SADEHA — 20

Publication: SADEHA · Issue: 20
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह -२० विदेह-सदेह २०, विदेह www.videha.co.in/ पेटार (अंक २१७-२५०) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. ३०००/- संस्‍करण: २०१८, २०२२ Videha Sadeha 20: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 217-250 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-६७२) गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली सी.डी. एल्बम, मैथिलीमे बाल सी.डी अल्बमक सर्वथा अभाव (पृ. २-७) दिनेश यादव- नेपाल मे“मैथिली गीत-संगीतक अवस्था” (८-१५) प्रदीप पुष्प- सिनेहिया: जगा क' टीस हृदयमे केहेन कठोर भेलौं (पृ. १६-१९) योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी'- वन्दनाक स्वरूप (पृ. २०-२३) चंद्रेश- अरिपन (पृ. २४-२९) इरा मल्लिक- शारदा सिन्हाजीक "विवाह गीत" (पृ. ३०-३४) मनीष झा ’बौआभाइ”- वर्तमान मैथिली गीत-संगीत हमरा नजरिसँ (पृ. ३५-३९) रवि भूषण पाठक- औझका डायरी (पृ. ४०-४२) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसर चण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग, परित्यक्ता आ परिस्थिति: मिथिलाक सन्दर्भ मे (परिचर्चा), गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद्व?, लघुकथा- पुरुषक नहि विश्वासे, मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना, लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावणी – मानवशास्त्रीय विवेचन, मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव, तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति, मैथिलानी पर विमर्श क अधिकारी के?, महाराजा पंहिबा: मणिपुर केर ग़रीब नबाज (पृ. ४३-१५८) जगदीश चंद्र ठाकुर ’अनिल’- महाकवि चन्दा झा कृत रामायणक सुन्दरकाण्डक एलबम (पृ. १५९-१६०) वन्दना अवस्थी दुबे- (वन्दना अवस्थी दुबेजीक हिन्दी कथा- अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा)- (पृ. १६१-१६४) आशीष अनचिन्हार- प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल, भाषा केर मनोविज्ञान (तीन टा बिंदु), मिथिला स्टूडेंट यूनियनक काज पर रिपोर्ट, "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि (प्. १६५-१९३) नन्द विलास राय- हमर लॉटरी निकलल, शिक्षाक अन्तिम उद्देश्य, कठही साइकिल, हमर पत्नीक मनोरथ, चरित्तर कक्काक ब्लडपेसर (पृ. १९४-२३२) रबीन्द्र नारायण मिश्र- यूरोप यात्रा, अमृतसर यात्रा, पहिल नौकरी, एकसरि, असगुन, बिधवा विवाह, आगाँ के देखलक अछि?, नवका पोखैर, इच्छा पत्र, तिरुअनन्तपुरम, कानूनी आतंकवाद (भारतीय दण्ड संहिता धारा- ४९८ ‘ए’, IPC 498 ‘A’), आजादक अन्त्येष्टि, मकर संक्रान्ति, राँची चारि दसक बाद, गामक बात, हिन्दू महिलाकेँ सम्पैतमे अधिकार, वरिष्ठ नागरिक, संगम तीरे, बाल्यकाल, क्रोध (पृ. २३३-४५१) बी.एन. लाल दास- चिचड़ी वाली भौजी (पृ. ४५२-४५४) डॉ. शिव कुमार प्रसाद- दलित साहित्यकेँ आन साहित्यसँ फुटकेबाक प्रयोजन (पृ. ४५५-४५९) ओम प्रकाश झा- विहनि कथा- विछोहक नोर (पृ. ४६०-४६०) राजदेव मण्डल- बीहैन कथा (भितरिया चोट, छोटकू दोस) (पृ. ४६१-४६४) सुकेश साहनी- (प्रख्यात हिन्दी लघुकथाकार श्री सुकेश साहनीक चर्चित आ पुरस्कृत लघुकथा "ठंढी रजाइ" क मैथिली रूपान्तरण- मुन्ना जी द्वारा) (पृ. ४६५-४६६) मुन्ना जी- बीहनि कथा (विधान, फसाद!, निवहता, हुव्वा) (पृ. ४६७-४७०) जवाहर लाल कश्यप- बीहनि कथा- कुक्कुर (पृ. ४७१-४७१) अब्दुर रज्जाक- बिहैन कथा (पृ. ४७२-४७३) बृषेश चन्द्र लाल- बुद्धिचौ (पृ. ४७४-४७५) मिथिलेश कुमार सिन्हा- बीहनि कथा (चुप्पी, आजादी, माया) (पृ. ४७६- ४८२) शिवशंकर- कंबल (पृ. ४८३-४८४) कपिलेश्वर राउत- चाहबला, गामे बीरान भऽ गेल, तीलकेँ तार, एक चुनौटी तमाकुल, आब कहिया चेतब, विघटनकारी तत्त्व (पृ. ४७५-५१३) नारायण यादव- चौदह नम्बर कोर्ट, चौरचनक बरतन, छोटकी पुतोहु, गोबर बिछनी (प्. ५१४-५४३) राजेश वर्मा "भवादित्य"- बीहनि कथा (सोंगर), बीहनि लेख (वैशिष्ठय) (पृ. ५४४-५४५) प्रणव झा- सदाचार क तावीज (मैथिली लघु नाटिका), राजा खानदान (संस्मरण), फेसबुक केsर चक्कर, चक्रफाँस, अरजल जमीन, रक्षिता, सुखैत पोखैर प्यासल गाम (पृ. ५४६-६०३) कल्पना झा- बीहनि कथा (निर्वहन, निरुत्तर) (पृ. ६०४-६०४) अभिलाष ठाकुर- बीहनि कथा (साँठ गाँठ, नोटबन्दी) (पृ. ६०५-६०५) डॉ. वीणा कर्ण- मैथिलीक धरोहर 'सीता-शील' (खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ मैथिली काव्यक साहित्यिक विवेचना) (पृ. ६०६-६१७) उमेश मण्डल- ’सगर राति दीप जरय’क ९३म आ ९४ म आयोजन, मिथिलाक लोक संगीत/ लोक कला- भगैत गबैया (पृ. ६१८-६४३) बेचन ठाकुर- दूटा एकांकी (नीशा मुक्ति आ बरहम बाबा) (पृ. ६४४-६७२) पद्य- खण्ड (पृ.६७३-१०४७) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- प्रेम-चालीसा, किछु गजल (पृ. ६७४-७११) आशीष अनचिन्हार- किछु जोगीरा, कविता- फेर, रुबाइ, बाल गजल, किछु गजल (पृ. ७१२-७४३) अशोक कुमार सहनी- गजल (पृ. ७४४-७४४) डा. जियाउर रहमान जाफरी- मुक्तक, आजाद गजल (पृ. ७४५-७४६) डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”- ६ टा कविता, १४ टा बाल कविता, किछु सचित्र बाल कविता, ४ टा कविता (बाबू साहेब चौधरी, मैथिली दधीचि, कुहेस, गीत) (पृ. ७४७-८३४) बाबा बैद्यनाथ- आजाद गजल (पृ. ८३५-८३६) प्रणव झा- जन-प्रतिनिधि, राईत इजोरिया ताइक रहल अछि (पृ. ८३७-८४०) रतन कुमार लाल दास- कोईली बाजी रहल अई (पृ. ८४१-८४१) प्रदीप पुष्प- किछु वैलेंटाइन स्पेशल... गजल, किछु गजल (पृ. ८४२-८४६) बृषेश चन्द्र लाल- तप ?! (पृ. ८४७-८४८) मुन्नी कामत- बाल कविता (जतरा, अंकक मेल, बहिन) (पृ. ८४९-८५२) राजेश मोहन झा 'गुंजन'- शिव भजन, ममताक अनुभूति (जूड़शीतल पर विशेष), सरस्वती वंदना, वसंत गीत (धुन:- सूफ़ियाना), धन रूप आ गुण (दहेजक पसाही), काटि गेल जुट्टी (हास्य रस) (पृ. ८५३-८६०) राजीव रंजन झा- फगुआ (मुक्तक), जोगीरा, किछु गजल (पृ. ८६१-८७६) महेश डखरामी- महेश पद्यावली- अनुरोध (पृ. ८७७-८७८) ओम प्रकाश झा- गजल (पृ. ८७९-८७९) सत्यनारायण झा- मोनक गीत (पृ. ८८०-८८१) गुफरान जीलानी- झमटबा गाछि (पृ. ८८२-८८२) अमरनाथ मिश्र- जुड़िशीतल-गीत (पृ. ८८३-८८३) रश्मि किरण झा-किछु हाइकू (पृ. ८८४-८८४) राम विलास साहु- किछु कविता (पृ. ८८५-९४०) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गामक कचोट (पृ. ९४१-९४२) राजेश वर्मा 'भवादित्य'- नवगीत (पृ. ९४३-९४३) बृषेश चन्द्र लाल- ३ टा बालगीत (पृ. ९४४-९४६) कमलेश प्रमेन्द्र- जरल कपार (पृ. ९४७-९४८) अम्बिकेश कुमार मिश्र- सुतारु, मिथिलाक आह, मौगियाहा नैइतन, दिल्ली (पृ. ९४९-९५३) कुमार रवि- वर्षा मेघक संग एलैय (पृ. ९५४-९५५) नीलमाधव चौधरी- ५६ टा कविता (प्रस्तुति- आशीष अनचिन्हार) (पृ. ९५६-१०४७) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर मैथिली सी.डी. एल्बम मैथिलीक किछु सी.डी. अल्बमक लिस्ट प्रस्तुत अछि। गुणक दृष्टिकोणसँ जागे महतो आ जागे राउत क संग बिरासी सदा बेछप छथि। धनीराम महतोक सल्हेश आदिक दरभंगा रेडियो स्टेशनपर रसास्वादन केनिहार केँ ओ मोन पड़ि जेता। आब धनीराम महत दरभंगा रेडियो स्टेशनपरसेहो अनुपलब्ध छथि, दरभंगा रेडियो स्टेशन अपन आर्काइवसँ हुनका निकालत तहूपर संदेह अछि। मिथिलाक लोकसंगीतक अल्बमक एकटा छोट सूची प्रस्तुत अछि। धनीराम महतो (सल्हेश आदि दरभंगा रेडियो स्टेशन- आब अनुपलब्ध- दरभंगा रेडियो स्टेशन अपन आर्काइवसँ एकरा निकालत तहूपर संदेह) कारिक झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (गंगा कैसेट्स) सोखा झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (टी सीरीज) https://youtu.be/p-LQS2ZHJ9o?list=PLTwW4p11kfqqUeI442nSqvoKWQ5aFs9bo https://youtu.be/gZsK3ZwXpYA https://youtu.be/Vmmighmi3hk https://youtu.be/sYT5iTsC3a4 गोविन्द झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (गंगा कैसेट्स) गहील माता के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) काली माइ के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) भुइंया बाबा के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) गंगा माइ के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) भुइया बाबा -भगैत प्रसंग- रमाकान्त पजियार (गंगा कैसेट्स) बाबा बख्तौर भुइया बाबा- सकलदेव दास आ साथी (सुप्रीम वीडियो) भक्त ज्योति (भगैत प्रसंग)- रंजीत पजियार (नीलम वी.सी.डी.) बैताली यादव- तपेश्वर यादव आ कामेश्वर यादव (गंगा कैसेट्स) कुँवर बृजवान- (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी] भुखना-भुखनी- राम खेलावन महतो, नेथल मण्डल, महीन्दर यादव, राम असेश्वर दास, हेमू मुखिया आ बिल्टु मुखिया [गीत मैथिली संवाद मैथिली] रेशमा चूहड़मल- रामवृक्ष ठाकुर एण्ड पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद मैथिली आ हिन्दी] राजा सल्हेश- विदेशिया नाच पार्टी, देवेन्द्र साहनी आ पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी] आल्हा रुदल झगरू बध- - विदेशिया नाच पार्टी, देवेन्द्र साहनी आ पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी] संत बाबा करू खिरहरी- रुदल पजियार (जयश्री कैसेट्स) [गीत मैथिली आ हिन्दी संवाद हिन्दी] मैथिलीमे बाल सी.डी अल्बमक सर्वथा अभाव मैथिलीमे बाल सी.डी अल्बमक सर्वथा अभाव अछि। तैयो एकटा छोट संकलन लिंकक संग प्रस्तुत अछि। मैथिली नाटक बुधियार छौडा आ राक्षस, २५ नोभेम्वर 2011, रसियन कल्चर सेन्टर, कमल पोखरी , काठमाण्डूमे प्रस्तुत लेखन रमेश रंजन https://youtu.be/lbyItMF9STE http://maithili-drama.blogspot.in/2011/12/blog-post_27.html कक्का हौ हमहू जेबै इस्कूल https://youtu.be/zikDHR8IXXc (धीरेन्द्र पूजा) https://youtu.be/rRjJmckzhSg गुरुदेव कामत https://youtu.be/7ZzEsE8XULc अंजना इस्सर https://youtu.be/J2FNIeMdopM रजनी पल्लवी https://youtu.be/_wlw2gjFyJQ https://youtu.be/LSDRp1bmE-w?list=PLE58799CC1970F50F https://youtu.be/3oL_MGVAm2g?list=PLE58799CC1970F50F https://youtu.be/BiTT330h9ok?list=PLE58799CC1970F50F ममता गाबय गीत (मैथिली फिल्म) (सौजन्य: केदार नाथ चौधरी) mamitohar.mp3 (सुमन कल्याणपुर) https://youtu.be/CcN4w47e4Fg https://youtu.be/vDMv-qUVDRg Arr_Bakri_Geeta_Dutt Kahu_Rame_Ram_Mahendra_Kapoor विश्वक पहिल देशभक्ति गीत (दूर्वाक्षत मंत्र , शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२: साभार आइ.आइ.एस.एच.)Doorvakshat_Mantra.mp3 वर्णमाला (शुद्ध उच्चारणक लेल: साभार संस्कृत भारती ) AtoGya.mp3 (बालमंडली किशोर-जगत) : गजेन्द्र ठाकुर GajendraThakurI0.mp3 जानकी एफ.एम. सामाचकेवा पर बिशेष रिपोर्ट २०१० https://youtu.be/AmLvMzZrfO8 https://youtu.be/3rAcKjUfijw चना जोर गरम https://youtu.be/H1vyD058V3Q https://youtu.be/QUBS5v1Cufk https://youtu.be/-H278XhHD6g https://youtu.be/0UjFakZe4BM https://youtu.be/_26zQlsDLPU https://youtu.be/Znmt3F7D98M https://youtu.be/kldDIcnL25k https://youtu.be/P7k9CnIaLds https://youtu.be/230RK3DB5SI https://youtu.be/GiT6oT4yaac https://youtu.be/V7g6wcp45RQ https://youtu.be/Ix6QF3fkNOU बौआ चान सन (विजय/ काजोल) https://youtu.be/3txJOqUySZw https://youtu.be/SW4fX6Wigrs दीक्षा भारती http://youtu.be/pTPYg_4a_II http://youtu.be/25NmustCBPI http://youtu.be/k43HnEW-TBk http://youtu.be/LXhMeEPnqys गीत-गोविन्ददास (गायन दीक्षा भारती) http://youtu.be/BJEH6Cy4rNk http://youtu.be/9Jvupm02uHg http://youtu.be/Sn3H8yuH9PU http://youtu.be/EpAvkk9Qa40 http://youtu.be/FNWGQz1evRg http://youtu.be/D2AxSdv8LyA मैथिली गजल (गजल- गजेन्द्र ठाकुर, गायन दीक्षा भारती) http://youtu.be/WDcPyKqAKIc http://youtu.be/weA0vk5-d8g (बहरे मुतकारिब) http://youtu.be/vma-sniQ8zs http://youtu.be/b2ti1ASefn4 82 म सगर राति दीप जरए, स्थान- गजेन्द्र ठाकुर जीक निज आवास, गाम- मेहथ, जिला- मधुबनी। दिनांक- 31 मई 2014 (शनि दिन), समए- संध्या छह बजेसँ। गोष्ठीक नाओं- कथा बौद्ध सिद्ध मेहथपा सगर राति दीप जरए। आयोजनक खेप- ८२ म आयोजन, संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर। विशेषता- बाल साहित्यपर केन्द्रित। https://www.youtube.com/watch?v=lnu6pf9e7zY हमर देवानन्द नाम यौ https://youtu.be/G2DYX8fouNE माए किन दे गै बकड़ी https://youtu.be/TtnPyo3tJBA दिनेश यादव नेपाल मे“मैथिली गीत-संगीतक अवस्था” १. उठू यौ मैथिल भेलैय फोर, चुनमुन चिरैया करैय शोर, कोशी कमला अमृत जलधारा, आलस छोडु कहे भुरुकुवा तारा ..... –विनित ठाकुर २. हम छी मैथिलबाबु, मेड इन मिथिला... –डिजे मैथिल ३. चल–चल रे अपन देश, स्वर्ग स सुन्दर अपन मधेश..... –कालीचरण वैठा नेपालक मिथिला क्षेत्र गीत-संगीत मे कतेक धनि अछि, तकर प्रमाण थिकैह यी उपर देल गेल तीन रचना । पहिल गीत मे समग्र मिथिलाबासी के उठबाक आग्रह अछि, दोसर मे पहिचान आ तेसर मे अपन भूमि के बखान कयल गेल अछि । कोनो आन भाषा-भाषी से ई बेजोड सिर्जना कनिको दुबर नए अछि । ऐहन रचना कएनिहार स“ भरल–पुरल अछि नेपालक मिथिला क्षेत्र । गाम–गाम आ जन–जन के बोली एही“ मे समटल गेल अछि । त“ईयो मिथिला कुहरी काट्बाक बाध्य अछि । एकर कारण बहुतो अए, आ भ“ सकैत छैक । मिथिला क्षेत्र मे ‘देवराज’ सभहक कमी, ‘दैत्यराज’ आ ‘दानवराज’ सभ बढि गेला के कारण समस्या अछि । ‘भगवती’ नए ‘अग्गती’ सभ बड बेसी भ“ गेल छन्हिन, मिथिला क्षेत्र मे । त“ई हरेक क्षेत्र मे सम्पन्न रहितौ मिथिला हुक्कहुक्की ल“ रहल अछि। नेपालक मिथिला क्षेत्र मे टक्का के“ लेल बेसी आ मैथिली गीत-संगीत, साहित्य-संस्कृति आ कला-परम्पराक उन्नति आ प्रगतिक लेल कम काज भ“ रहल छैक । आजू मिथिलाक जन–कोकिलकवि विद्यापति किछु खास वर्ग, जाति आ धर्म विशेषक बैन (तन्खाह) कमेबाक माध्यम बनल अछि । बनिहारी सभ एतेक बेसी भ“ गेल अछि जे हुनका सभ के मात्र बैन चाही, आर किछु नए । एहेन गतिविधि नेपालक मिथिला क्षेत्र मे मात्र नए, भारतक मिथिला क्षेत्र मे सेहो ओतबे भेटत । एतेह विद्यापति के नाम पर करोड टाकाके“ अक्षयकोष खडा सरकार केने छए, मुदा नाताबाद, कृपाबाद, गुटबाद आ जातिबाद के कारण कोष स्थापना काले स“ विवाद मे फसल अछि । त“ई आब विद्यापति के नाम पर घोषणा होमेवाला पुरस्कार-पदक मे ग्रहण लागल बुझाएत अछि । पुरस्कार प्राप्त कएनिहार सभ के ‘मन–कोत’ भ“ जाए छन्हि, ओ सभ मन स“ पुरस्कार लेबाक अवस्था मे नए थिकैह । मिथिला रत्न, वरिष्ठ गायक एवं संगीतकार गुरुदेव कामत एहीं विषय पर निक प्रतिक्रिया देने छन्छि । ओ कहैथ छन्हि, ‘महाकवि विद्यापति के प्रख्याति आ बेजोड चिनारी गायन-गायक क्षेत्र स“ भेल रहैए । गायक सभ हुनक गीत गाबी–गाबी के हुनका चर्चा मे अनने रहन्हि । हुनक नाम मे स्थापना भेल पुरस्कार अखनधरि गायक आ संगीतकार के नय, साहित्यकार आ अनुवादक के मात्र भेटलइए । ई दुखद बात थिक ।’ कामत कहैथि छन्हि, ‘पा“च विद्या मे ७ वर्ष स प्रदान कयल जा रहल इ पुरस्कार स्थापना काल स विवाद मे अछि । हम सभ सक्रिय रुप स“ एही क्षेत्र मे वर्षौ स लागल छि , नए भेटल त नया“ पीढी के इ पुरस्कार भेटनाए मुस्किल अए ।’ विद्यापति के नाम भजेनाए असल मिथिलाप्रेमी के आब बन्द करै पडत । कम स कम आबो मिथिला गीत-संगीत मे दशकों लागत आ सक्रिय लोकन्हि के खोजि होबाक पक्ष मे ओ छथि । वरिष्ठ गायक कामत आगा कहैथि छन्हि जे किछु लोक पोखरी मे जन्मल जलकुम्भी जका बनि बसल अछि । कनिको हावा बहल त एही महार कात स ओही महार कात चलि जाएत अछि । एहा“ दुखद बात अछि । हुनक बात किनको बेजाय लागि सकैत छन्हि । मुदा वास्तम मे मिथिला क्षेत्र मे पाछा स“ पैर(खुट्टा) खिचनिहार सभहक कारण मैथिली गीत-संगीत के जतेक प्रगति होबाक चाही से नए भ रहल अछि । किछु स्वनामधारी ‘कलाकार’ सभ वर्षौवर्ष अही क्षेत्र मे लागल लोकन्हि सभ के छुत जका व्यवहार क“ रहल छन्हि । एहेन अवस्था मे बहुतो के मन खिन्न होनाए स्वाभाविक छए । एतह के मैथिली गीत-संगीत क्षेत्र मे मुठ्ठीभरी लोकनिक हालीमुहाली छए, ओ सभ के गरिब, दरिद्र आ कलुषित एवं संकिर्ण मानसिकताक कारण ‘कार्टेलिङ’ के स्थिति देखबा मे आबि गेल अछि । एक–दोसर के सम्मान त दुरक बात, पुछोताछो होनाए बर्जित जका भ गेल छैक । युवा पीढि सभ फेसनक लेल अहीं क्षेत्र के प्रवेश क“ रहल अछि , व्यवसायिक दिस किनको चिन्ता नए । सभ के सभ मैथिली भाषाक नाम पर अपन–अपन खेति मे लागल अछि । त“ई कोनो लोकविशेष बेसी काल धरि एही मे टिकबाक हिम्मत नए जुटा पाबि रहल अछि । अपना के ‘सुपरमेसी’ मानएवला लोकन्हि सभ के कारण यी क्षेत्र दिनानुदिन दरिद्र, निसहाय आ मसोमात आ मुहदुब्बरा के श्रेणी मे पहु“चल जा रहल अछि । एक कहबी अछि जे अपन सिर्जना के टक्का स“ तौलबाक प्रयास नए होबाक चाही। मुदा ई बात बुझत के ? दोसर बात, विवादास्पद व्यक्ति सभ स“ नेपालक मैथिली गीत-संगीत जकरल अछि । त“ई एकर उथान आ प्रगतिक धरातल कमजोर भ“ गेल छैक । एकेटा मनुस जे ‘जेटिए’ पद मे रही सरकारी सेवा क“ रहल छन्हि आ गीतकार, संगीतकार, नाटककार, विज्ञापनकार, गायक, पत्रकार, रेडियोकर्मी, लेखक, विश्लेषक, अधिकारकर्मी, अभियानकर्मी, संस्कृतिकर्मी, राजनीतिकर्मी, भाषाकर्मी, एनजीओकर्मी.......बनि मिथिलाक के नाम पर बनियागिरी क“ रहल अछि । अहिठाम ई कही दिई जे ओ हुनक बहुआयामिक प्रतिभा भ सकैत छन्हि , मुदा हुनक ‘सिन्डीकेट प्रथा’ अहिठाम बर्जित होनाए अति आवश्यक अछि । किएत त हुनक ई ‘दुलर्भ प्रतिभा’ मिथिला के गीत-संगीत के क्षय दिश उन्मुख क रहल छैक । मिथिला के ऐतिहासिक गौरव गाथा आ प्रतिष्ठा मे आ“च पहु“चा रहल छैक । प्रचार के लेल प्रचार मे जुटल लोक सभ ‘अलकत गगरी छलकत जाय’ से उपर नए उठि सकैति छैन्हि । त“ई आब कम से कम ई बनियागिरीक अन्त्य होमाक चाही । रेडियो मे अपने प्रस्तोता,अपने गायक आ अपने गीत बजोनाए जौ बन्द भ जाए त मिथिला सटसिन आ सुहगनगर रुप से उपर उठि जाएत । नेपालक मिथिला क्षेत्र सप्तरी मे जन्मनिहार उदितनारायण झा मैथिली गीत-संगीत स“ बेसी भारत मे हिन्दी गायक के रुप मे परिचित अछि । सिरहा के मुरलीधर मैथिलीक धरोहर थिकैह, मैथिली गीत-संगीत मे हुनक योगदान अतुलनीय छैक । मैथिली फिल्म स“ ल“के मिथिला कला-संस्कृति के जगेर्ना मे हुनक जोडा नए । मुदा ओहो मिथिला क्षेत्र मे पिछला समय देखल जा रहल गलत परिपाटी स दुखित छन्हि । किछु वर्ष पहिले काठमाण्डू के एक बेर भेट मे ओ कहने छलाह, ‘अपन माटीपानी के मौलिक पहिचान आ बोली जाधरि मिथिलाकर्मीक जूनुन नए बनत, मैथिली के विकास, प्रर्वधन, उन्नति आ प्रगति असम्भव अए । मिथिला मे नटवरलाल सभ बढि रहल अछि, एकरा रोकबाक दिस पहल जरुरी भ चुकल अछि ।’ एही बेरक विद्यापति पुरस्कारक लेल हुनकर नाम सेहो सिफारिस भेल। मुदा जे विद्या मे ओ कहियो काज नए केने रहन्हि ओई के लेल हुनका पुरस्कार देबाक निर्णय भेल । भाषा अनुवादक लेल हुनक नामक चयन कएल गेल । मुदा मुरलीधर मात्र एहन मिथिलापुत्र आ योद्धा निकलल जे लाख टका के ओ पुरस्कार प्रदान कएनिहार सभ के विरोध केलन्हि । अहिपारक मैथिली गीत-संगीत मे महत्वपूर्ण योगदान कएनिहार मे गुरुदेव कामत के नाम सबसे उपर अछि । ओ नेपालक शास्त्रिय संगीतक एक धरोहर थिकैह । मिथिला क्षेत्र के दुर दराज गाम मे जन्मि के नेपालक राजधानी मे अखन एक स्थापित कलाकार बनल अछि । बहुतो मिथिलाबासी के ओ अपन शिष्य बना के“ मैथिली गीत-संगीतक उथ्थान आ प्रगतिके अभियान मे जुट छन्हि । कामत काठमाण्डू मे गुरुकूल संगीत महाविद्यालय खोली बहुतो के संगीत आ गायन क्षेत्र मे अएबाक लेल निपुण बनबति दिक्षित केने अछि । हरेक वर्ष आ हरेक कार्यक्रम मे अपन माय के बोली मैथिली मे ओ गीत गेबेटा करैति छथि । तहिना नेपाली गीत-संगीत स“ अपना के स्थापित कएनिहार वरिष्ठ गायक रामा मण्डल के मैथिली भाषाक गायन मे बड बेसी योगदान अछि । हुनक हमेसा प्रयास रहैत छैक जे मैथिली गीत-संगीत आगा बढए, मुदा किछु मिथिला अभियान हुनका साथ छुत के व्यवहार करैति छन्हि । आधा दर्जन स बेसी मैथिली सिडी-एलबम मे हुनक आबाज लोकप्रिय मात्र नए संग्रहणीय छन्हि । उपर उल्लेख कयल गेल लोकन्हि सभ व्यावसायिक रुप स एही क्षेत्र मे लागि अपन मु“हक लेल माड(रोटी) जुटा रहल अछि । अहीं पार मैथिली गीत-संगीतक श्रीबृद्धि करबा मे गायक हरिशंकर चौधरी, कमल मण्डल, सन्तोष कुमार, अभास लाभक योगदानक चर्चा नय केनाए अन्याय होइत । एही क्षेत्र मे नवप्रवेशी सभ सेहो पंक्तिबद्ध भ टाड अछि । भागवत मण्डल, कैलाश झा, अन्जू यादव, अन्जली पटेल, रञ्जित शर्मा, संजय यादव, अरुण बिजया, तनुजा चौरसिया, वीरेन्द्र झा सनक गायक सभ नेपालक मैथिली गीत-संगीत क्षेत्र मे बेजोड योगदान क रहल अछि । ओना त धिरेन्द्र आ रुपा सेहो गायन क्षेत्र मे अए, मुदा हुनक गायन ‘स्वप्रचार’ अभियानक कारण मात्र चर्चा मे अछि । पुरान लोक होइतो ई दुइ गोटा के गीत-संगीत घर–घर के नए बनि सकल अछि । हेल्लो मिथिला कार्यक्रम आ हुनक चिनह जानल लोकन्हि के एफएम बाहेक मे हिनका सभहक गीत नहिए के बराबर बजाओल जाएत छैक । अही पारक मैथिली गीत-संगीत के विषय मे चर्चित गीत एवं संगीतकार कमल मण्डल के कहबी अए जे ई क्षेत्र स्थिति सन्तोषजन नए छैक। नवप्रवेशी के प्रोत्साहन कएनिहार लोकन्हि के बड अभाव छैक । गीत-संगीत के नशा लागल लोक सभ कोनो धरानी एही क्षेत्र मे प्रवेश त करैत छैक मुदा बेसी दिन टिक नए पायब रहल अछि । कारण रेडियो-टेलिभिजनलगायतक के संचार माध्यम मे स्थानीय कलाकार सभ प्रस्तोता के रुप मे रहला स ओ सभ अपन आ चिन्ह्ल लोकन्हि के मात्र स्थान दैति छथि । ओ कहथि छन्हि, ‘मैथिली भाषा क्षेत्र मे धमाधम रेकर्डिङ स्टुडियो सभ खुजि रहल अछि । एकरा सकारात्मक रुपमा ल सकैत छि । अही“ क्षेत्रक भविष्य इजोत अछि। नेपालक मिथिला भूमि मे“ मैथिली साहित्यकार, गीतकारक सेहो कमी नए अछि । हुनका सभक योगदान मिथिलाक अनुपम पु“जि कही सकैत छि । कालिकान्त झा ‘तृषित’, विनित ठाकुर, सागरवीर कडारी, अर्जून गुप्ता, डिजे मैथिल,जेएन झा, कालीचरण वैठा सभ के मैथिली गीत रचनामे अतुलनीय योगदान रहलैए आ अइछे । हिनका सभहक गीत मे जन–जन के जिभक आबाज सुनल जाएत छैक । ओना त मैथिली गीतकार मे आन लोक सेहो छैथि । ओही मे प्रमुख नाम राजेन्द्र विमल, अशोक दत्त, सुनिल मल्लिक आ धिरेन्द्र प्रेमर्षी के ल“ सकैत छि । मुदा ओ सभ मैथिली भाषी के लेल कम सरकारी आ गैरसरकारी संस्था के लेल बड बेसी गीत लिखैत छन्हि। ‘पैसा फेकु आ तमासा देखु’ बला भूमिका मे अही मे स“किछु गोटा के ल सकैत छि । अही म स एकटा मान्यवर मिथिला क्षेत्र मे रही के नेपाली भाषा-साहित्यक मे योगदान करबाक लेल लाख टका के पुरस्कार सेहो ग्रहण क चुलक अछि । रेडियो मे हिनका सभहक पकड भेला के कारण हुन सभक बजाओल जायत अछि मुदा मैथिलीजन के मन स“ गुनगुनाय के कोटी मे नए रहैत छैक । युवा गीतकार विनित ठाकुर मिथिला क्षेत्रक एक संभावनायुक्त आ प्रतिभाशाली हस्ताक्षर अए । हुनक गीत सभ ‘इभर ग्रीन’ आ मन के झक्झोरै बाला कोटी मे रहैत छन्हि । हुनक कहब अछि जे नव–नव गायक सभ के इन्ट्री के बाबजूदो नेपाल मे मैथिली गीत-संगीतक अवस्था सन्तोषजनक नए छैक । किएक त बिना प्रशिक्षण के ओ सभ अहीं क्षेत्र मे प्रवेश कर रहल छन्हि । विचौलिया सभ स नवप्रवेशी तंग भरहल अछि, कम पाई मे एलबम आ गीत-संगीत उपलब्ध करा देब कही के ठगि सेहो भ रहल छैक । त“ई नव शब्द आ गीतक विन्यास मे कमजोरी भेला के कारण अश्लिल सब्द सभ सेहो पसरल जा रहल अछि । मैथिली गीत-संगीतक मौलिक टेस्ट आ फ्लेभर मे हिन्दी, भोजपुरी आ अंग्रेजी भाषा के प्रभाव सेहो बहुत बढी गेल छैक । त“ई मैथिली गीत-संगीत संक्रमण अवस्था मे छैक । ठाकुर आगा कहैथि छन्नि, ‘उपर उठेबाक लेल मिडिया के महत्वपूर्ण हात होयत छैक । मुदा मिडिया मे मैथिली के नाम पर किछु गलत व्यक्ति के पहु“च भेला स“ समस्या मे पडल अछि । व्यक्तिबादी सोच हाबी भेला के कारण अपने गीत-संगीत के प्रचार मे किछु मनुस लागल रहैत छैक । एफएम और केन्द्रिय रेडियो मे काज कएनिहार सभ ‘हमही सबा सेर छी, अउर सभ किछु नए’ तेहेन अभियान मे छथि । केन्द्रक ई रोग नेपालक तराई–मधेस मे संचालन भ“ रहल रेडियो सभ मे से हो पैसरी गेल अछि, देखल जा रहल अछि । अधिकांश स्थानीय एफएम रेडियोमे ओतएह के गायक सभ प्रस्तोता भेला के कारण अपन गीत-संगीत बाहेक दोसर के बजेनाए मुनासिब नए मानैत छैक ।’ एक मुखी हैकम के कारण मैथिली गीत-संगीत के विकास मे समस्या छैक । त“ई एकरा तोडबाक दिस सबगोटा अग्रसर हउ । प्रदीप पुष्प सिनेहिया: जगा क' टीस हृदयमे केहेन कठोर भेलौं मैथिली गीत -संगीतमे कुंज बिहारी मिश्रजी खूब परिचित नाम छथि।हिनक बहुतो रास गीत बेस लोकप्रिय छन्हि। एतय हिनक 'सिनेहिया' नामक अलबमक गीत-संगीतक समीक्षा कयल जा रहल अछि। अलबममे कुल सात गोट गीत संकलित अछि।गंगा कैसेटसँ निकलल एहि अलबमकेँ गीत-गजलक श्रेणीमे राखल गेल अछि मुदा सब रूपे ई गीतक संग्रह अछि गजलक नहिं। गीतकारक नाओ कभरपर स्पष्ट नहिं देखबामे आयल। स्वर मिथिला रत्न कुंज बिहारी मिश्राक छन्हि।गीतक क्रम हिसाबे चर्चा करब बेसी नीक हैत- १) गोरी सजना सिनेहिया जगा त' दिय- कैसेटक पहिल गीत हेबाक कारणे ई खूब झमकौआ मैथिली गीत अछि।कुंज बिहारीजी एहिमे प्रेम आ सिंगार रसमे ओत -प्रोत भाव प्रकट केने छथि।गायकीमे हुनक जे अपन खास स्टाइल छन्हि तकर नीक उपयोग केने छथि।गीतक शब्द शुरूमे सामान्य जनक लेल आसान अछि मुदा अंतरामे ई कहब जे' अहाँ आभा बनल छी तिमिर जालमे,रश्मि सूर्यक अपन ई देखा त' दिय' कने कठिन भ' गेल अछि।स्थायीक हिसाबे कने मुश्किल लगैत अछि ।संगीत सामान्य लोकगीत स्तरक अछि।की बोर्ड आ ढोलकसँ रेकर्ड गीतमे कोनो वाद्य सजीव बजाओल नहिं गेल अछि। जेना मिश्राजीक गायन अछि ताहि तरहक संगीतक निर्माण नहिं कयल गेल अछि। हँ, झमकौआ जरूर लगैए। २)सभक पाहुन शरीफा लगौलन्हि-मूलत: ई हास्य गीत अछि। मिथिलाक परम्परा रहल अछि पाहुन संग हास- परिहासक।गीतक उद्देश्य मात्र मनोरंजन अछि।गीतक स्थायी आ अंतरामे समान मीटर राखल गेल अछि।मजकिया गीत हेबा कारणे हाय हाय कहब कने बेसी आनंद दैत अछि।गीतकार हास्यक उत्पतिमे कने बेसी अगुता गेल छथि तें शुरूमे त ठीक मुदा ई कहब 'सभक पाहुन ......ह्वाइट लेबल पियेलन्हि,ग्रीन लेबल पियेलन्हि,सिगरेट पियेलन्हि,हमर पाहुन एगो बीड़ी पियेलन्हि' आन अंतराक अपेक्षा ओतेक प्रभावी नहिं लगैत अछि। ३) एक मिसिया जे मुस्किया देलियै-ई बहुत पुरान गीत अछि। बहुतोक लेल गजल कहाओत मुदा गजल नइ अछि, गजलनुमा कहि सकैत छी। ई रोमांससँ सराबोर प्रेमीक उद्गार अछि।कुंज बिहारीजीक गायन नीक अछि। स्थायीक पहिल पाँतीमे गायक वेरायटी देबाक नीक प्रयास केने छथि जाहिसँ हेमकांतजीक गाओल यैह गीतसँ फूट लागए मुदा आगू फेर वैह भास आबि जाइत अछि।आलाप गुलाम अलीक प्रसिद्ध ' वो कैसी पागल लड़की थी' सँ मिलैत जुलैत अछि।आरंभमे पिआनो बजाओल गेल अछि मुदा बादमे फेर वैह सामान्य संगति। हँ हारमोनियम जरूर ठाम ठाम पर सुनबामे अबैए।दोसर आ तेसर अंतरामे बिहुँसैत शब्दक रिपीट होयब किछु खटकैए । गायक ओना शुद्ध उच्चारणक नीक आग्रही छथि मुदा एक ठाम दोष बुझना गेल _मुस्किया देलियै मे। टेम्पो आओर पीच कम्म क' गीतकें और प्रभावी बनाओल जा सकैत छल मुदा ई सत्य जे झमकौआ ऩहिं भ' सकितय। ४) हम त' छी परदेसमे गाममे कानैत हेतै चान- ई एगो पैरोडी थिक । मूल गायक जगजीत सिंह छथि । आ गीत अछि- देश मे निकला होगा चाँद। पैरोडी करबामे गीतकार गीतकें परदेसी कमौआक जीवनक चित्र बना उपस्थित केने छथि। एगो दूर देशमे नौकरी चाकरी करय बला लोकक नीक चित्र अछि गीतमे।रोजगारक समस्या मिथिलामे सब दिन रहल अछि आ परदेसीक दुख - विरह अदौसँ गाओल सुनल जाइत रहल अछि। जगजीत सिंह अपन गायनमे स्वरक माधुर्य आ भावक पूरा ध्यान रखने छथि आ गुनगुनाक' गायन हुनक विशेषता अछि मुदा कुंजबिहारी जी एकरा लोकगीत बना गओने छथि। संगीतमे कोनो बेसी प्रयोग नहिं कहल जाय, हँ एकास्टिक बेंजोसँ मूल गीतक पीस बजाओल गेल अछि। ५) नैनसँ नैन मिलल नशा बेजोड़ भेलै- ई अलबमक सबसँ उम्दा गीत अछि । प्रेममे मातल प्रेमीक मनोदशाक चित्र। गजले जकाँ मधुर भाव आ शब्दक संयोग अछि मुदा व्याकरणक कमी हेबा कारणे ई गीते कहाओत।कंठक प्रयोग, अदायगी आ सुर तालक हिसाबे सुन्दर प्रस्तुति मुदा वाद्य यंत्र सामान्ये लोकगीत जकाँ बजाओल गेल अछि जे खटकैत अछि। ६) भुतिया गेलौं हम पीबैते- पीबैते - गीत रचना आ संगीत निर्माण दुनू हिसाबे ई आन गीत सभक तुलनामे कमजोर बनल अछि । गीतकार कखनो निराश भेल प्रेमी लगै छथि त' कखनो प्रेममे डूबल रसिकजन।हुनक कहबाक अभीष्ट पूरा देखार नहिं भ' सकल अछि। बिम्बक निर्माण स्पष्ट नहिं हेबाक कारणे गीत सुनलो बाद एकर प्रयोजन नहिं पता चलैत अछि ।सुनबा लेल एकमात्र चीज गायकक स्वर पर पकड़ अछि जे श्रोताकेँ किछु सीमा धरि रोकि सकैत अछि। संगीत आने गीत जकाँ काम चलाऊ अछि। संगीतकार एहि पाछू समय गमाएब उचित नहिं बुझने छथि। ७)नव कनियाँ जकाँ लगै छी अहाँ- अलबमक आखिरमे ई एगो मधुर गीत राखल गेल अछि।गीतक लय आ ताल बहुत हद धरि कव्वालीक आभास करबैत अछि। हँ गायक संगे कोरस नहिं अछि से किछु खटकैत रहैए। शब्दमे जेना स्थायी पर मेहनति कयल गेल अछि तेना अंतरा पर नहिं कयल गेल अछि। बुझाइत अछि जे मुखड़ा रचला बाद गीतकार किछु हड़बड़ा गेलाह।'अहाँ एक लाजबाब नारी छी,प्रेमी हमहूँ निपट अनाड़ी छी' सुनला बाद लगैए जे ई कोनो टीन एज लव होई मुदा स्थायी हिसाबे प्रौढ प्रेमीक मनोदशा थिक' नव कनियाँ जकाँ लगैए छी अहाँ'। ओना गीत सुनबामे कर्णप्रिय अछि तकर कारण गायकी नीक अछि । एहि तरहें अलबम ' सिनेहिया' लोकगीतक प्रस्तुति अछि। गंगा कैसेटक आने प्रस्तुति जकाँ की बोर्ड आ ढोलक संगहि पैडक संयोजनमे बनल।इन्ट्रो आ एम टू समान अछि जे चालू लगैए। जाहि गीतमे तबला लगबाक चाही ओतहु ढोलक बाजब बजटकेँ सीमा दिस इशारा करैत अछि। बाँसुरीक कमी स्पष्ट देखबामे अबैए। नीक होइत जे आनो आनो वाद्य सब आरिजनल बजाओल जाइत। अलबम मैथिली गजल प्रेमीकेँ ई सनेश दैत अछि- जगाक' टीस हृदयमे केहेन कठोर भेलौं। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी' वन्दनाक स्वरूप वर्तमान मे मिथिला क्षेत्र अपरिभाषित अछि। अपना अपना हिसाबें लोक एकर परिभाषा बनबैत अछि, पुरान कृति सब सॅं भौगोलिक सीमा उद्धरित करैत अछि। राजनीतिक कुचक्र तेहन सन बनलैक जे जेना परोसियाक आड़ि लोक काटि कए अपना खेत मे मिला लैत अछि तहिना एकरा लेल होमए लगलैक आ तखन एकर सीमा छोट होमए लगलैक। एहन स्थिति मे मिथिलाक लेल कोनो राष्ट्रगान ताकब जरूर कठिन काज छैक। तथापि किछु उत्साही संस्था आ कार्यकर्ता लोकनि विद्यापति लिखित भगवती वन्दना “जय जय भैरवि...” कें आगू बढ़ौलनि। प्रचार भेल जे कोनो कार्यक्रमक प्रारम्भ मे भगवती वन्दना जरूर गाओल जाए आ सब गोटे आदरभाव देखबैत ठाढ भs जाइ। ई प्रथा कतए आ कहिया शुरू भेलैक से हमरा ज्ञात नहि अछि। मुदा हमरा जे बात कहबाक अछि तकरा लेल ई जरूरी नहि। हम मानि लैत छी जे ई नीक बात भेल आ आशा करैत छी जे भगवती वन्दना सबकें पसिन्न परतनि। असली प्रश्न तकर बादे उठैत अछि – एहि वन्दना कें गाओल कोना जाए ? हम गीत संगीत शास्त्रक कोनो ज्ञान नहि रखैत छी आ जे किछु कहब से मात्र स्रोताक अनुभवक आधार पर। मैथिली कार्यक्रम मे हम किछुए दिन सॅं भाग लs रहल छी तें हमर अनुभव बहुत छोट अछि मुदा एतबे मे ई जरूर देखल जे एक ध्रुव पर कतहु कोनो ख्यातिप्राप्त गवैया हलहली सॅं युक्त भास पर रुकिरुकि कए गबैत अनेरे गीत कें बेर बेर तीरैत रहैत भेट्लाह तs दोसर ध्रुव पर कतहु अन्यत्र कोनो एहन बच्चा गीत गओलक जकरा ने पूरा वन्दना रटल छलैक आ ने ओकरा सामने गीत लीखल कागत छलैक। बेसी ठाम जकरा जेना मोन होइत छैक गाबि लैत अछि। एहन स्थिति मे ठाढ़ भेल लोकक की कर्तव्य ? सहभागी बनए कि मात्र शोक प्रस्तावक स्थिति बला मौन धारण कएने रहए ? सहभागी बनि नहि सकैत अछि कारण लय बूझल नहि रहैत छैक। स्थिति बेसी कष्टकर भs जाइत छैक जखन हलहली आ गीत तीरबाक क्रम मे अत्यधिक समय लागि जाइत छैक। सहभागी नहि रहला सॅं उचिते प्रतीक्षाक समय अखरs लगैत छैक। आ यदि कोनो बच्चा गलतीए गाबि रहल अछि तखन तs आरो खराप लगैत छैक। ओना तs कहबी छैक जे पूजा आ प्रार्थनाक कोनो निश्चित विधि नहि होइत छैक मुदा राष्ट्रगानक सम्बन्ध मे किछु मानक जरूर रहक चाही। एही दृष्टिकोणें “जन गन मन ...” बला गीतक एकटा मानक लय भास बनलैक जाहि मे कोनो तरहक हलहली आ कि पाँती कें दोहरा कए तीरबाक प्रावधान नहि रहलैक। फल ई भेलैक जे कश्मीर सॅं केरल आ अरुणाचल सॅं राजस्थान तक मिलिट्री सॅं लs कए छोट इसकुलिया बच्चा तक सब लोक एके भास मे गीत सिखलक आ जखन राष्ट्रगान होइत छैक तखन देखनहि हेबैक जे अधिकांशतः लोक स्वतः गीत गाबs लगैत अछि, ओकरा व्यतिक्रमक कोनो डर नहि रहैत छैक। नीक कोरस गान अनेरे प्रस्तुत भs जाइत छैक। की “जय जय भैरवि...” वन्दनाक एहन प्रस्तुति सम्भव नहि छैक ? जरूर छैक। एहि सम्बन्ध मे हम अपन अनुभव कहs चाहैत छी। पछिला शताब्दीक पचास--साठिक दशक के आसपास जे व्यक्ति मधेपुर हाइ स्कूलक छात्रावास मे रहल होएताह तिनका नीक जकाँ स्मरण हेतनि जे विद्यापतिक ई वन्दना छात्रावास मे प्रातःकाल सब बच्चा गबैत छल, ई अनिवार्य छलैक। ओहि गान लेल एकटा सरल भास बनल छलैक, कोना बनलैक, के बनौलनि से हमरा नहि बूझल अछि कारण ई परम्परा हमरा समय सॅं पूर्वहिं सॅं चल अबैत छलैक। मुदा एतेक जरूर छलैक जे ओ लय बहुत सुन्दर आ सरल छलैक आ सब बच्चा गाबि लैत छल। ई विद्यालयक प्रार्थना नहि, छात्रावासक प्रातःकालीन प्रार्थना छलैक। तहिना सायंकालीन प्रार्थना छलैक गीता सॅं उद्धरित अंश “त्वमादि देवः पुरुषः पुराणः .....”। एकरो लय भास सरल आ आकर्षक छलैक आ कोनो बच्चा कें गेबा मे दिक्कत नहि होइत छलैक। हम एखनहु ओहि लय मे ई वन्दना जखन तखन गबैत रहैत छी। ईहो सोचब जे मधेपुर स्कूल एकमात्र एहन जगह छल जतए ई प्रार्थना कराओल जाइत छलैक, सम्भव नहि लगैत अछि। जरूर आनो आन स्कूल मे ई प्रथा रहल हेतैक, नीक प्रथाक नकल हेबे करैत छैक। भs सकैत अछि मधेपुर स्कूलक शिक्षक लोकनि अपनहि एहन निर्णय लेलनि अथवा कतहु आनठाम सॅं नकल केलनि। ईहो सम्भव जे मधेपुरेक देखादेखी अन्यत्र एहन प्रार्थना शुरू कएल गेल। जे छात्र एतुका छात्रावस मे रहि पढलनि आ बाद मे आन ठाम शिक्षक भेलाह हुनको इच्छा भेले हेतनि जे एहन प्रार्थना अपना स्कूल मे शुरू कराबी। एवं प्रकारें हमरा बुझने जरूर बहुत रास स्कूल रहल होएत जतए सरल लय मे ई प्रार्थना गाओल जाइल छल होएत। जखन कोनो गीत संगीतक नामी कलाकार गाजा बाजा लs कए राष्ट्रगान “जन गन मन ...” गबैत छथि तखनहु हुनका ई विकल्प नहि रहैत छनि जे अपना हिसाबें ओकर लय बनाबथि। एहि गान लेल हुनका अपन प्रतिभा प्रदर्शित करबाक अवसर नहि भेटैत छनि। बाजा सॅं निःसृत धुन ओएह होइत छैक जे लोक कें सिखले छैक। “जय जय भैरवि ....” वन्दनाक रूप मे सरल छैक, बहुत पैघ सेहो नहि छैक आ यदि लोक कनिको परिश्रम करए तs निश्चिते सीख लेत। यदि हम सब इच्छा रखैत छी जे विद्यापति लिखित वन्दना सर्वमान्य होअए तs पहिल शर्त होएत जे एकर एकटा सरल लय बनाओल जाए। ई काज सिद्धहस्त कलाकारे कs सकैत छथि। हमर लिखबाक प्रयोजन एतबे जे एहन मैथिल कलाकार लोकनि अपना मे मिल कए एहि विषय पर विमर्श करैत एहि वन्दनाक लय बनाबथु आ जे कोनो लय बनि जाइ तकरा सब गोटे सीख ली, ओकर अनुसरण करी। जहिना “जनगन मन ....” गबैत काल लोक रुकैत नहि अछि तहिना हमरा सब कें ईहो ध्यान राखs पड़त जे नव लय मे रुकबाक अथवा कोनो पाँती कें टेक देबाक (दोहरेबाक) प्रावधान नहि रहैक। तखने कोनो आयोजन मे जन साधारण ठाढ़ भs कए वन्दना मे सहभागी भs सकत आ लोक कें ठाढ़ होएब अखरतै नहि। आइ कालि यूट्यूबक जमाना मे गीतक लय कें प्रसारित करब कठिन काज नहि छैक। आशा करी जे विद्वान मैथिल समाज एहि प्रश्न पर सकारात्मक विचार सॅं ध्यान दैत आगू बढ़ताह। चंद्रेश अरिपन क प्रस्तुति (नओ गोट बिबिध गीतक भिडियो एल्बम) इतिहासक हेतु चर्या गीतमे मैथिलीक अस्तित्वपर जतेक गुमान करी, वास्तवमे मैथिली गीतक स्वरुप चौदह्म शताब्दीक वर्णरत्नाकरक रचयिता कविशेखर ज्योतिरीश्वर ठाकुरक नाट्य रचना धूर्त समागममे प्रयुक्त भेल गीत सँ देखार भेल जकरा विश्व स्तर पर चर्चित प्रसारित कयलनि महाकवि विद्यापति । एहि बीच बहुतो गीतकार अएलाह , स्थापित भेलाह । लोक गायनक संग आधुनिक गीत संगीतक जोड़ चलैत रहल । अझुका समयमे भोजपुरी गीतक चलती सँ प्रभावित भऽ किछु मैथिलीयोक गीतकार झमकौआ गीतपर भसिया रहल छथि । हँ, मैथिली गीतकेँ स्वच्छ आ प्रतिष्ठित रुपमे स्थापित करबाक काज रविन्द्र महेन्द्रक जोडी कयलनि जे एक दशक धरि तँ तहलको मचौने रहल । आब त राँक स्टारक युगमे मैथिलीक मधुर गीत कतेककेँ पचतनि । तथापि लिखनिहारक कलम एखनो संयमित आ मर्यादित रहैत मैथिली गीतक उँचाइकेँ स्थापित करबामे लागल अछि । लौले सही नेनामे (प्रायः १३-१४ वर्षमे) राम भरोस कापडि़ भ्रमर गीत लिख लगलाह । जनकपुरक रेलवे स्टेशनपर काँखमे झोरा लटकौने, हाथमे अठपेजिया गीतक पर्ची लेने महिनाथपुर दिशक कोनो पंडितजीकेँ गीत गाबि गाबि ओ पर्चीनुमा किताब बेचैत देखि गीत लिखबाक मोन भेलैन आ तेहने सन गीत लिखि जनकपुरक तत्कालीन हिमाली छापाखानामे छपौलनि । गाममे एकटा दोकानमे बेचबाक हेतु देलखिन आ किछु ओहु रेलवे टिसनबला गबैयाकेँ । बस, गीत लिखबाक यात्राक शुरुआत भेल से आइधरि जारी अछि । समाजिक मर्यादाके भीतर लिखल गीतसभ पत्र पत्रिकामे छपैत रहैत छन्हि – संग्रहोमे आएल छन्हि । तखन मंचपर ततेक नहि जा सकल अछि । आ मंचक लेल चहटगर गीतक मांग प्रायः एकर बाधा रहल । से एक बेर भेलनि । ‘सीता’ नेपाली फिल्मक हेतु एकटा होरी गीत लिखबाक आग्रह कयलकनि अशोक शर्मा । लिखि पठौलनि । मुदा शम्भुजीत बाँसकोटाकेँ नहि अरघलैक ओकर साधु शब्दसभ । हारि कऽ दू अर्थि गीत लिखऽ पडलनि । ‘होरी है, होरी है, होरी है, आजु जनकपुरमे होरी है । कहबाक जरुरति नहि –ओहि वर्ष नेपाली फिल्मी गीतक समीक्षा प्रकाशित भेल तँ दश गोट श्रेष्ठ आ चर्चित गीतमे एकरा सामेल कएल गेल छलैक । ई छैक माया नगरीक माया आ रंग ताल । अरिपनमे की अछि ! कयक सालक उधेडबुनक बाद अन्ततः श्री राम भरोस कापडि़ भ्रमरक नओ गोट विविध विषयक गीतक भिडियो एल्बम आएल अछि – अरिपन । फेर एहि ठाम गीतकारक साधु प्रवृति हावी भऽ गेल अछि – नामाकरणमे । आजुक बजार ओहुना कम छैक सीडी , भीसीडी आदिकेँ । ताहि पर पूर्णतः साँस्कृतिक-मांगलिक नाम अरिपन – पता नहि कतेककेँ आकर्षित करतैक । मुदा एहिमे सामेल नओ गीत विविध सामाजिक जीवन तत्वकेँ प्रतिनिधित्व करैत संस्कारी भाषा आ भावक संग आएल अछि । पूर्णतः परिवारिक सरगम । अहाँ कम्प्युटर हो, टी भी हो अथवा प्रोजेक्टरसं देख चाही तँ सीनेमाक पर्दाधरि , एकाग्र चीते एकर आनन्द उठा सकै छी । नओ गीतमे तीन दाम्पत्य जीवनक नोक झोक, प्रेम विछोडकेँ देखबैत अछि । एकटा गीत युवासभकेँ ध्यानमे राखि लिखल गेल अछि से उत्तेजनामुलक नहि , सन्देश मुलक अछि । अपनो हँसु आ दोसरोकेँ हँसाउ सन उत्प्रेरणामूलक भाव सँ युवा पीढीक मानसीकताकेँ उद्वोधित करबाक प्रयास कएल गेल अछि । तहिना एक गीत शांत रसमे राखल गेल छैक – मनकेँ भीतर अन्दर दर्द भरल अछि ..। साँसारिक व्यामोहक प्रपंचनाक सुन्दर उपस्थापन एहि गीतमे भेल अछि । एकटा गीत नेनासभक हेतु आएल अछि – रुनझुन रुनझुन बाजे पैजनिया... । एहु गीतमे भाव भंगिमा आ स्वर सभक संगम सँ नेनाक बालपनक मनो विज्ञानकेँ प्रस्तुत करबाक प्रयास कएल गेल अछि । प्रसिद्ध शास्त्रिय गायक गुरुदेब कामतक स्वरमे एकर स्वरुप आरो निखरल अछि । एकटा गजल अछि । भ्रमरक पूर्वमे प्रकाशित चर्चित गजल छैक । पाबी ने हम इजोरिया तँ अन्हारी छिनत के हम्मर .. । हरिशंकर चौधरीक मधुर स्वर आ उपस्थिति गीतकेँ मार्मिक आ दर्शनीय बनबैत छैक । एहि एलबममे एकटा होरी गीत सेहो छैक जे सामान्यतः होरी गीतक चलताउ परिपाटी सँ भिन्न स्वरुपमे लिखल आ प्रस्तुत कएल गेल छैक । आभास लाभ एकरा स्वर देने छथि ।सभ सँ महत्वपूर्ण आ सम्भवतः पहिल बेर मैथिलीमे राखी गीतक प्रस्तुतीकरण भेल अछि जे काफी रोचक ढंग सँ मिथिलाञ्चलक कुआमे फिल्माओल गेल छैक । रामा मंडल आ रश्मी रानी ई गीत गौने छथि । नव की अछि ? एहि भिडियो एलबममे नवताक बात करी तँ बहुृतरास अछि जाहिमे एकर फिल्मांकनक हेतु लोकेशनक चयनक बात छैक । अधिकांश नेपाली भाषी भिडियो कलाकार सभक संग काठमाण्डूक पहाडी क्षेत्रमे एकर फिल्मांकन भेल छैक । पहाडी आ मैथिली संस्कृतिकेँ समन्वित स्वरुप एहि मैथिली भिडियो एलबममे अद्भूत छटा प्रदर्शित करैत अछि। एकर फिल्मांकनमे एम पाँच कैमराक प्रयोग भेल अछि जे बढका पर्दाक हेतु कएल जाइछ । एकर नृत्य निर्देशक आ सम्पादक नेपाली भाषी क्रान्ती केसी अछि मुदा ओ मैथिली संस्कृतिकेँ विविध पक्षकेँ बुझबाक प्रयास कर्रैत एहि भिडियोकेँ पूर्ण कएलक अछि । ई भिडियो कोना उपलब्ध हएत ! एहि भिडियोकेँ बाजारमे उतारबाक हेतु दूगोट माध्यम राखल गेल छैक। एकटा अनलाइन बिक्रीक व्यवस्था । दोसर खुल्ला बिक्री । अनलाइनमे अर्डर दऽ कऽ घर बैसले मंगा सकैत छथि ग्राहक तँ खुल्ला बिक्रीक हेतु सेहो दू गोट प्रविधान राखल गेल छैक । अनलाइनक हेतुकगउउथ mबचत सं सम्पर्क कएल जा सकैछ । एकर राँयल साइजमे विक्रीक हेतु बौक्समे राखि सुरक्षित आ संग्रहणीय बनाओल गेल छैक । एक मूल्य रु २५०-– टका छैक जे ग्राहककेँ २००-– टकामे भेटतैक । दोसर सस्ता संस्करण छैक जे नब्बे टकाक होइतो पचास टकामे उपलब्ध हएतैक । ई सुबिधा निर्मातासं खरिद कएने मात्र उपलब्ध भ सकैछ । दुनू संस्करणमे डिभिडी मौलिक आ टिकाउ राखल गेल छैक आ नक्कल करबा सँ रोकबाक हेतु ९०-– टकाबला संस्करणक प्रत्येक प्रतिपर गीतकारक हस्ताक्षर कएल गेल छैक । एकर कभरक डिजाइनकेँ नक्कल करबो सहज नहि छैक । सभ तरहे सुरक्षित , विश्वसनीय आ पारिवारिक मनोरंजनक उत्तम साधनक रुपमे अरिपनक पदार्पण भेल अछि । एहि एलबमक संगीतकार छथि दशरथ चौधरी जे मैथिली क्षेत्रक हेतु नव होएतो उत्तम काज कएने छथि । आशा अछि गीत संगीतक मर्मकेँ बुझनिहार श्रोता, दर्शक अवश्य एहि एलबमकेँ हृदय सँ स्वागत करत । इरा मल्लिक शारदा सिन्हाजीक "विवाह गीत" संगीत एक उत्कृष्ट कला थिक! लोगक हृदयक भावना के मधुर उद्गार प्रकट करबाक एक सरल सहज आ सुन्दर माध्यम मानल गेल अछि! कला के मुख्य उद्देश्य मानव मोन के अभिव्यक्ति अछि!आत्मा सँओ परमात्मा के एकाकार होयबाक साधन संगीत अछि। संगीत जन मन के सुरमय आवाज थिक ! लोग सुख दुख विरह मिलन आनन्द सब अवस्था मे गीत संगीत सँओ अपन भावना सहजहि प्रदर्शित कs लैत अछि! संगीत के दू भाग मे बाँटल गेल अछि! १: मार्गी संगीत तथा २: देशी संगीत! परमेश्ववर के प्राप्ति के अतिरिक्त जे संगीत जन मन रंजन के लेल प्रयुक्त भेल ओ देशी संगीत छल! देशी संगीत लोक अनुरूपे परिवर्तित होयत गेल! भिन्न भिन्न प्रान्त अपन अपन भाषाक अनुसार गीत रचना करैत जायत गेल! आधुनिक भारत मे सब वाग्गेयकार अपन अपन प्रान्त के भाषा मे समयानुसार, परंपरा आ संस्कृति , अवस्थाक वर्णन करैत गेलखिन्ह! मिथिला मे गीत संगीतक परम्परा आदिकाल सँओ अछि ! समग्र विश्व के सबसे मधुरतम भाषा मैथिली के उत्थान क लेल मैथिली गीत संगीत एकटा सशक्त माध्यम सिद्ध भेल अछि! मिथिला समाज मे शिशु जन्म सँओ लsकs जीवन के हरेक चरण सँओ गुजरैत सब संस्कार के गीत संगीत द्वारा दरशाओल गेल अछि! एकर अपन एकटा इतिहास छैक! परंपरा छैक! मैथिली संस्कार, परिवेश , संस्कृति आचार व्यवहार के मैथिली लोक संगीत के माध्यम सँओ विश्व मंच तक पहुँचेबा मे पद्मश्री तथा बिहार कोकिला श्रीमति शारदा सिन्हाजी के विशिष्ट योगदान छैन्ह! हिनकर गायकी मे भाषा कोनो महत्व नहिं रखै छै! ओ मैथिली भाषा के संग संग भोजपूरी, वज्जिका, मगही, अवधि हिन्दी अहि सब भाषा मे समान रूपे बहुत कुशलता सँओ गायन प्रस्तुत करैत छैथ! हुनकर गायकी मे गीत संगीतक मधुरता ते छैन्ह संगे दोसर दिस घर परिवारिक सम्बन्धक अपनापन के जीवन्त दर्शन होयत अछि! श्रीमति शारदा सिन्हाजी के सब म्युजिक कैसेट ,अल्बम अत्यन्त लोकप्रिय एवं कर्णप्रिय अछि! परंच हुनकर एकटा अल्बम 'विवाह- गीत हमर मोन के बहुत प्रभावित केलक! अहि विवाह गीत एल्बम मे गीत संग्रह पारंपरिक रचना होयतो बहुत सुन्दर अछि! विवाह- गीत अल्बम मे A तथा B दूटा साइड अछि! दुनु साइड मे कुल मिलाकs सोलह टा गीत छैक! जे क्रमश: एना अछि:- साइड-A 1: मोरे बबुआ को नजरियो न लागे २: आज धनमा कुटाउ रघुबरबा सँओ ३: राजा जनकजी के बाग मे ४: अरही वन के ५: सीता के सकल देखि ६: द्वार के छेकाई ७: चुमाबहु हे ललना ८: दुलहा सिन्दुर लियौ हाथ ९: शुभ शुभ के लगनवा १०: बड़ रे जतन सँ साइड:- B १: सोना के रे डलवा २: ठुनुक ठुनुक बोले ३: मोही लेलखिन्ह सजनी ४: सुतल छलियै बाबा ५: माय हे अयोध्या नगर ६: दुलहिन सिन्दुर लियौ हाथ लोकगीतक गायनमे शब्द-विन्यास राग-भास, लय ताल अहि सब आयाम पर समान रूपे ध्यान देल जायत अछि! श्रीमति शारदाजी के अहि म्युजिक अल्बम मे उपरोक्त सब नियम के सर्वथा पालन भेल अछि! हुनकर आवाज मे एक खनक ,जोरदार सुर लगबय के तरीका मे मिथिला के माटि , गाम घरक संस्कारक सुगन्ध सहजहि भेट जायत अछि! स्वर लगेबाक अन्दाज , ठोस लयकारी , आलापक तान ,स्वर विस्तार के व्यापकता सब किछ अनुपम अछि! भाव पच्छ सेहो मजबूती सँओं दृढ़ अछि! गायकी के मौलिकता निस्सन रूपें प्रतिष्ठित भेल अछि! शब्द चयन प्रक्रिया मे कतहु त्रुटि नहिं भेटत! पारंपरिक गीतक ई अल्बम अछि जाहि मे श्रोता आ गायक गीत संगीत सब एकाकार भs जायत अछि! श्रोता ओहि गीत सँओ अपना कय जोड़य लागै छैथ! आनन्द के उद्भव होमय लगैत छैक! यैह ते सार्थकता अछि संस्कार गीत के! गीतक शब्द हृदयग्राही होयत छैक तैं गीत सँ लोग अपन भावना के आत्मसात करय लगै छैथ! गीत मोरे बबुआ को नजरियो न लागे , अहि गीत मे मानवीय सम्बन्ध मे प्यार दुलार संगे सम्बन्धक भव्यता के बड्ड मनोहर ढ़ंग सँ दर्शाओल गेल अछि! अल्बम के सब गीत रचना सँओ मैथिल विधि व्यवहार, अनुशासन , हास परिहास , गृहस्थ धर्म के पालन , खुशी समदाओन गीत सँ छलकैत बेटी के करूणा , माता- पिता के प्यार, बेटी विदा करय के मर्मांतक व्यथा सबकिछ जेना आँखि के आगाँ सजीब भs उठैत अछि! गीतक शब्द के अपन गुण- धर्म होयत छैक! जे बड़ी सूक्छमता सँओ जनमानस तक पहुँचाबय के शक्ति रखैत छैक! विवाह-गीत अल्बम के सुन्दरता , मौलिकता , मधुरता श्रोता के मन- मस्तिस्क मे अमिट छाप छोड़य मे सफल भेल अछि! अहि अल्बम के एडिटिंग के जरूरति नहिं बुझना जायछ! पारंपरिक गीत के ई अल्बम मे श्रीमति शारदाजीक नैसर्गिक आवाज यथावत सुन्नर लगैत छैन्ह! हम स्पष्टरूपे कहि सकैत छी कि " विवाह-गीत" के अहि पारंपरिक अल्बम के माध्यम सँओ मैथिल गीत संगीत जगत के एक बेमिशाल आवाज भेटल अछि जे सर्वग्राह्य तथा सर्वमान्य अछि! शायद इयैह कारण छैक कि म्युजिक कंपनी के बाजारीकरण मे एतेक कठिन प्रतियोगिता होयतो श्रीमति शारदाजीक "विवाह-गीत " अल्बम एखनो एतेक लोकप्रिय अछि! मनीष झा बौआभाइ वर्तमान मैथिली गीत-संगीत हमरा नजरिसँ साहित्यमे अन्यान्य विधा जेंका गीत-संगीतक सेहो अपन वैशिष्ट्यता अछि. विदेह संपादन समूह द्वारा मैथिली गीत-संगीत केन्द्रित विषय पर आलेख हेतु विशेषांक निर्धारित करब एहि विधाक प्रति गंभीरताक द्योतक अछि. उक्त विषय पर विस्तृत आलेख शोधक विषय-वस्तु थिक, तैं एहि सभस’ फराक अपन व्यक्तिगत अनुभव स’ किछु लिखबाक चेष्टा मात्र क’ रहल छी. वर्तमान समयमे पारम्परिक गीतक अपेक्षा आधुनिक लोकगीत बेस प्रचलनमे अछि. कारण स्पष्ट अछि व्यावसायिक दृष्टिकोण. नव तूरक लोककें लटक झटक बेस रुचै छन्हि आ तदनुरूप गवैया ओ गीतकार सेहो ओहिमे रमबाक प्रयासमे वा कही जे फरमाइशकें यथासंभव पूर करबाक चेष्टा करैत छथि. पारम्परिक गीतक श्रोता वा कही जे खाँटी संस्कृति प्रेमी छथि त’ मुदा सीमित संख्यामे. आधुनिकतामे रमल नव पीढ़ीक नहि त’ गवैया लोकगीत कें गंभीरता स’ लैत छथि आ नें श्रोता. मैथिली गीत-संगीतक क्षेत्र वर्तमानमे कत्तेको कलाकारकें जीविकोपार्जन केर साधन बनल अछि. संगीत चाहे पारंपरिक होउ वा शास्त्रीय होउ वा आधुनिक होउ मैथिलीक सेवा क’ अर्थोपार्जन क’ जीवनयापन करब जतबे आह्लादक विषय अछि ततबे साहसिक डेग सेहो. साहसिक डेग स’ अभिप्राय ई जे वर्तमान जुगक अवधारणा अछि जे अहाँकें जाहि कोनो प्रतिभामे आत्मविश्वास अछि ओकरा आगाँ ल’ व्यावसायिक बनाउ आ अपन अभिरुचिक अनुसारे ओहिमे समर्पण भाव स’ योगदान देल जाउ, मुदा मैथिली गीत-संगीतक प्रति एकर विपरीत अवधारणा अछि जकर मुख्य कारण अछि अर्थोपार्जनमे अनिश्चितता. पूर्वक पीढ़ीमे अपवादस्वरूप किछुए लोक मुदा वर्तमान समयक बेसी-स-बेसी युवा एहि मिथककें तोड़बाक प्रयास केलनि अछि आ अपन जीविकोपार्जन केर साधन बनौलनि अछि. आलेख हेतु देल गेल विषयमे किछु महत्त्वपूर्ण बिन्दु सभ पर अनुभव साझा करबाक प्रयास मात्र क’ रहल छी. गीत-संगीतक भाव पक्ष केर संदर्भमे एतबा जरूर देखल जाइछ जे, गीतकार जे कोनो गीत लिखैत छथि ओ सर्वबोधगम्य हेबाक चाही, जिनक शब्द लेखन आम जनक बोलचाल वा दैनिकीय भाषा मे नियमित प्रयोग मे अबैत होइक आ जकरा संगीतकार लोकनि कर्णप्रिय बना सुन्दर गवैयाक माध्यम स’ जन-जन धरि पहुँचेबाक प्रयास करथि. गीतमे क्लिष्ठता ओ साहित्यिक शब्दक चयन एक वर्ग विशेष धरि सीमित रहैत अछि जे अमूमन एक सामान्य श्रोता द्वारा स्वीकार्य नहि होइत अछि. मूलतः देखल जाए त’ संगीतक प्रारंभिक रूप गीतक शब्द होइछ तैं गीतकारकें शब्द चयन हेतु विभिन्न अभिरुचिक श्रोताकें ध्यान मे राखि मर्यादित गीत लिखक चाहियनि. वर्तमान मे मैथिली गीत संगीत मे देखौंसक प्रक्रिया बेस हाबी भ’ रहल स्थिति मे विकृतता आएब स्वाभाविक अछि. संगीत जहिना मनोरंजन हेतु आवश्यक विधा अछि तहिना भाषा-संस्कृति केर रूपमे वाहकक श्रेणीमे सेहो अबैछ तैं गीतकार-संगीतकार आ गायक लोकनिकें एहि बातक समुचित धेआन रखबाक चाही. तकनीकी पक्षक जत’ तक प्रश्न अछि गीतक शब्दक अनुरूपे संगीत वा संगीतक अनुरूपे गीतक शब्दक तालमेल परम आवश्यक होइछ, कोन गायकक कंठ मे कोन गीत बेसी रोचक लगैछ एहि सभ विषय पर सेहो ध्यान देल जाए त’ गीत आर बेसी अपन सुन्नर रूपमे निखरि क’ सोझा आबि सकैत अछि. प्रस्तुतिक दू गोट रूप वा त’ मंच वा स्टूडियो रेकॉर्डिंग जाहिमे वाद्य-वादन सेहो गीतकें तकनीकी रूप स’ मजगूती प्रदान करैत अछि. आइ-काल्हि स्टूडियो रेकॉर्डिंग के नवका चलन आएल अछि डी-टोन केर. डी-टोन कोनो आवाजक टोन कें अपना स्तर स’ बदलि देइत अछि जकर प्रभाव मे गायकक मौलिक स्वर केर अंदाज करब सेहो मोसकिल अछि. सुर स’ भटकैत गवइया लोकनि एखन एकर प्रयोग बेसी स’ बेसी करैत देखल जाइ छथि आ ई प्रथा हरियाणवी आ भोजपुरी संगीत स’ बेस प्रभावित अछि. यत्र-तत्र कम स’ कम लागत मे दिनानुदिन पसरि रहल स्टूडियो,कैसेट कंपनी आदि स’ मैथिली संगीतक कमजोर गुणवत्ता त’ देखबामे अबैत अछि मुदा नव-नव कम्पनी के खुजला स’ नव प्रतिभावान कलाकार लोकनिक वास्ते एकटा नीक माध्यम बनि सोझा अबैत अछि. मार्केटिंग पक्षक दृष्टिकोण ज’ देखल जाए त’ मैथिली गीत-संगीतकें व्यावसायिक रूप प्रदान करबा लेल मार्केट एखनो धरि व्यापक स्तर पर सक्रिय नहि भेल अछि. आन-आन भाषा के तुलना मे मैथिली गीत-संगीतक बाजार एखनो बड्ड छोट आ सीमित अछि. कीनिक’ सुन’ बला मनोवृति एखनो धरि नहि जागल अछि. एकर दुन्नू कारण भ’ सकैइयै, पहिल जे लोककें मनमोताबिक संगीतक उपलब्धता नहि होइ छनि वा दोसर जे विधा स’ जूड़ल लोक द्वारा फ़ोकट मे बंटबा बला प्रवृति जकर स्थिति कमोवेश साहित्ये बला अछि. हालांकि डिजिटल व्यवस्था भेला स’ उपलब्धता सहूलियत स’ भ’ रहल अछि आ कलाकार लोकनिकें मंच, एलबम,सिनेमा आदिमे लिखबाक,गेबाक ओ धुन बनेबाक अवसर भेटैत छनि जेकि कएक टा मायनेमे महत्त्व रखैत अछि. एहि डिजिटल जुगमे दर्शक/श्रोताक पसीनकें धेआनमे रखैत प्रायः अधिकाधिक कम्पनी वीडियो बना बजार मे वितरण करै छथि वा सोशल नेटवर्कक विभिन्न श्रोत स’ जन-जन धरि पहुँचेबाक प्रयास करै छथि. अधिकाधिक संख्या मे देखल जाए त’ विडियो शूटिंगमे गीतक केन्द्रित विषय स’ आंशिको रूप स’ तालमेल नैं खाइत अछि, मने गीतक विषय किछु आर मुदा अभिनय द्वारा किछु आर दर्शाओल जाइत अछि.एहि पक्ष पर गंभीरता लाएब सेहो ओतबे आवश्यक अछि. मैथिली गीत-संगीत मे नैं गीतकारक अभाव छै आ नैं गौनिहार कें अभाव छैक मुदा सभस’ बेसी अभाव संगीतकारक देखबामे अबैछ. बनल-बनाएल धुन (ओ चाहे हिन्दी फिल्म संगीतक तर्ज पर होए वा आन-आन क्षेत्रीय भाषा केर तर्ज पर होए) आखर फिट क’ गीतकार द्वारा लिखब आ तदनुरूप गायक द्वारा ओकरा गाएल जेबाक प्रथा बेस जोर पकड़ने अछि. ओना संगीत विधा स’ जूड़ल प्रत्येक व्यक्ति के चाहियनि जे अपन-अपन अभिरुचिक क्षेत्रमे प्रशिक्षित होथु मुदा ताहूमे सभस’ बेसी खगता धुन बनेनिहारक अछि जेकि वर्तमान समयमे गीतकार ओ गायकक संख्याक तुलनामे बड्ड कम वा कहल जाए जे मात्र गिनल-चुनल लोक छथि. ओना एहि विधामे सभ दिने स’ गीतकार-संगीतकारक तुलनामे गायकक प्रसिद्धि बेसी रहल अछि, कारण गायक लोकनि अपन एक विशेष प्रकारक स्वरक बले समाजमे चिन्हल जाइ छथि संगहि मंचक सोझा स’ श्रोता/दर्शक स’ प्रत्यक्ष संवाद हेतु समय-समय पर उपलब्ध होइत रहैत छथि, एहेन सन स्थितिमे गायक लोकनिक एक इमानदार प्रयास अपेक्षित रहैत अछि जे ओ मंच पर वा कोनो साक्षात्कार मे गीत प्रस्तुति स’ पूर्व संगीतकार ओ गीतकारक नाओं केर उल्लेख करथि, कारण हुनकर प्रसिद्धिक पाँछा हिनका लोकनिक जोगदानकें नकारल नैं जा सकैत अछि. मैथिली गीत-संगीतमे कतबो विकृति आबि गेल छैक मुदा आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखबा लेल संख्या मे बढ़ोत्तरी अपेक्षित अछि. आलोचना वा तुलना ओत’ प्रभावी होइत अछि जत’ संख्या केर उपलब्धता अधिकाधिक होइछ. मैथिली गीत-संगीतकें अपन कर्मक्षेत्र बना गुजर-बसर केनिहार एक-एक कलाकारकें साधुवाद जे चाहे जाहि कोनो तरहें मुदा अपन मातृभाषाकें सेवैत अर्थोपार्जन क’ रहल छथि, बहुत हिम्मत के काज छैक. निवेदन जे भाषा संरक्षणक संग-संग संस्कृति संरक्षण पर सेहो ध्यान केन्द्रित करैत एहि क्षेत्रमे आगाँ बढैत छथि त’ से आर बेसी आह्लादक गप्प हएत. जय मिथिला. जय मैथिली. रवि भूषण पाठक औझका डायरी शुकुल जी जायसीक प्रशंसा करैत छथिन ।भाव ई छैक ‘मुसलमानो होइतो जायसी भारतीय कविता के एत्‍ते बूझैत छथिन ,मुसलमान होइतो जायसी हिंदू स्‍त्रीक जीवन ,प्रेम ,विरह कें एत्‍ते नीक जँका चिन्‍है छथिन ,मुसलमान होइतो जायसी अवधक लोकजीवन मे प्रवेश क’ पाबैत छथिन ...... जेना मुसलमान केओ होय त’ ऊ कविता नइ लिखै ,लिखबो करै त’ केवल अल्‍लाह आ कुरान पर या केवल ईरान ,तुर्किस्‍तान पर। (दिनांक07 -04-17) मैथिली के एकटा आलोचक चाही ,आलोचक नइ नव्‍यालोचक,नव्‍यालोचक नइ वज्रालोचक ।एहन आलोचक जे बज्‍जर सन सन बात कहै । काबिल सँ लिखबाबै , बेगारू सभ कें टरकाबै। एहन आलोचक जेकरा मे केवल बहुज्ञता नइ रसबोध सेहो होइ ,केवल रसबोधे नइ समै-सजगता सेहो । केवल फार्मे नइ कंटेंटक प्रति सेहो समझदारी होए । एहन आलोचक जेकरा मे समैक जिम्‍मेवारी उठाबैत साहित्‍य के आगू बरहेबाक ताकति होए । एहने सन जे मिथिला आ मैथिलीक परिवर्द्धित आ संवर्धित स्‍वरूपके बूझै आ ओकर रक्षा करै ।एहन आलोचक जेकरा मे मैथिलीक वर्तमान साहित्‍यक दिशा गमबाक हिम्‍मत होए आ ओकरा समकालीन भारतीय साहित्‍य के जनबाक जरूरति सेहो महसूस होए । (दिनांक 11 04 2017 ) ओकरा गाब’ दियौ ,गेबाक आनन्‍द लिय’ दियौ ,ओकरा पर अपन अपेक्षाक पहाड़ नइ लादियौ ,ओकरा पर उपराष्‍ट्रीयताक ठप्‍पा नइ लगाबियौ ,एहन अनेर नइ बाजियौ कि ऊ जीत जाए त’ मिथिला जीत गेलै आ ऊ हारि गेलै त’ मिथिला हारि गेलै । निश्चितरूपेण ओकरा मे आगू जेबाक हिम्‍मत आ ताकति छैक , मुदा ऐ चीजक लेल तैयार रहियौ कि ऊ जीत गेलै त’ ऊ राष्‍ट्रीय अपेक्षाक अनुसार अपना आप कें बदलि सकै ।ओकरा मत दियौ समर्थन दियौ आ ऐ चीजक आर्शीवाद कि ओ समग्र देशक लेल गाबि सकै ।जेना कुनो बोली राष्‍ट्रीय बनै छैक त’ ओ आनो बोलीक गुण आ सकारात्‍मक तत्‍व ग्रहण करैत छैक आ एक अर्थ मे ई ओइ बोलीक मृत्‍यु होइत छैक ,किएक त’ ओ पुरनका पंजर छोडि़ के नया रूप धारण करैत छैक ।तहिना ओ समुच्‍चा देसक लेल गाबै,ई शुभकामना । बात एहने सन होए कि गायन कला जीतै नइ कि मिथिला ,पंजाब ,महाराष्‍ट्र या गुजरात ,ओना मॉडर्न बनियौटी एकरा संघर्ष आ क्षेत्रक संघर्ष वला रूप देबाक प्रयास करत ,मुदा हम सब संयमित रही ।आ एतबे धरि नइ मिथिला मे सब तरहक गायनक मुकम्‍मल परंपरा फेर सँ प्रारंभ होए ,ई नेशान केवल अमता ,बहेड़ी ,दरभंगा आ विद्यापति समारोहे तक सीमित नइ रहै ।ओहुना मैथिली मंच पर राम चतुर मल्लिक कें हूट केनिहार आ दुमका-झुमका कें बढ़ाबा देनिहारक कमी नइ ...... दिनांक 13-04-2017 ऊ हम्‍मर कुटुम छथिन ,दियाद छथिन आ दोस छथिन।ऊ चौबीसो घंटा हेलमेट पहिरै छथिन ,केओ कुटुम देखि ने लए ,ऊ कखनो काल एकटा अंग के बेकाम क’ दए छथिन ,कहबेन त’ सुनता नइ ,ईशारा देबै त’ रूकता नइ ,अनुमान यदि लगा लेता त’ ह्रदयहीन भेने कुशल ।ऐ रस्‍ता बाटे नइ ,ऐ चौक पर बाटे नइ ,दस बजे के बदला मे एगारह बजे चलता आ पांच बजे के बदला मे सात बजे लौटता ।धीरे-धीरे .....केओ दे‍खि ने लए । हुनकर बदलबाक कुनो अंत नइ ,नाम ,गोत्र ,गाम ,शहर सब बदलि के अपन जेबी आ अपन स्टेटिक इनर्जी कें सेव करैत छथिन ।एहने केरेक्‍टर हमरे परिदृश्‍य मे नइ आहूं के वायुमंडल मे अछि ।ऊ आ हुनका सन कतेको कतेक अपन ओकादि बदलबाक प्रतीक्षा क’ रहल छैक । ओका‍दि बदलिते भाषा ,भंगिमा ,टोन ,बॉडी लैंग्‍वेज सब बदलि जाइत छैक ।कखनो-कखनो ओकादि आ भाषा साथ-साथ बदलैत छैक ,कखनो-कखनो ओकादि बदलबाक प्रत्‍याशा मे भाषा आ टोन समै सँ पहिले बदलि जाइत छैक आ ओकादि बाद मे बदलै छैक ।कखनो काल दुर्भाग्‍य सँ भाषा त’ बदलि जाइत छैक ,मुदा ओकादि बदलबाक प्रक्रिया मे ब्रेक लागि जाइत छैक (दिनांक 15-04-2017) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसर चण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग जीवन मे किछु एहेन क्षण अबैत छैक जखन लोक अपना के अनेरे असहाय अनुभव करैत अछि सब किछु रहैत छैक आ किछु नहि रहैत छैक। एहने सन अवस्था एखन हमर भेल अछि। स्वर्गीयप्रोफेसरचण्डेश्वर झा के गीतक सी. डी. अथवा डी. वी. डी. पर तीन दिन सं लिखक प्रयास क रहल छी मुदा नहि क पाबि रहल छी। से कथी लेल? एहि लेल जे हुनकर सब किछु हुनके हाथक देल हमर व्यक्तिगत संकलन मे हमर पुस्तकालय केर एक कोण मे रहैत अछि। अचरज ई भ रहल अछि जे नहि त कुनो पोथी आ नहिये कुनो सी. डी./ डी. वी. डी. भेट रहल अछि। ऐना मे आशीष अनचिन्हार हमरा पर उपकार केलनि आ यू टयूब केर लिंक भेजलनि जाहि मे आ आरो लिंक सं तकला पर सब मिलाक प्रोफेसर चण्डेश्वर केर निम्नलिखित चारि गीत भेटल अछि: (क) जोगिया मोर जगत सुखदायक दुःख ककरो नहि देल https://youtu.be/buED_dpmsxg (ख) हे हरि हे हरि सुनिय श्रवण भरि अब ने बिलासक बेरा https://youtu.be/klSuYBZko4s (ग) सबहक सुधि अहाँ लै छी हे अम्बे हमरा कियैक बिसरै छी हे https://youtu.be/KpKbUeeLG-0 (घ) बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटुम्ब भए गेल https://youtu.be/mXPmW8I-Dgg एहि चारि गीतक माध्यम सं हुनका बारे मे किछु लिखब झुझुआन सन लगैतअछि मुदा दोसर कोनो उपाय नहि अछि। जे अछि तहिये मे संतोष करैत लिख मे भलाई। प्रोफेसर चण्डेश्वर झा अपन सहज स्वभाव, गीत-नाद आ नाट्यक प्रति समर्पण, मैथिली वांग्मय के प्रति सोच, शास्त्र के प्रति ध्यान आ लोकज्ञान के प्रति अभिमानक कारने हमर प्रिय, सम्मानित आ अभिभावक तुल्य विद्वान आ गायक रहल छथि। हुनका संग आत्मीय लगाव १९९२ ईस्वी सं जे शुरू भेल से ४ जनवरी २०११ अर्थात हुनकर देहावसान दिन तक शाश्वत रहल। नित प्रगाढ़ होइत रहल। लगाव भौतिक आ शास्त्रीय ज्ञान दूनू कारने दुनू स्तर पर छल। भौतिक अहि हेतु जे जखन कखनो दिल्ली सं गाम जाई त हुनका सं भेंट अनिवार्य छल। सब तरहक गप्प – पारिवारिक शास्त्रीय। शास्त्रीय मे साहित्य आ समाज; लोक आ शास्त्र दुनू के बीच परस्पर सामंजस्य, लेन-देन, आवाजाही। ओ एक के देह त दोसर के आत्मा बुझैत छला। भावुक होइत गप्प करैत छला। बीच-बीच मे किछु गाबय लगैत छला। अतेक विषय सं लगाव रहैत छलनि जे बिना कहने हमहू भावुक भ जैत छलहुं। प्रोफेसर चण्डेश्वर सं गप्प करैत ई अनुभूति होइत छल जेना ओ उपनिषद परंपरा केर ऋषि (गुरु) होथि आ हम घनघोर अज्ञानी शिष्य। हमर काज मात्र एक प्रश्न पुछब तक छल। ओ कनि गंभीर होइत शुरू भ जैत छला। उत्तर देथि। अपना आपके हमर मनोदशा मे आनि जे हमर जिज्ञसा अथवा शंका भ सकैत छल तकरा बुझि जाथि आ कहथि, “कैलाशजी, अहांके एकर बाद एहनो प्रश्न भ सकैत अछि?” हम मंत्रमुग्ध होइत गरदनि हिला हाँ कहि दैत रहियैनआ ओ प्रश्नों केने जाथि आ ओकर निराकरण सेहो। ओहमरमनोदशा के ऐना हृदयंगम क लैत छला जे हम भाव विह्वल भ हुनका घंटों सुनैत रही। अहु चिंता सं मुक्त रही जे कुनो प्रश्न अथवा जिज्ञासा करबाक अछि। एकौ मिसिया समयक बरबादी नहि। भले हम विवेकानन्द नहि रही मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर झा कम-सं-कम हमर मोनक जिगेसा हेतु रामकृष्ण परमहंस सं एकौ रत्ती कम नहि छला। हमेशा अपन शोध, नव राग मे अन्य रागक मिश्रण, निक गीतक रचना, फेर ओहि गीत के गेनाई, आदि विषय पर गप्प करैत छला। सेहो सहज आ निश्छल ह्रदय सं। एक बात जे हुनका संगे भेलनि आ शायद ओ बात हुनका दीर्घायु नहि होमय देलकनि ओ बात छल विश्वविद्यालयकेर प्रबंधन आशिक्षक समुदाय केर तुच्छ राजनीति।एहि कारने ओ बहुत दुखी रहैत छला। अगर दरभंगा छोडि कोनो आन ठाम रहितथि त पद्मश्री कोनो पैघ बात नहि। मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर त ललित नारायण मिथिलायूनिवर्सिटी मे बारिक पटुआ छला। लोक सभ जे शैक्षणिक कार्य मे घासलेट आ तुच्छ राजनीति आ बितंडावाद मे माहिर ओ सब हमेशा हिनकर संगीत साधना के वाधित करैत रहलथिन। कल्पना करू की जाहि यूनिवर्सिटी मे एक जॉइंट रजिस्ट्रार अनेरे एक विद्वान प्रोफेसर केर विद्या क्षेत्र मे बलगेंग करैक आ दोसर विद्वान सब इर्ष्या सं विद्वान के विपरीत जाथि ओत की भ सकैत अछि? सरस्वती भोकासी पारि कानती। सैह ने? सैह भेल। ओ मैथिली गीत, संगीत, लोक विद्या आदि पर बहु विषयक विद्वानक संग परियोजना करए चाहैत छला। कतेक बेर विश्विद्यालय अनुदान आयोग एवं अन्य संस्था सं अपन वैदुश्यक बल सं परियोजना हेतु धन सेहो आनि लैत छला मुदा विश्विद्यालय केर लोक सब हुनकर सब मनोरथ के अनेरे अड़ंगा लगा ध्वस्त क दैत छलनि.प्रश्न ई उठैत अछि जे एहेन संस्था के की हैत? परिणाम प्रत्यक्ष अछि।अकादमिक स्तर पर ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी के की हाल अछि से ककरो सं अज्ञात नहि अछि। चण्डेश्वर जी मिथिलाक गामे गामे घूमि क लोक सब सं १५०० गीतक अद्भुत संग्रह केने छथि,विभिन्न राग पर आधारित एक सए सं अधिक गीतक रचना केने छथि।एकर अतिरक्त निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण सी. डी./ डी. वी. डी. (केसेट) केर निर्माण हिनकर मधुर स्वर मे भेल छनि: (अ) दुर्गति दूर करू माँ (सी. डी. एवं केसेट्स निर्माण)– २००५ ईस्वी (आ)जागू गिरिजाजागू महेश (सी. डी. निर्माण) – २००६ ईस्वी (इ) चंदा झा रचित मैथिली रामायण केर सुन्दरकाण्ड (सी. डी. निर्माण) – २००७ ईस्वी मिथिला मे रागक बात करैत चण्डेश्वर कहैत छला जे मैथिली साहित्य मे धूर्त समागम पहिल रचना अछि जाहि मे रागोल्लेख भेटैत अछि। उदाहरणस्वरूपरचना मे राग एवं तालक विवरण प्रस्तुत अछि। प्रथम अंक मे - विभास रागे गीतं, सालंगी रागे – पणिताले गीतम, वराली रागे – एकताली ताले गीतम, ललित रागे – एक ताली ताले गीतम, मालव रागे – एक ताली ताले गीतम, नटरागे – यति ताले गीतम, कानल रागे – प्रति ताले गीतम, द्वितीय अंक मे – शालंगी रागे – यतिक त्रिताले गीतम, देशाख रागे – एकताली ताले गीतम, कोलाव रागे – परिमंठ ताले गीतम, धनछी रागे – एक ताली ताले गीतम अछि. एहि तरहें अगर प्रोफेसर चण्डेश्वर के मानी त मैथिली साहित्य मे राग परंपराक यात्रा ज्योतिरेश्वर ठाकुर के समय सं प्रारंभ होइत अछि। मुदा एक बात जे महत्वपूर्ण अछि ओ ई थिक जे एक तरह सं ओ स्वीकार करैत छथि जे मिथिला के इलीट या विशेष वर्ग मे शास्त्रीय गीत आ संगीत केर परंपरा बहुत पहिने आबि गेल परन्तु जखन ओ गीत गबैत छथि त लोक सं अपना आपके जोडि लैत छथि आ वैह संपर्क, वैह सरोकार, वैह परिवेश आ अंत मे आर त आर अपना आपके कतौं-कतौं नारी ह्रदय मे घुसा लैत छथि। एकर निवारण हुनकर चारि गीत के जौ गंभीरता सं देखल जाय त स्वतः भ जैत। आबएक-एक गीत पर कनि विचार करी: प्रथम गीत प्राती अर्थात भोरक गीत छैक जे विद्यापति रचित थिक: हे हरि हे हरि सुनिअ स्र्वन भरि, अब न बिलासक बेरा। गगन नखत छल से अबेकत भेल, कोकुल कुल कर फेरा। चकबा मोर सोर कए चुप भेल, उठिअ मलिन भेल चंद। नगरक धेनु डगर कए संचर, कुमुदनि बस मकरंदा। मुख केर पान सेहो रे मलिन भेल, अबसर भल नहि मंदा। विद्यापति भन एहो न उचित थिक, जग भरि होएत निंदा। ई गीत शृंगार आ भक्ति के सोन्हगर आंच मे पाकल प्राती थिक। एकर चुनाव बहुत गंभीरता सँ चण्डेश्वर जी केलनि अछि। अपन बोलक उतार चढ़ाव सँ भोरक भान करबैत छथि। पुरुष स्वर मे नारी मनोदशा के चित्रण केने छथि। से तखने संभव छैक जखन ओहि भाव आ संवेदना के आत्मसात कैल जाए। एक गायक के रुप मे ओ नारीक ह्रदय के तह मे प्रवेश क जाइत छथि। गीत पुरुष के बुझना जाइत मुदा अंतर्मन स्त्रीगण केँ। भोरक अनुभूति जखनो कखन एहि गीतके सुनब तखने हैत। गीत केवल ऑडियो छैक तकर लाभ श्रोता के ई भ सकैत छनि जे आँखि मुनि गीत सुनथि आ भाव के स्वप्नलोक मे भ्रमण करथि। सुरुज केर इजोत, कोइली के बोल,भोरक सुगंध, नव् ऊर्जा सब किछु त भेटबे करत ओकरा संगे प्रेम, सृंगार आ भक्ति के अनुपम समंजस्यक भान अलग। एहि गीत मे शास्त्रीय आ लोक दुनु केर मध्य आश्चर्यजनक मिश्रण भेटैत छैक। बुझना ऐना जाइत जेना ई गीत लिखले अछि प्रोफेसर चण्डेश्वर झा के गेबाक लेल। गीत सुनला बाद मोन मे बैकुंठक शान्ति भेटैत छैक। दोसर गीत: सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे। हमरा कियै बिसरय छी हे माताहमरा कियै बिसरय छी हे। छी हम पुत्र अहीं के जननीसे तऽ अहाँ जनय छी हे। एहेन निष्ठुर कियै अहाँ भेलौंकनिको दृष्टि नै दय छी हे। क्षण-क्षण पल-पल ध्यान करय छीनाम अहीं के जपय छी हे। रैन दिवस हम ठाढ रहय छीदरसन बिनु तरसय छी हे। छी जगदम्बा जग अवलम्बातारिणी तरणि बनय छी हे। हमरा बेरि कियै न तकय छीपापी जानि फेरय छी हे। सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे।। उपरोक्त गीत मे जे की एक भक्ति गीत छैक जाहि मे एक भक्त आर्त भाव सं भक्ति मे लीन भेल भगबती सं अपन सम्बाद गीतक रूप मे क रहल छैक,मे एक नूतन प्रयोग ई छैक जे एहि मे कनि झटकारकेर गति छैक मुदा संतुलन यथावत छैक। गति एहेन जे गायक एकरा बटगमनी के बाट देखबैत आड़िये धुडिये जेना भक्ति मे लीन कुनो मंदिर दिश जा रहल होथि। भक्ति भावना मे कोनो कमी नहि। अहि गीतक एक अद्भुत अनुभूति जँ पहिल गीत जकाँ एकरो आँखि मुनि आ कान खोलि क सुनब त अनुभूति हैत जेना एक भक्त स्नान ध्यान सँ निबृत भ अपन हाथ मे अछिन्जल आ नाना तरहक फूल आ बेलपात सँ भरल फुलडाली लए भगबनाक ध्यान मे लीन भेल गीत गबैत कुनो मंदिर मे भगबती जगदंबा केर पूजा अर्चना के हेतु जा रहल हो। एकपेडिया रास्ता संगे शरीरक संग गीतक संतुलन बनएबाक हेतु गीत जेना कनि दौड़ैत हो। मुदा गति सँ गीत सुगीत बनैत छैक। एकर भाव आरो प्रबल भ जाइत छैक। भक्त केर आर्त भाव स्पष्ट होइत रहैत छैक। श्रोता अपना आपके गायक संगे ताल मे ताल मिला ई गीत सुनि आ गाबि सकैत अछि। बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल। पहिरन मे शिव के पीताम्बर देल। सेहो छोड़ि शिवजी मृगछाला ओढ़ि लेल। कोबर मे शिब के जे तेल फुलेल देल। सेहो छोड़ि शिबजी जे भसम लोपि लेल। भोजन मे शिबके खीर पूरी देल। सेहो छोड़ि शिबजी जे भांग पिब लेल। बड़ अजगुत भेलगिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल।। ई लोककंठ मे बसल महेशबानी अछि। एहि विलक्षण महेशबानी के गेबाक हेतु चयन कैल गेल अछि। गीत सुनब त मोनक घबराहट, बेमेल विवाहक पीड़ाक सँग-सँग भक्तक भगबान सँ स्नेहाधिक्य केर स्वतः आवेगक अप्रतिम अनुभूति भेटत। भावक सँग शब्दक उतार-चढ़ावक सँग लय मे सेहो उतरब चढ़ब केर परंपरा मे चलि जैब। शास्त्रीय राग चलैत छैक लेकिन एखुल्ला नहि लोकक ताल आ व्यवहारक सँगे। भाव भक्तिक आह्लाद केर अनुभूति हैत, खिदांश नहि। हिनक स्वरक पक्ष अतेक प्रवल छनि जे तमाम भाव के पाछा छोड़ैत आगु बढ़ैत जाइत छैक। गीतक आखर-आखर मोन मे छपल जाइत छैक। शब्दक अर्थ छिलका जकाँ बाहर भेल जाइत छैक। तमाम अवगुणक सँग शिब प्रशंशनीय, वंदनीय, आ सहज स्वीकार्य छथि। शब्द कखनो काल भले भावना केर संप्रेषण मे कमजोर भ गेल हो परंतु चण्डेश्वर जीक स्वर, हुनक सतत संगीत साधना आ शोधक कारणे एक एक शब्द के कान मे जेना मिशरी के घोल जकाँ घुसा दैत हो। वाद्य यंत्र बोलक सहचर अछि, गीतक प्राबल्य छैक हुनकर सधल स्वर। अन्तिम गीत पुनः विद्यापतिक रचित एक महेशबानी छैक: आगे माई , जोगिया मोर जगत सुख दायक , दुख ककरो नहि देल। दुख ककरो नहीं देल महादेव, दुख ककरो नहि देल। एहि जोगिया के भांग भुलेलक, धतुर खोआए धन लेल। आगे माई, कातिक गणपति दुइजन बालक , जग भर क नहि जान। तिनका अभरन किछुओ न थिकईन, रतिएक सोन नहि कान। आगे माईसोना रूपा अनका सुत अभरनअपन रुद्रक माल। अपना सुत लए किछुओ ने जुरइनिअनका लए जंजाल। आगे माईछन मे हेरथि कोटि धन –बकसथि ताहि देबा नहि थोर। भनहि विद्यापतिसुनुहे मनाईनथिका दिगम्बर भोर।। अहु गीतक अन्तस मे प्रवेश क जैत छथि गायक-साधक चण्डेश्वर झा. स्वर साधना मे अतेक प्रवीन जे बिना कुनो अवरोध के गबैत रहैत छथि। गीत घुसकैत नहि दौरैत अछि।शब्दक अनुरूप आरोहन अवरोहन अवश्य होइत छैक मुदा भावना के सम्प्रेषण त बेजोड़ छैक। गायक गीत संगे न्याय करैत छथि, विद्यापति संगे न्याय करैत छथि, आ अंततः गीतक भाव संगे न्याय करैत छथि। स्पष्ट किनाई आवश्यक अछि जे हिनकर उपलब्ध सी. डी. अथवा डी. वी. डी. केर सम्बन्ध मे हम कुनो छंद, ताल, मात्रा, अथवा रागक व्याकरण आ गणित केर सूत्र के आधार पर नहि लिखने छी। अहेन नहि त हमर शिक्षा अछि आ नहिये हमर सामर्थ्य। हमर प्रयास गीत सुनि, बुझि जे गीतक कोग्निटिक आ बोल केर भाव आ गायन के प्रति सामान्य श्रोता केर भाव जैत छैक तकर सम्बन्ध मे वार्तालाप करब। सैह एहि मे कएल गेल अछि। परित्यक्ता आ परिस्थिति: मिथिलाक सन्दर्भ मे (परिचर्चा) वैधव्य अभिशाप अछि आ कोनो महिला केँ परित्यक्ता बनेनाइ महा-दुष्कर्म। ई दुष्कर्म पितृसत्तात्मक समाज निर्लज्जता सँ, क्रूरता सँ ऐतिहासिक समय सँ करैत आबि रहल अछि। स्त्री शोषणक एहि सँ घृणित उदाहरण भेटब दुर्लभ। आश्चर्य तखन होइत अछि जखन जाहि पुरुषक कारणे हुनक पत्नी  परित्यक्ता बनलथिन तिनका समाज हुनकर आर्थिक संपन्नता, सामाजिक गरिमा (नाम), उच्च शिक्षा आ ओहदा, व्यवसायकि सफलता आदिक कारणे सम्मानित करैत अछि, मर्यादाक चद्दरि ओढ़बैत अछि, वक्ता बनबैत अछि। सबसँ अधिक दुःख तखन होइत अछि जखन तथाकथित आधुनिक महिला जे पढ़ल-लिखल छथि, सब बात बुझैत छथि, नारी स्वतंत्रताक दम्भ भरैत छथि, नारिवादक झण्डा हाथ मे लेने कोनो ऑलयम्पिकक धाविका जकाँ सनसन करैत दौड़ैत रहैत छथि; लेकिन समय एला पर अपन व्यक्तिगत हितक कारणे शोषक पुरुषक सङ्ग देमए लगैत छथि। जखन रक्षके भक्षक भ' जाए त' ककर आश? एहि विषयकेँ बुझबाक लेल एकर तह मे घुस' पडत। इतिहास सँ वर्तमानक जे बहुत विशाल दूरी एकपेड़िया उबड़-खाबड़ बाट अछि ताहि पर यात्रा सहभागी अवलोकनार्थी बनि करए पड़त। यथार्थक नजदिक जयबा लेल लिङ्ग भेदक भावकेँ त्याग करए पड़त। कागद की लेखी आ आँखन की देखी दुनू साक्ष्य केँ बेर-बेर ख़रोंच मार' पड़त। जखन ई सब काज पूर्ण निष्ठा आ ईमानदारी सँ समय लगाक' क' लेब त' बातक गह मे पहुँच सकैत छी। नारी सँ सम्बन्धित ई विषय अछि ताहिं जौं कियोक गुनमति गम्भीर मैथिलानी एहि पर काज करथि त' सजातीयताक भाव एहि मे स्वतः आबि सकैत अछि। हम श्रीमती अपर्णा झाक जिज्ञासक निराकरण अथवा हुनका द्वारे ठाढ़ कएल समस्या पर विचार करबा लेल एहि विषय पर अपन कलम उठाओल अछि। अपर्णा पुछैत छथि "परित्यक्ता अथवा पथ बाट जोहैत स्त्री या प्रतीक्षारत स्त्री? अपर्णा झाक कहबाक शैली आ हुनका द्वारा उद्धरित कएल किछु लोकजीवनक घटित दृष्टान्त हमरा झकझोडि देलक। सबसँ पहिने ई स्थापित क' ली जे परित्यक्ता किनका कही? हमरा जनैत आ लोकजीवनक जीवन्त उदाहरण देखैत परित्यक्ता ओहेन स्त्री भेलीह जिनका विवाहक बाद कोनो-ने-कोनो कारणे हुनकर पति त्यागि देने छथिन। बहुत दृष्टान्त मे पति दोसर स्त्रीगण केँ घोषित आ अघोषित रूपेँ आनि लैत छथि। बाट जोहए बाली स्त्रीगण ओ होइत छथि जिनकर पति कतौ गेल छथिन मुदा हुनका नहि बूझल छनि जे कतए गेल छथि, की क' रहल छथि। सब बिदेसिया गीत एहेन स्त्री पर लिखल गेल अछि। “परदेसिया केँ चिट्ठी लिखै छै बहुरिया पड़लै अकाल पिया कटै छी अहुरिया”। या फेरो: “कियेक दुईए दिनक छुट्टी मे गाम एलयै भरि दिन घुमिते रहलियै ने आराम केलियै”।। एहि गीत सब मे प्रतीक्षा छैक। एहेन प्रतीक्षा जाकर अंत सुखांत हेतैक। ई एहेन बाट जोहब छैक जाहि मे सब किछु मधुर-मधुर हेतैक। मुदा ओहि महिलाक की हेतैक जकर पति ओकरा विवाहक बाद छोड़ि देलथिन, परित्यक्ता बना देलथिन? जकर श्रृंगार, टिकुली, काजर, पाउडर, गहना, वस्त्र, सब बेकार भ' गेलैक। जकरा पति त' छोड़िये देलकैक समाज सेहो नीक भाव सँ नहि देखैत छैक। ओकरा सँ नीक त' विधबा जकरा लेल समाज एक निश्चित बात, वस्त्र, खान-पान, व्यवहार आ आचरण तय करैत ओकरा समाजक मुख्यधारा मे किछु हद धरि जुड़बाक अवसर प्रदान करैत छैक। पित्रिसत्तात्म्क समाज समाजक संरचना मे बहुत चालाकी सँ परित्यक्ताक स्थान निर्धारित करैत अछि। विध-बेभार आ देवता पितर मे एहि प्रथा केँ जोड़ैत अछि। एकर उदेश्य कहीं ई त नहि जे स्त्रिग्न समाज मानशिक रूप सँ परित्यक्ता बनबा लेल तैयार भ’ जाथि? चलू लोक परम्परा मे चलैत छी। मधुश्रावणी कथा मे एक प्रसंग सन्ध्याक विवाहक अबैत छैक। सन्ध्या के छथि? सन्ध्या शिवानी गौरीक छोट बहिन छथि। अपन सुन्नरि सारि सन्ध्या सँ महादेब केँ प्रेम भ’ जाइत छनि। सन्ध्या सेहो अपन बहिनोई महादेब सँ प्रेमक आदान-प्रदान केनाई शुरू केलनि। परिणाम ई भेल जे जखन सन्ध्या विवाह योग्य भेलीह त’ महादेब गौरी सँ चोराक सन्ध्या सँ विवाह करबा लेल चल गेलाह। एम्हर गौरी महादेब केँ तकने फिरथि मुदा ओ कतहु नहि भेटथिन्ह। बहुत खोज कएला पर गौरी केँ महादेबक विषय मे जानकारी भेटि गेलनि जे महादेब सन्ध्या सँ विवाह करए गेल छथि। गौरी केँ बड़ दुःख भेलनि ओ कानय लगलीह। कनैत-कनैत देह सँ घाम चललनि आओर मैल छुटए लगलनि-गौरी मैल छोड़ा कए जमा कएलनि आओर ओकर एकटा साँप गढि कए बाट पर राखि देलथिन-महादेब जखन सन्ध्या केँ विवाह क’ ल’ अनलनि त’ गौरी केँ कनैत देखल संगहि बाट पर मैलक साँप सेहो। महादेब ओहि साँप मे प्राण दए देलाह ओ लह-लहाए लागल। महादेब आओर सन्ध्या केँ देखि गौरी कानए आओर गारि-शाप देमए लगलीह: “की ए हम आहे शिब चोरनी की चटनी की ए हम कोखिया विहूत की हम आहे शिब सेवा मे चुकलहुँ केलहुँ दोसर विवाह” तखन महादेब कहलथिन: “नहि अहाँ आहे गौरी चोरनी चटनी नहि अहाँ कोखिया विहूत नहि अहाँ आहे गौरी सेवा मे चुकलहुँ हमरा कर’ परल दोसर विवाह” तखन गौरी कहलनि: “मरिहौ गे सन्ध्या तोरो जेठ भइया होएबे मे कोखिया विहूत” तखन महादेब पुनः समझाबैत कहलनि: “जनु गारी दिअ गौरी अपनो जेठ भइया जनु कहिओ कोखिया विहूत तोरहि सन गौरी पातरि छितरि तोरहि सन सुकुमारी बतिसो दाँत बिजुली छिटकनि सन्ध्या हुनकर नाम” बहुत अधिक विनम्रता स सन्ध्या कहैत छथिन: “कार्तिक गणपति गोद खेलाएब होएब चेरिया तोहार” आब महादेब निष्कर्ष दैत बजला: “अहाँ अनेरे कानि रहल छी। अहाँकेँ ई साँप बेटी भ’ क’ जन्म लेने अछि। अही नन्हिकीरबी केँ खेलाएबा लए हम एकटा कनियाँ आनि देल अछि। कथा अतहिं अंत भ’ जाइत छैक। आश्चर्यक बात ई जे गौरीक एहि प्रश्न आ शंका पर कहियो कोनो स्वर नहि उठल। पुरुख कथिलेल उठेता? स्त्रीगन सब सेहो मौन छथि। परित्यक्ता एहि कथा मे गौरी आ सन्ध्या दुनू छथि – पार्टटाइम या आंशिक परित्यक्ता। पतिक 100 प्रतिशत प्रेम सँ गौरी आ सन्ध्या दुनू जेना वंचित भ’ जाइत छथि! परित्यक्ता शब्द सँ जेना दुनू विभूषित भ’ जाइत छथि। बात आगा बढ़बैत छी। हमरा लगैत अछि महर्षि गौतमक पत्नी अहिल्या मिथिलाक पहिल परित्यक्ता छथि। इन्द्र गौतमक अनुपस्थिति मे आबि गेला। हुनका लग चलि गेलीह। फेर ताहि लेल अतेक पैघ आ दुर्दान्तक दण्ड! अपने विवाह केलाक बादो तप, तपस्या। पत्नी लेल सभ बन्धन? कोना चलत काज? आ फेर ओहि बन्धन अथवा श्राप सँ मुक्त के करतनि हुनका? एकर निर्णय सेहो श्राप देमय बला पति रूपक पुरुष करताह। गौतम कहैत छथिन जे जखन राम त्रेता युग मे अतए अऒताह तखन शिला मे परिणत अहिल्या हुनक चरणक स्पर्श सँ फेरो मनुख-योनि मे वापस लौटती। दोसर परित्यक्ता सीता छथि। सीता अपन पत्नी धर्मक पालन करैत राम संगे कत’-कत’ नहि जाइत छथि। वैह राम गर्भवती सीता केँ असगरे जंगल भेज दैत छथि। मर्यादा उत्तम भ’ जैतनि अगर सीता संगे राम सेहो फेर सँ जंगल चल जैतथि? से कहाँ करैत छथि? आर त आर अश्वमेध यज्ञ काल सेहो हुनका सीता कहाँ स्मरण अबैत छथिन? सोनाक सीता बना यज्ञ-वेदी पर बैस जाइत छथि। जखन लव-कुश भेट जाइत छथिन तखन सीताक स्मरण अबैत छनि। वियोग आ दर्द सँ छटपटाइत सीता धरतीक कोखि मे विलीन हेबाक लेल निवेदन करैत छथिन – “फाटू हे धरती!” धरती अपन पुत्रीक बात सुनैत देरी फाटि जाइत छथि आ सीता ओहि मे विलीन भ’ जाइत छथि। मिथिलाक तेसर परित्यक्ता भामती छथि. उद्भट विद्वान आचार्य वाचस्पति अपन गहन ज्ञान, परिश्रमक क्षमता आ हठयोगक कारणे उत्तर सं दक्षिण धरि ख्याति अर्जित कएने रहथि। आचार्य प्रवर अनेक ग्रंथक रचना कएलनि ताहिमे प्रमुख अछि: (1) न्यायणिका, (2) ब्रह्मतत्व समीक्षा, (3) तत्व विन्दु, (4) न्यायवार्तिका तात्पर्य टीका, (5) न्यायसूची निबंध, (6) सांख्यतत्व कौमदी, (7) तत्ववैशारदी। एकरा अतिरिक्त तत्कालीन पाचम नवम शताब्दी मे शंकराचार्यक आग्रह पर “अठारह वर्ष स्वगृह मे साधनारत भए सांसारिक सुख त्यागि 6 भागमे मंडन मिश्रक ब्रह्मसूत्रक शंकरभाष्यक टीकाक रचना कएलनि। आ ताहि मे भामती मूक योगदान दैत रहलथिन। तैँ हेतु ताहि मूक अवदान केँ अमर करए लए टीकाक नाम भामती संज्ञा सँ जोड़ि देलनि। ई मूक अवदान बड्ड कठिन शब्द अछि। अगर वाचस्पति केँ साधने करक छलनि त’ विवाह कथिलेल केलाह? एहि लेल जे पत्नी रूप मे भामती बिना ढउआ केँ आ बिना भावनाक संचार केँ सेविका बनल रहथि? वाचास्पतिक विद्वताकेँ नमन मुदा भामतीक प्रति हुनक प्रयोग हुनका द्वारे जानि-बुझि क’ भामती केँ परित्यक्ता बनाएब थिक। मैथिली लोक व्यवहारक गीत मे अनेक गीत भेटत जाहि मे सौतिन शब्दक प्रयोग अछि। सौतिन लेल कुबजो, कुब्जा शब्दक प्रयोग अछि जे हमरा जानैत घृणा सूचक अछि। बात परित्यक्ताक क रहल छी त’ उदाहरण समाज स लेमए पड़त। समाज दिस आँखि उठाबय पड़त। समाज केँ निहारए पड़त। नारी मनोदशा आ दर्दक, टीसक अनुभूति करए पड़त। एक बहुत स्थापित साहित्यकार अपन इच्छा सँ बिपरीत माता-पिता केँ मन आ मान रखबाक चक्कर मे एहेन परम्परागत आ अति सामान्य लड़की सँ विवाह क’ लेलाह जे कोनो रूप सँ हुनका संग साम्य नहि रखैत छलि – नहि दैहिक सौन्दर्य मे आ ने विद्या मे। विद्वान आ दैहिक सौन्दर्य आ सौष्ठव सँ परिपूर्ण साहित्यकार मन बना लेलाह जे विवाह क’ लेताह मुदा ओहि लड़की सँ कोनो तरहक कोनो सम्बन्ध नहि रखता। सैह भेल। विवाह भ’ गेलनि। चतुर्थी धरि सासुर मे रहला। संपन्न सासुरक लोक पाहुनक स्वागत मे कोनो कमी नहि रखलक। उपर सँ बिधकरी अति चातुरि। नीत-नूतन बात कहनि। सृंगार, मनुहार, प्रेमक बात मे ओझराबए लगलथिन। दियासलाई आ काठी एक ठाम रहतैक त’ आगि लगबे करतैक। सैह भेलैक। जाहि पत्नी सँ कहियो कोनो सम्बन्ध नहि रखबाक उदेश्य सँ विवाह केने छलाह ओकर प्रेम मे फँसि गेलाह। मन भले नहि मिलल होनि देह मिल गेलनि। 15 दिन रहला। बहुत रंगक बात भेलनि। कतेक बेर केलि केला। 15 दिनक बाद घर आबि गेला। घर वापस अएला पर पुनः अपन वैदुश्य आ सौन्दर्य पर दंभ भेलनि। भेलनि, आहि रे बाप, विवाह त’ गलत परिवेश, गलत परिवार आ गलत लड़की सँ भ’ गेल। अविकसित, बैकवर्ड सँ भ’ गेल! आब की हो? नहि-नहि, एहेन लड़की संग जीवन कोना कटत? असंभव। महानगरक सभ्य समाज लग कोना रहब? मर्यादा आ इज्जत नीलाम भ’ जाएत। फेर की उपाय? यैह जे त्यागि दी। परित्याग करी। परित्यक्ता बना दी। परित्यक्ता कोना बनत? अपमान सँ, शोषण सँ, दैहिक-मानशिक उत्पीड़न देला सँ। से केँ देत? हम स्वयम देब। ई निर्णय अन्तिम? एकदम अन्तिम। बिना एकर दोसर कोन उपाय?” यैह सब सोचैत भविष्यक महान साहित्यकार आ कलामा नारी उत्पीड़नक ठीका ल’ लेलाह। एक दुखद, तर्कहीन, अनर्गल आ अमानवीय घटनाक बीया बाउग़ भ’ गेल छल। ओ अपन वीभत्स रूप लेल तैयार छल। एक विद्वान एक चांडाल बनि गेल छल। साहित्यकार महोदय केँ सासुर सँ अएबाक हेतु बेर-बेर समाद अबनि। ई एहेन निष्ठुर जे जेबे ने करथि। सासुरक लोक हिनक प्लाट सँ अनजान। अंत मे ससुर महोदय स्वयम हिनकर दरबज्जा पर आबि गेल्थिन। आब की करताह? कोनो उपाय नहि बचलनि। लाचार भय सासुर गेला। खूब मान-दान भेलनि। नाना तरहक सचार लागल। खूब मन सँ भोजन केलाह। राति मे पत्नी एल्थिन। आबिते कामिनी मानिनी बनैत कहलथिन: “जाऊ! कतेक निष्ठुर लोक छी अहाँ? नहि अएलहुँ आ ने चिट्ठियो भेजलहुँ? एहेन कतौं मनुख भेलैक अछि? हम रुसल छी अहाँ स।” से कहैत कनिया मुँह बिपरीत अवस्था मे करैत झुट्ठे सुतबाक भगल केलनि। विद्वान साहित्यकार चुप रहला। गंभीर रहला। किछु नहि बजला। की बजितथि? मन त कोनो धराने अपन व्याहत धर्मपत्नी सँ मुक्तिक कामना आ ब्योंत मे बाझल छलनि। पत्नी दिस देखबो ने केलनि। तुरते पत्नी केँ बुझा गेलनि जे किछु त’ गडबड अछि। झट दनि विचार केलनि: “आखिर ई किछु प्रतिक्रिया कियैक नहि देला? हे भगबती! किछु अनिष्ट बुझना जा रहल अछि हमरा। कहीं कोनो निर्दय मनुखक संग त’ हमर हाथ विधाता नहि लगा देलनि? की करी? ककरा पर मानिनी बनी हम? जे मनुहार करत से त’ कोनो ध्याने-बात नहि द’ रहल अछि। फेर की करी? अहिना सुति रही? से कोना हएत? भले बाबा बिद्यापति कहि गेला ‘पुरुखक नहि बिस्वासे’। कोनो स्थिति मे पुरुख पर विश्वास नहि करी। फेर की करी? एहि ह्रदयहिन पुरुख केँ ह्रदय-वान पुरुख बनाबी। से कोना? एकरा अपन प्रेमक जाल मे गछानी।” यैह सब सोचैत बेचारी नव ब्याहल कनिया अपन जीवनक नैया केँ डूबए सँ बचेबाक उक्ति सोचय लगलीह। करबट अपन पति महोदय दिस बदलैत बजलनि: “की बात पाहुन! रुसल छी की? किछु गलती भ’ गेल हमरा सँ की? अगर गलती भेल त’ कहू। हम माफ़ी मांगि लैत छी”। अतेक बात कनिया कहलथिन मुदा पाहुन पर कोनो प्रभाव नहि परलनि। गुम-सुम-गंभीर बनल रहलाह। कनिया केँ अशुभक अशंका भेलनि। हिनकर आँखि मे कनि बिकराल, बिकट स्वरुप देखली। कनि कसाई कनि निर्दयातक भाव लगलनि। कनि ज्ञानक व्यर्थ घमण्डक अनुभूति भेलनि। लेकिन दोसर कोन उपाय? पैघ जाति आ कुलक मर्यादा सँ छेकएल छी। दोसर विवाह त’ आब सपनो मे नहि देखल जा सकैत अछि। तखन की करक चाही? किछु नहि अतबे जे येन-केन-प्रभावेन हिनका मना ली। से कोना मनाबी? प्रेम सँ आ अपन मनुहार सँ। देखैत छी, भगबती सफलता दैत छथि की नहि? अहि तरहक अंतर्द्वंद सँ जुझैत कनियाँ पाहूनकेँ अपना छाती सँ जकरबाक यत्न शुरू केलनि। आहि रे बा! ई की? पाहुन त’ एक क्षण मे बज्र उग्र भ’ गेलाह। हाथ झकझोरि देलथिन। अपन बलक प्रदर्शन करैत कर्कश ध्वनि मे बजला: “खबरदार जे आई के बाद हमरा सँ कोनो तरहक सम्बन्ध रखलहुँ। हमरा अहाँ सँ कोनो तरहक सम्बन्ध नहि रखबाक अछि। हम आई सँ अहाँक शरीर नहि छुब। अहुँ अपन मर्यादा मे रहू। अगर से मर्यादा केँ तोरबाक चेष्टा करब त’ हमरा सन खराप लोक नहि भेटत”। कनिया आब पूर्ण साकांक्ष भ’ गेल छलीह। भेलनि साहित्यकारक नाम पर राक्षस सँ विवाह भ’ गेल। आब की करी? कनि दृढ़ भेलीह। कहलथिन: “देखू, हम अहाँक व्याहता छी। हमर सम्बन्ध मे हमर पिता अपनेक पिता सँ सब किछु स्पष्ट क’ देने छलाह। अहेन समस्या छल त’ नहि कहि दितहुँ? हम आब कत’ जा सकैत छी? अहीं कहू? आ फेर विवाहक यात्रा मे त’ अहाँ हमरा संग सब किछु कएल जे एक स्त्री-पुरुष करैत अछि?” अहि बात सँ बेफ़िक्र मद मे चूर साहित्यकार अपन राग अलापैत रहला: “हमरा से सब किछु ने बुझल अछि। हमरा अहाँ सन जाहिल स्त्री संग कोनो सम्बन्ध नहि राखक अछि। अहाँक रस्ता अलग, हमर रस्ता अलग। नदीक दू स्वतन्त्र कछेड़। ककरो सँ ककरो मिलन संभव नहि अछि। ख़बरदार जे हमर देह मे सटबो केलहुँ।” पत्नी पाछा कोना होइतथि? लागल रहली। किछु मनुहार, किछु क्रंदन, किछु नोरक धार चुएलनि। किछु अपन माता-पिताक विवशताक भान करेलनि। कनि गिदरभभकी सेहो देलथिन। मुदा साहित्यकार महोदय त’ अडिग रहला। अपना केँ लंठ-साहित्यकार मानैत छला। एहि पत्नी सँ कोनो सम्बन्ध नहि रखता से ब्रह्मवाक्य छलनि। तथापि पत्नी हिम्मत करैत अर्ध वस्त्र मे एकबेर साहित्यकार महोदय केँ अपन बाहुपाश मे लेबाक प्रयाश केली। एहि बेर क्रोध सँ बताह भेल साहित्यकार अपन पत्नी केँ उपर प्रहार क’ देलाह। बेचारी लाचार भेल मारि खाइत रहली। बंद घर मे विचित्र स्वर सुनि लड़कीक माए आ भाऊज जागि गेल्थिन। घर खोलबाक आदेश देलथिन। लड़की घर खोलैत माएकेँ गर लागि कानए लागली। कनैत रहली आ बजैत रहली: “सब अनर्थ भ’ गेल। हमर कपार फुटि गेल। मनुखक बदला हैवानक संग भ’ गेल।” माए आ भाऊज पुछैत रह्ल्थिन: “की भेल बुच्ची?” मुदा हिनकर मुँह सँ बकारे ने निकलनि। कतेक काल धरि कनैत रहली। लोक सब बोसैत रह्लनि। उम्हर साहित्यकार महोदय काल-नाग आ यमक अवतार बनल क्रोध मे मातल घर मे क्रोधक ज्वाला मे धू-धू जरि रहल छला। हुनका सँ लोक पुछनि: “पाहुन! की भेलैक? किछु बकझक भेलनि की?” पाहुन पहिने त’ चुप रहला। फेर कर्कश स्वर मे उत्तर देलाह: “हमरा की पुछैत छी? अपन बेटी के पुछू। ओ जे कहती हमहुँ सैह कहब।” बहुत देर धरि वातावरण शांत रहल। जखन कनियाँ भरि इच्छे कानि अपन मनक दर्द बहा लेलथि त' कहलनि: "हिनका हमरा सँ कोनो सिनेह नहि छनि। ई माता-पिताक इज्जत हेतु विवाहक स्वांग केने छथि। हिनका हमरा सन सामान्य नहि आधुनिका चाही जे हिनका सँग महानगर मे हाथ-मे-हाथ थामने स्वच्छन्द घुमि सकए। ई हमरा सँ कोनो तरहक सम्बन्ध नहि राखय चाहैत छथि। उलटे हमरा सँ जतेक जल्दी हो मुक्ति पाबै चाहैत छथि। वेदमंत्रक उच्चारण सँग जे पत्नी बनेलनि तकरा पालन करैत अपन अधिकारक भाव जगबैत हम किछुए क्षण पूर्व हिनका देह दिस जएबाक अनर्गल प्रयास कएल तकर परिणाम देखू।" ई कहैत अपन छातीक ओ हिस्सा देखा देलथिन जतए आदरणीय साहित्यकार अपन घुसाक निर्दय प्रहार केने छलाह। निलाह-स्याह ओहिना देखा रहल छलनि। एक क्षण मे साहित्यकार महोदयक असली रूप बाहर आबि गेल छलनि। ओतय उपस्थित महिला सभक हृदय काँपि गेलनि। अनर्थ भ' चुकल छ्ल। एकर कतेक बिकट रुप भ' सकैत अछि एहि पर कियोक निश्चित नहि छली। अंत मे कन्याक माए थोड़ेक गम्भीर होइत अपन जमाय लग नहुँ-नहुँ गेलिह। स्थिरे सँ कान लग फुसफुसा क' बाजय लगली: "पाहुन! सब किछु ठीक ने? ई छौरी कोनो गलत बात त' नहि कहि देलकन्हि? चारि भाई मे असगरि छैक ने, ताहिं कनि छिड़िया गेल छैक। ओना मनक बड़ शुद्ध छैक। जे रहल से मुहँ पर कहि दैत छैक।" साहित्यकार निराकार भेल सब बात सुनैत रहला। अंत मे सासु पुछलथिन: "अगर कोनो त्रुटि छनि त' बाजथि? हम सब हिनकर सब माँगक पूर्ति अपन हैसियत हिसाबे करक प्रयास करबनि।" गहीर सांस लैत साहित्यकार ठाईं-पठाईं बजला: "देखू! ई विवाह नहि चलत। हिनका सँग नहि हम खुश रहि सकैत छी आ ने यैह रहि सकैत छथि। हिनकर सोच आ हमर सोच मे कोनो साम्य नहि अछि"। सब बात जेना एकहिं सांस मे साहित्यकार महोदय बाजि गेलाह। सासु अपन मायक ममत्वक कारणे गुम सधने रहली। फेर बजनाई शुरू केलनि: "देखथु पाहुन! ई ब्राह्मणक बेटी छैक। एना कोना हेतनि? विवाह एक केँ कहैत अछि सात-सात जन्मक सम्बन्ध छैक। उठथु आ दुनू मिल क' रहथु।" बेटी दिस तकैत माए बजली: "सोना, एना नहि चलैत छैक जीवन। दुनू गोटे हिल-मिल रहू। सब चीज़ नीक रहत। जाउ घर।"  ई कहैत माय बलपूर्वक बेटी केँ पाहुन सङ्गे घर दिस ल' गेलिह। आब सब किछु सामान्य भ' चुकल छ्ल। घर मे आगि आ घी केर समिधा एकत्रित छ्ल। केवल होम करबाक मंत्र फुकक प्रयोजन छ्ल। ई प्रयोजन कन्याक माए पूरा केलनि। अग्नि सुगंधित भ' धू-धू पजरए लागल। दू देह एक भ' गेल। साहित्यकार महोदय केँ एहि व्याहता मे आधुनिका देखाय लगलनि। दुनू मस्त भ' गेलाह। ओहि दिन एक आर बात भेल। प्रेमक अग्नि ततेक प्रबल छलनि दुनूक जे ओही राति आ क्षण नायिका केँ गर्भ ठहरि गेलनि। विवाहक, अहि तरहेँ एक उद्देश्य पूरा भ' गेलनि। सोझे साल द्विरागमन भ' गेलनि। जहिया सँ नायिका अपन सासुर अएलिह तहिया सँ साहित्यकार फेरो अपन उग्र रूप मे आबि गेलाह। मारि-पिट शुरू भेल। कखनो डंडा सँ त कखनो बेल्ट सँ। कहियो-कहियों आनो चीज़ सँ प्रहार करैत रहला। संगति साफे बन्द। पूर्ण विराम। यातना अबाध गति सँ चलैत रहलनि। एक साहित्यकार अपन कुकृत्य सँ दोसर साहित्यकार लेल सामग्रीक ओरिओन करैत रहला। नारीक शोषण होइत रहल। शोषिताक गर्भ मे शोषितक बीज पनपैत रहल। विनाशक क्रिया मे निर्माणक प्रक्रिया अपन स्वरूप पकरैत रहल। कोनहुना अपन सासुर मे रहैत नायिका एक पुत्रीक जन्म देलीह। पति सँग स्थिति नर्क जकाँ भ' गेलनि। बहुत यत्न केलीह मुदा असफलता हाथ लगलनि। यातना सहैत-सहैत तन -मन जबाब द' देलकनि। सासुर सँ नैहर आबि गेलीह। केश चललैक। अहि बीच साहित्यकार अपना सँ 18 वर्षक छोट लड़की सँ चुपे-चाप विवाह क' लेलाह। ककरो कानो ने लागय देलाह। डर छलनि नौकरी चलि जेतनि। नाम बदनाम भ' जेतनि। बाद मे विधिवत तलाक भ' गेलनि। आर जे केला से केलाह। एक नीक काज जरूर केलनि जे अपन जन्मल बेटीक विवाह अपन अरजल पाई सँ नीक जकाँ करा देलथिन। हुनक पत्नी सेहो अपन जीवन अपने जकाँ जिबक कोशिश करैत छथि त’ लोक हुनका नीक-अधलाह कहैत छनि। यैह थिक सामाजिक मर्यादा। यैह थिक महानता। साहित्यकार महान भेल छथि। नारी चेतना, साहित्य आ सृंगार केर बात करैत छथि। एक दू आधुनिक आ तथाकथित विदुषि हुनकर सब कृत्य आ कुकृत्य बुझैतो हुनका हँ मे हँ मिलबैत छथि। वरिष्ठ साहित्यकार लोकनि क्षणिक लोभे हुनका सङ्गे घुमरैत रहैत छथि। हुनक यशक झंडा फहरबैत रहैत छथि। हालहिं मे एक नवोदित साहित्यकार केँ एहि तथाकथित महान साहित्यकारक पूर्व पत्नी जे आब तलाक शुदा आ परित्यक्ताक टैग सँ जानल जाइत छथि, भेटलथिन्ह। नवोदित साहित्यकार हुनका लग गेलाह। अपन परिचय एक साहित्यकारक रूप मे देलनि।  परित्यक्ताक दर्द साहित्यकारक प्रति घृणा बनि ज्वार-भटा जकाँ फुइट पड़लनि। अपन ब्लाउज खोलि एक-एक दागक प्रदर्शन करैत बजली: "कहीं एहेन साहित्यकार त' नहि छी अहुँ जे अपन पत्नी सँग जलाल जकाँ व्यवहार करैत छी।" जखन ज्वाला फ़ुटले रहनि त’ अनेक तरहक नीक अधलाह बात सेहो कहि देलथिन, जे कोनो नाजायज नहि रहैक। बात एतहुँ कहाँ समाप्त होइत अछि। साहित्यकार अपन दोसर पत्नी केँ सेहो यातना मे रखने रहैत छथि। मारैत-पीटैत छथि। आधुनिका सब सङ्गे घुमरैत छथि। खूब साहित्य लिखैत छथि, खूब भाषण करैत छथि। समाजक एक तबका एहि महापतित केँ आइकॉन बना रखने अछि। हुनक प्रथम पत्नी केँ परित्यक्ता आ कुलक्षणा कहैत अछि। एकरा की कही? ई बात पाठक पर छोड़ि दैत छी। परित्यक्ताक लिखल आ ऐतिहासिक स्वरूपक की बात करी, अपन आँखि सँ अनेक स्वरूप देखने छी। कतौ परित्यक्ता सम्बन्धी रहलि छथि त' कतौ परित्यक्ता बनबै बला। कतौ परित्यक्ता त' कतौ दुर्दैवक मारलि परित्यक्ता। एक उदाहरण विचित्र अछि जे समाजक मानशिकता केँ आईना देखबैत अछि। से की? ई कथा प्रारम्भ होइत अछि एक अति सामान्य परिवारक युवक सँ जे अपन माता-पिताक एसगर संतान छला। B. Com करैत देरी दक्षिण मे कतौ चाय बागान मे डेप्युटी मैनेजर'क नौकरी लागि गेलनि। हुनका गामक बगले केँ गामक एक कन्यागत जिनका 4 लड़की मात्र छलनि, नीक पैसा दहेज दए अपन जेठ बेटी सँ विवाह करा देलथिन। कन्यागत किछु नहि अपितु बहुत रास फुइस बाजल छला। लड़की पढ़लि नहिये जकाँ रहैक। साकांक्ष सेहो नहि, बल्कि कनि अकान जकाँ। देखबा सुनबा मे मुदा अपूर्व। रंग-विरंगक गहना, वस्त्र, प्रसाधन सँ सजलि। बर कानियाँ केँ देखैत दंग। चतुर्थी कोना बितलै से बुझबे नहि केलाह। चतुर्थी प्रात अपने सङ्गे कोयंबटूर हनीमून लेल बिदा भेला। जखन ओतए गेलाह त' ज्ञात भेलनि जे लड़की साफे साकांक्ष नहि छैक। नित्यकर्म तक करबाक नीक सँ चेष्टा नहि छैक। आब की हो? तेसरे दिन वापस आबि गेलाह। सासुर आबि सासु आ ससुर केँ सब खेरहा कहलथिन्ह। ससुर उत्तर देलथिन्ह: "अपने उदास नहि होउ पाहुन, अहाँक सासु सब बात बुझा देतीह।" ई कहैत ससुर दरबज्जा दिस चलि गेलाह। सासु लग अबैत नहुँ-नहुँ कहलथिन्ह: "पाहुन! ई मन छोट नहि करथु। हम सब हिनकर विवाह अपन दोसर बेटी सँ करा देबनि। दोसर एकरा सँ 2 बरखक छोट अछि। सर्वगुणसम्पन्न छनि हिनकर सारि। श्रीमान मैनेजर साहेबक चानी। दिने सँ सारि पाहुन लग आबि गेलिह। सब किछु नार्मल। बहिनोई सँग सब किछु करए लगलि जे एक पति-पत्नीक बीच बन्द घर मे अन्हार मे होइत छैक। अहि क्रम मे 7 मास बीत गेल। 7 मास मे सोझे साल द्विरागमन भेलनि। द्विरागमन मे सारि कोना अबितथिन? उपाय नहि छलनि। ताहिं पत्नी एलथिन। गाम अबिते देरी नव पुतोहुक असलियत सबकेँ लागि गेलैक। आब की हौक? परिवारे मे किनको सरबेटी गरीब मुदा अतीव सुन्नरि। तुरत लड़कीक पिता विवाहक निवेदन भेज देलथिन। श्रीमान मैनेजर साहेब बिसरि गेलाह जे ओ सात मास धरि अपन सारि सँग गुलछर्रा उड़ेने छला। सब वचन बिसरि गेला। सब मर्यादा धो-पोछिक चाटि गेलाह। अपन दुखड़ा गबैत रहला। माए-पितियाइन सब अतबे कहथिन्ह: "धन कही एकरा जे सात मास धरि एहि अकान आ बकलेल कानियाँ सँग कोना बितेलक! एकरा आब शीघ्र अहि जंजाल सँ मुक्ति भेटक चाही।" अपना प्रति एहि तरहक सहानुभूति पाबि श्रीमान मैनेजर साहेब मने-मन गदगद छलाह। विवाह तय भ' गेलनि। प्रथम पत्नीक सब सामान, वस्त्र, गहना, द्रव्य-जात राखि राते-राती मारि पीट क' सासु भगा देलथिन्ह। कानियाँ थोड़ेक निवेदन अवश्य केल्थिन जे हुनको रह' देल जानि। मुदा केँ सुनैत अछि? आब श्रीमान मैनेजर साहेबक दोसर पत्नी हुनका ई आदेश, निर्देश द' देलथिन्ह : "जाहि दिन अहाँ पहिल पत्नी केँ अपन घर घुसा लेब ताहिये दिन हम माहुर खा आत्महत्या क' लेब।" मैनेजर साहेब एकाएक एक परम पत्नीभक्त पति बनैत बजला: "राम-राम! अहाँ की बजैत छी? विवाह सँ आई धरि हम एकर शरीर नहि छूल। आब घर घुसेबाक कोन प्रयोजन?" मैनेजर साहेब केँ वंश वृक्ष दोसर पत्नीक संतान सँ होमय लगलनि। बेटी-बेटा-बेटी। सब हरेक छह मास पर गाम आबथि। गाम अबितहिं नहि जानि कोना प्रथम पत्नी जकरा अड़ोस-पड़ौसी सब बियहुती कहैक बुझि जाइक। राति क' आबि जाइक। मुदा, भोजन त दूर मैनेजर साहेब केर माय पितियाइन सब समान छीन मारि-पिट क' भगा दैत छलथिन्ह। बेचारी रस्ताक भिखमंगी बनल अछि। मुदा कियोक मैनेजर साहेब केँ इहो नहि कहि सकलनि जे ओकरा अपना घर पर कम सँ कम अन्न-वस्त्र दियौक। आसरा दियौक। ऊपर सँ बाप-संबंधी सब सेहो ओहि अभगली परित्यक्ता केँ मारैत पीटैत छैक। जीवन नर्क बनल छैक। एहि प्रकरणक जड़ि मे अगर चली त' एहि परित्यक्ता केँ परित्यक्ता बनेबै मे प्रथम दोख ओकर पिता केँ छनि।  जखन हुनका बुझल छलनि जे हमर बेटी एहेन अछि त’ विवाह कथिलेल करा देलथिन्ह? ओहि पैसा सँ ओकरा लेल कोनो रिहैबिलिटेशन सेन्टर अथवा किछु आरो क' सकैत छला। से नहि केलनि। जखन जमाय बेटी केँ छोड़ि देलथिन्ह त' ओकरा जीवन लेल कोनो इंतज़ाम करक छलनि। दोसर दोख मैनेजर साहेब केँ? अगर सारि सँ विवाह नहि करबाक छलनि त' संबंध कोन कारणे सात मास धरि रखला? पुनःश्च, अगर दोसर विवाह केलाह त' प्रथम पत्नीक सब किछु वापस कथिलेल नहि क' देलथिन्ह? एहि प्रकरण मे दुनू पक्षक समाज सेहो ओहिना पातकी अछि। अनुभवक कथा अनंत अछि। ककरा कही ककरा छोड़ी? कहब तखने बात फरिछायेत। बिना कहने कोना बुझबैक? एक दृष्टान्त हाले केँ अछि। से की? एक व्यक्ति विवाह केलाह। विवाहक एक वर्षक बाद कतौं नौकरी लेल गेलाह। जे गेलाह से 3 वर्ष धरि एबे नहि केलाह। सब उपाय भेल। जगह-जगह लोक पहुचल। थाना-पुलिस मे रपट लिखा देल गेल। मुदा किछु ने भेल। अंत मे ओहि युवक केँ माता-पिता हुनक पत्नीक विवाह ओहि युवक सँ छोट भाई सँ करा देलथिन। परिवार चलए लगलैक। स्त्री मानि लेलक जे हमर प्रथम पति आब एहि संसार मे नहि छथि, त देओर संग विवाह कर’ मे कोनो हर्ज नहि। पहिल पति सँ एक लड़की रहैक। दोसर पति सँ एक बालक। सब किछु पटरी पर निक सँ चलय लगलैक। करीब 9 वर्षक बाद एकाएक ओहि महिलाक जीवन मे भूचाल आबि गेलैक। पहिल पति कहि नहि कोना कतए सँ वापस घर आबि गेलैक। अपन पत्नी लग गेल। बाद मे पता चललैक जे ओकर अनुपस्थिति मे ओकर छोट भाई सँ विवाह भ’ गेल छैक पहिल पत्नी केँ। बेचारी महिला दू नाव मे कोना पैर रखत? बड़का समस्या। पहिल पति ओकरा पर अपन अधिकार जतबैक। दोसर पति कहैक जे हम त’ सब चीज़ अवधारि क’ विवाह केने रही। दुनू भाई मे द्वन्द चलैत रहलैक। अन्तिम निर्णय ई भेलैक जे महिलाक प्रथम पति दोसर कोनो लड़की सँ विवाह करथु। जखन से भ’ गेलैक त’ मामला सुलझि गेलैक। मिथिला मे एहनो विधान रहल अछि जे जाति-मूलक नाम पर एक आदमी 20-25 टा विवाह क’ लैत छलाह। एक दू छोडि अधिकांश पत्नी परित्यक्ताक जीवन जीबैत छली। परित्यक्ताक अर्थ केवल अन्न-वस्त्र-स्थानक तकलीफ अथवा सामाजिक मर्यादे नहि अपितु शारीरिक, मानशिक सुख स वंचित हएब सेहो भेल। जखन लाचार भेल अहि तरहक स्त्रिग्न किछु दोसर पुरुष दिस देखैत छथि त’ समाज हुनका कुलटा, निर्लज्ज, अपवित्र, भ्रष्ट, दुश्चरित्र आ ने जानि की-की कहैत आबि रहल अछि? किनको डाईन त’ किनको डाहि कहि टार्चर कैल जाइत छनि। समाज बौक बनल रहैत अछि। धनक इच्छाक पूर्ति भ’ सकैत अछि, तनक इच्छाक पूर्ति कोना हएत? खादी आ मिथिला/मधुबनी पेन्टिंग केर शुरुआत भेला सँ बहुत परित्यक्ता अपन आर्थिक मर्यादाक रक्षा करबा मे सफलं रहलि छथि। पेंटिंग मे पद्मश्री गंगा देवी, गोदावरी दत्ताक कथा सबके बूझल अछि। खादीक आगमन सँ कतेको परित्यक्ता अपन अन्न, वस्त्रक उपार्जन करबा मे सफल भेली। अपन सोच, अरमान, सपना, सृंगार सब किछु खादीक ताग मे देखनाई शुरू केलनि। कलात्मकता अपन पराकाष्टा पर पहुँच गेल। मिथिलाक सूती खादी देखैत-देखैत समस्त भारत मे अपन महिनी, कलाकारी आदि गुणक कारणे प्रसिद्द भ’ गेल। हम मानवशास्त्र, कला-इतिहास आ मानवाधिकारक छात्र रहल छी। आदिवासी आ ग्रामीण समाज मे काज करैत आबि रहल छी। आदिवासी समाज मे कोनो कारणे अगर पति-पत्नी मे नहि पट्लैक त’ पति-पत्नी दुनू केँ ई स्वतंत्रता छैक जे अपन जीवनसाथी केँ छोडि दोसर ताकि लए। एहि सँ परित्यक्ता प्रथा एहि तरहे ओहि समाज मे प्रभावी नहि छैक जाहि तरहे अपना समाज मे। एक बात आरो हमरा अचरज मे डालैत अछि। लोक जाहि मे स्त्रिग्न सेहो सम्मिलित छथि, सभ कियोक अहि तरहक विधानक परिचालन लेल पुरुख सँ अधिक दोष स्त्री केँ दैत छथि। जखन की सत्य ई अछि जे पितृसत्तात्मक समाज अपन जाल ऐना ने बिछेने अछि जाहि मे सामान्य केँ केँ पुछैत अछि आधुनिका आ पढलि महिला सेहो फंसि जाइत छथि। अंत मे अतबे कहब जे परित्यक्ता स्त्री समाजक समस्या नहि अछि। ई मानवक समस्या अछि। एहि पर गंभीर बनक जरूरत अछि। सबकेँ एक संग आबि संगोर करैत अहि समस्याक निदान निकलबाक अछि। अहि अभिशाप केँ समाप्त करक अछि। से भेल तखने हम सब गर्व सँ कहि सकैत छी जे हम सब प्रगतिक पथ पर बढ़ि रहल छी। गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद्व? मधुश्रावणी कथा आ पाबनि मनुक्ख आ प्रकृति, लोक आ शास्त्र, स्त्री आ पुरुख,बूढ आ नव, प्रेम आ केलि, पारिस्थितिकी संतुलन केर सहज रुपे मिथिलाक अद्भुत परंपरा अछि। एकर जतेक चर्च हो से कम। एहि पाबनि के, एकर सब कथा, उपकथा, प्रसंग, उप-प्रसंग के नीक सं बुझनाई, कथा के मिथिलाक बिभिन्न क्षेत्र में उपलब्ध अंतर के संकलन, ओकर घमर्थन, समाजशास्त्रीय-मानवशास्त्रीय-मनोवैज्ञानिक विश्लेष्ण जरुरी अछि। दुर्भाग्य सं इतिहासकार, समाजशास्त्री, मानवशास्त्री, मनोवैज्ञानिक आर-त-आर साहित्यकार लोकनि सेहो एकर बहुत विवेचना नहि क सकलनि अछि। ई चिंताक विषय अछि।मानवशास्त्र में एक शब्द होइत छैक “enculturation” जकर अर्थ भेल जे लोक कुनो चीज, लूरि, ज्ञान, भाव, परंपरा आदि स्कूल अथवा क्लासरूम अथवा कुनो विशेष शिक्षक या शिक्षिका सं नहि बल्कि लोक व्यवहार के देखैत, ओकर अनुशरण करैत बिना बुझने आ प्रयत्न केने सिखने जैत अछि। नहि सिखबला/बाली के आ ने सिखाबय बला/बाली के एकर विशिष्ट भान होइत छैक मुदा ई सामाजिक ज्ञान के एक पीढ़ी सं दोसर पीढ़ी में हस्तांतरित निर्विघ्न रूप सं होइत रहैत छैक – चरैवेति-चरैवेति। अपन अल्पज्ञान सं मुदा मैथिली संस्कृति के सिनेह के कारण मधुश्रावणी पर हम किछु काज क रहल छी। प्रतिदिन नव बात ज्ञात होइत अछि। विवेचन नव दिशा दिस संकेत करैत अछि। इम्हर अपन माय लग पुनः तीन दिन धरि अहि कथा के बुझबाक प्रयत्न कैल। लागल, ई कथा आ पाबनि त पुरुख केर पूजाक एकाधिकार के सोझे-सोझ चुनौती द रहल अछि। कथा सुननिहारि महिला, कथा कहनिहारि महिला, कथा केर सामग्री, विध, विधान, सब किछु बताबय बाली महिला, पुरुख में मात्र अन्तिम दिन वर आ ओहो महिला के इसारा पर चलयबला यंत्रवत प्राणी! बाकि सब चीज़ में पुरुख के एन्ट्री बन्द। किछु लोक एक प्रश्नउठोलनि। ई जिज्ञासा पहिने बड़ प्रभावित नहि केलक सोचलहुँ, कथि लेल घमर्थन करु? लेकिन एखन भेल जे थोड़ेक सोची जे आख़िर ऐना कियैक छैक - गौरी आ छिनारि? एकरा कोना कही? जौं शास्त्र धेने रहब त एकर उत्तर असंभव। धर्माधिकारी सब आक्रमण करता। लोक सँ करब त समाधान के समिप आबि सकैत छी। लोक आ शास्त्र में एक अंतर स्पष्ट छैक - शास्त्र फ्रेम में बज्र गांठ सनक बान्हल छैक। ओहि फ्रेम सँ बाहर एबाक कल्पनो असंभव। ठीक एकर विपरीत लोक फ्रेम में रहैत अछि लेकिन आवश्यकता भेला पर फ्रेम सं बाहर एबामे में कनिकबो संकोच नहि होइत छैक। लोक प्रेम में भक्त आ भगवान मित्र जकाँ, नौकर मालिक जकाँ, प्रेमी-प्रेमिका जकाँ व्यवहार करैत अछि आ ओहि व्यवहार में शास्त्रक गुण, शिक्षा, संस्कार सम्मिलित रहैत छैक। लोक भगवान के आन नहि अपन बुझैत अछि। अपन नहि अपन परिवारक मनुख बुझैत अछि। सब निराकार सब गुणे साकार भ जाइत छैक। भगवान लोक में मनुखे जकाँ व्यवहार करैत छथि। ई बात शास्त्र में संभव नहि। लोक महादेब के “उगना” बना दैत अछि। सबरी लोक अछि जे अपन निश्छल प्रेम मे राम के आठि वैर खुआबय में संकोच नहि करैत अछि। सधना जाट भगवान के पहिने भोजन करबैत अछि तखने अपने खाइत अछि। लिंगायत समाज के एक महिला हमरा कहलक: "देखू, महादेब के ने माय ने पिता; ने भाई ने बहिन! बेचारे बाल रूप में हमरा लग हमर गाय केर बछड़ा बनि हमर गौशाला में खुटेसल रहैत छथि। अगर सर्दी भ गेलनि, नाक सँ पानि बहै लगतनि त के पोछतनि? के तेलक मालिश करतनि? चलु छोड़ू सब के हे बाऊ महादेब। आई सँ हम अहाँके अपन बेटा बना लैत छी। हम तेल-कुर क देब, नाक पोछि देब, काढ़ा पिया देब”। सब सँ पैघ बात ई जे ई महिला निर्विकार भाव सँ बजैत छलि। जे बजैत छलि सैह करबाक इच्छा सेहो छलैक। ई भेल लोक अथवा फोक के शक्ति। एहेन बात अथवा व्यवहार शास्त्र के ज्ञाता अथवा विद्वान/विदुषि नहि सोचि सकैत छथि। आब बात करी मधुश्रावणी पावनि आ कथा में ओ प्रसंग जाहि में गौरी लेल छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल अछि। कथा के अनेक स्वरूप अछि। लेकिन सब स्वरूप में छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल छनि। मधुश्रावणी के प्रयोजन नव विवाहित लड़की के जीवन के सब किछु के व्यवहारिक ज्ञान देनाई अछि। व्यवहारिक ज्ञान में शास्त्रीय ज्ञान सम्मिलित छैक। अगर मधुश्रावणी के कथा के सब प्रसंग आ उपकथा के देखब आ गुनब त लागत जे किछु बाँचल नहि अछि। एक गृहणी के जतेक ज्ञान चाही सब किछु घोटि-घोटि एहि कथा के मादे सिखा देल जाइत छैक। गौरी देवी के भूमिका के छोड़ि एक आदर्श स्त्री के भूमिका में छथि जकरा सामान्य स्थिति में अनेक तरहक परिस्थिति के सामना कोना करक चाही तकर प्रैक्टिकल ज्ञान भेटैत छैक। अहि प्रसंग में गौरी के भूमिका एक एहेन शिक्षिका के रूप में छनि जे नारी मनक द्वंद के समाधान करैत छथि। महादेब के भूमिका एक एहेन पतिक रूप में छनि जे पत्नी के भ्रम के दूर करैत छथि, अपन पत्नी के सम्मान करैत छथि आ हुनक सम्मानक आ शब्दक रक्षा करैत छथि। संगहि महादेब गौरी के मर्यादा के भान सेहो करबै चाहैत छथि। एहि सम्पूर्ण उपकथा में स्त्री आ पुरुख एक दोसरक पूरक छैक। दुनू के एक दोसरक मर्यादा के चिंता छनि। गौरी तीन स्वरूप - डाईन, चोरनी आ छिनारि - में ई संवाद स्थापित करय चाहैत छथि जे शंका आ जिज्ञासा मनुखक प्राकृतिक गुण छैक। एकर प्रमाणिकता के परीक्षा करब अनिवार्य। दोसर दिस महादेब अपन कृत्य सँ ई प्रमाणित करय चाहैत छथि जे पति-पत्नीक संबंध विश्वास पर टिकल रहैत छैक। अहि विश्वास के सम्मान आ रक्षा करब दुनू के सामूहिक जिम्मेदारी होईत छैक। अविश्वास सँ संबंध टूटैत छैक। बात गौरी आ शिव के होईत छैक तांहि उपकथाक विषय वस्तु ओहने छैक। महादेब तंत्र के जनक छथि। तांहि बात डाईन के भ रहल छैक। गौरी डाईन बनय चाहैत छथि। महादेब ई कहैत छथिन जे ई कार्य सभक नहि छैक। गौरी के दक्षिण दिशा के गाम में जेबाक लेल मना करैत छथिन। गौरी कोना मानती? सिखनाई शुरू करैत छथि। बिना कहने महादेब साक्षी रहैत सब क्रिया के देखैत अपना कंट्रोल में लेने रहैत छथि। आ जखन गौरी चुपचाप डाईन केर सब मंत्र पढ़ि सिख जाइत छथि त गौरी अपन पुत्र गणेश आ कार्तिक के कोढ़ करेज देखै लगैत छथि। आब महादेब गौरी के पकड़ि लैत छथि आ कहैत छथिन: "हद भ गेल? हमरा मना केलाक बादो अहाँ गेलौं दक्षिण कोण में?”तामसे भेड़ महादेब कहैत छथिन जे पूरा तंत्र डाहि देथिन। तुरत गणेश एक-एक मंत्र लिखने जाइत छथि आ कार्तिक डाहने जाइत छथि। गौरी के होइत छनि जे तंत्र कम सँ कम मूल रूप में बचि जाइक। साबर मंत्र मात्र अढ़ाई आखर के होईत छैक जकरा कातिक सँ चुटकी में चोरा लैत छथि। चोरेबक उद्देश्य मंत्र अथवा परम्परा के रक्षण छैक आर किछु ने। हमरा एना बुझना जाइत अछि जे एहि प्रसंग के प्रासंगिकता एहि बात मे छैक जे एक सफल गृहणी के सब तरहे अपन घर आ गृहस्थी के रक्षा करक चाही। आब गौरी चोरनी छथि ताहि प्रकरण पर आबि। बहुत बेजोड़ प्रकरण अछि। आ एकर आधार सेहो गौरी तैय्यार करैत छथि। गौरी महादेब सँ आग्रह करैत छथि जे अगर कियोक चोरी करैत अछि, किम्बा छिनरपन करैत अछि त ओकरा शरीर मे किछु एहेन चिन्ह अंकित भ जैक जाहि सँ जन-सामान्य के ई सिख भेट जाइक जे एहेन काज नहि करी। महादेब ना-नुकूर करैत गौरी के निवेदन मानि लैत छथि। एक बेर पुनः गौरी मर्यादा के लाँघेत छथि आ महादेब के मना केलाक बाद एक गाम में भाटा चोरी करैत छथि। निशान के रुप मे जहिना-जहिना गौरी भाटा चोरबैत गेली तहिना-तहिना नागड़ि बढ़ैत गेलनि। जखन गौरी के भान होईत छनि त महादेब सँ निवेदन करैत पुनः ओकरा समाप्त करय कहैत छथि। फेर होईत छनि कनिक अवशेष चिन्हक रूप में रहक चाही। आ कहैत छथिन जे निशान मात्र ई जानवर में होबक चाही। सैह भेल। आब छिनारि बला प्रकरण में अबैत छी। एक बेर पुनः महादेब के मना केलाक बाद नहरि कात में गेलनि। महादेब माल्लाह बनला। नाव पर राश्ता कटैत काल माल्लाह गौरी के कखनो गाल छुबि लैन।कखनो चुट्टी काटि लैन। भाव उत्तेजक भेल गेलनि। जेना-जेना केलि भाव मे गौरी मगन भेली तहिना-तहिना हुनकर माथ पर सिंग बढ़ैत गेलनि। मल्लाह जाल खसेलक। गौरी माछ बिछलनि। एकर फायदा उठबैत मल्लाह गौरी सँग एमहर-ओमहर करैत केलि क्रिया के सेहो आनंद नहि-नहि करैत लैत रहल। केलि होइत गेलनि आ सिंघ बढ़ैत गेलनि। आब गौरी के होश एलनि : "हे भगवान! ई की भेल? आब की हैत?” यैह सोचैत गौरी अपन सिंघ के साड़ी सँ झपैत गेली। मुदा सिंघ बढ़िते गेलनि। अंततः महादेब सँ निवेदन केल्थिन: "गलती भ गेल हमरा सँ। ई मलहबा अपन सीमा नाघि गेल। छू-छाप हमर प्रतिशोध के बादो करिते रहल। एकरा केलि कहनाय उचित नहि। गलती सँ हम कहि देलौं जे चिन्ह द दियौक। एकर उपाय अहाँ बताऊ?" महादेब कहलथिन: "हे गौरा, हम त कहने रही अहाँके जे निशान के चक्कर मे नहि परु। मुदा अहीं जिद ठानि देलौं जे द दियौक। लेकिन अहाँ चिन्ता जूनि करु। ओ मलहबा कियोक आर नहि छल। हम रही। ताहिं अहाँ छिनारि नहि भेलौं”। महादेब बजिते रहलनि: "हमरा बुझा गेल जे अहाँ तथ्य के जानय चाहैत छी। हम सोचलहुँ, से त ठीक मुदा कहीं ऊंच-नीच भ गेल त की हैत? सैह सोचैत स्वयं मलहबा बनि अहाँ लग गेल रही। अहाँक चरित्र बाँचल अछि। अहाँ अनेरे चिंता जूनि करु”। गौरी के भेलनि जे ओ अनेरे महादेब पर शंका केलनि। कहलथिन गौरी: "हे महादेब! हमरा सँ गलती भेल। आब अहाँ एकर उपाय करु। सिंघ त कोनादन लागि रहल अछि”? गौरी दिस देखि हँसैत महादेब आब सिंघ के समाप्त करय लगला। गौरी कहलथिन :"एक काज करु, कनि नाममात्र सिंघ रहय दियौ जे मृतभुवन में जानवर के सिंगार बनत”। गौरी के बातक सम्मान करैत महादेब नाममात्र के सिंघ रहय देलथिन जे कथाक अनुसार आजुक जुग में जानवर सब में भेटैत अछि। लोक व्यवहार के अनुरूपे अगर कथा के विवेचना करब त लागत जे गौरी एक सामान्य हाड़-मासक महिला बनि शिक्षा दैत छथिन। गौरी कदाचित सब महिला के ई सिख दैत छथिन: "एखन धरि जे गलत-सलत केलौं से बिसरि जाउ। आब अपन दाम्पत्य जीवन मे संलग्न होउ। पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, विश्वास बनल रहक चाही। इतिहास के छोड़ि वर्तमान आ भविष्य के चिंता होबक चाही”। शास्त्र केर गौरी भले एहेन बात सोचि नहि सकैत छथि, लोकक गौरी अपने समाजक महिला बनि समाज के जन सामान्य महिला के मानशिक अवस्था के देखबैत चोरनी, डाईन आ छिनारि बनि एक नव सिखक परम्परा स्थापित करैत छथि। एकर नाम जे द दी – यथार्थवाद(realism), लोक परंपरा केर शक्ति, व्यवहारिकता, पुरुख-प्रकृति के समावेश अथवा आरो किछु। समग्र रुपे ई अद्भुत परंपरा अछि। हाँ, मिथिला में मधुश्रावणी पाबनि केएक बात कनि कचोट करैत अछि आ एकर सार्वभौमिकता पर भले खिड़की दोगे कथिलेल नहि मुदा चैलेंज करैत अछि: “ई कुन कारण सं मिथिला के सब जाति में समाविष्ट नहि भ सकल आ ब्राह्मण मात्र में नुकायल रहि गेल?” भले ई प्रश्न छोट लगैत हो लेकिन एकर उत्तर देनाई अतेक सहज नहि अछि। उत्तर तकला सं एकर एक नव आयाम ठाढ़ भ सकैत अछि? पूरा कथा सुनलाक आ बेर-बेर मनन आ विवेचन केलाक बाद अहि निष्कर्ष तक यात्रा कैल. पाठक के भावक प्रतीक्षा रहत। आभार: अपन माता श्रीमती शिवदुलारी देवी के कहल कथा के आधार पर एहि प्रसंग पर चर्चा कएलहुँ अछि। लघुकथा- पुरुषक नहि विश्वासे आशुतोष गोड्डा सं छला आ सैनिक स्कूल तिलैया सं 12वीं पास केलाक बाद दिल्ली विश्विद्यालय मे बी एस सी मे नामांकन लेने छला। पढबा मे तेज आ अपना विषय के प्रति साकांक्ष छला। भाषा मे बहुत निक पकड़ छलनि जाहि कारने शिक्षक आ विद्यार्थी मे बहुत चर्चित छला।शब्द केर प्रयोग, ओकर उचाचरण, लालित्य सब किछु मे बेजोड़ छला आशुतोष।ई एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार सं छलाह। तीन भाई – एक पैघ एक छोट आ आशुतोष बीच मे।आशुतोष केर जेठ भाय हिनका सं तीन वर्ष केर पैघ आ ओहो सैनिक स्कूल तिलैया केर छात्र।हिनक पिता छोट छीन सड़क इत्यादि के मरम्मत के ठीकेदारीकरैत छलथिन आ घर इत्यादि सम्हारक काज आशुतोष केर माय जे की चतुर गृहणी छलथिन करैत छलथिन। कहि नहि कथिलेल आशुतोष के सैनिक अधिकारी बनबाक भुत नेने सं सवार छलनि। हुनकर जीवन केर एक मात्र उद्देश्य सैनिक अधिकारी बनब छलनि। अपन कक्षा केर एक लड़की चंद्रकला सं नहु-नहु आशुतोष केर सामिप्य भ रहल छलनि। ओना प्रारम्भ मे ई सामिप्य सहज आ पढबाक जिज्ञासा धरि सिमटल लेकिननित-नित आगा आ प्रगाढ़ होइत। आशुतोष जखन बी एस सी मे पढ़ैत छला ताहि क्षण अपन क्लास केर सब छात्र संग फील्ड वर्क लेल एक आत्मीय प्रोफेसर के संगे गुजरात गेल छलनि। ओतय मनोयोग सं काज केलनि। करीब 25 दिन रहला। हुनका संगे चंद्रकला सेहो छलथिन। चंद्रकला सावरि, सुनदरि छलि। अति संस्कारवती। चंद्रकला केर पिता इनकम टैक्स केर कमिश्नर छलथिन। दू भाई के बीच असगर बहिन। चंद्रकला बीच मे – एक भाय जेठ आ एक छोट। उपर सं जेठ भाय आई आ भाउज दुनू आई आर एस आ इनकम टैक्स विभाग मे पदाधिकारी। मुदा अहि बातक लेशो मात्र घमण्ड नहि छलनि। चंद्रकला सामान्य वस्त्र पहिरैत छली। मेक उप सेहो नाम मात्र। अपन पैघ-पैघ आंखि मे काजर जरुर लगबैत छली जे हुनका सौन्दर्य के कतेक गुणा बढ़ा दैत छल. चंद्रकला केर पहचान हुनकर सहजता, लज्जा भाव, आ पढ़ाई मे समर्पण छलनि। आशुतोष संग काज करैत-करैत नहि कहि कोना चंद्रकला आशुतोष संग प्रेम करे लगलनि। आशुतोष के सेहो एहि बातक भान जल्दी भ गेलनि। बिना बिलम्ब केने आशुतोष सेहो अपन ठोर मुसकियबैत चंद्रकला के अपन प्रेमक स्वीकृति द देलथिन। चंद्रकला के एकाएक भेलनि जे समस्त संसार केर ख़ुशी जेना हुनका तुरत भेट गेलनि। मोन भेलनि जे मस्त भ सरिसो के खेत सं भरल खेत मे नृत्य क सरिसबक पीयर फुल सं भरल खेत मे घुसबो केली। दुनू हाथ आसमान दिस उठेली आ सिनेमा केर गीत “चलती फिरूं उड़ती चलूं आज गगन मे” गेनाई शुरू केलनि। एकै आखर के बाद लज्जा आ हुनकर संस्कार जेना चंद्रकला के हाथ पकडि रोकि दनि? थमि गेली। भेलनि “ई की भेल?” यैह सब सोचैत-सोचैत नहु-नहु चलय लगलनि। करीब पांच डेग चलल हेती की कनि दूर सं आशुतोष केर हाकब सुनेलनि: “चंद्रकला, चंद्रकला? कत छी?” आब चंद्रकला आरो साकांक्ष होइत झट दनि सरिसबक खेत सं बाहर आबय लगली. लाज होम लगलनि, “कहीं आशुतोष हमरा हाथ ऊपर केने सरिसबक खेत मे गबैत आ नचैत त नहि देख लेलनि? हे भगबान! अगर देख लेला त की सोचता?” अहि तरहक भाव मोन मे बेर-बेर आबय लगलनि। डेग झटझारइत खेत सं बाहर आबय केर उपक्रम केली। अहि बीच आशुतोष आबि गेलाह अकचकाईत पुछलथिन: “की भेल चंद्रकला! अहाँ खेत मे की क रहल छी? हम अहाँ के बगल बला गाम मे किछु जानकारी लेबाक हेतु अपना संगे ल जाय चाहैत रही।" अकचकाइत अपन वस्त्र आ भाव-भंगिमा के ठीक करैत बाहर अबैत चंद्रकला बजली: “कुनो बात नहि। ओहिना सरिसब के फूल निक लागल त कनि भीतर खेत मे घुसि गेलौं। देखू ने कतेक सोभनगर लगैत छैक? दिल्ली मे की ई भेटत?” आशुतोष बिना किछु कहने अपन मुशकान सं हुनकर बात के हाँ कहलनि। आब चंद्रकला बजली: “चलू ने कुन गाम चलक अछि? हम तैयार छी. हमर रेकार्डर, पेन, नोटबुक सब किछु हमरा लगे अछि।” आशुतोष कनि रोमांटिक भ गेला। एहि क्षण चंद्रकला हुनका कनि अधिके सुन्नरि लगैत छलथिन। आगा बढैत चंद्रकला के हाथ अपन हाथ मे लैत कहलथिन: “हाँ, सरिसब के फूल त एहि खेत मे सत्ते बड्ड निक लगैत छैक। मोन त होइत अछि अहि खेत के बीच मे हमहु घुसी?” चंद्रकला लजाईत बजली: “ठीके घूस चाहैत छी अहाँ?” आशुतोष: “अहाँ मोने की झुट्ठे? बहुत मोन क रहल अछि।" चंद्रकला: “ठीक छैक। तखन घुसु ने सरिसबक खेत मे हमरा लग कैमरा अछि। हम फोटो खीचैत छी।" आशुतोष: “मुदा हमर एक शर्त अछि।" चंद्रकला: “की शर्त”? आशुतोष: “हमरा संगे अहुं चलू खेत मे। आ दुनू गोटे एक संगे फुलक सौन्दर्य, प्रकृति केर सजल रूप आ खेतक हरियर-पीयर स्वरुप के देखी, निहारी आ ओकरा संगे तारतम्य स्थापित करी”। चंद्रकला लजा गेली। फुसिये के अभिनय करैत बजली: “नहि-नहि अहाँ जाऊ। हम की करब जाक?” चंद्रकला के लज्जा भाव मे हाँ अथवा स्वीकारोक्ति केर अभिव्यक्ति स्पष्ट देखल जा सकैत छल। चंद्रकला के प्रेम मे मग्न भेल आशुतोष जेना चंद्रकला केर अंतर्मन केर भाषा बुझि गेला। बिना समय बरबाद केने चंद्रकला के हाथ पकरि खेत के भीतर जाय लगला। उन्मादित मोन सं नहि-नहि कहैत चंद्रकला आशुतोष संगे खेत मे बिदा भेली। आशुतोष केर पकड़ जोर भेल गेलनि। चंद्रकला आशुतोष केर हाथक दबाब सं आनंदित छली। तिल-तिल अनुराग बढ़ल जा रहल छलनि। आशुतोष सेहो गदगद छला। दुनू खेतक तह मे घुसि गेलनि। आशुतोष एकाएक चंद्रकला के अपन बाहुपास मे जकडि लेलनि। नहि-नहि कहैत चंद्रकला लाजवंती केर पात जकां समटल आशुतोष केर शरीरक अत्यधिक सामीप्य प्राप्त पाबि बैकुंठक सुख मे विलीन होमय लगली। बिना कुनो प्रतिकार केने अपना आपके आशुतोष के उपर न्योछावर भ गेली। एकरा कहैत छैक नैशर्गिक प्यार आ प्यार मे समर्पण। सघन खेत मे फेर दुनू के बीच सब किछु भेल जे स्थापित आ कमिटेड प्रेमी-प्रेमिका मे होइत छैक। हाँ, अपन मोन के सबल करबा लेल चंद्रकला आशुतोष के छाती सं सटैत,आशुतोष केर ह्रदय केर केश के जकरैत नहु-नहु कान मे अतेक जरुर कहलथिन: “आशु, अहाँ हमरा कहियो छोड़ब त नहि?” प्रेम मे – शरीर आ मोन दुनू – पागल आशुतोष झट दनि कनि ठसकल स्वर मे बजला: “की कहैत छी चंद्रकला? हम आ अहाँ आब कहियो कुनो स्थिति मे अलग नहि हैब। हाँ भ सकैत छी अगर अहाँ के हम पसीन नहि आबि आ कुनो अहाँ के पिता, भाई, आ परिवार के स्टेटस बला भेट जाय।" चंद्रकला आशुतोष के एहि बात सं तमसा गेली। कनि रुसैत उत्तर देलथिन: “की कहैत छी आशु? हमरा लेल अहाँ सबसँ उत्तम छी। अहाँ सफल रहि, असफल रही, हम अहाँ संगे आनंदित रहब। आई सं परिवार आ स्टेटस के बात नहि होबाक चाही।” अपन गलती के अनुभव करैत आशुतोष बिना किछु कहने अपन कान पकरैत चंद्रकला सं माफ़ी मांगि लेलनि। चंद्रकला सेहो फेर सं हुनक छाती सं सटि गेली। दू शरीर एक आत्मा बनि चुकल छल आ निश्छल प्रकृति केर कोरा मे बिहंसि रहल छल। ने कुनो छल ने प्रपंच। ने शहर केर कोलाहल ने थोपल स्टेटस केर मर्यादा। निष्कपट, प्रांजल, शुद्ध, आ नैशर्गिक प्रेम। आधा घंटा कोना बीत गेलनि से पते नहि चललनि। एक त निरजन मे खेत दोसर दुपहरिया के बेर। कियोक नहि एलेक। आधा घंटा के बाद आशुतोष चंद्रकला के माथ, आंखि, गाल, ठोर आ गरदनि मे चुम्मा लैत गदगद भेला। चंद्रकला कुनो प्रतिकार नहि केलथिन। अंत मे ओहो एक बेर आशुतोष के पकरि ठोर मे चुमि लेलथिन। फेर दुनू गोटे चकवा चकवी जकां हाथ मे हाथ देने खेत सं बाहर एलनि आ दोसर गाम दिस अपन फील्डवर्क लेल बिदा भेलनि। भरि रस्ता गप्प कम केला मुदा दुनू ख्वाब मे रह्लनि। किछु दिनक बाद दुनू – आशुतोष आ चंद्रकला फील्ड-ट्रिप सं वापस दिल्ली विश्विद्यालय आबि गेलनि। आब प्रति दिन चंद्रकला आशुतोष लेल किछु-ने-किछु जरुर लबैत छली। क्लास समाप्त होइते एक ठाम बैसनाई, सिनेमा देखनाई,निरुला मे किछु खेनाई, आर्ची गैलरी सं बिभिन्न तरहक कार्ड कीनब ओहि मे अपन मोनक अभिव्यक्ति करैत एक दोसर के देब, लेब करैत समय भागल जा रहल छलनि। चंद्रकला केर शरीर के दोसरे रंगक चुहचुही आबि गेल रहनि। मस्त अलमस्त, मुदा संयत भाव सं सुन्दर स्वाभाव आ संस्कार सं। अनुकरणीय, निक प्रेमक परिभाषा या दृष्टान्त एकरे कहल जा सकैत छल। समय अपन प्रवाह सं चलैत अछि। एकर गति पर ककरो नियंत्रण नहि। चंद्रकला आ आशुतोष बी.एस. सी. पास केलाक बाद एम. एस. सी. मे आबि गेलनि। आब चंद्रकला अपन अधिक सं अधिक क्षण आशुतोष संग बिताबय चाहैत चंद्रकला। अपन पिता आ यूनिवर्सिटी केर एक प्रोफेसर सं सिफारिस करा विमेस हॉस्टल मे आबि गेली। तर्क देलथिन जे रिसर्च लेल अपना आपके तैयार करती। पिता आ भाई कतेक बेर हिनका प्रशासनिक सेवा लेल प्रोत्साहित केलथिन मुदा चंद्रकला अपन धुन मे मगन रहली जे शोध करती आ यूनिवर्सिटी मे पढ़ेती। घरक लोक थाकि क छोडि देलथिन। आशुतोष कॉलेज के हॉस्टल सं यूनिवर्सिटी हॉस्टल मे राघब लग आबि गेला। आब 8 बजे राति धरि आशुतोष आ चंद्रकला एक दोसरक सामिप्य मे रहे लगलनि। प्रेम तिल-तिल बढ़ल गेलनि। विभाग केर सब छात्र आ बहुत शिक्षक सेहो बुझि गेल्थिन जे हिनक प्रेम सॉलिड रॉक छनि। एहि बीच आशुतोष केर ध्यान एकाएक भारतीय सेना के अधिकारी बला नोकरी दिस चलि गेलनि। अते चंद्रकला आ आशुतोष मे अंतर छलनि। चंद्रकला केर इच्छा सामान्य जीवन जिबाक रहनि। ओ चाहैत छली जे आशुतोष सेहो हुनके जकां शोध करथि आ यूनिवर्सिटी अथवा कुनो कॉलेज मे पढ़ाबथि। लेकिन आशुतोष अपन जिद पर डटल रहला। चंद्रकला आशुतोष केर भावना के सम्मान करैत चुप भ गेली। चंद्रकला कनि दब्बु प्रकृति के छली। कखनो काल आशुतोष हुनकर एहि स्वभाब के गलत फायदा उठबैत छलनि। आशुतोष केर किछु व्यवहार राघब के विचित्र लगैत छलनि। ओ हमेशा स्मार्ट बनि रहैत छला। ढंग सँ वस्र पहिरनाई,गर्दनि मे स्कार्फ़ केर प्रयोग, मोछ के ऊपर ऐंठब, छाती तानि क रहब, गर्दनि ऊंच आ सोझ केने चलब, हमेशा गंभीर रहब, अंग्रेजी केर उच्चारण आ शब्दाबली पर अधिक ध्यान राखब किछु एहेन गुण सँ युक्त छला आशुतोष। पढ़बा मे आशुतोष नीक छला। कुनो बातक वर्णन अथवा फील्ड वर्क केर रिपोर्ट साधल मानवशास्त्री जकाँ करथि। राघब के जूनियर रहितौं आशुतोष राघब केर भाषा एवं अन्य चीज़ सबके ठीक करैत छलथिन। आर त आर राघब केर एम फिल केर रिपोर्ट केर जखन अंतिम रूप बनि गेलनि त ओ आशुतोष के भाषा शुद्धिकरण एवं सिंगार लेल देलथिन। आशुतोष सेहो एहि काज के बहुत प्रोफेशनल ढंग सँ केलनि। 10 दिन मे पूरा रिपोर्ट के सुन्दर, सोभनगर आ व्यवस्थित क देलथिन। फाइनट्यून भेलाक बाद राघब ओकरा बाइंडिंग लेल द देलथिन। आशुतोष सेहो राघब के बहुत सम्मान करैत छलथिन। आशुतोष प्रतिदिन वर्जिस करैत छला। अपन कक्ष मे सद्दाम हुसैन केर फुल स्केल पोस्टर रखैत छला। पोस्टर के नीचा अपना हाथे लिखने रहथि - LET US IMBIBE HIM ई किछु एहेन बात रहैक राघब के कोनादन लगलनि। एक दिन राघब हुनका सँ जिज्ञासा केलथिन, "आशुतोष, ई सद्दाम केर पोस्टर आ ऊपर सँ अहाँक स्लोगन। एकर मतलब हमरा नहि लागल?" आशुतोष बिहँसैत बजला, "सर, सद्दाम केर दृढ़ इच्छाशक्ति, निर्णय आ हिम्मत हमरा प्रभावित करैत अछि। अमेरिका सनक देश के असगरे हिलेने अछि। सैनिक शाशक हो त सद्दाम सन। तांहि हम सद्दाम के पसिन करैत छी। देखू, हमेशा ई सैनिक केर वर्दी मे रहैत अछि। सब सँ पहिने अपने निर्णय लैत अछि । युद्ध भूमि मे सेहो आगा रहय बला नेता अछि एहि सँ एकर सेना मे जोश भरल रहैत छैक।“ राघब यद्यपि आशुतोष केर तर्क सँ बहुत प्रभावित त नहि भेला हुनकर जोश आ उमंग राघब के अवश्य प्रभावित केलकनि। एकदिन आशुतोष राघब के संबोधित करैत कहलथिन, "सर, हमरा जीवन मे मात्र एक नौकरी प्रभावित करैत अछि -सेनाक नौकरी। अगर रईसी आ गौरव के जीवन जीबाक हो त सेना मे अधिकारी के नौकरी जॉइन करु।" आशुतोष केर आँखि सँ साफ बुझना जा रहल छलनि जे हुनकर जीवन केर उद्देश्य की छनि। राघब केर दोसर प्रश्न छ्लनि: "आखिर की बात एहेन छैक एहि मे? अहाँ नीक विद्यार्थी छी, प्रशासनिक सेवा मे जा सकैत छी, आई पी एस बनू, किछु क सकैत छी। पुलिस मे सेहो कम सुविधा थोड़े ने छैक? अहाँ रिसर्च मे नीक क सकैत छी। बहुत उत्तम स्तर केर शिक्षक भ सकैत छी?" आशुतोष बजलनि, “सर, हम अपने सँ सेना के ऑफिसर्स केर ठाठ देख चुकल छी। भले पाई कतौ भेटय लेकिन जे सुविधा, मस्ती, रोब आदि सेनाक ऑफिसर होबा मे छैक से कतौ उपलब्ध नहि।“ आशुतोष के सैन्य अधिकारी बनबाक उच्च आकांक्षा देखि राघब अपना आप के मौन रखनाई उचैत बुझलनि। लेकिन मोने मोन थोड़ेक आशुतोष केर भविष्य के ल'क चिंतित जरूर भ गेला। एम एस सी प्रीवियस के नवम मास मे एकाएक एक दिन आशुतोष चंद्रकला के कहलथिन , "देखू, हम परीक्षा नहि देब। आब हम राति दिन सैनिक अधिकारी बला एंट्रेंस कर तैयारी करब।" चंद्रकला : "ई बात त ठीक। मुदा परीक्षा देब मे की हर्ज? कम सँ कम हॉस्टल मे रहबाक अधिकार त रहत?" आशुतोष: "से त ठीक मुदा हम दू नाव मे पैर नहि राखै चाहैत छी। सब समय आ ऊर्जा हम अपन प्रतिस्पर्धा बला परीक्षा मे लगबे चाहैत छी।" चंद्रकला के बुझा गेलनि जे आशुतोष के बुझेनाई असंभव अछि। चुपे रहब मे अपन आ आशुतोष दुनू के हित बुझना गेलनि। खैर, समय बितैत रहल आ आशुतोष अपन तैयारी मे संलग्न रहला। अंग्रेजी आ जनरल नॉलेज कर चिंता हुनका नहि छलनि। हां कनि फिजिकल फिटनेस मे डर रहनि। पहिल बेर मे लिखित परीक्षा नहि पास क पेलनि। निराश भेला। दू-तीन धरि मौन भ गेला। ने बाजब ने भूकब। भोजनो नीक सँ नहि करथि। हाँ, दू-तीन बेर राघब लग आबि अवश्य बाजथि, "ई नहि पचा पाबि रहल छी सर जे लिखित परीक्षा मे हमरा कथी लेल नहि भेल?" राघब सेहो दुखी छला। भरोश दैत कहलथिन, "कम ऑन आशुतोष! ई प्रतिस्पर्धा केर परीक्षा छ्ल कुनो यूनिवर्सिटी केर रूटीन परीक्षा नहि। रूटीन परीक्षा मे जतेक विद्यार्थी नीक लिखतै, सब पास भ जेतैक। एकर विपरीत कम्पटीशन केर परीक्षा मे निश्चित पद रहैत छैक आ अनन्त प्रवेशार्थी। तांहि बहुत गम्भीर छात्र सेहो छटा जाइत छथि। अहाँ मेधावी आ संस्कारी लोक छी। अपन कर्तव्य मे लागल रही। सफलता एक ने एक दिन अवश्य भेटत।" राघब के बात सँ जेना आशुतोष के प्राण मे प्राण एलनि। विस्वाश फेर जाग्रत भेलनि। कहलथिन, "ठीक कहैत छी सर। हमरा अनेरे भूतकाल केर असफलता पर पश्चाताप के छोड़ि फेर सँ पूर्ण मनोयोग सँ तैयारी करक चाही। आब हम सैह करब आ बाहरी दुनियां सँ थोड़ेक दूरी राखब।" एहि बीच चंद्रकलाकेर होस्टल मे एक ऋचा नामक लड़की एली। ऋचा के चंद्रकला सङ्गे रूम शेयर करक छलनि। थोड़ेक दिन मे दुनू मे प्रगाढ़ मित्रता भ गेलनि। ऋचा के चंद्रकला अपन आ आशुतोष केर सब बात बता देलथिन। आशुतोष सँ भेट सेहो करा देलथिन। ऋचा गोरधप-धप, नमहर कद काठी, मुहँ मे पानि, पैघ आँखि, आकर्षक शरीर,उंन्नत आ सुडौल कुच केर स्वामिनी छलि। जांघ तरासल, नितम्ब उठल आ गजगामिनी जकाँ चलैत छलि ऋचा। जेहने ऋचा देखबा मे सुन्नरि तेहने बजबा मे। ककरो पहिल बेर मे अपन तनक सुंदरता सँ आ वचनक चातुर्य सँ अपन गुलाम बना लैत छली। मुदा आशुतोष के ऋचा अपन जेठ भाय बना लेलनि। इम्हर परीक्षा मे नहि भाग लेबक करने आशुतोष के ऑफिशियली होस्टल खाली करय पड़लनि। यद्यपि राघब हुनका अपना रूम मे रखने रहलनि। एक समस्या भोजन के छलनि। आशुतोष बाहर सँ भोजन करे लगला। आशुतोष के घरक स्थिति बहुत नीक नहि छलनि। पिता रइस आ एक नंबर कर देहचोर। किछु ठीकेदारी आ किछु खेतीबाड़ी सँ जीवनक गुज़ाडा चलैत छलनि। ऊपर सँ आशुतोष तीन भाई। पहिल भाई सेहो सैनिक स्कूल तिलैया सँ पढ़ल। बाद मे आर्मी अफसर बनलथिन। मुदा थोड़ेक दिन मे नौकरी छोड़ि लखनऊ आबि टेलीकॉम जगत मे अपन व्यवसाय स्थापित केलनि। लखनऊ मे अपना सँ पांच वर्ष पैघ अपने व्यवसाय के क्षेत्र केर दिक्षीत ब्राम्हण कन्या सँ प्रेम विवाह क लेलनि। माता पिता आ भाई सब सँ कुनो संबंध नहि छलनि। लेकिन आशुतोष केर माय बहुत गुणमति स्त्रीगण छलि। ओ विपरीत परिस्थिति मे अपन दू छोट बालक के पढ़बैत छलि। आशुतोष एना स्थिति मे निर्णय लेलनि जे आब ओ ट्यूशन पढा अपन खर्च चलेता। ऋचा छलि मध्यप्रदेश केर सिन्धी। दू बहिन आ एक भाय। ऋचा सबसँ पैघ, तकर बाद भाय जे इंजीनियरिंग केर द्वितीय वर्ष केर छात्र आ सबसँ छोट बहिन आ ओहो इंजीनियरिंग केर प्रथम वर्ष केर छात्रा। आशुतोष सँग सैनिक स्कूल केर समय केर हुनक मित्र विजय सेहो छलथिन जे एम एस सी करैत छला। चूंकि विजय केर अंक बहुत नीक नहि छलनि तांहि ओ बाहर मे रहैत छला। ऋचा के भाई आ बहिन के सेहो होस्टल नहि भेटल छलनि। जखन हिनकर सभक संबंध प्रगाढ़ होमय लगलनि त सब मिलक मुखर्जी नगर मे एक फ्लैट शेयर मोड मे ल लेलनि। आशुतोष आब होस्टल छोड़ि देलनि। होस्टल मे राघब आ चंद्रकला रहि गेलनि। चंद्रकला के पिता आब चंद्रकला सँ विचार करैत लड़का तकनाई शुरू करय चाहैत छला। मुदा चंद्रकला एकै बात कहै छलथिन, "बिना पी एच डी आ नौकरी केने ओ व्याह नहि करती।" हालांकि ई त चंद्रकला के बहाना छलनि। हुनकर मोन मे रहनि जे एकबेर जखन आशुतोष आर्मी अफसर केर नौकरी मे चयनित भ जेता त हिनका अपन पिता आ जेठ भाई सँ भेट करा सब राज बता देथिन। एमहर आशुतोष लिखित परीक्षा मे दोसरो बेर असफल भ गेला। आब ओ बहुत तनाव मे आबि गेला। छेपक मे एहो बात बतेनाई जरूरी जे ऋचा मुक्त स्वभाब के।लड़की छलि। 11 विं क्लास सँ अनेक पुरुष मित्र सब सँग मानशिक आ दैहिक संबंध रखली। हुनका रति-रभस मे, चुम्बन मे आलिंगन मे आ काम कीड़ा मे बहुत आनंद अबैत छलनि। ओना त आशुतोष सँ भाई बहिन केर सम्बन्ध छलनि तथापि आशुतोष सँग सटिक रहब, हुनका भरि पांज क छेकब, हुनका सङ्गे आलिंगनबद्ध भय सुतब आदि सहज भाव सँ करैत छलि। आशुतोष सेहो अहि मे आनंदित होइत छला। जखन आशुतोष के दोसर बेर सफलता नहि भेलनि तखन ओ एकदिन चंद्रकला के कहलथिन, "चंद्रकला, आब अहाँ अपन पिता के पसिन केर कुनो योग्य लड़का सङ्गे विवाह क लिय। हमर जीवन अंधकार भेल जा रहल अछि।" चंद्रकला के आँखि मे नोर भरि गेलनि। बजली, "की कहैत छी आशुतोष? हम अहाँ सँ सिनेह केने छी। अहाँ जतय रहब हम ओतहि रहब आ खुश रहब। एहेन बात नहि बाजू अहाँ। अगर कही त आई हमर घर चलू। हम एखने अपन पिता आ भाई सँ अपन सबहक प्रेम आ विवाह के बात करैत छी। अगर कही त हम कोर्ट विवाह लेल सेहो तैयार छी।" आशुतोष कहलथिन : "हमर कहब अछि, अगर सफल नहि भेलौं त हमरा सङ्गे अहुँके जीवन बर्बाद भ जैत। अहाँक प्रति हमर प्यार ओतबे शाश्वत आ प्रांजल अछि जतेक अहाँक सिनेह हमरा प्रति।" ई कहैत आशुतोष चंद्रकला के अपन बाहुपाश मे ल लेलथिन। प्रेमाधिक्य मे चंद्रकला छोट नेना जकाँ कनैत रहलि। आब चंद्रकला पी एच डी करय लागली। बस्तर केर मुड़िया जनजाति केर जड़ी-बूटी केर ज्ञान, तंत्र-मंत्र आ चिकित्सा पद्धति पर हिनकर दिव्य काज चलि रहल छलनि। मुदा आशुतोष के प्रति प्यार एवं हुनक जीवन रूपी नैय्या के डगमग करैत चलब के कारणे चंद्रकला केर शोध कार्य जेना एक ठाम ठमकल पड़ल होनि! एहि बीच आशुतोष केर परिवार मे एक आरो घटना घटित भ गेलनि। हुनकर जेठ भाय आ भउजी मे तलाक केर स्थिति आबि गेलनि। बेचारी आशुतोष केर माय परेशान। करती त की करती? एकटा बेटा छलनि आशुतोष के जेठ भाय के। ओ बेचारा ककरा लग रहत? काज धाज से रुकल। जेठ बेटा घर मे बैसल। आशुतोष केर छोट भाय सेहो बी एस सी केलक बाद टेलीकम्यूनिकेशन केर क्षेत्र मे नौकरी केनाई शुरू केने छलाह। प्रारंभिक संघर्ष केर बाद स्थिति नीक भ गेल छलनि। गाम पर माता पिता के सहयोग करब शुरू क देलथिन। हुनकर नाम छलनि प्रकाश। ओ बीच बीच मे आशुतोष लग अबैत रहैत छलाह। हुनका ऋतु अपना प्रेमजाल मे फंसा लेली। पहिने हँसब, बाजब आ बाद मे सब किछु शुरू भ गेलनि। बाद मे ई जानकारी आशुतोष के सेहो चलि गेलनि। ऋतु आ प्रकाश घोषणा क देलथिन जे दुनू प्यार करैत छथि आ विवाह करती। विवाहक रोड़ा आशुतोष छलथि। मा कहलथिन, "जाबेत धरि आशुतोष सेटल नहि भ जेता आ विवाह नहि क लेता तावेत धरि प्रकाश केर विवाह कुनो हालत मे संभव नहि छनि।" आब की हो? सब चुप। एहि बीच आर्मी ऑफिसर केर एंट्रेंस मे आशुतोष असफल होइत रहला। अंत मे आयु सीमा सेहो खत्म भ गेलनि। पत्राचार केर माध्यम सँ प्रबंधन केर मास्टर डिग्री हासिल केलनि। आ अंततः एक सवयं सेवी संस्था मे छोट छीन नौकरी पकड़ि लेलनि। हुनक प्रेम मे मातलि दीपशिखा एखनो हुनका सँ विवाह करबा लेल तैयार। मुदा अपन हाव भाव सँ एवं अन्य श्रोत सँ आशुतोष चंद्रकला के ई सूचना द देलथिन जे हुनकर विवाह आब कुनो स्थिति मे संभव नहि छनि। चंद्रकला आब की क सकैत छलि। चंद्रकला संगे हुनका सँ एक साल जूनियर लड़की सौम्या सेहो बस्तर केर मुड़िया जनजाति पर शोध करैत छलि। ओहो निखिल नामक एक क्लासमेट सङ्गे प्यार करैत छलि। प्यार की त लिव इन रिलेशनशिप मे छलि। दुर्भाग्य सँ निखिल केर वकील पिता के ई संबंध नहि ठीक लगलनि। निखिल अलाइड सर्विस मे आबि गेला। बाद मे ई विवाह नहि भेलैक। हारि क सौम्या एक इंजीनियर सँग अरेंज्ड विवाह केली। ई अलग बात छैक की विवाह केर प्रथम दिन सँ हुनका अपन इंजीनियर पति सँ एडजस्ट होब मे दिक्कत शुरू भ गेलनि। एक बेर एक मास लेल चंद्रकला आ सौम्या अपन शोध केर प्रयोजन सँ बस्तर गेल छलि। जखन बस्तर सँ एली त सौम्या सँ चंद्रकला के पिता कहलथिन जे एक इंजीनियर टाटा कंसल्टेंसी मे काज करैत छैक। नीक परिवार छैक। लड़का के पिता आई आई टी दिल्ली मे प्रोफेसर, जेठ भाई सेहो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स मे छैक। छोट भाय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सँ एम बी बी एस क रहल छैक। लड़का सहज छैक आ देखबा सुतबा मे सुन्नर। अगर चंद्रकला के इच्छा होइक त एक बेर भेट क सकैत अछि। सौम्या चंद्रकला के ओहि लड़का के देख के हेतु उकसबय लागलि। चंद्रकला एक बेर फेरो आशुतोष लग गेली। आशुतोष अहि बेर साफ-साफ कहि देलथिन , "देखू, एहि स्थिति मे आब हमर आ अहाँक विवाह संभव नहि अछि।" चंद्रकला के आँखि सँ धाराप्रवाह नोर खसैत रहलनि। थोड़ेक काल मे वापस होस्टल मे आबि गेली। सब बात सौम्या के कहलथिन। सौम्या फेरो हुनका अपन दृष्टांत दैत एक बेर अपन पिता द्वारे चयनित लड़का सँ भेट करबा लेल मना लेलनि। दोसर दिन एक होटल मे चंद्रकला अनन्त अग्रवाल सँ भेट केलनि। अनन्त हुनका ठीक लगलथिन। अनंतों के चंद्रकला बड्ड नीक लगलथिन। दुनू अपन-अपन अभिभावक के विवाह करक स्वीकृति द देलथिन। एहि स्वीकृति केर 15 दिनक भीतर आशुतोष केर विवाह गोड्डा कॉलेज केर हिंदी केर प्रोफेसर केर बेटी सँ भ गेलनि। एक मासक बाद ऋचाक विवाह आशुतोष केर छोट भाई प्रकाश सँग भ गेलनि। आब चंद्रकला के सब बात बुझ मे आबि गेलनि। किछु त नहि बजली मुदा करेज भीतरे भीतर जेना दू फांक भ गेलनि। नहियो चाहैत ऋचा आ आशुतोष के श्राप दैत कहलथिन, "जाउ! हमर विश्वास, प्रेम आ समर्पण के अतेक खण्ड-खण्ड केलौं अछि अहाँ सब मिल क! कहियों नीक नहि हैत।" हां, ई श्राप ओ चुपचाप मुक्त अकास मे ठाढ़ भेल देने छलि। ओ बजली आ सृष्टि केर नियंता सुनलक। नीक जकां सुनलक। विवाह के स्वीकृति दैत देरी पांच दिनक भीतर चंद्रकला के दिल्ली मे एक यूनिवर्सिटी मे लेक्चरर केर नौकरी लागि गेलनि। हुनकर मंगेतर जे पुणे मे पोस्टेड छलथिन से एकाएक नोएडा मे आबि गेलथिन। शायद भगबानो के लागल होनि जे एकरा सङ्गे बहुत अन्याय भेलैक आब न्याय होबक चाही! ऋचा केर भाई एक मलयाली लड़की सँ प्रेम विवाह क सऊदी अरब चलि गेला । छोट बहिन सेहो प्रेम विवाह एक महाराष्ट्रीयन इंजीनियर सँ केलनि। विवाह के दोसरे साल चंद्रकला के एक बेटी भेलनि आ ऋचा के बेटा। सौम्या के सेहो एक बेटा रहैक। तीन साल के बाद चंद्रकला के बेटा आ ऋचा के बेटी भेलैक। बेटी भेलाक एक वर्ष के बाद ऋचा आ प्रकाश मे भयंकर लड़ाई शुरू भ गेलैक। स्थिति एहेन भ गेलैक जे दुनू आब संबंध ने विच्छेद क लेथि। मुदा प्रकाश केर मां आ ऋचा के सोचक कारणे फेरो दुनू मे समझौता भ गेलैक। आशुतोष आब दिल्ली छोड़ि पटना चलि गेला। पटना मे गुमनाम जिनगी जिबय लगलनि। दू बेटीक पिता। आमदनी सीमित। दुखक एकाकी जीवन। शायद एहि बातक अनुभव करैत जे सब किछु चंद्रकला सँग धोखा के कारण भेल अछि आ पता नहि भविष्य मे की-की हैत? चंद्रकला राघब के भैया कहैत छलि। किछु दिन पहिने भेट भेलनि दुनू के एक सेमिनार मे। एक कात मे आनि राघब लग चंद्रकला बजली: "भैया, ऋचा आ आशुतोष केर व्यवहार हमरा तबाह केने छ्ल। हमर रोम-रोम सिहरि गेल छल। हम अन्हार मे चलि गेल रही। तहिना ओहो सब खुश कहियों नहि रहत।" विजय गुरगांव मे एक ऐड एजेंसी मे काज करैत अछि। ओकर कनिया सेहो मैनेजमेट कंसलटेंट छैक। विवाह के 20 वर्ष भ गेलैक मुदा संतान एखन धरि नहि भेलैक अछि। सौम्या केर पति ओकर जीवन नर्क क देने छलैक। अंत मे बहुत मुश्किल सँ तलाक भेटलैक। आब दोसर विवाह केलनि अछि आ अपन पति आ बेटा संगे जीवन जीब रहलि छथि। यूनेस्को मे नौकरी सेहो लागि गेल छनि। चंद्रकला एक सफल पत्नी, पुतोहु, माँ, शिक्षिका केर भूमिका निभा रहलि छथि। जीवन मे आनंद आ परमानंद छनि। मुदा पुरुष जाति पर विश्वास नहि छनि। कोना रहतनि??? पुरुषक नहि विश्वासे। मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना राम जगतपुज्य छथि। राम के हिन्दू सब आराध्यदेव बुझि पूजा करैत छथि। मिथिला मे राम सर्वाधिक पूज्य छथि। पूज्य होबाक कारण रामक देवता भेनाई त अछिए ओ मिथिला केर दुलहा छथि ताहू लेल। कारण मिथिला मे जमाय के विष्णुक अवतार मानल जैत अछि। सर्वश्रेस्ट पाहून जमाय होइत छथि। हुनकर मान-दान, आतिथ्य, भोजनक सचार, रंग-रंगक बिध-बेभार, गीत-नाद आ सब किछु अपूर्व। मुदा मिथिला के लोक के अदौं सं ई होइत रह्लनि अछि जे सीता संग रामक व्यवहार उचित नहि रह्लनि। आइयो मैथिलानी बात-बात मे सीता के दुखक स्मरण करैत नोरायल आँखि सँ आ बझल कंठ सँ अनायास बाजि उठैत छथि: राम बियाहने कुन फल भेल। सीता जन्म अकारथ गेल। एकर अर्थ ई नहि जे राम मर्यादापुरुषोत्तम नहि रहला। एकर अर्थ इहो नहि जे मिथिलाक लोक अर्थात मैथिल विधर्मी भ गेलनि। ई त हिन्दू धर्म आ संस्कार के स्वभाव अछि जे जकरा लोक पसिन करैत अछि ओकर गलत निर्णय, अनुचित डेग, आदि पर ओकरा उपराग सेहो दैत अछि। यैह गुण सनातन धर्म के एखन धरि साश्वत रखने अछि। ताहि एहि लेख मे जे भाव अछि ओकरा एक मैथिल, मैथिल सं अधिक मैथिलानी के अपन किशोरी केर दुलहा रामक प्रति विभिन्न ग्रन्थ आ लोककथा केर मादे कैल गेल स्नेहपूर्ण उपराग बुझल जा सकैत अछि। कुनो विद्वेष नहि, घृणा नहि, धर्मक प्रति असंवेदनशीलता नहि। रामायण के प्रारंभ एखन धरि प्राप्त जानकारी के आधार पर महाकवि वाल्मीकि सँ होईत अछि। तकर बाद अनेक स्थानीय विद्वान, सन्त, भक्त, कवि एकर कुनो प्रसंग, अथवा सम्पूर्ण कथा पर शास्त्रीय आ स्थानीय मान्यता के आधार पर काव्यमय रचना करैत रहलनि। रचनाशीलता आइयो चलि रहल अछि। खंड अथवा संदर्भ विशेष मे अंतर कुनो बहुत पैघ बात नहि अछि। तुलसीदास त राम के अपन आराध्य देव मनैत राम के मर्यादापुरुषोत्तम बनबैत रामचरितमानस केर निर्माण करैत छथि। तुलसी के लेखनी अतेक प्रभावोत्पादक अछि जे समस्त उत्तर भारत, पूर्व भारत, उत्तर-पूर्व भारत, मध्य भारत धरि रामचरितमानस जन-जन के कण्ठहार बनि जाइत अछि। मिथिला मे सेहो एखन धरि हमर ज्ञात जानकारी के हिसाबे 4 प्रकार केर रामायण मैथिली मे लिखल जा चुकल अछि। मूल कथा के ध्यान मे रखैत महाकाव्य रचनाकार किछु प्रसंग स्थानीय मान्यताक सँग जोड़ि दैत छथि। एकर अतिरिक्त लोककथा मे, गीत मे,लोक व्यवहार मे सीता आ रामक भाँति-भाँति के चर्चा अबैत अछि। ई लेख रामायण के अतिरिक्त लोककथा, लोकमान्यता, गीत नाद आदि के आधार मानि लिखल गेल अछि। लोककथा सेहो साक्ष्य सँ कम नहि। आब चलु हमरा सङ्गे मिथिला आ रामकथा सँग रामक भाव के मैथिलानी आ सामान्य जनता के बीच मान्यता केर आधार पर, ग्रंथ आ लोककथा के आधार पर , गीत नाद पर शुद्ध मोन सँ सीताक प्रति रामक व्यवहार के समीक्षा करी। सिनेह राम सँ अछि त उपराग ककर? निश्चित रूप सँ रामक। मिथिलाक सब गाम, घर मे सीता छथि आ घरे-घरे राम सेहो छथि। जेना राम संग विवाहक बादो सीता दाई के सुख नहि भेटलनि तहिना आइओ सुख कहाँ छनि? दहेज़क उत्पीडन, बेटा आ बेटी मे अंतर, भ्रूणहत्या, शारीरक उत्पीडन, मानसिक दोहन इत्यादि अनंत समस्या स ग्रसित छथि घर-घर केर सीता। आ की नहि? कनि विचार करू ने? हेता राम प्रतापी राजा, महाबलशाली, समुद्र के सोखि लेबाक क्षमता बला, रावणक संहारक, आ की की! मुदा मिथिला मे आबि ओ दुल्हा राम भ जाथि छैथ। मिथिला के लोक हुनकर पूजा नहि हुनका सँ नेह लगबैत अछि। निधोख डहकन गाबि हुनका कखनो छगरा गोत्रक कहैत छनि त कखनो शंका करैत छनि जे राजा दशरथ गोर, कौशल्या गोर फेर राम आ भरत कारी कोना? मैथिलानी राम के विवाह के बाद सासुर मे रहबाक बेर-बेर निवेदन एहि लेल करैत छथिन जे सब भाई के आ विशेष रूप सँ राम आ भरत के रगड़ि-रगड़ि उबटन लगेती जाहि सँ हिनक श्यामवर्ण देह कनि सुन्नर लागै! भोजनक सिंगार, सचारक की कहब - अपूर्व । भाँति-भांति के सचार प्रेमक भाव सँ कतेक गुना बढ़ल। गान कला, नृत्यकला, वाद्यकला मे माहिर मैथिलानी सब गाबि क, वाद्ययन्त्र के बजा, सिनेहक प्रदर्शन सँ,अपन कोइली सन अनमोल बोल सँ दूल्हा राम के स्वागत आ हुनकर मनोरंजन करैत छथि। से राम अगर सीता के लंका सँ अबैत देरी अग्नि परीक्षा, गर्भ क समय मे ककरो कहला सँ सीता के पुनः असगर निट्ठुर भेल जंगल भेजि दैत छथि त मैथिलानी हाक्रोश त करबे ने करती??? बल्कि कहि सकैत छी जे नारीक स्थिति एखनो सीते दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर मे। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अछिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय मे राम के अगुआ दैत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि: बंदौ राम लखन बैदेही जे तुलसी के परम सनेही तुलसीदास रामचरितमानस मे 1443 बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ,दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र 147 पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि 325 – 147 बेर सीता, 69 बेर जानकी, 58 बेर बड़भागी आ 51 बेर बैदेही। अहू मे एक राजनीति ऐछ। सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ। ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब सीताक दुःख देखू: लंका मे राम रहला 111 दिन आ सीता रहली 435 दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन। डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वीक जीवन। देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप मे आबथि: माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।। राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम मे बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि। आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम। जखन समस्त मिथिला मे अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ मे एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहिये माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप मे आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल? सबहक मोन मे उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने! अगर राम नारायण के अवतार त सीता कुन कम? ओहो त श्री अथवा लक्ष्मी के अवतारे ने छथि? सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ मे लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम मे मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि मे डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स? सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन। यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया मे धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप मे ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला मे एकै पत्नी के नियम चलै छै”। राम चिंता मे आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।” सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत मे सीता के सौतिन नहि आनब।” राम बजलाह : "हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब।" फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप मे भ गेलनि। विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली। रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात मे सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली। मुदा सीता के शोषण वनवास के रस्ते शुरू भ गेलनि। मिथिला के लोक मे विशेष रूप सँ मैथिलीलानी सबहक बीच एक दंतकथा व्याप्त छैक। ई दंतकथा पुरुख समाज द्वारा स्त्रीगण के कोना संस्थागत संरचना के आड़ि मे शोषण कैल जाइत रहलैक अछि तकर बहुत सटीक व्यख्या करैत छैक। बात ई भेल रहैक जे जखन राम वनवास लेल सीता आ लक्ष्मण सङ्गे अयोध्या सँ विदा भ गेला त पुत्रशोक मे महाराज दशरथ अधीर भ गेलनि। खेनाइ पिनाई सब त्यागि देलनि। लोक कतेक बुझेबाक प्रयत्न केलकनि मुदा हुनकर हृदय प्रतिपल क्षीण भेल गेलनि। दुःख बढ़ल गेलनि। अंततः राम-राम कहैत राजा दशरथ अपन प्राण त्यागि देलनि। राम के जखन ई जानकारी भेटलनि त ओ बड़ दुखी भेला। फेर सब गोटे बिचारलनि जे गया पहुच फल्गु नदी के कात मे पितृ तर्पण करैत अपन पिता दशरथ सहित अन्य पित्र सबके पिण्डदान करता। कहल जाइत छैक जे ओहि समय मे पति सङ्ग पत्नी के सेहो ओतय जएबाक अनुमति रहैक। ताहिं राम आ लक्ष्मण सङ्ग सीता सेहो गया पहुँचली। स्नान ध्यान केलाक बाद राम किछु लेबाक हेतु बाहर गेलनि। सीता रामक बहिन सङ्ग असगरे रहि गेली। अहि बीच एकाएक राजा दशरथ केर आत्मा आबि गेलनि। आबि सीता के कहलथिन: "हम भूखल प्यासल छी। हमरा जल दीय, पिण्ड दीय।" सीता लजाईत बजली: "ई कोना उचित? राम आबि रहल छथि। अपने कनि इंतज़ार करु। ओ स्वयं अपना हाथे पिण्डदान करता। जल देता। आबिये रहल छथि।" मुदा दशरथ केर आत्मा रूकबा लेल तैय्यार नहि। झट दनि कहलथिन: "पुत्री सीता! अहाँ राम केर अर्द्धांगिनी छी। हमरा लेल जेहने राम तेहने अहाँ। हमर भूख आ प्यास प्रबल भेल जा रहल अछि। ताहिं अहाँ बिना कुनो बिलंब केने आ रामक पथ हेरने हमरा पिंडदान अर्पित करु। एकर शुभ फल राम आ अहाँ दुनू के सामान्य भाग मे भेटत।" अहि तरहक निर्देश पाबि सीता हृदय सँ प्रफुल्लित होईत झट दनि विधिवत कर्मकाण्ड के तैयारी केलनि। पिण्ड बनेली। आ अपन ननदि, फल्गु धार आ कामधेनु गाय के साक्षी मानि अपन ससुर अर्थात महाराजा दशरथ के आत्मा के पिण्ड अर्पित केलनि। राजा दशरथ केर आत्मा सीताक पिण्ड सँ संतुष्ट आ तृप्त होइत पिण्ड स्वीकार केलनि आ किछु क्षण मे ओतय सँ स्वर्गलोक लेल बिना राम आ लक्षमण के बाट तकने विदा भ गेला। किछु काल बाद राम वापस आबि गेला। पितर के दर्शन के अनेक प्रयत्न केलनि मुदा बेकार। दशरथ आकाश मार्ग सँ कहलथिन: "पुत्र हमरा अहाँक पत्नी पिण्डदान केली। आब अपनके कुनो प्रयोजन नहि।" एकर बाद राम चिंतित भ गेला। बहुत स्मरण केलनि मुदा दशरथ नहि एलथिन। सीता के पुछलथिन राम: "मैथिली! अहाँ पिण्डदान केलौं तकर की प्रमाण आ की साक्षी?" सीता उत्तर देलथिन: "हमर साक्षी अहाँक बहिन, कामधेनु गाय आ फल्गु नदी छथि।" आब राम फल्गु नदी, गाय आ सीता के ननदि सँ पुछलथिन। मुदा ओ तीनू साक्ष्य देमए मे असमर्थता व्यक्त केल्थिन। विग्धल सीता श्राप दैत बजली: "है हमर ननदि, अहाँ हमरा झुट्ठी बना रहल छी। अहाँ छुछुनर बनब आ अहाँ हमेशा छुछुआति रहब। अहिना अहाँक प्राण जैत। है गाय! अहाँक पवित्रता त यथावत रहत मुदा अहाँ झूठ बजलों अछि तांहि अहाँक मुह अपवित्र रहत आ विष्ठा धरि अहि मुह सँ अहाँ ग्रहण करब। आ हे फल्गु नदी, अहुँ झूठ बजलों। जाउ, अहाँक धार मे कखनो पानि बाहर रहबे नहि करत। ई हमर दग्धल मन के निश्छल श्राप अछि।" अहि सँ पता चलैत अछि जे सीता सँग अन्याय शुरू सँ भ चुकल छलनि। अनिष्ट हुनका अकारने भोग’ परतनि! जखन वैदेही के रावण छ्ल सँ हरण क ल जाइत अछि त जे राम समस्त चराचर के नियंता छथि, नियंत्रक छथि तथापि सीता के हरण के बाद जलचर,थलचर, कुंज लता, पक्षी सब किछु सँ बताह जकाँ सीताक वियोग सँ द्रवित पुछैत छथि: "अहाँ सब मे कियोक हमर मृगनयनी सीता के देखलौं अछि: जलचर, थलचर मधुकर श्रेणी। तुम देखी सीता मृगनयनी?" आ स्थिति विचित्र आ विभत्स त तखन भ जाइत छैक जखन रावणक संहार केलाक बाद जखन राम सीता के लंका सँ मुक्त करैत छथि त राम के सीता जे चरित्र पर शंका होईत छनि। इहो भ सकैत अछि जे जनमानस मे पत्नी के अपन पति के प्रति समर्पित भाव के उजागड़ अथवा स्थापित करबा लेल राम सीता दाई के अपन पवित्रता प्रमाणित करबा लेल कहैत छथि अन्यथा स्वीकार करबा सँ मना क दैत छथि। सीतो कुनो कम थोड़े ने छलि? साक्षात लक्ष्मी के अवतार। अपन पवित्र होमाक प्रमाण देबा हेतु सोझे अग्निकुण्ड मे कूदि गेली। सीताक सतित्व देखि अग्निदेवता दंग रहि जाइत छथि। सीता के कुशक क्लेश तक नहि होइत छनि। बिना एकौ रत्ती जरल के निशानी के सीता अग्निकुण्ड सँ वापस आबि जाइत छथि। आर त आर स्वर्ग लोक सँ देवता लोकनि सेहो सीताक निश्छल, आ पवित्र होबक प्रमाण दैत छथि तखन जाक राम पुनः सीता के स्वीकार करैत छथि। किछु लोक अहि मे ई तर्क (कुतर्क?) दैत कहैत छथि जे समाज मे उचित व्यवस्था आ आदर्श उत्पन्न करबा लेल राम एहेन कार्य केलनि। मुदा मैथिलानी के ई सोचब छनि जे राम सीता सङ्गे अन्याय केला आ समस्त स्त्री समाज पर बंधन थोपबाक एक अनर्गल परम्परा के प्रारंभ केलनि। की यैह छलनि रामक रघुकुल रीति? ओह!! कहब दुख ककरा सँ! अग्निपरीक्षा के संबंध मे किछु लोक कहबा लेल एहनो बात कहैत छथि जे जाहि सीता के रावण हरण केलक से सीता त सही अर्थ मे सीता छेबे कहाँ छलि। ओ त सीता के छाँह छलनि। असली सीता त अग्नि मे समाहित भ गेल रहथि आ निश्चिन्त सँ अग्नि मे चुपचाप बैसल। ताहिं छाँहक सीता के अग्निकुण्ड मे जाइते देरी असली सीता अग्नि सँ बाहर निकलली जिनका राम सहज रूप सँ अर्धांगनी के रूप मे स्वीकार करैत छथि। मुदा एक हाड़-मांस केर सामान्य मनुख होबाक नाते एकटा बात नहि पचा पबैत छी जे रामक ई दुरंगी चरित्र कोना देखी। जे राम ऋषि गौतम के पत्नी अहिल्या के उद्धार स्पर्श मात्र सँ करैत छथि वैह राम अपन पत्नी सीता लेल अतेक निरंकुश? जे राम बालि के एहि द्वारे बध करैत छथि जे ओ अपन छोट भाई सुग्रीव केर पत्नी के बलपूर्वक अपना लग रखने अछि। जखन बालि राम सँ पुछैत छनि: "मे बैरी सुग्रीवहिं प्यारा। कारण कबन नाथ मोहि मारा।।" त राम उत्तर दैत कहैत छथिन: "अनुजवधु भगिनी सुतनारी। सुन सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधे कछु दोष न होई।।" बालि के मृत्यु के बाद राम अपन सखा सुग्रीव के फेर सँ अपन पत्नी के स्वीकार करबा लेल प्रेरित करैत छथि जकरा सुग्रीवक जेठ भाय बालि बहुत दिन धरि अपन कब्जा मे रखने छ्ल। आ सैह राम सीताक मामला मे एहेन कठोर, हृदयहीन कोना??? जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल मे असगर भेज देलथिन। कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक? अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या मे एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ मे खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?” खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल मे असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम मे स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता मे प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या मे जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत, के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।” जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल। मुदा बीचे मे घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत मे राम एलाह त बाद मे सीता सेहो एलीह। सीता रामे के वंशक सन्तति के जंगल मे बहुत नीक जकाँ सब शिक्षा संस्कार मे पारंगत करा राम के औकात देखा देलनि। राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत मे राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।” सीता: “से कोना?” राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।” सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?” राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया मे नहि छी।” सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक ?” ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ि करुण स्वर मे विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा मे उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर मे स्थान द दीय! धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती मे सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती मे बिलुप्त भ गेलीह। धरती फटली आ धरतीपुत्री सीता धरती मे समा गेलनि। ताहि जखन मैथिलानी सबके कोनो कष्ट होईत छनि त अपना के सीता बुझैत अनायास बाजि उठैत छथि: “फाटू हे धरती”। ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला मे जरैत छथि। अपमानित होईत छथि। बेटी के बेटाक तुलना मे कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....” सनातन धर्म पूर्वजन्म के सिद्धान्त के मनैत अछि। मिथिला के लोक व्यवहार मे धोबी के कहला सँ राम द्वारे सीता के पुनः वन भेजबाक एक लोककथा अछि जे कर्म के सिद्धान्त पर टिकल अछि। कनि देखी एकरा: बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी मे भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से कम। झुला लागल प्रेमक डाली।i झुलथि सीता प्यारी ना।। सब सखी गबथि सिनेह देखाबथि। बिहुसथि जनकदुलारी ना।। सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर मे गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान मे मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ मे प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली। सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल मे आनि पिंजरा मे राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत! राजमहल मे अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी मे सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ी मनुखक आवाज़ मे मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी मे स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"। सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी मे स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा मे बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा मे देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली। ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरु हमर पत्नी के बदला मे अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा मे बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक। अपन पत्नी के प्रेम मे मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल मे आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन! बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट मे हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!" कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना मे मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल मे कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी। आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था मे घर स निकालि देता”। आब सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन। किछु लोक के मानब छनि जे रामक सीताक प्रति एहेन निष्ठुर व्यवहार सीता के व्यक्तित्व के सबल बनबैत छनि। मुदा ई केहेन व्यवहार। ककरो सबल बनेबाक हेतु, उदाहरण प्रस्तुत करबा हेतु अहाँ डेगे-डेगे प्रताड़ित करबैक? नहि-नहि, ई नहि उचित विचार। एक मैथिलानी हमरा कहली, "देखू, सीता एक प्रतापी राजा के बेटी आ दोसर प्रतापी राजा के पत्नी। हुनकर जखन ई हाल भेल त सामान्य महिला के की बात?" सीता मिथिला अपन नैहर आ पिता राजा जनक लग कियैक नहि एली? फेर स्मरण अबैत अछि : "बेटी सासुरे नीक की सर्गे नीक"। ताहिं सीता स्वर्गक रास्ता धेलनि। मोन मे एक बात होईत अछि, उमरैत रहैत अछि - अगर राम मर्यादापुरुषोत्तम छथि त फेर ओहि मर्यादा के धोती के तार-तार कथी लेल करैत छथि? वैदेही के दुःख सँ द्रवित होइत मिथिला के अनेक पुरुख आइयो कनि उत्थर भ जाइत छथि, अधीर भ जाइत छथि, जेना विद्रोहक स्वर रामक प्रति प्रचण्ड भ जाइत होनि! धीरेन्द्र प्रेमर्षि त अतेक तामसे भेर भ जाइत छथि की हुनकर लेखनी बुझू जे क्षण मात्र लेल सब मर्यादा के अतिक्रमण करैत अपन भड़ास निकलैत बाजि उठैत अछि: "दण्ड-भेदे करू कि अपनाउ साम-दाम हमर सीते जँ बोन, अहाँ सुथनीक राम?" जो रे मर्यादा आ पुरुख द्वारा स्त्रीगन के अदृश्यबेड़ी संजकड़ल पैर! बेचारीमैथिलानी से कोना कहती? ई सब त सीता के द्वारा स्थापित मापदंड के एखनो ओही मर्यादा के सँग अक्षर-अक्षर अनुशरण करैत छथि, निर्वहन करैत छथि। पाहुन राम सँ उपराग त ठीक मुदा हुनका लेल अवाच्य कथा - हे भगवान! कथमपि नहि। ऊपर सँ "हम नहि जियब बिनु राम" गाबि-गाबि पाहुन के दिन-राति स्मरण करैत रहैत छथि। अतेक भेला बादो राम के मिथिला के लोक अपन सब सँ सुन्नर पाहुन मनैत छथि। राम के प्रति जेहिना भक्तिभाव तहिना प्रेमभाव। एक भाव जे मैथिलानी लोकगीतक मादे गबैत छथि से जरूर मोन के द्रवित क दैत अछि आ सब मैथिलानी मे सीता आ सब मे सीताक व्यथा बुझना जाइत अछि: "हे भगवान! कुन कसूर विधना भेल बाम कहब दुख ककरा सँ?" लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावणी – मानवशास्त्रीय विवेचन एक बेर प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन एकाएक हमरा पुछलनि, "मिथिला मे कुन चीज़ थिक जे लोक आ शास्त्र, सब कला के एक सङ्गे जोड़ने अछि?" हमरा भेल की उत्तर देल जाय? संयोग सँ किछुए दिन पहिने मधुश्रावनी कथा माँ सँ सुनि रेकॉर्ड केने रही आ बाद मे ओकरा लिखने रही। भेल ई एक उत्तर भ सकैत छैक। हम झट दनि कहलियन्ह , "मधुश्रावणी पावनि”। हमर उत्तर सुनि प्रोफेसर जैन बहुत प्रसन्न भेला। कहलथि, "बिलकुल सत्य कहैत छी। यैह सही उत्तर अछि। अहाँक मिथिला मे ई गजब के पावनि अछि जे अनेक तरहक ज्ञान, शिक्षा, कला, के सिखबाक प्लेटफार्म नव व्याहल लड़की लेल तैयार करैत अछि। ई एक एहेन पावनि अछि जे लोक आ शास्त्र के जोड़ैत अछि। अहाँक जवाब सँ हम संतुष्ट छी।" बात पर हम अतेक गौर नहि केलौं। कतेक दिन सँ मधुश्रावणी पर किछु लिखबाक इच्छा अछि मुदा आलस आ किछु आन कारणे नहि लिख पाबि रहल छी। सविता झा खान केर एक प्रश्न ओहो अति लघु प्रश्न अनेक दिशा के दरबज्जा खोलि देने अछि। जबाब एक ठाम सँ भेटब असंभव। खेपे खेपे अनेक ठाम सँ आनय पड़त। सैह क रहल छी। अहि बात पर सविता जी कहलनि, "आब थोड़ेक मधुश्रावणी पर लिखू"। हुनका नहि कहबाक हिम्मत नहि भेल। माँ के कहल मधुश्रावणी कथा के फेर पढनाई शुरू केलौं। ओहि मे प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन केर जिज्ञासा (अथवा खोज) आ सविता झा खान के जिज्ञासा केर तत्त्व ताकय लगलौं। पहिल बेर मे लागल किछु छैक जरूर। फेर भेल, "कतेक छैक?" कतेक छैक आ कत-कत छैक ताहि बातक रहस्य तकबा लेल ओहि कथा के अनेक बेर पढ़लौं। एक मैथिल समाजक सदस्य के नाते पढ़लौं। एक मानव विज्ञान केर छात्र के रूप मे पढलौं। सब सँ पैघ बात ई जे एक जिज्ञासु के रूप मे पढलौं। हमरा जे भेटल सँ हमरा जनैत अपूर्व बात छैक। अपन ज्ञान आ समझ के हिसाब सँ ओकर संक्षिप्त व्याख्या क' रहल छी। मधुश्रावणी अपन मिथिला मे विवाहक पश्चात 13-15 दिन धरि के पाबनि छैक। जाहि मे नाना तरहक फूल, पात, फड़ लोढ्नाई, पूजा केनाई, गीत गेनाई,विध बेबहार के संपादन, नियम निष्ठा के पालन, आ प्रति दिन कथा केर एक अथवा अनेक प्रसंग के समूह मे बैस सुननाइ शामिल छैक। बरखा ऋतु मे भेलाक कारने एकर नाम मधुश्रावणी बहुत सार्थक लगैत छैक। अगर विस्तृत फलक पर उदार भाव सं देखबैक त कहि सकैत छी जे मधुश्रावणी अपन मिथिला मे मिथिला बला स्टाइल के हनीमून छैक। बरसातक मधुमास आ ताहि के मधुराति के जे आनंद मिथिला मे छैक से कहाँ – प्रेमानन्द, परमानन्द! मधुश्रावणी वस्तुतः एक सम्पूर्ण पाबनि छैक जाहि मे लोक आ शास्त्र, पुरुष आ प्रकृति, मनुख के प्रकृति केर अवयव जेना पानि, नदी, पोखरि, गाछ, झाड़-पात, लत्ती-फत्ती, फूल-फल; जीव-जंतु, सांप, कीड़ा; धरती-अकास, समतल आ पहाड़ आदि के बीच कोना साम्य बनबैत सबहक संगे कोना जीबी, कोना रही तकर शिक्षा, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा देल जैत छैक। कोना स्थानीयता के सम्मान करैत समग्रता के भाव के स्वीकार करी, से शिक्षा देल जैत छैक। शिक्षा क्लास रूम सं अधिक ओपेन थिएटर जकां परिवेश मे देल जैत छैक। जतय एक मांजल कथा वाचिका अपन कथा के ज्ञान सं आ अहु सं अधिक कथा कहबाक शैली सं नव व्यहिता के एक-एक कथा के खोइंछा छोड़ा-छोड़ा सुनबैत रहैत छथि। जखनओ कथा वाचिका कथा कहैत छथिन त ओ हरेक पात्र के अपना मे समाहित क लैत छथिन। कथा केर पात्र जकां हंसनाइ, गेनाई, नहु-नहु बजनाई, जोर सं चिचियेनाइ, नाना तरहक जीव जंतु केर आवाज निकालनाइ, कहबाक शैली मे उपर नीचा के भाव व्यक्त केनाई, सब किछु सर्वोत्तम। अभिनय केर पराकाष्ठा। ई एक एहेन स्टेज होइत छैक जाहि मे स्त्री, पुरुख, देवता, दानव, जीव-जंतु, सबहक भूमिका मात्र एक कलाकार के करय पड़ैत छैक – वैह एक्टर, वैह डायरेक्टर। बीच मे कुनो ब्रेक नहि। कतौं सं कुनो सहयोग नहि। मुदा बाह रे परंपरा मिथिला भूमि के आ बाह रे मैथिलानी! हरेक कथा वाचिका अपन दायित्व केर पालन बेजोड़ दंगे उत्कृष्ठता सं करैत छथि। अतेक प्रभावी ढंग सं जे, जे पूजैत छथि से त कथा सुनबाक हेतु बैसते छथि हुनका संगे आनो स्त्रीगन सब सुनैत रहैत छथि। जेहने कलाकार तेहने दर्शक – दुनू के बीच परफेक्ट हारमनी। आ कनिया के की कहब ओ चुपचाप एक गंभीर शिष्या जकां कथा वाचिका के हरेक शब्द के ज्ञानरूपी अमृत के एक एक बूंद मानि पिबैत रहैत छथि। एहि मे भूमि-चित्रण अर्थात अरिपन केर ज्ञान भेनाई सेहो आवश्यक छैक। मधुश्रावणी केर अरिपन मे वर्गाकार बॉर्डर के भीतर सुरुज, चान, कलश, पुरहर,पातिल, साठी (षष्टिका), मैना पात, नागक लटपटाएल जोड़ी, नवग्रह, नौमात्रिका आ कमल फुल के बिम्ब के रूप मे गौरी, कुसुमावती, पिंगला, लीली आ चनाई आदिक समावेश बहुत व्यवस्थित ढंग सं कैल जैत छैक। एक गोट नव डाबा पर माटि आ गोबर सं पांच टा साँप बना साटि देल जैत छैक। पांचो सांपक थुथुन मे दुभि खोईस देल जैत छैक। अरिपन काढब अथवा पारब मे सब बिम्ब के स्थान, दिशा, कोण, स्वरुप आदिक ज्ञान आ शैली मे निष्णात भेनाई अनिवार्य होइत छैक। चूँकि ई पाबनि अहिबात, वंश बृद्धि एवं वर आ कनिया के शुभ सँ जुड़ल छैक तांहि परफेक्शन मे कनिकबो कोताही के गुंजाइश नहि रहैत छैक। पूजा मे व्यवहरित सामग्री सं पता चलैत छैक जे बालिका के अहू बातक प्रशिक्षण देल जैत छनि जे ओ सब बस्तु के जानि लेथि। प्रतीकात्मक गौरी बनेबाक हेतु हरदि, कुसुमक फूल, सिंदुर, पान आ मेथी के पीसिक’ एक गोल आकृति केर प्रतिमा बना नव ढोरल सरबा मे ठाढ़ क देल जैत छैक। एकरा अलावे मैना पात,नेवो, नीम, दूध, केरा पात, फूल, काजर, अरबा चाउर, चुडा, चुडलाई, चीनी, लाबा, आम, कटहर, केरा, अंकुरी, दही, सुपारी, बड़की-छोटकी इलायची, जाफ़र,लौंग, बड़का छोटका हडरी, बहेड़ा, नीमक पात, अमतौआ अनार, पखुआ, कुश, धामिक पात आदि के प्रयोग होइत छैक। अहि मे अधिकांश बस्तु के एक नव वस्त्र मे राखि एक पोटरी बना देल जैत छैक जकरा बिनी कहल जैत छैक। एहि बिनी के गौरी आ बिषहरि के स्वरुप मानि भोर साँझ पूजा अनिवार्य रहैत छैक। मधुश्रावणी पूजा आ कथा नागपंचमी दिन सं प्रारंभ भ जैत छैक। प्रतिदिन पूजा भेल आ स्त्रीगन सब पूजा सं पहिने आ पूजाक बाद गीत गेलथि। पूजा मे संस्कृत आ मैथिली केर अद्भुत मिश्रण बला शब्द आ मन्त्र भेटैत छैक यद्यपि पण्डित जी के कुनो भूमिका एहि मे नहि रहैत छनि। एक अनुभवी महिला अन्य महिला केर सहयोग सं एहि कार्य के संपादन मे कनिया के निर्देशित करैत छथिन। सब चीज़ सटीक होइक तकर विशेष ध्यान रहैत छैक। गौरी पूजन केर एक मन्त्र देखू त संस्कृत आ लोक शब्दावली के सुखद जोग पर आनंदित हैब: “ऐ गौरी! महामाये, चानन डारि तोडैत एलहुं, सोहाग-भाग बटैत एलहुं, फूलक माला अहाँ लिअ, सोहाग-भाग हमरा दिअ, स्वामी-पुत्र सहित गौर्ये नमः।” फेर पूजा करक विधान आ ककर बाद ककर पूजा करी तकर विस्तृत व्याख्या आ रुपरेखा निर्धारित रहैत छैक। एहि क्रम मे गौरी केर पूजा के बाद कलश केर पूजा, बिषहरि केर पूजा, तकर बाद लगातार वैरसिक, चनाइ नाग, कुसुमावती, पिंगला, लीली नाग, शतभगिनी सहित गुसाउनि नाग, साठि आदिक पूजा होइत छैक। पूजा केर समाप्ति पर अनेक विनती जकरा बीनी कहल जैत छैक केर गायन महिला सब उच्च स्वर मे भक्तिभाव सं करैत छथि। पांच बीनी मे अन्तिम बीनी ई प्रमाणित करबा लेल तर्कसंगत छैक जे कोना एहि पाबनि मे सब वस्तु संगे सद्भाव आ संग रहबाक उक्ति व्याप्त छैक: दीप-दीप हरा जाथु घरा। मोती-मानिक भरथु घरा।। नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु। पांच बहिन बिषहरी बढ़थु।। बाल बसन्त भैया बढ़थु। डाढी-खोंढी मौसी बढ़थु।। आशावरी पीसी बढ़थु। बासुकी राजा नाग बढ़थु।। राही शब्द लए सुती। कांसा शब्द लए उठी।। होइत प्रात सोना कटोरा मे दूध-भात खाई।। साँझ सुती प्रात उठी पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी।। ब्रह्माक देल कोदारि विष्णुक चांछ्ल बाट।। भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा। ताहि बाट आओताह ईश्वर महादेब।। पडल गरुड़ केर ढाठ। आसतिक- आसतिक, गरुड़-गरुड़ .. आब एहि गीत संग मिथिला चलू। मिथिला मे बरसात के समय मे खेत-पथार, पोखरि इनार, कलम-गाछी सब किछु पानि सं भरि जैत अछि सावन-भादब मे। आब साँप आ नाना तरहक कीड़ा-मकोड़ा पानि के डर सं उचगर आ रुख स्थान दिस आबय लगैत अछि। मालक घर, मनुखक घर, चार, दरबज्जा आ कत-कत नहि आबि जैत अछि। अयबाक उद्देश्य कुनो ककरो छति पहुचेबक नहि अपितु पानि सं प्राण रक्षा आ भोजनक ब्योंत रहैत छैक। आ ठीक अही समय मे मधुश्रावणी पाबनि पूजल जैत छैक। एकर उद्देश्य छैक जे हे नाग आ आन कीड़ा-मकोरा सब जेना मनुखक वंश वृद्धि होइत छैक तहिना तोरो सबहक होब। मनुख आ तों एक संग दोसर के रक्षा करैत एहि पृथ्वी पर निवास करैत रह। तोरा खेबाक लेल वस्तु आ पीबाक हेतु हम दूध अर्पित करैत छी। हमरा, हमर पति के आ सगा-सम्बन्धी के तों क्षति नहि पहुचाबह. हे नाग आ कीड़ा मकोरा के स्वामी शिव, हम अहांके पूजा अर्चना करैत छी। हे तंत्र केर जन्मदाता, हम अहांके निवेदन करैत छी, अहाँक यशगान करैत छी जे सब संगे हमरो सबहक रक्षा करू। हे नाग अहाँ रक्षा करू, हे गरुड अहुं रक्षा करू। अहि गीत के अगर ध्यान सं सुनब त लागत जे ई गीत कम आ तंत्रक मन्त्र अधिक अछि। एकरा गेबाक अंदाज, स्वर सब किछु अलग छैक। महादेब संगे ब्रह्मा, विष्णु केर सेहो गोहरायल जैत छनि एहि गीत मे। गाय केर गोबर, दूध आदिक प्रयोग गाय केर उपयोगिता के देखबैत छैक ओतहि नाना तरहक वस्तु के प्रयोग सब मे सामंजस्य। पाबनि त मूलतः ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ मे होइत छैक मुदा एकर विधान आ सामग्री के जुटान मे अनेक जाति के सहभागिता होइत छैक। उदहारण के रूप मे सरबा, मङ्गल कलश कुम्हार सँ;डाला, बियनि, चंगेरा आदि डोम सँ; लहठी चूड़ी आ अन्य वस्तु लहेरनी सँ एवं अन्य सामग्री बज़ार सँ आनल जाइत छैक। ई सामंजस्य कथो मे अनेक ठाम अनेक प्रसंग आ उप-प्रसंग मे भेटैत छैक। कथा केर मूल नायक आ नायिका - बाला लखेंद्र आ बिहुला, बनिया अर्थात सौदागर समाज सँ छैक। तंत्र के ज्ञान, गूढ़ रहस्य जे बुझबैत छैक से धोबिन छैक, धामि केर चर्च सेहो होइत छैक जे छोट जाति केर छैक। कथा स्थानीयता के सीमा के सेहो तोरैत एकरा सार्वभौमिक बनबैत छैक। से कोना? ऐना जे चरित्र सब मिथिला सँ बाहर के सेहो छैक। कथा मे अनेक देवता, देवी, गण के भूमिका छैक। सब एक व्यवस्थित आ समन्वय के विधान के निर्माण करैत छैक। आब पूजा के विधिवत समाप्ति के बाद कथा प्रारंभ होइत छैक। एक अनुभवी महिला जिनकर स्मरण शक्ति, उच्चारण आ कहबाक शैली के संगे गीत आ फकरा सुनेबा मे महारत रहैत छनि से एहि कार्य के संपादन करैत छथि। कथा पांचो बहिनी बिषहरि सं शुरू होइत छैक। कोना एक बुढ़िया एक चिकनी पात मे लहलहाइत पांच सापक पोआ के देखैत अछि। आ बूढी के गाम आबि ओकर वृतान्त कहब सं पूजाक पद्धति प्रारम्भ होइत छैक। फेर बिषहरी के जन्म होइत छनि। दोसर दिन केर कथा एक नव मोड़ लैत छैक कारण एहि मे एकाएक मनसा के प्रवेश होइत छनि। मनसा के प्रवेश होइते मातर नाग आ तथाकथित पैघ देवता (ब्रम्हा, विष्णु एवं अन्य) के बीच आ दुनु के भक्त के बीच द्वन्द प्रारंभ होइत छैक। बिहुला आ चंदु सौदागर क्लासिक देवता के पूजक छथि जिनका मनसा जे मूल रूप सं नागक देवी छथि आ जिनका बारे मे इहो कहल जैत छैक जे ओ शिबक मानस पुत्री छथि, केर संग द्वन्द। चंदु सौदागर मनसा के अस्तित्त्व के स्वीकार नहि कर चाहैत अछि फलस्वरूप मनसा अपन नाग-नागिन सं ओकर सब संतान के डंसि क ख़तम केने जा रहल छैक। ओकर अन्तिम बालक केर नाम बाला लखेन्द्र छैक जकरा बारे मे ई छैक जे ओकर जाहि दिन विवाह हेतैक ओही दिन मनसा के साँप ओकरा डंसि लेतैक आ अहि तरहे चंदु सौदागर के वंश समाप्त। आब चंदु की करे ? धैर्य सं काज लैत अछि। चंदु के पता चलैत छैक जे बिहुला नामक एक लड़की छैक जकरा अखण्ड सोहागबती रहबाक वरदान छैक। चंदु अपन पुत्र बाला लखेन्द्र केर विवाह बिहुला सं कर दैत छैक। दुनू लेल एक शीशा के घर बनैत छैक। मुदा साँस लेबाक हेतु एकै रत्ती भूर छोडि दैत छैक। ओहि भूर सं अपन नाग के भेजि मनसा बाला लखेन्द्र के डंसि लैत छैक। आब की हो? बिहुला कहैत छैक, “एक केरा के थामक नाव बना जरुरी के सामान राखि हमरा बैसा दिय। हम अपन पति के माथ अपन कोरा मे ल नदी के प्रवाह संगे बहैत एकर कुनो समाधान करय चाहैत छी।” सैह व्यवस्था होइत छैक। बिहुला अपन पति के लाश लेने नदी मे चलल जा रहलि अछि। लाश आब गलनाई शुरू भ गेलैक मुदा बिहुला के हिम्मत एखनो दृढ़ छैक। जैत-जैत एक ठाम देखैत छैक जे एक धोबिन नदिक कछेर मे कपडा धो रहलि छैक। ओकर एक छोट बच्चा बेर-बेर ओकरा परेशान क रहल छैक। तंग आबि धोबिन अपन बच्चा के कंठ मचोडि दैत छैक। बच्चा मरि जैत छैक. आब धोबिन निश्चिन्त भ कपडा धोबैत अछि। बिहुला के बड़ आश्चर्य भेलैक! “कोना एक माय अपन संतान के छोट बात लेल जान मारि सकैत अछि?” बिहुला सोचैत छैक। बिहुला के होइत छैक जे जरुर अहि मे कुनो रहस्य छैक। आब ओ अपन नाव के कात लगा दूर सं धोबिन के निरिक्षण करैत छैक। जखन कपड़ा धोआ जैत छैक त धोबिन नदी सं अँजुर मे पानि ल मन्त्र पढ़ैत बच्चा पर फेकैत छैक. पानि परिते देरी बच्चा फुरफुरा क उठि जैत छैक। बिहुला बुझि जैत छैक जे ई धोबिन सामान्य महिला नहि अछि। ओकरा हांक लगबैत अपन व्यथा कहैत छैक। आब कहानी मे अते सं तंत्रक पूर्ण यात्रा शुरू होइत छैक। धोबिन के कहला पर बाला लखेन्द्र के लाश के ओतय छोडि दुनू गोटे शिव लोक मे जैत छैक। बीच मे अनेक कथा आ कथा केर उपकथा अबैत छैक। बिषहरी के कथा आ हुनकर बारह नाम – जगत गौरी, मनसा, जरत्कारू, वैष्णवी,सिध्ह्योगिनी, नागेश्वरी, शैवी, जरत्कारू-प्रिया, नाग-भगिनी, आसतिक माता, बिषहरी एवं महाज्ञानयुक्ता। कथा खेपे-खेपे चलैत रहैत छैक – मंगला-गौरीक कथा, पृथ्वीक उत्पति केर कथा, समुद्र-मंथन केर कथा, सतीक कथा, पतिव्रताक कथा, महादेब केर परिवारक कथा, गंगाक कथा, गौरीक जनम, गौरीक तपस्या, गौरीक विवाह, मैनाक मोह भांग, कार्तिक आ गणेश केर जन्म, संध्या केर विवाह आ लीली केर जन्म,पतिव्रता सुकन्याक कथा, बाल बसन्त केर कथा, गोसाउनिक कथा, श्रीकर राजा केर कथा, आ अंत मे गणेश भगबान द्वारा सोहाग माथब। अहि बीच बिहुला केर कथा चलैत रहैत छैक। कथा सब मे तंत्र छैक, बुझौअल, छैक, गीत छैक, सब किछु छैक। कथा मे हिन्दू धर्म के बहुत मूल तत्व के ज्ञान सेहो छैक। स्त्रीगन के व्यवहार, ओकरा समाज मे रहबाक लूरि, पति, संतान, श्रेष्ठ, देवता, पितर, आदिक सम्मान आदिक ज्ञान भेटैत छैक। ऊँच-छोट के भेद के कोना पाटिक जीवन के चलेबाक चाही तकर प्रशिक्षण देल जैत छैक। सब प्रमुख धार्मिक चरित्र आ आदर्श महिला के सम्बन्ध मे विवरण देल जैत छैक। अहि तरहे मधुश्रावणी केवल पाबनि नहि अपितु 13-15 दिनक कार्यशाला होइत छैक जाहि मे एक लड़की के ससुर जयबा सं पूर्व आ गृहस्थी सम्हारबा सं पहिने एक प्रशिक्षित महिला बना देल जैत छैक। ओ बच्ची सं दुलहिन आ फेर दुलहिन सं गुनमति नारि अथवा सम्पूर्ण मैथिलानी बनि जैत अछि। मधुश्रावणी मे नाग नागिन के मनुष्य स्वरुप मे कल्पना कैल जैत छैक आ तदनुसार हुनका लेल वस्त्र, श्रृंगार, आभुषण सब किछु सं मोन मे सुसज्जित के गीत गाबि स्मरण कैल जैत छैक। एक गीत देखू: पियरी अँचरी बिषहरी के नामी-नामी केस। घुमैत एली बिषहरी तिरहुत देस। तोहरो सिंगार बिषहरी लाबा आ दूध। हमरो सिंगार बिषहरी सिर के सिन्दूर। तोहरो सिंगार बिषहरी कोर भरि पूत। फल बीच गुअबा नवेद बीच पान। देवी बीच बिषहरी मैया दोसर नहि आन। मधुश्रावणी एक हिसाबे महिला के सत्ता के प्रतीक अछि. सब काज, विध, मन्त्र- पूजा महिला द्वारे प्रतिपादित होइत छैक। पुरुष केर कोनो भूमिका नहि। तंत्र के शक्ति एहेन जे छोट-पैघ सब एक ठाम आबि जैत अछि। सब तरहक देवता मे आपसी सौहार्द्य के सूचक अछि मधुश्रावणी। अंत मे सब ठाम होइत नदी केर कछेर केर धोबिन संगे बिहुला वापस अबैत अछि. बाला लखेन्द्र के लाश मे प्राण आबि जैत छनि। ओ आरो सुन्दर आ सोहनगर भ जैत छथि। चंदु सौदागर के सब बेटा आ सम्पति फेरो आबि जैत छैक। ओकर सब बेटा सेहो जिबित भ जैत छैक। चंदु आब आन देवता संगे अपन पुतहु के कहला पर बिषहरी आ मनसा के पूजा अर्चना शुरू क दैत अछि। सब किछु शुभ होमय लगैत छैक। एहि पाबनि आ कथा के जे ध्यान सँ सुनल जाय आ एकरा गुनल जाय त पता चलैत छैक जे शास्त्र पर लोक जेना कतौ-कतौ भारी पड़ैत हो! अंततः, चंदू सौदागर के भले अपन पुतहु आ बेटा के कारणे, मनसा देवी आ विषहरी के प्रभुत्व मानबाक हेतु बाध्य होमय पड़ैत छैक। एहि कथा मे एक बात स्पष्ट ई होइत छैक जे अगर बहुत बात शास्त्र मर्यादा के नाम पर बहुत बात अथवा क्रिया अथवा दृष्टान्त देबा लेल मना क दैत छैक मगर लोक ओही बात लेल ओकर व्यवहारिक पक्ष के देखैत उदार भ जाइत छैक। उदाहरण के रूप मे लोके मे ई हिम्मत भ सकैत छैक जे गौरी के छिनारि कहैंन; महा मर्यादित महादेव के मैथुन आ काम कर क्रिया मे लिप्त देखा देनि। यद्यपि उद्देश्य शिक्षा ग्रहण करक होइत छैक। एकर एक अर्थ एहो भ सकैत अछि जे नव व्याहता के ई बता दी जे काम अथवा यौन क्रिया शाश्वत प्रक्रिया छैक। एकरा मनुष्य आ जिव जंतु के बाते छोड़ि दी देवता, देवी सब स्वीकार करैत छथि सृष्टि के चलेबाक हेतु अहि मे संलग्न रहैत छथि। ई कदाचित सफल गृहस्थ जीवन जीबाक मूल मंत्र छैक। मधुश्रावणी पाबनि केर लिंक सूत्र छैक मनसा आ विषहरी केर आराधना। मनसा अर्थात नागक देवी। मनसा आर्थत ओहेन देवी जिनका शक्ति त छनि मुदा हुनकर सत्ता मानबाक लेल मुख्यधारा के देवी देवता केर भक्त सब सहज भाव सँ तैयार नहि अछि। मनसा एक एहेन देवी छथि जे अपन छोट स्वरुप अर्थात स्थानीय स्वरुप के विस्तार अखिल भारतीय स्वरुप मे करय चाहैत छथि। मनसा के इच्छा छनि जे हुनका सब वर्ग, जाति आ समाज के लोक पूजा करय, हिनकर गुणगान करय। मुदा ई काज ओतेक सहज नहि अछि। छोट जाति के लोक हिनकर सत्ता के स्वीकारि लेलक। स्त्रीगण सेहो ओही दिस बिदा भेली मुदा पुरुख कोना मानत? ई कनि पैघ प्रश्न अछि। मनसा हिमालय सँ चलैत छथि आ नेपाल, तराई बला मिथिला, भारत बला मिथिला, असम, बांग्लादेश, बंगाल, ओड़िसा, होइत फेरो मध्य आ उत्तर हिमालय धरि व्याप्त रहैत छथि - उत्तराखंड, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश धरि। मनसा संगे बिहुला केर कथा नेपाल, मिथिला, बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा धरि मूल कथा सँग डारि-झारि मे कनि-मनि फेर बदल सँग चलैत रहैत अछि। उत्तराखंड आ हिमाचल मे मनसा केर अनेक कथा प्रचलित अछि। साँप के प्रभाव आ भय के स्वीकार करैत लोक वर्ग, समुदाय, लिंग आ जातिक सीमा सँ उपर उठैत मनसा देवी के समक्ष नतमस्तक होइत छथि। यैह प्रभाव मिथिला मे सर्वहारा वर्ग मे आ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ केर स्त्रीगण मे भेटैत अछि। मुदा हमरा अगर हम समाजशास्त्रीय ढंग सं मधुश्रावणी केर विवेचन करैत छी त ऐना लगैत अछि जे पितृसत्तात्मक समाज किछु अनरगल प्रभाव एहि मे बिध आ पूजा के नाम पर घुसा देने छैक जाहि सं मानशिक स्तर पर महिला सब ओहि परम्परा के नाम पर अपना के स्वयम शोषित आ प्रतारित करैत रहैत छथि। अनेक ठाम सती केर महत्त्व के गुणगान कथा सब मे अनेक बेर अबैत छैक। धर्म, पूजा-पाठ, गिरहस्ती, प्रेम-अनुराग, तंत्र-मन्त्र, पितृ, देवता, प्रकृति, प्रकृति केर अवयव – फुल, पात, साँप, चिरै, धर्म ग्रन्थ केर सार; निक आ अधलाह मे अंतर करब, पुन्य आ पापक बीच अंतर आ निक मार्ग केर चुनाव, मानवधर्म केर पालन,स्त्री धर्म केर निर्वहन, आर ने जानि की की मुदा एहि पाबनि केर अन्तिम दिन जे कनिया के ठेहुन टेमी सं दगबक प्रथा अछि से बड़ अमानवीय। बल्कि ई कहि सकैत छी जे सती प्रथा के बांचल हिस्सा जकां अछि। सब महिला, माय, पितियाईन, दाई, सखी-बहिनपा एहि बात सं दुखी रहैत छथि जे कोना एहि जरैत टेमी के सेहो एक बेर नहि तीन-तीन बेर धाह केर घाव के वर्दाश्त करती! परन्तु परंपरा लाचार केने छनि। की क सकैत छथि? अगर निक सं फोका हेतनि त अचिर सोहागबती हेती। पति के सब किछु निक हेतनि। ताहि ओकर पालन हेबे करत। आब एकहि उपाय रहि जैत छनि जे सुरुज भगवान सं निवेदन कैल जाय जे ओ अपन रौशनी मे श्निग्धता आनथि, अग्नि कोमल भ जाथि, पानक पात ओना त शीतल होइत अछि मुदा ओ आरो शीतल भ जाय जाहि सं दागै काल बेटी शीतल के कम वेदना होनि,पाहून मधुर हाथ सं आंखि झापथि, गंगाजल आ आन जल खूब ठंढक प्रदान करय, टेमी के धाह मधुर-मधुर जरै, चानन केर लेप आरो शुशितल भ जै जाहि सं परम्परा के निर्वहन करैत कनिया के ठेहुन दागल जा सकै: शीतल बहथु समीर दहो दिश शीतल लथु उसासे। शीतल भानु लहुक लहु उगथु शीतल भरल अकासे। शीतल सजनी गीत पुनि शीतल शीतल बिध बेबहारे। शीतल मधुश्रावणी बिधि हो शीतल बसन सिंगारे। शीतल घृत शीतल वेरु बाती शीतल कामिनी अंगे। शीतल अगर सुशीतल चानन शीतल आबथु माँगे। शीतल कर लय नयन झँपाबह शीतल देलहुँ पाने। शीतल हो अहिबात कुमर सँग शीतल जल असनाने ।। गीत, बिध-बबहार सब किछु शीतल होबक चाही। वर अपन कोमल हाथ सँ आँखि झापथि, घी, बातिक सङ्गे टेमिक अग्निक सेहो शीतल भ जाय, पवन शीतल मंद भ बहै, वस्त्र आ सिंगारक सामग्री सेहो शीतल होइक जाहि सँ बेचारी नायिका अहि प्रथा के पालन करैत अपन ठेहुना के दगबा सकैथ। एक गीत मे त कनिया केर माय आ आन महिला सङ्गे हुनकर कुमर अर्थात वर सेहो अपन हाथ सँ ओना त नायिका के आँखि झाँपने रहैत छथि मुदा वेदना देखि द्रवित भ जाइत छथि। ह्रदय केर वेदना दुनू आँखि सँ नोर भ झहरै लगैत छनि: आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख कियै पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय किये कामिनी पल पल लैह उसासे। कुमर नयनसँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावणी विधि परम कठिन इहो रीते। मधुश्रावणी केर विध-बेभहार त सब के विध्वंसक आ स्त्रीगन के शारीरिक आ मानशिक शोषण केर एकटा वीभत्स परंपरा बुझना जा रहल छनि। धिया के दर्द हेतनि से बेचैनी सेहो छनि। बिधक पहिने आ विधक बादक दर्द हेतनि से जानि बहुत चिंतित रहैत छथि। मुदा विध के त्याग भला कोना सकैत छथि? एहि मे धिया के कल्याण छनि – अचिर सौहाग्यवती होबाक कल्याण, पुत्रवती होबाक कल्याण। अतेक सुन्नर पाबनि मे मात्र ई बिध कनि अन्कच्छ्ल लगैत अछि। एकरा समाप्त क देबाक चाही। समय बदलि रहल छैक। आबलड़की सब सेहो प्रतिकार करक अवस्था मे छथि। बाल विवाह मिथिला मे समाप्तप्राय अछि।ठेहुन दगबा के प्रतीक मे केवल टेमी धाह उपर सं देखा विध पूरा कैल जा सकैत अछि। अतेक निक पाबनि के मात्र ई छोट सन बिध जाहि मे धिया के सब उमंग आतंक मे बदलि जैत अछि, हमरा कोनादन लगैत अछि। अहि टेमी बला पर स्त्रीगन, पुरुष, संस्कृत के विद्वान मिल शीघ्र निर्णय लय एकरा समाप्त करथि अथवा प्रतीक मात्र राखथि। ओना कियोक भावुक कहि सकैत अछि, मुदा हमरा ऐना बुझना जैत अछि जेना बिना कुनो कसूर के सीता के अग्नि परीक्षा लेल जैत अछि। सीता के माँ, पितियाइन, जेठ बहिन, भौज सब मौन भेल तरपैत सीता के देखैत छथि! बड्ड भेल, एहि पर सोच आवश्यक। निक आ अधलाह त सब परंपरा मे रहैत छैक।जे हो मधुश्रावणी एक बहुत उत्तम पाबनि अछि। एकर निर्वहन होबाक चाही। ई अतेक पैघ विषय थिक जकरा पर पूरा पोथी लिख सब बात पर गंभीरता सं विचार राखल जा सकैत अछि। मुदा सब बात अगर एत लिखब त फेर पढ़नाइ दुर्लभ। ताहि अतय विराम दैत छी। मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव डॉ. सविता झा खान हालहिं मे ओ एक जिज्ञासा केने छली: “मैथिल विश्व-दृष्टि मे इरोटिका वा कामुकता मुख्यधारा मे अछि की सबवर्ज़न (सबवरज़न माने स्थापित मुल्य, सत्ता आ शक्ति के खिलाफ) के रुप मे”। हमर जे अपन शोधक अनुभव अछि ताहि के आधार पर कहि सकैत छी जे अगर मुख्यधारा के अर्थ लोक अथवा जन समुदाय अछि त कामुकता मुख्यधारा के चीज़ थिक आ ई मिथिला मे भारतक बहुत आन ठामक परंपरा जकां अदौं सं विद्यमान रहल अछि, मान्य रहल अछि। खास क विवाह के समय आ ओकर बादक बिध व्यवहार मे गीत आ आन माध्यम सं कामुकता के प्रदर्शन होइत अछि तकर जतेक वर्णन करी से थोड़। शायद बिध बेभारक माध्यम सं बर आ कनिया के काम के प्रति परिपक्व आ एक दोसरक समीप लेबाक ई उत्तम प्रक्रिया छैक। उदाहरण के लेल लाबा छीट’ काल लाबा जे छैक ओकरा अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करब त कनिया अथवा बर के मन मे उठैत रंग-विरंगक प्रेम, अभिसार केर तरंग छैक। काम इच्छा के भावक प्रतीक छैक। ऊपर सं गीतक शब्द जाहि मे महिला सब बर आ कनिया के झिझक वर के माता आ कनिया के पिता; वरक दाई आ कनिया के पितामह, वरक मामी आ कनिया केर माम आदि सम्बन्ध केर संग जोडि ओकरा आरो रमनगर आ दुनू लेल इजी गोइनिंग अथवा सहज बना दैत छैक। एक उदाहरण देखू: बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक बाबी कनियाक बाबा संगे सुताउ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक माय कनियाक बाबू संगे सुताउ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक बहिनी कनियाक भैया संगे सुताउ दुनू घर गुजर चलाउ ........ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ ओना त ऊपर वर्णित गीत सहज लगैत छैक। मुदा अपन गायकी आ लोकक समर्पण, बिधक उद्देश्य आ लाबा छिडियाएब केर क्रिया आ लड़की सब द्वारे ओकरा लेल छीना-झपटी सब नव बर आ कनिया के अभिसार हेतु सहज क दैत छैक। धोखेनाई केर बात समाप्त भ जैत छैक। अहि पूरा गीत मे बरक दाई, माय, आ बहिन सब आ कनिया केर पितामह, पिता, आ भाई सब पात्र भ जैत छैक जकरा बीच परिहास केर सम्बन्ध उचित आ समाज सम्मत मानल जैत छैक। अहिना एक विध पटिया समेटब आ ओछाएब के होइत छैक। अहु बिध केर उद्देश्य बर आ कनिया के अभिसार आ रति-रभस लेल तैयार करब, सम्बन्ध के प्रगाढ आ सहज करब थिक। एक छोट सन गीत देखब त एकरो अर्थ बुझबा मे कोनो भांगट नहि हैत। गीत देखू: सब रंग पटिया समटू सोहबे दुलहा सं ओछबाउ हे पटिया ओछयबामे कसमस करता मारब चाट घुमाय हे टेढ़-तूढ जुनि पटिया ओछाएब रूसि रहती सुकुमारि हे हँसी-ख़ुशी पटिया ओछाएब हँसती सिया सुकुमारि हे .. कतेक आनंद, उल्लास, रंग आ वैविध्य सं भरल ई छोट सनक गीत छैक! नाम लेल पटिया छैक मुदा छैक बहुरंगी। सखी सब गीतक मादे कनिया के केलि-कीड़ा केर प्रैक्टिकल ज्ञान देमक यत्न क रहलि छथि। बर के कोना सोसिअलाइज करी से युक्ति बता रहलि छथिन। पटिया ओछायबक हेतु बर के कहथिन से बता रहल छथिन। अगर त्रुटि होइत छनि त प्रेमक चाट मरबा लेल उकसबैत छथिन। प्रेमक चाट दुनू मे साम्पिय स्थापित करबा मे सहायक हेतनि तखन ने बात आगा बढ़तनि? रुसब-बौंसब केर कला केर ज्ञान द रहल छथिन हँसब-बाजब के गुण बता रहल छथिन। सब सं पैघ बात ई जे कोनो बात छुपल नहि, चोरैल नहि। सब स्त्रिगन – दाई, माय, पितियाइन, भौजी, जेठ बहिन सबहक समक्ष आ सबहक अनुमति सं। एक बात इहो, सब सखी सब ओहि पर पिहकारी मारैत प्रहसन के आरो अनुरंजक बनबैत रहैत छथि। एकर स्पष्टीकरण निम्लिखित गीत मे अछि: सबरंग पटिया समटू हे सोहबे दुलहा देता ओछाय टेढ़-टूढ जों पटिया ओछाओता रुसि रहब सुकुमारि हे हे कसार मसरने पटिया ओछोता मारबनि चाट घुमाए हे हँसी-खुशी सं पटिया ओछोता तखन हंसथि सुकुमारि हे आब गीतक एक-एक शब्द के देखब त लागत जे समाज कतेक उदार भाव सं इरोटिका के स्वीकृति द रहल अछि। लेकिन एहि इरोटिका मे यौनाचार अथवा यौन विकृति के सम्बाद अथवा प्रतीक नहि छैक। मर्यादित इरोटिका जकरा लोकक भाषा मे हँसब-ठेठायेब सेहो कहि सकैत छी। एहेन इरोटिका जे श्रृंगार, शब्द व्यंजना, भाव, विध-बेभार, आ संस्कार सं सुसज्जित अछि। जकरा मर्यादित स्वरुप मे समाज मान्यता प्रदान करैत छैक। मिथिला मे विवाह के संग एक क्रिया जोगक होइत छैक। जोग के प्यूरिस्ट सब योग कहि सकैत छथि। दुनू के अर्थ एक भेल – जुड़ब अथवा जोड़ब। बर के कनिया सं आ कनिया परिबार के बरक परिवार सं। लेकिन मुख्य रूप सं बर-कनिया के जुडब – मानशिक, शारीरिक आ सामाजिक स्तर के संग-संग मनोवैज्ञानिक स्तर पर सेहो महत्त्व रखैत छैक। जोग मे बर आ कनिया के गीत सं, बिध-बेभार सं, आ तांत्रिक क्रिया सं सेहो जोड़क परंपरा रहल छैक। तांत्रिक क्रिया मे परिहास आ गीतक चासनी लागल रहैत छैक। नैना जोगिन के बिध मे मानल जैत छैक जे बंगाल, अथवा हिमालय अथवा कामख्या सं एक हाँकल योगिन अबैत छैक। गीत मे कखनो काल गीतगाइन सब अपना आप के तिरहुत के एक नंबर के फेरल जोगिन प्रमाणित करैत छथि। जोगक एक उद्देश्य बरक ध्यान अपन माय-बहिन सं अधिक कनिया दिस आकर्षित करब सेहो छैक। जोग मे गीत गेबाक शैली पूरा तंत्रमय भ जैत छैक। कखनो काल क धरती, अकास, समुद्र,पहार सब चीज़ के बान्हब आ अधिन करब के चर्च होइत छैक। जोग द्वारे असंभव काज के संभव करक बात होइएत छैक। निम्नलिखित जोग गीत के देखू: माइ हे सात बहिन हम जोगिन नैनहु थिकी जेठ बहिन माइ हे तिनकहूँ सं जोग सिखल तिन भुवन जोग हाँकल माइ हे समुद्रहु बान्ह बन्हाओल तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे तरहथ दही जनमयलहूँ तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे सुखाएल गाछ पन्हगेलहु तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे बांझिक कोखि पलटलहूँ तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे भनहि विद्यापति गाओल जोगिनिक अंत न पाओल .... एहि जोग गीत मे जोगिन अपन कला अथवा तंत्रक ज्ञानक महिमा मंडित क रहल छैक। एकरा जखन स्त्रीगन सब गबैत छथि त लागत जे अथर्ववेद वेद केर मन्त्र के कल्लोल भ रहल अछि। तंत्र सं केहनो असंभव काज भ सकैत अछि; धरती,अकास आ पाताल के हाँकल जा सकैत अछि, समुद्रके बान्हि सकैत छी, तरहत्थी मे दही जमा सकैत छी, सुखैल ठुठ गाछ मे प्राण आनि ओकरा हरियर कचोर क सकैत छी, केह्नो बाँझिन के कोखि मे संतान डालि सकैत छी। आ ई सब क सकैत छी ताहि त हमर सबहक नाम जोगिन अछि। विद्यापति कहैत छथि, “एहि जोगिन सब के अंत कियोक नहि पाबि सकैत अछि!” आई काल्हि लड़की सब रैंप पर उतरैत छथि, बिलाई के चालि चलैत छथि अर्थात कैट वाकिंगकरैत छथि। लटका मटका झारैत छथि। शरीर आ वस्त्र के कमोतेजक सौन्दर्य सं दर्शक के अपना दिस आकर्षित करैत छथि। करक चाही। एहि मे कोनो हर्ज नहि। ठीके त कहल जैत छैक, “सोच बदलबाक जरुरत छैक, वस्त्र नहि”। जोग गीत मे एहने भाव बल्कि अहू सं रमनगर, आ कामोत्तेजक भाव नव व्याहित कनिया द्वारा प्रदर्शित होइत छैक। स्त्रीगन सब गीत गबैत छथि कनिया कमर मटकबैत, नव वस्त्र सं झापल अपन देहक उभार के देखबैत, आभुषण सं पैर के छम-छम करैत, चूड़ी आ कंगना के खनखन करैत चलैत छथि आ पाहून के अपना दिस मोहित करैत रहैत छथि। पाहून के ध्यान कनिया छोडि ककरो लग नहि जाइन ताहि हेतु कनिया के माय पितियाइन तांत्रिक क्रिया क देने छथिन। पाहून के नोन पढि खुआ देल गेल छनि,हुनकर पाग के ताग निकालि ओकरा तांत्रिक क्रिया द्वारा खन्ती के तर मे गारि देल गेल छनि। आब ओ पूरा कनिया के अधिन छथि। कनि एक एहेन जोग गीत जे एहि तरहक बात कहैत अछि के देखैत छी: जोग जतिन हम जानल पहचानल गुनगर कैल जमाय अधिनक राखब रुनुकि-झुनुकि धिया चलतीह’ पहु देखताह’ पागक फेंच उघारि ह्रदय बीच राखल जखन धिया मोरी चलतीह’ पहु तकताह’ नागरि कैल जमाय अधिन क राखल हमर जोग नागर’ गुण आगर’ सात खण्ड नव दीप जोग अवतारल भनहि विद्यापति गाओल फल पाओल गुनगर कैल जमाय अधिन क राखब.... बाह रे प्रेम। तंत्र सँ बान्हल सिनेहक डोरी। गीत मे एक सँग कमनीयता, सौन्दर्य, दैहिक सौष्ठव, आ स्त्रीगनक अधिकार पुरुख पर देखार भ रहल अछि। धिया के चलब, धिया के देखब, पहु के ताकब, जोगिन के अधिकार सब एक संगे प्रबल बेग सँ प्रमाणित होइत। एक जोगक गीत मे त जोगिन ताल ठोकि कहैत छथि जे "आब अतेक क्रिया आ तंत्र सँ पहुँ के बाँधि देने छियैन्ह जे ओ कतहु जाथि, अंततः घुरि फिर क हमरे लग एता। जेता कत? माइ हे हमरहु जँ पहुँ तेजताह फल बुझताह माइ हे बान्हि देबनि बनिसार अधीन भय रहताह माइ हे चान सुरुज जकाँ उगताह उगि झपताह माइ हे नैन नैन जोड़ल सिनेह फलक नहि छोड़ताह माइ हे नाव डोरी जकाँ घुमताह घुमि अओताह माइ हे मकरी देबनि ऐंठि देहरि धेने रहताह माइ हे भनहि विद्यापति गाओल फल पाओल माइ हे गौरी के बढ़नु अहिबात सुन्दर बर पाओल।। कहक तात्पर्य भेल जे गीत जे गाबि रहलि छथि तिनका अपना तंत्र पर गुमान छनि। जेना सुरुज-चना आँखि मिचौनी करैत रहैत अछि; तहिना नायक आ नायिका के नैन सँ नैन मिल गेल छनि आ ओकरा तंत्रक मन्त्र सँ बान्हि देल गेल छैक। ककर मजाल जे ओहि डोरी के तोड़ि सकै? बर त कनिया सङ्गे नावक डोरी जकाँ जुड़ल छथि, कतहु जाथि अंततः वापस आबहे पड़तनि। आरो बहुत उपमा छैक जकरा बुझनाई कुनो मुश्किल नहि। अतेक तंत्र केर बात होइत अछि। किछु एहनो लोकक तंत्र पर काज होबाक चाही। बात बहुत किछु अछि। एखन एतबे।।। तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति मिथिलाक संस्कृति केर दू अभिशाप अछि: तमाकूल आ भांग। पता नहि कोना ई दुनू इलम मैथिली संस्कृति सं जुडि गेल? दुनू के सेवन मिथिला मे नशा केर श्रेणी मे नहि अबैत अछि। तमाकूल त बाप सं बेटा, चरबाह, हरबाह सं गिरहत तक मांगि खैत छथि। तमाकूल के नाम सुनिते मैथिली के एक चर्चित गीत जकरा आइयो बहुत सुवाद सँ सुनल जाइत अछि स्मरण आबि जाइत अछि: मामा यौ कनि खैनी दीय अपनों खाऊ कनि हमरो दीय जौं नहि देब त कहि देबनि हम मामी के तमाकूल के खैनी, सुरती, तम्बाकू आदि नाम सं जानल जैत अछि। ई अपन समग्र अवस्था मिथिला के संस्कृति मे रचल बसल अछि। लोक त बारी-झारी मे खेबा जोग तमाकूल उपजा लैत छथि। फेर ओकर कटनी, छटनी करैत छथि। शीत-रौद देखबैत छथि आ अंत मे खर मे राखि साल भरि लेल जमा करैत छथि। तमाकूल के ऐंठी आ जूम मे सेहो कला देखि सकैत छी। कम्पनी सब के आबि गेलाक बाद सकरी कट आ आरो रंगक तमाकूल बाज़ार मे उपलब्ध अछि। कनि तेज लगबा लेल कम्पनी सब ओहि मे एसिड डालि दैत छैक। लोक कहता, “बड्ड चहट्गर अछि।” तमाकूल लोक सीधे चून लगा खाइत छथि, नोसि लेत छथि, बीड़ी मे, सिगरेट मे, चुरुट मे, सिगार मे, पाइप मे, गुटखा, गुड़ाखू, गूल आ नहि जानि कथी-कथी मे प्रयोग होइत अछि। आर त आर एकटा गूल केर कम्पनी "गुलाब गूल" नाम सँ अपन प्रोडक्ट बनबैत छ्ल। ओहि डिब्बा मे एक चहटगर स्लोगन रहैक - "गूल हमारा आविष्कार है"। आब कहु, कुनो जोड़ अछि एकर महत्त्व के? मुदा जे सबसँ खतरनाक तरीका तमाकूल खेबाक अछि से अपन मिथिला आ आसपास केर क्षेत्र मे देखल जाइत अछि - शुद्ध तमाकूल मे चून मिला आ चुनेटि क ठोर मे आँगुर सँ ठुसि लेनाइ। ई साक्षात् यम के नौत देबाक प्रथा अछि। ऊपर सँ ई लोक के असभ्य आ सुचिता के सिद्धान्त सँ दूर सेहो भगबैत अछि। लोक तमाकूल ठुसि यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकैत रहैत छथि। ई एहेन पपियाह लत अछि जे समाजवाद केर सिद्धांत पर अटकल अछि। समाजवाद, मार्क्सवाद,लेनिनवाद के जोड़ सँ पकड़ने अछि। की ब्राह्मण आ की हरिजन, की हिन्दू आ की मुस्लमान, ईसाई आ बहुत ठाम स्त्रीगण तक एकर स्वाद सँ झुमैत रहैत छथि। अतेक समाजवादी जे रिक्शा पर चढ़ल हाकिम रिक्शावाला सँ दांत निपोड़ैत बिना कुनो मान सम्मान के चिंता केने तमाकूल माँगि अपन ठोर मे ठुसि लैत छथि। रिक्शावाला सेहो जे कनिकबेकाल पहिने लघुशंका केने छ्ल आ पानि के अभाव अथवा आर कुनो कारणे हाथ नहि धोने छ्ल अपन ओहि पवित्र हाथ सँ खूब मोन सँ तमाकूल के चून सँ रगरैत अछि आ हाकिम के दैत छनि। बाह! की दृश्य - जेहिना हाकिम तहिना रिक्शावला दुनू मस्त। तमाकूल के सेवन केनिहार रंग-रंग के बहाना बनबैत छथि। कियोक एकरा B B C अर्थात बुद्धिवर्धक चूर्ण त कियोक आरो किछु कहि संबोधित करैत छथि आ भांति - भांति के महिमा के बखान करैत छथि। हमर एक सम्बन्धी एक घंटा मे 20 बेर तमाकूल ठोर तर दैत छथि। एयर फाॅर्स मे काज करैत छला। हवाई जहाज केर इंजन केर अभियंता रहथि। हुनका बारे मे एक बात प्रचलित छ्ल। जखन कखनो फाइटर हवाई जहाज केर इंजन मे कुनो खरापी होइक आ हुनका भांगट बुझ मे नहि आबनि त वरिष्ठ अधिकारी कहैंन, "भाई, हिनका चून तमाकूल दियौन, ई तुरत सब किछु ठीक क देताह।" फेर की लोक तुरंत तमाकूल तैयार करैत छल, हुनका दैत छलनि आ ओ बहुत गर्वित होइत तमाकूल के ठोर मे ठुसैत अपन काज मे मनोयोग सँ लागि जाइत छला। ई बात अलग अछि जे बाद मे दम्माक गहन रोगी भ गेला। हालाँकि तमाकूल केर लत एखन धरि नहि गेलनि अछि। हुनकर पत्नी ओना त तमाकूल खेबा लेल हुनका सँ झगरैत रहैत छली मुदा जखन यैह बात एक दिन हुनकर छोट भाई बुझाब' लागलथिन त पत्नी के भेलनि , "तमाकूल के इलम कुनो बड्ड कलंकक बात थोड़े ने भेल? खाइत छथि त कोन कुकर्म?" झट दनि पतिक सुरक्षा कवच बनैत अपन देवर के ऊंच नीच कहनाय शुरू केलनि: "अहाँके अतबो संस्कार नहि बचल जे जेठ भाय सँ कोना बाजी? कोना हिम्मत भेल हिनका भाषण देबके? तमाकूल खाइत छथि कुनो कुकर्म नहि।" बेचारा छोट भाय, काटू त खून नहि! आ तमाकूल ठूसा श्रीमान अपन पत्नी सँ गदगद भेल। जखन दिल्ली यूनिवर्सिटी केर हॉस्टल मे रहैत रही त अनेक बिहारी मित्र सब तमाकूल खैत छलाह आ एकरा बिहार आ मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर जकाँ मनैत अपन लत पर नितराइत छला। यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकबा के परंपरा के सेहो शाश्वत केने छला। एक मित्र त एहेन छला जे की कही। बहुत ज्ञानी, पढ़बा मे विलक्षण, कुशाग्रबुद्धि मुदा तमाकूल खेबाक घनघोर समर्थक। वाक्यपटु सेहो छला। अपना सङ्गे अनेक बिहारी आ बहुत रास आनो ठाम के लोक के तमाकूल ठुसबक लत मे निपुण केने छला - सिद्धस्त गुरु जकाँ। कहियों काल चिलम सेहो देख लैत छला। बाद मे आई पी एस अधिकारी भेला। मित्रता एखनो अछि मुदा नाम देखार नहि करब। हमर त किछु नहि करता कनि देखार भ जेताह। भारत के अनेक तथाकथित शैक्षणिक कौशल मे माहिर विश्वविद्यालय मे त तमाकूल सङ्गे बीड़ी के प्रचलन भ गेल। लोक बीड़ी के धुआं मे समाजवाद के संगीतक आनंद आ परमानन्द मे भेर होमय लगला। अनेक महिला सब सेहो एकरा समाजवाद, वर्ग बिभेद हटेबाक, आ स्त्री-पुरुख के समानता के इंडिकेटर के रूप मे देखैत छथि। सभा मे, रैली मे लोक बीड़ी पिबैत मस्त भेल मकुनी हाथी जकाँ चलैत रहैत छथि जेना बीड़ी केर हरेक कश सँ एक कुप्रथा के सर्वनाश क लेता, समाज सभ्य आ सम्यक भ जैत, माओ, नक्सल सब समस्या के चट सँ निदान। मुदा तमाकूल के आयुर्विज्ञान आ वैज्ञानिक शोध के तराजू पर जोखब त लागत जे ई दारु सँ अधिक हानिकारक अछि। कैंसर केर खतरा सब सँ अधिक तमाकूल सँ ओहू मे ठोर मे सीधे चुनेटल तमाकूल सँ अछि। विज्ञानक भाषा मे कही त तमाकूल के गाछ निकोटियाना प्रजाति के अछि जकर जड़ि भारत मे नहि अपितु दक्षिण अमेरिका मे छैक। दक्षिण अमेरिका सँ ई पुर्तगाल आ पुर्तगाल सँ भारत 1600 ईस्वी मे आनल गेल। आई विश्व के कुल उत्पाद के 7.8 प्रतिशत तमाकूल अपन देश भारत मे होइत अछि। जे अनकर छ्ल, हानिकारक छल, व्याधि के घर छ्ल से अपन भेल अछि? कहल ई जाइत छैक जे एक बेर पुर्तगाल स्थित फ़्रांसिसी राजदूत जॉन निकोट अपन देश के रानी लग तमाकूल के बिया भेजलनि आ अहि तरहेँ प्राचीन इतिहास मे तमाकूल नामक ई गाछ प्रचलित भ गेल जे आई समस्त विश्व लेल पैघ समस्या बनल अछि। निकोट महोदय केर नाम सं एकरा निकोटिन कहल गेल। एमहर हमरा किछु बूढ़ आ जानकार सब सूचना देलनि अछि जे जखन बीड़ी के कंपनी सब बीड़ी बनेलक त लोक ओकरा पीबे नहि करैक । जों नहि व्यवहार करतै त व्यापार कोना हेतैक? एकरा ध्यान मे रखैत कंपनी सब किछु कलाकार के एकत्रित केलक आ अनेक शहर, गाम, चौराहा पर लोक सबके लैला मजनू, सीरी फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि नाटक केर आयोजन कर लागल। लोक सब के बजा मंगनी मे नाटक देखबै आ बीच-बीच मे बीड़ी लुटबै। लोक नहु-नहु बीड़ी पिनाई शुरू केलक। नशा केर प्रयोग बढ़े लागल। बीड़ी सँ वर्ग केर रचना भेल। ब्राह्मण शुरू मे बीड़ी नहि पिलनि। सोइत ब्राह्मण - राम-राम कोना छोट लोकक चीज़ ग्रहण करितथि? लेकिन एकर स्वाद के चखबाक आकांक्षा सब के छलैक। फेर की समाधान? समाधान के रूप मे पहिने सँ चुनेटल तमाकूल त छले बाद मे सिगरेट आबि गेल। सिगरेट भेल त क्लास भ गेल। फेर की ब्राह्मण आ की जमींदार। बुझु जे सिगरेट त मॉडर्न आ पढ़ल लिखल ओहू मे आधुनिक आ अंग्रेजी शिक्षा केर मापदंड भ गेल। जे मिथिला आई सं ४०-५० वर्ष पूर्व टमाटर के सार्वजानिक भोज मे,आ आन व्यवहार मे अनबाक अनुमति नहि देने छल। चूँकि ई बिलायत सं आयल रहैक ताहि एकर बिलौती कहैत छल। तीमन-तरकारी मे टमाटर के बदला आमिल आ नेबो के प्रयोग करैत छल वैह समाज बिना कुनो मीन-मेख केने तमाकूल के कोना अपना लेलक? छैक ने गूढ़ बात! आर-त-आर, तमाकूल भ गेल शुद्ध, छुआछूत सं सेहो मुक्त। केह्नो उपास मे आरो किछु खाऊ-कि-नहि खाऊ तमाकूल चूसि सकैत छी। कर्मकाण्डी के एकरा ग्रहण करबा मे कुनो हर्ज नहि, शायद भगवान बैकुण्ठ सं अनुमति प्रदान केने छथिन। हमरा त लगैत अछि जे मिथिला आ मिथले कथिलेल समस्त बिहार मे दारू संग तमाकूल आ भांग पर बंदी करक अत्यंत आवश्यकता अछि। नीतिश कुमार जी कनि इम्हरो ध्यान दियौक। अते त एखनो तमाकूल के प्रोडक्ट बनबे बला कम्पनी सब खुजल उक बनल अछि। कुनो प्रतिबन्ध नहि। पश्चिमी देश विशेष रूपेँ अमेरिका मे तमाकूल इत्यादि के कारोबारीके अपन आमदनीक एक पुष्ट भाग 'कैंसर' आ दोसर असाध्य रोगक इलाजक हेतु लगब पड़ैत छनि किन्तु एहि तरहक नियम के बारे मे भारत मे सोचल तक नहि गेल अछि । ई अपना आप मे घनघोर चिंताक विषय अछि। तथाकाथित सोशलाइट, विद्वान आ प्रगतिशील लोक सब चुप छथि। कतेक त स्वयं तमाकूल चुन आ तमाकूल सं निर्मित अन्य वस्तु के उपयोग मे संलग्न छथि। जनसँख्या विष्फोट के कगार पर ठाढ़ भारत केर विद्वान लोकनि धर्म,मेजोरिटी, माइनॉरिटी, हरिजन, गिरिजन, आ व्यवस्था मे निक अधलाह के मीन-मेख निकलबा मे भेर छथि। जनसँख्या हुनका एसेट बुझना जैत छनि। कुनो अस्पताल के कैंसर, यक्ष्मा, आ ह्रदय विभाग मे जाऊ, स्थितिक भान भ जैत। दम्मा के मरिज केर सर्वेक्षण करू यथार्थ बुझि जैब। कम सँ कम तमाकूल के उत्पाद के पूर्णतः प्रतिबंधित करबाक नियम लागू कैल जा सकैत छैक जाहि सँ एकर प्रचार-प्रसार कम स कम हो और अंततः ई समाप्ति केर डेग दिश अग्रसर हो। तमाकूल सँ घटे-घाटा। तमाकूल मे मादकता अथवा उत्तेजना प्रदान कर’ वला मुख्य घटक निकोटीन (Nicotine) होइत छैक। यैह तत्व सबस अधिक मारुक सेहो होइत छैक। एकर अतिरिक्त तमाकूल मे अनेक तरहक कैंसर उत्पन्न कर’ वला तत्व पायल जाइत छैक। तमाकूल के सेवन सँ मुँह, घेंट, श्वांसनली आ फेफड़ा केर कैंसर (Mouth, throat and lung cancer)होबाक सम्भावना रहैत छैक। बिमारिक अंत अतै नहि होइत छैक एते धरि ह्रदय के बीमारी (Heart Disease),धमनी काठिन्यता, उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), पेटक अल्सर (Stomach Ulcer), अम्लपित (Acidity), अनिद्रा (insomnia) आदि रोगक सम्भावना तमाकूल केर उत्पाद केर सेवन सँ बढ़ि जाइत छैक। आदिवासी समाज मे सेहो बनिया सब स्त्री-पुरुख दुनू के तमाकूल आ एकरा सं निर्मित अनेक वस्तु के लति लगा देने छैक। तमाकूल केर सेवन एक पैघ समस्या अछि। मोन आ शरीर दुनू के सर्वनाश क रहल अछि। अहि पर सोचब जरुरी अछि। हम एहि कथ्य के माध्यम सं किनको ऊँच-नीच नहि कहि रहल छी। केवल यैह जे ई बहुत खराप इलम अछि, एकर त्याग करक चाही। मैथिलानी पर विमर्श क अधिकारी के? मैथिलानी अथवा मिथिला मे स्त्री केर स्थिति पर चर्चा करक अधिकारी के: स्त्री? पुरुष? अथवा दूनू? आजुक सन्दर्भ मे जखन स्त्री विमर्श पर महिला; दलितवर्ग पर दलित; कला पर कलाकार काज क रहल छथि, लिख रहल छथि; ओहेन स्थिति मे ई एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु बुझना जैत अछि। हमहु स्त्री पर आ कखनो काल मिथिलाक स्त्री पर हुनक जीवन के विभिन्न आयाम पर लिखैत रहैत छी।जे ओहि वर्ग सं छथि सैह लिखता अथवा व्यक्त करता किछु एहेन सन अवस्था अछि जे हमरा थोरेक परेशान करैत अछि। लगैत अछि “जेना हम दोसरक अधिकार क्षेत्र मे अधिक्रमण क रहल होई?” बातमे कनि उलझन छैक। मैथिलानी जं अपना पर नहि लिखती त आन के लिखतनि? जे अनुभव छैक तकर सटीक वर्णन आ व्यख्या वैह क सकैत छथि! लेकिन फेर एक दोसर बात मोन मे अबैत अछि। हमरा लोकनि नृतत्वशास्त्र आ समाजशास्त्र मे दोसरक संस्कृति (other cultures) के बारे मे पढैत छी। दोसरक संस्कृति पर काज करैत छी। अहू दुनु विधा मे स्थानीयया मूल (native) आ दोसर केर बीच द्वन्द छैक। एक के कहब छैक जे स्थानीय अथवा नेटिव चूँकि ओहि समाज आ संस्कृति केर हिस्सा छैक ताहि ओ ओकरा निक सं बुझैत छैक, ओहि मे जीबैत छैक आ ओकर अक्षरसः व्यख्या क सकैत छैक।एकर विपरीत दोसर संस्कृति पर आन द्वारा अध्ययन कर बला के ई मानब छनि जे वैश्विक बात त आने कहत। से कोना? कखनो काल जं बाहरी दुनिया के मापदण्ड नेटिव विद्वान के नहि बुझल होनि त ओ बहुत बात के चर्च करब छोडि देता। अपन शोध आ फिल्डवर्क केर एक सत्य उदाहरण दैत छी जे आंखि सं देखल आ कान सं सूनल अछि। हम मुसहर जाति पर एक विस्तृत परियोजना पर काज करैत रही। परियोजना केर उद्देश्य एहि समाजक लोक के शिक्षा, स्वास्थ, आर्थिक आ सामाजिक उन्नति के दिशा मे प्रयत्न रहैक. शिक्षा संग संग सांस्कृतिक धरोहर केर रक्षा सेहो मूल रहैक.विषय के गंभीरता के देखैत आ अपन पूर्व मे अहि समाज पर कुनो तरहक काजक अनुभव नहि होबाक कारने एक मुसहर समुदाय के पढ़ल युवक के साथ लय हम मुसहरटोलीमे गेलौं।स्थिति देखि द्रवित भेलौं. भेल, “आजुक जुग मे ई सब मुसहर जातिक लोक कतेक दुखक जीवन जी रहल अछि?ककरो घर दढ़ नहि. ककरो भरि देह वस्त्र नहि. भेल,फेर कुन तरहक विकास अपन देश अर्थात भारत क रहल अछि?सब के पुछ्लियैक: “अहाँ सब के की चाही?” झट दनि एक माईनजन उठला आ कहलनि: “हमरा सबके माटि काटक काज आ घर के मरम्मत भ जै त हम सब धन्य भ जैब।” हमर दोसर प्रश्न छल: “कतेक पाई मे घरक मरम्मत भ जैत?” हुनकर जवाब तहिना भेटल: “मालिक, हम सब फुसही झोपडी मे रहैत छी। २००० टाका भेट जेतैक त सब समस्याक समाधान।” आब देखू, ओ सब कियोक ढंग सं वस्त्र नहि पहिरने छल। सबहक पीठ उघार। मैल-फाटल धोती, ५-६ वर्ष केर बच्चा सब नंगटे। तथापि ओकर मांग मात्र २००० टका घर ठीक करेबाक हेतु आ माटि काटक काज नोन रोटी खेबाक लेल। नहि शिक्षा, नहि स्वास्थ, नहि आरो कोनो वस्तु केर अभिलाषा।ओहि समुदाय केर पढल युवक अर्थात हमर सहयोगी सेहो कुनो निक व्योंत बतेबा मे अपन असमर्थता व्यक्त केलनि।ओ कहलनि: “सर, हम सब भोजन, वस्त्र, आवास मात्र तीन वस्तु जनैत छी. अतेक भेट गेला सं सब मस्त. ने शिकबा ने शिकायत.” अहि तरहक बात आदिवासी आ अन्य समाज मे सेहो देखना जैत अछि।हम आब अपन विषय केर दोसर बात जे“सत्य वैह नहि होइत छैक जे लोक कहैत अछि, सत्य ओहो होइत छैक जे अहाँक आंखि देखैत अछि, आत्मा, आ विवेक कहैत अछि”, के मूल मानि अपन प्रतिवेदन लिखलौं. उपरोक्त उदाहरण देबाक तात्पर्य ई अछि जे जखन कुनो समुदाय अथवा वर्ग अपन समस्या तक व्यक्त करबा मे असमर्थ अछि त ओकरा समस्या के के बुझत? दोसर. तहिना मैथिलानी के समस्या मैथिलानी लिखथि से निक बात मुदा पुरुख सेहो लिखथि. समस्या के तह मे जाथि आ ओकर समाधान तकथि आ लिखथि. जखन महिला के बात करैत छी त अतेक जानब अनिवार्य भ जैत अछि जे महिला समाज पुरुष या पित्रसत्तात्मक व्यवस्था मे ऐना मिल गेल अछि जे ओकर अपन स्वरूप जेना हेरा गेल होइक? के स्त्री पुत्र जन्म देलाक बाद अपना के भगवंत नहि बुझैत छथि? कथी लेल सासु पुतहु झगरेतछथि? कथी लेल महिला अपन पुत्री के पुत्र जकां स्वतंत्रता नहि दैत छथि? मुदा एहि मे हुनक गलती नहि, पुरुष के बनाएल संरचना के गलती अछि।अपन गलती के भान पुरुष करथु। पुरुष जखन स्त्री विमर्श करथि त अपन अंतरात्मा मे एक स्त्री केर भाव आनथि। किछु एहेन भाव जे स्त्रिग्न नहि कहि सकैत छथि सेहो निर्विकार आ बिना कुनो अहम के बाजथि।ई समस्या अहि हेतु उत्पन्न भेल अछि जे एक के कम आ दोसर के अधिक महत्त्व देल जैएत अछि. प्रयोजन ई होबाक चाही जे मातृभाव आ पितृभाव बराबर हो. एकर सर्वोत्तम उदाहरण अफ्रिका के घाना देशक असन्ति (Ashanti) जनजातिक परिवार आ संस्कृति केर संकल्पना मे देखल जा सकैत अछि. असन्ति केर संस्कार मे परिवार आ माताक गोत्रबहुत पैघ स्थान रखैत छैक. एहेन मान्यता छैक जे शिशु अपन पिता सं आत्मा, प्राण आ साँस लैत अछि आ माता सं माँस (देह) आ शोनित. बच्चा ओना त दुनु पक्ष सं जुड़ल छैक परन्तु मातृपक्ष सं ओकर लगाव शोनितक लगाव, भावनाक लगाव, कहियो समाप्त नहि होबबला लगाव छैक. पूर्वोत्तर भारत केर मेघालय राज्य मे खासी जनजाति मे माता के सर्वोपरि मानबक परंपरा एखनो अछि. एकर तात्पर्य ई भेल जे संस्कृति मे संस्कार एहेन हो जे स्त्रीगन के सम्मान करय. कतेक लोक संस्कृति के रक्षा केर नाम पर नारी अधिकार, सम्मान, बराबरी, स्वतंत्रता आदि के विरोध करैत छथि. हुनका डर होइत छनि जे सब किछु समाप्त भ जैएत. मिथिलाक पतन भ जैत. लिंग आ वर्ग संघर्ष शुरू भ जैत. सम्मान, परम्पराक ह्रास भ जैत. एकर मतलब की जे स्त्री के घेंट दबाक मारि दी? स्त्री के विकासक सहगामिनी नहि बन दी? स्त्री के हुनक सुविधाक अनुसारक वस्त्र, गहना, पहिरक स्वतंत्रता नहि दी? हुनका आत्मसम्मान नहि दी? संस्कृति आ संस्कार बचेबाक लेल स्त्री मात्रक बध, ई कहेन बात? पुरुख बहुत दिन पहिने पेन्ट पहिर लेला, संस्कृति नहि मरल; स्त्री पेन्ट, सलवार पहिर लेती त संस्कार खत्म भ जैत! बेटी माता पिताके सम्पति के मांग करती त कोर्ट कचहरी शुरू भ जैत, आदि-आदि. ई सडल-गलल मानशिकता अछि. एकरा त्याग करक चाही. अगर भाई-भाई मे मुक़दमा चलैत अछि त समाज कहाँ समाप्त भ जैत अछि? अगर बेटा आ बेटी दूनू के पता लागि जेतनि जे माता –पिता केर सम्पति सं जवावदेही धरि हुनकर सामान अधिकार छनि त नहु-नहु ई अहं समाप्त भ जैत. मैथिलानी सेहो समग्रता मे पुरुष पर ओहिना लिखथि जेना पुरुष हुनका पर लिखैत छथि। महिला आ पुरुष सं पैघ बात ई जे समाज, ओकर परिवेश, ओकर संस्कृति, ओकर संस्कार, ओकर इतिहास, ओकर लोक व्यवहार पर जिनका रूचि होनि, जिनका जिज्ञासा होनि, जिनका किछु करबाक उत्साह होनि से लिखथि।मुदा सब सं पैघ बात ई जे पुरुख मैथिलानी के मनोदशा के बुझथि, ओहि पर मनन करथि आ तटस्थ भाव सं लिखथि. विकास लेल लिखथि. समानता के भाव लेल लिखथि. दिल्ली मे एक कार्यक्रम मे साहित्य अकादेमी पुरुस्कार सं सम्मानित तीन मैथिलानी: डॉ. नीरजा रेणु, डॉ. शेफालिका वर्मा आ डॉ. उषा किरण खान बजली जे अधिकांश लोकगीत केर रचना मैथिलानी केने छथि। हुनकर सबहक बात के सीधे कटबाक हिम्मत हमरा नहि अछि। ओ सब साहित्य केर हस्ताक्षर छथि। बहुत अनुभव, मनन के बाद एहि निष्कर्ष पर ऐल हेती। मुदा नारीवाद के घमर्थन जखन सामाजिक विज्ञान के शोध छात्रक रुपें करैत छी त किछु आरे बात सब बुझना जैत अछि।महिला त केवल गबैत छली। हुनका अपन बारे मे सोचबक स्वतंत्रता कहाँ छलनि? आ समय सेहो नहि।ओ त पुरुष रचित व्यवस्था मे मशीन जकां काज करैत छली। हमरा होइत अछि अधिकांश गीत पुरुष लिखलनि। मुदा जखन ओ गीत केर रचना कर’ लगला त अपन मोन, ह्रदय सब मे एक स्त्रिग्न के भाव आनि लेलनि। अतेक निक जे स्त्रिग्न सब ओहि भाव मे मस्त भ गेली। ओकरा अपन मानि लेलनि। पुरुष रचनाकार ओहि गीतक देवकी आ स्त्रिग्न सब ओकर यशोदा भ गेली। एक एहेन हरिजन स्त्री जकर पति अर्थोपार्जन लेल दूर देस गेल छैक, सासु, ससुर बुढ छैक आ सासु ससुर केर आंखि मे रतौंधी छैक, कान बहिर छैक। छैक त हरिजन, अछूत मुदा सुन्दरता के खान, कामायनी. वैह पुरुष जे छुआछूत केर बात, वर्ग विभेद केर बात, जाति-पातिक बात करैत छथि, सैह सब ओहि महिला के गसल देह, यौवन के सुख प्राप्त कर’ चाहैत छथि। आब ओ अछूत महिला अपन यौवन आ गसल देह के कारण पाण्डित्य कला मे निपुण पुरुष के सजाति बुझना जैत छनि। ओकरा अपन बाहुपाश मे लेबाक लेल उद्यत छथि। राति मे चोरी सं ओकर घर मे घुसि सब अक्षम्य काज आ कर्म कर’ लेल परेशान छथि. बेचारी महिला लाचार अछि। ओकर वेदना के सुनतै? मुदा एक पुरुष जे महाकवि विद्यापति छथि से सुनैत छथि आ द्रवित होइत अपन कलम उठा ओहि वेदना के लिखैत छथि: हम जुवती पति गेला बिदेस। लग नहि बसए पड़ोसिया देस।। सासु दोसर किछुओ नहि जान। आंखि रतौन्धी सुनए नहि कान।। जागह पथिक जाह जनु भोर। राति अन्हार गाम बड़ चोर।। भरमहु भोर ने देअ कोतबार। कहुक कियोक न करए विचार।। अधियन कर अपराधहु साति। पुरख महत सब हमर सजाति।। भनहि विद्यापति एहि रस गाब। उकुतिहि अबला भाव जनाब।। सब सं पैघ बात ई जे विद्यापति पीड़िता के दुःख सं केवल द्रवित नहि होइत छथि, ओकर मनःस्थिति के वर्णन आखर-आखर करैत छथि। नारी भाव के ऐना अपना भीतर आत्मसात क लैत छथि जे गीतक अंत मे ई तक घोषणा क दैत छथि जे हिनकर गीतक रस मात्र अबला के भाव के जगब’ बला रस छनि। ओ अपन गीत अही रस मे लिखैत छथि। विद्यापति के अनेको गीत नारी भाव, श्रृंगार, मनोदशा के अक्षरसः वर्णन अछि। अतेक निक जे मैथिलानी ओकरा अपन बना लैत छथि। गीत के कंठाग्र क लैत छथि। गीतक पोर-पोर सं कनेक्ट भ जैत छथि। किछु पुरुष गीत लिखनहार त एहेन छथि जे नारी भावना के तह तक घुसबा लेल समस्त नारी मनोदशा के संग-संग अपन नाम, व्यवहार तक नारी जकां क लैत छथि। एक बहुत प्रचलित भक्ति गीत जे मिथिला आ मैथिलानी द्वारा मिथिलाक गुणगान करैत अछि ओकर दू पांति देखी: साग पात खोंटि खोंटि दिवस गमेबै हे हम मिथिले मे रहबै। अपना किशोरीजी के टहल बजेबै हे हम मिथिले मे रहबै।। एहि गीतक रचैता छथि कपिलदेव ठाकुर। ई राम आ सीता सं आ कृष्ण आ राधा सं सम्बंधित मधुर भक्ति गीत रचैत छथि। विष्णु भक्ति मे ततेक तल्लीन भ जैत छथि जे अपन अस्तित्व महिलाक अस्तित्व मे परिणत क लैत छथि। अपन नाम तक बदलि लैत छथि। कपिलदेव ठाकुर सं स्नेहलता भ जैत छथि। नारी मनोदशा के लिखैत छथि आ ओही मनोदशा मे जीबैत छथि। हिनकर रचित अनेक गीत नारी भाव, भक्ति, श्रृंगार आ मनोदशा के व्यक्त करैत अछि। “पत्रहीन नग्नगाछ” मे जे नारी मनोदशा केर वर्णन यात्रीजी केलनि अछि तकर कुनो जवाब अछि? “पारो”, “घसल अठन्नी” आदि केर नायिका के बेदना मैथिलानी वर्दाश्त क सकैत छली मुदा ओकरा हु-बहु उकेरब बला काज त दोसर (other) अर्थात यात्री आ मधुप सनहक पुरुष नारी ह्रदय के अपना मे आनिक क’ सकैत छल! गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। तकर जे भाव यात्री व्यक्त केलनि से कुनो समान्य बात अछि? तीनू महिला विदुषी अर्थात डॉ. नीरजा रेणु, डॉ. उषाकिरण खान आ डॉ. शेफालिका वर्मा एक बात अंत मे बड्ड निक बजली: “साहित्यकार के सत्य लिखक चाही, मानव पर लिखक चाही, स्त्री-पुरुष केर बन्धन सं उठि क लिखक चाही। स्त्रिग्न केवल मैथिलानी पर नहि लिखथि पुरुषो पर लिखथि. तहिना पुरुष सेहो स्त्रीगण पर सेहो लिखथु। कुनो वाद अथवा लिंग केर बन्धन उचित नहि।” हमरा ई निचोड़ कथन बड्ड सोहनगर लागल। महाराजा पंहिबा: मणिपुर केर ग़रीब नबाज़ अजमेर केर हजरत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (1141-1236) के ग़ुरबतमे जीवन जिबैत लोकसँ आ जनसाधारणसँ अगाध प्रेमके कारण ग़रीब नबाज़ कहल जाइत छनि। मुग़ल बादशाह अकबर महान (1542-1605) के ग़रीब नबाज़ केर नामसँ जानल जाइत छैक। ओ प्रजावत्सल छला, ग़रीब, दुखी एवं असहाय के मदति करैत छला। "ग़रीब नबाज़" शब्द लोक कंठमे एना बैस गेलैक जे आर त आर महाकवि तुलसीदास (1497-1623) अपन अजेय कृतिरामचरितमानसमे भगवान राम लेल ग़रीब नबाज़ (गरीबनेबाजू) शब्दके प्रयोग करैत एक पद लिख लेला: गईबहोर गरीबनेबाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। बुधबर नहि हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निजबानी।। एकर अर्थ भेल, “प्रभु रघुनाथ हेरायल या हाथसँ चलि गेल वस्तुके फेरसँ आनि सकैत छथि, ग़रीबनबाज़ (दीनबन्धु) , सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमान आ सबहक स्वामी छथि। यैह बात बुझि गुणीजन ओहि श्रीहरि केर यशगानसँ अपनवाणीके पवित्र आ उत्तम फल देब' बला बनबैत छथि।” आश्चर्य तखन भेल जखन पूर्वोत्तर भारतके एकांतमे बसल राज्यमणिपुरमे अपन प्रवासक दौरान हमरा पता चलल जे मणिपुरके गौरवमय इतिहासमे सेहो एक प्रतापी, प्रजापालक, सम्यक, सहिष्णु राजा भेला जिनकर नाम ग़रीब नबाज़ छलनि। मणिपुर केर कुकी आदिवासी समुदायके डॉ. Leban Serto दिल्लीविश्विद्यालयमे हमर सहपाठी छला। काल्हि हुनकर एक मैसेज देखल जाहिमे ओ लिखने छथि जे दू आदिवासी समूह, नगा आ कुकीके बीच झगड़ाके चलते पूरा मणिपुर अस्त-व्यस्त भेल अछि। नेटवर्क या त बंद छैक अथवा कतौ कतौ बहुत मंथर गतिसँ चलि रहल छैक। लेबानके ई दुःख छनि जे अगर स्थिति अहिना रहलैक त क्रिसमस आ नववर्ष केर शुभकामना संदेश ओ अपन मित्रके नहि द पेताह। ताहि ओ 17 दिसम्बरक एडवांसमे सबके दुनु चीज़क शुभकामना द देलथि। दुर्भाग्यसँ हमरा लोकनि मणिपुर आ पूर्वोत्तर भारतके संबंधमे बहुत बातसँ बंचित छी। हम सब मीडिया द्वारे ई जरूर जनैत छी जे मणिपुरमे सेना आ सामान्य जनताके बीच सौहार्दय नहि छैक, आदिवासी आ गैर आदिवासीके बीच लड़ाई चलैत रहैत छैक, आदिवासी समाजक दू समहू, नगा आर कुकीके बीच युद्ध चलैत रहैत छैक, मारिकाट होइत रहैत छैक, सड़क जाम भ जाइत छैक, पेट्रोल 200 रुपया केर एक लीटर भ गेलैक, आदि-आदि। मुदा एहि राज्यके ऐतिहासिक , सांस्कृतिक, शैक्षणिक गौरव दिस ककर ध्यान जाइत अछि? हमरा लोकनि बिसरि जाइत छी जे यूनान आ चीनके मध्य मणिपुर सिल्करूटसँ जुडैत अछि। समस्त पूर्वोत्तर भारतमे मात्र दू राज्य अछि जतयसँ सिल्करूट जाइत छैक, जाहिमे एकटा राज्य मणिपुर सेहो अछि। ईराज्य 32 आदिवासी जे मूलतः नगा आ कुकी ग्रुपमे बॉटल अछि केर अतिरिक्त मैती समाजक गढ़ अछि। अतै केर तीन हिस्सा धरती पहाड़ आ एक हिस्सा मैदान छैक। अतै केर लोक अति प्राचीन समयसँ युद्धकला, संगीतकला, घुड़सवारी, मल्लयुद्ध, मार्शलआर्ट, नृत्य, नाटक, गायन, चित्रांकन आदिमे प्रबुद्ध रहल छथि। कहब त दंतककथा लागत मुदा ई शुद्ध ऐतिहासिक तथ्य छैक जे इसामसीहके जन्मसँ 33 वर्ष पूर्व मणिपुरके लिखीत इतिहास केर दस्तावेज उपलब्ध छैक। कहबाक तात्पर्य ई की जखन भारतके बहुत तथाकथित विकसित प्रान्त सबमे कुनो लिखित इतिहासके प्रथा नहि छल मणिपुरमे लिखित आ क्रमबद्ध लिखित इतिहास केर परंपरा रहल अछि। अतै बहुत राजा, राजकीय व्यवस्था, वंशावली आदि भेटत जे अहाँके मानय लेल बाध्य करत जे मणिपुर कुनो सामान्य राज्य नहि अछि। छोट छैक त की भेल, बहुत गौरवपूर्ण इतिहास आ परंपराके समेटने अछि। चलु बात करैत छी मणिपुर केर महाराजा ग़रीबनबाज़ केर सम्बन्धमे। ग़रीबनबाज़ के बात करैत छी त एक बात आरो स्मरण आबि गेल। एक संगोष्टीमे हम मणिपुर केर राजधानी इम्फालमे भाषण दैत रही। हमरा संगे पद्म श्री आर. के. जिलाजित सिंह बैसल छला। बिलकुल मैथिल पंडित जकाँ धोती कुर्ता पहिरने, कपारमे गोल ठोप लगेने, कान्हपर गमछा धारण केने। जखन हमर भाषण समाप्त भेल त ओ कहलनि: "अहाँ विद्यापति केर भूमिसँ छी। अहाँसँ नीक बात सुनबाक आकांक्षा छल। अहाँ आकांक्षाके पूरा केलौं। मणिपुर केर सेहो मिथिला जकाँ बौद्धिक, सांस्कृतिक गौरवपूर्ण इतिहास छैक। एकर सामरिक इतिहास, युद्धकौशल केर इतिहास बहुतों प्रदेशसँ उत्तम छैक। अतै एक राजा छला जिनका हमरा लोकनि ग़रीब नबाज़के नामसँ जनैत छी। अगर अहाँ संगे बैसब त निश्चिन्तसँ हुनकर सम्बन्धमे चर्चा करब।" अहि तरहेँ पद्मश्री जिलाजित सिंह हमरा मोनमे ई अद्भुत इतिहास जनबाक इच्छा जागृत क देलनि। बादमे कतेक दिन हुनकासँ आ आनो लोक सबसँ ग़रीब नबाज़पर चर्चा भेल। ई बात 2006 ईस्वीके अछि। सुनल इतिहासके जे बात सब स्मरण अछि तकरा आई यथावत लिखबाक प्रयास क रहल छी। हमर लेखनी संगे यात्रा करु बहुत आनंदित हैब। नव बात सुनब। भारतक संस्कृति केर एक क्षेत्र केर महानता सुनि समग्रतामे भारतपर गर्वक अनुभूति हैत। त इतिहासक एक कथा प्रारम्भ करैत छी।ग़रीब नबाज़ मणिपुरमे 1709 सँ 1748 ईस्वी धरि अर्थात क़रीब 4 दशक धरि राज केलनि। हिनकर पिताक नाम छलनि महाराजा चेराई सोंगबा। ग़रीबनबाज़ मणिपुरी नाम कुनो दृष्टिकोणसँ नहि बुझना जाइत अछि। लोक सब कहलक जे मणिपुरी सब हिनका पंहिबा कहैत छलनि। यद्यपि ई समस्त ग़रीब नबाज़के रूपमे ख्याति पौने छथि। ई पूर्णतः मुसलमानी नाम छैक जे कदाचित असममे मुस्लमानके आबि जेबाक कारणे मणिपुरमे एहि तरहक शब्द अपन वैशिष्यके कारण प्रचलनमे आबि गेल होइक। अहि बातपर सेहो इतिहास आ मानवशास्त्र केर विद्वान शोध क सकैत छथि। हालाँकि किछु विद्वानके मानव छनि जे सांस्कृतिक विस्तारवादके कारण भारतक लोक शायद हिनका ई नाम देलथिन जाहिसँ मणिपुरके सेहो भारतीय पुरातन आ समग्र परंपराके हिस्सा बुझल जा सकै। भइयो सकैत अछि जे मुग़ल अपन विस्तारवादी नीतिके कारण किछु एहेन केने हो। भ किछु सकैत अछि। पियाऊज केर छिलकाके परत त उखारब तखने पता चलत जे यथार्थ आखिर की छैक? खैर! अंगरेज सबके मानब छनि जे ग़रीब नबाज़ आदिवासी समाजसँ छला। लेकिन मणिपुरकेर अधिकांश लोक आ जिलाजित सिंहके मानव छनि जे गरीब नबाज़ ओतै केर राजाक पुत्र छला। से कोना? एहेन मान्यता छैक जे ई अर्थात ग़रीब नबाज़ राजा केर दोसर पत्नीके पुत्र छला। रानी हिनका जन्मिते एक आदिवासी परिवारमे गुप्त रूपसँ पठा देलथिन। ओतए हिनकर लालन पालन होमय लगलनि। ई बहुत तेज आ बलशाली नेनेसँ छला। कहल जाइत अछि जे जंगल केर बाघ, शेर आ तमाम हिंसक जानवर हिनका संगे खेल खेलैत छल। ई निर्भीक भावसँ सब संगे रहैत छला। तीरधनुष आ अन्य जंगली युद्धविद्यामे माहिर भ गेल रहथि। मुदा हिनक पिताके एहि सम्बन्धमे कोनो जानकारी नहि छलनि। महाराजा चेराई सोंगबाके पहिल रानीसँ कोनो संतान नहि छलनि। बल्कि हुनका हिसाबे कोनो रानीसँ हुनका पुत्र नहि छलनि। बूढ़ होब लागल छला। चिंतित छला जे हुनकर बाद राज सिंहासनपर के बैसतनि। एक दिन किछु सोचैत अपन सब रानीके बजेलनि आ कहलथिन: “देखु, हम आब बूढ़ भेल जा रहल छी। संतान होबाक उम्र समाप्त भ गेल। चिंता एहि बातक अछि जे हमरा बाद एहि राजगद्दीपर के बैसत। अगर अहाँ सबमे किनको पुत्र अछि जे हमरा ज्ञात नहि हो त हमरा सूचित करी अन्यथा हम अपन अधिकारी केर चुनाव आम जनतासँ कुनो पराक्रमी आ होनहार युवकके देखि करब।” महाराज चेराई सोंगबाके एहि बातपर सब रानी चुप रहली। मुदा कनि कालमे शांतिके भंग करैत दोसर महारानी बजली: “महाराज, हमरा माफ़ कैल जाओ। हमरा एक पुत्र भेल छल। ओहि समयमे हम नैहरमे रही। चूँकि परंपराके हिसाबे पहिल रानीके पुत्र राजगद्दीके सम्हारैत छैक से सोचि हम अपन पुत्रके एक आदिवासी लग गुप्त रूपेँ भेज देल। ओ ओतहि रहि रहल छथि। बली छथि। पराक्रमी छथि। शारीरिक सौष्ठवमे विलक्षण छथि। राजपुत्र छथि। चूँकि आब एहि वंशके वारिश चाही त हमरा हिसाबे आ यदि सब रानी आ अपनेक अनुमति हो त हम हुनका बजा दैत छी। ओ अहाँक प्राकृतिक उत्तराधिकारी छथि।” राजाक सँग सब रानी दोसर रानी केर एहि हर्षमय रहस्योद्घाटनसँ गदगद भ गेली। तुरंत आदमी भेजि ओहि पुत्रके राजमहलमे बजैल गेल। वैह युवक छला ग़रीब नबाज़। ग़रीब नबाज़ राजाके रूपमे समदर्शी छला। प्रजा पालक छला। आदिवासी आ मैतीके बीच नीक आ सहिष्णु छला। सर्वप्रिय छला।पहिने मणिपुरमे चंनामाई संस्कृति छलैक मुदा धीरे धीरे वैष्णव संस्कृतिके प्रचार होमय लगलैक। ओ सांस्कृतिक, धार्मिक एकतामे विस्वास राखैत छला। आर त आर पडोसी वर्माके राजा के सेहो जित लेलनि आ वर्मा (आजुक म्यंमार) मे अपन सुधारक कार्यक्रम चलौलनि। मणिपुरके सीमा विस्तार करैत रहला। एक दिस वर्मा त दोसर दिस असम धरि आबि गेला। ई बहुत मजबूत आ कुशल प्रशासक छला। एतबे नहि, महाराज ग़रीब नबाज़ बहुत तरहक चीज़ आ यंत्रके विकास केलनि। पहिल बेर टाइम मशीन केर निर्माण हिनका समयमे भेल। ई मशीन पानि आ किछु फेनेल केर एहेन युग्मसँ बनल छलैक जे सटीक टाइम देबामे सक्षम छलैक। ग़रीब नबाज़ केर दोसर खोज अथवा विकास छलनि अरामबाई। ई अरामबाई की भेल? ई बहुत खतरनाक आ प्रलयंकारी अस्त्र थिक। एकरा महाराजा ग़रीब नबाज़ बिना ककरो मदतिके अपने हाथे निर्माण केला। ओहि समय केर ई सबसँ खतरनाक अस्त्र छल। घोड़सवार एकरा अपना डाँर लग बहुत सावधानीसँ रक्षाकवचके रूपमे राखैत छल। हुनका समयमे मणिपुरके सैनिक आ योद्धा घोड़सवारी, घोडाके नियंत्रण, अश्वयुद्ध केर सञ्चालन, भाँति भाँतिके घोडाके पालन आ ओकर प्रशिक्षणमे माहिर छल। बतबैत चली जे पोलो खेलके जन्मदाता मणिपुर रहल अछि। पोलोके कतेक धुरंधर एहि धरापर भेल छथि। एखनो इम्फाल शहर केर पोलो ग्राउंड जेना अपन गौरवमय इतिहास केर गाथा गबैत हो। घोडापर चढ़ल घोड़सवार सैनिक रणकौशलमे अतेक माहिर छल जे घोडाके एकदिशामे अर्थात पांज लग आबि दौड़ैत अवस्थामे सेहो घोडापर चढ़ल एक हाथे घोडाके लगाम आ दोसर हाथे तीर धनुष अथवा आरो कुनो दुर्दांतक अस्त्रसँ दुश्मनके ध्वस्त क सकैत छल। ओ आगासँ, पाछासँ, कातसँ आ घोड़ाक पांजर लगसँ कतौसँ अपन सस्त्र चला सकैत छल। शत्रुके स्वाहा क सकैत छल। सबसँ प्रमुख बात ई जे राजा ग़रीब नबाज़ सब बात अपन नेतृत्वमे करैत छला। अरामबाई बहुत प्रलयंकारी आ कुनो सैनिक हेतु अमोघ अस्त्र छल। आर त आर अंग्रेज सब सेहो एहि अस्त्रसँ प्रभावित छल। आ एकरा सम्बन्धमे बहुत रास बात अपन डायरीमे लिखने छथि। कारण ओहि समयमे अंग्रेज लग अहि तरहक कुनो अस्त्र नहि छलैक। आई काल्हि अरामबाईके भारतीय राष्ट्रीय खेलमे शामिल क लेल गेल छैक। अहि तरहेँ महाराजा ग़रीब नबाज़ एक सर्वगुण संपन्न राजा छला। एक सफल राजा, सफल योद्धा, सफल सेनापति, अग्रचेति, दूरद्रष्टा, सफल प्रजापालक। मणिपुर केर सीमाके वर्माके ऊपरी भागसँ असमके सीमावर्ती क्षेत्र धरि विस्तार केलनि। मणिपुर केर लोक, ओतै केर वस्त्र विन्यास, महिला द्वारे वस्त्र बुनबाक परंपरा, ओतय केर नृत्य, प्राकृतिक छटा, खानपान, आ स्वर्णिम इतिहास अहाँके अपना दिस आकर्षित करत। कनि हमर बात मानि थोरेक दिन भ आउ ने मणिपुरसँ! जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल महाकवि चन्दा झा कृत रामायणक सुन्दरकाण्डक एलबम मिथिलाक प्रसिद्ध गायक-गायिका श्री विकास झा आ रश्मि झाक स्वरमे कविवर चन्दा झा विरचित मिथिला भाषा रामायणक सुन्दरकाण्डक एलबम दू भागमे यू-ट्यूब पर उपलब्ध अछि। अध्याय 2 धरि प्रस्तुत कएल गेल अछि। https://youtu.be/1ZED0SeYJwY?list=PLUmTaUxB0Bdv9bzuqkjpfKB0Uly1IAGoA https://youtu.be/ZKkd-UCNSEA एहि पर हमर मन्तव्य प्रस्तुत अछि : 1.प्रस्तुति : शारदे म्यूजिक । 2.योगदान : हेमानंद ठाकुर, शशिकान्त झा आ शम्भुनाथ झा आजाद । 3.संगीत : रश्मि आ मिथिलेश झा । 4.स्वर : श्री विकास झा आ रश्मि झा। 5.स्वरक प्रभाव : मधुर, मनमोहक, आनन्ददायक। 6.संगीतक प्रभाव : विलक्षण । 7.प्रस्तुतिक कोटि : प्रभावशाली। 8.उच्चारण : अधिकांश शब्द सबहक उच्चारण एकदम शुद्ध भेल अछि। अपवाद स्वरुप किछु शब्द सभमे कतहु-कतहु उच्चारण दोष अछि , जाहिसं बचल जा सकैत छल । जेना ई शब्द सभ : शब्द उच्चारण शूनि शूनी अपन अप्पन सपन सप्पन बैशि बैशी अनुकूला अनुकुला करति करती अवनि अवनी 9.अन्य दोष : अध्याय 2 मे कवित्त धनाक्षरी गीत, सवैया छन्द, गीत काफी, गीत पहिल, दोसर आ तेसरक चारिम पाँति धरि गायनमे नहि आएल अछि । 10.टिप्पणी : मैथिलीमे उपलब्ध आ हमर देखल-सूनल किछु उच्च कोटिक एलबमक श्रेणीमे एहि एलबम कें राखब। वन्दना अवस्थी दुबे (वन्दना अवस्थी दुबेजीक हिन्दी कथा- अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) -प्रस्तुत अछि वन्दना अवस्थी दुबेजीक कथा केर अनुवाद। ई कथा एकटा एहन विषय-वस्तुपर अछि जे कि प्रायः छूअल नै गेल। तँइ ई कथा अहाँक अपन कथा लागत। हमरा हिसाबें ई कथा पुरुष दृष्टिकोणसँ लिखल गेल अछि मुदा खिड़की स्त्रीक दिशामे खुलैत छै। तँ पढ़ू ई कथा-- वन्दना अवस्थी दुबे-- कथा -- दायित्व "रमणीक जी गुजरि गेलाह"................ ई समाद अखबारक पहिले पन्नापर छल। ओह, ई समाद पढ़िते आभा उदास भऽ उठल आ बजा गेलै "आब की हेतै"। फेर अपने कहलक की हेतै तकर कोनो मतलब नै। सभकेँ मरहे के छै। अट्ठासी बर्खमे मरला। कम उमर नै छलनि। अभय सेहो कोनो नार्मल समाद सन एकरा लेलक। नार्मल रूपें तँ आभा सेहो लेने छल मुदा आब ओकरा चिंता आब रमणीकजीक परिवारकेँ छलै जकर संचालन अपने रमणीकजी करैत छलाह। अट्ठासी बर्खक उम्रमे सेहो जबाने सन फुर्ती छलनि। मजाल जे कोनो बात बिसरि जाथि। दू-दू टा दोकान छलनि मुदा दूनूकेँ अपने सम्हारने। बेटा सभ सेहो साठिक उम्र धरि पहुँचल मुदा एखनो बापक देल खर्चापर निर्भर। घरक सभ काज रमणीकजीक फैसलासँ होइत छल चाहे ओ अपन कनियाँक एनाइ-गेनाइ हो कि पुतहुअक या बेटा बेटीक। हँ खर्चा दै छलखिन तँ हिसाबो सेहो पूरा लै छलखिन। हिसाबमे गड़बड़ी हुनका पसंद नै छलनि। कहियो-कहियो आभाकेँ रमणीकजीक पुतहु-बेटासँ बड़ ईर्खा होइत छलै। होइत छलै जे ओकरे जकाँ बिना जिम्मेदारीक जीवन रहितै तँ कते नीक।ने घरक चिंता ने बाहरक। ओकरा सभकेँ पहिने खर्चा भेटि जाइ छै आ हमरा खर्चा देबऽ पड़ैत अछि। आभाकेँ अपन ससुरपर तामस आबऽ लागै छै। ओकर बियाहक एकै सालक बाद अभयकेँ कहि देल गेलै अपन खर्चा अपने चलबए लेल। आभा फेर सोचैए एकटा हमर ससुर छलाह आ एकटा छलाह रमणीकजी जे मरितो धरि बेटा पुतहुकेँ कोनो दिक्कत नै देलथि। एकटा प्रतिष्ठित कपड़ा बेपारी छलाह रमणीकजी। ग्राहकक सभहँक एहन विश्वास जे हिनकेसँ सभ कपड़ा कीनए। रमणीकजीक टा टा बेटा छल। जाहिमेसँ दू टा साठि पास कऽ चुकल छथि। आ तेसर पार करहे बला छथि। रमणीकजी अपन तीनू बेटा लेल एक नम्बरक घर बनबेने छलाह। घरो एकै छलनि आ सोफा-कोठा सभ एकै रंगक। आभाक सहेली छलै हर्षा, रमणीकजीक बड़की पुतहु। से जखन आभा हर्षाक घर गेल सोफा सभ देखाबए तँ से देखि आभाकेँ कतेको दिन निंद नै भेलै। आ अपन ससुरपर फेरो तामस एलै। अपन बर अभयपर सेहो जे पने पाइसँ घर खरिदबाक सपना देखैए। पता नै कहिया हेतै ओकर अपन घर। मुदा पता नै किए आभाकेँ लगै छलै जे रमणीकजीक बेटा सभ खुश नै छल। आ खुश केना रहितनि। पुतहुए सभ नाखुश छलनि। जखन-जखन हर्षा आभा लग अबैत छल। शिकाइतक मोटरी सेहो नेने अबैत छल। "कमनियाँ (कामना) नैहर गेलै तँ बाबूजी बीस हजार देलखिन आ हमरा बेरमे दसे। हम तँ कहि देलियनि जे हम नै जाएब नैहर। दस हजारमे की सभ हेतै। बुझिते नै छथिन।" शिकाइत करैत-करैत हर्षाक मूह लाल भऽ जाइत छलै। आभाकेँ आश्चर्य लगैत छलै आ कहैत छलै- "लेकिन दस हजारमे पूरा महिनका खर्च पूरा कोना हेतै" "नइ से नइ, खेनाइ-पिनाइ, बिजली,स्कूलक फीस, नौकर-चाकर सभ बाबुएजी दै छथिन" हर्षा ई लिस्ट गनबैत जाइत छलै आ आभाकेँ छगुन्ता लगैत रहलै जे सभ किछु जखन बाबुएजी करै छथिन तखन इम्हर-उम्हरकेँ खर्च लेल दस हजार कम कोना पड़ि जाइत छै। हमरा तँ दस हजारमे पूरा घर चलबऽ पड़ैए। देखियौ कतेक निश्चिंती जीबन छै एकर सभहँक तैयो खुश कहाँ छै ई सभ। आभा एखनो चिंतामे छल जे आब की हेतै? रमणीकजीक बेटा सभ हुनका जिबितेमे अलग हेबाक लेल जे फरफर करै छल से तँ अजाद भैए गेलै। अइ घटनाकेँ एक मास भऽ गेल रहै मुदा काजे सभ एहन अबैत गेलै जे आभा आ हर्षाक भेंट नै भेल रहै। मुदा ओहि दिन आभा हर्षाकेँ हाटमे देखलकै तँ चिन्हबामे धोखा भऽ गेलै। "की भेल, तबीयत खराप अछि की?" "तबीयत तँ ठीक अछि मुदा भागे खराप अछि। बड़का दोकान मझला देखै छलखिन आ छोटकाकेँ दुन्नू भाए। से मझला आब ओइ दोकानपर कब्जा जमा लेलखिन। ओइ दोकानक एकौ पाइ देबा लेल तैयार नै छथि। आब एक दोकानमे ई दू परिवार कोना चलत। घरक खर्च कते छै से आब बुझा रहल अछि?" हाटेमे हर्षा अपन दुख कहऽ लगलै। आब आभाकेँ बुझा गेल रहै हर्षाक चेहरा एना किए भेलै। "बाबूजी सभ राज-काज अपने देखै छलखिन से अइ दुन्नू भाए पते नै कोना काज होइ छै। सभ दिन बाबुएजीक कहलपर काज केला अपना मोने तँ किछु केबे नै केला" ई सभ कहैत-कहैत हर्षा हकमए लागल छल। से सच छैहे जे नौकर जकाँ खटब आ मालिक जकाँ काज सम्हारब दुन्नूमे भारी फरक छै। आभाकेँ ई एखनो नै बुझएमे आबि रहल छलै जे रमणीकजीक नीक केला की खराप। बेटा सभकेँ काजसँ दूर रखला आ ओकरा सभकेँ अपन पएरपर ठाढ़ नै होमए देलाह। साठि सालसँ बापपर निर्भर रहए बला बेटा सभ दोकानक नौकरपर निर्भर छल। आपना बच्चामे अपनो काज करबाक बुद्धि नै।एना किए केलखिन रमणीकजी। अपन बेटा सभकेँ अपने बकलेल बना देलखिन। लोथ सन बना देलखिन। आभाकेँ लगलै आब ओ कते सुखी अछि अपन छोट परिवार, अपन कम पाइमे। पहिल बेर आभा अपन ससुरक फोटोकेँ नीक जकाँ देखलक, बहुत देर धरि देखिते रहल। (मूल शीर्षक-- रमणीक भाइ नहीं रहे) आशीष अनचिन्हार प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल प्रस्तुत अछि मैथिलीक व्यंग्य सम्राट प्रो. हरिमोहन झाजीक लिखल ई गजल जे कि हुनक रचनावली (कविता खंड)सँ पृष्ठ-87सँ साभार अछि। तकर बाद हम एकर तक्ती कऽ देखाएब जे ई वास्तवमे गजल थिक की नै थिक-- ने लड़लहुँ फौजदारी जौं त रुपया केर धाहे की खसौलक नोर नहि बापक त ओ कन्याक विवाहे की ने आधा ऐंठ फेकल गेल त फेर ओ भोज भाते की ने बहराएल एको बन्दूक त ओ थिक बराते की ने लगला जोंक बनि कय जे तेहन दुलहाक बापे की जौं लस्सा बनि कुटुम सटला त ओहिसँ बढ़ि पापे की पड़ल नहि खेत सुदभरना त ओ बापक सराधे की ने फनकल जौं देयादे सन त ओ गहुमन दराधे की 1972मे लिखल (प्रकाशित) आब एकर तक्ती देखू-- पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि--1222-1222 पहिल शेरक दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--1222-1222 दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर शेरक दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-11222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि- 1222-12221 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--12122-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि 1222-122221 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--122-1222 जँ कथित तौरपर "ए"केँ लघु मानी (जे कि गलत अछि) तखन एहि चारिम शेरक मात्राक्रम एना हएत-- पहिल पाँति -1222-12221 दोसर पाँति-122-1222 दूनू व्यवस्थाकमे मात्राक्रम मतलाक हिसाबें नै अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि- 2222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। छठम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। सातम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें अछि। आठम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि- 1222-2222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि। उपरक विवेचनासँ स्पष्ट अछि जे ई गजल नै अछि। ओना हरिमोहन झाजी अपन आत्मकथा "जीवन यात्रा" मे लिखै छथि जे ओ पटना आबि मोशायरा सभमे सेहो भाग लेबए लगलाह। भऽ सकैए जे मात्र लौलवश ई कथित गजल हरिमोहनजी लिखने होथि। जे किछु हो मुदा ई गजल गजल इतिहासमे उल्लेख करबा योग्य नै अछि मुदा ओइ बाबजूद मात्र अइ कारणसँ हम विवरण देलहुँ जे काल्हि कियो उठि कऽ कहि सकै छथि जे हरिमोहन झा सन महान हास्य-व्यंग्यकार गजल लिखने छथि आ सही लिखने छथि। बस एही कारणसँ हम एतेक मेहनति केलहुँ अन्यथा एहि गजलमे कोनो एहन बात नै। हरिमोहन झाजी गजलक संबंधमे की सोचैत छलाह तकर बानगी "कहू की औ बाबू" नामक कविताक पहिले खंडमे देने छथि-- बसाते तेहन छै जे गोष्ठी मे कवियो गजल दादरा आ कव्वाली गबैये किछु दिन मे एहो देखब औ बाबू जे कविताक संग-संग तबला बजैए हरिमोहन झा रचनावली (कविता खंड) पृष्ठ-120 (11-11-1978 मे प्रकाशित)। भऽ सकैए जे हरिमोहनजीकेँ उर्दू शाइर सभहँक संग घनिष्ठता होइन मुदा ओ घनिष्ठता शाइरी ज्ञानमे नै बदलि सकल से उपरक हुनक विचारसँ परिलक्षित भऽ जाइए। भाषा केर मनोविज्ञान (तीन टा बिंदु) भाषा केर मनोविज्ञान भाग-1 जखन केओ कहै छै जे "मैथिली मधुर भाषा थिक" तखन हमरा ओहिसँ बेसी बड़का गारि किछु नै बुझाइत अछि। कोनो भाषा मधुर वा खटगर वा नुनगर की तेलगर होइते नै छै। आ जँ मधुर होइ छै तँ किएक? ऐ प्रश्नपर एबाक लेल बड़ साहस चाही। मध्यकालीन मिथिला सामंती छल। सामंत बैसल की चमचा सभ घेरि अपन समस्या सुनबए लागैत छलाह। आ जखन केकरो अहाँ अपन समस्या सुनेबै वा की केकरो चमचइ करबै तखन भाषा तँ मधुर राखहे पड़त। हमरा जनैत मैथिली अहीठाम मधुर भाषा थिक। कारण मैथिल चमचइ कर'मे बहादुर होइ छथि। मधुर बोल तँ राखहे पड़तन्हि। ठीक विपरीत मिथिलाक दलित ओ गैर-सवर्णक भाषामे चमचइ नै छै तँए ओहिमे टाँस बेसी बुझि पड़ै छै आ ब्राम्हण-कायस्थ सभ ओकरा रड़बोली कहै छथि।मुदा हमरा जनैत ई मात्र दृष्टिगत भेद अछि। जकरा अपन बाँहिपर विश्वास छै ओकर बोली ओ भाषामे टाँस रहबे करतै--जेना मिथिलाक दलित वर्गक मैथिली।आ जे चमचइमे लागल रहत तकर बोली ओ भाषामे मधुरता रहबे करतै--जेना मिथिलाक ब्राम्हण ओ कायस्थ वर्गक मैथिली। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-2 ई हम दू मिनट लेल मानि लै छी जे ब्राम्हण-कायस्थ महातेजस्वी होइ छथि तँ हुनके टा पुरस्कार भेटबाक चाही। मुदा की ब्राम्हण-कायस्थ दरभंगे-मधुबनी-सहरसामे छै वा मिथिला मने की दरभंगे-मधुबनी-सहरसा छै। ऐ समस्यापर जखन हम दृष्टिपात करै छी एना बुझाइए---- १) जेना-जेना दरभंगा-मधुबनी-सहरसाक क्षेत्र खत्म होइत जाइए तेना-तेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ आन छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत जाइए (१००मे ९७टा केसमे)। चाहे ओ सीतामढ़ी हो की मुज्फफरपुर हो की पूर्णिया हो की भागलपुर हो की समस्तीपुर हो की बेगूसराय हो की चंपारणक किछु क्षेत्र (झारखंडक क्षेत्र बला लेल एहने बुझू, राजनैतिक बाध्यताकेँ देखैत नेपालीय मैथिलीक उल्लेख नै क' रहल छी)। २) जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार क' देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि। किछु दिन पहिने नरेन्द्र मोदी द्वारा मुज्फफरपुरमे भोजपुरीमे भाषण देब एही ब्राम्हणवादक विरोध अछि आ हम एकर स्वागत करै छी तथा ओहि दिनक बाट जोहि रहल छी जहिया ओ दरभंगा-मधुबनीमे भोजपुरी बजता। जँ ठोस विचारक रूपमे आबी तँ निश्चित रूपें कहि सकै छी जे मैथिलीकेँ तोड़बामे ई ब्राम्हणवादी सभ १०० प्रतिशत भूमिका निमाहला। जँ कदाचित् ई ब्राम्हणवादी सभ दरभंगा-मधुबनी-सहरसासँ हटि क' सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ पुरस्कार देने रहितथि तँ कमसँ कम मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहैत। ई अकारण नै अछि जे रामदेव झा, चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आदि एहन महान ब्राम्हणवादीक कारणे दरभंगा रेडियो स्टेशनसँ बज्जिकामे कार्यक्रम शुरू भेल। ३) आ जँ मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहितै तखन मिथिला राज्य लेल एतेक मेहनति नै कर' पड़ितै। कारण चंपारणसँ गोड्डा धरि सभ अपन भाषाकेँ मैथिली बुझितै। ऐ ठाम हम ई जोर द' क' कहब चाहब जे पुरान होथि की नव राज्य आंदोलनी सभ सेहो ब्राम्हणवादी छथि। अन्यथा ओ सभ सेहो रामदेव झा. चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आकी आन-आन मैथिली विघटनकारी सभहँक विरोध करतथि। आखिर की कारण छै जे धनाकर ठाकुर अपन मानचित्रमे चंपारण वा गोड्डाकेँ तँ लै छथि मुदा ओहि क्षेत्रक साहित्यकार लेल पुरस्कारक माँग नै करै छथि। ई प्रश्न मात्र धनाकरे ठाकुरसँ नै आन सभ राज्य आंदोलनीसँ अछि। ऐठाम ई बिसरि जाउ जे पुरस्कार कोनो छोट जातिकेँ देबाक छै। जँ ब्राम्हणे-कायस्थकेँ देबाक छल तखन फेर सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण, बेगूसराय आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ किएक नै ? तँ आब ई देखबाक अछि जे के-के मिथिला राज्य आंदोलनी ब्राम्हणवादी छथि आ के-के साँच मोनसँ मिथिला राज्यकेँ चाहै छथि। भाषा केर मनोविज्ञान भाग-3 लोक जखने ब्राम्हणवादक नाम सुनै छथि हुनका बुझाइत छनि जे सभ ब्राम्हणकेँ कहल जाइत छै। मुदा हमरा लोकनि बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे ब्राम्हण आ ब्राम्हणवादक कोनो सम्बन्ध नै। कोनो चमार सेहो ब्राम्हणवादी भ' सकै छथि। ब्राम्हणवाद जाति विशेष नै भेल ई मात्र मानसिकता भेल जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक प्रमुख तत्व वा लक्षण एना अछि--- १) केकरो आगू नै बढ़' देब------ एकटा छलाह स्व. रमानाथ मिश्र "मिहिर"। ई नीक हास्य-व्यंग केर कविता लीखै छलाह। मुदा ई मैथिली साहित्यमे आगू नै बढ़ि सकला। कारण? कारण हिनक दोख छलनि जे ई चंद्रनाथ मिश्र " अमर" जीक भातिज छलखिन्ह। दालि आ देयाद जते गलत तते नीक। साहित्यक स्तरसँ ल' क' पारिवारिक स्तरपर रमानाथ मिश्रजीकेँ पददलित होम' पड़लनि। ब्राम्हणवाद मात्र दलिते लेल नै छै। बहुत रास ब्राम्हण अपनो जाति केर लोककेँ आगू नै बढ़' दैत छै। २) मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब--- जँ साहित्य अकादेमीक लिस्ट बला झा-झा सभ प्रतिभावान छथि तँ फेर मैथिली साहित्य विश्वक छोड़ू भारतीय साहित्य केर समकक्ष किएक नै अछि। आ जँ प्रतिभे छै तखन तँ श्री विलट पासवान "विहंगम" भारतीय राजनीतिसँ ल' क' मैथिली साहित्य धरि योगदान देने छथि। की विहंगम जी प्रतिभाहीन छथि। विहंगम जी सन-सन आर बहुत बेसी नाम अछि। ३) परिवारवाद---- रामदेव झा जखन रिटायर भेलाह तँ साहित्य अकादेमीमे ओ अपन ससुर चंद्रनाथ मिश्र अमरकेँ बैसा देलाह। तकर बाद अमर जी अपन समधि विद्यानाथ झा विदितकेँ बैसेलाह। आब विदितजीक निकट संबंधी (चेलाइन) छथि। कारण-- ब्राम्हणवादक एकमात्र कारण हीन भावना अछि। मिथिला स्टूडेंट यूनियनक काज पर रिपोर्ट विदेह सदिखन वास्तिविक आ सामयिक काज करए बलाकेँ सलाम ओ प्रोत्साहित केलक अछि। एखन बाढ़ि पीड़ितक बीच जाहि तरहें मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) काज कऽ रहल अछि से आगूक लेल एकटा उदाहरण बनत। ई पहिल बेर अछि जखन कि मिथिलाक नामपर बनल कोनो संस्था जनताक बीच गेल आ ओकरा समर्थन भेटलै। ई समर्थन काज केलासँ भेटलैए। खाली मौखिक समर्थन नै तन-मन-धन तीनू भेटलैक अछि आ मिथिला स्टूडेंट यूनियन साबित केलक जे हँ ओ भविष्यमे नमहर दायित्व सम्हारि सकैए। विदेहक किछु पछिला अंकमे सेहो मिथिला स्टूडेंट यूनियनक काजकेँ रेखांकित कएल जे अछि जे कि संपादकीय वा रिपोर्टक रूपमे सुरक्षित अछि। "मिथिला स्टूडेंट यूनियन केर बाढ़ि पीड़ित फंडमे दान देबाक लेल सभ गोटा स्वतंत्र छी। चाहे एक रुपया हो कि एक लाख। निच्चामे बैंक डिटेल देल जा रहल अछि-- मिथिला स्टूडेंट यूनियन केर सभसँ बड़का विशेषता अछि मिथिलाकेँ दरभंगा-मधुबनीसँ बाहर करब। मिथिला स्टूडेंट यूनियन केर ई प्रवृति निश्चिते भविष्यमे वृहद मिथिला राज्यक गठन लेल बाट खोलत। ता धरि मिथिला स्टूडेंट यूनियन केर एहि काजक लेल फेसँ सलाम करैत किछु चित्र परसि रहल छी जे कि सेनानी सभहँक मनोबलकेँ आर आगू बढ़ाएत— "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि आइ हम जे लेख परसि रहल छी तकर मूल उद्येश्य अछि “मैथिली वेब पत्रिकारिताक प्रारंभिक स्वरूप”केँ फड़िच्छ करब। आन तथ्य देबासँ पहिने हम याहूसिटीज / ब्लागरसँ संबंधित किछु घोषणा देखा रहल छी जे कि याहूसिटीज / ब्लागर केर आफिसियल पेजसँ लेल गेल अछि आ एकरा कियो गलथोथी वा कुतर्कसँ गलत साबित नै कऽ सकै छथि। तँ देखू निच्चाक तथ्य- 1) 1999मे याहूसिटीज (Yahoo! GeoCities) चालू भेलै आ 2001मे प्रोफिट नै हेबाक कारणे एकरा लगभग बंद कऽ देल गेलै (फ्री एकांउट बला सभकेँ स्टेप बाइ स्टेप बंद कएल गेलै) मैथिलीक पहिल इंटरनेटीय उपस्थिति जे कि भालसरिक गाछ नामसँ सन 2000 सँ याहूसिटीजपर छल  तकरो एकांउट बंद भऽ गेलै (जँ कियो चाहता तँ एकर रेकार्ड याहूसँ मँगबा सकै छथि, ओना एकर चांस कम कारण आर्काइभ खत्म भऽ गेल छै)। एकर बादमे 2009सँ याहूसिटीज अमेरिका समेत सभ देशसँ अपन पेड सर्भिस सेहो हटा लेलक आ आब मात्र जापानमे एखन एकर सर्विस बाँचल छै। ई तँ बहुत पहिनेक बात छै हाल-फिलहाल (2014)मे सभ गोटा आरकुटकेँ बंद होइत देखने हेबै। आरकुटपर जिनकर-जिनकर प्रोफाइल रहए से आब नै भेटि सकैए। हँ जे आर्कइभ बना लेने हेता से फाइल रूपमे अपन डाटा रखने हेता। याहूसिटीज केर विकिपीडिया वा आन संदर्भसँ हमर तथ्यकेँ जाँचल जा सकैए। 2)  May 01, 2008सँ ब्लागर फ्यूचर पोस्ट केर सुविधा देलकै जकरा एहि लिंकपर देखि सकै छीhttps://blogger.googleblog.com/2008/05/blogger-now-schedules-future-dated.html एहि सुविधासँ लोक पोस्टकेँ ड्राफ्टमे भविष्यक तारीख संग राखि दै छथिन आ ओ पोस्ट नियत तारीखमे अपने-आप पोस्ट भऽ जाइत छै। एहि फीचरमे जे कैलेंडर देल गेल छै तकरे सहायतासँ आजुक पोस्टकेँ दू साल पाछूक तारीखमे लऽ जा सकै छी तेनाहिते दू साल पहिनुक पोस्टकेँ आजुक तारीखमे आनि सकै छी मुदा ई मात्र पोस्टक तारीख वा सालमे हेड़ा-फेरी कऽ सकै छी कोनो पोस्टक URL केर तारीख,महीना वा सालमे नै। URL बला तारीख,महीना वा साल वएह रहतै जहिया पोस्ट प्रकाशित भेल रहै। 3) December 10, 2008सँ ब्लागर दूटा ब्लाग केर मर्जिंग मने जोड़ि देबाक सुविधा देलकै एकरा एहि लिंकपर देखि सकै छीhttps://blogger.googleblog.com/2008/12/your-blog-your-data.html एहि सुविधासँ लोक अपन अलग-अलग ब्लागकेँ एकठाम जोड़ि सकै छलाह। 4) February 03, 2010सँ ब्लागर पेज शुरू करबाक सुविधा देलकै एकरा एहि लिंकपर देखि सकै छीhttps://blogger.googleblog.com/2010/02/create-pages-in-blogger.html एहि सुविधासँ लोक अपन ब्लागक विभिन्न सूचना पाठक लग दै छथि। पेज बनेलापर खाली अक्षर वा अक्षर-अंकक लिंक बनै छै मुदा तारीख,महीना वा सालनै रहै छै। 5) July 17, 2012सँ ब्लागर कस्टम लिंक बनेबाक सुविधा देलकै जकरा एहि लिंकपर देखि सकै छीhttps://blogger.googleblog.com/2012/07/customize-your-posts-with-permalinks.html कस्टम लिंक मने अहाँ अपना मोनक हिसाबें कोनो पोस्टक URL बना सकै छी मुदा URLमे पोस्टक प्रकाशन दिन बला तारीख,महीना वा साल रहत। पोस्टक ओरिजिनल पोस्ट डेट वा पोस्टक साल नै बदलल जा सकैए जकरा अहाँ सभ एहि लिंकपर देखि सकै छी http://blogger-hints-and-tips.blogspot.in/2009/12/changing-date-for-post.html उपरक तथ्य सभकेँ नीक जकाँ अहाँ सभ मोन राखू आ निच्चा देल गेल मैथिलीक आरंभिक ब्लाग / वेबसाइट सभहँक पहिल पोस्ट आ ओकर तारीख सभकेँ अहाँ अपने जाँचू जाहिसँ ई स्पष्ट हएत जे कोन पत्रिका पहिल अछि आ के दोसर। एहि अंतर्गत हम पाँच टा ब्लाग / वेबसाइट राखब 1) भालसरिक गाछ (याहू सिटीज आ ब्लागर दूनू बला ) 2) पल्लवमिथिला 3) समदिया  4) प्रकरांतर 5) कतेक रास बात आगू बढ़बासँ पहिने ई कहि दी जे एहि पाँचो ब्लागमे दू टा एहन लिंक अछि जकर आर्काइभ उपल्बध नै अछि मुदा चर्चा हम सभ लिंक केर करब चाहे ओकर आर्काइभ हो या नै हो। आर्काइभ नै हेबाक मततलब ई नै छै जे कोनो चीजक अस्तित्वकेँ नकारि देल जाए। भालसरिक गाछ गजेन्द्र ठाकुर जी याहूसिटीजपर बहुत रास मैथिलीक साइट बनेने छलाह मुदा ताहिमेसँ "भालसरिक गाछ" केर लिंक (जे सन 2000 सँ याहूसिटीजपर छल) बाँचल अछि। एकर लिंक http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/ अछि। याहूसिटीज पर ई बंद भेलाक बाद 5 जुलाई 2004केँ एही नामसँ ब्लागरपर सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ब्लाग बनाएल गेल आ जनवरी 2009मे एकरा विदेहक संग जोड़ि देल गेलै आ आब ईhttp://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर आर्काइभ सहित अछि। एहिठाम मोन राखब जरूरी जे याहूसिटीज बला ब्लाग केर आर्काइभ उपल्ब्ध नै अछि। पल्लवमिथिला पल्लवमिथिला नामक वेबसाइट जे कि 2059 माघे संक्रान्ति- (2003 जनवरीमे) धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी द्वारा बनाएल गेल। एकर लिंक अछि-www.pallavmithila.mainpage.net वर्तमानमे ई वेबसाइट बंद अछि। एहि वेबसाइट केर मूल पेज www.mainpage.net सेहो याहूजियो सिटीज जकाँ बंद भऽ गेलै। संगे-संग एहू वेबसाइट केर आर्काइभ उपल्बध नै अछि। विनय कुमार कसजू केर नेपाली पोथी "सूचना प्रविधिको शक्ति र नेपालमा यसको उपयोग" जे कि सितंबर 2003 मे प्रकाशित भेलै तकर पृष्ठ 155 पर "पल्लवमिथिलाक चर्चा छै। समदिया ईहो ब्लाग गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा 9 अगस्त 2004मे बनाएल गेल छल समादक वास्ते मुदा पहिल पोस्टक बाद लगभग चारि साल ई बंद रहल फेर 2008सँ एकर प्रकाशन शुरू भेल आ फेर-आस्ते-आस्ते 2015 धरि चलैत रहल। एहि ब्लागक पहिल पोस्टक लिंक अछि- http://esamaad.blogspot.in/2004/ प्रकरांतर एहि ब्लागक पहिल पोस्ट 12 फरवरी , 2005 केँ अछि जकर लिंक http://prakarantar.blogspot.in/2005/02/blog-post.html अछि। ई ब्लाग किनका द्वारा बनाएल गेल से अज्ञात अछि मुदा कमेंट सभसँ पता चलैए जे कोनो ठाकुरजी छथि (शायद विजय ठाकुर जिनक मैथिली दर्पण, तात्काल आदि ब्लाग सेहो छनि)। जे हो मुदा एकर लिंकसँ एहि ब्लागक तारीख पता चलि रहल अछि। मात्र दू टा पोस्टक बाद ई ब्लाग बंद भऽ गेल मने ओहिपर पोस्ट एनाइ बंद भऽ गेल। एहि ब्लागक अंतिम पोस्ट 19 फरवरी , 2005मे आएल। कतेक रास बात कतेक रास बातक मूल लिंक http://vidyapati.blogspot.com/ अछि (आब एकर पता http://www.vidyapati.org/ अछि मुदा दूनू लिंकसँ खुजैत छै)। कतेक रास बात नामक ब्लाग केर सभसँ पहिल पोस्ट जे देखा रहल अछि (देखू चित्र- 1, चित्र सभ निच्चा अछि) ताहिमे झोल-झाल छै। एकर URLमे http://www.vidyapati.org/2013/07/blog-post_28.html देखा रहल छै (देखू चित्र-1 केर उपर घेरामे) मतलब ई पोस्ट 2013 केर जुलाइ मासमे भेल छै। मुदा एकर प्रकाशन केर तारीख July 01,1999 तारीख देखा रहल छै (देखू चित्र-1 केर नीचा घेरामे)। आ एहि पोस्टसँ पहिने आरो कोनो पोस्ट नै छै से न्यूअर पोस्ट देखलासँ पता चलि जाइत छै। एहि पोस्टक बाद जे पोस्ट अछि से सूचनाक रूपमे अछि आ तकर URLhttp://www.vidyapati.org/2005/08/blog-post.html अछि (देखू चित्र- 2) मने ई पोस्ट 2005 केर अगस्त मासमे भेल अछि  (देखू चित्र-2 केर उपर घेरामे) मुदा फेर एहूक प्रकाशन तिथिमे गड़बड़ी कएल गेल अछि आ प्रकाशन तारीखकेँ November 28, 2004 बना देल गेल अछि (देखू चित्र-1 केर नीचा घेरामे)। एहि पोस्टक बाद बला जे पोस्ट अछि तकर URL http://www.vidyapati.org/2005/09/blog-post.html अछि मने ई पोस्ट 2005 केर सितंबर मासमे प्रकाशित भेल आ एकर प्रकाशन तारीख September 02, 2005 अछि मने एखन धरिमे इएह पोस्ट सही अछि (देखू चित्र- 3)। सितंबर 2005 केर बाद जुलाइ 2006मे पोस्ट भेल जकर URL अछि http://www.vidyapati.org/2006/07/blog-post.html आ एकर प्रकाशन तारीख अछि July 12, 2006 एहि आ एकर बाद बला पोस्टक URL आ प्रकाशन तारीख मीलै छै। जे गड़बड़ी छै से पहिलुक दूटा  टामे आ से मात्र इतिहासमे गलत तरीकासँ पहिल स्थान बनेबाक लेल। जँ कतेक रास बातक एहि चारि टा पोस्टक तारीखकेँ सजाएल जाए तँ ई निश्चित भऽ जाइ छै जे एहि ब्लागक पहिल पोस्ट 1 अगस्तसँ लए कऽ 31 अगस्त धरिक बीचमे भेल छै (सुविधा लेल अगस्त-2005 नाम हम देलहुँ)। एकटा आर रोचक तथ्य ई जे कतेक रास बात केर परिचय (पेज रूपमे, देखू चित्र-4)मे पद्मनाभजी लीखै छथि "प्रिय पाठकगण;एहि ब्लोग’क शुरुआत हम 2004 मे केलहुँ. ताबय धरि हमरा जानकारी मे मैथिली भाषा इन्टरनेट पर नहि छलए"। ई कोन जानकारीक दाबी भेलै। 2003मे प्रिंट पोथीमे पल्लवमिथिला बारेमे लिखाएल छै तखन आर हिनका कोन जानकारी चाही। भऽ सकैए जे पद्मनाभजी कहथि जे पल्लवमिथिला नेपालक अछि मुदा मैथिली तँ नेपालोमे छै आ ओनाहुतो इंटरनेटक कोन देश हेतै। इंग्लैंडमे चलि रहल मैथिलीक वेबसाइट वा ब्लागकेँ मैथिली भाषाक कहल जेतै या इंग्लैडक भाषाक। भऽ सकैए जे पद्मनाभ जी कहथि जे हम ब्लाग 2004मे बनेलहुँ मुदा ओकर पहिल पोस्ट अगस्त 2005मे भेल मुदा एहन दाबी तँ कियो कऽ सकैए। सभसँ पहिने तँ हमहीं दाबी करब जे हमर ब्लाग "अनचिन्हार आखर" 1999मे बनल मुदा ओकर पहिल पोस्ट 11 अप्रैल 2008केँ भेल। मुदा वास्तविक रूपें हम जानै छियै जे ई तर्क नै मात्र बकथोथी हेतै। कतेक रास बात दिसम्बर 2013 धरि चलैत रहल ओहि केर बाद ओहिपर कोनो सक्रियता नै अछि। गजेन्द्र ठाकुर अपन पोथी "कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक" (संस्करण 2009)मे एकटा आलेख देला जकर शीर्षक छै " भाषा आ प्रौद्यौगिकी (संगगणक, छायाकंन, कुंजीपटल, टंकण तकनीक) अंतर्जालपर मैथिली आ विश्वव्यापी अंतर्जालपर लेखन आ ई प्रकाशन" जे कि बादमे अंतिका पत्रिकाक अंतर्जाल विशेषांकमे सेहो प्रकाशित भेलै। एहि आलेखमे गजेन्द्रजी "भालसरिक गाछ" संबंधमे चर्चा केने छथि जाहि के बाद भ्रम पोसए बला "पहिल" लोक सभहँक भ्रम टूटल आ तकरे फलस्वरूप ओ सभ गलत तथ्य प्रकाशित केलाह जे हम एतेक सालमे शुरू केने रही तँ हम ओतेक सालमे शुरू केने रही। ठाकुरजीक ई आलेख ओहि समयमे पहिल ओहन आलेख रहै जाहिमे अंतर्जालक संबंधमे विस्तारसँ चर्चा रहै एते धरि जे बिना कोनो सर्टिफिकेट लेने अपनासँ कोना वेबसाइट बना सकै छी तकरो विधि ओहि आलेखमे छै। पाठक ई आलेख हुनक पोथी वा अंतिका पत्रिकाक "अंतर्जाल विशेषांक"मे पढ़ि सकै छथि।   मैथिलीमे सभ ई मानै छथि जे हम जहियासँ काज शुरू केलहुँ सएह पहिल भेल। इतिहासमे तकनाइ, अध्ययन केनाइ हुनका पसंद नहि छनि (एकटा टटका उदाहरण हमरा भेटल जे एक वेबसाइट जे कि अगस्त 2012सँ चालू भेल हुनक दावा छनि जे हम अपन वेबसाइटपर पहिल बेर साक्षात्कार शृंखला चालू केलहुँ जे कमसँ कम कोनो वेब पत्रिकामे नै छल। आब देखू जे समदिया अक्टूबर 2011सँ "हम पुछैत छी" नामक साक्षात्कार शृंखला चलेलक आ एहिमे कुल सत्तावनसँ बेसी व्यक्तित्वक साक्षात्कार प्रस्तुत कएल गेल अछि। आब कहू पहिनेसँ के चला रहल अछि। एही ठाम अध्ययनक जरूरति पड़ै छै। बिना पढ़ने आ जनने पहिल केर बीमारी पोसने मैथिलीक सेवक सभ बहुत पसरल छथि)। हम पुछैत छी शीर्षक सभ साक्षात्कार एहि लिंकपर पढ़ि सकै छी-http://esamaad.blogspot.in/p/blog-page_22.html एतेक देखेलाक बाद हम "कतेक रास बात" केर संचालक सभ सभ पूछए चाहै छी जे जँ प्रकाशने तारीखकेँ मानक बूझी तखन मैथिली किएक ओ हिंदी आ भारतक पहिल ब्लाग हेबाक दाबी किए नै कऽ रहल छथि। हिंदीक पहिल ब्लाग "नौ दो ग्‍यारह" अछि जे कि आलोक कुमार जी 21 अप्रैल 2003 के शुरू केने छलाह। कतेक रास बातक तँ प्रकाशन तिथिक हिसाबसँ "9211"सँ चारि साल पुरान अछि तखन  डा0 पद्मनाभ मिश्र  क्लेम करथु भारतक पहिल ब्लाग हेबाक। मुदा  डा0 पद्मनाभ मिश्र  नै कऽ सकताह कारण हुनका बूझल छनि अपन बैमानीक बारेमे।  डा0 पद्मनाभ मिश्र  किछु ओहन नवसिखुआ सभकेँ बड़गला सकै छथि के मात्र एकांउटिंग उद्येश्यक संग कंप्यूटर चलबै छथि मुदा जे कंप्यूटरसँ नीक जकाँ परिचित छथि तिनका ओ कोना बड़गला सकै छथि। हम एहि लेखक माध्यमे पद्मनाभजीकेँ चुनौती दै छियनि जे प्रकाशन तारीखक हिसाबसँ ओ अपन ब्लागकेँ भारतक पहिल ब्लाग घोषित करबाबथि आ से केलासँ ओ मैथिलिओक पहिल ब्लागर बनि जेता। उपरक तथ्य सभसँ पता चलल हएत जे इंटरनेटपर -- 1) भालसरिक गाछ (याहू सिटीज) 2000सँ अछि जकर लिंक http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/ अछि। 2) पल्लवमिथिला 2003सँ अछि जकर लिंक www.pallavmithila.mainpage.net अछि। 3) समदिया 2004सँ अछि जकर लिंक http://esamaad.blogspot.in/2004/ अछि। 4) प्रकरांतर 12 फरवरी , 2005 केँ अछि जकर लिंक http://prakarantar.blogspot.in/2005/02/blog-post.html अछि। 5) कतेक रास बात अगस्त-2005सँ अछि जकर लिंक http://www.vidyapati.org/2005/08/blog-post.html अछि। आ तँइ ई निश्चित रूपेण कहल जा सकैए जे भालसरिक गाछ (याहू सिटीज) बला इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति अछि। तकर बाद पल्लवमिथिलाक स्थान दोसर अछि। समदियाक स्थान तेसर अछि। प्रकरांतर केर स्थान चारिम अछि। आ अंतमे कतेक रास बात केर पाँचम स्थान अछि। बहुत संभव अछि जे इंटरनेटक अथाह दुनियाँ केर किछु तथ्य हमरासँ छुटि गेल हो तँइ जँ अहाँ सभ ओकर सूचना दऽ एहि लेखकेँ परिमार्जन करेबै तँ ई भविष्य आ इतिहास दूनू लेल नीक रहतै। आशा अछि जे कोनो गलती दिस निधोख भऽ अहाँ सभ सुझाव देब। चित्र सभ निच्चा अछि- नन्‍द विलास राय हमर लॉटरी निकलल झंझारपुर रेलबे टीशनक बगलमे एकटा दवाइ दोकान अछि, नाओं छिऐ- नवीन फार्मेसी। ओइ दोकानक ई विशेषता छै जे निर्मलीक डाक्‍टर पुरजा हुअए वा दरभंगाक डाक्‍टरक, फुलपरासक डाक्‍टरक पुरजा हुअए वा तमुरियाक डाक्‍टरक सभ दवाइ भेट जाएत। तँए दोकानमे खरीदवालक भीड़ हरिदम लगले रहैत अछि। हमरो पत्नीक इलाज चलि रहल अछि। डाक्‍टर साहैब कहने रहथिन जे छह मास धरि दवाइ खाए पड़तैन। पाँच मास तँ बीति गेल आब छठम मासक दवाइ चलतैन। तँए हमहूँ दवाइ कीलैले झंझारपुर विदा भेलौं। चारिये बजे भोरबामे उठि कऽ तैयार भऽ भपटियाही स्‍कूल लग मुख्‍यमंत्रीबला सड़कपर एलौं। ओइठामसँ टेम्‍पू पकैड़ परसा हाल्‍टपर पहुँचलौं। परसा हाल्‍टपर टिकट कटा छह बजिया ट्रेनक प्रतीक्षा करए लगलौं। बगलमे बैसल एक गोरे बाजल- “ट्रेन आइ निर्मली सबेर गेल अछि तँए छह बजे धरि ऐठाम पहुँच जाएत।” मोबइलमे समए देखलौं, पौने छह बजै रहए। ठीक छह बजे ट्रेन परसा हाल्‍टपर पहुँचल। हम एकटा कोठरीमे चढ़ि गेलौं। सबेर रहितो ट्रेनमे भीड़ छल। ट्रेन घोघरडीहा टीशन पहुँच कऽ रूकल। एकटा महिला जे सलवार-समीज पहिने रहए, हमरे कोठरीमे माने जइ कोठरीमे हम बैसल रही, ओहीमे चढ़ल। घोघरडीहा टीशनपर ट्रेनमे भीड़ बढ़ि गेल दल। ओ महिला जैठाम हम बैसल रही, ओहीठाम आबि चारूदिस हिया कऽ तकलक। केतौ खाली जगह नै देख हमरसँ कहलक- “बाबा, कने हमरो बैसए दिअ।” ओइ महिलाक बाबा कहब सुनि हम छगुन्‍तामे पड़ि गेलौं। आखिर हमरा ई औरत बाबा किए कहलक। भाइजी कहैत तँ ठीक छेलइ। कक्को कहैत तँ ओतेक सोच नहि होइतए। बाबा किए कहलक..! हम हिया कऽ निच्‍चा-सँ-ऊपर धरि ओइ महिलाकेँ देखए लगलौं। तैबीच ओ फेर टेकलक- “एना की निंगहारि-निंगहारि देखै छी। कहियो मौगी नै देखने छिऐ की? कनेक घुसकु ने।” आब तँ भेल औरो पहपैट। हमरा भेल जेना कोनो चीज चोरि करैत पकड़ा गेलौं। हम कनी खिसैक गेलौं। ओ महिला हमरा देहमे सटि कऽ बैस गेली। दोसर कियो रहैत तँ ओइ महिलाक सटब नीके लगिते। धरमागती पुछू तँ हमरो नीक लगैत मुदा ओ औरत जे बाबा कहने छेली तही सोचमे डुमल रही। सोची जे एतेक बुढ़ भऽ गेलौं जे ई महिला हमरा बाबा कहलक..? गाड़ी सीटी देलक आ ससरए लगल। एकटा बीस-बाइस बर्खकलड़की जेकरा कोरामे एकटा लकधक साल भरिक बच्‍चा रहै, ओ खिड़की लग प्‍लेटफार्मपर ठाढ़ छेली, ओइ औरतसँ बजली- “मम्‍मी ठीकसँ जइहेँ। गाम पहुँचते फोन करिहेँ।” फेर कोरैला बच्‍चासँ कहली- “बौआ, नानीकेँ टाटा कऽ दियौ।” ओ महिला खिड़कीसँ हाथ निकालि हिलबए लगली। हमर मन खसल रहए। हम सोचैत रही, आखिर ई महिला हमरा बाबा किए कहलक! जखन कि ओकरो नाति-नातिनभेल छै जे अखने देखलौं हेन। हम ओइ महिला दिस हिया कऽ तकलौं तँ बुझि पड़ल जे ओकर केश रंगल छइ। सलवार-समीज तेतेक कसल रहै जे शरीरक अंग, जे परदामे रहबाक चाही ओ अदहासँ बेसी वेपर्दा भऽ जाइ जखन ओ कनेको निहुरए। शरीरक रंग एकदम गोर। दोहरा हार-काठ। शरीर ने बेसी मोटे आ ने बेसी पातरे। एकदम छरहर। आँखिमे काज लगौने, कानमे आधुनिक डिजाइनक बाली पहिरने। एन-मेन सोनाक लगइ। एकटा हाथमे गोल्‍डेन चेनबला टाटा क्‍वार्ज घड़ी। दोसर हाथमे कीमती चूरी। ठोरमे गाढ़ लाल रंगक लिपिस्‍टिक, नाकमे पाथर पड़ल छक, गरदैनमे मोतीक माला। आँगुर सभमे पाथर पड़ल औंठी। आँखिमे गोल्‍डेन फ्रेमबला चश्‍मा। कन्‍हामे पर्स लटकल। हाथमे मेहदी लगौने। जखन ओकरा पएर दिस तकलौं तँ तकिते रहि गेलौं। दुनू पैरमे आरत लगौने जे ओकर पैरक सुन्‍दरतामे चारिचान लगबैत। हमरा कोनो कविक दोहा मोन पड़ि गेल- “न पैरो में महावर रचाओ गोरी संगमरमर का कलेजा पिघल जाएगा।” हम अन्‍दाज लगेलौं, ऐ महिलाक उमेर कमतीमे 40-42 बर्खसँ कम नै हेतइ। मुदा तेना कऽ मेन्‍टन केने अछि जे तीस-बत्तीस बर्खक लगैत अछि। की कहू, मन घोर-घोर भऽ गेल रहए। किछु सोहेबे ने करए। ताबत ऐगला टीशनपर पहुँच ट्रेन रूकल। हम उतैर गेलौं। पानक दोकानपर जा ऐनामे अपन चेहरा निंगहारि कऽ देखलौं तँ बुझाएल जे अदहासँ बेसी केश पाकि कऽ उज्‍जर भऽ गेल अछि। सोचलौं, सुआइतई महिला हमरा बाबा कहलक। फेर सोचलौं, ओकरो केश तँ रेगलेरहइ। फेर ऐनामे देखलौं तँ अपन गाल पचकल बुझाएल जखनकि ओइ महिलाक गाल पुआ जकाँ फूलल छेलइ। तहूँ सेव जकाँ लाल। फरे ऐनामे देखलौं तँ आँखि एक हाथ तरमे बुझाएल। पानक दोकानदार टोकलक- “पान खाएब की? केहेन पान खाइ छी, मीठा पत्ता आकि...।” बिच्‍चेमे हम कहलिऐ- “नै यौ बाबू, पान नइ खाएब।” दोकानदार पुछलक- “एना किए कननमुँह जकाँ बजै छी? की कियो रूपैआ-तुपैआ नै तँ निकालि लेलक हेँ?” “से तँ नै भेल अछि।” ई कहैत हम ससैर कऽ मोसाफिर खानामे आबि एकटा ब्रैंचपर बैस गेलौं। मन हुअए बोम फारि कऽ कानए लागी। हमरा कौलेजक समै गप मन पड़ि गेल। की जिनगी छल। फिल्‍मी हीरोक स्‍टाइलमे रहै छेलौं। अमिताभ बच्‍चनक स्‍टाइलमे बाबरी राखी। अन्‍दर सुटिंग करि पेन्‍ट-सर्ट पहिरैत रही। आँखिमे करिक्का चश्‍मा रहैत छल। कौलेजक लड़की सभ हमरा राजेशखन्ना कहए। एक दिन घटना मोन पड़ि गेल। एकटा लड़की जेकर नाओं अलका रहइ, ओ एकटा कागज हमरा कॉपीमे रखि देलक। हम कॉपी खोललौं तँ ओ कागज देखलिऐ। ओइमे लिखल रहै- आइ लव यू अलका। हम बुझू अकासमे उड़ए लगल छेलौं किएक तँ अलकाकेँ कौलेजक छौड़ा सभ कौलेज क्‍वीन कहैत छेलइ। ओ बड़ सुन्‍दर छेली। दोसर दिनसँ अलका कौलेज नइ अबैत रहए। पता चलल जे अलका बेमारपड़ि गेल अछि। बादमे पता चलल ओकर बाबूजी जे पीएनबी बैंकमे मैनेजरक पदपर काज करै छला, हुनकर प्रमोशन क्षेत्रीय प्रवंधकक पदपर दरभंगामे भऽ गेलैन हेन। तँए ओ सपरिवार दरभंगा चलि गेला। अलका आब दरभंगेमे पढ़त। एक मास तक हम अलकाक गममे गमगीन रहलौं। ताबेतमे ट्रेनक सीटी सुनलौं। मुसाफिर खानासँबाहर एलौं, गाड़ी टीशनपर पहुँच चुकल छल। गाड़ीमे चढ़ि गेलौं। परसा हाल्‍टपर ट्रेनसँ उतैर टेम्‍पू पकैड़ गाम आबि गेलौं। धोती-कुरता पहिरनहि बिछौनपर जा पड़ि रहलौं। पत्नी चूल्‍हि लग छेली, ओ देखली तँ लगमे आबि पुछली- “मर! की भेल हेँ जे एना बिना कपड़े बदलने पड़ि रहलौं। मन-तन ठीक अछि किने?” हम किछु नहि बजलौं। हमरा हुअए जे बोम फारि कानए लागी। पत्नी फेर पुछली- “दवाइ आनलिऐ की?” हम तैयो किछु ने बजलौं। पत्नी सोचए लगली आन दिन जे झंझारपुर दवाइ आनए जाइ छला तँ अढ़ाइ-तीन बजे धरि घुमि कऽ गाम अबै छला। आइ साढ़े दसे बजे आपस आबि गेला। भरिसक पाकेटमार रूपैए नहि तँ निकालि लेलकैन। बजली- “रूपैआ ने तँ पॉकेटमारी भऽ गेल?” हम फेरो किछ ने बजलौं। हमर पत्नी सोचली जे आखिर ई बजैत किए ने छथिन। ओ हमरा माथपर हाथ दैत पुछलैन- “माथ ने तँ दुखाइत अछि?” हम किछु ने बजलौं। हमर पत्नी हमर हाथ अपना हाथमे लऽ कऽ बड़ प्‍यारसँ बजली- “अहाँक हमर सप्‍पत छी, कहू की भेल। एना किए उदास भऽ कऽ पड़ल छी।” हम कनैत जकाँ बजलौं- “की हम बुढ़ भऽ गेलिऐ।” तैपर हमर पत्नी बजली- “किए, से किएक पुछै छी। के अहाँकेँ बुढ़ कहैत अछि। हम तँ आइ धरि नै कहलौं हेन।” हम कहलिऐ- “आइ ट्रेनमे एकटा मौगी हमरा बाबा कहलक।” हम ओइ औरतक पूरा हुलिया अपना पत्नीकेँ बता देलिऐ। हमर पत्नी ठहक्का लगा कऽ हँसल। हँसैत बाजल- “तँ ई बात छिऐ!” हम कहलिऐ- “अहाँ दिल खोलि कऽ हँसै छी। हमरा मन होइए जे भोकारि पाड़ि कऽ कानए लगी।” पत्नी बजली- “ऐमे केकर दोख। केतेक दिन कहलों जे समराट बनि कऽ रहू। मुदा अहाँ छी जे खादीक धोती, झोलंगाबला कुरता पहिर कन्‍हापर गमछा लऽ केतौ विदा भऽ जाइ छी। ने दाढ़ी कटबै दी आ नेकेशे सीटै छी। तँ बाबा नैकहत तँ बौआ कहत।” हम कहलिऐ- “सम्राट जे कहै छिऐ से कोनो हम राजा महराजाक बेटा छी जे सम्राट बनि कऽ रहब।” तैपर हमर बेटी जे टीशन पढ़ि कऽ आएले छल, बाजल- “पापा, मम्मी सम्राट नहि स्‍मार्ट कहैत अछि।” तैपर हमर पत्नी बजली- “हँ, हँ की कहलीही, बुच्‍ची असमाट?” हमर बेटी जे आइ.एस-सी.मे पढ़ैत अछि बाजल- “असमाट नै स्‍मार्ट।” हम पत्नीकेँ कहलिऐ- “अहूँ तँ कहियो काल कहैत रहै छी जे, आब अहाँकेँ के पुछत?” पत्नी हमर हाथ अपना हाथमे लऽ बजली- “उ तँ प्‍यारसँ मजाकमे कहलौं।” तैपर हम बजलिऐ- “के कहलक मजाकमे कहलौं छी आकि...।” बिच्‍चेमे हमर पत्नी हमर बात कटैत बजली- “अहाँक देह छुबि कऽ कहै छी जे ई गप हम मजाकमे कहलौं। आब मजाकोमे नै कहब। उठू, मुँह-हाथ धोउ ताबत हम चाह बना नेने अबै छी।” बजलौं- “अखन हमरा चाह-पान किछ ने सोहाइत अछि।” तैपर पत्नी तोष दैत बजली- “अहाँ एक्को मिसिया मनमे टेंशन नै लिअ। एक्के मासमे अहाँकेँ गोविन्‍दा जकाँ हीरो बना देब। फेर देखबै जे सोलह सालक लड़की अहाँसँ केहेन बेवहार करैत अछि।” बिहाने भने हमर पत्नी हमरा संग केने निर्मली एली। पहिने डाक्‍टर रमेश बाबूक क्‍लीनिकपर अनली। डाक्‍टर साहैबकेँ हमरा देखबैत हमर पत्नी बजली- “डाक्‍टर साहैब, हिनकर तेना कऽ इलाज करि दियौन जे गाल पुआ जकाँ फुलि जाइन।” तैपर डाक्‍टर साहैब कहलखिन- “गाल फुलबेटा नहि करतैन बल्‍कि सेब जकाँ लालो भऽ जेतैन मुदा दवाइक संग खानो-पान नीक हेबाक चाही।” पत्नी बजली- “डाक्‍टर साहैब, अहाँ जे-जे कहबै से-से खुएबैन मुदा गाल फुलबाक चाही।” डाक्‍टर साहैब किछु केप्‍सूल आ तीन फाइल टॉनिक लिख, खेनाइमे की-की हेबाक चाही से सभ हमरा पत्नीकेँ समझा देलखिन। डाक्‍टर साहैबक क्‍लिनीकसँ निकैल हम सभ बजार गेलौं। बजारमे एक किलो मनक्का, पाँच किलो सेब, पाँच किलो बदाम कीनि पत्नी झोरामे रखली। तेकर बाद क्‍लॉथ इंपोरियममे जा विमल सूटिंग-सर्टिंग दू-दूटा पैन्‍ट-शर्टक कपड़ा सेहो किनलैन। कपड़ा लऽ कऽ हम सभ मॉडर्न टेलरमे जा कऽ नाप दऽ कपड़ा सिबए लेल देलिऐ। पत्नी टेलर मास्‍टरकेँ कहलकैन- “फिटिंग एकदम ठीक-ठाक हेबाक चाही।” तैपर टेलर मास्‍टर जवाब देलखिन- “मैडम, अहाँ एक्को रत्ती चिन्‍ता जुनि करू, कपड़ा पहिरलाक बाद सर बिल्‍कुल गोविन्‍दा जकाँ लगथिन।” दर्जीकेँ कपड़ा देलाक बाद पत्नी हमरा लऽ कऽ हनमुमान रेडीमेडपर एली आ सेल्‍समेनकेँ हमरा देखबैत कहलखिन- “हिनका लेल दूटा नीक जीन्‍स पैन्‍ट आ दूटा टी-शर्ट निकालू।” सेल्‍समेन पुछलकैन- “की रेन्‍जमे निकाली मैडम?” तैपर पत्नी बजली- “रेंजक चिन्‍ता नै करू। स्‍टेनडरसँ स्‍टेनडर निकालू।” सेल्‍समेन पच्‍चीस-तीस पीस जीन्‍स पैन्‍ट आ पच्‍चीस तीस पीस टी-शर्ट हमरा सबहक आगाँमे पसारि देलक। ओइमे सँ एकटा ग्रे कलर आ एकटा ब्‍लू कलरक जीन्‍स पैन्‍ट पसिन केलौं। तेनाहिये एकटा लाल रंगक टी-शर्ट आ दोसर ब्‍लू रंगपर उज्जर धारीवला टी-शर्ट पसिन केलौं। चारि हजार टकाक बिल बनल। दोकानदार केँ बिल भुतान कऽ चश्‍माक दोकानपर गेलौं। ऐठाम गोल्‍डेन फ्रेमबला चश्‍मा खरिदली। चश्‍मा खरीदलाक बाद जूता दोकानपर जा एक जोड़ा खादिम कम्‍पनीक लेदरबला फूल जूता आ एक जोड़ा सैन्‍डिल खरीदली। ई सभ खरीदलाक बाद पत्नी पुछली- “आर किछ बाँकी तँ नइ रहल ने।” हम कहलिऐ- “दूटा रूमाल, दूटा कोठारी गंजी आ एकटा टाई।” पत्नी बजली- “ठीके, चलू पंसारी रेडीमेड सेन्‍टरमे ई सभ लऽ लइ छी।” गंजी, टाइ आ रूमाल कीनलाक बाद पत्नी हमरा लऽ कऽ मुम्‍बइ सैलूनमे गेली। ओइठाम पत्नी हजामसँ कहली- “हिनका फिल्‍मी असटाइलमे बाबरी छाँटि दियौन आ केशो रंगि दियौन।” जाबे हजाम हमर केश बनौलक ताबेमे पत्नी एकटा नीक रेजर, एक पैकेट टोपाज ब्‍लेड, ब्रश बा बढ़ियाँ क्रीम आ फेयर इन लवली क्रीम सेहो कीनि कऽ आनली। सभ समान कीनलाक बाद हम सभ मुन्ना होटलमे मासु-भात खेलौं। आ कनीकालक बाद मोसाफिर खानामे अराम कऽ चारि बजेमे टेम्‍पू पकैड़ आपस गाम आबि गेलौं। दोसर दिनसँ भोरमे अढ़ाइ साए ग्राम सेबक फलाहार करी। फल खेलाक एक घन्‍टाक पछाइत साए ग्राम औंकुरल बदामक संग गुड़ खाइ। फेर एक गिलास दूध पीबी। खानामे पालकक साग सेहो खाइ। रातिमे सुतैसँ पहिने मनक्का देल एक गिलास दूध पीबी। आ तेकर बाद डाक्‍टर साहैबक लिखल केप्‍सूल आ टॉनिकक सेहो सेवन करी। पनरह दिनपर केश रंगी आ तेसरा दिनपर ढाढ़ी बनाबी। जहिया केतौ जेबाक हुअएतँ जाइसँ पहिने दाढ़ी बना कऽ फेयर इन लवली क्रीम लगौनाइ नहि बिसरी। एक मास बीतैत-बीतै हमर गाल पुआ जकाँ तँ नहि फूलल मुदा सटकलो नहियेँ रहल। चिनाए गेलौं। चेहरापर रौहानी आबि गेल। संयोजसँ पितियौत सारक बिआहमे सासुर जेबाक रहए। गेलौं। बरियाती जाइ काल जखन ब्‍लू जीन्‍स पैन्‍ट आ ललका टी-शर्ट पहिर गोल्‍डेन फ्रेमबला चश्‍मा लगा विदा भेलौं तँ हमर सारि जे एम.ए.मे पढ़ै छैथ, बजली- “पाहुन तँ गोविन्‍दा जकाँ लगै छथिन।” तैपर हमर पत्नीबजली- “गइ छौरी, एना नहि हमरा दुल्‍हाकेँ आँखि लगाबही।” हमर मन तँ बुझि अकासमे उड़ए लगल। बिआहसँ पहिने जखन बरमाला भऽ रहल छल तँ दुल्‍हिनक संग चारि-पाँचटा लड़की सभ बरमालाबला मंचपर ठाढ़ छेली। ओइ चारि-पाँचटा लड़कीमे एकटा सत्तरह-अठारह बर्खक बड़ सुन्नैर जे एन-मेन करीना कपुर जकाँ लगै छेली ओ एकटकसँ हमरे दिस निहारि रहल छेली। जखन हमर आँखि हुनकर आँखिसँ मिलल तँ ओ हँसए लगली। बरमालाक बाद जखन ओ दुल्‍हिनक संग जाए लगली तँ हमरा लग आबि बजली- “हेल्‍लो, फेर भेँट हएब।” ई कहि ओ आगाँ बढ़ि गेली। हमरा भेल जेना लाख टकाक लॉटरी भेँट गेल। शिक्षाक अन्‍तिम उद्देश्‍य रामनगर डिग्री महाविद्यालयक स्‍थापनाक स्‍वर्ण जयन्‍ती समारोहक आयोजन भेल। तीन दिवसीय कार्यक्रम रहए। पहिल दिन दू बजे दिनमे कार्यक्रमक उद्घाटन माननीय शिक्षा मंत्री एवम्‍ कुलपति संयुक्‍त रूपसँ केलैन। उद्घाटनक पछाइत पहिल सत्रमे कौलेजक इतिहासक संग कौलेजमे की कमी आ की बेसी अछि ऐपर विद्वान-वक्‍तालोकैन अपन-अपन विचार रखलैन। ई कार्यक्रम साँझक पाँच बजे धरि चलल। दोसर सत्रमे साँझक छह बजेसँ कौलेजक छात्र-छात्रा नृय, प्रहसन आ गीतनाद प्रस्‍तुत केलैन। दोसर दिन, दिनक एगारह बजे छात्र-छात्राक बीच भाषण प्रतियोगिताक आयोजन छल। जेकर विषय छेलै- ‘लोक किए पढ़ै-लिखैए, शिक्षाक अन्‍तिम उदेस की अछि?’ प्रतियोगिताक जूरीमे कौलेजक प्राचार्य महोदय, शिक्षक संघक अध्‍यक्ष आ छात्र संघक अध्‍यक्ष छला। कार्यक्रममे कौलेजक शिक्षकगण, कर्मचारीगण आ पत्रकार लोकैन सेहो उपस्‍थित छला। अध्‍यक्षक आदेशसँ प्रतियोगिता प्रारम्‍भ कएल गेल। पहिल वक्‍ताक रूपमे बी.ए. फाइनलमे पढ़ैत छात्र आलोक ठाढ़ भेला।ओ अपना भाषणमे बजला- “पूज्‍यनीय अध्‍यक्ष महोदय, पूज्‍यपाद गुरुजन, उपस्‍थित वुजुर्ग आ वुद्धिजीवी लोकैन, छात्र-छात्रालोकनि- आजुक समैमे पढ़ाइ-लिखाइक बड़ महत अछि। जँ ई कहल जाए जे शिक्षा रोशनी छी तँए कोनो अनुचित नहि हएत। बिनु पढ़ल-लिखल मनुख आँखि रहितो आन्‍हर छैथ। शिक्षाक मूल उदेस ज्ञानी बनब छी। आ ज्ञानी बनि कऽ अपन चरित्र निर्माण करब थिक। ऐ सन्‍दर्भमे पूज्‍य बापू गॉंधीजी कहने छैथ- शिक्षाक अन्‍तिम उदेस चरित्र निर्माण छी। चरित्र निर्माणक पश्चात राष्‍ट्र निर्माण करब सेहो छी। और सभसँ पैघ बात ईजे चरित्र निर्माणक संग मानवक सेवा शिक्षित मनुखक सभसँ पैघ कतर्व्‍य अछि।” ई कहि आलोक बैस जाइ छैथ। जोरदार थोपड़ी बजा श्रोता लोकैन हुनका भाषणक समर्थन केलखिन। दोसर वक्‍ताक रूपमे अंजली ठाढ़ होइ छैथ। अंजली बी.ए. द्वितीय वर्षक छात्रा छैथ, मैक पकैड़ सम्‍बोधनक पश्चात अंजली बजै छैथ- “अखन जे पूर्व वक्‍ता आदरणीय आलोक भाय बजला जे शिक्षाक मूल उदेस चरित्रनिर्माण, राष्‍ट्र निर्माण ओ मानवक सेवा थिक, हम हुनका विचारसँ बिल्‍कुल सहमत नइ छी।” श्रोतामे वुद्धिजीवी लोकैनक कान जाइत अछि। अंजली आगाँ बजै छैथ- “हम तँ कहब शिक्षाक अन्‍तिक उदेस मात्र ढौआ कमेनाइ छी। देखियौ, लोक पढ़ि-लिख कऽ पैघ-सँ-पैघ इंजीनियर, डाक्‍टर, कलक्‍टर, एस.पी; बी.डी.ओ; प्रोफेसर, मास्‍टर नहि जानि की की बनै छैथ। मुदा किनकोमे चरित्रक निर्माण कहाँ होइ छैन। घूस लऽ कऽ अकूट सम्‍पैत जमा करए लगै छथिन। डाक्‍टर सभ कमीशनक लेल अनावश्‍यक जाँच, कमीशनबला दवाई आ बिनु जरूरतक ऑपरेशन करै छैथ। प्रोफेसर सभकेँ डेढ़-डेढ़ लाख टका दरमाहा भेटै छैन, मुदा की ओ सभ निष्‍ठा पूर्वक अपन कतर्व्‍यक निर्वहन नइ करै छैथ। डेढ़-डेढ़ लाख टका दरमाहाक बादो हुनका सभकेँ सन्‍तोख कहाँ छैन जे ट्यूशनक पाछाँ बेहाल रहै छैथ। हम तँ कहब जे विद्वानसेबेइमान आ जे डाक्‍टरसे डाकू!” श्रोता दिससँ जोरदार थोपड़ी बजैत अछि। अंजली आगू बजै छैथ- “आलोक भाय बाजल छला- राष्‍ट्रक निर्माण...। यौ देखबे करै छिऐ जे पैघ-पैघ इंजीनियर, डाक्‍टर ढौआक लेल अपन देश छोड़ि विदेश जाइ छैथ आ अपन गाम-घर, देश छोड़ि विदेशमे बसि जाइ छैथ। एकटा बात आलोक भाय आरो बाजल छला जे मानवक सेवा। यौ जे अपन बुढ़ माए-बापक सेवा नहि कऽ रहल छैथ ओ आन मनुखक सेवा केना करता। तखन मानवक सेवा केना भेल आकि मानवताक की भेल? हँ, पत्नीभक्‍त भऽ सकैत छैथ। हमर अनुभव अछि जे विद्वान लोकैन माए-बापसँ बेसी मोजर पत्नीकेँ दइ छथिन।” ई कहि अंजली बसि जाइ छैथ। हिनका भाषणपर बड़ीकाल धरि थोपड़ी बजैत रहैत अछि। तेसर वक्ताक रूपमे विवेक ठाढ़ होइत बजला- “हम पहिलुका दुनू वक्ताक विचारसँ बिल्‍कुल असहमत छी।” श्रोताक कान एकबेर फेर ठाढ़ भऽ जाइत अछि। विवेक आगॉं बजै छैथ- “शिक्षाक उदेस चौवनिया नेता गिरी केना थिक। चौवनियॉं नेतागिरी कऽ ब्‍लौक, थानामे दलाली आ गाम-घरमे झगड़ा लगा अपन उल्‍लू सोझ करब आइ-काल्‍हिक पढ़ल-लिखल लोकक मुख्‍य काज रहि गेल हेन। जेतए तक पाइ कमेबाक बात अछि तँ ओइ लेल शिक्षित भेनाइ जरूरी नहि छइ। हमरा ओतए एकटा डीलर अछि, हँ-हँ वएह डीलर जे जनताक चाउर-गहुम आ मटिया तेल दइ छै, मोशकिलसँ दसखत करए अबै छै, मुदा ढौआ कमाइमे बड़का-बड़का इंजीनियर-डाक्‍टरक कान काटै छइ। पाँच बर्ख पहिनेसँ बोलेरो गाड़ीपर चढ़ैत अछि। मनुखोक सेवा करिते अछि। केकरो बेटीक बिआहमे पान-दस लीटर मटिया तेल दऽ दइ छइ। पाँच-दस गोरेकेँ चौक-चौराहापर चाहो-पान करा दइते छइ। फगुआमे किछ गोरेकेँ दारूओ पियाइए दइ छइ।” ई कहि विवेक बैस जाइ छैथ। हिनको भाषणपर थोपड़ी बजैत अछि। चारिम वक्ताक रूपमे अलका माइक पकड़ै छैथ। ओ अपना भाषणमे कहै छथिन- “हम पहिलुका तीनू वक्ताक विचारसँ कनिक्को सहमत नै छी। यौ आजुक समैमे शिक्षाक अन्‍तिम उदेस बिआहमे बेसी-सँ-बेसी दहेज लेब थिक।” वुद्धिजीवी लोकैन एक-दोसरक मुँह दिस देखए लगला। अलका आगू बजै छैथ- “देखियौ, डाक्‍टरक बिआहमे केतेक दहेज भेटै छै, फेर इंजीनियरकेँ देखियौ, कलक्‍टर-एस.पी. आ बी.डी.ओ; सी.ओ.क तँ बाते किछु और छै जे लड़िका कौलेजमे पहुँच जाइत अछि बुझियो हुनकर माए-बापक लौटरी निकैल जाइत अछि। ओइ लड़काक बिआहमे दस-बीस लाख टका नगद एकटा मोटर साइकिल, दू चारि भरि सोन दहेजक रूपमे भेटब आम बात भऽ गेल अछि। तेतबे नहि, डाक्‍टर-इंजीनियरकेँ बिना चारि चक्का गाड़ी आ कमतीमे बीस-पच्‍चीस लाख टका नगदसँ बिआहे ने होइत अछि। अहाँ कहबै ई तँ लड़काक बात भेल, लड़कीकेँ सुनू- पढ़ल-लिखल लड़कीक मांग बेसी छइ। जे मिडिलो पास लड़का छै ओहो अपन कनियॉं कमतीमे इन्‍टर पास तकै छइ। किए तँ नै बेसी तँ कम-सँ-कम इन्‍टर पास लड़की मास्‍टर तँ बनियेँ जाएत। पढ़ल-लिखल लड़कीक बिआहमे दहेजोमे किछु छूट भेटै छइ। यौ हम अपने परिवारक गप कहै छी। हम दू भाँइ आ दू बहिन छी। जेठ दुनू भैया छैथ। बड़ा भैयासँ छोटा भैया एक बर्खक छोट छैथ। बड़का भैया छठा तक पढ़ि खेती गृहस्‍तीक काज देखए लगला। छोटका भैया कौलेजमे पढ़ै रहथिन। बड़का भैयापर जे बरतुहार सभ आबथिन आ हुनका सभकेँ जखन पता चलैन जे लड़का छठे धरि पढ़ल छै तँ ओ सभ जे आपस गाम जाथि से फेर घुमि कऽ नै आबैथ। मुदा छोटका भैयाक बिआहक लेल बरतुहारक लाइन लागल रहए। बड़का भैयाक बिआहमे बाबूजीकेँ अपना तरफसँ खर्च करए पड़ल रहैन। तँए हम कहै छी जे शिक्षाक उदेस दहेज लेब छी आर किछु नहि।” ई कहि ओ बैस जाइ छैथ। हिनको भाषणपर बड़ीकाल धरि थोपड़ी बजैत रहल। भाषण प्रतियोगिताक प्रथम पुरस्‍कार अलकाकेँ भेटलैन। हम सोचै रही जे प्रथम पुरस्‍कार आलोक नहि तँ अंजलीकेँ भेटतैन। मुदा से नहि भेल। हम छगुन्‍तामे रही। सोचैतरही प्राचार्य महोदय भेटता तँ पुछबैन। संयोग नीक बैसल। एकटा कथा गोष्‍ठीमे प्राचार्यमहोदय भेटला। हम पुछि देलिऐन- “श्रीमान्, स्‍वर्ण जयन्‍ति समारोहमे कोन आधारपर अलकाकेँ प्रथम पुरस्‍कार देलिऐन?” प्राचार्य महोदय गम्‍भीर होइत बजला- “शिक्षक संघक अध्‍यक्ष आ छात्र संघक अध्‍यक्षक विचार प्रथम पुरस्‍कार आलोकेँ देबाक रहैन, मुदा हम अड़ि गेलिऐ आ हमरा आगाँ हुनका दुनू गोरेकेँ किछु ने चललैन।” हम पुछलयैन- “अपने कोन बिन्‍दुपर अडि गेलिऐ?” तैपर ओ जवाब देलैन- “हमरा अपन बेटाक बिआह मोन पड़ि गेल रहए, जखन हमरा बेटाक बिआहक लेल बरतुहार एला तँ हम स्‍पष्‍ट कहि देलिऐन- हमरा बेटाक इंजीनियर बनेबामे बारह लाख टाका खर्च अछि। तँए ओकरा बिआहमे कमतीमे पच्‍चीस लाख टका लेब। लड़कीबला सहर्ष पच्‍चीस लाख टका दइले तैयार भऽ गेल छला।” कठही साइकिल “कतेक दिन ऐ पुरनका कठही साइकिलपर चढ़बह। कहह दुनियाँ केतए-सँ-केतए चलि गेल आ तूँ बीस-बाइस बर्खक ऐ पुरनका साइकिलपर चढ़ै छह!” -गेनालाल जियालालकेँ कहलकैन। जियालाल हँसैत बजला- “हौ भाय, तोहर बेटा सभ जे कमाइ छह ने, तँए तोरा हरियरी सुझै छह।” तैपर गेनालाल बजला- “आ तोरा जे कोचिंग सेन्‍टर आ चटिया सभकेँ टीशन पढ़ेलासँ आठ-दस हजारक महिनवारी आमदनी होइ छह से की करै छहक। कमतीमे एकटा सकेण्‍डो हेण्‍ड फटफटिया कीनि कऽ चढ़ह। हौ मरबह तँ किछ लऽ कऽ दुनियासँ नै जेबह। जेतबे सुख-मौज ऐ धरतीपर करबह ओतबे संग जेतह।” जियालाल बजला- “हौ भाय, अखन हमरा बड़ समस्‍या अछि तँए अखन हमरा अही साइकिलपर चढ़ह दएह।” चाहक दोकानदारो दुनू संगीक गप सुनैत रहए ओ बाजल- “मर्र! ऐ लोहाक साइकिलकेँ कठही साइकिल किए कहै छिऐ?” तैपर गेनालाल बजला- “ऐ साइकिलमे पाइडिल देखै छिऐ, काठक छी आ ऐ साइकिलपर जखन चढ़बै तँ जहिना कठही बैलगाड़ीक धुरामे सोन-तेल नै रहलापर चलैकाल कों-काँए, पों-पाँएक अबाज निकलै छै तेनाहिये ऐ साइकिलसँ अबाज निकलै छइ।” चाहक दोकनदार पुछलकैन- “से अहाँ केना बुझलिऐ?” गेनालाल जवाब देलखिन- “एक दिन हम निर्मली बसेसँ गेल रही। एक बोरा नोन कीनि अही साइकिलपर राखि बस स्‍टैण्‍डपर गेल रही। बस स्‍टैण्‍डपर नोन रखि जखन साइकिल पहुँचाबए जियालालक कोचिंग सेन्‍टरपर गेलौं तँ बुझाएल जे ई लोहाक नहि, काठक साइकिल छी। तहियेसँ हम एकरा कठही साइकिल कहै छिऐ।” जियालाल बजला- “हौ भाय कनेको पलखैत नै भेटए जे साइकिलकेँ भंगठियो करा लेब। दू दिन भंगठी करैले मिस्‍त्री ओतए साइकिल छोड़ि देलिऐ मुदा साँझमे जखन साइकिल लाबए गेलौ तँ साइकिल ओहिनाक-ओहिना राखल।” तैपर गेनालाल हँसैत कहलकैन- “धुर्र बुड़ि, तोरा कपारमे सुख लिखले ने छौ। कमा-कमा पाइ बैंकमे जमा कर मुदा भोग तँ तोरा बेटाकेँ लिखल छौ।” जियालाल हँसैत जवाब देलखिन- “ठीके कहलीही भाय, हमरा भागमे सुख नै लिखल अछि।” ई गप-सप्‍प गेनालाल आ जियालालक बीच भूतहा चौकपर चाहक दोकानमे होइत रहइ। गेनालाल आ जियालाल हाइ स्‍कूलसँ लऽ कऽ कौलेज धरिक संगी। गेनालालक घर झिटकी गाममे जखैन कि जियालालक घर नवटोली गाममे। दुनू गोरेक छठा किलाससँ एगारहम किलास धरि बनगामा हाइ स्‍कूलमे संगे पढ़लैथ। संगे मैट्रिक पास केलैन। मैट्रिक पास केला पछाइत दुनू गोरे निर्मली कौलेजमे इन्‍टरमे नाओं लिखौलैन। निर्मली कौलेजमे बी.ए. धरि दुनू गोरे संगे पढ़ला। गेनालाल पास कोर्सक विद्यार्थी छला जखैन कि जियालाल अंग्रेजी आनर्सक छात्र। बी.ए. पास केला पछाइत गेनालाल नौकरीक लेल परियास करए लगला।मुदा तीन बर्ख धरि परियास केला बादो जखन नौकरी नहि भेलैन तँ खेती-गृहस्तीमे भीर गेला। ओ अपना बापक एकलौता बेटा। पाँच बिघा जोतसीम जमीनक मालिक। ऊपरसँ गाछ-कलम-बाँस-पोखैर सभ किछु। नौकरी नहियोँ भेलापर गुजर-बसरमे कोनो दिक्कत नहि होइन। गेनालालकेँ दूटा बेटेटा। जे मैट्रिक केला पछाइत दिल्लीमे काज करै छैन आ दरमाहा भेटलापर अपन खर्चा राखि बापक बैंक-खातामे पठा दइ छैन। बेटा सबहक कमाइ आ खेतक उपजासँ गेनालाल आनदपूर्वक जिनगी बितबै छैथ। सुखक जिनगी बितबैक कारण ई जे परिवार छोट छैन। दुनू बेटा अखन अविवाहिते छैन जे दिल्ली खटै छैन। घरपर मात्र अपने आ पत्‍नी। खेतो सभ मनकूतपर लगौने छैथ। हँ, दूध खाइ वास्‍ते एकटा दोगला गाए जरूर पोसने छैथ। गेनालाल अपना बेटा सभकेँ मैट्रिकसँ आगाँ ऐ दुआरे ने पढ़ौलखिन जे पढ़ल-लिखल आदमीकेँ नौकरी नै भेटलापर समाजमे जे दुरगैत होइए से देखैत छथिन। जखन कि कम्‍मो पढ़ल-लिखल लोक दिल्ली, मुम्बइ, कलकत्तामे प्राइवेटो नौकरी कऽ शानसँ अपन जिनगी बितबैत अछि। मुदा जियालालक सोच ऐसँ बिलकुल भिन्न छैन। हुनकर कहब ई जे जइ पढ़ल-लिखल बेकतीमे टाइलेन्‍ट रहत ओ विद्यार्थीके ट्यूशनो पढ़ा अपन जिनगी शानसँ चलौत। पटनामे एकसँ एक कोचिंग संस्‍था अछि जेकर आमदनी लाखोमे अछि। जियालाल सीमान्त किसानक बेटा। हुनका बाबूजीकेँ मात्रअढ़ाइ बीघा खेत। जियालाल दू भाँइ। जेठ जियालाल अपने आ छोट पन्नालाल। पन्नालाल जखन मैट्रिकमे पढ़ैत रहैथ तखने हुनकर पिताजी परलोक चल गेला। मुदा पन्नालालकेँ पिताजीक स्वर्गवासक बादो हुनका पढ़ाइ-लिखाइमे कोनो दिक्कत नै भेलैन। जेठ भाय जियालाल ट्यूशन पढ़ा छोट भाएकेँ माने पन्नालालकेँ एम.ए. धरि पढ़ौलकैन। एम.ए. पास केलाक तीनियेँ मासक पेसतर पन्नालालक बहाली शिक्षा मित्रक पदपर भऽ गेलैन।शिक्षा मित्रमे बहाल भेलाक दू मासक भीतर पन्नालालक बिआह एकटा डीलरक बेटीसँ भेलैन। जियालाल अंगेजी आनर्सक संग बी.ए. केला पछाइत नौकरीक लेल काफी परियास केलखिन मुदा सफलता नइ भेटलैन। जइ समैमे सरकार शिक्षा मित्रक बहाली केलक ओइ समैमे जियालालक उमेर चालीस पार कऽ गेल रहैन। तँए शिक्षा मित्रमे बहाली होइसँ वंचित रहि गेला। जखन सरकार शिक्षा-मित्रकेँ मानदेय पनरह साएसँ बढ़ा कऽ चारि हजार कऽ देलकैन आ एगारह मासक नौकरीकेँ साठि बर्खक उमर धरि स्थायी कऽ देलकैन तँ पन्नालालक पत्नी अपना दुल्हाकेँ सिखा-पढ़ा परिवारमे भीन-भिनौज करा देलकैन। जखैन जियालाल आ पन्नालालमे भीन-भिनौजीभऽ गेलैन तँ जियालालकेँ एक बिघा जोतसीम खेत आर घराड़ी आ कलम-गाछी मिला कऽ पाँच कट्ठा हिसा भेल रहैन। हुनकर पाँच गोरेक परिवार। जेठ दूटा बेटी तैपर सँ एकटा बेटा आ दू परानी अपने। एक बिघा जेातसीम खेतसँ जखन परिवारक गुजर-बसरमे कठिनाइ होमए लगलैन तँ जियालाल ट्यूशन पढ़ाबैपर बेसी जोर देलखिन। ओना तँ दस बर्ख पहिनहिसँ निर्मलीमे एकटा कोचिंग संस्‍थामे अंग्रेजी पढ़बैत रहैथ। कोंचिग आ ट्यूशनक कमाइसँ जियालाल अपन दुनू बेटीकेँ पढ़ा-लिखा कऽ बिआह कऽ देलखिन। दुनू बेटियो आ जमाइयो टी.इ.टी. पास कऽ शिक्षकमे बहाल छैन। एकटा बेटाकेँ नीक पढ़ाइ खातिर पटना बी.एन.कौलेजमे नाओं लिखौने छेलखिन। बेटो विवेक पढ़ैमे चन्‍सगर। ओ पटना विश्वविद्यालयसँ मैथिलीमे एम.ए. कऽ प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीमे लागल छथिन। आइ फेर गेनालालक भेँट भूतहा चौकपर चाहक दोकानपर जियालालसँ भऽ गेल। गेनालाल चाहक दोकानपर पहिनेसँ बैसल रहैथ। जखन जियालाल निर्मलीसँ टीशन पढ़ा भूतहा चौकपर एला तँ चाह पीबैले चाहक दोकानक आगूमे साइकिल ठाढ़ करिते रहैथ कि गेनालालक नजैर जियालालपर पड़लैन, ओ बजला- “कह भाय, समाचार। आबो धरि वएह पुरनका साइकिलपर चढ़ै छेँ। रौ पूरा दुनियाँ सुधैर जेतै मुदा तूँ नहि सुधरबेँ। हे मरिहेँ ने तँ सभ किछ लाधि कऽ नेने जइहेँ। पचपन-छप्‍पनक उमेरमे ऐ कठही साइकिलपर चढ़ै छेँ। रौ तोरा बुझाएब आ दिल्ली पएरे जाएब बरबैर अछि। आ-आ चाह पीब ले।” जियालाल हँसैत कहलकैन- “तोहर जे बेटा कमा-कमा पाइ पठा दइ छौ ने तँए तोँ मोछमे घी लगबै छेँ।” तैपर गेनालाल बजला- “आब तँ तोरो बेटाक तँ पढ़ाइ खतम भऽ गेल छौ। तोँ तँ तेसरे साल कहने रहँ जे विवेक पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए.मे फस्‍ट क्‍लाससँ उतीर्ण भेल हेन।” ई गप-सप्‍प होइते रहए कि एकटा स्‍कारपियो गाड़ी आबि चाह दोकानक बगलमे रूकल। ड्राइवर गाड़ीसँ निकैल बीचला गेट खोललक। एकटा युवक गाड़ीसँ निच्चाँ उतरल। ओ पैन्‍ट-कार्ट-टाइ लगौने रहए। जखने ओइ युवकक नजैर जियालालपर गेलैन ओ दुनू हाथे पएर छुबि हुनका गोर लगलकैन। “बौआ विवेक! अच्छा काकाकेँ गेार लगहुन।” –गेनालाल दिस इशारा करैत जियालाल बजला। विवेक गेनालालोकेँ पएर छुबि गोर लगलकैन आ बजला- “बाबूजी, हमर चौथे दिन ट्रेनिंग खतम भऽ गेल। परसू बीरपुर डी.एस.पी. पदपर योगदान केलौं हेन। काल्‍हि पटनामे मीटिंग छल। अखन पटनेसँ बीरपुर जा रहल छी। ऐ ठाम एलौं तँ मनमे भेल भऽ सकैए बाबूजी निर्मलीसँ घूमल हेता।” गेनालालक बोलती बन्द। ओ कखनो जियालालकेँ देखैथ तँ कखनो विवेककेँ आ कखनो ओइ स्‍कारपियो गाड़ीकेँ। जियालाल विवेकसँ पुछलखिन- “माएसँ असिरबाद लेबए कहिया अबै छहक।” तैपर विवेक कहलकैन- “मनमे तँ रहए जे पटनासँ घुमतीमे अहाँ सभसँ आर्शीवाद लऽ लेब मुदा दरभंगेमे रही तँ बीरपुरक एस.डी.ओ. साहैब फोन केलैन। ओ कहलैन जेतेक जल्दी बीरपुर पहुँच सकी पहुँचू। तँए बीरपुर जल्दी पहुँचब जरूरी भऽ गेल। रबि दिन गाम आबि रहल छी।” ई कहि ओ जियालाल आ गेनालालकेँ गोर लागि गाड़ीमे बसि कऽ चलि गेला। गेनालाल बजला- “भाय जियालाल, तोहर कठही साइकिलक मान रहि गेलौं। तोहर बेटा पढ़ि-लिख कऽ डी.एस.पी. भऽ गेलौ। वाह भाइ वाह!” तैपर जियालाल बजला- “भाय हमर बेटा कि तोहर बेटा नइ छियौ।” ई सुनि गेनालाल, जियालालकेँ भरि पाँज कऽ पकैड़ छातीसँ लगा लेलखिन। लघु कथा- हमर पत्नीक मनोरथ हम निर्मलीमे डाक्‍टर रमेश बाबूक क्‍लिनिकपर बैसल रही। डाक्‍टर साहैब कोठरीमे रोगी सभकेँ जाँच कऽ रहल छला। कोठरीक आगाँ राजदेव बाबू, रामविलास बाबू आ हम बैस कऽ मैथिली साहित्‍यपर चर्चाकऽ रहल छेलौं कि हमर मोबाइलक घन्‍टी बजल। जेबीसँ मोबाइल निकालि नम्‍बर देखलौं तँ मालूम भेल हमर पत्नीक फोन छी। हम मने-मन भनभनेलौं- “आबि गेल आफत...!” एक मन भेल जे फोन काटि दी, फेर मन भेल जे रिसिभे ने करी। मुदा डर ईहो रहए जे जँ फोन रिसिभ नै करब तँ गामपर पहुँचते देरी महाभारत शुरू भऽ जाएत आ रातिमे फेरो मच्‍छर सभकेँ हमर भरपूर खून पीबाक अवसर भेट जेतइ। यौ बाबू की करितौं हारि कऽ मोबाइलक हरियरका बटम टीपैत बजलौं- “हेलौ, की कहै छी?” ओम्‍हरसँ पत्नीक अवाज आएल- “फोन किए ने उठबैत रहिऐ। की करै छेलिऐ?” बजलौं- “फोन तँ उठेबे केलौं, हँ! पहिलुक घन्‍टीपर नहि उठा चारिम घन्‍टीपर उठेलौं। अच्‍छा कहू की हुकुम?” ओम्‍हरसँ पत्नी बजली- “दूटा ब्रेड पकौड़ा नेने आएब। आ हँ, पोलीथीनमे चटनी सेहो लऽ लेब।” कहलयैन- “ब्रेड पकौड़ा तँ गरमे खाइमे नीक लगै छै, ढंढामे तँ कोनो सुआदे ने बुझाएत।” ओ बजली- “अहाँ नेने आउ ने चूल्‍ही पजारि हम ताबापर सेक लेब।” ई कहि ओ फोन काटि देली। हमर मुँह लटैक गेल। किए तँ जेबीमे एकोटा छेदामो ने रहए। बीसटा टका जे रखने रही ओ साइकिलक ट्यूब पंचरमे खर्च भऽ गेल रहए। सोचमे पड़ि गेलौं। सोची केकरासँ मुँह छोड़ी। जं केकरोसँ मुँह छोड़ी आजँ पाइ नै देत तब तँ अपनेसनक मुँह हएत आ तनावसँ बढ़ि जाएत। फेर सोची जँ पत्नीक फरमाइस पूरा कऽ कऽ गामपर नै जाएब तँ रातिमे फेरो दलानेपर सूतए पड़त आ सूतब की कपार, भरि राति मच्‍दर हौंकैत परात करए पड़त। हमरा दस बर्खक पहिलुका घटना मोन पड़ि गेल। निर्मलीमे सर्कस आएल रहइ। गामक जनीजाति सभ सर्कस देखबाक प्रोग्राम बनौलैन। हुनका सबहकप्रोगाम सौंझुका 6 बजसे 9 बजेक शो देखबाक छेलैन। मुदा गामपर सँ विदा हेती दुइये बजे, किएक तँ पहिने जेती तखन बजारमेमे अल्‍ता, टिकुली, लिपिस्‍टिक स्‍नो-पोडर, पवन टोकी कानमेहक, नाकमेहक आ केशमेहक कीनती...। हमरो पत्नीकेँ मालूम भेलैन। ओ जलखैये करैकाल हमरा कहली- “यौ सुनै छिऐ?” हम कहलयैन- “कोनो कि कानमे ठेकी नेने छी जे नै सुनब। बाजू ने की कहै छी?” तैपर पत्नी बजली- “अँइ यौ, दारू पीब कऽ आएल छी की जे एना बजै छी?” हम कहलयैन- “से दिन कहिया हेतै जे पुतोहु कहत ..... । ऐठाम तँ चाह पीबैले पाइयेने अछि आ अहाँकेँ दारू सुझैत अछि! कहू ने की कहै छी।” पत्नी बजली- “गामक लोक सभ सर्कस देखैले जाइत अछि।” तैपर बजलौं- “ऐमे की लगै छइ। पच्‍चीस टका टिकटमे आ पच्‍चीस टकाक चाह-नाश्‍ता। पच्‍चीस टकाक व्‍योंत करि लिअ। नइ होइए तँ तीन किलो चीकने बान्‍हि लेब। ओकरा पल्‍लपर बेच लेब, पाइ भऽ जाएत।” ई बात सुनिते-देरी पत्नीक पारा चढ़ि गेलैन। ओ तामसे भेर भऽ गेली। बजली- “अँइ! हम चिकना लऽ कऽ सर्कस देखए जाएब! नै जाएब! हमर कपारे जरल अछि जे अहाँ संग बिआहभेल। ने कहियो सिनेमा आ ने कहियो सर्कस देखेलौं। ने स्‍नो, ने पाउडर, ने नाकमेहक, ने कानमेहक, ने काजर, ने ठोर रंगा, ने सेनुर आ ने टिकुली कहियो अहाँकेँ जुड़ल। अहीठाम मैलावाली छै, अेकर दुल्‍हा ओकरा रंग-रंगक साबुन, तेल आ सिंगारक चीज-वौस आनि-आनि दइ छइ। जखनी घर बलाकेँ जे कहलक तखनी घरबला हजूरमे रहै छइ। की हमरा कोनो मनोरथ नै छइ। अहाँबुते कहियो हमर कोनो मनोरथ पुरा भेल।” ई कहैत ओ कानए लगली। हम छगुन्‍तामे पड़ि गेलौं। हम कहलयैन- “मैलाववालीक घरबला मास्‍टरी करै छइ। तीस-पैंतीस हजार टका महिना कमाइ छै, आ अहाँक घरबला कएटा पाइ कमाइए। अच्‍छा हमहीं दोकानसँ चिकना बेच कऽ आनि दइ छी, अहाँ सर्कस देख आएब।” तैपर पत्नी बजली- “निर्मलीबजार जाएबतँ सर्कसेटा देखब आकि किछु सिंगारो-पेटारोक चीज कीनब। हमरा कमतीमे दू साए टका चाही।” हम कहलयैन- “अहीं कहू जे अखन हाथमे एकोटा टका नै अछि तखन दू साए टका केतएसँ देब। के देत दू साए टका। जहिया पाइक ओरियान हएत तहिया निर्मली जा कऽ सिंगारक समान लऽ आनब। आइ सर्कसटा देख आबू। हम दोकानसँ चिकना बेचि पच्‍चीसटा टका आनि दइ छी।” तैपर पत्नी बजली- “हम जाएब तँ दू साए टका लऽ कऽ नहि तँ नै जाएब।” हम केतेको गोरेसँ दू साए टका मंगलौं मुदा कियो ने देलक। दोकानमे चिकना बेच पच्‍चास टका आनि पत्नीकेँ देलिऐन तँ ओ ढौआकेँ फेक देलक आ बाजल- “दू बजे लोक सभ सर्कस देखए विदा हएत। अहाँ जँ दू बजे तक दू साए टका आनि कऽ देब तब तँ बड्ड बढ़ियाँ नै तँ अहाँ जानी आ आ अहाँक काज जानए।” हम बड्ड परियास केलौं मुदा कियो मुँहपर माछी नै बैसए देलक। पत्नीक तुगलका फरमान हमरा बुत्ते पूरा कएल नै भेल। स्‍नान कऽ खेनाइ खा मैलामवाली लग गेलौं आ कहलयैन- “भौजी दू साए टकाक व्‍योँत कऽ दिअ। बड्ड जरूरी अछि।” तैपर मैलामवाली कहली- “हमरा लग पाँचे साए टका अछि आ निर्मली सर्कस देखए जाइ छी। बजारमे चूड़ी पहिरब आ किछु सिंगारक समान सेहो कीनब। हमरा तँ पाँच साए टकासँ पारो ने लागत तँ अहाँकेँ केना देब।” हम अपन सनक मुँह लऽ कऽ अँगना एलौं आ बोलीमे हजार मन मिश्री घोरैत पत्नीक हाथ अपना हाथमे लऽ कऽ कहलिऐ- “हे समूचा गाम घूमि एलौं मुदा कियो टका नै देलक। केकरा-केकरा लग ने मुँह छोड़लौं मुदा कियो मुँहपर माछी नइ बैसए देलक। से नै तँ अहाँ ई पच्‍चास टका लऽ कऽ सर्कस देख आउ, जखन पाइक व्‍योँत भऽ जाएत तँ दुनू गोरे फेर निर्मली चलब, सिनेमा देखब आ अहाँसिंगारोक समान कीनि लेब।” तैपर पत्नी हमर हाथ अपना हाथसँ झटकैत बजली- “ईह! बेदरा जकाँ हमर परताए एला हेन! जाउ राखु अपन पचसटकही। नै हम सर्कस देखै छी।” हम केतबो खुशामद केलिऐन मुदा ओ टस-सँ-मस नै भेली। आ ने सर्कसे देखए गेली। हमरो ब्‍लडपेसर बढ़ि गेल। मुदा दिमागकेँ स्‍थिर रखैत चौकपर चलि गेलौं। एक्केबेर आठ बजे रातिमे चौकपर सँ एलौं। अँगना गेलौं तँ चूल्‍हा-चौका सभ बन्न रहए आ पत्नी कोप भवनमे जा कऽ सूतल छेली। भीतरसँ बिलैया लगा नेने छली। हम केबाड़लग जा कऽ केतबो हाक देलिऐमुदा ने ओ केबाड़े खोलली आ ने किछु बजबे केलीह। सभसँ मोश्‍किल भेल जे रातिमे सूतब केतए। की करितौ हारि कऽ दलानपर जा अखड़े मोथीक पटियापर सूतलौं। सूतब की दैवक कपार भरि रातितौनीसँ मच्‍छर हौंकैत परात केलौं। मनमे पत्नीक प्रति पूरा रोष भऽ गेल रहए। सोचलौं ओ पत्नी की जे पतिक दुख नै बुझलक..! बिआहमे एकटा चरिआना भरि सोनाक औंठी देने रहए। वएह औंठी नरहिया बजारमे बन्‍हकी लगा दिल्‍ली विदा भऽ गेलौं। दिल्‍ली जा स्‍पोटमे पाँच हजार टका महिलापर काज पकड़लौं। आठ घन्‍टाक ड्यूटी रहए। चारि घन्‍टा ओभर टाइमो खटी। ख-पीब कऽ आ रूप भाउ़ा दऽ कऽ चारि हजार टका बँचैत रहए। छह मास धरि काज केला पछाइत लगधक पच्‍चीस हजार टका जमा भेल। एक दिन फोनसँ खबर भेल जे माए बीमार अछि। जँए छी तँए चलि जाउ। हम दिल्‍ली बजारमे पत्नी-ले ब्रेसिर, स्‍नो, पाउडर, लाहबला चूड़ी, रेाल्‍ड-गोल्‍ड नेकलस, कानक बाली, नाकमेहक नथिया, कानमेहक झुमका, गमकौआ साबून,ठोररंगा, पैररंगा आ लबन टोकी सभ सिंगारक चीज वौस कीनलौं। हँ, कपड़ा नै कीनने रही। किए तँ हमर कीनलाहाकपड़ा हमरा पत्नीकेँ पसिने नहि होइ छैन तँए सोचलौं दू हजार टका दऽ देबै अपन निर्मली जा शिव वस्‍त्रालयमे मनपसन्‍द कपड़ा कीनि लेती। एकटा अटैचीमे सभ समान राखि गाम विदा भेलौं। दरभंगावाली सुपर फास्‍ट ट्रेनमे बैसलौं। केतेको परियास केलाक बादो रिजर्वेशन नै भेल छल मुदा जेनरले बौगीमे खिड़की लग एकटा सीट भेट गेल रहए। अटैचीकेँ बर्थपर रखि चौकन्ना छेलौं जे कियो चोरा ने लिअए। भरि राति सुतबो ने केलौं। मुदा बनारस अबैत-अबैत आँखि लगि गेल। सपनामे देखलिऐ हमर पत्नी अपना आँगनमे सभ चीज-वौस रखि निहारि रहली अछि। ओ बड्ड खुश अछि। हमर हाथ अपना हाथमे रखैत बाजि रहल अछि- आइ हमर मनोरथ पूरा भऽ गेल। नीन टुटल तँ देखलिऐ एकटा बीस-बाइस बर्खक अति सुन्नैर लड़की हमरा कहि रहल छेली- कनेक हमरो बैसऽ दिअ प्‍लीज। हम पहिने अटैचीदिस देखलौं तँ ओ सुरक्षित बुझि पड़ल। तेकर बाद ओइ लड़की दिस धियानसँ देखलौं तँ ओ कोनो फिल्‍मी दुनियाँक हीरोइन जकाँ बुझि पड़ली। ताबेमे ओ लड़की फेर बाजल- “प्‍लीज कनेके खिसकु ने।” ओ गजब सुन्नैर छेली। अपना आपकेँ भाग्‍यशाली बुझैत हम खिसैक गेलौं। ओ लउ़की बैस गेली। भाग्‍यशाली ई बुझलौं जे एहेन दिव्‍य नवयौवना हमरा लगमे बैसली। हुनका शरीरसँ मधुर-मधुर सुगन्‍ध हमरा मदहोश करए लगल। ओ लउ़की पर्स खोललक आ एकटा पत्रिका निकालि पढ़ए लगल। हमर आँखि हुनकर सुन्‍दरता निहारएलगल। एकदम गोर वर्ण, भरल-पूरल देह। सेव जकाँगाल। हिरण जकाँ कजरारी आँखि। नागिनसन केश जे खुजले छल, कानमे तीन स्‍टेपबला झुमका,नाकमे हीरा जड़ल छक, समतोलाक फारा सन ठोर जैपर हल्‍का लाल रंगक लिपिस्‍टिक लागल। बिल्‍कुल पारदर्शी साड़ी आ ब्‍लौज पहिरने। साड़ीक भीतरसँ पेटीकोट आ ब्‍लौजक भीरसँ अधोवस्‍त्र पहिरने छेली से झलाक-झलाक देखाइत। पैरमे जे मेहदी(आरत)लगौने रहए ओ ओकरा पैरकसुन्‍दरतामेचारिचान लगबैत रहइ। ब्‍लौज तेतेककसल जे ओकर जवानीक छातीक एक चौथाइभागबाहरे। जेना देखनिहारकेँ जवानीक टेलर देखबैत...। हम ओइ लड़कीसँ पुछलिऐ- “ट्रेन केतए पहुँचल अछि?” ओ लड़की जवाब देलक- “मुजफ्फरपुरसँ आगाँ निकैल गेल अछि। केतए उतरब।” हमरा मुहसँ अनायास निकैल गेल- “दरभंगा।” तैपर ओ बजली- “हमहूँ दरभंगे उतरब। अहाँ दिल्‍लीसँ अबै छी की?” ओ फेर पुछलक। हमरा फेर बजा गेल- “हँ दिल्‍लीसँ अबै छी।” ई कहैत हम खिड़कीसँबाहर मकइकेँ फसल देखए लगलौं। ओ लड़की हमरा देहमे सटि गेली। हमरा जेना 440 वोल्‍ट बिजलीक झटा लगल, तहिना बुझना गेल। मुदा डरो हुअए तँए कनी अपनाकेँ सिकोररि लेलौं आ थोड़े ओइ लड़कीसँदेह अलग कऽ लेलौं। सोचलौं की जानि की भऽ जाए, किएक तँ कहल गेल छै-‘त्रियाचत्रिम् देवो ने जानए..।’ बजलौं- “मेडब कनेक हटिये कऽ बैसू।” ओ लड़की हमरा दिस तकैत बजली- “की यौ बिआह भेल अछि की नहि।” हम सोचलौं, लड़की ई गप किए पुछैए! कहलिऐ- “हँ बिआह तँ भऽ गेल अछि।” ओ फेर पुछलक- “बाल-बच्‍चा अछि की?” हमरा बजा गेल- “हँ एकटा बेटीअछि।” तैपर ओ पुछलक- “अपन छी की अनकर?” आब तँ बुझू जे हमरा रिश उठि गेल। मनमे बहुत बात आएल। मुदा डर हुअए जे किछु ऊँच-नीच गप बजा गेल आ जँ ई लड़की कोनो अबलट लगा दिए तखन तँ बड़का पहिपैटमे पड़ि जाएब आ सभ प्रतिष्‍ठा माटिमे चलि जाएत। मुदा तैयो हम पुछलिऐ- “मेडम एना किए बजै छिऐ।” तैपर ओ कहलक- “अहॉंकेँ देखै छी जे मौगीक महक लगैए। पत्नियोँ हेती तं हमरासँ सुन्नैर तँ नहियेँ हेती।” हम सकदम्म भऽ गेलौं। फेर वएह पुछलक- “आकि अहाँक बिआह हेमामालिनीक बहिनसँ भेल अछि?” हम बजलौं- “नइ जानि मेडम किएक अहाँ हमरा एहेन-एहेन बात कहै छी।” तैपर ओ लड़की बजली- “अच्‍छा छोड़ू ऐ बात सभकेँ आरामसँ चलू।” ई कहि ओ फेर हमरा देहसँ सटि गेल। डर तँ हेबे करए मुदा अपना-आपकेँ बड्ड सौभाग्यशाली सेहो बुझै रही जे एहेन दिव्‍य लड़कीक सानिध्‍य प्राप्‍त भऽ रहल अछि। थोड़ेकालक बाद ओ लड़की अपन हाथक पत्रिका हमरा दैत बजली- “लिअ पढू अहाँ बोर भऽ रहल छी।” हम पत्रिका पकड़ैत पुछलिऐ- “आ अहाँ?” जवाब देली- “हम गृहशोभा पढ़ै छी। हम पत्रिकाक पन्ना उलटाबए लगलौं। पत्रिकामे नीक-नीक लड़की सबहक अर्द्धनग्‍न फोटोसभ रहए। एकटा कथा रहै- लबली हेमा। कथा बड्ड रामोन्‍टिक रहए। हम ओइ कथामे हेरा गेलौं। ताबेमे ट्रेन समस्‍तीपुर टीशनपर पहुँच गेल छल। ट्रेन रूकल। एकटा चाहबला हमरा वौगीमे चए़ि अवाज देलक- “चाह गरम! गरम चाह..!” ओ लउ़की चाहबला दिस तकैत बजली- “ऐ चाहबला दो कप चाह देना।” हम मने-मन सोची जे दू कप चाह कीकरती। फेर मनमे भेल जे भऽ सकैए जे एक कप चाहसँ छाँक नै भरैत होइ। चाहबला दू कप चाह ओइ लड़कीकेँ पकड़ा देलकै। एकटा कम हमरा दिस बढ़बैत ओ लड़की बजली- “लिअ चाह पीबू। एतेक भीड़मे अहाँ अपना दिक्कत सहि हमरा जगह देलौं।” हम कहलिऐ- “धन्‍यवाद। अहाँ पीबू हम चाहबलासँ लऽ लइ छी।” तैपर ओ बजली- “यौ अहाँ हमर पाइक चाह नै पीयब तँ अहीं दियौ ढौआ, हमहीं अहाँ पाइक चाह पीब। अहाँ ने छुबा जाएब मुदा हम नै छुबाएब।” हम ओइ लड़कीक हाथसँ चाह पकड़ैत जेबीसँ दसटककी निकालि चाहबला दिस बढ़ा देलिऐ। ओ लड़की अपना पर्ससँ चारिटा मोट-मोट बिस्‍कुट निकालि दूटा बिस्‍कुट हमरा दिस बढ़बैत बाजल- “लिअ बिस्‍कुटक संग चाहक मजा लिअ।” हम कहलिऐ- “धन्‍यवाद। अहाँ खाउ।” तैपर ओ बाजल- “की होइए जे ई छौरी बिस्‍कुट खिया कऽ सभटा ढौआ-कौरी छीनि लेत। यौ हम एहेन नइ छी। हम मिथिला विश्‍वविद्यालयमे गृह विज्ञानक पी.जी फाइनलक छात्रा छी।” की करितौं। ओकरा हाथसँ बिस्‍कुट लऽ चाहमे डुबा-डुबा खाए लगलौं। बिस्‍कुट खेलाक किछे मिनटमे हमरा नीन आबए लगल। आँखि खुजल तँ लहेरियासराय अस्‍पतालमे बेडपर पड़ल रही। एकटा नर्स हमरा मुँहपर पानिक छीटा मारैत रहए। ने ट्रेन रहए आ ने ओ लड़की। हमरा चीज-वौससँ भरल अपन अटैची मोन पड़ल। हम बजलौं- “हमर अटैची?” तैपर ओ नर्स बजली- “आपको दरभंगा रेलबे स्‍टेशपर बेहोशी की हालत मे उतारा गया है। पूरा बौगी खाली था। आप अपने सीटपर बिल्‍कुल बेहोश थे। चाह घन्‍टा उपचार के बाद आपको होश आया है।” हम अपन जीन्‍स पैन्‍टक जेबी टटौललौं तँ ढौआबला पर्स गायब रहए। हम बजलौं- “हाय रे हमर पत्नीक मनोरथ।” ई कहैत हम फेर बेहोश भऽ गेलौं। ◌ लघु कथा- चरित्तर कक्काक ब्‍लडपेसर चरित्तर काकासँ भेँट करैले मन औनाइत रहए। हुनका भेँट भेना एक माससँ बेसीए भऽ गेल छल। किएक तँ हमहूँ धनकटनी आ गहुम बाउग करबामे व्‍यस्‍त छेलौं। गहुम बाउगसँ फुरसत भेटल तँ नारक टाल लगाएब, धान दौनी कराएब, एकटा ने एकटा काज लगले रहल। दौन-दौगोनी होइत-होइत गहुम पटबै-जोकर भऽ गेल। यौ बाबू किसानी जीवनमे बड्ड भीर। एकटा-ने-एकटा काज लगले रहत। आ जँ ओ काज समयपर नै करब तँ हानि छोड़ि लाभ नै हएत। मुदा मुदा नोकरी करैबलाकेँ से बात नहि। तइमे सरकारी नोकरी करनिहारक तँ बुझू पाँचो आँगुर घीयेमे। आगि लागौ चाहे पाथर खसौ समयपर दरमाहा भेटबे करतै आ ऊपरका आमदनी अलगसँ। ने हर-हर आ ने खट-खट। देखै नै छिऐ प्रो. वीरेन्‍द्र बाबूकेँ केहेन मोछमे घी लगबै छथिन। एगारह बजे दिनमे महाविद्यालय जाइ छथिन आ तीन बजे बेरमे आपस आबि जाइ छथिन आ दरमाहा केतेक भेटै छैन...। खाएर छोड़ू ऐ बातकेँ...। हम आ चरित्तर कक्काक बेटा विमल लंगोटिया संगी।पहलासँ बी.ए. धरि संगे पढ़लौं। ओ कलकत्तासँ बी.एड. कऽ लेलक तँए उच्‍च विद्यालयमे शिक्षकक पदपर नोकरी करै छैथ आ हम कोनो प्रशिक्षण नै प्राप्‍त केलौं तँए खेती-गिरहस्‍ती कऽ अपन जिनगीक गाड़ी खींच रहल छी। ओना, नोकरी-ले हमहूँ परियास कम नहि केलौं,मुदा ऐ युगमे भगवान भेटब असान अछि जखनकि नोकरी भेटब कठिन। 29 दिसम्‍बरकेँ जखन गहुम पटबैत रही, फोचाइ कहलक जे चरित्तर काका बेमार पड़ि गेला हेन। ब्‍लड पेसर बढ़ि गेल छैन। जखनेसँ कक्काक बेमारीक बात सुनलौं हुनकासँ भेँट करैले मन कछमछ करए लगल। कछमछाइत मनमे उठल- चरित्तर काका मेहनती किसान छैथ। कन्‍हपर कोदारि आ हाथमे खुरपी रहबे करै छैन। जीर-मरीच आ नोनक अलाबे खाइ-पीबैक कोनो वस्‍तु नै कीनए पड़ै छैन। कहियो ने सुनने रहिऐ जे चरित्तर काकाकेँ माथो दुखाएल हेतैन। फेर ब्‍लड पेसर किएक बढ़ि गेलैन? विहाने भेने सुति उठि कऽ चरित्तर काकासँ भेँट करए लेल विदा भेलौं। रस्‍तेमे नित्‍यक्रियासँ निवृत्त भेलौं। कक्काक घर हमरा घरसँ लगधक डेढ़ किलोमीटरपर। हमर घर गामक दछिनवरिया टोलमे सभसँ दच्‍छिन आ हुनकर घर उतरवरिया टोलमे सभसँ उत्तर छैन। चरित्तर काका दलापरचौकपर कम्‍मल ओढ़ि कऽ बैसल रहैथ। हम दलानक निच्‍चेसँकहलयैन- “काका गोड़ लगै छी।” काका बजला- “नीके रहह। आबह-आबह। केतए हेराएल छेलह हेन। एक-डेढ़ मासक वाद तोरासँ भेँट भेल हेन।” कहलयैन- “की कहब काका, एक्कोरत्ती फुरसत नइ भेटै छल। अहाँ तँ बुझिते छिऐ जे किसानक जिनगी केहेन होइ छइ। काल्‍हि गहुमक पहिल पटौनी समाप्‍त केलौं हेन। गहुमे पटबैतकाल फोचाइ कहलक जे काका बेमार भऽ गेला हेन। बुझू तखनेसँ अहाँक भेँट करैले मन कछमछ करै छइ। सुति उठि कऽ एमहरे विदा भऽ गेलौं।” काका बजला- “हँ, तेतेक ने टेंशन भऽ गेल अछि जे ब्‍लड पेसर बढ़ि गेल। आठम दिन डाक्‍टर रमेश जँचने रहए। कहलक जे नीचलका साए आ ऊपरका एकसाए साठि भऽ गेल अछि। दवाइ खाइ छी। काल्‍हि जँचबैलौं तँ कहलक आब ठीक अछि। तैयो परहेजसँ रहैले कहलक हेन। ठीक रहितो ऐ बेमरीमे दवाइ सभ दिन चलिते रहत सेहो कहलक। ठंढासँ बँचि कऽ रहैले कहलक हेन। भात आ नोन कम खाइले कहलक हेन।” हम सभ गप करिते रही ताबेमे चरित्तर कक्काक पोती दूटा प्‍लेटम चारि-चारिटा नमकीन बिस्‍कुट आ दूटा कपमे चाह दऽ गेल। काका पुछलैन- “पानियोँ पीबह?” कहलयैन- “हँ काका, पीब।” काका पोतीकेँ कहलखिन- “गइ रीना एकलोटा पानि आ एकटा गिलस नेने आ।” रीना एक लोटा जल आ एकटा गिलस राखि गेल। हम बिस्‍कुट खा जल पीब चाहक चुस्‍की लेबए लगलौं। चाहो पीबी आ कक्काकसँ गपो करी। हम पुछलयैन- “काका, ऐबेर गहुमक खेतीक केते केने छी?” तैपर काका जवाब देलैन- “एक्को धुर नहि।” कक्काक गप्‍पक हमरा कोनो अर्थे ने लगल। हम छगुन्‍तामे पड़ि गेलज्ञैं। सोचएलगलौं- काका जीवनी किसान छैथ। चारि-पाँच बिगहामे सभ साल गहुमक खेती करै छैथ। फेर एना किए बजला! पच्‍चीसे नवम्‍बरकेँ विमल चौकपर भेटल रहए तँ कहने छल जे आइए गहुमक बाउग समाप्‍त केलौं। तैपर हम पुछनौं रहिऐ जे केतेक खेतमे गहुम बाउग केलह अछि। तैपर विमल कहने रहए पँच बिगहामे। तैपर हम कहने रहिऐ-बड़ी अगता गहुम खेती मारि लेलह। तैपर विमल बाजल रहए- रौ मीत पाँचो बिगहा खेतमे क्रान्‍ति धान रोपने रही। नारेपर कटबा लेलौं। फारबला ट्रेक्‍टरसँ एक दिन पाँचो बबिगहा खेतकेँएक समार जोतबालेलौं आ पाँच दिन रौद लगला बाद छठम दिन खाद आ बीआ छीटबा कऽ रोटावेटरसँ एक चास करा देलौं। आब की कोनो हर-बरदसँ खेती होइए जे बेसी समय लगात। हम कहने रहिऐ- हँ से तँ ठीके कहै छीही। तोर खेतो सड़के कातमेछौ, तँए ट्रेक्‍टर जाइक सुविधा छौ आ छह-सात बिगहा खेतो एकेठाम छौ। विमल कहने रहए- हँ से तँ अछिए। एकेटा कमी अछि। बोरिंग नइ अछि। की करबै तीन-तीन ठाम लेअर जाँच करबौलिऐ मुदा 250-300 फीटसँ कमपर लेअरे ने भेटै छइ। हम कहने रहिऐ- तोहर खेत तँ बिहुलो धारसँ पटि जाइ छौ। बोरिंगक खगतो तँ नहियेँ छौ। विमल कहने रहए- हँ से तँ पटि जाइए। हमरा सोचमे डुमल देख चरित्तर काका टोकलैथ- “की सोचए लगलहक।” कहलयैन- “काका हमरा तँ अहाँ गपक कोनो अर्थे ने लागल। 25 नवम्‍बरकेँ विमल भाय कहने छला जे आइए पाँच बिगहा गहुम बाउग कऽ निचेन भेलौं हेन। ओ किए झूठ बाजल?” तैपर काका बजला- “ने विमले झूठ बाजल आ ने हमहीं गलत कहै छिअह।” कक्काक बात सुनि हम आरो ओझरीमे पड़ि गेलौं। गपक कोनेा भाँजे ने लागए। कहलयैन- “काका, अहाँ की कहै छिऐ से तँ हमरा भाँजे ने लगैए।” काका समझबैत बजला- “सुनह, गहुम ठीके पाँचबिगहामे बाउग केने छी। ओहो 25 नवम्‍बरकेँ। तोरा तँ बुझले छह जे गहुमक फसिलमे बाउग केलाक बीसम दिनसँ लऽ कऽ पच्‍चीसम दिन धरि पहिल पटौनी कऽ देबाक चाही।नै तँ गहुमक गाछमे वृद्धि नै होइ छइ।” मुड़ी डोलबैत कहलयैन- “हँ, से तँ ठीके। नहि तँ आखिरी पच्‍चीसम दिन धरि पहिल पानि देब अनिवार्य अछि।” काका बिच्‍चेमे बजला- “ठीके कहलक। आब तोंही कहह जे हमरा गहुम बाउग केला पैंतीस दिन भऽ गेल हेन आ अखन धरि पटवन नै भेल। भेल एक्को धुर गहुम बाउग केनाइ? बुझह जे हाथो तरक गेल आ लाटो तरक गेल।” हम मुड़ी डोलबैत बजलौं- “से तँ ठीके कहै छिऐ। जँ गहुमक फसिलमे पटवन नै केलिऐ तब तँ सभ खर्चा आ मेहनत पानिमे चलि गेल। मुदा एना भेल किए?” तैपरकाका बजला- “सभ साल बहुल नदीसँ गहुमक पटवन भऽ जाइ छल। एमकी अगते बहुल धार सुखि गेल।” हम पुछलयैन- “एना किए भेल? एतेक अगता धार किए सुखि गेल।” काका बजला- “सुनै छिऐ गोठ नरहिया लग एन.एच. 104मे पुल बनि रहल छै, तँए पुलक ठिकेदार धारकेँ नरहियासँ एक किलोमीटर उत्तर बान्‍हि देलक। तँए पानि एनाइ बन्न भऽ गेल आ धार सुखिगेल।” हमरा चरित्तर कक्काक ब्‍लड पेसरक कारणक भाँज लागि गेल। समयपर गहुम नै पटलासँ कक्काक ब्‍लड पेसर बढ़ि गेल रहैन। हम खड़ा होइत बजलौं- “काका,जाइ छी। बड्ड काज अछि।” ई कहैत हम विदा भऽ गेलौं। रबीन्‍द्र नारायण मिश्र यूरोप यात्रा भारत सरकारक प्रशिक्षण कार्यक्रमक अनुसार ३५ गोटेकेँ एक-संग युरोपक पाँच देश घुमबाक कार्यक्रम छल। सभ गोटे सरकारक प्रथम श्रेणीक अधिकारी छला। सभ नेतृत्‍व एकटा महिला अधिकारीक हाथमे छल। सभमे बेकतीमे विदेश देखबाक-घुमबाक आ रहबाक अवसरसँ मनमे अद्भुत प्रसन्नता छल। रहबो किए ने करत युरोपक देश छी किने। सभ कियो अपन-अपन कागज-पत्तर सरियाबैमे ललगौं। पासपोर्ट सरकारी बनल। वीजा कार्यालयक तरफसँ बनि गेल। टीकट सरकार देलक, तखन करके की रहइ। बस कपड़ा-लत्ता सरियाउ, किछु पाइ बेसी कऽ रखि सकी तँ राखि लिअ आ विदा होउ। ओना, किछु यूरोडालर सरकारक तरफसँ जेब खर्चक हेतु सेहो देल गेल। फ्रांसक राजधानी ‘पेरिस’ लौटबाकाल रस्‍तामे छल। सभकेँ इच्‍छा भेलै जे कनिको-मनिको ओकरो देख सकी तँ देख ली। से प्रयासक बाद सम्‍भव भेलइ। लौटैकालक कार्यक्रममे दिन भरि पेरिस भ्रमण शामिल कएल गेल। पैंतीस आदमीक हुजुम एक्केठामसँ विदेश विदा छल। एकर आनन्‍द सोचल जाए सकैत अछि। यूरोप भ्रमणक उपरोक्त कार्यक्रम असलमे प्रशिक्षणक अंग छल। अगस्‍त २००९ मे दू सप्‍ताहक हेतु केतेको दिनसँ तैयारी चलि रहल छल। विदेश यात्राक दौरान की करक नहि अछि, आ की करक अछि तेकर सविस्‍तार चर्चा भेल। कोनो एहेन काज नहि करबाक छेलै जइसँ देशक गरिमापर बट्टा लगइ। आठ बजैत-बजैत सभ कियो इन्‍दिरा गाँधी अन्‍तर्राष्‍ट्रीय हवाइ अड्डापर पहुँच गेल रही। सबहक जेबीमे अपन-अपन टीकट, पासपोर्ट आदि जरूरी कागजात छल। रातिक २ बजे करीब हवाइ जहाजक उड़ान छल। किछु गोटेकेँ मुम्‍बइसँ आगूक जहाज लेबाक रहैन तँए ओ सभ अलग पहिनहि मुम्‍बइ चल गेल रहैथ। हम दिल्‍लीसँ सीधा फ्रैकफर्ट जाइबला हवाइ जहाजमे जाइबला समूहक संगे रही। दिल्‍ली हवाइ अड्डापर एक-एक-के सभ सहयात्री सभ जमा भऽ गेलौं। सुरक्षा जाँचक बाद हम सभ अन्‍दर इमीग्रेशन काउन्‍टरपर ठप्‍पा लगेलौं। सभकेँ संगमे कोनो प्रतिबन्‍धित सामान नहि लऽ जेबाक हिदायत पहिनहि दऽ देल गेल रहइ। तँए कोनो परेशानी नहि भेल। किछु कालमे बोर्डीग शुरू भऽ गेल आ हम सभ एक-एक-के बेरा-बेरी सभ कियो हवाइ जहाजमे बैस गेलौं। हमरा लोकनिक प्रशिक्षण स्‍लोवेनियाँ लुबियाना स्‍थित आइ.सी.पी.ई.(Interational centre for public Enterprises) छल। एकर स्‍थापना २४ अप्रैल १९७४ ई.मे तत्‍कालीन यूगोस्‍लावीया सरकार द्वारा भेल। भारत, नेपाल, श्रीलंका सहित पनरहटा आर देश सभ एकर सदस्‍य छैथ। ऐ संस्‍थाक विकास यात्रामे भारतक गम्‍भीर योगदान अछि। वर्तमानमे आइ.सी.पी.ई. दुनियाँ भरिक लोक हेतु विभिन्न प्रकारक विषय, खास कऽ आर्थिक विषयपर चर्चाक सघन माध्‍यम अछि। ऐ संस्‍थाक स्‍थापनामे संयुक्‍त राष्‍ट्र संघक नाओं (Non Aligned Movement) क बहुत योगदान अछि। भारतक श्री सी सुव्रमन्‍यम एवम्‍ श्री जी पार्थ सारथी बहुत दिन धरि एकर नायक मार्ग दर्शक रहला। यूगोस्‍लावियाक विभाजनक बाद १९९२ ई.मे ऐ संस्‍थाक देख-रेख स्‍लोवेनियाँ सरकारक अधीन आबि गेल। ऐ संस्‍थाक प्रशासकीय प्रमुख डायरेक्‍टर जेनरल होइत छैथ जे संस्‍थाक एसेम्‍बलीक द्वारा चारि वर्षक हेतु चुनल जाइ छैथ। संम्‍प्रति डॉ. आनन्‍द एन अस्‍थाना ६ अप्रैल २०१५ सँ चारि सालक हेतु ऐ संस्‍थाक डायरेक्‍टर जेनरलक पदपर छैथ। दिल्‍लीसँ हवाइ जहाज खुजल तँ सोझे जर्मनीक फ्रैकफर्ट हवाइ अड्डापर उतरल। सूर्योदय भऽ गेल छल। मुम्‍बइसँ अबैबला हमर संगी सभ सेहो ओतहि आबि कऽ हमरा लोकनिक प्रतीक्षा करैत छला। ओइमे एक गोटेक सामानमे दारूक बोतल रहैन जे ओ मुम्‍बइ हवाइ अड्डापर कीनने रहैथ। फ्रैकफर्टमे ओ पकड़ल गेला आ हुनका बहुत परेशानी भेलैन। हुनका कहल गेल जे या तँ पीब लिअ, या केकरो दऽ दियौ चाहे फेक दियौ। संगे आगू नहि लऽ जा सकै छी। पता नहि, ओ तेकर की समाधान केलैन। फ्रैकफर्ट दुनियाँक पहिल हवाइ अड्डा थिक। १६ नवम्‍वर १९०९ ई.मे भेल। जर्मनीक ई वयस्तम हवाइ अड्डा अछि। सन्‍ २००९ मे पाँच कड़ोर ९ लाख ३२ हजार ८४० यात्री ऐठामसँ गुजरल। फ्रैकफर्टक टर्मीनल १A पर हमरा लोकनि स्‍लोवेनियाँक (Lajubljana) हेतु छोट सन हवाइ जहाज पकड़लौं। घन्‍टा भरिमे ई यात्रा संपन्न भेल। रस्‍तामे सभ तरहक जलखै सेहो देल गेल। यात्रासँ पूर्व हमरा सबहक एकटा संगी मार्गदर्शन करैत निम्नलिखित पहलुपर धियान रखबाक परामर्श देलैन। (ओ केतेको बेर विदेश गेल रहैथ आ विदेशमे २ साल काजो केने रहैथ) १. हैण्‍ड वैगेजमे एक सेट कपड़ा राखी ताकि जँ चेकइन वैगेज देरीसँ पहुँचल तँ काज औत। २. चेकइन वैगपर अपन नाओं, गन्‍तव्‍य स्‍थानक पता सहित फोन नम्‍बर लिखल जाए। ओइ बैगमे अपन भिजिटिंग कार्ड राखल जाए। ३. पासपोर्ट, हवाइ जहाजक टिक, विदेशी मुद्रा अपना संगे सुरक्षित स्‍थानपर राखल जाए। ४. उपरोक्त जरूरी कागजातक तीन फोटो प्रति वैगमे अलग-अलग स्‍थानपर राखल जाए। ५. नित्‍यप्रति प्रयोगक जरूरी दबाइ अपना संगे राखू। ६. होटल आदिमे अपन सामानपर धियान राखू, ताकि ओ चोरि ने भऽ जाए। ७. विदेशमे हमेशा दू वा अधिकक समहूमे रहू ताकि जरूरी भेलापर मदैत भऽ सकए। ८. विदेशमे कीनल गेल सामानक रसीद संगे राखू, एमीग्रेसन काउन्‍टरपर तेकर काज पड़ि सकैत अछि। ९. अपना संगे छाता, हल्‍का ऊनी स्‍वेटर, आ कोट राखू। उपरोक्त प्रशिक्षण ९ अगस्‍तसँ २३ अगस्‍त २००९क दौरान सम्‍पन्न हेबाक रहइ। कार्यक्रम प्रारम्भसँ पूर्वहि हमरा लोकनिकेँ संस्‍थापनक डायरेक्‍टर जेनरलक तरफसँ इमेल भेटल जइमे संस्‍थानक बारेमे प्रारम्‍भिक जानकारीक अलाबा प्रशिक्षण कार्यक्रमक छल। दैनिक कार्यक्रम छल। तहिक अनुसार माने कार्यक्रम दौरान कोनो काजक हेतु श्री अश्विन श्रेष्‍ठ एवम्‍ श्री उरोज जेबरसँ सम्‍पर्क करबाक छल। ९ अगस्त २००९ क लुवियाना हवाइ अड्डापर हमरा लोकनिक स्‍वागत हेतुश्री श्रेष्‍ठजी (जे नेपाली मूलक छला एवम्‍ स्‍लोविनियाँमे बसि गेल रहैथ) आएल रहैथ। दूटा नमगर-नमगर बसमे चढ़ि हमरा लोकनि संस्‍थानक हेतु विदा भेलौं। आधा घन्‍टामे हम सभ संस्‍थान पहुँचलौं जेतए हमरा लोकनिक स्‍वागत डॉ. स्‍टेफन वोगडन सलेज, डायरेक्‍टर जेनरल केलाह। सभ गोटेकेँ होस्‍टल रूमक कुंजी देल गेल। प्रत्‍येक कोठरीमे दू गोटाक जगह छेलइ। मात्र एक्केटा रूप छेलै जइमे एसगरे हमर एकटा संगी रहला। कार्यक्रमक समन्‍वयक (महिला अधिकारी) केँ सेहो फराक कोठरी देल गेलैन। तेकर पछाइत हमरा लोकनिकेँ चाइनीज रेस्‍टोरेन्‍ट- सांग हाइ, लुवियानामे दिनक भोजन करौल गेल। छात्रावास साफ-सुथरा छल। कोठरी सभमे ए.सी. नहि रहै कारण ओइठाम ओतेक गर्मी नहि पड़ैत अछि। सभ जरूरी समान ओइ कोठरीमे सुरभ छल। संस्थानक भूतलपर रवीन्‍द्रनाथ टैगोर हॉलमे नित्य साढ़े सातसँ आठ बजेक बीचमे जलखै देल जाइत छल। जे तेतेक जूश पीबए चाहैथ से भेटैन। भारतीय शाकाहारी भोजन एकटा गुजराती ठेकेदार द्वारा देल जाइत छल। लगैत छल जेना अपने देशमे खा रहल छी। ओही हॉलमे रोजाना रात्रि भोजनक बेवस्‍था सेहो रहैत छल। एवम्‍ दिनुका भोजना आन-आन ठाम। संस्‍थानक त्रुवार हॉलमे प्रशिक्षण भाषण होइत छल। समयसँ सभ प्रशिक्षणार्थी एवम्‍ व्‍याख्‍याता लोकनि उपस्‍थित भऽ जाइत छला। चाह एवम्‍ कौफीक हेतु दू बेर अवकाश होइत छल। चाह/कौफीक अलावा भरि पोख तरह-तरह केर बिस्‍कुटक बेवस्‍था सेहो छल। १० अगस्‍त २०१६क संस्‍थानक डी.जी. द्वारा स्‍वागत भाषणक बाद स्‍फोवेनियाँमे भारतीय राजदूत डॉ. भी.एस. शंषद्रि द्वारा भारत स्लोवेनियाँ सम्‍बन्‍धपर संक्षिप्‍त चर्चा कएल गेल। तद्दुपरान्‍त स्‍लोवेनियाँक विदेश मंत्रालयमे डी.जी. श्रीएन्‍ड्रेज वेन्‍डेज द्वारा स्‍लोवेनियाँ एवम्‍ अर्थ संकट विषयपर भाषण भेल। भोजनोपरान्‍त प्रो. जोज ग्रिकर द्वारा Innova tive Cron Border i-Resion Development विषयपर भाषण भेल। रातिमे स्‍वागत एवम्‍ रात्रि भोजनक कार्यक्रमक बाद सभ गोटे विश्राम केलौं। भोरे उठि हम सभ आसपासक जगहमे टहलए निकललौं। अकास स्‍वच्‍छ छल। वायुमण्‍डलमे केतौं प्रदूषण नहि। अकासक तारा सभ चकमक देखल जा सकैत छल। हवामे जे ताजगी छल ओकर अनुभव शब्‍दसँ नहि कएल जा सकैत अछि। मुदा ओत्तौ पार्कमे एकटा भिखमंगा सन बेकतीकेँ पुरान-धुरान ओढ़ना ओढ़ने सूतल देखलिऐ। कहबी छै जे गेलौं नेपाल, कपार गेल संगे..! स्‍लोवेनियाँ बहुत छोट सन देश अछि मुदा आर्थिक दृष्‍टिमे उन्नत देशमे अबैत अछि। ई देश यूरोपियन यूनियनक हिस्‍सा अछि एवम्‍ ओइठामक मुद्रा यूरोडालर अछि। सभ किछुक अछैतो ओत्तौ अभागल लोक पार्कमे अनाथ जकाँ सूतल देखाएल, से देख आश्चर्यमे पड़ि गेलौं। ११ सँ सोलह अगस्‍त २०१६ ई.क बीच स्‍लोवेनियासँ बाहर वियाना, म्‍युनिस्‍क, मेनिस जेबाक कार्यक्रम छल। समस्‍त यात्रामे श्री अश्विन श्रेष्‍ठजी हमरा लोकनिक संगे रहैथ। हुनका संगे एकटा गाइड छल एवम्‍ गाड़ीक ड्रइवर रहए जे अपना-आपमे मनोरंजक छल एवम्‍ बहुत रास जानकारी दैत रहै छल। ९ अगस्‍तक सायंकाल हमरा लोकनि सीटी सेन्‍टर घुमैले गेलौं। सड़कपर काते-काते चलैमे अद्भुत आनन्‍द आबि रहल छल। सड़कक काते-काते साइकिल चलेबाक हेतु अलग पाँति छल। ट्रैफिक कन्‍ट्रोल सिस्‍टममे एहेन बेवस्‍था छल जे पदयात्री सड़क पार करबाक सूचना खीच दबा कऽ दए सकैत छल। अलग जाइबला लोक सभ हमरा लेाकनिक संग बहुत नीक बेवहार करै छला। ट्रैफिक कन्‍ट्रोलमे सेन्‍सर लागल छेलइ। जइ कार सभमे अनुमतिक चीप छल, तेकरा चेक प्‍वाइन्‍टपर अबिते रस्‍ता खुजि जाइत छल। शेष लोककेँ अपन कागजात देखबए पड़ैत छल। तेकर बादे अहाँक गाड़ी आगू बढ़ि सकैत अछि। जँ सड़कपर यातायात नियमक उल्लंघन करैत पकड़ल जाएब तँ तुरन्‍त सायरन बजि उठैत छल आ ओइसँ उवरक हेतु भारी जुर्माना ३० यूरोडालर अदा करए पड़ैत छल। सड़कक कातमे किंवा कोनो पार्कमे लघुशंका करब विल्‍कुल मना छल। एमहर-ओमहर जाइत काल परिचय पत्र लटकौने रहैत छेलौं जइसँ असानीसँ पहिचान भऽ सकए। स्‍लोवेनियाँक सरकारमे विषय वस्‍तुकेँ विशेषज्ञ सभकेँ मंत्री, सचिव बनौल जाइत अछि। सरकार बदललापर ओ सभ अपन पुरना काजपर आपस लौट जाइत छैथ। यूरोपियन पुनियनक संभावी सभ राष्‍ट्रमे एके बिन्‍दुपर टैक्‍स लेबाक परम्‍परा अछि। संसदक दू सदन अछि। राष्‍ट्रपति, मंत्रीक अलाबा नगरपालिका होइत अछि। ओइठाम राज्‍य नहि अछि। शहरमे पीबक पानिक आपूर्तिक उत्तम बेवस्‍था अछि। पद यात्रीक बहुत सम्‍मान कएल जाइत छल। यदि कारसँ चलैत बेकती कोनो पद यात्रीकेँ देखैथ तँ तुरन्‍त गाड़ी रोकि कऽ सड़क पार करबाक आग्रह करैथ। ११ अगस्‍त २००९ ई.क प्रात: ६ बजे बससँ सभ गोटे आस्‍ट्रीयाक राजधानी वियानाक हेतु प्रस्‍थान केलौं। सभ गोटेक आपसी सहमतिसँ ओइ विदेश कार्यक्रमक हम मुनिटर रही। सभसँ पहिने तैयार भऽ आगू आबि कऽ आर लोक सभकेँ शीघ्र चलबाक हेतु प्रेरित करी। समयक प्रति निष्‍ठा ओइठाम बहुत आवश्‍यक छल, अन्‍यथा लोक हँसीक पात्र भऽ जाइत छल। वियाना आस्‍ट्रीयाक राजधानी थिक। एकर अवादी १.८ करोड़ अछि। वर्लिनक बाद विश्वमे सभसँ अधिक जर्मन भावी लोक ऐठाम रहै छैथ। आस्‍ट्रीयाक पूर्वी भागमे स्‍थित वियाना अनेको अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाक मुख्‍यालय अछि। २००१ ई.मे युनेस्‍को एकटा विश्व धरोहर घोषित केलक। वियानाकेँ संगीतक नगर सेहो कहल जाइत अछि। विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक- फ्राइड ओहीठाम जन्‍मल छला। वियाना दुनियाँकमे उच्‍च जीवन स्‍तरक हेतु प्रसिद्ध अछि। २००५ ई.क एक अध्‍ययनक अनुसार दुनियाँक सर्वोत्‍कृष्‍ट रहै जोगर शहरमे एकर नाओं आएल छल। अमेरिकाक सैन फ्रैसिस्‍को एवम्‍ कनाडाक वानकोमेर ऐ टक्करक आन शहर सभमे अछि। प्रति वर्ष ३.७ करोड़ पर्यटक ऐ शहरमे भ्रमण हेतु अबैत रहै छैथ। सायंकाल ५ बजे आस्‍ट्रीयामे भारतीय राजदूत श्री सौरभ कुमारसँ दूतावासमे हमरा लोकनिक भेँट भेल। सभ गोटेसँ परिचयक बाद जलखैक बेवस्‍था रहइ। वियानक बारेमे आवश्‍यक जानकारी सेहो हुनका माध्‍यमसँ भेलट। भारत एवम्‍ आस्‍ट्रीयाक पारस्‍परिक सम्‍बन्‍धक चर्चा करैत ओ स्‍पष्‍ट केलैन जे २००० भारतीय ओइ देशमे रहि रहल छैथ। भारत भ्रमण हेतु वीजा देबामे कोनो देरी नहि होइत छल ओ अधिकांश लोककेँ ओही दिन वीजा भेट जाइत छल। राजदूत महोदय हमरा लोकनि द्वारा पूछल गेल केतेको जिज्ञासाक उत्तर दैत रहला। दूतावासक बाद हमरा लेाकनि नगर भ्रमण हेतु विदा भेलौं। ओइ क्रममे पुरना महल देखलौं जेतए-सँ ८०० साल तक ओइ देशक शासन भेल छल। प्रधानमंत्री आवास एवम्‍ संसद भवनकेँ एकदम समीपसँ हम सभ देखलौं आ सुरक्षाकेँ जे ताम-झाम अपना देशमे अछि, से ओतए केतौ नहि बुझाएल। शहर एकदम स्‍वच्‍छ, मनोरम। लोकक अवादी बहुत कम। रस्‍तामे तँ मुश्‍किलसँ कियो देखाइत। खेत सभ हरिअर कंचन। बीच-बीचमे केतौ-केतौ गाम सभ, जेहो छोट-छोट मुदा पक्काक घर सभ दर्शनीय दृश्‍य उत्पन्न करैत छल। सभ घरपर सौर ऊर्जाक उत्‍पादनक बेवस्‍था छल। रस्‍ता भरि पवनचक्की द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्‍पादनक बेवस्‍था देखाएल। यत्र-तत्र द्वितीय विश्व युद्धक स्‍मृति अवशेष भरल छल। सड़कपर ३५टा भारतीय हुजुम जखन चलैत छल तँ अभूतपूर्व दृश्‍य भऽ जाइत छल। देशक प्राय: सभ राज्‍यक लोक हमरा सबहक संगे छला। अहिना सड़कपर चलैतकाल वियानाक फूट-पाथपर एकटा पंजाबी दोकान केने छला। हमरा सभकेँ हिन्‍दीमे गप करैत सुनि बहुत प्रसन्न भेला। गप-सप्‍प्‍क क्रममे अपन परेशानी सभ व्‍यक्‍त करैत रहला। सम्‍पूर्ण यूरोप एक दोसरसँ जुड़ल अछि। सड़कक माध्‍यमसँ पूरा यूरोप घुमि सकैत छी। मल्‍टीपाल इन्‍ट्री वीजा भेटैत छइ। जहिना अपना देशमे एक राज्‍यसँ दोसर राज्‍य जाइ छी तहिना ओतए एक देशसँ दोसर देश घुमि सकै छी। दूरगामी बस सभक ड्राइवरकेँ दूटा यात्राक बीचमे आधा घन्‍टाक कानूनी विश्राम देल जाइत छइ। आसपासक घर सभमे फलक बगीचा छल। निच्‍चाँमे फल सभक पथार रहैत छल। सड़कक काते-काते हम सभ चली तँ लोक सभ आश्चर्यचकित भऽ देखैत रहै छल। कियो-कियो कहैत जे ओ इण्‍डियाकेँ जनैत अछि किंवा इण्‍डिया गेलो अछि। मुदा सबहक मुखमण्‍डलपर एकटा सत्‍कारक भाव भेटैत छल जेकरा बिसरब असम्‍भव...। १२ अगस्‍त २००९क हमरा लोकनिक पहिल पड़ाव छल- यूनीडो (United Nations in Destrial Developemant Organization) संयुक्त राष्‍ट्रसंघक अधीन यूनीडो अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तरपर गरीबी निवारण हेतु औद्योगिकरणक विकास हेतु कार्यरत्‍ अछि। जनवरी २०१७ तक भार सहित १६८ देश ऐ संस्‍थाक सदस्‍य छैथ। संस्‍थाक निदेशक द्वारा प्रस्‍तुतिकरणक क्रममे मूलत: निम्नलिखित विषय उभरल- १. वर्तमान परिवेशमे सरकार सबहक महत्‍व बढ़ल अछि कारण बाजार आधारित नीति स्‍वयंमे अपूर्ण अछि। २. यूनिडो सदस्‍य देश सभकेँ उत्‍साहित कए सकैत अछि मुदा असल काज तँ देश सभकेँ स्‍वयं करक हएत। ३. वायुमण्‍डल परिवर्तनक खेती-वाड़ीपर जबरदस्‍त प्रभाव अछि। ४. ऊर्जा उत्‍पादनक ताधैर महत्‍व नहि हएत जाधैर एकर सक्षम उपयोग नहि हएत। ५. भारतमे अफ्रिकोसँ कम प्रति बेकती उपलब्‍ध अछि। भारतक प्रगति हेतु ऊर्जा उत्‍पादन ओ उपलब्‍धिमे वृद्धि आवश्‍यक अछि। ६. गरीबी ओ ऊर्जामे अन्‍योन्‍याश्रय सम्‍बन्‍ध अछि। ७. प्रत्‍येक घरमे सौर ऊर्जा लगौल जाए। ८. कार्यालय एवम्‍ दोकानक कार्यवधि घटा कऽ ऊर्जा व्‍ययकेँ सीमित कएल जाए। ९. भारतक किछु राज्‍य जेना महाराष्‍ट्र, जुजरात आन सात राज्‍यसँ बेहतर कऽ रहल अछि। ११ अगस्‍तक दिनुका भोजन एकटा भारतीय भोजनालयमे छल। ओकर संचालक एकटा भारतीय युवक छला जे ओइठाम होटल मैनेजमेन्‍ट करबाक हेतु गेल रहैथ आ पढ़ाइ पूरा कए भोजनालय चलबए लगला। ओ अपन प्रयासमे पूर्ण सफल छला। होटल खूब चलैत छल। उत्तम कोटिक भारतीय भोजनक बेवस्‍था छल। मुदा दोसर दिन एकटा चाइनीज भोजनालयमे खेनाइक बेवस्‍था छल। शाकाहारी लोकक संख्‍या आधा-आधी छल ओइमे ६-७ टा तँ कट्टर शाकाहारी छला। ..एकटा हाँड़ीमे भात राखल रहइ। वैरा कहलकै जे आधा दिस तँ अण्‍डा सहित भात अछि आ आधा बिना अण्‍डाबला। ई बात सुनि कऽ हम आ हमर एकटा दच्‍छिन भारतीय मित्र कड़ा विरोध कएल, आखिर ऐ बातक कोन गारंटी अछि जे एक्के हाँड़ीमे राखल दू तरहक भात उलैट नहि गेल हएत आ छूतिक तँ बाते छोड़ू। हम सभ ४-५ गोटे भोजनपर सँ उठि गेलौं। तैपर आयोजनक लोकनिक आग्रह भेल जे हम सभ कमसँ कम जूसे पीब ली। मुदा बादमे ओकर भूगतान लऽ कऽ बिबाद भऽ गेल जे मुश्‍किलसँ समटल। असलमे शाकाहारी लोकनिकेँ सभटा कष्‍ट बुझा सिवाय भारतीय होटल सभमे। दोसर ठाम तँ शाकारीक सही माने घास-फूस बुझल जाइक। जँ अहाँ छाँति सकब तँ अहाँ जानी। जय हो, शाकाहारी बाबा...। भोजनक मामलामे सभसँ नीक बेवस्‍था सलोविनयामे छल। ओइठाम भोरक जलखै एवम्‍ रात्रिक भोजन गुजराती होटलसँ व्‍यवस्‍थित छल तँए अति रूचिकर छल। ओत्तौ दिनुका भोजनक हेतु चाइनीज भोजनालयक बेवस्‍था छल जेतए हमरा सन शाकाहारी प्राय: भूखले रहि जाइत छेलौं। ऐ आशामे जे रातिमे सभ सधा लेबइ। बाहर खाएब किंवा पानियोँ पीब बड़ महग रहइ। एकटा कौफीक हेतु तीन यूरोडालर यानी भारतक लगभग २७० रूपैआ होइत छल जे बड़ महग बुझाइत छल। जखन-कखनो कोनो बैसक वा सरकारी कार्यक्रम होइत छल तँ पानि, चाह, कौफी, बिस्‍कुटक बेवस्‍था तँ रहिते छल। नगर भ्रमणमे सेहो आयोजक द्वारा सीमित मात्रामे पानिक बन्‍द बोतल देल जाइक। ओइसँ बेसी पीब तँ कीनए पड़त। दाम-पुछू नहि। टके सेर भाजी, टके सेर खाजा। १२ अगस्‍त २००९क दुपहरियाक भोजनक बाद आइ.ए.ई.ए. (International Atomic Energy Agency) क निदेशक द्वारा भ्रमण छल। ओ भारतीय छला। ओइठाम नौकरीसँ पहिने भारतीय प्रशासकीय सेवाक अधिकारी रहैथ, आ तँए भारतीय परिस्‍थितिसँ पूर्ण अवगत रहैथ। ओ तरह-तरहसँ नाभिकीय ऊर्जाक रचनात्‍मक उपयोगक विषयपर अपन विचार रखैत ऐ बातपर जोड़ दैत रहैथ जे दुनियाँमे जइ प्रकारसँ ऊर्जाक प्रयोजन बढ़ि रहल अछि, तइमे नाभिकीय ऊर्जाक रचनात्‍मक प्रयोग अनिवार्य भऽ गेल अछि। तेतबे नहि, केतेको प्रकारक चिकित्‍सीय जाँच एवम्‍ उपचारमे सेहो एकर उपयोगिता महत्‍वपूर्ण अछि। भाषणक बाद प्रश्‍न पुछबाक परिपाटी छल जइसँ बढ़ियाँ बात ई छल जे यू.एन.ओ.क संस्‍थामे रहितेा ओ भारतीय हितक प्रति बहुत संवेदनशील रहैथ। आइ.ए.ई.ए.क मूल उद्देश्‍य शान्‍ति हेतु आराविक शक्‍तिक प्रयोग थिक। एकर स्‍थापना संयुक्‍त राष्‍ट्र संघक स्‍वायत्‍व संस्‍थाक रूपमे सन्‍ १९५७ ई.मे भेल। वियानाक दर्शनीय स्‍थान सभमे महत्‍वपूर्ण अछि, हसवर्ग साम्राज्‍यक राज महल...। १२७९ ई.सँ लगातार कोनो-ने-कोनो राजाक शासन केन्‍द्र रहल ई महल संप्रति आस्‍ट्रीयाक राष्‍ट्रपतिक सरकारी आवास अछि। ऐ महलमे नाना प्रकारक म्‍यूजियम केर अलावा आवासीय अपार्टमेन्‍ट सभ अछि। राजमहलक अन्‍दर सार्वजनिक पूजाक स्‍थान अछि जैठाम आम जनता आबि जा सकैत अछि। रबि दिन-के ओइठाम संगीत कार्यक्रम सेहो आयोजित कएल जाइत अछि। राजमहलक अन्‍दर सीसी म्‍यूजियम अछि जे ९ बजेसँ सायं ५.३० बजे तक आम जनता हेतु खुलल रहैत अछि। सीसी म्‍यूजियमक अन्‍दर ऑडियो टूरसँ बहुत रास जानकारी भेटैत अछि। महलक अन्‍दर पुरना खजाना एवम्‍ ओइमे राखल राजमुकुट ओ राजकीय वस्‍वा सभ दर्शनीय थिक। १३ अगस्‍त २००९ क आठ बजे हम सभ वियानासँ म्‍युनिख (जर्मनी) हेतु बस द्वारा प्रस्‍थान केलौं। लगभग पाँच म्‍युनिख स्‍थित भारतीय कांसुलेट जेनरलक कार्यालय पहुँचलौं। ओइपर फहराइ तिरंगा झण्‍डा फटकियेसँ देखा रहल छल। आपसी परिचयक बाद कांसुलेट जेनरल महोदय भारत-जर्मनीक आपसी सम्‍बन्‍ध एवम्‍ वर्तमान आर्थिक परिवेशमे तेकर महत्‍व एवम्‍ अनतर्राष्‍ट्रीय महत्‍वपर सारगर्भित भाषण देला। हुनकर कहब रहैन जे जर्मनी संगे भारतक पुरान सम्‍बन्‍ध रहल अछि। जर्मनीमे संस्‍कृत अध्‍ययन एवम्‍ अनुसन्‍धानक अति प्राचीन इतिहास रहल अछि। दुनू देशकेँ जनतांत्रिक शासन पद्धतिक अलावा सांस्‍कृतिक एवम्‍ नैतिक मूल्‍यमे अनुरुपता अछि। संगे ईहो कहल रहैन जे भारतीय द्वारा जर्मनीमे कएल गेल निवेशसँ तुलनात्‍मक दृष्‍टिये अधिकर तर जर्मनकेँ नौकरी भेटल अछि वनस्‍पति भारतमे जर्मन निवेश द्वारा कमतर भारतीयकेँ जीविका भेटल अछि। ओ अतिशय आग्रही एवं सरल सोभावक लोक छला। कार्यक्रमक बाद चाह-पान चलल आहमरा लोकनि होटलमे रात्रि विश्रामक हेतु चलि गेलौं। १३-१४ अगस्‍तक रात्रिमे हम सभ म्‍युनिखमे रहलौं। होटल आलोशान छल। लानगृहमे छोट-सँ-पैघ नापक तरह-तरहकेँ तोलिया राखल छल। कोठरीमे मिनीवार छल। पीबैबला घरेमे बैसल पीब सकैत छल, मुदा सबहक पाइ जायकाल चुकता करैक पड़ैत। भोरक जलखैक गुल्‍क नहि देबक रहइ। जलखैक जगह विशाल काय छल आ ओइमे जलखैक सामानक भरमार छल। जे खाउ, जेतेक खाउ। फल खाउ, फलक रस पीबू, अण्‍डा खाउ। ब्रेड सबहक तँ तेतेक किसिम रहै जेकर वर्णन कठिन अछि। म्‍युनिखक होटल सबहक साज-सज्‍जा वियानासँ बेहतर रहइ। चाहक विन्‍यास सभमे भारतीय दार्जलींगक चाहक पुड़िया सभ सेहो रहइ। लोक सभ सुन्‍दर नमगर ओ स्‍मार्ट छल। बड़का-बड़का मौल सभमे वस्‍तुक भरमार छल। जे चाही लिअ, मुदा दाम भारतसँ बेसिये रहइ। इलेक्‍ट्रॉनिक सामान सबहक भरमार रहइ, मुदा महग। तखन की लेल जाए? तरह-तरहक चॉकलेट सभ लेलक, सनेस हेतु। म्‍युनिखक वीयर हॉलमे हजारो आदमी एकठाम बैस कऽ दारू पीबैत अछि। हमर किछु सहयोगी सभ उत्‍सुकतावस ओकरा देखबाक हेतु रातिमे गेला मुदा लौटला पछाइत अफशोस करैत रहैथ जे बेकारे गेलौं। सम्‍पूर्ण वातारण दुर्गन्‍धसँ भरल छल। हम आ हमर रूमेट ओइ समयकेँ सुतमो उपयोग कऽ प्राय: बेहतर निर्णय लेने रही। म्‍युनिखमे सालमे एकबेर वार्षिक वीयर उत्‍सव अष्‍ट्रवरलस्‍ट होइत अछि। प्राय: सितम्‍बरक मध्‍यसँ शुरू भऽ अक्‍टुवरक प्रथम सप्‍ताह तक चलैत अछि। ऐमे दुनियाँ भरिसँ ६ करोड़सँ अधिक लोक भाग लइ छैथ। वावेरियन संस्‍कृतिक ई एकटा महत्‍वपूर्ण अंग अछि। ऐ उत्‍सवमे तरह-तरह केर खेल-धुप, नाना प्रकारक भोजनक अतिरिक्‍त मनोरंजनक अनेकानेक विकल्‍प सुलभ रहैत अछि। १४ अगस्‍त २००९ ई.क प्रात:काल ९.३० बजेसँ जर्मनीक चैम्‍बर ऑफ कामर्स एण्‍ड इन्‍डस्‍ट्री वयारियाक सभा गृहमे संस्‍थानक अध्‍यक्ष भाषण छल। उपरोक्‍त संस्‍थाकेँ जर्मनीक ३.३० कम्‍पनी सदस्‍य छल। पेरिसक सी.सी.आई.क आद ई अपना तरहक संस्‍थानमे दोसर स्‍थानपर छल। जर्मनीक एकीकरण एवं तेकर प्रभावक विषयमे ऐ बैसारमे विस्‍तारसँ चर्चा भेल। पच्‍छिमी जर्मनी अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध अछि। पू. जर्मनीक आर्थिक स्‍थिति तखनो खास्‍ता-हाल छल। तँए एकीकरणक बाद पच्‍छिमी जर्मनी दिसुका लोक सभ एकीकरणसँ अप्रसन्नता व्‍यक्‍त करैथ। जर्मनीकेँ म्‍युनिखमे घुमैत हमरा लोकनि ओलम्‍पिक खेलक स्‍थान देखलौं। म्‍युनिखक टेक्‍नीकल म्‍युजियम देखलौं। ओइमे विद्युत उत्‍पादनक व्‍यवहारिक वर्णन छल। अलग-अलग तलपर नाना प्रकारक वस्‍तु सभ प्रदर्शनीक हेतु राखल छल। वायुयान, रेल, जल-जहाज सहित अनेकानेक वस्‍तुक जर्मनीमे अविष्‍कार एवं प्रयोगक जानकारी लैत, देखैत चकविदरो लागि जाइत छल। निश्चय ओ सभ केतेको क्षेत्रमे हमरा सभसँ बहुत आगू छला। भऽ सकैए जे लोक यूरोपक प्रति अनेकानेक धारणासँ पूर्वाग्रहित हो, परन्‍तु हमरा केतौ रास्‍ता, होटल, चौबटियामे कोनो अभद्र नहि देखाएल। ओइ तुलनामे तँ दिल्‍ली किंवा आसपासक परिस्‍थिति अतिशय चिंताजनक अछि। ओइठामक लोक सभ कार्यक प्रति निष्‍ठावान एवं परिश्रमी छैथ। तेतबे नहि, व्‍यर्थक बिबादसँ सेहो कोनो मतलब नहि। ओतेक दिनमे मात्र एक दिन वियानामे पुलिसक जत्‍था देखबामे आएल जे कोनो प्रर्दशनकेँ नियंत्रित कए रहल छल। अपना सभ ओइठाम जकाँ यत्र-तत्र सर्वत्र पुलिसिया हुजुम किंवा सुरक्षाक तामझाम केतौ नहि देखबामे आएल। आस्‍ट्रीयाक प्रधानमंत्रीक घर तक अपरिचित लोक सभ बेरोक-टोकक चल जाइत छल। मंत्री सभ मेट्रोरेलसँ कार्यालय अबैत-जाइत छला। भोरे-भोर केतेको कार्यालयमे लोक भरल आ कार्यरत भऽ जाइत छला। साइकिल चला कऽ व्‍यायाम करब आम बात छल। साइकिलक हेतु सभठाम अलग रस्‍ता छल। सभसँ बेसी जे आकर्षक बात छल से ई जे लोक सभमे व्‍यर्थक अहंकार नहि छल। सरल एवं सहज रूपेँ लोक बेवहार करैत छल जेकर अनमान देखिए कऽ भऽ सकैत अछि। ओइ सभ शहरमे जनसंख्‍या कम अछि। तँए ओकरा व्‍यवस्‍थित करब किंवा ओकरा लेल बेवस्‍था करब अपेक्षाकृत असान अछि। मुख्‍य शहरकेँ जँ छोड़ि दी तँ बीचक रस्‍ता सभमे मुश्‍किलसँ लोक देखाइत। हँ! सप्‍ताहांतक दृष्‍टि अलग रहैत छल। शुकक रातिमे वास्‍तवमे माछी जकाँ लोक मन भनाइत रहै छल। शनिक भोरे लगैत जेना पूरा अवादी शहर छोड़ि कऽ केतौ भागि रहल अछि। कियो कारसँ,कियो मिनी बससँ, कियो कारमे ट्राली लटकौने लोकक हुजुम देखाइत छल। सप्‍ताहांत बिताएब हेतु कोनो झील, कोनो रमणीय स्‍थान वा कोनो दोसर शहर जा रहल छल। झीलक आसपास लोक पटोटैन देने रौद सोंखैत रहै छल। समुद्रमे अति तीव्र गतिसँ स्‍वचालित नाह सभसँ लोक सभ जल क्रीड़ा करैत देखाइत। ओकर वेग आ ओइमे सभ लोकक दुस्‍साहस प्रशंसनीय छल। गोराय लोक बड़ मोटाएल देखाइत छल, से देख दुख ओ आश्चर्य होइत छल, जे एतेक सम्‍पन्न परिवेश रहितो ई सभ शारीरिक रूपसँ अक्षम जकाँ रहबाक कारण केतेको सुखसँ वंचित हएत। यएह सभ देखैत-सुनैत हमरा सबहक समय निकैल जाइत छल। १५ अगस्‍तक स्‍वतंत्रता दिवस समारोहक अवसरपर हमरा लोकनि पुन: भारतीय कन्‍सुलेट जेनरलक ओइठाम पहुँचलौं, जैठाम झण्‍डोत्तोलन भेल आ भारतक राष्‍ट्रपति महोदयक संदेश पढ़ि कऽ सुनौल गेल। तद्दुपरान्‍त मिष्‍ठान भोजन भेल एवं आपसी गप सभ सेहो भेल। कार्यक्रमक समापनक बाद नगर भ्रमण करैत हम सभ सल्जवर्गक हेतु प्रस्‍थान केलौं। सल्‍जवर्ग आस्‍ट्रीयाक चारिम सभसँ पैघ शहर अछि। द्वितीय विश्वयुद्धक दौरान ७६०० घर घ्‍वस्‍त भऽ गेल ओ ५५० लोक मारल गेला। शहरक अधिकांश घर घ्‍वस्‍त भऽ गेल। द्वितीय विश्वयुद्धक बाद सल्‍जवर्ग सल्‍जवर्गराज्‍यक राजधानी बनल। विश्व प्रसिद्ध गायक मोजार्टक जन्‍म अही शहरमे भेल छल। २७ जनवरी २००६क मोजार्टक २५० मा जन्‍म समारोह धूम-धामसँ मनौल गेल छल। हम सभ मोजार्टक घर देखए गेलौं। ओइ घरकेँ अद्भुत रूपसँ सुरक्षित राखल गेल अछि। घरमे माजार्ट द्वारा प्रयुक्त किछु वाद्य यंत्र सभ लोकक दर्शनार्थ राखल अछि। मोजार्टक देहान्‍त मात्र ३५ वर्षक आयुमे भऽ गेल परन्‍तु एतबे कम समयमे ६०० सँ अधिक संगीतक रचना केला आ पाश्चात्‍य कलात्‍मक संगीतपर अमिट छाप छोड़ि गेला। १५ अगस्‍त २००९ क ८ बजे रातिमे थाकल, झमारल हमरा लोकनि लुवियाना आपस एलौं आ संस्‍थानक छात्रावासमे रात्रिक भोजन करि विश्राम केलौं। १६ अगस्‍त (२०१६)केँ भोरे सात बजे हम सभ बससँ बेनिस देखबाक हेतु विदा भेलौं। इटलीक पूर्वोत्तर भागमे ११७ छोट-छोट टापूसँ आच्‍छादित ‘बेनिस’शहर पूल द्वारा एक-दोसरसँ जोड़ल अछि। वेनिसक अवादी लगभग ५५ हजार छल। लुवियानासँ वेनिस जाइत काल १८ किलोमीटरक आवा-जाहीमे लगभग ३००० गुफा सभसँ जुजरए पड़ल। बीचमे बर्ड स्‍थान अछि जेतए द्वितीय विश्वयुद्धक दौरान ११५ सैनिककेँ गाड़ि देल गेल छल। असलमे द्वितीय विश्वयुद्ध ओइठामक लोकक मोनमे गड़ि गेल अछि। चाहे, अनचाहे लोक ओइ युद्धसँ जुड़ल घटनाक गप्‍प करए लगैत छल। दच्‍छिन दिस आल्‍प्‍स पहाड़ी क्षेत्र देखाइत छल। शहरमे प्रवेश हेतु बसकेँ ४०० यूरोडालर आ पार्किंग हेतु ४० यूरोडालर देबए पड़ल। रस्‍तामे मकई, जौ,अंगुरक जबरदस्‍त खेती देखलौं। जेतए तक दृष्‍टि जाइत, हरियर कंचन देखाइत। वेनिस शहर तँ जेना पानिमे डुबि रहल अछि। एक घरसँ दोसर घर जाइले पूलक सहारा लेमए पड़ैत। जेतए पूल नहि अछि ओतए नाहसँ लोक एकठामसँ दोसरठाम जाइत अछि। जेना अपना सबहक ओतए साइकिल रहैत अछि, तहिना ओइठाम लोक सभ नाह रखैत अछि। वेनिए-क कलात्‍मकता एवं शिल्‍पकारी अद्भुत अछि। आश्‍चर्य होइत अछि जे ई शहर पानिमे डुबि किएक ने जाइ छइ। मध्‍यकालीन समयमे वैनिस आर्थिक एवं सामुहिक प्रतिनिधिक केन्‍द्र छल। रेशम, मसाला एवं अनाजक प्रचुर मात्रामे व्‍यापार होइत छल। ९ वीं सँ १७वीं शताब्‍दी धरि वेनिस प्रथम अन्‍तर्राष्‍ट्रीय आर्थिक केन्‍द्र छल जइ कारणसँ ई शहर सदिखन आर्थिक रूपसँ समृद्ध रहल। तेरहम शबदीमे ऐठाम ३७ हजार नाविक ३००० जहाजकेँ चलबैत छला। वेनिस अपन स्‍वतंत्र अवधिक दौरान गणराज्‍य बनल रहल। हलाँकि बेनिसक लोक आमतौरपर रूढिवादी रोमन कैथेलिक रहए मुदा धार्मिक कट्टरता एवं पाखण्‍डक होतए चलन नहि रहए। १३४८ ई.मे प्‍लेग फैल गेल जइसँ भयंकर मृत्‍यु भेल। १५७५ सँ १५८४ क बीच फेर ई विमारी फैलल जइमे पचास हजार आदमी मारल गेल। १६३० ई.मे फेर प्‍लेग पसरल जइमे बेनिसक एक लाख पचास हजार आदमी मारल गेल। नेपोलियन बोनापार्ट संगे युद्धक बाद वेनिसक स्‍थितिमे कएक बेर उठा-पटक होइत रहल। वेनिसकेँ महल सभक नीव लकड़ीक बनल अछि। ई लकड़ी सभ सैकड़ो वर्षसँ पानिमे डुमल रहलाक बादो खरापनहि भेल अछि। वेनिसमे दुपहरक भोजन एकटा भारतीय भोजनालयमे छल। ओहूठाम पहुँचक हेतु हमरा सभकेँ नाहक मदैत लेबए पड़ल रहए। भोजनक पछाइत हमरा लोकनि जहाजमे बैस कऽ मुरानो, वुरानो एवं टार्सोका द्वीप घुमैले निकैल गेलौं। मुरानोमे शीशा बनेबाक पुरान परम्‍परा अछि। वुरानोमे रंग-विरंगीघर एवं हथकरघाक सामानक प्रचूरता बुझाएल। टार्सोका द्वीपपर ऐतिहासिक एवं कलात्‍क हमत्‍वक केतेको उदाहरणक संग अत्‍याधुनिकताक प्रभाव देखबामे आएल। जहाजपर बैसल अनगिनित संख्‍यामे लोककेँ जल-क्रीड़ा करैत देख, ओइठामक लोक सभकेँ जीबाक अन्‍दाज अद्भुत छल। ऐ प्रकार घुमि-फिर हम सभ एक बेर फेर ९ बजे रातिमे कवियाना स्‍थित संस्‍थानक छात्रा-वासमे रात्रि विश्रामक हेतु पहुँचलौं। एवम्‍ प्रकारेण वियाना, झुविख एवम्‍ वेनिस सहित आसपासक प्रमुख स्‍थान देख-सुनि लेलाक बाद १७ अगस्‍तसँ २१ अगस्‍त २००९ तक संस्‍थानमे सार्वजनिक महत्‍वक अनेकानेक विषय सभपर भाषण भेल। जइमे सम्‍बन्‍धित विषयक शीर्षस्‍थ विद्वान सभ भाग लेला। संगहि लुवियानाक नगरपालिका, ब्‍लेड झील एवम्‍ कुन्‍जक भ्रमण सेहो भेल। स्‍लोवेनियाँ स्‍थित विश्व वेपार केन्‍द्र सेहो देखबाक हेतु हमरा लोकनि गेलौं। २१ अगस्‍त २००९ क प्रशिक्षण कार्यक्रमक समाप्‍तिक संग सभ गोटेकेँ प्रमाण पत्र देल गेल। रातिमे संस्‍थानक डायरेक्‍टर जेनरल द्वारा विदाइ-भोज देल गेल। ओइमे संगीत (ऑकेस्‍ट्रा)क कार्यक्रम सेहो छल। किछु गोटे अपनो गीत गौलैन। अद्भुत महौल छल। केतेक हृदयसँ हमरा लोकनिक विदाइ भेल, तेकर वर्णन करब कठिन। २२ अगस्‍त २००९क शनि दिनक गप छी। संस्‍थानक क्रिया-कलाप संपन्न भऽ गेल छल। आपसी यात्रा २३ अगस्‍त २००९क छल। तँए ओइ दिनक उपयोग घुमबा किखामे भेल। हम सभ गोटे विश्‍व प्रसिद्ध पाल्‍टोजना गुफा घुमए गेलौं। जमीनक अन्‍दर बनल ई गुफाकेँ पैछला २०० सालक दौरान ३६ करोड़ लोक देख चूकल अछि। ऐ गुफाक यात्रामे डेढ़ घन्‍टा समय लगैत अछि। सुरंगमे बनल रस्‍ता, दीर्घा एवं हॉल सबहक श्रृखला देखैत बनैत छल। गुफाक अन्‍दर घुमबाक हेतु छोट सन रेलपर चढ़लौं जे छुक-छुक करैत हमरा सभकेँ गुफाक आरामसँ भ्रमण करा देलक। उपरोक्‍त भ्रमणक मार्गदर्शन विश्वक अनेकानेक भाषामे उपलब्‍ध छल। ओइ गुफाकेँ देखला, घुमलाक बाद जे मोनपर छाप पड़ल से अखनो अमिट अछि। कला एवम्‍ पुरषार्थक अद्भुत संगम अछि ओ गुफा..! २२ अगस्‍त २००९क भोरे हम सभ कवियाना हवाइ अड्डापर रही। ओइठाम वायुयानमे संवार भऽ पेरिक हेतु विदा भेलौं। रस्‍तामे सभ यात्रीकेँ जलखै देल गेल। घन्‍टा भरिक ई लघु यात्रा देखैत-देखैतमे बीत गेल। फेर हम सभ पेरिस हवाइ अड्डापर उतरलौं। वार-वार हिदायत देल गेल जे अपन समानक सावधानीसँ रक्षा कएल जाए कारण ओइठाम उचक्का सभ तुरंत समान गाएब कऽ दैत अछि। हवाइ अड्डासँ बाहर निकैलते हमरा लोकनिक बस तैयार रहए। सभ अपन-अपन समान रखलक आ बस द्वारा नगर भ्रमणपर विदा भेल। संगमे एकटा मार्गदर्शक सेहो छल जे जगह-जगह अबैबला प्रमुख-प्रमुख वस्‍तु आ स्‍थान सबहक परिचय करबैत रहल। फ्रांसक राजधानी पेरिसक ‘इफेल टावर’ विश्‍व प्रसिद्ध अछि। हमरा लोकनि ओइ टावरपर चढ़लौं आ बेरा-बेरी पेरिस शहरक विभिन्न भागक फोटो टावरपर सँ खिचलौं। टावरक ऊपर तक चढ़बाक हेतु लिप्‍टक बेवस्‍था छै किंवा पएरो सिढ़ीक माध्‍यमसँ ओइपर चढ़ि सकै छी। इलेल टावरक नाओं ओकर निर्माता अभियंताक नाओंपर पड़ल अछि। ११८७-८९ ई.क बीच निर्मित एक इलेल टावरक ऊँचाइ ३२४ मीटर अछि। ऐ टावरपर चढ़ि, घुमि हमरा लोकनिकेँ पेरिस शहरक विहंगम दृष्‍टि भेटल। अद्भुत शहर अछि, जइमे लगभग एक्के रंग ऊँचाइक महल सबहक भरमार अछि। इलेल टावरक निच्‍चाँमे कएटा भारतीय सभ छोट-मोट समान सभ बेचैत भेटला। परिसक सीन नदीपर ३७ टा पूल पेरिसमे अन्‍दर बनल अछि। ई नदी पेरिसक मुख्‍य वेपारीक जलमार्ग अछि। पेरिस शहरमे प्रयुक्त पानिक आधा भाग अही नदीसँ अबैत अछि। गर्मीक समयमे एतए यात्रीगण विश्राम कए अद्भुत आनन्‍दक अनुभव करै छैथ। हमर एकटा संगी साल भरि पेरिसमे रहल रहैथ, तैयो केतेको चीज नहि देख पाएल रहैथ। हम सभ तँ मुश्‍किलसँ बारह घन्‍टामे पेरिसकेँ देखए चलल रही। जाहिर छै, केतेक देख सकितौं। तथापि मोटा-मोटी प्रमुख स्‍थान सभ लग बस रोकैत छल आ हमरा लोकनिक गाइड यथा साध्‍य ओइ विषय वस्‍तुक इतिहास एवम्‍ वर्तमानसँ परिचित करबैत छला। नेपोलियनक घर सेहो हम सभ देखलौं जे आइ-काल्‍हि स्‍मारक भऽ गेल अछि। दिनमे भोजनक हेतु एकटा पाकिस्‍तानी भोजनालयमे बेवस्‍था छल, मोन छह-पाँच करैत रहए जे खाइ आकि नहि खाइ, मुदा भूख बहुत लागि गेल छल। अस्‍तु भोजनमे शामिल भेलौं। पूर्णत: भारतीय शाकाहारी एवम्‍ अति स्‍वादिष्‍ट भोजन कऽ मोनमे जे संतुष्‍टि भेल तेकर वर्णन नहि। भोजनोपरान्‍त हम सभ पुन: घुमए निकैल गेलौं। पेरिसक मेट्रो देखलौं। दुनियाँक सवोलम मेट्रोमे सँ एक पेरिस मेट्रो रेल मानल जाइत अछि। ३०० कि.मी. लम्‍बा ट्रैकपर करीब-करीब ३०० स्‍टेशनपर ई ठाढ़ होइत अछि। मेट्रोक अलावा बस, टैक्‍सी एवं नाह द्वारा शहरक यातायातक उत्तम प्रबन्‍ध होइत अछि। शहरमे किरायापर साइकिल देबाक सेहो बेवस्‍था अछि, जइले मामूली शुल्‍क लेल जाइत अछि। सायंकाल हमरा लोकनि आपस पेरिस हवाइ अड्डापर पहुँच गेल रही। ओइठाम सूर्यास्‍त आठ बजे तक नहि भेल रहए। तखने हम हवाइ जहाजपर अपन देशक हेतु उड़ि गेलौं। अकासमे लटकल सूर्य भगवानकेँ बड़ीकाल तक देखैत रहलौं...। अमृतसर यात्रा पंजावक पैघ शहरमे अमृतसरक गणना अछि। ऐठाम पहिने तुँग नामक गाम छल। सिखक चारिम गुरु रामदास १५७४ मे ७०० रूपैआमे तुँग गामक लोकसँ जमीन किनलैथ। ओइ साल गुरु रामदास ओतए घर बना कऽ रहए लगला। ओइ समयमे ओकरा ‘गुरु दा चक्क’ कहल जाइत छल। बादमे एकर नाम ‘चक्क राम दास’ भऽ गेल। अमृतसर पहिने ‘गुरुरामदासपुर’क नाओंसँ जानल जाइत अछि। पंजावक राजधानी चण्‍डीगढ़सँ ई २१७ किलोमीटर दूरीपर एवम्‍ लाहौरसँ मात्र ५० किलोमीटर दूरीपर अवस्‍थित अछि। भारत-पाकिस्‍तानक वाधा वोर्डर ऐठामसँ मात्र २८ किलोमीटर अछि। कहल जाइत अछि वाल्‍मिकी ऋृषिक आश्रम अमृतसरक रामतीर्थमे छल। लवकुश अश्वमेघ यज्ञक घोड़ाकेँ ओतइ पकैड़ लेने छला आ हनुमानकेँ एकटा गाछसँ बान्‍हि देने रहैथ। ओही स्‍थानपर दुर्गिआना मन्‍दिर बनल अछि। तेसर सिख गुरु अमरदास जीक परामर्शपर चारिम सिख गुरुरामदासजी अमृत सरोवरक खुनाइ प्रारम्‍भ केलाह। ऐमे चारूकात पजेबाक घाटक निर्माण पाँचम सिख गुरु अर्जन देवजी द्वारा १५ दिसम्‍बर १५८८ क पूरा कएल गेल। वएह हरमन्‍दर साहेबक निर्माण प्रारम्‍भ केलैथ। १६ अगस्‍त १६०४ क ओइमे गुरु ग्रन्‍थ साहेबक स्‍थापना भेल। सिख भक्‍त बाबा बुधाजी ओइ मन्‍दरक प्रथम पुजेगरी नियुक्‍त भेल रहैथ। हरर्मान्‍दर साहेबक निर्माणमे सर्व धर्म सभ भावक विशेष धियान राखल गेल। सिख धर्मक ऐ भावनाक अनुरुप गुरु अर्जन देव मुस्‍लिम सूफी सन्‍त हजरत मिआँ मीरकेँ ऐ मन्‍दिरक शिलान्‍यासक हेतु आमंत्रित केने छला। सन्‍ १७६४ ई.मे जस्‍सा सिंह अहलुवालिया आन-आन लोक सबहक सहयोगसँ एकर जीर्णोद्धार केलाह। उन्‍तीसमी शताब्‍दीमे महाराजा रणजीत सिंह ७५० किलोग्राम सोनासँ ऐ मन्‍दिरक ऊपरी भागकेँ पाटि देलाह जैपर एकर नाओं ‘स्‍वर्ण मन्‍दिर’ माने ‘गोल्‍डेन टेम्‍पल’ पड़ि गेल। हरमन्‍दि साहेबक स्‍वर्ण मन्‍दिरमे पएर रखैत गजब आनन्‍दक अनुभूति भेल। साफ-सुथरा चक-चक करैत परिसर। सुरम्‍य वातावरणमे भजन कीर्तनक संगीतमय मधुर ध्‍वनि। चारूकात पसरल सैंकड़ोक तादादमे सेवादारक जत्‍था सभकेँ देखैत बनैत छल। समूहमे जीव, सेवा करब ओ समन्‍व्‍य पूर्वक सबहक स्‍वागत करब, ऐ वस्‍तुक प्रत्‍यक्ष उदाहरण हरमन्‍दर साहिवमे भेटैत अछि। मन्‍दरमे प्रवेशसँ पूर्व जूता निकालब आ माथ झाँपब अनिवार्य अछि। माथ झाँपबाक हेतु मन्‍दिर प्रवन्‍धक केर तरफसँ वस्‍त्र देल जाइत अछि। विशाल तलाव स्‍वच्‍छ जलसँ भरल अछि। ऐ तालावक नाओं अमृत सरोवर अछि। सरोवरक चारूकात लोक परिभ्रमण करैत अछि। सरोवरसँ जुड़ल अछि हरमन्‍दिर साहेब। मन्‍दिरमे निरन्‍तर गुणवाणीक पाठ होइत रहैत अछि। चारूकातसँ मन्‍दिरक दरबाजा खूजल अछि। तात्‍पर्य जे ओइठाम सबहक स्‍वागत अछि। हरमन्‍दिर साहेबमे कोनो धर्मक लोक जा सकैत अछि। ऐ मामलामे ई अद्भुत अछि। ऐठाम निरन्‍तर लंगर चलैत रहैत अछि। अनुमानत: प्रति दिन एक लाखसँ तीन लाख लोक तककेँ मुफ्तमे लंगर खुआबक बेवस्‍था ऐठाम रहैत अछि। हरमन्‍दिर साहेब हम दू बेर गेल छी। एकबेर अधिकारीक प्रतिनिधि मण्‍डलक संग आ दोसर बेर श्रीमतीजीक संग। दुनू बेर नीकसँ दर्शन भेल। स्‍थानीय प्रशासनक सहयोग रहबाक कारण मन्‍दिरमे हमरा सभकेँ सरोपा देल गेल। सरोपा देबक माने बहुत इज्‍जत देब भेल। अमृतसरक प्रसिद्ध स्‍वर्ण मन्‍दिरक दर्शनक बाद हमरा लोकनि ओइठामसँ सटले जालियावाला बाग गेलौं। ओइ वागक इतिहास केकरो नहि बुझल छइ। ब्रिटिश साम्राज्‍यक भारतमे कएल गेल ई क्रुड़तम घटना अछि। १३ अप्रैल १९१९ क ब्रिटिस हुकुमतक विरोधमे स्‍वर उठाबक हेतु जमा भेल हजारो लोकपर १० मिनट धरि धुँआधार गेली चलौल गेल, जइमे एक हजार लोक मारल गेला आ १५ साए लोक घायल भेला। सरकारी आँकड़ामे मृतक एवम्‍ घायलक संख्‍या बहुत कम क्रमश: ३६९ एवम्‍ २०० मात्र देखौल गेल मुदा ओ कोनो हिसावसँ सही नहि लगैत अछि। गोली काण्‍डक बाद ओइ मैदानमे लाश उठौनिहार कियो नहि छल। सैकड़ो आदमी जान बँचेबाक हेतु ओइठाम स्‍थित एकटा इनारमे कुदि गेल। बादमे १२० टा लाश ओइ इनारसँ निकालल गेल। धुँआधार चलल गोली सबहक निशान अखनौं ओइठामक देवाल सभपर देखल जा सकैत अछि। ओइ दिन बारहे बजेसँ लोक सभ बैसारमे भाग लेबाक हेतु ओइ मैदानमे जमा होमए लागल छल। बहुत रास निर्दोस लोक उत्‍सुकतावश सेहो ओइठाम जमा भऽ गेल छल। मुदा केकरो ई अन्‍दाज नइ छेलै जे ब्रिटिश हुकुमत एतेक वर्वरतापूर्ण काज करत! मुदा से भेल। ब्रिटिश हुकुमतक खिलाफ केतेको प्रकारक दुर्घटनाक पछाइत राज्‍यमे मार्शल लॉ लागू छल। १३ अप्रैल १९१९ क भोरे ब्रिटिश हुकुमत घोषणा कए लोककेँ चेतौलक जे पाँच आदमीसँ बेसी लोकक एकठाम जमा होएब गैरकानूनी अछि। मुदा बहुत लोककेँ एकर जानकारी नहि भेलै आ जेकरा भेबो केलै से नहि सोचि सकल जे आदेशक उल्‍लंघनक एहेन विनासकारी हएत! स्‍थानीय फौजी एवम्‍ असैनिक अधिकारीकेँ जालियावाला बागमे जमा होइत भीड़क जानकारी १२ बजे भऽ चूकल छल। ओ सभ चाहैत तँ ओइ बैसारक शुरूए-मे विरोध कए सकैत छल, मुदा एकटा सुनिश्चित योजनाक तहत भीड़केँ जमा होमए देल गेल आ बिना कोनो पूर्व उद्घोषणाक भीड़पर अन्‍धाधून गोली चलेबाक आदेश जनरल द्वारा दए देल गेल। सभसँ दुखद तँ ई भेल जे गोलीक बौछारमे घायल लोक सभ तरपैत-तरपैत मरि गेल आ कियो ओकरा सभकेँ असपताल उठा कऽ नहि लऽ गेल। ऐ घटनाक अंजाम देनिहार जेनरल डायरेक्‍टरकेँ जखन हंटर कमीशन पुछलक जे ‘अहॉं घायल लोक सबहक इलाजक की बन्‍दोवस्‍त केलौं?’ तँ ओ निर्लज्‍ज भऽ कहलक जे अस्‍पताल सभ खूजल छल। सही स्‍थिति तँ ई छल जे बाहरमे कर्फ्यू लागल छल तँए कियो केतौ घुसकियो नहि सकैत छल। जनरल डायर उपरोक्‍त कमीशनक समक्ष स्‍वीकार केलक जे ओ सोचि-समैझ कऽ जालियावाला वागमे गोली चलबौलैथ। ओ चाहितैथ तँ डरा-धमका कऽ भीड़केँ भगा दितैथ, मुदा फेर ओ सभ एकत्र भऽ जाइत, आ ब्रिटिश हुकुमतक वर्चस्‍वपर हँसैत। एहेन वर्वर घटनाक चश्‍मदीद गवाह देबाल सभपर पड़ल गेली सबहक निशान अखनौं देखल जा सकैत अछि। हम सभ चारूकात देबाल सभपर पड़ल एहेन निशान सभकेँ सद्य: देखलौं गोलीक निशान सभकेँ चिन्‍हित कए देल गेल अछि। आ जइ इनारमे सैकड़ो आदमी कुदि गेला आ जानसँ हाथ धो लेलैथ, सेहो ‘शहीदी कुआँ’क नाओंसँ स्‍मारक भऽ गेल अछि। ऐ काण्‍डमे शहीद भेल सैकड़ो लोकक यादगारमे ओतए स्‍मारक बनल अछि जेकर उद्घाटन भारक प्रथम राष्‍ट्रपति स्‍व. डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद सन् १९६३ मे केलाह। अमृतसरक दर्शनीय स्‍थानमे दुर्गिआना मन्‍दिर प्रमुख स्‍थान रखैत अछि। मूलत: दुर्गामाताक मन्‍दिर हेबाक कारण एकर नाओं दुर्गियाना मन्‍दिर पड़ल मुदा ऐ मन्‍दिरमे आनो-आनो भगवान सबहक भव्‍य मूर्ति विराजित अछि। ई मन्‍दिर अपन भव्‍यता एवम्‍ अध्‍यात्‍मिक वातावरण हेतु सम्‍पूर्ण विश्वमे प्रसिद्ध अछि। देश-विदेशसँ हजारो तीर्थयात्री ऐठाम अबैत रहै छैथ। मन्‍दिर बहुत पुरान अछि। मूल मन्‍दिर सोलहम शताब्‍दीमे बनल छल। तेकर बाद सन्‍ १९२१ ई.मे स्‍थानीय लोकनिक मदैतसँ एकर जीर्णोद्धार कएल गेल। नव निर्मित मन्‍दिरक उद्घाटन सन्‍ १९२५ ई.मे पं. मदन मोहन मालवीय केने रहैथ। मन्‍दिरक द्वार थानीसँ बनल अछि। पूरा मन्‍दिर चारूकातसँ सिमटल अछि। मूख्‍यत: मन्‍दिरक प्रागणमे पहुँचबाक हेतु पूल बनौल गेल अछि। मन्‍दिरक बनाबट ओ साज-सज्‍जा स्‍वर्ण मन्‍दिरसँ मिलैत अछि। मन्‍दिरक प्रागणमे सीतामाता ओ हनुमानजीक मन्‍दिर अछि। सन्‍ २०१३ सँ मन्‍दिर एवम्‍ मन्‍दिरक आसपासक परिसरक जीर्णोद्धारक कार्यक्रम चलि रहल अछि जेकर पूर्णतापर मन्‍दिरक भव्‍यता ओ सौन्‍दर्य पराकाष्‍ठापर पहुँच जाएत। कहल जाइत अछि जे लवकुश हनुमानजीकेँ अहीठाम बान्‍हि देने रहैथ। अश्वमेध यज्ञक घोड़ाकेँ बान्‍हि देने रहैथ। लक्षमण, भरत, शत्रुध्‍न सभ एतइ पराजित भऽ गेल रहैथ। हुनका सभकेँ जीएबाक हेतु देवता सभ अमृत अनने रहैथ ओ शेष अमृतकेँ माटिमे गाड़ि देल गेल छल। जहूसँ ऐ शहरक नाओं अमृतसर पड़ल। हम सभ अमृतसरक प्रसिद्ध दुर्गिआना मन्‍दिरमे घन्‍टो घुमैत रहलौं। पूजा-पाठ केलौं ओ एकर भव्‍यताक आनन्‍द उठेलौं। पं. मदन मोहन मालवीयजीक बारम्‍बार धियान अबैत रहल जे ऐ मन्‍दिरकेँ वर्तमान स्‍वरुपक नायक रहैथ। घुमैत-घुमैत हम सभ थाकि गेल रही। रौद बहुत करगर रहइ। हमर श्रमतीजी सेहो बहुत थाकि गेल छेली। अस्‍तु हम सभ ओइठामसँ सोझे सीपीडब्‍ल्‍यूडी गेष्‍ट हाउस स्‍थित अपन डेरा पहुँच गेलौं। घर घुमैत काल रस्‍ता भरि सोचैत रहलौं जे एतेक भारी तीर्थ स्‍थानमे जालियावाला वाग सन क्रूड़, वर्वर, नरसंहार केना भेल? सही कहल जाइत अछि जे सत्ताक नशामे मनुख पिशाच भऽ जाइत अछि। ओकर मानवीय संवेदना नष्‍ट भऽ जाइ छइ। मनुख ओकरा लेल मात्र एकटा मशीन रहि जाइत अछि जे आदेशक पालन करैत-करैत अपनहि बन्‍धु-बान्‍धवक खूनक धार बहा सकैत अछि। जेना कि जालियावाला वागमे अंग्रेजी हुकुमत केलक। हिन्‍दू, मुसलमान, सिख आदि सभ धर्मक लोक लोकक खून एक भऽ गेल छल, जालियावाला वाग चिकैर-चिकैर कऽ कहि रहल छल- “ऐ अत्‍याचारी निकृष्‍ट अंग्रेजी हुकुमत, आब बर्दास्‍त जोग नहि रहल। आब आर जुलुम नहि सहल जाएत..!” जालियावाला वागक काण्‍ड सम्‍पूर्ण देशक आत्‍माकेँ झकझोरि देलक। एकर बदलामे उधम सिंह विलायत जा कऽ माइकल डायरक हत्‍या कऽ देलक आ स्‍वयं फाँसी चढ़ि गेल। दोसर दिन साँझमे हमरा लोकनि बाधा वोर्डरपर होमएबला झण्डा उतारबाक कार्यक्रम देखए गेलौं। ओइ कार्यक्रमक आकर्षण अमृतसर गेनिहार प्रत्‍येक पर्यटककेँ रहैत छइ। भारत ओ पाकिस्‍तानक सीमा सुरक्षा बलक जवान सभ नाना प्रकारक करतब करैत आगू-पाछू बढ़ैत रहै छैथ। कखनो टाँगकेँ धराम-दे आगाँ तँ कखनो हाथकेँ फरकबैत पाछाँ करैत ओ सभ एक-दोसरकेँ कखनेा सिनेह करैत तँ कखनो आक्रमण मुद्रामे आबि जाइ छैथ। अपना देशक लोक जेतेक बेर हिन्‍दूस्‍तान जिन्‍दावाद कहैत तेतेक बेर सटले सीमापर सँ ओइ देशक नारा सभ लगैत रहैत अछि। कुल मिला कऽ सम्‍पूर्ण वातावरण देश-भक्‍तिसँ भरल रहैत अछि। उत्तेजक ओ भावुक महौलक वावजूद सैनिक सभ संयत रहै छैथ आ क्रमश: अपन-अपन देशक झण्‍डा उतारि कऽ वधा बोर्डरक गेटकेँ बन्‍द कऽ लइ छैथ। विशेष अवसर जेना ईद, दिवाली आ दुनू देशक स्‍वतंत्रता दिवस आदिपर एक-दोसरकेँ मिठाइक डिब्‍बाक आदान-प्रदान सेहो होइत अछि। कुल मिला कऽ ई कार्यक्रम दुनू देशक नागरिकक वर्तमान परिस्‍थितिपर सोचबाक हेतु मजबूर कए दैत अछि। दुनू देशक लोक हजारोक तादादमे आमने-सामने बैसए आ शान्‍तिपूर्ण महौलमे मनोरंजक कार्यक्रम देखए से अपना-आपमे एकटा मिसाल अछि। भऽ सकैए एकर सकारात्‍मक प्रभाव दुनू देशक जनता ओ सरकारपर पड़इ। एवम्‍ प्रकारेण अमृतसरक संक्षिप्‍त प्रवासक अन्‍त भऽ रहल छल। हमरा लोकनि प्रात भेने अमृतसर दिल्‍ली शताब्‍दी एक्‍सप्रेस पकैड़ कऽ दिल्‍ली विदा भऽ गेल रही। सुविधा सम्‍पन्न द्रुतगामी ई गाड़ी जल्‍दीए घर पहुँच गेल आ हम सभ अपन यात्राक आनन्‍दक चर्च करैत केतेको दिन धरि आनन्‍दमे रहलौं। पहिल नौकरी दड़िभंगामे हम पाँच सालसँ किछु बेसीए दिन रहलौं। तीन साल तँ सी.एम.कौलेजमे पढ़ैत विद्यार्थी रही। ओइ समय विज्ञान, कला, वाणिज्‍य सभ संकाय मिला कऽ एक्के कौलेज छल। सी.एम.कौलेज-दड़िभंगासँ हम बी.एस-सी. (भौतिकी प्रतिष्‍ठा) पास केलौं। बी.एस-सी केला बाद आगू की करी ई समस्‍या छल। पीक्षाफल बिलमसँ एबाक कारणे एम.एस-सी.क नामांकन सेहो बन्‍द भऽ गेल रहइ। ओहुना ओइ समैमे पढ़ाइ-लिखाइक क्षेत्रमे सम्‍पूर्ण बिहारमे अराजकता छल। परीक्षामे नकल करब तथा नकल कराएब दुनू गौरवक गप छल। विद्यार्थी सबहक अभिभावक सभ पुर्जी पहुँचबैले जान लगौने रहैथ। ऐ परिस्‍थितिमे बिहारक तेतेक बदनामी भऽ गेल छल जे सहियो विद्यार्थीक योग्‍यतापर प्रश्‍न चिन्‍ह लागि जाइत छल। ओइ समयमे डाक-तार विभागमे दूरभाष निरीक्षकक पदक रिक्तिक विज्ञापन निकलल रहइ। हम मधुबनी पोस्‍ट ऑफिसमे आवेदन-पत्रक लेल एकटा आग्रह पोस्‍ट कार्डपर लिखि खसा देलिऐ। किछुए दिनमे आवेदन-पत्र प्राप्‍त भेल। आवेदन-पत्र प्राप्‍त होइते भरि कऽ आइ.एस-सी.क अंक-पत्रक संग पठा देलिऐ। आइ.एस-सी.क प्राप्‍तांकक आधारपर ओइ पदपर चयन हेबाक रहइ। हमरा आइ.एस-सी. परीक्षामे बहुत नीक प्राप्‍तांक छल। किछुए मासक बाद हमरा पटना टेलीफोन विभागसँ दूरभाष निरीक्षकक पदक हेतु नियुक्‍ति-पत्र भेटल। नियुक्‍ति-पत्र भेटलाक बाद असमंजसक स्‍थिति बनि गेल, कारण हम बहुत महात्‍वाकांक्षी रही। पैघ पदपर जेबाक इच्‍छा रहए, तइ हेतु तैयारीक कार्यक्रम छल, मुदा हाथमे आएल लक्ष्‍मीकेँ लात मारब नीक नहि, ई बात केतेको गोटे कहैथ। अछताइत-पछताइत ओइ नियुक्‍तिकेँ स्‍वीकार करैत अगस्‍त १९६३मे राँची प्रशिक्षण हेतु चल गेलौं। राँची टेलीफोन एक्‍सचेंजक भूतलपर प्रशिक्षणक बेवस्‍था छल। ओइ प्रशिक्षणमे कएटा नीक-नीक विद्यार्थी सभ छला। कए गोटा एम.एस-सी. सेहो केने रहैथ। सरकारी नौकरीक बात छेलइ। सभ आँखि मूनि कऽ पकैड़ लेलक। राँचीमे छह मासक प्रशिक्षणक बाद हमर तीन मासक बेवहारिक प्रशिक्षण-लहेरियासराय टेलीफोन एक्‍सचेंजमे भेल। ओइ क्रममे बलभद्रपुर, लहेरियासरायमे एकटा विद्यार्थीक संग डेरा रहए। एक दिन ओ विद्यार्थी गाम चलि गेला आ हमरा कोठरीक कुंजी नहि रहए। लातसँ तेतेक जोरसँ केबाड़मे धक्का मारलिऐ जे टुटि गेल। बादमे मकान मालिक नाराजगी व्‍यक्‍त केलाह, मुदा बात जेना-तेना शान्‍त भऽ गेल। ओइ प्रशिक्षणक दौरान फगुआमे हम गाम एलौं आ २-३ दिन फाजिल रहि गेलौं। फोन विभागमे झाजी इन्‍जीनियरिंगक सुपरवाइजर रहैथ। वएह हमर हाकिम छला। हमरा डराबए लगला। की जे प्रशिक्षण अधूरा रहि गेल, ब्रेक लागि गेल। मुदा असलमे किछु नहि भेल। हमर प्रशिक्षण समयसँ पूरा भेल आ हम जमशेदपुरमे ३ मई १९७४ क पदभार ग्रहण कएल। ओहीठाम एकटा आर संगी पदभार ग्रहण केलैथ। सरकारी काज करबाक हमरा किछु अनुभव नहि छल। एसडीओ फोन्‍स बड़ा करगर अधिकारी रहैथ। अपन डाँटसँ अधीनस्‍थ सबहक सीटीपीटी गुम केने रहैत छला। जमशेदपुर ओइ समयमे बिहारक सुव्‍यवस्‍थित एवम्‍ साफ-सुथरा शहरमे मानल जाइत छल। छुट्टीक दिन शहरमे केतौ-केतौ घुमबाक कार्यक्रम बरबैर बनबैत रही। साक्‍ची ओ विष्‍टुपुरमे तरह-तरहक दोकान सभ छेलइ। जुबली पार्कमे घुमब आनन्‍ददायी छल। ओइ पार्कमे टहलबसँ हम आनन्‍दक अनुभव करैत रही। एक दिन मौका पाबि कऽ हम टाटा स्‍टीलक अन्‍दरसँ देखबाक अवसर सेहो प्राप्‍त कएल। अति उच्‍च तापक्रमपर लोहाकेँ गला कऽ द्रव्‍य रूपेमे एकठाम-सँ-दोसरठाम जाइत देखलौं। भयानक रूपसँ लाल रहैत छल ओ तरल लोहा। हमर रूमेट सिगरेट पीबैत छला। शुरूक एक मास तँ कहुना कऽ हुनका संग बितौल मुदा आगाँ बहुत दिन धरि हुनका संग चलब सम्‍भव नहि बुझाएल। एक दिन हम हुनका स्‍पष्‍ट कहलिऐन जे या तँ अहाँ सिगरेट छोड़ू नहि तँ अहॉंकेँ हम छोड़ि अलग डेरा लऽ लेब। ओ सिगरेट नहि, छोड़ि सकला आ हम अलग डेरा लऽ लेलौं। जमशेदपुरमे रहैत केन्‍द्रीय सिभिल सर्भिसेजक (संघ लोक सेवा आयोगक) परीक्षा हेतु छुट्टीक काज छल। अधिकारीगण छुट्टी मना कऽ देला। अन्‍तमे हम बिना अनुमतियेक ओतए-सँ घसैक गेलौं आ करीब एक मासक बाद परीक्षा दऽ कऽ आपस एलौं। एसडीओ फोन्‍सकेँ मोटर साइकिलपर अबैत देखलयैन, हुनका देखते देबाल फानि कऽ एकटा दोकानपर बैस गेलौं। मोनमे तरह-तरह केर आशंका रहए। हम बाटे तकैत रही कि हुनकर बुलाबा आबि गेल आ तरह-तरह केर उपदेश ओ देलाह। एवम्‍-प्रकारेण लगभग आठ मास धरि ओतए नौकरी केलौं, पछाइत बाबूजीक प्रयाससँ हमर स्‍थानान्‍तरण जमशेदपुरसँ डीइटी दड़िभंगाक अधीन भऽ गेल। मुदा एसडीओ फोन्‍स कार्यमुक्‍त करैमे नाकर-नुकुर करैत छला। हम जल्‍दीसँ जल्‍दी दड़िभंगा आबि कार्यभार ग्रहण करए चाही। हमर सहकर्मीक सेहो स्‍थानान्‍तरण दड़िभंगे भेल रहैन। ओ पहिने कार्यमुक्‍त भऽ ओतए पहुँच गेल छला। हमरा लटकौने छेलैथ। प्रात:काल भोरे-भोर हम डीइटीक डेरापर पहुँचलौं। ओहीठाम लेखाधिकारी सेहो रहैत छला। हम हुनका सभटा बात कहलयैन। ओ बहुत सहृदय बेकती छला। हमरासँ पुछलैन जे आखिर अहाँक बदली केना भेल। तँ कहलयैन जे बाबूजी पटना जा कऽ किछु प्रयास केलैन जइसँ हमर स्‍थानान्‍तरण दड़िभंगा डिवीजन भेल अछि। हमरा दड़िभंगा जाएब बहुत जरूरी अछि। आदि-आदि। सभ बात सुनि ओ आश्वासन देला जे अहाँक आइ अबस्‍स कार्यमुक्‍ति कए देल जाएत। भेबो कएल सएह। कार्यालय खुजिते ओ एसडीओ फोन्‍सकेँ फोनपर आदेश देलखिन जइसँ ओ तिलमिला गेला। मुदा हमरा ओइ दिन ओइठामसँ कार्यमुक्‍त कए देल गेल। साँझमे बससँ दड़िभंगा विदा भेलौं। दड़िभंगा पहुँचलापर पता लागल जे दुइएटा जगह खाली छइ। एकटा जयनगरमे आ दोसर सुपौलमे। जयनगरक खाली पदपर हमर संगी अपन जोगार लगा लेलैन। आब रहि गेल सुपौल। कोनो दोसर उपाय नहि देख हम सुपौलक रस्‍ता पकड़लौं। सहरसा वोट सुपौल ट्रेनसँ जाएब ओइ समयमे बेस टेढ़ काज छल। तथापि ओतए पहुँच कार्यभार ग्रहण कएल। छोट-छीन टेलीफोन एक्‍सचेंज छल जइमे किछु ऑपरेटर, एकटा मेकेनिक पहिनेसँ कार्यरत छल। हम ओतए वरिष्‍ठतम बेकती छेलौं। सहरसामे उच्‍च अधिकारी बैसैत छला। फोन द्वारा तरह-तरह केर आदेश पठबैत रहै छेलखिन। सुपौल छोट-छीन नीक शहर बुझाएल। ओइठामक माड़वाड़ी बासाक उत्तम ओ स्‍वादिष्‍ट भोजनक स्‍मरण कए अखनो जीहमे पानि आबि जाइत अछि। ओइठाम रेलबे स्‍टेशनक ठीक सामने लाल कोठीक एकटा कोठरीमे हम आ पोस्‍टमास्‍टर डेरा लेने रही। पोस्‍ट मास्‍टर बहुत कर्मठ छला। भोरे जाथि तँ देर राति थाकल-झमारल अबैथ। हुनका संगे तेकर बाद हँसी-ठठा होइत छल। ओही डेरामे रहैत हमरा पोसुआ कुकुर काटि लेलक आ दोसरे दिन ओ कुकुर मरि गेल। आब तँ बड़ चिन्‍तामे पड़ि गेलौं। कुकुरक नमगर-नमगर चौदहटा सूई पेटक अँतरीमे लगबए पड़ल। एक दिन सुई लगबिते काल एकटा घटक आबि गेला। सूई लगबैत देख लेला से चिन्‍तामे पड़ि गेलौं। ओना, कोनो कारणसँ ओ कथा नहि पटल। किछु दिन बाद हमर ससुर अपन अनुज ओ एकटा आर बेकतीक संग विवाहक क्रममे हमरासँ गप करए टेलीफोन एक्‍सचेंज- सुपौल आएल रहैथ। हुनका सभकेँ यथासम्‍भव स्‍वागत कएल। विवाहक आहटसँ मोनमे प्रसन्नता छल। जे जे पुछला, सभ उत्तर देलिऐन। साँझमे हमर पितिया ससुर डेरापर सेहो एला। डेराक हालत तँ वर्णन जोग नहियेँ छल। ऊपरसँ हमरा गंजी मोइल छल से बात हमर ससुरकेँ पता लगलैन। ओ चिन्‍तामे पड़ि गेला, कारण ओ स्‍वयं साफ-सुथरा रहैत छला। सुपौलक दही आ पेरा बड़ नामी छल। अति स्‍वादिष्‍ट पेरा खेबाक स्‍मरण होइते अखनौं मुँहमे पानि आबि जाइत अछि। किछु दिनक बाद हमर स्‍थानान्‍तरण सुपौलसँ दड़िभंगा डीइटी ऑफिसमे पीआइक पदपर भऽ गेल। ३ जून १९७४ क हम डीइटी दड़िभंगाक कार्यालयमे पदभार ग्रहण कए जखन गाम पहुँचलौं तँ दरबज्‍जापर अलगे प्रकारक गहमा-गहमी पसरल छल। हमर संगी एवम्‍ मित्र- लाल बच्‍चा (स्‍व. प्रो. विष्‍णु कान्‍त मिश्र) कहला जे हमर बिआह ठीक भऽ गेल अछि। क्रमश: सभटा जानकारी भेटल। प्रात भेने माने ४ जून १९७५ केँ हमर बिआह छल। कोनो जानकारी नहि हेबाक कारण हम ओही दिन कार्यालय जा एकाएक विवाहक हेतु छुट्टीक आवेदन देलिऐ आ तखन रातिमे आठ बजे दड़िभंगासँ गाम एलौं...। कार्यालयमे ई समाचार बिजलौका जकाँ पसैर गेल। चारूकातसँ वधाइ दैत सहकर्मी लोकनि हमर आनन्‍दकेँ कएक गुना बढ़ा देला। गाम पहुँचते विवाहक तैयारीमे लागि गेलौं। गाड़ी सभ लागल छल। बिरयाती तैयार छल आ बरक प्रतीक्षा छल। बरकेँ अबिते धराधर विध सभ पूरा कएल गेल। हमर पितिया ससुर हथधरीक हेतु आएल रहैथ। ओ बिच्‍चे दरबज्‍जापर धोती-कुर्ता पहिरने हमर प्रतीक्षामे बैसल रहैथ। आर-आर लोक सभ दरबज्‍जापर मुस्‍तैद छला। हमर मित्रगण सभ सेहो मौजूद छल। हथधरी भेल। बरियाती सभ चटपट गाड़ीमे बैसल। कुल १९ गोट बरियाती छल जे ओइ समयक हिसाबे बेसीए छल। नहि तँ पहिने पाँचटा-सातटा बरियाती पर्याप्‍त होइत छेलइ। बरियातीक संख्‍या लऽ कऽ जे अपना समाजमे रेबाज बदलल अछि से दुर्भाग्‍यपूर्ण, कारण सैकड़ोक तादादमे गाम-गामसँ बरियातीकेँ लादि कऽ कन्‍याक पिताक माथपर पटैक देब कोनो वुद्धिमानी नहि कहल जा सकैत अछि। व्‍यर्थक परेशानीक अलाबा आर्थिक क्षति सेहो होइत अछि, जेकर कोनो केकरो लाभ नहि। ..ओइ समयमे सीमित संख्‍यामे बरियाती जाइत छल तँ ओकर शोभे अलग रहै छेलइ। एक-एक बेकतीपर पर्याप्‍त धियान देल जाइत छल। बरियाती सबहक बेकतीगत परिचय होइत छल। आब तँ ढाकक ढाक बरियाती जाइ छैथ आ दुपहरिये-रातियेमे खुआ-पिआ कऽ विदा कए देल जाइत छैन। हमरा लोकनि दस बज रातिमे पण्‍डौल डीह टोल पहुँचलौं। गीत-नादक मनोरम वातावरणमे विवाहक प्रक्रिया सम्‍पन्न भेल। ऐसँ जीवन संगिनीक रूपमे आशा मिश्र भेटली जे ओइ समयमे मात्र १७ बर्खक छेली आ हमर उमेर २२ बर्ख छल। अद्यतन हमरा जिनगीमे ओ संगे सुख-दुखक सहभागी छैथ जइसँ हम नाना प्रकारक झंझावातसँ उवैर जीवनक ऐ पड़ावपर ठाढ़ छी। लगभग दस दिनक अवकाश समाप्‍तिपर छल। विवाहोपरान्‍त हम गाम आएल रही। माय केतेक प्रसन्न भेल रहैथ तेकर वर्णन करब असम्‍भव अछि। हमर पितिआइन सभ सेहो उत्‍सुकतावश कनियाँ ओ ओकर परिवारक विषयमे पुछैत रहली...। प्रात भेने कार्यालय गेलौं तँ सभ कियो हमरा उत्‍सुकतासँ हाल-चाल पुछैत, फाटो सभ देखैथ। ऐ तरहेँ केतेको दिन बीति गेल। एक दिन कार्यालयसँ झटैक कऽ दड़िभंगा बस स्‍टेण्‍डपर बस पकड़ए जाइत रही कि पाछूसँ अबाज सुनबामे आएल- “मिसरजी! सासुर जा रहल छी की?” डेगक गतिक अनुमान कए ओ हमर सासुरक यात्राक अन्‍दाज लगा लेला जे एकदम सही छल। दड़िभंगा कार्यालय लगमे रहबाक कारण ओइठामसँ पण्‍डौल जाएब असान रहै छल। छुट्टी नहि लेबए पड़ैत छल। डीइटी दड़िभंगा कार्यालयमे हम करीब दू साल काज केलौं। काज तँ कोनो खास नहि छल। पुरान टेलीफोनक बकाया असूली करक रहै छेलइ। जइ लेल हमरा लगभग पूरा उत्तर बिहार मुफ्त भ्रमण करबाक हेतु पास भेटल छल। ओना, ओइ पासक उपयोग कियो आन करैत छल आ हम अपन समय अपन समय प्रतियोगिता परीक्षा सबहक तैयारीमे लगबैत छेलौं। पढ़ाइ-लिखाइ कखनो व्‍यर्थ नहि जाइत छइ। सन्‍ १९९७ क केन्‍द्रीय सचिवालय सेवा हेतु आयोजित संघ लोक सेवा आयोगक एसीसटेन्‍ट ग्रेडक परीक्षा हम पहिले प्रयासमे पास कऽ लेलौं। किछु दिनमे नियुक्‍ति-पत्र सेहो आबि गेल। नियुक्‍ति-पत्र हाथमे अबिते मनमे उठल- कार्यालय, काज, स्‍थान सभ परिवर्तन भऽ जाएत। ई सोचि मोन आगू-पाछू करए लागल। अन्‍ततोगत्‍वा निर्णय कएल जे दिल्‍लीए जेबाक चाही। ओइठाम अपना तँ जे हएत से हएत मुदा बच्‍चा सभकेँ पढ़ै-लिखैक बेहतर अवसर भेटत। आदि-आदि। सोच-विचारक बाद हम दड़िभंगाक दूरभाष निरीक्षकक पद छोड़ि दिल्ली स्‍थित केन्‍द्रीय सचिवालय सेवाक सहायकक पदभार ग्रहण करबाक निर्णय कएल। ई निर्णय केतेक सही रहल, केतेक नहि तेकर विचार-विमर्शक आब समय नहि रहल। जे भेल से नीके भेल। गते न सोचामि कृतं न मन्‍येत। सही कहल गेल अछि जे विवाह भावी जीवनक दिशा दसा तय करैत अछि। यद्यपि हमरा लोकनिक विवाह अभिभावक गण तय केने रहैथ, मुदा हम आब निश्चय कहि सकैत छी जे ओ सभ बहुत वुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय केने छला। जीवन भरिमे हर समय हमर श्रीमती हमर संगे नहि देलैन अपितु जीवन मार्गकेँ अपेक्षाकृत सुगम सेहो करैत रहली। हुनकर रचनात्‍मक सोच एवम्‍ शान्‍त मस्‍तिष्‍कक लाभ हमरा भरपूर भेटैत रहल अछि। आ से घरोमे आ ऑफिसोमे। केतेको जटिल समस्‍या सभपर हुनकर राय बहुत कारगर होइत रहल अछि। बहुत सन्‍तोष पूर्वक सीमित आमदनीमे इमनदारीपूर्ण जिनगी केना जीबी तेकर ओ उदाहरण छैथ। हमर सासुर पण्‍डौल डीह टोल रेलबे लाइनसँ थोड़बे दूरपर अछि। घरे बैसल अबैत-जाइत ट्रेन देखाइत रहैत अछि। जखन हम सभ दिल्‍लीसँ पण्‍डौल आबी तँ रेलक आगमनक सूचना घरे बैसल हमर सासुरमे भेट जाइक। भवानीपुरक महादेव मन्‍दिर सामने देखाइत रहैत अछि। केतेको गोटे नियमित भवानीपुर जाइत रहै छैथ आ महादेवक जलढरी करै छैथ, घुमै-फिरै छैथ। असलमे गाम-घरमे लोकक जीबाक अन्‍दाज अखनो अध्‍यात्‍मिकतासँ जुड़ल अछि। कोनो-ने-कोनो रूपे लोक उपवास, पूजा-पाठमे लगले रहै छैथ। शिवरातिकेँ भवानीपुरमे जबरदस्‍त मेला लगैत अछि। स्‍थानीय आकाशवाणीसँ सद्य: प्रशारण सेहो होइत अछि। पण्‍डौल डीह बहुत ऊँचमे बसल अछि। टोलक सामनेक जमीन सेहो घराड़ीमे उपयोग कएल जा सकैत अछि। एहेन अइल-फइल ओ ऊँच घराड़ी मिथिाक कम गाममे देखल जाइत अछि। पण्‍डौलमे आदम-जमानासँ रेलबे टीशन अछि। मुदा रेलबे टीशनसँ डीहटोल एबामे बहुत समय ओ संघर्ष रहैत अछि। पण्‍डौल बजार केतेक पुरान अछि से कहब कठिन। आवश्‍यकताक सभ वस्‍तु ओतए भेट जाइत अछि। उत्तम कोटिक धोती ओइ बजारसँ आनि हम वर्षोसँ पहिरैत छी। पण्‍डौल डीह ओ भवानीपुरक बीचक एकपेरिया रस्‍तामे डरसामा डीह अबैत अछि। कहल जाइत अछि जे पाण्‍डव गुप्‍त बासमे ऐठाम रहल रहैथ। निश्चित रूपसँ कहल जा सकैत अछि जे मनुखक जीवनमे विवाह एकटा निर्णायक बिन्‍दु होइत अछि। आइ-काल्‍हि तँ तरह-तरह केर लोक परिचय आ की की मिलान करैत अछि, तथापि विवाह विच्‍छेदक संख्‍यामे निरन्‍तर बढ़ोत्तरी भऽ रहल अछि। हम तँ किछु नहि देखलिऐ, मात्र कन्‍याँक एकटा छोट-छीन फोटो हमरा सासुरसँ आएल छल, ओहो विवाह तय भेलाक बाद। ई नहि कहल जा सकैत अछि जे आधुनिकतासँ प्रभावित वर्तमान विवाह सम्‍बन्‍धमे सभ किछु गड़बड़ीए अछि, मुदा ई बात तँ तय अछि जे केहनो नीक-सँ-नीक विवाहकेँ सफलतापूर्वक आगू चलेबाक हेतु दुनू पक्षकेँ समझदारी आ समझौता जरूरी अछि, अन्‍यथा संकट उत्‍पन्न हएब भारी बात नहि। हमर ससुर (स्‍व. गणेश झा) ऐ बातसँ चिन्‍तित भऽ गेल रहैथ जे हम दड़िभंगाक नौकरी छोड़ि कए दिल्‍ली जा रहल छी मुदा किछुए दिनक बाद हम परिवारकेँ संगे लऽ अनलौं। जइसँ हुनका अतिशय प्रसन्नता भेलैन। हमर गाम अड़ेर डीह। अड़रे डीह चौदह टोलक गाम अछि। पहिने एक्के पंचायतमे सभटा टोल छल। अड़ेर पुवाहि टोल, अड़ेर डीह टोल, विष्‍णुपुर, जमुआरी होइत विचरवाना तक एक्के पंचायत छल- अड़ेर। ओकर मुखिया बहुत दिन तक स्‍व. मार्कण्‍डेय भण्‍डारी छला। आ हमर पिताजी सरपंच रहैथ। ओइ समय ग्राम पंचायतकेँ आइ-काल्‍हि जकाँ अधिकार नइ रहै तथापि मुखिया-सरपंचक नाम तँ पंचायतमे विख्‍यात भाइए जाइत छल। पंचायतक चुनाव ओहू समयमे गहमा-गहमीसँ भरल होइत छल। हम सभ स्‍कूलमे पढ़ैत रही तँ चुनाव भेल रहइ। स्‍व. मार्कण्‍डेय भण्‍डारीजी मुखियाक चुनाव जीतल रहैथ। सप्‍पत ग्रहण समारोहक क्रममे आयोजित उत्‍सवक प्रसंग अखनो मनसँ मेटाएल नहि। ई मोन बड़ा विचित्र चीज अछि किने। कहि नहि एकर कन्‍तोरमे केतेक खल होइत छै जे तरह-तरह केर गप-सप्‍प सालो-साल चौपेतल रहैत अछि। ओइ समयमे स्‍व. मार्कण्‍डेय भण्‍डारीजीक इलाकामे फूक चलैत छल। अड़ेरक सिनुआरा टोलमे हुनकर घर अछि। सभ तरहेँ सम्‍पन्नताक संग समाजिक मान-सम्‍मान हुनका भरपूर भेटल छेलैन। साँझकेँ जे अड़ेरक सड़कपर दल-बलक संगे हुनका टहलैत देखिऐन। ओह..! अड़ेर डीह टोल माने हमर गामक इतिहास बहुत परान लगैत अछि। गाममे आब जनसंख्‍याक अनुपातमे आवासीय जमीन सीमित अछि। तँए घरेपर घरक दृश्‍य अछि। लोक सभ अगल-बगलमे घर बना रहल छैथ। कलममे सेहो बास भऽ गेल अछि। सभसँ चमत्‍कारी विकास तँ चौकक आसपास भेल अछि। चौकक कातेकाते करीब-करीब दू साए दोकान खुजि गेल अछि। तरह-तरह केर थौक आपूर्ति करएबला दोकान सभ सेहो खुजि गेल अछि। असलमे अड़ेर चौकसँ चारूकात रोड बनि गेल अछि। तँए इलाकाक लोक क्रय-बिक्रयक लेल ओइठाम पहुँचै छैथ। अड़ेरमे स्‍टेट बैंक ऑफ इण्‍डियाक शाखा अछि, ओकरे एटीएम सेहो अछि। थाना अछि, पोस्‍ट ऑफिस अछि, सरकारी डिसपेंसरी अछि। प्राइमरी स्‍कूल, मिडिल स्‍कूल तथा हाइ सकूल अछि। संगे एकटा संस्‍कृत विद्यालय सेहो अछि जेतए सुनै छी जे विद्यार्थी सभ नदारदर छैथ मुदा सार्टिफिकेट भेट जाइत छैन। गाममे तीनटा पोखैर कहि नहि कहियासँ अछि। ओकर अतिरिक्‍त गामक बाहर नवका पोखैर, कुट्टी लगक पोखै सेहो अछि। गामक बीचमे पोखैर हेबाक कारण बासक जगहक दिक्कत छइ। हम सभ जखन बच्‍चा रही तँ गाममे हाइ स्‍कूल नहि रहइ। गामक विद्यार्थी सभ पढ़बाक हेतु एकतारा, लोहा वा रहिका जाइत रहैथ। एकाघ-टा विद्यार्थी मधुबनी किंवा बेनीपट्टी सेहो जाइत छला। कहल जाइत अछि जे एकबेर अंग्रेज सभ गामक बाटे जाइत काल पहलमान सभकेँ सौरो करैत जे देखलकै आ ठिठैक गेल। पुछलकै जे ई सभ डकैत छिऐ की? तँ कियो कहलकै जे नहि सरकार! ई सभ पहलमान छैथ, सुखी सम्‍पन्न छैथ आ खेती-बारी करि कऽ प्रतिष्‍ठा पूर्वक जीबैत छैथ। अड़ेरमे कमला नदीसँ जोड़ल नाला अछि जइमे पानि तखने अबैत अछि, जखन कि कमलामे बाढ़ि आबि जाइत अछि। कृषि काजमे ऐ नालाक योगदान नगण्य अछि। स्‍थानीय किसान सभ भगवानक कृपापर निर्भर छैथ। चिकित्‍साक मामलामे हमर गाम पिछड़ल अछि। केतौ-केतौसँ इलाज-बात होइए। पहिने दड़िभंगामे इलाजक नीक बेवस्‍था छल। पैसा खर्च केलापर लोककेँ औरुदा रहलापर जान बँचि जाइत छल, मुदा आब तँ भगवाने मालिक। बेमरी किछु, इलाज कथुक। हमर एकटा परिचितकेँ तेतेक करगर एन्‍टीवायोटिक देल गेल जे हुनकर दुनू किडनी फेल भऽ गेलैन। आब डयलिसिस करा कऽ कहुना जीबि रहला अछि। जेतेक दिन ससैर जाइथ। हमर गामक ब्रह्मस्‍थानमे सालमे एकबेर नवाह अबस्‍स होइत अछि। ओइठाम युवक सभ भव्‍य मन्‍दिरक निर्माण केलैथ। पहिने काली पूजामे मूर्तिक स्‍थापना होइत छल जे पूजाक बाद भँसा देल जाइत छल। आब होइठाम स्‍थायी रूपसँ माँ कालीक भव्‍य मूर्ति स्‍थापित भऽ चूकल छैथ। सालमे दियावातीक रातिमे भव्‍य आयोजन होइत अछि जइमे अड़ेर चौकसँ काली मन्‍दिर धरि नाना प्रकारक बल्‍ब सभ जगमग करैत रहैत अछि। काली पूजामे नाच-गानक अतिरिक्‍त तरह-तरह केर मनोरंजनक बेवस्‍था रहैत अछि। पहने हमरा गाममे काली पूजाक रेबाज नहि छल। लगभग ४५ सालपूर्व किछु युवक सभ एकरा प्रारम्‍भ केलैन जे तखनसँ एकटा परिपाटी भऽ गेल अछि। काली मन्‍दिरमे माइकसँ लगातार घोषणा होइत रहैत अछि जे फल्‍लाँ ठामसँ नाच-गान करए-बला/करए-वाली आएल छैथ, अबस्‍स देखब...। आदि-आदि। सुनबमे आएल जे परुकाँ आयोजनक क्रममे किछु झंझट भऽ गेल। पता नहि, आगाँ ऐ क्रार्यक्रमक की रूपरेखा रहत। अड़ेर बहुत साविक गाम अछि। मधुबनीसँ बेनीपट्टी जेबाक क्रममे ई गाम अबैत अछि। कहियासँ ई पक्का रोड बनल अछि से पता नहि। आब ओही रोडकेँ थोड़ेक चौड़गर सेहो कऽ देल गेल अछि। सीतामढ़ीक हेतु दड़िभंगा-पटनासँ जाइबला बस सभ हमरे गाम दऽ कऽ जाइत-अबैत अछि। कुल मिला कऽ देखल जाए तँ हमर गाम छोट-छीन शहरक रूप धऽ नेने अछि। गाममे पढ़ल-लिखल लोकक कमी नहि, देशमे सर्वत्र हमरा गामक लोक भेट जेता। दिल्‍ली ओ मुम्‍बइमे तँ भरल छैथ। एकर माने गामक जनसंख्‍यामे कमी आबि गेल सेहो बात नहि आखिर मिथिलाक भूमि थिक किने। हमरा लोकनि सोदरपुरिये मनिक मूलकक साण्‍डिल्‍य गोत्रीय मैथिली व्राह्मण छी। ७ पुस्‍त पूर्वसँ हमरा लोकनिक पूर्वजक विवाह अड़रे डीह गाममे भेलैन आ हुनका ससुर गामेमे बसा देलखिन। पर्याप्‍त जमीन-जत्‍था देलखिन। क्रमश: ओ सभ उद्यमसँ प्रचूर धन-सम्‍पैत अर्जित कए इलाकाक प्रतिष्‍ठित धनीकमे मानल जाइत छला। क्रमश: परिवारक विकास हेइत गेल। जनसंख्‍या बढ़ैत गेल आ ओही क्रममे परिवारिक सिरफुटौऐल सेहो बढ़ल। हम बच्‍चा रही तँ कए बेर कएक गोटाक आपसी मारि-पीटिमे कपार फुटैत देखिऐन। मोकदमावाजी तँ चलबे कएल। हमरा सबहक परबाबा तीन भाँइ रहैथ। गुमनी मिश्र, माना मिश्र ओ तुफानी मिश्र। माना मिश्रक पुत्र स्‍व. कमर मिश्र संस्‍कृतक प्रकाण्‍ड विद्वान छला। सुनैमे अबैत अछि जे दड़िभंगा महाराज हुनका अपन राज पण्‍डित बनबाक आग्रह केलखिन जे ओ अस्‍वीकार कऽ देलाह। ओ स्‍वयं एकटा पाठशाला चलबैत रहैथ। ओइ पाठशालामे सैकड़ो विद्यार्थीकेँ नि:शुल्‍क भोजन आ आवासक संग विद्या दान देल जाइत छल। हुनकासँ पढ़ल सैकड़ो विद्यार्थी मिथिलांचलमे हुनकर गुणगान करैत छला। ओइ समयमे अड़ेरमे नामी पहलमान भेल रहैथ स्‍व. बच्‍चा झा। हुनकर शक्‍तिसँ दड़िभंगा महाराज प्रभावित रहैथ। सुनबामे आएल जे ओ लोहाक हथकड़ीकेँ जोर लगा कए तोरि देने छला। हमरा गाममे पूर्वकालमे मूलत: कृषि आधारित लोक छला। अधिकांश लोककेँ जमीन-जत्‍था रहइ। गाम खुशहाल छल। दुपहरियाक समयमे बरबैर अल्‍हा-रूदलक गीतमय कविता पाठक आयोजन ढोलकक तालपर होइते रहै छल। ऐ तरहक आयोजन आम छल। मुदा आब समय-साल बदलल अछि। शिक्षा दिस लोकक रूझान बढ़ल अछि। लोक अपन छोट-छोट बच्‍चाकेँ पढ़ाइक लेल मधुबनी पठा रहल छैथ। पब्‍लिक स्‍कूलक चला-चलती बढ़ल अछि। शिक्षा ओ चिकित्‍साक समस्‍या हमरे गाम तक सीमित नहि अछि। ओ तँ पूरा बिहारक समस्‍या अछिए। तथापि लोक प्रयासरत अछि। आशा अछि, कालान्‍तरमे हमरो गाममे चिकित्‍साक बेहतर बेवस्‍था भऽ सकत जइसँ स्‍थानीय लोककेँ पटना/दिल्‍ली नहि दौड़ए पड़तैन। गाममे आब धनीक लोकक भरमार भऽ गेल अछि। केतेको बेकतीकेँ आर्थिक विकास बहुत भेल। गाममे जबार हएब आम बात भऽ गेल अछि। गाम लऽ कऽ भोज तँ होइते रहैत अछि। लोक सभ कहैत रहै छैथ जे ओ सभ भोज खाइत-खाइत तंग भऽ गेल छैथ। केतेको गोटाकेँ ब्‍लड-सूगर बढ़ि जाइत छैन। रसगुल्‍ला-छेनाक बिना तँ कोनो भोज होइते ने अछि। पुरना जमानामे किलोक किलो भोजन चट केनिहार लोक सबहक खिस्‍सा सुनैत रहै छेलौं मुदा आइयो-काल्‍हि एहेन एकाध बेकती हमरा गाममे मौजूद छैथ। जँ अपनेकेँ धैर्य जवाब नहि दऽ दिए तँ हुनकर भोजनक क्रममे कदमताल देख सकैत छी। हुनका द्वारा खएल गेल रसगुल्‍लाक गिनतीक हेतु जन लगबए पड़ि सकैत अछि। भोजनोपरान्‍त लदबद चलैत अपन घर आपस जाइत हुनका देख छगुन्‍तामे पड़ि जाएब। आखिर ओ केना जीब रहल छैथ? आश्चर्य..! एतेक भोज होइत रहैत अछि, मुदा सभजाना भोजमे अखनो स्‍त्रीगणकेँ शामिल नहि कएल जाइत अछि। जँ बेवस्‍थापक नीक छैथ तँ घरे-घर खएक (पारस) पहुँचा दइ छथिन, मुदा ओहो दुपहर रातिमे जखन कि कियो स्‍त्रीगण भोजनक वस्‍तु प्रतीक्षा मजबुरियेमे कए सकैत अछि। हम गाहे-वगाहे ऐ बेवस्‍थामे सुधारक चर्च करै छी, मुदा ग्रामीण बेवस्‍थामे सुधारक गुनाजाइश सहज नहि होइत अछि। देखै छी, आगाँ की होइत अछि। हमरा गाममे हाइ स्‍कूलक स्‍थापना हेतु इलाकाक गणमान्‍य लोक सभ प्रयास केलाह। ओइमे हमर बाबूजी सेहो अत्‍यन्‍त सक्रिय रहैथ। स्‍व. बच्‍चा झाक परिवारक लोक बहुत रास योगदान देलैथ। स्‍थानीय लोक सभ सेहो योगदान केलखिन जइसँ हाइ स्‍कूलक नाओं- ‘बच्‍चा झा जनता उच्‍च विद्यालय- अड़ेर’ पड़ल। किछु दिन धरि ओ विद्यालय पंचायत भवनमे चलैत छल। क्रमश: विद्यालयक अपन पक्का मकान एवम्‍ आन-आन सुविधा भेल। गेनखेलीक हेतु हमर गाम प्रसिद्ध छल। अंग्रेजी हुकुमतक लोक सभ हमरा गामक लोक सबहक गेनखलीमे अभिरुचि देख दंग रहैथ। हमर बाबूजी सेहो ऐमे माहिर रहैथ। केतेको मेडल हुनका भेटल छल। गेनखेलीसँ प्रभावित भऽ अंग्रेज अधिकारी सभ हमरा गामक कएक गोटाकेँ छोट-मोट नौकरी धरा देलखिन। अड़ेरक फुटबॉल टीमसँ बड़का-बड़का शहरक टीम सभ घबड़ाइत छला। हम सभ जखन बच्‍चा रही तखनो विष्‍णुपुरक मैदानक गेनखेलीमे बाबूजीकेँ भाग लैत देखिऐन। कए दिन हुनका पैरमे चोट लागि जाइन। चोट सबहक देशी इलाज होइत छल। आब समय-साल बदलल अछि। गामोमे लोकक आपसी सम्‍पर्क क्षीण भऽ गेल अछि। फगुआ सन पाबैनमे लोक अपन दरबज्‍जा ओगरने रहैत अछि। तथापि गाम तँ गामे अछि। आशा करै छी जे कालान्‍तरमे क्रमश: हमरा गाममे आर सभ सुविधा हएत जेकर कल्‍पना सुखद जीवनक हेतु कएल जाइत अछि। जइ प्रकारक चौहद्दी हमर गामक अछि तइमे एकरा विकासक शिखर तक पहुँचनाइ एक सफल स्वपन्न भऽ सकैत अछि, वशर्ते गामक युवा शक्‍ति रचनात्‍मक रूख धरैत सही दिशामे अग्रसर होइथ। लघुकथा- एकसरि पण्डितजी बेश कर्मकाण्डी छलाह। भोरसँ साँझ धरि जतेक काज करितथि सभमे भबानकेँ स्मरण अवश्य करितथि। मंत्रोच्चार करैत उठितथि आ मंत्रेच्चारेक संग सुतितथि। बेश त्रिपुण्ड आ ताहिपर लाल ठोप हुनक ललाटकेँ शुशोभित केने रहैत छल। ताहिपर सँ हरदम मुँहमे पान कचरैत, लाल-लाल पानक पीक फेकैत ओ साक्षात् कालीक अवतार लगैत छलाह। कारी चामपर ललका वस्त्र धारण कय जखन वो भवतीक बन्दना करय पहुँचैत छलाह तँ वातावरणमे एकटा अपूर्व सनसनी पसरि जाइत छल। पण्डितजीक उम्र करीब ४५ बर्ष होयतन्हि। दूआ बेटी आ एक बेटा छलन्हि। घरवालीक स्वर्गवास आइसँ दस साल पहिने भय गेल छलन्हि। पण्डितजीक दुनू बेटा वेश सुन्नरि आ लुड़िगर छलन्हि। मुदा हुनका पासमे टाकाक अभाव छलन्हि तँ कतहु कन्यादान पटैत नहि छलन्हि। बेटा भिन्न भय गेल छलखिन्ह आ पण्डितजी अपन दुनू बेटीक संग एकठाम छलाह। पण्डितजीक घरक आस-पासमे बेश सम्पन्न परिवार सभ छलैक। पण्डितजीक गुजरो हुनके सभहक माध्यमसँ होइत छलन्हि। बेटा अपन घरवालीक संग दरिभंगामे रहैत छलखिन्ह। ओहिठाम डिस्ट्रीक्ट बोर्डमे कैसियरक काज करैत छलाह। मुदा पण्डितजीकेँ किछु मदति नहि करैत छलखिन्ह। वो अखनो पण्डिताइक बले जीवैत छलाह। दुनू बेटी समर्थ छलखिन्ह। गामेक हाइ स्कूलसँ मैट्रिक धरि सभकेँ पढ़ौलखिन्ह। आगा पढेबाक सामर्थ्य नहि रहन्हि। वियाहक लेल घटपटायल छलाह मुदा कतहु टाका नहि भेटैत छलन्हि। बिना टकाक कोनो लड़का वियाह करय हेतु तैयार नहि छलन्हि। यैह सभ चिन्तामे वो चिन्तित रहैत छलाह। ओना पण्डितजीक सम्बन्ध पूरा गाममे सँ मधुर छलन्हि। मुदा दू-तीन परिवारक लोक हुनका बेशी आदर करैत छलखिन्ह। हीरा बाबूक ओतय तँ भोर-साँझ दू घन्टा जरूर बैसार होइत छलन्हि। मुदा पण्डितजी ककरो कहियो अपना हेतु किछु कहलखिन्ह नहि। हीरा बाबूकेँ चारिटा बेटा छलखिन्ह। दूटा तँ बाहर रहैत छलखिन्ह मुदा छोटका दुनू पालिमे मैट्रिक पास केने छलखिन्ह आ बससँ रोज मधुबनी जाइत छलैन्ह किलास करय। सरोज ओ मीरा सेहो ओकरे सभहक संगे मैट्रिक पास केने छल। एक दिन सौंसे गाम सुतल आ सुति कऽ उठल तँ गुम्मे रहि गेल। सरोज चुपचाप घरसँ निपत्ता भय गेल छलैक। घरे-घर तका-हेरी भेलैक मुदा कोनो पता नहि। आन्हर हीराबाबूक दोसर बेटा सेहो काल्हियेसँ गायबछलैक। सौंसे गाममे कनाफुसी होमय लगलैक। पण्डितजी गरीब जरूर छलाहमुदा हुनका अपन प्रतिष्ठाक पूरा ख्याल छलन्हि। ओ अहि गम्भीर चोटकेँ नहि सहि सकलाह आ रातिमे सुतलाह से सुतले रहि गेलाह। मीरा एकसर भय गेलीह। गुम्म, सुम्म आश्चर्यचकित ओ सोचि नहि पाबि रहल छलीह जे की करथि। मीरा आब एकसरिछल। आगू-पाछू क्यो नहि। बापक मरला चारि दिन भय गेल छलै। भातिज आगि देने छलन्हि। सौंसे गाममे सरोजक भगबाक समाचार बिजली जकाँ पसरि गेल रहैक। मीराक तँ बकारे नहि फुटैत छलैक। की करए। पाँचम दिन सभ दियाद-बादक बैसार भेलन्हि। तय भेल जे गाम लऽ कऽ श्राद्ध भय जाय। पैसा-कौरी हीराबाबू गछलखिन्ह। मीरासँ मात्र एतबा गछबा लेल गेलैक जे काज भेलाक बाद घर-घराड़ी जे पण्डितजीक एक मात्र सम्पत्ति छलन्हि जे हीराबाबूक नाम कय देल जयतन्हि। बैसार खतम भेल मीरा गुमसुम एकचारीदिस देखि रहल छल। पण्डितजीक श्राद्ध नीक जकाँ समपन्न भेल। हीराबाबू रजिष्टारकेँ गामेपर बजा अनलाह। लिखयी सम्पन्नभय गेल। हीराबाबू मीराकेँ कहलखिन्ह- “मीरा, मास दू मास अही घरमे रह। तोरे घर छौक ने।” मीरा चुपचाप सुनैत रहल जेना ठकबिदरो लागि गेल हो। अपने गाममे, अपने घरमे मीरा बेघर भऽ गेल छल। गामक लोक ओकरा प्रति सहानुभूतितँ देखबैत छलैक मुदा महज फार्मेल्टी। धीरे-धीरे ओहो खतम। पन्द्रह दिन भय गेल छलैक घरक रजिष्ट्रीक। मीराकेँ आब ओहि घरमे एक पल बितायब असम्भव लगैत छलैक। एक दिन सैह सभ सोचि रहल छल कि लगलैक जेना दरबाजापर क्यो ठाढ़ होइक। “हीराबाबू, अपने एतेक रातिमे..?” हीराबाबू किछु बजबाक हिम्मति नहि कय पाबि रहला छलाह। मीराक तामस अतिपर पहुँच गेलैक। ओ चिचियैल- “चोर! चोर!” हीराबाबू भगलाह। अगल-बगलक लोकक ओहिठाम भीड़ एकट्ठा भय गेल छलैक। मीरा भोकासि पाड़ि कऽ कानि रहल छल। दाइ-माइ सभ दस रंगक गप-सप्प करैत पहुँचि गेल छलैक। जकरा जे मोन होइक से बजैक। मीरा चुपचाप सभ किछु सुनैत रहल। धीरे-धीरे भीड़ ओहिठामसँ हटैत गेलैक। राति गम्भीर भेल जाइत छलैक। सौंसे गामक लोक सुति रहल छलैक। मीरा चुपचाप गामसँ बाहर भऽ गेल। ओकराकिछु नहि बुझल छलैक जे वो कतय जा रहल अछि मुदा कोनो दोसर बिकल्पो नहि रहि गेल छलैक। मीरा बड्ड पढ़लो नहि छल। शहरमे कहियो रहल नहि छल। मुदा तकर बादो ओकरा कोनो गम नहि छलैक। टीशनपर गाड़ी आबि गेल छलैक आ आर अधिक सोच-विचार करबाक अवसरो नहि छलैक। ओ तरदय टीकट कीनलक आ गाड़ीपर चढ़ि गेल। ट्रेनमे बेश भी छलैक। किछुकाल तँ वो ठाढ़े रहल मुदा ताबते ओकरा चिर-परिचित अमित सेहो ओकर सामनेक सीटपर बैसल भेटलैक। हीरा बाबूक ज्येष्ठ पुत्र अमित। मीराकेँ ट्रेनमे धक्कम-धुक्की करैत देखि ओ तुरन्त उठि गेलैक। “मीरा तूँ कतय जा रहल छेँ?” पुछलकै अमित। मीरा ओकरा देखि कय अवाक् रहि गेल। किछु बजबे नहि करैक। अमित ओकरा अपना सीटपर बैसा देलकै। अगिला टीशनपर किछु यात्री उतरलैक। अमित सेहो ओहिठाम उतरय चाहैत छल मुदा मीराकेँ एकसर छोड़ि देब ओकरा नीक नहि लागि रहल छलैक। ओ मीरासँ ओकर गन्तव्य पुछय चाहलकै। मुदा मीरा किछु बजबे नहि करैक। बड़ मुश्किलसँ मीरा ओकर कहब मानि ओतहि उतैर गेल। आखिर ओकर कोनो गन्तव्य नहि छलैक। गाड़ी सीटी दैत ओहिठामसँ आगा बढ़ि गेलैक। ट्रेनपर सँ उतरि कय मीरा कानय लागल। अविरल अश्रुक प्रवाह देख अमितक मोन करूणासँ भरि गेलैक। ओ मोनहि मोन निश्चय केलक जे मीराकेँ ओकर घर आपस दिआ कऽ रहत चाहे ओकरा कतबो संघर्ष कियैक नहि करय पड़ैक। ओ बड़ मुश्किलसँ मीराकेँ चुप केलक आ अपना संगे गाम आपस नेने अयलैक। ओहि दिन पूरा गामक बैसारी भेलैक। सभ हीराबाबूकेँ ‘छिया-छिया’ कहलकन्हि। ताबतमे अमिकत कतहुसँ आयल आ साफ-साफ घोषणा कय देलक जे वो मकान मीराक छैक ओओकरे रहतैक। सौंसे गौंवा प्रसन्न भय ओकर गुणगाण करय लागल। मुदा हीराबाबूकेँ जेना नअ मोन पानि पानि पड़ि गेलन्हि। बैसारीसँ लौटि ओ छटपटायल रहथि। साँझमे बाप-बेटामे बेश विवाद पसरि गेलन्हि। मुदा अमित हुनकर गप सुनबाक हेतु तैयार नहि छल आ एकबेर फेर साफ-साफ कहि देलकन्हि जे एहि अन्यायमे ओ हिनकर संग नहि देतन्हि। बाद-विवाद बढ़िते गेल। अन्ततोगत्वा हीराबाबू कम्बल, बिछाओन आदि सरिओलन्हि आ गामसँ विदा भय गेलाह। क्यो टोकलकन्हि नहि। अमित मोने-मोन सोचैत रहल- भने ई आफद टरि रहल छथि। हीराबाबू तँ गमसँ चलि गेलाह मुदा मीराकेँ तैयो चैन नहि भेटलन्हि। सौंसे गाममे दुष्ट लोक सभ मीरा आ अमितक बारेमे नाना प्रकारक कुप्रचार करय लगलैक। रोज एकटा नव अफवाह गामक एक कोणसँ निकलैत आ दोसर कोण धरि पसरि जाइत। मीराकेँ ई सभ गप्प क्यो-ने-क्यो आबि कय कहि दैक। ओ बड़ संवेदनशील छल, भावुक छल, तँए एहन-एहन गप-सप्प सुनि कय कानय लगैत छल। एक दिन अहिना एसगरे अँगनामे कनैत रहय। अमित कतहुसँ आबि गेलै। ओकरा एना कनैत देखि बड़ तकलीफ भेलै अमितकेँ। “मीरा नहि कान!” जेना कि सभ बात ओकरा बुझले होइक। “सुन! हमर बात मानि ले। हमरासँ बियाह कऽ ले। बाज सही, जकरा जे मोन होइक।” मीरा आर जोरसँ कानय लगल। अमित ई सभ नहि देखि सकल आ चुप्पे ओतयसँ सरकि गेल। तकर बाद अमित दोबारा घुरि कय नहि अयलैक ओकरा लग। पूरा गाममे हल्ला भय गेलैक जे अमित कतहु चल गेल। मीरा ओतेकटा गाममे फेर एकसर भय गेल छल। गाममे कोनो थाहपता नहि छलैक। बच्चा सभकेँ ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कऽ गुजर करैत छल। मुदा अमितक एकदम गामसँ निपात भय गेलाक बाद ओ अत्यधिक दुखी छल। ककरोसँ किछु गप करबाक इच्छा नहि रहैक। एतबेमे ककरो गरजब सुनेलैक। हीराबाबूक पितियौत अगिया बेताल छलाह। “कहाँ गेल पण्डितक बेटी...!” इत्यादि-इत्यादि। मीराकेँ ई सभ गप नहि सहि भेलैक। मुदा ओ किछु बाजियो नहि सकल। असोरापर करोट भऽ गेल। चारूकातसँ लोक सभ दौड़लै। हल्ला भऽ गेलैक जे ‘मीराक हार्ट फेल कऽ गेलैक। एक बेर फेर ओ घराड़ी सुन्न भय गेलैक।’ लघुकथा- असगुन गाम-घरमे कतेको प्रकारक असगुन सभ प्रसिद्ध अछि। जेना क्यो यात्रापर विदा हो आ नढ़िया रास्ता वायासँ दायाँ काटि दियै, किंवा क्यो विदा होइतकाल पाछासँ टोकि दियै। बुढ़बा बाबाकेँ एहि सभहक बेश विचार छलन्हि। जँ घरक क्यो विदा होइत आ कतहु क्यो छीक दैत तँ वो ‘चिरंजीवी भव:’ अवश्य कहितथि। तहिना आर-आर अपशकुन जँ होइतैक तँ ओकर विवारण कय लितथि। ओहि दिन गाममे हाट लागल रहैक। तीमन-तरकारी सभटा हाटेपर सँ कीनल जाइत छलन्हि। ओहुना हाट दिनक ओ नियमसँ ओतय पहुँचैत छलाह। रविक दिन छलैक। हाट जयबाक तैयारी ओ दुइए बजेसँ प्रारम्भ कय देने छलाह। जहाँ चारि डेग आगा बढ़ैत कि एक ने एकटा अपसगुन भय जान्हि। एवम् प्रकारेण चारि बाजि गेल। सूर्यास्त करीब छल। हारि कय वो बेंत घुमबैत विदा भेलाह। कनिके आगा बढ़लाह कि मुनेसरा सामनेमे पड़ि गेलन्हि। “प्रणाम पंडीतजी!” –बाजल मुनेसरा। “नीके रह”- मुनेसराकेँ आर्शीवाद दैत पडितजी आगा बढ़लाह। मोने-मोन कहि नहि की की घुनघुना रहल छलाह। मुनेसराकेँ एकेटा आँखि छलैक। गाममे दाहाक दिन मारि भय गेल रहैक। बेस फनैत छल ओ। लाठी लेने फानि गेल छल। ताबतमे क्योओकरे निशाना बना कय एकटा सीसाक बोतल फेकलकै। ओकर सौंसे आँखि लहु-लुहाम भय गेल रहैक। ओही घटनाक बाद ओ असगुन भय छल। प्राय: सैह सभ सोचैत पंडितजी आगा बढ़लाह। हाटपर बेश भीड़ छलैक। तीमन-तरकारीक भरमार छल। मुदा पंडितजीक आदति छलन्हि जे कोनो चीज ओ ठोकि-ठोकि कऽ करितथि। बीच बजारमे सजमनिक दाम मोलबति-मोलबति पहुँचलाह कि चारि गोटेमे एक दिससँ धुक्का मारैक आ चारि गोटे दोसर दिससँ। सामनेसँ दू-तीन गोटे हाँ-हॉं करैत पण्डितजीक रक्षा करय आबि गेलाह। धक्का-धुक्की खतम भेल तँ पण्डितजी आगा बढ़लाह। सजमनिक दाम मोलेलन्हि आ भाव पटि गेलापर जेबीसँ पैसा निकालय लगलाह कि अबाक रहि गेलाह। जेबी नदारद। पण्डितजी ठोह पारि कय कानय लगलाह। सौंसे ई खबरि बिजलौका जकाँ पसरि गेल। पण्डितजी माथा हाथ देने घर आपस अयलाह। तहियासँ वो असगुनक डरे छाँह कटने फिरथि। पण्डितजीकेँ तीनटा कन्या छलन्हि। प्रथम कन्याक कन्यादान तय भय गेल छलन्हि। नीक कुल-शीलक लड़का रहैक। अगहनक पुर्णिमाक बियाह तय भेलन्हि। बरक हाथ उठयबाक हेतु विदा होइत छलाह कि कियो तराक दय छींकनने। छींक...छींक...छीक...। हुनकर माथामे ई छींक घूमय लगलन्हि। पण्डितजीक टांग एकाएक गतिहीन भय गेलन्हि। ओ आगा बढ़य हेतु एकदम तैयार नहि छलाह। सौंसे गामक लोक करमान लागि गेल छल। पण्डितजी गुम। किछु बजबे नहि करथि। तेहन शुभ मुहुर्त्त छल जे छींकक चर्चो करब असगुन लगन्हि। लोक सभकेँ किछु फुराइक नहि जे आखिर बात की भेल। अखने तँ पण्डितजी टप-टप बजैत छलाह..! गाम भरिक लोक पण्डितजीकेँ घेरि लेलकन्हि। “पण्डितजी की भेल?” मुदा ओ तैयो गुम्म। अन्ततोगत्वा लोक हुनका उठा-पुठा कय डाक्टरक ओहिठाम लय गेल। ओतय डाक्टर हुनकरअवस्था देखि बेश सीरियस भय गेलाह आ कहलखिन्ह जे हुनका गम्भीर भावनात्मक अवधात भेलन्हि अछि। तात्कालिक उपचारक हेतु जहाँ वो सूई देबय लगलाह कि पण्डितजीकेँ नहि रहि भेलन्हि। ओ गरियबैत ओहिठामसँ गामपर भगलाह। ताबत भोरक चारि बाजि गेल छल। आ बरक ओहिठाम जयबाक कार्यक्रम रद्द भय गेल। ठीके असगुन भय गेलन्हि। ताहि दिनसँ पण्डितजी असगुनसँ बड्ड डराथि। ओहि दिन हुनकर मझिली बेटीक तहिना आँखि बड़ फरकय लगलन्हि। पण्डितजी एकदम अपसियाँत भय गेलाह। अबश्य कोनो गड़बड़ी होमयजा रहल अछि। ओ अपन अपन बेटीकेँ तुरन्त अपना लग बैसा लेलथि कि ताबतेमे एकटा गिरगिटहुनकर बायॉं हाथपर खसल। पण्डितजी ठामहि फानलाह। पैरमे खराम छलन्हि। दरबज्जा बेस ऊँच छलैक। दलानपर ठामहि चितंग भय गेलाह। बायाँ पैरक हड्डी टुटि गेल छलन्हि। सौंसे गाम! पण्डितजी बाप-बाप चिचिआय लगलाह। सभ गोटे हुनका लादि कय अस्पताल लय गेल। लाख कोशिशक बाबजूद ओ हड्डी नहि जुटल। पण्डितजी जन्म भरिक हेतु नाँगर भय गेलाह। तहियासँ पण्डितजी रोज भोरे उठैत देरी भगवानकेँ गुहारि देथि- “हे भगवान! असुगनसँ जान बचायब।” मुदा भावी प्रवल होइत छैक। होइत वैह छैक जे हेबाक रहैत छैक। एकादशीक दिन छलैक। महादेवक दर्शन करय जाइत छलाह। झलफल होइत छलैक। ताबतमे एकटा नढ़िया वामाकातसँआयल आसामने बाटे दायाँकात जुजरि गेल। पण्डितजी ठामहि खसलाह। “हे महादेव! आब अहीं प्राणक रखा करू।” कहैत-कहैत पण्डितजी वेहोश जकाँ भय गेलाह। तारा सभ एकाएकी हुनकर ई दुर्दशा देखबाक हेतु अपस्याँत छल। बो बेचारे एकहुँ डेग घुसकय हेतु तैयाक नहि छलाह। आ ने घुसकबाक हुनकामे तागति रहि गेल छलन्हि। पण्डितजीकेँ फेर कहि नहि कहाँसँ हिम्मत अयलन्हि। ओ चोटे पाछा घुमलाह। तैबीच एकबेर फेर वैह नढ़िया वायाँसँ दहिना भेल। पण्डितजी ओहि नढ़ियाकेँ गरियबैत, नाँगर टाँगे दौड़ैत, खसैत-पड़ैत घर दिस बढ़य लगलाह। बीच-बीचमे ओहि नढ़ियाकेँ कहैत- “ई सरबा, नहि जीबय देत। एकर हम की बिगारने छलियैक से नहि जानि!” ताबतेमे मुखियाजी पोखरि दिसिसँ आपस अबैत छलाह। पुछि बैसलखिन- “की भेल पण्डितजी?” “की कहू की भेल। कहबी छैक जे गेलहुँ नेपाल आ कर्म गेल संगे। सैह परि अछि हमर। एकादशीक दिन छलैक। सोचलहुँ जे महादेवक दर्शन करी। आधा रास्तासँ जहाँ आगा बढ़लहुँ कि औ बाबू! ई चण्डाल नढ़िया रास्ता काटि देलक।” ओहिसँ पहिने की मुखियाजी किछु बजितथि, पण्डितजी धराम दय खसलाह। मुखियाजी चिकरलाह। पासेमे पण्डितजीक भातिज पनिछोआ करैत छलखिन्ह। ओ दौड़लाह। अगल-बगलसँ सेहो लोक सभ दौड़ल। पण्डितजीकेँ उठा-पुठा कय दरबाजापर राखि देलक। लोक सभ पुछन्हि- “की भेल?” मुदा ओअपस्याँत आकाश दिसि तकैत रहि गेलाह। असगुन, असगुने होइत अछि। तेँ ने लोक सगुन करैत फिरैत रहैत अछि। पण्डितजी भोर होइतहि पनिभरनीकेँ बजौलखिन्हि आ आदेश देलखिन्ह जे आइसँ नित्य प्रात: काल ओ एक घैल पानि भरि कय दरबाजापर राखि देल करय, जाहिसँ हुनक दिन नीक जेना कटि जान्हि। पनिभरनी हुनकर आज्ञाकेँ सिरोधार्य कयलक आ रोज हुनकर सामनेमे बेश बड़का घैलमे पानि भरि-भरि राखय लागल। एक दिन अन्हरोखे पनिभरनी पानि भरि कय राखि गेल। ओकरा गहुँमक कटनी करबाक छलैक। पण्डितजी उठि जहाँ चारि डेग आगा बढ़लाह कि वोहि घैलसँ टकरा चारूनाल चित्त भय खसि पड़लाह। चारू कातसँ लोक सभ दौड़ल। मुदा मण्डितजी किछु नहि बजलाह। आब ओ सभ दिन चुप्पे रहबाक सपथ खा लेने छलाह। समय विपरीत भय गेल छलन्हि आ सगुनो असगुन भय गेल छलन्हि। बिधवा विवाह समाजक मान्यता, विधि-विधान एवम् लोक व्यवहार समय साक्षेप अछि। जे बात-विचार पचास सय साल पहिने अनिवार्य चलैत छल से आइ-काल्हि जँ लोक करय तऽ हस्यास्पद भय जायत। पहिने बाल विवाह आम बात छल। बेटीकेँ जनमिते जँ माय-बापकेँ कथुक चिन्ता होइक तऽ ओकर विवाहक। कहुना कऽ विवाह भऽ जाइक आ माय-बाप गंगा नहा लेथि। सोचल जा सकैत अछि जे समाजमे बेटीक स्थिति कतेक दायनीय छल..! ई बात सभ जनैत छैथ जे स्त्रीक बिना पुरुष कतयसँ आयत। जे आइ ककरो बेटी छैक सैह काल्हि ककरो स्त्री, केकरो माय बनतै। तथपि लोकमे अखनहुँ बेटाक प्रति मोह कम नहि भय रहल अछि। पहिने कतेको गोटा बेटाक चक्करमे आठ-नौ सन्तान कय लैत छलाह। लिंग आधारित एहि भेद-भावकेँ कम करबाक किंवा जड़िसँ दुरुस्त करबाक निरन्तर प्रयास होइत रहल। एक समय छल जखन पतिकेँ मरलाक बाद ओकर पत्नीकेँ ओकरे संगे जरा देल जाइत छल किंवा वो स्वयं जरि जाइत छल। समाज ओकरा सतीक रूपमे महिमा मण्डित करैत छल। ओकर चितापर सती मन्दिर बना देल जाइ छल। सोचल जा सकैत अछि जे वो कतेक क्रूड़ प्रथा छल। एकटा स्वस्थ जीबन्त व्यक्तिकेँ जरा कऽ एहि लेल मारि देल जाइत छल वा वो स्वयं मरि जाइत छल जे ओकर पतिक देहावसान भय गेल, जाहि लेल वो कोनो प्रकारसँ दोषी नहि छल। मरनाइ, जिलाइ ककरो हाथमे नहि छैक। ई एकटा संयोग होइत अछि मुदा तकर एतेक दुखद् परिणाम होइत छल से सोचियो कऽ रोंआ ठाढ़ भय जाइत अछि। एकटा विदेशी पर्यटक जखन अपन देश घुमैत रहथि तऽ संयोगसँ श्मसान घाटपर एकटा मुर्दाकेँ लऽ जाइत देखलथि। मुर्दा संगे ओकर पत्नी चिकरैत-भोकरैत श्मसान धरि संगे गेल। लोक सभ तमासा देखैत रहल आर वो पतिक लाशक संगे जारनिसँ लादि देल गेल। जोर-जोरसँ ढोल बजा-बजा कीर्तन करय लागल जाहिमे ओहि जीवित महिलाक करूण क्रंदन दबि कऽ गुम रहि गेलैक आ थोड़बेकालमे ओहो पतिक लाशक संगे छाउर भय गेल। (ई सैंकड़ो साल पूर्वक थिक एवम् एकर वर्णन Beyond the seas–माइकल एच. फीसर द्वारा सम्पादित–पुस्तकमे अछि) एहि तरहक घटना ओहि समयमे आम बात छल। स्त्रीगण सभ अपन नियति बुझि एकरा स्वीकार करैत छलीह। प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम मोहन रायक एहिपर ध्यान गेल आ वो ब्रिटिश सरकारसँ गोहार कय एहि सामाजिक कुरुतिकेँ बन्द करौलाह। समाजमे विधवाक स्थिति बेटीक स्थितिसँ जुड़ल अछि। जँ बेटी पढ़तै, लिखतै, बेटा जकाँ ओकरो अवसर भेटतै तऽ ओहो ककरोसँ पाछा नहि रहत। आइ-काल्हि एहिमे किछु परिवर्तन भेल अछि। लोक बेटीकेँ स्कूल-कालेज पठा रहल अछि। डाक्टर, इन्जिनीयर, अफसर सभ किछु बेटीओ बनि रहल अछि। कानूनमे परिबर्तन भेल अछि। पैत्रिक सम्पत्तिमे बेटा ओ बेटीक हक बरोबरि भय गेल अछि। घरेलू हिंसा कानूनक तहक कोनो महिलाकेँ शारीरिक, मानसिक यातना नहि देल जाय सकैत अछि। दहेज लेब देब गैर कानूनी भय गेल अछि। प्रश्न ई उठैत अछि जे एतेक रास कानूनसँ लैस भारतीय महिला की सभ तरहेँ अधिकार सम्पन्न, सुरक्षित ओ प्रतिष्ठिापूर्ण जीवन-यापन करबाक स्थितिमे आबि गेल छैथ? ई सोचिये कऽ कलम ठाढ़ भय जाइत अछि। समाजमे बेटीक स्थितिमे सुधारसँ मूलत: शहरी क्षेत्रटाक सीमित अछि। गाम-घरक हालक मोटा-मोटी ओहने अछि। अपना ओहिठाम शिक्षाक स्तर तेहन गड़बड़ायल अछि जे जँ क्यो स्कूल-कालेज जाइतो छथि, किंवा डिग्रीओ हासिल कऽ लैत छथि तैयो हुनका कोनो रोजगार भेटि सकत नहि से संदेहास्पद। जँ आर्थिक निर्भरता बनल रहत, सम्पत्तिक अधिकार मात्र कानूनक किताबे तक सीमित रहि गेल तऽ बेटी कोना बढ़त? जाहि समाजमे बेटीकेँ शिक्षाक समान अवसर भेटल, पैत्रिक सम्पत्तिमे अधिकार भेटल ओहिठामक महिला निश्चित रूपसँ सभ तरहें आगा भऽ गेलीह। एहिमे केरल राज्यक चर्चा कयल जा सकैत अछि। पुरना समयमे (आ किछु हद तक अखनहुँ) विधवा होइते जेना ओकरापर विपत्तिक पहाड़ टुटि जाइत छल। तत्कालीन समाजक समस्त मान्यता, बिध, व्यवहार ओकरा अपमानिते नहि करैत छल, अपितु अशुभ बुझैत छल। केस कटा लिय, नीक नीकुत खाउ नहि, साधारण कपड़ा पहिरू, उपास-पर-उपास करैत रहू। तेतबे नहि, कोनो शुभकाजमे आगा नहि रहू। आखिर ओकर की दोष रहैक जकर दण्ड ओकरा समाज दैत छलैक? लगैत अछि, समाजक पुरोधा सभ असुरक्षा भावसँ ततेक ग्रस्त रहथि जे हुनका आगा-पाछा किछु आओर सोचेबे नहि करन्हि। कतेको ठाम तऽ नवलिग बिधवा भय जाइत छलि आ आजीवन धोर कष्ट एवम् विपत्तिमे जीवन-यापन करैत छलीह। गरीबी, सामाजिक प्रताड़नासँ तंग भय कतेको बिधवा गाम-घर छोड़ि वृन्दावन किंवा आन-आन तीर्थ शरण धय लैत छलीह। अखनो हजारोक संख्यामे वृन्दावनमे बिधवा सभ पड़ल छथि। भारतक उच्चतम न्यायालय हुनका सभक स्थितिपर विचार केने छल। सुलभ इन्टरनेशनल द्वारा हुनका सभ लेल किछु कल्याणकारी योजना सभ सुनबामे आयल छल। मुदा ई सभ ऊँटक मुँहमे जीरक फोरन थिक। जरूरी तऽ ई अछि जे समस्याक जड़िमे जाय ओकरा समूल नष्ट कयल जाय। आखिर पुरुषबिधुर भेलापर विवाह करैत छथि की नहि? तहिना महिलोकेँ ई अधिकार समाज स्वीकृत हेबाक चाही। यद्यपि यत्र, तत्र सर्वत्र महिला सशक्तीकरणक चर्च होइत रहैत अछि, तथापि व्यवहारिकतामे संकट अछिए। जँ दुर्भाग्यवस क्यो बिधवा भय जाइत छथि तऽ अखनो हुनका नाना प्रकारक यातना सामाजिक प्रताड़नासँ गुजरय पड़ैछ। अस्तु ई विचारणीय थिक जे बिधवा लोकनिक स्थितिमे गुणात्मक सुधार हेतु हुनकर पुनर्विवाहक व्यवस्था हो। एहिमे सभसँ बाधक विवाहसँ जुड़ल खर्चा एवम् जातीय स्वाभिमान अछि। मुदा ई विचारणीय प्रश्न थिक जे समाजक कोनो व्यवस्था जँ एक विदो्रष जीवनकेँ कष्टमय केने रहैत अछि तऽ ओकरामे संशोधन किएक नहि हेबाक चाही? ओना, कतेको जातिमे बिधवा विवाह पहिनहिसँ चलनमे अछि। कतेको महिला एहिसँ एकटा नूतन जीवन जीबाक अवसर प्राप्त करैत छथि। मुदा किछु जाति विशेषमे अखनो एकरा पारिवारिक प्रतिष्ठासँ जोड़ि कय देखल जाइत अछि। आखिर, ओ प्रतिष्ठाक जे गति होइत अछि, ताहिपर चर्चाक आवश्यकता नहि अछि। एहन बिधवा जकरा सन्तानो नहि छैक, एकरा व्यर्थ निष्ठाक नामपर लगातार कष्ट सहैत रहय, जीवनक समस्त सुख, सम्पदासँ वंचित रहय से कहाँ तक जायज अछि? कतेको समाजमे ई व्यवस्था अछि जे बिधवाकेँ ओही परिवारक अविवाहित भाए किंवा समव्यस्क सम्बन्धीसँ विवाह कय देल जाइत अछि। निश्चित रूपसँ वो सभ बेसी व्यवहारिक एवम् वुधिआर लोक छथि। मुदा जँ सेहो सम्भव नहि होइक तखन तऽ परिवारक वयस्क सदस्यकेँ सव्यं आगा आबि ओहि महिलाक जीवनमे पुन: स्थापित करबामे सहयोग करथि आ सुयोग्य, सही व्यक्तिसँ विवाह करबामे सहयोग करथि। जँ बिधवाकेँ सन्तान छैक तखन पुनर्विवाहसँ दिक्कति भय सकैत छैक मुदा एहनो परिस्थितिमे ओहि बच्चा सभक संगे बिधवाकेँ स्वीकार करब सर्वोत्तम समाधान भय सकैत अछि। हम एकबेर यूरोप गेल रही तऽ हमर सभक ड्राइभर अपन परिवारक चर्चा करैत कहय लगलाह जे हुनकर स्त्रीक ई दोसर विवाह छन्हि। पहिल विवाहसँ दूटा सन्तान छन्हि। हुनकासँ विवादक बाद एकटा सन्तान छन्हि। एवम् प्रकारेण वो तीनटा सन्तानक पिता छथि आ सभक भरण-पोषण सहर्ष एवम् समान्य रूपसँ करैत छथि। विदेशमे ई आम बात अछि। ओहिठाम विवाह विच्छेद जहिना होइत अछि तहिना पुनर्विवाह सेहो भय जाइत अछि। फेर अधिकांश महिला पुरुष ओहि स्थिति हेतु तैयारो एहि मानेमे रहैत छथि जे आर्थिक निर्भरता सामान्यत: नहि रहैत अछि। ईहो बुझय जोगर गप्प अछि जे ओकर सभक सामाजक मूल्य अछि जे ओकर सभक समाजक एवम् पारिवारिक संरचना अलग अछि। अपन भारतीय मूल्यक रक्षा करैत एवम् परिवारक संरचनाकेँ कोनो तरहें बिना दूबर केने विशेष परिस्थितिमे सामाजिक सामंजस्यक व्यबस्था जरूरी अछि जाहिसँ संयोगवश जँ क्यो बिधवा भय जाइत अछि तऽ हुनका तरह तरहक कष्टसँ बचाऔल जा सकय आ हुनक भावी जीवनकेँ सुखद कयल जा सकय। ओना अपने देशक कतेको राज्यमे बिधवा विवाह आम बात भय गेल अछि। अपनो समाजमे किछु जाति विशेषमे एकरा लोक अखनो ढो रहल अछि जखन कि कतेको जातिमे पहिनहुँसँ ई व्यबस्था रहल अछि। अस्तु एहि कुप्रथाक कोनो मजगूत धार्मिक पक्ष नहि लगैत अछि। ई एकटा जाति विशेषक किंवा वर्ग विशेषक अहंसँ पोषित सामाजिक अभिशाप थिक जकर सुधारपर सभक ध्यान जा रहल अछि, मुदा व्यबहारमे अखनो स्वीकार्य नहि अछि। एहन नहि अछि जे बिधवा विवाह होइते नहि अछि, गाहे-वगाहे उच्च वर्गीय मैथिलोमे ई भय जाइत अछि मुदा अखनो ई एकटा स्वभाविक, सर्वमान्य चलनक रूप नहि लेने अछि, जाहि कारणें कतेको कम व्यसक कन्या जीवनक समस्त सुख, सुबिधासँ वंचित रहि दुखमय जीवन बीतेबाक हेतु विवस छथि। किछु एहन घटना सभ देखयमे आयल जतय परिस्थितिवश पतिक देहान्त भय गेलाक बाद हुनके परिवारक लोक विवाहक व्यबस्था केलाह आ आइ वो एकटा सुखी परिवारिक जीवन जीबि रहल छथि। पूर्व पतिसँ जे सन्तान छलैक ओकरो नीकसँ पालन-पोषण भय रहल अछि। नव विवाहमे सेहो सन्तान भेलैक। हमर कहबाक तात्पर्य अछि जे सभ किछुकेँ हठाते धर्म-कर्मसँ जोड़ि कय मनुक्खक जीबन नर्क कऽ देब कतहुँसँ उचित नहि अछि। गाम-गाममे एहन दृश्य देखयमे अबैत रहल अछि जे अपने लोक बिधवाक शोषण करैत छथि। कतेकठाम तऽ ओकर हत्या तक भऽ गेल। ओकर सम्पत्ति अपने लोक लूटि लेलक वा ठगि लेलक आ जखन ओकरा प्रयोजन भेलैक तऽ सभ कात भऽ गेल। तथाकथित मर्यादाक उल्लंघन जखन आम बात भऽ गेल हो, ताहि मर्यादाकेँ व्यर्थ होइत रहब सर्वथा अनुचित। पारिवारिक जीवन हेतु, भारतीय मूल्यक रक्षा हेतु, वैवाहिक जीवनक महत्वकेँ कमतर नहि आँकल जाय सकैत अछि। परन्तु ओकर आधार मजगूत बनल रहैक ताहि हेतु सोचमे परिवर्तन जरूरी अछि। पूरा दुनियाँ बदलि रहल अछि। इन्टरनेट, मोबाइल, टेलीवीजन, फूसबुक, ह्वाट्सअप सौंसे दुनियाँकेँ एक आँगन (Global Village) मे परिवर्तित कय देलक अछि। एहि परिवर्तनसँ क्यो बाँचल नहि रहि सकैत अछि। गाम-गाम वैह टेलीवीजन, वैह गीत नाद, वैह सीनेमा चलैत अछि। स्वाभाविक अछि जे गामोक धिया-पुतामे आधुनिकताक मानसिकता उत्पन्न होइक। एकरा एकदमसँ छोड़लो नहि जा सकैत अछि। अस्तु आधुनिकताक बिहाड़िमे सभटा उड़िया जाय ओहिसँ पूर्वे हमरा लोकनि स्वत: स्वभाविक रूपसँ परिस्थितिजन्य कारणसँ बिधवा भेल महिलाकेँ पुनर्वास हेतु ओकर सम्मानपूर्ण जीवन-यापन हेतु सोचबाक चाही। समाज जे गतिशील होइत अछि, जे बदलैत परिवेशसँ सामंजस्य स्थापित करबाक हेतु प्रयत्नशील रहैत अछि, सैह टिकैत अछि। ओकरे विकास होइत अछि। जँ से नहि भेल तऽ अपने बनाओल नियम, कानून वो मर्यादाक बोझसँ स्वत: चरमरा जाइत अछि। तँए जरूरी अछि जे समयक संग तादाम्य स्थापित कय हम सभ नूतन विचारकेँ सहर्ष स्वीकार करी ओ प्रगतिक पथपर आगा बढ़ी। ◌ आगाँ के देखलक अछि? जखन मनुक्खक जन्म होइत अछि तखन ओकरा संग ‘साँस’ रहैत अछि परन्तु कोनो ‘नाम’ नहि, मुदा जखन ओकर मृत्यु होइ छै तखन ओकरा संग ‘नाम’ रहैत अछि परन्तु ‘साँस’ नहि। ‘साँस’ आ ‘नाम’क बीचक एहि यात्राक नाम ‘जीवन’ थिक। आब सबाल अछि जे एहि जिनगीकेँ अहाँ केना जीबै छी, एकर की उपयोग करै छी...। कतेको गोटे स्वनिर्मित अभावमे जीबैत रहै छथि आ ताजन्म ओकर प्राप्‍ति हेतु सफल, असफल चेष्टा करैत रहै छथि। कतेको गोटे ककरो चेला भऽ जाइ छथि, ककरो समर्थक किंवा अनुरागी भऽ जाइ छथि, आ आँखि मुनिकऽ पाछाँ-पाछाँ चलैत रहै छथि। जाबे होश होइ छै ताबे बहुत देर भए गेल रहैत अछि । समस्त जीव-जन्तुकेँ प्रकृतिक वरदान स्वरूप जीवन भेटैत अछि। छोट वा पैघ जिनगी जकर जे छै से जीवैत अछि आ चलि जाइत अछि। एकटा मनुक्खे अछि जे नाना प्रकारक फसादमे पड़ि जीवनक आनन्दसँ कएक बेर वञ्चित रहि जाइत अछि। जीवनक प्रादुर्भाव एवम् ओकर विकास यात्रा एकटा आश्चर्यजनक प्रक्रिया अछि। छोटसँ छोट मच्छर सँ लऽ कऽ हाथी-मगरमच्‍छ सन-सन विशालकाय जीव सब एहि निर्माण एवम् विकासक प्रक्रियामे सहयोगी अछि। नान्‍हिटा चुट्टीकेँ देखियौ- अनवरत चलैत रहैत अछि। ओकर रस्तामे व्यवधान करबै तऽ, रस्ता बदलि लेत मुदा ठाढ़ नहि होएत। पंक्ति वद्ध हजारक हजार चुट्टी चलिते जाइत अछि। कतए जा रहल अछि? प्राय: जीवनक खोजमे निरन्तर प्रयत्नशील रहैत अछि। प्रकृतिमे स्वत: स्वभाविक रूपसँ जीव मात्रक जीवन रक्षा एवम् आवश्यकता पूर्तिक वैज्ञानिक व्यवस्था अछि। जाहि जीवकेँ जेहेन आवश्यकता अछि, ताहि प्रकारक शरीरक रचना भेल अछि। ककरो पैघ दाँत अछि तऽ ककरो पैघ सूढ़। ककरो शरीरपर काँट सन-सन रौंआँ लागल रहैत अछि। प्रकृति माता अपन समस्त सन्तानक जीवन-रक्षाक गजब व्यवस्था केने छथि। एहि संसारमे निरन्तर किछु-किछु घटित होइत रहैत अछि। सामान्यत: हमरा लोकनि निरपेक्ष रहैत छी। जे होइ छै से होइ छइ। बात तखन बदलि जाइत अछि, जखन ओहि घटनाक सम्बन्ध अपनासँ होइत अछि। नाना प्रकारक जीव-जन्तु जन्‍मैत अछि, मरैत अछि, मुदा हमरा लेल धन- सन। मुदा जौं परिवारमे खास कऽ अपन लोककेँ सन्तानक जन्म होइछ तऽ लोक उत्साहित भऽ जाइत अछि। आनन्द मनबए लगैत अछि। नाच-गान करैत अछि। वैह हाल मृत्युक संगे होइत अछि। दिन-राति लोक मरैत अछि। कोनो चर्चा नहि होइत अछि। जे मरलै से मरलै, हम थोड़े मरब। सबकेँ मरितो देखि लोककेँ अपन मृत्युक अन्‍दाज नहि भऽ पबैत छइ। ताहि मानसिकताक कारण जँ निकटक व्यक्तिक मृत्यु भऽ जाइत अछि तऽ लोक हतप्रभ भऽ जाइत अछि। लोक भगवानकेँ दोष देबए लगैत अछि। एकबेर हम डॉ. सुभद्र झाजीक संगे इलाहावाद पएरे कतौ जाइत रही। रस्तामे पुछलियनि- “अहाँक हिसाबे भगवान छथि कि नहि?” ओ कहला- “हमरा हिसाबे तऽ भगवान नहि छथि आ जौं छथि तऽ बड़ बइमान छथि।” पुछलियनि- “से किएक?” ओ आगू कहला- “पेटमे जे बच्चा मरि जाइत अछि, तकर कोन दोष? आ जँ दोष रहिते छै तऽ ओकर जन्म होबए दितथिन आ तखन ओ अपन कर्मक फल भोगैत। पेटेमे मरि जेबाक की औचित्य?” मुदा मृत्यु तऽ होइते रहै छइ। ओहिपर ककरो बस नहि रहल । लोक कतए-सँ आएल, कतए जाएत? ई शाश्वत प्रश्न अछि। लोक नित्य-प्रति उठैत अछि, एहि उमीदमे जे ओ अहिना रहत, मुदा सत्य तऽ यएह अछि जे साँझ धरि जीवनक एक दिन कम भऽ गेल रहैत अछि। मृत्यु एक दुखद प्रसंग अछि। निकट सम्बन्धीसँ समाजिक, परिबारिक सम्पर्कक एकाएक पूर्ण विराम लागि जाइत अछि। कएक बेर मृत्युक भयसँ चिन्ता, अवषाद वा निराशाक भाव पसरि जाइत अछि। किछु लोककेँ मृत्युक बाद पूर्व कर्मक अनुसार स्वर्ग वा नर्क जेबाक चिन्ता सेहो ग्रसित केने रहैत अछि। मृत्युक कारण अनेको भऽ सकैत अछि। दुर्घटना, विमारी, हत्‍या, आत्महत्‍या आ से सब नहि तऽ वृद्धावस्था। उम्रक संग-संग जीवन रक्षक तत्व सब घटि जाइत अछि। विमारीसँ प्रतिरोधक क्षमता क्षीण भऽ जाइत अछि। शरीरक अंग प्रत्‍यंग क्रमश: काज केनाइ छोड़ि दैत अछि, जकर परिणति मृत्युमे भऽ जाइत अछि। कहबी छै जे ‘टिटही टेकल पर्वत।’ चिड़ै अपन टाँग उन्टा आकाश दिशि कऽ कऽ सुतैत अछि, जे जँ आकाश खसत तऽ ओ रोकि लेत। यएह हाल मनुक्खक अछि। सौंसे जिनगी अपसियाँत रहैत अछि जे ओकरा बिना दुनियाँक काज नहि चलत ओ रहत तखने कोनो काज होएत अन्यथा दुनियाँ ठामहि धँसि जाएत। मुदा जीवनक सत्य किछु आर अछि। ककरो लेल ई दुनियाँ ठाढ़ नहि रहैत अछि। जखन जवाहर लाल नेहरू प्रधान मंत्री छलाह तऽ लोकमे चर्चा होइक जे नेहरूजीक बाद देश केना चलत? मुदा ई चिन्ता व्यर्थ साबित भेल। देश चलि रहल अछि। लोक अबैत अछि, जाइत अछि, परन्तु संसारक चक्र निरन्तर गतिमान रहैत अछि। समय ककरो प्रतीक्षा नहि करैत अछि। भोर, साँझ, इजोरिया, अन्‍हरिया अनवरत होइत रहैत अछि। जीवन-यात्राक अन्त तऽ भेनाइए अछि। कतेक बेर लोक स्वयं थाकि जाइ छथि, ओ विश्रामक निरन्तरता हेतु स्वत: मृत्युकेँ आलिंगन कए लैत छथि। उदाहरण स्वरूप आ. विनोव भावे अनशन कए प्राणक त्‍याग कए देलनि स्वामी विवेकानन्द, आदि शंकराचार्य सन-सन महान अध्यात्‍मिक व्यक्ति सब कमे बयसमे चलि जाइत रहलाह। महात्मा गाँधी सन त्‍यागी ओ निष्ठावान व्यक्तिक हत्‍या कऽ देल गेल। तीन-तीन गोली लगलाक बाबजूद ओ ‘राम-राम’ कहैत प्राणक त्‍याग केलनि। अस्तु मृत्यु कखन, ककरा केना होएत एवम् कोन परिस्थितिमे होएत तकर कोनो ठेकान नहि अछि मुदा ई बात पक्का अछि जे मृत्यु होएत, जखन हो, जेना हो, जतए हो। गीतामे तऽ कहल गेल अछि जे मृत्युक समय ओ स्थान पूर्व निर्धारित अछि। विज्ञान एवम् तकनीकीक विकाससँ जीवन एवम् मृत्यु सेहो प्रभावित भेल अछि। पहिने मामूली विमारीसँ लोक मरि जाइत छल। सुलबाई, मलेरियाक कोनो इलाज नहि छल। हैजा, तपेदिक सन संक्रामक विमारीसँ गामक-गाम सुडाह भऽ जाइत छल। क्रमश: तरह-तरह केर दबाइक अविष्कार भेल। लोकक आयुमे इजाफा भेल। लेकिन नव-नव आर कतेको घातक विमारी सब बाहर भऽ गेल, जकर तोड़ विज्ञानक पास नहि अछि। अस्पतालक सुविधा एवम् चिकित्साक बेहतर उपलब्‍धिसँ लोक कएबेर स्वस्थ भऽ दीर्घ जीवनकेँ प्राप्त केलक मुदा कतेको मामलामे विमार व्यक्ति अस्पतालेमे घिसियौर कटैत रहै छथि। अत्यन्त बेमार व्यक्तिकेँ इच्छा मृत्युक मांगक चर्चा होइत रहैत अछि। कहक मतलब जे विज्ञानक पराकाष्ठा मृत्युक पुरुषार्थकेँ कम नहि कऽ सकल। समयक चपेट तेहन निरन्तर ओ प्रवल अछि जे एकर परिणामक कल्‍पनो नहि कएल जा सकैत अछि। जहिना परमाणु बमसँ विध्‍वंस होइत, आ गामक-गाम लुप्त भऽ जाइत, तहिना समयक अचूक आघात/प्रतिघात कोनो बमसँ कम नहि अछि। सौंसे गामसँ घरे-धरे लोक बिला गेल। गनि कऽ देखल जाए तऽ साइदे क्यो पुरान लोक भेटता, कतए गेलाह सब गोटे? मुदा परमाणु बमक विध्वंस मात्र अनिष्टकारी होइत अछि, बाल-बच्चा, वृद्धमे कोनो विभेद नहि कऽ पबैत अछि। विनाशक बाद दूर दूर धरि श्रृजनक सम्भावना नहि रहि जाइत अछि। प्रकृति प्रदत्त विनाशक संगे श्रृजन भाए-बहिन जकाँ संगे चलैत अछि। जँ एकटा पात झड़ैत अछि तऽ दसटा हरियर कंचन पल्लवसँ गाछ समृद्ध भऽ जाइत अछि। लोक बीतल बातकेँ बिसरि आगाँक तैयारीमे लागि जाइत अछि। अद्वैतवादीक अनुसार आस्‍तित्व केवल अनन्तक अछि, शेष सब माया थिक। कोनो जड़ वस्तुक यथार्थ व्रह्म छथि, एवम् प्रकारेण जीवन रहए नहि रहए, ओकर आस्‍तित्वपर अन्तर नहि होइत अछि। समं पश्यन् सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्‍त्‍यात्मनात्‍यानं ततो याति परांगतिम्।। (गीता १३/१८) जे सर्वत्र ईश्वरकेँ सब भावसँ सर्वत्र अवस्थित देखि ओ आत्मा द्वारा आत्माक हिंसा नहि करै छथि, से मुक्त भऽ जाइ छथि। कहक माने जे मोनेक ऊपर सब बात निर्भर करैत अछि। घटनासँ बेसी ओहिपर हमर दृष्टिकोणसँ ओकर महत्व कम बेसी भऽ जाइत अछि। जीवनमे जहिना तरह-तरहक घटना घटित होइत रहैत अछि, तहिना जन्म ओ मृत्यु सेहो होइते रहैत अछि। समस्या घटनासँ नहि अपितु घटना विशेषक लगावसँ होइत अछि। “इहैब तैर्जित सर्गो येषां साम्‍ये स्थितं मन: निर्दोष हि समं ब्रह्म तस्‍मात्‍ ब्रह्मणि ते स्थित:” गीता ५/१९ जिनकर मन साम्‍यभावमे अवस्थित अछि, ओ एहि ठाम जीवन मृत्युक संसार चक्रकेँ जीत लेलाह अछि, चूँकि ब्रह्म निर्दोष ओ सर्वत्र सम छथि, अस्तु ओ ब्रह्ममे अवस्थित छथि। कहक माने जे मोनमे नीक भाव होइ तऽ मनुक्खे जीवन-मरणक प्रभावसँ हटि ब्रह्मलीन भऽ जाइत अछि। जीवनमे प्रतिपल परिवर्तन होइत रहैत अछि। लोकक सोच समयक संगे बदलैत रहैत अछि। जाहि बातकेँ लोक बच्चाक समयमे नीक कहैत अछि, मुदा पैघ भऽ ओही बातपर ओकर विचार बदलि जाइत अछि। वृद्धकेँ युवावस्थाक गप्प-सप्प सोचि हँसी लागि जाइत छइ। कहक माने जे मनुक्खक निरन्तर बदलिते रहैत अछि। जँ कोनो उपायसँ मृत्युपर बस चलितै तऽ कोनो बड़का आदमी नहि मरैत। धन्ना सेठ सब अमर बुटी खा-खा कऽ अमर भऽ जाइत आ गरीब, गुरबा सब नहि जीबैत। मुदा मृत्यु एकटा एहन प्रश्न चिन्‍ह अछि जकर जवाब ककरो लग नहि अछि। राजा, रंक ,फकीर सब हतप्रभ भऽ एकरा स्वीकार करैत अछि, कोनो विकल्‍पो नहि छइ। हम सब बच्चामे सुनि -पुरान घर खसे, नव घर उठे। ई फकरा जीवन-मरणक चक्रपर पूर्णत: लागू होइत अछि। जहिना बुढ़-पुरान लोक सब चलि जाइ छथि, ओहिना किंवा ओहूसँ बेसी तेजीसँ नव जीवनक सृजन होइत अछि। जहिना पतझड़क बाद नव पल्लवसँ गाछ वृक्ष हरियर भऽ जाइत अछि, ओहिना गाम-घर नवजात शिशुक जन्मसँ हरल-भरल रहैत अछि। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ। जे हेबाक छैक से होइत अछि। एहिपर माथा-पच्‍ची व्यर्थ। क्यो जीविते सुसम्पन्न परिवारक अंग भऽ जाइत अछि, तऽ क्यो रस्ता कातमे जन्‍मेसँ समय बितबै लेल मजबूर भऽ जाइत अछि। रामकृष्ण परमहंश सन महात्मा कैंसरसँ पीड़ित भऽ असाध्य कष्ट भोगलथि। महात्मा गाँधी सन शान्‍तिक समर्थक हिंसाक शिकार भऽ गेलाह आ हत्‍याराक गोलीसँ हुनक मृत्यु भेल। ई सब देखि-सुनि मानए पड़त जे एक्के जन्मक नहि अपितु अनेकानेक जन्मक कर्मफल मनुक्खे पछोर केने रहैत अछि। कतेक मनुक्ख साधारण प्रयास करितहि लक्ष्‍य प्राप्त कए लइ छथि तऽ क्यो जीवन भरि कष्टमे रहि कऽ दुनियासँ चलि जाइ छथि। ई सब केना आ किएक होइत अछि, तकर सटीक उत्तर देब कठिन अछि। मुदा भाग्‍यक कोनो जवाब नहि । भाग्‍यं फलति सर्वत्र, न विद्या न च पौरुष:। पछिला-अगिला जन्म क्यो देखलक नहि, मात्र अनुमाने लगाओल जा सकैत अछि मुदा वर्तमान जीवनमे जे किछु देखि-सुनि रहल छी से आश्चर्यसँ भरल अछि। जन्मसँ प्रारम्भ आ मृत्युसँ अन्त होइत एहि जीवन-यात्राक पुनरावृति होएत, नहि होएत...। ताहि पर तरह-तरहक मत अछि। मुदा ई तय अछि जे एहि जीवनमे बहुत किछु देखबा-सुनबामे अबैत अछि, जाहिसँ वर्तमान जीवनकेँ सुखी ओ शान्त कएल जा सकैत अछि। अशान्तस्‍य कुतो सुखम्‍! अस्तु हमर पूर्वज लोकनि शान्‍तिक हेतु प्रार्थना करैत रहलाह। जे किछु एहि जीवनमे प्राप्त अछि, से अपना आपमे अद्भुत अछि, अद्वितीय अछि। आगाँ के देखलक अछि? नवका पोखैर “हर-हर महादेव। जानह हे महादेव! हमरा मोनमे किछु छ: पाँच नहि अछि। तूँहीं जानह हे महादेव..!” “अहाँकेँ जे बुझाए मुदा हम तँ अपना भरि सभकेँ सभ दिन केलिऐ...।” “आ हम केकरा नहि केलिऐ..?” पंचमुखी महादेवपर जल ढारैतकाल महिला सभ आपसमे अहिना चिरौरी करैत रहै छेली...। एक हाथ महादेवक निमोलपर आ दोसर हाथे जल ढारि रहल महिला सभ बीच-बीचमे मौका पबिते फदका पढ़ए लगैथ। जे कियो आएल, महादेवक ऊपरसँ जल ढारलक। जाड़ होइ आकि गरमी, सभ मौसम जलढरी अनवरत चलैत रहै छल। रच्‍छ छल जे दुपहरियामे ई भीड़ कम भऽ जाइत रहै जइसँ महादेव चैनक अनुभव करैत हेता। कम-सँ-कम घरेलू तथा परिवारिक झमेल सभ सुनबासँ तँ मुक्‍ति होइते रहैन। चारि बजे भोरेसँ नवका पोखैरपर स्‍नानार्थी सभ तपकए लगैत छल। ओइमे नियमित पाँच गोटे टोलसँ अबैत छला जइमे तीन गोट महिला छेली। टाइमक सोलहन्नी पाबन्‍द रहैन। भोरे-भोर ‘हर-हर महादेव!’ किछु वृद्ध नवका पोखरिक कोणपर बसल परिवारमे सँ सेहो भोरे स्‍नान करएबला लोक सभमे शामिल रहिते छला। स्‍नान, ध्‍यान एवम्‍ आराधनाक संग महादेवक अनवरत जलढरी चलैत रहै छल, आ तैसंग गपाष्‍टक जे आनन्‍द छल, तेकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। कहि नहि, महादेवकेँ ई सभ केतेक पसिन्न पड़ैत हेतैन! खाएर.., मुदा लोक सभ तँ तृप्‍त लगिते छला। सभ अपना-आपमे मगन, सभ अपने-आपमे आनन्‍दित। नवका पोखैर ओइ समयमे हमर गामक नाक छल। मूलत: हमर पित्ती–स्‍व. वंगट मिश्र–ओइ स्‍थानक दिन-राति देख-देख करैत छला। नवका पोखरिक दच्‍छिनबरिया महारपर भगवान शिवक पंचमुखी मूर्तिबला मन्‍दिर छल। नवका पोखैर तथा ओइठामक मन्‍दिरक निर्माण हमर सबहक समस्‍त दियाद सभ मिलि कऽ केने रहैथ। मन्‍दिरक प्राण-प्रतिष्‍ठा हमर पितामह–स्‍व. श्रीशरण मिश्र–द्वारा भेल रहए। पोखरिक जाइठ पड़ैकालक खिस्‍सा सभ हम सभ बच्‍चामे सुनिऐ। ओइ समयमे पोखैर-इनार खुनाएब बहुत मान-मर्जाक बात बुझल जाइत छेलइ। ओना, गाममे पहिनेसँ कएटा पोखैर रहै, जइमे तीनटा पोखैर तँ हमरा सबहक टोलेमे बुझू। तेकर अलाबा कुट्टी लगक पोखैर सेहो एकटा। तथापि आरो पोखैर सुनौल गेल, तेकर तात्‍पर्य बुझल जा सकैत अछि...। नवका पोखैर प्राय: सभसँ बादमे बनल छल तँए ओकरा ‘नवका पोखैर’ कहल जाइत अछि। पोखरिक दच्‍छिनबरिया भीरपर मन्‍दिरक संग रंग-रंगक फूल सभ लगौल गेल छल। जेना- चम्‍पा, मालश्री, कामिनी, करबीर, अड़हुल इत्‍यादि। चम्‍पा, करबीर आ अड़हुलक बड़का-बड़का गाछ छल। सम्‍पूर्ण परिसरक सफाइ स्‍व. वंगट काका करैत छला। वंगट काका असगरे जीवन पर्यन्‍त ओइ काजकेँ पूर्ण भक्‍ति-भावसँ करैत रहला। कहियो थाकैथ नहि। निस्‍वार्थ, स्‍वान्‍त: सुखाय ऐ काजकेँ करैत ओ तत्‍कालिने समाजक नहि अपितु अखनो समाजक बीच दृष्‍टान्‍त छैथ। मन्‍दिरक आगूमे धरमशाला छल। फूसक दरबज्‍जानुमा घर जे चारूकातसँ खुजल छल। कियो थाकल-ठेहियाएल पथिक ओतए रहि सकैत छला। ओ समस्‍त परिवारक आतिथि होइत छला। हुनकर सभटा बेवस्‍था होइत छल। हमरा मोन पड़ैत अछि जे एकबेर एकटा महात्‍मा आएल रहैथ। ओ बाजैथ नहि। सिलेटपर लिखि कऽ अपन इच्‍छा, अपन मन्‍तव्‍य प्रकट करैथ। हुनकासँ भेँट करक हेतु लोकक करमान लागल रहैत छल। सौंसे देह बभूति रमौने, जौरक डोराडोरि पहिरने, जटा जूट धारी भेष हुनक आकर्षणक केन्‍द्र रहैन। माथक भयानक ठंढ हो आकि जेठक तप्‍त रौद ओ देहपर एकटा गमछा मात्र रखैत छला। अपना समयक नामी पहलमान सेहो रहैथ। नवका पोखरिक उत्तरबरिया भीरपर अखाड़ा छल। ओइठाम युवक सभकेँ कुश्‍तीक प्रशिक्षण दैत छला, डंड बैसक करैत छला। किलोक किलो आखाड़ाक माटि देहमे औंसने घामसँ तर-बत्तर भऽ जाइत छला। तेकर बाद बड़का खर्ड़ासँ सम्‍पूर्ण परिसरकेँ अपने हाथे साफ करैत छला। प्रात: स्‍नान करैबला लोक सभकेँ तरह-तरह केर हिदायत दैत रहै छेलखिन। पोखरिक पानि स्‍चच्‍छ बनल रहए, तइले सतत सतर्क रहैत छला। पोखरिमे साबुनसँ कपड़ा खिचनाइ मना छल, ऐ लेल ऊपरमे बेवस्‍था छल। ओइ समयमे कियो-कियो पोखरिमे साबुनसँ कपड़ा खींच लेथि, मुदा जँ पकड़ल गेल तँ भगवाने मालिक। नवका पोखरिक दिन-प्रति-दिनक देख-रेखक सम्‍पूर्ण दायित्‍व ताजीवन वंगठ काका बिना कोनो स्‍वार्थक उठौने छला। घन्‍टो ओइ परिसरक विकासक हेतु काज करैत रहला। हुनका बाद ओइ स्‍थानक पूर्ति नहि भऽ सकल, भाइयो नहि सकैत छल। गाम-घरमे एहेन साफ-सुथरा रमणीक पार्कनुमा स्‍थान भेटब कठिन। ओना तँ खेत-पथार सभ हरियर कंचन रहिते अछि, थाल-कादोक अपन स्‍वाद सेहो छइहे, मुदा तहू माहौलमे जे अध्‍यात्‍मिक, सांस्‍कृतिक केन्‍द्रक रूपमे नवका पोखरिक बेवस्‍था जे छल आ बहुत दिन धरि जेना चलैत रहल ओ अद्भुत ओ बेमिसाल कहल जा सकैत अछि। नवका पोखरिक निर्माणमे हमरा लोकनिक परिवारक समस्‍त लोकक योगदान छल। सोदरपुरिये मानिक मूलक हमरा लोकनिक पर्वज छला जे सात पुस्‍त पूर्व वैवाहिक सम्‍बन्‍धोपरान्‍त गाममे बसल रहैथ। आइ गामक आधा जनसंख्‍यामे सभ सहभागी छैथ। वंगट काका मूलत: पहलमान रहैथ। गाम भरिमे धाक रहैन। कोनो पर-पंचैतीमे हुनका अबस्‍स बजौल जाइत रहैन। धिया-पुता कुश्‍ती लड़ए, खेती-बाड़ी करए, माल-जालक सेवा करए, महींस राखए जइसँ डोलक-डोल शुद्ध दुधक सद्य: लाभ होइक–तइ विचारक पोषक छला वंगट काका छला। कए दिन हुनका बाबूसँ माने हमरा पिताजीसँ विवाद भऽ जाइन। विवादक मुद्दा रहैत छल जे पढ़ाइ-लिखाइ करब सार्थक थिक आकि निरर्थक? आब कियो सुनत तँ हँसत। मुदा वंगट काका अपन विचार जोर-सोरसँ बजैथ- “पढ़ो पूत चण्‍डी, जार्स चले हण्‍डी।” कहक सरांश- खेती-बाड़ी करू, ऐमे सद्य: लाभ अछि। पढ़ाइ-लिखाइमे कहिया की हएत से के देखलक! गाममे कियो लुंगी पहीरिलक तँ ओ (वंगट काका) जोरदार विरोध करैथ। समय बीतलाक बाद आब कहल जा सकैत अछि जे पढ़ाइ-लिखाइक समर्थन करब सही छल, विरोध गलत। गाममे वा केतौ जे पढ़लक-लिखलक से आगू भऽ गेल। ओहू समयमे किछु गोटे कहैथ- “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नबाब।” निसचित रूपसँ ओ सभ नश्‍चय अग्रसोची रहैथ। नवका पोखैर परिवारक गौरवसँ जुड़ल छल। केकरो कुटुम अबितैथ तँ नवका पोखैरपर हुनका अबस्‍स आनल जाइत। ओइठाम स्‍नान, ध्‍यान होइत, गप-सराका चलैत। धरमशालामे बैस कऽ आराम सेहो कएल जा सकैत छल। वंगट काका नित्‍य दुपहरियामे ओइठाम धर्मग्रन्‍थ पढ़ैथ। सायंकाल भगवान शिवक आरती-पूजाक संग नाचारी सेहो गाओल जाइत छल। ओइमे नियमित अनेको वृद्ध लोकनि भाग लैथ। नवके पोखरिक पच्‍छिम-दच्‍छिन भागमे सोदरपुरिये सरिसव मूलक किछु परिवार बसल छला। ओइ परिवारक बादशाह बाबा–स्‍व. ......– शिव मन्‍दिरक पूजाक बहुत दिन धरि बेवस्‍था देखैत रहला। सायंकालक नाचारीमे ओ तँ रहिते छला जे हुनका संगे ओही परिवारक कएटा आरो वृद्ध सभ सेहो नाचारी गायनमे भाग लऽ सुर-मे-सुर मिलबैत छला। हमर बाबा एवम्‍ वंगट काका तँ रहिते छला। ‘बाबा केतए सुतल छी औ बालक वनमे केतए-सँ अएला, कियो नहि हुनकर सथिया...।’ आदि नाचारीक स्‍वर अखनो हमर कानमे गुंजित होइत रहैत अछि। नवका पोखरिक मालश्री गाछक छाहैरमे हम केतेको दिन बैस कऽ प्रतियोगिता परीक्षा-सबहक तैयारी करैत रही। बीच-बीचमे पानि ओ अन्‍य आवश्‍यकताक पूर्ति ओइठाम रहनिहार नारायणजी करैथ। केतेको दिन हम अपन मित्र लाल बच्‍चा (स्‍व. प्रो. विष्‍णुकान्‍त मिश्र)क संग साँझक समयमे ओतए बैस गप-सप्‍प करी, भविसक योजना बनाबी। स्‍वच्‍छ, निर्मल वातावरणमे गाम-घरक झंझटिसँ दूर नवका पोखैरपर बैस कऽ एकटा स्‍वर्गीय आनन्‍द होइत छल। हम नियमित भोर-सॉंझ ओइठाम जाइत रही। प्राय:काल नित्‍यकर्म- स्‍नान, पूजा एवम्‍ व्‍यायाम आदि ओतइ होइत छल। नित्‍य सायंकाल गप-सप्‍प करबाक हेतु कएक गोटा भेट जाइथ। पूजा-पाठ तँ होइते छल। संग-संग एकटा स्‍वस्‍थ मनोरंजनक तथा अध्‍यात्‍मिकताक अनुभूति सेहो ओइठाम होइत छल। गाममे हमरा फरिखमे जँ केकरो देहान्‍त होइ तँ ओकर श्रद्धकर्म ओहीठाम होइत छल। हमर बाबा एवम्‍ बाबूक श्राद्ध-कर्म सेहो ओहीठाम भेल छेलैन। वैदिकी श्राद्ध-क्रर्ममे बछराकेँ दागल गेल। ओकर करूण क्रन्‍दन अखन तक हमरा रोमांचित करैत रहैत अछि। हमरा विचारासँ ई अमानवीय प्रयोग अछि, ऐसँ स्‍वर्गक सीढ़ी कियो केना चढ़त से हमर समझसँ बहार अछि। आर जे अछि से अछि, मुदा ई काज औअल दर्जाक क्रूड़ता अछि। एकटा जीवित प्राणीकेँ सरी धीपा कऽ दागि देब, केतौसँ मनुष्‍यत नहि थिक। नइ चाही एहेन स्‍वर्ग, जइ हेतु एकटा निरीह, निर्दोष जीवक संग क्रूड़ताक पराकाष्‍ठा कएल जाए। ओनाहू आब गाम-घरमे एकर विरोध भऽ रहल अछि, कारण साँढ़ द्वारा जजात चरि गेलासँ क्षतिक संग अन्‍यान्‍य कारण सभ सेहो अछि। नवका पोखरिक पच्‍छिम-दच्‍छिन कोणपर बसल किछु परिवार पहिने गामक बीचेमे छल। ओहो सभ भगिनमान छला। ओही परिवारक किछु गोटे गाममे शुरूए-मे बसि गेल छैथ। नवका पोखरिपर हुनका सभकेँ बच्‍चेसँ देखिऐन। सभ गोटे उद्यमी, संघर्षशील, परिश्रमी तथा संस्‍कारी छला। ओइठामक कएटा वृद्ध सबहक नाचारी महादेव मन्‍दिरपर सुनैत छेलौं। ओही परिवारमे उग्र संस्‍कार सम्‍पन्न, तेजस्‍वी स्‍व. रामनन्‍दन मिश्र भेला। उत्‍कृष्‍ट मेघा ओ उत्‍कट इच्‍छाक बाबजूद ओ बहुत आगू नहि पढ़ि सकला। खादी भण्‍डारमे नौकरी करैत निरन्‍तर गामसँ जुड़ल रहला। कोनो पाबनिमे ओ अबस्‍स गाममे उपस्‍थित रहैथ। हमरासँ हुनका अद्भुत सिनेह रहै छेलैन। कएक बेर नौकरीक दौरान जमशेदपुर एला। तेतबे नहि, कएक बेर दिल्‍लीमे आबि कऽ भेँट करैथ। अपन संघर्षककेँ सकारात्‍क रूखि दैत स्‍व. रामनन्‍दन मिश्र अपन परिवारक विकास यात्राकेँ एकटा निर्णयात्‍मक रूखि देबामे सफल रहला। परिणामत: आइ-काल्‍हि हुनकर परिवार गामे नहि, इलाकामे यशस्‍वी अछि, जानल जाइत अछि। आब ओइ स्‍थानमे कोठे-कोठा भऽ गेल अछि। ओही परिवारमे स्‍व. उमेश मिश्रक पुत्र श्री शशिवोध मिश्र अपन परिश्रम ओ संघर्षसँ ओइ समयमे बी.एस-सी. कऽ रहिका उच्‍च विद्यालयमे विज्ञान विषयक शिक्षक भेला। अपन पूरा परिवारक ओ कायाकल्‍प कऽ देलाह। जखन हुनका लग बैसी तँ ओ अपन जीवन-यात्राक एक-सँ-एक अनुभव सुनबैथ। पैछला चालिस बर्खमे नवका पोखरिक परिदृश्‍य एकदम बदैल गेल। ओतए बसल परिवारक अधिकांश लोक सकल विकास यात्राक उदाहरण छैथ। नवका पोखरिसँ हमर बाबाकेँ बहुत लगाव रहैन। जीवनक अन्‍तिम समय तक ओ नवका पोखैर टहलैले अबस्‍स जाइत छला। हाथमे छड़ी लेने रोडपर चलैत एक बेर हुनका एकटा साइकिलबला टक्कर मारि देने रहैन। ओहू अबस्‍थामे एक्के हाथे साइकिलकेँ घिसिएने-घिसिएने अपन दरबज्‍जापर लऽ आएल रहैथ। संभवत: १९६७-६८ इस्‍वीक गप थिक। हमरा लोकनि नवका पोखरिपर पुस्‍तकालय बनेबाक हेतु बैसार केलौं। गामक तमाम गणमान्‍य लोक सभ बैसारमे रहैथ। ओइसँ पूर्व गाममे एकटा पुस्‍तकालय बहुत पहिनेसँ छल, जे कोनो कारणसँ अव्‍यवस्‍थित भऽ गेल छल। एक समयमे ओ पुस्‍तकालय गामक प्रतिष्‍ठित संस्‍थान छल। १९६२क चीन-भारत युद्धक समाचार सुनबाक हेतु ओइठाम सौंसे गामक लोक जमा होइत छल। सटले खादी भण्‍डार छल ओ धिया-पुताक खेल-धूपक सामग्री सेहो छेल। मुदा की भेलै जे सभ गतिविधि कमश: ठप्‍प जकाँ भऽ गेल। नव पुस्‍तकालय बनेबाक बैसारमे किछु प्रवुद्ध लोकक विचार रहैन जे ओही पुस्‍तकालयकेँ जीर्णोद्धार कएल जाए। यद्यपि हम सभ ओइ प्रस्‍तावक समर्थन नहि केने रही, मुदा आब लगैत अछि जे ओ सही राय छल। नवका पोखरिक धरमशालामे पुस्‍तकालयक स्‍थापना हेतु प्रयासकेँ आगू बढ़बैत कएकटा बैसार आरो भेल। पुरान पुस्‍तक सभ घरे-घरसँ ताकि-हेरि कऽ आनल गेल। पुस्‍तक सभ रखबाक हेतु लकड़ीक रैक बनौल गेल। पुस्‍तकालयक उद्घाटन हेतु डा. शुभद्र झाजी केँ आमंत्रित कएल गेल। ओइ समयमे सेवा निवृत भऽ ओ गामेमे रहए लागल रहैथ। हाथमे बेंत लेने मिरनई पहीरिने ओ पुस्‍तकालयक उद्धघाटन कार्यक्रममे आएल रहैथ। हमरा लोकनि हुनकासँ किछु बजबाक आग्रह कएल। ओ कहला जे भाषण करब हुनका एकदम पसिन नहि अछि। तथापि ओ अपन बात कहैत पुस्‍तकालयक संचालनमे होमयबला बेवहारिक असुविधा सबहक वर्णन करैत अपन जीवनक अनेकानेक अनुभवक चर्चा सेहो केलैन। ओ पुस्‍तकालय अल्‍पजीवी भेल। संशाधनक अभावमे किछुए दिनक बाद सभ किछु ठप्‍प पड़ि गेल। नवका पोखैर अपना-आपमे एकटा संस्‍था छल। अध्‍यात्मिकताक संग ग्रामीण संस्‍कारकेँ सेहो प्रज्‍वलित केने रहैत छल। मुदा सभ खिस्‍साक केतौ-ने-केतौ आ कहुना-ने-कहुना अन्‍त होइते अछि। नवको पोखरिक संग सेहो सएह भेल। जहिना प्रत्‍येक मनुखक जीवनमे उत्‍थान-पतन होइत अछि तहिना ऐ संस्‍थाक संग सेहो भेल। जखन वंगट काका स्‍वर्गीय भऽ गेला तेकर पछाइत कियो एहेन बेकती नहि भेल जे नवका पोखरिक संग हुनका जकॉं एकात्‍म भऽ सकए। केकरो ओ रूचियो नहियेँ रहइ। जइ फुलबाड़ीमे एकटा पात नहि खसल भेटैत छल से क्रमश: कूड़ा, कर्कटसँ भरल रहए लागल। पोखरिक देख-रेख सेहो ढील भऽ गेल। जेतेक टा परिवार ऐ पोखैर एवम्‍ आसपासक परिसरक हिस्‍सेदार छैथ जे एकर एक स्‍वरमे रक्षा ओ विकास करबाक बजाय आपसेमे कचर-बचर होइत रहल। ढनमनाइत, ढनमनाइत मन्‍दिर खसि पड़ल। पोखैर सबहक व्‍यापारीकरण भऽ गेल। पोखरिक पानि नहाइ-जोकर नहि रहि गेल। कालान्‍तरमे किछु युवक लोकनिकेँ ऐपर धियान गेल। जइसँ मन्‍दिरक जीर्णोद्धारक प्रयास भऽ रहल अछि। आर-आर सकारात्‍मक प्रयास भऽ रहल अछि। मन्‍दिर भगवानक घर थिक, जेतए लोक अपन-अपन अहंकारक विसरजन कए ईवश्वरक शरणमे पहुँचैत अछि। अस्‍तु एकर पुनर्निर्माण ओ रखरखावमे जँ ऐ बातक धियान राखल गेल जे ओ परिवार विशेषक नहि अपितु समस्‍त आस्‍थावान लोकनिक वस्‍तु बनि सकए, तँ निश्चय ई कल्‍याणकारी हएत आ नवका पोखैर फेरसँ अपन गौरव प्राप्‍त कए सकत। ◌ तिथि : ३.७.२०१७ इच्‍छा पत्र मृत्‍यु अवश्‍यंभावी थिक। एक-ने-एक दिन सभ बेकती ऐ दुनियासँ सभ किछु छोड़ि कऽ चल जाइत अछि। जीवन भरिक स्‍वअर्जित एवम्‍ पैत्रिक सम्‍पैत अहीठाम रहि जाइत अछि। सवाल अछि जे ऐ तरहेँ छोड़ल गेल सम्‍पतिक की हएत? ओकर मलिकाना हक केकरा भेटत..? केतेक बेर ऐ प्रश्नक उत्तर तकबामे वर्षो लागि जाइत अछि। लोक आपसेमे लड़ि जाइत अछि। भाइ-भाइक दुश्मन भऽ जाइत अछि। आब तँ भाइक अलाबा बहिनो सभ ऐ युद्धमे कुदि जाइत अछि, खास कऽ तखन जखन सम्‍पतिक मूल्‍य ज्‍यादा हो, शहरी सम्‍पैत किंवा गामो-घरक सड़कक कातक सम्‍पैत सभ फसादक जड़ि भऽ रहल अछि। केतेको ठाम छोट-छोट विवाद लऽ कऽ अहंक टकराव भऽ जाइत अछि। कोनो पक्ष सुनैले तैयार नहि। तखन की हएत? जँ मृत्त बेकती इच्‍छा पत्र (Will) कऽ गेल छैथ तँ विवाद नहि हएत, नहि तँ सालक-साल मोकदमा चलत, जइसँ कोट-कचहरीक चक्कर लगबैत रहू एवम्‍ वकीलकेँ फीस थम्‍बैत रहियौ...। हमरा एकटा नामी वकील कहलैन जे एकटा छोट सन जमीन–जेकर मूल्‍य ७-८ लाख हेतइ–तैपर दू भैयारीमे विवाद छइ, अहंकारवश कियो हटए लेल तैयार नहि। जबकि एक भाँइ सात लाख टका फीसक रूपमे हमरा दऽ चूकल अछि। एतबे नहि, एक-आध लाख आरो भेटबे करत। ...कहक माने जे सम्‍पतिक जेतेक मूल्‍य होइत से वकील साहैब असूलि चूकल छैथ। तैयो लड़ाकू भैयारीमे सँ कियो पाछू हटैले तैयार नहि अछि..! ऐ तरहक लड़ाइमे कएक टा पुस्‍तैनी मकान खण्‍डहर भऽ जाइत अछि। अस्तु ई जरूरी ओ नितान्‍त आवश्‍यक अछि जे जिनका कोनो प्रकारक–माने चल वा अचल–सम्‍पैत अछि, से मृत्‍युक पूर्व इच्‍छा पत्र बना लेथि, कारण मृत्‍युक तारिखकेँ के जनैत अछि, कियो नहि। जँ कोनो बेकती मृत्‍युसँ पूर्व इच्‍छा पत्र (वसीयत) कऽ कऽ जाइ छैथ तँ हुनकर सम्‍पतिक हस्‍तान्‍तरण स्‍वत: ओइ बेकतीकेँ भऽ जाएत जेकरा सम्‍बन्‍धित इच्‍छा पत्रमे सम्‍पतिक अधिकारी बनौल गेल रहत। ओ बेकती माता, पिता, पुत्र, पुत्री, भाए, बहिन, भातिज, मित्र वा कियो अन्‍य भऽ सकैत छैथ। परन्‍तु जँ सम्‍पतिक मालिक बिना इच्‍छा पत्र बनौने मरि जाइ छैथ (Intestate) तखन ओइ सम्‍पतिक हस्‍तान्‍तरण आकि बँटबारा कानूनक अनुसार कोर्ट द्वारा होइत अछि। ऐ प्रक्रियामे सालो लागि सकैत अछि। खास कऽ जखन सम्‍बन्‍धित पक्ष परस्‍पतर विरोधी दाबा करैत हो। यदि सम्‍बन्‍धित पक्ष समझदार हुअए, आपसमे रजामन्‍दी होइक तखन ऐ तरह सम्‍पतिक निपटान असानीसँ भऽ जाएत। मुदा केतेको बेर सम्‍पतिकेँ मूल्‍यवान होइक कारणे बहिन वा बेटीक हक नहि देबाक कारण किंवा अहंक टकरावक कारण सम्‍पतिक बँटबारा/हस्‍तान्‍तरण परिवारिक कलह केर कारण भऽ जाइत अछि। अस्‍तु उचित ओ आवश्‍यक थिक जे जँ अहाँकेँ सम्‍पैत अछि तँ तेकर मृत्‍योपरान्‍त निस्‍तारण हेतु Will अबस्‍स करी। वसीयत कोनो बेकती द्वारा मृत्‍युक बाद ओकर स्‍वअर्जित सम्पतिक उत्तराधिकारीक बारेमे कानूनी घोषणा अछि जे ओइ बेकतीक जीवनकालमे बदलल वा रद्द भऽ सकैत अछि। मृत्‍युक बाद ओ लागू भऽ जाइत अछि। पैतृक सम्‍पतिक बारेमे वसीयत नहि कएल जा सकैत अछि। अस्‍तु वसीयत द्वारा स्‍वअर्जित सम्‍पतिक उत्तराधिकारी तय कएल जा सकैत अछि। भारतीय उत्तराधिकार कानून १९२५क धारा-२ (एच) मे वसीयतक कानूनी व्‍याख्‍या कएल गेल अछि। उपरोक्‍त कानूनक धारा ५क अनुसार वसीयत वा बिना वसीयतक स्‍वअर्जित सम्‍पित बेवस्‍था कएल गेल अछि। वसीयत केनिहारक उमर कम-सँ-कम २१ वर्ष हेबाक चाही। मानसिक रूपसँ स्‍वस्‍थ हेबाक चाही तथा बिना कोनो दबाबमे वसीयत करक चाही, ऐ सभ बातकेँ ओइमे उल्‍लेख करक चाही। इच्‍छा पत्र वसीयत केनिहारक जीवन कालमे कखनो ओकरा द्वारा बदलल जा सकैत अछि, संशोधित कएल जा सकैत अछि। मुदा वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बाद ओ तुरन्‍त लागू भऽ जाइत अछि। वसीयतक हेतु जरूरी अछि जे वसीयतकर्त्ता बिना कोनो दबाबसँ नहि, अपितु स्‍वेच्‍छासँ वसीयतमे अपन सम्‍पतिक वितरण करए। ओइ बेकतीकेँ मानसिक रूपसँ स्‍स्‍थ होएब जरूरी अछि जइसँ ओ निर्णय लेबक स्‍थितिमे हो। भारतमे इच्‍छा पत्र तैयार करबाक विधि बहुत असान अछि। सादा कागजपर बिना कोनो स्‍टाम्‍प पेपरक इच्‍छा पत्र टंकित कएल जा सकैत अछि। मुदा हस्‍तलिखित इच्‍छा पत्र केतेको कानूनी विवादमे लाभकारी भऽ सकैत अछि। वसीयतकर्त्ताकेँ इच्‍छा पत्रक प्रथम पैरामे स्‍पष्‍ट करक चाही जे ओ स्‍वेच्‍छासँ बिना कोनो दबाबक पूरा होशोहवासमे वसीयत कऽ रहल अछि। तेकर बाद समस्‍त सम्‍पतिक एक-एक कऽ फराक-फराक वर्णन हेबाक चाही। सम्‍पैत सबहक तत्‍कालीन मूल्‍य स्‍पष्‍टत: इच्‍छा पत्रमे लिखबाक चाही। तमाम बहुमूल्‍य कागजात रखबाक स्‍थान ओइमे स्‍पष्‍टतासँ लिखल जाए जइसँ समयपर ओ सभ ताकल जा सकए। वसीयतक भाषा सरल हेबाक चाही। वसीयतकर्त्ताक पूरा नाम लिखबाक चाही। वसीयतक सम्‍पतिक स्‍पष्‍ट विवरण हेबाक चाही। प्रस्‍तावित कानूनी उत्तराधिकारीक पूरा नाम हेबाक चाही। अन्‍तमे दूटा गवाहक नाम व पताक संग ओकर हस्‍ताक्षर हेबाक चाही। गवाह सामान्‍यत: ओहन बेकतीकेँ बनाबक चाही जे वसीयतकर्त्तासँ उम्रमे छोट होथि। यदि गवाहक मृत्‍यु पहिने भऽ जाइत अछि तँ फेरसँ वसीयत बना कऽ नव गवाहक हस्‍ताक्षर कराबक चाही। इच्‍छा पत्रमे हस्‍ताक्षरक संग तारिख अबस्‍स लिखबाक चाही। जँ एकसँ अधिक बेर इच्‍छा पत्र बनौल गेल तँ अन्‍तिम इच्‍छा पत्र लागू होइत अछि। बढ़िया हएत जे अन्‍तिम इच्‍छा पत्रमे पूर्व इच्‍छा पत्र सभकेँ निरस्‍त करबाक चर्च होइक। इच्‍छा पत्रकेँ जस-के-तस लागू करबाक हेतु बिसवासपात्र एवम्‍ जानकार बेकतीकेँ निष्‍पादक (Executor of will) बनाबक चाही जइसँ वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बाद वसीयतकेँ बिना लाइ-लपटक अमलीजामा देल जा सकए। वसीयतकर्त्ताकेँ चाही जे केकरो निष्‍पादक (Executor) नामित करैसँ पूर्व ओकर सहमति लऽ लेल जाए। वसीयतकर्त्ताकेँ दूटा गवाहक समक्ष हस्‍ताक्षर करक चाही। गवाहक पूरा नाम, पता सहित ओकर हस्‍ताक्षर जरूरी अछि। गवाह जँ चिकित्‍सक होइ तँ बढ़ियाँ जइसँ ओ स्‍पष्‍ट करत जे वसीयतकर्त्ता दिमागी रूपसँ स्‍वस्‍थ अछि। गवाह ओ निष्‍पादक अलग-अलग बेकती हेबाक चाही। वसीयतमे सम्‍पतिक हकदार गवाह नहि भऽ सकै छैथ। वसीयतक प्रत्‍येक पृष्‍ठपर संख्‍या लिखल जेबाक चाही एवम्‍ गवाह एवम् वसीयतकर्त्ताक स्‍पष्‍ट हस्‍ताक्षर हेबाक चाही। अन्‍तमे कुल पृष्‍ठ संख्‍या लिखल हेबाक चाही। ऐ प्रकारसँ तैयार वसीयतकेँ राखी केतए? कारण वसीयतक काज तँ ओइ बेकतीक मृत्‍युक बादे पड़ैत अछि आ तखन ओ ऐ विषयमे किछु कहक स्‍थितिमे नहि रहैत अछि। अस्‍तु वसीयतक दूटा मूल ओ हस्‍ताक्षरित प्रति बनाबी तँ बढ़ियाँ। एकटा प्रति बैंक लॉकरमे ओ दोसर प्रति निष्‍पादक वा तेहेन विश्वस्‍त बेकतीक संग रहक चाही। असलमे चाही तँ ई जे तमाम चीज, वस्‍तु, वसीयत, पासवर्ड आदिक जानकारी एकटा डायरीमे लिखि कऽ छोड़ि दी जइसँ मृत्‍युपरान्‍त अहाँक वारिसकेँ परेशानीसँ बँचौल जा सकए। एकबेर वसीयत केलाक बाद आवश्‍यकता भेलापर पूरक वसीयत द्वारा मूल वीयतमे संधोधन कएल जा सकैत अछि। मुदा बेर-बेर एहेन केलासँ वसीयतकेँ बदैल कऽ नव वसीयत कऽ लेब ज्‍यादा बढ़ियाँ होइत अछि। वसीयतकेँ निबन्‍धित कराबक आवश्‍यकता नहि अछि, मुदा जँ वसीयत द्वारा कोनो समाजसेवी संस्‍था (Chariable Organisation) केँ धन देबाक हो तखन वसीयतकेँ निबन्‍धित कराएब जरूरी अछि। जेना कि पहिने चर्च कऽ चूकल छी, वसीयत सम्‍बन्‍धित वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बादे लागू होइत अछि। जँ ओइमे स्‍पष्‍टता नहि रहत तँ मृत बेकती तेकर व्‍याख्‍या करक हेतु घुरि नहि औत। तँए वसीयतक भाषा सरल, स्‍पष्‍ट ओ बाध्‍यकारी हेबाक चाही। किन्‍तु-परन्‍तुसँ बँचबाक चाही। ओइ परिस्‍थितिक विचार हेबाक चाही जेकर घटित हेबाक संभावना जीवनमे बनल रहैत अछि। वसीयत केलाक बादो सम्‍पतिक मालिककेँ मृत्‍युसँ पूर्व ओकर निपटान करबाक अघिकार बनल रहैत अछि। कोनो बेकती जे कानूनी रूपसँ सम्‍पैत रखबाक अधिकारी अछि, वसीयतमे सम्‍पैत पाबक अधिकारी भऽ सकैत अछि। ओ नवालिग, भगवानक मूर्ति, कोनो तरहक कानूनी बेकती (Junstic person) भऽ सकैत छैथ। यदि कोनो नवालिगकेँ वसीयत द्वारा सम्‍पतिक उत्तराधिकारी धोषित कएल जाइत अछि तखन वसीयतकर्त्ता द्वारा अभिवावक नियुक्‍ति जरूरी अछि जे ऐ तरहेँ देल गेल सम्‍पतिक ओकरा वालिग हेबाकाल धरि बवस्‍था करताह। हिन्‍दू उत्तराधिकार कानून १९५६ क धारा ३०क अनुसार स्‍वअर्जित चल वा अचल सम्‍पतिक वसीयत द्वारा उत्तराधिकारी तय कएल जा सकैत अछि। वसीयतकर्त्ताक मृत्‍युक बाद वसीयतमे उल्‍लिखित उत्तराधिकारी सम्‍बन्‍धित न्‍यायालय द्वारा प्रोवेटक हेतु प्रार्थना कएल जाएत। प्रोवेट न्‍यायालय द्वारा आम प्रमाणित वसीयत थिक। प्रोवेट कोनो वसीयतक कानूनी रूपसँ पक्का हेबाक निर्णायक प्रमाण थिक। यदि कोनो उत्तराधिकारी द्वारा वसीयतकेँ कानूनी चुनौती देल जाइत अछि तँ सम्‍बन्‍धित पक्षकेँ नोटिस जारी हएत, सभ अपन पक्षमे न्‍यायालयमे राखि सकैत अछि। आ सबहक बातक विचारक बादे न्‍यायालय प्रोवेट जारी करत। न्‍यायालय प्रोवेट जारी करबासँ पूर्व सुनिश्चित करैत अछि जे वसीयतपर दस्‍तखत वास्‍तवमे वसीयतकर्त्ताक अछि ओ गवाह सभ वसीयतक समय मौजूद छल। वसीयत द्वारा हस्‍तान्‍तरित सम्‍पतिक मालिखितपर प्रोवेट कोर्ट विचार नहि करैत अछि। ओ तँ मात्र एतबे तय कऽ दैत अछि जे वसीयत (इच्‍छा पत्र) सही अछि कि नहि। वसीयतमे प्राप्‍त सम्‍पतिक मालिकाना हकपर सिविल न्‍यायालयमे सम्‍पतिक सम्‍बन्‍धित पक्षकार द्वारा चुनौती देल जा सकैत अछि। कहक माने जे जँ वसीयतमे देल गेल सम्‍पैतपर वसीयतकर्त्ता पूर्ण अधिकार नहि अछि, ओ सम्‍पैत ओकर स्‍वअर्जित नहि अछि आ तखनो ओकरा वसीयत द्वारा दऽ देल गेल अछि तखन ओकरा सम्‍बन्‍धित पक्षकार द्वारा सिविल न्‍यायालयमे चुनौती देल जा सकैत अछि। सारांश जे इच्‍छा पत्र द्वारा सम्‍पतिक हस्‍तांतरण हेतु जरूरी अछि जे सम्‍बन्‍धित सम्‍पैत स्‍वअर्जित होइक। इच्‍छा पत्रक भाषामे कोनो ओझर नहि होइक तइ लेल बढ़ियाँ होएत जे इच्‍छा पत्र (वसीयत) कोनो योग्‍य अधिवक्‍ता द्वारा तैयार करौल जाए, जइसँ इच्‍छाकर्त्ताक मृत्‍युक बाद ओइ सम्‍पतिक हस्‍तांतरणमे कोनो विवाद नहि होइक। विवादसँ बँचैक लेल तँ इच्‍छा पत्र बनौले जाइत अछि। तँए ओकरा स्‍पष्‍ट ओ कानूनी रूपसँ पक्का हएब बहुत जरूरी अछि। समयक कोन ठेकान। भविसक झंझट तय कऽ जाउ। अपन अर्जित सम्‍पतिक वसीयत (इच्‍छा पत्र) बना कऽ राखि दियौ आ चैनक बंशी बजाउ। ◌ २३.०६.२०१७ तिरुअनन्‍तपुरम दिल्‍लीसँ ९ बजे रातिमे हम सभ वायुयानसँ त्रिवेन्‍द्रम हवाइ अड्डापर उतरलौं। ऐ यात्रामे लगभग तीन घन्‍टा समय लगल। बेस पैघ जहाज रहइ जइमे तीन साएसँ बेसी यात्री एकसंग सवार रहैथ। बीचमे कोचीमे सेहो जहाज उतरल छल। बहुत रास यात्री ओहूठाम उतरला, मुदा काफी मात्रामे सवारो भेला। जे थोड़बे कालक यात्राक पछाइत त्रिवेन्‍द्रम पहुँच गेला। त्रिवेद्रम हवाइ अड्डापर उतरैत जहाज समुद्रक ऊपर जे भ्रमण करैत रहल, ओ दृष्‍य बहुत विहंगम छल..! त्रिवेन्‍द्रम हवाइ अड्डापर उतरलापर देखलौं जे ओइ जहाजसँ कएटा वीआइपी सेहो उतरलैथ। हुनका लोकनिक स्‍वागतक नाराक बीच हम सभ अपन गन्‍तव्‍य स्‍थानपर अर्थात् केरल सरकारक अतिथि गृह विदा भऽ गेलौं। केरल भारतक एकटा प्रान्‍त अछि। एकर राजधानी तिरुवनन्‍तपुरम अर्थात् त्रिवेन्‍द्रम अछि। मलयालम एकर मुख्‍य भाषा थिक। हिन्‍दू, मुसलमानक अलाबा ईसाइ सेहो काफी मात्रामे एतए रहै छैथ। अपन सांस्‍कृतिक ओ भाषा वैशिष्‍ट्यक कारण दक्षिणक चारि राज्‍यमे एकर फराक पहिचान अछि। पौराणिक कथाक अनुसार परशुराम अपन फरसा समुद्रमे फेकि देला, जइसँ ओही अकारक भूमि समुद्रसँ बाहर निकैल गेल ओ केरलक प्रादुर्भाव भेल। कहल जाइत अछि जे ‘चेट स्‍थल: कीचड़ ओ अलम प्रदेश’ शब्‍दक योगसँ ‘चेरलम’ शब्‍द बनल जे बादमे ‘केरल’ बनि गेल। बहुत दिन तक ई भू-भाग चेरा राजाक अधीन छल, ओहू कारणसँ एकरा चेरलम आ बादमे केरलम नाम पड़ल। केरलक प्राकृतिक सौन्‍दर्य अद्भुत अछि। तँए एकरा ईश्वरक अपन घर सेहो कहल जाइत अछि। समशीतोष्‍ण मौसम प्रचूर वर्षा, प्राकृतिक सौन्‍दर्य, सघन वन, समुद्र घट ओ चालीससँ अधिक नदी, सभ मिलि एकरा सचमुच पृथ्‍वीपर स्‍वर्गक रूप देने अछि। केरल भारतक दक्षिणी छोरपर अरब सागर ओ पच्‍छिमी घाटीक ५००-२७०० मीटर ऊँचाइपर अवस्‍थित अछि। केरलकेँ तीन भागमे विभाजित कएल गेल अछि- तटीय निचला इलाका, उपजाउ मिडलैण्‍ड आ हाइलैण्‍ड्स। केरलक निचला भागमे अन्‍तहीन वैकवाटर ओ चौआलिसटा नदी अछि। मिडलैण्‍ड्स काजू,नारियल, अकीका अखरोट, केरा, चाउर, अदरक, कारी मिर्च, कुसिआरक संग-संग आर-आर बहुत रास वनस्‍पतिक हेतु प्रसिद्ध अछि। जंगली हाइलैण्‍ड्स चाय,कॉफी, रबर, मसाला सबहक बगान ओ वन्‍यजीव सबहक लेल प्रसिद्ध अछि। केरलक शान्‍त समुद्र तट, नाना प्रकारक वन्‍यजीव, आकर्षक वैकवाटर, एवम्‍ आनन्‍ददायक वैकवाटर सभ जगत प्रसिद्ध अछि। सड़क मार्गसँ यात्रा केलापर केरलक मनोरम प्राकृतिक छटाक बेहतर आनन्‍द लेल जा सकैत अछि। दक्षिनी केरल अलेप्‍पीक वैकवाटरसँ तमिलनाडूसँ सटल दक्षिनी सीमाक तटीय क्षेत्र शामिल अछि। केरलक राजधानी त्रिवेन्‍द्रम, कोवलम ओ वरकला समुद्रीय तट एवम्‍ प्रतिष्‍ठित वैकवाटर ऐ क्षेत्रमे पड़ैत अछि। १९८० ईस्‍वीसँ पूर्व केरलमे बहुत कम पर्यटक अबैत छल। ओकर बाद स्‍थानीय सरकार लोकक भागीदारीसँ जबरदस्‍त प्रचार-प्रसार केलक जइसँ पर्यटक लोकनिक आवागमन बढ़ल। बहुत रास पर्यटक स्‍थल सबहक बेवस्‍था छोट-मोट कारोबारी सबहक हाथमे देल गेल जेना कि केरलक प्रसिद्ध वैकवाटर सभमे ९० प्रतिशत भागीदारी छोट-मोट कोरोबारी सबहक अछि। पहाड़सँ लऽ कऽ समुद्र तट तक पर्यटकक आराम ओ सुविधाक निरन्‍तर चेष्टा कएल गेल। परिणामत: केरलमे पर्यटकक आकर्षण बढ़िते गेल। केरलक राजधानी त्रिवेन्‍द्रम हम कएक बेर गेल छी। त्रिवेन्‍द्रममे कम खर्चमे सुरूचि पूर्ण ओ स्‍वादिष्‍ट भोजन उपलब्‍ध अछि। राज्‍य पर्यटन निगमक अतिथि गृहमे भोजन, जलखै आ चाह-पानक सुविधा तँ अछिए, आस-पासक केतेको ठाम इडली, बारा,कॉफी ओ चाह उपलब्‍ध रहैत अछि। भाषाक समस्‍या ओतेक जटिल नहि जेतेक की तामिलनाडूमे। लोक हिन्‍दी बुझैत अछि। हमर रहबाक बेवस्‍था केरल सरकारक अतिथि गृहमे छल जेकर जेतेक प्रशंसा कएल जाए से कम होएत। सभ सुविधासँ परिपूर्ण अतिथि गृहक शुल्‍क सेहो कमे अछि। कएकटा पैघ राजनेता सभ ओइठाम अबैत-जाइत रहैत छैथ, तॅँए कएक बेर ओतए स्‍थल भेटब आसान नहि रहैत अछि। यात्राक क्रममे हम ओइ ठामक प्रसिद्ध पद्मनाम मन्‍दिर पहुँचलौं। पद्मनाम मन्‍दिर दुनियाँक केनो धर्मक कोनो मन्‍दिरसँ धनिक अछि। बेसुमार सोना, चानी,जवाहरात ओइठाम सैंकड़ो सालसँ राखल अछि। कहल जाइत अछि जे ओइ सम्‍पैतमे अधिकांश ओइठामक राजा सबहक योगदान छैन जे अपनाकेँ पद्मनाम भगवानक दास बुझैत छला। दोसर बात जे सुनबामे आएल ओ ई जे स्‍थानीय राजा आक्रमणमे लूट-पाटसँ बँचेबाक हेतु अपन समस्‍त मूल्‍यवान वस्‍तु मन्‍दिरक तहखानामे रखबा देलखिन। जे जेना भेल होइ मुदा ओइ मन्‍दिरमे अकूट सम्‍पैत भरल अछि, जे राखल-राखल व्‍यर्थ भेल अछि। लोककेँ तँ तखन बुझबामे एलै जखन उच्‍चतम न्‍यायालयक आदेशपर पाँचटा तहखाना खोलल गेल ओ ओइमे राखल गेल अमूल्‍य वस्‍तु सबहक गणना होमए लगल। जेतेक वस्‍तु हिसाव-किताव भेल तेकरे मूल्‍य लाखो कड़ोरमे भऽ जेबाक अनुमान अछि। छठम तहखाना धार्मिक किम्‍ववंतीक कारण नहि खोलल गेल। कहबी छै जे ओकरा जे खोलत से जीवित नहि रहत। आदि-आदि। हम जखन ओइ मन्‍दिरमे गेल रही तँ उपरोक्‍त समाचार सभ आबि गेल रहैक मुदा केतौ किछु बाहरसँ सुनबामे नहि आएल, आ नहियेँ किछु देखाएल। दद्मनाम मन्‍दिरमे पहुँचलाक बाद सभसँ पहिने सर्ट-पैन्‍ट निकालि कऽ धोती पहिरए पड़ल। धोती ओहीठाम मन्‍दिर प्रबन्‍धक द्वारा उपलब्‍ध करौल जाइत अछि। तेकर बाद पक्‍तिवद्ध भऽ दर्शन होइत अछि। चूँकि हमरा जोगार छल, अस्‍तु भीआइपी दर्शन करबाक मौका भेटल छल। सभसँ आगू एकदम गर्भ गृहमे जा कऽ पद्मनाम भगवानक दर्शनक सौभाग्‍य हमरा भेटल। संयोगसँ भारत सरकारक सेवा निवृत सचिव सेहो दर्शन करए गेल छेली। हम हुनका संगे काज केने रही। चूँकि ओ पाछाँ रहैथ, तँए हम हुनका नहि देख सकलयैन। ओहो केरल सरकारक अतिथि गृहमे ठहरल रहैथ। ओइठाम स्‍वागत कक्षमे हुनकासँ भेँट भेल। ओ कहली जे पद्मनाम मन्‍दिरमे हमरा देखने छेली। त्रिवेन्‍द्रम यात्राक सन्‍दर्भमे गप-सप्‍पक बाद हम सभ अपन-अपन कक्षमे चलि गेलौं। पद्मनाम मन्‍दिरमे विष्‍णु भगवान अनन्‍द सयनम मुद्रामे आदि शेष नागपर पड़ल छैथ। ओ ओइठामक राजवंशक कुल देवता मानल जाइत छैथ। ३ जनवरी १७५०क त्रावणकोरक महाराजा महाराज श्री अनीझुम थिरूनाल त्रावणकोर राज्‍यकेँ भगवान पद्मनाम स्‍वामीकेँ समर्पित कए स्‍वयंकेँ हुनकर दासक रूपमे घोषित कए देला। तेकर बादे ओ स्‍वयं ओ हुनकर उत्तराधिकारी श्री पद्मनाम दासक उपाधि ग्रहण कए लेलैथ। ऐ प्रकारेण त्रावणकोर सम्‍पूर्ण राज्‍य भगवान पद्मनाम स्‍वामीक समर्पित भऽ गेल। श्री पद्मनाम दासक उपाधि प्राप्‍त करक हेतु राजकुलक नवजात शिशुकेँ प्रथम जन्‍म दिवसपर श्री पद्मनाम मन्‍दिरक मोटक्कालमण्‍डपमपर राखि कऽ जलाभिषेक कएल जाइत अछि। तेकर बादे ओ श्री पद्मनाम दासक उपाधि रखबाक पात्र माल जाइ छैथ। त्रावणकोरक अन्‍तिम महाराजा मार्तण्‍डवर्गाक जन्‍म २२ मार्च १९२२ केँ भेलैन। हुनकर पिताक नाओं रवि वर्मा ओ माता संथु पारवथी वयी (कनिष्‍ठ महारानी) छेलैन। ९१ वर्षक उमेरमे १६ दिसम्‍बर २०१३ केँ हुनकर मृत्‍यु भऽ गेल। हुनकर मृत्युक बाद ओइ राजवंशक प्रतीकात्‍क उपस्‍थिति समाप्‍त भऽ गेल। सन्‍ १९७१क संविधान संशोधनक बाद राजा/महाराजा सबहक उपाधि समाप्‍त भऽ गेल। तँए त्रावणकोरक कानूनी शासक तँ केरल सरकार भऽ गेल आ महाराजाकेँ मन्‍दिरक देख-भालक कानूनी अधिकारपर प्रश्‍नचिन्‍ह लागि गेल। केरल उच्‍च न्‍यायालय ऐ विवादमे अही तरहक बेवस्‍था देलक। महाराजा मार्तण्‍ड वर्मा सन्‍ १९४७ मे स्‍वतंत्रताक समयमे त्रावणमोरक भारतमे विलयक अन्‍तिम गवाह छला। कहल जाइत अछि जे त्रावणमोरक राज परिवार ओकरा स्‍वतंत्र राष्‍ट्र रखबाक पूरजोर प्रयास केलक, जे अन्‍ततोगत्‍वा सफल नहि भेल आ त्रावणमोर भारतक हिस्‍सा बनि गेल। स्‍वतंत्राक बाद बदलल महौलमे राज परिवारक अनेको सदस्‍य राज्‍यसँ बाहर जाए सामान्‍य नागरिक जकाँ जीवन-यापन करए लगलाह। महाराजा मार्तण्‍ड वर्मा सेहो सपरिवार बंगलोर चलि गेला। सन् १९९१मे महाराजा चिथिर लरुनलक मृत्‍युक समय जनतामे जवरदस्‍त सहानुभूति देखल गेल। तेकर बादे मार्तण्‍ड वर्माकेँ लोक महाराजा कहए लागल। पद्मनाम मन्‍दिरक सामने बनल राज महलक चोटीपर घड़ी मेघान मणिक नामसँ जानल जाइत अछि। ई करीब साए साल पुरान अछि। ई प्राचीन समयक अभियांत्रिक चमतकारक नमूना अछि। घड़ीक आकर्षण ओइमे राक्षसक मुखैटाक संगे-संग दुनू कात विद्यमान बकरा अछि। जहाँ घन्‍टा पुरैत अछि, राक्षस अपन मुँह खोलैत अछि। आ दुनू बकरा ओकर गालपर चाटी मारैत अछि। जइसँ घण्‍टाक जोरदार स्‍वर निकलैत अछि आ राक्षस अपन मुँह बन्न कऽ लैत अछि। जेतेक बाजल रहैत अछि। तेतेक बेर ओ प्रतिक्रिया दोहराइत अछि। कहक माने जँ चारि बजतै तँ चारि चमेटा ओइमे राक्षसकेँ दुनू बकरा मारतै आ चारि बेर घण्‍टाक अबाज सुनैमे औत। अछि ने चमतकारी यन्‍त्र? मुदा आब ओ घड़ी केतेको सालसँ खराप पड़ल अछि। पद्मनाम स्‍वामी मन्‍दिरक सामने कुथीरमलिका पैलेश म्‍युजियम अछि। ऐ महलक निर्माता गावणकोरक महाराजा स्‍वाथी थीरुनल बलराम वर्मा छला। ओ महान कवि, समाज सुधारक, गायक एवम्‍ राजनेता छला। ऐ संग्रहालयमे नाना प्रकारक अमूल्‍य पेंटिंग सभ राखल अछि। ऐ संग्रहालयकेँ सोम दिन छोड़ि कऽ कोनो दिन प्रात: साढ़े आठ बजेसँ एक बजे आ तीन बजेसँ साढ़े पाँच बजेक बीचमे देखल जा सकैत अछि। प्रति वर्ष ४ सँ १३ जनवरीक बीचमे ओइठाम महाराजा स्‍वाथी थीरुलक स्‍मृतिमे संगीत उत्‍सव मनौल जाइत अछि। महलसँ मन्‍दिर जएबाक गुप्‍त मार्ग अछि जइ बोटे महाराजा नित्‍य पद्मनाम मन्‍दिरमे पूजा अर्चना करैत छलाह। अखनो भोरक एक घन्‍टा समय भगवानक पूजाक हेतु महाराजाक हेतु आरक्षित अछि। महाराजा पूजा कऽ लइ छैथ तखने आम जनताकेँ मन्‍दिरमे प्रवेशक अनुमति भेटैत अछि। राजमहलमे तरह-तरह केर वस्‍तु सभ (जे महाराजाकेँ भेँटमे देल जाइत छल) राखल अछि। महलक अधिकांश हिस्‍सा बन्‍द पड़ल अछि। कहल जाइत अछि जे ऐ महलक निर्माणक थोड़बे दिनक बाद महाराजाक मृत्‍यु भऽ गेल। तँए एकरा अशुभ बुझि महलकेँ छोड़ि राज परिवार आनठाम रहए लागल। सायं काल हमरा लोकनि त्रिवेन्‍द्रमक कोवलम समुद्र तटपर गेलौं। दूर-दूर तक देखाइत स्‍वच्‍छ जल, दीर्घ समुद्र तट ओ दूरगामी क्षितिजक अद्भुत दृश्‍य उत्पन्न करैत अछि। समुद्र तटपर प्रकाश स्‍तम्‍भ दूरेसँ देखल जा सकैत अछि। सूर्यास्‍तक छटा ओ अकासक मनमोहक रंग समुद्रतट प्रेमीकेँ सबहक आनन्‍दकेँ पराकाष्‍ठा (Climex) पर पहुँचा दैत अछि। केतेको बेकती समुद्रतट पर साइकिल चलेबाक आनन्‍द लैत देखबामे एला। प्रात भेने हमरा लोकनि वर्कला समुद्र तटपर गेलौं। ओइठामसँ अरब सागरक अद्भुत दृष्‍य देखलौं। ओही क्रममे त्रिवेद्रमक दछिनबरिया भागमे अवस्‍थित पूवार नामक गाम सेहो देखए गेलौं। ओइठाम वैकवाटर ओ टापूक संगम स्‍थल हेबाक कारण पर्यटककेँ अद्भुत आनन्‍दक अवसर प्रदान करैत अछि। त्रिवेन्‍द्रमसँ कन्‍याकुमारी रोडसँ जेबाक रस्‍तामे पद्मनाम पैलेश पर्शनीय थिक। ई वस्‍तुत: आजुक तामिलनाडूमे पड़ैत अछि, मुदा ऐ महलक बेवस्‍था एवम्‍ शासन केरल सरकारक अधीन अछि। पद्मनामपुरम पैलेश १६ मी शताब्‍दीक शानदार लकड़ीक महल थिक। १५५० सँ ई १७५० तक रहल त्रावणकोरक राजा लोकनिक ई महल छल। ई वस्‍तु कलाक केरलक स्‍वदेशी शैलीक उत्‍कृष्‍ट नमूना अछि। प्राचीन आंतरिक अंदरुनी रोझवेड नक्‍काशी ओ मुर्तिकला सजाबटसँ भरल अछि। महलमे १७म ओ १८म शदीक भित्ति चित्र शामिल अछि। महोगनीमे संगीत धनुष, रंगीन अभ्रकक संग खिड़की, चीनी नक्काशीक संग शाही कुर्सी, अद्भुत आकर्षण उत्‍पन्न करैत अछि। राजमाताक महलमे ९० अलग-अलग प्रकारक पुष्‍प डिजाइनक संग लकड़ी ओ सौगानक नक्काशीदार छत आकर्षणक केन्‍द्र अछि। पर्यटककेँ पद्मनाम पैलेश देख कऽ आनन्‍द तँ होइते छैन जे तत्‍कालिन राज घरानाक वैभवक पराकाष्‍ठाक सद्य: प्रमाण सेहो देखबामे अबैत अछि। महलक विभिन्न भागमे घुमैत-घुमैत हम सभ थाकि गेलौं। बाहर आबि कऽ थोड़ेकाल धरि छाहैरमे सुस्‍तेलौं आ तेकर पछाइत कन्‍याकुमारी दिस विदा भेलौं। ◌ १५ जुलाइ २०१७ कानूनी आतंकवाद (भारतीय दण्‍ड संहिता धारा- ४९८ ‘ए’, IPC 498 ‘A’) परंपरागत रूपसँ परिवारिक जीवनमे स्‍त्री अपन पति केर सहायकक रूपमे काज करैत छल। समस्‍या तखन बढ़ि गेल जखन पति-पत्नीक आपसी सम्‍बन्‍धक कटुता परिवारक चौकैठसँ आगू बढ़ल। सहैत-सहैत महिलाक जीवन व्‍यर्थ ओ दुष्‍कर हुअ लगल, आ ओइ परिस्‍थितिसँ मुक्‍तिक एकमात्र उपाय आत्‍म हत्‍या बुझि पड़ए लगलइ। केतेको महिला द्वारा ऐ तरहेँ आत्‍म हत्‍या केलाक बाद समाजक आत्‍मा आइपीसी- धारा- ४९८ ‘ए’ सन हिंसक कानूनक जन्‍म देलक। ऐ कानूनकेँ लागू भेलाक बाद गलत वा सही महिला द्वारा आरोपक एफआइआर थानामे दर्ज भेल। पछाइत पति एवम्‍ ओकर परिवार–अर्थात्‍ वयोवृद्ध माता,पिता एवम्‍ छोट-छोट बच्‍चा सभ सेहो–पुलिसक कृपापर निर्भर रहि ऐ हद तक भऽ जाइ छला जे जखन हुनका पुलिस चाहत तँ जेलमे बन्‍द कऽ दैत। सन्‍ १९८३ मे फौजदारी कानूनमे संशोधन कऽ भारतीय दण्‍ड संहिता (आई.पी.सी.)मे अनुच्‍छेद ४९८ ‘ए’ जोड़ल गेल जइमे मूलत: निम्नलिखित प्रावधान छल- १. जखन कखनो पति वा ओकर सम्‍बन्‍धी महिलाक संग क्रुड़ता करत तँ अपराधीकेँ तीन साल तकक कैद हएत, संगे जुर्माना सेहो भऽ सकैत अछि। ऐ अनुच्‍छेद हेतु क्रुड़ताक अर्थ अछि- (क) जानि कऽ कएल गेल एहेन बेवहार, जइसँ सम्‍बन्‍धित महिला आत्‍म हत्‍या करबाक स्‍थितिमे पहुँच जाए किंवा महिलाकेँ शारीरिक वा मानसिक स्‍वास्‍थ्‍यकेँ गंभीर क्षति पहुँचैक। (ख) सम्‍बन्‍धित महिला वा ओकर निकट सम्‍बन्‍धितसँ सम्‍पैत वा कोनो मूल्‍यवान वस्‍तुक गैर कानूनी मांग करब आ एहेन मांग नहि पूरा भेलापर वा तइ हेतु प्रतारणा करब। भारतीय दण्‍ड संहिताक धारा ४९८ ‘ए’ संज्ञेय, गैर जमानती और गैर-संगठित अपराध थिक। अपराध संज्ञेय एवम्‍ असंज्ञेयमे विभाजित कएल गेल अछि। कानूनी तौरपर संज्ञेय अपराधक जॉंच करब एवम्‍ शिकायत दर्ज करब पुलिसक कर्तव्‍य थिक। ४९८ ‘ए’ एकटा संज्ञेय अपराध थिक। अपराध जमानती वा गैर जमानती भऽ सकैत अछि। ४९८ ‘ए’ गैर जमानी अछि। एकर माने भेल जे न्‍यायिक दण्‍डाधिकारी (मजिस्‍ट्रेट) केँ जमानत देबाक किंवा आरोपित बेकतीकेँ न्‍यायिक वा पुलिस हिरासतमे पठा देबाक अधिकार छइ। चूँकि ४९८ ‘ए’ गैर संगठित अपराधक श्रेणीमे अबैत अछि, अस्‍तु याचिकाकर्त्ता एकरा आपस नहि लऽ सकै छैथ। (मुदा जँ सम्‍बन्‍धित पक्ष मामलाकेँ आपसमे सोझराबैले न्‍यायालयसँ आवेदन करै छैथ, तखन न्‍यायालय मामलाकेँ आपस लेबाक अनुमति प्रदान कऽ सकैत अछि।) कानूनक उपरोक्त प्रावधानमे क्रुड़ताक प्रयोग निम्नलिखित प्ररिस्‍थितिमे कएल गेल अछि- १. एहेन बेवहार जइसँ महिला आत्‍म हत्‍या हेतु प्रेरित हो। २. एहेन बेवहार जइसँ महिलाक जीवन, शरीर वा स्‍वास्‍थ्‍यपर गंभीर समस्‍या उत्‍पन्न भऽ जाइक। ३. महिला वा ओकर सम्‍बन्‍धीक सम्‍पैत लेबाक उद्देश्‍यसँ कएल गेल प्रतारणा। ४. महिला वा ओकर सम्‍बन्‍धी द्वारा आर पैसा वा सम्पतिक हिस्‍साक मांग नहि मानबाक कारण प्रतारणा। यद्यपि ऐ कानूनकेँ लागू करबाक उद्देश्‍य विवाहित महिलाकेँ दहेज-लोभी पति एवम्‍ ओकर परिवार द्वारा प्रतारणासँ रक्षा करब छल, मुदा बेवहारमे एकर तेतेक दुरुपयोग भेल जे उच्‍चतम न्‍यायालय सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत सरकारक मामलामे आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ केँ कानूनी आतंकवादक रूपमे निन्‍दा केलक। उपरोक्त कानूनसँ पुलिस द्वारा लोकक लौकिक अधिकारक उल्‍लंघनक संभावना बढ़ल। ऐसँ निर्दोष लोक कानूनी धनचक्करक शिकार भेल एवम्‍ मजबूर भऽ कऽ वर्षो-वर्ष कोट-कचहरीक दरबज्‍जा खटखटबए लगल। तेतबे नहि, ऊपरसँ पुलिसक धनबल, राजनीतिक हस्‍तक्षेप, किंवा समाजमे प्रभवशाली वर्गक लिप्‍तता सेहो तइ रूपे काज करए लगल जे ओइ पति एवम्‍ ओइ परिवारक बुझू भगवाने मालिक..! केतेको मामलामे ऐ कानूनक दुरुपयोग विवाहित महिला द्वारा बर पक्षसँ अधिक-सँ-अधिक पैसा ओसलब, किंवा एहेन परिस्‍थिति निर्माण करब रहैत अछि जइसँ जान छोड़ेबाक लेल बर पक्षक लोक महिला पक्षक अनुचितो मांग मानैले बेवस भऽ जाइ छैथ। दहेज निषेध अधिनियम १९६१क धारा २ केर अनुसार दहेज लऽ कऽ माने बिआहसँ पूर्व, बिआहक समय वा बिआहक बाद कहियो देल गेल सम्‍पैत या मूल्‍यवान धरोहरसँ अछि- (१) जे बिआहक एक पक्ष द्वारा दोसरकेँ देल जाइत अछि। (२) माता-पिता वा कोनो आन बेकती द्वारा देल गेल। मुदा मुस्‍लिम विवाह कानूनक अधीन देल गेल मेहर वा (dower) ऐमे शामिल नहि अछि। विवाहक समय कोनो पक्ष द्वारा देल गेल नगदी, गहना, कपड़ा वा अन्‍य कोनो वस्‍तु दहेज नहि मानल वशर्ते ई वस्‍तु सभ विवाहक शर्तक अधिन नहि देल जाइत हो। ऐमे मूल्‍यवान धरोहरक अर्थ भारतीय दण्‍ड संहिता (आइपीसी)क धारा ३०क अनुकूल अछि। आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ मात्र पत्नी, पुतोहु वा ओकर सम्‍बन्‍धी द्वारा लागू कएल जा सकैत अछि। उच्‍चतम/उच्‍च न्‍यायालय बारम्‍बार ई स्‍वीकार केलक अछि जे कानूनक उपरोक्‍त धाराक अधीन ज्‍यादातर मामला झूठ रहैत अछि। अधिकांश मामलामे एकर दुरुपयोग वैवाहिक जीवनमे विवादक स्‍थितिमे पत्नी वा ओकर निकट सम्‍बन्‍धी द्वारा पति वा ओकर निकट सम्‍बन्‍धीकेँ ब्‍लैकमेल करबाक हेतु कएल जाइत अछि। एहेन परिस्‍थितिमे शिकायतकर्त्ता प्रचुर मात्रामे पैसाक उगाहीक प्रयास करै छैथ। एहेन अनगिनित उदाहरण सामने आएल अछि जइमे बिना जाँच-पड़ताल केने पुलिस बुजुर्ग माता-पिता, अविवाहित बहिन, गर्भवती भौजी एवम्‍ छोट-छोट बच्‍चाकेँ गिरफ्तार कऽ लेलक। ऐ तरहक मामलामे निर्दोष लोक मानसिक यातना एवम्‍ उत्‍पीड़नक शिकार भऽ जाइ छैथ। सामान्‍यत: एहेन मोकदमा ५-६ साल चलैत अछि आ मात्र २० प्रतिशत लोककेँ सजा होइत अछि। एहनो भेलै जे जेलसँ छुटि कऽ पति वा आरोपित माता-पिता आत्‍महत्‍या कऽ लेलक। चन्‍द्रभान बनाम राज्‍यक मामलामे दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय कहलक जे ऐमे कोनो संदेह नहि अछि जे अधिकांश एहेन शिकायत छोट-छोट बातपर आपसी अहं एवम्‍ टकरावक कारण तामसमे कएल जाइत अछि जेकर सभसँ गंभीर खामियाजा परिवारक छोट-छोट बच्‍चा सभ भोगैत अछि। अस्‍तु न्‍यायालय पुलिसकेँ निम्नलिखित आदेश देलक। (१) एफआइआर रूटिनमे पंजीकृत नहि कएल जाए। (२) पुलिसक प्रयास हेबाक चाही जे मामलाकेँ गंभीर जॉंच-पड़तालक बादे एफआइआर दर्ज करए। (३) आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’/४०६ क अन्‍तर्गत कोनो मामला बिना डीसीपी (उपायुक्‍त पुलिस) एवम्‍ अतिरिक्‍त डीसीपीक आदेशक दर्ज नहि हएत। (४) एफआइआर (पंजीकृत करबासँ पूर्व आपसी समझौताक हर संभव प्रयास कएल जाए आ जौं समझौताक कोनो आश नहि रहि जाइक तँ सभसँ पहिने स्‍त्रीधन आ दहेजक वस्‍तुकेँ सम्‍बन्‍धित महिलाकेँ आपस करौल जाए। (५) मुख्‍य अभियुक्‍तक गिरफ्तारी एसीपी (सहायक आयुक्‍त) अथबा डीसीपी (उपायुक्‍त)क स्‍वीकृतिसँ मामलाकेँ पूरा जाँच-पड़तालक बादे कएल जाए। (६) संपार्श्‍वक अभियुक्‍त (जेना सासु-ससुर)क मामलामे मिसिल (लाइल)मे डीसीपीक स्‍वीकृति जरूरी अछि। ऐ मामलामे न्‍यायालय ईहो आदेश देलक जे महिलाक उत्‍थान हेतु कार्यरत्‍ स्‍वयंसेवी संगठन एवम्‍ अन्‍य कानूनी संस्‍था सभ ऐ बातक पूरा प्रयास करए जे सम्‍बन्‍धित पक्ष सभकेँ आपसी सहमति बनि जाइक। मामलाकेँ न्‍यायालय पहुँचलाक बादो ऐ बातक लेल न्‍यायालय प्रयास करए। चाही तँ ई जे बिना बाहरी हस्‍तक्षेपक सम्‍बन्‍धित पक्ष मामलाकेँ आपसमे सोझरा लिअए। टी.आर. रमैयाक मामलामे मद्रास उच्‍च न्‍यायालसँ ऐ तरहक निर्देश दैत स्‍पष्‍ट केलक जे एहेन मामलामे पुलिसिया कार्रवाइ पयाप्‍त सावधानी एवम्‍ एहेन छान-बीनक बादे कएल जाएत। ललिता कुमारी बनाम राज्‍यक मामलामे उच्‍चतम न्‍यायालय ऐ बातपर विचार कए रहल अछि जे एहेन मामला उपस्‍थित भेलापर पुलिस द्वारा एफआइआर दर्ज करब अनिवार्य अछि किंवा तइसँ पहिने प्राथमिक पूछताछ जरूरी अछि। चूँकि ई मामला विचराधीन अछि अस्‍तु विभिन्‍न उच्‍च्‍ न्‍यायालय द्वारा देल गेल आदेश/निर्णयक सन्‍दर्भमे पुलिस कार्रवाइ करैत अछि। उच्‍चम न्‍यायालय द्वारा ऐ मामलाक निर्णयक बादे एहेन मामलामे एफआइआर करबाक दशा ओ दिसा अन्‍तिम रूखि लेत। ऐ कानूनसँ भयक वातावरण तँ बनल मुदा एकर दुरुपयोग ज्‍यादा होमए लागल। कनेको निर्दोष लोककेँ लोभ, किंवा प्रतिशोधक आवेशमे फँसा देल गेल। कएक बेर तँ पति एवम्‍ ओकर परिवारकेँ ऐ लेल फँसा देल गेल जे सम्‍बन्‍धित विवाहित महिला ओइ वैवाहिक जीवनसँ हटि कऽ प्रेमीक संग विवाह करए चाहैत छेली। केतेक बेर एहनो भेल जे पति-पत्नी बादमे मिलय चाहैत छल, अपन-अपन गलतीक अहसास करैत छल, मुदा ताधैर अपराधिक मोकदमाक जालवृत्तिमे फँसि चूकल छल, मुदा ओइसँ निकलत केना? कारण ई कानून Non Compoundable अछि माने शिकायतकर्त्ता स्‍वयं चाहियो कऽ एकरा आपस नहि लऽ सकैत अछि। ऐ सभ परिस्‍थितिमे मामला कतेको बेर उच्‍च न्‍यायालय एवम्‍ उच्‍चम न्‍यायालय पहुँचल जैठाम विचारणीय प्रश्‍न छल जे आखिर ऐ तरहक मामला चलबैत रहबाक की औचित्य अछि खास कऽ जखन कि पति-पत्नी आपसमे बातकेँ सलैट कऽ आपसी सहमति बना सुखी परिवारिक जीवन जीबए चाहैत होथि?आखिर एहेन मोकदमा जँ चलितो रहल तँ ऐमे सँ किछु निकलत नहि, कारण शिकायतकर्त्ता अपन बातसँ मुकैर जाएत। मामला कमजोर पड़ि जाएत, चाहे निरस्‍त निरस्‍त भऽ जाएत। मुदा एकर दोसरो पक्ष छल जे केतेको बेर समझौताक आडम्‍बर कऽ गरीब एवम्‍ कमजोर महिलाकेँ अपन शिकायत आपस लेबाक हेतु अनुचित दवाब बनौल जा सकैत अछि। मामला आपस लैतो पुनश्‍य यंत्रणाक नवीनीकरण भऽ सकैत अछि। ऐ सभ प्रश्‍नपर विभिन्न न्‍यायालयमे बारंबार विचार भेल। विवाह सम्‍बन्‍ध विच्‍छेदक प्रक्रियामे लम्‍बित मामलामे दुनू पक्षकेँ मौका पबैत आपसी सहमति बनबैक अवसर न्‍यायालय प्रदान करैत अछि। तहिना आइपीसी ४९८ ‘ए’सँ सम्‍बन्‍धित अपराधिक मामलामे यदि दुनू पक्ष आपसमे बातकेँ सोझराबए चाहैत अछि, सलैट लिअ चाहैत अछि तँ उच्‍च न्‍यायालय सीआरपीसीक धारा ४८२क अधीन अपन विशेषाधिकारक प्रयोग करैत मामलाकेँ रद्द कऽ देबाक आदेश दऽ सकैत अछि। उपरोक्‍त विषयसँ सम्‍बन्‍धित मामला उच्‍चतम न्‍यायालयक समक्ष जीतेन्‍द्र रघुवंशी एवम्‍ अन्‍य बनाम बबीता रघुवंशी एवम्‍ अन्‍य आएल। (जइमे पूर्वमे उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा बी.आर. जोशी बनाम हरियाणा सरकारक निर्णयकेँ बहाल राखल गेल।) जइमे कहल गेल छल जे सीआरपीसीक धार ४८२ क अधीन अधीन उच्‍च न्‍यायालय न्‍यायक हितमे अपराधिक प्रक्रिया वा एफआइआर रद्द कऽ सकैत अछि आ सीआरपीसीक धारा ३२० ऐमे बाधक नहि हएत। प्रीति गुप्‍ता बनाम झारखण्‍ड सरकारक मामलामे उच्‍चतम न्‍यायालय आइपीसी- धारा ४९८‘ए’ केर अधीन कएल गेल शिकायतक दुरुपयोग एवम्‍ बढ़ैत ममलाकेँ धियानमे रखैत केन्‍द्र सरकारकेँ उपरोक्‍त कानूनक समीक्षा करबाक हेतु कहलक। तदनुसार भारत सरकारक आग्रहपर विधि आयोग ऐ विषयमे गंभीरतासँ विचार करैत अपन २४३म प्रतिवेदनमे संस्‍तुति केलक जे ऐ अपराधकेँ न्‍यायालयक आज्ञासँ (Compoundable) बना देबाक चाही मुदा आयोग ऐ अपराधकेँ गैरजमानती बनौने राखए चाहलक ताकि समाजक दूरगामी कल्‍याणकेँ धियान रखैत ऐ कानूनक धार भोथ नहि होइक। ओयोगक कहब जे गिरफ्तारी सम्‍बन्‍धी लागू कानूनी निर्देश एवम्‍ मामलाक गहन छानबीन केलासँ एवम्‍ हिंसा सन गंभीर परिस्‍थितियेमे गिरफ्तारी केलासँ ऐ कानूनक दुरुपरोगसँ बँचल जा सकैत अछि। जुलाइ २०१४ मे न्‍यायमुर्ति सीके प्रसाद एवम्‍ पी.सी. घोषक उच्‍चतम न्‍यायालयक बैच द्वारा देल गेल निर्णयमे स्‍पष्‍ट कएल गेल जे धारा ४९८ ‘ए’ केर अधीन बिना मजिस्‍ट्रेटक आदेशक गिरफ्तारी नहि एहत। उच्‍चतम न्‍यायालयक कहब छल जे अधिकांश एहेन मामलामे महिला ऐ कानूनक दुरुपयोग करैत पति, सासु,ससुर आदिसँ बदला लइ छैथ। ऐ तरहक प्रकरणमे बहुत कम लोककेँ सजा धोषित हेबाक उद्धत करैत माननीय न्‍यायालय राज्‍य सरकार सभकेँ आदेश देलक जे पुलिस क्रीमिनल प्रोसीड्योर कोड (सीपीसी) क धारा ४१मे वर्णित मानकक अनुसरण करए एवम्‍ अपवादिक मामलामे अत्‍यावश्‍क भेने आरोपित बेकतीक गिरफ्तारी करए। सम्‍बन्‍धित मजिस्‍ट्रेट सीपीसीक धारा ४१ क अधीन पुलिस द्वारा प्रेषित प्रतिवेदनक विवेचना करैत बेकतीगत रूपसँ संतुष्‍ट भेलाक बाद एवम्‍ तेकर औचित्‍यक लिखित आधार बनबैत गिरफ्तारीक स्‍वीकृति प्रदान करए। उपरोक्‍त मामलामे फैसला दैत माननीय न्‍यायाधीशगण कहलैथ जे सन्‍ २०१२ मे दू लाख बेकती ऐ कानूनक अन्‍तर्गत गिरफ्तार भेला। जे सन्‍ २०११क संख्‍यासँ ९.४ प्रतिशत ज्‍यादा अछि। जइमे लगभग एक चौथाइ (४७९५१) महिला छेली। ऐसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि जे आरोपित पतिक माए, बहिनकेँ सेहो काफी तादादमे गिरफ्तार कऽ लेल गेल। उपरोक्‍त कानूनक तहत आरोप पत्रक दर ९३.७ प्रतिशत अछि जखन कि मात्र १५ प्रतिशत लोककेँ अन्‍तत: दण्‍डित कएल जा सकल। विभिन्न ट्रायल कोर्टमे ३७२७०६ मामला लम्‍बित अछि जइमे सँ लगभग ३१७००० मामलामे आरोपितकेँ छुटि जेबाक संभावना अछि। माननीय उच्‍चतम न्‍यायालयक कहब छल जे गिरफ्तारी बेकतीगत स्‍वतंत्रताक हनन तँ करिते अछि, संगे ई अपमान-जनक सेहो अछि। स्‍वतंत्रताक छह दशक बादो पुलिस अखन धरि उत्‍पीड़न, उत्‍पीड़नक साधनक रूपमे जानल जाइत अछि, जनताक मित्र तँ नहियेँ। अतएव उच्‍चतम न्‍यायालय गिरफ्तारीमे सावधानीसँ निर्णय लेबाक हेतु मजिस्‍ट्रेट लोकनिकेँ अगाह केलक। इन्‍दरराज मलिक एवम्‍ अन्‍य बनाम श्रीमती सुमिता मलिकमे दिल्ली उच्‍च न्‍यायालय बेवस्‍था केलक जे आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ दहेज निवारण कानूनक धारा ४ सँ एकदम अलग अछि, कारण दहेज कानूनमे मात्र दहेजक मांगसँ अपराध भऽ जाइत अछि। जखन कि आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’ मे पति तथा पतिक परिवार द्वारा दहेजक मांग संगे-संग क्रुड़ताक बेवहार जरूरी अछि। आधुनिकीकरण, शिक्षा, वित्तीय सुरक्षा एवम्‍ बेकतीगत स्‍वतंत्रतामे वृद्धिक संग कट्टरपंथी महिला सभ आइपीसी- धारा ४९८ ‘ए’केँ एकटा हथियारक रूपमे दुरुपयोग कऽ रहल छैथ। कानून बनलाक केतेको सालक बादो ऐ कानूनक उचित समीक्षा नहि भेल जइ कारणसँ एकर दुरुपयोगक मामलामे लगातार वृद्धि भेल आ निर्दोष एवम्‍ व्‍यर्थमे फँसौल गेल पति तथा ओकर सम्‍बन्‍धी त्राहिमाम कए रहल छैथ। विभिन्न न्‍यायालय, गैर सरकारी संगठन सभ ऐ विषयपर लगातार मंतव्‍य दऽ रहल छैथ, कानूनमे संशोधनक हेतु सेहो चर्चा होइत रहैत अछि। मुदा ऐठाम ईहो महत्‍वपूर्ण अछि जे एक पक्षीय संशोधनसँ कानून बनाबक मूल उद्देश्‍ये ने नष्‍ट भऽ जाए। ऐमे कोनो दू मत नहि जे केतेको मामलामे विवाहित महिलाकेँ जीवन ओ सम्‍मानपर संकट ओकर सासुरमे उत्पन्न भऽ जाइत अछि आ ओ मजबुड़ीमे सभ किछु सहैत अछि। सहैत-सहैत केतेको महिला तंग भऽ आत्‍म हत्‍या लेल सेहो विवश भऽ जाइ छैथ। अस्‍तु, ऐ कानूनक दुरुपयोगसँ उत्‍पन्न समस्‍याक समाधान हेतु बीचक रस्‍ता निकालबाक चाही जइसँ निर्दोष लोककेँ फँसौल नहि जाइक आ दोषीकेँ उचित दण्‍डो होइक आ समाजमे सम्‍मानक संग महिलो जीबैथ। अपन समाजमे कहबी छेलइ जे जेतए कनियॉंक डोली अबै ओतहिसँ अर्थी उठइ। मुदा आब युग बदैल गेल अछि। निष्‍ठाक समस्‍त जिम्‍मा मात्र महिलाक नहि भऽ सकैत अछि। लोक परिवर्तित परिस्‍थितिसँ जँ तालमेल नहि बैसोलक तँ जीवन भमरमे केतए जा कऽ थम्‍हत तेकर कोनो ठेकान नहि। शिक्षित बर-कनियॉं सभ रोजगार हेतु विश्व भरिमे पसैर गेल छैथ। गाम-घरक बात गामेमे सलटा लिअ से आब तथ्‍यपरक नहि रहि गेल। अपनो समाजमे विवाह विच्‍छेदक चलन बढ़ि गेल अछि। कानूनक रस्‍ता अख्‍तियार करैत केतेको परिवार नष्‍ट भऽ रहल अछि। प्रेम ओ सिनेहपर आधारित सम्‍बन्‍धकेँ कानूनक कुरहैरसँ चोट देल जाएत तँ परिणाम की हएत? परिवारिक मर्यादाक रक्षाक हेतु सन्‍तानक भविस बँचबैक लेल एवम्‍ जीवनमे सुख-शान्‍तिक स्‍थापना हेतु आवश्‍यक अछि जे हम सभ भारतीय संस्‍कारकेँ कटकटा कऽ पकैड़ ली आ पकड़नहि रही। त्‍येन त्‍येक्‍तेन भुंजीथा:। त्‍यागक गरिमा जखन जीवनमे लक्षित हएत, सभ अपने ठीक भऽ जाएत। आजादक अन्‍त्‍येष्‍टि १९८१ इस्‍वीक २६ फरबरीकेँ एकटा इलाहाबादक एलफ्रेड पार्कमे जेकर नाम आब चन्‍द्रशेखर आजाद पार्क राखि देल गेल अछि, आजादक मृत्‍यु पुलिसक संग भेल मुठभेड़मे भेलैन। हुनक दाह-संस्‍कार दोसर दिन अर्थात्‍ २८ फरबरी १९८१ इस्‍वीकेँ गंगाक रसूलावाद बाटपर कएल गेल। गुप्‍तचर विभागक उपलेख, स्‍वर्गीय शिवनायक मिश्रक संस्‍मरण तथा महामना मदनमोहन मालवीयक प्रपौत्र श्री पद्मकान्‍त मालवीयसँ ओइ घटनाक जानकारी होइछ। पं. शिवनायक मिश्र, आजादक निकटक सम्‍बन्‍धी छला। ओ बनारसमे छला आ हुनका ऐ काण्‍डक सूचना श्रीमती कमला नेहरू द्वारा पठौल गेल संवादवाहक द्वारा ११ बजे रातिमे भेटलैन। रातिमे इलाहावाद एबाक साधनक अभावक कारणेँ ओ प्रात:काल छोटी लाइनक गाड़ीसँ इलाहाबाद एला। आनन्‍द भवन गेलाक बाद कमला नेहरूसँ पता लगलैन जे आजादक लाशक पोस्‍टमार्टम भऽ रहल छैन। टमटमपर (इक्कापर) ओ अस्‍पताल गेला, जेतए पता लगलैन जे लाशकेँ पोस्‍टमार्टमक पछाइत दाह-संस्‍कारक हेतु पुलिस लऽ गेल। पोस्‍टमार्टम मोहनलाल आ कर्नल टाउनसेन्‍ड कएलैन। मिश्रजी तुरन्‍त जिलाधीशक ओतए गेला, जेतए जिलाधीशसँ हुनक गम्‍भीर बाता-बाती भऽ गेलैन। जिलाधीशक कहब रहैन जे अहाँ अपन सम्‍बन्‍धीकेँ एतबा दिन अबारागर्दी करबसँ किएक नहि रोकि सकलौं? अन्‍ततोगत्वा ओ दारागंजक थानेदारकेँ आदेश देलक जे पुलिसक देख-रेखमे हुनका आजादक अन्‍त्‍येष्‍टि करबाक अमुमति देल जाए। आजादक अन्‍त्‍येष्‍टिक समय श्री पद्मकान्‍त मालवीय उपस्‍थित छला। ओ ऐ घटनाक एक मात्र प्रत्‍यक्षर्दी छैथ जे अखनो जीवित छैथ। हुनका अनुसारेँ २७-२८ फरबरीक रातिमे पं. मदनमोहन मालवीय हुनका फोनपर कहलखिन जे चूँकि आजाद एकटा वीर आ क्रान्‍तिकारी लोक छला तँए हुनक संस्‍कारो ओही तरहक हेबाक चाही। राजर्षि टंडनक सहयोग लेबाक परामर्श सेहो ओ देलखिन। श्री पद्मकान्‍त मालवीय आ श्री शिव विनायक मिश्र जिलाधीशक आदेश दारागंजक थानेदारकेँ पढ़ि सुनौलखिन। ओ हुनका लोकनिकेँ संगमपर लऽ गेलखिन, मुदा ओतए किछु नहि भेटलैन। ओइठामसँ लौटैतकाल तुलारामवागमे एकटा छात्र नेता कहलकैन जे आजादक लाश रशूलबाद घाटपर गेलैन अछि। ओइठामसँ ओ लोकनि रशूलबाद पहुँचला। मालवीय आ मिश्रजी जखन रशूलबाद पहुँचला तँ चितामे आगि लगा देल गेल छल। ओहीठाम एकटा पुलिस इन्‍सपेक्‍टरसँ ओ लोकनि बेर-बेर आग्रह केलखिन, जे ओ लाश हुनका लोकनिकेँ दए देल जाइन। मुदा ओ इन्‍सपेक्‍टर समय काटक हेतुए अनेकानेक प्रश्‍न पुछैत रहल। ताधैर आजादक आधा लाश जरि चूकल छेलैन। तेकर बाद ओ लाशक संस्‍कार करबाक अनुमतिमे विलम्‍ब होइत देख मिश्रजीकेँ नहि देखल गेलैन। ओ बाजि उठला- “अंग्रेजक नून खाइत-खाइत तोहर आत्‍मा सेहो बिका गेलह की? आजादक संस्‍कार ओइ सरकारक पैसासँ कदापि नहि भऽ सकैत अछि। जेकर विरोध करैत-करैत ओ अपन प्राणक आहुति देलैन।” एकर बाद शिवकान्‍त मिश्र आ पद्मकान्‍त मालवीय दुनू गोटे मिलि कऽ चिताकेँ मिझौलैथ। फेर शास्‍त्रीय विधान आ मंत्रोच्‍चारक संग चितामे आगि देल गेल। ऐ हेतु ...कएल गेल। ताधैर पुरुषोत्‍म दास टंडन आ श्रीमती कमला नेहरू सेहो ओतए आबि गेल रहैथ। जल देमक समय एकटा फोटोग्राफर फोटो लेलक मुदा पुलिस ओकर कैमरा आ ओकर रील दुनू छीनि लेलक। अन्‍तमे शिवनायक मिश्र अस्‍थि संचय कए ओकर किछु भागकेँ गंगामे प्रवाहित केलैन। एकटा पोटरीमे पिताक भष्‍मावशेषकेँ वएह वनारस लऽ गेला। मूलत: आजादक संस्‍कार संगमपर करबाक निश्चय कएल गेल छल। मुदा ओतए बहुत अधिक दर्शकक भीड़ लागि जेबाक भयसँ ओ सभ अपन निर्णयकेँ अन्‍तिम क्षणमे परिवर्तित कएलैन। दाह-संस्‍कारसँ आपस भेलापर शिवविनायक मिश्र टंडनजीक ओइठाम एला। आ टंडनजीक निर्देशानुसार आपस हेबाकाल छात्र संघक तत्‍वावधानमे एकटा विशाल जुलुसक आयोजन भेल। सम्‍पूर्ण शहरमे अपूर्व तनाव छल। कखनौं किछु भऽ सकैत छल। ऐ स्‍थितिसँ निपटबाक हेतु शहर भरिमे सशस्‍त्र पुलिसबल नियुक्त कए देल गेल छल। सायंकाल अभ्‍युदय प्रेस लगसँ एक विशाल जुलुस निकलल जइमे हजारो युवक, स्‍त्री तथा पुरुष शामिल भेला। ऐ हेतु टंडनजीक दृढ़ समर्थन सहायक सिद्ध भेल। ओ ललैक कए कहलखिन- “आजादक रास्‍ता भने हमरा लोकनिसँ पृथक रहल होनि, मुदा ऐमे कोनो दूटा विचार नहि भऽ सकैत अछि जे ओ एक महान देशभक्त छला, आ तँए हुनक सम्‍मानमे जुलुस सभ आदि नहि करब एक बड़ पैघ राष्‍ट्रभक्तक अपमान करब होएत।” जुलुसमे आजादक भष्‍मावशेष एकटा कारी कपड़ामे बान्‍हि चौकीपर राखि घुमौल गेल। जानसेनगंज मुहल्‍लामे लोकक जमघट अनियंत्रित भऽ गेल आ पुलिस डडरे मुँह तकैत रहल। तदुपरान्‍त पी.डी. पार्कमे सभा भेल जइमे पुरुषोत्तम दास टंडन, कमला नेहरू, प्रसिद्ध क्रान्‍तिकारी श्री सचिन्‍द्रनाथ सन्‍यालक पत्नी आ पं. शिव विनायक मिश्र बजला। सभ गोटे आजादक महान त्‍यागक प्रशंसा करैत हुनक हार्दिक श्रर्द्धांजलि देलाह। ऐ प्रकारे भारतक एकटा महान सपूत आजादीक हेतु लड़ैत सदैत आजाद रहैत आत्‍म बलिदान कएल। जइ गाछक औढ़मे ओ गोली चलौलैन किंवा अन्‍ततोगत्‍वा सीनामे गोली लगलैन, ओही गाछक दर्शन करक हेतु लोक हजारक-हजार संख्‍यामे आबए लागल। जइसँ संग भऽ अंग्रेज शासक ओकरा कटबा देलक। आइ-काल्‍हि ओहीठाम एकटा दोसर पाखरिक गाछ रोपल अछि आ ओकर सामनेमे अछि आजादक भव्‍य मूर्ति जइमे हुनक एकटा हाथ मोँछपर आ दोसर हाथ पिस्‍तौलपर अछि। ऐठाम अखनौं हजारो लोक हुनका प्रति अपन सम्‍मान अर्पित करबाक लेल अबैत रहैत अछि। सरिपहुँ आजाद भारतक आजादीक लड़ाइमे प्राणक आहुति दए अमर भऽ गेला। मकर संक्रान्‍ति मकर संक्रान्‍ति सम्‍पूर्ण भारत ओ नेपालमे सर्वत्र कोनो-ने-कोनो प्रकारसँ मनौल जाइत अछि। पौष मासमे जखन सूर्य मकर राशिमे अबै छैथ तखने ई पावनि मनौल जाइत अछि। प्रतिवर्ष मकर संक्रान्‍ति १४ वा १५ जनबरीकेँ पड़ैत अछि। तमिलनाडूमे मकर संक्रान्‍तिकेँ एकरा ‘पोंगल’ कहल जाइत अछि। कर्नाटक, केरल एवं आँध्रप्रदेशमे एकरा संक्रान्‍तिये कहल जाइत अछि। पंजाब आ हरियाणामे ‘फोहड़ी’ कहल जाइत अछि एवं एक दिन पहिने अर्थात्‍ १३ जनबरीकेँ मनौल जाइत अछि। उत्तर प्रदेशमे एकरा मूलत: दानक पावनिक रूपमे मनौल जाइत अछि। प्रयागमे प्रतिवर्ष १४ जनबरीसँ माघमेला प्रारंभ होइत अछि। माघ मेलाक प्रथम स्‍नान १४ जनबरीसँ प्रारंभ भऽ कऽ अन्‍तिम स्‍नान शिवरात्रिकेँ होइत अछि। महाराष्‍ट्रमे ऐ दिन विवाहित महिला अपन पहिल संक्रान्‍तिपर तूर-तेल वा नून अन्‍य सुहागिनकेँ दइ छैथ। बंगालमे ऐ दिन स्‍नानक बाद तिल दान करबाक प्रथा अछि। ऐ अवसरपर गंगासागरमे प्रतिवर्ष विशाल मेला लगैत अछि। असममे मकर संक्रान्‍तिकेँ ‘माघ-विहू’ अथबा ‘भोगाली विहू’क नाओंसँ जानल जाइत अछि। राजस्‍थानमे ऐ पर्वपर सुहागिन महिला अपन सासुकेँ वियनि दऽ दऽ असीरवाद प्राप्‍त करै छैथ। संगे कोनो सौभाग्‍य सूचक वस्‍तुकेँ चौदहक संख्‍यामे पूजन एवं संकल्‍प कए चौदहटा ब्राह्मणकेँ दान दइ छैथ। एवम्‍ प्रकारेण मकर संक्रान्‍तिक माध्‍यमसँ भारतीय सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक विविध रूपमे आभास होइत अछि। एहेन धारणा अछि जे मकर संक्रान्‍तिक दिन शुद्ध घी एवं कम्‍बलक दान केलासँ मोक्षक प्राप्‍ति होइत अछि। माघे मासे महादेव: यो दास्‍पति वृहकम्‍वलम्‍ स भुक्त्‍वा सकलान भोगान अन्‍ते माक्ष प्राप्पति।। पुराणक अनुसार मकर संक्रान्‍तिक पर्व व्रह्मा, विष्‍णु, महेश, गणेश, आधशक्ति आ सूर्यक आराधना एवं उपासनाक पावन व्रत अछि जे तंत्र-मंत्र-आत्‍माकेँ शक्‍ति प्रदान करैत अछि। संत-महर्षि लोकनिक अनुसार एकर प्रभावसँ प्राणीक आत्‍मा शुद्ध होइत अछि, संकल्‍प शक्‍ति बढ़ैत अछि, ज्ञान तंतु विकसित होइत अछि। मकर संक्रान्‍ति अही चेतनाकेँ विकसित करैबला पावनि अछि। ई सम्‍पूर्ण भारतमे कोनो-ने-कोनो रूपे मनौल जाइत अछि। पुराणक अनुसार मकर संक्रान्‍तिक दिन सूर्य अपन पुत्र शनिक घर एक मासक हेतु जाइ छैथ, कारण मकर राशिक स्‍वामी शनि छैथ। यद्यपि ज्‍योतिषीय दृष्टिसँ सूर्य आ शनिक ताल-मेल संभव नहि अछि, तथापि ऐ दिन सूर्य स्‍वयं अपन पुत्रक घर जाइ छैथ। पुराणमे आजुक दिन पिता पुत्रक सम्‍बन्‍धमे निकटताक प्रारंभक रूपमे देखल जाइत अछि। मकर संक्रान्‍तिक दिन गंगाकेँ पृथ्‍वीपर आनैबला भगीरथ अपन पूर्वजक तर्पण केने छला। हुनक तर्पण स्‍वीकार केलाक बाद एही दिन गंगा समुद्रमे मिलि गेल रहैथ। तँए ऐ दिन गंगा सागरमे मेला लगैत अछि। विष्‍णु धर्मसूत्रक अनुसार पितरक आत्‍माक शान्‍तिक हेतु एवं अपन स्‍वास्‍थवर्द्धन ओ सबहक कल्‍याणक हेतु तिलक प्रयोग पुण्‍यदायक एवं फलदायक होइत अछि। तिल-जलसँ स्‍नान करब, ‘तिल’क दान करब, तिलसँ बनल भोजन, जलमे तिल अर्पण, तिलक आहुति एवं तिलक उवटन लगाएब। ऐ दिन भगवान विष्‍णु असुरक अन्‍त कए युद्ध समाजिक घोष्‍णा केने छला। ओ राक्षस सबहक मुड़ीकेँ मदार पर्वतमे दबा देने रहैथ। एतदर्थ ऐ दिनकेँ अशुभ एवं नकारात्‍मकताकेँ समाप्‍त करबाक दिनक रूपमे देखल जाइत अछि। सूर्यक उत्तरायण भेलाबाद देवता लोकनि व्रह्म मुर्हुत उपासनाक पुश्‍यकाल प्रारंभ होइत अछि। ऐ कालकेँ परा-अपरा विधाक प्राप्‍ति काल कहल जाइत अछि। साधनाक हेतु एकरा सिद्धिकाल सेहो कहल जाइत अछि। ऐ समयमे देव प्रतिष्‍ठा, गृह निर्माण, यज्ञकर्म आदि पवित्र काज कएल जाइत अछि। रामायण कालसँ भारतीय पत्र-पत्रिकामे दैनिक सूर्योपारायणक प्रचलन अछि। सबहक मोन-मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा सूर्योपारायणक उल्‍लेख अछि। रामचरितमानसमे भगवान राम द्वारा गुड्डी उड़ेबाक कार्यक उल्‍लेख सेहो अछि। मकर संक्रान्‍तिक वर्णन वाल्‍मिकी रामायणमे सेहो भेल अछि। राजा भगीरथ सूर्यवंशी छला। ओ भगीरथ तप-साधनाक द्वारा पापनाशिनी गंगाकेँ पृथ्‍वीपर आनि अपन पूर्वजक उद्धार केने छला। राजा भगीरथ अपन पूर्वजक गंगाजल, अक्षत, तिलसँ श्राद्ध-तर्पण केने छला। तहियासँ मकर संक्रान्‍तिक स्‍नान आ मकर संक्रान्‍तिक श्राद्ध-तर्पणक परंपरा चलि रहल अछि। कपिल मुनिक आश्रमपर मकर संक्रान्‍तिक दिन माँ गंगाक पदार्पण भेल छल। पावन गंगाजलक स्‍पर्श मात्रसँ राजा भगीरथक पूर्वजकेँ स्‍वर्ग प्राप्‍ति भेलैन। कपिल मुनि वरदान दैत बजला- “मातृ गंगे त्रिकाल तक लोक सबहक पापनाश करती एवं भक्‍तजनक सात पुश्‍तकेँ मुक्ति एवं मोक्ष प्रदान करती। गंगाजलक स्‍पर्श, पान, स्‍नान एवम्‍ दर्शन सभ पुण्‍यदायक फल प्रदान करत।” सूर्यक सातम किरण भारतवर्षमे आध्‍यात्‍मिक उन्नतिक प्रेरणादायी अछि। सातम किरणक प्रभाव भारतवर्षमे गंगा-जमुनाक मध्‍य अधिक समय तक रहैत अछि। ऐ भौगोलिक स्‍थितिक कारण हरिद्वार आ प्रयागमे माघमेलाक आयोजन होइत अछि। पितृतुल्‍य भगवान भास्‍कर दक्षिणायनसँ उत्तरायणमे जाइत काल उर्जामयी प्रकाश पृथ्‍वीपर वर्षा करै छैथ। अतुल्‍य शक्‍ति श्रोत प्रकृति रातिकेँ छोट एवं दिनकेँ पैघ करए लगै छैथ। पृथ्‍वीमाता उदरस्‍थ आनाजकेँ पकाबय लगै छैथ। चारू तरफ शुभे-शुभ होइत रहैत अछि। एहेन अद्भुत समयमे मकर संक्रान्‍तिक पर्व मनौल जाइत अछि। सक्रान्‍तिक दिन पंजाबमे ‘लोहड़ी’क नाओंसँ मनौल जाइत अछि। पंजाबक अतिरिक्‍त ई पावनि हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश आ जम्‍मू काश्‍मीरमे सेहो धूम-धामसँ मनौल जाइत अछि। पारंपरिक तौरपर ‘लोहड़ी’ फसलक रोपनी आ ओकर कटनीसँ जुड़ल एक विशेष पावनि अछि। ऐ दिन वॉंनफायर जकाँ आगिक ओलाव जरा कऽ ओकर चारूकात नृत्‍य कएल जाइत अछि। बालक सभ भांगड़ा एवम्‍ वालिका सभ गिद्धा नृत्‍य करै छैथ। लोहड़ीक आलावक आसपास लोक एकट्ठा भऽ दुल्‍ला-भट्ठी प्रशंसामे गायन करै छैथ। केतेको गोटेक मान्‍यता अछि जे ‘लोहड़ी’ शब्‍द लोई (सत कबीरक पत्नी) सँ उत्पन्न भेल मुदा अनेक लोक एकरा तिलोड़ीसँ उत्पन्न मानै छैथ, जे बादमे लोहाड़ी भऽ गेल। लोहड़ीक ऐतिहासिक सन्‍दर्भ सुन्‍दरी-मुंदरी नामक दूटा अनाथ कन्‍या छेली। ओकर काका ओकर विवाह नहि करए चाहै छल अपितु ओकरा राजाकेँ भेँट कए देबए चाहै छल। ओही समयमे हुल्‍ला भट्टी नामक एकटा उफाँइट छौड़ाकेँ नीकठाम बिआह कऽ देलक। वएह उफाँइट वरपक्षकेँ बिआहक हेतु मनौलक आ जंगलमे आगि जरा कऽ दुनू कन्‍याँक बिआह करौलक। कहल जाइत अछि जे दुल्‍ला शगुनक रूपमे गुड़ देलक। भावार्थ जे उफाँइट होइतो दुल्‍ला भट्टी निर्धन वालिका सबहक कन्‍याँदान केलक एवम्‍ ओकरा अपन कक्काक अत्‍याचारसँ बँचौलक। लोहड़ीक दिन बच्‍चा सभ दुल्‍ला भट्टीक सम्‍मानमे गीत गबैत घरे-घर घुमैत अछि। बच्‍चा सभकेँ मिठाइ एवम्‍ अन्‍य वस्‍तु सभ दैत अछि। जँ कोनो परिवारमे कोनो खास अवसर जेना बच्‍चाक जन्‍म, विवाह आदि अछि तँ लोहड़ी आर धूम-धामसँ मनौल जाइत अछि। सरिसवक साग आ मकईक रोटी खास कऽ ऐ अवसरपर बनौल जाइत अछि। तामिलनाडूमे ऐ समय ‘पोंगल’ मनौल जाइत अछि। प्रचूर मात्रामे अन्नक उपजापर भगवान सूर्यकेँ धन्‍यवाद ज्ञापन हेतु पावनिक आयोजन कएल जाइत अछि। तामिलनाडूक अलावा पुडुचेड़ी, श्रीलंका एवम्‍ विश्व भरिमे पसरल तमिल लोकनि एकरा मनबै छैथ। ओइ पोंगलमे चारि दिन तक–माने १४ सँ १६ जनवरी तक–मनौल जाइत अछि। इन्‍द्र देवताक सम्‍मानमे पहिल दिन भोगी उत्‍सव मनौल जाइत अछि। पोंगल दोसर दिन माटिक वर्तनमे दूधमे चाउर पका कऽ खीर भगवान सूर्यकेँ आन-आन वस्‍तु संगे चढ़ौल जाइत अछि। ऐ अवसरपर घरक आगूमे कोलम (अपना ओइठामक अरिपन जकाँ) बनौल जाइत अछि। पोंगलक तेसर दिन मट्ठू पोंगल कहल जाइत अछि। ऐ दिन गायकेँ नाना प्रकारसँ सजा कऽ ओकरा पोंगल खुआएल जाइत अछि। चारिम दिन कन्तुम पोंगल कहल जाइत अछि। घरक महिला सभ स्‍नानसँ पूर्व हरदिक पातपर मिठाइ, चाउर, कुसियार हरदि आदि राखि कऽ अपन भाय लोकनिक कल्‍याण कामना करै छैथ। भाइक हेतु हरदि, चून, चाउरक पानिसँ आरती करै छैथ आ ई पानि घरक आगूमे बनल कोलमपर छिड़ैक देल जाइत अछि। जल्‍लीकट्टू मट्टू पोंगल दिन पोंगल पर्वक एक हिस्‍साक रूपमे खेलल जाइत अछि। ऐ लेल ग्रामीण सभ पहिनेसँ साँढ़केँ खुआ-पिआ कऽ तैयार केने रहै छैथ। ऐमे मूलत: केतेको गामक मन्‍दिरक साँढ़ (कोविल कालइ-तमिल नाओं) भाग लैत अछि। जल्‍लीकट्टूक तीन अंग होइत अछि : वाटि मन्‍जू विराट्टू, वेली विराट्टू आ वाटम गन्‍जु विराट्टू। वाटि मन्‍जु विराट्टूमे साँढ़केँ जे बेकती किछु दूरीपर किछु समय तक रोकि लइ छैथ, से विजेता होइ छैथ। वेली विराट्टूमे साँढ़केँ खाली मैदानमे छोड़ि देल जाइत अछि आ लोक ओकरा नियंत्रणमे करबाक प्रयास करैत अछि। वाटम मन्‍जुविराट्टूमे साँढ़केँ नमगर रस्‍सीसँ बान्‍हि देल जाइत अछि, आ खिलाड़ी सभ ओकरा नियंत्रित करबाक प्रयास करै छैथ। एक जानकारीक अनुसार २०१० सँ २०१४ इस्‍वीक बीचमे जल्‍ली कट्टूक कारण करीब ११०० लोक घायल भेला एवम्‍ १७ लोक मुइला। पैछला २० सालमे करीब २०० लोक ऐ खेलक कारण मरि चूकल छैथ। ऐ खेलमे पशुक प्रति कूड़र्ताक संगे जीवनक क्षतिकेँ देखैत २०१६ इस्‍वीमे मा. उच्‍चतम न्‍यायालय प्रतिवन्‍ध लगा देलक। सम्‍पूर्ण देश जकाँ मिथिलांचलमे सेहो मकर संक्रान्‍तिक पर्व मनौल जाइत अछि। गाम-घरमे एकरा तिला सकराँति सेहो कहल जाइत अछि। अंग्रेजी नया सालक ई पहिल पावनि होइत अछि। लोकक घरमे नव अन्न भेल रहैत अछि। पहिनहिसँ लोक चूड़ा कुटा कऽ ऐ पावनिक तैयारी केने रहैए। अपना ऐठाम माघ मासकेँ अत्‍यन्‍त पवित्र मास मानल जाइत अछि। बुढ़-बुढ़ महिला सभ भोरे-भोर जाड़-ठाढ़केँ बिसरैत पोखैरमे डुबकी लगबै छैथ। गाममे कएटा मसोमात, वृद्धा सभकेँ थर-थर कँपैत स्‍नान करैत देखै छेलिऐन...। सभसँ मनोरंजक दृश्‍य तँ तखन होइत छल, जखन ओ सभ महादेवक माथपर जल ढाड़ैतकाल गाम-घरक सभटा झगड़ा सोझराबैमे लागल रहैत छेली। जानह हे महादेव! हमरा पेटमे किछु नहि अछि। हमर मोन गंगासन निर्मल अछि मुदा एहेन अत्‍याचारक निपटान तूँहीं करियह। ..पता नहि, महादेव सुनितो छेलखिन की नहि। मुदा हमरा ई सभ सुनि कऽ जरूर वकोर लागल रहैत छल। बच्‍चामे पावनि सभ अद्भुत आनन्‍दक विषय रहैत छल। सभसँ सरल ओ आनन्‍ददायी होइत छल तिला सकराँति। भोरे-भोर पोखैरमे जा कऽ डुबकी लगाउ। माइक हाथे तिल-चाउर खाउ। तिल-चाउर खिबैत माए पुछैथ- “तिल बहब की नहि?” तैपर कहिऐन- “खूब बहब।” विध समाप्‍त। तेकरबाद चुरलाइ, तिलबा इत्‍यादि भरि मोन खाउ...। कएक दिन पहिनहिसँ चुरलाइ, तिलबा (तिललाइ) आ लाइ (मुरहीक लाइ) बनेबाक कार्यक्रम प्रारंभ भऽ जाइत छल। घरक वातावरण चुरलाइक सुगन्‍धसँ परिपूर्ण। ऐ पावनिमे सभसँ विशेषता ई अछि पावनिक सामग्री बनि गेल तँ ओकरा लेल बेसी प्रतीक्षा नहि करए पड़ैत अछि। दिनमे व्राह्मण भोजन होइत छल। व्राह्मण कियो आसे-पासक लोक होइत छला, कारण भरि गाममे भोजे रहैत छल। बट्टा भरि-भरि घी खिचड़िमे देल जाइ। संगे तरह-तरह केर पकवान सभ सेहो रहैत छल। हमरा गाममे किछु गोटे ओइठाम तिला संक्रान्‍तिमे जिलेबी बनैत छल। भोजमे खिचड़िक संग जिलेबी खेबाक बच्‍चा सभकेँ अद्भुत उत्‍साह रहैत छल। खिचड़िमे तेतेक प्रचूर मात्रामे घी रहैत छल जे भोजनक बाद हाथ साफ-साफ धोनाइ कठिन। पावनिक कएक दिन बादो धरि चूरालाइ आ तिलबाक आनन्‍द भेटैत रहै छल। ऐ पावनिमे चूड़ा, दही, खेबाक सेहो परंपरा अछि। चूरा-दहीक वर्णन करैत खट्टर कका कहलखिन जे जखन पातपर चूड़ाक संग आम, धात्रीक अँचार ओ तरकारी परसल जाइत अछि तँ बुझू जे अन्‍हरिया आबि गेल। तेकर बाद जखन दही परसाएल तँ बुझू जे इजोरिया। जेना पातपर चन्‍द्रमा उतैर गेला। ऊपरसँ जँ मधुर राखि देल जाए ओ कौर पेटमे गेल तँ पुछू नहि। पुरा सोनित ठण्ढा जाइत अछि आ आत्‍मा तृप्‍त भऽ जाइत अछि। मिथिलांचलमे ऐ पर्वकेँ मनेबाक अद्भुत परंपरा अछि। चुरलाइ खाउ, चुरा-दही खाउ, खिचड़ि खाउ, जे खाउ, जखन खाउ...। वस्‍तुत: ई आनन्‍दक पर्व थिक जे कोनो-ने-कोनो रूपे सम्‍पूर्ण भारतपवर्षमे मनौल जाइत अछि। सूर्यक तेजक मकर संक्रान्‍तिसँ जहिना बढ़ैत रहैत अछि, तहिना सभ लोक-वेदक सुख बढ़ैत रहए, सएह ऐ पावनिक ध्‍येय थिक।◌ राँची चारि दसक बाद अगस्‍त १९७३ इस्‍वीमे दूरभाष निरीक्षक पदक प्रशिक्षण कार्यक्रमक हेतु हम पहिल बेर राँची गेल रही। ओइ समय डॉ. शुभद्र झाक संगे योगदा सतसंग मठमे हम एक मास रही। शुभद्र बाबू योददा महाविद्यालयक प्राचार्य रहैथ। प्राचार्यक निवासमे ओ एकटा नोकरक संग असगरे रहैथ। तीनटा कोठरी, भानसक घर, स्‍नान गृह आदि सुविधाक सहित आवासीय दृष्‍टिसँ उत्तम स्‍थान छल। आस-पासमे आमक गाछ सभ छल। गाछक आस-पासमे कुटी जकाँ कक्षा सभ चलैत छल। अन्‍दरमे योगदा सतसंग मढ़ छल। ओइ आश्रमक सात्‍विक वातावरण अत्‍यन्‍त मनोरम छल आ हमरा ओइठाम मोन लागि गेल। पहिल बेर राँची गेल रही तहिया हमर उमेर २१ वर्ष छल। जीवनक अनुभव नहि छल। विद्यार्थी रही। तेकर बाद नोकरी भेट गेल रहए। नोकरी करबाक इच्‍छा नहि रहए। आगू पढ़ाइ करए चाहैत रही। परन्‍तु परिवारमे सबहक विचार भेलै जे नोकरी पकैड़ लेबाक चाही, किएक तँ नोकरी जल्‍दी नइ भेटै छइ। पहिल नोकरीकेँ नहि छोड़क चाही,आएल लक्ष्‍मीकेँ लात नहि मारी इत्‍यादि...। ओहुना ओइ साल एम.एस-सी.क नामांकन भऽ गेल रहइ। हमर बहक परीक्षाकाल बिलम्‍बसँ आएल रहइ। तँए ई निर्णय भेल हम नोकरी पकैड़ ली। बससँ राँची पहुँचल रही। रस्‍तामे पहाड़ीक बीचमे खतरनाक रस्‍ता छल। ड्राइभरक ऊपर सबहक जीवन निर्भर छल। तँए ओ अपना लगक सीटपर एहने लोककेँ बैसबैत छल जे राति भरि जागि सकैथ। औंघाइत बेकतीकेँ लगमे बैसलासँ ड्राइभरोकेँ औंघी लागि सकै छल, अस्‍तु ई प्रयास कएल जाइत छल। राँची पहुँचते पिताजीक पत्रक संग शुभद्र बाबूक डेरापर पहुँचलौं। ओ पत्र पढ़ला आ हमरा अपन सामान सभ रखबाक हेतु कहलैन। शुभद्र बाबूकेँ एकाध बेर पहिनौं देखने रहिऐन, मुदा गप-सप्‍प नहि रहए। राँची हुनक डेरापर सामान सहित बिना पूर्व सूचनाक हम पहुँच गेल रही। ताहि हिसाबे ओ बहुत सहयोग केलाह। डेरामे ओ असगर रहैत छला, एकटा नोकर रहैन जे घरक सभटा काज करैत छल। भानस ओ स्‍वयं करैत छला। एक्के साँझ। रातिमे खेबाक बेवस्‍था सेहो भोरुके भानसक संग कऽ लैत छला। चूकी ओ अपने दिन भरि व्‍यस्‍त रहैत छला, तँए हुनकासँ भेँट-घाँट सामान्‍यत: साँझेमे होइत छल। रातिमे सुतबासँ पूर्व ओ स्‍वाध्‍याय करैत छला। हमरा रात-बिराति पढ़ैत देख ओ बहुत प्रसन्न होइत छला। कखनो काल हम नोकरीसँ त्‍यागपत्रक गप करी तँ ओ कहैथ जे बापसँ पुछि कऽ किछु करियह। नहि तँ ओ कहता जे मनो नहि केलखिन। ओइ डेरापर हम करीब एक मास रहलौं। मोन लागि गेल रहए। कएटा मैथिल सभसँ ओइठाम भेँट-घाँट होइत रहैत छल। मुदा ओइठाम केतेक दिन रहितौं। अपन बेवस्‍था तँ करबाके छल। तँए डेरा तकैमे लागि गेलौं। योगदा सत्‍संगमे दयामाताक आगमन भेल छल। हम डाक्‍टर साहैबक संगे दर्शनक हेतु गेल रही। गौर वर्ण एवम्‍ अति तेजस्‍वी दयामाताक दुलर्भ दर्शन होइते मोन आनन्‍दित भऽ गेल। ओ कोनो प्रवचन नहि देलीह। किछु काल सभ गोट धियान केलक आ सभा समाप्‍त भऽ गेल। गप-सप्‍पक क्रममे शुभद्र बाबू एक दिन कहला जे ओ सिड़डीक साई बाबासँ बहुत प्रभावित भेल रहैथ। हुनकर आश्रममे शुभद्र बाबू गेल रहैथ। कहला जे मोनक बात सभ ओ अपने बाजए लागल रहैथ। कएक तरहक चमत्‍कार सेहो ओदेखला। चूकी हुनकर डेरा छोट छल, आ परिवारक अन्‍य सदस्‍य लोकनि सभ आबि गेल रहथिन, अस्‍तु हम अपन डेरा ताकि लेलौं आ करीब एक मास रहला पछाइत ओतए-सँ प्रस्‍थान केलौं। पहिरन-ओढ़नमे शुभद्र बाबू चुस्‍त-दुरुस्‍त ओ आधुनिक वस्‍त्रक पक्षधर रहैथ। हमरा ऐ बातक हेतु ओ कएक बेर टोकियो दथि। कहैथ जे ओ एकठाम साक्षात्‍कारमे भेष-भूषाक कारण छाँटि देल गेला। राँचीक संस्‍कृत कौलेजक पास हमर नव डेरा छल। एकटा कोठरी छल, जेकर किराया २० रूपैआ मासिक छल। भोजन स्‍वयं बनाबी। पानि इनारसँ निकालए पड़इ। बहुत गहींर इनार छल जइसँ पानि निकालबाक हेतु यथेष्‍ट प्रयास करए पड़ैत छल। बगलमे एकटा पैघ कोठरीमे चारिटा हमर सहकर्मी सभ मिलि कऽ रहै छला। ओहो सभ अपन भेाजन स्‍वयं बनाबैथ। ओइठामसँ एच.इ.सी. आसानीसँ देखाइ छल। ओइ छोटसन कोठरीमे हम पाँच मास धरि रहलौं। टेलीफोन एक्‍सचेंजमे प्रशिक्षण कार्यक्रम छल। प्रशिक्षणक वातावरण स्‍फूले जकाँ छल। ज्‍यादातर किताबी विषय पढ़ौल जाइत छल। प्रशिक्षणक दौरान रबि दिनक छुट्टी रहै छल। ओइ समयक उपयोग हम सभ आसपासक वस्‍तु सभ घुमै-फिरैमे करी। कहियो काल बी.आइ.टी. मिसरा जाइ। ओइठाम हमर स्‍कूलिया संगी इन्‍जिनियरिंगक पढ़ाइ कए रहल छला। छात्रावासमे रहबाक आ खेबाक-पिबाक उत्तम बेवसथा छल। चारूकात जंगलनुमा वातावरणमे रचल-बसल ओइ कौलेज परिसर अत्‍यन्‍त सुखदायी छल। सभसँ आनन्‍द होइत छल अपन स्‍कूलिया संगीसँ भेँट केलापर। हम सभ एक्के संग मैट्रिक केने रही। प्री यूनिभरसिटीमे आर.के. कौलेज मधुबनीमे संगे रही। तेकर बाद हम सी.एम. कौलेज- मधुबनीमे संगे रही। तेकर बाद हम सी.एम. कौलेज- दरभंगामे नाओं लिखेलौं आ ओ बी.आइ.टी. मिसरामे। बेहतर परीक्षा परिणामक बाबजूद हम इन्‍जिनियरिंगमे नाओं नहि लिखा सकलौं। यद्यपि मोतीलाल नेहरू इन्‍जिनियरिंग कौलेजमे हमर नामांकन निश्चित भऽ जाइत, कारण ओइ समय नामांकन डिग्रीवन साईसक प्राप्‍तांकक आधारपर होइत छल, आ हमरासँ बहुत कम प्राप्‍तांक बला सबहक नामांकन भऽ गेल रहइ। मुदा आब ऐ विषयपर सोचब व्‍यर्थ। परिश्रम कखनो व्‍यर्थ नहि जाइत अछि। ओही प्राप्‍तांकक आधारपर हमरा दूरभाष निरीक्षकक नोकरी भेल जेकर प्रशिक्षणक क्रममे हम राँचीमे रही। प्रशिक्षणक दौरान एक दिन घटल दुर्घटना अखनो तक मोनमे कचोटैत रहैए। हमर सबहक बगलबला कोठरीमे टेलीफोन ऑपरेटरक प्रशिक्षण चलैत छल। ओइमे एकटा प्रशिक्षु राजस्‍थानक छला। जाड़क मास छल। रातिमे अपन डेरामे अंगेठी जरा कऽ सुति गेल रहैथ। प्रात भेने ओ जखन नहि उठला तँ अगल-बगलक लोक सभ कोठरी खोललक तँ ओ मृत छला। अंगेठीसँ निकलल कार्वनमोनोक्‍साइड हुनकर मृत्‍युक कारण भेल। गामसँ हुनकर पिता ई समाचार सुनि आएल रहैथ आ एक्‍सचेंजक एक कोणमे राखल युवा पुत्रक लाश देख ठोह पाड़ि कऽ कनैत रहैथ। ऐ प्रकारेण जीवन-यापनक जिज्ञासामे निकलल एकटा युवकक असामयिक ऐ दुखद अन्‍त भऽ गेल। नित्‍य प्रति चारूकात एहेन केतेको घटना सभ घटित होइत रहैत अछि जे देख-सुनि मोनमे चिन्‍ता हएब सोभाविक। जीवन यात्रामे ऐ तरहक घटना झकझोरि कऽ राखि दैत अछि, तथापि जीवनमे विश्वास एवम्‍ नियतिक अकाट्यता मानि आगू बढ़बे जीवन थिक। नीक काज करैत आगू चलैत चली, आगूक रस्‍ता अपने बनि जाइत अछि। एक दिन घुमैत-फिरैत हम सभ राँचीक कॉंके स्‍थित पागलखाना देखए गेलौं। ओइठामक दृश्‍य भयावह छल। माथक गड़बड़ीसँ मनुखक दुर्दशाक वर्णन असंभव छल। तरह-तरहक इशारा करैत, बड़बड़ाइत अपनेमे तल्‍लीन, सुखाएल, जीविते मरि गेल लोक सबहक दृश्‍य देख हृदय करुणासँ भरि आएल छल। केतेको विक्षिप्‍त लोक सभ ठीक भऽ गेल छल, मुदा हुनक परिजन कोनो खोज-पुछारि नहि कए रहल छल। ठीक-ठाक लोक सभ पागलखानामे पड़ल छल। आसपास विक्षिप्‍त लोकक समुहकेँ देखैत-सुनैत केकरो माथा भसकियो सकैत छल। ओइठामसँ गुजरैत मोनमे मानसिक स्‍वास्‍थ्‍यक महत्‍व बुझाइत छल। व्‍यर्थ चिन्‍ता कए, किंवा परिस्‍थितिसँ सामंजस्‍यक आभावमे केतेको लोक विक्षिप्‍त भऽ जाइ छैथ। शरीर व्‍यर्थ भऽ जाइत अछि। उचित देख-भालक अभावमे स्‍वस्‍थो लोक क्रमश: रुग्ण भऽ जाइत अछि। कएक गोटा असमयमे मानसिक चिकित्‍सालयेमे मरि जाइत अछि। मोनपर बेसी भार दऽ अपन दुर्गति कराएबसँ बँचब केतेक जरूरी अछि, से ओइठाम जा कऽ बुझाइत छल। ओना, आस-पासक मनोरम पहाड़ी दृष्‍य मोनकेँ सुखद अनुभव दैत छल, मुदा ओइठामक मानसिक बिमारीसँ ग्रस्‍त लोक सबहक दुर्दशा देख मोन खिन्न भऽ गेल छल। तँए जल्‍दिये हम सभ अपन डेरा आपस आबि गेल रही। टैगोर हिल राँटीक प्रसिद्ध स्‍थानमेसँ अछि। ऐ स्‍थानक अपन ऐतिहासिक महत्‍व अछि। रबीन्‍द्रनाथ टैगोरकेँ के नहि जनैत अछि। हुनक कविता संग्रह ‘गीतांजलि’क हेतु हुनका साहित्‍यक नोवेल पुरस्‍कार भेटल छल। मुदा ई बात कमे लोक जनैत अछि जे कवि, गायक एवम्‍ चित्रकारक रूपमे रबीन्‍द्रनाथक बेकतीत्‍वक निर्माणमे हुनकर अग्रज ज्‍योतिन्‍द्रनाथ टैगोरक बहुत योगदान अछि। ज्‍योतिन्‍द्रनाथ शान्‍ति ओ ध्‍यानक हेतु ‘मोहरावादी हिल’ राँचीक चुनाव केलाह जे आब ‘टैगोर हिल’क नाओंसँ जानल जाइत अछि। १९१० इस्‍वीसँ १९२५ इस्‍वी धरि असगरे रहि कऽ ओ शान्‍ति धामक स्‍थापना केलाह। ओइ समयमे राँची एकटा छोट-छीन गाम छल। ज्‍योतिन्‍द्रनाथ अपन जापानी रिक्‍सासँ सायंकाल सभ दिन राँची घुमैत छला। ब्रिटिश भारतक प्रथम आइ.ए.एस. सत्‍येन्‍द्रनाथ टैगोर पहाड़क जड़िमे छोट-छीन घरो बनौने रहैथ जे सत्‍य धामक नाओंसँ जानल जाइत छल। वर्तमानमे ऐ स्‍थानक देखभाल राज्‍य पर्यटन निगम द्वारा कएल जाइत अछि। ४३ बर्खक बाद भातिजक विवाहक बरियातीमे शामिल हेबाक हेतु सपरिवार दिल्लीसँ राँची वायुयान द्वारा पहुँचलौं। २३ फरबरी २०१७ केँ ७:३५ बजे प्रात:काल वायुयानक उड़ानक समय छल। तीन बजे भोरेसँ तैयारी प्रारंभ कएल। प्रात:कालीन दिनचर्या समाप्‍त कए पौने पाँच बजे भोरे हवाइ अड्डा हेतु प्रस्‍थान कएल। साढ़े पाँच बजे हवाइ अड्डापर पहुँच सुरक्षात्‍मक जॉंच-पड़ताल ओ सामानक ठेकान लागि गेलाक बादो हमरा लोकनिकेँ १ घन्‍टा समय छल। तेकर उपयोग चाह-पीबैमे कएल गेल। हवाइ अड्डापर सभ वस्‍तुक दाम अतत: रहैत अछि। तैयो भोरक चाहक प्रयोजन छल। घरसँ भोरे विदा भऽ गेल रही। तँए जे दाम लेलक से दऽ कऽ दूटा चाह कीनि दुनू बेकती चाह पीबैत गप-सप्‍प करैत समय कटलौं। राँचीमे वायुयान नियत समय अर्थात्‍ ९ बजे भोरे उतैर गेल। हम सभ कनिको थाकल नहि रही। सामान निकालैमे थोड़ेक समय लागल आ बाहर होइते हमर अनुज हमरा लोकनिक स्‍वागत हेतु मुस्‍तैद छला। हुनका संगे लाल गाड़ीपर बैस १५ मिनटमे हुनकर पटेल चौक, हरमू हॉउसिंग कालोनी स्‍थित आवासपर पहुँच गेलौं। ओइठाम पाहुन सबहक हुजुम छल। हमर भाय सभ सपरिवार पहिनहि पहुँच गेल रहैथ। बरक मामा गामसँ तँ केके ने आबि गेल छल। हुनकर नाना-नानीकेँ देख अतिशय प्रसन्नता भेल। ८२ वर्षक होइतो नाना थेहगर छथिन। ओ दड़िभंगाक कादिरावाद स्‍थित उच्‍चविद्यालयमे प्रधानाध्‍यापकक पदसँ सेवा निवृत भेल छैथ एवम्‍ बहुत नफीस एवम्‍ बेवहार कुशल बेकती छैथ। मुदा बरक नानीक स्‍थास्‍थ्‍य गड़बड़ाएल रहै छैन। किछु मास पूर्व दड़िभंगामे बहुत जोर बेमार पड़ि गेल रहैथ, कहुना कऽ जान बँचलैन। अखनो धरि वाकर पकैड़ किछु-किछु चलि पबै छैथ। नातिक बिआह देखबाक अति उत्‍साहमे सभटा बिसैर ओ राँची आबि सकलीह से अद्भुत बात...। यद्यपि डेरामे लोक सभ खचाखच भरल छल, तथापि हमरा हेतु रहबाक बहुत नीक बेवस्‍था छल। राँची हवाइ अड्डासँ घर अबैतकाल प्रसिद्ध क्रिकेट खेलाड़ी धोनीक आवाससँ गुजरलौं। कोनो बहुत विशिष्‍ट नहि बुझाएल तथापि धोनीक घर हेबाक कारणे लोकमे ओकरा देखबाक उत्‍सुकता बनल रहैत अछि। संगे रस्‍तामे बनल नव-नव कालोनी, आवासीय फलैट सभ देखाइत छल जेकर ४३ साल पूर्व नामो-निशान नहि छल। ओइ समयमे जेतए जंगल छल, तैठाम महल सभ ठाढ़ देखलौं। परिवर्तन एवम्‍ विकास जीवनक परिभाषा थिक। मनुखक सोभाव अछि जे ओ निरन्‍तर आगाँ बढ़ैमे लागल रहैत अछि। ओ गाछ जकाँ ठाढ़ नहि रहि सकैत अछि। मनुख चल प्राणी अछि। सोभावश निरन्‍तर किछु-ने-किछुमे लागल रहैत अछि। यएह थिक ओकर विकास यात्राक अन्‍तर्रहस्‍य। सोचियौ जे हमरा लोकनिक पूर्वजजँ यथास्‍थितिसँ संतुष्‍ट भऽ गेल रहितैथ तँ आइ हम सभ रेल, हवाइ जहाज, कारमे चलि सकितौं? कदापि नहि। संघर्षेसँ स्‍वर्णिम भविष्‍यक आवाहन होइत अछि। संघर्षे जीवन थिक। कहबी छै जे ‘सफलता टीकासन चढ़ि कऽ बजै छइ। वएह हाल धोनीक छइ। राँचीमे जेतै देखू, जेकरे देखू धोनीक नाओंसँ, ओकरासँ जुड़ल वस्‍तु सभसँ अतिशय प्रभावित अछि। धोनी जइ स्‍कूलमे पढ़ला से प्रसिद्ध भऽ गेल। जइ घरमे छैथ से प्रसिद्ध भऽ गेल। राँचीसँ ६० किलोमीटर दूरपर भगवतीक मन्‍दिर प्रसिद्ध भऽ गेल अछि। सभ कहैत अछि जे धोनी राँची एलापर किंवा कोनो मैच खेलेबाक हेतु प्रस्‍थानसँ पूर्व ऐ भगवतीक दर्शन अबस्‍स करै छैथ। तँए सभ ओइ भगवतीक दर्शनक हेतु उत्‍सुक रहै छैथ। राँचीसँ हमरा लोकनिक ओइठामसँ सेहो किछु गोटे ओइ भगवतीक दर्शन करए गेला। हम सभ नहि जा सकलौं मुदा मोनमे इच्‍छा तँ रहबे करए। ओना, जमशेदपुरसँ आपस अबैतकाल कियो कहलक जे वएह ओ मन्‍दिर अछि जा दूरेसँ सही, भगवतीकेँ मोने-मोन प्रणाम केने रही। जमशेदपुरसँ आएल पाहुनक स्‍वागतमे सभ मुस्‍तैद भेलैथ। बरक चुमौन भेल दुर्वाक्षत हेतु दुर्वाक्षतमंत्रक हम उच्‍चारण कएल। बरक हाथ उठबए लेल कनियाँक पित्ती आएल रहैथ। बरक हाथ उठौला पछाइत सभ गोटे बेराबेरी जमशेदपुर हेतु कारमे बैस प्रस्‍थान केलौं। लगभग साढ़े तीन घन्‍टाक यात्राक बाद हम सभ जमशेदपुरमे प्रवेश कए रहल छेलौं। जमशेदपुर हम पहिनौं रहल छी। मई १९७४ सँ मार्च १९६५ धरि, दूरभाष निरीक्षक हम ओहीठाम रही। बिस्‍तुपुरक मैदानमे जय प्रकाश नारायणजीक भाषण भेल रहइ। वर्षाक बाबजूद सम्‍पूर्ण मैदान लोकसँ खचाखच भरल छल। जय प्रकाशजी राष्‍ट्र भरिमे आन्‍दोलन कए रहल छला। ओही क्रममे जमशेदपुरक यात्रा छल। जमशेदपुर पहुँच कऽ हमसभ होटलमे विश्राम केलौं। सभ बरियातीक हेतु उत्तम बेवस्‍था छल। थोड़बे कालमे जलखै देल गेल। पाकेट बन्‍द डिब्‍बामे नाना प्रकारक जलखैक वस्‍तु सभ राखल छल। पानिक बोतल राखल छल। कोठरी सभमे टेलीवीजन, ए.सी. आदि-आदि सभटा सुविधा छल। लगभग तीन घन्‍टा विश्रामक बाद बरियातीक काफिला विवाह स्‍थली दिस विदा भेल। अद्भुत, रोमांचकारी दृश्‍य छल। फटाकासँ अकास ओ धरती एक भऽ गेल छल। युवक सभ मनोहारी नृत्‍य कऽ रहल छला। थोड़बे कालमे हम सभ विवाह स्‍थल पहुँच गेलौं। मैथिल परंपराक अनुसार बरियाती सबहक हार्दिक स्‍वागत कएल गेल। फेर बरियाती सभ अपन-अपन स्‍थान ग्रहण केलाह। मंचपर बर कनियाँक माल्‍यार्पणक दृश्‍यक आनन्‍दक वर्णन करब शब्‍दक बसक बात नहि। तदुपरान्‍त आज्ञाडाला आएल, विवाहक अनुमति प्रदान करक विध भेल। थोड़ेकालक बाद बर परिछन हेतु विदा भऽ गेला आ हम सभ भोजनक हेतु...। भोजनक उत्तम बेवस्‍था छल। शकाहारी बहुत कम लोक छला। माछ सहित अन्‍यान्‍य निरामिष वस्‍तुक भरमार छल। विवाहमे बरियातीक हेतु एहेन उत्तम बेवस्‍था कम ठाम देखैमे आएल छल। भोजनोपरान्‍त बहुत रास बरियाती विश्राम हेतु होटल आपस चलि गेला। हम अनुज सहित राति भरि विवाह स्‍थलीमे रहि गेलौं। कएटा विध सभ करक रहइ। विवाहोपरान्‍त दुवोक्षत मंत्रक हेतु पुनश्‍च हम सभ उपस्‍थित रही। विवाह भऽ गेल। लगभग पाँच बजे हम आपस होटल एलौं। सरियातीक तरफसँ बहुत रास लोक आएल छला। स्‍थानीय महत्‍वपूर्ण बेकती–एम.एल.ए.–आदि सभ सेहो आएल छला। दोसर दिन पुनश्‍च बरियातीक भोजनक बेवस्‍था छल। अद्भुत बेवस्‍था छल। निरामिष भोजी सबहक पाँव बारह छल। शाकाहारी कम लोक छला। आ ओइठाम अलग-थलग पड़ि गेल रही। सभ तरहेँ सन्‍तुष्‍ट भऽ हम सभ आपस जमशेदपुरसँ राँची विदा भेलौं। लगभग सात बजे हम सभ राँची डेरापर पहुँचलौं तँ साँझक गीत भऽ रहल छल। घरमे पाहुन सभ गजगज करैत छल। लगभग दस दिन यएह हाल रहल। मुदा बेवस्‍थामे कोनो चूक नहि छल। केतेको कार्य कर्ता सभ दिन राति चाह-पान, भोजन, जलखै सबहक बेवस्‍थामे लागल रहैत छला। द्विरागमन, चारिदिन बाद भेल। आ तेकर बाद स्‍वागत भोज। स्‍वागत भोजोपरान्‍त तेतेक लोक छला जे गनब कठिन। नाना प्रकारक वस्‍तु खाइत रहू। चलैत रहू। गप करैत रहू। बर-कनिया संगे फोटो खिचाउ,आ आगू बढ़ि जाउ। १२ बजे तक ई कार्यक्रम चलल। विवाहोपरान्‍त बाँचल समयमे आस-पासक प्रमुख स्‍थान सभकेँ देखबाक इच्‍छा भेल। तइ क्रममे ४३ सालक बाद दोबारा टैगोर हिल देखए गेल रही। पहाड़ीपर चढ़ैले सीढ़ीमे किछु परिवर्तन बुझाएल। आस-पासक दोकान-दौरीक संख्‍यामे वृद्धि बुझाएल मुदा ओइ स्‍थानमे कोनो गुणात्‍मक परिवर्तन नहि बुझाएल। पहाड़ीपर ऊपर चढ़ि गेलाक बाद समूचा राँची शहरक परिदृश्‍य निश्‍चाय मनोरम लगैत अछि। गाहे-बगाहे कियो-कियो देखए आबि जाइत छल। मुदा एतेक पैघ साहित्‍यकार, कलाकारक नाओंसँ जुड़ल ऐ स्‍थानकेँ बेहतर स्‍थितक कामना छल। ओइठामसँ लौटैत काल सड़कक काते-काते तरह-तरहक दोकान सभ देखाएल। मुख्‍यमंत्री, राज्‍यपालक आवास देखाएल, मुदा हम सभ रूकलौं राक गार्डेन लग। ओइ गार्डेनकेँ देख मोन प्रसन्न भऽ गेल। लगैत छल जेना बसन्‍त ऋृत साक्षात्‍प्रकट भऽ गेल छैथ। लालाव किनार पहाड़ीक कछेरमे तरह-तरह केर सजावट प्रकृति स्‍वयं कऽ देने छल। गोंडा हिलक पासमे बनल राक गार्डेन जयपुरक राक गोर्डेनक प्रतिकृति कहल जाइत अछि। एकर निर्माण गोंडा हिलक पाथर सभसँ भेल अछि। मानव निर्मित जल प्रपात, चट्टान एवं शिम्‍पकल प्रकृतिक सौदर्भमे मानव पुरुषार्थक समावेशक प्रमाण प्रस्‍तुत करैत अछि। राक गोर्डेन मात्र दर्शनीय स्‍थान नहि अछि अपितु एकर सुरम्‍य ओ शान्‍त वातावरणमे आत्‍माकेँ एकटा सकून भेटैत अछि जे आनठाम सुलभ नहि अछि। कॉके डैमक समीप हेबाक कारण एकर सौंदर्य अनायासे बढ़ि जाइत अछि। धिया-पुताक संगे कखनो काल ऐठाम जा कऽ नीक समय व्‍यतीत कएल जा सकैत अछि। असगरो जा कऽ आत्‍म चिन्‍तन एवम्‍ शान्‍तिक अन्‍वेषण करबाक ई एकटा उपयुक्‍त स्‍थान अछि। राक गोर्डेनमे हम सभ सपरिवार वर्तमान यात्रामे गेल रही। अद्भुत आनन्‍दक अनुभूति भेल। यत्र-तत्र हरियर कंचन, रंग-विरंगी फूल, पाथर काटि-काटि कऽ बनौल गेल तरह-तरह केर आकृति देख बहुत नीक लागल। किछुकाल बैस ओइठामक शान्‍ति ओ प्राकृतिक सौंदर्यक आनन्‍द लऽ हम सभ आगू बढ़ि गेलौं। राँची अपन आवो-हवाक हेतु प्रसिद्ध छल। लोक स्‍वास्‍थ्‍य लाभ करबाक हेतु ओइठाम जाइत छल। मनोरोगी सबहक प्रसिद्ध चिकित्‍सालय कॉके, राँचीमे अछि जेतए राँचीक सुरम्‍य वातावरणमे मनोरोगी सभ मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य लाभ करैत छल। आध्‍यात्मिक दृष्‍टिमे योगदा सत्‍संग केर मुख्‍यालय राँचीमे अछि जैठाम गेलापर अखनो शान्‍तिक अनुभव होइत अछि। यद्यपि योगदा सत्‍संग मंठ आब शहरक बीचमे भऽ गेल अछि, तथापि अखनौं आश्रमक अन्‍दर गेलासँ आनन्‍द होइत छइ। योगदा आश्रमक स्‍थापना सन्‍ १९१६ मे परमहंस योगानन्‍द द्वारा भेल। ओ ऐठाम आश्रमक आलावा बालक सबहक हेतु जीवन निर्माण विद्यालय एवम्‍ क्रिया योगक प्रशिक्षणक बेवस्‍था केलैथ। योगदा आश्रममे ४३ सालक बाद फेरसँ पहुँच बहुत सन्‍तोष ओ आनन्‍दक अनुभव भेल। ओइठाम सभसँ पहिने योगानन्‍द परमहंसक कक्ष देखलौं। ओइमे गुरुजीक किछु सामान सभ राखल अछि। हुनका हाथ तथा पैरक निशान अछि एवम्‍ हुनकर महासमाधिपर सँ आनल गुलावक फूल राखल अछि। गुरुजीक आवासक समीप एकटा लिचीक पैघ गाछ अछि जैठाम ओ बैस अपन विद्यार्थी सभकेँ प्रवचन करैत रहै छला। अखनो ओइ गाछकक जड़िमे गुरुजीक चित्र राखल अछि। आगन्‍तुक सभ ओइठाम बैस धियान कऽ आत्‍मशान्‍तिक अनुभव करै छैथ। राँची आश्रमक विद्यालयक स्‍टोर रूममे बैस गुरुजी कएक बेर आत्‍म चिन्‍तन करैत रहै छला।ओइठाम आइ-काल्‍हि स्‍मृति मन्‍दिर बनल अछि। षटकोणीय उज्‍जर संगमरमरसँ बनल ऐ स्‍मारकक मुकुटपर सुन्‍दर कमल बनल अछि। आश्रममे ध्‍यान केन्‍द्र अछि, जैठाम बैस लोक भोर-साँझ घन्‍टो धियान करैत अछि। अगल-बगलक तरह-तरहक वृक्ष सभ वातावरणकेँ अत्‍यन्‍त सुरम्‍य एवम्‍ आकर्षक केने अछि। तकैत-तकैत प्राचार्य निवास पहुँचलौं–जेतए ४३ बर्ष पूर्व हम डॉ. शुभद्र झाक संगे एक मास रहल रही। ओ छोट सन भवन बन्‍द छल मुदा ओकर छबि ओहिना छल। देख कऽ भूतकालक दृश्‍य फेरसँ आँखिक सोझमे आबि गेल। ओइठाम बरामदापर बैस साँझ-के शुभद्र बाबू अध्‍ययन ओ चर्चा करैत छला। आश्रमक एकभागमे प्रशासकीय भवन अछि, जेकर नाओं शिवालय थिक। ओतए जा कऽ किछु पोथी किनलौं, किछु जानकारी इकट्ठा केलौं। आ घुमैत-फिरैत हरमू हॉउसिंग कालोनी स्‍थित अपन डेरा आपस आबि गेलौं। एक दिन अहिना घुमैत-फिरैत रामकृष्‍ण मिशन मठ पहुँच गेलौं। ओइ दिन रामकृष्‍ण परमहंसक जयन्‍ती मनौल जा रहल छल। सत्‍संग भवन खचाखच भरल छल। अधिकांश बंगाली लोकनि गाहे-बगाहे मैथिली भाषी सेहो देखेलाह। होमक बाद फूलसँ अर्चना भेल। भक्‍त सबहक हाथमे फूल देल गेल आ पूजोपरान्‍त एकएक बेकतीक हाथक फूल एकटा अढ़ियामे एकट्ठा कएल गेल जइसँ केतौ मैलि नहि भेल। थोड़े कालक बाद सभ कियो भंडारामे गेला जैठाम पुरनिक पातपर खिचड़ि देल जा रहल छल मुदा मंगलक उपासक कारण हम फरिक्केसँ प्रणाम कए पुस्‍तकालय चलि गेलौं। रामकृष्‍ण मिशन मठ, टैगोर हिलसँ लगे अछि। सन्‍ १९१३ इस्‍वीमे श्रीरामकृष्‍ण परमहंसक अनन्‍य शिल्‍यमेसँ एक स्‍वामी सुबोधानन्‍द (खोका महाराज) क राँची शुभागमन भेल। ओ किछु भक्‍तक संग टैगोर हिल पहुँचला। भोजनादिक उपरान्‍त पेयजलक खोजमे वर्तमानमे रामकृष्‍ण मठ स्‍थित इनारपर पहुँचला आ ओकर पानिसँ अपन पियास बुझौलैथ। ओइ इनारकेँ अखनो स्‍मारकक रूपमे बँचा कऽ राखल गेल अछि। ओइठाम किछुकाल ठाढ़ भऽ सोचैत रहि गेलौं जे करीब साए साल पूर्व ई स्‍थान केहेन छल जे पानिक हेतु स्वामीजीकेँ एतए आबए पड़ल आ ऐगला साए सालक बाद पता नहि की रहत, की नहि रहत...। राँचीक नवनिर्मित खेलगॉव सेहो दर्शनीय अछि। तरह-तरहक खेलक हेतु प्रशिक्षणक बेवस्‍था ओइठाम अछि। ओइमे अनेकानेक प्रकारक इन्‍डोर स्‍टेडियम अछि जेकरा देखैत बनैत अछि। स्‍वच्‍छ ओ रमणीय वातावरणमे बनल ई खेल परिसर देखबामे बहुत आकर्षक अछि। मोन हएत जे घुमिते रही। राँची शहरसँ आध घन्‍टामे हमरा लोकनि विरसा जैविक उद्यान पहुँचलौं। उद्यानक अन्‍दर घुमबाक हेतु गाड़ी भेटै छै, मुदा जखन हम सभ पहुँचलौं तँ सभ गाड़ी खुजि गेल रहइ। एक घन्‍टाक बाद गाड़ी भेटैत तँए हम सभ पएरे उद्यानमे घुमबाक हेतु विदा भेलौं। तरह-तरह केर जीव-जन्‍तुसँ भरल उद्यानक हरियरी देखैत बनैत अछि। सभसँ पहने हम सभ शुतुरमुर्ग देखलौं, तेकर बाद गरूड़। गरूड़ देख आश्‍चर्य भेल जे विष्‍णु भगवान केना एकरा अपन वाहन बनौलथिन। क्रमश: हम सभ जाईट हेरोन, परिया चील आ तेकर बाद भारतीय बाघ देखलौं। बाघ ओइ बारक अन्‍दर लगातार घुमि रहल छल जेना कोनो शिकार करबाक हेतु आतुर हो। कनी कालक बाद तेंद्दुआ, हरिण, भाउल, शाहिल, कोटरा, नील गाए आ अन्‍तमे हाथी देखलौं। हाथीकेँ महथवार शिक्षित कए देने रहइ आ ओ दर्शक द्वारा फेकल गेल रूपैआकेँ शूरसँ उठा लैत छल। घुमैत-फिरैत अनेकानेक जीव-जन्‍तु देख सकलौं जे आइ तक नामो नहि सुनने रही मुदा मोनमे ई सोचि दुख भेल जे स्‍वतंत्र रहैबला ऐ प्राणी सभकेँ मनुख केना बान्‍हि देने अछि..! स्‍वार्थक हेतु मनुख संतति स्‍वतंत्र रहएबला जीव सबहक जिनगी नर्क कऽ देने अछि..! जंगलमे उन्‍मुक्त सदैत गरजैत-फरजैत रहएबला बाघ, चीता, भाउल इत्‍यादि सभ जीव मनुखक आत्‍याचारक कारणेँ बेवस अछि। बाघकेँ बेवस ओइ वारमे घुमैत-फिरैत देख हम अतिशय दुखी भऽ गेल रही। हे मनुक्‍ख! अहाँ अत्‍याचार, अहंकारपर विराम किएक ने दऽ रहल छी? केतबा दिन एतए रहब? चलि जाएब दुनियासँ तँ की छोड़ि जाएब? अत्‍याचारक मूक कथा? जे प्राणी प्रतिकार नहि कऽ सकल, जे बाजि नहि सकल किंवा जेकर चित्‍कारक भाषा अहाँ बुझि नहि सकलौं आ निर्दोष प्राणी सभकेँ सदा-सर्वदाक हेतु कारावासोसँ कठोर जीवन जीवाक हेतु विवस कए देलौं? केना शान्‍ति हएत, एहेन अत्‍याचारी आत्‍मा सभ? अस्‍तु मानव समाजकेँ सोचबाक चाही जे प्रकृति प्रदत्त सौन्‍दर्यक आनन्‍दक निवोध आनन्‍दक प्रयासमे ओकरा नष्‍ट किएक कऽ रहल अछि। लगभग चारि घन्‍टा धरि लगातार चलैत रहलाक बाद हमसभ थाकि गेल रही, सुस्‍ताएब जरूरी बुझाएल। अस्‍तु वोटींग स्‍थान लग बनल दोकानसँ पानि कीनलौं, किछु खेबाक सामान सेहो लेलौं आ खाइत-पीबैत किछुकाल विश्राम करैत पुन: विदा भेलौं। फेर नौका विहार हेतु टिकट लेलौं। नौका विहारक एहेन विचित्र बेवस्‍था आइ तक नहि देखलौं। छोट सन एकटा नाह दऽ देलक आ कहलक जे एकरा अपने चलाएब। कोनो नाविकक बेवस्‍था नहि अछि। परेशान भऽ गेलौं। नाह चलेबाक कोनो अनुभव हमरा नहि छल। चारि गोटे नाहपर बैसल रही। बेवस्‍थापक सभ बहुत हिम्‍मत देलक। तरह-तरहसँ प्रशिक्षित करबाक, बेझेबाक प्रयास केलक। मुदा हमरा हिम्‍मत नहि होइत छल। मनमे होइत छल जे जँ कहीं नाह डुबि जाएत, चाहे किछु गड़बड़ भऽ जेतै तखन तँ लेनीक-देनी पड़ि जाएत। तथापि बहुत हिम्‍मत कऽ ५-६ मीटर नाह खेबलौं। आगू बढ़बाक हिम्‍मत नहि भेल आ बहुत प्रयासक बाद आपस आबि नाहसँ उतैर गेलौं। उतैरते जेना जान-मे-जान आएल। सभ कियो थाकि गेल रही। अस्‍तु बाहर आबि गाड़ीमे बैस कऽ आगू बढ़ि गेलौं। राँचीक जगर्न्नाथ मन्‍दिर परिसरमे पहुँच आध्‍यात्‍मिक सुख भेटल। मंत्रोच्‍चार तथा भजनसँ वातावरण सुगन्‍धित छल। मन्‍दिरक गर्माहटमे बाहरे पण्‍डीजी छला। रूपैआ देखैत हुनक अन्‍दर भाव बढ़ि गेल अन्‍यथा ओसोझ मुहेँ गपो करबाक हेतु तैयार नहि रहैथ। किछु मंत्र पढ़ि हमरा लोकनिकेँ जगर्न्नाथजीकेँ पुष्‍पांजलि दियौलैथ। तद्दुपरान्‍त मन्‍दिरक किछु जानकारी सेहो भेटल। भोज खेबाक हेतु ३० प्रति बेकती एक दिन पूर्व जमा कराबए पड़ैत अछि तखने दोसर दिन बारह बजे भोग भेटैत अछि। पूरीक जगर्न्नाथ मन्‍दिरक भोगक स्‍मरण भऽ गेल। मुदा ओइठामक भोग तँ उम्‍दा होइत अछि जे खेलाक बाद आर किछु खेबाक इच्‍छा नहि होइत अछि- कहक माने जे भरिपेट्टा रहै छइ। देखबा योग्‍य राँचीक आसपास कएकटा डैम सभ अछि। आओर कएकटा ऐतिहासिक वस्‍तु सभ अछि, मुदा मोटा-मोटी हम खहरक परिभ्रमण कऽ लेने रही। टेलीफोन एक्‍सचें, कचहरी, शहीद चौक, रातु रोड विश्वविद्यालय आदि-आदि मुख्‍य स्‍थान सभसँ एकाधिक बेर भऽ आएल रही। ४३ साल बाद राँचीक स्‍मृति फेरसँ नूतन भऽ गेल आ एकटा अत्‍यन्‍त संतुष्‍टिक भाव मोनमे भेल। २ मार्च २०१७ इस्‍वीक भोरे हमर सबहक दिल्‍लीक हेतु वायुयान छल। साढ़े सात बजे भोरे डेरासँ हवाइ अड्डा प्रस्‍थान कएल। साढ़े नौ बजे दिल्‍लीक हेतु जहाज उड़ि गेल। एकटा मधुर स्‍मृतिक संग हम सभ राँचीसँ दिल्‍लीक यात्रा सम्‍पन्न कए एक बजे घर आपस आबि गेलौं। राँचीक एक सप्‍ताहक यात्रामे भातिजक बिआह तँ देखबे केलौं संगे बहुत रास आनो-आनो चीज सभ देख सकलौं। एकबेर फेर राँचीक स्‍मरण नवीन भऽ गेल छल। १२/३/२०१७ गामक बात बाल जीवनक तँ बाते किछु अलग होइत अछि। जखन लाउडस्‍पीकरसँ प्रचारित कएल जाइ जे आइ दड़िभंगा वा मधुबनीमे कोनो बड़का आदमीक अबाइ छै, तँ मोनमे भाव उठैत छल जे ओकरा अबस्‍स देखक चाही। पता नहि, ओ बड़का आदमी १० हाथक हएत कि बीस हाथक...। अहिना एकबेर बिनोबा भावे मधुबनी आएल छला। वाटसन स्‍कूल- मधुबनीमे बच्‍चा सबहक बीचमे प्रवचन केने रहैथ। हुनका देख आश्चर्यमे पड़ि गेलौं जे आखिर ई बड़का आदमी केना भेला। कद-काठीमे तँ छोटे रहैथ। तहिना एकबेर गुलजारी लाल नन्‍दाकेँ देखबाक हेतु मधुबनी सुरी स्‍कूलपर गेल रही। फेर वएह बात...। आखिर एकरा लोक बड़का आदमी किए कहै छइ? हमरे गामक लोक जकाँ पाँच फीटक आदमी तँ ईहो अछि। तखन पैघ कथीक भेल? ऐ प्रश्‍नक उत्तर ताकए-मे जिनगी निकैल गेल। पैघ के अछि? पैघत्वक प्रयासमे तँ सौंसे दुनियाँ लागल अछि, मुदा सबहक अकार-प्रकार तँ ओहिना-क-ओहिना रहि जाइत अछि। गाममे चौराहा सभपर घन्‍टो गप करैत लोकक दृश्‍य सामान्‍य बात छल। एमहरसँ एक गोरे आएल, ओमहरसँ कियो आएल आ गप शुरू भऽ गेल। हमहूँ सभ अपन दोस्‍त सभसँ अहिना गप करैत रहि जाइ छेलौं। कएक बेर हम अरियाति कऽ हुनका ओइठाम दऽ अबिऐन आ कएक बेर ओ हमरा। हाटपर, चौकपर तँ गपक गोष्‍ठी चलिते रहै छल। रास्‍तामे कियो भेट गेल तँ गप केने बिना केना चलि जाएत। आश्चर्य ई लगैत अछि जे आखिर लोक सबहक काज धन्‍धा केना चलइ। मुदा सभ किछु तँ हेबे करइ। असलमे लोकक जीबाक अन्‍दाज दोसर रहइ। सभ वस्‍तुमे, गप-सप्‍पमे, गरीबीमे, जीवन-संघर्षमे आनन्‍द ताकि लैत छल। जँ से नहि रहितैक तँ बोनि कऽ कऽ एकसंझू खाइबला बोनिहार सभ निचैन भऽ कऽ खेतमे गीत नहि गबैत, भोरे उठि कऽ लोक परातीकेँ स्‍वर नहि दऽ सकैत आ आठ बजिते चैनसँ सुति नहि जाइत। शहरक आपाधापी, प्रतिस्‍पर्धात्‍मक जीवन-शैली गाम तक नहि पहुँचल छल। लोक स्‍वत: स्‍फूर्त नैसर्गिकतासँ ओत्-प्रोत् छल। धन, एश्वर्य लोकक अवचेतन मोनपर तेते हाबी नहि छल जे श्रेष्‍ठताक प्रयत्नमे वर्तमानकेँ नर्क कऽ लिअए। परिवर्तन जीवनक संकेत थिक। जे काल्‍हि बच्‍चा छल ओ आइ जबान भऽ गेल, तहिना जबान प्रोढ आ क्रमश: बुढ़ भऽ गेल। ई प्रक्रिया तेहेन निरन्‍तर ओ सतत अछि जे हरषट्ठे किनको बुझए-मे नहि आबि सकैत अछि, जे की भऽ रहल छै, केना भऽ जाइ छइ। सेहो तेहेन जे जँ पाछू उनैट ताकब तँ तकिते रहि जाएब। आइसँ चालीस वा तीस साल पूर्व जे सभ गाममे कहबैका छला, धन-सम्‍पैत, प्रतिष्‍ठासँ ओत्-प्रोत्‍ छला, आइ तिनकर नामो निशान नहि अछि। गाम वएह अछि, जगह वएह अछि, घरो वएह अछि, मुदा लोक गायब अछि। केकरा लग बैसब, केकरासँ कहबै मोनक गप, केकरासँ सहानुभूतिक अपेक्षा करब, केकरा उपलब्‍धिक समाचार लऽ कऽ जाएब। तकलोपर कियो नहि भेटत। एक-एक-केँ सभ गुजैर गेल, आ गुजरलो जा रहल अछि। तथापि वातावरणमे दम्‍भ, अहंकार आ प्रतिशोधादिक वृति ओहिना देखल जा सकैत अछि। फल्‍लाँ बाबू हमर पुरखाक अहित केलाह, अपमानित केलाह, आब हमहूँ देखा देबइ...। ऐधन चक्करमे पुश्‍त-दर-पुश्‍त लोक अपसियाँत अछि। आधुनिकताक प्रचण्‍ड बिहाड़िमे पूरातनक वैमनस्‍यताकेँ हिलाइये ने सकल आ लोक छोट-छोट बातपर गोलबन्द भऽ जाइत अछि। पतझड़ अबिते गाछक गाछसँ पात सभ खसि पड़ैत अछि। गाछ सुन्न भऽ जाइत अछि। ठूठ गाछकेँ देख कऽ छगुन्‍ता लागि जाइ छइ। लोक ठिठैक जाइत अछि। परन्‍तु प्रकृति आगू बढ़ैत अछि। क्रमश: एक-एक डारिमे हजारो नव पम्‍ही निकलै छइ। हरियरी फेरसँ ओइ गाछकेँ आवृत कए लैत अछि। हरियर कंचन नव-नव पल्‍लवसँ सम्‍पूर्ण नव कनियाँ जकाँ प्रकृति ओइ गाछकेँ एश्वर्यमयी कए लैत अछि। गामोमे सएह होइत अछि। पुरान-पुरान लोक सभ क्रमश: गुजैर गेल। नव-नव लोक घरे-घर पसैर गेल। प्रवासी लोक जखन गाम जाइ छैथ तँ अपने गाममे अनचिन्‍हार भऽ गेल छैथ। मुदा ई समयक प्रभाव अछि। जइ एकपेरियापर चलैत बच्‍चामे दोस्‍त सभसँ झगड़ा भऽ जाइत छल, जैठाम बैस घन्‍टो गप करैत रहै छेलौं, जैठाम जाइते अपनत्‍वक बोध होइत छल ओ सबटा आइ लुप्‍त भऽ गेल। रहि गेल अछि मोनमे ओइ सबहक एकटा सुखद स्‍मृति। गाममे कामरेड सभ तूफान केने रहैत छला। गामेमे आन्‍दोलनक जड़ि आ फुनगी छल। बेकतीगत ईर्ष्‍या-द्वेषकेँ ठेकाना लगेबाक एकटा साधन छल ओ आन्‍दोलन। किछु युवक सभ अपने टोलक सुखी परिवारक जमीनपर तरह-तरह केर फसाद करैत रहै छला। ओ नीक छला, खराप छला, जे छला मुदा ओइ आनदोलनक किछु परिणाम नहि भेल, सिवाय ई जे सुखीत लोक तंग भेल। ओकर जमीनमे उपजावारी कम भेल, गामक वातावरण दुषित भेल। आ अन्‍तमे ठाकक तीन पात। ओ युवक सभ अन्‍तत: गाम छोड़ि रोजी-रोटीक प्रयासमे बाहर चलि गेला। गाम फेरसँ शान्‍त भऽ गेल, पुरनका रस्‍तापर चलए लगल। बात-बातमे दुगोला कऽ लेब, खएन-पीन बन्‍द कऽ लेब आम बात छल। हम सभ जखन बच्‍चा रही तँ आधा गामसँ बेसी दुगोला रहइ। कहि नहि, कखन कोन बातपर मतान्‍तर भेल आ भऽ गेल दुगोला। बहुत दिनक बाज जा कऽ केना-ने-केना आपसी सहमति भेल। किछु युवक सबहक प्रयाससँ गाममे एकगोला भेल। सभ कियो एक-दोसरक ओइठाम नौत-पेहानी शुरू केलक। कमो-बेसी अखनो एकगोला चलि रहल अछि। दुगोलाक तेतेक प्रभाव रहै जे लोक सभ एक्के गाममे फराक-फराक रहैत छल। हमर सबहक घरक पछुआरमे डिही सबहक घर छल। मुदा बच्‍चामे कहियो आपसी आवागमन नहि देखए-मे आएल। ओइठाम एकटा इनार रहइ जेकर पानि बहुत स्‍वादिष्ट छेलइ। पानि भरए लोक ओतए जाइ छल, हमहूँ कएबेर गेल रही, मुदा आन सम्‍पर्क नहि छेलइ। ऐ तरहक स्‍वत: घोषित प्रतिवन्‍धित क्षेत्रक यथार्थमे मनुखक अहंकार ईष्‍या-द्वेष, प्रतिशोध रहैत अछि। ऐ तरहक निषेधात्‍मकताक कोनो सुखद परिणाम केतए होइत। गाममे रहितो छी आ नहियोँ छी। मुदा आब तँ एकगोलाक अछैतो गामक परिदृश्‍य बदैल गेल अछि। आपसी सम्‍पर्क कम कि जे नहियेँक बरबैर भऽ गेल अछि। लोक शहरे जकाँ चुप्‍पा-चुप्‍पी अछि। एक दिन हम अपन घरक ओसरापर बैसल रही कि अवाज भेल ‘तर्राक तर्राक..!’ एक वृद्ध बेकतीपर एक पहलवान टाइपक बेकती तर्रातर लाठी बरसा रहल छल। हे राम! कियो ओकरा रोकै नहि छल। की भऽ गेलै ऐ गामकेँ? कहैले सभ गौवें अछि। कोनो-ने-कोनो तरहेँ एक-दोसरसँ जुड़ल अछि, एक-दोसरक सम्‍बन्‍धी अछि, तखन एहेन दृश्‍य। भऽ सकैए ओइ वृद्धसँ किछु गलती भऽ गेल होइक, मुदा तेकर प्रतिफल एहेन हिंसात्मक तँ नहि हेबाक चाही। मुदा की हेबाक चाही आ की भऽ रहल अछि? देखैत रहू, चुप रहू नहि तँ ई लाठी छिटैक कऽ अहूँपर लागि सकैत अछि। आठ-दस लाठी खेलाक बाद केना-ने-केना ओ भागि सकला कि लोक बँचा देलकैन से तँ आब मोन नहि अछि, मुदा ऐ घटनाकेँ बिसरलो नहि भऽ रहल अछि। लाठी चलौनिहार बेकती आब दुनियाँमे नहि छैथ, लाठी खेनिहार सेहो नहि छैथ, मुदा ओ दृश्‍य पता नहि केतए-केतए आ केकरा-केकरा दिमागपर अंकित अछि। कम-सँ-कम हम तँ नहियेँ बिसैर सकलौं। कम-सँ-कम ३५-४० वर्ष पूर्वक ई घटना थिक। ‘तुम तो ठहरे परदेशी, साथ क्‍या निभाओगे, सुबह पहली गाड़ी से घर को लौट जाओगे....।’ ऐ गीतक भावसँ आत्‍मा झंकृत भऽ जाइत अछि। जइ गाममे हम बच्‍चा रही, युवक भेलौं आ पढ़लौं-लिखलौं, सएह आब प्रश्‍न चिन्‍ह लऽ कऽ ठाढ़ अछि। रोजी-रोटीक जोगारमे लोक गामसँ बहराएल। तैयो लोक अबै-जाइत तँ रहबे करए। मुदा क्रमश: ई रफ्तार कम भेल। आ गामक परिवेश बदलैत रहल। गामक गाम परदेशी (प्रवासी)क एकटा जबरदस्‍त हुजुम भऽ गेल। आब गाम जा कऽ ओ सभ किंकर्तव्‍यविमूढ़ भऽ जाइत अछि। जे गाममे रहि गेला से बाबा वैद्यनाथ जकाँ तेहन कऽ जमि गेल छैथ जे हुनका उखाड़ब कोनो रावणक बसक नहि रहि गेल अछि। तमसा कऽ औंठा गाड़ि देबै तँ गाड़ि दियौं, ओ धँसि जेता मुदा उखड़ता नहि। अपनाकेँ अहाँ केतए ठाढ़ करब? अहाँ लग के रहत? अहाँसँ केकरा की लाभ हेतइ? अहाँ तँ चलि जाएब। फेर तँ हमरा ऐठामक लोकसँ निपटक अछि, अही अर्न्‍तद्वन्‍दसँ अभिभूत गामसँ अपनो लोक बहरियासँ कात भऽ जाइत अछि। ऐ प्रसंगमे किछु दिन पूर्व एकटा खिस्‍सा पढ़ए-मे आएल जे बहुत प्रासंगिक लगैत अछि। एकटा हंसक जोड़ा राति भेलापर एकटा गाछपर टीक गेल। ओइ गाछक खोदमे एकटा उल्‍लू रहैत छल। रहि-रहि कऽ ओ अवाज देबए लगइ। हंसक जोड़ा राति भरि ओइ कर्कस अवाजकेँ सुनैत-सुनैत तंग भऽ गेल। ओकरा बुझेबे नहि करै जे ई उल्‍लू एतेक अवाज किएक कऽ रहल अछि। भोर भेने हंसक जोड़ा गाछपर सँ विदा होइत छल कि उल्‍लू आगू आबि कऽ रस्‍ता छेकि लेलकै आ कहलकै- “खबरदार जँ आगाँ बढ़लह! ई हंसिनी हमर अछि। ई हमरे संगे रहत।” हंसकेँ ठकविदोर लागि गेल। जोरसँ चिचिया उठल। उल्‍लूकेँ चेतौलक। मुदा उल्‍लू टस-सँ-मस नहि भेल। कहलकै जे पंचैती करा लएह। हंस ऐ बातसँ सहमत भऽ गेल। पंचायतमे सभ पंच सर्व सम्‍मतिसँ फैसला कऽ देलक जे हंसिनी, उल्‍लूक पत्नी अछि आ ओकरे संगे रहत। हंस अवाक् भऽ गेल। अन्‍तमे ओकरा उल्‍लू बुझौलकै- “देखलहक केहेन गाम छइ? ऐठामक सरपंच वएह कहतै जे हम चाहबै। कारण हम ऐठाम रहै छी। तूँ परदेशी छह। कनीकालमे उड़ि जेबह। तँए तोहर के संग देतह। जायज-नजायजक चक्करमे के पड़त? अही दुआरे हम तोरा राति भरि चिकैर-चिकैर कऽ कहैत छेलियह जे ऐ गामसँ दूर चलि जाह। ऐठाम तोहर कियो नहि हएत। मुदा तूँ नहि बुझलह। आबो भागि जाह।” ई कहि उल्‍लू हंसिनीकेँ मुक्‍त कऽ देलक आ हंस हंसिनीकेँ लऽ ओतए-सँ तेना भागल जे फेर उलैट कऽ नहि तकलक। दियादीमे कोनो मतान्‍तर भेल कि दियादनीकेँ डाइन घोषित कऽ देल जाइत अछि। तेकर बाद तँ एकर तेहेन चक्रव्‍यूह बनैत अछि जे ओइ तथाकथित डाइनक जीवन नर्क भऽ जाइत अछि। अपनो लोक सभ ओकरासँ कन्नी काटए लगैत अछि। ओकरा हाथे चाहो-पानि पीबैमे संकोच होमए लगैत अछि। जेतइ बैसू ऐ बातक कानाफुसी हएत। तरह-तरह केर अबलट सभ सुनैमे औत। अरे, फँल्‍लीं तँ गाछ हँकैत अछि! राति-के नँगटे नचै छइ। ओकरा तँ ब्रह्म-पिचास पोस छै, इत्‍यादि। तरह-तरह केर अफवाह निरन्‍तर चलैत श्रृँखलाक ने आदि होइत अछि आ अन्‍त। ऐ तरहक अफवाह ओ दोषारोपणक कोनो अन्‍त नहि अछि। केकरो पेटमे दर्द भेलै तँ डाइन कऽ देलकै, केकरो बच्‍चा बेमार भेलै तँ डाइन अगिनवान फेक देलकै। माने जेतेक जे कष्‍ट भेलै से वएह कऽ देलकै। ऐ वैज्ञानिक युगमे लोक केतए-सँ-केतए चल गेल मुदा अपन ग्रामीण समाज अखनो सैकड़ो साल पर्वक मानसिकतासँ मुक्‍त नहि भऽ सकल। गाममे केकरो घरमे चोरी भऽ गेल रहइ। चोरकेँ पकड़बाक हेतु बट्टा चलौल गेल। मूसक बिलसँ निकालल गेल माटिकेँ मंत्रा कऽ बट्टापर फेकल जाइक,आ ओझा-गुनी ओइ बट्टाकेँ कटकटा कऽ धेने रहइ। मंत्रोक प्रभावसँ बट्टा शुर्र-दे चलए लगइ, चोरक दिशामे। लोक सभ, खास कऽ बच्‍चा सभ पाछाँ-पाछाँ भागैत। बट्टाक दिशा देख अनुमान लगौल जाइत जे चोर केमहर गेल। गाममे सबहक माथा अपना-अपना तरीकाक होइत अछि। जेकरे कहबै जे ई सभ फुसि थिक, अहींक उपहास करए लागत। बट्टा चला कऽ चोर पकड़ब आ झाड़-फूक कऽ साँपक बीख उतारब आम बात छल। एकबेर हमहूँ अपन अनुजक संग दस बजे रातिमे साँपक बीख झाड़ैबला केँ–चटिवाह कहल जाइए–बजबए कलमे-कलम तकने फीरी। बाबूकेँ साँप काटि लेने रहैन। बहुत प्रयासक बाद ओ भेटला, उलटनक वेग..., पलटनक वेग..., किदैन-किदैन कऽ कऽ साँपक मंत्र पढ़ि-पढ़ि बाबूक टाँगपर चाटी-पर-चाटी पड़ल ओ बँचि गेलाह। असलमे ओ साँप ढोढ़ रहइ, तर्थात्‍ विषहीन साँप। हाइस्‍कूलक कोठरीमे तीन गोटेकेँ पुलिस पकैड़ कऽ बन्‍द कऽ देने रहइ। गाम-गामसँ लेाक करमान लागि गेल छल। जेना-तेना केबाड़सँ लटैक कऽ, खिड़की बाटे, देबालक फट्ठाक भूरसँ ओकरा सभकेँ लोक एक बेर देखए चाहैत छल। असलमे बात ई भेल छल जे तीनू मिलि कऽ एकटा युवतीक बालात्‍कारक बाद हत्‍या कऽ देने छल। ओ युवती आसेपासक छल। घास काटैले घरसँ खुरपी ओ छिट्टा लऽ निकलल छल। रातियो भेलापर घर आपस नहि गेल, तँ खोज-पुछारि शुरू भेल। प्रात:काल महींस चरबैबलाकेँ ओकर लाश कलममे भेटलै। गर्द पड़ि गेल। पुलिस-थाना भेल आ शीघ्रे तीनू अपराधी पकड़ल गेल। ओइमे दूटा तँ ओइ महिलाक टोलेक छल आ तेसर अधवयसू कण्‍ठीधारी पड़ोसी टोलक छल जे घटनाक समय ओतए आबि गेल छल आ दुर्भाग्‍यवश ओइ अपराधमे सहयोगी भऽ गेल छल। तीनूकेँ आजन्‍म कारावास भेल। साले-साल ई दृश्‍य हमरा मोनमे उभरैत रहल, कचोटैत रहल जे केना एकटा मेहनतकश महिलाक अकाल मृत्‍यु भऽ गेल। ओइ महिलाक पिता मजदूर छल। हमरा गाममे बरोबरि मजदूरी करए अबैत छल। अपन कन्‍याँक हत्‍या दुखसँ सालो ओ शोक-संतप्‍त रहल। ग्रामीण परिवेशमे ओइ तरहक घटना कमे सुनबामे अबैत छल। मुदा मनुखक प्रवृतिक कोन ठेकान? कखन ओकरापर पैशाचिक पशुवृत्ति हाबी भऽ जाएत..? आजन्‍म कारावास काटि कऽ ओ सभ फेर घुरि आएल। फेरसँ अपन रोजी-रोटीमे लागि गेल मुदा ओइ बापकेँ बेटी आपस नहि आएल। ओ दुनियाँ प्रस्‍थान कऽ गेल। ई घटना आइसँ पचास साल पूर्वक अछि, मुदा लगैत अछि जे ओकर माए-बाप अखनो ओइ स्‍कूलपर ओहिना छाती पीट रहल हो, ओकर करुणामय चीत्‍कार जेना परोपट्टामे ओहिना पसैर गेल हो। आम आदमीक लेल वंशक ओ एक घटना मात्र रहल होइक, मुदा ओइ मेहनतकश गरीब माए-बापक दृश्‍य सदा-सर्वदा करूण क्रंदन करैत रहि गेल मुदा ओकर बेटी घुरि नहि आएल। हम सभ मैट्रिकक परीक्षा देबए गेल रही तँ एक्के संगे कएगोटा डेरा लेने रही। ओइमे एक गोटे रहिका उच्‍च विद्यालयक छात्र हमरे सबहक संगे रहैथ। कारी, सुगठित शरीर, मझौल कद-काठी। जहन नौकरी करैत इलाहावादमे रही तँ छुट्टीमे गाम आएल रही। बहुत दिन बाद फेर हुनकासँ भेँट भेल रहए। आसेपासक गाममे ओ प्राइमरी स्‍कूलमे शिक्षक रहैथ। कोनो बात लऽ कऽ गौंआँ सभसँ मतभेद भऽ गेलैन। गौआँ सभ हुनका स्‍कूलेमे घेर लेलकैन। अपन जान बँचबए हेतु ओ कोठरीकेँ अन्‍दरसँ बन्‍द कए लेलाह। मुदा भीड़ बढ़िते गेल। हुनका ओ सभ मारि देत, ऐ डरसँ ओ एकटा बच्‍चाक गरदैनपर छुरी धऽ कऽ लोककेँ डराबए लगलखिन। लोक सभ पुलिसकेँ बजौलक। पुलिस आबि कऽ हुनका कोठरी खोलबाक लेल कहलकै आ आश्वासन देलकै जे हुनका किछु अहित नहि हएत। पुलिसक आश्वासनक बाद ओ कोठरी खोलि देलखिन। कोठरी खुजिते यए-ले, वए-ले सैकड़ो लोक पुलिसक सामने हुनका पीटए लागल आ तेतेक पीटलक जे ओ ओहीठाम बेहोश भऽ कऽ खसि पड़लाह आ अस्‍पताल जाइत-जाइत हुनकर देहावसान भऽ गेल। सम्‍भवत: ग्रामीण सभसँ हुनकर विवाद पढ़ाइ-लिखाइ किंवा धिया-पुताकेँ डाँट-डपट लऽ कऽ भेल रहए, मुदा ओ विवाद बहुत आगू बढ़ि गेल आ असमयमे हुनकर जान चलि गेल। तीस सालसँ बेसी भऽ गेल मुदा अखनो धरि हमरा मोनमे ऐ घटनाक परिदृश्‍य उभरैत रहैत अछि। भीड़ केहेन अन्‍यायपूर्ण भऽ सकैत अछि तेकर ई ज्‍वलन्‍त दृष्‍टान्‍त अछि। कहुना कऽ जीवन-यापन करबाक प्रयासमे तत्‍पर एकटा युवकक एहेन दुखद अन्‍त मनुष्‍यतापर प्रश्‍नचिन्‍ह अछि। निसचित रूपसँ ओ अपराधी प्रवृतक लोक नहि छल। अनुशासनमे विद्यार्थी सभकेँ राखए चाहैत छल। गलत सही किछु विवाद भऽ गेलइ। ओकरासँ घबराहटमे गलती भेलै जे बच्‍चाक गारापर धुरी रखि कऽ आत्‍मरक्षा करबाक व्‍योँत तकलक मुदा बच्‍चाकेँ कोनो क्षति नहि केलकै। मुदा भीड़ तँ आशानीसँ उभैर जाइत अछि आ एहेन घटित भऽ जाइत अछि जेकर कल्‍पनो असंभव। गामक हाइस्‍कूलपर मोछ फरकबैत नेताजीक भाषण भेल। अड़ेरक छातीपर बिजलीक खाम्‍ह गाड़ल अछि, मुदा बिजली नहि अछि। ई महान अन्‍यायसँ गामकेँ मुक्‍ति दियाबक अछि तँ हुनका मतदान करू, एम.एल.ए. बनाउ। गाममे बिजली आबए-मे सालो लागि गेल आ जखन आबियो गेल तँ नहियेँ जकाँ, कारण तेतेक कमकाल रहैत छल जे मोबाइलो चार्ज करबामे बाट ताकए पड़ैत छल। आब किछु दिनसँ बिजलीक उपलब्‍धता बढ़ल अछि मुदा गाममे आपसी सम्‍पर्क ओही अनुपातमे घटि गेल अछि। शहरे जकाँ आब गामोमे लोक फराक-फराक रहैत अछि। सभ अपन-अपन घरमे दूरदर्शन सेटसँ सटल रहै छैथ। वियाहो-दानमे आएब-जाएब सीमित भऽ गेल अछि। किछु दिन पूर्व गाममे रही तँ बरियाती आएल रहइ। हमरा जेबाक इच्छा भेल मुदा हमर अनुज कहला जे हकार नहि अएलैक अछि। एवम्‍ प्रकारेण सम्‍पर्ककेँ सीमित कए शान्‍ति स्‍थापनाक प्रयास गामक मौलिकतापर आधुनिकताक जबरदस्‍त आधात अछि। जीवन-यापन फिराकमे गाम-घर छोड़ि सालक-साल परदेश रहए पड़ल। पहिने गाम जेबाक क्रम बेसी रहैत छल जे क्रमश: कम होइत चल गेल। गाम जाइतकाल केतेक मनोरथ रहैत छल। अपन गाम जा रहल छेलौं। महिनोसँ ओकर तैयारी होइत छल। मुदा गाम जाइते होइत जे कखन आपस चली। गामक लेखे ओझा बताह आ ओझा लेखे गाम बताह। गाम जाइते तरह-तरह केर अपेक्षा, उपेक्षाक संग सामंजस्‍यक अन्‍तविरोध बढ़ैत गेल। अपनत्‍वपर अपेक्षाक भार भारी होइत गेल। सभ किछु होइते पू. मायकेँ हँसैत, आनन्‍दित ओ भावनापूर्ण दर्शनक संग यात्राक संतुष्‍टिवोध होइत छल मुदा आब तँ ओहो नहि रहली! ने हमर दोस्‍ट सभ रहला। एकटा घनिष्ट मित्र सालो पूर्व गुजैर गेला। किछु गोटा हमरे जकाँ प्रवासी भऽ गेला। किछु गोटे जे बाँचल छैथ, सेहो गुम्‍म पड़ि गेल छैथ..! ‘ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ लेले हम रह गये अकेले...।’ क्रमश: असगर होइत जीवन यात्रामे गामकेँ बिसैर जाएब आसान नहि अछि, मुदा समयक तेतेक पैघ अनतराल बीचमे गुजैर गेल जे अपने गाम ‘अनचिन्‍हार’ भऽ गेल। युवक सबहक परिचय हेतु ओकर बाबाक नाओं पूछए पड़ैत अछि। परिवेशक जटिलताक संगहि अपनत्‍वक परिभाषा बदैल गेल अछि। सही बात बजनिहार नहि रहि गेल अछि। ऐ सबहक अछैत हम गाम अबैत-जाइत रहै छी। गामक कालीपूजाक चन्‍दा पठबैत रहै छी। मुदा आन-आन लेाक जेकरा अपेक्षा कम वा नहियेँ रहैत छइ, ओ भेँट भेलापर कएक बेर अद्भुत आनन्‍द कए दैत अछि। एहने उदाहरण एकबेर गाम अबिते भेल। गाममे प्रवेश केनहि रही की एकटा गामक हलुआइ भेटल। मिठाइ बना कऽ जाइत रहए। तर्र-दे मिठाइ निकालि कऽ आग्रह करए लागल, हाल-चाल पूछए लागल। ओकर सद्भावना अखनो मोन पड़ैत रहैत अछि। १८.३.२०१७ हिन्‍दू महिलाकेँ सम्‍पैतमे अधिकार भारतीय समाज मूलत: पुरुष प्रधान रहल अछि। हजारो-हजार बरखसँ पुरुषकेँ चल एवम्‍ अचल सम्‍पैतपर वर्चस्‍व छल। समयक संगे ऐ स्‍थितिमे परिवर्तन भऽ रहल अछि, महिला सम्पन्न भऽ रहल छैथ। वैदिक समयमे पुरुष एवम्‍ महिलाकेँ सम्‍पैतपर बराबर अधिकारक चर्च अछि। मुदा मनुस्‍मृतिमे कहल अछि जे पत्नी, चाकर ओ अवयस्‍क युवाकेँ सम्‍पैत नहि देबाक चाही। सम्‍पैतपर अधिकारक मामलामे पत्नी, बेटी वा विधवा कियो पूर्ण अधिकार सम्‍पन्न नहि छल। जँ स्‍त्रीगणकेँ सम्‍पैतपर अधिकार सीमित छल आ जेतए कनी-मनी छेलैहो, सेहो ओकर जीवन-यापन हेतु जीवनकाल तक रहैत छल, तेकर बाद ओ मूल श्रोतकेँ आपस भऽ जाइत छल। ऐ सबहक मूल उद्देश्‍य समाजमे स्‍त्रीगणपर स्‍वामित्‍व राखब छल। सम्‍पैतमे अधिकार भेलापर स्‍त्रीगणकेँ स्‍वतंत्र आस्‍तित्‍व बोध हएत जे तत्‍कालीन समाजकेँ स्‍वीकार नहि छल। हिन्‍दू संयुक्त परिवारमे एक पूर्वजसँ जन्‍मल लोक सभ होइत छैथ। ऐमे सबहक पत्नी, अविवाहित बेटी शामिल होइ छैथ। मुदा हिन्‍दू संदायदाता (Coparcenaty) ओइसँ बहुत सीमित होइत अछि। ओइमे बेटा, पौत्र, ओ प्रपौत्र शामिल होइत अछि। २००५ इस्‍वीक संशोधनक बाद बेटी सेहो ऐमे शामिल अछि। स्‍त्री, माय वा विधवा अखनो ऐमे शामिल नहि अछि। बेकती विशेषक हिस्‍सा कोनो सदस्‍यक मृत्‍युसँ बेसी किंवा नव सन्‍तानक जन्‍मसँ कम भऽ सकैत अछि। संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैतक विभाजनक बादे कोनो हिस्‍सेदार अपन हिस्‍सक सम्‍पूर्ण मालिक होइत अछि। संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैत हिन्‍दू कानूनक उपज थिक एवम्‍ एकर अधिकारीकेँ संदायदाता कहल जाइत अछि। सम्‍पैतक उत्तराधिकार कानूनमे बारम्‍बार प्रयुक्‍त कानूनी शब्‍दक सही समझ भेलासँ ऐ कानूनकेँ बुझबामे सुविधा हएत। अस्‍तु संक्षेपमे किछु शब्‍दक व्‍याख्‍या कऽ रहल छी। १. उत्ताराधिकारी (Hier) निर्वसीयत सम्‍पैतमे हकदार पुरुष वा स्‍त्रीकेँ उत्तराधिकारी कहल जाइत अछि। २. निर्वसीयत (Intestafe) स्‍वअर्जित सम्‍पैत किंवा अन्‍य कोनो प्रकारसँ प्राप्‍त सम्पैत जैपर ओइ बेकतीक पूर्ण अधिकार हो, केँ ओइ बेकतीक मृत्‍युक बाद हस्‍तांतरणक दस्‍ताबेजी बेवस्‍था जेना दान (Gift), इच्‍छा पत्र (Will) नहि केने हो। ३. संदायदाता सम्‍पैत (Coparcenary Property) पूर्वजसँ प्राप्‍त पैतृक सम्‍पैत जैपर अविभाजित हिन्‍दू परिवारक संदायदाताक हिस्‍सा हो। ४. दस्‍ताबेजी हस्‍तांतरण (Testamentary Disposition) ऐमे हस्‍तांतरणकर्ताकेँ ओकर जीवन भरि सम्‍पैतपर अधिकार बनल रहैत अछि एवम्‍ ओकर मृत्‍युक बाद ओइ दस्‍ताबेजी बेवस्‍थाक अनुसार सम्‍पैतक हस्‍तांतरण होइत अछि, जेना दानमे देल गेल सम्‍पैत। सन्‍ १९३७ सँ पूर्व स्‍त्रीगणक सम्‍पैतमे अधिकारक सम्‍बन्‍धमे कोनो स्‍पष्‍ट बेवस्‍था नहि छल। ऐ तरहक विवाद भेलापर स्‍थानीय परम्‍पराक अनुसार मामला तँइ होइत छल। सन्‍ १९३७ मे पहिल बेर हिन्‍दू महिलाक सम्‍पैतमे अधिकार कानूनन लागू भेल। ऐ कानून द्वारा विधवाकेँ ओकर पतिक सम्‍पैतमे सीमित अधिकार देल गेल। सन्‍ १९३८ क संशोधन द्वारा ओइ सीमित अधिकारकेँ आओर क्षीण करैत कृषि भूमिसँ विधवाक अधिकार समाप्‍त कए देल गेल। ऐ कानूनक अनुसार विधवा संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैतमे अपन पतिक हिस्‍साक मालिक तँ भऽ जाएत मुदा ओकर मृत्‍युक बाद ई सम्‍पैत ओकर उत्तराधिकारीकेँ नहि हेतैक, अपितु अन्‍तिम पुरुष मालिकवा स्‍त्रीधनक मामलामे अन्‍तिम महिला मालिकक उत्ताधिकारीकेँ हस्‍तान्‍तरित भऽ जाएत। सन्‍ १९३७क कानून द्वारा सीमित अधिकारक धारणामे हिन्‍दू उत्तराधिकार कानून १९५६ द्वारा समाप्‍त कए देल गेल। सम्‍पैतमे हिन्‍दू महिलाक अधिकारक क्षेत्रमे ई एकटा प्रगति गामी प्रयास छल। ऐ कानूनकेँ लागू भेलापर हिन्‍दू महिलाकेँ ओकर सम्‍पैतमे पूर्ण स्‍वामित्‍व प्राप्‍त भेल। उपरोक्‍त कानूनकेँ धारा १४ द्वारा महिलाक सम्‍पैतमे पूर्ण अधिकारक अयोग्‍यता समाप्‍त कए देल गेल एवम्‍ ओकर सीमित अधिकारकेँ पूर्णत: मालिकाना हकमे बदैल गेल गेल। कानूनमे उपरोक्‍त परिवर्तन भूतप्रभावी भेल। एवम्‍ प्रकारेण हिन्‍दू महिलाक सम्‍पैतमे अधिकारसँ सम्‍बन्‍धित विद्यमान समस्‍त, नियम, कानून ओ परंपराकेँ समाप्‍त कए ई सुनिश्‍चित कएल गेल जे कोनो प्रकारक परंपरा, वा बेवहारिक अवधारणाक कारण सम्‍पैतमे हुनकर अधिकारपर ग्रहण नहि लगौल जा सकत। हिन्‍दू उत्तराधिकार कानून १५५६ मूलत: हिन्‍दूक निर्वसीयत सम्‍पैतमे उत्तराधिकार तय करबाक हेतु भारतीय संसद द्वारा पारित भेलाक बाद १७ जून १९५६ क राष्‍ट्रपतिक स्‍वीकृतिक बाद लागू भेल। निर्वसीयत सम्‍पैतक माने ओइ सम्‍पैतसँ अछि जेकर मालिक सम्‍पैतमे पूर्ण अधिकारक अछैत कोनो दस्‍ताबेजी हस्‍तान्‍तरण बिना केने स्‍वर्गवासी भऽ जाइत छैथ। एहेन सम्‍पैत उपरोक्‍त कानूनक सूचीमे वर्ग एफमे देल गेल उत्तराधिकारी (माने बेटा, बेटी, विधवा पत्नी, माय एवम्‍ ऐ वर्गमे उल्‍लिखित अन्‍य बेकती) मे बरोबरि-बरोबरि कऽ बाँटल जाएत। वर्गक एकक उत्तराधिकारीक अभावमे वर्ग दू, तेकरो अभावमे क्रमश: मृतकक पुरुष रक्त सम्‍बन्‍धी अन्‍यथा महिला रक्त सम्‍बन्‍धी (Cognate) केँ ओ सम्‍पैतक अधिकार भऽ जाइत अछि। ऐ तरहेँ हिन्‍दू महिलाकेँ प्राप्‍त सम्‍पैतपर (उपरोक्‍त कानूनक धारा १४क अनुसार) पूर्ण अधिकार भऽ जाइत अछि। एवम्‍ प्रकारेण प्राप्‍त सम्‍पैत महिला द्वारा निर्वसियत रहि गेलापर उपरोक्‍त कानूनक धारा १५ एवम्‍ १६ द्वारा हस्‍तान्‍तरित होइत अछि। जइमे ओकर बेटा एवम्‍ बेटी एवम्‍ पतिकेँ बरोबरि-बरोबरि हक भेटैत अछि। उपरोक्त कानूनक धारा १४ हिन्‍दू महिलाक सम्‍पैतमे सीमित अधिकारकेँ पूर्ण अधिकारमे परिवर्तित करैत अछि। पतिसँ प्राप्‍त सम्‍पैतकेँ बेचि सकैत अछि आ क्रेताकेँ ओइ सम्‍पैतमे पूर्ण स्‍वामित्‍व प्राप्‍त भऽ जाइत अछि। पहिने ओ सम्‍पैतकेँ मात्र परिवारिक आवश्‍यकता एवम्‍ पतिक धार्मिक अनुष्‍ठानक हेतु बेचि सकैत छल। धारा १४ मे सम्‍पैतक विस्‍तारसँ व्‍याख्‍या भेल अछि। ऐमे उत्तराधिकार, परिवारिक विभाजन उपहार किंवा कोनो प्रकारसँ प्राप्‍त चल एवम्‍ अचल सम्‍पैत शामिल अछि। बिना वसीयतक मृत्‍यु भेलापर ऐ कानून द्वारा बेटाक माय, अतिरिक्‍त विधवा, बेटीकेँ संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैतमे अधिकार प्राप्‍त भेल। यद्यपि १९५६क कानून द्वारा हिन्‍दू महिलाक सम्‍पैतक अधिकारमे निश्चित रूपसँ बढ़ोत्तरी भेल आ ऐ तरहेँ कहल जाए तँ ई एकटा क्रान्‍तिकारी प्रयास छल,मुदा बेटीक मामलामे ई कानून बहुत हितकारी नहि छल। किछु राज्‍य ऐ विषयमे अलग कानून बना कऽ बेटीक अधिकार देलक मुदा ई सर्वव्‍यापी तँ नहियेँ छल। हिन्‍दू उत्तराधिकार कानून १९५६क पत्रमे संशोधन कएल गेल। उपरोक्‍त संशोधन बिल संसदमे २० दिसम्‍बर २००४ क मानल गेल छल, तँए ऐ तिथिसँ पूर्व भेल बँटवारापर ऐ संशोधनक प्रभाव नहि पड़त। हिन्‍दू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून २००५क अनुसार बेटीकेँ पिताक सम्‍पैतमे बेटा जकाँ बरोबरिक हिस्‍सा हएत, माइक सम्‍पैतमे सेहो हिस्‍सा हएत। उपरोक्‍त संशोधनसँ निम्‍नलिखित बेवस्‍था भेल- १. बेटा जकाँ बेटी संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैतक हिस्‍सेदारी हएत। २. ओकर अधिकार ओहिना हएत जेना बेटा भेने रहैत। ३. बेटे जकाँ बेटियोकेँ ओइ सम्‍पैतसँ जुड़ल जिम्‍मेदारी हएत। ४. बेटोक बरोबरि बेटीक हिस्‍सा तय हएत। हिन्‍दू उत्तराधिकार कानूनमे २००५क संशोधनक बाद पैतृक। संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैतक बँटवारा एवम्‍ ओइमे बेटी सबहक हिस्‍सेदारी लऽ कऽ यत्र-तत्र जबरदस्‍त विवाद प्रारम्‍भ भेल। कारण कानूनसँ अधिकार भेटलाक बाबजूद एकर समाजिक स्‍वीकृतिमे प्रश्‍नचिन्‍ह लागल रहल। नैहरसँ सम्‍बन्‍ध खराप नहि हो, तँए केतेको बेटी अपन अधिकारक बलिदान कए देलैन, मुदा एहनो बहुत रास मामिला उठल, जे बेटी सभ अपन अधिकारक बहाली हेतु न्‍यायालयक शरणमे चलि गेली। न्‍यायालयमे मामिला जेबाक कएटा कारण छल। कियो कहलक जे सन २००५क कानूनी संशोधनक लाभ ९ सितम्‍बर २००५ क बाद जन्‍मल कन्‍याकेँ भेटतै। केकरो अनुसार ई कानून १९५६ सँ लागू हएत। आदि आदि। देशक विभिन्न उच्‍च न्‍यायालय उपरोक्‍त विवादस्‍पद विषय सभपर अलग-अलग फैसला देलक। अन्‍ततोगत्‍वा ई मामला भारतक उच्‍चतम न्‍यायालयमे पहुँच गेल। उच्‍चतम न्‍यायालयक न्‍यायमूर्ति ए.आर.दवे एवम्‍ न्‍यायमूर्ति ए.के. गोयलक संयुक्‍त पीठ १६ अक्‍टूबर २०१५क अपन फैसलामे उत्तराधिकार कानून उपरोक्‍त विवादक पटाक्षेप करैत कर्णटक उच्‍च न्‍यायालयक फैसलाकेँ पलैट देलक। कर्णाटक उच्‍च न्‍यायालय फैसला देने छल जँ पिताक देहान्‍त ९ सितम्‍बर २००५ सँ पहिने भऽ गेल तखनो बेटीकेँ ओकर सम्‍पैतमे बेटाक बरोबरिक हिस्‍सा भेटत। मुदा उच्‍चतम न्‍यायालय एकरा पूर्णत: निरस्‍त कए देलक। प्रकाश एवम्‍ अन्‍य बनाम फुलवती एवम्‍ अन्‍यक मामलामे उच्‍चतम न्‍यायालय बेवस्‍था देलक जे उत्तराधिकार कानूनमे २००५क संशोधन भूतप्रभावी नहि अछि। ओ कानूनमे उपरोक्‍त संशोधन लागू हएत वशर्ते ओइ दिन पिता ओ पुत्री दुनू जीबैत रहल हो। १६ अक्‍टूबर २०१५ केँ उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा प्रकाश एवम्‍ अन्‍य बनाम फुलवती एवम्‍ अन्‍यक मामलाकेँ मूल निर्णय बिन्‍दु छल जे २००५ क सम्‍पैतमे अधिकारक कानूनक संशोधन भूतप्रभावी अछि की नहि? वंशकेँ विभिन्न उच्‍च न्‍यायालय ऐ विषय परस्‍पर विरोधी एवम्‍ भिन्न-भिन्‍न मत व्‍यक्‍त केने छल। ऐ मामलामे फुलवती उत्तराधिकारमे ओकर पिता द्वारा प्राप्‍त संम्‍पैतमे १/७ म हिस्‍साक मांग केने छल। १८ फरवरी १९८८क अन्‍दर पिताक देहान्‍त भऽ गेल। न्‍यायालयमे विचाराधीन मामलामे संशोधन करैत फुलवती संशोधित कानूनक अनुसार पिताक सम्‍पैतमे हिस्‍साक मांग केलक। कर्णाटक उच्‍च न्‍यायालय निर्णय देलक जे चुकी मामला न्‍यायालयमे विचाराधीन छल, अस्‍तु ऐ कानूनकेँ आगूसँ लागू हेबाक बाबजूद, एकर लाभ फूलवतीकेँ भेटत। उच्‍च न्‍यायालयक ऐ फैसलाक चुनौती उच्‍चम न्‍यायालयमे कएल गेल- १. ऐमे फुलवतीकेँ हिस्‍सा मात्र पिताक स्‍वअर्जित सम्‍पैतमे हएत। २. फुलवतीक पिताक देहान्‍त २००५ क संशोधित कानून लागू हेबासँ पूर्व १८ फरवरी १९८८ क भऽ गेल, तँए फुलवतीकेँ ऐ कानूनकेँ लागू हेबाक समय पैतृक सम्‍पैत वारिस नहि मानल जा सकैत अछि। ३. संशोधित कानून ऐ मामलामे लागू नहि हएत। संशोधित कानून लागू हेबासँ पूर्व हिन्‍दू उत्तराधिकार कानूनक धारा ६ केर मुताबिक बेटीकेँ एहेन संम्‍पैतमे अधिकार नहि हएत। उच्‍चतम्‍ न्‍यायालय अपन फैसलामे स्‍पष्‍ट केलक जे कानूनकेँ प्रथम दृष्‍ट्या पढ़लासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि जे ई संशोधन कानून लागू हेबाक तिथिसँ लागू हएत,कारण ऐमे केतौ एहेन संकेत नहि अछि जइसँ एकरा भूतप्रभावी कएल जाए। अतएव संदायदाता सम्‍पैतमे बेटीक हिस्‍सा तखने भेटत जखन कि कानून लागू हेबाक दिन यानी ९ सितम्‍बर २००५ क पिता ओ पुत्री दुनू जीवित हो। अन्‍य प्रमुख न्‍यायिक फैसलामे उच्‍चतम न्‍यायायल द्वारा सन्‍ २०१२ मे तय गंदूरी कोटेश्‍वरम्‍मा वनाम च्रकी यनादिमे कहल गेल जे- नव धारा ६ संयुक्‍त परिवारक सम्‍पैतमे ९ सितम्‍बर २००५ वा ओकर बाद पुरुष वा महिलाक अधिकारमे समानता अनलक अछि। ऐ कानून द्वारा बेटीकेँ पक्षमे ठोस केलक एकर बाद बेटी स्‍वयंमे बेटा जकाँ पैतृक सम्‍पैतमे हिस्‍सेदार बनल। एवम्‍ प्रकारेण ९ सितम्‍बर २००५ सँ बेटी पैतिक सम्‍पैतमे बेटा जकाँ उत्तराधिकारी भेल एवम्‍ ओकरा बराबर हक सेहो बेटल। उपरोक्‍त मामला नीचला आदालतमे विचारनीय रहिते २००५क संशोधन भेल। नीचला अदालत संशोधित कानूनकेँ लागू करैत बेटीक बेटाक बरबैर हिस्‍सा तय केलक जेकरा उच्‍च न्‍यायालय पलैट देलक। अन्‍ततोगत्‍वा मामला उच्‍चतम न्‍यायालय पहुँचल, जेतए बेटीक जीत भेल एवं बेटीकेँ बेटाक बरोवरि हिस्‍सा भेटल। सन्‍ २००५क हिन्‍दू उत्तराधिकार कानूनमे संशोधनक बाद परिवारक बेटीकेँ पैतृक सम्‍पैतमे हिस्‍सेदारी तँ भेट गेल मुदा ओइ संशोधनक आधारपर प्राप्‍त अधिकारकेँ केतेको प्रकारसँ पास कए पुत्र लोकनि द्वारा चुनौती देल गेल। एकटा एहने मामलामे सुजाता शर्मा वनाम मनु गुप्‍ता एवम्‍ अन्‍य,मे दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय दिल्‍ली द्वारा बेवस्‍था देल गेल जे संयुक्‍त परिवारमे जँ बेटी सभसँ पैघ जीवित हिस्‍सेदार अछि तँ ओ कर्ता भऽ सकैत अछि। माननीय न्‍यायालयक कहब जे उपरोक्‍त संशोधित कानून बेटीकेँ ओ सभ कानूनी हक दऽ दैत अछि जे बेटाकेँ पहिनेसँ प्राप्‍त अछि। मा. उच्‍च्‍तम न्‍यायालय त्रिभुवन दस हरि भाई तामबोली वनाम गुजरात राजस्‍व अधिकरण एवम्‍ अन्‍यक मामलामे निर्णय दऽ चूकल अछि जे संयुक्‍त परिवारक वरिष्‍ठतम सदस्‍य कर्ता हएत। अस्‍तु बेटकेँ कर्ता हेबाक क्रममे कोनो भांगठ नहि अछि। २००५ इस्‍वीक उत्तराधिकार कानूनमे संशोधनक उपरान्‍त यद्यपि बेटीकेँ पैत्रिक सम्‍पैतमे कानूनी अधिकार प्राप्‍त भऽ गेल अछि, मुदा समाजिक स्‍तरपर ओकर पुरजोर विरोध देखबामे अबैत अछि। हालत ओहिना अछि जेना दहेज विरोधी कानूनक अछि। कानूनक अछैत दहेज कोनो-ने-कोनो रूपे समस्‍त भारतमे चलिये रहल अछि। कानून ईहो अछि जे व्‍यस्‍क युवक, युवती स्‍वेच्‍छासँ विवाह कऽ सकै छैथ, मुदा केतेको ठाम एकर विरोध ऐ हद तक होइत अछि जे युगल जोड़ीक हत्‍या तक भऽ जाइत अछि। कहबाक माने जे कानूनमे बदलाव संगे समाजिक सोचमे परिवर्तन जरूरी अछि। जन जागरण जरूरी ऐ मानेमे महिला तखने अधिकार सम्‍पन्न भऽ सकै छैथ। जमीनक किछु समाजमे खास कऽ दिल्‍लीक किंवा आन-आन पैघ शहरक आसपासक क्षेत्रमे बहुत प्रमुखता अछि। जमीन परिवारक प्रतिष्‍ठासँ जुड़ल अछि। जमीनपर पुरुषक वचस्‍व्‍ कम होइ, भाग्‍यक संगे ओहिनो एकर हिस्‍सेदार हो, ई बात लेाककेँ पचि नइ रहल अछि। जहिना प्रेमी लोकनिक खिलाफ खास पंचायत काज करैत अछि वएह हाल पैतृक सम्‍पैतमे अपन हिस्‍साक मांग केलापर बेटी सबहक भऽ रहल अछि। हुनकर गप छोड़ू, माय, बाप सेहो ओकर संग नहि दइ छैथ। एहन केतेको दृष्‍टान्‍त आएल अछि जे जमीनमे अपन हिस्‍साक मांग करिते बेटीक गाममे प्रवेशो कठिन भऽ जाइत अछि, भाय सभ गप छोड़ि दइ छै आ माय-बापक मुँह लटैक जाइत अछि, जे ओकर बेटी जमीनमे अपन हक मागि कऽ ओकर सबहक नाक कटा रहल अछि। बेटी अपन हक नहि माँगि सकय तइले केतेको पिता अपन जीबैत अपन सम्‍पैत पोता किंवा पुत्रकेँ हस्‍तान्‍तरित कऽ दइ छैथ। तेतबे नहि, भाय सभ दवाब बना कऽ बेटीसँ बहिनसँ ओइ सम्‍पैतसँ अपन अधिकार छोड़बाक हेतु राजीनामा लिखा लइ छैथ। सारांश जे कानूनसँ प्राप्‍त अधिकारकेँ समान देबए-मे पुरजोर विरोध कऽ रहल अछि। हुनका लोकनिक धारणा अछि जे बेटीक देल गेल दहेज उत्तराधिकारमे प्राप्‍त होमए-बला सम्‍पैतक एवजमे पर्याप्‍त क्षतिपूर्ति अछि। एक सर्वेक अनुसार मात्र १३% बेटी अपन पैत्रिक सम्‍पैतमे अधिकार लऽ पबै छैथ। सम्‍पूर्ण देशमे लागू २००५ क कानूनसँ पूर्व पाँच राज्‍य (ऑंन्‍ध प्रदेश, कर्णाटक, महाराष्‍ट्र, तामिलनाडू आ केरल)मे बेटीकेँ पैत्रिक सम्‍पैतमे पहिनेसँ अधिकार प्राप्‍त अछि। परिणामत: बिहार एवम्‍ मध्‍य प्रदेशक तुलनामे आन्‍ध्र प्रदेशमे चारिगुणा अधिक महिलाकेँ उत्तराधिकारमे जमीन सम्‍पैत प्राप्‍त भेल। आन-आन राज्‍य सबहक तँ ई हाल अछि जे ६९% महिलाकेँ एहेन कोनो महिलाक जानकारी नहि छै जे ऐ कानूनसँ लाभान्‍वित होइत पैतृक सम्‍पैतमे हकदार भेल हो। जेकरा केकरो ऐ कानूनक जानकारी छैहो, सेहो जमीन-जायदादमे अपन हक नहि मंगै छैथ। भारत वर्षमे दुर्गाकरूपमे स्‍त्री शक्‍तिकेँ सम्‍मानित कएल गेल अछि। जगत जननीक रूपमे हुनकर आराधना कएल जाइत अछि। सत्‍य ई अछि जे प्रायेक बेटी काल्‍हि जा कऽ माय बनैत अछि ओहि रूपमे ओ ओहि परिवारक सृजन करैत अछि, पालन करैत अछि, पल प्रतिपल रक्षा करैत अछि। हमर संस्‍कृति इतिहासक कोन कोनामे जा कऽ पुरुष वर्चस्‍वक प्रधानताक स्‍वीकार करैत स्‍त्रीणकेँ द्वेमदर्जा स्‍वीकार केलक, ई कएटा दुखद एवम्‍ विचारणीय प्रसंग अछि। मुदा देरियेसँ सही, समाज जागि जाएत से उमेद अछि आ कानून द्वारा देल पैतृक सम्‍पैतमे उत्तराधिकारक सहर्ष पालन भऽ सकत। यत्र नारी पुज्‍यन्‍ते,रमन्‍ते तत्र देवता। उक्‍ति तखने सार्थक भऽ सकत। ६/४/२०१७ वरिष्‍ठ नागरिक सन्‍ २००७ मे भारतवर्षमे माता-पिता एवं वरिष्‍ठ नागरिकक भरण-पोषण एवं कल्‍याण कानून लागू भेल। ऐ कानूनमे मूलत: निम्नलिखित चारिटा बिन्‍दुपर धियान राखल गेल अछि- १. माता-पिता एवं वरिष्‍ठ नागरिकक आवश्‍यकताक अनुसार गुजाराक जोगार हेतु उपयुक्त बेवस्‍था माने उपयुक्‍त सरंजाम। २. वरिष्‍ठ नागरिक हेतु वेहतर चिकित्‍साक बेवस्‍था। ३. वृद्ध लोकनिक जीवन एवं सम्‍पैत केर रक्षा हेतु संस्‍थागत बेवस्‍था। ४. प्रत्‍येक जिलामे वृद्धाश्रमक स्‍थापना। उपरोक्‍त कानूनक अनुसार सन्‍तानक माने वालिग पुत्र, पुत्री, पौत्र, पौत्री अछि। साठि साल वा ओइसँ अधिकक कोनो बेकती विरिष्‍ठ नागरिककेँ कहल जाएत। नि:सन्‍तान वरिष्‍ठ नागरिकक सम्‍पैतिक वारिस वा ओकर सम्‍पैतपर कब्‍जा रखनिहार वालिग बेकती ओकर सम्‍बन्‍धी मानल जेता। गुजारामे भोजन, वस्‍त्र,आवास एवं चिकित्‍साक उचित बेवस्‍था शामिल अछि। प्रश्‍न अछि जे उपरोक्‍त कानूनक आवश्‍यकता किए भेल? अपन माटि-पानिक संस्‍करमे वृद्धजनकेँ सदैव आदर-भावसँ देखल जाइत छल। परिवारकेँ हुनकर ज्ञान एवं अनुभवक लाभ तँ भेटिते छल, संगहि सेवा सामान्‍य रूपसँ होइत रहैत छल। कालक्रमे संयुक्त परिवार टुटैत गेल। लोक गाम-घर छोड़ि कऽ नौकरी-चाकरीक जोगारमे महानागर चल गेल। गाममे वृद्ध असगर भऽ गेला। शहरी वृद्धक हालत तँ आरो खराप होइत जा रहल अछि, कारण ओइठाम लोक अलग-थलग रहैत अछि। अड़ोस-पड़ोससँ कोनो मतलब नहि रहैत छइ। उपरोक्‍त परिस्‍थितिमे बुढ़ सबहक हालत खराप होइत गेल। जीवनक अन्‍तिम वर्ष संघर्षमय एवं दुखद भेल जा रहल अछि। परिवारिक भावात्‍मक लगाउ कम भेल जा रहल अछि। केतेको वृद्ध लोकनिकेँ आमदनीक श्रोत नहि छैन आ परिवार उचित बेवस्‍था नहि करैत अछि। जिनका अधिक धिया-पुता अछि ओ सभ एक-दोसरपर फेका-फेकी करैत रहै छैथ। उपरोक्‍त परिस्‍थिति निपटक हेतु एवं वृद्धजनक कल्‍याणक हेतु ई कानून बनल। ऐसँ पूर्व सी.आर.पी.सी.क अधीन राहत हेतु मोकदमा चलि सकैत छल,मुदा ओ बहुत जटिल प्रक्रिया अछि। निपटानमे बहुत समय लागि जाइत अछि। २०१७ इस्‍वीसँ लागू उपरोक्‍त कानून बहुत असरदार अछि। ऐमे तीनसँ चारि महिनामे न्‍याय भऽ जाइत अछि। कोनो पक्ष वकील नहि राखि सकैत अछि। हरेक जिलामे ऐ हेतु न्‍यायाधिकरण अछि। न्‍यायाधिकरण मामलाक सार-संक्षेपमे सुनवाइ कऽ कऽ १० हजार रूपैआ मासिक तकक राहत दिया सकैत अछि। ऐ कानूनमे सभसँ विशेष बात ई अछि जे जँ माता-पिता किंवावरिष्‍ठ नागरिकक सम्‍पैत हुनक सन्‍तान किंवा सम्‍बन्‍धी लइ छैथ आ हुनकर पालन-पोषणमे कोताही करै छथिन तँ सम्‍बन्‍धित माता-पिता वा वरिष्‍ठ नागरिक न्‍यायाधिकरणमे दर्खास्‍त दऽ सकै छैथ आ न्‍यायाधिकरण के ओहन सम्‍पैत हस्‍तांतरणकेँ निरस्‍त करि ओइपर माता-पिता वा वरिष्‍ठ नागरिकक मालिकाना हक आपस दिया सकै छैथ। ऐ न्‍यायाधिकरणक निर्णयक विरूद्ध कोनो सिविल कोर्टमे सुनवाइ नहि भऽ सकैत अछि। जरूरत पड़लापर अपील जिलाधिकारीक समकक्ष अधिकारीक अध्‍यक्षतामे गठित अपीलीय न्‍यायाधिकरण ओइठाम कएल जा सकैत अछि। ऐ कानूनकेँ लागू भेला पाँच बर्ख भऽ गेल तथापि गामसँ शहर तक वृद्ध-वृद्धा लोकनिक समस्‍याक समाधान नहि भऽ सकल। तेकर एकटा प्रमुख कारण ई थिक जे माता-पिता अपने सन्‍तानक विरूद्ध अवाज नइ उठबै छैथ। लोक लाजक कारणेँ परिवारिक विषयपर चर्चो नहि करए चाहै छैथ। अपवादिक मामलामे आसपासक लोककेँ पता लगैत छइ। थाना, पुलिस, कोर्ट, कचहरी के करत? जीवनक संध्‍यामे ऐ तरहक फसाद करब संभव नहि बुझाइत अछि। समस्‍या मात्र आर्थिक नहि अछि। वयोवृद्ध लोकनिकेँ शारिरिक अक्षमता एवं निर्भरता बढ़ैत जाइत छैन। जँ पैसा बैंकमे ऐछो तँ आनत के? जँ कियो आनियोँ देलक तँ रोज-रोज वस्‍तु-जात केना आएत? आबियो जाएत तँ ओकर उपयोग वा मनोनुकूल कऽ सकता तइ बातकेँ के सुनिश्‍चित करत? जे बात हृदय एवं श्रद्धासँ भऽ सकैत अछि ओकरा कानून द्वारा लागू केना कएल जाएत? जइ वृद्ध सभकेँ सन्‍तान नहि अछि, हुनक समस्‍या आर जटिल रहैत अछि कारण निकट सम्‍बन्‍धी हुनकर सम्‍पैतपर धपाएल रहै छैथ आ सम्‍पैत कब्‍जा करिते निपत्ता..! भारतीय संविधानक चारिम भागक ४१म अनुच्‍छेदमे वृद्ध लोकनिक हित रक्षा करबाक परामर्श अछि। मुदा ई दिशा निर्देश हेबाक कारणेँ कानूनी अधिकार नहि दैत अछि। हिन्‍दू दन्‍तक ग्रहणसँ भरण-पोषण अधिनियम, १९५६क अधीन पहिल बेर कानूनी तौरपर बेटा एवं बेटीकेँ माता-पिताक पालन-पोषण करबाक जिम्‍मेदारी देल गेल। अपराधिक प्रक्रिया संहिताक धारा१२५ मे पहिल बेर सन्‍ १९७३ मे बेवस्‍था कएल गेल जे आर्थिक रूपसँ सक्षम सन्‍तानकेँ माता-पिताक भरण-पोषण करबाक कानूनी दायित्‍व अछि। मुदाऐ कानूनकेँ बेवस्‍थाक अनुसार ज्‍यादासँ ज्‍यादा ५०० रूपैआ प्रतिमास माता-पिताकेँ भेट सकैत छैन। उपरोक्‍त रकम वर्तमान समयमे देखैत हास्‍यास्‍पद लगैत अछि। ई कानून सभ धर्मक लोकपर लागू होइत अछि। वृद्ध लोकनिक भरण-पोषण हेतु सभसँ धारदार कानून माता-पिता एवं वरिष्‍ठ नागरिकक भरण-पोषण एवं कल्‍याण अधिनियम २००७ अछि। वरिष्‍ठ नागरिकक जीवन संध्‍यामे आर्थिक कष्‍टक निवारण हेतु रिभर्स मोर्गेज स्कीम २००८ आनल गेल अछि। ओअपन अर्जित मकानकेँ बैंकक पास बन्‍धक राखि कऽ ओइ एवजमे आजन्‍म मासिक आय प्राप्‍त कऽ सकै छैथ, संगे मासिक आय प्राप्‍त कऽ सकै छैथ, संगहि ओइ मकानमे रहियो सकै छैथ।हुनकर मृत्‍युक पछाइत हुनकर उत्तराधिकारी बैंकक ऋृण सूद सहित अदा कऽ मकान आपस अपना नामे करा सकै छैथ अन्‍यथा बैंक ओइ मकानकेँ बेचि कर्जक रकम चुकता कऽ सकैत अछि। एहनो वृद्ध छैथ जिनका ने सन्‍तान अछि आ ने सम्‍पैत। ओ की करता? कानूनसँ हुनका कोनो मदैत संभव नहि? बहुत रास वृद्धक सन्‍तान परदेशमे नौकरी आकि बेवसाय करै छथिन। एहेन बुढ़ सभ मजबूरीमे शहर अपन सन्‍तान लग चलि जाइ छैथ मुदा ओइठाम हुनका मन नइ लगै छैन। गाम-घर छुटबाक दरेग हरदम मनमे कचोटैत रहै छैन। सारांश जे वृद्धजनक जीवन-यापन एवं समुचित बेवस्‍था एकटा गम्‍भीर समस्‍या भऽ गेल अछि चाहे ओ गाम हो, शहर हो,धनीक हो वा गरीब। सभ ऐ समस्‍याक शिकार छैथ। सभकेँ एक दिन ऐ परिस्‍थितिसँ गुजरबाक छइ। जे आइ युवक अछि, काल्‍हि ओहो वृद्ध हएत। समाजिक परिस्‍थिति क्रमश: बिगैड़ते जा रहल अछि। धिया-पुता जे देखत सएह ने आगू करत। ई बात सभ सोचैत अछि मुदा किछु मजबूरीमे आ किछु लापरवाहीमे घरक बुढ़केँ काहि काटक हेतु विवश छोड़ि दइ छैथ। बुढ़ चाहे वयोवृद्ध लोकनिसँ जुड़ल एक-सँ-एक घटना नित्‍यप्रति समाचार पत्र, रेडियो, दुरदर्शनपर अबैत रहैत अछि। एकटा एहने घटना किछु दिन पूर्व दिल्‍लीमे घटल। एक वृद्ध महिलाक पतिक मृत्‍यु भऽ गेल छेलैन। दिल्लीमे हुनका आलीशान भवन छेलैन। पुत्र अमेरिकामे काज करैत रहथिन। बहुत दिनपर पुत्र दिल्‍ली एला आ माएकेँ अपना संगे चलबाक प्रस्‍ताव केलखिन। बेटाक बातसँ माए बहुत प्रसन्न भेली। दिल्‍लीक एकाकी जीवनसँ ओ तंग भऽ गेल छेली। बेटा कहलखिन जे जखन सभ गोरे अमेरिकामे रहब तँ दिल्‍लीक घरक की हएत? से नइ तँ एकरा बेचि लेनाइए ठीक रहत। माए सहर्ष ई प्रस्‍ताव मानि लेलैथ। दिल्‍लीक मकान बेचि देल गेल। सभटा रूपैआ बेटाक एकाउन्‍टमे जमा भेल। तेकर बाद सभ कियो दिल्‍ली हवाई अड्डा पहुँचला। अमेरिकाक यात्राक क्रममे। माएकेँ बाहर बैसा देलखिन, ई कहि कऽ जे टिकट कटा कऽ आबि रहल छैथ। माए बाहर प्रतीक्षा करैत रहली आ ओ कथीले आपस एता। जखन बहुत समय गुजैर गेल तँ पुलिस ओइ वृद्धा लग आएल आ ओकर बात बुझलक। तखन हठात्‍ पुलिस कहलकै जे अमेरिकाक जहाज उड़ला तँ घण्‍टो भऽ गेलइ। ओकर बटा माएकेँ छोड़ि कऽ अमेरिका चल गेल। बुढ़िया असगर कनैत रहल...। ई बात ओकर मकान कीननिहारकेँ सेहो पता लगलैक। बुढ़ियाकेँ अपन घरमे एकटा छोटसन जगह देलकै। बेटा घुरि कऽ कहियो हाल-चाल लेबए नहि आएल। अपन सन्‍तान लोककेँ केतेक धोखा दऽ सकैए तेकर ई उदाहरण अछि। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालयक विधि विभागक प्रोफेसर लोतिका सरकारक खिस्‍सा लोमहर्षक अछि। दिल्‍लीक K-१/१० हौजखास इनक्‍लेभमे हुनकर घर छल जेकरा हुनकर परिवारिक मित्र हथिया लेने छला। घटनाक्रम तेहेन भेल जे हुनका अपनहि घरसँ बाहर होमए पड़ल। तखन हुनकर इष्‍ट-मित्र सभकेँ ऐ बातक जानकारी भेटल। ८७ वर्षीय प्रो. लोतिका सरकारक तरफसँ समाजिक संगठन वरिष्‍ठ नागरिक ट्राइवूनलमे केस केलक। तमाम पूछ-ताछक पछाइत उपरोक्त ट्राइवूनल लोतिका सरकार द्वारा कथित उपहारमे देल गेल अनुबन्‍धक रक्षक हुनकर घर हुनका आपस दियौलक। लोतिका सरकारक सम्‍पैत हरपनिहार एक उच्च पदस्‍थ पुलिस अधिकारी छला जे हुनकासँ दोस्‍तीक स्‍वांग करैत-करैत हुनकर कीमती घरकेँ कब्‍जिया लेला। जँ दिल्‍लीक संभ्रान्‍त समाजक मदैत नहि उठाबैत तँ प्रो. लोतिका सरकारक अपन सर्वत्र लूटा गेल छल। सेहो केहेन बेकती द्वारा जे स्‍वयं अति शिक्षित उच्‍च पदस्‍थ पुलिस अधिकारी छला। रक्षको पक्ष भक्षक सावित भऽ रहल छल। होमपेज इण्‍डिया द्वारा कएल गेल एकटा सर्वेक्षणक मुताबिक प्रत्‍येक तीनमे सँ एक वृद्धकेँ परिवारिक लोक द्वारा प्रतारणाक सामना करए पड़ैत छैन। ५६ प्रतिशत एहेन मामलाक हेतु पुत्र एवं २५ प्रतिशत मामलामे पुत्रवधु जिम्‍मेदार होइ छैथ। ऐमे सँ आधासँ अधिक वृद्ध एहेन घटनाक बारेमे मूलत: परिवारिक प्रतिष्‍ठाकेँ धियानमे रखैत केकरो नहि कहैत छैथ। एहेन घटना मध्‍य प्रदेशमे सभसँ अधिक (४७.९२ प्रतिशत) आ राजस्‍थानमे सभसँ कम (१.६७ प्रतिशत) भेल। अधिकांश वृद्धक धारणा अछि जे वृद्ध लोकनिक दुर्दशा रोकबाक हेतु धिया-पुताकेँ सचेष्‍टकरब जरूरी अछि। वृद्ध एवं बच्‍चाकेँ आपसी सिनेह एवं सामंजस बढ़ाएब जरूरी अछि। अर्जित आत्‍म निर्भरता सेहो जरूरी अछि। वृद्धजनकेँ संयुक्त परिवारमे रहबाक बेवस्‍थाकेँ उत्‍साहित करबाक हेतु राष्‍ट्रीय नीति बनक चाही एवं ओहन लोक सभकेँ टैक्‍स एवं सरकारी नौकरीमे विशेष सुविधा देबाक चाही। एक अन्‍य प्रतिवेदनक अनुसार सन्‍ २००० सँ २०५० क बीचमे भारतक जनसंख्‍या ६० प्रतिशत बढ़ि जाएत। ऐ अवधिक बीच वरिष्‍ठ नागरिकक संख्‍या ३६ प्रतिशत बढ़ि जाएत जे तत्काल आवादीक २० प्रतिशत हएत। ईहो कहल गेल अछि जे विश्‍वमे २०५० इस्‍वी तक महिला वरिष्‍ठ नागरिकक संख्‍या पुरुखसँ अधिक भऽ जाएत। समाजमे महिलाक स्‍थिति ओहिना संघर्षपूर्ण रहैत अछि। ८० बर्खसँ ऊपर पुरुखक तुलनामे महिला अधिक दिन जीबै छैथ। जइमे अधिकांश विधवा भऽ गेल रहै छैथ। सर्वेक अनुसार ८० बर्खसँ बेसी आयुवर्गमे ७० प्रतिशत विधवा एवं २९ प्रतिशत विधुर छैथ। समाजक उपेक्षा एवं लिंग आधारित भेदभावक कारण विधवा वृद्धाक जीवन अपेक्षाकृत बेसी कष्‍टकर भऽ जाइत अछि। शिक्षा एवं जगरुकताक अभावमे ओ सरकारी सहायताक लाभ नीकसँ नहि उठा पबै छैथ। कएक बेर हुनकर सम्‍पैतकेँ हरैप लेल जाइत अछि एवं नाना प्रकारक प्रतारणाक शिकार सेहो होमए पड़ैत अछि। निरंतर बढ़ैत वृद्धक जनसंख्‍या आ लड़खड़ाइत परिवारिक संरचना वरिष्‍ठ नागरिक सबहक समस्‍याकेँ जटिल केने जा रहल अछि। पूर्वमे किछु कानूनी बेवस्‍थाक चर्चा भेल मुदा समस्‍या अछि जेअपने सन्‍तानक विरूद्ध न्‍यायक मांग कऽ आगू बढ़ैबला हजारमे कियो एक बेकती होइ छैथ, शेष लोक यंत्रनापूर्ण जीवन बीतबैत स्‍वर्ग सीधारि जाइ छैथ। आइसँ करीब २९ बर्ख पूर्व दिल्‍लीमे स्‍कूटरक पाछाँ एकटा बुढ़केँ उघारे देहे आ एकटा हाथ ऊपर उठेने जाइत देखने रहिऐक। पुछलिऐ जे ई एना किए छैथ? तँ आसपासक लोक सभ कहलक जे किछु साल पर्व हुनका अपन बेटाक संगे किछु विवाद भऽ गेल रहैन आ ओ हुनकर अँगा फाड़ि देलखिन। तहियासँ ओ बुड़हा अँगा पहिरब छोड़ि देलखिन आ विरोध-स्‍वरूप एकटा हाथ हमेशा अकास दिस केने रहै छैथ। ..सोचल जा सकैए जे ओइ पिताकेँ केतेकआन्‍तरिक कष्‍ठ भेलैन जे एहेन रूप धऽ लेलक। समस्‍या तँ ई अछि जे घर-परिवारसँ अनादृत, उपेक्षित होइतो वृद्ध लोकनि जाथि तँ केतए जाथि? कोनो दोसर विकल्‍प नहि बुझाइत अछि? नौकर-चाकरपर निर्भरता केतेको बेर जानलेबा साबित होइत अछि। घरमे असगर रहनिहार बुढ़क समस्‍या तँ आर जटिल भऽ गेल अछि। सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्‍था द्वारा विरष्‍ठ नागरिकक हेतु आवाससहित रखरखाउ लेल आन बेवस्‍था सभ सेहो कएल गेल अछि मुदा ओ अपर्याप्‍त अछि। दिल्‍ली, फरीदावाद, नोएडामे एहेन केतेको आवास (ओल्‍ड एज होम) अछि। परन्‍तु ऐ सभठाम रहनिहार वृद्ध लोकनिक हालत कोनो नीक नहि कहल जा सकैत अछि। कलकत्तामे डीगनीटी फाउण्‍डेसन, प्रोग्राम आदि नाओंसँ केतेको एहेन संस्‍था सभ ऐ क्षेत्रमे काज कऽ रहल अछि। मुदा वृद्ध लोकनिक संख्‍या देखैत एहेन सुविधा नगण्य अछि। फेर अधिकांश बुढ़ तँ ग्रामीण क्षेत्रमे रहि रहल छैथ। जैठाम परिवारक अतिरिक्त कोनो प्रकारक सहायताक संभावना नहि अछि। सरकार वरिष्‍ठ नागरिक लोकनि लेल कएटा सुविधा सभ दैत अछि, जेना- रेल टिकटमे छूट, अस्‍पतालमे अलग काउन्‍टर, पोस्‍ट ऑफिस, बैंक आदि सन सार्वजनिक जगहपर अतिरिक्‍त सुविधा मुदा बेवहारमे ई सुविधा सभ पर्याप्‍त नहि होइत अछि। अक्‍सर वृद्ध लोकनिकेँ झगड़ा करैपर मजबूर होमए पड़ै छैन। ऐ मामलामे दिल्‍लीक मेट्रोमे निश्‍चय बेहतर बेवस्‍था अछि। वरिष्‍ठ नागरिककेँ आसानीसँ आरक्षित जगहपर बैसए देल जाइत अछि। दिल्‍ली लोदी गार्डेनमे भोरू-पहरमे टहलैबला सबहक हुजुम रहैत अछि। ओइमे कएटा संगठित समूह बनि गेल अछि जइमे अधिकांश वरिष्‍ठ नागरिक लोकनि छैथ। ओ सभ भोरकेँ टहलै तँ छैथे संगे आपसमे भेँट-घाँट आ गप-सप्‍प सेहो करैत रहै छैथ। श्री भूटेलाल ठाकुर (सेवा निवृत्त आइ.ए.एस.) द्वारा ट्रस्‍ट सेहो ओइठाम बहुत सक्रिय अछि। वृहस्‍पति दिनकेँ नि:शुल्‍क चाहक बेवस्‍था ओतए रहैत अछि। टहलला पछाइत सभ ओतए एकट्ठा होइ छैत, चाह पीबै छैथ आ आपसमे अपन-अपन नीक-बेजाइक चर्च-बर्च करैत, हाँ-हाँ–हीं-ही करैत सभ कियो घर घुमै छैथ। ऐ सम्‍पर्कक प्रभावसँ कएटा वृद्धकेँ घोर विपत्तिसँ उबड़ैत पुनश्‍च नव उत्‍साहक संग जीबैत देखलौं। श्री ठाकुर द्वारा ट्रस्‍ट एकटा गैर-सरकारी संगठन अछि जे केतेको तरहक सेवा कार्य करैत अछि। कोसीक जखन बाढ़ि आएल छल तँ अहू ट्रस्‍ट द्वारा ट्रक भरि सहायता-सामग्री लऽ कऽ लोक सभ ओतए जरूरतमन्‍द लोकनिकेँ बीच वितरित केलैन। लोदी गार्डेनमे सेहो समय-समयपर अनेको कार्यक्रम ई सभ आयोजित करैत रहै छैथ। हौज खास, दिल्‍ली स्‍थित डियर पार्कमे सिनियर सिटिजन कॉसिल, दिल्‍लीक नामक एकटा संस्‍था अछि जे वरिष्‍ठ नागरिकक सुख-सुविधा आ मनोरंजनक लेल बेवस्‍थामे लागल रहैत अछि। समय-समयपर ओ सभ निवेश भ्रमणपर सेहो जाइत रहै छैथ। भोरमे ७ बजेसँ ८:३० बजे धरि नित्‍य ‘योग व्‍यायाम’ सहित अन्‍यान्‍य सांस्‍कृतिककार्यक्रमक आयोजन कएल जाइत अछि। पाँच साएसँ अधिक नागरिक ऐ संस्‍थाक सक्रिय सदस्‍य छैथ। किछु दिन पूर्व केन्‍द्र सरकार गरीबी रेखासँ निच्‍चाँबला वरिष्‍ठ नागरिकक हेतु मुफ्तमे छड़ी, चश्‍मा आ कानमे लगबैबला उपकरण देबाक घोषणा केलक अछि। जिलाक कलक्‍टरक अधीन गठित एकटा समिति एहेन लाभार्थीक पहचान करत। उपरोक्‍त समिति कानमे लगबैबला मशीन, चश्‍मा आ नकली दाँत इत्‍यादि वरिष्‍ठ नागरिकक हेतु बनेबाक लेल मूलभूत मेडिकल परीक्षण सेहो करौत। जनवरी २०१७ इस्‍वीसँ मार्च २०१७ इस्‍वीक बीच हर जिलामे १००० वरिष्‍ठ नागरिककेँ ई सुविधा देल जाएत। एवम्‍ प्रकारेण सरकार ओ समाज सेवी लोकनि वरिष्‍ठ नागरिकक कल्‍याण हेतु बहुविध प्रयास कऽ रहल छैथ। मुदा ई समस्‍त प्रयास मिलियो कऽ परिवारक दायित्‍वक स्‍थान नहि लऽ सकैत अछि। अस्‍तु जरूरी अछि जे आधुनिकता एवम्‍ वैश्‍वीकरणक प्रवाहमे हमरा लोकनि अपन संस्‍कारकेँ नहि बिसरी। माता-पिता, एवम्‍ अन्‍य वरिष्‍ठ नागरिकक प्रति अपन दायित्‍व निर्वाह आनन्‍दपूर्वक करी जइसँ ओ गर्वसँ जीबैथ आ शान्‍तिसँ अपन जीवनक यात्रा पूर्ण करैथ,स्‍वर्गारोहण करैथ। समाजमे एहेन लोककेँ उत्‍साहित करक चाही जइसँ अधिकांश लोक अपन माता-पिताक सेवा कानूनक भयसँ नहि अपितु कर्तव्‍यक भावनासँ करै छैथ। ऐ उद्देश्‍यसँ पटना स्‍थित आचार्य किशोर कुणालजी द्वारा स्‍थापित महावीर मन्‍दिर ट्रस्‍ट द्वारा श्रवण कुमार पुरस्‍कार पुत्र द्वारा माता-पिता आ पुतोहु द्वारा ससुरक सेवा केनिहारकेँ देल जाइत अछि। समाजमे विरिष्‍ठ नागरिकक जीवन पुत्र सुगम करबामे ऐ तरहक प्रयास निश्‍चय प्रेरणादायी भऽ सकैत अछि। अस्‍तु समाजमे वृद्ध लोकनिक आदर, सम्‍मान ओ सेवा बढ़य से संस्‍कार बच्‍चेसँ धिया-पुताकेँ देल जाए, ऐमे सबहक कल्‍याण अछि। अभिवादनशीलस्‍य नित्‍यं वृद्धोपसेविन: चत्‍वारि तस्‍य वर्धन्‍ते आयुर्विधा यशोवालम्। संगम तीरे पत्नीक संग डेढ़ सालक बच्‍चा आ किछु मोटा-चोंटा सहित इलाहाबाद स्‍टेशनपर पहुँचलौं। हमर अनुज दड़िभंगासँ हमरा मदैत करए आएल रहैथ। दिल्‍लीसँ स्‍थानान्‍तरणक बाद नव निर्मित कार्यालय कर्मचारी चयन आयोगमे योगदान करबाक हेतु हम इलाहाबाद सपरिवार बिना कोनो डेरा तकने आएल रही। आब सोचैत छी तँ अपनो हँसी लगैत अछि, आश्‍चर्यो होइत जे केना नान्‍हिटा बच्‍चा ओ पत्नीकेँ इलाहाबाद टीशनपर छोड़ि अनुज-संगे डेरा ताकए विदा भेलौं..! पहिल बेर अही क्रममे डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीसँ हुनकर आवास ‘तिरमुक्ति’ पर भेँट भेल। हुनकासँ भेँट भेलापर लागल जेना केतेको सालसँ परिचित होथि। सभ काज छोड़ि कऽ हमरासँ गप करैत रहला। परिवारक अन्‍य सदस्य सभ स्‍वागतमे लागल रहला। एक अपरिचित मैथिलक एतेक स्‍वागत करत? जयकान्‍त बाबूक मार्गदर्शनक अनुसार प्रयास कए हमरा लोकनिकेँ ओही दिन साँझ धरि डेरा भेटल। डेरा दड़ियागंजमे छल। ओइठामसँ टीशन आपस जा परिवारकेँ अन्‍य सदस्‍य, सामान सहित डेरामे प्रवेश केलौं। दिन भरिक संघर्षसँ हम सभ थाकि कऽ चूर भऽ गेल रही आ जेना-तेना भोजन कए शान्‍ति पूर्वक सूति रहलौं। प्रात:काल स्‍टेनली रोड स्‍थित कर्मचारी चयन आयोगक कार्यालय पहुँचलौं। ओ कार्यालय स्‍थापित भऽ रहल छल, अस्‍तु कार्यालय चलेबाक हेतु मूल वस्‍तु जेना कुर्सी, टेबुल तक नहि छल। एकटा अधिकारी छला जे ओइ कार्यालयक एक भागमे सपरिवार रहैत छला। क्रमश: किछु कर्मचारी सभ एला। टेबुल, कुर्सीक बेवस्‍था भेल। किछु स्‍थानीय नैर्मिातक कर्मचारी राखल गेल। आ कार्यालय चलि पड़ल। किछुए दिनमे नव भर्तीक विज्ञापनक आधापर आयोजित लिखित परीक्षाक हेतु आवेदन पत्रसभ आबए लागल। किछुए दिनमे एकटा कोठरी आवेदनक लिफाफासँ भरि गेल। किछु दिनक बाद कर्मचारी चयन आयोगक क्षेत्रीय निदेशक बनि कऽ श्री एल.के.जोश–आइ.ए.एस.–एला। कारी-कारी करगर मोछ, गोरनार भुट्ट आ बेसी काल गुमसुम रहएबला जोशीजीक एलाक बाद कार्यालयक प्रगति तेजीसँ होमए लागल। जोशीजीक पत्नी इलाहाबादेमे छेलखिन, तँए ओ ओहीठाम अपन पदस्‍थापना करौलैथ। कार्यालयमे कर्मचारी कम छल आ काज एकाएक बढ़ि गेल छल जइ कारणसँ लोक सभ तनावमे रहैत छल। चूकी परीक्षाक तिथि पहिने घोषित भऽ जाइत अछि, तँए सभ काज समयवद्ध ठंगसँ करबाक छल। तहिया कम्‍पूटरक आगमन नहि भेल छल। सभ काज हाथेसँ होइत रहइ। हालत ई छेलै जे जोशीजी स्‍वयं नित्‍य सैकड़ोक तादादमे प्रवेश पत्र लिखैत छला आ अनकर कथे कोन। परीक्षाक बेवस्‍था करब कोनो जबार भोज करबसँ बेसी कठिन काज छल। एतेक अस्‍त व्‍यस्‍तताक बाबजूद ओ कार्यालय आगू चलि पड़ल मुदा जोशीजी निरन्‍तर उदास रहैत छला। कारण परिवारिक छल। पत्नीक लगमे रही तँ ओ इलाहाबाद अएला आ थोड़ेक दिनक बाद ओ इलाहाबाद छोड़ि विदेश चलि गेलखिन। स्‍पष्‍टत: सभ किछु ठीक-ठाक नहि छल। बेकतीगत जीवनक ऐ अन्‍तर्द्धन्‍दसँ गुजरैत हुनकर मोन आसानीसँ पढ़ल जा सकैत छल। एकर दुष्‍प्रभव हुनकर कार्यालयक काजोपर पड़ैत छल। जोशीजीक प्रेम विवाह भेल छल। हुनकर पत्नी इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे इतिहास विषयक व्‍याख्‍याता छेलखिन। उम्रमे हुनकासँआठ साल पैघ। मुदा प्रेम तँ आन्‍हर होइत अछि। विवाह भऽ गेल। दूटा बच्‍चो भेल। मुदा खटपट सेहो शुरू भऽ गेल जे चलिते रहल आ अन्‍ततोगत्‍वा हुनका लोकनिक विवाह विच्‍छेद भऽ गेल। जोशीजी दिल्‍ली आपस चल गेला आ कार्मिक विभागक सचिव भेला। केन्‍द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT)क उपाध्‍यक्ष भेला। आब ओ ऐ दुनियाँमे नइ छैथ। प्रेमक आवेशक अंजाम केतेको बेर बहुत कुटिल होइत अछि। उफानकमे रहएबला जोड़ी कएक बेर एक-दोसरक हत्‍या कऽ दैत अछि। नित्‍यप्रति एहेन घटना होइत रहैत अछि, तथापि लोक प्रेम करैत अछि। जँ प्रेम त्‍यागसँ अभिभूत नहि भेल, तँ ओ अस्‍किर हेबे करत। के हारत, के जीतत तेकर कोनो ठेकान नहि, मुदा सर्जनात्‍मकता तँ अन्‍त भाइए जाइत...। जोशीजीक प्रकरणकेँ स्‍मरणसँ दृदयमे कएक बेर अखनो कचोट भऽ जाइत अछि। दुनू गोटे अतिशिक्षित ओ संभ्रान्‍त परिवारक छला। स्‍वयं बहुत योग्‍य रहैथ मुदा जीवनक व्‍यतिक्रमकेँ नहि नहि सम्‍हारि सकल। भावी प्रवल। कार्यालयमे एकाएक तेतेक काज आबि गेल आ काज केनिहार लोक तेतेक कम छल जे बहुत अस्‍तव्‍यस्‍तता भऽ गेल। रबियो दिन छुट्टी नहि होइत छल। कखनो काल तँ दिल्‍ली घुरि जेबाक इच्‍छा होइत छल। दड़ियागंजसँ स्‍टेनली रोड स्‍थित कार्यालय आएब-जाएब कठिन काज छल। एक्कापर चढ़ि कऽ बेसी काल यात्रा होइत छल, तथापि समय तँ लगिते छल। तँए कार्यालयक आसपास डेरा ताकए लगलौं। आखिर किछु दिनमे १७,नयाममफोड़गंज हमर डेरा भेल। ममफोड़गंज इलाहाबादक संभ्रान्‍त आवासीय मोहल्‍लामे सँ मानल जाइत अछि। मकान मालकिन वृद्धा, स्‍वतंत्रता सैनानी छेली,जिनका सभ गुरुजी कहैन, कारण ओ शिक्षक छेली। सेवा निवृत भऽ गेल रहैथ। मासमे एक दिन पैंशन लेबए लेल जखन ओ जाथि तँ लगैक जे ओ दिव्‍य बेकती ठाढ़ अछि। आन दिन विक्षिप्‍त जकाँ एकटा कोठरीमे सिमटल। भूतलपर दोसर किरायादार छल। छतपर खाली जगहमे गोइठा भरल छल। कुलमिला कऽ ई आवास सुखद छल। आसपासमे नीक लोक सभ छल। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक भूतपूर्व कुलपति स्‍व. ए.वी. लाल, अर्थशास्‍त्र विभागक विभागाध्‍यक्ष डॉ. महेश प्रसाद, प्रसिद्ध महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. रमा मिश्र इत्‍यादि सभ आसे पासमे रहैत रहैथ। निगम चौराहा लगेमे छल। मिठाइ केर दोकान घरेलू समान इत्‍यादि सभ किछुक दोकान सेहो आसेपासमे। कार्यालयसँ ममफोड़गंज स्‍थित हमर डेरा पैदल ५-७ मिनटक रस्‍ता छल। अस्‍तु आवागमनक समय ओ खर्चा दुनू बाँचए लगल। क्रमश: आसपासक लोक सभसँ परिचय होमए लागल आ जीवन यात्रा अपेक्षाकृत सरलतासँ आगू बढ़ए लगल। छुट्टी दिनमे आसपास एमहर-ओमहर आएब-जाएब प्रारम्‍भ भेल। मोतीलाल नेहरू रिजनल इन्‍जीनियरिंग कौलेजमे हमर पितियौत भातिज पढ़ै छला। कहियो काल हुनकासँ भेँट-घाँट करए छात्रावास चलि जाइ। ओतए गेलापर अफशोस हुअ लागए जे नीक नम्‍बर रहितौं हम ऐ इन्‍जीनियरिंग कौलेजमे अपन नओं नहि लिखबा सकलौं। गामक एकटा फौजी कहियो काल अबैत रहै छला। सासुरक किछु सम्‍बन्‍धी सेहो भेट गेला। हमर स्‍कूलिया संगी इन्‍जीनियरिंग पास कऽ इलाहाबादेमे नौकरी पकैड़ लेने रहैथ। एवम्‍ प्रकारेण पूर्व परिचित लोक सभसँ सम्‍पर्क भऽ गेलाक बाद कार्यालयसँ हटि कऽ समाज भऽ गेल जे क्रमश: बढ़िते गेल, तइसँ इलाहाबादमे रहब मनलग्‍गू भऽ गेल। कहि नहि हम दिल्‍ली छोड़ि इलाहाबाद किएक एलौं? प्राय: मोनमे रहए जे गाम लग रहत। खर्चा कम होएत वा इलाहाबाद धार्मिक स्‍थान अछि, तँए अध्‍यात्‍मिकताक विकासमे सहायक रहत। मुदा इलाहावाद आबि कऽ कोनो सुविधाजनक स्‍थिति नहि भेल। कार्यालयमे काज बहुत छल। रबियो दिन व्‍यस्‍तता रहैत छल, कारण अधिकांश परीक्षा रबिए दिन होइत छेलइ। अध्‍यात्‍मिक दृष्‍टिसँ किछु विशेषता तँ ऐ शहरकेँ अछिए। प्रतिवर्ष माघमे संगममे जबरदस्‍त मेला लगैत अछि। कहाँ-कहाँसँ सन्‍त-महात्‍मा, गृहस्‍थ सन्‍यासी लाखोक संख्‍यामे ओतए आबि कऽ मास करै छैथ। भजन-कीर्तन करै छैथ। गाम-घरक चिन्‍तासँ बेफिक्र लोक एकटा अद्भुत आनन्‍दक अनुभव करैत अछि। माघ मेलाक अवधिमे कहियो-कहियो विशेष स्‍नान होइत अछि। ओइ दिन तँ लगैत अछि जेना समुद्र संगम दिस अग्रसर भऽ रहल अछि। माघ मेलामे रंग-रंगक सन्‍त-महात्‍माक समागम होइत छल। ओइमे देवराहा बाबाक नाओंकेँ के नइ जनैत अछि। हुनकर उम्रक बारेमे कहल जाइत अछि जे ओ केतेक दिन जीला तेकर केकरो सही अनुमान नहि अछि। डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद २-३ सालक रहैथ तँ हुनकर पिता बाबा लग लऽ गेल रहथिन आ बाबा हुनका देखते कहि उठला जे ई तँ राजा हएत। सन्‍ १९५४ इस्‍वीमे भारतक राष्‍ट्रपति भेलाक बाद ओ बाबाक दर्शन केने रहैथ। ओही समयक समस्‍त प्रख्‍यात नेता सभ बाबाक दर्शन हेतु अबैत रहै छला। ओ घन्‍टो पानिमे डुबकी लगौने रहैत छला। हुनका योग सिद्ध रहैन आ सामने ठाढ़ बेकतीक मोनक बात बुझि जाइ छला। कहल जाइत अछि जे बाबा पानिपर चलि सकैत छला, योग क्रिया द्वारा एक स्‍थानसँ दोसर स्‍थान जा सकै छला। मंचपर बैस कऽ बाबा भक्‍त सभकेँ प्रसाद फेकैत रहै छला। केकरो-केकरो माथपर पैर रखि कऽ आशीर्वाद दैत छला। एहेन बेकती बहुत सौभाग्‍यशाली मानल जाइ छला। देवराहा बाबाक सम्‍बन्धमे हमर एकटा निदेशक महोदय सद्य: घटनाक वर्णन करैत कहला जे एकबेर हरिद्वारमे बाबा आएल रहैथ। ओ ओइठाम मेला अधिकारी छला। एकटा हाथी बताह भऽ गेल छल। लोक सभ कोनो तरहेँ ओइ हाथीकेँ नियंत्रित नहि कऽ पाबि रहल छला। बाबाक कान तक ई समाचार गेल। ओ हाथीक हेतु एकटा केरा देलखिन मुदा केकरो ओइ पागल हाथीक लग जेबाक साहस नहि होइ। बाबाक एकटा भक्‍त सिपाही ओ केरा लऽ हाथी दिस बढ़ल। हाथी ओकरा देखते हाथसँ बाबाक देल केरा लऽ कऽ खा लेलक आ एकदम शान्‍त भऽ गेल। एवम्‍ प्रकारेण रंग-रंगक प्रसंग बाबाक बारेमे सुनबामे अबैत छल। जाबे इलाहाबादमे रही,ताबे प्रति बर्ख बाबाक दर्शन माघ मेलामे होइत रहल। ऐ लेल ममफोड़गंजसँ माघ मेला क्षेत्र कएक बेर पएरे जाइत रही, कएक बेर रस्‍तामे एक्का कए ली। एक बेर सोचैत रही जे जा तँ रहल छी, मुदा एतेक दूरसँ फेर पएरे केना आएब। ततबेमे देखै छी जे हमर परिचित एकटा बेकती हमरा दिस बढ़ि रहल छैथ आ आग्रह करए लगला जे आपस हुनके संगे साइकिलपर चलब। १९ जून सन्‍ १९९० क योगिनी एकादशीक दिन बाबा ब्रम्‍ह्लीन भऽ गेला। एवम्‍ प्रकारेण भारतक एक महान सन्‍तसँ प्रत्‍यक्ष दर्शन सम्‍भव नहि रहल, मुदा हुनकर स्‍मृति हमर इलाहाबाद प्रवाससँ सभ दिनक लेल जुड़ि गेला। बाबाकेँ खेचड़ी विद्या सिद्ध छल जइ कारण हुनका भूख ओ आयुपर नियंत्रण छेलैन। इलाहाबादमे रहैत प्रभुदत्त ब्रह्मचारीसँ भेँट-घाँटक सौभाग्‍य सेहो भेटल। ओ सन्‍त तँ छलाहे, धार्मिक, अध्‍यात्‍मिक विषयक सैकड़ो पुस्‍तकक लेखक सेहो छला। हुनकर लिखल भगवती कथाक दुनू खण्‍ड देवराहा बाबाक मंच लग प्रसाद स्‍वरुप लोक कीनैत छल। बाबा ओइमे हाथ लगा कऽ सम्‍बन्‍धित बेकतीकेँ दैत कहथिन- “जा कलियाण होइ। एकरा पढ़।” प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम झैसीमे छल। ओइ आश्रम द्वारा संस्‍कृत महाविद्यालय चलैत छल, जइठाम गरीब विद्यार्थी सभकेँ नि:शुल्‍क शिक्षा देल जाइत छल। एकबेर हम अपन अनुजक संगे ओतए गेल रही। प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजी हुनका बारेमे जिज्ञासा केलैन आ हुनका आग्रह केलखिन जे हुनकर संस्‍कृत महाविद्यालयसँ शास्‍त्रीक पढ़ाइ करैथ, मुदा ओ तइले तैयार नहि भेला। कृष्‍णाष्‍टमीक अवसरपर हम सभ सपरिवार प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम गेल रही। आश्रममे कृष्‍णाष्‍टमीक पर्व मनौल जा रहल छल। करीब ४ बजे ओ बाहर एला आ हमरा सभकेँ हुनकासँ भेँट भेल। ब्रह्मचारीजी आग्रह केलैन जे हम सभ कृष्‍णजन्‍म देखबाक लेल आश्रमेमे रूकि जाइ, मुदा किछु काल धरि ठहैर हम सभ आपस डेरा आबि गेलौं। एकर अलाबा यदा-कदा हम हुनकर आश्रमपर जाइत रहै छेलौं। ओइ आश्रमक अध्‍यात्‍मिक वातावरणक आनन्‍द लैत रहै छेलौं। संगममे स्‍नान, माघ मेलाक मास भरिक आयोजन, आ संत महात्‍माक दर्शन इलाहाबाद रहैत स्‍वत: उपलब्‍ध छल जेकर लाभ हमरा यथा-सम्‍भव होइत रहल। डॉ. जयकान्‍त मिश्रसँ भेँट इलाहाबाद अबिते भेल। ई भेँट-घाँट अनवरत बनल रहल। मैथिल मात्रसँ हुनकर सिनेहक ई प्रमाण छल। कएक बेर हुनका ओइठाम मैथिली भाषाक मूर्धन्‍य विद्वान लोकनिसँ भेँट-घाँट सेहो भऽ जाइत छल। क्रमश: हुनकर समस्‍त परिवारसँ तँ तेतेक सम्‍पर्क भऽ गेल जे लगैत छल जेना हुनकर कोनो निकट सम्‍बन्‍धी होइ, ई सभ विशेषता हुनकर छेलैन। ऐमे हमर योगदान की कहल जा सकैत अछि? मधुर वाणी, उदार हृदय ओ अपनत्‍वसँ सरावोर बेवहार केकरो आकर्षित कए सकैत छल। प्राय: सभ सप्‍ताह खास कऽ छुट्टी दिन हुनका ओइठाम जाइत रहै छेलौं। ओहो कएक बेर हमरा डेरापर सपरिवार अबैत रहै छला। हुनकर पिता म. म. डॉ. उमेश मिश्रजीक बरखीक भोजमे हम अबस्‍स आमंत्रित रहै छेलौं। भोजो अद्भुत होइत छल। बहुत नेम-टेमसँ हुनकर पत्नी भोजक आयोजन करै छेली। अस्‍तु, हमर इलाहाबादक स्‍मृतिक डॉ. मिश्रजी एकटा अमिट अंग भऽ गेला तँ कोनो आश्‍चर्य नहि। इलाहाबादक चर्च होइक आ डॉ. मिश्रजीक ज्‍येष्‍ठ पुत्र डॉ. रूद्रकान्‍त मिश्रजीक चर्च नहि करी तँ ई हुनका संगे बड़का अन्‍याय हएत। रूद्रकान्‍तजी सोभावसँ एकदम शान्‍त छला। संस्‍कारसँ तेजस्‍वी, कर्मठ, मेहनती आ भावुक व्‍यक्‍तित्‍व। पितासँ सपरिवार अलग रहै छला। पहिल पत्नीक असमयमे निधन भऽ गेल रहैन। ओइ पक्षमे एकटा कन्‍या रहइ। दोसर विवाहसँ सेहो सखापात रहैन। रसूलाबादमे गंगा स्‍नान करैत, गंगामे गायत्री जप करैत हुनका कएक दिन देखिऐन। संस्‍कृतक विद्वान छला। इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे संस्‍कृतक व्‍याख्‍याता छला। परिवारिक कारणसँ कर्जमे डुमल रहै छला। कहैथ जे हुनकर दरमाहाक अधिकांश भाग सूदे-तरे चल जाइत अछि। अतिरिक्‍त काज कऽ कऽ कमाइ करक हेतु निरनतर चेष्‍टाशील रहै छला। अपन कार्यालयमे परीक्षाक उत्‍तर पुस्‍तक जाँचमे कएक बेर हुनका बजबिऐन। अद्भुत परिश्रम आ एकाग्रतासँ ओ काज करै छला। हुनकर काजमे एकटा गलती नहि पाबि सकैत छी। हमरासँ बहुत पटै छेलैन आ कएटा नितान्‍त व्‍यक्‍तिगत गपसभ हमरासँ करैथ जे लिखब उचित नहि। एकबेर हम सपत्नी हुनकर डेरापर गेल रही। बहुत स्‍वागत भेल। हलुआ से स्‍वादिष्‍ट छल जे आइ धरि जीहमे पानि आबि जाइत अछि। बहुत रास सभ गप-सप्‍प भेल। बच्‍चा सभ संस्‍कारी। किछु दिनक बाद ओइ हलुआक प्रशंसा डॉ. जयकान्‍त मिश्रजी ओइठाम कएल। तुरन्‍त ओतहुँ हलुआ बनल। कहक माने जे ऐठामक हलुआ सेहो कम नहि...। मुदा हलुआ रूद्रकान्‍तजीक बेसी स्‍वादिष्‍ट छल। रूद्रकान्‍तजी दिल्‍ली आएल रहैथ। हुनकर पहिल पत्नीसँ कन्‍याक विवाहक आमंत्रण देबाक हेतु। हम ओइ कार्यक्रममे गेल रही। दिल्‍लियेमे विवाह-कार्यक्रम भेल रहइ। हुनकर समस्‍त परिवारसँ भेँट भेल। रूद्रकान्‍तजीसँ बहुत दिन बाद फोनपर गप भेल। डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीकेँ साहित्‍य आकदमीसँ २००० इस्‍वीमे भाषा सम्‍मान भेटल रहैन। तइ क्रममे ओ सभ दिल्ली आएल रहैथ। हम भेँट करए गेलौं मुदा कनीक देरी भऽ गेल छल आ पता लागल जे किछुए काल पर्वू ओ सभ इलाहाबादक हेतु प्रस्‍थान कऽ चूकल छैथ। किछु दिनक बाद सुनैमे आएल जे रूद्रकान्‍तजी नहि रहला। ऑफिस तँ ऑफिस होइत अछि। चाहे ओ प्रयागमे होइक वा दिल्‍लीमे। इलाहाबाद अबैसँ पर्वू सोचने रही जे ओ धार्मिक स्‍थान अछि आ ओइठामक लोक सभ बहुत संस्‍कारी हेता। किछु एहेन लोक भेटबो कलाह। इलाहाबादक धार्मिक प्रसांगिकता अखनो अछिए। तँए किछु हदतक हमर ई सही छल। मुदा कार्यालयक अन्‍दर जे वातावरण छल, (आपसी सिरुफुरौआल कहि सकै छी) से तँ नर्के छल। एकटा निदेशक महोदय (जे आइ.एस. अधिकारी रहैथ) कहला जे कलक्‍टरक रूपमे काज करबामे हुनका ओतेक दिक्कत नहि भेल जेतेक १३ आदमीकँ सम्‍हारैमे ऐ कार्यालयमे भऽ रहल अछि। अधिकारी, कर्मचारी सभ युवक छला। केकरो बेसी अनुभव नहि रहइ। काज से बहुत रहइ। तनावक एकटा प्रमुख कारण सेहो छल। मुदा असल कारण छला एकटा स्‍टाफ जे दुनियाँ भरिक तिकरमवाज छला। जँ केकरो तंग करक हेतु २० किलोमीटर पएरो चलए पड़त तँ ओ तइले तैयारे रहै छला। एक राति करीब २ बजे हम भभा कऽ हँसि पड़लौं। श्रीमतीजीक नन टुटि गेलैन। निन्न टुटिते पुछली- “की भेलै, अहाँ एना किए हँसि रहल छी?” असलमे ओइ दिन कार्यालयमे मारि-पीट भऽ गेल रहइ, जेकर स्‍मरणसँ हँसी लागि गेल रहए। कार्यालयक दूटा स्टाफक बीच बाता-बाती होइत-होइत हाथापायी चलए लगल। हल्‍ला सुनि कार्यालयक सभसँ पैघ अधिकारी, निदेशक महोदय जे आइ.एस. छला, कोनो बहन्ने खसैक गेला। सभ गोटे मुहाँ-मुहीं देखैत रहल आ झंझैट हाथापायीमे बदैल गेल। एकटा सज्‍जनक हाथ टुटि गेल। ओ एफ.आई.आर. करबाक हेतु थाना विदा भेला। हुनकर अपेक्षा रहैन जे हम हुनका संगे थाना गबाहीमे चली, मुदा हमरा से पसिन नहि भेल आ ने हम ओइ झंझैटमे पड़ए चाही, अस्‍तु गाहे-बगाहे मौका ताकि कऽ हम घटना स्‍थलसँ खसैक डेरापर चल एलौं। ऐ बातसँ पीड़ित कर्मचारी बहुत नाराज भेला आ बहुत दिन धरि ऐ बातकेँ मोनमे गाड़ने रहला। नौकरीक शुरूआती दौड़मे दरमाहा कम छल। ओभर टाइम केलाक बाद किछु पैसा अतिरिक्‍त भेट जाइत छल। असलमे अधिकारीगण एकरा एकटा हथियारक रूपमे इस्‍तेमाल करैत छला। जे पसिन्नक लोक छल ओकरा असानीसँ ओभर टाइम भेट जाइ छल। हमरा सबहक एकटा संगी (जे दड़िभंगेक छला) चलाक-चुस्‍त रहबाक कारणेँ बिना अतिरिक्‍त काज केनौं ओभर टाइम प्राप्‍त कए लैत छला। कार्यालयोक समयमे ओ पढ़ैत रहै छला। प्रतियोगिता परीक्षा सबहक तैयारीमे लागल रहै छला आ अन्‍तत: आइ.ए.एस. परीक्षा पास कऽ ओ बहुत आगाँ बढ़ि गेला। किछु साल पूर्व आयकर आयुक्‍त रहैथ। ओभर-टाइम कार्यालयमे संवेदनशील मुद्दा छल। एकबेर समस्‍त कर्मचारीक अगुआ बनि हम कार्यालयमे हड़ताल करबा देलिऐ। परीक्षाक समय नजदीक रहइ। उम्‍मीदवार सबहक प्रवेश पत्र जारी हेबक छल मुदा कार्यलयमे काज ठप। मान-मनौअलक बाद हड़ताल समाप्‍त भेल। मुदा हड़तालमे सहयोगी हेबाक कारण बहुत दिन धरि तंग कएल गेल। एक दिन हम श्रीमतीजीकेँ डाक्‍टरसँ देखबए गल रही। कार्यालय आएबमे बिलम्‍ब भऽ गेल। जखन ओतए पहुँचलौं तँ देखलौं जे पूरा कार्यालयक कर्मचारी बाहर ठाढ़ अछि। निदेशक महोदय सेहो कुर्सी लगा कऽ बाहरेमे बैसल छला। मनमे उठल- माजरा की अछि? माथ ठनकल। तह-तहक बात सोचाए लगल। थोड़ेक आगाँ बढ़लौं तँ कियो कानमे फुसफुसा कऽ कहलैन- “ताला सभ कुंजीक अभावमे बन्‍दे रहि गेल अछि!” जल्‍दीसँ डेराआपस जा कऽ कुंजीक गुच्‍छा अनलौं। कोठरी सभ खोलल गेल। निदेशक माहेदय अपन कोठरीमे बैसला। तेकर बाद असगरमे बजा कऽ हमरा अपन नाराजगी व्‍यक्‍त केलैन। एहेन संतुलित आ संयत बेकती कम होइत अछि। लगभग तीन साल हुनका संगे काज करबाक अवसर भेल। प्राय: पहिलबेर हुना तमसाइत देखलिऐन जे वाजिवछल। असलमे कुंजीक झाबा बिना हमर जानकारीकेँ हमर बच्‍चाकेँ पकड़ा देने रहइ। हमरा ऐ बातक जानकारी नहि छल। मुदा गड़बड़ी तँ भाइए गेलइ। कार्यालयक रोकड़क हिसाव तथा पैसाक लेन-देन एकटा कर्मचारी छला जे जँ रातियोकेँ केतौ देखा जाइतैथ तँ भूतक प्रत्‍यक्ष दर्शनक आभास होइत। कारी,भुट्ट, बीड़ी पीबैत आ टंकक पर टिपिर-टिपिर करैत। अपन काजमे मेहनती आ माहिर रहबाक कारण अधिकारी सभ ओकरा मानैत। तेकर दुरुपयोग ओ लोककेँ तंग करबामे करैत छल। कोनो बिल दियौ, ओ ताकि कऽ लगती निकालि दैत, दाबापर कैंची चला दैत, ऐसँ टोकर परपीड़क सोभावकेँ आनन्‍द होइत रहइ। लोक सभ ओकरासँ तंग तँ रहए मुदा कएल किछु नहि। जखन प्रशासनक अधिकारी हम भेलौं तँ पहिने मौका भेटते ओकरापर आक्रमण कऽ देल। भेलै ई जे ओकर कोनो काजमे सुधारक परामर्श देलिऐक तँ ओकरा बड्ड खराप लगलै। चिकरए, भेकरए लागल जे ओकरा ऐ काजसँ हटा देल जाए, हम ने यएह देखलौं ने वएह, तुरन्‍त आदेश निकालि ओकरा जगह दोसर कर्मचारीकेँ खजॉंची बना देलिऐक। आक तँ ओ साँप जकाँ छटपटाए लगल, डिरियाइत घुमैत रहल। केतए-केतए-सँ सिफारिस लगेलक, मुदा हम अरि गेलिऐक। ओकरा हटए पड़लै आ कार्यालयक काज सेहो चलिते रहल। डॉ. जयकान्‍त मिश्रजी अंग्रेजीक प्राध्‍यापक छला। इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे विभागाध्‍यक्ष पदक हेतु हुनका मोकदमाबाजीक सामना करए पड़ल। हुनके विभागक कियो प्राध्‍यापक इलाहाबद विश्वविद्यालयमे मोकदमा कऽ विभागाध्‍यक्षक पदक हेतु हठ केने छल, मुदा ओ हारि गेल। अंग्रेजीक व्‍याख्‍यता रहितौं मैथिली आ मिथिलाक प्रति हुनकर अनुराग जगजाहिर अछि। हुनका ओइठामसँ मैथिलीमे ५-७ पृष्‍ठक एकटा पत्रिका निकलैत छल। हुनकर समस्‍त परिवार ओइ पत्रिकाक तैयारीमे लागल रहैत छल। ओकरा सैंकड़ो लोककेँ पठौल जाइत छल। एकाध बेर हमहूँ ओइ काजमे लागल रही। प्रतिवर्ष विद्यापति पर्व समारोह इलाहाबादमे मनौल जाइत छल। जइमे जयकान्‍त बाबू बढ़ि-चढ़ि कऽ भाग लैत छला। मुदा ओइमे गुटबन्‍दी भऽ जाइत छल। एकबेर तँ हालत तेतेक खराप भेल जे मारि-पीट तक भऽ गेल आ एक गोरेक कुर्ता सेहो फाटि गेलैन। कार्यालयक गुटबन्दी पराकाष्‍ठापर छल। छोटसन कार्यालयमे मानवीय सम्‍बन्‍ध एतेक जटिल छल जेकर वर्णन नहि। निदेशक सभ आइ.ए.एस. अधिकारी होइत छला, मुदा मानवीय सम्‍बन्‍धक ओझरी सरकारी आदेशसँ नहि सोझरा सकैत छल। मोटा-मोटी दू भागमे कार्यालयक लोक सभ बँटि गेल रहैथ। कियो नव स्‍टाफ आबए तँ दुनू गुट ओकरा पटबैमे लागि जाइत। अहीक्रममे हमर कौलेजक सहपाठी स्‍मरण भऽ जाइत अछि। सी.एम. कौलेज दड़िभंगासँ ओहो पढ़ल छला। दड़िभंगामे घर रहैन। नौकरी भेलाक बाद कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबादमे पदस्‍थापित भेला। मुदा मोटा-मोटी ओ दोसर गुटमे चलि गेला। बादमे ओ आइ.ए.एस परीक्षाक माध्‍यमसँ आयकर विभागमे पदनियुक्‍त भेला आ तेकर बाद कहियो भेँट नहि भेला। कार्यालयक एहेन उठा-पटकक बीच ९ वर्षक समय केना कटल से आश्चर्य...। इलाहाबाद स्‍थित कर्मचारी चयन आयोगक कार्यालयक मुखिया निदेशक आइ.ए.एस. अधिकारी होइत छला। १९८७ इस्‍वीमे हमरा चलि एलाक बाद ओइमे आन-आन सेवाक अधिकारी सभ सेहो नियुक्‍त भेला। ओइ पदपर वएह बेती अबैत छला जिनकर इलाहाबादमे घर वा परिवार रहए। हम ९ साल ओइ कार्यालयमे रहलौं जाइ अन्‍तरालमे चारिटा निदेशक संगे कार्य करबाक अवसर भेटल। ओइ चारूमे एकटा प्रोन्नत द्वारा आइ.ए.एस. बनल छला। ओइसँ पूर्व ओ प्रान्‍तीय सीनीक सेवा (पी.सी.एस.)मे रहैथ। हुनकर पिता उच्‍च न्‍यायालयक सेवा निवृत्त जज रहथिन। पिताक एक मात्र सन्‍तान छला। बहुत स्‍टाइलमे रहैथ। ओइ समयमे मूलत: फिएट वा एम्‍बेसडर कारक चलैन छलैक। हुनका लगमे फिएट कार छलैन, जइसँ ड्राइभर हुनका कार्यालय आनए आ लऽ जाए। दुपहरियाक भोजन सेहो घरे जा कऽ करैथ। कार्यालयमे जखन ओ पदस्‍थापित भेल रहैथ तँ कएक दिन धरि थूकदानीक लेल हंगामा भेल रहए। थुकदानी कोन नियमक अधीन कीनल जाए। हारि कऽ ओ अपन घरेसँ थुकदानी लऽ अनलाह। हुनका पान खेबाक आदैत रहैन, तँए पिकदानी राखब अनिवार्य छल। कार्यालयमे ओ कोनो रूचि नहि राखैथ। सभ अधीनस्‍थ अधिकारीपर छोड़ि देने रहैथ। एमहरसँ प्रस्‍ताव आएल तँ ओइपर दसखत आ ओमहरसँ आएल तँ ओइपर दसखत। कएक बेर तँ एहेन होइ जे एक्के विषयपर विपरीत आदेशपर ओ दसखत कऽ दैत छला। कहियो काल हुनकर घर जेबाक अवसर प्राप्‍त होइत छल। रसूलबाद स्‍थित गंगाक घाटसँ लगे काफी ऐल-फइल ओ सुन्‍दर हुनकर घर छल। बादमे पता लागल जे सेवा निवृत्तिक बाद ओ अपन घर बेचि लेला आ राजस्‍थानमे अपन पैतृक स्‍थानपर रहए लगला। कार्यालयमे हुनका निष्‍पृह रहबाक कारणे कार्यालयक महौल खरापे होइत गेल। मानवीय सम्‍बन्‍धमे कटुता बढ़ैत रहल आ किछु गोटे दिन-राति एक दोसरक टाँग खिचौवलमे लागल रहला। सन्‍ १९८५ इस्‍वीमे कर्मचारी चयन आयोग, इलाहाबादक समक्ष प्रस्‍ताव छल जे बिहारमे दूटा नव परीक्षा केन्‍द्र स्‍थापित कएल जाए। ओहीमे एकटा केन्‍द्र दड़िभंगा वा मुजफ्फरपुरमे ओ दोसर दुमका वा भागलपुरमे। हमरासँ तत्‍कालिन निदेशक महोदय ऐ विषयपर परामर्श मंगलैन। हमर आग्रहक अनुसार दड़िभंगा आ दुमकामे परीक्षा केन्‍द्रक स्‍थापना भेल। दड़िभंगामे परीक्षा आयोजनक बेवस्‍था हेतु पर्यवेक्षकक रूपमे हम दड़िभंगा गेलो रही। दड़िभंगामे ५-६ टा परीक्षा केन्‍द्र छल जइमे हजारोसँ बेसी परीक्षार्थी भाग लेला। किछु केन्‍द्रपर परीक्षा बेवस्‍था स्‍तरीय नहि छल तथापि जेना-तेना काज ससरल। दड़िभंगामे परीक्षा केन्‍द्रक स्‍थापनासँ सैकड़ो स्‍थानीय विद्यार्थी सभकेँ कर्मचारी चयन आयोगक माध्‍यमसँ नौकरी भेटल, अन्‍यथा हुनका पहिने अही परीक्षा हेतु पटना जाए पड़ैत छल। दुमका केन्‍द्रमे अपेक्षाकृत कम उम्‍मीदवार रहैत छल, तँए बादमे ओ परीक्षा केन्‍द्र नहि रहल। दुमकाक जगह भागलपुरमे परीक्षा केन्‍द्र बनल जे सफल रहल। सन्‍ १९८३क आसपास ओइ कार्यालयमे किछु नव लोक सबहक पदस्‍थापना भेल जइमे प्रमुख छला- श्री संजीव सिन्‍हा, एम.ए; एल.एल.बी.। ओ इलाहाबादक एकटा संयुक्‍त परिवारसँ अबैत छला। हुनक समस्‍त परिवार अति शिक्षित एवम्‍ वरिष्‍ठ अधिकारी सभ छला। हुनकर एकटा बहिनोइ भारत सरकारमे सचिव पदसँ सेवा निवृत्त भेला। हुनकार बेवहार ओ विचारसँ ओइ कार्यालयक वातावरणमे तँ जे सुधार भेल से भेल, मुदा हमरा तँ जबरदस्‍त समर्थन भेटल। हुनकासँ मित्रता अखन धरि ओहिना चलि रहल अछि। बीचमे ओ दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरित भऽ कऽ एला, फेर आपस इलाहाबाद गेला, हम दिल्‍ली चल एलौं, मुदा हमरा लोकनिक पारस्‍परिक सम्‍बन्‍ध ओहिना मधुर बनल अछि। हुनकर समस्‍त परिवारसँ हमरा क्रमश: सम्‍पर्क भऽ गेल जे अद्यावधि बनल अछि। कार्यालयक ओहन विकट वातावरणमे एहेन नीक लोक भेटला से ईश्वरक चमत्‍कारे कहक चाही। हमरा जीवनमे किछु गोटे एहेन भेटला जे बिना कोनो स्‍वार्थे निरन्‍तर मदैत करैत रहला। हमरा प्रति सद्भावना रहलैन आ संकटक समयमे सहोदर जकाँ ठाढ़ रहला। निश्चय कोनो जन्‍मक हमर पूण्‍यक ई फल रहल होएत। दड़िभंगामे नौकरी करैत काल पिण्‍डारूछक डॉ. विनय कुमार चौधरीजी ओ दिल्‍लीमे काज करैत काल हमरे नामधारी मिश्रजी (मूलत: दड़िभंगाक लगक रहनिहार) हमर जीवनमे प्रात:स्‍मरणीय छैथ। के कहैत अछि जे कार्यालयमे दोस्‍ती नहि होइ छइ? किंवा ओइठामक सम्‍बन्‍ध चलता होइत अछि। काजसँ काज मतलब राखए-बला परिवेशमे बेसी अपेक्षा सम्‍भवो नहि अछि आ ने राखक चाही। परन्‍तु उपरोक्‍त बेकती सभ विभिन्न समयमे कार्यालयमे हमरा भेटला आ जीवन भरिक हेतु घनिष्ट मित्र बनल रहला। इलाहाबाद कार्यालयक महौल खराप करैमे एक बेकतीक बहुत योगदान छल। आब ओ ऐ दुनियाँमे नहि छैथ मुदा जखन कखनो हुनकर चर्चा होइत अछि तँ ओ बात सभ मोन पड़िते अछि। गामक परिवेशसँ हम एकबेर दिल्‍ली तेकर बाद इलाहाबाद आबि गेल रही। नौकरी केना कएल जाइत अछि, तेकर बेवहारिक अनुभव नहि छल आ ने ओइ वातावरणमे कहियो रहलौं। दिन राति मेहनत करी, साए प्रतिशत इमानारीसँ काज करी, केकरो अहित नहि करी, तथापि अधिकारी लोकनि खूब प्रसन्न नहि रहैथ,कारण कोनो बात भेल आ आ ठाँइ-पठाँइ लड़ि जाइ, मुहेँपर सही बात बाजि दिऐ, कएक बेर सही विषयपर आक्रमणक सेहो भऽ जाइ, ऐ सभ कारणसँ अधिकारी लोकनिकेँ अहंपर चोट पड़ैत छेलैन आ सभ मौका पाबि कऽ तंग करैथ। कएक बेर बाजिव हक देबामे बाधा ठाढ़ कए दैथ आ किछु नहि तँ व्‍यंगे कऽ दैथ। कहलक माने जे काजसँ अधिकारीक अहंक रक्षा सरकारी कार्यालयमे अधिक महत्‍वपूर्ण होइत अछि, से बात जाबे बुझलिऐक, ताबे बहुत देरी भऽ गेल छल। कार्यालयक काज हेतु माटाडोर गाड़ी छल। ओकर ड्राइभर सज्‍जन बेकती छला। प्रशासनक काज हमरा जिम्‍मा छल, तँए गाड़ी ओ ड्राइभर हमर नियंत्रणमे रहैत छल। निदेशक महोदयक लेल अलगसँ गाड़ी नहि छल। आइ.ए.एस. अधिकारी होइतो ओ स्‍कूटरसँ कार्यालय अबैत छला। एकदिन एकाएक गाड़ी हुनकर घरपर पार्क भेल आ ओ गाड़ीक उपयोग अपना अधीन कऽ लेला। हमरा एकर जानकारी नहि छल भोरे किछु काजसँ केतौ जेबक हेतु गाड़ी तकलौं तँ पता लागल जे गाड़ी नहि अछि। हमरा बहुत तामस भेल। ड्राइभरकेँ डाँट-फटकार कऽ दिलिऐ। ओ नून-तेल लगा कऽ निदेशक महोदयकेँ चुगली कए देलक। सुनबामे आएल जे हुनका घर जा कऽ रंग-बिरंगक उपराग देलक। परिणाम भेल जे निदेशकजी बहुत क्रुद्ध भऽ गेला। ओहुना ओ हमरासँ अप्रसन्ने रहै छला। ऐ घटनाक बाद हमर हुनकर सम्‍बन्‍ध कहियो पटरीपर नहि आएल। आब सोचैत छी तँ हँसी लगैत अछि- अपनोपर, हुनकोपर। कार्यालयमे जे छल से छल, मुदा ओइसँ हटि कऽ हमर एकटा स्‍वस्‍थ, सुयोग्‍य लोकक समाज बनि गेल छल जइसँ तमाम कष्‍ट अभाव आ संघर्षक बीच हमरा मोन लगैत छल। डॉ. शुभद्र झाजी गाहे-बगाहे इलाहाबाद अपन माझिल पुत्र (भास्‍करजी)क ओइठाम अबैत रहै छला। हुनकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसरमे डेरा छल। एकबेर करीब ११ बजे दिनमे हम शुभद्र बाबूसँ भेँट करए भास्‍करजीक डेरापर गेलौं तँ डाक्‍टर साहैब कहला जे ओ लगातार ९ घटनासँ अध्‍ययन कए रहल छैथ। मैथिलीक शब्‍दकोषसँ सम्‍बन्‍धित किछु काजमे लागल छला। एकबेर शुभद्र बाबूकेँ हम नोत देने रहिऐन। डेरासँ ओ असगरे विदा भेला। भास्‍करजी पाछाँ विदा भेला आ हमर नायकटरा स्‍थित डेरापर पहिने पहुँच गेला। शुभद्र बाबूक कोनो पता नहि छल। भास्‍करजी परेशान रहैथ। हुनका ताकए हेतु एमहर, ओमहर वौआइत छला कि शुभद्रबाबूकेँ निच्‍चाँमे हमर नाम लऽ कऽ चिचियाइत सुनलौं। घर पहुँच कऽ कहए लगला जे गलतीसँ ओ बगलमे कनी हटि कऽ धोबी घाटपर चलि गेल छला। असलमे ओ मकान धोगीक छल, से गप हम हुनका कहने रहिऐन। कनी कालक बाद भाष्‍करजी सेहो आपस एला आ तखन भोज-भात भेल। हमर डेरा देख कऽ शुभद्र बाबू कहैथ जे केराक घौरमे जेना बातमे सँ पता निकलैत अछि, तहिना तोरा डेरामे कोठरीसँ कोठरी निकलैत अछि। गपक क्रममे कहलैथ जे सेवा निवृत्तक बाद रहक हेतु पाण्‍डिचेरीमे घर बनाबह। हुनका पाण्‍डिचेरी बहुत पसिन छेलैन। एवम्‍ प्रकारेण जखन-कखनो आ इलाहाबाद अबैत छला तँ हमर-हुनकर भेँट-घाँट होइत रहैत छल, जे निश्‍चय आनन्‍ददायी छल। “Life is an endless struggle. Ef you stop struggling, You are tirished.” उपरोक्‍त कथन एकदम सत्‍य अछि। जीवन संघर्षक अन्‍तहीन यात्राक प्रत्‍येक डेग आगाँक यात्राक पथ प्रदर्शक बनि जाइत अछि। एहेन कमे लोक छैथ जे बनल-बनाएल सभ किछु प्राप्‍त कए लैत छैथ। मुदा हुनका ओ आनन्‍द कदापि नहि भऽ सकै छैन जे कठोर संघर्षक बाद प्राप्‍त छोटो-मोटो उपलब्‍धिसँ होइत अछि। इमानदारीसँ परिश्रमक कऽ जीवन-यापन करब तलवारक धारपर चलब थिक। लेकिन यदि आदमीमे साहस होइ, दृढ़ निश्‍चय होइ, ईश्वरमे आस्‍था होइ तँ संघर्ष रंग लबैत अछि। कहबी छै जे “Say not the struggle availith not.” नहि कहू जे संघर्ष रंग नहि अनैत अछि, अबस्‍स अनैत अछि, देर-सबेर भऽ सकैत अछि। ताइ लेल धैर्य चाही। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक प्रख्‍यात उपकुलपति स्‍व. ए.वी. लाल कहियो काल साक्षात्‍कार लेबए-ले कर्मचारी चयन आयोग अबैत छला। ओही क्रममे कएक बेर हम हुनका ओइठाम जाइत छेलौं। हुनकर घर गेलापर अद्भुत शानतिक आभास होइत छल। हुनका धिया-पुता नहि छेलैन। पत्नी आ ओ अपने अद्भुत शान्‍तिसँ रहैत छला। सोभावक सरलताक कोनो वर्णनन नहि। एकबेर भोपाल साक्षात्‍कारक क्रममे हम सभ संगे अतिथि गृहमे रहल रही। भोपाल संगे घूमल रही। दिल्‍ली एला पछाइत केतेको दिनक बाद पता लागल जे हुनकर पत्नीकेँ हुनके नौकर हत्‍या कऽ देलक। भेलै ई जे ओ अपने केतौ बाहर रहैथ।घरमे पत्नी असगरे रहथिन। आल्‍मीरासँ किछु पाइ निकालि कऽ नौकरकेँ तरकारी आनक हेतु देलखिन। ओइ आल्‍मीरामे रूपैआक गड्डी ओकरा देखा गेलइ। ओ लालचमे पड़ि कऽ कोनो भारी चीजसँ हुनकर माथपर चोट केलक जइसँ एकाएक हुनकर मृत्‍यु भऽ गेल। नौकरबा सभटा रूपैआ-पैसा लऽ कऽ फरार। ओइ नोकरक पिताकेँ आ ओकरो स्‍व. ए.बी.लालजी इलाहाबाद विश्वविद्यालमे नौकरी धरौने रहैथ। बहुत दिनसँ ओ सभ हिनका परिवारसँ जुड़ल छल। मुदा लोभमे आबि गेल। सभ बफादारी मिनटोमे बिला गेलइ। मुदा फबलै नहि। पकड़ा गेल। आजन्‍म काराबास भेलइ। मुदा एक निर्दोष आदमी मारल गेल। वृद्धावस्‍थामे ए.बी.लालजीकेँ घोर कष्‍ट लिखल रहैन। “ऐ भाई जरा देख के...। आदमी से जानबर ज्‍यादा वफादार है..।” जइ बेकतीक पूरा परिवारकेँ ओ संरक्षण देने छला,आजिविकाक प्रबन्‍ध केने छला आ संगे रखैत छला वएह विश्वासघात कऽ गेल। भावी प्रवल। ईजीवन बड़ विचित्र अछि। स्‍मृतिक आँगनमे जेतइ ठाढ़ होइ छी, धँसि जाइतअछि। रंग-बिरंगक घटनाक्रम सभ माथाकेँ गछारि लैत अछि। की लिखू, केतबा लिखू आकि चुप्‍पे रहि जाँउ। रंग-रंगक घटना क्रम सभ होइत रहल। नीको लोक सभ कालचक्रमे पिसाइत रहल। एकक टा मुर्ख, गमार, बैमान, उचक्काकेँ फलैत-फुलैत देखलिऐ। किछु नहि बुझाइ छै जे आखिर की-सँ-की भऽ जाइत अछि। निश्‍चय जीवन दू दूना चारि नहि अछि। भऽ सकैए कएक जनम्‍क हिसाब-किताब होइत होइक। सत्‍य की अछि, से तँ भगवाने जानैथ। ओइ समयमे इलाहाबादक चर्चित व्‍यक्‍तित्‍वमेसँ एकटा छला, राम सहाय,आइ.ए.एस.। ओ फौजी छला। फौजसँ सेवा निवृत्तिक पछाइत आइ.ए.एस.मे आएल रहैथ। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक उपकुलपति बनौल गेल रहैथ। आर केतेको महत्‍वपूर्ण पद सभपर ओ रहला मुदा हुनकामे अहं नामक चीज नहि छल। हुनकासँ गप-सप्‍प केलासँ अद्भुत उत्‍साह होइत छल। एकबेर कोनो काजे हुनका ओइठाम गेल रही। हुनकर पत्नी नौकर-चाकरक अछैत स्‍वयं चाह बनौलैथ, अपने हाथे चाह परसलैथ आ गप-सप्‍पक दौरान तेना कऽ मिलि गेली जे लगैत रहए केतेको बर्खक पुरान जान-पहचान अछि। निरन्‍तर प्रसन्न रहैत छला। कखनो तनाव नहि। हम ऐ प्रसन्नताक रहस्‍यक बारेमे पुछलिऐन तँ ओ कहलैन- “एकर दूटा कारण अछि- पहिल तँ हमर पत्नी छैथ जे निरन्‍तर हमरा संग दैत रहली आ दोसर हमर अहंकार रहित बेवहार। हम एकसँ एक पदपर रहलौं मुदा सामनेबला बेकतीसँ बिलकुल बराबरीक बेवहार कएल। पदाक अहंकार हमरापर कहियो हाबी नहि भेल। जखन जे समस्‍या आएल, ओकर तुरन्‍त ओ सरलताम समाधान करब हमर सोभाव अछि। ऐसँ हमर माथ निरन्‍तर चिन्‍तामुक्‍त रहैत अछि।” एक दिन हुनका पैंट-सर्ट पहिरने कटरा स्‍थित लक्ष्‍मी सीनेमा लग साइकिल चलबैत देखलिऐन। सीभील लाइन्‍ससँ कटरा साइकिलेसँ आबि गेल रहैथ। ई चुश्‍ती-फुर्तीओइ उमेरमे केतए भेटत? एहेन-एहेन लोक पृथ्‍वीपर ईश्वरक बरदान थिक। निश्‍चय किछु एहेन नीक लोक सभ छैथ जिनका भरोसे पृथ्‍वी माता सभ अन्‍याय सहि जाइ छैथ आ जीवन चक्र चलैत रहैत अछि। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक सहायक उपकुलपति टी.पतिजी गणितक विद्वान छला। सीधा, साधा पएरे चलैबला बेकती छला। कएक बेर साक्षात्‍कारक क्रममे ओ कर्मचारी चयन आयोग अबैत छला। साक्षात्‍कारक बाद पएरे आपस भऽ जाइत छला। लगेमे मिठाइक एकटा दोकान खुजल छल। पूरा आग्रह कऽ कऽ ओ मिठाइक दोकानपर लऽ जाइथ। हुनका लगमे एकटा सूची रहै छल जइमे इलाहाबादक कोन मिठाइक दोकानमे कोन मधुर बढ़ियाँ भेटैए तेकर जानकारी छल। दोकानपर ओइ सूचीकेँ देख ओ मिठाइक आदेश करैथ। बादमे ओ इलाहाबाद विश्वविद्यालयक उपकुलपति सेहो भेला। असलमे इलाहाबाद विद्या, कला, संस्‍कृति आ अध्‍यात्‍म हेतु युग-युगसँ ख्‍यात रहल अछि। निराला, महादेवी वर्मा, पंत इत्‍यादि एक-सँ-एक विद्वान ओइठाम भेला। एहेन ऐतिहासिक स्‍थापर रहि कऽ हमरा निश्‍चय बहुत आनन्‍द होइत छल। कार्यालयक उठा-पटकमे ओतहि छोड़ि ओइसँ हटि कऽ एकटा सुन्‍दर समाज हमरा उपलब्‍ध भऽ गेल छल। आपति काल परेखिय चारी, धरिज धर्म मित्र ओ नारी। तुलसी बाबाक उपरोक्‍त कचनी एकदाम सटीक अछि। धैर्य अछि, अनवरत संघर्ष करबाक चेष्‍टा अछि, तँ कोनो प्रश्‍न नहि अछि जे अहाँ गन्‍तव्‍य तक नहि पहुँचब। अबस्‍से पहुँचब। आ सत्‍य पुछी तँ सही रास्‍तापर चलबाक संकल्‍प अपने आपमे विजयक आभास कऽ दैत अछि आ तइले तँ भगवान दैते छथिन। एकबेर हमर ससुर इलाहाबद आएल रहैथ। हुनका संगे हुनकर अनुज रहथिन। हमर श्रीमतीजीकेँ आपसी यात्रामे नैहर जेबाक रहैन। टीशन जेबाक हेतु हम रिक्‍सा आनए गेलौं। कनिक्के दूर आगू गेल हएब कि कुकुर काटि लेलक। तथापि रिक्‍सा अनलौं आहुनका लोकनिकेँ विदा कऽ देलिऐन। हुनका सभकेँ पता नहि चललैन जे हमरा कुकुर काटि लेलक अछि, अन्‍यथा नहि जइतैथ। आब हम असगर भऽ गेल रही। ओइ समयमे कुकुर कटला बाद अंतरीमे १४टा नमका सूइ लगैत छेलइ। एकबेर पहिनौं सुपौलमे १९७५ ई.मे हमरा कुकुर कटने छल। १४ टा सूइ ओइ बेर पड़ल छल। मुदा ओइ सूइक कोनो विकल्‍प नहि छल। कोताही केलापर रैबीज हेबाक डर छल। गाममे एक बेकतीकेँ रैबीजसँ मरैत देखने रही। से सोचि चिन्‍तामे पड़ि जाइ छेलौं। हमर डेरासँ १० किलोमीटर दूर नगरपालिका अस्‍पतालमे रैबीजक सूइ लगैत छल। एक दिनक बाद सूइ लगबक हेतु जाए पड़ैत छल। ओइमे कार्यालयक एकटा स्‍टाफ हमरा बहुत मदैत केला। ओ अपन साइकिलसँ हमरा लऽ जाथि, सूइ लगबा दैथ आ आपस डेरा तक पहुँचा दैथ। पेटमे सौंसे गुल्ठी भऽ गेल छल। मकान मालकिन बोतलमे पानि गरमा कऽ दैत छेली जइसँ पेटकेँ सेकल करी। क्रमश: उहो समय बीति गेल। पता नहि, कुकुरकेँ हमरासँ कोन जन्‍मक वैर छइ। तेसर बेर फेर दिल्‍लीमे आरकेपुरम डेराक लगमे कार्यालयसँ आपस अबैत काल नान्‍हिटा कुकुर अद्भुत तेजीसँ हमरा दिस आएल आ झपट्टा मारलक। कुकुर तेसर बेर काटि लेने छल। सभ काज छोड़ि कऽ चोट्टे सी.जी.एच.एस. जा कऽ सूइया लेलौं। ताबत सूइक आकार बदैल गेल छल। छोटा सूइ मात्र ६ टा लेबाक छल। लगेमे सी.जी.एच.एस. छल, तँए बहुत फेतरत नहि भेल। डाक्‍टरक कहब छेलै जे जेतेक बेर कुकुर। बानल काटत तेतेक बेर फेरसँ सूइ लेब अनिवार्य अछि। आब तँ कुकुरकेँ देखते साकंछ भऽ जाइ छी। जइसँ चारिम बेर सूइया नहि लेबए पड़ए। हम इलाहाबादमे ९ साल रहलौं। चारि साल गुरुजीक मकानमे किरायेदार छेलौं। १७ नयाममफोड़गंज, इलाहाबाद। तीन साल तँ निचैन भऽ कऽ रहलौं मुदा तेकर बाद तंग करए लागल जे मकान खाली करू। यद्यपि हम अपना भरि किराया समयपर देबक हेतु बहुत साकांक्ष रही। कोनो तरहेँ तंग नहि करिऐक मुदा ओकरा मोनमे मकानक चिन्‍ता होइत रहइ। डर होइ जे मकान चलि जाएत। केतबो बुझबिऐक मुदा ओकर मोन नहि बुझि पबइ। हमरा ओइ मकानमे बहुत नीक लगैत छल। मुदा नित्‍य प्रतिक झंझटसँ मोन तंग भऽ गेल आ कनी दूर हटि कऽ एकटा छोटसन मकान किरायापर लेलौं। ओकर किराया अपेक्षाकृत कम छल। कोठरीक आगाँ बड़ीटा छत छल जइमे कुर्सी धऽ कऽ बैसार होइत छल। मकान मालिकक सेवा निवृत्त पुरातत्‍व विभागक अधिकारी छला। बहुत सौम्‍य आ सहृदय बेकती। हमरा सबहक बहुत धियान राखैथ। ऐ डेरामे आबि कऽ बुत शान्‍ति भेल। किराया कम रहलासँ उसास सेहो भेल। लगभग २साल हम ओइ डेरामे रहलौं। हमर सबहक डेराक ठीक सामने ऊपरमे एकटा सज्‍जन सपरिवार रहैत छला। हुनकर छोटसन बच्‍चा स्‍कूलमे पढ़ैत छल। स्‍कूलक सवक पूरा करबाक क्रममे ओ अपन बच्‍चक जे दुर्गति करैत छला जे बिसरल नहि जा सकैए। प्रति दिन पढ़ाइक अन्‍त बच्‍चा मारि-पीटसँ होइ छल। पता नहि, ओइ बच्‍चाक की भविस भेल। अपन जीवनक महात्‍वाकांक्षा ओ भूतकालक असफलताक चोट निर्दोष बच्‍चापर बजारि कऽ अपने बच्‍चाक भविस नष्‍ट केनिहार ओ असगरे नहि छैथ। माता-पिताक ई बुझक चाही जे ऐ तरहक बेवहारसँ बच्‍चाक दिमाग कुंठित भऽ जाइत अछि, असफलताक भाव ओकरा घेरि लैत अछि आ एकटा व्‍यक्‍तित्‍व निर्माणसँ पहिनहि नष्‍ट भऽ जाइत अछि। एहने बच्‍चा सभ पैघ भऽ कुण्‍ठाग्रस्‍त भऽ आन-आनसँ बदला लैत रहैत अछि। एहने एकटा उदाहरण हमरा दिल्‍लीमे भेटल। हम गृहमंत्रालयमे अधिकारी छेलौं। हमर निदेशक महोदय प्रोन्‍नत आइ.ए.एस. अधिकारी छला। बेवहारमे बहुत कर्कस, बात-बातमे गारि देब हुनक सोभाव छल। बुझेबे ने करए जे ऐ बेकतीक संग केना समय कटत। क्रमश: हुनकर व्‍यक्‍तित्‍व बुझैमे आएल, आपसी सम्‍पर्क बढ़ल तँ एकदिन कहला जे हुनकर एहेन सदा बेवहार ओ अशुद्ध भाषाक हेतु हुनकर पिता जिमेदार छैथ। हुनकर पिता पाकिस्‍तानसँ भारत आएल रहथिन। हिन्‍दू कालैज दिल्‍लीसँ पढ़ल रहथिन आ मंत्रालयमे अधिकारी रहथिन। बचपनमे हुनका संगे बहुत सख्‍ती ओगारि-मारि करथिन जइ कारणेँ हुनकर सोभाव एहेन भऽ गेल जे सबहक हेतु कष्‍टकारी छल। धिया-पुताक संगे कएल गेल बेवहार ओकर व्‍यक्‍तित्‍वक अंग भऽ जाइत अछि। हमर ऐ डेराक सामने भूतलपर गैरेजमे एकटा चतुर्थ वर्गीय कर्मचारीक परिवार रहैत छल। नित्‍यप्रति साइकिलसँ ओ कार्यालय जाइत छल। कार्यालय जाइत काल पूरा परिवार ओकरा विदा करैत छल। परिवारमे बुढ़ माए, पत्नी आ कएटा बच्‍चा सभ छल। ओतेक छोट जगहमे सभ गोटे अद्भुत आनन्‍दसँ रहै छल। साँझमे कार्यालयसँ ओकर आपसीपर परिवारमे अद्भुत आनन्‍द पसैर जाइत छल। जोर-जोरसँ ठहाकासँ आस-पासक वातावरणमे आनन्‍द पसैर जाइत अछि। इलाहाबादक हमर दोसर डेरा अपेक्षाकृत छोट छल। एक्केटा कोठरी संगे स्‍नान, पैखाना गृह ओ कनीटा भनसा घर। मुदा आगूमे छत बड़ीटा छल। राति-बिराति छतपर जुड़ल पाइप लग लघी कए लैत छेलौं। एक राति अहिना करैत रही कि संयोगसँ निच्‍चाँक फ्लैट बालकनीमे सूतल एकटा बृद्धक मुँह खूजल रहैन आ हुनका नोनछराइन लगलैन। धड़फड़ा कऽ उठि गेला जे की भेल। भोर भेने ओइ बुढ़क जमाए (जे इन्‍जीनियर छला) तमसाएल एलाह। लाख बुझबिऐन जे मेघसँ पानिक बुन्नी खसि पड़ल हेतै, मुदा ओ मानैले तैयार नहि भेला। अन्‍तवोगत्‍वा हम अपन गलती मानि झगड़ा समाप्‍त कएल। कहि नहि सकै छी जे केतेक भारी संकटसँ जान बँचि गेल। थोरेक दिनक बाद हमरा सभकेँ कार्यालयसँ सटले नयाकटरा मोहल्‍लामे एकटा धोबीक मकान किरायापर भेल। ओइमे भनसा घर छोड़ि कऽ तीनटा कोठरी छल, छत छल आ किराया सेहो ठीके-ठाक छल। कर्यालयसँ पाँच मिनटमे घर आबि जाइ छेलौं। सटले वगलमे श्रीवास्‍तवजी रहै छला। ओ सभ अतिशय नीक लोक छला। कहियो काल टीवी देखबाक इच्‍छा भेलापर हम सभ ओइठाम चल जाइत रही। चित्रहार सप्‍ताहमे दू दिन होइत छल। टीभी देखू आ चाहो पीबू। पहिल बेर चन्‍द्रमापर गेल भारतीयसँ इन्‍दिरा गाँधीजीक वार्तालापक सद्य प्रसारण हम ओत्तै देखने रही। क्रमश: टीभीक चलन बड़ी तेजीसँ बढ़ि रहल छल। घरे-घरे टीभीक एन्‍टिना टँगाइत छल। सभ दोकानपर टीभी बिकाय लागल छल। हमर ज्‍येष्‍ठ पुत्र ‘भास्‍कर’छतपर लऽ जाथि आ सभ घरपर लागल एन्‍टिना देखबए लगैत। हमहूँ दोकान सभपर टीभीक मूल्‍यक सर्वे करैत रहलौं। कारी, उज्‍जर (स्‍वेत-श्‍याम) टीभीक जमाना छेलइ। ओकरा रंगीन टीभीमे परिवर्तित होमए-मे बहुत समय लागि गेल। नयाकटरा स्‍थित हमर डेराक मकान मालिक धोबी छला। बड़ीटा परिवारमे कियो पढ़ल-लिखल नहि छल। सबहक मुखिया बुढ़िया माए छेलइ। एकबेर हम किरायाक रसीदक मांग कएल, जइसँ इनकमटैक्‍समे छूट भेटैत। कनियेँ-कालमे जोरसँ हल्‍ला भेल! पुछलिऐन जे की भेलइ? भेल ई रहै जे किरायाक रसीदक मांगसँ ओ सभ भयभीत भऽ गेल जे मकान हाथसँ गेल आ ताहि चिन्‍तामे आपसमे लड़ए लागल। हम हुनका कहलिऐन जे कहियौ जे रसीद नहि चाही। से कहिते देरी तुरन्‍त एकदम शान्‍ति भऽ गेल। इलाहाबादक प्रसिद्ध गणितज्ञ स्‍व. गणेश प्रसादक ओ सभ धोबी छल आ वएह मकान बनबैमे मदैत केने रहथिन। क्रमश: ऊपरमे किछु आर कोठरी सभ बनौलक जइमे हम किरायेदार छेलौं। इलाहाबादक फगुआ बहुत आकर्षक होइत छल। पुरुकिया आ नाना प्रकारक पकवानक संग रंगमे सराबोर शहर मदमस्‍त ढंगमे फगुआ मनबैत छल। लाउडस्‍पीकरसँ पूरा मोहल्‍ला हल्‍ला होइत रहै छल आ झुंडक-झुंड लोक सभ रंग खेलाइत एक ठामसँ दोसर ठाम अबैत-जाइत रहैत छला। गाम-घरमे जहिना पहिने फगुआ मनौल जाइत छल, लगभग ओहिना इलाहाबादोमे धूम धर्ड़क्का होइत छल। मुदा आब तँ गामोमे फगुआ नि:शब्‍द भऽ गेल अछि। डालपर फागु सुनबामे नहि अबैत अछि। जोगीरा नहि गौल जाइत अछि। शराब बन्‍दीक बाद डगमग-डगमग चलैत लोक सभ देखबामे नहि अबैत अछि। फगुआ दिन गाम फोन कएल तँ पता लागल जे सभ किछु शान्‍त अछि। कोनो धू-धर्ड़क्का नहि। सभ अपन-अपन असोरापर बैसल पुरुकिया आ मालपूआक आनन्‍द लइ छैथ। इलाहाबाद प्रवासक महत्‍वपूर्ण घटनाक्रममे हमर कनिष्‍ठ पुत्रक जन्‍म छल। जन्‍मक समय नजदीक एलापर माए गामसँ एली। कमला नेहरू अस्‍पताल- इलाहाबादक प्रख्‍यात अस्‍पताल अछि। ओहीठाम हुनका भर्ती करौल गेल। माय संगे रहैथ। २-३ दिन रहलाक बाद डाक्‍टर सभ अस्‍पतालसँ ई कहि कऽ आपस कऽ देलक जे अखन समय लागत। मूल कारण अस्‍पतालक हड़ताल रहै, जइ कारणसँ मरीज सबहक देख-रेख कठिन भऽ गेल छल। घर पहुँचले रही कि तुरन्‍त अस्‍पताल जाए पड़ल। अस्‍पतालमे बहुत कम डाक्‍टर छला। हड़ताल चलिते रहइ। सी.जी.एच.एस.सँ हुनका हेतु दबाइक बोतल सभ अनने रही। ओइमे-सँ एकटा चढ़ैबते देरी स्‍वस्‍थ्‍य खराप होमए लागल। रच्‍छ भेल जे ऐ गड़बड़ीक तुरन्‍त पता लागि गेल आ डाक्‍टर सबहक तत्‍परतासँ हुनकर जान बँचि गेल। डाक्‍टर सभ विचार-विमर्श कऽ कऽ कहलक जे शल्‍य चिकित्‍सा द्वारा बच्‍चाक जन्‍म हएत। तइले प्रात:काल भोरेसँ अस्‍पतालमे तैनात रही। डाक्‍टरक परामर्शक अनुसार शल्‍य चिकित्‍साक सामग्री सभ कीनलौं। अस्‍पतालमे बेहोशी डाक्‍टरकेँ नहि रहबाक कारण ऑपरेशनमे देरी भऽ रहल छल। एलेनगंजमे डाक्‍टरक घरपर जा कऽ बहुत प्रयास केलौं, मुदा जखने हुनका आबक इच्‍छा भेलैन तखने एली। ऑपरेशन टीमक नेतृत्‍व डॉ. शशिवाला श्रीवास्‍तव करै छेली। ओ इलाहाबादक सफल तथा नामी डाक्‍टर छेली। हम हुनकर पिताक किरायेदार रहल रही। जान-पहचान देल। ऑपरेशनक समयमे हमर कार्यालयसँ कएक गोटे उपस्‍थित रहि भरपूर मदैत केलाह जइमे श्री संजीव सिन्‍हाजीक योगदान अविस्‍मरणीय अछि। किछु कालक बाद एकटा नर्स हँसैत बाहर निकलल आ पुत्र-जन्‍मक सूचना देलक। २० अप्रैल १९८५ क ११:३४ मिनटपर हमर छोट पुत्र क्षितिजक जन्‍म भेल। ऐसँ केतेक आनन्‍द भेल, तेकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। तुरन्‍त प्राइवेट वार्डमे कोठरीक बेवस्‍था कएल आ अर्द्ध-बेहोशीक हालतमे बच्‍चाक संग जच्‍चाकेँ ओतए आनल गेल। तेकर बाद तँ देखनिहरक ढवाहि लागि गेल। इलाहाबादक ई विशेषता थिक। लोकमे भावुक लगाव बेसी होइ छै, आ बेरपर आनो-आनो लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि। अगल-बगलमे रहैबला पड़ोसी, परिचित, कार्यालयक सहकर्मी, अधीनस्‍थ कर्मचारी सभ एकाध बेर अस्‍पताल अबस्‍स आएल। दिन भरि भूखल रही। संगम जा कऽ हनुमानजीक दर्शन केलाक बादे भोजन कएल। इलाहाबादमे आकाशवाणीमे कार्यरत कार्यक्रम अधिकारी डॉ. श्‍याम विद्यार्थीजी सँ आकाशवाणी युववाणी कार्यक्रमक रिकर्डिंगक दौरान भेल। सकारात्‍मक सोच ओ सरल सोभावक कारण हुनकासँ अनायासे मित्रता भऽ गेल। यदाकादा आकाशवाणीसँ हमर कार्यक्रम होइत रहै छल। स्‍थानीय अखबारमे सेहो कएकटा लेख कहियो काल छपैत छल। कार्यालयक बाद हमर ई सभ मनोरंजन छल। डॉ. श्‍याम विद्यार्थी राजस्‍थानक रहनिहार छला आ संघ लोक सेवा आयोगसँ आकाशवाणीक र्काक्रम विभागमे राजपत्रित पदपर नियुक्‍त भेल छला। ओइ समयमे डॉ. मधुकर गंगाधर आकाशवाणीक निदेशक छला। ओ पूर्णियाक छला आ किछु दिनक बाद स्‍थानान्‍तरित भऽ दिल्‍ली चल गेला। पटनासँ निकलैबला प्रसिद्ध मैथिली साप्‍ताहक मिथिला मिहिरमे हमर कएकटा कथा, लेख आ कविता सेहो छपल। बादमे मिथिला मिहिर बन्‍द भऽ गेल आ हम दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरित भऽ गेलौं। तेकर बाद ऐ तरहक गतिविधि कम भऽ गेल। कार्यालयक वागवानीक देख-भालक हेतु एकरा नैनित्रिक कर्मचारी छल। ओ गाहे-बगाहे हमर बच्‍चा सबहक मनोरंजन सेहो करैत रहै छल। ओकर खूबी ई छल जे प्रत्‍येक बातमे ओ कहैत ‘यससर’ एक दिन ओकरा पुछलिऐ जे तूँ ई कला केतए सीखलह? कहलक जे पूर्वमे ओ एकटा बहुत पैघ अधिकारीक ओइठाम काज करै छल। वएह ओकरा ‘यससर’ कहबाक आदैत लगौलक। जँ ओकर खिलाफो कोनो बात होइत तँ ओकर उत्तर ओ ‘यससर’ मे दैत छल। असलमे ‘यससर’ सरकारी कार्यालयक रामवाण थिक। केहनो संकटसँ अहाँ ‘यससर’क सहयोगसँ उबैर सकै छी। सरकारी कार्यालयमे अधिकारी सभकेँ काजसँ बेसी हुनकर अहं तुष्‍टि जरूरी होइत अछि। अहाँ दिन राति काज करू आ अधिकारीसँ अहंक टकरावमे कसि गेलौं तँ सभ गुड़-गोबर भऽ जाएत। नीक बेवहार तँ उचित थिक, मुदा बात एतबेपर नहि धमि जाइत अछि। जी-हजुरीक बिना नीक कार्य मूल्‍यांकन नहि होइत अदि। एहेन कियो बिरले हेता जे काजक आधारपर श्रेष्‍ठता तँइ करैत हेता। जीवनमे सभ किछु गणितीय गणना जकाँ नहि चलैत अछि। सभ किछु सोचले नहि होइत अछि आ जे भऽ जाइत अछि से कए बेर अप्रत्‍याशित रहैत अछि। यत चिन्‍तितं तदिह दुरतरं प्रयाति यच्‍चेतसपिज कृतं तदिहाप्‍यपेति प्रातर्भवामि वसधाधिप चक्रंवर्ती सोहं व्रजामि विपिने जटिल तपस्‍वी। भगवान राम द्वारा कहल उपरोक्‍त वाक्‍य हमरा-अहाँपर ओहिना लागू होइत अछि। जे हेबाक छै से हेतइ। होनी कियो रोकि नहि सकैत अछि। तथापि जीवनमे हाथ-पर-हाथ धऽ बैसलो नहि जा सकैत अछि। जे भावी अछि से हेतइ। दड़िभंगासँ दिल्‍ली नौकरी करए गेल रही। ओइठामसँ थोड़बे दिनमे प्रयास कऽ कऽ इलाहाबाद आबि गेलौं आ ऐठाम ९ वर्ष रहलौं। आब अपनो आश्‍चर्य लगैत अछि जे केना ओइ वातावरणमे एतेक दिन रहि सकलौं। असलमे कार्यालय तँ जे छल से छल, मुदा बाहर एकटा नीक समाजिक परिवेश बनि गेल छल जइसँ बहुत भावनात्‍मक समर्थन भेट जाइत छल। आ कहबी छै जे अन्‍हेर गाइक राम रखबार। अन्‍तिम २ साल जे निदेशक छला, हुनकासँ हमरा एकदम नहि पटल। यद्यपि हम परिश्रम पूर्वक ओ पूर्नत: इमानदारीसँ काज करी तथापि ओ असंतुष्‍ट रहैथ आ तंग करैथ। हमर बदली हेतु दिल्‍ली मुख्‍यालय लीखि देलखिन। हम दिल्‍लीसँ डराइ जे केना गुजर हएत, तँए ओहनोमे इलाहाबादे रहए चाही मुदा से नहि भेल आ फरबरी १९८७ मे हमर स्‍थानान्‍तरण दिल्ली गृह मंत्रालय भऽ गेल। इलाहाबाद हमरा गाम-घर लगैत छल। बहुत नीक समाज भऽ गेल छल। कार्यालयमे कनी-मनी झंझट तँ सभठाम रहिते छै, ओकरा झेलिये रहल छेलौं। बच्‍चा छोट रहए। अर्थ-कष्‍ट तँ रहबे करए। तँए हम ओइठामसँ हटए नहि चाही, परन्‍तु निदेशक महोदय हाथ धो कऽ हमरा पाछू पड़ल रहै छला। कार्यालयमे दू गुट छल। स्‍पष्‍टत: ओ हमर घोर विरोधी गुटक संग भऽ गेल छला। वरिष्‍ठ अधिकारीक हेतु ई उचित नहि छल मुदा हुनका हमरा खिलाफ किछु भेटैन नहि तँए खिसियौल बिलाड़ि जकाँ...। विरोधी सभकेँ हमरा खिलाफ हावा दैथ। हमरासँ काज सभ हटा कऽ विरोधी खेमाकेँ दऽ दैथ। मुदा लोक हमरा संगे जे छल से छल। हुनका डरे हटल नहि, मुदा हुनका हाथमे प्रशासकीय चाबुक छल, जेकर गलत उपयोग ओहमरा परास्‍त करए लेल प्रयोग करैथ। बदलीक खिलाफ हम अध्‍यक्ष, कर्मचारी चयन आयोगकेँ आवेदन देल। हम ईहो लिखलिऐ जे जँ बदली होइक तँ हमर घोर विरोधीक सेहो होनि मुदा निदेशक ओकर पक्ष लऽ लइथ। असलमे निदेशकजीकेँ हमरासँ डर होइन। एकबेर ओ कहला जे हम घरेमे रही आ ओ हमरा पूरा दरमाहा दऽ देल करताह। मुदा हम कहलिऐन जे काज करब हमर अधिकार अछि। बिना काज केने हम वेतन किएक लेब? ऐ विषयपर अध्‍यक्ष, कर्मचारी चयन आयोगसँ दिल्‍लीमे हम भेँट केलौं। ओ भेँट करैकाल तुरन्‍त एकटा अधिकारीकेँ बजा लेला जे इलाहाबादमे पूर्वमे रहैथ आ निदेशकसँ परिचित छला। परिणाम भेल जे अध्‍यक्षजीसँ भेल हमर सभटा गप इलाहाबाद निदेशकजीक कानमे चल गेल। हम ओतेक खुलि कऽ हुनकासँ गपो नहि कए सकलौं। इलाहाबाद आपस एलौं तँ निदेशकजी तेतेक घबड़ाएल छला जे स्‍वयं हमर कक्षमे पहुँचला आ रंग-रंगक आश्‍वासन दिअ लगला। मुदा सचमे ओ डरा गेल रहैथ। डरेबाक हेतु ओ स्‍वयं जिम्‍मदार छला। हम तँ अपन आस्‍तित्‍वक हेतु संघर्षशील रही। अन्‍ततोगत्‍वा हमर बदली भऽ गेल। ओना, कनीकाल लेल सत्‍य हारैत बुझाबामे आएल मुदा...।◌ बाल्‍यकाल घरक आगूमे कनीटा जगह छेलइ। ओइ जगहमे हमर फुलवाड़ी छल। केतौसँ तीरा फूलक बीआ आनि कऽ रोपि दिऐ आ लगले माने प्राते भेनेसँ बाबाकेँ पुछए लगिऐन- “बाबा! फूल तँ नहि फुलेलै?” हमर बात सुनिते बाबा हँसि दैथ। रोज भोरे उठिते यएह काज...। कएक बेर तीराक बीआसँ कनियोँटा पम्‍ह निकलै आकि फेर दौड़ी बाबा लग। बाबा फेर हँसए लगैथ। कएक दिन जखन अहिना बाबाकेँ तंग करिऐन तखन कहैथ- “समय लगै छै, एक्के-दिने थोड़े फूल फुलाइ छइ।” फेर बाट ताकी। पानिसँ पटाबी। क्रमश: बीआ गाछ बनबाक दिशामे अग्रसर होइत छल। आठ-दस दिनक बाद, जखन तीराक गाछ बढ़ि जइतैक तँ फेर बाबा लग चल जाइ आ हुनका पकैड़ कऽ आनि तीराक गाछ लग लऽ जा देखा दिऐन। गाछक स्‍थिति देख बाबा मुड़ी डोलबैत बजैथ- “हँ! आब फूल आबि जाएत। अहिना पानिसँ पटबैत रहियौ।” किछु दिनमे रंग-बिरंगक तीराक फूलक कोढ़ी अबै आ रोज भोरे फेर जिज्ञासा भरल आँखिसँ फूलक कोढ़ीकेँ देखैत रही। फूलकेँ कोढ़ीसँ स्‍फुटित होइत देखैत रही। केतेक आनन्‍द होइत रहए, केतेक आनन्‍दित भऽ जाइत रही, तेकर वर्णन हठात्‍ करब संभव नहि। हमर पितामह अपना समयमे पहलवान छला। लोक बजैथ जे ओ असगरे चार चढ़ा लइ छला। खेती-वाड़ी जमि कऽ करैत छला। छह फूट लम्‍बा, मजगूत कद-काठी आ घोर परिश्रमी व्‍यक्‍तित्वक लोक हमर पितामह छला। ओ भोरे उठैथ आ जन-मजदूर सभकेँ अढ़बए सिनुआरा टोल जाथि, जन लऽ कऽ खेतपर जाथि। जन सबहक पनपियाइ पहुँचाबैथ इत्‍यादि काज एकसूरे कऽ लथि। ६५ सालक उमेर तक हुनका घोर परिश्रम करैत हम देखिऐन। पोखरिक पुबरिया भीत्तापर ओलार छल। मीआजान चरबाहकेँ घरेपर सँ अवाज दैथ- “महींस पनहा गेल अछि...।” बाबाक एकटा महींस हुनके हाथे लगैत छल। जखन कखनो ओ केतौ चलि जाथि तँ आफत भऽ जाइत रहए। महींस चुकैर-चुकैर कऽ जान दइपर उतारू भऽ जाइत छल मुदा लगैत नहि छल। कर्मठताक संग-संग ओ आस्‍तिक एवम्‍ संस्‍कार सम्‍पन्न लोक छला। बाबाकेँ एकटा डमरू रहैन जे ओ बजबैत रहैत छला। कहैथ जे ओ डमरू हुनका महादेव देने छैन। हमरा लोकनिक जन्‍मसँ पूर्वेसँ ओ डमरू हुनका लगमे छल। बादमे ओइ डमरूकेँ महादेवक मन्‍दिरपर लेने गेला आ सायंकाल नचारी गबैतकाल एवम्‍ महादेवक आरतीक समय ओ डमरू कखनो बाबा स्‍वयं वा कखनो-कखनो आर बुढ़ सभ बजबैत छला। बच्‍चा सभकेँ बाबासँ बहुत सिनेह होइते अछि। हमरो हुनकासँ बड़ सिनेह छल। सदिखन बाबासँ सटल रही। कर्मठताक संगे ओ बड़ तमसाह छला। तथापि हमरापर ओ कहियो, एक्को बेर नइ तमसेला। मुदा हमर अनुज कएक बेर बाबासँ मारि खा जाइत छला। ओना, तमसपर बाबा मारि तँ दैन मुदा पछाइत अपने कानए लागैथ। गाममे सुसम्‍पन्न परिवारक नायक छला- हमर बाबा। हुनकर बिआह समस्‍तीपुरक आसपासमे सोतीसलमपुरक शीलानाथ झाक पाँजिमे, ओइ समयक पाँच साए चानीक सिक्का दऽ कऽ भेल रहैन। बादमे ओ सभ जनाढ़मे बसि गेल रहैथ। बाबाक सार सभ गाहे-वगाहे अबैत रहै छला आ बहुत सम्‍मान पूर्वक बहुत-बहुत दिन धरि हमरा ओइठाम ओ लोकनि रहितो छला। बाबाक हेतु छोट-मोट उपहार जेना- ‘चक्कू’, ‘सरौता’ इत्‍यादि नेने अबथिन। देवोत्‍थान एकादशी दिन भगवानकेँ जगौल जाइत छल। पीढ़ीपर रंग-बिरंगक अरिपन बना चारूकात दीप जरौल जाइत छल, आ चारि गोटे चारूकातसँ मन्‍त्रोच्‍चारक संग भगवानक ऊपर ...... जाथि आ फेर धीरे-धीरे निच्‍चाँ आबि जाथि। पूजा पाठ होइत, प्रसाद वितरण होइत। बाबा ऐ पूजाकेँ बहुत श्रद्धा पूर्वक करैत छला। अनन्‍त चतुर्दशीक दिन भगवानक पूजा हमरा ओइठाम सभ साल होइ छल। सभ अपन-अपन घरसँ अनन्‍त आनैथ, प्रसाद आनैथ आ ओकर पूजा विधि पूर्वक बाबा करैत रहथिन। “किं मथसि, क्षिर निधि प्राप्‍तो त्‍वंया, प्राप्‍तो मया।” उपरोक्‍त श्‍लोक कहि कऽ अनन्‍त सबहक पूजा होइत छल। व्रह्मस्‍थानमे लखराम महादेवक पूजा होइत आ घरे-घरे लोक माटिक महादेव बना कऽ लऽ जाइत छल। दिन भरि पूजा होइत रहै छल। गाममे समय-समयपर नवाह, अष्‍टजाम सेहो होइत रहै छल। ऐ सभसँ बालक सभमे नीक संस्‍कार पड़ैत छल। हमर पितामह इलाकाक प्रतिष्‍ठित जमीन्‍दार छला। डॉ. सुभद्र झाजी कहैथ जे ओ जखन घोड़ापर चढ़ि कऽ कर्ज-वसूलीक हेतु नागदह जाथि तँ लोक डरे नुका रहैत छल। परिवारक आर्थिक सामर्थ्‍य बढ़बैमे हुनक जबरदस्‍त योगदान छल। हमर गामक बिच्‍चेमे एक पोखैर अछि। पोखरिक पछवरिया भीरसँ कनिक्के हटि कऽ हमरा लोकनिक घर अछि। पोखरिक पुवरिया भीरपर ओलार छल जैठाम माल-जाल बान्‍हल जाइत छल। घरेसँ केतेको बेर बाबा चिकैर कऽ ओलारपर चरबाहकेँ निर्देश दैथ। घरक शुद्ध दूध, दही प्रचूर मात्रामे उपलब्‍ध करबामे ओलार आ ओइठाम दिन-राति खटैबला चरबाह–मियाँजान–क बहुत योगदान छल। धिया-पुता सभकेँ हमरा घरमे बहुत हिफाजत होइत छल। बाबू असगरे छला। तँए परिवारमे नब बच्‍चा स्‍वागत योग्‍य होइत छल। ऐ तरहेँ हम सभ ९ भाए-बहिनक पैघ परिवारक अंग भेलौं। हमर गाममे पीच सड़क छेलै, चौबटिया छेलै, जेकरा ओइ समयमे ‘कमाल चौक’ कहल जाइत छल। कारण पुवारि टोलक कमाल नामक एक बेकती ओइठाम पानक दोकान खोलने रहैथ। तैसंग चाह आ मधुरक दोकान स्‍व. सुखदेव साहुक छल। ऐ दोकान सबहक अतिरिक्‍त ठेलापर दूटा आर दोकान क्रमश: खूजल। कनिक्के हटि कऽ किछु आर दोकान छल। चाह, मधुर ओतौ उपलब्‍ध छल। केतेको गोटे ओइठाम बैस कऽ गप्‍प मारि समय कटैत छला। छोट-मोट क्‍लब जकाँ ओ काज करैत छल। ओइठामक गप-सप्‍प विषय बदलैत रहै छल। एकबेर जबरदस्‍त विवादक विषय छल जे हमर गामक नाम ‘अड़ेरु डीह’ छिऐ आकि ‘अड़ेर डीह?’ ..हमहूँ ओतए ई चर्च सुनैत रही। बच्‍चामे हमरा होइत छल जे ई सभ अपन समय व्‍यर्थ बरबाद कऽ रहला अछि, मुदा आब ओकर उपयोगिता बुझा रहल अछि। सही मानेमे ओ बुढ़ सभकेँ जीबाक बड़का सहारा छल। कनियेँ दूर हटि कऽ बुध आ रबि दिन हाट लगैत छल। तरह-तरह केर तीमन-तरकारी ओतए उपलब्‍ध रहै छल। चारूकात किछु स्‍थायी दोकान सभ छल। हम सभ हाट करि अपन घरक हेतु झोड़ा भरि-भरि तरकारी अनैत छेलौं। गाम दऽ कऽ दूटा बस चलैत छल। एकटा एकटा उजरी बस जे लाहरघाटसँ मधुबनी आ दोसर हरलाखीसँ मधुबनी जाइत छल। दुनू बस बेनीपट्टी, धकजरी,अड़ेर, रहिका होइत मधुबनी जाइत छल। ई दुनू बस जँ छुटि गेल तँ सिवाय रिक्‍शाक आर कोनो सवारी नहि छल। रिक्‍शा द्वारा गाम-घरक गरीब सबहक गुजर होइत छल। रिक्‍शो चलब धिया-पुताक मनोरंजन छल। कएटा बच्‍चा सभ रिक्‍शापर पाछासँ लटैक जाइत छल आ दूर तक रिक्‍शाक पछोर करैत छल बे-लजूलक तंग केनाइ छल आ रिक्‍शाबला सभ कए बेर तंग भऽ कऽ झगड़ापर उतारू भऽ जाइत छल। हमर गाम बस पकड़ए हेतु दूर-दूरसँ लोक अबैत छल। जमुआरी, एकतारा, नगवास आदि गामसँ लोक अड़ेर आबि कऽ बस पकड़ै छला। क्रमश: बसक संख्‍या बढ़ल। सरकारी बस सभ चलए लगल। सीतामढ़ीबला रोडक बस चलि गेलाक बाद तँ बसक संख्‍यामे बहुत वृद्धि भेल आ आब तँ अड़ेर छोट-छीन शहरक सुविधा सम्‍पन्न भऽ चूकल अछि। सड़कक काते-काते सभ रंगक सैकड़ो दोकान खुजि गेल अछि। बैंक, ए.टी.एम., थाना, हाइ स्‍कूल इत्‍यादि सभ भऽ गेल। आसपासक आन गाम-सभमे पक्का रोड बनि गेल अछि आ अड़ेर चौकक महत्‍व बढ़िते जा रहल अछि। गामक पूबसँ कमला नहरसँ जोड़ल धार बहैत छल। ओइमे तखने पानि अबै जखन जयनगरक आसपास बनल फाटकसँ पानि छोड़ल जाइत। भदवारिमे जखन चारूकात बाढ़ि आबि जाइ तँ ओहूमे पानिक दर्शन होइत। ओइ समयमे हम सभ धारमे खेलाइत छेलौं। चौकसँ आगाँ बनल पूल, जैपर लोहाक घेराबा देल छल,ओइपर सँ बच्‍चा सबहक देखा-देखी कुदि जाइत रही। सचमुच ई भयाबह छल मुदा सभ बच्‍चा देखसीमे एना करैत छल। कएक गोटाकेँ ओइमे चोटो लगैत रहइ। पुलक निच्‍चाँ पानिक झड़ना छल। ओइमे तेजीसँ पानि ऊपर-सँ-निच्‍चाँ खसैत छल। ओइमे फाटक लगबैक सेहो बेवस्‍था छल जइसँ जरूरत भेलापर पानिक बहाव नियंत्रित कएल जा सकए। ओइ झड़नामे अपन गामक बच्‍चा सबहक संगे हमहूँ कुदि जाइत रही। ओतए पानिक बहाव बहुत तेज रहैत छल आ कएबेर बच्‍चा सभ गोंता खेला बाद ५-६ मीटर दूर धरि बहि जाइत छल। एकबेर हमरे गामक खुरलुच्‍च पैघ बच्‍चा हमरा झड़नाक ऊपरसँ धकेल देलक, जइसँ हमर वामा आँखिसँ ऊपर माने भाँउ लगक कपार फुटि गेल। तेकर बाद जे उपरागा-उपरागी भेल से की लिखू। गाम-घरमे चेचकसँ बँचबाक हेतु पाच कएल जाइत छल। ओइ समयमे एकरा धार्मिक क्रिया बुझल जाइत छल। शीतला माइक आराधनाक स्‍वरुपमे झालि बजा-बजा कऽ पचनियाँ गीत मसहूर छल। बहुत नेम-टेमसँ घरक लोक रहैत छल। कार्यक्रमक अन्‍तिम दिन तेल चढ़ैत छेलइ। पचनियाँकेँ चढ़ौना देल जाइत छल। अखनो धरि ई दृश्‍य हमरा मोन पड़ैत रहैत अछि। वामा बाँहिपर दूटा नमगर-नमगर चेन्‍ह अखनो धरि विद्यमान अछिए। पचनियाँ सभ सरकारी कर्मचारी होइत छला जे लोकक धर्मिक भावना एवं अज्ञानताक फैदा उठबैत पैसाक उगाही करैत छला। ओइ समयमे ग्रामोफोन हएब बड़का बात छेलइ। हमरा गाममे प्राय: तीन गोटेकेँ ग्रामोफोन रहइ। ओइमे गीतक रेकर्डगोल-गोल चक्का सन चढ़ा कऽ ग्रामोफोनक सुई चला दइ तँ गाना-बजाना होइक। बच्‍चा सभकेँ कहल जाइक जे भोपूमे आदमी नुकाएल अछि। आ हम सभ ओइ आदमीकेँ तकै छेलौं। हमरो ओइठाम एकटा ग्रामोफोन रहैक। ओकर पार्ट सभकेँ खोलि ओइमे नुकाएल आदमीकेँ तकैत रहै छेलौं। एक दिन जेना-तेना किछु पाइक इन्‍तजाम कऽ मधुबनी जा कऽ दूटा ग्रामोफोनक रेकार्ड कीनलौं, जइमे एकटा छल ‘तेरी प्‍यारी प्‍यारी सूरत को किसी को नजर ने लगे’ ससुराल फिल्‍मक गाना छल। सन्‍दुकमे राखल ग्रामोफोनकेँ खोलि ओइमे रेकर्डकेँ बजबैत कियो देख लेलक। बात बाबू तक पहुँचल। मुदा कनी-मनी डाँट-फटकारक बाद छोड़ि देल गेलौं। हमरा गाममे दाहा अबैत छेलइ। बच्‍चा सभ ओइमे बड़ा आनन्‍दित रहैत छल। हम सभ दाहाक नकल करी। करचीमे फूल आ आर किछु खोपि दिऐ आ सभ बच्‍चा अपनामे संगोर करि कऽ अँगने-अँगने घुमी आ ‘दमदलियाक दाहा हुसे..।’ कहि-कहि संगे सभ बच्‍चा चिचिआइत खूब आनन्‍दित होइत रही। छोट-छोट बात सभसँ बच्‍चामे केतेक आनन्‍द होइत छल, तेकर ई उदारहण अछि। बरखा, थाल-कादो, रौद, पानि-बिहाड़ि इत्‍यादि सभमे बच्‍चा आनन्‍द ताकि लैत अछि। सच कही तँ वाल्‍यावस्‍था ईश्वरत्‍वक बहुत समीप रहैत अछि। अन्‍दक आनन्द यत्र, तत्र, सर्वत्र प्रस्‍फुटित होइत रहैत अछि। हम सभ दरबज्‍जापर बैसल रहितौं, सिलेट लऽ कऽ लिखैक अभ्‍यास करैत, कि एकटा पगला अबिते बड़बड़ाइत- “जलखै, जलखै...।” किछु-ने-किछु ओकरा कियो-ने-कियो खेनाइ दऽ दइ आ ओ चल जाइत। बहुत दिन तक ओ क्रम चलल रहइ...। बालमनपर जे गड़ि गेल से गड़ले अछि। अर्द्धनग्न शरी, माटि, थाल-कादो सटने, बकर-बकर बजैत ओ अबैत-जाइत रहैत छल। कहि नइ ओ के छल आ ओकर की अन्‍त भेल...। भूतकालक घटनाकेँ मोन पाड़ैत अनायास ओइ शिक्षकपर धियान चल जाइत अछि जे हमरा सबहक घरक सटले बच्‍चा सभकेँ पढ़बैत छला। बच्‍चा जँ कोनो गलती केलक, किंवा सबक नहि रटि सकल, तँ घोरनक छत्ता विद्यार्थी-सभपर छोड़ि दैथ। बाप-बाप चिचिआइत बच्‍चा सभक स्‍मरण करैत अखनो रोमांचित भऽ जाइत छी। सोचल जा सकैत अछि जे ओइ बच्‍चा सबहक की भविस रहल हेतइ। एक्कोटा बच्‍चा ओइमे सँ नहि पढ़ि सकल। बच्‍चाक माए-बाप सभ अपन बच्‍चा सबहक कल्‍याणक कामनासँ मूक दर्शक बनल रहल। आ सभ बर्वाद भऽ गेल। “ई बसुधा काइ को नाही...।” “ऐ पछवरिया घरवारी। ऐ पुबरिया घरवारी...।” ई टनक अबाज छल एकटा भिखमंगाक। साए वीघा खेतक हमहूँ मालिक छेलौं। “ई वसुधा काहु कि नाही...।” कएक बेर ओ ई बात चिचिआ कऽ कहैत। हाथमे छड़ी, आँखिपर टुटल-फुटल चश्‍मा, धोती पहिरने, ओकरे ओढ़ने। ओ हमरे गामसँ सटल बेलौजाक छला। हमर पितियौत बाबी ओही गामक रहैथ। तँए हुनकासँ बेसी ओ अपेक्षा रखैत छल। ओकरा एक तम्‍मा चाउर देल जाइत तखने लैत, मुट्ठी भरि नहि। जौं मुट्ठी भरि देबाक कियो चेष्‍टा करैत तँ ओ चिकरैत-भोकरैत चल जाइत। मास-दू-मासमे एकबेर अबैत आ भरि तम्‍मा भीख भेटलाक बाद ओइ दिन दोसर घर नहि जाइत। एहेन कड़क अबाज, बेवहारक ओ भीखमंगा। अन्‍दाज ओकरा ओइ अवस्‍थामे अलग पहचान दैत छल। कहि नहि की भेल जे ओकर एहेन आर्थिक पतन भेल। निश्‍चय ओ एकटा अलग व्‍यक्‍तित्वक लोक छल। स्‍कूलक रस्‍तेसँ अल्‍हाक ढोलकक थाप सुनाइत छेलइ। होइत जे दौड़ कऽ रस्‍ता तँइ कऽ अल्‍हा सुनए पहुँच जाइ। घर पहुँचते बस्‍ता रखितौं आ भागितौं। माय कहैथ- “पहिने किछु खा तँ लिअ।” माइक गप सुनिते कहि दिऐन- “आबि रहल छी।” आ अल्‍हा सुनए पहुँच जाइ। हमरा गाममे अल्‍हाक बहुत रेवाज छेलइ। दुपहरिया कटबाक ई उत्तर साधन छल। भरि गामक लेाक सभ जमा होइत आ ओ जोशा-जोशा कऽ ढोलकपर थाप मारैत आ गबैत अल्‍हा-रुदलक अनेकानेक प्रकरण सुनबैत- “बाबू सुनो हमारी बात, एक दिन की नहीं लड़ाई गाबत बीत जाय बारहम मास...।” ऐ तरहक पाँति सभसँ गीतमय कथानक रूचिगर छल। बच्‍चा सबहक हेतु ओ अद्भुत आकर्षण छल। बेरा-बेरी केतेको दरबज्‍जापर अल्‍हाक आयोजन होइत रहै छल। ओ नट हमरा गाममे बहुत प्रसिद्ध भऽ गेल छल। गाम-घरमे सामान्‍यत: लोककेँ ऐ तरहक मनोरंजन उपलब्‍ध छल। औझुका जकाँ टेलीवीजन नहि रहैक तहिया। रेडियो सेहो केकरो-केकरो गाममे रहइ। तँए किछु तँ चाही। ◌भाग- २ गाममे सामान्‍यत: लोक भोरे उठि जाइत अछि। हमर बाबा तँ भोरे उठि कऽ सभ काज कऽ जन अढ़ा कऽ आबि जाइत छला, तखनो चहल-पहल कमे रहैत छल। हमहूँ नित्‍य नियमित नवका पोखैरमे स्‍नान करी। ओइठाम भगवान शिवक पंचमुखी मूर्ति छल, पूजा करी, जल ढारी, व्‍यायाम करी, तखन घर आबी। स्‍नान करए जाइत रस्‍तामे रस्‍तामे हारमोनियमपर भजन गबैत मधुर अबाज सुनैमे अबैत रहैत छल। गामसँ उत्तर-पच्‍छिम मन्‍दिरपर ओ पुजारी छला। सिघिंऔन गामक। हुनक स्‍वरक मधुरता समस्‍त वातावरणमे अद्भुत आनन्‍द भरि दैत छल। सूर्योदयसँ पूर्व हमर स्‍नान भऽ जाइत छल। पोखैरमे धराधर डुबकी लगाबी। जाड़क मासमे तँ यैहले-वैहले स्‍नान भऽ जाइत छल। गर्मीमे कनी-मनी हेलानाइ सेहो भऽ जाइत छल। ओइ समयमे कुट्टीपर आरतीक घड़ी-घण्‍ट टनाटन करए लगैत छल जे बड़ीकाल धरि चलैत रहै छल। कुट्टी परहक बाबा बहुत संग्रही रहैथ। ओ बहुत रास गाए पोसैथ। मुदा एक राति चुप्‍पे मन्‍दिरसँ समान सभ लऽ चलि गेला। सन्‍ १९६१मे सम्‍पूर्ण रामायण सिनेमा आएल छल। लॉडस्‍पीकर-पर गामक गाम प्रचार होइ- ‘देखना मत भुलियेगा, शंकर टॉकिज- मधुबनीकेँ विशाल पर्दे पर सम्‍पूर्ण रामायण...।’ गाम-गामक लोक उनैट गेल छल। ओ सिनेमा केतेक चलल से नहि गनल जा सकैत अछि। हमरो गामसँ केतेको लोक सम्‍पूर्ण रामायण देखए गेला। हमहूँ बाबूजीकेँ केतेक बेर कहने हेबैन- “बाबूजी, सम्‍पूर्ण रामायण देखए चलू।” ओ आइ-काल्‍हि करैत रहला आ हम सम्‍पूर्ण रामायण सिनेमा नहि देख सकलौं। ओइ सिनेमाक गीत सभ अखनो हम सुनै छी तँ स्‍वत: अपन वाल्‍यावस्‍थामे विलीन भऽ जाइ छी। “बदलो बरसो नयन की ओर से...।” आ “हम रामचन्‍द्र की चन्‍द्रकला से...।” ई दुनू गीत तँ हमर बेर-बेर सुनैत रहै छी। मोन होइत रहैए एकबेर ई गीत अहूँकेँ सुना दी। चलू फेर कखनो। जखन कखनो ई गीत सुनै छी तँ स्‍वत: आँखि नोरसँ भरि जाइत अछि। सीता-जन्‍म वियोगे गेल, दुख दुख छोड़ि सुख कहियो ने भेल। जगतजननी मैथिली-सीतामैयाक दुखक वर्णन करैत ई गीतमे भावनाक अद्भुत विस्‍फोट अछि। समाजिक कुबेवस्‍था एवं सामन्‍तवादी सोचक विद्रोह स्‍वरुप अपन सन्‍तान द्वारा अन्‍यायक प्रतिवाद करैत ई गीत- “हे राम तुम्‍हारी रामायण तब तक होगी सम्‍पूर्ण नहि...। जब तक राज्‍य के निर्माता, धोबी के बाद मे आयेगे, भारत भविष्‍य की माता को धोखे से वनमे ठुकराऐंगे...।” ऐ गीतक एक-एक शब्‍द रोमांचित करैत अछि। केतेक अन्‍याय सहए पड़ल मिथिलाक ओइ यशस्‍वी सन्‍ताकेँ। खाएर चलू आगू बढ़ी...। जीवन यात्रामे एहेन केतेको दृश्‍य अछि, जे मोनमे गड़ि जाइत अछि। जानकीक संग एना किए भेलैन। सोचैत-सोचैत रहि जाएब। मुदा उत्तर नहि भेटत। बाबूजी कएक बेर बजैत रहैथ- “विधि वाम की करनी कठिन, जश सियहि किन्‍है बाबरो...।” यद्यपि समय बहुत आगाँ बढ़ि गेल अछि, लोकक विचारो बदलल अछि, तथापि सीता सदृश अनेको मैथिलानी अखनो चौबटियापर न्‍यायक बाट तकैत देखल जाइ छैथ। धिया-पुताक छोट-टोट बात ओकर भावी जीवनक दिशा निर्देश करैत अछि। हमरा बच्‍चामे खेलबाक बहुत जतन रहए। आस-पासक बच्‍चा सभकेँ पकैड़-पकैड़ कऽ खेलक हेतु इकट्ठा करी। कएक तरहक खेल होइत रहइ, बिनु खर्चक आ बिनु कोनो झंझटक- जेना कबड्डी, विट्टू, फूटबॉल, बालीबॉल आदि। कबड्डी तँ हमरा दरबज्‍जेपर होइत रहइ। स्‍कूलसँ अबिते देरी भीर जाइत रही। फूटबॉल हमरा गाममे बहुत प्रचलित छल। विष्‍णुपुर टोलसँ सटल खेलक मैदान छल, जइमे बरोबैर खेल होइत रहइ। बादमे हाई स्‍कूल बनि गेलाक बाद ओकरे मैदानमे खेल हुअ लगलै। पुरना समयमे हमर गामक फूटबॉल टीम बहुत प्रसिद्ध छल। हमर बाबू सेहो बढ़ियाँ खेलाइत छला। ओ कहैथ जे खेलक चक्करमे पढ़ाइ चौपट्ट भऽ गेल। वाट्सन स्‍कूल- मधुबनीक छात्र रहैथ आ गेनखेलीमे जेतए-तेतए चल जाइत रहैथ। हुनका केतेको मेडल भेटल रहैन। जँ आजुक समय रहैत तँ बाते अलग रहैत। शायद हुनका अपसोच नहि करए पड़ितैन। मुदा ओइ समयमे तेहेन परिस्‍थिति नइ रहइ। कलकत्ता गेल रहैथ तँ मोहनबगानमे गेनखेलीमे चुनाव भऽ गेल रहैन मुदा थोड़बे दिनक बाद गाम आपस चल एला। लोक सभ बुझेलकैन जे गाममे कोन कमी अछि जे अहाँ कलकत्ता एलौं, आदि-आदि अनेको बात कहलकैन। पछाइत गेनखेलीसँ हुनका तेतेक परहेज देखिऐन जे जँ हम कहियो खेलैत देखा जइतौं तँ पकैड़ कऽ लऽ अबैथ। जेना खेलकेँ पढ़ाइक शत्रु मानए लगला। परिणाम भेल जे हम खेलक मामलामे चौपट्ट भऽ गेलौं आ सदा-सर्वदाक लेल खेल-धूपसँ विरत रहि गेलौं। एकबेर केना-ने-केना पैसाक जोगार कऽ बड़का गेन किनलौं। बच्‍चा सभ मिलि ओइमे हवा भरलौं। आ कुट्टीक भीरपर खेलए गेलौं। ओ जगह गामसँ कनियेँ हटल अछि। तँए मनमे ई आशा रहए जे पकड़ल नै जाएब, मुदा केना-ने-केना बाबू ओत्तौ पहुँच गेला, हमरा देखते तमसाए लगला। खेल बन्‍द भऽ गेल। एवं प्रकारेण धीरे-धीरे हम ई सभ निठ्ठाहे छोड़ि देलौं आ सोलहन्नी कितावसँ चिपकए लगलौं। ओना, ऐसँ पढ़ाइमे फैदा भेल, मुदा खेल-धूपसँ हटि जेबाक कारण कएकटा क्षति सेहो भेल। हमरा हिसाबे ई ठीन नहि भेल, मुदा समय-समयक बात होइत अछि। ओइ समयमे जे भेलै से भेलइ। आब लोकक दृष्‍टिकोण बदैल रहल छइ। खेलक प्रति लोकक सकारात्‍मक रूखिसँ बच्‍चाक सर्वांगीण विकास होइत अछि। समाजिक पक्ष मजगूत होइत अछि एवं ओकर सोभावमे शहनशीलता ओ सामंजस्‍य करबाक भावना बढ़ैत छइ। परीक्षामे नम्‍बर आनि लेबे सभ किछु नहि अछि। ओइसँ हटियो कऽ जीवनक अनेक पक्ष अछि, जैपर धियान देबाक जरूरी अछि, जइसँ जीवन बेसी सुखी ओ शान्‍त रहि सकैत अछि। ई निश्‍चय जे माता-पिताक मनमे सन्‍तानक कल्‍याणक कामना रहैत अछि मुदा ओकरा अपन आकांक्षा किंवा मनोरथक प्रतिविम्‍ब बनबैक परियास कएक बेर बच्‍चाक विकासमे बाधक भऽ सकैत अछि। भगवानक दृष्‍टिमे सभ मनुख एक अद्भुत रचना अछि आ सभ किछु-ने-किछु विशेषता, विशेष क्षमता लऽ कऽ अबैत अछि। परिवार एवं विद्यालयक दायित्‍व अछि जे ओकर विशेषताकेँ बुझए आ ओइ दिशामे ओकरा विकासक समुचित सुविधा सेहो दइ। डाक्‍टर, इन्‍जीनियर बनि जाए, एतबे जीवनक अन्‍तिम सत्‍य नहि भऽ सकैत अछि। हमरा गामसँ उत्तर-पूबमे चौकसँ कनिक्के हटि कऽ एकटा मन्‍दिर अछि। जेकरा कुट्टी सेहो कहल जाइत अछि। ओइठाम सावनमे सभ साल झूला जोर-सोरसँ मनौल जाइत छल। भजन-कीर्तनक गायन होइत छल। आस-पासक गामक लोक झाँझमे ओइठाम एकट्ठा होइ छला। कार्यक्रमक अन्‍तमे प्रसाद वितरण होइत छल। कुट्टीपर बाबाकेँ बहुत रास गाए छेलैन। ओही गाइक दूधसँ प्रसाद बनौल जाइत छल, जइमे पर्याप्‍त मात्रा दूध आ मुट्ठीपर चाउर दऽ दऽ पायस बनौल जाइत छल। धिया-पुताकेँ ओ पायस खेला बाद स्‍वर्गक आनन्‍द भेटैत छल। बड़का थाड़मे पायस राखि कऽ बाँटल जाइत छल। मुदा लोककेँ पायस बहुत कम मात्रामे देल जाइत छल। मुँहमे पायस जाइते देरी लगैत जे गलि गेल। स्‍वादिष्‍ट, मधुबर एवं मनमोहक। बच्‍चा सभ पायस लेबाक हेतु बारंबार परियास करैत छल। धक्का-मुक्की होइत छल। वारिक (परसनिहार) हमरे टोलक रहैत छला। ओ सदिखन ऐ बातक धियान रखैत छला जे अपना-ले पर्याप्‍त मात्रामे पायस बँचि जाए, मुदा लोकक आक्रमण देख ओ परेशान भऽ जाइत छला। एक बेर तँ पायसक बट्टा लेने ओ पोखैरमे कुदि गेला आ अन्‍दर पानिमे जा कऽ ताबरतोर पायस सुरकए लगला। चारूकात गामक धिया-पुता ओ युवकगण ऐ दृश्‍यकेँ देखैत रहि गेला। हमहूँ पोखैरक कातमे आन-आन बच्‍चा सबहक संगे ऐ दृश्‍यकेँ देखैत रहि गेल रही, जे अखनो धरि नहि बिसराएल। बाबू साइकिलसँ मधुबनी जाइत रहैत छला। कहियो-काल किछु-किछु फरमाइस कऽ दिऐन। एकबेर पेन अनबाक हेतु कहलयैन। सड़कक कातमे ठाढ़ भेल बड़ीकाल तक बाट तकैत रही जे बाबू पेन लऽ कऽ आबि रहल छैथ। जेतेक साइकिल देखा पड़ैत, देखते होइत छल जे वएह आबि रहल छैथ। केतेको काल धरि बाट तकलाक बाद बाबू साइकिलपर अबैत देखेलैथ। थाकल, अपसियाँत भेल बाबूजीकेँ साइकिलसँ उतैरते पुछलयैन- “बाबू, पेन अनलौं?” बजला- “जा! बिसरा गेल..!” सुनिते देरी बहुत निराशा भऽ गेल रही। पछाइत वौसबाक हेतु बाबू अपन हाथसँ धड़ी निकालि कऽ हमरा हाथमे पहिरा दैथ। शर्त ई जे घड़ी देख कऽ पढ़ब। मधुबनीमे सर्कस आएल छल, राति-के फोकस लाइट छोड़ल जाइत छल जे दूर-दूर तक देखल जाइत छल। बाबूकेँ खुशामद कएल गेल। हम आ बाबू सर्कस देखलौं। तरह-तरहक व्‍यायाम, खेल, धूप आदि ओइ सर्कसमे देखौल गेल। तेतबे नहि, बाघक संग सर्कसमैनक खतरनाक खेल सेहो देखौल गेल छल। गाम-गामसँ सर्कस देखबाक लेल महिनो भरि लोकक ढवाहि मधुबनीमे लागल रहैत छल। सर्कस देख कऽ स्‍वर्गक आनन्‍द भेल रहए। तरह-तरह केर व्‍यायाम ओ खतरनाक खेल सभ एकट्ठे देखबाक एहेन अवसर गाम-घरमे कम अबैत छल। हम सभ बच्‍चा रही तँ हमरा गामक एक महान संत श्रपति श्वामीक चर्चा होइत रहै छल। ओ गौर वर्णक ओजस्‍वी व्‍यक्‍तित्वक लोक छला। सन्‍यासी रहैथ। हाथमे दण्‍ड-कमण्‍डल रहैन। माय कहैथ जे गीता पढ़ैत-पढ़ैत हुनका मोनमे वैराग्‍य उत्‍पन्न भऽ गेल आ ओ जवानियेँमे सन्‍यास लऽ लेला। ओ कहियो काल गाम अबैत छला आ अपन शिष्‍यक ओइठाम रहैत छला। गामक पुस्‍तकालय एवं नवका पोखैरपर लोक सबहक संग ओ धर्म चर्चा करैत छला। ओइ समयमे गामक प्रतिष्‍ठित बेकतीमे ओ गनल जाइत छला। गामक पुस्‍तकालयपर तरह-तरह केर खेलक सामग्री सभ सेहो लागल छल। किछु दिनक बाद एक-एककेँ ओ सभ टुटैत गेल आ क्रमश: नष्‍टभऽ गेल। पुस्‍ताकलयमे थोड़ेक समय तक बहुत गहमा-गहमी रहैत छल। अखबार, रेडियो अथबा पुस्‍तक सभ सेहो ओइमे छल। १९६२ ई.मे, जे चीन युद्धक समय छल, रेडियोसँ समाचार सुनबाक हेतु लेाकक भीड़ लागि जाइत छल। ऐ सभमे हमर गामक स्‍व. विश्‍वम्‍भर झाजीक गंभीर योगदान छल। दुर्भाग्‍यवस ओ बेसी दिन नहि रहि सकला। सन्‍१९६९ मे कमे उमेरमे हुनकर देहावशान भेलाक बाद ई सभ गतिविधि नष्‍ट भऽ गेल। गाम-घरक आस-पास एक-सँ-एक प्रतिभाशाली बच्‍चा सभ छल। केकरो स्‍वर अद्भुत छेलइ तँ कियो पहलमानीमे निपुण छल। कियो मधुर गायन आ वाद्ययंत्रक प्रति आकर्षित छल तँ कियो किछुमे...। मुदा परिवार वा स्‍कूलमे ऐ सबहक विकासक संभावना नगण्‍य छल। परीक्षामे रटि-फटि कऽ नीक नम्‍बर अनलौं तँ बड़ नीक अन्‍यथा सभ व्‍यर्थ..! एहेन बच्‍चाकेँ नकारा घोषित कऽ देल जाइत छल। परिणामत: कएटा बच्‍चा जे जीवनक केतेको क्षेत्रमे अग्रगामी भऽ यशस्‍वी भऽ सकैत छला,मुदा ओ विषादपूर्ण जीवन जीबैले मजबूर भेला। हमर गामेक एहेन कएटा बच्‍चा छल जिनकामे गेबाक अद्भुत सामर्थ्‍य छेलैन। बिना कोनो प्रशिक्षण लेने जे ओ मैथिली गीत सभ गबैथ से बुझू सुनिते रहि जइतौं। मुदा हुनका सभकेँ कोनो प्रकारक संरक्षण, प्रशिक्षण नहि भेल। सभ कलान्‍तरमे गाँजाक सोंट लगबैत अपन-अपन स्‍वरकेँ नष्‍ट केलैन..! बच्‍चामे हमरो हारमोनियम सीखबाक ललक जगल। जेना-तेना पैसाक प्रवन्‍ध कऽ मधुबनी जा कऽ अपनेसँ एकटा हारमोनियम कीनि अनलौं। गाममे एक गोटे हारमोनियम बजाएब जनैत छला। हुनकासँ हारमोनियम सीखए लगलौं कि गामक बुझनुक लोक सभ हमरा बाबूजीकेँ आबि शिकाइत केलकैन। शिकाइतो एना केलकैन जे ‘ई बच्‍चा तँ दुरि भऽ रहल छैथ। केहेन बढ़ियाँ पढ़ैत छला। आ तैपर सँ धियान हटि गेलैन..!’ परिणाम भेल जे हम हारमोनियम सीखब छोड़ि देलौं। हलाँकि थोड़-बहुत जे हारमोनियम सीखि सकलौं, ओ अखनो अबिते अछि। मुदा तेतबे...। जे कि किछु लय निकालि सकैत छी। मुदा अखनो धरि हम ई नइ बुझि सकलौं से कोन तरहेँ हारमोनियम सीखब खराप होइत। खाएर, लोकक सही सोचक अभाव छल जे बच्‍चा सबहक भविस हेतु कएक बेर बहुत अहितकर भेल। खाएर जे हौउ, मुदा बेटाकेँ पढ़बै-लिखबैमे हमर बाबूकेँ बहुत रूचि रहैन, जे कि हरिदम उत्‍साहित करैत रहैत छला, आ से मात्र हमरे नहि, गामक आनो-आन बच्‍चा सभकेँ। पिताजी जइले प्रेरित करैत रहैथ, तेकर फैदा तँ भेबे कएल आ भाइए रहल अछि। परीक्षा सभमे लगातार हमरा नीक नम्‍बर आएल। मुदा कहक माने जे परीक्षाक नम्‍बर अनबाक अतिरिक्‍त जीवनक अन्‍य आयाम थिक जेकर बुझबाक, विकासक गाम-घरमे कोनो जोगार ने तहिया छल आ ने आइये भऽ सकल। ‘भाग्‍ये ललति सर्वत्र, न विद्या न च पौरुष:’ कहल जाइत अछि जे विधाता जन्‍मसँ पूर्वे मनुखक भाग्‍य लिखि कऽ पठा दइ छैथ। हमर स्‍कूलक प्रयोगशाला कक्षमे उपरोक्‍त पाँति मोट-मोट अक्षरमे लिखल छल। जीवन यात्राक क्रममे घटित नाना प्रकारक घटना एवं अनका-अनका जीवनक तथ्‍य दिस देख, सुनि ई कथन एकदम सत्‍य लगैत अछि। एक आदमी जनैमते जीवनक समस्‍त सुख-सुविधा सम्पन्न भऽ जाइत अछि, दोसर तरफ केतेको एहेन लोक छैथ जे जीवन भरि जीबाक हेतु संघर्ष करैत रहि जाइत अछि। तेकर माने ई नहि जे भाग्‍यपर छोड़ि कऽ आदमी कर्तव्‍यहीन भऽ जाए, आ कामना करैत रहि जाए जे जे भाग्‍यमे हेतै से हेतइ। परियास तँ करब उचिते अछि, मुदा ई बात मानि कऽ चलू जे सभ किछु अपने मोनक नहि भऽ सकैत अछि। जँ अपना मोनक हो तँ नीक आ जँ अपना मोनक नहि हो तँ आर नीक। कारण ओइमे ईश्वरक इच्‍छा सम्‍मिलित रहैत अछि। बेचैन रहलासँ बढ़ियाँ अछि जे निमतिकेँ स्‍वीकार कए मनकेँ शान्‍त राखल जाए, कारण शान्‍त मनमे विकासक अनन्‍त सम्‍भावना रहैत अछि। बच्‍चाक दुनियाँ माए-बाप, चाचा-चाची किंवा आस-पासक अन्‍य निकट सम्‍बन्‍धीक इर्द-गिर्द सिमटल रहैत अछि। ओकर सम्‍पूर्ण व्‍यक्‍तित्वक निर्माणमे परिवार एवं परिवारिक परिस्‍थितिक गंभीर प्रभाव होइत अछि। आस-पासमे रहनिहार लोक एवं परिवेश सेहो ओकरा प्रभावित करैत अछि। निश्चित रूपसँ हम ऐ मामलामे भाग्‍यवान रही। माता-पिता एवं पितामहक अद्भुत सिनेह एवं समर्थन हमरा भेटल। ९ भाए-बहिनक पैघ परिवारमे कखनो ई नहि भेल जे कियो किनकोसँ कम महत्‍वपूर्ण छल। सभपर बरोबैर धियान देल गेल। हमरासँ ज्‍येष्‍ठ पाँचटा बहिन छेली। हुनका लोकनिक बिआह-दान एकटा दीर्घकालीन घटना क्रम छल। १०-१२ वर्ष लगातार घरमे बिआह, कोजागरा, मधुश्रावणी, द्विरागमन सहित नाना प्रकारक विध-बेवहार होइत रहैत छल। एतेक भारी परिवारिक जिम्‍मेदारीक अछैत माय-बाबू बहुत आशावादी एवं आस्‍थावान छला। हमरा निरन्‍तर आगू बढ़बाक हेतु प्रेरित करैत रहला। गामक लोकक एवं परिवेशक सकारात्‍मक रूखि सेहो हमरा उत्‍साहित करैत रहल। ओ सभ प्रणम्‍य छैथ, जिनकर स्‍मरण करैत-करैत हम ओइ गामसँ दूर रहितो सदिखन अपनाकेँ ओहीठाम अनुभव करैत रहै छी। ◌ क्रोध मनुख भावुक प्राणी होइत अछि। दैहिक आवश्‍यकताक पूर्तिक संगहि संग ओकर मनोवैज्ञानिक आवश्‍यकताक पूर्ति सेहो आवश्‍यक अछि। जखन कियो केकरो दैहिक वा मानसिक कष्‍ट दैत अछि तँ ओकरा मोनमे क्रोधक प्रादुर्भाव होइत छइ। अतएव क्रोधक हेतु आवश्‍यक थिक जे कियो केकरो कष्‍ट पहुँचबैक संगहि ईहो आवश्‍यक जे कष्‍ट पहुँचेनिहारक पता होइक। अज्ञात बेकती द्वारा उत्‍पन्न कष्‍ट किंवा स्‍वयं अपनेसँ भेल कष्‍टपर क्रोध नहि होइत अछि। उदाहरण स्‍वरूप अगर दाढ़ी बनबए-काल गालक चमरी कटि जाए, खून बहि जाए वा हाथक लोढ़ा धोखासँ पैरपर खसि पड़ए आ पैरक आँगुर थकुचा जाए तँ क्रोध नहि होएत अपितु पश्चाताप होएत जे एना बेसम्‍हार दाढ़ी नहि काटक छल वा लोढ़ाकेँ सम्‍हारि कऽ रखबाक चाही छल। किंतु जँ कियो आन हमरा पाथरसँ मारए किंवा मारबाक उपक्रमो करए तँ तामस धड़ दय भय जाएत। क्रोधक भोजन थिक विवेक। विवेके रहलासँ मनुख जानवरसँ फराक अछि। मनुख सोचि सकैत अछि। नीक-बेजाए केर विचार कए सकैत अछि। किन्‍तु ई सभ काज विवेकसँ उत्‍पन्न होइत अछि। मुदा जाहि मनुखक विवेक नष्‍ट भऽ जाइत छै ओ बहुत रास अनुचित कथा बजैत अछि एवम्‍ कर्म आ अकर्मक बीच भेदभाव बिसैर जाइत अछि। क्रोध अबिते नीक-सँ-नीक लोककक विवेक मरि जाइत छइ। आकृति बिगैड़ जाइ छै एवम्‍ रक्तचाप बढ़ि जाइ छइ। क्रोधावेगमे मनुख गड़बड़ काज कऽ लैत अछि। अर्थ-अनर्थक भेद बिसैर जाइत अछि आ तँए सोभाविक रूपेँ विनास दिस अग्रसर भऽ जाइत अछि। क्रोधक प्रवल वेगमे मनुख ईहो नहि सोचि पबैत अछि जे ओकरा जे कष्‍ट पहुँचौलक तेकरा एहेन अभिप्राय रहइ वा नहि। ऐप्रकारक सभसँ नीक दृष्‍टान्‍त चाणक्‍यक ओइ आचरणमे भेटैत अछि जखन किओ कुश गड़ि जेबाक कारणेँ सभ कुशकेँ उखारि ओकरा जरिमे धोर देबए लगला। केतेक बेर एहेन होइत अछि पाथरसँ चोट लगलासँ लोक पाथरेपर चोट करए लगैत अछि। एहेन क्रोधकेँ जड़क्रोध कहल जाइ अछि। कारण क्रोधीकेँ एतबो अन्‍दाज नहि रहै छै जे ओगलत स्‍थानपर गलत रूपेँ क्रोध कऽ रहल अछि। क्रोधक जन्‍म कष्‍टसँ होइत अछि। सोभाविक अछि जे जेकरामे सहनशीलता जेतेक बेसी हेतै तेकरा क्रोध तेतेक कम हेतइ। वर्तमान समयमे बढ़ैत महत्‍वाकांक्षा एवम्‍ वैज्ञानिक विकासक कारणेँ पारस्‍परिक टकरावक संभावना सेहो बढ़ि गेल अछि। जखन एक्के वस्‍तुक हेतु कएक गोटे प्रयत्नशील हेता तँ संघर्ष अनिवार्य भऽ जाइ छइ तथा असफल रहनिहार बेकतीकेँ क्रोध होएब सोभाविक। क्रोधमे लोकक आत्‍मसंयम समाप्‍त भऽ जाइ छइ। ऐ अवस्‍थामे लोक बहुत रास अन्‍ट-सन्‍टबाजि जाइत अछि। परिणामस्‍वरूप पुरान-सँ-पुरान सम्‍बन्‍ध ओ मित्रता नष्‍ट भऽ जाइ छइ। तँए उचित जे तामसमे गुम्‍म भऽ जाइ। जँ कियो तमसाएल अछि तँ ओ अन्‍ट-सन्‍ट बाजि सकैत अछि, जे सुनि हमहूँ उत्तेजित भऽ सकैत छी। परिणामत: मारि-पीट वा एहने कोनो अशुभ काज भऽ सकैत अछि। तँए उचित जे जेतए उत्तेजना होइक तैठामसँ ससैर जाइ जइसँ अनर्गल कथा ओ काज देख हमरो उत्तेजना नहि भऽ जाए। क्रोधक सीमित ओ संयत प्रयोग लाभकारी भऽ सकैत अछि। मानि लिअ जे कियो गोटे अहाँक टका रखने अछि आ लाख प्रयासक अछैतो ओ टका आपस नहि कए रहल अछि तखन क्रोधक प्रयोग केलासँ भऽ सकैत अछि ओ बेकती टका आपस कए दिए। परन्‍तु एहेन लाभकारी क्रोधकरबामे आत्‍मसंयमक प्रयोजन होइत अछि कारण क्रोध करैत-करैत जँ सीमाल्‍लंघन भऽ गेल, बहुत रास तामस भऽ गेल तँ परिणाम अनिष्‍टकारी भऽ सकैत अछि। टका तँ बुड़िये जाएत संगे ऊपरसँ मारियो लागि सकैत अछि। क्रोधक प्रयोग प्रतिकारक हेतु सेहो होइत अछि। जँ ट्रेनसँ यात्रा करैत कियो धक्का मारि दैत अछि किंवा ट्रेनसँ धकिया कए निच्‍चाँ खसा दैत अछि तँ ओकरापर कसि कऽ तामस भऽ जाइत अछि। परिणामस्‍वरूप हमहुँ ओकरा कोनो-ने-कोनो दण्‍ड देबए चाहैत छिऐ। यद्यपि ऐ बातक कोनो संभावना नहि रहैत छै जे ओइ आदमीसँ दुबारा कहियो भेँट होएत वा नहि। क्रोधक प्रयोगयदा-कदा आत्‍मस्‍वार्थ सेहो होइत अछि। कारण जँ कियो बेकती अहाँकेँ कोनो प्रकारक क्षति पहुँचा दैत अछि तँ अहाँक सोभाविक इच्‍छा रहैत अछि जे दुबारा फेर एहने क्षति नहि हो। तँए ओइ बेकतीपर क्रोधक प्रयोग कए घटनाक पुनरावृत्तिकेँ रोकबाक प्रयास कएल जाइत अछि। ऐ प्रकारसँ कएल गेल क्रोधमे आत्‍म रक्षाक भाव बेसी होइत अछि। क्रोधक शिकार नीक-सँ-नीक लोक भऽ जाइत अछि। कोनो आवश्यक नहि जे अहाँ कोनो गलती केनहि होइ आ तही कारणेँ अहाँकेँ कोपभाजन होमए पड़ल हो। असल बात तँ ई थिक जे क्रोधित मनुखक दृष्‍टिमे जँ अहाँ कोनो प्रकारसँ क्षति पहुँचेबाक चेष्‍टा कएल अछि तँ ओ क्रोधित भऽ जाएत। एहेन परिस्‍थितिमे क्रोधसँ बँचबाक एक मात्र साधन सहनशीलता थिक। क्रोध दुखक चेतन कारणक साक्षात्‍कार वा परिज्ञानमे होइत अछि। अतएव जेतए कार्य कारणक सम्‍बन्‍धमे त्रुटि होएतैक ओतए क्रोधमे धोखा भऽ सकैत अछि। दोसर बात जे क्रोध केनिहार लोक जेमहरसँ क्रोध अबै छै तेम्‍हरे देखैत अछि। अपना दिस नहि देखैत अछि। क्रोधक ई प्रवल इच्‍छा होइ छै जे जे बेकती ओकरा कष्‍ट देलक अछि ओकर नाश होइक मुदा ओ कखनो ई नहि सोचि सकैत अछि जे ओ जे कऽ रहल अछि से अनुचित छै, किंवा तेकर की परिणाम हेतइ। कखनो-कखनो लोक क्रोधमे अपने माथ पटकए लगैत अछि। तेकर कारण जे हुनकर ऐ काजसँ हुनक निकट सम्‍बन्‍धी, जिनकासँ ओ क्रुद्ध रहै छैथ, हुनका कष्‍ट होइ छैन। तँए हेतु क्रोधमे जँ कियो अपन माथ पटकए किंवा स्‍वयंकेँ कहुना कष्‍ट दिअए तँ बुझी जे ओ कोनो अपने बेकतीपर कुद्ध अछि। कोनो बातसँ खौंझाएब क्रोधक एकटा रूप छिऐ। एहेन बेकती मानसिक रूपसँ रोगग्रस्‍त होइ छैथ। ओ सामान्‍यत: छोट-मोट गड़बड़ी भेलासँ खौंझा जाइ छैथ। केतेको बुढ-बुढानुसकेँ अहाँ कोनो गप्‍प कहियौ, सुनिते देरी ओ ठेंगा लऽ कऽ दौग जाएत। ..क्रोधक ई रूप सामान्‍यत: वृद्ध वा रोगीमे देखना जाइत अछि। चाहे जे हो एतबा तँ निर्विवादे जे क्रोधक परिणाम बिरले नीक होइत अछि। सामान्‍यत: क्रोधमे समस्‍याक समाधान हेबाक बजाय नव-नव समस्‍याक प्रादुर्भाव भऽ जाइत अछि। क्रोधक आवेगमे कएल गेल गलती केतेको-बेर मरण-पर्यन्‍त पश्‍चातापक कारण भऽ जाइत अछि। अतएव क्रोध सबहक लेल घातक होइत अछि। ऐसँ अध्‍यात्‍मिक प्रगतिमे व्‍यवधान तँ होइते अछि संगे सांसारिक विकास सेहो अवरूद्ध भऽ जाइत अछि। अस्‍तु क्रोध अवश्‍य त्‍याज्‍य थिक। दिनांक- २४.०१.१९८८ बी.एन. लाल दास चिचड़ी वाली भौजी लाल काकी , नामि के कहैत रहथिन्ह जे एतेक टा छः घरवासी वाला आंगन मे चिचड़ीवाली कनिया के त्याग आओर बलिदान याद राखय योग्य अछि। नामि पुछलखिन्ह - माँ , की केलखिन्ह,भाभी। लाल काकी बड्ड पुरान घटना सभके कहँ लगलखिन्ह- जे चिचड़ी वाली कनिया एहि परिवार मे आब सं पूर्ब विधवाक जिंदगी जी रहल रहैथ। वोकर नाम जस्सी रहैंह। एक दिन लाल कका ककरो सिद्धान्त मे गेल रहथिन्ह। हाल चाल पुछैत समय पता चललैन्ह ,जस्सी के बारे मे, ज़े कतेक कठिन सा जीवन बिता रहल छैक। जस्सी के पिताजी, एतबे कहलथिन्ह - ओकरा भाग्य मे इहा लिखल रहैक। जिंदगी भार बनि गेलैक। हम ककरा की कबैक जे हमर विधवा बेटी के हाथ पीला करू। दालानों पर बैस नहीं देत। एक लोटा पानि त बहुत दूरक बात अछि। लाल कका काफी सुलझल आओर उदार विचारधारा के एक सम्मानित लोक छैथ। ई सुनि हुनक ह्रदय हहैर गेलैन्ह। सामाजिक व्यवस्थाक आओर सोच पर तरस ऐलैन्ह। हम सभ 21 वी सदी मे छी,समाजक सोच 19वी सदी के छैक। हम अपने घर सं शुरू करब विधवा बिबाह। हम अपन घर मे विधवा के बियाहब। हमर भातिज सं बढ़िया के हेतैक। लाल काकी ई सुनि स्तब्ध भ गेलिह। लाल ककाक ई निर्णय पर गाम मे खलबली मैच गेल। भात भतबरी के निर्णय समाज द्वारा सुनाओल गेल। लाल काका टस सा मस नहि भेलाह। पंचायत लागल,लाल कका स्पस्ट कहलखिन्ह - अहाँ सभ भात-भतबरी करू,कोनो बात नहि। हमरा सभ के बारि दि अ, कोनो बात नहि, मुदा एक विधवा के नया जीवन दें मं मे कोनो कमि नहि रह देबैक। हमर इहा प्रार्थमिकता अछि। पारिवारिक सभ लोक फगुआ मे जमा भेल। बैभव सेहो आयल रहैत।लाल कका विना लैप लपट के पुछलखिन्ह, बैभव , अहाँक की विचार? बिना संकोच केने बैभव अपन विचार प्रकट केलखिन्ह- अहाँ सभ जे करबैक,हमरा सहर्ष मंजूर अछि। विवाह शुभ मुहूर्त मे भय गेलैन्ह। आईं वो चिचड़ी वाली कनिया छैथ। चिचड़ी वाली कनियाक नया जीवन शुरू भेल काफी साल बीत गेलैन। सभक साथ केना मिल क रहल जाइत छैक,केना प्रेमक गंगा परिवार,समाज मे बहै, वो इक मिशाल मानल जाइत अछि। बैभव के नीक नौकरी नहीं रहैंह, एक स्कूलक नौकरी। परिवार मुश्किल से चलैत रहें। लाल काकी के नहीं याद रहैंह जे कहियो किछु मांगने हेतैन्ह। जे रहैं, भगवानक प्रसाद मानि चलैत रहथिन। बैभव के याद छैन्ह जे छोट बहिनक बिबाह मे जस्सी अपन सभ गहना गुरिया के बेच क नीक बिबाह मे सहयोग केने रथिन्ह। आई हुनका कोनो गहना गुरिया,किछु नहीं छैन्ह।गोल्डप्लेटेड गहना हुनक सौन्दर्य बढ़ा रहल छैन्ह।वाहि ठाम नामि के गहनाक कोई कमी नहि। कोनो ईर्ष्या, जलन के नामो निशान नहि। जिंदगी सा कोनो शिकवा- शिकायत नहि। बैभवक आंगन मे दू बच्चा सभ के दिल जीतने रहैछ। समाजक कोनो प्रकारक बीमारी,हॉस्पिटल के कोनो काज महिला के होइनिन्ह,जस्सी राति भरि समय द क लोक सभक दिल जीतने रहथिन्ह। जस्सी अपन आभार लाल काकी,लाल कका आओर पूरा परिवार के दैत नहीं थाकैत छैथ। आई समाज मे इज्जत, सम्मान सभ लाल कका के उच्च विचारक परिणाम छल। डॉ. शिव कुमार प्रसाद दलित साहित्‍यकेँ आन साहित्‍यसँ फुटकेबाक प्रयोजन साहित्‍य तँ साहित्‍ये होइ छइ। गद्य वा पद्य जतबा रचना अछि वा सिरजल जा रहल अछि तइमे कोनो एक विषयकेँ फुटकाएब ने तँ असान अछि आ ने हमरा बुझने उचित। शीर्षक दऽ देब बड़ असान छै परन्‍तु जखन विषय-वस्‍तुक अनुसन्‍धानमे डूमए पड़ै छै तखन बुझना जाइ छै जे एक दृष्‍टिकेँ रखबापर दोसर दृष्‍टि, आ दोसर रखलापर तेसर दृष्‍टिक प्रति अत्‍याचार हुअ लगै छइ। साहित्‍यमे जखन स्‍वार्थक वर्चस्‍व बढ़ए लगै छै तँ भाँति-भाँतिक बोल वा नारा ऊपर उठए लगैत छइ। दलित साहित्‍यकेँ आन साहित्‍यसँ फुटकेबाक प्रयोजन आइ किएक भऽ रहल छइ? हिन्‍दी साहित्‍यमे सेहो ई आन्‍दोलन उठल रहइ। किछु मुट्ठी भरि लोक साहित्‍यक मंचपर अपन नाओं कमाइले ऐ तरहक प्रयास कएला। स्‍थिति एतए तक पहुँच गेलै जे कथासम्राट प्रेमचन्‍दोक रचना जरा देल गेल। “प्रेमचन्‍द दलित साहित्‍य नहि लिखला, ओ दलितकेँ अपमान केला।” ऐ तरहक अनेकानेक घटना आ वक्तव्‍य मिडियामे अबैत रहल। कोनो-कोनो निष्‍पक्ष रचनाकारकेँ ऐ हल्‍लामे शामिल कऽ लेल गेल। मुदा आइ हिन्‍दीमे केतौ ‘दलित विमर्श’क नाराक प्रयोजन देखबामे नइ आबि रहल अछि। साहित्‍य राजनीति नै छिऐ। साहित्‍यमे राजिनीति विषय-वस्‍तु भऽ सकै छै मुदा राजनीतिकेँ साहित्‍यमे प्रवेश भेने साहित्‍य मरि जाइ छइ। धनिया आ पालकक कियारी नै छी साहित्‍य..! साहित्‍यक विस्‍तृत संसार छइ। ऐ साहित्‍यकेँ बाभन, कायस्‍थ, राजपूत, भूमिहार वा पिछड़ा, अत पिछड़ा, अनुसूचित जाति आदिक साहित्‍यमे विभाजित नहि कएल जा सकैत अछि। तँए हमरा बुझने दलित साहित्‍यकेँ फुटकेबाक कोनो प्रयोजन नहि। मैथिली साहित्‍यक एकटा सभसँ बड़का दुर्भाग्‍य रहल अछि छिजे किछु लोक साहित्‍यकेँ अपन खानगी सम्‍पैत बुझि लेलखिन। हुनका सभकेँ भेलैन जे जँ कहीं ई भाषा अनका हाथमे चलि जाएत तँ हमर हाथे हेरा जाएत। परिणाम भेलै जे उमेरक हिसाबसँ मैथिली दुबराइत रहली। पजरा सटैत गेलैन, डाँर झूकैत गेलैन। ऐ रूपे भाषाकेँ पकड़निहार सबहक पीढ़ी-दर-पीढ़ीक हाथमे नचार भऽ बिलखैत रहली। भाषा पौती-मौनीक वस्‍तु नहि। आकि मुनहर कोठी वा बखारीक जिनिस नहि। ई किनको मरौसी डीह वा खेत नहि। भाषा साहित्‍य तँ झड़-झड़ बहैत झड़ना थिक। साहित्‍यक धार होइत अछि जे मात्र अपन किनछैरेटा मे नहि वरन् किनछैरक संग-संग अपन बान्‍हकेँ तोड़ैत केतौ-सँ-केतौ धरि हृदय रूपी भूलोककेँ आप्‍लावित कऽ दैत अछि। भाषाकेँ सुनब, पढ़ब, लिखब आकि बाजबपर जे एकाधिकार बुझैत छला ओ हमर मैथिलीकेँ मात्र जीआ कऽ रखने छला। कागजक किछु पन्नामे सिकुड़ल प्‍लाष्‍टि साड़ी जकाँ जीवित भाषाकेँ स्‍त्री विमर्श, वा नारी विमर्श, दलित साहित्‍य वा दलित विमर्श, पिछड़ल साहित्‍य वा पिछड़ल विमर्श अथवा कोनो जाति वा बेकतीक विमर्शमे बाँटलासँ साहित्‍यक विकास अवरूद्ध भऽ सकैत अछि। दलित विमर्शकेँ फुटकेबाक आधार की? (क) जे दलित आक-धथूर लिखने जाइ छैथ सभकेँ साहित्‍य मानि लेल जाए? (ख) जे दलित, दलित पात्रक चित्रण साहित्‍यिक दृष्‍टिसँ कऽ रहल छैथ ओकरेटा दलित साहित्‍य मानल जाए? (ग) साहित्‍यक विविध विधा यथा- नाटक, एकांकी, उपन्‍यास, कथा, कविता, आलोचना, समालोचनादि सभकेँ अलग-अलग दलित साहित्‍यक खानामे राखि देल जाए? (घ) उच्‍च वर्गक रचनाकार द्वारा दलित चिन्‍तनकेँ दलित विमर्शमे राखल जाए? (ङ) उच्‍च वर्ग द्वारा लिखित साहित्‍यकेँ दलित साहित्‍यमे कोनो स्‍थान नहि देल जाए? (च) उच्‍च जातिकजे दलित पात्र छैथ, हुनकासँ सम्‍बद्ध साहित्यकेँ दलित साहित्‍यमे राखल जाए अथवा नहि? ऐ तरहेँ दलित साहित्‍यकेँ आन साहित्‍यसँ फुटकेबाक लेल अनेक विवादित विमर्श उपस्‍थित भऽ सकैत अछि। ओना एकटा विद्वान दलित विमर्शक मादे किछु नामक अनुशंशा केला अछि जे निम्नवत अछि[1]- “विलट पाससान विहंगम, डॉ. बुचरू पासवान, डॉ. महेन्‍द्र नारायण राम, डॉ. फूलो पासवान, डॉ. तारानन्‍द वियोगी, डॉ. सुभाष चन्‍द्र यादव, डॉ. सत्‍य नारायण मेहता, डॉ. राजाराम प्रसाद, डॉ. लालपरी देवी, डॉ. अमोल राय,डॉ. रविन्‍द्र कुमार चौधरी, डॉ. जयनारायण यादव, डॉ. अशोक कुमार मेहता, डॉ. मेघन प्रसाद, डॉ. देव नारायण साह,डॉ. राम सेवक सिंह, श्रीमती विभा रानी, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री उमेश मण्‍डल, श्री राजदेव मण्डल, डॉ. भुवनेश्‍वर गुरमैता, श्री राम भरोस कापड़ि भ्रमर, डॉ. रामावतार यादव, डॉ. अभय कुमार, सुश्री मंजू कुमारी, डॉ. ओम प्रकाश भारती, श्री कपिलेश्‍वर यादव, श्री विरेन्‍द्र कुमार यादव, श्री मोहन यादव, श्री नन्‍द विलास राय, श्री कपिलेश्‍वर राउत, श्री उमेश पासवान, श्री रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’, श्री राम प्रवेश मण्‍डल, श्री संजय कुमार मण्‍डल, श्री अच्‍छेलाल शास्‍त्री, श्री राम विलास साहु, श्री बलराम साह, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री मिथिलेश मण्‍डल, श्री सुधीर कुमार ‘सुमन’ श्रीमती मुन्नी कामत, श्री ललन कुमार कामत, श्री फागु लाल साहु, श्री उपेन्‍द्र प्रसाद यादव।” किछु रचनाकारक नाओं ओ रचना निम्नवत्‍ अछि जे हमरा विचारे दलित विमर्शक सूची प्रस्‍तुत केनिहार समीक्षकेँ नजैरपर जनु नहि पड़लैन अछि। हमरा बुझने ऐ कोटिमे घनेरो कवि-कथाकार छैथ, जइमे किछु निम्नवत्‍ अछि- (1) सर्वश्री विभूति आनन्‍दक- ‘स्‍वाद’, ‘जानवर’, ‘काठ’ आ ‘खुल्‍ला’ कथा।[2] (2) अनमोल झाक- ‘चेतना’, कुमार मनोज काश्‍यपक- ‘जरल पेट’, ‘जीतक आगू’, डॉ. शम्‍भु कुमार सिंह रचित-‘जेठ’ आ ‘पूस’, ‘गरमी’ आदि।[3] (3) मनोज कुमार कर्ण ‘मुन्नाजी’क कथा- ‘रिलिफ’, ‘आरक्षित’, ‘काँट’ आदि।[4] ललितक ‘पृथ्‍वीपुत्र’, धूमकेतुक ‘मोड़पर’, रामानन्‍द रेणुक- ‘दूध-फूल’, धीरेश्‍वर धीरेन्‍द्रक- ‘कादो ओ कोयला’,‘ठुमकि बहू कमला’, मनिपद्मक उपन्‍यास- ‘राजा सलहेस’, ‘नैका बनिजारा’, कथा- ‘फूटपाथ’, लिलि रे रचित-‘पटाक्षेप’, विद्यानाथ झा विदितक- ‘विप्‍लवी बेसरा’, ‘कौसिलिया’, गजेन्‍द्र ठाकुरक- ‘सहस्‍त्र शीर्षा’ आदि-आदि। आइ सभसँ पैघ प्रश्‍न अछि, साहित्‍यकेँ फुटकबैबला राजा प्रधानमंत्री वा मुख्‍यमंत्री तथा हुनक मन्‍त्री मण्‍डलक सदस्‍य किनका मानल जाएत। हम जे कही ओ अहाँ मानि लेब? आकि अहाँ जे कहब ओ हम मानि लेब? नहि..! हमर मैथिली भाषा आ साहित्‍य अखनो अल्‍प विकसित अछि। साहित्‍यक विकास हेतु संसाधनक धोर संकट अछि। मुट्ठी भरि लोक अपन कैंचा-कौड़ी जोड़िया-जोड़िया किछु पोथीक प्रकाशन करबा रहल छैथ। प्रकाशक रूपैआ लऽ कऽ पोथी तँ प्रकाशित कऽ दइ छथिन मुदा पोथीक प्रचार-प्रसार आ बिक्री केन्‍द्र आदिक असुविधासँ अथवा अपन भाषाक पोथी खरीदबाक अरूचिक कारणे हमर मैथिली सर्वव्‍यापी नहि भऽ पाबि रहल अछि। संगे-संग ऐ आलेखक माध्‍यमसँ ईहो आग्रह करए चाहै छी जे जइ बेकती वा समूह द्वारा मैथिली साहित्‍यक सेवा आकि विकासक कार्य भऽ रहल हो हुनका सम्‍मान देल जाए, हुनका सहयोग कएल जाए। साहित्‍य सबहक सम्‍पैत छिऐ। साहित्‍यकेँ बेकती-विशेष, वर्ग विशेष आकि जाति विशेष वा समुदाय विशेषक बीच विभक्त नहि कएल जाए।◌ जय मिथिला- जय मैथिली। ________________________________________ [1] मैथिलीक दलित साहित्‍यकार, आलेख- ‘सम्‍प्रति’ दलित साहित्‍यकारक सूची- डॉ. शिव कुमार यादव, सम्‍प्रति अध्‍यक्ष मैथिली विभाग, मारवाड़ी कौलेज, भागलपुर। यू.जी.सी. संपोषित संगोष्ठीमे पठित आलेखक संचयन- पृ. १६६-१७० [2] कथा संग्रह- काठ (विभूति आनन्‍द) [3] विदेह विहनि कथा संग्रह- श्रुति प्रकाशन दिल्‍लीसँ प्रकाशित। पृष्‍ठ- 82, 83, 105 [4] विहनि कथा संग्रह- ‘प्रतीक’ (मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी) पृष्‍ठ- 60, 45, 39 ओम प्रकाश झा विहनि कथा- विछोहक नोर पछिला साल कोचिंग करै लेल बेटीक नाम कोटामे लिखौने छलौं। जखन ओकरा कोटामे छोड़ि क' आबैत रही तखन ओ बड्ड उदास छल। ओकरा बुझेलियै जे हम नियमित रूप सँ आबि भेंट करैत रहबै। मुदा नौकरीक झमेलामे फुरसति नै भेंटल आ हम कहियो नै जा सकलौं। साल पूरा भेला पर ओ डेढ़ मासक छुट्टी पर गाम आएल छल। ऐ बेर ओकरा कोटा छोड़ै लेल फेर हमहीं गेलियै। ओकरा छोड़लाक उपरान्त जखन वापसीक ट्रेन पकड़बा लेल हम टीसन आबैत रही तखन ओ कातर दृष्टिसँ हमरा दिस ताकि रहल छल एकदम चुपचाप। हमहुँ ओकरासँ नजरि चोरेने औटोमे बैसि गेलौं। ओ हमरा गोर लागलक आ बेछोह कानय लागल। हमर आँखिमे सेहो जेना मेघ उमड़ि गेल मुदा ओइ मेघकेँ रोकैत ओकरा बूझबय लागलौं। रामायणक चौपाई मोन पड़ि गेल:- लोचन जल रहे लोचन कोना जैसे रहे कृपण घर सोना। खैर टीसन आबि ट्रेनमे बैसि गेलौं। जखने ट्रेन टीसनसँ घुसकल तखने ओकर कातर नजरि मोन पड़ि गेल आ लागल जे करेज फाटि जायत। नोरक मेघ ऐ बेर नै मानलक। हम सहयात्री सबसँ नजरि चोरबैत ट्रेनक बाथरूममे ढुकि गेलौं । बाथरूमक भीतर हमर मेघ बान्ह तोड़ि देलक आ हम पुक्की पारि क' कानय लागलौं। विछोहक नोर आवाजक संग पूर्ण गतिसँ बहय लागल मुदा हमर क्रन्दन ट्रेनक धड़धड़ीक आवाजमे विलीन भ' गेल। राजदेव मण्‍डल बीहैन कथा- भितरिया चोट चाहक दोकान लग किछु लोक ठाढ़ छल आ किछु बैसल छल। गप्‍पक छरक्का छुटि रहल छेलइ। विषय छेलै- आइ-काल्‍हिक लोक सभटा काज स्‍वार्थेक कारण करै छइ। मुदा हम ऐ बातपर अड़ल छेलौं जे किछु काज लोक ओहनो करैत अछि जइमे कोनो स्‍वार्थ नइ रहै छइ। जइ काजकेँ ‘उपकार’ कहल जाइ छइ। एम.एल.ए.क चुनाउ होइबला छेलइ। चुनाउक समैमे तँ पुलिसकेँ जेना पाँखि लगले रहै छइ। तखैने ओइठाम एकटा पुलिसिया गाड़ी रूकल। रूकल नहि बल्‍कि रोकए पड़लै। कारण छेलै, एकटा साइकिल सड़केपर ठाढ़ छेलै आ साइकिलबला केतौ चलि गेल छल। एकटा सिपाही गाड़ीसँ उतैरते बाजल- “केकर साइकिल छियौ रौ? साहैबक गाड़ी रूकल छइ। हटेबें जल्‍दी आकि देखबीही।” मुदा कियो साइकिल हटेबाक लेल नहि आएल। सिपाही पूरा तमसा गेल छल। ओकर रौद्र रूप देख हम जेना भीतरसँ डेरा गेल रहौं। हम तेजीसँ गेलौं आ साइकिलकेँ हटबए लगलौं। कमजोर रहने कनी अस्‍थिरसँ हटबै छेलौं। डरेबर बारम्‍बार हॉर्न बजा रहल छेलइ। सिपाही डण्‍टासँ हमरा पजरामे गोंजी मारैत बाजल- “तोहर खतियानी रोड छियौ। टेर मारैत केना चलैए! देखै नइ छै जे साहैबकेँ लेट होइ छइ!” हड़बड़ाइत आगू बढ़लौं कि रोडक कातमे साइकिल नेने खसि पड़लौं। चाहक दोकानपर लोक ठिठिया कऽ हँसि देलक। पुलिसिया गाड़ी हॉर्न दैत चलि गेल। एक गोरे टिटकारी मारैत बाजल- “की यौ उपकारीजी, की भेल?” डण्‍टासँ तँ कमे चोट लगल छल मुदा ‘की यौ उपकारीजी’ सुनिते भितरिया चोट जेना कुहरा देलक। लोक दिस तकलौं तँ लगल जेना नँगटे ठाढ़ छी। लाजे मुड़ी गोंतने विदा भऽ गेलौं।◌ बीहैन कथा- छोटकू दोस कृष्‍णाष्‍ठीक मेला लगल छल। दू-तीनटा संगीक संगे मेलाक गेट दिस ठाढ़ छेलौं। कृष्‍ण-सुदामाक मित्रतापर चरचा भऽ रहल छल। एकटा संगी बाजल- “देखियो जे कृष्‍ण आ सुदामाक दोस्‍ती। एगो राजा आ दोसर रंक। दुनूक दोस्‍ती एकटा ऐतिहासिक उदाहरण बनल अछि ऐ जुगमे एहेन दोस्‍ती संभव भऽ सकै छइ।” दोसर संगी बाजल- “नहि यौ, दोस्‍ती बरबैरमे होइ छै, तबे निमाहलो जाइ छै, नहि तँ ओ टुटि जाइए।” हमरा बाजए पड़ल- “केना नहि भऽ सकै छइ। हमर बाबूजी आ जगाधर बाबू दुनूमे केना दोस्‍ती छइ। जगाधर बाबूक परिवारमे तीन-तीनटा इन्‍जीनियर छैन आ हमर बाबू बिलकुल गरीब, तैयो हमरा बाबूसँ हुनक परेम देखियौ।” तखैने बगलमे एकटा कार रूकल। गजाधर बाबूक संगे एकटा ऑफिसर कारसँ उतरल। हम गजाधर बाबूकेँ देखते पएर छुबि प्रणाम केलिऐन। गजाधर बाबू बजला- “की रौ बाबू ठीक छौ ने?” कहलयैन- “जी ठीके छथिन।” गजाधर बाबू सँगे आगू बढ़ैत ऑफिसर पुछलकैन- “के छी ई बालक? संस्‍कारी बुझाइत अछि..!” मुँह घोंकचबैत गजाधर बाबू बजला- “धुर, छोड़ू ने। एकटा छोटकू दोसक बेटा छी।” गप करैत दुनू गोरे आगू बढ़ि गेला। गपकेँ झाँपैले हम किछु बाजए चाहलौं कि बिच्‍चेमे एकटा संगी चद-दे कहि देलक- “चुप रहू यौ छोटकू दोसक बेटा।” हमर बोलती बन्न भऽ गेल छल।◌ सुकेश साहनी (प्रख्यात हिन्दी लघुकथाकार श्री सुकेश साहनीक चर्चित आ पुरस्कृत लघुकथा "ठंढी रजाइ" क मैथिली रूपान्तरण- मुन्ना जी द्वारा) बीहनि कथा- ठ'रल सीरक " के छल ?" ओ आगि दिस हाथ पसारि तपैत पुछलक . " वएह. सोझाँ बालीक ओतए सँ , " कनिञाँ चिढ़ैत सुशीलाक नकल उतारलक. " बहीन, तुराय दीयय, हुनकर संगी एलनि हें ." फेर सीरक ओढति बडबडएल. " हिनका सब दिन सीरक मँगैत लाज नै होइ छनि ! हम त' साफ मना क' देलियै, कहि देलियै-" आइ हमरो ओत' कोइ अबै बला ऐछ." " नीक केलौं " ओहो सीरक मे नुकाइत बाजल ," ओकरा सबहक इएह इलाज ऐछ . " " बहुत ठंढी ऐछ !" ओ बड़बडएल . " हमर अपने हाथ - पएर सुन्न भेल जा रहल ऐछ.कनिञाँ अपन खटिया के धधकैत आगि ल'ग घीचैत बाजल." " सीरक त' जेना पुरे बर्फ भ' रहल ऐछ, नीन्न आओत कोना !" ओ करोट फेरैत बाजल. " नीन्न के त' जेना कोनो पते नै ऐछ." ऐ सरदी मे भरल सीरक सेहो बेअसर सन भ' गेल ऐछ." " एक बात कहू, खराप नै मानब ?" घ'रबला कहलक. " केहेन गप्प करै छी ?" " आइ खुब ठंढी छै , सोझाँ बला के ओतए कुटुमो आयल छै, तेहेन मे सीरक बिना बेशी कष्ट होइत हेतै." " हँ त',!" ओ आस लगा घ'रबला दिस तकलक . " हम सोइच रहल रही...हमर..मतलब इ छल जे..अपना ओतए एक टा सीरक त' फाजिले पड़ल ऐछ." " अहाँ त' हमर मोनक बात कहि देलौं, एक दिन ओढला सँ सीरक पतरा थोड़े ने जेतै, ओ चमकि के ठाढ़ भ' गेल, हम एखने सुशीला के सीरक द' के अबै छीयै." जहन ओ सुशीला के सीरक द' घुरल त' हरान छल ओ ओही ठ'रल सीरक मे निसभेड़ भ' सुतल छल. " ओहो अपन सीरक मे आबि घोसिया गेल. ओकरा सुखद आश्चर्य भेलै , सीरक खुब गरमएल छलै. मुन्ना जी बीहनि कथा- विधान -- तों एना धौना किए खसेने छें गै, जो ने झंडा ल' के सब धीया पुता खुशी मनबै छै. -- कथी के खुशी यौ ? -- आइये के दिन देशक अपन विधान ( संविधान ) बनल रहै. -- उँह....! भइया लेल , हमरा लेल थोडे ने ? -- इह , छओंड़ी मुँह केना तुरूच्छ जकाँ केने ऐछ ! -- गै मम्मी, तों त' नहिये बाज, भइया के बड़का झंडा आ हमरा छोटकी सन ! " माने दुनू भए- बहीन लेल फराक विधान , नै ?" -- गै बुच्ची ,एना किए घाठि फेनै छें गै ? -- यौ पप्पा, साँझ खन मम्मी के कहलियै-' डोलकी ला दुध आइन दै छीयौ .' कहलक -' बताहि भेलें हँ , मुनहारि साँझ के जुआन- जबान छओंड़ी जेतै दोसरा बस्ती , भइया के कही अनतौ दुध .' -- " ठीके बात गै, स्त्री एखनो पुरूषक चांगुरक शिकार भ' जाइए ". --" माने एखनो बेटे के नामक पतक्खा फहराइए देश मे, बेटी पछुआ.....! " बीहनि कथा- फसाद ! -- पप्पा, बेर उनहल जाइ छै, मुर्तिक भसाओन मे कखन जेबै ? -- थमहू ने, देखै नै छीयै नमाज पढ़ै बला सब सगरो के बाट छेकि रखने छै. -- त' भसाओन आइ नै हेतै ? -- यौ, भागू...भागू ! घर पैसू. -- कीए पप्पा , की भेलै ? -- फस़ाद ! -- फस़ाद की होइ छै ? --" नेता सब के दोसराक चुल्हि पर अपन रोटी पकएब. " बीहनि कथा- निवहता -- धौर, तहन सँ एकरा सबहक खुशामद क' अपस्याँत छी, कोइ टेरबे नै करैए. -- कथी मे अपस्याँत छी यै ? -- तील बहमे ? के रीत निमाहै लए. -- झुट्ठे अपस्याँत छी, आब की पहिलका जकाँ पुत सब बैसल रहै छै घर मे मए बापक निवहता लए. -- से त' छै, मोन त' पतिया लेब. -- जे धीया - पुता, तील - चाउर खाय मे घैहर कटबैए ओकरा सँ तील बहबाक मनोरथ रखै छी ? --" हमरा नै खुएब तील- चाउर ?" -- अहाँ के हमर निवहता लए त' हमर मए- बाप , तिलाञ्जलि द' जनम भरिक गेंठजड़बा क' देलनि. " हम अहाँ त' बिना तिल- चाउर खेनहु, एक दोसराक जिनगी भरि निमाहति रहब." बीहनि कथा- हुव्वा -- यौ , देखै छी जे सगरो लोक नव वर्षक अवैया मे उत्साहित ऐछ . पुरना के बिसरि जेतै की ? -- अहाँ बिसैर गेलियै ? -- हिया के कीया मे बन्न कतौ बहरए ! -- तहन पुरने के हुव्वा पर नवका पोषेतै ने ! जवाहर लाल कश्यप बीहनि कथा- कुक्कुर कार के पिछला सीट पर बैसल कुक्कुर, गरदनि उठेने दूनु कात ताकि रहल अछि आदमी दिस | नहिं ताकि रहल अछि पाछां जतय आओर कुक्कुर सब दौर रहल अछि कार के संगे , भुकैत एक दोसर क पछुआबैत । गाड़ी रुकल सब रुकि गेल । एकटा आदमी ओहि मे स पॉलीथिन मे किछु समान लेने उतरल, अप्पन कुक्कुर के बाहर निकाललक । ताबैत सब कुक्कुर आबि गेल छल । सब कुक्कुर के बीच ओकर चालि जेना ओ सिंह हो आ बाकि सब गीडर । आदमी आ कुक्कुर संगे-संगे आ बांकी कुक्कुर पाछा-पाछा। समुद्र कात तक गेल । ओतय ओ आदमी अप्पन पॉलिथीन मे स माँसक बुट्टी नीकलि फेक देलक सब कुक्कुर झाऊ-झाऊ क लुझय लागल । ओ आदमी संगे कुक्कुर वापस आबि गेल । कुक्कुर के चाली मे एकटा अजीब गौरब छल ओकरा ई नहीं पता छलै जे हम्मर किछु नहीं अछि , जे अछि से हम्मर मालिक के , कुक्कुर संगे चलैत ओहि आदमी क सेहो नहिं पता छल हम्मर किछु नहि अछि...... अब्दुर रज्जाक, हाल दोहा कतार बिहैन कथा मोतिया आ जहिर दुनु बापुते मोहरम के बाद चलल परदेश कऽ। कि करतै अतेटा भरल समाज मे निक बेजाए काजला ऐच पैच लाऽसे हो दिकते अछी अहिलेल कि ओ गरिब छैथ । पर ह मोतिया इमन्दार जरुर छैथ कि आइ तक लेनि देनि लेल चौक पऽ अहि समाज मे बैस्ला पचिश बरख भऽ कहियो कोइ आङुर नै देखोलक । गाम सऽ निकलैत किछहे अगा जनकपुर पहुचल । बहुत दिनक बाद जहीर बाप सङे आइ शहर पहुँचल छैथ ।किछ खेबाक इरादा अछी जहीर के लगे मे नस्ताक होटल देखाइ देलक । " बाबू कनि किछ खेबहो" " रे का खेबहो कनि पुछ्हो अन्डा उस्नाहुवा कित्ना मे देत है " " ह बाबु चुरा भुजा हुवा हेबे है अहि जोरे खालेबै चल त पुछै छियै" दोकान के लग मे जाऽक दुनु बाप बेटा खरा भेल "हे सुनै छ्हो साउ जि तोहरे कहै छियो उस्नाहुवा अण्डा कैसे देतहो" "एकटा के ३० रुपैया कैटा लेबहो?" बाबू दिस ताकैत जहीर कहलक "बाबू लेलु दुटा" "ने बेटा बडा महगा कहत है छोरदा अगिला स्टेशन पऽ देखत है" रेल खुजल जाएत रहे दुनु बाप बेटा जब स्टेशन पऽ जलदी मे टिकट लैत चैल गेल परदेश ।दिन ह्प्ता महिना बितैत देरि नै लागल ।दुनु बाप बेटा परदेश सऽ फेर लौट्ल फेर स्टेशन के वहि लग बला होटेल लग गेल बेटा कह्ल्क बाप सऽ "उसना हुआ अन्डा ललुबाबु" "ह लेला" " नए बाबू उ त कहतै ३०रुपैया एकटा के बहुत मह्गा ने भेलै?" "ना है महगा लेला चार पाँच " "पहिने तुहि कहने रहो से बडा महङा है?" "रे बात नै बुझलही पहले परदेश जाए बेरमे पैसा कहाँ रहा रहि उतना अभि पैसा है त सस्ते है ना " बृषेश चन्द्र लाल बुद्धिचौ टोलक अग्रज राम बहादुर हमर बनैत घरक निरीक्षण करैत बजलाह ‘घर बनवैत छह तँ आब तोरा बुधि अएतह ! बिना सोच आ विश्लेषणकेँ, तकरबाद निष्कर्षकेँ आ तखन फेर योजना, साधनक सङ्गोर, समन्वय आ कार्यान्वयनकेँ घर नइ बनैत छैक !! छोट गड़बड़ी सभ किछु गड़बड़ करिते जाइत छैक । कोन काज पहिने आ फेर कोन तकरबाद सेहो घोरिएक’ सोचय पड़ैत छैक । नइ तँ नोक्साने परिणाम ! .... बुद्धिबङ्गारा (बद्धिचौ) निकललह ?...” हम कहलिअन्हि – “ भाईजी निकलएकाल ततेक ने फारए जे डाक्टरलग जाए पड़ल । प्रवीणमा जड़िसँ उखारि देलक !” रामदाई जोड़सँ हँसि देलाह –“ जा ... ! जनमए दितैक । सभ गड़बड़ा गेल !!” आब दोसर प्रसंग । बीएमे अंग्रेजीमें एकटा शिर्षक रहैक – The speed of life । ओहिमे एक गोट विश्व प्रसिद्ध व्यापारी अपन पीड़ाक वर्णन कएने रहथि जे कोना जीवनक गति बढ़ल जारहल छैक आ ओ दौगए नहि सकिरहल छथि । आरकेसर बड्ड नीक पढ़बथिन्ह। पूरा कोशिश कएलन्हि हमरापर किंचित बेशीए ध्यान ’क’जे ई बुझि लेअओ । हुनका कदाचित् बुझल रहन्हि जे एकरा बुद्धचौ जनमल नइ छैक । मुदा, हम बूझि नइ सकलिऐक । बुद्धचौ जनमल रहैत तखन ने ! आब तेसर प्रसंग । अधिकांस मित्रसभक speed बड्ड तेज ! फेर त्वरण (acceleration) अकल्पनीय !! ठकमुड़िया लागि जाइत अछि। हमरासभ पकड़ए नहि सकैत छी । आकांक्षा फेर एतेक जे चिरईक नेना जकाँ पहिनहिं प्रयासमे आकाशे नापि ली । केओ आ किछु नीक लगिते नइ छन्हि । हरेक ठाम एकहिं बेर परिवर्त्तन चाहैत छथि । बिनु प्रयासेक परिणाम गनैत छथि । क्रान्तिकारी परिवर्त्तन! कोनो व्यक्ति, कोनो निर्णय अथवा कोनो प्रयास वा ताहिमे झाँपल रणनीतिकेँ खोजक-बूझक समयक आभाव छन्हि ! ककरो सोझे धराधर अपन वाणसँ मुहँ कोंचकएहेतु वाणसँ भरल मिसाइलसभ दागि दैत छथिन्ह ! पता नइ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्फ भीतरसँ केहन छथि ? मुदा, लगैत अछि, भीतरसँ जे होथि आमविश्वक नाड़ी पकड़ि नेने छलाह । हुनकर जमल बुद्धचौ निश्चिते गड़ल छल जे विजयश्री देलकन्हि । मुदा, समय तँ अकल्पनीय त्वरित अछि । फेर सभकिछु बदलि गेलैक । फ्रान्समे ट्रम्फक बड़बोलापनक विपरित युवा इमैनुएल मैक्रों राष्ट्रपति भेलाह अछि । बूझब कठीन ! चल मन भजन करह !! बुद्धिचौ जे नहि अछि !!! मिथिलेश कुमार सिन्हा बीहनि कथा- चुप्पी ओ'अपन बहिन'क ओत' आएल छलीह. हमर घर आ ओकर बहिन'क सासुर एकहि ठाम अगल-बगल मे छल. हम स्नातक'क फाईनल परीक्षा द' गाम आएल छलहुँ. हमर खान-पीन ओकरे बहनोई , जे हमर जिगरी दोस्त छैथि, हुनके ओहिठाम होईत छल. दोस'क साढि, तं स्वाभाविके छै....किछु हंसी-मजाक होइते छलै. 'ओ' लगभग मास दिन रहलीह..कहिया हमरा दुनू केर बीच प्रेम'क बीज अंकुरित भेल, नहि कही ? समय बीतलोपरान्त ओकर जेठ भाय ओकरा ल' जबाक वास्ते आवि गेलैथ. मोन भकदन क' गेल.... हमहुँ कहलहुँ जे हमरो दडिभंगा तक जेबाक अहि चलू हम ओत' धरि साथ रहब, किछु काज अहि क' वापस आबि जाएब ! बस सं विदा भेलहुँ. किछु आगू चलि क' एकटा चौक पर बस'क डरेभर,कंडक्टर, खलासी आ आन यात्री सभ चाय-नाश्ता कर' लेल उतरि गेलाह संगहि ओकर भाय सेहो उतरि गेलाह. हम बसे मे.... किछु क्षण मौन रहलाक उपरांत हम ओकर सीट लग आवि पुछलिये : "की, चलिए जेबै ?"' ओ' मौन.... "हम मोन आएब की नहि ?" फेनो चुप..... ओ' हमरा दीस नोर सं भरल आँखि सं देखलिह.... ओहि काल हमरा दुनू के कोनो होश नहि छल की केओ आनो देख-सुनि रहल छै....ओ सभ की सोंचैत हेतैक ? प्रेम'क आवेग मे मोन आंधर भ'जाएत छै ने ! सैह आब बूझि पड़ल. "आब कहिया भेंट हाएत ?" ओकर आंखि टूभ-टूभ लाल....ओढनी सं आंखि'क पोर पोछैत एतवे बजलिह, "जे मोन होइए, भैया सं कहि दियौ ने...?" ताबैं बस'क खलासी सभ यात्री कें बस मे बैस' लेल हल्ला कर' लागल. हमर मोन'क बात मोने रहि गेल, किछु बाजि नहि पौलहुं..... पन्द्रह'म वर्ष'क उपरांत, हमरा एक विवाह समारोह मे शामिल होव' केर मौका भेंटल. एकसरे छलहुँ. मोन भेल किछु पानीपूड़ी'क आनंद ली. बढि गेलहुं ओहि काउंटर लग. भीड़ मे घूसू कोना...? 'गर खोजैते रही कि आवाज आएल, "की हाल,कखन औलहुं ?" चौंकि पुछलियैह "के...?" "हम.... हमहूं त' अहां के नहि चिन्हलहुं, उ त' भौजी कहलथिन्ह कि अंही छियै ! इ दाढी मे चिनहिये मे ने अबैत छी.... एहि मे अखैन धरि स्मार्ट लागैत छी !" एक्के सांस मे बाजि गेलीह. "ओहहो अहां.... हमहूं नहि चिन्ह पौवलहुं, आब त' अहूं मे परिवर्तन आबि गेलैए....'' हम बजलियै. "मोन छी ने ?" ओ' पुछलकै. "एह.... एहो विसर' वाला छै ?" "हां, अपनेक ओ बस'क चुप्पी आई धरि मोन मे सूईया सन चूभि रहल यै...." "अहां अपन वियाह सं खुश छी ने ?" हम एहि मुद्दा सं फराक होम' लेल पुछलियैह. "हां,तन सं तं खुब्भे, मोन सं त' नहिए ने ....!" बाजि, अपन नोर पोछैत फुर्र भ' गेलिह. मोन में हथौड़ा'क चोट सन लागल.... कंठ सूख' लागल.... पानि पर पानि गटागट पीवोपरांत मोन शांत नहि भेल. वापस होटल मे आबि, विस्तरा पर धम्म सं खसि पडलहुं. नीन जेना बिला गेलैए टुकुर-टुकर नचैत पंखा कें निर्विकारें घुरि रहल छी. बीहनि कथा- आजादी 'अहाँ कें जन्माष्टमी आओर स्वतंत्रता दिवस केर बधाई' !' पत्नी बजलीह. 'अहूँ के बधाई !' 'ई शुभ दिन खासक' अहीं वास्ते आएल अहि !' जबाब देलथिन्ह. 'किएक, हमरे वास्ते शुभ दिन . . ? हम पुछलियैन्ह. 'से नै बुझलौहुँ ? अहूँ सात बहिन पर एगो छोट भाय.... कृष्ण भेलौहुँ आ कृष्णो सन व्यवहारो अहि.... पेशा सं वकील छी हे, जे स्वतंत्र पेशा अहि.... अहाँ आज़ाद छी !' पत्नी बुझौलीह. हम उसाँस ल' मोने-मोन बजलहुँ,' हं ठीके, कृष्ण त' भेलहुँ मुदा आज़ाद....?' दीवार पर टाँगल अपन विवाह'क फ़ोटो देखि, मुड़ी गोइंत लेलहुँ. बीहनि कथा- माया "हेह, सुनै छियै ?" "----" "सुनू नै !" "की कहै छी ?" "चाय नहि भेंटतै की ?" "थम्हू अखन कनियां के इस्कुल जाय मे बिलंब भ' रहल छैन्ह. हुनकर नाश्ता बना रहल छी. कनेक कृष्णा कें सम्हारियौ नै, कनियां के तंग कैने छै !" किचन सं ठेंसगर जबाब भेंटलैन्हि. "पप्पू केम्हर छै जे कृष्णा के हम सम्हारु ?" ओ बजलाह. "ओ मोटर साईकिल साफ क' रहल छै, कनियां के इस्कुल पहुंचैते ने...!" "बेस, कत' गेलौं यौ कृष्णा बाबूsss...? चलू पोखरि मे माछ देखाबै छी !" चाह'क मोह त्याग उठि कृष्णा केर लगलाह पोल्हाव' ! कनियां,पप्पू संग इस्कुल लेल विदा भ' गेलीह. "हे आबो त' चाय पीया दिय !" "थम्हू अखन, पप्पू लेल नाश्ता बनौबाक अहि, ओकरो ने आफिस जैबाक बेर भ' गेलैए ?" हुनक पत्नी बजलीह. पप्पूओ विदा भ' गेलै अप्पन आफिस ! चाय'क आस मे ओ बेकल छलाह,"आबो चाय भेंटतै की ?" "हां, छानि रहल छी, लाबि रहल छी." पत्नी'क मधूर आवाज भेंटलैन्ह. "लिअ" "एसगरे खाली हमहीं ?" "ई चाह'क बेर छै ?" "लाबू एकटा कप, एकरे मे बांटि लैत छी. कनी हमरो लग बैसू नै! खाली काम, काम....." "देखहीं, एहि उमैर मे...." बजैत-बजैत झेंपि गेलिह. "आहि कहू त'.... हमर अहां जीवन संगनी छीयै, हमरो दीस कखनो धियान दियौ !" ओ कनेक रोमांटिक भ' गेलाह आ हुनक हाथ अपन हाथ मे लैत बजलाह,"हमर त' एकदोसरे मे नै संसार एहि, एक्को बिनु हम अधूरे छी, बांकि सभ माया थीक.... सत्य छै त' हमर एकदोसर केर प्रति समर्पण.... प्रेम....!" "की भ' गेलै यै ई बूढ़वा के ?" पत्नी हंसैत बजलीह," देखियौ त' एहि उमैर मे बहैक गेलखिन यै !" "नहि पप्प मांं, हम बहैक नहि रहलहुं यै. हम एकदोसर सं जखने विमुख भ' जायब तखने बेटा-पूतोहु सभ'क नजरि मे टूअर भ' जाएब, केओ नै भैल्यू देत.... ने बेटा, ने बेटी ,ने पूतोहु, ने आन केओ !" "की पगला जकां बात क' रहल छी , की भ' गेलैए ?" "हमर एकदोसर केर प्रति आकर्षण कतओ हेरा गेलैए, अहां पर सं हमर अधिकार छीना गेलैए.... एकटा चाह'क लेल मजूरी कर' परैए.... की कहु पप्प् मां..... ककरा कहू, हमर ने मां छथिन नै बाबू, अंही सं ने कहबै, हमर सुनवो वास्ते किछु टेम निकलू पप्पू मां...." कहैत-कहैत ओ फफैक-फफैक कान' लागलाह. पत्नी अवाक, कृष्णा अवाक.....!! शिवशंकर, बल्लभगढ़, फरीदाबाद, हरियाणा कंबल उमाकांत बाबू बैंकक अधिकारी छथि, गरीब घरसँ। मुदा श्रीमतीजी पैघ घरक बेटी छथिन्ह। अपने मिथिलाक संस्कृतिक पोषक मुदा श्रीमतीजी विदेशी संस्कृतिक अनुगामी। श्रीमतीजी फैशनेबल, हवामे उड़ए बाली तितली, विदेशी जकाँ ओहिरन पहिरन, जींस पैंट, हाफ शर्ट, हेयर कट, कटिंग, आइ ब्रो, करिक्का चश्मा, फेशियल चेहरा, हील बला चप्पल, टच स्क्रीन मोबाइल, ई थिक श्रीमतीजीक परिभाषा। देशी मुर्गी बिलायती बोल। एहि सभक विपरीप उमाकामत बाबू सिंपल पैंट शर्टमे नजरि आबथि। दूनू गोटेमे आकाश पतालक फर्क। उमाकांत बाबूकेँ एकटा कंबल रहनि. सिंगल बेडक, धरि रहैक नीमन। जे हुनका भाइजी बहुत पहिने देने रहथिन्ह। ओ कंबल बड बेसी पुरान भ' गेल रहै। फाटल नै रहैक परंच आउट आफ फैशन जरूर भ' गेल रहै। हुनका घरमे आर कंबल रहै मुदा ओहिमे खास बात रहै। उमाकांत बाबू आबथि आ छतपर ओकरा सुखाबथि आ कहियो काल खीचथि। ओहि कंबलसँ हुनका बड़ सिनेह रहनि। हमरा मोनमे कतेक बेर जिज्ञासा भेल जे ओहि कंबलमे कोन बात छै। एक दिन हुनकासँ पुछिए देलियनि। ओ अपन कथा बतबए लगलाह...."ई बात ओहि समयक अछि जखन कि बेरोजगारीमे परीक्षा देबए लेल एक शहरसँ दोसर शहर जाइत रही तखन हम एहि कंबलकेँ संगमे लेने जाइ। ई हमर परमानेंट साथी छल। खास क' सर्दीमे ई हमर रक्षा कवच छल। ई खाली कंबल नै हमर अभिन्न अंग अछि। एकर की महत्व अछि से हमरा छोड़ि कियो नै बूझि सकैए। उमाकांत बाबूक छत आ हमर छत सटले अछि। शहरी सेक्टर बला मोहल्लामे जमीनक कमी रहै छै तँइ छत सटब स्वाभाविक। ई बुझाइत अछि जेना बिंल्डिंग सभ आदमीक उपहास करैत हो जे हम अपना कोरामे कतेक परिवारकेँ आश्रय देने छियै। मुदा मनुख हमरा कतेक वर्गमे विभाजित क' देने अछि। फर्स्ट फ्लोर जेठक, सेकेंड फ्लोर मँझिला भाइजीक, थर्ड फ्लोर देवरक, आ ग्रांउड फ्लोर माँ बाबू जीक। कतेक भेद अछि मनुखमे। ओहि कंबलसँ श्रीमतीजीकेँ घिन्न छलै। फैशनक दौरमे ओ कंबल बूढ़ भ' गेल छल। पछुआ गेल छल आ अपन किस्मतपर कानि रहल छल। एहि मायावी संसारमे कत्तौ भुतला गेल छल। ओकर भविष्य गेल छलै। समाज हेय दृष्टिकोणसँ ओहि कंबलकेँ परिभाषित क' देने छल। मनुख अपन इतिहास कतेक जल्दी बिसरि जाइत अछि एकर कल्पना करब कठिन अछि। एहि कंबलसँ मुक्ति पेबाक उपाय श्रीमतीजी कतेक दिनसँ ताकि रहल छलीह। आइ उमाकांत बाबू दू दिन लेल शहरसँ बाहर जा रहल छलाह, ओ घरसँ निकलि चुकल छलाह। कबाड़ी बला गलीमे अवाज लगा रहल छल। श्रीमतीजी लेल सुअवसर छल। ओ ओहि कंबलकेँ बेचि देलखिन। कंबल नहि उमाकांत बाबूक आत्मा आइ घरसँ विदा भ' गेल। कपिलेश्वर राउत चाहबला “बाबू आब चाहक दोकान छोड़ि दियौ। हम सभ भाँइ आब कमाए-खटाए लगलौं। आब अहाँक उमेरो पचपन-साठि भेल। सभ दिन कि काम-धन्‍धा करिते रहब।” “बौआ कहलह तँ बड़ नीक बात, मुदा चाहे दोकानक बदौलत तूँ सभ मनुख बनलह आ आइ शहर जा रूपैआ-पैसा देखै छहक। हम तँ कौहुना अपन रोजगारमे लागल रहै छी। देहकेँ धुनि गुजर-बसर करै छी। कमाएल-खटाएल देह अछि, जेतेक शरीरकेँ चलाएब-फिराएब तेतेक ने देहक खून चालू रहत आ अपनो दुरुस्‍त रहब। तूँ सभ तँ हमरा काहिल बनबैक बात कहै छह। जाबत धरि पैरुख अछि ताबत धरि हम कमेबे-खटेबे करबह। रफिक मियाँकेँ नहि देखलहक, पाँचटा बेटा छै, पाँचो कमासुत, वेचाराकेँ सभ काम-धन्‍धा छोड़ा देलक। काज छुटिते वेचरा लोथ भऽ कऽ मरि गेल। नोकरियोबला केँ तहिना होइ छइ। जहाँ ने कि काजसँ रिटायरमेन्‍ट भेटल कि वेचारा अपनाकेँ कोनो जोकरक नहि बुझऽ लागल। जिबाक बीस बर्ख तँ जीबत पाँच बर्ख। मने झूस भऽ जाइ छइ।” सुखल नून, एकटा मोटगर रोटी आ एक लोटा पानि नेने रमाकान्‍त बाबू बालेसरकेँ पनपियाइ लऽ कऽ गेल छल। आरिपर ठाढ़ भऽ कऽ जोरसँ बजला- “रौ बाले, पनपियाइ कऽ जो।” बालेसर आसा-बाटीमे रहबे करए। झट-दे बरद ठाढ़ कऽ आरिपर आबि, हाथ मुँह धो जलखै करए लागल। भूखलमे जहिना गुल्‍लैरो मीठ होइ छै तहिना बालेसर हाँइ-हाँइ पाँचे-सात कौरमे रोटी खा गेल आ एक्के नीशामे भरि लोटा पानि सेहो पीब गेल। मुदा आरो पानि पीबैक इच्‍छा रहइ। तैबीच रमाकान्‍त बाबूसँ बालेसर कहलकैन- “मालिक थोड़ेक कालक बाद एक लोटा पानि लऽ कऽ आएब।” रामाकान्‍त बाबू किएक पानि लऽ कऽ जेता! पानि लऽ नहि गेला। चैत-बैशाखक कर-करौआ रौद, तैपर पछिया हवा चलि रहल छल। एहेन समयमे बालेसर गहुमक खेतकेँ जोति रहल छल। पानिक आशा-बाटी तकैत रहल। मुदा जखन मालिक पानि लऽ कऽ नहि गेलैन तँ खिसिया कऽ हर खोलि देलक। हर-बरद नेने घरपर पहुँच, बरदकेँ खुट्टापर बान्‍हि हरकेँ गठुल्‍लामे राखि अघोर मने बालेसर अपना घरपर आबि गेल। थोड़ेक सुसतेलाक बाद भरि इच्‍छा पानि पीलक, तहन मन कनी शान्‍त भेलइ। मुदा मनमे तेसरे तरहक उड़ी-बिड़ी धऽ लेलकै। रमाकान्‍त बाबूक परिवार गामक भगिनमान। सभतूर पढ़ल-लिखल। रमाकान्‍त बाबूक पीत्ती दरभंगा महराजक ओइठाम नोकरी करैत, कियो दिवान तँ कियो पटबारी। रमाकान्‍त बाबू अपने सात भैयारी, सातो भाँइमे दू भाँइ गामपर रहैत छला बाँकी पाँचो भाँइ कियो सरकारी नोकरी तँ कियो प्राइवेट नोकरी करैत। रमाकान्‍त बाबूक मझिला भाए- विनोद आ अपने गामक खेती-बाड़ीक काज देखैत छला। ऊपरसँ निच्‍चाँ परिवारक सभतूर धूर्त नम्‍बर एक, जालफरेबी नम्‍बर एक। कियो सोनाक कंगना लऽ कऽ नदीक कछेरमे बैसल तँ कियो बहुरूपिया रूप धऽ कऽ अपन उल्‍लू सोझ करैत। सिरिफ छोटका भाए जेहने नाम विनोद तेहने काम विनम्र। बालेसरक पिताक नाओं रामकिसुन। रामकिसुन अपना जातिक मैनजन छल। शरीर एकदम हट्टा-कट्ठा रहै रामकिसुनक। रहबो किए ने करितै अखड़ाहा परक खेलेलहा देह रहै किने। अपना जवानीमे रमाकान्‍त बाबूक अमलदारीसँ पूर्व हुनके परिवारमे हरवाहि करैत छल। पछाइत जखन रामकिसुन हरबाहि छोड़ि देलक तहन बेटा पकैड़ लेलकै, माने बालेसर हरबाहि करए लागल। आइ बालेसर जखन तबधल मने घरपर आएल तँ मनमे एकटा संकल्‍प केलक। संकल्‍प ई जे आब अनकर हरबाहि नहि करब। अपन रोजगार करब। अपन काज करब। बिहान भने रमाकान्‍त बाबू जखन हरबाहि लेल बालेसरकेँ कहलखिन तँ ओ साफ-साफ कहि देलकैन- “आब हम हरबाहि नइ करब। आ ने अहाँक ओइठाम कोनो आने काज करब।” रमाकान्‍त बाबू पुछलखिन- “किए ने हरबाहि करमे? आ हमर जे कर्जा-बर्जा अछि से पहिने दऽ दे। बापे तेतेक खेने छौ से कहल ने जाए।” बालेसर ने आव देखलक आ ताव, तर-दे बाजल- “हिसाब कऽ लिअ।” “ठीक छै, घरपर आ हिसाब कऽ ले।” ई कहैत रमाकान्‍त बाबू अपना घरपर चलि गेला। ऐ घटनाकेँ आइ मास-दू-मास बीति गेल। तैबीच रूपौलीमे कोनो महतोक घरमे डकैती भेलइ। डकैत घरवारीकेँ मारबो-पीटबो केलकै आ लाखो रूपैआक समान सेहो लूटलकै। रमाकान्‍त बाबू जालफरेबी लोक तँ छथिए। ब्‍लॉकक प्रमुख सेहो छैथ। दरोगासँ मिल कऽ बालेसरक पिताकेँ डकैती केसमे फँसा देलक। रामकिसुनक घरपर पुलिस सभ दौर-बरहा करए लगल। आब रामकिसुन बोन-झाड़मे नुकाएल फिरए। घरक सभ समांग सबहक मुँहपर फुफरी उड़ए लगलै। अन्‍तमे रामकिसुन रमाकान्‍त बाबूक पएर-दाढ़ी पकैड़ केससँ उबारैक आग्रह-बात करए लगल। बालेसरो हारल नटुआ जकाँ फेर रमाकान्‍त बाबूक हरबाहि करए लगल। ओही समयमे पाहीपट्टीक एकटा मालिकक जमीन छेलइ। जइ जमीनक सटले रामकिसुनक घर सेहो छेलइ। ओ पाँचो बीघा जमीन मालिक बेचैक सूरसार करए लगला। रमाकान्‍त बाबू पाँचो बीघाक गप कऽ लेलैन। लिखबै बेरमे रमाकान्‍त बाबू ओइ पाँच बीघाक अलाबे रामकिसुनक जे पाँच कट्ठा जमीन सहित घराड़ी छेलै तेकरो खाता-खेसरा आ रकबा चढ़ा लेलैन। दखल-कब्‍जा बेरमे बालेसर रोकलक तैपर रमाकान्‍त बाबू बजला- “रौ बाले, चूप रह। ई जमीन मालिकक छेलै ओ हमरा लिखि देने अछि। हे देखही दस्‍ताबेज।” बालेसर मुर्ख तँए अनकासँ दस्‍ताबेज देखा चूप भऽ गेल। चुपे नहि भेल बल्‍कि बौक भऽ अँगना चलि आएल। किछु फुरबे ने करइ। रामकिसुनकेँ तीन लड़का। जेठकाक नाओं- बालेसर, मझिला- राजशेखर आ छोटका- चन्‍द्रशेखर। बोनि-बुत्ता करि कऽ कोनो धरानी सभ समांगक गुजर-बसर चलैत रहइ। बालेसर नून-तेलक दोकान खोलने छल मुदा दोकान चलबै छेलै राजशेखर। समय बीतैत गेलइ। मुदा जखन समय खराप होइ छै तँ बारहोरंगक बसात बहए लगिते छै, सएह भेलै बालेसरकेँ। वेचाराकेँ तेतेक ने दोकानक उधारी लागि गेलै जे अन्‍तमे नून-तेलक दोकान छोड़ए पड़लै। पूजीक अभाव भेने वेचारा चाहक दोकान खोललक। कम पूजीमे चाहक दोकान नीक होइते छइ। चाहक दोकान खूब चललै। समय आब बोलसरक आपस एलइ। बालेसरकेँ तीन लड़का। जेठका लड़काक नाओं- चन्‍द्रमोहन, मझिलाक- कृष्‍णमोहन आ छोटका नाओं छेलै- इन्‍द्रमोहन। तीनू भाँइ पढ़ि-लिख कऽ दिल्‍लीमे नोकरी करैले चलि गेल। नोकरियो नीक ठाम लगलै। एक एकाउण्‍टेंट, दोसर संचार विभागमे आ तेसर कृषि विभागमे तृतीय श्रेणीक काज करए लगल। बालेसरक मझिला भाए- राजशेखरकेँ सेहो दू लड़का। पहिल उमाकानत आ दोसर कृष्‍णकान्‍त। उमाकान्‍त एगारहवी केलाक बाद बम्‍बइ चलि गेल आ कोनो सेठक ओइठाम ड्राइवरी करए लागल। आ छोटका लड़का चन्‍द्रशेखरकेँ एक लड़का जेकर नओं छेलै लालमोहन जे पढ़लक-लिखलक नहि। जहन पन्‍द्रह बर्खक भेल तँ भागि कऽ मामा गाम चलि गेल। आ एक गोरेक संगे लुधियाना जा रहए लगल। लुधियानामे ओ कोनो किराना दोकानमे काज करए लगल। परिवारमे चारू दिससँ आमदनी भेने बालेसर तीनू भाँइक मन हरदम खुशीए-खुशी रहए लगलै। जहिना अदरा नक्षत्रमे झम-झमौआ बरखा भेने, अगहनमे नीक उपजा भेने किसानक मन हर्खित होइ छै तहिना बालेसरोक परिवारमे सबहक मन हर्खित रहए लगलै। किछु दिनक बाद रामकिसुनक मृत्‍यु भऽ गेलैन। बालेसर अपन पिताक श्राद्ध-कर्म नीक जकाँ केलक। रसगुल्‍ला-लालमोहनक भोज केलक। घरो-दुआर नीक बना लेलक। ट्रेकटर सेहो खदीर लेलक। शानसँ गुजर-बसर कऽ रहल अछि। बालेसर मुदा चाहक दोकान करिते रहल। धिया-पुता सभ जहन गाम आबै तँ चाहक दोकान चलबैत पिताकेँ देख मन झूस भऽ जाइ। बालेसरक परिवारक उन्नैत देख रमाकान्‍तक परिवार गलल जाइ। दुष्‍ट बुधिक लोक छलाहे। एमहर उमाकान्‍तक जेतए धनकुटिया मशील चलैत रहै, तेतइ छेलै एकटा आमक गाछ। बालेसरे ओकरा रोपने छल आ अपनेसँ गाछक सेवा सेहो केने छल। मुदा ओ गाछ कब्‍जामे छेलै रमाकान्‍त बाबूकेँ, ओकर फल वएह खाइ छला। संयोगसँ एक दिन एकटा आम दुआरे झंझट भेलै, माने रक्का-टोकी भेलइ। एक दिन उमाकान्‍त ओही आमक गाछपर दाबा ठोकि देलकै। झंझट उठलै। केस-फौदारी भेलइ। कोर्ट-कचहरीक आबा-जाही शुरू भेल। रमाकान्‍त बाबू बजैथ- “चाहक दोकानबला कि हमरासँ केस लड़त।” उमाकान्‍तक पिता- राजशेखर अलगसँ कोर्टमे जमीन-जत्‍था सम्‍बन्‍धी एकटा मोकदमा कऽ देलक, जइमे बाप-दादाक अरजलहा जमीन जे रमाकान्‍त बाबू लिखा नेने छला तैपर मुकदमा चलए लगल। रमाकान्‍त बाबूकेँ अपन केलहा पाप सभ भूत भऽ आगाँमे नाचए लगलैन। सबूतक जखन देख-भाल मजिस्‍ट्रेटक कोर्टमे होमए लागल तँ मजिस्‍ट्रेट रमाकान्‍त बाबूसँ कहलकैन- “आपको विवादित जमीन कैसे हाँसील हुआ और जिससे आप जमीन लिखबाये उनको ये विवादित जमीन कैसे प्राप्‍त हुआ, इसका सबूत दाखिल करें।” रमाकान्‍त बाबूकेँ तँ ऊपर-निच्‍चाँ सुझए लगलैन। दिनेमे तरेगन देखा लगलैन। एमहर बालेसरक समांग सभ चौक-चौराहापर बजैथ- “बहुत धन खेलेँ रे बगरा आ पड़लौ मरदसँ रगरा। जेतेक बेइमानी करि कऽ अरजने छेँ से सभटा आब बेरा-बेरी निकलतौ। नहि तँ एकटा सभ्‍य मनुख जकाँ समाजमे रह। हम तँ कौहुना अपन रोजगार इमानदारी पूर्वक करैत चाहे दोकानसँ आगाँ बढ़लौं। अपनापर हमरा अपन कर्मक बिसवास अछि। ठकि-फुसला कऽ तँ नहि ने। कमाइबला खेतइ आ लूटैबला जेल जेतइ।” यएह सभ बात आइ बालेसर अपन चाहक दोकानपर चन्‍द्रमोहनकेँ कहि रहल छला। ◌ गामे बीरान भऽ गेल किसुन देव दुआर परहक चौकीपर असमंजस भेल बैसल छला। तेकर कारण छेलै जखन तीस-पैंतीस बर्खक उमेर छेलैन, माने आइसँ साठि बर्ख पूर्व- जहन जुआनी चढ़ल छेलैन, तेहेन अवस्‍थामे कमाइ-ले मोरंग चलि गेला। गाममे कहियो कोनो साल रौदी, कोनो साल दाहीमे भूखमरीक समस्‍या उत्‍पन्न भऽ जाइत। मुट्ठी भरि लोकक हाथमे जमीन-जत्‍था, अधिकतर मजदूर तबकाक लोक। बोइन-बुत्तापर जीनिहारकेँ विकट समय रहने कएक साँझ उपासे रहऽ पड़ै छेलैन। अही सभ बातक सोच आइ किसुन देव भायकेँ भेल छेलैन। हाथमे चाहक कप देना पत्नीकेँ एक घन्‍टा भऽ गेल छेलैन। चाह पानि-पानि भऽ गेल छल। तखने राम सेवक चाह पीबैले किसुन देव भाइक घरे लगक चाहक दोकानपर जाइ छला। राम सेवक किसुन देव दिस तकैत पुछलखिन- “भाय एना किए मन झूस अछि। की केकरोसँ झगड़-झंझट भेल हेन, मुँह किए तुरुछ केने छी?” समाजिक रिस्‍तामे किसुन देव आ राम सेवकक बीच ‘भाय-भाय’ चलैत रहैन। किसुन देव बजला- “नहि भाय, कोनो बात नहि अछि, पैछला जिनगीक बात सभ मोन पड़ि गेल हेन। आबह-आबह बैसह, केतए जाइ छह। चाह पीब लएह, तैबीच किछु गपो-सप्‍प हेतइ।” राम सेवक ससैर कऽ किसुन देव लग जा चौकीए-पर बैसला। आ किसुन देव पत्नीकेँ हाक देलखिन- “यइ सुलोचनाक माय, कनी एमहर आउ, नहि तँ एक गिलास चाह आरो बनौने आउ।” अपना हाथक सरेलहा चाह किसुन देव एके घोंटमे पीब लेला। आ बजला- “राम सेवक भाय, की कहब आब तँ हमर उमेर अस्‍सी-पचासीक लगभग भऽ गेल। पाँचटा बेटा अछि। सबहक बिआह-दुरागमन भऽ गेलै, सभ बेटा धिया-पुता आ कनियाँ लऽ कऽ दिल्‍लीमे जमीन लऽ घर बना ओतै रहैत अछि।” राम सेवक कहलकैन- “भाय साहैब, से तँ नीके ने अछि, अपन कमाइए आ धिया-पुताक गूजर-बसर करैए। अहाँकेँ कोनो तरहक जवाबदेहियो तँ नइ अछि।” बिच्‍चेमे टोन दैत किसुन देव कहलकैन- “नइ हौ सेवक भाय, से बात नै छइ। हम दुनू परानी बुढ़ा-बुढ़ी की कऽ सकै छी। कियो एक लोटा पैनो देनिहार नइ अछि। गाममे की रोजगारक आब कमी छइ। पहिने ने रोजगारक कोनो साधन नहि छेलै, लोक ढाका, बंगाल, मोरंग, दिनाजपुर, सिल्‍लीगुरी जा कऽ धन रोपनी, मरूआ रोपनी आकि पटुआ झाड़ै छल, आ केते गोरे बहलमानी सेहो करै छल। चन्‍द किसिमक रोजगार करै छल। हमहीं एक दिन बिराटनगरसँ पाँचटा बहलमानक संग कटही गाड़ी लऽ कऽ जंगल लकड़ी आनैले जाइत रही। तीन दिनका रस्‍ता छेलै, रातिमे बाघक दुआरे गाड़ीकेँ गोल कऽ कऽ राखि दिऐ, बीचमे बरदकेँ बान्‍ही आ काते-कात चारू कोणपर लकड़ीए-केँ घूर कऽ दिऐ आ एक गोरे सिरपैह लऽ कऽ खड़ा पहरा दिऐ आ बैली सभ सुती। बिहान भने गाड़ी जोति कऽ विदा होइ। एक दिन लकड़ीसँ लादल गाड़ी छल। जंगलमे एकटा बाघ घात लगौने छल, डेरासँ दस लग्‍गा गाड़ी जोइत कऽ आगाँ गेल हएब आकि ऐगला गाड़ीक एकटा बरदक ऊपर बाघ झपटलक आ घिचने-तिरने घोर जंगल दिस लऽ गेल। कोनो तरहेँ बिराटनगर एलौं।” राम सेवक पुछलकैन- “ऐँ यौ भाय, तहन तँ प्राण उड़ि गेल हएत, डर नहि भेल जंगलसँ बहराइत?” किसुन देव कहलकैन- “डर कहूँ नै हुअए, हिम्‍मते ने कठिन-सँ-कठिन काजकेँ हल्‍लुक बना दइ छइ। हमरा सभकेँ तँ रेहल-खेहल रहए, एहेन-एहेन घटना सभसँ।” राम सेवक कहलकैन- “यौ भाय साहैब, हम जौं रहितौं तँ एक तँ प्राणे उड़ि जाइत आ जँ बँचियो जइतौं तँ नानी ने मरिहें जे फेर जंगल दिसक रस्‍ता दोहरा कऽ धरितौं!” “हे सुनू एक बेरका घटना कहै छी।” किसुन देव मुँहपर हाथ फेरैत बजला- “सिल्‍लीगुरीमे पटुआ झाड़ैत रही,भरि जाँघमे जोंक धऽ लेलक। से की कहब तमाकुल चुना कऽ रखने रही, हँसूआ सेहो रखने रहैत छेलौं। ऊपरमे आबि हँसूआसँ सभ जोंककेँ खड़ैर दिऐ आ चुनेलहा तमाकुल सबहक मुँहपर दऽ दिऐ। कियो सुइया-डोरा सेहो रखने रहैत छल, सुइएसँ गाँथि कऽ डोरामे धऽ लटका दिऐ आ डॉंरमे खोंसि लिअए। जोंक सभ पानिमे दहलाए लगए तहन पटुआ झाड़ी।” राम सेवक कहलकैन- “यौ भाय, तहन तँ बड़ जीबटगर काज करी।” किसुन देव भाय फेर कहलखिन- “तोरा एतबेमे अचम्‍भा लागि गेलह। हे सुनह- गाम आबी तँ सत-सत कट्ठा खेतमे हम आ हमर भजार अच्‍छेलाल मिल कऽ राति-के कोदारिसँ तामि दिऐ। दू-दू कट्ठा खेतमे असगरे धान-मरूआ रोपि ली। तब ने अस्‍सी बर्खक उमेरमे दुरुस्‍त छी। मरूआ सनक निरोग अन्नकेँ लेाक त्‍यागि देलक।” बिच्‍चेमे राम सेवक पुछि देलकैन- “अच्‍छेलाल के छल?” “नै चिन्‍हलहक, पितमराक बाप छल। ओकरा तेतेक तागत छेलै जे सात मनक पटुआ सोनक गठियाकेँ बिराटनगरमे असगरे उठा कऽ गोदाममे राखि दइ। एक दिन गोदामक चौकीदार देखलकै, ओ जा कऽ नेपालक थानामे कहि देलकै, वेचाराकेँ पकैड़ कऽ जेलमे दऽ देलकै। तहिना खाइयोमे छल, एक किलो चौरक भात कल्‍लौमे आ सातटा मरूआ रोटी जलखैमे खाइ छल। एक किलो राहैरक उसना तँ ओकर बामा-दहिना हाथक खेल छल। केतेक कहब बितलाहा गप-सप्‍प। अखुनका धिया-पुताकेँ देखै छिऐ जे दबाइयेपर खेपैए। झरो फिरैले साइकिल वा मोटरे साइकिलसँ जाइत अछि। बीसो किलो गहुमक मोटरी लऽ कऽ पिसबैले नइ जा होइ छै, ओहूले जने चाही। काजसँ देह चोरबैत रहतह।” राम सेवक बाजल- “भाय साहैब, आब तँ गाम-घरमे लोके माने जुआन-जहान कहाँ अछि। खेत सभ परती पड़ल रहैत अछि। नहि तँ गाछ-बिरीछ लगौल अछि। गाम जेना सून भऽ गेल हेन।” किसुन देव भाय बजला- “यौ सेवक भाय, हमरा तँ बुझना जाइत अछि जेना गाम उनैट गेल हेन आकि गाम सुनैट गेल हेन से बुझने ने जाइत अछि। कान तँ सोन नहि, आ सोन तँ कान नहि।” गाममे देखबहक जे पहिने कच्‍ची सड़क छल से आब पक्कीकरण भऽ गेल। जैठाम गाममे सबहक दुआरपर, केकरो एक पल्‍ला तँ केकरो जोड़ भरि बरद छल भैंस छेलै, गाए छेलै तैठाम आब देखबहक जे दस हजार लोकक बस्‍तीमे पाँच जोड़ा बरद नै भेटत। जहिना बड़का माछ छोटका माछकेँ खा जाइत अछि तहिना खेतीक उपकरण भेने भऽ गेल। आब ट्रेक्‍टर भेने जमीनक जोत-कोर, अन्नक दौनी, फसिलक कमठान इत्‍यादि सभ तरहक काज हल्‍लुक भऽ गेल हेन। तहिना अन्नक फसिलक बीआ-बैल भेने, सुख-सुविधा तँ भऽ गेलै मुदा लोक गामे छोड़ि कऽ पड़ा गेल हेन तखन खेती तँ बीरान हेबे करत।” “हँ से तँ भाइये गेल हेन।” –राम सेवक बाजल। तैपर किसुन देव बाजल- “यौ भाय, एम.बी.बी.एस. डाक्‍टरकेँ देखबै जे मनुखक खून-पैखानाक जॉंच करत। हमरे पोती डोली दिल्‍लीसँ गाम आएल छल, दसमीमे पढ़ैत अछि। एक दिन दलानपर बैसल रही, तखने गाए गोबर केलक, पोतीसँ कहलिऐ ‘गइ डोली गोबर कनी कोदारिसँ हटा दहिन तँ।’ मुदा पोती हमरापर ऑंखि गुड़रैत अँगना दिस चलि गेल। से कहू तँ कोदारियोसँ गोबर उठबैमे घिरना भेलइ!” बिच्‍चेमे राम सेवक किछु बाजए लागल मुदा किसुन देव रोकैत फेर बाजल- “यौ भाय, गोबर तँ ओहन वस्‍तु अछि जइसँ पूजाक ठाँउ नीपल जाइत अछि। खेतमे दियौ तँ उर्बरा शक्‍ति बढ़त, भानस कऽ सकैत छी, गोबरक छौरसँ माल-जालक थैरकेँ साफ कऽ सकै छी। कोनो फिनाइल वा अन्‍य दबाइक जरूरत नइ पड़त। बरतन-बासन साफ कऽ सकै छी। से कहू भाय, देहात सनक शुद्ध कोनो वस्‍तु शहरमे भेटते। तेहेन गामकेँ त्‍यागि कऽ लोक परदेशमे बास करैत अछि। शहरमे जेकरा लेल रूपैआ लगै छै से गाम-घरमे मंगनियेँमे भेट जाइ छइ। थोड़ेकाल चुप भऽ कऽ किसुन देव फेर बाजल- “आब कि ओ गाम रहलै जे सभ वस्‍तु लेल लोक कलहन्‍त छल। आब तँ गली-गलीमे पक्की सड़क छै, घरे-घर टी.बी. छै, मोटर साइकिलकेँ के पुछैए चरिचक्किया गाड़ी केतेको भऽ गेल अछि गाम-घरमे। स्‍कूल छै, अस्‍पताल छै, बिजली छै मुदा जुआन-जहान लोकक अभावमे गाम बीरान भऽ गेल अछि, एकदम्‍म सुनसान जकाँ।” राम सेवक अपन मुड़ी डोलबैत किसुन देव दिस तकैत रहल। मुदा किछु बाजल नहि। ◌ तीलकेँ तार लाल काकी साँझ दइले दीप नेस कऽ तुलसी चौरा लग जाइ छेली। अँगनामे गहुमक बोझ जह-पटार राखल छेलइ। दोगे-दोग लाल काकी तुलसी चौरा लग पहुँचली। तखने पछिया रमकल। लाल काकीक नजैर रहैन तुलसी चौरापर। हवा आ गर्मीसँ गहुमक बोझ हरनाठ भेले छल, कखैन-ने-कखैन एकटा बोझमे दीपसँ आगि लपैक लेलकै। तखन लाल काकी किछु ने बुझि सकली। जखन बोझसँ धुआँ निकलए लगल कि मझिली पुतोहु हल्‍ला केलखिन- “आगि लागि गेलइ।” घरक सटले दऽ कऽ पक्की सड़क छेलै, लोकक आवाजाही तँ छेलैहे। कियो बगलक गाम कछुबी-दे बाजल- ‘नवटोलियामे आगि लागल छइ।’ ओतुक्का लोक दौड़ल। कियो कछुबीकेँ तँ कियो तमुरिया दिस गेल। ओ बाजल- “नवटोलिया सुड्डाह भऽ गेल!” आब तँ नवटोलियाक जेतेक कुटमैती लागिमे छेलै ओ सभ दौड़ल। जहिना कोनो नीक बात होइ कि अधला बात आकि कोनो समदिया एक दोसरक संग बात-चीत कहैमे किछु तिलिया-फुलिया लगा दैत अछि, आ किछु बातकेँ घटा-बढ़ा कऽ कहैत अछि, तहिना भऽ गेल। जहन देखए गेल तँ मात्र एकटा गहुमक बोझक किछु अंश झरकल छल। तैबीच सुन्‍दरी पुतोहु बजली- “यै लाल काकी, देखियौ लोकक किरदानी! एतेक ने तीलकेँ तार बना कऽ बाजल जे कर-कुटुम तकक लोक पहुँच गेल।” लाल काकी बजली- “यै कनियाँ, अहिना लोक सभकेँ बजैमे कोनो कि टका-पैसा खर्चा होइ छै, गपकेँ छिलैन करैत-करैत केकरोसँ केकरो मुहोँ-ठुठी करा देतह। केकरो अपना बातसँ झूका देतह वा होशे उड़ा देतह। सही बात बुझत नहि, आ तीलकेँ तार बना उड़बैत रहत।” ◌ एक चुनौटी तमाकुल महान क्रान्‍तिकारी जुझारू समाज सेवी कम्‍युनिष्‍ट नेता शुभंकर बाबू। अंग्रेजक शासन अन्‍तिम अवस्‍थामे पहुँच गेल छल, गाम-घरसँ लऽ कऽ शहर तकमे गाँधी बाबाक पूर्ण अजादीक घोषणा भऽ चुकल छल। जँहि-पटार क्रान्‍तिकारी सभ रेलक पटरी, टीलीफोनक तार, सरकारी कागजातसँ लऽ कऽ भवन आ थाना तकमे तोड़-फोड़ केलक, आगि लगा-लगा जारलक। क्रुर अंग्रेजक हाकिम आ पलटन सभ सेहो क्रान्‍तिकारी सभकेँ पकैड़-पकैड़ केतेकेँ गाछमे टाँगि फँसरीपर चढ़ा दैत तँ केतेकोकेँ कालापानीमे भेज दैत छल। केतेक माए-बहिनकेँ माँगक सिनूर घुअ पड़लै। केतेक भायकेँ शहीद हुअ पड़लै। केतेककेँ जेलमे सड़ा देल गेलइ। केतेको लोक ललका मुरेठा देख घरमे ढुकल रहैत छल। शुभंकर बाबू सेहो कएक बेर जेल गेला। नमक सत्‍याग्रहमे भाग लेलैन अंग्रेजकेँ भगबैमे जहॉं तक जे बुधि छेलैन ओ गुलामीसँ मुक्‍तिक लेल लगौलैन। भंझारपुररेलक पटरी उखाड़ैमे हिनको जेलमे ठुसि देलकैन। जाबत जीला ताबत धरि कहियो लोभ-लालच, घूस-पेंच आदिसँ दूर रहला। साधारण भेष-भूषा छेलैन शुभंकर बाबूक। शुभंकर बाबूकेँ एकटा बेटा दिवाकर। पढ़ैमे तेजगर तँ नहि, मुदा जहिना गाइक नॉंगैर पकैड़ वेतरणी पार होइत अछि तहिना दिवाकर दसमी तक पढ़लक आ ब्‍लौकमे किरानीक नोकरी भेट गेलैन, सेहो स्‍वतंत्रता सेनानी शुभंकर बाबूक लड़का छथिन तँए। वेचारे शुभंकर बाबू तँ आब ऐ दुनियाँमे नइ छैथ मुदा हुनक कृत अखनो गाम, जिला आ राज्‍य तकमे छैन्‍हें। हमरा एकटा वोरिंगक जरूरत भेल। ब्‍लौकसँ सत्तैर प्रतिशत छूटपर भेटैत रहइ। हमहूँ दरखास देलिऐ आ बाँकी रूपैओ जमा कऽ देलिऐ। दिवाकर बाबूक प्रमोशन भेलैन। हुनका नाजीर आ बड़ा बाबूक काज देल गेलैन। हम वोरिंग उठबैले गेलौं। नाजीरकेँ माने दिवाकर बाबूकेँ कहलयैन- “सर, हमर जे वोरिंग उठबैक आदेशबला कागज छै, ओ देल जाए।” दिवाकर बाबू कहलैन- “जाबत किछु खर्चा-वर्चा नै करब ताबत कोना कागज देब।” पुछलयैन- “सर, हम तँ सभ रूपैआ आ जमीनक कागजात जमा कऽ देने छी। तहन फेर कोन खर्च-बर्च?” दिवाकर बाबू बजला- “से नहि बुझलिऐ, ऑफिसमे चन्‍द तरहक ने खर्च-बर्च छै किने, तइमे किछु पैसा लगबे करत।” ताबत एक गोरे सेहो नाजीर लग काज करेबाक लेल आएल। हुनको यएह बात कहलखिन। हम बाहर आबि वेवेकसँ सभ बात कहलिऐ ओ कहलैन- “यौ बाबू, हिनक हालत मैत पुछू। आश्‍चर्यक बात छै जे हिनक पिता श्री शुभंकर बाबू गरीब लोकक लेल, देशकेँ अजाद करक लेल कोन-कोन यातना ने सहलैन। मुदा हिनका तइ सबहक एको रती लाज-विचार नइ छैन। जाउ किछु एमहर-ओमहर करि कऽ काज करा लिअ।” हम दिवाकर बाबूक कुरसी लग फेर गेलौं आ कहलयैन- “सर, हमर काज कऽ दिअ ने।” दिवाकर बाबू बजला- “लाउ दू साए रूपैआआ हे लिअ कागज।” हम कहलयैन- “सर, हम गरीब छी। सभ पाइ खर्चा भऽ गेल। हमरा लग आब रूपैआ नइ अछि।” दिवाकर बाबू बजला- “गरीबकेँ तँ भगवानो सहायता नहि करै छथिन। अहीं कहू तॅं कोनो भगवान आकि इष्‍टदेवता बिना चढ़ौआ लेने केकरो काज करै छथिन? तहन हम मनुख भऽ कऽ कोना छुच्‍छे कऽ देब..!” हम कहलयैन- “सर अहाँक पिताश्री तँ महान स्‍वतंत्रता सेनानी छला। गरीबेक हितक लेल ने जहल गेला। माहूर खेलैन। एते तक जे स्‍वतंत्रता सेनानीबला पेंशनो नै लेलखिन आ सरकारीए कोषमे जमा करक लेल कहलखिन। ओ एहेन तियागी छला। आ अहाँ...।” तैपर दिवाकर बाबू बजला- “तँए ने, पाँच बीघा जे जमीन छेलैन तइमे सँ लोके सबहक सेवा करैत-करैत तीन बीघा जमीन बेच लेलैन। बेसी गप-सप्‍प नहि करू। लाउ एके साए रूपैआ आ कागज लिअ।” हम कहलयैन- “दिवाकर बाबू, हमरा लग तँ एकोटा टाका नइए, तहन हम केतए-सँ दिअ।” दिवाकर बाबू आँखि गुर्ड़ैत कहलैन- “पचासोटा टाका लाउ, नहि तँ पचीसोटा टाका दिअ।” हम कहलयैन- “सेहो नइ अछि।” फेर दिवाकर बाबू दराजसँ तमाकुलक डिब्‍बी निकालि कऽ दैत कहलैन- “तँ जाउ, दोकानसँ एक चुनौटी तमाकुले नेने आउ। हम ताबत कागज तैयार कऽ दइ छी।” हम सोचलौं आब की करी की नहि, चुनौटी लेलौ आ पाँच रूपैआक तमाकुल लेल विदा भेलौं। हमरा परोछ भेलाक बाद दोसर किरानीसँ दिवाकर बजला- “एहेन बुड़ि लोककेँ नहि देखलौं। पाँचोटा टाका लऽ नहि आएत ब्‍लौक! फोकटेमे काज कराएत!” हम जाबत तमाकुल लऽ कऽ एलौं ताबत कागज तैयार छल। हाथमे कागज दैत दिवाकर कहलैन- “ई देब घर छिऐ, बिना देने काज नै ससरत।” कागज लऽ कऽ माल गोदाम दिस जाइत रही कि हमरा पंचायतक ग्रामसेवक जदूवीर पासवान भेट गेला। हुनका सभ बात कहलयैन। सेवकजी कहलैन- “दिवाकर बाबूकेँ आदते एहने छैन। जहन हमरो सभकेँ कहता जे तूँ सभ बड़ माल मारैत छह, चलह चाह-पान कराबह। केकरो बिना किछु नेने काजे ने करै छथिन। तूँ तमाकुल देलहक ओकरा की करता तँ पन्नीमे झाड़ि कऽ राखि लेता आ दोसर जे कियो काज करबए लेल औत, तँ ओकरा फेर ओ चुनौटी धरा देथिन जे एक चुनौटी तमाकुल नेने आबह।” “कियो देखनिहार-सुननिहार नहि अछि एहेन चूप्‍पा चोर सभकेँ।” -हम कहलयैन। तैपर सेवकजी बजला- “नाजीरक पिते ने तेहेन त्‍याग-तपस्‍या केने छैन जे दिवाकरक मुहेँ देख छोड़ि दइ छइ। जहिना कियो बाप-दादाक कृतसँ उद्धार होइत चलैत अछि तँ कियो अपना बदौलत बाप-दादाक काजकेँ उद्धार करैत अछि। कियो हारि कऽ जीतैत अछि तँ कियो जीतला बाद हारैत अछि। जेकर ओजने एक चुनौटी तमाकुल, तेकरासँ की उमीद कऽ सकै छह।” ◌ आब कहिया चेतब 25 अप्रैल 2015 इस्‍वीक घटना छी। कियो स्‍नान करैत छल, कियो स्‍नान करि कऽ खेनाइ खा रहल छल, कियो अराम कऽ रहल छल। कियो ट्रेक्‍टरसँ खेत जोता रहल छल जे रौदीमे जोतलाहा खेतक दुभि मरि जाएत आ खेत निरोग रहत। समय पहिल दिनुका सबा बारह बजे आ दोसर दिनुका साढ़े एगारह बजेक लगभग छिऐ। एकाएक धरती डोलए लगलै। अफरा-तफरी मचि गेल। के धनीक, के गरीब सभ एकरंगाह भऽ गेल, जेलक खेनाइ बेरुका समय जकाँ सभ कियो घरसँ निकैल फलि जगहमे चलि गेल। घरसँ निकलैमे आ अफरा-तफरी भेने केतेक गोरेकेँ टाँग-हाथ टुटल। केतेक घर-दुआर तहन-नहँस भेल। कोन दैंत-दानो छेलै जे देवालयकेँ सेहो नइ बकसलक। केतेकेँ छातीक धड़कन बढ़ि गेल। अस्‍पतालमे रोगीकेँ रखैक जगह नइ रहलै। एके अछियापर दस-दसटा मुर्दाक डाह-संस्‍कार भेल। केतेक गोरे तँ मकानक मलबाकेँ तरेमे रहि गेल। जेकरा मशीनसँ धरतीए-मे पचा देल गेलइ। बाबाक नाम छेलैन छोटे लाल दास, लोक हुनका पारखी बाबा कहैत छेलैन। उमेर करीब 85-90 बर्खक छेलैन। पत्नी सुशीला जीबते छेलैन। बबो स्‍नान करि कऽ भोजनपर बैसले छला। दू कर भात-दालि खेने हेता कि नहि, पत्नी सुशीला कलपर सँ पानि आनए गेल छेली कि तखने धरती डोलए आ कुदकए लगलै। घर लगक पोखैरक पानि उछैल कऽ महार टपि गेल। पत्नी सुशीला बपहारि काटैत बजली- “ई की भेलै..!” कहैत सुशीला कलेपर धँइ भटका खसली आ अचेत भऽ गेली। बबो ताबत कुदि-फानि कऽ, फलि ऑंगन छेलैन, चल गेला। दू-तीन मिनट तक कनी-मनी धरती डोलिते रहलै। केकरो किछु फुरेबे ने करै जे की करी। धरती उठतै कि आ बैसते आकि धँसतै। बाबा हल्‍ला केलैन- “दौरे जाइ जा हौ..!” किछु गोरे आएल आ सुशीलाकेँ उठा-पुठा कऽ दलानपर जे भागवत करौलहा मरबा छेलै, तेते बैसा कऽ पानिक छीचा देबए लागल। ताबत डाक्‍टरोकेँ बजा कऽ आनल गेल। दवाइ-दारू कएल गेल। बड़ी कालक बाद सुशीला ठीक भेली। साँझक समय छेलै, बहुत गोरे मरबापर बैसल छल तखने सजन, बाबासँ पुछलकैन- “अँए यौ बाबा, एना किए भेलै। ई की छेलै। हम तँ बौक भऽ गेल छेलौं। जहाँ कि देह डोलए लागल कि अँगनासँ भगलौं। रोडोपर जेना कियो उठा कऽ पटैक देलक तहिना बुझि पड़ल।” पारखी बाबा, कहलखिन- “बौआ, ई भुमकम छेलै। तूँ सभ ने पहिल बेर भुमकम देखलहक। हम तँ छोटका-मोटका छोड़ि तीनटा बड़का भुमकम देखलिऐ हेन। पैंतीस इस्‍वीक भुमकम सभसँ जोरगर छेलै। केतेक ठाम बड़का-बड़का दरारि फाटि गेलै, केतेक घर-दुआर नास भेल, केतेक जान-मालक नोकसान भेल तेकर कोन ठेकान। सतासीक बाढ़ि आ अठासीक भुमकम नामी अछि। ओहू बेरका कम नै छेलै अदहा भारतकेँ पुरबसँ पच्‍छिम तक आ उत्तरमे नेपालकेँ सेहो डोला देलकै। अठासीक भुमकमक केन्‍द्र छेलै मधुबनी आ सीतामढ़ीक बीचमे आ ऐ बेरुका केन्‍द्र छेलै नेपालमे काठमाण्‍डूक नजदीक, तँए ओतए बेसी छति भेलै। जेकर केन्‍द्र जेतए रहैत अछि तेतए बेसी छति आ दूरबलाकेँ कम असर पड़ै छइ।” “एना किए छै बाबा?” –सजन पुछलकैन। ताबत पण्डित काका टीप देलखिन- “रौ सजन, धरती तरमे कौछु छै, ओकरापर जहन पापी सबहक भार पड़ै छै ने तहन ओ देहकेँ डोलबए लगैत अछि तहिन भुमकम होइ छइ।” सजन पुछलकैन- “अँए यौ पण्‍डित काका, केतेकटा कौछु छै जे पूरा धरतीए-केँ डोला दइ छइ?” पण्‍डित काकाकेँ किछु फुरबे ने करैन। तैबीच भुलचन बाजल- “नइ यौ पण्‍डित का, शेषनागपर ई धरती अछि। ऐ धरतीपर जहन बेसी पाप, अत्‍याचार, व्‍यभिचार, अपहरण आ हत्‍या हुअ लगैत अछि तहन शेषनाग अपन फनकेँ डोला हल्‍लूक करैत अछि।” जेकरा जे जेना बुझल छेलै से तेना अपन-अपन तर्क दैत छल। पारखी बाबाकेँ जहन सबहक गप सुनि-सुनि कऽ मन घोर भऽ गेलैन तँ गप हँकनिहारकेँ पुछलखिन- “जापानमे किए दसे दिनपर भुमकम होइ छइ?” सभ चुप भऽ गेल। कियो ने किछु बाजए। बाबा बजला- “ई बात नहि छइ। प्रकृतिमे माने ब्रह्माण्‍डमे जेतेक वस्‍तु-जात आकि पदार्थ अछि सभकेँ अपन-अपन गुण-अवगुण छइ। पृथ्‍वीकेँ सेहो अपन गुण-अवगुण छइ। पृथ्‍वी अपना पेटमे असंख्‍य वस्‍तु सभकेँ रखने अछि। ठंढ-गर्म तँ सभ वस्‍तु होइते अछि किने। सभकेँ अपन गति छै किने। धरतियोकेँ अपन गति अछि। ओकरो पेटमे जखन गैस वा पदार्थमे गर्मी होइ छै तँ केतौ ज्‍वालामुखी बनि, तँ केतौ परत-पर-परत चढ़ि गेल तँ केतौ धरतीए घँसि गेल, तँ केतौ झील बनि गेल तखनेने भुमकम होइ छइ। जहिना लक्ष्‍मण रेखा टपला बाद सीता हरन भेलै तहिना अधिक कोनो वस्‍तुमे भेलाक बाद उग्र रूप भाइये जाइ छइ।” सजन पुछलकैन- “ऑंइ यौ बाबा, तहिन तँ बाइढ़ोमे अहिना होइत हेतइ?” बाबा बजला- “हँ, प्रकृतिमे पाँचटा जे तत्‍व अछि जेना अकास, सूर्य, हवा, जल आ धरती एही पाँचो तत्‍वसँ बनल ई शरीर अछि आ अही पाँचोक नजैर सभ मनुखपर बराबर अछि। यएह ने देवता भेल, जेकरामे कोनो भेद-भाव नइ होइ। अकासमे जेकरा जेतेक उड़बाक होइ उड़ि सकैए। सुरुजक नजैर सभपर बराबर पड़ैत अछि। मौसमक हिसाबसँ अपन गुण-अवगुण छइ। बैशाख-जेठमे गर्मी जन-मारुख होइए आ वएह गर्मीक जाड़मे संजीवनी बुटीक काज करैत अछि़। तहिना जलोकेँ छै, सबहक लेल बराबर बरसैत अछि। मुदा वएह जल कहियो प्रलयकारी बाढ़ि सेहो आनि दैत अछि तँ कहियो पियासक लेल तरसबैत सेहो अछि। तहिना हवोकेँ छै, सबहक लेल बराबर। कहियो मारुख तँ कहियो शीतलता सेहो दैत अछि। तहिनाने धरतियोक अछि। धरतीकेँ धरती माता कहि कऽ लेाक पुकारैत अछि, जहिना माए अपन धिया-पुताकेँ केतबो कष्‍ट सहि कऽ पालन-पोषन करैत अछि तहिना ने धरती सेहो करैत अछि।” ताबत सुशीला चाह नेने एलखिन। सभ कियो चाह पीबए लगला। चाह पीब, कियो तमाकुल तँ कियो बीड़ी पीबैत गप-सप्‍प करए लगला। भुलचुन बाजल- “अँए यौ बाबा, हम सभ जे एतेक पुजा-पाठ करै छी से देवता सभ किए ने कष्‍टक बेरमे सहायता करैत अछि?” बाबा बजला- “रौ भुलचुन, लोकक चालि बुझबीहीन तँ देहमे आगि लगि जेतौ। चलाकक काज छिऐ। अपन स्‍वार्थक लेल मनुखकेँ बँटैत-बँटैत लोक आत्‍मोकेँ बॉंटि नेने अछि। भगवान आ धरतीकेँ के पुछैए।” तैबीच सजन बाजल- “तहिन केना कऽ जीब?” बाबा कहलखिन- “बौआ, बारुदक ढेरपर छह। कखन छह कखन नहि, तेकर कोन ठेकान। बाढ़ि, रौदी, भुमकम, अगिलग्‍गी, आतंकवादीक आक्रमण, सुनामी आ पैलोनक आक्रमण, ऐ सभकेँ पछाड़ैत सही रस्‍ता बना अपनाकेँ ठाढ़ केने जे जीब लेता वएह पूजणीय भेला। हुनके समाजमे पूजल जाइत अछि। मृत्‍युए-क नाम छै ने सत्‍यम, शिवम, सुन्‍दरम्। आब मशीनी युग आबि गेल हेन। जहिना घन्‍टोक काज सकेण्‍डमे होइत अछि, तहिना आफदो देखते-देखते प्रलय मचा दइ छइ। तँए आबो चेतइ जाइ जा। मनुख बनि आएल छह, मनुख जकाँ आचरण बना जीबह। केतेक की कहबह। बड़ ओझरी सभ छै ओझरीकेँ सोझरबैत चलैत रहह।” ◌ विघटनकारी तत्त्व जीवन बाबाकेँ सिरिफ पाँच कट्ठा बाड़ी-झाड़ी छल। जे एक्के दिनक बर्खामे एक मरद करीब पानि लागि गेल। तेकर कारण छल, चारूकात वस्‍ती रहने पानिक निकास नहि। जीवन बाबा एकटा दर्खास्‍त एस.डी.ओ. आ जे.ई.केँ देलखिन जे हमर सबहक पनरह बीघाक प्‍लॉट जे झीलनूमा बनि गेल हेन, तेकर निदान कएल जाए। जीवन बाबाक जिनगी सभ दिन संघर्षमे बीतल। जइ समैमे छात्रक जिनगीमे छला तहू समैमे बाबा गाइक सेवा आ खेती-बाड़ीमे तरकारी-फरकारी उपजबैथ। वएह सोन सन चौमासमे करीब सत्तैर घौड़ केरा, पनरहटा अनरनेवाक गाछ, पाँचटा सीमक गाछक संग करैला, सरीफा, धात्रीम आ अनारसक करीब एक साए गाछ आ तैसंग कट्ठा भरिक घेरा गाछक जड़िमे दू हाथ-तीन हाथ पानि लागि गेलैन। रंग-बिरंगक जे फल-फलहरीसँ लऽ कऽ तरकारी-फरकारी तक छल ओ सुड्डाह भऽ गेलैन। यएह दुर्दशा फलक देख बाबा दरखास्‍त देने छेलखिन। 1960-65 इस्‍वीक अमलमे पुरना मुखिया छला। ओ दछिनवाहि टोल आ मुसहरीक बीचमे एकटा पाइप देने छेलखिन पानिक निकास लेल। गामक जे गोठ टोल अछि जइमे करीब पचास घर मुसलमान, अस्‍सी घर मुसहर, सत्तैर घर धानूक, चालीस घर व्रह्मणक बास अछि ओइ सबहक घर आ चौमासक पानि ओही पनरह बीघाक गोरहा खेतमे अबै छल आ पाइप देने पोखैर होइत दछिनबरिया बाघ दिस चल जाइत छल। जइसँ धान, गहुम, मौसरी, खेसारी, सेरसो, तीसीक संग रंग-बिरंगक तरकारी-फरकारी सभ उपजैत छल। दस साल पहिनौं पंचायतसँ पुलियाक निर्माण भेल छेलइ। आर.डब्‍ल्‍यू.डी. सड़कसँ एकटा सड़क मूख्‍य मंत्रीक योजनासँ मंजूर भेल। ओ सड़क धनुकटोलीसँ दछिनवाहि टोल होइत मुसहरी होइत मुसलमानक टोलमे जा कऽ खतम होइत अछि। जखन सड़कपर मिट्टीकारण होइत छल तखने पानिक निकासी लेल गप-सप्‍प चललै। ठीकेदारकेँ एकटा पूल देबाक छेलै पानिक निकासी लेल। ओ वेचाराकेँ कियो अपना घरक आकि खेतक ऑंगामे पूल बनबैये ने देलक। वेचारा ठीकेदार हारि-थाकि कऽ गोठक पुबरिया चौरमे जा कऽ एकटा पूल बना देलकै जेकर कोनो उपयोग नहि। कहबी ठीके छै- लोल केतौ घोघ केतौ…। सएह पइर। सरकारियो ऐमला-फमिला कि कम पेंच-पाँच लगबै छइ। कियो अपना सीर अपजश लेबहि ने चाहत, ग्रामसेवकसँ लऽ कऽ बी.डी.ओ; जे.ई. आ कलक्‍टर तक ओ ओकरा लिखत तँ ओ ओकरा लिखत। ताबे समैये बीत गेल। सएह भेलै जीवन बाबाक दरखास्‍तक। एस.डी.ओ. लिखलक बी.डी.ओ.केँ आ बी.डी.ओ. लिखलक जे.ई.केँ। जे.ई. जहन सहर-जमीनपर मोआइना करए एला तँ दछिनवारि टोलक विघटनकारी तत्त्व सभ जलखै-चाह-पान करा तेसरसँ कहबा देलक जे ऐठाम पुलक जरूरते ने अछि। जहन ओहू टोलक लोकक जमीन ओइ पनरह-बीस बीघाक पलॉटमे। तेतबे नहि ओही टोलक एकटा प्रोफेसर साहैबक आँगनमे पानि भरि छाबा लागल। आश्‍चर्य तँ ई जे ओहो कहलखिन जे ऐठाम पुलक जरूरत नइ छइ। जहन ढलाइ पूरा भऽ गेलै तहन फेर जे.ई. साहैब सड़कक मोआइनामे एला। संयोगसँ आइ गौंआँ सभ उनटल जे.ई. साहैबपर। जीवन बाबाक तँ सभ किछु दहाइये गेल छेलैन। मन बिखाएल रहबे करैन। जे.ई.केँ देखते बजला- “रौ, घुरना इहे छियो इन्‍जीनियर, पकड़! ला रासा बान्‍ह तँ आ काँच-करचीसँ देह ततारि दहीन।” जे.ई.केँ तँ होशे उड़ि गेलइ। तखने जोखियाक पाँच बर्खक बेटा बाड़ीमे कलपर चलि गेल। ओ ओंघरा-पोंघरा कऽ भरि डाँर पानिमे चलि गेलइ। हल्‍ला भेलइ। जे.ई.केँ आब तँ किछु फुरबे ने करइ। बच्‍चा ताबे कनियेँ पानि पीने छल। जे.ई. बाजल- “अहाँ सभ धीरज धरू। हमरा जाए दिअ। कोनो-ने-कोनो निदान भऽ जाएत।” तैपर किसुन सदाय बाजल- “नहि, नइ जाए दियौ यौ जीवन बाबा।हमर जे घर खसि पड़ल हेन दाबा लागल अखनो पानि अछि, से की हेतइ।” रहमान, जे कुजरटोलीक छल, तखने ओहो हहासल-पियासल दौड़ल आएल। अबिते बाजल- “चलू तँ देखियौ तँ हमरा ऑंगनमे भरि ठेहुन पानि लागल अछि। साँप-कीड़ा सभ अँगने-घरे सहसह करैए।” मुदा दछिनवाहि टोलक लोक कियो ने किछु बजैत। सबहक मन रहइ- धू: कनी-मनी क्षतिये ने भेल। बेसीसँ बेसी ऐबेर उपजा नै हएत। मुदा विरोधी सबहक तँ घर-दुआर खसतै ने। जान-मालक क्षति हेतइ ने। बड़ जे संघर्षशील सभ छला तँ आब बुझौत। हमरा सभकेँ कोन अछि धिया-पुता सभ बम्‍बई-दिल्‍लीमे मारे कमाइए। गुजर-बसरमे कहियो कनिक्को दिक्कत थोड़े हएत। जे.ई.सँ जीवन बाबा पुछलखिन- “कहू तँ एक महिना हमरा दरखास्‍त देना भऽ गेल। ताबे सड़कपर माटिये पड़ि रहल छल। आब तँ गिट्टी-गाट्टी दऽ कऽ सिमेन्‍टसँ ढलाइयो भऽ गेल। कहू तँ दरखास्‍त जे देने रही से कहियो हमरा सूचनो देलौं जे अहाँ चुपे-चाप जाँच करि कऽ चलियो गेलौं। देखू तँ हमर फसिल सबहक दशा।” जे.ई. बाजल- “ई हमरासँ गलती भेल। आब एना नै हेतइ।” जीवन बाबा कहलखिन- “तँ बाजू जे पूल वा पुलिया कहिया बनतै आ हमरा सबहक घर-अँगनाक पानि कहिया निकलत?” जे.ई. बजला- “चारिसँ पाँच दिनमे पानिक निकासी भऽ जेतइ।” “ठीक छै जाउ, मोन राखब। नहि तँ सभ गुण्‍डइ निकैल जाएत।”- जीवन बाबा कहलखिन। जे.ई. साहैब तँ चलि गेला। 10 दिन समैयो बीत गेल मुदा कोनो तरहक कारगुजारी नहि। विघटनकारीलोक तँ अहिना सोचिते अछि जे किछु गमेलोसँ जँ अनकर क्षति होइ तँ ओहन सोचबला लोकक मुँह मलिन नइ होइत अछि। ओकरा खुशीए होइ छइ। सरकारियो तंत्रकेँ तँ वएह गति अछि। ऊहो कि आम जनताकेँ खुशहाल थोड़े देखए चाहैत अछि। कुर्सी भेटलै सभ किछु बिसैर गेल। नारायण यादव चौदह नम्‍बर कोर्ट रमेशक पढ़ाइ चलि रहल छल। बी.ए. पास कए बी-एड. कऽ रहल छला। बी-एड.क परीक्षा दऽ घर आएल छला। आगू पढ़ैक जिज्ञासा सेहो छैन्‍हें। रमेशक पिता किसान छैथ। हुनक आमदनी न्‍यून छैन। जेना-तेना घर-परिवारक काम-काज चलै छैन। पैघ खर्चा लेल जमीन-जाल बेचए पड़ै छैन। रमेशकेँ देखते पिता कहलखिन- “बौआ, परीक्षा केहेन भेलह। आब हम आगाँक पढ़ाइ हेतु खर्च केतए-सँ देबह। औरो धिया-पुता अछि। बेटीक बिआह आ दिनेशक पढ़ाइ कपारपर अछि। आब अहाँ केतौ नोकरी-चाकरी आकि कोनो नीक धन्‍धा करू जइसँ घरमे खुशहाली बनल रहत। घरक काम-काजमे आब अहाँक माए नइ सकै छैथ। तँए आब बिआहो कए लिअ जइसँ माइयोकेँ सुख भेटत आ हमहूँ प्रसन्न रहब। अही साल अखाढ़मे सभा गाछी चलू।” पिताक बात सुनि रमेशजी मौन छला। मौन स्‍वीकार लक्षणम्‍। रमेशक बाबूजी रमेशक सहमति पाबि सौराठक सभा गाछी जाइक तैयारी करए लगला। सौराठ मधुबनीसँ पाँच-छह किलोमीटर उत्तर-पच्‍छिम कोणमे अछि। मिथिलाक पौराणिक परम्‍परा विचित्र अछि। मिथिला छोड़ि एहेन परम्‍परा केतौ नइ छइ। माल-जालक हाट जकाँ बरक हाट लगै छइ। बिआहक लेल बनि-ठनि कऽ बर सभा गाछी अबै छैथ। कनियाँबला सेहो बरक खोजमे सभा गाछी पहुँचै छैथ। कनियागत बरक नाम, ठेकान, मूल, गोत्र आ योग्‍यतासँ अवगत भऽ पंजिकारसँ सम्‍पर्क करै छैथ। बर-कनियाँक मेल आ बरक सोभावसँ कनियागत आश्वास्‍त भेला बाद बिआहक चर्च करै छैथ। ई केतेक नीक बेवस्‍था मैथिली ब्राह्मण समाजक बीच अछि जे कनियागतकेँ बरक खोजमे घरे-घर, द्वारे-द्वार नहि जाए पड़ै छैन। ओना, किछु कनियागत दलालक फेरामे पड़ि ठकाइयो जाइत अछि। सभा गाछीमे एकटा पीपरक गाछ अछि, सुनै छिऐ जे जइ दिन एक लाख ब्राह्मणक जुटान सभा गाछीमे भऽ जाइत अछि ओइ दिन ओ पीपरक गाछ मौला जाइत अछि। जे कनियागत स्‍थिर मने, धैर्यसँ छानबीन कए बरक चयन करै छैथ हुनका सफलता हाँसिल होइ छैन। शादी-बिआह बड़ सोचि-समैझ कऽ करक चाही। बुढ़-पुरानक कथन छैन जे हाड़-बियाही मांस नहि। परिवारक स्‍तम्‍भ नारीए होइ छइ। कुशल गृहणी घरकेँ स्‍वर्ग बना दैत अछि। बिनु घरनी घर भूतक डेरा आ अछि घरनी तँ लागत फेरा। तँए कन्‍याँक शील-सोभावक संग खनदान देखिए कऽ कथा-कुटुमैती ठीक करक चाही। रमेशक बाबूजी गामक दू-चारि भल मानुषकेँ संग कए सभा गाछी पहुँचला। एक-दू दिन केतेक कन्‍यागतकेँ आपस केलैन। बर, पाँच-सात फीट नमगर, छरहरा बदन, गोर वर्ण बड़ सुन्‍दर भव्‍य शरीर। बरक अनुरूप कनिया चाही आ बरातीक स्‍वागत सत्‍कार सेहो खूब नीक जकाँ हेबाक चाही। तैसंग किछु दानो-दहेज गुप्‍त रूपे हेबाके चाही। ओना, ई बरक पिताक इच्‍छा रहिते अछि। तँए बुढ़-पुरान कहै छैथ जे सभ वरयाती कए मन? तँ ओकर जवाब होइत अछि- ‘तीन मन।’ तीन मन ओजनमे नहि, तीनटा मन, एकटा लड़काक मन जे खूब नीक कनियाँ हुअए,दोसरमन बरक पिताक होइ छैन जे हमरा खूब दहेज भेटए आ तेसर मन बरियातीक होइ छैन जे बरियाती लोकैनकेँ खूब स्‍वागत-सत्‍कार हेबाक चाही। एकटा पच्‍छिम तरफक कन्‍यागत हिनका लग जे बरक बापक दूरक सरोकारिये छेलैन- टकरेला। बर-कन्‍याँक विषयमे दुनू पक्षकेँ पहिनहिसँ जानकारी छेबे केलैन। बिआहक दिन-ठेकान तय भेल। मैथिल लोकैन बड़ बुधियार होइ छैथ। बिआहक अन्‍तिम लग्‍नक आस-पास सभा गाछीमे सभा लगबै छैथ। आ धड़फड़मे एक्के-आध दिनक बीच बिआह ठीक करै छैथ। जइसँ ने कार्ड छपबए पड़ै छैन आ ने गाड़ी-घोड़ाक बेवस्‍था करए पड़ै छैन। पाँच-दसटा बराती लए कम खर्चमे बिआह कए लइ छैथ। हमरा गाममे एकटा पण्‍डीजीक बेटीक शादी ठीक भेलैन। कनियागत पुछलकैन- “समैध बराती केतेक एबइ?” बरक पिता कहलखिन- “बरियाती न्‍यूनतम तीन अंकमे रहत।” तैपर कन्‍यागत बजला- “हम नहि समैझ सकलौं!” ताबत शीबू काका बजला- “नहि बुझलहक, तीन अंकक सभसँ छोट अंक भेल- 100 यानी एक साए बरियाती औता।” कन्‍यागत साए गोट बरियातीक बेवस्‍था केने छला। जखन बरियाती दरबज्‍जापर पहुँचला तँ मात्र एकटा मोटर गाड़ीमे बर लगा पाँचटा आदमी छल। ओना, बरक गिनती बरियातीमे नहि होइ छइ। तँए घरवारी पुछलखिन- “समैध, आरो गाड़ी सभ अछि किने?” बरक पिता कहलखिन- “नहि समैध, मात्र चारिटा बराती छी।” ई बात सुनिते कन्‍याक पिता आगि-बबूला भऽ गेला। तामसे थरथराइत बजला- “अहाँ हमर सभ भोजनक सामग्रीकेँ बरबाद करेलौं। अहाँ कहनेरही जे हम एक साए बरियाती आएब। मुदा तैठाम चारिटा बरियाती एलौं अछि! कहू तँ हमरा सभकेँ बेइजत करा रहल छी किने।” बरक पिता बजला- “समैध, चारिटा बराती घरपर एला आ एकटा पुरंधर काका पौखैर महारपर उतैर गेला। ओ पर-पैखाना करि कऽ औता।” कन्‍यागत कुदैत बजला- “हमरा अहाँ बुड़िबक बनबै छी किने।” पुन: बरागत बजला- “समैध, बरातीमे निहालू बाबू। देखबू बाबू, शिबू बाबू, हम आ पुरन्‍धर काका छैथ।अहाँक एक्को चुटकी भोजनक कोनो सामग्री बर्बाद नहि होएत। सुनू नौ (9) नेहालू (17) सत्रह देबू, बारह-बारह हम शीबू जखन औता पुरन्‍धर काका लगौता पचासक धक्का। कहू सौ आदमीक पारस सधत कि नहि। अहाँक हम उपकारे केलौं जे 100 आदमीक विदाइक बदला मात्र पाँच आदमीकेँ देबए पड़त।” कन्‍यागत किछु नहि बजला। रमेशक बिआह साधारणे पूर्वक भेल। आब पति आ पत्नी खुशी पूर्वक दामपत्‍य जीवन बिता रहल छला। किछु दिन सासुरेक रूपैआ-पैसासँ सुख-मौज करैत रहला। मुदा आब पत्नीक फरमाइशक पूर्ति नहि भऽ रहल छैन। रमेश मने-मन सोचैथ जे केतौ जा कऽ कोनो नौकरी करी। रमेशक एक मित्र सुरेश छेलखिन। दुनू मित्र टाका-पैसा कमेबाक हेतु कलकत्ता जेबाक विचार केलैन। पिताक विचार सेहो छेलैन जे बेटा बाहरसँ किछु टाका-पैसा कमा कऽ घर लाबैथ। प्राय: सभ पिताक ई इच्‍छा रहिते छैन जे बेटा नौकरी करैथ, टाकाक उपार्जान करैथ आ घरकेँ खुशहाल बनाबैथ। रमेश आ महेश माए-बापसँ अनुमति लऽ कलकत्ता प्रस्‍थान केलैन। कलकत्ता ‘कल’पर अछि से ओ बुझैत छल। सेाहे आइ देख लेत। बरौनी होइत सिमरिया पूलपर पहुँचल। रमेश गंगा मैयाक मने-मन नमस्‍कार केलक। आ जेबीसँ किछु पैसा निकालि दुनू मित्र माँ गंगाकेँ चढ़ा देलक। आ माँ गंगासँ प्रार्थना करैत बाजल- “हे गंगा मैया, हम सभ जइ धारणासँ कलकत्ता जा रहल छी, से पूरा करब।” गाड़ी नियत समयपर कलकत्ता स्‍टेशन पहुँचल। ऐसँ पहिने दुनू मित्र घरसँ कहियो निकलल नहि छल। शुद्ध देहाती जकाँ दुनू गोरेक देह-दशा आ बगे-वाणि रहइ। धोती-कुर्त्ता आ ललाटपर चानन मिथिलाक पहचान छल। कलकत्ता पहुँच ओ सभ अपने गौंआँ-घरूआसँ भेँट केलक। गाम-घरक लोक सभ अपना गौंआँ-घरूआकेँ बड़ आगत-भागत करैत अछि जे भेलैन। खूब स्‍वादिष्‍ट भोजन आ सम्‍पूर्ण कलकत्ताक भ्रमण, महत्‍वपूर्ण स्‍थानक दर्शन करौलकै। रमेश आ सुरेशक मेहमानी गौंआँ-घरूआक ओइठाम चलए लगलै। ऐ तरहेँ दस-बारह दिन बित गेल। दुनू मित्रकेँ मन लागए लगलै। एक दिन दुनू मित्र सबेरे उठला। स्‍ना-धियान आ भोजन कए बजार दिस विदा भेला। बाट गली जकाँ छल। ई बाट गली होइत आगाँ मेन रोडमे मिलैत छेलइ। जाइतकाल रमेशकेँ लघी लागि गेलैन। लघीक संवेदना विचित्र होइते अछि। जखन एक संगीकेँ लघी लगै छै तँ संगमे जे मित्र रहल हुनको लघी लागिये जाइत अछि। सुरेश सेहो एकटा नालीमे लघी करए लगला। लघी समाप्‍तो ने भेल छल कि पाछूमे दूटा बंगाली पुलिस ठाढ़ देखलक। जी तँ उड़ि गेलइ। तैबीच पुलिस बाजल- “आप इस गलीमे क्‍यों पेशाव किये हैं। बगलमे पेशावखाना बना हुआ है। वहाँ क्‍यों नहीं पेशाव किये। गली को प्रदूषित करने के जूर्म में आप दोनों को गिरफ्तार किया जाता है।” दुनू मित्र अचम्‍भित भऽ गेला। बंगाली पुलिसक सामने बड़ गिरगिरेलाह। किछु रूपैआ-पैसाक प्रलोभन सेहो देलैन। मुदा बिहार पुलिस जकाँ बंगालक पुलिस नहि छल। ओ रमेशआ सुरेशकेँ डाटि-टपैट देलक।आ बाजल- “बिहार से आये हो?” दुनू गोरे एक्के बेर बाजल- “जी हुजुर, बिहारसँ आएल छी।” ओ सभ सोचलैन जे घूसखोरीमे बिहार केतेक बदनाम अछि जँ बिहार रहैत तँ जरूर छोड़ि दइत। दुनू गोरेकेँ पकड़ने पुलिस थानापर लऽ गेल। दुनूकेँ देखते थाना प्रभारी बजला- “आप लोग पाँच-पाँच रूपैआ जमा कीजिए।” सुनिते दुनू मित्रकेँ मन बड़ खुशी भेलैन। जे पाँचे रूपैआमे जान छुटि गेल। पँच-पँचटा रूपैआ दुनू मित्र जेबीसँ निकालि दरोगाकेँ देलैन। दरोगा एकटा रसीदक संग एकटा फार्म सेहो भरि कऽ दैत दुनूकेँ कहलक- “ये सभ कागजात 14 नम्‍बर कोर्टमे मजिस्‍ट्रेट को दे दीजिएगा। वहाँ केश दायर हो जाएगा। आप लोग भागियेगा नहीं। नहीं तो फेरा में पड़ जाइयेगा। और वारण्‍ट हो जाएगा।” थानापर सँ दुनू मित्र उदास मने विदा भेला। कागजात सेरिया कऽ रखलैन। रातिमे डेरापर एला। भरि राति निन्न नहि भेलैन। भोरे उठि स्‍नान-भोजन कए दस बजे कचहरी दिस विदा भेला। लाजे कोनो गौंआँ-घरूआकेँ ई बात नहि कहलखिन। ट्रामसँ कचहरी पहुँचला। कचहरीक दृश्‍य देख आश्चर्यचकित भऽ गेला। एहेन सुन्‍दर आ एतेक मोट-मोट पायाबला मकान कहियो ने देखने। किछु काल धरि रमेश आ सुरेश मकानक भव्‍यता आ लोकक चहल-पहलकेँ देखैत रहला। तेकर बाद चौदह नम्‍बर कोर्टकेँ ताकए लगला। तकैत-तकैत लोगो सभसँ पुछैत-पुछैत आगाँबला मकान तक पहुँचला। ओतए एकटा दफ्तरक आगाँबला मकान तक पहुँचला। दफ्तरक आगाँ किछु लोक चटाइपर बैसल छल। चटाइपर बैसल बेकती सभसँ पुछलैन- “यौ 14 नम्‍बर कोर्ट यएह छिऐ?” मुंशी जे चटाइपर बैस किछु लिख रहल छला। साकांच भऽ गेला। आ ओइ दुनू मित्रकेँ शोर पाड़लैन। रमेश आ सुरेश मुंशीक ओतए पहुँचला। मुंशी पुछलखिन- “आप लोग मोर्डन एपार्टमेन्‍ट गली में पेशाव कर दिऐ हैं।” दुनू गोरे एक्के बेर बजला- “हँ यौ।” रमेशजी दरोगाक द्वारा देल कागज निकालि कऽ मुंशीजीक हाथमे थमा देलैन। मुंशीजी बजला- “तीन-तीन रूपैआ लाइए।” मुंशीजी केँ तीन-तीन गोट टाका निकालि दुनू मित्र देलैन। मुंशीजी दूटा फार्म निकालि दुनूपर किछु लिख रमेश आ सुरेशसँ हस्‍ताक्षर करा कोर्टक अन्‍दर जा कऽ पेशकारकेँ सभ कागजात दए देलखिन। आ बाहर आबि रमेशकेँ कहलैन- “आप लोग यहीं बैठिये। 2 बजे कोर्टकेँ अन्‍दर चले जाइयेगा। यहाँ कोई आप लोगोको बुलाएगा नहीं।” दू बजेक इन्‍तजार करैत दुनू मित्र बैसल रहला। जखन दू बाजल तँ दुनू गोरे कोर्टक अन्‍दर प्रवेश केलक। कोर्टमे मजिस्‍ट्रेट बैसल छला। पेशकार इजलासक निच्‍चाँ एकटा कुर्सीपर बैसल आगाँ टेबुलपर किछु संचिका सभकेँ उलट-फेर करैत छला। ओही समैमे रमेश मुंशीक द्वारा देल कागजात पेशकारक आगाँमे राखि देलैन। पेशकार हिनकर कागज साहैबकेँ बढ़ा देलखिन। साहैब कागजकेँ उलटा-पुलटा कऽ पढ़ि बजला- “आप लोग मोर्डन आपार्टमेन्‍ट गलीमे पेशाब कर दिऐ थे?” दुनू मित्र अपन-अपन हाथ जोड़ि बजला- “जी सरकार! हम लोगों से गलती हो गई। अब से इस तरह की गलती नहीं होगी।” मजिस्‍ट्रेट साहैब सहृदय बेकती छला। ओ पुछलखिन- “आप लोग बिहार से आये हैं?” रमेशक मुहसँ निकलल- “जी सर।” साहैब बजला- “आप लोग आठवें दिन आइयेगा आपका मुकदमा खत्‍म कर देंगे।” रमेशक मुहसँ एकाएक बजा गेल- “कलका रिजर्भेशन है। घर जाना है।” मजिस्‍ट्रेट साहैब दयालू सोभावक छला। पुछलखिन- “बिहार में आप लोगों का घर कहाँ पड़ता है?” रमेश कहलखिन- “मधुबनी जिला, सर।” साहैब बजला- “जहाँ सौराठ सभा लगता है?” रमेश कहलकैन- “जी सर।” मुड़ी डोलबैत मजिस्‍ट्रेट साहैब पेशकारकेँ कहलखिन- “पेशकार साहेब, ऑर्डर सीट तैयार कीजिए।” कहि, मजिस्‍ट्रेट साहैब फाइलपर किछु लिखए लगला। आ पेशकार साहैब ऑडर सीट तैयार कऽ मजिस्‍ट्रेट साहैबक टेबुलपर देलखिन। साहैब, रमेश आ सुरेशकेँ ऐ मुकदमासँ रिहा करैत बजला- “आप दोनों व्‍यक्‍ति ये ऑर्डर लेकर थानापर दे देंगे तथा पाँच-पाँच रूपये जो जमा किये हैं, ओ ले लेंगे।” रमेश आ सुरेश थानापर आबि दरोगाकेँ मजिस्‍ट्रेट साहैबबला कागज देलकैन। दरोगा दुनू बेकतीकेँ पँच-पँच टाका जे बॉण्‍डबला छल से आपस दए देलैन। दुनू गोरे सोचए लगला जे कोन फेरामे भगवान हमरा लोकैनकेँ दऽ देलैन। ◌ चौरचनक बरतन अन्‍धराक हाट शुक्र आ सोम दिन लगैत अछि। वरस्‍पैत दिन चौरचन पावैन छिऐ। इलाकाक लोक सभ पावैन-ले माटिक घैला,मटकुरी, लावन, दीप आ छाँछी कीनैक जोगारमे अछि। चौरचनक धार्मिक मान्‍यता जे होइ ई जानकारी दाइ-माइ लोकैनकेँ होनि वा नहि होनि मुदा बहुत ताम-झामक संग ऐ पावैनकेँ मनौल जाइत छइ। सुवंश बाबू घरसँ बाहर निकलला। हिनका घरक आगॉंमे एकटा यादवजीक घर छैन। सुवंश बाबू यादवजी केँ कहलैन- “यौ जेठरैयति, चलू हाट चौरचनक बरतन आनए।” दुनू गोरे संगतुरिया छैथ। दुनूमे भजार लागल अछि। दुनू भजार हाट दिस विदा भेला। भरि बाट आन घरक जनानी सबहक किरदानीपर गप-सप्‍प करैत ससैर रहल छला। सुवंश बाबू बजला- “यौ भजार, आइ-काल्‍हिक कनियाँ-बहुरिया केकरो लाज-धाक थोड़े मानैत अछि। देखियौ ने हमर पश्‍टनवाली कनियाँ अपन स्‍वामीसँ सबहक सोझेँमे खूब बतियाइत रहैत छइ। कहू! हमरा सबहक बिआह-दुरागमन भेल। दूटा बाल-बच्‍चा भेल तैयो ने दोसरक सामने घरवाली हमरासँ बाजल हेती। बतियाइत अछि ओ सभ आ लाज होइए हमरा।” जेठरैयति बजला- “की करबै! देश दुनियाँक हालत देखिए रहल छी। ऐ समैमे कनी अपने आँखि मुनि लेब नीक। की कहूँ हमर पुतोहु हमरा लग आबि बाबूजी-बाबूजी करैत रहैत अछि आ बेटाक शिकायत करैत रहैत अछि। ने माथपर नुआँ रखैत अछि आ ने बदनपर कपड़ा। हम तँ लाजे कठौत बनल रहै छी। जेना हमर बेटी रहए तहिना करैत रहैत अछि। की कहूँ, बेटो ने एक्को बेर डाँटै-डपटै छइ। आनो बेकतीक लाज-धाक नइ होइ छइ।” दुनू भजार गप-सप्‍प करैत अन्‍हरा हाट पहुँचला। हाटपर चौरचन पावनिक सभ समान कीनिलैथ। दूटा घैला सुवंश बाबू कीनलैथ आ एकटा जेठरैयति। दुनू भजार बात-चीत करैत पुन: हाटसँ घर दिस विदा भेला। गाम अबैसँ पहिनहि जेठरैयति मजाक करैत सुवंश बाबूकेँ कहलखिन- “यौ भजार, हमरा हाथमे एकटा घैल आ अहाँ हाथमे दूटा। ई अहाँकेँ नीक लगैत अछि?” ई गप सुनिते सुवंश बाबू एकटा घैलकेँ जोरसँ पटैक देलखिन आ कहलखिन- “लिअ आब दुनू भजारकेँ एक-एकटा घैल रहल ने।” ◌ छोटकी पुतोहु आनन्‍दक बिआह बड़ धूम-धामसँ भेल छल। कनियाँ अति सुन्नैर, तँए दानो-दहेज कमे भेटल छेलैन। आनन्‍दक पिताश्रीक घोषणा छल- “कद ऊँची, नाक लम्‍बी और रंग गोरी तो आओ, नहीं तो बाहर जाओ।” अही अधारपर कनियाँक चुनाव भेल छल। कनियाँक आगत-भागतमे आनन्‍दक माए राधादेवी परेशान छेली। मनमे होइत रहैन जे पुतोहु औत तँ काम-काजमे मदैत करत। सेवा सुश्रुषा करत। भानस-भात करत। माल-जालक नेकरम सेहो करत। बाधसँ आएब तँ एक लोटा पानि लाबत आ बिऐन हौंकैत...। आदि-आदि सभ टहल-टिकोरा करत...। आइ आनन्‍दक माए राधा देवी बड़ खुश छैथ। खुश ऐ लेल नहि जे आनन्‍द कनियाँ लए कऽ आबि रहल छैथ, खुश ऐ लेल जे आनन्‍द बिआह करैले तैयारे नहि भऽ रहल छल। बिआहोक उमर होइ छइ। उमर टुटल जा रहल छेलइ। ओ बिआह नइ करबाक हेतु अनेको बहाना बना रहल छल। कहैत छल ऐगला साल करब, आ जब ऐगला साल आएल तँ फेर ऐगला सालक बहाना करैत रहै छल। राधाक आग्रहपर बिआहक लेल तैयार भेल छल। ओ दिन आबि गेल जखन आनन्‍द अपन पत्नीकेँ अपना घर अनलक। मोटर गाड़ीक अबाज सुनिते अड़ोस-पड़ोसक दाइ-माइ लोकैन सभ अपन काम-काज छोड़ि-छोड़ि कनियाँ देखए आबए लगली। ननौरवाली सागमे सँ अटकी-मटकी बीछि रहल छेली। ओहो सभ किछु छोड़ि दौगल एली। लौफावाली बच्‍चाकेँ दूध पियाबैत छेलीसे बच्‍चाकेँ नेनहि दौगली। हर्ड़ीवाली आ ठाढ़ीवालीकेँ आमक टुकला लेल झगड़ा होइत रहै, ओहो दुनू गोरे झगड़ा छोड़ि कनियाँ देखए लफरल विदा भेली। राधा बरतन माजै छेली। बरतन माजब छोड़ि कनियाँक परिछण हेतु सामग्री ओरियाबए लगली। सभ दाइ-माइ जमा भऽ गेली। माथपर दौरा जइमे दीप जरैत छेलै, लय भरैत बन्‍हने गीत गबैत मोटर गाड़ी लग, पहुँचली। गीतक बोल छल- “एलै शुभ-के लगनमा शुभे हे शुभे...।” पाँच-सात गोट सधवा मौगी सभ कनियाँक परिछण केलक। तेकर बाद कनियाँक ननैद रूपम दाइ कनियाँ-बरकेँ आँगन लए गेल। जेतेक दाइ-माइ लोकैन आएल छेली ओ सभ अपन-अपन घर दिस विदा भेली। बाटमे कनियाँक टिका-टिपण्णी हुअ लगल। सिसवारिवाली काकी जे सभसँ बुजुर्ग छेली ओ बजली- “गे दाइ, आइ तक एहेन कनियाँ नइ देखने रही। देखही ने केकरो देख कऽ माथो झँपलकै। हमर पुतोहु एहेन रहैत ने तँ छाउर लगा कऽ जी खींच लैतिऐ। कहू तँ ससुरोक लाज केलकै।” नवानीवाली बजली- “एतेकटा कहीं मौगी होइ छइ..!” तैपर भेजावाली बजली- “पीठ केहेन चाकर-चौरस छै, जेना सुकदेव पहलमान होइ!” गुलछर्रा छोड़ैत सभ अपन-अपन घर गेल। राधा भनसा घरमे जा बेटा-पुतोहुक लेल खूब नीक तीमन-तरकारी बनौलक। पापड़, तिलौरी, तिलकोरक तरूआ थारीमे सजा बेटा आनन्‍द आ पुतोहु सुलेखा लेल ओकरा कोठलीमे पहुँचली। माएकेँ देखते आनन्‍द बाजल- “माए, अखन आठो नहि बाजल अछि आ तूँ खेनाइ लऽ कऽ आबि गेलेँ।” राधा बजली- “हँ बेटा,कनियाँ जे आएल अछि। नहि जानि कनियाँ कखन भोजन केने हेती।” बजैत राधा टेबुलपर थारी राखि चापाकलपर सँ एक लोटा जल आ एकटा गिलास सेहो आनि कऽ टेबुलपर राखि देलक। आनन्‍द आ ओकर पत्नी सुलेखा दुनू गोरे भोजन करए लागल। सुलेखा बजली- “भोजन के बनौलक अछि।” आनन्‍द कहलकै- “भोजन माँ बनेने हेती।” सुलेखा बजली- “खाना बनबैले नौकरानी नहि रखने छी। हमरा ओतए तँ आँगनक लेल एकटा नौकरानी आ दरबज्‍जा परहक लेल एकटा नौकर अछि।” आनन्‍द आ सुलेखा भोजन करए लागल। राधा बीच-बीचमे आबि परसन दए दैत रहथिन। भोजन समाप्‍त भेल। राधा आँठि फेरि एक जग पानि आ एकटा गिलास आनि टेबुलपर राखि गेली। आनन्‍द आ सुलेखा पूरब-पच्‍छिमक गप-सप्‍प करैत कखन सुतली से राधा नहि बुझि सकली। राधा भोरे उठि अँगना-दरबज्‍जामे झाड़ू लगौलक। घर आ आँगनमे फिनाइलबला पानिसँ पोछा लगौलक, तेकर बाद रसोइ घरमे जा सभ बरतन सभ साफ केलक। चाह बनौलक। दू कप चाह पहिने सुलेखा आ आनन्‍दक हेतु छनलक। दू कप चाह लऽ कऽ आनन्‍दक कोठरीक दरबज्‍जा खटखटेलक आ बाजल- “बेटा आनन्‍द, उठू। देखू सुरूज भगवान निकैल गेल छैथ। चाह पीब लीअ तखन सुतब।” दरबाजा खुजल राधा चाहक ट्रे टेबुलपर राखि बाहर आबि गेली। एक कप चाह अपन बेटी रूपम लेल आ एक कप चाह अपने वास्‍ते लए पीअ लगली। आनन्‍द आ सुलेखा सेहो चाह पीबैत रहैथ। सुलेखा रौतुका भोजनक आ अखुनका चाह प्रशंसा करैत बजली- “आनन्‍दजी, अहाँक माए अनमोल रत्न छैथ। हिनका हाथक चाह आ भोजन तँ मुहोँसँ नहि छुटैत अछि।” आनन्‍दजी बजला- “सुलेखा, माएकेँ सभ लूरि छइ। एकटा बेटी छइ। देखियौ ने ओकरो सभ लूरि सिखा देने अछि। हमरा बहिनकेँ कोन लूरि ने अछि। ई सभटा माइक देन अछि।” ताबत चाहक चुस्‍की लैत रूपम भौजीक कोठरीमे प्रवेश केली आ बजली- “भौजी, हमर चर्चा किए करै छी।” सुलेखा ऐंठैत बजली- “हम अहाँक चर्चा किएक करब। अहाँक भाइये अहाँक चर्चा करैत अछि।” आनन्‍दजी बजला- “बहिन, कनी भौजीकेँ अपन लूरि सभ सीखा दहीन।” भौजी चद-दे बजली- “हमरा कोन लूरि नइ अछि। जे हम अहाँक बहिनसँ लूरि सिखब। ओ अपन लूरि अपने लग रखथु।” रूपम अपन भौजीक हाव-भाव, बात-विचार आ अहंकारकेँ भाँपि चुकल छल। ओ चाह पीबैत अपना कोठरीमे चलि गेली। आनन्‍द अपन खेती-पथारीकेँ देखैले बाध-बोन जाए लगला। राधा जन-बोनिहारक जलखै लए खेतपर पहुँचाबए लगली। राधा ओमहरसँ माल-मवेशीक लेल एक पथिया घासो नेने अबैत छेली। राधाकेँ मनमे होइत रहैत छल जे पुतोहु खाना बना कऽ रखने हेती। मुदा पुतोहु तँ जलखै कए जे सुतै छेली से सासुकेँ बाधसँ एलाक बाद आ भोजन बनलाक बादे उठै छेली। उठि स्‍नान कए अपनेसँ खाना परैस बिनु केकरो खुऔनहि अपने खा कए पुन: कोठरीमे बन्‍द भऽ जाइत छेली। ऐ तरहेँ बहुतो दिन बीति गेल मुदा सुलेखामे कोनो सुधार नहि भऽ सकल। कएक बेर आनन्‍दो कहि कऽ थाकि गेल छला। सुलेखा घरक वातावरणकेँ बिगारए लागल। सासु-पुतोहुमे मन-मुटाव बढ़ि गेल। राधाक मनमे भेल छलैन जे पुतोहु औत। सेवा करत। कपड़ा-लत्ता साफ करत। मुदा सभ मनोरथ...। सेवा केनाइ तँ दूर जे प्रेमसँ बातो नहि करैत छेलैन। राधा भोरे उठि सभ घर-दुआरकेँ झाड़ूसँ साफ कए पोछा लगा मवेशीक लेल चारा लाबए चल गेल। जखन ओ बाधसँ आबैथ तँ सुलेखाकेँ सुतले देखलैन। मन तँ घोर भऽ गेलैन। मनमे ई आशा लागल रहैत छेलैन जे घर जाएब तँ सुलेखा एक लोटा पानि आनि आगाँमे देती। बिऐन डोलेती। मुदा एकोटा मनोरथ पूर नहि भेल। पुतोहुकेँ सुतल देख राधा अपनेसँ चापाकलपर जा हाथ-पएर धोलैन। रसोइ घर खोलि नाश्‍ता परोसि कए हवामे बैस नाश्‍ता कए लैत छेली। राधा सुलेखाक खातिरदारी करैत-करैत उबि चुकल छेली। बिना किछु बजनहि। किछु ठंढ़ाइत फेर भनसा घर खोलि भानस करए लगली। मुदा सुलेखा सुतले रहली। राधा मनमे सोचै छेली जे बेटा खेतसँ आएत आ भोजन समयपर नहि भेटतै तँ सुलेखाकेँ गारि-फज्‍झैत करत। आइ बेटासँ शिकायत करबाक उचित मौका देख रहल छल। तँए सुलेखाकेँ सुतले छोड़ि देलक। सुलेखाक नीन अचानक टुटि गेल।ओ धड़फड़ाइत भनसा घर गेली। ओतए देखलैन जे सासु भनसा बना रहली अछि। सुलेखा बजली- “चुल्‍हा लगसँ हटथिन ने हम भानस कऽ लइ छी।” राधा चुल्‍हा लगसँ नहि उठली। सुलेखा मुँह बिजकबैत अपना कोठरीमे जा सुति रहली। आनन्‍द खेतमे काम-काजकेँ सलटिया जखन कलौ बेरमे घर एला तँ देखै छैथ माए खाना बना रहल अछि आ सुलेखा अपना कोठरीमे सुतल अछि। माएसँ पुछलखिन- “माए, भानस तूँ बना रहल छेँ! सुलेखाकेँ किछु भऽ गेलैहेँ की?” राधा अपन बेटाक मुहसँ ई बात सुनिते तमशाएल मुद्रामे बाजल- “कनियाँकेँ की हेतइ। हम तँ तोरा सबहक नौकरानी छीहे।” आनन्‍द तामसे सुलेखाकेँ उठौलक आ ओकरा गाड़ि-फज्‍झैत करए लागल। सुलेखा मानएवाली नहि। ओहो आनन्‍दक तेरहो-पुरखाकेँ उकटए लगल। आनन्‍द खेतसँ गरमाएल आएले छल, तमसाएल छलाहे सुलेखाकेँ एक-दू थप्‍पर लगा देलक। आब तँ सुलेखा जोर-जोरसँ कानए लगली। कानब सुनि अड़ोसिया-पड़ोसिया जमा भऽ गेल। राधो भनसा घरसँ दौगल एली। आ बेटाकेँ डॉंट-फटकार देबए लगली। आनन्‍दकेँ हाथ पकैड़ कोठरीसँ बाहर केली। आ सुलेखाकेँ बोधए लगली। पुतोहु पैघ बापक बेटी तँए ओ केकरो ताना-बाना सहएवाली नहि छेली। राधोकेँ गाड़ि-फज्‍झैत करए लगली। बात दिनानुदिन तनाव आ अशान्‍तिक तरफ बढ़ए लगल। सुलेखा दू दिनसँ किछु ने खेने छेली। राधाक काम-काज बढ़ि गेल। आब तँ आनन्‍द आ आनन्‍दक माइयो परेशान रहए लागल। दुनूकेँ डर होमए लगलैन जे कहीं आत्‍महत्‍या ने करि लिअए। केतेक बुझैला-सुझेलासँ आ घटनाक जिम्‍मेदारी अपना ऊपरमे लए दुनू माय-पुत गलती सुलेखासँ मानलक, तखन सुलेखा जे दू दिनसँ भूखल-पियासल छल। दतमैन केलैन आ मुँह धोलैन। आ पछाइत भोजन केली। राधा हारि मानि सभ कार्य पूर्ववते करैत रहल। धीरे-धीरे दुनू पति-पत्नीमे मिलान भेलइ। आनन्‍द बाजल- “सुलेखा सभ माइ-बापक इच्‍छा होइ छैन जे पुतोहु घरक काम-धन्‍धाकेँ देखैथ आ सासु-ससुरक सेवा करैथ।” आनन्‍दक एतेक बजनाइयो समाप्‍त नहि भेल छल कि बिच्‍चेमे सुलेखा बाजि उठल- “हम अहाँ-सबहक नौकरानी बनि नहि आएल छी। हमर बाप केहेन छला जे हमरा एकटा भिखमंगा ओतए बियाहि देलक।” कहैत सुलेखा कानए लगली। सुलेखा धनिक घरक बेटी। कहियो भानस केनाइ तँ दूर जे अपन कपड़ो नहि साफ करैत छल। ऐ प्रकारे ओ अपन मर्जीसँ काम-काज करैत छल। राधाक इच्‍छा छल जे पुतोहु हमरासँ पुछैथ जे खानामे की सभ बनेबाक अछि। केतेक चाउर, केतेक दालि... इत्‍यादि इत्‍यादि। मुदा सुलेखा अपन मर्जीसँ कोनो काज करैत छल। अपना मन मोताबिक रसोइ बनबैत छल। ओ खाना दोसरकेँ पसिन होइ अथबा नहि। एक दिनक बात छी। सुलेखा तरूआ छानि रहल छल। ई देख राधा बाजल- “छानि कऽ खेबाक छह तँ बापकेँ कहक जे एक टीन तेल भेज देतह।” ऐपर सुलेखा जवाब देलक- “हिनकर बाप कहियो एक किलो तेल भेज देने छेलैन।” राधा सुलेखाक जवाब सुनि तिलमिला कऽ रहि गेली। ऐ प्रकारे सासु आ पुतोहुमे कोनो-कोनो छोटो-छोटो बातपर कखनो बहसवाजी शुरू भऽ जाइत छल। राधा अपन मन मसोइस कऽ रहि जाइ छेली। कामकाजु राधा दिन-प्रति-दिन चिड़चिड़ा सोभावक होबए लागल। ओना, एहेन बात नहि छल जे आनन्‍द अपना पत्नी सुलेखाकेँ नहि समझाबैत छल। परन्‍तु सुलेखा अपना सामने केकरो मोजरे ने दैत दल। एवम्‍ प्रकारेण पति-पत्नीमे सेहो मन-मुटाव बढ़ि गेल। सुलेखा अपना परिवारकेँ नरक बना देने छल। सुलेखा रूपवती छल तँए दहेजोमे छूट भेल छल। ओकरा अपन सुन्‍दरता आ बापक सम्‍पैतपर घमण्‍ड छेलैन। ओ अपनाकेँ घरक मालकिन आ अन्‍य सदस्‍यकेँ नौकर बुझैत छल। राधा टुटि चुकल छल। एक तँ काम-काजक बोझ, दोसर छोटो-छोटो बातक लेल हर-हर खट-खट होइत छल। एमहर दोसर बेटा सुरेश प्रतियोगिता परीक्षामे दिन-राति लागल रहैत छल। बी.एड. पास कए चुकल छल। टीईटी परीक्षामे सेहो नीक अंक आएल रहइ। तँए ओ शिक्षक भऽ गेल छल। मुदा सुरेश अपना घरमे जेठ भाइक पत्‍नी जे बड़का घरक बेटी छल, ओकर किरदानी देख नेने छल। तँए हेतुए ओ सोचैत छल जे हम कोनो मध्‍यम वर्गक परिवारक लड़कीसँ शादी करब। लड़कीक शील-सोभाव नीक होइ। काजुल होइ। घरक काज-करैमे निपुण होइ। ओहन गुणवाली लड़कीसँ शादी करबाक सोचमे छल। सुरेशक पिताजी आब बुढ़ भऽ गेल छला। ओ जेठकी पुतोहुक बेवहारसँ एतेक ने आहत भऽ गेल छला जे ब्‍लड-प्रेसरक शिकार भऽ गेला। सुरेशक माएकेँ जेतेक प्रसन्नता जेठका बेटाक बिआह करैमे छल तेतेक सुरेशक बिआहमे नहि। ओ गोनू झाक बिलाड़ि जकॉं पाकि चुकल छेली। तँए छोटका बेटाक बिआहक चर्चो नइ करै छेली। आ राधाकेँ कोनो विशेष जिज्ञासो नहियेँ छल। संयोगवश भवानी प्रसादजी अपन बेटी रोशनीक रिश्‍ता लऽ कऽ एला। सुरेश पहिनहिसँ ओइ परिवारकेँ जनैत छल। भवानी प्रसादक पुत्र सुरेशक संगी छल। तँए सुरेश भवानी प्रसादक ओइठाम जाइत-अबैत छल। रोशनीक शील-सोभावसँ सुरेश तेतेक ने प्रभावित छल जे एको बेर नाकर-नुकर नहि केलक। रिश्‍ताक मंजूरी दए देलक। दुनू परिवार स्‍वजातीय छल। अन्‍तरजातीय विवाहसँ ओ घृणा करैत छल। एमर राधाकेँ कोनो उत्‍सुकता आ प्रसन्नता नहि छल। ओ मने-मन सोचैत छल बड़की पुतोहु तँ सभ गुर गोबर काइये देलक। आब ई की करत ओ भगवान जानैथ...। सुरेशक बिआह भेल। बर-कनियाँ घर आएल। राधाक मन टुटल छल तँए ओ परिछनोमे नहि गेल। लाचार भऽ दियादिनी सुलेखा बर-कनियाँक परिछण कए घर लौलक। राधा तवियत खरापक बहाना केने छेली। रोशनीकेँ जखन पता लागल जे सासु माँ बीमार छैथ तँ ओ कोहबर घरसँ निकैल सासुक कमरामे गेल आ पहिने राधाक पएर छुबि प्रणाम केलक। आ पुछलक- “माँ, तबियत ठीक अछि की नहि।” एकाएक नबकी पुतोहुकेँ देख राधा लजा गेली। उठि कऽ बैसैत बजली- “कनियाँ, माथमे दर्द भऽ रहल अछि।” रोशनी तुरन्‍ते भिक्‍स लए सासुक माथमे लगौलक। आ किछु काल धरि पएरकेँ सेहो दबलक। आइ बड़ फुर्तीसँ सुलेखा खूब नीक जकाँ भानस-भात कए रोशनीकेँ भोजन परोसि खेबाक लेल दैत बाजल- “कनियाँ, खाना खा लीअ, कखन खेने हएब कखन नहि।” रोशनी बजली- “जखन सासु माँ भोजन करती तेकर बादे हम भोजन करब।” तैपर सुलेखा बजली- “माँक तबियत खराप छैन, जखन इच्‍छा हेतैन खा लेती।” रोशनी अपन खाना लए खुद सासु माँक कमरामे गेली आ एक कौर भात दालिमे मिला हाथमे लए बजली- “माँ, छोटकी पुतोहुक हाथसँ एक कौर खाना खाथु।” कहैत हाथ सासु माँक मुँहमे देलक। राधाक एक कौर भातसँ सभ दुख दूर भऽ गेल। भोजन करैत कहलक- “बेटी, जाउ अहूँ भोजन कए लीअ।” “नहि माँ जाबत अहाँ नहि खाएब ताबत हमहूँ नहि भोजन करब।” राधा छोटकी पुतोहुक जिद्दकेँ नहि टारि सकल। राधा भरि पेट भोजन केलक। राधाक खाना खेलाक बाद रोशनी आँठि फेरि कोठरीसँ बाहर भेल। पछाइत सुलेखा आ रोशनी माने दुनू दियादिनी संग-संग भोजन केलक। भोजन केला बाद सुलेखा सुतबाक लेल अपना कोठरीमे चल गेल। आ रोशनी एक लोटा पानि लए सासु माँक कोठरीमे जा राखि देलक आ सासु-माँक पएर दबाबए लगल। राधा जखन बाजल- “जाउ कनियाँ, अहाँक आइ पहिल दिन अछि, थाकल ठेहियाएल हएब। अराम करू गे।” तखन रोशनी सासु-माँकेँ बिछौन झारि मशहरी लगा कए अपन कोठरीमे आराम करक लेल चल गेली। राधा मने-मन रोशनीकेँ असिरवाद दऽ रहल छल। आ सोचैत छल। भविसमे जे हुअए मुदा अखन तँ अबैत देरी एतेक खातिरदारी तँ केलक। राधा छोटकी पुतोहुक परिछणमे नइ गेली तेकर आब पश्चाताप हुअ लागल छैन। रोशनी साक्षात देवी छैथ जे हमरा घरकेँ स्‍वर्ग बनौत...। यएह सभ सोचैत-विचारैत राधा कखन सुति रहली से नहि जाइन। रोशनी आ राधाक बीच जे क्रियाकलाप होइत छल से सुलेखा देखैत रहल। सुलेखा अपन सासु-माँक अदखोइ-बदखोइ रोशनीकेँ सुनाबए लगली। रोशनी सुलेखाक कोनो बातक जवाब नहि दइ छेलखिन। रोशनीकेँ अपन बिआहक पूर्वहिसँ सुलेखाक किरदानी सुरेशक माध्‍यमसँ बुझल रहैन। भोरे रोशनी उठि झाड़ू लऽ कऽ घर-आँगनकेँ बाहरए-सोहरए लगली। फरीच नहि भेलाक कारणे जखन सुलेखा अँगना बहारैत देखलक तँ ओकरा पहिने भेलैन जे राधाआन दिनुका जकाँ आँगनमे झाड़ू लगा रहल अछि। मुदा जखन आगॉं बढ़ल तँ रोशनीकेँ बाढ़ैन लगबैत देखलक तँ आश्चर्यचकित होइत बाजल- “कनियाँ, अहाँ काल्‍हिये एलौं आ आइये बाढ़ैन पकैड़ लेलौं। कहू तँ अहाँक माए-बाप की कहता। एतेक काज केनाइ कोनो जरूरी छइ!” रोशनी बजली- “बहिन, ई तँ हमर अपन काज अछि। हम नइ करब तँ के करत।” सुलेखा चुपे रहि गेली। राधा भोरे उठि बाधसँ घास आनए गेल छेली। छोटकी पुतोहुक बेवहारसँ राधा गदगद छेली। तँए राति खूब मनसँ सुतलो छेली। रोशनी घर-दुआरिकेँ बहारि एकटा टोकरीमे बाहरन-सोहरन उठा रहल छेली। ताबत राधा घास लऽ कऽ आँगनमे प्रवेश केलैन। आकि रोशनी देखलक, चटे बाढ़ैन छोड़ि सासुक माथपर सँ घासक छिट्टा लऽ घास रखैक जगहपर जा कऽ राखि आएल। राधा रोशनीकेँ कहए लगल- “तूँ किएक बढ़नी धेलह। हम अबितौं तँ झाड़ू लगा दितौं।” ई कहैत रोशनीक हाथसँ बाढ़ैन लेबए लगली। मुदा रोशनी बजली- “माए, आब अहाँकेँ काज करैक जमाना नइ अछि। अहाँ बैसू, अराम करू आ हम सभ काज करब।” राधा सुसताए लागल। ताबत रोशनी सासुक लेल एक लोटा पानि आ एकटा दतमैन आनि हाथमे थम्‍हबैत बजली- “सासु-माँ, ई दतमैन करौथ हम ताबत जलखै बना दइ छिऐन।” जलखै तैयार भेल। सुरेशक लेल भोजन आ टिफीन सेहो तैयार केलक। किएक तँ सुरेशकेँ विद्यालय जेबाक छेलैन। आनन्‍द आ राधा जलखै करि अपन-अपन काजमे लागि गेल। एमहर रोशनी अपन जेठ दियादिनीकेँ माने सुलेखाकेँ हुनक कोठरीमे जलखै लऽ कऽ पहुँचली। सुलेखा रोशनी संगे जलखै केलैन। आ दुनू अपना-अपना काजमे लागि गेली। रोशनी राधाक आधासँ बेसी काजकेँ सम्‍हारि लेलैन। सुलेखा रोशनीक बेवहारसँ आहत होइत रहली आ मने-मन अपनाकेँ अपराधी मानि पश्‍चातापो करैत रहै छेली। रोशनीक ज्ञान, विद्वुता आ चालि-चलन ओकरा घमण्‍डकेँ तोड़ि देलक। राधा आब सकुन महसूस करए लगली। फेर घरमे खुशहाली आबए लागल। एक दिन रोशनी अपन घरक सभ काम-काज निपटा भोजन कए सुतल छेली। ताबत रोशनी कोठरीमे चौकीपर सुतल राधाक पएर दबा रहल छेली। ओही समैमे ग्‍लानिसँ मर्माहत सुलेखा कनैत ओइ कमरामे घुसल आ बाजल- “माए, ऐ अभागिनकेँ क्षमा कए दीअ। अहाँ हमरा सबहक सुख-सुविधा लेल एतेक दिन-राति खटैत रहै छी। माए, हमरासँ अहाँकेँ बड़ कष्‍ट भेल। हम अहंकारी भऽ गेल छेलौं। रोशनी हमरा घरक साक्षात लक्ष्‍मी छैथ। एतेक पढ़ल-लिखल भऽ कऽ जे हमरा सबहक सेवा करै छैथ ओहीसँ हमरो रोशनीसँ शिक्षा भेटल जे परिवारक सदस्‍य खास कए सासु-माँ सँ बढ़ि ऐ संसारमे कियो नहि अछि। तँए हमरा सन अभागिनकेँ माफ कए दीअ।” कनैत सासु-माँकेँ पएर दबाबए लगली। राधा बजली- “बेटी भोरक हेराएल जँ साँझमे घर आबि जाए तँ ओकरा हेराएल नहि कहल जाइ छइ।” आनन्‍द पढ़ल-लिखल युवक, सभ तमाशा देख रहल छल। बाजल- “माए, सुलेखाकेँ माफ कए दहीन। कुल आ नीक खनदानक बेटी छोटकी कनियाँ हमरा घरकेँ साक्षात्‍ लक्ष्‍मी छैथ। मध्‍यम घरक बेटी एहेन होइत अछि जे बिगरल घरकेँ सुधारि दैत अछि।” ई कहैत आनन्‍दोक आँखिसँ नोर झहरए लगल। ◌ गोबर बिछनी कमली आ मंगली बाल-संगनी छेली। दुनूक घर सटले रहैन। दुनू माए-बाप अमीर किसानक ओतए मजदूरी कए घर चलबैत छेलखिन। घरक धिया-पुता सेहो ऐ काजमे हुनका लोकैनकेँ सहयोग करैत रहैन। कमली आ मंगली भोरे उठि घरक सभ काम-काज कए जलखै कऽ गोबर बीछैले गाइक पाछू-पाछू चलैत रहै छेली। साँझ-भिनसर गैवार-महींसवार अपन-अपन गाए-महींसकेँ चरबैले खोलै छल। कमली आ मंगली माथपर पथिया लेने महींसक पाछू-पाछू गोबर दिस तेना धियान लगौने रहै छेली जेना पोखरिक कछेरमे बौगला माछ पकड़ै खातिर धियान लगौने रहैत अछि। तपस्‍वी जेना तपस्‍यामे लीन रहै छैथ तहिना कमली आ मंगली गोबर बीछैमे लीन रहैत छल। चितकबरी गाए गोबर केलक आकि दुनू सहेली दौड़ल आ कमली अगुआ कऽ गोबर उठा लेलक। दुनूमे कम्‍पेटिशन रहै छेलइ। हम अधिक गोबर बिछी तँ हम अधिक गोबर उठाबी। जखन गोबरसँ पथिया भरि जाइत रहै तखन दुनू सहेली नमहर आरिक कछेरमे ओकरा जमा कऽ लैत छेली। आ फेर गोरब बीछैमे लीन भऽ जाइ छेली। गोबरक उपयोगिता आ ओकर महत्‍व कमली आ मंगली बुझौ कि नहि मुदा गोबर जमा कए ओकर गोरहा-चिपड़ी बनाएब तँ जनिते छेली। समय-समयपर ओकरा बेच किछु आमदनीक जोगार सेहो कए लैत छेली। एक दिन गोबर बीछैक क्रममे गामक नेना-भुटकाकेँ सिलेट-पेन्‍सिल लए विद्यालय जाइत देखलक। दुनू अपनामे संकल्‍प केलक जे हमहूँ सभ पढ़ब। ई विचारक भाव दुनूक मनमे जगलै। ई विचार करैत अपन-अपन घर पहुँचल। दुनू अपन-अपन माए लग पढ़बाक इच्‍छा जाहिर केलक। दुनूक उमेर तकरीवन आठ-नअ बर्खक भेल छेलइ। दुनूक माए अपन बेटीकेँ डॉंट-फटकार देबए लागल। कहलक- “गइ लड़कियो केतौ पढ़लकै हेन। तूँ पढ़ि कऽ हाकीम बनबें की। तो पढ़बें तँ की नौकरी करबेँ? घरक काम-काज के करत? बेटीकेँ पढ़ौला-लिखौलासँ ओ दूरि भऽ जाइ छइ। ओकरामे उदण्‍डता, लोक लज्‍जा, निर्मजता आ आदि-आदि दुर्गुण सभ आबि जाइ छइ। तँए तोरा नइ पढ़ए देबौ।” दुनूक माए एकठाम जमा भऽ अपना-अपना बेटीकेँ समझाबए-बुझाबए लगली। ओही समैमे कमलीक पिताजी सेहो आँगन आबि गेला। घरवालीकेँ बिगड़बाक कारण पुछलखिन। घरवाली व्‍यंग पूर्वक बाजल- “अहाँक बेटी पढ़त आ हाकीम बनत। किदैन कहलकै जे हम पटोर पहिरब तँ आँखि कहलकै जे हम संगेमे छियौ।” कमलीक पिताजी बजला- “कमली पढ़त तँ अहाँक देह एना किए जरैत अछि।अहाँकेँ एना ईर्ष्‍या किए भऽ रहल अछि। अहाँक माए-बाप नहि पढ़ौलक सएह एकरो प्रति सोचै छी।” कमलीकेँ ओकर पिता दुलारसँ गोदमे लैत पुछलखिन- “बेटा, तों पढ़बें तँ हम सिलेट, पेन्‍सिल, किताब-कॉपी सभ कीनि कऽ आनि देबौ।” कमली डेराइत बाजल- “बाबूजी, हम घरक कामो-काज कए देब आ पढ़बो करब।” तैपर कमलीक पिता कहलखिन- “तों जहाँ धरि पढ़मेँ हम पढ़ेबो।” कमली बड़ खुश भेली। तुरन्‍त दौग कऽ सभ हाल मंगलीकेँ सुनौलैन। कमली आ मंगली खुश भऽ नाचए लगली आ बजली- “हमहूँ पढ़ब, हमहूँ पढ़ब।” दोसरे दिन दुनूक पिता मजदूरी करि कऽ पैसासँ प्राथमिक विद्यालयमे नाम लिखा देलक। आ ओइ दुनू छात्राक नाम बदैल देल गेलइ। आब कमलीक नाम राधा आ मंगलीक निकहा नाम कुसुम भऽ गेल। राधा आ कुसुमकेँ सिलेट-पेन्‍सिल आ मनोहर पोथी खरीद देल गेलइ। दुनू सहेली मन लगा कऽ पढ़ए लगल। राधा ओ कुसुमक काम बढ़ि गेलइ। गोबर बिछनाइ, घरक बरतन-बासन मँजनाइ आ पढ़नाइ-लिखनाइ इत्‍यादि। गोबर बीछि गोरहा-चिपड़ी बना ओकरा बेच अपन पढ़ाइक खर्च सेहो निकालि लैत छल। किछुए दिनमे ओकरा सभकेँ किताब पढ़नाइ, लिखनाइ सेहो आबि गेलइ। ‘बाले दण्‍ड आ सियाने पाठक’ ऐ आधारपर ओ दुनू वर्गमे नीक स्‍थान आनए लागल। शिष्‍ट रहबाक कारणे शिक्षको लोकैन अधिक मानए लगलैन। सर्व शिक्षा अभियानसँ दुपहरक भोजन आ पोशाकक राशि सेहो भेटए लगलै। दुनूक लगनशीलता, कर्मठता, अनुशासन आ गुरुभक्‍ति देख शिक्षको लोकैन ओकरा प्रति अधिक संवेदनशील रहैत छला। दुनूक हरेक समस्‍याक समाधान शिक्षक लोकैन करैत छला। ऐ तरहें दुनू सहेली प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कए माध्‍यमिक शिक्षा प्राप्‍त करबाक लेल उच्‍च विद्यालयमे नामांकन करौलैन। सरकारी योजनाक तहत दुनूकेँ साइकिलक आ छात्रवृतिक राशि सेहो भेटलै। दुनू सहेली मैट्रिकक वोर्ड परीक्षामे प्रथम श्रेणीसँ उत्तीर्ण भेली। सरकारी योजनासँ दस-दस हजार रूपैआक प्रोत्‍साहन राशिक चेक सेहो भेटलै। आब राधा आ कुसुम गर्ल्‍स कौलेजमे इन्‍टरक पढ़ाइ करए लगली। अपन मेहनतक बलपर दुनू सहेली इन्‍टरमे सेहो प्रथम श्रेणी प्राप्‍त भेलैन। आ पुन: पनरह-पनरह हजारक चेक प्राप्‍त भेलैन। आगॉं पढ़बाक लिलसा बनल छेलइ। माए-बापक सेहो मनोबल बढ़ैत रहलै। दुनू सहेली बी.ए. मे नाम लिखा कौलेज जाए-आबए लगली। राधा आ कुसुम आब वयस्‍क भऽ गेल छेली। वसन्‍तक मादकता, कोयलीक कूक सावनक फुहार आ कामदेवक प्रहारसँ अवगत होमए लागल छेली। कौलेजक छात्र-छात्रामे एक-दोसरक प्रति आकर्षण बढ़ए लागल छेलइ। ओही क्रममे राधाकेँ एकटा राजेश नामक लड़कासँ दोस्‍ती भऽ गेलइ। राजेशकेँ कपड़ा-दोकान छेलै आ बी.ए.क थर्ड पार्टमे पढ़ैत सेहो छल। कभी-कभार कौलेजमे मौज-मस्‍तीक लेल जाइत छल। राधा आ राजेशक दोस्‍ती प्रगाढ़ हुअ लगलै। दोस्‍तीक बहाने दुनू एक-दोसरसँ प्रेम करए लागल। राजेश-राधाक लेल नव-नव उपहार लाबए लागल। कुसुमकेँ राधा-राजेशक दोस्‍ती पसिन नहि छेलैन। तथापि ओ दुनूक क्रिया-कलापपर विशेष धियान देमए लगलै। राजेश चाहैत छल जे राधाकेँ बहला-फुसला कऽ अपना फाँसमे फँसा घरसँ निकैल जाइ। मुदा राधा पढ़ल-लिखल आ होशियार लड़की, तँए घरसँ निकललासँ पहिनहि ओ एक दिन राजेशक घर पहुँचली। राजेशक माए घरमे छेलखिन। राजेशक माएकेँ प्राणाम करैत राधा अपन परिचए देलैन- “माइजी, हम राजेशक मित्र छी।” राजेशक माए कहलखिन- “आउ बेटी, बैसू। राजेश तँ दोकानपर अछि।” ताबत ओकरा ओइठाम गामक किछु सम्‍भ्रान्‍त परिवारक महिला लोकैन आबि गेलखिन। राजेशक माए ओइ महिला सबहक खातिरदारीमे लागि गेली। राधा आँगनमे असगरे बैसल छेली। तखने छोट बच्‍चाक कनबाक ध्‍वनि सुनाइ पड़लैन। एकटा दुबर-पातर महिलाकेँ एक घरसँ दोसर घरमे जाइत देखलैन। ओ औरत राधा दिस घुरि-घुरि कऽ तकैत छेलखिन। राधा ओइ औरतकेँ अपना लग बजा पुछलखिन- “अहाँ हमरा दिस एना किए गुम्‍हरै छी? अहाँ के छी?” ओ अपनाकेँ राजेशक पत्नी बतौलक। छोट-छोट धिया-पुताक कारणे ओ परेशान छेली। राजेशक पत्नी राधासँ पुछलखिन- “की अहींक नाओं राधा छी? अहाँ तँ पढ़ल-लिखल बुझना जाइ छी तखन केना अहाँ हुनका चक्करमे फँसि गेलौं?” एकाएक राधाकेँ फँसबाक आभास भेलैन। सोचए लगली। हम वास्‍तविकतासँ दूर हटि एक कपटी, क्षली, लम्‍पट आ चरित्रहीनक जालमे फँसि रहल छेलौं। राधा राजेशक माएसँ विदा लैत अपना घर एली। कुसुमसँ भेँट कए सारा वृतान्‍त सुनौलैन। दुनू सहेली राजेशकेँ सबक सिखेबाक लेल षडयंत्र रचलैन। साँझमे राजेशसँ भेँट करैले ओ आइ पहिनहिसँ इन्‍तजारमे छेली। साँझ पड़ैत देरी राजेश दोकान बन्न कए घर अबैत छल। नियत समैपर राधासँ भेँट भऽ गेलैन। कुसुम गाछक अढ़मे नुकाएल छेली। राजेश राधासँ प्रेमक वार्ता करए लागल। तइ बिच्‍चेमे राधा जोरसँ हल्‍ला करए लगली। हल्‍ला सुनि लोक सभ जमा भऽ गेल। कुसुम पुलिसकेँ खबर पहिनहिसँ कए देने छेली। पुलिस राजेशकेँ धारा 376 केर अन्‍तर्गत गिरफ्तार कए जहल भेज देलक। राधा अपन नजैर कुसुम दिस दैत बाजल- “गोबर बिछनीमे की शक्‍ति छै से देखौ...।” राजेश वर्मा "भवादित्य", पटोरी (पछवारि टोल), सहरसा 852124 बीहनि कथा- सोंगर मोहना राइतो-राति हीरो बनि गेलै। गाममे सभ ओकर प्रशंसा कऽ रहल छै।प्रशासनिक सेवाक परीक्षा जे पास केलकै अछि। तीनबट्टी पर गप्प चलि रहल छै-- "बूझलिए भाय! आय एकटा पिछड़ा वर्गक छात्रक कल्याण भऽ गेलै।" "ऐँ हौ कथीक पिछड़ल? बाप-भाय-भौज-घर-घरेना सभ तऽ सरकारिए नौकरीमे छै।" दोसर टोकलकै। "ऐँ रौ रौशना किएक नहि पास केलकै? ओहो तऽ दिन-राति एक केने रहय।" तेसर बाजल। "हँ से तऽ ठीके। रौशना तऽ पढबो मे बेसी तेज छलै। सभ दिन इसकुलमे फस्टे आबय। बेचारा माय बापक एकमात्र सहारा।टीसन क' कय घर चलबैत छैक। ओकरा एकटा नोकरी भेनाय बड्ड जरूरी।" सुनैत-सुनैत शंभुआ के नहि रहल गेलै-- "हे हौ! तों सभ तऽ अनठा-अनठा कऽ गप्प करैत छहक। जेना बुझले नञ। मोहना के पीछा से बड़का सोंगर लागल छैक। संवैधानिक सोंगर! तेँ नञ ओकर परिवार दिनोदिन अकास ठेकल जाय छै।" गप्प के आब झगड़ा मे बदलबाक प्रबल संभावना देखि हम ओतय सँ खिसकि गेलहुँ। बीहनि लेख : वैशिष्ठय स्त्री आ पुरूष कहियो समान नहि भऽ सकैत अछि। जे बुद्धिजीवी लोकनि स्त्री- पुरूषक समानता लेल हो हल्ला मचबैत रहैत छथि, तिनकर बुद्धि पर हमरा तरस अबैत अछि। अहीसभ कहू जे मंज्जर सँ लदल आमक गाछ आ बबूरक गाछ मे कोन समानता? सृष्टिक सभ जीव एहि संसारमे अपन अपन विशिष्टता लऽ के आयल छैक। सभक अपन-अपन विशिष्ट पहिचान छै।एहि मे समानता आ असमानता कतय सँ आबि गेल। स्त्री तऽ विधाताक एहन अमूल्य वरदान थिक जिनकर बिना सृष्टिक कल्पनो नै भऽ सकैत अछि। सृष्टिक एकटा एहेन अमूल्य उपहार जिनकर बिना पृथ्वीलोक मनुष्य विहीन भऽ जायत। चूकि स्त्रीलोकनिक एकटा विशिष्ट व्यक्तित्व होइत छैक तेँ हुनकालोकनि के संसारक सभ क्षेत्रमे विशेष सुविधा भेटबाक चाही। प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली सदाचार क तावीज (मैथिली लघु नाटिका) (ई नाटिका हरिशंकर परसाई जी क एकटा निबंध सं प्रेरित अछि ) सदाचार क तावीज (मैथिलि लघु नाटिका) पात्र: १. राजा (भानु प्रताप सकरवार) २. सूचना एवं प्रसारण मंत्री (महिला) ३.वित्त मंत्री ४. गृह मंत्री 5. महामंत्री 6. विशेषज्ञ (खट्टर झा) 7. शिष्य विशेषज्ञ-१ 8. शिष्य विशेषज्ञ-२ 9. साधू १०. शिष्य साधू -१ ११. शिष्य साधू -२ 12. कर्मचारी दृश्य - १ पृष्ठभूमि : (निगम देश मे हल्ला मचल छल जे भ्रष्टाचार अनहद रुपे पसरि गेल अछि | ) राजा दरबार मे चिंता के माहौल अछि | राजा(भानु प्रताप सकरवार) मंत्रीगण सं : हे हमर मंत्री रत्न गण ! प्रजा बहुत हरबिर्रो मचा रहल अछि जे पूरा चौहद्दी मे भ्रष्टाचार पसैर गेल अछि ! मुदा हम त आई धरि ई वस्तु के नै देखलहुँ अछि | यदि अहाँ सब के कतौ देखना मे आयल होय त बतायल जाउ | सूचना प्रसारण मंत्री : महाराज ! भ्रष्टाचार जखन हुजूरे के नजैर मे नै आयल, त हमारा लोकैन के कोना क देखयात ? राजा(गदगद भाव सं): ईह ! एहन कोनो बात नै अछि, सूचना मंत्रीजी ! कखनो काल जे हमारा नजैर मे नै आबैत हेतै ओहो त अहाँ सभ के देखना मे आबैत होयत की ने | जेना मानि लिय जे हमरा त खराप सपना कखनो नै देख मे आबै अछि , मुदा अहाँ सब त खरापो सपना देखैत हेबै ! वित्त मंत्री : जी देखैत छी महाराज | मुदा ओ त स्वप्न के बात अछि की ने | राजा : से बुझलौं, तथापि अहाँ सब सगरो राज्य मे खोज पर निकलु आ पता करू जे कतौ भ्रष्टाचार त नै अछि | जौं कतौ भेट जाय त हमरा देख लेल नमूना नेने आयब | हमहुँ त देखी की आखिर ई भ्रष्टाचार होइ केहन अछि ! गृह मंत्री (चाटुकार अंदाज मे) : हुजूर ओ हमरा सभ के नै देखा सके अछि | सुनबा मे आयल अछि जे ओ बड्ड महीन होइ अछि| हमरा सब के नजैर के त अहाँक विराटता देख के एतेक अभ्यास भ गेल अछि जे महीन वस्तु हमरा सब के देखाइते नै अछि | राजा (गंभीर होइत) : तखन फेर की करल जाय ? महामंत्री : महाराज ! अपनेक राज्य मे एकटा जाति रहै अछि जिनका विशेषज्ञ कहल जाइ अछि | एहि जाति वर्ग के लग किछु एहन ऐनक होइ अछि जकरा अपन आइङ्ख पर लगा क ओ सब सूक्ष्म सं सूक्ष्म वस्तु के भी देख लैत अछि | अस्तु, सरकार सं ई निवेदन अछि जे ई विशेषज्ञ जातिए के कोनो लोक के हुजूर ई भ्रष्टाचार के खोजय के काज सौंपैथ | राजा (हुक्म देइत) : बेस त ठीक अछि | विशेषज्ञ जाति के एकटा समिति गठित करल जाय आ हुनका राज दरबार मे उपस्थित होय के आज्ञा देल जाय | दृश्य - २ द्वारपाल : महाराज के जय होय ! महाराज ! विशेषज्ञ खट्टर झा अपन समिति सदस्य सहित महाराज के दर्शन के अभिलाषी छैथ | राजा (प्रशन्न होइत) : हुनका सभ के ससम्मान उपस्थित कैल जाय| (द्वारपाल चल जाइ अछि | खट्टर झा के चेला सहित प्रवेश ) खट्टर झा (चेला सहित) : प्रणाम महाराज ! राजा : प्रणाम महोदय ! महोदय, जनता हरबिर्रो मचेने अछि जे राज्य मे चौतरफा भ्रष्टाचार पसरल अछि | अस्तु हम जानै चाहै छी जे ई भ्रष्टाचार केहन होइ अछि ? की अहाँ के कतौ भ्रष्टाचार भेंटल अछि? खट्टर झा : जी महाराज कतेको रास भेंटल अछि | राजा (हाथ बढबैत) : अच्छा ! त लाउ देखाबू त | देखी त केहन होइ अछि ई भ्रष्टाचार ? खट्टर झा : सरकार, ओ हाथ के पकड़ मे आब वाला नै अछि | ओ स्थूल नै अछि परंच सूक्ष्म अछि, अगोचर अछि | मुदा ओ सर्वत्र अछि | ओकरा देखल नै जा सकै अछि, बस अनुभवे टा कैल जा सकै अछि | राजा (सोच मे पड़ैत) : मुदा महोदय ! सूक्ष्म , अगोचर आ सर्वव्यापी भेनाइ त ईश्वरक गुण अछि ! त की भ्रष्टाचार ईश्वर अछि ? चेला १ : जी हं महाराज ! बेस कहलौँ आब भ्रष्टाचार बुझू त ईश्वरे भ गेल अछि | सूचना एवं प्रसारण मंत्री : मुदा ओ अछि कत ? आ ओकर अनुभव कोना क कैल जाय ? खट्टर झा (झौंक मे) : ओ सर्वत्र अछि | एहि भवन मे अछि | महाराज के सिंहासन मे अछि .... राजा (सिंहासन सं उछलैत्त ): सिंहासन मे अछि .....! चेला २ : जी हाँ महाराज, अहाँक सिंहासन मे | पिछला महीना मे एहि सिंहासन मे रंग-रोगन करय के लेल जे बिल के भुगतान कैल गेल छल ओहि मे सं आधा त अहाँक मंत्री सभ के ख़ास लोक सब खा गेल अछि | खट्टर झा (बीचमे चेला के बिगड़ैत) : दूर बूड़ी ! तोरा बीच मे बजनाइ जरुरी छौह | (विशेषज्ञ के बात सुन के बाद राजा बड्ड चिंतित भ गेलाह आ संगहि मंत्री सब के कान सेहो ठाढ़ भ गेल ) राजा : ई त बड्ड पैघ चिंता के गप्प अछि ! खट्टर महोदय, हम ई भ्रष्टाचार के बिलकुल जैड़ सं मेटाब चाहै छी | की अहाँ सब एकरा मेटाब के कोनो उपाय बता सकै छी जे ई कोना क मेटायत ? खट्टर झा : जी हाँ महाराज | ऐ के लेल अपनेक एकटा योजना तैयार कर के होयत | भ्रष्टाचार मेटाब के लेल महाराज के व्यवस्था मे आमूलचूल परिवर्तन कर के पड़त | कोन कोन एहन कारण सब अछि जै खातिर मनुष्य भ्रष्टाचार मे लिप्त रहै अछि ई सब विचार कर पड़त | राजा : बेस, त ठीक अछि | अहाँ अपन योजना आ विचार सब के एकटा रिपोर्ट बना क अगिला तीस दिन के भीतर प्रस्तुत करू | खट्टर झा : जे महाराज के आज्ञा | ((चेला सहित प्रस्थान करै छथि) दृश्य - ३ (दरबार मे दरबारी सब बैसल छैथ |) राजा: महामंत्री जी | की भेल, आई तीस दिन पुरल जा रहल अछि मुदा एखन धरि विशेषज्ञ खट्टर झा समिति अपन रिपोर्ट नै प्रस्तुत केलाह अछि ? (तखने खट्टर झा के चेला समेत प्रवेश) खट्टर झा : बंदा हाजिर अछि सरकार | ई लिय महाराज, ११०१ पृष्ठक ई रिपोर्ट | राजा (आश्चर्य सं चकित होइत) : एत्तेक मोट रिपोर्ट ! खट्टर झा : जी महाराज | हमर समिति दिन रात्रि मेहनत आ रिसर्च क क ई रिपोर्ट तैयार केलक अछि | महाराज, समिति भ्रष्टाचार के कारण, तरीका आ निवारण के व्रिस्तृत अध्ययन आ शोध क क ई रिपोर्ट तैयार केलक अछि | भ्रष्टाचार के बहुत रास दृश्य आ अगोचर कारण सभ अछि | राजा : जेना किछु दृष्टान्त दिय | खट्टर झा : जेना मे की बेसिर पैरक विज्ञापन सब के बाढ़ि आबि गेल अछि जेकरा हम-अहाँ उपभोक्ता संस्कृति के नाम द देने छी मुदा एहि मे भ्रष्टाचार के बीज सेहो छुपल अछि | राजा : उपभोक्ता संस्कृत्ति ! से कोना ? खट्टर : सरकार, उदहारण के लेल एकटा विज्ञापन लेल जाउ जाहि मे देखबै अछि जे अमुक ब्राँडक कपड़ा पहिराला सं मुर्ख आ उदंड टाइप छौंड़ा के छोड़ी सब घेरने ठाढ़ अछि आ बगल मे साधारण कपड़ा पहिरने एकटा सीधा-सदा युवक हीन भावना सं ग्रसित भ रहल अछि | कखनो विज्ञापन मे ई नै देखना मे आयल अछि जे फलाना ब्रांड के कपड़ा पहिरला सं बालक कतेक चरित्रवान बनि गेल अछि| आ की बुधन कक्षा मे प्रथम आबै अछि कियेकी ओ फलाना ब्रांड के जूता पहिरै अछि | महाराज, एहि तरहक विज्ञापन सब साधारण परिवार के बच्चा सब मे कुंठा उत्पन्न क रहल अछि आ ओकरा सभ के भ्रष्टाचार के तरफ आकर्षित कय रहल अछि | महाराज, एकटा सज्जन हमरा कहै छलैथ जे की हुनकर बालक गाड़ी के लेल जिद्द केने छैथ | मना केला पर की अपन ओकाइत नै अछि ओ उत्तर देलैथ जे भुटकुन के बाबू ओकरा कोना गाड़ी दिएलखिन | उत्तर मे जखन सज्जन कहलखिन जे भुटकुन के बाप त घूसखोर अछि त बालक पलैट क जवाब देलखिन जे - अहाँक ईमानदारी के फायदे की जखन अहाँ बाइको नै दिया सकै छी ! आई-काल्हि के बालक-बालिका सब के ईमानदार बाप निकम्मा लाग लागल अछि हुजूर | राजा (गंभीर मुद्रा मे) : हूँ | दोसर कारण | खट्टर झा : एकटा अन्य कारण शिक्षा के व्यवसायीकरण अछि महाराज | राजा : से कोना ? खट्टर : महाराज आई काल्हि इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेट, लॉ आदि के पढ़ाई के लेल निजी क्षेत्र मे जे संस्थान सब खुजि रहल अछि ओहि मे स अधिकतर के एकमात्र ध्येय व्यावसायिक लाभ कमेनाइये रहि गेल अछि | एहि संस्थान सब मे छात्र सभ सं पैघ रकम डोनेशन के नाम पर ल क प्रवेश देल जाइ अछि | आब घूस के बीया सं त बैमानी आ भ्रष्टाचारे के फसल ने तैयार हेतै यौ सरकार ! राजा : हुंह | बेस कहलौँ तथापि शिक्षा के विकास के लेल त निजी शिक्षा संस्थान आवश्यक सेहो अछि | खट्टर झा ; अरे सरकार, आशय एत शिक्षा के शुद्ध लाभक व्यवसाय बनाब से अछि | प्राथमिक सं ल क उच्च शिक्षा तक बच्चा सब के केवल लाभ कमब के ट्रेनिंग देल जा रहल अछि | शिक्षा मे नैतिक सामाजिक आध्यात्मिक मूल्य के नितांत अभाव प्राथमिक स्तर सं देखना जाइ अछि आ उच्च शिक्षा मे त ई विलुप्ते बुझू | राजा : हुंह | अन्य कारण ? खट्टर : एकटा अन्य पैघ कारण अछि भ्रष्टाचारी सभ के सामाजिक स्वीकार्यता आ प्रतिष्ठा सरकार | राजा (विष्मय से) : अर्थात ? खट्टर: हुजूर अपने जे राज्य के जनता के भलाई के लेल, ख़ास क क वंचित वर्ग के लेल जे मिड डे मिल, ए.एन.एम, आशा, आंगनवाड़ी, मनरेगा आदि सामाजिक आ आर्थिक भलाई के योजना सब शुरू केलौ अछि, एहि सब मे कार्यरत भ्रष्ट कर्मी सब जे अछि से सब एहि योजना के राशि सं बड़का कोठा, गाडी आ सम्पइत ठाढ़ क लेलक अछि ओहि सम्पइत के वजह सं हिनकर सब के समाज मे इज्जत आ प्रतिष्ठा बैढ़ जाइ अछि | ईमानदारी से पढ़ाबय बला मास्टर सब के कोनो पूछ नै अछि मुदा जे मास्टर इस्कूलक मुंह देखने बिना दरमाहा हठबाई अछि आ पंचायत-प्रखंड मे जा क नेतागिरी आ वन टू का फॉर करै छथि हुनकर बड्ड नाम भ रहल अछि | एतबे नै सरकार कतेको कुप्रथा सब सेहो एहने लोक सब के कारण प्रतिष्ठा के विषय बनि गेल अछि | जे जतेक बेसी तिलक-दहेज़ देइत-लैत अछि समाज मे ओकर ओत्तेक बेसी मान-प्रतिष्ठा होइ अछि | स्वाइत लोक सब विवाह-दान, दहेज़-लेन-देन आदि के लेल भ्रष्ट तरीका सं बेसी सं बेसी धन कमब मे प्रवित्त भेल अछि | ई सब सुनैत सुनैत राजा साहब के माथ दुखाय लगलन (ओ माथ पर हाथ धरैत बीच मे बात काटैत बजलाह : ठीक अछि महोदय अहाँ अपन रिपोर्ट देने जाउ । मंत्री मंडल एकर अध्ययन क उचित कार्यवाही करता । (खट्टर झा रिपोर्ट सौंप क ओतय सं विदा होयत छैथ ) दृश्य ४ राजा (चिंतित मुद्रा मे ) सूचना एवं प्रसारण मंत्री : चिंता के कारण अहाँक स्वास्थ्य दिनोदिन खराब भेल जा रहल अछि महाराज | ओ विशेषज्ञ सरबा सब अहाँके अनेरे झंझट मे फंसा देलक | राजा : हाँ, आइकाल्हि हमरा राति-राति धैर चिंता के मारल निन्न नै आबै अछि | की करी ना करी किछु फुरा नै रहल अछि | वित्त मंत्री : मार बाढ़ैन ध क | एहन रिपोर्ट के त आइग लगा देब के चाही जेकरा चलते महाराज के नींद मे खलल पड़ै | राजा : लेकिन करी की ? अहों सब त रिपोर्ट के अध्ययन केलहुँ अछि | अहाँ सब के की राय-विचार अछि ? की ऐ रिपोर्ट के अमल मे लाब के चाहि ? गृह मंत्री : ई योजना की अछि एकटा मुसीबत अछि सरकार | एकरा जों लागू करै के चेष्टा करी त सबटा व्यवस्थे मे उलट फेर भ जायत | अपने सब के किछु एहन कर के आवश्यकता अछि जाहि सं व्यवस्था मे बिना किछु उलट फेर केनेहे भ्रष्टाचार समाप्त भ जाय| राजा : हमहुँ त इहे चाहै छी | मुदा से संभव कोना के होय ! हमर परबाबा के त जादूओ टोना आबै छलैन मुदा हमरा त ओहो नै आबै अछि | (तखने महामंत्री के एकटा साधू समेत प्रवेश ) महामंत्री (हर्षित मुद्रा मे) : महाराज अहाँ चिंता जुनि करू | अहाँक समस्या के समाधान हम ल क एलहुँ अछि | राजा : से की यौ ? जल्दी बाजू | हमारा सब्र नै अछि एही मामिला मे | महामंत्री : सरकार हम अपना संगे ई महान साधक के जोहने एलहुँ अछि जे कइएक वर्ष धरि खोज आ तपस्या के पश्चात सदाचारक तावीज बनौलैथ अछि जे मन्त्र सं सिद्ध कैल गेल अछि आ जेकरा बांधला सं मनुष्य स्वत: सदाचारी भ जाइ अछि | (साधू अपन झोरा सं तावीज निकालि क राजा के दैत अछि | ) राजा: हे महात्माजी एहि तावीज के विषय मे हमरा विस्तार से बुझाउ| साधू (दार्शनिक अंदाज मे ) : हे राजा, भ्रष्टाचार आ सदाचार मनुष्य के आत्मा मे वास करै अछि ; विधाता मनुष्य गढ़ई काल मे आत्मा मे एकटा यंत्र फिट क दैत छैथ जाहि मे सं ईमान अथवा बैमानी के स्वर निकलै अछि , जेकरा आत्मा के पुकार कहल जाइ अछि | त प्रश्न ई उठै अछि जे जिनका आत्मा सं बैमानी के स्वर उठै अछि ओकरा दबा क ईमान के स्वर कोना निकालल जाय ? एहि विषय पर कइएक वर्ष धरि शोध आ तपस्या के पश्चात हम ई तावीज बनेबा मे सफल भेलौ महाराज | जै मनुष्य के बाँहि पर ई बान्हल रहत ओ सदाचारी बैन जायत | राजा : मुदा एकर की गारंटी ? साधू: महाराज ई तावीज टेस्टेड अछि | हम एकर प्रयोग बिलाड़ियो पर क क देखने छी | ई तावीज बन्हला सं बिलाड़ियो रोटी नै चोरबई अछि | येह ई तावीज के खासियत अछि महाराज | (दरबारी सब उठी उठी क तावीजक तजबीज कर लागै छैथ ) राजा (प्रसन्न मुद्रा मे हाथ जोड़ैत ) : हम अपनेक बड्ड आभारी छी महात्मन | अपने हमरा घोर संकट सं उबारलहुँ अछि | हम सर्वव्यापी भ्रष्टाचार सं बड्ड परेशान छलहुँ आ एकरा रोक मे असमर्थ भेल छलहुँ| मुदा हमरा एकटा नै अपितु करोड़ो तावीज चाहि | हम राज्य के तरफ सं तावीजक कारखाना खुलबा दैत छी आ अहाँ के ओकर सी.ई.ओ बना दैत छी | की औ मंत्रीगण ई प्रस्ताव पारित होय की ने ? वित्त मंत्री : मुदा एकर की आवश्यकता सरकार ! राज्य एतेक झमेला मे किये परौ ! किएक नै एकरा लेल टेंडर निकालल जाय आ चुनिंदा एजेंसी सब के एकर ठेका द देल जाय | आ साधू महाराज सं ई फार्मूला के पेटेंट अधिकार राज्य के तरफ स अधिगृहीत क के ओहि कंपनी सब के द देल जाय | एहि सं अतिशीघ्र तावीज उत्पादन के कार्य संभव भ जायत आ राजदरबार एहि झंझट से सेहो उबरल रहत| राजा: ठीक अछि | साधू महाराज के उचित सत्कार कय के विदाय कैल जाय | आ हिनकर बौद्धिक सम्पदा ई तावीज फार्मूला के जनहित मे राज्य के तरफ सं अधिगृहीत कैल जाय | आ यथाशीघ्र टेंडर के कार्य पूरा क के तावीज के उत्पादन शुरू कैल जाय | (अगिला दिनक अखबार के खबर - "सदाचार क तावीज के खोज| जल्दीये तावीज बनाब के फैक्ट्री खुजत आ जनता के तावीज मुफ्त उपलब्ध करैल जायत तथा नागरीय सुविधा लेब लेल तावीज पहिरनाई अनिवार्य कैल जायत ") (पटाक्षेप ) दृश्य - ५ राजा अपना आप सं : - सदाचार के तावीज त बनि गेल | आब एकदिन भेष बदैल क देखबाक चाहि जे ई ठीक ढंग सं काज करै अछि की नै | (फेर राजा भेष बदैल क एकटा कार्यालय पहुँचैत अछि ) ओतय एकटा कर्मचारी सं राजा : नमस्कार बड़ा बाबू | कर्मचारी : नमस्कार | कहु की सेवा कैल जाय | राजा : हुजूर हमर एकटा टेंडर पास होबय के अछि अहाँ एत सं | कर्मचारी : ठीक छै, टेंडर अखन प्रक्रिया मे अछि | अगिला हफ्ता परिणाम आबि जायत | जे सबसँ योग्य उम्मीदवार हेथिन हुनका नाम सं टेंडर खुजत | राजा (5०० के नोट दैत ) : हे ई लिय हुजूर बच्चा सब के लेल मिठाई खातिर राखि लिय | नाचीज के बनवारी लाल कहल जाइ अछि बस एतेक ख्याल राखब | कर्मचारी ( डाँटे के मुद्रा मे ) : बेशर्म ! लाज नै होय छह घुस दैत | भागै छह एतय सं की बजाबी पुलिस के | (राजा लंक ल क पराई छैथ | ) (किछु दिन बाद एक दिन फेर राजा ओहि कर्मचारी लग जाय अछि) राजा (फेर से ५०० के नोट पकराबैत ) : हुजूर ई बाल-बच्चा के मिठाई खातिर राइख़ लिय | बस हमर टेंडर के ध्यान राखब | (एहि बेर कर्मचारी नोट राइख ले अछि ) राजा (क्रोधित होइत ) : हम अहाँक राजा छी | अहाँ घूस लैत रांगल हाथ पकड़ल गेलहुँ अछि | अहाँ घूस कोना क लेलहुँ ? की अहाँ सदाचारक तावीज नै बंधने छी ? कर्मचारी (डरे कँपैत स्वर मे ) बांधने छी महाराज | ई देख लिय (देखबै अछि ) | (राजा आश्चर्य सं तावीज मे कान लगबै अछि ) तावीज सं आवाज आबै अछि : "आई त ३० तारीख छै आई त ल ले नै त फेर आई कनियाँ आ बाल-बच्चा सब अपन अपन मांग ल क बेज्जत आ गंजन करतौ | ई सुनैत राता के तावीज के उत्पादन मे गड़बड़ी के भान भ जाइ अछि आ ओ अपन माँथ पीट ले अछि | (पटाक्षेप ) राजा खानदान (संस्मरण) बात आठ नौ बरष पहिने के अछि । एक बेर हम अपन पिसियौत भैया-भौजी संगे दरिभंगा घुमय के योजना बनेलौं। भोरगरे उठि क नहा-सोना कऽ तीनु गोटे टेंपू से दरिभंगा के लेल बिदा भ गेलहुं। ओतय पहुंचि क सर्वप्रथम श्यामा माई के दर्शन केलहुं । श्रद्धालु हमर आ गृहणी भौजी के मोन दर्शन में भाव विभोर भ रहल छल, मुदा कामरेड भैया के ओहि दर्शन में दार्शनिक तेज प्रज्वलित भ गेल छलैन। ओतय से निकलला पर बाट में ओ बजलाह जे ईह, ऐ मंदिर प्रांगण के वातावरण बड्ड पवित्र अछि मुदा बुजह जे इहो जे छह से सामंतवादऽक प्रतीक छह। हम पुछलियैन जे से कोना यौ भायजी? भायजी बजलाह जे देखह ई मंदिर जे अछि से महराज रामेश्वर सिंहऽक चिता पर बनायल गेल अछि। “हमर चितो पर लोक पूजा अर्चना करय” ई सामंती सोच नै अछि त की अछि? हम बजलहुं जे ईह! अहुं भायजी कहां के लिक कहां भिडा दैत छी। ऐ पर भायजी बजलाह हौ हम ठीके कहैत छियह। एतबे में भौजी प्रांगण के सभटा छोट-नमहर मंदिर, गाछ-वृक्ष आदि के पूजा क के आबि गेलिह आ बजलिह जे आब चलै चलू आगा। हमरा श्यामा माई के प्रसाद ’लड्डू’ बड्ड पसिन्द छल हम बजलहुं जे भौजी प्रसाद त द दिय ने। तै पर ओ बजलिह जे एह एतेक दूर सपैर कऽ एलहुं अछि त सभटा मंदीर में पूजा-पाठ केला के बादे खायब। ऐ पर हम की बजितहुं जे आधाटा लड्डू त हम पंडितजी से मांगि क पहिनेहे खा नेने छी! चुपे रहय में भलाई बुझलहुं आ सभ गोटे आगा बढि गेलहुं । आगा मनोकामना मंदिर में पूजा करैत, लक्ष्मिश्वर निवास(संस्कृत विश्वविद्यालय), नरगौना पैलेस, मिथिला विश्वविद्यालय के कैंपस घुमैत, फ़ोटो खिंचबैत दरभंगा महराजऽक किला पहुंचलहुं जहां से आगा बढैत कंकाली मंदिर प्रांगण में जा पहुंचलहुं । ओतय श्यामा माई मंदिर प्रांगण सन चहल पहल नै छल, मुदा वातावरण ओतुको दिव्य बुझना गेल छल। एकटा छोट-छिन दोकान पर दू टा छैंडा प्रसाद बेच रहल छल । प्रसाद किनला के बाद मंदिर में ढुकलहुं त देखल जे मंदिर में त केयौ अछिए नै। तखने हमर नजैर एकटा पुरूष पर पडल, जिनकर उमैर गोटैक पचपन बरख हेतैन । गंजी-धोती पहिरने, माथ पर चानन ठोप, गौर वर्ण पर आर शोभा बढा रहल छलैन। गंजी-धोती कतौ-कतौ खोंचायल सन छल मुदा उज्जर बग-बग छल। हम पुछलियैन जे की यौ महराज अहिं पंडित जी छी ? ओ बजलाह जे छी त हमहुं पंडिते मुदा ऐ मंदिर के पुजारी नै छी । हम अपस्यांत हौइत बजलहुं जे की भ गेलै त। छी त अहां पंडिते ने से कनि हमरा सब के प्रसाद चढाब के अछि से अहां चढा ने दियौ। ऐ पर ओ बजलाह जे बौआ चढा त हमहुं सकै छी मुदा “ककरो हक नै मारबाऽक चाही”। हमहुं राजे खानदान के छी, ऐ मंदिर के सेवा करैत एलहुं अछि। अहां सब पांच मिनट बैसै जाउ पुजारी जी आबि जेताह । बैसे के त पड.बे करितै, हम सब बैसियो गेलहुं, मुदा आसू भायजी त विशुद्ध पंचोभिया ब्राम्हण छलाह, गोटगर टीक-ठोप बला। ओ ओय ब्राम्हणदेव से शास्त्रार्थऽक मुद्रा में बजलाह जे औ जी अहां कोन राजा खानदानऽक छी । औइनवारि वंश के छि आ की खंडवाला वंश के छी। ओ बजलाह जे हम राजा महेश ठाकुरऽक वंशज छी। मुदा आसू भायजी एतबे से कहां मानय बला छलाह। ओ यक्ष जेना सवाल पर सवाल करैत गेलाह आ ओ ब्राम्हणदेव युधिष्ठिर जेना सभटा सवालऽक यथोचित जवाब दैत गेलाह। ऐ तरहे लगभग आधा-पौन घंटा बीत गेल छल। अंततोगत्वा आसू भायजी हुनका से बजलाह जे अच्छा चलू राजा महेश ठाकुरऽक खानदान के वंशावली बताउ त। ओ पंडितजी, रटाओल सुग्गा जेना धुरझार बाजय लगलाह राजा महेश ठाकुर, राजा गोपाल ठाकुर, राजा परमानंद ठाकुर, राजा सुभंकर ठाकुर, राजा पुरषोत्तम ठाकुर, नारायण ठाकुर, सुन्दर ठाकुर, महिनाथ ठाकुर, निरपत ठाकुर, रघु सिंह, बिष्णु सिंह, नरेन्द्र सिंह, प्रताप सिंह, माधो सिंह, छत्र सिंह बहादुर, रुद्र सिंह बहादुर, महेश्वर सिंह बहादुर, लक्षमेश्वर सिंह बहादुर, रामेश्वर सिंह, कामेश्वर सिंह................एक स्वरे ई नाम-पाठ सुनि क हमरा नजैर के सामने ओ वंशव×क्षऽक चित्र नाचै लागल जे हम दरिभंगा के म्युजियम में एकबेर देखने रहि। ऐ उत्तर के सुनला के बाद आसू भायजी ठीक ओहिना आस्वस्त भेलाह जेना अर्जुन के द्वारा अपन दसो टा नाम बतौला पर ’उत्तर’ विश्वस्त भेल छलाह जे किन्नर वेशधारी हुनकर सारथी आन केयौ ने ’अर्जुने’ थिकाह। एही बीच में घंटी डोलबैत संठी सन कायाबला पुजारीजी सेहो आबि गेल छलाह। हम सब भगवती के दर्शन केलहुं, भौजी पूजा केलिह आ पुजारीजी प्रसाद चढौलाह, दान-दक्षिणा दैत हम सब ओत से विदा भेलहुं आ कि पाछां से ओ ब्रामणश्रेष्ठ टोकलाह जे “हे बाउ, हमरो किछु देने जाउ, दू दिन से हम भोजन नै केलहुं अछि”। ऐ पर हम कनि विस्मयित भेल छलहुं। ता भौजी प्रसाद बला डिब्बा से ४ टा लड्डू निकालि क हुनका हाथ में थम्हा देलखिन आ हमहु अपन पर्स से एकटा दसटकिया निकालि कऽ हुनका हाथ के थम्हा देलियैन। ऐ के बाद ओ हमरा सब के खूब रास आशीर्वाद दैत विदा केलाह। ओतय से विदा होइत हमरा मोन मे दू टा बात गूंज लागल छल – “हमहु राजे खानदान के छी”, “ककरो हक नै मार्ऽ के चाही” । फेसबुक केsर चक्कर (मैथिली खिस्सा) कुशल जी, नोयडा के एकटा बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर छलाह। जहिना नाम कुशल तहिना ओ अपन पेशा आ बेक्तिगत जिनगी के सब कार्य में कुशल छलाह। समाजिकता सेहो छलैन्ह आ समाज सं जुड়ल रह के शौख सेहो। महानगरिय जिनगी के एकटा साईड इफ़ेक्ट इ अछि जे एतुका जिनगी के भागाभागी में अहां नहियो चाहैत समाज से कटि जायत छि! आधुनिक काल में मनुक्खक जिनगीशैली मे तकनिकि के बड्ड योगदान अछि। एहि क्रम में तकनिकि, भागादौरी में व्यस्त मनुख के समाज सं जोडै में सेहो मददगार साबित भऽ रहल अछि । जतय एक तरफ़ नेता से लऽ के अभिनेता सब भरि दिन ट्वीटर पर टिटियाइत रहै अछि ओतै आनो आन लोक सभ फ़ेसबुक आ व्हाट्सएप के मदैद स̐ अपन बिछुड়ल समाज-समांग आ संगी सब स̐ जुडल रह के नया प्रयोग में लागल छैथ। एहन लोक में कुशलजी के नाम अग्रणी श्रेणी मे राखल जा सकै अछि कियेक त हुनका फ़ेसबुकिया कीडा় खुब कटलकैन अछि। दिन भरि में देखल जाय त २४ घंटा में ओ १८ घंटा त निश्चिते फ़ेसबुक पर ओनलाईन भेट जेताह। नाना प्रकार के पोस्ट करैत रहताह – राजनीति स̐ ल के समाज तक आ फ़ूल-पत्ति से ल के जंगल-झाड तक । हुनका अंदर दिनोदिन ई फ़ेसबुकिया कीडा के संक्रमण बढैत जा रहल छलैन्ह जेकर परिणाम ई भेल छल जे हुनकर कनिया̐ के आब ई आदैत से किछु असोकर्ज जेना होमय लागल छल । दोसर गप्प जे ई किछु समाजिक आ क्षेत्रिय समस्या पर सेहो अपन प्रतिक्रिया ठांय पर ठांय दैत छलाह, जे किछु गोटे के अनसोहा̐त बुझना जाय छल। ऐ बातक शिकायत सेहो इनबोक्स में खूब भेटय छलैन्ह । चलु जे से मुदा दोसर गप्प के गैण बुझि पहिल गप्प के प्रमुख मानल जाय। अहिना एक दिन घर में ऐ फ़ेसबुकिया रोग के ल के खुब महाभारत मचल। कनिया̐ हिनका खुब सुनौली। विवाह स ल के आई धरि के जतेक उपराग छल सभटा मोन पारि पारि के ओय सभसं कनिया̐ हिनका पुन: अलंक्रित केलिह। उपरागक एहन दमसगर डोज स̐ कुशलजी के मोन अजीर्णता के शिकार भ गेल। हुनका अतेक रास गप्प पचलैन नै। ओ अपन मोबाईल में से फ़ेसबुक के अनइंस्टल करै के कठोर फ़ैसला लेलाह। हुनका लेल ई फ़ैसला लेनाई नोटबंदी के फ़ैसला से कम कठोर नै छल मुदा जेना सरकार के नोटबंदी में देश कऽ हित बुझना गेल छल तहिना हिनको अखुनका परिस्थिति में फ़ेसबुक बंदी में अपन हित बुझना गेल छल । तथापि फ़ेसबुकिया कीडा় के असर अतेक जल्दि कोना जा सकै छल से ओ फ़टाफ़ट अपन मोबाईल निकाललाह आ लगलाह अपन फ़ेसबुक स्टेसस अपडेट में – "पब्लिकक भारी डिमांड पर हम काल्हि सौं फ़ेसबुक छोडि रहल छी, ताहि लेल जिनका जे किछु कहबा-सुनबा के होइन से आई अधरतिया धरि कहि सकै छी ! " तकरा बाद त अधरतिया तक पोस्टऽक जेना ’बाढि’ आबि गेल होय। आ तहिना ’गिदरऽक हुआ-हुआ’ जेना ओय पोस्ट सभ पर कमेंटऽक हुलकार होमय लागल छल। जौं जौं समय बितल जाय छल कुशल जी के मोन कोना दैन करय लागल छल । मुदा एहि बेर फ़ेसबुक बंद करय के प्रण ओ कदाचित भीष्म पितामह के साक्षी मानि के लेने छलाह आ कि कनिया̐ के शब्द वाण हुनका तहिना घायल केने छलैन जेना अर्जुन के वाण कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह के। परिणाम ई भेल जे अंतत: ओ फ़ेसबुक बंद क देलाह। मुदा ककरो एने-गेने की जिनगी क चक्र रूकल अछि! एहिना फ़ेसबुको के चक्र हिनका अनुपस्थितियों में अपन गति से चलिते रहल। यद्यपि किछु निकटवर्ती सर-समांग सब से वाया व्हाट्सएप विमर्श क सिलसिला चालुए छल। ऐ घटना के किछु दिन बितल हैत की एक दिन कुशलजी के एकटा फ़ोन आयल। ’हेल्लो!’ "हें..हें…हें…मनेजर साहब यौ….नमस्कार" "नमस्कार। अहां के?" प्रतिउत्तर में कुशल जी बजलाह। " हें..हें…हें…नै चिन्हलौं? आह! चिन्ह्बो कोना के करब, पहिने कतौ भेंट भेल हैब तखन की ने। हम अहांक फ़ेसबंधु छी। नाम अछि पुष्पेन्द्रनाथ चौधरी। पुष्पेन्द्रनाथक अर्थ भेल पुष्प क राजा अर्थात कमल आ हुनकर नाथ अर्थात कमलपति भगवान विष्णु । हें..हें…हें…" अपन साहित्यिक परिचय दैत ओ फ़ेर स̐ बलह̐सी ह̐सय लगलाह। कुशलजी किछु याद करबाक चेष्टा करैत फ़ेर बजलाह "ओह। अच्छा। कहु की समाचार।" " हें..हें…हें… हमहु अत्तै सोनीपत में रहै छी। अहा̐क फ़ेसबुक पोस्ट सब स̐ बहुत प्रभावित छी। समाज में अहा̐ सन लोक सब के बड्ड आवश्यकता अछि। अतएव अहा̐के फ़ेसबुक छोड়ला से हम बहुत दुखित छी। अहा̐ के अंतिम पोस्ट सब हम देखने छलहु̐ । हम जनैत छी जे अहा̐क बात सब किछु गोटे के लोंगिया मिर्चाई सन लगै छलैन । आ एहने लोक सब के धमकी के कारणे अहा̐ फ़ेसबुक छोड়लहु̐ अछि। मुदा जहिया तक हमरा सन लोक जीवित अछि अहा̐ के डराय के कोनो आवश्यकता नै अछि। एहि संबंध में हम अहा̐ से भेंट क के विमर्श करै चाहै छि। बड्ड तिकरम से अहा̐ के नंबर उपलब्ध भेल अछि। आई हम नोयडा आबि रहल छि आ अहा̐ से भेंट करै के अभिलाषी छी ।" "मुदा हम आफ़िस क काज में कनि व्यस्त छी" कुशल जी बजलाह "आहि आहि आहि। बस किछु मिनट के भेंट चाहै छी। हम बस एक घंटा में पहु̐च रहल छी।" ई बजैत उत्तर के प्रतिक्षा केने बिना ओम्हर से फ़ोन राखि देल गेल । फ़ोन राखि के कुशलजी पुन: अपन कार्य में व्यस्त भ गेलाह। करीब डेढ घंटा के बाद रिसेप्शन से फ़ोन आयल "सर कोई पुष्पेंद्रनाथ चौधरी आपसे मिलने आए हैं ।" "ठीक है भेज दो" कहि कुशलजी फ़ेर अपन काज में व्यस्त भ गेल छलाह। दू मिनट बाद अर्दली एकटा थुलथुल काय व्यक्ति के संग नेने हाजिर भेल। उजरा धोती, ताहि पर से घाम में लभरायल सिल्क के कुर्ता, लंबा टा चानन केने ई व्यक्तित्व भीडो में आराम स̐ चिन्ह में आबि सकै छैथ से इ कियौ मैथिल थिकाह। "आउ बैसु" अतिथि के स्वागत करैत कुशलजी बजलाह। आह मैनेजर साहेब आइ अहा̐ स भेट भेने हमर जिनगी धन्य भ गेल। कहिया से नियारने छलहु̐, आइ जा के अहा̐ पकड় में एलहु̐ अछि। अच्छा से सब जाय दिय, पहिने ई बताउ जे अहा̐ फ़ेसबुक किये छोडलहु̐ अछि? अहा̐के भाषा बचाउ आन्दोलन बला किछ कहलक अछि आ कि शिथिला राज्य बला धमकेलक अछि, आ कि शिथिला हुरदंगिया सेना बला सब घुरकेलक अछि? अहा̐ बस एक बेर ना̐ लिय बा̐कि हम देख लेब। हम सभटा बुझै छि एकर सब के खेल-बेल। यौ महराज हमहु̐ बीस बरख स̐ एम्हरे रहै छी आ दिल्ली के गोट-गोट कालोनी सब जै में मैथिल-बिहारी सब बसल अछि,में पैठ बनौने छि। इलाका के छा̐टल बदमाश सब हमरा ना̐ से धोती…धोती त खैर पहिरैत नै जाय अछी धरि पैजामा में लघी क दैत अछि। एहि प्रकारे चौधरी जी आधा-पौना घंटा तक खूब हवा-बिहारि देलखिन । जखन हवा-बिहारि के क्रम किछु रुकले तखन गप्पक दिशा मोड़ैत चौधरीजी बजलाह: “हें..हें…हें… अहां भोजन त कैये नेने हैबैक?” आब चरबजिया बेरा में एहन प्रश्न के की उत्तर देल जाय! अस्तु कुशलजी एहि प्रश्नक उत्तर एकटा प्रश्ने से देलाह "कि अहां भोजन नै केने छी की?" "आह। हम त घरे सं भोजन क के विदा भेल रही। आब त जे हतै से नस्ते-पानी हेतै की। हमर घरनी त जलखै संगे बांन्है छलखिन। मुदा हम मना करैत कहलियैन जे मनेजर साहेब बिना नस्ता करेने मानथिन्ह थोरेक ने। से अनेरहे हमरा ई सब फ़ेर घुरा क नेने आबय परत।" चौधरी जी के आशय बुझ में कुशलजी के कोनो भांगट नै रहैन। तथापि ओ मोने मोन किछ राहत अनुभव करैत सोचय लगलाह जे हाथ एहिना टाईट अछि, एहन में यदि जलखै भरि कराक हिनका स̐ पिंड छूटै त सौदा महरग नै अछि। एहि निर्णय पर पहु̐चैत ओ चौधरीजी से बजलाह। जे चलु तखन किछु जलपाने क लेल जाय। हुनका संग नेने कुशलजी बगल क एकटा रेस्टोरेंट में पहु̐चलाह। ओतय बैरा के बजाय ओकरा दू टा सिंहारा, दू टा लालमोहन आ दू टा चाह क आर्डर दैते छलाह आ की चौधरी जी बीच में कूदैत बजलाह " इह! एकटा जमाना छल जे एक प्लेट सिंहारा माने दू टा सिंहारा बुझल जाय छल। आ ताहि पर से उप्पर से परसन जतेक लेल जाए तकर हिसाब नै। आ आब त एकटा सिंहारा के फ़ैशल आयल अछि। जे कहु, हमरा सन लोक के त एकटा सिंहारा से मोन छुछुआएले रहि जाय अछि। आ लालमोहन के की पुछल जाए। बरियाति सब में त गिनती के कोनो हिसाबे नै रहै छल। खौकार सब के बाजी लागय त सै, डेढ सै, दू सै टिका दैत छल। मुदा आबक जुग के की कही!" ई बजैत ओ बैरा के चारि टा सिंहारा, २० टा लालमोहन आ दू कप चाह क आर्डर क देलखिन, आ व्यापार कुशल बैरा सेहो कुशलजी द्वारा कोनो संशोधन के इंतजार केने बिना आर्डर ल के निकलि गेल। पा̐च मिनट बाद हिनकर सभक मेज पर सिंहारा आ लालमोहन के पथार लागि गेल छल। कुशल जी नहु नहु चम्मच काँटा स तोरि तोरि सिन्हारा आ लालमोहन खाय लगलाह आ ओम्हर कुशलजी बुलेट क गति से सिन्हारा आ लालमोहन के सद्गति देबय लगलाह। जा कुशलजी संग दैत २ टा सिन्हारा आ २ टा लालमोहन खेलथिन्ह टा बचलाहा सबटा माल चौधरीजी के पेट में अपन जगह पाबि गेल छल। चाह क अंतिम चुस्की लैत चौधरीजी बजलाह "ईह! इ नास्ता की भेल बुझू जे भोजन भ गेल।" "बेस तखन आज्ञा देल जाउ।" बैरा के बिल के बदला में पांच सौ के नोट पकराबैत कुशल जी बजलाह। "हें.. हें ..हें ... हें आब त अपने घरे निकलबै की ने। हम सोचै छलहुँ जे एतेक दूर आयल छी आ आई संजोग बनल अछि त भौजियो से एकरत्ती भेंट भैये जैतै त ...हें.. हें ..हें ... हें।" इ बजैत चौधरीजी फेर सं बलहँसी हँसय लगलाह। आब ऐ ढिठाई पर कुशलजी की कहि सकै छलाह! तिरहुत्ताम के रक्ष रखैत मौन स्वीकृत्ति दैत चौधरी जी के संग क लेलैथ आ गाड़ी में बैस घरक बाट धेलाह। घर पहुंचला पर चौधरीजी कुशलजी के कनियाँ 'चँदा दाई' आ बुतरू सब के बीच रैम गेलाह आ तुरत्ते हुनका बीच में अपन वाक्-कुशलता के धाक जमा देलखिन। गप्प-सप्प एम्हर आम्हार से होयत माँछ क गप्प पर पहुँचल। चौधरीजी बजलाह "ईह! अहाँक बगले में त छलेरा गाँव में बड़का मछहट्टा लगै अछि. बड़का-बड़का जिबैत रहु भेटै छै. चलु घुरि क अबैछि।" ई बजैत ओ कुशल जी के हाथ धेने बाहर जाय के उपक्रम करय लगलाह। आब आगाँ के खिस्सा अहाँ अपनहुँ सोची सकै छि। अस्तु रात्रि पहर दिवगर माँछ-भात-दही-पापड के भोजन भेलै। भोरे कुशलजी के छए बजे से एकटा मीटिंग छल बिदेशी क्लाइंट संगे वीडियो कांफ्रेंसिंग पर। ओ पँचबज्जी भोरे ऑफिस निकली गेलाह आ एम्हर चौधरी जी आठ बजे तक चद्दर तानि क फोंफ कटैत रहलाह। उठला पर चाह-चुक्का संगे फेर सं दमसगर नस्तो भेलै। चलै काल ओ कुशलजी के कनियाँ के कल जोरि के क्षमायाचना के भांगट पसारैत बजलाह "हें ..हें...हें... भौजी तखन आब आज्ञा देल जाउ। हमारा कारणे जे अहाँ सब के कष्ट भेल होयत तकरा लेल क्षमाप्रार्थी छि हें ..हें...हें..." "नै नै ऐ में कष्ट के कोन गप्प छै। अतिथि सत्कार त हमर सबहक परम कर्तव्य थीक" ई बाजि चँदा दाई हिनका जेबाक आशा में केबार लग ठाढ़ भ गेल छलीह मुदा चौधरीजी एक बेर फेर किछु संकोच करैत आ बलहँसी हँसैत बजलाह "हें ..हें...हें...जै काज से नोयडा आयल रही तै में किछु पाई के खगता भ गेल। मैनेजर साहब अपनहि रहितैथ तखन त किछु बाते नै रहितै जतेक कहतियन पुराइये दितथिन मुदा ओ त भोरे भोर मीटिंग के लेल निकली गेल छैथ। से दूओ हजार टका जौं भ जैतै त ...." चँदा दाई किछु धकमकाइत चौधरी जी के हाथ में एकटा दू हजरिया के नोट थम्हा देलीह। सांझ में कुशलजी जखन आफिस से घुरलाह त चँदा दाई हिनका हाथ से मोबाइल छीन किछ करै लगलीह। कुशलजी के भेलैन जे हौब्बा! आब कोन काण्ड भ गेलै। कनिके काल में कनियाँ हिनका हाथ में मोबाइल दैत बजलीह "लिय अहाँक मोबाइल में फेसबुक इंस्टॉल क देलौं अछि ... आब अहि पर करैत रहु शोशल नेटवर्किंग।" "चक्रफाँस (मैथिली खिस्सा) " दीपक बीसीए क के पूना के एकटा कंपनी में डाटा प्रोसेसर के पद पर काज करय छलाह । बीसीए कयलाक क बाद इ नौकडी় हुनका कोनो अनेरहे भेंट गेल होय एहन बात नै छल, मुदा हुनकर लगन, प्रतिभा आ भाग्य बले हुनका ई नौकडी় भेंट गेल छल अन्यथा हुनके कै टा संगी सभ एम्हरे-आम्हरे कय रहल छलाह। ओना जौं लंगोटिया दोस सब के बात करी त ओ सब हिनका स बढिये पोजिसन पर पहुंच गेल छलाह। रूपेश इलेक्ट्रोनिक इंजिनियरिंग क के इन्फ़ोसिस में छलाह त नंदन मैकेनिकल इंजिनियरिंग क के रिलायंस में । आषीश सेहो सरकारी बैंक में क्लर्क भ गेल छल । तखन इ छल जे दीपको ठीक-ठाक पोजिशन पकैड় नेने छलाह । एही बीच में देशऽक युवा वर्ग सब में राष्ट्र्भक्ति के नया हरबिर्रो उठि गेल छल। इलेक्ट्रोनिक मिडिया से ल के सोशल मिडिया तक में विविध प्रकार के उत्तेजक फ़ोटो, विडियो आ लिंक साझा करय जाय लागल छल । कालेजऽक कैंटीन से ल क आफ़िसऽक कैंटीन तक बस एतबे बहस। सेना की कय रहल अछि पाकिस्तान की कय रहल अछि, अमुक ग्रुप के छात्र सब देशद्रोही थिकाह, अमुक क्षेत्र के लोक सब देशद्रोहि थिकाह, बस यैह सभ चर्चा। दीपक सन भावुक लोक के कखनो काल ई अतिश्योक्ति देख मोन आरिज भऽ जाय छल त कखनो के ओ भावुक भऽ अपने आपे के कोसऽ लागै छहाल। इंटर पास करय के बाद दीपक एनडीए के परीक्षा में बैसल छलाह। पहिल प्रयास में त नै भेलैन ,मुदा दोसर प्रयास में ओ लिखित परीक्षा पास कऽ गेल छलाह। मुदा जखन एसएसबी के लेल भोपाल गेल छलाह त ओत घोर निराशा हाथ लगलैन। गा̐व आ दरिभंगा में पढल लड়का, नै अंग्रेजी बाजय में फ़र्राटेदार आ नै हिन्दी बाजय में ओ द̨ढता आ आत्मविश्वास! लिखित परीक्षा आ रिज्निंग राउंड तक त ठीके रहलैन मुदा जखन स्टोरी राईटिंग आ ग्रुप डिस्कसन राउंड आयल त हिनकर हाथ-पैर फ़ुलय लगलैन। अस्तु, ओ अगिला राउंड में नै पहुंच सकल छलाह। अहिना एक बेर बिहार मे प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षक के भर्ती निकलल। हिनको कै टा संगी आ गौंआ सब फ़ोर्म भरलक। ओ सब हिनको उकसैलक जे तोहुं भैर लैह हौ मीता, भ गेलह त बुजह जे आरामऽक नौकडी भ जेत अपन प्रदेश में । बाबू सेहो सैह राग अलापै छलखिन्ह। बाबू बाजल छलखिन्ह जे जतेक पाई ओत दै छौ लगभग ततेक पाई त एत्तौ भेटिए जेतौ। दीपक उत्तर में बजने छलाह जे बाबू से त ठीक अछि मुदा एत्त हमरा आगा तेजी स उन्नति भेटत ओतय से बात नै ने रहतै यौ। ऐ पर बाबू बजलाह जे देखह ओतय जत्तेक खर्च छ गाम-घर मे ओकर अपेक्षा खर्च कत्तेक कम हेत सेहो ने सोचह। तैं एकबेर ट्राई करऽ मे कोनो हर्ज नै। एहि प्रकारऽक घमर्थन के बीच दीपक के मोन मे एकबैगे एकटा सोच जगलैन। ओ सोचय लगलाह जे जौं हमरा मास्टरी में भ जाय त हमरा लेल इ एकटा अवसर हेतै अपना गाम-घर दिस के बच्चा के पढाबय-लिखाबय के । यदि हम अपन प्राप्त ग्यान आ अनुभव के उपयोग क के मेहनत से किछु धिया-पुता के पढाबय के प्रयास करब त निश्चिते प्राथमिक-माध्यमिक स्तर पर किछु बच्चा में ओ ग्यान आ आत्मविश्वास भैर सकै छी जैसे ओ आगा दुनिया में स्पर्धा क सकै। फ़ेर बाबूओ ठीके कहै छथिन जे भ सकै अछि जे वापस गामऽक रस्ता धेने हमर करियर ओ मोकाम हासिल नै क सकै जे पूना में रहि क अगिला १०-१५ साल में हम प्राप्त क सकै छि मुदा गाम-घर में ओइ अनुसार खर्चो कम हेतै आ अपन क्षेत्र में रहय के आनन्द सेहो त भेटतै । यैह सब सोचि क दीपक अप्लाई क देलाह। भगवती के इक्षा एहेन भेलैन जे दीपक ओई परीक्षा में सेलेक्ट भऽ गेलाह आ हुनका ट्रेनिंग के लेल सरकारी पत्र प्राप्त भेलैन । आब ऐ विषय पर लंगोटिया सब में ह्वाट्सएप ग्रुप में घमर्थन शुरू भेल । नंदन बजलाह जे बड्ड निक मिता जाउ जिब लिय अपन जिनगी….क लिय मजा । ऐ पर रूपेश बाजल छल जे एहेन कोन बडका नौकडी় लागल छैन, से हमरा लेखे त ऐ मे ज्वाईन केने कैरियर ग्रोथ पर ब्रेक लागि जेतैन । दीपक संग दैत बजलाह जे हमरो येह चिन्ता अछि। उत्तर में नंदन फ़ेर बजलाह जे "यौ भाई ई कियेक नै बुझै छि जे कतबो अछि त अछि त ई सरकारिए नौकडी की ने । ऐ मे सेलरी से बेसी उपरी कमाई देखल जाई अछि। आब देखियौ ने आशीष भाई के छैन त क्लर्के के नौकडी় ने यौ मुदा हुनका हमरा- अहां से बेसी तिलक भेटलैन अछि से किछु देखिए के भेटलैन अछि कि ने! औ दीपक मीता अहौक जैम क तिलक भेंटत, ज्वाई करू मास्टरी ।" "हमरा तिलक-दहेज के कोनो लोभ नै अछि मुदा आशीष एहन कोन कमाई करै छथि बैंक में !" – दीपक बजलाह। ऐ पर आशीष दार्शनिक के मुद्रा मे बजलाह जे बैंक लोक सभ के बकरी कीनय से ल के बकरी फ़ार्म खोलय तक के आ इंजिनियरिंग में नां लिखबय से ल के इंजिनियरिंग कालेज खोलय तक के लेल लोन दैत अछि। आ ऐ सभ प्रकारऽक लोन में बैंक अधिकारी-कर्मचारी सभ के ’कट’ फ़िक्स रहै अछि। अहिना अहौं के टिप दऽ दैत छी जे स्कूल में मिड डे मीळ से ल के भवन के रख-रखाव आ साईकिल वितरण से ल के स्कोलर्शिप वितरण तक में ’कट’ के जोगार रहै अछि आ बेसी हाथ-पर मारी त वोटर कार्ड से ल के राशन कार्ड आ स्वच्छ भारत से ल के इंदिरा आवास तक में ’कट’ भेटय के गुंजाइस रहै अछि। आ मास्टरी संग त अहां साईड बिजनेसो क सकै छी। एलआईसी एजेंट बनि जाउ, या लोन एजेंट या कोनो आन धंधा क लिय। बीच-बीच में स्कूल जाय हाजरी बना लिय आ हावा-पाईन लय आबु। इ सब सुनि क दीपक व्यथित भाव स बजलाह जे हम ऐ प्रोफ़ेशन में इ सब गोरख-धंधा करय लेल नै जाय चाहै छी । हमर उद्देश्य अछि अपन क्षेत्र क बच्चा सब के नीक शिक्षा भेटै तय में हमर योगदान हो। तैं हम बस अपन आर्थिक भविष्य आ करियर ग्रोथ ल क आशंकित छी। "तखन अहां बूडि छी" एहि बेर नंदन टोकलक । यौ भाय लोक एकटा काज छोडि় क दोसर धरै अछि अपन प्रगति के लेल दू टा पाई बेसी कामाबी ताहि लेल आ कि अनेरहे ……… बीच में बात कटैत दीपक द्रिढता से बजलाह जे नंदन भाय, अहां जे व्हट्सएप से लय के फ़ेसबुक तक पर भरि दिन राष्ट्रभक्ति के राग अलापैत रहै छी से खाली अनका ज्ञान ठेलय लेल आ कि किछु अपनो अमल में लाबय लेल आ कि बस अपन कुंठा मिटब के लेल! नंदन के समर्थन करैत रूपेश बजलाह जे दीपक भाय अहां अनेरे भावुक भ रहल छी। वास्तव में ई देशभक्ति, राष्ट्रवाद, ईमानदारी आदि शब्द नेता सभ के गरियाब लेल, कि समर्थन लेल आ कि अपन कुंठा मेटाब लेल, हवाबाजी लेल, दोसरा के परतार लेल प्रयुक्त होई अछि, मुदा वास्तविकता के धरातल पर अहां कोना क के अर्थ (धन) कमाबी यैह सबसं पैघ सोच होय अछि। अहांके समाज में इज्जत ऐ ल के नै भेंटत जे अहां कतेक शुद्ध आ समाजवादी आचरण रखै छी बल्कि ऐ से भेंटत जे अहां धन संचय करय में कतेक काबिल छी (चाहे ओकरा लेल जे तरीका अपनाबी)। आ देखु अहौं जे दुविधा में छी ओकर कारण करियर ग्रोथे त अछि । ऐ घमर्थन के बीच दीपक के मोन के दुविधा मेटा गेल छल ओ उत्तर दैत बजलाह "भ सकै अछि जे लोक हमरा बताहे क के बुझि लैथ मुदा आब हम इ नौकडी় ज्वाईन करब आ ओहि उद्देश्य लेल करब जे हमर मोन में अछि। रहल बात अर्थोपार्जन के त किछु आर तरीका सेहो अपनायब जेना विद्यालय के बाद के समय में ट्युशन, छोट-मोट सोफ़्टवेयर/वेबसाईट/प्रोजेक्ट/डाटा-एन्ट्री वर्क आदि के कार्य करय के प्रयत्न सेहो रहत। जौं भगवति कऽ आशिर्वाद बनल रहलै त जिनगी ठीके-ठाक कटि जेतै ।" दीपक के पोस्टिंग अपने जिला के एकटा आन प्रखंड के एकटा माध्यमिक विद्यालय में भ गेल छल । दीपक ओतबे उत्साह आ आशा के संग विद्यालय ज्वाईन केलाह जतेक उत्साह आ आशा सं कोनो सासु अपन नबकी कनिया के दुरागमन काल में परिछण करै छथि। मुदा किछुए दिन में दीपक के विद्यालय में पसरल अव्यवस्था के भान भ गेल। विद्यालय में अनुपस्थिति के मामिला में मास्टर आ विद्यार्थी में जेना कोनो अघोषित शर्त लागल होय! माने पचास प्रतिशत सं बेसी नै मास्टर के उपस्थिति रहै आ नै विद्यार्थी के । विद्यालय भवन के हाल सेहो तेहने सन भेल छल जेना कोनो स्त्री के, जिनकर वर बहुत दिन से बाहर कमाय लेल गेल होइथ आ सासुर में केयौ मानऽ बला नै होइन । शौचालय के नाम पर २ टा शौचालय टूटल-फ़ाटल गन्हाइत जैमे नाक नै देल जा सकै अछि आ दू टा मास्टर सब लेल कनि ठीक-ठाक अवस्था में जै में ताला मारल रहै छल । कियेकि आधा मास्टर सदिखन अनुपस्थिते रहै छलाह तैं किछु क्लास या त खालिए रहै छल अथवा दू टा तीन टा क्लास के एक्के संगे बैसा देल जाय छल । ई अव्यवस्था देख दीपक के मोन खिसिया गेलैन। ओ एकरा विषय में बिईओ साहेब के विस्तार पूर्वक लिखलाह आ हुनका से ऐ विषय में उचित कार्यवाही कर के निवेदन केलथिन्ह। किछु दिन बाद बिईओ साहब एलाह आ विद्यालय के निरिक्षण केलखिन। पूरा काल हेडमास्टर, किरानी आ लगुआ-भगुआ मास्टर सब हुनका घेरने रहलैन आ विद्यालय के अव्यवस्था के झांप के पूर्ण प्रयास केलाह । आब दीपक उम्मीद करै छलाह जे प्रखंड से किछु कार्यवाही हैतैक। मुदा एहन त किछु नै भेल परंच एक दिन मुखिया आ सरपंच पहुंचलाह स्कूल पर। पंहुचैत देरी दीपक के पुछारि भेलैन। दीपक आबि क हुनका सब के प्रणाम-पाती केलखिन्ह। मुदा प्रणाम के उत्तर देने बिना हुनका पर प्रश्न दागल गेल जे यौ दीपक बाबू! अहां एतय नौकडी় करय लेल एलहु अछि कि राजनीति करै लेल? जं राजनीति करै के अछि त खुलि क बाजू आ नै त एम्हर-आम्हर के बात सब नै कैल करू । चुपचाप विद्यालय में आउ, समय बिताबु आ आराम से दरमाहा लेल करू बस। "आ जौं दरमाहा कम बुझना जाय त टोली बना के सरकार के आगा धरना-प्रदर्शन करू" किरानी बाबू बीच में बात लोकैत व्यंगात्मक लहजा में बजलाह । दीपक उत्तर में कुछु नहीं बजलाह। हुनकर मोन बड्ड कुंठित आ व्यथित भ गेल छल । दीपक के मलिन मु̐ह देख के एक दिन मंडल सर पुछलखिन जे हौ दीपक, एना कियेक मोन मलिन केने छहक? सिनेहऽक छा̐ह भेटने दीपक के मोन द्रवित भ गेल। ओ बजलाह जे सर, हम अपन करियर आ महानगरऽक जीनगी छोडि় क इ नौकडी় पकड়ने छलहु̐ ई सोचि क जे अप्पन गाम-घर के धिया पुता सब के निक शिक्षा देबय में अपन योगदान करब। मुदा एत ओकरा लेल जे माहौल भेंट के चाहि से त अछिए नै, उल्टे धमकी भेटै अछि। ऐ पर मंडल सर बजलाह "हौ कि करबह, इ समाजे एहने अछि। ई हेडमास्टर, किरानी, मुखिया, चपरासी, इ सभ एहि समाज के छैथ कि ने हो, कोनो लंदन से त आयल नै छैथ! तोरा कि लगै छ: जे इ जतेक गोरख-धंधा होय अछि से कि मुखिया-सरपंच के बुझल नै रहै छै। हौ, ऐ सब में ओकर सब के हिस्सा राखल रहै छै।" मुदा सर ऐ विद्यालय में बच्चा त ग्रामीणे के ने पढै अछि, तखन लोक सब एहन चोर मुखिया-सरपंच के कियेक चुनै छथि! "हौ ई एकटा जटिल सिस्टम चक्र अछि जै में सबहक भागिदारी के तीली देखबह।" मंडल सर प्रतिउत्तर में बजलाह। "देख, ऐ विद्यालय में समाज के किछु एहनो सक्षम वर्ग के बुतरू सब के नामांकन भेल अछि जिनकर बुतरू सब वास्तव में कोनो पब्लिक स्कूल में पढि रहल अछि। मुदा सरकारी योजना के लाभ लेब हेतु ओ सब नामांकन एतहु करौने छथि। विद्यालय प्रशासन से हुनका ई लाभ भेटै छैन जे बिना विद्यालय एनहि हुनकर सब के हाजरी बनि जाय अछि आ सरकारी योजना सब के लाभ भेट जाय अछि। ताहि एवज में ओ सभ एहन चोर मुखिया-सरपंच के चुनै छथि। " "मुदा एना करै के बजाय यदि ओ सक्षम लोक सब एत्तहि निक पढाई के लेल जे दवाब बनेथिन त कदाचित एत्तहु निक पढाई भेंट सकै छैन जै से ओ सभ पब्लिक स्कूल के महरग फ़ीस के चक्कर से सेहो बा̐चि सकै छैथ!" दीपक बजलाह। मंडल सर एकटा गहिर सा̐स छोडैत बजलाह "ह̐। मुदा ऐ मे हुनका सब के एकटा भांगट ई बुझना जाय छैन जे फ़ंडऽक कमी स̐ सरकारी विद्यालय में ओ इंफ़्रास्ट्रक्चर आ सुविधा नै अछि जेकर दरकार अछि आ दोसर जे कदाचित इ मनोविचारधारा सेहो काज करै अछि जे तखन त हुनकर बच्चा संगे आनो (आर्थिक अक्षम) लोक सब के बच्चा सब सेहो आगु बढि जायत जे कदाचित इ वर्ग के पसंद नै छैन ।" मुदा एहनो लोक सब के त समाज में कमी नै जिनका सब के सरकारी विद्यालय में निक शिक्षा भेंटय से लाभ होउ। से सब किये नै एहन मुखिया-सरपंच सब के विरोध करै छैथ? – दीपक पुछलाह। "नाना प्रकार के दबाव, जागरूकता के कमी, रोटी-पानि में ओझरायल रहै के कारणे आ भ्रामक प्रचारतंत्र एकर कारण अछि" – मंडल सर बजलाह। ऐ प्रकारे किछुए मास में दीपक के ओय कुचक्रव्युह के जानकारी भ गेलैन जै में शिक्षा व्यवस्था(सिस्टम) ओझरायल छल । मुदा ऐ चक्रव्युह के तोडी कोना से कोनो मार्ग नै भेंटय छल। कोनो आर सक्षम लोक के सहायता के उम्मिदो लगेता त मार्ग रोकय लेल कैएक टा जयद्रथ ठाढ भेल छल। छुट्टी में जखन ओ गाम गेलाह त अपन मोनऽक व्यथा बाबा के सुनेलखिन्ह। बाबा कहलखिन्ह जे बौआ जखन उखैर मे मु̐ह दैये देलह त मु̐सर स̐ किये घबराय छह। तों त बस अपन कर्तव्य करह, बा̐कि विधाता पर छोडि় दहक। मोन लगाक धिया-पुता के पढाबह लिखाबह। एहन त नै अछि जे तों किछु अजगुत देख रहल छह। हमरा पीढि स̐ ल के तोरा पीढि तक लोक सीमिते साधन में ने पढलक अछि हौ। दीपक के बाबा के बात ज̐चि गेल । बस फ़ेर की ओ एम्हर-आम्हर के कुव्यवस्था के देखनाय छोडि क बच्चा सब के पढबै पर ध्यान देबय लगलाह। एक्स्ट्रा क्लास सेहो लेबय लगलाह। जल्दिए ओ छात्र सब आ किछु गार्जियन के बीच लोकप्रिय भ गेलाह। एम्हर ओ १५ अगस्त के अवसर पर छात्र सब के बीच छोट-मोट प्रतियोगिता के आयोजन के योजना बना रहल छलाह आ ओम्हर करमनेढ स्टाफ़ सब में खुसुर-फ़ुसुर चालु भ गेल छल। फ़ेर एकदिन दीपक जखन अपन योजना ल के हेडमास्टर लग पहु̐चलाह त हेडमास्टर बात कटैत बजलिह जे पहिने इ कहु जे कि अहां विद्यालय के बाद ट्यूशन करै छी? जी ह̐।-दीपक उत्तर में बजलाह। त की अहांक नियमावली नै बुझल अछि?-हेडमास्ट्र बजलिह। जी बुझल अछि मुदा हम ई विद्यालय समय के बाद करै छी आ ऐ से विद्यालय में हमर शिक्षण पर कोनो प्रभाव नै पडै় अछि, विद्यालय में सबस̐ बेसी क्लास हम लै छी ई विद्यालय के बच्चा-बचा जनै अछि। आ आन आन शिक्षक सभ त नै जानि कतेक तरहक व्यवसाय करै छैथ आ ओहो विद्यालय के समय में, आधा टाईम गैबे रहै छैथ। - दीपक आवेश में एक्कै सुर में बाजि गेलैथ। "अहा̐ बेसी काबिल बनै छि की? लोक की करै अछि से देखनाहर अहां के? अप्पन काज करू, हमरा की करय के चाही से जुनि बताउ। बेसी उड়ब त लिखित में ग्यापन पकडा় देल जायत अहां के ।" – हेडमास्टर साहिबा झिड়की दैत बजलिह। दीपक उखरल मोन सं ओतय से घुरलाह। हुनका हेडमास्टरो के गोरखधंधा बुझल छल। ओकर वर ठेकेदार अछि, आ विद्यालय के अधिकांश कार्य/आपूर्ति के ठेका ओकरे भेंटै अछि। मुखिया-नेता सब से सेहो संबंध। आ जे लोक समाजऽक लेल किछु काज करय चाहै अछि तेकरा ज्ञान देबय चललिह अछि! अगिला दिन किरानी हिनका हाथ में एकटा आर्डर थम्हा देलैन जेकर अनुसार हिनका प्रखंड के कोनो योजना के कार्यान्वयन के लेल सर्वेक्षण के कार्य में लगा देल गेल छल। मतलब जे हिनका विद्यालय में छात्र के पढाबै के कार्य से हटाब के नया षडयंत्र रचि देल गेल छल। दीपक हाथ में आर्डर नेने ई नव-संघर्ष के विषय में सोचय लगलाह। आब त इ समये बता सकै अछि जे दीपक व्यवस्था(सिस्टम) के ऐ चक्रफ़ा̐स स̐ बचि क निकैल पाबै छैथ की नै? लघुकथा- अरजल जमीन "की भेल यौ, कोनो निदान भेटल कि नै?" लालकाकी लालकक्का के दुआरि पर कपार धऽ कऽ बैसल देख के बजलिह। कहां कोनो बात बनल ओ त अडल अछि जे नै अहांक के त पाई देबैये पडत नै त ई जमीन हम आन ककरो हाथे बेच देब आ अहां के बेदखल होबय पडत। आ पंच सब कि बाजल? पंच सभ की बाजत, कहै ये जे अहां लग पाई देबाक कोनो सबूत नै अछि , नै अहां के नाम सं जमीन लिखायल गेल अछि त इ बात कोना मानल जाय जे अहां ई पांच कट्ठा जमीन कीनने छि! बेस त किछ बीच के रस्ता निकालल जा सकै अछि । आब देखियौ जे काइल्ह कि फ़ैसला होई अछि। बात इ छल जे करीब पच्चीस-तीस बरष पहिने लालकक्का अपन्न मेहनत आ श्रम के कमाई सं पांच कट्ठा घरारी के जमीन गामक जमीनदार ’सेठजी’ से कीनने छलाह । ओइ टाइम मे जवान जुआन छलाह, कलकत्ता के एकटा मील मे नौकरी करै छलाह, किछु पाई भेलैन त माय कहलखिन जे एकटा घरारी के जमीन कीन ले। बेस त किछु जमा कैल आ किछु ईपीएफ़ के पाई निकाईल के इ सेठजी से पांच कट्ठा घरारी के जमीन कीन नेने छलाह. मुदा भांगट एतबे रहि गेल छल जे ओ जमाना शुद्धा लोक सभ के जमाना छल, लिखा-परही, कागज-पत्तर गाम घर मे कहां होई छल ओइ टाईम मे ! बस मुंहक आश्वासन चलै छल । से लालकक्का के इ घरारी के दखल त भेंट गेल छल मुदा जमीन के रजिस्ट्री नै भेल। इ गप्प सब लालकाकी के बुझलो नै छल। के ओई जमाना मे इ गप सब अपन नबकनियां के बतबै छल! बेस लालकक्का धीरे-धीरे ओय बंसबिट्टी के उपटेलाह, आ किछेक साल मे एकटा छोट छिन पक्का के घर बना लेलाह. ओई टाईम मे गाम मे गोटैके घर पक्का के बनल छल, तखन लालकक्का के नाम सेहो बजै छल गाम मे । बाद मे जुआनी गेलैन आ काजो छुटलैन, आ ओ गाम धेलाह। गाम मे कोनो बेसी खेत पथार त छलैन ने जे ओहि मे लागल रहितैथ, तखन कोहुना समय कैटिये रहल छल ।ओना लालकक्का के इ व्यक्तिगत विचार छल जे लोक के जीवन मे तीन टा कर्म पूरा करबा के रहै अछि – घर बनेनाई, बेटी बियाह आ बेटा के अपन पैर पर ठारह रहै योग बनेनाई। से लाल कक्का इ तीनो काज सं निश्चिंत भ गेल छलाह आ कखनो गाम मे त कखनो बेटा लग मे जीवन बिताबय लगलाह। मुदा किछु दिन पहिने एकटा एहन बम फ़ूटल जै कारणे लालकक्का के अपन अरजल घरारी हाथ सं निकलैत बुझना गेलैन । जेना होमय लगलैन जे जीवन मे किछु नै केलहुं। बात इ भेल छल जे अचानके से गाम मे बात ई उठल जे हिनकर घरारी के जमीन त हिनका नाम पर अछिए नै। सेठजी के मुईला उपरांत इ जमीन हुनकर बडका बेटा के नाम पर चढा देल गेल छल आ आई सेठजी के मुईला के कतेक बरष उपरांत जमीनदारजी के इ जमीन ककरो आन के बेचय के बात कय रहल छलाह। लालकक्का के जखन ई खबर दलालबौआ द्वारा लगलैन ओ जमीनदारजी लग जाय कहलखिन जे औ जमीनदारजी! ई कि अन्याय करै छि। इ घरारी हम अहांक बाबूजी से किनने छलहुं चारि हजार कट्ठा के भाव से बीस हजार रूपया मे से अहुं के बुझल अछि, अहां के सामने पैसा गिन के देने छलहुं। कतेको बरष से एहि घरारी पर घर बना के वास कय रहल छि, से ओय समय मे त लीखा परही भेल नै छल, आब अहां करै चाहै छि त इ जमीन हमरा नामे लिखियौ। इ बात पर जमीनदारजी भौं चढा के बजलाह जे देखू अहां दूइए कट्टा के पाई देने रही आ बांकि के तीन कट्टा मे एहिना बास क रहल छी, से जौं यदि अहां सभटा जमीन लिखबऽ चाहै छि त लाख रूपए कट्ठा के दर से तीन लाख टाका लागत आ नै जौं अहां लग पांच कट्ठा जमीन कीनय के कोनो सबूत अछि त से बताबु। एतेक घुडकी लालकक्का सन शुद्धा लोक के विचलित करय लेल बहुत छल । तथापि ओ हिम्मत कऽ के बजलाह जे यौ श्रीमान एना कोना अहां बाजि रहल छि अहांके सामनेहे हम अहां बाबू से ई जमीन कीनने छलहुं आ कतेको बरष सं एतय रहै छि, आई सं पहिने त अहां किछु नै बजलहुं । बीच मे दलालबौआ बजलाह जे कक्का अहां लग लेन-देन के कोनो सबूत कोनो कागज ऐछ कि? यदि नै अछि त फ़ेर त पंचैति करा क जे निर्णय होय अछि से स्वीकार करय परत अन्यथा अहां के ओइ जमीन से बेदखल होबय परत । काल्हि भेने पंचैति बैसल – पंचैति कि बुझु, दलालबौआ, जमीदारबाबू, आ दू-चारि टा लगुआ-भगुआ । पंचैति मे जमीनदारबाबू तीन लाख टका के मांग रखलैथ, लालकक्का सेहो अपन पक्ष रखलैथ। अंतत: ई निर्णय भेल जे लाल कक्का या त दू कट्ठा जमीन जै पर घर बनल अछि से सोझा जमीनदारबाबू से लिखा लियैथ आ नै जौं पांचो कट्ठा के घरारी चाहिएन त डेढ लाख टाका (जमीनदारबाबू द्वारा प्रस्तावित मूल्य के आधा) जमीनदारबाबू के देबय परतैन । लालकक्का कहियो सपनो मे नै सोचने छलाह जे हुनका संगे एहनो कपट भ सकै अछि । मुदा आब कोनो चारा नै रहि गेल छल । बेटा के जौं इ बात कहलखिन त ओकर रिस्पोंस ठंढा छल. पहिने त अफ़सोच केलक जे बाबूजी अहां आई धरि ई बात नै मां लग बजने छलहु नै हमरा सभ लग। फ़ेर कहलक जे दूइए कट्ठा लिखा ने लिय, घरारी ल के की करब, हमरो सभ के कियौ गाम मे नै रह दै चाहै अछि आ साल मे किछुए दिन लेल त गाम जाय छी। मुदा लालकक्का के लेल ओ जमीन कोनो धिया-पुता से कम छल कि! अपन पसीना के कमाय से अरजल घरारी। ओ निर्णय केलाह जे डेढ लाख टाका दऽ के पांचो कट्ठा लिखबा लेब। लिखबाय सेहो पचास हजार टाका लगिए जाएत। माने जे आब सवाल छल दू लाख टाका के जोगार के । किछु पाई एम्हर-आम्हर से कर्ज लेलैथ । बांकि के लेल बेटा के कहलखिन त ओ कहलक ठीक छै अहां ओकर अकाउंट नं० भेजु हम दस दिन मे कतौ से जोगार क के ट्रांसफ़र क दैत छि। लाल कक्का जखन जमीनदारबाबू लग अकाउंट नं० मांगय गेलाह त एकटा नबे ताल शुरू भ गेल । जमीनदारबाबू कहलाह जे पाई त अहांके सभटा नकदे देबय परत से अहां अपना अकाउंट पर मंगबा लिय आ हमरा बैंक से निकालि क दऽ देब। लाल कक्का सभटा गप्प बेटा के कहलखिन। बेटा कहलक जे नै ई ठीक नै अछि, ओ कैश मे पाई ल के ब्लैकमनी बनबै चाहै अछि से अहां मना क दियौ। आ ओनाहुं जौं आइ अहां से पाई ल लेत आ पहिनेहे जेना मुकैर जायत तखन की करबै? से अहां साफ़ कहि दियौ जे जौं पाई बैंक के मार्फ़त लेताह त ठीक नै त हम नकद नै देब। लालकक्का के इ बुरहरी मे एहन उपद्रव भेल छल दिमाग अहिना सनकल छल तै पर से अपन अरजल जमीन हाथ से निकलि जाय के डर। तहि लेल शायद हुनका बेटा के इ आदर्शवादी बात निक नै लागल छल। उल्टा-सीधा सोचय लगलाह । भेलैन जे छौंडा कहिं टारि त नै रहल अछि। फ़ेर ध्यान पडलैन अपन एफ़डी दऽ। करीब डेढ लाख हेतै। बड्ड जतन सं जमा क के रखने छलाह। कोनो मनोरथ लेल। पता नै शायद पोता के उपनयन लेल की अपने श्राद्ध लेल हुनकर मोने जनैत हेतैन कि लालेलाकी के। एकाएक निर्णय केलैथ आ लालकाकी के कहलखिन जे एकटा काज करू – पेटी से हमर एफ़डी के कागज सभ निकालू त । लालकाकी उद्देश्य बुझैत कहलखिन जे धैर्य धरू ने, कंटीर कहलक अछि ने जे जमीनदारबाबू के अकाउंट नं० पठा देब लेल ओ पाई भेज देत, से कहै त ओ सहिए अछि कि ने – ईमानदारी के पैसा कमसेकम ईमानदारी से जमीनदरबा के भेटै ने, एकबार फ़ेर जाउ ओकरा से मांगियौ अकाउंट नं०, जौं पाई के ओकरा बेगरता छै त देबे करत ने। हं! हम भरोसा कऽ के पछताय छी आ आब बेटा ईमानदारी देखा रहल अछि। यै, आब सज्जन आ ईमानदार लोक के जुग रहलै अछि! देखलियै नै कोना जमीन लेल दरिभंगा मे एकटा के आगि लगा के मारि देलकै। ई लोभी आ बैमान दुनिया के कोनो ठेकान नै। तैं निकालू झट द कागज सब, आईए बैंक भ आबि। आब एतेक सुनला के बाद लाल काकी की जवाब दऽ सकै छलिह। हुनका लग एतेक गहनो त नै छ्ल जे आवेश दैत कहितथि जे "त बेस इ गहने बेच दिय"। बस चुपचाप पेटी खोलि क कागज निकालै लगलिह। रक्षिता (लघु कथा) आई रक्षिता भारतीय सेना के मेडिकल कोर्प मे कमिशंड होबय जा छलिह । ऐ समारोह मे हुनकर मां – पप्पा अर्थात रिद्धि आ रोहन सेहो आयल छलाह । रिद्धि के आई अपन बेटी के लेल किछु बेसिए दुलार आ फ़क्र बुझना जा रहल छल । समरोह मे कुर्सी पर बैसल बैसल ओ पुरना खयाल मे डूबि गेल छलिह । जखन पीजी - सुपर स्पेशलिटी के एंट्रेंस मे रक्षिता नीक रैंक नेने छलिह तखन रोहन हुनका दिल्ली के एकटा जानल-मानल प्राईवेट मेडिकल इंस्टिच्युशन मे प्रवेश लेब लेल कहने छलाह । ओ रक्षिता के बुझा रहल छलाह जे देखह बेटी ओ नामी कॉरपोरेट अस्पताल छै, नीक पाई भेटत, संगहि नाम आ शोहरत सेहो बढत त जिनगी ठाठ से कटत, तहि लेल कहै छि जे आर्मी अस्पताल मे प्रवेश लेबय के जिद्द जुनि करू। ओतय अहां सं पहिनेहे बॉण्ड भरायल जायत आ पोस्ट डोक्टोरल (सुपर-स्पेशलटी) करय के बाद अहां के कैएक साल धरि सेना मे जिवन घस पडत आ नै त लाखक लाख टका बॉन्ड भरू ! मुदा रक्षिता कहां मानय वला छलिह, छुटिते ओ बजलिह: अहुं ने पप्पा किछु बाजि दैत छी! हमरा जतेक नीक एक्स्पोजर आ लर्निंग के सुविधा आर्मी अस्पताल मे भेंटत ओहन सुविधा अहांक ओ कॉरपोरेट अस्पताल मे कतय सं भेटत! आ आर्मी अफ़सर के यूनिफ़ार्म देखने छी पप्पा कतेक चार्मिंग आ मस्त होई अछि ने, आ ओईपर सं आर्मी के रैंक पप्पा – सोचियौ जे डाक्टर के संगहि जौं हमरा कैप्टन , मेजर आ कर्नल रक्षिता रोहन के नाम सं पुकारल जायत त कत्तेक सोंहंतगर लगतै ने । आ अहां! ओना त टीवी डिबेट देख देख क हरदम सेना आ राष्ट्रवाद के जप करैत रहै छी आ आई जखन हम सेना के सेवा करय चाहै छी त अहां हमरा रोकि रहल छी! – इ सब गप्प ओ एक सुर मे कहि गेल छलिह। एत्तेक सब सुनला के बाद कहां रोहन हुनका रोकि सकल छलाह । आ फ़ाईनली ओ आर्मी अस्पताल मे डीएनबी-प्लास्टीक सर्जरी प्रोग्राम मे प्रवेश ल लेने छलिह। जिद्दीयो त ओ बहुत बडका छलिह । पीजी एडमिशन के टाईम पर सेहो रिद्धि हुनका सं कहने छलिह जे अहां लडकी छी अहि लेल लडकी बला कोनो स्पेशल्टी ल लिय – ओब्स गायनी, रेडियोलोजी या एहने सन कोनो मेडिकल स्पेशिलिटी ल लिय; कत्तौ, कोनो अस्पताल मे आराम सं काज भेंट जायत अ नै त अप्पन क्लिनिक सेहो खोलि सकै छी । फ़ेर विवाह दान भेला के बाद बर संगे एड्जस्ट्मेंट सेहो बनल रहत । "बर गेल अंगोर पर । हमरा त प्लास्टिक सर्जन बनै के अछि आ ओकरा लेल हमरा जनरल सर्जरी पढय के हेतै, त हम सर्जरी मे एडमिशन ल रहल छी बस । " – मां के बात के जवाब मे ओ इ बात एक सुर मे कहि गेल छलिह । रक्षिता बाल्यावस्थे सं होनहार बच्ची छलिह आ एकर श्रेय वास्तव मे रोहन के जाइ अछि । नेनपने सं ओकरा पढबै के जिम्मेवारी रोहन अपने सम्हारने छलाह । १०-१२ घंटा के ड्यूटी के बाद जखन ओ हारल थाकल घर आबै छहाल तखनो ओ बड्ड लगन सं रक्षिता के बैसा क पढबै छलाह । हुनका पढबै खातिर समय निकालबा के चक्कर मे कैएक बेर हुनका ऑफिस मे अपन अधिकारी से सेहो उलझय पडय छल । एहन स्थिति मे कै बेर रिद्धि कहने छलिह जे कत्तौ ट्यूशन लगा दियौ, आई-कैल्ह बिना ट्यूशन के कहीं बच्चा पढलकै अछि, मुदा रोहन हुनकर गप्प कहियो नै सुनलाह । इंटर मे गेला पर इ सब दास सर के संपर्क मे आयल छलाह, जे बड्ड योग्य शिक्षक छलाह, आ दास सर सेहो रक्षिता के पढबै मे बहुत मेहनत केने छलाह, जेकर ई परिणाम छल जे रक्षिता एमबीबीएस के लेल सेलेक्ट भ गेल छलिह । जखन ओ दास सर सं गुरूदक्षिणा मांगय कहने छलिह त सर कहने छलाह जे "बेटी चिकित्सा मनुख क सेवा करय वला पेशा अछि, त जतेक भ सकै लोक सभ के सेवा करिह, यैह हमर दक्षिणा होयत । याद क पांइख लगा क रिद्धि अतित के गहराई मे उतरय लागल छलिह । रोहन के संग हिनकर विवाह क कैएक वर्ष भ गेल छल मुदा हुनका कोनो संतान नै भेल छल । एक दिन अचानके स रोहन एकटा जन्मौटि नेना के कोरा मे नेने आयल छलाह आ ओकरा रिद्धि के कोरा मे राखि देने छलाह आ कहलाह जे "अपन बिटिया रानी"। "हाय राम! इ केकर बच्चा उठा के नेने एलहु अछि?" रिद्धि रोहन से पुछने छलिह । रोहन उत्तर दैत कहने छलाह जे "हम अनाथालय मे एकटा बच्चा लेल आवेदन केने छलहु, आई ओतय स खबर आयल छल जे एकटा जन्मौटी बच्चा के केयौ राइख गेल अछि अनाथालय मे यदि आहां देखय चाहै छि त …….।" बस हम ओतय पहुंच गेलहुं आ एत्तेक सुन्नैर नेना के देख क झट हं कहि देलहुं आ सभटा फ़ोर्मलिटि पुरा कय क एकरा अहां लग नेने एलहु अछि। "मुदा इ ककरो नाजाय बच्चा……" "हा..हा..हा… बच्चा कोनो नाजायज नै होई अछि, नाजायज त ओकरा समाज बनबै अछि" रिद्धि के बात काटैत रोहन बजने छलाह, आ जवाब बे रिद्धि बस एतबे बजने छलिह जे "अहां एकर रक्षक भेलहु आ इ हमर रक्षिता अछि।" अतितक गहराई मे डूबल रिद्धि के कान मे अचानक से रोहन के उ स्वर गूंजय लागल छल, आ हुनकर तन्द्रा तखन टूटल जब हुनका कान मे रक्षिता के नाम गूंजल जे रक्षिता के कमिशनिंग आ बैज ओफ़ ओनर के लेल बजाबय लेल पुकारल गेल छल । रिद्धि के आंखि सं मोती जेका नोर टपकय लागल छल, कियेकि आई हुनकर बेटी एकटा आर्मी अफ़सर का एकटा कुशल प्लास्टिक सर्जन जे बनि गेल छलिह। खिस्सा- सुखैत पोखैर प्यासल गाम एहि बेर गाम में एकटा भातिजऽक उपनेन छल आ आफ़िस में सेहो ३-४ टा छुट्टी लगातार भेट रहल छल । बस फ़ेर की एकबैगे गाम जेबा क प्लान बनि गेल । प्लानो तेहन जे जूर-शीतल दिन सांझ तक गाम पहुंचितौं। मगध एक्स्प्रेस अपन आद्त अनुसार चारि घंटा बिलंब सं पटना पहुंचेलक । आब ओत से बरौनी के ट्रेन पकरबाक छल । गर्मी के दिन में सूर्यास्त किछ बिलंबे स होइ अछि, स्वाइत राजेन्द्र पूल पर जखन लगभग साढे छ: बजे पहुंचल छलहुं त सूर्यास्त क मनोरम दृश्य दृष्टिगोचर भेल छल। ओई मनोरम छटा मे ३-४ टा छौंरा सब गंगा जी के बीच धार में चुभैक रह्ल छल। ई दृश्य देखय बला छल। मुदा इ कि! अचानक से ध्यान गेल जे गंगाजी त सूखि के आधा भ गेलिह आ पाईन क धार केवल पांजर धरि में बचल छल । आब ई स्थिति भयावह बुझना गेल। त एकर की मतलब जे सुखार अपनो गाम-घर दिस दस्तक द देने अछि ! जखन गाम पहुंचलौं त जूर-शीतलऽक कोनो नामो-निशान नै देखना गेल। यद्यपि गाम हम अन्हार भेला के बादे पहुंचल छलहुं । अगिला दिन भोरे भोर गाम दिस बिदा भेलहुं, बाट में भेंटनाहर लोक सब सं दुआ-सलामी लैत नदी कात पहुंचलहुं । मुदा देखै छी त ई की; नदी त अछिए नै! गामक बलान नदी सुखि क पीच रोड बनल अछि आ साइकिल, मोटरसाईकिल सभ ओई बाटे सरसरायल ऐ पार से ओइ पार भ रहल अछि। ध्यान गेल जे गामऽक मुखिया (जेकर जनेर-धैंचा के फ़सल नदी कात में लहलहायत छल) के अतिक्रमणक सीमा आउर अधिक बढि गेल अछि आ जत हरदम नदी के धार रहै छल तत्तौ मुखिया के फ़सल लागल छल। ओना फ़सलऽक हालत सेहो पिलपिल सन भेल छल । गाम सं नदी बिला जेनाइ मने कि जे मानु जेना कोनो सौभाग्यवती के सिहुंथ से सेनूर पोछि देनाई भेल! मानै छी जे हम बेसी दिन गाम नै रहलहुं अछि, मुदा जतबे दिन रहलहुं अछि, ई नदी से एकटा लगाव रहल अछि। बाल्यावस्था में नदी नहाय के अपन उत्साह होय छ्ल, मां के मनो केला पर कहां मानै छलियै। आ गर्मी महिना में त बुझू जे जखने मोन होय तखने चैल दिय नहाय लेल, कोनो अंगा-गंजी लेबा के काजे नै, बस ककरो सं गमछा मांगू आ कूदि जाउ। जा कनि काल नदि में चुभकि ततबे काल में नदि कात के भांईटऽक गाछ पर पसरल गंजी-जंघिया सभ सुखि जाय छल । हं ई बात के अफ़सोस रहत जे हम हेलनाई नै सीख पेलहुं। यद्यपि गामक भैयारी सब थोरे-बहुत सीखेने छल मुदा कालांतर में सेहो बिसरि गेलहुं। ओना गाम-घर में धिया-पुता के दुपहर काल में नदी कात जाय लेल मना करल जाय छल, जै के लेल भूत सं ल के पंडूब्बी तक के डर देखायल जाय छल। नदी किनार में ओना माछ आ डोका पकरय के सेहो अनुभव रहल अछि। ऐ मामला में मीता भाईजी बड्ड तेज छलाह। बुझु से बंसी आ बोर के असल खेलाडी वैह छलाह आ हम सभ त स्टेपनी टाइप में संग लागल रहै छलहुं । खैर छोडू, हमहुं कहां पहुंच गेलहुं। हलुमान चौक पर पहुंचलहु त देखै छी जे छौंरा सभ के चौकडी जमल अछि। मीता भायजी सेहो छलाह। हम कहलियैन जे यौ मीता भायजी इ त जुलुम भ गेल। ओ सशंकित होइत बजलाह – जे से की? की भ गेलय? हम प्रतिउत्तर में बजलहुं जे "महराज गामऽक नदी बिला गेल आ अहां पुछै छी जे की भेल!" मुदा हुनकर रिस्पांस बड्ड सर्द छल। ओ बजलाह जे ई सब भगवानऽक माया अछि। देश-दुनिया में पाप बढि रहल अछि, तेकर दुष्परिणाम त एहने ने हेतै हौ। हम बजलहुं जे भायजी, तैयो गमैया के त अपन कर्तव्य करबाक चाही ने नदी के बचाब के लेल। सालों-साल नदी के तह गाद से भरि क उपर भेल जाय अछि, तै पर से नदी तट पर मुखिया के अतिक्रमण बढल जाय अछि। आई नदी सुईख गेल, सोचु जे ऐ संगे कतेको जलिय जीव सभ के त समूले नष्ट भ गेल हैत। क्षेत्रऽक जमीन में पानिऽक लेवल भी नीच्चां खसि परल हैतैक…हं, से त सत्ते. पहिने पचासे फ़ीट पर कल गडा जाय छल मुदा आब सै फ़ीट से कम में कहां नीक पाईन अबै छै – बीच में बात कटैत कनकिरबा बाजल । हम बात के आगा बढबैत बजलहुं जे देखु ई नदी में लोक सब नहाइ जाय छल माल-जाल के नहब आ पाईन पियाब लेल नदी ल जाय छल, मौगमेहर सब कपडा-लत्ता सभ टा त नदिये मे करै जाय छल ने यौ। त जै नदी सं एतेक उपकार भेटै अछि ओकरा लेल किछ त चिंतित होयबाक चाहि ने। एना जे नदी के भूमि के अतिक्रमण होयत रहतै, त निश्चिते ने नदी बिला जायत। औ जी अहां शहर से आयल छि, ऐश-मौज में रहै छी तैं इ आदर्शवादी गप्प सब फ़ुरा रहल अछि। दिल्ली से ऐनिहार सब के एहिना गोल-गोल गप्प फ़ुराईत रहै छै। – ऐ बेर बीच में बात काटैत बंठाबबाजी बाजल । हम कनि व्यथित होयत कहलहुं जे हं शायद अहां ठीके कहै छि, हम पतित भेलहुं जे गामऽक चिन्ता केलहुं । ई गाम त जेना हमर अछिए नै। आ अहां कि जनै छि शहरऽक जिनगी के विषय में । पाईनऽक किल्लत आ ओकर मोल की होई अछि ई कोनो दिल्ली-बंबई बला से बढिया के बुझि सकै अछि! कालोनी सब में पाईन के लऽ कऽ झगडा-झंझट त डेली के खिस्सा रहै अछि, बात त मरै-मारय तक पहुंच जाय अछि। बडका कोठी आ फ़्लैट में रहऽ बला लोक सभ के सेहो सभ सुविधा त भेटै अछि मुदा पाईन हुनको नापि-जोखि क भेटै अछि आ ओकर बड्ड मोल चुकबय परै अछि। जे स्थिति अखन हम-गाम गमय दिस देख रहल छि, जौं लोक नै चेतल त भविष्य में एतुको स्थिति वैह होबय वाला अछि। खैर किछ काल गप्प-सरक्का मारलाक बाद हम गाम पर पहुंचलहुं आ नहाय के लेल बौआजी ईनार दिस बिदा होबैये बला छलहुं कि मां टोकलक जे कले पर नहा ले, बौआजी ईनारऽक पाईन कदुआह भ गेल छै। ओह! एकटा आउर अफ़सोचऽक गप्प। जहिया से हमर नदी नहेनाय छुटल छल गाम में हम बौआजीए ईनार पर नहाइत एलहुं अछि। बड्ड पवित्र आ शीतल पाईन होय छल ओहि ईनार के। गर्मी के दूबज्जी दुपहरियो में एकदम शीतल पाईन। हमरा याद अछि जे बचपन में देखै छलहुं जे जूरशीतल दिन गौआं लोक सभ एकट्ठा भ के एहि ईनारऽक सफ़ाई करै छल, ढेकुल कसाई छल, नब रस्सी बान्हल जाय छल। रामनन्दन पंडितजी यजमानी में भेंटल एकटा नबका डोल बान्है छलाह। माने बच्चो सभ के लेल ई उत्सव के माहौल होय छल । मुदा आब…..! गामऽक दोकान में आब कोल्ड-ड्रिंक संगे मिनरल वाटरऽक बोतल सेहो बिकाय लागल छल। किछु सम̨द्ध लोक के घर में २० लिटरा आरो-पाईनऽक बोतल सेहो किनाय लागल छल। भोज-भात में अक्सरहां कोनो छोट बच्चा जेकरा परसऽ के शौक होई अछि मुदा ओकरा लुरिगर नै बुझल जाय अछि के पाईन परसय लेल द देल जाय अछि। कुम्हरम के भोज काल में गुरकेलवा पाईन परसै छल। हम टोन दैत बजलहुं – कि रे गुरकेलवा! तों पाईने परसै छैं । ओ बाजल- ईह भायजी ! सबसं महरग चीज त हमही परसै छी। - से कोना रौ? हम पुछलियै ओ बाजल जे भाईजी, भोजन त कतौ भेट जायत मुदा ई गर्मी में सभसं सोंहतगर चीज त ठंढा पाईने लगै छै यौ। गामऽक आधा कल त सुखा गेल अछि आ ईनार-नदी सब के हाल त अहां देखनेहे हेबै। तखन अहिं कहु जे हम की गलत बजलहुं? एतनी गो गुरकेलवा एकटा गंभीर बात के बड्ड विनोदी भाव में बाजि गेल छल । पता लागल छल जे गामक चौधरी सरकार से सस्ता लोन ल के एकटा पोखैर खुनेला हन । हमरा प्रसन्नता भेल जे चलु नीके अछि जे एकटा पोखैर भेने किछ त राहत अछि आ ताजा माछ खाय लेल सेहो भेट जायत । मुदा मां से जखन चर्चा केलहुं त ओ बाजल जे एंह । ओ पोखैर में किछु अछियो! ओ त बहु पंचायत सदस्यऽक चुनाव जितलैन त जोगार से लोन पास करा लेलाह। बैंक के देखाब लेल खाईध खुना के मांईट सेहो बेच लेलाह आ लोनऽक पाई सूईद पर चढा क सूईद खा रहल छैथ। हम कहलहुं देखु त धंधा। सोझ रस्ता पर चलि क कियौ पाई कमाइये नै चाहै अछि, जै से लोक संगे समाजऽक सेहो भला होय। बहिन एत गेलहुं त ओतौ वैह हाल देखय लेल भेंटल। कहियो ओकर गाम एहि बात लेल नामी छल जे ओई गाम में बहत्तर टा पोखैर। आगा-पाछां, एम्हर-ओम्हर जेम्हरे मुडी घुमाउ तेम्हरे छोट-पैघ पोखैर-डाबर देखाय परै छल। मुदा देखलौ जे ऐ बेर ओइ में स कतेको पोखैर-डाबर भैस गेल छल । बचलाहो में से बहुते रास जीर्ण अवस्था में छल। भाईजी(बहिन के भैंसुर) के बुझल छल जे हम माछऽक प्रेमी आदमी छी। जै बेर बहिन ओत जाय छलहुं, ओ कोनो ने कोनो पोखैर से माछ ल आबै छलाह । बेरूपहर जखन भाईजी सकरी जाय लेल विदा भेलाह हम पुछलियै जे भाईजी कतऽ जा रहल छी। बजलाह जे अबै छी सकरी से माछ नेने। हम बजलहुं जे किए गाम में ऐ बेर उपलब्ध नै अछि की? ओ बजलाह जे ओह! गामऽक पोखैर सब सुखल जा रहल अछि। आई-काइल्ह कतौ मछहर कहां भ रहल अछि। तैं ऐ बेर अहां के सकरीए के माछ खोआबै छी। हमर एकटा मधुबनी के मित्र सं सूचना भेटल जे शहरऽक आस पास जे डाबर-पोखैर सभ छल जै में से कतेको में शहरऽक नाला सेहो बहै छल, ओकरा सभ के मुईन क ओय जगह पर मकान-दोकान सभ बनाओल जा रहल अछि। जै कारण भूजल स्तर में गिरावट के संगहि शहर में जलऽक निकासी के सेहो समस्या भ रहल अछि। वापस घुरै काल ट्रैन में जखन एकटा महिला के पंद्रह टाका एमआरपी बला पाईनऽक बोतल के बीस टाका में बेचै बला भेंडर से ऐ बात के लेल जिरह करैत देखलहुं त इ बात सब एक-एक कय के मोन परै लागल। हम सोचै लगलहुं जे अपन देश में जे हजारो-हजार के संख्या में पोखैर-डाबर-दिग्घी सब छल या अछि से अचानक से त नै प्रकट भ गेल हेतै। एकर पाछां निश्चिते जौं बनबाब बला के इकाई छल हैत त बनाब बला सभ के दहाई छल हैत। आ ई ईकाई-दहाई सभ मिल क सैंकडा-हजार बैन गेल हेतै। पिछला किछु दस-बीस साल में विकासऽक नया पाठ पैढ गेल समाज ऐ इकाई, दहाई, सैंकडा, हजार के सोझे शून्य में पहुंचाब के काज कय रहल अछि। ऐ विरासत के सम्हार के चिंता नै समाज के भ रहल अछि आ नै सरकार के । आ जौं कतौ भऽओ रहल अछि त सरकार आ समाज में सामन्जस्ये नै बैस रहल अछि। हम इहो सोचय लगलहुं जे जौं जिनगी में भगवती अवसर आ सामर्थ्य देलखिन त गाम में पांच कट्ठा जमीन कीन क ओतय एकटा पोखैर खुनायब आ ओहि में माछ पोसब। आब ट्रेनक गति संगे हम यैह सभ योजनाऽक खाका खीच रहल छी। बस एतबे छल ई खिस्सा । कल्पना झा बीहनि कथा- निर्वहन -- माय गे ! दादी त हाथे सँ लपे - लप तिल , चाउर परसै छलीह, मुदा तों त चम्मच सँ परसे छें ? -- धुरररररररर ! ताहि सँ की हेतैक ? -- नहि हेतेक की......? हमरो सभ के नीक रस्ता भेटल . -- से की ? -- येह जे ' निर्वहन' मे सेहो 'चम्मच' लगौल जा सकैछ बीहनि कथा- निरुत्तर -- माए गे , माए ! लक्ष्मी की होइत छथि ? -- ध'नक देवी ,, -- धनक देवी माने ? -- जे सब के रूपैया - पाइ, बौस्त - जात देथा. -- तहन बुच्ची के जनम पर बाबा किएक कहलनि 'घर मे लक्ष्मी एलीह हए' -- लबड़ी नहितन चुप्प ! बेटी सेहो घरलागनि होइत छैक. -- तहन बुच्ची के देखिते तोहर ऑखि किए नोरा गेलौ ? "लक्ष्मी नहि सोहाइ छौ की"? अभिलाष ठाकुर बीहनि कथा- साँठ गाँठ बौआ - यै भौजी ऐना तमसैल किए छी। भौजी- यौ बौआ की कहु आब अहाँ के भैया फोन केनाइ सेहो बिसरि जाइ छैथ, बूझि पड़ैए कोनो ककरो सँ कोनो साँठ-गाँठ तऽ नहि। बौआ- एना जुनि बाजु, हमर भैया राम थिकाह अौर अपन सीता छोइर साँठ-गाँठ असंभव। बीहनि कथा- नोटबन्दी लाल काका- हौ आइ झुमना बजै छल मोदीके कारने बैंकमे पुरा दुपहरिया लाइनमे लाग् पड़ल आ गाइ एखन धरि भुखले छल। टुनटुनमा- हाहाहा कका यौ कारी धन जमेने हेतैथ। लाल काका- धुर बुरबक। टुनटुनमा- त ॥ लालकाका- फोचन बाबु कहलखिन 1000 हजार बेसी देबौ इ थकी जमा केने आ तखन रौतका भोजन संगे। से पुरा दिन सांझ भ गेलै आ बरका बौआ गाइ कऽ सानी लगेलक॥ ॥पाइ की नै कराबै॥ डॉ. वीणा कर्ण मैथिलीक धरोहर 'सीता-शील' (खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ मैथिली काव्यक साहित्यिक विवेचना) मानवीय आदर्श ओ अध्यात्म चिन्तनक अभिव्यक्तिक लेल काव्य अमृत्वक काज करैत अछि। भक्तिक भावुकतासँ भरल मोनकें काव्य सृजक प्रेरणा स्रोत कहब अनुपयुक्त नहि होएत। एहि काव्यक शब्दार्थ होइत अछि कवि-कर्म जकर काव्य सम्पादनमे रचनाकारक काव्य रचनाक प्रवृत्ति ओ अभ्यास कार्यरत होइत अछि आ अहि व्युत्पत्ति ओ अभ्यासक बलपर ओ जे रचना पाठककें समर्पित करैत छथि से काव्य कहबैत अछि। वस्तुत: काव्यक रसानुभूतिसँ हमर हृतंत्रीमे जे तरंग उत्पन्न लेइत अछि ओकर लय ओ छन्दमे बान्हल रहब आवश्यक होइत अछि जे शैलीक आधारपर क्रमश: तीन कोटिमे बाँटल रहैछ, यथा- गद्य, पद्य ओ मिश्र। मिश्रकेँ चम्पू काव्य सेहो कहल जाइत अछि। छन्दरहित काव्य विधानकें जँ गद्य तँ छन्द्युक्त रचनाकेँ पद्य कहल जाइत अछि। पुन: गद्यमे अनेकानेक विधा अछि, जेना- कथा, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्तांत , रिपोर्टाज, नाटक ,एकांकी आदि-आदि। ओहिना पद्यक सेहो दू भेद होइत अछि: प्रबंध ओ मुक्तक। प्रबन्ध काव्यक सेहो दू भेद होइत अछि – महाकाव्य ओ खण्डकाव्य। महाकाव्यमे जँ इतिहास प्रसिद्ध महापुरुष अथवा महीयशी नारीक सम्पूर्ण जीवनक गतिविधिक चारित्रिक लीला-गान रहैत अछि तँ खण्डकाव्यक विषयवस्तु होइत अछि एहने महापुरुष अथवा महीयशी नारीक जीवनकप्रसिद्ध खण्डविशेषक घटनाक्रमक चित्रांकन। प्रस्तुत कसौटीक आधारपर ‘सीता-शील’ केँ प्रबन्धकाव्यक कोटिमे राखल जा सकैत अछि सेहो महाकाव्यक कोटिमे। हँ, महाकाव्यक संज्ञासँ अभिहित करबाक क्रममे एहि रचनाक सन्दर्भमे किछु नियमकें शिथिल करए पड़त। एहि रचनाक महाकाव्यत्व सिद्ध करएमे मात्र दू टा तत्व,विविध छन्दक प्रयोग ओ सर्गवद्धताक अभावकें शिथिल करए पड़त। ‘सीता-शील’क रचनाकार स्वयं एकटा साहित्यिक विधाक कोनो कोटिमे नहि राखि पद्य-रचना कहैत छथि “सामान्य जन कें ओ सुग्रन्थक अर्थ समझ पड़नि जें स्पष्ट सुन्दर भाव समझै मे कठिनता होनि तें से जानि रचलहुँ मधुर भाषा मैथिली कें पद्यमे लागत पड़ै मे पढ़ि रहल छी जाहि तरहें गद्य मे” वस्तुत: रचना कोन कोटिक अछि से परिभाषित करब रचनाकारक नहि अपितु आलोचकक काज होइत छन्हि। ई हमर सभक दायित्व अछि जे एहन महानतम रचनाक प्रति संवेदनशील भए एकर उपयोगिताकें देखैत एकरा प्रति न्याय कए सकी। एकरा अहू लेल खण्डकाव्य नहि कहल जा सकैत अछि जे खण्डकाव्य तँ महाकाव्यक शैलीमे प्रधान पात्रक जीवनक कोनो एक खण्ड विशेष के लए कए लिखल जाइत अछि, किन्तु एहि रचनामे भगवती सीताक जन्मसँ लए कए जीवनक अन्तमे धरती प्रवेश धरिक घटना निबद्ध अछि। वास्तवमे देखबाक ई अछि जे प्रबन्धकाव्य लेल जे आवश्यक अर्हता होइत अछि तकर समाहार एहि महाकाव्य मे भेल अछि अथवा नहि। प्रबंन्ध-काव्यमे सर्वप्रथम कथानकक अनिवार्यता होइछ आ तकर प्रयोजन ओहि पात्र विशेषक क्रियाकलापक कथा होइत अछि जाहि कथासँ प्रभाव ग्रहण कए भावक अपन स्वच्छ चरित्रक निर्माणक दिशामे अग्रसर भए लोक-कल्याणक भावनाकें सबलता प्रदान करैत छथि। एहि महाकाव्यक कथानक सेहो एकटा महत् उद्देशयकें लए कए सृजित भेल अछि जाहिसँ समाज सुधारक मार्ग प्रशस्त भए सकए। भगवती जानकीक जीवन-चरितक प्रसंगमे रचनाकारक जे भावोक्ति छन्हि ताहीसँ एकर कथानकक चयनक औचित्य प्रतिपादित भए जाइत अछि। देखू जे महाकवि स्वयँ की कहैत छथि – “ओहिठाम प्रातिज्ञाबद्ध भ गेलहुँ जे रामायण मे वर्णित जगत जननी जानकीक आदर्श चरित्रक वर्णन अपन मातृभाषा मैथिली मे पद्य रचना कए पुस्तक प्रकाशित कराबी, तें – “आदर्श पुरुषक प्रेमिका कें चरित शुभ लीखैत छी उपदेश नारी लेल ‘सीता-शील’ मध्य पबैत छी अछि धारणा सीताक प्रति उर-मध्य श्रद्धा-भक्ति जे पद रचि प्रकट कs रहल छी अछि योग्यता आ शक्ति जे” एकरा संगहि एहि महाकाव्यक कथानकक चयनमे रचनाकार जे एहन सफलता प्राप्त कएलन्हि अछि से अहू कारणें जे ग्रामीण निष्कलुष वातावरणमे रहि कऽ महाकवि खड्गबल्लभ दास अपन एकान्त साधनासँ सुन्दर कथानकक चयन कएलन्हि अछि जाहिमे प्रेमक मधुर संगीत अछि तँ उद्दाम उत्साह सेहो। मानवताक व्याकुल आह्वाहन अछि तँ प्रकृतिक मधुर सौंदर्य अछि। सीताक वैभवक संग आदर्शक आकर्षण सेहो सशक्तता सँ चित्रित भेल अछि। कहल जा सकैत अछि जे एकर कथानक संयमित भावात्मकता ओ संयमित कलात्मकताक संग सामंजस्य सँ अत्यन्त प्रभावोत्पादक भए उठल अछि। वास्तवमे एहि महत् काव्यक कथानकक माध्यम सँ मानवीय मूल्यक अवमूल्यन कएनिहार लोककें मर्यादा रक्षाक पाठ पढ़एबाक आवशयकता बूझि एहन कथानक प्रस्तुत कएल गेल अछि जकर कथानक चयनक मादें पटना विश्वविद्यालयक अवकाशप्राप्त मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो। आनन्द मिश्र लिखैत छथि -“एहि पुस्तक द्वारा कवि साधारणों व्यक्ति कें ओहि उदात्त चरित्र सँ परिचय कराय नैतिकता एवं शालीनताक पाठ दए रहल छथि। लोकक चारित्रिक उत्थानहि सँ समाज एवं देशक उत्थान भए सकैछ। सम्प्रति लोक आधुनिक चाकचिक्यक जाल मे फँसल अपन संस्कृति एवं सभ्यता सँ हँटल जा रहल अछि। मानवीय मूल्यक अवमूल्यन भए गेल अछि। लोक अपन आदर्श चरित्र सँ अनभिज्ञ भए रहल अछि। बिना संस्कृतिक उत्थानहि आन प्रगति अकर्मिक भए जाएत।” वस्तुत: एहि कारणसँ एहन आदर्श कथानकक चयन कएल गेल अछि। महाकाव्यक दोसर तत्व होइत अछि नायक। जें कि पात्रक माध्यम सँ कविकें समाजकल्याणकारी महत् उद्देशयक प्रतिपादन करबए पड़ैत छैन्हि तें महाकाव्यक पात्रमे लोकनायकत्व क्षमता रहब अत्यन्त आवश्यक होइत अछि। संगहि कथानकक प्रतिपादनमे एहि लोकनायकक उद्देशयक पूर्तिक लेल अन्य सहयोगी पात्र सभक अनिवार्यता सेहो छैक। ‘सीता-शील’मे पात्रक सुन्दर प्रयोगसँ एकर सफलता सिद्ध भेल अछि। भगवत् भक्तिक प्रति अनुरक्तिसँ मनुष्यकें जाहि ब्रह्मानन्द सहोदरक प्राप्ति होइत अछि सएह जीवनक चरम उत्कर्ष बूझल जा सकैत अछि। परमात्माक असीम सत्त ओ हुनक लोककल्याणक भावनाक अजस्र धारमे सराबोर करबाक करुण चित्रण मैथिली सीताराम विषय महाकाव्यक विषय वस्तु बनल अछि। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ओ अयोनिजा भगवती सीताक चरित्रक स्मरण मात्रसँ एहि भावक बोध होइछ जे संसारमे जे किछु अछि से अही महत् चरित्र परमेश्वर ओ परमेश्वरीसँ ओत प्रोत अछि आ अही परमात्मा सीता-रामक लीला-गानकें प्रस्तुत रचनामे स्थान देल गेल अछि। भौतिकताक सीमासँ ऊपर उठि कए ‘सीता-शील’क रचनाकार ओहि परम सत्ताक संग अपन चेतनाकें एकाकार करैत अपन ‘स्व’ केर उत्सर्ग कए देने छथि। परमात्माक चारित्रिक उत्कर्षक प्रकाश एहि रचनामे सर्वत्र परिव्याप्त अछि जे ‘यावच्चंद्र दिवाकरौ’ हमरा सभक आचार विचारकें अनुशासित करैत रहत। मानवीय मूल्य संरक्षणक जेहन व्यवस्था, ओहि व्यवस्थाक प्रति व्यक्तिक उत्तरदायित्व निर्वहन जेहन दिशा-निर्देश जाहि रूपें एहि रचना सँ प्राप्त होइत अछि तकर समाजकल्याणक मार्ग प्रशस्त करएमे अत्यन्त पैघ भूमिका छैक तें एकर रचनाकार एहन पात्रक चयन कएलन्हि जिनक आदर्शक आलोकसँ समाजक मानसिकताकें प्रकाशित करबाक सद्प्रयासमे ओ कहैत छथि :- “आदर्श पूरुषक प्रेमिका कें चरित शुभ लीखैत छी उपदेश नारी लेल ‘सीता-शील’ मध्य पबैत छी” XXXXXXXXXX आ पुन: - “ई चरित पढ़ि आदर्श जीवन कें बनौती नारि जे बनतीह जग मे परम पूज्या पतिक परम पियारि से” महाकाव्यक लेल सर्गबद्धता अनिवायता कें स्वीकारल गेल अछि किन्तु एकर कथानककें विषयवस्तुक अनुरूप शीर्षक दए विषयकें विश्लेषित कएल गेल अछि। सर्गक अनिवार्यताक स्थानपर एहन प्रयोग महाकविक भावुक मानसिकताक परिचायक तँ अछिए संगहि एहि दिशा मे सक्रिय रचनाकारक लेल ई पोथी एकटा नव दृष्टिकोण सेहो प्रदान करैत अछि। महाकाव्यमे विविध छन्दक प्रयोग हएब सेहो आवश्यक अछि। अगिला विषयक विश्लेषण लेल पछिले सर्गक अन्तमे छन्द परिवर्तित कए देल जाइत अछि किन्तु एहि वृहत् रचनाक विषयवस्तुकें एकहि छ्न्दमे नियोजित कए कवि प्रवर चमत्कार उत्पन्न कए देने छथि। महाकाव्यमे अनेक छन्दक प्रयोगसँ ओकर अनेक तरहक रसास्वादनक स्थानपर एकहि छन्द मे एकर नियोजनसँ कोनो अन्तर नहि आएल अछि किएक तँ रसास्वादनक प्रवाहक गतिशीलता कखनहु अवरोध उत्पन्न नहि करैछ। एहन छन्द प्रयोगक मादें कवि स्वयं कहैत छथि :- “मात्रा अठाइस पाँति प्रति लघु-गुरु चरण कें अन्त मे सुन्दर श्रवण- सुखकर मधुर हरिगीतिका कें छन्द मे” आश्चर्यक बात तँ ई जे मात्र एकहि छन्दमे प्रयुक्त कथानक भेलोपर एहिमे कतहु रसहीनताक अवसर नहि भेटैछ। काव्यकलाक अन्तरंग ओ बहिरंग नवीनता, भावनाक माधुर्य ओ रसविदग्चताक कारण कविकें अपन अन्तस्थल सांस्कृतिक चेतनाकें सार्वजनिक करबाक सुअवसर प्रप्त भेल छन्हि। रसकें काव्यक आत्मा मानल गेल अछि। संस्कृतक प्राय: सभ विद्वान रसक महत्ताकें स्वीकार केने छथि। पंडित राज जगन्नाथ रसेकें काव्यक आत्मा स्वीकार करैत चाथि: -"रमणीयार्थ: प्रतिपादक: शबद: काव्यम" रसेमे ई शक्ति छैक जे काव्यक रसास्वादनक सत्य अर्थमे अवसर प्रदान करबैत अछि। सहृदयक ह्रदयमे आह्लाद एवं मनकें तन्मय बना देबाक रसक क्षमतासँ वाणी गद्गद ओ शरीर रोमांचित कए जायत अछि। साहित्यमे एकर सुन्दर प्रयोगसँ ब्रह्मानंदक सहोदरक रूपमे परमात्माक साक्षात्कार होएबाक अनुभूति होइत अछि। आध्यात्मिकताक भावभूमिपर रचल-बसल एकर विषयवस्तुक निर्वहनक लेल 'सीता-शील'मे शान्त रसक प्रयोग तँ भेले अछि, एहिमे शृंगार रसक एहन प्रभावशाली ओ उत्प्रेरक वर्णन भेल अछि जे काव्यमे साधारणीकरणक उपयोगिताकें सार्थक सिद्ध करैत अछि। महाकाव्यमे रसक उपस्थितिक केहन सशक्त प्रभाव पड़ैत अछि, पाठकक भावुकताकें उद्बुद्ध करएमे एकर की भूमिका छैक, एकर समालोचना एकरा कोन रूपें स्वीकार करैत छथि तकरा एहि महाकाव्यक प्रति कहल गेल बिहार विश्वविद्यालयक भूतपूर्व राजनीति विज्ञानक अधयक्ष प्रो.देवनारायण मल्लिकक शब्द मे देखल जा सकैत अछि- "रचनाकारक प्रारम्भिक विनययुक्त पद्य पर दृष्टि परितहिं पढ़बाक उत्सुकता भेल। एके बैसक मे 'सीता-शील' कें आद्योपान्त पढ़ि गेलहुँ। एहि पाठ्यांतर मे कतेको बेर आँखि सँ नोर बहल अछि, कतेको बेर रोमांचित भए उठलहुँ अछि, कतेको बेर देवत्वक परिवेश मे आत्मा कें विचरण करैत पौलहुँ।" काव्यमे जँ रसास्वादन करएबाक क्षमता नहि हो तँ ओकरा काव्यक कोटि मे राखले नहि जा सकैत अछि। काव्य सृजनक आधार होइत अछि रस। प्रबन्ध काव्यमे एकटा प्रधान रस होइत अछि जकरा अंगी रस कहल जाइत अछि आ अन्य रस सभ ओहि अंगी रसक सफलतामे सहयोगीक काज करैत अछि। काव्यमे रसक अनिवार्यता प्राय: सभ विद्वान मानने छथि। हँ,ई बात फराक अछि जे केओ एकरे काव्यक आत्मा मानैत छथि तँ केओ अलंकार कें। केओ काव्यमे ध्वनिक समर्थक छथि तँ केओ छंदपर जोर दैत छथि किन्तु समग्र रूपसँ विद्वान सभक कथानक निचोड़ ई अछि जे रसोत्कर्षक सहायकक रूपमे अलंकार केँ राखल जा सकैत अछि किन्तु एकरा काव्यमे सार्वभौम सत्ताक कारण नहि कहल जा सकैत अछि। अलंकार काव्यक सौंदर्यवृद्धिमे सहायक तँ होइत अछि किन्तु एकरा काव्यक आत्मा मानब अनुपयुक्त होएत। वस्तुत: रसेकेँ काव्यक आत्मा मानब उचित अछि से रस 'सीता-शील'क प्राणवन्तताक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। जेँ कि प्रस्तुत महाकाव्य भगवती सीताक सुशीला स्वभावक दस्तावेज अछि, भारतीय संस्कृतिक प्रति कविक उच्चादर्शक निरूपण अछि आ पोथीक प्रारम्भसँ लए कए अन्त धरि सीताक प्रति करुणाक अजस्र धार बहएबाक अवसर प्रदान करैत अछि तेँ एकरा करुण रस प्रधान महाकाव्य कहि सकैत छी अर्थात् करुण रस एहि महाकाव्यमे अंगी रसक रूपमे उपस्थित अछि आ अंगक रूपमे अन्य रस सभ सहयोगीक काज करैत एकर रसास्वादनक क्षेत्र विस्तार करैत अछि जेना - सीतारामक अपरिमित प्रेम प्रसंगमे संयोग ओ वियोग श्रृंगार, सूर्पनखाक विरूपित रूपमे हास्य रस, जानकीक जन्मक क्रममे वात्सल्य, परशुराम-लक्षमण संवादमे रौद्र, राम-रावण युद्ध, बालि-वध, खरदूषण वध, मारीचवध आदिमे वीर रस, सीताक जनकपुरसँ विदाइ ओ वनगमनक काल सासु सभक उपदेश ओ सीतासँ विछोहमे करुण रस आदिक उपादेयताकेँ देखल जा सकैत अछि। काव्यमे अलंकारक उपस्थितिसँ एकर सौंदर्यवृद्धि ठीक ओहिना होइत अछि जेना कोनो नारीक सौन्दर्य अलंकारक प्रयोगेँ द्विगुणित भए जाइत अछि। अलंकारसँ काव्यमे जे प्रभावोत्पादकता उत्पन्न होइत अछि से ओकर इएह शक्तिमत्ता अछि जाहिसँ काव्य सुकोमल ओ मधुर रूप ग्रहण कए पाठककेँ भाव-विभोर करैत अछि। एकरामे हृदयग्रह्यता ओ सुषमासृष्टि करबाक क्षमतासँ एकर प्रभावान्वितिक प्रवाह तीव्रतर भए पबैत अछि। अलंकार प्रयोगक दृष्टिएँ 'सीता-शील' अद्भुत उदाहरण अछि। एहिमे उपमा, रूपक, अनुप्रास, अप्रस्तुत प्रशंसा आदिक आधिक्य रहितहुँ यमक उत्प्रेक्षा, वक्रोक्ति आदि अधिकाधिक अलंकारक प्रयोगेँ कविक कथ्यक मार्मिकता पाठककेँ साधारण स्तरसँ ऊपर उठाकए तन्मय कए दैत अछि। अपन सुकोमल भावनाक अभिव्यक्तिमे कवि प्रकृतिकेँ कखनहुँ बिसरल नहि छथि। काव्यमे प्रकृति चित्रणक कारण होइत अछि कविक सौन्दर्यबोध ओ प्रकृतिसँ हुनक साहचर्य से हिनक सौन्दरोपासनाक प्रति फलक साक्षी तँ प्रस्तुत रचना अछिए तखन ओहि सौन्दर्य के आत्मसात कएनिहार महाकविक वैभवपूर्ण सौंदर्यक वर्णन कोना ने करितथि। हिनक उच्चस्थ प्रकृति प्रेमकेँ पोथीमे अनेको ठाम देखल जा सकैत अछि जेना मिथिलाक शोभा वर्णनक क्रममे कवि प्रवर कहैत छथि - "हिमधवल पर्वत-पुञ्ज तल मे बसल मिथिला प्रान्त ई "सम्पूर्ण विश्वक देश एवं प्रान्त सँ शुभ शान्त ई" सीता हरणक पश्चात रामक विलापमे कविक प्रकृतिसँ साहचार्यक एहन अभिव्यक्ति भेल अछि से देखिते बनैत अछि। कखनो ओ अशोककेँ सम्बोधित करैत भगवती सीताक पता ज्ञात होएबाक जिज्ञासा करैत छथि तँ कखनो जामुनसँ पूछैत छथि। कखनहुँ शालसँ पूछैत छथि तँ कखनहुँ आम आ कटहरसँ। कखनो पीपरसँ पूछैत छथि तँ कखनो जूही, कनाओल, गेना, गुलाब, चम्पा, चन्दन, वर, कदम्ब, अनार, गूलरिसँ। कखनो कोमल हरिण, गजराज सिंह, बानर, भालू, सूर्या, वायु, चंद्र, धरती, वरुण, आकाश आदि जड़ हो अथवा चेतन, प्रकृतिक कण-कणसँ पूछैत छथि। कविकेँ प्रकृतिसँ आत्मीय सम्बन्ध छन्हि जे प्रकृतिक लेल रामक सम्बोधनमे देखल जा सकय अछि। प्रकृतिक मानवीकरणसँ कथ्यक विश्वसनीयता द्विगुणित भए जाइत अछि जकरा आलम्बनक रूपमे ग्रहण कए महाकवि 'स्वजन' जी एहि महाकवि 'स्वजन' जी एहि महाकाव्य केँ चिरनूतन सौन्दर्य प्रदान करलन्हि अछि। चित्ताकर्षक ओ प्रांजल भाषा मन-प्राणकेँ पुलकित कए दैत अछि से 'सीता-शील'क रचनाकार भाषाकेँ बोधगम्य, चित्रोपम एवं सस्वर बनएबाक भावुक प्रयास कएने छथि जाहि कारणें एकरा प्रति उद्दाम चित्ताकर्षण होइत अछि। कोनो साहित्यिक अपन रचनाकेँ चित्ताकर्षक बनएबाक लेल भाषा-प्रयोगक प्रति साकांक्ष रहैत छथि आ कथनकेँ भव्यतर बनएबाक लेल नै मात्र अपनहि मातृभाषाक प्रयोग करैत छथि अपितु तत्सम, तद्भव, देशज ओ विदेशज भाषाक चारू रूपक सानुपातिक प्रयोगसँ रचनाक उत्कृष्ट बनएबाक सत्प्रयास करैत छथि। महाकवि 'स्वजन' जीक एहि रचनामे तत्सम, तद्भए आ देशज शब्द तँ एकर आधार स्तम्भ अछिए विदेशज शब्दल प्रयोगइ सेहो रचनाकार अत्यन्त कुशल आ प्रबुद्ध छथि जाहि कारणें ठाम-ठाम ओकर सुन्दर प्रयोगसँ वाक्य संगठनमे कतहु मोनकेँ अकछा देबाक अवसर नहि देने छथि। जेना औषधिक स्थान पर दवा, उनटि देबाक स्थान पर उलटि देब, घुरबाक स्थान पर वापस, लोकक स्थान पर लोग, पिताक स्थान पर बाप, नमहरक स्थान पर लम्बा, कायरताक स्थान पर कायरपना आदि अनेको शब्दकेँ देखल जा सकैत अछि। वस्तुत: कवि 'स्वजन' जी जाहि कुशलतासँ एहि रचनामे सीता-शीलक महत्ताक निरूपणमे अपन संवेदना ओ विस्तारकेँ भाषाक कसौटीपर कसि कए भावनाकेँ अभिव्यक्ति देने छथि से निश्चित रूपेँ एहन महाकाव्यक लेल उपयुक्त, सुष्ठु भाषाक अनुरूप अछि जाहिसँ एहन भाषाक भावुकता महाकाव्यमे प्रयुक्त रस ओ अलंकार जकाँ धारदार, तीक्ष्ण ओ प्रभावोत्पादक भए सकल अछि। कवि अपन अतुल शब्द भण्डार सँ सुन्दर, सुकोमल ओ भावाभिव्यंजक शब्दक चयन कएने छथि जाहिमे अपन हृदयक रसरंग रंग टीपि देने छथि। कोनहु रचनाकारक ई दायित्व होइत छन्हि जे ओ अपन एहन रचनामे स्थानीय विशेषताकेँ स्थान अवश्य देथि से 'सीता-शील' मे मिथिलाक सौन्दर्य ओ संस्कृतिक वर्णनक क्रममे महाकवि अपन उदात्त पात्रक मुँहसँ की कहबैत छथि से देखू - "तिरहुतक तुलना मे कोनो नहि देश-प्रान्त पबैत छी मिथिला सदृश सौन्दर्य हम संसार मे न सुनैत छी" तहिना वनक मनोरमताकेँ सीता-रामक वनवासक क्रममे ओ रावणक ऐश्चर्यकेँ लंकाक वैभव सम्पन्न क्षेत्रमे देखल जा सकैत अछि। प्रबन्ध काव्यक लेल कथोपकथन सेहो अत्यन्त आवशयक तत्व अछि किएक तँ एकर एक पात्र दोसर पात्रसँ जाहि बातक अपेक्षा रखैत छथि से वार्तालापहिसँ सम्भव भए सकैत अछि। रचनाकार कथोपकथनक प्रयोगमे केहन निपुण छथि तकर संगठन 'सीता-शील'मे सर्वत्र देखएमे अबैत अछि खास कए परशुराम-लक्ष्मण संवाद, लंकामे रावण ओ सीताक मध्यक वार्तालाप, अनुसूया-सीताक मध्य वैचारिक आदान-प्रदान आदि प्रसंग मे देखल जा सकैत अछि। महाकाव्यक महत् उद्देश्य होइत अछि आ रचनाकार द्वारा ओकरा अपन रचनाक बिना आलम्बन बनौने कोनहु रचनाक सार्थकता सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि से अहू रचनाक पाछाँ महत् उद्देश्य छैक आ ओ छैक संसारसँ आसुरी शक्तिक नाश, मानवताक उच्चस्थ भावनाकेँ सम्मानित करब आ भगवती सीताक शील केँ समक्ष राखि नारीक विशुद्धाचरणक माध्यमसँ जन-कल्याणक भावनाकेँ पल्लवित करब। अपन एहि महत् कार्य-सम्पादनमे महाकवि अनेक ठाम सटीक सूक्ति वचनक प्रयोग कए समाजसुधारक कार्य सम्पादन करैत छथि जकरा देखबाक होयए तँ 'सीता-शील'क अनेक प्रसंग एकर गवाही देत। नारीक आदर्शकेँ जीवनक अक्षयनिधि मानि ओकरा सम्मानित करब एहि रचनाक मुख्य उद्देश्य अछि जकरा एकर चरित्र-प्रधान शीर्षकमे देखल जा सकैत अछि। कहाकवि 'स्वजन' जी स्वयं कहैत छथि - "सीखथु जगत मे नारिगण शिक्षा सियाक चरित्र सँ स्वामी प्रसन्नक लेल सब किछु करथि हृदय पवित्र सँ" आ पुन:- "ई चरित पढि आदर्श नीवन केँ बनौती नारि जे बनतीह जग मे परमपूज्या पतिक परम पियारि से" नारीक कर्त्तव्य ओ आदर्शक प्रति समाजकेँ साकांक्ष करबाक एहि उद्देश्य प्रतिपादनमे महाकवि ख्ड्गबल्लभ दास जी अत्यन्त संवेदनशील छथि। भगवती सीताक शिव संकल्पयुक्त कर्त्तव्यपरायणता ओ पातिव्रत्य हिनका अत्यधिक भावुक बनौने छन्हि फलत: कवि कहि उठैत छथि - "ई जौं पढ़थि सभ व्यक्ति 'सीता-शील' चित्त पवित्र सँ पढ़ि नारि-नर आचार सीखथि जानकीक चरित्र सँ" नारी चरित्रक सहिषणुता, सच्चरित्रता, लाग, क्षमाशीलता, ममता आदि गुण स्वस्थ समाज-निर्माणक दिशामे आवश्यक तत्व अछि जे लोककल्याणकारी विचारधाराकेँ सबल बनबैत अछि आ इएह अछि महाकवि खड्गबल्लभ दास 'स्वजन'क लोककल्याणकारी नारी जीवनक आदर्श आ ओहि आदर्शक अक्षरस: पालन करबाक पाठक सँ अपेक्षाक उद्देश्य प्रतिपादन। उमेश मण्डल ’सगर राति दीप जरय’क ९३म आ ९४ म आयोजन १ 25 मार्चक राति, रतनसारा गाममे जे ‘सगर राति दीप जरय’क 93म कथा-साहित्य गोष्ठी सम्पन्न भेल, तइमे बीहैन आ लघु मिला दू दर्जनसँ बेसी कथाक पाठ भेल। सात पालीमे कथा सभकेँ मंचपर पढ़ल गेल आ तैपर समीक्षक लोकैन समीक्षा करैत भरि रातिक समए केना बितौलैन से किनको नहि पता चलल। भोर नहि, भिनसर धरि गोष्ठी दनदनाइत रहल। समीक्षक, आलोचक आ कथाकारक संग श्रोता सेहो सगर राति जागि गोष्ठीक आनन्द लैत रहला। ओना तँ गोष्ठीक आरम्भ साझे, करीब छबे बजे भेल मुदा कथा पाठक क्रम रातिक आठ बजेसँ, जेकरा दोसर साँझ सेहो कहि सकै छी-भेल। दीप प्रज्वलनक पछाति स्वागत, स्वागत भाषण, पोथी लोकार्पण, लोकार्पित पोथी सभपर टिप्पणी इत्यादिमे करीब दू घन्टा लागिए जाइए। तहूमे चारिटा पोथीक लोकार्पण छल। जइमे पहिल छल श्री राजदेव मण्डल रचित उपन्यास- ‘जल भँवर’, दोसर- श्रीमती मुन्नी कामतजीक काव्य संग्रह- ‘सुखल मन तरसल आँखि’ आ तेसर तथा चारिम छल लघु कथा-संग्रह- ‘बीरांगना’ आ ‘स्मृति शेष’ जेकर रचियता छैथ- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी। श्री मण्डलजी एवं डॉ योगेन्द्र पाठक वियोगी, प्रो. शिव कुमार प्रसाद तथा श्री नारायण यादवजीक अध्यक्षता एवं श्री दुर्गानन्द मण्डल, श्री उमेश पासवान तथा उमेश मण्डलक (अर्थात् अपने) संचालनमे सगर रातिक ऐ साहित्यिक कार्यक्रमकेँ मंचप सफल बनौल गेल, जइमे कथा सभ जे आएल छल तेकर शीर्षक निम्न अछि- 1. टुटैत मनक जुड़ाउ, 2. घुरि गाम चलु, 3. देशक इतिहास, 4. टुटल मन, 5. छोटकू दोस, 6. अछूत, 7. दादा, 8. स्टार्टर, 9. हमर पत्नीक मनोरथ, 10. कर्म मुक्ति, 11. लौल, 12. गामक कटान, 13. बोझ, 14. गोमुखी, 15. हिन्दु-मुस्लिम भाई-भाई, 16. ठिठर काका, 17. रोहानी, 18. मानव संग माछ, 19. शराब संगे शराबी, 20. दूध बेचनी चमेली, 21. तोबा बनल अंग्रेज, 22. लकबाबला, 23. घरक बाँस, 24. अन्धविश्वास, 25. भितरिया चोट। अखन तत्काल अपनौं लोकैन निम्न कथाक आनन्द lel jau भितरिया चोट चाहक दोकान लग किछु लोक ठाढ़ छल आ किछु बैसल छल। गप्पक छरक्का छुटि रहल छेलइ। विषय छेलै- आइ-काल्हिक लोक सभटा काज स्वार्थेक कारण करै छइ। मुदा हम ऐ बातपर अड़ल देलौं जे किछु काज लोक ओहनो करैत अछि जइमे कोनो स्वार्थ नइ रहै छइ। जइ काजकेँ ‘उपकार’ कहल जाइ छइ। एम.एल.ए.क चुनाउ होइबला छेलइ। चुनाउक समैमे तँ पुलिसकेँ जेना पाँखि लगले रहै छइ। तखैने ओइठाम एकटा पुलिसिया गाड़ी रूकल। रूकल नहि बल्कि रोकए पड़लै। कारण छेलै, एकटा साइकिल सड़केपर ठाढ़ छेलै आ साइकिलबला केतौ चलि गेल छल। एकटा सिपाही गाड़ीसँ उतैरते बाजल- “केकर साइकिल छियौ रौ? साहैबक गाड़ी रूकल छइ। हटेबें जल्दी आकि देखबीही।” मुदा कियो साइकिल हटेबाक लेल नहि आएल। सिपाही पूरा तमसा गेल छल। ओकर रौद्र रूप देख हम जेना भीतरसँ डेरा गेल रहौं। हम तेजीसँ गेलौं आ साइकिलकेँ हटबए लगलौं। कमजोर रहने कनी अस्थिरसँ हटबै छेलौं। डरेबर बारम्बार हॉर्न बजा रहल छेलइ। सिपाही डण्टासँ हमरा पजरामे गोंजी मारैत बाजल- “तोहर खतियानी रोड छियौ। टेर मारैत केना चलैए! देखै नइ छै जे साहैबकेँ लेट होइ छइ!” हड़बड़ाइत आगू बढ़लौं कि रोडक कातमे साइकिल नेने खसि पड़लौं। चाहक दोकापर लोक ठिठिया कऽ हँसि देलक। पुलिसिया गाड़ी हॉर्न दैत चलि गेल। एक गोरे टिटकारी मारैत बाजल- “की यौ उपकारीजी, की भेल?” डण्टासँ तँ कमे चोट लगल छल मुदा ‘की यौ उपकारीजी, की भेल’ सुनि भितरिया चोट जेना कुहरा देलक। लोक दिस तकलौं तँ लगल जेना नँगटे ठाढ़ छी। लाजे मुड़ी गोंतने विदा भऽ गेलौं।◌ कथाकार- श्री राजदेव मण्डल।◌ टुटैत मनक जुड़ाउ मन टुटने जहिना अपना संग दुनियाँ टुटए लगै छै तहिना हमरो भेल। हलाँकी मनो सबहक एके कारणे नइ टुटै छै, सबहक अपन-अपन-अपन-फराक-फराक कारण रहै छै। हँ, किछु कारण एहेन जरूर अछि जे एक-दोसरसँ मिलैए। तँए कारणक महत् केकरोसँ केकरो कम अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। जँ से रहैत तँ अपने चलियो जाइत आ दुनियाँसँ सम्बन्ध रखैत वा दुनियेँसँ चलि जाइत आ अपनासँ रखैत, सेहो तँ नहियेँ अछि तँए सबहक महत्वक महत अछिए। तहिना ने जुड़ाउ सेहो छी। ओना, टुटब आ जुड़व दुनू विपरीत पाशापर अछि, किन्तु पाशापर दुनू नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। भलेँ एक प्रेम-स्वरूप आ दोसर वियोगे-स्वरूप किए ने हुअए। ओना, टुटैत मनक क्रिया एकरंगाहो होइए आ एकरंगाह नहियोँ होइए। भलेँ गाछ-गाछमे अन्तर रहने फलो आ फलक सुआदोमे अन्तर किए ने होइत हौउ मुदा फलाफल तँ प्राय: एकरंगाहे होइए। अर्थात् जिनगीक अन्त वा एक दुनियासँ दोसर दुनियाँ जाएब तँ एकरंगाहे होइए। तँए ने कियो अपन जान दइले कनैलक बीआ फोड़ि खाइए तँ कियो सम्पन्नता रहितो बालो-बच्चा आ विवाहित संगियोँ छोड़ि आन घर चलि जाइए। तहिना कियो रेलगाड़ीमे कटैले पहिया-तरमे गरदैन दइए तँ कियो गरदैनमे फँसरी लगा घरक धरैनमे लटैक जाइए, चाहे पंखामे झूलि जाइए। मुदा तँए कि सभ एक्केरंग अछि, सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। किछु एहनो तँ ऐछे जेकर अपन जुड़ाउ अपना संग आनोसँ रहने दुनियोँक संग ऐछे जइसँ अपन कोन बात जे आनो-ले अपन जान गमैबते अछि। अस्तु अपनो आ अपन परिवारो आ दुनियोँक संग मन टुटैक कारण अपन अपने अछि। खाएर जे अछि सएह अहाँ सभकेँ सुनबै छी। विद्यार्थी-जीवनमे जखन रही तखन बुझिलिऐ जे अपना-ले थोड़े पढ़ै छी माइये-बाप-ले पढ़ै छी, तेकर गवाहियो भेटिये जाइत रहए। गवाही ई भेट जाइत रहए जे जँ अपना-ले पढ़ितौं तँ अपने मन ने तैयार होइतइ, माता-पिताकेँ किए कहए पड़ै छैन, हुनका सभकेँ कोन खगता छैन। जँ अपन-अपने होइए तखन हुनको सभकेँ ने अपने काज दइतैन तइले हमरा पाछू किए पड़ै छैथ..? बचकानी मन दुआरे आकि पढ़ैसँ देह चोरबै दुआरे, से नहि बुझि पबिऐ, तँए स्कूल-कौलेजक तँ खानापुरी करैत रहलौं मुदा पुरी-खाना नइ बुझि पबी। तँए भुसकौलोसँ भुसकौल होइत गेलौं। ई तँ बुझू कहुना कऽ जान बँचल जे थर्ड डिवीजनसँ बी.ए. पास कऽ गेलौं। नोकरी करै-जोगर तँ बनियेँ गेलौं, तँए जेतबे-तेतबे दिन-ले मनमे संतोखो भाइए गेल आ मातो-पिता अपन बेटाक कर्जसँ मुक्त भेला, तँए हुनको सबहक मनमे खुशी एबे केलैन जइसँ पितृ-सिनेहमे बढ़ोतरीए भेल जे कमल नहि। अपन दोसर ऋृण माता-पिता ईहो चुका लेलैन जे समैपर बिआहो काइए देलैन। ओइ समयमे माता-पितापर आश्रित जिनगी रहए, तँए बिआहक बेसी विचार अपनो किए करितौं, खुशी-खुशी बिआहो काइए लेलौं। बिआह होइते सासुर सन अड्डा भेटिये गेल। आबाजाहीमे आनसँ कनी बेसीए प्रेम रहल। बी.ए. पास रहबे करी तँए मनमे आशा भरले रहए जे एतेटा देशमे जखन छी आ एते लोककेँ जखन नोकरी भेबे केलै तँ हमरा किए ने हएत। मुदा समय निकलल जाइत रहइ। बिआहक पछाइत पत्नियोँ कहलैन, आ संगियोँ-साथी हुथलक, तखन अखबारमे पढ़ि-पढ़ि भँजिया-भँजिया नोकरीक दरखास दिअ लगलौं। केतौ लिखित परीक्षामे पासो करी तँ मौखिकमे छँटा जाइ, किए तँ किताबमे पढ़ल रहैत तखन ने बिसवासक संग भरल-पूरल जवाब देतौं से तँ मने थरथरा जाए। जइसँ बोलीए बन्न भऽ जाए, फेल कऽ जाइ। अन्तो-अन्त नोकरी नहियेँ भेल। जिनगीक आशा टुटए लगल। टुटैत-टुटैत एते टुटि गेल जे जिनगीए-सँ घृणा भऽ गेल। घृणित मन अपनासँ लऽ कऽ दुनियाँ धरिसँ टुटि गेल। जखन सभसँ टुटिये गेल तखन मरबे नीक छल तँए सोचैत-विचारैत गरदैनमे फँसरी लगा धरैनमे लटकए लगलौं। मुदा पत्नी देख लेलैन। हलाँकी घरक संग खिड़कियो बन्न कऽ देने रहिऐ, पता नहि, केना देख लेलैन- लगैए खिड़कीक दोग-देने देख लेलैन। गरदैनमे फँसरी लगा जखन फाँसीपर चढ़ए लगलौं कि पत्नी हल्ला केलैन। ओना, जौड़क दोस छोर दोसर दोसर खुट्टामे नइ बन्हने छेलौं, तइ बिच्चेमे हल्ला भेल! केबाड़ तोड़ि गरदैनमे जौड़ बान्हल सभ देखलैन। अपन मने हेरा गेल जे की केलौं तँ किछु ने! हल्ला सुनि जीवन काका सेहो एला। अबिते बजला- “ईह बुड़ि कहीं केँ! जेकरा हाथमे रूखाने-बैसला नइ रहत ओ गाम कमा गुजर कऽ लेत।” ओना जीवनो काका तमसाएले बुझेला, मुदा अपनो मनमे मरैक तामस चढ़ले रहए। बिधुआएल मुहेँ की बजितौं, तैयो कहलयैन- “काका बड़ गलती भेल।” जीवन काका बजला- “बड़ गलती नइ भेलह, भेलह एतबे जे जहिना तूँ समैयक महत् नइ देलहक, तहिना समैयो तोरा छोड़ि देलकह।” २ 1990 इस्वीमे आरम्भ भेल मैथिली साहित्यक प्रमुख कथा-संगोष्ठी ‘सगर राति दीप जरय’क 94म आयोजन जाल्पा मध्य विद्यालय परिसर- लौफा (मधेपुर)मे 24 जून 2017 संध्या 6 बजेमे शुरू भ’ भिनसर 6 बजेमे सम्पन्न भेल। डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ (वैज्ञानिकजी) केर संयोजकत्वमे आयोजित ऐ सगर रातिक कथा संगोष्ठीक उद्घाटन केलैन मैथिली साहित्यक सर्वश्रेष्ठ रचनकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल। श्री अरविन्द ठाकुर, डॉ योगानन्द झा, श्री केदार नाथ झा, डॉ. शिव कुमार प्रसाद एवम् डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’क संग दीप प्रज्वलन कार्यक्रमकेँ आगाँ बढ़ौल गेल। श्रीमती कुसुमलता झा, श्री फुलेन्द्र पाठक, राम सेवक ठाकुर एवम् श्री राम किशोर सिंह स्वागत गीत एवम् डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’क स्वागत भाषणक संग पोथी लोकार्पण सत्रमे प्रवेश भेल। पाँच गोट पोथीक लोकार्पण भेल। जइमे पहिल पोथी छल डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’क द्वारा अनुदित- ‘रोबो’। रोबो चेक भाषामे कारेल चापेक द्वारा लिखित ‘RUR’ नामक नाटक अछि, जेकर अंग्रेजी अनुवाद पॉल सेल्वर नामक लेखक केलैन। रोबोक लोकार्पण श्री अरविन्द ठाकुरजीक हाथे भेल। दोसर एवम् तेसर पोथी छल श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक मौलिक कृति लघुकथा संग्रह- ‘बेटीक पैरुख’ तथा ‘क्रान्तियोग’। बेटीक पैरुख’क लोकार्पण केलैन- डॉ. शिव कुमार प्रसाद एवम् ‘क्रान्तियोग’क लोकार्पण कर्ता छला- श्री दुर्गानन्द मण्डलजी। चारिम पोथी छल श्री राम विलास साहुक रचित काव्य संग्रह- ‘कोसीक कछेर’, जेकर लोकार्पण केलैन- श्री राजदेव मण्डल आ पाँचम पोथी छल श्री बेचन ठाकुर द्वारा रचित नाटक संचयन- ‘नबघर’। ‘नबघर’क लोकार्पण केलैन डॉ. शिव कुमार प्रसाद। लोकार्पित पाँचू पोथीक सन्दर्भमे लोर्कापण कर्ता अपन-अपन संक्षिप्त मनतव्य व्यक्त केलैन। ‘रोबो’क सन्दर्भमे श्री अरविन्द ठाकुर कहलैन- आइसँ करीब साए बर्ख पूर्व ऐ पोथीकेँ चेक भाषामे लिखल गेल छल, जेकरा मैथिली साहित्यमे डॉ. ‘वियोगी’ भावा अनुवाद केलैन। ‘रोबॉट’क कपल्पना कारेल चापेक आइसँ साए बर्ख पूर्व केने छला जे आइ अपना सबहक सोझ अछि। नाटकमे ईहो देखौल गेल अछि जे केना रोबॉट मानवक संहार करैए...। ‘बेटीक पैरुख’ कथा संग्रहक सन्दर्भमे डॉ. शिव कुमार प्रसाद कहलैन- बेटीक पैरुख संग्रहक सभटा कथा महिला सशक्तीकरणपर आधारित अछि। जँ पाठक आत्मसात् करैथ तँ स्वत: हुनकामे आत्मनिर्भता केना जागि जेतैन यएह ऐ पोथीमे संकलित सभ कथाक उत्ष अछि। ‘क्रान्तियोग’ लघु कथा संग्रहक सन्दर्भमे श्री दुर्गानन्द मण्डल कहलैन- बेकती अपने-आपमे अपन गुण-दोष केना चिन्हित करता तथा दोष मुक्त केना हेता, समयक संग चलबाक खगताकेँ केना बुझता तथा समयक संग मानवीय चेतनाकेँ जगबैत चलैले केना आ कोन बाटपर चलता इत्यादि ऐ संग्रहमे कथाकार अपन कथाक माध्यमे कहलैन अछि। ‘कोसीक कछेर’ काव्य संग्रहक सन्दर्भमे श्री राजदेव मण्डलजी कहलैन- कवि राम विलास साहुजी कोसी कातक वासी छैथ, कोसीक कछेरमे जीवन-यापन करै छैथ, अपन जीवनक अनुभवकेँ श्री साहुजी अपन काव्य सभमे बिना कोनो छान-बान्हक एव धरी-धोखाक रखलैन अछि। ‘नबघर’ पोथीक सन्दर्भमे डॉ. शिव कुमार प्रसाद कहलैन- ऐ पोथीमे चारि गोट नाटक/एकांकी अछि। चारू रचनामे वर्तमान समाजक दशा-दिशाकेँ नाटकरकार देखबैत अछि। लोकार्पण सत्रक पछाइत कथा सत्रमे प्रवेश भेल। अध्यक्ष मण्डलक गठन भेल। श्री नारायण यादव, डॉ. योगानन्द झा, श्री अरविन्द ठाकुर आ श्री जगदीश प्रसाद मण्डल चयनित भेला। एवम् मंच संचालन हेतु डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री दुर्गानन्द मण्डल, उमेश मण्डल तथा श्री नन्द विलास राय। कुल सात पालीमे प्राय: तीन-तीन गोट कथा पाठ भेल एवम् पठित कथा सभपर आलोचक लोकैन आलोचना केलैन। विवरण निम्न अछि- पहिल पालीमे- 1. हमर भीतरका सियाना : अरविन्द ठाकुर 2. आशीर्वाद : राम विलास साहु 3. कौआ के बौआ : प्रीतम निषाद प्रथम पालीक पठित कथापर आलोचना केलैन- डॉ. शिव कुमार प्रसाद, नन्द विलास राय, डॉ. योगानन्द झा। दोसर पाली- 4. विघटन : जगदीश प्रसाद मण्डल 5. दिलजान आंटी : शम्भु सौरभ 6. कृतघ्न : आनन्द मोहन झा आलोचना- कमलेश झा, नारायण यादव, दुर्गानन्द मण्डल। तेसर पाली- 7. सरकार हम पापी छी : नन्द विलास राय 8. संवेदनाक शरण : आनन्द कुमार झा 9. घरवालीक झिरकी : लक्ष्मी दास आलोचना- राजदेव मण्डल, अरविन्द ठाकुर, राम विलास साहु तथा दुर्गानन्द मण्डल। चारिम पाली- 10. जएह अपन सएह आन : अजय कुमार दास ‘पिन्टु’ 11. गामे बीरान भऽ गेल : कपिलेश्वर राउत 12. पथिक : विद्याचन्द्र झा आलोचना- गोविन्दाचार्य, कमलेश झा, उमेश मण्डल, योगान्द झा। पाँचिम पाली- 13. उपरारि जमीन : उमेश मण्डल 14. होनी-अनहोनी : नारायण यादव 15. स्वार्थान्ध : बेचन ठाकुर आलोचना- योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, राजदेव मण्डल, दुर्गानन्द मण्डल। छठम पाली- 16. जुड़शीतल : शारदा नन्द सिंह 17. निर्णय : योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ 18. मानव आ माछ : राधाकान्त मण्डल आलोचना- कपिलेश्वर राउत, प्रीतम निषाद, नन्द विलास राय। सातम पाली- 19. स्वाभिमान : उमेश पासवान 20. विश्वास : आनन्द मोहन झा 21. होइ छै गोहाय : शारदा नन्द सिंह 22. कर्मक फल : दुर्गानन्द मण्डल आलोचना- कमलेश झा, आनन्द झा, संजीव कुमार ‘शमा’ डॉ. शिव कुमार प्रसाद। ऐगला आयोजन अर्थात् सगर राति दीप जरय’क 95म खेपक आयोजन लेल माला उठौलैन श्री नारायण यादवजी। नारायण यादवजी अवकाश प्राप्त शिक्षक छैथ, कथाकार एवं आलोचक सेहो छैथ। जयनगरमे रहै छैथ, डुमरा घर छिऐन। श्री यादवजी दीप-पंजी हस्तगत करैत कहलैन- ‘ओना तँ हम रहै छी जयनगरमे मुदा जहिना सगर राति दीप जरयक यात्रा किछु दिनसँ गाम दिस मुखर अछि तहिना हमहूँ गामेमे अर्थात् जलसैन डुमरामे पनचानबेअम आयोजन कराएब।’ हलाँकि भावी संयोजक आयोजनक तिथि सेहो निर्धारित क’ लेलाह मुदा ओ अखन दूमर्जा अछि तँए संभावित तिथि- सितम्बर मासक पहिल शनि। 1990 इस्वीसँ आइ धरिक 'सगर राति दीप जरय'क आयोजनक विवरण- (क्रम संख्या, स्थानक नाओं एवं तिथि सहित- उमेश मण्डल) 1. मुजफ्फरपुर 21.01.1990 2. डेओढ़ 29.04.1990 3. दरभंगा 07.07.1990 4. पटना 3.11.1990 5. बेगुसराय 13.01.1991 6. कटिहार 22.04.1991 7. नवानी 21.07.1991 8. सकरी 22.10.1991 9. नेहरा 11.10.1992 10. विराटनगर 14.04.1992 11. वाराणसी 18.07.1992 12. पटना 19.10.1992 13. सुपौल 1 18.10.1993 14. बोकारो 24.04.1993 15. पैटघाट 10.07.1993 16. जनकपुर 09.10.1994 17. इसहपुर 06.02.1994 18. सरहद 23.04.1994 19. झंझारपुर 09.07.1994 20. घोघरडीहा 22.10.1994 21. बहेरा 21.01.1995 22. सुपौल (दरभंगा) 08.04.1995 23. काठमांडू 23.09.1995 24. राजविराज 24.01.1996 25. कोलकाता रजत जयंती 28.12.1996 26. महिषी 13.04.1997 क्र.सं. स्थान तिथि 27. तरौनी 20.06.1997 28. पटना 18.07.1997 29. बेगूसराय 13.09.1997 30. खजौली 04.04.1998 31. सहरसा 18.07.1998 32 पटना 10.10.1998 33. बलाइन; नागदह 08.01.1999 34. भवानीपुर 10.04.1999 35. मधुबनी 24.07.1999 36. अन्दौली 20.10.1999 37. जनकपुर 25.03.2000 38. काठमांडू 25.06.2000 39. धनबाद 21.10.2000 40. बिटठो 21.01.2001 41. हटनी(घोघरडीहा) 19.05.2001 42. बोकारो 25.08.2001 43. पटना (किरणजयंती) 01.12.2001 44. राँची 13.04.2002 45. भागलपुर 24.08.2002 46. विद्यापति भवन पटना 16.11.2002 क्र.सं. स्थान तिथि 47. कोलकाता 22.01.2003 48. खुटौना 07.06.2003 49. बेनीपुर 20.09.2003 50. दरभंगा 21.02.2004 51. जमशेदपुर 10.07.2004 52. राँची 02.10.2004 53. देवघर 08.01.2005 54. बेगूसराय 09.04.2005 55. पूर्णियाँ 20.06.2005 56. पटना 03.11.2005 57. जनकपुर (नेपाल) 12.08.2006 58. जयनगर 02.12.2006 59. बेगूसराय 10.02.2007 60. सहरसा 21.07.2007 61. सुपौल-2 01.12.2007 62. जमशेदपुर 03.05.2008 63. राँची 19.07.2008 64. रहुआ संग्राम 08.11.2008 65. पटना कथा गंगा-3 21.02.2009 66. मधुबनी 30.05.2009 67. मानारायटोल नरहन- समस्तीपुर 05.09.2009 68. सुपौल- 3 05.12.2009 69. जनकपुर 03.04.2010 70. कबिलपुर (दरभंगा) 12.06.2010 71. बेरमा (झंझारपुर) स्थान- मध्य विद्यालय परिसर- बेरमा। (सार्वजनिक स्थलपर) 02.10.2010 72. सुपौल 04.12.2010 73. महिषी कथा राजकमल 05.03.2011 74. हजारीबाग 10.09.2011 75. पटना हीरक जयन्ती 10.12.2011 76. चेन्नै 14.07.2012 77. दरभंगा किरण जयन्ती 01.12.2012 क्र.सं. स्थान तिथि 78. घनश्यामपुर 09.03.2013 79. औरहा (लौकही) (सार्वजनिक स्थलपर) 15.5.2013 80. निर्मली (स्थान- मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, सुभाष चौक, निर्मली- सुपौल) 30.11.2013 81. देवघर (स्थान- बिजली कोठी, बम्पासटॉन, देवघर) 22.03.2014 82. मेंहथ (झंझारपुर) कथा बौध सिद्ध मेहथपा 31.05.2014 83. सखुआ-भपटियाही सार्वजनिक स्थान- उत्क्रमित मध्य विद्यालयल परिसर। 30.08.2014 84. बेरमा मध्य विद्यालय परिसर (बेरमा,मधुबनी) 20.12.2014 85. भागलपुर ‘श्याम कुंज’ (द्वारिकापुरी भागलपुर) 04.04.2015 86. लकसेना उनमुक्त आश्रमक गांधी सभा कक्ष जिला- मधुबनी 20.06.2015 87. श्यामा रेसिडेन्सी कॉम विवाह हॉल (एस.बी.आइ. केम्पस) निर्मली (सुपौल) 19.09.2015 88. मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर) 30.01.2016 89. लौकही स्थान: सूर्य प्रसाद उच्च विद्यालय- लौकही 26.03.2016 90. लक्ष्मीनियाँ (मधुबनी) 18.06.2016 91. गोधनपुर (मिथिला दीपसँ उत्तर) जिला- मधुबनी 24.9.2016 92. नवानी (मधुबनी) 31.12.2016 93. रतनसारा (घोघरडीहा) जिला- मधुबनी 25.03.2017 94. लौफा (मधेपुर) जिला- मधुबनी 24.06.2017 मिथिलाक लोक संगीत/ लोक कला- भगैत गबैया (धर्मराज, ज्योतिश महराज, अंदू मालि, उदय साहु, हरिया डोम, बेनी, शती अवला, कारूबाबा इत्यादि भगैत निम्नलिखित ‘रसुआर-भगैत पार्टी’ 1980 ई.सँ गबै छथि।) श्री शम्भु प्रसाद मण्डल सुपुत्र स्व. लखन मण्डल भगैत गायन सह खजरी वादन उमेर- 42 साल 1980 ई.सँ भगैत गबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल। श्री गंगाराम मण्डल सुपुत्र श्री अशर्फी मण्डल- झालि वादक उमेर- 40 1980 ई.सँ झालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल। श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्व. उचित मण्डल उमेर- 60 रमझालि/ कठझालि/ करताल वादक 1975 ई.सँ रमझालि बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल। श्री रविन्द्र मण्डल सुपुत्र श्री खट्टर मण्डल उमेर- 32 नाल वादक पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल। श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्व. बिहारी मण्डल उमेर- 41 ग्रुमबाजा/ गुमगुिमयाँ 1980 ई.सँ गुमगुिमयाँ बजबै छथि। पता- गाम- बढियाघाट/रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- िनर्मली, जिला- सुपौल। श्री महेन्द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र स्व. छेदी मण्डल उमेर- 48 कठझालि वादक बचपनसँ गेबो करै छथि आ रमझालि/कठझालि बजेबो करै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्ट- मुंगराहा, भाया- निर्मली, जिला- सुपौल। बेचन ठाकुरक दूटा एकांकी नीशा मुक्‍ति आ बरहम बाबा नीशा मुक्‍ति पात्र परिचय : नीशा मुक्‍ति 1. शंकर : एकटा गरीब किसान 2. सुनैना : शंकरक पत्नी 3. सुन्नर : शंकरक बड़का बेटा 4. खखन : शंकरक छोटका बेटा 5. शान्‍ति : शंकरक बड़की बेटी 6. चानी : शंकरक छोटकी बेटी 7. खट्टर : शंकरक दोस 8. मीना : सतमा वर्गक छात्रा 9. राजीव : मीनाक इसकूलक छात्र 10. रौशन : मीनाक इसकूलक छात्र 11. केदार सिंह : पहिल पुलिस 12. बदरी सिंह : दोसर पुलिस 13. रघुनाथ : पहिल चौकीदार 14. देवनाथ : दोसर चौकीदार 15. मटरा : स्‍थानीय किराना दोकानदार 16. रामनाथ : रेल यात्री 17. प्रभुदयाल : रेल यात्री 18. नन्‍द किशोर : रेल यात्री 19. प्रियंका : रेल यात्री 20. शशिकान्‍त : प्रधानाध्‍यापक 21. सोमदेव : सहायक शिक्षक 22. अनूप : सहायक शिक्षक 23. सोनी : सहायक शिक्षिका 24. चन्‍दन : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 25. गुंजन : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 26. रानी : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 27. अमन : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 28. महारानी : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 29. कपिलदेव : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 30. रामदेव : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 31. हरिदेव : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 32. ललिता : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 33. कविता : मानव श्रृंखलाक विद्यार्थी 34. महेश्वर : मानव श्रृंखलाक हाकिम 35. दिनेश : फोटोग्राफर 36. बच्‍चन : एकटा समाजिक बेकती 37. राम शरण : बच्‍चनक सहयोगी 38. रामलाल : एकटा समाजिक बेकती 39. रामबाबू : चाह दोकानदार 40. ललन : रामबाबूक सहयोगी दृश्‍य एक (स्‍थान- शंकरक घर। शंकरक पत्नी सुनैना। दूटा बेटा। सुन्नर आ खखन तथा दूटा बेटी शान्‍ति आर चानी मंचपर उपस्‍थित अछि। सुनैना परिवारिक दयनीय स्‍थितिक सम्‍बन्‍धमे चिन्‍तामग्‍न अछि। शान्‍ति आर चानी तीती-तीती खेलैए। सुन्नर आर खखन गुल्‍ली–डन्‍टा खेलैए।) शान्‍ति- ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती था। चानी- ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती था। शान्‍ति- ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती था। ई हमर राज भेलौ। हमरा राजमे पएर नै दीहें। चानी- ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती ती था। ई हमर राज भेलौं। तूँ हूँ हमरा राजमे पएर नै दऽ सकै छें। शान्‍ति- (चानीक राजमे जा कऽ) हम एबौ तोरा राजमे। तूँ की करभिन? चानी- तूँ हमरा राजमे सँ चलि जो। नै तँ कोनो बाप काज नै देतौ। शान्‍ति- नै जेबौ गइ, नै जेबौ। चानी- एक दू तीन कहै छियौ मारबौ। नै तँ हमरा राजमे सँ अपना राजमे चलि जो। शान्‍ति- मारि कऽ देखही तँ। बापसँ भेँट करा दइ छियौ। (दुनूमे मारि फँसि गेल। दुनू उट्ठम-पटका करैए। सुनैना दौग कऽ आबि दुनूकेँ छोड़ा दू दिस केलक।) सुनैना- सरधुआकेँ खाली जनमाबै ले होइ छइ। प्रतिपाल करैमे करौआ लागल छइ। दारू-ताड़ी-गाजा पीऐ ले होइ छइ। मुड़ी मचरूआकेँ एकौटा नीशा नै छूटल छइ। भाँग खाइए। खैनी खाइए, बीड़ी-सिकरेट पीते अछि। जर्दाबला पान खाइते अछि। चाह पीबते अछि। हे मैया सरसत्ती, एहेन घरबला सात घर दुश्‍मनोकेँ नै देबइ। (सुनैना फेर माथा-हाथ दऽ बैस रहली।) सुन्नर- (गुल्‍ली फेंक कऽ) ओत्तैसँ पढ़ैत आ। खखन- (एक टाँगपर) चैत-कबड्डी, चैत कबड्डी, चैत कबड्डी चैत कबड्डीऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ। (खखनकेँ रस्‍तेमे साँस टुटि गेल।) सुन्नर- सार नै भेलौं, फेर पढ़। खखन- (फेर जगहपर जा कऽ) चैत कबड्डी आबए दे, तबला बजाबऽ दे। गीत-नाद गाबए दे, नटुआ नचाबऽ दे ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ। (खखन ठाढ़ भऽ हकैम रहलए।) सुन्नर- फेरो नै भेलौ सार। फेरो जो। पढ़ गऽ। खखन- (तुरैछ कऽ) हम नै जेबौ सार। हम हकैम गेलौं हेन। (सुन्नर खखनकेँ एक सटका बैसा देलक। खखन चिचिआ कऽ कानऽ लागल आर हाथ पएर पटकऽ लागल।) माए गै माए, बाप रौ बाप, सार सभ मारि देलक, जे सार हमरा मारलकै ओकरा माएके। (सुनैना उठि कऽ दौगली। दुनूकेँ एक एक चाट मारि अपना लग लऽ जा कऽ बैसेली। दुनू एक-दोसरपर कन्‍हुआइए।) सुनैना- तूँ सभ इसकूल किए ने गेलहीन? घरपर गुल्‍ली-डन्‍टा खेलै छें आर मारि-गारि करै छें। सुन्नर- कॉपी छे नहियेँ तँ इसकूल केना जेबै? खखन- हमरो पेन नइए तँ मुड़ी लऽ कऽ जेबै इसकूल? सुनैना- बापसँ पाइ मांगए जाइ गेलहीन? सुन्नर- मंगलिऐ तँ कहलक- पाइ नै छौ। बुढ़बाकेँ दारू-गाँजा पीऐ ले होइ छै पाइ आर कॉपी ले नै होइ छइ। खखन- हरदम बुढ़बा खिसियाएले रहै छइ। हम मंगलिऐ तँ कहक-जो ने कहिऐं माएकेँ। सुनैना- हँ हँ, किए ने? हमरा थैली देने छै रखै ले। अपना ले लल आर गोइठा बीछऽ चल। अपना दारू-ताड़ी, गाँजा-भाँग ले पाइए नै होइ छै आर हमरा रखै ले पाइ दइए। एत्तै केतौ नीशाँ केनाइ होइ छइ। बाप रे बा, हरदम नीशेमे चूर। चकेठबा जेतै कहियो चटपटमे। टुनकीबा कमाइ कम नै छइ। मुदा पीऐ ले बेहाल रहै छइ। हम सभ अन्न बेगैर मरे छी। धिया-पुता कुकुर-बानर जकाँ एमहर-ओमहर ढहनाइए। हे भगवान, हे दाता दिनकर, ओकर नेत सुधारहक। नै तँ हमरा सभकेँ मौगैत दऽ दएह। (सुनैना कानए लगली।) सुन्नर- माए गइ, खाइ ले दे। बड़ भूख लागलए। खखन- (कनैत) केतए सँ देबौ। की देबौ? घरमे किच्‍छो नै छौ। शान्‍ति- खाइले दे नऽ माए। हमरा बड़ भूख लागलए। चानी- (कनैत) खाइले दे नऽ गइ। खाइ ले दे नऽ गइ। सुनैना- (खिसिया कऽ) खाइ जाइ जो नऽ हमर देह। नोचि ले हमर देह आर खाइ जाइ जो। (सुनैना कानऽ लगली। झूमैत-झामैत शंकरक प्रवेश।) शंकर- की भेलै हन? सुन्नर माए किए कनै छें? शान्‍ति, की भेलौ हेन माएकेँ? शान्‍ति- खाइ ले मंगलिऐ तँ कानऽ लागल। शंकर- सुन्नर माए, तूँ कनलें किए? हमरा कहितेँ। खाइक जोगार हम करितिऐ। सुनैना- आबो की भेलै? दहक पाइ। कीन आनै छी। शंकर- (जेबी- ढट्ठामे ताकि कऽ) पाइ कहाँ छौ जे देबौ? पाइ तँ छेलै हन। की भेलै? लगैए केतौ खसि पड़लै। अच्‍छा जो, आइ केकरोसँ उधारी आनि लीहें। सुनैना- जा नऽ तूँही। आनि दहक नऽ। हमरा कोइ उधारी नै दइए। सभकेँ धरने छिऐ। सभ खोंखिया कऽ दौगैए। तूँही आनि दहक। शंकर- तूँही जो। हमरा तँ आओर कोइ नै दइए। तूँही जो। तोरा दऽ देतौ। तूँ मौगी छिहीन। सुनैना- हम नै जाएब, हम नै जाएब, हम नै जाएब। हम मुँह नोचबै ले जाउ गऽ। शंकर- (खिसिया कऽ) तोरा जाए पड़तौ। हमर कहल करए पड़तौ। नै तँ देखा देबौ। सुनैना- हम नै जाएब। हमरा कोइ उधारी नै दइए। अपने जा। शंकर- (खिसिया कऽ) हमर कहल नै करभिन तँ देखही हमर खेल। (शंकर सुनैनाकेँ अनधून मारऽ लागल चारू धिया-पुता कानऽ लागल। सुन्नर आर शानति शंकरकेँ अपन-अपना दिस घीच कऽ छोड़बऽ लागल आकि सभ धियो-पुताकेँ अनधून मारऽ लागल। सभ कियो जोर-जोरसँ चिचियाए लागल- माए गै, बाप रौ। अन्‍तमे सुनैनाकेँ मारऽ लागल। सुनैनाक मुहसँ खून खसैत देख शंकर भागल।) ◌पटाक्षेप। दृश्‍य दू (स्‍थान- समूदायिक भवन। शंकर आर खट्टर दारू पी रहलए। दुनू गोरे दोस छैथ। दुनू चखनो खा रहलए।) शंकर- रौ बैंह खट्टरा, औझका दारू बड़ सुअदगर छौ। आइ भरि मन, भरि छाँक पीबौ। खट्टर- शंकर सार, आइ मटराक दोकानक ताला तोड़ै के छइ। छेनी, मरिया आर रीन्‍च लऽ लीहें। शंकर- लै के कोन जरूरी छइ। संगेमे छइ। (फाँड़सँ निकालि खट्टरकेँ देखौलक।) खट्टर- सार, तूँ पहुँचल फकीर छें रौ। शंकर- तब नऽ मलफै उड़बै छिऐ। (एकटा तेरह बर्खक सुन्नैर लड़िकी मीना बस्‍ता लऽ कऽ गुजरली।) खट्टर- रौ सार शंकर, किछु देखबो केलही? शंकर- कथी रौ? खट्टर- समान। चारा। शंकर- कथी कहै छिहीन रौ? खोलि कऽ बाज नऽ। खट्टर- एगो लड़की इसकूल जाइ छेलै। उ छेलै कमाल के। शंकर- चल नऽ कनी देखिऐ। सुनसान हेतै तँ देखबै। (शंकर आर खट्टर अन्‍दर गेल। मीना जोर-जोरसँ माए गै, बाप रौ चिचिआ रहलए। कनीकालक पछाइत मीना दम तोड़ि देली।) खट्टर- (अन्‍दरसँ) रौ सार शंकरबा, तोरा बुते मरलै। शंकर- (अन्‍दरेसँ) रौ बैंह खट्टरा, तोरा बुते मरलै। खट्टर- लऽ चल एकरा। केतौ सड़क कातमे फेंक देबै। शंकर- जल्‍दी चल। विद्यार्थी सभ अबै छइ। पकड़ा जाइ जेबें। (शंकर आर खट्टर मीनाकेँ उठौने प्रवेश केलक। शीघ्र दुनू गोरे मीनाकेँ मंचपर पटैक भागि जाइ गेल। राजीव आर रौशनक प्रवेश। दुनू विद्यार्थी मीनाक लाश देख डरि कऽ चौंकल।) राजीव- रौ रौशन, उ तँ मीना छै। अपने इसकूलमे पढ़ै छइ। इसकूलक डरेशो पहीरने छइ। रौशन- राजीव, हमरा बड़ डर होइ छौ। भाग एतए सँ। जल्‍दी चल, इसकूलमे सरकेँ कहबै। (राजीव आर रौशनक तेजीसँ प्रस्‍थान। कनियेँ कालक पछाइत दूटा पुलिस केदार सिंहआ बदरी सिंह अपन दूटा चौकीदार रघुनाथ आर देवनाथक संग प्रवेश केलैथ। चारू गोरे लाशकेँ देखलैथ।) केदार सिंह- रेहे चौकीदार, लाश को लादो गाड़ी में। बदरी सिंह- सर, ई लड़की इसकूल जा रही थी। रस्‍ता मं मौका पाकर कोइ दारूबाज इसका जान ले लिया। साला निशेवाज सभ, हरामी बच्‍चा ऐ भोली-भाली बच्‍ची को लगत काम करके मारकर फेंक दिया। केदार सिंह- रेहे चौकीदार सभ, मुँह का देखता है? जल्‍दी लादो लाश को गाड़ीमे। (रघुनाथ आर देवनाथ लाशकेँ उठा कऽ अन्‍दर लऽ गेलैथ। दुनू पुलिस सेहो पाछू-पाछू अन्‍दर गेलैथ। कनैत-कनैत मटराक प्रवेश।) मटरा- (छाती पीटैत) माए गै माए, बाप रौ बाप। जुलुम कऽ देलक चोरबा जनमल सभ। हमर बाल-बच्‍चा आब केना जीयत? बाप रौ बाप। सार चोरबाकेँ पकैड़तिऐ तँ टेंगारीसँ कुट्टी-कुट्टी काटि दैतिऐ। (रघुनाथक प्रवेश।) रघुनाथ- की भेलह हन मटरा भाय? मटरा- बाप रौ बाप, जुलुम भऽ गेलह हौ चौकीदार। डिल्‍लीसँ कमा कऽ एलौं। एक लाख पूजी लगेलौं। किराना दोकान खोललौं। महिनो नै कमेलौं। साला चोरबा ताला तोड़ि देलक। सभटा समान लऽ गेलऽ। आब कथी हम बेचबऽ? धिया-पुता कथी खेतऽ? आब हम की करबै हौ चौकीदार? हमरा किछु नै फुराइ छह हौ चौकीदार। रघुनाथ- ई गप तूँ थानामे इन्‍ट्री करा दहक। मटरा- हमरा माहुरो खाइले पाइ नै छह। तँ थानापर केना जेबै? तूँही मदैत करऽ ने? रघुनाथ- छोड़ि दहक। हमहीं बाड़ा बाबूकेँ कहि देबैन। (रघुनाथक प्रस्‍थान) मटरा- लगैए, शंकरबा सार लऽ गेल समान। मुदा हम देखलिऐ तँ नहि। जौं पकैड़तिऐ तँ सारकेँ टेंगारीसँ कुट्टी-कुट्टी काटि ओतै राखि दैतिऐ। ◌ पटाक्षेप। दृश्‍य तीन (स्‍थान- सामूदायिक भवन। शंकर आर खट्टर दुनू दोस चखनाक संग ताड़ी पी रहल अछि। दुनू मस्‍तीमे अछि।) शंकर- सार खट्टर, तूँ अनाड़ी छें। कनियेँ ले रातिमे बाँचि गेलें। नहि तँ दुनू गोरे धरा जैतें। चौकीदर अबै छेलै हन। खट्टर- सार शंकर, तूँही अनाड़ी छें। केहेन-केहेन पुलिस हमरा पकैड़ नै सकल। ई चौकीदरबा कोन माल-मे-माल छइ। बेसी एमहर-ओहमर करतै तँ ओकरो घरमे चोरि कऽ लेबै। लैत रहत गदहाबला। शंकर- औझका की प्रोग्राम छौ से कह सार खट्टरा। खट्टर- औझका हमर विचार ई जे बहुत परदेशी सभ फगुआमे गाम अबैत हेतै दिल्‍ली-पैंजाब-मुम्‍बइसँ कमा कऽ सभ लग बहुत-बहुत पाइ हेतइ। होशियारीसँ सबहक जेबी मारि लेबै। चल आइ टीशनेपर। शंकर- ठीक विचार छौ। चल टीशनेपर। जेबी नै सुतरतै तँ बैग-एटैची सुतरतै नऽ। मुदा जाइसँ पहिने गाँजा पी कऽ मूड बना ले। सट्टर- हमरो तँ सएह मन छेलौ। जेबी मारनाइ आकि बैग-एटैची पार केनाइ भीड़ेमे बढ़ियाँ होइ छइ। (दुनू गोटे गाँजा पीलक। फेर दुनू गोरे सिकरेट धरा कऽ पीबैत टीशन दिस विदा भेल।) शंकर- रौ बैंह खट्टरा, टीशनपर छौड़ी-मौगी सभ बड़ रहै छइ। एक-पर-एक सुन्नैर सभ रहै छइ। अपना सभकेँ जएह किछु तँ संतोख हेतइ। खट्टर- शंकरबा सार, हमरा ओत्तै नै पढ़ा। हम अपने ओइ सभसँ रिटाइर छी। भीड़मे केत्तेकेँ हम की नै करै छी। चल, चल। जल्‍दी चल। गाड़ीक समए भऽ गेलै हन। (दुनू गोरे टीशन जा रहलए। दुनू गोरे क्षणिक समए ले अन्‍दर गेल। क्षणिक पटाक्षेप भेल। अन्‍दरमे रामनाथ, प्रभु दयाल, नन्‍द किशोर आर प्रियंका ट्रेन पकड़ै ले तैयारअछि। शंकर आर खट्टर मंचपर आएल। शीघ्र पर्दा हटल। यात्री चारू गोरे कुरसीपर बैसलए। शंकर दुनू गोरे घुमि रहलए।) शंकर- गाड़ी आबि रहल अछि। पॉकीटमार सँ सावधान। (यात्री चारू गोरे उठलैथ। प्रभुदयाल जेबी टटोललैथ। शंकरसहैट कऽ प्रभुदयाल लग आर खट्टर प्रियंका लग गेल। शंकर दुनू गोरे पॉकेट मारऽ लागल आकि धरा गेल। चारू आदमी शंकर आर खट्टरकेँ मारि रहलए। मार सार के- मार सार केँ हल्‍ला भऽ रहलए। केदार सिंह आर बदरी सिंह प्रवेश कऽ दुनूकेँ अनधुन मारऽ लागल। शंकर दुनू गोरे ओंघरा रहलए। बदरी सिंह शंकरकेँ आर केदार सिंह खट्टरकेँ मारि रहल छैथ।) अनुवोधक- (अन्‍दरसँ) यात्रीगण कृपया ध्‍यान दें। जयनगर से चलकर नई दिल्‍ली को जानेवाली गरीब रथ एक्‍सप्रेस प्‍लेटफॉर्म नं. १ पर आ रही है। (अनुवोधक ऐ गपकेँ दू बेर कहलैथ।) चारू यात्री अन्‍दर गेल। दुनू पुलिस शंकर दुनू गोरेकेँ मारनाइ छोड़ि देलैथ। दुनू उठि कऽ हाथ-पएर झाड़लक।) बदरी सिंह- ला साला, माल-पानी। शंकर- आइ नै देब सर। आइ बड़ मारलौं हन। केदार सिंह- तूँ बड़ी चौंसठ बा। बहोत माल मारता है। लाउ एक हजार। खट्टर- आइ किन्नौं नै देब। अहाँ बड मारलौं हन। केदार सिंह- ना मारी तँ पब्‍लिक कैसे बुझी। पब्‍लिक के बुझाना हाय जे हम पुलिस हाय। कुछ शो भी करना पड़ता हाय नऽ। जो ही कुछ देना है दे दऽ। खट्टर- आइ हम किन्नौं नै देब। हमरा दवाइ कराबऽ पड़त। केदार सिंह- जाउ साला सभ, जाउ। आज छोड़ देते हैं। (शंकर आर खट्टर लड़खड़ाइत-लड़खड़ाइत अन्‍दर गेल।) बदरी सिंह- केदार भाय, एगो गप बुझलिऐ हन की नहि, दारूक सम्‍बन्‍धमे? केदार सिंह- नहि, की भेलै से? बदरी सिंह- दारू बन्न भऽ गेल। हम भोरे पेपरमे पढ़लौं। हेन सरकार चाहै छैथ जे देवराज्‍यकेँ नीशा मुक्‍त करी। कारण ऐ सँ राज्‍यमे अनेक तरहक घटना दुर्घटना भऽ रहलै हन। जेना- चोरी-डकैती, छीनरपनी, बैमानी, लूट-पाट, बलत्‍कारी इत्‍यादि। ऐ सभ तरहक शिकाइत सरकारकेँ बहुत भेलै हन। तही दुआरे सरकार नीशाँ मुक्‍तिक करगर कदम उठेलक हन। (दुनू पुलिस कुरसीपर बैसलैथ।) केदार सिंह- कदम जदी सफल भऽ जेतैन तँ देवराज्‍य सरकारकेँ दुनियाँमे नीक प्रतिष्‍ठा भेटतैन। मुदा भाय, अपना सभकेँ बड़ दिक्कत भऽ जाएत। कारण ओइ बेगैर अपना सभकेँ एको दिन नै निमहत। अपना सभ ले सरकार किछु जोगार करतै, की नहि? बदरी सिंह- उम्‍मीद कम आर भरोस ज्‍यादे। ओना पेपरमे दारू, ताड़ी, गाँजा, भाँग, खैनी, बीड़ी, सिकरेट, पान इत्‍यादिपर रोक लगाएल गेल हन। कारण सभ मे नीशा छै आर उ नीशा कोनो-ने-कोनो रूपमे देहक लेल नोकसानदायक अछि। जेना खैनीमे निकोटीन पएल जाइए जइसँ कैंसरक सम्‍भावना रहैए। ओही खैनीसँ बीड़ी, सिकरेट, पान मशाला इत्‍यादि बनैए। सोभाविक छै उ समान अपना सभकेँ नोकसान करत। दारूसँ फेफड़ा जरै छै, कीडनी फेल करै छै। गाँजासँ फेफड़ा जरै छै, दम्‍मा होइ छइ। ऐ तरहें हम कहि सकै छी जे प्राय: सभ नीशाबला पदार्थ देहक लेल खतरनाक अछि जेकरा तियागने स्‍वास्‍थ्‍यक रक्षा हएत। केदार सिंह- भाय बदरी, सरकारकेँ जे करबाक हो, से करौ। मुदा हमरा ले दारूक जोगार सरकार करैत रहौ। बदरी सिंह- अहाँ बताह जकाँ गप करै छी भाय। अहाँ आब दारूसँ छातीपर मुक्का मारि लिअ। केदार सिंह- भाय, हमरा ओइ बेगैर नै बनत। बदरी सिंह- किए नै बनतै? मनकेँ जेत्ते चसकेबै, मन ओते चसकतै। मन जेते काबूमे रहत, ओते मानवतामे धनिक रहब। मने सभ किछु छिऐ। कोनो शायर कहने छथिन- मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय। मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होइ। केदार सिंह- भाय, अहाँ केँ अध्‍यात्‍मिक ज्ञान बड़ अछि यौ। बदरी सिंह- हमरा अध्‍यात्‍मिक ज्ञान सूइयाक नोको बरबैर नै अछि। ओना, समए निकालि कखनो-कखनो कोनो-कोनो अध्‍यात्‍मिक पोथी पढ़ि लै छी। सरकारक नीशा मुक्‍ति कदमक स्‍वागत करैत हम आइ संकल्‍प लै छी जे हम कोनो नीशा नै करब, नै करब, नै करब। ◌ पटाक्षेप। दृश्‍य चारि (स्‍थान- शंकरक घर। सुनैना सूपमे चाउर फटैक रहलए। सुन्नर आर शान्‍ति एक दिस तथा खखन आर चानी दोसर दिस भऽ कबड्डी खेल रहलए।) सुन्नर- कबड्डी, कबड्डी, कबड्डी, कबड्डी, कबड्डीऽऽऽ। खखन- चैत कबड्डी, चैत कबड्डी, चौत कबड्डी, चैत कबड्डीऽऽऽ। शान्‍ति- कबड्डी कबड्डी, कबड्डी खेल। घृणा त्‍यागि, राखू मेल। चानी- चैत कबड्डी अड्डा, बाप तोहर बुड्ढ़ा। तोड़ि देबौ नेंगरी, बना देबौ बोंगरी। सुन्नर- चैत कबड्डी एला, माए तोहर लैला। बाप तोहर मजलूम, तूँ बाबा मखदूमऽऽऽऽ (खखन आर चानी सुन्‍नरकेँ टाँग पकैड़ घीचैए अपना दिस आर सुन्नर अड्डा दिस घीच कऽ लऽ जाइए। सुन्नरकेँ अड्डासँ पहिने साँस टुटि गेल। खखन आर चानी थोपड़ी बजा कऽ खूम हँसए लागल।) खखन- कबड्डी कबड्डी, तोड़ि देबौ हड्डी। निकालि देबौ पोंटा, मारबो दू सोंटाऽऽऽऽ। (खखन शान्‍तिकेँ घीचने-घीचने पढ़ैत-पढ़ैत अपना घर लऽ गेल। फेर खखन आर चानी थोपड़ी बजा कऽ हँसए लागल।) खखन- (नचैत-नचैत) हरा देलियौ, हरा देलियौ। चानी- (हारि गेलें हरूआ, खा ले गूँहके तरूआ।) – 3 (चारू भाए-बहिनमे मारि फँसि गेल। सुन्नर-खखन आर शान्‍ति-चानी उट्ठम-पटका करैए। सुनैना चाउर फटकनाइ छोड़ि दौग कऽ आबि झगड़ा छोड़ाबऽ लगली। चारूकेँ दू-दू चाट दऽ कऽ सुनैना अलग-अलग केली। चारू हकमैत एक-दोसरपर कन्‍हुआ रहलए।) सुनैना- तूँ सभ झगड़ा किए करै जाइ गेलें? सुन्नर- तोहर बेटी हमरा किए कहलकौ- हारि गेलें हरूआ, खा ले गूँहक तरूआ? तीन बेर कहलकौ। सुनैना- आब नै कहतौ। झगड़ा नै करै जाइ जो। भाए-बहिनमे झगड़ा करै जाइ जेबहीन तँ लोक बुड़बक कहतौ। खखन- माए गै, पापा केतए रहै छै? काए दिनसँ घर पर नै देखै छिऐ। सुनैना- केतौ रहौ सरधुआ। ओम्‍हरै मरि जाउ। शान्‍ति- पापाकेँ गारि किए दइ छिहीन गै? सुनैना- तोहर पापा ताड़ी-दारू-गाँजा पी कऽ बुच्‍च रहै छौ। अपना सबहक पेटक जोगार नै करै छौ। हमरा मजूरी कऽ पेटक जोगार करए पड़ैए। तोरा सबहक पढ़ैक जोगार नै करै छौ। दोकानदार सभकेँ उधारीबला पाइ नै दै छौ। अही सभसँ दिल बड दुखाएल अछि। तँए ओकरा गरियबै छिऐ। शान्‍ति- ओहेन पापाकेँ हमहूँ गरियेबै। ओहेन पापाकेँसुपैन धारमे देबै, गजहर गाछमे सुतेबै। (शंकरकेँ पकड़ने खट्टरक प्रवेश। खट्टर साधुक भेषमे अछि। शंकर एककातमे नीशामे ठाढ़ भऽ असथिरे-असथिरे हिलैए आर खट्टर ओकरा पकड़ने ठाढ़ अछि।) खट्टर- दोसतीनी, दोसकेँ परसू साँझमे घुमैकाल एन.एच.पर एगो बोलेरोबला ठोकर मारि देलकै। हम उठा-पुठा कऽ टेम्‍पूमे लादि होस्‍पीटल लऽ गेलौं। डाक्‍टर जाँच-परतालक पछाइत कहलैन- हिनकर फेफड़ा जरल छैन आर किडनी सेहो फेल छैन। ई बहुत सिरियस छैथ। ई दू-चारि दिनक मेहमान रहि गेल छैथ। हिनका घरेपर लऽ जाउ। सुनैना- अहाँ तँ एकरा बहसा कऽ तूल कऽ देलिऐ। दारू पीआ-पीआ जान लऽ लेलिऐ निशेवाज कहीं के। खट्टर- दोस्‍तीनी, जहियासँ सरकार नीशा बन्न केलकै तहियासँ हम नीशेबाजी छोड़ि देलिऐ। बबाजी बनि गेलौं हन। देखै छिऐ, हमर बगे। सुनैना- झूठा नहितन। देखबैले बबाजी भऽ गेल हन। खट्टर- (कण्‍ठी देखा छुबैत) हम कण्‍ठी छुबै छी। झूठ नै कहै छी। हम सभटा नीशा छोड़ि देलौं। (शंकर बैस गेल। खट्टर ठाढ़े रहल।) सुनैना- तँ दोसोकेँ किए नै छोड़ा देलिऐ? खट्टर- दोसकेँ हम कहलिऐ। मुदा ओ नइ मानलैथ। केना-ने-केना केतौ-ने-केतौसँ ऊपर कऽ कनी-मनी पीए लै छैथ। सुनैना- अखनो तँ दोस पीनेए। खट्टर- हमरो लगैए। हमरा आश्‍चर्य लगैए जे केना उपरा कऽ मारि दै छथिन। सुनैना- (खिसिया कऽ) बड़ पीयाक छै तँ भने ओम्‍हरे होस्‍पीटलेमे मरि जइतै से नहि। शंकर- (खिसिया कऽ झूमैत) तोरा बापक कमाइकेँ नै पीलौं हन। अपना कमा कऽ पीलौं हन। हमरा अपने बड़ मन खराप अछि। तैपर खिसियबैए। खट्टर- दोसतीनी, हम जाइ छी। सोसराइरमे साइरकेँ बिहा छिऐ। दोसपर नीक जकाँ धियान देबइ। (खट्टरक प्रस्‍थान।) सुनैना- दारू-गाँजा पीऐत-पीऐत मन खराप कऽ लेलक हन। परिवारपर कोनो धियाने नहि। लेबरमे खटि-खटि हम कौहना पेट चलबै छी। एकरा एकर कोनो लाज नहि। (शंकर टगि कऽ मरि गेल। सुनैना माए गै, बाप रौ चिचियाए लगल। चारू धिया-पुता सेहो खूम कानए लागल।) केतए चलि गेलहक हौ सुन्नर पापा। केतए चलि गेलहक हौ शान्‍ति पापा। आब केना रहबै हौ चानी पापा। ◌ पटाक्षेप। दृश्‍य पाँच (स्‍थान- एन.एच.। नीशा मुक्ति हेतु मानव श्रृंखलाक पूर्ण तैयारी भऽ चुकल अछि। प्रधानाध्‍यापक शशिकान्‍त आर सहायक शिक्षक सोमदेव नीशा मुक्‍तिक सम्‍बन्‍धमे गप-सप्‍प करै छैथ।) शशिकान्‍त- सोमदेव बाबू, देवराज्‍य सरकारकेँ नीशाबन्‍दी कानून बड़ नीक रहलैन। प्राय: सम्‍पूर्ण राज्‍य नीशा मुक्‍त भऽ गेल हन। दारू बाज सभ तँ छरपटाइए। मुदा केतौ दारू नै भेटैए ओकरा सभकेँ। दारूए-टा नहि, ताड़ी, भाँग, गाँजा, खैनी, बीड़ी, पान, सिकरेट सेहो बन्न भऽ गेल। सोमदेव- सर, देवराज्‍य सरकारक ई कदम बहुत सराहनीय रहल। मुदा किछु हेहर, पतीत अखनो चोरा-नुका कऽ दारू-ताड़ी-गाँजा मारिए लै छइ। आखिर रजबुधिसँ चोरबुधि भारी होइ छै किने। शशिकान्‍त- से जे हौउ। मुदा सरकारक ई नीशाबन्‍दी नीशामुक्‍ति कार्यक्रम 99 प्रतिशत सफल रहल। ऐ ले हम सरकारकेँ हार्दिक धैनवाद दै छिऐन। अहिना जदी सरकार अपराधपर नियंत्रण करै तँ देवराज्‍य देवलोक बनि जाएत। सोमदेव- सरकारेक मन छिऐ। ऊहो भऽ सकैए। सर, अखैन धरि विद्यार्थी सभ नै जुटल हन। कहीं चेकमे अपना सभ पकड़ा नै जाइ। सुनैना- पकड़ेबै किए? हाकिम नै बुझै छथिन ठंढाक समए छइ। सभ विद्यार्थी खा-पीब कऽ मजगूत भऽ कऽ आएत किने। कारण एन.एच.पर रौदमे ठाढ़ हुअ पड़तै। गाम-गामसँ विद्यार्थीकेँ पहुँचैमे कनी-मनी अबैर-सबेर हेबै करतै। (सहायक शिक्षक अनूपक संग चन्‍दन, गुंजन, अमन, रानी आर महारानी अन्‍दरमे नारा लगा रहलए।) चन्‍दन- ताड़ी-दारू बन्न करू। (शशिकान्‍त सोमदेव उठि कऽ टहैल रहल छैथ।) सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। (सभ कियो प्रवेश केलैथ। चन्‍दनक हाथमे झण्‍डा छैन। अनूप सभसँ पाछू छैथ झंडापर नीशामुक्‍त देवराज्‍य लिखल अछि।) चन्‍दन- गाँजा-भाँग बन्न करू। (घुमि-घुमि कऽ) सभ कियो- बन्न करू बन्न करू। चन्‍दन- खैनी-बीड़ी बन्न करू। सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। चन्‍दन- सिकरेट-पान बन्न करू। सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। (अनूप सभ विद्यार्थीकेँ पतयानीमे लगेलैथ। सहायक शिक्षिका- सोनीक संग कपिलदेव, रामदेव, हरिदेव, ललिता आर कविता अन्‍दरमे नारा लगा रहलए। अनूप अपन टीम लग ठाढ़ छैथ।) (शशिकान्‍त आर सोमदेवक प्रस्‍थान।) कपिलदेव- ताड़ी-दारू, बन्न करू। सभ कियो- नीरोग रहू, नीरोग रहू। (सभ कियो प्रवेश केलैथ। कपिलदवेक हाथमे झण्‍डा छैन। सोनी सभसँ पाछू छैथ। झण्‍डापर नीशा हटाउ, देवराज्‍य बँचाउ लिखलए।) कपिलदेव- गाँजा-भाँग बन्न करू। (घुमि-घुमि कऽ) सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। कपिलदेव- खैनी-बीड़ी बन्न करू। सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। कपिलदेव- सिकरेट-पान बन्न करू। सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। कपिलदेव- सुपारी-गुटका बन्न करू। सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। (सोनी सभकेँ पतयानीमे लगेलैथ। सोनी अपन टीम लग ठाढ़ छैथ।) अनूप- (घुमि कऽ) सभ गोरे ठाढ़ रह। ऊपरसँ हाकिम सभ एथिन। फोटो झीकैबला एथिन। फोटो झीका कऽ जाइ जइहें। सभ कियो सटि-सटि कऽ ठाढ़ रह आर नारा लगबैत रह। सोनी- (घुमि कऽ) जखन तोरा सभकेँ टाँग दुखा जेतौ तँ बैस जाइ जइहें। बिना फोटो झीकेने कोइ नइ जाइ जइहें। कपिलदेव- नीशा हटाउ, नीशा हटाउ। सभ कियो- राज्‍य बँचाउ, राज्‍य बँचाउ। चन्‍दन- नीशा छोड़ू, पाय बँचाउ। सभ कियो- धिया-पुता, पढ़ाउ-लिखाउ। (एकाएकी सभ गोरे बैस गेल। रामशरण आर बच्‍चनक पानि लऽ कऽ प्रवेश। सभ गोरे ठाढ़ भऽ जाइ गेल। रामशरण आ बच्‍चन पानि बँटै छैथ। पानि बाँटि दुनू गोरे प्रस्‍थान केलैथ। रामलाल बिस्‍कुट लऽ कऽ प्रवेश केलैथ। रामलाल बिस्‍कुट बँटै छैथ। बिस्‍कुट बाँटि रामलालक प्रस्‍थान। राम बाबू आर ललनक चाह लऽ कऽ प्रवेश। ई दुनू गोरे चाह बँटै छैथ। चाह बाँटि दुनू गोरे प्रस्‍थान केलैथ।) अनूप- चन्‍दन, नीशामुक्‍तिपर जे ऊ गीत तैयार केने छेलहीन से, गाबही ने। चन्‍दन- जी सर, गाबै छिऐ। (चन्‍दन आर रानी एक दिस झड़नी लऽ कऽ तथा गुंजन आर ललिता दोसर दिस झड़नी लऽ कऽ गीत गाबैले तैयार भेल।) चन्‍दन+रानी- हॉंएजीऽ ऽ ऽ ऽ, दारू-ताड़ी बन्न भेलइ। बन्न भाँग गाँजा। खैनी बीड़ी सिकरेट बन्न भेलैजी। गुंजन+ललिता- हाँएजीऽ ऽ ऽ ऽ, गुटको पान सुपारी हटलै। रोगी सभ निरोग भेलइ। राज्‍य नीशामुक्‍त भेलैजी। चन्‍दन+ललिता- हाँएजीऽ ऽ ऽ ऽ, चोरी हटलै डकैती घटलै अपराध बलत्‍कारी भगलै। समुचित शिक्षा बढ़लै जी। गुंजन+रानी- हाँएजीऽ ऽ ऽ ऽ, अनुशासन, शिष्‍टाचार एलै। सुख-शान्‍ति बहार एलै। सहानुभूति परेम बढ़लैजी। चन्‍दन+रानी- हाँएजीऽ ऽ ऽ ऽ, आब नै कहियो नीशा औतै। औतै सत्‍यानाश हेतै। सम्‍हरल घर बिगैड़ जेतैजी। गुंजन+ललिता- हाँएजीऽ ऽ ऽ ऽ, चोरबुद्धी भारी रहलै। रजबुद्धी हल्‍लुक। चोर उपरा कऽ पीतैजी। (थोपड़ीक बौछार भेल।) अनूप- (फोन रिसिभ कऽ) हेल्‍लो, सर प्रणाम। जी जी। जी सर। हम सभ तैयार छी। (फोन कटि गेल) सोनीजी, अहाँ एक-एक हाथपर लाइन लगबा लिअ। हाकिम आर फोटोग्राफर आबि रहल छैथ। सोनी- जी सर, हम लाइन लगबा लै छी। सभ कोइ एक-एक हाथपर लाइन लगबै जाइ जो। (सोनी एक-एक हाथपर सभ विद्यार्थीकेँ लाइनमे लगेलैन।) (शाशिकान्‍त आर सोमदेवक प्रवेश।) चन्‍दन- नीशेवाजी बन्न करू। सभ कियो- बन्न करू, बन्न करू। कपिलदेव- नीशा भगाउ, इज्‍जत बँचाउ। सभ कियो- इज्‍जत बँचाउ, इज्‍जत बँचाउ। (नीशाबन्‍दी कार्यक्रमक प्रखण्‍ड स्‍तरीय हाकिम बैचयुक्‍त महेश्‍वर आर फोटोग्राफार दिनेशक प्रवेश। महेश्‍वर निरीक्षण करै छैथ आर दिनेश फोटो झीकै छैथ।) महेश्‍वर- अनूपजी आर सोनीजी, हमरा दुनू गोटेक गेला पछाइत अहूँ सभकेँछुट्टी। सरकारक नीशामुक्‍ति कार्यक्रम पूर्ण सफल रहल। (महेश्‍वर आर दिनेशक प्रस्‍थान।) अनूप- आब सभ विद्यार्थी अपन-अपन घर ओरिया कऽ जाइ जाइ जो। एन.एच. नीक जकाँ पार करिहें दुनू कात देख कऽ। (सभ विद्यार्थीक प्रस्‍थान भेल। शशिकान्‍त, सोमदेव, अनूप आर सोनी हाथ जोड़ि प्रणाम कऽ मुड़ी झूका लेलैथ।) ◌ पटाक्षेप। इति शुभम। बरहम बाबा पात्र-परिचय (1.) बौकु- एकटा गरीब किसान (2.) फूलो- बौकुक पत्नी (3.) बुधन- बौकुक पड़ोसी (4.) चानोदाइ- पहिल कारणी (5.) रामबती- दोसर कारणी (6.) बदरी- पहिल दर्शक (7.) कारी- दोसर दर्शक (8.) भूल्‍ला- तेसर दर्शक (9.) अशर्फी- चारिम दर्शक (10.) राम उदगार- पॉंचिम दर्शक (11.) मुसना- बौकुक दू बर्खक बेटा (12.) राम कुमारी- बौकुक बड़की बेटी (13.) रामपरी- बौकुक छोटकी बेटी दृश्‍य- एक (स्थान- बरहम बाबाक गहबर। समए-सौंझका बौकु आ फूलो बरहम बाबाक पूजा ले सभ श्रमजानक संग उपस्‍थित छैथ। फूलो गहबर साफ कऽ रहली अछि। तखने बुधन मृदंग आ झालिक संग प्रवेश करैए।) बुधन- भैया, बरहम बाबाक महिमा अगम अथाह छैन। सुनलौं, हुनके किरपासँ तोरा बेटा भेलह। मन बड़ हर्षित भेल। आब ठीक छह- दूगो बेटी आ एगो बेटा। बौकु- हुनकासँ पैघ दुनियॉंमे आर के? हिनका शरणमे जे कियो एला, हुनकर कल्‍याण आइ धरि भेल हन आ अग्रिमो हेबे करत। तँए ने हमर मुसना माए हुनक पूजामे जी-जान लगौने रहैए। बुधन- भैया, तूँ केतेक दिनसँ भीख मॉंगै छेलह? बौकु- तीन पहिनासँ बेसीए बुझीन। बुधन- ऐ बेर बरद नै ने बेचए पड़तह? बौकु- से नै पूछ। ओइ बेरुका मारल अखैन धरि छी। होश नै भेल हन। ओइ बेर पनरह दिन भीख मॉंगने रही। मुदा ऐबेर दुनू परानी तीन महिनासँ भीख ले कोन-कोन गाम नै बौआकेँ कोरामे लऽ कऽ वौएलौं। लगैए ऐ बेर नै घटतै। ओहीसँ पेटो चलै छेलए किने। सॉंझू पहर घर चलि अबै छेलिऐ। बुधन- अँए हौ, पूजा ले भीख मॉंगै छेलहक आ ओहीसँ पेटो चलबै छेलहक? ई नीक बात नै भेलह। अइसँ पुन नै पापे हेतह। बौकु- की करबै, हमरा तँ और कोनो जोगार नै छेलए। बाबा नै बुझै छथिन जे हमरा भगतकेँ पाँच आदमीक पलिवार छइ। (अपन-अपन डालीक संग चानोदाइ आ रामबतीक प्रवेश। पूजाक सभ तैयारी फूलो कऽ लेली अछि। बौकु झालि आ बुधन मृदंग बजबैत भगैत गाबि रहल अछि। फूलो ध्‍यानस्‍थ भेली। बदरी, कारी, भूल्‍ला, अशर्फी आ राम उदगारक प्रवेश। राम कुमारी कोरामे मुसनाकेँ लऽ कऽ प्रवेश केली। संगमे बहीन-रामपरी सेहो अछि।) बौकु+बुधन- बरहम अँगनमामे, पीपरकेर गछिया हे। तै पर देवी ऽ, दे ऽ वता हे। बरहम अँगनमामे...। कौन फूल चढ़ै देवी, कौन फूल देवता हे। कौने फूल चढ़ै बरहम, बाऽ बाऽ हे। बरहम अँगनमामे...। अरहुल चढ़ै देवी, गेंदा फूल देवता हे। गुलाब फूल चढ़ै बरहम, बाऽ बा हे। बरहम अँगनमामे...। फूल दीप मधुर देवी, लड्डू पान देवता हे। खीर पूड़ी बरहम, बाऽ बा हे। बरहम अँगनमामे...। (फूलोक देहपर बरहम बाबा अबै छथिन। मृदंग बजनाइ बन्न भऽ जाइए। सभ कारणी शान्‍त भऽ हाथ जोड़ि लइ छैथ।) फूलो- बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। सरकार, के छियह तूँ? फूलो- बोल जय गंगा। हम बरहम छियह। बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। बड़ी कालसँ कारणी सभ बैसल छइ। कनी एकरो सभकेँ कल्‍याण करहक। फूलो- हम कोन जोकरक छी जे लोककेँ कल्‍याण करबै। बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। हम बुझै छिऐ किने तूँ कोन जोकरक छहक से। एत्ते दूरसँ जे कारणी अबै जाइ छै से बिन कल्‍याणे अबै छइ। तूँ हीरा छहक। हीरा अपन मोल नै बतबै छइ। फूलो- बोल जय गंगा। हमरा बुत्ते जे हेतह तइमे हम नै चुबहक। सएह ने। बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। हे, ऐ कारणीकेँ देखहक। फूलो- (चानोदाइ दिस ताकि) हइ, तोहर घरबला कमाइ बड़ छह मुदा भाभंश नै होइ छह। पाँच आदमीक परिवार छह। तीनि साए टाका रोज कमाइ छह। कहियो बैसलो नै रहै छह। मुदा पेटोपर आफद रहै छह। इएह बात छै की ने? चानोदाइ- (घोघ तरसँ मुड़ी डोलबैत) हँ। फूलो- हम जे कहबह, से करबहक की ने? चानोदाइ- हँ, करबैन। फूलो- सत्त करह। बाजह- ‘एक सत्त दू सत्त, ब्रह्म विषुण सत्त अहॉंक कहल जे नै करए, अस्‍सी कोस नरकमे खस। चानोदाइ- एक सत्त दू सत्त, बह्म विषुण सत्त अहॉंक कहल जे नै करए, अस्‍सी कोस नरकमे खस। फूलो- बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। फूलो- तोहर घरबला दारू आ गॉंजा पीऐ छह। काजो करैले जाइ छह तँ पीकऽ बुच्‍च रहै छह। ओकरा कखैन की हेतह, कोनो ठेकान नहि। अँए हइ, तीन साए टाकामे दू साए-अढ़ाइ साएक पीए लेतह तँ बँचल-खोंचलसँ की भाभंश हेतह? तहूमे मँहगाइ अकास छूने जा रहल अछि। घरवलाकेँ कौहुना ई आदैत छोड़ाबह। कहक- ‘दारू-गॉंजाक बदलामे दूध-दही-घी खाउ। थकान ले हम सभ दिन मालिश कऽ देब।’ आ करबो करहक। अइसँ पहिने तूँ कहियो मालिश नै करै छेलहक। की, बात सॉंच छिऐ, की नइ? चानोदाइ- हँ, सॉंचे छिऐ। फूलो- बोल जय गंगा। बौकू- जय गंगा। फूलो- घरवलाकेँ हँसा कऽ खेला कऽ मालिश कऽ आ ओकरामे पैस कऽ रसे-रसे कड़ाइ करबहक तँ उ अबस्‍स चेत जेतह। उ सुधरतह आ तोहर सभटा दु:ख भागि जेतह। बाजह हमर कहल करबहक की ने? चानोदाइ- हँ, अबस्‍स करबैन। फूलो- जा, तोहर कल्‍याण हेबे करतह। (हाथ जोड़ि प्रणाम कऽ चानोदाइक प्रस्‍थान।) बोल जय गंगा। और के छह? बौकु- (रामबती दिस इशारा करैत) सरकार, ई छथिन। फूलो- बोल जय गंगा। तोहर दूटा बेटा आ एगो बेटी नै सुधैर रहल छह। हरदम नरहेर जकाँ एमहर-ओहमर करैत रहै छह। तीनूक पाछू तोरा बड़ पाय खरच होइ छह। मुदा कोइ रस्‍तापर नै आबि रहल छह। तोरा अपन दियादनीपर शक होइ छह जे वएह किछु कऽ देलक हन। सएह ने? रामबती- (मुँह उधारि) हँ, बाबा। अपने अंतर्यामी छथिन बाबा। फूलो- बोल जय गंगा। हइ, दियादनीक कोनो दोख नै छह। तोहर अपने दोख छह। तीन साल पहिने परमानन्‍द मासाएबसँ छअ महिना पढ़बा कऽ फील ले आइ-काल्‍हि, आइ-काल्‍हि करै छेलहक। एक दिन बेचारा खगने कनी जोरसँ पाय मॉंगलखुन तँ तूँ सभ हुनका सातू पुरखाकेँ उकटलहक आ मारबो करै जाइ गेलहक। बेचारा कानि कऽ दुआरिपरसँ गेलह। हुनके आप छयह। कहह तँ वेचरा टीशन कऽके गुजर-बसर करै छथिन। बेचारा बड़ असथीर लोक छथिन। हुनका संग हुनके बोनि ले एहेन खराप बेवहार! ई बड़ पैघ गलती भेलह। बोल जय गंगा। रामबती- बाबा, आब ओकर कोन उपाए छइ? फूलो- बोल जय गंगा। (कनीकाल किछु सोचि कऽ) दुनू परानी हुनका ऐठाम जा कऽ पएर पकैड़ क्षमा मॉंगहक। उ दयालु लोक छथिन अबस्‍स क्षमा कऽ देथुन। तेकर पछाइत हुनका बॉंकी फीसक दोबर फीस दऽ दिहौन आ हुनकासँ अनुनय-विनय करीहक। जे धिया-पुताकेँ फेर पढ़ा दियौ। अहीं बुत्ते उ सभ सुधैर सकै छइ। आब अहॉंकेँ नै छोड़ब आ ने अहॉं संग गलती करब। बोल जय गंगा। हइ, हमरा बिसवास छह जे उ मानि जेतह। जा, अक्‍खैन जा। उ घरेपर छथिन। (हाथ जोड़ि प्रणाम कऽ रामबतीक प्रस्‍थान।) बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। सरकार, हम जे सकलियह तइमे जी-जान लगा कऽ पूजा केलियह आ एहिना करैत रहबह। फूलो- बोल जय गंगा। हमर पूजा करै छह, नीक बात। मुदा हमरा पूजा खातिर तूँ बीकि जाह वा तकलीफ उठाबह वा प्रतिष्‍ठा हनन करह, से बात हमरा एक्को रत्ती पसीन नै छह़। हम तोरा पूजासँ एक्केअना प्रसन्न छिअ। तोहर पूजा पनरहअना बेकार भेलह। बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। हम तँ जी-जान लगा पूजा केलियह जइसँ सरकार हमरापर सोलहन्नी खुश रहथिन आ मनसँ असिरवाद देथिन। मुदा केतए की गलती भेलै, उ तँ सरकार अपने कहबै। फूलो- हमरा पूजा खातिर तूँ बरद बेचलहक। से किए? आ जँ बरद रहितह तँ हरो जोति गुजर-बसर करितह। कहह तँ, केते दिन कमेबह तँ बरद कीनबह? तहूमे पेटोक सवाल छइ। गरीब किसान छह। बरद तोहर हाथ-पएर छह। बरद खातिर तोरा तकलीफ भऽ रहल छह। ओइसँ हमरो तकलीफ छह। तूँ भीख मॉंगि पूजा करै छह से किए? अपन पसेनाक कमाइसँ पूजा करबहक तँ बेसी फल हेतह। भीख मॉंगि कऽ करैमे भीख देनिहार तोहर फल बॉंटि लइ छह। कनी देरी वा बेसी देरी हेतै पूजामे, सएह ने? तँ की भऽ जेतइ? हम तँ केतौ भागल नै जा रहल छी। तहूमे बेसी खरचा करबाक कोन खगता छइ। हम खीरक भूखल नै छी। हम प्रेम-श्रद्धाक भूखल छी। प्रेमसँ जे किछु भेलै आ जेतबे भेलै, वएह बड़ भेलइ। जी-जान लगेबाक कोनो खगता नै छै। बोल जय गंगा। बौकु- जय गंगा। सरकार, दोसर बेरसँ ऐ सभ बातकेँ धियान रखबै। अखैन धरि जे किछु घट्टी-कुघट्टी भेल हो, ओकरा माफ करिहक। फूलो- जा, माफ छह। आन बेरसँ लगती माफ नै हेतह। आब जाइ छिअ। केसटोलीमे पूजा ढारल छइ। बोल जय गंगा। (फूलो धरतीपर माथ टेकलैथ। बौकु गंगाजल छींटलैथ। फूलो उठि देह-हाथ झाड़ि सम्‍हारि कऽ बैसली। दुनू परानी दर्शककेँ हाथ जोड़ि प्रणाम केलैथ। थोपड़ीक बौछार भेल।) इति शुभम् पद्य खण्ड जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ प्रेम-चालीसा सभ क्यो दुनियामे अपन, कतहु कियो नहि आन इएह सोचि सदिखन करी, हम सबहक सम्मान | ई दुनिया भगवानक दुनिया सुरुज तरेगन चानक दुनिया न’व दृष्टि नव युगकेर दुनिया शांत सुखी सतयुगकेर दुनिया वन पर्वत खग सिन्धु सरोवर ई दुनिया सुन्दर-सुन्दर भिन्न मुदा सभ दृश्य मनोहर स’भ देश सुन्दर-सुन्दर पोखरि गाछी बाध रमनगर स’भ गाम सुन्दर-सुन्दर सुनू पराती. लगनी. सोहर सभ लोक सुन्दर-सुन्दर प्रेम क्षमा श्रद्धा आ आदर सभक सोच सुन्दर-सुन्दर कमल फूल सन निर्मल शीतल सभक बोल सुन्दर-सुन्दर जाति आतमा धर्म दिव्यता सभक दृष्टि सुन्दर-सुन्दर तन-मन-धन सभ सत्यक पथपर सभक सृष्टि सुन्दर-सुन्दर चलय अहर्निश शान्तिक पूजा सभक कृत्य सुन्दर-सुन्दर राग भैरवी ताल भैरवी सभक नृत्य सुन्दर-सुन्दर ह’म आतमा दिव्य आतमा ज्योति विन्दु चैतन्य आतमा ज्ञान प्रेम सुख शान्ति रूप हम पवित्रता आनंद शक्ति हम सहनशीलता अस्त्र हमर अछि देह हमर ई वस्त्र हमर अछि परम धाम केर बासी छी हम अजर अमर अविनाशी छी हम सभले’ शुभ भावना निरंतर हमर सोच सुन्दर-सुन्दर सदा सत्य सुन्दर कल्याणी हमर बोल सुन्दर-सुन्दर सबहक हितमे सदिखन तत्पर हम्मर तन सुन्दर-सुन्दर काम क्रोध मद लोभक बाहर हम्मर मन सुन्दर-सुन्दर सबहक छी हम,सभ छथि हम्मर हमर दृष्टि सुन्दर-सुन्दर हरियर नमहर और ललितगर हमर सृष्टि सुन्दर-सुन्दर धरती आ आकाश रमनगर सभक भाग्य सुन्दर-सुन्दर हम आनंदित सृजनक पथपर हमर भाग्य सुन्दर-सुन्दर हमर पिता पति वन्धु सखा ओ परम पिता परमातमा ओ ज्योति विन्दु करुणासागर ओ सकल कला सभ गुण आगर ओ सदिखन हमरा संग रहै छथि सत्य प्रेम आनंद भरै छथि हम हुनके सभ काज करै छी अपना मनपर राज करै छी सभले’ देखी सुन्दर सपना हम सभकें स्वीकार करै छी हम पूजै छी ध्यानक प्रतिमा ज्ञान और विज्ञानक प्रतिमा अपन शक्तिसं परिचय भेल विषय-वासना आ भय गेल दुखकेर सागर फानि गेलौं हम सभ संभव अछि जानि गेलौं हम शांतिक सीता ताकि एलौं हम घ’र घूरिक’ आबि गेलौं हम लोभक लंका जरा-तराक’ मन रावणकें डरा-हराक’ पहुंचि गेलौं सुखधाम अपन हम स्वयं पवनसुत, राम अपन हम हम भगवानक शक्ति पबै छी दुनियामे सुख-शान्ति बँटै छी हुनके आशीर्वाद बँटै छी आनंदक परसाद बँटै छी न’व दृष्टि नव सृष्टिक जय हो सुख-समृद्धि केर वृष्टिक जय हो अंध स्वार्थसं मुक्तिक जय हो संस्कृति केर भक्तिक जय हो पवित्रता केर जय हो जय हो मानवता केर जय हो जय हो | गजल हुनका सोझाँ लिबल ने भेल ’प्रेम करैछी’ कहल ने भेल हमरा मोनक चैन चोरेलौं मुदा अहाँकें जहल ने भेल छलै अशरफी ओत्तै गाडल हमरा जैठाँ रहल ने भेल केश माथमे जते,तते दुःख गन’ चाहलौं गनल ने भेल ठोहि पाड़िक’कियो कनै छल घ’र बंद क’ पडल ने भेल नोरहिसं लिखने छलीह ओ चिट्ठी हमरा पढल ने भेल बिना बहरके पद्य ‘अनिल’ कविता भेलै गजल ने भेल (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-11 ) गजल युद्ध करू जुनि शोक करू हे अर्जुन जुनि सोच करू धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रमे छी पापक तीब्र विरोध करू मित्र कियो नै शत्रु कियो नै बुझियौ और संतोष करू जीतू भोगू सुख धरतीक अथवा स्वर्गक भोग करू अहाँ आतमा अविनाशी छी तन आ मोनक योग करू सत्य और शांतिक जय हो नूतन नित्य प्रयोग करू जय हो जय हो पवित्रता आउ एखन उद्घोष करू (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-10 ) गजल वेद-पुराणक महिमा सभटा बूझल अछि मुदा लोक हमरे करतबसं रूसल अछि राति आ दिन ओझराएल रहै छी हम जैमे इहो जाल त अपनहि हाथक बूनल अछि भूमि-भवन गहना-गुडिया एफ डी सभटा सोचि रहल छी की अरजल की लूटल अछि ह्रदय कहैए ई अन्हार हटतै एकदिन सपता-विपताकेर कथा सभ सूनल अछि जे जागल अछि ओकरा खातिर भरि दुनिया ‘अनिल’ ओकर की जे सपनेमे डूबल अछि (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-17) गजल रावणकेर संहार केलौं अपने मनमे रामक हम दर्शन कयने छी जीवनमे पढबा-लिखबामे आनंद अबैत रहल मोन रमल नै कतौ और किछु अर्जनमे दूर रहैत एलौं सभदिन चौका-छक्कासं लागल रहलौं शब्दक सागर-मंथनमे माए बाबू दादी दादा नानी नाना मामी मामा सभ क्यो छथि हमरा संगे शुभ चिंतनमे कोना बिसरबै राति दिसंबर सोलहके शाप सुनै छी निरभयाक ओइ क्रंदनमे (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-16) गजल शौर्य शील आ घाम तकै छी ह’म स्वयंमे राम तकै छी गाम छोड़िक’ एलौं पटना आब अहूठाँ गाम तकै छी अहाँ गीत छी अहीं गजल अहींमे चारू धाम तकै छी सभ पोथीमे सभ पन्नामे खाली अपने नाम तकै छी मैथिल छी मैथिल बस्तीमे धोती और खराम तकै छी (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-10 ) गजल कानमे तूर धेने अछि लोक गजल की कहबै भोरेसं भांग खेने अछि लोक गजल की कहबै बरियातीकें चाही माछ माउस और रसगुल्ला पिबैले’ जान देने अछि लोक गजल की कहबै हो ब्लडप्रेशर डायबिटीज कि आन कोनो रोग भोजले’ मूंह बेने अछि लोक गजल की कहबै खुट्टा त गडतै ओहीठाम जत’ ह’म कहै छिऐ एकेटा गीत गेने अछि लोक गजल की कहबै ढेपाक जवाब पाथरसं देबाक चलन गेल हाथमे बम नेने अछि लोक गजल की कहबै चतुर्थी मधुश्रावनी कोजगरा और जराउर तिलकें ताड़ केने अछि लोक गजल की कहबै चाहियै सभकें जाडमे रौद आ गर्मीमे बसात खिड़की बंद केने अछि लोक गजल की कहबै (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-18 ) गजल ह’म कनैछी हँसैए लोक पता ने की की बजैए लोक कन्यादान अहाँक घ’रमे लेकिन बर्ख गनैए लोक सयमे नब्बे फ़ूसि बजैए हरिश्चंद्र कहबैए लोक पोनेपर ठोकै छी तबला खूब अहूँकें चिन्हैए लोक कियो बनैए छत कोनोठाँ सीढ़ी जखन बनैए लोक देखू क्यो मरियोक’ जीबय जिबिते कतौ मरैए लोक (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-10) गजल अपन उपस्थिति दर्ज कराब’ चाहै छी ऐ संसारमे ताकि रहल छी भोरे-भोरे नाम अपन अख़बारमे छओटा कन्यादान केलौं आ बारहटा वरदान सेहो एक पैर घ’रमे रहै छल दोसर हाट-बजारमे भार-दौड़ आ भोज-भातमे स’भ दिन लगले रहलौं स’भ साल कर्जा पर कर्जा सटले रहल कपारमे उचितनुचितक ध्यान नै केलौं नै गेलौं मतदानमे आब बैसि टेटर गनैत छी ऐ चूनल सरकारमे एहि धामसं ओहि धाम कबुला-पाती करिते रहलौं नै केलौं कोनो परिवरतन अप्पन तुच्छ विचारमे भागि एलौं मंदिर-मस्जिद-गिरिजाघर-गुरुद्वारासं एखनो लोक तकैए हमरा ऋषिकेश-हरिद्वारमे (सरल वार्णिक बहर/वर्ण-20) गजल सभ घर सभ आंगनमे देखल चोरा-नुक्की पसरल जन-जीवनमे देखल चोरा-नुक्की कखनो नाचय कखनो कानय सभ दुनियामे सभतरि तन-मन-धनमे देखल चोरा-नुक्की परवत-सन भारी आ हल्लुक तूरे-सन सभ सभदिन सभ दरपनमे देखल चोरा-नुक्की जहिना आबय तहिना जाइछ सरदी-गरमी पल-पल परिवरतनमे देखल चोरा-नुक्की जे हेतै से नीके हेतै कहइछ गीता अन्तक अभिनन्दनमे देखल चोरा-नुक्की (मात्रा-क्रम :222222-222222 ) गजल भात दालि तरकारी ला मंगनी पैंच उधारी ला सभ चाही एखने चाही बेचिक’ घ’र घरारी ला उपनयनक अर्थ की गहना आ धोती साडी ला परम्परामे पिसा गेलौं चल कोनो बुधियारी ला ईहो दुःख, थिक पाहुन झटद’ पान सुपारी ला बियाहसं विधिए भारी बदलबाक तैयारी ला राम-राज हो दुनियामे हुनके-सन भैयारी ला (सरल वार्णिक बहर, वर्ण-9) गजल ऐ ठामक लोक बदलाम किए छै सभ रस्तापर एत्ते जाम किए छै ने खा सकैत छी ने पीबि सकैत छी एहनो वस्तुक एते दाम किए छै जकरा नै सोहाइ छै भाएक ख़ुशी ओकरा ठोरपर श्रीराम किए छै नै एलै झोडी टांगैले’ उपनैनमे एहेन निसोख चारू माम किए छै ए सी कारमे बैसल कियो सोचैए ओकरा लेल विधाता बाम किए छै (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-13) गजल कखनो सागर कखनो निरझर कखनो फूल समान गजल कखनो लागय धधरा धह-धह कखनो तीर कमान गजल कखनो खुरपी कुडहरि खंती ऊखड़ि और समाठ जकां कखनो बाड़ी कखनो गाछी कखनो भेल मचान गजल कखनो आंगनमे अरिपन सन कखनो नार-पुआर जकां कखनो चालनि कखनो बाढ़नि कखनो पान मखान गजल कखनो गामक चौबटिया लग मंदिर और इनार जकां आ कखनो सीमापर लडइत देशक वीर जवान गजल कखनो मौनी आ पौतीमे सांठल जीर-मरीच जकां कखनो कोसीमे हलचल आ छटपट कोटि परान गजल ककरो खातिर मुरही-कचरी जामुन आम लताम ‘अनिल’ हमरा खातिर दीयाबाती अथवा देव-उठान गजल (मात्रा-क्रम : 2222-2222-2221-12112) गजल कहलक जामुन आम साढ़ू नै जा सकलौं गाम साढ़ू सभ रस्तापर थाल-कादो सभ रस्तापर जाम साढ़ू किरदानी छै छोट ओकर जक्कर बड़का नाम साढ़ू बाहर सभठाँ भेल आदर घरमे छी बदलाम साढ़ू सबहक माथक पाग छलियै बनलौं आब खराम साढ़ू सोची कत्ते भेल रावण एके भेला राम साढ़ू (मात्रा-क्रम : 2222-2122 ) गजल सेवक छी हम राजा छी हम बौआ बाबू बाबा छी हम ककरो खातिर छी गिरिजाघर काशी छी हम काबा छी हम कोनोठाँ पाछाँ छी जगमे आ कोनोठाँ आगाँ छी हम कहुना बांचल छी हमहूँ सभ अरिपन पुरहर लाबा छी हम सबहक घरमे हमरे चलती चकला बेलन आंटा छी हम हमरे खातिर हल्ला-गुल्ला गहना-गुडिया कपडा छी हम हम्मर दुःख जहिना के तहिना माँ सीताके मिथिला छी हम (मात्रा-क्रम : 2222-2222 ) गजल बाजब ककरोसँ सिखलौं कानब ककरोसँ सिखलौं सिखलौं ककरोसँ झगडा मारब ककरोसँ सिखलौं सिखलौं ककरोसं छीनब मांगब ककरोसँ सिखलौं फेकब ककरोसँ सीखल राखब ककरोसँ सिखलौं सोचब देखब क’रब की ठानब ककरोसँ सिखलौं हम के छी आ अ’हाँ के जानब ककरोसँ सिखलौं हम भवसागरसँ निकलब फानब ककरोसं सिखलौं (मात्रा-क्रम : 2222-122 ) गजल सत्यक पूजा घर-घर रहितै दुनिया कत्ते सुन्दर रहितै सबहक हिरदय रहितै नमहर वाणी सबहक मिठगर रहितै ककरो कीयो दुःख नै दीतै सभकें सभले’ आदर रहितै माथापर उघने चल अबितौं मोटा कतबो भरिगर रहितै एत्ते दुःख दीतै नै मनसा यदि अपनो ओ थितगर रहितै एके सुरमे बजितै सभक्यो भारत सबहक ऊपर रहितै (मात्रा-क्रम : 2222-2222 ) गजल बाघ जकां लोक आ हुराड़ जकां लोक गाम-गाम भेटता सियार जकां लोक जहां-तहां पोखरि-इनार जकां लोक सागर नदी आओर धार जकां लोक खाधि जकां लोक किछु आरि जकां लोक देखने छी नार आ पुआर जकां लोक सभठाँ करथि मोल-भाव नाप-तौल भेटि जेता हाट आ बजार जकां लोक रूसलकें बौंसय भूखलकें नोतय जामुन लताम कुसियार जकां लोक गंगाक ज’ल-सन किछु लोक भेटला भेटला हिमालय पहाड़ जकां लोक लोकेले’ जीबय आ लोकेले’जान देत गेंदा गुलाब हरसिंगार जकां लोक (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-14) गजल गीत लीखि-लीखिक’ गजल लीखि-लीखिक’ ह’म मौन भेल छी नोरेमे भीजि-भीजिक’ लोकेकें देखि-देखि प्रेम हम करैत छी लोककें ठकैत छी लोकेकें देखि-देखिक’ संस्कृतिक ऊपर सभ्यता सवार भेल फ्लैट हम किनैत छी खेत बेचि-बेचिक’ क्यो ख़ुशीसं जान दैत अछि मातृभूमिले’ क्यो मगन रहैए देशेकें लूटि–लूटिक’ सत्यक पराजय ‘असत्यमेव जयते’ घोषणा करैछ कियो ताल ठोकि-ठोकिक’ एना किए ओना किए एहेन किये भेलै राति-दिन झकैत छी यैह सोचि-सोचिक’ (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-15 ) गजल अहंकारमे सदिखन छी अहाँ कंस छी रावण छी अहाँ बात सबहक काटी अहीं बाउ दुरजोधन छी महावीर मनभावन छी अहाँ राम आ लछुमन छी अहाँ चुप्प रहि जाइत छी महाधीर मनमोहन छी जते दृश्य अछि दुनियामे महाभारतक जीवन छी हमर मोन नीपल आंगन अहाँ ओहिमे अरिपन छी अबै राति आ दिन अहिना कते नीक आयोजन छी (सभ पांतिमे मात्रा क्रम-1221-2222) गजल मन अतीतमे भागि चलैए कखनो-कखनो खीर कोबरक मोन पड़ैए कखनो-कखनो ललका धोती आँखिमे काजर पाग माथपर गीत मनोहर नेह भरैए कखनो-कखनो पाकल-पाकल आम गाछमे केहेन-केहेन मोनक गाछी गमकि उठैए कखनो-कखनो कुम्हरौड़ी ब'डी सकरौड़ी द'ही आ रसगुल्ला भोज गामकेर सोर करैए कखनो-कखनो सभतरि सदिखन थाल-कीच लाठी आ भाला मिठगर डंफा ढोल बजैए कखनो-कखनो कखनो-कखनो राम अबै छथि तन-मनमे खेल जकाँ वनबास लगैए कखनो-कखनो जेठक रौदजकाँ ई जीवन-डगर 'अनिल' शीतल मीठ बसात बहैए कखनो-कखनो (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण-17) गजल ककरासं ई कही हम कहबामे लाज होइए ल' क' बिसरि गेलाह ओ मङबामे लाज होइए ठुमरी ई सुनि-सुनिक' परेशान भेल छी हम भागब त ओ की कहता भगबामे लाज होइए नब्बे बरखमे एखनो दनदना रहल छथि हुनका समक्ष कारसं चलबामे लाज होइए फेस-बुक के ई जमाना मोबाइलकेर जमाना अपनहि सिखा-सिखाक' डंटबामे लाज होइए एहि ठाम मैथिली छथि ओहि ठाम मैथिली छथि हिन्दीमे हम ने बाजब बजबामे लाज होइए (सरल वार्णिक बहर / वर्ण : 18) गजल ककरोले' मजबूरी कविता हमराले' कस्तूरी कविता लागय सौंसे दुनिया अपने गप्पक बड़का धूरी कविता कवि आ पाठक दूरे रहला कम नै केलक दूरी कविता ककरो खातिर बनि-बनि आबय सींनुर टिकुली चूड़ी कविता कहिया ककरो खातिर बनती तरकारी आ पूरी कविता (मात्रा-क्रम : 22222222) गजल गरमी जाड़क खेल जिनगी दिन आ रातिक मेल जिनगी कखनो लागय फूल गाछक कखनो लागय रेल जिनगी कखनो पाकल आम जामुन कखनो काँचे बेल जिनगी कखनो लागय माँछ पानिक कखनो लागय जेल जिनगी मेला सभदिन पाप पुण्यक संगम सन अछि भेल जिनगी बाजय ताधरि ढोल डंफा जा दीयामे तेल जिनगी (मात्रा-क्रम : 2222-2122) गजल मौन रहत ओ राम जपत ओ जैह सिखेबै सैह करत ओ तेज चलेबै तेज चलत ओ जैह करत ओ सैह कहत ओ चोर कहू जुनि चोर बनत ओ वाह कहै क्यो खूब हंसत ओ पाइ बहुत छै भोज करत ओ पाग खसै नै पैर धरत ओ आगि मुतै छल आब मरत ओ (मात्रा क्रम : 21-122) गजल नै अछि भुस्सा नार हमरा आ रे बरदा मार हमरा तकरे पाछां जैब हमहूं जे देलक कुसियार हमरा जकरा सबदिन गोर लागी से बूझय बुधियार हमरा कखनो सबकिछु ठीक लागय आ कखनो बेकार हमरा नारक तोशक आगि घूरक मोने अछि ओ जाड हमरा अनकर साडी फ्लैट गाडी केने अछि बीमार हमरा जक्कर खेबै गैब तकरे एत्ते अछि अधिकार हमरा जेहन खेबै गैब तेहन कहने अछि संसार हमरा जाधरि खेबै गैब ताधरि सब केलक लाचार हमरा भरि दुनियामे चोर डाकू कहइत अछि अखवार हमरा समले' सुख आ शांति ताकी सय कोटिक अछि भार हमरा (मात्रा क्रम: 2222-2122) गजल घूमि एलौं हम जहाँ-तहाँ ऐ दुनियामे कियो ने भेटल अहाँ जकाँ ऐ दुनियामे सूर्यक चारू कात घुमथि धरती मैया छनि जननीकें चैन कहाँ ऐ दुनियामे पाप थीक अनकामे ताकब दोखहिटा सबसं बड़का धर्म क्षमा ऐ दुनियामे जतेक सिकन्दर एला खाली हाथ गेला अंतमे टूटै सभक निशा ऐ दुनियामे ओ सम्पति जे मुइलो पर जायत संगे जतेक मोन हो करू जमा ऐ दुनियामे चलू-चलू ऐ दुनियासं हंसिते-हंसिते जुनि ककरोसं करू घृणा ऐ दुनियामे (सरल वार्णिक बहर/ वर्ण -15) गजल काहि कटै छी तोरे ले' गीत गबै छी तोरे ले' माटि हवा आ जल बनलौं आगि बनै छी तोरे ले' चानक चोरी केलौं हम भोर अनै छी तोरे ले' रौद बहुत छै दुनियामे छाँह तकै छी तोरे ले' बात हमर ई बूझत के हम कुहरै छी तोरे ले' (मात्रा-क्रम : 21122- 222) गजल सभकें कमल सामान बूझू संगमे छथि भगवान बूझू बेटा पुतहु पौत्र और पौत्री सभकें गगनक चान बूझू मोनक शान्ति अमोल होइए एकरहि सोनक खान बूझू छला जे पर्वत खाधि बनला समय कते बलवान बूझू बाढ़ि और भूकम्पक तांडव छटपट कोटि परान बूझू अनिल त्याग विनु जिनगी की विनु धानक खरिहान बूझू (वर्ण- 11) गजल देखबामे नीक लागल सुनबामे नीक लागल शब्दक इनार पोखरि खुनबामे नीक लागल आयल पहाड जत्ते सभ तूर सन बुझायल मनसं धुनैत रहलौं धुनबामे नीक लागल अहां आंखिसं जे कहलौं से बात हम बुझलियै सभ ठाम फूल गाछक चुनबामे नीक लागल केलौं कतेक मेहनति भरलौं दुखक खजाना अपनाले' जाल अपने बुनबामे नीक लागल कहियो बबूर वनसं भयभीत हम ने भेलौं बीहरि कतेक सांपक मुनबामे नीक लागल वर्ण-18 गजल करुणा आदर प्रेम सिखबियौ ऐ बौरहबा मोनके बटुक कनेक काबूमे रखियौ ऐ बौरहबा मोनके देशक आजादीके खातिर फांसी चढला युबक कते भगत सिंहके कथा सुनबियौ ऐ बौरहबा मोनके जहां-तहांसं झोड़ि-झाड़िक’ झोरी अप्पन भरइत छी अयाचीक किछु पाठ पढ़बियौ ऐ बौरहबा मोनके अपने खातिर कते हरानीसँ बुनैत छी जाल अहाँ सत्य,शांतिकेर बाट धरबियौ ऐ बौरहबा मोनके नमन करू भारत माताकें, अपन संस्कृति,भाषाकें सोझ बाटपर नित्य चलबियौ ऐ बौरहबा मोनके (वर्ण- 20) गजल पर-चिंतनसं मुक्त करैए राम-कथा जीवनमे सुख-शान्ति अनैए राम-कथा असली धन की थीक भरतजीसं सीखू मोनक सभटा ब्याधि हरैए राम-कथा सेवामे आनंद कते हनुमाने कहता प्रवल आत्म विश्वास भरैए राम-कथा रावणसं सीखू परिणाम अहंकारक राज स्वयंपर करू कहैए राम-कथा सहनशीलता, पौरुषके संगम देखू भवसागरले’ नाव बनैए राम-कथा (वर्ण-15) आशीष अनचिन्हार किछु जोगीरा* जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा कहानी भेलै काँच कविता भेलै तीत पुरस्कार लेल जूरी लागै बापोसँ मीठ जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा पोथी लेने घूमैए बौआ कोने कोन जूरी केर दर्शन भेलै चानी ओ सोन जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा अड़हर दरहर सभ छै राड़ दरभंगा बलाकेँ बचलै ने चार जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा पटना बला सूतल छै लऽ कऽ नेपाली सहरसा बला बजाबैए खूब्बे ताली जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा कथा की कविता लीखू मगजक खेतमे पुरस्कार तँ जेतै दरभंगिये के पेटमे जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा दू दुन्नी चारि पढ़ि बनलै चारि सए बीस जूरी के दरबज्जापर चरबै महींस जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा गोष्ठीमे गुष्ठीपर होइ छै चर्चा तइ बाद भेटै छै चमचाकेँ खर्चा जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा बोतल कि सोंटल कि चिक्केन मटन जूरी लोभाबै देखा कऽ बदन जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा पुरना लेखक लेल अनेरे बबाल नवका हँसोथि गेल सभहँक माल जोगी जी सारा रारा रारारारारारारारा जोगी जी सारा रारा * स्थानक नाम साहित्यसँ संदर्भित अछि। कविता- फेर "चुप ठोरक अवाज बहुत दूर धरि जाइ छै" "सिक्कामे अवाज होइ छै नोट चुप्पे रहै छै" एही विश्वासक संग ओ चुप रहला बहुत दिन आ अंतिम समयमे जखन किछु बजबाक जरूरति बुझेलनि तखन कमजोर अंग संग नै देलकनि रुबाइ अपन पीठ अपने ठोकि लेलियै हम अपन गेंद अपने लोकि लेलियै हम आनक गला घोंटलासँ की फायदा अपन कंठ अपने मोकि लेलियै हम बाल गजल तीने वर्णक बनल मिठाइ तीने वर्णक बनल मलाइ तीने वर्णक बनल किताब तीने वर्णक बनल पढ़ाइ तीने वर्णक बनल सलाह तीने वर्णक बनल लड़ाइ तीने वर्णक बनल फचाँड़ि तीने वर्णक बनल पिटाइ तीने वर्णक बनल अकास तीने वर्णक बनल लटाइ तीने वर्णक बनल इजोत तीने वर्णक बनल सलाइ सभ पाँतिमे 22-2212-121 मात्राक्रम अछि गजल जे अछि जयकार विरोधी से अछि दरबार विरोधी ई मानू या नै मानू सभ छै अधिकार विरोधी संसारे खातिर देखू भेलै संसार विरोधी खाली संगे भरलाहा बनतै अवतार विरोधी चारू दिस बंदूक मुदा कहलक हथियार विरोधी सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि, दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल रस रंग साधना काम्य हमर मधु सिक्त वासना काम्य हमर अछि हियमे राखल नेह मधुर विष रिक्त भावना काम्य हमर छोट छीन जीवन रहै मुदा सही प्रस्तावना काम्य हमर अहाँ जपैत रहू विनाशकेँ नीक संभावना काम्य हमर संग रही स्वस्थ रही अतबे छोट शुभकामना काम्य हमर सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि (बहरे मीर), दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल कियो हँसलै कोनो बातपर कियो कनलै कोनो बातपर कियो उठि गेलै बड़ ऊँच आ कियो खसलै कोनो बातपर कियो चुप्पे रहलै देर धरि कियो बजलै कोनो बातपर कियो पाथर बनि जिंदा रहल कियो गललै कोनो बातपर कियो रहलै तहिआएल सन कियो भजलै कोनो बातपर सभ पाँतिमे 1222-22-212 मात्राक्रम अछि गजल नौकर बनलै गरीब बच्चा होटल मोटल ईंटा भट्ठा रसगुल्ले सन के जीवन छै दुइए दिनमे खट्टा खट्टा अपना अपनी केलहुँ बड़ाइ अपने कहलहुँ अच्छा अच्छा अइ नेहक मारल हमहूँ छी दुनियाँ लागै फिक्का फिक्का किछु परसादी हमरो भेटल हमहूँ खेलहुँ फक्के फक्का सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि, दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल छै सभ कियो असगर अपने अपन सहचर ई आगि ओ आगि दुन्नू रहल मजगर बुझबै अहाँ सभ किछु एतै जखन अवसर जीवन मने बिजनस रिस्को रहत कसगर संवेदना टूटल खूनो रहै पनिगर सभ पाँतिमे 2212-22 मात्राक्रम अछि दोसर शेरक पहिल पाँतिक लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल छन भरि के पहिचान छै जीवन भरि अनुमान छै सोना चानी बैंकमे आँचरमे दुभि धान छै पुरहित आ जजमान संग अपने ओ भगवान छै चुप्पे रहलहुँ देखितो केहन ई अभिमान छै स्वामी अनचिन्हार जी हमरे सन बइमान छै सभ पाँतिमे 222+2212 मात्राक्रम अछि, तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि, मकतामे हमरा जनैत दोष छै। पहिल पाँतिमे "जी" आदर सूचक छै तँ दोसर पाँतिमे "छै" बराबरी सूचक। गजल लूटक मंडीमे बैसल छी हम झूठक मंडीमे बैसल छी हम भेटैए रंग बिरंगक समाद दूतक मंडीमे बैसल छी हम छै हुनके थारी सभहँक हिस्सा भूखक मंडीमे बैसल छी हम अबियौ किनियौ हमरे दोकानसँ छूटक मंडीमे बैसल छी हम कोठा बनलै सौंसे दुनियाँमे खेतक मंडीमे बैसल छी हम सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि, दू टा अलग-अलग लघुकेँ नियम शैथिल्यक तहत एकटा दीर्घ मानल गेल अछि गजल दिल्ली पटना गाम लखन काजक मारल राम लखन टुक टुक ताकै जेबी सभ कोना चुकतै दाम लखन ई सभ छै अग्निपरीक्षा टप टप चूबै घाम लखन सभहँक भीतर रावण छै नाम भने हो राम लखन बनियाँ बैसल बिच्चे ठाँ बेचै अप्पन चाम लखन सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि गजल देह बसिया गेल छै मोन मसुआ गेल छै बाढ़ि रौदी सभ सही मेघ अगड़ा गेल छै फाइलो सभ कहि रहल काज अधिया गेल छै आइ फेरो हेतै किछु बात भजिया गेल छै पानि चाहै ठोरकेँ धार डेरा गेल छै सभ पाँतिमे 2122 + 212 मात्राक्रम अछि, चारिम शेरक पहिल पाँतिक एकटा अंतिम दीर्घकेँ लघु नियम शैथिल्यक तहत मानल गेल अछि गजल आइ फेर निंद नै अबैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर मोन नै लगैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर चोट लागि गेलै आइ फेर कियो मलहम देलक आइ फेर दर्द बड़ उठैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर देह छू कियो चलि गेल फेर कियो बैसल अछि आइ फेर सेज सभ बुझैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर नोर आबि गेलै आइ फेर कियो पोछत जल्दी आइ फेर आँखि ई बजैए आइ फेर कियो जागल हेतै आइ फेर लोढ़ि लेत हमरा आइ फेर कियो छोड़त हमरा आइ फेर नेह किछु कहैए आइ फेर कियो जागल हेतै गजल जै ठाँ निबाह नै हेतै तै ठाँ उछाह नै हेतै रहतै समुद्र नुनगर आ पोखरि अथाह नै हेतै केना कहू जे किछु रहने दुनियाँ बताह नै हेतै किछु झूठ लेल मरलो सन सच तोतराह नै हेतै सभ साधनाक एकै फल जीवन कँचाह नै हेतै सभ पाँतिमे 2212+1222 मात्राक्रम अछि, दोसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ नियम शैथिल्यक कारण लघु मानल गेल अछि गजल छौ तोहर केहन करतूत सखी देखि जो कनी हमर सबूत सखी छै काँचे जौबन काँचे जीबन नेहो हुनकर काँचे सूत सखी बहुते झुकला टुटलापर लागल दुनियाँमे किछु नै निजगूत सखी हुनकर घिरना सहि बुझलहुँ जे हम्मर नेह कते मजबूत सखी नहिए रहलै विश्वासो लायक अनचिन्हरबा छै अवधूत सखी सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि, दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल कियो चूसि गेलै बहुत कियो हूसि गेलै बहुत कनी बातपर जानि कऽ कियो रूसि गेलै बहुत छलै मूँह बड़ सान के कियो दूसि गेलै बहुत रहै भूर कनियें मुदा कियो घूसि गेलै बहुत अहाँ सन कि हमरे सनक से महसूसि गेलै बहुत सभ पाँतिमे 122-122-12 मात्राक्रम अछि, दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु संस्कृतानुसार दीर्घ मानल गेल अछि, अंतिम शेरक दोसर पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानल गेल अछि गजल हरजाइ छलै ओ कस्साइ छलै ओ घाटा छथि अपने भरपाइ छलै ओ भोरक भूखल लग लटुआइ छलै ओ लक्ष्य जकर बहकल अगुताइ छलै ओ देखि कऽ अनचोक्के पछताइ छलै ओ अनचिन्हारेपर नितराइ छलै ओ सभ पाँतिमे 22-22-2 मात्राक्रम अछि, दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल हम्मर हक केर बात के करतै आ गुड लक केर बात के करतै भागल जे छीनि छानि मोनक नेह ओहन ठक केर बात के करतै चालू छै आन जान बहुते तँइ उपजल शक केर बात के करतै हीरा मोतीक भीड़मे ओकर नाकक छक केर बात के करतै जागल सूतल अहीं छियै सरकार टूटल भक केर बात के करतै सभ पाँतिमे 22-2212-1222, दोसर आ पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु नियम शैथिल्य बूझल जाए गजल देशमे उत्फाल नवका दर्द पुरने हाल नवका धार जानै नेत सभहँक माछ पुरने जाल नवका किछु चुनौती फेर एलै लोक ठोकै ताल नवका छै जरूरे खाद फेंटल खेत पुरने टाल नवका दाग लगने इज्जते छै देह चाहै थाल नवका सभ पाँतिमे 2122+2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी) गजल बड़का बड़का धारे झा सौंसे छै बुधियारे झा मुरदा सन के दुनियाँ छै की करता हथियारे झा सूतल दुखिया मोन हमर जागल बस संसारे झा हमरा लग सुखले सुक्खल हुनका लग रसदारे झा अगुअति धेने एकै दू बड़ बैसल पछुआरे झा सभ पाँतिमे 222-222-2 मात्राक्रम अछि गजल कनियें दूर नबाबक गाम बहुते दूर विकासक गाम बीचो बीच फसादी ठाढ़ चारू कात लहासक गाम किनको लेल हजारो लाख किनको लेल उधारक गाम बड़ खुश बाजि कऽ नव नौतार चुप्पे चूप पुरानक गाम अंतिम रूप दुखक एहन छै दाही माँगै सुखाड़क गाम सभ पाँतिमे 2221 + 12221 मात्राक्रम अछि गजल मंच माला आ गर्जना भेटत घोषणा छुच्छे घोषणा भेटत मेहनति हेड़ा ने सकत कत्तौ साध्य बनि गेने साधना भेटत प्रेम छै देहक नेह छै मोनक वासना केने वासना भेटत रीत छै सभहँक एहने एहन मान केने अवमानना भेटत जज बनल अनचिन्हार लग खाली एहने सन संभावना भेटत सभ पाँतिमे 212+22+212+22 मात्राक्रम अछि गजल सरकार केकरो नै दरबार केकरो नै बकलेल जान दैए बुधियार केकरो नै जे बेचि देत एहन अधिकार केकरो नै जयकार छै छिनार जयकार केकरो नै हटले रहू बहुत दूर चिन्हार केकरो नै सभ पाँतिमे 2212+122 मात्राक्रम अछि, तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ संस्कृत परंपरानुसार दीर्घ मानल गेल अछि, चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघुकेँ छूटक तौरपर लेल गेल अछि गजल नेह लगाबैए कियो कियो भाग बनाबैए कियो कियो आँखि बला भेटल बहुत मुदा नोर लुटाबैए कियो कियो आब तँ छै बेपार चोट केर दर्द नुकाबैए कियो कियो बात सुनाबैए सगर नगर बात बुझाबैए कियो कियो देह छुआबै आदमी बहुत मोन छुआबैए कियो कियो सभ पाँतिमे 21-1222-12-12 मात्राक्रम अछि, तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि गजल एकै रातिमे फकीर भऽ गेलै दुइए पाँतिमे कबीर भऽ गेलै भरि देने रहै जै खाधि समस्याक कनियें कालमे गँहीर भऽ गेलै जे सुंदर इजोरिया लऽ कऽ नाचल ग्रहणक नामपर अधीर भऽ गेलै पहिने नाम बड़ सुनलकै विकासक ओकर बाद सभ बहीर भऽ गेलै मेटा देलकै निशान गरीबक एनाही तँ सभ अमीर भऽ गेलै सभ पाँतिमे 2221-212-1122 मात्राक्रम अछि, दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि, किछु दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल प्रश्नो चुप छै उतरो चुप छै आँखिक दुखपर सपनो चुप छै उघड़ल बरतन झँपनो चुप छै मेल मिलापो झगड़ो चुप छै अनका संगे अपनो चुप छै सभ पाँतिमे 2222 मात्राक्रम अछि, दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल सौंसे दाबल अछि आँजुर भरि संघर्ष किछुए बाँचल अछि आँजुर भरि संघर्ष ओ अनलथि हीरा मोती हुनका लेल हमहूँ आनल अछि आँजुर भरि संघर्ष नोटक संगे भोटक संगे घुमि घुमि कऽ बहुते नाचल अछि आँजुर भरि संघर्ष सुंदर हाथें बिच्चे आँगनमे खूब अरिपन पाड़ल अछि आँजुर भरि संघर्ष चिन्हारो एतै अनचिन्हारक बाद ता धरि राखल अछि आँजुर भरि संघर्ष सभ पाँतिमे 22-22-22-22-221 मात्राक्रम अछि गजल कना कऽ पूछै हाल जगत बहुत पसारै जाल जगत अहींसँ भेलै दीन दुखी अहींसँ मालामाल जगत सुतल सुतल छै ड्राइवरे खसल पड़ल तिरपाल जगत के के बढ़ल अछि आगू तकर बहुत करै पड़ताल जगत हुनक जगत छनि सोन सुगंधि हमर तँ कादो थाल जगत सभ पाँतिमे 12-122-21-12 मात्राक्रम अछि, तेसर शेरक पहिल पाँतिमे दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि, अंतिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि गजल आहि उठबे करतै इयाद एलापर नोर खसबे करतै इयाद एलापर पानि खाली देहक मिझा सकैए बस मोन जरबे करतै इयाद एलापर हाल केहन से अनुभवेसँ बुझि सकबै फूल झड़बे करतै इयाद एलापर मलहमो बेकारे बुझाइए हमरा घाव रहबे करतै इयाद एलापर पड़ि रहब ओछाएनपर नै छै सूतब आँखि जगबे करतै इयाद एलापर सभ पाँतिमे 2122+2212+1222 मात्राक्रक अछि, अंतिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि गजल आर जिलेबी पार जिलेबी बड़ सुंदर संसार जिलेबी किछु ने कहबै चुप्पे रहबै अपने छै बुधियार जिलेबी चाक कहू चक्र कहू या किछु सभ सुनतै कुम्हार जिलेबी ओ सभ कहथिन भोजन साजन हम कहबै हथियार जिलेबी रसगुल्ला सभहँक संगतमे बनि गेलै खुंखार जिलेबी सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि, दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि अशोक कुमार सहनी, लहान- ४ रघुनाथपुर , सिरहा, नेपाल, हाल- दोहा कतार गजल नहिं ऐलै राति निन्द बस लिखैत गेलहुँ अपन दर्द कागज पऽ निखारैत गेलहुँ रही जमिनपऽ कोना छुब सकब अकाश बस तरेग्न बिच, चाँन्द निहारैत गेलहुँ कमजोर रहिती तऽ कहिया टूटि जैतहुँ छी नरम ठाँरि सभ आगु झुकैत गेलहुँ ओ जहिना-जहिना बदलैत गेलै रसता हम इ जीनगीकें ओहिना पिसैत गेलहुँ आयल अशोककें जीनगीमे हावा बनिक ओंहे आँन्धिस्ँ हम जीनगी सिखैत गेलहुँ सरल वार्णिक बहर--१६ डा जियाउर रहमान जाफरी, माफ़ी, आस्थावा, नालंदा, बिहार 803107 मुक्तक जिनगी अपन कम नहि अछि आँखि हमर ते नम नहि अछि विश्व टिकल अछि प्रेमक संग गोली बारूद बम नहि अछि आजाद गजल अहाँ यदि उपकार करब हमहूँ नीक व्यवहार करब खुशी जिनगीमे नहि आयत दुख के जब विस्तार करब धर्म जात पे नाम पे आखिर कब तक अत्याचार करब चढ के बोलत मिथ्यावादी सच के जब इनकार करब ईहे सोचि के बिसरल सभ दिन भिनसर मे दीदार करब केकरा अहाँ कहै छी नियम हमर अछी सरकार करब हमर भाखा मैथिली भाखा कोना अकर इनकार करब डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” ६ टा कविता हमर ई छओ गोट कविता मौलिक रूपसँ मैथिलीमे लिखित ओ अप्रकाशित अछि । ई कविता सभ तहिया लिखल गेल छल जहिया हम कॉलेज ऑफ आयुर्वेदमे (भारती विद्यापीठ, पूना) B.A.M.S. द्वितीय ओ तृतीय वर्षक (2nd & 3rd PROFESSIONAL YEAR) छात्र रही । ताहि समएमे महाविद्यालयक छात्र लोकनिमे EXTRA CO-CURRICULAR ACTIVITY केँ बढ़एबाक लेल “निर्मिती” नामक WALL MAGAZINE पर कविता आदि साहित्यिक कृति लगाओल जाइत छल जकर संयोजिका श्रीमति इण्दापुरकर मैडम (तत्कालीन लेक्चरर आ बादमे विभागाध्यक्ष - शारीर क्रिया विभाग) छलीह । हमहूँ मैथिली कविता लेल प्रस्ताव देल मुदा पाठक आन केओ नञि छलाह तेँ ओकर हिन्दी अनुवाद (स्वयं द्वारा अनुदित) देब स्वीकृत भेल । ताहि अनुदित रचना पर स्पष्ट उल्लेख रहैत छल कि मूल रचना “मैथिली” भाषामे अछि । - डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” १ कालचक्र (कविता) पन्ना पर पन्ना उनटि रहल, हर पृष्ठ नवल नित्-नूतन छी । जे बीति चुकल से छल अद्भुत, आबएबाला सेहो अनुपम छी ।। ई समय-सरित् अविरल बहइछ, अप्पन प्रवाह - गति ओ लयमे । हम मूक ठाढ़ भऽ देखि रहल, हर एक दृश्य अतिविश्मयमे ।। प्राचीर कतेकहु ध्वस्त भेल, कतबा तटबन्ह भेल कवलित । फेर ओकरहि सलिल-सुधा-रससँ, कतबा कोंढ़ी* भेलछि विकसित ।। एकरहि प्रभाओसँ फेर अगिन, पाथर मोती बनि निखरि गेल । अगनित हीरा पुनि भेल मलिन, आ सीसा - टुकड़ी बदलि गेल ।। जे श्वेत प्रतीत होइत छल से, देखल तँऽ कारी - गुजगुज छल । पाषाण-प्रतिम छल जे लगैत, खन मोम जेकाँ देखल पघिलल ।। के भेल एतए जे कालचक्रसँ, बाँचि सकल कहुखन कहियो ? सुरपुर - जञो इन्द्र ने बचा सकथि, की मानव केर हस्ती - कहियौ ?? * एहि कवितामे “कोंढ़ी” शब्दक प्रयोग “पुष्प-कलिका” अथवा अविकसित फूल वा फूल केर फुलएबासँ पुर्वक अवस्थाक अर्थमे भेल भछि । विमर्शः- कोंढ़ - ई शब्द मैथिलीमे “अनेकार्थक शब्द” जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । एकर एकटा अर्थ “कुष्ठ वा महाकुष्ठ” (अंग्रेजीक लेप्रसी वा LEPROSY) नामक बेमारीक सन्दर्भमे होइत अछि । दोसर प्रयोग “डाँढ़” (हिन्दीक “कमर” आ अंग्रेजीक “वेस्ट वा WAIST”) केर सन्दर्भमे होइत अछि (यथा - कोंढ़ तोड़ि देलक ………….इत्यादि) । कल्याणी कोशकार “कोंढ़गर” माने “कलेजगर” बतओलन्हि अछि । मुदा मैथिलीमे “कोंढ़-करेज” दूनू संगहि-संग सेहो प्रयुक्त होइत अछि (यथा - ओकरा कोंढ़-करेज काटि कऽ दऽ दितियै की ? …………… आदि) जाहिसँ ई ध्वनित होइत अछि कि विशिष्ट अर्थमे “कोंढ़” आ “करेज” दूनू अलग-अलग अर्थ रखैत अछि । कोंढ़ी - ईहो शब्द मैथिलीमे “अनेकार्थक शब्द” जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । एकर पहिल अर्थ पुष्प कलिकाक (हिन्दीक “कली” आ अंग्रेजीक “फ्लोरल बड् वाFLORAL BUD”) केर अर्थमे होइत अछि । दोसर प्रयोग “कुष्ठ-रोगी” केर अर्थमे होइत अछि । कोढ़ि - एकर उच्चारण मैथिलीमे “कोइढ़” होइत अछि जकर मतलब अछि “आलसी” । यथा - कोढ़िआ बड़द, कोढ़िआ मचान आदि । कोढ़ि - ई शब्द सेहो दू अर्थमे प्रयुक्त अछि । पहिल “कोढ़” रोगसँ ग्रसित व्यक्ति आ दोसर एहेन ताड़क गाछ जाहिसँ ताड़ी नञि गरैत हो । कोंढ़ी आ कोढ़ी - किछु लेखक लोकनिक मानब छन्हि जे “कोंढ़ी” शब्द “पुष्प-कलिका” केर परिचायक थिक जखनि कि “कोढ़ी” शब्द “रोग विशेष”केँ निरूपित करैछ । एहि बातक पुष्टि किछु सीमा धरि “कोढ़ि या कोइढ़” शब्दसँ होइत अछि जकर निष्पत्ति सम्भवतः “कोढ़ वा कोढ़ी” शब्दसँ भेल अछि । आयुर्वेदमे कुष्ठरोगक (कोढ़क) प्रमुख कारण आलस्य आ आलस्यकारी भोजन (मधुर ओ स्निग्ध) बताओल गेल अछि आ मैथिलीमे “कोढ़ि या कोइढ़” शब्दक अर्थ सेहो “आलसी” अछि । “कोढ़ि” शब्दक उत्पत्तिक एहि आधारकेँ मानलासँ “कोढ़” शब्द कुठक परिचायक बूझि पड़ैछ आ “कोढ़ी” शब्द कुष्ठ रोगीक परिचायक जखनि कि “कोंढ़ी” शब्द पुष्प कलिकाक रूपमे प्रयुक्त बूझल जाएत । परञ्च सामान्य रूपेण देखबामे अबैत अछि कि जे केओ जीवन भरि गामहिमे रहलाह (वा रहलीह) आ हिन्दी नञि केर बराबर जनैत छथि ओ आनुनासिकक प्रयोग करैत पुष्प-कलिका ओ रोग-विशेष दुहुक लेल “कोंढ़ी” शब्दक प्रयोग करैत छथि । जखनि कि, विशेषतः शहरमे रहनिहार (वा रहनिहारि) लोक जे हिन्दी नीक जेकाँ जनैत अछि से आनुनासिकक प्रयोग नञि करैछ आ उपरोक्त दुहु अर्थमे “कोढ़ी” शब्दक प्रयोग करैछ । २ कागत केर फूल (कविता) हम छोड़ि चलल हुनिकर नगरी, जनिकर दुनिञामे प्यार ने छल । छल द्वेष - लोभ - छल - कपट सगर, नञि छल तँऽ केवल प्यार ने छल ।। वन - उपवन आ फुलबाड़ी छल, पर डाढ़ि कोनहु ने फूल एकहु । जे किछु छल, सब किछु कागत केर, नञि छल सुगन्धि वा गमक कोनहु ।। हम जनिका लेल रही पागल, नञि हुनिका छल विश्वास हमर । सब लऽग रहथि बस कहबा लए, केओ अप्पन कहनिहार ने छल ।। विमर्शः- गमक = सुगन्धि (मैथिलीमे; यथा - फूल गमकि रहल अछि) महक = दुर्गन्धि (मैथिलीमे; यथा - आलू सड़ि कऽ महकि रहल अछि) = गन्ध (हिन्दीमे) (हिन्दीमे “महक” या “मेहक” शब्द दुहु प्रकारक गन्ध मतलब कि “सुगन्धि” ओ “दुर्गन्धि” केर लेल प्रयुक्त होइत अछि) । गन्ह, गन्धि आ गन्ध - “गन्ध” तत्सम रूप थिक, “गन्धि” अर्धतत्सम ओ “गन्ह” तद्भव रूप । मैथिलीमे तीनूक मतलब एक्कहि थिक आ से नाक/घ्राणेन्द्रिय (NOSE / OLFACTORY RECEPTORS) ग्राह्य विषय थिक जकरा अंग्रेजीमे “स्मेल” (SMELL / OLFACTION) कहल जाइत अछि । मैथिलीमे एहि शब्दसभक प्रयोग तीन अर्थमे होइत अछि - (‍१) गन्ध केर स्वरूप अज्ञात भेला पर; यथा - ई कोन तरहक गन्ध/गन्धि/गन्ह अछि ? (२) प्रायः दुर्गन्धि केर अर्थमे; यथा - ई की गन्ध करै(त) छै अथवा ई की गन्हाइत छै ? (३) कोनहु आन विशेषण लगला पर अथवा परिस्थिति या भाव विशेषक अभिव्यक्तिक कारणेँ सुगन्धिक अर्थमे; यथा - महमह गन्ध, सुन्नर गन्ह, गुलाबक मादक गन्ध, रातुक रानीक गन्ध, मीठ गन्ध आदि । ३ दू शब्द - अहँक प्रति (कविता) अहँ जाए छी तँऽ जाउ, अहँक मर्जी, सप्पत हमरा, हम नञि रोकब । हमरासँ दूर जँ खुश अपने, सप्पत हमरा, हम नञि रोकब ।। अहँ केर जिनगी, अधिकार अहँक, अहँ केर इच्छा, जे अहाँ करी । मधु - अमृत - पान करी या फेर, हालाहल - घट केर वरण करी ।। जाहि मृगतृष्णामे भटकि रहल छी, गीरह बान्हू, अहँ पछताएब । जाहि बाटसँ उनटहि पएर गेलहुँ, आपिस ओहिठाँ घुरि पुनि आएब ।। जकरा पाछाँ छी भागि रहल, से तँऽ बस माया छी केवल । अप्पन मतिभ्रमकेँ थीर करू, पुनि सोचू की छूटल - भेटल ।। ४ हे आकांक्षे ! (कविता) हम आपना प्रति उत्तरदायी छी, तोहर कृत्यक तोंऽऽहींऽ जानए । हम कएलहुँ जे से उचित रहए, तोहर औचित्य तोंहीं जानए ।। अप्पन छवि अपनहि सोझाँमे, कारी-मलीन नञि बनल रहए । अपनहि समक्ष अप्पन माथा, लाजेँ बोझिल ने झूकल रहए ।। ई प्रीति पुनीत रहए हम्मर, हम तँऽ बस एतबहि टा बूझल । तोहर प्रदत्त अपमान - गरल, सेहो अमृत सनि हम बूझल ।। सभटा बन्हन आब टूटि चुकल, भ्रम मोह छोड़ि पाछाँ अएलहुँ । रही दूर स्वयंसँ भटकि गेल, आपिस फेर अपनाकेँ पओलहुँ ।। हे “आकांक्षे” ! हम मुक्त भेलहुँ, तोहर एहि विस्तृत मायासँ ।* मुइलहुँ ने, तपि कऽ निखड़ल छी, ओहि हवनकुण्ड केर छायासँ ।। * आकांक्षा = इच्छा, स्पृहा = प्रायः एहेन इच्छासभ जे ककरहु अहं केर तुष्टि लेल होइछ । ५ दर्द (कविता) एतबा भेटल जे दर्द केर अभ्यस्त भऽ गेलहुँ । नोरहिकेँ प्रति आइ हम आशक्त भऽ गेलहुँ ।। सोचने रही हम बैसब, कोनहु प्रेम - खोहमे । देखल जे प्रेम - रंग तँऽ विरक्त भऽ गेलहुँ ।। निकलल रही हम चाह लऽ फूलहि केर सोहमे । थाम्हल जे काँट आँचर संशक्त भऽ गेलहुँ ।। भटकैत रही निरन्तर इजोतहि केर खोजमे । इजोतक चमकसँ आइ अनाशक्त भऽ गेलहुँ ।। सुनइत छलहुँ अन्हार करए सेन्ह ओजमे । अन्हारेक शांति पाबि कऽ सशक्त भऽ गेलहुँ ।। सुनने रही खड़ाब छै पड़िहेँ ने मोहमे । देखल जे ताहि सोचसँ विभक्त भऽ गेलहुँ ।। ६ अहम् / अहं (कविता) हम देखि रहल छी सिन्धु-लहरि, जे अछि उठैत टकराइत अछि । अम्बर छूबा केर आश नेने, किछु दूर गगनमे जाइत अछि ।। किछु काल लागैतछि एहना जे, ओ सिन्धु छाड़ि पाछाँ आएल । पर नभ असीम, अतिशान्त, शून्य, के कहिया ओकरा अछि पाओल ?? एतबामे शैल-शिखर भेटल, आ लहरि ओतहि जा टकराएल । फेर आँखि फुजल, मुड़ि कऽ देखल, पुनि सिन्धु बीच स्वकेँ पाओल ।। ओ क्षुब्ध मनेँ बैसल किछु क्षण, नञि हारि मुदा तइयो मानल । शैथिल्य त्यागि कऽ सजग भेल, पुनि आपिस जएबा केर ठानल ।। किछु पुनि बेसी, आओरहु बेसी, ओ कसगर फेर प्रयास करैछ । अम्बरसँ लहरि धरिक दूरी, मूँह बओने ओहिना ठाढ़ रहैछ ।। कते दण्ड-पऽल, क्षण ओ प्रतिक्षण, बीतल कतबा दिन - राति बरख । ओ तन - मन - धनसँ लागल छल, श्रम - साफल्यक पर दूर दरस ।। निज रूप - अहं ओ त्यागि देल, एतबहिमे ओकरा की फूरल ! घनगृहसँ नीचाँ ताकि रहल, अम्बर पर अपनाकेँ देखल !! १४ टा बाल कविता १ कठसुग्गी / कठसुगीया हरियर हरियर चिड़ै छै बैसल । बऽड़क फऽड़ भखै छै बैसल । नञि सुगवा-सीकी ने हरियल । नाम ओकर कह बुच्ची !! *‍‍१ लोल ओकर मजगूत लगै छै । ठक् - ठक् गाछक काठ खोधै छै । ठोस लोल आबाज करै छै । छै ने मुदा कठखोद्धी ।।*‍२ सूर्योदय खन बड़ चहकै छै । मुदा ने तकलासँ भेटै छै । जानि कतए ओ नुका रहै छै । हड़बड़ाए देखि लुक्खी ।।*‍३ बच्चा हरियर रंग गात छै । चेतन गर्दनि-माथ लाल छै । जहिना बऽड़क फऽड़ - पात छै । नाम ओकर कठसुग्गी ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - हरियर रंगक चिड़ै सभमे अपना दिशि सभसँ प्रशिद्ध अछि सुग्गा आ हरियल । सुगवा सीकी सेहो हरियर रंगक होइत अछि । एहि कवितामे वर्णित चिड़ै सेहो हरियर रंगक अछि मुदा एहिठाँ नामित चिड़ै सभमेसँ नञि अछि । *‍२ - एहि कवितामे वर्णित चिड़ैकेँ मजगूत लोल होइत छै जाहिसँ ओ गाछक काठकेँ खोधि अपना रहबा लेल घऽर बनबैत अछि । सक्कत लोलसँ काठ पर प्रहार करबाक कारणेँ ठक् - ठक् केर स्इष्ट ध्वनि सेहो कर्णगोचर होइत अछि । मुदा तथापि ओ कठखोद्धी नामक चिड़ै नञि अछि । *‍३ - सूर्योदय खन सूर्य पहिल किरण पड़लाक लगभग एक घण्टा धरि ई चिड़ै खूब जोर - जोरसँ चहचहाइत अछि मुदा गाछक नीचाँ ठाढ़ भए ऊपर तकला पर देखबामे नञि अबैत अछि वा बड्ड मोश्किलसँ गोटेक - दूटा देखाइ दैत अछि । एकर मुख्य कारण ओहि चिड़ै केर रंग अछि जे गाछक पात पर पड़ैत सूर्य किरणसँ हू-ब-हू मेल खाइत अछि । *‍४ - कठसुग्गीक उपरुका लोलक ठीक ऊपर कड़गर नम्मा केस सदृश किछु संरचना होइत अछि जकरा अंग्रेजीमे बॉर्ब (BARB) कहल जाइत अछि । तेँ कठसुग्गीकेँ अंग्रेजीमे बार्बेट (BARBET) नामक चिड़ै कहल जाइत अछि । कठसुग्गीक कएक टा भेद - प्रभेद अछि जकरा जीवविज्ञानमे अलग-अलग जातिक (Species)रूपमे वर्गीकृत कएल गेल अछि । एहिमेसँ एकटा भेद जे अपना दिशि खूब भेटैत अछि, से अछि लाल माथ बला कठसुग्गी (COPPERSMITH BARBET) जकर वयस्कावस्थामे माथक ऊपर सुन्नर लाल रंगक मुकुट सनक संरचना रहैत अछि । एहने लाल रंगक संरचना गर्दनिपर अगिला भागमे सेहो रहैत अछि । एहि चिड़ै केर बाल्यकालमे एहि तरहक कोनहु लाल संरचना नञि रहैत अछि । एकर रंग आ बगए - बानी भोरुका रौद पड़ैत बऽड़क पातक ओ फऽड़क रंगसँ तेना ने मेल खाइत अछि कि सोझाँ रहितहुँ मनुक्खक आँखिकेँ ता धरि चिन्हबामे नञि आबैत अछि जा धरि ओ कोनहु प्रकारक हलचल नञि करैछ । अपना दिशि बेसी भेटए बला कठसुग्गीक दोसर प्रकार अछि भूरा या मटियाही माथ बला कठसुग्गी (BROWN HEADED BARBET) जकर जीवनकालक कोनहु अवस्थामे गर्दनि ओ माथ पर लाल रंगक कोनहु संरचना नञि होइत अछि । एकर माथ ओ गर्दनिक रंग भूरा या गाढ़ मटियाही रंगक होइत अछि । २ भगजोगनी गे भगजोगनी, बड़ चमकै छेँ ! कतएसँ बिजुरी छेँ । घुप्प अन्हरिया, बाटक कातेँ, चकमक चकमक कएने छेँ ।। आबि गेलेँ हमरा सोझाँ, हमरा हाथक तरहत्थी पर । बिजुरीसँ ने हाथ जरैतछि, छौ इजोत तोहर शीतल ।।*‍१ पेटक निचुला भाग पता नञि, केहेन माया रचने छेँ ! डिबिया - टेमी बिना तोँ सौंसे, भुक्-भुक् भुक्-भुक् कएने छेँ ।। पीच सड़क केर कातेँ - कातेँ, जमकल पानि आ गाछ छै । ताहि गाछ पर सत्ता - सोड़े, भगजोगनी केर बास छै ।।*‍२ भारी बरखा आ ठण्ढीमे, पतनुकान लए लैत छै । बरखक शेष समएमे ओ तँऽ, भुक् - भुक् - भुक् चमकैत छै ।।*‍३ भगजोगनीकेँ पकड़ि - पकड़ि, बन्न करैत छी शीशीमे । भूर छी कएने मुन्नामे, साँस लेबा लेल शीशीमे ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - भगजोगनीक उदर भाग (VENTRAL SURFACE) केर नीचाँमे विशिष्ट अवयवी संरचना होइत अछि जकरा प्रकाश उत्पादक अंग (LIGHT EMITTING ORGANS) कहल जाइत अछि । एहिमे ल्यूसीफेरेज (LUCIFERASE) नामक एकटा किण्वक या एञ्जाइम (ENZYME) होइत अछि जे ऑक्सीजन आ मैग्नेशियम आयनक (Mg++) उपस्थितिमे ल्यूसीफेरीन (LUCIFERIN) नामक रासायनिक पदार्थ पर क्रिया कऽ कऽ प्रकाश या इजोत उत्पन्न करैछ । एहि तरहेँ इजोतक उत्पत्ति जैव संदीप्ति (BIOLUMINESCENCE) केर उदाहरण अछि । भगजोगनीक एहि इजोतकेँ शीत इजोत (COLD LIGHT) कहल जाइत अछि । एहि इजोतमे पराबैगनी (ULTRA VIOLET) ओ अवरक्त (INFRA RED) किरण नञि रहैत अछि । अवरक्त किरणक अनुपस्थितिक कारणेँ एहिमे उष्णता या गर्मी नञि रहैत अछि आ तेँ छुअबा (छूबा) पर हाथ नञि पाकैत अछि । विश्वमे भगजोगनीक करीब दू (दुइ) हजार जाति (SPECIES) होइत अछि । भगजोगनीक विभिन्न जाति-प्रजातिक अनुसारेँ एहि इजोतक रंग पीयर, हरियर या पिरौंछ लाल भऽ सकैत अछि । *‍२ - भगजोगनी दलदली अथवा पानि लागल ओ गाछ-बिरिछसँ युक्त जगह सब पर रहैत अछि । एहि तरहक आवास क्षेत्र (HABITAT) अपना दिशि पीच (पक्का) सड़कक कातेँ-कातेँ आसानीसँ भेटि जाइत अछि कारण अछि ओहि सड़कक दूनू कात माटि कटलासँ गँहीर भेल स्थानमे बरख या बाढ़िक पानिक जमाव आ संगहि - संग भेल वृक्षारोपण । *‍३ - आन सन्धिपाद प्राणी (Arthropods) सब जेकाँ भगजोगनी सेहो शीतरक्तीय प्राणी (Cold blooded / Poikilothermal animal) अछि आ तेँ ठण्ढीक समएमे ओ पतनुकान लऽ लैत अछि अर्थात् शीतनिष्क्रिय अवस्थामे (Hibernating Stage) चलि जाइत अछि । किछु तँऽ बेङ्ग आ भेंक जेकाँ माटिक भीतर नुकाए रहैत अछि । तहिना बेसी तेज बरखा भेला पर सेहो । *‍४ - बहुतहु लोक अपन नेनपनमे भगजोगनीकेँ पकड़ि शिशीमे किछु काल वा किछु दिनक लेल बन्न कएने होएताह आ एखनहु धियापुता सब करैत अछि । ३ सतबहिनी मटियाही गात छै । दस - पाँच - सात छै । तेँ ओ कहाइत छै सतबहिनी ।।*‍‍१ छोट छिन समाज छै । खाइत ओ अनाज छै । दाना चुगि खाइत छै सतबहिनी ।। देखने जरूर छी । चिन्हबासँ दूर छी । गुण ने विशेष कोनहु सतबहिनी ।। मैथिली कि अंग्रेजी । बंगाली या हिन्दी । सभतरि कहाबैछ ओ सतबहिनी ।।*‍२ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - ई चिड़ै प्रायः पाँच सँ सात धरिक छोट समूहमे रहैत अछि । तेँ एकर नाम सतबहिनी (सप्त = सात; शत = सए) पड़ल । *‍२ - अंग्रेजीमे एकर नाम सेवेन सिस्टर्स (seven sisters) बंगाली भाषाक नाम “सातभाई” सँ पज़ल अछि — से बताओल जाइत अछि । मुदा ध्यातव्य जे पहिने मिथिला सेहो अंग्रजक अनुसारेँ बंगाल प्रॉविन्सक भाग छल आ ग्रियर्शन महोदयक काजसँ पहिने मैथिलीक स्वतन्त्र अस्तित्व अंग्रेजक डाटाबेसमे नञि छल । मिथिलामे ३, ५, ७, ‍११ आदि विषम संख्याक किछु अलगहि महत्तव रहल अछि; जेना कि - सतभैंया, पंचभैंया आदि । ४ हमहूँ पढ़बै मैथिली हे ऐ बहिनजी, यौ मास्टरजी, हमहूँ पढ़बै मैथिली । हिन्दी, ईंग्लिश, जर्मन सीखबै, पर ने बिसरबै मैथिली ।। मैथिली बाजथि दादा - दादी, नाना - नानी मैथिली । बाहर जा कऽ माम बिसरलाह, मामी बिसरलीह मैथिली ।। कक्का - काकी जखन बजै छथि, हिन्दी फेंटल मैथिली । बौआ - बुच्चीक मोन होइछ पर, सीखितहुँ हमहूँ मैथिली ।। तेँ टीचरजी हमरा पढ़बू, हम्मर भाषा मैथिली । आनो भाषा नीक लगए, पर मीठगर छी बड़ मैथिली ।। गणित - ज्ञान - विज्ञानक भाषा, जखनहि होयत मैथिली । बुझबामे भाङ्गठ नञि होयत, अप्पन भाषा मैथिली ।। ५ ईद छै कि होली छै ईद छै कि होली छै । दुर्गा − छठि − दिवाली छै । हमरा लए हर दिन सुन्नर, कारण इस्कूलमे छुट्टी छै ।। कक्कर पाबनि, के मनबै छै । कहाँ बात से एतेक फुरै छै । हमसभ खुश छी इएह सोचि कऽ, आबै बला छुट्टी छै ।। ककर जन्म आ कक्कर बरषी । सभटा सरकारक मनमर्जी । हम बच्चासब इएह सोचै छी, एक दिन फेरो छुट्टी छै ।। रौद छै कड़गर, लूऽऽ चलै छै । बर्खा - बुन्नी, शीतलहरी छै । एतेक प्रखर हो हर मौसिम जे, होअए घोषणा - छुट्टी छै ।। ६ अबोध बच्चा टुकुर-टुकुर ओ ताकि रहल अछि । आँखिसँ दुनिञा नापि रहल अछि । एहि जग केर जगमगकेँ निहारैत, जग केर माया भाँपि रहल अछि।। बाल-गोपाल स्वरूप छी बच्चा । सृष्टिक कोमल रूप छी बच्चा । छी अबोध, पर बोध कराबैछ, भगवानक छवि-रूपकेँ बच्चा।। बच्चा नञि बस अगबहि बौआ । बच्चा माने बुच्ची आ बौआ । नेन्ना कोमल, कोमल नेनपन, देखि कऽ बिहुँसए आङ्गन कौआ ।। ७ मच्छर दुनिञामे मनुक्खक आगमसँ, बड़ पहिनेसँ मच्छर अछि ।*‍१ छोट जीव, मुदा पैघ जीवकेँ, कएने बहुत उछन्नर अछि ।। मच्छर केर जे पुरुष रूप से, पुष्प - परागकेँ चूसैत अछि । मच्छर केर स्त्रैन रूप मुदा, खून पीबि कऽ जीबैत अछि ।।*‍२ मच्छर अपनहि छोट अछैतहुँ, सूक्ष्मजीव केर आश्रय अछि । ओक्कर लेड़ - ग्रण्थिमे कएटा, परजीवी केर प्रश्रय अछि ।।*‍३ खून चूसबा काल लेड़ संग, परजीवी प्रस्थान करैछ । जकर खून चूसल जा रहलए, तकर काय स्थान धरैछ ।। नऽव कायमे ओ परजीवी, रोगक अछि निर्माण करैत । संग मनुक्खक आनहु पशुमे, नूतन ब्याधि-विधान करैछ ।।*‍४ जापानी एनसिफेलाइटिस ओ, डेङ्गू आओर मलेरिया । चिकेन गुनिञा सनक बेमारी, अथवा रोग फलेरिया ।।*‍५ मच्छर छी बड़ असञ्जाति, ओ हर युक्तिक प्रतिरोध गढ़ैछ । मशहरीक नञि तोड़ कोनहु छी, मच्छर केर अवरोध करैछ ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - एहि धरती पर जीवनक क्रमविकाशमे (Organic Evolution) नवीन मतानुसार मच्छरक उद्गम कमसँ कम 2 अरब 30 करोड़ वर्ष पहिने भेल छल जखनि कि आधुनिक विज्ञानानुसार मनुक्ख वंशक (Genus - Homo) उद्भव करीब 2 करोड़ वर्ष पहिनहि भेल अछि । आधुनिक मानव (Homo sapiens) केर उत्पत्ति तँऽ मात्र 2 लाख 50 हजार वर्ष पहिने बताओल जाइत अछि । *‍२ - पुरुष वा नर मच्छर पुष्प पराग पीबि (पिउबि) कऽ अपन जीवन निमाहैत अछि जखनि कि स्त्री या मादा मच्छर मनुक्खक अतिरिक्त किछु आन जन्तु सभक खून पीबि (पिउबि) जीवन निर्वाह करैछ । एकर पोषक जन्तु सबमे (Host animals) किछु रीढ़धारी आ किछु आन सन्धिपाद प्राणी सभ रहैत अछि । रीढ़धारी प्राणी सभमे स्तनपायी (Mammals), चिड़ै (Birds), सरिसृप (Reptiles), उभयचर (Amphibians), मत्स्य (Fishes) आदि वर्गक प्राणी सभ एकर पोषक जन्तु (Host animals) भऽ सकैत अछि । *‍३ *‍४ - स्त्री मच्छरक लेर ग्रण्थिमे (Salivary gland) बहुत रास अन्तः परजीवी सभ (Internal Parasites) निवास करैत अछि । जखन कोनहु परजीवीसँ संक्रमित वा व्यापित स्त्री मच्छर (Infected or Infested Female Mosquito) कोनहु पोषक जन्तु केर खून चूसैत (चूषैत) अछि तँऽ ओ परजीवी मच्छरक लेर(Saliva) केर संग ओहि पोषक जन्तुक रक्त परिसंचरण तन्त्रमे (Haemo Circulatory system) प्रवेश पबैछ । तकर बाद अपन विशिष्ट जीवन चक्रक (Specific Life Cycle) अनुसार ओहि पोषक जन्तुकेँ विभिन्न तरहक रोगसँ आक्रान्त करैछ । *‍५ - मनुक्खक मच्छर जनित बेमारी सबमे किछु प्रमुख अछि · मलेरिया (Malaria) · फलेरिया (Filariasis / Elephantiasis) · जपानी मस्तिष्क शोथ (Japanese Encephalitis) · डेङ्गू या डेङ्गी (Dengue) · चिकनगुनिञा (Chickengunya) · जिका वायरस बोखार (Zika Virus Fever) · पच्छिमी नील वायरस बोखार (West Nile Fever) आदि । *‍६ - कोनहु प्रकारक मच्छरनाशी वा मच्छररोधी रसायनक प्रति मात्र किछुअहि साल वा महीनामे मच्छर प्रतिरोध (Resistance) उत्पन्न कऽ लैत अछि ओ ओकरा बेअसरि कऽ दैत अछि । मच्छरसँ बचबाक लेल मशहरीक प्रयोग सस्ता आ रामबाण तरीक अछि । मैथिलीमे “मच्छर” ओ “मशहरी” दूनू तद्भव शब्द भेल जकर मूल संस्कृत शब्द क्रमशः “मत्सर” आ “मशकहरी” अछि । ८ देबाड़ या दिबाड़ (बाल कविता) कतबहु हो मजगूत मकान । चाहे हो परोपट्टाक शान । भूकम्प - बाढ़ि - अन्हररोधी । या तड़ितपात - ठनकारोधी । पर तइयो ने अजर - अमर बुझियौ, कारण एक्कर छी दिबाड़ ।। छी दिबाड़ बड़ ढीठ जीव । बड़ असंजाइत नाशी ई जीव । भीजल - भू छाहरि एकर डीह । नञि सुखलहुमे ई करैछ पीठ । ओ रक्षित नञि स्थान कोनहु, पहुँचए नञि जाहि ठाँ ई दिबाड़ ।।*‍‍१ छी भाँति - भाँति केर रंग रूप । जल - थल सभठाँ भेटै ई भूप । किछु लागै उजरा चुट्टी सनि । किछु उड़ैबाला कीड़ी सनि ।*‍२ हर निर्माणक ढाहैछ अहं, जे छोट जीव कहबैछ दिबाड़ ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - दिबाड़ यद्यपि भीजल (वा नम वा आर्द्र) आ छाहरियुक्त स्थान पर बेसी भेटैत अछि मुदा सही कही तँऽ धरतीक दूनू ध्रुवीय (आर्कटिक ओ अण्टार्कटिक) प्रदेशकेँ छोड़ि विश्वमे सभठाँ भेटैत अछि । *‍२ - दिबाड़केँ अंग्रेजीमे व्हाइट ऑण्ट (WHITE ANT = उजरा चुट्टी) कहल जाइत अछि । सम्भवतः तेँ कल्याणी कोशमे एकरा चुट्टीक एक प्रकार कहल गेल अछि मुदा जीव विज्ञानक अनुसारेँ ई चुट्टीक प्रकार नञि अछि अपितु जैविक क्रमविकाशमे चुट्टीसँ बहुत दूर अछि । उनटहि दिबाड़ जैविक क्रमविकाशमे सनकिड़बाक बेसी नजदीक अछि । ९ घोरन (बाल कविता) चुट्टी सनि छी वा चुट्टी छी, चुट्टीसँ किछु भिन्नहु छी । चुट्टा सनि छी रूप मुदा, संतोला रंगक ई छी ।।*‍१ आम या जामुन केर गाछ पर, रहइछ प्रायः सोहरल । जखने केओ चढ़ैछ गाछ पर, ओकरा देहमे लुधकल ।। आमक गाछक पात सीबि कऽ, गोल - गोल खोंता बनबए । चुट्टा सनि ई जीव छी घोरन, आ “घोरन छत्ता” बनबए ।।*‍२ अपना देशक वन्य भागमे, जन - जातिक आहार थिकै । भुजिया चटनी बहुत चहटगर, अम्मत खटगर स्वाद थिकै ।।*‍३ पात सीबैछ, तेँ अंग्रेजीमे, ‘वीवर ऑण्ट’ छै नाम ओकर । ‘ग्रीन’ माने जंगल सेहो होइए, ‘ग्रीन ऑण्ट’ सेहो नाम ओकर ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मोटा-मोटी जँ देखी तँऽ घोरन सेहो चुट्टीएक (चुट्टीअहिक) प्रभेद छी, मुदा तथापि अपन विशिष्टताक कारणेँ ई चुट्टीसँ फराक छी । *‍२ - आम, जामुन आदि गाछक स्वस्थ पातकेँ सीबि (सिउबि) कऽ घोरन रहबाक लेल घऽर बनबैछ जकरा “घोरनक छत्ता” (COMB OF A WEAVER / GREEN ANT) कहल जाइत अछि । सिउब = सीअब वा सीयब; सिउबैछ = सीबैछ । *‍३ - अपना देशक जनजातिय भागमे आ विश्वमे आन बहुतहु ठाम घोरनकेँ भूजि कऽ वा चटनी बनाए कऽ वा आन तरहेँ खाएल जाइत अछि । *‍४ - पात सीबि कऽ छत्ता बनएबाक कारण अंग्रेजीमे एकरा “वीवर अण्ट” (WEAVER ANT) आ गाछ पर रहबाक कारण “ग्रीन अण्ट” (GREEN ANT) कहल जाइत अछि । एहि ठाम ग्रीन (GREEN) केर मतलब हरियर रंग नञि अछि अपितु जंगल अछि। १० आइ आबए बला रिजल्ट छै (बाल कविता) आइ आबए बला रिजल्ट छै । आइ दिन बड़ी डिफिकल्ट छै । की करियै - किछु फुरा रहल ने, आइ ने कोनो विकल्प छै ।। जएह लिखलियै, खूब लिखलियै । सभ पन्नाकेँ भरि - भरि देलियै । तइयो आइ बड़ डऽर लगैए, छपने केहेन रिजल्ट छै !! कोनो चीजमे मोन ने लागए । कछमछ मोन उताहुल भागए । इण्टरनेट अछि देखा रहल बस, “आबए बला रिजल्ट छै” ।। कहुखन मोनेँ टॉप करै छी । कहुखन सभसँ फ्लॉप करै छी । आइ तराजू केर पलड़ा सनि, डगमग दृढ़ संकल्प छै ।। ११ छोट माँछ, पैघ माँछ (बाल कविता) छोट माँछ, पैघ माँछ, ताहूसँ पैघ माँछ, कक्कर आहार के ? – बुझिते छी भाइ यौ । दुनिञाक इएह नियम, सदिखनसँ आबैए, बेसी हम की कहू - बुझिते छी भाइ यौ ।। जिनगी संघर्ष छिऐ, सएह आदर्श छी, विश्वक विचित्र संकल्पना छी भाइ यौ । हर कण निर्जीव जे, वा हो सजीव जे, करइछ संघर्ष नित, अस्तित्वक, भाइ यौ ।। मानी ने मानी अहँ, संघर्षे सत्य छी, शान्तिक विचार बस सपना छी भाइ यौ । जतबा प्रकृतिकेँ, हमसब जनैत छी, अस्तित्वक इएह संकल्पना छी भाइ यौ ।। जल थल बसात नभ, अस्तित्व लेल निज, करइछ प्रयत्न नित, बुझले छी भाइ यौ । अपना अस्तित्वकेँ जञो नञि बचाए सकी, सहअस्तित्व तखन सपना छी भाइ यौ ।। १२ पटना पुस्तक मेला (बाल कविता) आइ गेल छलहुँ पुस्तक मेला, पटनाक गान्धी मैदानमे ।*‍१ नञि विशेष किछु छल तइयो, नव पोथीक अनुसन्धानमे ।। याद आबैछ एखनहु ओहिना, पटनाक पहिल पुस्तक मेला । पोथी सभहक अम्बार बेस, आ लोक सभक रेला - ठेला ।। मीर, रादुगा, प्रगति प्रकाशन, सोवियतक पुस्तक आगार ।*‍२ ऑक्सफोर्ड, प्रैण्टिस आ कैम्ब्रिज, एन॰बी॰टी॰, सी॰एस॰आइ॰आर॰ ।।*‍३ हरेक विषय पर छल पुस्तक, भाषा, इतिहास, भूगोल रहए । अभियंत्रन, वाणिज्य, चिकित्सा, ज्योतिष, धर्म, खगोल रहए ।। बहुबिध देसी आओर बिदेसी, पुस्तक केर स्टॉल रहए । मैथिलीक सेहो एक - दू टा, नीक छोट स्टॉल रहए ।। सोचल आगाँ धीरे - धीरे, मैथिलीक स्टॉल बढ़त । ई तँऽ पहिलुक बेर थिकै, आगाँ बढ़िञा माहौल रहत ।। एहनहु बरख रहल जहिया, छल नामहि केर पुस्तक मेला । पाटलीपुत्र मैदान फिरल, भेल दूसल्ला पुस्तक मेला ।। कतोक प्रकाशन बन्न भेल, अन्तर्जालक ई युग आएल । थिक उदासीन सरकार सेहो, राज्यक भाषा सभ बौआएल ।। युवा ई मेला - चौबीस बरखक, वृद्ध सनक लागैत अछि । पुस्तक मेलाक शिशु अवस्था, याद बहुत आबैत अछि ।। *‍१ - पटना पुस्तक मेला २०१७ *‍२ - रादुगा पब्लिशर्स मॉस्को, मीर पब्लिशर्स मॉस्को आ प्रगति प्रकाशन मॉस्को - ताहि समए मे भारत मे उपलब्ध सोवियत पोथीक प्रकाशक सभ । *‍३ - किछु अमेरिकी’ ब्रिटिश आ भारतीय विज्ञान विषयक पोथीक प्रकाशक सब । १३ बरियातीक समए - ‍१ बौआ ! सम्हरि कऽ चलिहें बाट कातमे, बरियातीक समए छै । ई की कहलियै ? बरियातिसँ, हमरा की मतलब छै ।। बड़ बेमत्त छै चलबैत ओ सभ, पी-पा कऽ बुझू मातल । की कहैत छी ? अपना राज्यसँ, दारू अन्तऽ भागल ।। पिउने हो वा नञि पिउने मुदा, रहइछ सभ बेमत्त । बरियाती नञि, सेना युद्धक, तहिना सभ उन्मत्त ।। जएबाक छै बरियाती - सुनितहि, ऊठैछ मोन उजहिया । बरियाती हुहुकारा दैछ, ड्राइवर केर मोन उछहिया ।। तहिना साटा पर साटा, दिन - राति उघैतछि गाड़ी । जागरणक जे निशाँ लगैतछि, फीका दारु-ताड़ी ।। अपने तँऽ मरबे करैत अछि, बरियातीक अपग्रह । पएरे छी वा संग दुचकिया, सभहक लेल अवग्रह ।। १४ बरियातीक समए - २ आजुक मिथिलाक बरियाति, आहा ! बड़ दीव ! धूरा उड़बैत, यातायातक सभ नियम तोड़ैत, रोड पर सनसनाइत, युद्धक घुड़सवारक काफिला सनि, दूचकिया चारिचकियाक पाँति ।। पाँति नञि, अनियन्त्रित बेसम्हार काफिला । केकर मजाल छी जे, सड़क पर साइड रहितहुँ आगाँ बढ़ि जाए । केकर मजाल छी जे, क्रॉसिंगक लेल पास मांगए । बरियाती थोड़बहि ने छी, राष्ट्रपतिक काफिला छी, आगाँ-पाछाँ आ साइड खाली करब, अहाँक जिम्मेवारी छी ।। साइड नञि अछि तँऽ, कूदि जाउ, सड़क कातक धारमे, सड़क कातक बाधमे, वा नञि तँऽ, मरि जाउ पिचा कऽ, बरियातीक काफिला नञि रूकत, ओकर रफ्तार नञि थम्हत, राजशाही ठाठ छी , ओकर बापक बाट छी ।। प्रस्थान बरियातीक कहाँ छी ? प्रयाण युद्धक छी ! के कहैछ बरियाति ओकरा, सेना छी ओ कीर्तिसिंह केर, अथवा राजा शिवसिंह केर, कीर्त्तिलता लिखबा लेल बेहाल ! कीर्त्तिपताका फहरएबा लेल बेहाल !! संकेत - बरियाति (उच्चारण - बरियाइत) बरियाती (उच्चारण - बरियाती) किछु सचित्र बाल कविता कड़रिक सितुआ या कड़रिक शितुआ या जोंकती (बाल कविता) कड़रिक  ऊपर   सितुआ  चोख ।*‍१ कड़रिक थम्ह पर  सितुआ चोख ।*‍२ कड़रि - कदलि - केरा  भेल अर्थ, केरा पर किए  सितुआ  चोख ?? *‍३ केराक  फऽड़  ने,  केराक  थम्ह, आशय  छी − केरा  केर  गाछ ।*‍२ ताहि  केरा  केर  गाछक  ऊपर, खुरचनि चलबय केर की काज ?? *‍३ खुरचनि - सितुआ  धार - नदीसँ, केरा   गाछ   कोना   पहुँचल ? नञि पहुँचल तँऽ कोना कड़रि पर, दाँत ओकर  भऽ गेल धारगर ?? *‍४ खुरचनि - सितुआ आन जीव आ कड़रिक  सितुआ  आन  थिकै ।*‍५ दुहु  जीवमे   छी  बड़  अन्तर, की जँ  एक्कहि  नाम  भेलै ?? कड़रिक सितुआकेँ  रओ  बौआ, खुरचनि - ढाकन नञि होइ छै ।*‍६ छाहरियुक्त  माटि  जे  भीजल, ताहि ठाँ  कड़रिक सितुआ छै ।। भाँति-भाँति छै  कड़रिक सितुआ, एक्कर छै  साम्राज्य बड़ी - टा । सभहक  देह  बहुत छै  कोमल, रौद - नूनसँ   भागय  उनटा ।। प्रायः  देह  एकर  छै   नमगर, मूड़ी  पर  छै   दू  संस्पर्शक । कतोक  जीव केर  छै आहार ई, मुदा मनुक्ख एकर ने भक्षक ।।*‍७ छाहरिमे   जे   गाछ   उगैतछि, तकर   देहमे   पानि    बहुत । ओकरहि खा कऽ अछि  जिबैत ई, करैछ  तकर  तेँ  हानि  बहुत ।।*‍८ एहने  गाछ  छी  केरा  केर  आ लत्ती - फत्ती    सजमनि   केर । स्वयं  जीव  कोमल  छी  तइयो, भक्षक  कोमल  तरुगण   केर ।।*‍९ तेँ     कहबीमे    केरा - कदुआ, अबल - दुबल   पर्याय   बनल ।*‍९ मुदा छगुन्ता, कड़रि आ खुरचनि, कोना   एक   पर्याय   बनल !!*‍१० जोंक  जेकाँ  नमरैत  चलैत  अछि, मुदा ने जन्तुक  खून चुसैत अछि । चलबामे   सादृश्य  छै  किछु  तेँ, “जोंकती” सेहो लोक कहैत अछि ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - मैथिलीक एकटा पुरान कहबी । कड़रि = कदलि = केरा । *‍२ - उपरोक्त कहबीक समानार्थी अपरूप । “कड़रिक थम्ह” संकेत करैछ जे एहि कहबीमे “कड़रि” माने केराक फऽर नञि अपितु केराक गाछ अभिप्रेत अछि । *‍३ - जँ एहि कहबीक “शितुआ”केँ खुरचनि मानैत छी तँऽ प्रश्न ई उठैत अछि जे कड़रिक थम्ह पर खुरचनि चलएबाक की प्रयोजन ? *‍४ *‍५ - जँ जिबैत खुरचनि (अर्थात खुरचनि सितुआ) केर बात करी तँऽ ओ नदी वा धारक पेनीमे रहैत अछि । आ केरबन्नी वा केराबाड़ी धरि पहुँचबाक कोनहु सम्भावना नञि । आ जँ बाढिक पानिक संग ताहि ठाम पहुँचिअहु गेल तँऽ केरा गाछकेँ नोकशान नञि पहुँचाए सकैछ । तेँ “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ”निश्चितहि दू अलग-अलग तरहक प्राणी वा प्राणी समूह थिक । *‍६ - “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” दूनू मोलस्का सुदायक (Phylum - Mollusca / Molluska) प्राणी छी मुदा दूनूमे बहुत अन्तर अछि । “खुरचनि सितुआ” (FRESHWATER BIVALVE MOLLUSCS) पानिमे रहएबला जीव अछि, पानिअहिसँ भोजन तथा ऑक्सीजन प्राप्त करैछ आ बाहरसँ दूटा ढाकन सदृश कठोर अवयवसँ बनल सम्पुटसँ आवृत्त रहैछ । मुदा, “कड़रिक सितुआ” (GASTROPOD / UNIVALVE PULMONATE MOLLUSCS) जमीन पर रहएबला जीव अछि तथा ओ ऑक्सीजनकेँ सीधे वायुमण्डलसँ अपन श्वसन छिद्र वा न्यूमोस्टोम (PNEUMOSTOME) नामक अंग द्वारा ग्रहण करैछ । “कड़रिक सितुआ” जमीन पर छाहरियुक्त ओ नम स्थान पर रहैत अछि तथा ताहि ठामक वनस्पतिसभकेँ हराशंखहि जेकाँ बड़ क्षति करैछ । कड़रिक सितुआकेँ ऊपरसँ देखला पर ओकर शरीर पर प्रायः कोनहु कवच (SHELL / EXOSKELETON) नञि रहैत अछि मुदा उपरुका चामक नीचाँमे एकटा छोट-क्षिण अन्तः कवच(VESTIGIAL INTERNAL SHELL / EXOSKELETON) रहैत अछि जे कि ओकर शरीरकेँ पुर्ण रूपेँ नञि झाँपि सकैत अछि । *‍७ - “कड़रिक सितुआ”क भक्षण प्रायः मनुक्ख नञि करैत अछि, जखनि कि मिथिलाक जनजातीय समूहक लोक सभ “खुरचनि सितुआ”क भक्षण डोका आ घोंघरी आदि सदृश करैत अछि । *‍८ - छाहरिबला स्थान पर उगल कोमल गाछ-पात, लत्ती-फत्ती आदि केर भक्षण कए कड़रिक सितुआ अपन पेट भरैत अछि । *‍९ - छहरिबला स्थान पर उगल कोमल गाछ-पात, लत्ती-फत्ती आदिकेँ दुर्बल वा कमजोर मानल जाइत अछि कारण जे ओहि तरहक गाछ बिरिछमे पानिक मात्रा बहुत बेसी रहैत अछि आ मजगूत काठ नञि रहैत अछि । तेँ मिथिलामे एकटा कहबी आओरहु अछि - “अबल दुबल पर सितुआ चोख” । *‍१० - एहि प्रकारेँ निम्न चारू कहबी समानार्थी अछि - ·        कड़रिक ऊपर सितुआ चोख ·        कड़रिक थम्ह / गाछ पर सितुआ चोख ·        अबल दुबल पर सितुआ चोख ·        कदुआ ऊपर सितुआ चोख मुदा आश्चर्यक बात जे मिथिलाक जन-सामान्य ओ विद्वत-लेखक वर्गमे सेहो दूनू सितुआकेँ खुरचनि बूझल जाइत अछि जखनि कि लोक साहित्यक सूक्ष्म अवलोकनसँ स्पष्ट संकेत भेटैछ जे दुहु दू प्रकारक जीव थिक । खुरचनि सितुआ या खुरचनि शितुआ (बाल कविता) कड़रिक  सितुआ  बुझू ने  हमरा, हम   छी   खुरचनि - सितुआ ।*‍१ हम  ने  केरा - सजमनि  नाशक, निर्धन     केर     पेटभरुआ ।।*‍२ सीप  सनक  हमरहु  दू - ढाकन, “खुरचनि”    तकरहि     नाम । हम  छी  कोमल  जीव, हमर छी कवचक   “खुरचनि”     नाम ।।*‍३ पोखरि - धार - नदी - डबरा  केर, पेनीमे   अछि   बास    हमर । हम नञि  धरती पर  फिरैत  छी, पानिमे  चलइछ   साँस  हमर ।।*‍४ मनुख जे निर्धन, नहि उपाए किछु, तकर   प्राण-रक्षक   हम   छी । आहूत बनि  स्वयं,  पेट भरी हम, नञि   जजाति-भक्षक  हम छी ।।*‍२ खतड़ा  देखितहिं  अपन  कवचमे, नुका  रहैत  छी   हम   बैसल । जिबितहि  हमरा  उसीनि दैत छी, तइयो  हमरा   नञि  चिन्हल ।। कोना कहैत छी  कड़रिक सितुआ, अबल - दुबल पर सितुआ चोख ? हम तँऽ छी  निर्बल  केर  रक्षक, तकरा  पेटक   आगिक  तोष ।।*‍५ आन  ठाम   दुनिञाभरि   सौंसे, हमर   बहुत   व्यञ्जन  अछि । अपन देश,  ने जानि किए,  पर हमर  बहुत   गञ्जन   अछि ।। हमर खोल  खुरचनि केर  जगमे, बहुतहि      छी      उपयोग । “बटन” बनैत छल  एहिसँ पहिने, बहुविध      आन     प्रयोग ।। दूध  आ  घी  केर  डाढ़ी  पहिने, खुरचनिसँ    खोखरैत    छलहुँ । रगड़ि - भूर  कऽ   बीच  भागमे, काँच   आम   सोहैत   छलहुँ ।। चित्रकार    खुरचनिमे    पहिने, रंगक      करथि     मिलान । पएर - मँजना  केर  रूपमे  सेहो, हम्मर   छल    बड़    माँग ।।*‍६ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - “खुरचनि सितुआ” आ “कड़रिक सितुआ” दूनू मोलस्का सुदायक (Phylum - Mollusca / Molluska) प्राणी छी मुदा दूनूमे बहुत अन्तर अछि । *‍२ - “खुरचनि सितुआ”  लत्ती, साग आ छाहरियुक्त जमीन पर उपजएबला आन कोनहु तरहक /कोमलन गाछ-बिरिछकेँ कोनहु ञि पहुँचेबैत अछि । *‍३ - मोलस्का समुदाय (PHYLUM - MOLLUSCA) केर एहेन समस्त प्राणी (चाहे समुद्रमे रहए किंवा नदी-धार आदिमे) जे दू गोट ढाकन सदृश ठोसगर संरचनाक सम्पुटमे बन्न रहैत अछि मैथिलीमे “सीप” (BIVALVES / BIVALVE MOLLUSCS / BIVALVE MOLLUSKS) कहबैत अछि । सीपक दूनू ढाकन वा पट एक कातसँ एकटा स्नायु (LIGAMENT) द्वारा परस्पर जुड़ल रहैत अछि जे कब्जा (HINGE) जेकाँ काज करैछ । एहि कब्जाक कारणेँ सीपक दूनू ढाकन एक दिशिसँ परस्पर जुड़ल रहैत अछि आ दोसर दिशिसँ जीवक इच्छानुसार फुजि सकैत अछि । एहि प्रकारेँ खुरचनि सितुआ (UNIOES) सेहो व्यापक रूपेँ एकटा सीपहि अछि जकर दूनू ढाकनकेँ मैथिलीमे “खुरचनि” नाँओसँ जानल जाइत अछि । *‍४ - “खुरचनि सितुआ”  नदी, धार, पोखरि आदिक पेनीमे माटि वा बालुमे आधा धँसल रहैत अछि । एकर शरीरमे दूटा नली सदृश संरचना रहैत अछि जे कवचसँ (ढाकनसँ) बाहर अलग-अलग छेदक रूपमे फुजैत अछि । एक छेदसँ पानि अन्दर जाइत अछि आ दोसरसँ बाहर आबैत अछि । पानिमे उपस्थित भोज्य पदार्थ आ ऑक्सीजनकेँ ई जीव अवशोषित कऽ लैत अछि आ उच्छिष्ट व उत्सर्जी पदार्थकेँ पानिक संग पुनः आपिस जलाशयमे त्यागि दैछ । पानिसँ निकाललाक बाद किछु दिन धरि ई सुषुप्तावस्थामे निष्क्रिय वा निस्चेष्ट रहैत अछि मुदा बेसी दिन धरि नञि जीबि सकैत अछि । *‍५ - कड़रिक सितुआक रूपमे खुरचनि सितुआकेँ उपस्थित करब एकटा बहुत पैघ साहित्यिक चूकि छी । खुरचनि सितुआ कोनहु प्रकारक मनुष्योपयोगी गाछ - बिरिछकेँ नोकशान नञि पहुँचबैत अछि । उनटहि, मिथिलामे सामाजिक-आर्थिक रूपसँ कमजोर वर्गक आहार बनि ओकर क्षुधाकेँ शान्त करैछ । *‍६ - विश्वक विभिन्न भागमे भिन्न-भिन्न समुदायक लोकसब द्वारा खुरचनि सितुआ आहारक रूपमे लेल जाइत अछि । खुरचनिसँ पहिने शर्ट आदि केर बटन बनैत छल । गाम घरमे लोकसब दूधक डाढ़ी खखोरबाक लेल, काँच आम आ खीरा आदि सोहबाक लेल, पएर मँजबाक लेल प्रयुक्त होइत छल । पहिने चित्रकार लोकनि विभिन्न रंगकेँ फेँटबाक लेल वा मिलान करबाक लेल खुरचनिक प्रयोग करैत छलाह । गिरगिट (बाल कविता) गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें । गिरगिट केहेन ?? सोचए बच्चा मनें - मनें ।।*‍१ वन-उपवन बाड़ी-झाड़ी, सभ ठाँ भेटैत अछि । ठण्ढीक भोरमे बैसल, ओ  रौदा  सेकैत अछि । घऽरमे  भेटैछ, भेटैछ संगहि  रणे - बने ।*‍२ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। पहिने रंग रहए जे चामक, चट दऽ बदलल । या रंगक विन्यास सकल, आमूलहि बदलल । देखि अचंभित, चकित आँखि छै कने-कने ! *‍३ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। गोहि आओर सनगोहि, भाए छी गिरगिट केर । मुदा पैघ ने, ओतेक  काय छी  गिरगिट केर । जीह निकालि कऽ, पकड़ए कीड़ा क्षणें - क्षणें ।*‍४ गिरगिट छेँ की ? रंग बदलै छेँ खनें - खनें ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - “गिरगिट” शब्दक अर्थ मैथिलीमे बहुत व्यापक अछि जे अपना आपमे सामान्य गिरगिट, ठिकठिकिआ / घरैया गिरगिट, गोहि, सनगोहि, डाइनोसॉर आदि सभकेँ समाहित करैत अछि । मैथिलीक गिरगिटक तुलना अंग्रेजीक LIZARD शब्दसँ कए सकैत छी जाहिमे COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON आदि सभ आबैत अछि । गिरगिट शब्दसँ अमेरिकी महाद्वीपक  IGUANA नामक सरिसृपक केर सेहो बोध कहल जा सकैत अछि, हलाँकि ओ सामान्य गिरगिटसँ ओ बहुतहु बातमे भिन्न अछि । परिवेश वा इच्छानुसार चामक रंग बदलबाक गुण कमोबेश हर गिरगिटमे होइत अछि मुदा चमेलिओनाइडी /केमेलिओनाइडी कुल (Family - Chamaeleonidae; Eng. - Chameleons) केर गिरगिट सभमे ई गुण बहुत अधिक विकसित भेल अछि । चुँकि, मैथिलीमे ठिकठिकिआ, गोहि, सनगोहि आदि शब्द पुर्णतः परिभाषित अछि तेँ एकरा सभकेँ छोड़ि शेष सम्बन्धित प्राणीक लेल हम एहि ठाम “गिरगिट” शब्दक प्रयोग कएल अछि । *‍२ - सरिसृप वर्गक प्राणि होएबाक कारणेँ गिरगिट सेहो शीतरक्तीय प्राणी अछि आ तेँ ठण्ढीक समएमे भोरुका पहर रौद सेकैत आरामसँ देखल जा सकैत अछि । *‍३ - गिरगिट रंग बदलबामे माहिर होइत अछि । ओ अपन चामक रंग ओ रंगक विन्यास अपना आस - पासक परिवेशक अनुसार क्षण भरिमे बदलि लैत अछि । ओना तँऽ बहुत रास समुद्री जीवमे ई गुण पाओल जाइत अछि, मुदा धरती पर आ ओहो मनुक्खक आवास क्षेत्र केर आस - पास गिरगिटहि एहिमे सभसँ कुशल होइत अछि । जीव विज्ञानमे एहि तरहक घटनाकेँ छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) कहल जाइत अछि । ई छद्मावरण दू तरहेँ गिरगिटकेँ सुरक्षा प्रदान करेत हछि - पहिल तँऽ वातावरणक रंगमे स्वयंकेँ दुश्मनक नजरिसँ नुकाए लैत अछि आ दोसर आक्रामक रंग परिवर्तन कए प्रतिद्वन्दीकेँ डेराए दैत अछि । *‍४ - गिरगिटक जीह बेङ्ग जेकाँ होइत अछि आ मूँहसँ बाहर शिकार पर दागल जाइत अछि । जीह केर अगिला भाग शिकारकेँ अपन लसलस लेरमे सटाए मुँहक भीतर नेने जाइत अछि । क्र॰ सं॰ जीवक मैथिली नाम अंग्रेजी नाम विशिष्ट गुण १ गिरगिट LIZARDS (Including CHAMELEONS & IGUANAS & OTHERS) ·        रंग बदलबामे कुशल ·        बहुतहु गिरगिटक जीहक संरचना ओ कार्य-शैली बेङ्ग जेकाँ होइछ २ ठिकठिकिआ (ठिकठिकिया) /घरैया गिरगिट COMMON HOUSE GECKOES / HOUSE LIZARDS ·        रंग बदलबामे बेसी कुशल नञि ·        खतरा पड़ला पर नाङ्गरिक पछिला भागक त्याग करैछ ३ गोहि MONITOR LIZARDS  / VARANUSES (Including KOMODO DRAGONS) ·        साँप जेकाँ द्विभाजित जीह ·        गिरगिटसँ पैघ आकार ·        रंग बदलबाक गुण नञि ४ सनगोहि GOLDEN / YELLOW MONITOR LIZARD ·        गोहि केर एक प्रकार ·        चामक रंग किछु पीताभ सनि होइछ आ अपना दिशि पाओल जाइछ ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया (बाल कविता) गिरगिट छी, पर नञि छी गिरगिट, या छी घरैया गिरगिट । “ठिकठिकिआ”  सभ लोक कहैए,  छी से “घरैया गिरगिट”।।*‍‍१ घरक भीत - देबाल आदि पर सदिखन भेटत । कोनहु इजोतक, लऽग - पासमे, अनुखन देखब । कीड़ी - फतिङ्गी लगीच इजोतक, खाए ठिकठिकिआ गिरगिट । “ठिकठिकिआ”  सभ लोक कहैए,  छी से “घरैया गिरगिट” ।। बदलए चामक रंग, सहज गुण - से एकरामे । मुदा कने कमतर, बड़का गिरगिट  तुलनामे ।*‍२ बहुत  प्रकारक  विश्वमे  होइए,  ई  ठिकठिकिआ गिरगिट । “ठिकठिकिआ”  सभ लोक कहैए,  छी से “घरैया गिरगिट” ।। खतरा बुझने, पछिला नाङरि, चट दए छोड़ैछ । छटपटाइत ओ नाङ्गरि, दुश्मनसबकेँ धोखबैछ । प्राण   बचाए   भागैछ   बेचारा,  नाङ्गरिकट्टा  गिरगिट ।*‍३ “ठिकठिकिआ”  सभ लोक कहैए,  छी से “घरैया गिरगिट” ।। रातिचर ई गिरगिट, तेँ रातिमे, बेसी अभरैछ । वा दिनहु, अन्हार दोग दिशि, भागैत देखबैक । ठिक-ठिक-ठिक केर ध्वनिक कारणेँ, छै ठिकठिकिआ गिरगिट ।*‍४ “ठिकठिकिआ”  सभ लोक कहैए,  छी से “घरैया गिरगिट” ।। संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - सामान्य मैथिलीमे एकरा सेहो गिरगिट कहि देल जाइत अछि, किछु हद धरि से ठीकहु अछि, मुदा गलत सेहो । गिरगिटसँ अवश्यहि किछु विशिष्ट अन्तर अछि आ तेँ गिरगिटसँ पार्थक्य देखएबाक लेल एकरा “घरैया गिरगिट” (HOUSE LIZARD) कहल जाइत अछि । गाम घऽरमे एकरा ठिकठिकिआ या ठिकठिकिया(COMMON HOUSE GECKO) सेहो कहल जाइत अछि । *‍२ - एकर चामक रंग माटि या गोबरसँ नीपल भीतक देबालक रंगमे छपएबला होइत अछि । एकरहुमे रंग बदलबाक क्षमता रहैत अछि, मुदा गिरगिट (CHAMELEON) केर तुलनामे एहि तरहक समायोजनक क्षमता बहुत कम होइत अछि । *‍३ - गिरगिट (CHAMELEON) अपना सुरक्षाक लेल चामक रंग बदलि छलावरण या छद्मावरण (CAMOUFLAGE) केर सहारा लैत अछि । जखनि किठिकठिकिआ (HOUSE LIZARD / COMMON HOUSE GECKO) आवश्यकता पड़ला पर अपन नाङ्गरिक पछिला हिस्साकेँ अपन शरीरसँ अलग कऽ दैत अछि । धऽरसँ अलग भेल नाङ्गरि कने काल धरि छटपटाइत रहैत अछि जाहिसँ ठिकठिकिआक दुश्मन शिकारी जीव ओहिमे ओझराए जाइत अछि आ ठिकठिकिआ अपन जान बचाए भागि जाइत अछि । बादमे किछु दिन वा महीनामे ओ कटलाहा नाङ्गरि पुनः बढ़ि पहिने जेकाँ भऽ जाइत अछि । *‍४ - ई रातिचर प्राणी अछि आ दिनमे अन्हार जगह पर कोण-दोगमे नुकाएल रहैत अछि । तेँ अंग्रेजीमे एकरा “मून लिजार्ड / लिजर्ड” (MOON LIZARD) सेहो कहल जाइत अछि । ई एक प्रकारक ध्वनि निकालैत अछि जे सुनबामे मैथिलीक “ठिक-ठिक-ठिक” ध्वनि सन लगैत अछि । तेँ मैथिलीमे एकर नाम ठिकठिकिआ (या ठिकठिकिया) पड़ल होयत । मिथिला सहित पुबारी ओ उतरबारी भारतक आन बहुत रास क्षेत्र सभक जन सामान्यमे ई धारणा अछि कि कोनहु बातकेँ बजबा काल जँ ठिकठिकिआ “ठिक-ठिक-ठिक” ध्वनि बहार करैत अछि तँ ओ बात या तँऽ सत्य अछि या भविष्यमे सत्य होयत । ओना एहि धारणाक कोनहु वैज्ञानिक आधार नञि अछि, एहि ठाम बस प्रसंगवश उल्लेख कएल गेल अछि । अंग्रेज आ यूरोपीय लोक सभ ठिकठिकिआक ध्वनिकेँ “Gecko,Gecko,Gecko” सन बुझैत छथि आ तेँ एकर नाम GECKO / GEKKO राखि देल । गोहि (बाल कविता) संस्कृतक  जे “गोधिका”, ताहिसँ निकसलि “गोधि”। ताहि गोधि केर  रूप छी, मिथिलाभाषाक “गोहि” ।। पैघ-पैघ गिरगिटक नाँओ, सामुहिक  रूपसँ  गोहि । संसारक हर-एक  भागमे, भाँति-भाँति  केर गोहि ।।*‍१ थलचर जीव ई गोहि छी, प्रायः   बिलमे   रहैछ । बाढ़ि  आ  बरखा कालमे, बेसी   ओ    अभरैछ ।।*‍२ किछु एहनहु छी गोहि जे, पानिक   कात   रहैछ । गोंता मारि शिकार करैछ, पानिमे   खूब  हेलैछ ।।*‍३ बाध - बोन केर  बीचसँ, सड़क - बाट जे जाइछ । तकरा  पार  करैत  ओ, बहुधा  देखल  जाइछ ।। गोहिमे किछु विषहीन छी, आ किछु छी विषयुक्त । तेँ  जनमानस   धारणा, गोहि  लेल  भययुक्त ।।*‍४ इण्डोनेसियाक गोहि एक, नाम  “कॉमोडो ड्रेगन” । गोहिमे सभसँ छी विशाल, “दैत्य गोहि” ओ ड्रेगन ।।*‍५ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ - आइ - काल्हि ओना तँऽ मैथिलीमे “गोहि” आ “सनगोहि” पर्यायवाची शब्द जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । किछु लोकक निजी धारणा इहो छन्हि जे सनगोहि गोहिसँ बेसी विषाह होइत अछि …….. आदि, आदि । मुदा वास्तवमे “गोहि” एकटा व्यापक शब्द अछि आ बहुतहु पैघ-पैघ गिरगिटसभक (जे सामान्य गिरगिट सभसँ बेस पैघ होइत अछि) लेल सामुहिक रूपसँ मैथिलीमे प्रयुक्त होइत अछि । गोहिकेँ अंग्रेजीमे मॉनीटर लिजार्ड्स या वैरानस (MONITOR LIZARDS / VARANUSES) कहल जाइत अछि । *‍२ - विश्वक बेसीतर गोहि थलचर (TERRESTRIAL) होइत अछि, आ जमीन पर बिल (बियरि) बनाए अथवा प्राकृतिक रूपसँ बनल बिलमे अथवा आन प्राणीसभ द्वारा बनाओल आ छोड़ल बिलमे रहैत अछि । *‍३ - किछु गोहि वृक्षाश्रयी (ARBOREAL) ओ आन किछु उभयचरी (AMPHIBIOUS) अर्थात् थल ओ जल दूनूमे विचरण करएबला होइत अछि । उभयचरीगोहि सेहो जमीनहि पर बिल बनाए रहैत अछि, मुदा पानिमे हेलि शिकार करबामे माहिर होइत अछि । *‍४ - विश्वक बेसीतर गोहि विषहीन होइत अछि, मुदा किछु प्रजाति विषयुक्त । मुदा मिथिला सहित पूरा भारतक जनमानसमे ई धारणा प्रबल अछि जे गोहि अतिशय विषयुक्त ओ बयानक प्राणी अछि । जकर कारणमेसँ किछु निम्न प्रकारेँ भऽ सकैत अछि - ·        गोहि केर हवामे लपलपाइत द्विभाजित जीह, साँप सदृश भयोत्पादक लगैछ ·        गोहि केर आकार गिरगिटसँ बहुत पैघ होयब ·        गोहि ओ साँपक अवास क्षेत्रमे समानता होयब ·        विषहीन ओ विषयुक्त गोहि केर पहिचान जन सामान्यक बीच नयि होयब ·        सम्भवतः ऐतिहासिक समएमे विषयुक्त गोहिक संख्या आजुक समएसँ बहुत बेसी होयब, आदि । किछु लोकक कहब अछि जे गोहि जँ मनुक्ख वा सूतल नेनाकेँ फूकि दैत अछि तँऽ ओहि मनुक्ख वा नेनाक शरीर फुलि जाइत अछि जाहिसँ बादमे ओकर मृत्यु भए जाइछ वा जँ जिउतहु अछि तँऽ कोनहु काजक नञि रहि जाइछ । मुदा, यथार्थमे से नञि (अपवाद - दैत्य गोहि, मुदा भारतमे ओ ने तँऽ कहियो छल आ ने आइ अछि) होइत अछि । *‍५ - इण्डोनेसिया नामक देशक एक गोट निर्जन द्वीप पर “कॉमोडो ड्रेगन” (COMODO DRAGON) नामक विशालकाय ओ महाविषयुक्त गोहि पाओल जाइत अछि जकरा मैथिलीमे “दैत्य गोहि” कहि सकैत छी । ई दुनिञाक सभसँ पैघ गोहि अछि मुदा ओहि तथाकथित द्वीपक अतिरिक्त दुनिञामे आन कतहु नञि पाओल जाइत अछि । सनगोहि (बाल कविता) बहुविध पैघ - पैघ  गिरगिटसभ, कहल जाइछ  मिथिलामे गोहि । ताहि गोहिमे  किछु पीयर  सनि, सएह  कहाबैत अछि सनगोहि ।।*‍१ थलचर जीव छी  गोहि  समूहक, पानिमे नञि ओ हेलि पाबैतछि । बाढ़ि आ बरखाक पानि बियरिमे, तेँ मनुक्ख दिशि ओ भागैतछि ।।*‍२ गोहि  साँप  दूनू  सरिसृप अछि, जीह  कटल अछि  तेँ  आगाँसँ । सएह  देखि कए  लोक  डेराइछ, मारि  दैछ   बरछी - भालासँ ।।*‍३ कटल जीह केर  कारण कए ठाँ, “सनगोहि साँप” एकर छी नाम । एखनहु खूब  भेटैतछि  जाहि ठाँ, बाध - बोन केर संग छी गाम ।।*‍४ संकेत आ किछु रोचक तथ्य - *‍१ -   आइ - काल्हि ओना तँऽ मैथिलीमे “गोहि” आ “सनगोहि” पर्यायवाची शब्द जेकाँ प्रयुक्त होइत अछि । किछु लोकक निजी धारणा इहो छन्हि जे सनगोहि गोहिसँ बेसी विषाह होइत अछि …….. आदि, आदि । मुदा वास्तवमे “गोहि” एकटा व्यापक शब्द अछि आ बहुतहु पैघ-पैघ गिरगिटसभक (जे सामान्य गिरगिट सभसँ बेस पैघ होइत अछि) लेल सामुहिक रूपसँ मैथिलीमे प्रयुक्त होइत अछि । गोहिकेँ अंग्रेजीमे मॉनीटर लिजार्ड्स या वैरानस (MONITOR LIZARDS / VARANUSES) कहल जाइत अछि । एहि मे सँ एकटा विशेष प्रकारक गोहि जकर चामक रंग किछु पीयर सनि वा सोनाक रंग सनि होइत अछि, से सनगोहि कहबैत अछि । सनगोहिकेँ अंग्रेजीमे यॅलो या गोल्डेन मॉनीटर लिजार्ड (YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD) कहल जाइत अछि । एकर जैव वैज्ञानिक नाँओ वैरानस फ्लॅवेस्सेन्स (Varanus flavescens) अछि । *‍२ - ई थलचर प्राणी अछि आ प्रायः नम (आर्द्र) ओ छाहरियुक्त जमीन पर बियरि (बिल) बनाए रहैत अछि । बाढ़िक समय बियरिमे पानि भरि जएबाक कारणेँ प्रायः मनुक्कक आवास-क्षेत्र दिशि बौआइत भेटैत अछि । *‍३ - सनगोहि साँप जेकाँ विषयुक्त नञि होइत अछि मुदा साँपहि जेकाँ ओकरहु जीह आगाँसँ कटि दू भागमे बँटल रहैत अछि । तेँ लोक विशेष डेराइत अछि आ बहुधा भाला, बर्छीसँ मारि दैत अछि । *‍४ - द्विभाजित जीहक (Bifid tongue) कारण सनगोहिकेँ मिथिलाक किछु भागमे “सनगोहि साँप” सेहो कहल जाइत अछि । ४ टा कविता १ बाबू साहेब चौधरी ।। ०१ ।। बाबू साहेब चौधरी । के छलाह ? ……………….. हम नञि चिन्हैत छी । यौ ! अहींक गाम - पंचायतक छलाह । ……………….. हम नञि चिन्हैत छी । यौ ! ब्राह्मणहि छलाह ओहो । ……………….. हम नञि चिन्हैत छी । आश्चर्य ! बड़ पैघ आश्चर्य !! अहाँ हुनिका नञि चिन्हैत छी !! ।। ०२ ।। हाँ ! हम चिन्हैत छी । हम चिन्हैत छी — मैथिलीक अभियानीकेँ । हम चिन्हैत छी — मिथिलाक सेनानीकेँ । हाँ ! हम चिन्हैत छी — नेनपनहिसँ चिन्हैत छी । साक्षात नञि देखल, मुदा काजहिसँ चिन्हैत छी । ।। ०३ ।। हाँ ! हम जानैत छी । हम जानैत छी, मिथिलाक ओहि सशक्त व्यक्तित्वकेँ । मैथिलीक ओहि सशक्त हस्ताक्षरकेँ । मैथिलीक अमर प्रकाश पुञ्जकेँ । मिथिलाक अडिग दृढ़ स्तम्भकेँ । ।। ०४ ।। हम चिन्हैत छी । हाँ ! हम हुनिका चिन्हैत छी । जे समस्त मिथिलाक रहथि । प्रेरणाक श्रोत रहथि, हमरा लेल, हमर बाप - पित्तीक लेल । आ हमरहि सनि, आनहु समस्त मैथिली प्रेमीक लेल । सनस्त मैथिलक लेल । समस्त मिथिलाक लेल ।। ।। ०५ ।। मिथिलाभाषा । मिथिलाक जन - जन केर भाषा । मिथिलाक जड़ि - चेतन केर भाषा । मिथिलाक हर जाति - धर्म केर भाषा । मिथिलाक बारहो वर्ण केर भाषा । आ ताहि भाषा लेल जिनगी अर्पित कएनिहार, बाबू साहेब चौधरी । कोना नञि चिन्हबन्हि हुनिका । किएक नञि चिन्हबन्हि हुनिका ।। अखिल भारतीय मिथिला संघ कोलकाताक सहयोगसँ दुलारपुरमे (रुचौल-दुलारपुर) ०८ जनबरी २०१७ कऽ आयोजित बाबू साहेब चौधरी जन्म शताब्दी समारोहक कवि सम्मेलनमे पठित । २ मैथिली दधीचि (कविता) बाबू साहेब चौधरी - मैथिली दधीचि । हँऽऽ ! हँऽऽ !! थम्हू !!! दधीचि छथि भोला लाल दासजी । नञि ! नञि !! से कोना ? दधीचि छथि लक्ष्मण झाजी । अओ भाइ लोकनि ! किएक लड़ैत छी ? दधीचि माने की ? दधीचि के ? दधीचि जे अपन अस्थि दान देल । दान देल वृत्तासुरक संहार लेल । जीवितहि अस्थि दान - जिनगीक दान । मिथिलाक महायज्ञमे, मैथिलीक महायज्ञमे, नञि जानि एहने कतेको लोक, लगा देल अपन जिनगी । आ कतेको लगओताह । ओ सभ मैथिली दधीचि छलाह । आ ओ सभ मैथिली दधीचि होएताह । यज्ञ एखन बाँकी अछि । हवन एखन बाँकी अछि । कतेकहु दधीचि केर, अवतरण बाँकी अछि ।। ३ कुहेस (कविता) कुहेस । एखनहु धरि लगलहि अछि । हटि रहल शनैः शनैः । मुदा, एखनहु धरि लगलहि अछि ।। मैथिलीक अस्तित्व पर लागल कुहेस । मिथिलाक मानचित्र पर लागल कुहेस । मैथिलक मैथिल होएबा पर लागल कुहेस । छँटि रहल शनैः शनैः । मुदा, एखनहु धरि लगलहि अछि ।। बिकास कए रहल अछि ई राज्य । विकाश कए रहल अछि अपन देश । मिथिलाक ऊपर सरिपहुं घनगर कुहेस । फाटि रहल शनैः शनैः । मुदा, एखनहु धरि लगलहि अछि ।। अगनित पीढ़ीसँ चलि रहल ओ प्रश्न । ओएह भात - रोटी - भुखमरीक प्रश्न । ओएह उच्चतर नीक शिक्षाक प्रश्न । सृजन करैछ नित कुहेस । तेँ, एखनहु धरि लगलहि अछि ।। ४ गीत साहित्य रहितहु, साहित्यहि लेल तीत छी । नाम ओकर गीत छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। कण्ठ - कण्ठ पसरए, बैसाखक अगिलग्गी सनि । मानस सरोवरमे, चतरए जललत्ती सनि । शोभा हर मूँहक ओ, पतित मुदा पीक छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। गीतसँ छी “गीतकार”, “कवि”सँ फराकहि छी । गद्य ने छी, पद्य मुदा, तइयो तँऽ कातहि छी । तोषित हर कण्ठ, पारितोषक विपरीत छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। लिखल जञो गीत तँऽ, साहित्यक मान नञि । श्रोता अछैतहुँ, साहित्यक सम्मान नञि । पाठ करू कविता कहि, कहियौ ने — गीत छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। कतबहु उत्कृष्ट शब्द, भाव - अर्थ युक्त छी । कहि देल जँ गीत, बूझू सब गुण विलुप्त छी । कविता जँ कहि देल तँऽ, काज बड़ दीब छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। बनलहुँ जञो “गीतकार”, साहित्यक काँट छी । करतल ध्वनि संग तेँ, साहित्यक भाँट छी । साहित्यक मञ्च पर ने, पुररष्कृत गीत छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। गीतक साम्राज्य कहाँ, तइयो थम्हैत छै । गीतक नञि सर्जना, तइयो रुकैत छै । मानल जे पद्य - मञ्च, तिरस्कृत गीत छी । हरेक ठोर पर सजल, सुख - दुख केर मीत छी । नाम ओकर गीत छी ।। बाबा बैद्यनाथ, पूर्णियाँ आजाद गजल आउ सभ मैथिल माय जानकी पर एतबहि उपकार करी 'मिथिला-राज्य' बनय ई कहुना सभ मिलि एकर विचार करी सहैत रहल छी घोर उपेक्षा सभदिनसँ सभ लोक एतऽ एते सहब नहि तेँ सभ मिलि कऽ जन-जन केर हुंकार करी सहनशील होइते छी मैथिल बूझए नहि डरपोक कियो जखन जेना जे भाषा बूझय तहिने सभ व्यवहार करी कतेक शक्ति एहि माटि-पानिमे आब सगर दुनियाँ देखतै आब कोनो अन्याय देखितहि तखनहि सभ प्रतिकार करी एखन पलायन सँ सभ मैथिल भटकि रहला पूरे दुनियाँ कोना घूरि कऽ सभ घर आबथि मिलि खेती रोजगार करी राजनीति केर चक्रचालिमे बांटैत अछि सभकेँ नेता जाति-पाति केर भेद बिसरि कऽ कटुता केर संहार करी अपन कानमे तूर-तेल दए सुतले आब कोना रहबै सुप्त पड़ल जे सभकेर मनमे ऊर्जाक नव संचार करी शंखनाद करबैक जँ मिलिकऽ लेबैक सभ अधिकार अपन मातृभूमि केर कर्ज उतारी मिथिलाकेर उद्धार करी। प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली जन-प्रतिनिधि कहबै छि हम जनप्रतिनिधि मुदा भेंटब नै हम कोनो विधि मचल रहौ जनता में हाहाकार रहै छि तैयो हम निर्विकार किये सोची कोना जीबैत निर्धन निमग्न छि बढाब में हम अप्पन धन नै मतलब कतय भेल अन्याय बस अप्पन पैर में नै फाटै बेमाय सगर गाँव रहौ अन्हरिया में बनल रहि हम बस ‘पावर हाउस’ छात्र सब भने होएत रहै फेल किएक लेबै हम ककरो टेर? ठप्प रहै रेल क यातायात कहुत ई भेल कोन बड़का बात! लड़ै छि बड़का जुबानी जंग बजबै छि ट्वीटर पर झाइल मृदंग भेटै अछि जौं किछु आलोचक लोक झट द करै छि हुनका ब्लॉक आयल कत्तेक सुन्नर बरसात कवि लिखू अहूँ किछु रसगर बात शहर तब्दील भेल नाला में व्यस्त छि हम घोटाला में शिक्षा-स्वास्थ्य बनि गेल अछि व्यापार युवा भ रहल अछि बेरोजगार मुदा हम मगन ई आशा में विधाता करताह बेड़ा पार शुरू करब सभटा अप्पन खेल जखन आयत वोट लेबा के बेर नै छोड़ने छि कोनो विकल्प चुनत सब हमरे बेरम बेर।। राईत इजोरिया ताइक रहल अछि राईत इजोरिया ताइक रहल अछि छौंडा सब भकुआइत रहल अछि फ़ेसबुक पर टिपिर-टिपिर किद्देन-कहां सब छाईप रहल अछि नुनू बाबु एना जुनि करू बनू नै अहां दिनजरू वाट्सएप-फ़ेसबुक सं फ़ुरसत लय क पोथी-पुस्तक सेहो धरू बुच्ची दाई के शौख बड्ड भारी चाहियैन हुनका बड়का गाडी पा̆प, रैप आ डिस्को क चक्कर मे बिसरि गेल ओ गोसाऊनि आ नचारी बाबू कहथिन पढ गै बुच्ची नै त भेंटतौ वर खुरलुच्ची पढि लिखि क जौं लोक बनलैं त शौख पुरा हेतौ सच्ची-मुच्ची वैदेहि बेटी अछि बड्ड होसगर बैस जाई अछि ओ पढै लेल एकसर आंगन मे आन धिया-पुता सब खुसुर-फ़ुसुर बतियाइत रहल अछि राईत इजोरिया ताइक रहल अछि छौंडा सब भकुआइत रहल अछि कियौ करैथ इंजिनियरिंग के तैयारी किनको मेडिकल भेटले चाही सोशल-मिडीया के भ्रमजाल मे, मुदा सभ कियौ ओझराय रहल अछि राईत इजोरिया ताइक रहल अछि छौंडा सब भकुआइत रहल अछि नेता सब मुस्काइत रहल अछि जनता सब मुंह ताइक रहल अछि हरियर-लाल रंग मे रंगिक पुरने भाषण बांचि रहल अछि राईत इजोरिया ताइक रहल अछि छौंडा सब भकुआइत रहल अछि कहै ’प्रणव’ अछि सुन छौंडा सब काज नै आबय सुख्खल भाषण जेकरा कर के लक्ष्य हासिल छै कठीन निशाना साईध रहल अछि राईत इजोरिया ताइक रहल अछि छौंडा सब भकुआइत रहल अछि रतन कुमार लाल दास कोईली बाजी रहल अई कोईली बाजी रहल अई, उठु मिथलावासी भेय गेल भोर, जाती-पाती के ताख पर राखु, चलु विकासक ओर । बऊआ- बच्चा किलोल कय रहल अई, चलु पटना के ओर, चारऊ दिशा मे नहर बनाबु , किसान के लय चलु उन्नति के ओर । बड़का-छोटका कय रहल अई दंगा शोर चलु मिथलावासी दिल्ली के ओर, अधौगिक लेल बिजली चाही एही सँ भय जायत मिथला मे भोर बहिन -बेटी बिलखी रहल छैथ पोछैथ आँखीक नोर, दहेजक अई बहुत घनघोर बहिन- बेटी कुमैरे रहती भेजू जेलक ओर । प्रदीप पुष्प वैलेंटाइन स्पेशल... गजल पीआरक सीजन हिट भ' गेल पागो धोतीमे फिट भ' गेल बहलै सगरो लवमय बसात देसी कलचर एक्जिट भ' गेल छौंड़ा छौंड़ी बनलै भजार जे नइ सेहो परमिट भ' गेल नबका नबका गिफ्टक लगान टाका टोटल डेबिट भ' गेल पीयो फेंको भेलै पिरीत बिजनिस अजुका डिफनिट भ' गेल (२२२२२२१२१ सब पाँतिमे| ) वैलेंटाइन स्पेशल... गजल के की कहलक की कहू के की ठकलक की कहू हमरो उजरे रंग छ'ल के की दगलक की कहू भेलै साधू आब सब के की चिखलक की कहू माया बड़का पैघ ई के की रचलक की कहू अखनो नै छी पास हम के की जँचलक की कहू (२२२२२१२ सब पाँतिमे) गजल गप्प उठतै त' पहुँचबे करतै मेघ लगतै त' बरसबे करतै ओकरा रोकि सकत नै केओ गीत रचतै त' परसबे करतै पाप आ पुण्य कथी नइ बूझै भूख लगतै त' भटकबे करतै छै अभिव्यक्तिक हक सबकें तें दम्म फुलतै त' खखसबे करतै छै उमेरक गलती चालिक नइ डाँढ हिलतै त' लचकबे करतै (2122 112222 सब पाँतिमे।) गजल अचके ल' जाय दूर ई जिनगी केहेन छै निठूर ई जिनगी तकिते रहत अहाँक नैना आ सपना क' देत चूर ई जिनगी केओ अपन जँ संग छोड़ै छै जानक लगै जबूर ई जिनगी ककरा कहब कठोर कत्ते ई छै लैत सूद मूड़ ई जिनगी सबकेँ तहस नहस करै पलमे सबहक बनल हजूर ई जिनगी (२२१२ १२१२ २२ सब पाँतिमे|) गजल हेतौ जहिया इजोर हम मोन पड़बौ लगतौ ठीके बकोर हम मोन पड़बौ तोरा पाछू चलैत चुप्पेसँ केओ धरतौ जहने पछोड़ हम मोन पड़बौ फेरो केओ निहारि चंदा जकाँ मुख लगतौ तोहर चकोर हम मोन पड़बौ जे तोरा देखि भोजमे खूब रस ल'क' बनतौ डलना चटोर हम मोन पड़बौ बेदीतर बैसि मंत्र पढ' लेल बहिना पहिरेतौ जे पटोर हम मोन पड़बौ (222212122122 सब पाँतिमे) बृषेश चन्द्र लाल, २६ माघ,२०७३ तप ?! कहाँदोन तप ! कथीलेँ ?! अनेरे जान भफाबएलेल ? बेसाहि आओर पीडा अपनाकेँ उलाबएलेल ?! ब्रह्म कोनो ‘राज्य’ छथि जे चाटुकारसँ फुलि जएताह ? सुनि स्तुति अपन मस्त भ’ ओ झुलि जएताह ? हास्य आ विनोदसँ प्रिय जकाँ की खुलि जएताह ? वा अहाँक जीद्दपर मिसरी बनि घुलि जएताह ?! ‘जीवन’ कोनो कैद नहि जे ‘मोक्ष’लेल मरैत फिरी ! ‘कर्म’केँ कात कए ल’ नाम धर्म सरैत फिरी !! तप जौँ संघर्ष अछि तँ आऊ अपन फाँड बान्हू, लक्ष्यकेर भोगलेल कर्मेटा अछि ‘धर्म’ मानू ! बाँहिं जखन कैसि जाएत स्वेद श्रमेँ झरि जाएत अमृतेँ गर तर हएत ‘रहस्य’क से तथ्य जानू !! मुन्नी कामत बाल कविता- जतरा बाबू आबि रहल अछि जतरा लेब अहाँसँ लब कपड़ा घुरैले जाएब अहाँ संगे मेला देखब ओतए कठपुतलीक खेला कीनब हम एगो उड़न जहाज तैपर बैस घुमब सगरे संसार। बाल कविता- अंकक मेल चलू खेलब आइ हम एगो खेल जइमे एक संगे करब केतेक अंकक मेल। 1-2-3-4-5-6-7-8-9-दस अइसँ आगू चलत एगो बस। छुक-छुक नहि ई तेज दौड़ैए एक-पर-एक एग्यारह भऽ जाइए। एक-पर-दू बैस 12 एक-पर-तीन बैस 13 एक-पर-चारि बैस 14 एक-पर-पाँच बैस 15 एक-पर-छअ बैस 16 एक-पर-सात बैस 17 एक-पर-आठ बैस 18 एक-पर-नअ बैस 19 दूपर बैस जिरो बीस भऽ गेल पहिले एक असगर छल आब उन्नीसटा भऽ गेल! अहिना एकता अपन जीवन मे अहूँ लाउ मिल कऽ अपन शक्ति बढ़ाउ। बाल कविता- बहि‍न माए हमरा एगो बहिन आनि दे। चल बजार उ बजैबला गुड़िया कीनि‍ दे। जे हमरा भैया कहत सभ साल हमरा हाथ पर राखी बान्हत उ चुलबुलिया मुनिया आनि दे। किए तूँ हमरा असगर रखने छेँ हमरासँ बहिनक सिनेह छीनने छेँ तूँ हमर कान्हाकेँ राधा आनि दे माए हमरा एगो बहिन आनि दे। केकर भय तोरा सतबै छउ कोन बात छै जे तोहर आँखि भरै छउ तूहों तँ केकरो बहिन छी तँ फेर किए हमरा बहिन-ले कंश बनल छेँ हमरा तूँ एगो मौका दऽ दे माए हमरा बहिनक जिनगी बकैस दे ई सोन चिड़ैया चिड़ियाँ आनि दे माए हमरा एगो बहिन आनि दे। राजेश मोहन झा 'गुंजन' शिव भजन ठुमकि चालि मे किए चलै छी झट झट डेग बढाबू ने, औढर दानी पार लगौथिन्ह हे बम! बोलबम गाबू ने। आबि सूरूज कें झाँपल बादरि बिजुरी रहि रहि चमकै हे बाट निहारथि फूल ल' मालिन मंदार सुमन भल गमकै हे, शिव भक्ति मे गाबथि पूरबा अहूँ संग गाबि सुनाबू ने। औढर दानी....॥ केओ भूत के रूप धेने छथि जोगिन बनि केओ नाचै हे बढ़ल चलल संगक कमरथुआ अनुपम स्वांग रचाबै हे, आश पूरत दर्शन क' शिव केँ मोनहि ध्यान लगाबू ने। औढर दानी......॥ नाचिते गाबिते आओल दर्शनियाँ मंदिर गुम्बज बड़ भाबै हे नीलगगन केर भाल मे शिव ध्वज केसर तिलक लगाबै है, हे हर हमर अकारथ जीवन भब सँ पार लगाबू ने। औढर दानी.......॥ ("सभ शिवभक्त गण केँ परम पावन शिवप्रिय साओन मासक मंगलकामना।") ममताक अनुभूति (जूड़शीतल पर विशेष) हृदय हकारल स्नेह नीर सँ माथ जुड़ाओल जूड़शीतल मे, ममता केर छल ओ अनुभूति नीन मे आओल जूड़शीतल मे, चिर ज्योति विलीन भेली जे आजु स्वप्न मे आबि गेली जे माँ मिथिलाक धरि क' रूप आबि उठाओल जूड़शीतल मे, सगर दाह आ थाह कतहु नहि दामिनी कखनो डरा रहल छै शीतल आँचरक द' क' छाँह पुनि सुताओल जूड़शीतल मे, कतेक दिन बीति छवि भेल विस्मृत पैरक ध्वनि टा मोन पड़ैए रातुक अंत पहर ओ ध्वनि सुनि कान जुड़ाओल जूड़शीतल मे॥ (जूड़शीतल आ मैथिली नववर्षक शुभकामना।) सरस्वती वंदना नव नव पल्लव घट नव, गंगाजल भरि हे सखि हे ! अंगना मे गाबथि वसंत माँ शारदा पूजन बेरि हे। एक कर वीणा साजै, दोसर वेद भावथि हे सखि हे ! सुर संग विद्यादायिनी विनमहुं वागीश्वरी हे। श्वेत वसन वीणापाणी, हंस सवारी हे सखि हे ! केसर कुमकुम रोली ल' माँ के चरण गही हे। शब्द-रागक स्वामिनी, वाणी कहावथि हे सखि हे ! आजुक दिन घर आबथि माँ शारदा ज्ञानेश्वरी हे। (सरस्वती पूजा आ वसंत पंचमीक शुभकामनाक संग।) वसंत गीत (धुन:- सूफ़ियाना) राखि वसंतक मान रे, घर पिया मोर औथिन। भोरे आंगन कुजरय बायस, मधुकर गाबथि गान रे, घर पिया मोर औथिन। महुआ रस मे उपवन गमकय, भेलै मधुमास जुआन रे,घर पिया मोर औथिन। बाम नयन रहि रहि क' फड़कै, लागल हुनके धियान रे, घर पिया मोर औथिन। स्वागत मे तों गाबह कोयली, गान वसंतक शान हे, घर पिया मोर औथिन। राखि वसंतक मान रे, घर पिया मोर औथिन ॥ धन रूप आ गुण (दहेजक पसाही) गुण देखू, नै रूप निहारू। जखन सद्य: लक्ष्मी घर औती लाख कोटि धन किए बिचारू भूख लोभ केर कोनो अंत नहि मोल मनुक्खक हृदय उतारू, गुण देखू, नै रूप निहारू। मुंह सुरसा सन बढ़ि रहल कुरीति रीति पर चढ़ि रहल दहेजक माया के धूलि उड़ैए मान बचाबू पाग सम्हारू, गुण देखू, नै रूप निहारू। गानिते गुणिते दिन बीताओल कतेक लगाओल पूत पर लगा पसाही दहेजक व्यापार बेचब मोल बिनु दाँतक पर्रू, गुण देखू, नै रूप निहारू। कारी आखर महीष बूझै छथि मुदा कनियाँ बीए एमए चाही बाबा दलानक पगहा ल' घूमथि एहन बरद की मोल बिचारू, गुण देखू, नै रूप निहारू। जे दहेजक पीटै छथि डंका परधन लोभक महल बना क' कुटिल भाव बैसल छथि लंका ओहि लंका कें मिलि जराबू, गुण देखू, नै रूप निहारू। काटि गेल जुट्टी (हास्य रस) साँप जेना जुट्टी कें काटि गेल चुड़ैल, की कहू हे दैया। गरदनि सँ डाँड़ धरि सदिखन लहराय छल सतरंगी आँचर पर आबि क' फहराय छल काटलक निरासिन बनेलक चनैल, की कहू हे दैया। देखथि 'ओ' कहथि ई साओन केर घन हे केशक सिनेह मे डूबि उमड़ल मोर मन हे काटि मधुलत्ती लगा गेल करैल, की कहू हे दैया। परवतिया पूछलक माँ जुट्टी की भेलौ गे माँझ राति पहर केओ काटि ल' गेलौ गे सुन्नर सुराही भेल कनफुट्टा घैल, की कहू हे दैया। सघन घन केश काटि हिप्पी बना देलक पूनम के इजोरिया तरेगन देखा देलक माथ छल मधुवन लगाओल कनैल, की कहू हे दैया। साँप जेना जुट्टी कें काटि गेल चुड़ैल, की कहू हे दैया। (ध्यान देल जाऊ:-एहि रचनाक उद्देश्य मनोरंजन मात्र। अंधविश्वास सँ कोनो संबंध नहि। ई चर्चित जुट्टीकांडक एकटा कारण सौतिया डाह भ' सकै छै।- राजेश मोहन झा 'गुंजन'॥) राजीव रंजन झा, (जन्म तिथि: 12/01/1980), ग्राम+पो: भीठ भगवानपुर, भाया: मधेपुर, जिला : मधुबनी (बिहार), सम्प्रति: उच्च वर्गीय सहायक, भारतीय जीवन बीमा निगम, समस्तीपुर शाखा, समस्तीपुर, बिहार फगुआ (मुक्तक) फगुआ केर एहि पावन अवसर आबू भाल गुलाल मली आबू प्रेमक एहि अवसर पर रंग एक दोसरक गाल मली आबू सभ केओ मिलिजुलि केँ बढा ली निज हिय केर धड़कन आबू सभ केओ सजा ली अप्पन सात रंग सँ उर उपवन आबू एहि बासंती क्षण मे बढा ली किछु मन केर सिहरन आबू गरा मिली सभ मिलिजुलि बिसरि द्वेष जौँ राखल मन बरसय खुशी अपार अहाँ पर फूलय नित्तहि हर्ष सुमन सातो रंगक सपना अहाँ केर हुअ' सजीव प्रतिपल प्रतिक्षण जोगीरा फेंकू भैय्याक हाथ टूटि गेल सभा लुटायल खाट दर-दर ठोकर खाइत अछि पप्पू कुर्त्तो गेलय फाट... जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा.. मुलायम कठोर भेल चलल चाइल शिवपाल बापहि केर बाप निकलल नेताजीक लाल जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा फेंकू भैया घर-घर बाँटय पन्दरह- पन्दरह लाख साह बताबय जुमला ओकरा तइयो नहि टूटल साख। जोगीरा सारारारा....जोगीरा सारारारा अखिलेश भैया सभा बजाबथि भाषण करन्हि लुगाइ बूढवा बच्चा सबहक डिम्पल भ' गेलीह भौजाइ जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा... मालामाल फेंकू भैया बाँकी सभ कंगाल दीदी, बुआ, पप्पू कानय खाँसथि खुजलीवाल जोगीरा सारारारा...जोगीरा सारारारा गजल आँगुर त'र मे विश्व सगर छै अपनहि लागय लोक दीगर छै यारी फूसि फटक अछि सभटा पूरल भरल पड़ल असगर छै भावक भाव नैं रहल कनिञो मुइल मिझायल नयन नगर छै आँगुर पर निबाहि रहल मुदा हृदयक ई नहि सरल डगर छै शत शत मीत देश परदेशक अपनहि बीच जेना झगड़ छै बैसल ठाम आहार भेटय लेने काढि फेन अजगर छै जरि रहल अछि जड़ि गाछ केर लागय डारि सभ मोटगर छै गजल जे काजक अछि सुनै छी ततबे जे भाबय हिय गुनै छी ततबे केओ कहय किछु, मानी कोना जतबे रूई धुनै छी ततबे सपना देखब नहि अनुचित मुदा जतबे बीया बुनै छी ततबे आँखि रहैत अछि हरदम फूजल जतबे काजक मुनै छी ततबे मजगूती नीबक अछि जरूरी जतबे चाही खुनै छी ततबे गजल मुट्ठी भरि नेहाल छै बाँकी सभ बेहाल छै ककरो रोटी नोन नै केओ मालामाल छै साधि रहल निज साध्य किछु निज ताले बेताल छै बेचि रहल निज माय केँ घूमय एहन दलाल छै बेईमानक राज ई मुहसच सभ मोहाल छै गड़य गड़ल अछि माटि मे इचना पोठी जाल छै छै जतबे धुड़फंद जे ततबे गोटी लाल छै राजीव पतित नीच जे वैह बजाबय गाल छै गजल ककरो होअ सरकार यौ हमरा कोन दरकार यौ भोटक भीख देल जकरा भेलय वैह चिन्हार यौ करतै किएक चिंता हमर एकरो इएह बेपार यौ ठकलक बेर बेर हमरा धूनै छी हम कपार यौ कैंचा जैह खरचत तकर करबै भाइ जयकार यौ सभटा गढल एक साँच मे सभटा एक्कहि भजार यौ लुटतै फेर वैह करोड़, तेँ झीटय छी हम हजार यौ ककरो भोट देब करतै नेता भ्रष्ट आचार यौ ककरो पर भरोसा करब भेलै आइ बेकार यौ सबहक पार पायब अहाँ नेताजीक नहि पार यौ गिरगिट सन बदलताह ई झुट्ठा केर सरदार यौ बाबू कहथि एक बेर ओ करियौ फेर सतकार यौ पाँचो बरख दर्शन कहाँ देतय फेर ई यार यौ फेरो इएह करबे करत एहने भाइ आचार यौ हमहूँ आइए ठनलहुँ अछि टनबै सत्तरि हजार यौ चीन्हू अप्पन प्रतिनिधि के घेरू बीच बाजार यौ अप्पन यैह अधिकार छै बैसू आब तैयार यौ चोरिक माल जौं दैछ ओ करु नहि आब विचार यौ ओकर बात सुनियौ कनी करियौ जैह नेयार यौ देखू छोट जेकर उदर मतक दियौक आधार यौ राजिव अपन संधानि लिय जनतंत्रक हथियाबिहार गजल ककरो होअ सरकार यौ हमरा कोन दरकार यौ भोटक भीख देल जकरा भेलय वैह चिन्हार यौ करतै किएक चिंता हमर एकरो इएह बेपार यौ ठकलक बेर बेर हमरा धूनै छी हम कपार यौ कैंचा जैह खरचत तकर करबै भाइ जयकार यौ सभटा गढल एक साँच मे सभटा एक्कहि भजार यौ लुटतै फेर वैह करोड़, तेँ झीटय छी हम हजार यौ ककरो भोट देब करतै नेता भ्रष्ट आचार यौ ककरो पर भरोसा करब भेलै आइ बेकार यौ सबहक पार पायब अहाँ नेताजीक नहि पार यौ गिरगिट सन बदलताह ई झुट्ठा केर सरदार यौ बाबू कहथि एक बेर ओ करियौ फेर सतकार यौ पाँचो बरख दर्शन कहाँ देतय फेर ई यार यौ फेरो इएह करबे करत एहने भाइ आचार यौ हमहूँ आइए ठनलहुँ अछि टनबै सत्तरि हजार यौ चीन्हू अप्पन प्रतिनिधि के घेरू बीच बाजार यौ अप्पन यैह अधिकार छै बैसू आब तैयार यौ चोरिक माल जौं दैछ ओ करु नहि आब विचार यौ ओकर बात सुनियौ कनी करियौ जैह नेयार यौ देखू छोट जेकर उदर मतक दियौक आधार यौ राजिव अपन संधानि लिय जनतंत्रक हथियार यौ गजल अहीं हृदय केँ भाबय छी कहू किएक नहि बाजय छी सगर राति कछमछ कछमछ अहीं याद मे जागय छी अहींक सपना मे डूबि के मधुर प्रेम रस पाबय छी अहीं लेल अछि मन-आसन किएक एतय नहि राजय छी कुसुम स्नेह अर्पित क सदिखन किएक नहि हिय सजाबय छी स्व -अधरक सिनुरिया आभा किएक नहि पुनि पसारय छी स्मित अधर सुधा रस अप्पन खनो नहि त छलकाबय छी चमकि रहल अछि देह गगन निज लटघन केँ छितराबय छी नहि एतेक आब जुलुम करु एतेक किएक कनाबय छी अहीं सँ हमर सब मनोरथ एतेक किएक सताबय छी हमर शपथ घूरि क' ताकू कहू पुनि अहाँ आबय छी सुनू राजिव शपथ मानू अहीं जितल हम हारय छी । (मात्रा क्रम: 122 122 22) गजल राजनीति सरहंडी भेल भोट भाट के मंडी भेल सगर देश के सिस्टम आइ खौलि रहल एक हंडी भेल लोकतंत्र के सेवक आइ पतित पैघ पाखंडी भेल जाति पाति मे बाँटनिहार मातृभूमि के दण्डी भेल शासन मद मे नेता चूर संतरी धरि घमंडी भेल मालिक जनतंत्रक जे बनल वैह नम्हर कुकंडी भेल लूट पाट तांडव अछि मचल ’रेप' पीड़िता चंडी भेल अन्न अन्न केँ कोटि मरैछ राजिव शिक्षित शिखंडी भेल । (मात्रा क्रम: 2121 222 21) महेश डखरामी महेश पद्यावली- अनुरोध ☆ मैथिल मध्य नहि सहजहि एका धरहि मान सिर तजहि विवेका ☆ बिखह विषाद विशद बखाना मनहि मनन सुसचिव सुजाना ☆ मैथिल प्रवासी संगम एकठामा सियहि सुभाष जोगाबहि रामा ☆ कारन कबन सब बैसि विचारी विगत त्रूटि अब लेंहु सम्हारी ☆ सीता संतति जानि सब हृदय सिनेह सुजान कहेउ महेश हित मैथिली तेजहु सब अभिमान ☆ भिन्न पुष्प अरु गुण प्रतिकूला माला मध्य मति मंगल मूला ☆ अन्तर प्रीति मन सनेहु अनुरागे तबहि प्रेम सबहि हिय जागे ☆ मातु एक अरु संतति अनेका सबहि सहोदर सिंचित एका ☆ धरहुं धीर शत कोटि निहारी चिंतन मनन अब तुम्हरी बारी ☆ ओम प्रकाश झा गजल गमक' लागलै बसंती हवा चहक' लागलै बसंती हवा करेजाक टीस बढ़बै हमर चमक' लागलै बसंती हवा चलल झूमि मस्त हाथी जकाँ बहक' लागलै बसंती हवा अगिनबाण मारलक बीच हिय दहक' लागलै बसंती हवा चिड़ै गीत गाब' लागल मधुर ठहक' लागलै बसंती हवा मात्राक्रम (1-2-2, 1-2) दू बेर प्रत्येक पाँतिमे। सत्यनारायण झा मोनक गीत तखनहि ओकर याद अबैत अछि । मोनक तृष्णा शान्त होयत अछि लोक वेद सभ नीन्द लैत अछि पछबा पुरबा वायु चलैत अछि हृदयक अन्दर स्नेह जगैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि जखन ओकर नोर देखाइत अछि आगु पाछू किछु ने सोहाइत अछि आँखिक भीतर समा जाइत अछि मरल मोन फेर जागि पड़ैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि ओकर काया हमर हीया, दुनू मिलि कए एक बनैत अछि आध पहर रातिए मे निस दिन मानस पटल हमर खुलैत अछि भए विह्वल हीय नाचि उठैत अछि अपन तन मन लुप्त रहैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि स्वप्न लोक विचरैत विचरैत, मोहन मुरली बाजि उठैत अछि तन कए सुधि रहय ने केखनो मोनक गीत गबाय लगैत अछि सुधा पीबि मोन झुमि उठैत अछि तखनहि ओकर याद अबैत अछि । गुफरान जीलानी, -MANUU , दरभंगा झमटबा गाछि अपन गामक झमटबा गाछि सुखि रहल अछि खादि दियौ पानि दियौ आ अगोरबाहि करु भोरि म' दुपहरि म' साझि म' अनहरिया म' उजरिया म' अनहर म' आ बरखा म' तहन फेरि सँ अपन गामक झमटबा गाछि हरियर भ' जाएत। अमरनाथ मिश्र, भटसिमरि जुड़िशीतल-गीत जुड़िशीतलमे सभकेँ जुड़ा दियौन यौ-२ जुड़िशीतलमे सभकेँ।। साल नव मैथिलीक शुभागमन भेलै, नव-नव अन्न-पानि आँगन-दलान भेलै, शीतल सतुआक सतुआनि करा दियौ यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। टटका आ बसियाकेँ अजगुत विधान एलै, फेँटि-फेँटि घाइठक बड़-बड़ी खोंटैल गेलै, आमक टिकुलासँ चटनी बनबा दियौन यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। पौखरि-इनार गाम-घरक सफाई भेलै, तुरिया-भजारमे थाल-कादो लेपाइ भेलै, प्रेम चासैत, समारैत, गजारि दियौ यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। बाँसक दुइ खुट्टा पर बल्ली लटका दियौ, तुलसी - चौड़ामे पानि सल्ला बना दियौ, देव-पितर केर प्यासकेँ मिंझा दियौन यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ जुड़ा दियौन यौ, जुड़िशीतलमे सभकेँ।। (जुड़िशीतलक अनंत शुभकामनाक संग) रश्मि किरण झा किछु हाइकू 1)जाड माघ के दलपिट्ठी बगिया रान्हे कनिया 2)बुड पुरान हड्डी पांजर काँपे माघ डेरावे 3)पैन न छूबौ ओसरे बैसल रे माघ जाय दे 4)गतिया तौर खिस्सा कहबो तोरा नुनु ऐते आ 5) बितलै माघ गधा जन्म छुडैबो गंगा नहैबो राम विलास साहु दिलक दरद मन पड़ल हे सखी पिया अधरतिया हे मनुआँ घबराएल हमर पिया खटैए परदेश हे...। क्षणकट छगाएल जिनगी योवन बनल पहाड़ हे आँखिक नीन हेराएल राति काटै छी मन महुड़ाएल हे...। बीसम बरस देह विषाएल मनमे लगल अछि वाण हे पिया परदेशिया सपनो ने देखै छी लगैए तनसँ छुटत प्राण हे...। जहिया एतै हमर पिया चरण पखारि नैन मिलबै हे पान-मखानसँ सुआगत करबै प्रेमक बतिया सुनेबै हे...। नयनक नोर केना सुखत मनक त्रास कहिया मेटत हे दिलक दरदकेँ के हरत की पिया बिनु तेजब प्राण हे...। ◌ उत्तम अन्न मरुआक मान अपरमपार रौदीक समय अमृत समान सभकेँ बचबैए परान कनियेँ पानि ऊँच खेत उपजै कम मेहनत उपजै कठमन बिपैत समयमे राखे मान देखैमे कारी बड़ गुणकारी खाइयोमे सुअदगर पियरगर सभ अन्नमे बेसी यार एकरे नोन, तेल, मिरचाइ, चटनी पियौज, कसौनी, अचारक संग खाइतो मजेदार अन्नक सुबेदार अन्नमे उत्तम सुरो ने खाए गरीबक मान मरुआ रखैए सागक संगे खाए शान बढ़बैए कफ-खाँसी जलोदर रक्‍तचाप मधुमेह रोगकेँ भगबैए पेटक रोगकेँ करैए कात जे मरुआकेँ दुखमे सुमिरन करैए तेकर बचबैए इज्‍जत प्राण मरुआकेँ नइए कोनो गुमान सभकेँ देखैए एक समान। ◌ बदलल नजैर सबहक नजैर अछि बदलल केकरा कहब के पतियाएत सगरो बैसल-ए बैमाने-शैतान जेतए जाइ छी तेतइ ठकाइ छी सगरे पसरल-ए ठकक ठीकेदार धरतीसँ असमान धरि बाट लगैए अन्‍हारे-अन्‍हार के पुछत केना जीबै छी सबहक सुखल-ए मुँह-गात खाइ खातिर पेट पीटैए जान बँचबैले भागल फिरैए घर छोड़ि परदेश खटैए समाज टुटि छिड़िया गेल-ए के सम्‍हारत एहेन समाजकेँ बदलल नजैरसँ करैए घात संकटमे अछि आजुक समाज बेवस्‍थाक छै दूटा आँखि एकटा अकास दोसर पताल बीचला केकरापर करत बिसवास बदलल नजैरसँ करैए विनाश। ◌ मिथिलाक अपमान युग-युगसँ प्रसिद्ध नाम अछि ऐ धरतीपर मिथिलाक नाम कोन बियाधि लगल जे ई भेल हाल स्‍वर्गसन धरती नरक बनल-ए के करत नव निर्माण, के देत प्राण भरल धरती मरल पड़ल अछि बिनु साधन लोक पड़ा रहल-ए जे मिथिलाकेँ होइए अपमान धर्म ग्रन्‍थ पुराणमे लिखए मोटगर अक्षरमे मिथिला महान सभ किछुसँ समपन्न रहितो आइ तेज रहल-ए प्राण मिथि वंशक राजा जनककेँ घर-घरमे जपैए अमर नाम जनक नन्‍दनी जानकी नारीमे प्रधान बड़ दुख सहि सीता जगमे सती महान्‍ मिथिलाक संस्‍कृतिकेँ विश्‍वमे मान केकर कसुरसँ आइ भेल बदनाम के करत बलिदान, जे हएत कल्‍यण की नव सृजनकर्ता रक्‍तहीन बनल-ए जे मिथिलाक अपमान सहि मरि रहल-ए उत्‍थानक बात तँ सभ करैए मुदा नइ भेल अखन धरि कल्‍याण बेर-बेर मिथिला सहि रहल-ए अपमान। ◌जागु इंसान जागु-जागु इंसान सुतलसँ हएत हानि धरती धधैक रहल-ए बरैस रहल-ए अग्निवाण आबि गेल महगी शैतान नइ करत कियो कल्‍यण विधि विधाता दुनू बैमान जागु-जागु इंसान...। दूध बिनु बच्‍चा कनैए रोगी कानैए इलाजक खातिर नइए अखनो केकरो धियान इज्‍जत-आबरूक नै ठेकान भ्रष्‍ट तंत्र षडयंत्र रचैए लूट हत्‍या रेप अपहरणक उद्योग बढ़ल-ए धरती-असमान जागु-जागु इंसान...। ठकक कोनो कमी नै अछि ठकि रहल-ए छाती तानि धर्मक नामपर लूट होइए मानव बनैए दानव समान जाति-पातिमे टुटल इंसान शिष्‍टाचारसँ भ्रष्‍टाचार बेसी जेना मरि गेल जगसँ इमान जागु-जागु इंसान...। ◌ जीवन पथ चल रे बटोही चलैत चल जीवन पथपर बढ़ैत चल पाछू नहि आगू चलैत चल राह कठीन राही निर्भिक बनि अपन पथपर डेगैत चल जिनगीक नाह डगमग चलैए सही दिसा खेबैत पार चल चल रे बटोही चलैत चल जीवन पथपर बढ़ैत चल…। जग सुन्‍दर जीवन दुर्लभ प्रकृति जीवक जीवन दाता अपने करनी भेल वेतरणी मनुखे बनल-ए मनुखक दुखदाता लोभ, मोह, मद असन्‍तोषमे फँसि बाट कुबाट पकैड़ चलैए नरकक द्वार खोलि रहल-ए स्‍वर्गक बाट कर्मयोगी चलैए चल रे बटोही चलैत चल जीवन पथपर बढ़ैत चल...। ◌ चंचल मन चंचल मन चलैत चल दुनियाँकेँ परखैत चल सभकेँ सम नजैरसँ देख समतल करैत बढ़ैत चल। भेद-भावक विचारि छोड़ि अभावमे भाव भरैत चल धीर वीर बनि चलैत चल ज्ञानक प्रकाश पसारैत चल। पलखैत कम पहचान बेसी सबहक उपकार करैत चल दुख-सुख सहैत जगक संग संजीविनी बुटी बाँटैत चल। सम धारा बनि बहैत चल राग-विराग खटराग छोड़ि प्रेमक बाट पकैड़ बढ़ैत चल कर्मक पूजा करैत चल। मनक गति सभसँ बेसी सदिखन पकैड़ काबू कर मायासँ हटि कर्मसँ सटि दुख-सुख संगे सम्‍हैर चल चंचल मन चलैत चल दुनियाँकेँ परखैत चल। ◌ माघक जाड़ माघक जाड़ हाड़ छुबैए थर-थर कँपैए करेज ठिठुरल हाथ-पएर बेकाम लगैए शरद भऽ गेल सौंसे देह जेना छुटि जाएत तनसँ प्राण कोसी-कमलाक बीच चास-बास झलफाँफी बनल टटघर ओश –कुहेससँ डुमल धरती सौन मेघौन सन पड़ैए फुहार पुरबा-पछियाक सम्राज्‍य बिनु साधन हम छी नचार खाइले फुटहो ने अछि सुतैले अछि कनियेँ नार-पुआर सुरुजक दर्शन सेहो ने होइए दिन-राति लगैए एक्के समान भसठिया लकड़ी ठेंगक संगे बनगोइठाक घूर जरा कऽ कहुना बँचबै छी प्राण मुदा नै मानत ई माघक जाड़ हाड़पर पीटत लोहाक फाड़ गरीबकेँ नइए कोनो उपाय बुढ़ लोक जान मालकेँ सताए खा लेत सुखा अचार-बना तखने करत जान उबरास माघक जाड़ माघक जाड़। ◌ हकार जड़ि गेल बीआ मरि गेल खेत सुखल धरती पड़ती पड़ल-ए खरिहाँन बनल-ए श्‍मशान माथ ठोकि कनैए किसान हड्डी-पसलीमे नइए जान भुखल नेना तेजैए प्राण रक्षक भक्षक बनि बैसल-ए नइ छै अखनो केकरो धियान केना जीब हौ भगवान काज बिनु हाथ भेल बेकाम दिन भेल बाम छुटत प्राण पड़ल अकाल गरीब भेल कंगाल सुखि गेल देह जेना नर कंकाल कालक पहड़ा नचैए जोगनी शोणित पीब रहल-ए सियार माथपर टीटही चिल्‍होरिया उड़ैए गीद्ध-कौआ मीलि मांस नोचैए सुखल हड्डी कुकुर चिबबैए नइए केकरो गरीबसँ सरोकार विधि विधाता बनल लचार भुखल निर्बल दऽ रहल-ए हकार मचि रहल-ए चहुदिस हहाकार एके सिरहौने सभ हएब पार हकार, हकार, हकार...। ◌कोसीक इतिहास अगम कोसी केर कोश भरिक पेट अथाह पानि भरल भित्तामे दराइर फटल कटिनियासँ धसना गिरल सबहक होश उड़ल बहि गेल गामक-गाम उजरल खेत-पथार खरिहाँन उपजा-बारीक थाह नहि सगरो पसरल बालुक ढेर चर-चाँचर टपरामे पटेर, झौआ, कासक बोन उपैट गेल गाम-समाज जे बँचल गेल कोसी पेट तैयो नहि भेल सन्‍तोख अछैते औरुदे लेलक जान बँचल बेघर बेठेकान कखनो जाएत सबहक प्राण नइए तेकर कोनो ठेकान केना भेटत ऐसँ त्राण बेवस्‍था अछि अखनो बेइमान दू भागमे बँटल समाज कोसीकेँ नइए कोनो लाज विकास नहि होइए ह्रास केना बनत नव इतिहास कोसीक इतिहास, कोसीक इतिहास। ◌ मुक्‍ति हथिया नक्षत्रक झाँट सुतल छी टुटल खाट मठौत उजरल लटकल सोकबा ठोपे-ठोप चुबैत पानि...। रहि-रहि भिजैए देह सिहैर उठलौं अकचकाति सगरो अन्‍हरिया राति सुझए ने कोनो बाट...। केहेन भेल दिन बाम झख मारै छी निष्‍काम पेटमे अन्नो ने अछि दू दिनसँ उपास पड़ल-ए..। भीखो जे देने रहए कुकुर खा गेल बाट कठजीव बनि जे जीबै छी मरै नइ छी ई खाटपर...। दिनक दोख जे चुकल छी जीबै छी ने मरै छी अधमरू पड़ल छी खाट केतेक सहब केतेक कहब दुखक बात...। हे ईश्वर फाटह धरती दऽ दाए तीन हाथ परती केतेक कठ काटि मरब दऽ दाए ऐ तनसँ छुट्टी...। मृत्‍यु भूवनमे तन तरपैए करब भक्‍ति दिय शक्‍ति करम-धरम देख-परेख कऽ जनम-मरणसँ कऽ दाए मुक्‍ति...। ◌ ऋृतुराज वसन्‍त आएल ऋृतुराज वसन्‍त सजि गेल चहुओर धरती पुष्‍पकक पराग छिटैक गेल मदमातल पवन झिलहैर खेले मधुआएल महुआ महमह करैए आमक मंज्जरसँ अमटोकी वौड़ाएल भन-भन करैए सगरो मधुमाछी कोइली कुहकैए मिश्री समान फूलक रस पराग पीब कऽ भ्रमरा गबैए वसन्‍तक गान तीसी, सेरसो, मटरक फूलसँ खेत सजल-ए दुल्‍हिन समान हँसि चान नजैर लगबैए छबि छटा धरतीकेँ देख अचरजमे पड़ि गेल ऋृतुराज पछिया पवन मस्‍ती मारैए धूल उड़ि चढ़ि गेल आसमान फॉगुक रंगमे तनमन रंगाएल बुढ़बा, नवतुरिया फगुआ गबैए रंग-अबीरमे सभ नहाएल सभ साल अबैए नव उमंग लऽ कऽ हरियर-पीअर मनोरथ पूर्ण आएल ऋृतुराज वसन्‍त। अनमोल जिनगी तूँ अमरुख अज्ञानी अभिमानी किए घुमै छँह डेगे-डेग ठक बैसल छौ गली-गलीमे लेतौ प्राण क्षणेमे अमती खेत बड़ी कठिनसँ मिलल छौ जिनगी धने देने छौ बनैले दानी सेवा खातिर जग मिलल छौ किए बैसल छँए बनि नदानी ज्ञान-विज्ञानकेँ अलख जगबैले कुकर्म छोड़ि सद्कर्म करैले जग बनतै अद्भुत कल्‍याणी सहए कहै छैथ पण्‍डितज्ञानी रे मुरख तूँ धीरज धरिहेँ कर्म पथ सत्‍यकेँ पकड़िहेँ तीनूलेाकमे नाम करिहेँ कर्मक फल उत्तम मिलतौ नाओं अमर अमृतरस पीब यमराजो तोरासँ दूरे रहतो स्‍वर्गक बाट खुजले भेटतौ हरि नाम हरि कथा अनन्‍ता जे जपत से अमरत्‍व पाबत अममोल जिनगी किए ठकाएत जीवन-मरणसं मुक्‍ति पाएत। ◌मिथिलाक गुमान कोसी कमलाक रेठान तैपर बनल बलानक दलान बालुक बुर्जा बनल गाए महींसक बथान दूध-दहीक पेमौज होइए छाल्‍ही घीकेँ कियो ने पुछैए डारहीकेँ कुकुरो ने खाइए अल्‍हुआ होइए प्रात जलपान तिलकोरक पातक तरुआ प्रधान मरूआ रखने गरीबक मान मकइ गहुमक अछि छिगरीतान खा सुतैए ऊँचगर मचान गामे-गाम चाहक दोकान निठुर दूधमे चाह बनैए फिका पड़ैए मेबा मिष्‍ठान माछ-मखान महग भेल-ए मधु भेल-ए अमृत समान अपन खेती छोड़ि किसान परा रहल-ए जान-बेजान बेवस्‍था अछि अखनो बेइमान रावण कंसक राज चलैए केना भेटत ऐसँ त्राण ई छी मिथिलाक गुमान। ◌हम किछ नै कहै छी हम किछ नै कहै छी तैयो कीए हमरे पुछै छी की कहब कहैत जलाइ छी सभ जनै छी सभ देखै छी बजैले कोइ ने चाहै छी नेता अभिनेतासँ सभ तवाह छी बेटाक नजैरबाप अपराधी छी नेता अभिनेता यार बनल-ए चोर सिपाहीपर भारी पड़ल-ए देशक खजाना अधिकारी लूटैए साधनक अभावमे खेत पड़ल-ए बेरोजगारीसँ लोक भूखे मरैए जन्‍मेसँ देशमे गरीबी भेटल-ए पुरुखा लगसँ शौगात मिलल-ए असन्‍तोषक बोखारमे सभ वौआइए दिन-राति सुनि अचरज लगैए की कहब ई दुखक बात जहरक घोँट पीब मरै छी हम किद नै कहै छी...। ◌ हमर टोल हमर टोल सभ दिन करैत रहल किलोल कोइ ने सुनलक आइ धरि हाकीम-हुकुम नै देखक दिन दुखियाकेँ ईश्‍वार सेहो बेमुखे रहल के करत हमर सहयोग बाढ़ि पानिसँ घेराएल लगैए नै बँचत हमर टोल छाती पीट-पीट बहबैए आँखिक नोर भँसिया गेल माल-जाल किदु नै बँचल अन्न-पानि धिया पुत्ताक के कहैए बुढ़बो बुढ़िया उगडुम करैए नवतुरियासँ जवनका धरि हिम्‍मत जुटा कऽ माल-जालकेँ बँचबैमे भीरल-ए पुरबा-पछिया झाँटि-बिहाड़ि हमरे टोलकेँ सतबैए जेना सभ दुख सहैले हमर टोल अगुआएल-ए नै कोनो रक्षा, अनुदान तखन केना हएत हमर ओलक उत्‍थान सभ मिलि संकल्‍प लेलौं अपन जन श्रमदानसँ टोलक करब ऊंच नाम सा मिलि दुखकेँ भगाएब टोलकेँ समृद्ध बनाएब अपन काजसँ आत्‍मनिर्भर हएब। ◌ खेतीक काज फाड़ पीट खेत जोति बैसाखक रौदमे हाड़ सुखाए जेठ मास मरूआ रोपि करैए कमठौन अखारमे धानक बीहैन पाड़ि सौन-भादो करैए कादो बिीहैन उपाड़ि रोपैए धान आसीन मास धानक कमौनी कातितमे करैए खेतक रखबारि अगहन-पुसमेकटनी-दौनी उपजल अन्न तैयार करैए साल भरिक उपजाकेँ भरैए कोठी-बखारी अपनो खाइए आनोकेँ खीबैए दाही-रौदी-ले बँचा राखैए समय पाबि अन्नदान कऽ खुशीमनसँ भण्‍ज्ञार करैए अपन परिश्रमपर भरोष रखि नै केकरोसँ आश करैए चास-बासपर करैए राज खेतीसँ सबहक पेट भरैए सभ दिन तियाग श्रम करैए देशक बढ़बैए मान-सम्‍मान सोचि चलु हे देशक इंसान खेतीक काज छी सभसँ महान किसान छी देशक असल सन्‍तान। ◌ मोह-माया सगरो माह-माया पसरल-ए मायाक बजार सजल-ए ठगिनियाँ माया-जाल पसाइर सभकेँ बान्‍हि-फँसा रहल-ए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। सभ सज्‍जनदुर्जन नहि कोइ साधु सन्‍त महंथ कहबैए सज्‍जन साधु सन्‍त महंथ माया फँसि घुरिया रहल-ए ठो-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। लोभी सभ निरलोभी नै कोइ इमान बेचि इंसान कहबैए कुकर्मकेँ धरम-करम बुझि मोह-मायामे सभ घेराएल-ए ठामिे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। ई जगत केना कऽ चलतै के नेकी इंसान कहेतै केना सभकेँ भेटतै त्राण माया देख कवि नोर बहबैए ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए सभकेँ ठकि...। ◌ सतघटिया बाट सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलै छी सात समुद्र जकाँ किए उनैट उधियाइ रहै छी जिनगीक असल बाट छोड़ि किए सतरंगी बनि जीबै छी सात घाट सात बाट पकैउ़ किए चलै छी। जिनगी केना सजि चलत से नै बान्‍हि चलै छी पानि वाणि छानि कऽ जिनगी किए ने जीबै छी झूठ-फुसक खेल खेला हानि नकिहानि करै छी सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलै छी। सुलभकेँ दुरलभ बुझि-बुझि उनटे नजैर सदिखन रखै छी पथ्‍य, कुपथ्‍य खा-खा कऽ नव-नव रोग सृजैत रहै छी सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलै छी। एक बाट एक उदेस पकैड़ चलैत जीबैत रहब मातृभूमिकेँ कर्मभूमि बुझि कर्मक पथपर चलैत बढ़ब सही ज्ञानक ज्‍योति जरा जगतकेँ जगमग करैत रहब सात घाट सात बाट पकैड़ किए चलैत रहब। ◌ मिथिला महान पावन धाम मिथिला महान पावन धाम हमर छी असल पहिचान धान, पान, मखानक खान पान बढ़बैए सबहक सम्‍मान फूल-फड़केँ के पुछैए माछक होइए नीत खान पान पोखैर, खन्‍ता डेग-डेगपर नदी बहैए गामे गाम जगतमे होइए अमर गुनगान मिथिला महान पावन धाम। स्‍वर्गसँ सुन्‍दर जगतक मनोरम माटि-पानि हवा अमृत सन बाग-बगीचा फलवाड़ीमे फूल-फड़ लुभधल रहैए बाड़ी-झाड़ी फड़ल भरल-ए सभसँ गुणगर फड़ लताम चिड़ै-चुनमुन चहैक-चहैक कोइली बजैए मधुरतान जगतमे अछि बड़ नाम मिथिला महान पावन धाम। जड़ी-बुटीसँ भरल ई धरती औषधीक खान अदौसँ अछि घरे-घर पैघ-पैघ वैद्य बना रहल-ए उत्त दवाइ ऋृषि मुनीकेँ पहिलपपसीन रहल मिथिलाक पावन भूमि जैठाम मनुज अछि देव समान अपन ज्ञान बाँटि बाँटि जगतकेँ करैए कल्‍याण मिथिला महान पावन धाम। सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, अन्नपूर्णा देवी सबरी सीता भारती सन नारी घर-घर, गामे-गाम बसैए ज्ञानी सन्‍त विद्वान भरल-ए दुनियाँकेँ दइए ज्ञज्ञन-विज्ञान जेतए जनता करैए श्रमदान घर-दलानमे भरल-ए धान अतिथिक सेवा देव समान जगतमेअछि अमर नाम मिथिला महान पावन धाम। ◌ चरण पूजव चरण पूजव हे जननी जन्‍मभूमि सुति-उठि चढ़ाएब चरणमे फूल जनम-करम तँ अहीं देलौं पालि-पोसि सपुत बनेलौं अहाँक सेवा बढ़ अनमोल केना साधाएब हम अहाँक कर्जा मनक भूल नै करैए कबुल ज्ञान विज्ञान दइ छी अद्भुत साए जनम सेवा करब हम नै करब जिनगीमे कहियो भूल चरण पूजव हे जननी जन्‍मभूमि सुति उठि चढ़ाएब चरणमे फूल। जननी जन्‍मभूमि हमर छी दाता दोसर नै अछि कोनो विधाता अहाँ छोड़1ि हम केकरा पूजब सभसँ पैघ माता अन्नदाता अहाँक ऋृण केना चुकाएब हम कोनो कसैर रहत हे माता साए बेर हम सिर झुकाएब अपन वलिदान दऽ ऋृण चुकाएब सभ कसूर माफ करब हे माता हम छी अहाँक नदान सन्‍तान चरण पूजव हे जननी जन्‍मभूमि सुति उठि चढ़ाएब चरणमे फूल। ◌ भजन हरि दर्शन बिनु अँखिया तरसैए मोर जन्‍मेसँ सागरमे सीप पियासल बहबैए नोर स्‍वातीक बून लेल विभोर हरि दर्शन बिनु अँखिया...। हम छी पियासल पंक्षी चकोर चित चंचल मन अविचल स्‍वातीक बून लेल छी बेकल हरि दर्शन लेल रस्‍ता तकै छी बनि चकोर हरि दर्शन बिनु अँखिया तरसैए मोर...। ◌ धधकैत धरती धधैक-धधैक धरती दिन-राति धधकैत जरि-जरि सुरुज आगिक ज्‍वाला बनि धरतीकेँ जरबैत भीषण गर्मी बढ़ैत धरतीसँ अम्‍बर धरि धधराक धाह लगाए के बुझाएत धधराकेँ पािन सुखि पतालमे डरे नुकाएल रहए अपन दुखकेँ मनुख अपने सृजन करैए गाछ वृक्ष काटि-काटि जंगलकेँ उजारैए धरतीक स्‍वरूप बिगरल जन-जीवन बिगैर वृष्‍टि अनावृष्‍टि भेल रौदी-दाही बाढ़ि बढ़ैए मनुखक समस्‍या बढ़ल बढ़ैत सभ बुरिया रहल धधकैत धरतीमे जीव जरि मरि रहल-ए। अग्निपथ केनए जाएब, केनए छिपाएब केकरा-ले कानब के हमर नोर पोछत जेनइ जाइ छी तेनइ डेग-डेगपर रावण कंस देखाइए सुगम राह कोनो ने सभ राह काँटसँ भरल-ए अग्निपथपर चलैत चलैत मंजिल अतिदूर लगैए हारि थाकि जौं उठै छी कुकुर बहुत भुकैए मनमे होइए डुमि मरी कोसी-कमला सुखाएल-ए गंगासन पवित्र नी खन्‍ता डबरामे नुकाएल-ए भागैत पहुँचलौं धाम सभ धाम दानवसँ भरल मिथिला धामक धरती भेद-कुभेदसँ घेरल मानपर दानव भारी ऐ दानवसँ मुक्ति लेल जाधैर जिनगी अछि हारि केना मानब जीबैले किछु करए पड़त अग्निपथपर चलए पड़त। ◌ किसान जिनका सभ कहै छी अन्नदाता भाग्‍य विधाता मतदाता वएह छी देशक असल बेटा हुनके अछि टुटल घर तनपर नै लत्ता कपड़ा दुखमे फँसल हरिनाम जपैए जिनकर करैए सभ गुणगान हुनके समस्‍या अछि महान्‍ जिनगी सुखल लड़की सन संघर्ष करैत जाइए श्‍मशान तैयो सहैए दोसरत तान आइ धरि ने कियो सुधि लेलक आ ने दुखमे नोर पोछलक मुदा ओ करैए सबहक कल्‍याण अपना भूखल सबहक पेट भरैए सभ दिन करैत रहल उपकार हुनके दुख अछि पहाड़ जेहेन दुर्दशा बनल छै जीवन हारि एक दिन अन्न नै उपजेतै तखन सभ लोक भूखले मरतै ताधैर नै किसानक दिशा दशा सुधरतै। ◌दिन भेल बाम खेतमे फटल दराइर आड़िपर बैसल सोगाएल किसान छाती पीट बपहारि कटैए केना कटत सालक दिन राति की खा जीयब हौ भगवान खेत की जरल, जरल तकदरीर सभटा हमर अरमान जरल धियापता भऽ जाएत बीरान पेट पीट-पीट देत जान टुटल धर टटल दलान केना निमहत मेहमान खुट्टापर गाए महींस हुकरैए केना बँचाएब ओकर प्राण अखड़ा रोटी नून देख चिलकौर कनैए साँझ बिहान माथपर टीटही टहकैए बगल बैसल कुकुर कनैए बिलाइ छालही ओलि खाइए सरकार उड़बैए रॉकेट यान गरीबक जिनगी बनल गुलाम किसान दइए खेतमे जान सरकारक कोन ठेकान कुर्सीकेँ बुझैए भगवान केना बँचत किसानक प्राण दिन भेल बाम...। ◌ नशा जे नशा करत ओकर जिनगी नकर बनत ओ दिन दुरदिन नहि जखन बाटीमे भीख मांगए पड़त देख जगत हँसत अपन पराया सभ छुटत जिनगी दुखमे डुमल रहत जे नशा करत। गाँजा पीब कऽ उड़ाएत भँग खा भकुआएल रहत दारू पीब कऽ दुरि भेल बीड़ी पीते बुड़ियाएल घर उजरल परिवार बिगड़ल सभ सम्‍पैत बिलैट गेल तखनो कोनो कुकर्म नै बँचल बाटीमे भीख मांगए पड़त जे नशा करत। ◌ भगवतीक गीत कोन फूल लोढ़ब हे मैया कोन फूल चढ़ाएब हे कोन फूलक माला बनाएब हमरा नै अछि ज्ञज्ञन हे जगत जननी छी हे मैया सबहक करै छी पतिवाल हे कोन कसुरक चुक हमर छी गे हमरा दइ छी सजा हे बेली चमेलीक गजरा बनेलौं चम्पा फूल पैर पूजन हे गेना फूलक आसन बनेलौं अरहुल फूलक माला हे पान, फूल, फल, मधुर, मेबा सभ दिन चढ़ाएब प्रसाद हे छागर-पाठी बलि नै देब हम अहिंसाकेँ होइ छै अत्‍याचार हे अंजान अवोधकेँ माफ करबै हम छी अहींक सन्‍तान हे सभ जीब पर दश करियौ हेतै जगतक कल्‍याण हे कवि करैत अछि विनती हे मैया सभकेँ दियौ सभ ज्ञान हे जगमग हेतै अन्‍ध जगतक दियो एहेन वरदान हे...। ◌केहेन मिथिला हमर मिथिला हम छी मैथिल किए बदैल गेल काया स्‍वरूप के अछि एकर जिम्‍मेदार की नै रहल असल रखबार दोषी बेवस्‍था बढ़ल समस्‍या कंकीर्ण सोचसँ बँटल समाज तखैन मँगै छी मिथिला राज्‍य की मिथिला मिथ्‍या छल जे असल मांग करै छी हमर मिथिला केतए हरा गेल जे खोजैमे आन्‍हर बनल छी के दोषी छैथ के जिम्‍मेदार जे केलैन भेद कुभेद जोगी कहि योगी बनि गेल कर्म भूलि पाखण्‍डी भेल अवसर देख रंगवादी भेल जाति पाँतिक राजनीतिक खेलमे मिथिलामैथिली बदैल गेल जे मिथिला अदौसँ स्‍वर्ग छल तेकर किएक ई हाल भेल जाति परजातिक बात करै छी सभकेँ बुझै छी अखनो अछोप तैयो ने अछि मनमे सन्‍तोख गरीब कमा केतौ गुजर करत तइले लोक किए प्राण गमाएत उठत एक दिन साए-साए सबाल केकर मिथिला केहेन स्‍वरूप किनका मिलत ऐसँ सुख भूखले पेट जे करतै काज से किए माँगत मिथिला राज नै छैथ जनक नै छैथ सीता के भोगतै ई मिथिला राज। ◌ दीन हीन दीन-हीन जखने भेलौं सभ दुख सम्‍हिर पड़ल आपैत-बिपैतमे फँसि सभ नेकरम करैत एलौं आब की करब नै फुराइए तखने केलौं हरिक पुकार हरिक महिमा अपरमपार देलैन साहस भेल एहसास कहलैथ कर्मपर करू बिसवास कर्म-धर्मसँ बढ़ि किछु नइए तेकरे दइ छी हमहूँ साथ दुखक दरिया पार लगा सुख सागरमे दइ छी पहुँचा दुख-सुखक बीच जीब जीबैए से रहस्‍य किया ने जानैए ऋृषि-मुनी, देवी-देवता सबहक विधाता हरि अनन्‍ता हरि हरण दुख हरता दीन-हीन दुख सहितो स्‍वर्ग जगतमे सुख पबैए दुख देखि जे अधिर होइए से नर सुख कहियो ने पबैए कर्म प्रधान बिश्‍वक मांग जे अपनाबए वएह महान्। ◌हम गरीब हम गरीब केतेक करीब सबहक काज करैत जीबै छी बहुतो काज नहि छी बाज फुरसत पाबि अपन बीरान सबहक पुरबै छी काज लेल रोब देखा नजैर बदैल काज करबैए प्रेम-भाव नहि अपमान भरल बेवहार करैए तैयो दुखे-भुखे जरैत5मरैत करैत रहलौं सभ दिन काज बोल भरोसक नै भेटल शौगात बुढ़ाड़ी देह जखन भेलौं बेकाम नै कियो पुछैए नाम ठेकान आब की करब घरेमे मरब जपैत हरि नाम राम-राम। ◌ किरानीक किरदानी देखलौं किरानीक किरदानी मरदे नहि मौगियाहे बुझि पड़ल जएह कहता वएह नै करता तीन पेखन रोज घुमौता तखन कहता परसू आएब जँ परसू जाएब तँ ओ नै रहता बेसी घुमेता फिरिसान करता तखन कहता खर्चा करए पड़तह हम कहलौं काज तँ नइए भीरगर सुनिते कुकुर जकाँ भूमि भगौता डरि हारि जँ पराए लगलौं तखन बनर भूलकियो देता साहस करि कऽ हम डटले रहलौं जखन निर्भिक हमरा देखलैन इशारा दऽ लग बजौलैन कानमे कनफुसकी दैत बजला- मोटगर रकम खर्च करए पड़तह जँ नै करब खर्चा-बर्चा तँ ऑफिस अबैत जाइत पएर टुटि जेतह हारि थाकि हमहूँ बजलौं- मोटगर तँ नहि दऽ सकब हम मुदा पातरेसँ चलाउ काज निर्जज बनि बढ़ौलक हाथ तखने मनमे भेल आश काज भऽ जाएत हाथो-हाथ। ◌ फूलक लचारी मालि पटबैए कियारी फुलवाड़ी हँसि फूल कहैए- भेद कुभेद नै हमरा मनमे सबहक छी प्रेमी रंग रूप स्‍वरूप भिन्न रहितो मिलि रहै छी कियारी नइए रंगभेद, वर्भेद केकरोसँ नै छुबाइ छी एक बेवहार अपन सुवास सभ मिलि बँटैत रहै छी राजाहुअए आकि रंग सबहक छी हम पुजारी नहि कलेश आ ने उपराग सबहक दिलमे करै छी बास प्रकृतिकेँ सुन्‍दर बनबै छी वातावरणकेँ करै छी साफ धरती, पवन, गगनकेँ गमकाबै छी चारूकात मुदा, मनुख नै करैए हमरा बीच इंसाफ जाति भेद, वर्ण भेद रंगभेद बाँटि करैए बिसवासघात सृंगार बुझि सजा दइए बेचैए हमरा हाट बजार की कसुर अछि हमर जे करै छी एहेन अत्‍याचार दया रखि करू विचार अहाँक बीच हम झूकि करै छी विनती, छी लचार के करत हमर इंसाफ? ◌ लोकतंत्रक खून निर्वल जनता, दागी पहलवान जनता लचार, वदनाक सरकार जंगल राज,अन्‍धा कानून बिनु घूस नै काज चलैए न्‍याय बिकाइए पसेरी भाव इंसानक इमानकेँ के पुछैए तरजू तौल बेचैए बेमान भ्रष्ट तंत्र बीकि गेल जनता लफड़ामे पड़ि गेल लोकतंत्रक खून होइए हंस सुग्‍गा भूखे मरैए गिद्ध, कौआ चिल्‍होरिया मासु नोचि खा रहल-ए शेर, बाघ खा मोटा गेल नढ़िया खिखिर मंत्री बनल कुकुर बिलाइ रखबारि करैए हत्‍या अपहरणक उद्योग बढ़ल जनताक खूनसँ देश चलैए जिनगी नकर कंगाल बनल-ए हिंसक हिंसाक बीच निर्दोषक फाँसी पड़ि रहल-ए राम राज्‍यक सपना सपने रहि गेल बुद्ध गाँधीजीक बाट बिसैर गेल। ◌सपना सपना कुसपना देख-देख भ्रममे भरैम भरमैत रहल अमर अमृत छोड़ि-छोड़ि विष विषहा लूटैत रहल भेद-कुभेद वाण-उवाणि देख हंस कौआ लड़ैत रहल देश समाज दहि भँसियाइए बिनु पतवार चलैत रहल मनुख कुमनुखक बीचमे अन्‍हारा डीठरा देख रहल-ए जनताक सुख ऊपरके लूटि-लूटि धरती अम्‍बर बीच उड़ैत रहल देश माल खजाना खाली कालाधनमे बदैल गेल महगी मारि जनता सहि पातर बनि पतराइत रहल नेता अफसर मोट-मोट बनि भरिगर भारसँ भरिया गेल भारी भारसँ देा दबि कऽ चिन्‍तामे शेागा गेल भेद-कुभेदक बीच भेदिया लहू पीब जीबैत रहल राग, ताल, सुर अलाप अलगे नाच नरखेल करैत रहल देशक इज्‍जित लूटि-लूटि बीच बजारमे बेचैत रहल सुतल छेलौं नीरन भेर की देख सपना नीन टुटल। ◌ बटिया खेती बड़ी जतनसँ बटिया खेतीकेलौं रौदी आबि विषाएल खेतमे फटल दाराइर फसल जरि उसैर गेल गिरत गिरहकट्टा दू-चारि कथा बेथा सुनबे साँझ विहान अपजश माथ चढ़ल ऊपरसँ भूखमरी बढ़ल मेहनत लागत दुरि गेल मँह सुखल पेट धँसल परिवारक चिन्‍तामे फँसल की खाएब केना जीयब भूखे मरत धियापुता जँ कमाइ-ले जाएब दिल्‍ली, पंजाब, कलकत्ता धियापुता बिलैट जाएत के बनत भाग्‍य विधाता हारि थाकि ठीकौती खेत लेलौं दस कट्ठा खेत जोति कुइयॉं खुनि तरकारीक खेतीकेलौं रंग-बिरंगक बीया रोपि दिन-राति मेहनत करैत रहलौं खोपड़ी बान्‍हि केलौं रखवारि मनसम्‍फे तरकारी उपजल हाट-बजार बेच भेलौं नेहाल खा-पीब ठीकौती दऽ नफा भेल हजारक हजार पाँच कट्ठा खेत कीनि जोड़ा भरि हर-बरद संगे बटिया छोड़ि अपन खेती केलौं चास-बासपर करै छी राज ने केकरोसँ अछि आश बटियो खेती जँ करत रही पपदेशक काजसँ घरे नीक। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र गामक कचोट बूढ़ी आ बूढ़क भुरुकबा पराती मस्ती करैत पोखरि आ नहरि में हेलब फुलबारी में कनैल, अड़हुल, चम्पा, फूल लोढ़ब हाथ सँ माटिक महादेब- हज़ार, लखराम बनाएब मंदिर, तुलसी चौरा, भगवती घर के निपब आ पूजाक ठाम शालीग्रामक पूजा, भगबतीक पातरि, भगवानक भोग कबड्डी, झिटकी, नुका-चौड़ी, झिझिया खेलायेब अन्हरिया राति में पानिक झट्टक के सङ्गे आम बिछब आम ख़ेसारी साग, अडरनेवा के झखहा कंसार वाली सँ भुजबैत चाउर, गहूम, चुरा, बदाम मड़ुआ के रोटी में पोठी मछरिया बकेन महिसक दूध-दही, छाली नब बियायल महिसक खिड़सा उदासी, सोहर, समदाउन, जोग, खेलोना लोकगीत चैताबर, बसन्त, तिरहुत, बारहमासा, छौमासा सजनी गीत महेशबानी, नचारी, ब्राह्मण, भगबती, विष्णुक भजन हरियर कचोर पोखरिक पानि निर्मल जल इनारक जे करैत छल पियास केर शांत लह-लह करैत बहैत नदिक अछिन्जल जल कादो में भीजल आ कदियाल गृहस्थक देह आ वस्त्र मारकीन के नुआ में प्रकृति सुन्नरि बनल गामक युवती लताम, केरा, कटहर, बरहर, आता, सरिफा, टाभ नेबो मह-मह गमकैत रंग-विरंगक फल झींगा, इचना, बुआरी, रहु, गैंचा, कबइ, पोठी, मारा सिंघी, मांगुर, दरही, छही माछ डोका आ कांकोड के तीमन बाड़ीक पटुआ, झाड़िक तिलकोरा आ कन्ना पातक तरुआ ज़मीरी नेबो देल ओलक सन्ना घुरक पाकल सोन्हगर आलू आ अल्हुआ तरल कदिमाक फूल आ खमहारु माय-पितियैन केर बिना लोभक अशीर्वादक सँग नीक बोल आ ने जानि की की सब समाप्त भ गेल??? शहर में आबि भ गेल मनुख घड़िक सुई पर नचनिया नीक वस्त्र, घर, गाड़ी, A. C. सब सुविधा में रहैत अछि मुदा जीवन मे एना लगैत छैक जेना नाना तरहक मिष्ठान्न परसल हो लेकिन मधुमेह सँ ग्रसित रोगी हो मनुख ? जे सब वस्तुक उपलब्धता के बादो ओकर उपयोग सँ बंचित हो!!! ओह गाम! अप्पन गाम! मिथिलाक गाम!!! राजेश वर्मा 'भवादित्य', पटोरी (पछवारि टोल), पंचगछिया, सहरसा नवगीत जाहि चान से ईद तोहर छौ, ओहि चान से हमरो चौरचन! अही राष्ट्र केर तू पैगम्बर, अही राष्ट्र केर हम पुजारी। अही व्योम मे तोर अजान छौ, अही मे गाओल हम नचारी। जाहि बाट ईदगाहक तोहर, ओहि बाट मे हमरो तर्पण! अही धरा से हमरो जिनगी, अही धरा से तोरो जिनगी। फूसि फटक्कर चक्कर खातिर, किए पजारी द्रोहक चिनगी। शोणित हमर आ घाम तोहर लय, रची स्नेह सौहार्दक अरिपन! आ सोची उत्थानक मादे, कृषि-कर्म विज्ञानक मादे। जे अखनो छै उजड़ल बिलटल, तिनकर किछु कल्याणक मादे। आ मिली जुलि के आय शपथ ली, मातृभूमि हित पूर्ण समर्पण! बृषेश चन्द्र लाल ३ टा बालगीत १ सोन चिरैया नाना, नाना ! देखू नाना । सोन चिरैया चुगए दाना ।। फुर्र-फुर्र उड़ए खूब चकुआए । नाचि-नाचि फेर बिछि-बिछि खाए ।। चीं-चीं करैत ई गबैअ गाना । सोन चिरैया देखियौ नाना ।। २ चौरचन चौरचन उगल चान झट दए पूरी दही आन मरड़ भाङि खूब खाएब पूरी सभ भाई सभओ आङन घूरी मीठ पिरुकिआ आ अछि खीर लाबह जल्दी छूटल धीर तोड़ब तरुआ आह तिलकोर भैया जो तोँ नरिअल फोर तैपर देबै मीठगर पान बौआ कुदए देखबति शान ! ३ हमर पोती हमर पोती खेलए खेल बिंब बनल अछि मीत आ मेल । अनुपम दर्पण निष्छल छाया मिलल रंग एक मन आ काया । खिलकैत खुशी स्पर्श आ शोर देखू दर्पण स्वयं विभोर । विस्मृत नेनपन प्रस्तुत भेल हमरि पोती जे खेलए खेल । कमलेश प्रमेन्द्र, दामोदरपुर बेनीपट्टी जरल कपार एकटा लड़का सजल देखलियै, सूट-बूट मे रहै तैयार। सभ लगन परदेस सँ अबै, एकहु बेर नहि भेलहि जोगार। चिकन चुनमुन साफ़ दरबाजा, नबका चादरि चौकी पर। तीन रंगक चारिटा कुर्सी, महग पर्दा सँ सजल घर। आइ घटक आबि रहल छै, चहल-पहल पूरा परिवार। सभ लगन............. जे समय निर्धारित छल, भेल घटक केँ आब में लेट। लड़का के मुँह फिफरी परै, अहू लगन नहि कटा जे घेंट। तखने गाड़ीक पिपही बजलै, घरक आगा लागल मारुती कार। सभ लगन............. पहिने ठंडा तखन बिगजी, चाह-पान चललै ताबर तोड़। नाम-गाम लड़का सँ पूछल, की सभ चाही से खोलू ठोर। सतर्क बाप झट सँ बजलाह, बियाह रातुक उठबियौ भार। सभ लगन परदेस ........ बियाह भेल फाइनल मोन भेल गद्गद, लड़का लगलक सभकेँ गोर। आशीर्वाद संग टाका हाथ एलै, लड़का-लड़की केँ जोड़ी बेजोर। मोनेमोन लड़का सोचलक, कहुना लागल बेड़ापार। सभ लगन............ सिध्यांत लेल कन्यागत लेला परिचय, आहि रे बा जुलूम भ' गेल। कोना आब इ बियाह हेतै, लड़का-लड़की केँ गोत्र मिल गेल। देबे-शेबे बियाह ठीक भेल, अभगला के छै जरल कपार। अगिलो साल आब बियाह नहि हेतै, परै छै कठिन अतिचार। सभ लगन परदेस सँ अबै, एकहु बेर नहि भेलै जोगार। अम्बिकेश कुमार मिश्र, ग्राम+पोस्ट-सतघरा (बाबूबरही), मधुबनी सुतारु बौवा रहल ै सुतारु काटि रहल ै अहुरिया अपन' स्वार्थक पूर्ति लय' बिधुआयल आत्मा आ हॅसैत मुँहस' दबबैत ै हाथ-गोर छातिमें नून आ मुँह में चिन्नी धरने वासना,लोभ,घृणास' भरल' भजिया रहल ै कोनो छाह उदरपूर्तिक पश्चात डकरिक' अनकर सपना आ श्रृंगार दिनक' इजोत' में चाटि रहल' अछि गन्हाइत विष्ठा लागल योनि चूसै लय तत्पर अछि मूतस' भरल स्तन कंठ मोकने वासनाक' भूत जैव प्रक्रियामें मस्त हँसि रहल ै अपन वीरतापर दुनियाक सबसॅ पैघ तनाशाहक सबसॅ दुर्दांत हँसि गाबि रहल ै अपन वीरताक' गीत सट्टे अन्हरा गेल ै स्वार्थी मिथिलाक आह कानि रहल छथि माsए मिथिला हलधर जननी दुःखमें अबला, दिन-दुर्दिन हालत छनि खस्ता अपने पूत नपाबैन रस्ता| कानि रहल छथि अपन व्यथापर ओंघरा रहली जथा-पथापर, आँखि नोर लेर मुँह बहकल रस-रस तुषदह मोनो लहकल| गोचर डाटि पाएर फुलाबैन मार्कण्डय लह पीठ जराबैन, बिन कारा अंतड़ी छनि सटकल मुँह पीयर प्रेम बिन लटकल| तन रूचि आई सैकत सन हहरल वयन मसृण लोल नै ठहरल, महीपंके आई वारि बिआरी निशा भेर गाबै छथि नचारी| चार' मकई जकरा लए खोंसल जकरा उरमें साटि क' पोसल, आई ओ बनल आन केर पट्ठा एकरा स' निक हाथक' लट्ठा| मौगियाहा नैइतन गामपर रहि जाबत सुनि बाबूजीकs ताना-फज्जति ग्रेजुएशन भs गेलै दू पाई कमायत सेनै घुसियायल रहैत अछि घरमें जेना सेबने होइ सौरि मौगियाहा नैइतन| दू दिन भेल शहर ऐना गामपर कनैत अछि माय पछताई छथि बाबूजी फोन का कहैत ै मsए बउवा तमशा गेलहि कि................. नै माँ ..................... दाई कहै बड्ड बईमान भs गेलए बउवा आब तs फोनो नै करैछ……..| दिल्ली ई शहर छी,दिल्ली ... हाँ ! दिल बलाकs शहर दिल? दिल जतs भरल अछि सपना आ बचलाहा जगहमें धुवां सँ ई राजधानी छी धूवाँकs जकर शहंशाह ै कार्बनमोनोऑक्साइड| ई शहर छी हाथमें सिगरेट आ पेटमें धूवाँकs अतय नाकसँ निकलैत ऐ क्षिण होईत आयुक प्रतिकृति आ उड़ियाईतs चलि जायत अछि ओजोन परततक इन्तजारमें ऐ शहर कखन खसतs ओजोन आ बढ़ि जायत मकानकs भाड़ा आर बेसि बढ़ि जायत जैकेटकs बिक्री गर्मीमें रने-बने भगत लोकs अपनाके बचाबै लय सुरूजक पराबैगनी किरण सs तखन एकटा छत्ता बेचव दू सैय रुपैये कत्ते निक! कुमार रवि वर्षा मेघक संग एलैय वर्षा मेघक संग एलैय तकली काटैत चरखा चललैय आष करैत विस्तार पोखैर स खाई के देखी लागैय छै केहन पोखैर बहार वर्षा मेघक संग एलैय हैर गेल ओ पीठ देखा क भ्रमर संग केलक बिचार मकड़ा जाल क बुनि के कस्ती डुबेलक माँझधार वर्षा मेघक संग एलैय गाँम घर उजैड़ी के बिहैर घर बसेलक मांथक तौला फोरी क पनघट अलग बनेलक वर्षा मेघक संग एलैय नक्शा चौहद्दी उल्टा क छोड़ि रवि के संग अपन ढोल तुहीं बजा खूब पि क भंग वर्षा मेघक संग एलैय दीप जरेलूं रैत म दिवस भेल हेरान दु चैर टा सिक्का रैहि गेल बाँकी गिरल सुनसान वर्षा मेघक संग एलैय नीलमाधव चौधरी विदेह द्वारा संचालित "आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणी" शृंखलाक दोसर भागक घोषणा विदेहक 218 अंकमे भेल छल जाहिमे आमंत्रित कवि छलाह नीलमाधव चौधरीजी एवं आमंत्रित आलोचक छलाह कैलाश कुमार मिश्रजी। कविता आबि गेल मुदा टिप्पणी किछु कारणवश नहि आएल। अंततः कविक 56 टा कविता देल जा रहल अछि। नीलमाधवजीक कविता यदा-कदा प्रकाशित होइत रहल अछि जखन कि लीखै छथि बहुत दिनसँ। मैथिलीमे तँ एहन रेवाज रहलैक अछि जे जँ परिवारमे कियो साहित्यकार भऽ गेल तँ पूरा परिवार अनुचित रूपें ठप्पा लागल साहित्यकार भऽ जाइत अछि। ओना एहि रेवाजकेँ तोड़बाक सेहो प्रयास भेल अछि जकर दृष्टांत प्रो. हरिमोहन झा पुत्र जनार्दन झा जनसीदन आ राजमोहन झा पुत्र प्रो. हरिमोहन झा केर उदाहरणमे भेटत। जँ नव उदाहरण देखी तँ ई रेवाज तोड़बाक साहस नीलमाधव चौधरी पुत्र राजकमल चौधरी केलाह अछि। आ से अही बातसँ बुझा जाइत अछि जे राजकमल चौधरीजीक घर देखबाक बहन्ने संस्मरण लिखए बला आ राजकमलजीक पोथीक संपादन कए कऽ संपादक बनल लोक सभ सेहो नीलमाधवजीकेँ आगू अनबामे असफल भऽ गेला आब से एकर कारण जे हो मुदा एकटा पाठकक तौरपर ई क्रेडिट हम नीलेमाधवजीकेँ देबनि जे ओ मात्र राजकमलजीक पुत्र हेबाक कारणे अनुचित लाभ लेबासँ अपनाकेँ कात कऽ लेलाह। एहिठाम नीलमाधवजीक 56 टा कविता प्रस्तुत करैत ईहो हम कहब जे पहिल बेर एहि कविक एतेक रास कविता एकै संगे प्रकाशित भऽ रहल अछि। एहिसँ पाठक आ समीक्षक दूनूकेँ सुभीता हेतनि। पाठक आ समीक्षक दूनू लग एहि बारल कविक कविताक प्रवृति ओ प्रकृति एकै बेरमे बुझबामे एतनि। तँ आउ रसास्वादन करी एहि कविता सबहक- (प्रस्तुति आशीष अनचिन्हार) 1 ई उपराग के सुनत? हम सब कतेक अभागल छी अन्तिम दर्शन तक नहि कऽ सकलहुँ ओहि दादी के जे नहि जानि कतेक राति बिना नींद बीता देने होयतीह एतबहि लेल कि हमर नींदमे बिघ्न नहि हो ई दर्द हमरे नहि आजुक सभ पोता -पोतीक दर्द अछि मुदा कएल की जाय दादी रहैत छथि कोनो कस्बा कोनो गाँवमे कोनो अपन -कोनो आनक छाँवमे पोता-पोती एडीलेड,बिस्बेन,वॉशिंगटन,स्विट्ज़रलैंड बड्ड मुश्किल घुरि आयब अप्पन लैंड कएक टा काज जे छन्हि बड्ड जरुरी नहि करता तऽ जेतनि ई नौकरी केहेन ई मंदा के युग छै से सभ बुझले छन्हि पुनः कहाँ आबि हेतनि,सभ सुझले छन्हि बउआ आ बॉबी के पढ़ाई साफ भऽ जयतन्हि शिक्षक के बात कि बिद्यार्थियो बोकियतन्हि एक तऽ ओनाहिये एतय निम्न बुझल जाइत छथि जे अबैत रहैत छन्हि सेहो कहएमे धकाइत छथि पता नहि कहिया धरि ई धाक छुटतन्हि काश ई कारी चमड़ी हिनको उज्जर होइतन्हि दादी के लेल कोना धिया पुता क जीवन बरबाद करी बीतल काल्हि लेल आब' बला काल्हि कोना खराब करी मुदा एकटा संशय जीवए नहि दैत छन्हि दादी ओहो बनतिह से सोचि डर होइत छन्हि दादी के तँ सब अपने छलन्हि देशमे हम्मर कि होयत नहि जानि एहि विदेशमे | 2 जँ भेलहुँ पथभ्रष्ट सब तरि बात अधिकार के कर्तव्य नष्ट निर्मूल न्यायक आस तँ सब करैत अछि कानून बनल अछि शूल सत्य न्याय के बाटपर चलब कखनहुँ कहाँ रहल आसान जँ भेलहुँ पथभ्रष्ट तँ फेर समाजक कतऽ कल्याण सब धर्म केर मूलमे एक मात्र परोपकार एक दोसरसँ जुड़ल रही होइत रहय सपना साकार मुदा एहि वैचारिक अकाल अन्हारमे धिया पुताक पढ़ाइ कि नून रोटीक जोगारमे लोक-वेद , गाम घर दुनियाँ समाज बिसरल छी उचित अनुचितक विचार त्यागि धर्मक मार्गसँ उतरल छी एहनमे जिनगीक मर्म कोना बाँचल रहत बिना सत्य न्यायकेँ धर्म कोना बाँचल रहत 3 हम तऽ ठीके छी:सत्ते ? हम सब एतेक कोना बदलि सकैत छी जेना बदलि गेल छी कोनो आकर्षण नहि कोनो प्रतिरोध नहि जे जेहन करता से तेहन भोगता बड्ड संतुष्ट,बड्ड सहज बाप- भाय मीलि कऽ बहिन- बेटी संग नौ वर्ष तक अस्सी सालक संत सोलह साल कऽ कन्या मुदा हमर खून नहि खौलैत अछि अपनापर नजर दौड़बैत छी पहिनेसँ बेसी सशक्त भऽ गेल छी बेसी बुद्धिमान (समय आ अनुभवकेँ देखैत, ओना तँ) आ बेसी गुदकर मुदा पहिनेसँ बेसी असंतुष्ट असुरक्षित अपमानित नहि फरछाइत अछि प्रगतिक पथपर छी कि अवनतिक पथपर ? 4 घनघोर अन्हरिया जे बीति रहल ताहिपर तँ कोने गरे नहि दिन बीतलकेँ कोना बजा लैत छी सजल अछि महल रंग विरंगक प्रकाशसँ चन्द्रमा अचंभित छथि मनुक्खक प्रयाससँ आँखिक पर्दा नहि किए हटा लैत छी राति घनघोर अन्हरिया लोक सजा लैत अछि सुख दुख बिसरि दीवालीक मजा लैत अछि दूर कतऽ अहाँ अपनाक बझा लैत छी हएत तँ वएह जे एखन तक भेलै सुरुज डुबल राति भेल सुरुज उगलै भोर भेलै राति दिनमे एना किए मिला दैत छी । 5 संयोग ककरासँ प्रेम ई कहेन वियोग अछि हमर जिनगीक ई केहन संयोग अछि जकरासँ स्नेह करी ओकरेसँ होइत संहार अछि जकरासँ रहल विमुख ओकरेसँ उद्धार अछि 6 आर कतेक दूर भऽ सकैत अछि बाहरक हवा किछ दूषित होमय किछ लोक अप्प्न स्वार्थ लेल व्यथित होमय मुदा बिन प्रयासे की किछुओ भेटत जे अछि कि सेहो बाँचल रहत ऐना जे खिड़की केबाड़ बंद केने रहब हवा आ रोशनीपर पैबन्द लगेने रहब कहूँ कतेक दिन हम सब सही सकैत छी आर कतेक दूर तक रही सकैत छी? की इच्छा अछि कतय छी उलझल जागल छी कि छी अहाँ सुतल कतय जेबाक अछि कतय जा रहल छी मोनमे की अछि की सुना रहल छी अहाँ दैत छी ज्ञान पोथीकेँ जे पोथी हम फाड़ि चुकल छी संस्कारक पाठ पढा कऽ हमरा किए अहाँ मारि रहल छी हम मैथिल आब किछ नहि बुझब अप्पन मिथिला लेल हम जुझब बड्ड चुप रहलहुँ आब नहिं रहब बड्ड दिन सहलहु आब नहिं सहब 7 नव एहिना पनपत अछि तँ सब अंग सुरक्षित एना किएक अपंग भेल छी भरलहुँ तँ कतेक रंग जिनगीमे एना किएक बेरंग भेल छी की हित की बेजाय कहाँ किछु स्पष्ट तकैत रहलहुँ मृग मरिचिका भगैत रहलहुँ सरपट आब देश दुनियाँक हाल देखि एना किएक दंग भेल छी नव एहिना पनपत पुरानकेँ झरए पड़तै झहरि कऽ जेहन बीया खसत तेहने ने पौध बनत अपने रोपल गाछ अछि तखन एहि छाँहसँ एना किएक तंग भेल छी 8 नव परिभाषा गढ़ि सकय लिखल तँ जाइत अछि मुदा एहन कहाँ जे लोककेँ पढ़ब सिखबितइ जे पढ़ल छै ताहिपर दृढ निश्चय रहब सिखबितइ सबकेँ लेल सब एना किए कुक्कुर बानर अपने बेगरते अछि भेल विश्व आन्हर सामने की परोक्ष लोकक सम्मान कहाँ जे भंगठि गेल तकर कतहुँ निदान कहाँ लिखल गेल लोक लेल कि अपना लेल नहि हमर प्रश्न मुदा ई लेखनी नहि रोकि सकल समाजक पतन निश्चिते जे लोक नहि किछुओ पढ़ि सकल निज स्वार्थक परिधिसँ बाहर नहि निकलि सकल चलू होय प्रयास जे बेसीसँ बेसी लोक पढ़ि सकय जिनगीक सुंदर सन नव परिभाषा गढ़ि सकय । 9 मोनक तृष्णा लगातार चारि दिनसँ बरसैत पानि अकच्छ भऽ गेल अछि मोन ओना बारिसक मनभावन द़ृश्य बड्ड नीक लगैत छैक मुदा कखन जखन पेटक भूखसँ मोन व्यथित नहि हो जखन कोनो घावसँ देह पीड़ित नहि हो जखन नव तरुणि संग यौवन उमड़ल हो मोनमे उल्लास होमय जेब भरल हो मुदा एखन अहि अकलबेलामे जतय नून रोटी जुटेबाक समस्यामे प्रतिभाक एक-एक टा काठी जड़बए पड़ैत छैक जतय रोज बापक बीमारी मायक फाटल साड़ी बहिन-बेटीक बढैत उम्र चारु कातसँ घेरने रहैत हो कोना लिखी सकैत छी अपन प्रेयसी पत्नीक हृदय सागरक अथाह प्रेम वर्णन जीवन-आनंद के सूक्ष्म पवित्र दर्शन जतय फूल बनबासँ पहिने झहरि जाइत अछि कोमल-कोमल कोढी वॄक्ष बनबासँ पहिने सुखा जाइत अछि प्रेमक गाछ कोना लीखि सकैत छी श्रृंगारक कविता, प्रेमक गीत ओना जाड़क उन्मुक्त राति बड्ड प्रियगर देहक पोर पोरमे जागृत करैत अछि कामोवासनाक आगि जगा दैत अछि अंतर्मनमे नुकायल मनलग्गु दैत्यकेँ मुदा भवनाक लहरि तोड़ि दैत अछि यथार्थक क्रूर बोध काँपी कलम हाथसँ छुटि जाइत अछि यथार्थ कविक कल्पनाक सीमा नाँघि जाइत अछि चारि जोड़ी आँखि टुकुर टुकुर हमरे देखि रहल छल हम चुप- चाप घरसँ बहरा जाइत छी कोनो जोगार, कोनो व्यवस्थामे भीजल तीतल अवस्थामे अपूर्ण कविता अपूर्णे रहि जाइत अछि मोन क तृष्णा प्यासल, हारल, थाकल, निराश मोनहिमे दबि जाइत अछि | 10 एखन तक तँ अछि ई दवाई अछि कि गरल ई तँ समय बताएत मुदा ई निश्चित जे दिन बीतल नहि लौटि पाएत एखन तक तँ छी लाइनमे लागल डर अछि जे लाइन नहि बिगड़ि जाय एखन तक तँ अछि भूख प्यास जागल डर अछि जे भूख प्यासे नहि मरि जाय 11 सएह टा बात कोना भऽ सकैत हम सब बड्ड नीचाँ धसि गेल छी आ भगवान बड्ड उपर चलि गेलाह नहि भजन सुनैत छथि नहि आँखिक नोर देखैत छथि ठीके कलयुगमे आबि भगवानो बदलि गेलाह , ततेक जल्दी वातावरण कि प्रयोजन बदलि जाइत अछि उपराग दैत-दैत गारि, प्रार्थनामे बदलि जाइत अछि तखन कथि लेल एतेक व्यग्रता तखन कथिक एतेक प्रसन्नता तँ की हम सभ माटिक मुरुत बनि पड़ल रही बरू किछु होइक दुनियाँमे कम्बल ओढि सुतल रही भगवान दूर नहि बड्ड लग आबि गेल छथि क्रिया कलापक फल तुरंत दऽ दैत छथि कहाँ कोनो एहन नीक कर्म छल जे नीक भाग्य भऽ सकैत हमरे जे जे नीक लागय सएह टा बात कोना भऽ सकैत | 12 कते कम अछि भ्रममे अछि जिनगी कि जिनगिये भ्रम अछि सब तरि पसरल अछि अनर्थ केर ठहाकाक गूँज देख लिअ सबहक आँखि मुदा नोराएल अछि कतेक दिन बीत गेल एक छनक मुस्की लेल हँसीक लेल ठीके ई जिनगी कते कम अछि 13 बजट के भ्यु की ई सावन के घटा ई मन भावन छटा बिहुँसि बिहुसि डारि-पात गाछकेँ डोला रहल गाछक व्याकुल मोन मुसलाधार बरसात देखि जड़िकेँ आजमा रहल डाँड़ भरि डुबल गाछ ! फल-फूलसँ भरल गाछ | कहियासँ लाल किला ओहिना ठाड़ अछि देखलक कतेको प्रधानमंत्री कतेको प्रधानमंत्रीक अनेकानेक बेर बदलल रूप परिस्थितिजनक रूप कहियो कोनो राज्य मुख्य मुद्दा तँ कहियो कोनो , कहियो साउथक चर्चा तँ कहियो सिर्फ नोर्थ ईस्ट कहियो शिक्षा कहियो व्यापार कहियो कलाधन कहियो भ्रष्टाचार बात तँ कहलहुँ बड्ड नीक छोट मोट नौकरीक लेल इन्टरव्यू की ? जखन परीक्षा इंटरव्यू लेबहे पड़त तखन शिक्षा के बजट के भ्यु की ? शिक्षा आ स्वास्थ्य ई दुनू सेवा सिर्फ सरकारी हो नहि कोनो जाति धर्मक भेद नहि गरीबी अमीरीक फर्क नहि कोर्सेमे कतहुँ कोनो विविधता शिक्षा व्यापार नहि नहि शिक्षक व्यापारी हो नहि डाक्टर साक्षात यमराज नहि रोग कोनो महामारी हो शिक्षाक अर्थ पाइ कमाबय नै बनब संस्कारी हो मोदी जी एहि शापित शहरी जीवनमे चमक दमक माँलमेट्रोक कृत्रिम तिलस्ममे ओझरा गेल अछि मनुक्ख ताहिपर ई एहन झमठगर बरसात राजीव गांधीक "करेंगे, करेंगे" एखन तक रेंगिते अछि ई आश्वासनक हरियरी तँ ठीक मुदा एतेक नहि जे गलि जाय उत्कंठा उत्सवक बीच देखब कर्तव्य मर्यादा नहि बिसरि जाय | 14 दीपसँ अन्हार दीपसँ दीप नेसल जा सकैत अछि दीपसँ अन्हार मिटाओल जा सकैत अछि दीपसँ इजोत आनल जा सकैत अछि मुदा ई अन्हारसँ दीप जड़ेबाक कोशिश ई अन्हारसँ अन्हार भगेबाक कोशिश एहि धुआँमे तँ दीवालीक इजोतो बेकार दीया तँ नेसलहुँ आँखि खुलबा लय कहाँ तैयार | मोनमे जोशे नहि सजल अछि घर संसार जेबमे खिद्दी नहि विदा भेलहुँ हाट बाजार बिना युद्धे सीमापर नित्य शहीद होइत जवान हवामे प्रदूषण मुश्किल अछि बचनाय प्राण | 15 नहि रहल हँसबा, कनबाक समय कहिया खुलिक हँसल रही नहि याद अछि खूब जोर दैत छी दिमागपर कहाँ याद अबैत अछि कोनो खुशीक बात भेले नहि हो, से तँ नहि सवा करोड़ लोकक देश तीन सौ पैसठ दिनमे तीन सएसँ बेसि पाबनि-तिहार समाज परिवार सेहो कम झमटगर नहि राष्ट्रीय कि सामाजिक कि व्यवसायिक कतेक तरहक मनमोहक कार्यक्रम कतेक ब्याह दान, जन्मदिनक सुअवसर कहाँ खुलिक हँसि पयलहुँ मोनमे ई विचार चलिते छल कि तखने मोनमे नव प्रश्न उठल खुलिक कानल कहिया रही कएक टा एहेन घटना भेल जे हृदयकेँ अत्यधिक चोट देलक जुआन, बच्चा, हित-परिचितक मृत्यु देखबा, भोगबा लेल विवश भेलहुँ रोज सीमापर जवान तँ खेत देखि किसान शहीद होइत देखि सुनि मोन आक्रोशित भेल दू-चारि बूँद नोरो टपकल खुलि कऽ कानि कहाँ सकलहुँ बुझाइए आब नहि रहल हँसबा, कनबाक समय आब नहि रहल कोनो बातक हर्ष-विषाद, चिंता कि विस्मय 16 मोन छोट कऽ दैत अछि जहिना जहिना रंग चढैत छै तहिना तहिना उतरय छै ई दुनियाँमे सिद्ध बात जे जे फड़य से झहरय छै तखन ई रस्ता तँ अपने चूनल अछि आब गडल काँट तऽ माँ मोन पड़ैत अछि नहि गाउ फगुआ नहि कोनो रंग लगाउ एहि गीत एहि रंगसँ गामक गमक अबैत अछि नहि जानि किएक ई पाबनि तिहारि मोन छोट कऽ दैत अछि खुशीक एहन सन मौकापर मोन वेदनासँ भरि दैत अछि असगरे बुझाइत छी अछि भरल घर आँगन आब की हर्ष विषाद नहि रंग कोनो एहि आनन अछि बुझल नहि छै कत्तो खुशी मुदा छी हम प्रतीक्षामे परिणाम तँ बुझल अछि लागल छी परीक्षामे 17 माँ किछु नहि बाजल मोन होइत अछि पड़ा जाइ , भागि जाइ मुदा कतऽ आ किएक एहने सन स्थितिमे मायक कोरासँ प्रिय कहाँ किछु रहैत छैक एखनो याद अछि एक-एक शब्द एहिना बाप भागैत भागैत चलिये गेलखुन तहूँ भागि जेबह तँ भागि जा हमर की जकर देहरिपर रहबय घिसियाक फेकिए देत याद अबैत अछि कहियो माँक जेवर लऽ कऽ भागि गेल छलहुँ बम्बई मुदा नहि साहस भेल देखबितअइ कोनो सोनारकेँ प्राते भेने लौटि कऽ आबि गेल रही माँ किछ नहि बाजल नहि तमसायल नहि कनियो आँखि नोरेलै दुनियाँक सातम आश्चर्यसँ कम नहि माँ हमर एहने छल | 18 गाम गाम थिक भारतक कोनो गाम हो एक दिन एहिना पहुँचि गेल रही गाजियाबादक समीप रावणक गाम विशरख आ राजेश पायलटक गाम वेदपुरा कम्पलेन भिजिट छल संगमे कम्पनीक इंजिनीयर, ड्राइवर, गाडी शर्मा जी जतबे कुशल किसान ततबे कुशल व्यापारी बात फरियने नहि फरियबय क्लेम पचास के पाँचो मुनासिब नहि शर्मा जीक मृदुल स्वभाव , सत्कार स्वागत देखि ई तँ निश्चित जे शर्माजीक नुकसान नहि होइन मुदा अपन प्रतिष्ठा आ कम्पनीक प्रति निष्ठा सेहो देखनाय जरूरी छल अंतत: सब बात ठीके रहल मुदा जे मूलता: आकर्षित कयलक ओ छल ग्रामीण समाज एखनो ग्रामीण समाजमे पर्दा अछि प्रेम अछि अक्षर बोध भने नही होय मुदा बचल संस्कार अछि ज बिगड़ल अछि किछुओ तँ ओ सरकारी संस्था कि सरकार अछि चारि पाँच घंटाक बीच जाहि तरहक परिवेश देखलहुँ गाम घरसँ हजारो मील दूर मिथिले सन कोनो देश देखलहुँ किछु बात जरूर अजगुत जे इंजिनियर सिन्हा जीकेँ पसिन्न नै कुमार-वार छथि एतनि रातिमे निन्न नै मौगी सब मुँह तँ झपने छल मुदा छाती उघार छलैक व्यवहारमे शालीनता बोली लट्ठमार छलैक बहुत किछ अन्तर होइतहुँ मिथिलेक कोनो गाम सन लाल काकीक अँगना फढुँआ काकाक मचान सन कएक बेर कदीमा साबुत कि कदीमाक फूल तरूआ लेल लऽ गेल छी याद आबैत छल स्कूल ई तँ छल उजड़ल प्रदेशक उजड़ल कोनो गाम अपन मिथिला तँ स्वर्ग अछि ओहिना ने कहाइत अछि ई मिथिला धाम तखन बात पहिलुका आब कहूँ कोना रहत गाम की शहर अपने नहि पेट रहैत अछि पेटक संग कएक टा जुड़ल घेँट रहैत अछि 19 रहल अछि रौदी-दाही अन्हार आ इजोत जरूरी तँ दुनू अछि जखन जकर प्रयोजन तखन से भेटत कोना राति केर दिन केलहुँ दिन केर राति आब समयानुसार सुरूज चान उगत कोना खेत-खरिहान छूटल कलम बाग निपत्ता अँगना दलान छूटल खत्म भेल पोखरि खत्ता आब हवा पानिकेँ संरक्षण, शुद्धिकरण चाही दुनियाँ तँ ओहिना के ओहिना अछि सब दिने रहल अछि रौदी-दाही तखन एना किएक एको बेर मुँहपर मुस्की नहि अबैत अछि छोट छोट बातपर लोक कते पैघ पैघ लड़ाइ लड़ैत अछि | 20 माँ मने महिषी जखन जखन ठेस लगैत अछि मोन पडैत अछि माँ माँ मने महिषी माँ मने मिथिला माँ माने तारा माँ मने शीतला माँ मने गंगा मोन भेल चंगा माँ के चरणसँ पवित्र आर किछु कहाँ माँ बिन दुनियाँमे सुख कतहुँ कहाँ | 21 पैघ-पैघ लक्ष्य अछि जे कष्ट छल से तँ रहिये गेल झुट्ठे फुसलेबाक कोशिश करैत अछि कखनहुँ एम्हर तँ कखनहुँ ओम्हर टहलेने अछि अनेरे अजमेबाक कोशिश करैत अछि जंग लागल छै सत्ता जर्जर छै भेल तन्त्र चाही पारदर्शिता डेगे-डेग भरल षड्यंत्र सब चोर संसदमे मुलुर-मुलुर तकैत अछि शाहक शाह जोड़ी कि कियो आने फसैत अछि पैघ लक्ष्य छै कने कष्ट बरदाश्त करू ऊँच-नीच छोडू एकताक बात करू मामला गंभीर छै नित्य बुझेबाक कोशिश करैत अछि 22 नमन करू संस्कृति संस्कारकेँ आजुक नेना नेनपन बिसरल माय बापसँ रहत छिटकल-छिटकल वजन बराबर बस्ता उघय मध्य रात्रि तक तैयो नहि ना उघय डर मैडमक करेजमे पसरल नहि रहय जागल नहि रहय सूतल बंद करू एहि शिक्षा व्यापारकेँ नमन करू संसकृति संस्कारकेँ 23 ककर दोष? अन्हरिया रातिक एहि शून्य बेलामे कहियो जन्म लेने छलाह कारी कृपा निधान कृष्ण पाछा देखैत छी बस हमर पदचिह्नक स्वर कतेक आगू आबि गेल छी कि लौटब संभव ? आगू अथाह दुर्गम बाट हमारा असगरे पार करए पड़त एहि गँहीर सागरकेँ एकटा आमक गाछपर नजर जाइत अछि आह केहन मधुगंध बरसा रहल छल पल-छिन लेल मोन भावविह्वल भऽ गेल परन्तु हवाक तीव्र झोंखासँ खसि पड़ल बहुत रास आम्र मज्जर आह वएह खसल मज्जर तँ नहि हम सत्ते कते क्रूर अछि प्रकृति ना ना नाहि नाहि ? ककर दोष? ओकर वाल्यपन के की ई हवाक झोंखा के नहि सोचि पबैत छी हम हमर दोष की युगक प्रवाहकेँ ? 24 दीप चाहे कतहुँ जरय जिनगी ककरा कहैछ जिनगीक माने की लोक उजड़ल सभ ठामसँ हमहीं अहाँ नहि उजड़ल छी मुदा फर्क अछि जेना हम सब बसल रही की तहिना आनो आन बसल छल ? परिवर्तन जीवनक मूल अछि सामर्थ्यवानक लेल समय सदैव अनुकूल अछि मुदा ई सामर्थ्य ककरो संग कतेक दिन बालपन,जुआनी आ वृद्धावस्था जहिना सत्य तहिना ध्रुवसत्य जे अन्तिम साँस तक अप्प्न भाषा , अप्पन माँटि पानि अप्प्न लोक-वेद अपने अछि हाँ एतबा जरूर जे विकासक भीषण छद्म मानवताकेँ झँपने अछि होइक सम्मिलित प्रयास जे मिथिला मैथिली बाँचल रहय इजोत सब तरि हेबाक चाही दीप चाहे कतहुँ जरय | 25 ओकर जीवन राति अन्हार अछि मायाक संचारसँ सर्वत्र ई प्रचार अछि लोकलाजसँ वंचित हमर ई व्यापार अछि लोक जे कहय हमर जीबाक आधार अछि नइ चाहैत करैत छी नित्य पाप अछि जीवन हमर बनल अभिशाप नहि जानि ककर ई पड़ल श्राप यैह जीवन अछि यैह दुख:संताप 26 बीच मुहान छोड़ि कऽ आँखि लगले छल ओ कहलनि भोर भऽ गेल नाम सुनतहि भोरक मोन घोर भऽ गेल एना किएक जे रातिए राति नीक लगैत अछि बीच मुहान छोड़िक कोन कात ठीक लगैत अछि सब तरि पसरि रहल अछि आगि आ मोम भेल जा रहल छी आकांक्षाक बजार गरम जेब नरम रूकब कि झूकब कहाँ ककरो मंजूर पाछू लागल आगि अछि बस उड़ल जा रहल छी | 27 नहि अप्पन नहि आन करू एखन तक तँ बात, मात्र जोड़ए केर कएल गेल तखन तँ ई हाल घरोमे बिलायल छी* आ तोड़ब तँ तोड़ब की लोक अपने टूटल अछि बीझो केर बाटमे नहि कतहु ब्राह्मण भूखल अछि उनटे निमंत्रण भेल पराभव छय छूट्टीक बात माने नौकरी ताकब छै अंश भरि ओहि योगदानक सम्मान करू माँ मैथिली बसथि हृदयमे नहि अप्पन नहीं आन करू (*दरभंगो, सहरसामे लोक मैथिली नहीं बजैत अछि) 28 किछु एहिना बीतैत अछि किएक नहि बुझैत छी मधुश्रावणी, पंचमी किएक नहि बुझैत छी छोड़ि किछु लक्ष्मी किएक नहि डर बाढि , भूकंपसँ किएक नहि डर भय , आतंकसँ किएक नहि डर आक धथूरसँ किएक नहि डर देवता पितरसँ किएक तँ हमरा फुरसति नहि जिनगीक बबालसँ जीविका की चकारी की पारिवारिक जंजालसँ किछु एहन सन जिनगिक हिसाब-किताब व्यर्थमे व्यस्त रहू जबरदस्त तनावग्रस्त रहू दिन रति एक केने छी मुदा बिन ककरो से नेने नहि कोनो महीना बीतैत अछि छोड़ू की सूनब बहुत लोकक जिनगी किछु एहिना बीतैत अछि | 29 नहि पछाड़ि सकलहुँ निन्न भूखकेँ खूब बुझैत छी किएक नित दिन बढैत जाइत अछि चपलता , किएक नहि पूर्ण भेल हमर सेहन्ता कहाँ कहियो खुलि कऽ जिनगीक भार सम्हारि सकलहुँ निन्नेमे सब स्वप्न जरि कऽ खाक भेल , खूजल आँखियो कहाँ कनियों निहारि सकलहुँ । जिनगीक असंख्य रूप लोको रंग विरंगकेँ कोनो रंगमे नहि मुदा अपनाकेँ निखारि सकलहुँ जे भेटल से रूचल नहि जे रूचल से पचल नहि अपने निन्न भूखकेँ नहि पछाड़ि सकलहुँ 30 माँ मैथिली अहाँकेँ कोना बिसरि सकैत छी माँ मैथिली अहाँकेँ कतहुँ जे कियो भेटैए अहाँकेँ नहि गेल देखल छौंड़ा भूखल भागि एलहुँ परदेश भेट गेल नमहर झोरा जे नहि भरैत अछि कहियो हम गदहा घोड़ा मुदा तँइ कि, माँ मैथिली अहाँकेँ बिसरब कतए जाएब फेर कहू माँ जँ फेर हम खसब हाँ दुःख अछि जे भेटल हमरा शिक्षा संस्कार नहि भेटि रहल धिया पुताकेँ ओ सुदृढ़ आधार नहि बुझि रहल अछि ओ अहाँक महिमा उद्गार नहि जानि किएक नहि भेल अहाँक प्रचार प्रसार एहि दोषक प्रायश्चित कहू माँ कोना की कएल जाय जे जेना जाहि मजबूरी बिसरि अहाँकेँ बैसल छथि हुनका घर बजायल जाय | 31 लोक परेशाने टा भेटत तीव्र गतिसँ भागल जा रहल अछि समय नहि पकड़ि पबैत छी जीवनक सुर ताल लय परिवर्तन तँ संसारक शाश्वत नियम अछि ई रूकत से तँ संभव नहि मुदा सार्थक बीतय से किए नहि भ रहल अछि रात अन्हार दिन अन्हार भोर साँझ कहाँ भऽ रहल अछि किएक मोनमे बात जे मात्र नुकसाने टा भेटत जिम्हरे कदम बढ़ाएब लोक परेशान टा भेटत किएक नहि मोनमे आस जे सभ बिहुँसैत भेटत किएक नहि ई विश्वास जे लोक बाट तकिते भेटत लोक निर्मल अछि मिथिलाक प्रेम सत्कार बचल अछि माँ मैथिली के कृपासँ लोक लाज बचल अछि मूल मुद्दा मुदा जे पलायन रोकब कोना जे बिसरल छथि कुल-शील हुनका टोकब कोना छुटतहि कहता कहू किछु अपराध भेल जीबि रहल छी की ई नहि विश्वास भेल कोना बुझता की कहियनि किएक नोयडा सन बंजर जमीन सोन भेल अछि अर्थतंत्रक चक्रव्यूहमे फँसि प्रतिभा मोन भेल अछि 32 मोन परतारि रहल छी बात एतबे सत्त जे सभ झुट्ठे घूमि रहल अछि नीक कि बेजाय जे बुझायल अप्पन तकरे चूमि रहल छी मुदा एहि छन किछ भेल परिवर्तन बड्ड जल्दी बदलि गेल आन आ अप्पन कतेक सम्बन्ध लुप्त भेल कतेक नव गढल गेल ओहि लुप्त सम्बन्धकेँ एहि गढ़ल नव रूपसँ जिनगी सम्हारि रहल छी हरियर पीअर बातसँ मोनकेँ परतारि रहल छी | 33 गप्प अन्हारमे अन्हारक गप्प हमर अन्हारसँ हुनकर अन्हार बेसि घनगर बेसि प्रियगर अन्हारमे होइत अछि नाना तरहक घटनाक्रम अन्हारमे होइत अछि पैघसँ पैघ पराक्रम एहन उदारता एहन समानता कतहुँ नहि केहनो पुरान गुरू केहनो नव शिष्य सबहक सामने एके रंगक दृश्य सबके एकेटा दुःख कोना एहि अन्हारमे मात्र अपने लेल अपने टा लेल इजोत आनल जाय ईश्वरसँ कि सृष्टिसँ अपन सुरक्षा मात्र अपने टा सुरक्षा माँगल जाय कोनो दधिचि ,कोनो कर्ण कोनो भीष्मक अराधनामे लागल अछि विश्व कोनो न कोनो साधनामे मुदा आब ओ दधिचि कि दानवीर कर्ण कहाँ मानव धर्ममे विश्वास होय आब से वर्ण कहाँ ? 34 कहैत तँ छलैए ई विश्व अप्पन आखिर ई हाल किएक पिछला किछु समयमे जहिना घृणित लोकक संख्या बढ़ल अछि तहिना नीक लोक धन प्रतिष्ठाक लोभमे खराब बनबा लेल बेचैन भेल छथि ढीठपन तँ देखियौन जे सबकेँ बुझल बात परिणाम कोनो हाले नीक नहि सेहो विकासक नामपर नीक भऽ जाइत अछि जाती धर्मक बात छोड़ू सब घर बाँटल अछि मन्दिर-मस्जिद तँ चमकि दमकि रहल गीता-कुरान नाथल अछि भूकंप त्रासदीसँ पार पेबाक कोशिशमे नेपाल ओह, ताहिपर आब ई बबाल मोन भेल उद्वेलित अछि एहन ज्ञान , एहन प्रगति कहू कतए केर रहि गेलहुँ कहैत तँ छलैए ई विश्व अप्पन घरक तँ नहि अप्पन रहि सकलहुँ? 35 भरोसपर जीबि लीअ स्वाद जिनगीक देखू आब बदलि गेल अछि माउस छोड़ि दियौ आर सोनित पीब लीअ महीना दू महीनामे एक दिन बनत रोटी भात बाँकी दिन गोलीक भरोसपर जीब लीअ जँ चाही मॅाल मैट्रो पिज्जा बर्गरक जिनगी तँ बेसी नहि एतबा करू मोनकेँ मारि लीअ मूँहकेँ सीबि लीअ 36 पाथरपर बसंत आयल बसंत मुदा भेल कहाँ कष्ट केर अंत छिड़िआयल डेग डेगपर ओहिना अछि बाधा अनन्त कोनो बातक असरि नहि एहनो कतहुँ भेलैए पाथरपर कहूँ बसंत एलैए ज्ञान-बोध कुंठित ताकि रहल छी मेवा सब तरि तकैत छी माँकेँ अछि बिसरि गेल सेवा एहि हालमे ककरो संपूर्ण सुख भेटलैए पाथरपर कहूँ बसंत कतहुँ एलैए फूल बनबाक कहाँ सेहन्ता बचल अछि गाछ काटि प्रगतिक सड़क बनै सभक इच्छा बनल अछि कल्पनाक सागरमे नव नव कमल फुलाइए पाथरपर कहूँ बसंत कतहुँ एलैए अछि उपजल मधुबन बस काँट कूस भारी काल कोठरीमे बंद गरीबक सोहारी कहाँ ओकर चूल्हिसँ एखन धधरा उठलैए पाथरपर कहूँ कतहुँ बसंत एलैए चाही बसंत तँ भाय गाछ फूल बन पडत बिसरि कुड़हरि टेंगारी मज्जरसँ देह भरए पड़त फूलक जिनगीमे कहूँ कतहुँ काल्हि भेलैए पाथरपर कहूँ कतहुँ बसंत एलैए 37 कहाँ ओ मनुक्ख किछुए दूर तक जेहन चाहैत अछि तेहन बाट चुनैत अछि मुदा किछुए दूर तक फेर कहाँ बाट कि जिनगी अप्पन रहैत अछि सोन बेचि माटि खयबा लेल होइछ विवश फेर कहाँ ओ मनुक्ख कहूँ मनुक्ख रहैत अछि 38 आँचर तर सहेज मुंडे मुंडे मतिर्रभिन्ना दिन राति आफत भेल दूना आब आफते के भाग्य मानि बैसल छी कोरो तक जाड़ कऽ खएबामे नहि संकोच हाल सुधरत से निश्चय जानि बैसल छी बिहारक नामपर मिथिलाक बद्ध भेल मैथिल सब नेता भेला लोक करबद्ध भेल सेंट्रलमे ललित बाबूक छवि छल महान छलल गेला अपनेसँ विधिक छल विधान मुख्य मन्त्री मिश्राजी मैथिलसँ भरल बिधान सभा मधुबनी दरभंगा छुटि गेल बिसरि गेल लोक सौराठ सभा तकर बादक तँ फेर पूछू नै केहेन ने केहेन कांड भेल बिकाय लागल पटना स्टेशन श्वेतनिशा उर्फ बाँबी हत्याकांड भेल ललित बाबू छोड़ि नहि कियो देलनि मिथिलापर ध्यान भोट लेल बस मिथिला प्रेम पाग पहरि शुरू करथि अभियान मिथिलाकेँ अछि मैथिले बिसरल नहि आनकेँ मिथिलासँ परहेज बेटे त्यागथि बूढ मायकेँ जे रखलनि आँचर तर सहेज | 39 काजर भरल नयनकेँ देखू काजर भरल नयनकेँ देखू कि देखू पूर्णिमाक चन्दा देखब पीठ पाछु कियो करय ने निन्दा कारण ऐखन देशक गरामे लागल छैक फाँसीक फन्दा झंडा फहराबैत देशक राजनेता राष्ट्र-गान गबैत भुखल प्यासल जनता बुझैत नहि पुरल स्वतंत्रताक सेहंता नेताजीक संग तँ देबहे पड़त देश समाजक तँ वएह छथि भाग्य नियंता तिरंगा जे प्रतीक अछि स्वाधीनताकेँ ओकर हरियर आ केसरिया रंग तँ ओहिना गाढ़ अछि मुदा उज्जर रंगक आगू जेना कियो ठाढ़ अछि सत्ते गौर करियौ वएह भ्रष्टाचार अछि जतैक दबबैत छी ततबे बढ़ल जाइए मौनमे उठैत अछि विचार देशक लेल करी किछु काज स्वीकार मुदा धरमक सेवक छी करू कोना अत्याचार मुदा आब जंगमे आबय पड़त सुतल धरतीकेँ जगाबए पड़त दुष्ट दानवक पराजय लेल उठबए पड़त कटार पाबय लेल निज अधिकार 40 अपने अपन हंता सहजतासँ नहि किएक किछुओ मोन स्वीकार करैत अछि किएक बुझाइए सबके संग सब, बस व्यापार करैत अछि बात एक एक टा गंभीर मुँहपर गजब केर चिन्ता हृदय ततबे बहीर अछि बनल अपने अपन हंता करत ई कलम की जँ सामने तरुआरि अछि नियम तँ सब नीके कहूँ के मानए लय तैयार अछि अड़सठ साल पहिने किछु एहन सन संरचना भेल विद्वान, भद्र-जन भेला कात मूर्ख लठैतक वन्दना भेल कर्तव्यक मात्र बात रहल अधिकार भेल निपत्ता के छथि ई अन्वेषक ई केहेन अभियंता अप्पन के अपने संहार करैत अछि सहजतासँ नहि किएक किछुओ मोन स्वीकार करैत अछि 41 दोसर गाल बढ़ायब दुःख नहि होइत अछि जखन कोनो आई ए एस कि आई पी एस कोनो बेईमान भ्रष्ट देशद्रोही नेता-मंत्रीसँ थापर खाइत अछि दुःख नहि होइत अछि जखन कोनो कर्नल लेफ्टिनेंट कोनो जवानकेँ हिस्सा खा पचा लैत अछि दुःख नहि होइत अछि जखन कोनो देशद्रोही नेता, कैबिनट मंत्री राष्ट्रपिता गांधीकेँ गरियबैत अछि कारण हम सब गांधीकेँ मोन नहि राख चाहैत छी गाँधी जीक मृत्यु आजाद भारतक पहिल हिंसा छल तँ शास्त्री जीक मृत्यु पहिल षडयंत्र इन्दिरा तक अबैत अबैत तँ गाँधी जी बस वोट की नोट लेल कहाँ हुनक मार्गपर चलबाक भेल प्रयास गाँधीजीक चश्मा कियो लऽ सकैत अछि गाँधीजीक चरखा कियो लऽ सकैत अछि मुदा गाँधीजीकेँ गाल पायब आसान नहि एक गाल पर लागल चोट छनमे बिसरि दोसर गाल बढ़ायब आसान नहि। 42 टूटि चुकल छी हम सब टूटि नहि रहल छी टूटि चुकल छी वैह टा करैत छी जे सरकार चाहैत अछि गाम घर दुनिया समाज प्रेम-घृणा, लोक-लाज लोक वेद टोल परिवार रीति रिवाज पर्व तिहार सब छूटि चुकल अछि सत्ता वर्ग बुझैत अछि हम सब किछ एहेन बन्हनमे बन्हि जाइत छी जे तोड़ि नहि सकैत छी मोह-माया हित-अहित लोक-परलोक वाय-पित्त छोड़ि नहि सकैत छी एहेन ई शासन सत्ताक गुप्त षड़यंत्र कि हम सब आलासी , स्वार्थी नपुंसक भेल जा रहल छी कतहुँ कोनो प्रतिरोधक आवज नहि जँ अइछो तँ समवेत नहि हजारों ,लाखो , करोड़ोक भीड़मे सब एसकर आ एसकर तँ वृहस्पतियो झूठ | 43 अहाँ नहि रुकि सकब नहि जनैत छी अपन अधिकार नहि माँगैत छी हम अहाँसँ न्याय बस एतबै प्रार्थना अछि हमर दोष बतौने जाऊ जिनगी बड्ड छोट होइत छैक सेहो नहि निश्चय कखन मौत आत्मसात कऽ लेत किछ बुझल नहि किछ देखल नहि ओना तँ जीबाक इच्छा तहिये मरि गेल जहिया अस्वीकारलक अहाँक हृदय हमर प्रेमातुर मोनकेँ मुदा उम्मीद अछि अहाँ लौटि आयब समय नहि अछि किछु छन रुकि कऽ पाछु मुड़ि कऽ देखबाक अहाँ व्यस्त छी हमरा संग जिनगी बेकार नहि करए चाहैत छी हम बुझैत छी नहि बुझैत अछि जिनगीक पिपासा लोक दुनियाँ समाज हमर अहाँक विवशता अहाँ नहि रुकि सकब मुजरा के तानपर वेश्याक गानपर शराबक दुकानपर अहाँ लौटि आयब मिथिलाक आनपर एहि टूटल मचानपर ढलान लैत दलानपर गामक सीमानपर। 44 हमरा चाही इलाज कहैत अछि युवा राष्ट्रकेँ बिगड़ल लोकतंत्र यौ नेताजी अहाँके चाही काज हमरा चाही इलाज बात कहू बनत तँ बनत कोना अहाँकेँ चाही स्वराज हमर अछि सर्वसमाज बात कहू निभत तँ निभत कोना भेल छलहुँ जखन स्वतंत्र भेटल छलै जनताकेँ उत्तम शिक्षा स्वास्थ्यक नि:शुल्क सुविधा जीवन तहियो कठिन छल छल तखनो दुविधा मुदा आस्था आ विश्वास प्रेम, अपनत्व बनल छल दूर रहितो लोक गाम-घर लोक-वेदसँ जुड़ल छल ग्रामीण की शहरी शिक्षित लोक संस्कारी होइत छल आम जनताकेँ लेल प्रतिष्ठित लोक सरकारी होइत छल किछुए दिन बाद मुदा बजार तेना हावी भऽ गेल शिक्षा, स्वास्थ्य की लोकक जिनाइ भारी भऽ गेल सत्ताकेँ रोकबाक चाही मुदा से कहाँ भेल अपने सबहक चरित्रहीनतासँ सत्ता अपने खेल भऽ गेल 45 यत्र तत्र सर्वत्र कष्ट होइत छैक ककरा आ किए होइत छैक ककरा बुझबाक चाही आ समय ककरा ककरा बुझा दैत छैक आदमी आ आदमीमे एतेक फर्क किए एकटा लूटै छै दुनियाँ एकटा लुटा दैत छैक चुप रहैत छी तँ आत्मा कानि जाइत अछि किछ बजा गेल तँ जिनगी विपरीत भऽ जाइत अछि बिन बातेक लोक बात बना दैत छैक आब नहि साहस नहि ओ पैरूख अछि बाँचल यत्र तत्र सर्वत्र चिंताक बर्छी अछि गाँथल हाल ऐहनमे कोनो इच्छा व्यथा होइत छैक नहि भरोस करू कनियो नहि विरोध करू कनियो जिनगीक किछु एहने सन कथा होइत छैक 46 जुनि करू खट-पट मोन भरियाइत अछि जतैक सोचैत छी मोन ओतबे बौआइत अछि कलम रुकि जाइत अछि कविताक लीक टुटि जाइत अछि मोनमे उठल भावना कऽ लहर-गति रुकि जाइत अछि जुनि करू खट-पट मोन भरियाइत अछि कतेक जतनसँ लिखल दू पाँति आइ दूनू पाँति वियोगक दू पोथी बुझाइत अछि अहाँक शृंगारमे छलहुँ कखन लीन हम ओहि समयकेँ ताकमे राति बीति जाइत अछि जुनि करू खट-पट मोन भरियाइत अछि आपसक झंझट छल अपनहि सम्हारि लीतहुँ कोना मोन मानलक सभ छोड़ि चल जाइत छी छनहिमे तोड़ि मान -मर्यादाक सभ धनुष विवेक छोड़ि बिना पूँछ पशु बनि जाइत छी हमर अश्रु-पूर्ण आँखि बाट तकिते रहि जाइत अछि जुनि करू खट-पट मोन भरियाइत अछि देखू ई जीवन छै सुख दुःख केर संगम सुखक अनुभूति बिना दुःखकेँ नहि होइत अछि एना जे मानव दुःखसँ पड़ाइत घूरत जिनगीक बृह्त ज्ञान ओकरा कहाँ होइत अछि भीजेबै तखन ना सूखत , सूखल तँ टटाइत अछि जुनि करू खट-पट मोन भरियाइत अछि 47 लोके बदलै साल बदलल हाल बदलत सोचैत तँ सब साल छी हम कि बदलब लोके बदलै ततबे लेल बेहाल छी नियमे नित्य धँसि रहल छी डेग डेगपर फँसि रहल छी बढल अछि क्लेष भेटैत अछि उपदेश सब कहैत अछि हम की करबै अपने ओझराएल महाजाल छी रामकेँ पढलहुँ कृष्ण के पढलहुँ गीता बाइबिल कुरान उलटलहुँ सबतरि लीखल एक्के भाषा जीवन कि प्रकृति ईश्वरक देल अमूल्य धन नष्ट करबा लेल हम सब स्वयं बनल महाकाल छी 48 मर्म बिसरि गेल छी रोज किछु ने किछु हेड़ाइत अछि रोज किछु ने किछु भेटैत अछि जे हेड़ाएल सेहो नहि अप्पन जे भेटल ओहो नहि अप्पन मुदा एहि हेड़ेनाइ आ भेटनाइमे जे समय बीतैत अछि से नितांत अप्पन मुदा ओहो कतेक अप्पन नीक बीतय एहि से बेसी की चाहब सहेजब की आ सहेजि कऽ राखब की तखन, नहि कनियो नहि नहि भसियाल छी ? नहि हेरायल छी ? नहि भुतियाल छी ? कहि कर्मक प्रतिफल कर्म बिसरि गेल छी साँस तँ चलैत अछि जीवनक मर्म बिसरि गेल छी जतेक सहन करब तकेक कष्ट भोगब जनता जनार्दन जागू प्रतिरोध प्रतिकार करू व्यर्थक नहि व्यर्थ के जय जयकार करू इतिहास कलंकित हैत जँ आबहुँ मोन रहब दुनियाँ नहि पुछत जँ अपने घरमे गौण रहब मिथिला की मैथिल ताधरि बचल रहत जाबत जीबैत रहती भाषा अप्प्न मैथिली एतबा प्रयास होय जे मातृभाषाक ज्योति नहि क्षीण होय हरेक मैथिल नेना बुझय कि होइछ टिकला कोइली | 49 एतबे अनुसंधान चाही छूबि कऽ देखियौ ई पाथर,पाथरे रहत विरह, दुख, चिंता कि सुख शान्ति सेहंताक आखर नहि भऽ सकत आब नहि कोनो अहिल्या राम अहाँक प्रतीक्षामे आब नहि कोनो सीताक रूचि वनवास कि अग्नि परीक्षामे आब नहि एहि दुनियाँकेँ उचित-अनुचितक ज्ञान चाही कोनो प्रयत्ने पैसा झहरै बस एतबे अनुसंधान चाही | 50 आजुक दिनचर्या आइ लिखू तँ लिखू कि मोन अछि उदास भोरसँ साँझ धरि रहल अछि उपास भोरे भोर वो कहलनि मुनियाँ परल अछि बीमार देखेबैय नै डॉक्टरसँ करबैय नै कोनो उपचार मनोहरकेँ सेहो देलकनि स्कूलसँ निकालि पोथि नहि छन्हि, जेहो छलन्हि सेहो लेला फाड़ि धिया –पुता के नहि अछि अहाँकेँ कोनो परवाहि मुदा भरि दिनमे पीयब दस बेर कऽ चाह अहाँक संग मुश्किल अछि आब हमर निर्वाह सम्हारू अप्पन घर द्वार बरू कऽ दियौ सुड्डाह कहलियनि हुनका जे एतेक जुनि तमसाऊ अहाँ भगवानपर भरोस कऽ भोजन-भात बनाऊ अहाँ डॉक्टर साहबकेँ छी हम तावत चूल्हापर एक बेर चाय चढाउ अहाँ कहलन्हि ओ, हमरा संग जुनि करू बकवास बुझलहुँ चललहुँ खेलेयबा लेल ताश बड्ड धर्म केने छलहुँ, जे भेटल अहाँक संग हे भगवान उठा लिअ पुरि गेल जिनगीक सब आस हम कहलियन्हि यथार्थ मुदा बुझलयन्हि ओ व्यंग्य एकरा डेहरी पर ठाढ़ भऽ करए लगली झगड़ा हाल हमर देखि मित्र सभ मुस्काइत छल किछु ने बुझाइत छल स्थिति अप्पन कहब ककरा सत्ते हमरा सन लोकक ई केहेन मजबूरी छैक एक टा पाय नहि हजार टा जरूरी छैक 51 पसरल बादल देहक दर्द,मोन नहि बुझल रहल मोहमे डुबल सदिखन व्याकुल सदिखन उलझल आर कहाँ किछ सूझल अपने करेजकेँ भुजि-भुजि खाय की सीझल की पाकल नोर नयनकेँ घोरि घोरि पीबी रहल आत्मा प्यासल एसगर सुतल रही पलंगपर देखलहु सब किछु भीजल दूर छिटकि गेल चान गगनसँ सब तरि पसरल बादल 52 टघार चिनवारसँ टघरल पिठारक टघार जखन खूनक धार बुझाए लागय पडोसीक आत्मघाती व्यवहारसँ साकार जखन अप्पन हार बुझाय लागय बजारसँ कीनल उधारक हथियार जखन अप्प्न कपार बुझाए लागय बुझि लीअय धर्म विलुप्त भऽ रहल अछि बिना धर्म बगदादी कि ओसामा तँ संभव मुदा असंभव अछि विवेकानंद कि टैगोर भेटब | 53 थाह जिनगीक टूटल डंटीक कपमे राखल दू घोंट चाह नहि जानि कखनसँ सेरा रहल छल जेना हमर जिनगी एक घोंट चाह जिनगीक थाह 54 आत्माक हनन बसात पुरबा बहय कि पछबा बहय ई रुकि रुकि चलय कि निरंतर चलय घर हमर अहाँ तक पहुँचैत कहाँ अछि रोकि लैत अछि बाटेमे बड़का बड़का महल जाहिमे इमहरसँ उमहर घुमरैत रहैत अछि कहू करब की लऽ कऽ ई भोर जे रातुक अन्हारसँ अछि बेसी कठोर नहि गाएल जाएत प्राती लागल अछि दाँती बौक बताह बनल बस टुक टुक तकैत छी हँसि लिअय बाउ आइ देखि हमर स्थिति हम अहाँक भविष्य देखि कानियो नहि पबैत छी । यौ उठि कऽ ठाढ होउ देखियौ केहन इजोत छै आबि रहल अछि केकटा सुरुज चान अकास ई आओत अपने आँगन अपने मिथिलामे देखब लिखत नव इतिहास नव निर्माण क रूप रेखा अछि बनि रहल सबहक मोनमे जे एखन तक बनैत छल बाध बन कोनो कोनमे परदेशीक दंश कतेक दिन सहन करत पेटक ज्वालाक शांति लेल कतेक दिन आत्माक हनन करत । 55 शांति बनल हाहाकार अछि प्रीत तँ सब दिनसँ स्वार्थक प्रतीक थिक , की निक की बेजाय सब भाग्यक ट्रिक थिक समयक संग सब किछु सब दिन बदलैत रहल रीति-रिवाज,पाप -धर्म समयानुकुल बदलैत रहल सब दिन लिखल गेल निक-निक ग्रन्थ सब दिन होइत रहला एकसँ एक महान संत तखन पाप कोना एतेक बढ़ि गेल सत्य चढ़ल फांसी झूठ गद्दी चढ़ि गेल अर्थतंत्रक चक्रव्यूहमे हताश आदमी बेहिसाब फँसैत गेल सुख , संतुष्टि आ सुरक्षाक आसमे मौनक शांति बिसरि गेल सुख कतऽ,सुख कथि के ? देहकेँ ,पेटकेँ की मोनकेँ की क्षणिक सुख की सर्वकालिक की धार्मिक की चमत्कारिक संतुष्टि , ओह जरूरीसँ जरूरी काज नहि क पबैत छी कहाँ छनो भरि लय अप्पन आकलन करैत छी सुरक्षाक बात तँ केनाय आब बेकार अछि घर बाहर आतंक मचल शांति बनल हाहाकार अछि | 56 हमरा लेल : हम्मर गाम गाँव आब हमरा लेल वीरान भऽ गेल हम्मर गाम हमरा लेल मरि गेल बाबा मुइला भेल सब काज गामेमे पिता मुइला भेल सब काज गामेमे मुदा दादी आ माँकेँ नहि गाम देखा सकलहुँ गामक माँटि पानिकेँ नहि कर्ज चुका सकलहुँ नहि बुझि सकलहुँ कोना की भेल मुदा सरिपहुँ गाम हम्मर बहुत दूर छूटि गेल 1044 || विदेह सदेह:२० विदेह सदेह:२०|| 1045

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_ जलाशयक पेनीक माटिमे आधा गड़ल "Water खितुआ" (खुर्चनिक मुँह आंशिक रूपयेँ फुजल अछि)

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साभार सौजन्य - pixabay.com (free download) एक 5 प पे Pa oor... डिक हि be Shae Bs कर Se [3 Be . 4 ieee oe x = 4 Pas 3 न = Pisabay.com (free download) मैथिली - गिरगिट हिन्दी - गिरंगिट संस्कृत - कृकलास, कृकवाकु, शरण्ड, प्रतियूर्य, प्रतिसूर्यशयान, गलगति (2) अंग्रेजी - LIZARD (Including COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON, IGUANA & OTHERS) जैववैज्ञा० नाम - SAURIA SUPERGROUP of SUBORDER LACERTILIA (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नांओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नंओ भ$ जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

-~ 3 7 as & eo”, : A 6S 3 Rec ee a agdg गिरगिटक (खास DS CHAMELEON समूहक गिरगिटक) sie सरिसूप वर्गक आन सदस्यक (यथा - ita, गोहि आदि) जीह जेकॉ द्धिभाजित (BIFID) abr होइत अछि | sites सभक जीहक संरचना उभयचर वर्गक (AMPHIBIANS) बेड्ग आदिक सदश होइत अछि। 'एकर जीह शिकार पकड़बाक प्रमुस्व अंगक रूपमे रुपान्तरित रहैत अछि।

0 a ar _— onal hi “Videha’ र के. ननिवत न जि ioe eee 2 atc ६: + seed सर न — ie 4] : ae pegs # कि कर tate न दे, कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जॉोंकती

द् हि कु दा we गण fo 4 pete gitar Kumar "Videha” © डॉ. शशिधर कुमर “विदेह” © UT. AP ¥ a स्थान - ast pre पे Spat एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (पृष्ठ भाग / DORSAL ASPECT)

हे # Z c ogi के : Q 4 G Re ope Fz, कक 5 4 by. मैथिली - खुस्चनि (उच्चारण - Wado) सितुआ / Wafer शितुआ अंग्रेजी - UNIO (A type of FRESHWATER BIVALVE MOLLUSC) जैंववैज्ञा८ नाम - Unio spp. हनोट - See भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी नॉो स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉजो Sts जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे)

a 7 . कु es bain कर दी > Y A ete” pa. / मैथिली - गोहि या गोहि Bia (उच्चारण - गोहि ar aise) अंग्रेजी - MONITOR LIZARDS / VARANUSES जैववैज्ञा०८ नाम - Varanus spp. (नोट - संस्कृत माषामें आयल हरेक नॉजों या पर्यायी at स्वतः AP ar पर्यायी at ts जाइत अखि- तत्सम स्खमे)

रद्द पर | uals ws खाइत ठिकठिकिआ वा ठिकठिकिया

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एखन फोटो उपलब्ध नजि अछि। मैथिली - सनगोहि / सनगोहि Ata (उच्चा५ - सनगोहि / सनगोइह) हिन्दी - पीला oie संस्कृत - स्वर्णगोधिका अंग्रेजी - YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD जैववैज्ञा० नाम - Varanus flavescens (Hardwick & Gray, 827) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः ARH भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

ee wi © साभार सौजन्य - pixdbay- snr ही ie aes oa जीव विज्ञानमे गोहि ओ सौँप go सरिसूप वर्ग (Class - Reptilia) केर प्राणी अछि आओर Gorey जीढ आरगोर्सें द्िभाजित (Bifid) Sel अछि | तेँ मिथिलामे ASA ora "गोहि" a5 "गोहि सॉप" कहल GSA अछि | (चित्रमें - Sea SHS वा कॉमोडो ड्रेगन) |

“ge ee ae a Wise pe Te ‘ bia | ope ej y J : Lo pixabay.com eee” "कॉमोडो Serer" - विश्वक सभर्से Ga आ विषयुक्त गोहि, Fel मात्र इल्डोनेसियाक एकटा द्वीप पर पाओल जाइत अछि | दैत्य गोहि = COMODO DRAGON = Varanus komodoensis

‘Se. Gare > की 2 स्थान - दुलारपुर (रुचौल - दुलास्पुर), दरिशनंगा स्थान -सजे rotary, दरिननंगा मैथिली - कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती हिन्दी - वनस्पति को नष्ट करनेवाला एक प्रकार का घोंघा * संस्कृत © अंग्रेजी - SLUG / LAND SLUG / GARDEN SLUG जैववैज्ञा८ नाम - Limax 5] ., Ambigolimax spp., Tandonia spp. ete PP. Ig PP. PP: [a polyphylactic group of apparently shell-less terrestrial Gastropod molluscs] ake संस्कृत भाषामे आयल हरेक नॉओ या पर्यायी न स्वतः मैथिली आषामे पर्यायी नॉँओ as जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) * Rog बिहारी पत्रकार लोकलि द्वारा Roda wow aa प्रयुक्त "सितुआ" शब्द वास्तव मैथिलीक शब्द थिक

ie fii मी ~~ मैथिली - ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया / den गिरगिट अंग्रेजी - HOUSE LIZARD / GEKKO जैंववैज्ञा८ नाम - Hemidactylus spp. Gekko spp. (चित्रमे Gekko gecko) (कुल 5 वंशक लगभग 950 जातिक सदस्यसभ) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ sts जाइत अछि - तत्सम रूपमे)

a 5 mI Si a? ¢ ee थे ’ oe Be ae 4 % 4 एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (उदर भाग/ VENTRAL ASPECT)

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By Bank Deposit You can deposit amount In favour of "MITHILA STUDENT UNION” Axis Bank Branch - Pahar Ganj, New Delhi Account Number -950002400672 RTGS/NEFT IFSC Code - UTIB000I924 By Cheque / Demand Draft You can write a cheque or Demand Draft(DD) in the Name of "MITHILA STUDENT UNION” and send it to the below address. उ/32 2nd-Floor,Vipin Garden Extn.,55 foota road, Near Dwarka Mor Metro station, New Dethi-59. INDIA. oo To pay Mithila Student Union scan payin code oe arene Say eae us Fal Sacto one ERs Sen रन a Tara Patol Or enter mobile numbe:

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788 || विदेह सदेह:२० fos सचित्र बाल कविता कड़रिक Riga या कड़रिक Rigen या जोंकती (बाल कविता) — i 4 = — = a De io ee eee 3 “व. > “कर Re Mae > el ay “सुर eng SS ad a TSS मैथिली - कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती हिन्दी - वनस्पति को नष्ट करनेवाला एक प्रकार का घोंघा * अंग्रेजी - SLUG / LAND SLUG / GARDEN SLUG जैववैज्ञा८ नाम - Limax spp., Ambigolimax spp., Tandonia spp. ete [a polyphylactic group of apparently shell-less terrestrial Gastropod molluscs] नोट - संस्कृत भाषामे आयल्र हरेक नॉओ या पर्यायी नॉँओ स्वतः ARR आाषामें rah नॉओ Bs जाइत अछि - तत्सम स्वरूपमे) * किछु बिहारी पत्रकार लोकलि द्वारा KoA wea लेल प्रयुक्त "सितुआ" शब्द areata मैंथिलीक शब्द थिक

विदेह सदेह:२०|| 789 —— एक प्रकारक कड़रिक सितुआ / कड़रिक शितुआ / जोंकती (पृष्ठ भाग / DORSAL ASPECT)

विदेह सदेह:२०|| 802 = Ma ae कर bs हर & ः a 4 पएर (GR WI) बाहर निकालने सुश्चनि सितुआ / सुस्चनि शितुआ as a wi jf जलाशयक पेनीक माटिमे आधा गड़ल "स्वुस्चनि खितुआ" (खुरचनिक मुँह आंशिक रूपसेँ फुजल अछि)

804 || विदेह सदेह: २० गिरगिट (बाल कविता) साभार सौजन्य - pixabay.com (free download) aes, ee ee * a ant \ i ऊन” Pixabay.com (free download) मैथिली - गिरगिट हिन्दी - गिरंगिट संस्कृत - कृकलास, pwar, ove, प्रतिसूर्य, प्रतिसूर्यशयान, गलगति (?) अंग्रेजी - LIZARD (Including COMMON GARDEN LIZARD, CHAMELEON, IGUANA & OTHERS) जैववैज्ञा० नाम - SAURIA SUPERGROUP of SUBORDER LACERTILIA Gate - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नॉओ भ$ जाइल अछि - तत्सम स्वरूपमे) गिरगिट छेँ की ?

82 || विदेह सदेह:२० ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया (बाल कविता) दा 2 Be कि दर 3 shou cS 3 2 मैथिली - ठिकठिकिआ / ठिकठिकिया / घंरैया गिरगिट हिल्‍दी - छिपकली संस्कृत - पलभी, गृहगोधिका, भित्तिका आदि अंग्रेजी - HOUSE LIZARD / GEKKO जैववैज्ञा० नाम - Hemidactylus spp., Gekko spp. (चित्रमे Gekko gecko) (कुल 5 वंशक लगभग 950 जातिक सदस्यसभ) (नोट - संस्कृत भाषामे आयल हरेक नाँओ या पर्यायी नाँओ स्वतः मैथिली भाषामे पर्यायी नाँओ Hs जाइत अछि - तत्सम wT)

820 || विदेह सदेह:२० Ne 4 A: “ se hn = af We ry ee ae a Hel मात्र इल्डोनेसियाक एकटा द्वीप पर पाओल जाइत अछि | दैत्य गोहि = COMODO DRAGON = Varanus komodoensis

824 || विदेह सदेह:२० सनगोहि (बाल कविता) Heh - Hors । सलगोहि सौंप (उच्चा८ - सनगोहि । Howse) हिल्‍्दी -पीलागोह = संस्कृत -स्वर्णगोधिका अंग्रेजी - YELLOW / GOLDEN MONITOR LIZARD जैववैन्ञा८ Oa - Varanus flavescens (Hardwick & Gray, 2) (नोट - संस्कृत भाषामे आयत्र ge att aa नाँओ स्वत: मैथित्री ea ah नाँओ as जाइत अछि - TATA