कनियाँ नवधिया "भोला" आ सुमैनाके आवैके बाट निहारै छथि । सुमैनाके आविरहल खबर सुनी कँsमेनुकाके गर्भके दरद उठि जायत अछि । ) सोहर :- एक त' पिया मोरा भोला दोसर सुमैना बियाहे गेला ! ललना रे तेसरमे गर्भके दरदिया बड सतावेला रे-२ !! लाँल पियाके बाट तकै दुवार में -२ हाँस बिहुस छै कोहबर सजावै में -२ ललना रे दरदके मारे हमरा किछ नें फुराई  अछि रे-२ ! सुमैना बियाह पिया दुवार एल -२ सब सखी सुमैनाके परिछें गेल -२ ललना रे सुमैनाके राखिते पायर बोवा जन्म लेल्कै रे-२ ! लाँल खुशी झुमी कs नाँचs लाग्लै-२ देखिते सचमैना बौवाके गोदी लेल्कै-२ ललना रे हँसितें हाँस बिहुस भरी आंगन फूलेफूल भेलैं रे-२! ( सुमैनाके राखितें अंगनामे पायर मेनुकाके कोगख सँs नव राज कुमारके जन्म होएत छैथ । जेकर नमाकरन करैत अछि "अमर" । अमरकें जन्म सँ पुरा राज खुशी अछि । दिनचरिया कटैके क्रममें एकदिन मेनुकाके मनमें अप्पन मातापिताके देखएकें लेल जेबाके बिचार पैदा होएत छै मुदा यी बात केकरा कहति जें हम माँ बापकें देख जायब आ चुपचाप मन मारिके बैसल रहै अछि । मेनुकाके मन मारिके बैसल देखि कँs सुमैना पुछै छैथ मेनुका सँs ।) सुमैना:  दिदी की भेलैन जें एना मन उदास कँsकें बैसल छथि । मेनुका:  नै किछ ओहिनती बैसल छी । सुमैना:  नै दिदी जरूर किछ बात अछि जे अहाँ हमरा सँ छिपारहल छी । कहूँ की बात अछि दिदी जें अहाँ एना मन मारिके बैसल छी ? मेनुका:  बात किछो नै अछि सुमैना बस माँ बाबुके याद आबि गेल । देखके मन करै छै । सुमैना:  एतबेंटा बातमें दिदी एतेक उदास चलूं काल्हिखुन सबगोटा जबैं माँ बाबु जीके देखकें लेल । ( दोसर दिन बिहान सवेरें नवधिया संग सब गोटा चलि दैत अछि मेनुकाके नहिहर माँ बापके देखकें लेल । जब मेनुका नहिहर पहुचै छथि तँ ओहि राजके किओ नैं पहिचानै छथि मेनुकाकें ।ओहीठाम देखै छथि कत्तौ नें अप्पन मातापिताके घर नजर आवैत अछि । ततबेंमे एक नवयुवक आवै छथि आ ओकरा सँ सुमैना पुछै छैथ ।) सुमैना:  हे हौ भैय्या हेंएनें सुन तँ ! नवयुवक:  कहूँ की बात ? सुमैना:  अहि राजके राजा जे छलै ओ कतँ रहै छै आजुकल ? नवयुवक:  बहिन उ राजा आब अहिठाम नै रहै छथि । ओकर बेटीसबके बियाह भेलाके बाद हुन्कर सब राजपाट बिलैट गेल ।३ टा बेटीसबके बढिया राजघरानामें बियाह केल्खिन मुदा ऊसब तँ घुमि कँs अखनधरि माँ बापकें देखैयो लेल नै आयल । आउर एकटा बटी जे सब सँ छोट बेटी रहै हुन्का लँगडा लुल्हाके संगे बियाह कराके रातोरात अही राज सँ निकाली देल्कै । ओकर अखन धरि कोनो खबर नै जे ओ कतँ गेला , कतँ छथि । हँ एतेक सुनमें आयल अछि जें राजारानी दुनों कहानती दोसर टोलमें भिख मांगीके अप्पन गुजारा कsरहल छथीन । ( एतेक बात सुनीकें मेनुकाकें आँखी सँ नोरक' धार बह् लागै छैथ । मुदा करथि की ? सबकिओ सुमैना , हाँसबिहुस , लाँल कनियाँ सम्झावै छैथ ।दोसर दिन ओसब गरिब आ असहाय लोककें अनाज आ लत्ताकपडा दान करsके ओही गाममें काजकरम राखै छथि । असहायके गाउँमे अनाज आ लत्ताकपडा बांटिरहल छै से सुनिके मेनुकाके मातापिता भी जाइ अछि । मेनुकाके मातापिता पुरा बुढ भ'गेल रहै अछि । किन्को ओसब पहिचानें नै सकैत अइछ । मेनुका अप्पन मातापिताके वस्त्र देवके क्रममे नाम पुछै छथि । मेनुकाके पिता मेनुका दिस घुमि कँs देखै छथि.......... (अन्तिम भाग -१८) मेनुका :- अहाँ दुनू गोटाके नाम की अछि बाबु ? बृद्धबृद्धा :- हमर निम कर्मलाल आ हमर पत्नीके नाम सुस्मा अछि । ( मेनुका जैहनति नाम सुनैत छैथ तहिनति हुन्का आँखि सँ नोरक' समुन्द्र बह लागै छैथ आ अप्पन मातापिताके भरि पाँज पकरिके  कान लागै छथि । कर्मलाल  अपना दुनूगोटाके भरिपाँज पकरिके कानैत देखिके मेनुका सँ पछै छैथ । ) कर्मलाल :- बौवा अहाँ के छी ? किये हमरा दुनूंगोटाके नाम सुनीके कांन लागलौं ? मेनुका :- पिता जी हमरा नै पहिचानलौं अहाँसब ? कर्मलाल :- नै , नाम कहब तब नें चिन्हब जे अहाँ के छी ? मेनुका :- हम अहाँके छोट्की बेटी मेनुका छी पिता जी मेनुका । ( एतेक बात सुनि कँ कर्मलाल मेनुकाके मूह निहारैत रहिगेल जेनाकी ओकर बोल बन्द भ'गेल । किछ बोल नै सकिरहल आ मेनुका काँनैत पुछैत रहल । ) मेनुका :- यी की हालत बना लेलौं पिता जी ?  की चिजके कमी भेल अहाँलोकिनकें जे आइ दोसरकें दुवार दुवार पर जाँके भिख मांगे लागलौं ? कर्मलाल :- बेटी , यी सब हमर कर्मके फल अइछ । अहाँ सही कहनें छेलौं जन्म दैत अछि माँ बाप करम तँ अपनेही" सेहें भेल बेटी । अहाँके अइ राज सँ निकाललाँके वाद अहाँके दाइसबके शादी भेलाके वाद अपना महलमे उडीबिडी लागिगेल बेटी । सब राजपाट बिकागेल किछ नें रहल बाँकी । यी सब हमरा हमर करमके फल मिलिरहल छैक बेटी । हम अहाँके संगमे बहुत बड्का अन्याय केलूं बेटी । तेकरें सजाय आइ हम भोगैत छी बेटी । मेनुका :- नै पिता जी एना नैं बाजूं ।  यी सब विधिके विधान अछि । जे विधाता छठिके राति लिखि दैत छैक ओ हर प्राणीके भोगहीटा परै छै मुदा मानवके अप्पन करम करसें पाँछा नैं हटबाक चाही। माँबाप अप्पन बेटाबेटीके जन्म दैत छथि संगे पढालिखाँ दैत छैक मुदा ओ बेटाबेटीके करममे शुख चायन लिखल नै अछि तँ ओ बेटाबेटी अनैतिक काजमें संलग्न भ'के नैतिक करम करs सँ चुकी जायत रहै छैथ जेकर नतिजा जिनगीभर भोग पडै छैथ ।चलूं पिता जी आब घर जाएत छी । ( ओहीठाम सँ मेनुका अप्पन मातापिताके ल'के  संगे सबगोटा अप्पन राज आवै छथि आ फेर स' खुशीके जीवन बितावें लागैं अछि ।) जन्म दैत अछि माँ बाप करम तँ अपनेही (समाप्त) ओम प्रकाश झा सामंत साहेब आफिससँ निकलि क' कतौ जाइत छलाह। चपरासी हुनकर वातानुकूलित कक्षक दरबज्जा खोलि क' ठाढ़ भ' गेल। दोसर चपरासी हुनकर बैग ल' कए चलल। बाहर बत्ती लागल कार लागल छल। कारक चालक कारक गेट खोलि ठाढ़ छल। अप्पन कक्षसँ कार धरि पच्चीस मीटरक दूरी साहेब पाँच मिनटमे पहुँचि गेलाह।ओतबा दूरमे कतेको मुलाजिम ठाढ़ छल आ सलामी ठोकने जा रहल छल।साहेब मूड़ी हिला क' जबाब दैत कार धरि गेला आ शानसँ गाड़ीमे बैसि गेला। कार ओतयसँ चलि क' शहरक टाउन हाल पहुँचल। साहेब गाड़ीसँ उतरलाह तँ ढ़ेरी लोक सलामी ठोकैत आगाँ पाछाँ करैत हुनका भीतर ल' कए चलि गेल। आइ ओतय "सामंतवादक प्रभाव आ नब सामंतवाद" विषयपर एकटा गोष्ठी छल आ साहेब मुख्य अतिथि छलाह।सामंतवादक दुष्प्रभाव आ ओकर आतंकसँ जकड़ल समाजकेँ नब रस्ता देखेबा लेल साहेबक भाषणक प्रतीक्षामे हुनकर जिंदाबादक नारासँ पूरा हाल गुंजायमान भ' गेल। जस जस सुरसा बदनु बढ़ाबा रामलाल आइ बड्ड खुश छल। कंपनी ओकर दरमाहा बीस हजारसँ बढ़ा क' बाईस हजार क' देलकै। ओ कनी मधुर कीनलक आ घर आबि ई सूचना अपन घरनीकेँ देलक। घरनी खुश होइत बाजलीह -"ई तँ बड्ड नीक भेल। दुनू बच्चाक इसकूलक फीस अही माससँ दू दू सय टका बढ़ा देलकैए। हमर होली आ दीवाली दुनूकेँ साड़ी बकियौता अछि। माँजीक दवाय पछिला मास नै कीनाएल छल सेहो कीना जेतैक। बनियाक बकियौता सेहो........." "हे यै चुप रहू।" रामलाल घरनीकेँ बीचहिमे टोकलनि-"एखन धरि अहाँ तीन हजारसँ ऊपरक खरचा जोड़ा देलौं, जखन की दरमाहा दूइये हजार बढ़ल अछि।" घरनी कहलकनि-"एखन तँ आरो खरचा सब छै।" रामलाल चुप भ' मूड़ी पर हाथ ध' बैसि रहलाह। हुनका रामचरितमानसक चौपाई मोन पड़ि गेलनि- जस-जस सुरसा बदनु बढ़ाबा तासु दुगुन कपि रूप देखाबा मुन्ना जी लघुकथा आ विहनिकथा- तुलनात्मक विवेचन पढ़बा लिखबा सँ पहिने सुनबा गुणवाक परिपाटी छल.जे परिपाटी मनुक्खक पशु सँ भिन्नता पविते प्रारम्भ भ' गेल हएत.मुदा से आदि मानव मे नै रहल हएत.ई सौभाग्य त' मनुक्खक विकसीत रूपें के भेटल हेतै . प्रारम्भ मे एक दोसराक बीच कह- सुनी आ ओकरा तेसर - चारिम.....लोक लग कहि के सुनेवाक क्रम बनि गेल.ई क्रम ता धरि चलैत बढ़ैत रहल जा धरि पढवा लिखवाक परिपाटी नै बनल.इएह श्रुति- वाचनक क्रम कोनो घटना विशेष कें एक लोक सँ दोसर लोक तेसर, चारिम......होइत समूह मे पसरल.एक समूहक दोसरा समूहक बीच कथ्ये वा वाक्ये आगाँ बढैत गेल.उएह विभिन्न कथ्य कालान्तरे कथाक रूपें सोझाँ आयल. मैथिली मे भाषाइ विकास त' प्रारम्भिके चरण सँ देखार भेल मुदा कथा लेखन सुषुप्त रहल.सुषुप्ते ना वरन् धुमिल वा पछुआएल रहल.मौखिक कथा त' पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होइत रहल मुदा लिखित कथाक उपस्थिति शुन्य सन रहल.ऐ सँ ई साबित होइछ जे मैथिली मे साहित्यिक लुरिक अभाव वा शुन्यता पसरल छल.तकर एक कारण इहो भ' सकैए जे मैथिलीक प्राम्भिक चरण मे बजबाक भाषा त' मैथिली छल.मुदा पढ़बा - लिखबाक भाषा संस्कृत वा उर्दु छल. सब कागजी काज ओही माध्यमे होइत रहल.समयान्तरे ओकर स्थान अँग्रेजी लेलक.कम पढ़ल- लिखल लोक संस्कृत वा उर्दुक ज्ञान नेने छलाह वेशी पढ़ल - लिखल लोक अँग्रेजी भाषा अंगीकार केने छलाह.जिनका मे साहित्यिक अभिरूचि शुन्य छल. मैथिली मे संस्कृतक प्रभाव रहल आइयो ओही भाषाक मूल मे मैथिली साहित्य टीकल ऐछ. प्राय: इएह कारण रहल हएत जाहि सँ मैथिलीक प्रारम्भिक लेखन अपन भाषिक मूल रचना सँ नै भेल.प्रारम्भिक लेखन विद्यापतिक संस्कृत मे लिखल ' पुरूष परीक्षा'क मैथिली अनुवाद सँ भेल.तकर मुख्य कारण छल- तत्कालीन मिथिला मे जाहि वर्गक प्रभाव छल हुनक शिक्षा आ सनातनी रोजगारक ( यथा- पुजा- पाठ)भाषा संस्कृत छल.गैर पुरोहित वर्गक भाषा मैथिली मात्र छल. मैथिली विद्वानक वा आलोचकक मतानुसार इअह मुख्य वा विशेष कारण रहल जे मैथिलीक पहिल साहित्यिक मूल रचना गैर पौरोहित वर्गक रचनाकार रासबिहारी लाल दासक उपन्यास " सुमति " (1918) सँ प्रारम्भ भेल. समयान्तरे मैथिली साहित्यक विकास भेलोपरान्त ऐ भाषाक साहित्य पर ओही पौरोहित्य वर्गक आधिपत्य भ' गेल. ओही ठाम सँ एकर विकासक बजाय क्षीणता प्रारम्भ भेल. [4/26, 8:02 PM] manojkumarkarn71: विद्यापति संस्कृत मे अनेक ग्रन्थक रचना कएलनि, मुदा चन्दा झा ताहि मे सँ अनुवाद करबाक लेल चुनलनि- " पुरूष परीक्षा " के.अहि प्रकारें मैथिलीक पहिल कथापोथी पुरूष परीक्षा मानल जा सकैए.--- मोहन भारद्वाज, मैथिली कथाक विकास, सा. अकादमी- २००३ सं. वासुकीनाथ झा. पहिने पौराणिक खिस्सा लिखाइत छल. साहित्य विधा मे ओतर नाम छल- नाटक.पद्य मे भेलत' काव्य.कहल गेल त' खिस्सा, कहबाक शैली मे लिखल गेल त' उपाख्यान भ' गेल.श्रुतकथा वा गढ़ल कथा के लेखक जँ अपन शब्द मे लिखलनि त' ओ कहएल मौलिक रचना.एहि तरहें मौलिक कथाक पहिल रचना- काली कुमार दासक " भीषण अन्याय "(१९२३) के मानल गेल. उपरोक्त स्थिति मैथिली कथासाहित्यक प्रारम्भिक चरण के परिलक्षित करैए.कथाक विकास यात्रा के एक टा नव मोड़ देलक- रमानाथ झा द्वारा एकरा अंग्रेजीक SHORT STORY कहि फरिछेवाक पछाति. कथा वा गल्पक आब विकसीत रूप सोझाँ आबय लागल.आ उएह कहएल मैथिली लघुकथा ( Maithili Short Story)ऐ सँ पहिने रचनाकार लोकनि एकरा अंग्रेजी मे Story कहि संबोधित करैत छलाह.जनतब करबैत चली जे- Story यानी  ' कथा ' वा कहानी त' साहित्यिक दुहू विधाक सभ प्रकार माने की उपन्यास, कविता , नाटक.....आदि मे उपस्थित रहैछ.बिना कथांशक त' कोनो रचनाक अस्तित्वे नै मानल जा सकैए. वस्तुत: आधुनिक मैथिली लघुकथाक विकास स्थुलता सँ  सुक्षमताक विकास छी,भावुकता सँ तटस्थताक विकास छी, आदर्श सँ यथार्थक विकास छी. परञ्च आधुनिक मैथिली लघुकथाक प्रेरणा भूमि युरोप, विशेषत: अंग्रेजीक लघुकथा साहित्य रहल ऐछ, सेहो निर्विवाद ऐछ.कथा साहित्य कहला सँ कहानी / कथा/ गल्प ओ उपन्यास दुनूक बोध होइछ.किन्तु मात्र कथा सँ कहानी अथवा गल्प केर बोध होइछ. अंग्रेजी मे ऐ लेल मानक शब्द ऐछ-Short Story.मायानन्द मिश्र- मैथिली कथाक विकास सं. वासुकीनाथ झा.सा.अकादमी- २००३. रमानाथ झाक Short Storyके लघुकथा कहि  विवेचनक पछाति मैथिलीक कथा/ गल्प लधुकथाक रूपें प्रकाशित होइत रहल.सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Maithili Short Story लिखल भेटत.एखन धरि मैथिली मे हजारो लघुकथा आ सैकड़ो लघुकथा संग्रह(Collection Of Maithili Short Story)मैथिली मे विद्ययमान ऐछ. एखन धरि विभिन्न विश्वविद्यालय सँ अाठ गोटे मैथिली लघुकथा (Maithili Short Story). पर शोध क' चुकलाह ऐछ.लघुकथाक नवम शोधार्थी छथि- अनमोल झा, जे सम्प्रति तिलका माँझी विश्वविद्यालय सँ लघुकथा( Short Story)मेशोधरत छथि.ओना हुनक लघुकथा कथ्य, शैली एवं लेखकीय तकनीकी वी सुक्ष्म दर्शीयें विहनिकथा (Seed Story)क समकक्ष बुझाइए.ओ एकर शोध श्री केष्कर ठाकुर जीक निर्देशन मे क' रहलाह ऐछ ! त' जहिना आन सब प्रोफेसर/आलोचक/ संपादक मैथिली लघुकथाक आधिकारिक आ ऐतिहासिक मानदण्द के बिसरि वा अज्ञानता रहि हिन्दीक लघुकथा के मैथिली मे लघुकथा बुझैत रहलाह तही मे सँ श्री केष्कर ठाकुर जी के सेहो देखल जा सकैए. भारत सरकारक साहित्य अकादमी सबतरि मैथिली कथा/ गल्प के लिखित आ मौखिक (मंचीय उदघोषणा)रूपें  मैथिली लघुकथा कहि संबोधित करैत आबि रहल ऐछ.मुदा साहित्य अकादमी सँ मैथिली लघुकथा संग्रह छपेनिहार / पुरस्कार पेनिहार कहियो विरोध नै केलनि आ लाभान्वित होइत रहलाह.तहू सँ हास्यास्पद बात जे मैथिली लघुकथा संग्रह पर देवनागरी मे- कथा संग्रह आ English मे Collection of Maithili Short Story छपबैत रहलाह .आ स्वघोषित विद्वानक दर्जा पबैत रहला.भारत सरकारक साहित्य अकादमी सँ मैथिली  लघुकथा संग्रह के पहिल बेर १९८७ मे पुरस्कृत हेबाक सौभाग्य प्राप्त भेल छल.  ई लघुकथा संग्रह छल- ' अतीत' लघुकथाकार छलाह- उमानाथ झा  लघुकथा    लेखनक प्रारम्भ सँ ९८ वर्षक पछातियो स्वघोषित /पेटपोषित सब अपन इरखे नाङरि कटबैत दोसरो कथ लेखक के दिशारहित.....करैत रहलाह. मैथिली मे लघुकथाक स्पष्टीकरणक पछाति आब विचार करी ऐ सँ विलग '  बिहनिकथा '  पर ' बिहनि' माने बीया. जेना एक टा बिहनि अपन कतेको प्रक्रिया सँ गुजरि एक टा संपुर्ण गाछक सामर्थ्य रखैए. तहिना बिहनिकथा (माने-  बीजकथा- हिन्दी,Seed Story in English)अपन सब रूपें यथा- कथ्य, शिल्प एवं सिरखारी  सँ एक टा संपुर्ण कथाक प्रतीक ऐछ. ने ओ लघुकथाक छोट रूप छी, ने छेँट ने अखरकट्टु. अपन सब कशीदाकारीक संग पुर्णत: भरल- पुरल कथाक सामर्थ्यवान रूप ऐछ विहनिकथा(Seed Story)  एत' जाहि बिहनिकथाक विवेचन क' रहल छी ओहि नामक पदार्पण भेल ऐछ- बीसम सदीक अन्तिम दशक मे. एकर खगता हमरा ऐ दुआरे भेल जे पहिने सँ मैथिली मे कथा/ गल्प लघुकथा लिखाइते छल आ किछु मैथिलीक अज्ञानी विद्वान हिन्दीक लघुकथा के सेहो मैथिली मे लघुकथा लिखै छलाह जाहि सँ दुनूक पहिचान संकट मे बुझएल.अही खगता के पुर करब लेल वा दुनू के विलगा दुनूक अस्तित्व बचा के रखबा लेल.भिन्न नाम द' आगाँ बढ़ाओल गेल. ऐ सँ पहिने मैथिली मे बिहनिकथाक लेखन ' हिन्दीक देखाउँसे लघुकथा नामे  होइत आबि रहल छल.तकर मुख्य कारण छल- तत्कालीन बिहनिकथाकारक.दुरदृष्टिहीनता वा अज्ञानता.ओ सब  लौल क' वा नकलची बनि एकरा लिख' चाहलाह.पाठक के सेहो नव चीज भेटलै त' एकर स्वागत हएब स्वाभाविक छल.ओ सब अंधानुकरण क' लिखब शुरू केलनि छोट आकारक कथा.आ पहिने सँ मैथिली मे लघुकथा विद्यमान रहितो ऐछोट अकारक कथा के सेहो नाम देलनि लघुकथा.(Short Story)सत्यत: ई हिन्दी सँ उधार लेल गेल शब्द छल.हिन्दी साहित्य जेना अँग्रेजी साहित्य सँ आच्छादित ऐछ तहिना मैथिलीक किछु रचनाकार हिन्दीक अन्धानुकरण क' अपन जग्गह बनेबा लेल संघर्षरत देखल जाइ छथि. असल मे हिन्दी कथाकार हिन्दी मे Story के कहानी नामे लिखैत रहलाह...! जहन खलील जिब्रान वा अन्यान्य अंग्रेजी रचनाकारक देखा देखी छोट अकारक कथा हिन्दी मे लिखए लागल तहन हिन्दी बला  सब अंग्रेजीक Story क स्थान पर Short Story लघुकथाक नामकरण केलनि. मैथिली रचनाकार लेखन शैलीक संग एकर नामो के अंधानुकरण क' एक टा हास्यास्पद काज केलनि.तकर मपख्य कारण छल- तत्कलीन रचनाकारक दृष्टि फरीछ नै हएब. ओ सब हिलसि क' अंधानुकरण क' आत्मिक प्रसन्न भेलाह जे एक टा आओर सफलता .....लीक सँ हँटि क' भेट गेल. जनतब दी जे जहिया हिन्दी मे लघुकथा लिखब  शुरू भेल( उन्नैसम सदीक मध्य) तहिया मैथिली लघुकथा( कथा/ गल्प,Short Story) जे हिन्दीक कहानीक समकक्ष छल, लेखनीक प्रारम्भिक अवस्था मे छल. माने जे मैथिली साहित्य आओर सब दोसर भाषाक समर्थ्य साहित्य मध्य पछुएल रहैए.तकर मूल कारण ऐछ जे मैथिलीक रचनाकार मे वेशी( सब नै) साहित्य/ इतिहास / व्याकरण सँ अज्ञात रहि अपन साहित्यिक दृष्टि कें वा अस्तित्व के मिथिला मैथिली सँ बहरेवाक चेष्टा वा सोच नै रखै छथि .एहि मूल कारणे मैथिली साहित्य आओर साहित्यकार आन भाषा साहित्यक रचनाकारक तुलने सब सँ नीचला पौदान पर देखाइ छथि.उदाहरण स्वरूप पंजाबीक ' मिन्नीकथा' हिन्दीक लघुकथाक संग फरिछा गेल.से ओइ भाषाक रचनाकारक दूर दृष्टिक प्रभाव छल. पंजाबी लघुकथा कहियो ' लघुकथा' नामे नै लिखा ' मिन्नीकथा नामे शुरू भेल.(किएक त' पंजाबी कहानी  आधिकारिक रूपे लघुकथा कहाइए. ) आइयो ओही नामे अपन स्वतंत्र अस्तित्व पावि चुकल ऐछ.तहिना हिन्दीक लघुकथा वांग्ला मे ' ए मिनिटेर कथा ' संस्कृत मे लघ्वी आदि संपुर्ण अस्तित्व मे ऐछ.मैथिली सँ दबल/ पछुएल भाषा ओड़िया मे सेहो हिन्दीक लघुकथा क्षुद्रकथा( खुद्रकथा) नामे लिखाइछ. तहन की मैथिली मेअपन शब्द भंडार नै की मैथिलीक रचनाकारक ओतेक अवगति नै जे हिन्दीक लघुकथा मैथिली मे अपन स्वतंत्र नामे किए नै? हमहू अपन लेखनीक प्रारम्भिक चरण मे लघुकथा शब्दें विहनिकथा लिखब शुरू केने रही. कहबी छै' जे देखतै कुलपरिवार से सीखतै रीति व्यवहार ' साहित्यकुलक अग्रज सब सएह करैत अबै छलाह.किछुए दिनक पछाति मोन मे हिन्दीक अंधानुकरणे लिखल जाइत लघुकथाक जग्गह पर शुद्ध मैथिली शब्द हेबाक जिज्ञासा जागल.ऐ नाम के जनौलनि मैथिलीक स्थापित कवि, चर्चित लघुकथाकार एवं विहनिकथाकार श्री राज.फरवरी 1995 मे 'सहयात्री मंच' लोहना( मधुबनी) क साहित्यिक विमर्श लेल भेल बैसार मे हम  ( मुन्ना जी)   ' बिहनिकथा ' शब्दक स्वतंत्र नामक प्रस्ताव रखलौं. जकरा सहृदये श्री राज द्वारा समर्थनक संग उपस्थित सब रचनाकारक समर्थने/ सहयोग ऐ नाम के सर्वमान्य घोषित कएल गेल.आ तहिया सँ हिन्दीक लघुकथाक कथ्य/ शिल्प मे म लिखल जाय बला मैथिली लघुकथा ' बिहनिकथा नामे लिखाइत आबि रहल ऐछ आ लघुकथा(Short Story) ओहिना मैथिलीक गल्पकथा बनल रहल जे अपन स्वतंत्र अस्तित्व मे सामाजिक और सरकारी संस्थागत मान्य ऐछ. बिहनिकथा(Seed story)स्वयं मे कथाक पुर्ण रूप ऐछ. सामान्यतया लघुकथा(Short story) कतेको विन्दु के छुबैत/ समेटैत पाठक के अपन उद्देश्य बतेबा मे सक्षम भ' पबैए.ओकर विपरीत  ' बिहनिकथा ' (Seed Story)पाठक के एक खुट्टा पर खुटेसल सन राखि अपन सार्थकता के एके क्रम मे बेकछा लेखकीय मन: स्थिति के फरिछा दैछ.आ पाठकक मगज मे ऐनमैन स्थिर भ' समा जाइछ .  मैथिली लघुकथा आ मैथिली बिहनिकथा के मुख्य रूपें जे विलगबैए ताहि मे महत्पुर्ण तथ्य ऐछ- जे मैथिली लघुकथा (Maithili Short Story)क शुरूआत संस्कृतक मूल रचनाक उल्था(अनुवाद) सँ प्रारम्भ भेल. जहन की बिहनिकथा मैथिलीक मूल रचना सँ प्रारम्भ भेल. मैथिली लघुकथाक विकास कतेको चरण पार क' भेल.जहन की बिहनिकथा जनमहि सँ स्वतंत्र अस्तित्व मे आयल.आ अल्प समय मे बिहनिकथाक कतेको प्रारूप यथा- प्रेम बिहनिकथा, भुतहा बिहनिकथा, बाल बिहनिकथा सहित कुल१२ गोट पोथी आवि चुकल ऐछ. बिहनिकथा आलोचनाक पहिल पोथी ' अर्द्धविराम ' शीघ्र प्रकाश्य ऐछ.एकरा फरिछाबे मे सब सँ महत्वपुर्ण योगदान ' मैथिली पाक्षिक विदेहक बिहनिकथा विशेषांक ,अंक - ६७ रहल. बिहनिकथाक एकल एवं सामुहिक पोस्टर प्रदर्शनी लगाओल गेल .जे मैथिली कथा साहित्यक इतिहासक पहिल सफल प्रयोग ऐछ.बिहनिकथाक एक टा मजगुत कड़ी रहल फरिछएल मानसिकता बला रचनाकारक आगू आयब.जहन की हिन्दी लघुकथाक घेर मे फँसल  किछु रचनाकार बेर - बेर बिहनिकथा पर अपन अज्ञानता थोपबाक असफल प्रयास करैत रहलाह. आब प्रारम्भ सँ  तेसर दशक मे आबि कतेको उतार- चढ़ावक संग आगाँ बढ़ैत अपन स्वतंत्र नामे  स्थान पौलक. बीहनि कथा- कोठा वाली -- गै विमला,हे ओइ गाछ मे लगा ई नुआ बान्हि दही. -- किए गै ? -- देखै नै छीही, किछु पुरखाह लोकक नजरि एम्हरे छै. -- रौ बाँहि , पोखरीक घाट पर त' इहो सब ओहिना परदा करै छै जेना आन जनि जाति ! -- हे, सब पुरूख छेछराहे होइ छै , नै ? -- यै, अहाँ सब त' उघरल वृत करै छी, तहन लाज ? -- जी, कोठा पर , बन्न घर मे ! " कोठा सँ बहरी ओहिना बुझू जेना आन मए- बहीन " ! बीहनि कथा- बॉस -- सप्ताह भरि सँ चलि रहल बॉसक पी.ए लेल साक्षात्कारक आइ खत्मी दिन ऐछ. कॉलबेल बाजल.....! -- किरानी बाबू , साहेबक केबिन मे फाईल खोलैत-- नाम रीतिका, उमेर- १९ बरख..... -- बॉस तमसाइत -- " हमरा साक्षात्कारक रिपोर्ट नै, ओ लड़की चाही !" -- सर ! ओ फ्रेसर ऐछ ! -- बॉस हम छी की अहाँ ? -- सर !बॉस त' अहीं ने . -- प्रशिक्षणक जिम्मा हम्मर ,एक सप्ताह मे एहेन ट्रेण्ड क' देबै जे ओ अपन घर घूरनाइ बिसैर जएत ! -- जी , उपस्थित करै छी ! बीहनि कथा- बहिंगा -- हें...हें...हें...आब बुझही, भगवानक घर देर छै , अन्हेर नै ! -- गै, दुखक घरी मे चौल कीए करै छें ? -- हम चौल नै करै छीयौ गै, मोन पड़ल पुरना बात - माइकेल के दुर्घटना मे टांग टुटला सँ तों सगाइ के लेल मना क' देने रही. ओ हृदय सँ तोरा चाहै छलौ...! आब इ त' पुरे दिव्यांग भ' गेलखुन , त' छोइर दोसर विआह क' ने ले ! -- गै विआह सँ पहिने कतेको दुआरि खुजल रहैए, आव त' विआहि गेलौं. " ओ आन छल , ई त' अपन छथि,ओकरा उघि बताहि कहइतौं, हिनका उघि पतिव्रता ! बीहनि कथा- झोल -- जा.....! यौ पुरहीत अहाँ त' सब टा गल्तीये पढ़ने जाइ छी. -- चुप्प ! तों की जान' गेलें संस्कृत.हमर त' इ खानदानी पेशा छी. -- यौ पुरहीत , हमहु संस्कृते सँ एम.ए केने छी. आ पुजा विधान सेहो अवैए. -- हेहरै, पुजि ने ले अपने. -- नै , बुजुर्ग सब कहै छथि- पुरहीते के पुजेने पुजाक पटि. -- त' सीखा नै, हम संस्कृतक पंडित नै ,मुदा जनउ रखने छी. -- ' हमरो एक टा जनउ देने जाउ, अहाँक भार हल्लुक ! बीहनि कथा- पटकनिया -- हाँ....हाँ...भगा....भगा छुतएत सब टा . -- मालिक बड्ड भूख लागल ऐछ, खए दियय ने. -- कने काल विलम सब खा क' उठतै त' सब टा ऐंठ समेट खाइत रहिहें. -- ऐंठ.....गीजल गाजल, उँह...! -- रौ , तोरा त' लोक गाम सँ बाहर वास देने ऐछ आ तों तकै छें निरैठ ! -- मालिक- हमरे बीनल वासन सँ सबहक शुभ / अशुभ काज पुर होइए, आ हम अछुत ? -- रौ, ओइ वासन सब के गंगाजल सँ सिक्त क' काज पुर करै छी. -- ओकर आँखिक चमक बढ़ि गेलै, मुस्किएल मालिक- हमहू अहींक पतियानी मे बैस जाइ छी. " हमरो गंगा जल सँ सिक्त क' दियय ने ." प्रेम बीहनि कथा- असरा बेरहट लए किछु देलकै ? हँ ,बान्हि देलियै . हम जाइ हियै....., नै सुनलकै की ? सुनि गेली ,मुदा हमर मोन करै है जे आइ नै जेतै से नै हेतै ? आइ मासक अन्तिम तारीख हइ, जएह एक दिनक खोराकी के पाइ त' बढ़ि जेतै. ओना मोन त' हमरो आगू - पाछू करैहए. ई कहतै बलू त' रहि जेबै! सब दिन त' एकरा थाका हारी रहिते हइ, आ घर अबै हइ त' बाले बच्चे सोहरल. हमरा लेल एकरा पलखति कहाँ रहै हइ. ईह.....! हम की भरि दिन खटै हियै अपने पेट खातिर! हे , पेट त' सबहक कोनहुना भरिए जाइ है. ई खाली, पेटे के सोचैत दिन, मास, बरख बितबैत रहओ. हम एकर पलखतिक असरे तकैत रहि जाइ हियै. आ एकरा लेल धानि सन! एह.....! हमहू त' कहिया स' उहे बाट तकैत रहियै. हे , एने आउ ने...... केवाड़क विलइया ठक सँ उठल ! प्रेम बीहनि कथा- संगबे अगिनवाणक फोँका जकाँ बड़बड़ा उठल रहै नेहक लावा. कुलीन रहबाक कारणे नै कोइ बजै, आ नहिये कोइ रोकि पौलकै. दिन...... दुपहरिया सौंसे गाम सोरहा भ' गेलै.....! सुरूजक ताप सन उठल ज्वारि चान उगवा धरि चाने सन सेरा गेल रहै. मुदा ता धरि छओंड़ाक शोणितक टघार....मुँह मलिन क' देने रहै.छओंड़ी अपन ओढ़नी सँ ओकर फुटल कपार के झँपने....! गामक चारू भ'र सँ सगरोक लोक जुमि गेल रहै. सब कियो बिन माँगल सलाह देब' लगलै-....! दुन्नू के गोली मारि दे....! नै, छओंड़ी के भगा के छओंड़ा अनलकौ, एकरे गाछ मे टांगि दे, गरदनि मे गमछा लगा के. पंचायतक बैठार भेलै ,फरमान सुनएल गेल.... " छओंड़ा के काटि के गाड़ि दे !" छओंड़ी विहुँसैत पुछलक - 'आ छओंड़ी के ?' माय - बाप केधमका के  सुनझा दही. नै, किन्नहुँ नै. छओंड़ी तमकि उठल- " जेबै त' दुन्नू, जीबै त' दुन्नू ."

प्रेम बीहनि कथा- छुच्छ दुलार समस्त युवा युवती सँ अपील-" जाति- पाति, रंग- भेद, धर्म - कर्म सँ उपर उठि देशक सर्वांगिन विकासक लेल सोचै जाउ." की यौ......, आइ त' बुझाइ छल  जे कोनो बड़का पाटीक बड़का नेता भ' गेलौं अहाँ . यै , हम समाजक सब रूढ़िक रीढ़ के तोड़ि नव समाज बनेबाक संकल्पित छी. आ ताहि मे अहाँ सनक उच्चकोटिक विचारवान महिला चाही, संग पुरवा लेल. सेआइये मात्र नै, जन्म जन्मांतर धरि. 'खाउ सप्पत....अहाँ संग देव, जीवन संगिनी बनि. ' ' हे भाषण छोरू, पुइछ आउ अपन पुरखा के, हमर जातिक लोक अहाँक जाति मे मिझ्झर हएत. ? ' वाह! ओइ छओंड़ाक नमहर- नमहर लच्छेदार शब्द आ वाक्य माइक आ मंचे पर तक रहि गेलै. केना नयना मे घुइस हृदय मे उतरै लए उताहुल छल! हमर जाति सुनि ओकर आँखिक पानि उतरि गेलै. 'नीक भेल जे हमर हीयाक हीत हिया मे बाँचल रहि गेल, अप्पन लोक लए.' " नै त' प्रेमक फाँस मे फँसा हमरो घीना छोड़ैत आ अपन बाप पुरखा के सेहो "

प्रेम बीहनि कथा- दिहलगड़ि टेंगरा, पोठी, ईचना लै जाऊ...! कोना दै छीही गै ? लू ने मालिक , जे टका दै के मोन होत से द' देबै.साँझ झलफलाइ है.फेनो घरो घुरै के है. एँ गै, तों जे दिन राति खटै छें से तोहर मरद'बा की करै  छौ, कहाँ छौ ओ ? ओ घरे मे रहै है मालिक. किए गै ओ मरद छौ की तों  ? मालिक ओकरा घुमै फिरै मे असोकर्ज होइ है, तें भानस भात आ बाल बच्चा उएह देखै है " मुनहारि साँझ हो गेलै हम कखनी से एकर असरा मे ओसारा पर बैसल हीयै.ई मौगी भ' दुरे दुरे जा खटै है आ हम,बाल बच्चा आ भनसाघर मे लागल रहि जाइ हियै की विधनाक लिखल है से नै जानि" ई हदियाइ किए है, मनसा आ मौगी असगर मे त' अधुरे रहै है पूर त' तहन होइ है जहन दुनू एक भ' काज पुरवै है. हम करियौ की ई करौ, बात त' बरोबरिये ने बुझौ. "आ हे , दुनू गोटे बलू सब खन घर मे रहौ की नै रहौ,एक दोसरा के हिया मे त: बसले रहै है न'.  !

प्रेम बीहनि कथा- उफाँटि ओह...! केहेन निर्मम हत्या भेलै ओकर. के केने हेतै एहेन काज ? छओंड़ी जतबे सुन्नर ततबे सुशील सेहो छलै.तहन ककरो सँ दुश्मनीयो त' नै हेतै! यै, सुन्नर आ सुशीलक संग भरल पुरल जुआन सेहो छलै. हँ से त' छलैहे. त' ककरो सँ ....रंगरभस के फेर मे भेल हेतै ! यै जहन सभ चीज सँ भरल पुरल छलैहे तहन ककरो हिया मे त' बैसिये गेल हेतै ने. नै यौ,एकक हिया मे पैसल रहितै तहन ने अ'ढ़घात सँ दोसरो जँ नजरि गड़ेने होइ ? सब टा दोष छओंड़े के किएक ? जँ छओंड़ीयो सिनेह के पीयो फेको वासन जकाँ बुझैत होइ ! पकड़ा गेलै......पुलिस पकैड़ लेलकै. ककरा यौ ? हत्यारा के! के छै ? ओकरे प्रेमी !

प्रेम बीहनि कथा- जुड़बन्हन गेंठजोड़बा क' दियौ ....! देखब यै कनिया , एम्हर ओम्हर नै भागथि. ककरा भगै के गप्प करै छी यै, कनिया के की वर के ? मनगर त' दुनू ने. मुदा मौगी त' जाँतल मोने रहि जाइए पर मनसा....हुलकाह बुझू. किए यै, मौगी के मोन कोनो मनसा पर नै जाइ छै की, सत्ते कहू त ' ? यौ, ज' से नै होइतै त' मनसा मौगीक प्रयोजने कोन ? मनसा मनसाक संग आ मौगी मौगीक संग रहि लैतै. तहन अहीं कहू बन्हन सँ की हएत ? हँ यौ इहो बात त' सत्ते ! " नुआ , धोतीक बन्हन सँ मोन नै बन्हाइए. मोनक बन्हन लए हिया सँ हियाक मिलान चाही " प्रेम बीहनि कथा- निंघेस 

गै दइया गै दइया, कहू त' एकर सपरतिब. ई रहत केठरीक भीतर विलइया ठोकि के , आ हम रहू टुग्गर- टापर जकाँ ढेंगराइत. मनसा त' पहिने हमर , तहन ने ओकर. पहिने प्रेमालाप! तहन देहक  भूख.....निवारण.कहियो ऐ सब मे असोकर्ज नै हुअ' पबै ताहि लेल  दिन राति अपना के समर्पित क' रखने रही यौ, अहाँक प्रेम फाँस मे फँसि दुनू गोटेक जुड़बंधन भेल छल. .आ हम तकर निवहता आइ धरि करैत रहलौं. मुदा अहाँ....अहाँ त' स्वर्गक सुख देखा नरक मे धकेल देलहुँ. "गै, ओ हमरासँ   प्रेम केलकै आ हमहु ओकरा सँ......!" तखने दुनू एक भेलियै.आ तों त' आब देह सँ पुरान भ' गेलेँ. गै दइया गै दइया, हम पुरान भ' गेलियै आ एकर देह त' नवे धएल छै. हँ गै. त' ई कहौ जे आइ दोसराक प्रेम मे अपन अछिंजल सँ ओकरा सिक्त क' रखतै.आ काल्हि फेर तेसर.फेर....कतेक दिन धरि अपन अछिंजल सँ नवकी - नवकी छओँड़ी के घोंकि- घोंकि के छोड़ैत रहतै. ' जाधरि देह मे हुव्वा रहत!' आ ओउ निँघुछल.मौगी सबहक की हेतै ? ओहो सब हमरे जकाँ नवका प्रेम जाल बुनतै.....! बाढ़ैन नै मारतै ओहोन  सिनेही के.....? " बाढ़ैन मारौ की खापड़ि, डेग त' चुकि गेलै."

प्रेम बीहनि कथा- बखरा मुन्ना जी उँह........! की भेल.  ? अहाँक दाढ़ी गड़ैए . हा....हा....हा !नीक चौल केलौं. पहिने त' बिन काटलो दाढ़ी नै गड़ल कहियो.   आ आब.....! आब बौआ भेलै ने . " त' की, बौआ भेने हमर गाल मे काट उगि गेल की ." से नै यौ......! आ की हमरा लेल अहाँक हृदय मे पाथर समा गेल ? नै यौ, सिनेह त' आब बौओ के चाहियै ने . हँ, समय अलग - अलग हेतै . नै , हमरा अहाँक बीचक सिनेह मे सँ आब ओकरो बखरा लगतै. " हे देखियौ, अहाँक किरदानी पर ओहो मुस्कियाइए ."

प्रेम बीहनि कथा- अन्हरिया मे

हम ओकर दुनू पाँजर मे गुदगुदी लगाबी आ ओ खिलखिला उठए.....! बड़ मजगर लागए ओ क्षण, ओकरा लेल धानि सन. फुलवारीक बीच दुनू गोटे एके पाथर पर बैसी, सोझाँ सोझे नजरि मिलौने. दुनूक गप्पक पहाड़ नै ढ़हि पावए कखनो, कतौ , कहियो. मुदा ओकर ठोरक विहुँसव, आ हमर ओकर नयनक किरणक मिझ्झर हएब, नै जानि कत' हेरा दै छल दुनू के.सोच जतेक दुर धरि जए, सिनेहक ओतेक लगीचक एहसास होइत रहै छल. ई क्रम जारी रहल......! फेर आजुक गप्पक क्रम मे पुछि बैसल.....एँ यौ, हमरा सेझाँ पबिते अहाँ एना बेसुधि किए भ' जाइत छी ? अहाँक नयनक किरिण हमरा अहाँक हिरदय मे समेबाक लेल उताहुल क' दैए!  अच्छा छोड़ू , कहू जे हम अपन विआह मे बजएब त' एबै ने  ? " यै, आब ई त' पक्का ऐछ जे जहन दुनू गोटे एक मड़बा पर बैसब, तखने विआहल जएब." नै यौ, हमर अहाँक प्रेम लचार भ' गेल हमर मए बापक हमरा प्रति प्रेमक आगाँ.....! हमर विआह दोसरा सँ हएब निश्चित भेल ऐछ. सिनुर दानक बेर बिजली गुल भ' गेल. अन्हारे अन्हार.......की भेलै.....ठीक करू जनरेटर....! " ईजोत भेल.....वर सिनुरक तामा हाथ मे लेने ठाढ. कनिया......फरार ! प्रेम बीहनि कथा- सेल्फी        

यौ, अपन मोनक एक टा बात कह' चाहै छी , कहू ? कहू ने एत' कियो दोसर त' छै नै. हमर मोन कहैए- जेनाहमरा अहाँ स' प्रेम भ' गेल ऐछ. यै हमहू फरिछाइए दी, सत्ते अहाँ हमरा हृदय मे समा गेलौं ऐछ मुदा हम अहाँ सँ प्रेम नै करै छी. बुध्दु कहीं के ! प्रेम कएल नै जाइ छै, ओ त' अपने भ' जाइ छै. यै ,जे अपने भ' जाइ छै से अनेरूआ कहाइ छै. ओकर कोनो ठौर- ठेकाना नै होइ छै. तहन दुनू गोटे एहिना रह' दियौ. " एक दोसरा क् करेज मे समएल ."

प्रेम बीहनि कथा- खोंइछक धान

गै विमला, ओम्हर के पतियानी मे हाँसू किए लगेलें. एम्हरे आ ने हमर वाम - दहिन. एके संग दुनू गोरा कटनी करब, काजो उसरत आ तोहर मुँह निहारव सेहो संगे चलत. उँह....! एत' एलैए बोइन कर' की परेम कर' ? गै, जाबे आओर बोनिहार सब एतै ता धरि ई छओंड़ा- छओंड़ी पेटक संग- संग करेजक आगि सेहो सेरा लेतै.  हरज कोन ! "ई कह जे तोरा मोन मे ओ नै होइ छौ जे हमरा होइत हएत ? यौ, छओंड़ा जते उधवा उठवैए तै सँ की कम आगि छओंड़ी के लेसै छै. मुदा हम सब निमुधन !  जबले मुँह रही त' परिवार आ समाज दुनूक प्रतिष्ठा रखनिहार बुझू. हे यौ, ओ सब अवै बला है.हम अपन आँटी ल' के जाइ छी. गै, तों ज' चलि जेम' त' हमरो बोझ कहाँ पुरत. आँटिये भरि रहि जएत. हे ले........! राजू हाँय -हाँय धान मीर के ओकरा खोंइछ मे द' देलक. विमला- ऐँ ई की करै छी, हमर विआह त' भेवे नै कएल.तहन खोंइछ ? " गै , ई खोंइछक धान नै , प्रेम दै छियौ धराउख रखिहें." आ ज' हम दोसरा के भ' जेबै ? तें ने धराउख.....! " आ जे से हेतै त' हम अहिना रहि जेबै तोहर खोँइछक  याद मे !

प्रेम बीहनि कथा- दासीन

नहुएँ, नहुएँ पछिया सिहक' लागल रहै. मोन त' चान सन शीतल मुदा हृदय मे सिनेह लहक' लगलै. यै, अहाँ ठोर पर लिपिस्टिक किए लगा लै छी ? "ठोर मे नवका रंग देवा लेल ." मुदा अहाँक ठोरक वास्तविक रंग कहाँ धोखरल ऐछ एखन धरि.अहाँक ठोरक मुस्की त' कतेको ठोर त'र क' दैए. यौ वास्तविक ठोर त' एके टाक मुस्की मे मिझ्झर होइ छै. मुदा रांगल ठोर नै जानि कतेको हृदय पर पाथर जकाँ बजरैए. आ हमर हृदय त' ओहिना रहि जाइए  मोम जकाँ नहुएँ नहुएँ पसिझैत अहाँक सिनेहक दासिन बनि. " दोसरा सँ की स'ख मनोरथ."

प्रेम बीहनि कथा- प्रतिक  गै , तोहर घर त' बालू के छौ, अपने भहरि के खसि पड़तौ! चुप्प, तोरो घर त' संठी के छौ, एके बिहाड़ि मे उधिया जेतौ! रंजन, बाध मे महीस आ नमिता बकरी ल' चरब' जाइ छल.कतेको चरवाहा चरवहिनीक संग इहो दुनू गोटे घोलका -माली खेलाइत रहै छल. सामा -चकेवा आ कनिया - पुतरा खेलाइत कतेको बरख धरि दुनू एक दोसराक संग झगड़ा झाँटी केलक आ फेर सहटल रहल. वयसक चढानक संग आव मिलनक चढान सेहो उपर जए लगलै.पहिने त' सबहक सोझाँ मिलान होइआ आव चोरा नुका के. " रौ रंजन आब. तोँ ककरा सँ चोरा नुकी मिलबेँ रौ !" किए गै, तोरे सँ .....! हमर त' काल्हि विआह भ' जएत. हम सासुर चलि जेबौ. आ तोँ.....? रंजन अवाक.....! की भेलौ रौ ? ' ऐँ गै, हमर सबहक मोनक महल ठीके के भहरि गेल!  एतेक दिनक याद क्षणे मे विला जएत गै ?' नै रौ, चल ऐ च'र  मे एक टा गाछ रोपि दै छियै.जहिया धरि लोक रहतै तहिया धरि हमर तोहर सिनेह जियैत रहतौ. ' कथी के गाछ रोपमे ? पीपर के, सब के छहरियेतै सब मोन पाड़ैत रहतौ. नै  रौ चल आमक गाछ  रोपि दै छियै किए गै , आमेक  गाछ . किएक? रौ, जहिया फड़तै तहिया हमर तोहर रसिकताक प्रतीक दोसरो के हिया रसौतै " प्रेम बीहनि कथा- सिनेहक धार 

ऐं गै छओंड़ी, तोरा सब दिन नवका - नवका छओंड़ा संग देखै छियौ....? आंटी ओ सब हमर ब्वायफ्रेण्ड छै ! त' तोहर कोनो संगबहिना नै छौ, सब टा संग भइये छौ की ? अहाँ एना शक्क किए करै छी आंटी ! चुप्प गै लुच्ची ! " सिनेह ककरो सँ लागए त' धराउख बुझी.ई नै जे जकरे सँ नैन मिल जए, मोन बाँटि लियय. यै आंटी ,अहाँ सब बला जमाना धएल नै रहलै आब.सुनै छी जे पहिलुका लोक सबहक ( कनियो - वरक)चोरा क'मिलान होइ छलै.संतान ......दर्जन भरि ! लबरी कहीं के.....! गै, हम सब दर्जन भरि जनमाइयो के शरीर मे हुव्वा रखै छलौं.आ सब टा चिलकाक निमेरा सेहो अपने सँ करै छलौं. मुदा आवक छओंड़ा -छओंड़ीक जुआनीयो नितुआन ! शक्तिवर्द्धक दवाई, जीम आ योगा पर टिक के जीवैए. धीया - पुता भेल त' वेशी सँ वेशी दू टा ओहो पलाइए दोसरे भरोसे. यै आंटी ,लोक जनम लेलक ऐछ कमाऊ , खाऊ मौज उड़ा ऊ फेर चलि जाउ !  ' तें रंग रभस त' जरूरी छै' त' एकर मतलब भेल जे क्षणे- क्षणे किरायाक घर जकाँ घरवला सेहो बदलैत रहू.एहेन कोन प्रेम जे कतौ ककरो पर जा टिक नै पावए. यैआंटी, .....जकरा सँ मोन मिलए उएह मीत बुझू. ई काज त' उएह क' सकैए जे सिनेही ऐछ ! " तेँ मोन राखू, दुखक नोर सुखि जए त' सुख' दियौ, हृदय सँ सिनेह नै सुखल ताकए कहियो" प्रेम बीहनि कथा- ऐब की बेरिया

रौ सौरभ, तोरा बड़िखन सँ  देखै हियौ एने- ओने मुड़ियारी देने फिरै ही रे. किछो हेरा गेल हौ की ? दोग दोसाइने वोन झाँखुड़ मे तकने फीरै ही रे....! सौरभ अवाक्......! फेर -  हँ रौ, ताकै हियै से देखाइ कहाँ  कतौ हइ. की हेरा गेल हौ, कह ने त' हमहू ताकिदै हियौ. रौ सुरजा ,तोरा नै भेटतौ. तूँ हियाँ से जो. ऐँ , एहेन कोन चीज हेरएल है रौ, जे तोरा भेटतौ हमरा नै.सेहो भेटेतौ तखनी जहन हम हियाँ नै रहबै. सेआब जे होइ हमहू तोरा संग ताकिये के रहबै.दुनू गोटे मिलि तकमे त' जल्दी भेटेतौ रौ. हौअए रौ....जकरे नाम गुलाब छड़ी सएह चलि आबए. निक्की सौरभ दिस बढ़ले रहए ....सौरभ सेहो सहटल निक्की दिस दुनूक नजरि मिललै की निक्की के सोझाँ मे परि गेलै सुरजा.निक्की दुनू के मुँह लुलूअबैत पड़एल उनटे पएरे.कोनटा फड़की, दोग दोसाइने लंक ल' पड़ाइत........! सौरभ ओकरा पछुएने.....अपस्याँत! " रूक....रूक गै,आइ नहिये छोड़बौ जाबे तोरा पटा नै देबौ.तोहर ठोरक मुस्की मे अपन ठोरक मुस्की मिझ्झर क' " प्रेम बीहनि कथा- परदा पर

हम सबहक सोझाँ सप्पत खा कहै छी.पृथ्वी अकाशक बीच अगिनक सोझाँ. आई सँ अहाँ हम्मर आ हम अहाँक भेलौं  अहा.,प्रिये....!  जेहने रसिकगर गप्प तेहने बनल सेट. जेना स्वर्गक  आनन्द करवैए. से त' सत्ते. हमहू नै जानि कोना अहाँक करेज मे सटि सब किछु बिसैर गेलौं.ई संकोचे हेरा गेल जे हम अहाँ मंच पर छी.घर मे नै.हम अहाँ एक टा कलाकार मात्र छी सच्चौ के पति-पत्नी नै. यौ से त' ठीके. ठीके नै यै ! माने, मंचक प्रदर्शन करैत- करैत मोन नुकएल की खुजल सत्तौ के प्रदर्शन ताकय लागल ऐछ. मुदा से त' मोने भरि रहि सकैए.कल्पना करैत रहू यथार्थक खोज मे विलमल रहू. त' की हमर अहाँक प्रेम प्रदर्शन कहियो बन्न घर मे आकार नै लेत ? किन्नौ नै. "प्रेम आ कला कहियो बन्हन मे नै बन्हाइछ.लोक के देखाउ, मुदा मोन नै भरमाउ." प्रेम बीहनि कथा- पसार....!

इह .....! चोर नहितन. कखनो एम्हर कखनो ओम्हर, हुलूक बुलूक़ करैत रहै छथि.उचक्का नहितन. की बरबराइ छी यै ? किछु नै, अहाँक उचकपनी के फरियबै छलहुँ.आब ई सब बहुत भेल छोड़ि दियय हुलूक बुलूक. जँ सत्ते सिनेही छी त'आइ एकर स्थायी निदान भ' जए. स्थायी निदान ? से कोना    विआहि क'. तखन जतेक सिनेह हृदय मे उसारि राखल ऐछ, सबटा खुल्लम खुल्ला उझिल सकैछी. यै विआहो क' के लोकक प्रेमालाप लए बन्ने घर चाही. तहन विआहे किए ? प्रेमक वंशमनि पसार लए......! प्रेम बीहनि कथा- आशीर्वाद

कला आ प्रेम कहियो कखनो कोनो सीमा मे नै बन्हएल .दुनू असीम ऐछ.तहन प्रेम पर पहरा किएक ? खास क' ओहोन प्रेम जे वएसक परिपक्वताक संग सीढी चढए आ बढए.. नै किन्नौ नै, ई सर्वथा असंभव ऐछ. प्रेमक धार मे तुँ वहि गेलेँ.मुदा हम भसिए नै देबौ. ई कह जे तोरा सब सुविधा द'पढ़बा लेल छोड़लियौ की प्रेमक धार वहेवा लेल! डैडी, प्रेमक लेल कोनो सरंजामक बेगरता नै हृदयक उदारता चाही.जाहि सँ विआहक बन्हन मे बन्हा एक दोसराक नीजता के उघि सकी. अहाँ दुनू माय बेटी बताह भ' गेलौं की ? ओ जे कहत सएह हेतै.मानलौ जेओ छओंड़ा सेहो अपने जातिक छै.पढ़ल गुनल इंजिनियर छै.मुदा एकर जन्मदाता की आश्रयदाता त' हमही छी.हम जे चाहब से हेतै ! ऐं...., निम्मी भागि गेल ! अहाँ मए भ' के की करै छलौं? हम त' अहूँ के बुझौलौं आ बेटियो के.मुदा की करू मौगी त' शुरूहे सँ वेवश ऐछ पुरूखक सोझाँ. हँ, आ बेटी वेवश छल प्रेमक आगाँ ! तहन पढल आ मुर्ख मे की अन्तर . प्रेमक बेर त' दुनू बरोबरि ! ओकरा कहि देबै जे घूरि के ऐ घर मे पएर नै दिए.आशीर्वाद त' दुरक गप्प जे ओकरा लेल ई दुआरि सदा के लेल बन्न भ'गेल. "डैडी,अहाँ हमरा लेल नव दुआरि त' ओही दिन खोलि देलौं जहिया हमरा इंजिनियरी करेलौं.उएह आशीर्वाद हमर निवहताक सारथी सेहो हएत ." प्रेम बीहनि कथा- आँचर....! मए बापक इच्छाक विरूद्ध प्रेम मे बताह भ' घर सँ भागल बेटीक लेल - " बेटी, तों हमर धाख नै मानलेँ.मए सँ त' सीखतेँ जे ओआइयो हमर निर्णयक विरूद्ध डेग नै उठबै छथि." तों भगलें त' सदाक लेल ऐ घरक दरवज्जा बन्न बुझ, अपना लेल.बना ले नव दुनिया बसा ले नव परिवार.बिसरि जो जन्मदाता आ आश्रयदाता के. नै , हम अहाँक भोगक वौस्त नै छलहुँ, अर्द्धांगिनी छी.आ अपन पेट मे पालल धिया लेल- " बेटी तों गलत डेग त' निश्चिते उठेलेँ मुदा प्रसन्न रह जकरा जिनगीक संगी बनेले तकरा संग.मुदा कहियो जँ सब देहरि बन्न बुझाउ तइयो एक टा दुरखा अवश्य खुजल भेटतौ-   मएक आँचर ." प्रेम बीहनि कथा- उठल्लू

देखू त' केहेन उजड़ी उपटी सन भ' गेल ऐछ! प्रेम विआह सँ भेल छुट्टा छुट्टी ओकरा मौगति धरि पहुँचा देलक ऐछ. कहू त' की उमेर छै ओकर.ह मरा आगाँ त' जनमल ऐछ.देखिते देखिते जुआन भेल, प्रेम भेलै , विआह भेलै. आ, फेर छुट्टम छुट्टा! हे, देह आ मोन दुनू सँ टुटि गेल ऐछ.ओकरा परिवार समाज द्वारा सम्हारवाक प्रयास कएल जए तोड़वाक नै.आखिर नेनमति सँ जे केलक तकर सजए जिनगी भरिक लेल हम सब त' नै दियै. बड्ड खटरास करै छी अहूँ.एहेन जे कुल शील बुझिते त' अनेरूआ लोकक प्रेम जाल मे फँसिबे नै करितए.तहिया मए बाप, गौंआ समाज ज' बुझबै त' सब बुझाय ओकर दुश्मन ! त' भोग' बुझतै कोना ? हे यौ अनिल जी,हम अहाँक हृदय सँ आभारी छी.जे अहाँ टुटल समय मे जिनगी के जीवाक आ कि भोगवाक सामर्थ्य देलौं.अहाँक प्रेम हमरा आइ धरि जियौने रहल.ज' एहिना हमरा आगुओ जियाव' चाहै छी त' अंगिया क' नव जिनगी दियय.धर्म रक्षक आ जीवन रक्षक दुनू मे नाम हएत अहाँक. हे , हम  परिवार आ बाल बच्चे भरल पुरल छी.तोरा जकाँ उठल्लू नै छी हम. " ध्यान रखिहें ,सेवा आ प्रेम बँटै छी हम, सोहाग नै."

प्रेम बीहनि कथा- बाट- घाट

अहा ! केहेन मनोरम दृश्य. प्रकृतिक कोरा मे हम सब, कृत्रिम कोरा मे दुनू गोटे.कहू केहेन आनन्दक क्षण ! हँ यौ, पहाड़, जंगल ताहु मे दुइ टा जुआन छओंड़ा छओंड़ीक जोड़ी.अहाँक मोन जेना उच्छश्रृंखल हेबाक प्रयास क' रहल ऐछ ! आओर अहाँक यै ? स्थिर चित, शान्त मोन प्रेरणाक मध्य टिकल. हँ यै, जिनगीक किछु क्षण ऐ तरहें बितैत....लगैए जेना जिनगीक मठोमाठ सन. हे यौ, मुदा छओंड़ी, जँ एहेन जिनगी मे देखार भ' जए त' बुझू जेना- मसोमात सन ! तहन आब अहीं कहू आगूक की विचार ? हे यौ , हमर विचार मानव ? किएक ने .कहि के त' सुनाउ. आब दुनू गोटे अपन जिनगीक  यथार्थ तकबा लेल विलगि जाउ एक दोसरा सँ. आँय यै, त' अहाँ एहिना अधखर जिनगी जियव ? नै यौ, जहिया जकर गात लगबै तहिया ने.ता धरि त' सब टा अपने छी संपुर्ण.आ ओही संपुर्णताक खातिर त' अहूँ सहटलौं! त' हम ई मानि ली जे ओ सहटब क्षणिक छल. किएक ने. " अपन बाट अपने बना, मोकाम ताकू !"

प्रेम बीहनि कथा- द्वन्द

हे , फोन क' वेशी तंग केलौं त' आवि के गरदनि मोइक देव, बुझलियै.घरवाली छी, घरे भरिक सोचू....! हम कत' जाइ छी, की करै छी ओइ मे टांग अड़वै के कोशिश नै करू.  फोन राखू. यौ सुनीत हमआब जाइ छी , बड्ड बेर भेल. एन केना जए देब. त' की करव आओर ? गप्प सरक्का ! डेढ़ बरख सँ सएह करैत एलौं.मुदा आइ पता चलल जे अहाँ सिनेही नै निर्मोही छी. से की ? एक त' अहाँ विअाहल छी , परिवारिक लोक.जे हमरा सँ नुकौलौं.दोसर जे मौगीक उपभोग मात्रक वौस्त बुझि पहिने रंग रभस फेर गरदनि मोकवाक लेल  तैयार..! आ आव हमरा संग....! हे रुकू.... रुकू ने,नै रूकब त' गोली मारि देब. यै, ओइ दिन त' भागि गेलौं. तकर पछाति फोन बन्द....! की भ' गेल अहाँ के ? "हे , सुनू राति मम्मी- डैडीक चिन्हल जानल लड़िका सँ हमर विआह भ' गेल.अखन हम सब हनीमून पर निकलल छी.अखनुक पछाति फेर हमरा फोन नै करी अहाँ , से मोन राखब. " विआह अहाँक,पसिन्न मम्मी- डैडीक !" हँ यौ, कुल- परिवार त' चिन्हल जानल छै. " बाट-घाटक सिनेही त' अनेरूआ होइ छै, अनेरूआक धरम- करम के कोनो किच्छो ठौर ठेकान नै  ! " प्रेम बीहनि कथा- देह, मोन आ प्रेम सबीना आ मोहसिनक जोड़ी सौंसे जोलह टोलीमे प्रसिद्ध छल। किएक तँ मोहसिन सभ साँझ पोलिथिन पीबि कए आबए आ सबिनाकेँ खूब मारै गरियाबै। मुदा सबिना चुपचाप पाथर बनि जाए। लोककेँ आशचर्य लागै। जखन की ओकर टोलक आर मर्द-जनानी मीलि हपनामे खूब उठा-पटक, भागादौड़ी करए, हरबिर्रो मचि जाए टोल भरिमे। कहियो काल सबिना सेहो मोहसिनसँ मुँह लगा लिए आ मोहसिन भरि इच्छा कूटि दै ओकरा। बाजा-भुक्की बन्न भए जाइ दूनूमे। तखन सबिनाक बाप अबै। सबिनाक बाप बड़का मौलबी छल। सबिनाकेँ सिखाबए पढ़ाबए जे अपन अल्ला मियाँ नराज भए जाइ छथिन्ह जँ केओ मौगी अपन पतिपर हाथ छोड़ैए तँ। अब्बाक कहल बात सुनि अपन नोरकेँ नूआक खूँटमे सुखा लिए। सम्मान करए अल्ला आ कुरानकेँ। मोहसिनकेँ मुइना आइ तेसर दिन भए गेल रहै। ओ सभ दिन भोर-साँझ ओकर कब्र लग जा भेसै छल। कब्रक उपर बेना डोलबैत छल। देखहो बला लोककेँ आशचर्य लगै।एकरासँ बेसी प्रेम तँ कोनो मौगी अपन पतिकेँ नै केने हेतै। मुदा..........मुदा सत्य छल जे ओकरा मोहसिनसँ प्रेम नै रहै। ओकरा मगजमे खाली कुरान शरीफक ओ बात घुसल रहै जाहिमे कहल गेल रहै जे" साँच मुसलमान वएह अछि जे कुरानक तहरीरकेँ मानैए" आ सबिना कहियो सुनने रहए जे " जाबत धरि पतिक साराक माटि नै सुखाइत छै तावत दोसर बिआह वा परपुरुख संपर्क कुरानक नजरिये अवैध मानल जाइत अछि" आ....आब आस्ते, आस्ते मोहसिनक कब्र केर गिल्ल सारा सुखा सक्कत भेल जा रहल छलै। प्रेम बीहनि कथा- परमेश्वर करमान लागल लोकक बीच पंचैती शुरू भेल। पहिल पुरुष पंच----- अइ छौंड़ा-छौंड़ीकेँ तँ भकसी झोंका कए मारि दिअ। छोड़ू नै। इ प्रेमक नामपर सगरो समाजकेँ कलंकित केलक अछि। दोसर पुरुष पंच----- नै एकरा ऐ पड़ौआ छौंड़ासँ मुक्ति दिआ बिआहि दिऔ कोनो लुल्ह,नाङर,घेघाह वा कनाहसँ अपन कुकर्मक सजाए एतै भोगि लेत इ। मौगी पंच----ऐ उढ़री-ढ़ररीसँ कोन गामक लोक बिआह करत? एकरा तँ तरहड़ा खूनि गाड़ि दिऔ। एहि घोंघाउजक बीच छौंडीक कुहरल आवाज आएल----- हम अहाँ सभहँक पएर पकड़ै छी। हम उढ़री नै छी। हम एकरासँ प्रेम करै छी। हमरा जे चाही से सजाए दिअ। मुदा हमरा सभकेँ जिनगी दिअ। आ चोट्टे मुखिया जी छौड़ी माएकेँ बजा कहलखिन्ह------ लिअ एकरा झोंट पकड़ि लए जाउ आ बान्हि राखू। तखने सभ पंच समवेत स्वरे बाजल---- मुखिया जी अपने तँ परमेश्वर छिऐ तखन फेर एकर सजाए-----बास एतबे। मुखिया जी बजलाह--- नेतृत्वक काज छै जे जँ कतौ पसाही लागल देखए तँ ओहिमे पानि ढ़ारि दै नै की घी। प्रेम बीहनि कथा- जिया जरए सगर राति अहा.....मूहँ तँ लगै जेना चाने हो आ आँखि तँ बुझू जे मृगनयनी सन। कने मूड़ी तँ उठाउ। एक बेर नजरि मिला कए तँ देखिऔ। आँ...... एहन झटका तँ बिजुरियोसँ नै लागल छल। कोनो बात नै बिआहक पछाति पहिल राति एहने संवेदनशील होइत छै। हे यै....की भेल। एना आँखिसँ गंगा-जमुनाक धार किएक ? हमरासँ कोनो गलती भेल की। नै गलती तँ हमरासँ भेल जे अपन गलतीक सजा अहाँकेँ दए देलहुँ। केहन गलती आ केहन सजाए ? किशोरी होइतहिं हम यौवनक मधुमासमे डुब्बी लगेबाक सोचि उतरए लगलहुँ। अमीरीमे पोसाइत, जुआनीकेँ पबिते मोन बान्ह-सिकड़ीकेँ तोड़ि बहार हेबाक लेल औनाए लागल छल। हम कइए की सकैत छलहुँ। किशोर वयमे भटकबाक एकमात्र कारण छल- ई भरल-पुरल देह जे जौबनकेँ चरम पर जा टिकल छल। जकरा अमीरी आ जुआनीकेँ बीचसँ निकलल संक्रमण घेर लेलक। बिआहो तँ अहाँ संग वएह सभ करेलक जे हमर बाँचल संपतिक पहिल उपभोग केने छल। हमर माए-बाप अपन बेटे जकाँ बुझि सभ सुख-सुविधासँ पूर्णछुट्टा छोडि देलनि। कारण जे माए-बापक एक मात्र संतान रही हम। यै, हम बड्ड उम्मेदसँ आजुक रातिक प्रतीक्षा करैत रही। हमरा सोंझा उपस्थित कएल गेल बहुत रास कथा स्थगित भए गेल छल। कारण छल हमर सोच-- जे हम शहरुआ छोंड़ीक लिव-इन-रिलेशनशिपकेँ फैसन वालीकेँ अपनासँ दूर राखए चाहैत छी। यौ, हमर बिआह भए गेल। हमर कुमारिक पद छुटि गेल। मुदा हम अहाँक जिनगी खराप नै करए चाहैत छी। हमर मौगी जाति असवी होइत अछि। मुदा किछु वर्ख पहिने लागल एड्सक बेमारी हमर जिनगीक सीमा देखा देलक अछि। सत्ये बेमारीक कोनो विश्वास नै, मुदा अहाँ एकटा रोगी मात्र नै अहाँ तँ चरित्रहीनसँ बेसी किछु नै देखाइ छी हमरा। जँ एतेक निष्ठावान छी जे अपन रोग हमरामे नै देखए चाहैत छी तँ अपन मूँह पर पोतल करिखासँ हमर मोन जिनगी स्याह किएक केलहुँ ? यौ, ऐ समाजक परंपरा निमाहैत लोक-लाज आ अपन रक्षार्थ पुरुषक गात लागब आवश्यक बुझलहुँ। बस। बाहर रौदक धाह देखाएल। मुदा मोनमे अन्हारे-अन्हार पसरि गेल छल। उजासक बाट सेहो अन्हराएल। प्रेम बीहनि कथा- साढ़े एकैसम सदी हेलो..... हाय। की हाल छै ? फाइन। ई कोनो एबाक समय छै। डेढ़ घंटा लेटसँ । खिसिया किए गेलहुँ। रस्तामे सौरभ भेटि गेल। सटि गेल हमरासँ । कहू हब भागि जैतहुँ । केहन एक्सपिरिएन्स गेन करैत ओ। मुदा अहूँ तँ समय पर नहिए आएल हएब। हँ रियाकेँ गोल्डेन पार्कमे तते ने मोन लगै छै जे घेंटा-जोड़ी कए लेने छल। छोड़िते नै छल। जखन रियासँ एते घेंटा-जोड़ी अछि तखन हमर कोन काज ? अहाँसँ नीक सौरभे जे हमर बाट जोहैए। ओ नामरद अछि की जे अहीं टाक बाट जोहैए। हम जाइ छी। कत' सौरभ लग। कथी लेल। इन्ज्याय करबा लेल।३ हेलो जुगनू कत' छी। बुढ़बा गाइड लग। की करै छी। हर्षक संग छलौहें की। आब फ्री छी। आबि जाउ हमरा लग। कतए छी अहाँ ? डीयर पार्कमे। आबै छी। तँ करू प्रतीक्षा जुगनू केर हम चलै छी। खिसिआइ छि किए। आब की केकरो पर आश्रित छै। एक जँ केलक मना तँ दोसर तैयार छै। आब बिआह तँ केकरोसँ कतौ क' लैए। मुदा भोगैए केओ, कतौ केकरो दोसराकेँ। पहिने प्रथा चल घर बदलबाकेँ मुदा आब तँ घरवला बदलबाक परंपरा छै। प्रेम बीहनि कथा- भूख सतबरतीक मोहर अपना उपर लगेबाक लेल नै जानि कतेको सासु आ माएकेँ आरोपित केलक। एतेक धरि जे कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक। ओकरा पर शंका तँ भरि गौंआ करै मुदा ओहि मौगीक छुटल मूँहक सोंझा सभ अपन-अपन मूँह बन्द राखए। असलमे ओकर घरबला सेनाक नौकरीमे छल। छुट्टीक कमी। ताहि पर ओ मौगी गजबकेँ सुन्दर रहै। तँए ओ गामे नै अनगौंआक नजरिमे आबि गेल रहै। एक दिन गाम भरिक मौगी सभ ओकरा बैसार क' क' कूब ज्ञान देलक। ओ मौगी खूब आक्रोशित स्वरें बाजल---ऐ गामक कोन घरक बेटी-पुतोहु हाट-बजार आ मेला ज क' नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ कहियो अपन घरसँ बहरा क' दूरो पर नै जाइ छी। आब केओ पाहुन-परक एतै तँ हम ओकरा कोना क' भगा देबै। यै कनियाँ, नै बरदास भेल तँए मूहँ खोलै छी। पाहुन-परककेँ नै भगा देबै मुदा ओकरा संग करै बला रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकै छी ने। देखिऔ सभहँक बेटी-पुतोहु अपन सासु-माए केर संग जा कतौ घुमैए आ फेर चलि अबैए। केकरो किछु भेलैए आइ धरि। अहाँ तँ घरेमे रहि पेट क' लेलहुँ अछि। घरबला जे अगिला मासमे आएत तकरे लेल ई रखने छिऐ ई अनजनुआ चिलका। बुझा ने देथुन्ह ईएह सभ। हम तँ फोन पर फोन कए हारि गेलहुँ। नौकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जबानी की धराउ राखल छैओ तँ आबि घुरि जेतै फेर दिया-बातीमे एबाक बचन द' क'। ऐ बीचमे हमरा जखन मोन हएत संग रहबाक तकर कोन बाट हेतै। अहिना कुहरि क' मरबै की आ कि एकरा शांतिक लेल दोसर बाट तकबै हम। भूख लगला पर भोजन चाही खाली बचन नै। आ सभा खत्म भ' गेल छल। अब्दुर रज्जाक बिहैन कथा- १ समीम संग सगीराके निकाहके भs गेल अछि ४ बर्ष। "अल्लाहक भेद अपरम्पार अछि -कहैत सगीरा बाजल, "सुनली कहाँदन मोहम्मदपुरबाली दीदीके फेर सs महिनबारी रूइक गेल है "  समीमक नयन सगिराक नयनमें अपनाके देखैत बाजल/ " ह, त निक नहीं हेतैय की पांचम बेर कही बेटिए भेलै त खाली बेटिए बेटिए रहतै"  " ह ,त निक नहींए हेतै की सहीमें ? हे, ओकर बेटियों अल्लाह हमरे कोखमें किया नहीं धदैय। हमरो कहित अम्मी गे अम्मी अब्बू कहिया अरबसs औतई हमरा लेल खजूर आ बुर्का लक "  " है ,बताही जा जा कथीसब बकs लगली पहिने बेटीयो भेल त् नहिए ताले बेटीएके मोनक बिचार बकs लगली ,बेटियों होब त दियौ " "सब बात सुईंन लेली हमरा त बुझाइलसे अहा अखन फेसबुकिया बनल छि आ हमरा बातके ओतेह ध्यान नहीं दsक सुईंन रहल छि खाली फेसबुक पs छौरी सबहक आ पार्टी सबहक़ फोटो सोटो प ध्यान रखने रहैछि" "हम दुनु तिनु काज एकैबेरमें करैछि से अहाके नहीं जानल हबसे अहा जोरे बत्कहो आ निसंतानक लेल कोनो चमत्कारी बला दबाईके प्रचारों हेरैत रहैछि" "धर मरदबो सबके बात नहीं बूइझ पाबैछि , लोक अखन रंग रंग के दबाई कराब डाक्टर ल जाइए झुठे फुसेके फेसबुक प कहादन दबाई मिलतै" बिहैन कथा- २ हनीफ आ खदिजाक निकाह के एक दसक पूरा भगेल अछि । दिन राईत पसिना आ इमन्दारी सदुपयोग सs रुखी -सुखी भs नित्य क दिनचर्या अल्लाह क मर्जी सँ बीत रहल अछि।  गरीबी संग जिनगी कs भाग दौड़ बड्ड कठिन होइतो, संग रहला सँ हर्षित अछि दुनु प्राणी । साँझक पहर घरमे हनीफ किछ एम्हर ओम्हर टर्च बाइरक' देख रहल अछि।  हनीफ किछ हेरैत मुडमें कहलेंन  -" कहलिय, सुनै छी अपन टचबला मोबाइल खम्हाबला खोधलीएमें धैल छल से नहीं देखरहल छी ?" खदिज़ा माथ पs ओढ़नीके मिलाबैत  -" हँ , मोबाइलके कोन काज अछि सब लग त' मोबाइल अछिए। ताहूमें ओकर बैट्री त साफ़ साफ़ नहीं काज करहल अछि ?" -"ओहे त साफ़ साफ़ बैट्री नहीं काज करहल छलै ओहि स' ओई में बट्री लगाब लेल हेर रहल छि " -" मर कोन जरुरी भsगेल छेलै से ओकरा बट्री फेरबाक लेल ?" -" जरुरी अछि भs गेल कहूँन' कहाँ अछि से ?" -" ओकरा त बट्री ओ फेराक ठीक करालेने अछि हमरा नहिरामें । भाई जी आइल रहथिनसे उनके दs देलिएन ,कहादंन कनियाँ के मोबाइल पानिमें गिर कs बिगैर गेल गेलै ओहीले उनका दिक्कत छलहा।  -" ओना हमहू अपने बहिनके देबलेल सोचने छ्लौ मुदा बिग्रल देबै लेल कनि संकोच छल निके कैलौ से भने नैहर भेज देलीए अहि बहने ओकरा लेल नयाँ किन क भेज देबै। " -"नयाँ ल'क ओ की करता खाली उनका बाते करबाक लेल चाही त भाई जी एकटा पुरान मोबाइल देने अछि हमरा से भेज देबैय त नहीं हेतै से ?" -" जा ,म हमरा बहिन लेल पुरान अछि घरमें नैहर लेल टच बला भेजा गेल त कम स कम पूछोआछी नहीं " लोहछैथ खदीज़ा कहलीं  -" हमरा नैहर लेल त पुछबाक छल मुदा अहाँक बहिन लेल किछो कोनो पुछबाक केकरो बेगरता नहीं अछि ,कहाँदन महिलो अधिकार अछि अखन मधेशी महीलाक लेल नयाँ अधूरा संबिधानमें।" -" कानून में भs गेल अछि मुदा जखन बड़ा बड़ा पार्टीमें महिला नेत्रि सब तैतीसो प्रतिशत अधिकार युक्त नहीं अछि त सामाजिक व्य्ह्बारक में कहाँदन पचास प्रतिशत कतs सँ ? " राजीव कर्ण बीहनि कथा- पौस

साँझक समय रहय पान खाय के मोन भेल तैं दोकान पर गेलौंह। ओमहर सँ हमर एकटा मित्र एलाह "नमस्कार यौ" आऊ आऊ दोस पान खाऊ गप्पे गप्प में किछु देर पहिने के बात मोन पड़ल। दोस? कहु.... यौ अहाँक बाबु जी कुत्ता..... दोस-हे सुनु! अहाँक बाबु जी कुत्ता..... आहा! गरम किये होय छी दोस? हम कहलौ जे अहाँक बाबु जी कुत्ता खरीदलाहा? घर परिवारक लेल लोक पर विश्वास नै रहलैंह की? बीहनि कथा- सिनेह

-- बौआ , कने एम्हर सुनू ने ! -- की कहै छी भइया.....कहू ने ? -- आँय यौ , अहाँ के अप्पन राज काज नै ऐछ की ? -- से की ? -- दोसरा के काजक पाछाँ अहाँ अपना के हेरा लै छी. -- आ अप्पन काज ...? -- की करबै भइया , दोसराक हीया मे पैसि के त' देखियौ. -- सिनेह मे मातल सब गछारने बुझएत ! बीहनि कथा- नेत

देखियौंन कोना काते काते मुह घुमा क जा रहल छैथ। --से किये यौ कक्का ? --ओहो ! की कहै छह बौआ छः माह भ गेल  एक्को टा पाय नै देलक अखन धरि उधारी जे  खेलक से। --त कहै नै छियै अहाँ ?  --होउ कहलियै दू चारि बेर लेकिन...........हमरा त बुझाइए जे हिनकर नेते ख़राब छैन्ह। --(एक दिन भोरे भोरे) -- लक्ष्मी बाबू छी यौ ? --की बात छै यौ ? आय भोरे भोरे दर्शन देलियै। --यौ हमरा बड्ड लाज लगै छल अहाँ सँ तैं हम  काते काते चैल जायत रही अहाँक उधारी जे  रखने रही।  लेकिन लिय अपन पाय अहाँ हमरा फेरो सँ नौकरी लागि गेल। मज़बूरी अछि मुदा नेतगर छी। बीहनि कथा- देखौवल न्याय

-- आंय यै भौजी एतेक भीड़ अहि अंगना में किये  छै। --देखियौ न बोआ उ है ने मंगनुआ के पुतौह से अपन साउस आ ससुर के बड़ दुःख दै है तैं लोक आउर ओकरा मारै ले गेल है। --आ मंगनुआ अपने क त छै से ? -- उ दिल्ली गेल है कमाय लय। --ओहो ! आंय यै भौजी तखन त जुल्मे ने हेतै। ई कोन न्याय भेलै ? मंगनुआ के आबह दैतथिन तखैन फैसला करबाक चाही ने। --आ तखन की होतई जखन बुढ़बा बुढिया के मारि देतै उ मौगी। --अच्छे देखियौ दूये मिनट में फैसला केना होय छै। --(सब सँ आगू आबि) अपने सब सँ आग्रह जे जिनका जिनका अहि कनियाँ सँ कष्ट अछि आ बूढ़ा बूढ़ी सँ स्नेह से अपना अपना ओहिठाम ई दुनु प्राणी के ल जा क सेवा कैरतियैन्ह त उचित होइत। (सबहक बाक बंद सब अपन मुड़ी झुका अपन घरक रास्ता देखलाह) बीहनि कथा- पैघ लोक

--बोउआ कनि टोल में आ दियाद सबके निमंत्रण द अबियौ न। --ठीक छै कक्का, हम आधा घंटा बाद द एबैन्ह। --(सब गोटे दलान पर जुटला खाय लेल) --यौ बोउआ मोहन बाबू त नजैरे नै अबै छैथ हुनका नत नै देलियैन की? --जा यौ कक्का हम त बिसैरिये गेलियै हुनका। --आहा। जाऊ जाऊ दौड़ क ओना आब त बड्ड लेट भ गेलै । मानता की नै लेकिन खोज पूछारी जरूरी ऐछ। --मोहन कक्का छी यौ ? --हाँ बोउआ आबह। की कहै छ ? --यौ हमरा सँ त बड़का गलती भ गेल। --से की हौ। --सब जगह हम नत देलियै आ अहाँ के ओहिठाम छुटी गेल। --ओहो ! रामू छ हौ ? --हाँ कक्का। --की सब बनि गे$ल ? --दाइल भात भ गेलै आ खाली तरकारी बांकी छै। --छो$ड़ ओकरा , च$ल भोज खाय।सब इंतज़ार में हेताह। बीहनि कथा- ख़ुशी --बधाई हो मुखिया जी ! अहाँ त आय सबके पछाड़ी देलियैन। होउ आब भोज भात आ लडडू मिठाई के व्यवस्था करियौ। --हाँ हाँ किये नै जरूर हेतै। --मुखिया जी एकटा बात पूछू ? --हाँ पूछु। --यौ हम बेर बेर देख रहल छी जे अहाँ खुशियो होय छी आ चेहरा उतैरियो जाइये। किछु बात छै की ? --नै कोनो खास नै ,हम सोचै छी जे ई जीत हमर  सबस पैघ ख़ुशी नै ऐछ । हमरा त वोहि दिन  सबस बेसी ख़ुशी होयत जै दिन हमरा मुखिया  चुननाहर लोक सब सुखी रहता । बीहनि कथा- उल्टा पुल्टा --हे हे । मर तोड़ी भला के। ई छौड़ा त सबटा काम उलटे पुल्टे करै छै। --की भेल कक्का यौ ? --ओह! की कहै छ ई हमर जे पोता छै ने  ओकरा कहबै पूब जाय ले त चैल जाइये पछिम। पता नै की पढई लिखै ये। --ओहो । नै बुझलियई कक्का आब त पढाईये उल्टा भ गेलै ने। पहिले पढलकै उ, ए बी सी डी, आ आब पढई छै आई. ए .,बी. ए. ,सी.ए.,बी.सी.ए.। बीहनि कथा- फोटो कॉपी --भैया ! --हँ , की कहै छह बोउआ। --मनुखक फोटो कॉपी देखने छी अहाँ ? --है। मनुखक केहन फोटो कॉपी होय छै हौ ? --हे , ई देखियौ । --आरौ तोरी भला के ! ई त फेकना बुझाई छै हौ ? --हँ भैया वेह छै। --त एकरे तू फोटो कॉपी कहै छहक ? --हँ भैया। --हौ से किये? --हम चाहै छी जे नवतुरिया सब ओरिजिनल बनय ताकि लोक एकरे सभक नक़ल करय लेकिन ई छौड़ा सब त अपना के बिसैर कखनो सलमान खान आ कखनो शाहरुख़ के इस्टाइल मारैये फेस बुक पर तैं। बीहनि कथा- जमाना --एना किये यौ भाई ? एना उलटल किये छी ? ई कोन रोग भ गेल अहाँ के ? --कोनो रोग नै भेल ? कनि जमाना के देखै छी। लोक सब कहै छथिन जे जमाना उल्टा भ गेलैये तैं कनि जमाना के देखै के कोशिश करै छी। -- से अहाँ सीधा भ नै देख सकैत छी की ? --कीन्न्हु नै। उल्टा चीज के उलटे भ ठीक सं देख सकैत छी। बीहनि कथा- चक्षु भोजन --घनश्याम जी छी यौ? --हँ मनोज जी , की कहै छी? --कहलौ जे राइत में अहाँ के निमंत्रण अछि हमरा ओहिठाम। --ठीक छै। (राइत मे) --मनोज जी छी यौ ,हम आबि गेलौं। --आउ आउ। --हयै, भोजन निकालू। (मनोज जीक कनिया एक्के थारी भोजन निकालली आ मनोज जी अकेले अकेले खाय लगलाह। इमहर घनश्याम जी अहि सोच में छैथ जे हमर थारी आब आयत तब आयत। मनोज जी भोजन क क उठलाह।) --आंय यौ मनोज जी निमंत्रण हमरा देलौ आ भोजन अपने केलौं। --ओहो नै बुझलियै घनश्याम जी हम अहाँ के चक्षु भोजन करय लेल बजेने रही से त अहाँ केलौं। आब अपने जा सकै छी। नीरज कर्ण बीहनि कथा- नोर ओ कानि रहल छलैक। चान सन मुखड़ा पर कोनो भाव नहिं, बस ढब ढब बहैत नोर देखबा में आयल। मुदा कारण बुझवा में नहिं आयल। बुझियो जइतौं जौं नोरक किछु रंग रूप होइत, दुःखक हिसाबे..। बीहनि कथा- फादर्स डे बजार सँ घुरैत बेर एगो मोड़ पर दूटा आजुक छौड़ा देखायल। दुनू एक दोसरा सँ घेंटाजोड़ी क' क' "हैप्पी फादर्स डे, हैप्पी फादर्स डे" बजैत रहए। कि ओहि में सँ एकटा जोसियाइत बाजल "दोस आइ त' पार्टी बनै छौ रौ" दोसरो तान मिलेलक "हँ हँ किएक नहि, आइये डैड सँ जेब खर्च लेलहुँ, जरूर हेतै पार्टी आ जइम क' हेतै दोस।" कनि नीक सँ देखला पर बुझायल कि ओकर सबहक जिंस पैंट पचास ठाम फारल अछि आ डाँड़ सँ नीचा ससरल जा रहल छलै। हम मुस्कियाइत घ'र दिस झटकारैत बिदा भेलौं कि किनसाइद बाबूजी बाट जोहि रहल हेता। राम सोगारथ यादव सपना सपने अछि---(बीहनि कथा) हे सुनै है .... ऐकरे कहै छि ऐ.... बहिर जेना भगेलै ......यै बुधनाके बाबू नहि सुनै छि यै ? .....एऽह कथी कहै छि कहुन ? कि भेलै कैला ओते फटियाई छि...... ......बौवा साथीके फोन आयल छलैय कथी सब कहलकैय निकसँ नहिं बुईझ पैलियै कनि बौवाके मिस्कल मारियो तँ गप करबा लेल मन ब्याकुल भरहल अछि । ............ई गप सुनिक हम मने मन मुस्कुराईत रहि गेलौं ओतेबे मे काका हमरा सँ कहलखिन .........रे .... रबिन्द्र ,कनिक बुधना लँ फोन लगात ? .......काका बुधना के फोन स्विचओफ बताबै छो । काकी जहि नम्बरसँ फोन आईल छ्ल ओहि पर फोन करबै तँ नहिं हे तै ...कि?... ............होतै बौवा बात भजैतै कि मारहोन ...............हमरा एना महसुस होईत छ्ल जे जब प्रदेश मे अपन संतान होईत अछि तखन बोली सुनेला माय बाबू कतेक आतुर होईत छै । .........ए .... रुक काका कनिक देख हो मनिष भैया के फोन चैल अलै कत्तारसँ हेलो भैया प्रणाम.... .........आँईरौ बुधनाके घरे फोन कैला नहि लगै है । ..........भैया ओकर माई बाबू हमरे लँ छै बात कैर सकै छा । ........नै नै सुन हम जे कहै छियो ई बात ओकरा माई बाबूके नहि कैहियही ओना बाध मे तँ पता चलिये जैतै ..........आब हम अकबक भगेलौ हमरा मुहँमे जेना बकार लाईग गेल । ............रे ....रबिन्द्रा कि भेलो तो कैला नहि बजै छे । मनिष तँ बुधनेके बारेमे पुछै छलौ ग नै कि भेलै कहन काका बहुत उत्साह भँ हमरा सँ पुछ केकोसिस करैत छलखिन मुदा हमरा आँखिस्ँ जब नोर टप टप बहलागल तब काका ,काकी चिन्तित भँ पुछ लगलै  ।आ आरो लोक सबके जमघट लागलगलैकाका , काकी संतान के खबर सुनला आतुर भगेल खिन हमरा  ई बात छुपनाई बहुत कठिन भगेल अन्तमे मुहँ खोल्ही टा परल काका बुधना भैया के एक्सिडेन्ट भँ क मृत्युु भँ गेलो आब काका , काकी सेहो माथ पकडैत काँन लगलखिन ............ओह बेचरा बहुतो सपना बोईक कऽ बिदेश गेल छलै । आ बजैत रहै छलै जे बिदेशसँ आईब तब छोटकी बहनके शादी करब धुमधामसँ । ई कि भँगेलै सब दैब के लिखल बिधना अछि जेना जेना घुमाउत तेना तेना घुम्ही पडत । नारायण मधुशाला बीहनिकथा-१ एकटा लड़का पैँजाब खटै छल । बैशाख महिनाके ओकर बाप ओकरा फोन करैय । बेटा आप तोँ घर चलि आ । ओ लड़का सोचैय जे ठीकेमे बेसी दिन भऽ गेल एतऽ रहला । आब घर जेना चाही । मुदा ओईसँ पहिने सबक्यो लेल लत्ताकपड़ा किनि लई छी । ओ गेल एकटा निक Malla मे कपड़ा किनबाक लेल । आ माई बाप बहिन क्यो लेल कपड़ा किनिलक । अन्तमे ऊ सोचैय सब लेल कपड़ा तँ लेलौँ मुदा अपना लेल कुछ तँ लेबे नै केलौँ । तब ओकर नजैर एकटा काफी महग Jacket पर पड़ैय आ महगे सही ऊ किनि लैय । घर आबैय । घरमे ओकर वियाह लेल करबाक लेल बोलेने छल । बिहाने भने वरतुहार एल । छँडा खुब सजिधजि लेलक । आ ऊ सम्झैय जे अते महगमे अते निक Jacket अखन नै पहिरै छी तँ ओकर अपमान भऽ जाएत । से नै तँ पहीर लई छी । छँडा पहीर लेल । आ तब गेल वरतुहार लग । लड़का देखलक । लड़काके देख कऽ ऊ सब जे जा लगल तब लड़काक बाप वरतुहारसँ पुछैय । हमर बेटा पसन्द पड़ल ने । वरतुहार जबाफ दैय । यौ अहाँक बेटा तँ हजारमे एक अछि । लड़का तँ एक्को रती नै काटै बला अछि । लेकीन वैह कने लड़का हिरोसँ हुराठ भऽ गेल अछि । हिरो धरि रहैत तब तँ ठिके छल मुदा अहाँक बेटा हुराठ भऽ गेल अछि । बीहनिकथा-२ -- अते दिनसँ अहाँ कत गेल रही ? -- अपन संस्थाक दिसिसँ गिरगिट सभक आयोजन कएल गेल प्रोग्राममे । -- गिरगिट सभक प्रोग्राममेँ, माने ? -- अनु ई कवियो गिरगिटेसन होईछै नै ? -- की भेल ? -- यार अनु, कवि लिखैत अछि कुछ आ प्रयोगमे स्वम आनैत अछि कुछ । लोक झुठेके कहै छै जे सब काज बराबर होइछै । आ एहो देखाबटी बात जे नारी पुरुष एक सम्मान अछि । ई सब बात बेकार जेना लगैए । -- से किए ? -- आब देखुन ! हम जे गेल रही जै प्रोग्राममे । ओतऽ पैघ पैघ कवि, कलाकारके सम्मान मिलल । मुदा ओतऽ जे बहिन सब सभके भानस करि खुवेलक तेकरा पर क्यो विचारे नै केलक । एकटा बात कहुँ केकरो जन्म के दैय ? -- माए ! -- मुदा कहुँ तऽ महिलाक नाम कतौ आबैए ?...देखु तऽ सभतरि...विज्ञानक पिताके...राष्ट्रक पिताके...एहने प्रश्न अबैए । सगतर पुरुषक नाम मात्र। माएक नामक कियाने ? राष्ट्रपति होईत अछि मुदा राष्ट्रपत्नी किए ने ? -- अहाँक प्रश्न गम्भीर अछि । -- अनु जँ पियौनोके कतौ सम्मान मिलैत तऽ की ओ सभ अपना पर गौरभानवीत नै होएत ? ऊ मेहनतसँ काज करैए तँए स्कूल ठीकसँ चलैए मुदा ओकरे नाम कतौ ने । तब किए ने कोई काजके छोट वा पैघ मानत ? किया कोई पियौन, भानस करऽबला आदि बनबाक लेल चाहत ? -- पिलीज, अहाँ शान्त भऽ जाऊ । किछ बात किताबी बात बनिक मात्र रहि जाईए । की करबै ? माथा पर प्रेसर नै लिए । -- अनु की करु कतबो करै छी ई मतभेद देखले नै जाईए। -- असली चिन्तन करबाला व्यक्तिके एहिना होई छै। मलय नाथ मण्डन बीहनि कथा- समीकरण

::-एहू बेरदा छोटका-बडकाक रंग देबाक चेष्टा केने रहै ओ! मुदा नञि सुतरलै,खूमे प्रयास केने रहै। ::-किये नञि होम'देलहक।हमरा सब त' एहि बेर अनठा देलियै।जेकरा हेबाक हेतै से अपन हेतै। ::-नञि बुझलियै मालिक! पछिला चुनावक भोग त' भोगिते छलू।एबरीदा हम पहिले से साबधान छलू। ::-ऐ बेर की भेल' ।पछिला बेर त' तहूँ खूब नाच केने छल',छोटका -बडका नाम पर। ::-मालिक! आब कान पकरै छी।बलू हैर जेब से कबूल,मुदा आब फेनो::::::उँउउउउहूँ। ::-किये की भेल',भने निके त'छह। ::-नञि यौ मालिक!!तीन-तीन टा' केस कपार पर अछि।घूस-पैंच दैत दैत साकिन भ'गेलौं।लूटि लेलक नेतबा सब। ::-एहि बेर कोन राजनीति छ'तोहर सबहक। ::-एहि बेरदा किछु नञि छै।कान मे तूर तेल ल' सूतल छियै।सूतलो रहबै त' अहाँ सबहक माँ बाबूक चरणक किरपा से जितबे करबै। ::-कोना के जितब'से ने कह'।सूतले जिततै जँ लोक त'हमहूँ सब वेह फरमूला लगा देबै किने। ::-जा'से नञि बुझलियै! मुखिया बनतै सोमन मिसर के कनियाँ आ पंचायत समिति हेतै अतिपिछडा मे से, तैले हम छियै।सरपंच द' देलियै अंजुमन मियां के।आ जिला परिषद बनेबै हम सब बुधना पासमान नञि छलै तेकर बेटा,भने निके त'नाम छै ओकर,हँ हँ संजितबा।बड सुन्दर छौंरा छै।पढलो लिखल छै आ बोलियो बानी नीके छै। ::-ओहो इ त'सब समीकरण बैसा लेलह तों सब किने।ठिके कहै छ'एहि समीकरण पर त'सब निश्चिते सुतलो मे जितबे करब'।अच्छा थमह' हमहूँ सब लगबै छी माथा।एही सोशल इंजीनियरिंग पर। बीहनि कथा- बेकाजक का'ज :-कि कहियौ! बिद्यार्थी त' दूर बुरियार्थीयो सब जे रहिते त' कम से कम तासो त' फेंटतौ। ::-किये ओत' मन नञि लगैये। ::-मन कोना लागत, गपो करय बला के अभावे रहय छै। ::-तखन लफरेंटिशे करय परैत हेत। ::-कि करब किछु त' करब।उपजल गप ऐ कोठी सँ ऐ कोठी करैत रहै छी।ताही मे किछु नीक -खराब सब भ'जाइछै। इ मोबाइल अछि जे कोनहुना दिन काटि लै छी। ::-नीके करै छी।घर चलबै ले सरकार ढेर रास दैते अछि। बेरोजगारक कुटि-चालि मे लागल रहू,जे जेहो रोजगार मे लागल छै ओ अहींके लगौल खुरापात मे ओझरेल रहे।जे करी सरकार!!दोहाइ ओहिपार के छी। ::- बड बड देखलौं लेकिन तोरा जेकाँ कागचेष्टी नञि देखलौं।एक्कहि साँस मे सबटा सुरैड ने देलही।तोरो जोडा नञि भेटल हमरा। सबटा ठांहि पठाहिं मुँहे पर। ::-आहि रे बा! आबो त'सुधरू।धीया पूता पैघ भेल।नामी-गिरामी कहबै छी।लेक्चर-फरफेसर सबटा नाङरि लागल अछि।आब त' इज्जैत बचबै के समय आबि गेले।बरू कहब त' तास फेंटनिहार के हम तैक दै छी। लबडा बला काज सँ बढिया तासे फेंटब। ::-ठीक छ' ताक'।तखनि तासो फेंट के दिन काटब। ::-त'बाद मे इ नञि कह' लागब जे जुआ बला तसक्कर चाही। बीहनि कथा- कोढिया हरक लागैन कें जोर सँ दबने किसानक संतानक मन अपरतीव सन। ओ कहैये::-हरखडा,पालो आ बरदक बले खेती आब कते दिन।एतेक जुगाड छै तैयो लोक सब पुराने ढाठी धेने अछि। ::-अँय रौ!!दू दिन लागैन धेना भेलौहे नञि आकि उपदेश देनाय शुरू क'देलें। ::-नञि हौ बाबू ! कहय छिय' जे लवका लवका मिशीन सब एलैये ।जोत-कोड,कदबा,चौकी त चौकी,रोपनी आ कटनी तक भ जाय है।दौनी तौनी सब त' होइते है।तखन इ सब पुरने धुरने बेवस्था कथी ले। ::-हँ रौ बौआ! आगू जनमल गोड लगेबे करबे किने! हमरा से सब कि बुझल अछि। ::-बुझल छ' त' किये हरान-फिरीशान होइ छ'? ::-हे रौ कहबौ त' लगतौ छक द',चुप्पे रह ने।किये बड बड केने जाइछें। ::-त' से कह' ने "साँच मे आँच कि",कह' कह'। ::- देखै नञि छें अपन काया जेना घून लागल जाय छौ।मिशीनक उपजेल खेबें त' अपने मिशीन नञि हेबे।आ मिहनति क' खेबें त'मिशीने सनक मजगूत धुआ-काया हेतौ।इ पिलपिलहा काया ल' कतेक चक्कर मारलें।इह बूरि कोढिया कहाँ के मिशीने से खेती करता।हिनका सुतै के इन्तजाम क' दियौन। जगदानन्द झा ॒मनु॒ बीहनि कथा- बेटाक बाप "ई जे भरि दिन नेतागिरीमे लागल रहै छी कि एहिसँ पेट भरत? चलू अप्पन पेटक आगि तँ जेना तेना मिझा लेब कनिक बेटीक ब्याहो केर चिंतासँ तँ डरू । भेल तँ ३-४ वर्खमे ओकरो ब्याह करए परत, ओहु लेल १०-१५ लाख रूपैया चाही ।" "केहेन गप्प करै छी ? आब ओ ज़माना नहि रहलै । बेटा आ बेटीमे फराके की? जेना बेटाक पढ़ाइ-लिखाइ लालन पालनमे ख़र्चा तेँनाहिते बेटीमे । बेटी बेटासँ कतौ कम नहि । आ हम्मर बेटी तँ लाखोमे एक अछि ।" "ई अहाँ बुझै छीयै मुदा समाजमे दहेज लोभी बेटाक बाप नहि ।" बीहनि कथा- रभसल "धूर भौजी ! अहुँ बड़ रभसल जकाँ किनादन करैत रहै छी ।" "यौ लाल बाबु रहै दियौ, जँ हम एना रभसल जकाँ नहि करितौँ तँ, ई जे कोरामे भतिजाकेँ लदने रहै छी से मनोरथ अहाँक भैया बुते तँ रहिए गेल रहिते ।" प्रेम बीहनि कथा- एसगर बासोपत्ती बस अड्डा । 'म'केँ दिल्ली जेए बला ट्रेन दरभंगासँ पकरैक छलै । बासोपत्तीसँ दरभंगाक धरिक यात्रा बससँ । बसक इन्तजारमे 'म' एकटा लगेज हाथमे नेने ठाड़ । ततबामे 'स' अफसीयाँत भागि कय आबि 'म' लग ठाड़ होति, टूकुर टूकुर ओकर मुँह तकैत । दुनू आँखिसँ नोर निकलि 'स'केँ गाल होति गरदनि धरि टघरि गेल । म, "तु एतेक कनै किएक छेँ?" स म केर दुनू हाथ खीच, ओकर हाथपर अपन मुँह रखैत, "हम कहाँ कनि रहल छी ।" ओकरा उदास आ कनैत देखि म दूटा बस छोरि देलकै । "हमरो ल' चलू, अहाँ बिनु हम एहिठाम नहि जी सकब । ओहीठाम हम सबकेँ कहबै जे हम अहाँक नोकरानी छी । अहाँक नेनाकेँ खेलाएब, घरमे पोछा लगाएब, बर्तन धोब ।" ई कथन छल एकटा बिधबा माएक जेकर बेटा दिल्ली बाली संगे ब्याह कय दिल्लीए बसि गेल छल आ माए एसगर गाममे । प्रेम बीहनि कथा- प्रेम गुदड़ी बाजारक भीड़ भाड़सँ निकलैत, एकटा दुकानक आँगा टीवीक आबाज सुनि डेग रूकि गेल । टीवीसँ अबैत ओकर अबाजे टा सुनाइ द' रहल छल । ओकर देह नहि देखा रहल छल मुदा अबाजेसँ ओकरा चिन्हनाइ कतेक आसान छै । आइसँ तीस वर्ष पहिने, हमरे संगे संग नमी वर्ग धरि पढ़ै बाली, सुन्दर, चंचल मात्र मूठ्ठी भरि डाँड़ बाली सु..... "कि प्रेम इहे छैक की मात्र देहक प्रजनन अंगपर एकाधिकार बना कय राखैमे सफल भेनाइ?" प्रेम बीहनि कथा- सोहागिन हल्द्वानी, हम आ सा । क़ब्रिस्तान पार कय क' हम दुनू पहाड़क उपर चढ़ैत, समतल जगह ताकि पार्ककेँ एकटा वेंचपर बैसि, देहक गर्मीकेँ कम करैक हेतु बर्फमलाइ (आइस्क्रीम) कीन खेनाइ शुरू केलौंहँ । दुनू गोटा अप्पन अप्पन आधा बर्फमलाइ खेने होएब कि, सा "जँ हम अहाँक सामने मरि गेलौं तँ हमर सारापर चबूतरा बना देब ।" मेघ धरि उँच उँच पहाड़, चारू कात प्राकृतिक सौंदर्य, मखमल सन घास, स्वर्गसन वातावरण, बर्फमलाइ केर आनन्दक बिच अचानक एहेन गप्प सुनि, बर्फमलाइ हमर मुँहसँ छूटि हाथमे ठिठैक गेल । कनिक काल सा केर मुँह पढ़ैक असफल प्रयास केलाक बाद; "अवस्य एकटा नीक चबूतरा । जँ हम पहिने मरि गेलौं तँ एतेक व्यवस्था ज़रूर कय जाएब जे एकटा नीक चबू.... " बिच्चेमे सा हमर मुँहकेँ अप्पन हाथसँ दाबैत, "नीक नहि साधारणे चबूतरा मुदा अहाँक हाथे आ ओहिपर लिखल हुए "सोहागिन सा" । प्रेम बीहनि कथा- बेगरता दोसर मँुहेँ करोटिया दय सुतल मकेँ अपना दिस घुमाबैत - "धूर जाउ ! कोना मुँह घूमेने सुतल छी, दस मिनट पहिने अप्पन बेगरता काल बिसरि गेलियै कोना जोँक जकाँ सटल छलौं ।" प्रेम बीहनि कथा- अगिला जनम “डाँड़ टूटल जाइए भरि रा ति सूतलहुँ नहि बड़ तंग करै छ ी, अगिला जन्ममे अहाँ हिजड़ा होएब जे कोनो आओर मौगीकेँ एना तंग नहि कए सकब।” “ठ ीक छै ! अगिला जन्म अगिला जन्ममे देखल जेतै, एहि जन्मक आनन्द तँ लए लिअ ।  आ अगिला  जन्ममे ओहि हिजड़ाक  ब्याह जँ अहिँक संगे भए गेलहि तँ ।" प्रेम बीहनि कथा- मँुह झौँसा “गै दैया ! एतेक आँखि किएक फूलल छौ ? लगैए रा त भरि पहुना सुतए नहि देलकौ।” “छोर, मँुह झौँसा िकएक नहि सुतए देत, अपने तँ ओ बिछानपर परैत मातर कुम्भकरन जकाँ स ुति रहल आ हम भरि रा ति कोरो गनैत बितेलहुँ।” विद्याचन्द्र झा “बमबम”, कैथिनियाँ बीहनि कथा- आबक जमाय बहिन दाय देखथुन आँगनक मोख तक कियो आयल छलखिन ,पूछलिएन जे के छी तऽ चोट्टे आपस भय गेलथि ! ने जानि के छल हेताह ? हम ताबत हल्ला होइत देखलिए :- मार सार केऽ चोर उच्चका लमपट नहि तन रे, आ भीड़ एक गोट व्यक्ति कैंऽ लात - मूक्का सऽ दूरुस्त कऽ रहल छल ! हमहु भीड़ कऽ चिरैत -फारैत ओतय धरि पहुँचलहु , आखिर एतय कि भय रहल छैइक ? किआक एतेक भीड़ लागल छैइक ? किआाक एतेक हो - हल्ला भय रहल छैइक ? मात्र जिज्ञासा बस गेलहु आ आब सब किछु आँखिक सोझां मे छल ! हम जावत हाँ-हाँ करि तावत तऽ हुनका अधमिरुत कऽ देने रहैन ! हम पूछलिए :- ऐंऽ रउ तों सब एना किआक हुनका मारि रहल छहुन ? छौंड़ा सब :- कि कहु भैया ई छौड़ा लाल काकी केर कोञ्टा पर एतेक राति कऽ हुलकी मारैत छलैक तऽ कि करितियैक से अहिं कहु ? हम टॉर्च बारि गौर सऽ हुनक मुह देखय लगलहु हे भगवान ! ई कि केलह तों सब ? ई तऽ लाल काकी कऽ जामाय छथिन ! इ सुनि ठार भीड़ अवाक रहि गेल ! बीहनि कथा- अभगलाहा होसीआरपुर बाली कनियाँ छी यईऽऽ - - - -? सुन्दरपुर बाली फटकिए लग संऽ आवाज दइत छथिन ! आबौथ बहिन दाय बैसौथ ,इ तऽ आब एबो नहि करैत छथि ? मार बारहनि कि आयब एकरा सब द्वारे ! ककरा सब द्वारे ? कि भेलनि बहिन हमर छौड़ा सब तऽ नहि किछु कहलकनि अछि ? राम - राम अाहाँ धीया - पूता सन नेना रहय त भागे छैइक ! तखन कि भेलनि बहिन दाय ? ओ हमरे अभगलाहा सदिखन पिव कऽ हल्ला - फसाद करैत रहैत छैइक ! काजो करवाक लेल नहि जाइत रहैत छैइक , ओकरे द्वारे मोन सदिखन बेप्रित लगैत रहैत अछि, कउखन मोन चैन नहि रहैत अछि ! कि कहु ओकर खिस्सा कनियाँ सबदिन लोक सब संऽ गारि - गलौज मारा - पिटी केनहे अबैत अछि ! जतय - ततय सऽ उपराग सब अबैत रहैत अछि ,जेहो सब मूरी नहि उठबैत छल सेहो सब दूटा बात - कथा कहि कऽ चलि जाइत अछि ! कि करि किछु नहि फूराइत अछि ? चिन्ता जूनि करौथ , कहाँ दिन सुनलिए जे सरकार सगरे दारु - तारी बन्न करऽ जा रहल छैइक ! धू कि बन्न करत इ फूसियाहा नेतवा सब , सब फूसिये बजैत रहैत अछि ! आर गामे - गामे एकर दोकान फोलने जा रहल छैइक आ आहां कहैत छियै जे बन्न करत ! नइऽ यईऽ बहिनदाय सत्ते कहै छियैन बन्न कऽ देतैक , किआक तऽ टीवी रेडियो कागत-समाचार सगरे कहैत रहैत छैइक ! तखन तऽ दिने सुदिन भ जेतैक हमरा सबहक ! भगवान भल करौक ओकरा जे इ सब बन्न करवाओत ! ( कि ता फेर हल्ला भेलय ) जाय दिअ कनियाँ फेर लगयैऽ पिव कऽ एलय अछि ! फेर अवियहथि बहिन दाय - - - - - ! बीहनि कथा- आदति संयोग संऽ आय लाल कक्का भेंट भऽ गेलाह ! ओ अपन मस्ती मऽ बरबराइत जाइत छलथि ! हम पूछलिएन कि हाल समाचार अछि कक्का ? ओ झूमैत बजलाह बहुत नीक , तूं अप्पन कहऽ ? हमहुं ठीक छी , मूदा अहाँक मूंह संऽ दूर्गंध कथिक निकलैत अछि ? दारु - तारी नहि तऽ- - - - - - ? हमर आदति सऽ तूं तऽ परिचिते छऽ तखन एना अकचाइत किआक छऽ ? बूझले छऽ जे जावत हम एक घोट दऽ नहि दइत छियैक तावत थकान दूर कहाँ होइत अछि ! नहि हमरा तऽ भेल जे सरकार दारु - तारी बन्न कऽ देलकइ तऽ - - - - - ? तऽ कि लोक अप्पन आदति सॅऽ बाज आवि गेल हेतय सैह ने ? हउ एतय टाका छऽ तऽ बुझऽ जे जिन्ह बला आका छऽ तों ! एतय पाय'क बले कि नहि भेटैत छैइक ? मात्र पाय रहल ताकि फेर जे तकबह से तोरा हाथ मऽ ! सरकार डैढै़ - डैढ़ै तऽ भ्रष्टाचारी सब पाते - पाते चलैत छैइक ! हम :- एकर मतलव जे दारु - तारी भेटतहि छैइक ? नहि ओना नहि भेटैत छैइक , जेना पहिने डेग - डेग पर भेटैत छलैक ! परंच जकरा बूझल छैइक तकरा लेल कमी नहि छैक दू पाय सस्त की महग ! जाय दैह दोरा सने बक्क - बक्क के करत कहि बरबड़ाइ बिदा भेलाह ! बीहनि कथा- भोंट लाल कक्का केर देखियैन जे ,जेसब भोंट माँगय लेल आबनि सब कैंऽ भोंट देवाक आश्वासन दय विदा करैथ ! जे आवनि सब कैंऽ कहथिन जे चिन्ता जूनि करु हम अहाँक भोंट देबे करब दोसर कैं दियैक वा नहि दियैक? आ अहाँ सब बुझितै छियैक जे हम कहियो फूसि नहि बजलहु ! हुनक इ बात सुनि हमरा नहि रहि भेल हम पूछि बैसलिऐन ऐं यउ कक्का अहाँ फूसि नहि तऽ कि सबटा सत्ते बजैत छी ? त कि हम फूसि बजैत छी से तोंहि कहऽ जे आइ धड़ि कि फूसि बजलहुं ? हम कहलिएन जे जतेक मुखिया - सरपंच भोंट मगवाक हेतु अबैत अछि सबकैंऽ कहि दइत छियैक जे अहाँक भोंट देबे करब तखन फेर - - - - - ? तखन फेर कि - - ? इ नहि ने कहैत छियैक जे अहाँक छोंड़ि दोसर कैं नहि देबैक ! परंच कक्का - - - ? परंच कि ? इहय ने जे तूं सोचैत हेबह जे सब कें कोना भोंट द देबैक सैह ने ? हउ जखन टप्पे मारवाक छैइक तखन जेहने एक ठाम मारने तेहने सब ठाम मारने ! कोनो भीड़क काज त नहि छइक जे दिक्कत होयत ? तखन तऽ सब भोंट बोकसे भऽ जायत ! बोकस भऽ जाउ वा खोखस भय जाउ परंच हमर बात झूठ नहि ने होयत ? आओर एकटा बात जे सब तऽ मूर्खे - गवार ठाढ भेल छैइक जकरा सी आखरक ज्ञाण नहि छैइक से जनताक प्रतिनिधि बनत आ हम ओकरा भोंट दय पापक भागी नहि बनब हउ? तांय सबकैंऽ देबय आ भेटतय ककरहु नहि ! वाह कक्का अहाँ कमाल आ अहाँक सोचो कमाल ! बीहनि कथा- इलेक्सन लाल कक्का आओर लाल काकी दूनू गोटेक हल्ला सुनि हमहु हुनक आंगन प्रविष्ट केलहु ! हम कहलिएन कक्का आय धरि काकी कैंऽ तमसायल नहि देखने रहियैन आय कि बात छैक जे काकी अहाँ पर अग्निच - वायुश्च भेल छथि ? तावत लाल काकी बाजि उठलि ऐं यउ बउआ कि कहि जहाँ कि इलेक्सन नजदिक आओत कि हिनका भरिदिन दनान पर चाहे (चाय) चाहि ! चीनी आ चाहक पातक कोनो उद्यमे नहि , तखन अहिं कहु जे कतय संऽ इ सब पार लगत - - - ? कि लाल कक्का बमकि उठला तऽ कि हम दनान पर बैसल लोक सब कैंऽ दनान पर सैंऽ भगा दियौक कि ? दनान छैइक त लोक एबे करत आ बैसबे करत ! भगबैय लेल के कहैत अछि ? बैस ने होय छैइक लोक कैंऽ जत्ते काल धरि बैसत से परंच चायक चाह आवश्यक छैइक कि ? हउ हमहु कि अनका चाह पिआबैत छी ? सब तऽ मुखिये - सरपंच आ आ ओकर लोक सब तकरा ने पिआबैत छी हउ ! हमहुं हुसल काज नहि करैत छी पाँच साल तऽ ओकरे सबहक बदौलत खेपब कि कतहु चाकरी करय लेल जायब से तूंहि कहऽ कने ? कि बाहर संऽ कोन ओमिदवारक आबाज एलय लालबाबू छी यउ ? हं - हं हइआ ! जाउ -जाउ चाह त जढ़ले अछि ने ? भरि दिन इ सब अकच्छ कऽ छोरत ! बीहनि कथा- हेल्लो लाल कक्का :- बमबम छऽ हउ बमबम - - - - ? हं कक्का कि भेल ? एम्हर आबह कने तोरे संऽ काज छल ! आय हमरा संऽ अहाँक कोन काज भ गेल यउ ? जे ने कराबय इ वैज्ञाणीक यूग ! से कि भेल यउ कक्का ? हउ कि कहियऽ ? एहि बेर बेटा एगो हेल्लो द गेल अछि तहि द्वारे सदिखन फरिसान भेल रहै छी ! ओ त भने मोबाइल दऽ गेलाह जे जखन मोन होयत तखन बेटा - पुतहु , सर - सबंधी जकरा संऽ मोन होयत तकरा संऽ गप कऽ लेब एहि मे फरिसान होयबाक कोन काज ? हउ कि कहियऽ एहि हेल्लोक कारन संऽ तोरा काकी संग झंझट भऽ गेल ! से कोना झंझट भ गेल अहाँक तऽ नहि कहियो काकी संऽ - - - ! कि कहियऽ तोरा कहय बला गप्प रहय तखन ने कहबऽ ? आ नहि कहबऽ तऽ तों बुझबहक कोना सेहो बात छैइक ! हं बिनु कहने कोना बुझबैक कहबै तखने बुझबय ! हउ तोरा जहाँ कि कतहु हेल्लो लगबैत छी की एकटा जनना बाजऽ लगैत अछि इ सुनि तोहर काकी हमरा पर कुपित भ जाइत छहऽ ! आ एक दिन तऽ कहि बैसल जे बूढ़ारी मऽ घीढ़ारी करबाक मोन होयत अछि ? नवारी मऽ कहियो लांछन लगेबे नहि केलक आ हेल्लो द्वारे बुढ़ारी मऽ - - -? हेल्लो संऽ नीक चिट्ठीए छल ककरहु अबय त तोहर काकी बूझबे नहि करय पढ़ले नहि होयक ! आब तूही कहऽ जे कि करि एहि हेल्लो कऽ ? हमरा त मोन होयत अछि जे चूरि कऽ डबरा मऽ फेक दियै ! हँ - हँ एना जूनि करु ओ त कम्प्यूटर बजैत रहैत छैइक ! ओह से गप्प तोरा काकी कऽ के बुझेतह ? हमर गप्प सुनबाक लेल तैयार नहि छथि कने तोही बुझा दहक नहि त एहि हेल्लो क आय हम - - - - - ! बीहनि कथा- नोन चटबा पुर बाली एक्के सुरे गाड़ि कथा पढ़ने जाइत छलैक ! कि भेलय किआक एतेक तमसायल छैइक आइ ई ? कि हेतैक छौंड़ाक हालत देखौक ने तखन फेन फूछियौक जे किआक तमसायल छैइक ? कि भेलय छौंड़ा कऽ? से देख ने होइत छैइक जे कि भेल हन से ! बाप रे बाप एना के मारलकय एकरा ? के मारतैक अपने गिरहत मारलकई कने खेत मे बकड़ी हुलि गेलय तय लेल देखौक ने केना दू-दालि कऽ फोरि देने छैय ! छौड़ा कतय छलय जे बकड़ी खेत मे चलि गेल रहैक ? कतय जेतैक कने छौड़ा सब सने - सने खेलाय लगलहि तय लऽ हमर नेना कऽ एना भऽ कऽ मारलकई नीक नहि हेतय ओकरा ! किआक एना बाजैत छैक इ , कियो दोसर मारलकई अपने गिरहत कने डाँटि देलखिन छौड़ा बदमासो बड्ड छय बदमासी केने हेतय आ जाँउ मारनेहे हेथिन तऽ ओ नीके द्वारे ने मारने हेथिन ! ओ कखनहु बेजाय नहि कऽ सकैत छथि हम हुनका नीक संऽ चिन्हैत छियैन्ह ! इ मनसा कऽ कि भऽ गेलय से नहि कहि ? बेटा कऽ एना भऽ कऽ मारलकई तइयो मालिक'क बड़ाई कम नहि होइत छैइक ! लगय एकरा नोन पढ़ा कऽ खुआ देने छैइक एकरा गिरहतवा ! बीहनि कथा- साढ़े बाइस थोथर बाबूक ओतय ब्राह्मण भोजन होइत छलैक आ भोजक पाँती मे लाल कक्का घूमैत छलाह कि एक गोटे पूछलकैन लाल बाबू , खोखाय बाबू केना कि भोज - भात कैलथि अथि ? लाल कक्का बजलथि खोखाय बाबू साढ़ै बाइस केलथि ! ओ व्यक्ति लाल कक्काक मूहे देखैत रहि गेल छल ! ओना हमहु बात नहि बुझि सकल रहि ! कि ओ पूणः बाजि उठल आ थोथर बाबू कते नोतने छथि ? इहो हमरा हिसाबे साढ़े बाइसे केलथि अछि ! बेचारे ओ तऽ चूप्प परंच पाँती मे बैसल लोक सब लाल कक्का'क मूँह बक्कर - बक्कर तकैत रहि गेल छल जे लाल बाबू इ कि बजलाह ? हम सेहो भोज खयला'क उपरांत साढ़े बाइस'क बारे मे सोचैत छलहु जे साढ़े बाइस मे कि होइत छैइक ? ओन साढ़े बाइसक मतलब तऽ नहि मे बुझैत छल ! मूदा थोथर बाबू तऽ भोज केलथि आ सब बैसि खेबो केलहुं तखन तऽ एकर मतलव नहि मे नय लगा सकैत छी ! परंच इ कोन साढ़े बाइस कहलथि से नहि कहि ? प्रात भेने लाल कक्का कैंऽ बाट बहारैत देखलिऐन हमहु अपन मोनक भितर बसिआइत बात हुनका सऽ पूछि बैसलहुं ऐं यउ लाल कक्का साढ़े बाइसक मतलब कि होइत छैइक ? लाल कक्का कोन साढ़े बाइस मतलब कि कहैत छऽ कने फरिछा कऽ कहऽ ने हउ ? हयउ राति मे भोज बला साढ़े बाइसक अहाँ जे कहने रहिए तकरे मतलब नहि बुझि सकलहुं ? ओऽऽऽ हउ अप्पन टोल कैंऽ नाम पैंतालीस घर छियैक कि नहि से कहऽ ? हम हं से तऽ पैंतालीस घर छियैके मूदा इ साढ़ै बाइसक कि भेलय से पूछलहुं अछि ? लाल कक्का हउऽ तुहूं महा बूड़ि लोक छऽ ! पैंतालीक आधा कि होइत छैइक से कहऽ ? पैंतालीसक आधा तऽ साढ़े बाइसे होइत छैइ मूदा - - - - -? मदा कि ? दूहु गोटे आधा - आधा टोल लऽ कऽ भोज केने रहथि ! आबो बुझलहक कि नहि साढ़े बाइस ? आ नय बुझलहक तऽ कहियो नहि हुझबहक ! हम हं - हं कक्का बुझि गेलिए साढ़े बाइस ! धन्य छी अहाँ आ धन्य अहाँक सोंच ! बीहनि कथा- मोहन भोग आय चारि - पाँचटा लंगोटिया संगी सब भोरहि - भोर हमरा घर पर पहुंचल ! ओहि मे दू - तीनटा परदेशी दिल्ली - बम्बई मे रहनिहार सब छल जे गर्मी छूट्टी मे गाम आयल छल ! हउ बाबू एबिते देरि तेहन ने अनघोल मचेलक से जूनि पूछु ! हरउ दोष घर संऽ निकल ने रउ , देखि हम सब बाहर संऽ एलहु अछि तऽ एकरा खोज करय लेल आबि गेलहुं आ एकरा घर संऽ निकलल पार नहि लगैत छैइक ? जखन विआह नहि भेलय तय पर , विआह भऽ जेतय तऽ लगय अछि दर्शनो एकर दूर्लव भऽ जायत आरो किदनिकहां दनि सब - - - - - -! हमहु अकच्छ भऽ घर संऽ निकललहु ! कि बात छियै रउ तों सब एना किआ अनेरो गरदमगोल मचेने छंऽ रउ ? हरउ कि कहियउ कहलिए जे गाम एलहुं अछि तऽ गाछी - बिर्छीक मजा सेहो लेवाक चाहि आ जहने गाछी दिस जायब तऽ तोहर ओ मिठका मोहन भोग कोना बिसरि सकैत छी ? जे तोरा बिनु गेनहि भोग नहि होयत ! हम :- अच्छ तांय हमरा संग करय लेल ऐलऽ नय तऽ नहि अबितैंय सैह ने ? नय रउ एहन कोनो बात नहि छहि तोरा हम सब बिसरि सकैत छियउ कि से कह ? से तऽ हम बुझैते छियै जे तों सब कि कऽ सकैत छैंऽ ? हम कटहरक गाछ पर आ तों सब कटहरक आंठी टा निच्चा मे छोड़ने छलैंय , सक्क रहितउ त ओहो तुं सब नहि छोड़ितैंह ! इ बात एखन तक तोरा मोने छउ ? हाऽऽऽऽ हाऽऽऽऽ सब गोटे खूब हँसलक अच्छऽ सून एकटा दू हत्थी झटहा लऽ ले तखन चलिहैं नहि तऽ - - - - - बुझिते छहि कि खेबैंऽ से ! लऽ लेलिए तूं सब तकर चिंता किआक करैत छैं तोरा सब आम खेबा सऽ मतलब छउ कि गाछ - - - - - - ? हरउ बुझलियउ आब चलबो कर ! (सब गोटे बिदा भेलहुं जकरे गाछ भेटय ओहि पर झटबाहि शुरु ! बानर जकाँ किछु खाइत किछु फेकैत गेलहु ! आ अपना गाछी पहुचि बुझु जे मोहन भोग के झटहाक मारि मारि कऽ सहन भोग बना दइ गेलय) बीहनि कथा- जड़ैत चिमनी छाप लाल कक्का दनान पर खैनी चूनबैत बैसल छलथि कि एकटा कुर्ता - पैजामा बला यूवक जकरा पाछू - पाछू करीब दस - पंद्रह टा नव - यूवक छौंड़ा सब सेहो छलैक ओ आबि कऽ लाल कक्का कैंऽ प्रणाम करैत छैन्ह ! पहिने तऽ लाल कक्का कने हरबरा जाइत छथि मूदा मूह संऽ निकलैत छैन्ह नीके रहऽ ! लाल कक्का एखन नीके रहय बला आर्शिवादक कुनो औचित्य नहि अछि कुर्ता - पैजामा बला बाजल ! ताहि पर लाल कक्का हउ बाबू तखन कि कहियऽ हम तऽ सब कैंऽ सैह कहैत छियैक जे नीक ( स्वस्थ ) रहऽ, लोक कऽ आओर कि चाहि परंच तूं तऽ अजबे लोक बुझायत छऽ ? पाछू संऽ एकटा छौड़ा बाजल हिनका विजय श्री कऽ आर्शिवाद दियौन कक्का ! कि लाल कक्का बाजि उठला हमरा पहिनहि बुझाइत छलय जे एहि मूसटंडा छौंड़ा सब संगे कतहु मारि करवाक लेल जाइत छऽ परंच मोन मे भेल जे कहिं से बात पूछबऽ तऽ तोरा खराप ने लागि जाउ ताहि हेतु नहि पूछलिऽ ! कुर्ता - पैजामा बला एहि बेर हाथ जोड़ि विनम्रता पूर्वक बाजल अहाँक बात कियो बेजाय नहि लैइत अछि तऽ हम कोना बेजाय मानब से कहु ? हं सेहो तोंऽ ठीके कहैत छऽ हम कखन कि बजैत छी से अपनहु नहि बू़झैत छियै तखन लोकक कोन कथा ! परंच लाल कक्का अहाँ जे सोचलहु से हम नहि छि ! हम एहि बेरक चूनाव मेऽ सरपंचक पदक ओमिदवार छी ! जेना लाल कक्का कैंऽ अपसोस भेल हो तहिना भऽ कऽ बजला ओह तोरा पहिनहि ने से बात बजवाक चाहि छलहऽ ने हउ ? देखहक हम तऽ तोरा चिन्हवे नहि केलियऽ ! कि ओर पूणः बाजल कक्का हम गूरकुनक बेटा छी आ हमर बाबाक नाम भूटकुन छलैन्ह आऔर हमर नाम छरपन भेल ! छऽ लम्बर पर हमर चूनाव चिन्ह जड़ैत चिमनी छाप अछि ! आब अपन आर्शिवाद दिऔक कक्का ! लाल कक्का अहि बेर बेस सम्हरि कऽ बजलाह हउ हम तऽ पहिनहि कहि देने छियह जे नीके रहऽ ! हउ नीके रहबऽ तखन ने मेहनत करबऽ आ बुझैते छहक जे मेहनतिक फर मिठ होइत छैइक से तऽ तोंहु बुझिए गेल हेबहक बिनु नीक रहने किछु संभव नहि छैय तखन जा खूब मेहनत करऽ ! नीके कऽ इहो मतलब भेल जे ओहो मे नीके रहबऽ कि बूझलक ! जे आज्ञा कक्का कहि फेर एक बेर प्रणाम कऽ ओ बिदा भेल ! ओकरा गेलाक बाद लाल कक्का बाजऽ लगलाह देखियउ गूंडे सब सरपंच बनवाक लेल तैयार अछि ! धन्य हमर प्रजातंत्र !! बीहनि कथा- नोटक भोंट सूकन के चारि - पाँच गोटे सँऽ मारि रहल छलैक ! मूक्का - हाथ लात - जूता जेना ओकरा उपर बरसि रहल छलैक ! धिरे - धिरे आरो लोक सबहक जूटान ओहि दिस भऽ रहल छलैक परंच ओतय पहुचलोक बाद कियो किछु बाजैत नहि छलैक ! सब अपन मूकदर्शक बनि ओहि दृश्यक आनंद उठबैत छल ! ता हमहु ओतय पहुंचलहु परंच हमहु ओ दृश्य देखि के किं कर्तव्य विमूढ़ भऽ गेलहुं ! देखत छी सोमन आ सोमनक समर्थक सब इ कहि मारैत छलैक जे - - सार तों जे भोंट देवऽक बदला नोंट लेने छलहि तकर कि भेलहु ? आ सूकन बजैत छल जे हम अहाँक भोंट दिआ देलहु ! परंच सोमनक आदमी सब मानय लेल तैयार नहि जाँ तों सब हमरा भोंट देंलह तऽ हम हारि कोना गेलहु रउ ? सार फूसियों कऽ पाय ठकनाय अइये निकालि दैइत छियहु - - - - - - हम तऽ इहय सोचैत रहि गेलहु जे दोष ककर ? मारि खेनहार केंऽ कि मारनाहर कैंऽ पाय देनहार कैंऽ कि लेनहार कैऽ ? बीहनि कथा- हकार रखवारी वाली'क अंगना मे हकार पूरय वाली सबहक धर्रोहि लागल छय टोल - पारक धिया - पूता संऽ ल'क बुढ़िया धरि बेरा -बेरी बरसाइतक बदाम लेबऽ लेल आबय -जाइत छैइक ! रखवारी वाली'क पुतहु सबकें आग्रह संऽ बैसाय कऽ माथ मऽ तेल सिनूर दऽ आदरक संग बदाम दय विदाह करैत छलैक ! मूदा एहन उदार भाव अप्पन पुतहु केऽ देखि रखवाली वाली कैंऽ ग्रह्य नहि भऽ रहल छैइक भितरे - भितर पुतहु पर कन्हुअाय रहल छल परंच करत कि एतेक स्त्रिगण आंगन मे बैसल छय तकरे द्वारे टा चूप्प भेल अछि नहि तऽ - - - - - ! मूदा संयोग देखियो मौका भेटिए गेलहि - - बघांत वाली यऽइ कनियाँ हम तीन गोटे छी तीनू गोटे'क हिस्सा बेन हमरा दऽ दिऽ - - - रखवारी वाली'क पुतहु अपन साउस दिस ताकऽ लगलि जे कि करि कि ताबत पितोझिया वाली बाजि उठलखिन कने लबाइये कऽ दियहु ने अहाँक भगवान कोन बस्तूक कमी देने छथि जे साउक मुह तकैत छी ? साउस तऽ अहाँक आय धरि टोल पार मे ककरो खोंटियो के बेन नहि देने हेती तेहन कृप्पन छथि ! हउ दियउनु देखय छियहि बुच्ची दाय'क वर सेहो सूनय छी कहाँदनि इनजियर छथिन आ भारो - दउर तऽ खूब नीक जकाँ आयल छल तखनो अहाँ से - - - - - ? एतबहि बात सुनैत देरी रखवारी वाली अग्निश्च - वायूश्च भऽ गेली भगवान देने छथिन तऽ कि सबटा लूटा देतहि कि ? इ सब हमरा पुतहु कैंऽ सिखा - पढ़ा कऽ खराब करय जाय - जाइत छथि इ हमरा नीक नहि लगैत अछि से बुझि लय जइयो ! कि पितोझिया बाली सेहो ताउ मे अबैत अंयऽइ अहाँ अंगना कि कियो बिन बजौने आयल कि ? अहाँक अंगना कियो थूको फेकय लऽ नहि आयत लोक ! हऽ य चलय - चल ,आ सब बिदा भऽ गेल ! नहि देवाक छलहि तऽ हकारे नहि दितहि लोक कुकूर छय कि -- - ? प्रेम बीहनि कथा- सिनेह गऽइ तोरा सब कैंऽ एखन धरि तैयार नहि भऽ भेलहु ? सब वरसाइत पूजनिहारि जाइतो गेलय बड़क गाछ तर जगहो नहि भेटतहु सब पहिने जगह छेक लेतहु लालकाकी बाजि उठलि ! रानी तों तखन सऽ घर मऽ कि करैत छहि गऽइ एखन धरि तोहर श्रींगार पूर्ण नहि भलहु अछि ! हँ काकी हइया हमरा भऽ गेल - - आब कने भउजी कऽ सेहो ने - - - - ! तों दुनू ननदि - भाउज भोरहिं संऽ ओरियौन मऽ लागल छंऽ आ पहर दिन बितल जाइत छहि आ तोरा सब केंऽ सजब - संबरब कऽ अंते नहि लइत छउ ? आ हम सब किछु ओरियौन कऽ केंऽ तोरा सब कैऽ कथा सूनबय द्वारे एक पहर संऽ बैसल छी आ तोहर सबहक लिला तऽ कहले ने जाय ? कि घर संऽ भउजी'क मध्यम स्वर बहरेलन्हि आब कि सब दिन हिनके सब कैंऽ समय रहतन्हि कि ? एखनो धरि कक्का'क सिनेह मानल नहि जाइत छैन्हि सब संऽ पहिने बियैनि आ सिंनुरिया आम डाली मऽ ल'क तैयार रहैत छथि ! ( कि अहि बात पर भेलहि ठहक्का ) आ हमरा सब कैंऽ - - - - ! हम सब त एखन नव छी नेह उचिते छैइक ने ? लालकाकी तखन नेहियाति रहु नहु - नहु - - - - प्रेम बीहनि कथा- उड़ाँत मास्टर सेहाबक बेटा पढऽ - लिखऽ मऽ बेस तेजगर छलैइक ! ईस्कूलक परिक्षा मऽ सदिखन प्रथमे अबैत छल ! ओकरा कोनो दोस्त - महिम सऽ बेसी मतलब नहि रहैत छलैक ! ओना ईस्कूलक सब छौंड़ा - छौंड़ी सब ओकरा संऽ बात करबाक लेल आतुर रहैत छलैक , मूदा ओ ककरहु संऽ बेसी बात - चित नहि करैइत छल ! ओ अप्पन पठन - पाठनक काज सऽ बेसी मतलब रखैत छल यथा ओहि मे लागल रहैत छल ! समय बितैत गेलय आ ईस्कूलक पढा़ई समाप्त कऽ ओ आब कॉलेज जेवाऽ जोग भऽ गेल छल ! आ कॉलेज मऽ नाउ सेहो लिखौलक , ओकरहि संगे सुजित बाबूक बहिन सेहो ओकरहि कॉलेज मऽ नाउ लिखेलकइ ! बता दि जे दूनू इस्कूले सऽ संगे पढ़ैत छलय ! छौड़ी केर कॉलेज मऽ नाउ लिखेवाक घर सऽ मनाहि भेटल छलहि मूदा जिद्द केला उत्तर ओकर नाउ लिखेलहि ! शायद छौड़ी कैंऽ ईस्कूले कऽ समय मास्टरक बेटा सऽ सिनेह भऽ गेल छलहि ! दूनू कॉलेज जाय लागल कने दिनक बाद दूनू के गप - शप सेहो खूब नीक जकाँ होमऽ लगलहि ! दूनूटा बाट - घाट सेहो बात - चित करऽ लगलैक निधोक भय कऽ ! ने जानि दूनू मे एहन बदलाव एका - एक कोना आबि गेलय , भ सकय कॉलेजक प्रभाव हो अथवा स्नेहक प्रभाव हो ! जे होई दूनू टा आब बेस उड़ाँत भ गेल छल ! परंच गंउआ - घरुआ कैंऽ एना भऽ दूनूक मखरनाई अंसोहात जकाँ लगैइत छलैक ! होइत - होइत एक दिन बात सुजित बाबूक कान मे सेहो परलइक जे अहाँक बहिन आ मास्टरक बेटा - - - - - ! फेर कि छलहि सुजित बाबू ओकरा दूनू पर नजरि राखऽ लगलाह संयोग सऽ एक दिन दूनू कऽ कॉलेजक पाछू ठाकूरबारीक मंदिरक आंगन मऽ लगाओल फूलक बगान मऽ दूहु केर बैसल अपना आँखि सऽ देख लईत छथिन ! आ ओतय सऽ अप्पन बहिन कऽ पकरि गाड़ी मऽ बैसाऽ घर आनि लैइत छथिन ! तखर बाद प्रात भेने संउसे गाम मऽ अनघोल मचल छलहि जे सुजित बाबूक बहिन फंसरि लागा मरि गेलय ! आ मास्टरक बेटा सेहो लापता छैइक ! मूदा चरबाह - हरबाहक धिआ पूता हल्ला करैइत एलय जे माहटर सेहैऽबक बेटा कमला कात मऽ मूइल परल छैइक ! लोक सब दउरल नदी कात - - ! देखियो एकर साँस चलिते छहि - - - ! छौड़ जिव तऽ गेलहि मुदा सनकल सन भ गेलय ! आब तऽ ओ छौंड़ा एकदम निच्छट बताह जंका करैत रहैत छैइक ! छिछिआति रहैत छैइक बरबराइत रहैत छैइक ! प्रेम बीहनि कथा- जूड़ाएब रविश बाबू सूतले रहथि कि श्रीमति जी वासी पानि हाथ मऽ लय रविश बाबूक माँथ पर दइत हाथ फेरैइत ! उठू ने - - ! देखियो सूर्य भगवान कोना सोलहो कला लय उगल छथि ! चिड़ै - चूरमून्नी सब कोना चहकि रहल अछि ? वसात सेहो कतेक सोहनगर बहि रहल छैइक ! उठूऽ उठूऽऽऽऽऽ ! रविश बाबू आँखि खोलइते देरी आय माय मोन पड़ि गेल ! नेना रहि तखन जूड़ि - शितलक दिन बेस अहिना ओहो कहैत उठबैत छल ! ओह ओ दिन सब कतय चलि गेलय आ ओ पावनि तिहार सब से नहि कहि ? परंच आय अहाँक हमरा उठेवाक इ नव ढंग कतय सऽ प्राप्ती भेल ? जे हम निंद्रा संऽ सिधे तंद्रा मे नेनपनक बीच चलि गेलहु ! हमर माय ने तऽ फोन पर कहलक ? हे भगवान आय जूड़ि शितल छियैक से अहाँक नहि बूझल अछि कि ? पत्नि माँथ पर हाथ फेरैइत कहलकनि ! ओह सैह देखियौक एहि शहरक भग - दौड़ मऽ अपन पावनि - तिहार सेहो मोन नहि राखि पावैत छी ! परंच इ कहु जे अहाँक बासी पानि सूतले मंऽ माथ पर देवाक ख्याल कोना आयल ? पत्नि :- आय दिने सैह थिकैक जकरा संऽ लोक कैंऽ आस रहैत छैइक लोक अजूका दिन ओकरा जूरबैइत छैइक ! जेना गाम मंऽ माय, पितियैन, मंइयाँ आरो - आरो लोक सब आजूक दिन धिया - पूता कैंऽ माँथ पर पानि दय जूरायल रहवाक आशिर्वाद दइत रहलैक अछि ! किआक तऽ भविष्य मऽ ओहि धिया - पूता संऽ समाज कैं किछु आस रहैत छैइक तैंय ! गाछ - पात केर लोक पानि दय जूड़बैत छैइक जे लोक कैऽ भारी आस लागल रहैत छैइक गाछ - पात संऽ ! परंच हमर तऽ सगर जिनगी अहिं पर चलैइत अछि ! हम अहाँक जूराअयल रहवाक प्रार्थना नहि करब त ककर करब ? इ कहि दूनू गोटे पूर्ण शांत भय किछु सोचय लगलाह ! प्रेम बीहनि कथा- पंचैती प्रणव सब दिन ओकर आगू - पाछू करैइत रहैत छल ! यथा ओकरा पर नजरि राखल करैइत छल ! शायद प्रणव कैंऽ ओकरा संऽ स्नेह भ गेल रहैक ! परंच प्रणव कैंऽ ओकरा संऽ इ गप्प कहैत डर लगैत छलैक ! एवं - क्रमे चारि साल बीति गेल मुदा आय धरि प्रणव सऽ ओकरा कहल नहि भेलय ! एक दिन कोना ने कोना प्रणव के हमरा संऽ बात - चित होइत -२ मित्रता भय गेलय आ ओ हमरा ओतय बेसी काल आबय लागल ! ओ छौड़ी सेहो बेसी काल एमहर घूरिया - फिरिया कऽ आबऽ लगलहि! हमरा एखन धरि एहि बातक भनक तक नहि लागल ! कि संयोग सऽ एक दिन प्रणव हमरा सऽ सब बृतांत कहैत कहै अछि जे हमरा ओकरा सऽ स्नेह भ गेल अछि ! हम पूछलिए जे कि ओहो अहाँ स स्नेह करैत अछि कि ? प्रणव बाजल से हम एखन धरि नहि बुझि सकलहु अछि ! से कने अहिं पूछितियैक किआक त आहाँ संऽ ओकरा गप्प होइत छैक ! हम बेस कहि ! एक दिन छौंड़ी कऽ इ बात पूछैत छियैक तऽ ओ हं मे मूरी हिला चलि दैइत अछि ! हम बुझि गेलिए जे दूनू एक दोसर सऽ सिनेह करैत अछि ! आ इ सिनेह एक भगाह नहि छैइक! फेेर कि छय दूनू टा बात करय लगैत अछि ! कि एक दिन गाम मे हल्ला हल्ला भेलहि जे फल्लांमा बेटा आ फल्लांमा बेटी भागी गेलय ! आ सगरो इहय प्रचार होमऽ लगलहि जे छौंड़ा "बमबम" केर दोष छलहि ओकरहि लग बेसी काल रहैत छलहि इ ओकरहि कारनामा हेतैक ! फेर कि छलैक दूनू पक्षक गार्जियन हमरहि उपर पंचैती बैसेलक ! आ गामक पंचक निर्णय तऽ अहाँ सब बूझैते हेबैक ! जे मूह देख मूंगवा ! आय हम फसल छी दोसरक सिनेहक जाल मे - - - - - - - - घनश्याम घनेरो बीहनि कथा- जमाना लड़की खसैत - खसैत बाँचलि तँ पुलिस लड़का केँ थोपड़ा देलकै । लड़की उंटलि आ पुलिस सँ पुछलकैक -- हिनका किए थोपड़ेलिएक ? -- अहाँक दुपट्टा खिचलक तेँ ! -- ओ नहि, हमर खुद केँ चप्पलमे फंसि गेल छल । -- अच्छा ? -- अच्छा कि ? एहि भाग - दौड़क जिनगीमे पुरुख संगे स्त्री नहि भेटैछ ! स्त्री खुद परेशान छथि जे पुरुख भेटय ? बीहनि कथा- नफासी फ़रज़ाना केँ सड़कपर चलैत देखि नगमा केँ आँखि चोंहिया गेलैक । झटकि क' बढलि आ पुछलकै -- की बात छै ? आइ चान रोड पर बुलैत अछि ! -- बुझल नहि छौ, इंतखाब केँ तलाक द' देलियै ने ? -- तँ ओ कार ककरा पल्लामे गेलै ? -- हमरा पल्लामे ! -- फरजाना, एक बात कहियौ - तोरो बड्ड नफासी छलौ । -- अरे ! साला ओ आदमी छल ? कह भला ! छह महीना पर चारि दिनक हाजरी ? -- चल ! आब तँ खुल्ला राज छौ ? -- हँ ! देखही, किस्मत कत' ल' जाइए ! नगमा केँ फ़रज़ानाक बाजब भान करौलकैक - नफासीक दायरा सीमित होइत छैक । बीहनि कथा- आवारा के ?

-- रे भठियारा जकाँ किए ठिठिआइत छें ? -- आइ छोड़बौ नइ ! -- आ, आ ने रे ? पकड़ ने रे ! आंगी खोल, रभस कर ! आ ? आ ? देखहक हउ लोक सभ ! उन्टे भागल जाइ छै । आ ने रे ? छेछड़पनक अंत आब भ' रहल छैक । छौंड़ी - मौगी राखब पुरुखक बुत्ता सँ बाहरक बात ! इ बातक ज्ञान स्त्रीमे पोखगर भेलैक अछि ! बीहनि कथा- पैरबी

मिडिया सहित सभ केओ लखना बाबा केँ संत मानै छइ । लाखोमे भक्त छन्हि । लखन बाबा गुरु शिक्षा सेहो दैत छथिन्ह । हाजरी दरवारमे लगाओल । गघमिसन भीड़ । चारि घंटा लगलै भीड़ उसरैमे । लखन बाबा चेला सँ पुछलथि - -- ओ के ? -- गुरु शिक्षा लेल आतुर छथि । -- पठाबह ! प्रणाम कयलाक बाद नब्बे डिग्री कोण पर ठाढ़ रही कि लखना बाबा हुड़कलाह - -- सोझ सँ ठाढ रहू ? -- अहाँ संत नइ छी ! -- तँ की छी ? -- कथा वाचक ! -- से कोना ? -- संत हुड़कै नहि छथि ! -- आइ सँ हमर उत्तराधिकारी अहाँ ! -- इ संभव नहि । -- तखन ? -- मीडिया केँ सोझाँ सकारू जे अहाँ संत नहि छी ! बाबा आसान तर सँ सोनाक मोटका चेन निकालि पहिरबैत बजलाह - बच्चा, ज्ञानी छह! परख छह !! बीहनि कथा- खल्लास

पिछला मर्डर सफल रहलैक । पछाति बलिप्रदान हो । छागरक स्नान पोखरि सँ करा अनने छल । पंडितजी मंत्रोचारण प्रारम्भ कयलाह । छागरक देह भुलकलैक । कसैया हंसल - खुश । ता मे छागर नागरि झाड़ने छल आ कसैयाक आँखिमे किछु गड़ि गेलै । -- भाई ! खल्लास । जब्बार हंफियाइत बाजल । भीमा ई बात सुनिते ठाढ़ भ' गेल आ पंडितजी केँ आदेश दैत बाजल " छागर केँ स्वतंत्र क' दियौ ! -- किए यौ ? -- मनुख छोड़ि आन जीवक बध बड्ड झंझटियाह अछि । पंडितजी भीतर सं डेरा गेलाह । बीहनि कथा- पेटक अँटकर 

चूड़ा-दहीक आर्डर केँ बैरा निष्पादित क' चुकल छल । हरी बाबू किए बिलंब करताह - मुदा ढकार नहि भेलनि तँ सशंकित भ' उठलाह । हाक देलथिन -- रमुआ दौगल आयल । -- साफ - साफ बता, डंडी मारने छलैं आ कि नइ ? -- हाकिम ! अइ होटलक दस रुम हमर जिम्मा छै । डंडी मारबै तँ अफरि नइ जेबै ! -- मतलब, हम फूसि बजै छी ? -- से कहाँ कहै छी ! एक बेर फेर सँ अँटकर लगा क' देखतिएक ? -- हमर पेट केँ उकटबें ? -- कस्टमर तँ हमर सभक भगवान् छथि ? भगवानो सँ लोक कहूं उकटा - पैंची कयलक अछि ! -- होशियार छेँ ? -- होसियारी तँ कस्टमर सिखबै छै ! मुदा कस्टमर नइ जनै छै जे दोसरक ईमान ओकर पेटक अनुसारे रंग नहि बदलै छै ! रमुआ केँ गट्टा पकड़ि हरी बाबू बैसोलन्हि - चिल्ड वाटर चाही, अनबें ? किए नइ ! रमुआ केँ आब जा क' दिमाग हल्लुक भेलै । दौगल फ्रीज़ बाला हन्ना डिस । बीहनि कथा- प्रेम पेसगी सैंयां बिना ..., सैंयां ले ...., सैंयां - बाक बन्न । फेर शुरू वैह सैंयां भइल ...। -- हे रौ मचरुआ ! चुप्प भेलैं कि उठियौ ? -- तोरा की भेलौ गे बुढ़िया ? -- सैयां माने बुझै छेँ ? -- हँ गइ ! कनियाँ हेतै तँ हमरा कहतै सैंया ! -- तँ तों किए अनघोल कयने छेँ ? -- तों की बुझबी ? ओकरे सांती कहै छियै, गबै छियै । -- निर्लज्जा ! लोक की कहतौ ? -- लोक एकरा प्रेम पेसगी कहतै ! -- भगलह कि ? जो सूत ग' ! हारि क' बुढ़िया अपन हन्नाक केबाड़ भिड़ा लेलक । बीहनि कथा- समुदाय विधायक बाला एलेक्शनमे दुएटा नामक चर्चा रहैक । मिसर आ इदरीस । मनुक्खमे अतेक सोझमतुआ नहि देखल । ओना काल्हि भोंट खसाओत लोकसभ ! साइत थाकि गेल हेतैक । नबो नाथ आ मोह नाथ चललाह भोंट खसाब ' । -- नबो, तों ककरा भोंट देबहक़ ? -- भैया ! मिसर तँ नहि जीत रहल छैथि ! -- हमरो सैह लगैए ! -- तखन ? -- ठिकेदारिओ बैसिए गेल छह । एहि बेर इदरीसबा केँ ट्राई करबहक ? -- इच्छा तँ होइए मुदा मोन छ - पांच ? -- से किए ? -- मिंया छै ने ! -- अपन काज ककरा सँ सुतरतह ? -- से तँ इदरीसबे सँ । छठा धरि संगे पढ़ने अछि ! जीतल तँ बाह - बाह ! -- अहाँक धर्म की कहैए ? -- धर्मक चर्च केलह तखन सुनह : वैतरणीक पार करबा लेल बाट एखनोधरि फोर लेन नहि भेलैक अछि । वैह एकपेड़िया । समुदाय विभिन्न छै मुदा बाट वैह छै आ रहतै! बीहनि कथा- धुज्ज़ा

अराडि करबामे अब्बल अछि सोनमा । अपन बँसबिट्टी छैक । जखने मोन भेलै दूटा बांस काटि लाओत आ छेकम छेका शुरू ! सोनमाक पित्ती केँ साहस नहि भेलै जे किछु कहितैक । तबो बाजल -- बांस उपटेला सं फायदा हेतौ ? -- तँ दोसरा केँ घुसक' दियै ? -- से तँ ठीके करय छेँ, किछु - किछु दोसरो काज कायल क'र ! -- कोन काज ? -- सिरिफ अराडि सँ डिप्लोमा केने हेतौ ? -- किछु नहि फुराइऐ ! -- अइमे सँ एकटा बांस कात क' दही ? -- किए ? -- काल्हि रामनवमी छै । धुज्ज़ा गडेतै । -- अच्छे ! हनुमानी झंडा अनलहक ? -- हमर हाथ खाली छौ । -- हमरो तँ वैह हाल छह । -- तँ दोसर बांस बेचि दे ? सोनमाक माथा ठनकलै । आब एहि सभ सँ काज नहि चलत । बांस उपटि जायत । -- कक्का आब चललियह बम्बई ! -- किछु देने जैतें ? -- अराडि बाला डिप्लोमा छोड़ने जाइ छियह । बीहनि कथा- निरमा पोता तीनटा आम नेने छल । उम्र पाँचम चढ़ल छलै । दुएटा हाथ - उबडुब्ब भेल छल । पुछलिएक - -- एकटा आम देबह ? -- अंहुँ केँ नइ देब आ रागनियों केँ नहि देबै ! -- किए ? -- दुनु गोटे हमर बात नहि मानै छी । ता मे रागनी धमकलि । -- एकटा हमर, एकटा बाबा केँ आ बाँकी तोहर ! -- छु क' देख ? दांते नहि कटलियौ तँ ? -- बाबा ! नइ देतौ । -- जाय दही, खाय दही ! -- थमह ने बाबा ? उपाय करै छी ! रागनी आँगन गेलि आ एक लोटा पानि नेने आयलि । लोटाक पानि घोंकैत छलि । पोता पुछलकै -- लोटामे की छौ ? -- तोहर करेज । -- नइ गे अइ मे फेन छौ ! -- निरमा देने छियै, शुद्ध निरमा ! निर्मल निरमा । -- की करबही ? -- उघारे देह रह ने, मम्मी थूरि देतौ ? -- अत' बाबा छथिन्ह ! -- अच्छा रुक तोहर हिरदे शुद्ध आ निर्मल करै छियौ । -- कोना ? रागनी लोटमे हाथ भिजा भिजा ओकर छाती पोछैत रहलै ताधरि , जाधरि दुनु आम नुका क' बाबा केँ देने रहैक आ लोटा ओंघरा देलकै । -- हमर आम ? -- तोरे पलथी तर छौ ! -- एक्केटा ? -- हिरदे निर्मल नइ भेलै ? -- अच्छे, एकटा आम बाबो केँ दियौंह ? रागनी बाबा दिस तकलक आ आँखि मटका देलकै । बीहनि कथा- रक्तदान

भैया बोकारोमे नव घर लेलनि आ एहि लाथे भौजी सँ भरि पोख बतियाल रही । -- सुन्नर लगै छी ! -- धन्यवाद ! ओना मुंह कान चिक्कन अछिए । -- नहि औ, धोती - कुर्तामे ! -- ओ ! -- कबूला रहय कि जे पचासक उपर हयब तँ धोती धारण करब ? -- नइ अइ ! सुनबामे आयल अछि मिथिला राज्य बनतै । -- ओइ राज्यमे अहींक धोती उधियाएत की ? -- मिथिलाक पोशाक की हेतै ? गुनघुनमे छी ? -- किए ? -- नवतुरिया केँ पहिराबा देखै नहि छिऐ ! -- आप रूपी भोजन, पर रूपी श्रृंगार ! -- तँ अहाँ जीन्स किए ने पहिरै छी ? -- से आब हेतै ? आब साड़िए मे जिनगी कटि जेतै । -- आब झोरामे एक सेट धोती, कुरता, दोपट्टा आ पाग रखबाक हिस्सक लगबै छी ! -- यैह पोशाकक धोषणा मिथिला राज्य करत ? -- परंपरा देखल जेतै तँ कँहु हमरे बात ने साँच भ' जाय ! -- दुविधामे किए छी ? -- डिपेंड मुख्यमंत्रीपर करै छै ने ? भौजी फेर घुरि फिर धोतीपर टकटकी लगोलनि आ पुछलन्हि : -- पहिने सँ बेसी कम्फर्ट लगैत हयत ? -- हँ अय ! देह से हल्लुक जकाँ । -- वाह ! -- लेकिन एकटा अवगुण छइ, अइ मे फाँक छै । -- से तँ परम्परा निमाहैमे लोक चारि फाँक छै । -- फाँक बाटे मच्छर खूब खून पिबैए । -- परम्पराक नाम पर किछु तँ रक्तदान करू ? -- बेस ! चाह पियाउ ।  -- किए ने ! -- साँझ पड़लै, आब रक्तदान स्वतः होइत रहतै ! बीहनि कथा- दियाद-ताप

घूरन झाक आँगन टोलमे सभ सँ नमगर आ चौड़गर छैक मुदा बीचमे टाट लागल । तीन बरखक बाद आइ टाट भोरे उजारि देने छलैक तँ पूरन केँ करेज सुप सनक भेलैक । संताप रहैक ! घूरन झा लगले तीनटा खाधि खुनि साँस लेलन्हि तँ फेर पूरन झाक मोन कसिया गेलनि - पुछलथिन्ह -- ई की केलह ! आबो दियादी ताप कम नहि भेलह ? -- भेल तखनहि ने टाट उजारि देलिए ! -- तखन ई खाधि ? -- भैया ! दियादी ताप कम आ सूर्यक ताप केँ धुज्ज़ा लहरै छै । -- एहि खाधिमे की करबहक ? -- काल्हिए तीनटा आम गाछक बेना  द' आयल छलहुँ, आइ अनबै । पूरन झा अपन टीक सोझरबैत मुस्कैत छलाह - टाट रगड़क प्रतीक छल । (पर्यावरण दिवस) बीहनि कथा- काँट

रमण नहि रमण बाबू कह' पड़त ! भैयाक सार थिकाह । दालि सुड़काहा । हम नहि दीदी नाम रखने छलै । -- पिंटू बाबू अहाँक विवाह मरुकिया ने ? -- हँ ! -- पाहुन सँ यैह चूक भेलन्हि । ई सुनतहि पत्नी घेड़ाक पथिया पटकैत बमकलीह - हे रौ रमना ! ओना डारि पात नहि पकड़ । फरिच्छा क' बाज जे की खेबाक इच्छा छौ । हाट विदा भेलहुँ तँ पाछु लागि गेलाह रमणजी आ पत्नी कहलन्हि - दही लइए लेबै आ कहि दै छी - रमना केँ पाई - ताई खर्चा नहि करबै ? -- दीदी कहिया धरि एतै यौ ? -- से किए ? -- सभटा बात ओकरा कहबै ? -- राम राम ! माँछ भात खुआ, काँट नहि गराबी ! पत्नी अपने हाथ सँ अपने गाल थोपियौलन्हि किए ....... ? बीहनि कथा- करता हूँ - स्त्रीलिंग

आफिस सँ घुमल छलहुँ । घमायल शरीर । लाल काकी केँ हाक देलियनि : -- कत' छी ? -- काम करता हूँ ! खसल अठबज्जर ! पंखा ऑन कयल आ लुद द' बैसा गेल । पंखा जाधरि स्पीड पकड़ैत ता घाम सुखा क' बाउल भ' गेल रहय । -- कने सोझ सँ बाजब तँ नइ हएत ? -- कोना हयत ? पुरुखक कपडा खीचू हम, आयरन करू, हाट - बाजार, डाक्टर - बैद, न्योत - पिहान, इस्कूल पहुंचाबी हम । तै पर सं आयल गेल से ! आब अहीं बाजू ? हमरा बकज'र लागि गेल । नहि तँ भाषा शुद्धिकरण क' सकलहुँ आ ने चाहक फरमाइस करबाक हिम्मति भेल । बीहनि कथा- वर (?) साइत नैंसीक हमर ननदि । तीन मास पूर्व बियाह भेल छल हमर । हुनक अबैया रहनि - नहि जुमलाह । अकथाइन मोन सँ नैंसी केँ हाक देलियन्हि : -- कने एम्हर आएब ? -- सुनै छी - बहीर नइँ छी ! -- दुनु भाय - बहिन एक्के रंग ! -- की भेल भाभी ? -- आइ हमर सैं अहीं ! -- आज्ञा ? -- बाजार जाउ ने, किछु - किछु किनी लाउ ने ? -- जेना ? -- पंखा । -- उषा आ कि तूफान ? -- अइ मे बाँसक होइ छै ? -- कोन बाँसक ? -- हरौथक । -- आगू बाजू ? -- कोनी बेनी, रील नहि तागाक पोला, अगरबत्ती किछु किछु फल फूल आ मिठाई । -- दो हजार निकालो ! -- अनमन भायक आवाज लागल । -- ठीक है एक्के हजार लाओ । -- अच्छे ! जायब कोना अय ? -- हमरा पर छोड़ू ने ! पाइ लाउ पाइ ? अहाँ नहा सोना क' तावत तैयार रहब, हम लगले पयर एलौं आ नैंसी फुद्दी भ' गेलि । जखन पाइए नइ आपस करती तँ उघउथ चंगेरा । ओना नैंसी भौजाई केँ हाथ सं लुझिए लैतैक ! जेहने झमटगर वरक गाछ तेहने स्त्रीगणक झुण्ड । मुदा ओइमे एक भाग करबै तँ कुमारि सभ हेतै । धियान सं गुनैत - बुनैत ! नैन्सीक भौजाई तागा सँ वर गाछक अटूट बान्हक तिरपेक्षण करैत छलीह तँ अन्चोके नैंसीपर नजरि पड़लन्हि - अरे ! ई की ? अनजान छौंड़ा केँ तागा सँ किए बन्है छथिन्ह ! चंगेरा सैंति रोड पर अबिते नैंसी भौजाई सँ कहलकै -- पका दै छै नइ ? -- अहाँ की पकबै छलहुँ ? -- अंहुँ कुमारि मे एहने हयब ? -- बेसी फड़फराउ नहि । ओ के छल ? -- के अय ! -- वर ? साइत ! -- धुत ! चलू ने अय । नैंसीक मूड़ी गोंतब भौजाई केँ नीक लगलै । बीहनि कथा- जानेमन

वाश रूम वरिष्ठ नागरिक हेतु काल अछि । अपन किरदानी देखाओत अवस्स - जेना रानहल माँछ पर बिलाइ धपायल हो । लालकाकी सिर बिसायल । पिछड़ि गेल रहथि । चकरी घूमि गेलनि । प्लास्टर उपरान्त लालकक्का उठा अनने रहथिन लालकाकी केँ । एक गिलास पानि दैत पूछलखिन्ह - कोना भेल ? लालकाकी किछु बजितैथ मुदा कोना पड़ल रहतीह तकर ग'र बैसा रहल छलीह । ता मे लालकक्का केँ जोर सं भभायल हँसी छुटलन्हि । ले बलैया ! लालकाकी तेना ने हड़बड़ेलीह जे अपने ग'र बैसि गेलनि । निसास छोड़ैत बजलीह - धुत जाउ ! बीहनि कथा- आशीर्वाद

बुढ़बा केँ बुढ़िया हबक्का कटने रहैक । सांझूक समय आ पुतौह तेसर मंजिल सँ सेहो उतरि गेल छलैक । दुनु बेकती गुम्म आ असमंजसमे रहथि । भोरे बुढ़ उठलाह । स्नान उपरान्त लोटामे जल भरि ठाढ़ छलाह । हाक देलथिन्ह : -- कने गंगाजल आनब ? बूढी गंगाजलक बोतल दैत पुछलथिन्ह - की करबै ? बूढ़ा लोटामे गंगाजल फेंट देलथिन्ह आ बूढी केँ स्थिर भ' बैसबाक अनुनय विनय कयलनि आ बूढी संचमंच बैसि गेलीह। बूढ़ा लोटाक सम्पूर्ण जल बुढ़ीक माथपर पातर धार सं खसबैत पुछलथि - जलक चोट लागय तँ कहब ! बूढी मुड़ी ऊपर उठौलन्हि आ किछु गंगाजलक बुन्न घोंटा गेल रहनि आ हुनक हाथ उठि गेलनि - जेना आशीर्वाद दैत होथि ! बीहनि कथा- तेरे सिवा

मॉर्निंग वाक डाक्टर सँ बेसी घरक लोक कहैए तें करैत छी । ककरा ने मोन होइत हेतैक जे भोरका सिहकी ओछाओन पर लागय । एक चक्कर मैदानक लगाओल आ कोन ध' बैसि गेलहुँ । एकटा बुढ़ नेगरियाइत लुद द' बैसलाह । चुनौटी पर नजरि खिरलन्हि आ पुछलन्हि : -- अछियो की ? -- हँ ! -- एम्हरो ? -- किए नहि ! मुदा अहाँ आइ उदास छी । -- एहि उम्रमे हंसी हमरा लेल उपहास ! -- से कोना ? -- लोक कहत - बुढ़बा बताह भ' गेलैए । -- सभ नहि कहत ? -- हँ, पत्नी छोड़ि - सभ ! -- सत्ते ? -- कारण हुनको बाध्यता छन्हि । -- मुदा हँसैत तँ जरूर हएब ? -- हँ ! हम हुनका देखि आ ओ हमरा .... । बीहनि कथा- फिरसान

तीनटा मिस्ड कॉल - भोरे भोर । देखलंहु तँ फिरसान महराज । -- हेल्लो ? -- हँ हँ, हम फिरसान ! -- सुनाबह, टिकट कनफर्म्ड नहि भेलह कि ? -- कतुक्का ? -- बैकुंठधामक ! -- खिल्ली नहि उड़ो ? -- हम खुद फिरसान छी ! -- मजाक नहि करह । छूतहर कहूँ ई सभ सोचए ! -- तोरा सभक अखन चलती छह ! -- तोहर दुबकब लोकक खुसी ! -- सैह तँ ! भेंटघाँट भ' जायत, अबियौ ? -- भगलह की ! थम्ह, हमहीं अबैय छियौ।  -- बेस आ ! बाटपर ठाढ़ फिरसान माथ परहक घाम काछैत बाजल -- मीता, लोक होशियार भेल जाइत अछि । वेट वेट एंड वेटक ज्ञान भेलैक आ हमरा घर बैसा देलक । बीहनि कथा- सहरसाबाली

इ तेसर बेर छलै । कारी घटाटोप मेघ । लटकल । गुमकी तेहने । आ कि बिजलोका चमकलै, कड़कलै - ठनका कत्तौ खसल हेतै अवस्से ! कमलाक निन्न टुटलन्हि । हफियलीह आ अंगेठीमोड़ लैत देह तँलैन्हि -- चली आब दीदी सँ भेंट करी ! बड़बडाइत विदा भेलीह । दीदीक चौकठि नाँघिते कोशी अक्चकेलीह : -- गे ! आबो थीर हेबें से नहि ? -- किए ? -- आबो वैह जुआनी छौ ? -- जतबे दिन बाँचल छै, उमक' दे ने गे ! -- जो जे मोन होइ छौ क'र ! -- मुंह नइ घोंकचो ! खेलैत - कूदैत तँ फेर तोरे शरणमे रहै छियौ। -- बेसी हमरा पतियो नहि ? -- अपने जेना बड़ सज्जन ? -- तँ की ! -- पूछा दियौक ? -- ककरा सँ ? -- राजकमल सँ, सहरसाबाली सँ .... कतेक नाम लियौ, बता' ? 'हूँ' ! कोशी स्तब्ध छलीह कमलाक बातपर । बीहनि कथा- भठियारा 

स्वीट होम सँ निकलैत सड़कक काते कात राधा विदा भेलि । रघबा अन्चोके स्कूटी सटा देलकै । -- नइ सुधरबें ? -- घूर ! चल, मिठाई खुआ ? -- निर्लज्जा ! कथीक खुसीमे ! -- हमरा जे निरैस देलें । -- तोहर सिद्धान्त हमरा पसिन्न नहि । -- ठीक । तकर माने हम भठियारा छी ? -- नइ रे ! तों प्रिय छेँ ! -- हमरा सँ अखन डेराइत हेबें ? -- किए ? -- तोहर होयबला सिद्धांत तोड़बा सकै छियौ ! -- चल, तँ खा ले मिठाई ! -- डेरा गेलें ? -- नइ रे ! तों भठियारा नइ छें । जानि ने किए रघबा केँ आँखि नोरा गेलैक । राधा अपन छोटकी रुमाल बढ़ा देने छलि । बीहनि कथा- जिज्ञासा

ओ तखन फँसि गेल जखन पत्नीक खाता सँ भैयाक खातामे तीस हजार रुपैया ट्रांसफर क' देने रहैक । ओ होशियार अछि मुदा अनुज अछि । अग्रज किछु देने हेथनि से मोन होइक वा नहि मुदा जनैत अछि हुनके देखायल बाट, जतय ठाढ़ अछि तकर परिणाम छैक । कतेको प्रयास कयलक - फूसि कंहू गलय, ओहिना छिटछिट । पत्नी आगू लिबल नहि । गुम्मा छुआ अनने रहय । अग्रजक दू मास पहिने नोकरी छुटि गेल छलैक । ओ भने कोनो दोसर महानगरमे सपत्नी दूर छल । पत्नीक कलह बेसाहब जायज रहैक । ओकरा पत्नी औना क' राख' चाहै छैक । ओ भातृ भक्त अछि । पत्नी उधबा उठा देलकै । नैहर सँ फोनपर पंचैती करौलक । ओ अग्रज मामिला सं आहत छल । उपर सं पत्नीक तलाक मुद्दा । लतियौलक पंचकेँ - दमिभरि । पुरुख कें चन्ठो हएब जरुरी । सभ सक्कदम ! पत्नीक आस नैहरो सं खत्म । मामिला हारिक' अग्रजक कोर्टमे ओकर पत्नी दाखिल कयलनि । सेहो मोबाइल पर । दस तरहक बात ओकरा सुन' पड़लैक । पत्नी खुश रहैक । पराजित अपने सं कराबी सैह सफल ! ओ बौक भेल पराजित होइत रहल फोनपर । घिघियाइत रहल । बात कयनिहार दोसर आन नहि ओकर अग्रज रहथिन । तीन मास बाद । ओ साँझमे आफिस सं आयल छल कि पत्नी मोबाइलपर आयल मैसेज केँ देखबैत पुछलकै - पैंतीस हजारक कोना आबि गेलै ? -- कप्पारक छोट तँ हम छी ! -- से की ? -- भैया ट्रान्सफर केने हेथन्हि ! -- ओ ... ! तखन ओतेक बात किए अहाँ केँ ओइ दिन सुनौलथि ? -- अहाँ खुश रही ! -- एकटा बात पुछू ? -- की ? -- दीदी (दियादनी) केँ हालचाल पुछिएक । भाईजी पांच मास सं घर बैसल छथिन । -- के कहलक ?  -- दिदिए बाजल रहैक ! -- हमरा तँ आइ धरि केओ नहि कहलक ? -- जाय दियौक बीतल बात । ओकर पत्नी फोन लगौलक : -- गोड़ लगै छियौ ! -- सोहागवती ! -- निसबद्दी किए लदने रहैं छेँ ? -- फोने करै लए रहियौ ? -- भैया केँ किए नइ कहै छियौंह जे हुनका सं बात करथिन ? -- किए ? फेर कोनो बात उखड़लैए ! -- नइ गे ! तोरा तँ ओही पर मोन रहै छौ ? -- चल नइ कोनो बात ! जिज्ञासा केलें यैह बड़का बात । जिज्ञासामे बल छैक ।  -- से की ? -- तों सभ छेँ ने ! आर की चाही ! ओकरा थारीमे पत्नी एकटा आओर रोटी रखैत पुछलकै - -- छुच्छे जिज्ञासामे बल होइ छै से हमरा नहि बुझल छल । -- तँ हम की करू ? -- जखन पाइ कौड़िक बाते नहि तँ हाथ धोउ आ भैयाकेँ हालचाल पुछियौंह ? -- ठीके ? -- हँ अइ !!!! बीहनि कथा- काम अमर

टोलमे भैयारी लिहाजे सभ सँ पैघ - मुसन छैथि । दलान सड़कक सटले । सन्नुक राखल । दिनभरि पड़ल रहैत छथि - मुसन । पचपन सँ उपरे हेतैन्हि । मुदा बेर खसैत उतरि जाइ छथि आ सड़कक कातमे बैसल करची सँ घरती केँ छौंकियबैत रहैत छथि - नित दिन । धियापुता खेलाइत - खेलाइत मुसन आगू सँ निकलल । एकटा छौंड़ा केँ नहुँए इशारा कयलन्हि आ -- सुन ! हमरा मौसा नहि कह । -- किए ? -- साँझ पड़लै, हमरा नहाय पड़त ! सभ धियापुता मौसा मौसा किल्लोल क'र' लागल । ता एकटा छौंडाक माय ओही रस्ते गुजरलै । -- भैयो जे छथिन ने ! आ घोघ नमरा मुस्कियाइत डेग झटकारि लेलन्हि । बाध सँ घास क' मलाहिनक झुंड जाइत छलि । धियापुता मुंह सँ मौसा मौसा शब्दक सुनि ठामकि गेलि । मुसन ठिठियाइत रहथि । -- देखियौ बढ़बाक सपरतीव ! कहलकै जे ...... । झुण्ड ससरि गेल रहै । हम ससरि क' मुसन लग गेलहुँ । भाइ ! अहाँक काज अमर रहत । फाइनल करची धरती पर पटकैत मुसन ठाढ़ होइत बजलाह - काम अमर छैक ! बीहनि कथा- डेट-तिथि

भिनसरक समय । घर निसबद छल । दुनु प्राणी जागल । छौंक एक्के ! -- केहन बनलै ? -- नीक । कड़गर । पत्ती बेसी खसा देने हेबै ? -- जाय दियौक । एकटा काज करब ? -- की ? -- एकटा फूल पैन्ट आ कमीज सिया लेब ? -- किए ? -- 28 तारीख अबै छै । -- मतलब ? -- मैरेज डे, बूझै नइ छियै ऐ ? -- बियाह कहाँ भेलाय, कुमारे छी । -- भगलंहु की ? पाइ नामे पुरुख ओहिना कुमार भ' जाइ छथि ! -- अहाँ सप्पत ! हाथ खाली अछि । अहाँ कही तँ एकटा FD तोड़बा ली । -- छोड़ि दियौ । सिल्वर जुबली लए एकटा SIP अगिला महीना सँ चालु करबा दियौक ? -- नीक आइडिया । दू तारीख । रवि दिन । पाठकजी घर बगलमे । कहा पठौलहुँ । अयलाह - सन 91 सालक पतरा नेने । -- 1991मे 28 मई कए कोन तिथि रहै ? -- से की ? -- आ एहि साल सेम तारीखमे ई तिथि कहिया पड़ै छै ? -- अच्छे ।  -- ठीक सँ देखबै ? -- तेरह दिन आगू भागल अछि । अर्थात एहि साल जुनक दस तारीख । उत्सुक पत्नी पाठकजी दिस चाह बढ़बैत पुछलथिन्ह - पक्का ने ? -- कहै केँ बात छैक - सद्यः ! पत्नीक आँखि चमकि गेलनि । पूछलिएन्हि - चलु ने, मॉल सँ घूमि आबी ? हमर पयर जूतामे घुसियाइत छल हुनका सँ फेयर एन्ड लवली पिच्चा गेल रहन्हि आ बहुत रास लोसन बुल द' बाहर भ' गेल छलैक । घर सँ बाहर होइत पत्नी हमर कॉलर ठीक करैत कहलैन्हि - डेट सँ तिथिए नीक, नइ ! बीहनि कथा- आवाज

-- दीदी गइ ? -- की ? -- अखन जे फोन कयने रहै से गुंडा बुझायल । -- भक् ! ओ भूटकुन छलखुन । -- अपने मोने लोक बूझि जेतै जे हम तोरा ओत्त' आयल छियौक ? -- हँ गे ! आवाज सँ । -- नइ गे ? पुछलक जे पाहुन छथि ? -- से की ? हुनका सँ बियाह करबें कि ? -- ओकर आवाजमे एहन मिसरी रहै जे लागल ओ हमरा सँ बियाह करत । -- गे ! हुनकर उमेर बुझल छौक ? -- हम तँ आइ धरि देखनेहो नइ छिऐ । -- पचासकेँ लगभग ! -- आंइ ! स'ख़मे आगि लगौक । दीदीक बहिन डेग झटकारि दोसर हन्ना पैसि गेलि । बीहनि कथा- कुकूर

मोबाइल सँ हुनक फ़ोटो लैत पूछलिएन्हि - हम घनश्याम ! आबो तँ घोघ सरका रोटी उंटाउ ? -- की कहू बौआ ! हिस्सक पड़ि गेल अछि ? -- से कोना ? -- आँगनमे ननदि दियोर सँ बेसी  जेठ/ससुर सभ बैसि टाइम पास करै छथि । हम लगले दलानमे हुलकलंहु - ठीके कुकूर चौकी पर बैसल छल । बीहनि कथा- सुपर बाए

सुन्नरि काकी । झुडकुट बूढ़ । कारी मजिस्ट तेहने । हाथमे अगबे यश । बाए बैसबैमे इल्मी । मुदा सुन्नरि काकीक बाए पुतौह कहियो नहि जगह पर स्थिर र'ह' दैन्हि । कलरा दौगल आयल । मौसी सँ पुछलकै - दादी कत' छै ? की बात छै रौ ? सुन्नरि काकीक पुतौह अपन बहिन पूत सँ पुछलथिन । माय केँ पेटमे दरद करै छै । बाबू कहलखिन्ह जे पकड़ि क' अनियाउन्ह ! -- हे अय माँ ! कने दीदीकेँ देखि अबथुन्ह ने ? -- पहिने हुक्का सुनगा क' लाउ ? -- एती तँ नहि पीतिह ? -- दोसरा बेरमे एहन अनुराग गाम बुल' चलि जाइए ? -- अच्छा तँ हुक्का भरिए दै छियन्हि । -- पीनी नहि हेतै, मंगा लेब ता हम देखने अबै छी । -- अच्छा जाउथ । उखरा बिताइए क' एतीह ! भनभनाइति काते कात, बाड़िए बाड़ी बहिनक अंगना ढुकि गेलीह - सुन्नरि काकीक पुतौह । -- पीनी मंगेलहुँ ? -- हँ अय ! की भेलै दीदी केँ ? -- कलराक बाप केँ पठेलियैक अछि ? -- किए ? हिनका सँ अंटकर नहि लगलन्हि ! -- दुनु बहिनक थाह भगवाने लगौताह । दीदीक नकिया कए बाजब आ लजाइत सँ सुन्नरि काकीक पुतौह खिखियए लगलीह । काकी टीप दैत बजलीह - -- आब नहि अबेर होइए ! बीहनि कथा- शागिर्द

उर्मिला उमेश सँ अपन कमजोरी एना बखान केलक : -- जनै छें, राति क' सुतै छी तँ कोना ने कोना डेंग चढ़ि जाइए । -- कतेक दिन सँ एना होइ छौ ? -- अक्सर ! -- तखन तँ तोँ फूलकुमारी छें । -- सत्ते रौ ? -- नहि विश्वास होइ छौ तँ मन सँ पुछि ले ! -- झुट्ठा कहीं के ! -- मोहने केँ फोन लगा ले ? -- कोन मोहना ? -- छोड़ ! सिंहजी केँ तँ जनै छें ? -- ओ.......! बीहनि कथा- भ्रम -- हम सभकेँ छोड़ल आ सभ सँ रिश्ता तोड़ल ।  -- ठीके ? -- दृढ निश्चय ! -- आब केओ फोनोफान करै छह ? -- नहि तँ ! -- काल्हि ठेकना क' देखियह आ फेर कहियह । -- की ? -- तोरा के के पकड़ने छलह ? बीहनि कथा- बट सावत्री

-- आम नब्बे रुपये किलो, लीची अस्सी रूपये किलो । -- से की ? -- चारि तारीख क' बड़साइत छै ! -- ककरा सांती होइ छै ? -- अइमे सांती फांती नइ होइ छै ! -- तँ किए करब ? -- धूत ! बूझै नइ छिऐ - स्त्रीगण बर लेल करै छथि । -- ऐ बेर हमरा लेल नइ करू ! -- तँ ककरा लेल सहबै ? -- महंगाई लेल ! पत्नी बकुआ गेलीह । आग्रिम सूचना व्यर्थ जकाँ । बीहनि कथा- गुलबदन

-- छोड़ झाड़ हमरा डूब' दे ? -- किए ? से तोरा बीच कमलामे नइ गोइंत एबौ ! -- अतेक मेहनति किए करबें ? -- एकटा कहबी बुझल छौ ? -- की ? -- डूबैत के खढो उबारि दैत छैक । -- की मतलब ? -- तोरा पर कोन विश्वास ! झाड़ फुनुस पकड़ि फेर उपर आबि जेबें । -- यैह पपियाहि मोन तोरा नहि बिसरै छौ । -- तँ एहन कटाओन बात किए बजलें ? -- ऊँ ! -- रे बाज ने ? अय दुनियामे तोरा सिबाय हमर केओ आर छै ! -- चुप्प पगली ! एहन बात जुनि कर । -- किए ? -- तोहर मुंह विचित्रे भ' जाइ छौ ! -- केहन ? -- गुलबदन जकाँ । आ प्रेमिका प्रेमी केँ मुलुढ़ मुलुढ़ देखितो छलि आ घुसकैतो रहय । बीहनि कथा- गुणवत्ता -- रश्मि तोँ एतेक ओपन माइंड केँ कोना भ' गेलें ? -- जहिया सँ रमेश सँ प्रेम भ' गेल । -- एना होइ छै ?  -- हँ गे ! डिस्कसमे जान छै, सभ तरहक ज्ञान छै ! -- अच्छा ! किछु बता - रमेशक बारेमे ? -- काल्हि रमेश संगे पार्कमे दू घंटा छलहुँ । ओकर नेनमतियाही बातपर खूब हंसलहुँ । अंतमे हमरा सँ ओकर नाक टेढ़ भ' गेल रहैक ! -- कोना गे ! -- ओकर फेसमे जादू छैक । हम प्रेममे बहल जाइत रही आ ओकर नाक पकड़ि डोलबैत गबैत रही - तोँ हमर सोना रे, सोना रे, सोना .... । रागनी रश्मि केँ बिच्चेमे टोकि देलकै - तोहर सोना कतेक कैरेट केँ छौक ? रश्मि सकदम । फक्क आ झमायलि सनक मुँहक आकृति । -- की भेलौ ? -- सैह तँ नहि अखियास कयल ! -- छोड़ ओइ बात केँ ! भोरक भटकल साँझमे घर आबय तँ भटकल नहि कहैछ । रश्मिक सभ आंगुर रागनीक आंगुरमे फँसल रहैक । कड़कड़ा देलकै। रागनीक मुंह सँ खसलै - भक् ! आ दुनु ठिठिया लागलि । बीहनि कथा- झटहा

आमक टिकुला छेटगर भेल आ गाछीमे मचान स्थापित होइत गेल । गुनेसर सभ सँ आगू रहथि । भोगिन्द्र उखपाती अछि । एकटा लुकड़ी सदिखन संगे रखैछ । गुनेसर चेतल छैथि । ओकरा देखतहि मचान पर सँ कुदलाह । -- आबह तँ ? भोगिन्द्र सहटल । धात्रीक सुखल गाछपर फेकलक झटहा । अब्बल डारि सभ झाड़झडा खसलै । फेर फेकलक - लगातार दसो बेर । -- रे भोगिया ? पगला गेलें कि ? -- अहाँ केँ की भेल ? -- सुखल गाछमे झटहा मारने रस चुबतह की ? -- अहाँ सेबू गाछी - तीन मास धरि । खायब - आम आ कटहर । -- आ तोँ ? -- हम तँ यैह बंहलहुँ बोझ आ चलहुँ - खायब गरम गरम टटका रोटी । माय बाट तकिते हयत ! गुनेसर असफल प्रयास करैत रहथि - मचानपर चढ़बा लेल । बीहनि कथा- होश

-- भाग, भाग ? -- की भेलै ? -- आगि लगलै ! -- ठहर ! थम्ह । -- किए ? -- आगि के मिझेतै ? तोहर बाप ! बिहनि कथा- सुख-दुःख -- माय ! अय कोबरा घरमे नइ सुतबौ ? -- की भेलौ से ! -- राति पेट फुलि गेल । -- कहू तँ भला ! अय, अहाँ नीचें मे पाटिया ओछा लैतौंह तँ नइ होइत ? -- हम की जान' गेलियै ! -- ओकर ओछावन सभ दिन फराके करै छलहुँ । -- माय ! कहलियौ ने, अलगे ओछाओन किए ने केलें ? -- आइ की भ' गेलौ ? -- बाँहि चढ़ि गेल । हाथे नइ उठैए ! -- कोना रौ ? -- अपढ़ंगाहि पुतौह अनलें, भरि राति बाँहि केँ सिरहन्ना बनोने रहौ । -- ओहोहो ! नस दबा गेल हेतौ, बाँहि झारही ने रे ! हे अय, सुनै छी - कनी मूव हँसौंथ दियौ ने ! -- एना हुनकर सभ बातमे किए दहीमे सही करै छथिन ? -- भक् बकलेलही ! एक्केटा तँ पूत अछि । ओकरे सुख लए नेनमति जगौने रहै छी । -- तै सँ फायदा ? -- पूतमे माय फायदा घाटा नहि हरै छै । -- काल्हि केँ टिकट छैक, चलि जेबन्हि तखन ? -- काल्हि केँ के देखलक अछि ! अहाँ नहि बाजू । हमर करेज केँ जुराय दिअ - जेना तेना ! पुतौह सासु केँ घेंटमे घेंट जोड़ि सुबकैति बजलीह - माँ, असगर दुःख कोना काटतीह ! बिहनि कथा- भूलचूक-लेनीदेनी

पिपरक झमटगर गाछ । ओकरे सीके पांच डेग पर पोखरि । गाछक कातमे भोला बाबाक मंदिर । ओकर दुनूक उमेर पचास के अंदर हेतैक । देखबामे पैंसठक लगभग । नाम छैक - राम पिरीत आ दुखन । दुखन सरकारक भक्त छल आ कि दुष्ट, रमपिरता केँ तखन भान भेलैक जखन बृद्धा पेंसनबला आवेदन केँ सही बता खारिज करबा देने रहैक । दुखन पर राम पिरीत कनखरल आ धपायल सेहो रहैत छल । दुखना केँ एहि बीचमे घर मचमचा गेल छैक । बाबा केँ गोहरियामे लागल रहैत अछि - भोरे भोर । रमपिरता सोचलक - दुखना केँ पाछु पड़क चाही । भोला बाबा केँ कोन ठीक - झूठ बात पर मूड़ी डोलि जएतन्हि तँ हमरा सँ टैपि जायत । रामपिरीत भोरे उठल । लोटा लैत दुखनाक पाछु लागि गेल । पोखरिमे दुनु स्नान केलक । जल उठा मंदिर ढुकल । पहिने दुखना जल ढारैत पढ़लक : -- सांई इतना दीजिए जामे कुटुंम समाय ! -- हय - हय ! लोटा ऊपर कर ? -- किए रौ ? -- अपन बाल गोपाल गाम अबिते नइ छौ, कुटुम केँ के पुछैए ! पाछु हट । आब हमरा जल चढब' दे ! -- तोँ की मंगबही ? -- तोरा रोग लागि जाउ, जल्दिए ! -- किए रौ ? -- पटना सँ बेटा औत्तौ, घिसिया क' ल' जेत्तौ ! -- तोरा कोन फायदा होत्तौ ? -- तोरे पड़ेने बृद्धा पेंसन पास होतै, बाबा पर जल ढाड़ने सम्भब नहि। आ रामपिरता जल मंदिरक सीढ़ी पर हेरबैत उतारि गेल । राजदेव मण्डल एडजस्‍टमेन्‍ट (लघुकथा) मनक बाटिकामे कामनाक पुष्‍प फुलाइते रहैत अछि। कालक कारणे किछ मौला जाइ छै मुदा किछ विकसितो होइते रहै छै। भुलोटन खेतसँ आपस अबैत-काल सोचि रहल छल- जाड़ भेल अछि। आगि लग बैसबो करब आ पत्‍नीसँ प्रेमपूर्वक गप्‍पो करब। जहियासँ बेटा-पुतौहुक पुतौहक अँगना भेल पत्‍नियोँसँ गप्‍प करैमे संकोचे रहैत अछि। मुदा अखनी अँगना सुनहट होएत। लोक सोचैत रहैत अछि किछ आ भऽ जाइ छै किछु आर। विचारले गप्‍प जँ भऽ जाइ तँ सभ स्‍वर्गेमे डुमकी मारत...। भुलोटन अँगना ऐबते देखलक जे पत्‍नी कोनटामे मुँह नमरौने बैसल अछि। सहैट कऽ लग गेल आ सिनेहसँ पीठपर हाथ दैत पुछलकै- “की भेल?” पत्‍नी फनैक उठलै- “हटू, ऐठामसँ..!” “एना किए कनै छी?” “कानबै नै तँ हँसबै। ऐसँ नीक तँ मरि जइतौं।” “फरिया कऽ बजबै तब ने बुझबै।” “कहै छै जे मने-मन गजै छी आ गज लऽ कऽ नपै छी! ओइ दिन नै कहलौं जे हमरा अलगे रस्‍ता लगा दिअ। एकर ओल सनक बोल सहल नै जाइए। मुदा अहाँक मन तँ अछि दोसरे। आइ सभ करम करा देलिऐ।” “कानू नै चुप रहू। कोनो गप्‍प तँ रस्‍तेसँ कएल जेतै किने।” “अहाँ रस्‍ता आ बाट तकैत रहू। अँगनामे रहबै तब ने देखबै रँगताल। अहाँक बेटा पुतौह मीठ अछि तँ संगे रहू। हम अलगे रहब। नहि हेतै तँ केकरो बरतन-बासन माँजबै। एकटा पेट तँ कुतो पालि लइ छै। हम तँ मनुख छी।” “धुर, तेतेक लगौड़ी लगबै छी ने। अहूँ की कम छी। कोय ईर घाट तँ कोय वीर घाट। हम पुछै छी- अखनी की भेलै से बजू ने?” भुलोटनक बात सुनिते जेना ओकरा पत्‍नीक अन्‍तरमे उधका मारलकै। बुझेलै कोनो सहाराकेँ कियो जोरसँ डोला देलकै। ओकरा आँखिसँ भर-भरा नोर खसए लगलै। ओ बझल गलासँ बजली- “एतेक दुख काटि अहीले बेटाकेँ पोसलिऐ। केतेक आसा लगौने छेलिऐ। सभटा आस-मनोरथ आब संगे चलि जाएत। यादि अछि- अहूँ कहै छेलिऐ- कमजोर छी तैयो अँगना-घरक सभटा काज करए पड़ैत अछि। पुतौह आएत तँ किछो ने करए पड़त। गिरथाइन बनल रहब। बैसलेमे तीमन-भात भेटत। देखियो आब- आगूमे भात पाछूसँ लात। से अहाँक सोझहामे। जखैनकि अहाँ खुट्टा जेकाँ ठाढ़ छी। तब हमर ई गति?” पत्‍नीक अन्‍तिम वाक्‍य जेना भुलोटनक सूतल पुरुषार्थकेँ जगा देलकै। बुझेलै देहक कोनो भागसँ गर्मीक उत्‍पति भऽ रहल होइ...। बुढ़ाएल नस-नस तना गेलइ...। “ओ कुपूत केनए गेल अछि। दूटा पाइ कमए लगल तँ अपनाकेँ की बुझैत अछि। दुनू परानी निपत्ता किए भेल अछि। अखनी सोझहामे रहैत तब ने देखा दैतिऐ।” “की भेल यौ भुलोटन काका? किए गरमा रहल छिऐ?” कहैत पड़ोसिया निरसू लगमे आबि गेल छल। पत्‍नी कनैत बजली- “हँ, निरसूओ बौआ तँ ओहीठाम रहइ। हमरापर तँ बिसवासो नै हएत। एकरेसँ पूछि लियौ। केना हमर कण्‍ठ पकड़ने रहए।” “कनी फरिया कऽ हमरा बुझबए पड़तह निरसू। की सभ भेल रहै?” निरसू कातमे बैसैत बाजल- “यौ भुलेटन काका, किछ दोख लोहोक आ किछु लोहोरोक। केकरा की कहबै। एहो औंगरीमे काटबै चाहे ओहू औंगरीमे कटबै, जखम तँ अहींक हएत।” पत्‍नी बिच्‍चेमे काटैत बजली- “अहूँ झूठ नइ बाजू। हमरा कण्‍ठ पकैड़ नै मारै छेलै?” हाथसँ इशारा करैत निरसू बाजल- “अहाँ थिर रहू हम तँ कहिते छिऐ। दूधक लेल लड़ाइ भेल रहइ। तखैन कनियाँक नैहरसँ चारि गोरे आबि गेल रहइ।हुनकर भाइक संगे। सभटा दूधक चाह बना देल गेलइ। तहीपर काकीकेँ नै रहल गेलइ।” “रहल केना जाइत। मालिक-मलिकाइन सुतले रहै छै। हम जाड़-ठारमे अनरोखे थरथराइत ओइ टोलसँ दूध लाबि दइ छिऐ। टाँग-हाथ कठुआ जाइए। देहमे जड़ैया बोखार रहए तैयो दूध लाबलौं। से एको घोंट कथीले रहए देत। सभ दिन इहए टेबा। कहलिऐ तँ कण्‍ठ मोकै छलए। अहिना कहियो मारि देत हमरा।” “ई गप्‍प बरदाइश करैबला छै निरसू? दुनू परानी हमरा सभकेँ जिअ नै देत।” निरसू भरोस दैत बाजल- “तेहेन बात नै छेलै। एकेबरे आमील नै पीबू। कनियोँ कनी बेसी तमसा गेल छेली। तेकर कारण छेलै जे भाइक संगे नैहरक नीक लोक सभ छेलै। काकी ओकरा सबहक सोझेमे गारि-बात दिअ लगली। बता-बातीमे सौस-पुतौह ठेलम-ठेल कऽ लेलकै। कमजोरीक कारणे काकी गिर पड़ली। आब एकरा तिलकेँ तार नहि हुए दियौ। काका एडजस्‍ट करू। यौ अहाँ सबहक समए गेल बीत, आब भऽ गेलै दुनियॉंक इएह रीत।” मुदा भुलोटनकेँ मनमे दोसरे बात उपकलै- कहियो-काल जे पत्‍नीक हाथसँ तेल लगै छल सेहो दुरलभ हएत, तँए बाजल- “नहि हौ, सभ गप्‍पमे ई सभ अहिना करै छै। हम नै मानबै। पाँचटा पंचकेँ बैसेबै करबै।” एक दिस बेटाक सिनेह आ दोसर दिस पत्नीक प्रेम बीचमे पिसाइत भुलोटन सोचैत-विचारैत बढ़ि रहल छल। सुनै छिऐ किछे दिनक बाद एलेक्‍सन होइबला छै। ऐबेर अछेवटकेँ भोँट दऽ मुखिया बनेबाक छै। देखै छी ओ निडर छैथ। बजै-भुकैक छमता छै। पर पंचायतमे दूधक दूध आ पानिक पानि बेरा दइ छथिन। एहने लोक मुखिया हेबाक चाही। कतेक दिनसँ सोचै छेलौं जे आन गोरेतँ झगड़ोकेँ बढ़ा देत। अछेवटकेँ एक दिन घरपर लऽ जाएब। एकरे बुत्ते झगड़ा सुलझत मुदा समएपर भेँट हुअए तब ने...। भुलेटन विचारक बोनमे वौआइत अछेवटक दुआरिपर पहुँच गेल छल। दुआरिक एक कातमे अछेवटक पिता बैसल छला। भुलोटन कनी दूरेसँ पुछलक- “यौ, अछेवटजी छैथ आकि नै?” “ओकरा कथीले ताकै छहक हौ?” “एगो पंचैती करेबाक छै।” “आँइ, ओ बेमनमाँ पंचैती करत?” भुलोटनकेँ शंका भेलै। एना किए बजै छै। सहैट कऽ लग चलि गेल छल। अछेवटक पिता हाथ देखबैत कहलकै- “देखै छहक चण्‍डलबाक किरदानी। सटकासँ हाथ तोड़ि देलक। जे बापक हाड़ तोड़ै छै से तोहर निसाफ करैले जेतै।” भुलोटनक टाँग तरक धरती हिलए लगलै। चारू भर धुइयाँ-धुंध। किछ फुरेबे ने करइ। मोन पड़लै पड़ोसियाक गप्‍प। निरसू ठीके कहै छल- “एडजस्‍टमेन्‍ट..!” गंगजलिया पोखैर (बीहनि कथा) कोनो वस्‍तु वा स्‍थानक नव नामकरणक एकटा इतिहास होइ छै, से कनी साँचो रहै छै, कनी झूठो रहै छै आ कनी बदललो रहै छै। ऐ पोखैरकेँ गंगजलिया पोखैर किए कहै छै? गामक लोक जे गंगा असलान करए जाइ छै, ओतएसँ आपसी हैतकाल गंगाजल नेने अबै छै आ ओ पोखैरक पानिमे मिला दइ छै। ई परम्‍परा बहुत पहिनेसँ चलि रहल छै। तँए ऐ पोखैरकेँ गंगजलिया पोखैर कहै छै। गामक पैघ लोक कहै- “ऐ पोखैरमे नहेलासँ लोक पवितर भऽ जाइत अछि।” ओही गंगजलिया पोखैरमे नहाइत रही। चारि-पाँचटा धिया-पुता संगी सभ सेहो छेलै। एक-दोसरपर पानि झोंकैत। सुड़कुरिया मारैत सोना डुम्‍मी खेलैत रही। कोय माछ जकाँ उछलैत आ कोय साँप जकाँ हेलैत। खुशीक कोनो सीमा नहि छल। तखैने गामक बड़का लोक असलान करए पहुँचला। संगी छौड़ा सभ संच-मंच भऽ गेल। थिर भऽ कऽ नहए लगल। हमरा ओइ गामक सभ गप्‍प नहि बुझल छल। किएक तँ हम बेसी मामा गाममे रहै छेलौं। तँए हम ओहिना उछलैत-कुदैत रहलौं। ओइ बड़का लोककेँ देहपर पानि पड़ि गेलैन। ओ तमसा गेला। आँखि गुड़ैर कऽ तकलैथ। मुदा हम नै बूझि सकलौं। ओहिना उछलैत-कुदैत नहाइत रहलौं। ओ बड़का लोक अन्‍तिम डूम दैत गंगा-गंगा करैत विदा भेला। फेर हमरा बुते पानि पड़ि गेलैन। ओ फनकैत कसि कऽ दू चमेटा घींच देलक। नोराएल आँखिए पुछलयैन- “हमरा अहाँ मारलौं किए?” ओ फोंफियाइत बजला- “एना बानर जकाँ किए कुदै छेँ। पानि पड़ा देलेँ। अपवित्र भऽ गेलौं!” हम कनैत कहलयैन- “ई तँ गंगाजीक पानि छिऐ। ई पड़लासँ अपवितर केना हेतै?” ओ बजला- “रौ पानि तँ ठीके पवित्र अछि मुदा तूँ तँ अपवित्र छेँ।” “केना कऽ यौ, हमहूँ तँ गंगेमे असलान केने छी।” चटाक फेर चमेटा लगल। “बकटेंटी करै छेँ। गंगाजी मे नहेलासँ जाति थोड़े बदैल जाइ छै।” जेना लागल अन्‍तरमे किछु दरैक गेल। आँखि ललिया गेल छल। तामसा कऽ तकलौं। ओ किछु दूर जा रहल छला। हमरा लगल जे हुनका आ हमरा बीचक दूरी बढ़ि रहल अछि। कतेक तेकर थाह नहि। दिनेश रसिया बीहनि  कथा-१ मनसुखाः बाबा कत स अबै छह ? बाबाः चौरी गेल रहियै । मनसुखाः अतेक रौदमे कि करै छेलहा ? बाबाः कि करियै आमक गाछी के रखबारी , मनसुखाः एह तहन त खुब आम खाइत हेबा तों नै ? बाबाः बौवा कने जा क देखी जे बापक कन्हाके हर कतेक हल्लुक होइ छै । मनसुखा चुप्पी लधने ........ बीहनि कथा-२ बाबा मनसुखाः बाबा कत स अबै छह ? बाबाः चौरी गेल रहियै । मनसुखाः अतेक रौदमे कि करै छेलहा ? बाबाः कि करियै आमक गाछी के रखबारी , मनसुखाः एह तहन त खुब आम खाइत हेबा तों नै ? बाबाः बौवा कने जा क देखी जे बापक कन्हाके हर कतेक हल्लुक होइ छै । मनसुखा चुप्पी लधने ........ सत्यनारायण झा बीहनि कथा- सुटिया अन्हार गुफ्फ |हाथ हाथ नहि सुझैत | आकाश साफ़ रहैक |पूरा आकाश तारा सं आच्छादित |निरवता त’ तेहन रहैक जे हृदय मे अनेरे सनसनाहट बुझाय |भगजोगनिक यत्र तत्र प्रकाश रात्रिक निरवता क’ आओर प्रखर केने रहैक |पक्षी सभ अपना खोता मे तेना ने सुतल रहैक जे कतौ सं कोनो आवाज नहि अबैत रहैक |एकदम शांत |वायुक वेग मे केखनो क’ बाँसक झुरमुट ऊपर नीचा भ’ जायक लगैक जेना कोनो अदृश्य शक्ति ओकरा हिला रहल छैक | एहन अन्हरिया राति नहि देखने छलियेक |हम ओही दिन कतेको अंतराल क’ बाद इलाहाबाद सं गाम आयल रही |हम ओहि समय इलाहाबाद मे पढ़ैत रही |भोजनोपरांत हम अपन दलान पर सुतल रही |नींद नहि होयत रहय |दोसर पहर राति बित गेल रहैक |कनेके काल पहिने बाँध बोन में गिदरक हुआ हुआ सुनने रहियैक |कतबो प्रयास करी नींद हेबे नहि करय |छटपट करैत परल रही |तखने दलानक कात कनैलक गाछ लग कुकुर कानय लगलैक |कुकुरक रुदन हमरा देह मे कपकपी भरि देलक |कनेक मोन क’ स्थिर केलौ |आब बुझायल निद्रा देवीक आगमन भ’ रहल छनि | अर्द्धावस्था मे रही |तखने बुझायल पुबारी कात सं दुर दुर सं केकरो विलाप करबाक आवाज आबि रहल अछि |निद्रा देबी पुनः लंक लेलनि |एतेक राति मे के कानि सकैत छैक ?अनुमान सं बुझायल जे मलहटोली सं कनबाक अवाज आबि रहल छैक |विलाप त’ एहन करैक जेना अंतरात्मा सं चित्कार करैत होयक |ओह ,कियो भारी बिपति मे कानि रहल छैक ?ओहिना ओछेन पर परल रही ,ताबे आँगन दिस सं माय अयलीह आ उठा, कहय लगलीह जे लगैत अछि जेना सुटिया कनैत छैक |ओकर बेटा बच्चेलाल बर जोर दुखित छैक |मियादी ज्वर लगैत छैक |सुटियाक नाम सुनिते मोन दुःख सं भरि गेल |ओ हमरा घरक खबासनी छल |एकेटा बच्चा भेल रहैक त’ ओकर पति भोकरहा मरि गेलैक |बेटाक कारण सगाइ नहि केलक |ओकर निर्बाह हमरे घर सं होयत छलैक |हमरा सात्विक सिनेह सुटिया सं छल |हम ओकरा बेटा सं चारि पाँच सालक पैघ रहियैक |बच्चे रही त’ सुटिया हमरा मायसन सिनेह देने छल |बर माने |हम बच्चे सं ओकर पाछू पछु दौड़ैत रहैत छलौ |आत्मीय सिनेह छल |गाम आबी त’ सुनिते ओ दौड़ जायत छल |अपना हाथे पानि पियाबति छल |हमरा माय क’ पूरा सम्हारैत छलैक |आइ नहि आयल त’ मोन में एकबेर ठह्कल मुदा भेल नहि बुझल हेतैक ?आब त’ ओकरो बच्चेलाल सोलह –सत्रह बरखक भ’ गेलैक |मुदा ----|मायक मुँह सं जहिना सु निलियैक ,तुरत ओकरा घर दिस भागलौ |वास्तव मे बच्चेलाल क’ तुलसी पीड़ा लग सुता देने रहैक आ ओकरा देह पर सुटिया अपन देह बजारि चिचिया रहल छलैक |हमरा देखिते सुटिया हमरा पैर पर अपन कपार पीटय लागल |ओ बेहोश भ’ गेलैक |ओकर दांती छोरेलियैक मुदा होश मे अबिते ओ ओहिना कपार पिटय लगैक |बच्चेलाल निष्प्राण भ’ गेल रहैक |ओ एहि दुनिया क’ छोरि चुकल छल | कनेकालक बाद लोक सभ एकटा ठठरी बना क’ अनलकै \ ओहिपर बच्चेलाल क’ धय देलकै आ राम नाम सत्य छै ,कहैत ,सभ श्मशान दिस बिदा भ’गेलैक | ओकरा अंगना सं सभ चलि गेल रहैक |सुटिया असगरे कनैत रहैक |बगल मे हमहू ठाढ़ रहियैक |एक बेर ओकर आँखि हमरा आँखि सं मिललय |ओकर दर्द जेना हमरा पूरा शरीर मे समा गेल |नहि रोकि सकलौ अपना क’ आ ओकरा भरि पाँज पकरि अपना करेज मे सटा लेलौ आ जोर जोर सं कानय लगलौ जेना माय क’ पकरि बेटा कनैत छैक | कुमार साहेब जैह सुनलकै सैह स्तब्ध भए गेलैक ।मृत्व ओतेक भयावह नहि होयत छैक मुदा जेना कुमार साहेब दय लोक सुनलकै से सभ के विस्मयकारी लगलैक ।कुमार साहेब बहुत मेधावी छात्र रहथि ।एम एस सी मे पुरे विश्व विद्यालय मे प्रथम आयल रहथि ।तत्काल एकटा नामी गिरामी कओलेज मे शिक्षक नियुक्त भए गेल रहथि ।सिद्धान्तवादी ,इमंदार आ कर्तव्य परायण छलाह ।कओलेज शिक्षक रहितो आर्थिक रुपे कमजोरे छलाह ।अनर्गल अर्जन करब महापाप बुझैत छलाह ।विद्यार्थी लोकनि के ट्युसन दैत छलखीन मुदा निःशुल्क ।विश्वविद्यालय मे लोक प्रिय छलाह ।कुमार साहेबक बचपन बर कठिन समय सँ बितल रहनि ।हुनक पिता साधारण कृषक रहथीन ।माय-बापक एक मात्र सन्तान ओ रहथि ।कुमार साहेब माय बापक परम भक्त छलाह ।नौकड़ी भेटला के बाद बूढ़ माय बाप के संगहि रखलनि आ अन्त तक माय बाप के सेवा करैत रहलाह ।माय बापक जीविते ओ अपन ब्याह केने छलाह ।पत्नी सुशीलाजी नामेक अनुरुप सुदृढ़ आ मृदुभाषी रहथीन ।कुमार साहेब के तीनटा पुत्र रहथीन ।बेटा सभक पढ़ाइ लिखाइ मे कोनो कमी नहि केलखीन ।अपने जकाँ बेटा सभ प्रतिभाशाली रहथीन । मुदा बेटा सभक सोच आ कुमार साहेबक सोच मे आकाश पतालक अन्तर छल ।जहाँ कुमार साहेब अर्थवाद सँ दूर रहैत छलाह ,एकर विपरीति बेटा सभ अर्थक पाछू बताह जकाँ करथीन ।तीनू भाई समाज लोक वेद सँ दूर रहथीन ।पतिये के पदचिह्न पर पुतौहु सभ रहथीन ।केकरो सँ कोनो मतलव नहि ।तीनू पुतौहु आधुनिकता सँ भरल ।कोनो चिन्तन नहि ,कोनो सोच नहि ,बस मात्र निज सुख ।कुमार साहेब दुनू बेकती के कष्ट होनि मुदा बाजथि नहि जे एखनुक समय एहिना छैक । जेष्ठ पुत्र अमेरिका ,माझिल इंगलैन्ड आ छोट जर्मनी मे कार्यरत रहथीन ।अर्थोपार्जन आ सुख सुविधा मे ततेक तल्लीन तीनू भाई रहथीन जे माय बाप कोना छथीन तेकर ध्यान तीनू मे केकरो नहि ।बस अपना मे तीनू मस्त । रिटायर भेलाक बाद कुमार साहेब अपन गृह जिला भागलपुर मे रहय लगलाह ।कहुना कय जीवनक गाड़ी चला रहल छलाह ।कोनो एहन कष्टो नहि रहनि ।मुदा सभ दिन नीके रहत तेकर कोन ठेकान छैक ?केकरा भाग्य मे विधाता की लिखने छथीन, से के जनैत अछि ।विधाताक प्रकोप कुमार साहेब कें सेहो घेर लेलकनि ।कुमार साहेबक पत्नी के लकवा मारि देलकनि ।हाथ पैर शिथिल भए गेलनि ।वाक हरण सेहो भए गेलनि ।सुशीलाजी के ने उठि होनि ने बैस सकैत छलीह । खबरि भेला पर बेटा पुतौहु एलखीन ।पाँच –दस दिन रहि सभ अपन अपन गंतब्य स्थान चलि गेल खीन ।फेर तीनू बेटा पुतौहु पलटि के नहि अयलखीन्ह । एहिना समय बितैत गेलैक ।कुमार साहेब अपन पति धर्मक काज करैत रहलाह । पत्नीक परिचर्या अपने करथि ।पत्नीक सभ आवश्यक काज अपने करथि ।कुमार साहेब गम्भीर प्रकृतिक लोक छलाह ।केखनो कय बाल बच्चा पर क्षोभ होनि मुदा अपन कपारक दोष दय शान्त भए जाथि ।बेटा सभ के माय बाप सँ डर होमय लगलनि कारण माय बापक भार कियो उठाबय नहि चाहैत रहथीन ।कुमार साहेब सभ दुख पीबि जाइत छलाह मुदा अनावश्यक तनाव मे आबि जाथि । कुमार साहेब भोरे उठि पहिने पत्नी के शौच क्रिया सँ निवृत करा दैत छलखीन ।पत्नी के सभ आवश्यक काज कराय ,तखन अपना काज मे लगैत छलाह ।तीन दिन पहिने भोर भेलैक ।पत्नी जागल रहथीन ।पत्नी देखथीन जे कुमार साहेब सुतले छथि ।जखन बरीकाल भए गेलैक तखन पत्नी चिन्तित भए गेलखीन ।ओ बाजि त सकैत नहि छलखीन ।अन्त मे ओ लैन्ड लाइन फोन जे हुनका सँ कनेके हटि कय रहैक ,ततय कहुना कय हाथ लय गेलीह ।बहुत चेष्टा के बाद बगलबाला पड़ोसी के नम्बर डायल केलनि ।मुदा हिनका बाजल नहि होनि ।एहि प्रकारे तीन चारिबेर रिंग केलखीन ।पड़ोसी के शंका भेलनि ।ओ आबि काँल वेल दवेलखीन ।मुदा कोनो रिसपोन्स नहि भेलैक ।ताबे कोलोनी के कयएक लोक आबि गेलाह ।अन्त मे दरवाजा तोड़ल गेलैक ।कुमार साहेब के निधन भए गेल रहनि ।जहिना कुमार साहेबक निधन हुनक पत्नी सुनलखीन ,हुनको प्राणान्त भय गेलनि । लोक सभ तीनू बेटा के खबरि कय देलखीन । बेटा सभक प्रतीक्षा मे लास तीन दिन तक राखल गेलैक । कुमार साहेब बहुत लोकप्रिय लोक छलाह फलस्वरुप हुनक अन्तिम संस्कार मे लोकक हुजुम छल ।दुनू बेकती के एके स्थान पर संस्कार कय देल गेलैनि ।सैकड़ो लोक रहैक मुदा नहि रहैक त हुनक तीनू पुत्र । आइ एकटा मित्र भेट करय आयल छलाह ।वैह ई कथा कहलनि । सुनि स्तब्ध भए गेलौ ।तत्क्षण कलम उठायल आ आत्म संतोष लेल कथा लिखल । प्रजातंत्र एकटा मजाक बहुत पहिने एकटा फिल्म आयल रहैक जेकर नाम रहैक सत्यकाम ।ओहि मे धर्मेन्द्र एवं संजीव कुमार क्रमशः कलाकार आओर सह कलाकार रहथि ।दुनू सिविल इंन्जिनियर रहथि ।धर्मेन्द्र जाहि कम्पनी मे काज करैत रहथि ओहि कम्पनी के सर्वे करक ठीका भेटल रहैक । सर्वे करबाक लेल ओ मालिक के कहलखीन जे थियोडोलाइट मसीन चाही ।मलिक रहै मूर्ख ,ओ थियोडोलाइट के नामो नहि सुनने रहैक ।ओ इंजिनियर धर्मेन्द्र के कहै जे बहाना नहि कर ,पहिने सर्वे कर तखन मसीन किन देबौ ,कहबाक मतलव मालिक ने सर्वे बुझै आ ने थियोडोलाइट मसीन ओ त मूर्ख रहैक मुदा रहैक मालिक ।इंजिनियर महाशय के मालिकक बात सुनि पसीना देबय लगलनि जे एहि मूर्ख के कोना बुझाउ । हमर एकटा पित्ती छथि ओ हमरा पढ़ेनो छथि तै हुनका हम मास्टर साहेब सेहो कहै छियैन ।ओ एकटा खिस्सा कहलनि ।ओ जखन बी काँम कय गेलाह त जीबिका लेल पटना गेलाह ।तत्काल एकटा सेठक लोहाक कारखाना मे काज धेलनि ।कारखाना कोनो पैघ नहि रहैक ,तै काजो साधारणे रहैक जे कतेक लोहा सप्लाइ भेल आ के लय गेल तेकर नाम नोट करू ।मास्टर साहेब छलाह प्रतिभाशाली, बैसल मोन नहि लगनि,तै ओ रेस्ट मे सेठक बेटा रहैक दसवाँ क्लास मे, तेकरा पढ़ा देथिन, से सेठ के नीक लगैक ।पहिने अंग्रेजीक एकटा किताब पढ़ाइ होय 'बुक फोर' ,ओहि मे एकटा चैप्टर रहैक ' द अर्थ' (The Earth )एक दिन मास्टर साहेब सेठक बेटा के पढ़बैत रहथीन वैह चैप्टर द अर्थ ।ओ पढ़बैत रहथीन जे कोना पृथ्वी सूर्यक चारू कात घुमै छैक आ कोना चन्द्रमा पृथ्वी क चक्कर लगबैत छैक .कोना दिन राति होयत छैक ।विस्तृत सँ मास्टर साहेब पढ़बैत रहथीन ,आ गद्दी पर बैसल सेठ सेहो सभटा सुनैत रहैक ।ओकरा किछु नहि बुझाइक ।ओकरा आश्चर्य लगलैक जे कोना पृथ्वी सूर्यक चक्कर कटतैक आ कोना चन्द्रमा पृथ्वीक चक्कर कटतै ,से यदि होयतै त पटना कलकत्ता चलि जयतै आ कलकता दिल्ली ।चन्द्रमा घुमितै त तारा लग लोक रहिते ,हो ने हो ई मास्टरक दिमाग खराब भे गेल छै आ किछु दिन रहत त हमर बेटो पागल भए जायत ।मास्टर साहेब के नौकरी सँ निकालि देलकनि । गाम मे घूर तपैत रही त एक दिन रघू काका पुछलनि रे बौआ तू त बरका इंजिनियर छें ,एकटा चीज बता दे जे कलकत्ता सँ गाम फोन अबै छैक से एतेक जल्दी अवाज कोना चलि अबैत छैक ।बात एतेक जल्दी कोना सुनाय लगैत छैक ,हम हुनका टेली कमुनिकेसन के विस्तार सँ बुझाबय लगलियैन मुदा काका कहलनि तू त भूत जका बकै छै ,कि बजै छै से किछु ने बुझायल ।बगल मे हमर जेठ सार स्वामीजी बैसल रहथि ओ कहलखीन जे काकाजी हम बुझा दैत छी ,असल मे टेलीफोन मे तार रहै छै से त आहाँ देखने हेबै ?काका कहलखीन, हँ यौ पाहुन कियै ने देखबै ,हमरा गामे दके रेल गेल छै ,रेलक काते दके तार गेल छै ,स्वामी जी कहलखीन ,बस आब अहाँके बुझा जायत ।ओहि तार मे तरे तर भूर कयल छै ,जहाँ कियो फोन करत कि घंटी बाजत आ जौं बात करबैक कि भूरे भूर अबाज कालिका मेल जका तेज मे आबय आ जाय लगैत छैक ,बस गप्प भए जाइत छैक ।काका कहलखीन आब बुझलियैक ।पाहुन बहुत योग्य लोक छथि आ बौआ त अनेरे लेल इंजिनियर भेल । हमरा सभक प्रजातंत्रक सरकार की छी ,एकटा मजाक छी । एहि ठाम विशेषज्ञ पदाधिकारीक उपर अनुपयुक्त वोट सँ चुनल नेता बैसल छैक जाहि मे 90 प्रतिशत अबूझ रहैत छैक जेकर स्थित सत्यकामक सेठ जकाँ छैक ।ओना कहक लेल प्रजातंत्री सरकार मे पारदर्शिता रहैत छैक मुदा एहिठाम त सभटा झूठ पर आधारित छैक ।भारत मे सभके वोट देबाक समान अधिकार छैक मुदा वोट मे ठाढ़ होय बाला लेल योग्यता त रहबाक चाही । आइ ए एस ,इंजिनियर ,डाक्टर ,प्रोफेसर ,एवं सरकारक आओर पदाधिकारीक मंत्री त पदाधिकारी सँ योग्य हेबाक चाही ,एहि लेल कियो अवाज नहि उठायत ।ई केहन प्रजातंत्र छैक जेकर सरकारक मुखिया निरक्षरो भए सकैत अछि ।ई देसक दुर्भागय अछि ।हम त कहब एहि सत्यकामक सेठ ,लोहा कारखानाक सेठ आ ऱघू काका रुपी सरकारक मुखिया वोट मे नहि ठाढ़ हुए ताहि लेल अवाज एक संग उठेबाक प्रयोजन छैक आ कि नहि ? मनोज कुमार मंडल बीहनि कथा- हिलकोर अगहन मास। दुपहरियाक समय। राम लखन भोजन केला पछाति दरबज्जाक आगू रौदमे चटाई बिछा बैठके विदेह समालोचनाक पोथी उलटबैत छला। संगे सिरहोनामे राखल रेडियोमे दरभंगा आकाशवाणीसँ दैत लोकगीत सेहो सुनि रहल छला। एकाएक धियान पेरा दिश गेलैन आकि दरबज्जा दिश मुस्की दैत राघवके अबैत देखलैन । देखते पहिने तऽ अकचकेला पर मिनटे भरि पछाति अख्यासि उठि कऽ ठाढ भऽ गेला । राघव सेहो डेग नम्हर करैत झट राम लखनसँ हाथ मिलबैत गलामे गला सेहो मिलला। दुनू गोटाक खुशीक कोनो सिमाने नहि। राम लखन आ राघव बाल संगी छला। जा धरि पाँचवाँसँ मैट्रिक केला छनो भरि एक दोसरसँ दूर नै रहैत छला। पढैयोमे जहिना राम लखन वर्गमे ऊपरसँ पहिल तहिना राघव नीचासँ पहिल अबै छला। अखन राम लखनक जीविका ट्यूशन पढा कऽ चलै छैन आ राघव दिल्ली सर्वोच्च न्यायालयमे अधिवक्ता छथि। दुनू गोटा असथिर भेला बाद चटाए पर बैठला। राम लखन बजला " हम पहिने तऽ चिन्हबे नहि केऔं कारण दसो बरखसँ बेसिए भऽ गेल छल अहाँसँ मिलब।" " अहिना नऽ हमरा बीसरि जाएब। तेरह बरखक बाद गाम एलहुँ हन। " " तहन कहु जे के किनका बीसरि गेला। " दुनू गोटा रंग बिरंगक गप सप करैत रहला। घंटोभरिसँ बेसए भऽ गेल। राम लखन बेटीके हाक दऽ बजला " गै बेटा दुविधा माय कऽ कहुन चाय बनाबै लऽ। फेर राघवसँ बजला " अपना सब तना नहि गपमे तल्लीन भऽ गेलहुँ जे बेर धियाने नहि रहल।" " कोनो नै ढेरो दिनक बाद भेटलहुँ हन तऽ गपो तऽ बेसिए रहत किने। " राम लखन ई सुनि मुस्कीएला। राघवक नजरि ओछान पर राखल पोथी पर परलैन। पोथी हाथमे लऽ उलटा - पुलटाके देखैत बजला " अहुँ केहन केहन पोथी पढैत रहै छी। के जनै छै मैथिली ? ई पढिके की हेतै ? " राम लखन मने मन सोचला ई बदलि गेला से तऽ बुझिते रही पर सोचक परिधि अतेक ओछ भऽ गेल हेतैन ई अंदाज नहि छल। ओना बहुत दिनक बाद भेटला अछि तेँ किछ कहब उचित नहि। फेर मनमे एलैन छिया तऽ संगी तेँ जँ ठमकि गेला अछि तऽ सचेत नहि कोना करबैन। ई गप मनमे अबिते बजला " राघव! एकटा बात कहु दुनियामे जतेक मनुख अछि सबके माय छै। तेँ कि दोसर स्त्री हमर मायक असथान लऽ सकै छथि ।" " एहनो कतौ लऽ सकै छथि । " " हँ दोसर स्त्रीक सम्मान करब मनुखक करतब अछि। " " हँ से तऽ अछिए। " ततबे कालमे राम लखनक पत्नी चाय लऽ कऽ एली। दुनू गोटा चाय पीला कप रखलैन। राधव उठि बिदा भेला। मनमे जेना हिलकोर......। बीहनि कथा- छुतहर बुढिया दादी आए भोरेसँ चरभर बजैत छली कारण केओ पछुएतमे राखल छुतहर बिन कहने उठा कऽ लऽ गेल छलै। जानि नहि के कहिया लऽ गेल छलै। ओ तऽ मरूआ बीहनि पटेबाक खागता पड़ने बुढिया दादीक धियान गेलैन। भरि टोल भँजया एली कतौ थाह पता नहि लगलैन। अंगना अबिते काकीके सुनबैत बजली " अंगनाक मनुख सब सेहो छुतहरि खापैर सब भऽ भऽ गेल। जखन अंगनामे मनुख रहत तयो लोग चीज बौस उठा कऽ लऽ जाएत तऽ ओए मनुखक कोन काज ?" काकी बुढिया दादीक गप सुनि अकचकेले रहली। बुढिया दादीसँ पूछैत बजली " ई एना किए बजैत छथिन। के कई लऽ गेलै - - - - ? काकी बैजते छली आकि बुढिया दादी बीचहिमे टभकैत बजली " जखन अंगनामे रहै बाली सबके किछ बुझले नहि रहै छै तहन हे भगवान जनिहऽ तू अहि घर दुआरके आब भगवाने बचौत। " बुढिया दादी बैजते छली ताधरि कक्का अंगना एला। दादीके बजैत देखि पूछलखिन " दादी की भेलौ?" "हरौ मोहना तोहि कह जे आब मरूआ बीहनि कथिसँ पटौल जाएत । चनबारमे टांगल छुतहर कोए लऽ गेल आ अंगनाक मनुखके कुछ पते नहि। " " केहन बढिया तऽ गठुलामे राखल रहै छलै तकरा तू पछुएतमे राखि एलेँह। तहन - - - - - ।" " तहुँ की अलछ जेँका बाजै छेँ । छुतहर कोए घरमे रखै अछि। दोसर बरतनमे भिरने ओहो छुआ जाएत किने। " " जखन दोसर बरतनमे भिरने छुआ जाएत तहन तऽ मरूआ सेहो छुएन जाएत किने। " बुढिया दादी हँसैत बजली " जो हम बात नहि पदबै छी। बीहनि केना पटेमे से तू जान। " कक्का काकीके देखि मुसकी दऽ दरबज्जा दिश बिदा भेला। बीहनि कथा- अध्यापन दू ढाई बजेक दुपहरियाक समय छलए। मंडलजी मास्सैब साइकिलसँ तबधल गाम दिस जाय छला। जखन गंजक चौक लग एला आकि वैद्यनाथजीक नजरि मंडलजी मास्सैब पर पड़लैन। जोरसँ हाक दैत बजला " यऊ गुरूजी ! गुरुजी !" मास्सैब साइकिले परसँ उलैट कऽ तकला तऽ देखलैन वैद्यनाथजी हाथसँ इशारा दैत छलैन। ओ साइकिल धूमा वैद्यनाथजीक दरबज्जा पर बैठला आ पूछलैन "आब कहु अपने की कहि रहल छी।" " अपनेक सबके शिक्षा दैत छिए तेँ कहलौ जे हमरो दुनू बेटाके पढा दैतिए। " " हम सबके नहि कछेक धियापुताके पढबै छी आ पढेब की जे अपने पढै छी। " मंडलजीक गप सुनि वैद्यनाथजी हँसैत बजला " अहुँ गप पकैड़ि लै छिए। हमरो बच्चा सबके पढा देल जाउ। अपने जे कहबै से हम देब। " " आब अहाँ कहै छी तऽ पढा देब। " " शुल्क कहिऔ न कते दऽ देब? " " अहाँक जे उचित बुझना जाएत ओ दऽ देबै। पर हे दू मासक शुल्क हम ओहिना लेब। " " ई बुझलौं नहि गुरुजी!" " पहिने हम दू मास अहाँ बच्चा सबसँ पढबा पछाइत पढैब ।" " अहाँ की पढबै। " " जाछरि हम अहाँ बच्चा सबके नहि पढबऽ ताधरि हम कोना पढा सकब। " मंडलजीक गपक मर्म बुझि वैद्यनाथजी बजला " अपनेक दूए मासक नहि हम सालो भरिक शुल्क ओहिना देब। अपने पढा देल जाउ। " " बेस।" कहि मंडलजी मास्सैब उठि बिदा भेला। बीहनि कथा- अगरजीत --- रौ छौड़बा ! कतऽ अए रौदमे बिदा भेलें हन? --- माए नहाए लऽ जाए छी। --- कल बाड़ीमे छै कि चौमास दिश, तू चौमास दिश किए भागल जाए छें ? --- माए पोखैर जाए छिए । --- नइ कोनो काज छै तू चुप चाप कल पर नहा ले नहि तऽ गत्तर ससाइर देबौ । --- माए आइएटा जै छिऔ । ई कहि फुदना लंक लऽ लेलक । जाबे माए सोर पारै पारै ताबे तऽ ओ पोखरि पहुँचि गेल। पोखरिमे फुदने जेकाँ और छोड़ा सब उमकै छलै। सब हेलि हेलि जाएठ लग जाए छलै। फुदना सेहो हेलि जाएठ छुबै लेल बिदा भेल परंतु जाएठ लग जाएसँ पहिनए हिम्मत हारि देलकै। आब पानिमे उगडुम उगडुम करऽ लागल । ताबे कोए ओकरा माए कऽ कहऽ गेलै । माए पोखैर दिश आबैत बजली --- ई छोड़बा छैइछे अते अगरजीत तऽ मरऽ---------। बीहनि कथा- एना किए झलफल साँझक समय। बैजू अंगनामे ओसार पर बैठि रेडियोमे दैत गीत नाद सुनए छला। तखने कनिया पारो हाथमे उगहैन लेने आठ बरखक बेटी सुधाके चोटियाबैत आ उच - नीच बजैत दरबज्जा दिशसँ अंगना एली। बैजू देखलैन सुधा डरे कठौत बनल एछ पारो बजैत बजैत अफस्यात छथि । रेडियो बन्न कऽ गप बुझैक जिज्ञासासँ पूछलैन " की गप छिए ? किए ई साँझ भरली अलगौने छै ? पारो बैजूके जबाब दैत बजली " की रहतै! ई छौड़ी उगहैन आ डोल लऽ इनार पर गेल छलै। खेलौर करऽ लागल हेतै । उगहैन छइहे आ डोल कोए उड़ा लेलकै। " बैजू सुधासँ पूछैत बजला " गै सुधा की भेलौ डोल केना हरा गेलौ ? " ओ तना नहि डरि गेल छलै जे आर हिचकऽ लागल। बैजू अपने उगहैनके तजबिज कऽ देखलैन तऽ बुझि पड़िलैन जे जनु डोल इनारमे गिर पड़लै। जखने मनमे ई गप एलैन आकि पारोसँ कहलखिन " सुनै छै ! देखौ न लाल कक्का घरमे काँकोर हेतै। भऽ सकै छै इनारमे गिर पड़ल हेतै। " " इहो खटरास करै छै ! मौगी सब उड़ा नइ तऽ लेलकै हन । " बैजू गप हलूक करैत बजला -" धू इहो जे एछ न ! जँ कोए लओ लेने हेतै तऽ आइ नइ काइल्ह पकड़ले जाएत । कहिओ नइ कहिओ इनार पर लौत तऽ पकड़ले जाएत । " " ई नहि बुझै छए मौगी सबहक खेल - बेल। नएहर सासुर साँइठ देत। " बैजू गप बदलैत बजला " आब हरा तऽ गेबे केलै। देखौ न! लाल कक्का घरमे काँकोर। "  बैजूके कहिते पारो लाल कक्का अंगना दिश बिदा भेली। पाछु लागल हाथमे उगहैन लऽ बैजू सेहो बिदा भेला कारण लाल कक्काक अंगना इनारे लग छल। जाधरि बैजू इनार पर पहुँचला ता पारो लाल कक्काक अंगनासँ बूल दऽ निकल्ली । अपने बैजू झट दऽ उगहैनमे बाइन्ह चारि पाँच बेर इनारमे तेहला आकि काँकोरमे फँसल एकटा डोल। हाँय हाँय ऊपर केला। पारो तजबिज कऽ देखैत बजली "ई डोल तऽ अप्पन नहि छिए। अप्पन डोल पुरान छलै आ ई तऽ नवे छै।" बैजू सेहो तजबिज कऽ बजला " हँ ई तऽ जनु अप्पन नहि छिए। " बैजू ई कहि फेरसँ काँकोर इनारमे खसा थेहऽ लगला । कने काल थेहला पछाइत फेर एकटा डोल फँसलैन। ऊपर निकल्ला बाद देखलैन तऽ ई डोल हुनके छलैन। पारोके सुनबैत बजला " देखौ ई डोल अप्पन छिए। " " तऽ ई अप्पने छिए। ई छोड़ी बजबो केलै। " " अहि दोसर डोलके कि करतै। " " नेने चलबै अंगना की। कोनो हम केकरो चोरा लेलए हन ।" " जेकर हेतै ओकरा दऽ देतै । एक्के इनार भेने कहियो नहि कहियो देखिए लेत। बेमतलबक झगड़ा हेतै। " " हम नहि एकरा जँका बटने घुरए छी । आरतीके डोल फूइट गेल छै ओकरे भेज देबै। " बैजू कनियाक बाजब सुनि छुब्ध भऽ गेला आब बजता - - - - -? बीहनि कथा-उपवास ज्ञानेंद्रक नजरि कनीया पर पड़िते पूछलैन  --- "हे यइ! एना किए लटुएल पटुएल छी ?"  --- " आए देवउठौन एकादशीक उपवास एछ किने तै परसँ ई दुनू ततेक हैरान केलक अछि जे पूछू जूनि।"  --- " आब की चाही धन - संपत्ति, काया - समांग आ ज्ञानसँ नहिअरे - सासुर भरल पूरल छीहे तखनो देहके किएक सतबैत छी ।"  --- "जाउ अहुँ जे हेब न! " कोनो बाल बच्चा नहि अछि। बाल - बच्चा आ सोहागक चिंता केकरा नहि रहैत छै? " ---" तऽ अहाँक कहब अछि अहि लेल अहाँ देह सधने छी? एना देह सधने सब ठीक रहत? " ---" अहुँ जे हेब न! अहाँ जे बुझिए। " ---" मासो दिन नहि भेलए हन बमभोलीक कनीया सखरा भगवतीक दर्शन लेल जाए छली। बाटमे टैम्पो उलैट गेलै आ ओ बेचारी मरि गेली। " ---" हे जुलुम भऽ गेलै! धिया पुताक जे गैत होए छै कहल नहि जाए।"  --- "तहन अहिँ कहु किने जँ उपवास रखने सब कुशल रहैत तऽ ओ बेचारी तऽ अपन प्राणे अर्पित कऽ देली तहन धिया पुता-----।" ज्ञानेंद्रक गप सुइनते कनीया एकटक्की लगा देखैत - - - - - । बीहनि कथा- अवाक दादी निर्मला अपना जमानाक दर्शन शास्त्रमे एम. ए कऽ बिहार विश्वविद्यालयमे दर्शन शास्त्रक अध्यापिका छली। पोती सुजाता आ दादीसँ नहि केवल मेलजोल रहै छल बल्कि सखि बहिनपा जेँका दादी पोतीक बीच संबंध छलैन। सुजाताके जखन जे मनमे अबैत दादीसँ बेधरक पूछि लैत छली । दादी सेहो निसंकोच सुजाताके जिज्ञासा शांत कऽ दैत छली।  ---" दादी ! एकटा बात पूछिऔ ? " ---" हँ पूछ ने " ---" जतऽ बहुत रास कुल्टा स्त्री एक्के संगे रहैत अछि ओकरा की कहै छै ? " ---" वेश्यालय।"  --- "जतऽ बहुत रास चरित्रहीन पुरुख घरे-घर होए ओकरा की कहै छै ?"  दादी सुजाताक जिज्ञासा सुनि अवाके रहि गेली। कारण जबाब - - - - - । बीहनि कथा- लाल काकी आइ भोरे भोर दरबज्जा परसँ सहटि सड़क पर थोरबे दूर गेला पछाइत लाल काकी पर नजरि पड़ल। लाल काकी देखते बजलीह ---यऊ बउआ! अहिँके तकैत अबै छलूँ । ---की बात काकी ?  --- कने हमरा अंगना एब।  --- कहुने की बात।  --- देखही! अंगना एब तबने।  --- बेस एब । जलपान कऽ लाल काकी अंगना पहुँचि पूछलएन  ---कहु काकी की बात?  ---- कक्का फोन केने छला आ कहलैन एकटा दूधगर गाए भजियाके खरीदबा देमऽ लऽ । ---- बेस ! कतेक तक भऽ जाएत तऽ लऽ लेबै । ---- कमसँ कम तक भऽ जाए। हम लगा नहि राखब।  हम लाल काकीके मूँहे तकैत रहि गेलहूँ । बीहनि कथा- ठेकनगर केक दिनसँ दीपचन्द आ रुपचन्द दुनू भायक बीच भिनौजी फरिछोट होए छलै। दुनू भाय मिलके भरि टोलक लोकके बैठौने छला। टोलक लोक अपना हिसाबे सब कथुक बटबारा कऽ देलैन्ह । अंतमे बाँचल विधबा माए आ अलबटैह बहिन। पंच लोकैन्ह पूछखिन्ह "अए दुनू माए - धी के कोना पार लगतैन्ह। दुनू भाए सोचिके कहु।" दीपचन्द बजलाह अपने सबहक जे आदेश हेत ओ हमरा स्वीकार अछि। " रुपचन्दके पूछला पछाति ओ असमंजस होएत भायक बातके समर्थन करैत बजलाह-" अपने सब निर्णय कऽ दिऔ। जे निर्णय हेतै ओ तऽ मानै पड़त। "पंच अपन बात दुनू भायके सुनबैत बजलाह -" हमरा लोकनिक बिचारे एक भाय माएके रखियौ आ एक भाय बहिनके। या मड़ौसी सम्पत्तिसे मिलजुमले 10 कट्ठा जोतसीम आ पाँच कट्ठा गाछी संग दुनू माए-धीके कोनो एक भाए सेहो राखि सकै छी । ई सुनिते रुपचन्द दुनू परानी बाजि उठल हम माए आ बहिन दुनूके रखबा लेल तैयार छी। जखन दीपचन्दसँ पूछल गेल तऽ ओ बजलाह "आब बटबा लेल तऽ किछ नहि बाँचल अछि तऽ हम की बाजी।" पंच लोकैन्ह जब उठै उठै पर भेलाह तहन दीपचन्दक पत्नी बजलीह - - - "एक बेर माताजीसँ सेहो पूछथिन्ह न। हुनकर की मन छैन्ह।"  पंच - "बूढी अहाँ कहु, अहाँक की विचार अछि।"  माए- "दुनू बेटा तऽ हमरे छी तहन रुपचन्द सब दिन परदेश रहल। हम माए बेटी दीपचन्दक गात पकड़ि अखन तक छी। एसगरे रहितौ तऽ कोनो धरानी रहि लैतौ परंच संगे भगवानक देल डांग सेहो अछि।"  दीपचन्दक पत्नी - "माए आ बुच्चीक लेल देल संपत्ति रुप कऽ दऽ देथुन्ह। हम दुनू गोटेके रखबैन्ह।"  जखन रुपचन्दके पूछल गेल तऽ ओ कुछ बजबे नहि केलाह। आँखिसँ नोर बहैत छलैन्ह। पंच सेहो दीपचन्दक पत्नीक ठेकनगर गप सुनि अबाक भऽ गेलाह। सब संपत्ति बराबर करैत माए बेटीके दीपचन्दक पत्नीके सोइप उठि बिदा भेला। बीहनि कथा- झूठक खेती ----- की कहु भाय देखिके ताज्जुब लगैत अछि।  ----- से की यऊ भाय ?  ----- पहिने तऽ ई खेती चोरानुकाके होएत छल परंतु आब तऽ कोनोटा संकोचे नहि छै।  ----- भाय कने फरियाके कहुने। कोन खेती ?  ---- ओ जाउ भाय अहाँ एखनधरि नहि बुझलिए।  ----- कने फरिछ कऽ कहुने । ----- झुठक खेती। ई खेतीओ करबा लेल स्पेशल औजार घरे घर आबि गेल अछि।  ----- कोन औजार ?  ----- भाय अहुँ किने ! यऊजी मोबाइल। देखै नहि छिए लोक रहै अछि कतौ आ नाम कहै छथि कतौक। बीहनि कथा- पड़ोसिया डाह --- सुनै छिए! आइ लालमैनक बेटा एक टमटम समान लऽ एल।  ---- के फोकना एलै हन।  ---- हे! बोरा सब उठना नहि उठै छलै।  ---- कमाएमे तऽ कोढिए छल। कतौ हाथ साफ कऽ एल हेत।  ---- लालमैन दुनू सास पूतहु अफस्यात छली बोरा-बोरी घर करबामे।  ---- किए अंगनामे और कोए नहि छलै ?  ---- धत्त! केकरो हवा तऽ लगए नहि देलकै। भरि दुपहरिया घर बन्न कऽ समान सबके तीनो परानी गर लगा लेलकै।  ---- फोकनाक देह दशा केहन छै?  ---- अहुँ केहन गप करै छी ! ठीके हेतै की। युक्ति शक्ति (लघु कथा) बैसाख मास। ओना दूए दिनक बाद जेठक आगमन होए बला छलै। उम्मस भरल दुपहरियाक समय। अपने भोजन केला बाद ठंडाक बाट जोहैत गाछी दिश टहिल गेलहुँ । गाछी पहुँचतहि बाबा कहलैन "आब तू कने काल रहऽ हम नहेने खेने अबै छी ।" बाबाक बात सुनि हमहूँ हामी भरैत कहलिएन " बेस! जाउ न।" हमर बात सुनते बाबा चलि गेलाह। बाबाक गेला पछाइत गाछीमे टहिल टहिल गाछक आमके हिआबऽ लगलौहँ ई सोचि जे जँ गाछमे बेसी आम पाकल हेत तऽ जाए बेर झखा कऽ नेने जाएब। बाबाक नजरि कमजोर भेने नहि देख पबै छथिन। जँ हवा बिहारिमे गिड़बो करत तऽ छौड़ासब बाबाके एक तऽ पैरपैंख नहि लागऽ देतैन दोसर जेँ जँ केओ कनिओ प्रेमसँ मंगितैन तऽ मना नहि करथिन सहजे दऽ देथिन । कारण बाबाक हमहिटा पोता नहि बल्कि भरि गामक बाल बोधक बाबा छथिन। जाबे दादी जीबै छली ताधरि दादी आ बाबाक बीच होएत कहा सुनीक विषय इहे रहैत छल। बाबा पर भरि गामक बाल मंडलीक जेना सर्वेसर्वा छला। बालो बेदरुक बाबा बात ततबे मानैत छल। समाजमे जतबे गंभीरताक परिचय छलैन ततबे बाल बोध लेल खुजल व्यक्तित्व छलैन।  भरि गाछी घूमला बाद आबि खोपरीमे मचान बैठ गेलहुँ। ताधरि देह सेहो ठंडाएल। अमरस्साक नीनक आगमन भेल ठामै लेट गेलहुँ। नीन्न परि गेलहुँ। कनिए कालक पछाइत दूटा छौड़ा तनानै हल्ला केलक जे नीन्न टूटि गेल। दूनू बकझक करै छल। हम सेहो सहिटके लग गेलहुँ ।ताबे बाबा सेहो आबि गेलाह। बाबा दुनू छौड़ाके दबारैत कहखिन "रै छौड़ा सब कथिक हल्ला छिए रौ। खेलहा अन्न नहि पहलौ हन।" बाबा बात सुनि दुनू छौड़ा सहिटके लग आबि पहिने घुसका बाजल "बाबा अहिँ कहु जे सबसे पैघ शक्ति होए अछि न?"  घुसकाके कहला बाद दोसर प्रवीण बाजल " बाबा सबसँ पैघ युक्ति होए छै न ? दुनू छौड़ाक बात सुनि हमरो धियान बाबाक निर्णय सुनबा लेल एकाग्र भेल। कारण हम बाबाक स्वभावसँ परिचित रही। भलहिँ पूछने दुनू छौड़ा छल परंतु प्रश्न तऽ गंभीर छल। बाबाक एक मन भेलैन कोनो तरहे अहि बातके सहटैर दिअए कारण उतर तऽ कोनो एक्के बच्चाक पछमे हेत तऽ दोसर बच्चाक मन टूटि जाएत। फेर भेलैन जे बच्चाक जिज्ञासाक दबौने नव पीढ़ीक ज्ञानसँ बिमुख हेबा पापक भागी बनब। तखने हुनकर धियान हमरा पर पलैन। सोचलैन आब जबाब देबए पड़त। तहन तरीका कोनो दोसर अपनाबऽ पड़त। दुनू छौड़ाक धियान बहटबैत बजलाह " एकटा बात बुझलही हन तू सब ? " दुनू एक्के संगे कहलक "की बाबा ?" काइल्ह बेरु पहर बिदेशर गाछ परसँ गिर पड़ल। कहाँ दिन डारे भरे गिरल से डार आ जाग्घक हड्डी टूटि गेल छै। " घुसका आ प्रवीण अपन अपन बातसँ हटि अहि घटनाक बात सुनऽ लागल। अपने सेहो जिज्ञासा जागल। कारण गामक घटना छल। पूछलिएन" कोना खैस पड़ल?" कहलैन " बड़की पोखरिक महार पर नै पेरे कातमे सुरुगंबा सरही आमक गाछ छै तहि पर तीन चारिटा पियरबुन्न पाकर आम छलै। कना नै कना बिदेशरक नजरि ओहि आम पर पड़ि गलै।" हम पूछलिएन "सरही आम अखन तक लगले छलै ?"  "नहि, आम तऽ दस दिन पहिनऐ तोड़ि लेने छल। ओ छुटलहा आम छलै। लग्गेमे मुनेश्वरक घर पर दरबज्जे पर लग्गी राखल छलै तै दिश धियाने नहि गलै आ आम पर नजिर पड़िते नहि औ देखलक आ नहि तौ गाछ पर चढि गेल। " " तहन?"  " चढैत चढैत गाछक फुनगी पर चढि गेल। आमक डाढि लिबऽ लागल आकि कमजोर डाढि रहने टूटि गेलै। ओ जाबे दोसर डाढि पकैड़ते ताबे जहि पर ठाढ छल सेहो टूटि गेलै। गिर पड़ल। " दुनू छोड़ा जनु अपन बात बिसैर गेल। बाजल" बाबा सपेतामे दस बारटा आम पाकल अछि। लग्गीसँ तोड़ि दौ। " बाबाक सहमति पाबि नुनू आम तोड़ै लऽ चलि गेल। हम्मर धियान जखन छौड़ाक प्रश्न पर गेल की एकाएक बिदेशरक घटना पर ठमैक गेल। बाबाक देल जबाब सुनि मूँह पर मुसकी आबि - - - - - । प्रणव कुमार झा लघु कथा- नव-आशा मीरा आई पहिल बेर हवाई जहाज के यात्रा क रहल छली; पटना सं बैंगलोर वाया दिल्ली । पटना सं त ओ दिल्ली पहूंच गेल छली मुदा दिल्ली से बैंगलुरू क फ़्लाईट दू घंटा बाद छल । मीरा इंदिरा गांधी हवाई अड्डा के प्रतीक्षालय में बैसल इंतजार क रहल छली। दरअसल बात ई छल जे ओ अपन एकटा छात्रा आशा क विवाह में शामिल होई खातिर बैंगलुरू जा रहल छली । मीरा के विशेष रूप सं आशा न्योत देने छल आ हिनका लेल न्योत के संगहि हवाई-जहाजक टिकट पठौने छल । आ सब सं विशेष गप्प ई जे, जै फ़्लाईट सं मीरा दिल्ली सं बैंगलोर जाई बला छैथ ओकर पाईलट आर कियौ नै बल्कि आशा क होमय बला वर आकाश कुमार छैथ । बैसल बैसल मीरा क मोन अतीत क यात्रा करय लागलैन। मीरा गामक मध्य विद्यालय में शिक्षिका छथिन । एकटा निक शिक्षिका, जे धिया-पुता के खुब मानै वाली । बात किछु १५ – १६ बरष पहिले के आछि । मीरा शिक्षिका के व्यवसाय के अपनौने छलि त इ मूल-मंत्र के संगे जे "सब बच्चा भगवतीक संतान थीक आ ओकरा लाड-दुलार केनाई मनुक्खक कर्तव्य" । किन्तु हुनकर कक्षा में एकटा बचिया आबै छल जेकर नाम छल "आशा" । आन बच्चा सब त ठिक-ठाक सं रहै छल मुदा आशा नै ढंग सं स्कूलड्रेस पहिरै छल, नै ओकर किताब-बस्ता ओरियाईल रहैत छल । नै माथ मे तेल देने नै ठिक सं केस थकरने। मैल-कुचैल में लपटायल! इ सब देख मीरा के ओकरा स घीन आबै छल । आ ओ चाहितो ओकरा नै ठीक सं पढा पाबै छलि आ नै ओकरा सं दुलार क पाबै छलि, अपितु यदा-कदा ओकरा दुत्काइरियो दै छलखिन । मुदा मीरा के अपन इ व्यवहार पर कखनो काल आत्मग्लानियो होई छलैन । एक दिन अपन इ समस्या मीरा विद्यालयक हेड-मास्टर साहब सं साझा केलैन । "सर अहां कहै छी जे सब बच्चा भगवतीक संतान थीक आ ओकरा लाड-दुलार केनाई मनुक्खक कर्तव्य।" हम ऐ विचार के मानै छी । मुदा अही कहु जे औइ बच्ची सं हम कोना क दुलार क सकै छि जे नै ढंग से कपडा पहिरै अछि आ नै जेकरा साफ़-सफ़ाई के कोनो लिहाज अछि" । विद्यालयक हेड-मास्टर श्री शशिभुषण झा बड्ड सौम्य व्यक्तित्वक इंसान छालाह । ओ मीरा क सभटा बात सुनि क कहलैथ : "मीरा अहां ओई बचिया क समस्या देखलौं मुदा की अहां औई समस्या क कारण बुझबा क चेस्टा केलहुं? अहां इ बुझबा क प्रयत्न केने रहितौं त अहांक आई इ बातक असोकर्ज नै रहत छल जे अहां अपन कर्तव्य क पालन निक सं नै क पाबि रहल छी । ओ बच्ची एकटा दुखियारी बच्ची अछि जेकार बाबू दिहाडी मजदूर अछि आ माई कैंसर सं पीडीत! आब अहां कहू जे एहन स्थिति में ओकर ठीक सं परिचर्या के करत? आ इ सब मे ओ बच्ची के कोन दोष ? मीरा ! चिक्कन-चुनमुन आ सुन्नैर नेना सब के त सभ केयौ दुलार क लै अछि मुदा आशा सन जे इश्वरक संतान अछि ओकरा जे दुलार क पाबै अछि वैह इश्वरक सच्चा सेवक होई अछि । की! अहांक अखनो कोनो आशंका या असोकर्ज अछि? " मीरा क अपन सभटा प्रश्नक जवाब भेट गेल छल । आ ओ अपन कमीयो के चिन्ह लेलखिन । आ आब समय छल ओई कमी सं पार पाबैक । मीरा आब अपन सभटा ग्यान आ दुलार आशा पर उझैल देलखिन । ओकर पढाई-लिखाई, कपडा-लत्ता, तेल-कूड় सबहक ध्यान ओ राखय लागलखिन । कालान्तर में आशा क माई क देहांत भ गेल छल । आ आशा सेहो मीरा क छत्रछाया में बरहैत मैट्रीक क नेने छली। ओ मैट्रीक क परीक्षा में सम्म्पूर्ण जिला में टा̆प केने छली । डीएम साहब आशा के एहि उपलब्धि लेल अपन हाथ सं सम्मनित केने छलथिन । मुदा इ त कामयाबी क पहिल सीढी छल। अखन त आगा कामयाबीक अनेको पिहानी लिखेनाई बांकिए छल । मैट्रीक के बाद आशा के पोस्ट मैट्रीक स्कालरशीप सेहो भेंट लागल, मुदा आब हुनक बाबूजी हुनक विवाह क सुर-सार में लागि गेलाह । ई बात कनैत-कनैत आशा मीरा के बतौने छल । मीरा ओकरा ओहि दिन बड्ड मोश्किल सं चुप्प करेने छली । " ऐंगे एहि लेल तो एना कनै किएक छैं । हम बुझैबैन ने तोरा बाबू के आ ओ बुझियो जेथुन। हम मस्टरनी जे बनलहुं से कथि लेल? एं हमर त काजे अछि लोक के निक-बेजाय बुझेनाइ। आ हम केह्न-केहन के त बुझा क पटरी पर आनने छी । अहां त बड्ड होशियार नेना छि आहां त आगा बड्ड परहब आ पैघ डा̆क्टर बनब।" मीरा के द्वारा सान्त्वना के लेल कहल गेल ई वाक्य सब आशा क मोन मे घर क गेल छल। मीरा आशा क बाबूजी के बजौली । हुनका कहल्थिन औ जी अहांक भगवत्ती क̨पा केने छैथ जे एत्तेक निक बेटी देली जे मैट्रीक परीक्षा में समुचा जिला में प्रथम आबि अहांक संगहि गाम-समाजक सेहो नाम केलक अछि । आ अहां एकरा पैर में विवाहक सीकडी बान्हय चाहै छी ! आशा क बाबू कहलखिन "देवीजी अहां कहै त ठीके छि मुदा हम गरीब अनपढ लोक छी दिहाडी मजूरी पर जिबय बला आ आगा-पाछा कियौ अछियो नै सम्हारै बला; माय एकर पहिनहि छोडि क चल गेल अछि। एना में अहीं कहू जे बेटी क बाप होमय के नाते हम एकर विवाह कय एकर घर बसा देबाक विषय में सोचै छि से कि गलत करै छि? मीरा कहलखिन अहां अपन सक भैर त निके सोचै छी मुदा एहि सं आगा बरहु। आशा कोनो साधारण बालिका नै अछि। ओकरा में समाज के आगां बढाबै के सामर्थ अखने सं देखबा में आबि रहल अछि । ताहि लेल अहां इ निजी समस्या से आगा सोचबा के प्रयत्न करू । एखन ओकरा पढाई के समर्थन लेल एकटा छात्रव̨त्ति भेलट अछि, आगा आर कैयेक टा भेटत जै के बल पर ओ आगा अपन पढाई आ जिनगी में स्वाबलंबी भ जेति । तहु सं जौं अहां के भरोस नै अछि त अहां के हम वचन दै छि जे आइ सं मीरा क सभटा भार हम उठब लेल तैयार छी । एहि प्रकारे येन-केन दलील सं मीरा आशा क बाबू के राजी क नेने छलि । आब आशा के नाम इंटर में लिखा गेल छल । दरिभंगा में रहि ओ सी एम साइंस कालेज सं इंटर क पढाई कर लागली आ संगहि मेडिकल प्रवेश परीक्षा क तैयारी सेहो । अपन खर्च निकाल लेल ओ ट्यूशन पढेनाई सेहो शुरू क देने छलि आ संगही जरूरत पड়ला पर मीरा क मार्गदर्शन आ सहयोग सेहो भेट जाई छलैन । एही प्रकारे मीरा क मार्गदर्शन, आशीर्वाद आ अपन मेहनत-लगन के फ़ल आशा क ई भेटलैन जे ओ इंटर के संग बीसीईसीई परीक्षा सेहो पास क गेल छलि आ दरभंगा मेडिकल कालेज में हुनका एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश भेंट गेल छल । आब आशा नव पंख लगा क सफ़लता क नव ’आकाश’ में उड় लेल तैयार छलि । दिन बितैत गेल आ क्रमश: आशा एमबीबीएस क क डाक्टरी के प्राथमिक डिग्री प्राप्त क लेली संगहि पीजी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में निक रैंक आनि क ओ जीपमर में एमडी मेडीसीन के पाठ्यक्रम में सेहो प्रवेश पाबि गेली आ एहि प्रकारे पीजी केली आ आई नरायणा ह्रुदयालया बैंगलुरू में डीएनबी(कार्डियोलोजी) क टैनिंग के संग सिनियर रेसीडेंसी क रहल छैथ । समय के एहि कालक्रम में आशा क संपर्क मीरा सं धीरे धीरे कम होइत चल गेल छल । मुदा आशा अपन मूल्य आ संसकार के स्म्हारने छलि । सफ़लता क एहि आकाश पर चढला के बावजूद ओ अपन वजूद आ ओकरा बनब वाली अपन गुरूआई के नै बिसरल छलि । स्वाईत ओ बातचित के क्रम में अक्सर आकाशजी से मीरा दीदी के चर्चा केने नै थाकै छलि । आ अक्सर कहै छलि जे हमर विवाह में क्यों आबै कि नै आबै मीरा दीदी के त बजेबे करबै । आ आकाश मजाक में उत्तर दै छलखिन जे अहां चिंता जुनि करू अहांक मीरा दीदी के त हम अपने जहाज पर चढा क नेने चलि आयब नै त अहांक कोन ठेकान जे फ़ेरे लै सं मना क दी ! इ सब सोचैत सोचैत अचानक माईक पर विमानक अनांसमेंट सुनि क मीरा क भक खुजलैन आ ओ अपन समान उठा क चेकईन के ले विदा भ गेली । चन्‍दना दत्त- राँटी (मधुबनी) बाबा लालदास “जे क्‍यो ई कथा मनदय सुनतीह तनिकाँ सन्‍तति, सम्‍प्रत्ति एवं सौभाग्‍यक वृद्धि होयतन्‍हि। अन्‍तकाल तक धर्मराजक प्रसादेँ निर्भय रहतीह।” प्रात: स्‍मरणीय माँ सावित्रीकेँ गोड़ लगैत सभ स्‍त्रीगण बड़क गाछमे जल ढारए लगलीह। “ईकथा बड्ड नीक लगैत अछि सुनबामे, तँए गाछ तर बैसल रहैत छी पिंकी माइक आसमे। हुनकेँ लग छन्‍हि ई पोथी,एक गोटा बजलीह। सुनि हमर माइक ठोरपर मुस्‍की आबि गेल।” ‘हमर परबाबा लिखने छथि’ गवौक्‍ति छलनि हुनकर कथमे। माइक संग हमहूँ गेल छलहुँ बड़ए गाछ तर। खिस्‍सा-पिहानी नीक लगैत छल सुनबामे। ताहि दिनमे स्‍त्रीक लेल ‘सम्‍पत्ति, संतति आ सोगाह’क महात्ता की अछि से बुझल कहाँ छल? ज्ञज्ञन भेलापर ज्ञात भेल जे ई पोथी ‘स्‍त्री धर्म शिक्षा’ हमर माइक परबाबाक लिखल छन्‍हि,जनिकाँ ओ बहुमूल्‍य थाती जकाँ रखने छलीहकिएक तँ हमर माएकेँ दहेजमे ई पोथी भेटल छलनि। ओ छलाह महाकवि पण्‍डित लालदास। कतेक अल्‍प शब्‍दमे बाबा लालदास कतेक पैघ आशीर्वाद स्‍त्रीगणकेँ देलखिन्‍ह अछि ई हुनक विचार एवं लेखनीक विशेषता छन्‍हि। कोनो नारी लेल संततिक की महत्‍व अछि ई हमरा सभकेँ सद्यप्रसवा नारीक ठज्ञेरक मुस्‍की देखि बुझना जाइत अछि जे कोरमे शिशुकेँ लए जखन स्‍तनपान करबैत छथि तँ अपन तमाम कष्‍ट बिसरि जाइत छथि जे ओहि बालककेँ जन्‍म देबा काल उठौने रहैत छथि। सम्‍पत्तिक महत्ता तँ आदिकालसँ सभ स्‍वीकार कयने छथि मुदा स्‍त्रीगणक लेल अपन घर-गृहस्‍तीकेँ सुचारू रूपसँ व्‍यवस्‍थित रखबाक लेल सम्‍पत्ति भेलाइ अत्‍यावश्‍यक रहैत छन्‍हि। भनहि ओ धन सम्‍पत्तिक अर्जन नहि करैत छलीह मुदा सम्‍पत्तिक संरक्षण करबामे कतेक व्‍योंत लगबय पड़ैत छन्‍हि एहि बातकेँ संयुक्‍त परिवारमे रहनिहार बाबा खूब जनैत छलाह। सौभाग्‍य तँ स्‍त्रीकेँ नीक पति भेटलाक उपराँते प्राप्‍त होइत छन्‍हि ताहि सौभाग्‍यक लेल सावित्री पिता, नारद मुनि आ अन्‍त धरि धर्मराजोसँ अपन बात मनबा कऽ रहलीह। एहि कथामे ईहो लिखने छथि जे मिथिलामे माए सभ अपन पुत्रीकेँ बाल्‍यावस्‍थासँ लिखाय-पढ़ाय, उत्तम उत्तम उपदेश ओ गृह परिचर्य्या आदि स्‍त्री धर्मसँ सुशिक्षित कय लोक हेतु आदर्श बनबैत छथि। कोनो धर्म-संस्‍कृति वा संस्‍कारक प्रचार-प्रसार वा संरक्षण समाजमे स्‍त्रीगणेँ द्वारा होइत आएल अछि। आइ जँ विद्यापति विश्‍वप्रसिद्ध भेला तँ एहिमे हुनक काव्‍यकेँ अपन गोसाउनि गीत बनाय, अपन स्‍वरलहरी देबय वाली स्‍त्रीगणक महत्‍व कतहु कम नहि कहल जा सकैछ। आइ जखन स्‍त्री-शिक्षापर विश्‍व स्‍तरपर जोर अछि। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’क नारा बुलन्‍द भऽ रहल अछि ओतय आइसँ सैंकड़ो वर्ष पूर्व मिथिलाक बेटी सीता-सावित्री अपन आचरण, धर्म-शास्‍त्रक ज्ञानसँ विश्‍वक लेल आदर्श उपस्‍थित कयने छथि। महाकविक लेखनी स्‍त्री धर्म शिक्षासँ रामायण तकमे अपूर्व चललनि। मकाकवि लालदासकेँ विश्‍वास छलनि जे सीता हिनका रामायण लिखबाक लेल प्रेरित कएल। ‘ब्रह्मर्वेवर्त पुराण’क अनुसारेँ लक्ष्‍मीक जन्‍म कुशध्‍वजक पुत्रीक रूपमे भेलनि। लंकापति रावण अंहकार मदसँ भरल छल ओ हिनक सौंदर्यपर आकृष्‍ट भए लक्ष्‍मीसँ विवाह करबाक लेल उद्दत छल। लक्ष्‍मी रावणक एहि प्रकारक व्‍यवहारसँ क्षुब्‍ध भए सराप देलथिन्‍ह आ तकरे परिणामस्‍वरूप सीताक रूपमे मिथिलामे जन्‍म लेल जे रावण सपरिवार समूल नष्‍ट भए सकए। लालदास कविवरक हेतु सीता वा माँ मैथिली सर्वशक्‍तिमान छथिन। मैथिली साहित्‍यमे लालदास सीताकेँ गरिमा प्रदान कएलनि आ मिथिलाक बेटीकेँ सर्वोच्‍च स्‍थान देलनि। “सीता चरित ललित अनुमानि। रामकथा भए कहब बखानि।।” महाकवि लाल दास अपन रामायणमे मिथिलाक सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक चित्रण विशद रूपेँ कएलनि अछि। मुख्‍य रूपेँ गिरिजा अर्चना,सीता अर्चना, परदा प्रथा, विवहोत्सव, अतिथि सत्‍कार, महुअक, डहकन, उचिती, विधकरी, दुरागमन, समदाउन, भार-दउर केर विशेष वर्णन कएलनि अछि। अपन मातृभूमिक प्रति महाकविकेँ प्रेम हुनक लेखनीकेँ मिथिलाक गौरव गान करबामे दृष्‍टव्‍य अछि- “जन्‍मभूमि नैहर सीताक। जतय स्‍वयं शिवरूप पिताक।। शक्‍तिपीठ उत्म स्‍थान। उग्रभूमि सभ भाँति महान।।” अपन मातृभूमिक वर्णन कए महाकवि मिथिला राज्‍यक शोभा सुन्‍दरता, मिथिलाक उद्यान, नदी, जलाशय, खेत-पथार संगहि मिथिलावासीक सदाचारिता, तपस्‍या,धर्मप्रियता प्रभृतिक वर्णन अनेक दृष्‍टिसँ कएलनि। ई मर्त्‍यलोकमे मिथिलाक तुलना सुरलोकक विष्‍णुधामसँ कयने छथि- “आसमान मिथिलापुरी, रवि सन तेज प्रचण्‍ड। बुझि पड़ अनुमप देश जनि, महिगत स्‍वर्गक खण्‍ड।।” मिथिलाकेँ प्राकृतिक सौन्‍दर्य अनुपम अछि। गाछ-बिरीछ, नदी, पोखरि, जीव-जन्‍तु चिड़ै-चुनमुनीक विविधता कविवरक लेखनीमे मुखरित भए आएल अछि। यथा- “कति विध मृग पशु-जन्‍तु बिराज से जनि तपसिक प्रजा-समाज, गरजे मृगपति बैर-बिहाय मुनि पहरा तनि पड़ए सदाय, शुक पिक चातक चक्र चकोर गुंजय मधुकर मधुर सुराग वीण वाद्य सम सुनि प्रिय लाग...।” ऐ प्रकारेँ हम कहि सकैत छी जे बाबा लालदास जे उद्भट विद्वान, शक्‍ति पूजक, गद्यकार, चित्रकार, लिपिकार, भाषाविद्, कलाकार,समाज सुधारक, राष्‍ट्रीय चेतनाक सम्‍पोषक, ओजस्‍वी वक्‍ता छलाह। हुनक विराट व्‍यक्‍तित्‍व आ नवीन मार्ग प्रदर्शक तथा उदार दृष्‍टिकोणक फलस्‍वरूप हम कहि सकैत छी गर्वसँ कि हम एहन जातिसँ छी जतय सभ महिला साक्षर छलीह आ ई महाकविक देन छल। किएक तँ दहेज स्‍वरूप एहन अनमोल पोथी बेटीकेँ देल जाइत छल जे ओ बेटी सभ दुहू कुलक नाम रौशन करैत छलीह। महाकवि लालदास निज भाषानुरागी छलाह। माँ मैथिलीक संग अपन मातृभाषाक हुनक प्रेम मैथिलीक प्रति लिखल एहि पंक्तिमे देखल जा सकैछ- “निज भाषा जननी निज देश स्‍वर्गोसँ जानथि जन वेश।” आखिरमे हम खड़ौआक माटि-पानिक प्रति अपन भाव कहब। हमर माँ-पापाक विवाहक पचासम वर्षगाँठ छल- 16 मई 2012 केँ। फारबिसगंज स्‍थित निज निवास आचार्यपूरीमे, छोट-छीन कार्यक्रमक संग हम सभ भाए-बहिन आ बहुत रास परिजनक संग हमर प्रिय नानी सेहो उपस्‍थित छल। पूजा-पाठ भोज भातक पश्‍चात रात्रिमे नाति-नातीन, पोता-पोती सांस्‍कृतिक कार्य-क्रमक आयोजन भेल। सभ खूब आनन्‍दित छल। धिया-पुताक नाच-गानक पश्‍चात हम मायसँ पुछलहुँ- “अहाँ अपन विवाहक पश्‍चात पापासँ गप्‍प-सप्‍पक किछु प्रसंग कहू।” माँ बजलीह- “ई तँ विवाहेक रात्रिसँ हमरा अंगरेजी सिखबय लगलाह, मुदा हम लालदासक परपोती अपन मैथिली कोना छोड़ितहुँ।” ताहिपर हमर बड़की बहिन ‘पिंकी दीदी’ चुटकी लेलक- “अंगरेजीक विभागाध्‍यक्ष हमर बाबूजीकेँ माँ मैथिली लिखबा कऽ मानल तहन ने साहित्‍य अकादमीक मैथिली अनुवाद पुरस्‍करसँ सम्‍मानित भेलाह।” नवेंदु कुमार झा, (मैथिली पत्रकारिता लेल विदेह सम्मान प्राप्त) गाम मे समटि रहल प्रभाव आ चर्चा भेल वैश्विक प्रभावक- साहित्य अकादमीक भुसकौल मंडलीक कारनामा देशक प्रतिष्ठित सरकारी साहित्यक संस्था साहित्य अकादमी पटना मे अपन साहित्यिक उपस्थिति दर्ज करा अपन उपलब्धि मे एकटा आओर कड़ी जोड़ि लेलक। बिहारक तथाकथित प्रतिनिधि सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक संस्था चेतना समितिक सहयोग सॅ सम्पन्न कार्यक्रमक बाद आयोजक गदगद बुझि पड़ैत छलाह। मुदा सम्पूर्ण आयोजन इ स्पष्ट कऽ देलक जे साहित्यक अकादमीक मैथिली परामर्षदात्री समिति (मैथिली भाषा परामर्ष मंडल) प्रचण्ड बुड़िक मंडली अछि। पैघ संस्था छल, पैघ आयोजन छल तऽ पैघ आ प्रचण्ड विद्वानक उपस्थिति मैथिली साहित्यक लेल गौरवक विषय स्वाभाविके अछि। विषय चाहे जे हो विद्वानक संगति मे भरि दिन बितल तऽ नीक-नीक जनतब भेटबे कएल। मुदा जाहि उद्देष्य आ विषय पर ई कार्यक्रम केन्द्रित छल ओहि पर मैथिलीक प्रचण्ड साहित्यानुरागी सभक ध्यान नहि छल। उद्घाटन सत्र से लऽकऽ कथा संधि धरिक सत्र ज्ञान अर्जन करऽवला अवष्य रहल। विद्वान सभ विद्वतापूर्ण गप उपस्थित श्रोताक ज्ञानक भंडार के अवष्य बढ़ौलक आ जिनका अपन ज्ञान पर विषेष भरोसा छल ओ अपन स्मार्ट फोन पर ‘‘फेसबुक’’ क पेज खोलि अपन ज्ञानक उत्सर्जन करैत रहलाह। हमर तऽ दाबा अछि जे इ सम्पूर्ण कार्यक्रम विषय सॅ विषयांतर रहल। एहि आयोजन मे सभ सहभागी विद्वानक विचार ज्ञानाअर्जन मे सहायक रहल। इ कहबा मे कोनो संकोच नहि जे इ सरकारी आयोजन कोनो विषय पर केन्द्रित कऽ सरकारक खजाना के चूना लगैबाक सफल प्रयास रहल। भने मैथिली भाषा के संविधानक अष्टम् अनुसूची मे स्थान भेटि गेल हो। विद्वान एहि आयोजन मे सम्मिलित विद्वान आ परामर्ष मंडली नह कटा शहीद हेबा लेल तैयार होथि मुदा हुनक योगदान नाम मात्र अछि। खैर आब हमहूॅ विषयांतर भऽ रहल छी। अष्टम् अनुसूची मे सम्मिलित मैथिली भाषाक आब गमैया प्रभाव समाप्त हेबा स्थिति मे अछि। गाम घर सॅ आब जगत जननी माता सीताक भाषा मैथिली विदा भऽ रहल अछि। मैथिली भाषी क्षेत्र मे हिन्दी जड़ि गहिर भेल जा रहल अछि। मैथिली भाषाक क्षेत्र आ आबादी बढ़ि रहल अछि। जखनकि सरकारक आंकड़ा मे मैथिली बजनहारक संख्या घटि रहल अछि। एहि स्थिति में मैथिली साहित्य, आ पत्रकारिता पर वैष्विक प्रभावक चर्चा करब मात्र गप्पबाजी अछि। आब जखन सरकारी संस्था अछि तऽ ओकर बजटक उपयोग करब हमरा सभक नैतिक दायित्व अछि पूरा देषक शासन व्यवस्था लोक कल्याणकारी व्यवस्थाक अन्तर्गत चलि रहल अछि। सरकारक सेहो दायित्व अछि जे ओ लोक सभक (विषिष्ट) कल्याण करए। सम्पूर्ण समाजक कल्याण करब कोनो सरकारक लेल संभव नहि अछि मुदा किछु विषिष्ट लोकक तऽ कल्याण भइए सकैत अछि। से अहू आयोजन मे भेल आ पूरा सफाइक संग भेल। एहि कार्यक्रमक विषय तऽ बड़ व्यापक छल। एहि मे सहभागी विद्वान सभक विदूता पर सेहो कोनो आषंका नहि। कार्यक्रमक आयोजन आ कर्ताधर्ताक प्रतिभा तऽ मानहे पड़त। तखन नहि जे अपन सेवाकाल मे मैथिली के अपन साध्यं बुझलनि तिनका एहू बेर साधबाक अवसर भेटि गेल। मैथिलीक वैष्विक प्रभाव पर चारि दृष्टिए अपन विचार रख निहार चारू प्रतिभाषाली विद्वानक अद्भूत योग्यताक धनी छलाह। एहि मे तीन गोटे तऽ अवष्य एहन छलाह जिनकर रोजी-रोटीक आधार मैथिली नहि छल तइयो मैथिली लेल काज कएलनि आ काज कऽ रहल छथि। हुनका सभ के अवसर भेटल तऽ एकर उपयोग नहि कऽ सकलाह। चारू विद्वानक जे आलेख प्रस्तुत भेल ओ विद्वतापूर्ण छल मुदा ओकरा विषय सॅ दूर राखल गेल छल। जखन परामर्ष मंडलक नेतृत्व दिषाहीन छल तऽ भला वक्ताक दिषा पर चलबाक कोन प्रयोजन? इ तऽ मैथिलीक दुर्भाग्य अछि जे सरकारी सेवा आ हिन्दी पत्रकारिता मे खुटा गाड़वला मैथिली साहित्य आ पत्रकारिता मे सेहो खुटा गाड़बा मे सफल रहल। विषय सॅ विषयांतर भेल प्रषासनिक साहित्यकारक आलेख मे साहित्यक प्रषासनिक दंभ स्पष्ट गेल तऽ हिन्दी पत्रकारिताक स्तम्भ जे अपन पत्रकारिताक जीवन मे बिना अर्थ मैथिली पत्रकारिताक सेवा नहि देलनि ओ मैथिली पत्रकारिता पर वैष्विक प्रभावक चर्चा तऽ नहि कऽ बाकी सभ गप्प कहलनि। अर्थक मोह पाष मे फसल इ नव मैथिली पत्रकार अपन मनक व्यथा कहबा मे से हो संकोच नहि कएलनि जे ओ एक बोनि पर दू टा काज कऽ रहल छथि। (आलेख पढ़लनि आ अध्यक्ष्ता कएलनि) हुनका पत्रकारिता पर वैष्विक प्रभाव सॅ बेसी चिन्ता एहि लेल छल जे कोलकाताक कोनो मैथिली दैनिक सरकारक विज्ञापन लऽ रहल अछि। जेना हुनक जमीन केबाला कऽ सरकार ओहि मैथिली दैनिक के विज्ञापन दऽ रहल हो। हिन्दी पत्रकार मैथिली पत्रकारिताक आनक बानगी इ छल जे ओ मिथिला मिहिर सन यषस्वी मैथिली पत्रिका संपादक सुधांषु शेखर चौधरीक नाम धरि नहि लेलनि। एतबा नहि विकट परिस्थिति के बादो समय साल चलैत रहल आ एहि पर हुनक नाजरि नहि गेल। मुदा अपन मित्र हुनक पत्रिका पर विषेष ध्यान रहल। मैथिली साहित्यक इ सौभाग्य बुझि आ कि दुर्भाग्य, एकटा नाव फैषन बनि गेल अछि, जे अपन सामर्थ्य मे मैथिली के बिसरि जाइन अछि, अपन सरकारी सेवा आ आन सेवा सॅ मुक्त भऽ जाइत अछि ओ अपन वैष्विक प्रभाव देखबऽ लेल पैघ मैथिली साहित्यकार आ पत्रकार बनि जाइत छथि आ एहन अवसरक खोज मे लागि जाइत छथि। एहि आयोजनक प्रति मैथिली परामर्ष मंडलक कतेक सजग छल एकर बानगी आछि आमंत्रण पत्र आ कनि सॅ भेट कार्यक्रमक बुकलेट। आमंत्रण पत्रक भाषाक त्रुटि तऽ इ साबितक देलक जे परामर्ष मंडल मैथिली भाषाक पैघ भुसकौल साहित्यकारक मंडल अछि। एतबा नहि कनि सॅ भेट कार्यक्रमक कीति नारायण मिश्र पर केन्द्रित हिन्दी मे छपल बुकलेट मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभाव के रेखांकित करैत अछि। या तऽ मैथिली परामर्ष मंडल मात्र अर्थ उपार्जनक लेल बनक अछि अथवा सŸो भुसकौल अछि। जखन आमंत्रण पत्र हिन्दी आ मैथिली दूनू भाषा मे छपि सकैत अछि तऽ बुकलेट के मैथिली मे छलपऽ मे कोन परेषानी छल। एहि संदर्भ मे जनतब पर इ स्पष्टीकरण देल गेल जे साहित्य अकादमी क इ कार्यालयी भाषा अछि। प्रधानमंत्री कार्यालयक भाषा सेहो हिन्दी आ अंग्रेजी अछि। मा० प्रधानमंत्रीक कार्यक्रमक मैथिली अनुवाद प्रसारित होइत अछि तऽ साहित्य अकादमी के अपन कार्यालय भाषा बदलऽ मे कोन परेषानी छल। इ सभ अव्यवस्था परामर्ष मंडलक भुसकौल हेबाक परिणाम अछि। असल मे परामर्ष मंडलक नेतृत्वकर्ता के साहित्य अकादमी मे मैथिली साहित्यक खराम पुजबाक लेल देल गेल छल। मॉ सरस्वतीक वाद्ययंत्र नामी परामर्ष मंडलक नेतृत्वकर्ता एहि खराम के पहिर कऽ चलबाक प्रयास कऽ रहल छथि। मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभावक असरि कवि सॅ भेट कार्यक्रमक दरमियान स्पष्ट रूपें देखल गेल। एहि सत्रक विद्वान साहित्यकार कीर्ति नारायण मिश्रक साहित्यिक योग्यता पर कोनो तरहें टिप्पणी करब उचित नहि अछि मुदा एहि सत्र मे जाहि तरहे बेका सॅ हिन्दी मे अपन विचार रखलनि ओहि सॅ तऽ स्पष्ट भेल जे हुनक साहित्यिक आत्मा अवष्ये वैष्विक भऽ गेल अछि। कीर्ति बाबू हिन्दी आ मैथिली साहित्यक भूर्धन्य साहित्यकार छथि। हमरा नहि लगैत अछि जे हिन्दी साहित्यिक आयोजन मे एहि तरहें ओ मैथिली मे अपन विचार रखैत हेताह। हिन्दी हमरा सभक राष्ट्रभाषा अछि। एकर सम्मान करब हमरा सभक दायित्व अछि राष्ट्रभाषाक प्रतिनिधित्व करबाक लेल साहित्य अकादमीक प्रतिनिधि पूरा आयोजन मे सदेह उपस्थित छलाह तखन मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभावक चर्चा छोड़ि अपना पर वैष्विक प्रभाव देखैबाक कोन प्रयोजन। एहि आयोजनक एकटा आन सत्र छल ‘‘कथा संधि ओहि मे हिन्दीयाइन साहित्यकार के अवसर देब परामर्ष मंडलक मैथिलीक प्रति अनुराग के स्पष्ट करैत अछि। हुनक कथाक पृष्ठभूमि हिन्दीए सन जागल जे ओ स्वयं सेहो स्पष्ट कएलनि ओ कथा सुनौलनि। हमरा कथा नहि बुझि पड़ल तऽ एहि मे हुनकर कोन दोष। दोष तऽ सूनऽ वलाक। जे कथा दिस ध्यान नहि तऽ एहि आयोजनक गुण-दोषक ब्लू प्रिन्ट बनबऽ मे अपन ध्यान लगौने छलाह। मैथिली साहित्य मे भने मैथिलीक षिक्षक आ प्राध्यापक अपना के पैघ विद्वान बुझैत होथि। मुदा वास्तविकता इ अछि जे डा0 हरिमोहन झा सॅ मनमोहन झा धरि आ राज कमल चौधरी सॅ कमल मोहन चुन्नू धरि मैथिली साहित्यकारक जे पैघ सूची सोझा अछि ओहि मे निःसंदेह नब्बे प्रतिषत मैथिली साहित्यिक प्रतिभा ओ छथि जिनकर रोजगारक माध्यम मैथिली नहि अछि। नवका पीढ़ीक सेहो बेसी सक्रिय मैथिली साहित्यकार सेहो मैथिली पढ़निहार नहि छथि तथापि ओ मैथिली साहित्य मे अपन झण्डा गा़ड़ऽ लेल सतत् सक्रिय छथि। साहित्य अकादमीक मैथिली परामर्ष मंडल मे बेसी सदस्यक पेटक आगि मैथिली साहित्यक माध्यम सॅ मिझा रहल अछि मुदा ओ गाम घर पर मैथिली साहित्यक कोनो प्रभाव नहि छोड़ि रहलाह अछि। ओ तऽ मात्र सरकारी गैर सरकारी आयोजन माध्यमे अपन वैष्विक प्रभाव देखैबाक अवसर तकैत रहैत छथि। साहित्यक अकादमीक इ आयोजन जेना अज्ञानताक प्रतियोगिता बुझि पड़ल। एहि आयोजनक प्रति साहित्य अकादमी आ आयोजक संस्था चेतना समितिकक गंभरीता ओकर कार्यषैली सॅ स्पष्ट भऽ गेल। जखन साहित्य अकादमी जे एहि आयोजनक वित पोषक छल एहि आयोजनक प्रति गंभीर नहि छल तऽ सदा सॅ अगंभीर रहल चेतना समिति कि एक एहि कार्यक्रम के गंभीरता सॅ लैत। साहित्य अकादमी आमंत्रण पत्रक बंडल पठा देलक आ चेतना समितिक सोइत वला व्यवस्था एहि आमंत्रण के नजर अंदाजक अपना तरहे आयोजनक व्यवस्था मे लागि गेल। अकादमी के जेना चेतना समितिक कार्य प्रणालीक अंदाज छल। ओ साहित्यकार सभ के सेहो फराक सॅ पांच पांच टा आमंत्रण पत्र पठौने छल। लगैत अछि जे इ कोनो रैली छल जे सभ साहित्यकार के पांच पांच मुड़ि क संग उपस्थित हेबाक छल। राजधानी पटना मे मैथिली साहित्य प्रेमीक कोनो कमी नहि अछि मुदा एहि आयोजन मे भांज पुराओल उपस्थिति चेतना परिवारक सोइताना व्यवस्थाक एकटा बानगी छल। आतिथ्य सत्कारक लेल चर्चित मिथिलाक संस्कृति पर एहि आयोजन मे वैष्विक प्रभाव देखल गेल। महाकवि विद्यापतिक नाम पर बनल विद्यापतिक भवनक बिम्ब पर मिथिलाक आतिथ्य परम्परा के टांगि सरदारी व्यवस्था मे अतिथि सत्कार भेल ओ आष्चर्यजनक छल। चेतना समितिक महादेवक सोइत बसहा कार्यक्रमक सफलता पर गद्गद् छलाह। मैथिली लेखाक संघक मैथिली लिटरेचर फेस्टिवेल मे जखन चेतना समिति पर प्रतिकूल टिप्पणी भेल छल तऽ ओहि ठाम उपस्थित चेतना समितिक महादेवक बसह। सभ तांडव देखबा योग छल मुदा महादेवक एहि मंदिर मे क एहि अव्यवस्था पर ओ बसहा सभ महादेवक आगा मुड़ि हिलबैत रहलाह। असल मे विद्यापति भवनक संदर्भ मे इ उक्ति सटीक बैसैत अछि जे माल महाराज के आ मिर्जा खेले होली विद्यापति भवन मैथिल समाजक सम्पति अछि आ महादेव एकरा सरदार के होली खेलबा लेल गिरवी राखि देलनि अछि। साहित्य, संस्था आ समिति अछि तऽ आयोजन होएब आवष्यक अछि। पैघ संस्था रहत तऽ पैघ आयोजन ज्यो पैघ आयोजन तऽ विद्वान सेहो पैघ-पैघ रहताह। पैघ विद्वानक उपस्थिति मे नीक ज्ञानार्जनक अवसर भेटत। इ नीक गप। मुदा विषय सॅ विषयांतर भऽ श्रोता सभ के दिग्भ्रमित करब उचित नहि। मैथिली साहित्य पर वैष्विक प्रभावक बहन्ने ज्ञानार्जन तऽ अवष्य भेल। एहि बहन्ने अनियमित अवकाश प्राप्त साहित्यकार, विद्वान आ पत्रकार मैथिली साहित्य पर अपन प्रभाव छोड़ऽ मे सफल रहलाह। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र दीर्घ कथा- परिस्‍थिति लेखिका राघव परेशान छला। सरिपहुँ दिल्‍लीसँ शोधक प्रक्रियामे दरिभंगा जेबाक छेलैन। दरिभंगा गेला। ओतए प्रोफेसर सुधाकर ठाकुरजीक निवासपर पहुँचला। सुधाकर पचास वर्षीय श्रोतीय ब्राह्मण छैथ, कारी भुजंग। डेढ़ आँखि। कुनो अफ्रिकन जकाँ बड़का बरी सन बिदरल ठोर। कँचियाएल नयन। तइमे बिना ढंगसँ धोल आ बिना आयरन कएल अंगा, अंगाक बाँहिक एक बटम टुटल। एक हाथमे अंगाकेँ मोड़ने आ दोसरमे बटम लगेने। पएरमे कोयला-मजदूर जकाँ गन्‍दगी सटल आ दुनू ऍंड़ीमे छँहोछित बेमाए फाटल। ऊपरसँ एकटा प्‍लाष्‍टिकबला चप्‍पल पहीरने। मुँहमे पान ठुसने। पानक दाग समस्‍त वस्‍त्रपर चकचकाइत...। राघवकेँ भेलैन, हे भगवान! कोन मनुख-लग आबि गेलौं!! मुदा करितैथ की। लचार छला राघव। आधा मनसँ राघव प्रोफेसर सुधाकरकेँ चरण-स्‍पर्श केलैन। सुधाकर बहुत प्रसन्नतासँ राघवकेँ आवभगत केलखिन। प्रोफेसर सुधाकरकेँ दरिभंगामे भव्‍य तीन मन्‍जिला मकान छैन। पैघ क्षेत्रमे बनल। मकानक आगूसँ पक्की-सड़क आ पाछूसँ पोखैर घेरल। प्रांगणमे प्रचुर खाली धरती, जइमे आम, जामुन आ लीचीक गाछ चतरल। घरक काते-कात गेना, गुलाब, अड़हुल इत्‍यादि फूलक अतिरिक्‍त तुलसी, पुदिना लागल। परिसरक मध्‍यमे झबड़ल नीमक गाछ जे छाहैरसँ परिपूर्ण छल। निच्‍चासँ दू मन्‍जिल मकानकेँ प्रोफेसर सुधाकर कुनो आवासीय विद्यालयक छात्रावासक हेतु दऽ देने छेलखिन। तेसर मन्‍जिलमे स्‍वयं पत्नी-नन्‍दिता, पुत्र- अमरेश आ विमल संग रहै छला। पत्नी छेलखिन पैंतीस बर्खक। जेठ पुत्र सोलह बर्खक आ छोट तेहर बर्खक। घरमे प्रवेश करैत राघवकेँ एना बुझेलैन जे नर्कमे आबि गेलौं। घर सभ धुरा-गर्दासँ भरल। बाथरूम गन्‍हाइत। भीजल कपड़ा सभ तीन-चारि दिनसँ जेना पड़ल हो। बाथरूमक बाहर चारि-पाँचटा आँठि थारी पड़ल। थारीमे भात,तीमन आदि आँठि गन्‍हाइत, माछी भिनकैत..! राघव एकटा कुर्सीमे बैसला। कनी कालमे प्रोफेसर सुधाकर जीक दुनू बालक आबि राघवकेँ पएर छूबि प्रणाम केलकैन। जेठ बालकक मुँह-कान कुनो रूपे एक सभ्‍य प्रोफेसर केर संतति नहि लगै छल। जेठ पुत्रक खिखिर जकाँ मुँह, ढाबूस बेंग सन पीअर-पीअर-छोट-छोट दाँत। शरीरक कांति हदसँ बेसी कमजोर। जेना यक्ष्‍मा रोगसँ ग्रसित होथि। फाटल हाफ पेन्‍ट आ नव अंगा पहीरने। गरदेन आ कनपट्टीपर मैल जमल। अपरोजकक नेता। छोट बालक मोट, मुदा मुँह-कान शोभनगर नहि। रीक्ष जकाँ झोंट। बुझाइत एना जेना कहियो कंगही आ तेलक भेँट नहि भेल होइ। दुनू भाँइमे एक अन्‍तर अबस्‍स बुझना गेलैन राघवकेँ- जेठ कनी सोझ, निश्छल तँ छोट कनी कईयाँ आ मतलबी। एकटा पनरह बर्खक बच्‍चिया सुधाकरजी ओतए घरक-काज करै छलि, जेकर छीनकाय काया। आँखिमे काँची पड़ल। नाकपर सुखाएल पोटाक मोट मुल्‍लमा मोती जकाँ लागल। आँगुरक नह-सभमे कारी-कारी मैल भरल। ओकर नाओं छिऐ बेबी। प्रोफेसर सुधाकर बेबीकेँ कहलखिन- “बेबी, कनी राघवजीकेँ एक गिलास सुसुम पानि पीआ। फेर नेबोबला चाह बना। वेचारे थाकल छैथ। जाबेत चाह पीता, स्‍नान-ध्‍यान करताह, ओतबा कालमे भोजनक व्‍यवस्‍था कर।” प्रोफेसर सुधाकर अपन छोट पुत्रकेँ कहलखिन- “बाऊ, कनी हम्‍मर पर्ससँ बीस टाका लऽ चौकपर सँ थोरेक खीरा, चुकुन्‍दर, मुरई, धनी पात आ हरिअर मिरचाइ लऽ आउ। नेबो घरेमे अछि।” थोरबे कालमे बेबी एक गिलास सुसुम पानि लेने राघव लग आबि गेलैन। राघव तँ गन्‍दगीसँ परेशान छला, मुदा हारि मानि नाक आ आँखि मुनि पानि पीब गेला। प्रोफेसर सुधाकर केर बाथरूम भारतीय रेलक जेनरल बोगीक बाथरूमसँ कुनो दृष्‍टिकोणे नीक नहि छेलैन। मुदा ‘मरता क्‍या नहीं करता’केँ स्‍मरण करैत राघव बिना कुनो प्रश्‍न केने बाथरूम दिस विदा भेला। स्‍नान एवं अन्‍य नित्‍य-क्रियाकेँ सम्‍पादित करबाक लेल यद्यपि राघव साबुन, सेम्‍पू, पेस्‍ट, अंगपोछा इत्‍यादि अपना अटैचीसँ निकालि ओतएसँ निकालला। स्‍नानादिसँ निवृत भऽ राघव बाहर एला तँ देखै छैथ जे प्रोफेसर सुधाकर केकरोसँ बात फोनपर कऽ रहल छैथ। कनी-कालक पछाइत बातकेँ विराम दैत सुधाकर कहलखिन- “राघवजी, अहाँक पत्नी सहजन्‍यासँ बात भऽ रहल छल। ओ कहै छेली जे राघव, बाहरक भोजन नहि पसिन करै छैथ आ कनी लजकोटर सेहो छैथ। भूखो लगल रहतैन तँ बजता नहि। तँए अपने हुनकर भोजनक बेवस्‍था शीर्घातिशीघ्र कऽ दियौन।” एतेक बात कहैत प्रोफेसर सुधाकर बेबीकेँ कहलखिन- “बेबी छेँ। राघवजी भूखल-पीआसल छैथ। एखनहि हिनक पत्नी- सहजन्‍यासँ फोनपर बात भेल छल। जल्‍दी-जल्‍दी भोजन तैयार कर।” ई कहैत प्रोफेसर सुधाकर अपन छोट पुत्रकेँ बजेलखिन- “विमलजी! जल्‍दी आउ आ सलादक सामग्री लेने आउ। कीचनक दछिनवरिया कोणमे तेजहा चक्कु अछि सेहो लेने आएब। जाबेत धरि बेबी भोजन तैयार करैत अछि ताबेत धरि हमरा लोकैन सलाद तैयार कऽ लैत छी।” विमल अपन पिताक आज्ञाकेँ पालन करैत सलादक सामग्रीकेँ एकटा सूपमे लऽ संगे चक्कू, थारी आदि सेहो लऽ अपन पिता लग आबि गेला। प्रोफेसर सुधाकर सलाद काटए लगला। ओना सलादक सामग्री नीकसँ धोल नहि छेलैन। राघवकेँ मने-मन अपन सहचरी सहजन्‍यापर धोर तामस उठए लगलैन। सोचलैन- “बेकारे ऐ प्रोफेसर सुधाकरकेँ ई किएक कहि देलखिन जे राघव घरक भोजन करता? कनी-मनी खा लितौं आ बादमे चुपचाप टावर केर कुनो भोजनालयमे भोजन कऽ अपन जीवन-रक्षा करितौं। मुदा सहजन्‍या तँ सभटा चौपट्ट कऽ देली! हे भगवान, आब की हएत? चण्‍डाल सोइत प्रोफेसर भाय अपना घरक अपवित्र आ गन्हाएल भोजनसँ हमर जान लऽ लेत! दुख- हरहु हारकानाथ शरण मैं तोरी।” आ देखते-देखते भोजन तैयार भेल। सचार लगलै। संगे-संगे राघव आ प्रोफेसर सुधाकर भोजन करबाक लेल बैसला। सुधाकर अपन जेठ पुत्र- अमरेशकेँ कहलखिन- “बाऊ, जल्‍दीसँ तीन-चारि तरहक अँचार लाऊ। राघवजी छब्बीस घण्‍टासँ भूखल छैथ।” खैर! राघव नहियोँ चाहैत भोजन केला। ओना, भोजन ओतबो अधला नहि जेहेन राघव सोचने रहैथ। हँ, सुचिताक अभाव अबस्‍स रहइ। तरकारी सभमे नोन कनी अधिक जरूर रहइ। भोजन केला पछाइत राघव प्रोफेसर सुधाकरकेँ संगे एक पैघ कमरामे गेला। कमरामे ओछाइन इत्‍यादि राखल रहइ। दुनू गोरे बैसला। थोड़बे कालमे एक महिला नीक वस्‍त्र पहीरने, खुजल केसक संग ओतए पहुँचली। सुधाकर उठि एक कुर्सीपर ओहि महिलाकेँ इशारासँ बैसबाक निवेदन केलखिन। महिला प्रोफेसर साहैबकेँ इशारासँ सम्‍मान करैत एक कुर्सीपर जा सहज भावसँ बैस गेली। आब सुधाकर राघव दिस मुखाकृत होइत बजला- “राघवजी, ई छैथ नन्‍दिता। हमर पत्नी। साहित्‍यमे अभिरूचि छैन। कविता, गल्‍प्‍, उपन्‍यास आदि लिखबो करै छैथ। समाजशास्‍त्रसँ एम.ए. छैथ। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयसँ समाजशास्‍त्र विभागसँ ‘नारी मनोदशा’ केर ऊपर पी.एच-डी कऽ रहली अछि। थेसिस लगभग तैयार छैन। सभ चीज ठीक रहलैन तँ दू मासक भीतर जमा भऽ जेतैन...।” महिला मुस्‍कियाइत रहली। नन्‍दिता आ राघव लगभग उमेरमे समवयस्‍की, मुदा राघव प्रोफेसर सुधाकरकेँ गुरु तुल्‍य मानैत सदिकाल हुनकर चरण-स्‍पर्श करैबला, तँए मर्यादाक पालन करैत नहियोँ चाहैत राघव उठि कऽ नन्‍दिताक पएर छूबि प्रणाम केलकैन। नन्‍दितो अदहे मनसँ अभिवादन-स्‍वीकार करैत राघवकेँ पीठ थपथपा असिरवाद दऽ अपन गुरु-पत्नी बनबाक भारसँ उरीन भेली। मुदा नन्‍दिता देखए-सुनएमे अद्भुत सुन्नैर। छरहर देह। कारी केस जे ठेहुनकेँ छुबैत...। नन्‍दिता सफेद रंगक साड़ीमे छेली। जइमे किछु डिजाइन बनल छेलैन। कम्‍प्‍युटराइज्‍ड पेर्टन, जे साड़ीकेँ आकर्षक आओर नन्‍दिताक सौन्‍दर्यकेँ बढ़ा रहल छेलैन। नन्‍दिताकेँ देख ई लगै छल जेना नन्‍दिता सोभाव आ संस्‍कारसँ आधुनिकी छैथ। कलरलेस लीपिस्‍टिक लगेने, आँखिमे सहनाज हूसेनक काजर, आ केस कुनो महग सेम्‍पूसँ धोने। केसक चमक ऐ बातक प्रमाण छेलैन। अधकटी बेलौजसँ नन्‍दिताक काँख देखाइत रहैन आ ओकरा अकारणे नहि झाँपए चाहैथ। राघवक धियान ओइ दिस चलिये गेलैन। समुन्नत वक्षकेँ तुरत बाद काँखक हस्‍यावलोकन कनी मनकेँ झंकृत करए बला लगलैन। नन्‍दिता कुनो युक्षिणीक मूर्तिसँ कम नहि छेली। कियो नइ कहि सकै छल जे पैंतीस बर्खक भऽ गेल छैथ आ दू गोट पुत्रक माता थीकीह। अपाद्मस्‍तक सुन्‍दरताक खान बुझाइत नन्‍दिता। बादमे प्रोफेसर सुधाकर नन्‍दिताकेँ राघवक परिचय दैत कहलखिन- “राघवजी, संस्‍कृत आ कलाक बहुत नीक विद्वान छैथ। संस्‍कृतक संग-संग हिन्‍दी, मैथिली आ अंग्रेजी साहित्‍यपर समान अधिकार छैन। समाजशास्‍त्र,नृतत्त्वशास्‍त्र, कला-इतिहास, संग्रहालय विज्ञान, पुरातत्व आ सौन्‍दर्यशास्‍त्रमे गहन अभिरूचि रखै छैथ राघवजी। बहुत नीक लिखैत छैथ आ बहुत नीक बजैत छैथ। UNESCO-UNDP आदि संस्‍थाक हेतु भारतीय संस्‍कृति केर अनेको विषयपर लिखै छैथ, डक्‍युमेन्‍टरी फिल्‍म बनबैत छैथ। कविता, गल्‍प आदि सेहो लिखैत छैथ। मैथिली संस्‍कृतिपर कार्य करबाक हेतु मिथिला आएल छैथ। UNESCO-UNDP परियोजना लेल भारत सरकारक सहयोगसँ काज कऽ रहला अछि। एतए बीस-पचीस दिन रहता। दिनमे मिथिलाक अनेक गाम जेना- सौराठ, सरिसब पाही, सतलखा, अन्‍धराठाढ़ी, पुनौराधाम आदिक भ्रमण करता आ अधिकांश दिनमे रातिक दरिभंगा अपने सभ लग रहए चलि औता। किछु-किछु गाममे हमहूँ हिनका संगे जाएब। बहुत किछु सीखबाक अछि राघवजी सँ आ भारतीय लोक संस्‍कृतिसँ।” नन्‍दिता राघव केर प्रशंसासँ बड्ड प्रभावित भेली। राघव दिस आनन्‍दक भावसँ देखलखिन। बजलैथ- “तखन तँ हमहूँ जखन-कखनो राघव उपलब्‍ध रहता तँ अपन साहित्‍य आ साहित्‍य-लेखन केर विधापर विस्‍तृत चर्चा हिनकासँ कऽ सकै छी?” आब राघव बजला- “किएक नहि मैडम! हम अहाँक साहित्‍य पढ़ि आ ओइपर चर्च कय अपना-आपकेँ धन्‍य बुझब! अहाँसँ बहुत किछु सिखबाक अवसर भेटत। शैली, उपमा,अलंकारक प्रयोग आ बिम्‍बक विधानक जानकारी भेटत। हम तँ सौखिया लेखन करै छी साहित्‍यमे। संस्‍कृति आ मानव विज्ञानसँ समय नहि निकालि पबैत छी। ओना ईहो बता दी जे हमरा सम्‍बन्‍धमे श्रीमान कनी अधिक बता देलाह। हम तँ कला-संस्‍कृति आ मानव विज्ञानक अति-समान्‍य छात्र मात्र छी।” “अहाँसँ भेँट भेल तँ हम अपना आपकेँ उत्‍साहित बुझै छी।” –स्‍वत: बजली नन्‍दिता। ई कहैत नन्‍दिता उठि कऽ अपन शयन कक्षमे गेली आ एकटा चानीक प्‍लेटमे लौंग, इलायची, सुपारी, सौंफ, नारिकेल इत्‍यादि लऽ कऽ पुन: लगमे आबि, प्‍लेट राघव दिस बढ़ा देलखिन आ पुन: अपन कुर्सीपर बैस रहली। राघव प्‍लेटकेँ प्रोफेसर सुधाकर दिस बढ़बैत बजला- “श्रीमान, पहिने अपने लेल जाओ।” प्रोफेसर साहैब हाथक इशारासँ राघवकेँ सिनेहक आदेश दैत पहिने लेबाक निर्देश देलखिन। सिनेहादेशक सम्‍मान करैत राघव प्‍लेटसँ दछिनी आ कनी सौंफ लऽ लेलैन। थोड़े कालक बाद नन्‍दिता पुन: अपना कक्ष दिस गेली। दस मिनट लगेलैन आ आपस हाथमे पान बनेबाक तमाम सामग्री लय अनलैथ। अपन कुर्सीपर आसन ग्रहण करैत पान लगबए लगली, निपुणताक संग। राघवकेँ पुछलखिन- “केहेन पान खाएब राघवजी? कुन जर्दा एवं अन्‍य चीज? कुट्टीबला सुपारी की सरौतासँ छल्‍ला बनल?” राघवकेँ नन्‍दिताक आवभगतक स्‍टाइल नीक लगलैन, बजला- “मैडम, हमरा क्षमा करू। हम कुनो तरहक पान नहि खाइ छी। श्रीमानकेँ दियौन आ स्‍वयं खाउ पान।” नन्‍दिता आब एक खिली पान लगा प्रो. सुधाकरकेँ दऽ देलखिन आ दोसर खिली स्‍वयं लऽ लेली। पानक डालीसँ प्रो. सुधाकर अपना हाथे कारी-पीअर रंगक जर्दा अपने इच्‍छे लऽ लेलैन। नन्‍दिता सेहो एकटा छोट खिल्‍ली अपना लेल बनेली आ बिना कथ के सुपारी एक नान्‍हिटा टुकड़ी दाँत तरमे ग्रहण केली। थोड़बे कालक पछाइत नन्‍दिता प्रो. सुधाकरकेँ कहलखिन- “बुझलौं की एगो बात?” प्रो. सुधाकर- “की? कहू ने?” नन्‍दिता- “ई पानक खिल्‍ली हमर जिनगीक अन्‍तिम, पानक खिल्‍ली थीक। आब हमहूँ पान नहि लेब। अगर राघवजी बिना पान खेने रहि सकै छैथ तँ हम किएक नहि?” ऐ बातपर राघव विनम्रता पूर्वक बजला- “नहि नहि। ऐमे कुनो महानताबला बात नहि छै, मैडम। ई तँ अपन पसिन आ ना पसिनपर निर्भर करै छै। हमरा पान नहि नीक लगैत अछि तँए नइ खाइ छी।” बिच्‍चेमे प्रो. साहैब बाजि उठला- “देखू नन्‍दिता! अगर अहाँ पानक तियाग करए चाहै छी तँ अबस्‍स करू। ई उत्तम निर्णय हएत। एहनो भऽ सकैत अछि जे किछु दिनक बाद हमहूँ पान तियागि दी।” आब राघव गद्-गद् भऽ गेला। गदगदाइत बजला- “श्रीमान आ मैडम, ओना अगर अहाँ लोकैन पान छोड़ि दी तँ नीक बात। सुपारी, जर्दा इत्‍यादिक कारणे पान आजुक युगमे माहुर बनि चुकल अछि। डाक्‍टर तँ एतेक तक कहै छैथ जे Oral Cancer केर प्रमुख कारणमे एक कारण पानो खाएब छी।” राघवक कथनकेँ स्‍वीकृति प्रोफेसर सुधाकर आ नन्‍दिता अपन-अपन गरदेन हिला देलखिन। राघवकेँ नीक लगलैन। एकाएक नन्‍दिता राघव दिस देखैत बजली- “राघवजी, एक बातक निवेदन करी?” राघव- “निवेदन की मैडम, आज्ञा करू?” नन्‍दिता- “कुनो आज्ञा नहि। सिर्फ छोट-छीन निवेदन।” राघव- “कहू ने मैडम।” नन्‍दिता- “हमरा अहाँ मेडम नहि कहू। कुनो आरो नामसँ सम्‍बोधित करू। नन्‍दिता कहि सकै छी।” राघव- “नाम लऽ कऽ केना बजाउ? अहाँ गुरुपत्नी छी।” प्रोफेसर सुधाकर निराकरण करैत बजला- “सुनू ने राघवजी। अहाँ तँ हमर छोट भाए जकाँ छी। तइ दृष्‍टिकोणसँ नन्‍दिता अहाँक भाउज भेली। अगर अहाँ चाही तँ हिनका नन्‍दिता भाभीक नामसँ सम्‍बोधित कऽ सकैत छिऐन। नन्‍दितोकेँ हमरा जनैत ई सम्‍बोधन नीक लगतैन।” नन्‍दिता- “हँ हँ। बिल्‍कुल ठीक शब्‍दक चयन भऽ गेल। राघवजी, आब अहाँ हमरा नन्‍दिता भाभी कहि सम्‍बोधित करू। हमरा बड्ड नीक लागत। मैडमकेँ भारसँ हम दबल जा रहल छी।” मन्‍द-मन्‍द मुस्‍कीसँ मुस्‍कियाइत राधव अपन सहमति देलखिन- “ठीक छै। नन्‍दिता भाभी अहाँ लोकैनकेँ जेहेन आज्ञा हुअए हमरा स्‍वीकार्य अछि।” हलाँकी ऐ शब्‍दाबलीसँ राघव सेहो मने-मन पुलकित छला। हुनका आब लागए लगलैन जे आब कनी नन्‍दिताक साहित्‍य बिना कुनो विशेष मर्यादाक बन्‍धनसँ उवैड़ जाएब। शायद ई एक नव रस्‍ता प्रशस्‍त कऽ रहल छल। नन्‍दिताक चेहरा सेहो चमैक रहल छेलैन। हलाँकी प्रोफेसर सुधाकर कहि नहि किए, कनी परेशान भऽ रहल छला। आब प्रोफेसर सुधाकर कहलखिन- “राघवजी अहाँ थाकल छी। पहिने कनी आराम कएल जाउ। साँझमे छह बजे धरि हमरा लोकैन बैसब आ आगाँ केना कार्य करबाक अछि। कुन गाम कहिया जेबाक अछि, किनकासँ भेँट करबाक अछि आदि विषयपर विस्‍तारसँ चर्चा कऽ सर्वेक्षण केर ब्‍लू प्रिण्‍ट तैयार कऽ लेब।” राघवजी सूति रहला...। साँझमे साढ़े तीन बजे राघव जागि गेला। कनी कालमे प्रो. सुधाकर केर छोट बालक विमलेश एलखिन। विमलेश राघवकेँ पुछलखिन- “ककाजी, जल लबैत छी?” राघव गरदेन हिला स्‍वीकृति दऽ देलखिन। विमलेश पानि अनला। राघव पानि पीब लेला। पानि पीबते मन हर्षित भेलैन। विमलेशसँ स्‍कूलक पढ़ाइ आदिपर विचार करए लगला। विमलेश एक-नम्‍बर-के गपोड़ी, बात करैमे माहिर, बूढ़ जकाँ सभ बातकेँ रचिया-रचिया सुनबए लगलैन। राघवोकेँ कुनो खराप नहियेँ लागि रहल छेलैन। पनरह मिनटक बाद अमरेश सेहो ट्यूशन पढ़ि कऽ आपस आबि गेला। विमलेश आ अमरेश अपन-अपन कथा सुना कऽ राघवकेँ समय बिता रहल छेलखिन। कनी कालक बाद प्रोफेसर सुधाकर आँखिकेँ हाथसँ पोछैत धड़फड़ाएल पहुँचला। कहलखिन- “राघवजी, उठि गेलौं? नीकसँ नीन भेल किने?” राघव- “हँ श्रीमान, खूब सुतलौं। तमाम थकाबट दूर भऽ गेल। आब तरोताजा भऽ गेल छी। अपनेक बालक सभ बड्ड नीक छैथ। बीस-पच्‍चीस मिनटसँ हिनका लोकैनसँ वार्तालाप कऽ रहल छी। नीक लागि रहल अछि।” आब चाह आबि गेल छेलैन। चाहक संगे-संग नन्‍दिता सेहो आबि गेली। कहि नइ किएक नन्‍दिताकेँ देखते-मातर राघवमे आश्‍चर्यजनक स्‍फूर्ति अबि गेलैन। सभ कियो चाह पीलाह। राघव प्रोफेसर सुधाकरजीक संगे Fieldwork केर Blie Print तैयार करए लगला। बीच-बीचमे नन्‍दिता दिस धियान चलि जाइन। ब्‍लू प्रिंट तैयार भऽ गेलैन। निर्णए लेलैन जे ऐगला दिन सात बजे भोरमे सौराठ गाम लेल प्रस्‍थान करता। आब राघवआ प्रो. सुधाकर बजार हेतु विदा भेला। दरिभंगामे सुधाकर राघवकेँ किछु प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार, इतिहासकार, संगीतकार आदि लग लऽ गेलखिन। राघवकेँ नीक लागि रहल छेलैन। जानकारी प्राप्‍त भऽ रहल छेलैन। साँझमे आबै काल जीबैत रेहु माछ कीनलाह। पैसा राघव देलखिन। माछक पाकमे नन्‍दिता सेहो संलग्‍न भेली। प्रो. सुधाकर सेहो लागल छला। माछक मसाला पीसबाक कार्य सेविका-बेबी कऽ रहलि छलि। राघव सेहो ओतै ठाढ़ भऽ गेला। पूरा पीकनिकक माहौल बनि गेल छेलइ। विमलेश चुपेचाप राघवकेँ कानमे कहलखिन- “जनै छिऐ काकाजी, आइ मॉं पहिल बेर कीचेनमे घुसली अछि। पापा आ माँ दुनू गोरे पाक विद्यामे केतेक नीक लागि रहल छैथ।” राघव केवल एक मिसिया हँसि कऽ बातकेँ ओतै समाप्‍त कऽ देला। भोजन तैयार भेलइ। सभ गोरे संगे भोजन करै गेला। रातिमे भोजनमे सुचिता आ सचारमे श्रृंगार बुझेलैन। भोजन करै काल प्रो. सुधाकर नन्‍दितासँ कहलखिन- “आमिल केतएसँ आएल छल?” नन्‍दिता आनन्‍दित स्‍वरमे बजली- “माँ भेजने छेली। पनरह दिन भऽ गेल। भेल जे राघवजीकेँ मिथिलामबला माछ बना कऽ खुएबैन। तँए ऐ माछमे पीऔज, लहसुन नहि देल अछि। टमाटरक बदला आमिल, पिऔज, लहसुनक बदला हींग, दही आ पुश्‍तादाना।” सुआद बिल्‍कुल अलग आ चहटगर। राघव भरि इच्‍छा भोजन केला। एहेन माछ खेबाक अवसर राघवकेँ जीवनमे पहिल बेर भेल रहैन। भोजन केला बाद राघव सूति रहला। दोसर दिन साढ़े छह बजे प्रात: नहा-धो कऽ राघव तैयार छला। राघव आ प्रो. सुधाकर चूरा-दही-चीनीक जलपान कए सौराठ लेल विदा भेला। सौराठक यात्रा सफल रहलैन। सौराठसँ साढ़े चारि बजे साँझमे दरिभंगाक लेल विदा भेला। दरिभंगा अबिते नन्‍दिता अपनेहाथे चाह बनेली। सभ कियो संगे चाह पीला। दोसर दिन सरिसब-पाही जेबाक छेलैन। प्रति-दिन भोरे सात बजेक यात्रा कुनो-ने-कुनो गाम लेल निश्चित रहैन। तेसर दिन प्रोफेसर सुधाकर केर एकाएक जानकारी प्राप्‍त भेलैन जे कॉपी-जाँच करबा लेल विश्वविद्यालय केर अन्‍य शैक्षणिक सहयोगी संगे हुनको बनारस हिन्‍दु विश्वविद्यालयमे पनरह दिन धरि सेन्‍ट्रलाइज्‍ड कॉपीक चेकिंगमे भाग लेबाक छैन। प्रो. सुधाकर किंकर्तव्‍यविमुढ छला। राघव सेहो परेशान छला। भेलैन, बिना प्रो. सुधाकरसँ काज केना हएत? मुदा अपन पनरह बर्खक अनुभवकेँ स्‍मरण केला पछाइत मनमे भेलैन- सभ किछु सम्‍भव छै। सोचलैन- आखिर हमहूँ तँ छी अही माटि-पानिक संतति। फेर चिन्‍ता कुन बातक? जे हेतै देखल जेतइ। हिम्‍मत देखबैत बजला- “श्रीमान् अपने अबस्‍स जाउ। हम्‍मर मार्ग प्रश्‍स्‍त भऽ गेल अछि। अहाँ सभटा दिशा-निर्देशन कऽ देने छी। हम कार्य कऽ लेब। हमरा जेबासँ चारि-पाँच दिन पहिने अपने आपस आबि जाएब। बँचल-खुचल डाटा दुनू गोरे मिल कऽ कऽ लेब।” प्रो. सुधाकर राघव केर ऐ तर्कसँ सहमत भेला आ बनारस जेबाक तैयारी करए लगलैन। ऐगला दिन भोरे सात बजे राघव कुनो गाम Fieldwork लेल गेला तँ एगारह बजे दिनमे प्रो. सुधाकर बनारस लेल दरिभंगा स्‍टेशनसँ रेल पकड़बाक लेल प्रस्‍थान केला। राघव साँझ छह बजे आपस एला। नन्‍दिता अपने हाथे चाह बनेली। एक लोटा आ एक गिलासमे जल अनलैन। राघव बिना कुनो प्रतिकारक भरि इच्‍छा जल पीला। फेर चाह पीबैले बैसला। नन्‍दिता चाह संगे भूजल चूरा तरल झींगा माछ लऽ अनलैन। थाकल राघवकेँ ई सत्‍कार गदगद कऽ देलकैन। बृहस्‍पैत दिन रहैक तँए नन्‍दिता पीअर साड़ी पहिरने छेली। ब्‍लौज सेहो पीअर मुदा ब्‍लौज केर गला बाहिं आ वक्ष लग कारी रहइ। पीअर आ कारीक मिलान रमनगर लगैत छेलैन। नन्‍दिता सोनाक एकटा बल्‍ला एक हाथमे आ दोसरमे घड़ी पहीरिने छेली। नन्‍दिताक हाथ-पैर आदि साफ छेलैन। नन्‍दिता आ प्रो. सुधाकर केर जोड़ी देखलापर ‘बानरक हाथमे नारिकेल’बला कहबी चरितार्थ होइ छल। चाह पीबै काल नन्‍दिता राघवसँ पुछलखिन- “राघवजी, अगर अहाँ लग समए हो तँ, आइ राति किछु काल अहाँसँ साहित्‍यक चर्चा कऽ सकै छी?” राघव बजला- “हँ-हँ नन्‍दिता भाभी, किएक नहि। हम सामान्‍यत: दिनेमे अपन लेखन कार्य सम्‍पन्न कऽ लैत छी। अपने परेशान जुनि हौउ। निश्चिन्‍तसँ कऽ सकै छी।” राघवक अश्वासनसँ नन्‍दिता बिहुँसि उठली। राघवो कुनो कम प्रफुल्‍लित नहि छला। चाह पीला पछाइत राघव पुन: किछु बाँचल कार्यकेँ सम्‍पादित कए स्‍नान केला। तेकर बाद प्रो. सुधाकर केर आवास लग एकटा सैलूनमे जा पूरा माथक मालिश, फेशियल इत्‍यादि करेलैन आ आपस आबि नन्‍दिता, अमरेश आ विमलेशक संग रात्रिक भोजन केला। रातुक भोजनमे नन्‍दिता अन्‍य भोज्‍य-पदार्थक अतिरिक्‍त काँच टमाटरकेँ आगिमे पका ओइमे पिऔज, लहसुन, आद, हरिअर मिरचाय आदि मिला चहटगर चटनी बनेने छेली। राघवकेँ चटनी बड्ड नीक लगलैन। भोजन करै काल विमलेश राघवकेँ कहलखिन- “चचाजी, टमाटरक चटनी केहेन लगल?” राघव जबाव देलखिन- “अपूर्व! मन होइए रोटी चटनीए संग खाइ। ऐ चटनीक आगू सभ व्‍यंजन बेकार।” राघवक ऐ जबावसँ नन्‍दिता प्रसन्न भेली आ गर्वान्‍वित स्‍वरूप निखैर उठली। राघवकेँ हुनकर स्‍वरूप बड्ड सोहनगर लगलैन। मुस्‍कियाइत रहला आ चहटगर चटनीक संग रोटी खाइत रहला। आब बिमलेश कहलखिन- “चचाजी, मम्‍मी अपने हाथे अहाँ लेल ऐ टमाटरक चटनी बनेली अछि।” राघव कृतज्ञताक स्‍वरमे बजला- “नन्‍दिता भाभी, अहाँ सभ हमरा लेल केतेक कष्‍ट लइ छी? ऐ कर्जकेँ हम सातो जनममे नइ सधा सकब। बड़ा अपूर्व आ चहटगर अछि चटनी।” नन्‍दिता- “अरे राघवजी! अहाँ एना किए सोचै छी। सुधाकर नहि छैथ। बनारस जाइसँ पहिनहि हमरा कहने छला जे राघवकेँ बाहरक भोजन पसिन्न नइ होइ छैन, तँए घरेमे किछु-ने-किछु अपने हाथे बना देबैन। बेबी-हाथमे सुआद नइ छै।’ तँए किछु बना देलौं। अहाँ तेतेक नीकसँ भोजन करै छी जे हमरो बनबैमे आन्‍नद अबैत अछि।” आब राघव चुप्‍पे भऽ गेला। भोजन केला। हाथ धोइते रहैथ कि सुधाकरक फोर एलैन- “की राघवजी, ठीक छी किने? आजुक यात्रा केहेन रहल? बुच्‍ची किछु नव चीज बनेली की? राघव बजला- “हँ श्रीमान्, अखने भोजन केलौं अछि। सभ वस्‍तु अपूर्व, मुदा काँच बिलौती केर चटनीक तँ जबाव नहि। मन तिरपीत भऽ गेल। कुनो दिक्कत नहि श्रीमान्। केवल अपनेक कमी खलि रहल अछि। फिल्डवर्क सेहो ठीक रहल। लोक सभ सहयोगी छला। बहुत रास जानकारी भेटल। अपने आएब तँ सभ डेटा आ आँकरापर वृहत चर्चा करब।” हलाँकि राघव जनै छला जे सभ बातमे एक बात झूठ बजला, बाजल छला जे प्रोफेसर सुधाकर केर कमी हुनका महसूस भऽ रहल छैन। राघव तँ प्रसन्न छला जे आब ओ नन्‍दितासँ मुक्त भावसँ वर्तालाप कऽ सकैत छला। राघवकेँ प्रो. सुधाकर आ नन्‍दिताक बिआहमे कुनो रहस्‍य बुझना जा रहल छेलैन। खैर, भोजन केला बाद राघव अपन कक्षमे गेला। कनी कालक बाद, भोजन केला बाद, बेबी अपन घर चलि गेलि। आब निच्‍चाँ जा नन्‍दिता मुख्‍य द्वार बन्‍द केलैन। जखन आपस एलीह तँ राघव पुछलखिन- “नन्‍दिता भाभी, की करए गेल रही?” नन्‍दिता जबाव देलखिन- “सुधाकर नहि रहै छैथ तखन कैम्‍पसक मुख्‍य-द्वार हमरे बन्‍द करए पड़ैत अछि। सएह करए गेल रही।” राघव बजला- “हमरा कहितौं? हम कऽ दितौं!” नन्‍दिता- “कुनो बात नहि। हमरा आदत पड़ि गेल अछि। अहाँ चिन्‍ता नहि करू।” पुन: नन्‍दिता अमरेश आ विमलेशकेँ आदेश करैत कहलखिन- “अहाँ सभकेँ स्‍कूल जाइसँ पहिने भोरे-भोर उठि कऽ पढ़ाइ करक अछि। जल्‍दी-जल्‍दी दूध पीब लीअ आ सूति रहू।हम साढ़े चारि बजे भोरक घण्‍टी लगा दइ छी। अपने मने उठि मुँह-हाथ धो पढ़नाइ प्रारम्‍भ कऽ लेब।” दुनू बालक माताक आज्ञाकेँ सम्‍मान करैत रसोइ-घर गेला। दूध गिलासमे राखल रहैन। दूध पीला आ सुतबा लेल चलि गेला। नन्‍दिता भीतर गेली। मच्‍छरदानी लगा देलखिन। लाइट ऑफ कऽ देलखिन। जीरो पावरक बल्‍ब ऑन कऽ देलखिन आ अपन दुनू छपल किताव, डायरी, किछु सादा पन्ना आ पेन लऽ राघव बला कक्षमे आबि गेली। राघव तैबीचमे एकटा अंग्रेजी उपन्‍यास पढ़ैत रहैथ। नन्‍दिताकेँ ऐबते-देरी राघव उपन्‍यासकेँ झाँपि लेला आ कातमे रखि देलखिन आ नन्‍दिताक स्‍वागतमे उठि कऽ बैसैत बजला- “आउ नन्‍दिता भाभी।” नन्‍दिता सामनेबला कुरसीपर बैसली। अपन दुनू पुस्‍तकमे ऑटोग्राफ लिखलैन- “सिनेही राघवजीकेँ, सिनेह आ सम्‍मानक संग -नन्‍दिता।” राघवकेँ नन्‍दिताक ऑटोग्राफ नीक लगलैन। दुनू पोथीक पन्नाकेँ उलैट कऽ देखलाह। ओइमे एकटा पोथी काव्‍यक संग्रह रहै आ दोसर गल्‍प संग्रह। दुनू पोथीक भाषा हिन्‍दी रहैक। तमाम कथाक मुख्‍य पात्र महिला। पुरुखक प्रति महिलाक क्रोध, आक्रोश, घृणा आदि स्‍पष्‍ट परिलक्षित होइत रहइ। एना बुझना गेलैन राघवकेँ जे नन्‍दिताक महिला चरित्र बागी आ विद्रोही तेबरमे ठाढ़़ छैन। हिंसक हेबामे सेहो महिला चरित्रकेँ कुनो दिक्कत नहि छै। आब नन्‍दिता राघवकेँ कहलखिन- “सुनू राघवजी, हम अहासँ साहित्‍यिक चर्चा करए चाहै छी। हम्‍मर पोथी बादमे अहाँ पढ़ि लेब। अखैन किछु चर्चा करी?” राघव बजला- “हँ-हँ अबस्‍स करू। अहाँक लेखनी हमरा प्रभावकारी लागि रहल अछि। पहिने अपन लिखल एक-आध मैथिली कविता सुनाउ।” नन्‍दिता राघव केर ऐ निवेदनसँ गद्-गद् भऽ गेली। अपन डायरीक पन्‍ना पलटनाइ प्रारम्‍भ करैत पुछलखिन- “प्रेम-कविता सुनाबी?” राघव कहलखिन- “कुनो सुना सकै छी। हम अहाँक शैली आ रचनासँ अपना-आपकेँ अवगत करए चाहै छी।” आब बिना कुनो प्‍लोट बैक-ग्राउण्‍ड तैयार केने नन्‍दिता नहुँ-नहुँ अपन कविताक पाठ करए लगली। प्रारम्‍भ लघु कवितासँ केलैन। कविताक संरचना ने बड्ड नीक आ ने बड्ड अधलाहे। हलाँकि प्रेममे सेहो नारीक फ्रस्‍ट्रेशन परिलक्षित बुझना गेलैन, राघवकेँ नन्‍दिताक कवितामे। ओना, नन्‍दिताक अवाज कोइली जकाँ मधुर आ चहकैत। कविता-पाठ करैत-करैत नन्‍दिताक भाव-भंगिमा भव्‍य लागि रहल छेलैन। एक कविता पढ़ैत रूकली नन्‍दिता। राघव झट दनि पूछि देलखिन- “नन्‍दिता भाभी,एक बात पुछी?” नन्‍दिता- “हँ-हँ पुछू ने!” राघव- “अहाँक साहित्‍यिक कृतिमे महिला पात्र रिबेलियन किएक होइत अछि? ओना लेखन शैली हमरा बड़ प्रभावित कऽ रहल अछि।” “यों ही कोई वेवफा नहीं होता” ई कहैत नन्‍दिता नमहर साँस भरलैन। फेर साँस छोड़लैन। फेर भरलैन। साँस भरब आ छोड़बक प्रक्रिया किछु काल धरि चलैत रहलैन। प्रत्‍येक साँसक संग नन्‍दिताक वक्ष ऊपर-निच्‍चाँ करैत रहल। राघव नन्‍दिताक पुष्‍ट-वक्ष गुच्‍छकेँ कन्‍हिया-कन्‍हिया निहारैत रहला। शायद ई सोचैत जे देखितो छैथ आ नन्‍दिता बुझियो नहि रहल छैथ। मुदा नन्‍दिता तँ छैथ स्‍मार्ट। भान लागि गेलैन जे राघव हुनकर यौवनकेँ तारि रहल छैन। नन्‍दिता सोचलैन : चलू राघवकेँ ऐ ख्‍वाबमे रहए दइ छिऐन जे हम किदु नइ बूझि रहल छी। फेर नन्‍दिता बजली- “हँ राघवजी। अहाँक अवलोकन सूक्ष्‍म आ सार्थक अछि। एकर इतिहास छै। हमर जीवनक बीतल किछु एहेन घटना जे हमर साहित्‍य-सर्जनाक महिला चरित्रकेँ किछु उग्र, व्‍याकुल, प्रतिशोधी, अहंकारी बना दइ छै। ओना, कखनो काल नहियोँ चाहैत हमर सृजनमे महिला पात्र ओहन भऽ जाइत अछि। ऐपर हम काल्‍हि रातिमे अहाँक संग विस्‍तारसँ चर्चा करब। आइ अपन किछु कविता आ गल्‍प अहाँकेँ सुनबए चाहै छी। शैली, कथानक, परिवेश, उपमा, अलंकार आदिक प्रयोगपर अहाँक विचार जानए चाहै छी।” राघव बजला- “हँ-हँ नन्‍दिता भाभीजी, अहाँ अपन किछु लघु कथा आ अन्‍य कविता सुनाउ। रातिमे हम निश्चिन्‍ततासँ अहाँक पोथीकेँ समाजिक परिदृश्‍यमे समाजशास्‍त्री जकाँ पढ़ए आ समझए चाहै छी। समाजशास्‍त्रक परिदृश्‍यमे विवेचन करए चाहै छी। नारी मनोदशा, मानवीय संवेदनाक पितृसत्तात्‍मक समाज केर संरचना आ पितृसत्तात्‍मक समाज द्वारा नारीक शोषणकेँ अहाँक लेखनीक ऐनासँ बुझए चाहै छी।” नन्‍दिताक मन प्रफुल्‍लित भऽ गेलैन। साहित्‍यकारकेँ साहित्‍यकेँ सुनैबला आ साहित्‍य समीक्षाक संग ओकर प्रशंसा करैबला भेट जाए तखन मन हर्षित तँ हेबे करै छै। नन्‍दिता अपन कविताक पोथीक पन्ना चश्‍मा पहीरि पलटए लगली। तीनटा पन्नाकेँ मोड़ि लेलैन। फेर अपन कुर्सीसँ उठली आ अपन शयन कक्ष दिस बढ़ैत बजली- “राघवजी! हम कनिकबे कालमे आबि रहल छी।” राघव सोचए लगला, आखिर कुन प्रयोजनसँ नन्‍दिता भाभी अपन शयन कक्ष गेली? कुनो-ने-कुनो प्रयोजन तँ अबस्‍स हेतैन। पनरह मिनटक भीतर नन्‍दिता पुन: राघवजीक कक्षमे हाथमे एक कलात्‍मक शीशाक ट्रेमे दूटा बाटीमे रसमलाइ लेने प्रवेश केलैन। नन्‍दिताक मन प्रसन्नचित आ संतुष्‍ट छेलैन। ट्रेकेँ टेबुलपर रखैत बजली- “राघवजी, काल्हि हमर छोट भाए राँचीसँ आएल छल। माँ ओकरे दिया ई मिठाइ भेजने छेली। छोटका रसमलाइ। एकरा रसभरी सेहो कहल जाइ छै। राँचीमे पंजाब स्‍वीट्स केर रसभरी बहुत विख्‍यात छै। बातेक क्रममे एकएक स्‍मरण आएल जे रसभरी तँ फ्रीजमे राखल अछि। सुधाकर मधुमेहक रोगी भऽ गेल छैथ ने, तँए ओ ई सभ नइ खाइ छैथ। अमरेश आ विमलेश दिनेमे खेने छला। केवल हम आ अहाँ नइ खेने रही। सोचलौं साहित्‍य सुनेबाक क्रियाकेँ आरो आगाँ बढ़ेबासँ पूर्व कनी मुँहकेँ नीक मीठाइसँ मीठ कऽ ली।” राघव मने-मन प्रसन्न भेला। नन्‍दिताक आदरमे आत्‍मिकताक भाव जगलैन। बिना किछु बजने अपना संकेता-भावसँ नन्‍दिताकेँ बहुत किछु कहि देलखिन। आब एक कटोरी राघव अपन बामा हाथमे लऽ दहिना हाथे चम्‍मचसँ रसभरी खाए लगला। बिना किछु कहने मशीन जकाँ नन्‍दिता सेहो राघवकेँ अनुशरण करैत दोसर कटोरी बला रसभरीकेँ ग्रहण करए लगली। मीठाइ खेलाक पश्‍चात् राघव अपन असलासँ दक्षिणी निकालि एक सौंस दाना नन्‍दिताकेँ आ एक स्‍वयं लेला। नन्‍दिताक हाथमे जखन राघव दक्षिणी देलखिन तँ राघवक हाथ नन्‍दिताक हाथसँ सटि गेलैन। राघवकेँ नन्‍दिताक कोमल हाथक स्‍पर्श नीक लगलैन। हाथ कनी काल सटले रहए देलखिन। कहि नइ किए, नन्‍दिता सेहो जेना चहैक उठली। चेहरापर किछु अलग तरहक उमंग नन्‍दिताकेँ राघवक स्‍पर्शसँ प्राप्‍त भेलैन। नन्‍दिता सेहो राघवकेँ हाथक स्‍पर्शक सानिघ्‍य किछु क्षण लेल आरो प्राप्‍त करए चाहै छेली। दुनू एक-दोसरक हाथक स्‍पर्शक मुद्रामे करीब दू मिनट धरि रहलैन। आब राघवकेँ एकाएक ई भान भेलैन जे नन्‍दिता तँ हमरा इशारा कऽ रहली अछि। नन्‍दिता सुन्‍नरि आ आकर्षक छैथ। हमरो नन्‍दिताक प्रति आकर्षन बढ़ि रहल अछि मुदा नन्‍दिता तँ छैथ गुरु-पत्नी समान। कहीं हमर डेग कुनो शास्‍त्र अथबा परम्‍परा विरोधी दिशामे तँ ने बढ़ि रहल अछि..? ..एक पैघ प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह राघवक कपारपर नाचए लगलैन। राघवकेँ स्‍थितिक भान भेलैन जे बात गलत भऽ रहल अछि। ऐ बातकेँ सोचैत राघव झट-दे नन्‍दिताक हाथसँ अपन हाथ हटा लेलैन। नन्‍दिता सेहो पुन: अपन पोथीक पन्ना उनटबए लगली। नन्‍दिता राघवकेँ पुछलखिन- “राघवजी, अगर अहाँ कही तँ दू-तीनटा छोट-छोट कविता सुनाबी आ तेकर बाद एक या दूटा कथा सुनाबी, अहाँकेँ?” राघव बजला- “हँ-हँ! सुनाउ ने। एकटा किए चारिटा कविता सुनाउ।” आब नन्‍दिता कविता पाठ करए लगली। जेतेक नन्‍दिताक तनक सुन्‍दरता तेतबे मनक सुन्‍दरता आ तइसँ बढ़ि कऽ बात करैक मीठाँस। राघव गद्-गद् भेल जा रहल छला। काव्‍य-पाठक क्रममे नन्‍दिताक नुआँक ऑंचर खसि पड़लैन। अधकटी आङीमे सहेजल नन्‍दिताक उन्नत वक्ष जेना कविताक धारक संग यात्रा करैत हो। उठैत-बैसैत। साँस संग नन्‍दिताक वक्ष जेना नृत्‍य करैत हो। कविताक संग-संग राघव दोग-दागमे नन्‍दिताक वक्षकेँ सेहो अवलोकन करए लगला। हुनका किछु-किछु होमए लगलैन। मन करैन जे नन्‍दिता भरि रातिअहिना आँचर खसेने वक्षक अवलोकन करबैत कविता-कथाक पाठ करैत रहथु। मुदा ई की कुनो सम्‍भव बात छल? नहि। कदापि नहि। कविताक पाठ आ गल्‍पक वर्णन चलैत रहलै। पता नइ केना रातिक डेढ़ बाजि गेल। आब नन्‍दिताक नजैर देबाल-घड़ीपर गेलैन। झट दनि अकचकेली- “राघवजी! रातिक डेढ़ बजि गेल। अहाँकेँ भोरे-भोर फिल्‍डवर्कमे जेबाक अछि। आब ऐगला चर्च काल्हि करब। अहाँक निन्नक पूर्ति केना हएत तइ बातक चिन्‍ता भऽ रहल अछि।” राघव- “कुनो बात नहि नन्‍दिता भाभी। हमरा लोकैन ऐ तरहक गति-विधिसँ अपना-आपकेँ आत्‍मसात कऽ नेने छी। केतेक दिन तँ चौबिसो घण्‍टा काज करए पड़ैत अछि। तँए अहाँ चिन्‍ता जुनि करू। अगर इच्‍छा हुअए तँ एकटा कथा आ दूटा कविता आरो सुनाउ। अहाँक लेखनीमे चुम्‍बकीय आकर्षण अछि। कथ्‍यकेँ सपाट आ अलग अन्‍दाजमे अहाँ लिखै छी। समाजक दृढ़ मान्‍यता आ पुरुख-समाज द्वारा बनाएल गेल जंजीरकेँ तोड़ैले अहाँक साहित्‍यक नारी पात्र उद्धत रहैत अछि। परिवेशक संग कथानक सम्‍बन्‍ध स्‍थापित कऽ लैत अछि।” राघवक ऐ बातसँ प्रभावित भऽ नन्‍दिता मने-मन आनन्‍दित भऽ पुन: कुर्सीपर बैस गेली। आ अपन पोथीक पन्ना उलटाबए लगली। राघव बजला- “ओना, आब अहाँकेँ नीन आबि गेल हएत।बच्‍चा सभ सेहो असगरे सूतल छैथ। अगर चाही तँ अहाँ जा सकै छी।” नन्‍दिता झट-दे बजली- “हमरो लेल जगनाइ कुनो समस्‍या नै अछि। लेखनक कार्य अधिकांशत: हम रातियेमे करै छी। हमर दुनू पुत्र आब छेँटगर भऽ गेल छैथ। अहाँ कहि रहल छी तँ एक कथा आ तीन कविता आरो सुनबै छी।” नन्‍दिता पुन: कविताक पाठ करए लगली। नहुँ-नहुँ मुदा स्‍वर स्‍पष्‍ट आ नजाकतसँ भरल पाठ। हरेक कविताक पाठक उपरान्‍त राघव ओइ कवितापर किछु प्रश्‍नआ जिज्ञासा करैत रहलखिन। आ नन्‍दिता ओइ जिज्ञासाक उत्तर दैत रहली। अन्‍तमे नन्‍दिता एक लघु कथा अपन नाटकीय अन्‍दाजमे सुनेलैन। कथा राघवकेँ बड्ड नीक लगलैन। कथोसँ नीक नन्‍दिताक उपस्‍थिति राघवकेँ नीक लागि रहल छेलैन। आब अढ़ाइ बाजि चुकल छल। नन्‍दिता किताबकेँ सेरियबैत उठली। कहलखिन- “राघवजी, आब सूतए जा रहल छी। शुभ रात्री।” ‘शुभ रात्री’ कहैत नन्‍दिता राघव दिस अपन हाथ बढ़ा देलैन। राघव कनी सह देला परन्‍तु हाथ नन्‍दिता दिस बढ़ि गेलैन। हैण्‍डसेक केलैन। हैण्‍डसेक करैत राघव नन्‍दिताकेँ ‘शुभ रात्री’ कहैत बाहर धरि छोड़ए एला। नन्‍दिता अपन कक्ष दिस चलि गेली। राघव नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे एक घण्‍टा धरि सोचैत रहला। अन्‍तत: साढ़े तीन बजेमे सूति रहला। दोसर दिन भोरे राघव स्‍नान-धियान केला बाद चूरा-दहीक जलपान कऽ सीतामढ़ीक हेतु प्रस्‍थान केलैन। प्रस्‍थान करै काल नन्‍दिता दक्षिणी आ लौंग लेने ठाढ़ि छेलैन। राघव बिना किछु कहने आँखिक भाषा बुझैथ, नन्‍दिताक हाथसँ सभटा लौंग-दक्षिणी लऽ लेलैन। नन्‍दिताक आँखिसँ ई लागि रहल छेलैन जे नीक रहितैक जे राघव आइ केतौ जेबे नहि करितैथ। बिना नन्‍दिताकेँ कहने राघव हुनकर आँखिक भाषा बूझि गेला। आँखियेक इशारासँ कहलखिन- “शोधक कार्य अछि, तँए दिन भरि लेल अवलोकन हेतु जेनाइ आवश्‍यक।” राघव चलि पड़ला। जाबे धरि नजैरसँ ओझल नहि भेलैन ताबे धरि नन्‍दिता दिस राघव घूमि-घूमि तकैत रहला। नन्‍दितो एकटक भेल गेलरीमे ठाढ़ भऽ राघवकेँ जाइत देखैत रहली। राघव भरि रस्‍ता केवल आ केवल नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे सोचैत रहला। प्रेम, आकर्षण, सेक्‍स आ पाप सबहक बोध राघवकेँ एके संग हुअ लगलैन। नन्‍दिताक देहक बनाबटसँ राघव आकर्षित छला। नन्‍दिताक लेखनी सेहो अपने ढंगसँ राघवकेँ प्रभावित कऽ रहल छेलैन। नन्‍दिताक वस्‍त्र पहिरक अन्‍दाज आ सौन्‍दर्य विलास राघवकेँ कामूक बना रहल छेलैन। हुनकर मनक आ तकन कामदेव जाग्रत भऽ रहल छेलैन। मर्यादा आ अन्‍य चीज जेना विद्रोह करबाक हेतु उफान मारैत हो। भाँड़मे गेल मर्यादा आ विचारक लक्ष्‍मण-रेखा। नन्‍दिता सिनेहमणि आ कामदेवी छैथ। हुनका शायद हमरा सन युवकक आवश्‍यकता मनक आ तनक सामंजस्‍य आ अदान-प्रदानक हेतु जरूरी छैन तँ ओइमे मर्यादाक हनन केहेन? किछु एहने भावना राघवकेँ भऽ रहल छेलैन। फेर ई भाव कनी राघवकेँ चिन्‍तित आ ग्‍लानि-भावसँ भरि दैत रहैन जे अन्‍तत: नन्‍दिता छैथ तँ गुरुक पत्नी। अगर मर्यादा भंग भेल तँ गुरुजीक संग विश्वासघात भेल। गुरुकी सोचता! कहीं शापित कऽ देता तखन तँ..? फेर आधुनिक विचार कहैन- जे हेतै ओ देखल जेतइ। नन्‍दिता किछु उलझनकेँ आइ राति जरूर बतेती। फेर अन्‍तिम निर्णए लेब जे की करब। पूरा दिन कार्य करैमे चित्त नै भवैत रहैन, राघवकेँ। जेना नन्‍दिता हुनकर मनोवृतिकेँ एरेस्‍ट कऽ नेने होनि। मुदा कार्यक सम्‍पादन करब हुनकर शैक्षणिक आ प्रोफेशनल जबाव-देही छेलैन। तँए कार्यकेँ सम्‍पादन केला। कनी जल्‍दी समाप्‍त कऽ दरिभंगाक लेल विदा भेला। शनि दिन रहइ। रस्‍तामे जीबैत कबइ माछ भेटलैन। लगभग दू किलोक कुड़ी। राघव हुण्‍डे कीन लेला। मलाहिनसँ कुनो मोल-भाव नहि केला। हाथमे माछ नेने राघव तीव्र गतिसँ प्रो. सुधाकर केर मकानक प्रांगणमे प्रवेश केला। आशाक विपरित नन्‍दिता नहि छेली। नन्‍दिताक जेठ बालक अमरेशसँ पता चललैन जे नन्‍दिता रेडियो स्‍टेशनपर अपन एक लघु कथाक प्रसारण हेतु गेल छैथ। राघव माछक झोरा अमरेशकेँ दऽ देलखिन। बेबी इन्‍होर पानि देलकैन। राघव पानि पीलाक बाद मुँह-हाथ धोलैन। बाहर एला तँ बेबी नेबोबला चाह दऽ गेलैन। राघव चाह पीबैत रहला आ नन्‍दिताकेँ एबाक इन्‍तजार करैत रहला। लगभग अदहा घण्‍टामे नन्‍दिता एली। ऐबते राघवसँ पुछलखिन- “कखन एलौं राघवजी?” राघव- “अदहा घण्‍टा भेल।” नन्‍दिता- “चाह इत्‍यादि भेटल की नइ?” राघव- “हँ-हँ। सभ किछ भेटल। गर्म पानि आ चाह दुनू। आइ कनी जल्‍दी आबि गेलौं। अमरेश कहलैन जे अहाँ दरिभंगा रेडियो स्‍टेशन कुनो कथाक प्रसारण हेतु गेल रही।” नन्‍दिता- “हँ। प्रति मास दरिभंगा रेडियो स्‍टेशनसँ हमर एक कथा प्रसारित होइत अछि। अही बहाने रचना करैमे आ साहित्‍य सर्जनामे नीक लगैत अछि।” ई कहैत नन्‍दिता अपन कक्ष दिस विदा होइत बजली- “राघवजी, कनी हम दस मिनटमे अबै छी। फेर बैस कऽ निश्चिन्‍त भऽ गप करब।” राघव गरदेन हिला ‘हँ’ कहि देलखिन। दस मिनटक भीतर नन्‍दिता फ्रेश भऽ राघव लग आबि एक कुर्सीपर बैस गेली। राघवकेँ कहलखिन- “जीबैत कबइ माछ केतए भेट गेल राघवजी?” राघव- “रस्‍तामे एक मलाहिन बेचैत छलि। सोचल कीन लइ छी।” कनी कालक बाद नन्‍दिता अपनेसँ भीतर जा चाह बना कऽ अनलैन। राघवकेँ आगूमे चाहक ट्रे दैत बजली- “लीअ राघवजी, एक बेर पुन: चाह पीबू। हमरो चाह पीबाक इच्‍छा भऽ रहल अछि।” चाह संगे किछु नमकीन सेहो परोसल गेल रहइ। राघवकेँ सेहो चाह पीबाक इच्‍छा भेलैन। दुनू गोरे चाह संगे पीला। रात्रिक भोजनक पश्चात नन्‍दिता पुन: राघव लग आबि साहित्‍य चर्चामे लगि गेली। आइ नन्‍दिता कारी रंगक नुआँ पहीरिने छेली। नुआँक खोंछि नाभिसँ निच्‍चेँ। नाभी स्‍पस्‍ट देखाइत रहैन। नुआाँ पहीरबाक एहेन स्‍टाइल जे पूरा पेटक संग नाभीक सौन्‍दर्य प्रस्‍फुटित भऽ रहल छेलैन। दुधिया गोराइ चाम नन्‍दिताकेँ काम सुन्‍दरी बना रहल छेलैन। राघव ओइ सौन्‍दर्यमे डूमि गेला। मन बहकए लगलैन। पहिल बेर राघवकेँ ई एहसास भेलैन जे नारीक शरीरक सभसँ उत्तेजक आ कामुक अंग नाभि होइ छै। सुडौल पेट, तरीकासँ नुआँ धारण करबाक अन्‍दाज ओकरा आरो उत्तेजक बना दइ छै। बहुतो स्‍त्रीगणकेँ बच्‍चा भेला बाद पेटक नाभि फाटि जाइ छै आ पेट,नाभि आ नाभिसँ निच्‍चाँबला प्रदेशकेँ छितीर-बितीर कऽ ओकर सौन्‍दर्यकेँ स्‍वाहा कऽ दइ छै। नन्‍दिता यद्यपि भागवन्‍त छेली। हुनकर पेट आ नाभि प्रदेशमे एकौटा दागक लेश नहि छेलैन। नाभि तक पेट देखाइत रहैन। के कहैत अछि जे नुआँ कामोत्तेजक नइ होइत अछि। राघव जखन नन्‍दिताक सौन्‍दर्यक सर्वेक्षक नुआँमे केलैन तँ लगलैन जेना नारी सभसँ सुन्नरि, चहटगरि, कामोत्तेजक नूएँमे लागि सकैत अछि। नुआाँकेँ नाभिसँ निच्‍चाँ पहीरक अन्‍दाज नन्‍दिताकेँ यक्षीबला प्रतिमासँ कनीकबो कम सुन्नर नहि बना रहल छेलैन। ईहो सम्‍भव भऽ सकैत अछि जे राघव नन्‍दिताक प्रति आकर्षित छला तँए हुनका नन्‍दितामे दोदारगंज यक्षीक सौन्‍दर्य तकै छला। अन्‍तत: सौन्‍दर्यक तँ बखान करएबला पर निर्भर करैत अछि जे गुण विद्यमान छै। खैर, अखनुक मोटा-मोटी स्‍थिति ई छल जे राघवकेँ नन्‍दिता बड्ड सोहनगर-रमनगर आ कामुक नारी लगै छथिन। नन्‍दिता सेहो कुनो कम पारखी थोड़बे ने छेली। मने-मन आँकि लेलैन, राघवक मनोदशाकेँ। बुझना गेलैन जे ओ स्‍वयं कुनो बड्ड सुन्‍दर आ सुगन्‍धमयी फूलल फूल तँ राघाव ओइ फूलक मकरन्‍दकेँ चुसएबला भमरा छला। यद्यपि नन्‍दिताकेँ राघव रूपी भमराकेँ चुसए देमएमे कुनो आपैत नहि छेलैन। हँ, कनी एक-आध दिन आरो परैख लेमए चाहै छेली। नन्‍दिता राघवकेँ ड्रीम-वर्ल्‍डसँ जगबैत पुछलखिन- “की राघवजी, आइ हम अपन कवितासँ प्रारम्‍भ करी अथबा गद्यसँ?” राघवकेँ ने गद्यसँ मतलब छेलैन आ ने पद्येसँ। हुनका मतलब छेलैन तँ सिर्फ आ सिर्फ नन्‍दितासँ। झट-दे उत्तर देलखिन- “नन्‍दिता भाभी, हमरा वएह पसन्‍द अछि जे अहाँ सुनाबी। अहीं कहू की सुनबए चाहै छी?” नन्‍दिता बजली- “एक बात कही?” राघव- “हँ-हँ कहू! की कहए चाहै छी?” नन्‍दिता- “हमर इच्‍छा अछि जे आइ सर्वप्रथम हम अहाँकेँ अपन लघु हिन्‍दी उपन्‍यास ‘मधुमय आकाश’क किछु-किछु प्रेरक आ महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाबी।कुनो हर्जा तँ ने?” राघव- “हर्जा किएक? अबस्‍स सुनाउ।” आब नन्‍दिता अपन हिन्‍दी उपन्‍यास ‘मधुमय आकाश’क पन्ना पलटए लगली। पन्नो सभमे अनेक कथनीय पाँतिकेँ अण्‍डरलाइन पेन्‍शिलसँ केने छेली। पेन्‍शिलसँ रेंखांकित पंक्तिक एक-एक शब्‍दकेँ पढ़ए लगली। उतार-चढ़ाव नीक जकाँ मेन्‍टेन करैत रहलैन। कखनो प्रत्‍यंचा चढ़ैत कखनो प्रेमाधिक्‍यक आवेगमे प्रस्‍फुटित चेहरा आरो सौन्‍दर्यकेँ बिखेरब प्रारम्‍भ कऽ दैन। राघव भाव-विह्वल होइत नन्‍दिताक उपन्‍यासक अंश नन्‍दिताक मुहसँ भाव-विभोर होइत सुनैत रहला। बीच-बीचमे कखनो गरदेन हिला, कखनो मुखाकृतिकेँ गम्‍भीर कऽ तँ कखनो जिज्ञासा प्रवृतिसँ प्रश्‍न कऽ तँ कखनो मुक्‍त-कण्‍ठसँ प्रशंसाक शब्‍दाडम्‍बरसँ नन्‍दिताकेँ उत्‍साहित करैत रहलैन। उपन्‍यास कम प्रेरक नहि रहइ। एक एहेन किशोरीक कथा जे भावावेशमे आबि अपन जेठ बहिनक देबरसँ प्रेम-विवाह कऽ लैत अछि। बादमे प्रतारना, शोषण,अत्‍याचार, भावनात्‍मक दोहनक शिकार भऽ आत्‍म-ग्‍लानि आ अपन निर्णएपर पश्चाताप करैत ओ किशोरी आत्‍म-हत्‍या करबा लेल विवश भऽ जाइत अछि। आत्‍म-हत्‍या कैयो लैत अछि। उपन्‍यासक उतार-चढ़ाव भावनाक प्रबलता आदि नीक जकाँ प्रदर्शित केने छेली। नन्‍दिता समस्‍त चीज एकीकृत भाव आ स्‍वरूपमे राघवकेँ नीक लगलैन। बीच-बीचमे राघव कनखी दोगे नन्‍दिताक नाभि आ खुजल पेटक दर्शन करैत रहला। नन्‍दिता कखनो नाभि लग हाथ राखि लथि तँ कखनो फुजल छोड़ि दैत छेलखिन। राघवक दृष्‍टि यदाकदा नन्‍दिताक समुन्नत वक्ष दिस सेहो जानि। राघवकेँ होनि- ठीके नन्‍दिता भाभी बानरक हाथमे नारिकेल जकाँ छैथ। प्रोफेसर सुधाकर हिनकर सौन्‍दर्यकेँ भला की बूझि सकै छैथ? नन्‍दिता अपन उपन्‍यासमे से एक घण्‍टा धरि उद्धधरण पढ़ैत रहली। राघव सुनैत रहला। अन्‍तमे उपन्‍यासक अन्‍तिम तीन पन्ना नन्‍दिता भाव-विभोर भऽ पढ़लैन। आब राघव दिस गम्‍भीर होइत बजली- “कहू राघवजी, उपन्‍यास पसिन आएल?” राघव- “हँ-हँ, खूब पसिन आएल।पते नहि चलल जे समए केना निकैल गेल। भावमय, भावनामय सभ तरहेँ नीक रचना। एकरा एन्‍थोपोलोजी ऑफ इमोशन कही तँ कुनो अतिशियोक्‍ति नहि। अहाँ तही मनोदशाक चित्रण अपन खॉंटी अन्‍दाजमे करैत छी। अहाँ परिवेश, बिम्‍ब इत्‍यादिक विधन अपना तरहेँ करै छी। नारी विशेष रूपे मिथिलाक मैथिल ब्राह्मणक तथाकथित सभ्रान्‍त नारीक मनोदशा आ पुरुखक नारीक प्रति विचार-संस्‍कार आ बेवहारक वर्णन आ विवेचनमे अहाँ बेजोड़ छी। अहाँक शैली आ अहॉंक रचनाक प्रचार हेबाक नितान्‍त आवश्‍यकता अछि। अहाँक जिह्वापर ओ सरस्‍वती बैसल छैथ जे सत्‍यकेँ बिना कुनो भय आ धोखें-निर्भिक रूपे लीखै छैथ। ओ सरस्‍वती बैसल छैथ जे पागधारीक, कुकृत्‍यकेँ ताल ठोकि कहै छैथ। ओ सरस्‍वती बैसल छैथ जे तथाकथित इलीट या सम्‍य समाजक अधार कऽ पुरुख समाजक भीतरक निर्लज्‍जता आ स्‍वांगसँ संसारकेँ परिचित करबै छैथ।” राघवसँ अपना बारेमे ऐ तरहक बात सुनि नन्‍दिता गद्-गद् भऽ गेली। कनी भावनात्‍मक सेहो भेली। राघव दिस गम्‍भीर होइत नन्‍दिता बजली- “एक बात कही, हमर परिस्‍थिति हमरा लेखिका बना देलक राघवजी। की सोचने रही आ की भऽ गेल! देखैत-देखैत जीवनक तमाम अरमानमे जेना अगराही लागि गेल! आब जीवनमे कुनो इच्‍छा नहि अछि। एकेटा इच्‍छा अछि जे अपना संग घटल आ अपना आँखिक समक्ष घटल सभ परिस्‍थिति-परिवेश आ घटनाकेँ बेलाग लिख पाठकक समक्ष लऽ आबी। आइ ने काल्हि कियोक तँ पढ़तै आ सत्‍यक अन्‍वेषण हेतइ? वो सुबह कभी तो आएगी?” राघव गम्‍भीर भेला। जिज्ञासा बढ़लैन। मन भेलैन नन्‍दिताक वेदना आ इतिहासकेँ कुरेदी। मन भेलैन कनी साहित्‍यसँ खिसकी आ सत्‍यक अन्‍वेषण करी। बिना किछु कहने जिज्ञासाक मूद्रामे नन्‍दिता दिस तकला राघव। नन्‍दिता बूझि गेली राघवक मनोदशा आ बातकेँ आगाँ बढ़ौलैन। गम्‍भीर होइत बजली नन्‍दिता- “राघवजी, अहाँकेँ लागल हएत जे हम प्रोफेसर सुधाकरकेँ किएक नहि सम्‍मान करैत छिऐन?” राघव- “एहेन बात नहि छै नन्‍दिता भाभी। कनी ऐ बातक आभास हमरा अबस्‍स भेल जे अहाँ आ प्रोफेसर साहैबमे किछु मत-भिन्नता अछि। विचार द्वन्‍द्व तँ सभ पति-पत्नीमे होइत छै। हमरो सहजन्‍याक संग अछि। मुदा हमरा लोकैनमे सामंजस्‍य अछि। मतभिन्नता बहुत नाजी अछि। प्रखर तखने रहैत अछि जखन केवल हमहीं दुनू गोरे रहैत छी। एकर विपरीत अहाँ आ भाइ साहैब केर मतभिन्नता जेना केकरो लग दृष्‍टिगोचर भऽ जाइत अछि? आ आब अहाँक साहित्‍यक श्रवण केलासँ ई स्‍पष्‍ट भऽ गेल जे ई मत-भिन्नता आ अहाँक वैचारिक विद्रोह अकारण नहि भऽ सकैत अछि।” राघवक ई बात सुनिते जेना नन्‍दिता भावावेशमे आबि गेली। आँखिसँ नोर मोती जकाँ झहरए लगलैन। आब राघवोकेँ नइ रहल गेलैन। उठला आ नन्‍दिताक माथकेँ अपना एक हाथसँ पकैड़ दोसर हाथसँ रूमाल निकालि हुनकर नोर पोछए लगला। नन्‍दिता आरो भावुक भऽ गेली। नोर आरो तीव्र गतिसँ बहए लगलैन। कुहेस फाटए लगलैन। राघव नोर पोछैत रहला आ नन्‍दिता नोर चुआबैत रहली। ओना नन्‍दिताक आँखि आ गालक स्‍पर्शसँ राघवक मन दोसरे रंगक हुअ लगलैन। लाल-लाल कोमल गाल। क्रीम इत्‍यादि लगलाक कारणे चिक्कन। फूलल-फूलल गाल। नोर पोछबाक क्रमे समस्‍त गाल आ गरदेनक स्‍पर्श अनेको बेर राघवकेँ भेलैन। नन्‍दिता सेहो नहि रोकलखिन। शनै: शनै: राघव नन्‍दिताक गालकेँ सहलबए लगला। नन्‍दिता चुप रहली। राघवकेँ मोन भेलैन जे नन्‍दिताकेँ चुमि ली। मुदा मनकेँ थीर केला। हलाँकि एक आँगुर नन्‍दिताक ठोर लग लऽ गेला। आँगुर कॉंपैत रहलैन। कॉंपैत आँगुरकेँ एकाएक पाछू लऽ गेला। कनियेँ कालक बाद फेर हिम्‍मत केलैन। ऐबेर ठुड्डी तक आँगुरकेँ लऽ गेला। हाथ अखनो काँपि रहल छेलैन। कनी कालक बाद हाथकेँ संयमित केला आ ठुड्डीकेँ सहलबए लगला। तीन मिनट धरि सहलबैत रहला। आब राघव धीरे-धीरे नन्‍दिताक कुर्सीक पाछाँ जा ठाढ़ भऽ गेला। फेरो अपन आँगुरक हरकतकेँ बढ़बए लगला। आँगुर आब नन्‍दिताक रसगर-रमनगर ठोर दिस यात्रा प्रारम्‍भ केलकैन। पूरा शरी घामसँ अनेरे भीज गेलैन। राघवकेँ हाथ फेरो काँपए लगलैन। हाथ फेर ठुड्डी दिस लऽ एला। बीच-बीचमे रूमालसँ नन्‍दिताक नोर सेहो पोछैत रहला। आब अन्‍तिम प्रयास केलैन आ आँगुरकेँ नन्‍दिताक ठोरपर राखि देलखिन। नन्‍दिता जेना स्‍वप्‍नसँ जगली तहिना तुरन्‍त अपन हाथसँ राघवक आँगुरकेँ हटा देलखिन। मुदा राघवक आँगुर फेर हरकतमे आबि गेलैन आ नन्‍दिताक ठोरपर आबि थमि गेलैन। आब हिलनाइ कम भऽ गेल छेलैन। ऐबेर नन्‍दिता सेहो प्रतिकार नहि केलखिन। राघव नन्‍दिताक निच्‍चाँ-ऊपरक ठोर सहलबैत रहलाह। नन्‍दिता आ राघव दुनू गोरे चुप छला। राघव केर हाथ आ नन्‍दिताक ठोर अपन हरकतमे व्‍यस्‍त छल। आकर्षण आ मनोभावक मिलन। आब राघव दोसर हाथसँ नन्‍दिताक गालकेँ सहलबए लगला। ई क्रम पाँच मिनट धरि चलल। राघवक हिम्‍मत बढ़ैत गेलैन। आब हाथ नहि काँपि रहल छेलैन। राघव आब कनी हिम्‍मत करैत नन्‍दिताक केसकेँ माथ लग चुमि लेला। नन्‍दिताक फेरो कुनो प्रतिकार नहि केलखिन। मुदा राघव कनी सोचमे जेना पड़ला। अन्‍तत: नन्‍दिताक संग हुनकर ई बेवहार केतेक उचित छेलैन? मुदा एकै क्षणमे राघव जाग्रत भेला आ सोचलैन- ऐमे पाप केहेन? नन्‍दिता भाभी तँ सिनेहक पियासल छैथ। पियासलकेँ पानि पीयाबएमे कुन पाप? ई सोचि राघव नन्‍दिताकेँ जोरसँ पकड़ैत हुनकर ओंठपर अपन ओठ पाछाँ देने लऽ एला। नन्‍दिता आँखि झाँपि लेली। राघव चुम्‍बनक प्रहार-पर-प्रहार करए लगला। फेर अपना मुहमे नन्‍दिताक ओंठ लऽ चूसऽ लगला। नन्‍दिता सेहो राघवक संग देमए लगली। दुनू नैसर्गिक लोकमे विचरण करए लगला। वातावरण सरमणीय चिन्‍ता मुक्‍त, भय मुक्‍त भऽ चुकल छल। हँ, राघव आ नन्‍दिता जोर-जोरसँ आ जल्‍दी-जल्‍दी साँस लैत छला। राघवकेँ इच्‍छा भेलैन जे नन्‍दिताकेँ वक्ष अपन छातीसँ सटा ली। अपन वाहपासमे समेट ली। हाथ एक क्षणक हेतु वक्ष दिस बढ़लैन मुदा कहि नहि किएक हाथ आपस खींच लेलैन। राघव नन्‍दिताकेँ छोड़ि पुन: अपन स्‍थानपर आबि गेला। नन्‍दिता पाँच मिनट धरि पाथरक मूर्ति जकाँ बैसल रहली। फेर उठली। अपनाकेँ ठीक केलैन। राघव दिस देखैत बजली- “हम पाँच मिनटमे वापस अबै छी।” दस मिनटमे नन्‍दिता राघव दिस आबि गेली। राघवक सामने बैसैत कहलखिन- “राघवजी, अगर अहाँ लग समए हो तँ हम अपन जीवनक वृतान्‍तक किछु विशेष घटनाक यर्थाथ अहाँ संगे बाँटए चाहै छी?” राघव तँ ऐ बातक इन्‍तजारे करै छला। झट-दे कहलखिन- “हँ-हँ किएक नइ। अबस्‍स सुनाउ।” नन्‍दिता- “भऽ सकैत अछि सभटा वृतान्‍त कहैत-कहैत भोर भऽ जाए। ऐ स्‍थितिमे अहाँ की करब? फेर भोरे-भोर अहाँ केतौ केना जाएब? अरामो करब तँ आवश्‍यक ने?” राघव- “अहाँ चिन्‍ता नहि करू। जेतेक समए लेबाक अछि लीअ। हमरा एतेक दिनक बहुत रास बात सभकेँ लिखबाक अछि। काल्‍हि केतौ ने जाएब। अहाँसँ वार्तालापक पश्चात तीन-चारि घण्‍टा सूतब तत्‍पश्चात लिखनाइ प्रारम्‍भ करब।” राघवक बातसँ नन्‍दिता आश्वस्‍त होइत बजली- “निश्चिन्‍तसँ पलथी मारि कऽ बैस जेबाक इच्‍छा अछि। ऐसँ कथा निधोख कहि सकब।” राघव उठला आ नन्‍दिताकेँ हाथ पकड़ैत कहलखिन- “ठीक छै तखन पलंगपर पलथी मारि बैस जाउ। मच्‍छरदानीक भीतर बैसब तँ मच्‍छरो ने काटत।” नन्‍दिता राघवकेँ आग्रहक सम्‍मान करैत पलंगपर मच्‍छरदानीक भीतर बैस रहली आ कथा प्रारम्‍भ केली। नन्‍दिताक दुनू पुत्र अलग कक्षमे निनभेर छला। राघव केबाड़ीकेँ सटा अपनो मच्‍छरदानीमे आबि गेला आ नन्‍दिताकेँ पकैड़ हुनका माथकेँ अपन पलथीपर राखि लेलैन। नन्‍दिता कुनो प्रतिकार नहि केली। राघव नन्‍दिताक केस सहलबए लगला आ कथा प्रारम्‍भ करबाक इसारा केलैन। नन्‍दिता कथा कहब आरम्‍भ केली- “हमर पिता एक सभ्रान्‍त अभियन्‍ता छला आ बिहार सरकारमे पैघ ओहदापर छला। हम सभ दू बहिन आ एक भॉंइ छेलौं। सभसँ पैघ हम। हमरासँ तीन बर्खक छोट हम्‍मर बहिन। आ छह बर्खक छोट भाए। हम्‍मर माता-पिता हमरा सभ संग कुनो विभेद नहि केलैन। हम तीनू भाए-बहिन कन्‍वेन्‍ट स्‍कूलमे पढ़लौं। हमरा लड़का सभसँ मित्रता छल आ ओइ लेल कुनो परिवारसँ कुनो पावन्‍दी नहि। जखन पॉंचमी कक्षामे गेलौं तँ बाबूजी साईकिल कीन देलैन। एक मासक भीतर साईकिल चलाएब सीख गेलौं। स्‍कूल आ बजार इत्‍यादिमे साईकिलसँ जाए-आबए लगलौं। चूकि हमर बाबूजी आ माँ लम्‍बा छला। तँए हमहूँ तीनू भाए-बहिन कद-काठीमे छरहरगर आ गोर-नार रही। जखन हम दस बर्खक भेलौं तँ लोककेँ बूझि पड़िऐ जे चौदह बर्खक छी। सुन्नैर तँ रहबे करी। पिताजीक आमदनी अगाध रहैन तँए कुनो तरहक दिक्कत नहि छल। जखन कखनो कुनो चीज, खेलौना, वस्‍त्र, भोज्‍य पदार्थ आदिक जरूरत भेल, हमर माता-पिता तुरन्‍ते आनि दइ छला। ऊपरसँ जेठ सन्‍तान हेबाक फायदा अलग छल। हम अपन माता-पिताक प्रथम सन्‍तान रही। आ हमर माथ हमर नाना-नानीक कपार...।” इम्‍हर राघव, नन्‍दिताक कखनो केस तँ कखनो ओठकेँ सहलबैत रहैन। कखनो काल राघवक हाथ नन्‍दिताक गरदेन धरि चलि जाइन। मुदा राघव अपना-आपकेँ गरदेन धरि सीमित रखला। हँ, बीच-बीचमे ठोर, आँखि आ कपारपर चुम्‍बन करैत रहला। नन्‍दिता प्रतिकार नहि करथिन। ओइसँ आरो हरियर होइत उर्जावान भऽ अपन कथाक बखान करैत रहली नन्‍दिता। नन्‍दिता- “हमर पिताक एक संगी पटना विश्वविद्यालयमे इतिहासक प्रोफेसर छेलखिन। जखन हम मैट्रिकक परीक्षा दऽ देलौं, तहिया पनरह बर्खक रही। पिताक प्रोफेसर मित्र हमरा ओतए एला। हमर माता-पिता हुनकर नीक आव-भगत केलखिन। हम हुनकर पएर छूबि कऽ प्रणाम केलिऐन। ओ हमरा पुछला, की करै छी बुच्‍ची? हम जबाव देलिऐन- हम ऐबेर मैट्रिकक परीक्षा देलौं अछि। ओ प्रसन्न भेला। ओही बातक क्रममे हमर बाबूजी प्रोफेसर साहैब लग निवेदन केलखिन, कनी बुच्‍ची लेल योग्‍य बर देखू ने प्रोफेसर साहैब? प्रोफेसर साहैब बजला- कनी समए देल जाउ, हम अबस्‍स नीक बर तकबाक प्रयास करब। हमर पिताजी हुनकर आश्वासन सुनि गद्-गद् भऽ गेला। हमर बाल-सुलभ मनकेँ ई प्रपोजल नीक नहि लागल।” नन्‍दिता बजैत रहली आ राघव सुनैत रहला। एककेँ कथा सुनेबाक आतुरता तँ दोसरकेँ कथा सुनबाक जिज्ञासा। दुनूक मनमे एक-दोसराक मानसिक आ शारीरिक प्रेमकेँ प्राप्‍त करबाक उत्‍कट अभिलाषा आ इच्‍छा। मुदा ऐ इच्‍छाकेँ केवल कामेक्षा कहनाइ उचित नहि। राघवक हाथ आब कनी मर्यादाकेँ भंग करैत गरदेन आ बाँहि लग आबि गेलैन। हाथ पुन: काँपए लगलैन। मुदा हिम्‍मत नहि हारला। धीरे-धीरे राघवक हाथ नन्‍दिताक वक्षकेँ स्‍पर्श करए लागल। पहिने एक आँगुर, फेर दोसर ऑंगुर आ बादमे सम्‍स्‍त हाथ...। नन्‍दिता आनन्‍दित भेली। मुदा कथाक्रमक प्रवाहकेँ रोकलैन नहि। कथा चलिते रहल। ..नन्‍दिता- “जखन प्रोफेसर साहैब चलि गेला तँ हम अपन माएसँ लड़ए लगलौं, जे अखन नहि करक अछि विवाह। पहिने पढ़ब। एम.ए. करब। कुनो कौलेजमे नौकरी करब। फेर देखल जेतइ। माँ अहाँ पिताजीकेँ कहि दियौन जे अखन हम्‍मर विवाहक सम्‍बन्‍धमे नहि सोचैथ आ ने केकरोसँ जिक्र करैथ।” “..मुदा माए छेली बुझनुक आ परम्‍परासँ बान्‍हल। झट-दे बजली, अहाँ चुप रहू ने बुची। कुनो आइये लड़का तका गेल? जहाँ धरि पढ़बाक बात छै तँ पढ़ैवाली लड़की बिआहक बादो पढ़ि सकैए। अहाँक काज अछि पढ़ब आ घरक काजमे दक्षता प्राप्‍त करब। बिआहक निर्णए बाबूजीपर छोड़ि दियौन। जहाँ धरि प्रोफेसर साहैबक बात छैन तँ ओ बड्ड नीक लोक छैथ। केतेको नीक कन्‍यादान आ बरदान करा चुकल छैथ। ऊपरसँ अहाँक बाबूजीक बालसखा सेहो छैथ, जे करता से नीके करता।’ “माइक मनमे प्रोफेसर साहैबक प्रति अटूट बिसवास देख हमहूँ कनी निश्चिन्‍त भेलौं। आ एकबेर पुन: मस्‍तीक जिनगी जीबाक प्रयास करए लगलौं। मुदा मस्‍तीबला दिनमे जेना ग्रहण लागि गेल हमरा! तीन मासक भीतर, रबि दिन प्रोफेसर साहैब बिनु बजाएल आ नौतल पाहुन जकाँ हमर आवासपर एक आरो मित्रक संग पहुँचला। संजोगसँ पिताजी घरेपर छला। प्रोफेसर साहैबकेँ नीक जकाँ आव-भगत आ स्‍वागत-सत्‍कार कएल गेल...।” “..चाह इत्‍यादि ग्रहण करला बाद प्रोफेसर साहैब अपन अटैची खोलला आ एकटा पोस्‍टकार्ड साइजक ब्‍लेक एण्‍ड व्‍हाइट फोटो निकालि पिताजीकेँ देखबैत कहलकैन जे ई लड़का बड़ संस्‍कारी छैथ। बी.ए. आ एम.ए. दुनूमे गोल्‍ड मेडल भेटल छैन। पी.एच-डी.क थीसीस तैयार छैन। एक मासक भीतर जमा भऽ जेतैन आ छह मासक अभियन्‍तरे पी.एच-डी.सँ अवार्डेड भऽ जेता। थोड़बे दिनमे लेक्‍चरर भऽ जेता। हँ, उमेरमे करीब चौदह-पनरह बर्खक अन्‍तर अबस्‍स छैन।” “..हमर बाबूजी गम्‍भीर होइत फोटो देखए लगला। जखन लड़काक सम्‍बन्‍धमे सभ जानकारी भेटलैन तँ ‘हँ’ कहि देलखिन। पंजिकार लग अधिकार मालाक परिक्षण भेल आ विवाह तँइ भऽ गेल। भेलै जे एक मासक भीतर विवाह हेतइ। हम चिन्‍तामे मग्‍न भऽ गेलौं। आब की करूँ, की नहि? हमर आयु पनरह बर्खक आ हमर होमएबला पतिक आयु तीस बर्खक!!” “..एकेटा आस लागल जे माए लग जाइ आ हुनकेसँ बात करी। माए लग गेलौं। कहलयैन- ‘ई की भऽ रहल अछि? तैपर माए बजली- ‘देखू बुच्‍ची जे हेतै से नीके हेतइ। अहाँक पिता अहाँ लेल कुनो गलत निर्णए थोड़े ने लेता। लड़का विद्वान छै। एकर फायदा अहाँकेँ भेटत। अहाँ असानीसँ एम.ए; पी.एच-डी. इत्‍यादि कऽ सकब। ई लड़का अहाँकेँ ऐ दिशामे उत्‍साहित करता आ सभ तरहक मदैत देता। तँए, अहाँ चिन्‍ता जुनि करू। हमहूँ तँ अहाँ बाबूजी सँ तेरह बर्खक छोट छी। कुन समस्‍या अछि हमरा? कहू ने?” “..आब हम मानि लेलौं जे हमर समस्‍याक कुनो निदान नहि अछि। आत्‍म समर्पन मात्र बॉंचल छल। एक मासक भीतर हमर विवाह भऽ गेल। विवाहक रातिमे वीध-बेवहार करैत-करैत चारि बाजि गेल। हमरा ईहो नहि बुझल छल जे विवाहक पश्चात वर-कनियाँ आपसमे बात करै छै। अगर दुनूमे सामंजस्‍य हौउ तँ शारीरिक सम्‍बन्‍ध सेहो स्‍थापित कऽ सकैत अछि। हम विधकरीक बगलमे विवाह भेलोपरान्‍त भेर नीनमे सुति रहलौं। शायद सुधाकरकेँ ई बात नीक नहि लगलैन। भिनसरमे करीब साढ़े दस बजे, कोहबर घरमे हमरा असगरमे बजा पुछलैन- बुच्‍ची, रातिमे अहाँ हमरा लग किए ने एलौं? तैपर हम कहने रहिऐन- नीन आबि गेल छल। सुति रहलौं। तखन ओ कहने छला- ठीक छै आइ दिनमे हमरा लोकैन गप करब। कहलयैन- ठीक छै।” “..मुदा कहि नहि किए हम अपन सहेली सभ संग बात-चीतमे लागि गेलौं। सुधाकर लग नहि जा सकलौं। पाँच बजे साँझमे सुधाकर हमरा बजेला। हम सहज भावसँ हुनका लगमे गेलौं। ओ तामसे घोर छला। हमरा घरमे प्रवेश करिते-मातर कहलैन, अहाँ किए ने ऐलौं आइ दिनमे?” हम कहलयैन- “बिसरा गेल। सखी-बहिनपा संगे बैसल रही।” सुधाकर- “बुच्‍ची अहाँ बीस बेर कान पकैड़ कऽ उठू-बैसू। ई हमर आदेश अछि।” “हम कहलयैन- किएक? हम नै उठब-बैसब। नहि आबि सकलौं तँ ऐ लेल कान पकैड़ कऽ उठ-बैस करबाक की प्रयोजन?” “..हमर ई जबाव सुनि सुधाकर चप्‍पल लऽ हमरा दिस बढ़ला। हमरा भेल ई आब हमरापर प्रहार करता। एकर प्रतिकार करी। जँ नहि करब तँ जिनगी पर्यन्‍त हिनकर कोपभाजन बनए पड़त। ई सोचि हमहूँ अपन पेन्‍सिल हिलबला सैण्‍डल हाथमे उठेलौं आ चिचियाइत बजलौं, खबरदार जे हमरा मारलौं। अगर हमरा मारब तँ हमहूँ चप्‍पलसँ अहाँकेँ कपार फोड़ि देब।” “सुधाकर बूझि गेला जे हम हुनका केवल गीदर भभकी नहि देखा रहल छेलिऐन अपितु अगर ओ हमरा लग एला तँ हमर पेन्‍सिल हिलबला चप्‍पलसँ...। सुधाकर ठमैक गेला। हाथसँ चप्‍पल निच्‍चाँ राखि देलैन। हमहूँ अपन पेन्‍सिल हिल सैण्‍डलकेँ निच्‍चाँ राखि देलौं। आब सुधाकर किछु अभद्र गारिक प्रयोग करए लगला। हम फेरो शेरनी जकाँ चिचिएलौं, खबरदार जे अभद्र भाषाक प्रयोग केलौं आ गारि पढ़लौं हमरा! अहाँ एकटा गारि पढ़ब तँ हम दसटा गारि पढ़ब। एहेन बेवहार हमरा लग नहि चलत।” “..सुधाकर अपन मन मसोसि कऽ रहि गेला। केवल एतबे बजला जे रातिमे गप करब, अखन अहाँ जाउ..।” “..हम चोटे कोहबर घरसँ बाहर भऽ गेलौं। ओना ई निश्चित भऽ गेल जे ई आदमी विद्वान कम आ राक्षस बेसी अछि। एकरा पत्नी नहि एक सेविका अथबा दासी चाही। मुदा हम दासी थोड़े ने रही?” “..रातिमे सभ वीध-बेवहारक बाद पाँचटा गीतहारि विद्यापतिक गीत- ‘सुन्‍दरि चलली पहुँ घर ना चहु दिस सखी सब कर धरा ना रे घरबा मे जाइते परम डर ना रे जइसे रहु डर शशी कापे ना रे...।” “..गबैत हमरा कोहबर दिस लऽ गेली। हमर स्‍थिति ‘जैसे रहू डर शशी कांपे ना रे’ बला छल। पनरह बर्खक जीवनमे पहिल बेर डरक अनुभूति भेल छल। खैर!भीतर प्रवेश केलौं। ओछाइनपर चम्‍पा फूल छिड़ियाएल। इत्रसँ समुच्‍चा कोठली सुगन्‍धित। सुधाकर चुपचाप एक मोट पोथी पढ़बामे तल्‍लीन छला। हम जखन भीतर गेलौं तँ कहलैन- आउ बैसू बुच्‍ची। हम बैस रहलौं। सुधाकर ठाढ़ भेला। घरक केबाड़ भीतरसँ बन्‍द केला। आ हमरा लग आबि कहलैन- ‘बुच्‍ची, आइसँ हम आ अहाँ पति-पत्नी छी। ऐ बातक एहसास अहाँकेँ अछि ने?” “..हम चुपचाप रही। सुधाकर बजैत रहला- ‘अहाँकेँ बुझल अछि जे आब हमर शरीरपर अहाँक अधिकार अछि आ अहाँक शरीरपर हमर। आइसँ हम सभ एक-दोसरक, शरीरक स्‍पर्श आ प्रयोग करब। ई कहैत सुधाकर हमरा लग आबि हमर गालकेँ चुमि लेला। हुनकर मुखसँ जर्दा पानक गंध अबैत छल, जे हमरा नीक नहि लागल। ऐसँ पूर्व स्‍त्री-पुरुखक बीच यौन सम्‍बन्‍धक नाम अबस्‍स सुनने रहिऐक मुदा केना होइ छै, की सभ होइ छै, की प्रक्रिया छै, तइमे स्‍त्री केर भूमिका की होइ छइ आ पुरुखक भूमिका की होइ छइ, तइ सब बातक ने तँ कुनो जानकारी छल आ ने कुनो अनुभवे। हम एही गुण-धुनमे रही। मुदा सुधाकर निर्लज्‍ज बनि अपन वस्‍त्र हमरा समक्ष खोलए लगला। कनी काल तँ हम चुप रहलौं मुदा जखन ओ लगभग निर्वस्‍त्र भऽ गेला तँ बाजि उठलौं- ‘ई की कऽ रहल छी अहाँ? निर्लज्‍जताक पाराकाष्‍ठा पार कऽ रहल छी। ई नीक बात नहि। उघारे देहे ओ थेथर जकाँ दाँत निपोरैत हमरा दिस बढ़ला। हुनकर भावना हमरा विध्‍वंसक लागि रहल छल। हम पलंगपर सँ उठि कऽ बाहर भगबाक निरर्थक प्रयत्न केलौं। मुदा बेकार। पाछाँसँ हमर झोंट पकैड़ सुधाकर हमरा ओछाइनपर अनला आ सीधे हमर वक्ष पकैड़ लेलैन। हम हाथ छोड़ेबाक यत्न करए लगलौं। मुदा बेकार। हमहूँ जल्‍दी हारि मनबाक लेल तैयार नहि। सुधाकरक दहिना हाथक आँगुरकेँ दाँतसँ हम काटए लगलौं। आब सुधाकर तामसे प्रचण्‍ड भऽ एक घूसा हमरा मुँहपर मारलैन। लागल जेना आँखिक आगू अन्‍हार पसैर गेल। हम लाचार भऽ गेलौं। बलिष्‍ठ राक्षस लग एक पनरह बर्खक बच्‍ची भला की टीक सकै छलि। सुधाकरकेँ तामस कम नहि भेलैन। हमरा ओ तीन चमेटा आरो मारलैन। फेरो हमर समस्‍त कपड़ाकेँ खोलि निर्वस्‍त्र कऽ दरिंदा जकाँ हमर अंगक संग खेलए लगला। हब्‍सी जकाँ हमर वक्ष, दरदेन, पीठ, नितम्‍ब आदिपर दाँत कटलैन। आ हमरा संगे बलात्‍कार केला। एक ओहन बलात्‍कार जेकरा सामाजिक मान्‍यता प्राप्‍त छै। एक ओहेन बलात्‍कार जइमे बलात्‍कारीकेँ लड़कीबला सभ भगवानक दर्जा दइ छइ आ प्रति दिन बलात्‍कार करबा लेल अवसर प्रदान कऽ अपना-आपकेँ धन्‍य बुझैत अछि। एहेन बलात्‍कार जइमे लड़कीकेँ माए, बहिन, भाऊज, सखी एवं अन्‍य महिला सभ सजा कऽ, संवारि कऽ उत्‍सवक माहौल बना गीत-नाद गबैत श्रृगार कए बलात्‍कारीक कक्षमे असगरे छोड़ि अबैत छै। ओइ अभागिनक वेदना, दर्दकेँ के बुझत? नारीक जनम नहि दिअए विधाता..!” ‘विधाता’ कहि नन्‍दिता थोड़े कालक लेल जेना ठमैक गेली। मुदा ओ पुन: ओही क्रममे आबि बाजए लगली- “..हमरा बीचमे दाँती लगि गेल। हमर कानबक अवाज नहि छिड़िअए तइले एक हाथसँ हमर मुँहकेँ दबने रहला सुधाकर। जखन दाँती लागलतँ पानिक छींच्चा मारि दाँती छोड़ाबैथ। हम आब अपना-आपकेँ सरेण्‍डर कऽ देलौं। भरि राति चील आ नढ़िया जकाँ सुधाकर हमर मांस नोचैत रहला। तीन बेर बलात्‍कार केलैन। भोरे साढ़े पाँच बजे कहलैन जे आब बाहर जाउ। हमर पएर डगमगा रहल छल। आँखि झँपा रहल छल। समुच्‍चा शरीर गुड़-घा जकाँ दर्द करैत रहए। गुप्‍तांगक दर्दक की चर्चा करी। नहि बाजी सएह नीक। पहिल बेर ई अनुभूति भेल जे बेटी बनि कऽ रहनाइ केतेक कष्‍टमय छै। बरामदाक कातमे अखरे चौकीपर बेहोशीक हालतमे पड़ि रहलौं।” “..थोड़बे कालक बाद हमर भाभी एली आ पुछलैन- बुच्‍ची पाहुन पसिन एला? हम तामसे धोर होइत जबाव देलिऐन- भाभी एखन जाउ! हमरा असगर सुतए दिअ।” “..पछाइत माए एली। हमर माथ सहलबैत पुछलैन- बुच्‍ची, मुँह-हाथ नहि धोब? मौहकक बेर भऽ गेल अछि। पाहुन इन्‍तजार कऽ रहला छैथ। हमर कुहेस फाटि गेल। हम माएकेँ भरि पाँज पँजिया पकैड़ भोकासि पाड़ि कानए लगलौं। संयोगसँ ओतए कियो नहि छल। तैयो माए दोसर घरक भीतर लऽ गेली। हम कानि कऽ सभ बात कहलयैन। हम कनैत रहलौं आ माए हमरा अपन करेजसँ सटेने रहली। भेल सभ दिन अहिना माइक छातीसँ सटल रही।” “..माए गम्‍भीर होइत बजली- बुच्‍ची की करबै एकरे कहै छै नारी जीवन! समझौता सबतरि सभ परिस्‍थितिमे स्‍त्रीगणेकेँ करए पड़ै छै। अहाँकेँ नहि बुझल अछि जे हम अहाँक पिताक संग केतेक समझौता केलौं अछि। अहाँ पाहुन संगे मिल कऽ रहू। दुनू गोरेमे समझौता भऽ जाएत तँ जीवन स्‍वर्ग भऽ जाएत। प्रारम्‍भमे कनी दिक्कत सभकेँ होइ छै। अहाँ चिन्‍ता जुनि करब।” “..भेल जेना माय सेहो हमर दर्दकेँ नहि बूझि सकली। नीक ई रहैत जे ऐ नृशंसकारी दुगुना उमेरक कारी भुजुंग डेढ़ आँखिक विद्वानक बदला हमरा सिनेह करएबला, हम-वयस्‍क कमे पढ़ल आ सुन्‍दर युवक हमर पति रहैत। मुदा बाबूजीक पागक रक्षाक लेल आ सगा-सम्‍बन्‍धी लग अपन शेखी बघारबा लेल बाबूजी हमरा राक्षक संग बान्‍हि देला। ई चण्‍डाल हमरा लेल कसाइ अछि।” “..जीवनक यएह नियति छै, ई हमरा ज्ञात भऽ गेल छल। लेकिन हम ऐबातक निर्णए अबस्‍स लऽ नेने छेलौं जे कुनो परिस्‍थितिमे सुधाकरकेँ अपनापर आक्रमण नहि करए देबैन। आब अगर हमरा ओ मारता तँ चोरा कऽ माहुर खुआ जान मारि देबैन।” “..ऐ दृढ़ प्रतिज्ञा आ आत्‍म विश्वासक संग माइक संग हम पएर-हाथ धो मौहक करए हेतु चलि गेलौं।” “..दोसर रातिमे हमर रूप रनचण्‍डीबला छल। हम घरमे प्रवेश करिते सुधाकरकेँ कहि देलिऐन, देखू! हम अहाँक पत्नी छी। वेश्‍या नहि। हमरासँ शारीरिक सम्‍बन्‍ध चाहैत छी। राखू। मुदा हमरा संगे भविसमे मारि-पीट नहि करू। अगर ई स्‍थिति भेल तँ हमरासँ खराप कियो ने हएत। केतेक मारब घरमे अहाँ। बाहर निकलैत देरी हम चप्‍पल, ईंटा कुनो वस्‍तुसँ सबहक समक्ष प्रहार कऽ देब। तैयो नहि मानब तँ थाना जा एफ.आई.आर. दर्ज करा देब। अगर अहाँ सम्‍मान करब तँ हमहूँ सम्‍मान करब आ चुप रहब।” “..हमर ऐधमकीसँ सुधाकर काँपि गेला। भेलैन इज्‍जत मटिया-मेट भऽ जाएत। ऐबेर ओ किछुनहि बजला। यद्यपि ओ ओइ रातिमे तीन बेर हमरा संगे यौन सम्‍बन्‍ध स्‍थापित केलैन- बलात् आ हमरा इच्‍छात विपरीत। हम सोचि लेलौं जे ई मनुख हमर तनक भूखल अछि। मनक भूखल नहि अछि। हमहूँ एकरा संग मनसँ प्रेम आ स्‍नेहालिंगन तँ नहि कऽ सकैत छी। फेर कऽ लीअ जेतेक हमर शरीरक उपयोग करत। हम जड़ बनल रहब...।” “विवाहक पाँच बर्खक पश्चात हमर प्रथम पुत्र अमरेश जीक जन्‍म भेलैन। तीन बर्खक बाद बिमल भेला। तेकर बाद कुनो बच्‍चा नहि होमए देलिऐ। जड़वत जीवन चलैत रहल। सुधाकर आ हम दू विपरीत बाटक बटोही। हम सुधाकर संगे केतौ सभा, कार्यक्रम, विवाह-दान इत्‍यादिमे नहि जाइ छी। विवाहक दोसरे दिनसँ बाबूजीकेँ टोकनाइ तक छोड़ि देल। अबैत छैथ तँ यंत्र जकाँ प्रणाम कऽ लइ छिऐन। एकर अतिरिक्त किछु नहि।” “विवाहक तीन बर्खक वाद एक घटना घटल,जे हमर परिवारकेँ झँककोरि देलक।” राघव- “से की?” नन्‍दिता- “हमर छोट बहिन रागिनी हमरा ओतए आएल छलि। करीब पाँच मास एतए रहल। कहि नहि केना ओकरा सुधाकर केर छोट भाए प्रभाकरसँ प्रेम भऽ गेलइ। एक मासक बाद हमरा रागिनी ऐ बातक जानकारी देलक। हम मना केलऐ मुदा दुनू एक-दोसरक प्रेममे पागल। एक-दोसरक संग मरबा आ जीबाक सप्‍पत खेबाबला। यद्यपि सुधाकर सेहो ऐ प्रेम-प्रसंगसँ प्रसन्न नहि छला। हम्‍मर माता-पिता सेहो दुनूकेँ बुझेलखिन। मुदा बेकार। एक दिन दुनू अपन हाथक नस काटि लेलक। जखन पता चललै तँ डाक्‍टरकेँ बजाएल गेल। दुनू परिवार रागिनी आ प्रभाकरकेँ प्रेम लग झूकि गेल। विधिवत् विवाह भऽ गेलइ। रागिनी विवाहक पश्चात् जमशेदपुर चलि गेली। जमशेदपुरमे प्रभाकर अंग्रेजीक लेक्‍चरर छला।” “तीन बर्ख धरि तँ बड्ड नीक रहलै, एकटा बेटा सेहो जन्‍म लेलकै मुदा बेटाक जन्‍म होइते-मातर दुनूमे खट-पट प्ररम्‍भ भऽ गेलइ। मारि-पीट प्रारम्‍भ भऽ गेलइ। स्‍थिति बद्-सँ-बदतर होइत रहलै। एकबेर तँ रागिनी तलाक तक लेबाक लेल मन बना लेलैन। मुदा हमर बाबूजी, सुधाकर, हमर ससुर कहियो चाहे रागिणीक ससुर,सभ मिल कऽ रागिणीकेँ सम्‍बन्‍ध विच्‍छेद नहि करए देलखिन प्रभाकरसँ। किछु दिनक बाद रागिणी पुन: जमशेदपुर गेली। छह मास धरि ठीक रहलैन। सातम माससँ वएह रामा वएह खटोला। फेर मतभेद-मनभेद प्रारम्‍भ। फेर मारि-पीटक सिलसिला। रागिणी जखन तंग भऽ जाथि तँ हमरा फोनपर गप करए लगैथ। हम तँ अपने लाचार छेलौं। की कऽ सकै छेलिऐन। खाली एतेक कहि दइ छेलिऐन जे हम तँ मना केने रही ने रागिणी? ई सभ तँ राक्षसक परिवार अछि। ई सभ शेरक खालमे नढ़िया अछि। रागिणी किछु नहि बाजैथ। केवल हिचुकि-हिचुकि कऽ कानैथ। फेर कहैथ- बहिनदाइ! हमर दिने खराप छल। ई राक्षस दारू पीब जरैत सिगरेटसँ हमर जाँघ आ कनपट्टी जरबैत रहैए। कामातुर भऽ विपरीत तरहक सेक्‍स लेल हमरा बाध्‍य करैत अछि। एकर शरीरसँ विचित्र तरहक गन्‍ध अबै छै। एकरा की कएल जाए?” “रागिनीक प्रश्‍न छोट मुदा हमरा लेल यक्ष प्रश्‍न छल- अनुतरित।” “आ अन्‍तमे जीबनक कष्‍ट आ प्रभाकर केर शारीरिक आऔर मानसिक यातनासँ तंग आबि कऽ रागिणी असगरेमे अपन दहिना हाथक नश काटि लेली। घरमे कियो ने रहइ। जखन रातिमे साढ़े दस बजे प्रभाकर एला तँ देखै छैथ जे शोनितक धार बहैत आ रागिणी बेसुधि भेल पड़ल। प्रभाकरकेँ किछु ने फुरलैन। उठा-पुठा कऽ नर्शिंग होम लऽ गेला। डाक्‍टर कहलखिन सभ किछु समाप्‍त भऽ गेल। रागिणी आब जीबैत नहि छैथ। आ ऐ तरहेँ एक जीवनक दुखद अन्‍त भऽ गेल। रागिणीक आत्‍महत्‍याक पश्चात हमर बाबूजी केँ दिमाग खुजलैन। आब ओ बुझलखिन जे समाजिक मर्यादा, लोकाचार आ सोतियानाक नामपर केना महिलाकेँ शोषण आ दोहन कएल जाइत अछि। देखू रक्षसबा प्रभाकरकेँ? आब ओ अनेरे नोर चुअबैत रहैए। असगरेमे मध्‍य–रात्रिमे रागिणी अहाँ केतए चलि गेलौं? आदि-आदि चिचिआइत रहैए। लेकिन आब की। चिचिएने की हएत? रागिणी तँ उड़ि गेली पिजरासँ। अजाद भऽ गेली। नीके भेलइ। सभ दिनका झंझट, शोषण, मार-पीटसँ नीक वेचारी दुनियाँ छोड़ि चलि गेल।” रागिणीक कथा कहलाक बाद नन्‍दिता जोर-जोरसँ साँस लेमए लगली। छातीक धड़कन बढ़ि गेलैन। मनमे अकुलाहट उठए लगलैन। राघव सेहो द्रवित भऽ गेला। प्रोफेसर सुधाकर प्रभाकर एवं सुधाकरक प्रति घृणा आ आक्रोश भरि गेलैन। नन्‍दिताक प्रति सिनेह आ संवेदना बढ़ि गेलैन। नन्‍दिताक आँखिमे नोर छेलैन। गालपर सेहो नोरक टघार आबि गेल रहैन। राघव अपन रूमालसँ नन्‍दिताक नोर पोछलैन। नन्‍दिता राघवक पलथीपर सँ माथ हटबैत बैसली। अपन कक्ष दिस विदा भेली। राघव चुप छला। दस मिनटक भीतर नन्‍दिता तरोताजा भऽ मुँह-कान धो, क्रीम इत्‍यादि लगा पुन: राघव केर कक्षमे प्रवेश केलैन। राघवक मन हर्षित भेलैन। नन्‍दिता राघव लग आबि बिना किछु कहने पुन: राघवक पलथीपर माथ राखि लेट गेली। राघवक हाथ अनायास नन्‍दिताक माथपर चलि गेलैन। आ राघव नन्‍दिताक रेशमी केशकेँ सहलबए लगला। नन्‍दिता कथाकेँ आगू बढ़ेनाइ शुरू केलैन- “राघवजी, आब कहू ई सभ सम्‍मानक पात्र छैथ?” राघव- “नहि नन्‍दिता भाभी नहि। ई सभ तँ कसाइ छैथ। हिनका लोकैनकेँ अपन डिग्री आ शिक्षाक तमाम कागजातकेँ आगिमे जरा कऽ सुड्डाह कऽ लेबाक चाही। एहेन शिक्षाक की प्रयोजन जे मनुखकेँ जानवर बना दिए?” नन्‍दिता- “देखू राघवजी, अखन डेढ़ राति भऽ गेल अछि। अगर काल्‍हि अहाँ केतौ बाहर नहि जाइ तँ हम चारि-साढ़े-चारि धरि अपन जिनगीक वृतान्‍त अक्षरसह सुनबए चाहै छी। अगर बाहर जेबाक विचार अछि तँ ऐतै विराम दइ छी?” राघव- “आगू अपन वृतान्‍त पूरा करू। हम काल्‍हि केतौ ने जाएब। आगूक वृतान्‍तसँ सेहो हम बहुत किछु सीखब। समाजक एहेन चीजकेँ जानि रहल छी जेकरा सम्‍बन्‍धमे कल्‍पना तक नहि केने रही।” राघवक ऐ आश्वासनसँ नन्‍दिता निश्चिन्‍त भऽ गेली। राघवकेँ हाथ पकैड़ अपन वक्ष लग लऽ जा बजली- “राघवजी, आइ पहिलबेर विवाहक बाद कुनो पुरुखक प्रति सिनेह उत्‍पन्न भेल अछि हमरा। हम तँ सुधाकर आ प्रभाकरक किरदानी देख ई मानि नेने रही जे सभ पुरुख घटिया आ स्‍त्रीगणक चामक भूखल अछि। हमरा होइत छल जे पुरुखकेँ केवल अपन दंभ, लोक-लाज, समाजिक मर्यादासँ मतलब रहै छै। स्‍त्रीगणक मान, मर्यादा स्‍वाभिमान, भावना भॉंड़मे गेल, तइसँ पुरुखकेँ की प्रयोजन? लेकिन अहाँक विचार हमर मान्‍यताकेँ बदैल रहल अछि। जइ तरहेँ प्रति दिन अहाँ अपन पत्नी सहजन्‍यासँ फोनपर बात करै छी। हरेक निर्णएमे हुनकर भागीदारीकेँ सम्‍मान करै छी, तइसँ ई स्‍पष्‍ट अछि जे अहाँ स्‍त्रीकेँ सही अर्थमे सहचरी मानै छी।” राघव- “अहाँ ठीके कहै छी नन्‍दिता भाभी। ओना, एक बात स्‍पष्‍ट कऽ दी जे जइ परिवारमे हमर जन्‍म भेल अछि तइमे महिलाक स्‍थान सर्वोपरि छै। हमर पिता बिना हमरा माएकेँ पुछने कुनो कार्य नहि करै छैथ। परिवारक संचालनक तमाम जिम्‍मेवारी माइक छैन। पिताजीक कार्य केवल अर्थोपार्जन छैन। केतेक निर्णए हमर माए असगरे लैत छैथ। हमर पिता कखनो ओइ निर्णएपर अथबा माइक निर्णए क्षमतापर प्रश्‍न नहि करैत छैथ। यएह स्‍थिति हमरो अछि। बजारक खरीददारी, गृहकार्यक निर्णए, नौत-हकार, कुटुम-परिवार सम्‍बन्‍धी तमाम निर्णए सहजन्‍य अपने हिसावे करै छैथ। वेतनउठा हम हुनका दऽ दइ छिऐन। बाँकी कुनो चीजसँ हमरा लेना-देना नइ अछि। आइ धरि हम कहियो सहजन्‍यासँ कुनो तरहक हिसाव नहि लेलिऐन। हुनकर आलमारी आ लॉकर खुजले रहै छैन, मुदा कहियो हम ओकरा नहि छुबै छी। यएह शायद हमरा दुनूक बीच असली प्रेमक गाँठ अछि। सहजन्‍याक माता-पिताकेँ हम अपन माता-पिता जकाँ सम्‍मान करै छिऐन। एकर फायदा हमरा ई भेटैए जे सहजन्‍या सेहो हमर माता-पिताकेँ बड्ड सम्‍मान आ सेवा करै छैथ। हमरा हमर सासुरक लोक सभ कहै छैथ जे अहाँ अलग-तरहक लोक छी। अन्‍यथा पत्नीकेँ माता-पिताक प्रति केकर धियान जाइ छै- मिथिलामे।” राघवक बात सुनि नन्‍दिता भावुक भऽ गेली। राघवक प्रति प्रेममे हुनका आरो बृद्धि भऽ गेलैन। राघवक हाथकेँ जोरसँ पकैड़ अपना छाती लग सटेलैन। राघवक हाथक पृष्‍ठ भाग आब नन्‍दिताक वक्षक अनुभव कऽ रहल छल। राघव ऐ अनुभवमे मग्‍न छला। धीरे-धीरे हिम्‍मत कऽ राघव अपन हाथकेँ सोझ केला आ आब अपन दुनू हाथ सोझे-सोझ नन्‍दिताक वक्षपर रखि ओकर आङीक ऊपरसँ दबाबए लगला। नन्‍दिता चुप रहली। कुनो प्रतिकार नहि..। थोड़बे कालक पछाइत राघवक हाथ नन्‍दिताक आङीक भीतर प्रवेश कऽ अपन आनन्‍दक हरकतमे संलग्‍न भऽ गेल। आनन्‍दित नन्‍दितो। पहिल बेर नन्‍दिता स्‍त्री आ पुरुखक सामंजस्‍यक प्रेमक अनुभूति जे कऽ रहल छेली। आब जखन प्रोफेसर सुधाकरक यर्थाथक ज्ञान भऽ गेलैन तँ राघवक मनक अपराधबोध सेहो खतम भऽ गेलैन। नन्‍दिताकेँ शारीरिक आ मानसिक सहयोग देनाइ निश्चित रूपे राघवकेँ परमार्थक कार्य अथबा ई कहू जे मानबाधिकारक रक्षा करब बुझना गेलैन। नन्‍दिता आनन्‍दित होइत बिना राघवकेँ हाथ हटेने अपन वृतान्‍तकेँ आगू बढ़बैत जारी रखली- “आ तही दिनसँ हम यन्‍त्रवत रहए लगलौं। जीवनक उत्‍साह खतम भऽ गेल। बचपनेमे अपना-आपकेँ बूढ़ बुझए लगलौं! जखन दुनू बच्‍चा कनी नमहर भऽ गेला आ स्‍कूल जाए-अबए लगला तँ पढ़नाइ प्रारम्‍भ केलौं। हलाँकी खेनाइ बनाएब, घरक काज सम्‍हारब इत्‍यादि ऐ सभमे हम कहियो रूचि नहि रखलौं। सुधाकर चेरी इत्‍यादिक बेवस्‍था केलैन। आर्थिक सहयोग सुधाकरसँ नहि भेटल।पिता हमर माइक माध्‍यमसँ किछु टका इत्‍यादि हमरा लेल भेज दइ छला। बादमे हमरा भेल जे स्‍वयंसिद्धा बनी। पढ़ाइ प्रारम्‍भ केलौं। बी.ए; एम.ए. केलौं आ आब पी.एच-डी. केर थीसीस जमा होबएबला अछि। आशाक प्रतिकूल सुधाकर शिक्षाक क्षेत्रमे अपन प्रभुत्तवक कारणे हमरा एम.ए. आ पी.एच-डी.मे नीक मदैत केलैन। फेर कथा लिखनाइ प्रारम्‍भ कएल। प्रारम्‍भमे मैथिलीमे आ बादमे हिन्‍दीमे सेहो। आब दुनू भाषामे एक प्रवाह, प्रभाव एवं अधिकारक संग लिखै छी। जखन एक आध रचना छपल तँ लिखैमे आरो मन लागए लगल। हमर साहित्‍य सही अर्थमे हमर जीवनक आगू-पाछू घुमैत रहैत अछि।” नन्‍दिता बजैत रहली। राघव सुनैत रहला। बीच-बीचमे राघवक हाथ नन्‍दिताक आङीक भीतर किछु अलग तरहक क्रीड़ामे व्‍यस्‍त छल। नन्‍दिता हाथक क्रीड़ासँ आनन्‍दित होइत रहली। राघव नन्‍दिताक वृतान्‍त सुनबामे मस्‍त आ नन्‍दिताक संग क्रीड़ा करबामे मस्‍त। नन्‍दिता राघवकेँ अपन वृतान्‍त सुनबैमे आ राघवक हाथक चहलकदमीकेँ अपन आङीक भीतर आन्‍नद लेमएमे व्‍यस्‍त आ प्रसन्न...। नन्‍दिता- “एकटा बात तँ हम रागिनीक सम्‍बन्‍धमे नहि बतेलौं। सहज मनक रागिनी आत्‍महत्यासँ पहिने प्रभाकर हेतु एक कविताक निर्माण हिन्‍दीमे केली। हुनकर लाश लग एक पन्नामे मोचरल किछु शोणितक बुनक छिट्टासँ भरल ओ कविता लोककेँ भेटलै। ओ कविता हमरा दुइये बेर पढ़ला बाद कंठस्‍थ भऽ गेल अछि। राघवजी, अगर अहाँ कही तँ हम ओइ कविताकेँ सुनाऊ?” राघव- “हँ-हँ। अबस्‍स सुनाउ नन्‍दिता भाभी। हमहूँ तँ बुझी जे आत्‍महत्यासँ ठीक पहिने रागिनीक मनोदशा की छेलैन आ प्रभाकरजीक प्रति हुनकर सोच की छेलैन।” आब नन्‍दिता आँखि मुनि कऽ रागिनीक अन्‍तिम कविताक पाठ करए लगली- “तुम्‍हारा दिया धोखा मैंने उठाकर वहीं रख दिया है जहाँ बहुत संभाल के रखती थी तुम्‍हारा प्‍यार..! तुम्‍हारी सूरत में कहाँ छिपी थी ये फ़रेब की लत और ये दिलों से खेलने की फ़ितरत अन्‍दाज तुम्‍हारा अभी तो सदमा है गहरी नीन्‍द से मानो किसी ने जबरदस्‍ती उठा दिया हो झिंझोड़ कर ये भी टूटेगा ठीक वैसे ही जैसे तोड़ दिया तुमने यकीन और अधबने मिट्टी के धरौंदे दिल भी हमरा कभी जो सोचू तो एक लहर सी उठती है बहुत तेज दर्द की, जैसे खंजर ही तुमने दे मारा डूबने से पहले एक झलक सी दिखी थी तुम्‍हारी शहद सी आँखों की और राज तुम्‍हारा अब तो यूं है के होश आया है जैसे मीलों चले गहरी बेहोशी में ये कदम आवारा अब तो न मैं हूँ तुम्‍हारो साथ न मेरी जिद न जजबात बस एक निशानी बाँकी जो अब है तुम्‍हारा चली मैं दूर गगन की ओर न मेरा कोई ओर न ही छोर सम्‍हालना बेसक लोक लाज के भय से हमको यही अन्‍तिम परिणाम हमारा।” थोड़े कालक पछाइत नन्‍दिता पुन: बाजए लगली- “राघवजी बीचमे ई प्रसंग बाँकी रहि गेल छल। एकाएक स्‍मरण आबि गेल तँ सोचलौं जे अहाँकेँ सुना दी। रागिनीक ई पत्र अपना-आपमे बहुत बात कहैत अछि।” रागिनीक कवितासँ राघव सेहो भावुक भऽ गेला। अपन नोर नहि रोकि सकला। कनी कालक बाद नन्‍दिता एकबेर पुन: अपन जीवन वृतान्‍तकेँ सुनाएब प्रारभ केलैन। नन्‍दिता गम्‍भीर भेली आ बाजए लगली- “राघवजी, कहि नहि किए हमरा अपना-आपकेँ श्रोतीय ब्राह्मण परिवारमे जन्‍म लऽ एना बुझना जा रहल अछि! बुझना जा रहल अछि जेना पूर्वजन्‍ममे सहस्‍त्रो गाइक बध केने रही। आ तेकरे फल भोगि रहल छी। ओना तँ अपना-आपकेँ श्रोतीय सभ सर्वश्रेष्‍ठ मानैत अछि मुदा जहाँधरि महिलाक स्‍थिति छइ तँ महिलाकेँ अमानवीय ढंगसँ शोषण ई समाज कऽ रहल अछि। कथा हमरा आ रागिनीक जीवन आ शोषणसँ अन्‍त नहि होइत अछि। असंख्‍य रागिनी आ नन्‍दिता ऐ तथाकथित सर्वश्रेष्‍ठ ब्राह्मणक वितंडावाद आ कर्मकाण्‍डक नाओंपर कुल, जाति, मूल आ परोपट्टाक नाओंपर अभिशप्‍त भऽ तप्‍त नोर झहरबैत अपन जिनगीकेँ बिता रहल छैथ। केतेक रागिनी या तँ विवश भऽ आत्‍महत्‍या कऽ लइ छैथ, चाहे मारि देल जाइ छैथ। की कहलैन यात्रीजी- ‘अगराही लगौ बरू बज्र खसौ एहेन जातिपर बरू धसना धँसौ भूमिकम्‍प हौ या फटौ धरती माँ मिथिला रहिये कऽ की करती?’ ..हम मानि लेलौं जे किछु नहि बाजब। हँ, सुधाकरकेँ ई भान अबस्‍स करा देलिऐन जे जँ ओ हमरा शरीरपर प्रहार करता तँ हमहूँ नहि छोड़बैन। सुधाकर ऐ बातकेँ बूझि गेला। हम कुनो सभा, संस्‍कार, गोष्‍ठी, उत्‍सव आदिमे सुधाकरक संग नहि जाइ छी। सुधाकरकेँ एतेक अबस्‍स बता देलिऐन जे हमरा संसर्गसँ पूर्व ओ नीक जकाँ साबुन तेल आदि लगा स्‍नान ध्‍यान कऽ लेथि। अन्‍यथा हमरा लग नहि आबथु। सुधाकर ऐ बातकेँ स्‍वीकारि लेलैन। हमर यातना, हमर विद्रोह, हमर अरमानक टुटब, रागिनीक प्रेम-विवाह, विवाहेत्तर शोषण आत्‍महत्‍या सभ हमरा लेल साहित्‍य सृजनक आधार आ सामग्री बनि गेल। हम लिखैत रहलौं। तीन विधामे- कविता, कहानी आ उपन्‍यास। दुनू भाषामे- मैथिली आ हिन्‍दी। जखन किछु कविता आ गल्‍प छपए लागल तँ आरो उत्‍साहित भेलौं। बादमे रेडियोसँ सेहो हमर कथा आ कविताक प्रसारण नीज वाणीमे हुअए लगल। ..जनै छी राघवजी! हमरा सभसँ संतुष्‍टि ऐ बातसँ होइए जे लोक आ समाजआब नहु-नहु हमरा अपन साहित्‍य लेखनक कारणे जनैत अछि। हम प्रो. सुधाकरक पत्नी या चीफ इन्‍जीनियर केर बेटीक रूपमे अपन परिचय समाजमे नहि जानबए जाहै छी। मनक आर सभ अरमान तँ ध्‍वस्‍त भऽ गेल मुदा अपना कृतिक कारणे आइ अबस्‍स जानल जाइ छी। पैछला मासमे हमर एक कथा ‘सरिता’ आ एक कथा ‘हंस’मे छपबा लेल स्‍वीकृत भऽ गेल अछि। एक छोट कविता ‘कादम्‍बनी’क नव अंकमे छपल अछि। ऐ सभसँ हमरा आत्‍मिक संतुष्‍टि भेटैत अछि।” “आब अहाँसँ भेँट भेलापर हम पुरुषक प्रति अपन नजरिया बदलबाक प्रयास करब। जनै छी, जखन हम किशोर वयमे एलौं तँ मनक अनन्‍त अरमान छल। अपन सम-कक्ष तथा सिनियरो लड़का सभ हमरा बड़ गौरसँ देखैत छल। कतेक लड़का सभ हमरा सुना-सुना कऽ कहैत छल- ‘की चीज अछि नन्‍दिता! जेकर कनियाँ हेतै ओ बड्ड भाग्‍यशाली हएत। एकर घरबला तँ एक साल धरि एकरा छोड़ि केतौ निकलबे ने करत।’ आदि-आदि। ई बात सभ सुनि हम बड्ड आनन्‍दित होइत रही। परीक देशमे विचरन करए लगी। भेल जे दुनियाँक सभसँ सुन्‍दर, सिनेही आ रमनगर लड़का हमर जीवन-साथी बनत। मुदा हाय रे भाग्‍य..! ‘हे देव तूँ ई की केलह? हमर भाग्‍यमे की लिख देलह? कारी वर्ण, डेढ़ आँखि, हमरा उमेरसँ पनरह बर्खक अधिक आयुक वर! ओहो निरंकुश, मिथ्‍याभिमानी, नारीक शोषक, संस्‍कारहीन, आ मचण्‍ड! एहेन राक्षस जे सोलह-सतरह बर्खक लड़कीक भावनाकेँ नहि बूझि सकै छल! भॉंड़मे जाए ओकर शिक्षा आ समाजशास्‍त्रक ज्ञान। भाँड़मे जाए मर्यादा आ लोक-लाजक दीवार। दुर्भाग्‍य हमर ई छल जे हमरा सासुओक सुख नहि भेटल! जखन सुधाकर इण्‍टरमिडिएटमे पढ़ै छला, तखने माए मरि गेलखिन। कियो हमर भावनाकेँ बुझिनिहार नै।” नन्‍दिता राघव दिस देखैत बजली- “राघवजी, आब तीन बजि गेल। अहाँकेँ निन्‍द आबि गेल हएत। दिन भरिक थाकल छी। अहाँ अराम करू, हम जाइ छी।” राघव- “कुनो एहेन बात नइ छै नन्‍दिता भाभी। अहाँकेँ संगति हमरा नीक लगैए। किछु आरो बात करू। काल्‍हि तँ आब केतौ नहियेँ जाएब।” ई कहि राघव नन्‍दिताकेँ पूरा अपना-आपसँ सटा लेलैन। राघव नन्‍दिताक आङीकेँ लगभग खोलि देलखिन। हाथ नाभीसँ निच्‍चाँ जा चहलकदमी करए लगलैन। प्रारम्‍भमे नन्‍दिता राघवक हाथकेँ रोकलखिन। राघव नहि मानला। नन्‍दितो छोड़ि देलखिन। दुनू एक दोसरक देहक अनुभूति आ विलक्ष्ण आन्‍नदमे मग्न भऽ गेला। दू शरीर एक आत्मा बनि गेल। ई क्रिया करीब बीस मिनट धरि चलल। नन्‍दिताक गौर वर्ण आ राघवक श्‍यामल शरीर एक अलग रंग-रभसक संजोग बना रहल छल। नन्‍दिताकेँ आइ एना बुझा रहल छेलैन जेना ओ राघव संगेअपन हनीमून मना रहल होथि। आब नन्‍दिताकेँ एहसास भेलैन जे सुहागराति की होइ छै। आब ओ बुझली जे शारीरिक सुख अगर स्‍त्री-पुरुखक मिलाप आ आपसी सहयोगसँ होइ तँ ओ सुख सर्वाधिक सुन्‍दर सुख छी। राघव पागल जकाँ नन्‍दिताक प्रत्‍येक अंगकेँ अपना वसमे केने जा रहल छला। नन्‍दिताकेँ अपनामे समेटने जाइत छला आ नन्‍दिता राघवक प्रेममे मिश्री जकाँ घुलल जा रहल छेली। सभ मर्यादा खतम भऽ गेल छल। दुनू एक-दोसराक प्रत्‍येक अंगकेँ प्राकृतिक रूपे दर्शन केलैन, भोगलैन आ तिरपित-तिरपित भऽ गेला। ने धोख ने लाज। केवल आ केवल शारीरिक आ मानसिक प्रेम आ समर्पण। दुनू ब्‍याहल मुदा दुनूक प्रेमकेँ निश्‍छल आ प्रथम प्रेमक अनुभूति कहल जा सकैत छल। अन्‍तमे कामोत्तेजनाक अधिक आवेशसँ राघव आ नन्‍दिता घामसँ तरबतर भऽ गेला। राघव हाफए लगला। नन्‍दिता झट-दनि अपन वस्‍त्र सम्‍हारए लगली। राघव सेहो अपन वस्‍त्र आ ओछाइनकेँ सेरियाबए लगला। नन्‍दिता ठाढ़ होइत बजली- “आब तीन बाजि कऽ पच्‍चास मिनट भोर भऽ गेल। बीस मिनटमे बच्‍चा सभ उठि कऽ पढ़ब शुरू करता। आब अहाँ सुतू। हमहूँ जाइ छी।” राघव एकबेर पुन: नन्‍दिताक हाथ पकैड़ हुनका अपन हृदयसँ सटेलखिन आ अनेको बेर अनेको स्‍थानपर चुमि लेलखिन। नन्‍दिता राघवक ऐनूतन प्रयोगसँ गद्-गद् भऽ गेली। आब नन्‍दिता अपन कक्षमे प्रविष्‍ट भऽ गेली। राघव नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे सोचए लगला। एकबेर भेलैन जे की ओ अपन अपन पत्नी- सहजन्‍याक संग धोखा तँ ने कऽ रहला अछि? एक मन ईहो भेलैन जे कदाचित राघव अपन ऐ कृत्‍यसँ प्रोफेसर सुधाकर-संगे बिसवाघात तँ ने कऽ रहला अछि? फेर भेलैन जे नहि नन्‍दिताक समस्‍त वृतान्‍त बुझला बाद शायद राघव आ नन्‍दिताक बीच जे किछु भेल ओ निश्चित रूपेण सर्वथा धर्मक कार्य छी। यएह बात सभ सोचैत-सोचैत राघव नीनभेर भऽ गेला। प्रात: नियत समैपर राघव उठि गेला। आश्चर्यक बात ई जे नन्‍दिता सेहो चहकैत उठली। हुनकर सौन्‍दर्यमे आइ एक नैसर्गिक रोहानी झलकैत छल। समुच्‍चा शरीरक पोर-पोर जेना प्रेम-प्रसंगक अनुभूतिसँ खिल रहल छेलैन। नन्‍दिता बेबीक आबैक प्रतिक्षा नहि केली। सीधे रसोइ कक्षमे गेली। सर्व प्रथम राघव लेल इन्‍होर पानि, तत्‍पश्चात नेबोबला चाह लऽ कऽ आबि गेली। नन्‍दिता आ राघव संगे-संग चाह पीलैन। राघव स्‍नान-धियान केला बाद घर बन्‍द कऽ दू घण्‍टा सुति रहला। तकर बाद दू घण्‍टा धरि अपन फिल्‍ड डायरी लिखलैन। आब भोजन तैयार छल। राघव आ नन्‍दिता संगे भोजन केला। भोजनक बाद नन्‍दिता बेबीकेँ दस टका आ गहुम दैत कहलखिन- “बेबी, जो गहुम पीसेने आ। आइ-काल्‍हि मीलबला दोसर चीज मिला दइ छै, तँए अपना सामनेमे गहुम पीसा कऽ चिक्कस नेने आ।” बेबी नन्‍दिताक आज्ञाक पालन करैत गहुम पीसबैले विदा भेल। आब समए दू बजि कऽ पच्‍चीस मिनट भऽ रहल अछि। नन्‍दिता राघवक कक्षमे प्रवेश करैत बजली- “राघवजी, आब ऐ घरमे मात्रहम आ अहाँ छी। हमर दुनू बालक साढ़े चारि बजे साँझमे स्‍कूलसँ विदा हएत।” राघव नन्‍दिताक इसारा बूझि गेला आ झट-दनि घर बन्न कऽ लेलैन। आब नन्‍दिता आ राघव भयमुक्‍त वातावरण पाबि कामदेवक आगोशमे मग्न भऽ गेला। करीब एक घण्‍टा धरि दुनू एक-दोसरामे पूर्ण रूपेण समर्पित भऽ गेला। हरेक दैहिक सुखक बाद दुनू आर उत्‍साही आ स्‍फूर्तिवान भऽ जाइत रहैथ। दुनूक चेहरापर एक फराक चमक झलैक रहल छेलैन। लगभग चालिस मिनटक पछाइत नन्‍दिता राघवकेँ कहलखिन- “राघवजी, आब घरक केबाड़ खोलि दियौ। बेबी कुनो क्षण आबि जाएत। बेबी आ हमर दुनू बालक सुधाकरक गुप्‍तचर अछि। हिंगसँ हरैद तक सभ बात सुधाकरकेँ बतबैत रहै छैन। एकरा सभ लग एक बातक धेयान अबस्‍स रहए जे हमरा लोकैन कुनो ओहन हरकत नहि करी जइसँ एकरा सभकेँ कुनो आभाष लगइ।” राघव गरदेन हिला नन्‍दिताक बातकेँ समर्थन केलैन। आब सभ राति नन्‍दिता अपन नव रचनाक डायरीमे आबि राघवक कोरामे माथ रखि अपन साहित्‍यक चर्चाक संग-संग प्रेम-प्रसंग आ देहक संसर्ग सेहो चलैत रहलैन। आब दुनूक मध्‍य मानसिक, साहित्‍यिक आ शारीरिक समन्‍वय परिपक्‍व भऽ रहल छेलैन। दुनू एक-दोसरक प्रति समर्पित एना जेना राघव अठारह बर्खक होथि आ नन्‍दिता सतरह बर्खक। आ उमहर ऐ सभ घटनासँ बेखबर प्रोफेसर सुधाकर बनारसमे कॉपी जँचबामे मग्न...। जखन राघवकेँ दिल्‍ली जेबाक पाँच दिन शेष रहि गेलैन तहिया प्रो. सुधाकर आबि गेला। दोसर दिन बिहार बन्‍द रहइ। कारण बसबला आ टैक्‍सीबला बन्‍दक आह्वान केने रहै, तँए राघव फिल्डवर्क लेल केतौ ने गेला। इमहर प्रो. सुधाकरकेँ चलि एबाक कारणो रातुक साहित्‍य श्रवण आ रंग-रभस सेहो समाप्‍त भऽ गेलैन। दिनेमे दस-पनरह मिनट लेल नन्‍दिता प्रो. सुधाकर केर समक्षमे राघवसँ किछु पुछि लइ छेली। आब स्‍वतंत्रता समाप्‍त भऽ चुकल छेलैन। दोसर दिन हड़तालक कारणे राघव केतौ नहि गेला। नन्‍दिता प्रसन्न छेली। ओना राघव आ नन्‍दिताक प्रसन्नता कइयेक गुणा बढ़ि गेलैन जखन प्रो. सुधाकर राघवसँ कहलखिन- “राघवजी! आइ हम विश्वविद्यालय जा रहल छी। विभागमे रिसर्च कमिटिक मिटिंग तीन बजेसँ अछि। ओइसँ पहिने हमरा लोकैनकेँ किछु दस्‍तावेज इत्‍यादि ठीक करक अछि। हम पाँच बजे साँझ धरि फ्री हएब। जखन आएब तँ निश्चिन्‍तसँ गप करब।” ई कहि आधा घण्‍टाक भीतर प्रो. सुधाकर घरसँ बाहर निकैल गेला। कनियेँ कालक बाद नन्‍दिता स्‍नान-धियान करक बास्‍ते विदा भेली। बारह बजैत-बजैत राघव आ नन्‍दिता संगे भोजन केला। भोजनक तुरंत बाद बेबी सेहो खेलक। नन्‍दिता बेबीकेँ कहलखिन- “जो बेबी अपन माएसँ भेँट केने आ। पाँच बजे धरि चलि अबिहेँ।” बेबी नन्‍दिताक कृपा बूझि गद-गद भऽ गेलि। पाँच मिनटक भीतर कैम्‍पससँ बाहर भऽ गेलि। आब नन्‍दिता आ राघव सबा चारि बजे धरि स्‍वतंत्र...। नन्‍दिता अपन साहित्‍यक डायरी लऽ राघवक कक्षमे प्रवेश केली। राघव गद्-गद् भऽ गेला। नन्‍दिता अपन साहित्‍य-चर्चा प्रारम्‍भ केलैन। आधा घण्‍टाक बाद राघव उठला आ नन्‍दिता सहज भावसँ बिहुसैत आ मने-मन गदगदाइत राघवक कोरामे बैस गेली। आब एक दिस नन्‍दिता अपन साहित्‍य सुना रहल छेली आ दोसर दिस राघव नन्‍दिताक संग छेड़खानीमे व्‍यस्‍त आ मस्‍त छला। ई क्रम चलैत रहलैन। एकाएक करीब पौने दू बजेमे प्रो. सुधाकर किछु कार्यसँ घर आबि गेला। नन्‍दिता झट-दनि राघवक कोरासँ निच्‍चाँ उतैर गेली। बिना सुधाकरकेँ देखने नन्‍दिता अपन घर दिस विदा भेली। प्रो. सुधाकरक आँखि क्रोधे आगि उगैल रहल छेलैन। हलाँकी सुधाकर ने तँ राघवकेँ किछु कहलखिन आ ने नन्‍दितेकेँ। आधा घण्‍टाक पछाइत सुधाकर किछु फाइल लऽ पुन: विश्वविद्यालय दिस विदा भेला। जाइ काल राघवकेँ कहलखिन- “राघवजी, अहाँ अपन समान लऽ ग्राउण्‍ड फ्लोरमे एकटा छोटका रूम अछि तइमे रखि लिअ आ हमरे संगे विश्वविद्यालय चलू।” राघव समान लऽ निच्‍चाँ चलि एला। घरमे ताला लगेला आ सुधाकर संगे विश्वविद्यालय दिस विदा भेला। भरि रस्‍ता सुधाकर राघवकेँ किछु नहि कहलखिन। राघवो सहमल छला। भेलैन अगर सुधाकर अपमानित करितैथ तँ की होइत..? खैर, राघवकेँ पुस्‍तकालयमे बैसा प्रो. सुधाकर अपन विभागमे चलि गेला। राघव पुस्‍तकालयमे तीन चारि गोट पोथी लऽ एकठाम बैस पढ़ए लगला। यद्यपि पढ़ैमे मन नै लगलैन। हलाँकी राघवकेँ अपन कृत्‍यपर कुनो पश्चाताप नहि छेलैन। आब हुनकर मनमे प्रो. सुधाकरक प्रति कुनो सम्‍मान नहि रहि गेल छेलैन। नन्‍दिताक कथा सुनला बाद सुधाकरमे ओ एक निहायत राक्षसकेँ देखए लगला। मुदा राघवकेँ अपनासँ बेसी नन्‍दिताक चिन्‍ता छेलैन। प्रोफेसर सुधाकर छह बजेमे राघव लग पुस्‍तकालय एला आ दुनू गोरे संगे विदा भेला। सुधाकर रस्‍तामे राघवसँ कहलखिन- “राघवजी, अहाँ नन्‍दिताक बातमे समए बरबाद नहि कऽ अपन कार्यपर धियान केन्‍द्रित करू। हुनका कथा लिखबा आ सुनेबाक अतिरिक्‍त कुनो काज नहि छैन। हमरा अहाँ सबहक बात बेवहार नीक नहि लागल। तँए निच्‍चाँ लऽ एलौं अहाँकेँ। निच्‍चोमे सभ बेवस्‍था छै। हमहूँ अहीं लग बातचित करबा लेल चलि आएब। केवल भोजन लेल ऊपर हमर निवासपर जेबाक अछि।” राघव गरदेन हिला प्रो. सुधाकरकेँ अपन स्‍वीकृति दऽ देलखिन। दुनू गोरे गन्‍तव्‍यपर पहुँचला। राघव ऊपर नहि गेला। निचला कमरा बहुत छोट आ तीतर-बीतर रहइ। मकराक झोलसँ भरल। किछु किताब अबस्‍स राखल रहइ। राघवकेँ भेलैन जे एतए रहनाइ सम्‍भव नहि अछि। मुदा राति भऽ गेल रहइ। सोचलैन राति भरि कहुना रहि जाइ छी। साढ़े आठ बजे दिवाकर आबि कऽ कहलकैन- “भोजन तैयार अछि चचाजी। चलू करबा लेल। पापा आ मम्‍मी दुनू अहाँक इन्‍तजार कऽ रहल छैथ।” राघव आधा मनसँ विदा भेला। प्रो. सुधाकर आ नन्‍दिता डायनिंग टेबुलपर बैसल छला। प्रो. सुधाकर राघवकेँ अपना लग बैसक इशारा केलखिन। राघव हुनकर आज्ञाकेँ सम्‍मान करैत हुनके लग बैस गेला। नन्‍दिता कनी परेशान अबस्‍स छेली। मुदा ओतबो नइ जेतेक राघव सोचै छला। खैर, सभ गोरे भोजन केला। नन्‍दिता राघवकेँ लौंग आ इलायची तथा प्रो. सुधाकरकेँ पान बना देलखिन। नन्‍दिता सेहो स्‍वयं इलायची खेली। पान छोड़ला आइ छठम दिन छेलैन नन्‍दिताकेँ। आब प्रो. सुधाकर आ राघव निच्‍चाँ दिस विदा भेला। राघवक मनमे रातिक वार्तालाप नहि होमाक कचोट तँ बहुत छेलैन मुदा की कऽ सकै छला। राघवक कक्षमे आबि प्रो. सुधाकर हुनकासँ परियोजना सम्‍बन्‍धी बात बहुत काल धरि करैत रहला। लगभग एगारह बजे रातिमे प्रो. सुधाकर सुतैले गेला। ऐ घरमे राघवकेँ भरि राति नीन नइ भेलैन। ऐगला दिन भोरे राघव कुनो गाम लेल प्रस्‍थान केलैन। बहुत देर धरि कार्य केला बाद आपसीमे दरिभंगाक नै आबि अपन गाम चलि गेला। दू दिन अपने गामसँ अलग-अगल स्‍थान जाथि। दोसर दिन भोरे-भोर प्रो. सुधाकर फोन केलखिन तँ राघव कहि देलखिन जे ओ अपन वृद्ध माता-पितासँ भेँट करक हेतु अपन गाम चलि एला। राघव ईहो कहलखिन जे दिल्‍ली जाइसँ एक दिन पूर्व ओ दरिभंगा जेता आ विस्‍तारसँ चर्च करता। नन्‍दितासँ सेहो राघवकेँ फोनपर बात होइ छेलैन। कार्यक समाप्‍तिक बाद राघव दरिभंगा गेला। तखन प्रो. सुधाकर घरपर नहि छला। नन्‍दिता निच्‍चाँ एली आ कहलखिन जे प्रो. सुधाकर लहेरियासराय कुनो मित्रकेँ कुनो नर्सिंग होममे देखबा लेल तुरंते गेल छैथ। राघव हाथ-पएर धोलैन। तैबीच नन्‍दिता स्‍वयं चाह बना लऽ अनली। राघव चाह पीबैत बजला- “नन्‍दिता भाभी, हमरा कारणे अहाँकेँ बहुत दिक्कत भऽ गेल?” नन्‍दिता- “अरे! बेकार अहाँ किए चिन्‍ता करै छी राघवजी? सुधाकर अपने-आप ठीक भऽ जेता। हिनका हमर कुनो पुरुखसँ बातचित आ आत्‍मियता नहि पसिन छैन। हमरा दुख केवल ऐ बातक अछि जे अहाँकेँ निच्‍चाँ आबए पड़ल!” राघव- “नहि! ऐसँ हम परेशान नइ छी। हमरा केवल अहाँक चिन्‍ता भऽ रहल छल। कहीं भाइ साहैब मारि-पीटपर ने उतरल होथि?” नन्‍दिता- “ओते हिम्‍मत नहि छैन। हमरापर जहिया हाथ उठा देता तहिया हमहूँ औकात देखा देबैन।” ई कहैत नन्‍दिता राघव दिस बढ़ली आ राघवजीक कपार चूमि लेली। राघव पुन: उत्‍साहित भेला। कक्ष बन्‍द केलैन आ दुनू गोरे आनन्‍दलोकक अनुभव करैत रभसमे लागि गेला। एना लगैत छल जेना नन्‍दिता सिर्फ आ सिर्फ राघव लेल बनल होथि। राघव नन्‍दिताक शारीरिक सानिघ्‍य पाबि तृप्‍त छला। नन्‍दितो तहिना छेली। करीब चालिस मिनटक पछाइत दुनू अपन-आपकेँ ठीक केलैन आ घरक दरबज्‍जा नन्‍दिता खोलली। फेर गप करए लगला। थोड़े कालक बाद नन्‍दिता ऊपर जाए लगली। राघव एकबेर फेर भरि पाँज-के पकैड़ नन्‍दिताकेँ चुमए लगला। नन्‍दिता सेहो प्रत्‍युत्तरमे सएह केलखिन। आब राघव अपन डायरीमे छुटल बात सभ लिखए लगला। कैमराक चीप निकालि फोटो सभकेँ लैप-टॉपमे डाउनलोड केलैन। फेर थीमक अनुसारे ओकर अलग-अलग फोल्‍डर बना ओइमे रखला। ताबे प्रो. सुधाकर आबि गेलखिन। दुनू गोरेमे बहुत देर धरि गप भेलैन। नन्‍दिता बीचमे बेबीकेँ भेजलखिन। बेबी आबि कऽ बाजलि- “चाह लाबी की?” प्रो. सुधाकर जबाव देलखिन- “हँ-हँ, चाह बना। कनी चूरा सेहो भूज। हम सभ ऊपरे आबि रहल छी।” आब राघव आ प्रो. सुधाकर ऊपर एला। बेबी चूरा भुजए लगल। सुधाकर अपन पुत्र दिवाकरकेँ दोकानसँ पकौड़ा लाबए कहलखिन। सभ गोरे भूजल चूरा आ गरम-गरम पकौड़ा खेलैन। नन्‍दिता सेहो संगे बैसल छेली। राघव आ प्रो. सुधाकर फेर निच्‍चॉं आबि गेला आ सभ डाटापर चर्च प्रारम्‍भ केलैन। साढ़े दस बजे रातिमे कार्यक समाप्‍तिक बाद सभ गोरे भोजन केला। राघव अपन कक्षमे आबि किछु आरो बचल बात सभ लिखलैन आ सूति रहला। दोसर दिन राघव स्‍नान-धियान केलैन आ छह बजे भोरे प्रो. सुधाकर स्‍वयं हुनका ऊपर लऽ गेलखिन। चूरा-दही-चीनी परोसल छेलैन। नन्‍दिता कीचनमे व्‍यस्‍त छेली। जखन राघव जलखै कऽ लेला तखन नन्‍दिता कीचनसँ बाहर एली। एकटा टीफीन राघव लेल तैयार छेलैन। राघवकेँ दैत कहलखिन- “राघवजी, अहाँक पत्नी सहजन्‍या सुधाकरकेँ कहने छेलखिन जे अहाँ बाहरक वस्‍तु यात्राक अवधिमे नइ खाइ छी। तँए थोड़ेक पुरी, पड़ोरक दू फँक्का आ थोड़ेक खजुरिया बना देलौं अछि। एकरा खाइत जाएब भरि रस्‍ता...।” राघव लग कृतज्ञताक कुनो शब्‍द नहि छेलैन। राघव आब प्रो. सुधाकरकेँ चरण स्‍पर्श केला। सुधाकर पीठ ठोकि असिरवाद देलखिन आ हृदयसँ लगेलखिन। आब राघव नन्‍दिताक चरण छुला। नन्‍दिता अपन हाथ राघवक पीठपर देलखिन। नन्‍दिताक हाथक स्‍पर्शसँ राघव धन्‍य भऽ गेला। नन्‍दिता आ हुनकर दुनू बालक राघवकेँ निच्‍चाँ धरि छोड़ि एलैन। राघवक संगे प्रो. सुधाकर सेहो रेलबे स्‍टेशन धरि विदा भेला। स्‍टेशनपर गाड़ी आबि गेल रहइ। राघव गाड़ीक प्रथम ए.सी. कोंचमे बैस गेला। प्रो. सुधाकर सेहो कोच धरि गेलखिन। आब ट्रेन पाँच मिनटमे खुजत। ई जानि राघव पुन: प्रो. सुधाकरकेँ चरण स्‍पर्श करैत कहलखिन- “श्रीमान, आब अहाँ उतैर जाउ।” प्रो. सुधाकर गाड़ीसँ निच्‍चाँ उतैर गेला। ट्रेन खुजि गेल। राघव एकबेर पुन: नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे सोचए लगला। मनमे एलैन, केना परिस्‍थिति मनुखकेँ की की बना दइ छै। नन्‍दिताक परिस्‍थिति हुनका लेखिका बना देलकैन- परिस्‍थिति लेखिका। सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्य मे भारतीय लोक आ शाश्त्र दूनू परंपरा में सुग्गा अपन विशिष्ट स्थान आदि काल स रखने अछि। सुग्गा सिनेह, प्रेम, ज्ञान आ श्रृंगार के प्रतीक मानल जैत अछि। अनेक कथा समस्त भारतवर्ष में भेटत जतए सुग्गा अपन बुद्धिमानी स अलग कीर्तिमान स्थापित केलक। जायसीक महाकाव्य पद्मावत में हीरामन सुग्गाक भूमिका के नहि जनैत अछि। कोना हिरामन राजकुमारी पद्मावती अथवा पद्मिनी संग अपन समय बीतबैत छल; कोना पद्मिनी अपन प्रेमक बात आ विवाह नहि होबाक टीस ओकरा संग बाटैत छली; आ कोना हीरामन सुग्गा सिंहलद्वीप के राजकुमारी पद्मावती आ चित्तोडगढक राजा रत्नसेन केर प्रेम में सुत्रधारक भूमिका के निर्वहन करैत अछि, के बारे में सबके बुझल अछि। बात मैथिली लोकगीत में सुग्गाक स्थान पर क रहल छी ताहि पद्मावत के प्रसंग पर विस्तार सं नहि जा रहल छी। अगर लोक व्यव्हार के बात करी त मिथिला समाज में सुग्गा आ आनो चिरै-चुनमुन एवं जानवर सबहक अपन भूमिका अछि। ओकरा मानवीकरण कए ओकर भाव के देखल जैत छैक। लोक अपन बच्चा, प्रिय लोक, जमाय के सुग्गा कहि संबोधित करैत छथि। ओ बच्चा जकर स्मरण शक्ति तीक्ष्ण होइत छैक तकरा सुग्गा कहि संबोधित कैल जैत छैक।माय, पितियाईन, नानी, दाई इत्यादि अपन बच्चा के सुग्गा कौर, मेना कौर कहि क भोजन खुअबैत छथि। नायक अथवा नायिका के नाक अगर बड्ड सुन्दर छैक त ओकरा सुग्गाक ठोर या चोंच स उपमा देल जैत छैक। मधुर बोली के सुग्गा सनहक बोली कहल जैत छैक। स्त्रीगन सब फ्रेम में कुरुश स सुग्गा मेना बनबैत छली. मिथिला चित्रकला में आ कोहबर घर में स्त्री आ पुरुष सुग्गा के स्नेहालिंगन अवस्था में बॉर्डर पर चित्रित कैल जैत छैक। स्नेहालिंगन के ठेठ मैथिली में लटपटायल अवस्था कहल जैत छैक। मिथिला चित्रकला में बॉर्डर पर वैह लटपटिया सुग्गा आपस में एक दोसर के पकड़ने चोंच में चोंच सटेने अंकित रहैत छैक। कोबरघर में एहि चित्रांकन केर उकेरबाक तात्पर्य ई रहैत छैक कि जेना सुग्गा के पति-पत्नीक जोड़ी में प्रेम रहैत छैक तेहने प्रेम, सिनेह आ आकर्षण एहि वरआ कनिया में बनल रहैक। दुनु एक दोसर स कहियो अलग नहि हो। दुलहिन स्त्री सुग्गा आ दुलहा पुरुष सुग्गा बनि जैत छैक। सुग्गा स्नेहक संग-संग सौन्दर्य आ रंगक प्रतिबिम्ब सेहो बनि जैत छैक। अगर बड्ड सुन्दर हरियर रंग केर सारी अथवा नुआ छैक त ओ सुगबा रंग अथवा सुगापंखी रंग कहेतै। लाल रंग केर मान्यता तखन स्थापित हेतैक जखन ओकर तुलना सुग्गाक ओठ स कैल जेतैक। सुग्गा स सिनेह अतेक जे ओकरा सोनाक पिंजरा में रखबाक कल्पना कैल जैत छैक। मैथिली लोकपरम्परा में सुग्गा बड्ड महत्त्व रखैत अछि। दुटा एहेन दन्तकथा मिथिला भूमि में व्याप्त अछि जाहि में सुग्गाक भूमिका के बेर-बेर स्मरण गर्व स कैल जैत अछि।पहिला कथा सीता सं सम्बंधित अछि आ दोसर कथा आदि गुरु शंकराचार्य के महापण्डित मंडन मिश्रक गामक यात्रा सं। एहि आलेख के आगा बढ़ाबी ओहि स पहिने ई दुनु दन्तकथा के बुझब जरुरी। प्रारंभ सीताक प्रसंग सं करैत छी। मिथिला में सुग्गा आ सीता के लऽ कऽ एकटा दन्तकथा प्रचलित अछि। बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी में भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से काम। झुला लागल प्रेमक डाली। झुलथि सीता प्यारी ना।। सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर में गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान में मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ में प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली। सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल में आनि पिंजरा में राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत! राजमहल में अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी में सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ीमनुखक आवाज़ में मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी में स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"। सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी में स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा में बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा में देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली। ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरुहमर पत्नी के बदला में अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा में बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक। अपन पत्नी के प्रेम में मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल में आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन! बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट में हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!" कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना में मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल में कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी।आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था में घर स निकालि देता”। आव सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन। आब दोसर दन्तकथा दिस बढ़ी। दोसर दन्तकथा शकाराचार्य आ महापण्डित मंडन सं जुड़ल अछि। मिथिला में अगाध पण्डित आ विद्वान सब भारतवर्ष केर सब कोनस अबैत छलाह। अतए अर्थात मिथिला में परम्परानुसार एक बेर में अनेक दिन धरि चलए बला शास्त्राथ में जीवन-जगत सं संबंधित विषय एवं उप-विषय पर वाद-विवाद चलैत छल। जे विद्वान शास्त्रार्थ में जितैत छला हुनकर विशेष सम्मान होइत छल। मान्यता ई अछि जे शंकराचार्य मिथिला के परम विद्वान आ कुमारिल भट्ट केर शिष्यमहापण्डित मंडन मिश्रक प्रसिद्धि सं प्रभावित भ स्वयं हुनका सं भेट करक हेतु आ शाश्त्रार्थ करबाक हेतु भ्रमण करैत मंडन केर गाम पहुचला। गामक इनार पर पनिहारिन सब पानि भरैत आपस में संस्कृत में वार्तालाप क रहल छलि। शंकराचार्य पनिहारिन सबके पुछलथिन: “महापण्डित मंडन मिश्रककुन घर छनि?”पनिहारिन में स एक महिला आगा अबैत बजली: “आगा बढ़ल जाऊ। जाहिदरबज्जा पर सुग्गो आपस में शास्त्रार्थ करैत हो, वैह घर महापण्डित मंडन मिश्रकहेतनि”। शंकराचार्य अपन शिष्य मण्डलीक संग आगू बढ़लनि। कलम, पोखरि, बसबट्टी, फुलक कियारी, लहलहातइत हरियर धानक खेत होइत थोरेक काल में महिषी गांव पहुंचला। महापण्डित मंडन मिश्रक घर ताक में कुनों दिक्कत नहि भेलनि। एक घर के दरबज्जा पर पिंजडा में सुग्गा आपस में शास्त्रार्थ क रहल छल। शंकराचार्य के भांगठ नहि रह्लनि जे यैह घर महापण्डित मंडन मिश्रक छनि। आब लोकगीत केर आंगन में प्रवेश करी आ देखी जे सुग्गा अपन कहेन स्थान बनेने अछि। एक नायिका के दर्द देखू. बेचारी के पति परदेस गेल छैक। बहुत दिन भ गेलैक परदेस स गाम एला। अखाढ़ मास समाप्त होम पर छैक लोक खरही काटि घर लग जमा करैत अछि। कथी लेल? जे घर के छारत। मनुखक त बाते छोडि देल जाओ चिरै-चुनमुन सब एक-एक खर के चुनि अपन खोता अथवा नीड़ के निर्माण क रहल अछि। सब आब मधुमास अर्थात बरसात में अपन-अपन जोड़ी संग रहत। मधुमसक मिलन यामिनीक सुख भोगत। देह आ नेह एक बनतैक। मुदा हाय रे दुर्भाग्य! बेचारीक कंत त एखनो परदेसे में छैक।लगैत अछि जे नायिका अही वियोग स शरीर ने त्यागि दे! अखाढहि मास अखाढी रोप कि नब खरही सब काटए लोक चिडै चुनमुनी सब खोता लगाएल कि हमरो कंत रहल घर छोडि कि हम मरि जइहें।। छठि माता के प्रसन्न करबाक हेतु महिला सब रंग-विरंगक गीत गबैत घाट दिस जैत छथि। हरेक गीत में प्रसाद सामग्री के वर्णन, विधक विधान, माता के गुणगान, आ सुचिताक ध्यानक वर्णन रहैत छैक। एक गीतक दू पांति देखू जे केना ओहि में सुगा के वर्णन अछि। कांच बांस के आधार बना केराक दू घौर के बीचो बीच फसा देल गेल छैक। दुनु कात घौर में हत्थाक हत्था पाकल-पाकल पीयर-पीयर केरा लुबझल छैक। केरा के आकर्षण देखि झुण्डक झुण्ड सुग्गा ओहि पर लुधकि रहल छैक। पबनौतिन मनुख जकां सुग्गा के बुझबैत छथिन के हे सुग्गा ई केराक घौर छठि महरानी के निमित्त छैक। एहि पर तों चोंच मारि एकरा अपित्र नहि कर। जखन पूजा पूरा भ जेतैक त तोरा तोहर हिस्सा भेट जेतौक।सम्बाद एहेन जेना सुगा एक एक शब्द के बुझैत हो आ आज्ञा के मानबक हेतु तत्पर। ई भेल लोक परमपरा में मनुख आ चिरै के बीच तारतम्य आ सामंजस्य। कांचहि बांस के बगहिया बह्गी लचकत जाए केरा फरल घौर स ओहि पर सुगा मंडराय छठि महरानी के दोसर गीत में कनि पबनौतिन तमसा जैत छथि कियैक त सुग्गा कनि लुबधि-लुबधि क आवश्यकता स अधिक परेशान क देने छनि। अहि बेर गीत में ओकरा सावधान भ जएबाक लेल कहैत छथिन: “देख सुग्गा! बड्ड भ गेल. लाख बुझेलाक बादो तों समरह के नाम नहि ल रहल छै। कहि देल्युक ने जे ई केराक घौर छठि महारानी के निमित्त छैक! मुदा तों आजिज क देलै। आब किछु नहि कहबौ। बौआ के पिताजी आबि रहल छथिन बन्दुक हुनका संगे छनि। गोली मारि देथुन। फेर हमरा नहि कहिहैं जे सावधान नहि केलयौक?” ई भेल लोकक चिरै आ चुनमुन के प्राति सिनेह। जेना माय अपना बच्चा के डरबैत छथि तहिना ओही सिनेह आ अनुराग स पबनौतिन सुग्गा के डरा रहल छथि। गोली मरबाक बात होइत छैक। मारल नहि जैत छैक। एहन अवस्था में जौ प्रकृति आ संस्कृति में समन्वय नहि बनत त कोना बनत? जखन वर बरियाती संगे कन्या के घर पर प्रवेश करैत अछि त बरक सुन्दर छवि देखि सासु गदगद भ जैत छथि। बरक मनमोहक छवि के तुलना सुग्गा सं कैल जैत अछि। महाकवि विद्यापति सेहो अपन पदावली में एक गीत में वरक सुन्दरता सुग्गा स करैत छथि।जमाए केर तुलना सोभनगर सुग्गा सं करैत सासु आ बूढ पुरान महिला सब प्रसन्न भ रहल छथि. धिया के भाग्य पर गुमान भ रहल छनि। गीत गाबि-गाबि सोचैत छथि जे ई जे अतेक निक सुग्गा रूपी जमाए छथि से कत स आबि क नेह लगेने छथि? ई सबहक मनमोहना कत बसेरा बनेने छथि? ई सोभनगर सुग्गा अपन गाँव स आबि सासुर में बसेर केने छथि आ सासुरक लोक सभ सं नेह लगेने छथि। हुनकर ससुर पिंजरा बना ओहि में एहि बर रूपी सुग्गा के बझा रखने छथि। पिजरा शब्द दुलहिन लेल कैल गेल छैक. सुग्गा जखन पिजरा में रहत त ओकरा आहार चाही। से आहार देबाक जिम्मेदारी सासु के देल गेल छनि। एहेन आहार देथु जाहि स सुग्गा के उचाट नहि लागै। संगहि सासु के इहो डर भ रहल छनि जे सुग्गा के जखन पाँखि झमटगर आ मजबूत भ जेतैक त भागि ने जाय? ताहि सासु एहो कहैत छथि जे एहेन सुग्गा के पोसने की लाभ।थोरेकबे दिनक बाद ई अपन घर चलि जायेत। आखिर जमाए रूपी सुग्गा कतेक दिन सासुर रूपी पिजरा में सासु हाथक चारा अर्थात व्यन्जन खा रहत? विद्यापति कहैत छथि जे ई गौरी रूपी दुलहिन के भाग्य छनि जे साक्षात् महादेब रूपी मनमोहक वर भेट गेल छनि। हे दाइ-माइ हुलसित भ गीत नाद गाऊ आ विध-बेभार करू। कहमाँसँ सुगा आयल, नेह लायल। कहमा लेल बसेरा सुगा मन मोहल। फल्लां ठासँ सुग्गा आयल, नेह लायल। फल्लां गाम लेल बसेरा, सुग्गा मन मोहल। फल्लां ससुर पिजुरा गढ़ाओल, सुग्गा बझाओल। हे फल्लां सासु देथु आहर सुग्गा मन मोहब। एहन सुग्गा नहि पोसब जे पोस ने मानत। हे सुगबा होयत उड़ाँत, अपन गृह जायत। एहन सुग्गा हम पोसब जे पोस मानत। हे सुगबा होयत बुधियार, पलटि फेर आओत। भनहि विद्यापति गाओल, फल पाओल। हे गौरी केँ बढ़नु अहिबात, सुन्दर बर पाओल।। विवाह के समय में जखन बरिआत के संग वर अपन सासुर विवाह करक हेतु प्रस्थान करैत अछि त दरबज्जा परदाई-माई सब बरिआती लेल रंग विरंगक गीत समवेत आ उच्च स्वर में गबैत छथि। वर्णन होइत अछि बरिआतिक साज के, श्रृंगार के, उत्साह के, तैय्यारी के, वस्त्र विन्यास के। बरक पितामह एक चीज़क व्यवस्था त पितामह के भाई दोसर चीज केर व्यवस्था में लागल छथि।कियो बाजा-गाजा के व्यवस्था में त कियोकआन चीजक। एक आदमी हरियर सुग्गा के पिजरा के सजा रहल छथि कारण विवाह में सुग्गा नहि जैत से कोना? गीत इहो बतबैत अछि जे बरिआती दल के सदस्य के कत-कत ठहराएल जैत। सुग्गा सेहो ओना थोरे ने जैत? पूरा बनि ठनि क जैत।चिरै रूपी सुग्गा वरक ससुर के पोखरिक भीड़ पर चानन गाछ के ठारि पर बैसत आ वर रूपी सुग्गा अपन सासु के बनाओल कोहबर घर में दुलहिन संगे बैसता।सुगा के फल भोजन करक लेल देल जेतैक आ रहबाक लेल सोनाक पिजरा। बरिआत सब दरबज्जा पर विश्राम करता। आंगन केर सोझा में आजन-बाजन राखल जैत। बरिआती सब के लाल पीयर धोती पहिरक हेतु देल जएतैक। सुग्गा, सुग्गा संग सोनाक पिजरा आ फल भोजन जेना अनिवार्य होइक? बरिआतक लोक सब धोती पाबि प्रसन्न भ जेता आ जमाए बेटी देख खुश भ जेता। कोने बाबा साजल आजन बाजन कोने बाबा साजु बरिआत हे। कोने बाबा सजथु हरियर सुगबा सुगा लय जायब बरिआत हे। बड़का बाबा साजल आजन बाजन मझिला बाबा साजु बरिआत हे। छोटका बाबा साजथु हरियर सुग सुगा लय जायब बरिआत हे। कहमा बैसायब आजन-बाजन कहमा बैसायब बरिआत हे। कहमा बैसाएब हरियर सुगा सुगा लय जायब बरिआत हे। पोखरि बैसायब आजन-बाजन दुअरे बैसायब बरिआत हे। पिजड़े बैसायब हरियर सुगा सुगा लए जायब बरिआत हे। कथी लए जायब बरिआत हे। कथी लय बुझायब बरिआत हे। कथी लए बुझायब हरियर सुगा सुगा कथी लए बुझायब जमाइ हे। टारा लए बुझायब आजन-बाजन धोती लए बुझायब बरिआत हे। फल लए बुझायब हरियर सुगा बेटी लए बुझाएब जमाइ हे। एहेन जमइया कतहु ने देखल सुगा लए आयल बरिआत हे। दोसर बरिआत गीत में एहेन कल्पना कैल जैत अछि जे दुलहा घुमबाक हेतु तथा खेलबाक हेतु बहुत दूर हरियर क्षेत्र दिस चलि जैत छथि। रस्ता में अनेक तरहक गाछ-बृक्ष, पोखरि, फुलवारी भेटैत छनि।जैत-जैत एक गाछ पर सोहनगर हरियर कचोर सुग्गा भेटैत छनि जकरा पकडि क ल अबैत छथि। सुग्गा मांझ आंगन में बैस जैत अछि आ रुसि रहैत अछि जे ओकरा सेहो बरिआती जएबाक छैक। मुदा बरिआती में ओना थोरे ने जैत सुग्गा। सुग्गा के ओहि लेल अँगिया आ टोपी चाही। ओ सजि क सुन्दर बनि क बरिआत में जाए चाहैत अछि। सुग्गाक अतेक मानवीकरण केवल लोकगीत में भ सकैत अछि। आगा- आगा देखैत जाऊ सुग्गा के नखरा। सब बरिआतिक सदस्य दरबज्जा पर स्थान ग्रहण केलक। अतए सुग्गा के एकाएक चिरै छी ताहि बातक अनुभूति भेलैक। ताहि बरिआती के कन्या पक्ष के ओतए पहुचला उत्तर सुग्गा एक आमक गाछक ठारि पर चढि गेल आ ओतए स सब विध व्यवहार देखि पुलकित होइत रहल। सुग्गा के ठोर बड्ड रमनगर। जेहने सुग्गा के ठोर तेहने वरक ठोर। सासु आनंदे बताहि। प्रेमाधिक्य में मातलि कखनो सुग्गा के ठोर निहारथि त कखनो जमाय के ठोर आ नैन नक्श। सासुरानी के फेरो इहो डर बीच-बीच में भ रहल छनि जे कियोक दाई-माई कुनो करामात ने क देथि! की पता नजरि लागि जैक सुग्गा के, जमेईया के, या दुनु के? इहो सोचैत छथि जे सुग्गा त वनक प्राणी अछि ताहि अंतत वन में वापस चलि जैत मुदा बेटी आ जमाए त कम-स-कम थिर भ क रहत ने! हमरो दुलहा के फलां दुलहा खेल जेता बड़ी दुर हे। ओत स जे लएला दुलरुआ हरियर सुगबा सुगबा बइसल माँझे ठाम हे। सभ केओ साजल जाइ बरिअतिया सुगा लेल अंगुरी पसारि हे। हमहु त लेब बाबा अँगिया टोपिया हमहु त जायब बरिआत हे। सभ बरिअतिया अटकल दरबज्जा सुगबा अटकल आमक ठारि हे। सभ केयो निरेखथि जाइत बरिअतिया सासु निरेखि सुगा ठोर हे। आइ हे माइ पर हे पड़ोसिन सुगा जुनि नजरि लगाउ हे। वनहि के सुगबा बनहि उडि जायत रहि जायत धीअहि जमाई हे। झरनी जे मिथिलाक मुसलमान महिला सब आ ओकरा संगे कतौं-कतौं हिन्दू सब सेहो दहा संगे चलैत रहैत अछि आ गबैत रहैत अछि। यद्यपि झरनी उदासी के तर्ज पर आ तेज़ी स चलैत बटगबनी जकां गैल जैत छैक जाहि में मक्का मदीना आ हसन हुसैन के सहादत केर गुणगान तथा हुनकर सौन्दर्य एवं सौर्य केर गाथा गैल जैत छैक। माहोल उदास मुदा जोश आ ओज सं भरल।लोक अही बहाने हसन आ हुसैन के कुर्बानी के याद करैत अछि। हसन आ हुसैन मोहम्मद साहेब केर नाति छला। इस्लाम, न्याय आ शांति के रक्षा के लेल अपन जान गमा लेला मुदा सत्य केर रस्ता सं नहि भटकलनि। हुनकर सहादत केर गाथा कतौं अज़ादारी त मिथिला में झरनी के रूप में गैल जैत अछि। केवल चरित्र अरब के होइत छैक मुदा चित्रण स्थानीय भावक अनुकूल। उपमा आ अलंकार वैह जे मिथिलाक लोक उदासी में अथवा आर कुनो कारुणिक गीत में प्रयुक्त करैत छथि। गीत गेबा में सेहो हिन्दू महिला जकां मुसलमान महिलाक प्राबल्य। एक झरनी में छाती पिटैत महिला सब गबैत छथि हाय अल्ला सुन्दर आ सोहनगर लाल सुग्गा के जन्म कोन ठाम भेल आ कोन ठाम ई दुनु भाई अर्थात हसन आ हुसैन जन्म लेलाह? फेर उत्तर में बजैत छथि जे पर्वत पर हरियर गाछ पर ललका सुग्गा जन्म लेलक आ अरब के मक्का शहर में हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के जन्म भेलैक। हे दाई- माई, कथी खुआक क लाल सुग्गा के हम पोसब आ कथी खुआ क दुनु बच्चा के? चारा अथवा आहार खुआ क सुग्गा के पोसब आ दूध पिया क हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के प्राण बचायेब। सोना के पिजरा में सुग्गा के बाजब सिखायेब आ इसकुल में भेज क दुनु बच्चा के पढ़ेएब। अगिला अंश में उदासी प्रबल भ जैत छैक। गीतक बोल कहैत छैक जे लाल सुग्गा उड़ात भेला पर कत उडि जैत आ बच्चा नमहर भेला पर कत चलि जैत? प्रश्न आ उत्तर के तर्ज पर झरनी गैल जैत अछि। एहि प्रश्न के उत्तर में कहल जैत छैक की उड़ात भेला पर सुग्गा फेरो पर्वत पर उडि जैत आ दुनु बच्चा नमहर भेलाक बाद मक्का चलि जेतैक कारण ओकरा धर्म केर रक्षा करबाक छैक। एहि झरनी के गंभीरता स देखला आ मनन केला सं ई अनुभूति होइत छैक जे उदासी आ झरनी में कतेक समानता छैक। जमाए के जखन सुग्गा स तुलना हिन्दू महिला सब अपन गीत में करैत छथि त कहैत छथि: “वनक सुग्गा वने उडि जायत”, “सुगबा हैत ओड़ियात अपन घर जायत” आदि। अतए पहार स सुग्गा अबैत छैक आ पहार में वापस चलि जैत छैक। हाय-हाय कहमा जलम लेल लाल एक सुगबा कहमा जलम दुनू बचबे हाय। हाय-हाय परबत जलम लेल लाल एक सुगबा मक्का जलम दुनू बचबे हाय। हाय-हाय कथिये खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा कथिये खिअयबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय आहरा खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा दुधबा पिलयबइ दुनु बचबे हाय। हाय-हाय कथिये पढ़ेबइ हम लाल एक सुगबा कथिये पढ़ेबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय पिजड़े पढ़ेबइ हमें लाल एक सुगबा इसकुल पढेबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय कहाँ उडि जेतइ लाल एक सुगबा कहाँ चलि जेतइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय परबत उडि जेतइ लाल एक सुगबा मक्का चलि जेतइ दुनू बचबे हाय।। मुसलमान महिला में हरियर रंग के सारी अथवा आनो वस्त्र के क्रेज रहैत छैक। हरियर के झरनी में सुगबा रंग कहल जैत छैक। एक अन्य झरनी में महिला सब अपन उत्सव आ सिंगारक चर्च करैत छथि। अते स्थान, उपमा, अलंकार, विधान सब खांटी देसी भ जैत छैक।झरनी के प्रकृति प्रश्न आ उत्तर सं छैक। एहि गीत में गीत गाईन सब अपने में चर्च करैत प्रश्न करैत छथि जे हाजीपुर, पटना आ बेतिया शहर के जा रहल छैक? फेर उत्तर दैत कहैत छथि, पिताजी हाजीपुर, भैया पटना आ पतिदेब बेतिया शहर जा रहल छथि। कथी लेल? पिताजी सुग्गा रंगक सारी लेबाक लेल, भैया कंगना लेबाक लेल आ पतिदेब माथक सिन्दुर लेबाक लेल। देखू कोना स्थानीय परंपरा में रंगा जैत छथि मुसलमान स्त्रीगन मिथिला में। सिन्दुर आ सोहाग के महत्त्व एकाएक प्रबल भ जैत अछि। धर्म अपन स्थान पर मुदा स्थानीयता कुनो कम थोरे? अगर सिन्दुर हिन्दू स्त्रीक श्रृंगारअइहबहोबाक प्रमाण त मुसलमानस्त्रीगन केलेल कियैक नहि। फेर गीत लिखनिहार आ गेनीहारिके के रोकि सकैत अछि? हाय-हाय के जयतै हाजीपुर के जयतै पटना के जयतै बेतिया शहरबे हाय। हाय-हाय बाबा जयतै हाजीपुर भैया जयतै पटना स्वामी जयतै बेतिया शहरबे हाय। हाय-हाय के लयतै सारी सुगबा के लयतै कंगना के लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय बाबा लयतै सारी सुगबा भैया लयतै कंगना स्वामी लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय के पहनतै सारी सुगबा के पहनतै कंगना के पहनतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय अम्मा पहनतै सारी सुगबा भऊजो पहनतै कंगना हमें पहनबै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय फाटि जयतै सारी सुगबा टूटी जयतै कंगना रहि जयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। अपन एक छोट कविता फूलडालीक कनेर में कवि कृष्णमोहन झा लिखैत छथि जिलेबीक काँट जकाँ हम अहाँक धानक लाबा सन तरबा मे गड़ि जायब आ किछु दिन धरि बिसबिसायब। चतुर्थीक औंठी आ बरसाइतक मेहदी जकाँ हम अहाँक विकल संसर्ग मे आयब आ असंख्य सुग्गा बनि अहाँक मोन मे उड़ियाएब। कवि नायिका के अंतःकरण के बुझैत छथि। ह्रदय में प्रवेश करबाक हिम्मत रखैत छथि। कहैत छथिन जे झुण्डक झुण्ड सुग्गा जकां नायिका के स्मृति में बेर-बेर आबि अपन होबाक प्रमाण देता. नायिका टीस में पतिक अथवा प्रेमीक अनुभूति करैत रहती। भगबान केर भजन, प्राति, उदासी आदि में मनुख त मनुखे भगबानो के सिनेहवससुग्गा बना क हुनकर सौन्दर्य, वात्सल्य, मनोहर स्वरुप के लोक स्मरण करैत अछि। कृष्ण लेल सुग्गा मनमोहन त जन-जन के कंठ में जेना रचल बसल हो।भगबान कृष्ण केर मथुरा सं द्वारका केर यात्रा लोक के अतेक दुखी क दैत छैक जे सखी बहिनपा सब अपन जीवन के उद्देश्यहीन बुझैत छथि। पूरा नगर उदास अछि। कखनो मोन होइत छनि जे यमुना के कारी, तीव्र गति सं चलैत अथाह पानि में डूबि क आत्महत्या क लेथि त कखनो होइत छनि जे जहर-माहुर खा प्राण के समाप्त क ली। हे निर्मोही कृष्ण कोना अहाँ मथुरा छोरि सबके ह्रदय दुखा सुग्गा जकां पिजरा सं बाहर निकलिते द्वारका चलि गेलौं? कनिकबोदरेग नहि भेल? अहि तरहे लोक अपन व्यवहार, संस्कार, संस्कृति सं सुग्गा आ अन्य चिरै-चुनमुन संग प्रेम आ सामंजस्य स्थापित केने अछि। हलांकि तथाकथित आधुनिकता, विज्ञान, विज्ञानक प्रयोग आ मनुष्य केर नित नूतन खोज एहि तरहक परम्परा के शनै शनै कमजोर केने जा रहल अछि। लोक सब अहि तरहक समंजस्य के बिसरल जा रहल अछि। ई कुनो अर्थ में निक बात नहि। सुग्गा आ मैनाक कथा ग्राम्य जीवन स समाप्त भेल जा रहल अछि आ किताब में सिमटल जा रहल अछि। खेत खरिहान, जंगल, पर्वत, पोखरि, गाछ सब खत्म भेल जा रहल अछि। सुग्गे नहि आरो चिरै-चुनमुन धीरे-धीरे अतितक वस्तु बनल जा रहल अछि।अगर संस्कृति के ओ स्वरुप जे सब के संगे चलबाक सामर्थ्य रखैत अछि समाप्त भ जैत त किछु नहि बचत।सब के एहि विषय पर गंभीरता स सोचबाक चाही आ संतुलन के सिद्धांत के मनबाक चाही। मैथिली लोकगीतमे कौआ सम्बाहक मैथिली लोकगीतक संसार अपूर्व संसार आ गीतक महासागर अछि। एहि महासागर केर हरेक गीत बेसकिमती सीपी जकां अछि जकर मूंह स्वातिक बूंद पेबा लेल खुजल छैक जाहि स ओ मोती बनि सकै। फेर ओ मोती समुद्रक कछेर में बालु आ अन्य वस्तुक ढेर में ओंघराएल अछि कुनो जौहरीक ताक में जे ओकरा गढि सकए तरासि सकए। मैथिली लोकगीत गंगा के अनेक आयाम छैक। सब आयाम के अपन महत्त्व। जखन लोकगीतक विस्तृत आ विशाल संख्या के देखैत छी त अनेक बिंदु दिस ध्यान जैत अछि। एहिना ध्यान एक गीतक अनुवाद करैत लोकगीत में कौआ के प्रयोग आ ओकर उपयोगिता दिस चलि गेल। लोकगीत में कौआ के मानवीकरण क नायिका के द्वारा कौआ के विभिन्न तरह स प्रयोग कैल गेल अछि। प्रचलित व्यवहार में कौआ के प्रति लोकक विश्वास पर गेल। अदौं सं लोकधारा में कौआ मनुखक खाश क महिला एवं बच्चा सबहक पल-पल केर मित्र बनल अछि। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र इथनोग्राफर छथि, आ तंए पाब्लो नेरुदाक ई पद्य हुनका पसिन्न छन्हि/ ऐ आलेखक बीच ऐ पद्यक आनन्द आर बढ़ि जाएत/ Pablo Neruda "You start dying slowly" You start dying slowly; if you do not travel, if you do not read, If you do not listen to the sounds of life, If you do not appreciate yourself. You start dying slowly: When you kill your self-esteem, When you do not let others help you. You start dying slowly; If you become a slave of your habits, Walking everyday on the same paths… If you do not change your routine, If you do not wear different colours Or you do not speak to those you don’t know. You start dying slowly: If you avoid to feel passion And their turbulent emotions; Those which make your eyes glisten And your heart beat fast. You start dying slowly: If you do not risk what is safe for the uncertain, If you do not go after a dream, If you do not allow yourself, At least once in your lifetime, To run away..... You start dying Slowly!!! Love your life Love yourself...``` अपना स सिनेह करू, अपना के सम्मान करू सदिखन पाब्लो नेरुदा मैथिली अनुवाद : डॉ. कैलाश कुमार मिश्र पाब्लो नेरुदा स्पेन के कवि छथि। साहित्य में योगदान हेतु हिनका नोबेल पुरस्कार भेटल छनि। अहाँ नहु-नहु मरै छी यदि अहाँ यात्रा नहि करै छी अहाँ अध्ययन नहि करै छी अहाँ जीवनक स्वर के नहि सुनै छी यदि अहाँ अपना गुणक स्वयं ग्राहक नहि छी अहाँ नहु-नहु मरै छी... जाहि घडी अहाँ आत्म-विश्वास के खून क दैत छी जखन अहाँ ककरो स मदतिकेर आशा नहि रखैत छी अहाँ नहु-नहु मरै छी.... एकहि रस्ता पर प्रतिदिन चलैत ..... जखन अहाँ अपन आदति के दास भ जैत छी यदि अहाँ अपन दैनन्दिनी के नहि बदलै छी बिभिन्न रंगक परिधान नहि पहिरैत छी किम्बा अहाँ कुनो अनजान मनुख स बातचीत नहि करैत छी अहाँ नहु-नहु मरै छी.... यदि अहाँ जीवन में उत्साह आ त्वरित आवेग दिस उदास भ रहल छी जे अहाँक आंखि के दिव्य आ झलकैत आ ह्रदय गति के तीव्र बनबैत अछि अहाँ नहु-नहु मरै छी.... अगर अहाँ जीवन में कम स कम एक बेर अनिश्चित के सुरक्षित करबाक हेतु जोखिम के स्वीकार नहि करैत छी सपना के साकार करवाक प्रयास नहि करैत छी सब जिम्मेवारी स भगबाक हेतु ..... अहाँ नहु-नहु मरै छी.... अपन जीवन स सिनेह करू अपना आप सं सिनेह करू...... विभिन्न प्रकारक जानवर आ चिरै-चुनमुन केर अति प्राचीन समय सं मनुखक जीवन स नाता रहल छैक। मैथिली लोकगीत में चिड़ई-चुनमुन के प्रति प्रेमक अद्भुत वर्णन आ प्रेमाधिक्य देखल जा सकैत छैक। चिरै-चुनमुन कुन क्षण मनुखक जीवनक अभिन्न अंग बनि जैत अछि पते नहि चलैत छैक। भोजन बनबैत काल चिरै-चुनमुन आ जानवर लेल पहिल कौर माय राखि दैत छली। सामूहिक अवसर के निमित्त भोज-भात में भोजन बनबए स पूर्व चिरई-चुनमुन लेल पहिल कौर एखनो निकालि देल जैत अछि। काक़ भुशुंडी त कौआ छला जे पक्षीराज गरुड़ के रामकथा पहिने सुना देने छलथिन। अहि बातक वर्णन बाल्मीकी के रामायण आ तुलसीदास केर रामचरितमानस में भेटैत अछि। भगवान शिव पार्वती सँ कहैत छथिन: "कि हम जे सुंदर कथा अहाँ के सुनेलौ अछि ओहि कथा के काक़ भुशुंडी गरुड़ के सुना चुकल छथि। नारद केर ज्ञान सँ भगवान राम के नागपाश सँ मुक्त कए गरुड़ ज़खन अपन धाम घुरैत रहथि त एकाएक हुनकर मोन में एक शंका उत्पन्न होईत छनि कि केहेन भगवान छथि राम जे एक तुच्छ राक्षस द्वारा फ़ेकल नागपाश में बन्हा गेला? गरुड़ एहि शंका केर समाधान ऋषि नारद सँ पुछला। नारद अहि शंका के समाधान बतेबा में असमर्थ छथि। नारद गरुड़ के ब्रह्मा लग भेज दैत छथिन। ब्रह्मा जी सेहो अहि शंका के समाधान बतेबा में असमर्थ छला। आब ब्रह्माजी गरुड़ के महादेव लग पठा देलथिन। महादेव कहलथिन: "भगवानक माया बतेनाइ असम्भव अछि। एक चिरै दोसर चिरै के ठीक सँ बुझा सकैत छैक ताहि अहाँ काक़ भुशुंडी लग जाऊ। वैह अहाँ के सब बात नीक स बुझा देता। आ अंतत जखन गरुड़ काक़ भुशुंडी लग गेलाह त काक़ भुशुंडी अपन अद्भुत वैदुश्य के परिचय दैत गरुड़ के पूरा रामायण के कथा समझा देलथिन। ई कथा कौआ के बुद्धिमान प्रमाणित करैत अछि संगहि मानव मोन में चिरै-चुनमुन संगे गूढ़ बात के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार के सेहो प्रमाणित करैत अछि। चिरै-चुनमुन आ कौआ केर मनुखक जीवन में महत्त्व के सब स उत्तम उदाहरण विष्णु शर्मा द्वारा रचित कालजयी रचना पंचतन्त्र अछि। प्राचीन भारत में गुरुकुल जंगल में होइत छल। गुरु अपन शिष्य के प्राकृतिक वातावरण में राखि ओकरा प्रकृति आ प्रकृति के अवयव जे गाछ-बृक्ष, चिरै-चुनमुन, जड़ी-बूटी, नदी-नाला, झरना, पोखरि, पहार, वन्यजीव आदिक जानकारी दैत छलथिन आ ओकरा संग कोना तारतम्य स्थापित हो से गुण सिखायल जैत छलैक। विष्णु शर्मा त चिरै-चुनमुन आ वन्यजीव के मानवीकरण कए पूरा पंचतन्त्र केर निर्माण बच्चा के ज्ञान विकसित करबा लेल क लेला। बात पंचतन्त्र के क रहल छी आ प्रसंग कौआ के अछि त पंचतन्त्र केर एक कथाक उल्लेख करब अनिवार्य बुझना जा रहल अछि जकर सम्बन्ध कौआ स छैक। कथा किछु ऐना छैक: बहुत पहिने एक झमटगर बर कौआ सबहक राजधानी छल। हजारो के संख्या में कौआ ओतए कागराज मेघवर्ण संग रहैत छल। बरक गाछ एक पहाड़ी रहैक जाहि में असंख्य गुफा रहैक। ओहि गुफा सब में उल्लू सब रहैत छल। उल्लुक राजा अरिमर्दन छल। अरिमर्दन पराक्रमी छल। कौआ सब के ओ अपन सबस पैघ दुश्मन बूझैत छल। कौआ स ओक़रा अतेक घृणा रहैक जे बिना कौआ के वध केने ओ भोजन तक नहि करैत छल। ज़खन बहुत संख्या में कौआ मरए लगलैक त मेघवर्ण बड्ड चिंतित भेल। अहि विषय पर विचार करबाक हेतु मेघवर्ण कौआ सभक एक बैसार केलक। मेघवर्ण बाजल: "हमर प्रिय कौआ सब, अहाँ सबके त बुझले अछि जे बेर-बेर उल्लू के आक्रमण केर कारण अपन सभक जीवन असुरक्षित भ गेल अछि। अपन सभक शत्रु शक्तिशाली आ एक नम्बर केर अहंकारी सेहो अछि। अपना सब पर रातिक हमला करैत अछि किएक जे अपने सब रातिक देखि नहि सकैत छी। हमर सभक विवसता ई अछि जे हमरालोकनि दिन में जवाबी आक्रमण नहि क सकैत छी कारण जे उल्लू सब गूप्प अनहार गुफ़ा में सुरक्षित बैसल रहैत अछि। ई कहि मेघवर्ण चतुर आ ज्ञानी कौआ सब स अपन-अपन सुझाव देबाक़ निवेदन केलक। एक डरपोक कौआ बाजि उठल: "हमरा सबके उल्लू सँ समझौता क लेबाक चाही। ओ सब जे कुनो शर्त रखैत छथि ओक़रा स्वीकार क लेबा में अपन सभक हित अछि। अपना स चफ़्फ़र शत्रु सँ बेर-बेर पराजित हेबा में कुन फ़ायदा?" अहि बात के काँव-काँव कए बहुत कौआ सब विरोध केलक। एक कौआ चिचियाएल: "हमरा सबके अहि दुष्ट सब स किन्नहुँ बात नहि करक चाही। सब गोटे उठु आ चढ़ाई करु।" एक निराशावादी कौआ बाजल: "शत्रु शक्तिशाली अछि। हमरासबके ई स्थान छोड़ि कतौ आर चलि जेबाक चाही।" एक बुझनुक़ कौआ बाजल: “अपन घर छोड़नाई ठीक नहि रहत। अगर हम सब अतए सँ चलि गेलौ त कतहुँ के नहि रहब। बिलकुल टुटि जाएब। अपना सब के एतहि रहि आरों चिरै सब सँ मदति लेबाक चाही जाहि सँ एकर समाधान भ सकय”। स्थिरजीवी ओहि कौआ सभ में सब सँ चतुर आ बुद्धिमान छल जे चुप चाप बैसल सभक तर्क ध्यानमग्न भ सुनि रहल छल। राजा मेघवर्ण ओक़रा दिस मुखाकृति भेला आ कहलथिन, "परमज्ञानी स्थिरजीवी, अहाँ चुप छी? हम अपनेक विचार जानए चाहैत छी।" स्थिरजीवी बाजल: “महाराज, हमर सोचब अछि जे शत्रु अधिक बलशाली हो त छलनीति के सहारा लेबाक चाही”। "केहेन छलनीति? कनि स्पष्ट करु, श्रीमंत स्थिरजीवी।" कागराज बजला। स्थिरजीवी: "अहाँ हमरा ऊँच-नीच कहु आ हमरा पर जानलेवा हमला करू।" मेघवर्ण अकचकेला, "ई अहाँ की बाजि रहल छी स्थिरजीवी?" स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण बला ठाढि पर गेला आ कान में कहलथिन, "छलनीतिक हेतु हमरा ई नाटक कर पड़त। अपना सबके अग़ल-बग़ल के गाछ सब पर उल्लू जासूस अपन सबहक़ सभाक सब क्रिया-कलाप के देख रहल अछि। ओक़रा सबके देखाक अपना सबके आपसी फूट आ फ़सादक नाटक करए पड़त। ओक़र बाद अहाँ सब कौआ के लक' ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँच हमर प्रतीक्षा करु। हम उल्लूक दल में शामिल भ ओकर सबहक़ विनाश केर समान एकत्रित करब। घरक भेदी बनि लंका डाहि देबाक़ व्योंत करब।" फेर की छल। नाटक शुरू भेल। स्थिरजीवी चिकरैत बाजल: “हम जेना कहैत छी तेना कर राजा, राजा केर बच्चा। किएक हमरा सब के मारबाब' पर तुलल छैं?” मेघवर्ण गरजल: "ग़द्दार, राजा सँ एहेन बदतमीजी बला भाषा में आ सहो ज़ोर सँ तोरा बज़बाक हिम्मत केना भेलौक?" अनेक कौआ एकहि संगे चिचियैत बाजल: "अहि ग़द्दार के जान सँ मारि देल जाओ महाराज।" आब राजा मेघवर्ण अपन पंख सँ स्थिरजीवी के कनपट्टी में धेले चमेंटा मारैत ठाढि सँ नीचा खसा देलथिन आ तुरंत घोषणा केला की "हम ऐ ग़द्दार स्थिरजीवी के तुरंत के प्रभाव स कौआ समाज सँ बहिष्कृत क रहल छी। आब एखन सँ कुनो कौआ अहि अधम सँ कुनो तरहक़ नाता नहि राखत। ई हमर आज्ञा अछि।" अग़ल-बग़ल के गाछ पर नुकाक बैसल उल्लू जासूस के आँख़ि ख़ुशी स चमकि उठल। जासूस सब तुरंत उल्लू के राजा के संवाद देलक जे कौआ सबमें फूट पड़ि गेल अछि। मारि-पीटक संग-संग गारि-गरौअल भ रहल छैक। अतेक बात सुनितहि उल्लूक सेनापति राजा के सम्बोधित करैत बाजल: "महाराज, यैह मौक़ा अछि कौआ सब पर आक्रमण करबाक हेतु। अहि समय में हम सब ओक़रा सबके आसानी सँ हरा देबैक़।" उल्लू सम्राट अरिमर्दन के अपन सेनापति के बात नीक लगलैक। ओ तुरंत आक्रमण केर आदेश द देलक़ैक़। फेर की छल हज़ारों केर संख्या में उल्लूक सेना बरक गाछ पर आक्रमण करक हेतु विदा भेल। यद्यपि ओतए एकौ टा कौआ नहि भेंटलैक। भेटबो कोना करितै? योजनाक अनुसार मेघवर्ण सब कौआ के ल क ऋष्यमूक पर्वत दिस कूच क गेल छल। खाली गाछ देखि उल्लूक राजा थूक फेकैत बाजल: “हम्मर सबहक सामना त की डरे कौआ सब भागि गेल। एहेन काएर पर एक हज़ार बेर थू-थू।” सब उल्लू जीतक मद में मातल ‘हू-हू’ के आवाज निकालि अपन जीतक घोषणा करए लागल। नीचा में जमीन पर झाड़ झंखाड़ में खसल स्थिरजीवी कौआ ई सब ध्यानपूर्वक देख रहल छल। स्थिरजीवी कांव-कांव केर आवाज़ निकाललक। ओकरा देखते मातर जासूस बाजि उठल: “अरे, ई त वैह कौआ अछि जकरा एकर राजा धक्का दए माटि पर खसा देने रहैक आ अपमानित करैत रहैक।” उल्लूक राजा सेहो ओतय आबि गेलैक ओ पूछलकैक: “तोहर एहेन दुर्दशा केना भेलह?” स्थिरजीवी बाजल “हम राजा मेघवर्णक नीतिमंत्री छलहु। हम ओकरा एक नेक सलाह देलयैक जे आई-काल्हि उल्लू सबहक नेतृत्व एक अति पराक्रमी राजा क रहल छथि। हमरालोकनि के उल्लू सबहक अधीनता स्वीकार क लेबाक चाही। हमर बात सुनि राजा मेघवर्ण तामसे लाल भ गेल आ फटकारलक, दूतकारलक, एवं अपमानित कए कौआ समाज सं निष्कासित क देलक। हे महाराज, हमरा अपन शरण में ल लीय।” उल्लूराज अरिमर्दन आब गहन सोच में पडि गेल। ओकर नीति सलाहकार कान में कहलकै “राजन, शत्रुक बात पर कखनो भरोसा नहि करक चाही। ई अपन सबहक़ शत्रु थिक। एकरा जान स मारि देल जाए।” एक चापलूस मंत्री बाजल “नहि राजन! एकरा नहि मारल जाए। एहि कौआ के बल्कि अपना दल में राखि लेबा में अपना सबके फायदा अछि. ई कौआ सबहक घरक भेद समय-समय पर बतबैत रहत।” राजा के सेहो भेलैक जे स्थिरजीवी के उल्लू सबहक साथ मिला लेबा में लाभे-लाभ अछि. ई सोचि उल्लूक झुण्ड स्थिरजीवी कौआ के अपने संगे लेने गेल। ओतए अरिमर्दन अपन उल्लू नौकर-चाकर के निर्देश दैत बाजल, “स्थिरजीवी के गुफा के शाही अतिथि कक्ष में रहबाक व्यवस्था कैल जै। हिनका कुनो तरहक कष्ट नहि होबाक चाही।” चतुर स्थिरजीवी कौआ हाथ जोड़ैत बाजल: “महाराज, अपने हमरा शरण देलहु, हमरा लेल ई बड्ड पैघ बात अछि। हमरा अहाँ अपन शाही गुफ़ा के बाहर एक पाथर पर एक सेवक जकां रह देल जाओ। हमर इच्छा अछि जे एतहि बैसक हम अहाँक गुणगान करैत रही।” एहि तरहें स्थिरजीवी शाही गुफ़ा के बाहर डेरा जमा लेलक। गुफ़ा में नीति सलाहकार एकबेर पुनः राजा के सावधान करैत कहलकैक: “महाराज, शत्रु पर कखनो विश्वास नहि करक चाही। शत्रु के अपन घर में शरण देब आत्महत्याक सामान अछि।” घमंडे मातल उल्लू सम्राट अरिमर्दन अपन नीति सलाहकार के दिस आंखि तरेरैत बाजल: “तों हमरा जादे नीति बुझाबए के कोशिश नहि कर। अगर तोरा ई लगैत छौ जे तोरा उचित सम्मान नहि भेट रहल छौक त तों अतए सं जा सकैत छै।” नीति सलाहकार उल्लू हारि मानि आब अपन दू-तीन मित्रक संग ओतय सं ई कहैत विदा भ गेल: “विनाशकाले विपरीत बुद्धि।” किछु दिनक बाद स्थिरजीवी अगल-बगल स लकड़ी अथवा काठी इत्यादि आनि गुफ़ा के द्वार लग एकत्रित करे लागल। कहला पर बाजल: “सरकार सर्दी आबै बला छैक। हम काठ आ झांखर सबहक फुसही मडैया बनबै चाहैत छी ताकि जार सं बचि सकी।” शनैः-शनैः लकड़ीक बड्ड पैघ ढेर जमा भ गेलैक। एक दिन जखन सब उल्लू सुति रहल छल तखन स्थिरजीवी उडिक सोझे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुचल। ओतए योजना के अनुसार मेघवर्ण सब कौआ संग ओकर प्रतीक्षा क रहल छलैक। स्थिरजीवी बाजल: “आब अहाँ लोकनि समीप के जंगल सं जतए आगि लागल छैक एक-एक जरैत लकड़ी अपन-अपन चोंच में उठा हमरा पाछा-पाछा आउ।” समस्त कौआक सेना अपन-अपन चोंच में जरैत लुकाठी लेने स्थिरजीवीक पाछा-पाछा उल्लूक गुफ़ा में आबि गेल। स्थिरजीवी द्वारा एकत्रित कैल लकड़ीक ढेर में आगि लगा देल गेलैक। एक-एक टा उल्लू या त जडि क मरि गेल अथवा दम घोटला सं मरि गेल। कागराज मेघवर्ण स्थिरजीवी के योजना आ चातुर्य सं गद-गद होइत ओकरा कौआ रत्नाक उपाधि सं सम्मानित केलक। पंचतन्त्र केर ई कथा एहि बात के प्रमाणित करैत अछि जे चिड़ई-चुनमुन मनुखक जीवनक अभिन्न अंग जकां थिक। एकरा सब स सीख लेल जा सकैत अछि आ तारतम्य स्थापित क जीनाई निक। अर्थ भेल जे अपन लोक समाज आ व्यवहार ई कहैत अछि जे एकरा सब स प्रकृति में सामंजस्य स्थापित करू। एक दोसरक बिना जीवन अपूर्ण अछि। पशु आ चिरै स तारतम्य स्थापित केने लाभ। हलांकि एखन किछु वर्ष स ई सुनबा में आबि रहल अछि जे कौआ हेंजक-हेंज में मरि रहल अछि। मोन एहि तरहक बात सुनि आहत होइत अछि। कौआ त पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी थिक आ सैह मरि रहल अछि तखन पर्यावरण के की हैत? आब लोकगीत पर अपन ध्यान केन्द्रित करी। माय अपन बच्चा के मुँह में कौर दैत काल भांति-भांति के चिरई सब स सम्बन्ध जोड़ैत कहैत रहैत छथि ले बौआ ई कौर कौआक छौ; ई कौर मैनाक छौ, आदि-आदि। कदाचित एहि तरहे सामाजिक रुपे हमरालोकनि चिरै-चुनमुन स एक मानवीय सम्बन्ध बना लैत छी। चिरै केवल चिरै नहि अपितु, भाई, बहिन, सखा आ सम्बन्धी बनि जैत अछि। एकटा नेनाक गीतक किछु पंक्ति देखु: मेना के बच्चा चिरैया गे दू टा जामुन खसा लाली खसैबए त मारबौ गे दू टा कारी खसा तू छै बहिन तोहर हम भैया जौ ने खसेलें त बुझि ले दैया मारब खुआ तोरा जहर गे दू टा जामुन खसा मेना के बच्चा चिरैया गे दू टा जामुन खसा।। काली कान्त झा “बूच” अपन कविता “दीनक नेना” जे गीत सेहो कहल जा सकैत अछि में कौआ के सम्बाहक जकां प्रयुक्त करैत छथि। एहि गीत में कवि एक गरीब माय जकर पति बाहर कमेबा लेल गेल छैक, घर में ने अन्न ने ढउआ छै। छोट दुधपीबा बच्चा कखनो चाकलेट, कखनो बिस्कुट त कखनो कुनो आरो वस्तु लेल माय स जिद्द करैत छैक आ कनैत छै। लाचार माय एक कौआ के कुचरैत देखैत छैक आ ओकरे सहारा लए अपन कनैत होरिला के गीत सुना बौंसबाक प्रयत्न क रहलि छैक। बौआ देखु-देखु, ई क़ुआ गाबि रहल अछि। ई तोरे कुचरि क सुना रहल छौ रे बाऊ। तों ओसारा के बीच में सुतल छै आ ई कौआ पूब दिस तोरा देखि ख़ुशी स नाचि रहल अछि। अते सुन्नर पुरबा बसात जेना कौआ के नाचब लेल आ तोरा मस्त करक लेल बसातक छनन-छनन लहरि सं बाँसुरी बजा रहल छौक। रे बौआ तोहर जन्म निर्धन घर में भेल छौक ताहि तोरा लेल बिस्कुट आ चाकलेट बनले नहि छौक। बिसरि जो एहि वस्तु सबके। तोहर गोलगर पेट नोन रोटी सं भरि जाऊ त भाग्य! लेकिन, चिंता के कोन बात? बसातक धुन आ कौआक मस्त भ नाचब मधुर बातक स्वरलहरी तोरा लेल तैयार केने छौ। अनका थोरे ने ई भाग्य छैक? तोहर पिता परदेसिया छौ रे बाऊ। कतेक दिन भ गेल मुदा निरमोहिया कुनो चिट्ठियों नहि भेजलक अछि! ई कोनो बात भेलै, कह ने? केना एहि अवस्था में ई कौआ अपन कुचरब सं आ बसातक झोंका अपन मधुर धुन स तोहर नींद स झकमैत माय के टीस जगा रहल छौक! रे नेना! तों की बुझबैं जे गरीबी ककरा कहै छैक? श्रमजीवी के सपनों में सुख नहि लिखल छैक। बेचारा श्रमजीवी अपने त अन्हार घर में डिबिया जरा क राति बीतबैत अछि आ अपन परिश्रम सं समस्त नगर के जगमग करैत अछि। देख ने कोना ई हुलसगर बियनि अपन नहु-नहु मिठगर बसात सं तोरा सुता रहल छौक! निनियारानी, झटकि क बौआ लग आउ ने! बौआ के सुताउ ने! रे सोन, तों बिना वस्तु सब खेने उपासल छै। हम ग्लानि सं मरल जा रहल छी। मुदा हम छी लाचार करू त की करू रे बौआ?” मूल गीतमय कविता कनि देखू: देखहीं रौ बौआ, ई कौआ गवै छौ। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। एम्हर तों सूतल छे माँझे ओसार पर ओम्हर ओ नाँचै पुवरिया मोहार पर पुरबा वसात बाँसुरी बजवै छौ.........। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। तोरा लय बनलौ ने बिस्कुट आ चाकलेट नोनो रोटी सं भरतौ ई गोल पेट बातक मधुर स्वरलहरी अबै छौ .....। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। बापे तोहर बनलौ परदेशी चिट्ठी ने एलौ भेलौ दिन वेशी माँ केर निनायल व्यथा जगबै छौ। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। की बुझबैं ककरा कहै छै गरीबी सपनो में सुख नहि जतऽ श्रमजीवी लुत्ती लगाकऽ नगर बसबै छौ.......। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। कोरा में तोरा सुताबै छौ बिनियाँ झटकल औ अविहें रौ नूनूक निनिया तोहर उपास हमरा लजबै छौ सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। कौआ मिथिला में दू प्रकारक पैल ज़ैत अछि सामान्य कौआ आ कार कौआ। दुनू के अपन-अपन स्थान मैथिल समाज आ लोक परम्परा में छैक। कार कौआ अशुभ के सूचना दैत अछि । आ सामान्य कौआ शुभक संकेत। दुनू जे बजैत अछि तक़रा लेल अलग-अलग शब्द छैक। कार कौआ "डकै" छै आ सामान्य कौआ "कुचरै" छै। ड़कनाई अशुभ के सूचक आ कुचरनाई शुभक सूचक। किछु लक्षण छैक जाहि स ई पता चलैत छैक जे कौआ के कुन परिस्थिति में बेसब, उठब, कुचरब शुभ आ कोन परिस्थिति में अशुभ केर सूचना दैत अछि। कौआ जखन घरक चार अथवा आंगन में कुनो ऊँच चीज़ पर चढिक कुचरे त कहल जैत छैक जे ई शुभक संकेत अछि; संगहि घर में कियोक पाहून एता कतेको बेर एहि तरहक बात सत्य भ जैत अछि। यदि कौआ घरक छत (अथवा चार) अथवा आंगन में हरियर गाछ पर बैसए त हेरायल वस्तु भेटब निश्चित बुझु। एहन स्थिति में कोर्ट कचहरी में दबदबा बनैत छैक आ मुक़दमा में जीत हासिल होइत छैक एवं धन-धान्य में बृद्धि होइत छैक। कौआ अगर बखारी, अन्नक ढेर आदि पर बैसय त धनक लाभ होइत छैक। गाय केर माथ पर कौआ बैस गेल त प्रियजन सं भेट हेबेटा करत। एहो मान्यता प्रबल अछि अपन मैथिल समाज में कि अगर कौआ सुखैल मांटि किंवा गर्दा में ओंघराए लागल त एकर अर्थ ई भेल जे प्रचुर मात्र में वर्षा हैत। एहि सबहक बिपरीत कौआ जों कुनो सुखैल गाछ पर बैस क कुचरि रहल हो त ई कुनो महामारी फैलबाक पूर्व सूचना थिक। अगर ककरो माथ पर कौआ अपन चोंच स हड्डीक टुकड़ी खसा दैक त ओहि व्यक्ति के मृत्यु निश्चित बुझु। मैथिली लोकगीत महाकवि विद्यापति के बिना अपूर्ण अछि। एक विरही नायिका जकर पति परदेस गेल छैक केर वेदना आ केना ओ कौआ के अपन समदिया बनबैत अछि, केना ओकरा लोभबैत अछि इत्यादिक बहुत सुन्नर वर्णन महाकवि निम्न लोकगीत में करैत छथि: मोरा रे अंगनमा चनन केर गछिया ताहि तर कुरुरै काग रे। सोने चोंच तोहें बांधि देबौ बायस जौं पिया अओता आजु रे। गाबह गाबह सखि लोरी झूमरि मदन अराधन जानु रे। चहुं दिसि चंपा मेहुलि फूललि चंद्र इजोरिया राति रे। कोना कए हम मयन अराधब होयत बड़ी रतिसाति रे। पांक समय कागा केओ ने अपन हित देखल आंखि पसारि रे। विद्यापति कविवर इहो गाबए तोकें अछि गुनक निधान रे। राव भोगीसर सब गुन आगर पदमा देवी रमान रे।। एहि गीतक संक्षेप में अर्थ ई भेल जे हमरा आंगन में चानन केर गाछ अछि आ ओई गाछ के ठाढि पर एगो कौआ बैसल कुचरि रहल अछि। ई निश्चित रुपे शुभ समाचार केर लक्षण थिक। हे कौआ, अगर आई हमर प्रियतम आबि गेला त हम तोहर चोंच सोन स मढ़वा देबौ। आउ हे सखी बहिनपा सब, सब मिलि झूमर गाउ। आई हम प्रेमक आराधना कर जा रहल छी। चारु दिस चंपा आर भालसरी के फूल फुलाएल अछि। मुदा ई पूर्णिमाक राति? कोना हम कामदेवक आराधना क’ पैब। कारण जे एहि मिलनक सबस पैघ उपहार त कामदेवक आराधने हेतनि। सुन कौआ, खराप समय में कियोक अपन नहि होइत छैक। ई बात आंखि खोलि क देखि चुकल छी। कवि विद्यापति कहैत छथि हे सुन्नरी, अहाँक प्रियतम गुणक खान छथि। जेना राजा भोगेश्‍वर छथि आर जे पद्मा देवी के साथ रमण करैत छथि। जाहि समय में आवागमन के सुविधा अतेक उन्नत नहि रहैक ताहि क्षण में कौआ के लोक खाश तौर पर स्त्रिगन आ नेना सब कहौतिया बूझैत छल। नायिका निवेदन करैत छथि जे आउ आ हमर अंगना में कनि कुचरू। अहांके हमर आंगन में स्वागत अछि। हम हम अहाँ के पानि स स्वागत करब, बेसबाक लेल पीढ़ी देब आ अगर अहाँ के कुचरला सं हमर प्रियतम कहीं आबि गेला त ओ जे कोनो सनेश अनता ताहि में पहिल हिस्सा अहींके देब। एतबे नहि, अगर हमर प्रियतम परदेसी आबि गेला त हम अहाँ लेल कंगना सनेश बनाएब। अहाँ चिंता नहि करू। हमर बात पर विश्वास करू। हमर हितग्राहक बनु आ आउ आ हमर अंगना में कुचरू। कनि देखू एहि गीत के: हे रे कौआ कुचरि बैस अंगना में। पानि देबौ पीढ़ी देबौ। पहिलुक सनेश हम तोरे देबौ। जौं प्रियतम परदेसी औता। तोरा सजैब हम कंगना में। हे रे कौआ कुचरि बैस अंगना में। अगर कुनो महिला आ नवकनिया कनि ताम-झाम वाली छैथ आ हुनकर दिमाग सातम असमान पर चढ़ल छनि। हरेक चीज़ भोजन स पहिरन धरि में नखरा छनि तकर अलगे बात! मूह-कान कुनो खाके सन मुदा घमंड ऐना जेना विश्वसुन्दरी होथि। यथार्थ में हुनकर मुह कौआ सनहक छनि। कमेंट हुनका पर छोटगर अछि ओहो गीतक रूप में। कनि देखी: कौआ सनहक़ कारी आ बाकूला सनहक़ ठोर। बैसल-बैसल चाही हिनका दाली भात तिलकोर। हमही सबस सुन्नरि छी आ हमरे सुन्नर दूल्हा। सासु कियैक नहि भानस करती नहि फूकब हम चुलहा।। ग्राम्यांचल में कौआ के कुचरब भोर होमाक सूचक अछि। नायिका के नायक कहैत छथिन जे कौआ बजलक आ भोर भ गेल; भोर भेल त नगर भरि में शोर भ गेल. आब कतेक काल सुतब? यै फलां बौआ के माय उठू ने! ऐना कोना चलत दिन? चलू आब नित्यकर्म में लागि जाई। कौआ जगलै भेलै भोर भेलै भरि नगरी में शोर आबो जागू यै बौआ के माय। माय अपन कनैत बच्चा के कौआके नाम लै सूतक हेतु तैयार करैत छथि। लोरी जकां कौआ के गीत में पात्र बना कनैत नेना के सुतबैत छथि। बौआ सुति रहू देखू-देखू आकाश में केना कौआ उडि रहल अछि। चिंता नहि करू अहाँक पिताजी जखन आबए लगता त पटना स अहाँ लेल ढ़ौआ लेने एता। चुप रहु चुप रहु बौआ आकाश में उड़ई अछि कौआ एयता बाबू पटना स लेने औता ढ़ौआ। चैताबर में नायिका के टीस आ कौआ दुनु के मेल देखल जा सकैत अछि। नायिका के आंगुर में सांप डसि लेने छैक. शायद विरह के डंक? अपन ननदि सं नायिका कहैत अछि जे के ओकरा लेल वैद बजा आनत? के ओकर पीड़ा के समाप्त करत? के ओकरा लेल पलंग के ओछायन तैयार करतै; नायिका के प्रियतमके के बजा अनतै हो राम? नायिका के पिता वैद बजेथिन, और माय पीड़ा मिटेथिन; ननदि पलंग पर ओछायन तैयार करथिन; देबर पिया के बजा अनथिन। नायिका कौआ स निवेदन करैत कहैत छथिन जे रे कौआ तोरा हम दही आ चूडा के भोज खुआ देबौक अगर हमर समाद के हमर प्रियतम तक लेने जयबै। आब कनि कौआ के मानवीकरण देखु, कौआ नायिका के कहैत अछि “ठीक छै हम तोहर समाद तोरा प्रियतम लग ल जेबौक मुदा एकटा समस्या अछि। हम तोहर प्रियतम के नहि जनैत छी फेर कोना तोहर समाद देबैक?” आब नायिका कौआ के अपन प्रियतम के हुलिया बतबैत कहैत अछि: “हमर प्रियतम के पातर-पातर डाँर छनि आ घरक दरबज्जा पर चानन केर गाछ छनि।” आब कौआ सहर्ष नायिका के समाद ल क ओकर प्रियतम लग जएबाक लेल तैयार भ जैत अछि। अंगुरी में डसलक नगिनियाँ हो रामा के मोरा जायत बैद बजाएत के मोरा हरत दरदिया हो रामा। के मोरा जाएत पलंगा ओछाएत के मोरा पिया के बजाएत हो रामा। बाबा मोरा जाएत बैद बजाएत अम्मा मोरा हरत दरदिया हो रामा । ननदि मोरा जाएत पलंगा ओछाएत दिओर मोरा पिया के बजाएत हो रामा देबऊ रे कागा दही-चूड़ा भोजन हमरो समाद नेने ज़ाह हो रामा। तोहरो बलमुजी चीन्हियो ने जानियौ कोना समाद नेने जाएब हो रामा। हमरो बलमुजी के मुठी एक डाँर छनि दुअरे चनन केर गछिया हो रामा।। आब कनि सोहर दिस चली. बिना सोहर के मैथिली लोकगीत कहेन? एक सोहर में नायिका जे गर्भ सं अछि कोना अपन भावना के व्यक्त क रहल अछि। संतान केर कामना में व्याकुल नायिका हरेक आगंतुक के सूचना देमए बला कौआ के चोंच के सोन स मढबाक अश्वासन दैत अछि आ अपन जानि बड्ड सिनेह स कौआ के कहैत अछि कि हे कागा अगर हमर अंगना में तोहर कुचरब शुभ सिद्ध भ गेल – आ यदि हमर परदेसी प्रियतम घर आबि जाथि त हमर बांझपन ख़तम भ जायेत। आ से भ गेल त हम तोहर चोंच के सोन स मढ़ा देबह। जों मोरा कगबा रे पिया अयताह होरिला जनम लेत रे। कगबा सोन में मढएबो दुनू लोल त बोलिया बर सोहाबन रे। चुपे रहू चुपे तिरिया जनिअ करू रोदन हे। तिरिया आजुए आओत घरबइआ बझिनिया पाप छुटत हे।। दोसर सोहर में नायिका के संतान प्राप्ति में आब देर नहि छैक। कखनो ई शुभ सूचना आबि सकैत छै। आब छठिहार में ककरा-ककरा सूचित कैल जाय आ निमंत्रित कैल जाय ताहि पर पति आ पत्नी में बात भ रहल छैक। होरिला के जनम भेल छैक से सूचना त कौआ ने देतैक? सगुन केर नौत त काग ने भाखत। हाँ जी हाँ. नायिका अपन पति के चिढ़बैत कहैत छथि जे दियाद आ लोक आ समाज के नौत त जैत मुदा हे पिया हम अहाँ बहिन के नहि नोतब कारण जे अहाँक भागिन नहि आबि पेता। कौआ के सगुनिया बनेबाक विधान सरिपहु बड्ड सोहनगर लगैत छैक। आरे-आरे कागा सगुनिया सगुन नौत भाख़ब रे कागा रे मोर घर उचित कल्याण कहाँ-कहाँ नौतब रे । दर जे नोतब दिआद लोक आओर समाज लोक रे। पिया हे आहाँक बहिन नहि नोतब कि भागिन कहाँ आओत रे।। एक विरह गीत में नायिका केर बेहाल हालक दारुण व्यथा व्यक्त कैल गेल अछि। तमाम चिड़ई जाहि में कागा सेहो सम्मिलित अछि गाछक डारि बैस गेल अछि। प्रात भ चुकल अछि आ प्रात होइतहि नभ मंडल में सूर्य केर लालिमा छटकि रहल छैक। नायिका अपन सखी के संबोधित करैत कहैत छथि “हे सखी, हमर प्रेमक पियास कोना मेटत? हम त विरह वेदना में तडपि-तडपि क दिन आ राति काटि रहल छी. राति बीत गेल; हम बेर-बेर चारू कात चकुयैल देखैत छी मुदा हे सखी, एखन धरि हमर पिया कहाँ अएला? खग उड़ि बैसल तरुवर डाली भेल गगन में प्रात सुलाली हमर पियास मेटत कोना सजनी तडपि-तडपि बितए दिन-रजनी रैन बितल मोरा पिया नहि आएल रहि-रहि चहुँ दिश ताकल सजनी।। मैथिली लोकगीतक सब सं सुन्दर रूप तखन द्रष्टिगोचर होइत अछि जखन कौआ संग-संग दोसर जंतु के सेहो मानवीकरण कए ओकर श्रृंगार आ प्रेम भाव के गीतक माध्यम सं व्यक्त कैल जैत अछि। एहि तरहक उदाहरण में सब सं सुन्नर उदाहरण विषहरि आ कौआक थिक। एक विषहरिक गीत में एहेन स्थिति अबैत छैक जे विषहरि के अंगूठी कौआ आ सोनक ग्रीमहार चिलहोरि ल क भागि गेलनि। आब विषहरि कानए लगली। लोक सब विषहरि के मनेबाक प्रयास क रहल अछि। सोनरा के बजा सोन देल जैत अछि आ पटबा के रूपा। दुनु के तुरत आदेश देल जैत अछि जे यथाशीघ्र विषहरि मुद्रिका आ ग्रीमहार गढ़ल जाय। कागा ल' गेल मुद्रिका चिलहोरि ग्रीमहार राम ताहि लेल विषहरि रोदना पसार। सोन ले रे सोनरा रूपा ले रे पटबा राम गढि दए सोनरा भैया सोने ग्रीमहार पहिर लीअ विषहरि मैय्या गले ग्रीमहार।। विषहरि के दोसर गीत में एक गहीर पोखरि में घुसि क जकर उचगर भिड छैक विषहरि स्नान क रहल छली। नहेला-सोनेला के बाद अपन नमहर-नमहर केश के थकरेत छली। एकाएक कौआ सोनाक ककबा ल क भागि गेल। आब कनैत-खीजैत विषहरि अपन माय लग आबि कहलथिन जे कोना कागा हुनकर ककबा चोंच में ल क पर उडि गेलनि। माय बौंसति कहलथिन: “हे विषहरि दाई, अहाँ कानू-खिजू नहि हम अहाँ लेल फेर स सोना के ककबा बनबा देब”। आब विषहरि चुप भ गेली। नीची रे पोखरिया के ऊँची रे मोहार राम ताहि पइसि विषहरि करु स्नान। नहाय सोनाय विषहरि थकरथि केश राम सोना के ककहिया आजु काग लए गेल। कनैत खीजैते विषहरि आमा आगु ठाढि राम सोना के ककहिया आजु काग लए गेल। जुनि क़ानु जुनि खोजू विषहरि माय राम सोना के ककहिया हम देब बनबाय ।। तेसर बिषहरि गीत में एहेन कल्पना कैल गेल छैक जे एक छोटछिन जमुना के कछेर में बान्ह पर छोट कदम्बक गाछ छैक। ओहि गाछक छाहरि में बिषहरि जुआ खेल लगली। जुआ खेल काल ततेक बेसुध भ गेली की कखन कौआ उडिक एलई आ झपट्टा मारि बिषहरि के हार ल गेलनि से पते नहि चललनि। जखन होश में एली त कनैत खिजैत कौआ के पाछा-पाछा दौडली। रे कौआ तों जते बैसबैं हम तोरा छोरबौ ने ओतहि तोहर ठोर दागि देबौक। छोटी-मोटी जमुना-दह में छोटी नील गाछ राम ताहि तर विषहरि खेलू जुआसारि। ज़ुअबा खेलइते विषहरि भेली बेसूधि राम ताहि खन काग उड़ि हार लए गेल कनइते-खीजइते विषहरि धयल पछोर राम जहाँ धय बैसबह दागब तोर ठोर।। अहि तरहें मैथिली लोकगीत आ व्यवहार में कौआ आ मनुखक बीच प्रेम अनंत अछि। जतेक भीतर जैब आ जतेक मंथन करब ततेक अमृत भेटत। ओना चर्चा मैथिली लोकगीत आ कौआ पर क रहल छी मुदा कहि नहि कथीलेल यात्रीजीक (नागार्जुनक) “अकाल और उसके बाद” कविता स्मरण आबि रहल अछि। भुखक ज्वाला में एहि कविता में केवल नायिका नहि तड़पि रहल छैक अपितु ओकरा संगे गिरगिट, कुकुर, कौआ, मुस सब ओहि भुखक वेदना के सहयात्री छैक। कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद। बाबा ई कविता हिंदी में लिखला। चूँकि ई लेख हम मैथिली में लिख रहल छी त सोचलौ एक बेर एहि कविता के मैथिली में अनुवाद करबाक प्रयत्न करी। कहेन भेल से नहि बुझल अछि मुदा प्रयत्न त केलहु। कनि देखू कतेक दिन धरि कानल चुलहा जांतो रहल उदास कतेक दिन धरि कनही कुकुर सुतलै ओकरा पास कतेक दिन धरि घरक भीत में गिरगिट केलक गश्त कतेक दिन धरि मुसो के रहलै हालत शिकस्त। दाना आएल घरक भीतर कतेक दिन के बाद देखल धुआं अंगना स ऊपर कतेक दिन के बाद मोन भेलै घर भरि के हरियर कतेक दिन के बाद सुगबुगेलक पाँखि के कौआ कते दिन के बाद।। एकटा बसन्त के गीत में नायिका कागा के सम्बाहक बना कतेक बात बता दैत छैक। बेचारी नायिका, फगुआ नजदीक आबि गेलैक। लोक के देखि ओकरो रंग रभस करक इच्छा भ रहल छैक मुदा रंग खेलत त ककरा संग? पाहून त परदेसिया छथिन. दूर देस में बैसल छथि। हे कागा अहाँ हमर समदिया बनु आ उडि क हमर कंत के हमर समाद द अबियौन। ओ हमरा हीरा मोती आ नग सं सुसज्जित एक चोली पठा देने छला से तार-तार भ गेल। हुनकर बिरह वेदना अलग रहि-रहि हमरा सता रहल अछि. आब रहल नहि जैत अछि। ककरा संग खेलब ऋतु वसन्त। निरायल फागुन दूर बसु कन्त।। उड़ि-उड़ि कागा जाहु बिदेश। हमरो ललाजी के कहब उदेश।। चोलिया एक पहु देल पठाय। चारु दिश हीरा-मोती लाल जड़ाय।। चोलिया फाटल तारम्तार। विरह सताओल बारम्बार।। सूरदास जे गाओल वसन्त। एहि जग बहुरी ने आयल कन्त।। फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना राम बियाहने कुन फल भेल। सीता जन्म अकारथ गेल। कखनो काल जखन माय तंग भ जैत छलीह त अनायास दोदिल होइएत कहैत छलीह: “फाटू हे धरती” एकर बाद सब बुइझ जैएत छल जे माय आब तामसे घोर छथि। फेर हुनका कियोक किछु नहि कहैत छलनि। मुदा हमर नेनमति देखू हमरा होइएत छल माय फाटू हे धरती कथी लेल कहैत छथि। एक दिन जखन माय केर मोन शांत रहनि त बाल सुलभ जिज्ञासा कैल: “माय, अहाँ फाटू हे धरती कियैक कहैत छियैक?” माय कहली: “की कहु बाऊ, नारीक स्थिति एखनो सीता दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अच्छिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय में राम के अगुआ देत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि: बंदौं राम लखन वैदेही, जो तुलसी के परम सनेही। तुलसीदास अपन रचना रामचरितमानस में १४४३ बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ, दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। लेकिन वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र १४७ पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि ३२५ – १४७ बेर सीता, ६९ बेर जानकी, ५८ बेर बड़भागी आ ५१ बेर बैदेही। अहू में एक राजनीति ऐछ. सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ. ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब वैह सीताक दुःख देखू: लंका में राम रहला १११ दिन आ सीता रहली ४३५ दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन. डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वी क जीवन।” कहि ने की भेल! माय जेना अपन भावना के फोरि-फोरि हमरा कह्य लगली। हम छोट जरुर रही मुदा अतबो छोट ने जे माय के कहक भाव नहि बुइझ पाबी। कनिक क्षण लेल लागल जेना माय केर शरीर में सीताक आत्मा बैस गेल हो! माय कहैत रहली: “देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप में आबथि: माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।। आ राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम में बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि। आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम. जखन समस्त मिथिला में अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ में एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहि माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप में आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल। सबहक मोन में उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने!” सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि में डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स? सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन. यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै” राम चिंता में आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।” सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब” राम बजलाह : हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब। फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि। विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली. रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली। “जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन. कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक? अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ में खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?” खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत,के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।” जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल। मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह. राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।” सीता: “से कोना?” राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।” सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?” राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी।” सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक?” ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ी करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय! धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती में बिलुप्त भ गेलीह।” ई बात कहि माए कनि जोर स सास लेलीह आ कहलनि “ बाऊ ताहि जखन हमरा सबके कोनो कष्ट होइएत अछि त अपना के सीता बुझैत छी आ अनायास मुह स निकलि जैत अछि : “फाटू हे धरती”। ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि। अपमानित होइएत छथि। बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....” ई बात कहैत माय केर नयन नोर स भरि गेलनि. ओहि क्षण त नेना रही आब बुझै छी जे माय के नोर कोना खसलनि!!! मैथिली संस्कृति केर अवयव मैथिली संस्कृति के समग्रता में मिथिलाम कहल जा सकैत अछि। कुनो सांस्कृतिक क्षेत्र अपन किछु विशेष खानपान, विध बेबहार, गीत संगीत आदि के कारणे विशेष स्थान आ पहिचान रखैत अछि। मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलाम के सेहो अपन विलक्षण विशेषता छैक। कनिक ओहि विलक्षणता पर विचार करी। मिथिलाम के संक्षिप्त रूप सँ 6 भाग में देखल जा सकैत अछि: क) खानपान, ख) वस्त्र विन्यास, ग) गीत आ संगीत, घ) वाद्ययंत्र, च) भाषा , छ) धार्मिक संप्रदाय आ परंपरा। क. खानपान खानपान कोनो समाज के संस्कृति के मूल होइत अछि। मिथिला में खानपान के दू दृष्टिकोण सँ देखल जा सकैत अछि। भोजन के मुख्य आ स्थानीय तत्त्व आ दोसर भोजनक सचार। जखन बहुत रासक वस्तु सँ भोजनक थारी अथवा थार सजैल जैत अछि त ई भेल सचार। सचार में कोनो जरुरी नहि जे सब वस्तु अथवा भोज्य सामग्री स्थानीय हो। जखन भोज्य सामग्री के बात करैत छी त मिथिलाक मूल भोज्य सामग्री के बुझ पडत। एक फकरा में कहल जैत छैक: तिरहुतीयता के भोजन तीन। कदली कबकब मीन।। आब कनि एकरा देखी: कदली (केरा): केरा गाछक सब चीज़क प्रयोग मिथिला में होइत अछि। थम्ब के भीतर केर तरकारी, कोषा केर तरकारी, कांच केरा केर तरकारी, पाकल केराक विविध रूप में प्रयोग। कोनो भार बिना केरा के पूर्ण नहि अछि। केराक प्रयोग सब बिध, बेबहार, पूजा पाठ, उत्सव, सत्यनारायण कथा आदि में होइत अछि। कांच केराक तरकारी पथ्य के रूप में प्रयुक्त अछि। केरा थम्भ के बहुत शुभ कार्य में प्रयोग होइत अछि। केराक पात पर भोजन करब अदौ सँ अबैत परंपरा अछि। कबकब: कबकब के अंतर्गत भेल ओल, खमहारु , कौआं पात , ओलक पेंपी, कन्ना पात, अरिकंचक लोढ़हा, आदि। ओल शुद्ध आ सुपाच्य वस्तु अछि। सामूहिक भोज में ओलक सन्ना अनिवार्य रहैत अछि। ओलक तरकारी सेहो खूब चाव सँ हमरालोकनि खाइत छी। खमहारु के तरुआ अथवा खमहारुआ मिथिलाक विशेषता अछि। अरिकोंच ओना त सब खाइत छथि मुदा स्त्रीगनक मध्य ई कनि अधिक प्रिय अछि। कबकब भोज्य पदार्थ के बनेबा में कागजी, ज़मीरी नेबो, कांच आम, आ आमिल के प्रयोग होइत अछि। मीन : मीनक अर्थ भेल माछ। माछ त अपना सभक भोजनक मुख्य पदार्थ अछि। अनेक तरहक माछ आ माछक संग संग ओहि प्रजातिक अन्य चीज़ जेना कांकोड, डोका, काछु आदि खेबाक परंपरा मिथिला में अछि। ई त भेल तीन मुख्य तत्त्व। एकरा अतिरिक्त किछु पदार्थ अछि जे मैथिल के बहुत प्रिय छनि। ई सब अछि: दही-चूरा, चीनी: समस्त विश्व में मिथिले एहेन क्षेत्र अछि जत दही-चूरा-चीनी के मुख्य भोजन आ भोज इत्यादि में सामूहिक भोजन के रूप में खैल जैत अछि। आ सब व्यंजन पर भारी पड़ैत अछि अपन मिथिलाक तिलकोरा । सर्वत्र उपलब्ध, ने दाम ने छदाम, आ स्वाद केर की कहब? छोट पैघ सब में अपन स्थान रखने अछि। ई एहेन भोज्य पदार्थ अछि जकरा केवल मैथिल खाइत छथि। मखान: भारतवर्ष में सबसँ अधिक मखान अपन मिथिला में होइत अछि आ सबसँ बेसी एकर उपयोग सेहो हमरे लोकनि करैत छी। अंततः भोजनक पूर्णता मुखशुद्धि सँ होइत अछि आ मुखशुद्धि पान सुपारी संगे। ख. वस्त्र विन्यास परंपरागत वस्त्र मिथिलाक पुरुष लेल धोती, गमछा, या मुरेठा आ स्त्रीगण लेल नुआ, आंगी अछि। किछु विशेष वर्ग केर लोक या त विशेष अवसर पर अथवा ओहुना पाग सेहो धारण करैत छथि। धोती त।मिथिलाक मुसलमान सेहो पहिरैत छला। आब मुस्लमानक बाते छोड़ू हिन्दू सब सेहो धोती सँ बप्पा बैर केने जा रहल छथि। पहिने अपना ओत कोकटा बाँग होइत छल जाकर प्राकृतिक रंग ऑफ वाइट होइत छलैक। ओही बांग केर धोती के कोकटा धोती कहल जैत छलैक। प्राचीन समय में पुरुष गाम गमैत भ्रमण करबा काल धोती, मिर्जई, दुपट्टा, गमछा, आदिक प्रयोग करैत छला। पैर में खराम पहिरबाक प्रथा हाल तक छल। पाहून परख के पैर धोबक हेतु खराम देल जेबाक परंपरा एखनो बहुत ठाम अछि। उच्च वर्ण में खराम पहिरक व्यवस्था उपनयन संग प्रारम्भ भ जाइत छल। किछु लोक खरपा सेहो पहिरैत छला। खरपा के आधार आर्थत तरवा काठ के आ ऊपर में आँगुर लग प्लास्टिक अथवा चाम लागल रहैत छलैक। बाद में लोक गोल गला सेहो पहिरनाइ प्रारम्भ केलनि। मिथिलाक स्त्रीगण सब व्यवहार कैल वस्त्र यथा धोती आ नुआ सँ केथड़ी आ सुजनीक निर्माण सुई ताग सँ करैत छली। केथड़ी मोटगर होइत छैक जकर व्यवहार मोटगर गद्दा जकाँ जारक समय बिछेबक हेतु कैल जाइत छैक। सुजनी कलात्मक होइत छैक। सुजनी में अनेक तरहक ताग के सुन्नर संयोजन सँ बहुत रास डिजाईन , मोटिफ, वोटिफ, पैटर्न आदि बनेबाक प्रथा मिथिला में छलैक। सब वर्ग आ जातिक स्त्रीगण एहि कला में निपुण होइत छली। सुजनीक प्रयोग ओछाइन केर चद्दरि के रूप में होइत छैक। किछु लोक गरीबी में केथड़ी सेहो ओढ़ैत छथि। ग. गीत संगीत मिथिलाक लोकगीत एक महासागर अछि। एकर संख्या कतेक अछि से कहब असंभव। मैथिली लोकगीतक विशेषता एकर समवेत गायन शैली छैक। लगभग 98 प्रतिशत गीत बिना कोनो वाद्ययंत्र और विशेष राग सँ गैल जाइत अछि। मुदा गीतक शब्द, भाव, गबैय्या के उत्साह आ समर्पण, विध बेबहार के प्रति ध्यान , ऋतुक संग स्वभाव, क्रियाकलाप सँ प्रतिबद्धता, काज में लगाव, आपसी प्रेम आ प्रकृति सँ अनुराग बिना कोनो वाद्ययंत्र के सेहो मैथिली लोकगीत के अलग संसार में ल जाइत अछि। विद्यापतिक पदावली, ताहू में उत्सव विशेष केर गीत, सोहर, समदाउन, उदासी, साँझ, प्राती आ शिवक गीत में महेशवानी , नचारी आ कंरथुआ गीत बहुत हर्षित करैत अछि तन के आ मोन के। सीता, राजा सलहेस, कारिख महाराज, दीनाभद्री, आदिक लोकगाथा आ गीत सेहो अपन अलग स्थान रखैत अछि। सब शास्त्रीय गीत मिथिला में बहार सँ आयातित अछि, यद्यपि ध्रुपद मैथिली लोकशैली संगे तारतम्य बना सकल अछि। बटगबनी, तिरहुत, लगनी तीव्रगति सँ चलैत गीत आ मोन लगबे बला गीत अछि। उदासी संत परंपरा, कबीरपंथी परम्परा, सँ प्रभावित भ रचल गेल अछि। मिथिलाक उच्चवर्ग विशेष रूप सँ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अपन महिला के पब्लिक स्पेस में गायन, वाद्ययंत्र संगे गायन, नृत्य आदिक स्वतंत्रता नहि देने छथि जाहि सँ एहि वर्ग केर महिला में नृत्य, नृत्यगीत, नृत्यनाटिका आदिक शैली नहि विकशित भ सकल छनि। अन्य जाति सब में डोमकच्छ, जटा-जटिन, झ्झिया, आदिक रूप भेटैत अछि। शामा चकेबा में बहुत साधारण तरहक नृत्य आ उत्साहक स्वतंत्रता देखैत छी। मुस्लमान महिला सब ताजिया के समय झिझिया छाती पीट पीट गाबैत छथि। हुनकर स्वर आ टोन बहुत हद तक उदासी आ समदाउन सँ मेल खाइत छनि। घ. वाद्ययंत्र मिथिलाक मूल वाद्ययंत्र रसनचौकी में प्रयुक्त होइत अछि। दुर्भाग्य सँ एकरा कहियो मिथिलाक तथाकथित विद्वान लोकनि प्रोत्साहित नहि केला। एकरा बारे में कहल जाइत अछि जे जखन सीता कुम्भ सँ बहार भेली त भगवान स्वर्ग सँ प्रसन्न होइत अप्सरा, वाद्ययंत्र आ ओकरा बजबय बला कलाकार सेहो मिथिला पठेला। किछु लोकक कहब छनि जे चूँकि ई वाद्ययंत्र चमार बजबैत छथि ताहि एहि पर विशेष ध्यान नहि देल गेल। च. भाषा: मैथिली भाषा प्राचीन भाषा अछि। एकर अपन लिपि छैक मुदा आब लोक देवनागरी में लिखैत छथि। बंगला लिपि मिथिलाक्षर सँ प्रेरित भ बनल अछि। एहि भाषा में विद्यापति, ज्योतिरेश्वर, चंदा झा, लाल दास, हरिमोहन झा आ यात्री सनहक़ साहित्यकार भेल छथि। आन भाषा जकाँ मैथिली में सेहो स्थान आ लोक ज्ञाने भाषा के बजबाक शैली, शब्द व्यवहार, टोन, आदि में परिवर्तन पैल जाइत अछि। बेगूसराय, बरौनी, मुंगेर आदिक मैथिली दक्षिण प्रभाव सँ ओत प्रोत अछि आ शैली में स्थानीय आनंदक अनुभूति भेटत। यद्यपि दरभंगा, मधुबनी में रहनिहार मैथिल सब अपन बोली के प्रमाणित करबा लेल बेहाल रहैत छथि। तहिना मिथिला केर पश्चिम में प्रयुक्त भाषा में कनि अलग स्थानीय भाव भेटैत अछि। भागलपुर, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, दुमका, बांका में व्यवहृत मैथिली के अंगिका कहल जैत अछि। वैशाली क्षेत्र के मैथिली के बज्जिका कहल जाइत अछि। उच्च आ निम्न वर्ग ज्ञाने सेहो मैथिली बजबाक शैली में किछु उतार चढ़ाव भेटैत अछि। सब क्षेत्र, समुदाय, के स्थानीय शब्द, शैली, उपमा, अलंकार, पिहानी, फकरा, गीत नाद आदि के आधार मानि एक प्रामाणिक मैथिली भाषा के विकशित करबाक जरुरत अछि जे सबके मान्य हो, सब के सोहनगर लागनि। छ. धर्म आ संप्रदाय मिथिला में सब वर्ण के लोक, सब धर्म के लोक रहैत छथि। अतै केर हिन्दू पंचोपासक छथि। महादेव केर पूजा माटिक महादेव बना अद्भुत ढंग सँ कैल जैत अछि। बुद्ध केर भाषा आ चार्यपद के एखनो मैथिली अपना में आत्मसात केने अछि। तंत्र में बौद्ध तंत्र के स्पष्ट प्रभाव छैक। सिद्ध पीठ आ बज्रयान केर तंत्र स्थल मिथिला में आबि जेना संगम जकाँ एक दिशा में एक भे बहे लगैत अछि। मुस्लमान सब सेहो अपन धर्म केर पालन करैत छथि संगहि किछु लोक परंपरा केर तत्व के अपना में समावेश क लेत छथि। सीता के मिथिलाक स्त्री नायिका के प्रतिनिधि आ राजा सलहेस के पुरुष नायक के प्रतिनिधि कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकला मिथिला चित्रकला जकरा मधुबनी चित्रकला सेहो कहल जाइत अछि, अपन स्थान आ नाम कला संसार में नीक जकाँ दर्ज करा लेने अछि। एहि पर बड्ड लिखब अनिवार्य नहि। इंगित भ गेल अतेक पर्याप्त अछि। मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद लोक गाथाक परिवेश हमर नानी लोक-परम्परा केर संरक्षिका छली।शायद अक्षरमालाके ज्ञान हुनका नहि छलनि मुदा लोकज्ञान जेना कंठमें कंप्यूटरके कोनो चिप जकाँ सेट छलनि। जखन हुनका लग जाई ओ किछु नव आ महत्त्वपूर्ण लोकव्यव्हार अथवा कथा अथवा गीतअ थवा फकरा, देव ीदेवता, स्थानक विशेषता आदिकसन्दर्भमें बात करथि। गंभीर बात। एक-एक चीज़क अर्थ स्पष्ट करैत विवरण दैत छली। नानी छली बड़ा कुलीन घरसं। नाना सेहो अपना समय केरजमींदार छला। मुदा बजबाक शैलीमे ंनानी मधु छली। हमरा कखनो “रौ” के त छोडू “हौ” नहि कहलनि। सदरिकाल “यौ” कहि सम्बोधन करथि।बजबाकशैली विलक्षण। भेटथि त कुशल क्षेम पुछबाक अद्भुत अंदाज़। जखन कहियो नानी लग जाई अपन गामक संस्कारके तिलांजलि द दी। बिना डांट-फटकार केनिक संस्कार कोना सिखाबी ई कियो नानीक व्यवहार संग्रहण क सकैत छल। हमर जेठ बहिन केर नाम विद्या आ सरोज छनि। जखन कखनो नानी लगजाईत हुनका सबहक कुशल क्षेम अहि तरहे पुछथि: “विद्या कुमारी कोना छथि? सरोज कुमारी कोना छथि?” ई छलनि नानी के व्यवहार अपन बेटीक बेटीके प्रति; सेहो परोक्षमे। कहि नहि कथी लेल नानी के हमरापर बड्ड विश्वास छलनि। जखन जाई नानी घंटों बात करथि – कखनो घरमे, कखनो चिनबार लग, कखनोदलानपर त कखनो आमक गाछीमे।नानी के शायद ई भान छलनि जे: “कैलाश कहियो ने कहियो मैथिली लोकपरंपरा लेल किछु करताह!” बहुत रास अजगुत गीत सब नानी गबैत छली। कतेको बेर सोचलौं रेकॉर्ड करब आ लिखियो लेब। किछु लिखबो केलों। मुदा देव संयोग ई छलजे नानी बिचहिंमें बैकुंठक रस्ता ध लेली। एक बेर नानी लग दालान पर बैसल गप्प करैत रही ततबे में एक नाथ जोगी हाथ में सारंगी लेने, बढ़ल दाढ़ी आ भगबा वस्त्र में सारंगी के तार के झनकबैत आबि गेलैक। बिना ककरो आज्ञा के इंतजार केने तारक झनकार तेज भ गेलैक। करुण रस झहरए लगलैक। नानी हमरा कहलनि : “कैलाशजी, जोगी जी के कुर्सी दियौन बैसबाक हेतु”। हम तुरत एक कुर्सी के झारि जोगी जी के द देलयनि। जोगी जी सारंगी बजबैत मस्त भेल चुपचाप कुर्सी ग्रहण केलनि आ कनिकाल में सारंगी केर तान संगे उच्च स्वर में गोपीचंद के गीत गाबय लगला। धीरे-धीरे अगल-बगल सं बहुत स्त्रीगन आ नेना सब जमा भ गेल। किछु पुरुख सेहो एला। जोगी महराज गीत गबैत रहला, सारंगी बजबैत रहला आ स्त्रीगन सब कनैत रहली।पूरा वातावरण उदासी के भाव सं ओतप्रोत छल। पूरा त नहि परन्तु आंशिक बात हमहु बुझलियैक आ थोरेक द्रवित सेहो भेलौं। जोगी डेढ़ घंटा धरि सारंगी के तान पर गीत गबैत रहला।जखन समाप्त भ गेलनि त कियोक पाई, कियोक अन्न, कियोक वस्त्र आदि देलकनि। मामी किछु जलखई देलथिन आ चाह सेहो भेटलनि। जलखई समाप्त क जखन जोगी जी चाह पीब लगला ओही क्षण एक आश्चर्यजनक दृश्य उपस्थित भ गेलैक।एक 90 वर्ष केर महिला हाथ में लाठी पकड़ने आबि गेली। जोगी के पकडि कानय लगली: “रे बुधना! हम छियौ तोहर माय! रे हमर बेरा पार लगा दे तखन फेर जोगी बनि जैहें। बाप बुधना बुधना रटैत प्राण त्यागि देल्थुन। अपटी खेत में हुनकर आत्मा भटकैत हेतनि। रे बइमान! रे बाप के तर्पण दे। संस्कार कर। रे वंशक रक्षक कर!” बेचारा जोगी हतप्रभ! बुढ़िया किछु बजबाक अवसर देबाक हेतु तैयार नहि। जोगी कहलकै, “बूढी माँ, मै छपरा जिले का हूँ और जाति से कुम्भकार हूँ।मै चार भाई हूँ और मेरी माँ मर चुकी है। मै आपका पुत्र या कोई बुधना नही हूँ। मेरी नाथ सम्प्रदाय में दीक्षा से पहले मेरा नाम रमेश पण्डित था। दीक्षा के बाद मेरा नाम जोगी मोतीनाथ है।” लेकिन बुढ़िया ओकर तर्क सुनबाक हेतु तैयार नहि। बड़ा बिपत्ति! पुराण लोक सब ऐल। ओकरा चीन्हबाक प्रयत्न केलक। सब कहलकै जे ई बुधना नहि थिक. मुदा पुत्रविछोह सं तरपैत माय के बुझेनाई अतेक सहज कहाँ? अंत में सब कहलकै “ठीक छै, कोनो एक चिन्ह बताऊ जे बुधना के खाश छलैक?” कनिकाल लेल बुढ़िया चुप भ गेल। फेर सोचैत बाजलि: “हमर बुधना के मध्य पीठ पर तीन टा नमहर-नमहर तील छैक।” लोक सब जोगी के पीठ देखेबा लेल कहलकै। जोगी शुरू में पीठ उघारबा लेल तैयार नहि छल। अहि बात सं बुढ़िया के शंका आर प्रबल भ गेलैक। बुढ़िया जोर-जोर सं कानि-कानि लोक के कहए लागलि: “देखू हे माई दाई! ई बुधने अछि। पीठ नहि उघारि रहल अछि. हम दूध पियेने छी एकरा। हमरा आंखि सं कोना अपना आप के बचा लेत?” बुढ़ियाक कानब सं द्रबित होइत लोक सब में एक प्रमुख व्यक्ति जोगी के सम्बोधित करैत बजला: “देखू जोगी जी! एहि 90 वर्ष केर महिला पर दया करू। हिनका पीठ उघारि देखा दियौन। जं तीन तील लगातार एक ठाम मध्य पीठ में नहि हैत त अहाँ के हमरालोकनि छोडि देब अन्यथा अहाँ अतए सं नहि जा सकैत छी।” कनि ना नुकुर केलाक बाद जोगी पीठ उघारबा लेल तैयार भ गेल। सब जिज्ञासा सं जोगी के पीठक निरिक्षण केलक मुदा मध्य पीठ में तीन तीलक त बाते नहि एकौ तील नहि रहैक। बुढ़िया झमा खसलि। जोगी प्रफुल्लित होइत सारंगी उठा सारंगी बजबैत दोसर गाम दिस बिदा भेल। राति में सुते सं पहिने नानी सं हम जोगी आ समस्त चीज़ के सम्बन्ध में जिज्ञासा कैल। नानी कहली: “हमरा ज्ञात छल जे अहाँ ई प्रश्न करब. अगर अहाँ नहि करितों तैयो हम जोगी आ सारंगी के सम्बन्ध में आई चर्चा करितौं.” हमरा नानीक ई कहब बड्ड निक लागल. नानी कहली जे ई सब नाथ सम्प्रदाय जकर आदिगुरु गोरखनाथ छथि केर सदस्य छथि. हिनका सबके अपन मिथिला में जोगी, सारंगीबला जोगी, सिध्ह जोगी, गुदडियाबाबा, घुनाबाबा, गोपीचंद बाबा सेहो कहल जैत छैन। मान्यता छै कि जे रुईसक घर सं भागि जैत छला वो गोरखपुर जा बाबा गोरखनाथ के नाथ सम्प्रदाय केर चेला भ जैत छला। घर-द्वार सं उन्मुक्त। ने उधो को लेना ने माधो को देना। ओ सन्यासी के श्रेणी में आबि जैत छथि। संसारिकता केर मोहजाल सं मुक्त। ओतए हरेक जोगी के एकटा सारंगी देल जैत छनि। वैह सारंगी बजबैत आ गीत शिक्षा में निपुण भेला पर नगर आ ग्राम में घरे-घरे भीख मांगि बारह बर्ष धरि ओ जीवन व्यतीत करैत छथि। बारह बरिख सं पहिने हुनका अपन माए सं भीख लेबा में सफल होबाक छनि। जे सफल भ गेला ओ सिद्ध जोगी आ ओकर बाद ओ आनो के गुरु के रूप में दीक्षा द सकैत छथि। ओहि समय में जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्ति पर जोर दे लिख रहल छी। अहि लोक स्मरण में जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओ नानीक छनि आ जतएकथा इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक। लोक परंपरा में जननायक के रूप में प्रतिष्ठित भर्तृहरि राजा के जीवन वृत्तान्त, नीति आ उपदेश के लोक शैली में भरथरी में नाथ जोगी सब गाबि-गाबि सुनबैत अछि. एहि लोकगाथा के गोरखपंथी साधु अपन सारंगी पर गबैत छथि. सारंगी के कतौ- कतौ चिकारे सेहो कहल जैत छैक। नाथ सम्प्रदाय केर गुरु गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ केर निर्गुण सिद्धांत सं प्रेरित एहि लोकगाथा में सामदेवी रानी आ समस्त विलासिता आ राजभोग के त्यागि भरथरी राजा केना वैराग्य लेलनि आ फेर जोगीक वेश में रह्लनि एकर बहुत करुण विवरण अछि। एहि लोकगाथा के दू पाट में बाटि बुझल जा सकैत अछि। प्रथम भाग में राजा भरथरी के वैराग्य तथा पिंगला द्वारा पूर्व जन्म केर कथा। दोसर भाग में जंगल में गेलाक बाद भरथरी राजा द्वारा कारी मृग के वध करब तथा माता मैनावती के आज्ञा के शिरोधार्य करैत जोगी अथवा वैरागी होबाक कथा छैक। एहि गेय गाथा में योग-भोग केर अंतर्द्वंद तथा करुण विप्रलम्भ केर प्रयोग चरमोत्कर्ष पर भेटैत छैक। कथा ऐना शुरू होइत छैक। राजा भरथरी के एकाएक वैराग्य उत्पन्न होइत छनि।एकर कारण हुनकर जन्म कुण्डली में वैराग्य लिखल छनि. फेर की, भरथरी राजा सामदेवी रानी के छोडि भरल जुआनी में वैराग्य लेल जा रहल छथि। रानी पहिने त मना करैत छथिन लेकिन जखन भरथरी राजा नहि मानैत छथि त पुछैथ छथिन: “ठीक छैक स्वामी! अहाँ जा रहल छी मुदा जएबाक कारण त बता दिय हमरा?” भरथरी राजा कहैत छथिन: “हे रानी, एकर एकमात्र कारण थिक हमर जन्म कुण्डली में वैराग्यक योग।” मुदा सामदेवी रानी एहि जवाब सं संतुष्ट नहि होइत छथि आ भरथरी राजा के बाहर जएबाक अनुमति नहि दैत छथिन। भरथरी मोन मसोसि क रहि जैत छथि।भरथरी राजा एक प्रश्न रानी सं पुछैत छथिन: “हे रानी एक बात के उत्तर हमरा अहाँ दिय! अपन सबहक सोहाग राति में पलंग केर पाटी कुन कारने बिखंडित भ गेल?” भेल ई रहनि जे जखने सोहागराति के समय राजा अपन रानी सं काम क्रिया करबा लेल उद्दत भ रानी के बाहुपास में लेमै लगला एकाएक पलंग केर फट्ठी टूटि गेलैक। रानी आ राजा के एहि बात सं किछु अशुभ केर शंका भेलनि। निर्णय केलनि जे आई राति सोहाग नहि मनेता आ ने कामेक्रिया में लिप्त हेता। एक दिन में कोनो बैकुण्ठ थोरे ने खासि पड़तैक? ओकर बादे राजा भरथरी के मोन में विचित्र तरहक उचाट होबए लगलनि। कखनो रानी लग जएबाक मोने ने करनि। वैह प्रश्न आई राजा अपन रानी सामदेवी सं पुछि देलथिन। रानी सामदेवी बजली: “राजन, एहि बात के हम नहि जनैत छी। हलांकि हम्मर छोट बहिन पिंगला अग्रज्ञानी अछि। ओकरा भुत, वर्तमान आ भविष्य सब चीज़ के अपूर्व ज्ञान छैक। मुदा पिंगला दिल्ली में रहैत अछि।” राजा तुरत अपन सारि पिंगला के चिट्ठी लिख दिल्ली सं मालवा एबाक प्रार्थना केलनि। चिट्ठी पाबि पिंगला झट दनि राजा लग जैत छथि आ कहैत छथिन: “हे राजन! जों हम सत्य कहब त अहाँ स्वीकार नहि क पैब। ताहि पूर्व जन्मक सत्य जनबाक हठ छोडि देल जाओ।” मुदा भरथरी राजा अपन जिद्द पर अटल रहला। कहलथिन: “हे हमर सुन्नरि, दुलारू आ गुनमति सारि पिंगला, अहाँ सत्य कहू। हम चेतन्य आ कठोर ह्रदय केर पुरुख छी।केहनो सत्य के स्वीकार करबाक क्षमता हमरा में अछि। अहाँ निश्चिन्त भ जे सत्य छैक तकर बखान करू।” आब पिंगला गंभीर भेली आ बजली: “ठीक छैक भरथरी राजा, अगर अपने सत्य सुनबा लेल आतुर छी त हम आई एहि क्षण अहाँ के सत्य बता दैत छी। हम्मर बहिन सामदेवी रानी जे अहि जन्म में अहाँक पत्नी छथि पूर्व जन्म में अहाँक माँ छली। ई बात अही लेल हम अहाँके नहि बता रहल छलों। ओना रानी सामदेवी के सेहो पूर्व जन्म के बात ज्ञात छनि मुदा एहि जन्म में त ओ अहाँक पत्नी छथि ताहि नहि बतेली। आब ई अहाँ ऊपर अछि की भोगमय बिलाशिता पूर्वक जीवन जीबी अथवा योगमय कोनो जोगी अथवा संयासिक जीवन।” ई बात सुनि भरथरी राजा उदास भ जैत छथि। माथा टनकए लगैत छनि। संसार आ मानवीय सम्बन्ध सब में मिथ्याभाव लगैत छनि। कनि काल बाद भरथरी राजा अपन नव व्याहित रानी सामदेवी सं आज्ञा लै सिंहलद्वीप केर घनघोर बोन में कारी मृग के शिकार हेतु प्रस्थान करैत छथि। मृग केर पत्नी हरिनी भरथरी राजा के शिकारी के खेमा देखि अनिष्ट केर आशंका सं घबरैत अपन पतिक प्रानक रक्षा में लागि जैत अछि। जखन कोनों व्योंत नहि भेटैत छैक त स्वयं राजा भरथरी लग आबि जैत अछि आ निवेदन करैत छैक: “हे राजा, अहाँ हमर पति केर प्राण केर रक्षा करू। हुनकर शिकार नहि करू। हुनका बदला में हम्मर शिकार क लिय!” लेकिन भरथरी राजा ओकर निवेदन के स्वीकार नहि करैत छथि. हरिणी निराश भ जैत अछि। हरिणी हारि नहि मानैत अछि आ पतिक प्राण केर रक्षा कोनो ने कोनो हालत में कर चाहैत अछि। दौर क कारी हरिण लग जैत अछि आ हाफैत कहैत छैक: “हे प्रिय, भरथरी राजा अपन शिकारी दल के संग बोन में घुसि गेल छथि। ओ अहाँक शिकार करता। अहाँ तुरत एहि बोन के छोडि कोनो आन ठाम चलि जाऊ।” कारी हरिण सोचलक: “आखिर भरथरी राजा अकारण हमरा कथी लेल मरता? हमरा हुनका संग कोनो तरहक वैमनस्य नहि अछि। कथी लेल एहेन सुन्दर बोन के छोड़ी, अनजान बोन में धक्का खेबाक हेतु जाई?” यैह सोचैत ओ हरिणी के सम्बोधित करैत बाजल: “हे हमर दुल्लरि! अहाँ चिंता जुनि करू। हमरा राजा नहि मारता। हम हुनकर कोनो अहित नहि केने छी। केवल वैह प्राणी दोसर प्राणी के मारि सकैत अछि जे ओकरा कोनो तरहक दुःख देने होइक अथवा अहित केने होईक। हमरा कोनो आन बोन में अनेरे नहि जएबाक चाही।” आब हरिणी मोन मसोसि क रहि जैत अछि। इम्हर भरथरी राजा अपन शिकारी दल संगे गहन बोन में बढ़ल जैत छथि। एकाएक कारी मृग के देखैत छथि आ ओकरा वध करबाक हेतु तीर के धनुष के प्रत्यंचा पर चढ़ा लैत छथि। माजल शिकारी जकाँ लगातार सात तीर सं प्रहार करैत छथि। सात में स छ तीर गंगा माता, वनस्पति देवी, गुरु गोरखनाथ, एवं कारी मृग केर सिंघ सं बेकार भ जैत छनि मुदा सातम तीर सं मृग घायल भ जैत अछि। शोनित सं भरल देह, तीरक टीस सं व्यथित मृग वेदना के आधिक्य में भरथरी राजा के श्राप दैत छनि: “हे राजन! अहाँ त नृशंश भ हमरा मारि देलौं! आब हमर नेत्र अहाँ अपन रानी के श्रृंगार करबा लेल द देबनि; हमर सुन्दर कलात्मक सिंघ कोनो राजा के दरबज्जा पर मढबाक हेतु द देबनि; हमर चाम के कोनो साधु के आसन बनेबा लेल द देबनि; आ अन्ततः हमर माउस अहाँ रान्हि बघारि क खा लेब। मुदा एक बात स्मरण राखब, जहिना हम्मर सत्तरि सै रानी कलपि रहल छथि तहिना एक दिन अहुक रानी सब कलपती।” अपन बात के समाप्त करैत कारी मृग जे ओहि बोनक हरिण सबहक राजा छल, अपन प्राण त्यागि देलक। भरथरी राजा द्रवित भ गेला. तुरत हुनका अपना आप सं घृणा होबए लगलनि। कोनो तरहें ओ आब कारी मृग के जानक रक्षा करै चाहैत छथि। व्यथित भ गुरु गोरखनाथ के कुटिया में घुसैत छथि आ अपन गलती के स्वीकार करैत निवेदन करैत छथिन: “हे गुरु गोरखनाथ! हमरा सं बड्ड पैघ पाप भ गेल। अहाँ कोनो तरहें अपन दैवीय शक्ति सं अहि कारी मृगराज के प्राण के पुनः वापस क दियौक!” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “हे राजन! आब एकरा पुनः जीवित केनाई हमरा वशक बात नहि अछि।” भरथरी राजा पागल जकां कर लगैत छथि। माटि में ओहरिया मरैत छथि। कनैत बेहाल भ जैत छथि आ गुरु गोरखनाथ के कहैत छथिन: “अगर अहाँ अहि मृगा के प्राण नहि वापस केलौं त हम अही ठाम अपन प्राण त्यागि लेब!” विवश भ गुरु गोरखनाथ कारी मृगराज के अपन दैवीय शक्ति सं पुनः जीवित क दैत छथिन। मृग उठि क बैस जैत अछि। राजा पर एकबेर फेर दयाभाव देखबैत कारी मृग अपन श्राप वापस ल लैत अछि।समस्त हरिण समुदाय में उत्सव केर वातावरण भ जैत छैक। हरिणराज केर सत्तर सए रानी मस्त भ नाचए लगैत छैक। कस्तूरी केर सुगन्ध सं बोनक वातावरण महो-महो भ जैत छैक। कारी मृग अपन रानी सब लग बिचरन करए चलि जैत अछि। एहि दृश्य के देखि भरथरी राजा आनन्दविभोर भ जैत छथि। इम्हर भरथरी राजा के ह्रदय परिवर्तित भ जैत छनि। संसार क्षद्म लगैत छनि। मोन में सांसारिक सुख सं वैराग्य उत्पन्न भ जैत छनि।गुरु गोरखनाथ के चरण पर बैस जैत छथि। कहैत छथिन: “हे गुरुदेव! हमर उद्धार करू। हमरा अपन शरण में लेल जाओ। अपन शिष्य बना हमरा धन्य करू।” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “राजन! हम कोनो स्थिति में अहाँ के अपन शिष्य नहि बना सकैत छी। एकर एकमात्र कारण थिक अहाँक राजसिक वृत्ति। अहाँ राजा थिकहूँ। राजा भला जोगी कोना क बनत?” भरथरी राजा उत्तर में कहैत छथिन: “हे गुरु श्रेष्ठ! हम अहाँक पथ पर अहाँक चेला बनि चलए चाहैत छी। एहि लेल सब किछु भौतिक पदार्थक संग-संग अपन चित्तक चीज़ के सेहो त्याग करक हेतु तैयार छी।” अंतत गुरु गोरखनाथ एहि शर्त पर की भरथरी राजा सन्यासी त बनि जेताह मुदा हुनका अन्तिम दीक्षा गोरखनाथ तखन देथिन जखन भरथरी राजा अपन रानी सामदेवी सं ‘माए’ कहि भीख मंगताह। आब एतहि सं भरथरी राजा नाथ जोगी के रूप धारण क, गेरुआ वस्त्र पहिर, हाथ में सारंगी लेने गामे-घरे होइत राजक द्वार पर अलख जगेने गीत गाबि रहल छथि। रानी साम देवी जखन भरथरी राजा के जोगी के भेष में देखैत छथि त परेशान भ जैत छथि।रानी हुनका कोनो स्थिति में भीख देबाक हेतु तैयार नहि भ रहल छथिन। भरथरी राजा अहि बात पर हुनका कहैत छथिन जे ओ अपन नैहर चलि जाथु। मुदा रानी नैहर नहि जैत छथि आ उलटे भरथरी राजा के राजमहल में कोनो एकांत स्थान में रहि जोगी के भेष में तपस्या करक हेतु कहैत छथिन। भरथरी राजा कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर अहाँ गंगा के निर्मल धार एते ल आबी त हम राजमहल में रहि क तपस्या क लेब।” रानी छली परम सती. तुरत अपन सत सं गंगा के धार के ओतहि ल एली। आब भरथरी राजा हुनका बतबैत छथिन जे कोना एक जोगी के सर्वाधिक पुन्य तीर्थ स्थल केर भ्रमण सं भेटैत छैक। ई सुनि रानी गंगा के धार के वापस चलि जएबाक हेतु कहैत छथि। रानीक बात के सम्मान करैत गंगा केर धारा वापस चलि जैत छैक। एकर बादो रानी सामदेवी भरथरी राजा के भीख देबाक लेल तैयार नहि भेली। भरथरी राजा के भेलनि “अगर रानी भीख नहि देती त साधना बीचहि में अटकि जैत। फेर की हैत? गुरु दीक्षा भेटबे ने करत. फेर बैकुण्ठ कोना प्राप्त हैत?” अंततः गुरु गोरखनाथ स्वयं अबैत छथि. रानी सामदेवी के पूरा बात बुझबैत छथिन। आब रानी मानि जैत छथि आ भरथरी राजा के भीख द दैत छथिन। एकर बाद भरथरी राजा के अपना संगे गुरु गोरखनाथ जोगीक गहन तपस्याक हेतु बोन में लेने जैत छथि। ओही दिन सं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माए सं भीख मंगबा में सफल भ जैत।मिथिला कहियो वैराग्य के स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवन में रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक। ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माए सं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक। नानी कथो कहथि आ बीच-बीच में गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल।नानी सेहो कानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथा में मस्त – एक सुनेबा में मस्त आ दोसर सुनबा में मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैत छलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़ में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्य कलाकार नानी आ एक मात्र श्रोता हम मुदा दुनु के आंखि, ह्रदय, आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथा वाचिका केर गुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतःकरण में कथा के बसेला सं अबैत छैक। हमरा एकाएक स्मरण भेल जे दिन में नाथ जोगी किछु मैनावती आ गोपीचंद केर गीत सेहो गबैत छल। हम नानी के स्मरण दियेलएनि। नानी कहली: “गोपीचंद आ मैनावती केर प्रसंग भरथरी राजा के जोगी बनलाक बाद अबैत छैक। गोपीचंद केर प्रसंग सेहो बड़ा रोचक छैक। बड्ड राति भ गेल। आई सुनब की काल्हि?” हमर जिज्ञासा प्रबल छल। भेल एखने सुनि ली। नानी के कहलिएनि: “हमरा निन नहि लागल अछि। गाथाक अन्तिम भाग जानबाक उत्कंठा सेहो अछि। ताहि निक यैह रहत जे लगले में मैनावती आ गोपीचंद केर कथा सेहो सुना दी अहाँ?” नानी सहज भाव सं हमर निवेदन के स्वीकार करैत कथा कहनाई प्रारंभ केलनि। गोपीचंद एक संस्कारी पुत्र छथि पदामसेन राजा आ मैनावती रानी के।मैनावती भरथरी के बहिन छथिन।गोपीचंद के चंद्रावल नामक एक सहोदर बहिन छथिन। जवान भेला पर गोपीचंद के विवाह होइत छनि। संयोग सं पहिल पत्नी सं हिनका पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लोभ में ब्याकुल रानी पद्मावती अपन असगर पुत्र गोपीचंद के दोसर विवाह कर दैत छथिन। दोसरो पत्नी सं गोपीचंद के पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लालषा में मैनावती गोपीचंद के तेसर, चारिम, पाचम करैत १६ टा विवाह करा दैत छथिन। विधनाक विधान देखू, गोपीचंद के १६ रानी सं १२ पुत्री त भ जैत छनि मुदा बेटा एकौटा नहि।मैनावती अंत में अपन भाई भरथरी जे नाथ जोगी भ गेल छथि के बजबैत छथि आ अपन रोदना पसारैत छथि। कहैत छथिन: “अगर हिनका पुत्र नहि भेलनि त समस्त राजपाट समाप्त भ जैत। वंशक अंत भ जैत। कियोक पितृ के तर्पण देब लेल नहि रहत। एहेन जीवन जीब सं बढियाँ जे आत्महत्या क ली? किछु उपाय करू हे भाई भरथरी जाहि सं गोपीचंद के एक पुत्र भ जाईन।” जोगी भरथरी कनि ध्यानस्थ होइत छथि। फेर चिंतित भ कहैत छथिन: “बहिन दाई, बड्ड दुखक बात! भागिन गोपीचंद के संतानक योग नहि छनि। हम एहि में किछु करबा में असमर्थ छी।” ई बात सुनि रानी मैनावती बिलाप करै छथि। बड्ड जोर-जोर सं कनैत छथि।कहैत छथिन: “हम किछु नहि जनैत छी। अहाँ कोनो युक्ति निकालू जाहि सं गोपीचंद के पुत्र होनि!” आब आरो गंभीर होइत भरथरी कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर भागिन राजमहल त्यागि घनघोर बोन में नाथ जोगी बनि तपस्या करथि त हिनका पुत्र भ सकैत छनि।” ई बात सुनि मैनावती रानी झमा खसैत छथि। मुदा भरथरी के बुझेलाक बाद अपन पुत्र के जोगी बना बिजन बोन में जएबाक लेल कहैत छथिन। गोपीचंद माए केर आज्ञा पाबि सोलहो रानी लग जैत छथि आ भरथरी जी के निर्णय बतबैत छथिन। सोलहो रानी पुत्र आकांक्षा के ध्यान में रखैत छाती के पाथर क लैत छथि आ अपन पति राजा गोपीचंद के जोगी बना बीजन बोन में भेजि दैत छथि। बोन में गेलाक बाद गोपीचंद घोर साधना में लागि जैत छथि। दिनभरि जंगल में साधना आ साँझ पहर भिक्षाटन लेल नगर आ ग्राम केर यात्रा हाथ में सारंगी लेने वैराग्य केर गीत गबैत। यैह हिनकर सब दिनका जीवन भ गेल छनि। एक दिन भिक्षाटन के क्रम में घुमैत-घुमैत गोपीचंद अपन बहिन चंद्रावल के सासुर चैल जैत छथि। जोगी के देखि चन्द्रावल घर सं भीख देबा ले बाहर भेली। देखैत छथि जे ई जोगी कोनो आन नहि अपितु हुनकर सहोदर भाई राजा गोपीचंद छथि।कुहेस फाटि गेलनि। आंखि अन्हार भ गेलनि. धम्म सं धरती पर चित्ते खसली। जखन लोक उठेलकनि त पता चललैक जे प्राण त्यागि देने छथि। गोपीचंद के सहोदर के ममत्व जागि जैत छनि। बफारि मारि-मारि कनैत छथि। मुदा आब की चंद्रावल बहिन त समाप्त भ गेल छथिन! हिम्मत नहि हारेत छथि गोपीचंद। चट्टे गुरु गोरखनाथ लग बहिन के पुनः जियेबाक हेतु जैत छथि. बहुत अनुनय विनय करैत छथिन. कहैत छथिन: “बरु हम्मर प्राण ल लिय मुदा बहिन दाई के जिया दियौन।” गुरु गोरखनाथ द्रवित भ जैत छथि आ गोपीचंद संगे चंद्रावल केर मृत शरीर लग अबैत छथि। हुनकर स्पर्श मात्र सं चंद्रावल जीब जैत छथि आ उठि क बैस जैत छथि। आब चंद्रावल अपन भाए गोपीचंद लेल गुरु गोरखनाथ सं निवेदन करैत छथिन जे हुनका पुत्र होबाक बरदान देथुन।गुरु गोरखनाथ भाए-बहिन के अपूर्व प्रेम देखि बड्ड प्रसन्न होइत गोपीचंद के पुत्र प्राप्त हेबाक आशीर्वाद त दईते छथिन संगहिं अमर होबाक बरदान सेहो दैत छथिन। गोपीचंद ख़ुशी-ख़ुशी अपन राजमहल वापस आबि जैत छथि। एहिकथा गाथा के प्रसंग बहुत निक अछि। एक बात त ई छैक जे राजा भरथरी,रानीसामदेवी,रानीमैनावती, गोपीचंद, चंद्रावल, आ गुरु गोरखनाथ सब कियोक मिथिला के चरित्र नहि छथि। मुदा जोगी परंपरा सं जुड़ने कथा में स्थानीय भाव आबि जैत छैक। लोक जोगी के केवल भीख देबाक हेतु नहि बजबैत छैक। जोगी अपन सारंगी आ सुमधुर कंठ के कारण एक लोक कलाकार सेहो बनि जैत अछि। गाथाक भावनात्मक पक्ष अतेक प्रबल छैक जे मिथिलाक लोक सेहो कथा के अनेक प्रसंग के उदासी, चौमासा, छौमासा, बारहमासा के रूप में लोकगीतक स्वरूप में गबैत छथि।अहि तरहे ई कथावाचना जोगी आ गृहस्त दुनु के द्वारा गैल जैत अछि।एक कला के मात्र कलाप्रशंशक अथवा श्रोताक संग-संग अनेक प्रकारक कलाकार– गीतकरचना करनिहार, गेनिहार/गीतगैन, कथावाचक, कथावाचिका – सेहो भेट जैत छैक।रचना के कारण भाषा सेहो संपन्न होइत छैक। नव शैली, शब्दाबली के प्रयोग होइत छैक। ई मूल कथा मालवा सं बहुत क्षेत्र के भ्रमण करैत भोजपुरी क्षेत्र होइत मिथिलाक माटि में प्रवेश करैत छैक। गोरखपुर भोजपुरी क्षेत्र छैक ताहि कारने नाथ जोगीक भाषा भोजपुरी भ जैत छैक। ओ मूल गीत भोजपुरी के लोक स्वरुप में गबैत छैक।ओहि स्टाइल के कॉपी मिथिला में सेहो लोकगीत (जोगी गीत) में बहुत उत्तम रूप में भेटैत छैक। दुनु भाषा – मैथिली आ भोजपुरी – सहोदरा अर्थात गंगा जमुना जकां एक भय भव्य रूप सं हिलकोरा मारैत कल-कल करैत बहैत रहैत छैक।जखन गरीबी, भावनात्मक टूटन, असफलता, अपमान आदि सं व्यथित भ कुनो युवक नाथ सम्प्रदाय के सदस्य बनि जोगी भ जैत छथि त कथा ओहि व्यक्ति, ओकर माता-पिता, पत्नी-संतान, भाए-बहिन, समाज आ गाम लेल एकभावनात्मक आ जिवंत बात भ जैत छैक।लोक झट दनि अपना आप के चरित्र सं जोड़ लगैत छथि। भरथरी, मैनावती, गोपीचंद एकाएक सब जीब जैत छथि। गीत में नव रक्त प्रबह्मान भ जैत छैक, स्वक्ष आ फ्रेश ऑक्सीजन साँस लेबाक लेल भेट लगैत छैक।मालवाक कथा एकहि क्षण में मिथिला के कथा भ जैत छैक। ओ महिला सब जिनकर पति मिथिला सं बाहर रहैत छथिन काज धंधा के चक्कर में ओ सब अपन परदेसिया अथवा बिदेसिया पति के जोगी के रूप में देखि गीत गबैत छथि। विरहअपन चरम अवस्था में पहुच जैत अछि। एक एक आखर मर्म के आखर भ जैत छैक।एहने एक गीत देखू: कथीलै प्रीति लागौलें रे जोगिया प्रीति छोड़ेने चलि जाय आंगन मोरा लेखे विजुवन रे जोगिया घर लागै दिवस अन्हार लाली पलंगिया सुन्न भेलै रे जोगिया तकिया मोहि ने सोहाए खुजल केश नीड़ भेलै रे जोगिया काजर गेल दहाए एहि गीत में विरहिणी नायिका के अपन पति बिना आंगन एकांत वन; घर दिनों में अन्हरिया राति जकाँ अन्हार, ललका सजल पलंग अनसोहानगर, तकिया मारुक लगैत छैक। खुजल केश बेकार लागि रहल छैक, अंखि सं नोरक धार कम होबाक नामे नहि लैत छैक। नोर केर धार काजर के मेटा देने छैक। ऐना लगैत छैक जेना ओकर पति नाथ जोगी बनि गेल हो। घर सं भागि गेल हो! दोसर गीत में ई प्रदर्शित कैल जा रहल छैक जे राजा भरथरी जंगल में कारी मृग(हरिण) के शिकार करक हेतु गेल छथि। रानी के अपना राजा पर गर्व छनि। बुझल छनि जे बिना शिकार के नहि औताह। रानी रातुक रभस के तैय्यारी क रहल छथि. सोहागिन रानी अपन सौन्दर्य के चानन के लेप सं सुगन्धित, फुलक हार सं सुशोभित, आ माथक सिन्दूर सं मनमोहक केने छथि. मुदा ई की? आंगन केर प्रवेश पर एक जोगी सारंगी लेने गीत गाबि रहल छैक: “हे रानी! हम दूर देस केर जोगी छी. हमरा जल्दी-जल्दी भीख द दिय, हम अहाँक दुआरि छोडि दोसर अंगना भीख लेल चलि जैब।” बेचारी रानी के की बुझल जे ई जोगी आर कियो आन व्यक्ति नहि अपितु हुनके पति राजा भरथरी छथिन। चानन रगड़ी सोहागिन हे गले फूलक हार सिंदुरा से मंगिया भरलअछिहे सुख मास अखार राजा गईले मृग मारन हे वन गईले शिकार जोगी एक ठाढ़ आंगन में हे रानी सुनले मेरी बात दए दीय भिक्षा जोगी के हे ओ त छोड़त दुआर... ओही दिनसं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माएसं भीखमंगबामें सफल भ जैत। मिथिला कहियो वैराग्यके स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवनमें रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक।ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माएसं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक। नानी कथो कहथि आ बीच-बीचमें गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल। नानी सेहोकानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथामें मस्त – एक सुनेबामें मस्त आ दोसर सुनबामें मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैतछलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्यकलाकार नानी आ एकमात्र श्रोता हम मुदा दुनुके आंखि, ह्रदय. आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथावाचिका केरगुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतः करणमें कथाके बसेलासं अबैत छैक। नम्रनिवेदन ओहि समयमें जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्तिपर जोर द' लिख रहल छी। अहि लोकस्मरणमें जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओनानीक छनि आ जतए इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक। राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती इतिहासक पैघ विद्वान छथि। कला इतिहासमे हिनकर PhD हार्वर्ड विश्विद्यालयसँ ओम्कारेश्वरपर छनि। ओरछा आ अनेको आर्कियोलॉजिकल साइटपर बहुत महत्वपूर्ण काज केने छथि। सफल आई.ए. एस. अधिकारी रहल छथि। भारत सरकारसँ सचिव केर पदसँ रिटायर केने छथि। अपन कला प्रेम आ विद्वताक कारण डॉ. चक्रवर्ती इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय भोपाल केर निदेशक; इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली केर सदस्य सचिव; नेशनल म्यूजियम, दिल्ली केर महानिदेशक आ नेशनल म्यूजियम इंस्टिट्यूट ऑफ़ आर्ट हिस्टीरी, म्युजियोलॉजी ,आ कॉन्सेर्वशन केर वाईस चांसलर ; NEUPA केर वाईस चांसलर; दिल्ली विरासत संसथान, दिल्ली केर चीफ; आ ललित कला अकादमी केर अध्यक्ष पदके सुशोभित क चुकल छथि। डॉ. चक्रवर्ती सौम्य, मृदु आ सहज लोक छथि। ई अपना आपके विद्वान मानैत छथि प्रशासक नहि। गुफा चित्रकलाके वैज्ञानिकता, उद्भव, विकास, खोज, शोध आदिपर बहुत गंभीर आ विस्तृत काज केने छथि। लोक आ जनजातीय कलाके सब पक्षपर काज करबाक प्रबल इच्छा छनि। हमरा हिनका संगे बहुत काज करबाक अवसर भेटल अछि। हिनका संगे नालंदा, छत्तीसगढ़, असम, अरुणाचल, मणिपुर, सिक्किम, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, बंगाल, आदि शोध कारणे रहबाक आ भ्रमण करबाक मौका भेटल अछि। हिनकर जिज्ञासा अनंत छनि। हमेशा अपन डायरीमे जानकारी लेत रहैत छथि। कहैत रहैत छथि जे भाव इतिहास, भाव भूगोल, लोक इतिहासके बिना भारतके नहि बुझल जा सकैत अछि। हिनका संगे कतेक सै सेमिनार, वर्कशॉप आदिके आयोजन केने छी सेहो पूर्ण बौद्धिक स्वतंत्रताके संग। एक बेर एहने प्रयोजनसँ 2001 मे जोधपुर गेल रही। ओत एक एहेन स्थान भेटल आ एहेन जानकारी भेटल जे एक बेर लोकमे कुनो मूर्त संरचनापर कतेक अमूर्त कथा एवं लोकइतिहास केर परत बनि जाइत छैक सेहो विलक्षण ताहिपर सोचबाक लेल बाध्य केलक। अगर हम कही जे हमरा संगे लंकापति रावण केर सासुर आ मंदोदरी केर नैहर चलु, हुनकर विवाहमण्डपके देखु, कुलदेवीके दर्शन कए धन्य होउ त केहेन लागत? दिनमे सपना जकाँ ने? मुदा दृष्टान्त किछु एहने सन अछि। प्रामाणिक आ अप्रमाणिक अलग बात छैक, कनि लोक इतिहास आ आख्यान केर जाल केर निर्माण देखु। एक संगे राम आ कृष्णके एकहि वेदीपर अलग अलग कालखण्डमे विवाह केर कथा आ किम्बदन्ति देखू। हमरा लेखनी संगे अहुँ यात्रा करु। नीक लागत। घुमबाक आ जानकारी विशेषरूपसँ लोक इतिहास केर संकलनके दृष्टिकोणसँ अनेक बेर राजस्थान जाइत रहैत छी। राजस्थान जेबाक अर्थ भेल सांस्कृतिक विरासत केर गर्भमे जेनाइ। एहि धरा केर मूर्त आ अमूर्त दुनू सांस्कृतिक सम्पदा प्रदेश केर गौरवपूर्ण इतिहास केर साक्षी अछि। चप्पा-चप्पा धरती वीर पुत्र आ वीरांगना केर पदचापसँ अभिमंत्रित अछि। राजा आ प्रजाकेर मध्य नीक आ अधलाह अनेक कथा जिवंत अछि। ई मीरा, महाराणा प्रताप, बिक्रम आ नेरा केर धरती अछि। ई ओ धरा अछि जतय केर क्षत्राणी आ अन्य महिला अपन इज्जत आ आन, बान आ शान केर रक्षाक हेतु सै सै केर संख्यामे आत्मदाह अथवा सामूहिक जौहर क लेलथि। अपना आपके जिबैत अग्निमे समर्पित केलि मुदा आक्रांताके अपन शारीर तकके हाथ नहि स्पर्श कर देलनि। राजस्थानके कुनो भागमे जाऊ, किछु ने किछु महत्वपूर्ण इतिहास, परंपरा, केर भान भेटत, गढ़ आ गढ़ैया भेटत, ढ़नमनायल हवेली भेटत, राजाक कथा भेटत: कतौ प्रजावत्सलताके त कतौ निरंकुशताके। मुदा भेटत जरूर। जोधपुरके बागलमे मंडोवर नामक एक बहुत पैघ प्राचीन नगर छलैक। बिखरल खंडहर, प्रस्तर अवशेष एहि बातके साक्षी छैक। अगर स्थानीय लोकक बातके विश्वास करी त 24 कोसमे ई नगर व्याप्त छल। कतेक महल उल्टा लटकल जकाँ लागत। अगर ध्यानसँ देखब त ऐना बुझना जैत जेना कियोक पूराके पूरा नगरके उलटा लटका देने होइक। पहिने प्रवेशमे बुझा जैत जे जरूर बहुत रहस्यसँ भरल नगर छल हैत ई खँडहर। पूरा खण्डहर जेना बहुत पैघ रहस्य अपना गर्तमे नुका क रखने हो? खैर! एक बहुत बुजुर्ग महिलासँ भेट भेल। ओ कहली : "बेटा, कांई फोटू लेवे है , आखी नगरी ही उलटी पड़ी है।" (बेटा, की कोनो फोटो ल रहल छी? ई त समस्त नगरी उलटा छैक"।) बात बहुत बिचित्र रहैक। ऐना मोनमे जिज्ञासा भेल जे जौं कियोक स्थानीय आदमी एहिपर किछु कहैत। एक युवक भेट भेल। ओ कहलक कुनो खास बात नहि छैक। अर्चेयोलॉजिस्ट्स आ प्रागइतिहास एहिपर मौन अछि। शायद कियोक स्थानीय लोक किछु बता पबथि। एतबेमे एक बुजुर्ग एला। करीब 80 वर्षक। पातर देह। गोर धप-धप। जिज्ञासाके देखैत कहला: "हमर पितामह किछु एहि शांत आ ढ़नमनयाल खण्डहरके गूढ़ रहस्य आ इतिहासके बारेमे कहने छला।अगर अहाँ लग समय हो आ सुनबाक धैर्य हो त हम बता सकैत छी।" हमरा ऐना लागल जेना सब किछु भेट गेल। हम झट दनि कहलियनि : "जरूर, अपने कहल जाओ। हम अपने सनहक़ लोकक तलाश करैत रही।" आब बूढ़ा एक पाथरपर बैस कहनाय प्रारम्भ केला: आईसँ सात हज़ार पाँच सै वर्ष पूर्व लंकापति रावण अही स्थानपर आबि मंदोदरीसँ विवाह केला। मन्दोदरीके स्थानीय लोक मंदोधरी कहैत छनि। हिनक पिताक नाम छल निमंदूजी। ओही नामसँ एहि स्थानक नाम मंडोवर पड़लैक। एकटा 10 खंभाके चँवर दिश इशारा करैत ओ बुजुर्ग कहलनि "यैह थिक ओ स्थान जतय रावण आ मंदोदरी केर विवाह मंडप केर वेदी छलैक।" ठीक ओकर बगलमे पाथरक कलात्मक भव्य आ उत्कीर्ण तोरण रहैक जे आब खण्ड-खण्ड भेल छैक। हालाँकि एक बेर एकरा देखलासँ सुधिजन सहजहि अनुमान लगा सकैत छथि जे ई विवाह कतेक शाही ठाठसँ भेल हेतैक आ ऐश्वर्यके प्रतीक छल हेतैक। कतेक कारिगर आ कलाकार राति-दिन एकर निर्माणमे लागल हेतैक। बेजुवान पाथर जेना अपन इतिहास केर गाथा सुनबैत हो। आब हमहु बुजुर्ग व्यक्तिके कहल सब बात के पाथर संगे जोड़ै लगलौं। अद्भुत अनुभव। अद्भुत सिनेह। राजस्थानके इंच इंच धरतीसँ पुनः आत्मिक लगाव होम लागल। आब बुजुर्ग एक ऊंच महलपर ल गेला। कहलनि जे ई ध्वस्त महल 24 खण्ड केर छलैक। दूमहलमे विभक्त, 12 खण्ड ऊपर आ 12 खण्ड निचा। निचा खण्ड केर तलघर एखनो बाँचल छैक आ सुरक्षित छैक। समस्त भवन आ दुनु खण्ड केर हरेक हिस्सामे सुरुज केर धुप इजोतक संग वसातआर्थत क्रॉसवेंटिलेशन केर गजब व्यवस्था छलैक। निचाके तहलखानामे गुप्त स्थानपर खजाना सेहो बनल रहैक। एक तहलखानामे त पूराके पूरा मंदिर दबल रहैक। मंदिर केर देबारपर रंगविरंगक उत्कीर्ण आकृति एखनो मनोहारी लागि रहल छलैक। तत्पश्चात ओहि स्थान लग गेलहुँ जतय राजघराना केर पुरुष रहैत छला, स्त्रीगण रहैत छलि। कुलदेवीकेर डीह केर दर्शन भेल। बिना कुलदेवीके विधिवत पूजा अर्चनाके घरक कोनो स्त्रीगण अथवा पुरुष भोजन नहि करैत छल। मंदोदरी केर महल देखल। बुजुर्ग सब स्थानक एक टूरिस्ट गाइड जकाँ विस्तारसँ जानकारी द रहल छलाह। एक एक शब्द नापल – ने कम ने अधिक। पूरा संतुलित। बुझना ऐना जाइत छल जेना रावण आ मंदोदरीके विवाहक पुजेगड़ी यैह होथि! भवन निर्माण कला उत्तम बुझना गेल। ओहि समयमे आर्किटेक्चर केर सम्बन्धमे ओतेक जानकारी नहि छल ताहि कोनो स्कूल अथवा स्टाइलसँ जोड़बामे असमर्थ रही। फ़ोटो बहुत सुन्नर नहि छल। जे छलो से समाप्त भ गेल। स्मरण शेष अछि। वैह लिख रहल छी। गढ़ल मुदा टूटल आ छत विछत पाथर केर हरेक भाग जेना किछु कहैत छल? पहिल बेर भेल जेना पाथर बजैत हो। मुदा जोरसँ नहि, कानमे नहु-नहु। फेर भेल, जे जकर विखण्डित पाथर केर ढ़ेर अतेक बजैत छैक ओकर साक्षात स्वरुप केहेन हेतैक? मोन त करैत छल जे इतिहासके कान पकड़ि पाछा क ली आ सब बात देख ली, छू ली, बुझि ली, आ लिख ली, एक साक्षात प्रत्यक्षदर्शीके रूपमे! मुदा इहो बुझल अछि जे ई सपनेटामे संभव अछि। बुजुर्ग देखेबो करथि आ विशद वर्णन सेहो केने जाथि। हुनकासँ इहो ज्ञात भेल जे रावण जतेक वलशाली छल ओतबे घमण्डी सेहो। रावण समस्त संसारके अपनामे समेट लेबाक प्रण केने छल। अहंकार ओकर अपन सीमा लाँघि लेलकैक। अतेक जे रावण अपन ससुर मेदूजीके सेहो कहि देलकनि जे ओहो ओकर अधिनस्त भ जाथि। जाति कुलसँ श्रेष्ठ मेदूजी भला एहि प्रस्तावके कोना स्वीकार क सकैत छला? अपन जमाय रावणके सम्मानपूर्वक मना क देलथिन। रावण छल धैर्यहीन। क्रोधसँ काँपे लागल। कुपित भेल तुरंत अपन भाय कुम्भकरण आ पुत्र मेघनादके बजा पूरा नगरके उलटि देलक। ध्वस्त क देलक। ताहिं आई ओई खण्डहर उलटा अछि। चँवरी लग रानीमहल, जनाना महल आदिक जीर्ण अवशेष देखल। किछु घर केर कमरा सब एखनो अनेक तरहक कलाकारी केर बेजोड़ गाथा कहैत छैक। रंग आ रूपविन्यास आईओ ओहिना छैक। संयोग नीक छल। हमर सूचनादाता बुजुर्ग संस्कृत आ इतिहासक नीक ज्ञाता छला। हुनकर ई मानब छलनि जे जनमानसमे प्राचीन इतिहासके सटीक ज्ञान नहि हेबाक कारण बहुत अनर्थ भ रहल अछि। हरेक बातक विवरण इतिहासमे नहि अंकित अछि। कुनो राजकीय सुखसँ संपोषित इतिहासकार मंडोवर केर इतिहास कियैक लिखैत? इतिहासकारके लिखक हेतु के पैसा देतैक? के ओकरा भग्नावशेष केरगर्तमे धसल इतिहासके पोर-पोर खोइंछा छोड़ा क कहतै? ताहिं बहुत रास बात, रहस्य, आदि कालके गालमे अथवा मंडोवर केर विशालकाय चट्टान्नमे धंसि क समाप्त जकाँ भ गेलैक। कतेक दबल अहि आशमे छैक जे उत्खनन कए कियोक तथ्यके उजागर करता। मुदा कहि नहि कहियों ई रहस्यसँ समाज आ विद्वान वर्ग लाभान्वित हैबो करता की नहि??? हमरा लोक निराई-आँगन, सभा मंडप हथिसार, घोड़सार, दासीगृह, आदि सब किछुके अपना आँखि आ बुजुर्ग केर ऐतिहासिक दिव्य आँखिसँ देखल, हुनकर अभूतपूर्व वाणीसँ सुनल। जिज्ञासा भेल जे बुजुर्गसँ रावणके संबंधमे आ लंकाके बारेमे जानकारी प्राप्त करी। पुछलापर कहलनि: "असली लंका त अथाह समुद्रमे डूबल अछि। ओहि लंका केर एक कोण तिरुपति बालाजी छथि। लंकापुरीमे राम 100 योजन केर बान्ह बनने छला। तिरुपति वैह स्थान अछि जतय राम आ विभीषण केर भेट पहिल बेर भेल छलनि। एहि मंडोवरमे निचामे 3 सुरंग छैक। एक अयोध्या, दोसर लंका आ तेसर द्वारका जाइत छैक। बुजुर्ग एक मारक बात कहलथि: "श्रीमान, ककर ध्यान छैक अहि पुरातन धरोहर दिस? सब विनाश केर प्रक्रियामे मग्न अछि। आ ई जे जोधपुर नगर देख रहल छी ओकर बहुत भागक निर्माण एतहि केर अवशेषसँ भेल अछि। नव्निर्माण लेल पुरातनके सब संहार क रहल अछि।" एक बात बुजुर्ग जे कहलनि से थोरेक चिंता आ शंशय दुनुके जन्म द देलक। ओ बात ई रहैक जे बुजुर्गक हिसाबे आईसँ करीब 3000 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण सेहो अतै आबि अपन विवाह केने छला। से कोना? ई विवाह भेल छलनि कृष्ण आ जामवंतीके बीच। दरअसल ई विवाह ओतेक योजनावद्ध तरीकासँ नहि संपन्न भेल रहैक जेना रावण आ मंदोदरीके समयमे भेल रहैक। अर्जुन संग कृष्ण मणि तकैत-तकैत एते आबि गेल छला कारण जे ओ मणि जामवंती लग छलनि। जामवंती मणिके महत्त्वसँ अनजान छली आ ओकरा कैंचा बुझि खेल खेला रहल छली। कृष्ण जामवंतीसँ ओ मणि मांगला। एहि बातपर जामवंती केर पिता गम्भीर होइत कहलथिन: "हे केशव, हम ई मणि अहाँके द देब' चाहैत छी, मुदा एक शर्त अछि? अगर अपने एहि शर्तके स्वीकार क ली त मणि तुरत भेट जैत." कृष्ण कहलथिन: "अहाँ अपन शर्त कहु। हम स्वीकार करब।" कृष्णसँ अस्वासन पाबि जामवंती केर पिता बजला: "मणि त हम तुरत्तेद' देब परंतु मणि सँग अपन पुत्री जामवंती केर हाथ सेहो अहाँके हाथमे सुपुर्द कर चाहैत छी अहाँक अर्धांगिनीके रूपमे।" कृष्ण तुरंत जामवंती केर पिताक निवेदनके स्वीकारि लेलनि आ अहि तरहेँ ओही दिन ओही स्थलपर कृष्ण सङ्गे जामवंती केर विवाह भ गेलनि। अतेक जानकारी प्राप्त करैत-करैत 2 घंटा लागि गेल। पता नहि चलल जे समय कोना बीत गेल। सब जानकारी रुचिकारक आ बहुत हद धरि प्रामाणिक सेहो भेटल। अंतहीन प्रश्न जे मोनके परेशान केने अछि ओ ई थिक जे एहि टूटल पाथर, भवन, अट्टलिका, आ स्थानके रहस्य कोना खुजत???? छागरक बलिप्रदानपर चिन्‍तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्‍य हम सोभाव आ कर्मसँ परम्परावादी छी। परम्पराकेँ मानबो करै छी आ परम्पराक सम्बन्धमे लिखबो करै छी तथा परम्परेमे जीवितो रहलौं अछि। परम्परामे बहुत नीको बात सभ अछि तेकरा बारेमे लोककेँ जाग्रत सेहो करैत रहै छी। परम्परा आ प्रकृतिमे सामंजस्य देखैत छी। मुदा परम्पराक पालन, प्रशंसा आ लेखनमे साकांक्ष सेहो रहै छी। परम्परा जे लोक विरूद्ध नहि हो, परम्परा जे हिंसक नहि हो, परम्परा जे केकरो शोषण अथवा दोहनक पुष्टि नहि करैत हो, वएह परम्परा अनुकरणीय परम्परा अछि...। जखन परम्पराकेँ अमानवीय पक्षपर कियो बात करैत अछि तँ ओकर विरोध होइत छइ। आ एक टटष्ठ शोधार्थी अथवा समाजिक बेकतीकेँ एहि तरहक विरोध सहबाक लेल तैयार रहक चाही। कनी सोचु, अगर राजा राममोहन राय सती-प्रथाकेँ विरोध नहि केने रहितैथ तँ आई की स्थिति रहैत? कोना परम्पराक नामपर जीबैत स्‍त्रीगणकेँ हुनक पतिक संग चितामे बलपूर्वक झोंइक हुनका जरा देल जाइ छल? आ लोकक सतीमाता केर जयकारक नादमे जरैत महिलाक दर्द, पीड़ाकेँ दबा देल जाइत छल। अखनो जखन परम्पराक नामपर मधुश्रावनी पाबैनमे नव विवाहित महिलाक ठेहुनकेँ टेमीसँ दागल जाइत अछि तँ हम इतिहासक गर्तमे चलि जाइ छी। जहिया सती जरैत छेली! मुदा नचार भऽ परम्पराक समक्ष अपने-आपकेँ असहाय बुझैत छी। छोटे स्तरपर किएक नहि, अपन विरोध अवश्य दर्ज करा लैत छी। जखन हमर विवाह भेल तँ अपन मधुश्रावनीमे हम किनको अपन पत्नीक ठेहुन दगबाक अनुमति नहि देलिऐन। थोड़ेक उपहासक पात्र बनलौं। स्‍त्रीगण सभ कियो ‘मौगियाह’ तँ कियो ‘घमण्डी’ कहलैन। सुनि लेलौं, मुदा ‘नइ’ कहि देलिऐन तँ नहियेँ करए देलिऐन। आब अबैत छी छागरक बलिदानक प्रथापर। अपन अनुभवक अधारपर कहि सकैत छी जे ई प्रथा बड्ड नीक परम्परा नहि अछि। छागरक बदला किछु और व्योंत हेबाक चाही जाहिसँ एहि प्रथाक अन्‍त हो। उत्सव, संस्कार विशेष रूपेण दुर्गापूजा, केतौ-केतौ काली पूजा, उपनयनमे घरक कुलदेवी अथवा कुलदेवताक समक्ष किंवा ब्रह्मस्थान आदिमे छागरक बलिदान जेना मनकेँ विचलित कऽ दैत अछि..! एहि बातकेँ अपन जीवनक दू अनुभवसँ जोड़ि कऽ देखै छी। एकमे नेना रही तँए लाचार आ दोसरमे परम्पराक आड़िमे माँ, बहिन, भाय लाचार कऽ देने छला। एक घटना पाबैन– दुर्गापूजासँ सम्‍बन्‍धित तँ दोसर संस्कार– उपनयन-सँ सम्‍बन्‍धित अछि। प्रारम्भ प्रथम घटनासँ करैत छी। नेना रही तँ दुर्गापूजा सँ सात मास पहिनहि एकटा छागर माँ कीनि लेने छेली बलिप्रदान लेल। भगवतीक नामे राखल छागर बान्हल कम आ खुजल बेसी रहै छल। दियाद सबहक बाड़ी-झाड़ीक तीमन तरकारी चरि जाइ तँ भगवतीक नामक कारणे कियो किछु ने बाजैथ। बहुत धियान राखल जाइक। पूरा बलन्‍ठ आ बोतो बनि गेलैक। अन्‍ततः अष्टमी दिन ओकरा हमसभ दुर्गास्थान लऽ गेलौं। पूजा पाठसँ पहिनहि ओ छागर दोसर टोलक छागरसँ लड़ल। सिंघसँ सिंघक युद्ध। हमर सबहक छागर जीत गेल। जयकार मचलइ..! आब ओहि एकरंगी कारी छागरकेँ पोखैरमे नहाएल गेल। गरदैनसँ रस्सी हटा दूटा कबगर समाँग ओकरा अपन कब्जामे लेने रहला। नहेला बाद छागरकेँ भगवती लग लऽ गेला। पण्डितजी खर्गक पूजा कऽ लेने छला। महाभयानक खर्ग। पैघ, धरगर, तेजगर आ प्रलयंकारी! हम रही ता बारह वर्षक नेना। आब भेल जे एते दिनक पोसल छागर बलि चढ़ि जाएत। आइ सभ किछु समाप्त। स्‍त्रीगण सभ गीत गेबामे मग्न। गाममे एक पहलमान छला। लोकक कहब रहै जे हुनकापर साक्षात् भगवती सवार भऽ जाइ छथिन। केहनो जुआएल छागरकेँ एक्केबेर-मे ओ धरसँ गरदैनकेँ अलग कऽ दैत छला। खर्ग उठेबासँ पहिने भगवतीक मुर्ती लग एक पैरपर हाथ जोड़ने एक घन्‍टा ठाढ़ रहैत छला। स्‍नान केलाक बाद लाल धोती आ बिनु सीअल वस्‍त्र पहिरने। जखन बाहर अबैत छला हाथमे खर्ग लेने तँ यमक सहोदर लगैत छला। लोक सभ कण्‍ठ फारि-फारि "दुर्गा महरानी की जय" केर नादसँ हुनका आरो विभत्स बना दैत छल। ओहि जयकारक अवाजमे छागरक अवाज जेना विलुप्त भऽ जाइत छल! खएर! पण्डितजी पूजा केलैन। मंत्र पढ़ला। फूल, अक्षत आ जल लऽ भिजल छागरक ऊपर फेकलथिन। छागर सिहैर उठल। भूल्लाक गरदैन हिलाबए लागल। कान पटकए लागल। सबहक मन खुशीसँ बताह। लोक चिचियाएल- "छागर परीक्षा लऽ लेलक।" समस्त विजयी मुश्कान। एकबेर फेर अवाज भेलै- "दुर्गा महरानी की जय।" आब छागरकेँ मन्‍दिरसँ बाहर लाएल गेल। भेलै ई जे दोसर टोलबला छागरकेँ पहिने बलिदान पड़तै। बलिदान देमए-बला अपन हाथमे खर्ग लेने बाहर आबि गेला। लोक सभ ‘जय-जयकार’ करैत रहल। छागर सभ कटैत रहल। भगवती लग एक माय केर सन्तान दोसर माय केर सन्तानक स्वाद, आयु, उन्नति, विकास लेल कटैत रहल। खूनक धार बहैत रहल। छागरक मेमियेनाइ जय-जयकार आ गीतक ध्वनिमे गौण होइत रहल...। हमर बाल्‍य-मन भरि रास्ता कनैत रहल। दुर्गा लग जा-जा ई पाँति बेर-बेर गबैत रहलौं- "गे माय, तोरा बेटाकेँ खाइत केना नीक लगलौ?” मन बेर-बेर असहाय छागरक काटल मुड़ीसँ बहैत शोनितक स्मरण कऽ रहल छल। लोकक जय-जयकार तेहेन जेना बुझि पड़ए कान फाड़ि देत। मनमे डर घुसि गेल। स्‍त्रीगणक समवेत गान आ दुर्गाक भजन सोहनगर नहि लागि रहल छल। घर एला बाद ओहि छागरक मौस बनल। ओना, ‘मौस’ कहैसँ माँ परहेज केने छेली। कहने छेली ई ‘दुर्गाक प्रसाद’ छी। दियादी परिवारमे प्रसादक बेन बँटाएल। अपनो घरमे रनहाएल। सभ खेलक खूब प्रेमसँ खेलक। परसन-पर-परसन लऽ कऽ खेलक। मुदा हम नहि खेलौं। माँ कहैत-कहैत रहि गेली मुदा हम नइ खेलौं। आब दोसर अनुभव दिस चली। हमर पुत्र शशांक केर उपनयन हएब निसचित भेल। तिथि छल, जून 2014 माने दू-अढ़ाइ साल पूर्व। हमर कनियाँ शाकाहारी छैथ। ओ किएक शाकाहारी छैथ तहूमे एक बलिप्रदानेसँ जुड़ल घटना अछि। हमर पूनम माछ-मौस खूब खाइत छेली। एकबेर–भाइक उपनैनमे–छागरक बलि चढ़लै। ओहो अपना आँखिए देखलखिन। अतेक वीभत्स लगलैन जे ओही दिनसँ माछ-मौस खेनाइ छोड़ि देलैन। तेतबे नहि, हिनकर अनुकरण करैत अपन छोट बहिन सेहो शाकाहारी भऽ गेलैन। ..जखन हमर पुत्र शशांक माँक शाकाहारी प्रवृतिकेँ देखलैन तँ ओहो शाकाहारी भऽ गेला। हमरा एहिसँ कुनो समस्या नहि अछि। जे खाए चाहै छैथ खाथु जे नहि चाहैत छैथ नहि खाथु। मुदा एहिसँ एक चीज तँ स्पष्ट भाइए गेल जे हमर पत्नी, हम आ हमर पुत्र तीनू गोरे छागरक बलिप्रदानक पक्षमे साफे नहि छी। खएर, संस्मरणकेँ आगाँ बढ़बैत छी। हमर गामक एक संस्कृतक विद्वान पण्डित- राघवेन्द्र झा दिल्लीक स्कूलमे शिक्षक छैथ। वएह हमर पुत्रक उपनयनक दिन निर्धारित केलैन। पण्डित राघवेन्द्र झाजी स्वयं वैष्णव छैथ। हम अपन समस्या हुनका समक्ष राखल। ओ कहलैन- “एकर उपचार छै, अहाँ चिन्‍ता नहि करू। जेतेक ओजनक छागर छै तेतेक पसेरी मिठाइ अर्थात् लड्डू भगवतीकेँ आ ब्रह्मस्थानमे सेहो चढ़ा देयौ।” हुनकर एहि व्योंतसँ हम तीनू परानी बड्ड प्रसन्न भेलौं। दोसरे दिन हम गामपर माँ, भैया एवं अन्य सम्बन्धीकेँ उपनयनक दिनक सम्‍बन्‍धमे जानकारी दैत सभ तैयारी करबाक निवेदन कएल। तेसरे दिन माँक फोन आबि गेल जे ओ पाँचटा छागरक बेवस्था कऽ लेलीह। ई सुनिते हमर माथ पकैड़ लेलक। गृहयुद्धक पृष्ठभूमि बनि गेल परिवारमे। माँ अपना आगूमे केकरो टेरती नहि, आ पत्नी छागरक बलि लेल तैयार नहि हेती। पुत्र सेहो अपन माइयेक पक्षमे रहता...। अन्‍तत: हम हिम्मत करैत माँसँ निवेदन केलौं- “मॉं, राघवेन्द्र-गुरुजीक कहब छैन जे जेतेक छागर तेतेक पसेरी लड्डूसँ काज चलि जाएत।” माँ हमर व्योंत सुनिते बिकराल रूप पकैड़ लेली- “की कहैत छी? अहाँ सभ आब देवता-पितर सभकेँ समाप्त करए चाहैत छी? छोटकी काकी[1] मरैसँ पहिने कहलैन ‘कैलाशक माय, सुनु हम आब नहि बाँचब। मुदा अहाँ चिन्‍ता नहि करू। हम भगबान लग जा भगबानसँ लड़ि कऽ कैलाश लेल बेटा भेजब। अहाँ एक काज करब एकरा बदलामे अहाँ एकटा एकवर्ण कारी-छागर अँगनाक भगवतीकेँ आ एकटा एकवर्ण-छागर ब्रह्मबाबाकेँ ओहि बच्चाक उपनयनक समयमे चढ़ा देबैन। छोटकी काकी थोड़बे दिनमे मरि गेली। आ हुनक पहिल बरखीसँ पहिने शशांकक जन्म भऽ गेलैन। बिसैर गेलौं की?” माँ ई कहैत फ़ोन हमर भौजीकेँ दऽ देलथिन। आब भौजी शुरू भेली- “देखू बौआ! अहाँ दुनू परानी जे करब से करू। मुदा शशांक लेल कुनो अशुभ ठाढ़ नहि करू। बुझल अछि, हमर बाबा वैष्णव छैथ मुदा जखन छागर चढ़ै छै तँ बलि-प्रदानक भूमिसँ एक ठोप रक्त भगवतीक प्रसाद मानि अपना जीभसँ अवश्य सटबैत छैथ। माँ ठीके कहैत छैथ। छोटकी दाइ भरि अँगनामे शशांक लेल कबुला-पाती केने छेली। निसचित रूपसँ ओ भगबानसँ लड़ि कऽ शशांक अहाँ सभ लेल भेजलैन अछि। जे परम्‍परा अदौंसँ आबि रहल छै तेकरा अहाँ सभ केना समाप्त कऽ देबइ! अहाँ मर्द बनू आ बेटाक शुभकार्य करू। पूनमकेँ बुझा दियौन जे हुनकर दालि एतए नहि गलतैन। जहाँ तक छागरक दामक प्रश्‍न अछि तँ कुनो बात नहि। शशांक हमर सबहक बेटा पहिने अछि आ अहाँ सबहक बादमे। हम छागरक दाम दऽ दइ छी। एकर अतिरिक्त अहाँ सभ जेतेक मिठाइ, लड्डू आ छप्पन भोग करब से करू। कियो ने मना करत।” अहि तरहेँ माँकेँ तैयार कएल विचारकेँ भौजी ठोस भावनात्मक अधार दऽ देलैन। सभसँ पैघ बात ई जे अपन बात कहि भौजी बिनु हमर बात सुननहि फोन काटि देली। हम चाहियो कऽ अपन पत्नी लग ई बात नहि बजलौं, मुदा रणभूमि युद्ध लेल तैयार भऽ चुकल छल। ओही दिन रातिमे मामाक फोन सेहो आएल। कहलैन- “बौआ, कुनो एहेन काज नहि करू जइसँ बहिनकेँ अहाँक पिताक कमी अनुभव होनि। ई हुनकर अन्तिम पोताक उपनयन छिऐन। अही लेल आइ धरि एकादशी यज्ञक उद्यापन नहि केली। अहाँ सभ जखन अपन पोताकेँ उपनयन करब तँ जेना-जे इच्छा हएत सएह करब। ताबेत धरि ने बहिन रहती आ ने हम। आधा घन्‍टा धरि फोनपर कनैत छेली। हुनका अनिष्ट केर आशंका भऽ रहल छैन। हमरा कहै छेली जे जहियासँ कैलाशक ओहि परिवारमे विवाह केला, तहियासँ सभ संस्कार बिसरने जा रहल छैथ। अगर छागरक बलिप्रदान नहि हएत तँ हम कुनो आर गाम चलि जाएब। घुमि कऽ ऐ नग्रमे प्रवेश नहि करब। मरला उत्तर हम कैलाशक पिताकेँ की कहबैन जे तमाम मर्यादाकेँ सर्वनाश कऽ हम आबि रहल छी! आब मिसर अर्थात अहाँक पिता नहि छैथ ताहि सम्बन्धमे श्रेष्ठ रहबाक कारण हमर ई उत्तरदायित्व होइत अछि जे अहाँ सभकेँ उचित रस्ता देखाबी। अहाँ हमेशा अपन माता-पिताक आज्ञाकारी रहल छी, कैलाश। कम-सँ-कम ऐ उपनयन धरि ई परम्‍पराकेँ कायम राखू। रहल कनियाँक प्रश्‍न तँ अहाँक मामी कहैत छैथ जे ओ अपन पुतोहु अर्थात् शशांक केर मायकेँ समझा-बुझा देथिन।” ऐतेक बात कहि मामा सेहो अपन फोन बिना हमर बात सुननहि काटि देलैन! हमर माथ भारी भऽ गेल। ब्लड-पेसर बढ़ि गेल। माथ घुमय लागल। ऑंखिक आगू पूज्‍य पिताजी आबि गेला। होइत छल जे अगर पिताजी रहितैथ तँ अवश्य हमरा भावनाकेँ बुझितैथ..! मामा आ भैया तँ एक नम्मर-के पुरानपंथी छैथ। पिताजी हमेशा श्राद्धमे सांढ़ दागबकेँ विरोध करै छला, विरोधी छला। मुदा जखन ओ मरला तँ माँ आ मामा जिद्द ठानि देलैन जे ब्रिखोद्सर्ग श्राद्ध आ सांढ़ दागब अनिवार्य। माँ कहली जे हुनका परिवारमे केकरो अइक बिना श्राद्ध नहि होइत छैन। भावनामे बहैत माँ कहली अगर हमरा अछैत अहाँ सभ अपन पिता लेल ई नहि करब तँ हमर की करब? अन्‍तमे माँ आ मामाक जिद्दक आगाँ नतमस्तक होइत हम सांढ़ दगबा लेल तैयार भऽ गेलौं। एहि प्रकरणमे भैया सेहो जूमक-जूम तमाकुल खाइत रहला आ मुड़ी डोला-डोला माँ आ मामाक हँ-मे-हँ मिलबैत रहला। आब भयसँ कण्‍ठ सुखा रहल छल। परम्‍परा हमरा परास्त कऽ रहल छल। सभ शिक्षा, सभ तर्क धराशायी भऽ रहल छल। भावना ज्ञानकेँ ध्वस्त कऽ रहल छल..! भेल कनी पानि पीबी। पानि-दे पत्नीकेँ कहए चाहलयैन कि बिच्‍चेमे भैयाक फोन आबि गेल। नहियोँ चाहैत फोन उठा लेलौं। ‘हेलो भौया!’ कहिते मातर भैया दुर्वाषाक रौर्द रूपमे आबि गेला- “ई की भेल! हम अधा घन्‍टासँ फोन कऽ रहल छी आ अहाँक फोन व्यस्त जा रहल अछि? अहाँ सभ हरेक चीजकेँ मजाक बना देने छी!” हम कनी झल्लाइत मुदा विनम्र भावे भैयाकेँ कहलयैन- “भैया, हम मामासँ गप्प करैत रही। हुनके फोन ऐल छल।” ई बात सुनि भैयाक तामस थोड़ेक शान्‍त भेलैन। फेर शुरू भेला- “बौआ, एकटा बात मोन अछि। जखन पिताजी दरभंगासँ पटना लऽ जएबाक क्रममे रस्तामे अपन अन्तिम साँस लेलैन तँ हम अहाँकेँ की कहने रही?” हम जवाब दितयैन कि ओइसँ पहिनहि ओ स्वयं बाजए लगला- “हम अहाँकेँ कहने रही जे हमर पिता मरला अछि, अहाँक नहि। आईसँ अहाँक पिता हम छी। कहू कहने रही की नहि?” हम बजलौं- “हाँ भैया, अहाँ कहने रही। आ सैह मर्यादाक पालन अहाँ एखन धरि कऽ रहल छी।” भैया दम्माक रोगी छैथ, तँए जोर-जोरसँ हकमबो करैथ बजबो करैथ- “आब अहाँ कहू, जे हमरा रहैत शशांकक उपनयनक दिन ताकए-बला अहाँ के?” भैया भावनामे कनबो करैथ आ बजबो करैथ- “फेरो, केना करक अछि, की करक अछि। केहेन भोज करक अछि, इत्यादिपर अहाँक की निर्णय? ई निर्णय तँ हमरा लेबाक अछि। अहाँ राखू अप्पन पाइ। हम करब शशांकक उपनयन। माँ दिन भरिसँ अन-पानि तियागने छैथ। बुझल अछि अहाँकेँ? सुनू, अहाँ सबहक खटराग नहि चलत। माँ तँ पाँचटा छागर किनली अछि। हम पाँचटा आरो कीनब। देखै छी हमरा के रोकि लैत अछि? कनियाकेँ कहि दियौन जे अपन सभ नियम दिल्लीए-मे राखैथ। एतय हमर नियम चलत। ऐ घरक मुखिया पिताजीक पछाइत हम छी। आर कियो नहि। अहाँ सम्बन्धमे हमर छोट भाए जरुर छी मुदा हम अहाँ के कहियो अपन पुत्रसँ कम नहि मानल अछि।” भैया ई बात सभ कनैत कहैत रहला आ जखन अपन बात कहल भऽ गेलैन तँ फोन राखि देलैन। हम प्रलयमे पड़ि गेलौं। करी तँ की करी? किंकर्तव्यविमूढ़ भेल किछुकाल ठाढ़ रहलौं। मनमे उठल- आब पत्नीकेँ की कहबैन? ओ तँ छागरक बलिप्रदानबला बात लेल किन्नहु तैयार नहि हेती! “दुःख हरहु द्वारकानाथ शरणमे तेरी..।” अही गुनधुनमे पड़ल रही, कि एतबेमे हमर सासु आबि गेली, हमरा सभसँ भेट करबाक हेतु। हमरा लग अबिते बजली- “की मिसरजी, कुनो चिन्‍तामे छैथ की?” हम चुपे रहलौं। फेर ओ हमरा अपना लग बैसा सभ बात पुछए लगली। हम सभ बात बता देलिऐन। ओ कनी गंभीर भेली, कारण हमर पत्नीक उग्र सोभावसँ ओ परिचित रहबे करैथ। फेर निर्णयक मुद्रामे अबैत बजली- “मिसरजी, ओना हमहूँ बलिप्रदानक विरोधीए छी, मुदा हिनकर परिवारक लोक सभकेँ कियो नहि बुझा सकैतैन। ई चिन्‍ता जुनि करौथ, हम पूनमकेँ समझा दइ छिऐ।” हमर सबहक बात चलिए रहल छल कि हमर मामी हमर पत्नीकेँ फोन केलथिन। आब हमर मन घबराए लगल। भेल आब भयंकर कलह हएत घरमे। ईहो डर छल जे पूनम ने कहीं तामसमे हमरा मामीकेँ किछु अन्‍ट-शन्‍ट बात कहि दनि! ..खएर, सासु हमर भावनाकेँ बुझि गेली। ओ पूनम लग जा हाथक इसारासँ कहलथिन जे शान्‍तिसँ गप्प करैथ...। मुदा आशाक विपरीत मामी जनु पूनमे-सन बात बजली। तथापि ई कहलखिन जे हमर नैहरमे बलिदान बन्‍द भऽ गेल अछि। मुदा मामा सभ एहि बातकेँ कखनो मानैले तैयार नहि। तैपर मामी पूनमकेँ बुझबैत कहलथिन- “की करबै कनियाँ, दीदी आब कते दिन रहती। हुनकर बात मानि जाउ। अहीमे बच्चोकेँ आ अहूँ सबहक कल्याण अछि। नहि तँ ओ सभ पाहुन-परक लग यएह बातक चर्चा करैत रहती।” पूनम छेली अन्‍तत: एक माए। ई सोचैत जे बच्चा के उपनयनमे कुनो अवग्रह नहि हो मामीक बात मानि गेली। जखन उपनयन प्रारम्‍भ भेल तँ घरक भगवती लग छागरकेँ जाबे तक परीक्षा भेलै ताबे तक हमर पत्नी, पुत्र आ हम रहलौं। घरक सभसँ पैघ हेबाक कारणे भैया लाल धोती पहिरने भगवती-पूजा लग हमरा संगे बैसल रहला। विजय प्राप्त केलैन आ बलिप्रदान अन्‍ततः भऽ रहल छेलै ऐ बातक आत्मिक संतुष्टि छलैन। आभा मण्‍डल जीतक घमण्‍डमे चमकैत रहैन। शरीरसँ खिन्न भेल माँ सेहो बड़ आह्लादित छेली। भौजी कण्‍ठ फारि-फारि स्‍त्रीगण सबहक-संगे गीत गाबि रहल छेली। माँक संग-संग हमर दुनू बहिन सेहो उत्साहित छेली। माँकेँ आ भैयाकेँ आब हमरासँ कुनो शिकबा-शिकायत नहि छेलैन...। अस्‍तु, एकर विपरीत एकर ‘हम’ हारल, थाकल, लगैत रही। एतेक पैघ उत्सव मुदा आनन्‍द नइ लऽ पबैत रही। खचाखच भरल भीड़मे असगर..! मुदा संतोषक बात ई छल जे सदिखन तामसे घोर रहैबाली हमर ‘पुनम’ आइ एक मातृत्वक सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत एकदम शान्त छेली। सभ विध-बेवहारकेँ ओही तरहेँ पालन कऽ रहल छेली जेना हमर माँ, हमर बहिन आ ऑंगनमे उपस्‍थित बुढ़-पुरान सभ निर्देशित करैत छेलखिन। जेना कि पहिनहि निर्धारित रहै, जखने बलिदानक समय एलै कि हम सभ ओतएसँ हटि गेलौं। दू दिनक बाद माँ कहलैन- “पिपही बजबैत शशांक, शशांक केर माता-पिता आ परिवारक सभ सदस्य ब्रह्मस्थान जाएब। आ ब्रह्मबाबाक पूजा अर्चना हेतैन आ ओत्तो जोड़ा छागर चढ़तै।” हम सभ हुनकर आज्ञाकेँ मानैत विदा भेलौं। पूजा अर्चनाक पछाइत, जखन छागरकेँ बलि चढ़बैक सुरसार भेल, तखने हमर नेन-कालक मित्र-पण्‍डित कहलैन- “कैलाश भाइ, अहाँ ठाढ़ रहू।” हमरा मनमे उठल, जखन सभठाम हारि मानिए लेलौं तँ..। तँए एतौ अपना-आपकेँ समर्पण कऽ देलौं। पहिल छागर तँ एक्केबेर-मे कटि गेलैक मुदा दोसर छागर बेरमे–जइ छागरकेँ रस्सीसँ गरदैन गतानल रहइ–गरदैनक रस्सी टुटि गेलइ। आब अधा गरदैन काटल छागर दौड़ए लगलै। शोनितक धार फुचक्का जकाँ बहए लगलैक। बहुत विभत्स दृश्य भऽ गेलइ। पछाइत लोक हिम्मत केलक। छागरकेँ पकैड़ खर्गसँ ओकर गरदैनकेँ रेति बलि चढ़ौल। बलि देबए-बलाकेँ धोती आ सौंसे देह छागरक रक्तसँ रंगा गेलैक। मुदा ओ एहि बातसँ प्रसन्न छल जे बलिप्रदानक बदलामे ओकरा जोड़ भरि लाल धोती आ 101 टाका नगद भेटलैक। अपन मन घोर भेल छल। अपन कायरतापर मने-मन पश्चाताप होइत रहए। सभ शिक्षा, सभ ज्ञान, सभ सेमिनार आ पब्लिक भीड़मे बजबाक क्षमता सुड्डाह भऽ गेल छल। मनमे ई जरुर अबैत छल जे एतेक विवश केना भऽ गेलौं हम? मनकेँ कुनो कोनमे छिपल दुष्ट जेना बेर-बेर हमर पौरुष आ निर्णय-क्षमतापर अट्टहास कऽ रहल हो..! अस्‍तु, आब बुझैमे आबि रहल अछि जे राजा राममोहन राय सन समाज सुधारक बनब कतेक दुष्कर कार्य अछि। जे समाज हमरा एकटा बलिप्रदान सन प्रथाकेँ, समाज परिवार तँ दूर अपन बेटाक उपनयनमे नहि समाप्त करए देलक, वएह समाज 19म शदीमे केना राजा राममोहन रायकेँ सती-प्रथा सन विशाल प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल जनजागरण करए देने हेतैन? केना परम्‍परा, धर्म, तंत्र आ पुन्यक मोहजालमे पुरुष प्रधान समाजकेँ धियानमे रखैत जीवैत स्‍त्रीगणकेँ मृत पतिक संगे ओही चितामे बैसा, सुन्दर लाल-पीयर बिऔहती नुआ-अंगी-लहठी-गहना पहिरा; लाल सिन्‍दुरसँ मांग भरि अग्निमे जरा दैत छल! ई पूण्य भेल की नृशंसता? ई सोहागिनक सम्मान भेल आकि मातृशक्तिक अपमान? ई सभ्य समाजक कृत्य भेल आकि हत्याराक अपराध? वेचारी स्‍त्री केना जीबैत जरैत छल हेती? आ लोक सभ सती माताक गीतक जय-जयकारमे केना हुनकर क्रंदन आ वेदनाकेँ समाप्त कऽ दैत छल हएत! कहल जाइत अछि जे राजा राममोहन रायक जेठ भौजी हुनका पुत्रतुल्य मानैत छलथिन। जखन हुनका पता चललैन जे ई सती-प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल आन्दोलन कऽ रहल छैथ आ अइक विरुद्ध अंग्रेजसँ मिलि कऽ कानून पास करबा रहल छैथ तँ ओही दिनसँ ओ राममोहन रायसँ बातचीत बन्न कऽ देलथिन। अपन पुत्रवत् देओरकेँ घृणा करै लगलैथ। आ ओहू स्थितिक सामना करैत ई महापुरुष अपन संघर्षमे लागल रहला। सतीप्रथाक अमानवीय रूढ़ अन्‍ततः टुटल, समाप्‍त भेल। अगर ‘सती-प्रथा’ गलत छल तँ ‘छागरक बलिप्रदान-प्रथा’ सेहो गलत अछि। एकरो समाप्त भऽ जएबाक चाही। कतेक लोक ई तर्क दैत छैथ जे मिथिला तंत्रक केन्द्र रहल अछि। एतुक्का लोक शक्तिक उपासक छैथ। की एतए छागरक बलिप्रदान उचित अछि? ओना, कतेक लोकक ईहो तर्क छैन जे दिल्ली, कलकता, मुम्‍बई आदि महानगरमे बुचरखानामे विभत्स दृश्य होइत अछि, छागरकेँ काटि कऽ दोकान सभमे उघारे टाँगि कऽ लोक रखने रहैत अछि। ऐ सभकेँ विरोध किएक नहि होइत अछि। अगर से नहि तँ भगवती घर, ब्रह्मस्थान, मन्‍दिर परिसर आदिमे बलिप्रदानपर विरोध कथी लेल? हमर बहुत मित्र सभ सेहो हमरासँ नाराज छैथ जे हम एहि बातकेँ अनेरे प्रचार कऽ रहल छी। किछु लोक आ मित्र सभ तँ हमरा विधर्मी कहैत छैथ। बहुत लोककेँ नहि बुझल छैन जे परम्‍परा आ हमरा मध्य साँस आ शरीरक सम्बन्ध अछि। हम प्रति दिन पूजा करैत छी, देव तर्पण, ऋषि तर्पण आ पितृतर्पण करैत छी। मुदा हमरा ईहो लगैत अछि जे मन्‍दिर परिसर, भगवती घर आ ब्रह्मस्थान आदि सार्वजनिक स्थान थिक। ओतए कुनो तरहक बलिप्रदान नहि हो। बदलैत समयमे लोक धोती पहिरनाइ छोड़ि देलैथ, बहुत स्‍त्रीगण सभ सेहो आब उत्सव इत्यादिमे मात्र साड़ी पहिरै छैथ, घरही लोक मुर्गाक मौस खाइत अछि, पीयाउज, लहसुन सहरगंजा भऽ गेल, एहि सभ कर्म लेल धर्म अहाँकेँ किछु ने कहैत अछि मुदा छागरक बलिप्रदान छोड़ि देलासँ अहाँक धर्म भ्रष्ट भऽ जाएत! अहाँ पापक रस्ता दिस चलि पड़ब। वाह रे सोच! जेतेक माछ, मौस खेबाक अछि खाउ। के मना करैत अछि। मुदा पवित्र परिसरकेँ रक्तमय नहि बनाउ। भऽ सकैत अछि नर बलि प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल छागरक एवं अन्य जीव केर बलिक प्रथा प्रारम्‍भ भेल हो। आब ओकरो बन्‍द करू। छागरक बदला बेल, कुम्हर आदिकेँ प्रतीक रुपे बलि पड़िते अछि। होबए दियौक। ओकरेमे आरो नीक विधि-विधान जोड़ू। नागा जनजातिमे किछु वर्ष पूर्व धरि नर-बलि केर प्रथा छेलइ। नागाक हेड हंटर अथवा सिरकेँ शिकारी कहल जाइत छेलइ। नागा आब अपनामे सुधार केलक आ ऐ प्रथाकेँ समूल समाप्त केलक। नर-बलि प्रथाकेँ आब स्वांग, नृत्य आ नाटकक रूपमे मनबैत अछि। हमरो सभकेँ एहिपर गंभीरता पूर्वक सोचबाक खगता अछि। संतोषक विषय ई अछि जे ‘पण्डित’ आ ‘कर्मकाण्डी’क एक पैघ-वर्ग छागर बलिकेँ समाप्त करए चाहै छैथ। वो सभ एकर बदलामे फल, मिठाई एवं अन्य शास्‍त्र सम्मत विधान बतेबा लेल तत्पर छैथ। केतेको लोक एहि प्रथाकेँ छोड़ियो देने छैथ आ छोड़रो रहल छैथ। एक सर्वसम्मति निर्णय हो। सबहक सहमति हो। सबहक सहभागिता हो। सबहक विचारसँ एकर विकल्प (अल्टरनेटिव) दिस धियान जाए आ ई प्रथा समाप्त हुअए। निर्णय सबहक हो, सहमति सबहक हो, केकरो बीच द्वेष नहि हो आ नव प्रथाक सूत्रपात हो जे सभ लेल कल्याणकारी हो। एहने प्रथाक प्रारम्‍भ हएत से आशा करैत छी। मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास मैथिली लोकगीतक संसार स्त्रीगणक संसार थिक। पुरुष पक्षक भूमिका गीत निर्माणक आओर किछु गीतक गायन तक सिमित अछि। मैथिलानी एक बेर अर्जित कयल गेल अमूर्त धरोहर जेनाँकि गीत-नाद, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, व्रत-निष्ठा, कथा-पीहानी; अरिपन काढ़ब,ठांव निपब, कोबर लिखब; केथरी, सुजनी सीयब; सीकीसँ पौती-मौनी बुनब, माटिक महादेब, सामा-चकेबा, खेलोना, कोठी, चूल्हा आदि बनेबाक परंपरा कें अपन माय, पितियाईन, दाई, नानी, सासु आदिसँ सिखैत छथि आओर फेर अपन सभटा लुइरकें अपन बेटी, पूतहु, पोती, नातिन आदिकें अदौसँ एहि कलाकें पीढ़ी दर पीढ़ी नीक जेकाँ सिखेबाक परंपराकें हस्तारंतरित करैत निमाहि रहल छथि। हलांकि आधुनिकता आ उपभोक्तावादक युगमे एहि परंपराक पतन भेल जा रहल अछि परञ्च मूल भावमे थोर बहुत जोड़-तोड़क संग ई परंपरा अपन मिथिला समाजक महिला वर्गमे एखनो शाश्वत अछि। आश्चर्य आ दुःख तखन होइत अछि जखन एहि समाजक स्त्रीगनक चर्चा होइत छैक। आजुक परिवेशमे बहुत स्त्रीगन पुछला पर निधोख कहैत छथि जे “हम किछु नहि करैत छी, निठल्ली छी कियैकतँ हाउसवाइफ/गृहणी छी”। पुरुष पात्र बहुतो एहेन छथि पुछला पर कहता – हमर घरनी किछु नहि करैत छथि घरमे रहैत छथि, हलांकि ओकर बाद कहबाक तात्पर्यकें पूर्ण करैत जरुर करताह – “हमर आँगनसँ सहीमे मात्र गृहणी/हाउसवाइफ छथि"। औजी, कहियो अपन आँगनबालीक भूमिकामे जीवन जीब कS तS देखियौ तखन पता लागत जे आहाँक घरवाली कतेक पैघ जवाबदेहीकें निमाहि रहल छथि ! हुनका नहितँ कहियो छुट्टी, ने कहियो आराम, आने कहियो केओ मदति केनिहार,आओर ताहि जवाबदेहिक मतलब किछु नहि ? ई एकटा बड्ड पैघ प्रश्न अछि। एहि पर विचार जरुर करक चाही। भोजन आ भोजनक विन्यास सभसँ पैघ, त्वरित आ शाश्वत कला अछि। एकटा कहबी छैक – “जे निक खैएत सैह नीक भोजन बनाएत”। इहो कहल जैत छैक जे जखन कुनो महिला सुचिता आ समर्पणकें भावसँ भाँनस करैत छथि तS भोजन सुअदगर आ रुचिगर हेबेटा करत। यैह कारण छैक जे भगबान राम माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई; सासु सुनयना; गुरुपत्नी अरुंधती, पत्नी सीता सबहक हाथक रान्हल भोजन केलाह, मुदा जे स्वाद हुनका भीलनी सबरी के आंइठ बैरमे लगलनि तेहेन सुआद कत्तहुने लगलनि। ई भेल भोजन बनोनिहारिक आ परोसनिहारिक अनुराग। आजुक समयमे नाना तरहक सुविधा जेनाँकि रसोई गैस आकि आनो तरहक जारैन उपलब्ध अछि जाहिसँ चट्टहि भाँनस भअ जाइत अछि। कल्पना ओहि समयक करू जखन साओन-भादबक मुसलाधार बरखामे खड़हक छप्पर चुबैत घरमे अपन सभक बहुतो गोटेके माय, पितियाईन, दाई कोन धरानी भाँनस करैत छली! जारैनमे भीजल चेरा, गोइठा, करची, झाँखी चुल्हामे घोंसिया कखनो मूंहसँ तS कखनो बियनि होंकि आंच पजारब, धुआंसँ आँखिमे नोर भरल आ तैयो रंग-बिरंगक पकमान आ भोजनक सचार। ताहूमे अगर घरमे केओ पैघ पाहून जेनांकि जमाय, समधि इत्यादि आबि गेलाह तS घोर बिकट, तथापि बिना मोन मलीन केने हुलसित मोनसँ भोजनक विन्यासमे लागि जैत छली। तरकारीक अभावमे बारीक़ साग, कंद, खम्हारु, ओल, लती-फत्तीक पात जेना कन्ना, तिलकोड़क पात; लटकल चारक सजमनि,कदीमा; झाड़क झीमनी, करैल; घर-पछुआरमे लागल गाछक फल जेनाँकि- केरा, कटहर आदिसँ चीज़ जोरिया कS अनेक तरहक तरकारी, तरुआ-बघरुआ, भुजिया-सन्ना-चटनी बनबैत छली तकरा बादो टारासँ नाना तरहक़ अंचार जाहिमे फारा, कुच्चा, खटमिट्ठीबला आदि ब्यंजन परोसि पाहूनक सत्कारमे २०-२५ तरहक सचार लागि जैत छलै। आब जखन पाहून भोजन पर बैसता आ महिला लोकनि गीत नहि गेती से कोना हेतैक तें बिनु थकने विहुँसैत मोनसँ दाई-माई सभकें संगौर कS गीत-नाद शुरू होइत छल। पाहून खाईतो रहैत छलाह आ गीतक आनंद लैत छलाह। जखन कखनो हम कोनो पांच सितारा होटल में भोजन करैत छी आ कोनो गीतगैन के गबैत देखैत छी तS होइत अछि जे एहिसँ बढ़ियाँ कोरसमे गीत हमरा सभक समाजक महिला गबैत छथि। वैह खानसामा, वैह परोसय बाली, वैह गीत गेनिहारि, वैह वस्तुक व्यवस्था केनिहारि। मल्टीटास्किंग कें अहिसँ पैघ उदाहरण भला आर की भS सकैत अछि? पहिनेकें समयमे लोक सभ बियाहसँ पहिने एहि बातक खाँझ-भाँझ करैत छलाह जे जाहि घरमे कन्यादान करबाक अछि ओहि घरक चीनबार कहेन छैक। मतलब कतेक साफ़-सफाई, कोन तरहक द्रव्य केर बरतन-बासन बड़ पक्षक ओहिठाम उपयोग होइत छैक। हिनका लोकनिक खान-पान कहेन छन्हि, घर-परिवारक भोजनक विन्यास, दु:खक भोजन, सुखक भोजन, पाबनि-तिहारक भोजन, यात्रा पर जएबाक काल बाटमे खेबाक जोग भोजन, खाद्य भोजन, अखाद्य भोजन, पथ्य बला भोजन, कोन समयमे की खाई आओर की नञ खाई, इत्यादि नाना तरहक जानकारीकें अगर ठीकसँ ओहि भावकें विवेचना कयल जाय आओर विभिन्न अवसर पर मैथिलानी सभक द्वारा गाओल गीत सभकें देखलासँ एहसास होयत जे ओ गीत सब विधपुरौआ आकि मनोरंजने वला गीत मात्र नहि अछि अपितु ज्ञानक खान अछि। ओहि गीतमे ज्ञान,विज्ञान, संस्कार, सामग्रीक वर्णन आ विवरण सब किछु समाविष्ट अछि। मैथिलीमे अगर अंग्रेजीक शब्द culture कें अनुवाद कयल जाय तँ हमरा बुझने ओ शब्द जे culture कें सभसँ लगमे अछि मैथिलीमे ओकरा “मिथिलाम” कहल जायत आओर इयैह मिथिलाम अछि जे मैथिल सभकें भारते टा नहि अपितु समस्त संसारमे अलग पहचान दैत अछि। मिथिलामक चर्चा बिनु भोजन विन्यास, बिनु महिला सभक भूमिका, बिनु गीत-नाद आकि विध-व्यवहारक संभव नहि अछि। वस्तुतः भोजन विन्यास, गीत-नाद, विध-व्यबहार, जीवन जीबाक अंदाज़, वस्त्र विन्यास, धर्मक आचरण, प्रकृति आ संस्कृति मे समन्वयक नाम भेल मिथिलाम। बात भोजन विन्यासक चलि रहल अछि तें कनेक मिथिलाक इतिहास कें सेहो ध्यान देमय पड़त। ज्योतिरीश्वर अपन कृति वर्णरत्नाकर मे ११म् शताब्दीक मिथिलाक भोजन विन्यास पर प्रकाश देलनि अछि। हिनका अनुसारे मिथिलाक प्रमुख भोजन भात, दालि, तरकारी, चूडा, दही, शक्कर, फल तथा दूध छल। ज्योतिरीश्वर अपन दोसर पोथी प्राकृति-पैँगलम् मे कहैत छथि जे “ओ गृहणी धन्य छथि जे अपन पति केँ केराक पात पर भात आ घी परोसि खोअबैत छथि”। एहि पोथी मे रंग-बिरंगक माँछ रान्हव आ तरकारी बनेवाक विधि सेहो लिखल अछि। वर्णरत्नाकर मे जे मिथिलाक प्राचीन परम्परागत भोजन समिग्रिक सूची प्रस्तुत कयल गेल अछि ताहिमे “चाउर, चूडा, मुंगवा, लडुबी, सरुआरि, माँठ, फ़ेना, मधुकूप्पी, तिलबा, सिरोल, खिरसा, सिरनी, झिल्ली, फरही, भूजा, मोतीचूड़, अमृतकुंड आदिक उल्लेख अछि संगहि भोजनमे दहीक प्रधानता सेहो भेंटल अछि। आब लोकगीत पर अबैत छी, लोकगीतमे फकरा, पीहानी, गीत, लोकवृति आदि सब किछु समाहित अछि। एहिठाम दू गोट फकरा मैथिल समुदायक भोजन विन्यास आ भोजनक प्रति आसक्तिकें बुझबाक हेतु पर्याप्त अछि । पहिल : मिथिलाक भोजन तीन/ कदली, कबकब मीन।। दोसर: तीन तीरहुतीया तेरह पाक। ककरो लेल चुडा दही ककरो लेल भात।। अही दू गोट गीतक आधार बना सब विवरणकें देखल जा सकैत अछि। मिथिलाक भोजन तीन। कदली, कबकब मीन।। एकर अर्थ भेल जे मिथिलाकें लोक सभ लगभग नीकसँ लकS अधलाह तकमे जेनाँकि- उत्सव, काज-राज, संस्कार, पाबनि-तिहार धरिमे केरा, ओल बा ओले परिवारक आन कंद जेनाँकि खम्हरुआ; आओर अंततः नाना प्रकारक माछके प्रयोग भोजनमे अवश्य करैत छथि। विवाह -दान, मुड़न, उपनयन, पाबनि तिहार सबमे केराक प्रयोग हेबेटा करैत अछि। ओहुना लोकसब केराकें पाकल, काँच आ केराक फुलक सेहो खेबाक विन्यासमे प्रयोग करैत छथि। केराक तरुआ, तरकारी, सत्यनारायण भगवानक कथामे घोरुआ प्रसाद आ ओहुना पाकल केराक प्रयोग शाश्वत अछि। कबकबकें बात करैत ई कहब जरुरी अछि जे ओल मिथिलामे बहुत प्रिय अछि। एक फकरामे भादबक ओल केर बारेमे कहल जैत छैक: भादवक ओल की खै राजा आकि चोर मिथिला आ माछ एक दोसरक पूरक अछि। पंचदेवताक एकहि संगे उपासना करे बला मैथिल समाज जाहिमे ब्राह्मण सेहो सम्मिलित छथि कुनो दिन आ कुनो मास माछ खेबासँ परहेज नहि करैत छथि। माछकें जल-पड़ोर, जल-फूल आदि नामसँ बजा कतेक गोटे तँ एकरा मांसाहारी भोजनक श्रेणी तकमे नञ राखय चाहैत छथि। कातिक आ साओन मासमे जखन लोक सामान्यतया मांसाहारी भोजनकें त्यागि दैत छथि, अपन मैथिल अहू मासमे खूब चटकारसँ माँछ खाईत छथि, संगहि एहि मासमे माँछ खाय बलाक हेतु बैकुंठमे जगह बना दैत छथि। कातिक मास जे गैंचा खाय। ससरि-फ़सरि बैकुंठे जाय।। एक बारहमासा गीत एहेन भेटल जाहिमे मिथलाक पानिमे उपलब्ध लगभग सब माछक वर्णन तँ अहिए ओकरा कोना बनाबी कोना खाई, कथीक संगे खाई सब वर्णित अछि। एतबे नहि लगभग ७५% माँछ जे मिथिलाक पानिमे भेटैत अछि तकर वर्णन छैक। कने एहि बरह्मासाकें देखू: मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ा संग यो। तरल चेचड़ा माछ कुरमुर लागय मोन भरि संग यो।। पूस हे सखि अन्न नवका संग मांगुर झोर यो। कबइ कुरमुर दाँत दबइत करय जनजन शोर यो।। माघ बदरी जाड़ थरथर काँपय तन बड़ जोर यो। सुख बोआरी खंड लखि कए मन विनोद विभोर यो।। मास फागुन मदक मातल बहय पछबा बसात यो। बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यो।। चैत हे सखि रोग सभदिस रूप नाना देखि यो। तरल भुन्ना पलइ रान्हल खाइत बड़ सुख लेखि यो।। मास हे सखि आबि पहुँचल गरम बड़ बइसाख यो। गेल मन रुचि माछ गामर खंड सभ दिन चाख यो।। जेठ हे सखि हे हेठ बरखा मुंड भाकुर पात यो। पड़तु बिसरतु आबि ससरतु कर नवका भात यो।। मेघ सखि बरसत अखाढ़ जत रसालक डारि यो। तोड़ि काँचे आम आमिल देल सौरा पाल यो।। मास हे सखि आओल साओन भरल अंडा घेंट यो। तरल दही माछ मारा खाथि भरि पेट यो।। माछ इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यो। मास आसिन देवपूजा शंख घंटा नाद यो।। रान्हि रहुआ माछ बइसब पूर्ण भेल परसाद यो। मास कातिक बारि मरूआ बऽड़ तरल-अपूर्व यो।। पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यो... माँछ खेबाक वर्णन तँ अहिए माछक शिरा खेबाक परंपरा प्रबल सेहो अछि, घरक मुखिया, पाहून, बरियाती आदिकें शिरा परोसल गेल आ बुझू हुनकर उचित सत्कार भेल। निम्नलिखित फकरा एहि कथ्य के प्रमाणित करैत अछि: शिरा खाय से मीरा। पूच्छी खाय गुलाम।। जमाय जखन भोजन करक हेतु बैसति छथि तँ नाना तरहक गीत गाबि हुनका मनोरंजन कयल जाइत अछि। एकटा डहकन जाहिमे देखियौ, ओना तँ गारि देबाक परंपरा अछि मुदा गारिक संग-संग भोजन विन्यासक वर्णन सेहो अछि। खाजा मूंगबा आर पिरिकिया ता पर गरम सोहारी जी। माजी के गारी पिताजी के गारी आ बाबाजी के पढथि गारी जी। पढु हे सारि हमरो के गारी हम लेब देह के पसारी जी।। एहि गीतमे गारि तँ छैहे जे डहकनक मूल प्रकृति अछि, मुदा गारिकें संगे-संगे भोजन सामग्री – खाजा, मूंगबा, पुरुकिया, सोहारी आदिक विवरण सेहो छैक। सामा-चकेबाक एक गीतमे बहिन सब भोजनक बात करैत छथि: साम-चको साम-चको अबिह हे अबिह हे। जोतला खेतमे बैसिह हे बैसिह हे। लाले रंग पूरी पकबिह हे पकबिह हे।। मिथिलामे साग खेबाक परंपरा सेहो अदौसँ अछि। अयाची मिश्रक जीवनवृत्त ककरा नहि बुझल छैक। मात्र ११ कट्ठा खेतमे साग-पात कंद-मूल खाकS जीवन यापन करैत छलाह आ अध्ययन-अध्यापन करैत छलाह। कतेक बेर राजा बजौलखिन मुदा अपन गामक गुरुकुलकें छोडि कत्तहु नहि गेला। स्वयात संप्रभुताकें सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत छलाह। माँछक तुलनामे सागक अधिक प्रधानता देबाक प्रथा मिथिलामे सहज अछि। एकटा फकरा एहि बातकें प्रमाणित करैत अछि: माछ-भात पांच हाथ। साग-भात सात हाथ।। विन्यासमे सागक अलावे सागकें आन चीज़ सब जेना अरिकोच, गुजिया, इत्यादि बनबैत छथि, खेसारी, बथुआ, केराव, चना, कर्मी,गेनहारी, पटुआ आदिक साग मिथिला लोक खाईत छथि। अपना ओतय साग तोडल नहि अपितु खोटल जैत अछि। कोनो भोजमे साग एक महत्वपूर्ण तरकारी होइत अछि। मिथिलाक एहि परंपरासँ प्रभावित होइत ठीके कहल गेल अछि: कोकटा धोती पटुआ साग। तीरहुत गीत बड़े अनुराग। भाव भरल तन तरुणी रूप। तैं तँ तिरहुत होइछ अनूप।। अपन माटि सँ गुजरियाकें एतेक सिनेह जे साग-पात खोंटि लेती, साग-भात खा लेती मुदा रहती मिथिलेमे : साग-पात खोंटि- खोंटि दिवसों गेमेबै यौ हम मिथिलेमे रहबै नहि चाही हमरा सुख-आराम यौ हम मिथिलेमे रहबै।। तिलकोर आ कन्ना साग बिना की मिथिलाक पाहुनक सचार लागि सकैत अछि? चाउरक पीठारमे डुबा शुद्ध सरिसबक तेलमे छानल तिलकोर दुरो देसमे रहनिहार मैथिल सबके जीभमे पानि आनि दैत अछि। सजमनि, भाटा इत्यादिमे अदौरी तँ चाहबे करी तखनने भाटा-अदौरिक चहट्गर तरकारी बनत! भाँटाकें तरुआ, भटबर आर की-की नहि बनैत अछि। बारिक भाँटातँ बेर बिपत्तिक समय इज्जत रखैत अछि। भांटाकें भटबर, ठोपेके तेल। खेलक जमैया ठेलम ठेल।। मिथिलाक लोककें खिच्चरिमे सेहो पापर, घी, दही, अचार, चटनी इत्यादि संग खाईत छथि। खिच्चरिमे चारि बस्तु नहितँ केहन खिच्चरि? खिच्चरि के चार यार। घी पापर दही अचार।। ई त भेल पद परन्तु सही अर्थ में खिच्चरि के छौ यार थिक: घी, पापर, दही, अचार, चटनी, तरुआ। एक उचती गीतमे जखन विवाहक बाद वर भोजन करवा लेल बैसैत छथि तS सासु आ आन स्त्रीगन सब अपन गीतमे व्यंजन केर वर्णन करैत छथि: जाहि दिन राम जनकपुर अयला देखहु दुनिया के लोके भाति-भाति के भोज्य लगाओल नयना बिनु परकारे जी केरा नारियल खण्ड सोहारी परबल केर तरकारी जी जीमय बैसला ओ चारू भाई परसथु प्रेम पीयारी जी // दोसर उचती में बर के कृष्ण स्वरुप मानि किछु अहि तरहक विवरण भेटैत अछि: खाजा खुरमा तपत जिलेबी तापर सक्त सुपाड़ी जी। जेमय बैसला कृष्ण-कन्हाई सारि जे पढ़थिन गारि जी।। भगबान कृष्णक बालकालकें एक भक्ति गीतमे भोजनक किछु वर्णन भेटैत अछि: करथि पुकार जशोदा माई मोहन प्रात नाहाई। दही केरा गरम जिलेबी खोआ भोग लगाई।। लोकगीतमे भूख, निर्धनता, कुअन्न आदिक ऐतिहासिक संदर्भक वर्णन लोकगीत लोकविद्या होइत अछि, लोकइतिहास होइत अछि। एहेन इतिहास जे अपन प्रमाणिकता एवं शैली कें कारण जन-जन केर कंठमे लिखा जैत अछि। एहेन लिखान जकरा ने कुनो पानि गला सकैत अछि ने कुनो आगि जरा सकैत अछि आने कुनो कीड़ा खा सकैत अछि। एकबेर जनकंठमे रचि गेल त पीढ़ी-दर-पीढ़ी अबाध गति सँ चलैत रहैत अछि। मधुबनी ज़िलाक शाहपुर गाममे एक जनमान्ध लोक कवि भेला। हुनकर नाम छलनि फतुरी लाल। फतुरी लाल एक बेर मिथिलाक भयानक अकालक सामना केलनि आ अकालक विभीषिकाक ह्रदयविदारक विवरण अपन कवित्तमे केलनि। ओ रचना अकालकवित्त कें नाम सS जानल जैत अछि। अब्राहम ग्रिएर्सन १८८७ ईस्वीमे फतुरी लाल केर अकाल कवित्त हुनके मुहें सुनिकS लिखलनि। एहि कवित्तमे ई विवरण अछि जे भुखमरी केर अवस्थामे लोक प्राणरक्षा हेतु की-की नहि करैत अछि। किछु पंक्ति मात्र देखलासँ दुखक असीम वेदनाक अनुभूति सहजे भS जैत छैक: भेल धनतरि दुई फ़ासिल जग-राहडिऔर मकई। अकाल पडल तिरहुति में भारी-तैं बही गेल हवा। घर-घर मांगन करे नर नारी-फाँकि मकई केर लावा। मालीक आउर महाजन सभ-कै-घर-घर ढेरीक अन्न। लोक बुझओल ओहो तकै छथि मुंह्गा ऋणक शान। सभै देखि बनियान सभ सनकल-डरें लगाओलक टट्टी। सुन्न दोकान शहरमे परि गेल-सुन्न भेल सभ चट्टी। सूखल गात भात भौ लटपट-कतेक बात अब सहना। नर नारी सभ सान तेआगल-बेकारी भेल अब गहना।। बारहमासा एवं अन्य गीतमे गरीबीकें चित्रण करैत कोना कियोक महिला कम भोजन अथवा कुअन्न खा कS दिन खेपैत छथि तकर मर्मस्पर्शी वर्णन कैल गेल अछि। आईसँ करीब ३०-३५ सालक इतिहासमे अगर जा सकी आ अपन मानस पटल पर ओहि स्थिति आ गरीबीकें ऐनाँके रिफ्लेकशन जेकाँ देख पाबी तS सहज रूपमे ई अनुमान लगा सकैत छी। एकटा बारहमासा एहेन भेटल जाहिमे एकटा निर्धन महिला जिनकर पति परदेस गेल छथिन ओ कोन धरानी अपन समय नितांत निर्धनतामे बिता रहल छथि तकर विवरण देल गेल अछि। पूस गोइठा डाहि तापब माघ खेसारिक साग यो फागुन हुनका छिमरि माकरि चैत खेसारीक दालि यो बैशाख टिकुला सोहि राखब जेठ खेरहिक भात यो अखाढ़ गाड़ा गाड़ि खायब साओन कटहर कोब यो भादव हुनको आंठी पखुआ आसिन मडुआक रोटी यो कातिक दुख-सुख संगहि खेपब अगहन दुनू सांझ भात यो उपरोक्त गीतमे कोना एक महिला खेसारीक साग, खेसारीक दालि आमक टिकुला, खेरहिक उसिना, पाकल आमक गाड़ा, कटहरक कोआ,नेढा, आमक पखुआ, मडुआ रोटी, एक मास अनिश्चितता केर स्थिति आ अंततः अगहनमे भात। कहू तS कतेक सत्यकें जे आई लगभग इतिहास भS चुकल अछि तकरा ई अपना मानसमे रखने अछि मिथिलाक गीत-नाद। गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। ओहने विधवाक दुःखसँ द्रवित होइत बाबा “यात्री” लिखैत छथि: बांसक ओधि उपारि करै छी जारनि... हमर दिन की नै घुरतै जगतारिनि // मैथिली लोकगीतमे भोजन विन्यास आ औषधि लोकगीत लोकविद्याकें अंग अछि। लोक विद्याकें अनेक पक्ष वैज्ञानिक होइत अछि। कृषिकार्य एवं अन्य सब कार्यमे डाक बचन कतेक सटीक अछि से हमरा लोकनि बहुत निक जेकाँ बुझैत छी। बहुतो लोकगीत एहेन अछि जे कहेन अन्न अथवा भोज्य सामग्री सेहो कुन दिन, कुन मासमे खेलासँ की भS सकैत अछि तकर बहुत तथ्यपरक जानकारी दैत अछि गीत सुनब अथवा पढ़ब तँ लागत जेना आयुर्वेदक कोनो वैद्यक देल नुस्खा हो। हरेक गाछ आ हरेक भोज्य सामग्रीमे प्राचीन भारतीय परंपराकें अनुसार किछु-ने-किछु औषधिक तत्व छैक। भारतीय परम्परामे औषधि आ भोजन अलग-अलग चीज़ नहि छैक। ताहि अपना सबहक भोजनमे पथ्य आ कुपथ्यकें बात प्रबल मानल जाइत अछि। अपन शोधकार्यकें अवधिमे जखन मिथिलाकें गाम सभसँ गीतक संकलन करैत रही तS एकटा गीत एहेन भेटल जाहिमे ओ ई बतबैत छल जे कोन दिन कथिक प्रयोग भोजनमे करक चाही जाहिसँ तन आ मन दुनु स्वस्थ्य रहत। ई वर्णन ज्योतिष विचार पर सेहो आधारित अछि। रबि के पान सोम के दर्पण मंगल के किछु धनियाँ चर्पण बुध के गुड़ बृहस्पति राई शुक्र कहे मोहे दही सुहाई शनिबार जे अदरख खाई कालौं काल कटति घर जाईं।। ई त भेल कहिया की खेबाक चाही। एक एहेन गीत भेटल जे बारहमासाक रूपमे रचित भेल अछि। ई एकटा वैद्य जेकाँ बहुत वैज्ञानिकताकें आधार पर लिखल अछि। गीत अर्थकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि: सावनक साग ने भादबक दही। आसिनक ओस ने ने क़ातिकक मही। अगहनक जीर ने पूसक धनी। माघक मिसरी ने फ़ागुनक चना। चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल। ज़ेठक चलब ने अषाढ़क बेल। कहे धनवनतरि अहि स बचे। वैद्यराज काहे पुरिया रचे।। मैथिली लोकगीत अनंत महासागर अछि। अहि महासागरमे सँ भोजनक सम्बन्धमे जे किछु जानकारी छल से समयसीमा कें ध्यानमे राखि पाठकक समक्ष राखल। नीक लागल तS मैथिली लोकगीत परम्परा केर महानता अधलाह लागल तखन हमर ज्ञानक विपन्नता। आभार: हमर लोकविद्या पर लिखल सब काज लोकस लेल अछि। लेकिन एहि लेख के भाषा के मर्यादा के संचालक एवं हमर अनुजतुल्य श्री अमरनाथ मिश्र अंखि फोरि-फोरि ठीक केलाह अछि। एहि काज लेल हुनका धन्यवाद द हुनकर योगदान के छोट नहि कर चाहैत छी मुदा ओ खूब आगा बढ़थि से आशीर्वाद दैत छियनि। सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथमे समानता-(लोक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे) सौराठ मिथिलाक धरोहर-गाम अछि। केतेको सालसँ चलैत सभा हेतु अइ गाम आ सभा-गाछीकेँ के नहि जनैत अछि? कहल जाइत अछि जे सौराठक मूल नाम ‘सौराष्ट्र’ छल। सौराष्ट्रक अर्थ भेल १०० राष्ट्र। लोक कथाकेँ जँ मानी तँ सौराठ रामायण (हमरा हिसाबे सीतायण) सँ जुड़ल स्थान अछि। लोक कथा के मान्यता में कहल जाइत अछि जे सीताक स्वयंवर सौराठमे भेल छल। ओइ स्वयंवरमे १०० राष्ट्रक राजकुमार भाग लेने छला तँए एकर नाम ‘सौराष्ट्र’ भेल जे बादमे अपभ्रंशित भऽ‘सौराठ’ भेल। ऐ बातकेँ थोड़ेक आरो ठोस आधार देबाक लेल चली लोक मान्यता दिस। कहल ईहो जाइत अछि जे सीता-स्वयंवर आ बिआहमे सात लाख लोक आएल छला। ओतेक मनुख रहत केतए? तँए ऐ लेल एकटा पैघ स्थानक निर्माण कएल गेल जे सभ सुविधासँ युक्त छल।  ओ स्थान आब ‘सतलखा’ नामक गामसँ विख्यात अछि। सतलखा सौराठसँ सटले अछि। मात्र तीन किलोमीटरक अन्‍तर छै। आब दोसर उदहारण, भगवान शिवक धनुष जतए राखल गेल छल ओ स्थान आब ‘धनुखी’ नाओंसँ जानल जाइत अछि अर्थात धनुखी गाम। राजा जनकक छोट भाए छलखिन कनक। कनक ऋषि छला। ओ अपन आश्रम बनौने छला। ओइ स्थानपर आब ‘कनैल गाम’ बसल अछि। सीता प्रति दिन भोरे अपन संगी-बहिनपाक संग ‘मंगलबनी’ नामक फुलबाड़ीसँ फूल लोढ़ै छली। मंगलबनी आब अपभ्रंशित भऽ ‘मंगरौनी’ बनि चुकल अछि आ मधुबनीक बगलेमे ई गाम अछि। भऽसकैत अछि जे सौराठक यएह दन्त-कथा ऐ गामकेँ ‘सभा गाछी’ लेल योग्य बनेने हुअए? खैर! सभा गाछी पर चर्चा कहिओ बाद में  करब। विद्यापतिक पौत्र बादमे सौराठमे आबि कऽ बसि गेला। ओ सभ अखनो छैथ। हुनकर संतति सब एखनो अहि गौरव के समेटने छथि । जखन हम सौराठ में रही त अही कुलक एक महिला विद्यापतिक बहुत गीत अपन मधुर कंठ स सुनेली । एक गीत जे मोन के थैहर-थैहर क देलक ओ छल: सुरसरि सेबि मोरा किछुओ ने भेल । पुनमति गंगा भागीरथ लैल। हटबह बनिया हाट बजारे। अही बाटे अबै छथि सुरसरि धारे।। विद्यापति पर सेहो विस्तार स कहिओ आर बात करब. एखन अपन मूल बात के आगा बढ़ाबी। सौराठ अपना-आपमे रामायण, भगवान शिवक तंत्र आ राजा सलहेसक आख्यानसँ जुड़ल अछि। सौराठ हिन्दू आ मुसलमानक बीच आपसी सम्बन्धक अद्भुत उदाहण सेहो अछि। गुजरातमे जे ‘सौराष्ट्र’ अछि जेतुक्का सोमनाथ मन्‍दिर विश्व प्रसिद्ध अछि आ द्वादस ज्योतिर्लिंगमे एक लिंग अछि, जेहो लोकधारामे मिथिलाक सौराठसँ जुड़ल अछि। बता दी जे गुजराती भाषामे सौराष्ट्रकेँ सेहो सौराठे कहल जाइत छै। गुजरातक सौराठ आ मिथिलाक सौराठक मध्य एक कथा ऐतिहासिक अछि। ऐ कथाक इतिहासमे चली। सौराठ गाममे दू गोट ब्राह्मण कुमार भेला- गंगदत्त (गंग देव) आ भागीरथ दत्त (भागिरथ देव)। दुनू सहोदर भाए। नैनेसँ संस्कृतमे उत्कृष्‍ट आ कर्मकाण्‍डमे मग्न। एक बेर दुनू भाँइ निआरलैन जे द्वादस ज्योतिर्लिंगक दर्शन करब। फेर की छल दोसरे दिन निकैल गेला। सभ लिंगक दर्शन करैत सौराष्ट्र[1]क सोमनाथ मन्‍दिरमे पहुँच खूब नियम निष्ठासँ पूजा-अर्चना केलैन। भगवान शिव जेना हुनकर आत्मामे बसि गेलखिन। आब हुनका सोमनाथ छोड़बाक मोने ने होनि! बाह रे भक्त! बाह रे समर्पण! पाँच दिन ओतै रहि गेला। छठम राति सोमनाथ महादेव मन्‍दिरक देख-रेख करैबला मुखियाक सपनामे आबि कहलखिन- “दू संस्कारी आ विद्वान् मैथिल ब्राह्मण कुमार अतए आएल छैथ। ई सभ बहुत नीक लोक छैथ। विद्वान त छथिए एक नंबर केर भक्त सेहो थिकाह । अहाँ सभ हिनका लोकैनकेँ निवेदन करू जे ऐ मन्‍दिरक मुख्य पण्डित केर भार स्वीकार कऽ लेथि।” ..सोमनाथ बाबा ऐ दुनू भाँइक हुलिया सेहो बता देलखिन। जखन मुखिया भोरमे उठल तँ देखलक जे सहीमे दू ब्राह्मण बालक शिवक ध्यानमे मग्न छैथ। हुनका लग गेला। परिचए-पात भेलैन। आ अन्‍ततः निवेदन केलखिन- “हे मिथिलाक पण्डित द्वय! ऐ भूमिपर अपनेक स्वागत अछि। सोमनाथ महादेव केर ई इच्छा छैन जे अहाँ सभ मुख्य पुजारिक भार ग्रहण कए हमरा लोकनि के  चरितार्थ करी?” गंगदत्त आ भागीरथ दत्त ऐ भारकेँ स्वीकारि लेलैन। मुदा ई अबस्‍स कहि देलखिन जे छह मास एकटा भाए सोमनाथमे रहता आ दोसर मिथिलामे आ हरेक छह मासमे पार बदैल जेतैन। दुनू भाँइ आब कर्मकाण्‍डमे आरो लीन भऽ गेला। ओइ समय सोमनाथ भारतक सभसँ सम्‍पन्न मन्‍दिर छल। प्रतिदिन वनारससँ भरल गंगाजलसँ शिव लिंगक स्‍नान आ पूजा होइत छल। कहल जाइत अछि जे वनारससँ सोमनाथ धरि पीत-वस्‍त्र पहीरल भक्तक चेन (श्रृंखला) लागल रहैत छल। सबहक हाथमे स्वर्ण कलश। पहिल बेकती कलशमे गंगाजल भरि लगभग डेढ़ किलोमीटर जा ओ कलश दोसर आदमीकेँ दऽ दइत। दोसर आदमी पहिनहिसँ खाली कलश लेने ठाढ़ रहैत। फेर ओ आदमी भरल कलश हाथमे लऽ डेढ़ दू किलोमीटर चलैत छल आ तेसर आदमीकेँ भरल कलश दैत खाली कलश लैत गंगा दिस आबि जाइ छल। ..अही तरहेँ वनारससँ सोमनाथ धरि मानव श्रृंखलासँ गंगाजल स्वर्ण कलशमे पहुँचै छल। सभकेँ अपन समय बूझल रहइ। वनारससँ सोमनाथक दूरी अछि १७९२ किलोमीटर। एकर अर्थ भेल जे २४०० स्वर्ण कलश गंगाजल लेल प्रयोगमे अबैत छल आ २४०० पीत वस्‍त्रमे लोक ऐ कार्यक सम्‍पादनमे अपन श्रमदान करैत छल। गुजरात प्रान्तक काठियावाड़ क्षेत्रमे सोमनाथ अछि। प्रतिहार वंशक राजा नागभट द्वतीय ८१५ इसवीमे लाल रंगक पाथर (Red sandstone) सँ एक भव्य आ विशाल मन्‍दिरक स्थापना केलैन। ई मन्‍दिर अपन स्थापत्य कला, क्षेत्र गौरव, आ स्वर्ण, चानी, हीरा, एवं अनेक बहुमुल्य पाथर, रत्न, द्रव्य संगे मुद्राक भण्डारण लेल सेहो विश्व विख्यात छल। महमूद गज़नी (९७१-१०३०) जेकरा ‘महमूद जाबुली’ अथवा ‘यामीन-उद-दवला अब्दुल कासिम महमूद इब्न सेबुक्तेगिन’क नाओंसँ सेहो इतिहासमे जानल जाइत अछि–ओ अपन सेना सबहक संगे भारतक–औझुका गुजरात प्रान्त स्थित–प्रसिद्ध सोमनाथ मन्‍दिरपर १०२५ ईस्वीमे आक्रमण केलक। प्रारम्‍भमे मन्‍दिरक रक्षक-प्रहरी-स्थानीय सेना– आ चालुक्य वंशक राजा भीम प्रथम (काठियावाडक राजा) राजक सेना ग़ज़नीक विरोध करैत लड़ल मुदा अन्ततः हारि गेल। निरंकुश आ जीतक मदमे मातल गज़नी अपन सेनाक संग समस्त सोमनाथ मन्‍दिरक परिसरकेँ मटियामेट करए लगल। मन्‍दिरसँ सभ मूर्ति एवं बहुमुल्य वस्तु, हीरा-सोना-चानी-मूंगा-पन्ना-पुखराज-स्फटिक-माणिक्य इत्‍यादि आर ने जानि की की, सभकेँ लूटलक। मन्‍दिरकेँ तोड़ि कऽ ध्वस्त कऽ देलक। आ जे कियो ओतए आएल ओकरा मौतक घाट उतारि देलक। भक्त, सेवादार आ पण्डित सभ या तँ भागि गेला वा जे नहि भागि सकला सेहो सभ अपन प्राणसँ हाथ धोलैन आ निर्मम हत्याक शिकार भेला। किछु सेवादार आ मन्‍दिर संचालन समितिक सदस्‍य सोमनाथ मन्‍दिरक लिंग बँचबैक अन्तिम प्रयास केलैन आ हिम्मत करैत गज़नी लग गेला। हाथ जोड़ी विनम्र भावसँ निवेदन करैत कहलखिन- “श्रीमान! अपने जे ध्वस्त केलौं तइले कुनो बात नहि। आरो अगर हीरा, मोती, द्रव्य जात लेबाक अछि तँ हम सभ आनि दइ छी। जेतेक लिंगमे लागल अछि तेकर ५० गुणा, मुदा लिंगकेँ ध्वस्त नहि कएल जाओ!” ई बात सुनिते गज़नी क्रोधसँ लाल भऽ गेल। चिचियाक बाजल- “अही लेल हम युद्ध जितलौं! हम जखन अपन देश आपस जाएब तँ लोक की कहत? कहत ने ‘गज़नी बुत पूजक काफ़िरक देवताकेँ बिना ध्वस्त केने आबि गेल?’ अल्लाह हमरा कहियो माफ़ नहि करता?” कहैत गज़नी सभकेँ ओतै मारि देलक। रक्त केर धार बहए लगल...। ऐ तरहेँ सोमनाथ मन्‍दिरकेँ लूटैत काल गजनी लगभग ५०,००० ब्राह्मण एवं हिंदू सबहक नृशंस हत्या केलक। एतेक शोणित बहेलाक बादो गज़नीकेँ मोन शांत नहि भेलइ। लिंगक सभ कीमती वस्तुकेँ समैट अपना कब्ज़ामे लेलक। आ स्वयं अपना हाथमे पैघ हथौरा लऽ शिव लिंगपर दानवी प्रहार तेना करए लगल जेना मदमे पागल भेल हो। प्रहारपर प्रहार! निर्दय प्रहार। निरंकुश प्रहार! आस्थावादी आ मूर्ति-पूजक देवतापर मूर्ति भंजक प्रहार! इतिहासपर प्रहार! वर्तमानपर प्रहार! भविष्यपर प्रहार! संस्कृतिपर प्रहार! संस्कारपर प्रहार! हिन्दू धर्मक भावना आ बिश्वासपर प्रहार! मान्यतापर प्रहार! आरो नहि जानि कथी-कथीपर प्रहार! आब गज़नी सैकड़ो संख्यामे गाइक वद्ध कए मन्‍दिरक प्रांगनमे भोजन बना अपन आसुरी सेना आ लूटेरा सभ संगे खाए लगल...। ..किम्बदन्तिक अनुसार सोमनाथ शिव लिंगक प्रस्तरक भग्नावशेषकेँ गज़नी अपना संगे लेने गेल। आ ओ अपन शहरक जमा मस्जिदमे ओइ प्रस्तर अवशेषकेँ सीढ़ी बनबैमे प्रयोग केलक। दुनियाकेँ ई बतेबा लेल जे “देखू हिन्दू धर्मक सभसँ पैघ देवताक ऊपर हम सभ लात-दऽ नित्‍य नमाज पढ़ए जाइ छी।” धन सम्पैतक अतिरिक्त गज़नी अपना संगे हजारक संख्यामे स्‍त्रीगण एवं बच्चा सभकेँ सेहो गुलाम बना कऽ एतएसँ लऽ गेल। आब फेर कनी मिथिलाक सौराठ दिस आबी। लोक मान्यता ई अछि जे सोमनाथ महादेवकेँ पहिनहि भान भऽ गेल रहैन जे गज़नी प्रांगणकेँ ध्वस्त कऽ देत। तँए ओ ऐ घटनासँ एक दिन पहिनहि सोमनाथ मन्‍दिरक पुजारी श्री गंगा उपाध्याय (देव) के रातिमे स्वप्नमे आबि कहलखिन- “आब हम अतएसँ पलायन कऽ रहल छी। अहाँ जँ हमर पूजा करए चाहै छी तँ हमर निर्माल लऽ लिअ आ अहाँ एकरा जेतए राखब हम ओतइ पहुँच जाएब आ अहाँ हमरा पुनः पूजा-अर्चना करब। हँ, ऐ बातक धियान अबस्‍स राखब जे केकरो ऐ बातक भान नहि हुअए।” ई कहि सोमनाथ महादेव अन्‍तर्धयान भऽ गेला। गंगदेव जखन सुति कऽ उठला तँ सपना जेना सत्य बुझमे आबै लगलैन। मन्‍दिरकेँ प्रांगनमे जेना भियौन लागए लगलैन। पूजा–पाठ, स्वाध्याय आदि कुनो कार्यमे मोने ने लगैन..! तखन गंगदेव अपन छोट भाए भागीरथदेवकेँ बजेला आ सपनाबला बात सुनेलखिन। सुनिते भागीरथदेव कहलकैन- “भाय, हमरो बाबा सोमनाथ यएह सपना देला अछि। आब अतए रहनाइक अर्थ भेल अनिष्टकेँ अनेरे निमंत्रण देब।” ई सोचैत दुनू भाँइ समस्त परिवारक संग शिब निर्माल लऽ चुपचाप अपन गाम अर्थात सौराठ विदा भेला। सौराठ आबि–एखन जे सोमनाथ छैथ ताही ठाम–शिव निर्माल राखि पूजा-अर्चना करए लगला। पूजा तँ करैथ मुदा सोमनाथ महादेवक सपनाबला बात केकरो नहि कहलखिन। पछाइत ओइ स्थानपर स्वतः एक लिंग प्रगट भेल। दुनू भाँइ गद-गद भऽ गेला। पूजा पाठमे लीन रहए लगला। सौराठ एलाक उपरान्त दुनू भाँइक जीवन शैलीमे सेहो परिवर्तन भेल। दुनू भाँइ खेतीक तरफ़ सेहो धियान देमय लगला। अहीठाम दुनू भाँइ अपन-अपन बेवस्‍था सेहो अलग कऽ लेला। आ तइ निमित्ते ऐ गामक रकबा जे चौदह साए बीघा अछि तेकर बँटबाराक चर्च उठल। दुनू भाँइ सोचलैन जे जमीनक बँटबारा कऽ ली मुदा दुनू भाँइ एहिमे अपनाकेँ असमर्थ पेला। आब की करी? तखन गंगदेव महादेवक आराधना कए हुनकेसँ प्रार्थना केलैन जे उक्त जमीनक बँटबारा करू। लोक मान्यता कहैत अछि जे तखन कमला राता-राती ऐ गामक रकबा चौदह साए बीघाकेँ बीचो-बीच धारक रूपमे आबि सात-सात साए बीघा कएल। जेठ भाय–गंगदेव–केँ कमलाक पूब आ छोट भाए–भागीरथदेव–केँ कमलाक पच्‍छिम जमीन भेटलैन। जेकर प्रमाण आइयो जिला कार्यालयमे जे उपलब्ध नक्शा अछि, जेकर निर्माण १९०१ इस्‍वीक जनगणनाक संग भेल छल। तइमे चादर नम्‍बर-१ पछवरिया शीटबला नक्शापर सौराठ भागीरथ आ पुवरिया शीटबला नक्शापर चादर नम्‍बर-२ केर सौराठ गंगा अछि। संग-संग दुनूक रकबा सात-सात साए बीघा सेहो अछि। दुनू भाँइ केकरो सोमनाथ केर सम्बन्धमे बिना बतेने मरि गेला। एकर बहुत दिनक बाद शिव निर्मालक पूजा धीरे-धीरे बन्द जकाँ भऽ गेल। आ उक्त धरतीपर खेती-बाड़ी तँ नहि, मुदा चरौर बनि गेल। जैपर गामक चरवाहा सभ अपन-अपन माल-जालकेँ चरबैले जाइ छल। अहिना होइत होइत २०० वर्ष बीति गेल। अही क्रममे फ़कीरचन्‍द नामक एक सूफी (मुसलमान कृषक, जेकर नामसँ फकोरमा नामक खेत अखनो धरि अछि) अपन टेंगारीसँ उक्त स्थानक झाड़  आ घास पातकेँ साफ़ करै छल। एकाएक फ़कीरचन्‍दक टेंगारी सोमनाथ नामक महादेवक लिंगपर लगलैन। टेंगारीक  चोट लगिते लिंगसँ शोणित बहए लगल। स्थितिकेँ देखते फ़कीरचन्‍द घबराइत टेंगारी  ओतै छोड़ि घर आबि गेला। फ़कीरचन्‍द ओना तँ मुसलमान छला मुदा हिन्दू धर्मसँ सेहो हुनका सिनेह कम नहि छेलैन। भोजन कए ओ दिनमे कनीकाल लेल आँखि मुनला तखन हुनका सोमनाथ महादेव स्वप्न देलखिन आ कहलखिन- “अहाँक टेंगारीसँ जइ पत्थरकेँ चोट लागल ओ साधारण पत्थर नहि अपितु शिव लिंग अछि। हम छी सोमनाथ महादेव। गज़नीक आक्रमणक समय ऐ गामक दू गोट ब्राह्मण गंगदेव आ भागीरथदेव हमर आज्ञापर सौराष्ट्रसँ हमरा निर्मालक रूपमे अनलैन। हुनकर मृत्युक पछाइत आब कियो हमर पूजा नहि करैए। ओना, अइले गामक लोकक कुनो दोख नहि। अहाँ दूटा काज करू। पहिल तँ ई जे गामक लोक सभकेँ लऽ कऽ अहाँ ओइ स्थलपर जाउ आ लोक सभकेँ कहियौ जे पीसल भाँग, बेलपत्र, गाइक घी, चन्दन, दही आदिक लेपसँ हमर लिंगकेँ पवित्र करैत। पूजा प्रारम्‍भ करैथ। अहाँकेँ हम असीरवाद दइ छी जे खूब फली-फूली। मुदा अहाँ ऐ गामसँ थोड़ेक दूर अर्थात १४०० बीघा केर सीमानसँ बाहर बास करू। तुर्क लूटेरा गज़नी हमरा बहुत परेशान केलक आ तंग तंग कऽ देने छल।” एतेक बात कहि सोमनाथ अन्‍तर्धान भऽ गेला। फ़कीरचन्‍द अकचका कऽ उठल आ मुँह-हाथ धोइ कऽ गामक लोककेँ बजा सभ बात कहलक। आब गामक समस्त लोक- बच्चा, स्‍त्रीगण, बुढ़, युवा सभ चरौर दिस गेल। देखलक जे लिंगसँ शोणित बहि रहल अछि..! लगले पीसल भाँग, बेलपत्र, चन्दन, गंगाजल, गाए घी, दही, मधु, आदिसँ मालिश कए शिवलिंग के पवित्र कएल गेलैन तखन आब लिंगसँ रक्तस्त्राव बन्‍द भेल। पूरा गाम ऐ चमत्कारसँ नाचए लगल। ढोल, पिपही, शंख, डमरू, झालि बाजए लगल, भजन कीर्तन शुरू भेल। ‘हर-हर बम-बम’ केर उद्घोषसँ वातावरण प्रफुल्लित भेल। लोक फ़कीरचन्‍दक प्रति अपन कृतज्ञता अर्पित करए लगल। फ़कीरचन्‍दक आँखिसँ खुशीक नोर झहरए लगलैन। मनमे उठलैन-  अनेरे किए लोक धर्मक नाओंपर कटै-मरैए? की महमूद गज़नी सोमनाथ मन्‍दिरकेँ ध्वस्त केलाक बाद अमर भऽ गेल? अल्लाहकेँ आँखिमे तँ ओ गुनहगारे ने भेल..? फ़कीरचन्‍दक सभसँ बेसी ई रहै जे हमरे कारण सौराठक सोमनाथ प्रगट भेला। आब जहिया धरि ई शिवलिंग रहत तहिया धरि फ़कीरचन्‍द अमर रहब। ई ने भेल गांगी-जमुनी तहजीब। पुन: फ़कीरचन्‍दकेँ सपनाक दोसर बात मन पड़लैन। मन पड़िते गुनधुनमे पड़ि गेला- बाबा सोमनाथ तँ हमरा ऐ गामक चौहद्दी छोड़ि देमाक लेल कहने छला!आब की करी, केना करी? फ़कीरचन्‍द असमंजसमे पड़ि गेला- जे गाम हमर जीवन छी ओकरा केना छोड़ब? मुदा नहियोँ छोड़ब उचित नहि। तखन हमरामे आ महमूद गज़नीमे अन्तरे कुन? अगर एक मुसलमान सोमनाथ बाबाकेँ ध्वस्त आ तवाह करबा लेल जानल जाइत अछि तँ एक मुसलमान सौराठक सोमनाथकेँ पुनर्स्थापित करबाक लेल जानल जाएत। आ ओ मुसलमान आर कियो नहि फ़कीरचन्‍द हएत..। ..सोचैत-विचारैत फ़कीरचन्‍द दृढ़ मुद्रामे अपन घर जा कनियाँ आ बेटा सभकेँ बैसा कऽ सभ बात कहलखिन। संगे ईहो देलखिन जे ‘देख, ई निर्णय हमर अन्तिम अछि। हम पाँच वक्त सभ दिन नमाज पढ़ै छी। सुच्चा मुसलमान छी, तँए हम तँ ऐ गामसँ बाहर जेबे करब।’ ..किछु काल ना-नुकर केलाक बाद फ़कीरचन्‍दक घरवाली, बेटा सभ मानि गेली। तखन फ़कीरचन्‍द गामक लोककेँ बजेलक आ बाजल- “देखू, बाबा सोमनाथ हमरा ईहो कहलैन जे हम ऐ गामक अर्थात सौराठक चौहद्दीसँ बाहर अपन घर बनाबी। तँए हम ई गाम छोड़ि १०-१५ दिनक भीतर केतौ दोसर ठाम चलि जाएब।” समस्त सौराठक लोक फ़कीरचन्‍दक ऐ तियागसँ मन्‍त्र-मुग्ध भऽ गेल। गामक लोक अपन कृतज्ञता देखबैत फ़कीरचन्‍दकेँ जमीनक बदला दोसर गाममे दुन्ना जमीन कीनि देलकै आ ऐठामक घरसँ पैघ आ बेवस्थित घरो बना देलकै। फ़कीरचन्‍द सेहो गामक लोकक उपकार के जीवन पर्यन्त यादि रखलक आ जाबेत धरि जील ताबेत धरि सौराठ सप्ताहमे एक दिन अबस्‍स अबैत रहल। फ़कीरचन्‍दकेँ गाम छोड़ला बाद कुनो मुसलमान ऐ गाममे बसबाक हेतु नहि आएल। गामक लोकके ई कथन छैन जे अखनो धरि ओइ मोजेमे मुसलमान सम्प्रदायक बासकेँ शुभ नइ मानल जाइत अछि। इमहर आबि कऽ एक-दू गोटे उत्साही मुसलमान युवक सभ सड़कक पच्‍छिम–पोखरौनी टोलपर बसबाक प्रयास केलैन मुदा हुनका सभकेँ एतेक प्राकृतिक उपद्रव भेलैन जे अन्‍ततः बाध्य भऽ सौराठ मौजासँ हटए पड़लैन। आब बात फेर सोमनाथ महादेवक करी। बहुत दिन धरि ओइ रूपमे बाबाक पूजा होइत रहल। बहुत दिनक बाद ऐठाम एक हकरू गोसाईं नामक सिद्ध महात्मा[2] भेला। ओ अहीठाम कुटिया बना रहए लगला आ सोमनाथ मन्‍दिरक समस्त परिसरक विकास कार्य जुटि गेला। सोमनाथ महादेव केर लिंग गर्भ गृहमे बहुत नीचाँ छैन। केतेको बेर गौआँ सबहक बीच विचार भेलैन जे हुनका ऊपर अनैक प्रयास कएल जाए। मुदा तइमे एक बिडम्बना सदिकाल देखल गेल। कोरैत-कोरैत लोक जौं-जौं नीचाँ जाथि तौं-तौं शिव लिंग विशाल होइत गेल। जड़िक अन्ते नहि! सभ गोटे  हारि कऽ अन्तिम निर्णय ई लेलैन जे आब कोरनाइ बन्‍द कऽ दी। सएह भेल, लोक नतमस्तक भऽ भाव-भिभोर होइत ह्रदयसँ शिवक महिमाकेँ स्वीकारलैन। शिव के प्रणाम केलैन। शिव लिंगक सटल उत्तर दिशामे एक जलधरी अछि। ई जलधरी शिव लिंगक संगहि अंकुरित अछि। ऐ जलधरीक स्रोतकेँ समुद्र तलसँ जुड़ल बताएल जाइत अछि। कहियो काल ऐ जलधरीसँ आपरूपी जल निकैल बाबाक मन्‍दिरमे प्रवेश करैत शिव लिंगकेँ पूर्णतया जलमग्‍न कऽ लैत अछि। जल बहुत स्वच्छ आ हरियर कचोर होइत अछि। कियो-कियो ऐ जलक तुलना गंगाजलसँ करै छैथ। ऐ जलक स्वतः प्रस्फुटन होइक कुनो निश्चित तिथि, अवधि अथवा मौसम नहि अछि। कखनो भऽ सकैत अछि। कोनो-कोनो बेर सौन-भादोमे तँ कोनो-कोनो बेर बैशाख-जेठमे सेहो निकलैत अछि। जलक स्वतः प्रस्फुटन केर अवधि दू-सँ-सात दिनक रहैत अछि। ओकर बाद ई स्वतः सुखा जाइत अछि आ जल प्रवाह बन्‍द भऽ जाइ छै। बेसी काल शिव लिंगमे साँपकेँ लटपटाएल सेहो देखल जाइए। सौराठ गाममे अनेकानेक विभूति भेला। जइमे महामहोपाध्याय पण्डित राजनाथ मिश्र उर्फ़ रजे मिश्र छह विषयक अद्भुत ज्ञाता। हुनक लिखल कएकटा पोथी अखनो उपलब्ध अछि। ऐ गाममे हुनक लिखल तांत्रिक पद्धतिसँ निर्मित दुर्गा पोथीसँ अखनो धरि दुर्गा पूजा होइत अछि। महामहोपाध्याय डॉ. गंगानाथ झा हिनक शिष्य छलाह । रजे मिश्र  काशी वास  केलाह आ ओतहि भगबान भोलानाथ के नगरी में गंगा कात में अपन अहि नश्वर काया के त्याग केलनि । ऐ भूमिपर एक विभूति भेला श्री गंगाधर मिश्र जिनकर योगदानक फलस्वरूप चन्‍द्रधारी मिथिला महाविद्यालय केर स्थापना भेल। ऐठाम महान क्रांतिकारी श्री भागीरथ झा भेला,जिनकासँ ब्रिटिश हुकूमत त्राहि-कृष्ण करै छल आ ‘शूट एट साईट’क आदेश सेहो देने छल। जे हिनका जीबैत अथवा मुइल पकड़ैबला अथवा जानकारी दइबलाकेँ लेल इनाम देल जाएत...। ..देशक आज़ादीक पछाइत भागीरथ झा जिवकोपार्जन हेतु महाराष्ट्र गेला आ बादमे सौराठ गामक नामक पताका फहरेला आ महाराष्ट्र विधान-सभाक सदस्य चुनल गेला। सौराठमे एक विभूति छला बाबु अबध विहारी झा। ई अंग्रेजक समयमे डिप्टी भेल छला बादमे विधान पार्षद सेहो भेला। ऐ गामक डॉ. सुरेन्द्रनाथ ठाकुर नामक प्रख्यात चिकित्सक भेला। ई जीवन पर्यन्‍त गाम आ परोपट्टाक लोकक मुफ्त सेवा आ चिकित्सा केलैन। ऐ गामक अन्य विभूतिमे पण्डित फेकू मिश्र, पण्डित हरीशचन्‍द्र झा, पण्डित कृष्णदेव झा, तांत्रिक नारायण मिश्र तथा डॉ. कलिका दत्त झा आदि प्रमुख छैथ। सौराठसँ जखन हम आबए लगलौं तखन एक व्यक्ति हमरा भेँट करए एला। ओ गामक विद्यालयमे शिक्षक छला। सौराठ गामक इतिहास आ एकर गौरवकेँ ओ अपन एक कवितामे बहुत सुन्‍दर वर्णन केने छैथ। ओ कविता हम सुधी पाठक लेल दऽ रहल छी- तपोभूमि जगजननी मिथिला ह्रदयस्थली जकर सौराठ/ श्री शारद नव निधि केर नैहर संग-संग जते सिधहु आठ// पूर्व पवित्र धार जीबछ केर उत्तर लोहा ग्राम/ पश्चिम पोखरौनी दक्षिण धनुखिक मध्य ई धाम// पुन्यस्थल सौराठ सभा मिथिला संस्कृति प्रतिक/ दर्शनीय सुन्दर शिव मन्‍दिर माधवेस्वरक थिक// तुर्क लूटेरा महमूद गज़नी जखन उपद्रव कएल / गुजरातक सौराष्ट्र तेजि शिव पथ सौराठक धैल// ईस्वी एक हज़ार पचीसिक अछि ई गप्प करू विश्वास/ सोमनाथ शिव कमला केर छारनि पर आबि बनोलनि बास// जंगल झार मशान मध्य शिव बसला गामक भेल उद्धार/ पुरना मन्‍दिर बोधकृष्ण सम्प्रति कयलनि अछि जीर्णोद्धार// दतकट कथा सुनब तँ लागत मुदा जुरायेबदेखने नयन/ कार्तिक जेठक विषम ज्वालामे शिव लै छथि अपनहि जलशैन// साधक सिद्ध समाज सुधारक न्यायी न्यायविज्ञ भरमार/ कुशल प्रशासक अभिनेता डॉक्टर प्रबुद्धजन अपरम्पार// बानी केर बरदानी बेटा मिथिला केर संचित अध्याय/ राजनाथ मिथिला केर गौरव विश्रुत महामहोपाध्याय// न्यायविज्ञ पण्डित गंगाधर साधक शिक्षा प्रेमीप्रज्ञ/ सूत्रधार सी. एम. कॉलेजक मिथिलावासी जिनक कृतज्ञ// हरिश्चन्द्र ज्योतिष केर ज्ञाता कृष्णदेव व्याकरणाचार्य/ नाम कतेको गनब अन्‍त नहि छथि नवीन नामी प्राचार्य// पद्मकान्‍त प्रियपात्र समाजक जिनका जन-जन केर आशीष/ सब तरहेँ मिथिला के गौरव सबतरि अपन बढ़ोलनि शीस// विश्वविदित कवि विद्यापति केर बंसज आबि बनोलनि बास/ के नहि जनैछ शिव उगना भए भेलथि विद्यापति केर दास// विद्यापति पुस्तक केर आलय केन्द्र चिकित्सा शिक्षा शोध/ संग्रहालय पत्रालय करैछ विकसित गामक बोध// सोभा सभ्य सुशिक्षित जन-जन मुँह पर चौअनिया मुस्कान/ बाल ब्रिद्ध युवजन मृदुभाषी बुझि परत नहि छथि ई आन// पग-पग पोखरि भव्य शिवालय रम्य बाग़ देखि होइछ हर्ष/ थिक सौराठ गाम सब तरहेँ मिथिला मैथिल केर उत्कर्ष// आभार- हम ऐ लेखक लेल श्री शिव कुमार मिश्र, श्री समरेन्द्र नाथ ठाकुर एवं सौराठ गामक महिला आ पुरुषकेँ धन्यवाद दइ छिऐन, किएक तँ हुनके सबहक देल जानकारीसँ ऐ आलेखक रचना कएल गेल अछि। हम अपन कृतज्ञता स्वर्गीय प्रोफेसर बैद्यनाथ सरस्वती के प्रति अर्पित करैत छी कारण ओ इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय कलाकेन्द्र में unesco चेयर केर प्रोफेसर छलाह आ हम unesco स्कॉलर । unesco –UNDP और इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय कलाकेन्द्र के सम्मिलित प्रयास स भारत केर १०० गामक संस्कृतिक आ संरचना केर अध्ययन करक रहैक. डॉ. कपिला वात्स्यायन आ प्रोफेसर सरस्वती हमरा कहलनि जे अहाँ एकटा एहेन गामक अध्ययन करू जकरा सब स्कॉलर आधार मानि काज करथि आ १०० गामक काज संपन्न हो. हम तुरते सौराठ केर नाम लेलौ आ दुनु गोटे स्वीकार क लेलनि. ◌◌◌ [1] गुजरातक सौराष्‍ट्र [2] बबाजी कुमार गगन ई-पत्र- डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ मे समानता विदेह २०८ अंक मे डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ मे समानता पढ़ल । नीक लागल । मुदा सौराठक विभूतिक नाम सब पढ़ला पर लागल जे सूचि में एकटा महत्वपूर्ण नाम छुटि गेल छनि जेना महात्मा पुरुषोत्तम ठाकुरक नाम नहि देखल । महात्माजी एक पैर पर ठाढ़ भ भोर स साँझ धरि सहस्त्र गायत्रीक जाप करैत साधना करैत छलाह । जीवनभरि एक संध्या फलाहार पर रहैत आध्यात्मिक मार्ग में लीन छलाह । हुनक आश्रम में गायत्री मंदिर स्थापित अछि । सोमनाथ बाबाक मंदिर सँ ई स्थान लगभग 200 मीटरक दुरी पर ओही टोल में अवस्थित अछि । सभागाछी सँ सटले । नहि जानि एहेन महत्वपूर्ण नाम कोना छुटि गेल । कैलाश बाबू अपन रिसर्च में इहो जोड़ि लेथि से आग्रह । विशेष जानकारी पंडित देवोत्तम ठाकुर गायत्री स्थान ,सौराठ सँ भेटि सकैत छनि । भवदीय- कुमार गगन राजेश वर्मा 'भवादित्य'- पटोरी पछवारि टोल, पो○- पंचगछिया, सहरसा। बीहनि कथा रौशन राज। प्राथमिक स्कूलक चौथा किलासक विद्यार्थी। स्वतंत्रता दिवस मनेबाक उत्साह ओकरा कतेक दिन पहिने सँ रहय। 15 अगस्त सँ एक दिन पहिने ओ अपन मम्मी सँ पैसा माँगि पन्नीवला तिरंगा झंडा, माथमे बान्हयवला पट्टी जाहिपर " I LOVE MY INDIA" लिखल रहै आ गालमे साटय लेल तिरंगा वला स्टीकर कीनिके आनि लेने छल। 15 अगस्तक भोरे उठि ओ पन्नीवला तिरंगाके एकटा करचीमे खोंसि, गालमे स्टीकर साटि आ माथमे पट्टी बान्हि स्कूल पहुँचल। प्रभातफेरी मे खूब नारालगेलक। झंडोत्तोलनक बाद सभ छात्रकेँ प्रसादक रूपमे बुनियाक वितरण भेलै। ओ पन्नीवला तिरंगेमे बुनिया लऽ कय खाइत-खाइत घर दिस चलि देलक। बाटमे जखन बुनिया खतम भऽ गेलै ओ जूठका तिरंगावला पन्नीकेँ मोड़ि- माड़ि सड़कक कातमे फेक देलक आ अपन संगीसभ संगे खेलबामे व्यस्त भऽ गेल। ओकर मुखमंडल पर पूर्ण स्वाधीनताक संतोष पसरल छलै। रवि भूषण पाठक फसाद आ आनंद (लघु कथा) समै काटबा ,बितेबा लेल आदर्श जगह ।ई गाम जत्‍त’ भरि दिन केकरो सँ केकरो फसल रहै ,मारि नइ त’ मारिक भूमिका नइ त’ मारिक उपसंहार ।कतौ पंचैती ,कतौ उपराग ,नालिश ,कतौ गारागंजन ,कतौ निंदा रसक आनंद ,मुदा सबसँ बेशी आनंद रहै मारि-पीट ,मल्‍लयुद्ध या फेर दू पाटी क’ बीचक सामूहिक संघर्ष । यदि कतौ झगड़ा फसल होए त' किमहरो सँ हूलि जाउ ,केकरो पक्ष ' लियौ ,कुनो बात पर नराज भ' जाउ ,केकरो हां मे हां मिलबू ,मौका देखिके केकरो पर बिगडि़ जाउ,भीड़क आनंद लिय' ।अप्‍पन माथ-कपाड़ बचबैत केकरो पक्ष सँ लाठी चलबू या उपदेश दिय' मुदा सम्‍हरि के ,कहियो-कहियो जतरा खराब होइ छैक ,नइ सम्‍हरै त’भाग-पड़ाउ । फसाद पछिला दू दिन सँ सब ताक मे रहै ...कुनो मौका मिलै आ सधा ली... केओ एक बेर छीकै त' दोसर दू बेर ...कोहुना मारि शुरू भ' जाए..मोर्टन झा एक बेर राम कहलखिन त' सोहन मिसर कें भेलेन जे हमरा खौंझा रहल अछि तें ओ दू बेर राम राम कहलखिन ...यदि दशरथ कुनो भगवानक नाम रहतै छल त' मिश्रजी दशरथो-दशरथ जरूर कहथिन छल ,यदि रावण राम कें हरेने रहतै छल तखन मिश्रजी रावण-रावण जरूर कहथिन रहै ।मुदा राम-राम कहला सँ मोर्टन मिश्र पर कुनो प्रभाव नइ पड़लै ,ओ खौंझाबै लेल कहने छलखिन थोड़कें तें निराश दूनू गुट मारि करबा लेल दोसर बहन्‍ना बनब' लागलै फसाद-1 अल्‍फा मरसैब तामैत रहलखिन आ गारि सुनैत रहलखिन ।बीटा एक बेर गारि दै आ हहा के हँसि पड़ै ,मरसैब उत्‍तर तामैत रहथिन त' दक्खिन चलि जाथिन ,फेर बीटा दछिनबारी कात मे गडि़या आबै ,मरसैब पूबारी कात चलि जाथिन आ फेर बीटा ससरि के पूबारी कात चलि जाए ।ई परिक्रमा कतेको बेर चललै ,बीटा थाकि जाए त' गामा काज कर' लागै ।मरसैब कुनो तरहे चाहथिन जे आइ मारि नइ फँसै मुदा बीटा आ गामा दूनू भाइ पनपियाइ खेला के बादे आयल छलै ,ओ चाहै छलै जे आइ कोहुना मामला फरिया जाए ,किएक त' आइ मरसैब असगरे छलखिन ,आ मरसैबो आइ एकदम अड्डी गाड़ने छलखिन कि आइ किछ नइ होए ।ताबते मे मरसैबक बेटा प्रोटान बड़हल आबैत देखेलै ,मरसैब कें भेलेन जे आब किछु कएल जा सकैत अछि ,आ ऊ धोती कें कनेक सम्‍हारि कें बान्‍हनै शुरू केलखिन ।पूब दिस बान्‍ह पर एकटा हलचल देखेलेन ,आंखि पोछि के देखलखिन ,शायत बीटा क' बाप रहै ,मरसैब फेर सँ तामनै शुरू क' देलखिन... फसाद-2 ई कुनो मीटिंग रहै मंदिर पर ।सब टोलक आदमी जमा भेला ।सरकारी कर्मचारी ,ओकर दलाल ,गामक चौकीदार ,पोस्‍टमेन ,बैंक मनेजर आदि आदि सेहो रहथिन ।सरकार के पास रहै बहुत रास पैसा ,बहुत रास प्‍लानिंग ,बहुत रास झोल-झाल ।मीटिंगक अध्‍यक्ष कहलखिन ' हम पूछि रहल छी ,अहां सब बताबैत चलू ' अस्‍पताल कत' स्‍थापित होए? बभनटोली मे सर गौशाला किमहर रहतै? काइथटोली मे सर बैंक लेल कुन जगह? रजपूताना सर आ दूधसंग्रह केंद्र? भूमिहरटोली मे होए त' केहन रहतै ई सुनिते दुसधटोलीक लोक ,चमरटोलीक लोक सब धीरे-धीरे घूसक' लागलै । मुदा कुरमी टोली आ गुअरटोलीक लोक सब ओहिना मौजूद रहलै । सब के लागलै कि मीटिंग आब खतम भ' गेलै ।अध्‍यक्ष महोदय कार्यवृत्ति भर' लागलखिन आ कहलखिन सब आदमी साइन करू ,तखने गुअरटोलीक एकटा जवान कहलकै हाकिम सब संस्‍था ओमहरे ल' जेबै कि किछु हमरो आर दिसन रहतै ।अध्‍यक्ष महोदय कहलखिन बाजू ने जे सर्वसम्‍मति से अहां सब कहबै से कएल जेतै । तावते समवेत स्‍वर मे खुसूरपुसूर शुरू भ' गेलै ।ऐ स्‍वर मे जातिक नाम ,लाठीक नाम ,स्‍वतंत्रता ,विकास आदिक विभिन्‍न शब्‍द एक-दोसर पर बजर' लागलै ।एतबे मे के लाठी ,के मूसर ,के कुरसी ,के टेबुल ,के कोरो उठा के एक-दोसर पर चलब' लागलै एकर अलग-अलग लिस्‍ट छैक ।ई सब लिस्‍ट थानाक दरोगा संग मे छैक ।घायलक सूची ,मृतकक सूची अखबार मे छापल छैक आ घाव ,दर्द ,बेंडेजक संग पूरा गाम खूनोखून भेल छैक फसाद-3 दिनेश कहलखिन रै 'राजेश' ,मुदा राजेश के सुनेलए 'रए राइतेश' आ ई सुनिते कहैत छै 'हँ पादेश' । दिनेश- की कहलहीं? राजेेश- जे तू कहलहीं दिनेश-एना किएक बाजैत छें? राजेश-जेना तू बाजै छहीं दिनेश सोच' लागलै कि रजेशवा एना किएक बाजि रहल छैक ,तखने ओकरा हाथ सँ खुरपी बाल्‍टीन मे गिर गेलै ।खुरपी देखिते राजेश चिकरैत आबि गेलै दिनेशक सामने राजेश दूनू हाथ सँ दिनेशक गट्टा धेलकै ,दिनेश ओकरा धकियाबैत ,गट्टा छोड़ब' लागलै ।गट्टा छूटलै तखन राजेश डांड़ ध' लेलकै ,राजेश डांड़ छोड़बै आ दिनेश ओकरा नचाब' लागलै ।दिनेश एकटा बिट्ठू काटलकै त' राजेश एक्‍के बेर हाथ छोडि़ देलकै आ अपन दांत ओकरा पीठ मे गड़ा देलकै ।दांत गड़ाबिते दिनेशक देह एक्‍के बेर झनझना उठलै ,ऊ खुरपी उठेलकै आ उलटा क' के बेंट दिस सँ एक बेंट ओकरा पीठ पर देलकै ।बेंटक मारि खाइते राजेश पलटलै आ अप्‍पन दांत सँ दिनेशक करेजा मे लगा देलकै ।करेजा मे दांत घूसबैत माउस नोचैत बाहर निकललै आ थूकि के अप्‍प्‍न लाल मुंह दिनेश कें देखब' लागलै ।खून देखिते दिनेश कें बहुत तामस एलै ,ओ खुरपी छोडि़ अपन घर मे घूसि गेलै आ अन्‍दर सँ भाला निकालि लेलकै ।भाला देखिते गामक दर्शकवर्ग सक्रिय भेलै ।खुसुर-पुसूरक बाद एकाध आदमी आगू बरहलखिन ,तावते दिनेशक कनियां एकबाइग आबि के एक लाठी राजेशवा कें ध' देलकै आ ओमहर राजेशवाक कनियां काननै शुरू क' देलकै ,पता नइ किएक । दोस्‍तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य) आ झड़बैर कालक दोस्‍ती बहुत किछ महुआक रंग नेने रहै ,रंगो सँ बेशी गंध ।खूब मादक गंध ,पूरा क' पूरा गाछी-बिरछी ओइ गंध सँ पुलकित ,मुदा ऐ गंधक आयु कत्‍ते दिन ,ऐ फलक आयु कत्‍ते दिन ,ऐ वसंतक आयु कत्‍ते दिन ,तहिना ऐ कालक दोस्‍ती सब रहै ।किछु दिनक लेल पूरा जगजगाड़ ,आ फेर जल्दिए बाइस भेनै आ किछुए घंटाक बाद मौलेनए ,मौलाईत-मौलाईत लाल भेनै आ फेर करियेनए ।मुदा चलाक लोक शरबत बना पी लैत रहथिन,बेशी चलाक लोग लट्टा बना के राखि दैत रहथिन आ जे जन्‍मी चलाक रहथिन से महुआ कें सड़बाक प्रतीक्षा करैत रहथिन ,महुआ सड़ै आ मधु मे बदलि जाए ।काबिल लोक सब ऐ दोस्‍ती कें सीसी मे राखि के अमर बना देलखिन ।तें ऐ काल मे जल्‍दी-जल्‍दी दोस्‍ती बनै आ टूटै ।बहुत किछु ‘ट्रायल एंड एरर’ तकनीक पर ।दोस्‍ती बहुत किछ तात्‍कालिक स्‍वार्थक आधार पर बनैत रहै ,आ ईहो पता नइ रहै कि ऐ दोस्‍ती सँ किछु भ' पेतए वा नइ आ किछु समै बितैत जखन पता चलै कि हे दोस्‍ती तोहर कोन दिशा ,तोहर कोन रंग ,तखन तुरत दोस्‍त सब बदलि जाए आ जे विशेषण ,समास आ मुसकियान अहांक लेल प्रयुक्‍त भेल रहै ,से दोसराक लेल खर्च भेनै शुरू भ' जाए ।कखनो काल दोस्‍त लोकनिक' स्‍वार्थ आमने-सामने आबि जाइ तखन दूनू एक-दोसर पर आरोप लगबैत अलग भ' जाइत रहथिन ।जे जत्‍ते बुधियार ,से तत्‍ते कम आरोप लगबै ।आ एहने समै मे एलखिन साव जी आ साव जी दूए दिन मे विदा भ' गेलखिन ,एहने समै मे एलखिन कमती जी ,ऊहो दुए दिन मे विदा भ' गेलखिन ........मुदा सभ एहने नइ रहै क्‍।किछु आयल छथिन कि पुरनका सब कें उखाडि़ के फेक देबै कत्‍त’ बागमती मे ,गंगा मे ,करेह मे..... ईहो एगो समै रहै ,मधुबनी जिला मे एक सँ एक इंस्‍पेक्‍टर भूमि विभाग मे । एगो सिंह जी रहथिन ,जिनकर पहुंच पटना तक ,मिश्रा जी रहथिन हरदम पटना-रांची बौआइत रहथिन आ झाजी दिल्‍ली -कोलकाता सँ कम कखनो नइ बतियाथिन ,एगो ईहो समै छैक सब झड़बैर सब पहुंच गेल छैक ।एगो छथिन विनय भूषण से हरदम सिंहजीक पाछू लागल रहै छथिन ,आ ऐ अागू-पाछू मे भोजन-जलपानक चिंता सँ मुक्‍त छथिन ,एतबे नइ सिंहजी कनेक पहुंच वला छथिन से एही बहाने कनेक बात-सात ,निंदा-प्रशंंसा ,पाद-फूस करैत नजदीकी बढि़ रहल छैक आ कनेक काजो ससरि रहल छैक ।विनय भूषण जी आ सिंह जी सहरसाक महिषी प्रखण्‍डक छथिन ।दूनूक दोस्‍ती एही ठामक अछि,मुदा दूनू आदमी एके साथ कहै छथिन भगवती तारादेवीक जय ।ऐ दोस्‍ती के झाजी कनेक वक्र आंखि सँ देखै छथिन ,किएक त' विनय भूषण छोट जाति सब मे सँ छथिन आ झाजी कें लागैत छैन जे विनय भूषण सिंहजी कें साथ मिलि एकटा नया समीकरण बना सकैत अछि ,मुदा सिंहजी एकरा एकटा संभावना कें रूप मे देखैत छथिन,मतलब एहन आदमी जे ब्राह्मण सबकें गरिया सकैत अछि ,बस एकटा चाय ,कनेक जलपान ,बासि-कुसि मिठाई आ ई सब नइ होए तैयो एकटा भविष्‍य आ एकटा संभावनाक मद्देनजर.... आ झड़बैरक दोसर फुल्‍ली जीवछ ठाकुर ।देह पिलपिल्‍ली मुदा अवाज भरिगर ।की चाही आ की बाजै छी ,ऐं यौ ठाकुर जी ,एना मे केना मिलत ओ सभ ,जे अहां चाहै छी आ जे कंठ पर आबैत आबैत रहि जाइत अछि ।मुदा कतबो कहियौ करता ओतबे ।आ एकटा चीजक गैरेंटी कि ओ सही चीज नइ बता सकैत छी ,पता नइ पर्सनेलेटी डिजोर्डर ,जेनेटिक समस्‍या वा कोनो खास मानसिकता ।अहां पूछबै नाम आ ओ पूर्ण शिष्‍टताक संग अपन शैक्षिक योग्‍यता बतेता ।नइ -नइ हुनकर कान ठीक छइ ,ओ बताहो नइ छथिन ,ओ अहां संग मजाको नइ करैत छथि,मुदा ई अल्‍लक बल्‍ल जे छैक ,सएह हुनकर शक्ति ।एही शक्तिएंक भरोसे ओ अपन रस्‍ता चलैत छथिन आ अहां अनुमान नइ लगा सकैत छियै कि ओ किमहर जेता ।आ ठाकुर जी सब दिस छथिन कनेक सिंह जी दिस ,कनेक झा दिस ,कनेक मिश्रा जी दिस ,कनेक रंजन दिस ,कनेक विनय भूषण दिस ,मुदा ओ गोजर नइ छथिन कि शतपादी होथि ,तें ओ किमहरो नइ घुसुकि पाबै छथिन ,ओ चालियो नइ छथिन कि ससरैत-ससरैत नमहर रस्‍ता पार क' सकैथ ,से ऊ भ' गेलखिन वृद्ध ऊंट जे अपन नमहर गर‍दनि उचका-उचका पात तोड़ैत हो आ ठाकुरो जी बस पाते तोड़ैत छथिन ,फल ,डांट छूबाक सामर्थ्‍य हुनका मे नइ ।जे ऊर्जा बचैत छैन से रेलवेक टाईम-टेबुल देखबा मे लगा दैत छथिन ,डेली सकरी जाइत छथिन ने ,तें आबि जेता दस मिनट पहिले आ आफिस सँ भागि जेता दू घंटा पहिले ।पीठ पर बैग टांगने ठाकुर जी एकटा निश्चित समै मे दरभंगा आ संकरी स्‍टेशन पर देखा सकैत छथिन आ ई मासिंक सीजनल टिकट हुनका कत्‍तौ के नइ छोड़लक । ने ओइ ग्रूपक भेलखिन ,ने अइ पटटी दिस ससरलखिन ।ओ अखंड यात्री रहलखिन आ पूरा मंडली जिला चरैत रहलै ......अधिकारी परेशान कि किछु कमा के नइ दैत अछि ,आ अधीनस्‍थ परेशान कि साहेब कमबा नइ रहल छथि ।मुदा एहने मे कतेको एहनो सूरमा सब छैक ,जे चाहैत छैक कि ठाकुर जी नइ आ‍बैथ मधुबनी ,ओ बैग ल’ के ,टिकट ल’ के ,मोटर साईकिल सँ ठाकुर जी कें विदा करैत छैक ,आ ठाकुर जी गाम जाइत छथिन ,मुदा गाम मे रहैत छथिन त’ धियान रहैत छैन मोबाईल पर ,हरदम चौंकैत रहता कि केकर फोन एलै ,केखनो कंपनी वला फोन केलकै ,त’ ऊचकि के देखता ,केखनो वौआ –बुच्‍ची सब सेहो गलती सँ रिंगटोन बजा देलकै त’ परेशान ठाकुर जी बच्‍चा सब कें डेंगा दैत छथिन ।केखनो डेरा के फोन बंद क’ दैत छथिन ,केखनो बैटरी निकालि दैत छथिन आ केखनो काल ओछैने पर मुसकियाइत बहन्‍ना सोचैत छथिन ।ई मुसकिएनै कतेको बेर कनियां के खराब लागलेन ,पहिले टोकैत रहथिन ,आब टोकनै छोडि़ देलखिन ,मुदा एखनो कहियो काल कनियां ताक’ लागैत छथिन ।हाय रे ठाकुर जी ,ठाकुर जी केकरो नइ भेलखिन ,ने कनियां आ बाल बच्‍चा के ,ने आफिस मे रहि के दू पैसा कमा पेलखिन ,ने अधिकारी वर्ग पर दू पइसा लुटा सकलखिन ,ने रोड पर शुद्ध मोन सँ खखसि कें भरि गाल पीक फेंकलखिन।ठाकुर जत्‍त’ रहलखिन परेशान रहलखिन आ सब हुनका सँ परेशाने रहलै । झड़बैर कालक तेसर सम्‍माननीय इंस्‍पेक्‍टर साहेब आत्‍मानंद छी छथिन ।अपने सिंहजीक बाल सखा छी आ अपनेक घर जिला सहरसा मे अछि ।अपने सिंह जीक साथे साथ पटना मे जवानी नष्‍ट कएल आ चापलूसी ,चमचै आ जासूसी मे निष्‍णात भेलौं ।पता नइ कोन सुखे मधुबनी मे च्वाइस देलौं आ ऐ ठाम सिंहजीक जूनियर इंस्‍पेक्‍टर के रूप मे ख्‍यात छी ।ई जूनियरिटी पदरूप मे नइ विशेषण आ क्रिया रूप मे छैक ।जइ समै आत्‍मानंद जी जिला ज्‍वाइन केलखिन ,जिला दू भाग मे बँटल रहै सिंह जी ,सहरसा आ सिंह जी समस्‍तीपुर मे ।आ आत्‍मानंद जी आबिते दूनू पाटी ओत' धुरझार घूम' लागलखिन ।लोक अनुमान लगबै ,कथी लेल आबै छौ आत्‍मानंद ,लोग शक करै ,विश्‍वास करै ,आरोप लगबै ,अपना आप के बचाबै ,मुदा आत्‍मानंद एबा-जेबा मे कोनो कमी नै केलखिन ,जेकरा जे बूझबा के होए से बूझहै ।आ आत्‍मानंद जी अपन काज अत्‍यंत मौन आ समर्पण के साथ क' रहल छथिन ।केओ कहै छै जे आत्‍मानंद दूनू गुट के एक करबा मे लागल छथिन ,दोसर तर्क ई छैक जे आत्‍मानंद भेला ब्राह्मण,ओ किएक एक करथिन ,ओ त' इएह चाहता कि सिंह जी कमजोर होए आ ओ एकर स्‍थान ,झोड़ा-झपटा आ कमंडल सहित सिंहासन ल' लैथ ।तेसर तर्क ई छैक जे ई आतमबा जासूसी क' रहल छौ ।सब ठाम अपन कैमरा आ टेप सेट केने रहै छौ आ जा के सिंह जी ओइ ठाम बोकरि दैत छैक आ ऐ बोकराए क' पइसा सिंहबा एकरा दैत छैक ।मुदा आत्‍मानंद जी की क' रहलखिन से मात्र आत्‍मानंदे टा जानैत छथिन ।आत्‍मानंद जी क’ अस्‍त्र छैक मौन ।जे जेकरा बाजै के छौ ,से बाजि ले ,ओइ पर कोनो प्रतिक्रिया नइ देता ,बस मुसकिएता ,आ मुसकीओ छोट-छीन ,अहां मुसकी बुझियौ या नया छी तखन ई अनुमान लगाबियौ कि आत्‍मानंद जी क’ मुह कहिया सँ टेढ़ छेन । आ बस नइ बजबा कें कारणे ई अनुमान लगेनए कठिन कि आत्‍मानंद किमहर छथिन आ बस एही कारणें ओ सब गुट ,टोल आ पट्टी मे स्‍वीकार्य छथिन ,बस स्‍वीकार्ये छथिन ,लोकप्रिय नइ ,िकएक त’ गुप्‍त योजना मे या त’ सिंह जी संग शामिल रहैत छथिन या फेर अधिकारी वर्ग सब संगे ।मुदा अहां ईहो नइ कहि सकैत छियै कि आत्‍मानंद जी कें बाज’ नइ आ‍बैत छनि या हुनका संग मे विषयक अभाव छैक ,यदि मौका मिलैत छैन त’ बीटल्‍स ,लांग मार्च ,ब्रह्मांड आ बिगबैंग पर अबाध रूप सँ घंटा-दू घंटा बाजि सकैत छथिन ।तें एक टा चीज नोट करू कि मितभाषित ,चुप्‍पी आ मौन हुनकर अस्‍त्रे टा अछि,आउर किछु नइ । आत्‍मानंदजी मे एकटा आर गुण छैक –भक्ति ।अधिकारी वर्ग मे ई भक्‍तक रूप मे ख्‍यात छथिन ।डेली जेनए ,बिना बजाओल जेनए आ बिना आज्ञा के नइ एनए ।फ्रिज साफ केनए ,तरकारी आननै ,‘तबियत ठीक अछि ने ‘ ई पूछनै ।दोहा क’ दोसर लाईन बाजनै।हँसी-खुशी क’ मौका होए त’ हँसनै आ कोनो दुख-विषादक बात होए त’ मुंह लटकेनए ।साहेब जेकरा पर प्रसन्‍न छथिन त’ प्रसन्‍न भेनए आ साहेब जेकरा पर नराज छथिन त’ आत्‍मानंद सेहो नराज भ’ जाइत छथिन ।आत्‍मानंद जी सूचनाक वाईर छथिन । के कत्‍त’ छैक ,के केकरा सँ भेंट केलकै ,केकरा केकरा सँ नइ पटैत छैक आ के केकरा मे सटेने छैक ई सब सूचना आत्‍मानंदजी यथा स्‍थान राखि दैत छथिन ।आ केखनो काल त’ शक होइत अछि कि आत्‍मानंद जी आदमी छथिन कि पेन ड्राईव ।आ एक दिन विनय भूषण सपना देखलकै कि आत्‍मानंद पर सिंहजी एकटा दवाई फेंक देलखिन आ आत्‍मानंद ओछैन बनि गेलै ,आ विनय भूषण दोसर दिन सपना देखलकै कि सिंह जी एकटाा मंत्र बाजलखिन आ आत्‍मानंद नटुआ जँका नाच’ लागलै ।तेसर दिन फेर विनय भूषण सपना देखलकै सिंह जी आंखि मूनि के किछु मंत्रे जँका परहलखिन,आत्‍मानंद कंडोम बनि के साहेबक जेबी मे चलि गेलै ।विनय भूषण कहैत छैक कि ई सपना नइ सत्‍त छैक ,हमर आंखिक देखल ,मुदा सिंह जी कहैत छथिन कि विनयबाक दिमाग बेशी भ’ गेल छैक,एकरा ईलाज चाही । विनीत उत्पल (जानकी नवमीक मौका पर गांधी दर्शन एवं स्मृति समितिक तत्वावधानमे आयोजित परिचर्चा आ संगोष्ठीमे वक्ता सबहक- [पंकज मिश्र, अमरनाथ झा, राजेश झा, सविता खान, अरविंद कुमार झा, मनीन्द्र नाथ ठाकुर, शेफालिका वर्मा, वेदव्यास कुंडू, आर.के. सिंह, प्रभात झा, प्रचंड पौटील्य, माया देवी, कृष्णा प्रसाद] वक्तव्य- ट्रांसस्क्रिप्ट आ अनुवाद: विनीत उत्पल) डॉ. पंकज मिश्र, दिल्ली विश्वविद्यालय - अन्वेषणक विषय छै जानकीक वास्तविक नाम हमरा बड प्रसन्नता भेल जानकी नवमी राजधानीमे मनाओल जा रहल अछि. चर्चा करैत छलहुं जे क्या ‘वैदेही’- त’ अपना सब जानैत छियै जे मिथिलामे हमर सबहक बुद्धि-शक्ति छै, ओहि प्रति असीम अनुराग छै, अविभक्त स्नेह छै आ वैदेही कहला मात्र सं अपनत्वक प्रतीति होय छै. वैदेही समग्र देहक, समग्र मिथिलाक प्रतीक छै. ओना हमर दिमागमे एकटा प्रश्न आबैत अछि जे सीताके वास्तविक नाम की रहय? ओना जानकी मतलब जनकक पुत्री, मैथिली मतलब मिथिला के, सीता मतलब हर के फार सें उत्पन्न भेल, पुनीता मतलब पुण्य सं तखन हुनकर असली नाम की छल, ई अन्वेषणक विषय अछि. आजुक दौरमें सशक्तिकरण शब्दके बुझबाक आवश्यकता अछि. हम आयके जुगमे एकर मतलब एतबे टा बुझय छियै, जे पतिके जवाब द’ सकय, धमका सकय, ओ नारीके वास्तविक सशक्तिकरण होइत छै. अपना सब नै जानैत छियै जे ओ सीता छलखिन जे जखन राम मना क’ देलखिन जे हम अहाँ के वनवास नै ल’ जायब ते ओ की बाजलखिन. बाल्मीकि रामायणक मुताबिक, सीताजी रामके संबोधित कहैत कहलखिन जे हमर पिता हमर ब्याह कोन निकम्मा सं करा देलक. अयोध्याकांड में सन्दर्भ अछि. सीताजी ओहि समयमे स्टैंड लेने छलखिन जे अहाँ हमरा कोना नै ल’ जायब. त’ सशक्तिकरण नारी के पर्याय होयत अछि. दशहरा में जखन दुर्गा सप्तशतीके हम-अहाँ पाठ करैत छी, तखन एक्के चीज बार-बार कहैत छी, ‘शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः’. अमरनाथ झा,  संस्थापक ‘वैदेही’- स्त्री सशक्तिकरण के पैग उदाहरण वैदेही छथिन ‘वैदेही’ कथिक लेल, ई सवाल अहम अछि आजुक जुगमे. विदेहसं आयल ‘वैदेही’. विदेह मतलब जिनका देह नै छै, होयत छै. देह नै छै मतलब सेल्फलेस. कोनो स्वार्थ नै, कत्तो किछु नै. किछु नै कत्तो. हमरा मोताबिक कोना समाजक पिछडल लोक आगां बढय, ओ भेल विदेह. ‘वैदेही’ सेहो शरीरसं नै आयल छथिन. वैदेही धरती सं आयल छथिन. सीता यानी वैदेही, मैथिली छथिन. सरकार के एकटा महत्वकांक्षी आभियान छै, ‘बेटी बचाउ, बेटी पढ़ाउ’, ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’. अहि मामलामे सीतासं बढिके हमरा ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’ कंपेनक सबसं पैग उदहारण कियो नै लखाह दैत छै. ओ पहिल बेटी छलखिन, जे धरतीसं निकालल गेल छल, बचायल गेल छल. अहि तरहे ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’ पहिलुक ते वहि छलखिन रहय. ‘सेव द गर्ल चाइल्डक’ एम्बेसेडर ते वहि छली. दोसर ई जे जखन हम नारी सशक्तिकरण के गप करय छियै, जखन नारी सशक्तिकरणके सबसं पैग उदाहरण हमरा सीताजी बुझाबैत छथिन. आ हमरा सबके मिथिला संस्कृतिमे नारी सशक्तिकरण त्रेता युग से अछि. कहबय कोना? हमरा अहिठाम सीताजीके लेल स्वयंवर छल, अहि सं पैग सशक्तीकरण की देब अहाँ? की कहब अहाँ? हुनका वर चुनय के अधिकार छल. हमर सबहके विदुषी मैत्रेयी, गार्गी जे भेल छथिन, के नै जानैत अछि हुनका? ओ सब कत्तेक विद्वान भेल अछि, ई नुकायल नै अछि. हुनका सभहक पढ़ैक पूर्ण आजादी छल. विद्वान भेलखिन ओ, शास्त्रार्थ केलखिन ओ. मिथिलाके जे संस्कृति रहल अछि, सदिखन दुनियाक नेतृत्व केलक. दू सौ-तीन सौ-पांच सौ सालक बाद दुनिया ओ काज केलक, मुदा शुरुआत कतय सं भेल-मिथिला सं भेल, मैथिली सं भेल. मिथिलासं या जानकीक सहयोगसं जे सीताके जे वर भेलखिन, राम ओ मर्यादा पुरुषोत्तम भेलखिन. एत्बाक कष्ट केलाक बावजूद, बादमे धरतीमे समा गेलखिन. सीता नवमी या सीताके जे जन्म होयत छै, ओहि बारेमे किनको बुझल नै, बहुत कमके बुझल रहय. कहि सकैत छी जे आंगुर पर गिनय बला. ई केकर जिम्मेवारी छै? सीता कतय के छथिन. मिथिला के, मैथिली छथिन ओ, तखन ई ते हमरे-अहाँके जिम्मेवारी बनय छै नै, हमरे-अहाँके ऊपर ई कर्ज छै नै. हमरा सब जखन जन्म लैत छी तखने हमरा सबके दुइटा-तीनटा कर्ज भ’ जायत छै- मातृकर्ज, पितृकर्ज आ दुनिया-दारीक कर्ज. बहुत रास कर्ज सब छै. माँ जखन माटी छै, धरती छै, ओकरो हमरा लेल कर्ज छै. तखन अहाँ जों ओहि माइट-पाइन के छियै, अहाँ कत्तो किछु क’ रहल छियै, किछु लायक बनि गेलयै, ते अहाँके जरूर ओहि माटीके दस-बीस प्रतिशत कर्ज उतारबाक प्रयास करबाक चाहि. डा. राजेश झा, दिल्ली विश्वविद्यालय- जानकी आजुक जरूरत एकटा फिल्म आयल छल ‘लगे रहे मुन्नाभाई’. हमर बेटी ओकरा डीवीडी पर बार-बार देखय. महात्मा गांधीके ल’ क’ हम एकेडमिशियन सब सेहो पढैत छियै, पढ़बैत छियै, ढेर रास किताब सेहो आबि गेल छै. मुदा, गांधीजीक मूल भावनाके ई फिल्म नीक जेना राखैत छै. जेना संवाद करलक ताहिसं छोट-छोट बाल-बच्चा ओकरा बार-बार देखैत अछि. तहिना हमरा लागयये जे जानकी जेकरा सिम्बोलायिज करय छथिन, रिप्रेसेन्ट करय छथिन, जानकीके आयके मिथिलामे जरूरत अछि. हम मानिके चलैत छी जे स्त्री सशक्तिकरणके मतलब छै जे डिसीजन मेकिंगक पावर ((निर्णय लेबक क्षमता) होबाक चाहि, ओटोनोमी होबाक चाहि आओर एकटा वर्किंग. जे गांधीक करीब भ’ सकैत छै जे परिभाषा, ओ यहि भ’ सकैत छै, जे महिलाक जे अधिकार छै, ओटोनोमी छै, ऊ ओकरा हैण्ड ओवर कायल जाय. ई होयत स्त्री सशक्तिकरण. बहुत लोक कहैत छै जे अहाँ सभ भारतमे सरस्वतीक पूजा करैत छी मुदा अहाँ पुरुषक तुलनामे स्त्रिगनक लिट्रेसी रेट (शिक्षा दर) देखियो, तहिना लक्ष्मीक देखियो, जे धनक देवी छै, मुदा धनक अधिकार नै छै. ते ई बहुत रास बहस सोशल साइंसमे अछि. जों हम सब देवीक पूजा करैत छी ते ओकर आम महिलाक दैनिक जीवन पर की प्रभाव छै. ओकरा की भ’ रहल अछि या इम्पावरमेंट की भ’ रहल अछि. दुनू तरहक विचार अछि अहिमे. कतेक लोग कहैत अछि जे अहाँक देवीक स्वरूप द’ क’ हुनकर इम्पावरमेंट नै क’ देल जाहि रहल अछि, मुदा हुनका धोखा देल जा रहल अछि. ओतय दोसरो ग्रुप अछि जे मानैत छैथ जे ई मीथोलोजिकल स्टोरी छै या देवीक स्वरूपमे जखन पूजा क’ रहल छियै, जे हिन्दू धर्ममे एकटा ट्रेडिशन छै, देवता आ मनुष्यक बीचक दूरी काफी कम रहय छै, ओहि कंटेस्ट में कत्तो नै कत्तो सकारात्मक असर करैत छै. हाल-फिलहाल कत्ते आन्दोलन भेल अछि जे देवीक ल’ क’ मोवलाइज करैक कोशिश कायल गेल अछि. जेना महाराष्ट्रमे शेतकारी संगठन करलक किसान आन्दोलन में. ओहि ठाम सीताक या लक्ष्मीक इमेजनरीक यूज करैत लोगके मोवलाइज केल गेल आ मांग करल गेल जे ई खेत, ई माइट, महिलाक नाम पर ट्रांसफर भ’ जाय. गांधी के अहाँ अहिमे कतय लोकेट करब. गांधी के देखय लेल अहाँके ई समझय पडत जे ओ सोशल रिफार्मर (सामाजिक सुधारक) रहथिन. हुनका समाजके ल’ क’ की विचार रहैन. सोशल रिफार्मक ल’ क’ की विचार रहैन. इंडीविजुवलक ल’ क’ की विचार रहैन आओर कम्युनिटी क’ ल’ क’ की विचार रहै. गांधी बहुत रचनात्मक सुधारक रहथिन. सुधार दू तरीक सं भ’ सकैत छै. अहाँ अस्तित्व बला परंपराके गारि दियो. ओहिमे अहाँके कतेक क्रेडिबिलिटी बनत, कतेक एक्सेप्टबिलिटी बनत, ई प्रश्नक विषय वस्तु छै. गांधी महसूस केलखिन जे जों अहाँ भारतमे सामाजिक परिवर्तन आनैल चाहैत छी, सामाजिक सुधर आनैल चाहैत छी, ते एकटा विख्यात कोट छैन गांधीजीके ‘इट इस बेटर टू स्वीम थ्रू द ट्रेडिशनल, इफ यू डाउन द ट्रेडिशन, यू विल डाई’. अहाँ परंपराके मार्गदर्शन करब ते अहाँ नीक परिणाम पायब. हुनकर जे पूरा संगठन छै सुधारक उपर, हुनकर जे अप्रोच छै ट्रेडिशन के उपर, केना इस्तेमाल कएल जाय सामाजिक सुधारमे, अहिमे गांधीजी के ओहि परिदृश्यमे हमरा सबके देखय के जरूरत छै. एकटा किताब छै, ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज’. दिल्ली विश्वविद्यालयक इतिहास विषयमे सजेस्टेड रीडिंग में ओ छल. कोनो संगठन ओकरा पर केस करलक जे ‘थ्री हंड्रेड रामायनाज’ मे सीताजीक ल’ क’ किछु आपतिजनक गप कहल गेल अछि, ते ओकरा ओहि ठामसं हटा देल जाय. आओर सुप्रीम कोर्ट एकेडमिक काउन्सिलमे ओहि गके रिकोमेंड कएलकय जे ओहि बारेमे बताऊ जे हमरा की करबाक अछि. छह-सात घंटा ओहि पर बहस भेलय आओर जे डिसीजन भेल ओहि में ई भेल जे विभिन्न विचार-विमर्श हेबाक चाहि. मिथिलाक रामायणक सेहो दू-तीनटा वर्जन छै. जे सीताक वर्जन हम सब पढैत छी या सुनय छी, ओ एक वर्जन छै, कई आओर सेहो वर्जन छै. हमरा बुझाबय ये जे गांधीजीक लेल सीताके एकटा रोल माडलक तरहे रहय. गांधीजी आओर रामायणक संबंध छै. गांधीजी अप्पन ओटोबायोग्राफीमे लिखने छथिन. ओ बचपनमे बड डरपोक रहथिन, भूत-प्रेत सं डरय रथिन जेना कोनो आम बच्चाके लागैत छै. हुनका कतय एकटा महिला काजवाली रहय, ओ हुनका की कहलक. गांधीजीक जीवनमे, महिलाक ल’ क’ जे हुनकर अप्रोच रहय, हुनकर जिन्दगी अहि सं बड रास प्रभावित छल. गांधी जीक ल’ क’ ई देखय पडत. एकते हुनकर माँ, दोसर हुनकर पत्नी, पत्नीक संग जे हुनकर संबंध रहय, ओ बहुत ट्रांसफॉर्म भेलय, समयक संग. तेसर रामायण या रामनामासं जे हुनकर लिंक रहेन. महिला काजवाली रहय, जिनकासं हुनका बेसी प्रेम रहल. ओ कहलखिन जे अहाँके डर लागय ये ते अहाँ रामनामा का पाठ करू. ओहि सं हुनकर रामायणसं लिंक शुरू होयत छै. ओ मानैत छथिन जे तुलसीदास द्वारा रचित जे रामचरितमानस अछि, भक्ति के जे लिटरेचर छै. ओहि में सर्वोत्तम छै. एकटा खास ट्रेडिशन के प्रति, एक खास इंटरप्रेटेशन के प्रति, गांधीजीक आयडिया रहैथ. सीतजसं हमू सब पर्सनली लिंक छी. सीतक  कहानी हम सब नेनासं सुनैत छी, हुनकर अपील जे छै, त्याग जे छै, पवित्रता जे छै तकर बादो अइयो मिथिला मे सेक्स निर्धारण होयत छै, ई बंद हेबाक चाहि. तखने गांधी और सीताजीक ख्याल पारब सत होयत. डॉ. सविता खान, दिल्ली विश्वविद्यालय- विद्यापति आ जानकी हमर सबहक साइनेज छथिन कोनो स्त्रीक ख़ासके बड महिमामंडित होबय लागैत छै ते ऊ बड डराय बला चीज होयत छै. जखन अमरनाथ झा जी सीता नवमीक गप कहलखिन ते हमर रोमांस आओर रोमांच दुनू शुरू भेल. जे आय धरि हमसब रामनवमी या मैस्कुलीन (पुरुष) नवमीक गप सुनय रहिये. जे राम प्रतीक छथिन. एवरी टू डू विद मैस्कुलिनीटी (सब किछु पुरुषत्वक संग होयत अछि). तखन हम राष्ट्रीय राजधानीमे फेमिनिज्म (नारीवादी) के एकटा कार्यक्रमक ल’ क’ आओर ओकर नवमीक सेलिब्रेट क’ सकी, ई बिलकुल नव गप छल आ आओर बेसी उत्सुकता सेहो भेल. उत्सुकताक बाद दोसर कड़ी आबय छय, जखन अवलोकन करय लागय छी जे ओकर स्वरूप की हेतय. एकर सबसं महत्वपूर्ण गप ई जे एकर अर्थ की हेतय. जानकी नवमीक अर्थ की छै आ एकरा हम दूटा खंड में देखय लैक चाहैत छी. मिथिलाक सिंबलक तौर पर हरेक समुदायके, हरेक प्रान्तके, हरेक देश के, किछु-किछु प्रतीकक जरूरत होयत छै. ओय प्रतीकक जरूरत ते होयत छै, जे ओ प्रतीक के बल पर ओ समुदाय अपनाक एक गंतव्यक दिस कनि-कनि ल’ जायत छै, ताहिमे विद्यापति आ जानकी जी छै. साइनेज के तौर पर इस्तेमाल कएल जायत छैथ. जना अहाँ के जीएसडीएस (गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति) पहुचैक छल ते बहुत ठाम साइनेज छल जे कार्यक्रम ओतय भ’ रहल छै, तहिना विद्यापति या जानकी हमरा सबहक लेल साइनेज छथिन. ओ साइनेज जेकरामे हम सब बहुत गर्वक संग ई उदगार क’ सकैत छी जे विद्यापति हमर, जानकी हमर. ई ठीक अछि मुदा ओकर बाद की? कतेक लोक अहि सभागारमे बैसल या फेर शहर-दर-शहर विद्यापति पर्व मनाबैत छथिन, ओ विद्यापति के अर्थ कतेक बुझय छथिन-अहि विषय पर हमर खास दिलचस्पी अछि. ओहू पर हमरा दिलचस्पी ये जे जानकी नवमी जे सब गोटे एतय सेलिब्रेट क’ रहल छी, जुटल छी या सन्देश दैक कोशिश क’ रहल छी, एकटा खास समुदाय के या राष्ट्रीय राजधानी में क’ रहल छी ते एक जगह लिमिटेड नै रहतय, ई सन्देश सब जगह जतय. ओय सन्देशमे हम सब स्वयं कतेक विश्वास करैत छी? सैद्धांतिक महिमामंडित दिस हम नीकसं बढ़य लागैत छी, लेकिन जे ग्राउंड रियलिटी छै, वास्तिवकता छै, मिथिला, मैथिली, जानकी, सीता सबके, ओहिमे बहुत गैप छै. हमरा लगय ये जे जानकी नवमीके मनाबैक जे पहिल सफलता या ओकर सबसे पैग अर्थ होयत, ओ गैपके एड्रेस करयमे होयत. जतय सिद्धांतमे हम किछु आओर बाजैत छी सैद्धांतिकमे किछु आओर बाजैत छी. आवरण किछु आओर ओढेत छी, वास्तविकता हमर सबके किछु आओर अछि. बहरहाल, सबसं पैग कनेक्ट मिथिला क’ ल’ क’ दूटा जे साइनेजक ल’ क’ गप  केने रहि, पहिल विद्यापति आ दोसर जानकी. हमरा मोताबिक जों कोनो भी संस्कृति के आगू बढ़ाबे चाहैत छी ते एहन-एहन सूत्रके अहाँके खोजय पडत. सूत्र के खोजिके निकालय पडत, जे समाजक तमाम वर्णके, तमाम वर्गके एकसूत्रमे बान्हि सकय. अहि लेल मिथिला में ओ चिन्हे पडत, जे एहन कोन-कोन सूत्र अछि जे अहाँ के कम्युनलिटी दिस ल’ ज’ सकय. हमरा लेल दूटा सूत्र छै विद्यापति आ जानकी. जानकी ते नै, जे ओ महिमामंडित देवी छल, तं जे ओ मिथिलाक बेटी छैथ. बेटी जे होयत अछि तकरा हम बेटीयेटा नै कहैत छिये. राम राजा की पत्नी सीता नै होय छथिन, जनक के बेटी जानकी होयत छथिन. ओ बेटी जेकरा हरेक गाम में कह्य छथिन जे ओ गामक बेटी छथिन, मिथिला के बेटी छथिन, ते ओ हमरा प्रिय छैथ. ते हमरा लेल अद्भुत छ्ल, ते हमरा लेल स्मरणीय छैथ, ते हमरा लेल ओ वन्दनीय छैथ. क्याकि ओ बेटी छथिन. आब प्रश्न उठैत छै जे ओ बेटीसं अपना सबहक एक्सपेक्टेशन की अछि. बेटी के हमसब कतय-कतय ल’ जायत चाहैत छियै. मिथिलाक बेटी संगे कतय-कतय ट्रेवल करैत छियै. जे हमर आय धरि पर्सनल अनुभव रहल अछि, जे हम देखलहुं ये, बेटीक भेला पर मिथिला, जे जानकी के धरती छैन, बेटीक खुशी अनुभव, या चेहरा पर खुशी जे हमरा बेटी भेलय, आय धरि हम नै देखने छी. हमरा नै लगय ये जे वास्तविक तौर पर जानकीके वंदना मिथिला एखन धरि क’ सकलय ये. हमरा नै बुझि पड़य ये. खैर, तखन जानकी आ विद्यापति कोन एहन सूत्रमे सब वर्ग आ वर्णके बान्हैत छथिन, विद्यापति के बारे में किछु ख़ास चर्चा शुरू करब आ ओकरा जानकी के तरफ ल’ जायब. विद्यापति हमरा ख्याल सं प्रथम कवि छथिन, जे ‘देसिल बयना सबजन मिट्ठा’ से शुरू करय छथिन, जतय ऊ बोली के, भाषा के, निज भाषा के आओर निजता के गौरव दिस ध्यान दियाबैत छथिन. हरिश्चंद्रसं बहुत पहिने जखन ओ कहैत छथिन ओ आम लोकक तरफ, गाँवक तरफ, ग्वालिनक तरफ, पनिहारिनक तरफ, जे पुरुषार्थक परिभाषित करैक जे विद्यापति के परिभाषा छल, अहाँ ओहि पुरुषार्थ के रिलाइज करय छिये, जखन अहाँ ओहि प्रेम भक्ति भाव सं गुजरै छी. कोनो प्रेम भक्ति भावनासं गुजरयके जे पद्धति छल, ओ एलिट पद्धति नै छल, ओ बहुत ही बहुत सबअल्टरन, बहुत ही कॉमन, सबजक भाषामे, मैथिली भाषामे, जकरा पटगमनीमे, चैतीमे, परातमे, साँझमे आ हरेक स्त्री स्वावलंबी भ’ क’ गायब सकय, बुझि सकय, ओकरा व्यवहारमे उतरि सकय. क्याकि हम सब गोटे जानैत छी, याज्ञवलक्य जे मिथिलेमे भेला आ हुनका स्पष्ट कहल छैन आ हुनकर स्पष्ट लाइन छैन, ‘धर्मस्य निर्णयो ज्ञयो मिथिला व्यवहारतः’ एकर अर्थ अछि जे जों अहाँक धर्मक निर्णय बुझय के अछि ते अहाँ मिथिलाक व्यवहार के देखू. ओ मिथिलाक व्यवहारक वाहिनीक, मिथिलाक बेटी, मिथिलाक स्त्रीमे भेटत. मिथिलाक एक-एक स्त्री ओ व्यवहारक पालन करैत आ कायम करैत छै जे मिथिला के ओ हायर स्टेज धरि ल’ जायत छथिन, जे हमर सबके एकटा गंतव्य ये. हम सब ओ साइनेज लगा के जे छिये, फाइनली ओ अल्टीमेट रियलिटी तरफ रिलायिज करय चाहैत छी. तें विद्यापति पुरुषार्थ के ओय स्टेज तक ल’ गेलखिन, ओ स्तर तक ल’ गेलखिन, जतय बोली आ भाषा अछि. एक गप दिस ध्यान करायब चाहैत छी जे मैथिली कोनो भाषा नै छै, अहाँ जानकी के सेहो मैथिली कहैत छी. ते देवी जानकी आ भाषा इंटरक्वाइंड भ’ गेल छै, मिल गेल छै. तें ई आइडेंटीफाई करब मुश्किल छै जे हम मैथिलीक प्रैक्टिस क’ रहल छी, देवीक पूजा क’ रहल छी या अहाँ भाषाक प्रक्टिस क’ रहल छी. भाषा आ मैथिलीक एहन सुन्दर समन्वय जे छै ओ मिथिलामे देखय लेल भेटय ये. ताहिमे जानकी जे छै, ओ बहुत पैग माध्यमक तौर पर आबैत ये. दोसर गप जे गांधी, विद्यापति आ जानकीक बीच परस्पर कोन सूत्र भ’ सकैत छैन? ओ परस्पर सूत्र छैन जे आय धरि वेस्टर्न सोचक एकटा समस्या रहलय ये. ओ जखन स्त्रीक देखत त्याग करैत, स्त्रीक देखत बलिदान करैत, स्त्रीक देखत एक ख़ास ढांचामे जेना साड़ी पहिरने छै, मुडी झुकैने छै सदिक्खन, पुरुषक संग जेना सीताक फोटो या वंदना रामक बिना नै देखय छैयेन, ते एकटा लेबल लगा देत छै, जे नै-नै ई स्त्री सशक्तिकरण नै छै. ई ते बहुत कमजोर छै. ई ते अबला नारी छै. एकरा स्त्री सशक्तिकरणक जरुरत छै. गांधी ओहि सशक्तिकरण के पलटि देलखिन. स्त्री के या सीता के जे अबलाकरण भ’ रहल छै, ओकरा ओ सबला बना देलखिन. क्या की ओ त्याग के, बलिदान के, चाहे कोनो बेटी, स्त्री होथिन, ओकरा ओ कहलखिन जे सशक्त टा त्याग क’ सकैत छै. जे कमजोर रहते, अबला रहते, ओ त्याग कखनो नै करतय. तें गांधी के जे बहुत इम्पोर्टेंस छैन, जतय ओ व्यस्कक सोचक कमी छल, त्यागक, बलिदानक जे एकटा नीचां स्तर पर राखि रहल छल, गांधी ओकरा अकस्मात टर्न क’ देलखिन आ बतओल्खिन जे त्याग आ बलिदान की छै? मुदा हमर प्रश्न त्याग, बलिदान, जानकी सं आगू के अछि. मिथिला या दोसरे जगहक बेटी त्याग त’ क’ देलखिन मगर हुनका वापस की भेटल? हमरा नै लागय ये जे किछु भेटल. यू ट्यूब पर जखन अहाँ जानकी वंदनाके टाइप करबै, एक्को टा सिंगल, पोपुलर कल्चरमे जानकी वंदना कत्तो नै देखाह पडत. ई हमर एकटा अनुभव रहल. अतय जानकी वंदना एकटा लोग गाबि रहल छल आ जानकी वंदना सेहो होयत अछि, हमरा लेल ई एकटा खबर छल. पोपुलर कल्चर में जखन अहाँ जानकी वंदना के ट्रेस करय लेल चाहबै ते ओ अहाँ के कत्तो नै भेटत. राम वन्दना अहाके ढेर सारा भेटत. तेखन प्रश्न ई छै जे जानकके स्त्री सशक्तिकरणक रूपमे, उत्सवक रूपमे देखिके संगे बहुत सारा एट्रिब्युट्स के, वेल्युके लगाके आखिरकार हमरा सबके भेट की रहल अछि? हमरा सबके संग जानकी सबके भेंट की रहल अछि? हमरा ख्याल सं बहुत कम, बहुत ही आवरण के तौर पर. जतेक एक्टिविटी छै, जतेक एक तरहेसं टोकेनिज्म जेकरा कहैत छियै हमसब, टोकेनिज्म के तौर पर सारा कार्यक्रम, सारा हाव-भाव, बेसी सं बेसी टोकेनिज्म के तरफ ल’ जा रहल छै. वास्तविक परिवर्तन कतय भ’ रहल ये, कोना भ’ रहल ये, भ’ रहल ये या नै भ’ रहल ये, हमरा बुझने ई बात के सोचनाय, एक-एक आदमी के मानस में बैसेनाय बहुत जरूरी ये. नै ते जानकीक उत्सव मनेनैआय, जानकीक गप केनाय, हुनकर वंदना केनाय, हुनकर फोटो बनेनाय, हमरा लागय ये एकरासं किछु नै भ’ सकय ये. प्रो. अरविंद कुमार झा, डीन (शिक्षा निकाय), महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा - जानकी आ गांधी सं सीखय अप्पन समाज हम सब सौभाग्यशाली छी जे ओहि पवित्र भाषामे बजि रहल छी, जे कहियो जगतजननी जानकीक सेहो मात्रभाषा छल. रामायणमे एकरा मानुषी कहल गेल अछि. हनुमान जखन लंका पहुन्चाल्खिन, अशोक वाटिकामे ओ सीतासं संस्कृतमे नै बाजैत छैथ. क्या, क्याकि संस्कृत लंकोमे सब जानैत छल, तें सीताजीक विश्वास प्राप्त करय लेल, करबाक लेल अति बुद्धिमान हनुमान मानुषी अर्थात मैथिलीमे बाजय लागैत छैथ. क्या ते मैथिली लंकामे जानतय के? आ दोसर बात जे एतेक दिनक बाद ओहि प्रदेशमे अप्पन मातृभाषा सुनिके आह्लादित भेनाय स्वाभाविक छल. ई कहल जाय छै जे आत्मीयाकताक संबंध मातृभाषा बनबैक छै ओ दुनियाक कोनो भाषा नै बना सकैत छै. आब सवाल उठे छै जे एक तरफ जानकीजी, एक तरफ तरफ गांधीजी आ एक तरफ हमर आजुक समाज. ते हम कहब चाहब कतय मिथिलाक बेटी, मर्यादापुरुषोत्तम रामक जीवन संगिनी जनक दुलारी जानकी, आ कतय गुजरातक साबरमती नदीक तट सं सत्य, अहिंसाक बल पर जग-जीतनहार महात्मा गांधी आ कतय वैश्विकरण आ औद्योगिकीकरणक चौबटिया पर ठकमुडी लगौने ठाड़ अप्पन समाज. तीनों तीन दिशा जाय छय. तखन ओ कोन फार्मूला अछि जे तीनो के एक सूत्रमे बान्हैत अछि. संजोग से ओ महत्वपूर्ण फार्मूला हमरा बाल्मीकि रामायणमे जाके भेटल. दंडकारण्यमे जखन ऋषि-मुनि अप्पन दुर्दाशक वर्णन करैत कहैत अछि, जे हम सब तपस्या क’ के पुण्य कमाबैत छी, तकर छठम भाग राजाक जायत छै, तखन हमरा लोकके राक्षसक उत्पातसं बचायब अहाँक राजधर्म छी. ताहि पर उत्तेजित भ’ के राम प्रतिज्ञा करैत छैथ जे हम अहाँ लोकेन लेल शत्रु राक्षसक वध अवश्य करब. अहि पर जानकी के उक्ति महत्वपूर्ण अछि. ओ राम सं कहैत छथिन, ‘हम सब एतय बनवास करय लेल आयल छी, शस्त्र उठाबय नै, कतय तपोवृत आ कतय क्षत्रिय धर्म. दुनू में कोनो मेल नै. एतय देश धर्म के पालन करब सर्वथा उचित. अहाँ जखन वनवासक अवधि पूरा क’ के, अयोध्या लौटब तखन शस्त्र धारण करब किया ते शस्त्रक सेवन सं बुद्धि मलिन भ’ जायत छै.’ जानकीजीक ओ बात भगवान राम नै मनालखिन, मुदा तकर हजारों साल बाद महात्मा गांधी मायक ई वचनक अनुसरण केलेन आ बिना शस्त्र आ शास्त्रक प्रयोग केने सत्य अहिंसाक बल पर मातृभूमि के परतंत्रता सं मुक्ति दियेलेन. हमर सौभाग्य अछि जे हम जन्मना जानकीजी सें सम्बद्ध छी, आ कर्मना हम गांधीजीसं. अपने सब जानैत छी जे जाहि वर्धा विश्वविद्यालयमे हम रहैत छी, तकरा पासेमे सेवाग्राम आश्रम छै, जतयसं गांधीजी अहिंसक लड़ाई लड़ने छलाह. जानकीजी जन्म लेली सीतामढक पुनौरा गाम में, मुदा हुनकर लालन-पालन भेलैन जनकपुरमे, तें भारत आ नेपालक बीच उनका सं बढ़के कियो सांस्कृतिक सेतु आर की भ’ सकैत छै? ई हमर व्यक्तिगत धारणा सेहो ये, राष्ट्र आओर समाजक बीच जों कोनो संबंध होय छै ते ओ सांस्कृतिक संबंध होय छै. जानकीक एकटा लोकप्रिय नाम सीता सेहो छै. सीता नाम के की अर्थ होय छै. खेतमे हरक फारसं से क्यारी बनैत छै, ओकरा संस्कृतमे सीता कहल जायत छै. सीताक उत्पत्ति राजा जनक द्वारा हर जोतैत काल भेल छलैन. मान्यता अछि जे एकबेर बहुत बड़का अकाल पड़ गेल, वर्षा करबैक लेल राजा जनक स्वयं हरके मूठ पकड़लाह आ हर जोतय लागल. अहि क्रममे एकटा कुम्भ उखड़ल, जाहिसं जगतजननी प्रकट भेली, ओ महाशक्ति छलीह आ हुनका दृष्टिपातक बादे अवधक राजकुमार श्री राम शिव धनुष तोड़ी सकल छलाह. बादमे लंका जाके असुर संहार क’ सकल छलाह. आखिर राम-रावण युद्धक कारण ते भगवती सीते छलीह. संसारमे सीतासं सुन्दर नै कोनो स्त्री भेल, नै कोनो स्त्री हेताह. स्वामी तुलसीदास रामक एहन भक्त छलाह, जे हुनकर सुन्दरताक आगू करोड़ों कामदेव के फेल मानैत छलाह. ‘कोटिक काम लजावन हारी’. तुलसी जखन सीताजीक देखैत छैथ, ते अवाक रहि जायत छैथ आ कहैत छैथ, ‘सब उपमा कवि झुठारी’. मने सीताके कोनो उपमा भैये नै सकैत छै. ओ तुलसी बडबड छंदमे रामसं कहैत छथिन, ‘गर्व करहु रघुनन्दन जानी मन मानी, आपनी सूरत सिया के छांह’. हे रघुनन्दन राम, अहाँ आपन रूप पर घमंड नै करू, अहाँके रूप ते सीताके छाहियो बराबर नै अछि. रूपक ल’ क’ दू शब्द आओर कहेल चाहब. ई रूप जे सामने देखय छियै अहाँ, ई रूप सिर्फ चर्मक या हड्डीक मिश्रण नै होयत छै. हम मानैत छियै आ शेक्सपीयर सेहो कहने अछि अहाँ जे केकरो रूप देखय छियै, ओ अहि मस्तिष्कमे जे विचार, जे आचार, जे सोच होय छै, ओकरे रिफ्लेक्सन देखय छियै. तें तुलसी एकदम सही छैथ. तुलसी जानैत छलाह जे हुनकर उद्धार पुत्रवत्सला माता सीता क’ सकैत छैथ. विनय पत्रिकाक एकटा पदमे तुलसी माँ जानकी सं निहोरा करैत छैथ, ‘कबहुक अंब अवसर पाई, ध्यावी सुधि मेरी किछु करून कथा सुनाई’. की अर्थ भेल एकर? एकर अर्थ भेल, ‘हे माँ कहियो मौका देखके भगवान रामके हमरो सुधि दिये देबैन, सेहो पहिने किछु करून कथा सुना के.’ दुनिया के कोनो रामायमे लंकाकांडमे पूरा युद्धकालमे सीता अशोक वाटिकामे बैसल की क’ रहल छलीह, तकर वर्णन नै आयल अछि. मुदा की ई संभव छै जे आद्यशक्ति सीता मर्यादा पुरुषोत्तम राम के असगरे युद्ध करय देथिन. असली युद्ध ते महादुर्गा सीता अशोक वाटिकामे बैस के क’ रहल छलीह. राम ते माध्यम मात्र छलाह. हम रामके भगवान् नै, पुरुषोत्तम मानैत छी. बहुत सं लोक पुछैत छै जे अहाँ राम के भगवान् किया नै मानैत छियै, किया मर्यादा पुरुषोत्तम. रामक पिता दशरथ के सेहो तीन रानी, मुदा देखियो, सीता के तेज, जानकी माता के तेज, जे पहिल रातमे, पहिल वचन जे ओ अप्पन पत्नीके देत छैथ, ओ यहै कहैत छैथ जे आय के बाद अहीं हमर पत्नी रहब, कियो आओर नै. पहिल व्यक्ति पुरुष हेबाक बावजूद अपनाके मर्यादाके मर्यादित राखैत अछि ते ओ मर्यादा पुरुषोत्तम छैथ. आय मैथिल समाजक आवश्यकता अछि जे हम सब अपनके मर्यादित करि. आब बचल समाज. वस्तुतः आय हमरा लोकेन समाज कहैत छियै, तकरा किछु सदी पहिने ‘ज्यांपद जन’ कहल जायत छल. सम्राट अशोक अपन धर्मयात्राक उद्देश्य घोषित करैत छैथ आ कहैत छैथ, ‘ज्यांपद जन क’ दर्शन’. ज्यांपद जनके धर्मके नीति सिखायब, ज्यांपद जन के संग नीति विमर्श करब. समाजक अर्थ कहियो टोली छल. आय समाज ते अछि, भारतीय संस्कृति सं प्रभावित समस्त समाजमे सीता पवित्रतम नारीक प्रतीक छैथ, सर्वथा पूज्य, लोकमे हुनकर एहन प्रतिष्ठा जे रामसं पहिने हुनकर नाम लेल जायत छै. तहिना अगर भारत के पूरे विश्वमे जानल जायैत छै ते दू व्यक्तिक वजह सं. एक महात्मा बुद्ध आ दोसर महात्मा गांधी. विष्णु, ब्रह्मा आ महेशक द्वारा नै. महात्मा गांधी के जे प्रतिष्ठा लोकमानसमे छै ओ कोनो हुनका समकालीन नायकमे नै भेट सकैत छै. भारत नै सम्पूर्ण विश्वक समाज महात्मा गांधीक आध्यात्मिक नेतृत्वमे अप्पन भविष्य सुरक्षित पाबय अछि. जब लन्दनमे वकीलक रूपमे गांधी आ ई गांधी जखैन चंपारण पहुँचैत छैथ, ते कम्पलीट ट्रांस्फोर्मेशन, जेकरा अहाँ काया रूप कहि सकैत छियै. बहुत लोग अहिमे आओर भी विशेषण देने अछि, लेकिन हम कहैत छी जे ई रूपांतरण अछि. जों हम एकटा चीज गांधीसं सीखैय लेल चाही ते ई जे ‘हाउ टू ट्रांसफॉर्म योरसेल्फ’. मैथिल बहुत बढ़िया क’ रहल अछि अप्पन अप्पन फील्ड में. जे जतय छैथ सिरमौर पर छैथ. मुदा ‘बेटी बचाउ, बेटी पढाउ’, ई सिर्फ हरियाणाक लेल नै छै, देशक लेल नै, ई मिथिलाक लेल बेसी सटीक अछि. प्रोफ़ेसर मनीन्द्र नाथ ठाकुर, जेएनयू- बाट देखाबैक अछि मिथिलाक दर्शन हम तीन गप कहेल चाहैत छी. पहिल गप गांधी क’ ल’ क’ जे गांधी के आय कोना देखैक जरूरत अछि, दोसर गप मिथिलाक ल’ क’ आ मिथिलाक संस्कृतिक ल’ क’ आओर तेसर गप वैदेही क’ ल’ क’. गांधीक जे बात महत्वपूर्ण आजुक तारीखमे अछि से ई नै जे गांधी शांतिक पुजारी छल बल्कि ई जे गांधी शांतिपूर्वक युद्धक पुजारी छल. गांधी संघर्षक पुजारी छल आ हुनकर कहब छल जे संघर्ष शांतिपूर्वक करहि के जरूरत अछि. दोसर गप जे ओ आत्मालोचनाके महत्वपूर्ण मानैत छलाह. ओ लगातार समीक्षा करैत छल जे समाजके, अपना आपके. ई दू गप गांधीजी के सभटा नेतृत्वसं फराक करैत अछि. अहाँ सब ‘गांधी’ फिल्म देखने होयब. फिल्ममे गांधी दक्खिन अफ्रीकासं जखैन आबैत छथिन, ते बड रास नेता बैसल छैथ आ हुनकर बाट जोहि रहल अछि. जिन्ना साहेब बैसल छैथ, नेहरूजी बैसल छैथ आ गांधीजीक ल’ क’ गप क’ रहल छैथ जे कियो गांधी आयल अछि आ ओ आबय बला अछि. आ ओ आबि जाय ते हम सब गप शुरू करि. गांधी आबैत अछि आध धोतीमे आ पहिल काज ओ करैत अछि जे, जे वेटर ट्रे मे चाह दैक लेल आबैत अछि ओकरा सं ट्रे अप्पन हाथ के ल’ लय छथिन. संगे कहैत छथिन कि जा धरि अपना आ एकरा सबमे बराबरी नै होयत तक धरि हम अंगरेजी सबहक बराबरी नै क’ सकब. ई हमरा लागैत ये जे गांधीक ये सही स्वरूप अछि. सामाजिक परिवर्तनक लेल मुक्तिके जे बिगुल शांतिपूर्वक संघर्षक लेल ओ बजैने छथिन, यहि गांधीजीक असली रूप अछि. आओर अहि असली रूपक एकटा खास आयाम अछि जे हुनका मिथिलासं जोड़ैत अछि. ओ खास आयाम अछि जे हुनकर आत्मक ल’ क’ जे आयाम अछि. कोनो लोक राजनीति तौर पर कोना भ’ सकैत अछि जे ओ निराधार सेल्फलेस भ’ जाय. जे लोक राजनीति क’ रहल अछि, हुनका मालूम होयत जे अहाँ आन्दोलन क’ रहल छी ते ई नीक गप अछि, पढ़ा रहल छी ते नीक गप अछि मुदा जहिना अहाँ राजनीतिमे आयलहुं, अहांके सभटा बुराई लोकक आगू आबि जायत. एतेक बेसी कम्पीटीशन अछि, एतेक आब्सेसिव सेन्स अछि जे ई सदिक्खन देखैर अछि जे कत्तो हमर अपमान ते नै भ’ रहल अछि, कत्तो हमर सम्मानमे कमी ते नै भ’ रहल अछि. सभटा मौका पर देखय के कोशिश करैत छै जे पावरक सही बैलेंस बनि रहल अछि की नै. गांधीजी कोना अहिसं निकल? गांधी के ई बुझा गेल छल जे यात्रा जतेक बाहर अछि, ओतबे अन्दर सेहो अछि. एकर समझ जों पूरा दुनियाक फिलासफीमे कत्तो सं आबैत अछि ते ई मिथिलासं आबैत अछि. आ एतय सं हम अहाँके मिथिला ल’ जायब. जे नाम वैदेही पडल अछि तकर पाछू विदेहक पूरा खिस्सा अछि. अहाँ जानैत छी जे अष्टावक्र बड कम उम्रक बड पैग फिलासफर छल. हुनकर देह चारि ठामसं मुड़ल छल. ओ विकलांग छल. ओ जनक सं भेंट करय लेल जायत छल ते हुनका गेट पर रोकि देल गेल. ओकरा पाछां नम्हर खिस्सा अछि, जे हम नै कहब. ओ अष्टावक्र क्या भेल छलाह? जखैन ओ अप्पन माँक पेटमे छल तखन हुनकर माँ वेदक आलोचना करैत छल. तब हुनकर पिता बाजलखिन जे अहाँ के भीतर जे अहाँक बेटा अछि, ओ अहाँक संग गड़बड़ क’ रहल अछि. ते ओ हुनका शाप द’ देलखिन आ ओ अष्टावक्र भ’ गेलखिन. एकर मतलब ई जे ओहि कालमे वेदक आलोचना संभव छल. जखन ओ जनकक दरबारमे पहुँचलाह ते पहिने ते बहार सं भीतर नै आबय देलक. सब बाजय लागल जे ई नेना अछि, अन्दर कोना जायत. तखन ओ एकटा श्लोक पढलक ते लोक के लागल जे ई कोन लोक छियै? प्रवेश भेटल. अन्दर गेल ते दरबारी सब हुनकर शरीरके देखिके हँसैत लागल. ओ बाजलखिन जे हम ते सोचने छलहुं जे एतय विद्वान लोक बैसल अछि मुदा एतय ते चर्मकार लोक बैसल अछि आ देखि रहल अछि जे हमर चर्म उपयोगमे आबि सकैत छै या नै. फेर ते हंगामा मचि गेल. ओ ओत्ते क्या गेल छल, ओकरो एकटा खिस्सा अछि. ओ दरबारमे बाजलखिन जे हम ओहि लोकसं भेंट करय लेल आयल छी जे अपना आपके विदेह कहैत अछि. विदेहक मतलब होयत अछि जेकरा अप्पन देहक सुध नै हुए. ओ देखलखिन जे राजा जनक दू स्त्रीगनक अर्धनग्न देह पर हाथ राखने अछि, ते हुनका आओर तामस चढ़ल. मुदा ता धरि ओ देखलखिन जे नीचां आगि जलि रहल अछि आ पइर आगक उपर अछि. तकर बाद राजा जनक आ अष्टावक्रक बीच संवाद होयत अछि, जेकरा अष्टावक्र गीता कहल जायत अछि. अष्टावक्र गीताक ल’ क’ लोक कहैत छथिन जे माइंड आ बॉडी रिलेशनक ल’ क’ ई दुनियाक सबसं पावरफुल टेक्स्ट अछि. माइंड आओर बॉडी रिलेशनक प्रॉब्लम पश्चिमी देशमे भेल, जतय शरीर आ मनके अलग-अलग करल गेल आ कहल गेल जे शरीरक विज्ञान पूरा विकसित भ’ गेल अछि मुदा मन क’ ल’ क’ हुनका सबके किछु बुझयमे नै आयल. ताहि सं सविताजी कहि रहल रहथिन जे एहन फेमिनिज्म विकसित भेल जाहिमे महिलाके सिर्फ देहक रूपमे देखला जा रहा अछि. ई नै बुझल जा रहल अछि जे ओकर पूर्णता की अछि? अष्टावक्रमे ओ डिबेट बड पावरफुल तरीकासं आयल अछि. आ हम ई मानैत छी जे कोनो डिबेट ता धरि नै होयत अछि जा धरि समाजक अन्दर डिबेट नै होयत अछ्ही. निश्चित रूपसं मिथिलाक समाजमे अहि तरहक डिबेट चलि रहल होयत, एकर कतेक रास उदाहरण अछि. याज्ञवल्क्य जखन अप्पन पत्नी सं बाजल जे हम संन्यास पर जा रहल छी आ आब सभटा संपत्ति अहाँके अछि. अहाँ एतय आराम करू ते ओ की बाजल रहथिन. ओ कहलखिन छल जे अहाँ ई कोन गप क’ रहल छी. हम संपत्ति ल’ क’ की करब? की हमरा सन्यास लेबाक अधिकार नै अछि? की हमरा मुक्त हेबाक अधिकार नै अछि? पूरा तरहे माइंड आ बॉडी रिलेशन पर ई डिबेट चलैत अछि जे कोंसेसनेसक कोन लेवल पर मुक्त भ’ सकैत छी. चेतनक स्तर पर हम कोना मुक्त भ’ सकैत छी. गांधी हमर ख्यालसं चेतनाक लेवल पर मुक्त हयके गप करय छथिन, जेकरा बादमे कतेक मार्क्सवादी चिन्तक सेहो कहने अछि. ओ काउंट हेजेमोनीक गप करैत छथिन. ओ कहैत छथिन जे पहिने अहाँ अप्पन अन्दर सोचू जे अहाँ मुक्त भ’ गेल छी. जों अहाँ अपना अन्दर सोचि लेलहुं जे अहाँ मुक्त छी ते बाहरसं अहाँके कियो गुलाम नै बना सकैत अछि. आ ई सोचय बला गप अछि जे ई अप्पन चेतनाक अन्दर पहुंच सकैत अछि की नै? की हम सामाजिक तौर पर गुलाम भेलाहक बादो मानसिक तौर पर मुक्त भ’ जाय. हमरा लागैत अछि जे ई मिथिलाक संस्कृतिक एकटा पार्ट रहल होयत. हम किछु आओर शोध क’ रहल छी आया ओकर बाद हम ठीकसं अहाँ के कहि सकब जे आब ओ चेतना ओतय अछि या नै. मुदा निश्चित रूपसं ई संस्कृतिक पार्ट रहल होयत. अहि तरहक संस्कृतिमे स्त्री विमर्शक गप भ’ सकैत अछि. हमरा लागैत अछि जे गांधी ओहिसं प्रभावित छल. निश्चित रूप सं कहब कठिन अछि मुदा गांधीक जों हम देखी, जे गप राजेशजी सेहो कहने अछि जे गांधी के अहि गपक क्रेडिट देबाक जरूरी अछि जे ओ बड पैमाना पर स्त्री के घरसं निकलि के राजनीतिक बना देने छल. ओहि काल हुनका सभके राजनीतिक बना देलक जखन भारतीय समाज अलग-अलग प्रथासं मुक्त भेल छल. ओहि काल ओ बड पैमाना पर महिला सभके घरसं बाहर निकललक आ ई डिबेट ओहि काल जरूर चलैत होयत जे हुनकर चरित्र की अछि. महिला पहिल बेर घरसं बाहर निकलि रहल छल ते हुनका दोसर पुरुख सं संपर्क होयत ते संबंध केहन बनि रहल अछि. गांधी अहि सब चीजसं वाकिफ होयत ताहि सं गांधी ओहि मूल्य दिस ध्यान द’ रहल होयत, जाहि मूल्यक ल’ क’ रेडिकल फेमिनिस्ट कहैत अछि जे ई गांधी कंजर्वेटिव छथिन आ एंटी-वुमेन छथिन. हमरा ख्यालसं गांधी मिथिला संस्कृतिसं एकटा अल्टरनेटिव फेमिनिज्म ल’ क’ आबै छथिन. जे क्रांतिकारी अछि, मुदा श्रेष्ट अछि. जे तर्कपूर्ण अछि, जे चीजके आसानीसं नै मानैत अछि, मुदा संबंधके सम्मान करैत अछि. ओ फेमिनिज्मके बुझैत अछि जे ओहि में शायद पावर रिलेशनशिप अछि, शायद हमरा इन्फेरियर बुझल जा रहल अछि तकर बादो हम अहि संबंधके माथ पर राखैत छी. मिथिलामे फिलोसिफिकल ट्रेडिशनक पार्ट रहल होयत. गांधी ओकरासं बड रास चीज सीखैत छल. गांधीक सीखैक टेक्सचुअल प्रमाण खोजब ते पोलिटिकल साइंसटिस्टक तरहे ई भेटब बड कठिन होयत. गांधीजी कुरआन सं बड किछु लेने अछि मुदा ई भेटब बड मुश्किल अछि. जों अहाँ गांधी आ कुरआनके पढब ते लागत जे गांधी ते कुरआनक नीक अध्येता अछि. बाइबिलसं सेहो ओ बड किछु लेने अछि. ओना गांधी जे ज्ञान यात्रा भारतमे केने अछि, हमरा सभके समाजके बुझैक लेल ई ज्ञान यात्रा करबाक चाहि. गांधी जे ज्ञान यात्रा केने छल, जाहि संस्कृतिके पकडैक कोशिश केने छल, हमरा लागैत अछि जे ओहिमे मिथिलाक अहि तथ्यके ओ राखने छल. जे वैदेहीक संस्कृति छल, जेना पंकज मिश्रजी कहलक जे ओना देखयमे लागैत अछि जे ई केहन महिला अछि, जे सबटा गप मानि लैत अछि, चलि गेल वनवास, घुरिके आयल, ओकरा निकालि देल गेल, बाहर चलि गेल, धरतीमे समा गेल. ई जे ‘हाईट ऑफ़ सबमिशन’ अछि, ‘हाईट ऑफ़ पेट्ररिकल ओपरेशन’ अछि, हमरा लागैत अछि जे एकर बादो कोनो बेर वैदेही तर्कके नै छोड़लक आया क्षमा के ते आओर नै छोड़लक. रामके सदिक्खन क्षमा करैत रहल. संबंधक मर्यादाके बुझैत रहल मुदा बताबैत रहल जे अहिमे किछु नै किछु गड़बड़ चलि रहल अछि. ई हमरा लागैत अछि जे गांधीक शांतिपूर्ण परिवर्तनक लेल ई जरूरी आयाम छल. ई सरेंडर नै छल. जखन गांधी अहाँकक गपके मानैत छथिन, बहस करैत छथिन, अहाँसं बहसक लेल तैयार छथिन, ते ई सरेंडर नै अछि. ई आमंत्रण अछि डायलागक लेल. आओर जाहि डायलोग क’ ल’ क’ ओ परिवर्तनक गप करैत छथिन, ओ सत्याग्रह. आग्रह अछि. दुराग्रह नै अछि सत्याग्रह. जे सत्याग्रहक पूरा गप अछि ओ वैदेहीक संस्कृतिक पार्ट रहल अछि. एकरा गंभीरतासं बुझैक गप अछि आ बौद्धिक जगतके अहिमे जायके जरुरत अछि जे कोना हम अहि दिस जाय. एकटा आखिरी गप कहै लेल चाहब, जे प्रयोग गांधीजी केलखिन, ओ सेवाक प्रयोग छल. महिलाके आन्दोलनमे ठाड़ केलखिन. जे महिला घरसं बाहर निकलि के आयल, बड परेशान रहैत होयत. कतेक महिलाके पति छोडि देने होयत. कतेक महिलाक पति आंदोलनक काल मारल गेल होयत. तखन गांधीक आगू एकता सवाल छल जे की करब? ताहि सं गांधी एकटा संगठन बनैलखिन. सेल्फ इम्प्लायड बनैलखिन आ ओ संघठन आय धरि सबसें सफल संगठन अछि, एकटा मॉडल अछि इंडस्ट्रीक. ई अहि वैदेही संस्कृतिक पार्ट अछि, जाहि वैदेही संस्कृतिमे लोकगीत, पेंटिंग, आर्ट एंड क्राफ्ट ओकर हिस्सा अछि, जेकर कोनो ट्रेनिग नै अछि, स्कूल नै अछि, कॉलेज नै अछि, मुदा ओकर एकटा हिस्सा अछि, जीवन अछि आ अहि जीवनक हिस्सा ओतय सं बाहर निकलि के आबैत अछि. ओकर प्रतिभा बाहर निकलिके आबैत अछि. हमरा लागैत अछि जे ताहिसं वैदेही संस्कृति क’ ल’ क’ गप महत्वपूर्ण अछि जे हम मिथिलाक संस्कृतिक गप करि. संस्कृतिक ल’ क’ अहाँ जखन ऊंच गप करैत छी ते ओ ई अहि बातक परिचायक अछि जे अहाँ कत्तो नै कत्तो डिप्रेस्ड छी. अहाँ अप्पन संस्कृति क’ ल’ क’ कत्तो नै कत्तो डिप्रेस्ड छी. अहाँ तखने ओकरा ल’ क’ ऊँच गप करब जखन अहाँके लागत जे ओकरा सही मान्यता नै भेटल अछि. ई सत अछि. आजुक तारीखमे मिथिलामे सेक्स अनुपात कम भ’ गेल अछि. कनि दिन पहिने एकटा महिला ओतुका पंचायतसा आयल छल आया बतोलक जे भ्रूण हत्या ओतय हर दिन भ’ रहल अछि. तें ओतय परिवर्तनक आगाज करैक लेल अपना सबके संस्कृतिक रक्षा करबी जरूरी अछि. जों हम अप्पन गुणगान टामे लागल रहब ते शायद परिवर्तन नै भ’ सकैत अछि. ओतय भारी आन्दोलन जरूरत अछि. हमर एकटा फिलोसफी (दर्शन) छल. हम फिलोसफीमे सबसं पैग सेंटर हैत छलहुं. ओतय सं एत्ते अबी गेलहुं ते दर्शन सेहो ख़त्म भ गेल. रिचुवल्स बचि गेल अछि. हम रिचुवल्समे फंसके रहि गेल छी. हमर एकटा मित्रक स्त्री मिथिलाक अछि. ओ सामा-चकेवा पर काज क’ रहल अछि. ओ कहैत छथिन जे मिथिलामे सबसं पैग परेशानी ई अछि जे हम सब जे कमाबैत छी, ओकर सबसं बेसी भाग रिचुवल्स पर ख़त्म भ’ जाइत अछि. हम सब पाय बचा नै सकैत छी. माता-पिताक मरलाह के बाद कतेक बरख धरि हमलोग हुनकर रिचुवलमे लागल रहैत छी. सभटा कमाय ओहिमे जा रहल अछि. ओतय पूंजीक ल’ क’ कोनो काज नै भ’ रहल अछि. ई कोना बदलत? अहि दिस सोचबाक चाहि. ‘वैदेही’ सामाजिक परिवर्तनक दिस जाए तखन ई गांधीक बाट होयत. शेफालिका वर्मा- हमहीं बेटी, हमहीं शक्ति, हमहीं अहाँमे अन्तर्निहित छी आय जानकी नवमी छी. आजुका दिन बहुत पवित्र आ पावन अछि जे आय सीताक जन्म भेल अछि. हमरा जहियासं स्मृतिमे आयल अछि, रामनवमी सुनैत आयल छी, जानकी नवमी नै सुनलाहूँ. मुश्किसं हमर ज्ञानमे आठ-दस बरससं जानकी नवमी सुनि रहल छी. एक-दू ठाम हम गेलहु मुदा आयोजन जानकी सब करैत छलाह. आय पहिलुक बेर दिल्लीमे, देशक ह्रदयमे वैदेही नै राम सब एकर आयोजन क’ रहल अछि. ताहि सं एकटा हिलकोर मैच गेल अछि, सीता नवमी, जानकी नवमी. हार्दिक आभार. बेटी के बचाउ नै, बेटीक जन्म छी हमर. एकर उत्सव मना रहल छी. एकरा बचाउ क्या, हमहीं बेटी, हमहीं शक्ति, हमहीं अहाँमे अन्तर्निहित छी. आय जों जानकी नै रहतियेथ, ते कहियो राम नै बनताह. रामक जतेक रूप आयल, ओहिके भीतर सीताक त्याग, समर्पण, संग-संग हुनकर जतेक तागत, शक्ति रहैत, ओ राममे तिरोहित भेल, तखन राम आय मर्यादा पुरुषोत्तम बनलाह. कखनो काल हमरा मन होयत अछि, काश अहि लेखनी तुलसीदासक बदले कोनो नारीक हाथम रहतीये. रत्नावलीक हाथमे रहतीये, तखन जे मानस लिखल जैतीये, ताहिमे मर्यादा पुरुषोत्तम रामक बदलामे सीताशिरोमणी नारीक नाम हेतिये. ओहिमे उर्मिलाक वाक्य वेद वाक्य जेना हेतिये. ऐना किछु नै भेल. क्याकि कलम ते अपने सबके हाथमे छल. हम सभ ते तिरोहित भेल रहैत छी. सरस्वती जेना अपने सभहक भीतरमे, अपने सब्बके सभ किछु नीक करबाक प्रेरणा बनल रहैत छी. तुलसी रामचरितमानस लिखके वास्तवमे कागजक पन्ना-पन्नाके तुलसी, तुलसीदल बना गेल. तुलसी रामचरितमानस लिखके समस्त मध्य युगके भारतके अप्पन दास बना लेलखिन. क्याकि हमर सबहक जीवमे जे परंपरा अछि, जे मूल्य अछि, जे जीवनमूल्य अछि, ओ सभ किछु हमरा सबहक तुलसीदाससं भेटल अछि. जीवन जीवाक जे नियम अछि, इखनो, जा आईयो ओतबे सजीव अछि जे मध्यकाल में छल. अहि द्वारे तुलसीक लिखल अहि मानसमे बैसल अछि. मुदा एकर मतलब ई नै जे आब तुलसी लिख गेलाह, ‘कत विधि श्रीजी नारी जग माही, पराधीन कखनो सुख नाहि’. नै मानब. क्या नारी क्या पराधीन? अहाँ नौकरी करय छी, ते अहों ते पराधीन छी. जय दिन रिटायर करय छी, कहैत छी जे मुक्त भ’ गेलहुं. ते नारी कोना पराधीन. पिताक अधीन नारी नै रहय छै, बेटा-बेटी दुनू पराधीन रहय छै बच्चा में. पतिक अधीनमे पत्नी नै रहय छै, पति-पत्नी एक दोसराक प्रेमक अधीन रहिके परिवार, समाज आ देश के बचा बै छथिन. पुत्रक अधीन ते सवाल नै उठे छैथ. पुत्रक अधीन माता क्या, पिता क्या नै? जे नारी, जे माँ, जे पिता, भरि जिनगी संतान के बनेबाक लेल अपना आपके गला दय छथिन, ओ जों अप्पन पुत्रक पास कनिक चैनक छहारमे सुतैक चाहैत छैन ते कोना भ’ गेलखिन ओ पुत्रक अधीन.  नारी सीताक जन्म भेल छै, धरती सं, खेत सं. हरेक स्त्री के आगू बढ़ाबयके वास्ते खेत गम घर जाय पडत. ओते जे नारीक स्थिति अछि, ओतुका सशक्तिकरणक वास्ते, हमरा सभके ओहि सीता लग. नारी पुरुषोत्तम राम, एकटा पत्नीक हैसियत ते दूर प्रजाके नै कहि सकलाह. ई रामक विफलता छी. पाग बचाउ मतलब इज्जत बचाउ. स्त्री अहाँक इज्जत छी, चाहे जे रूपमें ओ हुए. नारीक सुरखा नै स्वरक्षा हुए. ओ निर्णय ल’ सकय, आर्थिक तौर पर सुदृढ़ हुए, यहि कामना अछि. श्री वेदव्यास कुंडू, निदेशक, गांधी स्मृति और दर्शन समिति, नई दिल्ली- चंपारणमे होयत बड रास कार्यक्रम एतय आयल लोक गांधी, सीता आ स्त्री सशक्तिकरण पर नीक फ्रेमवर्क देलक. एतय हम फोकस करैत छी गांधी स्मृति और दर्शन समिति दिस. ई जे ‘बेटी बचाउ-बेटी पढाउ’ नारा आ स्त्री सशक्तिकरण अछि, एकरा ल’ क’ समिति समूचा देशमे की काज क’ रहल अछि. अहिमे हम एकरो सं आगू आओर काज क’ सकैत छी. समूचा देशमे कारगिलसं ल’ क’ अगरतला धरि अहि सभ विषयमे गांधी स्मृति और दर्शन समिति कतेक रास प्रोग्राम करैत अछि. एखन पिछला मार्चमे बड पैग प्रोग्राम कारगिलमे केने छलहुं जतय 160 युवामे 90 प्रतिशत लडकी सब छल. ओतय अलग-अलग समुदायमे अलग-अलग चुनौती अछि, ओकरा फोकस केने छलहुं. लडकी सबहक भागीदारी, निर्णय लयक क्षमता आदि पर बेसी ध्यान देलहुं जे गांधीजीक सेहो फोकस छल. शांति आ अहिंसामे महिला सबहक अहम भूमिका अछि, ताहि सं ओकरा फोकस करैत वर्कशॉप करैत छी. अगरतलामे हम बड नीक प्रोग्राम केने छलहुं. ओतय गामक अन्दर, ट्राइबल एरियामे, सभ ठाम काज केलहुं. दक्खिन आ उत्तरमे सेहो काज करैत छी. अहि बरख चंपारण सत्याग्रहक 100 बरख शुरू भेल अछि. अहिक लेल हम व्यापक रूपसं पूरा काजक फ्रेमवर्क बनैने छी. अहिमे हम चंपारणमे की करब, ओकरा बेसी फोकस केने छी, अहिमे ‘बेटी बचाउ, बेटी पढाउ’ आ स्त्री सशक्तिकरण क’ ल’ क’ ध्यान देब. अहिमे दोसर फोकस हम इंटरप्रेन्योर युवती सबके केने छी. किछु दिन पहिने हम सब गुवाहाटीमे एकटा कानक्लेव ‘यंग एन्त्रोपोनस कानक्लेव’ केने छलहुं. ओकरामे जे युवती छल, छोट-छोट काज करैत छल, हुनका सभके हकार देने रहि. अहि बरख वर्तमान वित्तीय वर्षमे केंद्र सरकारक ई फ्लैगशिप प्रोग्राम दिस गांधी स्मृतिक फोकस अछि. ओकरा हमसभके आगू बढेबाक अछि. अहिक लेल अलग-अलग ठाममे, प्रान्तमे वुमेन इम्पावरमेंट कोना हुए, महिला आ युवाक भागीदारी कोना बढ़य, शांति आ अहिंसा समाजमे कोना बढ़य, ओकरा लेल वर्कशॉप आ ट्रेनिंग सेहो देत छी. श्री आर.के. सिंह, लोकसभा सदस्य- मिथिलामे कोनो भेदभाव नै छल पहिने ते हम अमरनाथजी कें धन्यवाद दिअ चाहब जे ओ अपना सबके अप्पन जड़सं भेंट करैलखिन. हम सहरसाके रहय बला छी, हमर नानी गाम मधुबनीमे अछि, हमर सासुर भोजपुरमे अछि. कियो लोक जखन अप्पन जड़सं फराक भ’ जायत अछि ते ओ सूइखि जाइत अछि. कियो समाजसं कटि जाइत अछि ते ओ सूख जाइत अछि. ओ समाजमे चलि नै सकैत अछि, ओकरामे ओ आत्मविश्वास, आत्मबल नै रहि जाइत अछि. ई अपना सबहक संस्कृति अछि जे अपना सबके आत्मविश्वास दैक अछि, आत्मबल दैक अछि. हम सब आपन प्रान्तके छोडि के आयल छी. हम एतय प्रवासी छी. हम सब आपन प्रांत के छोडिके अहि द्वारे अहिलहूं, क्याकि शनै-शनै ओतय शिक्षा व्यवस्था धराशायी भ’ गेल. स्कूली शिक्षा धराशायी भ’ गेल. आब ते विश्वविद्यालय धरि शिक्षा धराशायी भ’ गेल. अप्पन नेना सबके कतय पढ़ाबी, ई अहम प्रश्न अछि. एकटा हमर जेनरेशन छल जे एतय आयल. हमर पिताजी हमरा कॉलेजमे पढैक लेल एतय भेजने छल. हम लोक जाहि काल एतय आयलहूं, ओहि काल साइंस कॉलेज नीक छल, पटना कॉलेज सेहो नीक छ्हल मुदा कनि गिरावट आयब शुरू भ’ चुकल छ्ल. तइयो नीक छल. आब नै अछि. ताहि सं अपना दिस सं बेसी सं बेसी लोक इम्हर आबि रहल अछि. सम्पूर्ण पूर्वांचलसं लोक इम्हर आबि रहल अछि, बिहारसं ते आबिये रहल अछि. जों अहाँ पढ़-लिख ली ते ओतय नौकरी सेहो नै अछि, ते एत्ते आयब आवश्यक अछि. जों हा एतय आबी आ अप्पन संस्कृतिसं दूर भ’ जाय ते अप्पन सबहक बाल-बच्चा एकटा जड़विहीन अस्तित्वमे चलि जायत, जेकरा संस्कृतिक बंधन नै अछि, ओ दोसर संस्कृतिक दिस चलि जायत अछि. ई दोसर जे संस्कृति अछि, मिलल-जुलल संस्कृति अछि, ओकर स्तर बड नीचा अछि आ अपना सबके अप्पन संस्कृति पर गर्व अछि. ताहि सं अहि तरहक बीच-बीचमे एहन कार्यक्रम हैत रहय जाहिसं हमसभ बीच-बीचमे भेंट क’ सकी आ अप्पन संस्कृतिक एतय जिन्दा राखि सकी. आजुक विषय बड महत्वूर्ण अछि आ अपना सबसं संबंधित अछि. हम सब ओतुका रहय बला छी जतुका सीताजी छलीह. अपना सबहक एतय पहिने कोनो भेद नै छल, नारीक लेल बड इज्जत छल. ताहिसं हम सब दुर्गाजीक पूजा करैत छी. अपना एतय मनमे कोनो भेदभाव नै छ्हल. अपना कतय, अप्पन समाजमे जतेक महिला नेतृत्व भेल, ओतय कोनो आओर देशमे, कोनो समाजमे नै भेल. ऐना अहि द्वारे, अपना सबहक़ पूर्वज अप्पन संस्कृतिमे सबके बराबरीक दर्जा देने छल. हमसब ‘सीताराम’ कहैत छी, ‘रामसीता’ नै. पहिने सीता, तकर बाद राम. बादमे जखन दोसर-दोसर संस्कृति आयल, ओकरा सुसंस्कृत ते नै कहि सकैत छी, अपना कतय इन्वेडर्स (आक्रमणकारी) आयल, तखन पर्दा प्रथा शुरू भेल. ओकर बाद जे अप्पन समाजक महिलाक स्थिति भ’ गेल, ओकरा सुधारब आवश्यक भ’ गेल अछि. ई अहि द्वारे क्याकि 50 प्रतिशतक बल पर कोनो समाज प्रगति नै क’ सकैत अछि. एकटा पुरुष प्रधान समाजक प्रासंगिकता तखैन छल जखैन लड़ाई तीर-तलवारसं लड़ाल जायत छल. लोक खायक लेल शिकारक लेल जायत छल. आब नॉलेज सोसाइटी भ’ गेल अछि. आब कंप्यूटरसं लड़ाई लड़ल जा रहल अछि. आब नौकरीकक लेल नॉलेजक आवश्यकता अछि, बाहुबलक नै. ताहिसं हम चाहि या नै चाहि, समानता ते अइबे करत आ आबइये पडत. जों प्रगति आनैक अछि ते समानता आनय पडत. जों अपना सभ लगातार अहि दिस काज करि ते अपना सभ तेजीसं तरक्की करब. ई अपना सबके मानय पडत. दोसर गप ई सेहो अछि जे कोनो समाजमे जों समानता नै हुए ते ओ समाज बेसी प्रगति नै क’ सकैत अछि. समानताक मतलब अछि विचार राखयके स्वतंत्रता, अप्पन गप कहैक स्वतंत्रता, अप्पन डिग्निटी मेंटेन करैक स्वतंत्रता. ई नै भ’ सकैत अछि ते बुझू ओ समाज बीमार अछि. जाहि समाजमे आध जनताके अप्पन अभिव्यक्तिके खुलिके कहैक अधिकार नै हुए, ओ समाज बीमार अछि. अपना सब्बके अहि बीमारीसं निकलबाक अछि. अहि दिश बहुत दिनसं काज सेहो चलि रहल अछि. हम सब दहेज़ उन्मूलन क’ ल’ क’ कानून आनलहूं. हम सब ई कानून आनलहूँ जे लड़का आ लडकीक समान अधिकार संपत्ति पर भेटत. ओकरा हमसब एखैन धरि वास्तविकतामे ट्रांसलेट नै क’सकलहूँ. हम सब अप्पन परिवारेमे देख लिअ, अप्पन्न समाजमे देखि लिअ. एकटा ट्रांसलेट करहिके जरुरत अछि तकरा बादे सहीमे क्वालिटी आयत. अपना सबके ई मेंटिलिटी छोड़बाक होयत जे हम सबहक देखभाल बेटे टा क’ सकैत अछि. बेटी माय-बापक नीक देखभाल करैत अछि. बेटीके अप्पन माय-बापक बेसी चिंता अछि. ई बुझे पडत अपना सबके. समाजके बुझय पडत. एखन अहिमे अपना सबके आओर सुधार आनय पडत आ आनय के आवश्यकता अछि. मुदा लोक के ठाम-ठाम ई बुझाबय पडत. ओकरासं पहिने एकरा ल’ क’ अपना के अंगीकृत करय पडत. हम सब बाजि दैत छी, भाषण द’ दैत छी मुदा व्यवहार करैक होयत अछि ते अप्पन निजी जिनगीमे ऐना नै करैत छी. ऐना करय पडत. अपना आपमे अपनाक प्रति ईमानदार हुए पडत. अप्पन विचारक प्रति ईमानदारी आनय पडत. केकरोमे ईमानदारी नै अछि. पहिने अप्पन विचारमे ईमानदारी आनि लिए ते समाजक ओहिना कतेक रास कुरीति कनि-कनि दूर भ’ जा लागत. अप्पन सबके जे प्रकृति अछि, संस्कृति अछि, ई सब करब दोसराक बनिस्पत अपना सबहक लेल बेसी आसान अछि. एकरा अंगीकृत करब बेसी आसान अछि. श्री प्रभात झा,  वरिष्ठ नेता, भाजपा- मिथिलामे सम्मान दैक परंपरा अछि जीवनमे संवाद आ प्रवास दुनू हेबाक चाही. लोकके सम्मान देबय चाही. हम भाषण दी या नै दी, हम बाजी या नै बाजी, सबके सम्मान देब मैथिलक संस्कार छियै. ‘अतिथि देवो भव’. पाहूनक जतेक सत्कार मिथिलामे होयत अछि, ओत्ते कोनो देशमे, कोनो राज्यमे, कोनो जाइमे नै होयत छै. पाहून माने भगवान. पइर धोयल जायत छै. एहन नै होयत छै, जखन जाय छै तखनो विदाईयो सेहो देल जाय छै. ई हम सबहके परंपरा छै. जेकरा जीवनमे दोसरके सम्मान देबक स्थान नै बनय छै, समाज ओकरा नै मान्यता नै दैत छै, समाजमे स्वीकृति ओकरे भेटय  छे, जे अपना इगोके शांत राखय छै. गांधीजी क्या बढ़लखिन, हुनका इगो नै रहय. जे आदमी जवाहरलाल नेहरूके झेल लेलखिन, सबसें पैग आदमीक बेटा, ओहि कालक सबसें पैग वकीलक बेटा. जेकर  कपड़ा पेरिससं धुलाके आबय छल, ओहि पर कियो नियंत्रण केलक ते ओ गांधीजी छलाह आ हुनकर नैतिक नियंत्रण जवाहरलाल पर छल. आओर समाजमे अहाँ नैतिकवान छी, अहाँके नियंत्रण सदैव रहैत. इन्क्रोच्मेंट नै होयत छै राजनीतिमे आ समाजमे. दिक्कत ई भ’ गेल छै जे गांधीजीके मानय सब छियै मुदा जीवमे उतारयके कोशिश नै करैत छी. गांधीजीक शतांश जों अहाँ किछु जीवनमे ल’ लहूं, सबसं नीक. हम सीतामढीसं आबय छी. एकटा लड़ाई हम एखन धरि लड़ रहल छी. जों अयोध्यामे रामक पैग मंदिर, ते पुनौरामे जानकी माँक किया नै? आओर अहिके लेल भारतक जतेक जनप्रतिनिधि भेला अछि हम हुनका चिठ्ठी लिखने छी. एखनो बहुत लोकके बुझल नै अछि जे जनकपुरमे हुनकर ब्याह भेलैन, लाल-पालन भेलैन, मुदा जन्म ते पुनौरामे भेलैन, जे भारतमे अछि. आओर अयोध्यामे ते डिस्प्यूट छियै, जमीन पर, जन्म स्थान पर, मुदा सीताजीक पुनौरामे कोनो डिस्प्यूट नै छै. ताहिसं सबके कोशिश करैक चाही, अगर माँके बेटाके संस्कार देबाक अछि ते संस्कारके सबसे बड़का धनी कियो छै ते ओ सीता छैथ. तें पुनौरा धाममे सीताजीक नाम पर भारतक संस्कार राजधानी बनाओल जाय. अइयो हम जाय छियै हर साल ओतय, ते देखय छियै जे बच्चा सबके कोरामें ल’ जाय छै माय, आ माय ओतय कनि टा माटी अप्पन बच्चाक माथमे लगा दैत छै. ई ओय पावन धराके छियै आ विश्वके कियो महिला धारासं नै आयलै. अग्नि, रक्त सं दूर कियो महिला रहलय ते ओकर नाम छियै माँ जानकी. कतय समा गेलखिन धरतीमे, इहो केकरो नै बुझल अछि. अहि लेल आन्दोलनमे संग दियो. सीताजी पर बजय छी, गांधीजी पर बजय छी मुदा जों किछु अंश अपनामे नै आनि सकलहूं, ते कष्ट भ’ जायत. आओर अहि लेल धरा जननी के संतति छियै, ओकर वंशज छियै. एकरा सबके लेल अपना सबके प्रार्थना करबाक चाहि. भगवान सब किछु दिये, गरूर नै दिए, घमंड नै दिए. अप्पन समाज आ संस्कृतिके जे जीवन दर्शन अछि आ ओकरा जीबाक राखयके छै ते गाम जरुर जाऊ. ओतय पढ़यके सुविधा नै छै, नौकरीके सेहो सुविधा नै छै मुदा जाऊ. हम सब सीताजीके संतति छी, गांधजी के विचार मानय छियै ते गाम जरूर जाऊ. समाज चलय छै समाजक जीवन-दर्शन सें आओर अहि लेल सभ दल सं उपर उठिके मा जानकी के दलमे आऊ क्याकि माँ जानकीक दल ते एक्के टा अछि. जीवन में सतत सक्रियता, पुरुषार्थके जगेनाय, प्रीतीसं जोड़नाय, ई अपना जीवनके संबंध हेबाक चाहि. नीक बाजय में की लागय छै? आय अहाँ केकरो कना नै सकय छियै ते हंसाऊ. नाभि सं हँसब दूर भ’ गेल. हमरा कतय एकटा ‘खां’ छैथ, एडीजी अनुराधा शंकर खां, रामचंद्र खांक बेटी. हमरा सबके बड मानैत छैथ. कत्तो जाय छथिन ओ मैथिली में बजैत छथिन. एडीजी बहुत स्मार्ट, जेकरा लोग तगड़ा कहैत छैथ. विदिशा के एसपी. शिवराजजी (मध्यप्रदेशक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान) के जिन्दगी बांचल छैन, राखी बान्हे छै. एक बेर एक्सीडेंट भेलय ते ओ अपना कोरामे शिवराजजी के उठाके इलाज करयलखिन.ई छियै सीताजीके दायित्व, मिथिलाके दायित्व. आओर अहि लेल हम कहैत छी, हम काहियो अहाँ सब लेल ठार होयत छी ते हम सब अप्पन जीवनके सफल करैत छी, अहाँ के जीवन के सफल नै बनबैत छी. आओर मनुष्य जीवनके सफल बनाबयक मुख्य कारण छियै जे हमसब धर्मराजक उपासक छी, भगवतीक उपासक छी. उच्चैठ में कालीदासके ज्ञान भ’ गेलय, जन्म उज्जैनमे भेल छल आ हमरा सबके ज्ञान नै भ’ रहल अछि, जतय हम सब पैदा भेल छी. ई ते बड कष्टक गप छियै नै. कालीदास जेकरा घर बाली भगा देलकय, तकरा ज्ञान भ’ गेलय अ चारि टा महाकाव्य भ’ लिख देलक. अहाँ जखैन उच्चैठ जेबय, नदी किनारे छै आ संस्कृत विद्यालय छै अहि ठाम. हम पूरा सांस्कृतिक घुमल छी, विद्यापतिक गाम बिस्फी सेहो गेल छी, हुनकर जे स्थान छै ओतय गेल छी. मंडन मिश्रजी के गाम गेल छी, जाहि गामसं सत्तर-अस्सी टा आईएएस-आईपीएस निकलले, ओहि गामक माटी देखय लेल गेलहुं, जे केहन ओ माटी छै जे खाली आईएएस-आईपीएस निकालैत छै. भारतमे जों सबसे पैग सांस्कृतिक धरोहर छै कत्तो, ते ओकर नाम छै मिथिलांचल. ओहि धरोहरके लेल जे ‘वैदेही’ संस्था बनाके काज क’ रहल छी, बहुत-बहुत बधाई. गांधी जेहन समाज में मैसेज दय बला, भारते टा नै विश्वमे कियो नै भेलाह. हम अहाँ गाय-महीसक दूध पीय छी, गांधीजी बकरक दूध पिबय रहथिन. क्या? गरीबक घरमे बकरी रहैथ छै. प्रचार करयके काज नै रहय हुनका. अहिना प्रचार भ’ गेल. जे बकरी बला रहय, ‘गांधीजी’, ‘गांधीजी’ करय लगलाह. हम अहाँ हाथमे घड़ी पहिरय छी, ओ डारमे घड़ी पहिरय रहथिन. गांधीजी डोराक चश्मा पहिनय रहथिन. गांधी जतय जाथिन ते हरिजन कतय भोजन करथिन. ‘मासेज’ में ‘मैसेज’ देत रहथिन. दांडी यात्रामे सबके हाथमे डंडा छल, ओ आन्दोलनक संकेत देलखिन. नमक आन्दोलन जे हर घरमे खायल जायत अछि, थोक में मैसेज देनायके काज करलखिन शांतिपूर्वक. ओ गोलमेज सम्मलेनमे आधा धोती पहिनके गेलखिन आ लोक देखय लागल, जे गांधी ये छैथ. समाज एखनो ईमानदारीके इज्जत देत छै. अहाँ दूटा आंखि से दुनिया देखय लेल चाहैत छी मुदा दुनिया अहाँके हजारों आंखि से देखय ये. आब अहाँके कोनो चीज नुकायल नै रहत, अपना जीवनके केहन संस्कारमे राखयके ये, ई दायित्व स्वयं अहाँके छी. जेखन अहाँके संस्कारित जीवन रहत ते अगल-बगलके लोगमे सेहो संस्कार रहत. हमरा लागय ये जे हम सब मैथिल छी, मिथिला सं छी, जानकीके छी, अप्पन संस्कारके जीबैत राखैत, जीवन-दर्शनके जीबैत राखैत, गांधीके आदर्श पर चलब, भेदभाव मिटाके. कियो आदमी ऊपर-नीचां नै होय छै, भगवान राखैत छै. लक्ष्मी चंचला होयत छै. मैथिल मतलब जूनून. हम सब बाहर जायत छी. खूब काज करैत छी. गाममे दू-चारि बीघा जमीन भ’ जाइत छै ते कहैत छी, के काज करत? माटीके सेवा केनाय बिसुरी नै. छैठके पूजा बिसुरी नै. गामके पोखैरके आनंद कत्तो नै भेटत. गाम जरूर जाऊ, एहन प्लानिंग करू जे दस आदमीके काज जरूर दियो. बुद्धि बाजारमे नै बिकायत छै, भगवान देत छथिन. प्रचंड पौटील्य, संचालक, भानु कला केंद्र- संस्कृति गौरव होयत अछि कोनो राष्ट्रक गौरव, ओकर भू-क्षेत्रफल आ आर्थिक सम्पन्नता नै होयत अछि बल्कि ओहि देशक भाषा, संस्कृतिक अवस्थाक प्रतिबिंबित करैत अछि. नेपाली संस्कृतिक उपर पाश्चात्य संस्कृतिक अतिक्रमण या आक्रमण रोकबाक आ बचाबैक लेल भानु कला केंद्रक स्थापना भेल अछि. संस्कृतिक संरक्षण, संवर्धन आ प्रवर्धन लेल हम सब ई पावन अवसर पर शामिल हेबाक लेल नेपाल सं आयल छी. माया देवी, भानु कला केंद्र- मैथिलीमे बड सम्मान भेटल मैथिली भाषाक लेल पचपन साल पहिने हमर घरबला, जेकर फोटो अहाँक आगूमे राखल अछि, मैथिलि भाषाक लेल बहुत संघर्ष क’ करने छल. ओ एक्के टा चीजसं बड प्रभावित भेल छ्ल. हम जनकपुरक लडकी छी आ विराट राजाक कनिया जनक राजाक बेटी छल. हमर घरबाला जनकपुर गेल रहैथ जखन हमर शादी भेलय तखन. मैथिली भाषा बला सब अप्पन कनियाके सम्मान द’ क’ बजय छलाह ते हुनका बड मन लगलाह. मैथिली भाषा में ‘तों’ शब्दक प्रयोग नै होयत छै, सम्मान द’ क’ कहैत अछि, ‘हे आऊ’. ओहि सं ओ बड प्रभावित भेल आ ओ मैथिली भाषाक लेल जान-प्राण देलखिन. आयसं इक्कीस बरख पहिने दिल्लीक तालकटोरा स्टेडियममे एकटा कार्यक्रम भेल छल आ हिनका मैथिली एकेडमी सें सम्मानों भेटल छल. ओहिमे एकटा कार्यक्रम भेल छ्हल ‘अरिपन’ पटना दिस सं, कम्पीटीशन करने रहय. ओहि में 265 संस्था भाग लेने रहय. ओहि में 14टा पुरस्कार रहय आ तेरह टा पुरस्कार हम असगरे लेने रहि. हमर एखैन धरि सबटा कार्यक्रममे वीपी फाउनडेशनसं बड सहायता भेटल छैथ. कृष्णा प्रसाद,  कार्यवाहक राजदूत, नेपाल- सीता हमर विभूति छली हम भले ही नेपालक पहाडी इलाका सं छी मुदा हमर शिक्षक मैथिली समुदायसं छल. मैथिली सिर्फ एकटा भाषा नै अछि, मुदा सभ्यता आ संस्कृति सेहो अछि. नेपालमे मैथिली दोसर सबसं बेसी बाजय बला भाषा अछि. नेपाल आ भारतक बीच सिर्फ राजनीतिक संबंध नै अछि मुदा संस्कृति, धर्म आ परंपराक संबंध सेहो अछि. दुनू देशक बीच संबंध हम नै जानकी आ महात्मा बुद्ध केने छल. माता सीता हमर देशक विभूति छली. आशीष अनचिन्हार संशोधन केर मतलब विनाश नै होइ छै हमर मने आशीष अनचिन्हारक एकटा आलेख दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला आवाजमे 9 फरवरी 2014केँ "मैथिली गजलमे लोथ गजलकारक योगदान" नामसँ भेल रहैतकर उत्तर दैत सुरेन्द्रनाथजी एकटा आलेख लिखला जे कलकत्तासँ प्रकाशित कर्णामृत केर अप्रैल-जून 2015मे "मैथिली गजलक पूंषत्वहीन आलोचना" केर नामसँ प्रकाशितभेल आ सुरेन्द्रनाथ जीक ऐ आलेखक उत्तर दैत हमर एकटा आलेख कर्णेमृतक नवीन अंक अप्रैल-जून 2016मे "संशोधन केर मतलब विनाश नै होइ छै" नामसँ प्रकाशित भेलअछि। ओना संपादक महोदय किछु काँट-छाँट सेहो केलखनि अछि तँए विदेहक पाठक लेल मूल आलेख देल जा रहल अछि पढ़ल जाए। संगे-संग ऐ मूल लेखक अंतमेकर्णामृतमे प्रकाशित लेखक कटिंग सेहो देल जा रहल अछि पहिले सुरेन्द्रनाथजीक तकर बाद हमर बला (ऐ लेखमे देल गेल सुझाव कर्णामृत पत्रिका लेल छल)---- संपादक/ उपसंपादक महोदय लोकनिसँ आग्रह जे ऐ आलेखमे आएल सभ उदाहरण आ ओकर लक्षणकेँ यथावत् राखथि कारण गजल उच्चारणपर निर्भर करै छै आ उच्चारणवर्तनीपर। संगे-संग दू शेरक बीचमे जते जगह छै से रहऽ दियौ। अप्रैल-जून 2015मे प्रकाशित सुरेन्द्रनाथ जीक आलेख " मैथिली गजलक पूंषत्वहीन आलोचना" पढ़लहुँ आ ओहिपर हम अपन किछु विचार राखऽ चाहब। ओना सुरेन्द्रनाथजीक आलोचना हमर आलेखपर केंद्रित छल तँए पाठककेँ लगतिन जे ई प्रत्यालोचना थिक मुदा सुरेन्द्र नाथ जी अपने ठाम-ठीम किछु स्पष्ट करऽ कहने छथि तँइ ई आलेखलऽ कऽ हम आएल छी आ पाठक सभसँ आग्रह जे एकरा प्रत्यालोचना नै बल्कि सुरेन्द्र नाथजीक आग्रह मानबाक परिणाम बूझथि। जे-जे चीज सुरेन्द्रजी हमरासँ बूझए चाहैछथि वा हुनकर जै-जै विचारपर हमरा आपत्ति अछि से हम क्रमशः बिंदुवार दऽ रहल छी---- 1) ऐ लेखक शुरूआतेमे सुरेन्द्रनाथ जी "मैथिली-हिंदी" लऽ कऽ अगुता गेल छथि। हम फेर जोर दऽ कऽ कहब चाहब जे मैथिलीक अधिकांश रचनाकार हिंदीक नकल करैए आएकर सबूत सुरेन्द्रनाथजी अपने ऐ आलेखमे बहुत बेर देने छथि। कतहुँ ज्ञानेन्द्रक ना तँ कतहुँ अनिरुद्ध सिन्हा तँ कतहुँ हिंदी गजलः संघर्ष और सफलता। कुल मिला कऽ ईआलेख हिंदीक नकल थिक आ ऐ आलेखसँ ई हमर ओ विचार मजगूत भऽ जाइए जकरा तहत हम बेर-बेर कहै छी आ कहऽ चाहब जे मैथिलीक अधिकांश लेखन हिंदीक नकलथिक। ऐ ठाम ई स्पष्ट करब बेसी जरूरी जे सुरेन्द्रनाथ जी रेफरेन्स दैत काल अपन मानसिक वर्णसंकरताक परिचय देने छथि। पूरा दुनियाँक रेफरेन्स तँ दऽ देला मुदा गंगेशगुंजन जीक "बहर-मेनिया" बला कथन ओ कहाँसँ लेला। विदेहमे मुन्नाजीक संयोजनमे गजलक उपर परिचर्चा भेल रहै आ तैमे गंगेश गुंजन जीक आलेखमे ई संदर्भ आएल छैआ बादमे ई आलेख विदेह-सदेहमे प्रिंट रूपमे एलै। मुदा रेफरेन्समे एकर चर्चा नै। की सुरन्द्रनाथजी ई कहि सकै छथि जे अमीर खुसरोक मैथिली मिश्रित गजलक अंश ओकहाँसँ प्राप्त केने छथि? संगे-संग ओ राजेन्द्र विमलजीक उक्ति कहाँसँ आनि लेलथि जखन की ओ इंटरव्यू विदेहमे प्रकाशित छै (सदेहमे सेहो)| ई छनि सुरेन्द्रनाथजीकमानसिक वर्णसंकरता जकरा ओ बेर-बेर अपन आलेखमे देखेने छथि। 2) लगैए जे सुरेन्द्रनाथजी जखन तामसमे अबैत हेता तखन हुनक आँखि मुना जाइत हेतनि (मात्र अनुमान) से हम माया बाबू आ नीरजजीक संदर्भमे हिनक तामसकेँ देखैतअनुमान लगा रहल छी। हमरा ने माया बाबूक गीतलसँ परेशानी अछि ने बीतलसँ। हिंदीक नीरजकेँ उँच स्थान मात्र ऐ दुआरे देल गेलन्हि जे ओ हिंदी भाषाक क्षमतापर बिनाबयान देने कहलखिन जे गजलक नाम गीतिका हेबाक चाही। ऐठाम धेआन दिऔ नीरजजी ई कहियो नै कहलखिन जे हिंदीमे गजल लिखब संभव नै छै, तँइ हिंदीमे नीरजजीकेँऊँच स्थान भेटलनि। ऐकेँ उल्टा माया बाबू अपन अक्षमताकेँ झाँपि ई बयान देला जे मैथिलीमे गजल लिखब संभव नै तँए गीतल हेबाक चाही। दूनू बयानमे फर्क छै तँए दुन्नूकसम्मानो अलग-अलग। हमरा ने माया बाबूपर आपत्ति अछि आ ने हुनक प्रयोगपर हमरा तँ बस हुनकर उद्येश्यपर आपत्ति अछि। माया बाबूक सामने निस्सन मैथिली गजलकपरंपरा छल ओइकेँ बाबजूदो एहन बयान किएक? 3) जेना प्रकृति अपन मान्यता लेल केकरो पुछारी नै करै छै तेनाहिते पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीक गजलकेँ कोनो आशीष अनचिन्हार वा सुरेन्द्रनाथ कीआन कोनो गजलकारक अनुसंशाक जरूरति नै छै। पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीक गजल मैथिली गजलक पूर्वज थिक तँ ई तीनू गोटें निश्चित रूपसँ मैथिलीगजलक "असल प्रवर्तक” छथि। सुरेन्द्रनाथजी पुछै छथि जे "की ओ सभहँक (पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजीक) गजलक व्याकरण अनचिन्हारक आखरकव्याकरणसँ ऐम-मेन मेल खाइत अछि। जँ सएह तँ हुनकर सभहँक अवसान भेलाक बादो मैथिली गजल बाँझ अथवा मसोमात किए बनल रहल?" आब ऐ प्रश्नक उत्तर तँ सुरेन्द्रनाथजी अपने छथि। बाप बच्चाक लालन-पालन करै छै मुदा जँ बच्चा जवान भेलाक बाद अपना हिसाबें चलै छै तँ फेर ओइमे बापक कतेसहभागिता? पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजी ई तीनू गोटें व्याकरणयुक्त गजल देला मुदा तकर बादक नकलची पीढ़ी जँ पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झाआ मधुपजीकेँ नै गुदानै तँ फेर ओइ लेल ई तीनू (पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजी) किए दोषी हेता। जा धरि मैथिली गजलमे सुरेन्द्रनाथजी सन-सन अराजकगजलकार होइत रहत ता धरि मैथिली गजल बाँझ अथवा मसोमात बनल रहत।ऐ तीनू (पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा आ मधुपजी)क संपूर्ण गजल ओ ओकरव्याकरणिक व्याख्या सहित पढ़बाक लेल "मैथिलीक प्रतिनिधि गजल 1905सँ 2014 धरि" नामक पोथी देखू। 4) बहुत रास अराजक गजलकार जकाँ सुरेन्द्रनाथजी सेहो बहर आ छंदकेँ अलग-अलग मानै छथि। ई माननाइ तेहने भेल जेना कियो वाटर आ पानिकेँ अलग मानथि। बुक आपोथीकेँ अलग मानथि। सच तँ ई छै जे बहर आ छंदमे मात्र भाषायी अंतर छै। संस्कृतमे छंद कहल जाइत छै तँ अरबीमे बहर। ओना एकटा तात्विक अंतर जरूर छै जे संस्कृतमेछंद व्यापक अर्थ दै छै आ सरल वार्णिक, वर्णवृत आ मात्रिक तीनू छंद अबै छै तँ बहरमे मात्र वर्णवृत। ओना अरबीमे सरल वार्णिक आ मात्रिक छंदक प्रचार नै केर बराबर छै आवर्णवृतक एकछत्र राज्य छै तँए बहर आ छंद एक समान अछि। वर्णवृत वा बहरक साधारण नियम छै जे ई लघु-गुरू द्वारा निर्धारित होइत छै (बहुत काल लघु-गुरू लेल लघु-दीर्घ वा ह्रस्व-दीर्घ युग्म केर सेहो प्रयोग होइत छै)। आ संस्कृतक वर्णिक छंदमे पहिल पाँतिक मात्राक्रम जे छै सएह सभ पाँतिक मात्राक्रम समान हेबाक चाही आ प्रत्येकशब्दक संख्या समान हेबाक चाही तखन वार्णिक छंद हएत। अरबियोमे तेहने सन छै मुदा आधुनिक भाषामे मात्राक्रम तँ समान रहलै मुदा अक्षर संख्या उपर निच्चा कऽ सकैछी। संगे-संग गजल लिखबा कालमे किछु छूट देल जाइत छै जे की मात्र आवश्यक स्थितिमे प्रयोग होइत छै। आब ई लघु-गुरूक की व्यवस्था छै वा छूट कोन रूपें लेल जेतै सेजनबाक लेल कोनो छंदशास्त्रीक पोथी पढ़ि लिअ। ओना हमरा पूरा उम्मेद अछि जे सुरेन्द्रनाथजी लग लघु-गुरू गनबाक ज्ञान हेबे करतनि ( ई उम्मेद हमरा ऐ लेल अछि कारणसुरेन्द्रजी अपन आलेखमे बेर-बेर छूट बला ज्ञानक प्रदर्शन केने छथि)। ऐठाम कही जे गजलक हरेक पाँतिक मात्राक्रम एक समान हेबाक चाही ( एक समान मात्रा आ एकसमान मात्राक्रम दूनू अलग-अलग वस्तु छै)। 5) कहबी छै जे "नकल करबाक लेल अकल चाही" मुदा सुरेन्द्रनाथजीकेँ नकलो करबाक बुद्धि नै छनि। ओ कोनो ज्ञानेन्द्र केर पोथीक उदाहरण दै छथि आ कहै छथि जे निरालागजलक व्याकरणकेँ तोड़ि देला। सच तँ ई अछि जे निराला मात्र विषय परिवर्तन केला आ उर्दू शब्दक बदला गजलमे हिंदी शब्दक प्रयोग केला। मैथिलीक बहुत रास शाइर एहनेअराजक बयान दैत छथि जे दुष्यंत कुमार व्याकरण तोड़ला तँ अदम गोंडवी ई केला तँ ओ ओना केला। मुदा हिंदीक सभ गजलकार व्याकरणक पालन केला खाली ओ विषयपरिवर्तन केला आ हिंदी शब्दक प्रयोग बेसी केला। हम ऐठाम पहिने निराला आ शमशेर बहादुर सिंह केर गजलक व्याकरण देखा रहल छी ( चूँकि सुरेन्द्रनाथजी फैशन आनकल करैत बिना पढ़ने हिनकर सभहँक नाम लेने छथिन) आ तकर बाद जयशंकर प्रसाद सहित दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, मुनव्वर राना सहित आन-आन गजलकारकगजलक व्याकरण देखा रहल छी। वास्तवमे सुरेन्द्रनाथजी भ्रम पसारि रहल छथि वा ई कहब बेसी उचित जे ओ अपन अज्ञानताक कारणें भ्रम पसारि रहल छथि। ऐठाम हमकही जे सुरेन्द्रनाथजी अपन आलेखमे कत्तौ उदाहरण नै देने छथि जे कोन तरहें निरालाजी गजलक व्याकरणकेँ तोड़लखिन मुदा हम उदाहरण दऽ कऽ देखा रहल छी जे हिंदीकसभ गजलकार सभ कोना व्याकरणक पालन केलथि। । तँ पहिने निराला आ शमशेर बहादुरक गजलकेँ देखू-- (संपादक/ उपसंपादक महोदय लोकनिसँ आग्रह जे ऐ आलेखमे आएल सभ उदाहरण आ ओकर लक्षणकेँ यथावत् राखथि कारण गजल उच्चारणपर निर्भर करै छै आ उच्चारणवर्तनीपर।संगे-संग दू शेरक बीचमे जते जगह छै से रहऽ दियौ) सूर्यकांत त्रिपाठी निराला भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है मतला ( मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि-- 2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरेरमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। मौलाना हसरत मोहानीक गजल " चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" अही बहरमे छै जकर विवरण आगू देल जाएत। ऐठाँ ईदेखू जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै। हमरा ने ज्ञानेन्द्रसँ मतलब अछि नेसुरेन्द्रनाथसँ। हमरा मात्र पाठकसँ मतलब अछि आब वएह कहथि जे कि निरालाजी व्याकरण कतऽ तोड़लखिन? आब हम ऐठाम सुरेन्द्रजीसँ आग्रह करबनि जे हुनका तँ लघु-गुरूक सिद्धांत अबिते छनि तँ आब बाँचल शेरक निर्णय कऽ लेथु। सभ पाठकसँ आग्रह जे निर्णय करथि जे निराला जी बहरक पालन केला की नै। बाँचल शेर एना छै-- हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये, हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है तरस है ये देर से आँखे गड़ी श्रृंगार में, और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, जोर से आँधी चली, हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें, सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है शमशेर बहादुर सिंह 1 जहाँ में अब तो जितने रोज अपना जीना होना है, तुम्हारी चोटें होनी हैं हमारा सीना होना है। वो जल्वे लोटते फिरते है खाको-खूने-इंसाँ में : 'तुम्हारा तूर पर जाना मगर नाबीना होना है! ऐ गजलक मतलाक मात्राक्रम अछि 1222-1222-1222-1222 आ एकर पालन दोसर शेर सहित आन सभ शेरमे अछि। सुरेन्द्रनाथजीसँ आग्रह जे ओ पूरा गजल पढ़ि लेथि। चूँकि सुरेन्द्रनाथजीक इच्छित उदाहरण हम दऽ चुकल छी मुदा तैयो हम ऐठाम हिंदी-उर्दूकक किछु महत्वपूर्ण गजलक व्याकरण देखा रहल छी जे तँ मुख्यतः पाठक लेल अछिमुदा सुरेन्द्रनाथ आ हुनकर संगी सेहो देखथि-- जयशंकर प्रसाद सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं उन्हें अवकाश ही इतना कहां है मुझसे मिलने का किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं जो ऊंचे चढ़ के चलते हैं वे नीचे देखते हरदम प्रफ्फुलित वृक्ष की यह भूमि कुसुमगार करते हैं न इतना फूलिए तरुवर सुफल कोरी कली लेकर बिना मकरंद के मधुकर नहीं गुंजार करते हैं 'प्रसाद' उनको न भूलो तुम तुम्हारा जो भी प्रेमी हो न सज्जन छोड़ते उसको जिसे स्वीकार करते हैं प्रसादजी ऐ गजलक बहर अछि-- 1222-1222-1222-1222 आजुक समयक प्रसिद्ध शाइर आ फिल्मी गीतककार जावेद अख्तरजीक ई गजल देखू जे की जगजीत सिंह गेने छथि-- तमन्ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ ये मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ 1222-1222-1222-1222 आब पूरा गजल देखू-- तमन्ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ ये मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ मुझे गम है कि मैने जिन्दगी में कुछ नहीं पाया ये ग़म दिल से निकल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे ज़माना मुझसे जल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्से, काम की बातें बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ आब हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजल देखू-- 2122-2122-2122-212 चुपके-चुपके- रात दिन आँ-सू बहाना- याद है हमको अब तक- आशिक़ी का- वो ज़माना -याद है आब पूरा गजल देखू-- चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़ तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तन और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है जानकर सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी मेरा और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है (ई गजल बहुत नमहर छै तँए मात्र पाँच टा शेर दऽ रहल छी) कबीर दासक एकट गजलकेँ तक्ती कऽ कऽ देखा रहल छी-- बहर—ए—हजज केर ई गजल जकर लयखंड (अर्कान) (1222×4) अछि-- ह1 मन2 हैं2 इश्2, क़1 मस्2ता2ना2, ह1 मन2 को 2 हो 2, शि1 या2 री2 क्या2 हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है, हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ? न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ? तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू— बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है नकाब उलटे हुए जब भी चमन से वह गुज़रता है समझ कर फ़ूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है मुनव्वर राना (घर अकेला हो गया, पृष्ठ - 37) तक्तीअ बहुत पानी / बरसता है / तो मिट्टी बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 न रोया कर / बहुत रोने / से छाती बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 यही मौसम / था जब नंगे / बदन छत पर / टहलते थे 1222 / 1222 / 1222 / 1222 यही मौसम / है अब सीने / में सर्दी बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 नकाब उलटे / हुए जब भी / चमन से वह / गुज़रता है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 (नकाब उलटे के अलिफ़ वस्ल द्वारा न/का/बुल/टे 1222 मानल गेल अछि) समझ कर फ़ू / ल उसके लब / पे तितली बै / ठ जाती है 1222 / 1222 / 1222 / 1222 आब राहत इन्दौरी जीक ऐ गजलकेँ देखू-- ग़ज़ल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज केर मुजाइफ) चरागों को उछाला जा रहा है हवा पर रौब डाला जा रहा है न हार अपनी न अपनी जीत होगी मगर सिक्का उछाला जा रहा है जनाजे पर मेरे लिख देना यारों मुहब्बत करने वाला जा रहा है राहत इन्दौरी (चाँद पागल है, पृष्ठ - 24) तक्तीअ = चरागों को / उछाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 हवा पर रौ / ब डाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 न हार अपनी / न अपनी जी / त होगी 1222 / 1222 / 122 (हार अपनी को अलिफ़ वस्ल द्वारा हा/रप/नी 222 गिना गया है) मगर सिक्का / उछाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 जनाजे पर / मेरे लिख दे / ना यारों 1222 / 1222 / 122 मुहब्बत कर / ने वाला जा / रहा है 1222 / 1222 / 122 फेरसँ मुनव्वर रानाजीक एकटा आर गजलकेँ देखू-- हमारी ज़िंदगी का इस तरह हर साल कटता है कभी गाड़ी पलटती है कभी तिरपाल कटता है सियासी वार भी तलवार से कुछ कम नहीं होता कभी कश्मीर कटता है कभी बंगाल कटता है (मुनव्वर राना) 1222 / 1222 / 1222 / 1222 (मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन / मुफाईलुन) हमारी ज़िं / दगी का इस / तरह हर सा / ल कटता है कभी गाड़ी / पलटती है / कभी तिरपा / ल कटता है सियासी वा/ र भी तलवा/ र से कुछ कम / नहीं होता कभी कश्मी/ र कटता है / कभी बंगा / ल कटता है आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू-- 2122 / 2122 / 2122 / 212 हो गई है / पीर पर्वत /-सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए। आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी— हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू— 1222 / 1222 / 1222 / 1222 ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी— ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी क़तारों में अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक़ के चाँद-तारों में रहे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तज़रबे से बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में. फेर गोंडवीजीक दोसर गजल लिअ— 2122 / 2122 / 2122 / 212 भूख के एह / सास को शे / रो-सुख़न तक /ले चलो या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो आब अहाँ सभ ऐ गजलकेँ अंत धरि जा सकै छी। पूरा गजल हम दऽ रहल छी-- भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो जो ग़ज़ल माशूक के जल्वों से वाक़िफ़ हो गयी उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो मुझको नज़्मो-ज़ब्त की तालीम देना बाद में पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो गंगा जल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो ख़ुद को ज़ख्मी कर रहे हैं ग़ैर के धोखे में लोग इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो. आब आधुनिक उर्दूक प्राचीनतम गजलकार हरी चंद अख़्तरजीक ई गजल देखू-- सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं उन्हें कुछ और बेगाना बना कर लौट आए है 1222-1222-1222-1222 आब पूरा गजल देखू-- सुना कर हाल क़िस्मत आज़मा कर लौट आए हैं उन्हें कुछ और बेगाना बना कर लौट आए है फिर इक टूटा हुआ रिश्ता फिर इक उजड़ी हुई दुनिया फिर इक दिलचस्प अफ़्साना सुना कर लौट आए हैं फ़रेब-ए-आरज़ू अब तो न दे ऐ मर्ग-ए-मायूसी हम उम्मीदों की इक दुनिया लुटा कर लौट आए हैं ख़ुदा शाहिद है अब तो उन सा भी कोई नहीं मिला ब-ज़ोम-ए-ख़ुवेश इन का आज़मा कर लौट आए हैं बिछ जाते हैं या रब क्यूँ किसी काफ़िर के क़दमों में वो सज्दे जो दर-ए-काबा जा कर लौट आए हैं ("फिर इक" मे अलिफ-वस्ल छूट छै आ एकर उच्चारण "फिरिक" छै। तेनाहिते "हम उम्मीदों “ लेल तेहने सन बूझू।) कतेक नाम आ गजल दिअ ऐ ठाम। कहबाक मतलब जे हरेक शाइर अपन गजलमे कथ्य आ तेवर बदलै छथि व्याकरण वएह रहै छै। मुदा मैथिलीक विद्वान तँ बस विद्वानछथि हुनका के टोकत। ऐ ठाम ई उदाहरण सभ देबाक मतलब मात्र सही पक्षकेँ उजागर करबाक अछि। ओना सुरेन्द्रनाथजी कहता जे ई उदाहरण सभ हिंदी-उर्दूक अछि आ मैथिलीक अपन व्याकरण हेबाक चाही। पहिल गप्प जे ओ अपने कहै छथि जे हिंदीक गजलमे व्याकरण नैछै आ दोसर गप्प जे कोनो विधाक व्याकरण तँ मूले भाषासँ लेल जेतै खाली लक्ष्य भाषामे संशोधन हेतै । आब ई संशोधन केना हेतै से ऐ उदाहरणसँ बूझू— 1222-1222-1222-1222 (मने लघु-दीर्घ-दीर्घ, लघु-दीर्घ-दीर्घ,लघु-दीर्घ-दीर्घ,लघु-दीर्घ-दीर्घ केर चारि बेर प्रयोग) के अरबीमे बहरे-हज़ज कहल जाइत छै आ एकरा बहुतसंगीतमय बूझल जाइत छै मुदा बहुत संभव जे भाषायी भिन्नताक कारण ई बहर या छंद मैथिलीमे कर्णप्रिय नै हो। आ एहन स्थितिमे मैथिलीमे 122-1222-222-1222सनकेँ कोनो छंद आबि जाए। हमरा बुझने इएह संशोधन छै। आब 1222-1222-1222-1222 केर गिनती करबाक लेल जे नियम छै सएह नियम 122-1222-222-1222 लेल सेहो रहतै या अन्य कोनो छंद लेल वएह रहतै। तेनाहिते संस्कृत आ अरबीमे 122-122-122-122 छंदक समान रूपसँ प्रयोग होइत छै। संस्कृतमे एकरा भुजंगप्रयात कहल जाइत छै तँ अरबीमे बहरे-मुतकारिब। दूनू भाषामे ईउच्च संगीत क्षमता नेने भेटत। संस्कृतमे गोस्वामी तुलसीदासजीक ई रचना देखू जे भुजंगप्रयात ( बहरे मुतकारिब)मे अछि-- नमामी शमीशान निर्वाण रूपं विभू व्यापकम् ब्रम्ह वेदः स्वरूपं पहिल पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि---- ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ, दोसरो पाँतिकेँ मात्रा क्रम अछि-----ह्रस्व- दीर्घ -दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ फेर उपरे जकाँ कही जे भऽ सकैए जे मैथिलीमे ऐ ढ़ाँचामे संगीत नै आबि सकै आ तँए 22-122-22-122 रूप आबि जाए वा 221-122-212-122 रूप आबि जाए। मुदा लघु-दीर्घ गिनती करबाक नियम तँ समाने रहतै। बदलतै नै। मैथिलीमे शाइर राजीवरंजन मिश्रजी एहने संशोधन ओ परिवर्तन करैत गजल कहि-लीखि रहल छथि। राजीवजी कोनोअरबी वा संस्कृतक मान्य छंद नै लै छथि मुदा गजलक पहिल पाँतिमे जे मात्राक्रम रहै छै तकर ओ पूरा गजलमे पालन करै छथि आ इएह तँ छंद वा बहरक निर्वाह केनाइ भेलै।उदाहरण लेल राजीवजीक एकटा गजल राखि रहल छी— नै राम रहीमक झोक रहय नै वेद कुरानक टोक चलय मतलाक दूनू पाँतिमे 221 122 2112 ढ़ाँचा अछि आ निच्चा आन शेर सभमे देखू इएह मात्राक्रम भेटत-- किछु आर भने नै होइ मुदा बस संग धऽ लोकक लोक सहय नै ईद दिवाली भरिकँ मजा आनंद सहित नित नेह लहय हो राम रहीमक गान सदति नै नामकँ खातिर जीव मरय राजीव सुनब नै लोककँ कहल किछु लोक तऽ अतबे खेल करय की ऐ गजलमे समकालीन स्वर नै छै। सुरेन्द्रनाथजीकेँ मेहनति नै करबाक छनि तँ नै करथु मुदा भ्रम ओ अज्ञानता नै पसारथु से हमर आग्रह। हम ऐ ठाम मैथिलीक किछुगजल कारक दूटा कऽ शेर देखा रहल छी। सभ गोटा देखू जे कोना एकै संग समकालीन स्वर आ व्याकरण छै— कविवर सीताराम झाजीक गजलक दूटा शेर-- हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़तीतल` मतलाक छंद अछि 2212+ 122+2212+ 122 आब दोसर शेर मिला लिअ- अछि देशमे दुपाटी कङरेस ओ किसानक हम माँझमे पड़ल छी बनि कै बिलाड़ि तीतल पहिल शेर आइयो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल। आइयो नव साल गरीबक लेल नै होइ छै। दोसर शेरकेँ नीक जकाँ पढ़ू आइसँ साठि-सत्तर साल पहिलुक राजनीतिक चित्र आँखि लग आबि जाएत। जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" जीक गजलक दू टा शेर-- टूटल छी तँइ गजल कहै छी भूखल छी तँइ गजल कहै छी मतलाक दूनू पाँतिमे 2222 +12 + 122 छंद अछि आ एकर दोसर शेर देखू-- ऑफिस सबहक कथा कहू की लूटल छी तँइ गजल कहै छी पाठक निर्णय करता जे समकालीन स्वर छै की नै। योगानंद हीराजीक गजलक दू टा शेर— मोनमे अछि सवाल बाजू की छल कपट केर हाल बाजू की मतलाक दूनू पाँतिमे 2122-12-1222 अछि आ दोसर शेर देखू छोट सन चीज कीनि ने पाबी बाल बोधक सवाल बाजू की की समकालीन स्वर नै छै? समकालीन स्वरे नै कालातीत स्वरक संग विजयनाथ झा जीक ऐ गजलक दूटा शेर देखू-- जीवनक आशय सदाशय सूत्र शिवता सार किछु बेस बीतल शेष एहिना अभिलषित आभार किछु मतलाक छंद अछि 212-212-212-212 आब दोसर शेरक दूनू पाँतिकेँ जाँच कऽ लिअ संगे संग भाव केर सेहो। द्वन्द अछि आनंद तैयो क्लेश प्रियगर वारुणी पी रहल हम जानि गंगा मधु मदिर नहि आर किछु ऐठाम हमरा लग उदहारणक नमहर लिस्ट अछि मुदा मुदा पत्रिकाक सीमा होइत छै तँए हम रुकि रहल छी। सुरेन्द्रनाथजी कहै छथि जे रचनामे समकालीन स्वर हेबाक चाही। आ देखू जे दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, निराला सहित मैथिलीक बहुत रास शाइर बिना व्याकरणकेँ तोड़नेकेना समकालीन स्वर देने छथि अपन गजलमे। की ई हिम्मत आ मेहनति करबाक क्षमता सुरेन्द्रनाथ जीमे छनि? हमरा बुझने सुरेन्द्रनाथजी संशोधनक मतलब छोड़ि देनाइ-तोड़ि देनाइ आ विनाश केनाइ बुझै छथि। आ हुनकर ऐ अज्ञानतापर की कएल जा सकैए से पाठक निर्णय करता। 6) सुरेन्द्रनाथजी अपन आलेखमे योगानंद हीरा आ विजयनाथ झाजीक संदर्भमे ई प्रश्न केला जे "हिनका सभमे प्रतिभा छलनि तँ ई सभ घनगर किएक नै भेला"। एकरजबाबमे हम बस एतबा कहऽ चाहै छी जे जँ कोनो खेतिहर अपन खेतमे गहूँम बाउग करै छै। आ गहूमक संग बहुत रास घास सभ जनमै छै। आब जँ खेतिहर कमौट नै करतै तँओ घास सभ गहूमकेँ बढ़हे नै देतै। ई पूर्णतः सत्य छै आ पाठक एकर अंदाजा लगा सकै छथि। मैथिली गजलक संदर्भमे इएह भेलै। शुरूमे नीक गजल तँ एलै मुदा बिनाआलोचकक ई विधा रहि गेल आ एकर परिणाम स्वरूप "सुरेन्द्रनाथ" सन-सन जंगली घास " योगानंद हीरा ओ विजयनाथ झा" सन गहूमकेँ झाँपि देलकै। बीच-बीचमे जे खादपड़लै तकर तागति सेहो बहुसंख्यक घास द्वारा चूसि लेल गेलै। 7) सुरेन्द्रनाथजी हमर ऐ बातसँ बहुत तामसमे छथि जे " गजेन्द्र ठाकुर मैथिलीक पहिल गजलशास्त्र देला"। सुरेन्द्रनाथजी कहै छथि जे मैथिलीमे बहुत पहिलेसँ गजलशास्त्रछै। हम हुनकर मतक आदर करै छी संगे संग पूछए चाहै छी जे " अराजक गजलकार सभ गजलशास्त्र कहिया लिखला" आ जँ लिखबो केला तकर सूचना सुरेन्द्रनाथजी नै दऽरहल छथि। हुनका कहबाक चाही जे अमुक लेखक गजेन्द्र ठाकुरसँ पहिने गजलशास्त्र लिखने छथि। बस बात खत्म मुदा ओ नाम नै कहि रहल छथि। ऐ पत्रिकाक माध्यमें हमहुनकासँ आग्रह करैत छी जी जे ओ पाठककेँ मैथिलीक पहिल गजलशास्त्रक नाम ओ ओकर लेखकक नाम कहता। आ तकर बाद गजेन्द्र ठाकुर बला दावा हम अपने खारिज कलेब................. प्रतीक्षामे छी 8) ई जानल बात छै जे मैथिलीमे सरल वार्णिक बहरक अविष्कार मात्र एकसूत्रमे बन्हबाक लेल भेल छै। आ एकर लाभ मैथिलीक नव गजलकार सभकेँ भेलै से पूरा दुनियाँजानि रहल अछि। मुदा सुरेन्द्रनाथजी बिना मूल ग्रंथ, पढ़ने तामसमे आबि लिखै छथि। तँए हुनकासँ गंभीरताक आशा करब बेकार। 9) पद्य बला प्रसंगमे सुरेन्द्रनाथजी अपने ओझरीमे छथि। हुनका बुझबाक चाही जे समस्त लिखित वस्तु काव्यक अंतर्गत आबै छै। बादमे गेय आ सरस काव्यकेँ "पद्य"कहल गेलै तँ शुष्क काव्यकेँ "गद्य"। कोनो निश्चित नियमसँ बान्हल पद्य एकटा विधा बनल जेना कोनो पद्यकेँ दोहाक नियममे दियौ तँ दोहा बनतै, सोरठाक नियममे दियौतँ सोरठा।। तेनाहिते गजलक सेहो नियम छै। आब प्रश्न छै जे जँ कोनो दोहा की सोरठा की कुंडलिया की गजल ओइ निश्चित नियमक पालन नै सकल छै तँ ओ की कहेतै।निश्चित तौरपर ओ सभ पद्ये कहेतै। कारण ओइमे कोनो खास विधाक नियम नै छै मुदा गेयता आ सरसता तँ छैके। मुदा सुरेन्द्रनाथजी एतेक छोट आ सरल बात नै बूझिसकलाह तकर हमरा दुख अछि। 10) सुरेन्द्रनाथजी अपन आलेखमे बहुत दुविधाग्रस्त छथि। कतहुँ ओ लिखै छथि जे गजलमे व्याकरण नै होइ छै, तँ कतहुँ लिखै छथि जे गजलमे व्याकरण नै हेबाक चाही आअंतमे कहै छथि जे मैथिलीक गजलकेँ अपन व्याकरण हेबाक चाही। बहुत दुविधा छनि सुरेन्द्रनाथजीकेँ मुदा ऐ दुविधामे हम फँसऽ नै चाहैत छी आ तँए सोझे पाठक लग चलै छी......................... उमेश मण्डल आ पुनम मण्‍डल समाद- सगर राति दीप जरय- 91म सगर राति दीप जरय:गोधनपुर- 24.09.2016 91म सगर राति दीप जरय : गोधनपुर (मधुबनी) स्‍थान : उत्‍क्रमित मध्‍य विद्यालय परिसर नका चौक गोधनपुर 1. उद्घाटन सत्र- दीप प्रज्‍जवलन : श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री अरविन्‍द ठाकुर, श्री राजदेव मण्‍डल आ श्री शम्‍भु सौरभ। स्‍वागत गीत : श्री राधाकान्‍त मण्‍डल। स्‍वागत भाषण : संयोजक दुर्गानन्‍द मण्‍डल। दू शब्‍द : श्री अरविन्‍द ठाकुर, श्री योगेन्‍द्र पाठक वियोगी आ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। एवं सत्रक संचालन : उमेश मण्‍डल। 2. पोथी लोकार्पण सत्र- अध्‍यक्ष मण्‍डल : डॉ. योगानन्‍द झा, श्री राजदेव मण्‍डल, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगी, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री गिरिजानन्‍द झा एवं अजीत झा आजाद, पहिल लोकार्पण- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डलक मौलिक पहिल कृति ‘कथा कुसुम’ (लघु कथा संग्रह) : लोकार्पणकर्ता- अध्‍यक्ष मण्‍डलक संग उपस्‍थित समस्‍त साहित्‍य प्रेमी आ साहित्‍यकार। दोसर लोकार्पण- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक मौलिक पचपनम कृति ‘गुलेती दास’ (लघु कथा संग्रह) : लोकार्पणकर्ता- अध्‍यक्ष मण्‍डलक संग उपस्‍थित समस्‍त साहित्‍य प्रेमी आ साहित्‍यकार। लोकार्पण उद्वोधन- डॉ. योगानन्‍द झा, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगी, श्री राजदेव मण्‍डल आ श्री अजीत झा आजाद। सत्रक संचालन- उमेश मण्‍डल। 3. कथा सत्र- अध्‍यक्ष मण्‍डल- डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री राम विलास साहु, श्री बेचन ठाकुर, श्री शिव कुमार मित्र आ श्री शम्‍भु सौरभ। पहिल पालीक संचालन- श्री अजीत झा आजाद कथा पाठ, पहिल पालीमे : 1. ओ अनहरिया राति- (श्री ऋृषि बशिष्‍ठ) 2. जी-दाँत- (श्री बेचन ठाकुर) 3. बतीसोअना- (श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल) पहिल पालीक पठित कथा सभपर समीक्षा- डॉ. योगानन्‍द झा, पंडित बाल गोविन्‍द यादव आचार्य, श्री अरविन्‍द ठाकुर, श्री अनील कुमार ठाकुर, श्री शारदा नन्‍द सिंह तथा डॉ. शिवकुमार प्रसाद। दोसर पाली- संचालन : श्री संजीव कुमार ‘शमा’ कथा पाठ- 1. हमर लॉटरी निकलल- (श्री नन्‍द विलास राय) 2. छिटकी- (श्री अजय कुमार दास ‘पिन्‍टु’) 3. पढ़ए फारसी बेचए तेल- (डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगी) 4. करोड़पति- (डॉ. योगेन्‍द्र पाठक वियोगी) 5. भिनसुरका जतरा- (श्री बेचन ठाकुर) समीक्षा- श्री राजदेव मण्‍डल, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री शिव कुमार मिश्र आ श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल। तेसर पाली- संचालक : श्री नन्‍द विलास राय कथा पाठ- 1. भैयारी- (श्री शंभु सौरभ) 2. बेटीक बाप- (श्री आनन्‍द मोहन झा) 3. विडम्‍बना- (श्री शारदानन्‍द सिंह) 4. स्‍वयंभू- (श्री अरविन्‍द ठाकुर) समीक्षा- श्री अजीत झा आजाद, श्री कपिलेश्वर राउत, श्री अनील ठाकुर, श्री राम विलास साहु आ पंडित बाल गोविन्‍द यादव आचार्य। चारिम पाली- संचालक : श्री नन्‍द विलास राय। कथा पाठ- 1. कचोट- (श्री संजीव कुमार ‘शमा’) 2. शंका- (श्री कपिलेश्वर राउत) 3. हँ-निहँस- (श्री अखिलेश कुमार मण्‍डल) समीक्षा- श्री ऋृषि बशिष्‍ठ, श्री अरविन्‍द ठाकुर, श्री राम विलास साहु, आ श्री अजय कुमार दास ‘पिन्‍टु’। पाँचिम पाली- संचालक : उमेश मण्‍डल कथा पाठ- 1. मकड़ाक जाल- (श्री शिवकुमार मिश्र) 2. विपैत- (श्री राम विलास साहु) समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. योगानन्‍द झा आ डॉ शिव कुमार प्रसाद। अन्‍तमे अध्‍यक्षीय उद्वोधन- तथा धन्‍यवाद ज्ञापन तथा दीप एवं पंजीक हस्‍तान्‍तरण। सगर राति दीप जरय केर 92म आयोजन मधुबनी जिलाक नवानी गाममे श्री अजय कुमार दास ‘पिन्‍टु’ जीक संयोजकत्‍वमे अही सालक अन्‍तिम मासमे...। 90म सगर राति दीप जरय स्थान : लक्ष्मिनिया गाम तिथि : 18 जून 2016 ९०म खेपक दीप सगर राति लक्ष्‍मीनियाँमे जरल स्‍व. नेवी भगत केर स्‍मृतिमे ‘सगर राति दीप जरय’क ९०म आयोजन काल्‍हि साँझमे आरम्‍भ भेल जे आइ भोरमे इति भेल। ई खेप श्री राम विलास साहुजीक संयोजकत्‍वमे छल जेकर आयोजक समस्‍त लक्ष्‍मीनियाँ गामक साहित्‍य प्रेमी छला। ऐ गोष्‍ठीक अवसरपर तीनटा कथा संग्रहक लोकार्पण भेल। पहिल ‘अंकुर’ कथा संग्रह श्री राम विलास सहुजीक आ दोसर एवं तेसर क्रमश: ‘गाछपर सँ खसला’ आ ‘डभियाएल गाम’ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजीक। ऐ तीनू पोथीक लोकार्पण गाष्‍ठीमे उपस्‍थित समस्‍त साहित्‍यकार एवं साहित्‍य प्रेमीक हाथे भेल। दीप प्रज्‍व्‍लन सेहो सम्‍मिलिते रूपे भेल। कथा संत्रक अध्‍यक्ष मण्‍डलमे श्री अरविन्‍द ठाकुर, श्री राजदेव मण्‍डल आ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चयन कएल गेल। तहिना संचालन समितिमे सेहो तीन गोट व्‍यक्‍तिक चयन क्रमश श्री नन्‍द विलास राय, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल तथा उमेश मण्‍डलक भेल। ऐगला आयोजन श्री दुगानन्‍द मण्‍डलजीक संयोजकत्‍वमे दीप-गोधनपुर गाममे जरत। प्रत्‍येक पालिमे प्राय: तीन-तीन कथा पाठ आ तैपर तीन-चारि समीक्षकक समीक्षा होइत रहल। प्रस्‍तुत अछि पहिल पालीसँ अन्‍तिम पालि धरिक पठित कथाक नाओं एवं कथाकारक नाओं- १. असली परिचय : राजदेव मण्‍डल २. चोटक कचोट : शम्‍भु सौरभ ३. मिड डे मिल : शारदा नन्‍द सिंह ४. अपन जाति : नन्‍द विलास राय ५. ई भाव हुनकामे जगए : रतन कुमार रवि ६. देवगनाह : गौड़ी शंकर साह ७. असाध्‍य पिता : फागुलाल साहु ८. कुत्ताक डीह : कपिलेश्‍वर राउत ९. मरियाएल मन : जगदीश प्रसाद मण्‍डल १०. स्‍वाभिमान : दुर्गानन्‍द मण्‍डल ११. खिचड़ी मोछ : लक्ष्‍मी दास १२. रिमझिम : उमेश नारायण कर्ण १३. पैयाही बुधि : उमेश मण्‍डल १४. बेंगक महंथी : राम विलास साहु १५. शंकाक बेमारी : ललन कुमार कामत १६. नेनाक बहादुरी : उमेश नारायण कर्ण १७. श्रोता बनल कथाकार : शारदा नन्‍द सिंह १८. परतर : अरविन्‍द कुमार ठाकुर १९. डेरा गेल छी : राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ 89म सगर राति दीप जरय लौकहीमे श्री उमेश पासवान द्वारा ‘दलित विषयक कथा केन्द्रित २६ मार्च २०१६ केँ उच्च विद्यालय परिसर- लौकहीमे 88 म सगर राति दीप जरय 88म कथा-साहित्‍य गोष्‍ठी डखराममे सम्‍पन्न भेल डखराम (बेनीपुर) मुखियाजी श्री अमर नाथ झाक आयोजकत्‍व आ श्री कमलेश झाक संयोजकत्‍वमे ‘सगर राति दीप जरय’क 88म कथा-साहित्‍य गोष्‍ठी 30 जनवरीक साँझमे शुरू भेल। जेकर उद्घाटन सम्‍म्‍लित रूपे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. शिवकुमार प्रसाद, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री नन्‍द विलास राय, श्री फागुलाल साहु, श्री शारदा नन्‍द सिंह, श्री उमेश पासवान, श्री कपिलेश्वर राउ, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री शम्‍भु सौरभ श्री तथा श्री राम विलास साहु केलैन। उद्घाटनक पछाइत स्‍वागत गीत सेहो सम्‍मिलित रूपे समवैत स्‍वरमे श्री राधाकान्‍त मण्‍डल तथा श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार गौलैन आ स्‍वागत भाषण श्री कमलेश झा कहलैन- ‘1990 इस्‍वीसँ ‘सगर राति दीप जरय’क आरम्‍भ यात्रा शुरू भेल जे चलैत-चलैत आब ओइ तहपर चलि आएल अछि जेतए खॉंटी माटिक सुगन्‍धसँ सुगन्‍धित कथाक लेखन एवं पठन भऽ रहल अछि...।’ उद्घाटन सत्रक पछाइत लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा पोथी, पहिल एगच्‍छा आमक गाछ (कथा संग्रह) आ दोसर ठूठ गाछ (उपन्‍यास)क लोकार्पण सम्‍मिलित रूपे भेल। तथा ‘खसैत गाछ’ (लघु कथा संग्रह) नामक पोथीक वितरण सेहो भेल। क्रमश: कथा सत्रमे प्रवेश भेल। छह पालीमे कथाक पाठ। जइमे श्री उमेश नारायण कर्ण- ‘मौनी बाबा, अलवत्त छोड़ी’ शीर्षकक दूटा कथा पढ़लैन। श्री राजदेव मण्‍डल- एडजस्‍टमेन्‍ट, श्री राम विलास साहु- जाति, श्री शारदा नन्‍द सिंह- ‘आशातीत’ तथा ‘पलटा माय’, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल- ‘एगच्‍छा आमक गाछ’, श्री लक्ष्‍मी दास- बापक धरम, श्री ललन कुमार कामत- बाबाक लोटा, श्री शम्‍भू सौरभ- परम्‍पराक बलि, श्री फागु लाल साहु- अछूत, श्री शिव कुमार मिश्र- व्‍यवहार तथा प्रौहित्‍य, श्री कपिलेश्‍वर राउत- घूर लगक गप, अखिलेश मण्‍डल- गढ़ैनगर हाथ, तथा अपने (उमेश मण्‍डल) पढ़लौं- ‘अपने गरदैन कटलौं।’ पठित कथा सभपर एक-सँ-एक समीक्षा सेहो भेल। डॉ. शिव कुमार प्रसाद, पण्‍डित बाल गोविन्‍द आर्य ‘गोविन्‍दाचार्य’, श्री फागु लाल साहु, राधाकान्‍त मण्‍डल तथा श्री कमलेश झा विषद रूपे समीक्षा कार्य केलैन। मुदा श्री राजदेव मण्‍डल, श्री शारदा नन्‍द सिंह, श्री कपिलेश्‍वर राउत, श्री उमेश पासवान, श्री शिवकुमार मिश्र, श्री राजा राम यादव, श्री नन्‍द विलास राय तथा अपने (उमेश मण्‍डल) सेहे समीक्षा कार्यमे भाग लेलौं। अगिला गोष्‍ठीक भार लैत श्री उमेश पासवान कहलैन- 89म सगर राति दीप जरय- लौकही (जिला मधुबनी)मे कराएब। जेकर हकार मंचेसँ दऽ रहल छी जे 89म गोष्‍ठीमे ‘दलित विषयक कथाक विशेष स्‍वागत होएत।’ ऐ तरहेँ 88म गोष्‍ठीक समापन भेल। 89 गोष्‍ठी लौकहीमे श्री उमेशजी करौता। सम्‍भव जे मार्चक अन्‍तिम शनिकेँ होएत। ८७म सगर राति दीप जरय सगर राति दीप जरल- ८७म कथा-साहित्‍य गोष निर्मली, दिनांक 19 सितम्‍बर 2015 : सगर राति दीप जरय समिति- निर्मलीक प्रस्‍तुतिमे शहरक विशालकाय विवाह भवन- श्‍यामा रेसिडेन्‍सी- सभागार-मे सगर राति दीप जरय केर 87म गोष्‍ठी ‘कथा तिलजुगा’क शुभारम्‍भ 6:30 बजे भेल। जेकर उद्घाटन सम्‍मिलित रूपे केलैन, नेतरहाट उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालयक पूर्व प्राचार्य डॉ. दुर्गा प्रसाद साहू, हरि प्रसाद साह महाविद्यालयक पूर्व एवं वर्तमान प्राचार्य द्वय डॉ राम अशीष सिंह, डॉ. विमल कुमार राय, प्रखण्‍ड विकास पदाधिकारी श्री सुशील कुमार, जिला पार्षदक पूर्व सदस्‍या श्रीमती आशा देवी, श्‍यामा रेसिडेन्‍सीक निर्माणकर्ता श्री सत्‍य नारायण प्रसाद साहु तथा सी.एम.बी. कॉलेजक हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष सह मैथिली साहित्‍यक चर्चित साहित्‍यकार प्रो. धीरेन्‍द्र कुमार। अवसरपर श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ स्‍व रचित गीत- “करू स्‍वागत स्‍वीकार हे प्रियवर, हम नै अपनेक योग्‍य...।”सँ स्‍वागत केलैन, तथा धन्‍यवाद ज्ञापनक संग स्‍वागत-भाषण केलैन, प्रोफेसर द्वय डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. श्रीमोहन झा। ऐ तरहें उद्घाटन सत्रसँ पोथी लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल। सत्रक मुख्‍य अतिथि, बिहार अति पिछड़ा प्रकोष्‍ठक सदस्‍य मो. शरफराज अहमद संगे विशिष्‍ठ अतिथि रहैथ- डॉ श्‍यामानन्‍द चौधरी, डॉ. सुरेन्‍द्र प्रसाद सिंह, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्री शंभु सौरभ, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री श्रीकृष्‍ण राम, श्री अजय कुमार दास, श्री नागेश्वर कामत, श्रीमती विभा कुमारी, श्रीमती अनुपम कुमारी, श्री मनोज कुमार साह उर्फ चन्‍दनजी, श्री जे. के. आनन्‍द, श्री रतन कुमार रवि, श्री विनोद कुमार गोप, श्री राम प्रवेश मण्‍डल तथा श्री रामलखन भण्‍डारी, तथा सत्रक अध्‍यक्षता केलैन- समर्पणक चेअरमेन श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल, मध्‍य विद्यालयक शिक्षक मो. ए.के. मंजूर, सामाजिक कार्यकर्ता श्री सुरेन्‍द्र प्रसाद यादव, श्री विनोद कुमार तथा मध्‍य विद्यालयक प्राचार्य श्री नारायण प्रसाद सिंह। पॉंच गोट पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे टैगोर साहित्‍य पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत एवं विदेह भाषा सम्‍मानसँ सम्‍मानित साहित्‍यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल रचित चारि गोट पोथी- ‘गुड़ा-खुद्दीक रोटी’, ‘फलहार’, ‘लजबिजी’ आ ‘गामक शकल-सूरत’ लघुकथा संग्रहक छल आ पॉंचम- ‘विदेह’ आ ‘वैदेह’ द्वय सम्‍मानसँ सम्‍मानित साहित्‍यकार श्री राजदेव मण्‍डल रचित पोथी- ‘जाल’ (पटकथा) रहए। पाँचू पोथी भरि सभागारमे वितरणो भेल। भाड़ी संख्‍यामे विद्वत-श्रोतागणक उपस्‍थिति सेहो छल। जेना- इतिहासक विभागाध्‍यक्ष प्रो. जय प्रकाश साहु, अधिवक्‍ता सह पत्रकार श्री रौशन कुमार गुप्‍ता, श्री सागर कुमार साहु, श्री विष्‍णु कुमार गुप्‍ता, श्री टुनटुन कामत, श्री राम नरेश यादव, श्री अजय कुमार गुप्‍ता, श्री आलोक कुमार ‘नाहर’, श्री राम विलास सिंह, श्री बिहारी मण्‍डल, श्री राज कुमार यादव, श्री बद्रीलाल यादव, श्री राम नारायण कामत, श्री रामकृष्‍ण ठाकुर, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री अरविन्‍द कुमार मण्‍डल, श्री राजेश पासवान, श्री संजीव कुमार, ई. आशुतोष कुमार, श्रीमती आराधना मिस्‍टी, श्री चन्‍द्र भूषण झा ‘राधव’, श्री मनोज कुमार झा, श्री राजकुमार मिश्र, श्री अरविन्‍द यादव, श्री विनय कुमार रूद्र, श्री बिलट मण्‍डल, श्री रामबाबू कामत, श्री दशरथ प्रसाद यादव, श्री राम अशीष मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी मण्‍डल, डॉ. विष्‍णुदेव ठाकुर, श्री गोपाल गिरि, श्री राजाराम यादव, संतोष कुमार पाण्‍डेय, श्री सत्‍य नारायण महतो, सुश्री काजोक कुमारी, श्री मदन महतो, श्री शम्‍भु कमार साह, श्री योगीलाल कामत, श्री हजारी प्रसाद साहु, तथा अवकाश प्राप्‍त शिक्षक श्री अशर्फी साहु इत्‍यादि-इत्‍यादि। क्रमश: आगू बढ़ैत कथा सत्रमे प्रवेश कएल...। ऐ सत्रक अध्‍यक्षता केलैन ‘सखारी-पेटारी’ कथा संग्रहक कथाकार श्री नन्‍द विलास राय, ‘रथक चक्का उलैट चलै बाट’क कवि श्री राम विलास साहु, ‘उलहन’ कथा संग्रहक कथाकार श्री कपिलेश्वर राउत तथा अशर्फी दास साहु समाज इण्‍टर महिला महाविद्यालय- निर्मली केर मैथिली विभागाध्‍यक्ष प्रो. हेम नारायण साहु। सात पालीमे विभक्‍त पच्‍चीस गोट कथा पाठ भेल, समीक्षा भेल। ऐ तरहें तीनू सत्रक समापन भेल। जेकर संचालक छला- श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री भारत भूषण झा, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल तथा श्री उमेश मण्‍डल। अन्‍तिम सत्र ‘अगिला गोष्‍ठी केतए’मे प्रवेश भेल। चारि गोट प्रस्‍ताव आएल, पहिल- श्री रोहित कुमार सिंहक दरभंगा लेल मार्च 2016. श्री दुखन प्रसाद यादवक ‘धबही’ लेल जून 2016 तथा दिसम्‍बर 2015क गोष्‍ठी लेल दूटा, प्रथम- श्री कमलेश झाक ‘डखराम’ लेल तथा श्री राजदेव मण्‍डलक ‘रतनसारा-मुसहरनियॉं’ लेल। सभामे बैसल समस्‍तक विचारपर अध्‍यक्ष मण्‍डल द्वारा निर्णय भेलैन- डखराम। अत: अगिला गोष्‍ठी श्री कमलेश झाक संजोजकत्‍वमे दरभंगा जिलाक बेनीपुर अनुमण्‍डल अन्‍तर्गत ‘डखराम’ गाममे होएत। भावी संयोजक श्री कमलेश झाकेँ वर्तमान संयोजक श्री उमेश मण्‍डल दीप तथा पंजी समर्पित केलैन। अन्‍तमे, धन्‍यवाद ज्ञापनमे, बाहरसँ आएल साहित्‍यकार, स्‍थानीय साहित्‍यकार एंव सहयोगी तथा विशेष सहयोगीकेँ संयोजक धन्‍यवाद-नमन केलैन। ऐ तरहें सगर रातिक कथा शेष भेल। निम्न अछि- क्रमानुसार पठित कथाक नओं, कथाकारक नाओं, तथा समीक्षकक सुची, संगे सगर राति दीप जरय समिति- निर्मली केर सक्रिय कार्यकर्ता, संचालक तथा विशेष सहयोगीक सेहो। कथा पाठ एवं समीक्षा : पहिल पाली- १. फ्रेण्‍ड : पल्‍लवी कुमारी २. सभसँ कठिन जातिक अपमान : रतन कुमार ‘रवि’ ३. अवाक् : राजदेव मण्‍डल समीक्षा : डॉ. विमल कुमार राय, डॉ. श्‍यामानन्‍द चौधरी, डॉ. राम अशीष सिंह। दोसर पाली- ४. अवसरवाद : अजय कुमार दास ५. ऊपर फरकी मामीक सराध : लक्ष्‍मी दास ६. हाथी आ मूस : जगदीश प्रसाद मण्‍डल समीक्षा : श्री कमलेश झा, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल (बनरझूला) श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल। तेसर पाली- ७. बबाजीक मकड़जाल : संजीव कुमार ‘शमा’ ८. शैतान आ भगवान : दुर्गानन्‍द मण्‍डल ९. सहोदरा नै बना पेलौं : उमेश मण्‍डल समीक्षा : डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. विमल कुमार राय, डॉ. श्‍यामानन्‍द चौधरी, डॉ. राम अशीष सिंह। चारिम पाली- १०. समाजक हाल : रोहित कुमार सिंह ११. इज्‍जतक सवाल : राम विलास साहु १२. हैवानक संग सधमुहोँ : दुखन प्रसाद यादव १३. बाल बोध : शम्‍भु सौरभ १४. एक दिन हमरो : शारदा नन्‍द सिंह समीक्षा : श्री फागु लाल साहु, श्री सुशील कुमार साह, श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’। पॉंचिम पाली- १५. सिद्धि साध्‍ये : उमेश नारायण कर्ण ‘कल्‍पकवि’ १६. श्रोता : अशोक कुमार मिश्र १७. फ्रॉडिज्‍म : शिव कुमार मिश्र १८. कर्मक फल : फागु लाल साहु समीक्षा : श्री राजदेव मण्‍डल, श्री रतन कुमार ‘रवि’, श्री कमलेश झा। छठम पाली- १९. आब कहू : नन्‍द विलास राय २०. हमर समाज : कौशल झा २१. खुशी : पंकज कुमार ‘प्रभाकर’ २२. मौखिक : राधाकान्‍त मण्‍डल २३. मनुखक मोल : सुशील कुमार समीक्षा : श्री राम विलास साहु, श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री उमेश मण्‍डल। सातम पाली- २४. एकटा आर : शारदानन्‍द सिंह २५. बरियातीमे गारि : लक्ष्‍मी दास समीक्षा : डॉ श्‍यामानन्‍द चौधरी, श्री कमलेश झा। ....................... श्री संजय कुमार मण्‍डल, श्री सत्रुघ्‍न कुमार मण्‍डल, श्री विनोद ठाकुर, श्री सुजीत कुमार साहु, श्री अखिलेश कुमार मण्‍डल, श्री शशि भूषण कुमार, श्री संतोष कुमार राय आदि। श्री सुरेश महतो, श्री मुकुल प्रसाद साहु, श्री सुरेन्‍द्र प्रसाद यादव, श्री विनोद कुमार तथा उमेश मण्‍डल। श्री सत्‍य नारायण प्रसाद साहु, श्री नारायण प्रसाद सिंह, श्री पिंकु पंसारी, श्री राम प्रकाश साहु, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री प्रभाष कुमार कामत, श्री मनोज कुमार शर्मा, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री रामनाथ गुप्‍ता, श्री राम लखन भण्‍डारी, श्री अखिलेश चौधरी, श्री राम सुन्‍द्रर साहु, प्रो. धीरेन्‍द्र कुमार तथा डॉ. विमल कुमार राय...। समाद : पुनम मण्‍डल। 86म दीप सरग राति जरल मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमण्‍डलक ‘लकसेना’ गाममे 20 जून 2015 केँ 86म ‘सगर राति दीप जरय’ (कथा-साहित्‍य गोष्‍ठी) क आयोजन ‘उन्‍मुक्‍त’क सौजन्‍यसँ श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’क संयोजकत्‍वमे आयोजित भऽ सफल भेल। ऐ अवसरिपर श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा पोथी क्रमश: ‘पसेनाक धरम’ आ ‘मधुमाछी’ (लघु कथा संग्रह)क लोकार्पणक संग वितरण भेल। संगे हालहिमे प्रकाशित डॉ. रंगनाथ दिवाकार (मूल नाम- रंगनाथ चौधरी)क लधु कथा संग्रह ''भखरैत नील रंग'' किछु कथाकारकेँ देल गेलनि। अगिला गोष्‍ठीसुपौल जिला अन्‍तर्गत ‘निर्मली’मे हएत से सर्वसम्‍मतिसँ निर्णए भेल। फोटोक संग ब्रेकिंग न्‍यूज निम्न अछि- संयोजक- श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ आयोजक- उन्‍मुक्‍त उद्घाटन- डॉ. खुशीलाल मण्‍डल, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री भोगेन्‍द्र यादव ‘भाष्‍कर’, श्री कमलेश झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री राजदेव मण्‍डल, डॉ. शिव कुमार प्रसाद। दू शब्‍द- श्री कमलेश झा, श्री नन्‍द विलास राय, श्री बाल गोविन्‍द यादव ‘गोविन्‍दाचार्य’ अध्‍यक्ष मण्‍डल- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल (बनरझूला), श्री भोगेन्‍द्र यादव ‘भाष्‍कर’ (अवकाश प्राप्‍त शिक्षक), डॉ. शिव कुमार प्रसाद, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल आ श्री कमलेश झा। संचालन समिति- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल आ उमेश मण्‍डल पोथी लोकार्पण- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा लघु कथा संग्रह क्रमश: (1) पसेनाक धरम, (2) मधुमाछी। पहिल पोथीक लोकार्पण कर्ता- प्रो. खुशीलाल मण्‍डल, प्रो. राम विलास राय आ डॉ.योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’। दोसर पोथीक लोकार्पण कर्ता- श्री भोगेन्‍द्र यादव ‘भाष्‍कर’, श्री रतन कुमार ‘रवि’ आ श्री कमलेश झा। कथा पाठ- पहिल सत्र- (1) चोरविद्या- पल्‍लवी कुमारी (2) केतौ किछु होउ- लक्ष्‍मी दास (3) टोन- दीन बन्‍धु झा समीक्षा- श्री कमलेश झा, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री राजदवे मण्‍डल, बाल गोविन्‍द यादव ‘गोविन्‍दाचार्य’ दोसर सत्र- (4) भगवनान भरोष- ललन कुमार कामत (5) सपनेमे बीति गेल जिनगी- संजीव कुमार ‘शमा’ (6) शबनम- उमेश नारायण कर्ण (7) मुड़नक मुर- उमेश मण्‍डल समीक्षा- श्री राम विलास साहु, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री शम्‍भु ‘सौरभ’, दुर्गा नन्‍द मण्‍डल (बनरझूला) तेसर सत्र- (8) सस्‍ता रोबे वार-वार- डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’ (9) गंगा सुखा गेल- डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’ (10) गंगा नहाएब- राम विलास साहु (11) टुटैसँ बँचि गेल- दुर्गानन्‍द मण्‍डल समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री भोगेन्‍द्र यादव ‘भाष्‍कर’, श्री संजीव कुमार ‘शमा’, श्री राजदेव मण्‍डल आ उमेश मण्‍डल। चारिम सत्र- (12) शिक्षाक अन्‍तिम उद्देश्‍य- नन्‍द विलास राय (13) वेस्‍तता- बेचन ठाकुर (14) छोटू- शम्‍भु सौरभ समीक्षा- श्री शारदा नन्‍द सिंह, श्री कमलेश झा, श्री अजय कुमार ‘पिण्‍टू’ पाँचम सत्र- (15) तितल बिलाड़ि- शिवकुमार मिश्र (16) आब कहिया चेतब- कपिलेश्वर राउत (17) लाचारी- गौड़ी शंकर साह समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री नन्‍द विलास राय। छठम सत्र- (18) पहपटि- जगदीश प्रसाद मण्‍डल (19) इजोरिया राति- जगदीश प्रसाद मण्‍डल (20) खलिया बन्‍दूक भटाभटि- शारदा नन्‍द सिंह समीक्षा- श्री कमलेश झा, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’, डॉ. शिवकुमार प्रसाद, श्री बाल गोविन्‍द ‘गोविन्‍दाचार्य’, श्री दुर्गा नन्‍द मण्‍डल (बनरझूला) ८५ म सगर राति दीप जरय ‘कथा गंगा’मे सगर राति दीप जरल- ‘सगर राति दीप जरय’ एक ओहन मंचक नाओं छी, जइ मंचपर सभ वर्गक साहित्‍यकार भाग लइ छथि, जाइ-अबै छथि तथा भाषा-साहित्‍यक विकासक लेल विचार-विमर्श करै छथि। तँए ई ‘सगर राति दीप जरय’ मैथिली भाषा-साहित्‍यक सभसँ श्रेष्‍ठ मंच कहबैत अछि। एकर आयोजन जगह-जगह प्राय: तीन मासक अन्‍तरालपर १९९० ई.सँ होइत आबि रहल अछि। ८५म गोष्‍ठी श्री ओम प्रकाश झाक संयोजकत्‍व आ मिथिला परिषद केर प्रस्‍तुतिमे भागलपुरक द्वारिकापुरी स्‍थित ‘श्‍याम कुंज’मे आयोजित भेल जेकर उद्धघाटन वरिष्‍ठ समालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंह, ‘विदेह’ एवं टैगोर सम्मानसँ सम्मानित साहित्‍यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, तिलकामाझी विश्वविद्यालयक मैथिली विभागाध्‍यक्ष डॉ. केष्‍कर ठाकुर, डॉ. शिव प्रसाद यादव एवं अवकाश प्राप्‍त शिक्षक दुखमोचन झा संयुक्‍त रूपे दीप नेसि केलनि। पछाति एक विशिष्‍ठ अध्‍यक्ष मण्‍डल एवं संचालन समितिक निर्माण करि गोसाउनिक गीत, स्‍वागत गान एवं स्‍वस्‍ति वाचनसँ साँझक छह बजे गोष्‍ठीक शुभारम्‍भ भेल, रातिक १२:३० बजे घण्‍टा भरिक भोजनावकाश भेल, जइ शुन्‍यकालमे, भोजनक पछाति, संयोजक- सह गजलकार ओम प्रकाशजी अपन नव रचित दूटा गजल सुना कथाकार सभ साहित्‍यकार-साहित्‍य प्रेमीकेँ साहित्‍य-रसमे बोरि देलनि। पुन: कथा पाठ आ समीक्षाक क्रमकेँ आगू बढ़ौल गेल। जे चलैत-चलैत भिनसर छह बजेमे आबि अध्‍यक्षीय उद्बोधनक संग संयोजकक धन्‍यवाद ज्ञापन तथा दीप-पंजीक हस्‍तांतरणक पछाति इति भेल। ऐ गोष्‍ठीमे दूर-दूरसँ आएल साहित्‍यकार-कथाकार-समीक्षक एवं श्रोताक तथा स्‍थानीय साहित्‍यकार-कथाकारक संग कथा प्रेमीक बेस जमघट ताधरि बनल रहल जाधरि अगिला गोष्‍ठीक निर्णयक संग आयोजित गोष्‍ठीक समापनक घोषणा नहि कएल गेल। ८६म आयोजन मधुबनी जिला अन्‍तर्गत फुलपरास प्रखण्‍डक महिन्‍दवार पंचायतक ‘लकसेना’ गाममे होएत, जइमे पहुँचैक हकार दैत भावी संयोजक श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’जी कहलनि- ‘अधिक-सँ-अधिक कथाकार-साहित्‍यकार-समीक्षक सभकेँ लकसेना गामक ८६म कथा गोष्‍ठीमे सुआगत छन्‍हि।’ ८५म गोष्‍ठीक अध्‍यक्ष मण्‍डल, संचालन समिति, कथायात्राक मादे दू शब्‍द, पोथी लोकार्पण, कथा पाठ एवं समीक्षा-टिप्‍पणीक विवरण निच्‍चाँमे देल जा रहल अछि- अध्‍यक्ष मण्‍डल- डॉ. प्रेम शंकर सिंह, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. केष्‍कर ठाकुर, श्री विवेकानन्‍द झा ‘बीनू’ श्री राजदेव मण्‍डल, श्री श्‍यामानन्‍द चौधरी। संचालन समिति- श्री दुगानन्‍द मण्‍डल, श्री पंकज कुमार झा एवं उमेश मण्‍डल। कथायात्राक मादे दू शब्‍द- प्रो. केष्‍कर ठाकुर, पो. प्रेम शंकर सिंह, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री विवेकानन्‍द झा ‘बीनू’ गोसाउनिक गीत- श्रीमती निक्की प्रियदर्शनी आ स्वीटी कुमारी। स्‍वस्‍ति वाचन- श्री शिव कुमार मिश्र। पोथी लोकापर्ण- अपन मन अपन धन (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक उकड़ू समय (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक लोकार्पण कर्ता- डॉ. केष्‍कर ठाकुर डा. प्रेम शंकर सिंह पहिल सत्रमे कथा पाठ- (१) लगक दूरी- निक्की प्रियदर्शनी (२) गहींर आँखिक बेथा- ओम प्रकाश झा (३) डोमक आगि- रामविलास साहु (४) शिवनाथ कक्काक डायरी- अखिलेश मण्‍डल। समीक्षा-टिप्‍पणी, पहिल सत्रक- डॉ. शिव कुमार प्रसाद, उमेश मण्‍डल, डॉ. शिव प्रसाद यादव एवं श्री नन्‍द विलास राय। दोसर सत्रमे कथा पाठ- (५) हमर बाइनिक विचार- जगदीश प्रसाद मण्‍डल (६) प्राश्चित- गौड़ी शंकर साह (७) मजाकेमे चलि गेलौं- लक्ष्‍मी दास। समीक्षा- श्री राम सेवक सिंह, प्रो. केष्‍कर ठाकुर, श्री श्‍यामानान्‍द चौधरी, डॉ. प्रमोद पाण्‍डेय। तेसर सत्रमे कथा पाठ- (८) जीन्‍स पेन्‍ट- नन्‍द विलास राय (९) लाल नुआँ- शम्‍भु सौरभ (१०) धोइते-धोइते भगवान बना देबइ- उमेश मण्‍डल (११) धर्म आ धार्मिक- दुख मोचन झा समीक्षा- श्री ओम प्रकाश झा, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, डा. शिव प्रसाद यादव, श्री राजदवे मण्‍डल। चारिम सत्रमे कथा पाठ- (१२) अनमेल बिआह- शिव प्रसाद यादव (१३) मुरझाएल फूल- कपिलेश्वर राउत (१४) पुत्रक कर्तव्‍य- नारायण झा (१५) भूख- पंकज कुमार झा (१६) बेसी भऽ गेल आब नहि- हेम नारयण साहु। समीक्षा- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री विनोदानन्‍द झा ‘बीनू’, डॉ. शिव कुमार प्रसाद। पाँचिम सत्रमे कथा पाठ- (१७) भीखमंगा- प्रकाश कुमार झा (१८) भोला- ललन कुमार कामत (१९) विधवा बिआह- बेचन ठाकुर (२०) होटलमे पुकार- दुखन प्रसाद यादव (२१) चोंचाक खोंता- उमेश नारायण कर्ण समीक्षा- श्री श्‍यामानन्‍द चौधरी, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, राजदेव मण्डल ‘रमण’ छठिम सत्रमे कथा पाठ- (२२) अपन घर- राजदेव मण्‍डल (२३) चीफ गेष्‍ट- शिव कुमार मिश्र (२४) मायाक तागत- राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ (२५) आमक ठाढ़ि- शिव कुमार प्रसाद (२६) हेराएल कोदारि- शिव कुमार प्रसाद (२७) डिजाइनवाली कनियाँ- शारदा नन्द सिंह समीक्षा- उमेश मण्‍डल, नन्‍द विलास राय, श्‍यामानन्‍द चौधरी एवं हेम नारायण साहु। समाद- उमेश मण्‍डल। ८४म सगर राति दीप जरय ८४म सगर राति दीप जरय २० दिसम्‍बरक साँझमे शुरू भ' २१ दिसम्‍बर २०१४क भिनसरमे सम्‍पन्न भेल। ८५म आयोजन भागलपुरमे श्री ओम प्रकाश झा केर संयोजकत्‍वमे मार्च २०१५क अन्‍तिम शनिकेँ होएत। ई निर्णए अध्‍यक्ष मण्‍डल एवं संचालन समिति तथा गोष्‍ठीमे उपस्‍थित सबहक विचारसँ भेल। ओना प्रस्‍ताव श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ जीक सेहो रहनि जे लकसेना (मधुबनी)मे हुअए। मुदा सर्वसम्‍मति भागलपुरेक रहल। अत: दीप आ पंजी वर्तमान गोष्‍ठीक संयोजक भावी संयोजककेँ देलखिन। संचालन समितिमे दुर्गानन्‍द मण्‍डल, ओम प्रकाश झा तथा उमेश मण्‍डल छला आ अध्‍यक्ष मण्‍डलमे शिव कुमार प्रसाद, श्‍यामानन्‍द चौधरी तथा सच्‍चिदानन्‍द ‘सचिद’। मो. गुल हसन एवं फिरोज आलम स्‍वागत गीत गौलनि, एवं स्‍वतीवाचन शिवकुमार मिश्र। तीन सत्रमे निम्न कार्यक्रमानुसार ऐ गोष्‍ठीक भरि रातिक यात्रा भेल- उद्घाटन सत्र- परिचए-पात तथा दू शब्‍द- उद्घाटनकर्ता- श्‍यामानन्‍द चौधरी जगदीश प्रसाद मण्‍डल पं. सच्‍चिदानन्‍द मिश्र ‘सचिद’ मिहिर झा महादेव ओम प्रकाश झा शिव कुमार प्रसाद राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ पोथी लोकार्पण सत्र- (१) डीहक जमीन (विहनि/लघु कथा संग्रह) ओम प्रकाश झाजी केर लोकार्पणकर्ता- जगदीश प्रसाद मण्‍डल, उमेश नारायण कर्ण, राम विलास साहु। (२) समरथाइक भूत (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा सच्‍चिदानन्‍द ‘सचिद’ शम्‍भु सौरभ (३) गामक शकल-सूरत (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- श्‍यामानन्‍द चौधरी अनुप कुमार कश्‍यप राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ उमेश नारायण कर्ण (४) अप्‍पन-बीरान (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- बेचन ठाकुर फागुलाल साहु मिहिर झा महादेव रामाकान्‍त मिश्र (५) बाल-गोपाल (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- संजय कुमार मण्‍डल सूर्य नारायण कामत (सूरज कामत) शम्‍भु सौरभ शिव कुमार प्रसाद (६) लजबिजी (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- बमभोली झा दुर्गानन्‍द मण्‍डल शिव कुमार प्रसाद गांधी प्रसाद (सरपंच) (७) पतझाड़ (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा श्‍यामानन्‍द चौधरी राम विलास साहु नन्‍द विलास राय (८) रटनी खढ़ (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी केर लोकार्पणकर्ता- अरविन्‍द चौधरी अनुप कुमार कश्‍यप कपिलेश्वर राउत मो. गुल हसन (९) शिव दर्शन (पद्य) पं. सच्‍चिदानन्‍द मिश्र लोकार्पणकर्ता- ओम प्रकाश झा शम्‍भु सौरभ शिव कुमार प्रसाद कपिलेश्वर राउत (१०) अभिलाषा (मैथिली भजनमाला) पं. सच्‍चिदानन्‍द मिश्र लोकार्पणकर्ता- श्‍यामानन्‍द चौधरी बेचन ठाकुर (सरिसव पाही) (११) सीडी लोकार्पण- (१) मैथिली गजल: आगमन ओ प्रस्‍थान बिंदु (आलोचना संकलन) सं.सं- गजेन्‍द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्‍हारजी केर (२) सखुआवाली (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्‍डलक (३) निर्मल सनेस (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्‍डलक (४) देवघरक प्रसाद (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- उमेश मण्‍डलक (५) कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा- (विहनि/लघु कथा संग्रह) सं.सं- विदेह- सम्‍मिलित रूपे लोकार्पण- जगदीश प्रसाद मण्‍डल शिव कुमार प्रसाद ओम प्रकाश झा राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ कपिलेश्वर राउत। कथा सत्र- कथा पाठ एवं समीक्षा- पहिल पालीमे- लोकतंत्रक माने- ओम प्रकाश झा- टेटरा हीरा- नन्‍द विलास राय- समीक्षा- श्‍यामानन्‍द चौधरी फागुलाल साह शिव कुमार प्रसाद अनुप कुमार कश्‍यप। दोसर पाली- पवित्र पापी- उमेश नारायण कर्ण- जाति-पाति- दुर्गानन्‍द मण्‍डल समीक्षा- राम विलास साहु राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ संयज कुमार मण्‍डल मिहिर झा महादेव तेसर पाली- एकर उत्तरदायी के?- शम्‍भु सौरभ कमतिया हवेली- राम विलास साहु समीक्षा- उमेश मण्‍डल फागुलाल साहु सच्‍चिदा नन्‍द झा ‘सचिद’ बेचन ठाकुर (नाटकार) चारिम पाली- खेती-वाड़ी- बेचन ठाकुर डीहक जमीन- ओम प्रकाश झा समीक्षा- शिव कुमार प्रसाद मिहिर कुमार झा बमभोली झा शम्‍भु सौरभ पाँचिम पाली- बिआह- गौड़ी शंकर साह इन्‍फेक्‍शन- फागुलाल साहु समीक्षा- कपिलेश्वर राउत राम विलास साहु शशिकान्‍त झा उमेश नारायण कर्ण छठिम पाली- पाँच भूत- उमेश नारायण कर्ण जरि गेल माइक आस- विपिन कुमार कर्ण समीक्षा- कपिलेश्वर राउत नन्‍द विलास राय ओम प्रकाश झा अनुप कुमार कश्‍यप सातिम पाली- शिव विद्यापति- सच्‍चिदानन्‍द ‘सचिद’ भरम- लक्ष्‍मी दास कलयुगक निर्णए- कपिलेश्वर राउत समीक्षा- शम्‍भु सौरभ जगदीश प्रसाद मण्‍डल श्‍यामानन्‍द चौधरी। अंतमे अध्‍यक्षीय भाषण तथा धन्‍यवाद ज्ञापन। ८३म सगर राति दीप जरय मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रसि‍द्ध सर्वहारा मंच “सगर राति‍ दीप जरय” केर ८३म कथा गोष्‍ठी फुलपरास अनुमण्‍डलक सखुआ-भपटि‍याही गामक उत्‍क्रमि‍त मध्‍य वि‍द्यालय परि‍सरमे दि‍नांक ३० अगस्‍तक (२०१४) साँझ छह बजेसँ शूरू भऽ ३१ अगस्‍तक भि‍नसर छह बजे धरि‍ आकर्षक अध्‍यक्ष मण्‍डल तथा संचालन समि‍ति‍ केर अन्‍तर्गत चलैत रहल। अध्‍यक्ष मण्‍डलमे डा. वि‍मल कुमार राय, डा. योगेन्‍द्र पाठक ‘वि‍यागी’, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री कमलेश झा, तथा डा. शि‍वकुमार प्रसाद रहथि‍, तहि‍ना मंचक संचालन समि‍ति‍मे श्री ओम प्रकाश झा, श्री राजदेव मण्‍डल आ श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल छला। जहि‍ना जन सहयोगसँ ई गोष्‍ठी आयोजि‍त छल तहि‍ना भपटि‍याही, सखुआ, छजना, नरहि‍या, निर्मली, औरहा, बेरयाही, सुरयाही, रतनसारा, चतरापट्टी, नवटोली, कदमपुरा, पकड़ि‍या, लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, गम्‍हरि‍या, बेलही इत्‍यादि‍ गामक तथा टोलक साहि‍त्‍य प्रेमीक उपस्‍थि‍ति‍ छल। नव-नव साहि‍त्‍य प्रेमी सोझाँ एला। पठि‍त कथापर त्‍वरि‍त समीक्षा/टि‍प्‍पणी दऽ केतेक गोटे अपन नव परि‍चए बनौलनि‍, देलनि‍ आ सोझा एला। जे सगर राति‍ दीप जरय’क उदेस रहल अछि‍। उपस्‍थि‍त साहि‍त्‍यकार सभ अह्लादि‍त भेला। केते गोटे अपन वि‍चार सेहो मंचेपर व्‍यक्‍त केलनि‍ जे अहि‍ना गोष्‍ठी जँ गाम-घरमे हएत तँ नव-नव लोकक प्रवेश स्‍वत: साहि‍त्‍य क्षेत्र होइत रहत, जइसँ समाजक संग साहि‍त्‍य डेग-मे-डेग मि‍ला कऽ चलत आ चलैत रहत। जइसँ जनजागरण हएत आ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक मध्‍य एक खास अभावक पूर्ति सेहो हएत। नारी केन्‍द्रि‍त गोष्‍ठी भेने नारी वि‍मर्श करैत अनेक कथा आएल। कथा मध्‍य ढेर रास नारी-समस्‍याकेँ चि‍न्हि‍त कएल गेल। समीक्षक लोकनि‍ अपन-अपन मत दैत भरि‍ राति‍क यात्राकेँ सफल बनौलनि‍। गामक कि‍छु नारीओ गोष्‍ठीमे एक श्रोता रूपमे उपस्‍थि‍त छेली। गोष्‍ठीक आरम्‍भ सामुहि‍क रूपेँ वि‍धि‍वत् दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ स्‍थानीय डा. वि‍मल कुमार राय, श्री सूरज नारायण राय ‘सुमन’, संग-संग कलकत्तासँ आएल डा. योगेन्‍द्र पाठक ‘वि‍याेगी’, भागलपुरसँ आएल श्री ओम प्रकाश झा एवं बेरमासँ आएल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी द्वारा करौल गेल। छह पालीमे कुल २७ गोट नूतन वि‍हनि/लघु कथाक पाठ भेल। समीक्षा भेल, दर्जन भरि‍ पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे दू गोट पोथी क्रमश: “कारू खि‍रहरि” आ “संत कारू खि‍रहरि” अयोधी यादव ‘अमर’क। आ पाँच गोट लघु कथाक पोथीक साॅफ्ट कौपी क्रमश: “अप्‍पन-बीरान”, “पतझाड़”, “बाल-गोपाल”, “रटनी खढ़” तथा नारी केन्‍द्रि‍त कथा संग्रह “लजबि‍जी” जगदीश प्रसाद मण्‍डलक तहि‍ना दूटा पटकथा पहि‍ल “जाल” आ दोसर “पंचैती” राजदेव मण्‍डलक, एकटा कवि‍ता संग्रह “सूखल मन तरसल आँखि‍” मुन्नी कामतक आ बेचन ठाकुरक एकटा नाटक “भोँट” लोकार्पि‍त भेल। ८४म सगर राति‍ दीप जरयक आयोजन झंझारपुर अनुमण्‍डलक बेरमा गाममे शि‍वकुमार मि‍श्र जीक संयोजकत्‍वमे २० दि‍सम्‍बर-२०१४केँ होएत। बेरमा गाममे ७१म कथा गोष्‍ठी दि‍नांक ०२.१०.२०१०केँ मध्‍य वि‍द्यालय परि‍सर-बुढ़ि‍या गाछी-दुर्गा स्‍थान-मे भेल छल। एतेक दि‍नमे ई दोसर खेप छी। अन्‍तमे संयोजक नन्‍द वि‍लास राय स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमी, जि‍नका सबहक वि‍शेष सहयोग छल ऐ आयोजनमे, तइ सभ बेक्‍तीकेँ धैनवाद ज्ञापन केलनि‍। संग-संग श्री गजेन्‍द्र ठाकुर दि‍ससँ श्रुति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त मैथि‍लीक आधुनि‍क पोथी, सभ गोटेकेँ मंचेपर देल गेलनि‍। वि‍शेष सहयोगी सबहक नाओं ऐ तरहेँ अछि‍- डा. वि‍मल कुमार राय, श्री धीरेन्‍द्र कुमार, श्री सूरज नारायण राय, श्री अशोक कुमार राय, श्री सुन्‍दर लाल साह, मो. रि‍जवान, श्री सि‍याराम साह, श्री शम्‍भू सिंह, श्री यादव, श्री उमाकान्‍त राय, श्री जगत नारायण राय, श्री ब्रजनन्‍दन साह, श्री उमेश साह, श्री सुधीर साह, श्री रामकुमार मण्‍डल, श्री सत्‍य नारायण सिंह आ श्री लक्ष्‍मी मण्‍डल। ब्रेकिंग- अध्‍यक्ष मण्‍डल- डा. वि‍मल कुमार राय, डा. योगेन्‍द्र पाठक ‘वि‍यागी’, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री कमलेश झा, डा. शि‍वकुमार प्रसाद। संचालन समि‍ति‍- श्री ओम प्रकाश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल। कथा पाठ एवं समीक्षा- पहि‍ल सत्रमे- जगदीश प्रसाद मण्‍डल- “गावीस मोइस”; शारदानन्‍द सिंह- “की करब से अहीं कहू”; राजदेव मण्‍डल- “दोख केकर” तथा लक्ष्‍मी दास- “गंगाजलक धोल” समीक्षा- योगेन्‍द्र पाठक ‘ि‍वयोगी’, कमलेश झा, वि‍मल कुमार राय, शि‍वकुमार प्रसाद, गौड़ी शंकर साह। दोसर सत्रमे- दुर्गानन्‍द मण्‍डल- “छुतहरि‍”; कपि‍लेश्वर राउत- “बड़का खीरा”, योगेन्‍द्र पाठक वि‍यागी- “वि‍जय दृश्‍य-१, वि‍जय दृश्‍य दू-२”; ललन कुमार कामत- “बेटी” समीक्षा- फागुलाल साहु, राजदेव मण्‍डल, अयोधी यादव ‘अमर’, कमलेश झा आ शि‍वकुमार प्रसाद। तेसर सत्र- ओम प्रकाश झा- बेटीक बि‍याह, शि‍व कुमार प्रसाद- “झमकी”; राम ि‍वलास साहु- “अवि‍सबास”; हेम नारायण साहु- “बेसी भ’ गेल आब नै” समीक्षा- उमेश मण्‍डल, शम्‍भु सौरभ, दुर्गानन्‍द मण्‍डल। चारि‍म सत्र- उमेश मण्‍डल- “कोटाक चाउर”; फागुलाल साहु- “मर्दानी नारी”; शम्‍भु सौरभ- “लाजो”; शि‍व कुमार मि‍श्र- “बाल वि‍धवा” समीक्षा- कमलेश झा, ओम प्रकाश झा, राजदेव मण्‍डल, उमेश नारायण कर्ण तथा दुर्गानन्‍द मण्‍डल। पाँचि‍म सत्र- ओम प्रकाश झा- “कुलच्‍छनी”; गौड़ी शंकर साह- “छोटकी”; उमेश नारायण कर्ण- “यूज एण्‍ड थ्रो”; अच्‍छेलाल शास्‍त्री- “गुलटेनमा”; नन्‍द वि‍लास राय- “दि‍व्‍या” समीक्षा- कमलेश झा, दुर्गानन्‍द मण्‍डल, राम कुमार मण्‍डल, फागुलाल साहु, राजदेव मण्‍डल। छअम सत्र- राम वि‍लास साहु- “बौआ बाजल”; फागुलाल साहु- “चतुर बालक”; जगदीश प्रसाद मण्‍डल- “रेहना चाची”; शारदा नन्‍द सिंह- “फक द’ नि‍साँस छूटल”; डाॅ. कीर्ति नाथ झा- (वाचक- उमेश मण्‍डल) “शेफाली, फुलपरासवाली आ हम” समीक्षा- अयोधी यादव, ओम प्रकाश झा, शम्‍भू सौरभ, ललन कुमार कामत, शि‍व कुमार मि‍श्र। पोथी लोकार्पणकर्ता डा. योगेन्‍द्र पाठक ‘वि‍योगी’/श्री कमलेश झा/श्री रामकुमार मण्‍डल- “कारु खि‍रहरि‍” अयोधी यादव ‘अमर’क श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल/ श्री राजदेव मण्‍डल/ डा. वि‍मल कुमार राय/ डा. शि‍वकुमार प्रसाद/ श्री शम्‍भु सौरभ- “संत कारू खि‍रहरि” अयोधी यादव ‘अमर’क श्री फागुलाल साहु- “सूखल मन तरसल आँखि‍” (कवि‍ता संग्रह)- मुन्नी कामतक श्री शम्‍भु सौरभ- “कथा कुसुम” (वि‍हनि‍/लघु कथा संग्रह) दुर्गानन्‍द मण्‍डलक श्री ब्रजनन्‍दन साह- “भोँट” (नाटक) बेचन ठाकुरक श्री हेम नारायण साहु- “पंचैती” (पटकथा) राजदेव मण्‍डलक श्री शि‍व कुमार मि‍श्र- “जाल” (पटकथा) राजदेव मण्‍डलक श्री कमलेश झा- “अपन-बि‍रान” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक श्री उमेश नारायण कर्ण- “पतझाड़” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक श्री फागुलाल साहु- “रटनी खढ़” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक श्री राम कुमार मण्‍डल- “बाल-गोपाल” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक श्री ओम प्रकाश झा- “लजबि‍जी” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डलक -उमेश मण्‍डल ३१/०८/२०१४ ८२म सगर राति दीप जरय 82म सगर राति‍ दीप जरए केर ब्रेकिंग न्‍यूज- स्‍थान- गजेन्‍द्र ठाकुरक नि‍ज आवास, गाम- मेंहथ, जि‍ला- मधुबनी। दि‍नांक- 31 मई 2014 (शनि‍ दि‍न) समए- संध्‍या छह बजेसँ गोष्‍ठीक नाओं- कथा बौद्ध सि‍द्ध मेहथपा सगर राति‍ दीप जरए। आयोजनक खेप- 82म आयोजन संयोजक- गजेन्‍द्र ठाकुर वि‍शेषता- बाल साहि‍त्‍यपर केन्‍द्रि‍त। गोष्‍ठीक उद्घाटन- डॉ. कमलकान्‍त झा, राज देव मण्‍डल, डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद, शि‍वकुमार मि‍श्रा तथा जगदीश प्रसाद मण्‍डल। स्‍वागत, गीत गाबि‍ केलनि‍- काशीनाथ झा ‘कि‍रण’ कथा गोष्‍ठीक अध्‍यक्षता केलनि‍- अरवि‍न्‍द ठाकुर मंच संचालन केलनि‍- आनन्‍द कुमार झा आ उमेश मण्‍डल अगि‍ला गोष्‍ठी स्‍थान- मधुबनी जि‍लाक भपटि‍याही गामक सखुआ टोलपर। अगि‍ला गोष्‍ठीक केन्‍द्रबि‍न्‍दु- स्‍त्री वि‍मर्श। आगि‍ला गोष्‍ठीक संयोजक हेता- नन्‍द वि‍लास राय। अगि‍ला गोष्‍ठीक संभावि‍त ति‍थि‍- 30 अगस्‍त 2014 (शनि‍ दि‍न) हकार देलनि‍- सामुहि‍क रूपे अगि‍ला गोष्‍ठी लेल हकार मंचपर नन्‍द वि‍लास राय देलनि‍। समीक्षा/टि‍प्‍पणीमे भाग लेलनि‍- दुर्गानन्‍द मण्‍डल, शि‍वशंकर श्रीनि‍वास, राम वि‍लास साहु, बाल गोवि‍न्‍द्र गोवि‍न्‍दाचार्य, फागुलाल साहु, नन्‍द वि‍लास राय, शि‍वकुमार मि‍श्र, नारायणजी, कमलकान्‍त झा, काशीनाथ झा कि‍रण, शि‍वकुमार प्रसाद, बि‍पि‍न कुमार कर्ण, संजीव कुमार समा, उमेश नारायण कर्ण, शारदानन्‍द सि‍ंह, जगदीश प्रसाद मण्‍डल, संजय कुमार मण्‍डल, हेम नारायण साहु, पंकज सत्‍यम इत्‍यादि‍। आठ गोट पोथीक लोकार्पण भेल- 1. बैशाखमे दलानपर- गद्य-पद्य संग्रह संग आत्‍मकथा लेखक- संदीप साफी। लोकार्पण- डाॅ. कमलकान्‍त झा, अरवि‍न्‍द ठाकुर, राजदेव मण्‍डल, सीताराम साफी 2. नेपालक नोर मरुभूमि‍मे- गद्य-पद्य संग्रह, लेखक- वि‍न्‍देश्वर ठाकुर। लोकार्पण- जगदीश प्रसाद मण्‍डल, नन्‍द वि‍लास राय, चन्‍डेश्वर खाँ। 3. उलहन- वि‍हनि‍ आ लघुकथा संग्रह, लेखक- कपि‍लेश्वर राउत। लोकार्पण- गजेन्‍द्र ठाकुर, शि‍व कुमार प्रसाद, दुर्गानन्‍द मण्‍डल। 4. On the Dice Board of the Millennium- Joity Jha Chaudhary. लोकार्पण- कमल कान्‍त झा, आनन्‍द कुमार झा, शि‍व कुमार प्रसाद। 5. The Science of Words कथा संग्रह, अनुवादक- गजेन्‍द्र ठाकुर। लोकार्पण- असीन ठाकुर, ललन कुमार कामत, अरवि‍न्‍द कुमार ठाकुर। 6. धांगि‍ बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ, गजल संग्रह, गजलकार- गजेन्‍द्र ठाकुर। लोकार्पण- बाल गोवि‍न्‍द यादव ‘गोवि‍न्‍दाचार्य’, उमेश पासवान, रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ राम सेवक ठाकुर। 7. सहस्रजि‍त- पद्य संग्रह, लेखक- गजेन्‍द्र ठाकुर, लोकार्पण- बेचन ठाकुर, राम वि‍लास साहु, हेम नारायण साहु। 8. प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना भाग- 2, आलोचक- गजेन्‍द्र ठाकुर। लोकार्पण- अरवि‍न्‍द ठाकुर, जगदीश प्रसाद मण्‍डल, फागुलाल साहु, राजदेव मण्‍डल। 33 गोट वि‍हनि‍/लघु कथाक पाठ भेल- 1. अखि‍लेश मण्‍डल- ललि‍याएल मुँह 2. ललन कुमार कामत- स्‍कूलक फीस 3. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- ‘अवाक्’ तथा ‘पल भरि’ 4. चण्‍डेश्वर खाँ- ‘रोटी’ तथा ‘भोज’ 5. लक्ष्‍मी दास- दुश्‍टपना 6. जगदानन्‍द मनु- ‘भगवानकेँ जे नीक लगनि‍’ तथा ‘बड़का बाबू’ 7. उमेश पासवान- अजोह 8. शि‍व शंकर श्रीनि‍वास- हाथी आ गीदड़ 9. बेचन ठाकुर- हरि‍या इन्‍सपेकटर 10. राम सेवक ठाकुर- मोटरीमे कथी छेलै 11. गौड़ी शंकर साह- परीक्षा 12. राम वि‍लास साहु- बोल-बोध 13. नन्‍द वि‍लास राय- अमर-मदन 14. शारदा नन्‍द सिंह- सुचीमे नाम’ तथा ‘एकर जवाबदेह के? 15. उमेश नारायण कर्ण- म्‍याऊँ म्‍याऊँ म्‍याऊँ 16. संजय कुमार मण्‍डल- एकन्‍त 17. शि‍व कुमार प्रसाद- अदि‍या 18. अजय कुमार दास ‘पि‍न्‍टूजी’- सचेतल प्रेम 19. पंकज सत्‍यम- जननायक 20. शि‍व कुमार मि‍श्र- गर्म आन्‍हर 21. दुर्गानन्‍द मण्‍डल- बुइध 22. फागुलाल साहु- माँ केर डाँट 23. राजदेव मण्‍डल- रूसल बौआ 24. कपि‍लेश्वर राउत- खराप 25. कमलकान्‍त झा- साँझक सुख 26. बि‍पि‍न कुमार कर्ण- निश्छल नारी 27. उमेश मण्‍डल- दूध 28. योगेन्‍द्र पाठक ‘वि‍योगी’- खजाना, कथा पाठ- उमेश मण्‍डल 29. गजेन्‍द्र ठाकुर- रेश 30. दीपाली झा- दादीक गाम, कथा पाठ- आनन्‍द कुमार झा 31. अरवि‍न्‍द ठाकुर- बेदरमैत ८१म सगर राति दीप जरय देवघरमे 81म सगर राति‍ दीप जरए सफलता पूर्वक सम्‍पन्न भेल :: उमेश मण्‍डल स्‍व. मायानन्‍द मि‍श्र तथा जीवकान्‍तक स्‍मृतकेँ समरपि‍त 81म सगर राति‍ दीप जरए केर आयोजन दि‍नांक 22 मार्च 2014केँ श्री ओम प्रकाश झाक संयोजकत्‍वमे संध्‍या 6 बजेसँ देवघरक बम्‍पास टॉनक बि‍जली कोठी-3 मे आयोजि‍त भेल। ओयोजनक उद्घाटन दीप प्रज्‍वलि‍त करि‍ कऽ श्री ओ.पी. मि‍श्राजी केलनि‍। मि‍थि‍लाक गाम-गामसँ आ भारतक शहर-शहरसँ आएल कथाकार, साहि‍त्‍यकार, समालोचक तथा साहि‍त्‍य प्रेमीक कसगर जुटान छल। साँझक पाँचे बजेसँ जुटान हुअ लगल। मि‍डि‍याकर्मीक थहाथही शुरू भऽ गेल। शुभारम्‍भ मंगला चरणसँ श्री एस.के. मि‍श्राजी केलनि‍। झारूदारजी अपन सृजि‍त अनुपम गीत “हम नै छी अहाँ योग यौ पाहुन/ अहाँ छी बड़ा महान/ स्‍वागत स्‍वीकार करू श्रीमान्/ अहाँ छी गंगा अहाँ छी यमुना/ पग धुलसँ पावण भेल अँगना...।” गाबि उपस्‍थि‍त साहि‍त्‍यप्रेमी आ साहि‍त्‍यकारकेँ स्‍वागत केलनि‍। पोथीक लोकार्पण शुरू भेल। गजेन्‍द्र ठाकुरक संग सम्‍पादनमे सम्‍पादि‍त मि‍थि‍लाक पंजी प्रबन्‍ध “जीनाेम मैपिंग भाग- 2” आ “जि‍नीयोलोजि‍कल मैपिंग” 950 एडीसँ 2009 एडी धरि‍क पंजीक लोकार्पण श्री ओम प्रकाश झा, डॉ. योगानन्‍द झा आ श्री राजीव रंजन मि‍श्रा जीक हाथे भेल। शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’जी रचि‍त समालोचनाक पोथी “अंशु” केर लोकार्पण श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री राजदेव मण्‍डल आ श्री बेचन ठाकुरजी केलनि‍। अंग्रेजी-मैथि‍ली शब्‍द कोष भाग-2, “मैथि‍ली-अंग्रेजी कम्‍प्‍यूटर शब्‍दकोष” तथा बेचन ठाकुरक “ऊँच-नीच” नाटकक लोकार्पण सेहो भेल। दू शब्‍दक कड़ीमे प्रवेश केलौं। ओ.पी.मि‍श्रा, दि‍लीप दास, ओम प्रकाश झा, दैनि‍क समाचार पत्र प्रभात खबर केर सम्‍पादक श्री सुशील भारती मैथि‍लीक दशा दि‍सापर अपन वि‍चार प्रकट केलनि‍। ओ कहलनि-‍ “अही तरहक आयोजन मैथि‍लीक सम्‍पूर्ण वि‍कासक मार्ग सहज बनौत।” आयोजककेँ धन्‍यवाद ज्ञापन करैत एक-सँ-एक साहि‍त्‍यकार अपन मनक खुलता बात मैथि‍ली वि‍कास लेल स्‍वतंत्रता पूर्वक मंचपर रखलनि‍। मुख्‍य अति‍थि‍ ओ.पी. मि‍श्राजी सेहो एकटा सुन्‍दर गीत गाबि‍ स्‍वागतक भाव प्रकट केलनि‍। राजीव रंजनजी स्‍वलि‍खि‍त गजल गाबि‍ अपन भाव प्रकट केलनि‍। सगर राति‍ दीप जरए (सभ अज्ञानीमे ज्ञानक दीप जरौ) कथायात्राक मादे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍चार बकतनक संग लि‍खतनमे सेहो वि‍स्‍तारपूर्वक आएल। दू पि‍ट्ठा कागत हाथे-हाथ बाँटल गेल। जे ऐ लिंकपर उपलब्‍ध अछि‍- http://maithili-samalochna.blogspot.in/…/…/blog-post_24.html 34 गोट लघुकथा/वि‍हनि‍ कथाक पाठ भेल। सात पालीमे बाँटि‍ सभ कथाक पाठ करौल गेल। अंति‍म पाली छोड़ि‍ छबो पालीमे पठि‍त कथापर तीन गोट समीक्षकक समीक्षा अबैत रहल आ समीक्षाक समीक्षा सेहो होइत रहल। समीक्षाक समीक्षा केनि‍हार सभ छला राजदेव मण्‍डल, नन्‍द वि‍लास राय, भाष्‍कर झा, उमेश मण्‍डल, चन्‍दन झा, डॉ. धनाकर ठाकुर, बि‍पीन कुमार कर्ण इत्‍यादि‍। प्रति‍समीक्षाक क्रममे एक गोट वि‍चारणीय टि‍प्पणी आएल। ओ छल, युवा समीक्षकक। अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करैत कहलखि‍न- “समसामयि‍क कथाक गहराइकेँ आधुनि‍क पाठक स्‍वागत नै करए चाहैए। से ई कथाक दोष भेल। फलस्‍वरूप पाठकक अभाव अछि‍।” संचालक गजेन्‍द्र ठाकुरजी ऐ वि‍चारपर असहमति‍ जँतौलनि‍। कहलखि‍न- “ई तँ भाषाक वि‍शेषता छि‍ऐ जे कथानककेँ गहराइ प्रदान करै छै। जेकर अभाव मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ पाठक वि‍हि‍न केने रहल।” ऐ तथ्‍यकेँ सत्‍यापि‍त करैत ठाकुरजी आइसलैण्‍डक भाषाक जि‍कि‍र केलनि‍। दू सत्रक पछाति‍ भोजनावकाश भेल। मि‍थि‍लाक खान-पानक आधुनि‍क रूप अकति‍यार केने छला आयोजक। करीब 125 गोटे एक पाँति‍मे बैस भोजन केलनि‍। ऐ तरहक समायोजनसँ हुनका मुँहक रोहानी फुलाएल गुलाबक फूल सन देखबामे आएल। बारीक सभ फुदैक-फुदैक अपन-अपन जि‍म्‍माकेँ जीतैत खेलाड़ी जकाँ निर्वहन करैत देखल गेला। भोजनक घंटा भरि‍ पछाति पुन: अगि‍ला सत्रक यात्रा शुरू भेल। पठि‍त कथापर समीक्षा हेतु वि‍शेष सुि‍वधा प्रदान कएल गेल छल। ओ ई जे जँ समीक्षक पठि‍त कथाकेँ कोनो कारणे धि‍यानसँ नै सुनि‍ पबथि‍ तँ हुनका लेल कथाक पाण्‍डुलि‍पि‍ उपलब्‍ध करौल जाइ छल। संचालकक कहब रहनि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे समीक्षाक स्‍थि‍ति‍ उमदा नै अछि‍। ऐपर श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर असहमति‍ व्‍यक्‍त केलनि‍। ओ कहलनि‍- “सगर राि‍तक अलि‍खि‍त नि‍अमो रहल अछि‍ जे समीक्षापर समीक्षासँ गोष्‍ठीमे वि‍वाद बढ़ि‍ सकैए तँए एहेन कार्यसँ बँचक चाही।” सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक लाइव प्रसारण कएल गेल। सगर राति‍क इति‍हासक पन्नामे ई एक गोट अनुपम कार्य सि‍द्ध हएत। सम्‍पूर्ण कार्यक्रमक वि‍डिओ यू-ट्यूबपर उपलब्‍ध करौल जाएत तेकरो बेवस्‍था आयोजक केने छला। मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ पूर्णत: इलेक्‍ट्रॉनि‍क स्‍पोर्ट भेटौ ऐ हेतु आयोजक प्रति‍वद्ध छला। अगि‍ला गोष्‍ठी हेतु दू गोट प्रस्‍ताव आएल। बहुसंख्‍यक साहि‍त्‍यकारक वि‍चारकेँ आगू बढ़बैत अध्‍यक्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल भावी संयोजककेँ दीप आ उपस्‍थि‍ति‍ पुस्‍ति‍का हश्‍तगत करौलनि‍। 31 मई 2014केँ मधुबनी जि‍लाक मेंहथ गाममे 82म कथा गोष्‍ठी हेतु भावी संयोजक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर समगर्दा हकार दऽ सभकेँ आमंत्रि‍त करैत कहलखि‍न- ”बालकथापर केन्‍द्रि‍त अगि‍ला गोष्‍ठी आयोजि‍त हएत।” अंतमे संयोजक श्री ओम प्रकाश झा आयोजक धन्‍यवाद ज्ञापन करैत कहलनि‍- “81m Sagar Raati Deep Jaray katha Gosthi 22 March 2014 saanjh sa shuru bha ka 23 March 2014 ke bhor me safalta poorvak Deoghar me sampann bha gel. Ehi beruka katha gosthi ke swargiy Mayanand babu aa swargiy Jeevkant ke samarpit kayal gel. Gosthik adhyakshta sri Jagdish Pd Mandal kayalanhi aa sanchalak chhalaah Sri Gajendra Thakur. Mukhy atithi Sri O. P. Mishra chhalaah. Kul 29 got kathaakaarak dwara 35 got katha paaTh kayal gel. Samalochna seho badd neek rahal. Kul milaa ka kathaa goshthi ekTa neek workshop saabit bhel. Katha goshthi me aaynihaar sab kathakaar lokani ke hum hriday sa aabhari chhi. Sangahi ahaa sab shubhkaamna denihaar mitra sabhak seho aabhari chhi. Kichhu gote anupasthitik khed prakaT karait shubhkaamna prakaT kelanhi, hunko sabhak aabhari chhi. Je jaani boojhi ka nai aylaah tinko aabhari chhi kiyak ta hunkar vyavhaar humra bheetar Maa Maithilik prati pratibaddhtaa aar badhaa delanhi.” 81म सगर राति‍ दीप जरए- देवघरमे सुसम्‍पन्न भेल 82म कथा गोष्‍ठी मेंहथमे होएत मायानन्‍द मि‍श्र जीवकान्‍त स्‍मृति‍-सगर राति‍ दीप जरए केर 81म कथा गोष्‍ठी– देवघर (झारखण्‍ड) संयोजक- ओम प्रकाश झा उद्घाटन सत्र- दीप प्रज्‍वलन- श्री ओ.पी. मि‍श्रा एवं समस्‍त कथाकार संचालन- ओम प्रकाश झा लोकार्पण सत्र- अध्‍यक्ष- जगदीश प्रसाद मण्‍डल मुख्‍य अति‍थि‍- श्री ओ.पी. झा आ श्री गजेन्‍द्र ठाकुर संचालक- उमेश मण्‍डल दू शब्‍द- 1. ओ.पी. झा, अवकाश प्राप्‍त अभि‍यंता- झारखण्‍ड सरकार 2. सुशील भारती, संपादक, प्रभात खबर हि‍न्‍दी दैनि‍क। 3. दि‍लीप दास 4. ओम प्रकाश झा 5. मिथि‍लेश कुमार 6. जगदीश प्रसाद मण्‍डल कथा सत्र- अध्‍यक्ष- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, वरि‍ष्‍ठ साहि‍त्‍यकार मंच संचालक- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर, संपादक, ‘वि‍देह’ इण्‍टरनेशनल ई-जनरल पहि‍ल सत्रमे पठि‍त कथा एवं कथाकार- असली हीरा- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल (निर्मली) रि‍क्‍शाक भाड़ा आ बुधि‍ए बताह- श्रभ्‍ फागुलाल साहु (सखुआ) बुढ़ि‍या मैया- ओम प्रकाश झा (भागलपुर) केते बेर- उमेश मण्‍डल (निर्मली) समीक्षक- योगानन्‍द झा राजदेव मण्‍डल अरवि‍न्‍द ठाकुर प्रमोद कुमार झा समीक्षाक समीक्षक नन्‍द वि‍लास राय चन्‍दन झा धनाकर ठाकुर दोसर सत्र- सभसँ बड़का भी.आई.पी. गेष्‍ट- श्री नन्‍द वि‍लास राय (भपटि‍याही) डरक डंका- श्री राजदेव मण्‍डल (मुसहरनि‍याँ) ई छी हमर मजबूरी आ इमानदारीक पाठ- श्री राम वि‍लास साहु (लक्ष्‍मि‍नि‍याँ) अप्‍पन माए-बाप- श्री ललन कुमार कामत (ललमनि‍याँ) तेसर सत्र- छि‍न्ना-झपटी- श्री शि‍व कुमार मि‍श्र (बेरमा) बड़का मोछ- श्री कपि‍लेश्वर राउत (बेरमा) उतेढ़क श्राद्ध- श्री शम्‍भू सौरभ (बैका) जाति‍क भोज- श्री उमेश पासवान (औरहा) चारि‍म सत्र- गुरुदक्षि‍णा- डाॅ. योगानन्‍द झा (कबि‍लपुर) अपराध- श्री पंकज सत्‍यम् (मधुबनी लगक) ककर चरवाही आ चुनावधर्मी लोक- डॉ. उमेश नारायण कर्ण कबाउछ- डॉ. धनाकर ठाकुर पाँचम सत्र- आन्‍हर- श्री अखि‍लेश कुमार मण्‍डल (बेरमा) सरकारीए नौकरी कि‍एक- बि‍पीन कुमार कर्ण (रेवाड़ी) बनमानुष आ मनुष- डाॅ. शि‍वकुमार प्रसाद (सि‍मरा) वृधापेंसन आ मजबुरी- श्री शारदानन्‍द सि‍ंह पानि‍- श्री बेचन ठाकुर छअम सत्र- सत्ता-चरि‍त- श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर (सुपौल) बापक प्राण- श्री भाष्‍करानन्‍द झा भाष्‍कर (कोलकाता) संबोधन- श्री चन्‍दन कुमार झा (कोलकाता) ठीका- श्री आमोद कुमार झा चौठि‍या- श्री अच्‍छेलाल शास्‍त्री (सोनवर्षा) सातम सत्र- तखन, जखन- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर (दि‍ल्‍ली) चैन-बेचैन- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल (बेरमा) पहिल सगर राति जकरा सगर विश्वमे लाइव प्रसारित कएल गेल, लिंक छल: https://new.livestream.com/accounts/7191650/events/2827795 ऐ तरहेँ देवघरक गोष्‍ठीमे कुल कथाकारक संख्‍या 29 छल। 34 गोट कथाक पाठ भेल। 80म सगर राति‍ दीप जरय 80म कथा गोष्ठी “कथा मि‍लन सदाय-सगर राति‍ दीप जरय” निर्मलीमे पठि‍त कथा एवं कथाकारक नाओं- 1. जीवपर दया करी- पल्लवी कुमारी 2. स्पेशल परमीट- ओम प्रकश झा 3. ढेपमारा गोसाँइ- ओम प्रकाश झा 4. ओ स्त्री - सदरे आलम गौहर 5. बाल अधि‍कार- नारायण झा 6. मांग- अमि‍त मि‍श्र 7. नवतुरि‍या- अमि‍त मि‍श्र 8. जनता लेल- अमि‍त मि‍श्र 9. थ्रीजी- मुकुन्द मयंक 10. पढ़ाइ आ खेती- बि‍पीन कुमार कर्ण 11. बदरि‍या मूसक घर- उमेश पासवान 12. अपन घर- लक्ष्मी दास 13. मि‍त्र- नारायण यादव 14. प्रेम एगो अचम्भा - बाल मुकुन्द पाठक 15. भगवानक पूजा- संजय कुमार मण्डल 16. वि‍पन्नता- पंकज सत्‍यम 17. गौतमक अहि‍ल्या-- दुखन प्रसाद यादव 18. तरकारीक चोर- ललन कुमार कामत 19. व्यंग्य- मि‍थि‍लेश कुमार व्यास 20. खेनि‍हारक लेखा- चंदन कुमार झा 21. चाहबला- कपि‍लेश्वर राउत 22. बि‍लाइ रस्ता काटि‍ देलक- राम वि‍लास साहु 23. भैरवी- रौशन कुमार झा 24. संदेह- शारदा नन्द सिंह 25. अंधवि‍श्वास- शम्भू सौरभ 26. डीजे ट्रोली- बेचन ठाकुर 27. मुखि‍याजी सँ मंत्री धरि‍ एक्के रंग- दुर्गा नन्द ठाकुर 28. कारागार- कि‍शलय कृष्ण 29. पैघ लोक के?- नन्द वि‍लास राय 30. पेंच-पाँच- शि‍व कुमार मि‍श्र 31. महेशबाबूक चौकपर एकदि‍न- गौड़ी शंकर साह 32. परि‍वर्त्तन- राजदेव मण्डल 33. एकघाप जमीन- जगदीश प्रसाद मण्डल 34. गइ बुढ़ि‍या हम बड़ बि‍हर छी- डॉ. शि‍व कुमार प्रसाद 35. भीखमंगा- डॉ. अशोक अवि‍चल मिथिलांचलक प्रसिद्ध साहित्यिक मंच “सगर राति‍ दीप जरय” केर 80म आयोजन जे निर्मली (सुपौल)मे स्थानीय कलाकार स्व. मि‍लन सदाय केर नाओंपर आयोजित छल तइ कथा गोष्ठीमे जे समीक्षक-आलोचक सभ पठि‍त कथापर समीक्षा केने रहथि‍, आलोचना केने रहथि‍ से सूची निम्न अछि‍- डॉ. शिव कुमार प्रसाद ओम प्रकाश झा राजदेव मण्डल जगदीश प्रसाद मण्डल डॉ. अशोक अवि‍चल डॉ. रामाशीष सिंह उमेश पासवान चन्दन कुमार झा राम वि‍लास साहु फागुलाल साहु पंकज सत्यम् किशलय कृष्ण शंभु सौरभ कपिलेश्वर राउत बाल गोवि‍न्द यादव गोवि‍न्दा‍चार्य वीरेन्द्र कुमार यादव राम वि‍लास साफी शि‍व कुमार मि‍श्र दुर्गानन्द मण्डल नारायण यादव संजय कुमार मण्‍डल राम प्रवेश मण्डल नारायण यादव बालमुकुन्द पाठक बेचन ठाकुर दुर्गानन्द ठाकुर शारदा नन्द सिंह 80म सगर राति‍ दीप जरय'' निर्मलीमे 45 गोट पोथीक लोकार्पण- बाल निबंध- 1. देवीजी (ज्योती झा चौधरी) कवि‍ राजदेव मण्डल वि‍वि‍धा- 1. कुरुक्षेत्रम अन्तर्मनक- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. बचेश्वर झा शब्द.कोष- 1. अंग्रजी-मैथि‍ली शब्दकोष- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. रामाशीष सिंह 2. मैथि‍ली-अंग्रेजी शब्दकोष- (गजेन्द्र ठाकुर) डॉ. अशोक अवि‍चल वि‍हनि‍ कथा संग्रह- 1. बजन्ता-बुझन्ता (जगदीश प्रसाद मण्डाल) अनुमण्‍डलाधि‍कारी अरूण कुमार सिंह 2. तरेगन- दोसर संस्करण (जगदीश प्रसाद मण्डल)- वि‍धायक सतीश साह लघु कथा संग्रह- 1. सखारी-पेटारी (नन्द वि‍लास राय) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद 2. उलबा चाउर (जगदीश प्रसाद मण्डल) वि‍नोद कुमार ‘वि‍कल’ 3. अर्द्धांगि‍नी (जगदीश प्रसाद मण्डल) दुर्गानन्द मण्डल 4. सतभैंया पोखरि‍ (जगदीश प्रसाद मण्डल) प्रो. जयप्रकाश साह 5. भकमोड़ (जगदीश प्रसाद मण्डल) फागुलाल साहु दीर्घ कथा संग्रह- 1. शंभुदास (जगदीश प्रसाद मण्डल) सदरे आलम गौहर कवि‍ता संग्रह- 1. बसुन्धरा (राजदेव मण्‍डल) गजलकार ओम प्रकाश झा 2. राति‍-दि‍न (जगदीश प्रसाद मण्डल) रामजी प्रसाद मण्डल 3. रथक चक्का उलटि‍ चलै बाट (रामवि‍लास साहु) नाटककार बेचन ठाकुर 4. नि‍श्तुकी दोसर संस्‍करण (उमेश मण्डल) जनकवि‍ रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ 5. इन्द्र्धनुषी अकास (जगदीश प्रसाद मण्डल) पत्रकार राम लखन यादव 6. प्रतीक (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) अधि‍वक्‍ता वीरेन्द्र कुमार यादव गजल संग्रह- 1. क्यो जानि‍ नै सकल हमरा (ओम प्रकाश झा) साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्डल 2. माझ आंगनमे कति‍याएल छी (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) गायक रामवि‍लास यादव 3. मोनक बात (चन्दन कुमार झा) डॉ. शि‍वकुमार प्रसाद 4. अंशु (अमि‍त मि‍श्र) कथाकार कपि‍लेश्वर राउत गीत संग्रह- 1. गीतांजलि‍ (जगदीश प्रसाद मण्डल) अमीत मि‍श्र 2. तीन जेठ एगारहम माघ (जगदीश प्रसाद मण्डल) चन्दन कुमार झा 3. सरि‍ता (जगदीश प्रसाद मण्डल) बालमुकुन्द 4. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ (जगदीश प्रसाद मण्डल) बि‍पीन कुमार कर्ण 5. हमरा बि‍नु जगत सुन्ना छै (रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’) अधि‍वक्‍ता मनोज कुमार बि‍हारी 6. क्षणप्रभा- (शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्लू‘’) राजाराम यादव अनुवाद साहि‍त्य- 1. पाखलो (उपन्यास (कोंकणीसँ हि‍न्दी सेवी फर्णांडि‍स एवं शंभु कुमार सिंह तथा हि‍न्दी‍सँ मैथि‍ली शंभु कुमार सिंह- कवि‍ शंभु सौरभ नाटक- 1. रि‍हलसल (रवि‍ भूषण पाठक) कवि‍ राम वि‍लास साफी 2. बि‍सवासघात (बेचन ठाकुर) बाल गोवि‍न्द यादव ‘गोवि‍न्दाचार्य’ 3. बाप भेल पि‍त्ती आ अधि‍कार (बेचन ठाकुर) कवि‍ रामवि‍लास साहु 4. रत्नाकार डकैत (जगदीश प्रसाद मण्डल) कि‍शलय कृष्ण 5. स्वयंवर (जगदीश प्रसाद मण्डल) कवि‍ शंभु सौरभ 6. पंचवटी एकांकी संचयन- (जगदीश प्रसाद मण्डल) उपन्‍यासकार राजदेव मण्डल 7. कम्‍प्रोमाइज- (जगदीश प्रसाद मण्डल) कथाकार राम प्रवेश मण्डल 8. झमेलि‍या बि‍आह (जगदीश प्रसाद मण्डल) अधि‍वक्‍ता वीरेन्द्र् कुमार यादव उपन्यास 1. हमर टोल (राजदेव मण्डल) कवि‍ हेम नारायण साहु 2. जीवन संघर्ष (दोसर संस्करण) जगदीश प्रसाद मण्डाल) नारायण यादव 3. बड़की बहि‍न (जगदीश प्रसाद मण्डल) कवि‍ शारदा नन्द सिंह 4. जीवन-मरण (दोसर संस्करण) (जगदीश प्रसाद मण्डल) डाकबाबू छजना 5. नै धाड़ैए (बाल उपन्यास, जगदीश प्रसाद मण्डल) गुरुदयाल भ्रमर सह्त्रबाढ़नि‍ (ब्रेल लि‍पि‍) गजेन्द्र ठाकुर) शि‍क्षक मनोज कुमार राम वायोग्राफी- 1. जगदीश प्रसाद मण्डल एकटा वायोग्राफी- (गजेन्द्र ठाकुर) कवि‍ उमेश पासवान संस्‍मरण साहि‍त्‍य- मध्य प्रदेशक यात्रा (ज्योति‍ झा चौधरी) कथाकार नन्द वि‍लास राय ७९म सगर राति‍ दीप जरय सगर राति‍ दीप जरय’क ७९म आयोजन ‘कथा कोसी’ उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे औरहामे सम्पन्न/ ८०म सगर राति‍ दीप जरय सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे उमेश मण्‍डलक संयोजकत्वमे- उमेश मण्डल सगर राति‍ दीप जरय’क ७९म आयोजन ‘कथा कोसी’ नामक वैनरक नीचाँ दि‍नांक १५ जून संध्‍या ६.३० बजेसँ शुरू भऽ १६ जूनक भि‍नसर ६ बजे धरि‍ लौकही थाना अन्‍तर्गत औरहा गामक मध्‍य वि‍द्यालयक नव नि‍र्मित भवनमे श्री उमेश पासवानक संयोजकत्‍वमे सुसम्‍पन्न भेल। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डलक प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं श्री रामचन्‍द्र पासवान जीक संयुक्‍त अध्‍यक्षतामे तथा श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव आ श्री दुर्गागान्‍द मण्‍डलक संयुक्‍त संचालनमे ऐ कथा गोष्‍ठीक भरि‍ राति‍क यात्रा भेल। गोष्‍ठीक शुभारम्‍भ श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह एवं श्री रामचन्‍द्र पासवानजी संयुक्‍त रूपे दीप प्रज्‍वलि‍त कऽ उद्घाटन केलनि‍। दीप प्रज्वलनमे डॉ. रामानन्‍द झा ‘रमण’ श्री हेम नारायण साह श्री शंभु सौरभ संग-संग प्रेक्षागारमे उपस्‍थि‍त सभ कथा-साहि‍त्‍य प्रेमी थोपड़ी बजा सहयोग केलनि‍। वि‍देह-सदेह-५ वि‍देह मैथि‍ली वि‍हनि‍ कथा, वि‍देह सदेह-६ वि‍देह मैथि‍ली लघुकथा, वि‍देह-सदेह-७ वि‍देह मैथि‍ली पद्य, वि‍देह-सदेह-८ वि‍देह मैथि‍ली नाट्य उत्‍सव, वि‍देह-सदेह-९ वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव तथा वि‍देह-सदेह-१० वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध-समालोचना नामक पोथीक लोकार्पण स्‍थानीय वि‍द्वतजन श्री संजय कुमार सिंह, श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री मि‍थि‍लेश सिंह, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री लक्ष्‍मी नारायण यादव तथा श्री वीरेन्‍द्र प्रसाद सिंह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल) जीक हाथे भेल। लोकार्पण सत्रक पछाति‍ दू-शब्‍दक एकटा महत्‍वपूर्ण सत्रक सेहो आयोजन भेल जइमे श्री रामचन्‍द्र पासवान, श्री बेचन ठाकुर, श्री कपि‍लेश्वर राउत, श्री कमलेश झा, श्री राजदेव मण्‍डल, श्री राम वि‍लास साहु, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री रामानन्‍द झा ‘रमण’, श्री शंभु सौरभ, श्री वीरेन्‍द्र यादव, श्री दुगानन्‍द मण्‍डल, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री हेम नारायण साहु, डॉ शि‍वकुमार प्रसाद, श्री अरूणाभ सौरभ तथा हम माने उमेश मण्‍डल आ संयोजक श्री उमेश पासवान द्वारा ‘सगर राति‍ दीप जरय’ कथा गोष्‍ठीक दीर्घ यात्रा तथा उदेसपर सभागारमे उपस्‍थि‍त दूर-दूरसँ आएल कथाकार, समीक्षक-आलोचक एवं स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमीक समक्ष अपन-अपन मनतव्‍य रखलनि‍। सगर राति‍क ७५म आयोजनक पश्चात ७६म आयोजन जे श्री देवशंकर नवीन दि‍ल्‍लीमे करेबाक घोषना तँ केने रहथि‍ मुदा से नै करा साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा आयोजि‍त कथा गोष्‍ठीकेँ गनि नेने रहथि‍ जहू गि‍नतीकेँ सोझरौल गेल आ तँए ऐ गोष्‍ठीकेँ श्री उमेश पासवान अपन इमानक परि‍चए दैत ७९म आयोजन केलनि‍। ओ कहलनि‍ जे हम सभ अर्थात् वि‍देह मैथि‍ली साहि‍त्‍य आन्‍दोलनसँ जुड़ल मैथि‍ली वि‍कास प्रेमी छी। हम सभ ७७म, ७८म आयोजनक आयोजनकर्ताकेँ स्‍पष्‍ट रूपे कहैत एलि‍यनि‍ मुदा हमरा सबहक बात नहियेँ वि‍भारानी मानलनि‍ आ नहि‍येँ कमलेश झा मानलनि‍। मुदा से हमहूँ नै मानब आ सही-सही गि‍नती करब।” ऐ तरहेँ उक्‍त आयोजनकेँ ‘सगर राति‍ दीप जरय’क ७९मे बहुसंख्‍यक मनानुसार तँइ भेल, आयोजि‍त भेल। हलाँकि‍ दरभंगासँ आएल कथाकार श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक उकसेला पर रहुआसँ आएल श्री वि‍नय मोहन झा जगदीश, श्री दुखमोचन झा आ दरभंगेसँ आएल श्री अशोक कुमार मेहता, हीरेन्‍द्र झा जीक संग गोष्‍ठीक आरम्‍भक घंटा भरि‍क पछाति‍ चलि‍ जाइ गेला। जीवि‍ते नर्क (उमेश मण्‍डल), शि‍क्षाक महत (राम वि‍लास साहु), बि‍आहक पहि‍ल साल गि‍ड़ह (दुर्गानन्‍द मण्‍डल), बौका डाँड़ (लक्ष्‍मी दास), बंश (कपि‍लेश्वर राउत), टाटीक बाँस (राम देव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’), सगतोरनी (शि‍वकुमार मि‍श्र), पाथर, पि‍यक्कर, जोगार आ अंग्रेज नैना (अमीत मि‍श्र), संत आकि‍ चंठ (बेचन ठाकुर), अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ), नमोनाइटिस (उमेश नारायण कर्ण), द्वादशा (सुभाष चन्‍द्र ‘सि‍नेही’), राँड़ि‍न (रोशन कुमार ‘मैथि‍ल’), पँचवेदी (अखि‍लेश कुमार मण्‍डल), मुइलो बि‍सेबनि (जगदीश प्रसाद मण्‍डल) इत्‍यादि‍ महत्‍वपूर्ण लघु कथा/वि‍हन‍ कथाक पाठ भेल आ सत्रे-सत्र मौखि‍क टि‍प्‍पणी आ समीक्षा सेहो भेल। अछोपक छाप (शम्‍भु सौरभ) क समीक्षाक क्रममे श्री रमानन्द झा "रमण" कथावस्तुसँ अपन असहमति देखेलनि आ कहलनि- "नै आब ई गप नै अछि, एकटा गप एतै देखियौ, हम रमानन्द झा "रमण" श्रोत्रिय उच्च कुलक, आ कतऽ आएल छी! उमेश पासवानक दरबज्जापर!" श्री बेचन ठाकुर श्री रमानन्द झा "रमण"क नव-ब्राह्मणवादी सोचक विरोध करैत कहलनि- "लोकक मगजमे अखनो जाति-पाति भरल छै, मैलोरंगक प्रकाश झा तँए ने कहै छथि जे बेचन ठाकुर भरि दिन तँ केश काटैत रहैए, ई रंगमंच की करत!! श्रीधरमकेँ सेहो ई गप बूझल छन्हि।” माने मैथिली साहित्यकार, समीक्षक आ रंगमंचसँ जुड़ल ब्राह्मणवादी आ नव-ब्राह्म्णवादी सोचक लोककेँ देखैत ई कहल जा सकैए जे २१म शताब्दीमे श्री रमानन्द झा "रमण"क व्‍यान ई देखबैत अछि जे केना ओ उमेश पासवानक दरबज्जापर आबि उपकृत करबाक भावनासँ ग्रसित छथि। ऐ अवसरि‍पर वि‍देह मैथि‍ली पोथी प्रदर्शनी (२७म प्रदर्शनी) सेहो लागल रहए। अगि‍ला ८०म गोष्‍ठी सुपौल जि‍लाक निर्मलीमे हेबाक लेल उमेश मण्‍डलक प्रस्‍ताव आएल जे सर्वसम्मति‍सँ मान्‍य भऽ घोषित भेल। सभ कथाकार, कथा-साहि‍त्‍य प्रेमी एवं समीक्षक-आलोचकसँ आग्रह-अनुरोध-नि‍वेदन‍ जे ८०म सगर राति‍क कथा गोष्‍ठी- निर्मलीमे अपन गरि‍मामयी उपस्‍थि‍ति दि‍ऐ। उमेश मण्डल इतिहास- सगर राति दीप जरय सगर राति‍ दीप जरय (कथा पाठ एवं परि‍चर्चा) क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक/लेखि‍का लोकार्पण कर्ता अन्‍य 1. मुजफ्फरपुर 21.01.1990 प्रभास कुमार चौधरी श्री रमानन्‍द रेणु शैलेन्‍द्र आनन्‍दक कथा यात्रा- डा. रमानन्‍द झा रमण 2. डेओढ़ 29.04.1990 जीवकान्‍त श्री प्रभास कुमार चौधरी 3. दरभंगा 07.07.1990 डा. भीमनाथ झा, प्रदीप मैथि‍ली पुत्र, बेवस्‍थापक- वि‍जयकान्‍त ठाकुर श्री गोवि‍न्‍द झा 1 सामाक पौती 2 मोम जकाँ बर्फ जकाँ गोवि‍न्‍द झा अमरनाथ डा. मुनीश्वर झा श्री प्रभास कुमार चौधरी 4. पटना 3.11.1990 गोवि‍न्‍द झा बेवस्‍थापक- दमनकान्‍त झा श्री उपेन्‍द्रनाथ झा ‘व्‍यास’ एवं राजमोहन झा - - - - 5. बेगुसराय 13.01.1991 प्रदीप बि‍हारी प्रो. प्रफुल्‍ल कुमार सिंह ‘मौन’ 3 हमर युद्धक साक्ष्‍य मे तारानन्‍द वि‍योगी उपेन्‍द्र दोषी - 6. कटि‍हार 22.04.1991 अशोक श्री उपेन्‍द्र दोषी 4 ओहि‍ रातुक भोर 5 अदहन अशोक शि‍वशंकर श्रीनिवास डा. भीमनाथ झा डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ वि‍भूति‍ आनन्‍दक कथा यात्रा- डा. रमण 7. नवानी 21.07.1991 मोहन भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झा 6 समाढ़ रमेश श्री कुलानन्‍द मि‍श्र - 8. सकरी 22.10.1991 प्रो. सुरेश्वर झा, बेवस्‍थापक- डा. राम बाबू श्री ए.सी. दीपक 7 साहि‍त्‍यालाप भीमनाथ झा पं. गोवि‍न्‍द झा - 9. नेहरा 11.10.1992 ए.सी. दीपक श्री मन्‍त्रेश्वर झा - - - - 10. वि‍राटनगर 14.04.1992 जीतेन्‍द्र जीत डा. गणेश प्रसाद कर्ण उद- गोवि‍न्‍द झा - - - नेपालमे मैथि‍ली कथा- डा. रमण 11. वाराणसी 18.07.1992 प्रभास कुमार चौधरी श्री मयानन्‍द मि‍श्र/ गंगेश गुंजन उद- ठाकुर प्रसाद सिंह एवं पं. रमाकान्‍त मि‍श्र - - - - 12. पटना 19.10.1992 राजमोहन झा श्री सुभाषचन्‍द्र यादव - - - - 13. सुपौल 1 18.10.1993 केदार कानन श्री बुद्धि‍नाथ झा 8 पुनर्नवा हेाइत ओ छौंड़ी वि‍भूति‍ आनन्‍द श्री महाप्रकाश - 14. बोकारो 24.04.1993 बुद्धि‍नाथ झा श्री गोवि‍न्‍द झा - - - - 15. पैटघाट 10.07.1993 डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ प्रो. उमानाथ झा 9. वि‍द्यापति‍क आत्‍मकथा गोवि‍न्‍द झा श्री प्रभास कुमार चौधरी - 16. जनकपुर 09.10.1994 रमेश रंजन श्री गोवि‍न्‍द झा उद- डा. रामावतार यादव 10 श्वेतपत्र 11 मि‍थि‍लावाणी- प्रत्रि‍का 12 गाम नहि‍ सुतैत अछि‍ 13 मर्सिनी- उपन्‍यास स. वि‍योगी एवं रमेश मि‍लाप, जनकपुरधाम महेन्‍द्र मलंगि‍या अरूण कुमार झा डा. धीरेन्‍द्र श्री धूमकेतु पं. गोवि‍न्‍द झा डा. रामावतार यादव - 17. इसहपुर 06.02.1994 डा. अरवि‍न्‍द कुमार ‘अक्कू’ डा. भीमनाथ झा - - - - 18. सरहद 23.04.1994 अमि‍य कुमार झा श्री प्रेमलता मि‍श्र प्रेम - - - - 19. झंझारपुर 09.07.1994 श्‍यामानन्‍द चौधरी श्री जीवकान्‍त - - - - 20. घोघरडीहा 22.10.1994 डा. नारायणजी श्री राजमोहन झा 14 कथा कुम्‍भ सं. बुद्धि‍नाथ झा पं. गोवि‍न्‍द झा - 21. बहेरा 21.01.1995 कमलेश झा श्री श्‍यामानन्‍द ठाकुर उद- चन्‍द्रभानु सिंह 15 सत्‍य एकटा काल्‍पनि‍क वि‍जय सारस्‍वत श्री जीवकान्‍त - 22. सुपौल (दरभंगा) 08.04.1995 कमलेश झा प्रो. रामसुदि‍ष्‍ट राय ‘व्‍याधा’ उद- गोवि‍न्‍द झा - - - - 23. काठमांडू 23.09.1995 धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि डा. धीरेन्‍द्र 16 नख दर्पण गोवि‍न्‍द झा डा. रामावतार यादव - 24. राजवि‍राज 24.01.1996 रामनारायण देव डा. धीरेन्‍द्र, उद- डा. योगेन्‍द्र प्र. यादव, मुख्‍य- गजेन्‍द्रनारायण सिंह, मंत्री- नेपाल सरकार - - - - 25. कोलकाता रजत जयंती 28.12.1996 प्रभास कुमार चौधरी श्री गोवि‍न्‍द झा, उद- यमुनाधर मि‍श्र 17 नि‍वेदि‍ता 18 कथाकल्‍प सुधांशु शेखर चौधरी देवकान्‍त झा पं. गोवि‍न्‍द झा श्री प्रभास कुमार चौधरी - 26. महिषी 13.04.1997 डा. तारानन्‍द वि‍योगी/ रमेश प्रायोजि‍त श्री मायानन्‍द मि‍श्र 19 अति‍क्रमण 20 हस्‍तक्षेप 21 शि‍लालेश 22 परि‍चि‍ति‍ तारानन्‍द वि‍योगी तारानन्‍द वि‍योगी तारानन्‍द वि‍योगी सुस्‍मि‍ता पाठक पं. गोवि‍न्‍द झा श्री कुलानन्‍द मि‍श्र श्री सुभाष चन्‍द्र यादव श्री मोहन भारद्वाज - क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक/लेखि‍का लोकार्पण कर्ता अन्‍य 27. तरौनी 20.06.1997 शोभाकान्‍त श्री जीवनकान्‍त - - - - 28. पटना 18.07.1997 प्रभास कुमार चौधरी श्री हरि‍नारायण मि‍श्र/ रामचद्र खान 23 समानान्‍तर रमेश श्री प्रभास कुमार चौधरी - 29. बेगूसराय 13.09.1997 प्रदीप बि‍हारी श्री प्रफुल्‍ल कुमार सिंह ‘मौन’ 24 कुक्करूकू आ कसौटी चन्‍द्रेश श्री प्रभास कुमार चौधरी प्रभास कुमार चौधरीक अन्‍ति‍म सहभागि‍ता 30. खजौली 04.04.1998 प्रदीप बि‍हारी श्री रमानन्‍द रेणु - - - - 31. सहरसा 18.07.1998 रमेश डा. महेश 25 ओना मासी 26 चानन काजर 27 प्रति‍क्रि‍या देवशंकर नवीन देवशंकर नवीन रमेश कुमारी ऋृचा श्री मायानन्‍द मि‍श्र पं. गोवि‍न्‍द झा - 32 पटना 10.10.1998 श्‍याम दरि‍हरे श्री राजमोहन झा, उद- गोवि‍न्‍द झा 28 भरि‍ राति‍ भोर के.डी. झा, श्‍याम दरि‍हरे एवं प्रदीप बि‍हारी श्री उपेन्‍द्रनाथ झा ‘व्‍यास’ - 33. बलाइन; नागदह 08.01.1999 पदम सम्‍भव श्री जीवकान्‍त - - - - 34. भवानीपुर 10.04.1999 डा. जि‍ष्‍णु दत्त मि‍श्र श्रीमती कामि‍नी 29 काल्हि‍ आ आइ धीरेन्‍द्र श्री जीवकान्‍त - 35. मधुबनी 24.07.1999 सि‍याराम झा ‘सरस’ बेवस्‍था– डा. कुलधारी सिंह श्री राजमोहन झा, उद- जयधारी सिंह 30 काजे तोहर भगवान शैलेन्‍द्र आनन्‍द डा. वि‍भूति‍ आनन्‍द - 36. अन्‍दौली 20.10.1999 कमलेश झा श्री चन्‍द्रभानु सिंह - - - - 37. जनकपुर 25.03.2000 रमेश रंजन डा. धीरेन्‍द्र, उद- डा. राजेन्‍द्र वि‍मल - - - - 38. काठमांडू 25.06.2000 धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि डा. रामानन्‍द झा ‘रमण’, उद- महेन्‍द्र कुमार मि‍श्र, सांसद 31 मकड़ी 32 मि‍थि‍लांचलक लोक कथा 33 शि‍रीषक फूल- अनुवाद 34 हम मैथि‍ल छी- कैसेट 35 मंडनमि‍श्र अद्धैत मीमांसा प्रदीप बि‍हारी गंगा प्रसाद अकेला गंगा प्रसाद अकेला सि‍याराम झा ‘सरस’ रमेश/ दीनानाथ/ सुरेन्‍द्रनाथ श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या डा. रामानन्‍द झा ‘रमण’ डा. ‘रमण’ डा. रामावतार यादव डा. रामावतार यादव - 39. धनबाद 21.10.2000 श्‍याम दरि‍हरे एवं रामचन्‍द्र लालदास राजमोहन झा, उद-कीर्तिनारायण मि‍श्र 36 मनक आड़ नमे ठाढ़ डा. भीमनाथ झा श्री राजमोहन झा - 40. बि‍टठो 21.01.2001 डा. अक्कू, बेवस्‍था- प्रो.वि‍द्यानन्‍द झा श्री बलराम, उद. कुलानन्‍द मि‍श्र 37 मातवर 38 दृष्‍टि‍कोण अशोक सुरेन्‍द्रनाथ डा. धीरेन्‍द्र डा. भीमनाथ झा मैथि‍ली कथाक समस्‍या डा. भीमनाथ झा 41. हटनी(घोघरडीहा) 19.05.2001 प्रो. योगानन्‍द झा/ अजि‍त कु.आजाद श्री सामदेव - - - - 42. बोकारो 25.08.2001 गि‍रि‍जानन्‍द झा ‘अर्धनारीश्वर’, बेवस्‍था- मि‍थि‍ला सा. परि‍षद् श्री दयानाथ झा, उद- हरेकृष्‍ण झा 39 नि‍ष्‍प्राण स्‍वप्‍न 40 मि‍थि‍ला दर्पण(1925/2001) दयाकान्‍त झा पुण्‍यानन्‍द झा, सं. रमानन्‍द झा ‘रमण’ श्री हरेकृष्‍ण मि‍श्र श्री फूलचन्‍द्र मि‍श्र ‘रमण’ - 43. पटना (कि‍रणजयंती) 01.12.2001 अशोक, बेवस्‍था- चेतना समि‍ति‍, पटना श्री सोमदेव 41 प्रलाप 42 युगान्‍तर 43 एकैसम शताब्‍दीक घोष्‍णा पत्र. गोवि‍न्‍द झा वि‍श्वनाथ रमेश/ श्‍याम दरि‍हरे/ मोहन यादव श्री सोमदेव पं. गोवि‍न्‍द झा श्री राजमोहन झा - 44. राँची 13.04.2002 कुमार मनीष अरवि‍न्‍द श्री साकेतानन्‍द, उद- परमानन्‍द मि‍श्र 44 चानन घन गछि‍या 45 शुभास्‍ते पन्‍थान: वि‍वेकानन्‍द ठाकुर परमान्‍न्‍द मि‍श्र श्री मोहन भारद्वाज श्री साकेतानन्‍द - 45. भागलपुर 24.08.2002 धीरेन्‍द्र मोहन झा श्री योगीराज, उद- डा. बेचन 46 कथा सेतु 47 पृथा 48 आउ, कि‍छु गप्‍प करी सं. प्रशान्‍त नीता झा कुलानन्‍द मि‍श्र डा. बेचन श्री राजमोहन झा डा. अरूणाकर झा - 46. वि‍द्यापति‍ भवन पटना 16.11.2002 अजि‍त कुमार आजाद श्री मोहन भारद्वाज उद- राजनन्‍दन लाल दास 49 काठ 50 एक फाॅक रौद 51 तीन रंग तेरह चि‍त्र 52 उदयास्‍त 53 साँझक गाछ 54 सर्वस्‍वांत 55 अभि‍युक्‍त 56 यात्री समग्र 57 मैथि‍ली बाल साहि‍त्‍य 58 The Colonial Periphery Imaging Mithila (1875-1955) 59 मैथि‍ल समाज पत्रि‍का, नेपाल वि‍भूति‍ आनन्‍द योगीराज सुधाकर चौधरी धूमकेतु राजकमल,सं.देवशंकर नवीन साकेतानन्‍द राजमोहन झा सं. शोभाकान्‍त दमन कुमार झा पंकज कुमार झा सं. धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि डा. तारानन्‍द वि‍योगी श्री गोवि‍न्‍द झा श्री सोमदेव श्री सोमदेव श्री रामलोचन ठाकुर श्री सोमदेव श्री सोमदेव श्री गोवि‍न्‍द झा पं. गोवि‍न्‍द झा डा. हेतुकर झा क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक/लेखि‍का लोकार्पण कर्ता अन्‍य 47. कोलकाता 22.01.2003 कर्णगोष्‍ठी, कोलकाता डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ उद- रमानन्‍द रेणु 60 आत्‍मालाप गोवि‍न्‍द झा श्री रमानन्‍द रेणु मैथि‍ली कथाक वर्तमान समस्‍या-डा.ता.न.वि‍योगी 48. खुटौना 07.06.2003 डा. महेन्‍द्र नारायण राम सोमदेव/उद- डा. खुशीलाल झा एवं रामलोचन ठाकुर 61. लाख प्रश्न अनुत्तरि‍त रामलोचन ठाकुर श्री सोमदेव - 49. बेनीपुर 20.09.2003 कमलेश झा डा. फूलचन्‍्द्र मि‍श्र ‘रमण’ उद- प्रो. रामसुदि‍ष्‍ट राय ‘व्‍याधा’ - - - - 50. दरभंगा 21.02.2004 डा. अशोक कुमार मेहता श्री गोवि‍न्‍द्र झा उद- चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ 62 दि‍दबल 63 चि‍तकावर 64 गंगा 65 बाबाक वि‍जया 66 सरि‍सब मे भूत 67 गहवर 68 हाथी चलय बजार 69 उगैत सूर्यक धमक 70 आदमी केँ जोहैत 71 ओना कहबा लेल बहुत कि‍छु हमरा लग 72 गाछ झूलझूल 73 खंजन नयन नि‍रंजन 74 हम भेटब 75 चि‍न्‍तन प्रवाह 76 दुर्वासा 77 पाथर पर दुभि‍ 78 कोशी घाटी सभ्‍यता‍ 79 जागि‍ गेल छी 80 हमरा मोनक खंजन चि‍ड़ैया 81 जयमाला 82 माटि‍क आबाज 83 इजोरि‍यरक अंगैठी मोर 84 बेसाहल 85 यदुवर रचनावली 86 सगर राति ‍दीप जरयक इति‍हास 87 अभि‍ज्ञा 88 वि‍मर्श 89 स्‍मरणक संग 90 कथा काव्‍य आ द्वादसी 91 तात्‍पर्य 92 हेमलेट 93 लोरि‍क मनि‍यार 94 कनुप्रि‍या 95 मन्‍दाकि‍नी 96 सीता व्‍याथा कथा 97 नागार्जुन के उपन्‍यास 98 Sesected Poems of Jee 99 अंतरंग हि‍न्‍दी पत्रि‍का मैथि‍ली वि‍शेषांक प्रभास कुमार चौधरी हंशराज यन्‍त्रनाथ मि‍श्र उमाकान्‍त श्‍याम दरि‍हरे डा. महेन्‍द्र नारायण राम डा. देवशंकर नवीन सि‍याराम झा ‘सरस’ कीर्तिनारायण मि‍श्र कुलानन्‍द मि‍श्र जीवकान्‍त अनंत बि‍.लाल. ‘इन्‍दु’ मार्कण्‍डेय प्रवासी धीरेन्‍द्रनाथ मि‍श्र जयनारायण यादव रमेश रमेश महेन्‍द्र राम फूलचन्‍द्र मि‍श्र ‘प्रवीण’ जयानन्‍द मि‍श्र मंजर सुलेमान सं. माला झा रमानन्‍द झा ‘रमण’ रमानन्‍द झा ‘रमण’ रमानन्‍द झा ‘रमण’ फूल चन्‍द्र मि‍श्र ‘रमण’ भीमनाथ झा वि‍भूति‍ आनन्‍द अरूण कुमार कर्ण अशोक कुमार मेहता प्रो. रमाकान्‍त मि‍श्र चन्‍द्रेश अनु. श्‍याम दरि‍हरे प्रभाष कुमार चौधरी अनन्‍त बि‍. लाल दास ‘इन्‍दू’ मोहि‍त ठाकुर मुरारि‍ मधुसुदन ठाकुर सं. प्रदीप बि‍हारी पं. गोवि‍न्‍द झा श्री सोमदेव पं. गोवि‍न्‍द झा श्री मार्कण्‍डेय प्रवासी श्री राजमोहन झा श्री जयनारायण यादव श्री राजमोहन झा डा. रामान्‍नद झा ‘रमण’ श्री मोहन भारद्वाज श्री कीर्तिनारायण मि‍श्र पं. गोवि‍न्‍द्र झा चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ पं. गोवि‍न्‍द झा श्री राजमोहन झा गोपालजी त्रि‍पाठी डा. शि‍वशंकर श्रीनि‍वास डा. शि‍वशंकर श्रीनि‍वास डा. रामदेव झा श्री मार्कण्‍डेय प्रवासी पं. चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ श्री मोहन भारद्वाज श्री अशोक श्री मार्कण्‍डेय प्रवासी पं. गोवि‍न्‍द झा श्री रमेश डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ डा. देवेन्‍द्र झा श्री रतीश चन्‍द्र झा श्री रमानन्‍द रेणु श्रीमती अंजलि‍ मेहता श्री नीलमणि‍ बनर्जी पं. गोवि‍न्‍द झा श्री श्‍यामसुन्‍द्र मि‍श्र पं. चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ डा. रमादेव झा डा. सुरेश्वर झा - डा. रमानन्‍द रेणु - 51. जमशेदपुर 10.07.2004 डा. रवीन्‍द्र कुमार चौधरी श्री सुरेन्‍द्र पाठक उद- राजनन्‍दनलाल दास मु. अति‍. सत्‍यनारायण लाल - - - - 52. राँची 02.10.2004 वि‍वेकानन्‍द ठाकुर डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ उद- राजनन्‍दन लाल दास 100 स्‍वास स्‍वास मे वि‍श्वास 101 सम्‍पर्क-4 वि‍वेकानन्‍द ठाकुर स. सि‍याराम झा ‘सरस’ डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ श्री राजनन्‍दन लाल दास - - क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक/लेखि‍का लोकार्पण कर्ता अन्‍य 53. देवघर 08.01.2005 श्‍याम दरि‍हरे एवं अवि‍नाश श्री दयानाथ झा उद- यन्‍त्रनाथ मि‍श्र - - - - 54. बेगूसराय 09.04.2005 प्रदीप बि‍हारी श्री रामलोचन ठाकुर उद- सत्‍यनारायण लाल 102 भजारल 103 सरोकार 104 औरत 105 अन्‍तरंग पत्रि‍का डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ प्रदीप बि‍हारी मेनका मल्‍लि‍क स. प्रदीप बि‍हारी श्री कीर्तिनारायण मि‍श्र श्री राजमोहन झा श्रीमती ज्‍योत्‍सना चन्‍द्रम डा. आनन्‍द नारायण शर्मा - 55. पूर्णियाँ 20.06.2005 रमेश श्री साकेतानन्‍द - - - - 56. पटना 03.11.2005 अजीत कुमार आजाद डा. फूलचन्‍द्र मि‍श्र ‘रमण’ उद- गोवि‍न्‍द झा 106 अतीतालोक 107 गामक लोक 108 मैथि‍ली कवि‍ता संचयन 109 मैथि‍ली कथासंचयन ने.बु.ट्र. 110 बड़ अजगुत देखल 111 कि‍छु पुरान गप्‍प, कि‍छु नव गप्‍प गोवि‍न्‍द झा शि‍वशंकर श्रीनि‍वास सं. गंगेश गुंजन सं. शि‍वशंकर श्रीनि‍वास शरदि‍न्‍दु चौधरी कीर्तिनाथ झा श्री राजमोहन झा डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ पं. गोवि‍न्‍द झा श्री राजमोहन झा श्री फूलचन्‍द्र मि‍श्र ‘रमण’ श्री गोवि‍न्‍द झा - 57. जनकपुर (नेपाल) 12.08.2006 रमेश रंजन श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या, डा. ‘रमण’ उद- डा. रेवती रमण लाल - - - - 58. जयनगर 02.12.2006 श्री नारायण यादव डा. कमलकान्‍त झा, उद- श्री रामदेव पासवान, मु.अ. भगीरथप्रसाद अग्रवाल - - - - 59. बेगूसराय 10.02.2007 प्रदीप बि‍हारी नवीन चौधरी 112 स्‍नेहलता डा. योगानन्‍द झा डा. तारानन्‍द वि‍यागी - 60. सहरसा 21.07.2007 कि‍सलय कृष्‍ण डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ डा. मनोरंजन झा 113 अक्षर आर्केस्‍ट्रा अनु- प्रदीप बि‍हारी डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ - 61. सुपौल-2 01.12.2007 अरवि‍न्‍द ठाकुर अंशुमान सत्‍यकेतु डा. धीरेन्‍द्र धीर 114 अन्‍हारक वि‍रोधमे अरवि‍न्‍द ठाकुर श्री अजि‍त कुमार आजाद 62. जमशेदपुर 03.05.2008 डा. रवीन्‍द्र कुमार चौधरी वि‍वेकानन्‍द ठाकुर वि‍द्यानाथ झा ‘वि‍दि‍त’ - - - - 63. राँची 19.07.2008 कुमार मनीष अरवि‍न्‍द वि‍वेकान्‍द ठाकुर/ डा. रमण उद- डा. वि‍दि‍त 115 समय शि‍लापर सुरेन्‍द्रनाथ डा. विद्यानाथ झा‘वि‍दि‍त’ 64. रहुआ संग्राम 08.11.2008 डा. अशोक अवि‍चल डा. रमण/डा. श्री शि‍वशंकर नि‍वास उद- उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’ 116 भि‍न्न-भि‍न्न अभि‍न्न 117 अन्‍तर ध्‍वनि‍ 118 माइक चि‍ट्ठी 119 ई भेटल तँ की भेटल 120 बुद्ध का दुख और मेरा डा. रमण झा सुशीला झा अर्धनारीश्वर तारानन्‍द वि‍योगी तारानन्‍द वि‍योगी प्रो. खुशीलाल झा चण्‍डेश्वर खाँ डा. रमण डा. कमलकान्‍त झा डा. बोधकृष्‍ण झा 65. पटना कथा गंगा-3 21.02.2009 अजि‍त कुमार आजाद/ चेतना समि‍ति‍ अशोक प्रो. वि‍जय बहादुर सिंह 121 गजल हमर हथि‍यार थि‍क 122 कोढ़ि‍या घर स्‍वाहा 123 टावर चौकसँ 124 मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क परम्‍परा 125 हुगली उपर बहैत गंगा सुरेन्‍द्रनाथ ऋृषि‍ बशि‍ष्‍ट डा. भीमनाथ झा डा. रेवती रमण लाल राम भरोस कापड़ि‍ ‘भ्रमर’ म. प्रवासी पं. गोवि‍न्‍द झा म. प्रवासी डा. गंगेश गुंजन साकेतानन्‍द 66. मधुबनी 30.05.2009 दि‍लीप कुमार झा हीरेन्‍द्र कुमार झा डा. देवकान्‍त झा 126 घरमुहाँ 127 झुठपकड़ा मशीन शैलेन्‍द्र आनन्‍द ऋृषि‍ बशि‍ष्‍ट डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ 67. मानारायटोल नरहन- समस्‍तीपुर 05.09.2009 रमाकान्‍त रय ‘रमा’ डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ डा. वि‍पि‍न बि‍हारी ठाकुर 128 कवि‍ताक छाँहमे 129 कल्‍पनाक सागरमे 130 भाषा टीका 131 उद्वेलन (हि‍न्‍दी) ललि‍त कुमार झा ललि‍त कुमार झा डा. वि‍भूति‍ आनन्‍द मुन्ना माधोपुरी डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ श्री रमाकान्‍त राय ‘रमा’ डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ डा. शंकर झा 68. सुपौल- 3 05.12.2009 अरवि‍न्‍द ठाकुर अशोक कुमार मेहता परमानन्‍द पाठक 132 मैथि‍लीक आरम्‍भि‍क यात्रा साहि‍त्‍य 133 कहाँ गये मेरे उगना डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ उषा कि‍रण खान डा. परमान्‍नद पाठक डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ 69. जनकपुर 03.04.2010 राजाराम सिंह ‘राठौर’ डा. रामानन्‍द झा ‘रमण’ उद- डा. रामावतार यादव 134 मि‍थि‍लाक बेटी (नाटक) 135 मौलाइल गाछक फूल(उपन्‍यास) 136 हम पुछैत छी (काव्‍य) 137 अर्चिस (काव्‍य) 138 भाग रौ आ बलचन्‍द्रा 139 नताशा (कौमि‍क्‍स) 140 मैथि‍ली कथा संग्रह 141 वि‍देह मैथि‍ली पद्य 142 नेपथ्‍य 143 वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बंध 144 वि‍देह मैथि‍ली लघु कथा जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल वि‍नीत उत्‍पल ज्‍योति‍ सुनि‍त चौधरी वि‍भारानी देवांशु बत्‍स सं. रेवती रमण लाल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/उमेश मण्‍डल सं. रेवती रमण लाल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/उमेश मण्‍डल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/उमेश मण्‍डल डा. राजेन्‍द्र वि‍मल डा. रामवतार यादव श्री राम भरो. कापड़ि‍ ‘भ्रमर’ डा. वि‍भूति‍ आनन्‍द श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर प्रो. प्र.कु. सिंह ‘मौन’ रमानन्‍द झा ‘रमण’ हीरेन्‍द्र कुमार झा डा. रामवतार यादव डा. रामावतार यादव ड. रामावतार यादव 70. कबि‍लपुर (दरभंगा) 12.06.2010 डा. योगानन्‍द झा डा. रामदेव झा उद- चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’/ श्री शंकर झा वि‍शेष अति‍थि‍- डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ 145 मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍य 20म शताब्‍दी 146 पि‍लपि‍लहा गाछ 147 उत्‍थान-पतन (उपन्‍यास) 148 जि‍नगीक जीत (उपन्‍यास) 149 गामक जि‍नगी (लघु कथा) 150 गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा 151 अमरजीक साहि‍त्‍यमे हास्‍य- व्‍यंग्‍य 152 वि‍धकरी 153 मैथि‍ली चि‍त्रकथा 154 मि‍थि‍लाक पंजी प्रबन्‍ध 155 खसल 156 जमीनमे फुटै छै अंकुर 157 हमरो लेने चलू 158 पक्षधर 159 उचाट 160 कथा लोक कथा 161 समाचार कथा 162 भारती - प्रेमशंकर सिंह मुरलीधर झा जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल प्रीति‍ ठाकुर भाग्‍यनारायण झा वि‍द्यानाथ झा ‘वि‍दि‍त’ प्रीति‍ ठाकुर सं. गजेन्‍द्र ठाकुर मनमोहन झा दयानन्‍द मि‍श्र अमरनाथ चौधरी शीतांशु काश्‍यप आशा मि‍श्र योगानन्‍द झा धीरेन्‍द्रनाथ मि‍श्र वीणा ठाकुर - आशा मि‍श्र डा. भीमनाथ झा डा. वीणा ठाकुर डा. मोहन मि‍श्र डा. कमला चौधरी प्रदीप मैथि‍लीपुत्र डा. सुरेश्वर झा डा. सुरेश्वर झा ज्‍योत्‍सना चन्‍द्रम चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ चन्‍द्रनाथ मि‍श्र ‘अमर’ डा. रामदेव झा डा. रामदेव झा डा. रामदेव झा डा. रामदेव झा - 71. बेरमा (झंझारपुर) स्‍थान- मध्‍य वि‍द्यालय परि‍सर- बेरमा। (सार्वजनि‍क स्‍थलपर) 02.10.2010 जगदीश प्रसाद मण्‍डल बेवस्‍था- स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमी डा. तारानन्‍द ‘वि‍योगी’ उद- उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’ 163 नि‍बन्‍ध तरंग 164 प्रलय रहस्‍य 165 जीवन-मरण (उपन्‍यास) 166 तरेगन 167 जीवन-संघर्ष (उपन्‍यास) 168 अलका श्रीपति‍ सिंह तारानन्‍द ‘वि‍योगी’ जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल कमलकान्‍त झा डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ डा. रमण कुमार रामेश्वर लाल दास डा. रमण, फूलचन्‍द्र ‘रमण’ उग्र.ना.मि‍श्र ‘कनक’/अशोक डा. धनाकर ठाकुर जन सहयोगसँ आयोजि‍त भेने, स्‍थानीय लोकक सहभावी बेस रहल। (पहिल बेर जन सहयोगसँ गोष्‍ठीक आयोजन) 72. सुपौल 04.12.2010 अरवि‍न्‍द ठाकुर डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ उद- डा. शचीन्‍द्रनाथ महतो 169 एकहि‍ पच्‍छ इजोर जीवकान्‍त श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर 73. महि‍षी कथा राजकमल 05.03.2011 वि‍जय महापात्र अरवि‍न्‍द ठाकुर उद- साकार यादव, स्‍वामी रमेशानन्‍दजी महाराज 170 अघोषि‍त युद्ध की भूमि‍का 171 कुदरत बेहुस्‍न नहीं हुइ है (उर्दू) मू. अजि‍त कुमार आजाद मू. अजि‍त कुमार आजाद रमाकान्‍त राय ‘रमा’ श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर 74. हजारीबाग 10.09.2011 श्‍याम दरि‍हरे डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ 172 Survey of Maithili lierature 173 मि‍थि‍लाक इति‍हास 174 धुंध के वाबजूद 175 परती टूट रही है 176 कठि‍न समयमे शब्‍द 177 कलानि‍धि‍ 178 रहए चाहैछ गाछ प्रो. राधाकृष्‍ण चौधरी प्रो. राधाकृष्‍ण चौधरी अजि‍त आजाद मू. अजि‍त आजाद मू. अ.कु. सि‍न्‍हा कालीकान्‍त झा ‘बूच’ जीवकान्‍त श्री अशोक श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल श्री जगदीश सिंह श्री रमानन्द झा‘रमण’ श्री जीवेन्द्रनाथ झा जीवेन्‍द्रनाथ झा श्री प्रदीप बि‍हारी श्री तुलानन्‍द मि‍श्र 75. पटना हीरक जयन्‍ती 10.12.2011 अशोक एवं कमलमोहन ‘चुन्नु’ श्री उग्रनारायण मि‍श्र ‘कनक’ 179 जुबैदा 180 समय साक्षी थि‍क 181 गंगा नहौन 182 बेटीक अपमान 183 अनचि‍न्‍हार आखर 184 सीतावरण 185 गाममे 186 नि‍बन्‍ध सुधा 187 जखन-तखन (प्रेम क.वि‍.) 188 वि‍हनि‍ कथाक पो. प्रदर्शनी 189 ऐ अकाबोनमे 190 कोशी कातक गंगा 191 जेना जनलि‍यनि‍ उग्र ना. मि‍श्र ‘कनक’ अनमोल झा नि‍शाकर बेचन ठाकुर आशीष अनचि‍न्‍हर मू.सनेहलता, सं.योगानन्‍दझा अनु प्रदीप बि‍हारी सुधा कुमारी सं. वि‍भूति‍ आनन्‍द मुन्नाजी राज साकेतानन्‍द महेन्‍द्र नारायण राम श्रीमती उषा कि‍रण खान श्री मोहन भारद्वाज डा. रमानन्‍द झा ‘रमण’ 76. चेन्नै 14.07.2012 वि‍भा रानी श्री रमानन्‍द झा ‘रमण’ उद- चन्‍द्रकान्‍ता गरि‍यारी (IAS) 192 हि‍आओल रमानन्‍द झा ‘रमण’ प्रो. श्रीश चौधरी - 77. दरभंगा कि‍रण जयन्‍ती 01.12.2012 अरवि‍न्‍द ठाकुर डा. भीमनाथ झा उद- राकेश कुमार मि‍श्र (IPS) 193 सी.डी. (37 गोट पोथीक) श्रुति‍ प्रकाशन दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशनाधि‍न वि‍भि‍न्न रचनाकारक उपस्‍थि‍त समस्‍त वि‍द्वतजन क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक लोकार्पण कर्ता अन्‍य 78. घनश्‍यामपुर 09.03.2013 कमलेश झा श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, उद- डा. रमण, मं.सं- डा. अशोक मेहता 194 वर्णित रस (कवि‍ता संग्रह) उमेश पासवान (औरहा) जगदीश प्रसाद मण्‍डल - 79. औरहा (लौकही) (सार्वजनि‍क स्‍थलपर) 15.5.2013 उमेश पासवान श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल/ रामचन्‍द्र पासवान उद- श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह (औरहा नि‍वासी) 195 वि‍देह वि‍हनि‍ कथा, वि‍-स;5 196 वि‍देह मैथि‍ली प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना- वि‍-स;10 197 वि‍देह मैथि‍ली लघु कथा- 6 198 वि‍देह नाट्य उत्‍सव,वि‍-स;8 199 वि‍देह मैथि‍ली शि‍शु उत्‍सव, वि‍देह-सदेह- 9 200 वि‍देह मैथि‍ली पद्य वि‍.स; 7 सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/ उमेश मण्‍डल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/ उमेश मण्‍डल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/ उमेश मण्‍डल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/ उमेश मण्‍डल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/ उमेश मण्‍डल सं. गजेन्‍द्र ठाकुर/ उमेश मण्‍डल श्री संजय कुमार सिंह श्री रामचन्‍द्र पासवान श्री मि‍थि‍लेश सि‍ंह श्री राजदेव मण्‍डल श्री लक्ष्‍मी नारायण सिंह श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव स्‍थानीय लोकक सहभावी बेस 80. निर्मली (स्‍थान- मानि‍क राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, सुभाष चौक, निर्मली- सुपौल) 30.11.2013 उमेश मण्‍डल बेवस्‍था-स्‍थानीय साहि‍त्‍य प्रेमी एवं साहि‍त्‍यकार, वि‍शेष सहयोग- श्री धीरेन्‍द्र कुमार राय, श्री वि‍नोद कुमार साह, श्री अखि‍लेश कुमार ‘चि‍न्‍टुजी’; श्री अभि‍षेख पंसारी, श्री सीता राम चौधरी, श्री सुरेश कुमार महतो, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल, श्री खड़ानन्‍द यादव, श्री रामदयाल भ्रमर, श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ श्री राहुल कुमार अध्‍यक्ष- डा. अशोक अवि‍चल एवं डा. रामाशीष सिंह (प्राचार्य, ह.प्र.सा.म.वि‍.नि‍.) उद्घाटन- श्री सतीश साह (वि‍धायक), श्री अरूण कुमार सिंह (अनुमण्‍डल पदाधि‍कारी), श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डा. अशोक अवि‍चल। डा. रामाशीष सिंह (प्राचार्य) मंच संचालक-कथा सत्र- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल लोकार्पण सत्र-उमेश मण्‍डल 201 देवीजी (बाल नि‍बन्‍ध) 202 कुरुक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक (वि‍वि‍धा) 203 अंग्रजी-मैथि‍ली शब्‍दकोष 204 मैथि‍ली-अंग्रेजी शब्‍दकोष-2 205 बजन्‍ता-बुझन्‍ता (वि‍हनि‍ कथा) 206 तरेगन (दोसर संस्‍करण) 207 सखारी-पेटारी (लघु कथा) 208 उलबा-चाउर (लघु कथा) 209 अर्द्धांगि‍नी (लघु कथा) 210 सतभैंया पोखरि‍ (लघु कथा) 211 भकमोड़ (लघु कथा) 212 शम्‍भुदास (दीर्घ कथा) 213 बसुन्‍धरा (कवि‍ता) 214 राति‍-दि‍न (कवि‍ता) 215रथक चक्का उलटि‍ चलै बाट 216 नि‍श्तुकी (कवि‍ता संग्रह) 217 इन्‍द्रधनुषी अकास (कवि‍ता) 218 प्रति‍क (कवि‍ता) 219 कि‍यो जानि‍ नै सकल हमरा 220 माझ आँगनमे कति‍याएल छी 221 मोनक बात (गजल) 222 अंशु (गजल) 223 गीतांजलि‍ (गीत) 224 तीन जेठ एगारहम माघ 225 सरि‍ता (गीत संग्रह) 226 सुखाएल पोखरि‍क जाइठ 227 हमरा बि‍नु जगत सुना छै 228 क्षणप्रभा (पद्य) 229 पाखलो (कोंकणी, उपन्‍यास) 230 रि‍हर्सल (नाटक) 231 बि‍सवासघात (नाटक) 232 बाप भेल पि‍त्ती आ अधि‍कार 233 रत्नाकर डकैत (नाटक) 234 स्‍वयंवर (नाटक) 235 पंचवटी (एकांकी संचयन) 236 कम्‍प्रोमाइज (नाटक) 237 झमेलि‍या बि‍आह (नाटक) 238 हमर टोल (उपन्‍यास) 239 जीवन-संघर्ष (उपन्‍यास, दो.संस्‍करण) 240 बड़की बहि‍न (उपन्‍यास) 241 जीवन-मरण (उपन्‍यास, दो.संस्‍करण) 242 नै धाड़ैए (बाल उपन्‍यास) 243 सह्त्रबाढ़नि‍ (ब्रेल लि‍पि‍मे उपन्‍यास) 244 जगदीश प्रसाद मण्‍डल एकटा वायोग्राफी (वायोग्राफी) 245 मध्‍य प्रदेशक यात्रा (संस्‍मरण) ज्‍योति‍ झा चौधरी गजेन्‍द्र ठाकुर गजेन्‍द्र ठाकुर एवं अन्‍य गजेन्‍द्र ठाकुर एवं अन्‍य जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल नन्‍द वि‍लास राय जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल राजदेव मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल राम वि‍लास साहु उमेश मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल मनोज कुमार कर्ण ‘मुन्नाजी’ ओम प्रकाश झा मनोज कुमार कर्ण ‘मुन्नाजी’ चन्‍दन झा अमि‍त मि‍श्र जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ अनु शम्‍भु कुमार सिंह रवि‍ भूषण पाठक बेचन ठाकुर बेचन ठाकुर जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल राजदेव मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल गजेन्‍द्र ठाकुर गजेन्‍द्र ठाकुर ज्‍योि‍त झा चौधरी श्री राजदेव मण्‍डल डा. बचेश्वर झा डा. रामाशीष सिंह डा. अशोक अवि‍चल श्री अरूण कुमार सिंह SDO श्री सतीश साह, वि‍धायक डा. शि‍वकुमार प्रसाद श्री वि‍नोद कुमार साह श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल प्रो. जय प्रकाश साह श्री फागुलाल साहु सदरे आलम ‘गोहर’ श्री ओम प्रकाश झा श्री रामजी प्रसाद मण्‍डल श्री बेचन ठाकुर श्री रामदेव प्र.मं. ‘झारूदार’ श्री रामलखन यादव, पत्रकार श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल श्री वीरेन्‍द्र कुमार यादव डा. शि‍वकुमार प्रसाद श्री कपि‍लेश्वर राउत श्री अमि‍त मि‍श्र श्री चन्‍दन कुमार झा श्री बालमुकुन्‍द पाठक श्री बि‍पीन कुमार कर्ण श्री मनोज कुमार बि‍हारी श्री राजाराम यादव श्री शंभु सौरभ श्री राम वि‍लास साफी श्री बालगोवि‍न्‍द यादव‘गोवि‍न्‍दाचार्य’ श्री राम वि‍लास साहु श्री कीशलय कृष्‍ण श्री शम्‍भु सौरभ श्री राजदेव मण्‍डल श्री रामप्रवेश मण्‍डल श्री वीरेन्‍द कुमार यादव श्री हेम नारायण साहु श्री नारायण यादव श्री शारदानन्‍द सिंह श्री राजलाल साहु श्री गुरुदयाल भ्रमर श्री मनोज कुमार राम श्री उमेश पासवान श्री नन्‍द वि‍लास राय 1. ‘कथा मि‍लन सदाय सगर राति‍ दीप जरय’ ई 80म आयोजन स्‍थानीय कलाकार स्‍व. मि‍लन सदाय केर नाओंपर आयोजत भेल। 2. श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल ‘भकमोड़’ लघु कथा संग्रह ऐ गोष्‍ठीक नामे समरपि‍त केलनि‍। 3. वि‍भि‍न्न वि‍धाक 45 गोट पोथी लोकार्पि‍त भेल। 81. देवघर (स्‍थान- बि‍जली कोठी, बम्‍पासटॉन, देवघर) 22.03.2014 ओम प्रकाश झा अध्‍यक्ष- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल उद्घाटन- श्री ओ.पी. मि‍श्रा, (अ.प्र. अभि‍यंता, झारखण्‍ड सरकार) मंच संचालक-श्री गजेन्‍द्र ठाकुर 246 अंशु  (आलोचना) 247 मैथि‍ली-अंग्रेजी शब्‍दकोष-2 248 ऊँच-नीच (नाटक) 249 अंग्रेजी-मैथि‍ली शब्‍दककोष-1 250.जीनि‍योलोजि‍कल मैपिंग-2 251. जीनोम मैपिंग (मि‍थि‍लाक पंजी प्रबन्‍ध) शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ सं. गजेन्‍द्र ठाकुर बेचन ठाकुर सं. गजेन्‍द्र ठाकुर सं. गजेन्‍द्र ठाकुर सं. गजेन्‍द्र ठाकुर श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल श्री सुशील भारती श्री योगानन्‍द झा डा. उमेश ना. कर्ण डा. योगानन्‍द झा श्री राजीव रंगजन मि‍श्र एवं श्री ओम प्रकाश झा समीक्षाक समीक्षा (प्रति‍समीक्षा,प्रति‍आलोचना) केर आवश्‍यकतापर एक नव प्रयोग। -श्री गजेन्‍द्र ठाकुर -श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल -श्री ओम प्रकाश झा -श्री उमेश मण्‍डल 82. मेंहथ (झंझारपुर) कथा बौध सि‍द्ध मेहथपा 31.05.2014 गजेन्‍द्र ठाकुर अध्‍यक्ष- श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर उद- श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल डा. कमलकान्‍त झा श्री शि‍वकुमार मि‍श्र स्‍वागत- श्री काशीकान्‍त झा ‘कि‍रण’ मंच संचालन-श्री उमेश मण्‍डल एवं श्री आनन्‍द कुमार झा 252. बैशाखमे दलानपर (गद्य-पद्य) 253. नेपालक नोर मरुभूमि‍मे(ग/प.सं) 254. उलहन (वि‍/ल.सं) 255. On the Dice Bord of the Millennium 256. सहस्त्रावि‍दि‍क चौपड़पर (प.सं) 257. The Science of  Words (Short Story) 258. धांगि‍ बाट बनेबाक दाम अगूवार पेने छँ (गजल) 259. सहस्रजि‍त (पद्य संग्रह) 260. कुरुक्षेत्रम् प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना-2 संदीप साफी वि‍न्‍देश्वर ठाकुर कपि‍लेश्वर राउत अनु- ज्‍योति‍ झा चौधरी गजेन्‍द्र ठाकुर Gajendra Thakur गजेन्‍द्र ठाकुर गजेन्‍द्र ठाकुर गजेन्‍द्र ठाकुर गजेन्‍द्र ठाकुर डा. कमलकान्‍त झा श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल गजेन्‍द्र ठाकुर डा. शि‍वकुमार प्रसाद श्री आनन्‍द कुमार झा श्री असीन ठाकुर, ललन कु कामत श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ श्रीबेचन ठाकुर/श्री रामवि‍लास साहु/श्री हेम नारायण साहु श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री अरवि‍न्‍द ठाकुर, श्री राजदेव मण्‍डल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल ऐ बाल केन्‍द्रि‍त गोष्‍ठीक आयोजन पर  अपन “बाल-गोपाल” नामक लघु कथा संग्रह समरपि‍त केलनि‍। क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक/लेखि‍का लोकार्पण कर्ता अन्‍य 83. सखुआ-भपटि‍याही सार्वजनि‍क स्‍थान- उत्‍क्रमि‍त मध्‍य वि‍द्यालयल परि‍सर। 30.08.2014 नन्‍द वि‍लास राय, फागुलाल साहु, सूरज नारायण राय ‘सुमन’ बेवस्‍था-स्‍थानीय वि‍द्वतजन वि‍शेष सहयोग- डा. वि‍मल कुमार राय, श्री धीरेन्‍द्र कुमार, श्री सूरज नारायण राय, श्री अशोक कुमार राय, श्री सुन्‍दर लाल साह, मो. रि‍जवान, श्री सि‍याराम साह, श्री शम्‍भू सिंह, श्री यादव, श्री उमाकान्‍त राय, श्री जगत नारायण राय, श्री ब्रजनन्‍दन साह, श्री उमेश साह, श्री सुधीर साह, श्री रामकुमार मण्‍डल, श्री सत्‍य नारायण सिंह आ श्री लक्ष्‍मी  मण्‍डल, उमेश मण्‍डल तथा श्री गजेन्‍द्र ठाकुर। अध्‍यक्ष मण्‍डल-डा. वि‍मल कुमार राय, डा. योगेन्‍द्र पाठक वि‍योगी, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री कमलेश झा आ डा. शि‍व कुमार प्रसाद उद- डा. वि‍मल कुमार राय, श्री सूरज नारायण राय, डा. योगेन्‍द पाठक वि‍योगी, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री ओम प्रकाश झा संचालन समि‍ति‍- श्री ओम प्रकाश झा, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल, श्री राजदेव मण्‍डल आ उमेश मण्‍डल 261 “सूखल मन तरसल आँखि‍” (कवि‍ता संग्रह)साॅफ्ट कौपी 262 “कथा कुसुम” (वि‍हनि‍/लघु कथा संग्रह) 263 “भोँट” (नाटक) 264 “पंचैती” (पटकथा) 265 “जाल” (पटकथा) 266 “अपन-बि‍रान” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) 267 “पतझाड़” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) 268 “रटनी खढ़” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) 269 “बाल-गोपाल” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) 270 “लजबि‍जी” (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह) 271 “संत करु खि‍रहरि‍” (कारूक जीवनी) 272 “कारु खि‍रहरि‍” मुन्नी कामत दुर्गानन्‍द मण्‍डल बेचन ठाकुरक राजदेव मण्‍डल राजदेव मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल अयोधी यादव ‘अमर’ अयोधी यादव ‘अमर’ श्री फागुलाल साहु श्री शम्‍भु सौरभ श्री ब्रजनन्‍दन साह श्री हेम नारायण साहु श्री शि‍व कुमार मि‍श्र श्री कमलेश झा श्री उमेश नारायण कर्ण श्री फागुलाल साहु श्री राम कुमार मण्‍डल श्री ओम प्रकाश झा श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल डा. वि‍मल कुमार राय/ डा. योगेन्‍द्र पाठक ‘वि‍योगी’ जन सहयोगसँ गोष्‍ठीक आयोजन फलस्‍वरूप जन साधारणक उपस्‍थि‍ति‍। श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल ऐ गोष्‍ठीकेँ नारी केन्‍द्रि‍त लघु कथा संग्रह “लजवि‍जी” समरपि‍त केलनि‍। 84. बेरमा मध्‍य विद्यालय परिसर (बेरमा,मधुबनी) 20.12.2014 शि‍वकुमार मि‍श्र बेवस्‍था- स्‍थानीय साहित्‍यकार एवं साहित्‍य प्रेमी अध्‍यक्ष मण्‍डल- शिव कुमार प्रसाद,श्‍यामानन्‍द चौधरी,सच्‍चिदानन्‍द‘सचिद’। संचालन समिति- दुर्गानन्‍द मण्‍डल,ओम प्रकाश झा,उमेश मण्‍डल उद्घाटनकर्ता- श्‍यामानन्‍द चौधरी, जगदीश प्रसाद मण्‍डल,पं. सच्‍चिदानन्‍द मिश्र ‘सचिद’ 273 डीहक जमीन (विहनि/लघु कथा संग्रह) 274 समरथाइक भूत (लघु कथा संग्रह) 275 गामक शकल-सूरत (लघु कथा संग्रह) 276 अप्‍पन-बीरान (लघु कथा संग्रह) 277 बाल-गोपाल (लघु कथा संग्रह) 278 लजबिजी (लघु कथा संग्रह) 279 पतझाड़ (लघु कथा संग्रह) 280. रटनी खढ़ (दी.क. संग्रह) 281. शिव दर्शन (पद्य) 282. अभिलाषा (मैथिली भजनमाला) 283. मैथिली गजल: आगमन ओ प्रस्‍थान बिंदु (आलोचना संकलन) (सी.डी.) 284. सखुआवाली (विहनि/लघु कथा संग्रह) (सी.डी.) 285. निर्मल सनेस (विहनि/लघु कथा संग्रह) (सी.डी.) 286. देवघरक प्रसाद (विहनि/लघु कथा संग्रह) (सी.डी.) 287. कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा- (विहनि/लघु कथा संग्रह) (सी.डी.) ओम प्रकाश झा जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल पं. सच्‍चिदानन्‍द मिश्र पं. सच्‍चिदानन्‍द मिश्र सं.सं- गजेन्‍द्र ठाकुर,आशीष अनचिन्‍हार सं.सं- उमेश मण्‍डल सं.सं- उमेश मण्‍डल सं.सं- उमेश मण्‍डल सं.सं- विदेह ग्रुप जगदीश प्रसाद मण्‍डल, उमेश नारायण कर्ण,राम विलास साहु ओम प्रकाश झा,सच्‍चिदानन्‍द‘सचिद’, शम्‍भु सौरभ श्‍यामानन्‍द चौधरी, अनुप कुमार कश्‍यप,राजदेव मण्‍डल‘रमण’ बेचन ठाकुर,फागुलाल साहु,मिहिर झा महादेव, उमेश ना. कर्ण संजय कुमार मण्‍डल, सूर्य नारायण कामत (सूरज कामत),शम्‍भु सौरभ, शिव कुमार प्रसाद बमभोली झा,दुर्गानन्‍द मण्‍डल,शिव कुमार प्रसाद, गांधी प्रसाद (सरपंच) ओम प्रकाश झा,श्‍यामानन्‍द चौधरी, राम विलास साहु,नन्‍द विलास राय अरविन्‍द चौधरी,अनुपकुमार कश्‍यप,कपिलेश्वर राउत,मो. गुल हसन ओम प्रकाश झा,शम्‍भु सौरभ, शिव कुमार प्रसाद,कपिलेश्वर राउत श्‍यामानन्‍द चौधरी, बेचन ठाकुर (सरिसव पाही) श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल श्री ओम प्रकाश झा डा. शिव कुमार प्रसाद श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’ श्री कपिलेश्वर राउत अन्‍य- जन सहयोगसँ गोष्‍ठीक आयोजन फलस्‍वरूप जन साधारणक उपस्‍थि‍ति‍। क्र.सं. स्‍थान ति‍थि‍ संयोजक/आयोजक अध्‍यक्षता/उद्घाटन पोथी लोकार्पण लेखक/लेखि‍का लोकार्पण कर्ता अन्‍य 85. भागलपुर ‘श्‍याम कुंज’ (द्वारिकापुरी भागलपुर) 04.04.2015 ओम प्रकाश झा जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डा. प्रेम शंकर सिंह, श्री डा. केष्‍कर ठाकुर, श्री विवेकानन्‍द झा‘बीनू’ श्री राजदेव मण्‍डल,श्री श्‍यामानन्‍द चौधरी। संचालन समिति- श्री दुगानन्‍द मण्‍डल, श्री पंकज कुमार झा एवं उमेश मण्‍डल। 288. अपन मन अपन धन (लघु कथा संग्रह) 289. उकड़ू समय (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल डा. केष्‍कर ठाकुर डा. प्रेम शंकर सिंह 1.अपन मन अपन धन (लघुकथा संग्रह) 2.उकड़ू समय- (लघुकथा संग्रह) 3.मिथि-मालिनी (वार्षिक पत्रिका) ऐ तीनू पोथीक पचास-पचास प्रति नि:शुल्‍क वितरण कएल गेल...। 86. लकसेना उनमुक्‍त आश्रमक गांधी सभा कक्ष जिला- मधुबनी 20.06.2015 राजदेव मण्‍डल‘रमण’ उ- डॉ. खुशीलाल मण्‍डल, डॉ. योगेन्‍द्र पाठक‘वियोगी’, श्री भोगेन्‍द्र यादव‘भाष्‍कर’, श्री कमलेश झा। अ- श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल (बनरझूला), डॉ. योगेन्‍द्र पाठक‘वियोगी’, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। 290. पसेनाक धरम (ल.क. संग्रह) 291. मधुमाछी (लघु कथा संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल डॉ. खुशीलाल मण्‍डल डॉ. योगेन्‍द्र पाठक ‘वियोगी’ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक दूटा लघु कथा संग्रह, जे ऐ गोष्‍ठीमे लोकार्पित भेल तेकर पचास-पचास प्रति नि:शुल्‍क वितरण कएल गेल तथा डॉ रंगनाथ दिवाकरक लघु कथा संग्रह- ‘भखरैत नील रंग’, सेहो किछु कथाकारकेँ देल गेलनि। 87. श्‍यामा रेसिडेन्‍सी कॉम विवाह हॉल (एस.बी.आइ. केम्‍पस) निर्मली (सुपौल) 19.09.2015 संयोजक. उमेश मण्‍डल,आयोजक: निर्मलीक स्‍थानीय साहित्‍य प्रेमी अा साहित्‍यकार।विशेष सहयोग: श्री सत्‍य नारायण प्रसाद साहु,श्री नारायण प्रसाद सिंह,श्री पिंकु पंसारी, श्री राम प्रकाश साहु, श्री प्रभाष कुमार कामत, श्री देवेश कुमार सिंह, श्री मनोज कुमार शर्मा, श्री रामनाथ गुप्‍ता, श्री राम लखन भण्‍डारी, श्री अखिलेश चौधरी, श्री राम सुन्‍द्रर साहु, प्रो. धीरेन्‍द्र कुमार तथा डॉ. विमल कुमार राय। श्री विनोद कुमार, श्री सुरेन्‍द्र प्रसाद यादव, श्री सुरेश महतो। उद्धाटन : संयुक्‍त रूपे- डॉ. दुर्गा प्रसाद साहू, डॉ. राम अशीष सिंह, डॉ. विमल कुमार राय, श्री सुशील कुमार, श्री सत्‍य नारायण प्रसाद साहु, श्रीमती आशा देवी तथा प्रो. विलम कुमार राय। अध्‍यक्ष मण्‍डल- श्री नन्‍द विलास राय, श्री कपिलेश्‍वर राउत, श्री राम विलास साहु,प्रो. हेम नारायण साहु। स्‍वागत गीत : रामदेव प्रसाद मण्‍डल‘झारूदार’। स्‍वागत भाषण : डॉ शिव कुमार प्रसाद, डॉ श्री मोहन झा। 292. गुड़ा खुद्दीक रोटी (कथा) 293. फलहार (कथा संग्रह) 294.लजबिजी(अगिला संस्‍करण) 295. गामक शकल-सूरत (कथा) 296. जाल (पटकथा) जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल राजदेव मण्‍डल डॉ. दुर्गा प्रसाद साहू डॉ. राम अशीष सिंह श्रीमती आशा देवी प्रो. धीरेन्‍द्र कुमार राय डॉ. विमल कुमार राय श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारू पोथी जे आइ लोकार्पण भेल तेकर पचास-पचास प्रति संयोजक अपना दिससँ वितरण केलैन 88. मध्‍य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर) 30.01.2016 आयोजक : श्री अमर नाथ झा संयोजक : कमलेश झा उद्धाटन : श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री राजदेश मण्‍डल,फागु लाल साहु,उमेश पासवान,शारदा नन्‍द सिंह, नन्‍द विलास राय,उमेश नारायण कर्ण। स्‍वागत गीत : राधाकान्‍त मण्‍डल 297. ठूठ गाछ (उपन्‍यास) 298. एगच्‍छा आमक गाछ (कथा) जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल सम्‍मिलित रूपे अर्थात् गोष्‍ठीमे पहुँचल सबहक द्वारा श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक ‘खसैत गाछ’(लघु कथा संग्रह) आ ठूठ गाछ (उपन्‍यासक) पचास-पचास कॉपी वितरण लेखक अपना दिससँ केलैन। 89. लौकही स्‍थान: सूर्य प्रसाद उच्‍च विद्यालय-लौकही 26.03.2016 संयोजक : उमेश पासवान एवं प्रेम कुमार साहु उद्धाटन: श्री रामचन्‍द्र चौपाल,श्री राजदेव मण्‍डल ‘रमण’,श्री लक्ष्‍मी ना. सिंह, शम्‍भू सौरभ, अध्‍यक्ष मण्‍डल: श्री ज्रदीश प्रसाद मण्‍डल, रवि कुमार एवं शम्‍भू सौरभ, राजदेव मण्‍डल। मंच संचालन : श्री उमेश मण्‍डल, श्री नन्‍द विलास राय, श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल। 299. चन्‍द्रमणि (काव्‍य संग्रह) 300. शुभचिन्‍तक (ल.क. संग्रह) उमेश पासवान जगदीश प्रसाद मण्‍डल सम्‍मिलित रूपे सम्‍मिलित रूपे उमेश पासवानक पोथी‘चन्‍द्रमणि’ एवं जगदीश प्रसाद मण्‍डलक पोथी :‘शुभचिन्‍तक’ सए-सए कौपी वितरण। 90. लक्ष्‍मीनियाँ (मधुबनी) 18.06.2016 संयोजक : राम विलास साहु आयोजक : लक्ष्‍मीनियाँ गामक सम्‍स्‍त साहित्‍य प्रेमी। उद्घाटन: 301. गाछपर सँ खसला (क.संग्रह) 302. डभियाएल गाम (क. संग्रह) 303. अंकुर (क.संग्रह) जगदीश प्रसाद मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल राम विलास साहु सम्‍मिलित रूपे सम्‍मिलित रूपे सम्‍मिलित रूपे 91. गोधनपुर (मिथिला दीपसँ उत्तर) जिला- मधुबनी 24.9.2016 संयोजक : दुर्गानन्‍द मण्‍डल उद्धाटन: अध्‍यक्ष मण्‍डल: मंच संचालन : 304. कथा कुसुम (क. संग्रह) 303. गुलेती दास (क. संग्रह) दुर्गानन्‍द मण्‍डल जगदीश प्रसाद मण्‍डल विदेह सम्मान समारोह (समानान्तर साह्त्य अकादेमी पुरस्कार सहित)- सचित्र विवरण श्री परमानंद ठाकुरकेँ वि‍देह हारमोनि‍यम कला सम्मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता। परि‍चए- श्री परमानन्‍द ठाकुर, पि‍ताक नाओं- श्री नथुनी ठाकुर, गाम- जगदर, पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छैथ। ३० वर्षीय परमानन्‍द एखन पंचायत शि‍क्षक छैथ। ऐसँ पहि‍ने ओ बैंड पार्टीमे कैसि‍यो मास्‍टरक कार्य करैत छला। ढोलक सेहो बजेबाक कला छैन‍। ओना हारमोनि‍यम कलासँ दर्शक-श्रोताकेँ मंत्र-मुग्‍ध करैत रहला अछि‍। हि‍नक कलाकेँ झंझारपमुर क्षेत्रमे सभ सराहै छैन‍‍। जे. एम. एस. कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे सरस्‍वती पूजाक अवसरपर नाट्य उत्‍सवमे हि‍नक कलाक प्रदर्शन नीक होइत रहलनि‍ अछि‍। हि‍नक कलामे आशातीत उन्नति‍ हेतु वि‍देह परि‍वार हि‍नका वि‍देह हारमोनि‍यम कला सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत अपनाकेँ गौर्वान्‍वि‍त महसूस केलक अछि‍। सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारीकेँ वि‍देह अभि‍नय सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत डॉ. उषा महासेठ। फाइल फोटो-२, वि‍देह अभि‍नय सम्‍मानसँ सम्मानि‍त शि‍ल्‍पी कुमारीकेँ उपहार प्रदान करैत डॉ. उषा महासेठ। परि‍चए- सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, पि‍ताक नाओं श्री लक्ष्‍मण झा, पता- गाम- चनौरागोठ, पत्रालय- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार) १७ वर्षीय शि‍ल्‍पी दसम वर्गक छात्रा छैथ। पंचायत, प्रखण्‍ड आ अनुमण्‍डल स्‍तरपर अपन प्रति‍भासँ केतेको बेर पुरस्‍कृत भऽ चुकल छैथ। जे. एम. एस; कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंजमे सभ क्षेत्रमे हि‍नक नीक प्रदर्शन रहलनि‍ अछि‍। खास कऽ अभि‍नय कलाक मादे दर्शक लोकनि‍क बीच बड्ड सराहल गेलीह। वि‍देह अभि‍नय सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार हर्षित अछि‍। श्री अमीत रंजनकेँ वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री कवि‍लेश्वर राउत (वायासँ) एवं श्री जगदीश झा (दहि‍नासँ)। फाइल फोटो-२, वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त अमीत रंजनकेँ उपहार प्रदान करैत श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। परि‍चए- श्री अमीत रंजन, पि‍ताक नाओं- श्री नागेश्वर कामत, गाम- पौराम, पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छैथ। १८ वर्षीय अमि‍त बारहवींक छात्र छैथ। अनुमण्‍डल स्‍तरपर नृत्‍यकलामे हि‍नका प्रथम पुरस्‍कार भेटल छैन‍। जे. एम. एस. कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे आयोजि‍त सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे नृत्‍य लेल सराहल जाइत रहला अछि‍। वि‍देह नृत्‍यकला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नता महसूस केलक अछि‍। श्री बहादुर रामकेँ वि‍देह रसनचौकी कला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री उमेश मण्‍डल वायासँ एवं दहि‍नासँ श्री बेचन ठाकुर। फाइल फोटो-२, वि‍देह रसनचौकी कला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त बहादुर रामकेँ श्री बेचन ठाकुर उपहार प्रदान करैत एवं मंच संचालन करैत श्री दुर्गानन्‍द मण्‍डल। परि‍चए- श्री बहादुर राम, पि‍ताक नाओं स्‍व. सरजुग राम, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हार केर स्‍थायी नि‍वासी छैथ। हि‍नक उम्र ६० बर्ख छैन‍। ४० बर्खसँ रसनचौकी बजबैत छैथ। समाजक सभ वर्णक लोकक मध्‍य हि‍नक उक्‍त कला लेल वि‍शेष मांग रहैए। पढ़ल-लि‍खल तँ नै छथि‍ मुदा रसनचौकी कलासँ गाम-घरमे लोकप्रि‍य व्‍यक्‍ति‍ छैथ। आर्थिक रूपसँ नि‍म्न रहि‍तो मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क धरोरहकेँ अक्षुण्‍य रखने छैथ। एतदर्थ हि‍नका वि‍देह रसनचौकी कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित भऽ रहल अछि‍। श्री शोभा कान्‍त महतोकेँ वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री कपि‍लेश्वर राउत। फाइल फोटो-२, वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त शोभा कान्‍त महतोकेँ माल्‍यार्पण श्री उमेश मण्‍डल। परि‍चए- श्री शोभा कान्‍त महतो, पि‍ताक नाओं श्री राम अवतार महतो, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छैथ। १६ बर्खक शोभा कान्‍तजी नवम कक्षाक छात्र छैथ। वि‍देह नाट्य उत्‍सवक संग-संग जे.एम.एस. कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे आयोजि‍त सभ कार्यक्रममे हि‍नक प्रदर्शन बढ़ि‍या रहैत छैन‍। नाटकमे हि‍नक अभि‍नयसँ दर्शक वृन्‍द प्रसन्न भऽ सहाहैत रहलखि‍न अछि‍। पंचायत एवं प्रखण्‍ड स्‍तरपर सुन्‍दर अभि‍नय लेल हि‍नका पुरस्‍कृत कएल गेल छैन‍। वि‍देह अभि‍नय कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित भऽ रहल अछि‍। श्री जगदीश मल्लि‍ककेँ वि‍देह हस्‍तकला सम्‍मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री बेचन ठाकुर। परि‍चए- श्री जगदीश मल्‍लि‍क, पि‍ताक नाओं- स्‍व. स्‍वरूप मल्‍लि‍क, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) केर स्‍थायी नि‍वासी छैथ। शि‍ल्‍पकलामे हि‍नका प्रति‍ष्‍ठा छैन‍। हि‍नक बनौल पथि‍या, कोनि‍याँ, चँङेरा, बि‍आहक डाला इत्‍यादि‍क प्रशंसनीय होइत छैन‍। वि‍देह हस्‍तकला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नता महसूस केलक अछि‍। श्री झमेली मुखि‍याकेँ वि‍देह वस्‍तुकला सम्मान- २०१२ क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री हेमनारायण साहु। फाइल फोटो-२, वि‍देह वस्‍तुकला सम्मानसँ सम्मानि‍त झमेली मुखि‍याकेँ उपहार प्रदान करैत श्री अजय कुमार दास। परि‍चए- श्री झमेली मुखि‍या, पि‍ताक नाओं- स्‍व. मुंगालाल मुखि‍या, गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) जन्‍म– लगभग १९५० शि‍क्षा- नि‍रक्षर बेवसाय- बरहीगि‍री, (लकड़ी फर्निचर) मुखि‍याजी वाल्‍यकालहि‍सँ शि‍ल्‍पी (वस्‍तुकला, फर्निचर)क कार्य कऽ परि‍वारक भरन-पोषण करैत रहला अछि‍। ऐ लेल सामाजि‍क संघर्ष सेहो करए पड़लनि‍‍। मुदा आब एक तरहसँ अनुकरणीय व्‍यक्‍ति‍क रूपमे समाजमे जानल-मानल जाइ छैथ। वि‍देह वस्‍तुकला सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार गौरव महसूस कऽ रहल अछि‍। श्री रमेश कुमार भारतीकेँ वि‍देह चि‍त्रकला सम्मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत मो. समसाद आलम। फाइल फोटो-२, वि‍देह चि‍त्रकला सम्मानसँ सम्मानि‍त रमेश कुमार भारतीकेँ उपहार प्रदान करैत वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय एवं साहि‍त्‍यकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल। परि‍चए- श्री रमेश कुमार भारती पि‍ताक नाओं- श्री मोती मण्‍डल जन्‍म ति‍थि‍- १० मार्च १९८६ शि‍क्षा- अन्‍तर स्‍नातक गाम+पोस्‍ट- बेरमा भाया- तमुरि‍या जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) पि‍न- ८४७४१० श्री पनक लाल मण्‍डलकेँ वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री हेमनारायण साहु। फाइल फोटो-२, वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त पनक लाल मण्‍डलकेँ सम्मानि‍त करैत वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय एवं कवि‍ जनक कि‍शोर लाल दास। परि‍चए- श्री पनक लाल मण्‍डल, पि‍ताक नाओं स्‍व. सुन्‍दर मण्‍डल, गाम एवं पत्रालय- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेवसाय- पेन्‍टींग जन्‍म ति‍थि‍- ०५/ ०९/ १९६७ शि‍क्षा- बी.ए. (१९९३-९५) चि‍त्र कलासँ इलाकामे प्रसि‍द्ध छैथ। वि‍द्यालय, महावि‍द्यालय, अनुमण्‍डल कार्यालय इत्‍यादि‍मे अनेको चि‍त्र बना अपन पहि‍चान एकटा नीक चि‍त्रकारक रूपमे बनौनो छैथ। वि‍देह चि‍त्रकला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्‍मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नता महसूस केलक अछि‍। श्री लक्ष्‍मी दासकेँ वि‍देह कि‍सानी आत्‍म नि‍र्भर संस्‍कृति‍ सम्मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री जगदीश झा। फाइल फोटो-२, वि‍देह कि‍सानी आत्‍म नि‍र्भर संस्‍कृति‍ सम्मानसँ सम्मानि‍त लक्ष्‍मी दासकेँ सम्मानि‍त करैत एवं उपहार प्रदान करैत श्री बेचन ठाकुर एवं दुर्गानन्‍द मण्‍डल। परि‍चए- श्री लक्ष्‍मी दास, पि‍ताक नाओं स्‍व. फनी दास, गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छैथ। गाममे रहि कृर्षि कार्यसँ जीवन-यापन करैत रहला अछि‍। डीहक अलाबे कट्ठा पाँचेक जमीन रहने आवश्‍यकता अनुसार बटाइ खेती-वाड़ी करबामे अपन गुंजाइश कएलनि‍। अपने अल्‍प शि‍क्षि‍त रहि‍तो बेटा-बेटीकेँ नीक शि‍क्षा दि‍येबामे गाममे अनुकरणीय व्‍यक्‍ति‍ छैथ। एतदर्थ हि‍नका वि‍देह कि‍सानी आत्‍म नि‍र्भर संस्‍कृति‍ सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त कऽ सम्‍पूर्ण वि‍देह परि‍वार प्रसन्न अछि‍। सुश्री प्रि‍यंका कुमारीकेँ वि‍देह हास्‍य कला सम्‍मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्रीमती नीतू देवी। फाइल फोटो-२, वि‍देह हास्‍य कला सम्‍मानसँ सम्मानि‍त प्रि‍यंका कुमारीकेँ सम्मानि‍त करैत डॉ. उषा महासेठ। परि‍चए- सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, पि‍ताक नाओं श्री बैद्यनाथ साह, गाम- सि‍मरा, पत्रालय- सि‍मरा, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) १६ वर्षीय प्रि‍यंका दसम वर्गक छात्रा छैथ। पंचायत स्‍तरपर अपन नीक प्रदर्शन लेल पुरस्‍कृत भऽ चुकल छैथ। जे. एम. एस; कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंज केर प्रांगणमे सरस्‍वती पूजाक अवसरपर आयोजि‍त सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे हास्‍यक क्षेत्रमे हि‍नका प्रति‍ष्‍ठा भेटलनि‍। वि‍देह हास्‍य कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्न अछि‍‍। श्री यदुनन्‍दन पण्‍डि‍तकेँ वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल। वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मानसँ सम्मानि‍त यदुनन्‍दन पण्‍डि‍तकेँ सम्मानि‍त करैत पूर्व जि‍ला पार्षद सदस्‍य बलराम साहु एवं कवि‍ जनक कि‍शोर लाल दास। परि‍चए- श्री यदुनन्‍दन पण्‍डि‍त, पि‍ताक नाओं- श्री अशर्फी पण्‍डि‍त, गाम+पोस्‍ट- बेलाराही, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) केर स्‍थायी नि‍वासी छैथ। उम्र ५० बर्ख। हि‍नका बचपनसँ कुम्हारक कार्यमे अभि‍रूचि छैन‍। माटि‍क बर्तन-बासन आदि‍क अति‍रि‍क्‍त वि‍भि‍न्न देवी-देवताक मूर्ति बनेबामे सि‍द्धस्‍त छैथ। उक्‍त कलासँ ई इलाकामे प्रसि‍द्ध छैथ। सरस्‍वती सनक देवीकेँ दूगो हाथ काटैबला कुम्हारकेँ कलाक संग मजाक बुझै छथि‍ मुदा अपने चारि‍ हाथवाली प्रति‍मा बना अपन क्षेत्रमे प्रसि‍द्धि‍ हासि‍ल कएने छैथ। ‍वि‍देह शि‍ल्‍प कला सम्मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार हर्षित अछि‍। श्री बुलन राउतकेँ वि‍देह वाद्यकला (ढोलक) सम्मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत श्री प्रेम प्रकाश एवं श्री भगि‍रथ प्रधान। परि‍चए- श्री बुलन राउत, पि‍ताक नओं स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत, गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छैथ। उम्र ५० बर्ख। बुलनजी पानक खेती कऽ जीवन यापन करैत छैथ। ढोलक बजौनाइक रूचि‍ हि‍नका आइ नै वरण बच्‍चेसँ रहल छैन‍। अपना इलाकामे उक्‍त कलाक मादे चर्चित छैथ। लय-ताकल अन्‍दाज बेजोर छैन‍। ई अपन कीर्तन मंडलीक रीढ़ मानल जाइत छैथ। वि‍देह वाद्यकला (ढोलक) सम्मान- २०१२सँ सम्मानि‍त कऽ वि‍देह परि‍वार काफी हर्षित अछि‍। श्री दुर्गानन्‍द ठाकुरकेँ वि‍देह हास्‍य कला सम्मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत वायासँ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल एवं दहि‍नासँ श्री नन्‍द कि‍शोर गुप्‍ता। फाइल फोटो-२, वि‍देह हास्‍य कला सम्मानसँ सम्मानि‍त दुर्गानन्‍द ठाकुरकेँ सम्मानि‍त करैत अवकाश प्राप्‍त शि‍क्षक हरि‍नारायण झा एवं वरीय उपसमाहर्ता सह प्रभारी एस.डी.ओ. चेतनारायण राय। परि‍चए- श्री दुर्गानन्‍द ठाकुर, पि‍ताक नाओं- स्‍व. भरत ठाकुर, गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हारक स्‍थायी नि‍वासी छैथ। दुर्गानन्‍दजी अंग्रेजी वि‍षयसँ बी.ए. कएने छैथ। आर्थिक रूपसँ पछुआएल रहलाक कारणे निजी अध्‍यापन कार्य करैत परि‍वारक भरन-पोषन करैत छैथ। जे. एम. एस. कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंजक वि‍श्‍वसनीय छात्रमे अग्रगण्‍य छैथ। हि‍नक हास्‍य प्रदर्शन बड्ड चोटगर दर्शक वृन्‍दकेँ लगैत छैन‍। वि‍देह हास्‍य सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार प्रसन्नताक अनुभव केलक अछि‍। फाइल फोटो, सुश्री सुलेखा कुमारीकेँ वि‍देह नृत्‍यकला सम्मान- २०१२क प्रशस्‍ती पत्र प्रदान करैत डॉ. उषा महासेठ। परि‍चए- सुश्री सुलेखा कुमारी, पि‍ताक नाओं श्री हरेराम यादव, गाम आ पत्रालय- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) १६ वर्षीय शि‍ल्‍पी श्री हरेराम यादवक द्वि‍तीय पुत्री छैथ। नवम वर्गक छात्रा छैथ। पंचायत आ प्रखण्‍ड स्‍तरपर नृत्‍य कलाक लेल केतेको बेर पुरस्‍कार भेटल छैन। जे. एम. एस; कोचिंग सेन्‍टर, चनौरागंजक प्रांगणमे आयोजि‍त सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे ई दर्शक लोकनि‍क मन मोहैत रहली अछि‍। वि‍देह नृत्‍य कला सम्‍मान- २०१२ सँ सम्मानि‍त करैत वि‍देह परि‍वार गौवान्‍वि‍त महसूस केलक अछि‍। “वि‍देह मूल साहि‍त्‍य सम्‍मान-2012” श्री राजदेव मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सोने लाल मण्‍डल उर्फ सोनाई मण्‍डल, उमेर- 52, “अम्‍बरा” कवि‍ता संग्रह लेल “वि‍देह मूल साहि‍त्‍य सम्‍मान-2012” परिचय: जनम : १५ मार्च १९६० ईं.मे। पिता : स्‍व. सोनेलाल मण्‍डल उर्फ सोनाइ मण्‍डल। माता : स्‍व. फूलवती देवी। पत्नी : श्रीमती चन्‍द्रप्रभा देवी। पुत्र : निशान्‍त मण्‍डल, कृष्‍णकान्‍त मण्‍डल, वि‍प्रकान्‍त मण्‍डल। पुत्री : रश्मि‍ कुमारी। मातृक : बेलहा (फुलपरास, मधुबनी) मूलगाम : मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- मधुबनी। बिहार- ८४७४५२ मोबाइल : ९१९९५९२९२० शि‍क्षा : एम.ए. द्वय (मैथि‍ली, हि‍न्‍दी, एल.एल.बी) ई पत्र : rajdeokavi@gmail.com सम्‍मान : अम्‍बरा कवि‍ता संग्रह लेल वि‍देह समानान्‍तर साहित्‍य अकादेमी पुरस्‍कार वर्ष २०१२क मूल पुरस्‍कार तथा समग्र योगदान लेल वैदेह सम्‍मान-२०१३ प्राप्‍त। प्रकाशि‍त कृति : (१) अम्‍बरा- कवि‍ता संग्रह (२०१०), (२) बसुंधरा कवि‍ता संग्रह (२०१३), (३) हमर टोल- उपन्‍यास (२०१३) श्रुति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त। अप्रकाशि‍त कृति‍- चाक (उपन्‍यास), त्रि‍वेणीक रंग (लघु/वि‍हनि‍ कथा संग्रह)। “वि‍देह अनुवाद पुरस्‍कार” डॉ. नरेश कुमार वि‍कल “ययाति‍” (वि‍. स. खाण्‍डेकर, मराठी)क वि‍देह अनुवाद लेल 2013क “वि‍देह अनुवाद पुरस्‍कार”। सम्‍पर्क- भगवानपुर, देसुआ समस्‍तीपुर बि‍हार। “वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान” श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. दल्‍लू मण्‍डल “तरेगन (बाल प्रेरक बिहैन‍ कथा संग्रह” लेल 2012क “वि‍देह बाल साहि‍त्‍य सम्‍मान” परिचय: जन्‍म : 5 जुलाई 1947 ई., पिताक नाओं : स्‍व. दल्‍लू मण्‍डल। माताक नाओं : स्‍व. मकोबती देवी। पत्नी : श्रीमती रामसखी देवी। पता : मूलगाम- बेरमा, भाया- तमुरिया, प्रखण्‍ड- लखनौर, जिला- मधुबनी, (बि‍हार) पिन : 847410, मो. 9931654742, 9570938611. मातृक : मनसारा, भाया- घनश्‍यामपुर, जिला- दरभंगा। जीवि‍कोपार्जन : कृषि (मुख्‍यत: तरकारी खेती) शि‍क्षा : एम.ए. द्वय (हिन्‍दी एवं राजनीति शास्‍त्र) साहित्‍य लेखन : 2001 ईस्‍वीक पछाइतसँ...। मौलिक रचना : गीत संग्रह : 1. गीतांजलि, 2. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरि‍ता। कविता संग्रह : 5. इंद्रधनुषी अकास, 6. राति‍-दि‍न, 7. सतबेध। एकांकी संचयन : 8. पंचवटी। नाटक : 9. मि‍थि‍लाक बेटी, 10. कम्‍प्रोमाइज, 11. झमेलि‍या बि‍आह, 12. रत्नाकर डकैत, 13. स्‍वयंवर। उपन्‍यास : 14. मौलाइल गाछक फूल, 15. उत्‍थान-पतन, 16. जि‍नगीक जीत, 17. जीवन-मरण, 18. जीवन संघर्ष, 19. नै धाड़ैए, 20. बड़की बहि‍न, 21. भादवक आठ अन्‍हार, 22. सधबा-वि‍धवा, 23. ठूठ गाछ। एकांकी : 24. कल्‍याणी, 25. सतमाए, 26. समझौता, 27. तामक तमघैल, 28. बीरांगना। विहैन कथा संग्रह : 29. तरेगन, 30. बजन्‍ता-बुझन्‍ता। दीर्घ कथा संग्रह : 31. शंभुदास, 32. रटनी खढ़। लघु कथा संग्रह : 33. गामक जि‍नगी, 34. अर्द्धांगि‍नी, 35. सतभैंया पोखरि, 36. गामक शकल-सूरत, 37. अपन मन अपन धन, 38. समरथाइक भूत, 39. अप्‍पन-बीरान, 40. बाल गोपाल, 41. भकमोड़, 42. उलबा चाउर, 43. पतझाड़, 44. लजबि‍जी, 45. उकड़ू समय, 46. मधुमाछी, 47. पसेनाक धरम, 48. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 49. फलहार, 50. खसैत गाछ, 51. एगच्‍छा आमक गाछ, 52. शुभचिन्‍तक, 53. गाछपर सँ खसला, 54. डभियाएल गाम। “वि‍देह मानद् महत्तर सदस्‍यता” श्री राजनन्‍दन लाल दास (प्रति‍नि‍धि‍- डॉ. बुचरू पासवान) मैथि‍लीमे समग्र योगदान लेल “वि‍देह मानद् महत्तर सदस्‍यता” प्रदान कएल जा रहल अछि‍। श्रीमती ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी “अर्चिस” कवि‍ता संग्रह लेल 2012क “वि‍देह युवा पुरस्‍कार” शास्‍त्रीय संगीत आ तानपुरा वाद्य लेल वि‍देह “मांगनि‍ खबास सम्‍मान” श्री रामवृक्ष सिंह सुपुत्र श्री अनि‍रूद्ध सिंह, उमेर- ५६, गाम- फुलवरि‍या, पोस्‍ट- बाबूबरही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) “समग्र योगदान सम्‍मान” तबला वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री देवनाथ यादव सुपुत्र स्‍व. सर्वजीत यादव, उमेर- ५०, गाम- झाँझपट्टी, पोस्‍ट- पीपराही, भाया- लदनि‍याँ, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) श्री नवेन्‍दु कुमार झा सुपुत्र श्री सत्‍य नारायण झा, मैथि‍ली पत्रकारि‍ता लेल “विदेह मैथि‍ली पत्रकारि‍ता सम्मान-2012” सम्‍पर्क- गाम- सबास जि‍ला- मुजफ्फरपुर। मुख्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री आशा कुमारी सुपुत्री श्री रामावतार यादव, उमेर- १८, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. समसाद आलम सुपुत्र मो. ईषा आलम, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रंगमंच अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री अपर्णा कुमारी सुपुत्री श्री मनोज कुमार साहु, जन्‍म ति‍थि‍- १८-२-१९९८, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रंगमंच हास्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री ब्रह्मदेव पासवान उर्फ रामजानी पासवान सुपुत्र- स्‍व. लक्ष्‍मी पासवान, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रंगमंच हास्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” टॉसि‍फ आलम उमेर २० बर्ख, (प्रति‍नि‍धि‍ मुस्‍ताक आलम, पिता) उमेर- २० बर्ख। पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नृत्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री हरि‍ नारायण मण्‍डल सुपुत्र- स्‍व. नन्‍दी मण्‍डल, उमेर- ५८, पता- गाम+पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नृत्‍य अभि‍नय लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री संगीता कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव पासवान, उमेर- १६, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जय प्रकाश मण्‍डल सुपुत्र- श्री कुशेश्वर मण्‍डल, उमेर- ३५, पता- गाम- सनपतहा, पोस्‍ट– बौरहा, भाया- सरायगढ़, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री चन्‍दन कुमार मण्‍डल सुपुत्र श्री भोला मण्‍डल, पता- गाम- खड़गपुर, पोस्‍ट- बेलही, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) संप्रति‍, छात्र स्‍नातक अंति‍म वर्ष, कला एवं शि‍ल्‍प महावि‍द्यालय- पटना। हरमुनि‍याँ वाद्य लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री महादेव साह सुपुत्र रामदेव साह, उमेर- ५८, गाम- बेलहा, वार्ड- नं. ०९, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) हरमुनि‍याँ वाद्य लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जागेश्वर प्रसाद राउत सुपुत्र स्‍व. रामस्‍वरूप राउत, उमेर ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) ढोलक-ठेकैता लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री अनुप सदाय सुपुत्र स्‍व. डोमी सदाय, उमेर- ८०, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) ढोलक-ठेकैता लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कल्‍लर राम सुपुत्र स्‍व. खट्टर राम, उमेर- ५०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रसनचौकी वाद्य लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” वासुदेव राम सुपुत्र स्‍व. अनुप राम, गाम+पोस्‍ट- निर्मली, वार्ड न. ०७ , जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) शि‍ल्‍प-वास्‍तुकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री बौकू मल्‍लि‍क सुपुत्र दरबारी मल्‍लि‍क, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) (प्रति‍नि‍धि‍- रामपति मण्‍डलक पत्नी- पुतोहु : श्रीमती सुकनी देवी) शि‍ल्‍प-वास्‍तुकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम वि‍लास धरि‍कार सुपुत्र स्‍व. ठोढ़ाइ धरि‍कार, उमेर- ४०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” घूरन पंडि‍त सुपुत्र- श्री मोलहू पंडि‍त, पता- गाम+पोस्‍ट– बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मूर्तिकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री प्रभु पंडि‍त सुपुत्र स्‍व. वासुदेव, उमेर- ५० , पता- गाम+पोस्‍ट- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी, बि‍हार। प्रभुजी १९८३ ईस्‍वीसँ सिलौलियामे सभ साल दुर्गा-प्रतिमा बनबैत रहला अछि। तहिना निर्मली अम्‍बेदकर चौक परक दुगा-प्रतिमा सेहो सभ साल यएह बनबै छैथ। काष्ठ-कला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान”श्री जगदेव साहु सुपुत्र स्‍व. शनीचर साहु, उमेर- ३६, गाम- ‍निर्मली-पुनर्वास, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) काष्‍ट कला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री योगेन्‍द्र ठाकुर सुपुत्र स्‍व. बुद्धू ठाकुर उमेर- ४५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी आत्मनिर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम अवतार राउत सुपुत्र स्‍व. सुबध राउत, उमेर- ६६, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) किसानी आत्मनिर्भर संस्कृतिक संरक्षण लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रौशन यादव सुपुत्र स्‍व. कपि‍लेश्वर यादव, उमेर- ३५, गाम+पोस्‍ट– बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) अल्हा/महराइ लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. जीबछ (प्रति‍नि‍धि‍ मो. समसूल, सरबेटा) सुपुत्र मो. बि‍लट मरहूम, उमेर- ६५, पता- गाम- बसहा, पोस्‍ट- बड़हारा, भाया- अन्‍धराठाढ़ी, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०१ जोगि‍रा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री बच्‍चन मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. सीताराम मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) जोगीरा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रामदेव ठाकुर सुपुत्र स्‍व. जागेश्वर ठाकुर, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पराती गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सुकदेव साफी सुपुत्र स्‍व. बाबूनाथ साफी, उमेर- ७५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- निर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) श्री लेल्हु दास सुपुत्र स्‍व. सनक मण्‍डल पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. गुल हसन सुपुत्र अब्‍दुल रसीद मरहूम, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) झरनी लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. रहमान साहब सुपुत्र दिल मोहम्‍मद मरहूम, उमेर- ५८, गाम- नरहि‍या, भाया- फुलपरास, प्रखण्‍ड- लौकही, जि‍ला- मधुबनीक निवासी छैथ। चालीस बर्खसँ नौसाद बैण्‍ड पाट्टी सेहो चलबै छैथ, झरनी वादनमे तँ निपुण छैथे। नाल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जगत नारायण मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल, उमेर- ४०, गाम+पोस्‍ट- ककरडोभ, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री देव नारायण यादव सुपुत्र श्री कुशुमलाल यादव, पता- गाम- बनरझूला, पोस्‍ट- अमही, थाना- घोघड़डीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैथि‍ली लोकगीत लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्रीमती फुदनी देवी पत्नी श्री रामफल मण्‍डल, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मैथि‍ली लोकगीत लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री सुवि‍ता कुमारी सुपुत्री श्री गंगाराम मण्‍डल, उमेर- १८, पता- गाम- मछधी, पोस्‍ट- बलि‍यारि‍, भाया- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सीताराम राम सुपुत्र स्‍व. जंगल राम, उमेर- ६२, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) खुरदक वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री लक्ष्‍मी राम सुपुत्र स्‍व. पंचू मोची, उमेर- ७०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) कॉरनेट वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री चन्‍दर राम सुपुत्र- स्‍व. जीतन राम, उमेर- ५०, पता- गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) कॉरनेट वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” मो. सुभान, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) बेन्‍जो वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राज कुमार महतो सुपुत्र स्‍व. लक्ष्‍मी महतो, उमेर- ४५, गाम- निर्मली वार्ड नं. ०४, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) बेन्‍जो वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान”श्री घुरन राम सुपुत्र स्‍व. तोफी राम, उमेर- ४३, गाम+पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार), प्रतिनिधि- श्रीमती धनावत्ती देवी- पत्नी। भगैत गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जीबछ यादव सुपुत्र स्‍व. रूपालाल यादव, उमेर- ८०, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- निर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) भगैत गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री शम्‍भु मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्‍डल, पता- गाम- बढि‍याघाट-रसुआर, पोस्‍ट– मुंगराहा, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल (बि‍हार) मैथि‍ली खि‍सक्करी लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री छुतहरू यादव उर्फ राजकुमार, सुपुत्र श्री राम खेलावन यादव, गाम- घोघड़रिया, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल, पि‍न- ८४७४५२ मैथि‍ली खि‍सक्करी लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” बैजनाथ मुखि‍या उर्फ टहल मुखि‍या- सुपुत्र स्‍व. ढोंगाइ मुखि‍या, पता- गाम+पोस्‍ट- औरहा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) लोक संस्‍कृति‍क संलक्षण लेल वि‍देह “मांगनि‍ खबास सम्‍मान” श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु, उमेर- ६५, पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) मि‍थि‍ला चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” सुश्री मि‍थि‍लेश कुमारी सुपुत्री श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट-– मुंगराहा, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल (बि‍हार) मि‍थि‍ला चि‍त्रकला लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्रीमती वीणा देवी पत्नी श्री दि‍लि‍प झा, उमेर- ३५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) खौजरी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कि‍शोरी दास सुपुत्र स्‍व. नेबैत मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल (बि‍हार) तबला वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री उपेन्‍द्र चौधरी सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ५५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) घुना-मुना/ सारंगी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री पंची ठाकुर सुपुत्र स्‍व लेल्‍हाय ठाकुर, गाम- पि‍पराही, पोस्‍ट- बनगामा, भाया- नरहिया, जिला- मधुबनी। प्रतिनिधि श्री बेचन ठाकुर- पुत्र। झालि‍ वादन लेल लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कुन्‍दन कुमार कर्ण सुपुत्र श्री इन्‍द्र कुमार कर्ण पता- गाम- रेबाड़ी, पोस्‍ट- चौरामहरैल, थाना- झंझारपुर, जि‍ला- मधुबनी, पि‍न- ८४७४०४ झालि‍ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम खेलावन राउत सुपुत्र स्‍व. कैलू राउत, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) बौसरी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रामचन्‍द्र प्रसाद मण्‍डल सुपुत्र श्री झोटन मण्‍डल, उमेर- ३०, बौसरी/बौसली/बासुरी बजबै छैथ‍। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल (बि‍हार) बौसरी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री वि‍भूति‍ झा सुपुत्र स्‍व. कनटीर झा, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- कछुबी, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैथि‍ली लोकगाथा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रवि‍न्‍द्र यादव सुपुत्र सीताराम यादव, पता- गाम- तुलसि‍याही, पोस्‍ट- मनोहर पट्टी, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) मैथि‍ली लोकगाथा गायन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री पि‍चकुन सदाय सुपुत्र स्‍व. मेथर सदाय, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) मजि‍रा/ छोटका झालि‍ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रामपति‍ मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. अर्जुन मण्‍डल, पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल, बि‍हार। (प्रति‍नि‍धि‍- रामपति मण्‍डलक पत्नी- श्रीमती वीणा देवी) मृदंग वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री कपि‍लेश्वर दास सुपुत्र स्‍व. सुन्नर दास, उमेर- ७०, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मृदन वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री खखर सदाय सुपुत्र स्‍व. बंठा सदाय, उमेर- ६०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) भाव संगीत आ तानपुरा लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री रामवि‍लास यादव सुपुत्र स्‍व. दुखरन यादव, उमेर- ४८, गाम- सि‍मरा, पोस्‍ट- सांगी‍, भाया- घोघड़डीहा, थाना- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) तरसा/तासा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जोगेन्‍द्र राम सुपुत्र स्‍व. बि‍ल्‍टू राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) तरसा/तासा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राजेन्‍द्र राम सुपुत्र रामेश्वर राम, उमेर- ६०, गाम- मझौरा, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री सैनी राम सुपुत्र स्‍व. ललि‍त राम, उमेर- ५०, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जनक मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्‍डल, उमेर- ६०, पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- निर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) गुमगुमि‍याँ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री परमेश्वर मण्‍डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्‍डल उमेर- ४१, (प्रति‍नि‍धि‍- श्रीमती फूलो देवी- पत्नी) १९८० ई.सँ गुमगुमियाँ बजबै छैथ। गुमगुमि‍याँ वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जुगाय साफी सुपुत्र स्‍व. श्री श्रीचन्‍द्र साफी, उमेर- ७५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंका/ढोल वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री बदरी राम सुपुत्र स्‍व. शुबलाल राम उमेर- ५५, पता- गाम इटहरी, पोस्‍ट- बेलही, भाया- निर्मली, थाना- मरौना, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) डंफा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री जग्रनाथ चौधरी उर्फ धि‍यानी दास सुपुत्र स्‍व. महावीर दास, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) डंफा वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री महेन्‍द्र पोद्दार, उमेर- ६५, पता- गाम+पोस्‍ट- चनौरागंज, भाया- तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नङेरा/डि‍गरी वादन लेल वि‍देह “समग्र योगदान सम्‍मान” श्री राम प्रसाद राम सुपुत्र स्‍व. सरयुग मोची, उमेर- ५२, पता- गाम+पोस्‍ट- बेरमा, भाया- तमुरि‍या, थाना- झंझारपुर (आर.एस. शि‍वि‍र), जि‍ला- मधुबनी पि‍न- ८४७४१० (बि‍हार) पद्य खण्ड राम सोगारथ यादव ।। गरिब ।। फटै जखन करेज तऽ, अपनेसँ सी लै छी । अबै जखन अन्हर तऽ हवेमे जिनगी जी लै छी ।। जँ पानि कम पडि जाय तँ, बस नोरे पी लै छी । फटै जखन करेज तऽ, अपनेसँ सी लै छी ।। यमबसियाक रातिमे चँन्द्रमाके अशा लगौने छी । देह धुनिक रुइयाँकें सिरक चमरिकें बनौने छी ।। धनवानकें बाँन्दर बनी, नित दिन नचैत रहै छी । प्यासल आशक जिनगिमे लक्ष्य लेल दौडते रहै छी ।। सभहक खुसिसँ कोठी भरै मुदा बर्ष भरी हमरा मनक कोठिमे, टिस मारिते रहैय । प्रकृतिककें खेल निरला अछि मासे पछाडि कनिबिते रहैय ।। करम कऽ पछाडि दौडते रहबै जाँ धैर हाथ पैर चलाब सकबै । थरथरा जैतै जँ हाथ पैर तखन दैबसँ जीवन अन्तकें प्रथना करबै ।। भेंटी जैतै जिनगिकें रंग तऽ जीवन समहारी ले'बै । जँ आरो परिक्षा लेतै दैब तऽ हँसी हँसिक सुहकारी ले'बै।। ।। देश प्रति स्नेह ।। आई निंदबासन रात्रिमे अद्भुत सपन देखलौं । बिचित्र रुपमे एकटा नारी आ हाथमे कफन देखलौँ ।। कुछ लोक ओकरा पछाडी रंग बिरंगकें झण्डा लेने अवाज लगबैत अबैत छलै । आ उ नारी कनैत कनैत भगैत छलै ।। इ दृश्य देखि हमर मन बिभोर भ'गेल आ हम पुछि देलियै । अहाँ पाछु अतेक लोक किय ? अहाँ हाथमें कफन किय ? अहाँ के छी ? हमरा उतर अहि प्रकार भेंटल हम अहि ब्रह्माण्डकें एक कोनामे अपन अस्तित्व कायम कैने बहु जाती बहु धर्म बहु संस्कृतिमे रमिरहल अहि दुनियाके एक मात्र दासीबिहिन स्वतन्त्र लोक छी ।। हमरालँ अचल सम्पत्ति अछि । हमर एक एक कणकें अलग महत्त्वसँ दुनिया चिन्हिरहल अछि ।। हम पृथ्वी लोकमे सभसँ उच्च शिरसँ चिनहायत छी । हमर खेतकें दाहर कहुवो बहैत पानि मात्र अछि मुदा किन्कोलेल अमृत सम्मान छी ।। मुदा...अपसोच !! इ हमरा पछाडी पडल सभ हमरे संतान अछि । किन्कोमे किन्कोसँ मेलमिलाप नहिं अछि ।। आपसी लडाईमे सभ ब्यस्त छैक । कोई जातिकें नाम पऽ कोई किन्को पहिरनकें मजाक बना कऽ कोई किन्को भाषा संस्कृतिकें नाटक बनाकऽ यहाँ तक कि छालाकें रंग हिसाबे आपसी भेंद भावमे झगडी रहल छैक । अहि लडाईमे हमर बहुत संतान मरि गेल आब हमरा शंका लागिरहल य कि इ सभ हमर संतान हमरा टुक्रा टुक्रा करि धनकैत चितामे सवाह नै क दे । तँहि लेल हम कफन नुकाबैत ओइ वीर बेटा लँ भागिरहल छी । जे अहि राक्षस सन लोककें मारीक इ कफन ओरहा हमरा आत्माकें शान्ती दियाबि सकत । आ हमरा समुचा सम्पत्ति पऽ फिर अपन पहुलके ताजकें साथ अपन शिर दुनिया आगु फिरसँ उच्च राखे ।। अचानक हम चेहा उठलौं आ बुझिगेलियै के छलिं ई सुन्नर नारी के छलीह - सात समुन्द्र पार एहि मरुभूमिक देशमे हमरासँ दूर अपनत्व सँ तडैप रहल हमर मातृभूमी छलीह हमर देश छलीह जे, अपन उद्दार लेल हमर सपना आयल छलीह । "समुन्दर पार " परिचित , अपरिचित , संस्कृति संग, अपन, परिचय, कराबिरहल छी । गोर, कारी, श्यमला लोक संग, अपन, मधुरता, बडाबिरहल छी ।। बालु, पथर, कारी चटान संग, अपना, माटिके, लेखाजोखा करिरहल छी । सात समुन्दरपार , मारुभुमिमे, अपना, उर्बल , संस्कृतिके बिज भ'रिरहल छी ।। ज्ञान,बिज्ञानसँ, भरल,युगमे, अपना, माटिके,नमुना, पेस करिरहल छी । रमन,चमनसँ, भरल,जगमे, चेत्थरी पहिर, अपना माटिके अस्तित्व खोजि रहल छि ।। "हमर बिनती"-(कविता) ई पावन धरती देख , देव ललायल । तँय, महादेव बनि उगना, बिद्यापति घर आयल ।। अनन्त बर्ष पवित्र रहए ई धरती, बनि बहन सीताक पति, पाहुन राम एतऽ एला । हे प्रभु ! मिथिलेमे अंत होइ, मिथिले जन्म दिहऽ ।। ऐ राज्यमे , ज्ञान सुन्दरता, एकता , गौरव कऽ छै भन्डार । नदी नाल , ताल तलैया , कुण्ड, सरोवर छै प्राकृति कऽ श्रीङ्गार ।। स्वर्ग नहिं भायत देख मिथिला, तँय ऐ धरतीपर लादिहऽ । हे "प्रभु" ! मिथिलेमे अंत होई मिथिले जन्म दिहऽ।। जहिठाम कमला , कोशी बहै, खल-खल हसैँ बलान । खिस्सा-पेहानी, गीत सुनि, सत्संगमे बैठी अपने दलान ।। परशुराम अवतारी, सप्त ॠषीकेँ तपसँ पवित्र भेल , भुमीपर्ऽ लादिहऽ हे "प्रभु" , मिथिलेमे अंत होई मिथिले जन्म दिहऽ।। " हे युवा उठू "---(कविता) हे युवा उठू, अहाँ कौलहुका भोर छी । प्रचंड गरमीकेँ सहासी, अहाँ पथके डोर छी ।। सब गुणसऽ भरल , अहाँ सतरंगी छी । बदलैत रिति प्रथाके, अहाँ नयाँ सुरुवात छी ।। हे युवा उठू, अहाँ वसंतकऽ हवा सितल छी । किचरसँऽ भरल समाजमे, अहाँ फुलल कमल छी ।। चिन्हुँ अपन नम्रता, आ कठोर जरिके । कतेक मजबुत अछि, देखु अहाँ बाँझल पैरके ।। हे युवा उठू, अहाँ नयाँ प्रबेश छी । चिंन्हुँ देर नहिं करु, अहाँ नयाँ संदेश छी ।। बिन गरजल बरसात, अहाँ होन्हाँरी नंक्षत्र छी । भबिष्यकेँ कर्ण धार, अहाँ मुख्य पात्र छी ।। हे युवा उठू, अहाँ कौल्हुका भोर छी । प्रचंड गरमीकें सहाशी, अहाँ पथकेर डोर छी ।। "रोकू दहेजकेँ" (कविता) बहुतो बेटी आगिमे जरि गेलै , बहुतो बेटी फाँसी चढ़ि गेलै !! बहुतो घर लुटा गेलै, बहुतो भाइ मरि गेलै, मुदा , जुटाबऽ नहिं सकलकै रुपैया, दहेजके । बड-बड ज्ञानी भेलै, बड-बड अगुवा भेलै, देशके शासक बदललै, आदमीमे चेतना जगलै, मुदा, लगाम लगाब नै सकलकै, दहेज के ।। बहुतो जोरि घुटना टेक, दहेजके आगु मजबुर भऽजाइय। बहुतो बाप एकरा अगाडि, पागकेँ लाज गिरबैयऽ ।। मुदा, तैयो रोकि नहिं सकलकै, ऐ रीतके !! जैं बेटी छथि तँय हम छी, सब किए नहिं सोचलकै । जैं बेटी छथि तँय संसार अछि, ई रीत किए नहिं बुझलकै ।। अन्त करु खरीद बिकरी, जिन्दगी बेटीकेँ । आ तब सम्भव अछि, मधुर रिश्ता रोटीकें ।। "लोभ किए ?" (कविता) नहिं किनको ई धरती अछि, नहिं किनको प्राकृतिक हावा । हम सभ छी मानव जाति, करै छी ऐ गपकऽ दवा ।। बेकारकें लड़ै छी जातिक लड़ाइ, चार पलकें मेहमानिमे । कोई नहिं छथिं फरक, लागि जाउ मानव सम्मानमे ।। छै ई हमर छै ई अहाँकें, मनमे रखनाइयो अछि भुल । संसार एकेटा अछि, जे अछि परमात्मा पाउकऽ धुल ।। चार दिनके हमर अहाँक जिन्दगीमे, कोई नहिं अछि, अपन नहिं कोई आन । अन्तिम छनमे पुगिते धन,सम्पत्ति, संतान,सब भऽजाइत अछि बिरान ।। पृथ्वी एकटा मन्दिर अछि, मानव जेकर पुजारी । ई हमर ई अहाँकें जाईके बेरा, जाई पड़ैत छैक सबके बनि भिखारी ।। कमाईल सम्पती छनिक खुसी, सामानकऽ खुसी अमर अछि तैयौं बेद भाव किए ? सब नंगे आयल छी नंगे जायब, नहिं कोई बड नहिं कोई छोट, बुझितो सम्पतिकें लोभ किए ? महानुभाव ज्यू ! (कविता) महानुभाव ज्यू ! प्रवासिके तरफसँ जय नेपाल ।। एकटा छोट कविता लिखिरहल छी । अशा अछि जे पढ़ऽ देब ! हमरा कवितामे नहिं कोनो ऐजेन्डा अछि नहिं कोनो क्रान्तिकारी शब्द, नहिं राजनितिक गंध, हमरा कवितामे बिगरल रेमिट्यान्स मसिनकेर दू:खद खबर अछि ।। जे २४० फिट उच रुपैयाकें गाछसँ गिर बिगैर गेल अछि अँ.. ह..... फेकु ...नहिं पूरा पढऽ दिय..... हमरा कबितामे कोनो समुदायकेर गप नहिं अछि । नहिं कोनो गाम ,नामके वर्णन अछि हमरा कबितामे मारुभुमीमे बैहैत पसिनाके नदी नदीसँ निकलैत समुन्द्र जेहन लहर अछि हा.... हा..... हा.... अहाँ कि बुझब ई मर्म अपन्हिके गाडिमे, बंगलामे टऑयलेट मे ए.सी. हबे नहिं बुझबै अहाँ माय रहिते टुहरा बनल बेटा मर्म नहिं.....नहिं..... महानुभाव ज्यु..... कनिके रहिगेल पढ़ऽ दिय..... हमरा कवितामे अहाँके विरुद्ध कोनो शब्द नहिं अछि ।। नहि एकल पीड़ा हमरा कवितामे बिदेशे भुमिपर निकलल बेटीके अवाज अछि । अहाँ कि बुझब मनक पीड़ा, अखन देश बनाब मे लागल छी नै ? ।। बनाउ सुन्दर शान्त बिशल बनाउ एकटा अलग मिशाल ।। हम रौंदामे जरिक रिमिटान्स पठादेब मोह , मया तेज नोर पिलेब शान्तिके प्रतीक बुद्धसंन रहए । बनाउ त्रीमुखी दिया बराबरी प्रकाश तीनु ओर रहै ।। "घूसकें जूस बंद करु"-( कविता) खुर्सी तऽर सँ देबकेँ उपहार पाँचे टकातऽ छै, बन्द करु ऐन उपकार । सबकेर जैंरिया ऐतै छै, कुछ कैर नहिं सकत सरकार, जाँ धैर पोसाईत रहत भ्रष्टाचार ।। खुर्सीकें मन्याता दिउ पुजा नहिं । उन्कर ऐ काज अछि अँहा पछुवा नहिं।। निसपक्क्ष अगुवाकें समान करु । कि त बोतलपर नहिं बिकायल करु ।। घूस पैठीमे नसायल दूनिया तहे तह पर एकर दलान छै । भ्रष्टा आ दलालिकें भिता भितामे दोकान छै ।। नयाँ सुरुवात हेतु ऐ पोटरिकेर जतनल करु । भ्रष्टाकेर अन्त करु घूसकेर जूस पिनाई बन्द करु ।।"गामकऽ याद"--(कविता) टिफिनमे बसिया भात भैर, नित दिन दौरी काम लाँ। हक हक करैत, आइख मिजैंत, जब महिना पुगै, सयोके पछाडि रहि दाम लाँ।। दौड़ैत-दौड़ैत तङ्ग भगेली, मनकरैय कनि कैरतो अराम । आँखिमे नोर लैऐक आबै, जखन याद आबे अपन गाम ।। मरभुमी देख कोशीके पानी, मनमे हिलोर मरैय । बड-बड बिलडिङ्ग देख, गामक झोपरी याद अबैय ।। कैहिया देखब कमलके फुल, कमलाके पुल, आँखिके सोझा अबै धनुषा धाम । आँखिमे नोर लैऐक अबै, जखन याद अबै अपन गाम ।। नित दिन छटप्टाइत सुति, सुतलमे देखि सपना मायके । लोट जाउतँ कोना लौटु, अपने तँ छी अन्पढ, सोचैत छी पढाली भाइके ।। कहाँ बिसर्ल छी बगरियाके, कोनाकँ बिसैर जाउ ? मजाकी बाबाके । कोना कऽ बिसैर सकै छी होली, दिवाली, छठ, गर्म-गर्म रोटी माय हाथकँ तवाके ।। तनतँ कतो यै मन हमर, ओहि सुन्दर बगमे, जैंठाम सब मिठ-मिठ बजैं, फुल भंभरा लाँ सजैं, अपनेपऽ हसिं अबैय, जब होठपर अबै प्रीतक नाम । आँखिमे नोर लैऐक आबै, जखान याद अबै अपन गाम "भूत लागल कतेकेँ ?"-(कविता) जहिया अस्थिर छलै मधेश । अपनेपर समपन्न छलै देश ।। सब वर्ण छलै, एके नेपाली, संगे खेलैत छला होली । कनफुसकीए मे बिका गेलै, मारै आब छातिमे गोलि ।। पहाड़ झरैत छल, मधेश जाक रोकैत छला । मधेश दहाईत छल, पहाड़ आईब कऽ छ्नैत छला ।। हिमालपऽ सबके शान छलै, उच छला सबहक शिर । कोन डकहाके डाह लगलै, केकरा चढलै माथक पिर ।। छीट्का रहल यै गाथल मोति, पकड़ू उड़ल कबुत्तरके । हे यो ओझा जि ? अगुवाके भूत लगलै कहाँ के? दक्षिणके कि उत्तर के ।। " नोर बिरान भेल"--(कविता) बर्षोसऽ सजायल सपना, आई टुटिए गेल । बचपनसऽ जतनल नोर, आई बहिये गेल ।। बिधाताके बिधना अछि कि ? चलैत बाट ठेंश लागिये गेल । हजारो सपनाके एकेटा लक्ष्य, प्रप्ति बिफल भेल ।। सपनाके वाटमे अपनाके भुलागेली हम । असली खुसी कहाँ मिलैय, खुसिके डगर भुलाइए गेलि हम ।। गोंदि खेलायल खुसीके बिदाईमे पछुवाईए गेलि हम । सपनाके कहरिया जे ठहरली ! बहल नोर पियेलेली हम ।। अपने देहके अंग आई आन भगेल । आँखीक नोर आई बिरान भगेल ।। प्रवासी जे ठहरलो हम, भरल दूनियाँ सुन सान भगेल । आँखिक नोर आई बिरान भगेल ।। प्रलय अहीं छी (कविता) खटगर छै कि मिठगर?, स्वाद बुझैछी अहाँ दूनुटा । धरतीपर प्रलय किए कारण, बुझैछी अहाँ तिनुटा ।। भगवान बास करैय हृदयमे, हम नहिं अहीं बजैंत छी । हम तँ सेवक छी मुदा, अहाँतँ अंतोके घडी बुझैत छी ।। चाँन्दपर जमिन बिकाईय, जमिन बंझर भगेलै । कारणपर कारण अहि देखाबैत छी, तब कहुँ , अंतक घडी अहाँ बुझै छी कि नहिं ? ।। बिन ब्रेकके देह रातिकऽ जेनै रुकैत छै । सबटा, सबटा जैंरिया ओतै अछि होबे करतै, जौं रौतका लिला कम नै हेतै ।। कोना नहिं कहुँ एना ! धर्तिपर बाहरके , बोझ साले साल जे थपैछी । घरसँ वारि तक पुगने बिन छोडी नहिं धरती हिल्लापर माला जपै छी ।। अगाडियोके ध्यान दैत गाडी बरहाउ । बंशो कायमे राखु सौख नहि जराउ ।। अगैरा बगैरा सब समापती हेतै चाँन्दोके जमिन बिहानेला रहिजैंतै ।। "नव मिथिलाक निर्माण करैत चलू"--(कविता) नेहसँ स्नेह जोड़ैत चलू धोती कुर्ता पाग लगबैत चलू प्रेम भावकऽ गीत गबैत चलू दूनु हाथे ताली बजबैत चलू नव मिथिलाक निर्माण करैत चलू डेगसँ डेग मिलाबैत रहु अपन भाषा सैदखन बोलैत रहु भिन्सरे भिन्सरे प्राती गबैत रहु अपन हरायल कालाके खोजैंत चलू नव मिथिलाक निर्माण करैत चलू अपन सँस्कृतीपर सदैब बिसवाश करु आन-आने रहत अपनापर गुमान करु मरबे करब तऽ अपना माटिला मरु आउ प्यारक हाथ अगाडि करु नव मिथिलाक निर्माण करैत चलू निक बोली सदैब बजैंत रहु सुन्दर व्यवहार सगरुप करैत चलू मीत सऽ मित्रता बडबै चलू मानसमान सबके सैदखन करैत रहु नव मिथिलाक निर्माण करैत चलू " करुवाइल स्वाद "(कविता) जगंसऽ तंग भगेली, बेरोजगारीसऽ भंग मोछक यैठन नहिं छुटल, पछोर धैने छी बर्का बर्काके संग ।। नसामे नसायल संसद भवन, गाम गाममे छीटायल बिसकी रम लगैय । प्रजातन्त्रके सवाद आब अलुके चटनीयोसँ कम लगैय ।। घूस पैठी आ दलालिके, तहे तह पर दलान बनोने छै । कनफुसकीपर चल बला ई निकमा स्वर्ग उताइर देब सब के सपना देखोने छै ।। हम भोट कटा केकरोसँ कम नहिँ छी, एक औंठापर आब लाख टका दाम लगैय । प्रजातन्त्रके सवाद आब, अलुके चटनीसँ कम लगैय ।। दल दल मे फसल गाडी , जुवनका रेमिटायन्ससँ खिच रहल अछि आस्नसँ भाषन दैइत प्रजातन्त्रके मिच रहल अछि जाईत पाईतके मुदापऽ उपरेस आब दम लगैय । प्रजातन्त्रके स्वाद , आब अलु के चटनीसँ कम लगैय ।। अखनो बिसरल नहिं छी, जैं ठाम खुने खुन सऽ बिहान भेल छलै । अपने घरमे लोक आमने सामुने बिरान भेल छलै ।। प्रप्तीसँ बेसि उदासी आब देख देख पडोसिया हसैंय । प्रजातन्त्रके स्वाद आब अलुके चटनीसँ कम लगैय ।। मानैत छलो जेकरा बृछक जरि ओहो आई अपन कर्म खोजैंय । प्रजातन्त्रके स्वाद आब अलुके चटनीसँ कम लगैय ।। "भरिया"--(कविता) मुँह डुबल अछि सनेहमे, तन ढाकल चिथरा कपडासऽ । समयक मारल भरिया, दुःख सुनाबे ककरासऽ ।। चलैत बाट भेटलै पिपलक गाछ, सुस्ताले रे मन !,बृक्षक छाँयामे, देह परल यै झकारी । थुलुर-थुलुर बोईक यैलै भरिया, नेहक सन्देश भारी ।।"सहिद"-(कविता) सहिद हमर अगुवा, उपधिक घरोहर । बिसैर रहल छी उ दिन, नैया डुइब रहल सरोवर ।। सन्कोच नै उन्का मनमे, लुटा देलक घरपरिवार । खस्वादी उ शास्कसँ मङ्ग्ने छला हक बराबर ।। अहुछी ओहि माटिके , जैंठाम भेल्छ्ला सपुतक अन्त,। चिता बोइक शहिद्क बेटा, किरिया खैने छल राकके ।। ल छोरब अपन हिसा, बनायब एकटा नया हिसा । चारु तरफ धुवा देखाय, आदत परल सहक हिन्सा ।। बनाउ इन्कर उपदेशक, एकताक सङ्गहोर । सहिद हमर अगुवा, उपधिक धरोहर ।। प्रवास--(कविता) सजलै छै मार्बल आ पथरसँ चुह-चुह घर करै छै । बिसतर तकियासँ घर सेन्टसँ साजल छै ।। सुतके कोसिस करि रहलछी मुदा निन्द कहाँ अबै । कखनो मायके याद, कखनो प्रीतके याद अबै ।। छ्टपटयतँ छी, कर फेरैत छी, लाख कोसिस करि रहल छी । निन्दिया उडिगेल, मोन बिचलितमे परल अछि मुदा मनकें बुझाबेमे अकाम छी बहुत कोसिस करै छी बिसरके कुछ कमाइ के, कामक चिन्ता सेहो सतबै कुछ नया करके, परदेशमे छी जे मन ऐसांस दियबैय ।। उइठक पानी पियै छी कुछ मनके शान्त करै छी । फनु बिसतरप लेटै छी, मन कहाँ मनैय फनु ओहि धुन मे बोवाई छी ।। घर जे रहती संगि संगे घुम जैंती पवैन तिहारमे मिठ मिठ प्रसाद खैती । मामा ऐतै हमरा गाम , हम बहन के गाम जैंती ।। ओतनेमे अलार्म बजैंय, भोरक चार बजल छै, ओहो.... कामप जैंबाक समय भगेलै आहिने गुनधुन- गुनधुनमे दिन कटैय । गामक पोखरी तलाव नदी नाल, साथी संगि के याद सेहो नै छोरैय प्रदेश मे छी जे मन ऐसाँस दियबैय ।। "दहेजक चपेटा"-(कविता) ओकरा फुलमे नहिं काँट छलै , हमरा आगु जायतके फाँट छलै " दूनिया प्रेम दिवस मन्बै मुदा हमर मन कनै ! हम प्रेम दिवसके बिरोधी नहि छी ! हमतँ दहेजके मारल , जायत पायतके सतावल छी एहि तरह , मारल गेल छलै ओहो तंन , मुदा उ मरि गेलै ! हमरतँ नहिं अन्ते भसल नहिं साथ निभयबे सकलि किएकतँ ऽ हम दहेजके रितिमे बाँध्ल छली जायत पायतके रिश्तामे छुटयावल छली कठिनाय उन्को आगु आयल छलै ! मुदा उ निभालेलकै ! हमरा फुलोमे नहिं काँट छलै जेइ प ऽ हम चैल लिति हमरा अगाडित दहेजके जेल छल जैंमे हम कैदी कैद भगेली हमरा माथपऽ जाईतके नाम लिखायल छ्ल जैंमे हम लेपटा गेलि हम दहेजके चपेटामे प्रेमोके भुला गेलि ।। हेरा गेलै (कविता) हेरा गेलै यौ हेरा गेलै जहिंऐसँ पश्चिमा हावा लगलै तहिएसँ धोती हेरा गेलै । बिसरा गेलै यौ बिसरा गेलै जहिएसँ जेबमे रुपैया भरलै तहिऐसँ अपन रितियो भुलागेलै ।। कहाँ सुन्बै है आब खिसा बाबा दलानमे ब्यस्ताके कारण नहिं अछि समयके बदलैत भुलायल नहिं अछि ई तँ मानवताके असमान्तामे दरार भगेलै । कहाँ बजैं है यो बिहनका भोरमे कोयली जहियासँ पंछीके रुप धैलकै मानव तैहिएसँ पंछी बाजके बिसरागेलै ।। कहाँ है यौ मैथिलके धरोहर जहिएसँ अपनैलकै तहिए बिका गेलै । हेरा गेलै यौ हेरा गेलै पुर्खाके सम्पती हेरा गेलै ।। बंदिमे --(कविता) घोडा मुहसऽ घास छिनाइत गदहा के थाली लडु सजाईत कनफुसकीमे बकरी बिकाईत हकके दबबैत देखलौ, हकदारके गोलि मारैत देखलौ ६ महिनाके बंदीमे । बजारमे जुलुस निकलैत बेसिया के पाउडर लगबैतै बँन्दरके हसैत देखलौ, शेरके कनैत देखलौ, जनता पिटाईत देखलौ, नेता बिदेश भ्रमनमे निकलैत देखलौ, ६ महिनाके बंदी मे ।। कोइलीके कुहकैत मैनाके गीत गबैत खुनक नदी के धरा देखलौ कोमरो तिहार मनबैत देखलौ, नकाबंदीके सेहो देखलौ ६ महिनाके बंदीमे । राजधानिमे पार्टीप पार्टि देखलौ, समुचा देशमे महगाई बड़ैत देखलौ ६ महिना के बंदीमे ।। "नकामी जिनगी"---(कविता) गामकऽ खुसि छोडिकँ जाय छी यो बिदेश, अहिठाम कुछ कैर नहिं सकैत छीयौ माय । दहेजकऽ रुपैयाँ महाजनकें ॠण तिरिते, जल्दिऐ चलि आयब स्वदेश माय ।। सभ दिनकेँ लागि कहाँ, दू सालतँ अछिऐ माय, मायकऽ आँखी नोरसँ भरीकऽ डबडबा गेलै । हम पथर दिलकेँ, कहाँ कानी सकलियै भैया, नोर छुईयोनै सकलकै,हमरा मनमेतँ उमंग छलै ।। धरफर- धरफरमे अपना रुपैयाँसँ अपनाके बेचीलेलियै !! कहियो बेल्चा नहिं चलाइल ई हाथ, कहियो कोदारी नहिं चलाईल ई हाथ, करिरहल छी आई दामके लागि । कहियो बसिया भात नहिं देखने आँईख, सभ दिन ठंडा-ठंडेमे घुमल ई देह, आई करिरहल छी एक साँझ खैबाक लागि ।। साइत... हमर संघर्ष देख दैबोकें जलन भगेलै ! ९ हेक्टरकें भुकम्पसँ घर तोडिदेलकै । दहेजकें चपेटामे बहनोके जरा देलकै ।। आब... मोबाईलो हमरा लेल बैमान भगेलै मात्रे महाजनके बोली सुनाबैत अछि । कहिया तिरबे हमर ॠण .....!! सपने सपना बोकि आयल हम , आब जिनगिसँ दूर होईबकेँ चाहैत छी । दू सालमे नकामिकें बाट देखौने सपना, खाली हाथ घर जैंबालेल बाध्य भेल छी ।। साइत ऐहे नकामिके लक्ष्य छलै हमर !! मारुभुमिकें बृक्षसँ , रुपैयाँ नहिं तोडिसकलियौ माय । माफ करिहे , हमर हजारो सपना सपने रहिगेलौ माय ।। आब हम थाकिगेलि यौ, आब हम माईत गेलि यौ जल्दिऐ घुमी ऐबो तोरा शरणमे । मेहनत करब अपने देशमे श्रमे कर पडतै, करबै अपना देशमे ।। प्रवासीके होली सपनामे --(कविता) आई राईत एगो सपना देखलौं, होलीके रंगमे रंगायल छलौं । ढम्फाके धुनमे रमायल छलौं।। खुब जोगिरा गबैत छलौं, गामके चोबटियापर । संगि हाथमे फिंचकारी छलै । हमर जेब भरल गुलालसँऽ छलै भाँगके नसा ओतबे चढैत छलै।। जतेक जोगिरा गबैत छलियै गबैत काल नहिं जानी किए मन हिचैक गेल कर फेरिते निन्द खुलिगेल आँखी खुलिते अपनाके पैलौं बिदेशी खाटपर अहि ठाम तँ हम प्यासे हिचकैत छलौ साइत मन चलिगेल छल,आई मिथिला नगरियामे , ई फगुवा अछि ? सपनामे कोना नहिं आउत ! पुवा पुरिके दिन हम रोटी जे खैने छलौ । रंगमे रंगायबला दिन हम बालुमे जे लेहराईल छलौ ।। साइत अहिबेर के फगुवामे रंगके हकदार हमरो याद कैने छला । हमरो मन बरा पछतायल साइत तँय सपना ऐन आईल छला ।। अन्त्त: तँ मनके मनालेलौ मुदा आईखक नोर नहिं समहाईर सकलौ । महसुस भेल , अहि बेरक होली,हम प्रवासी सपनेमे मनैलौ ।। कलंकी प्रथा---(कविता) यै प्रथाके कोनो लाज नहिं जतेक परहएज ओतेक बडले जाईय तिने अक्षर दहेजकें, सरुवा रिति बेटी फाँसी लटकल जाईय देखु पलैटक यौं कुमरका बापे हाथ देह अहाँके बिकाईय रितिके नामपर दहेज कलंक मैथिल बेटीके नाम घिनाईय भिख मङ्गै छी फटफटिया जब अपने करै छी अहाँ कमाई नया युगमे ढाठी पुरनके लगैय दहेजमे दगायल बेटी नोर पोछैय बिचलित मन--(कविता) आई काईल नै जानी किए, डेग पछा हटिरहल अछि। देखैत सुन्दर संसारके हमर मन, नहिं जानी किए ड़ैर रहल अछि ।। नया सुरुवातकेँ आशतँ जगैत अछि, जखन पुर्बमे लाल सुर्य देखैत छी। नहिं जानी किए अस्त होईते सब निराश भऽ जाइत अछि जखन कुछ नया सोच बनाबै छी ।। असफल सँ बिचलित मन नहिं जानी किए हरपल सफलताके डोर खोजैंय । डरतँ ओत लगैय कैला पर लोक जब पानी फेट दैय ।। साइत कहि खोजलासँ भेट जैंतै सब प्यार । खोजिक आईन लितियै बसा लितियै संसार ।। एहन भग्य होबाक चाहिँ तेहन नहि अछि लगै दिनोमे अंहार । असफल ई जिन्दगीसँ दूर भँजैंतो तेज दितौ संसार ।। बेदना (कविता) नोर कतेक दिन पोछु, खुईलक जियके मन करैय । बिधाताके जे बिधना अछि, घरी-घरी कनादैय ।। एक तरफ मायाके जाल अछि, दोसर तरफ , असल पुत्रके कर्तब्य निर्वाह करचाहै छी । छातिके टुक्डा जवानीके मित्र छातिएमे साईटक राखचाहै छी ।। दूख लिखलकै बिधाता, सुख लिख काल, साइत मसि निहैट गेल हेतै । कर्म सँ कखनो पछाडी नहिं छी । जाँ धैर हाथ नहि थर्थरा जाई, ताँ धैर कोशिस करै छी । साइत हमरा कर्ममे कतो खोंट हेतै । तँयतोरै छी फुल भजाइय काँट चलै छी बाट चलाजाईय माँथ जियके आश आगु जिन्दगी बिफल अछि, नोरे झोरे हृदय कनैय । कतेक सहुँ पर्तर आ बेदना दूनिया तयागके मन करैय ।। पूज्य आत्मा-(कविता) पुजनियँ आत्मा,कहाँ छी अहाँ, हम देह दगारहल छी । पुनः देह प्रबेश क कऽ आउ, हमरा मन्दिरमे , हम गुदा छलाके देह, राक्षस सँ तंग भरहल छी ।। देहक हडि साथ नहिं दरहल अछि । अंग अंगमे छीरियायल नासा, बात-बातमे रुकिरहल अछि ।। असम्भव अछि अहाँ बिन गाडी, हम सिधा देहसँ चलारहल छी । स्विकार करब हे आत्मा पुनःह , आगमनके पत्र पठारहल छी ।। आउ हे पुजनियँ आत्मा आउ, ई शान्तिके देह बारुद सँ छीरिया रहल अछि। बहुत डर भरहल अछि, कहिँ हृदय नहि फुटिजाई । कोनो अंगमे साहस नहि, जे समहाईर सकत आब देहके ।। हे पुजनियँ आत्मा आउ, हमरा मन्दिरमे प्रवेश करु, पुनः हमरा निरोगी बना दिय, अहिँके मोह सँ बाँचल वृक्ष , अखनो हरियालीके सहास कैने छै । कोनो परिवर्तन बदलावनै भेल, ई लम्बा कलहल, अपने अंग सँ बिस्वस्त भरहल छी ।। हे पुजनियँ आत्मा आउ । अपना मन्दिरमे स्थान लिय यै देह के मृत लोक जाई सँ बचाउ ।। "फागुन महिना"--(कविता) बसंतक फागुन ,रंग अबिरा । पुवा पुरी भाङ्ग खाँ ,गैबै कबिरा ।। कोयलीक कुहुकुहु ,मधुर स्वर । लगन उताहुल देखबै ,स्वैम्बर।। प्रेमक जोरि वाट तकै, साल सलिना। हाइ रे ! हाइ,फागुन महिना ...२।। बदाम,राहरकऽ बीज भरल,मन ललयल । आम,बर्हर फुल्लै,देख पंछी कलायल ।। फुर्सतकऽ घुर तापी,ओयर उनक चादर । जङग्ल छोइर,गाछे गाछ घुमै बान्दर ।। नहिं ठंडे नहिं गर्म, नहिं छुटै पसिना । हाई रे ! हाई फागुन महिना २ ।। अपनेमे बेहाल रहै बदाम,ओरहक घुर । चिरी-चिरी भङगेरा बजैं,लगन उताहुर ।। ऐ छै ! सालक अन्त,होली के महिना हाई रे ! हाई फालगुन महिना २।। आत्माक अवाज--(कविता) हम मुर्कटा मुडि खोजिरहल छी । फिर सँ आत्मा प्रवेश लेल देह खोजिरहल छी ।। कायर्ता के घुनमे पिसारहल आत्मा, हमरा देह दे ।। हम मुर्कटा आत्मा देह खोजिरहल छी । जहिना बंन्दुकिया, देहसँ दूर कैलकै आत्मा, हम फिर , अपना माँथ पर लागल कलँक हटाब चाहै छी । गे माय हमरा गर्भमे स्थान दे, हम फिरसँ जन्मलँ पुर्वमे , शान्तिकेँ रंग उराबचाहै छी । स्वार्थी जिन्दा सपूत तोहर, बँन्दरके चंगुरमे फसल छौ । किए, किए हमरा सुतादेले अंचलमे हमरा पुनः आगमन करा, हम मुर्कटा एक बेर आरो, सहिदमे पंत्तिमे नाम लिखाब चाहै छी । गे माय अपना गर्भमे , हमरा पुनः स्थान दे । हम फिरसँ लाल नदीमे नहाई चाहै छी । हमरा शान्ति नहिं मिलरहल अछि, हम बन-बन भटैक रहल छी । स्थान दे , हम एक बेर आरो सहिदकें पंत्तिमे नाम लिखाब चाहै छी ।। "समय संग हम"--(कविता) वाह रे समय वाह ! गजबकेँ तोहर फेर बदल छौ, आखिर आँखिकऽ नोर , हाथसँऽ पोछाइऐ देले । गजबकें तोहर गति छौ, आखिर सबटा खुसी, हाथसँऽ छोडाइऐ देले ।। दूरतँ अपनासऽ कैले- कैले, साथ जे लजैंते ओहि ठाम । एक तरफ खुसिकेँ लडु बटैतै, हम पिति गमकऽ जाम ।। वाह रे समय वाह ! गजबकेँ तोहर कोलहु छौ । जैं मे तोरि जिका , सबके भाग्य पेरैत छे ।। एहन मोर पऽ लाक खारा कैले, अपनाके खुसी नहिं साथ बाँट सकली । नहिं मुहसऽ हसिऐ सकली, नहिं हाथसँ ताली बजाइबे सकली ।। दिन राइत मेहन्त करैत छी, मुदा सबटा फल तो छीनाइए देले । वाह रे समय वाह ! कि हम करैत छी? कि हमर लक्ष्य ? कुछो नहिं बुझ सकली । तोरे दोसर नाम भाग्य छौ कि ? तोहर नीति नहिं हम बुझ सकली ।। तो चलबैत गेले, हम चलैत गेलि,साथे साथ मुदा, तैयो तोरा नहिं पहिचान सकली । अन्त्य तँ जवानीसऽ , बुढापामे धकेलिए देले ।। वाह रे समय वाह ! गजबके तोहर नीति छौ आखिर लहरैत चितामे धकेल, हमर आन्त कैए देले ।। वाह रे समय वह ! "भाग्य बिदेशमे"--(कविता) बहरिये खुर्सि बहरिये कलम, लिखदेलकै सब आबेशमे । लगैय जनताकँ भाग्य, लिखदेलकै बिदेश मे ।। कोई मरै पानी ला तँ, कोमहरो दाहर अबै । केकरो घर अपना बिन सुन सान लगै तँ, कोमरो खुसिके गीत गबै ।। बुद्धके देश फसल छै क्रन्तिमे, बन्दुकलँ सबके उताइर देलकै रेश मे । लगैय जनताक भाग्य, लिखदेलकै बिदेशमे ।। समुन्द्रके चिर कोई,बन्बै डगर, कोई बसबै रेतमे बस्ति । कोई उड़ै हवामे दूनिया राज करै, कोई करै चाँन्द तारामे गस्ती ।। हमरा पानी के कोनो सिमा नहिं, सबटा गंगा बैह जाइ । पडोसी लोक पथर चिर पानी लबै, अपना रेतपऽ स्वर्ग उताइर जाइ ।। हमर अगुवा कम नहिं बरा जोगरु, जोगालै अपना खुर्सिके जोगालै अपना सत्ताके, आ डुइब जाइ मधु रसमे । लगैय जनताक भाग्य , लिखदेलकै बिदेशमे ।। पहाड़क सुन माटि मिलै, तराईयक धानके कोनो मोल नहिं। हिमाल कऽ हिरामोती सागर बहै, अस्तित्वकें, कोनो मोल नहिं।। महानुभाव ज्यु ! काला कोट लगाक , चैल रहल अछि राजनितिके भेषमे । लगैय जनताक भाग्य , लिखदेलकै बिदेश मे ।। "यात्रामे जिनगी"--(कविता) कहियो बिदामे, तँऽ कहियो पढाईमे । कहियो काजमे, तँऽ कहियो घुमनाईमे ।। कहियो मन बहैक जाई कोनो जत्रामे । जिन्दगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ कहियो शादिमे, तँऽ कहियो ससुरालिमे । कहियो पतझरमे, तँऽ कहियो हरयालिमे ।। कहियो मन बहैक जाइ पत्रामे । जिन्दगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ कहियो नोरमे डुईब जाई, तँऽ कहियो हँसि सऽ मन फुईल जाई । कहियो प्रीतके याद अबै, तँऽ कहियो बिछोड्मे मन मुरछा जाई ।। कहियो बहैक जाई मौतक खत्रामे । जिन्दगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ कहियो हवामे उड़ि , तँऽ कहियो धरतीपर चली । कहियो खुला मैदामे दोडि, तँऽ कहियो भट्की गलि ।। कहियो ध्यान लगाबी अंकऽक मात्रामे । जिन्दगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ कहियो माईके आंचलमे रहि, तँऽ कहियो बिदेशमे । कहियो पत्नीके बाहमे रहि, तँऽ कहियो स्वदेशमे ।। कहियो सुन्दरतामे रहि, तँऽ कहियो कचरामे । जिनगी बित रहल अछि यात्रामे ।।२ बटोहिया (कविता) आईल छला बिपतमे बटोही बनि कऽ । जियैत छलै सबके आत्मामे बैठ क ।। बडकाके दूलारा छलै,छोटकाके खिलोना । मालिकके नोकर छलै , मित्रके दिवाना ।। हुनरके जोर छलै,पूरा टोलके प्यारा । अन्नाथ छलै मुदा ,गामके छला सहारा ।। गलत के बिरोधी छलै ,सचाइके मित्र । सैदखन करैत जनता,हक हितके जिक्र ।। अनहरमे नहिँ उड़ियलै , आईगमे नहिं जरलै , ओकरातँ बफादार जिन्दे गाईर देलकै । आईल छलै कहाँस बटोहिया, गाम छोईर कहाँ चैल गेलै बटोहिया, बैमानके जातितँ ओकरा गोलि मारि देलकै ।। मुदा बटोहिया मरलै कहाँ ।। देशकेहर स्तम्भपर ओकर नाम लिखागेलै । ओकर खुन बयर्थ भेलै कहाँ नेपाल मायकेआंचल लाल रंग सऽ सजागेलै ।। आईल छला बटोही बनिकऽ मुदा अमर भगेलै । बटोहिया अपन बन्श हितके लागि, सबके पयारा सहिद भगेलै ।।२ " सरकार जी"-(कविता) हे यो सरकार ? कँहा गेल हमर अधिकर । हमहुँ छी अहीं देशक बासी, नाम यै हमर मधेशी ।। माटिपर आँच आब नहिं देव, हमरो बाहमे छैक ओते दम ।। जैंय हम छी,तै भोगै छी ? प्रजातान्त्रिक दरबर । हे यो सरकार ? कहाँ गेल हमर ,अधिकार ।।२ किए नहि, बुझै छी अहाँ? छै हकदर । हे यो सरकर ? कहाँ गेल हमर अधिकर ।। कसैया मोथा---(कविता) आई गामसँ बिदा भेला दू साल भगेल परिवर्तन के गति बहुत तेज देखलौं अहिठाम । पतथर तोड़िकऽ सुन्दर बस्ती बनबैत देखलौं अहिठाम ।। अहिठामकें रेतमे, ईमन्दारिके बीज भरल अछि । मारुभुमिमे हावा संग उडियायत बालुमे, एकता समान्ताक गुण भरल अछि ।। ईमन्दारिके बाट तैय करैत बालु अपन स्थान बनाबैत अछि । हेरायल बीज खोजी-खोजी सुन्दर गाछ बनाबैत अछि ।। फलके आन्नद सब मिल बाँटैत छैक । अप्सोच ! हमर माटी, सुन्दर माटी, उर्वर माटी, ईमन्दारिके बीजसँ झारतँ बनाबैत अछि झार सँ गाछ बनाबक संकल्पतँ करैत अछि मुदा मोथा (घाँस) कसैया इमानदारी बीजके जन्मैते झाँपके प्रयासमे रहैत छैक ।। मोथा इमानदारी बीज के झाँपमे सफल होईत अछि । जाँ धैर पोसाईत रहतै मोथा ताँ धैर इमानदारीक गाछ होनाई अस्मभव अछि ।। अस्मभव अछि बिकास ।। प्रीतक ईन्तजार (कविता) ओहे कमला नदीके बाँध, ओहे गामक पिपलके छैयाँ । मन त हमर अँहिमे डुबल, अहाँ भेलौ केहन कसैया ?।। हमतँ अखनो अहाँकें, ओहि ठाम इन्तजार करै छी । लोट चैल आउ प्रिये,हमतँ अखनो अहाँसँ प्यार करै छी ।। बिस्की, महुवा, रम सब छोरैली, हमरा जिन्दगिमे आबिक । जिन्दगी जियकेंतँ,सिखा देलो, मुदा कहाँ चैल गेलि मन तोडिक।। हमरा मनके बाग सुना-सुना लगैय, सुखल बागमे,अहाँक इन्तजार करै छी । लोट चैल आउ प्रिये,हमतँ अखनो अहिसँ प्यार करै छी ।। "ई किनकर"( कविता) ई किनका बाड़ीके फुल हबे । पोखरिमे मुर्छा रहल अछि । रोपबाक सोख छ्ल, निक कैलौं, रोप्लौं बाड़ीमे फुलाक फुल, फेकदेलौं किए ? गामके कुवाँमे, चौबटिया पर । नदी मे, सडक पर ।। जतबे सोखिन छी , वास्ना लेबमे । ओतबे समर्थ राखु, फुलके समहार मे ।। एना गन्ध बिहिन नहिं करियौ एना पोखरी मे छताई नहिं दियौ ई किनकर सुखकऽ खुसि हबे, ई केकर पापके पोटरी अछि। जुवनका के, किशोरके, जेकर होई, उठा लजाउ बिना झारके फुल ।। छता रहल हबे, लोकके जना रहल हबे बिस्तरके गंध, खायल पियल रोटी नहिं, राईतक गंध, चौबटिया पर गन्हा रहल हबे ।। ई केकर जवानीके पाप हबे लजाउ छता रहल अछि पोखरिमे ।। "अछोप किए कहै छी"----कविता मनमे छुपल अछि बात, हमरा आई कह दिय । खुनकऽ रंग सबके लाल अछि, संगे हमरो पानी पिय दिय ।। हमरा पसिनामे गन्ध नहिं मेहन्तमे खोट नहिं, पैसा सऽ हम मजदूरी बदलै छी । तैयो हमरा अछोप किए कहै छी ? जैं घरमे चैन क सांस लैछी, जैं रोटीसँ पेट भरै छी, बिचाईर कऽ देखु सबमे , हमरे पसिना अछि । सजावल महलकें प्रतेक कुनामे, हमरे हाथक छाप अछि।। छोट निच तऽ अहाँ छुटियो ने छी हमहुँ तँ मानव जाति अँहु जनैत छी तै यो हमरा अछोप किए कहै छी ? हमरो देह सजायल अछि, लाले लाल खुनमे । दूनिया अकाश छुबै अहाँ, नाची रहल छी जायतक धुनमे ।। रोजो हमरे खिचल ईनारक पानी सऽ, कया जुरबै छी । तैयो हमरा अछोप किए कहै छी ? जैंय देव अहाँ पुजि, ओहि देवकें हम पुजारी छी । फरक तऽ अतबे अछि । मन्दिर मे हम पाँउ रखिते,अहाँ अपबित्रताकें संकेत देखबै छी ।। मनावता नहिं सम्पतिके घमण्ड, उठैय अहाँक मनमे,भिन करैत छी।। फनु गामसँऽ बाहर किए सँगे , जल ढरी करैत छी । गाम अबिते हमर अछोप किए कहै छी ? "मिथिला अटल अछि "(कविता) लंका आगु झुकलै नहिं मिथिलानि, रावणो राज्यमे अटल रहै मिथिला । धर्तिके अन्तिम छन तक, एना फहराईत रहतै मिथिला ।। किएक तँऽ मिथिला एकटा अस्तित्व अछि । मिथिला सबके मनमे बसल भाव अछि ।। रौंदियो सँऽ अकाल परल छलै, तहियो भुखल छलै नहिं मिथिला । कमला कोशी बहिते छलै, सुखल छलै नहिं मिथिला ।। किएक तँऽ मिथिला दैव के राज्य अछि । मिथिला के अपने प्रकृतिक श्रीङ्गार अछि ।। बड-बड संकट ऐलै,ऐ धरती पर, सब समा गेलै मिथिला । ऐतै भबिस्यमे जौँ एहन समय, सब घोईट जैंतै मिथिला ।। किएक तँऽ मिथिला ज्ञानक भंडार अछि । मिथिला तिनु दैव के मन भायल स्वर्ग अछि ।। "भावना"-- (कविता) हे स्वार्थ हमरा छोडि दिय, हम नि:स्वार्थ बन चाहैत छी ।। हमरा मनसँ हटि जाउ अहाँ हम संसारिक प्रेममे, अथावत रह चाहैत छी ।। हे घमण्ड अहाँ हमरा माथसँ हटि जाउ, अहाँ बहुत भारी पैर रहल छी ।। नम्र हृदयके कठोर बनाक अहाँ, अपना अहंकारमे जारि रहल छी ।। हे पाप अपनासँ दूरकँ दिय, अहाँक भागी नहिँ बनचाहैत छी ।। संग रहिक, अपनासँ दूरके अनुभव करि रहल छी ।। हे स्वार्थ , हे घमण्ड , हे पाप, सदाके लागि बिदा भजाउ, हमरा जिनगिसँ ।। नित दिन प्रेमक बाड़ीष हेतै, हटि जाउ हमरा जिनगिसँ ।। "महराज ! एना किए ?" (कविता) महराज ! हम अहिठाम खेलैत छलौं, हम अहिठाम, शान्तिक गुण गबैत छलौं । क्रन्ति कि होईत अछि ? अर्थो नै बुझैत छलौं ।। महराज ! पगलैत बर्फ किए, कठोर भगेल अछि ? बहैत पानी किए , रुकि गेल अछि ? किए- किए अपना दरवजो पर, शान्ति महशुश नहिं भरहल अछि ? महराज ! आखिंके रोशनी कम भगेल कि ? हाथ काम करनाई छोईर देलक कि ? हमरा उपलब्धिके फल कत बेच देलियै ? प्रजातान्त्रिक के अर्थ कोन बैग मे नुका लेलिऐ ? महराज ! ऐहे दिन देखला हम अन्चिन्हार भेल छलौं ? याद अछि अपने के ? अहाँके बाड़ीमे निमके पता खाक हम हर जोतैत छलौं । दिय - दिय हमर कमाई जोईख क नै हाथ उठाक दिय मुदा हमर हक बमोजी । महराज ! छनिके सहि स्वतन्त्रता के अनुभव करैत छलौं पुनः किए टायर जराब पर मजबुर कदेलौं भाव (रचना) आई ई मन फरु आईखमे पानी भैर देलक बुझैलियै जौं मनके कहैछै आई मदरडे है तैं याद दिला देलौं जो रे जो पापी मन रे माई जे रहितै जिन्दा तँ जरुर मिल यैतियै हम त टुहर छी नै बुझल हौ मन आरो बिचलित होईत हृदयके सेहो कना देलक आईख मे कनिके पानी आईल छल आब तँ आरो नोर बहादेलक साँचे , आईखमे जखन नोर आबैय रुमाल ,तोलिया सँ पोईछ लैछी मुदा जखन मन कनैय तखन वस कान्हिटा परैय ।। बधाइ अछि प्रिये--(भाव रचना) मारुभुमी सऽ प्रेम दिवसके बधाइ प्रिये हर साँसमे समायल रहि एहे दूवाइ प्रिये लिखरहल छी रेतपर बैठक सुहकार करब समय बदलतै अपनो बजतै सहनाई प्रिये मनमे बैठाकँ नोरकेँ सियाही बनाकँ अहिके यादमे कुछ लिख रहल छी आई प्रिये जब याद आबै सुन्दर नगरी सहजे मन मुर्छाई प्रिये गजल पुछु नै अहाँ बिन हम कोना जिवै छि कहियो पौवा कहियो बोतल पिवै छि जहिऐ छोडी गेलियै अहाँ बिचे वाट तखनेसँ खाली पेट नसेमे हिलै छि घायल करेज पुछु कोना तडपैय टुक्रा मिलाकँ दिलकँ पोटरी सिबै छि जगलोमे याद किय ? सुतलो सताबै अँही सपनाके हम दिनोमे चिबै छि हमर जेना तेना अहाँ खुस रहब आई अहिंक यादमे दु शब्द लिखै छि सरल वार्णिक- १४ गजल जराउ नै बिधाके मन्दिर महा पाप भसकैय काईल अंहुँक संतान अंगुठा छाप भसकैय सकैछि तँ मन कऽ अहिंसा जराउ देहक मैल छिनु नै किन्को जीवन श्राप महा श्राप भसकैय सडक हडतालके नामपर बस्ती जरनाई काईल अपनो घर जरिक सखाप भसकैय भेदभावसँ भरल बस्तिमे गन्तबय खोजै छि काईल अपने लोक अपने खिलाप भसकैय अहिंसा भेदभाव जौं मनसँ हटादेबै तखन सुन्दर संसारसँ निक मेलमिलाप भसकैय सरल वार्णिक –१८ गजल जिवै छि पिबै छि नसामे हिलै छि यादके चिबै छि फाटल सिवै छि नोरसँ लिखै छि सरल वार्णिक--३ गजल छिटकु नै भटकु नै बिचे वाट लटकु नै मोका ऐलै सटकु नै गर्मे गर्म चपकु नै संग मे सँ मटकु नै सरल वार्णिक ---४ आजाद गजल प्रतिगिया कैने छलौ हम, भेटव जरुर माफ करब ! जवना आगु भेलौ मजबुर समयक खेल छै सब,धैर्यता राखु अहाँ एक दिन घुईम आयब, हम छी नै दूर अहाँ एनामे देखु,आखिंमे बसल छी हम अहाँके सोझे छी,मन करु नै सकनाचुर प्रेम झुकल नै अछि, भल्हे मैइर गेल है संकोच नै करु, प्रेम अछि नै कोनो कसुर बुझैत दूनियाके संग आयब हम ,अहाँ माङ्ग सजौने रहब, भर आयब सिन्दुर आजाद गजल रुप एहने सजायब अहाँ एना फहरायब जेना हवा सँग गुडिया मुस्कान ठोरेँ उडायब ईसो नै कहब कखनो अहाँ मेकप करायब कैन्को नै दोष देव हम अहाँ माथ नै देखायब कनिक मन शर्मो करु तैँ निक नारि कहायब आजाद गजल जिबैत छी अँहीक, लेल मरैत छी अँहीक , लेल आगि सन जरल ,रौदा सहैत छी अँहिक लेल प्रेमक भुखल, पथर महैत छी अँहिक लेल मनेमे बिछोडक, गीत गबैत छी अँहिक लेल वचन ई यैगला , साल अबैत छी अँहिक लेल आजाद गजल वाह रे उपर वाला, अहाँ आगु चल्लै नै किनको जोर तैँ चलिते बाट नै जानी किए आई कानै मन मोर टुटल बिन्दु, समयक परिधिमे घुमिरहल छी हँसिते - हँसिते नहिँ जानी किए बहिजाई दू नोर अहाँक बाट कठिन अछि , तैयो चलिरहल छी शितल ई मन आई अशान्त किए,करै दू:ख शोर लक्ष्य पछाडि दौड़ैत दौड़ैत, कुछ नहिं बुझिपैलौ दू:ख भुँजैंत नित दिन , कहियो भेल नै नव भोर उटाले दैब आब, जिनगिके जुवा हम हारी गेलौं सहन शक्ति सब हेरागेल, मन परल बिभोर आजाद गजल आहाँ नै पुछु कोना बितैय राईत किनकालाँ उदास छी पुछैय राईत कतेक सुनसान लगै आहाँ बिनु हम नै आहाँ बुझी बुझैय राईत आहाँ कहैछी बिसैर गेलौं हमरा कते नाम जपै छी सुनैय राईत कोना बिसैर जायब बितल बात याद अबिते आहाँ झुमैय राईत जहि दिन कनि याद आबि नै आहाँ ओहि दिन ई ताना मारैय राईत आजाद गजल चाँन्द उतरल छलै, आई मटैक-मटैक कऽ रुप हमहुँ देखलौं, आई लटैक-लटैक कऽ केशक चोटि बाँन्हल , नयन कजधार छलै हाथक चुरि बजैं ,ओकर खनैक खनैक कऽ नजरि मिलते बुझि , जेना चमत्कार भगेलै चाँन्द खुदे जे आयल, छलै महैक महैक कऽ लग हमहुँ गेलियै, रुप निकसँ देखलियै हाथ उठैबते उ,भागल झनैक झनैक कऽ आँखिक निन्दो हरान भेल,मनो उदास भेल कुछो नै पैलौं राती ,बितल भटैक-भटैक कऽ आजाद गजल राजनिती आ घूस पैठिके बनल दलान छै लुटतैकि बचतै देश ? अगुवाकेकि प्लान छै दूनियामे अलगे ई अपन चिन्हारी रखने प्रकृतिकसँ भरल देश अपन महान छै कात करोट खुब सुझाई बिचक घाव नहि आँखिऐ सोझा सम्पत्ति बहैत नदी बलान छै स्वार्थी भेल नेता जेब भरमे लागल अछि पाछ लागल आजुक युवा कथिके जवान छै देश जडिरहल जनता मरिरहल अछि गम नहि निपनियाके खुर्सीके ताना तान छै आजाद गजल गोर नै कारी छै, जान हमर चित्तकबरि छै , प्रण हमर दन्त खिस्टी ,खिसिऐल रहै छै आबिते करै , सम्मान हमर बिन दहेजेके सैट गेलै उ कारी अछि मुदा शान हमर देह रंग तँ छै , चितकबरि ऐँठे हाथे नोचै कान हमर कोना कपार सटलै हमरा के कैलकै कन्यादान हमर आजाद गजल मानवके बस्तिमे मानवताके ब्यपार लगैय गुण,दोष बिसैर बनाउल व्यवहार लगैय जोरगरहाके उच्च अवाज निर्धनके लगाम बदलाब कहाँ अछि ? पुरनके बिचार लगैय बाँन्दरसँ मानव जंगलसँ उठिऐलौं बस्तिमे पुनः पंछी जेना नंगा होईत ई संसार लगैय कतनो तरकि करै लोक दू भाग नै बिसरलै पशुके गुण देखबैत मानव उघार लगैय दोष हिंसा ई जलनके हवो सँ तेज गति अछि मानव मानवता बिन तरकी बेकार लगैय मंगलेश डबराल (मंगलेश डबरालक सातटा हिंदीक कविताक मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा) 1. कमरा अहि कमरामे सपना आबैत छै लोक पहुंच जाइत छै दस या बारह बरखक उम्रमे एतय फर्श पर बारिश गिरैत छै सुतल मेघ मंडराबैत छै रोज एकटा पहाड़ कनि-कनि अहि पर टुटैत छै एकटा जंगल एतय अप्पन पात खासबैत छै एकटा धार एतौका किछु सामान अपना संग बहा के लअ जाइत छै एतय देवता आ मनुख लखाह देत छै नांगर पइर फाटल कपड़ामे घुमैत संग-संग घर छोडैक सोचैत. (1989 मे रचित) 2. बाहर हम दरवज्जा बन के देलहुं आ कविता लिखैक लेल बैसलहूं बाहर हवा बहि रहल छल हल्का इजोत छल बारिश मे एकटा साइकिल ठाड़ छल एकटा बच्चा घर घुरि रहल छल हम कविता लिखलहूं जाहि मे हवा नै छल इजोत नै छल साइकिल नै छल बच्चा नै छल. (1990 मे रचित) 3. लिखल चलल जाइत छलहुं आखिर हम देखलहुं जे स्त्री कतेक यातना सहित अछि. नेना सब अनेरवा जेना घुमैत अछि. सखा-संबंधी सब हमरा सं गप करब बेकार बुझैत अछि. बाप बुझलक जे आब हम शायद कहियो हुनका चिट्टी नै लिखब. हमरा की छल एकर सबहक पता हम लिखल चलल जाइत छलहुं कविता. (1988) 4. उम्मीद आंखिक इलाज करबैक लेल जायत बाप सं दस डेग आगू चलैत छी हम आंखिक इजोत घुरय के उम्मीदमे बापक आंखि चमकैत छै उम्मीदसं ओहि चमकमे हम हुनका लखाह दैत छी दस डेग आगू चलैत. (1989) 5. अप्पन अधिकार जखन इजोत भेल छांह लखाह देलक अपनासं पैग लखाह देलक अप्पन अन्हार. (1991 मे रचित) 6. पहाड़ छथिन ओ नीक पहाड़ छथिन पसरल निमग्न पहाड़ पर आबैत छै नीन. (1988 मे रचित) 7. एहन काल जेकरा लखाह दैत नै ओकरा कोनो बाट नै लखाह दैत अछि जे नांगर अछि ओ कत्तो नै पहुंच सकैत अछि जे बहीर अछि ओ जीवनक धम्म नै सुनि सकैत अछि बेघर कोनो घर नै बनाबय अछि जे बताह अछि ओ नै जाइन सकैत अछि जे ओकरा की चाहि ई एहन काल अछि जे कियो भी भअ सकैत अछि आन्हर, नांगर बहीर बेघर बताह. (1992) पंकज चतुर्वेदी [पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविता (अनुवाद-भावानुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा)] प्रस्तुत अछि पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविताक अनुवाद-भावानुवाद। एहन समय जखन कि अधिकांश वर्तमान कविता नमहर, रसहीन ओ रीढ़हीन भेल जा रहल अछि ओतहि पंकज जीक मात्र किछु शब्दक कविता लीखि चमत्कार आनि दै छथि। एकटा पाठकक दृष्टिसँ देखी तँ कम शब्दक कविता नमहर कविताक अपेक्षा बेसी प्रभावकारी रहैत छै। तँइ पुरान आचार्य सभ महाकाव्यमे दोहा, सोरठा ओ अन्य छोट छंदक प्रधानता दैत छलाह जाहिसँ विविधता अबै छलै आ पाठक बान्हल रहैत छल। पंकजजीक कविता प्रकरांतरसँ मुक्त छंदमे रहितों कथित मुक्त छंदक कवितासँ बेसी लयबद्ध ओ समयबद्ध दूनू अछि। विदेहक पाठककेँ अनिवार्य रूपसँ एहन कविता सभ पढ़बाक चाही तँइ ई अनुवाद हम अनलहुँ। पहिने हिनक डायरीक अनुवाद दऽ रहल छी आ तकर बाद कविताक एनासँ कविताक प्रभाव दुगुन्ना भऽ जाएत से हमरा विश्वास अछि कारण पंकजजीक डायरी सभ आत्मकथ्य सन अछि आ पाठक ओकरे सहारे कविताक मर्म धरि पहुँचताह से हमरा उम्मेद अछि (आशीष अनचिन्हार) डायरी खंड डायरी--1 रचनाकारकेँ आलोचना आ भूमिगत आलोचना दुन्नूक सामना करबाक चाही। डायरी--2 सार्थक कविकेँ कोनो आन कवि या गुटसँ नै खाली अपने कवितासँ खतरा होइत छै। डायरी--3 आलोचनामे अनिवार्य रूपसँ धार हेबाक चाही। मिरचाइ जँ कड़ुगर नै हो तँ लगै छै जेना दूभि चिबा रहल होइ। डायरी--4 जँ जिम्मेदारी हो तँ आलोचना कठिन काज थिक आ जँ जिम्मेदारी नै हो तँ आलोचनासँ हल्लुक काज कोनो नै। डायरी--5 कोनो समाद जँ बेसी मिठगर हो तँ बूझि लिअ जे कोनो सचकेँ झाँपि देल गेल अछि। डायरी--6 तर्कसँ संचालित प्रशंसा आलोचना थिक। डायरी--7 समर्थ आलोचक अपन रचनाकार ताकि लै छै मुदा असमर्थ आलोचक रचनाकारक भीड़मे फँसि जाइत छै। डायरी--8 मारए बलाकेँ मोनमे कोनो लाज-संकोच नै होइ छै। ने मारए काल ने ओहन परिस्थिति तैयार करबा काल। डायरी--9 अहाँक खिद्धांससँ कियो छोट नै भऽ सकैए हँ कनी काल लेल अहाँक विशालताक लग ओ छोट बुझा सकैए। डायरी--10 साहित्यमे कहियो देरी नै होइ छै मने जे अहाँ कोनो समय साहित्यक कोनो बिंदुपर पहुँचि सकै छी। डायरी--11 यांत्रिक मार्क्सवादक प्रतिक्रियामे जन्मल उत्तर यांत्रिक मार्क्सवाद बेसी खतरनाक अछि। कविता खंड 1 इच्छा संबंधक साँझमे ओहने इजोत रहए जेहन छल संबंधक भोरमे (मूल शीर्षक-हसरत) 2 इमरजेंसी आबिए जाइ छै इमरजेंसी आ कहै छै हम ओहन नै छी जे केने रहै बदमाशी केने रहै जीवनक चक्का जाम आबि गेलहुँ हम अइ बेर अहाँक संगे प्रेम करबाक लेल (मूल शीर्षक-इमरजेंसी) 3 दुख असहमति नै भेटए कतहुँ से चाहै छै सत्ता देशकेँ दुख होइ छै किए अपनाकेँ सौंपि देलहुँ एहन लोक लग (मूल शीर्षक-अफ़सोस) 4 मतलब जखन कोनो अपराधी कहै छै जे ओकरा मोनमे देशक कानून, संविधान लेल आदर छै तखन बुझू जे ओ साफ-साफ कहैए जे कानून ओकरा छोड़ेबामे मदतिए नै करतै छोडियो देतै (मूल शीर्षक-आशय) 5 इशारा प्रजा पुछलकै- अहाँ की सभ देब हमरा राजा उत्तर देलकै- हमर मानब अछि जे छीनिए कऽ देल जा सकैए किछु हम तोहर खेत छीनि कऽ कारखाना बलाकेँ दऽ देलियै तेनाहिते तोरा लेल हम बगल बला देशसँ छीनि कऽ देबौ ओना ई युद्धक इशारा छल मुदा प्रजा ई जानि राजाक जैकार केलक जे राजा प्रतापी थिकाह युद्धसँ हमरे भलाइ करता (मूल शीर्षक-इशारा) 6 उदारवादी राजाकेँ अपन राज्यक खराप व्यवस्थाक ओतेक चिंता नै छलै जतेक ऐ बातक छलै जे प्रजा विरोध करैए अंतमे ओ घोषणा केलक हम उदारवादी छी हम सभहँक विरोधक स्वागत करै छी व्यवस्था ओहने रहि गेल (मूल शीर्षक-सदिच्छा) 7 पराक्रमी कलाकार लोकतंत्रमे शासन करबाक एकटा एहनो तरीका छै कि शासन आ शिकार करबामे कोनो फर्क नै रहए मने मारू आ नुका जाउ पापक भागी देखए बला ऐठाम मारब पराक्रम भेल आ नुका जाएब कला आ जे एहन कऽ सकथि से पराक्रमी कलाकार (मूल शीर्षक-तरीका) 8 कहियो-कहियो कहियो-कहियो विपक्ष सेहो सत्ताक लग-लगीचमे रहैत छै आ सत्ता विपक्षक उप मने जे लगीचमे तँ हो मुदा ठीक ओहने नै हो जेना नगरक लगीचमे उप-नगर प्रधानमंत्रीक लगीचमे उप-प्रधानमंत्री ओनाहिते उप-सत्ता सेहो रहैत छै आ उप-विपक्ष सेहो (मूल शीर्षक-इतिहास में कभी-कभी) 9 जाँचि लेब जँ सत्ता अहाँक स्वागत कि प्रशंसा करए तँ जाँचि लेब जे अहाँ ओ जनताक माँझ कतेक दूरी बढ़ि गेल अछि ओना हमरा बूझल अछि जे अहाँ लेल देश जनता नै कोनो भू-खंड अछि (मूल शीर्षक-देखना) 10 उम्मेद अहाँ हमर लिखलसँ सहमत हेबे करब तइ लेल नै लीखै छी हम ओहू दुआरे लीखै छी जे हमर लिखल चाँछैत चलि जाए जँ हमर लिखल आलोचनासँ अहाँकेँ दुख पहुँचल तँ हमरा लग ई उम्मेद अछि जे एखनो बचि सकैए सर-समाज (मूल शीर्षक-प्रत्याशा) 11 जन्मदिन जन्मदिनक खुशी अइ लेल होइ छै जे जतेक दिन जीबऽ देलक सएह बहुत (मूल शीर्षक-जन्मदिन) 12 विपत्ति सौंदर्य कि सौंदर्य-बोधक अभाव लेल प्रयास नै करऽ पड़ैत छै ई तँ अपना-आपमे एकटा विपत्ति छै जे चारू दिशा उनचासो पवन संग आबि जाइत छै (मूल शीर्षक-विपत्ति) 13 अमानुषिकताक संबंध जखन शासकक मूँहपर एकै संग देखै छी शांति आ चिंता तँ हम बुझै छी जे ओकर अमानुषिकताक संबंध धर्मशास्त्र ओ इतिहासक ओइ पोथी सभसँ छै जे किछु दिनक बाद लिखल जेतै (मूल शीर्षक-शासक का चेहरा) 14 माए गै माए बड़का-बड़का मुद्दासँ शुरू केने छलही अध्याय बीचमे चाह अंतमे गाए माए गै माए (मूल शीर्षक-हाय) 15 अपन प्रजा मचल छलै हाहाकार काहि काटि कऽ मरि रहल छल लोक तखनो मंत्री कहै छलै- "अपन प्रजा खुशहाल अछि" आब राजा खुश छल जे ई कननाइ ओइ प्रजाक अछि जे हमरा नै चुनलक (मूल शीर्षक- मुद्रा के अभाव में) संतोष चतुर्वेदी (संतोष चतुर्वेदीक दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) गाँठ बेर-बेर एहन होइत छै की कोनो गाछक गाँठसँ फुटि जाइ छै नवका पल्लव आ तकरा संग शुरू होइ छै नव बाट अपन संघर्षसँ ओतहिंसँ रचा जाइ छै नव कविता अपन रससँ नदी-समुद्र केर सृजन करैत आ एक पल्लव कि बाट कि कविता केर बदला ठीक ओत्तहिं जनमि जाइ छै हजारक हजार जैठाम सोझ ठाढ़ि रहै छै तैठाम सृजनक कोनो उम्मीद नै (मूल हिंदी कविता "वहीं से फूटती हैं राहें" केर भावानुवाद) मेघक दूभि अकासक अगम-अथाह संसारमे अवारा जकाँ घुमनिहार हम मेघ, आ तों जमीनपर एकैठाम हिलैत-डोलैत रहए बाली हरियर-हरियर छोटकी दूभि बरखा बनि एबौ तोरा लग आ बना लेबौ हीत-मीत अपन इच्छामे भिजा कऽ रचि-बसि जेबौ तोहर हरियरीमे चुप-चाप हम रहबौ तोरा लग अनचिन्हार बनि कऽ जे कियो अलग नै कऽ सकए हमरा तोहर हरियरीसँ (मूल हिंदी कविता "बादल और दूब" केर भावानुवाद) वीरू सोनकर (वीरू सोनकर केर तीन टा हिंदी कविताक मैथिली भावानुवाद। अनुवादक आशीष अनचिन्हार) उपलब्धि धार अपन सभसँ बेसी जरूरी जात्रा पूरा केलक आ ओ अराम नै छल जखन सभ गाछ-बिरिछ रुकबाक मोन बनेलक योग छलै पहाड़क सन्यासक बदला जे धरतीमे गँहीर धरि चलि गेल छलै आ निशिबद्ता रचि रहल छलै सर्व-श्रेष्ठ गीतक बदला जिवनक पहिल जन्मौटी हँसी लेल बसातमे उठल हाथ अकाशकेँ केने छल प्रणाम समुद्र चौंकि उठल पहिल डेगक अवाजपर आ मोन बना लेलक जे सभ दिन नव रहब आ तइ लेल ओ लहरिकेँ चमड़ा बना सभ दिन हटा दैए पुरान चमड़ाकेँ एतेक होइतो कविता लेल बाँचल रहल जगह आ कविता अबिते कहलक बचबैत रह, बचैत रह एकरा संग कविता ईहो कहैत रहल बेर-बेर कि हरेक समयमे विश्व-विजेता घर नै पहुँचि पाबै छै मोनक हरेक चोटक इलाज कविताक लग देखि धरती एखनो धरि खुशीसँ नाचि रहल अछि अपन अइ एकमात्र उपलब्धिपर नून हमर गेड़ुआ जे सोखने रहए नून से छीटल अछि पूरा धरतीपर आ हम अपन जुत्तासँ कहि रहल छी जे चलू ओ पूरा नून लाबए लेल बिना कोनो पहचानिक कोनो दुख नै रहत हमर खालपर आ जुत्तामे नुका कऽ आपस लऽ अनबै नूनकेँ आ रखबै ओहीमे घरमे जकर देबालपर हवा-बिहाड़िसँ टकराइत टाँगल अछि हमरे एकटा फोटो जकर रेखा साँपमे बदलि जाइत अछि आ पसरि जाइत अछि हमर ओछाएनपर कोनो एकटा बिंदुसँ शुरु फेर ओही बिंदुपर खत्म उदासीक संसारसँ अलग हम रचि रहल छी सात समुद्दरकेँ एकै डेगमे पार करबाक साहस दिन बर्खक सभसँ गर्म दिनक भोरमे समयमे अखबार आएल देरीसँ देरसँ आएल रंग-बिरही समाद-समाचार नौकरीक प्रचार बला पन्नामे हम अपन संभावना नै देखलहुँ बिन उत्साहक दिनमे हम रहलहुँ असगरे ओइ योजना विहीन दिनक शुरूएमे हमरा सोचबाक छल जे रातिधरि सभ काज कऽ लेबाक छै आ हम काज करबाक बदला दिनेकेँ बुझाबए लगलहुँ आ दिन हमर हरेक बातमे हँ-हँ करैत बीति गेल रातिक अंतिम पहर भीजल अछि पछिला सर्दीक सुगंधसँ मुदा तैयो ई गर्मीक एकटा बेकार राति छल जे अपन अंतिम समयमे किछु सुगंध पसारलक एतेक होइतो ओ दिन अबस्से आस आएत भोरक चाहमे सर्दीक राति बला सुगंध सेहो आएत अखबार सेहो आ दिनकेँ तखन बुझाबए नै पड़त गुड  नाइट केर संग ओ कहत जे हम फेर आएब हमहूँ कहबै हँ आशीष अनचिन्हार बाल गजल उजड़ैए जे आँगन बाबा नाचैए पतराखन बाबा भानस भात बना धेलक ओ चीखैए किछु चाखन बाबा अजगर गहुँमन साँखर संगे घूमैए बड़ धामन बाबा टालक टाल लगा मरि गेलै लूटैए सभ लूटन बाबा किछु दुर्घटना हेबे करतै झूमैए मनभावन बाबा सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि ऐ गजलमे दू टा काफियाक प्रयोग अछि गजल आँखिमे बहार छै हाथमे उधार छै भिन्न भिन्न गाँहके एकटा बजार छै बेरपर अलग अलग ओहने भजार छै एकबाल केहनो जल्दिये उतार छै डोल केर दोस्त ओ तेहने इनार छै सभ पाँतिमे 212+12+12 मात्राक्रम अछि सुझाव सादर आमंत्रित अछि गजल केखनो उठा देलकै केखनो खसा देलकै देवता बना केकरो नोरमे भसा देलकै डारि पात छै ओकरे बात से बुझा देलकै पानि छै बहुत दूर तँइ आगि ओ लगा देलकै सोचने रहै अपने सन आन सन बना देलकै सभ पाँतिमे 212+12+212 मात्राक्रम अछि अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि सुझाव सादर आमंत्रित अछि गजल हुनके चूड़ा हुनके पिज्जा कोन अजादी पुछितो लज्जा गठरी बान्हल किनकर हिस्सा खूब हँसोथब सभहँक इच्छा अनचिन्हारक किछु ने पक्का सभ पाँतिमे 22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल सेज सजिते इजोरिया एलै घोघ उठिते इजोरिया एलै मूँह हुनकर अतेक सुंदर जे बात बजिते इजोरिया एलै आँखि झुकलै इजोरिया भागल आँखि उठिते इजोरिया एलै शब्द उपजल अलग अलग ढ़ंगसँ अर्थ बुझिते इजोरिया एलै मोन देहक इजोत बहुरंगी ध्यान लगिते इजोरिया एलै सभ पाँतिमे 2122-12-1222 मात्राक्रम अछि इजोरिया शब्दक बहुरंगी अर्थ छटा लेल हम जनआनंद मिश्र जीक आभारी छी गजल ताड़ी लेने एलै पासी हमरे लेल लबनी देने गेलै पासी हमरे लेल नहिएँ चाही फुनगी भुनगी अपना लेल हमरे सदिखन ठेलै पासी हमरे लेल हमरा हिस्सामे छै खाली फेने फेन केहन निष्ठुर भेलै पासी हमरे लेल हाथक कादोकेँ हीरा बुझलहुँ तँइ आब उगना सन हेरेलै पासी हमरे लेल हमरा एम्पायर घोषित केलक तइ बाद हमरे पिचपर खेलै पासी हमरे लेल सभ पाँतिमे 222-222-222--221 मात्राक्रम अछि गजल बेबाक लिखू बिंदास लिखू बात सधारण या खास लिखू अन धन लछमी मिठगर भेने दुरदिन रहितो मधुमास लिखू शब्द बहुत लिखलहुँ आब अहाँ अइ खिच्चा ठोरक आस लिखू हम बूझै छी नीक अहाँकेँ अपने दाबल इतिहास लिखू असगर रहनाइ कठिन नै छै तँइ भीड़ भरल बनबास लिखू सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि "बिंदास" कूल ड्यूड सभहँक शब्द छनि गजल खेत मसान सन पेट लगान सन भूख जँ धर्म छै दर्द विधान सन भाव घिसल पिटल शब्द महान सन देह कलश बनल मोन भसान सन आँखि उठल खसल अर्थ असान सन सभ पाँतिमे 211-212 मात्राक्रम अछि गजल इल्ली दिल्ली पटना राज सौंसे पसरल गदहा राज अपना मोने हमहीं पंच के जानैए विधना राज बहुते भेलै गंगा जमुना हमरा चाही कमला राज आगू पाछू छै खरमास तइपर एतै भदबा राज पंडित मुल्ला जनते बीच तँइ सभ चाहै फतबा राज सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि गजल रस्ता छेकल दुनियाँमे हमरे भेटल दुनियाँमे ब्रम्हांडक ई रीत बुझू दुनियाँ फेकल दुनियाँमे अपने लिखलहुँ नाम अपन अपने मेटल दुनियाँमे हमरा एहन तोरा सन बहुते बेकल दुनियाँमे कपड़ा बरतन गहना बुझि मोनो बेचल दुनियाँमे सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल अंबार हेतै की नै हेतै जैकार हेतै की नै हेतै हमहूँ पठेने रहियै हुनका स्वीकार हेतै की नै हेतै ग्राहक तँ भेलै छै बरबाद पैकार हेतै की नै हेतै ई ओइ पारक चेन्हासी छै अइ पार हेतै की नै हेतै कीनि एलै दोकानक दोकान व्यवहार हेतै की नै हेतै सभ पाँतिमे 2122 + 222 + 22 तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ अतिरिक्त छूट मानल गेल अछि गजल रातिमे भोरक इच्छा भोरमे साँझक इच्छा डेग छै सभहँक जँइ-तँइ हाथमे हाथक इच्छा छै घृणा स्थायी भाव साथमे प्रेमक इच्छा ओ जरै अपने दुखमे सभ कहै धाहक इच्छा तीर सन फूलो भेटल फूल सन काँटक इच्छा सभ पाँतिमे 2122 +222 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि गजल इम्हर उम्हर बहसल बात बड़ दुख दैए सनकल बात खाली खाली हुनकर मूँह उड़िए गेलै उघरल बात हुनका भेटनि सौंसे सौंस हमरा भेटै चनकल बात दाबल रहतै तैयो भाइ सुनबे करबै निरसल बात झुट्ठा चकमक चकमक दीप सचकेँ मानू झलफल बात सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम अछि गजल हमरो समय बीति जेतै हुनको समय बीति जेतै ओकर इयादक सहारे सड़लो समय बीति जेतै उज्जर पीयर नील हरियर ललको समय बीति जेतै बंदूक संदूक जे छै तकरो समय बीति जेतै पुरना समयपर नै हँसियौ नवको समय बीति जेतै सभ पाँतिमे 2212 + 2122 मात्राक्रम अछि अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल ई हँसी लाबा छै ओ खुशी भुज्जा छै छै हमर दुख काशी सुख हुनक काबा छै देह पूरा पूरी मोन किछु आधा छै ठोर छै तड़कुन सन आँखि बस डाबा छै राग रंगक सीमा प्रेममे बाधा छै सभ पाँतिमे 212+ 222 मात्राक्रम अछि गजल किश्तेमे हँसबै किश्तेमे कनबै हम किश्तेमे जीबै किश्तेमे मरबै हम भोरसँ साँझसँ रातिसँ आइसँ की काल्हिसँ जहिया मगँबै खाली तोरे मँगबै हम अपने जौड़सँ बान्हल छानल रहलहुँ तँइ किछु जे कहबै तँ कहू किनका कहबै हम शब्द अहाँ बूझू की वाक्य अहाँ बूझू जीवन भरि खाली अपनाकेँ रचबै हम जइ दिन कहतै अनचिन्हार कियो हमरा ओही दिनकेँ थैहर थैहर बुझबै हम सभ पाँतिमे 222 + 222 + 222 + 22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल झूठक बीजबिंदु एते टा साँचक बीजबिंदु एते टा देलक चोट फूल तँइ कहलहुँ काँटक बीजबिंदु एते टा जिंदा आदमीक संगे संग लाशक बीजबिंदु एते टा फैक्ट्रीकेँ लगा चला बुझलहुँ चासक बीजबिंदु एते टा खेतक पानि नापि कहलक ओ मेघक बीजबिंदु एते टा सभ पाँतिमे 2221 + 2122 + 2 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि गजल भीतर भीतर गुमसैए बाहर बाहर धधकैए जीवन फाटल गुड्डी छै तैयो ओ सभ उड़बैए सभहँक चिंता अँगना धरि अपना अपनी बचबैए असगर असगर दुनियाँमे लाशो अपने उठबैए बरखा बुन्नी पाहुन सन कहियो कखनो पहुँचैए सभ पाँतिमे 222 + 222 + 2 मात्राक्रम अछि गजल बात जे कहल गेलै अनचोक्के हाथ सभ जुटल गेलै अनचोक्के केखनो करा दैए दुर्घटना बात जे बुझल गेलै अनचोक्के मोन पड़ि रहल सभ धीरे धीरे संग जे छुटल गेलै अनचोक्के बाजि नै सकल किछु रहलै चुप्पे प्रश्न से पुछल गेलै अनचोक्के धार बूझि रहलै सभ किरदानी पानि जे सुखल गेलै अनचोक्के सभ पाँतिमे 212-1222-222 मात्रा क्रम अछि गजल पहिने भक्तक तगमा भेटल तइ बादे किछु सुविधा भेटल हँसि उठलै रस्ता कारक संग गुमसुम बैसल रिक्सा भेटल नवका ताला नवका चाभी बिन कब्जा के बक्सा भेटल हुनकर ता थैया थैया केर डेगा डेगी चरचा भेटल अटकल बंसी बड़ जीवन भरि कनियें बोरक हिस्सा भेटल सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि दोसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतिम लघुकेँ छूटक तौरपर लेल गेल अछि गजल मोनक गाछी मजरल किछु धीरे धीरे गमकल किछु खुल्लम खुल्ला जीवनमे परदा पाछू खनकल किछु हमहूँ छी बुधिमान बहुत हमरो लग तँइ अभरल किछु बड़ देलहुँ धेआन मुदा देहक एना चनकल किछु भेलै मेघक बँटवारा इम्हर उम्हर बरसल किछु सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल सात तहमे दाबल बात बड़ महकलै झाँपल बात काँपि रहलै रसगर ठोर काँपि रहलै कोमल बात नै नुका सकलै भीतरमे चमचमाइत माँजल बात हमरा लग उजड़ल पुजड़ल तँ हुनका लग छै साँठल बात चुप रहू किछु नै बाजू हमहूँ जानी जानल बात सभ पाँतिमे 2122 + 2221 मात्राक्रम अछि तेसर चारिम आ पाँचम शेरक किछु दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल किछु किछु रसधार जकाँ किछु किछु बेकार जकाँ हुनको सभहँक दुनियाँ आने संसार जकाँ साधल मातल लोकक बोली ललकार जकाँ बेरा बेरी हमरो केलक उद्धार जकाँ ओकर इच्छा लागै अनमन कंसार जकाँ सभ पाँतिमे 222-222 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल धार ताकै पानिकेँ खूब चाहै पानिकेँ हाल आसक की कहू श्वास जानै पानिकेँ संग रहितों सभ समय पानि थाहै पानिकेँ आँखि ओकर देखि देखि आहि आबै पानिकेँ केकरो लग रेत सभ बान्हि राखै पानिकेँ सभ पाँतिमे 2122 + 212 मात्राक्रम अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। गजल देश देह दुबराएल छै लोक मोन उधिआएल छै पाप पुण्य एना केलकै स्वर्ग नर्क भरमाएल छै भोर साँझ हमरे मेहनति घाम केकरो आएल छै ठोर कहि रहल जे प्रीत केर गीत ओकरे गाएल छै गाछ पात जरि रहलै मुदा डारि फूल हरिआएल छै सभ पाँतिमे 21-21-222-12 मात्राक्रम अछि चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि गजल नाम विकासक काज विनाशक धरती बेचि कऽ बात अकासक छुटिए गेलै संग हुलासक माछे जानै हाल पियासक बेपारी छी भाव लहासक सभ पाँतिमे 22-22 मात्राक्रम अछि दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल एक ठोप नोर साँझ राति भोर टूटि गेल आस की लगाउ जोर प्राण देह मोन माछ पानि बोर देश धर्म चास बीत बीत चोर चाहि रहलै खाली सिक्स सिक्स फोर सभ पाँतिमे 21-21-21 मात्राक्रम अछि अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे दूटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल काज गुलाब बराबर घाम शराब बराबर सुख छै पन्ना पन्ना दुख तँ किताब बराबर छै धर्मक आँगनमे घोघ नकाब बराबर क्रेडिट जय डेबिट जय फंड हिसाब बराबर ठोरो चुप मोनो चुप प्रश्न जबाब बराबर सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल कियो अपनेसँ क्लीन बोल्ड कियो अनकेसँ क्लीन बोल्ड कियो खेपैए कानि कानि कियो हँसियेसँ क्लीन बोल्ड कियो हाँ जी हाँ जीसँ जिंदा कियो नहियेसँ क्लीन बोल्ड कियो पसरल छथि झूठ मूठ कियो सहियेसँ क्लीन बोल्ड कियो छै पासी केर संग कियो कटियेसँ क्लीन बोल्ड सभ पाँतिमे 122+2221+21 मात्राक्रम अछि तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। मनोज कुमार मंडल गजल चालि एहन जे छैनह जग जाहिर घोघ एहन जे नव कनीए होएथ बजैत तऽ छथि बड मिचराबैत लगै बेचए बाली बनिया होएथ बाबाक पागक कोनो नहि ठेकान ससुरक मान घटबै पर होएथ घेरल सीमान ओ नांग्घि रहल छथि घरमे जेना टाँग लटकौने होएथि जगमे भूर अहिना न होएत अछि बिन सोचने चालि पकड़ने होएथ गजल हम राह चलैत मुसाफिर छी जानि नहि अंनत राहमे पथिक बनि ई फँसल छी जिनगीक जलेबीया मोर पर लटकल घटमे प्राण जेना हम आब ई अटकल छी जेना वृत पर घूमि एक्के ठाम छी अबैत मूल बिंदू पर जाएसँ पहिने नाचल छी करनी देखबै मरनी बेर सुनै छलहुँ अहिसँ मनोजे कोन केओ नहि बाँचल छी गजल अदलल बदलल रुप बना रंगल सियार शेर बनल छै भरि दिन जाल बिछा रहल ओ फँसलके ओ धमका रहल छै ई दोकान चलतै कहिया तक ई तऽ ओ अकानि नहि रहल छै आगू पाछू लोक देखि रहलै हन ओकर मन लोभमे गड़ल छै देखि देखि मन झाझर होएछ सत्कर्म मनोज ऐक रहल छै गजल हम छी पागल ते घर सँ छी भागल उदरक निमिते बनल छी अभागल मन अखनो रहैत अछि लागल हुनको जी हेतैन हमरे पर लागल परधीन रहि सपना अछि लागल गाम छोरबाक मोहर अछि लागल मायक ममता बर छैन जागल बाबूक मन मिलबाक छैन लागल गजल दुल्हा त' बड़ सुन्नर छला पढ़बामे वैषनबे छला बाजैत छला मिचराबैत लगै पाकल परोरे छला छला नम्बरी नरहेर बाबू हिसाबे हाकीमे छला पढ़ले कनिया चहिएन्ह अपने आठवी फेले छला कहैत त "मनोज "छलैन्ह कनिया बाबू बताहे छला गजल की कहु भाय हमरा पियार भ' गेल अबिते एलहुँ कि चिन्हार भ' गेल आबिते हमरा तरास लागि गेल माँ सँ हमरा दूधक आस भेट गेल मायए सबसँ त चिन्ह करा देल बाबूओ सँ हमरा चिन्हार भ ' गेल एकेटा जड़ि कैकटा ठाढ़ि लागि गेल की कहु भाय सबसँ पियार भ' गेल धीरेसँ सब जबाबदेही भेट गेल तहिमे जीनगी त पार भ ' गेल की कहु भाय बिन नामे क' एल रही अबिते हमरा मनोज नाम पड़ि गेल वर्ण -14 गजल पूछि तऽ अहाँ उचिते रहल छी मन करैए अछि कहि दी वा नइ आधुनिकतामे फसि उगडुम छी चकाचौंधमे परि कहि दी वा नइ बजारवाद- पूँजीवादीक बिचारल ई गठजोड़ छिए कहि दी वा नइ घर-घर घूसिएल जा रहल छै कोए अछुता नहि कहि दी वा नइ नीक करैत अधलाह होएत छै बिछाएल जाल छै कहि दी वा नइ गप कने मेँही छै सोचलाक बाद मन करैए अछि कहि दी वा नइ रिश्ता - नाता अपने, अपनासँ कटि रहल छै, जन्मक नाता सँ दूर भऽ अनचिन्हारसँ चिन्ह परचिन्ह करै छै, सगे संबंधीसँ छुप छाएप दोसर तेसरसँ राज बतबै छै। अपने, अपनासँ कटि रहल छै, भेल दोस्तके छोड़ि छाएर मोबाइल कम्प्यूटरसँ दोस्त बढबै छै, रिश्ता नाताके कातियाबैत अपने सबसँ कतिया रहल छै। अपने, अपनासँ कटि रहल छै, अपन हारि छुपा रहल आ नाता रिश्ता नहि सहेजै छै, स्वार्थक घोड़ा पर चढ़ि चाढि सहज बाट खोइज रहल छै। अपने, अपनासँ कटि रहल छै, अपने अपनाके ठकि रहल गाममे माय बहिन ठीक्के कहै छथि, अपन मामा मरि मरि गेल आ फलना चिलना मामा भेल। भरदुतीया बाट जोहैत दूरखा धेनेऽ ठाढ बहिनिया भायक डेग अकायन रहल छथि मने मन विचारि रहल छथि कखन भाइया औताह मोर पहर बितल जा रहल छै बहि रहल छै बहिनिया आँखिसँ नोर गोबरसँ अंगना नपऽ टाटक दोगसँ तकै छथि बहिनिया कखन भइया औताह मोर बाट रे बटोहिया सँ पूछै छथि बहिनिया देखल बाटमे अबैत भइया मोर आस लगोने बाट तकै छथि मनेही मन आब उठै छैन्ह हिलकोर सब बलाय टरि जाय हे संझा माय जूग जूग जीबैथ भइया हम्मर मोर हिया हारि उठि गेली बहिया लगै छैन आब बकोर भइयाक औरदा रहैन अगिला बरख लिलसा पूरा हेतै मोर। मोती कतेक दिन स्वाति नक्षत्रक बून्नक बाट जोहैत रहब, सीपक मूँहमे बून्न पड़िते ओ मोती बनि निकलि पड़त। नित्य दिन मिलैत अछि मोती कर्मक डोरमे गथल हार , चौबीस दानक बना क' माला पहिर देखू आभा चमकत । एक एक मोतीके जोगेनेसँ सीपक मोतीसँ महगे हेत, नकलत यदि सीपसँ मोती अहाँक हार नमगरे हेत। संजोग त ' निकम्माक होएत कर्मठक सृजन छैक मोती, तेँ न धन रहितो मौगएत धन हीन जीवैत हरखित। संजोग लग वियोग बिराजै कर्मठक लग सदा खुशहाली, कर्मक तप जे तपैत तपस्वी फलित होए देखल जिनगी। दीप होशमे रहि जोश भरल हर्षित मन ओजक उपवन देशक सीमान रक्षा निमित डटल छथि वीर जवान एक दीप अछि हुनक नाम । हेरैथ कालकंस जगदम्ब नीजके अर्पित सब लऽ समर्पित होए नइ किओ कलुषित लेने सपत छथि वीर जवान एक दीप अछि हुनक नाम। सबसँ नाता जोड़ि चलल घर अपनाके छोड़ि चलल आतंकवाद सऽ लड़बा लेल जानक लगौने बाजी वीर जवान एक दीप अछि हुनक नाम। छी अहाँ स्वयं जग दीपक चमकैत अछि जहान ऋणी छी अहाँक हमसब करब स्वीकार वीर जवान एक दीप अछि अहाँक नाम। जानकी गौरवशाली मिथिलाक विलक्षण इतिहास सम्पूर्ण महिला जातिक जन समस्याक रखली जानकी। जन चेतनाक अलख जगबैत रहली बेर बेर राज ऋषि जनक दुलारी वसुंधराक बेटी जानकी। भेटल छलैन संस्कारक सौगात दिआबै छली रामके याद प्रेमक संग मर्यादाक केलैन अंत तक निर्वाह जानकी। बेर एला पर रुप बिकराल रन चंडी बनि केली संहार करैत रहल छली शिव धनुष उठबैक अभ्यास जानकी। रहलैन मर्यादाक सतत् धियान रखली राग रहित प्रेमक मान जखन जतऽ रहली सबमे रचि बसि गेली जानकी। अकरहर बहि गैलैन्ह नोर सुनिते हम्मर बोल देखते कहने रहिएन्ह काकी देखलौ आइ चुलबुलक तन उघार भरि तन लत्ता नहि निकलल छली बहार ई सुनि काकी कहली धौर जाउ बौउआ अहुँ की अकरहर करै छी नव युगक ई छी परिधान करु आब एकरा समान समय बदलि गेलै काकीक गप सुनि चुप्पे रहि गेल रही ताबे पड़लै अगत्तिया सबहक चुलबुल पर धियान धेलक सब पछोर कनैत एलीह घर काकी तिनैक तकैत एलीह हमरा कोरे कोर देखते कहलिएन की सुनब काकी हमरा मूँहे अकरहर काकीके बहि गैलैन्ह नोर सुनते हम्मर बोल। दिपावली आबि रहल अछि खुशीक सौगात लऽ इजोतक राति दिपावली अमावस्याक घनघोर अन्हरिया राति चमकत दीपक स्वभाविक ज्योतिस़ँ चमकल छलै एक दिन अयोध्या रामक कर्म दिव्य ज्योतिसँ लेने छला मानवता स्थापनाक अखण्ड व्रत रावण सनक राक्षसके मारि रावणेक सखा विभिषणके देलएन स्वर्ण जरित लंका दान बालिके मारि सुग्रीवके देलएन सिंहासन अत्ति प्रेम छलएन सियासँ बेर एला पर देलएन वनवास हृदयक अंश सन भायके त्याग कऽ रागरहित पौलएन सम्मान अहि मर्यादाके दोहराबैत अबैत छी खुशीक दीप जरबैत अबैत छी दीप जरेला बादो ओ चमक नहि देखाए अछि मानवताक राह भटैक जनु राक्षस बनि मानव घूमै अछि। परदेशी भेलहूँ परदेशी हम छुटि गेल गाम-घर छुटि गेल घर-परिवार बनि मशीन खटैत रहलौ सबके छोड़ि एसगरे भऽ गेलौँ हम। बेर - बेर सुनएत रही कहै छला लाल कक्का जे पूत परदेश गेलाह देव-पित्तर संगहि नेने गेला ठीक्के कहै छला आब बुझै छी हम। बाबू बेराम छथि गाममे सेवा नहि दऽ पाबि छी हम एक दिश बाबूक सिनेह दोसर दिश नौकरी बीचहि दुबिधामे फँसल छी हम। एखनो बाबूक सिनेह ओतबे छैन जखन हमर दुबिधा बुझलैन कहलैन नौकरी देकहक हम कोनो तरहे खेप लेब हुनकर सिनेह देखि लाजाएल छी हम। कला लुरिसँ भरल बनबैत बहुतो रंगक चीज। लुरि कलाक रुप बनि बनौलक देशेटामे नहि विदेशोमे अपन पहचान। पुरूख बनबैत छीटा-पथीया जोड़ै माटिक देवाल आ बाँसक ओ घर बनाबैथ सुन्दर अतेक देखै संसार। स्त्रीगण मूजक मुजेला बीनै सीक्कीक बिनै छली चंगेरी रंग-बिरंगक चित्र बनबै छली अंगनामे अरिपन भारी। माटिक चूल्ह माटिएक कोठी अन्नसँ भरि रखै छली बरख भरि कहैत छली बखारी। चरखोसँ पहीने तकलीसँ सूत काटए छली शुद्धता आ शुभ भावनासँ जनऊ बनबैत छली । खुशी अपन मन अपनेसँ पचताए रहल छी चीज-बौस उलटा-पुलटाके घूमि-घूमि हम खुशी ताएक रहल छी छनीक भेंट जँ भऽओ जाएछ पुरनी पातक पानि जेँका डगमग कऽ ओ छीछैल जाए अछि पकैड़ि राखी हम एकरा से युक्ति नहि लाइग रहल अछि बरख भरिमे सब उत्सव पर ढोल पीट कहैत रहल ढोलकिया तयो मन नहि जागि रहल अछि चकाचौंधमे पड़ि हम दोसरे दिश ध्यान लागल अछि सगर लोक तकै हमरे दिश अपने दिश ध्यान नहि जाए अछि लगेमे ठाढ रही सैदखन ततऽ हमर ज्ञान नहि जाए अछि पंडित जहिना पृथ्वी अपना अक्ष पर घूमि - घूमि राति - दिन आ नव साल - पुरान साल अनैत अछि तहिना ओ चाक घूमाऽ - घूमाऽ गरहैत रहल रंग-बिरंगक बर्तन-बासन आ बनबैत रहल मनुखक जिनगी हल्लुक सुन्दर - सुन्दर मूर्ति बनाऽ-बनाऽ मनुखक मानस पटलसँ नहि मिटाए देलक देवी-देवताक आ ऋषि महर्षिक चित्र जहिना मनुख पाँच तत्वसँ बनल अछि तहिना ओ ओहि तत्वसँ बनबैत रहल प्राण तऽ ओ नहि दऽ सकल पर मनुखक प्राण बचौलक आ पशु सदृश्य जिनगीसँ मनुखक जिनगीक बाट धरौलक अछि समाजो कतेक ईमानदार छेलाह जे पंडितक उपाधिसँ सम्मानीत केलाह लत्ता-कपड़ाक तंगी रहला बादो पावनि-तिहार आ नव उत्सव पर नव कपड़ा दऽ सम्मान दैत रहला पर आइ अहि त्यागक कथा झपि रहल अछि मनुखक कामक कम आ दामक महत्व बढि रहल अछि कैंचे पर नजरि ठमैक रहल अछि माय! अबैत रहलेँ तू बारंबार होएत रहल शक्तिक संचार होएत रहल सब कथुक विस्तार गरहैत गेलहुँ चीज बौस भरैत गेल घर - दुआर बढैत गेलहुँ हमसब ससरैत रहल जिनगी भोगमे उलैझ देखैत रहलौँ संसार छुटि गेल तोहर देल उपहार चुकि गेल भाईचारा आओर प्यार भऽ गेल छै मानवता पर वार बहि रहल छै शोनितक धार माय! एकबेर कहि दे विस्तारसँ कोउना उतड़ब अहिसँ पार कऽ दे फेर एक बेर नव शक्तिक संचार कऽ ले हम्मर ई प्रार्थना स्वीकार भाय! टोलाक बीचहिमे एकगोट इनार छलै स्त्रीगणक साँझ-भोर सभाक अड्डा काँखतरि घैल आ हाथमे उगहैन लागल डोल इनार पर पहुंचतहि नीकलि पड़ै छलै बोल जेँना नींदा-खिस्साक बनि जाए छलै घोल एक दोसरके करै छलै सचेत। भावना जे कुछ रहैत छलै सब प्रेमसँ सकबेधल होएत छलै मनुख कम्मे रहै छलै तेँ नहि तऽ बेटा गामक काम अबै छलै आ बेटी माए-बापक नहि दोसराक सोगारथ पूरा करै छलै कला छलै अगुएल माटिक घरमे गरहै छलै रंग बिरंगक फूल गबै छलै सुख दुखक गीत संगतुरिया सबसँ लगबै छलै मीत मरै काल धरि निभाबै छलै ओ रिस्ता परिवार छलै संयुक्त तयो मनुख छलै प्रेमयुक्त भाय! आब अहीँ कहु हम बढि गेलौ कतेक आगू पीछरि गेलौ कतेक पाछु? मायक बदलैत छवि नौ मासधरि गर्वमे रखलेँ अप्पन खैक तू बाँटि खुएले अपन खूनसँ पियास बुझा तू खूनेसँ नहलौले खून घटबाक कारण केक रोग सिरजौले अपनाके ओछानक संग बितौले तखन तकक रूप तोहर माय बुढिया माय सन छेँले जनम दैते किए बदललें अपन दूध देहे बिलहिके डिब्बाक दूध पीऔले निज देहक आंचल हेराके गमछा तू ओरहेलेँ अपन संस्कार फेक फाकि तू पर संस्कार अपनौलेँ कोना बदललौ तोहर ई छवि ई बात जनथुन् रवि कोन लोभे हमरा जनमेले पुछै छथुन्ह कवि केकरो नहि रहलै ई जवानी किए अपनाके भारमौलेँ खूनक रिश्ताक गप की कहियौ सिनेह प्रेम भोथला भोथला बनियागिरी देखाबई छेँ देवी रूप मायक किए तू आब बिगारै छेँ ? कलह कलहक जडि नहि बुझहब बात कुसंगतक पकड़ने रहब गात खुट्टा गारब अहि ठाम यौ तात बतकटबैल क' दैत रहब मात गाल फुला नहि करब बात नहि बुझब दिन आ नहि राति नीक अधलाहक नहि बिचाराब बात हरिदम सोचब कोना द' दी मात हम एतबे कहब यौ तात एक दोसराक बुजहु बात अहि खेलमे नै बिताबु दिन व राति सुसंगतक पकरू गात माफी मागंने छोट नै होए छै दोस्ती लेल बढाबू अपन हाथ फेरसँ एक बेर गला मिल हाथ जोडि चलु साथ साथ कली काँच कली हम बेली छी मायक हम अलबेली छी नित सुनैत हम लोरी छी सुन्नर उपवन बना बास करब हम फूल बनि छितरब एक दिन छोट पैग मिल बनौने छी सुन्नर बाग हम बसौने छी सबहक मन ललचौने छी शोभा हम आ शोभित सुन्नर वन फूल बनि गमकब एक दिन मुनि झाँपि हम रखने छी मायक सिनेह बटोरै छी ज्ञानक सिर सिरजौने छी शुभ हम शुभे हम्मर उपवन फूल बनि देव पूजि एक दिन वीरक पत्नी आँचलक दूध दबौने छी आँखिक नोर सुखौने छी बनि गेल आब करेज पाथर सीमानक बाट धऽ निकलल छी नहि देखल जाय अछि बाल रुदन बिलखि रहल वीरक परिवार अवला अवला सुनि सुनि आँचल सक्कतसँ बान्हि निकलल छी एक दिश दानव ललकारि रहल हथियार उठा आतंक मचौने अछि दोसर दिश पेटक ज्वाला आब व्याथासँ व्यथित सिहरल छी रनभेदी आब बाजि उठल अछि ठेकानल डेग आब उठौने छी उड़ी आकाशमे भरि तिरंगा गाड़ी लऽ आब निकलल छी हे जनक नंदनी जानकी माय जानि अहाँक सुमरै छी बल बुधि ज्ञानक आशीष दिऽ अहाँक रुप सिरजाबै छी छुटि गेल अविलम्ब हम्मर अप्पन जिम्माक रुप निहारै छी वीरक काम कऽ पूरा क' कऽ माय अहीँ लग आब आबै छी देशी कौआ मन परि रहल अछि ओ दिन जहिया माएक हम छोट नेना रही मायक आँचर तर खेलैत -धुपैत रही माएक बोल हमर ध्यान एक रहैत छल जखने बजै अँगनामे कौआ बुढ़िया दादी बाजि उठै छलिह पाहुन एताह एना लागि रहल अछि सुनिते मन गद -गद भ' जाए छल आब तरुआ -तरकारी के पूछैअ दही -चीनी सेहो भेटत दिन भरिमे कैक बेर पूछिए माए आए कखन पाहुन औताह आब ओ दिनक यादेटा रहि गेल देशी कौआ मरि -मरि गेल कारकौआ गिरिहबासु भ' गेल आजुक कौआ बाजब ई भ' गेल अमंगलक संदेश द' गेल कौआ बैजते कनिया कहै छथि ढेला ल' एकरा भगाओ हम कहलिएन की कहै छि बिन भगौने देशी कौआ भागि गेल की कारो कौआ क ' बिदाहे क देब कौआ देखब सपना क' देब बताह हेलैत -हेलैत पहुचल जाय छै अथाह रस्ता भोथिया गेल छै भेल छै बताह एल छै हिलकोर सम्हारि नै सकलै अपना क' सह पाबि गेल जाय छै दहला . पूंजिबादके भेलै देखि डाह अनलकै बाजारबादक बाइढ़ नक -सक करै छै नाक तक पानि एखनो सम्हारने भेटतै थाह नहि त' भने अछिए अथाह ई देखि -देखि अबै अछि आह ओ ऊपर मे ठाढ़ भ' कहै छै वाह आबो त' मेटाबे अपन इ नव चाह नहि त' सबकुछ बिका देतै क क' बताह सब किछु बिका जेतै ओ किए करतै आह लेने छै अपन ओ मोछ पीजाह त्यागक भूमि पर देतै भोगी बना अपना क' आबो बचा नहि त धन -धरम संगे जेताह खाली हाथ रही जेत बनल इ नव चाह भूख हमारा सहल नहि जाय अछि भूख सबदिन खा -खा क' सूखल आ रुख सैदखन हमरे किए अछि लागल दुख फुफरी परल रहैत अछि हमरे मुख किओ खा -खा बनल अछि नै सोख सबटा हमरे नहि अछि न दोख एक्को दिन हमरो जं भेटैत चोख भैर जैते भूखसँ पचकल कोख तहन मनमे नहि रहिते हमारा रोख उधारी सामान बाबू आब हम नहि जाएब बेचू भाए दोकान लेबा लेल उधारी सामान कतबो कहला पर नहि दै छथि आब ओ कोनोटा समान कहअ लगै छथि ओ हमरा तू छ' रौ बड़ नादान बन्न क' देलिए देनै दान बौआ सुनि ले क क' ध्यान तोरा नै छौ एखनो ज्ञान तोरा सबके दैत -दैत बेचअ पड़त अपन मकान पकैर ले तू अप्पन कान खाली हाथ नहि अबिहे आब कहिओ हमरा दोकान भीखमंगा माए एलैहन एकगोट भीखमंगा संगे एल छै बहिन ओकर गंगा फाटल ठोर लागि रहल छै ठोर मे लागल होए ठोररंगा पेट -पांजर एक भेल छै जेना भूखसँ क' रहल छै दंगा खैक ल' किछु द' दही माए मोन भ' जेतै ओकर चंगा देह ठिठुरने मोन उदास छै द' दही बुच्चीया बाला लहँगा हमर एकटा जे छै भटरंगा पुरना सन राखाल अंगा पेंट सेहो द दही ओकरा हमरे बला जे छै सतरंगा एकर जीनगिए छै बहुरंगा हम पहिरबौ जे तू देमे आब नहि मांगबौ मूहमंगा चुट्टी देख देख देख बाबू चुट्टीक हेँर चलि रहल छै आपसमे घेर -घेर अगिला पिछला क ' क संगमेरह जल्दी जाए वा भ ' जाए अबेर धारी लगा चलै जेना रेल केहन सुन्नर छै सबके मेल अपना बाटमे डरै नै एक्को बेर काजो करै आ करै छै खेल हिम्मत छै ओकरा जेना होए शेर जान रहै वा जाए ओ मरि काज नै छोडै छनो भरि नदी नाला होए वा होए पहाड़ पार करबा ल' लागल रहै बार बार गिरैत पड़ैत होए छै नहि डर बाबू रखिंहे अहिना मेल आफद अबौ घनेरो बेर संग मिल लडिहे हर बेर संग छोडि नहि रहिहे एसगर लक्ष आगू अपने पाछू अपनामे नहि करिहे डर हिम्मत संग आगू बडिहे चाहे आगू रहौ भलहि शेर आब हमरा दे पोथी कीन आब हमरा दे पोथी कीन नहि लेब अँगा नहि लेब टोपी आब हमरा दे पोथी कीन नहि खेलब नहि छुपब रहब हम पढ़बामे लीन नहि हम लड़ब नहि हम झगरब रहब हम सबसंग मील कुसंगतमे हम नहि पड़ब हमरा देखमे ओकरासँ भीन गुल्ली -डनटा हाथमे द' ओ उड़ा देने अछि हमर नीन सब जीवक आदर करब मारब नै हम केकरो पीन गठरी खोल वा पोटरी खोल चाहे हमरा ल' ले रीन आब हमारा दे पोथी कीन आब दुःख सहि गेलौ रहब बनल आब दीन आंखि रहैत आन्हर नहि रहब हमरो जिनगीमे हेतै दिन आब हमरा दे पोथी कीन चंदा मामा चंदा मामा चंदा मामा दूधक कटोरा पठा दिअ नहि तअ अमृत सुधा बरसा दिअ हम अहाँक आंखिक तारा अपने लग बजा कअ हमारा अपने सन समदरसी बना दिअ चंदा मामा चंदा मामा हम अहाँक लाडला अपने सन चमका दिअ कोरा सन निर्मल कायामे शीतल मन बना दिअ ज्ञान प्रकाशक दीप हमरा हिर्दयमे जड़ा दिअ चंदा मामा चंदा मामा अहाँ अपने सन बना दिअ ओम प्रकाश झा गजल कहियो तँ ई बात हेतै जिनगीसँ शह मात हेतै तांडव शुरू भेल फेरसँ दू, पाँच की सात हेतै ऐ गाछकेँ काटि देलक नै आब नब पात हेतै छै राति कारी भयावह कहियो कतौ प्रात हेतै 'ओम'क गजल नै सुनू यौ सुर-ताल-लय कात हेतै मात्राक्रम अछि 2-2-1-2, 2-1-2-2 प्रत्येक पाँतिमे एक बेर। गजल सिनेहक धधरा पजरल किए नै उछेहक सागर उमड़ल किए नै किछो नै रहलौं हम आब ओकर तखन ओ हमरा बिसरल किए नै कतेको धक्का सहि सहि बचल छै नगर ई यादिक उजड़ल किए नै हमर आँखिसँ खूनक नोर झहरै हुनक छवि मोनसँ ससरल किए नै जरै छी हम दिन आ राति सदिखन करेजा 'ओम'क कुहरल किए नै बाबा बैद्यनाथ आजाद बाल गजल कियै करै छी देरी बाबा लागल भोगक ढेरी बाबा मंत्र पढ़ि उत्सर्ग केने जाउ भगतक बेरा-बेरी बाबा मद्यनिषेधक प्रवचन करता पीबैत भांग, गजेरी बाबा गांजा केर व्यापार करै छथि मंदिर केर पुजेरी बाबा अहाँक इशारापर जुटि जाइछ हेजक हेज हंसेरी बाबा जाति-धर्म केर बात ने पूछी कुर्मी, कोइर, गड़ेरी बाबा घरमे फुटहा फांकि रहल छथि भोजक बेरि पसेरी बाबा आबहु तँ संतोष करू किछु भेल उपाति चंगेरी बाबा दही-चुड़ामे रूचि नहि, खेता मुरगा, माछ, बगेरी बाबा स्वार्थेमे आन्हर भऽ उमड़त मंदिरमे जनु भेड़ी बाबा बाल कविता- बाबा-पोताक सिनेह अपन पौत्र छथि बड़ बुधियार हिनक हँसी छनि सिंगरहार ठुमुकि-ठुमुकिकऽ ई नाचै छथि सद्यः जेना कृष्ण अवतार जखनहिसँ अवतीर्ण भेल छथि भेल हमर जिनगी साकार हिनकर हँसी-ठहक्का सुनितहि लगैछ जेना हम नहि बेमार एखन जदि क्यो पाहुन आबथि कऽ ने सकी किनको सत्कार बुझा रहल हम हेरा गेल छी पाबि एहन अनमोल दुलार गीत कवित्त सकल बिसरल हम लीखि सकी नहि ई उद्गार पाबि रहल नैसर्गिक सुख हम प्रभुकेर महिमा अगम अपार बाबा-पोताकेर एहि सुख लग दुनियाँकेर सभ सुख बेकार हमर उदासल एहि जिनगीमे विधि देलनि अद्भुत उपहार चुका सकब नहि ऋण हुनकर हम ओ जे केलनि परम उपकार आब बुझाइछ हमर जीवन ई सरिपहुँ भेल सफल साकार आजाद गजल जिनगी तँ अभिशप्त बनल अछि तइयो तिल-तिल जीबि रहल छी भाग्यक एहि फाटल गोनरिकेँ बूझू कहुना सीबि रहल छी नेनपनेसँ हमरा सभकियोअप्पन बनिकऽ ठगिते रहलै शंकर बनिकऽ तीक्ष्ण हलाहल सभदिनसँ हम पीबि रहल छी हे भगवान ई ककरो नहि दी संकटकेर भंडार एतेक पोरे-पोरे घायल अछि तेँ रक्त बनल हम चूबि रहल छी साँपक आगू नाचि रहल अछि ताल ठोकि ई बेंग कोना हाथमे छूरा आर तमंचा डरें थर-थर लीबि रहल छी रोगग्रस्त एहि बूढ़ देहसँ आब तँ किछु नहि अर्जन होइए थाकल-मारल आश्रित, दोसर केर हमतँ 'परजीव' रहल छी आब एखन हम ऊबि गेल छी एहि जीवनसँ मरण नीक हो पाकल आम बनल हम देखू ठोपे-ठोपे तूबि रहल छी इएह संतोष बनल अछि "बाबा"दुनियाँ बड़ सम्मान दैत अछि सभक नजरिमे हम पूजाकेर मानू 'अक्षत-दूबि' रहल छी। आजाद गजल कतऽ गेलौं ये लग आबि जाउ ने एकबेर आबि पुनि भागि जाउ ने प्रेमक मादे हमर फुटले कपार छै सपनेमे प्रेमगीत गाबि जाउ ने अहाँ बिना हम्मर करेजे फाटल छै स्नेहक ताग लऽ कऽ तागि जाउ ने अहाँ सन लोक एते निठुर तँ नहि हो एकबेर प्राण हमर मांगि जाउ ने चिन्तासँ मुक्त किये एत्ते निसभेर छी किये एतेक सूतल छी जागि जाउ ने गलती क्षमा करू माफी मंगैत छी सभ किछु बिसरि हृदय लागि जाउ ने एखनहु पड़ैछ मन देल अहँक प्रेमरस एकबेर चखा पुनि दागि जाउ ने । आजाद गजल जखनहि जगलहुँ तखनहि भोर । चिड़ै करए बरू कतबहु सोर । प्यासक मारल सूखल ठोर । देह बुझाइछ बहुत कमजोर । घरक लोकसभ पड़ल बेडपर, कोना पीबि हम पानि इन्होर । जदि जगेबैक सभ तमसायत, बूढ़क घरमे चलय ने जोर । बिना सुसुम हम पानि पीब तँ, तखनहि उखड़त खोंखी जोर । गिद्धक औरदा हमरा देलनि, कियै विधाता एहन कठोर । मुइले गुण की पड़ेले गुण ई. कहबीक कतेक अर्थ बेजोड़ । आब बुझाइछ प्राण बचत नहि, तखनहि ससरल परदाक छोर । खोंखि सुनि पोता उठि आयल, चूमि गाल ओ बैसल कोर । पुछलक कियै ने अहाँ बजै छी, आंखिमे भरल कियै अछि नोर? हिम्मतिकऽ कने चुल्हि पजारू, "बाबा " कनेक लगबियौ जोर । जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गजल छल प्रपंच सभटा धुरफंदी जानि गेल ओ पाइ कमायब लक्ष्य जीवनक मानि गेल ओ पटकि आएल माए बाबूकें बिरधाश्रममे श्रद्धा आ ममता सन देबालकें फानि गेल ओ कंस जकाँ निरमल ज्ञानी दुरजोधन सन जहिया आयल अपने कीर्ति बखानि गेल ओ रखने हजारटा मूड़ी बाँहि आ पयर सेहो सभटा रस्ता अपनहि लेल दफानि गेल ओ ककरो संग मुन्नी भागि गेलै अधरतियेमे नै भेटलै पोखरि इनार सभ छानि गेल ओ जिनगी भरि सूतल टाका केर तोषकपर काल्हि पुछलियै कहू कुशल त कानि गेल ओ वर्ण -17 गजल ई जे घर आ आँगन छै सबहक अप्पन जीवन छै छै कहियो बरखी ककरो कहियो ककरो मूड़न छै सकुनी के चलती सभठां जै-जै ठां दुरयोधन छै कखनो ककरो नै टारू सभ ले' ई आयोजन छै रावण- दहनक मेलामे गनियौ कत्ते रावण छै मात्रा–क्रम : 2222–222 गजल भोरे-भोरे जागब सिखलौं आ अपनाकें ताकब सिखलौं आसन प्राणायामो सिखलौं तन-मन सुंदर राखब सिखलौं सूगा सनके बाजब सिखलौं आ कौआ सन भागब सिखलौं गायब सिखलौं नाचब सिखलौं आ रामायण बांचब सिखलौं आनब सिखलौं रान्हब सिखलौं आ सभ जनमे बांटब सिखलौं सभ छी हमरे, हम छी सबहक से सदिखन हम मानब सिखलौं जय- जय मिथिला, जय-जय भारत जय-जय राधे -माधब सिखलौं मात्रा-क्रम : 2222-2222 गजल लछुमन रेखा नांघू नै पाइक पाछां भागू नै रस्ता आगू के देखू पाछां घुरि-घुरि ताकू नै एहन नै क्यो दुनियांमे जकराले' क्यो आगू नैत। सोचू दुनियां निरमल हो अपना ले' किछु मांगू नै सुख आयल दुख अछि पाछू कखनो नङटे नाचू नै दुख आयल अछि चलि जायत सुख अछि पाछां कानू नै अपने सुत मानू सदिखन हरियर गछुली काटू नै मात्रा-क्रम : २२२२-२२२ गजल किछुए जन छथि देशमे रखने सभकें क्लेशमे रावण भेटल अछि कते रामक सुन्दर भेषमे जे सुख भेटल गाममे से दुरलभ परदेशमे आपसमे पटरी कहाँ ब्रह्मा विष्णु महेशमे के छथि माँ आ के पिता सुख सुविधाके रेसमे मात्रा-क्रम : 2222-212 गजल गंजन केलौं थोड़ अहां नै लागू हमरा गोर अहां नै थापर अछिए मोन अहांकें देखल आंखिक नोर अहां नै हमहूं कारी मेघ कहां छी छी जंगलके मोर अहां नै जैतहुं एको बेर अयोध्या केलौं कहियो जोर अहां नै नै काटब ई राति जं कहुना देखब कहियो भोर अहां नै साधू नै छी भाइ अहां सन बूझू लेकिन चोर अहां नै मात्रा-क्रम : 2222-21-122 गजल खेल-कूदमे बचपन बीतल रंग-भंगमे यौवन बीतल भोज-भातमे रहलौं सभदिन बात-बातमे पचपन बीतल जेठ मासके गरमी भोगल पूस-माघके ठिठुरन बीतल लोभ-मोहमे पागल रहलौं द्वेष-रागमे छण-छण बीतल भोर, साँझ आ दिन-दुपहरिया दौड़-धूपमे जीवन बीतल आइ बाढ़िमे डूबल सभ किछु ढ़ोल-झालि अभिनन्दन बीतल मात्रा-क्रम : 21212-2222 गजल सभकें सभ सुनतै एकदिन सबहक दिन घुरतै एकदिन सभ सबहक आदर करतै सभले' सभ मरतै एकदिन अनके बलपर कूदय ओ खसतै बस बुझतै एकदिन जे जे रावण बनि चिकरय सबहक घर जरतै एकदिन अपनाकें जानत- मानत से विजयी बनतै एकदिन जय जय भारत जय मिथिला सब गेतै नचतै एकदिन मात्रा-क्रम : 222-2222 गजल किछु नरमे नारायण देखल बाकीमे बस रावण देखल सभठाँ सभ घटनामे भैया शकुनी आ दुरयोधन देखल झगड़ा-झाँटी भितरे भीतर बाहरमे अपनापन देखल सबहक छल अनुमोदन पहिने पाछाँ सय संशोधन देखल पेटो ओकर नमहर सन के भोजन अति साधारण देखल लाठी भाला तीरक बदला फूलक हम आयोजन देखल मात्रा-क्रम : 2 2 2 - 2 2 2 - 2 2 गजल झूठक कारोबार बड़ीटा चोरक अछि संसार बड़ीटा जे नै कहियो गेल पढ़ैले से रखने अछि कार बड़ीटा देखैमे ओ छोट लगै छथि छनि गरदनिमे हार बड़ीटा हुनका लग नै गेल रही हम छल रस्तामे धार बड़ीटा हुनकर सेवा भेल कहाँ किछु छनि हुनकर उपकार बड़ीटा सगरो दुनियां गाम हमर अछि अछि हम्मर परिवार बड़ीटा मात्रा-क्रम : 22-2221-122 गजल पढिते -पढिते लीख' लगलौं की थिक दुनिया सोच' लगलौं नै गेलौं इसकूल जहिया भेटल छौंकी कान' लगलौं गेलौं हम कौलेज जहिया कूदय लगलौं फान' लगलौं देखा-देखी लोक स'भकें हमहूं कूकुर पोस' लगलौं छाहरि दै छल गाछ हमरा हम गाछेकें काट' लगलौं दुनियामे सभ दोख 'अनिल'क लिखिते-पढिते जान' लगलौं मात्राक्रम- 2222-2122 गजल अपन निन्न अपने सपना छै सबहक एक भिन्न दुनियां छै ताम झाम आ तडक भडक ई  की बदलल सभटा ओहिना  छै मोटर बंगला बैंक डिपोजिट सभटा छै  लेकिन लाज कहां छै आंगन घर आओर दरबज्जा केहन  शून माए बाप बिना छै गप्प हंकैए अरब खरबके करतब लेकिन चोर जकां छै लोक बुझैए एखन नगरमे सत सत बाजब साफ मना छै सीता रामक मर्म जे बुझलक अनिल तकर शीले गहना छै वर्ण १२ गजल मेघ बनि बनि क' अबैत रहू अहिना अहां नीक हमरा  लगैत रहू अहिना नाटक ई जिनगी आ हम अहां नटुआ सभ कियो नाचय नचैत रहू अहिना बाहरेमे रखियौ ई दुनियांके झंझटि राम राम भीतर  जपैत रहू अहिना काम क्रोध लोभ मोह दुश्मन छी बडका सदिखन स्वयंसं लडैत रहू  अहिना मोन वचन कर्मसं सबहक खुशीले' संकल्प पल पल करैत रहू अहिना अपनाकें चीन्हब आ दुनियांकें जा नब चलबेमे सुख छै चलैत रहू अहिना वर्ण १५ गजल चान सुरुज के नक़ल करत ओ दुनियांमे एसगरहु   चलत ओ जाहि डगरपर नेह   फुलाइछ ततहि  प्रेमसं पएर धरत  ओ लड़त ने कहियो खेतक खातिर अपन विकारक संग लड़त ओ धनक लेल अगुतायल  दुनियां मुदा बहरकेर  संग  रहत  ओ मगन रहत ओ गगन देखिक’ प्रेम करत त  गजल कहत ओ दनदनाइत  रहतीह  मैथिली सभठाँ  जय-जयकार करत ओ (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-१३ ) गजल अपने गलती गना रहल छी भरि दुनियांकें जना रहल छी खाली घैल बनल छी हम सभ बेर-बेर ढनमना    रहल छी कबाछु लगाक’ पूछि रहल छी किए एना भनभना रहल छी पएर पकड़िक’ कहै छी दौडू कथीले’ हमरा कना रहल छी आसन-प्राणायाम ने बिसरल तें एखनो दनदना रहल छी हमरे बलपर देखलौं दिल्ली आ हमरे उल्लू बना रहल छी रहै ने कोनो दुःख धरतीपर इश्वरसं हम   मना रहल छी (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-१२) गजल चौबीसो अवतारक  दुनियां  बनि गेलै व्यभिचारक दुनियां हमरा सोझांमे अछि पसरल  ई सनकल अनहारक दुनियां टुक-टुक ताकए पोथी-पतरा  आगां अछि हथियारक दुनियां हुनका रसगुल्ला - पनितोबा  हमरा ले' कुसियारक दुनियां सदिखन नोरेमे डूबल अछि  करुणा आ उपकारक दुनियां भुखलोमे चिन्ता संसारक  अदभुत रचनाकारक दुनियां (मात्रा क्रम : 222-222-22) गजल निरमल तन निरमल मन हो आनन्दित ई    जीवन   हो पर-चिन्तन  होइछ  दुश्मन आतम - चिन्तन सदिखन हो वृन्दावन-सन हो चितवन नचइत राधा-मोहन हो चकमक हो जीवन-आंगन सभ शुभ भावक अरिपन हो सभ कायामे  धरतीपर परमेश्वर के दर्शन हो.  (मात्रा क्रम: 22-222-22) जगदानन्द झा 'मनु' भक्ति गजल आइ मैया बजेलनि हमरा अपन दर्शन दिएलनि हमरा मनक शक्ती सगरो छनमे आइ मैया दखेलनि हमरा हुनक महिमा कते छनि भाड़ी  ज्ञानकेँ दिप जरेलनि हमरा पाप सगरो हमर बिसरा कय छोट बेटा बनेलनि हमरा दय क' ममता अपन आँचरकेँ मनु करेजसँ लगेलनि हमरा (मात्रा क्रम; 2122-122-22) गजल बनेलहुँ अपन हम जान अहाँकेँ जँ कहि लाबि देबै चान अहाँकेँ हँसीमे सभक माहुर झलकैए सिनेहसँ भरल मुस्कान अहाँकेँ कमल फूल सन गमकैत अहाँ छी जहर भरल आँखिक बाण अहाँकेँ पियासल अहाँ बिनु रहल सगर मन सिनेहक तँ चाही दान अहाँकेँ करेजक भितर 'मनु' अछि कि बसेने रहल नै कनीको भान अहाँकेँ (मात्रा क्रम ; १२२-१२२-२१ १२२) गजल साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै गाम नोतब सराधे सबहक कहल छी आँखिकेँ पानि आइ तँ सगरो मरल अछि राति दिन हम मुदा ताड़ीमे बहल छी कहब ककरा करेजा हम खोलि अप्पन नै कियो बूझलक हम धेने जहल छी सुनि क' हम्मर गजल जग पागल बुझैए दर्द मुस्कीसँ झपने 'मनु' सब सहल छी (बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२) गजल हारिकेँ बाद जीतो त' अबिते छै रातिकेँ बाद सगरो इजोते छै दुखक माला जपै छी किए दिन भरि एहि जगमे घड़ी सुखक बहुते छै नोर राखू पजारब गजल एहिसँ किछु पुरनका खड़ेएल रहिते छै बेंगकेँ जिन्दगी नै इनारे भरि भादबक बाढ़िमे ओ त जनिते छै छोरि तकनाइ मुँह हाथ नम्हर करु किछु पबै लेल 'मनु' दाम लगिते छै (मात्रा क्रम ; २१२-२१२-२१२-२२) गजल रूप मारूक तोहर देखते कनियाँ ख़ून देहक सगर भेलै हमर पनियाँ नै कतौ केर विश्वामित्र छी हमहूँ प्राण लेलक हइर ई तोर चौवनियाँ जरि क' तोहर पजारल आगिमे दुनियाँ माय बापक नजरिमे बनल छै बनियाँ नीक बहुते गजल कहने छलहुँ हमहूँ आइ सभ किछु बिसरि बेचैत छी धनियाँ झाँपि राखू अपन रूपक महलकेँ 'मनु' भेल पागल कतेको देखि यौवनियाँ (बहरे मुशाकिल, मात्रा क्रम; 2122-1222-1222) गजल साँप चलि गेल लाठी पीटे रहल छी बाप मुइला पछाइत भोजक टहल छी पानि नै अन्न कहियो जीवैत देबै गाम नोतब सराधे सबहक कहल छी आँखिकेँ पानि आइ तँ सगरो मरल अछि राति दिन हम मुदा ताड़ीमे बहल छी कहब ककरा करेजा हम खोलि अप्पन नै कियो बूझलक हम धेने जहल छी सुनि क' हम्मर गजल जग पागल बुझैए दर्द मुस्कीसँ झपने 'मनु' सब सहल छी (बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२) कविता भीख नहि अधिकार चाही, हमरा मिथिला राज चाही जे हमर अछि खूनमे ओ खूनक अधिकार चाही जनक वाचस्पतिकेँ पुत्र हम, हमर चुप्पीकेँ नै किछु आओर बुझू शांतचित्त हम समुद्र सन, हमर क्रोधकेँ सोनित चाही सिंह सन हम बलवान रहितो, मेघ सन हम शांत छी ई जुनि बिसरी ऊधियाइत मेघकेँ, मुठ्ठीमे संसार चाही जाहि कोखिसँ सीता छथि जनमल, ओहि कोखिक संतान छी बाँहिमे प्रज्वलित अछि अग्णि, बस एकटा संकेत चाही भूखसँ व्याकुल छी,   मुदा उठाएब नहि फेकल टुकड़ी कर्ण बनि जे नहि भेटल, ओ ममता केर अधिकार चाही माए मैथिली रहती किएक,  निसहाय एना एतेक दिन होम करे जे तन मन अप्पन, एहेन लव कुश सन संतान चाही संतोष कुमार झा वरिष्ठ संकाय एवं पाठ्यक्रम निदेशक (फाउंडेशन),चर्म वस्तु एवं उपवस्तु डिज़ाइन विभाग, फुटवेयर डिज़ाइन एवं डेव्लपमेंट इंस्टीट्यूट, ए-10/ए, सैक्टर-24,नोएडा. सामा-चकेबा निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिईपावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक,सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि,गीतसुमधुर गाबि-गाबि! भोरका अरघ, छईठ पावइन कें, परय जाहिए दिन, रातिताहिये, प्रारंभ होमय, सामा-चकेबा कsसंगीत! कार्तिक पूर्णिमा तक नित, राति, ई खेलल जाय, सब बहिनि केर मुख सौं निकलय सुमधुर संगीत! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! की नेना-भुटका, की बुरही, बहिन त होइछ बहिन! वैह उमंग, वैह उत्साह, सभ में होइछ एक समान, सामा-चकेवा,वृंदावन, चुगला केर मूर्ति, सब भरि डाला में, जुटय छथि सब नारी, जोतल खेत वा चौक पर! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! सुमधुर कंठ-संगीत सौं, कय वातावरण गुंजायमान, करैत छथि सभ, अपन भायक, दीर्घायु कें कामना! सामा-चकेबा कें मूर्ति,एहि संग फेरबइ जाइतछथि, अपन भायक नाम लैत, शिरिक फेरइत जाइत अछि! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! जतेक बेसी फेरी होमय, भायक औरदा बढ़य ओतेक, गाम-टोलक, सभ महिला कें,शिरिक जाइत छै देल! वृंदावन मे आगि लगाए चुगला ओहि मे जराओल जाय, गाबाय छथी, सखी सब मिल: “वृंदावन मे लागल आगि,कियो नहि मिझाबय हे, हमर बड़का-छोटका भईया,मिलिकए मिझाउत जायत हे!” निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! फेर,बहिनि सबमुंखझुलसाए,पुतलाक चरित्र केर निंदा करय, लय सामा-चकेवा केर मूर्ति सभ, विदा होइतछथि,घर दिस! परंतु भाग्य-चक्र सौं बिमुख, मैना केर,दू गोट मूर्ति, कहबइतअछि जे ‘बाटो-बहिन’, बाटे छोडि़ देलजाइत अछि! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! आब पहुंच, घर, अपन भाय सौं,सबटा मूर्ति,तुड़वाओलजाइतअछि, बना नाव बाँस-बत्ती सौं,सब मूर्ति ओहिमें बैसाओल जाइत अछि! पोखरी, झील, नदी में सामा-चकेबा बहाओल जाइत छथि, पुरातन मैथिल कला-संस्कृति मे,घोरय,सामा-चकेवा रंग अनेक! निश्छल-प्रेम, होइत अछि पूजा,बतबैत अछिई पावइन, भाय-बहिनि कें, पवित्र प्रेमक, सामा-चकेबा, अछि पावइन! घर-घर में, मिथिला कें, रुचि संग, खेलल ई जाय, खेलईथि बहिनिपा मिल-जुलि, गीत सुमधुर गाबि-गाबि! कथा,गल्प,शिल्प,कला,संगीत, सब रंग समाओल एहि पर्व में, अछिपंद्रह दिनक कथा-पर्वई,भाय-बहिनिक निश्चल प्रेम कथा-प्रतिरूप! सुजनी शिल्प मिथिला मे, आबाय मौसम चारि, बरखा, जार, वसंत, ओ गर्मी! चाहे मौसम, जेहो होमय, नरम बिछौन, ताकय नीन! नीन मीठ, सुजनी देबय, मौसम संग, अपन गुण बदलय, चाहे मौसम, कोनो आबाय, एकर महत्ता, कम नै करि पावय! सुजनी मिथिला कें, कला-विरासत, घर-घर मे, आबय जे काज! पुरान-धुरान, फाटल, नूआ, सुजनी कला में, काज आबय! बैस आँगन, सीबय सुजनी, मैइयाँ, काकी, मौसी सब घेर! गाबि-गाबि, संगीत मधुर, हास्य-व्यंग के मिसरी घोरि! सुइया, खरी, इंची, कैंची, तागा, रंग-बिरंगक चाही! लत्ता-नूआ बईसा, नाप संग, मजबूत सिलाई, सुजनी कें चाही! कैथी, करी, कट-कटुवा आदि, रचलक कढ़ाई, लय रूप अनेक! कढ़ाई कला मे, माहिर महिला, कथा-चित्र, फूल-पत्र आदि, बनबई छथि! कन्यादान, द्विरांगमन, छठिहार, सुभ काज नहिं, सुजनी बिन पूर्ण! घर-घर मिथिला मे, भेटत सुजनी, मैथिल संस्कृति कें, ई श्रेष्ठ पहचान! अथर्व शिशु कें जन्म खोलि आंखि, देखलह जग, समक्ष पिताजी सेहो ठाढ़, चाचा दुनु, नानी ओ मामा, कयला सब स्वागत सत्कार! प्रथम संघर्ष आनू कपड़ा नुआ सब आनू, आनि सुजनी शिशु के झांपू, बौआ हम्मर कांपय थरथर, एकरा झांपि कय राखय जाऊ! प्रथम सफलता संरक्षण नव-जीवन कें भेल, प्रथम संघर्ष विजेता बनि अथु, नींद प्रथम धरती पर लेल, नाचल हँसी अनेकों मुख पर! नामकरण श्रीगणेश जीवन कें भेल, “अ”कार भेटल दादी सौं, “अथर्व” नाम देली माता, बाबा सौं भेटल सहश्र आशीष! किलकारी शिशु किलकारी गुञ्जल चहूँदिशि, घर-आँगन गुञ्जल मधुर संगीत! वातावरण भेल प्रफुल्लित, सुंदर, मधुर बनल संसार! ठेहुनियाँ ठेहुनियाँ दैत जे बौआ दौड़ल, दौड़ला सब हँसि बौआ पाछू! गिरइये बौआ तइयो हँसईये, सबकें ज्ञान हँसबा कें दइये! तोतरेनाइ वाक खुलय सौं पहिनेक बोली, किछु अ-अस्पष्ट, लेकिन मधुर, पानी कें “पी”, दूध कें “डूडू” बुझबा, बुझेबाक रूप मधुर! पहिल डेग माँ-पिता संग खिलखिलाइत खेलईत, नुका-छुपी खेलईत मुसकाइत, पकइर-धकइर सोफा, पलंग, भरलक शिशु पहिल डेग धरती पर! विद्यारंभ माता संग नित्य करय पूजा, पिता सौं नित्य सुनय कथा! विद्यारंभ शिशु कें प्रथम, मनोरंजक सीढ़ी ज्ञान दिस! मार्गदर्शन सिखइत चलू, बढ़इत चलू इतिहास कखनों नहिं बिसरु, लेकिन ओहि में उलझू नहिं! रात्रि-स्वप्न माया छै... दिवा-स्वप्न देखू अवश्य! लक्ष्य जीवनक ओतहि भेटत, नेत्र-ध्यान सब लक्ष्य पर राखू! स्वस्थ लक्ष्य संग योजना, जीवन के बस एत्ते संबल, सफलता-असफलता दुनू पचबैत जाउ, अतिरेक कें दूर भगाबू, एहिसौं जीवन विकट बनई छै, तै दुनू के बिसराबू, झूठ-फरेब सौं दूर रहब, अपन सु-कर्म में रमल रहब, जौं द्वार आबय कोनो दुखी, असहाय, कंधा पर हाथ जरूर राखब, गप्प हुनकर सबटा सुनब जरूर, हित-अनहित कें चिनहैत अपन, हुनकर मदद आगाँ करब तखन! नाम प्रभु कें नहिं बिसरब, हर अंधकार भय जायत दूर, जीवन यात्रा बनत सुगम, मार्ग जीवनक जखनों देखब अंधकार, नेत्र बंद कय प्रभु नाम दोहराबू, रस्ता तखनहिं होयत प्रकाश! स्वस्थ काया जीवन आधार, ई तथ्य सर्वदा राखब याद, स्वस्थ संगति, स्वस्थ भोजन, देत स्वस्थ विचार संचार, ई जीवनक मूल आधार! किओ संग नहि आयल छै जे संग अहां कें जायत, दादा-दादी, नाना-नानी, माय-बाप सेहो नै रुकता, अपन जीवन जीबि सब, एक दिन मार्ग पकरता! मिथ्या संसार कें माया जाल में, नहि कहियो लपटायाब! अथु जल वैह निर्मल होइछ, जे सदा बहैत जाई छइ, रुकब नहि, कतौ अहां, चलईत जायब सर्वदा... चिर प्रसन्न निद्रा तक अहां... खेलईत, खिलखिलाइत रहब अहां, नाम अथर्व सार्थक करैत रहब अहां, मात-पिता केर मार्गदर्शन सब, संग राखने रहब अहाँ! विचार हम सोचई छी, जौं नहिं अबितह तों जीवन में, जीवन तइयो चलिते रहितय, बनल रहितय निरस, बेकार, चलईत रहितय बोझ रूप सौं! तों अयलह, आयल बहार, तों हंसलह, हंसल आत्मा-परमात्मा, जीवन में, आयल बहार, चहुंदिशि गूंजि उठल मल्हार! अशरफ राईन गजल सब लुटैत रहल बस हम लुटाइत रहलौ करति नीक काज तबो पिटाएत रहलौ मन तऽ साफ छलै झलकैत ऐना जकाँ तैयो नैऽ किया किनको सोहाएत रहलौ उठाबैत सब फायदा सोझापन के हमर  झूठे हम सब केऽ नेह में बन्हाएत रहलौ लगाक छाती सँ दिल निकालि लै छै तबो जालिम केर सहर में हम रमाएत रहलौ सुख बटैत दुःख नुकाबैत अशरफ़ तैऽ  सफल बाट पऽ सदति मुसकाएत रहलौ नारायण मधुशाला गीत अपन कारी नैनासँ चलेलक' हमरा प' चपेट जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट गाछीमे मचान पर हम ओँघरल रही सहेलीसँगमे टुकला खालि ओ आयल छली कमल नयन देखैत भेल हिआ मोर अचेत जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट वसन्तेसन मन ओकर छल, रौदमे तपिकऽ माथा प' पसिना, नयाँ पल्लवीसन लाली ठोरपऽ खुलल कारी केशीयामे लेलक' मनके लपेट जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट ऋतुए सँग गेल ओहो, आबि गेल विरहक' ग्रीष्मऽ आब तँ ओकरा देखैल, बेकल रहैछी हरक्षणऽ के सुनत हिआक दु:ख, के बुझत कलेश ? जखन भेल हमर आ ओकर पहिल भेट अपन कारी नैनासँ चलेलक' हमरा प' चपेट दिनेश रसिया गजल कनकनीमे ठरल पाइन इन्हेर नै भ जाइ । गरिबक घरमे कही कतौ भोर नै भ जाइ ।। मुह त सिबक रखनैये छै सोसकसब, सियल मुह फेरसं कही जोर नै भ जाइ । एक साँझ भुखले रहै छि मिता अखनो हम, धियापुताक दशा देख मनकही अघोर नै भ जाइ । अपन बात राखैयोके स्वतन्त्रता नै देखै छी, स्वतन्त्रताले माहुुरसन कही तिलकोर नै भ जाइ । ध्यान देबै यौ गौँवासब रसियाके बात पर, मेहनतके फल फेरो कही घरक चोर नै ल जाइ । सुकोसुत शिशिर- बाउर, दड़िभंगा फूइस बाजी त' वज्र खसन्ता बन्हन तऽर रहल ने गुजर-बसर लेब सप्पत की ? भेल छगुन्ता. जाने जगरनाथ, देह छुबै छी, फूइस बाजी तऽ वज्र खसन्ता ! ......१ सिरागु छल चिनबारक आगू, रोज निपैत छल घर भगवन्ता पनही उतारि,ओलतीए राखि, बैसी ओसार टाट लगन्ता ! .............२ सग्गा पियाउज , लसूनक पत्ता बाड़ी केर लंका तैयार तुरन्ता. सद्य: कूटल , तखनहि फटकल सुआदी चूरा होइछ सेहन्ता ! ...........३ बेरहट आँगन , जलखइ दलान कलौ कतए नहिं तकर ठेकान फुल्ही थार, संगे सभक बैसार बरसे सिनेह , पसरे परसन्नता ! .......४ ठेलि-ठेलि झुटकी कित कित खेली करिया - झुम्मरि मोन घुमन्ता . दिने कोटपीस, राति पचीसी जीतब सिखेलक गोधि भगवन्ता ! .....५ गप्पक खेती , अल्हुआक लत्ती बेस अगत्ती लुत्ती लगन्ता, आगू बढ़ैत देखि देह जरैत मारैत छिटकी नहिं देर लगन्ता ! ........६ उकसाएल बाती ढुनमुन काकी उकटि के पुरखा गारि पढ़न्ता, नुनू कहथि पुनि माथ हँसोथि सिनेह केहन भगवाने जनता ! ...........७ डायनक शूल, देवी केर फूल भगत भगाबे कलेश अनन्ता, बट्टा चलै, चौरठ लठियाय पंचैती झट न्याय करन्ता ! ................८ खढ़-पुआर, गोरहा-गोइठा चेरा-सुण्ठी जखन सठन्ता कोड़ो-काठी , हरौतक लाठी होम जराठी चुल्हि जरन्ता ! ...............९ मूजक मौनी,पौती सींकिक कोहबर,कोठी, सामा, चकेवा ताड़क बियैन. खजूड़क पटिया सुजनी,कथरी कला अनन्ता ! ............१० साउस-ससुर सुन्नर सार पँजियार सारि-सरहोजिक देखि लवणता बिसरे सुध-बुध,संसारक सभ दु:ख सासुरक सुख भोगल जे कन्ता ! .........११ बन्हन तऽर रहल ने गुजर-बसर लेब सप्पत की ? भेल छगुन्ता. जाने जगरनाथ, देह छुबै छी, फूइस बाजी तऽ वज्र खसन्ता ! राजदेव मण्डल शिशुक स्‍वर बन्न परसौति‍ घर चि‍चि‍आइत शि‍शुक स्‍वर नि‍कलैत सुगन्‍ध मन्‍द–मन्‍द शान्‍ति‍मे स्‍पन्‍द मधुर आवाज सजौने साज कनैत बारम्‍बार खोलत अनन्‍त संभावनाक दुआर बनत नि‍त-नूतन सि‍रजनहार ऐ हेतु होए एहेन आधार बढ़ै बुधि‍, वि‍वेक, वि‍चार तत्काल चाही सुरक्षाक ढाल देखू पाछू नचै छै काल लेने छै वएह पुरना जाल क्रन्‍दन स्‍वर पुछै सवाल “की हरण कऽ सकब अहाँ हमर दुख देख रहल छी घातीक रूख ताकि‍ सकब अहाँ चि‍न्‍हल मुख हएत कोनो मनुक्‍खे सन मनुक्‍ख?” सृजन शेखर 'अज्ञेय' (मूल नाम- गंगानन्द झा) दूटा कविता १ गीत सँ पहिने शब्द छऽल चुप प्रकाश सँ पहिने अन्हार छऽल ..... समय भागि गेल समय भागि रहल समय आगू एत्तै समय सँ पहिने समय छऽल ..... कि कि ने केलौं कि कि ने भेलौं समटि नहिं सकलौं एक मुट्ठी जिनगी जिनगी सँ पहिने साँस छऽल .... अन्हार भेल मंच पर चलि रहल तमाशा नाचि रहल नटुआ टूटल ताल ताशा मेला सऽ पहिने बजार छऽल ...... रूकतैऽ तऽ मरतैऽ मरतैऽ तऽ रूकतैऽ तकतैऽ तऽ भेटतैऽ देखतैऽ तऽ बुझतैऽ चलय सऽ पहिने रूकल छऽल ...... आगू सऽ बढि गेल आगू सऽ बिका गेल रहि गेल से रहि गेल गाड़ी जकर छूटि गेल सपना सऽ पहिने अइंख छऽल ...... बात कि हेतै मुँह जे नय खुजतै ठाढ़ कोना रहतै डोरी जे टूटतै अंत सऽ पहिने आदि छऽल ..... माटिक मुरूत पानि बिनु फाटैत माटिक मुरूत पानि छू भखरैत माटि सऽ पहिने माटि छऽल..... भेंट नय भेलै भीड़ छलै बहुत रूकि नय पेलै जल्दी छलै बहुत प्रेमी सऽ पहिने प्रेम छऽल ..... २ हऽम कनी तमसएऽल छी निन्न टूटल अखने तैं ओंघाएऽल छी केलौं बहुत स्वाँग भऽ गेलौं निर्लज्ज देखलौं मुँह एना में तें कनी लजायल छी छोड़ू ओहि बात के दोसर कोनो बात करू टारि-टारि एहिना सच बिसराएऽल छी चलब ने अनचिन्हार बाट अन्हार राइत डरि-डरि एहिना डरे नुकाएऽल छी बचि-बचि के चलैत रहलौं जिनगी भरि सहेजलौं ने एक्कहु साँस तें खलियाएऽल छी लिखैत रहलौं जाहि हाथ सऽ जाली ख़त उसरै ने पुण्य काज तैं कँपकपाएऽल छी माँगैय के अछि आदत खोललौं ने बंद मुट्ठी दै के बेर तें कनी हिचकिचाएल छी हँसि ने पेलौं कानि ने पेलौं बनलौं बुधियार विदा के बेर तें आय नोरे नहाएल छी डॊ शशिधर कुमर- किछु बाल कविता अबोध बच्चा टुकुर-टुकुर ओ ताकि रहल अछि । आँखिसँ दुनिञा नापि रहल अछि । एहि जग केर जगमगकेँ निहारैत, जग केर माया भाँपि रहल अछि ।। बाल-गोपाल स्वरूप छी बच्चा । सृष्टिक कोमल रूप छी बच्चा । छी अबोध, पर बोध कराबैछ, भगवानक छवि-रूपकेँ बच्चा ।। बच्चा नञि बस अगबहि बौआ । बच्चा माने बुच्ची आ बौआ । नेन्ना कोमल, कोमल नेनपन, देखि कऽ बिहुँसए आङ्गन कौआ ।। ईद छै कि होली छै ईद छै कि होली छै । दुर्गा − छठि − दिवाली छै । हमरा लए हर दिन सुन्नर, कारण इस्कूलमे छुट्टी छै ।। कक्कर पाबनि, के मनबै छै । कहाँ बात से एतेक फुरै छै । हमसभ खुश छी इएह सोचि कऽ, आबै बला छुट्टी छै ।। ककर जन्म आ कक्कर बरषी । सभटा सरकारक मनमर्जी । हम बच्चासब इएह सोचै छी, एक दिन फेरो छुट्टी छै ।। रौद छै कड़गर, लूऽऽ चलै छै । बर्खा - बुन्नी, शीतलहरी छै । एतेक प्रखर हो हर मौसिम जे, होअए घोषणा - छुट्टी छै ।। हमहूँ पढ़बै मैथिली हे ऐ बहिनजी, यौ मास्टरजी, हमहूँ पढ़बै मैथिली । हिन्दी, ईंग्लिश, जर्मन सीखबै, पर ने बिसरबै मैथिली ।। मैथिली बाजथि दादा - दादी, नाना - नानी मैथिली । बाहर जा कऽ माम बिसरलाह, मामी बिसरलीह मैथिली ।। कक्का - काकी जखन बजै छथि, हिन्दी फेंटल मैथिली । बौआ - बुच्चीक मोन होइछ पर, सीखितहुँ हमहूँ मैथिली ।। तेँ टीचरजी हमरा पढ़बू, हम्मर भाषा मैथिली । आनो भाषा नीक लगए, पर मीठगर छी बड़ मैथिली ।। गणित - ज्ञान - विज्ञानक भाषा, जखनहि होयत मैथिली । बुझबामे भाङ्गठ नञि होयत, अप्पन भाषा मैथिली ।। ऊद या ऊदबिलाड़ि (बाल कविता) कोना करै छै, देखही एकरा, ऊदमति धऽ लेलकैए । की छी ऊद आ केहेन ऊदमति, ककरा धऽ लेलकैए ?? ऊद छी जीव, जमीनक बासी, तइयो छै बड़ पानि प्रिय । पानिमे हेलए, डुम्मी काटए, ओकरा छै बड़ माछ प्रिय ।। देहमे ओकरा बड़ छै फुर्ती, बुट्टी - बुट्टी चमकै छै । की जमीन, की पानिक भीतर, मस्त - मगन ओ रमकै छै ।। बैसि ने रहइछ ओ निचैनसँ, पानिमे करइछ बड़ छलमल । तेँ कहबी छै - ऊदमति धेलकै, जकर मोन बेसी चंचल ।। ऊदमति मोन ने रहए थीर, लगले एम्हर, लगले ओम्हर । जेना “ऊद” ने रहैछ थीर, एखने एम्हर, एखने ओम्हर ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - ऊद वा ऊदबिलाड़ि मुख्यतः स्थलीय जीव अछि आ मीठ पानिक जलाशय सभसँ लऽ कऽ समुद्रक नोनगर पानि धरि भेटैछ । ओ मांसाहारी जीव अछि आ माछक शिकार करबामे बहुत माहिर होइत अछि । ओ पानिमे डुम्मी कटबामे आ गोंता लगएबामे अत्यन्त कुशल होइत अछि । बांग्लादेशमे एकरा पोशुआ बनाए प्रशिक्षित कएल जाइत अछि आ प्रशिक्षित ऊद मनुक्खक लेल नदीमेसँ माछ पकड़ि कऽ आनैत अछि । चीता (बाल कविता) चित्रकाय - चीता प्रशिद्ध अछि, भारत  भरिमे  भेल  विलुप्त । संस्कृतक  अछि  देल   नाँओ, पर संस्कृतक  क्षेत्रहिसँ लुप्त ।।*‍‍१ “भारतीय चीता”  बाँचल अछि, अगबहि    आब    ईरानमे । किछु केर  आशा छी  एखनहु, ओ   भेटत  बलुचिस्तानमे ।।*‍२ ईरानक चीता    ओएह   बूझू, जे  छल  भारत केर  चीता । भारत  आ  भारतसँ पच्छिम, एसियामे छल  इएह चीता ।।*‍२ चीता केर  इएह  एक प्रजाति, छल एसियाक सभ टा चीता । बाँकी  चारि  प्रजाति  शेष जे, अफ्रिकाक से  अछि  चीता ।।*‍२ जतबा  धरतीक  जन्तु एखन, स्थलमंडल पर विचरैत अछि । सभसँ   बेसी  त्वरित  वेगसँ, चीतहि टा बस दौड़ैत अछि ।।*‍३ बाघ-सिंह-तेन्दुआ  जे अछि से, प्रायः     रातिचर    प्राणी । जगुआरक दिन - राति समानेँ, चीता     दिनचर    प्राणी ।।*‍४ अल्प  समयमे  त्वरित  वेगसँ, करैछ     खेहारि    शिकार । बारहसिंघा,  हरीन,   नीलगाए, खढ़िआ    आदि    शिकार ।। अल्प  समयमे  त्वरित  वेगसँ, हकमि  जाइत  अछि  चीता । कए शिकार,  नञि खाऽ सकैछ, ओ  आधा - पओने   घण्टा ।।*‍५ निर्बल ओ असहाय  देखि कऽ, आन    उठाबैछ    फायदा । मारल  शिकारकेँ  लए भागैछ, चीता आ सिंह - लकड़बग्घा ।।*‍५ भूखल चीता  उठैछ पुनः आ, फेरहु     करैछ    शिकार । जँ तकदीर नीक एहि बेर तँऽ, बनैछ    शिकार - आहार ।। भारतीय - चीता    भारतमे, करए     फेरसँ     बास । तकर व्योंतमे  अछि लागल, आब भारत  केर  सरकार ।। देशक ई भोतिआएल धरोहरि, प्राप्तिक   होइछ   प्रयास । जतन भऽ रहल भारत-भू पर, चीताक    हो    पुनर्बास ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - संस्कृतक “चित्रक” वा “चित्रकाय” शब्दसँ “चीता” शब्दक उत्पत्ति भेल अछि । मुदा “भारतीय चीता” आब भारतसँ विलुप्त(EXTINCT) भऽ चुकल अछि । *‍२ - “भारतीय चीता” एखन मात्र ईरान देशमे बाँचल अछि आ तेँ ओकरा आब “ईरानी चीता” कहि सम्बोधित कयल जाइत अछि । किछु लोकक कहब अछि जे भारतीय चीता बलुचिस्तानमे सेहो बाँचल भऽ सकैत अछि मुदा तकर पुष्टिक लेल कोनहु वैज्ञानिक अध्ययन नञि कयल गेल अछि । *‍३ - जिबैत चीताक कुल पाँच प्रजाति (SUB SPECIES) अछि । पहिल प्रजाति एसिया महाद्वीपमे भेटए बला “भारतीय या ईरानी चीता”अछि आ शेष चारिटा प्रजाति अफ्रिका महाद्वीपमे पाओल जाइत अछि । *‍४ - बाघ, सिंह आ तेनुआ आदिक विपरीत चीता मुख्यतः दिनचर जन्तु अछि आ दिनहिमे शिकार करैत अछि । चीता अपन घ्राण शक्ति वा सुँघबाक शक्तिक आधार पर नञि अपितु दृष्टि वा देखबाक क्षमताक बलेँ शिकार करैत अछि । *‍५ - चीता बहुत कम समयावधिमे बहुत बेसी गति धरि पहुँचि सकैत अछि । गति पकड़बाक एहि त्वरित प्रक्रियाक कारणेँ चीताक त्वरण(ACCELERATION) धरती पर विचरण कएनिहार जन्तुसभमे सभसँ बेसी अछि । शिकार करबा काल चीताक औसत गति (AVARAGE SPEED) 64 कि॰मि॰ प्रति घण्टा रहैत अछिपर शुरुआति गति 112 कि॰मि॰ प्रति घण्टा धरि भऽ सकैत अछि । गति पकड़बाक एहि त्वरित प्रक्रिया अर्थात अत्यधिक त्वरणक कारणेँ चीताक शरीर बहुत बेसी गर्म भऽ जाइत अछि जाहिसँ चीता बहुत बेसी थाकि जाइत अछि । ओ एतबा थाकि जाइत अछि जे अपन पकड़ल शिकारकेँ अपना सोझाँमे राखि आधा - पओन घण्टा सुस्ताइत अछि आ तकरा बादहि ओ एहि शिकारकेँ खाइत अछि । बहुधा ओकर क्लांति वा हकमीक फायदा आन मांसाहारी जन्तुसभ (यथा - आन चीता, बाघ, सिंह, लकड़बग्घा, हुड़ार आदि) उठबैत अछि आ सुस्ताइत चीताक सोझाँसँ ओकर शिकार लऽ कऽ भागि जाइत अछि आ बेचारा चीता विवश भऽ से देखैत रहि जाइत अछि । *‍६ - भारतीय चीताकेँ ईरानसँ आनि फेरसँ भारत जंगलसभमे पुनर्वासित करबाक प्रयास भारत सरकार द्वारा कएल जा रहल अछि । *अंग्रेजीक पॅन्थर (PANTHER) शब्द चीताक अतिरिक्त तेनुआ ओ जगुआर लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि । जगुआर (बाल कविता) जगुआरक  मतलब  नञि  चीता, ओ तँऽ  आनहि  जीव छी । किछु-किछु तेन्दुआ सनि देखबामे, मुदा ओ आनहि जीव छी ।।*‍१ तेसर   पैघ   बिलाड़ि   अछैतहु, बहुतहि  ओ  शक्तिशाली । छोट  मुदा  सुगठित   काय  छै, फुर्ती छै  सब पर  भारी ।। छोट  मुदा  खूब  मोट  पएर छै, बड़ छै  पएरक  मजगूती । मगर - काछुकेँ  चीड़ि  सकैतछि, दाँतक  ततबा  मजगूती ।।*‍२ हरीन आदि प्राणिक बुझलहि अछि, पैघ बिलाड़ि शिकार करैछ । साँप - मगर - कछुआ सरिसृप जे, तकरहु ने जगुआर छोड़ैछ ।।*‍२ दिनचर छी,  रातिचर  सेहो  ओ, जखन मोन, शिकार करैछ ।*‍३ नबका दुनिञा  केर  बासी  अछि, दच्छिन-माँझ विहार करैछ ।।*‍१ तेन्दुआ आओर बिलाड़ि जेकाँ ओ, आसानीसँ  गाछ   चढ़ैछ । पानि हेलि कऽ  ओ बाघहि सनि, नदी - धारकेँ  पार करैछ ।। “जगुआरेट” आमेजन  घाटीक, भाषा   केर   छी   शब्द । तकरहिसँ जगुआर बनल अछि, अंग्रेजीक   नञि    शब्द ।।*‍४ अहँसभकेँ जँ फुरए नऽव किछु, कही    मैथिली     नाम । ता धरि जगुआरहि मिथिलामे, एहि  जीवक  भेल  नाम ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - आइ - काल्हि जगुआर या जैग्युआर (JAGUAR) शब्द श्रव्य ओ दृश्य माध्यम (AUDEOVISUAL MEDIA) पर बेसी चर्चित भऽ गेल अछि आ कतेकहु बेर ओकर भ्रामक अर्थ “चीता” धिया-पुतसभकेँ बताओल जाइत अछि । मुदा से नञि, चीता ओ जगुआर दूनू दू जन्तु अछि - एकदम भिन्न । चीता पुरना दुनिञाक (एसिया ओ अफ्रिका महादेशक) मूल निवासी अछि जखनि कि जगुआर नबका दुनिञाक (दछिनबारी ओ उतरबारी अमेरिका महादेशक) मूल निवासी । जगुआर सम्पुर्ण दछिनबारी अमेरिका आ उतरबारी अमेरिकाक माँझ ओ दछिनबारी भागक वन्य क्षेत्रमे पाओल जाइत अछि । जगुआर बहुत किछु तेन्दुआ सनि लागैत आछि, मुदा तेन्दुआसँ सेहो भिन्न अछि । जगुआरक चाम पर बनल कारी घेरेबाक बीचमे एकटा कारी बुनका रहैत अछि पर, तेनुआमे से नञि । बाँकी, आन अन्तरसभ तँऽ अछिअहि । *‍२ - जगुआर बिलाड़ि कुलमे (Family - FELIDAE) आकार ओ भारक अनुसारेँ तेसर (क्रमशः बाघ ओ सिंहक बाद) सभसँ पैघ सदस्य अछि मुदा ताहि अनुरूपेँ ओ बहुत शक्तिशाली होइत अछि । बिलाड़ि कुलक आन कोनहु सदस्य मगर ओ काछु केर शिकार नञि करैत अछि मुदा जगुआर अपन शक्तिशाली श्वदन्त दाँत (CANINE TEETH) ओ हन्वास्थिक (MANDIBLE) बलेँ मगरक मजगूत खाल ओ कछुआक मजगूत खोलकेँ चीड़ि दैत अछि । *‍३ - बाघ, सिंह आ तेनुआ मुख्यतः रातिचर होइत अछि जखनि कि चीता दिनचर । मुदा जगुआर दिनचर ओ रातिचर दूनू होइत अछि, मतलब कि ओ दिन ओ राति दूनू समय समान रूपेँ शिकार करबामे सक्षम अछि आ शिकार करैत अछि । *‍४ - अंग्रेजीक “जगुआर” शब्द आमेजन घाटीक क्षेत्रीय भाषाक शब्द “जगुआरेट” सँ लेल गेल अछि आ तेँ एहि ठाम मैथिलीमे सेहो हम ओहि शब्दक यथावत प्रयोग कयल अछि । मैथिलीमे जगुआर विदेशज श्रेणीक शब्द भेल । तेन्दुआ या तेनुआ (बाल कविता) किछु-किछु बाघहि सनि लगैत छै, किछु मिलैत अछि चीतासँ । पानिमे बाघहि सनि  हेलैत अछि, रंग मिलैत अछि  चीतासँ ।। चित्रकाय छै  चीतहि  सनि, मुदा करिया धब्बा  गोल ने छै ।*‍‍१ गाछ  चढ़एमे   बहुतहि  माहिर, पैघ बिलाड़िमे जोड़ ने छै ।।*‍२ गाछ चढ़ैछ  झट  मूँहमे  धएने, मूइल  बहुत भारी शिकार । छीनि सकैछ ने  बाँटि सकैतछि, आन केओ मूहँक आहार ।। गाछक मोटका डाढ़ि पर बैसल, भक्षण करैछ शिकार ओ । दिनभरि सूतल रहइछ ओहि ठाँ, उतरैछ साँझ अन्हार ओ ।। बाघ - सिंह - चीतासँ  छोट छै, लागैत छै  जगुआर जेकाँ । एक जँ रहितए  दुहु टा  दुनिञा, अलग फेर जगुआर कहाँ !! *‍३ तेनुआ भेटैछ एसिया - अफ्रिका, विविध क्षेत्र - जलवायुमे । बारल छै  बस क्षेत्र विषम अति, मरू - हिम जलवायु जे ।। “हिम-तेनुआ” अलगहि छी प्राणी, भेटैछ  ऊँच  पहाड़  पर ।*‍४ ओतबहि अलग ओ छी तेनुआसँ, जतबा चीता - बाघसभ ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - प्राचीन संस्कृतक “चित्रकः” वा “चित्रकायः” शब्दमे आजुक “चीता” सेहो आबैत छल आ “तेन्दुआ या तेनुआ” सेहो । किछु लोक संस्कृतक “तरक्षुः” शब्दसँ तेन्दुआ मानैत छथि पर तरक्षुः चीता आ बाघ आदि लेल सेहो आयल अछि । हिन्दीमे सेहो “तेन्दुआ” शब्दक आगमनक श्रोत स्पष्ट नञि अछि; सम्भवतः कोनहु जनजातीय भाषा वा बोलीसँ आयल छल आ ओतहिसँ मैथिलीमे सेहो आयल । मैथिलीमे“तेन्दुआ” शब्द यथावत प्रयुक्त होइत अछि जकर उच्चार भेद (PHOENETIC VARIANT) “तेनुआ” सेहो अछि । *‍२ - तेन्दुआ गाछ पर चढ़बामे बड्ड माहिर होइत अछि । ओ शिकार कएलाक बाद ओहि शिकारक लहाशकेँ अपन मूँहमे दाबि आसानीसँ गाछ पर चढ़ि जाइत अछि । एहि प्रकारेँ ओ अपन भोजनकेँ आन प्रतिद्वन्दी शिकारीसभसँ (जेना कि - बाघ, सिंह, चीता आदिसँ) सुरक्षित कऽ लैत अछि । *‍३ - पैघ बिलाड़िसभमे तेन्दुआक अतिरिक्त मात्र जगुआर गाछ पर चढ़ि पाबैत अछि । जँ पुरना आ नबका दुनिञा कोनहु स्थल मार्ग द्वारा परस्पर जुड़ल रहैत तँऽ सम्भवतः तेन्दुआ ओ जगुआर अलग - अलग प्राणीक रूपमे नञि विकसित भेल रहैत । *‍४ - “हिम तेन्दुआ” (या हिम तेनुआ) नामक जन्तु “तेन्दुआ” (या तेनुआ) केर कोनहु प्रजाति नञि छी अपितु एक गोट स्वतन्त्र मांसुभक्षी जन्तु छी । ओहि दूनूमे ओतबहि अन्तर अछि जतबा कि तेन्दुआ ओ आन पैघ बिलाड़ि (बाघ, सिंह, जगुआर, चीता) सभमे अछि । “हिम तेन्दुआ” (Eng. - SNOW LEOPARD / OUNCE) (Bio. Name - Panthera uncia syn. Uncia uncia) भारतमे मात्र हिमालय पर्वत श्रेणीक 3000मीटर सँ 4,500 मीटर (9,800 फीट सँ 14,800 फीट) केर ऊँचाई धरि भेटैत अछि । भारतक अतिरिक्त प्राकृतिक रूप सँ ओ नेपाल, भूटान, चीन, मंगोलिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गीस्तान, ताज़िकिस्तान आ उजबेकिस्तान देशमे पाओल जाइत अछि । बनबिलाड़ि आ खटाँसु/खटाँस (बाल कविता) छी “बिलाड़ि” ओ जे मनुक्ख केर, घऽर - आङ्गन खरिहान  भेटैछ । आ  मनुक्ख  केर   परिवेशहिमे, जकर  सभक  सन्तान  पलैछ ।।*‍१ आन बिलाड़ि  जतेक जे  बाँचल, “बनबिलाड़ि” केर  नाम  पाबैछ । बाध - बोन  जंगल  आ  झाड़मे, बनबिलाड़ि  केर   बास  रहैछ ।।*‍२ साँझ - परातहि  घुमैत - घामैत, बाट - घाट   खरिहान   भेटैछ । छै   बिलाड़िसँ  पैघ - पुष्ट  ओ, मोटका भोकना बिलाड़ि लागैछ ।। एकरहि  तँऽ यौ  गाम - घऽरमे, दोसर  नाम  “खटाँसु”  कहैछ । पर “खटाँसु”  शब्दक  परीधिमे, आनहु  जन्तुक  नाँओ आबैछ ।।*‍३ तेँ अर्थक  फरिछौठ  लेल  किछु, होअए  उपाए  से  माँग करैछ । जोड़ि  विशेषण, भिन्न कएल तेँ, अपन - अपन दूनू नाम पबैछ ।।*‍४ जे   खटाँसु   मार्यार   समूहक, “बनबिलाड़ि खटाँसु”     भेलैक । अथवा  मांसुक  भक्षण  कारण, “मांसुभक्षी खटाँसु”     हेतैक ।।*‍५ आन  समूहक  जे  खटाँसु  से, मांसु  खाइछ, फलाहार  करैछ । तेँ  अप्पन गुण केर  अनुसारहि, “सर्वभक्षी खटाँसु”     भेलैक ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मैथिलीमे जाहि जन्तुक नाम “बिलाड़ि” अछि से अंग्रेजी ढर्रा पर “घरैया बिलाड़ि” (DOMESTIC CAT / FERAL CAT) भेल किएक तँऽ ई मनुक्खक घऽर-आङ्गन खरिहान-दलान आदि स्थानहि पर रहैत अछि । वस्तुतः बिलाड़िक बेसीतर समय मनुक्खहि केर परिवेशमे बितैत अछि, ओकर बच्चासभ मनुक्खहि केर परिवेशमे जन्म लैत अछि आ पैघहु होइत अछि । *‍२ - आन बिलाड़िसभ जे मनुक्खक परिवेशसँ दूर बाध-बोन, जंगल-झाड़ आदिमे रहैत अछि आ जकर बच्चासभ ओही परिवेशमे जन्मैछ आ पलैछ-बढ़ैछ, तकरासभकेँ मैथिलीमे “बनबिलाड़ि” कहल जाइत अछि । ओ सभ साँझ-परात कहुखन-कहुखन मनुक्खक परिवेशमे या बाट-घाट पर घुमैत-फिरैत भेटि सकैत अछि पर बेसी काल मनुक्खक परिवेशसँ दूरहि रहैत अछि । बनबिलाड़ि बिलाड़िक अपेक्षा आकारमे थोड़ेक पैघ होइत अछि । *‍३ - बनबिलाड़िकेँ खटाँसु (उच्चारण - खटाँउस या खटौंस) अथवा खटाँस (कल्याणी कोशमे देल वर्तनीक अनुसार) सेहो कहल जाइत अछि ।मुदा एहि शब्दक एकटा समस्या छैक । खटाँसु या खटाँस शब्द बनबिलाड़ि समूहक जन्तुक अतिरिक्त एकटा आनहु जन्तुक लेल प्रयुक्त होइत अछि जकरा अंग्रेजीमे सीवेट (CIVET) कहल जाइत अछि । *‍४ *‍५ - आजुक परिस्थितिमे एहि तरहक ओझराएल शब्दकेँ फरिछाएब आ फरिछाए कऽ परिभाषित करब आवश्यक । तेँ हम समानता ओ विषमताकेँ देखैत खटाँसु या खटाँसकेँ दू टा व्यापक समूहमे बाँटल अछि । *‍५ - खटाँसु (खटाँस) केर पहिल समूह भेल “बनबिलाड़ि खटाँसु (खटाँस)” जे कि ऊपर “बनबिलाड़ि” नामसँ परिभाषित कएल गेल अछि । ई जन्तुसभ बिलाड़ि कुल या मार्यार कुल (Family - FELIDAE) केर सदस्य अछि । ई सभ प्राकृतिक रूपसँ मुख्यतः मांसु केर भक्षण करैछ अर्थात मांसुभक्षी (CARNIVOROUS) होइत अछि । तेँ एकरासभकेँ “मांसुभक्षी खटाँसु (खटाँस)” सेहो कहि सकैत छी । *‍६ - खटाँसु (खटाँस) केर दोसर समूहकेँ हिन्दीमे “गन्धबिलाव” कहल जाइत अछि कारण जे एकर एकरासभमे कस्तुरी सनि सुगन्ह (सुगन्धि) होइत अछि । तेँ मैथिलीमे  “गन्हबिलाड़ि (या सुगन्हबिलाड़ि) खटाँसु (खटाँस)” कहि सकैत छी । मुदा ध्यातव्य जे “गन्हबिलाड़ि”कोनहु बिलाड़ि नञि छी आ नहिञे बिलाड़ि कुल या मार्यार कुल (Family - FELIDAE) सँ एकर कोनहु सम्बन्ध अछि । ई जन्तुसभविवेराइडी कुल या गन्हबिलाड़ि कुल (Family - VIVERRIDAE) केर सदस्य अछि आ रातिचर होइत अछि । ई सभ प्राकृतिक रूपसँ मांसु आ संगहि संग फऽल (यथा - आम, चीकू, ताड़कून आदि) ओ घास-पातक भक्षण सेहो करैछ, मतलब कि ई सब नैसर्गिक रूपेँ सर्वभक्षी(OMNIVOROUS) होइत अछि । तेँ एकरासभकेँ “सर्वभक्षी खटाँसु (खटाँस)” सेहो कहि सकैत छी । बंगालीभाषामे एकरा “गन्धगोकूल” या“खाटोश” कहल जाइत अछि । बाघ (बाल कविता) राजा मरि गेल,  राज तँऽ अछिए । सिंह मूइल सनि, बाघ तँऽ अछिए । जाहि जंगलमे सिंह अलोपित, ताहि ठाँ राजा  बाघ तँऽ अछिए ।।*‍‍१ सिंहक छल साम्राज्य विश्व भरि । कहियो ओतबा नञि छल बाघक । सत्ता पलटल, सिंह बिलटि गेल, बिलटल तइयो बाघ तँऽ अछिए ।।*‍२ सभसँ  पैघ  बिलाड़ि  बाघ छी । तदनन्तर  सिंहक  अछि पदवी । पर जे हो,  सौंसे  जंगलमे, मार्यारक  साम्राज्य  तँऽ  अछिए ।। भारत,   दच्छिन−पूब  एसिया । हिन्द-पड़ोसी   आ  साइबेरिया । एसियाक ओ मात्र धरोहरि, दुनिञा भरिमे  धाख तँऽ  अछिए ।।*‍३ चामक रंग छै  लाल - नारंगी । ताहि पर  कारी - कारी पट्टी । पेट, गाल, नाङ्गरि छी उज्जर; कारी धारीक छाप तँऽ अछिए ।। जे  कहबैछ   बंगालक  बाघ । छी  पूरा  भारत  केर  बाघ । अंग्रेजक देल नाम ई भ्रामक, ऊघैत एखनहु  बाघ तँऽ अछिए ।।*‍४ नगर वाल्मीकि भारत केर छी । चितवन - परसा नेपालक छी । पछबारी मिथिला गण्डक तट, एखनहु शोभित बाघ तँऽ अछिए ।।*‍५ सभ  बिलाड़िकेँ  पानिक डऽर । एकरा  तक्कर  डऽर ने भऽर । सुन्दरवन गंगा - तिमुहानी, दलदल तइयो  बाघ तँऽ अछिए ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - पहिने समस्त भारतवर्षमे सिंहक साम्राज्य छल । एक्कहि जंगलमे सिंह (LION, Panthera leo) आ बाघ (TIGER/TIGRE, Panthera tigris) दूनू रहैत छल आ ताहि समएमे सिंहकेँ जंगलक राजा कहल जाइत छल । धीरे - धीरे शिकारक कारण सिंहक संख्या बहुत तेजीसँ घटल । घटल तँऽ बाघक संख्या सेहो, मुदा सिंह अपेक्षा कम तेजीसँ । आ जाहि ठाम सिंह अलोपित भऽ गेल ताहि जंगलक राजा बाघकेँ कहल जाए लागल । अछिअहि = (अछिअ + इ + ह) = (अछिए + ह) = (अछिए + ……… ह केर लोप) = अछिए *‍२ - बहुत पहिने सिंहक साम्राज्य बाघक तुलनामे बहुत विस्तृत छल । सिंह पहिने सम्पुर्ण भारतवर्षक जंगलमे पर्याप्त मात्रामे (सम्भवतः बाघसँ बेसी मात्रामे) छल ।  समय बदलल, परिस्थिति उनटि गेल आ आब गुजरातक गिरिवनकेँ छाड़ि सिंह समूचा भारतक जंगलसँ अलोपित भऽ गेल । सिंहक तुलनामे बाघक स्थिति भारतमे बहुत बेसी नीक अछि । आ सिंहक अनुपस्थितिमे बाघहि जंगलक राजा भेल । *‍३ - बाघ प्राकृतिक रूपसँ मात्र एसिया महादेशमे भेटैत अछि । भारतक संगहि भारतक पड़ोसी देशसभ, आन दच्छिन-पूब एसियाक देशसभ आ रूसक साइबेरिया प्रदेशक दच्छिन-पूब भागमे भेटैत अछि । तेँ ओ खास तँऽ अछिए । *‍४ - ईस्ट इण्डिया कम्पनीक बंगाल स्टेटमे ताहि समय आजुक पच्छिम बंगालक अतिरिक्त बिहार (मिथिला सहित), उड़ीसा आ बाङ्ग्ला देश अबैत छल । ओ लोकनि सुन्दरवनमे बाघकेँ देखि कऽ ओकर नाम “रॉयल बंगाल टाइगर (ROYAL BENGAL TIGRE)” राखि देलन्हि जखनि कि ताहि समयमे बाघ समस्त अविभाजित भारतक जंगलसभमे सामान्य रूपसँ भेटैत छल । ताहि समय अपना दिशि भेटए बला बहुत रास जीव-जन्तु ओ गाछ-बिरिछक नाम बंगालक नामसँ राखि देल गेल जे भ्रामक छल आ अछि । तहिना ई बाघ सेहो । कोनहु जैववैज्ञानिक नाँओमे जञो “बेंगालेन्सिस (bengalensis / benghalensis)” प्रत्यय जुड़ल होअए तँऽ बेसी सम्भावना जे ओ जैव-जाति वा प्रजाति अपना दिशि सेहो सामान्य रूपसँ भेटैत होयत । *‍५ - मिथिलाक पछबारी सीमा पर गण्डकक तट पर अवस्थित जंगलसभमे एखनहु बाघकेँ देखल जा सकैत अछि । पच्छिम चम्पारणक“वाल्मीकि राष्ट्रिय उद्यान” (VALMIKI NATIONAL PARK & WILDLIFE SANCTUARY) केर “वाल्मीकि बाघ रिजर्व” (VALMIKI TIGER RESERVE / VTR) भारतमे बाघक प्रमुख प्राकृतिक आवास क्षेत्रमेसँ एक अछि । एकरहि ठीक उत्तर भऽर नेपालक सीमामे अवस्थित “चितवन राष्ट्रिय निकुञ्ज” (CHITWAN NATIONAL PARK) आओर “पर्सा वन्यजन्तु आरक्ष” (PARSA WILDLIFE RESERVE) सेहो बाघक प्राकृतिक आवास क्षेत्र अछि । एहिमेसँ चितवन राष्ट्रिय निकुञ्जकेँ युनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व सम्पदा क्षेत्र (WORLD HERITAGE SITE) केर श्रेणीमे सम्मिलित कएल गेल अछि । वास्तवमे ई तीनू वन्य क्षेत्र मीलि कऽ एक गोट बाघ आरक्ष एकाई केर रचना करैछ जकरा “चितवन-पर्सा-वाल्मीकि बाघ आरक्ष एकाई” (CHITWAN-PARSA-VALMIKI TIGER CONSERVATION UNIT or CPV-TCU) कहल जाइत अछि । *‍६ - बिलाड़ि कुलक आन सदस्य सभकेँ पानिसँ बड़ डऽर होइत अछि । “तीतल बिलाड़ि” - एक गोट प्रशिद्ध कहबी छै । मुदा “बाघ” आ“जगुआर” एहेन सदस्य अछि जकरा पानिसँ डऽर - भऽर नञि होइत छै । ई दूनू पानिमे बहुत दूर धरि आ बहुत काल धरि हेलि सकैत अछि। तेँ बाघकेँ सुन्दरवन सनि तिमुहानीक (DELTA) दलदली क्षेत्रमे सेहो कोनहु असौकर्य नञि होइत छै । बिलाड़ि (बाल कविता) बाघक मौसी  कहै छी  जकरा, तकरहि नाम “बिलाड़ि” छै । एक्कहि कुल केर  जीव दुनु छै, बहुतहि छोट  बिलाड़ि छै ।। छोट  ओकर  कद-काठी छै तेँ,  विचरि  रहल  निर्बाध छै । पैघ बिलाड़ि जेकाँ ओक्कर नञि, सिकुड़ि रहल साम्राज्य छै ।। कखनहुँ म्याँउ-म्याँउ बाजैत अछि, खन गुम्हरैत आबाज छै । घऽर-आङ्गन  कि  बाध-बोन, सभठाँ  मार्यारक  राज छै ।। अपना  मिथिलामे  प्रशिद्ध  बड़, “गोनू झाक बिलाड़ि” छै ।*‍१ एतबा कीर्त्ति  जे  कहबी बनि गेल, “गोनू झाक बिलाड़ि छै” ।। मांसुभक्षी  आ  चतुर  शिकारी, मूसक  करैछ  शिकार  छै । माछक  चाट  बहुत छै  ओकरा, दूधक  सद्यः काल  छै ।। जतए बिलाड़िक पहुँच असम्भव, “सीक” एहेन निर्माण छै ।*‍२ सीक टुटल  तँऽ  भाग बिलाड़िक, तेँ ई कहबी विधान छै ।। घर-आङ्गन जे भेटैछ हरदम, सएह कहबैछ “बिलाड़ि” छै । जंगल-झाड़  बिलाड़ि  रहैछ जे, से तँऽ “बन-बिलाड़ि” छै ।।*‍३ तेनुआ ओ जगुआर जेकाँ ओ, गाछ चढ़एमे  माहिर  छै । ऊँच भवन ओ गाछ-बिरिछसँ, कूदि जाइछ जग-जाहिर छै ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - गोनू झाक खिस्साक बिलाड़ि ततेक ने प्रशिद्ध भेल कि ओकरा नाम पर कहबीअहि बनि गेल । *‍२ - “सीक” वस्तुतः दूध, दऽही आ माखन आदिकेँ बिलाड़िसँ सुरक्षित रखबाक एकटा सस्ता लेकिन बहुत नीक उपाए छल । *‍३ - “बिलाड़ि” वस्तुतः मनुक्खहि केर परिवेशमे रहैत अछि आ जे जंगली परिवेशमे रहैत अछि से “बनबिलाड़ि” कहबैत अछि । बनबिलाड़िकेँ “खटाँसु” (उच्चारण - खटाँउस या खटौंस) अथवा “खटाँस” सेहो कहल जाइत अछि । मुदा “खटाँसु” या “खटाँस” शब्दक अन्तर्गत “बनबिलाड़िक” अतिरिक्त एकटा आन जन्तु सेहो अबैत अछि जकरा अंग्रेजीमे “सीवेट” (CEVET) कहल जाइत अछि । एकर गुणक आधार पर एकरा मैथिलीमे “गन्हबिलाड़ि” कहि सकैत छी (हलाँकि मैथिलीमे एकर ई नाँओ प्रचलित नञि अछि) । *‍४ - बिलाड़ि कुल (Family - FELIDAE) केर मात्र ४ टा सदस्य गाछ पर चढ़बामे माहिर होइत अछि । ओ चारू सदस्य अछि - तेन्दुआ (तेनुआ), जगुआर, बनबिलाड़ि आ स्वयं बिलाड़ि । सिंह या सिंघ (बाल कविता) सिंह  कहू  या  सिंघ कहू  अहँ, छी  ओ  तँऽ जंगल  केर राजा । पहिने छल विचरैत  विश्व  भरि, मुदा आब बाजल अछि  बाजा ।।*‍‍१ राज  ओकर  भारत भरिमे  छल, आ   सौंसे  पच्छिमक  एसिया । छाड़ि     सहारा     मरूभूमिकेँ, भेटैत छल  हर ठाम  अफ्रिका ।।*‍२ दू  शताब्दी   पहिने  धरि  तँऽ, यूरोपहुमे   बड़   रहैत   छल । प्रागैतिहासिक   कालक   युगमे, भरि अमेरिका ओ फिरैत छल ।।*‍२ आब तँऽ बाँचल ठाम-ठीम किछु, जतए  सुरक्षित  जंगल  अछि । भारत केर गुजरातक “गिरिवन”, ओत्तहि सिंहक  मंगल  अछि ।।*‍३ अछि प्रयास चलि रहल  बसाबी, सिंहकेँ     आनहु    जंगलमे । पहिल  खेप  छी  मध्य-प्रदेशक, “कुनो”  नाम  केर  जंगलमे ।।*‍४ तहिना  अफ्रिकाक  स्थिति  छै, ओत्तहु  कम्महि  सिंह  बचल । नवका    गिनतीमे    पहिनेसँ, सिंहक  संख्या  बहुत  घटल ।। पुरुष-सिंह  केर  गर्दनि पर  छै, केसरिया    केसक   “केसर” ।*‍५ सिंहनी केर  नञि रहैछ घेंट पर, लटकैत सुन्नर सनि “केसर” ।। इएह केसर केर कारण  सिंहक, नाम  “केसरी”    सेहो   पड़ल । इएह  “केसरी”  जतए - ततए, अछि  शूरत्वक पर्याय बनल ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१*‍२*‍३ - बहुत पहिने सिंहक साम्राज्य बाघक तुलनामे बहुत विस्तृत छल । सिंह पहिने एसिया, अफ्रिकाक अतिरिक्त यूरोप आ दूनू अमेरिका महादेशमे पाओल जाइत छल । करीब ‍दस हजार वर्ष पहिने अमेरिका महादेश आ प्रागैतिहासिक कालमे (PREHISTORIC ERA)यूरोपसँ विलुप्त भेल । भारतमे सेहो मात्र गुजरातक गिरवनमे किछु सिंह बाँचल अछि । हाँ, अफ्रिकाक सिंहसभक स्थिति भारतीय सिंहसभसँ किछु नीक अवश्य अछि । क्र॰सं॰ मैथिली नाँओ अंग्रेजी नाँओ जैववैज्ञानिक नाँओ सिंहक स्थिति १ भारतीय या एसियाक सिंह Asiatic Lion / Indian Lion / Persian Lion Panthera leo persica जिबैत (जिउत)  अछि २ अफ्रिकाक सिंह African Lions - collectively (Each subspecies with a different name individually) Panthera leo leo & other approx. 17-18 subspecies जिबैत (जिउत)  अछि ३ यूरोपक सिंह European Lion Panthera leo spelaea करीब २,५०० वर्ष पहिने विलुप्त ४ अमेरिकाक सिंह Americon Lion Panthera leo atrox करीब १०,००० वर्ष पहिने विलुप्त *‍४ - भारतमे एखन मात्र गुजरात राज्यक गिरिवनमे (GIR FOREST NATIONAL PARK & WILDLIFE SANCTUARY) सिंह बाँचल अछि जे कोनहु प्राकृतिक आफद या महामारीक कारण एक संगहि सुड्डाह भऽ सकैत अछि । एहि बातकेँ ध्यानमे रखैत भारत सरकार सिंहकेँ किछु आनहु जंगलसभमे पुनर्स्थापित करबाक प्रयास कऽ रहल अछि । एहेन पहिल प्रयास मध्य प्रदेशक “कुनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य”(KUNO - PALPUR WILDLIFE SANCTUARY) करबाक तैयारी भऽ रहल अछि । *‍५ - पुरुष सिंहक गर्दनिसँ चहु दिशि स्वर्णाभ पीयर (वा किछु प्रजातिमे पीयर-भूरा-कारी) रंगक केस लटकैत रहैत अछि जकरा संस्कृत आ मैथिलीमे “केसर” कहल जाइत अछि । इएह कारणेँ सिंहक एकटा पर्यायी नाँओ “केसरी” सेहो अछि । हिन्दीमे एकरा “आयाल” आ अंग्रेजीमे“मॅन” (MANE) कहल जाइत अछि । सिंहनीमे एहि तरहक संरचना नञि रहैत अछि । जिराफ (बाल कविता) “सितार” रहए देशी,  बिदेशी “गितार” छल । “हरमुनिञा” - संगीतक  साज भेल मैथिली ।।*‍१ “बाज” भेल मैथिली, “आबाज” भेल मैथिली । तहिना  “कंगारू” - “जिराफ”  भेल मैथिली ।।*‍१ अरबीक “बाज” छल आ अरबी “जिराफ” छी । अरबीमे   सेहो   बिदेशज  “जिराफ”   छी ।।*‍२ देशक  ने  जीव  ओ,  जीवहि बिदेशी  छी । तेँ  जे बिदेशी छल,  नाम  सएह  मैथिली ।।*‍३ ऊँटहुसँ  पैघ  देखू,  गर्दनि  आ  टाङ्ग छै । अफ्रिकाक  प्राणी छी,  नामहि “जिराफ” छै ।। दुनिञामे   बेसीतर  इएह  एक  नाम  छै । मैथिली की ? - अंग्रेजी, हिन्दी वा आन छै ।।*‍४ बबूरक छी पात प्रिय,  शुद्ध शाकाहारी छी । अफ्रिकाक माँझ-पूब-दच्छिन  केर बासी छी ।। एतबा धरि ऊँच आन धरती पर जीव नञि । धरती जमीन बुझू − ग्रह केर प्रतीक नञि ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ *‍२ *‍३ - जहिना GUITAR सँ बनल गितार, HARMONIUM सँ बनल हरनुनिञा आ अरबी भाषासँ आयल शब्द “बाज” (चिड़ै) मैथिलीक विदेशज/विदेशी/बिदेसी शब्द भण्डारमे शोभायमान अछि तहिना आन बहुत रास शब्द एहि श्रेणीमे आओरहु आबैत अछि आ भविष्यहुमे आबैत रहत । ई कोनहु जिबैत भाषाक शब्दभण्डारमे होमएबला एकटा सतत प्रक्रिया अछि । कंगारू (ऑस्ट्रेलियाक एकटा प्राणीक नाँओ) आ जिराफ (अफ्रिकाक एकटा प्राणीक नाँओ) शब्दक मैथिली वा आन भाषाक (यथा - अंग्रेजी, हिन्दी आदि) शब्द-भण्डारमे आगमण सेहो एहि प्रक्रियाक भाग थिक । एहेन जीव वा कोनहु बस्तु जे एहि ठाम नञि पाओल जाइत अछि तकर स्थानीय नामकेँ हू-ब-हू स्वीकार कऽ लेब बेसी उपयुक्त थिक । *‍४ - मैथिलीमे “जिराफ” शब्द अरबीक “ज़राफा” शब्दसँ आयल अछि परञ्च अरबीमे सेहो ई शब्द देशज नञि । अरबीमे ई शब्द सम्भवतः सोमालिया नामक अफ्रिकी देशक भाषासँ आयल अछि । जिराफ अफ्रिका महादेशक मूल निवासी अछि आ तेँ विभिन्न अफ्की देशक भाषासभमे एकर अलग - अलग नाँओ अछि । शेष सम्पुर्ण विश्वमे ई जीव जिराफहि नाँओसँ जानल जाइत अछि । *‍५ - धरती पर (जमीन पर) एखन पाओल जाए बला समस्त जिबैत जीवमे “जिराफ” सभसँ ऊँच जीव (TALLEST LIVING TERRESTRIAL ANIMAL) अछि । बिज्जी या सपनौर (बाल कविता) ओ बिज्जी छै !   सपनौर  छै ! ओ छै बिज्जी !  सपनौर छिऐ ! की भेलह ? किए लड़ै छह तोँ सभ ? जे बिज्जी, सएह सपनौर छै ।।*‍१ ओ बिज्जी छै ! सपनौर  छै !! बाड़ी - झाड़ी  सब  घुमैत छै । भरि दिन बस दौड़िते रहैत छै । गाछ - बिरिछ नहिञे चढ़ैत छै ।*‍२ धरती पर किछु तँऽ ताकैत छै । जएह  कहाबैछ  बिज्जी  एक  ठाँ, दोसर   ठाँ   सपनौर   छै ।। ओ बिज्जी छै ! सपनौर  छै !! मांसुक भक्षक जीव छिऐ ओ । राति ने, दिनहिमे फिरैछ ओ ।*‍३ साँपहु केर  भक्षण करैछ ओ । गहुमनसँ सेहो ने  डरैछ ओ । कहबी − साँपक  दुश्मन  बिज्जी, सपलेउर  -  सपनौर    छै ।।*‍४ ओ बिज्जी छै ! सपनौर  छै !! एसिया, योरोप आओर अफ्रिका । छै जे कहाबैत  पुरना - दुनिञा । ताहि ठामक छी  वासी  बिज्जी । नबका - दुनिञा लेल उड़कुस्सी ।*‍५ राष्ट्र - अमेरिकामे  प्रतिबन्धित, लऽ  जायब   सपनौर   छै ।।*‍६ ओ बिज्जी छै ! सपनौर  छै !! संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - दू टा धिया-पुता एक टा जीवकेँ देखि कऽ परस्पर झगड़ि रहल छल । पहिलुकक कहब छल जे ओ जीव “बिज्जी” थिक आ दोसरक कहब छल कि “सपनौर” अछि । वास्तवमे ओ दुहु बच्चा / बच्ची सही छल कारण “बिज्जी” आ “सपनौर” दुहु एक्कहि जीवक पर्यायी नाँओ थिक जकरा अंग्रेजी भाषामे MONGOOSE (Singular) (Plural - MONGOOSES / MONGEESE) कहल जाइत अछि । सपनौरहि केर एक टा पाठभेद वा उच्चारभेद (PHOENETIC/PHONETIC VARIANT) “सपलेउर” अछि । *‍२ - बिज्जी / सपनौर लुक्खी जेकाँ वृक्षाश्रयी (ARBOREAL) जीव नञि थिक ओ बिलेशय (TERRESTRIAL BURROW DWELLER) अर्थात बिलमे रहनिहार प्राणी थिक । *‍३ - बिज्जी / सपनौर बिलेशय प्राणी होइतहुँ मूस वा मुसरी (RAT/S & MOUSE/MICE) जेकाँ रातिचर (NOCTURNAL) प्राणी नञि अछि; ओ दिनचर (DIURNAL) प्राणी अछि । *‍४ - बिज्जी / सपनौर अपन किछु विशिष्ट शरीर रचना (यथा - मोट चाम) ओ शरीर क्रियाक (विशेषीकृत ACETYLCHOLINE RECEPTORS) कारणेँ साँपक (विशेषतः गहुमनक) विषक दुष्प्रभावसँ सुरक्षित रहैत अछि । साँपसँ ओना तँऽ ईहो कतियाए कऽ निकलैत अछि मुदा सामना भेला पर गहुमन (KOBRAS & OTHER ELAPIDS) आ ओहि वर्गक आन साँपकेँ मारि दैत अछि । वाइपर आ अजगर (VIPERS & BOAS) समूहक साँपसँ युद्ध भेला पर बहुधा बिज्जी केर हारि होइत अछि आ ओ मारल जाइत अछि । आम धारणाक विपरीत एहि जीवकेँ साँपक मांसु खएबाक प्रति कोनहु विशेष रुचि नञि होइत अछि । *‍५ - यूरेसिया (यूरोप आ एसिया) तथा अफ्रिका महादेशकेँ पुरना दुनिञा (OLD WORLD) आ उतरबारी तथा दछिनबारी अमेरिका महादेशकेँ नवका दुनिञा (NEW WORLD) कहल जाइत अछि । बिज्जी पुरना दुनिञाक मूल निवासी (NATIVE SPECIES) अछि आ नबका दुनिञामे प्राकृतिक रूपसँ नञि पाओल जाइत अछि । तेँ नबका दुनिञाक लोकक लेल ओ एकटा विचित्र वा आश्चर्यजनक जीव अछि । *‍६ - बिज्जीकेँ साँप आदिसँ घऽरक सुरक्षाक उद्देश्यसँ किछु लोक पोषितहु छथि । उतरबारी अमेरिका महादेशक (NORTH AMERICA CONTINENT) संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) नामक देशमे बिज्जीकेँ लऽ जाएब प्रतिबन्धित अछि । मधुमाक्षी या मधुमाछी (बाल कविता) मधुमाक्षी  हम  मऽध  बनाबी,  सब जनैत छी अपने । मऽध अहाँ जे खाए रहल छी,  अपना लए रही रखने ।।*‍१ छत्ता हऽम छी लगबैत कोनहु, ऊँच भवन या गाछ पर । जोगबी, मोम आ मऽध बनाबी,  सर्दीमे देत काज बड़ ।।*‍१ हम नञि छी  मरखाह, अनेरो  नञि काटैत छी ककरो । होइ छी  हम खिसियाह, जखन खतड़ा बुझाइए हमरो ।।*‍२ हमरा  कटला  पर  बौआकेँ,  याद  आबै छन्हि नानी । मजबूरी  छल  तेँ कटलहुँ,  हम  मरब अवश्ये  जानी ।।*‍२ हम्मर छत्ता  बहुत  पैघ,  बिढ़नी - छत्ता  केर  आगाँ । हर कोठरी छी  बनल  मोमसँ,  कागत केर ने खाका ।।*‍३ हमरो ओहिठाँ  बड़ मजूर,  किछु नर आ एकटा रानी । आँच जँ  रानी या छत्ता  पर,  हो  मजूर  बलिदानी ।।*‍४ मऽध बहुत अनमोल,  मजूरक मेहनति केर छी सत्त्व । ई  तँऽ अछि  सद्यः अमृत,  रखने सभ पोषक तत्त्व ।। आइ कतेको ठाम हमर, होइए  व्यावसायिक  पालन । दूध आ अण्डा सनि हमहूँ, छी करैत मऽध उत्पादन ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मधुमाक्षी द्वारा मऽध वस्तुतः शीतकालीन वा आपातकालीन खाद्य भण्डारक रूपमे सञ्चित कएल जाइत अछि । आन कीड़ासभ (ARTHROPODS) जेकाँ मधुमाक्षी सेहो शीतरक्तीय प्राणी (COLD BLOODED / POIKILOTHERMIC ORGANISMS) अछि मतलब कि ओकर शरीरक भीतरी तापमान मनुक्ख जेकाँ नियत (CONSTANT) नञि रहैत अछि आ वातावरणक तापमानक संग घटैत-बढ़ैत रहैत अछि । वातावरणक तापमान 10°C (=50°F)सँ नीचाँ खसला पर मधुमाक्षी उड़ान नञि भरैछ आ छत्ताक केन्द्रिय भागमे जमा भऽ जाइछ । एहि तरहक घटनाकेँ शीत समूहन (WINTER CLUSTERING) आ एहि तरहें एकत्रित भेल मधुमाक्षीक समूहकेँ शीत-समूह (WINTER CLUSTER) कहल जाइत अछि । शीत समूहित श्रमिक मधुमाक्षी अपन शरीरमे सिहरन या कम्पन (SHIVERING) कऽ कऽ ऊष्मा (गर्मी) उत्पन्न करैछ जाहिसँ छत्ताक आन्तरिक भागक तापमान 27°C (=81°F) धरि बनल रहैछ । एहि विकट समयमे आहार ओ तत्पश्चात कम्पनसँ ऊष्माक उत्पत्ति लेल छत्ताक सभ मधुमाक्षी छत्तामे पुर्वसञ्चित मऽधहि पर आश्रित रहैछ । एहि प्रकारेँ मधुमाक्षी आपातकालमे भोजन व ताप-नियण्त्रणक लेल एहि सञ्चित मऽध केर उपयोग करैत अछि । *‍२ - मधुमाक्षी बिढ़नी आ पचहिया जेकाँ अनेरहु मरखाह प्रवृत्तिक (OVER-AGGRESSIVE NATURE) नञि होइत अछि । जखन मधुमाक्षीक छत्ता या समूहक रानी पर मनुक्ख वा कोनहु आन जीवसँ (जेना कि - बिढ़नी, पचहिया, घियारी कीड़ी, आन दलक घुसपैठिया रानी मधुमाक्षी) खतड़ाक आभास होइत अछि तखनहि प्रायः मजूर-मधुमाक्षी ओकरा काटैत (BEE STINGS) अछि । ककरहु काटलाक बाद काटनिहारि मधुमाक्षीक विष-ग्रण्थि सहित दंश-शुण्डिका (STING & ASSOCIATED VENOM SAC) ओकर शरीरसँ टूटि कऽ अलग भऽ जाइत अछि आ काटनिहारि मधुमाक्षीक तत्काल मृत्यु भऽ जाइछ । *‍३ - बिढ़नी ओ पचहिया आदिक छत्ता ओकर लेरसँ सानल अर्धपाचित काठसँ बनल रहैत अछि जकर मुख्य रासायनिक घटक सेल्युलोज (CELLULOSE) होइत अछि । इएह घटक कागज/कगाद (PAPER) केर सेहो होइछ । तेँ अंग्रेजीमे बिढ़नी ओ पचहिया आदिकेँ पेपर वॉस्प (PAPER WASP) कहल जाइत अछि । एकर विपरीत, मधुमाक्षीक छत्ता मोमसँ (WAX) बनल रहैत अछि । ई मोम (WAX) श्रमिक मधुमाक्षीसभ परागकणकेँ लेरसँ सानि अर्धपाचित कऽ कऽ बनबैत छथि तेँ ओकरा संस्कृतमे “मधूच्छिष्ट” कहल जाइत अछि । *‍४ - मधुमाक्षी वास्तविक सामाजिक माक्षी (EUSOCIAL BEES) केर समूहमे आबैत अछि । ओकर हरेक समूह या छत्तामे (HERD / BEE SWARM / HONEYCOMB) एकटा रानी मधुमाक्षी (QUEEN BEE) किछु हजार नर मधुमाक्षी (DRONE BEES) आ दसहु हजार श्रमिक वा मजूर मधुमाक्षी (WORKER/NURSE BEES) रहैत अछि । पराग एकत्र कऽ कऽ मोम (छत्तामे कठरी निर्माण लेल) ओ मऽध (आपातकालीन आहार लेल) बनायब ओ छत्ताक सुरक्षा करब − ई सभटा काज श्रमिक वा मजूर मधुमाक्षीक थिक । *‍५ - भारत ओ विश्वक आन ठामसेहो मधुमाक्षी - पालन (APICULTURE; API = Apis = मधुमाक्षीक वंशक प्राणीशास्त्रीय नाम आ CULTURE = पालन) एकटा पैघ व्यवसायक रूपमे विकसित भऽ चुकल अछि । मधुमक्षिका → मधुमाक्षी → मधुमाछी लालबोङ्गी या ललबोंगी (बाल कविता) छोट चिड़ैञा मीठ बाजैत अछि । पेटक निचला भाग लाल अछि । इएह कारणेँ भरि मिथिलामे, चिड़ै ओ “लालबोङ्गी” कहबैतछि ।।*‍१ किछु केर  माथ छै  पूरा कारी । पेटहु    उज्जर - भूरा - कारी । मुदा पेट केर निचला हिस्सा, लाल − तेँ लालबोङ्गी कहबैतछि ।।*‍२ आनक  छाती,  पेटहु  उज्जर । आँखिक पाछाँ लाल छी सुन्नर । एकरहु पेटक निचला हिस्सा, लाल − तेँ लालबोङ्गी कहबैतछि ।।*‍३ दुहुक  माथ पर  कारी कलगी । पहिलुक छोट,  दोसरक बड़की । दूरसँ देखि कऽ भ्रमित भेलहुँ हम, दू-दू टा किए लोल रहैतछि !! *‍४ बोल मीठ  एहि दुहु  प्रकारक । छी सदस्य  बुलबुल परिवारक । बुलबुल रहितहुँ रूप विशिष्टहि,  तेँ ओ लालबोङ्गी कहबैतछि ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मैथिलीमे व्यापक रूपेँ मनुक्खक “वङ्क्षण-प्रदेश”केँ (INGUINAL REGION) “बोङ्ग” कहल जाइत अछि, जे कि पेटक नीचाँ अवस्थित होइत अछि । ओना अतिसीमित अर्थमे “वृषण” (TESTIES) सेहो होइत अछि मुदा, एहि ठाम अभिप्राय वङ्क्षण-प्रदेशहिसँ अछि । चूँकि, एहि चिड़ै केर पेटक निचलुका भाग लाल होइत अछि तेँ साम्यक आधार पर एकर नाम “लालबोङ्गी / ललबोंगी” पड़ल । *‍२ - किछु लालबोङ्गीक माथ पूरा कारी होइत अछि गर्दनि केर अगिला भाग, वक्ष (छाती) ओ उदर (पेट) सेहो भूरा - कारी सनि रंगक होइत अछि । एकर कनपट्टीमे लाल रंग नञि होइत अछि । पर, वङ्क्षण-प्रदेश लाल अवश्य रहैत अछि । ई चिड़ै भेल “कारी मूरीबला लालबोङ्गी” जकरा अंग्रेजीमे RED VENTED BULBUL कहल जाइत अछि । *‍३ - किछु लालबोङ्गीक कनपट्टीमे दुहु कात लाल रंगक एकटा पट्टी रहैत अछि संगहि ओकर वङ्क्षण-प्रदेश सेहो लाल रहैत अछि । ओकर गर्दनि केर अगिला भाग, वक्ष (छाती) ओ उदर (पेट) स्वच्छ उज्जर रंगक होइत अछि । ई चिड़ै भेल “लाल कनपट्टीबला लालबोङ्गी” जकरा अंग्रेजीमे RED WHISKERED BULBUL कहल जाइत अछि । *‍४ - दुहु प्रकारक लालबोङ्गीक माथक ऊपर एक-एक गोट कारी रंगक नमगर-तिकोणी (NARROW ELONGATED TRIANGULAR) कलगी (CREST) होइत अछि । लाल कनपट्टीबला लालबोङ्गी केर कलगी अपेक्षाकृत बेसी पैघ होइत अछि आ दूरसँ एहेन सनि लागैत अछि जेना ओहि चिड़ैकेँ दूटा लोल होअए − एकटा नीचाँ मूँहें आ दोसर ऊपर मूँहें । *‍५ - अरबी, फारसी, हिन्दी आदि भाषासभमे ई “बुलबुल” नामक चिड़ै केर अन्तर्गतहि आबैत अछि मुदा, मैथिलीमे एकर विशिष्ट रंगक कारण पाकल आम (छवि वा सन्दर्भ आधारित ६ गोट कविता) कहियो - कहियो सभ किछु ठीक रहितहुँ, पर्याप्त समय रहितहुँ, लाख प्रयासक बावजूदहु किछु नञि लिखाइत अछि । कहियो तकर ठीक विपरीत, मोन चहुचङ्ग रहितहँ, बिना कोनो खास प्रयत्नक, बहुत कम समयमे अनायसहि बहुत किछु लिखा जाइत अछि । सएह भेल ‍१० जून २०१६ ई॰क भोरमे । फेसबुक फोलल, श्री बिभूति आनन्दजीक (मैथिली वरिष्ठ लेखक) प्रोफाइल फोटोक रूपमे आमक झब्बाक छवि लागल छल । झब्बामे चारिटा आम छल आ ताहिमे एकटा पाकल (पीयर ढाबुस), एकटा अधपक्कू आ शेष दू टा काँच (किंवा डम्हाएल) छल । झब्बा नीक लागल - ताहि सन्दर्भ पर एक टा कविता लीखल । तकरा बाद पाँचटा आओरहु कविता धरा-धर अपनहि-आप लिखा गेल । ०१ एक अधवयसू − दू टा जुआन । संगहि एक गोट “पाकल आम” । सुन्नर  समय −  विहंगम  दृश्य, तीन पीढ़ी केर  भेल  मिलान ।। जिनगीक गति  छी एहने भैय्या, सब  अबटीमे  “पाकल आम” । समयक चालि ने बदलल कहियो, तूबत बनि सब  पाकल आम ।। समय  हाथ  -  जीबू  मस्तीमे, जिनगी केर नञि कोनहु ठेकान । कनितहि रहब, हँसब कहिया फेर, उलहन − देव  भेलाह  बेइमान ।। ०२ एक    परम    पाकल     प्रबुद्ध, दोसर पकबा लए  प्रेरित अछि । तेसर - चारिम   से  देखि  रहल, खेला देखि  अचम्भित  अछि ।। पहिलुक अछि  सत्ता  हथिअओने, आनक सत्ता  लए  काल बनल । दोसर   सोचए,   तूबए   पाकल, तखनहि तँऽ  गुरूघण्टाल बनब ।। तेसर - चारिम छी  मूक  प्रजा, सब देखि रहल आ सोचि रहल । सत्ताक  समर  नञि  प्रतिभागी, परिणाम मुदा सब भोगि रहल ।। ०३ एक  गुरू  छथि  दीप्त  ज्ञानसँ, दोसर  किछु  अवभासित छथि । तेसर - चारिम नव शिष्य हुनक, संगति बैसल आह्लादित छथि ।। कहथि  गुरू - ई  ज्ञान  थिकहि, बँटलासँ  कहियो  नञि  घटैछ । अज्ञानक    अम्मत    टिकुला, ज्ञानहि बल मधुर रसाल बनैछ ।। सद्-ज्ञान गुरूक छी झलकि रहल, पीताभ मधुर आमक फल सनि । संगतिमे अम्मत काँच आम सेहो, बदलि रहल पाकल फल सनि ।। ०४ एक   दूइर  दोसरहुँकेँ  करैछ, से  संगति  केर  प्रभाव  छै । पाकल देखि  कऽ काँच  पकैए, फऽड़क  सहज  स्वभाव  छै ।। एक जँ  उजिआएल,  दोसरहुमे उजिअएबा  केर  भाव भरैछ । जँ  केओ  बुड़िआएल  समूहमे, सभक भविष्यक काल बनैछ ।। एक शराबी इएह  चाहैत अछि, मित्रहु  बैसि  शराब पिउबए । मुदा तपस्वी  सदिखन चाहैछ, संगीक तप - जंजाल तजए ।। संगति केर  महिमा छी भारी, एहि झब्बामे से  बुझा रहल । पाकल  देखि   पकैए  दोसर, तेसर-चारिम छी डम्हा रहल ।। ०५ देखि सुपुक - पाकल - गोपीकेँ, मोन  करय  खएतहुँ ओकरा । बहुत ऊँच छी, चढ़ि नञि तोड़ब, फेंकि  रहल  छी  तेँ झटहा ।। गछपक्कू  तँऽ  गछपक्कू छी, दोसर  पालहु  पर पका लेबै । संगमे कँचका सेहो खसल तँऽ, गोड़ि  अनाजमे  पका  देबै ।। ई  की  भेलै ! गछपक्कू  तँऽ, अपनहि तूबल आओर खसल । हमर मोन भगवानहु बुझलन्हि, हापुस आम ओ बिहुँसि रहल ।। सुपुक = सुपक = सुपक्व गोपी = सुपक्व निदग्ग पीयर वा लाल-पीयर गछपक्कू आम हापुस = रत - रत करैत सुपक्व गछपक्कू आम (मराठी आदि भाषामे "हापुस" आमक एक गोट प्रकारक नाम थिक, मुदा मैथिलीमे ताहि अर्थमे नञि प्रयुक्त भऽ कऽ निर्दिष्ट अर्थमे प्रयोग होइछ) आमक बिहुँसब = गछपक्कू आम जखन बेसी ऊँचाईसँ तूबि कऽ माटि पर खसैछ तँऽ ओ एक वा एकाधिक स्थान पर (प्रायः ऊपरमे या बगलमे/पार्श्वमे) फाटि जाइछ । एहि घटनाकेँ आमक बिहुँसब ओ एहेन आमकेँ बिहुँसल आम कहल जाइत अछि । ०६ पाँचहु आङ्गुर  नञि छी समान, नहिञे   दू   गोटे   संसारमे । भाँति - भाँति  केर  लोक भेटैए, अप्पन    सभक   समाजमे ।। एक्कहि  आमक   झब्बामे  छै, काँच,  डम्हाएल  आ  पाकल । तहिना  समाजमे  लोक  थिकै, अपना - अपनी काजेँ  पागल ।। किछु प्रबुद्ध, किछु अतिप्रबुद्ध, सामान्य तथा किछु  निर्बुद्धी । सुजन - सुबुद्धि सेहो  बहुतहि, किछु  रहैछ अनेरहु  दुर्बुद्धी ।। ओहुना ई सभ किछु बदलैत छै, समय - वयस - अनुभव संगे । सबहक अप्पन अलगहि महत्त्व, आ काज आबैछ  अपना ढंगे ।। पाकत जञो सभटा  आम संग, एक्कहि बेर भऽ  जायत ढेरी । तेँ तकर व्यवस्था प्रकृति करैछ, पकबैछ ओ आम  बेरा - बेरी ।। कबार (बाल कविता) छी कंकूर - सहोदर,  पर हम ओकरासँ  किछु  छोट  छी । नाङ्गरि पातर छोट-क्षीण मोर, ओक्कर  तँऽ  चौकोर  छी ।।*‍१ कंकूरहि  सनि  लोल   हमर, आ  देहक  कारी  रंग  छी । माथ  सेहो   एकवर्णी  कारी, लाल ने  ओक्कर  रंग छी ।।*‍२ सालक किछु  एहनहु महीना, लोहाक बीझ सनि रंग हमर । देहक चमक  बढ़ल - बदलल, हरियर-कारी छी पंख हमर ।।*‍३ कंकूरक सनि भलहि लोल छी, अलगहि पर सब ढंग हमर । हम  नञि भेटब  दूर चऽड़मे, पानिक श्रोतक  संग हमर ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - करांकुलक अंग्रेजी नाम BLACK NAPED IBIS अछि आ कबारक GLOSSY IBIS, तेँ दुहुमे बहुत नजदीकक सम्बन्ध अछि । तथापि, दुहुमे बहुत किछु भिन्नता सेहो अछि आ तेँ प्राणीशास्त्रक वर्गीकरणमे सेहो दुहु अलग - अलग वंशक चिड़ै अछि । करांकुलसँ कबारक आकार छोट होइत अछि । करांकुलक नाङ्गरि चौकोर होइत अछि जखनि कि कबारक अपेक्षाकृत कम चौकोर ओ छोट । *‍२ - कबारक आकार-सुकार देखबामे करांकुलहि सनि लागैत अछि । लोलक आकृति सेहो कंकूरहि सनि रहैछ । पर, कबारक माथक ऊपरमे कंकूर जेकाँ लाल रंग नञि रहैत अछि । *‍३ - सालक किछु महीना एहन होइत अछि जाहिमे कबारक देहक रंग भूरा-कारीसँ बदलि बीझायल लोहाक रंगक (RUSTY COLOUR) आ चमकयुक्त (GLOSSY) भऽ जाइत अछि । दुहु पंखक रंग बदलि कऽ कजरी सनि गाढ़ चमकैत हरियर भऽ जाइत अछि । *‍४ - करांकुलक विपरीत कबार जलाशयक आस-पासक क्षेत्रमे भेटैत अछि । पानिक श्रोतसँ बेसी दूर ई चिड़ै नञि देखाइ दैछ । करांकुल (बाल कविता) एत्तेक  मेहनति  किएक  करै  छेँ ? अपन स्वास्थ्य पर ध्यान ने दै छेँ । कारी - झामरि  देह भेल छौ,  अनमन्न तोँ कंकूर लागै छेँ ।। जे “कंकूर”  छै  सएह  “करांकुर” । इएह “कालकण्टक” आ “करांकुल” । एकरहि उपमा रोजहि बाजथि,  तइयो तोँ एकरा ने चिन्है छेँ ।।*‍१ चिड़ै  ई  कारी,   धुत्थुर - कारी । लेशहि  उज्जर,  आँखियहु  कारी । माथक लाल रंग केर कारण, भ्रमसँ तोँ  “लालसर”  बुझै छेँ ।।*‍२ प्रायः   छोट    झुण्डमे   भेटैछ । बाध - बोन  आ  चऽड़मे  भेटैछ । पानिक श्रोतसँ  दूरहि देखही,  धारक कातमे किएक ताकै छेँ ।।*‍३ लोल एकर किछु खास लागैत छै । बिनु  बेँतक  गैंतीसँ  मिलैत छै । या फेर तकरहि सनि आकृति छै, जकरा तोँ तरुआरि कहै छेँ ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - “कंकूर” केर उपमा अपना दिशि बहुत प्रचलित अछि, पर बहुत कम्महि लोककेँ बूझल अछि जे “कंकूड़ या कंकूर” एक टा चिड़ै केर नाम थिक । किछु लोक “कंकूर” शब्दक उत्पत्ति “कंकाल” शब्दसँ मानैत छथि − शायद ओहो लोकनि सही छथि । सूखि कऽ कंकूर भऽ गेलेँ - कंकालसँ कंकूरक उद्गम दिशि ईशारा करैछ । चिड़ै दिशि ईशारा करैत बाँकी उद्धरण उपरुका कवितामे देल गेल अछि । *‍२ - बहुत लोक एकर माथ परक लाल रंग देखि “एकरा” भ्रमवश “लालसर” चिड़ै कहैत छथि − से गलत थिक । चिड़ै केर सम्यक जानकारी रखनिहार/-रि लोकनि जनैत छथि कि लालसर आन चिड़ै थिक । *‍३ - उड़ए बला अधिकांश पैघ चिड़ै कोनहु-ने-कोनहु प्रकारक जलाशयक नजदीकमे भेटैछ । मुदा, करांकुल प्रायः जलाशयसँ बहुत दूरक घासयुक्त मैदानी क्षेत्रमे भेटैत अछि । कखनहु - कखनहु जलाशयक आस - पास सेहो भेटि सकैत अछि । *‍४ - एकर लोल केर आकृति विशिष्ट प्रकारक होइत अछि जे कि देखबामे बिना बेंतक गैती (PICK AXE) या फेर भीतर दिशि वक्रित तरूआरि (INWARD CURVED SWORD) सनि लागैत अछि । राजहंस या हंसावर (बाल कविता) हउए   देखियौ   “अरुण - क्रुञ्च”, वाह ! केहेन रमणगर  लागैत छै ! *‍१ सागर तट पर झुण्डक - झुण्ड ओ, केहेन   सोहनगर   लागैत  छै !! *‍२ खन  सारस  सनि   ठाढ़  भेल छै, खन   हंसहि  सनि   हेलैत  छै ।*‍३ हंसहि   सनि   देखियौ   गर्दनि, ओ  पानिसँ अनुखन खेलैत छै ।। केओ कहैछ - छै  “राजहंस” इएह, केओ  कहैछ  -  “हंसावर”  छै ।*‍४ अपना  दिशि   नञि  छै  भेटैत, ओकरा  बड़ रुचिगर सागर छै ।।*‍२ हंसहि सनि  एकरहु  तँऽ  मूँहमे, छन्नी  सनि  किछु  लागल छै । कादो   सानल   पानिसँ   सेहो, स्वच्छ आहार  ओ  छानैत छै ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - प्राचीन हिन्दू धर्मग्रण्थसभमे जाहि “अरुण क्रुञ्च” नामक चिड़ैकेँ अग्निदेवताक वाहन बताओल गेल अछि से इएह चिड़ै थिक । *‍२ - ई चिड़ै समुद्र तट पर रहब पसिन्न करैत अछि आ तेँ अपना दिशि नञि भेटैत अछि । भारतमे विशेष कऽ पछबारी समुद्रतटीय घाट पर ई चिड़ै आबैत अछि आ किछु संख्यामे पुबारी समुद्रतटीय घाट केर क्षेत्रमे (यथा - उड़ीसाक चिल्का झीलमे) सेहो । ई प्रबासी चिड़ै(MIGRATORY BIRD) थिक । गर्मीमे अफ्रिकाक समुद्री तटसँ भागि प्रायः दच्छिन-पच्छिम एसियाक आ यूरोपक समुद्र तट पर आबैत अछि आ ठण्ढीमे पुनः ओतहि चलि जाइत अछि । *‍३ - ठाढ़ भेल ई चिड़ै लाल रंगक सारस (क्रुञ्च या क्रौञ्च) जेकाँ लागैत अछि आ तेँ संस्कृतमे एकर एकटा नाम “अरुण क्रुञ्च” अछि । पानिमे हेलबा काल ई अनमन्न हंस सदृश लागैत अछि, हंसहि सनि एकर गर्दनि अंग्रेजीक “S” वर्ण जेकाँ देखाइ दैत अछि । एकर आबाज सेहो हंसहिसं मिलैत अछि । इएह कारणेँ “राजहंस” सेहो कहबैत अछि । *‍४ - किछु लोक “अरुण क्रुञ्च” नामक चिड़ै केर पर्यायी नाँओ “राजहंस” सेहो मानैत छथि तँऽ किछु लोक एकरा “हंसावर” कहि सम्बोधित करैत छथि । *‍५ - एहि चिड़ै केर लोलक भीतर एकटा छन्नी सनि संरचना (SIEVE LIKE STRUCTURE) होइत अछि जकर मदतिसँ कादो भरल पानिमेसँ सेहो अपन खएबा जोग बस्तुकेँ स्वच्छ स्वरुपमे प्राप्त कऽ लैत अछि आ बाँकी अनावश्यक पदार्थकेँ बाहरहि छोड़ि (छाड़ि) दैत अछि । एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे प्राचीन शास्त्रसभमे वर्णित “नीर - क्षीर विवेक” (नीर = कादो वा निर्माल्ययुक्त पानि; क्षीर = पोषक तत्त्वसभ) केर गुण राजहंसमे पाओल जाइछ । किछु विशेष बात - ·         ई चिड़ै अपना दिशि (सम्पुर्ण मिथिलामे) नञि भेटैत अछि । तेँ एकर कोनहु आन मैथिली नाम नञि अछि । एहना स्थितिमे हम एहि ठाँ ओकर संस्कृतहि नामकेँ तत्सम स्वरूपमे मैथिली नामक रूपमे प्रयोग कयल अछि । ·         मैथिली तँऽ मैथिली, संस्कृतहुमे “राजहंस” नाम केर सन्दर्भमे बहुत मत - मतान्तर अछि । परञ्च, संस्कृतक प्रशिद्ध ग्रण्थ “अमरकोश”मे देल गेल राजहंसक विवरण एहि चिड़ैसँ बेसी मेल खाइत अछि । संगहि आनहु बहुत रास गुण-धर्म केर मिलानक आधार पर आइ-काल्हि बेसीतर विद्वान एकरहि “राजहंस” मानैत छथि । अमरकोशक अनुसार राजहंसक विवरण निम्न प्रकारेँ अछि - Ø  ……… राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैर्लोहितैः सितः ……….।। Ø  अर्थात्, राजहंस ओ थिक जे सित वर्ण (किछु धूसर उज्जर; नञि कि स्वच्छ उज्जर) केर अछि आ जकर चक्षु (आँखि) ओ चरण (पएर) लोहित (लाल वा ललौन) वर्णक अछि । ·         जाहि ठाम ई चिड़ै नञि पाओल जाइत अछि (मिथिलामे सेहो) ओहि ठामक सहित्यकारलोकनि आ लोकसभ राजहंस चिड़ै केर रूपमे अपना मन केर कल्पनाक अनुसार गढ़ि लैत छथि । अथवा, राजहंस शब्दक प्रयोग तँऽ करैत छथि पर राजहंसकेँ प्रत्यक्षतः चिन्हबाक झंझटिसँ दूरहि रहैत छथि । ·          हिन्दीमे देल गेल एकटा आओर नाम अछि - “हंसावर” । ई नाम फादर कामिल बुल्के (अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश) द्वारा देल गेल छल । पर, हिन्दीअहुमे आब एहि शब्दक प्रयोग कम भऽ गेल आ एहि चिड़ै लेल “राजहंस” शब्दक प्रयोग होइत अछि । ·         लॅमिङ्गो (राजहंस) केर विश्वमे कुल छओ (बेसीतर प्रणीशास्त्री द्वारा मान्य) जाति अछि- Ø  GREATER FLAMINGO - Phoenicopterus roseus - बड़का राजहंस / गुलाबी राजहंस Ø  LESSER FLAMINGO - Phoenicopterus minor - छोटका राजहंस Ø  CHILEAN FLAMINGO - Phoenicopterus chilensis - चीलीक राजहंस Ø  JAMES’ (or JAMES’S) FLAMINGO - Phoenicopterus jamesi - जेम्सक राजहंस Ø  ANDEAN FLAMINGO - Phoenicopterus andinus - एण्डीज पहाड़क राजहंस Ø  AMERICAN FLAMINGO - Phoenicopterus ruber - अमेरिकाक राजहंस उपरोक्त जातिसभमेसँ (BIOLOGICAL SPECIES) पहिल दू गोट भारतमे भेटैत अछि । राजहंसक छओ जातिसभमेसँ पहिल केर संख्या विश्वभरिमे सभसँ बेसी अछि । सिरोली या सिरोली मएना (बाल कविता) छी मएने सनि,   वा मएने छी, पर  चितकाबर   रंग   हमर । बोली  मीठ छी,  सएह  कारणेँ, एहेन सनि  छी  नाम  हमर ।।*‍१ केओ  कहथि  स्थान  “सिरोई”, ताहिसँ  बनल  “सिरोली”  छै ।*‍१ पर  मीठगर   बोलहि   कारण, हम्मर तँऽ नाम “सिरोली” छै ।।*‍१ साधारण मएना  सनि  ने  हम, भेटब   घर - आङ्गन   बेसी । ढीठ  ओतेक  नञि  तेँ  हमरा, देखब ओत्तहि, नञि जन बेसी ।।*‍२ हल्लुक - पीयर लोल हमर छी, नेने  जड़िमे   किछु   लाली । सुग्गा  सनि  अनुकरण  करी, हमहूँ  तँऽ  मनुक्खक बोली ।।*‍३ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - पुर्वोत्तर भारतक मणीपुर राज्यमे एकटा स्थान अछि “सिरोई / सिरोही” जाहि ठाम सिरोई राष्ट्रिय उद्यान (SIROHI / SHIRUI NATIONAL PARK) या यैंगैंगपोक्पी लोकचाओ वन्यजीव अभयारण्य थिक जकर स्थापना सन् 1982 ई॰मे कयल गेल छल । अन्तर्जाल पर उपलब्ध जानकारी इएह कहैत अछि कि “सिरोई” नामक स्थानक आधार पर एहि मएनाक नाम “सिरोई मएना” पड़ल जे कि बादमे“सिरोली मएना” भऽ गेल । परञ्च हमरा ई बात पचि नञि रहल अछि कारण कि - ·        “सिरोली मएना” पूरा दछिनबारी एसियामे मैदानी (PLAINS) आ निचला तराई (LOWER FOOTHILLS) क्षेत्रमे पाओल जाइत अछि, तखन फेर मात्र मणीपुरहि के “सिरोई” केर विशेषण किएक ? ·        सिरोई राष्ट्रिय उद्यान केर स्थापना सन् 1982 मे भेल पर मिथिलामे एहि चिड़ै केर नाम “सिरोली” बहुत पहिनहिसँ अछि (मिथिलाक किछु अतिवृद्ध महिला लोकनि बतओलन्हि) । ·        अपना दिशि लोक सभक (विशेष कऽ किछु अतिवृद्ध जानकार महिला लोकनि) अनुसारेँ “सिरोली” (सिरोली मएना) केर बोली “मएना” (साधारण घरैया मएना) केर बोलीक अपेक्षा मधुर होइत अछि तेँ एकर एहेन नाम अछि । ·        ई चिड़ै गाबएबला पक्षीक (SINGING BIRDS) श्रेणीमे आबैत अछि जे कि किछु सीमा धरि नामकरणक पाछाँ ओकर आबाजकेँ कारण होयबाक पुष्टि करैछ । *‍२ - “सिरोली” “साधारण मएना” जेकाँ ढीठ नञि होइत अछि आ तेँ घर आङ्गनमे जाहि ठाम मनुक्खक आबर-जात बेसी हो ताहि ठाम नञि देखाइ देत । गाम-घऽरमे कने कात -करौटमे आ प्रायः छोट-छोट झुण्डमे सिरोली देखबामे आओत । *‍३ - पिञ्जरामे पोषला पर सिरोली सेहो सुग्गा जेकाँ मनुक्खक बोलीक नकल करैत देखल गेल अछि । साही (बाल कविता) साहीक काँट तँऽ सुनने हएबहक । सुनने की - देखने सेहो हएबहक । साहीक काँटमे “साही” की ?? “साही” मूस - गणक  छी प्राणी ।*‍१ मूससँ  बहुते  पैघ - से  जानी । सौंसे  देहे  “काँट”  बुझी ।। दिन भरि बियरिमे रहैत अछि । बाहर  रातिएमे निकसैत अछि ।*‍२ रक्षा-कवच ई “काँट” कही ।। कारी - उज्जर   काँट  छियै ।*‍३ उपनयनहुमे    काज   छियै ।*‍४ पहिलुक लेखनी इहो बुझी ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मूस आ साही − दुहु एक्कहि कुलक सदस्य अछि । ओहि कुलक नाम अछि रॉडेण्शिया (RODENTIA) । *‍२ - ई बिलेशय प्राणी अछि आ माटिक नीचाँमे बिलमे रहैत अछि । संगहि रातिचर (NOCTURNAL) प्राणी सेहो अछि । *‍३ - साहीक काँट (QUILS / SPINES) परिवर्तित रोइयाँ (MODIFIED HAIR) थिक जकर रूप-रंग ओ आकार साहीक प्रकार तथा सहीक वयस पर निर्भर करैछ । *‍४ - उपनयनमे शिखा-विभाजनक विधमे (बरुआक टीककेँ ३ भागमे बँटबाक बिधमे) साहीक काँटक काज पड़ैछ । *‍५ - पहिने अपना दिशि भीत (माटिक देबाल) पर चित्र बनएबा काल चित्रक खाका (OUTLINE / ROUGH DIAGRAMME) बनएबा हेतु सेहो प्रयुक्त होइत छल । यूरेसिया (यूरोप आ एसिया) तथा अफ्रिका महादेशकेँ पुरना दुनिञा (OLD WORLD) आ उतरबारी तथा दछिनबारी अमेरिका महादेशकेँ नवका दुनिञा (NEW WORLD) कहल जाइत अछि । साहीक जे जाति (SPECIES) जाहि ठामक मूल निवासी अछि ताहि अनुसारेँ ओकरा सभकेँ पुरान दुनिञाक साही (OLD WORLD PORCUPINES - ORDER HYSTRICIDAE) आ नऽव दुनिञाक साही (NEW WORLD PORCUPINES - ORDER ERETHIZONTIDAE) कहल जाइत अछि । साही रहितहुँ दुनु समूहमे बहुत बेसी अन्तर अछि । गरूड़ (बाल कविता) पैघ चिड़ै  -  चिल्होरिसँ  नम्हर, या   बड़का   चिल्होरि   बुझू । छी “गरूड़” - जँ नाम रूचए नहि, तँऽ  “बड़का  चिल्होरि”  कहू ।।*‍१ चाङ्गुर*‍२  छै  मजगूत   ततेक, खरहहुकेँ  धएने  उड़ि  भागैछ ।*‍३ किछु  प्रजाति   तँऽ  चाङ्गुरमे, साँपहुकेँ  धएने  उड़ि  भागैछ ।।*‍४ ओ चिल्होरि जेकाँ नञि कहियो, भागैछ  लोलमे  दाबि शिकार । एक्कहि कुल,  अन्तर तइयो छै, भिन्न दुहुक किछु छै बेबहार ।।*‍५ बहुविध गरूड़,  शिकारहु बहुविध, अपन - अपन छी जीहक चाट । चिड़ै - छोट,  खरहा  तँऽ  छैहे, ककरो प्रियगर साँप कि माछ ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - गरूड़ (EAGLE), चिल्होरि (KITE) आ किछु बाज (ACCIPITRINE HAWKS / TRUE HAWKS) - तीनू एक्कहि कुलक (FAMILY - ACCIPITRIDAE)सदस्य थिक तेँ तीनूमे बहुत किछु समानता अछि । समानता रहितहुँ तीनूमे बहुत किछु विभिन्नता अछि आ तीनू तरहक चिड़ै केर अपन किछु वैशिष्ट्य अछि जकरा आधार पर मैथिलीमे, संस्कृतमे आ हिन्दी - अंग्रेजी आदि भाषासभमे तीनूक अलग - अलग नाम देल गेल अछि । एहि ठाम जाहि शिकारी चिड़ैसमूहकेँ गरूड़ मानल गेल अछि तकरा भारतक आनो बहुत रास पक्षी वैज्ञानिकसभ गरूड़हि मानैत छथि । गरूड़क वर्णन हिन्दू धर्म ग्रण्थसभमे किछि मिथकीय काल्पनिक स्वरूपक होयबाक कारणेँ किछु लोक एकरा गरूड़ नञि मानैत छथि आ ताहि तरहक लोक एकरा “बड़का चिल्होरि” कहि सकैत छथि । *‍२ - चाङ्गुर = पञ्जा = CLAW (यद्यपि “चाङ्गुर” शब्द केर शाब्दिक अर्थ चारि आङ्गुरसँ बनल मुट्ठी स्वरूप भेल आ “पञ्जा” माने पाँच आङ्गुरसँ बनल, तथापि दुनु केर सामान्य रूढ़ि स्वरूपक अर्थ एक्कहि अछि − अंग्रेजीक CLAW केर अर्थमे ।) *‍३ - गरूड़क चाङ्गुर बड़ मजगूत होइत अछि । तेँ ओ अपन शिकारकेँ अपन चाङ्गुरमे दाबि उड़ि जाइत अछि − नञि कि चिल्होरि जेकाँ लोलमे दाबि कऽ । ओकर चाङ्गुरक पकड़ि एतेक शक्तिशाली होइत अछि कि ओ कएक बेर खरहाकेँ सेहो अपन चाङ्गुरमे पकड़ि कऽ बहुत फुर्तीसँ उड़ि जाइत अछि । *‍४ - गरूड़क किछु जातिसभ (Circaetus spp., Terathopius spp. & Spilornis spp. ) तँऽ साँपक शिकार करबामे माहिर होइत अछि तेँ अंग्रजीमे एकरासभकेँ सर्पेण्ट ईगल (SERPENT EAGLES) कहल जाइत अछि । विश्वमे गरूड़क करीब साठि टा जाति (60 SPECIES) पाओल जाइत अछि जाहिमेसँ अधिकांश यूरेसिया (यूरोप व एसिया) तथा अफ्रिका महादेशमे पाओल जाइत अछि । *‍५ - गरूड़क चाङ्गुरक पकड़ि चिल्होरिक चाङ्गुरक (CLAW) पकड़ि केर अपेक्षा बहुत मजगूत होइत अछि जखनि कि गरूड़क लोलक (BEAK)पकड़ि चिल्होरिक लोलक पकड़ि केर अपेक्षा बहुत कमजोर होइत अछि । तेँ गरूड़ अपन शिकारकेँ चाङ्गुरमे पकड़ि कऽ उड़ भागैत अछि जखनि कि चिल्होरि लोलमे । *‍६ - सामन्यतः सभ प्रकारक गरूड़ अपनासँ छोट चिड़ै, छोट रीढ़धारी प्राणी (जेना कि - मूस, खरहा, खरगोश, लुक्खी आदि), छोट सरिसृप (जेना कि - गिरगिट, छोट साँप आदि) केर शिकार करितहि अछि । गरूड़क किछु जातिसभ (Circaetus spp., Terathopius spp. &Spilornis spp. ) साँपक शिकार करबामे विशेष माहिर होइत अछि तेँ अंग्रजीमे एकरासभकेँ सर्पेण्ट ईगल (SERPENT EAGLES) कहल जाइत अछि । तहिना गरूड़क किछु जातिसभक (Haliaeetus spp., & Icthyophaga spp. ) विशेष अभिरुचि माछ आ जलीय - पक्षीसभक शिकार करबामे रहैत अछि । कल्याणी कोशक अनुसार - गरूड़ = एक पक्षी = a kind of EAGLE = Homraius bicornis गरूड़ = एक पक्षी = a kind of EAGLE एहि ठाम धरि तँऽ ठीक अछि परञ्च गरूड़ = Homraius bicornis बात मान्य नञि बुझना जाइत अछि । Homraius bicornis (syn. Buceros bicornis syn. Buceros homrai syn. Buceros cavatus syn. Dichoceros bicornis) वास्तवमे बड़का धनेश थिक जकरा अंग्रेजीमे GREAT HORNBILL / GREAT INDIAN HORNBILL / GREAT PIED HORNBILL कहल जाइत अछि । [syn. = synonymous  to  =  पर्याय / पर्यायवाची अछि ] गिद्ध (बाल कविता) बड़की  टा  केर  चिड़ै  छिऐ, आ पंखक  पैघ  पसार  छै ।*‍१ हेय दृष्टिसँ  लोक  देखै  पर, ओक्कर  बड़  उपकार  छै ।। मुर्दाखौक  अशुभ  परिचायक, पैघ   लहाश   आहार  छै । छोट  जीव  खरहा आ मूसक, सेहो  करैछ   शिकार  छै ।।*‍२ मृत प्राणीकेँ  खा  धरती केर, करइत   ओ   सिंगार  छै । ओकरा बिनु  धरती पर सौंसे, मृत  जीवक  अम्बार  छै ।।*‍३ पछिला तीस बरखसँ  एहिठाँ, गिद्धक  पड़ल  अकाल छै । छी अकाल केर मूल मनुक्खे, ओकरे  करनी   काल  छै ।।*‍४ मृत गो महींष बड़द तँऽ बूझू, भऽ गेल आब  जंजाल  छै । धार नदी ओ नहरि   बाढ़िमे, सड़ैत  लहाशक  टाल  छै ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - शिकारी पक्षीमे प्रायः गिद्ध सभसँ पैघ होइत अछि । भारतमे मुख्यतः एकर पाँच टा प्रजाति पाओल जाइत अछि - ·        WHITE RUMPED VULTURE = Gyps bengalensis ·        INDIAN VULTURE = Gyps indicus ·        SLENDER BILLED VULTURE = Gyps tenuirostris ·        HIMALAYAN VULTURE = Gyps himalayensis ·        GRIFFON VULTURE / EURASIAN GRIFFON = Gyps fulvus *‍२ - ई चिड़ै प्राथमिक रूपेँ मुर्दाखौक (SCAVANGER) अछि पर आवश्यकता पड़ला पर मूस, खरहा, खरगोश आदि प्राणिक शिकार सेहो करैत अछि । तेँ एकरा मुर्दाखौक शिकारी पक्षी (SCAVANGING BIRD OF PREY) कहल जाइत अछि । *‍३ - गिद्ध अपन समाजमे प्रायः अशुभक परिचायक मानल जाइत अछि पर वास्तवमे ओकर एहि धरती पर बड़ पैघ उपकार छै । ओ मृत प्राणीकेँ खा कऽ एहि धरतीकेँ स्वच्छ रखेत अछि, एहि धरतीक सिंगार करैत अछि, धरती पर महामारीकेँ पसरबासँ रोकैत अछि । *‍४ - पछिला तीस बरखसँ (सन् 1990सँ) भारत ओ नेपालमे गिद्धक संख्या बहुत तेजीसँ घटल अछि आ एहि ठाम भेटए बला गिद्धक जातिसभ विलुप्त होएबाक कगार पर पहुँचि चुकल अछि । एकर मुख्य कारण अछि पोशुआ पशु (माल - जाल) केर बेमार अवस्थामे सुई(INJECTION) केर रूपमे उपयोग होमए बला एकटा दबाई जकर नाम अछि DICLOFENAC SODIUM । ई दबाई मवेशीसभकेँ बोखारमे, चोट लगला पर, घाव-घोषसँ दर्द भेला पर देल जाइत छल । एहि दबाईक किछु अंश मवेशीसभक शरीरक चर्बी ओ मांसुमे सञ्चित भऽ जाइत अछि आ मुइलाक बाद आहार श्रृंखला (FOOD CHAIN) द्वारा गिद्धक पेटमे चलि जाइत छल । एहि दबाईकेँ गिद्ध नञि पचा पाबैत छल आ ओकर तत्काल प्रभावसँ गिद्धक आँत आ आन अंगसभमेसँ रक्तस्राव (INTERNAL BLEEDING / HAEMORRHAGE) होमए लागैत छल जाहि कारणेँ गिद्धक मृत्यु भऽ जाइत छल । एहि तरहेँ मनुक्ख ओ माल - जालक लेल प्राणरक्षक दबाई गिद्धक लेल सद्यः प्राणघातक भऽ जाइत छल । आब भारत, नेपाल ओ पाकिस्तान सरकार माल - जालमे एहि दबाई केर प्रयोग पर रोक लगा चुकल अछि आ ओकरा बदला MELOXICAM दबाई प्रयोग करबा लेल कहल गेल अछि । MELOXICAM गिद्धक लेल घातक नञि अछि । एहि प्रतिबन्धक बावजूदहु आँकड़ा कहैत अछि जे चोरा-नुका कऽ गाम-घऽरमे DICLOFENAC SODIUM केर प्रयोग मवेशीपर एखनहु भऽ रहल अछि । *‍५ - पहिने मृत मवेशीसभकेँ (खास कऽ हिन्दूलोकनि द्वारा मृत गाएकेँ) गामसँ बाहर चऽरमे छोड़ि देल जाइत छल जकरा गिद्धक झुण्ड किछुए कालमे खा जाइत छल पर आब से नञि भेलासँ बहुत समस्या भऽ गेल अछि । विशेष - हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध ऊँच पर्वतीय क्षेत्रमे होयबाक कारण आ संगहि अपन किछु विशिष्ट शारीरिक क्षमताक कारणेँDICLOFENAC SODIUM केर दुष्प्रभावसँ सबसँ कम प्रभावित भेल । भारतमे पाओल जाए बला शेष सभ गिद्धक प्रायः निनानबे प्रतिशतसँ बेशी (>99%) संख्या समाप्त भऽ चुकल अछि आ आब ओ सिर्फ संरक्षित स्थानहि पर बाँचल अछि । चिल्होरि या चील्ह (बाल कविता) पएर छोट मजगूत पंख छै, मुर्दाखौक    शिकारी । पर सामान्य ई एकर रूप छै, ई   तँऽ   सर्वाहारी ।।*‍१ लाल पीठ चिल्होरि ब्राह्मिणी, आन  छै  भूरा-कारी ।*‍२ आँखि एकर बड़ तेज होइछ तेँ, ई छै कुशल शिकारी ।। सधल  उड़ान  भरैछ  चिड़ै ई, मारैछ  दक्ष  झपट्टा । भरल हाटमे बिनु टकरएने, मांसु लऽ भागै पक्का ।।*‍३ भागैत काल मांसुकेँ ओ तँऽ, लोलहिमे  पकड़ै   छै । पएर ओकर कमजोर होइछ तेँ, लोलहिसँ  झपटै  छै ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ *‍४ - गरूड़क अपेक्षा चिल्होरिक चाङ्गुर बहुत कमजोर होइत अछि जखनि अपन वजनक अनुसारेँ ओकर लोल बहुत मजगूत होइत अछि । तेँ ओ अपन शिकारकेँ अपन लोलमे दाबि उड़ि जाइत अछि − नञि कि गरूड़ जेकाँ चाङ्गुरमे दाबि कऽ । ई ओना तँऽ सर्वाहारी पक्षी(OMNIVOROUS BIRD) अछि आ समय पड़ला पर किछुओ खा लैत अछि परञ्च मुख्य रूपेण ई मुर्दाखौक शिकारी चिड़ै (SCAVANGER RAPTOR / SCAVANGINGER RAPTOR BIRD) अछि । *‍२ - गिद्ध, गरूड़, चिल्होरि आ बाज − ई सभ शब्द स्वयंमे वैविध्यपुर्ण अछि तथा कोनहु एक जातिक चिड़ै केर बोध नञि करबैछ अपितु कतेकहु जैववैज्ञानिक वंश ओ जातिसभक (BIOLOGICAL GENERA & SPECIES) समूह केर परिचायक थिक । चिल्होरि शब्दसँ माइल्विनी (MILVINAE),एलानिनी (ELANINAE) आ परनिनी (PENINAE) नामक तीन टा उपकुल (3 SUBFAMILIES) केर सदस्य जाति-प्रजातिसभक बोध होइत अछि । ·        माइल्विनी (MILVINAE) उपकुल (SUB FAMILY) केर सदस्य मँझलुका आकारक शिकारी चिड़ै अछि पर चिल्होरि समूहमे सभसँ पैघ होइत अछि । ई बेशी समय आकाशमे मँड़राइत रहैत (HOVERING) अछि − एक ऊँचाई तक उड़लाक बाद गुड्डी (Eng. - KITE,हिन्दी - पतंग) जेना हवामे उधियाइत रहैत अछि − तेँ अंग्रेजीमे एकरा मँड़राईबला या उधियाईबला चिल्होरि (HOVERING KITES)कहल जाइत अछि । एहि तरहक परिभ्रमण ओ सम्भवतः मृत-प्राणीक खोज लेल करैत अछि । ललका चिल्होरि (RED KITE;Milvus milvus), कारी-भूरा रंगक करिया चिल्होरि (BLACK KITE; Milvus migrans), कत्थी-लाल रंगक ब्राह्मिणी चिल्होरि(BRAHMINY KITE / RED BACKED SEA EAGLE;  Haliastur indus) आदि इएह उपकुलक सदस्य अछि । मिथिलामे बेशीतर लोक इएह कुलक सदस्यकेँ चिल्होरि बुझैत अछि वा कहैत अछि । ·        एलानिनी (ELANINAE) उपकुल (SUB FAMILY) केर सदस्य किछु छोट आकारक होइत अछि । ई आकाशमे मँड़राइत नञि रहैत अछि पर प्रायः ऊँच गाछ पर बैसि शिकारकेँ ताकैत रहैत अछि आ देखाई देला पर तेजीसँ उड़ि झपट्टा मारि शिकारकेँ लोलमे पकड़ि उड़ि भागैत अछि तेँ अंग्रेजीमे एकरा उड़एबला चिल्होरि (SOARING KITES) कहल जाइत अछि । एहि चिल्होरिसभक आँखिक रंग लाल (RED IRISH) होइत अछि आ देह केर वक्षोदर भाग (VENTRAL PART) प्रायः उज्जर रंगक होइत अछि । छोट आकार, उज्जर रंग, मँड़रएबाक गुणक आभाव आदिक कारणेँ मिथिलामे प्रायः एकरा बाज कहि देल जाइत अछि । ·         परनिनी (PENINAE) नामक उपकुलमे (SUB FAMILY) शेष बचल चिल्होरिसभ आबैत अछि । *‍३ - चाहे ओ कोनहु प्रकारक चिल्होरि हो (नञि कि गरूड़), पर ओकर उड़ान एतेक सधल ओ दक्ष होइत अछि कि बहुत भीड़-भाड़बला हाट-बजारमे सेहो बिना कोनहु मनुक्खसँ टकरएने कसाईक दोकानपरसँ मांसुक टुकड़ी या माछ वा माछक कुटिया लोलमे दाबि कऽ उड़ि भागैत अछि । मैथिलीमे - चील्हो = Abbreviated form of चिल्होरि कल्याणी कोशक अनुसार - चिलहोरि (चिल्होरि) = चील्ह, एक पक्षी = KITE = Falco chila चील्ह  = चिलहोरि (चिल्होरि) = KITE चिलहोरि / चील्ह = एक पक्षी = KITE एहि ठाम धरि तँऽ ठीक अछि परञ्च चिलहोरि / चील्ह = Falco chila बात मान्य नञि बुझना जाइत अछि । Falco chila बहुत पुरान शब्द थिक जे सर्वमान्य कहियो नञि रहल आ आब एहि शब्दक प्रयोग भ्रमित करैछ, तेँ सर्वथा त्याज्य थिक । परबा या परेबा (बाल कविता) केहेन  ई  चिड़ै छै ! दिनहिमे  उड़ै  छै । साँझ होइतहि देरी ओकरा बाट ने सुझै छै ।।*‍१ पोशुआ  सेहो  छै । बनैया   सेहो  छै । बैसितहि  सभ ठाँ ओ,  गुटर - गूँ करै छै ।।*‍२ धूसरि कारी उज्जर । गर्दनि नील हरियर । भाँति - भाँति रंग,  मुदा एक्कहि चिड़ै छै ।।*‍३ प्रशिक्षण पाबै छल । चिट्ठी पहुँचबै छल । उजराकेँ  शान्तिदूत,  जग  भरि  मानै छै ।। पौड़की सनि लागै छै । पौड़की  ओ  नञि छै । पौड़की - विपरीत ओ तँऽ, झुण्डेमे रहै छै ।।*‍४ पौड़की  कुलक ओ । हरियल कुलक ओ । माँसु लेल लोक खूब,  ओकरा  पोषै छै ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - हमसभ देखैत छी जे साँझ होइतहि देरी पोशुआ परबा उड़ैत नञि अछि जाहिसँ अनुमान होइत अछि जे साँझ भेला पर परबाकेँ देखाइ नञि दैत अछि । वास्तवमे से बात नञि । परबा विशुद्ध दिनचर (STRICTLY DIURNAL) चिड़ै अछि । ओकरा रातिमे देखाइ तँऽ दैत छै पर ओ राति कऽ उड़ैत नञि अछि । ओ रातिमे तखने उड़ैत अछि जखनि कि ओकरा उछन्नर देल जाय अथवा विशेष प्रकारसँ प्रशिक्षित कएल गेल हो । परबामे रंग चिन्हबाक शक्ति होइत अछि । ओ पराबैगनी किरणकेँ (ULTRAVIOLET RAYS) सेहो आँखिसँ देखि सकैत अछि । तहिना परबा अपश्रव्य तरंगकेँ (INFRASONIC WAVES) सेहो सुनि सकैत अछि । मनुक्खक आँखि नहि तँऽ पराबैगनी किरणकेँ देखि सकैत अछि आ नहिञे ओकर कान अपश्रव्य तरंगकेँ सुनि सकैत अछि । अन्हारमे वा कम प्रकाशमे परबाक रंग पहिचानबाक शक्ति अवश्य बाधित होइत अछि । *‍२ - गुटर-गूँ = COOS / COOING SOUND *‍३ - बनैया परबाक रंगमे प्रायः बेसी अन्तर नञि होइत अछि जखनि कि पोशुआ परबाक रंग भाँति-भाँति केर होइत अछि । *‍४ - परबा झुण्ड या समूहमे रहएबला (GREGARIOUS) चिड़ै अछि जखनि कि पौज़की आ हरियल एकाकी (SOLITARY) चिड़ै अछि। पुरना अंग्रेजीमे परबा लेल DOVE आ PIGEON दुहु शब्द प्रयुक्त होइत छल । DOVE अंग्रेजीमे जर्मन मूलक शब्द अछि जखनि कि  PIGEON फ्रेञ्च मूलक । आइ काल्हि प्रायः छोट आकारक परबा लेल आ पौड़की लेल DOVE शब्दक प्रयोग होइत अछि आओर पैघ कारक परबा लेलPIGEON शब्दक । परबा लेल किछु आओरहु शब्द सभक प्रयोग होइत अछि जाहिसँ धियापुता की, पैघहु लोकनि भ्रममे पड़ि जाइत छथि । एहेन शब्दसभ नीचाँ अर्थ सहित देल जा रहल अछि - ·       ROCK DOVE / PIGEON = WILD DOVE / PIGEON = Columba livia = बनैया परबा − ई प्राकृतिक रूपसँ समुद्री तटीय भृगु (सीधा ठाढ़ चट्टानसभक दड़ारि; उच्चारण - दड़ाइर) (SEA CLIFF), चट्टनी बहिर्निक्षेप (बहिर्गत या आगाँ निकलल भाग) (ROCK LEDGES) आ ताहि तरहक आन स्थानसभमे रहैत अछि । ·       DOMESTIC PIGEON = Columba livia domestica = पोशुआ परबा − बनैया परबाक ओ समूह जकरा मनुक्ख पोशुआ बना लेलक । ·       FERAL PIGEON = ESCAPED DOMESTIC PIGEON = Columba livia domestica = निस्तार पाओल (भागल) पोशुआ परबा − पोशुआ परबा जे कि निस्तार पाबि (भागि कऽ या फेर मुक्त भऽ कऽ) पुनः बनैया भऽ गेल हो । एहि तरहक परबा प्रायः पुर्ण रूपसँ बनैया नञि बनि पाबैत अछि । गेटवे ऑफ इण्डिया, लाल किला परिसर, कोनहु मन्दिर वा महजिदक परिसर आदि स्थानमे भेटएबला परबा एहने परबाक समूह थिक । ·       FANCY PIGEON = Columba livia domestica = कल्पित परबा − ई वास्तवमे पोशुआ परबा थिक जकरा किछु लोक अपना अनुसारेँ प्रजनन करा कऽ () अपन इच्छानुरूप रंग-रूप, कद-काठी ओ स्वभाव बला परबाकेँ उत्पन्न करैत छथि ·       WAR PIGEON = CARRIER PIGEON = MESSENGER PIGEON = Columba livia domestica = सनेशवाहक परबा − किछु विशेष प्रकारक प्रशिक्षित परबा पहिने सनेशवाहक केर काज करैत छल तेँ CARRIER / MESSENGER PIGEON कहाओल । प्रथम ओ द्वितीय विश्वयुद्धमे ओ अपन सनेशवाहकक भूमिकाक कारण WAR PIGEON कहाओल । बगेरी या बगेड़ी (बाल कविता) बगरा सनि ओ  छै देखबामे, पर  ओ  बगरा  नञि  छै । नहिञे  बगरी  पिउरा माथक, ओ  “बगेरी”   कहबै   छै ।।*‍१ बाधमे बिजुरीक ताड़क ऊपर, बैसल     प्रायः    देखबै । खेतक आढ़ि-बान्ह  पर सेहो, बैसल   कखनो    देखबै ।।*‍२ नर - बगरी उड़बाक कालमे, गाबैत छै  अपना  स्वरमे ।*‍३ धरती पर खोंता ओ बनबय, खरही   खऽढ़   भीतरमे ।।*‍४ बंगाली  चातक  कहैत छथि, अहँ  चातक  नञि बुझियौ । ई  “बगरी”  छी  मैथिलीक, एकरा जुनि चातक कहियौ ।।*‍५ कोइली  शिशु-भरण परजीवी, एकरहु   खूब    छकाबैछ । कौआ  सनि  एकरहु खोंतामे, नुका  कऽ  अण्डा  पाड़ैछ ।।*‍६ गौरसँ देखबै, एकर माथ पर, कलगी सनि  किछु लागैछ । बगरा आओर  बगेरीमे नञि, बगरी तेँ अलगहि  भाखैछ ।।*‍७ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - बगरा (बगड़ा), बगरी (बगड़ी) आ बगेरी (बगेड़ी) तीनू अलग चिड़ै केर नाम अछि- मैथिली नाँओ हिन्दी नाँओ संस्कृत नाँओ अंग्रेजी नाँओ जैववैज्ञानिक नाँओ बगरा या बगड़ा गौरैया कलविङ्क, चटक SPARROW Passer spp. बगेरी या बगेड़ी चकता या लावा पक्षी भारद्वाज पक्षी LARK, SKYLARK, esp. EURASIAN SKYLARK Alauda arvensis बगरी या बगड़ी बया पीतमुण्ड कलविङ्क BAYA WEAVER, WEAVER BIRD Baya philipinnus ई तीनू चिड़ै बगड़ा गण (Order - PASSERIFORMES) केर सदस्य अछि आ तेँ एकरंगाह सनि लगैत अछि । एकरा सामान्य अंग्रेजीमे पॅसेराइन बर्ड्स (PASSERINE BIRDS) सेहो कहल जाइत अछि । एहि गण (ORDER) केर चिड़ै सभक चाङ्गुर (CLAW) केर बनावटमे विशेष प्रकारक रहैछ जाहिमे तीन टा औंठा (TOE/S) आगाँ दिशि आ एक टा पाछाँ दिशि रहैत अछि । वास्तवमे ई चिड़ैसभक सभसँ पैघ गण थिक जाहिमे चिड़ै सभक ज्ञात जातिक (SPECIES) करीब आधासँ बेशी जाति समाविष्ट अछि । ई समस्त रीढ़धारी जीव (VERTEBRATES) केर सभसँ वैविध्यपुर्ण गण (MOST DIVERSE ORDER) सेहो अछि जाहिमे चिड़ैसभक पाँच हजारसँ बेशी जातिक (>5000 SPECIES) समावेश अछि । *‍२ *‍७ - ई चिड़ै प्रायः बाधमे बिजलीक ताड़ पर (एकसरि वा सुगवा सीकी, मएना, सिरौली आदि चिड़ै केर संगमे) या फेर बान्ह, आढ़ि, धूर आदि पर बैसल भेटत । प्रारम्भिक नजरिमे ई चिड़ै बगराक कोनहु प्रभेद बुझि पड़ैछ । परञ्च ध्यानसँ देखला पर एकर माथ, गर्दनि ओ चाङ्गुरमे औंठाक संरचना किछु अलग आ विशिष्ट बुझि पड़त । ·        माथ पर एक टा छोट-क्षीण कलगीनुमा (SHORT BLUNT CREST) संरचना होइत अछि जे चिड़ै केर अपना इच्छाक मोताबिक उठाओल या खसाओल जा सकैछ । ·        गर्दनि घुमओला पर ओकर गर्दनिक पाँखि शेष धऽड़ केर ऊपर एकटा टोपी सनि राखल बुझि पड़ैछ (देखू उपरुका चित्रमे) । ·        चाङ्गुरक पछिल औंठाक नऽह बहुत बेशी पैघ (नमगर) रहैछ (देखू उपरुका चित्रमे) । एकर टाङ्ग बहुत मजगूत होइत अछि आ तेँ ओ बेशी काल जमीनहि पर चलैत-दौड़ैत भेटत । ओकर मटियाही रंग जमीन पर ओकरा लेलछद्मावरण या छलावरण (CAMOUFLAGE) केर काज करैछ । *‍३ - पुरुष/नर बगेरी/बगेड़ी अपना स्वरमे गाबैत अछि आ से गायन प्रायः आकाशमे उड़ैत काल होइत अछि । *‍४ - बगेरी अपन खोंता गाछक डाढ़ि पर नञि बनबैत अछि । ओ खढ़-खरही आदिक अऽढ़मे जमीनहि पर घाससँ खोंता बनबैत अछि । *‍५ - बंगालीमे चातक शब्द अंग्रेजीक स्काइलार्क (SKYLARK) (Alauda spp.) चिड़ै लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि पर मैथिलीमे कदापि नञि । बंगालीमे एहि तरहक प्रयोगक (वा भ्रमित प्रयोगक)  निम्न कारण अछि - ·        चातक ओ बगेरी दुहुक माथ पर कलगी वा कलगीनुमा संरचनाक होयब ·        दुहु चिड़ैमे गायनक प्रवृत्ति होयब ·        चातक केर उपस्थिति अपेक्षाकृत बहुत कम होयब आ ताहूमे दिनमे प्रायः नञि देखाई देब ·        बहुधा साहित्यमे गायनक प्रयोजनसँ चातक ओ पपीहाकेँ एक मानि लेब, आदि । *‍६ - कौअहि जेकाँ बगेरीक खोंतामे सेहो कोइली, पपीहा, चातक आदि चिड़ै (शिशुभरण परजीवी चिड़ै) नुका - चोड़ा कऽ अपन अण्डा दैत अछि । (विशेष देखू - कोइलीक पाद टिप्पणीमे) । गायक पक्षी (SONG BIRDS / SINGING BIRDS) केर रूपमे अंग्रजी साहित्यमे लार्क (LARK) या स्काइलार्क (SKYLARK) केर ओहने महत्त्व अछि जेहेन मैथिली सहित आन भारतीय वाङ्गमयमे चातकक अछि । प्राचीन अंग्रेजीक लार्क (LARK) शब्द जँ कोनहु आन शब्दक वा विशेषणक बिना आयल अछि तँऽ ओ वस्तुतः स्काइलार्क (SKYLARK) या यूरेसीय स्काईलार्क (EURASIAN SKYLARK) शब्दक परिचायक थिक । स्काइलार्क (SKYLARK) शब्दक प्रवेश अंग्रजीमे बादमे भेल अछि आ यूरेसीय स्काईलार्क (EURASIAN SKYLARK) शब्दक तँऽ बहुत बादमे । एखनहु सामान्य अंग्रेजी साहित्य मुख्यतः लार्क (LARK) या स्काइलार्क (SKYLARK) शब्दक प्रयोग पर्यायी स्वरूपमे करैत अछि जखनि कि यूरेसीय स्काईलार्क (EURASIAN SKYLARK) शब्दक प्रयोग मात्र जैववैज्ञानिक अंग्रेजी साहित्यसभमे होइत अछि । पाठकलोकनिसँ - पहिल बात - हम गलतीसँ पहिने हिन्दीक “बया” नामक चिड़ै केर मैथिली नाम “बगेरी” लीखि चुकल छी । कृपया ओहि गलतीकेँ क्षमा करी ताहि चिड़ै केर मैथिली नाम “बगरी” या “बगड़ी” पढ़ी । दोसर बात - चातक चिड़ै केर पाद टिप्पणीमे (FOOT NOTE) हम लिखने रही जे, “अंग्रेजीक स्काइलार्क (SKYLARK) (Alauda spp.) चिड़ै केर मैथिली नाँओ एखनि धरि हमरा नञि बूझल अछि ।” ई लेखन भ्रमवश भेल छल । वास्तवमे आढ़ि-धूर-बान्ह आ बिजलीक ताड़ पर बैसल-दौगैत-कूदैत-उड़ैत बगरी नामक जाहि चिड़ैकेँ हम देखने रही आ अपना छविकर्षण यंत्रसँ (CAMERA) छवि (PHOTO / SNAP) निकालने रही (ऊपर देल गेल पहिल चित्र) से आन संदर्भमे देल गेल स्काइलार्क (SKYLARK) केर छविसँ नञि मिलैत छल । बादमे अधिक आवर्धन (HIGHER ZOOM) बला छविकर्षण यंत्रसँ (NIKON COOLPIX - S700 CAMERA, 20X- ZOOM, 16.00 MEGAPIXELS) लेल गेल छविसभसँ (ऊपर देल गेल दोसर आ तेसर चित्र) ज्ञात भेल जे दुहु चिड़ै एक्कहि अछि आ अंग्रेजीक लार्क (LARK) या स्काइलार्क (SKYLARK) वास्तवमे मैथिलीक “बगरी” या “बगड़ी” थिक । कल्याणी कोशक अनुसार - बगेड़ी = बगड़ा-सन एक खाद्य पक्षी = A TABLE BIRD = ORTOLAN, LARK (SHORT TOED) कल्याणी कोश सेहो बगेड़ी (बगेरी) केर लेल अंग्रेजीमे LARK शब्दक प्रयोग कएल अछि हलाँकि ओ एहि शब्दसँ मात्र SHORT TOED LARK केर समावेश कएल अछि । पुनः SHORT TOED LARK दू तरहक होइत अछि - ·         GREATER SHORT TOED LARK (Calandrella brachydactyla) ·         LESSER SHORT TOED LARK (Calandrella rufescens) संगहि-संग एहिमे ORTOLAN = ORTOLON BUNTING (Emberiza hortulana) नामक चिड़ै केर समावेश सेहो कएल गेल अछि । ई चिड़ै सेहो LARK या SKYLARK जेकाँ जमीनहि पर खोंता लगाबैत अछि । जे हो, पर LARK नामक चिड़ै केर कोनहु प्रकार हो, ओकर मांसु केर खाद्यप्रयोग मिथिलहिमे नहि अपितु विश्वभरिमे प्रशिद्ध अछि । जखनि कि ORTOLON BUNTING नामक चिड़ै पिञ्जरामे पोषल जाइत अछि तथा ओकर मांसु खाद्यक रूपमे प्रायः नहिञे प्रयुक्त होइत अछि । बाज (बाल कविता) मैथिलीमे   छी  “बाज”  विदेशज । नञि छी - तत्सम, तद्भव, देशज ।।*‍१ जाहि भाषासँ  “बाज”  छै आयल । ओहि  भाषामे  अर्थ छै  व्यापक ।।*‍२ “बाज - बहादुर”  पोषथि   बाज । पैघ,  छोट  आ  माँझिल  बाज ।।*‍३ मैथिलीमे  भेल  “अर्थ - संकोच” । छोटकी  शिकारी  पक्षीक   बोध ।।*‍४ छोट - मँझलुका  विविध चिड़ैसभ । गरूड़ - चिल्होरिक बाद जे बाँचल ।।*‍५ बहुविध देश  आ  बहुविध  बाज । सौंसे   दुनिञा   पसरल   राज ।।*‍६ चिल्होरिक  गण  साझी   बाज । तेँ किछु गुण सझियो छै व्याप्त ।।*‍७ छोट  चिड़ै  केर  करैछ शिकार । बेङ्ग आ गिरगिट  सेहो आहार ।। दिनचर - चिड़ै - शिकारी  ढीठ । सुरुजक दिशि कऽ  बैसए पीठ ।।*‍८ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - “बाज” - शिकारी चिड़ै केर अर्थमे प्रयुक्त होमए बला ई शब्द मैथिलीमे “विदेशज शब्द” थिक अर्थात आन भाषासँ (संस्कृतक अतिरिक्त आन भाषा) मैथिलीमे आयल अछि । *‍२ - शिकारी चिड़ै केर अर्थमे प्रयुक्त होमए बला “बाज” शब्द मैथिली आ आन भारतीय भाषासभमे “अरबी भाषा” सँ आयल अछि । प्राचीन अरबीमे बाजक अर्थ बेस व्यापक छल जाहिमे प्रायः गरूड़, चिल्होरि, गिद्ध आदि समस्त शिकारी चिड़ै आबैत छल । *‍३ - नेनपनमे गाम-घऽरमे सुनल बहुतहु खिस्सा-पिहानीमे “बाज बहादुर” नामक पात्र रहैत छल जे भाँति - भाँति केर बाज पोषैत छल - छोटका बाज, मँझलुका बाज आ बड़का बाज । ई “बाज” शब्दसँ बोध होइ बला शिकारी चिड़ैसभक व्यापकताक परिचायक छल । (ध्यातव्य जे अरबी भाषामे गरूड़, चिल्होरि, गिद्ध आदि नञि होइत अछि − मैथिलीमे शिकारी पक्षी सभक ई सब समूह “संस्कृत” भाषाक देन छी − तत्सम वा तद्भव रूपमे) । *‍४ *‍५ *‍६ - मैथिली भाषामे “बाज” शब्द तँऽ प्रयोग होइत अछि, पर ओकर अर्थ मूल अर्थसँ कम व्यापक अछि । व्याकरणमे एहि तरहक घटनाकेँ “अर्थ सङ्कोच/संकोच” कहल जाइत अछि । जखन कोनहु शब्दक पहिलुक अर्थसँ एखनुक अर्थ संकुचित (कम) भऽ गेल हो तँऽ “अर्थ संकोच” तथा जँ पहिलुक अर्थसँ एखनुक अर्थ व्यापक (विस्तृत) भऽ गेल हो तँऽ “अर्थ प्रसार” कहबैत अछि । गिद्ध, गरूड़ आ चिल्होरि केर अतिरिक्त जे शिकारी पक्षी बाँचल से वस्तुतः मैथिलीक “बाज” शब्दमे समाहित भेल । तेँ अंग्रेजीक FALCON, HAWK, BUZZARD, OSPREY, HARRIER, KESTREL आदि शब्दसँ बोध होइ बला शिकारी पक्षीसभ प्रायः मैथिलीक “बाज” शब्दमे निहित अछि । अनुवाद साहित्यमे प्रायः अंग्रेजीक HAWK शब्दकेँ बाज शब्दक समकक्ष मानल जाइत अछि । अंग्रेजीक HAWK शब्दसँ निम्न चिड़ैसभक बोद होइत अछि - ·         ACCIPITRINE HAWK = TRUE HAWK = GOSHAWKS + SPARROW HAWKS + OTHERS = members of Sub Family ACCIPITRINAE ·         BUTEONINE HAWK = BUZZARDS = members of Sub Family BUTEONINAE मोटा-मोटी मैथिलीक “बाज” शब्द अंग्रेजीक  शब्दसँ वृहत् अछि आ अरबी भाषाक “बाज” शब्दसँ न्यून अछि । मैथिलीक भाषाक “बाज” शब्द निम्न चिड़ैसभकेँ समाहित करैछ - ·        ACCIPITRINE HAWK = TRUE HAWK = GOSHAWKS + SPARROW HAWKS + OTHERS = members of Sub Family ACCIPITRINAE ·        BUTEONINE HAWK = BUZZARDS = members of Sub Family BUTEONINAE ·        HARRIERS = members of Sub Family CIRCINAE ·        OSPREY = Pandion haliaetus (Family - PANDIONIDAE) ·        FALCONS, KESTRELS & CARACARAS = members of Family FALCONIDAE *‍७ *‍८ - दिनचर = DIURNAL = दिनमे शिकार कएनिहार चिड़ै = तेँ सुरूज दिशि पीठ कऽ कऽ बैसैत अछि ताकि शिकार पर पड़ि रहल सुरूजक किरिण परावर्तित भऽ कऽ सोझेँ ओकर (गरूड़, चिल्होरि वा बाज केर) आँखि पर पड़ओ । लुक्खी (बाल कविता) छोट जीव, बड़ मोट छै नाङ्गरि, पर ओ खिखीर नञि छै । अपना  दिशि  सौंसे  भेटैत छै, बाड़ल  कत्तहु  नञि छै ।। पैघ  छै  पछिला  टाङ्ग  दुहु, अगिला बड़ छोट रहै छै । छोटकी  कंगारू  सनि  लागए, पर  कंगारू  नञि  छै ।।*‍१ फऽल - फूल - दाना   खाइए, ने  घास - पात रूचै छै । अगिला पएरकेँ  हाथ बना ओ, फऽल - फूल  पकड़ै छै ।।*‍२ भूरा   रंगक   देह    ओकर, वा  रंग जेना मटियाही । पाँच या  तीन टा  भेटत पीठेँ, उज्जर - उज्जर धारी ।।*‍३ टी - टी, टी - टी ध्वनि तीव्र, ओ बेर - बेर  करै छै । संगहि नाङ्गरि उठा कऽ ऊपर, हावामे ओ  डोलबै छै ।।*‍४ आबहु ने चिन्हलहुँ तँऽ कहै छी, “लुक्खी” ओ कहबै छै । धारीबाला    भारतमे     आ, आस - पड़ोस भेटै छै ।। विश्वमे सौंसे पसरल लुक्खी, बहुत प्रकारक होइ छै । रंग जे हो, पर पीठ पर धारी, अन्तऽ नञि भेटै छै ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - कंगारू ऑस्ट्रेलियामे पाओल जाय बला एकटा जीव अछि । विदेशी जीव रहितहुँ आइ - काल्हिक बच्चासभ ओकरासँ खूब परिचित रहैत अछि - कारण थिक, आजुक पोथीसभ (“K” for KANGAROO), क्रिकेट नामक खेलक प्रचलन आ श्रव्य ओ दृश्य मिडिया पर कंगारूक विशेष चर्च । “कंगारू”, “जिराफ” आदि शब्द मैथिलीमे विदेशज शब्द भेल । मैथिली सेहो ओहि तरहक शब्दसभकेँ ठीक ओहिना आत्मसात कएने अछि जेना कि हिन्दी ओ आन भारतीय तथा विदेशी भाषासभ । *‍२ - एहि जीवक अगिला दुहु पएर छोट - छोट होइत छै जकर उपयोग ओ खएबा काल कोनहु बस्तुकेँ पकड़बाक लेल करैत अछि । *‍३ - प्रायः उतरबारी भारतमे भेटए बला लुक्खीक (NORTH INDIAN PALM SQUIRREL; Funambulus pennantii) पीठ पर पाँच टा उज्जर रेखा (धारी) होइत अछि जखनि कि दक्षिनबारी भारतक लुक्खीक (SOUTH INDIAN PALM SQUIRREL; Funambulus palmarum) पीठ पर तीन टा । *‍४ - ई जीव (लुक्खी) बैसल - बैसल “टि - टि” केर एक टा विशिष्ट ध्वनि निकालैत अछि आ संगहि अपन नाङ्गरिकेँ ऊपर उठाए हवामे झुलबैत रहैत अछि । *‍५ - मात्र भारतीय लुक्खीक पीठ उज्जर धारीसँ युक्त होइत अछि । विश्वमे भेटए बला आन लुक्खीक पीठ पर धारी नञि रहैत अछि । शिकरा या सिकरा (बाल कविता) शिकरा छी एक बाजक रूप ।*‍१ सिकरा लीखथि बहुतो भूप ।।*‍२ पाँखि छोट  ओ  गोलाकार । छोट चिड़ै आ आन शिकार ।। बगरा ओक्कर प्रिय शिकार । बेङ्ग आदि छै सेहो आहार ।।*‍३ उज्जर रंगक पेट आ छाती । ताहि पर कत्थी रंगक धारी ।।*‍४ नर-शिकरा केर लाले आँखि । स्त्री-शिकराक  पिउरा आँखि ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - “शिकरा” एक प्रकारक बाज अछि । *‍२ - “शिकरा” शब्दक निस्पत्ति “शिकार” शब्दसँ भेल अछि । मैथिलीमे किछु लोक “शिकरा”केँ “सिकरा” लिखैत छथि पर “शिकार”केँ“सिकार” एखन धरि नञि लिखल जाइत अछि । *‍३ - छोट चिड़ै − विशेष कऽ बगरा (SPARROW) − शिकराक सभसँ प्रिय शिकार थिक । ओना आनहु छोट चिड़ैसभ, छोट सरिसृप (REPTILES,जेना कि - गिरगिट आदि) आ छोट उभयचर (AMPHIBIANS, जेना कि - बेङ्ग, भेंक आदि) वर्गक प्राणी आदि शिकराक शिकार बनैत अछि । *‍४ - दुहु लिङ्गक शिकराक वक्षोदर भाग (VENTRAL / ANTERIOR PART) उज्जर रंगक होइछ आ ओहि पर भूरा-कत्थी रंगक अड़ीय पट्टी(TRANSVERSE BANDS) रहैछ । *‍५ - नर शिकरा आँखिक रंग नारंगी वा लाल होइत अछि जखनि कि स्त्री-शिकराक आँखिक रंग पिउरा । सुगवा सीकी या सीकी सुगना या सुगवा कीड़ीखौक (बाल कविता) देखियौ बाबू  !  सुग्गा हउए, सुग्गा  नञि  छी - बौआ रे ! सुग्गे सनि केर रंग लागै छै, पर नञि सुग्गा - दैय्या गे !! *‍१ हरियर सुग्गा पाँखिक सनि आ, फेंटल किछु  आनहु हरियर । आन रंग  ककरहु छै  फेंटल, आन  छटा केर छै हरियर ।।*‍२ एक्कर नाङ्गरि गौरसँ देखियौ, सीकी सनि किछु बहकल छै ।*‍३ सुग्गा  पाँखिक  रंगक  बेशी, “सुगवा सीकी”  कहबै  छै ।। बाधमे, चऽड़मे, ठूँठ गाछ पर, बिजलीक ताड़ पर छै बैसल । खन उड़ि-उड़ि धरती पर आबै, खनहि ओतहि देखब बैसल ।। कीड़ा आओर मकोड़ा खाइतछि, तेँ कूदि  धरती पर  आबैछ । मधुमाछी, बिढ़नी आ फतिंगी, सभकेँ  लोलसँ  धऽ दाबैछ ।।*‍४ पर सभसँ बेशी रुचैत अछि, खाएमे  एकरा “मधुमाछी” । अंग्रेजीमे   नामे   एक्कर, पड़लै  “भक्षक मधुमाछी” ।।*‍५ लोल लाल  सुग्गा केर सुन्नर, फलाहार  केर  लेल  बनल । एकर लोल  छै  कारी - कारी, एकर आहारक योग्य बनल ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - सुगवा सीकी (BEE EATER) नामक चिड़ै केर जे जाति (SPECIES) अपना दिशि पाओल जाइत अछि तकर पाँखिक रंग अपना दिशि पाओल जाय बला सुग्गाक पाँखिक रंग सनि होइत अछि । एकर इएह रंगक कारण एकर मैथिली नाममे “सुगवा / सुगना / सुग्गा” उपसर्ग वा प्रत्यय (PREFIX / SUFFIX) केर रूपमे लागल अछि । मैथिलीअहि नञि, आनहु भाषा - जेना कि मराठी भाषामे एकर एकटा पर्यायी नाम“पाणपोपट” अछि, जकर अर्थ भेल “पात केर बनल सुग्गा” या “पात सनि हरियर सुग्गा” । संस्कृतक “पत्रिंगा” (पत्र = पत्ता या पात) केर सेहो एहने सनि अर्थ अछि जखनि कि मैथिली आ हिन्दीमे प्रयुक्त पतरेंगा आ पतरिंगा एकरहि तद्भव रूप अछि । *‍२ - अपना दिशि बहुतायतमे जे सुगवा-सीकी चिड़ै (BEE EATERS / BEE EATER BIRDS) भेटैत अछि तकर गर्दनि आ धऽरक रंग सुगापंखी हरियर होइत अछि जखनि कि माथक रंग नारंगी-हरियर जखनि कि मूँहक निचलुका रंग हरिताभ नील (हल्का फिरोजी सनि) होइत अछि । एकर नाम तेँ हरियर सुगवा सीकी वा सुगापंखी सुगवा सीकी (GREEN BEE EATER / LITTLE GREEN B. E. / ORIENTAL G.B.E.) कहि सकैत छी । सुगवा सीकीक आन जाति सभमे सेहो हरियर रंग अवश्ये रहैत अछि पर हरियरक आभा बदलैत जाइत अछि ओ नीलाभ-हरियर भऽ जाइत अछि । हरियरमे नील रंगक मात्राक अनुसारें ओकर रंग गाढ़ हरियर वा नील हरियर भऽ जाइत अछि । यूरोप ओ अफ्रिकामे पाओल जाए बला जातिमे नारंगी ओ पीयर रंगक प्रमाण सेहो बढ़ि जाइत अछि । *‍३ - एहि चिड़ै केर नाङ्गरिसँ दू टा सीकी सनि पातर संरचना निकलल रहैत अछि । एहि चिड़ै केर जे प्रजाति अपना दिशि बेशी भेटैत अछि से सुगापंखी रंगक होइत अछि । तेँ सम्भवतः एकर नाम “सुगवा सीकी” या “सीकी सुगना” अछि । *‍४ - ई चिड़ै हवामे उड़ैत कीड़ा - मकोड़ा, चुट्टी, बिढ़नी, पचहिया आ मधुमाक्षी(-छी) सभकेँ पकड़ि लोलमे दाबि गीरि (खाए) जाइत अछि । तेँ एकर नाम “सुगवा कीड़ीखौक” सेहो पड़ल होयत । *‍५ - एकर प्रतिदिनक आहारक बीस प्रतिशतसँ (20%) छियानबे प्रतिशत (96%) धरि चुट्टी, बिढ़नी, पचहिया आ मधुमाक्षी(HYMENOPTERANS) भऽ सकैत अछि । ताहूमे मधुमाक्षी(-छी) (Apis dorsata) एकरा विशेष प्रिय अछि । तेँ अंग्रेजीमे एकर नाम “बी ईटर”(BEE EATER) छैक जकर शाब्दिक अर्थ “मधुमाक्षी(-छी) भक्षक” होइत छैक । *‍६ - सुग्गा आ एहि चिड़ै केर लोलमे बहुत पैघ अन्तर होइत छै । सुग्गा पुर्णतः फलाहारी (FRUGIVOROUS) चिड़ै अछि आ तेँ ओकर लोल ओहि तरहेँ बनल अछि । सुगवा-सीकी चिड़ै केर आहार ऊपर वर्णित अछि आ तेँ ओकर लोल ओही तरहक बनल छै। अब्दुर रज्जाक राइन कता कतेक रहब परदेसमे लौट आबु आबो घर  प्रीतक' चार चुबिरहल अछि आबु आबो घर  कते रुकु देख-देख कs कोरोसब गनैत ढहल जाइय टाटोसब सम्हारू आबो घर कता देखू केहन मोडर्न ज़माना अछि  बोतलक पाइन और पाकेटमें खाना अछि  केहनकs बदलल जीबन शैली लोकक  भोजन आधुनिक मुदा सोंच पुराना अछि। गजल देश अहाँ संगे ,प्रदेश अहाँ संगे जे बीतल ओ पल बेश अहाँ संगे दिलमे रहलौ एना दिलस नै जाइछि किछ रहलय जैन शेष अहाँ संगे बाजूने किछ आबो कहूने किछ लगैत रहैय चलैत ठेस अहाँ संगे मोन हमरो होइय उइर जैतो गगन हार्ली हम स्नेहमे बस रेश अहाँ संगे रही-रही कते कहू फेर कोना कहू पल भरके झलकमे संदेश अहाँ संगे गजल काँट सs भरल तलाबके बाते नै करू दिल तोइर गेली जनाब के बाते नै करु . सियाह भेल बादल बर्षलै नै कोना धोखा ओ दैत गेली तनाबके बाते नै करू . आइर बनोने ओ बड डैर बनोने ओ जं बात करी त सबाबके बाते नै करू . सीमान पs अपने ओ बदनाम अपने भs ओ दोष केकर पूछी टकराबके बाते नै करू . अन्हर उठल कतउ बज्जर गिरल कतउ लछ्तर संगे ओ पथराबके बाते नै करू . ओ रोग एहन देली बिरोग एहन देली बस जिबित शरीर खराबके बाते नै करू . अनजान रही ओ बिरान रही हम लs दs किछ जबाबके बाते नै करु . नै ओ फासी दs गेल नै प्राण लगेल तलबार गर्दन पs नबाबके बाते नै करु . बात ओकर एहन जज्बात ओकर केहन ओकर स्नेहक धुन गुलाबके बाते नै करू गजल समाद अछि ओकरा, कुशल छि अहि ठाम चिंता जुनी किया एकरा, कुशल छि अहि ठाम . की भेलैन जखन कांट लगौलेन हमरा बाटमें  सोनित सsपैर रंगल तकरा,कुशल छिअहि ठाम  . बेचैनीके यादमें ओ आबे संगे जखने शांझ  साथसंग बस होबैत जेकरा ,कुशल छि अहि ठाम  . बहिगेल कोसी बलान जखने ह्र्दयके नयन सं कानियोक के सुनत केकरा ,कुशल छि अहि ठाम  . देख लेब जखन धोखा सs अगर हमरा लाशके  नोर बहा नही करब नखरा ,कुशल छि अहि ठाम गजल अहाँसंग स्नेह जोडs लेल बड्ड कठिन अछि  अहाँसंग चित मोडs लेल बड्ड कठिन अछि  . ओ जोडल, पैघ नाता नहीं सोनित के ओ किरिया तोड़s लेल बड्ड कठिन अछि .  आबो ह्र्दयके फूल फूलबाक छल मुदा ?  पथ्थर दिल फोडs लेल बड्ड कठिन अछि  . बान्हैत जकडलौं अनेक भिन्न -भिन्न फंदामें रहल किछ याद छोड़s लेल बड्ड कठिन अछि  . महँग जिनगीमें सेनुरक ओते मोल किया ? साँच प्रीत बिच भोड़s लेल बड्ड कठिनअछि गजल अहाँ जाई छि त जाऊ अपन याद लेने जाऊ  एक बेरक भेटमें हमर नहीं करेज लेने जाऊ नहीं तरेगन अहाँ सन नहीं चांन अहा सन  मधुर इजोत संग हमर दुनु नयन लेने जाऊ अहाँक पैरक आहाट संग मुस्कान आबैय  ओ आहटसंग नहीं हमर मुस्कान लेने जाऊ कहबाक रहल मोनमे कोना कहूकी भsगेल ओ शब्द हमर मुदा ,अपन साथ लेने जाऊ अब्दुरक किछ अहाक उपराग नहीं कहत  अहाँ अपने अपन सबटा उपराग लेने जाऊ गजल बनल एक सवालक जवाफ छि अहाँ बसन्तमें फुलल एक गुलाब छि अहाँ उठल तूफान भs मोंनक हियासंग  साजल हमरा लेल उ सबाब छिअहाँ देखैत हम जागलमें जेना देखलेलौ नहीं सुतल बेरक सुंदर खाब छि अहाँ हमर प्रीत मिलल जंs अहाक नैनासंग  देखैत रहलौ एक खाश जनाब छि अहाँ 'अब्दुल'क ह्र्दयमें फुलल फुलबारीस किए तोइरक फूल बनलौ बेताब अहाँ मुसहर डोम आ चमार देश डूबैत बेर  सरकार गिरैत बेर  सरकार बनैत बेर  ओ बिपन्नताक चपेटमें परल  मुशहर अहि देशक  अहि समाजक  अहि बस्तीमे  अपन स्थान खोजी रहल अछि  लेकिन नहीं रहबाक ठेकान  नहीं खेबाक ठेकान  नहीं कमेबाक ठेकान  नहीं अस्तित्वक ठेकान सs  दर दर ठोकाईत रहलौ  अहिलेल की हम गरीब रहिए गेली  गरीबी हमर अभिशाप रहिएगेल। महाराज कहियो सुरुज छाप संग  कहियो गाछी छाप संग  कहियो गाई छाप संग  कहियो हाथ छाप संग  झंडा लs जिंदाबाद- मुर्दाबाद ! आ अनेक अनेक नारासंग  गाराके ढोल बजाबैत रहलौ  अनेक अनेक महाराजा सब हक़  दलानमें तs मकानमें त कहियो  मरलाहाके मशानमें  लs अपना गरिबिके बिबसतामें अहि देश क ओ महरासब  अहिलेल की हम गरीब रहिए गेली  गरीबी हमर अभिशाप रहिएगेल। कोना कहू केकरा कहू कहिया  नहीं कहलौ अहाँ सबके  अपन बीती ओ हमरा संग भेल  अत्याचार सब जे लाज सs सरम सs अपना के बिपनन्ता संग नुकाबैत रहलौ  अपना के बहुत निंदक नहीं बनी  छुपाबैत रहलौ अनेक अनके  बिबसता संग हम अहाँक  ग्रामीण खेहरू डोम  जे फेकैत रहलौ अहिके कैल गंदा सब अहिके देहारी सs अहिलेल की हम गरीब रहिए गेली  गरीबी हमर अभिशाप रहिए गेल। प्रयास प्रेमी मैथिल (साहित्यिक नाम), राम नारायण मेहता (वास्तविक नाम), पता :- डुम्राहा- ९ , सुनसरी , नेपाल, अखन- मलेशिया १.हमर गुडिया रानी ------------------------ अंगनाके हमर गुडिया रानी आइ भ'रहल विदाई छै ! माएके करेजा फाटल नयना नीर बहाई छै !! रहैत ओकरा हमर अंगनामे हरदम चाँन चकोर रहैय ! साँझ बिहान हरदम ओ बाबु माएके कहल करैय !! बेटा बेटीमे नै कोनो अन्तर त' किए बेटिये होएत पराई छै ! बेटी माए बापके आशिर्वाद मांगैय बेटा धन लेल करैत लडाई छै !! सुनैत समाद बेटी दौरैत चलि आवैय छै ! माए बापके दु:ख नै बुझै बेटा डिस्कोमे धन बहावैय छै !! आँखीके सामनें मे बेटी भ'जाएत छै सियानी ! थारीमे भात दैय छै लोटामे भरिके पानि !! देख कऽ बेटीके चाँनसन चेहरा माए बापके रहल नहीं जाइ छै ! अंगनाके हमर गुडिया रानी आइ भ'रहल विदाई छै !! २.शादी भ'गेल -------------------- नयनक' चौपारि पऽ प्रेमक' बैसार भेल किछु बजबो नें केलु हम तै सँ पहिनें दिलक' फैसला भ'गेल नै किनको सम्बोधन नहिं कोनो वादप्रतिवाद स्नेहक' कलम सँ उपस्थिति लिखा गेल प्रस्तावक' कार्यनयन उ तेजी सँ शुरु भेल अन्त्यमे काजक' स्वरुप ओकरा किओ दोसरके संगमे, हमर रेखाके संगमे शादी भ'गेल ! ३.भाइ बहिनके खुन चुइस चुइस ----------------------------------------- वसन्तक' बहार एलै रंगक' त्योहार फगुवा गेलै ! मनमे अनेको सवाल उब्जैय छै आँइखक' आगा उदासी किए ? कोनाके कही हम जे होली नै मनेलौं मातृभुमि पऽ रंग अबिरके वर्षा भेवें केलै ! कोना कही हम होली मनेंलौं अपनें माँ बहिनके उजर नुवां पहिरें पडलैय !! कोना करि देशक' हृदयके अवलोकन आँइख सँ अपनेमनेए नोर खसऽ लागैय छै ! पडोसियाके दोष लगेनाइ अनुचित छै जखन अपनें भाइ गद्दार बनल छै !! कहैय छलैं अहीबेर नै त' कहियो नहिं देखूँ सब भेलैय बुढिया फुइस ! अखन ढिढ़ फुलाके वैसल छै भाइ बहिनके खुन चुइस चुइस !! ४.असगर भेलियै --------------------- दोस्त सब दोस्तीयारी करैय छै ! प्रकृती आ जीनगी गद्दारी करैय छै !! बाधा आ अडचन संग लडि रहल छी ! समयके पाँछा दोडि रहल छी !! भुख पियास सब किछके तियागी ! बनलौं हम जीनगीके अनुरागी !! जीनगीके बाट कटैत नहिं कटैय छै ! हर डेग पs दु:ख आ दर्द भेटैय छै !! दु:ख, दर्दके संग दोस्ती केलियै ! सब संग बिछैडके असगर भेलियै !! ५.प्रेम बिमारी ----------------- अइछ गोर वदन अहाँके संगे आउर केश कारी ! देखि कऽ पुनम चेहरा हम भ'गेल छी बिमारी !! अहाँ मन मोहिनी, मृग नयनी किए करै छी एना ! अहीं लऽ प्रेम पिज़डामे बन्द भेल यौ देखूँ यी मेना !! मधुरस अइछ भरल अहाँके गुलाबी ठोरमे ! होएत रहैय ये अहाँके चर्चा नगर चारू ओरमे !! मिठ-मिठ बोली बाजिके अहाँ हमरा फसा लेलियै ! दिल लऽके हमरा किए पिज़डामे बन्द केलियै !! उडऽ चाहैय छी हम खुला गग़नमे प्रिय खोलूँ केबार ! घुमिके आयब फेर हम करऽ लेल अहाँ संग प्यार !! कतेक दिन बन्द कऽके राखब हे प्रिय दुलारी ! अहाँ संगमे नेह लगाके हम भ'गेल छी बिमारी !! ६.हमर जान अहाँ के जान मे ----------------------------------- नयन अछि बेचैन मोन पियासल ! जेहो लगमे छेल ओहो दूर भागल !! खोजैय छी त' भेटैय ये सुखल नदी नाला ! अहिंके याद करिके हम जपैय छी प्रेमक' माला !! दिन अनहार लागैय यें कहूँ आब हम की करि ! अहाँ बिनू हम आब अही कहूँ जीबि की मरि !! अहाँ रहीं त' इजोत रहैय सगरो घर अंगना मे ! अहाँ के सुन्दर रुप अगाडी दाग बुझाई छेल चाँन मे !! कतs चलि गेलौं प्रिय ? हम खोजैय छी खेत खरिहान मे ! घुइम के चलि आउ प्रिय अइछ हमर जान अहाँ के जान मे !! ७.तडपब हमर प्रेम ल' ----------------------------- प्रित लगेलौं अहाँ सँ हम सब संग नाता तोइर के ! अहाँ किए भेलौं दोसर के हमरा सँ मूह् मोइर के !! अहाँके हम पुजैत रहिं दिलके फूल लोहिर के ! हमरा भिखारी बना देलौं नसिब हमर फोइर के !! कुन जन्म के बदला लेलौं हमर दिल तोइर के ! दिल मे बनेलौं घाँह अहाँ ऊ नैं छुटै छै किछो कईर के !! यौ पछिता रहल छी हम अहाँ संग पाछा पइर के ! दुनियाँ अनहार भ'गेल हम जीबि कोना की कईर के !! यौ कहियो खुश नहिं रहब हमरा सँ अहाँ बिछैर के ! तडपब हमर प्रेम ल' अहाँ हम कहैय छी हल्ला कईर के !! ८.कोरियाहा बरद ---------------------- हाथमे छै ज्ञेनिहाँ लाठी दुवार पऽ गाडल हरोठा बाँसके मेह ! दूइटा पाख घुमल से दुखावे लागल कोरियाहा बरदके देह !! झारन दैय बखत सब स पहिनें खोह बनाके खाए आहार ! दाउनी केनिहारके परेशान कऽदेल फेकैत फेकैत साहार !! खोह तोडैत देखि कऽ गिरहतबा जूनाँ स' देलक मुहँ बान्ही ! हाँकैत दाउनी एके डेगमे गिरावे लागल मुहँसे लेर, पोटा, पानी !! यी दाउनी खोलैत सबसे पाँछा आहार खाए खातिर रहैय ये ! एकरा पिठ पऽ पडैत ज्ञेनिहाँ लाठीके चोट यी लंक ल'के भागैय ये !! ९.नहिहरके मान, सासुरके सम्मान आ साजनके प्राण ---------------------------------------------------------------- यी रिस्ता केहेन अछि जे छोडऽ परैय ये नहिहरके संसार ! चुटकी भर सेनुर सँ अपन होएत अछि दोसरके संसार !! भाइ बाप विदाई करैत कुलके मान रखियह बेटी कहैय ये ! जाएत ससुराल सास ससुर पुत्रबधुके आशिर्वाद दैय ये !! संग लाविते हमरा हमर साजनसे जे रहल नहिं जाइ ये ! सुहाग राति कोहबर घरमे हमरा सँ की बात करैय ये !! अहाँके मधुर मुस्कान देखिते हमर मन डोलि गेल ! अहाँके आविते प्रिय अंगना दुवार सिगरो इजोत भ'गेल !! की जाँदु अइछ अहाँमे जे सगरो समाज करैय ये गुणगान ! आब त अही अछि हमर सुखचाइन प्रिय अही अछि प्राण !! कृष्ण पक्षके पुनम राति अहाँ आविते संग ल'के एलौं ! जन्म देनिहार माँ बापके छोडिके अहाँ हमर भ'गेलौं !! १०. फुलवारीमे एक फूल रहैय ------------------------------------- फुलवारीमे एक फूल रहैय खलखल हँसैत दुतियाँके चाँन जकाँ जीनगीमे इजोत हेत से सपना देखलूँ पुनमके राइत जकाँ ! ओ फूल इशारा केलक हम ससैरके लगमे गेलूँ फेर ऊ हमरा सँ कहलक हमरा तोइरके ल'चलूँ हम पुछलियै किए ? ओ मुश्कुरा कऽ बोलऽल अहाँके पिड हमरा पसंद अछि हम कहलियै होतै ! किछ दिनके वाद फूलक' लेल बात करऽ हम माली लऽ जाइत रहिं किछु दूरें स' नजर पडल फुलवारी उजरल जकाँ दोसर फूल सँ पुछली ओ कहलक हमरा सँ ऊ फूल दोसरके पिड पऽ चढिगेल १० दिन अगाडी किओ दोसर तोइर ल'गेल ! सुनिते हमर सुरुज पऽ करिया बादल लाइग गेल मुसलधार बर्षा बर्सल नयनके धारमे बाइढ चलि एल बचल-खुचल सब भाइंस गेल रुकल बर्षा त' सबके नजरमें यी "प्रयास" असगर रहि गेल ! ११.धोती ------------ धोती भगवानके पहिरन अछि मिथिलाके शान ! नित दिन पुजा कर जाइ पहिर धोती जज़मान !! धोतीके महत्व अछि बड्ड मिथिलामे चारु ओर ! दुल्हा, दुल्हिन माथ पऽ ल'के करऽ जाइ छै मटकोर !! सबकिओ मिल करियौं धोतीके सम्मान ! बियाहमें धोती पहिरके होएत अछि सेनुर दान !! मिथिलाके सदियो सँ धोती अछि आन ! सब किओ पहिर धोती बढाऊ मिथिलाके शान !! अपन मिथिला पऽ अछि हमरा गुमान ! दुई हाथ जोडि सबकें "प्रयास" करैय ये प्रणाम !! १२.हुनकें ---------- भुख पियास सब हेराए गेल हुनकें के खोजी करैत ! पायर पिरा गेल जीनगीके डगहर चलैत चलैत !! हुनकर डेरा अछि कतऽ से जाइ छी सबकिओ के पुछैत ! नितदिन ओकरें पुजै छी भोरेंभोर सुरूज उगैत !! यौं बतीस बसन्त बीत गेल हुनकें बाट तकैत ! मठ-मन्दिर घुमैय छी हम हुनकर नाम जपैत !! अछि सबहक मालिक ओ , छै तीनों आँइख सँ देखैत ! सब काल कष्ट दूर भागैय छै हुनकर नाम लैत !! आब साँझ बिहान कटैय हमर हुनकें नाम लैत ! यौं अहूँ हुनका मनमें बैसाबूँ सब दु:ख हरिलेत !! १३.हमर दिल अहींके याद करैय ये -------------------------------------------- नीत दिन अहाँके यादमे नयन हमर मोती बर्षावैय यें ! यौं अहाँ परदेसीके एकोरति नैं हमर याद आवैय ये !! ननद हरदम झघरा करऽ लेल दाउपेच खोजैय ये ! सासु हरदम गारि पढैय छै आ कूलक्षिणी कहैय ये !! यौं बौवाके अनमनामें जलखैयमे बेर भ'जाए छै कि ! ससुर दिअर दुनूँ मिलिके हमरा पऽ जुवाली सुर्रैय ये !! आब जि पिता गेल यी जीनगीसे, मन होइ छै डुबि मरी ! की करि बौवाके रुप, अहाँके स्नेह संग नहिं छोडैय ये !! जुनि रहूँ विदेश प्रिय अहाँ छोडि आबूँ अपन गाम यौं ! यौ घरबामें सजनी अहाँके अहाँ बेगर दु:ख काटैय ये !! करियौ नहिं देरी साजन कहीं भ'जेत अबेर यौं ! हरदम हरक्षण हमर दिल अहींके याद करैय ये !! १४.जीनगीके मेला ------------------------- यी जीनगीके मेला सँ की ल'के जेवैय छोडि दियौं किछ अहिठाम अमर अजर भ'जेवैय ! बड्ड नमहर यी मेला फेर नहिं आब पेब दोसरके पाछा नैं लागू कहिं कतौं हराजेब ! देखूँ मेलामें छै कतेग रंग बिरंगके मिठाई किओ अपनें ढिर भरैय छै किओ दोसरके खिलाई ! कहिं मेलाके रम-झममे अहाँ अपनो नें बिसैएर जायब दुनियाँके पाछा पडिके अहाँ जितें मुर्दा भऽजायब ! अहिठाम सब अवसरवादी छै दोसरके पसिनाके कमाई खाए छै अपन पेट भरैयके लेल दोसरके आहार छिनैय छै ! अहिठाम दारु पिबिके सब किओ सिसि फोडिके फेक्नें ये अहाँके दोषी बनावके लेल कुकर्मके जाल बिछौनें ये ! यी मनुखक' जीनगी अछि उजरा सफेद रंगके चादर दाग लाग से बचाबूँ एकरा सदैव करू एकर आदर ! नहिं एलौं किछु ल'के नहिं जायब किछु ल'के रोपू शान्ति, सतविचारके बिहैन रहब सदा अमर अजर भऽके ! १५.चेतनाके दिप जलाबूँ ------------------------------ मिथिला गगन खाली छै आहाँ तारा बनिके आबूँ ! चमचम चमकैत आहाँ हमरा दिल सँ सजाबूँ !! सब मेघ, कुभेसके आहाँ कात लगाके आबूँ ! भोरक' सुरूजक' लाली सँ अहाँ हमरा सजाबूँ !! मुर्झाएल यी गाछमें अहाँ खाँध पाइन लगाबूँ ! फेर स' रंग बिरंके फूल अहाँ फुलाबूँ !! यी रेगिस्तान सनके भुमी पऽ अहाँ प्रेम रस बर्षाबूँ ! मिथिलामेमें लागल मैलकें अहाँ दिल सँ पखारू !! ईर्श्या विभेदके तियागी सदभावके गीत गाबूँ ! घर-घर में जाइके अहाँ चेतनाके दिप जलाबूँ !! १६.जीवन हमर उद्धार करू ---------------------------------- हमर नयनमे अपन नयन मिलाके देखूँ अपन मनके दिया जला के देखूँ हम अहींके लेल बनल छी हम अहींके राहमे बैसल छी ! पल अनमोल सब बितल जाइ अहाँ बेगर हमर मन घबराइ हम त' ओकरा अपन देवता बुझै छी तहियो हमरासे किए ऊ रुसल आइ ! मांग हमर पुरा खाली छै ओठके सुखिगेल लाली छै आबू सजना आसन करू हमर दिलके आसन अहीं लेल खाली छै ! समय देखूँ बितल जाइ छै हमर मोनक' आशा पुरा करू लाल सेनुर सँ' हमर मांग रंगिके जीवन हमर उद्धार करू ! १७.हमर जीनगी लुटि ल'गेल ---------------------------------- आशक' डोर टुटि गेल , मनके मित छुटि गेल , सीनेहक' नोरके वर्षा शुरू भेल , लागल मेघ भादो आविगेल ! तन भिजल पुरा मन भिजल , डबरा सबरा सब भरिगेल , हमरे आँखिके सामनहिंमे , हमर अपनें जीनगी भसिया गेल ! घट-घट बाईढक' पाइन पिलूँ , जाँनमे साँस रहिते लास भेलूँ , नै लोक जुटल नै शंख घरिघण्ट बजल , हमर आँखिके सामनें हमर जीनगीके लहास उठिगेल ! हमरा आपन प्रेमक' जालमे फसा कें , खेललक' हमरा संग धोखेवाजीके खेल , जब हमर हाथ खली भेल देखलक' तऽ ओ , दोसरके हाथ पकडी हमरा छोडी गेल ! जे सोचनों नें रहि कहियो हमें , कोना सब बर्वाद भ'गेल , हमरे आँखिके सामनें मे , हमर जीनगी लुटी लगेल! १८.मिथिलाके लेल लडिते रहवैय --------------------------------------- ससरैत चलूँ गजरैत चलूँ अत्याचारी सबके संग लडैत चलूँ ! जकरल कूभेसके फायर देवैय सान सँ मिथिलाके झण्डा गायड देवैय !! सुतलके निन्द स' जगावें चलूँ भटकलके रसता पऽ लावेय चलूँ ! जब सबकिओ एक साथ हेवैय तखनें स्वतन्त्र मिथिला राज पेवैय !! मन भीतरके अज्ञानके बहारैत चलूँ अधिकारके डिबिया बारैत चलूँ ! देखूँ सबकिओके एकरंग पायर बढाबूँ सबकिओ एकसंग !! झाँएट बिहायर स' जुद्धि जेवैय दुश्मनके उपर टुइट पडवैय ! हत्या , हिंसाके दूर राखैत अपन अधिकारके लडाई लडवैय !! चोख शब्दके बाण छोडवैय निरंकुश सत्ताके भ्रम तोडवैय ! जबतक देहमे प्राण रहतैय मिथिलाके लेल लडिते रहवैय !! १९.उल्हा चुकाके खेल ---------------------------------- केहेन नेता चुन्लियै जें मधेशी जनता भुखें मरैय ये । मधेशी नेता ढिर फुलाकें सिंघेसरा जकाँ गर्जैय ये ।। मधेशी जनता भुखल काँनिरहल छै नेतासब दहमे हर्दा खेल खेलैय ये । जब मधेशी जनता सडक पऽ उतरल त' नेतासब हर्दा खेलमें सरेल बोलैय ये ।। जौं पहिनें जनताके कहल मानितौं तें आइ मधेशी जनता सडक पऽ नैं एतियै । मान सम्मानके साथ जीवन जीतियै आइ मधेशके नहिं एहेन स्थिति हेतीयै ।। सुन्दर सनकें अपन मिथिला मधेश आइ लडाईके करूक्षेत्र बनिगेल । केहेन नेता चुन्लियै जें खेलरहल ये उल्हा चुकाके खेल ।। २०.संगे रहब सेहें सही ---------------------------------- सब किछ सम्भव अइछ देर सही , खोजु भेटत मोतीके दाना कहिं न' कहिं । अपन माटी पानीके बिसैर अहाँ , ब्यर्थमे बौवाबी रहल छी जहिंतही । की भेटल ? वर्षो दिन रहिके विदेशमे , बिसैर गेलौं ऊ गोदी जहि पऽ खेलैत रहीं । मोन पारैय याद करैय ये हर बखत , रनें-बनें भटकैत यें अहाँके सीनेही । अहाँ चलि आबु अपन जन्मभुमि पऽ , दू पाय कम बेस मुदा संगे रहब सेहे सही । २१.संकल्प ---------------------------- मन बचन सँ संकल्प करू आब करबैय एहेटा काज । खुन पसिना चुवा देवैय लऽके रहवैय मिथिला राज ।। दुश्मनके उपर टुइट पडू हमसब वीर मैथिल सन्तान । अपन भुमिके रक्षा करू बचाबू अपन पहिचान ।। मिथिला अपन जन्मभुमि हमसब मैथिल छी हुनकर सन्तान । माँके चीर हरण नहि हुवेय दियौं चाहेय गमाव पडैय अपन जाँन ।। अटल रहब डटल रहब लै ल' अपन अधिकार । शस्त्र सँ सु-सज्जित भ'के चाहेय ओ कलम हो या तलवार ।। २२. ल'के रहत मधेश ------------------------------ चुपचाप छी त' यी नैं बुझू जे हम हाएर गेलूँ । मधेश पुत्रके आँखिमे देखूँ जागरुकताके दिया बाइर देलूँ ।। बड्ड दूरित केलौं सबटा सनेस असगरें ठुसलौं । जब झड़ लागल पेट त' पडोसी स' भेटैयके बहानें Metron खाएले गेलौं ।। छुटत नहिं यी पेटझरी आब Metron खाऊ आ आउर किछ । जे आगी लगेलौं मधेशमें ऊ धधकैत जायत अइछ अहीं दिस ।। आब केतबो नौटंकी कऽलियौं चाहें धरू बहुरूपीके भेष । मिथिला आब जागिगेल अइछ आब त' लऽके रहत मधेश ।। २३ . हे मां हंस वाहिनी ---------------------------------- हे मां हंस वाहिनी सरस्वती बारि दिअ सगरो अहाँ चेतनाके ज्योती ! अहाँके महिमा अछि अपरम्पार अहाँ लग अइछ ज्ञानक' भण्डार !! चार भुजा धारिनी हे मां शारदे शिक्षाके नैय्या हमर पार करि दे ! दू हाथमे अहाँ कमल आ पुस्तक लेनेय छी अहाँ दू हाथ से विणा बजावैय छी !! ताकू हे मां एकबेर नयन अपन खोली पानफूल प्रसादके संगमे हम द्वारमे एली ! अपन शिष अहाँके चरणमे नवावैय छी तनमन समर्पन क'के हम श्रीपञ्चमीके गाथा गावैय छी !! शिक्षा दान क'के हे मां शारदे करु भक्तके उद्धार हे माते ! हे हंस वाहिनी , विणा धारिनी भुजा अईछ चार शिक्षारुपी प्रसाद द'के हे मां करु प्रणाम हमर स्वीकार ! २४ बखान सजनीकें -------------------------------- रुप अहाँके पुनम चाँन नयन अहाँके मृगक' समान ! मुस्कान अहाँके दुतियाँके चाँन नाँच नाचै छी मौरणी सामान !! चाल चलैय छी नागिनके चाल उमेर अछि अहाँके सोलह् साल ! चौराह् पऽ बिछौनें छी प्रेमक' जाल जालमे फसाँके करैय छी बवाल !! पायरके पायल बजैय ये छन-छन बढें लागल हमर दिलके धड़कन ! हाथमे अहाँके हरिहर चुरि लगावैय ये हमर गर्दन छुरी !! गाल अहाँके टमाटर सन लाल ठोर अहाँके गुलावी लाल ! दाँत चम्कैय ये मोती सन केश अइछ अहाँके वृन्दावन !! जखिनें केलौं अहाँ आँखि स' इशारा फँसि गेल यी "प्रयास" विचारा ! सुनु यौं संगी साथी सारा कहिनतियो लगाबू हमरा अररा !! २५ . राइतक' सपना पायलक' धुन बाजैय रुनझुन ! नाकके नथुनियां घुमावैय पुरा दुनियां !! कसल-कसल गोर वदन महकेलक' हमर मन ! नैनक' पिरछी नजर पढलक' मोहनी मन्तर !! मन नहिं आब हमर काबू ससैरके कनि लग आबु ! मन जतन स' रैचके नव कनियाँ जकाँ सैजके !! बाजिके मिठ मधुर बोली दिल पऽ चलावैय छी प्रेमक' गोली ! ठोरक' लाली चम्कैय चम-चम बजावेत छी चुरी खन-खन !! कुन जादु, गुण छै यी नारीमे लागैय छै सुन्दर सोलह् सिंगारसंग सारीमे ! रुप छै एकर बड्ड अनमोल पहिरनें छै कानमें कानवाली गोल !! बाजब नहिं किछ हम मजबुर छी मस्त निन्दमे हम चुर छी ! यी हम लिखलूँ डेरा जाइत खिन देखलूँ यी सपना हम राइत खिन !! २६. तब बनत पहिचान ---------------------------------- पाइनक' बीना फुलवारी जैएर रहल छै ! फूलक' लेल सखी सहेली झगैर रहल छै !! मालीसब पोखैरमें हर्दा खेलरहल छै ! किओ धत्ता पऽ त' किओ पानीमें उछैलरहल छै !! कतेक सखी सहेली चौकीदारक' सिकार भेल ! कतेक त' फुललारीमे फूलक' लेल विलिन भ'गेल !! जेहो माली पऽ विश्वास केलूँ वोहो स्वार्थी भ'गेल ! वर्षो बितल फूल बेगर फुलवारी बाँझ रहिगेल !! छोडब नहिं फुलवारीमें सँ अपन बखरा लेब आब ! मल-जल द'के फुलायब फूल चम्पा,चमेली,गुलाब !! नहिं जायब दोसरके फुलवारीमें अपनें फुलवारी सजायब ! अपन पसंदके फूलक' गाछ अपन फुलवारीमे लगायब !! तब देखव अपन फुलवारीमे हायत नवका भोर ! कोइली मधुर गीत गुनगुनायत हायत चाहूँओर शोर !! तब फुलवारीके पडोसियों करत गुणगान ! जब बनायब अलग फुलवारी तब बनत पहिचान !! २७ .कुन गल्ती भेल हमरा स' ---------------------------------- यौ कुन गल्ती भेल हमरा स' जे एहेन साजा देलौं । हमर दिलक' खुनसे अहाँ अप्पन हाथ रंगेलौं ।। मठ मंदिरके वादा कसम अहाँ सब तोडि देलौं । दिल पऽ पाथर राखिके हमर प्रेमके लतिएलौं ।। यौ कतेक सपनासब हम अहाँ पऽ सजेनें छेलौं । अहाँ दोसरके भऽ हमर सब सपना चुर केलौं ।। केहेन कठोर भेलौ अहाँ एना हमरा भुला देलौं । अहाँके देल चोट स' हम जीविते लहास भ'गेलौं ।। हमर जीनगी स' अहाँ किए दुर भागि चलि गेलौं । किए दोसरके सेनुर सँ अप्पन सितके सजेलौं ।। २८. लाल सलाम ---------------------------------- अपन बीरता देखाके गेल मधेशीके निन्द सँ जगाके गेल ! हे शहिद मधेशक' बीर सन्तान करैय छी अहाँके हम लाल सलाम !! अहाँके सपना साकार करऽ सीनामे क्रान्तिके ज्वाला धधैक गेल ! दुश्मनके आब नहिंए छोडब लडैत रहब अपन मातृभुमिके लेल !! रे खस बाहुनवादी शाषक पहाडी एक मधेशी पडतौ सय पऽ भारी ! देख नजर सँ मधेश दिस देख खुलि गेलौ मधेशक' क्रान्तिके केवाडी !! बेर-बेर धोखा देल्ही मधेशके तूसब लुटैत एल्ही मधेशक' खेत खरिहान ! आब मेची सँ माहाकाली तक क्रान्ति करऽ निकली गेल छौ मधेशक' तीर कमान !! जबतक अपन भुमि नै भेटतैय तावेतक नै हेतैय मधेशीके पुरा अरमान ! हे शहिद मधेशक' बीर सन्तान करैय छी अहाँके हम लाल सलाम !! २९. नटखट कृष्ण कनहैया ---------------------------------- मथुरा कारागारमे जन्म लैत सब द्वारपाल सुतिगेल ! पिताके हाथ पायरके जंजीर खुलऽल सब गेटक' केवाड खुलीगेल ! राखिते पायर यमुनामे बसुदेव मुसलधार बारिस शुरू भेल ! भाई लक्ष्मण शेषनाग बनि रक्षा केलक यमुना प्रभुके चरण स्पर्स कऽके गेल ! भेल जन्म पुत्रीके नन्द घरमे माई यसोधा मुर्क्षित भ'गेल ! अपन पुत्र नन्दके दऽके बासुदेव अपन संग हुनकर पुत्रीके लऽके गेल ! भेल जन्म बच्चाके सुनिते कंस दौरिते कारागारमे गेल ! बद्ध करैयके बेरमे बच्चा हाथ सँ छुटिके आकाशमे उडिगेल ! देलक आकाशवाणी कंसके आब अहाँके अत्याचार बहुत भ'गेल ! तोरा मारैयवाला बीर पुरुषके पृथ्वी पऽ जन्म भ'गेल ! नन्द घरमे पुत्रके जन्म भेल सुनिके गौकुलमे खुशीके वर्षात भ'गेल ! बालकके देख आयल ग्वालिनसब हुन्का देखिके देखिते रहिगेल ! कान्हाके मारैय लेल कंसद्वारा कतेक दानव गौकुल पठायल गेल ! कतबो झाँट बिहाएर हावा चलऽल मुदा कनँहैया हँसैतके हँसिते रहिगेल ! अन्तमे कंसके बहिन पुतना रुप बदलिके स्वंम ऐल ! बालक कान्हाके छाती सऽ लगाके आकाश मार्गमे लऽके चलिगेल ! प्रभु हुन्का देखिते चिन्हिगेल पिवैत पुतनाके छाती सँ दुदक' संग पुतनाके प्राण सहित पिगेल ! ग्लालबाल संग गेन्द खेलऽ कान्हा यमुनाके तटपर गेल ! तेहेन जोर सँ गेन्द फेकलक कान्हा गेन्द जाएके यमुनामे गिरिगेल ! मित्रके वचनपर कान्हा यमुनामे कुदिगेल ! गौकुलमे सुनिते खबर यी माँ यसोधा बेहोस भ'गेल ! किछिये देरमे नाग नाथिके कान्हा नागके फेंपपर नाँचैत उपर एल ! देखिके कान्हाके नाँच देव लोक सँ फूलक' वर्षा भेल ! अन्त घरि जब आयल कंसके कृष्ण बलरामके बोलाके मथुरा ल'गेल ! मथुरामे मामा आ भान्जाके संगमे माहायुद्ध शुरू भेल ! कतेक दानवसब मरल बलरामके हाथ सँ हाथी मरिगेल ! अन्त्यमे कंसके मृत्युके समय एल कान्हा फाँनिके कंसके छातीपर चढिगेल ! तेहेन मुक्का मारलक छातीपर प्रभु छणमे कंसके प्राण छुटिगेल ! ३०. एलैय मिथिलामे पावैन चौठीचाँन ----------------------------------------------- एलैय मिथिलामे पावैन चौठीचाँन घर-घरमे पकतैं खिरपुरी पकवान ! भरि डाली चढेतैय फल-फूल धूपदानीमे जरेतैय सरऽर गूल ! छाँछीसंग कौरनामें दही चढेतैय लावनक' उपर दिप जरेतैय ! माए चौठीके हात उठेतैय बड्का भैया पैनढार करतैय ! मांगै माए चौठी सँ वरदान सदा सुखी रहें हमर जहान ! मिथिलामे एहो पावैन अछि माहान बैएठ चौका पऽ भोग लगावैय मरऽर जज़मान ! एलैय मिथिलामे पावैन चौठीचाँन घर-घरमे पकतैं खिरपुरी पकवान ! ३१. मधेशी जनता दु:खित यी मन हमर खोजीरहल चाँनचकोर छै ! ज्ञानक' दिपके ज्योति बेगर मधेशमे अन्हार चारूओर छै !! रसता चौबटिया पऽ भटैकरहल छी लsके हाथमे बिन फूलके डाला ! नजरमे नै किओ आबिरहल छै सत्तबाटके मार्गदर्शन कराबवाला !! बिना उदेश्य बयर्थे बौवाबीरहल छी जहि तहि सगरो चाहूँओर ! साँझ परल ईजोतक' दिया बुतायल फेर किल्ही हेत की नहिं हेत सरूजक' लिलीसंग भोर !! मध्य रातीमें चारूओर बिहाएर एलै अब त' हमरा निन्द नै भ'रहल छै एको छन ! घरक' खुट्टा हिललै छपर परके खर उडिगेलै देखिके यी, बिभोर भ'के कानिरहल छै हमर नयन !! कानैत-कानैत नोर सुखिगेल, कण्ठ बैएठ गेल तहियो झुठक' आशके जोरिमे लटकल छी ! मिलत की नै मिलत भिखमंगा गद्दार सबहक पाछाँ हमहूँसब टिन्हा बिटी लऽके हो हो क'रहल छी !! कतेक भाइबन्धु एकरें पिछाँ मिटगेल तहियो नें बन्द भेल अछि धोखाबाजिके खेल ! गद्दार सबके अही सऽ नै किछ फरक पडल बौवा-बुच्ची टुगर बनल, बहिनसबके सेनुर पुछागेल !! ३२. निहोरा अछि मैथिल जन सँ ---------------------------------------- निहोरा अछि मैथिल जन सँ करियौ संकल्प स्वच्छ मन सँ ! आब नै ल'के दहेज शादी करबैय , घरक' लक्ष्मी बेटीके बचेबैय !! बेटा खाट पऽ सुतल रहैय यें , बेटी घरकें सब काज बजबैय यें ! बेटी बापके माथक' पाग छी , कुलके फुलवारीके फूलक' बाग छी !! बेटी उपर नै करू अत्याचार , बेटियोके दियौ बेटाकें दुलार ! तब देखब अहाँके केहेन मान बढैय यें , बेटीये सें सबहक कुलके दिप जरैय यें !! बेटा-बेटी बिच नै करू दू-रित , बेटियोके जीवनमें बारु शिक्षाके दिप ! बेटियो बेटा नेहायत अभिमान जगायत , उच्च गग़नमे विमान चलायत !! बेटी घरके ईज्जत छी , बेटी अदभुत दौलत छी ! सबकिओ बेटीके सम्मान करू , दहेज नै लऽ, दऽके कन्यादान करू !! ३३.बड्ड अनमोल छेल ओ क्षण -------------------------------------- मिलन बिछोडक' बिचके क्षण , बहुत सुन्दर स्वर्गके सन ! जतवेए शुख ततवेए दु:ख , देखैय लेल हरदम चौकैय नयन !! मिठ-मिठ बात क्षणेंमे रुसनाई , एको क्षण नै नजर सऽ दुर जायले दैय ! जन्म-जन्म हम साथ निभायब , हँसि-हँसिके ओ वादा करैय !! मिलनके क्षण आमावसोके राति पुनम लागैय , जखनेंए तखनेंए चाँन चम-चम चम्कैय ! ओकर हँसिके देख सारा जग हँसैय , दाँत लागैय ओकर जेना मोती चम्कैय !! बड्ड अनमोल छेल ओ क्षण , कतबो करि कम अछि ओकर वर्णन ! दृढ विश्वासक' संग स्वच्छ छलै मन , हमारा पऽ समर्पण क'देलक ओ अपन जीवन !! ३४. सुत्तल निन्दमे सपना सपनाएत रहि ------------------------------------------------- सुत्तल निन्दमे सपना सपनाएत रहि ! प्रेमक' गीत हम गुनगुनाएत रहि !! अडहुल फूल सन लाल अहाँके ठोर ! नैनाके खिड्की सऽ मारै छी हुल्की भोरे भोर !! बोल बाजै छी मिठगर कोईलीके बोली ! दिलपर चलावै छी अहाँ प्रेमक' गोली !! नैन मट्का-मट्की आब कतेक दिन ! रहेय नै सकैय छी हम अहाँ सऽ एको छन भिन !! जखनें अहाँ केलियै सोलह् शृगार ! देखिते लागल हमरा प्रेमक' बोखार !! आब कोना हम काटब दिन ! अहाँ लेलौं हमर आँखिके निन्द छिन !! धड़कन बढलैय, करेजामे मारैय हिलोर ! टुटल निन्द खुलल आँखी भ'गेलैय भोर !! ३५. मायाजाल --------------------------------- पुनम चाँनकें चेहरा सुरूजक' लाली गाल । मजुरनी नाँच नचै छी उमर यें सोलह् साल ॥ नयनमें कारी कजरा ठोर अछि गुलाबी लाल । अहाँ पाजल बजबैत चलै छी नागिनकें चाल ॥ टनटन बजै छी अहाँ जेना बाजै ढोलक नाल । प्रेमक' छुरी चलाकें अहाँ हियाकें करै छी हलाल ॥ प्रेमक' दर्दसें तडैपकें सबकें भेल बुराहाल । सुन्दर रूप देखाकें अहाँ बुनै छी मायाजाल ॥ ३६. जीनगीके डगर ---------------------------------- जीनगीके डगर बड छोट बड नम्हर ! डेग डेग पऽ खुशी भेटै डेग डेग पऽ दु:खक' कहर ! मनमे खुशीके सपना सजाँके एलु अनकर देश प्रदेश ! सबटा सपना सपनें रहीगेल बनी बाईढ आयल दु:खक' क्लेस ! राईतमे आँखीमे निन्द नै हैयें दिनमे नैं छै कखिनो चैन ! शोक चिन्ताके भारी सऽ पुरा जीनगी बनल बेचैन ! सोचै छी कोनाके पार हेबै यी दु:ख सऽ भरल धार ! बिच रेतपऽ चैढ गेल छी नै जासकै छी ओही पार नैं अही पार ! ३७. अपन भुमिके लेल लडिते रहवैय --------------------------------------------- जनताके धकैएल देल्कैय धोखामें अपना बैसल छै सोफामें बाप बिन बेटा-बेटी भेलैय टुगर तेकर नुन खाएके नेता बनल छै सुगर ! कतेक धियाके सुहाग लुटा गेल कतेक माँके कोएख खाली भेल खुनेंखुन सँ मातृभुमि लतपत बनल मुदा गद्दार सबहक पेट खालिए रहिगेल ! चुप नै रहूँ चलू आब लड्वैय गद्दार सबहक पेट फोड्बैय बहुत वर्दास्त कsलेलौं आब कतेक दिन जरैत रहवै आब चलू सबकिओ सिना तानिकें हाथ हाथमें नुन बुकनी सानिके शासकके आँखीमे जाँके थोपी देवैय गर्दन भिराके मुडी छोपि लेवैय ! आब खुनक' हिसाब खुन सँ लेवैय दमन अत्याचार आब नै सहवैय जबतक देहमे प्राण रहतैय अपन भुमिके लेल लडिते रहवैय ! ३८. जीनगीके कथा ---------------------------------- अहाँ दिया हम बात्ती छी ! गाबिरहल जीनगीके प्राति छी !! जीनगीके इनार बड्ड अनमोल ! बिना उघैनके राखल छै दोल !! कोनाके भरि ज्ञानक' पानी ! व्यर्थे वितिरहल छै जीन्दगानी !! कथी कऽ उघैन लगाबी दोलमें ! दम फर- फरारहल छै कलियुगक' खोलमे !! थुना गेल छी मनुखक' जेलमें ! सफर कऽरहल छी बिना पटरी पऽके रेलमे !! हम कत' जारहल छी हमरा किछ नै पता ! एहे अछि हमर जीनगीके कथा !! ३९. मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? ---------------------------------------------------- बिहारी कहबे केलक अड्डागोडा छिनमें कोशिस सेहो केलक अखन घरमें घुइसकें बेटा पुतौहकें पिटलक मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? हस्पतालमें बेटा भर्ना यें खेतमें बिहैन बनल जर्ना यें अहाँ छी भुखल ठोर सुखल कि आई अहाँकें बर्ना यें ? मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? अखन मधेशी नेता ब्यस्त छै सोफा पऽ फेबिकल लगावमें बिना बिहैनकें खेत रोपऽमें मधेशी जनताकें भट्ठीमें झोकऽमें मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? निकलू सब मधेशी साथमें लsकें कचियां कुढारी हाथमें नै कैरकें भेदभाव जाईतमें नै सोचु आयल यी साईतमें दुश्मनकें गर्दन छोपे चलु दिन हुवें चाहे राईतमें मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? क्रान्ति आब करबे करबै दुश्मनकें आब नै छोड्बै आब नै चुपचाप रहबै अपन हिसाँ लऽकें छोड्बै मिथिला-मधेशी आब कतेक सहबैय ? ४०. जरल कपार ---------------------------------- दु:ख दर्द सब छुपा कें हैंस कें बजबाक हमर अछि बानी । बतीस बसन्त बित गेल किओ नैं बुझलक हमर जीनगानी ॥ नोरें नोर कें धार में हेल रहल छी बैंइन कें नवका हेलवार । हेलैत हेलैत थाकी गेलौं पुगs नैं सकली नदी ओई पार ॥ कूल कें मर्यादा , परिवार कें परवरिस में बतीस बीत गेल । दोसर कें लेल सोचैय में यी जीनगी जहिनें कें तहिनें रहि गेल ॥ मानव योनिकें जीनगी यौं संगी हमर भऽगेल अछि बेकार । मिलल नै किछ दुनीयांदारी में भेलु सुनसान आ जरल कपार ॥ ४१. धोकेवाज प्रेम ---------------------------------- खेल खेलै छी अहाँ नुकाचोरी । दिल पऽ चलेलौं प्रेमक छुरी ॥ बोलु नेँ कि मन मेँ यें आहाँ केँ । करै छी कियेँ एना दिल लँsकेँ ॥ सामने मेँ मिठमिठ बोलै छी । पछाँ हमर खिधास करै छी ॥ कुन जन्म केँ बदला लैँ छी । जें हम दर्द सेँ तड्पैत छी ॥ प्रेमक दर्द बडजोर हैयेँ । हमरा देख केँ हँसी लागै येँ ॥ छोडीके जाएत छी हम अहाँ केँ । साक्छी राईख सारा जाहाँ केँ ॥ ४२. कंकल , पत्थर , शीसा , काँट ----------------------------------------- सपारऽ नै सकैय छी , तs बिगार्बो नै करू । जित नै सकैय छी , तs हार्बो नै करू ॥ जीनगी एकटा रंगमंच छियै , जै पऽके हम आहा कालाकार । गामघर मे चेतना के सनेस बाँटु , भगाऊ जातीपातीके छुवाछुत ब्यवहार ॥ मिठगर मिठगर बोल बजैय छै , मुख मे राम राम बगल मे छुरा । गामघर के घुन बनेल्कैय , बैइन आबी के सुडा ॥ कतेग सुन्दर लागैय छेल , रंगबिरंग के फूलबारी । खाधपानि बेगर मरिरहल छै , गेल फूलबारीमे लगा के केबाडी ॥ नहीं लऽके एल छेलौं किछु , नहीं लऽके जायब किछु साथ । निक कर्मके संग हँसु खेलुँ , नै धऽके बैसु कपारमे हाथ ॥ समय गतिशिल छै , हिन्का सदैव सदुपयोग करू । सत्य कर्म मे सहजोग दियौ , दुराचारी दुष्टब्यवहारी के पिछा नै परू ॥ जीनगी के डगर चलबैय , बहुतो भेटत दूपेडिया । कुमार्गमे ईजोत देखब , सत्यमार्गमे अन्हरिया ॥ कर्म सँ पिछा नै भागै जाउ , यी अछि बिधाताके लिखल लेख । जीवनक रस्ता ठमैक ठमैक चलुँ , ककंल , पत्थर , शिषा , काँट के देख ॥ ४३. अहाँ हमर प्रेम कहानी छी ---------------------------------------, अहाँ बोली बचन केँ रानी छी । अहाँ हमर प्रेम कहानी छी ॥ गोरी कारी कारी केश अहाँ केँ । दिवाना बने लऽ सारा जाहाँ केँ ॥ अहाँ हमर मन केँ देवी छी । कैरकी गोरकी अहाँ जे भी छी ॥ नैन सँ बजै छी प्रेमक भाषा । अहीं पऽ लगेनेँ छी हम आशा ॥ खोलु प्रिये दिल केँ दरबाजा । बजवै छी हम प्रेमक बाजा ॥ सुनी केँ अहाँ खुश भऽजेबै । जौं प्रेमिका अहाँ हमर हेबै ॥ बड बेर भेल हम जाएत छी । अहाँ तेँ हमरा सेँ लजाएत छी ॥ ४४. प्रेमक दुकान ---------------------------------- चमचम चम्कैय येँ ठोरक लाली । यौं मारैय अइछ पेङ्गा कान केँ बाली ॥ नयन सँ करैय छी अहाँ नुकाचोरी । प्रेमक भाषा अहाँ बजैय छी गोरी ॥ नाक केँ नथुनियां देखैय मेँ बिजोर । सब केँ ल'गेलौं अहाँ अपन ओर ॥ दऽकेँ अहाँ चौबन्नी मुश्कान । लेनें जाई छी अहाँ सबहक प्राण ॥ प्रिय किए अहाँ एनंग करैय छी । अहीं पँ सजनी हमहूँ मरैत छी ॥ नुका केँ राखूँ अहाँ अपन समान । बन्द करु प्रिय प्रेमक दुकान ॥ ४५ . करै छी प्रणाम ---------------------------------- खुश छी अहाँ हमर दिल दुखाँ केँ । जे लऽगेलौं हमर निन्द उडा के ॥ यौं खुश नै रहब अहाँ एकोदिन । जब याद आयत बितलाह दिन ॥ यौं कि करै छेलियै कि से कि भऽगेल । बनल बात सबटा बिगैर गेल ॥ मन तेँ करै अछि फाँसी लाईग जाइ। वेदर्द समाज सेँ दुर भाईग जाइ ॥ छी प्रदेशी केँ प्रयास उपनाम यौं । नै करु अहाँ हमरा बदनाम यौं ॥ जौं करब अहाँ हमरा बदनाम । साच्चे कहै छी तियागी देब प्राण ॥ करै जाऊ संगी हमरो सम्मान । दुई हाथ जोईर करै छी प्रणाम ॥ ४६. लजेब जीत केँ ---------------------------------- अहाँ गुलभन्टा केँ बारी छी । पाकल पुरल महकारी छी ॥ अहाँ समतोला सन लाल छी । अहाँ हमसब केँ मिशाल छी ॥ जी करै येँ हमर किछ करी । अहाँ केँ संग मेँ कुस्ती लडी ॥ अपन मन केँ सक पुराली । अहाँ केँ नैना सेँ नैना लडाली ॥ रोकु नेँ पैहनेँ दिलक रेल । तब खेल्बै कुस्ती केँ खेल ॥ खेल मेँ अहाँ केँ चित करब । यौं प्रेमक टाँका फिट करब ॥ बात करी हम प्रेम प्रीत केँ । लऽजेब अहाँ केँ खेल जीत केँ ॥ ४७. आई के युग मेँ ---------------------------------- आई के युग मेँ प्रेम सेँ पाप होई छै , पाप सेँ फलिफाप । निर्दोषी केँ लात दै छै , दोषी केँ साथ ॥ सत्य बोलै छै , परिवार सेँ टूटै येँ । पाप के बिरोध करेँ , उ समाज सेँ फूटै येँ ॥ सत्य बचन तीत होई छै , असत्य मिठ रस । निक काज मेँ उल्हन मिलै छै , गलत मेँ मिलेँ जस ॥ ४८. रुसल दुल्हिन ---------------------------------- प्रिय प्रेम हम अहीं केँ करै छी । अहाँ हमरा सँ कियँ रुसल छी ॥ अहाँ के राह मेँ नैन बिछौने छी । घरक' केबार खुलेँ छोडनेँ छी ॥ प्रिया अहाँ आबु हमरा लग मेँ ! बड राईत भेल भित्तर चलुँ । भुल , गल्ती हमर माफ करू ॥ एनंग अहाँ रूसब हमरा सेँ । कहुँ हम प्रेम करी केकरा सेँ ॥ प्रिय एक बेर तँ हैँस कऽ बजु ! देखूँ तीनतरिया डुबी गेल । राइत कट्ल , बिन्सर भेल ॥ सुनु तँ कोइली केँ मिठ अवाज । बतेबैय नै केकरो अपन राज ॥ राइतभर जागलौं अखन झूकैत छी ! ४९. सुनु साजन ---------------------------------- यौं अहाँ संग केँ सुन्दर पल हमरा याद आवै येँ । अहाँ केँ गुथल प्रेमक माला हमरा बड सतावै येँ ॥ पढलौं एहेन कुन जादु आँ मन्तर आहाँ साजन । हर बखत अहींकेँ याद करै येँ हमर तनमन ॥ राईत राइत केँ सपना मेँ अहीं केँ चेहरा देखै छी । राईत केँ निन्द मेँ आईब अहाँ कियेँ लल्चावै छी ॥ फगुवा , सिरूवा बित गेल पाईक गेल जेठवा आम । सजनी मन पारै येँ छोईर बिदेश चलि आबु गाम ॥ ५०. डाक्टर कवि बिमारी कलम ------------------------------------------ अहाँ अछि कवि हम कलम यौं । दिल केँ घाँ पँ लगाऊ मलम यौं ॥ मिठ शब्द केँ पट्टी लगाऊ । घाँ केँ सब आहाँ दर्द भगाऊ ॥ मन सेँ चलाब नैना केँ सिजर । निक सँ देख्बै घाँ केँ चारू भर ॥ कंचन कोमल बिमारी केँ मन । दर्द सेँ धडकै यैछ धडकन ॥ अहाँ अछि कवि हम कलम यौं । जल्दी सेँ लगाऊ मलम यौं ॥ ५१. मोनक फुलबारी ---------------------------------- हमर मोनक फुलबारी मे अहाँ खोपरी बनाँ के बास बैस गेलौं । सोच्लौं फुलबारी के पहरदारी हेतै मुदा आहाँ हमरा पागल बनाँ देलौं ॥ फुलबारी के माली कही के फूलक सब रस आहाँ चुसी लेलौं । रस चुसल फूल मलिन भेल देख के खोपरी तोडीके बास छोरी गेलौं ॥ सोचने छेली अहाँ खाधपाईन लगाँ के फुलबारी मे हँरिहँरी लाएब देबै । कि थाह अहाँ निर्मोही हमर फूलक पैड के ठठरी बनाँ के भागी जेबै ॥ केतबो फूलक फुलबारी मे अहाँ कलियौं माली के शासन । सगरो के फूलक रस से बैढ के उपर रहत हमर फूलक रस के आसन ॥ ५२. विश्वासक बोतल ---------------------------------- विश्वासक बोतल पिवैत पिवैत पेट हमर भैर गेल । विश्वासक तिजौरी जेकरा मान्लौं उ तिजौरी मे आगी लगाँ गेल ॥ पजरल विश्वासक पजाही मे विश्वासक मसिन जैर गेल । देख के एक छन मुर्छित कि भेलौं सब कहलँ यी पागल भगेल ॥ विश्वासक सोक मे नैन सँ चुवे लागल विश्वासक मोती के दाना । सेह देखी के वेदर्दी जवाना हैंस हैंस मारे लागल ताना ॥ विश्वासक पैर संगी आहाँसब नै रोपव यौं । कतौं सँ निकलत हुनकर बिंज तँ अपने आप मे सोपव यौं ॥ ५३. प्रेमक दर्द ---------------------------------- अहाँ नैना के धनुष सेँ चलेलौं प्रितक बाण यै । दिल भगेल घाँयल हमर निक्लै छै प्राण यै ॥ कुन गल्ती भेल हमरा सेँ जे देलौं येहेन सजा । दर्द सेँ तडपै छी हम तँ आहाँ केँ आवै ये मजा ॥ कुन मिट्टी सँ बनल छी आहाँ तनी हमरा बताबु । धर्ती के मनुष्य छी याँ अश्मानक परी सामने त' आबु॥ यी प्रेमक घाँ पँ अहाँ बेवफा केँ नुन बुकनी छिटी गेलौं । दर्द तँ देलौं देलौं मुदा संगे हमर सारा संसार लुटी लेलौं ॥ प्रेमक दर्द कि होएत छै कि मालुम अहाँ केँ । प्रेम नै करू कहै छी हम सब साथी सारा जाहाँ केँ ॥ ५४. सपना के परी ---------------------------------- नैन अहाँ के लजौनी झार । देखै ची हैँस के हमरा बार बार ॥ लाल गाल , गुलाबी होट । दिलपर मारलक प्यारक चोट ॥ मस्त मौसम आँ छै मस्त जवानी । करँ खोजै हमरा संग मनमानी ॥ मोनक मनोरथ मोनक आशा । बजै लँ चाहै छै प्रेमक भाषा ॥ परी के समान रुप , रेशम जकाँ केश। टुटल निन्द तँ देख्लौं हम छी बिदेश ॥ सुन्दर गगन के आहाँ छी एक सुन्दर तारा । कहुँ अहाँ फेर हमरा कहियाँ भेटब दोबारा ॥ ५५. बितलाह प्रेम ---------------------------------- दिल मे दर्द ठोर पँ प्यार । सुखल खरेरी हमर संसार ॥ नै छै संगी साथी नै कोई अपना । दिल पँ लागल चोट टुटल सब सपना ॥ फूल मे रस छेल सब चुईस गेल । मुर्झायल फूल तँ हमरा भुली गेल ॥ कि करै छेली कि भगेल । भरल जवानी मे आगी लागी गेल ॥ रैह रैह के तडपावै । बितलाह दिन याद आवै ॥ चढल जवानी हमर लुईट के । भेल दोसर के हमरा सँ फुईट के ॥ ५६. मिथिला हमर माहान ---------------------------------- मिथिला केँ मैथिल सँ आशा । सदखिन बजियौ मैथिलि भाषा ॥ धोती, पाग, माछ, पान, मखान । येह सब अछि मिथिला केँ पहिचान ।। नितदिन सदखिन मैथिली गाबू । अपन बौवा बुच्ची केँ मैथिली पढाबु ॥ मिथिला माईटक अछि गुण अपरम्पार । स्वंम माँ लक्ष्मी सिता बैन लेलक अवतार ॥ स्वर्ग सँ सुन्दर अपन मिथिला माहान । अहिठाम बैन पाहुन येल स्वंम भगवान ॥ ५७. हमर करेजा के टुक्रा ---------------------------------- हमर करेजा के टुक्रा हम जाइ छी बिदेश । कमा कऽ ढौवा लावब अहाँ ले झुनझुना सनेस ॥ मन परैय छी अहाँ, हम सपना सपनाएत छी । आँइख मे अहाँ के हम चेहरा ल'के जाएत छी ॥ जुनि बौवा अहाँ माए के उल्हन सुनावैय । माए के कहल करब , बुधियार बेटा कहावैय ॥ जाइ छी अहीं के लेल हम दुरदेश बाहार । जुनि बिसरब बेटा अहाँ हमर दुलार ॥ अहाँ के देख के हम केनें छी कतेग कल्पना । पुरा करब बौवा अहाँ हमर सब सपना ॥ जब होइबैय अहाँ सियान तँ कुल के राखब मान । समाज मे नमुनारूपी बनायब अपन पहिचान ॥ युगयुग जीवैत रहब हम आशिष दै छी । अहाँ लेल हम देश छोइर बिदेश जाई छी ॥ ५८. हे त्रिभुवनपति ---------------------------------- हे त्रिभुवनपति जग के रचैया छीअहाँ केहेन रचना केलौं । कतेग के दिया बुतेलौं तँ कतेग के दीयाबाती छिन लेलौं ॥ हे त्रिभुवनपति छीअहाँ ऐहेन निहृदय कियँ भगेलौं । दिन मे रंग देखेलौं मुदा राईतो मे एतै सगरो से हल्ला भेल । ऐना किए देह डोलेलौं सबहक सपना सँ सजल महल टुईट गेल ॥ कतेग के हाथपैर गेल, कतेग बेसहारा बनल आँईखक नोर सुईख गेल । सब पुकारलक अही के हे त्रिभुवनपति पृथिवी के रचैया आहाँ कतँ गेलौं । भेलौं बहीर छीअहाँ कतेग गाछक मजर झाईर देलौं तँ कतेग गाछ उखाईर लगेलौं ॥ हे त्रिभुवनपति आहाँ ऐहेन निहृदय कियँ भगेलौं । ५९. बटोही के संग मे परी, मोनक बनल रसभरी " ------------------------------------------------------------- मनमोहक बचन संगे मधुर मुश्कान । औशी के राईत लागै पुर्णिमा सामान ॥ शुभ दिन अइछ संगे शुभ घरी । रुप के रानी छी अहाँ स्वर्ग के परी ॥ नयन सँ अहाँ चलाँ के जादू । सब किओ के केलौं अहाँ अपन काबु ॥ जखन बजेलौं अहाँ चुरी खनखन । बढेय लागल हमर दिलक धडकन ॥ एलौं कतऽ सँ अहाँ आ जेबैय कुन गाम ? करैय छी कुन काम अहाँ आ अइछ कि नाम ? ६०. सुईया बैन के आयल कैची बैन के गेल ----------------------------------------------------- ऊ सुईया बनि के आयल जीनगी मे आँ कैची बनि के गेल । मोती दाना लुटी हमर, हमरा खन्ता मे धकलीके गेल ॥ जीवनभर अहाँ के साथ नै छोडब से कसम खेने छेल । नवका डेरा पावलँ कि ऊ सब कसम वादा भुईल गेल ॥ जारक मास मे हमर जीनगी के सिरक भरिके ओढी लेलऽ। गेल जाड तँ हावा मे सिमरक रूईया समैझ उडा देलऽ ॥ प्रेमक बेवफाई के झेल रहल अछि हम बडका झेल । ऊ सुईया बनि के आयल जीनगी मे आँ कैची बनि के गेल ॥ ६१. दागक दर्द ---------------------------------- छेल लगवार दोसर तें हमरा कियें फसेलियै । आगा साही हमरा पाछासें किएक धकैल देलियै ॥ कपडामें लागल थाल देखकें सब कियो हंसै यें । यी दाग जीनगीकें पिरेलऽ हमरा किछ नें फुरै यें ॥ लगाकें कपडामें दाग अहाँ खुब हैंस रहल छी । देल दागक दर्दसें हम जीवैतें मैररहल छी ॥ खुशीसें रहुं आहाँ हमर जीनगीमें दाग लगाकें । फेर नें करब एना दोसरकें संग नेह लगाकें ॥ ६२. शिव त्रिपुरारी ---------------------------------- तिनो पुर कें पति शिव त्रिपुरारी ! संग में सांप लऽकें बसाहा पऽकेलन सवारी !! भांग धतुर कें भोजन करैं पहिरैं यें बाघक छाला ! जटा में चांन चमचम चम्कैं गाला में उजंरात कें माला !! हाथ में त्रिशुल आँ डमरू लेनें जटा सँ बहैं गंगाधार ! सब देवो कें देव कहावै हिनकर लिला अपरम्पार !! ६३. कण कण में आहाँ ---------------------------------- कण कण में आहाँ हर पल में आहाँ आहाँ अविनासी छी आहाँ अदृष्यकारी छी ! अहीं कें चरण में संसार अहीं लs दुलार मलार अहीं सबहक मैया छी अहीं जग कें खेवैया छी ! आहाँ अरूपा छी आहाँ शक्तिस्वरूपा छी आहाँ काली छी आहाँ कल्याणी छी ! शंख , चक्र , गदा लेनें छी आहाँ शेर पs सवार केनें छी अइछ भैरव भैया साथ में लक्ष्मी , सरस्वती दुनू कात में ! ६४. असगर भेलियै ---------------------------------- दोस्त सब दोस्तयारी करै छै । प्रकृति आँ जीनगी गद्दारी करै छै ॥ बाधा आँ अडचन सँ लैड़रहल छी । समय के पांँछा दोईड रहल छी ॥ भुख पियास सब किछकें त्यागी । बनलौं जीनगीकें हम अनुरागी ॥ जीनगीकें बाट कटल नैं कटै छै । हर डेग पऽ द:ख आँ दर्द भेटै छै ॥ दु:ख दर्दकें संग दोस्ती केलियै । सब सँ बिछैड असगर भेलियै ॥ ६५.यौ मधेशी ---------------------------------- मन होई छै आँखी मुईन ली यी वेदर्द दुनियांकें छोएरकें । माया ममता तियागीकें सबटा आँ सबसंग रिस्ता तोएरकें ॥ बनल छै सब अवसरवादी अपने आपमें सब झगैरकें । यौं लै छै परोसिया मोकामें चौका भाई भाई बिच चुगली कैरिकें ॥ पढलो लिखलो बनल छै मुर्ख सम्झायब हिन्का कि करिकें । देखकें माईकें करेजा कानल भाई भाईमें दरारकें ॥ भुमीकें चिर हरै यें दुश्मन के छै जे चिरत छाती पकैरकें । जेकरो पठेलौं रक्षा कर लेल ओ चुप भगेल बैरीसंग मिलकें ॥ जे चाहै छै भुमीके चिर बचाबें ओकरा गारी दै फटकाईरकें । आबो त आईख खोलु यौं मधेशी अपन सुतल निन तोईरकें ॥ सब मधेशी एकजुट हबियो किछ त चलु अगाडी ससैरकें । बनायब भुमीकें स्वतन्त्र यौं येहटा संकल्प कैरकें ॥ ६६. प्रेम --------------------- दिलकें आँखी खोलीकें देखुं हम अहाँकें सामनें छी ! दिलोजानसें अहींकें चाहलौं अहींकें अपना मान्ने छी !! प्रेम रस बड मिठ है छै एकबेर पि कऽते देखुं ! भवसागर पार भजेब जौं प्रेम अहाँ कैरलेबैं !! प्रेम सुर बड मधुर पैरक पायलकें झन्कार ! साजा लियौं अपन भवनमें आबि जेत खुशीकें बाहार !! स्वच्छ मनसें हृदयमें दियौं हमरा बास ! संग नै छोडब कहियो जबतक रहत जानमें सांस !! ६७. क्रान्ति करबें करब ---------------------------------- आई मिथिला माईकें चिर हरऽ देखुं दुश्मन भेल अईछ तैयार घर घर स' निकलू यौं मैथिल दुश्मनकें करियौं खबरदार कि केल्कै आई नेतासब मिथिला-मधेशमें नै छै शान्ति उतरें लागल मैथिल जुवकसब मिथिला भुमीकें लेल करऽ क्रान्ति मिथिला आँ मधेशकें लेल सब मैथिल-मधेशी हबियौं तैयार सहजें दै अइछ त' बड निक नै त' छिनकें लियौं अपन अधिकार बाट रोकनिहारकें मुंहसें सम्झाउ नैं मानैंयें त' लातसें लत्याऊ हमसब मिथिला-मधेशी एतबें कहब अपन मिथिला-मधेश लऽकें रहब आब जान चाहें लियँ पडैं आँ दियँ पडैं मिथिला-मधेशक लेल क्रान्ति करबें करब ६८.हमर जीनगीके परिचय ---------------------------------- मन करैय बसन्त ऋतुमे फुलल फूल जकाँ फुलि । मुदा करि की शिशिर मासमे पोउनकल काँट जकाँ भ'गेल छी । हँसी खुशी सऽ मौरणी जकाँ नाँची मोन होइय । मुदा यी नीहृदय दुनियाँमे जिन्दा लहास बनिके जीरहल छी । मानव जोनि एक रंगमंचके साधन अछि । जहिठाँ बाध्यता आ बिडम्बनाके गिठहसे पैघ किछो नैं । हर मोड, चौक , चौपारी, चौराहपर ठोकरें ठोकर । किओ हाथके सहारा दै तऽ किओ टांग पकरिके खिचै छै । साहस बटोएरके दौडैयले चाहैय छी । रसता भेटैय देखाय दैछै सुखल बाउलक फाँक । पिछा घुमिके देखैय छी हम निकली गेल छी बहुत दुर । नजर पडैय छै अप्पन पायरके छाप पऽ । माटिपर बनल छाप जहिनाके तहिना छै । बाउलपरके छाप हावा उडाके लऽगेलैय । आब डेग कोना उठाबी आ कतऽ राखि । दानापानी बेगर पेटमे बिलाई नाँच नाँचै छै । आँखी मुनैं छी तऽ रसता साफा नजर आवैय यें । खोलितें आँखी फेर यी दुनियाँ अन्हार देखाए यें । अहि मंचपर "प्रयास" कऽरहल अछि अभिनय । एहे अछि संगी वास्तवीक हमर जीनगीके परिचय । ६९.सायद सबदिनके लेल नामोनिसान मिटि जेत ----------------------------------------------------------- मनमे एकताके दिप जरीरहल छै, देहक' सब अंग-अंगके नससब जागल छै! नेपालके मधेशीयो नेपाली से स्वीकारें नें, तहियो मधेशीके आँखीमे नेपाली चश्मा लागल छै!! फूल सँ सजायल डाली राखल छै, तकरा उठाबत बभनाके डर लागैय! नेता वर्तामे स्वार्थक' वेद पढैय, मधेशी आमक, साकल जकाँ जरैय!! नैं सठल यें साकलसब अखन , स्वार्थक' घी ढारैत रहूँ.! साकलक' आहुतीके अन्जाम मिलें नैं मिलें, अहाँ स्वार्थक, घी सँ अप्पन फाइदा लुटैत रहूँ !! अप्पन पुर्खौती बचावैयके लेल , पढैत रहूँ झुठेंके वेद ! धोखेवाजीके यज्ञमे देखब कहीं, सायद सबदिनके लेल नमोनिसान मिटि जेत !! ७०.पुश मास पानी ठार लगैय ---------------------------------- पुश मास पानी ठार लगैय, अस्नान करैतखुन बड्ड जार लगैय! भरिदिन कुभेस फसरल छै, गोहाली घरमें घूर धधरल छै! बुढवा दादा अलुवाह पकाय, बौवा बुच्चि मागि-मागि खाय! लोटामे पानी, थारीमे भात काढल छै, बुढवा दादा गप्पमें लागल छै! थारीकें भात देखूं ठैर गेलैय, घूर महक अलुवाह सेहो जैर गेलैय! देहमे मैलक' चिप्परी सट्ल छै, टांगक' तरबा सेहो फाटल छै! पानी छुवैत बड्ड कोढि लगैय, खाएत खुन फुररसिन उठैय! ७१. अहाँ ओतऽ बिन संगीतके गीत गबू ------------------------------------------------- बिहुसल कारी केस अहाँके, रहि-रहि हमरा इशारा करैय ! मनमें हमरो प्रेमक' टुसी पनुकलैय सामुन्ने जेबाक लेल डर लगैय !! अहाँके चन्द्रमुखी चेहरा पऽ हम, बजारहल छी प्रेमक' धुन ! आँखि लागिते सपना देखैत छी हम, अहाँके संगमें मनारहल छी हनिमुन !! अहाँके मन्द-मन्द मुस्कीके जादु, हमरा कऽ लेलक अप्पन काबू ! हम एतऽ गीतारके तार कसैत छी, अहाँ ओतऽ बिन संगीतके गीत गाबू !! ७२. आब उठाबिरहल छियौ बन्दुक ! --------------------------------------------- कतेक मधेशीके खुन पिलही, तैयो नैं मेटलौं तोहर भुख! तोहर भुख मिटाबऽ लेल, आब उठाबिरहल छियौ बन्दुक !! अप्पन भूमिके लेल हम, सहि लेबै सबटा गम! खुनक' होली खेलऽ तोरासंग, आबि रहल छी लऽके गोली, बारुद, बम !! मानवताके सीमा नांघि देलें तु, सब नियम कानुन तोडिके! बहुत शासन कएलें तुसब, आब भागै पडतौ मधेश छोडिक !!थ शहिद भाइ सबहक कसम, आबि रहल अछि कफ्फन बान्हिके! आर पारके लडाई लैड़ तोरासंग, बचेबै अप्पन माटी पानिके !! मधेशक' गांव गांव सऽ, फुका गेल एकताके शंख! अप्पन अधिकार लेबऽ लेल, निकली गेल मधेशी लड़ऽ मधेशक' जंग !! ७३. हंसा जारहल अछि ससुराल" ---------------------------------------- जाई छी अहाँ सँ दुर हम यी बेदर्द दुनियाके छोडीके ! नाम अहाँ के जपैत हम यौं उजरा चादर ओढीके !! नसीबमें नैं छेल हमर जीनगी जिब अहाँ संगमें ! दुवा करब भगवान सँ मिलब दोसर जनममें !! हँसी खुशीके साथ रहब यौं हमर दुवा यें अहाँ पऽ ! अइछ हमरा लेल किछ त' यौं चलुँ कटिहारी लाश पऽ !! सब मिल समदाउन गाबु बजाबु शंख घण्टकें ताल ! हमर हंसा हमरा छोडी जाँरहल अछि ससुराल !! ७४. अपनें घरमे नोकरी करतै ------------------------------------ मन अपनेमें हलचल छै सबहक मन भट़कल छै ! सगरो सऽ थाकि बौवाबीकें रस्ता दोपेडिया पऽ अटकल छै !! भयंकर आगी लागल छै धन्धोर बढैत जारहल छै ! धियापुताकें टांगहात झर्कलै गार्जन कानमें तेल लऽकें सुतल छै !! घरक' कोरो फट फट फुटै छै पडोसिया हँसि हँसिकें मजा लुटै छै ! घरमें नोकरबा फोक़डा पढैय तेकरा मालिकवा बेसर्मी सँ सुनैं छै !! लागैय छै आब घर सुडाह भ'जेतै नोकरबा अपनें संसारमें रमेतैंय ! पडोसीया सब चिज पऽ कब्जा करता तब मालिकवा अपनें घरमें नोकरी करतैंय !! ७५. बिदेशीके रक्षा बन्धन -------------------------------- भाई बहिनक' माहान पावैन आयल रक्षा बन्धन ! बहिनक यादमे बिदेशक भाईसबहक धड्कीरहल अछि धड्कन !! माहाजनक कर्जा स' भऽके तंग एलु मलेशिया साउदी कतार ! बिदेशोमे रहैत बहिन हम याद करै छी राखी त्योहार !! रेशमके काँच धागा जेका अछि भाई बहिनके बन्धन ! सदियोसे मानी आयल आई अछि पावैन रक्षा बन्धन !! भाईके लेल बहिन लऽके एल मिठाई संग राखी थारीमे ! प्रेम स' भाईके मिठाई खुवाबैत बान्है छैथ राखी दहिना हाथके नाडीमे !! ७६. माइके ममता ----------------------- माई कें ममता अथाह् सब सँ पैग जथाह् ! पी माईकें दुध दशधार देखै अछि दुनियाँ संसार !! माईकें गोदीसन नैं कोनो आसन बैस गोदीमें केलौं शासन ! लथार-पथार सब सहैं मिठ बचन सऽ बौवा कहैं !! करि काज साँझ घर आवै बौवा बौवा कैहीकें बोलावै ! नेह सँ उठाके गोदीमें सुतावै दुधके संग लोरी सुनावै !! नितदिन भोर अंगनामें लावै अंगुरी पकैर कऽ लरऽ सिखावै ! माई अछि ममताकें माहारानी माई सऽ जुटल सब सन्तानकें जीनगानी !! ७७. गन्तब्य ---------------- बिधाताकें बिधि काटऽ नै सकै छी, जीनगी सँ दुर भाग नै सकै छी ! दु:ख दर्द सब संगमें ल'के , संघर्षके रथ पऽ यात्रा करे छी !! नै जानि कतऽ भेटतै गनतब्य , खोजैत जारहल छी चाँहूदिस ! मनमें बहुतो सवाल जवाफ उब्जै छै, कहीं हरेबैए की जनमासक' बिच !! कखनो खसैत छी त' कखनो समहरैत छी, जीनगी संघर्षके बाट पऽ ! बड पैघ जिम्मेवारी सोपल अछि, यी मानव चोलाके काँध पऽ !! ससरि-ससरिके आगू बढिरहल छी, अप्पन गनतब्य लग पुगिजेबै ! जगमे निक कोनो काज कऽके , यी मानव जोनिके सफल बनेवै !! ७८. हमसब मैथिल कहावै छी –----------------------------------- जन्म लेलौं हम मिथिला भुमि पऽ मैथिल पुत्र कहावै छी ! भोरें प्रातें जखनें तखनें मैथिली भाषा बाजै छी !! माँ जानकीके जन्मभुमि मिथिला हमर महान छै ! तहीं भुमिके बनल जमाई स्वंम राम भगवान छै !! धोती, कुर्ता, गम्छा, पाग अछि मिथिलाके भेष ! अहीं मिथिलाके पुत्र छेल राजा सत्तवर्ता स्लहेस !! इतिहासके स्वच्छ पाना पऽ लिखल बिदेह जनकके कहानी छै ! अहीं मिथिलाके भुमि पऽ बहिरहल कमला कोशीके पानी छै !! मिथिलें भुमिके जंगलमे भगवान राम धुनि लगेनें छेल ! तहीं दिन सऽ ओ जंगलके नाम रामधुनि वन राखल गेल !! स्वर्गसन अहीं मिथिलाके सब मैथिल गाथा गावै छै ! सत्ययुग बितल कलियुग आयल तहियो नें रामधुनिके आगी निभावै छै !! मिथिलाके कोकिल कवि छेल विधापति महान ! तेकरें शिष्य बनल रहैं! स्वंम महेश्वर भगवान !! हमसब मैथिल मिथिलावासी जन्मभुमिके चरणमें शिष नवावै छी ! गर्व अछि हमरा अपन मिथिला पऽ जे हमसब मैथिल कहावै छी !! ७९.हम परदेसिया पागल बनि गेलौं ! -------------------------------------------- जखनें तखनें अहीं याद आवै छी , अहाँ वेदर्दी कोना हमरा छोडी गेलौं ! संग संग जीयै मरैके कसम अहाँ, कोनाके एतेक जल्दी सँऽ बिर्सि गेलौं ! लोकक' आगा सरम सऽ शीर झुकैत छै, यी केहेन जीनगीमे दाग लगा देलौं ! बहुत पछितारहल छी अखन हम , जे अहाँ सनके घाति सँऽ दिल लगेलौं ! अहाँ वेदर्दीके याद भुलावके लेल , हम परदेसिया पागल बनि गेलौं ! ८०.कोना मनायब दिपावली ? ------------------------------------ केहेन आगी लागल छै मधेशमें, कतौं नै देखै छी खुशहाली ! सगरो छै बन्द,हडताल,आन्दोलनके र्याली, त' कहूँ एनामे कोना मनायब दिपावली ? तन छै बिदेशमें, मन अछि गाममें , मातृभुमिके खबर सुनि-सुनिके हमरा , एकोरति मन नै लागिरहल छै काममें ! खेतखरिहान सबटा लुटिरहल छै, घरक' बोखारी भ'गेलै खाली , त' कहूँ एनामे कोना मनायब दिपावली ? केकरो घरमे जगमग दिप जरतै , केकरो घरमे घट़ा घनघोर काली ! जब दियाबातीके उक्की फेरैवाला छिन लेलकै , त' कहूँ एनामे कोना मनायब दिपावली ? ८१. सत्तापरके सरकार ---------------------------- जनताके छातीपर गोली चलावैके हुकुम दै छै सत्ता पऽके सरकार । से देखि कँ' आँखी मुनि लेनें छै राष्ट्रिय स्तरके मिडिया आ संचार ।। हक मंगनिहार भाइ मारिके बीरता देख्वै छै जंगी प्रशासन । चरनसिमाके पार क'चुकल छै खसवादी सबहक शासन ।। अप्पन अधिकार लेल जे अवाज उठावै ओकरा कहै छै आतंकवादी । जे माइके आंचल भाइके खुन सँ रंगवै से कहावैत छै राष्ट्रवादी ।। शोषन दमनके घैला भरिगेल , गुन्जे लागल मधेशमे अजादीके अवाज । द'के अपँपन कुर्बानी मधेशी आब बनायत स्वच्छ , स्वतन्त्र स्वराज ।। गामगाम आ बथानबथानमे बज लाग्लै स्वराजक' गीत । हबियो एकजुट मधेशी आब भ'के रहतै मधेशक' जीत ।। ८२.सिकापर टांगल डाली छै --------------------------------- सिकापर टांगल डाली छै मुर्झाएल जाइत फुलवारी छै पगलागेल सब माली छै खाधपानिके कमि नै अहिठाम तहिओ भुमि प्रतिप्राठभs खाली छै ! देवतासब अशिआएल छै वेली चमेली चम्पाके लेल पुजेगरीके नै कोनो कमि छै तोरै सँ पहिनें फूल मुर्झागेल ! सब अहिठाम देवताके नामे जय जयकार करै छै जेहो २/४ टा फूल नीक भेटै तकरा अपने लेल माला बन्वै छै ! भूत प्रेतसब ठिठियारहल छै घरोके दगरिन वोनै मिलल बाँकी लोग सेहो दगरिनके कहल मानै तै हरदम घरमे ओझा धामी लागल छै ! कहिआ तक चलैत रहतै यी रबैया नै भुते भागै नै देवते पुजाई प्रकृतियो उपर सँ बज्जर खसवैय देवताके घर दिन दिन डहल जाई ! ८३.सुरुजक' छेहाएरमे ------------------------- सुरुजक' छेहाएरमे बारह बजिया रोदके संग हजार कोस दुरमे अपन देह सँ नुनछाह पाइन निकालैत अपना खातिर नहिए परिवार आ सन्तानक शुखी जीवनके लेल अपना मोनमे अनेको सपना सजावैत अपन देहके दोहिरहल छी । गजल - १ मोनक सब सपना आँइख सँ नोर बनि बैह गेलै ! बितल प्रेमक पल दिलमे छाप बनिके रैह गेलै !! सबदिन हम ओकरासंग सुच्चा प्रेम करैत एलूँ , मुदा आइ ओ निर्मोही हमरा बेवफा नाम कैह गेलै ! देल बेवफाके नामसंग प्रेम बिछोडक' दर्दसब , घायल दिल हमर हँसिके सबटा दर्द सैह गेलै ! अपन दिल पऽ पत्थर राखि ओकरा बिर्सै लऽ खोजलूँ , मुदा फेर सऽ सामनें आबि ओ छुटल घाँ उरैह गेलै ! दिन बितलै माह बितलै संगे सब किछु बिसरैत , यी "प्रयास"के पुरा जीनगी ओकरा बिनु निमैह गेलै ! गजल - २ मिठ बोल बाजिके गर्दन पऽ चलवै छी आरी किए ? दिल सँ खेलके अहाँ बनै छी दिलक' ब्यपारी किए ? जब अहाँके अंग्रेज शहरमे रहैयके छेल तऽ, कहूँ पसंद केलौं मिथिलाके पहिरन सारि किए ? अपना बेरमे हमर करुवो बोली मिठ लागैय , हमरा बेरमे लगावैय छी दिलक' केवारि किए ? बहार सँ सुरत देखैयमे ये चाँनसन चकोर , मुदा भित्री दिलके अहाँ बनौनें छी कारि कारि किए ? जब हमर देलाह सुझावसब खराब नै छै तऽ , कहूँ हमरा हरदम दैत रहैय छी गारी किए ? गजल - ३ जनता के बिसैर संसदमे नेता करै मोज छै ! जहि खातिर जितेल्कै ओहीपर नै कोनो खोज छै !! अधिकार छिनेंलै सबमे हहाकार मचलैय , देशभर हडताल , चक्काजाम भ'रहल रोज छै ! जनताके घरमे नहीं कतौं चुल्ही पजरलैय , संसदके घरमे भ'रहल सबदिन भोज छै ! जनताके खुन सँ मातृभुमी लतपत भेलैय , तहियो नहीं नेतासबके बदलsल सोच छै ! ब्यक्तिगत स्वार्थ खातिर जनताके उस्का उस्काके , वर्तामे जाइके करिरहल कुर्सीके प्रपोज छै ! गजल - ४ हमरा डायर अपनाके फूल सम्झैय ! अपन पायरक' हमरा धुल सम्झैय !! अपनाके जटावाला माहान माहाराजी , हमराके चिलम परके गुल सम्झैय ! अपनाके त्रीपुरेश्वर बंमभोला भगवान , हमराके ओ डमरू आ त्रीशुल सम्झैय ! अपनाके आनन्द सँ रहैवाला मालिक , हमराके अपन मच्छर झुल सम्झैय ! हमराके वेली ,चमेली , गेन्दा आ क्रोटन , अपना सब सँ पैघ अरहुल सम्झैय ! हमरा हरदम आएर गैर बिरान , अपना आपके सबहक मुल सम्झैय ! गजल - ५ देखिते हमरा ओ भ'गेलै दिवानी हमर ! एतऽ कन्ट्रोलमे नै रहलै जवानी हमर !! ओ कहियो नहीं हमर अनादर करैय , ओकरा उपर चलैय मनमानी हमर ! देखनिहार सब देखिते रहिजाएत छै , सब गुण सँ सु-सज्जित छै जनानी हमर ! ओ त' ईशारा सँ सबटा बात बुझि जाइ छै , यौ सबसे बेसी अछि कनियाँ ज्ञानी हमर ! आब त' ओकरा बिनु हम जिअ नै सकै छी , ओ त' बनिगेल छै जीवन कहानी हमर ! गजल - ६ एना किए रुसै छी हमर प्राण अहाँ ! किए ल'रहल छी हमर जान अहाँ !! बचपना अखिन्तो नहीं गेल अहाँ कऽ , मुदा अखन भ'गेल छी सियान अहाँ ! हरदम हमरा नंगोचंगो करिकें , किए उडवै छी हमर धियान अहाँ ! अहिनतिमे यी जवानी बिति जायत , त' कहूँ कहिया करबै लवान अहाँ ! बात मानूँ पकडि लियँ हात हमर हमर अछी अनमोल समान अहाँ ! गजल-७ झुठें कऽ सिनेहक' जालमे हमरा अहाँ फसेलियै किए ? वचन हमरा , तन दोसर पऽ समर्पण केलियै किए ? यै कोमल हमर दिल सँ खुन निकाली निकालीके अहाँ , एना दोसरके जीवनक' महल अहाँ रंगेलियै किए ? हमरा सँ किछु सिकायत रहें तँ दिल खोलीक' कहतौं , मुदा एकाएक बिसैर दोसरके संगी बनेलियै किए ? अदि जीवनभर संग संग चलै के मोन नहीं छेल तऽ , हमरा रंगी विरंगी झुठा सपनासब देखेलियै किए ? आइ अपन जीनगी सँ हमरा दुसमनी भ'रहल छै , यी कहियो नै छुटैवाला वेवफाके दाग लगेलियै किए ? गजल-८ बड सुनर अछि रुप आ रंग अहाँ कऽ ! पावितौं हमहूँ जीवनक' संग अहाँ कऽ !! भोर सँ साँझ चेहरा पऽ मुस्कान रहै ये , केहेन अछि जवानीके उमंग अहाँ कऽ ! गजबे सुरक' संगम अछि जवानीमे , के बजावें पावता यी मिरदंग अहाँ कऽ ! चौक चौराह पर गुलछर्रा छोडैय यें , मारैत कन्खी सबटा अंग अंग अहाँ.कऽ ! नयनक' जाँदूके नै अछि जवाफ कोनो , कमाल करैय ये प्रेमक' जंग अहाँ कऽ ! गजल -९ सामने आबिके अहाँ किए नजर चोरावैय छी ? लगमें बोलाके किए फेर हमरा भगावैय छी ? नजरके सामनेमें दोसरके हाथ पकडिके , किए अहाँ हमरा प्रेमक जहर पियावैय छी ? प्रेमक झुठा सपना देखा देखाके आइ हमरा , हमर दिलके किए एना अहाँ धडकावैय छी ? आइ देखूँ अहाँके प्रेममे पागल बनिके प्रिय , घायल दिलके हाथमे ल'के हम बौवाबैय छी ! प्रेमक दियामे धोखेवाजके हावा लगाके अहाँ , हे यै "प्रयास प्रेमी" के किए एना तडपावैय छी ? गजल - १० नै करै नै किछु करऽ दै झुठें कऽ अटकल छै ! बाँकी जे छै सेहो अपन रसता भटकल छै !! मूह सँ फोडैय लब्बा करनीधरनी किछु नै , बेसरमी जकाँ बिच रसता पऽ थभरल छै ! पायरके निंचाके जमिन खुसकल जाइ छै , बेसरमीके गुमान तहियो नें सटकल छै ! आधा दर्जन निर्लज सबहक टिम बनाके , यौ टिमक कप्तान खेलरहल भलिवल छै ! यौ खेलाडी सबहक खेल देख देख कऽ आइ , दर्शकके हृदय नोर सँ भेल जलथल छै ! गजल - ११ हमर आँखिके सामने हमर दिलके तार टुटि गेलै ! हम देखिते रहि गेलूँ किओ हमर जीनगी लुटी गेलै !! अपन मनमे बहुतोरास सपनासब सजौउने रही हम , सबटा सपना चुर भेलै आ नसिब हमर फुटी गेलै ! दरबदर पागल नेहाएत बौवाबीरहल छियै हम , हमर भाग्य विधाता आइ हमरा संग किए रुठी गेलै ! हरदम सबदिन हम समयके संगमे चलैत एलुँ , मुदा तबो किए आइ हमरा हात सँ समय छुटी गेलै ! प्रयासक' सबटा प्रयास निरासाके बाईढमे भसिएलै , मोनक' सब आशा अभिलाषाके आइ लहास उठी गेलै ! गजल - १२ खजानाके ढेरी सठऽ लाग्लैय मुदा अघावैय नै किओ ! अपन मर्यादा बिर्सि वेसर्मी जेकाँ लजावैय नै किओ !! नव संगीतक' सुर आ धुन सुनैय लेल ब्याकुल छै , रंगमंच पऽ सजाएल साजवाज बजावैय नै किओ ! देखूँ मंडपके सबटा खुटाखभनी सब गाडल छै , यौ राखल छै रंगबिरंगके फूल सजावैय नै किओ ! दक्षिना मागैय छै बभना मात्र सावा टका चारिआना , यौ जज़मान लsछै सौसें हजरिया भजावैय नै किओ ! देखूँ सब आनहर सबके आँखिमे छै धुल झोकल , सामनेंमे छै सु-मार्गके रसता से देखावैय नै किओ ! गजल - १३ अपन वसमे नै ओ अंग केहेन ? जहीमे चमक नै ओ रंग केहेन ? समस्यामे नै कोनो मद्दत करैय , ओहेन साथीसबके संग केहेन ? जे अपने आपमे कटैय मरैय , यी बिना उदेश्यवाला जङ्ग केहेन ? नै कतौं खुशु देखी नै कतौं चमक , छायल उदासीके उमंग केहेन ? नै धुनमे मधुरता नै कोनो सुर , बौका गीतारक' तरंग केहेन ? गजल - १४ मोहक' पिज़डामे फैइस गेल छी भागब कोना ? यौ लोकक' कू-दृष्टिके रेत सँ कात लागब कोना ? सपना देखैत छी सबदिन सत्तकर्मके हम , गहिर निन्द सुतल छी निन्द तोडि जागब कोना ? यौ पुर्खाके अर्जल सम्पति लोक लुटिरहल छै , तकरा बैरीसब सँ बचाके हम राखब कोना ? हम लागल छी मुदा भाइ पडोसीके बात सुनैं , आब अपन भाइके की कैरके सम्झायब कोना ? मन भितरमे यी बातसब गुचौर मारै। छै , से हम शिक्षित मुरुख लोकके देखायब कोना ? गजल - १५ समाजक' सबटा कूरिती अहाँ संग लेनें चलूँ ! संस्कृति संरक्षणके पाठ सबके सिखेनें चलूँ !! जेमहर जेमहर शिक्षामे अन्हार देखैय छी , ओमहर ओमहर शिक्षाके ज्योति जलेनें चलूँ ! यौ समाजक' मस्तिष्कमे जक्रल मैएलके अहाँ , अपन दिमागी ब्रस सँ माझीके चमकेनें चलूँ ! माझल मोएलसबके अहाँ धोवैत धोखारैत , अपन मातृ संस्कृति सँ समाजके सजेनें चलूँ ! रस्ता भटकल बिसरल बाटबटोही सबके , सत्तमार्गक' रस्ताके दर्शन अहाँ करेनें चलूँ ! छोट-बर सबके बराबर नजर सँ देखैत , समाजके संग इन्सानके कर्तब निभेनें चलूँ ! गजल - १६ सोनाचाँनी सँ भरल पुरल जीनगी सुनसान किए ? फूलेफूल सँ सजायल यी महल लागैय स्मसान किए ? यौ हम त' सबकिओके नीक सँ पैहचानी रहल छी , यौ मुदा हमरा सँ सब बनिरहल छै अन्जान किए ? नै किओ गुदानैं यें नै किओ हमर कहल मानैत छै , लोग सम्झीरहल छै हमरा खेलौनाके समान किए ? आब नहिं जियल जाएत छै नहिं मरल जाएत छै , यी मानव जोनि हमरा लऽ भेलैय अनसोहान किए ? यी जीनगी आब हमरा बड्का पहाड बुझाएत छै , हमरा सँ रुसिगेल छै आइ हमर भगवान किए ? गजल - १७ अते पैघ धोका किए अहाँ हमरे साथ केलौ झुठा सपना देखाके अहाँ हमरा संग किए घात केलौं ? बौवाबैत रही हम अपने संसारमे दु:ख दर्द सहैत अपन जीनगी स' अहाँ हमरा किए आजाद केलौं ? अखन हमरा देखिके सारा दुनियाँ हँसिरहल छै, हमरा जीनगीके अहाँ एना किए बर्वाद केलौं ? लोक' क सामने माथ उठाके चल' नै सकै छी हम, हमर खुन सँ अहाँ दोसरक लाल किए हाथ केलौं ? आब त' जीन्दा लास बनिके जीरहल छी हम, कहूँ हमर सपना सबके अहाँ किए श्राद्ध केलौैं ? गजल - १८ देखिते ओकरा हमर नैनाचार भ'गेलै, नै जानी कतऽ कोनाके हमरा प्यार भ'गेलै ! की कहब, कोनाके कहब किछ नै फुरैय, यी चंचल मनमे प्रेमक' बैसार भ'गेलै ! ओकरा देखै बिना रहल नै जाइ हमरा, आब दिनों औशी राति जकाँ अन्हार भ'गेलै ! ओकरा लेल दानापानी सब तियागवैय, आब ऊ हमर जीनगीके आधार भ'गेलै ! कतऽ जा'के खोजी नाम, पत्ता किछो नै मालुम, ओकरा पाछाँ "प्रयास" गजलकार भ'गेलै ! गजल - १९ अहाँ हमर ठोरक' अछि गीत प्रिय , सेनुर स' सजेलौं अहाँके शीत प्रिय ! अहाँ दुल्हिन बनिके एलियै अंगना , नै सर्माबु यी छी दुनियाँके रित प्रिय ! खेलैत बतिसी खेल अहाँ हारि गेलौं , लेलौं अहाँके खेलमे हम जीत प्रिय ! बड्ड अनमोल पुरस्कार अछि अहाँ , बनेलौं अहाँके जीनगीके मित प्रिय ! मिलि जुलि सबटा दु:ख सहवैय , बनेवैय सफल अपन प्रित प्रिय ! गजल - २० हम बाट जोहैत अछि ओ एतै कहिया ? देल वचन हमरा ओ निभेतै कहिया ? कुमारी बैसल अछि हम ओकरे लेल , नै जानि हमरा दुल्हन बनेतै कहिया ? एतऽ मनमे हमर खरेरी लागल छै , मनमे प्रेमक' बारिस बर्सेतै कहिया ? सपना सब कतेक सजेनें अछि हम , यी सपना सकार हमर हेतै कहिया ? जीवनके रंग सबटा बेरंग भ'गेलै , ओ नव रंगसे हमरा रंगेतै कहिया ? गजल - २१ फसि गेलूँ हम समाजक' भिडमे आयब कोना ? कहूँ अहाँ लेल प्रेमक' फूल हम लायब कोना ? बड्ड भारि समस्यामे फसिगेल छी हम सजनी , अहाँ संगमे केल वादा कसम निभायब कोना ? पियास से हमर कण्ठ सुखिरहल छै अहि ठाँ , कहूँ आब प्रितक गीत हम प्रिय गायब कोना ? डेग-डेग पऽ आँगा पाछा पहरेदारी लागल छै , अपन संदेश हम अहाँतक पठायब कोना ? अहाँ संगके ओ प्रेमक' पल बड्ड याद आवे छै , दिल पऽ पाथर राखिके अहाँके भुलायब कोना ? गजल - २२ अहाँके देखिते हमर नयन खुशी सँ बिभोर भऽगेलै ! अहाँके आविते प्रिय हमर जीनगीमे भोर भऽगेलै !! हमर जीनगी औशीके अन्हरिया राइत बनल रहै , अहाँके मुश्कान से यी जीनगी चाँन जकाँ चकोर भऽगेलै ! बुतायल जाएत छलै मन महके आशाके किरण सब , अहाँके स्वच्छ स्नेहके ताप सँ पजैरके धंधोर भऽगेलै ! सुनसान लगैत रहैय हमर यी समुच्चा घर अंगना , अहाँ एलौं लक्ष्मी एलै से सगरो जहाँमे शोर भऽगेलै ! लोकके लेल कारी रहैय सबदिन यी प्रयासके मन , अहाँके मोहिनी रूपके जाँदू सँ यी मन गोर भऽगेलै ! गजल - २३ अहाँ किए हमरा सँ दूर भऽके लैछी प्राण साजन ! अहाँ बेगर निकली रहल छै एतऽ हमर जान साजन !! बिछोडके दर्द हम आब त' सहेय नै सकैय छी, आब त' यी जीनगी सँ भऽगेल छी हम हैरान साजन ! पंक्षी , पवन , झर्ना, खोला हमरा संग मजाक करैय, अहाँ सब जानितो किए बनै छी अन्जान साजन ! ननदी सौतिनीञा हरदम हमरा सँ झगरैत रहैय छै, सास-ससुर सम्झैय लागल छै हमरा बिरान साजन ! आँइखमे एको रति निन्द नहिं होएत छै हमरा पिया, सजाएल सेज अहाँ बिनु लागैय छै सुनसान साजन ! गजल - २४ यै बात मानू हमर हम करैय छी अहाँके प्यार सजनी ! यी जीवन अर्पण करै छी अहाँ पर नै करू इन्कार सजनी !! निन्द हमर हरेलै आँखी स' चैइन नै होएत छै एको छन, एक बेर अहूँ करिके देखूँ त हमरा संग दुलार सजनी ! यै हमर करेजा दिलोजान स' हम अहींके चाहैत छी, सबके सामनें कऽरहल छी अपन प्रेमके इजहार सजनी ! अहाँ जौं एना मूह् मोडवैय हमरा सँ' यै हमर जान, देखूँ यी जीनगी हमर भऽजेतैय बिलकुल बेकार सजनी ! यी नयन हमर आइतक अहींके बाट निहारी रहल ये प्रिय, अह़ीके लेल अखन धरि अइछ यी "प्रयास" कुमार सजनी ! गजल - २५ लागल करेजामे प्रेम बिछोडके बाण यी जीनगी जियल नै जाइ छै ! जेकरा मनके महलमे सजेनें छेलुँ ओ आइ भऽरहल पराई छै !! दुनियाँके केहेन रित बनल सब ताकैय अपना खातिर फाईदा, प्रेमक' सब वादा कसम तोडिके ओ हमरा सँ' भऽरहल विदाई छै! एतऽ सब किओ हमर अर्थी उठावैयके लेल तैयारीमे लागलैय, ओतऽ ओ हाथमे मेहंदी सजेलकै घर अंगनामे बजैत सेहनाई छै! सब सखीसब नाँचैत गावैत ओकरा दुल्हिन बनाके डोली चढेल्कै, एतऽ हमरा अछियामे चढाएत सब संगतुरिया नोर बहाई छै ! ओ हरदम सबदिन खुश रहऊ अपन नव सजनाके संगमे, एतऽ अछियामे डहैत "प्रयास"के घायल आत्मा दऽरहल बधाई छै ! गजल - २६ ब्यर्थे हमर जीनगीके इजोरिया डुबें लागल छै ! पियाके बाट तकैत यी नयन हमर जागल छै !! ओकरा बीनू एकोछन मन नहिं लागैय हमरा , नै जानि किए पिया हमर हमरा छोडी भागल छै ! पिया बिछोडके गीत गवैत देखिके लोग हमरा, सबकिओ पाथर मारैय कहै यी छौरी पागल छै ! पीया मिलनके खातिर हमर सुहाग रातिके सेज, यौ बर्षो सँ प्रेमक' फूल संग सजायल राखल छै ! यौ आशे आशमे पुरा जवानी ढलि गेलैय हमर, पिया बीनू हमर जीनगीमे जकरल बादल छै ! गजल - २७ हम त' छी अहाँके साजन अहींके भऽके रहब यौं ! जतेक कलेश देवै अहाँ सबटा हम सहब यौं !! दूर नै करू अपनासे हमरा यौ हमर साजन, अहाँ नै सुनवैय त' कहूँ ककरा हम कहब यौं ! यौ अहीं त' छी हमर भगवान पति परमेश्वर, देहमे प्राण रहैयतक अहींके नाम जपव यौं ! बस अहीं छी एकटा हमर यी जीनगीके सहारा, अहाँ बिनूँ एकपल भी हम जि नहिं सकब यौं ! अदि अहाँ आबो नहिं मानब त हमर प्राणनाथ, अपन खुन सँ यी जीनगी अहाँके नाम लिखब यौं ! गजल - २८ बसिगेलौं अहाँ हमर मनमें प्रिय प्राण बनिंके , सोभा बढा दिअँ हमर दुवारके दलान बनिंके !! देखूँ अपन मनमें प्रेमक' मण्डप बनेलौं हम, अहाँ आबिके आसन करु प्रिय जजमान बनिंके ! हमर मनके मन्दिरमे प्रेम यज्ञ सजायल। छै, अहाँ यज्ञमें समा जाऊ साकलके समान बनिंके ! बड्ड उदास लागैय हमर यी सुनसान जीनगी, यौ अहाँ मुश्कान लाबि दिअँ दुतियाके चाँन बनिंके ! यौ सखाप क'देवैय दुनियाँसे प्रेमक' बिरोधीके, हम प्रेमक' तीर तऽ प्रितम अहाँ कमान बनिंके ! गजल - २९ प्रिय प्रेम हमर हमरा गुलावके फूल तोइर दिअँ ! टुटल कोमल मनकें हमर अहाँ प्रिय जोइर दिअँ !! मन करैय भगवानके हम प्रेमक' फूल चढावितौं , हमरा प्रेमक' बगियासे प्रेमक' फूल लोहैएर दिअँ ! बिगरल रस्तापर चढि गेलैय यी जीनगीके पहिया , सुमार्ग दिस हमर जीनगीके मुह् अहाँ मोइर दिअँ ! किछु नहिं फुरैय हमरा आब हम की करि अहिं कहूँ , चलूँ मिलके संग संग ऊ बितलाह बात बिसैर दिअँ ! मुडि हिलावैके इशारा हमरा समझमे नहिं आवै ये , यौ अपन मुखारविन्द से प्रेमक' आवाज चिकैर दिअँ ! गजल - ३० याद करै छी ओकरा जे ओ एतै कहिया ? मनके ललुसा हमर पुरेतै कहिया ? अपन मांग स'जौउनें बैसल छी हम , ओ सेनुर सँ हमर मांग सजेतै कहिया ? जोवनक' रंग सब धोख्रल जाएत छै , ओ नव रंग जोवनमे लगेतै कहिया ? ध्रुव दर्शन लेल मन छै ब्याकुल हमर , ओ हमरा ध्रुव दर्शन करेतै कहिया ? घर अंगना सुनसान लागैय हमर , नै जानी ओ प्रेमक' बाजा बजेतै कहिया ? हमरा संग केलाह वादा कसमके ओ , हमरा दुल्हिन बनाके निभेतै कहिया ? गजल - ३१ सुरुजक' छेहाएरमे सबदिन पसिना चुबावैय छी ! जीवनक' सब दु:ख दर्दके अपन मीत बनावैय छी !! रस्ता पेरामे भेटल सब अनचिन्हारके संगमे लऽके , सब किछु जानितो हम दुश्मन संगे गाला मिलावैय छी ! सुखमे सबकिओ हमरा संगे हँसैत खेलैत रहैय , पडल दु:ख तऽ हम अखन अस्गर नोर बहावैय छी ! सुरुजक' छेहाएर सँ झर्कल हम अपन देहमे , जीनगी जीवैय लेल गरिबीके मलहम लगावैय छी ! बगिचामे मजरल मजरमे महुवा लागल देखि कऽ , भोर साँझ जखनें तखनें हम बिरह गीत गावैय छी ! गजल - ३२ बर्षो स' सजाएल सपना हमर आइ किओ लुटि गेल ! सब किछु बाइढमे भाँसल नसिब हमर फुटि गेल !! मनमे बनाएल प्रेमके सुन्दर महल हमर आइ , हमरे आँखिके सामनेंमे झहैर झहैरके टुटि गेल ! नै जानी कुन गल्ती भेल हमरासे ओकरा संगमे , मूह घुमा लेल्कै, हमरासे हमर विधाता रुठि गेल ! कुन कर्मके सजा तु देलह हो भगवान आइ हमरा , हमर सामनेंमे आइ हमर जाँनके डोली उठि गेल ! प्रेम बिछोडके दर्द नै सैह् पेलूँ आँखिसे नोर गिरल , पता नै पेलूँ हम हमर जिन्दा लाससे प्राण छुटी गेल ! गजल - ३३ लाल लाली लगाएल अइछ ठोर अहाँके ! चमचम चमकैय चेहरा गोर अहाँके !! कतs हेरा गेलौं किए नहि बाजिरहल छी , चिकैर चिकैर कऽरहल छी शोर अहाँके ! हर बखत बौवा बुच्चीके फटकारैय छी , कोनाके बनिगेल हृदय कठोर अहाँके ! केकरो जि मे नइ लगवैय छी आइकल , देखरहल छी भ'गेल मूह जोर अहाँके ! नीक बात कहला स' कुरकुटाके लागै ये , झुठेके आँखिसे बहीरहल नोर अहाँके ! गजल - ३४ नोरक' मईस स' हम जीनगानी लिखै छी ! अपन दु:ख सुखके हम कहानी लिखै छी !! स्मरण भ'रहल छै ओ प्रिया संगके पल , याद कऽके अपन हम ओ जवानी लिखै छी ! समाजके विपरित प्रियाके अपनेंलाह , आइ ओहें हम अपन मरदानी लिखै छी ! प्रियाके खातिर सबके संग झगरलाह , अखन ओहे अपन पहलवानी लिखै छी ! सम्झैत ओ दिनसब आँइख रसा गेलैय , सोचैत जीनगीके बाइढक' पानी लिखै छी ! गजल - ३५ यौ जखनें जखनें नेतासब गद्दार भेलैय ! यौ तखनें तखनें जनता बलत्कार भेलैय !! जखन सत्ता हथियावै के समय आएल त' , झुठेके अस्वासनके जनमे प्रचार भेलैय ! जब अपन अधिकार मागलक जनता त' , तब जनता पर सत्ताबल प्रहार भेलैय ! आइ मधेश भुमि पऽ खुनक' दाग लागलैय , मधेशीके उपर कतेग आत्याचार भेलैय ! नेतासब कुर्सि खातिर भागदौड करैय छै , निमुखा जनता आन्दोलनमे आचार भेलैय ! गजल - ३६ दिलमे लागल आँइग हम देखायब कोना ? मरल मनके आत्माके हम .जिआयब कोना ? देखूँँ हम अभागलके जरल कपार छै , महलके सुख भाग्यमे लिखायब कोना ? यी जीनगी हमर जनमासक जालमे छै , डेग-डेग पऽ छै बाधा आब बचायब कोना ? चलैत चलैत हृदयके कण्ठ सुखि गेलै , आब कतऽ सँ की लाएबके पिआयब कोना ? बड्ड जिम्मेवारी यी मानव तनके रिस्तामे , यौ बड्ड भारी यी रिस्ता हम निभायब कोना ? गजल - ३७ हमर मनके सपना कहिया साकार हेतै ! मन भितरके भावना कहिया बहार हेतै !! मनक' चौपारि पर बनाएल योजनासब , यी जनमासक' बिचमे कहिया प्रचार हेतै ! दर-दर भटैक रहल छी लोकsक देशमे , अपनें भुमि पऽ कहिया नीक रोजगार हेतै !! लडैत लडैत शहीद भ'गेलैय भाइसब , अहिंपर संविधानमे कहिया विचार हेतै ! छुपाएल प्रयासक' यी संघर्षके डेगसब , लोकसबके नजरमे कहिया देखार हेतै ! गजल - ३८ फसि गेलूँ प्रेमक झोलमे मन कानि रहल छै ! देख हमर तडप निर्मोहीया फानि रहल छै !! हम कोनो गल्ती नइ कलौं ओकरा संग प्रेममे , यी सबटा बातसब धोखेवाज जानि रहल छै ! हम त' ओकरा सबदिन सँ प्रेम करैत एलौं , मुदा ओ हमरा बेवफा नाममे सानि रहल छै ! अतेक बडका इल्जाम लागाएत हमरा पऽ , यौ एकोरति नइ हमर यी दिल मानि रहल छै ! मन करै बिर्सि जेतौं सबदिनके लेल ओकरा , ओ त' अखिन्तो हमर हृदयके रानी रहल छै ! गजल - ३९ फाटिगेल करेजा दुई टुक्रा आब हम सियब कोना ? दर्द त' बड्डजोर होएत छै आब हम जीयब कोना ? यौ मन होएत अछि जहर पीबि कऽ मरि जेतौं हम , मुदा हाथ थरथराएत छै से जहर पियब कोना ? अपनें मनक' बात मनके रसेरस खारहल छै , यौ यी मनके भीतरके बात केकरो हम कहब कोना ? पिया बिनू एकोरति निक नै लागैय छै घर अंगना , यौ आब हम यी चढल जवानीके दर्द सहब कोना ? पिया बेगर हमरा यी दिनो औशीके राति सामान छै , ओकरा बिनू तीन तीन साल असगर रहब कोना ? गजल - ४० ------------ हृदय भितर इजोत बारैत चलूँ ! सबकिओ गीत शिक्षाके गावैत चलूँ !! अज्ञानके दहमे डुबलाह सबके , ज्ञानक' सरोवरमे नहाबैत चलूँ ! यात्रामे भटैकरहल यात्री सबके , सत्तमार्गके दर्शन करावैत चलूँ ! जाईत पाईत सबकिछुके छोडिकऽ , इनसानियतके नाता निभावैत चलूँ ! अपन मर्यादामे नै कोनो आँच आवे , ऊ नैतिकताके सिप चलावैत चलूँ ! गजल - ४१ ----------- स्वार्थ सँ भरल नै निस्वार्थ सरकार चाही ! जातिपाती नै मानवताके ब्यवहार चाही !! हरदम जाम , हडताल , दंगाफसाद नै सुख चाइन सँ जिवै लेल रोजगार चाही ! असुर रावणसन पापी पण्डित जन्म नै मर्यादा पुरूष रामसन अवतार चाही ! धनके खातिर लडाई करैवाला भाई नै शुखदु:ख आधा बाटैवाला हकदार चाही ! पेटके लेल आँगु सँ भात पाँछु सँ लात नै अष्लिल रहित मिठ शब्दके आहार चाही ! राजेश मोहन झा "गुंजन" बिनु राधाक ब्रज कतबो जप तप जोग बखानी, नेहक आखर बिनु सभ अज्ञानी। पद पंकज आनन घन मोहक, बिनु राधा निष्प्राण तन जानी। मोर मुकुट चानन केर रेखा, वंशी धुन करि रहल गुमानी। पायल नहि देखब कोन दामिनि, धीपल साओन जेठ समानी। दहकय मधुवन पनघट सूखल, मसान बूझि गोकुल सखा मसानी। कुसुम तेजि सभ शूल निहारथि, उजड़ल उपवन जे छल धानी। गरल भरल यमुना जल देखल, नहिं भाबय कोयली केर वाणी। पूनीमक राति चान मुरझायल, बिलखथि ब्रज बिनु ब्रजरानी। जनचेतना आ मानव वेदनाक प्रतिनिधि कवि यात्रीजी केर जन्मदिवस पर हंस बसाओल सूखल डोबहा बगुला मानस राज भोगैए, कलियुग राजा चाकर सतयुग मुंह रहितो किछु कहल नै जाइए। कोयला आंगुर शोभित भ' क' नीलम कें दुत्कारि रहल छथि, चेतनाशून्य मानवता राखथि नहि ओ सिंहासन सम्हारि रहल छथि। हे बाबा! की भ' रहल अछि देखू स्वतंत्र राष्ट्रक सगर ठाम मे, ह'रक उपासक भेला नगर मे जोन सेठ लूटि मचाबथि गाम मे। पातहीन जे गाछ अछि नांगट होइए सभ जल ओकरे अर्पण, भरि जीवन हृदय रहल पियासल मरला बाद गंगाजल सँ तर्पण॥॥॥ बाल कविता- भादवक अन्हरिया भादवक राति घनघोर अन्हारि कांपय पात आ डोलय ठांढ़ि शांत जगत निशब्द राति बिजुरी खन खन चमकै दुआरि। सूखल ठूठ गाछ पर भगजोगनी उड़ैए जेना मसान मे चिता सँ लुत्ती उड़ैए एहन अन्हार कहिओ नहि देखल पल-क्षण-पहर आब लगै पहाड़ ममता चिरनिद्रा मे जीवन उधार मनुक्खक मोन,आश नहि तेजल विधानक लेख कहियो नहि मेटल एहि जीवन मे, जौं देखलहुं, शरदक चान इजोरिया फुहारि त' कहियो काट' पड़त भादवक ई वीभत्स अन्हारि जरैत दीप केर किछु शिखा अछि बांचल मिझाओत निश्चय अंत कथा बिधना केर रचल बीति गेल राति दिनकर अयला भेल इजोत अन्हारि परा गेल मुदा जे लिखल छल ओ भ' गेल ई वीभत्स भादवक अन्हरिया! त्याग-ममताक जीवन हरि लेल॥ कृष्ण छठिहारक पद नीलनयन मे काजर लागल बिहुंसि रहल चितचोर हे, बाल गोपाल छठिहारक राति सूतल यशोमती कोर हे। पीयर अंगा टोपी पीयर पीतांबर मुकुट भल मोर हे, तीनू देवी सोहर गाबथि बालक मुस्की ठोर हे। पैजनिया झुनझुन रुनझुन बाजै देखू रूप बेजोर हे, बिसरि गेल छथि सभ अपना कें नंदन माखनचोर हे। धन धन मातु यशोदा जे आओल ललना कोर हे, धन भेल गोकुलधाम देखि नटवर नंदकिशोर हे। मनोज झा मुक्ति प्रकृतिसँ अनुनय मृत्यु शैय्यापरसँ अपन सत्कर्मक तपस्यासँ ओ प्रकृतिकेँ अनुनय कऽ रहल अछि अवतारक वास्ते । ओ एहन अवतारक माँग करैछ जे गाम आ देशके सत्यकपथपर डोरिआवए समाजके समाजिकताक पाठ पढाबए । कियाकि ओ देखने अछि, रक्षकके भक्षक कर्मचारीके भ्रष्टाचारी आ समाजसेवीके दुराचारी बनल । ओ अनुभव कएने अछि परमेश्वरके बास होबऽवला पञ्चके नोट आ भोटकलेल धकड़िया बनल व्यक्तिगत स्वार्थक पूर्तिमे मधेशियाके पहडिया आ पहडियाके मधेशिया बनल । ओ सुनने अछि, पत्रकारके भ्रष्टाचारीके दलाली करैत शिक्षककेँ विद्यार्थीक भविष्यके हलाली करैत न्यायमूर्तिसबके सत्यके खुलेआम बली चढवैत मन्त्री–जन्त्रीकेँ देशके बेचिकऽ अपन झोरी भरैत । ओ चिन्तित अछि, निमुखाक निसाफ आ जनताक न्यायकलेल समाजमे समाजिकता आ देशक विकासलेल देशमे राजनैतिक स्थायित्व आ भ्रष्टाचारिक नाशलेल वृद्धप्रति सम्मान आ छोटप्रति स्नेहक भाव विकासलेल । ओकरा आँखिक आगा सब दृश्य नाँचि रहल छैक, नागरिक,व्यापारी, कर्मचारी, नेता ओ समाजकसब अवयवकेँ पहिरने मुखौटाके भाँपि रहल छैक । अपन जीवनक अन्तिम क्षणमे, अन्तिम अभिलाषा पुरा करबाकलेल प्रकृतिके मृत्यु शैय्यापरसँ गोहरवैत अछि, ‘हे प्रकृति आँहाँमे सामथ्र्य अछि, एकटा अवतारी जन्मादियौ जे गाम आ देशके सत्यकपथपर डोरियाबय समाजके समाजिकताक पाठ पढाबय । जहियासँ समाजमे समाजिकता अओतै गाम आ देश पटरीपर अपने अओतै ।’ रौशन कुमार झा "गोविन्द"- पिता - श्री नारायण जी झा, पता - ग्रा०+पो० - सतघरा, थाना - बाबूबरही, जिला - मधुबनी, बिहार कसैया दहेज मिथिला के पावन धरती पर, राखल एखनो धरि अय सहेज । आंच अबैया नारीक मान पर, बहुत कसैया अय इ दहेज़ ।।१।। आन शान के राइख ताख पर, लैया बेटा के बदला में दहेज़ । सबटा भार दइया बेटीये पर, रहि ने गेल कनिको परहेज ।।२।। नै जनि कक्कर अय ई देन, पराया सब बेटी के बुझैया । जमा करैया दहेजक धन, बेटा ककरो जेना किनैया ।।३।। देब लेल बेटी के निक घर, करैया अरमानक त्याग । घुमि तकैया गाम-गाम वर, नै थाकैया घटकक पग ।।४।। दाम लगबैया बेटा के, बेटा के बजार बड तेज । खाली करैया बात टका के, बहुत कसैया अय ई दहेज़ ।।५।। बहुत मोल-भाव कय, होइया बियाह फेर ठीक । दहेजक मोल चुकाबय, जाइया घरारी तक बिक ।।६।। सखी-सहेली नैना जोगिन, बर बराती सब अबइया । नव युवती बनय सुहागिन, ख़ुशी स् बियाह भ् जाइया ।।७।। माँ-बाबू , बहिन और भैया, सब तेजि कय सासुर बसैया । सौस-ससुर सब ताना दैया, बिन जवाब के सब सुनैया ।।८।। सब पैलो पर सौस कहैया, किछु नै अनलक ई दहेज । नारी के सम्मान जरैया, बहुत कसैया अय ई दहेज ।।९।। अपने भाग्य के दोषी मानै, नोर बहा क सब सहैया । नैहरक लोक किछो नै जानै, बेटी पर कि कहर अबैया ।।१०।। किछु नारी सबटा सहैया, किछु जीवन के मिटबैया । जे जीवन के मोल बुझैया, सासुर ओकर जान ल लैया ।।११।। समस्या नै मात्र मिथिला के, समस्या पूरा भारतवर्ष में । दहेज स बचाऊ नारी के, नारीक जीवन बड संघर्ष में ।।१२।। रवि भूषण पाठक श्री लक्ष्‍मी चौधरी ,करियनक सम्‍मान मे ऊ जे क' देलखिन उठानी मे की तू क' सकबीहीं जवानी मे? कोन जोकरक तोहर चरचा एे ठाम बहुत दम छै हुनकर कहानी मे की भाव की अभाव की परभाव कहियौ बूझि पेबही ऐ जिनगानी मे? हजार-लाख मे एकोटा ने ईमानदार रहै सौ मे सौटा विधायकजीक कोटेदार रहै भीजल चीन्‍नी रहै गहुम बोरापार रहै जेहल मे जीभ पेट थाना मे गिरफ्तार रहै दै मुट्ठी सॅं लै लोपेलोप एहने ई कारोबार रहै ऐ मिलावट –कमतौली क सब हिस्‍सेदार रहै मिलतै छल एक धुर अप्‍प्‍न जमीन सिमरिया सँ बिस्‍फी तक भाषाक कालाबजार रहै डहकन जत्‍ते खोड़बौ ओत्‍ते गड़तौ गरमी मे आगि जाड़ मे बर्फ सन लागतौ नोचतौ नछोरतौ भमोरतौ ने फालतू जत्‍त' जत्‍त' छूतौ ओत' ओत' दागतौ भगेतौ खेहाड़तौ ने जालेे बिछेतौ बिन कत्‍ते दूरे सँ गत्‍तर-गत्‍तर काटतौ खट्टा चूक्‍क दोसरक खु‍शी देखिते हुनकर मोन भ' जाइ छैन खट्टा चूक्‍क दोसर के मुसकियाइत हुनकर दिल मे उठै छैन हुक दोसर के हरियाइत देख हुनकर पानि किएक सुखैत छैक किएक ओ सुखा के कसौंझी भेल जाइत छथिन पूरा टोल गीत गाबैत रहै आ हुनकर दांत कोथ रहै पुरा गाम खुशी सँ हरियर रहै केवल हुनकर मोन पतैली जँका कारी भेल रहै हयौ नीच्‍चे गिरबाक होए त' भरल-पुरल गिरू झूल भ' गिरबै त' किओ छुअत नइ छुअत..... मीत्‍ता-2 एना दोस्‍ती के जुनि गीज मीत्‍ता कखनो दुश्‍मनो पर पसीज मीत्‍ता ढ़ोलहा देने कसम किरिया केहन दम धेनाइयौ कुनो छै चीज मीत्ता एना जे करबै दर्दक विज्ञापन कम कहनैये छै तमीज मीत्‍ता हरियर हरियर खूब हरियर रहै आ लाल खूब टक्‍क लाल मुदा हरियर जे कनेक करियाइत रहै आ लाल जे खूनमाखून होइत रहै सेहो देखि लेलियै ऐ बेर गाम मे तहिना ऊज्‍जर मे खूब टीनोपाल रहै आ सेठबा सब खूब मालामाल रहै मुदा उजरका आब बेदाग नइ बचलै सेहो लिख लेलियै ऐ बेर गाम मे पीयर ने हरिदैल रहै ने बसंती पाकल जे सडि़ गेल रहै से चखि लेलियै ऐ बेर गाम मे..... बहुत किछु विदा भ' गेल रहै आ किछु विदा हेबाक लेल तैयार रहै गेट पर सबसँ पहिने मुंहक मैथिली आ ईसरगत,डरकडोरि ,बद्धी,माला लागैत रहै नइ रहतै देह पर कुनो सूत खरखर सुभाव क' स्‍थान पर बरसैत रहै चाशनी वला मौध आ जे मोन मे रहै से ठोर पर नइ रहै तमाम आदर्श नुका रहलै भगवत्‍ती घरक कुनो ताखा मे सपना सब भकुआयल -भूतिआयल अतृप्‍त ईच्‍छाक धार बहैत रहै पूरा देह व्‍यर्थ प्रलापी व्‍यर्थ प्रलापी घनघोर षड्यंत्रकारी जे लिखै छथिन बड्ड नीक ओ कत' गेलखिन ? सुर आ असुर दूनू के देलासा दए वला कविता ,कहानी ,आलोचना ब्‍लॉग ,पत्रिका ,किताबादि सँ सम्‍पुष्‍ट ओ युवा मनीषि कत' चलि गेलखिन हुनकर अशुभ वाणी अमंगलकारी छाया नइ देखाइछ त' मोन किदनदन कर' लागैत अ‍छि ऊ छथिन चालि चलै लेल आ हमहूं छी हुनकर चालि बिगाड़बाक लेल हे ऊप्‍पर सँ हरियर आ अंदर सँ सोंसि-घडि़यार अहांक फू-फा नइ सुनै छी त' कान नोच्‍च' लागैत अछि अहांक दुष्‍ट सोच अछि तखने हमहूं छी अपने कत्‍त'छी धियान लगेने ? झाबाद झाबाद रहै ,मिश्राबाद रहै यादबाद रहै ,मंडलाबाद रहै आ सिंह सँ पसवान के सुसमाद रहै तखने मिथिला जिंदाबाद रहै बाल कविता- 'क' 'क' सँ कवि मे इएह बेमारी ''हम्‍मर कविता सबसँ भारी'' कहि कहि राहडि़ लिखथि खेसारी 'ग' हरियर कचोर गेनहारी 'घ' सॅं घमर्थन चलै दिन-राति 'ङ ' सँ कोनो नइ किछुओ ने बात बाल कविता - मानसून पहिल बुटम सुरूज भगवान बाबू हौ दादा हौ निकलै प्राण तखने सहकै हवा मचान दोसर बुटम दक्षिण अंडमान रोकि हिमालय ई बलवान कहै नहाबू खेत बथान तेसर बुटम पछुआ विक्षोभ देखै की छें मालदह चोभ चारिम बुटम दछिनहा थान हम ने देखलियै हे भगवान एलनीनो सन बुटम नइ गान भीज -भीजा जुड़ा बहलमान

बाल कविता- सुन वौआ सुन ऊ एथुन बस आबै लेल दुनिया के देखाबै लेल सुन वौआ सुन ऊ एथुन  पात बिछाबै लेल खाए ने लेल खुआबै लेल कर वौआ कर ऊ एथुन की खर उठाबै लेल? बातक लकड़ी लगाबै लेल मान वौआ मान

बाल कविता- ब्‍लेक होल चाकर छै की गोल छै नाम एकर ब्‍लेक होल छै बड़का दावी ग्रह नक्षत्र केे खोलै सबहक पोल छै नाम एकर ब्‍लेकहोल छै

कहियो रहै ई रंगगर तारा आब ई उजरल टोल छै नाम एकर ब्‍लेक होल छै

बड़ घनत्‍व बड़ बेशी आकर्षण की बूझियै हौ झोल छै नाम एकर ब्‍लेकहोल छै प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली अलर - बलर मालिक – नौकर हम नै बुझी आटा चोकर हम नै बुझी खेल – बुझौअल में छी पारंगत अपन – अनकर हम नै बुझी आमक गाछी दैड়बे करब खेतक छिमि तोड়बे करब कब्बै – मांगुर के लालच में बंसी ल क बैसबे करब बाबा गेलखिन हरवाही पर कक्का गेलखिन सुनवाही पर गर्मी छुट्टी में आम क गाछी में बैसल छी हम ओगरवाही पर बाबू के नै पसिन्द छैन लालू कहै छैथ ओ अछि बड्ड चालू आंगन में मां बडी काल सं पका रहल अछि सहजन-आलू हरवाहा सब हर जोतै अछि चरवाहा सब मुंह दूसै अछि बैट-बा̆ल ल क छौंडा सब चौका-छक्का खूब जडै় अछि । कंसार क भूंजा फ़ांक़बे करब एम्हर-आमहर झांक़बे करब दाय-माय के डेरबय खातिर कुकूर जेकाँ भुंकबे करब माँ के बात सेहो बुझब सोझा इस्कूल जेबे करब पानि पीब लेल मुदा दू मिनट चापा कल पर रुकबे करब कोठा पर हम सुतबे करब मना करय पर रूसबे करब इस्कूल क सबक याद कर लेल भोरका पहर उठबे करब पीसा कहै छैथ पायलट बनिह मामा कहै छथि डा̆क्टर बनिह जिनका जे कहबा क कहौथ ग हम जे चाहै छि से बनबे करब आर किछु बनी वा नै बनी निक मनुख हम बनबे करब विन्देश्वर_ठाकुर सामा भरि साल ओ रहली सासुर नैहर आब बजाबू एलै देखियौ खरनाके दिन सामा चलू बनाबू छोटकी बहिनो हंस बनाबू जेठकी दिदी चकेबा हम बनाबी ढोलकियासब भौजी बनबू चुगला एलै केहन सोहाबन रतिया चकमक करै चंगेरा ताँहिपर चारुदिस पसरल सामा दाइके डेरा गैयौ सबकिओ गीत गोसाओन करियौ श्री गणेश भैया जिता' सालो-साल करथिन् कृपा महेश समा-चकेबा खेलू बहिना नीक गीतसब गाबू भैया घर हो अनधन सोना चुगलाके मुंह झरकाबू लालदेव कामत कविता- उर्फ नाम एकटा रहथि मसोमात शान्‍ति हिनक काज छलनि अशान्‍ति जाहि दिन किनकोसँ झगड़ नहि हुअ से दिन अशुद्धे रहि जाइक ई भाय लगाकए क्रिया-शपथ खाथि आ गारि फज्‍जति सेहो भाइये लगाकऽ दैन्‍ह कोनो गप्‍प सरक्कामे सेहो बजैत-बजैत कहथिन भैखौकी नीक वार्तालापमे सेहो कईबेर बाजथि भैखौकी भरि गामक लोक जनिजाति आ पुरुखो हुनका देखतहि बाजि उठैत- भैखौकी। नीक वार्तालापमे सेहो कएक बेर बाजथि- भैखौकी। आब ई हिनका मादे रेबाज रूा रीयाज भऽ गेल गेल छल। सभ कियो हुनका मुहोँपर करए सम्‍बोधन हेयै भैखौकी आब हुनका कियो अलोलावाली नहि चाल पारय, हेगै भैखौकी...। हुनक प्रसिद्ध उर्फ नाम आ उपनाम भऽ गेल रहनि भैखौकी। हुनक मृत्‍यु भोजमे तिमन चिख्‍खा पंचो बजला आ बारिको बाजल- भैखौकीक भोज नीक बनल, बड़ नीक।” राम प्रीत पासवान कविता- भूतक बाप पिशांच उर्फ आशारामक जोड़ा लगले भूत पिशांच प्रेत पता नइ छल कोन देवी आएल गुनी ओजहा वैद्य बौरहवा जोगी। देल माथपर हाथ कानमे पोरो डॉंट भगलै गै छुतहरी पकैड़ कए ठोकबौ कॉंटी। देलक भूत झमारि मोचारि पकड़लक गट्टा। पीठपर ऐँठ घुमाय बजल करियौ की पढ़ा। ओजहा भेल अवाक् दृश्‍य भऽ गेलै अचम्‍भा सौंसे गामक लोक देखलक भूतक दंगा। भुइयॉं देलक पटैक देमए लगलै गरदनियॉं। एमहर-ओमहर देख भूत मारै पटकनियॉं। भूतक देख अदङ्क घुसैर गेल तंतर-मंतर। दौड़ै जा हओ बाप काज नइ केलकए जंतर। मोटका लाठी हाथ नेने संग आएल भँगीवा। भूतक देख आतंक खूब तमसाएल भँगीवा। कसि कऽ पटकल डॉंग जेना हो हमरे लागल बाप-बाप चिचियाएल लोक छहोँ-छित्ते भागल। भूतक बाप पिशांच छिऐँ तूँ चिन्‍हले हमरा। नइ भगवेँ तूँ आब तखन हम कटबौ चमरा। भेल भूत स्‍तब्‍ध भँगीवा गट्टा पकड़लक। लेनहि चलि गेल घर तखन बिलैया ठोकलक। कोय बजै छल वाह भँगीवा बड़ मंतरिया कोय कहै भक लड़ि भँगीवा छै दिवगढ़िया। ढोरियाक मंतर नै कहियो सियाय भँगीवा झारए लागल भूत बिलैया ठोकि भँगीवा। घन्‍टा बीतल बाद तखन बहराएल भँगीवा नर्रा खोलैत निकसल बाहर आएल भँगीवा। भूत छेलै बड़ ढीठ मोँछ टेरैत बाजल नै केकरो वस बात तखन हमरेसँ भागल। भगलै भूत प्रेत घरसँ निकसल कनियॉं तनने नमहर घोघ पैरमे बजैए पैजनियॉं। निकैसते लगलक गोर खुश भऽ गेलै भँगीवा ठोकलक माथा हाथ तूँ कनियॉं जुग जुग जीवा। छौड़ा केतए नरहेर रहि-रहि व्‍यंग कसै छल तोहर जनौ भितुरका गप मुँहकेँ देख हँसै छल। भँगीवा भेल महंथ बनि गेल मुँर्खक ओजहा एनए गामक कृष्‍ण बजत के ओकरा सोझहा..? बेसी भेल समर्थक चेला जर-जनानी भँगीवा मस्‍त निधोख केतौ नै आना-कानी। भँगीवा चलै बाट पुक्की मरै केतए छौ भेल भँगीवा भगवान आशारामक जोड़ा। किशन कारीगर इस्कूल इस्कूल जाइत छी हम झोड़ामे कॉपी किताब नेने स्कूल बैगमे टिफिन रखने कूदैत फंगैत हँसैत-गबैत स्कूल जाइत छी हम. टेम-टेमपर पढ़ब-लिखब अ आ आ ई हम सीखब पैरे-पैरे, स्कूल गाड़ीमे बैसि हमहूँ आई स्कूल जाएब. अपने मने कहियो भिंसरे उठब सभ सं पहिने मुहँ हाथ धोअब भूख लागत त' जलखै करब फेर कनि कल पढ़ै लेल बैसब. इस्कूलक घंटी हमरा शोर पारै मास्टरजी कतेक नीक खिस्सा सुनाबैथ नहा-सोनाक' छी हम तैयार मम्मी डैडी हमरा स्कूल द' आबै. किताबमे कतेक नीक डाँरी पारल सीलेट भट्ठापर लिखब नीक लागल देखि देखि हम डाँरी परलौहं रंग भरल स्केच केहेन हँसी लागल. मास्टरजी हमरा कानमे कहलैन पढ़ बौआ अ आ, सी डी ई आई हहूँ अक्षर सिखलौहं हँसी लागल केहेन खी खी खी आई कतेक लोक इस्कूल एलै धिया-पूता सभ हँसले-कनलै सभ मिली फेर पढ़ै लगलै मास्टरजी के कतेक नीक लगलै. इस्कूलमे नबका ज्ञान सीखब पढहब-लिखब आ खेलब-धूपब दोस महिम संग सलाह आ झगड़ा कतेक नीक किताबी ककहरा. जखैन जेहेन नीक लागल फेर खेलेबो धूपबो करैत छी हम अपने मने आ की होमवर्क बनने इस्कूल जाइत छी हम. सुशान्त झा "अवलोकित" कविता- नेनपन मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। बाबू केर कनहा, मइयाँ केर मालिश। बाबाक पढ़ल श्लोक फेर सँ सुनि आय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय।। नानी केर खिस्सा, नाना केर दुलार, मामा केर थोपड़ी,मामी केर मल्हार। हाथ महक चुसनी,पैर महक फुदना, मोन होइया फेर सँ भेट जायत आय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय, माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। नहि भोजन केर चिन्ता,नहि ओछौन'क झमेला। हम नहि बिसरलौं घुआं मुआं वाला खेला। जार'क रौद में , बीचे आंगन में, कपड़ा वाला झूला में फेर सँ झूलि जाय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। हे यौ #भोला बाबा,हे यौ #औघड़दानी । माँग'य अहाँ सँ "अवलोकित" अज्ञानी। जँ किछु देब त' द' दिअ #नेनपन, फेर सँ एक बेर हम नेना भ' जाय। मन होइया फेर सँ नेना भ' जाय। माय'क कोरा में हँसी आ खेलाय। विदेह सदेह:१९|| 1339 1340 || विदेह सदेह:१९

A

- 45/0 ‘al %: ve ar Th , ae q d — i |

> ee i i | जि 2 ; = ai & गन

_ i है... कु जोक हू सी ये के “4 से i Lax: ci Ne 7 — aE eS 4 Aa... oa NN &

= तल विवेह सम्मान 5. 4 “0 Favre Sa | | tanta zeae यादव: सुपर सवा दुखरन ee | | & तानपुरा का ae ete रे PSE aie | | प्रकनकरुलजारहलअंि। कला, रे

, a My a iis INA S = x Py & _ tg) न iv

नक्शा पक सम 2 g JEeesrursyrecc | CJ €

a ap geo 4 \ . SI 23 PE i ~~ 7 BY : न

34 an: SY twa +

pa “< — a ¥ कु श @ Ed

कै. 2 i — a >

Ee

fics | ; fa y

vg me, 4 3 sak 4 \ > ! z= : का . Ti = : INS

क्र, = ee __ Ss

जद ली ८0 ATA डर ty

“@ 4 OF iy AN NTA बी We WAN AN ANA || Mm , a > \p fe. eo $ 3 4 न eae है 4 ats a, ~~ Poe ! we कि : a | \4 दर ६ i ie m7}

| My दे

ः be गेल \ , ay > है _ rd

>> “रे, hg ¢ Sa ?E— a ont की st Se मा कै vena ; न hl “—™, ही a 4 \\ ry \. y | ee: “रा Ss - i

न 4 Lene जय | La कर हा... ZG a ae » ४ “सु f 44 EES ae = | ay Fees.) “aX १९ ae | | ही. 3 2 कक AS . अर cee eR ot

by. हे भी गा

uy eo

‘ .

mS

é ' ES न का - ; | {ec Ste > । चल रद om

की. | डर > a Vv « , ee

हि RY गन

~ 3 = == a yas, x se ce

| | किक. / 5 y 7५ | - = 8 बुर गेल ae के = = 2 — fern. 8 3 Es at < दर | Pr , | — / | | f seg | y | Had yy Wie

BP iy, रा । हा .

सर / = ay: [INN 2 x ut i Va = ni . ५४५ f ery

लाख

का” छू ¥ x 4 पर

\ मिला cS , R tase | 4 = के .

Va Wha: है.) | Bey oa i a

ही ee Va ze iS Se { i . f = मर ri mT जा... -. ३ 3 ी

ही { » AS = | अं og \ . लि

» री 3 ~~. By 7% 2 é cia a भा bid = >

क्र. i hi | Hi A BONN | 0 = i ॥ fe ey \, \ 2 er! \ । मल wey | \ सा tie gS =]

ie Is : है 3 2a है

5 Pad = ge , \ y ३ . = =

नगर = । पर ty. A = laced > eT a aaa I te? ed)

4 A -”

a ie = A Lee AS ON 7 : a <jer Ne = x Fs aig "3 ; ~ 7

Pe देय armed peal तय पट i ee pl NG | <a HON SS x. ZA é | i हो) ia

S| eee. विवेह aout a o fare जशथोन ४ || senses किशोरी दास; ayrer निबित मण्डल | |e सौजरी बादल 3s ई समझा योगदान सम्मन | प्रानकएल जारहल SHB! Za |] pas SH 2 हक. De

Aa <

a 6 . & mh थे. ! |

T | Us q EI a Ls ;

Ex ne

पथ ta है ee at WA

ध Fai जद कि लि कि * ay २ oy “3 he, a A ee F) ae { ese Ci eae ३२८ ~~ के कि ee ATP WG a WEN ce ee =e ARE itr. Saicany are, SIO PEE ARE aes Pi CAEL ce, LOwnloa) अफ़िकाक चीता AFRICAN CHEETA Acinonyx jubatus

३७ न eS Seq साभार aon pisabay-com (freedownload) मैथिली - चीता (चित्रमें - अफ्िकाक चीता) हिल्‍दी - चीता संस्कृत - चित्रकः, चित्रकायः, तरक्षुः, चित्रव्याघ:,वेगवत्‌, द्वीपिनू अंग्रेजी - CHEETA (NORTH & EAST INDIAN ACCENT), CHEETAH (SOUTH & WEST INDIAN ACCENT), PANTHER, HUNTING LEOPARD जैंववैज्ञा८ नाम - Acinonyx jubatus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भर जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

y Py 5 Se y 4 7% Z od wt J ASS 4 Tt ye SoM Fin al \ AN can So allo a दठ \ a \ \\ रे \ 2 हिमालयी गिद्ध / हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE Gyps himalayensis

अर aN = © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शर v4 ag” © जा नलिवत = cy 4S , oe DN pa रद my RLS : 5 Ap we Pei a pnt aie at कि "रन Oe मैथिली - चिल्होरि (उच्चा० - चिल्होइर) या चील्ह (चित्रमे - करिया facet हिन्दी - चील संस्कृत - चिल्ल, वाताट, आतायिनु, प्रतिबिम्ब, कएठनीडक आदि अंग्रेजी - KITE (चित्रमे - BLACK / PARRIAH KITE) जैववैज्ञा० नाम - Milvus spp., Elanus spp. & members of 0 other genera (चित्रमे - Milvus migrans) (Excluding genera covered under EAGLE) he - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ Ts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

g डर ‘es न Bo. > मैथिली - चिल्होरि (उच्चा० - चिल्होइर) या चील्ह (चित्रमे - करिया पीठबला sont चिल्होरि) हिन्दी - चील संस्कृत - चिल्ल, वाताट, आतायिनू्‌, प्रतिबिम्ब, कणठनीडक आदि अंग्रेजी - KITE (चित्रमे - BLACK WINGED KITE) जेववैज्ञा० नाम - Milvus spp., Elanus spp. & members of 0 other genera (चित्रमे - Elanus caeruleus) (Excluding genera covered under EAGLE) इनौट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

Qa Shae a ag ar ‘Videha” © डॉ. शशिधर कुमर tdag XN पद be NAG 73 , Va, . NN ¥ है, x Ze x i pete m\ मे iN AS ahs 9 q vy नस १0 स्थान -संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना | करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

शनि ion (ees ¥ my (Axl IBY Mester Kumar “idea, व डॉ. शशिथर presen वा Wg अपर iene | दि... ९ OO ९३% Ra 5 स्थान - संजय गाँधी जैविक उद्यान, करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

कि जि Sade न तट ०. ae ‘2 a) ¢ ‘ ss es ae — =} Nea x & वे wre | Fs SN Jar Kia ee ad i ae NY 9 Sa कि उन हाल -संजय आधी जैविक se, CoE हिमालयी गिद्ध / हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE Gyps himalayensis

ze a - Ee ——” SI = yp N RN Ne = J न 4 90) टन ee ff ही y) कसर नर लि = ७९ woe Ly 7 ant +.. स्थाल अर पटला (चित्रमे - हिमालयी ग्रिफॉल गिद्ध / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE / Gyps himalayensis)

fs BTS FF fy रा pore Sk 4 i f ip . ba oY i iF ies “| ral / हू om शशिधर कमरे. डर. ?' a =i ee | i: an i PSL) QPS « | it ~ 4 «४ 44 कि. धर AN ही RS er eee PLew लोल आ गर्दनिक बनावट (नजदीकर्से देखला पर) (चित्रमे - हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE / Gyps himalayensis)

) © Dr, Shashidhar Kumar “Videha” ORME ee ey © afte चूधव face” मैंथिली - गरूड़, Asal चिल्होरि (उच्चा« - चिल्होइर) हिन्दी - गरूड, महाश्येन संस्कृत - गरूड, उत्क्रोश, श्येन / श्येनिका (पु०/स्त्री०) आदि अंग्रेजी - EAGLE (BALD, GOLDEN, , CROWNED, BOOTED HARPY, MARTIAL, STEPPE, SERPENT etc. EAGLES) (चित्रमे - STEPPE EAGLE / मैंदानी aos) जैववैज्ञा० नाम - कुल 60 वा Asa बेसी जाति (SPECIES) (चित्रमे - Aquilla nipalensis) हनौट- संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली srt पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

oa दिन... ‘Ne iia ShashitharKinar“Videka® © डॉ. शशि ae 2 rg aii. pe galore gersaz बाथ, गा बाधमें जिलेबी गाछक डाढ़ि पर बैंसल एकटा गरूड़क जोड़ा विश्वमें गरूड़क समस्त जातिसभमें परुष-गरूड़क आकार BIC आ Sil-oResew आकार Ua होइत अछि चित्रमे - मैदानी oes = STEPPE EAGLE = Aquila nipalensis

ना लि स्वर्णिम गरूड़क चाड़गुर i TE जा | (चित्रीय निरूपण) | |) | — ft Wii ha! j j }/ ty CLAW OF A GOLDEN EAGLE] 0 7] भी ही j i) है | mtaGRaMMATIC ILLUSTRATION) \\ a RN NY Cae \ 4 PAN Wt? wy ’ yi) डर , नि ee ee साभार सौंजल्य - तिकिणीडिया पब्लिक डेमिल

लय eae? | + at २ के... 3 > 7 i} 4: कर aS | Ry ae Whe aaa न लहर Z io tie {A hes है | BL. ni = स्वर्णिम गरूड़ / GOLDEN EAGLE / Aquila chrysaetos साभार सौंजन्य - विकिपीडिया पब्लिक डॉमिन)

4 Rae? VS pes ONG Ti | i" Na Ne 2, Le, 4) is पका moe हे f 2.5 oe 3 कर if ? 4 . ३८१ एज her Kumar "dehy ©, St x “Reet © झा PA ada SWAP , | x ahs w —L—- —— | म्याल, भुनये 2 मी fen rar, जया ~— — = मैथिली - गिद्ध / गीद्ध / efter हिन्दी - गिद्ध संस्कृत - ye, सुदर्शन, Yelle, snot, भास, वज़चज्चु, वज़तुण्ड, खनगेन्द्र, Wear, दीर्घदर्शिन, कामायुसू, सघन्‌ आदि। अंग्रेजी - VULTURE (चित्रमे - HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE) जैंववैज्ञा० नाम - OLD WORLD VULTURES - 6 SPECIES & NEW WORLD VULTURES - 7 SPECIES (चित्रमें - Gyps himalayensis - an OLD WORLD VULTURE) he seep set आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी a मड़ जाइत अछि - तत्सम स्वस्पमे)

Ti Ae Pa) lanl = ve Fas कक “4 mes <r eS न: 2 ६ स्थाल - संजय गाँधी जैविक उद्याल, पटना केर प्राइगणमे एकटा गाछक & डाढ़ि पर बैंसल स्वच्छल्द South, esl oy "करिया चिल्होरि" 2 i DE th LA FU: नर: 2: Tate क करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

मा ie VS eS NG “\ ‘ x -. ae ey, , po ही aA \ NWS S we SN CSS ee NO nor संजय गा जितना करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

नल 3 श = ¥ wy) } j wai चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

ee as haa He aed (अगिला दुह UL) दाना उठा Ws खाइत Gait

G 4 ( (ee कु = x Sie alt - मर —e v-Shashidhar = र i तर गौ = अपना अगिला GE UGG हाथ जेकॉ प्रयोग Ia aA देखबामे छोटकी कंगारू (ऑस्ट्रेलियाक जीव) afer लागैत लुवस्वी

re Bs — रुभी / मादा शिकरा / Ripa (शिकरा / Rip बाज) Se = TN 4 es a TT कर कि " \)

कं की व. मे किक ‘a b= re ape ey Y गा as a हि x “i ¢ x ete ./ x Who iy Ii we “पक, बट ८: fl o e 4 x 9 Pee sg By bya 2, Dey OK ES we I Ey Og Ske 9d पातक छन्मावरण / छलावरणमे (CAMOUFLAGE) नुकायल "सुगवा सीकी" या "पतरेंगा खुग्गा" (GREEN BEE EATER) (Merops orientalis) DI जोड़ी | प्रायः ई जोड़ीअहिमे बैंसल Wa अछि आ gg fergor एकरंगाहि होइत अछि |

करिए - _ TE yi * ७ Dr Shashidhar Kumar “deh” © डॉ. अधिकार “विदेह © जान नियन = acre हि ng a thing tal 38 . मैंथिली - लुक्खी हिल्‍दी - गिलहरी संस्कृत - वृक्षशायिका, रोमशी, कलन्दक, वृक्षमर्कटिका, शाखामूग ("शाखामृग" शब्दक अर्थ "बानर" Wel - अनेकार्थक शब्द) अंग्रेजी - SQUIRREL (चित्रमे - NORTH INDIAN PALM SQUIRREL - 5 STRIPED) जैववैज्ञा०८ नाम -Family - SCIURIDAE (लुकखी कुल) केर समस्त जाति ओ प्रजातिस्रभ्न (SPECIES & SUB SPECIES) (चित्रमे - Funambulus pennanitii) नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

’ R कुमर “विदेह” ww «i ‘ - —_— री 4 हे _—_—> 3 4 = स्थान - पाहीघाट-समौर ane, मधुबनी बगेरी / EURASIAN SKYLARK / Alauda arvensis

Pe q Be Ost. शशिधर कुमर “विदेह” 6 र द्ध } का स्थान - पाहीघाट-समौर are, मधुबनी बगेरी / EURASIAN SKYLARK / Alauda arvensis

Ss A YQ g Fe 4 कर } VF - Ys ie bs भर SS NO y fh gos > »~\ = A oe oa 8 “ डक 3 UX i & $2 स्थाल -रुचौल-दुलास्पुरूगल्डबारि (गल्धबारि) arr दरिंगा-धुवली x lh, के & करिया पीठबला soni चिल्होरि (प्राय: बाज कहि देल जाइछ) BLACK WINGED KITE / BLACK SHOULDERED EURASIAN KITE Elanus caeruleus

कर eg UN दर 28 का डक ARE कर कर ‘ 5 र q IRR NT ४० Se PG eS ere © Dr. Shashidhar Kumar “Videha” © डॉ. शशिधर gat “विदेह” © छा “Pa ब्लबव “facHR? ' Je विभिन्‍न रूप - रंगक UAT / परेबासभ

न मकर है उत्तर रन ९८०८०, जज Ne के wes a aN a er ier ~ a a , के ae सन उजरा परबा / Ua (विश्वभरिमें शान्तिक प्रतीक मानल जाइत अछि)

: ya o™ » = ¥ . Sar RY i 4 = (4 7} ~< ३ ७ पे... ; का Vy ¥ > र 9 ae “A 4 Wi Reset me (Saat १: ही मैथिली - बगेरी / बगेड़ी हिन्दी - चकता / लावा पक्नी _... संस्कृत - भारद्ाज पक्षी अंग्रेजी - LARK (चित्र - EURASIAN SKYLARK / SKY LARK) जैंव० नाम - Alauda spp., Mirafra spp. 3i आन Agra (Genera) जातिसभ्र (Species) (चित्र - Alauda arvensis) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

कि... = — ee — <q —— — a = कक... या साहीक विभिन्‍न तरहक wic (साभार साँजन्य - विकिपीडिया पब्लिक sida)

~ a दर ~ a. ‘ 2 bs सम, Re ee? ; ya $n at ee” ae 2S A ee a a % es | Fi \I जाझार सौजल्य - gofreeddWvnioad.net_ - gofreedoWnload.net बड़की (गुलाबी) राजहंसक AVS GREATER PINK FLAMINGO Phoenicopterus roseus

है a te 7. oe teas’ 5 मैथिली - राजहंस dep - बड़का गुलाबी राजहंस) हिन्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण Hoa अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] Gado नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटिस्स) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) हनोट -संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉजो या प्यौयी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे wah नाँओों Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे,

MP न Se eh का: 22: = Ps eh Lig tia दि ROR, f Bt tt BG Soe कि. ea Nas cities: रे | senor -संजय गांवी जैंविक उद्यम, पर्दा मैथिली - Srp हिन्दी - fru संस्कृत - चित्रोष्ट्र अंग्रेजी - GIRAFFE जैंववैज्ञा८ नाम - Giraffa camelopardalis Gite - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी लाँओ स्वतः मैथिली भ्राषाने पर्यायी नाँओ भर जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

र yi chy a कम 2 — a a - कि a

s . a ही ~ pixfbay.com (free download) . | ‘

लक «न उप i tS) aes ¥ ci at दे कि > _ aN he aN ee 4 wy Me ae ro tte. KaNG ९-७ शक Pee, we. gee ? लिन के x | a $3 ie ee em बज 4 re i per OND el हि हर oi कि लि aay लि ot Lf, a py a) ee मैंथिली - बिज्जी या सपनौर या सपलेंउर (चित्रमें - सामान्य या साधारण भारतीय बिज्जी) हिल्‍दी - नेवला संस्कृत - नकुल, सर्पनकुल अंग्रेजी - MONGOOSE (Sing.), MONGOOSES / MONGEESE (Plu.) (चित्रमे - INDIAN GREY MONGOOSE / COMMON GREY MONG.) जैववैज्ञा० नाम - बिज्जी कुलक (Family - HERPESTIDAE) प्रायः १४ वंशक (GENERA) सदस्यगण (चित्रमे - Herpestes edwardsii) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

कि. ae ही Vagina on ia 2 ee © ॥ idghaa em संजय: ah Oe हा TCHR? बिज्जी या सपनौर / MONGOOSE / Herpestes edwardsii

: 5 के rite att sad a ; & area a सका rv i) “Se sot bea ers » » ला = | हि = = a ee ४ Vf - La : of le _ 3a ly ई स्थान - संजय मांधी जैविक sean eo

Wie = = es ROPER NL “a: । RR ee 22: री La } fe! Wages जी % न O She. ag sesh oe me 0 छा fae रूपव Fiore? a: भारतीय तेन्दुआ (तेलुआ) / INDIAN LEOPARD / Panthera pardus fusca तेन्दुआ (तेनुआ) /INDIAN LEOPARD / Panthera pardus fusca

25 my ks eb me श्र id bes ay a REACT. 5 ] ie | sae ey गे Avs ३९ PORN i es Maeva © iment = — 5 बा st. ag i Gy मै चर ey 2 ashe के जय सर Ay any . _ : a दि व ~ 65 और 4 -- “सदा मैथिली - तेन्टुआ, तेनुआ (चित्रमे - भारतीय तेन्दुआ / तेनुआ) हिल्‍दी - Aegan (चित्रमे - भारतीय तेन्दुआ) संस्कृत - चित्रक, चित्रव्याघ्, शार्टूल, ACL, SUC, व्याल अंग्रेजी - LEOPARD (चित्रमे - INDIAN LEOPARD) जैववैज्ञा० नाम - Panthera pardus (चित्रमे - Panthera pardus fusca) (संस्कृतमें आ प्राचीन मैथिलीमें dogsn "चीता" शब्द केर अन्तर्गतहि समाहित छल | आइ wifes प्राणिशारूमीय वर्गीकरणक अनुरूप जवका मैथिलीमें eal एकरा पृथक माल "तेल्दुआ" या "तेलुआ" संज्ञासँ सम्बोधित कएल जाइत अछि |) (नोट - संस्कत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉजों स्वतः मैयिलीं झाषामे पर्यायी नॉओ अड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

हि ra A { ं | } | , | ) i # ae

Pee ae वि कु > Oo pe EPR ett ELE eae gt साभार सौंजन्य - pixabay.com (free download) अफ़िकाक चीता AFRICAN CHEETA Acinonyx jubatus

ही मत लक, । कक से भी | bas : Pe age जे GF = VER ATI S XN ay etna Ae ee a हा son किक soe Ney mA ra Noe ‘ cola — a Mote लय मैथिली - जगुआर हिल्‍दी - जगुआर संस्कृत... अंग्रेजी - JAGUAR जैववैज्ञा० नाम - Panthera onca नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

HS Ta एन Seer oo Wy ही On 2: ee CONTE १५.० vie i PSE | yO NBRINS yf a tees uses ae १९५६: EAS SS ig पल... vt Ue) हर 5 es

z » Raa aa + A Sak > ae a eS & हु डे SF प्लस aoe =~) < a SS <I See it जे $ ले Se ESSAY —— Ss ¥ ; a s ae रद = = Na a ee ee Tee बिज्जी या सपनौर / MONGOOSE / Herpestes edwardsii

eS Mk ae pS hia <i PANS + A Pee wi ३ गा eae pie ae " LGD ie Seat avis हे ee EER, oy | पर Oe & ol) फू 4 (- RAT) Sate) BK .F के: ; = AS ie fs oS put eae Syren 6 Satay ciel £ & WRC RE SS OR BOE BRE STRESS fl ¢ PES MOO OTA: Sa मैथिली - मधुमाक्षी / मधुमाछी हिल्‍दी - मधुमक्स्ती संस्कृत - AYA, श्रमरक, माधुक्तर, रुक्षवालुक आदि अंग्रेजी - HONEY BEE / HONEYBEE (FORMER IS MORE SCIENTIFIC WAY OF WRITING) (चित्रमें - ASIATIC HONEY BEE) जैंववैज्ञा८ जाम - Apis spp. (चित्रमें - Apis cerana indica) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी iat स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

ae >> qe Le ee ASSES Pek ee ५3 Lege ; Sigs नवनिर्मित मधुमाक्षी (मधुमाछी) केर छत्ता (मात्र ६ घण्टा पुथान)

ra Orta : जला सर ete से Pein की न =< i : uf : Suan - HII सौजन्य - plvabay.com (free dowiilowdy मैथिली - par हिन्दी - छोटा बुज्जा, Dray संस्कृत - कवार अंग्रेजी - GLOSSY IBIS जैववैज्ञा० नाम - Plegadis falcinellus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वत: मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

A cae Pl Va TR पर VEN. ही ch, A i} | i 0 a थे ARS Aes fe eae "4 is i . oat i i} bog Cin) ली ¥ 2 es ae ond i eae ar Pa खाए: मैथिली -wsigod / कड़ांकुल / Pipa (तत्सम), 'कथयंकुर (अर्ध तत्सम), कंकूर / PPS ga) हिन्दी - काला बुज्जा संस्कृत - कयंकुल , कालकण्टक , कृष्ण आदि, रक्तशिर्ष आटि अंग्रेजी - RED NAPED IBIS / INDIAN BLACK IBIS / BLACK IBIS जैंववैज्ञा० नाम - Pseudibis papillosa syn. Pseudibis davisoni syn. Inocotis papillosus atte - सैस्कृत भाषामे आयल हरेक ना ओ या पर्यायी AED स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ Sts जाइत INT - तत्सम स्वरूपमे

th: “” as BE IRE, aah . AL e papi = We है भी me sy we ae eon कड़ाडइकुल / कराड़कुल / कयंकुल / ps / कंकूर fers hz झुण्ड FLOCK OF RED NAPED IBIS / INDIAN BLACK IBIS / BLACK IBIS Pseudibis papillosa

ra a न k japan | गैंतीक बेंत “रू दे a \ f

Ee ee Raid us a Es ae es 33 mC RAN “5 = F East Rn @ ehh Fad oe a Ce Ca है | an ईद Oa | | pene : eae | 2 = मैथिली - याजहंस dep - बड़का गुलाबी राजहंस) हिन्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण Pra अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैंववैज्ञा८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेस्स) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) हनोट -संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉजो या प्यौयी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे wah नाँजों Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे,

| ae है. eesse हैँ. श्र की ख Bie PSS के =.

. t 5 ७ <i EE ६. ¥ t re ai { ata oS “ ~“ i < “We es a द पद = NN [के मे & // aN N 7 yh ~ XY \ कि करिया Hel बला लालबोड्गी / कारी मूरी बला लालबोड़गी RED VENTED BULBUL Pycnonotus cafer

एव X : a i Wee: by स्थान - दुलारपुर (रुचौंल - दुलारपुर), efter a > करिया Hel बला लालबोड्गी / कारी मूरी बला लालबोड़गी RED VENTED BULBUL Pycnonotus cafer

< S\N Nae Al 2 NY Fey : Fey As ~ mai tiy Ve bao je x SN <a SS ie ‘4 SA AN poo A ~ > , ia = ae iss Vi ANAS se Pkt ie era hee bd) 4 eS yee Mee ty ee SN सॉजन्य - कि अब 0-00. (free download)

4 2 . x. . करें . i RN a) bt Se bo, \ . aN x . r % Eo 2 4 bi; ४. GAN vee 4 क्र रे है" | ete ~~ «३३ X's » 4) eS WN e १. जी हि के ले बा ¥ |

ie ean: S a 25 कि \. ‘4 % t ¥ i a 4 (P fx 4 | a a (fa < था <2 ee eC मैथिली - लालबोड़गी / लाललबोंगी (लाल कनपड्टी।गाल बला) हिन्दी - पहाड़ी बुलबुल या कमेर बुलबुल या सिपाही बुलबुल संस्कृत - रक्त श्मश्रु गोवत्सक अंग्रेजी - RED WHISKERED BULBUL जैववैज्ञा० नाम - Pycnonotus jocosus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

ही Vem है» कि ‘i i न ce * aa es ma le { ~ wy A H deh - लालबोड्गी / लाललबोंगी (कारी माथ / करिया AS बला) हिन्दी - कालासिर बुलबुल या गुल्दुम बुलबुल संस्कृत - कृष्णचूड़ गोवत्सक अंग्रेजी - RED VENTED BULBUL जैववैज्ञा० नाम - Pycnonotus cafer (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी aisha जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

ण्ण GA S . = 4 ; a bot K 4 4, a Mt Sea iat

|

कक की ४ oe थी i =,

Me as a, mo =

Nh yh it nn | कर, एस \ जि > +

oy \

aoe

ae 4 & ql पे 4 ij Ma Tye | £ 7 ae 4 ey tip iA se

er Play tl & Se eae is ह कर र pee ac. = न MS by Wp) > 6) 9 7 | ot wg

a यम a}. खा ——— = == —~

be Al ot » i >)7 ¢ Y था * [NS —- any ¢ ‘i k दे Dh ia F

PAAR

= ee ie कै वि - न” ४

aN \) है

a 4 है

थ 4 at oe Oe wi | थी ट् me PENS

wh aM

ही के

तर rf . 4 Wy +f |

2 4 a é et vt} लो हि !

न दर कर भा | मा fn pert cage) Nee Se

al “जया,

जे

| जि Sees यु a" =<

ra ashy oe carne 4: aaa we oe : 5: न. का सु ne . BA asin 4% ry p भर har a Tt .

की i es lly, a St ; \ r i a | ( SS i” = > oy yp भय

केक न yi ey ee oe) me iP 4 ६ ‘Wy, |B y “we ।

3:3 all >i) What | Removed Added | ggajendra@videha.com You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 7 Feb 203 qo tome / From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date 7 Feb 2073, 6:58 PM Andre Klapper changed bug 39968 छपी Bhojpuri wikipedia wikipedia कर should start with should start ‘eats ont Summary | >, bho' instead of 'bh with 'bho ‘ A ; to avoid confusion instead of ही निधि न with Bihari bh Comment # 3 on bug 39968 from Andre Klapper [Restoring summary that was reset. ] © Reply @ Forward

3:0 all प्रो) Comment # " on bug 4509] from Alex Monk (Krenair), https://meta.wikimedia.org/ wiki/Requests for new_ languages/Wikipedia Maithili bugzilla-daemon 7 Feb 203 a ow tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date १7 Feb 203, 7:03 PM ME-Warburg changed bug 4509] UNCONFIRMED | RESOLVED Comment # 2 on bug 4509 from MF-Warburg marking as invalid: The creation of this wiki was not approved by the language committee. [It would also currently have no chance because of a lack of activity in the test-project. Please address any questions on the page on Meta] > bugzilla-s SSS ,

:53 all >i) [Bug 44938] Create a mailing list चर for Maithili (mai) Wikipedia ® inbox Ww bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 qe tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date 7 Feb 203, 8:3 PM Sam Reed (reedy) changed bug 44938 | what | Removed Added ASSIGNED | RESOLVED Comment # 3 on bug 44938 from Sam Reed (reedy) See also bug _4509l as the wiki doesn't exist. (In reply to comment #2) > marking as invalid: The creation of this wiki was not approved by the > language > committee. > > [It would also currently have no chance because of a lack of activity in the > test-project. Please address any questions on the page on Meta] You are receiving this mail because: हि

32 all Sl) < To « bugzilla-daemon 8 Feb 203 qo tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date 8 Feb 2073, 0:4 AM Rajesh Ranjan changed bug 4509 | what | Removed Added amir.aharoni@mail.huji.ac.il Comment # 3 on bug 45097 from Rajesh Ranjan Thanks! I understand, but once the language did a good improvement. We just created this bug to track the things we need to do to release it. The language grp had put around 000 article on incubator for the same. Please specify what we need to do to release our language Maithili on wikipedia. cc'ing Amir who is aware of all the details. bugzilla-daemon 8 Feb 203 Sy २०० tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org ae pecssrBleage Tae:

32 al Sl) < To « nad put around 000 article on incubator for the same. Please specify what we need to do to release our language Maithili on wikipedia. cc'ing Amir who is aware of all the details. bugzilla-daemon 8 Feb 203 qa tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date 8 Feb 2073, 0:44 AM Comment # 4 on bug 45097 from Amir E. Aharoni Bugs like this one are usually opened by language committee members after all the requirements for starting a new project are satisfied. The most convenient page for tracking this is https://meta.wikimedia.org/ wiki/Language committee/Status/wp/mai © Reply @ Forward ——EE

33 all SC) [Bug 39968] Bhojpuri wikipedia should start with 'bho' instead of Kg ‘ph’ to avoid confusion with Bihari ~~ Inbox bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 a tome v Rajesh Ranjan changed bug 39968 | ggajendra@videha.com You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 7 Feb 203 qj ow tome “~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date १7 Feb 203, 6:58 PM Andre Klapper changed bug 39968 | what _| hat Removed Added Bhojpun Bhojpuri wikipedia wikipedia : should start with should start ही Summary ee a j ‘pbho' instead of 'bh' with 'bho . दि लि to avoid confusion in WI Wari

33 all SC) [Bug 39968] Bhojpuri wikipedia should start with 'bho' instead of sr ‘oh’ Inbox bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 qo tome “~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date १760 2073, 3:2 ९५ Rajesh Ranjan changed bug 39968 Bhojpuri wikipedia Bba/purl दर wikipedia should start with ' । नी should start Summary | 'bho' instead of 'bh wy j : 4 with 'bho to avoid confusion , ही ae instead of with Bihari Moe bh You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. © Reply @ Forward

3:08 all SC) [Bug 450%9] Please move Maithili from incubator to st mai.wikipedia.org ® inbox bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 qo tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date १7#60 2073, 3:05 PM Rajesh Ranjan changed bug_4509 cc ggajendra@videha.com, rajeshkajha@yahoo.com You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 7 Feb 203 - tome v Alex Monk (Krenair) changed bug 4509 krenair@gmail.com, cc F mfwarburg@googlemail.com Comment # on bug 4509' from Alex Monk (Krenair),

9:77 ना Fe) Anshuman Pandey asked to join "Videha http:// www.facebook.com/I/fa770/ * www.videha.co.in" inbox Anshuman Pandey 2 May 207! jw tome ~ From Anshuman Pandey notification+zl6=efil@facebookmail.com Reply to Facebook notification+zl6=efil@facebookmail.com To Prity Jha Thakur kumariprity@gmail.com Date १2 May 2077, पप2 AM Anshuman asked to join "Videha http://www.facebook.com/I/fa770/www.videha.co.in". As an admin of this group, you can approve this request. Please note that if another admin has already processed this, it may not appear when you visit Facebook. To approve this request, follow the link below: http://www.facebook.com/n/?hom e.php&sk=group_70445809632326 &mid=434e3bcG40558dd5G25a32faG 5&bcode=TxU45m8c&n_m=kumaripr ity%40gmail.com

9:3 ना Fe) [Videha www.videha.co.in] Update: The proposal to encode sr Tirhuta in Unicode... inbox Anshuman Pandey 7 May 2074 qo tome « From Anshuman Pandey notification+zl6=efiI@facebookmail.com Reply to Reply to comment g+4tiz5k000000hum6s500a7p3ikk09000z e5g2tils930@groups.facebook.com To Prity Jha Thakur kumariprity@gmail.com Date 7 May 207, 0:25 PM Anshuman Pandey posted in Videha_www.videha.co.in Anshuman Pandeyi7 May 22:25 Update: The proposal to encode Tirhuta in Unicode was reviewed and accepted by the Unicode Technical Committee. Now the proposal will be reviewed by the ISO technical group JTC2/SC2/WG2. If ISO approves the script, then Tirhuta will be officially placed in the queue for inclusion in a future version of Unicode. http:/ /std.dkuug.dk/JTCi/SC2/ WG2/docs/n4035.pdf std.dkuug.dk View Post on Facebook * Edit email settings - Reply to this email to add a comment. ——

9:2 ना Fe) [Videha www.videha.co.in] Tirhuta approved for inclusion in Unicode =~ by ISOL... Inbox Anshuman Pandey 7 Jun 207! Sow to Videha ~ From Anshuman Pandey notification+zl6=efiI@facebookmail.com Reply to Reply to comment g+4473mbk000000hum6s500Ic28m0v4c300 0ze5g2tilsx46@groups.facebook.com To Videha www.videha.co.in videha@groups.facebook.com Date व उप 207, १2:6 PM Anshuman Pandey posted in Videha www.videha.co.in Anshuman Pandeyi0 June 23:46 Tirhuta approved for inclusion in Unicode by ISO! Now Tirhuta will have its own encoding. I will provide more details soon. View Post on Facebook - Edit email settings - Reply to this email to add a comment. ही

3:23 all >) < Ta a « bug maithili wiki Inbox xt Rajesh Ranjan 6 Feb 2073 esse tome ~ From Rajesh Ranjan rajesh672@gmail.com To Gajendra Thakur ggajendra@videha.com Date 6 Feb 2073, 9:43 PM Please check and create a account here: https://bugzilla.wikimedia.org/ Our bug for mailing list: https://bugzilla.wikimedia.org/show_bug.cgi? id=44938 © Reply @ Forward काला

:54. wlsec) You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 8 Feb 20i3 qa oe tome v Comment # 4 on bug 44938 from Rajesh Ranjan Amir, I put here a request for mailing list only after the consultation with you. Please check and let me know what makes my request invalid. bugzilla-daemon 24 Sep 204 Kj समर tome v Muzammil changed bug 44938 | what | Removed Added | mba_hyd@rediffmail.com Comment # 5 on bug 44938 from Muzammil There is need to re-examine the refusal: l) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. 2) Likelihood of the Wikipedia in the near future (see: http://blog.wikimedia.org/204/09/08/a- focused-approach-for-maithili- wikipedia/) 3) Growing social media activity for the Wikipedia: https: //www.facebook.com/ Maithil iW k j jeetdalieiiaieisddsieabimma

:54. Pr i ) < 73 « Comment # 5 on bug 44938 from Muzammil There is need to re-examine the refusal: l) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. 2) Likelihood of the Wikipedia in the near future (see: http: //blog.wikimedia.org/204/09/08/a- focused-approach-for-maithili- wikipedia/) 3) Growing social media activity for the Wikipedia: https: //www.facebook.com/ MaithiliWikipedia?fref=ts Regards, Muzammil. bugzilla-daemon 24 Sep 204 qj ow tome v Comment # 6 on bug 44938 from Andre Klapper Hi Muzammil, > ]) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. Where exactly? Link welcome. bugzilla-daemon 24 Sep 2024 Comment # 7 on bug 44938 from Muzammil (In reply t... काला

पव2 wlec) Regards, Rajesh Ranjan twitter: @kajha facebook: rajeshkajha www.rajeshranjan.in On Wed, Sep 24, 2074 at 79 PM, Amir E. Aharoni <amir.aharoni@mail.huji.ac.il> wrote: Hi Rajesh (and Runa), | was looking at the Maithili Wikipedia incubator: https://incubator.wikimedia. org/wiki/Wp/mai/Main_Page It looks pretty OK as far as | can tell - the activity is reasonable, and there are over a thousand articles. Many of them are short (stubs), but as far as I'm concerned, it's not a big issue. | thought about proposing it for approval, but one thing that I'm supposed to make sure before | go forward is that it's indeed Maithili. It's part of our Language Committee's required bureaucracy :) You're the only Maithili speakers | know, so can you please approve that the pages there are written in correct Maithili? Thanks! © Reply @ Forward

9:25 all. @ ) Videha ‘faze’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ फरवरी २००८ (वर्ष । मास 2 अंक 3) favre fee सक्कि Videha Maithili Formightly € Magazine fare विदेह a me where विकीपीडिया पर मैथिली पर लेख ते छल yer मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाक स्वीकृति नहि मेटल छल। हम बहुत Port एहिमे लागल रही,आ' सूचि करैत afta छी जे 27.07.2008 कें भाषारें विकी शुरू करवाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसें कम पाँच गोटे,विभिन्न जगहसें एकर एडिटरक रूपमे नियमित रे कार्य करथि तखने योजनाकें पूर्ण स्वीकृति भेटतैक। नीचां लिखल लिंक पर जाय एडिट कय एहि प्रोजेक्टमे अहाँ सभ सहयोग करव, से आशा अछि। पद्चिला अंकमे देवनागरी कोना लिखू ,एहि पर हम लेख लिखने रही। इंगलिश कीबोर्ड पर ओहि तरहे लिखने विकीमे सेहो मैथिली लिखि सकैत छी। एम. गेरार्डक माध्यम श्री अंशुमन पाष्डेयक, जिनकर मैथिलीक युनीकोडमे स्थानक आवेदन लंबित अछि, अनुरोध मेटल छल, ओ' सूचना मैंगलन्ि जाहि at स्पष्ट ee बंगला लिपि आ' मैथिली लिपिक मध्य अंतर ज्ञात भय सकयाई सूचना हम एम. गेरा्डक माध्यम हुतका पठा देलियन्हि, कारण पाण्डेयजी ईमेल एडरेस हमरा नहि अछि। विकीमे पूर्ण स्वीकृतिक हेतु एहिं लिंक सभ पर राखल प्रोजेक्टकें ऑँगा बढ़ाऊ। http:/meta.wkimedia org/wiki/Requests_for_new_languages/WMKipedia_Maithili http:/Anaubator.wkimedia org/wki/Wpimai http://transiatewiki nevwiki/MediaWiki:Mainpage/mai http://translatewiki netwiki/Sped al: Translate 7task=untransiated&group=core- mostused&limit=20008&language=mai अपनेक प्रतिक्रिया आ' रचनाक प्रतीक्षा aft नई दिल्‍ली fiw LLG 07022008 & सर्वाधिकार लेखकाधीन ar जतय लेखकक नाम नहि af ततय संपादकाधीना Rite (nits) संपादक-बचेन्द्र ठाकुरा एतय प्रकाशित रचना समक कॉपी राइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्द्वि, मात्र एकर कम प्रकाशनक अधिकार Ui Safer सैका स्वनाकार अप्पन मौलिक a, अश्रकाशित रचना सम(जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व deere मध्य खन्ि) ggsendra@ychoo.cain aft ggajendra@idehacoin’ मेल अटैचमेष्टक रूपये .60८, 6०0, Lot eat pdf फॉर्मेटमें पठाय सकेत खजिरचनाक संग रचनाकार अप्पन संक्षिप्त 'परिचव(बायोदाटा) ar अप्यन स्कैन कल मेल फोटो पठेताह, से आशा sta छी। रचनाक संग ई घोषणा रहव-ने ई रचना मौलिक af ar पहिल प्रकाशनक हेतु विदेज्नंपाकिक)-ई-पत्रिकाकें देल जा रहल afer मेल प्राप्त होवनाक बाद ययासंभव शीज्रतासें (सात दिनमें) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायता 2 Videha ‘faze’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका १ फरवरी २००८ (वर्ष 4 मास 2 अंक 3) favre साशिक सक्कि Videha Maithili Formighty 6 Magazine fare विदेह vensfitehtrhvnidera coin ma wenger . शोध लेख, @ books.googleusercontent.com eS

9:53 o > लि < -, Gajendra Thakur shared a link. eee Admin 23 Jun 207 - हि गूगल ट्रांसलेशन टूलमे "बिहारी" भाषाक बदलामे मैथिली लेल अलग ट्रांसलेशन टूल बनेबाक आवेदन विदेहक सदस्यगण द्वारा देल गेल अछि। अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद HS; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद | http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject http://www.google.com/transconsole/giyl/ chooseActivity?project=gws&langcode=bh google.com Google in Your Language a Like © Comment ® Send © You, Ashish Anchinhar and 7 others 7... Gajendra Thakur Author Admin +++ नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकें आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/wiki/ Requests_for_new_languages/ Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate? task=untranslated&group=core- mostused&limit=2000&language=mai Write a comment... GIF, © 0 € am & @ @ ८ @ Home Friends Watch Profile Notifications Menu —— eee

9:54 a Se) < _-, Gajendra Thakur shared a link. eee Admin 23 Jun 207 - हि NUp://WWww.google.com/transconsole/glyl/CNOOSerroject http://www.google.com/transconsole/giyl/ chooseActivity?project=gws&langcode=bh google.com Google in Your Language ॥है Like © Comment @® Send © You, Ashish Anchinhar and 7 others —-, Gajendra Thakur Author Admin १११ नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकें आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/wiki/ Requests_for_new_languages/ Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate? task=untranslated&group=core- mostused&limit=2000&language=mai http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/ MediaWiki:Mainpage/mai 0y Like 30 Write a comment... GIF © 0 € am & @ @ ८ @ Home Friends Watch Profile Notifications Menu —— eee

Tr रह रॉ Unitea Nations E i ions Educational, Scientific || | OFFICE OF THE UNESCO REPRESENTATIVE TO BHUTAN, tog Cottarat Organization —_—>= ASIA - PACIFIC REGIONAL BUREAU FOR COMMUNICATION AND INFORM. ATOM eat TEL. + 94-44-26743000 i ' ™ Use INTERNET + Mtp://uneseodeltsi.nic.in सुराग + Tyee2s 2 fuly 2003 TO WHOM IT MAY CONCERN « Dr. Kailash Kumar Mishra has been known to me as a sincere, bright, hardworking and original scholar since 998. He had prepared an extensive village report of Saurath - a heritage village of Mithila, Bihar under the UNDP-UNESCO-IGNCA Project on VILLAGE INDIA in १999. This report of Dr Mishra was used by several scholars working in this project as 8 model study to arrange the data in the universal pattern. Later, when UNESCO and Indira Gandhi National Centre for the Arts decided to quantify all of 87 village reports of the project in a systematic and statistical style, Dr. Mishra was assigned to develop a universal format of presentation, His format of presentation could be deemed very good. Clear, concise and easy to understand even to a layman, it gives not only the demographic pattern and ethnology, but also explains away the myths related to the village to understand the psyche. | wish him success in his future endeavours and recommend his candidature for any research/academic post for which Dr. Mishra may be applying. R.P.Perera Chief Administration Programme Officer/Culture दी

569 all eo) बिप्लब आनन्द changed bug 44938 | what | Removed Added | biplabanand@gmail.com Comment # on bug 44938 from बिप्लब आनन्द Thanks @Muzammil ..... ok add me too for the admin --We are very close,let make it happen- -- Jai Mithila Jay Maithil------ bugzilla-daemon 6 Oct 2074 Ts tome ~ From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date 6 Oct 2074, 7:25 AM John F. Lewis changed bug 44938 ASSIGNED | RESOLVED Comment # 72 on bug 44938 from John F. Lewis Created. Setting list admins and sending the password to all shortly. हि

7:55 all >i) Comment # 9 on bug 44938 from Rajesh Ranjan (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. > > THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I > personally see no issue with this and will deal with this. > > @Muzammil: Who would the list administrators be now since the original > request was made well over a year ago? Already mentioned, add Gajendra Thakur (see comment #2) and myself for mailing list admin! Good to see its moving! You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 28 Sep 2074 - tome v Comment # 0 on bug 44938 from Muzammil (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. > हि

7:55 all >i) A Ringer < ee SM ० Comment # 70 on bug 44938 from Muzammil (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. > > THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I > personally see no issue with this and will deal with this. > > @Muzammil: Who would the list administrators be now since the original > request was made well over a year ago? I think you can add me also an administrator for the list. I will discuss with Biplab to see if he too is interested as he is very active on the incubator project. bugzilla-daemon 28 Sep 20i4 - tome v बिप्लब आनन्द changed bug 44938 | | biplabanand@gmail.com Comment # 7 on bug 44938 from बिप्लब आनन्द Thanks @Muzammil ..... ok add me too for the admin —

7:54 all © CD) Where exactly? Link welcome. bugzilla-daemon 24 Sep 2074 ae tome v Comment # 7 on bug 44938 from Muzammil (In reply to Andre Klapper from comment _ #6) > Hi Muzammil, > > > ) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. > > Where exactly? Link welcome. Ch: https://tools.wmflabs.org/ meta/catanalysis/index. php? cat=0&title=Wp/mai&wiki=incubatorwiki bugzilla-daemon 27 Sep 204 qe tome v John _F. Lewis changed bug 44938 Le] =| Comment # 8 on@====eeee=fropmmeen F. Lewis

पव2 all >i) < 7 oOo « ---------- Forwarded message ---------- From: Rajesh Ranjan <rajesh672@gmail.com> Date: Thu, Sep 25, 204 at 8:06 AM Subject: Re: Mathitili Wikipedia To: "Amir E. Aharoni" <amir.aharoni@mail.huji.ac.il> Cc: Runa Bhattacharjee <rbhattacharjee@wikimedia.org> Hi Amir, Thanks! This is Maithili. As | already discussed with you that Maithili community associated with Wikipedia have sufficient contributors and knowledge to run and sustain the Maithili language. Regards, Rajesh Ranjan twitter: @kajha facebook: rajeshkajha www.rajeshranjan.in On Wed, Sep 24, 204 at 79 PM, Amir E. Aharoni <amir.aharoni@mail.huji.ac.il> wrote: Hi Rajesh (and Runa), | was looking at the Maithili Wikipedia incubator: https://incubator.wikimedia. org/wiki/Wp/mai/Main_Page It looks pretty OK as far as | can tell - the activity is reasonable, and there are over a thousand articles. Many of them are short (stubs), but as OY | pee eM ee fmt] अब व जब या Oh ony mere

१:40 all >i) Fwd: Mathitili Wikipedia ® inbox oad Rajesh Ranjan 25 Sep 2074 eq aes tome v Hi Gajendra jee, Please check fwd msg. Hopefully soon Wikipedia Maithili dream will come true. Do you know Firefox browser for Android now also available in Hindi: ftp://ftp.mozilla.org/pub/ mobile/releases/37.0/android/mai/ Gajendra jee, the most important work for us remaining is that we need to request people to use it...here | see people talk much for Maithili but don't work for the language and use it. Please spread the new of Android browser availability. Thanks! Regards, Rajesh Ranjan twitter: @kajha facebook: rajeshkajha www.rajeshranjan.in —--------- FOrWakeh@ehtt@@0@GOmmmmme —--——

7:55 all © CD) Comment # 8 on bug 44938 from John F. Lewis There has been an increase in activity. THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I personally see no issue with this and will deal with this. @Muzammil: Who would the list administrators be now since the original request was made well over a year ago? bugzilla-daemon 27 Sep 20i4 eq ses tome v John F. Lewis changed bug 44938 | what | Removed Added Status | REOPENED | ASSIGNED bugzilla-daemon 27 Sep 2074 ey see tome v Comment # 9 on bug 44938 from Rajesh Ranjan (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. > > THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I > personally see no issue with this and will deal with this. > ——E

4 f

लता

बल i i : ७ के < S ; | बे जी

é 4 i >,

th tig 4 मे eel | 7 हि =. \ ae : —— 2 > a. joa

GF ) जी । "4 i path ee

i! "i

९७. कि हि oe | \ : 3 की.

. = — है | ——F 75 sommes s ————_—_] he | === ॥ द हि 4 मे NM कक a ’) he ४४ = rete dd

: aa os S 7) 6 Tate सम्मान है c AS see ete 2 के” Botner do Saag Sg सामात | |] प्रदालकएल जारहल अंछि। 2 || कह अर्मियी ke

; A , ३ | A> AA Ne Sia NY “Tel | & कि. Ay / SY . 4 ae) A ad . है i a“ ? i

— 6 जि |) pre » 4 { 4 )

हे ie ete , we oe ; Z i, wy |

< कक ay ay TNT I <& G रू / Y

हद कि erat | ig ener? ५6

| q@ ६

} 4 a Co + 2 a = By i न , न a - = : x - =| / es ; —

की ba” : दीप é _लिमसकसर दि sf = ~ A दि Shem . te Loe <f g

) =p ह-उ

r ; \y (im फू a

; ee . Ns zal At cal a AK a w Me thee: है A (2 ७. :

i =

है ही ठेबेह Ave, Z a @ oc भशुबोत 5. : _। ओरी/श्रीमती/सुश्री सुक्दैवसाफी सुपर स्व दाबूनाध साफी a के 'पराती rma आयोबदीवऐेठ ईन्ससड़ा सोजवानसाकात | — || प्रहानकएलजारहलअंछि। a MOT TTT a

gp»

कब ... : ete es QS i, 4 = VY a ५ ye Ss LT a i) ae q :

a की Ky ae

he 5 जी

eet i 4)

| 2 के ff A pags = ee a ma. ~~ = — ह् Ta.

S| =m विवेह सम्माल 9 2 q for ran 3 | ऑ/ओयती/सुमी हरि नारायण मणल सुपर स्व सती | i 2 के” द्भृत्यम समर ओोजदान' ठेल fee ~ ee =| प्रकानकफुलजारहल अं! : nas 9 : ee a

Bp हर EEE a ने \ AY aa |

ee है a on dene s —™ अ a. : हि ‘ } — ~<a om an

A y &् 7 द fi - ae i} Tok es | है

ae fe a Fs ‘Ty a) ’ } 7 Ss of

/ op, नम A ९१९९४

कर ee ie P| a] iy ‘Ae A अत 8

eae 7 LGR | |

ना Os Be we « कं F ua.

yu < Pm

4 Ce थे

“ ¥ a AYN

f/ Yi Ga eae aN

7 ie Te a 2 hs ee he a रू न = s | % awe athe, ey i £ — Ee ; io = 4 i Scandia nied i ७. सदर) || ज = a oe

२७ ५ iy 7 } f ; .

हरे MAN ANU Ne ~~ a था J . —

विदेह सदेह:१९||3 97 ai क्लिक < uo 3 - Anshuman Pandey asked to join “Videha http:// www.facebook.com/I/fa770/ ~ www.videha.co.in" inbox Anshuman Pandey 2 May 2077 <a nee tome ~ From Anshuman Pandey notification+zl6=efil@facebookmail.com Reply to Facebook notification+zIG=efil@facebookmail.com To Prity Jha Thakur kumariprity@gmail.com Date व May 20, उदाए AM Anshuman asked to join "“Videha http://www.facebook.com/I/fa770/www.videha.co.in". As an admin of this group, you can approve this request. Please note that if another admin has already processed this, it may not appear when you visit Facebook. To approve this request, follow the link below: http://www.facebook.com/n/?hom e.php&sk=group_0445809632326 &mid=434e3bcG40558dd5G25a32faG I5&bcode=TxU45m8c&n_m=kumaripr ity%40gmail.com

4 || विदेह सदेह:१९ 9:3 wl FD < नि wea = [Videha www.videha.co.in] Update: The proposal to encode xy Tirhuta in Unicode... inbox Anshuman Pandey 7 May 2074 a « tome» From Anshuman Pandey notification+zI6=efiI@facebookmail.com Reply to Reply to comment g+4tiz5k000000hum6s500a7p3ikk09007I0z e5g2tils930@groups.facebook.com To Prity Jha Thakur kumariprity@gmail.com Date चर May 207, 0:25 PM Anshuman Pandey posted in Videha www.videha.co.in Anshuman Pandeyi? May 22:25 Update: The proposal to encode Tirhuta in Unicode was reviewed and accepted by the Unicode Technical Committee. Now the proposal will be reviewed by the ISO technical group JTC2/SC2/WG2. If ISO approves the script, then Tirhuta will be officially placed in the queue for inclusion in a future version of Unicode. http:/ /std.dkuug.dk/JTCi/SC2/ WG2/docs/n4035.pdf std.dkuug.dk View Post on Facebook + Edit email settings + Reply to this email to add a comment. ——_———

विदेह सदेह:१९|| 5 9:2 wi Fe) [Videha www.videha.co.in] Tirhuta approved for inclusion in Unicode =~ by ISOL... inbox Anshuman Pandey उठा 2077 eq *र+ to Videha ~ From Anshuman Pandey notification+zl6=efil@facebookmail.com Reply to Reply to comment 9+4473mbk000000hum6s500Ic28m0v4c3007 0ze5g2tisx46@groups.facebook.com To Videha www.videha.co.in videha@groups.facebook.com Date Jun 20, ग2:6 PM Anshuman Pandey posted in Videha www.videha.co.in Anshuman Pandey0 June 23:46 Tirhuta approved for inclusion in Unicode by ISO! Now Tirhuta will have its own encoding. I will provide more details soon. View Post on Facebook - Edit email settings - Reply to this email to add a comment.

विदेह सदेह:१९||7 3:08 al FC) < 6uea १ [Bug 4509'] Please move Maithili from incubator to oad mai.wikipedia.org ® inbox bugzilla-daemon 7 Feb 203 Sy ee tome » From bugzilla-daemon@wikimedia.org To —_ggajendra@videha.com Date 7 Feb 203, 3:05 PM Rajesh Ranjan changed 99 4509 | what | Removed Added cc ggajendra@videha.com, tajeshkajha@yahoo.com You are receiving this mail because: * You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 7 Feb 203 + me tome v Alex Monk (Krenair) changed bug 45097 What | Removed Added 0 krenair@gmail.com, Cc ss mfwarburg@googlemail.com Comment # on bug 4509 from Alex Monk (Krenair)

8 || विदेह सदेह:१९ 33 भा eC) [Bug 39968] Bhojpuri wikipedia should start with 'bho' instead of yy ‘bh’ inbox bugzilla-daemon 7 Feb 20:3 ew tome « From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To ggajendra@videha.com Date 7 Feb 2073, 3:27 शत Rajesh Ranjan changed bug 39968 Bhojpuri wikipedia Bhojpuri धर wikipedia should start with a के should start Summary | 'bho' instead of 'bh' कि : = " with 'bho to avoid confusion थे ah pikes instead of with Bihari tee bh You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. © Reply © Forward

face सदेह:१९|| 9 3-3 al FC) [Bug 39968] Bhojpuri wikipedia should start with 'pho' instead of sy ‘ph’ to avoid confusion with Bihari ~~ Inbox bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 a tome v Rajesh Ranjan changed bug 39968 | wat | Removed Added ggajendra@videha.com You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 a «8 tome ~ From _ bugzilla-daemon@wikimedia.org To — ggajendra@videha.com Date 760 203, 6:58 PM Andre Klapper changed bug 39968 What Removed Added Bhojpuri Bhojpuri wikipedia wikipedia i should start with should start ‘i oa Test Summary | ५५: bho! instead of 'bh with 'bho . दि कर to avoid confusion be wi tari

0 || विदेह सदेह:१९ 33 ail FC) < दि wa = What | Removed Added CG ggajendra@videha.com You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 7 Feb 203 a *++ tome « From bugzilla-daemon@wikimedia.org ०... ggajendra@videha.com 096... 7 Feb 2043, 6:58 PM Andre Klapper changed bug 39968 Bhojpuri Bhojpuri wikipedia wikipedia should start with should start | न ‘bh! Summary ee inert bho' instead of 'bh with 'bho Hf q न to avoid confusion instead of ah Bihad ‘bh! with Bihari Comment # 3 on bug 39968 from Andre Klapper [Restoring summary that was reset.] © Reply © Forward SD

विदेह सदेह:१९|| 0 30 wl el < Beagles cont” Comment # on bug 45094 from Alex Monk (Krenair) https://meta.wikimedia.org/ wiki/Requests_for_new Tangungea/ Wikipedia Maientid: bugzilla-daemon 7 Feb 20i3 a tome « From _ bugzilla~daemon@wikimedia.org To —_ggajendra@videha.com 096... 7 Feb 203, 7:03 PM ME-Warburg, changed bug 4509] What Removed Added UNCONFIRMED | RESOLVED Comment # 2 on bug 45094 from MF-Warburg marking as invalid: The creation of this wiki was not approved by the language committee. [It would also currently have no chance because of a lack of activity in the test-project. Please address any questions on the page on Meta] bugzilla ese

2 || विदेह सदेह:१९ १:53 all FC) < Oo wo - [Bug 44938] Create a mailing list ord for Maithili (mai) Wikipedia ® inbox ~ bugzilla-daemon 7 Feb 203 & a tome « From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To _ggajendra@videha.com Date 80 203, 853 PM Sam Reed (reedy) changed bug 44938 What heed Status | ASSIGNED | RESOLVED Comment # 3 on bug 44938 from Sam Reed (reedy) See also bug 4509] as the wiki doesn't exist. (In reply to comment #2) > marking as invalid: The creation of this wiki was not approved by the > language > committee. > > [It would also currently have no chance because of a lack of activity in the > test-project. Please address any questions on the page on Meta] You are receiving this mail because: ——————

विदेह सदेह:१९|| 3 3:2 al FC) < थि ऐए लि - bugzilla-daemon 8 Feb 203 a « tome » From — bugzilla-daemon@wikimedia.org To —_ggajendra@videha.com Date 8 Feb 2073, 0:4 AM Rajesh Ranjan changed bug _45097 | what | Removed Added | | amir.aharoni@mail.huji.ac.il Comment # 3 on bug 45097 from Rajesh Ranjan Thanks! I understand, but once the language did a good improvement. We just created this bug to track the things we need to do to release it. The language grp had put around 000 article on incubator for the same. Please specify what we need to do to release our language Maithili on wikipedia. cc'ing Amir who is aware of all the details. bugzilla-daemon 8 Feb 203 a tome » From — bugzilla~daemon@wikimedia.org

I4|| विदेह सदेह:१९ 32 all FC) < [Sjing [we Fajed as nad put around 000 article on incubator for the same. Please specify what we need to do to release our language Maithili on wikipedia. ec'ing Amir who is aware of all the details. bugzilla-daemon 8 Feb 20I3 a * tome » From _ bugzilla-daemon@wikimedia.org ०... ggajendra@videha.com Date 78 Feb 203, 0:44 AM Comment # 4 on bug 4509 from Amir ६. Aharoni Bugs like this one are usually opened by language committee members after all the requirements for starting a new project are satisfied. The most convenient page for tracking this is https: //meta.wikimedia.org/ wiki/Language_committee/Status/wp/mai © Reply > Forward Se

विदेह सदेह:१९|| 5 54 भा कि) < 6 ण लि - You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 8 Feb 20i3 a *र tome v Comment # 4 on bug 44938 from Rajesh Ranjan Amir, I put here a request for mailing list only after the consultation with you. Please check and let me know what makes my request invalid. bugzilla-daemon 24 Sep 204 a ow tome v Muzammil changed bug 44938 [ wnat | Removed Added | | mba_hyd@rediffmail.com Comment # 5 on bug 44938 from Muzammil There is need to re-examine the refusal: l) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. 2) Likelihood of the Wikipedia in the near future (see: http://blog.wikimedia.org/20l4/09/08/a- focused-approach-for-maithili- 3) Growing social media activity for the Wikipedia: https: //www.facebook.com/ MaithiliWik: ac

6 || विदेह सदेह:१९ 54 ail कि) < oo wa Comment # 5 on bug 44938 from Muzammil There is need to re-examine the refusal: l) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. 2) Likelihood of the Wikipedia in the near future (see: http://blog.wikimedia.org/204/09/08/a- focused-approach-for-maithili- wikipedia/) 3) Growing social media activity for the Wikipedia: https: //www.facebook.com/ MaithiliWikipedia?fref=ts Regards, Muzammil. bugzilla-daemon 24 Sep 204 a « tome v Comment # 6 on bug 44938 from Andre Klapper Hi Muzammil, > l) Activity level has increased - 6 active users and about 60 overall users. Where exactly? Link welcome. bugzilla~daemon 24 Sep 204 Comment # 7 on bug 44938 from Muzammil (In reply t... ————

विदेह सदेह:१९|| ।7 4:42 wi Fl Regards, Rajesh Ranjan twitter: @kajha facebook: rajeshkajha www.rajeshranjan.in On Wed, Sep 24, 2074 at 779 PM, Amir E. Aharoni <amir.aharoni@mail.huji.ac.il> wrote: Hi Rajesh (and Runa), | was looking at the Maithili Wikipedia incubator: https://incubator wikimedia. org/wiki/Wp/mai/Main_Page It looks pretty OK as far as | can tell - the activity is reasonable, and there are over a thousand articles. Many of them are short (stubs), but as far as I'm concerned, it's not a big issue. | thought about proposing it for approval, but one thing that I'm supposed to make sure before | go forward is that it's indeed Maithili. It's part of our Language Committee's required bureaucracy :) You're the only Maithili speakers | know, so can you please approve that the pages there are written in correct Maithili? Thanks! © Reply > Forward

I8 || विदेह सदेह:१९ प:54 a el Where exactly? Link welcome. bugzilla-daemon 24 Sep 2074 a ow tome ४ Comment # 7 on bug 44938 from Muzammil (In reply to Andre Klapper from comment #6) > Hi Muzammil, > > > ]) Activity level has increased - 26 active users and about 60 overall users. > > Where exactly? Link welcome. Cf: https://tools.wmflabs.org/ mata Icatananyeta/tndex awe cat=0&title=Wp/mai&swiki=incubatorwiki bugzilla-daemon 27 Sep 2074 a ow tome ४ John F. Lewis changed bug 44938 = Comment # 8 on@===e=ee=fperrmeeen FL ewis

विदेह सदेह:१९|| 9 7:42 wi Fl ---------- Forwarded message ---------- From: Rajesh Ranjan <rajesh672@gmail.com> Date: Thu, Sep 25, 2074 at 8:06 AM Subject: Re: Mathitili Wikipedia To: "Amir E. Aharoni" <amir.aharoni@mail.huji.ac.il> Cc: Runa Bhattacharjee <rbhattacharjee@wikimedia.org> Hi Amir, Thanks! This is Maithili. As | already discussed with you that Maithili community associated with Wikipedia have sufficient contributors and knowledge to run and sustain the Maithili language. Regards, Rajesh Ranjan twitter: @kajha facebook: rajeshkajha Wwww.rajeshranjan.in On Wed, Sep 24, 2074 at 79 PM, Amir E. Aharoni <amir.aharoni@mail.huji.ac.il> wrote: Hi Rajesh (and Runa), | was looking at the Maithili Wikipedia incubator: https://incubator.wikimedia.. org/wiki/Wp/mai/Main_Page It looks pretty OK as far as | can tell - the activity is reasonable, and there are over a thousand articles. Many of them are short (stubs), but as Picea Hasan सन East

20 || विदेह सदेह:१९ वव0 भा कि) < Ho wa ० Fwd: Mathitili Wikipedia 2 inbox Pad Rajesh Ranjan 25 Sep 204 e axe tome ४ Hi Gajendra jee, Please check fwd msg. Hopefully soon Wikipedia Maithili dream will come true. Do you know Firefox browser for Android now also available in Hindi: ftp://ftp.mozilla.org/pub/ mobile/releases/3.0/android/mai/ Gajendra jee, the most important work for us remaining is that we need to request people to use it...here | see people talk much for Maithili but don't work for the language and use it. Please spread the new of Android browser availability. Thanks! Regards, Rajesh Ranjan twitter: @kajha facebook: rajeshkajha www.rajeshranjan.in ---------- FOr Wareheemti0@60@6-@mmmmme --—-—

विदेह सदेह:१९|| 2I १:55 ail FC) Comment # 8 on bug 44938 from John F. Lewis There has been an increase in activity. THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I personally see no issue with this and will deal with this. @Muzammil: Who would the list administrators be now since the original request was made well over a year ago? bugzilla-daemon 27 Sep 204 eS we tome v John F. Lewis changed bug 44938 | What | Removed Added REOPENED | ASSIGNED bugzilla-daemon 27 Sep 204 a *++ tome ४ Comment # 9 on bug 44938 from Rajesh Ranjan (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. > > THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I > personally see no issue with this and will deal with this. > ———

22 || विदेह सदेह:१९ 7:55 al Fl) é a Ringer a Comment # 0 on bug 44938 from Muzammil (In reply to John F. Lewis from comment #8) > There has been an increase in activity. > > THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I > personally see no issue with this and will deal with this. > > @Muzammil: Who would the list administrators be now since the original > request was made well over a year ago? I think you can add me also an administrator for the list. I will discuss with Biplab to see if he too is interested as he is very active on the incubator project. bugzilla-daemon 28 Sep 204 a « tome v बिप्लब आनन्द changed bug 44938 | biplabanand@gmail.com Comment # 7] on bug 44938 from 'बिप्लब आनन्द Thanks @Muzammil ..... ok add me too for the admin ही

विदेह सदेह:१९|| 23 7:55 a Fl) .< Oo wa » Comment # 9 on bug 44938 from Rajesh Ranjan (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. > > THO forwarded me an email regarding a reconsideration of this request, I > personally see no issue with this and will deal with this. > > @Muzammil: Who would the list administrators be now since the original > request was made well over a year ago? Already mentioned, add Gajendra Thakur (see comment #2) and myself for mailing list admin! Good to see its moving! You are receiving this mail because: e You are on the CC list for the bug. bugzilla-daemon 28 Sep 2074 a *रर tome v Comment # 0 on bug 44938 from Muzammil (In reply to John F. Lewis from comment _ #8) > There has been an increase in activity. = ही

24 || विदेह सदेह:१९ 569 all FC) < नि ण लि = बिप्लब आनन्द changed bug 44938 [ what | Removed Added || biplabanand@gmail.com Comment # on bug 44938 from बिप्लब आनन्द Thanks @Muzammil ..... ok add me too for the admin --We are very close,let make it happen- -- Jai Mithila Jay Maithil------ bugzilla~-daemon 6 Oct 204 a *र tome ~ From bugzilla-daemon@wikimedia.org ०... ggajendra@videha.com Date 6 Oct 204, 7:25 AM John F. Lewis changed bug 44938 What nade Status | ASSIGNED | RESOLVED Comment # 2 on bug 44938 from John F. Lewis Created. Setting list admins and sending the password to all shortly.

9:25 all> ae) Videna ‘fate प्रथम मैचिली airfare ई पत्रिका १ फरवरी २००८ (वर्ष t मास 2 अंक 3) acre “TES ST videna Manni Formignty ० Magazine FACIE REE en | ........ Re fritec cee aS मार नेज मे वन सता AR CER ee connie मैजिक Reerfiferre हमीकणि ae Soe eee ee wp fee GN eT Tear Ae ee PA G27 OF-2008 BAT PEN aT CRT Boy etry soon ewan te my nae mite op Pane eee rer eon ora oration 2 oo Se See nrg toh बीए लि arte teat PEE लिए पर बाय EEE पथ OPE IE ही TRE ATER PT थे जमा अखि। पश्चिना tw देवनागरी कीना Ore ce पर दस Orr लिखे रही। इगलिस dre पर a wey सिखने Artie ny atid orien seen iy rae eeree arent ot quan areca, Peet ANAM ATE ST Serr fie fe, apr ae te ae ee ey AE oe ee eo NAY a A NE Sire माय wre erent pert कम er, सेट seed pret ar RPh, कारण eA Ben TC शमरा हि te ET ok स्यीफतिक PP सभ पर दाल TSE MT TE hiipsimote.uikimeda org/wih/Requests for new languages/WK pedia_Mai hill iip/Anaubator wkimed a arg/edki/Wpnat InUpL/Aranssawewil neWwilg/Media Wil Mainpage mal पक सका बट nevwils/Spedal: Translate? imakmuntensiated@group=core- ‘Mostisedalimit=20008iarguage=mna! अपनेक RET ar रचनाक wher af at feet meres उस 0+.02.2000 Owefiterc twentia ar जलय twee नाथ aft afte सलब iereeniin Fave Corey rere et oreo cae wera Cer owe पॉफीसकट tere eee oo हवन साय EE Se प्रकाशनक अधिकार WE इन्पलिकाकि सका रचनाकार अपन सौसिक aL अप्रकास्तित रचना EEC सीसिकसताक Sof secufter teenie wer WAY gpsendm@yehco.con =f gysjerte@nideha.coin के गोला Reiter STR doc dock bt RET pol SHER परान सकेल AACE संग रचनाकार जप्पन WT Serr ertisten ar eer der फनटुत मेल फोटो Rang, से कसा फेल चल! Ces er Ere CEE ई रचना see af ae fee wens केस RRs) Eafe देव ar सहन aR नेल बा Gears are eee stivart (साल Teri) एकर प्रकाशनक wee ETT देख SEN 2 Videha ‘fate प्रथम मैथिली arfire € पत्रिका १ फरवरी २००८ (वर्ष 4 मास 2 अंक 3) Facer साश्किक सक्िका Videha Maithili Formightly & Magazine facie विदेश ee | कक १८ बच के: @ books.googleusercontent.com —Sa

56 || विदेह सदेह:१९ 9:53 alee < - Gajendra Thakur shared a link. ex Admin 23 Jun 207 - डा गूगल ट्रांसलेशन टूलमे "बिहारी" भाषाक बदलामे मैथिली लेल अलग ट्रांसलेशन टूल बनेबाक आवेदन विदेहक सदस्यगण द्वारा देल गेल अछि। अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंप्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट S लॉग इन केलाक बाद | http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject http://www.google.com/transconsole/giyl/ chooseActivity?project=gws&langcode=bh google.com Google in Your Language tb Like © comment @ send Oo You, Ashish Anchinhar and 7 others - Gajendra Thakur Author Admin +++ नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकें आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/wiki/ Requests_for_new_languages/ Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate? task=untranslated&group=core- mostused&limit=2000&language=mai Write a comment... (GIF) (cS) 0. ma & कि @®@ ८ (8 Home Friends Wateh Profile Notifications. Menu लो

विदेह सदेह:१९|| 57 9:54 al Fe) < - Gajendra Thakur shared a link. aes Admin 23 Jun 207 - डा nup://www.google.comptransconsole/gly/cnooserroject http://www.google.com/transconsole/giy|/ chooseActivity?project=gws&langcode=bh google.com Google in Your Language कि Like © comment ® sena © You, Ashish Anchinhar and 7 others ~ Gajendra Thakur Author Admin +++ नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकें आगाँ बढ़ाऊ। http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator http://meta.wikimedia.org/wiki/ Requests_for_new_languages/ Wikipedia_Maithili http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate? task=untranslated&group=core- mostused&limit=2000&language=mai http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai http://translatewiki.net/wiki/ MediaWiki:Mainpage/mai 40y Like 30 Write a comment... © 0, e mam & OP @ ८ (8 Home Friends Watch Profile Notifications Menu ——

विदेह सदेह:१९|| 55

722 || विदेह सदेह:१९ (बिहार) पराती गायन लेल विदेह “समग्र योगदान सम्मान”

748 || विदेह सदेह:१९ मैथिली लोकगाथा गायन लेल विदेह “समग्र योगदान सम्मान” है i ) {

00 || विदेह सदेह:१९ sn, RRR OE ESD ge रे न eee be +l vi, a iio! q ve २3८५६: कर ~~ ae (weg 4 = Ss . मैथिली - citar (चित्रमे - अफ्रिकाक चीता) अंग्रेजी - CHEETA (NORTH & EAST INDIAN ACCENT), CHEETAH (SOUTH & WEST INDIAN ACCENT), PANTHER, HUNTING LEOPARD HAAS नाम - Acinonyx jubatus (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँ ओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

विदेह सदेह:१९|| 0i5 औ pe ~ of tN Br ea रद ~~ a a” न e(¢ ow oe >| ae ae 5 व Les wate ७ wy c , ‘ ae. रे yee. “5. a> ‘ ef-s Sota SS Se चर ; ro “3 + = ty | ‘2 at कि ca) ae Ye a a - i Pe “beats Sa ३ अफ़िकाक citar ~AFRICAN CHEETA Acinonyx jubatus

विदेह सदेह:१९|| 025 ५ र्िरिररिचत'्त86 = 7 , F = SS ua ! | q *¢ da AY ? NTA OO iz Pe .. = ry nee AWARE SI VIN || ye St 2० BSS Se SRR OT | की... : SOR गन HSA. BAA, i ' a ata ip ह कि 3. “3 a A ae Tn eg SLs Bs 4 se Sse |. की i कक 4 oe जी 3 . थी राज संजय गांधी जेतिक eng के. ~ _ मैथिली - तेन्टुआ, तेनुआ (चित्रमे - भारतीय तेन्दुआ / तेनुआ) हिन्दी - तेन्टुआ (चित्रमे - भारतीय तेन्दुआ) संस्कृत - चित्रक, चित्रव्याघ्र, शार्टूल, ध्वव्याघ्र, FUCA, व्याल अंग्रेजी - LEOPARD (चित्रमे - INDIAN LEOPARD) जैंववैज्ञा० नाम - Panthera pardus (चित्रमे - Panthera pardus fusca) (संस्कृतमें आ प्राचीन मैथिलीमें dogan "चीता" शब्द केर अन्तर्गतहि समाहित छल | ang काल्हि प्राणिशारूमीय वर्गीकरणक अनुरूप जवका मैथिलीमें Hel wpa पृथक afer "तेल्‍्दुआ" या "तेलुआ" संज्ञासँ सम्बोधित कएल जाइत अछि |) नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉजो या पर्यायी नॉओ स्वतः मैथिली भाषामें पर्यायी नॉजो भर जाइत अछि - तत्सम स्वरूपसे)

058 || विदेह सदेह:१९ बिज्जी या सपनौर (बाल कविता) = = a aad aes = ee oN ie Se Ne SN De GRE ८ ens | ah BES Sse Se Se. 43 ty wa” Cam 4 खा कर ge So Vs S Wie ye > Wess Ve ५८ rN LMG, <$ / ee, oe Ls ©: SS “जन ag | स्थान -दुलारपुर (रुचौल -दुलारपुर), fav Pe = Ab Fatty मैथिली - बिज्जी या सपनौर या सपलेउर (चित्रमें - सामान्य या साधारण भारतीय बिज्जी) अंग्रेजी - MONGOOSE (Sing,), MONGOOSES / MONGEESE (Plu.) (feprat - INDIAN GREY MONGOOSE / COMMON GREY MONG.) जैंववैज्ञा० नाम - बिज्जी कुलक (Family - HERPESTIDAE) प्रायः १४ वंशक्त (GENERA) सदस्यगण (चित्रमे - Herpestes edwardsii) (नोट - संस्कृत भाषामे आयलर हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ ss जाइत अछि - तत्सम रूपमे) at बिज्जी छे ! सपनौर छै !

विदेह सदेह:१९|| 062 © Dr. Shashidhar (जाग "की | ee रे oad © wr fies बूमव face sit auth a “2 ५३ eT ag i h . \ ! ie . \ की ही सेन र्ं ही भ बिज्जी या सपनौर / MONGOOSE / Herpestes edwardsii Tal सपनौर / MONGOOSE / Herpestes edwardsii

विदेह सदेह:१९|| 065 मधुमाक्षी या मधुमाछी (बाल कविता) प्र Sot Re in) % oy é री 4) =, be 2 it Donan haa oS Be as x लि nod Py » Ve PES hee Atte : (OB Siig Bit ® aL िशिवर Una 6S ES PO t $M Bet URAL Ss Say OR i हा Bio) ENS Ud eyes रू Shh Ss मैथिली - मधुमाक्षी / मधुमाछी हिल्‍दी - Head संस्कृत - मधुमक्षिका, श्रमरक, माधुकर, रुक्षवालुक आदि अंग्रेजी - HONEY BEE / HONEYBEE (FORMER IS MORE SCIENTIFIC WAY OF WRITING) (चित्रमें - ASIATIC HONEY BEE) जैववैज्ञा० नाम - Apis spp. (चित्रमे - Apis cerana indica) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँ ओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ भड जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

विदेह सदेह:१९|| 075 कहबैतछि | ।** व्“<<ररररररर = : — tye x © Dr. Shashidhar ai a Cee “facne’ वि MRA माथ बला लालबोड़गी / कारी मूरी बला लालबोड़गी RED VENTED BULBUL Pycnonotus cafer

विदेह सदेह:१९|| 093 ला + > शक SIN ve २ दि \ \ पी $ Fe: x - Z ft iS} r Ps \ a गैंतीक \ da रे \ , | hy } राजहंस या हंसावर (बाल कविता)

094 || fae सदेह:१९ 2 मर es . iS Tu कद + f dee vere o : की | ne Pe pe ० / ARS SB Se - गदर = : 4 (सा्रिसॉजम्य/ ey: 258 है | साभार सॉजन्य : gotreedownload.net हिन्दी - राजहंस, हंसावर संस्कृत - राजहंस, अरुण क्रुज्च अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] GAAS नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेरस) & Phoeniconaias spp. (चित्रमें - Phoenicopterus roseus) ote -सेस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या vate नाँओ स्वतः: मैथिली भाषामे प्यीयी नॉँओ Hs जाइत अछि -तत्सम रूपमे,

विदेह सदेह:१९|| 095 = meta | —_ | (ae yy x tee b> 3 is “Saag न & साभार सौंजन्य - ५ ownlo i Sa मैथिली - कि (चित्रमे - बड़ गुलाबी डा अंग्रेजी - FLAMINGO (चित्रमे - GREATER PINK FLAMINGO) [उच्चारण - लेंमिड्गो (ब्रिटिश ई०), फ्लेमिड्गो (अमे०ई०)] जैववैज्ञा०८ नाम - Phoenicopterus spp. (उच्चारण - फिनिकोटेर्स) & Phoeniconaias spp. (feprat - Phoenicopterus roseus) atte -संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पयौयी नॉँओ स्वतः मैथिली भाषामे पयौयी at ss जाइत अछि -तत्सम रूपमे,

08 || विदेह सदेह:१९ -_= x; whe 3 : y कै) 4 रा ही | | ७ मैथिली - गरूड़, बड़का चिल्होरि (उच्चा०« - चिल्होइर) हिन्दी - गरूड, महाश्येन संस्कृत - गरूड, उत्क्रोश, श्येन / श्येनिका (पु०/रुत्री०) आदि अंग्रेजी - EAGLE (BALD, GOLDEN, , CROWNED, BOOTED HARPY, MARTIAL, STEPPE, SERPENT etc. EAGLES) (चित्रमे - STEPPE EAGLE / मैंद्रानी गरूड़) जैववैज्ञा० नाम - कुल 60 वा ताहिसेँ बेसी जाति (SPECIES) (चित्रमे - Aquilla nipalensis) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नांओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली आाषामे पर्यायी नाँओ ats जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) पैघ fas - चिल्होरिसँ नम्हर, a aa चिल्होरि बुझू |

I20 || विदेह सदेह:१९ oa प्रियगर साँप fe AB । जप A ; e है. Silos ८... मे कै पुरुष गरुूनड़ ई z , we + tee Ee वि हि si ie” ae Ng. बिक Shashidhar Kimar “Videha” “© डॉ. शशिधर दे g I “fag I a» sy Ba 3 WG कि sie we iS. ™ Ss & gt oa | fart prea -रुचौल-दुलारपुर बाध, दरिशंगा बाधमें जिलेबी गाछक डाढ़ि पर GAC एकटा गरूड़क जोड़ा आकार BIC आ स्त्री-गरूड़क आकार Ua होइत अछि चित्रमे - मैदानी गरूड़ = STEPPE EAGLE = Aquila nipalensis

विदेह सदेह:१९|| 2 का sisi. ी। / ,. स्वर्णिम गरूड़क चाड़गुर (| if Bie | | (चित्रीय निरूपण) है eae f |) CLAW OF A GOLDEN EAGLE it i i ) } | h 4) @MIAGRAMMATIC ILLUSTRATION) ‘ \ A 4 A BAR » 2 ASS a “हे, सर कि vr ese aa a PE ye [Sa SO 2s = साभार सौजल्य - fafeouifsar पब्लिक डेमिल

I6 || विदेह सदेह:१९ गिद्ध (बाल कविता) iy TEE f ता गाजर कै u ae 2 Oe Diy m4 gf % = पर My } / y i ry 4 ey f ere Len aN My VAS | Ale \ अके व cee. O ‘ lM कक कि » ' 3-४६. = ./ , i है ५ 3 रोज, 25.00 i थी, पते छा नर्नियद स्वमर्वअविमेरर ues Re | श | A: A x 3) / | दर Nine ) iy & Se . 4 rama. — मैथिली - गिद्ध / गीद्ध / गीध feoct - गिद्ध संस्कृत - गृध, सुदर्शन, सुदृष्टि, आज, भ्रास, वज़्चज्चु, वज़तुण्ड, खगेन्द्र, खगेश्वर, दीर्घदर्शिन, कामायुसू, सघनू आदि । अंग्रेजी - VULTURE (चित्रमे - HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE) जैववैज्ञा० नाम - OLD WORLD VULTURES - 6 SPECIES & NEW WORLD VULTURES -7 SPECIES (चित्रमें - Gyps himalayensis - an OLD WORLD VULTURE) ott - संस्कृत माषामे आयल हरेक नांओ या पर्यायी नांओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नांओ ts जाइत अछि - तत्सम स्वसूपमे)

विदेह सदेह:१९|| 29 4 au #4 / or ay j Y \ SAG \ / es / eN Dr j " = 7 AN | | \ (0 We Shashitharguma, 4 y Ge ig (68 7h उन्भेव é. 4 &E f i i कर कर थी 4७ श्र 4 Nae svi ¢ \ AA Y कै \ Pas, गिद्भक लोल आ गर्दनिक बनावट (नजदीकरसँ देखला पर) (चित्रमे - हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE / Gyps himalayensis)

720 || विदेह सदेह:१९ a F, be i ‘2 GS = ae f/ a iN * iy y ' | jie! Hh , zs कि" ‘ Ne ~ cx ig Biew . काका न ee ————— (चित्रमे - हिमालयी ग्रिफॉल smnnieein (नजदीकक = |

विदेह सदेह:१९|| 2224 on Eee # a सजा Ra रह 2 ae 5. Sua ot in eu है? Se ne + N Wak भी Ebr Silda ona Vi ‘ ft Par “ beeen waa “ब्रिटमड ieee ie. Ni) BA F 2 हिमालयी गिद्ध / हिमालयी ग्रिफॉन गिद्ध HIMALAYAN VULTURE / HIMALAYAN GRIFFON VULTURE Gyps himalayensis

26 || विदेह सदेह:१९ fra या aie (बाल कविता) = as © Or. Shashidhar Kumar “Video” © डॉ. शशि नि की cag © जा ननियव =H Ky W (gh 4 \ al oy है or नि नि = Le : | जज h rN 4 * ही कक ve 4 मनन रा क्र eo हल मैंथिली - चिल्होरि (caro - चिल्होइर) या चील्ह चित्रमे - करिया चिल्होरि) संस्कृत - चिल्ल, वाताट, आतायिन्‌, प्रतिबिम्ब, कण्ठनीडक आदि अंग्रेजी - KITE (चित्रमे - BLACK / PARRIAH KITE) जैववैज्ञा०८ नाम - Milvus spp., Elanus spp. & members of 0 other genera (चित्रमे - Milvus migrans) (Excluding genera covered under EAGLE) हनौट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँ ओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली TTY पर्यायी नाँओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

विदेह सदेह:१९|| 27 ् कसर रे ~ 7 ts > Wy मैथिली - चिल्होरि cate - चिल्होइर) या चील्ह (चित्रमे - करिया पीठबला sort चिल्होरि) संस्कृत - चिल्ल, वाताट, आतायिनु्‌, प्रतिबिम्ब, कण्ठनीडक आदि अंग्रेजी - KITE (चित्रमे - BLACK WINGED KITE) जैववैज्ञा८ नाम - Milvus spp., Elanus spp. & members of 0 other genera (चित्रमे - Elanus caeruleus) (Excluding genera covered under EAGLE) ete - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नांओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ ses जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) aR we मजयूत पंख छै, मुर्दाखौक शिकारी |

विदेह सदेह:१९|| 29 लोलहिसँ झपटै 8 । ।** ९४ 3 ‘SI Wy Kumar “Videha” 6 डॉ. शशिधर कुमरं a day 3 REA, i vk \ Woy s iv) है प्र y SS ७... q 4 - Ya pare 4 ae vs is 4 gt) CN ll स्थान -संजय गाँधी जैविक उद्यान, पटना! करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

30 || विदेह सदेह:१९ श्प् जे कक | oe aw ay : ee j LR ८ Ke BE << उसे, ला श्देः ae pt i Pr, Se: a 3 है व कस re RSA et oN जा funk Es heee oka Nae! | me y Bria jae lumar $ © ST. शशिधर " | bree Bete अर जप. ey ’ i i WAYS. iat 8 Oa ne _ - a ia ie tom 20 me ae भर ig Li स्थान - संजय गाँधी जैविक उद्यान, करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

विदेह सदेह:१९|| 3] < gl BO, & is ie eh Se Sci} af: @: 2" ee -_ सील के Ne of & 2 Spashidhar tu Kota जि” - © डॉ. or “ae. OCT aaa ee. brat Pr ete & ee . ... ye a 4 & i ~ S whee * Siig पर बैसल स्वच्छल्द (उठ्मुक्त, पिजजयमें लजि) "करिया चिल्होरि" + (ie Wick US RT ‘ Te 0B करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAH) KITE / Milvus migrans

932 || विदेह सदेह:१९ के ' Th ee 5 $] भर S . =, 5“ = “he N 4 Win ९५० सी tee a © Dr. Shashidhar Ku NN . Se "pe oa हे 4 कै ie करिया चिल्होरि / BLACK (PARRIAB) KITE / Milvus migrans

40 || विदेह सदेह:१९ RESTS oS Le Me हू, ६४ दिए भर At a) f oe ge ७ ९. ५१९४ हा Dr, Shashidhar Kingae"Videha” :. हि डॉ. नर कर, Tee निभियत mwa acne alt कह. \ AE ASSEN. F be x eet vy दि कस ५९.९ ae ORE Og . OWRD HL Bean > . FOR Belt - socrenks ierogety), मघुबंजी ah SMa Tt, Uap ‘ “ my F स्थान - गल्थवारि (गल्डबारि), मधुबलो लि पे विभिन्‍न रूप - रंगक परबा / परेबासभ

विदेह सदेह:१९|| 47 कै. हद. / = ae i > hy ’ © Dp. Shashidhar Kumtar.V = \ Ue hia cr Pe \— — A ps स्थान - पाहीघाट-समौर are, मधुबली बगेरी / EURASIAN SKYLARK / Alauda arvensis

60 || विदेह सदेह:१९ लुक्खी (बाल कविता) RES agp Bi . वि ‘3 ty Pests 2 YL4 व 4 \ y हि न a तो ngs Pr a ie तक, SM मैंथिली - लुक्खी हिन्दी - गिलहरी संस्कृत - वृक्षशायिका, रोमशी, कलन्दक, वृक्षमर्कटिका, शाखामृग ( "शाखामुग" शब्दक अर्थ "बानर" Wel - अनेकार्थक शब्द) अंग्रेजी - SQUIRREL (चित्रमे - NORTH INDIAN PALM SQUIRREL - 5 STRIPED) जैववैज्ञा० नाम -Family - SCIURIDAE (Gael कुल) केर समस्त जाति ओ प्रजातिसभ्न (SPECIES & SUB SPECIES) चित्रमे - Funambulus pennantii) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम रूपमे) छोट जीव, बड़ Ae B नाज़रि,