ISSN 2229-547X विदेह सदेह २१ विदेह-सदेह २१, विदेह www.videha.co.in/ पेटार (अंक २५१-२७६) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ३५००/- संस्करण: २०२०, २०२२ Videha Sadeha 21: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 251-276 at www.videha.co.in). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-७७९) गजेन्द्र ठाकुर- रामिवलास साहुजीक दधू बेचनी लघुकथा संग्रह, सम्पादकीय (पृ. २-५) मिसिदा- बीहनि कथा (पियार, जश्न, द्वंद्व) (प्. ६-१२) प्रणव झा- दोसर बियाह, चनमा, मैथिली कथामे स्त्री, एकटा जन्मेजय कथा (पृ. १३-३५) मृणाल आशुतोष- छुटकी (पृ. ३६-३८) गीतेश शर्मा - भारतीय मुसलमान आ भारतीयता (मूल हिन्दी लेख केर मैथिली अनुवाद- उमेश मण्डल) (पृ. ३९-४७) उमेश मण्डल- बीहैन कथा- भिनसुरका गप-सप्प, सगर राति दीप जरय ९९ म आयोजन), ९८म कथा गोष्ठी सगर राति दीप जरय- सिमरा (झंझारपुर) (पृ. ४८-५८) डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ - हमर गाम (पृ. ५९-९१) देवेश झा- हिन्दू विवाह :एक समीक्षा, मैथिली पत्रिकामे अनुवाद साहित्य, ‘दू-पत्र’ उपन्यासक विश्लेषणात्मक अध्ययन (पृ. ९२-१०५) राकेश प्रेमचन्द्र ‘पीसी’- लघुकथा- किसानकेँ डुबौलक लखन ठेकेदार (प्. १०६-११०) अरुण लाल- बीहनि कथा (कुंभ स्नान, ग्राहक) (पृ. १११-११७) मोहनराज "गगन"- बीहनि कथा-१, बीहनि कथा-२ (पृ. ११८-११९) राम विलास साहु- लघुकथा- घुमि गाम चलु (पृ. १२०-१२७) नन्द विलास राय- लघुकथा (सियानक मारि दही-चूरा, दहेज पाप छी) (पृ. १२८-१४८) आशीष अनचिन्हार- "इश्क को दिल में दे जगह अकबर" आ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल, हिंदी फिल्मी गीतमे बहर १-८, आधुनिक मैथिली गजलक संक्षिप्त आलोचनात्मक परिचय, नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलक तुलनात्मक विवेचना, बयानक संदर्भमे मैथिली गजल (प्. १४९-२६१) रबीन्द्र नारायण मिश्र- अशांतस्य कुतः सुखम्, सफलताक रहस्य, मनः पूतं समाचरेत, ई समय ककरो नहि, घमंड, कलनाबला बाबा, डॉ. सुभद्र झा (संस्मरण), डॉ. जयकान्त मिश्र (संस्मरण), पं. परमानन्द झा (एक संस्मरण), संपत्ति हस्तांतरण, क्रान्तिदूत : कबीरदास, मकर संक्रांति, घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005, गिरफ्तारी ओ जमानत, सूचनाक अधिकार, गया गेल रही, बिधवा विआह, उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६, मिथिलाक संस्कृति, लघुकथा- पढ़ू पूत चण्डी, लघुकथा (मुख्यमंत्रीक स्वप्न, यमलोकक दल-बदलू, नर्कक संसद, जीबी तँ की की ने देखी !, तुषारपात, असगुन, गाम, फसाद, पुनर्मिलन, पंचैती, मुखिआक चुनाव, हम बौक छी, फाटू हे धरती !, उपकारक भार, सनकल, क्रान्ति विसर्जन (पृ. २६२-४७९) दुर्गानन्द मण्डल- लघुकथा (सीख, बोझ) (पृ. ४८०-४८५) डॉ. बचेश्वर झा- मौलाइल गाछक फूल : जगदीश प्रसाद मण्डल, मिथिलाक विभूति आयाची मिश्र, मैथिली साहित्यमे यदुनाथ झा ‘यदुवर’क देन, मैथिलीक विकासमे नेपालक योगदान, मैथिली साहित्यक अवदान- मिथिला भाषा रामायण- चन्दा झा, एकैसम शताब्दीक प्रारंभ जनवृद्धिमे भारत प्रथम आ चीन दोसर, पुस्तक समीक्षा- साकेतानन्दक ‘गण-नायक’,कन्यादानक भीषण समस्याक कारण, विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि, विद्यापतिक रचनामे विरह वर्णन (पृ. ४८६-५४७) नारायण यादव- लघुकथा (पंचैती, स्वाद परिवर्तन, गिफ्ट, भाय-बहिन, इमानदार चोर, नसिहत, प्रेमक ऑंसु ), गुरुमैता-सल्हैता (जीवनी) (प्. ५४८-६०२) कैलाश कुमार मिश्र- लघुकथा (पण्डिताइन, बुरिराज), फकड़ाक संग यात्रा करैत मैथिलानीक मनोदशाक: मानवशास्त्रीय विवेचना (पृ. ६०३-६७६) जगदीश प्रसाद मण्डल- पंगु (उपन्यास)- साहित्य अकादेमी पुरस्कार (२०२१) सँ सम्मानित कृति (पृ. ६७७-७७९) पद्य-खण्ड (पृ. ७८०-१३३६) आशीष अनचिन्हार- बाल गजल, किछु गजल (पृ. ७८१-७८८) राजेश मोहन झा "गुंजन"- नवदुर्गा, गाछक गोहारि- (विश्व पर्यावरण दिवस पर), किनकर विकास? (पूंजीवाद कि सर्वहारा) (यात्रीजी "बाबा नागार्जुन" कें जन्म दिन पर) (पृ. ७८९-७९२) प्रीतम कुमार निषाद- यात्रीक स्मृति, अमर शहीदक श्रद्धांजली, सार बहिनोई (हँस्सी-चौल), आहत अगस्त, हाय भूकम्प, विकासक दम्भ, हँसनी-खेलनी, हिस्सा-बखड़ा, हम नारी छी..!, हमरा के मारलक गै?, ओ, के छथिन्ह?, सुत्थड़ समाज, सुनबै-गुनबै, बुझवाक चाही, कत्तऽ तकै छी?, आद्यार्चना, दिवसास्तार्चना, सांध्यार्चना, निशार्चना, विद्यापति स्मृति, वरद वसन्त, सरस वसन्त, कवित्त : ऋृतुराज वसन्त और मस्त पवन, गीतल मिथिला, गीतल, गौंआँ-गीतल, हाय हौ हितलग, सीखऽ तँऽ दियऽ, ईर घाट, वीर घाट, खगता-बेगरता, नीक-बेजाय, हम के? और की? केकरो केकरो, जय गंगाजल, दीप प्रज्ज्वलन, अहो अभिनन्दन, सीतार्चना (पृ. ७९३-८६८) उमेश पासवान- ई की होइ छै, बताह वादल, घा, जिद्द, सड़क, मैथिली, बिसैर जाउ, खिस्सा, फाँसी, गलती, रोग, बटोही, हवा, दोख, गुमान, लड़की, आदत, अनजान, लोभ, स्वार्थी, करिछौन, एकबेर, साँच, यादमे, जमाना, पछताएब, चिट्ठीक पन्ना, कविता, गामसँ, तरहत्थी, डुबैत, तागत, हालत (प्. ८६९-९०८) जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’- गीत, गजल (पृ. ९०९-९११) रजनी छाबड़ा (हिन्दी कविता संग्रह ’पिघलते हिमखण्ड’ सँ मैथिली अनुवाद- अनुवादक डॉ. शिवकुमार प्रसाद) - (पृ. ९१२-१०००) डॉ. शिवकुमार प्रसाद- किछु कविता (पृ. १००१-१०७१) राहुल कुमार चौधरी- हेलैत प्राण (पृ. १०७२-१०७४) बृषेश चन्द्र लाल- ठंढाउ, हिड़ला लगाउ! (पृ. १०७५-१०७६) रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’- किछु झारू (पृ. १०७७-११०२) कुमोद रंजन चौधरी- उठु मैथिल चलु मैथिल (पृ. ११०३-११०५) प्रभाष अकिंचन- महाकवि लाल दास (पृ. ११०६-११०७) राकेश कर्ण- सृजन (पृ. ११०८-११०९) अरुण लाल- ६ टा क्षणिका आ ६ टा कविता (पृ. १११०-११२७) इन्द्रकान्त लाल- कक्का तोर अंगना (पृ. ११२८-११२८) सृजन शेखर ’अज्ञेय’- ककरा अबिते जादू भऽ जाय रे (पृ. ११२९-११२९) संतोष कुमार राय 'बटोही'- गहमा- गहमी, सुन्नर कनिया,गाल पर थप्पड़, साहित्य मे भिनभिनौज, लोकतंत्रक प्रहरी, बहि रहल अछि फगुआक बयार, दलित छी हम, अबोध नेना, कनफुस्सी बिगाड़लक घर, नौकरी, गामक दुर्गा मंदिर, गाम-घरुआ, किसानी, बिन ब्याहले रहति सिया (पृ. ११३०-११४८) नन्द विलास राय- हमर होली, दहेज, हमर चारूधाम, इन्दिरा आवास, अछैत पुत्र निपुत्र (पृ. ११४९-११७०) डॉ. शशिधर कुमर "विदेह"- स्व. अटल बिहारी वाजपेयीजी - एकटा मैथिलक सादर, विनम्र श्रद्धांजलि (पृ. ११७१-११७१) राम विलास साहु- किछु हाइकू/ शैर्न्यू, किछु टनका, ठेँस, आजुक दिन, धनक खातिर, शिवक नचारी, दिनक दोख, हमरा मोन पड़ैए, अनजनुआँ, धरतीक बोझ, हरबाहाक जिनगी, माछ, मनक मोलि,तृष्णा, बेटी, वसंतक गीत, केकरा लेल, धर्मक उपदेश की भेल, जीबिते जी मरै छी,माघक जाड़, किसानक मजबुरी, बैशाखक विष, बैशाखक विष, कोसीक कहर, केकरापर करब श्रृंगार, करमक खेल, भीखमंगनी (पृ. ११७२-१२६९) राहुल झा "आर.जे."- बटगवनी (पृ. १२७०-१२७१) राकेश प्रेमचन्द्र ‘पीसी’- पी.सी.क पाँच हाइकु (पृ. १२७२-१२७२) मिसिदा- स्मृति शेष (पृ. १२७३-१२७५) रवि भूषण पाठक- छौड़ा अजगुत कंप्यूटर छै, महाकवि विद्यापति (पृ. १२७६-१२७९) नीलमाधव चौधरी- किछु कविता (पृ. १२८०-१३३६) 2
गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर रामिवलास साहुजीक दधू बेचनी लघुकथा संग्रह ‘गामक गाछी’ लघुकथामे बुधुआक दादा कालेसरक गछकट्टीमे दबि क’ मरि गेलाक प्रसंग पुरना गेल छलै, नवका पंच सभकेँ बुझले नै, आकि बुझल रहलोपर ओकर महत्त नै खड़िया क’ बुझल रहै। से जखन मुखियाजे ऐ गपक चर्चा कथाक क्लाइमेक्समे करै छथि तँ सभ महत्त बुझै छथि जे कोना बोन कलम-गाछी बनल। ‘कमतियाक कामत’ क खिस्सा आ कमतियाक घरकेँ हबेली कहैपर मदीना दादीक विरोधपर कमतिया हबेली शब्दावलीक जन्म ऐ कथाक शीर्षक उचिते बनल। ‘घुमि गाम चलू’ कथाकेँ कनी आर चुस्त करबाक खगता छल, कथा सोइरी घरसँ शुरू होइए मुदा अंत कपचा गेल लगैए। ‘बिपैत’ मे बिपैतक संग (बिपैत छोड़ि आर के?) नीक बनल अछि। ‘झंझैटक जड़ि सिनुरिया आमक गाछ’ भिन-भिनौजपर लिखल कथा छी। ‘जारैन’ मे नव चीजक विरोधक संग लेखक ठाढ़ बुझाइ छथि, कारण महिलाकेँ धुँआसँ होइबला कष्टकेँ ओ वाद-विवादमे नै अनलनि। ‘जेहेन पाठ ने पढ़ए पुत्ता अपने सिर विसए’ पढ़ि लेखक अंधविश्वासक पक्षमे ठाढ़ बुझाइ छथि। आइ काल्हि टी.वी. पर भुतहा आ अंधविश्वास आधारित सीरियलक पक्षमे यएह सफाइ शुरुहेमे देल जाइत अछि जे ई मात्र मनोरंजन लेल बनल अछि आ एकर उद्देश्य अंधविश्वासकेँ बढ़ाबा देब नै अछि। से ईहो कथा मनोरंजने उद्देश्यसँ पढ़ू। ‘कौल्हुक सुच्चा करु तेल’ हमरा हिसाबे ऐ लघुकथा संग्रहक सर्वश्रेष्ठ लघुकथा अछि। कोना लोक अपन कुटीर उद्योग पूँजीवादक फेरमे खतम केलक, ई कथा तकरे विस्तार अछि आ आशाक संग खतम होइए। ‘दूधबेचनी’ ऐ लघुकथा संग्रहक टाइटल कथा छी। बकलेलसँ बेटीक बियाह। पतिक मृत्यु आ पत्नी द्वारा असगरे बाल-बच्चाकेँ पोसब जिनगीक लक्ष्य। मुदा फेर मोहभंग आ फेर समाजक लेल किछु करबाक इच्छा संग कथाक समाप्ति। ‘गोदानक गाए घुमि घर आएल’ अंधविश्वासपर चोट अछि। से ‘जेहेन पाठ ने पढ़ए पुत्ता अपने सिर विसए’ क विपरीत। ‘असिरवाद’ यत्रा वृत्तांत सन अछि, आ ‘हम’ शैलीक रचना अछि। आ कारण आधारित संयोग आकि भविष्यवाणी ऐमे दू बेर भेल। एक कोसीक नाह आ दोसर घुरती काल बसक दुर्घटना। ‘ई केकर दोख’ मे कथानक आगू बढ़ैए मुदा सभ हीस नीकसँ नै फौदाइए। रूपनक कथा आकि कारीक? रूपनक कथा भँसियाइत अछि तँ कारीक कथा संग नीक जकाँ मिज्झर नै भ’ पबैए। कथा-संग्रह मुदा जीति गेल अछि। कारण अची एकर शब्दावली आ फकड़ा सभक सफलता। जँ एकर अनुवाद कएल जाए तँ भ’ सकैए जे ‘कौल्हुक सुच्चा करु तेल’ क अलाबे आन कथा सभ सामान्य बुझा पड़ए, मुदा मूल मैथिलीमे ई संग्रह जीतल अछि। गामक समाजक समस्याक वर्णन जे नग्रक लोककेँ छोट आ पुरान बुझा सकैए, गामक लोक लेल पैघ आ समकालीन अछि; आ राम विलास साहुजीक शब्दावली ऐ वर्णनक संग न्याय केने अछि। सम्पादकीय सािहत्य अकादमी, िदल्ली मैिथली लेल ऐ बेरुका युवा सािहत्य पुरस्कार श्री उमेश पासवान जी केँ हुनकर २०१२ मे प्रकािशत पद्य संग्रह ’वर्णित रस’ पर देबाक िनर्णय सािहत्य अकादमी, िदल्ली मैिथली लेल ऐ बेरुका युवा सािहत्य पुरस्कार श्री उमेश पासवान जी केँ हुनकर २०१२ मे प्रकािशत पद्य संग्रह ’वर्णित रस’ पर देबाक िनर्णय लेलक अछि। िनर्णय विलम्बित मुदा स्वागत योग्य अछि। https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videhapothi/Home/UmeshPaswan.pdf?attachauth=ANoY7coRlGM02SpW8rbrtLhu4Nv4f7F4v tyo56SmjrOoRMDSi9nHhMV9uqV0mwLzGsgdjKR2HKNiVvSkqvqdJUXDR4Q5zlGEZ7PfHHEaiD9LFLEjz2sIC8F7pyCruDc0J4T3NS0zb 1RSoLfQnCONbYP7XRoG3Pn1fr8Ol8w2644nsB5Qfz5Edz1dw9DqNLUdQ6XyQM3XUI0i3P31bUMqOlaD_EkRdzQQ%3D%3D&attredirects=0 http://sahitya-akademi.gov.in/sahitya-akademi/pdf/Pressrelease_YP-2018.pdf सािहत्य अकादमीक मैिथलीक नव परामर्शदात्री समिति आ जूरी संकीर्णतासँ बाहर एबामे सफल भ ेल, तइ लेल धन्यवादक पात्र अछि। डॊ. प्रेम मोहन मिश्र नव परामर्शदात्री समितिक अध्यक्ष छथि, मैिथलीक नै वरन् रसायनशास्त्रक प्रोफेसर छथि, से मेिडयोकर नै छथि। बी.बी.सी. क िहन्दी िवभागमे ऐ पुरस्कारक चर्चा तँ संगमे दलित न्यूज आ ललनटॉपमे डॉ अरविन्द दास द्वारा सेहो: https://www.bbc.com/hindi/india-44635012 http://www.dalitdastak.com/yuva-sahitya-akademi-awardee-2018-maithili-poet-umeshpaswan-latest-news-story-literature/ https://www.thelallantop.com/bherant/dr-arvind-das-writes-about-a-maithili-poetumesh-paswan-who-is-a-watchman-in-madhubani/ मुदा ऐसँ िवपरीत मैिथलीक िकछु युवा आ अधवयसु सािहत्यकारक िटप्पणी सोचबापर िववश केलक जे २१म शताब्दीयो मे िहनकर सभक सोच कतेेक पाछू छन्हि। मुदा ऐ तरहक लोकक संख्या नगण्य अछि, से खुशीक गप। मिसिदा [मिथिलेश सिन्हा "दाथवासी" (मिसिदा), (मिथिलेश कुमार सिन्हा), अधिवक्ता, मोहल्ला/पोस्ट : लक्ष्मीसागर, जिला : दड़िभंगा, पिन : 846009] बीहनि कथा- पियार ''की गै, की हाल छौ ?'' ''मर टटिवा, आई फुरैलौ यै, जहिया कहलियौ, अप्पन बाबू कें हम्मर बाबू लग भेजहीं तखन त' बकोड़ लागि गेलौ.....आई, पूछै से केना ?'' ''आंय गै, हम्मर बाबू जेतौ तोहर बाबू लग ? नहि, नहि.... हम लड़का बाला छी, हम कोना क' बाबू के तोहर बाबू लग भेजियौ ? अप्पन बाबू के हम्मर बाबू लग भेज, हम बाति सम्हारि लेबौ !'' ''आहि....आहि..... आंय रौ, हम गेल छलियौ तोरा लग कहै लेल,जे हम तोरा सं पियार करैत छियौ ?'' ''एह, ई जेना किछुए ने केलकै.... आंय गै, मनोजवा केर वियाह मे एतेक निहारि निहारि किएक देखि कें हँसैत रहैं ?'' ''अच्छा.... ओहि दिन ? रौ, ओहि दिन, तोहर पैजामा केर डोरी निच्चा लटकैत रहौ तैं.'' ''हे गै, एतेक ने बोन, ओहि दिन तों आम'क बारी मे नै कहने छलैं कि हम तोरा नीक लागै छियौ ?'' ''आंय रे, मनसूक्खा, नीक लागै केर मतलब भेलै कि हम तोरा सं पियार करै लगलियौह ?'' ''ठिक्के छै तोरा हमरा सं पियार नहि छौ, तखन हम जाइत छियौ !'' कहि राजेश चल'लागल. ''ऐ, राजेश केमहर जाता है , ई पियार का खेल खेला के हमको बुड़बक बनाता है, बूझि लो, हम तोहर पाँछा कहियो छोड़ेंगे....पियार मे नाटक करै छैं ?'' कहि कान' लागल. ''हेह तोरा की बूझि पड़ता है कि तोरा हम नहि बुझता है, हम तोहर बिनु रहि सकता है..... हम तोरा बहुत पियार करता है जी.....? बजैत राजेश ओकर हाथ पकड़ि लेलक. बीहनि कथा- जश्न पलंग पर मृत्यु-सज्जया पर पड़ल बाबूजी'क गोरथारि मे हुनक पाएर रसे-रसे दाबि रहल छलहुँ. बाबूजी, कैंसर सं पीड़ित छलाह. डागदर जवाब द' देलकै. इलाज मे कोनो कसरि नहि छूटल. जतेक औकात छल, कएल. बाबूजी, आँखि मुनि दुर्गाशप्तशती'क पाठ क' रहल छथि आओर सभ'क आँखि सं नोर वहि रहल छल. मां त' जखन हम सभ बच्चे रही, स्वर्ग सिधारि गेल छलखिन्ह. दिमाग मे बाबूजी'क संग बिताओल सभटा पावैन चलचित्र'क भांति चलि रहल छल. होली हो वा जुड़शीतल, सरस्वती पूजा हो वा दुर्गा पूजा, दिवाली हो वा छठि, सभटा पावैन-त्योहारि मे बाबूजी मां'क रोल मे आबि, सम्पन्न करैथ. आई, दिवाली आब' बाला छै.... बाबूजी,बीमार. राति भ' गेलैए. "बाबूजी, किछु भोजन क' लिअ ने !" हम पाएर दबौबैत पुछलियैन्ह. ओ चुपचाप टुकुर-टुकुर हमरा सभ दीस नजरि घुमा क' देख' लगलाह. हमर त' करेज फाट' लागल,मुदा मोन थीर कएल. "किछु खा लिअ बाबूजी." हम पुनः बजलौंह. "हौ, देखह बत्ती पर फतिंगा सभ कोना क' घुमि रहल छै ?" बाबूजी बजलाह. "की बत्ती मुझा दौं ?" "नहि, नहि... देखह ओ फतिंगा सभ कें.... ओ सभ अपन परिवार संगे कतेक खुश भ' नाचि रहल छै !" बाबूजी बात कटैत बजलाह," फतिंगा सभ'क परिवार कें पता छै, जे कार्तिक मास'क आमावस्या दिन तक ओकर सभ'क मृत्यु निश्चित छै.... कोनो विषाद नहि, अपन मृत्युक कतेक खुशी सं जश्न मना रहल छै.... आ तों सभ हमर मृत्यु लगीच देखि कानि रहल छह..... मृत्यु त' सत्य छै ओकर सम्मान केनाइ हमर धर्म....." बाबूजी संगहि हमहुं सभ फतिंगा के बत्ती पर नचैत देख' लगलहुँ. बाबूजी सेहो ठोर पर मुस्कान पसौरने, एक्के टक्के फतिंगा कें देखैत ओकर जश्न मे शामिल भ' गेलाह. बीहनि कथा- द्वंद्व काल्हि साँझ मे अपन बेटा-बेटी संग छत पर बैसल छलहुं. बेटा, अन्तरस्नातक क' प्रतियोगिता आओर बेटी अंग्रेजी सं स्नातकोत्तर'क परीक्षा केर तैयारी क' रहल छथि. चर्चा'क दौरान, हम अपन किछु मित्र आओर संबंधी'क परिवार'क चर्चा क' कहलियैन्ह जे, "देखू, हुनकर बाल-बुच्ची सभ घर-परिवार'क नाम पुरे परोपट्टा मे रोशन क' देलैथ.... हमहुं अपने सभ सं इएह आस लगौने छी....." लगले बेटा बाजल, "की हई छै, एतेक पढ़ला-लिखला सं....? एतेक पढ़ि-लिखि, आईआईटी आओर अन्य कोनो पढ़ाई केलहुँ आ नोकरी भेटैछ बारह-तेरह हज़ार सं ...." "जे दिन-राति लगा, मेहनत करतै ओकरा सफलता अवस्से भेंटतै. अहां सभ कें पढबा मे मोने नहि लगैए, तखन एहने बात फुरवे करत.... दिन-राति मोबाइल आओर फेसबुक....व्हाट्सएप्प केर सिवाय कहियो किताबो केर दरस होइबो करैया....? खाली दिमाग शैतान केर.... " हम दमसाइत बजलहुँ. "पापा,अहां बात बुझलहुँ ने, लागलहुँ डांट', ओ की कह' चाहैए.... बुझु त' ?" बेटी बाजलिह. "की बाजत, ओ घमन्डे फूलल अहि. परीक्षा मे एतेक नंबर मे पास ने कै गेल की बुझैए, की ओ राजेन्द्रे प्रसाद भे गेल...." हमर तामस बढ़' लागल. "पापा, अहां सभ कें खाली पढ़ाई.... पढ़ाई.... पढ़ाई.... की एकरो अलावे आओर कोनो रस्ता नहि अहि, जेकरा सं घर-परिवार आओर समाज'क नाम बढ़ि सकै ?" बेटी बाजलिह. हम कनेक शांत भ' ओकर बात सुन' लागलहुँ, "पापा, अहां सब पुरना जमाना मे जीवि रहल छी आओर नवका सोंच पालने छी. हमर रुचि डांस मे छल.... अहां बाज' लागलहुँ जे आई धरि हमर परिवार मे ई नहि भेलै,हम मोन मारि पढ़' लागलहुँ मुदा पढ़' मे एक्को रत्ती मोन नहि लागल,फेल क' गेलहूं.... अहां'क डरें, आई हम पीजी त' क' रहल छी, मुदा आगू की हेतै नहि कहि.....?" बजैत-बजैत ओ कान' लगलीह. "हमरा कोन आज़ादी भेंटल.... ? मैट्रिक धरि टीसन सं ओहि पार जेनाइ पर रोक.... बाजार जेनाइ पर रोक.... दोस्त बनाव' सं रोक.... हमर मोन क्रिकेट सं छल,खेल' सं रोक.... खाली,रोके-रोक.... अप्पन कोनो मर्ज़ी नहि !" बेटा बाजल. "हम त' अहीं सभ'क कैरियरे वास्ते ने केलहुँ. पढ़ि-लिखि ऑफिसर बनब,त' अहीं सभ'क प्रतिष्ठा ने बढ़त ?" "पापा,अहां हमर नहि, अपन प्रतिष्ठा देखि रहल छी. हमर कोनो इच्छा नहि, अहीं सभ'क थोपल इच्छा कें पूर्ण कर'क वास्ते अपन इच्छा केर पूर्णाहुति दैत आवि रहल छी.... ! अहां सभ'क इच्छा पूर्ण अवस्से करब,मुदा आव' वाला भविष्य केर संग हम एना नहि करब,ई हमर प्रण अहि." बेटा बाजल आओर हुनक विचार सं हमर बेटी सेहो सहमति छलीह. प्रणव झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नयी दिल्ली लघुकथा- दोसर बियाह विनय काँची कामाकोटि चाइल्ड ट्रस्ट सं डीएनबी पीडियाट्रिक्स आ एफएनबी पीडियाट्रिक हीमेटोलॉजी (शिशुरोग विशेषज्ञ) क के सहरसा में नबे-नबे प्रैक्टिस शुरू केने छलाह. काँची कामाकोटि चाइल्ड ट्रस्ट सन जानल-मानल संस्थान सं शिशुरोग में विशेषज्ञता आ फेलोशिप हासिल केला के बाद कइएक महानगरीय कॉर्पोरेट अस्पताल में हिनका ज्वाइन कर के मौक़ा भेटल छल, मुदा विनय एमबीबीएस करै काल ई नियारने छलाह जे डॉक्टरी में विशेषज्ञता हासिल केला के बाद गाम घुरि औता आ सहरसा में अपन क्लिनिक खोलि के प्रैक्टिस करथिन. हुनका बुझल छल जे एही ठाम विशेषज्ञ डॉक्टर जे नैतिकता के साथ प्रैक्टिस करै, केर कमी छै आ तैं इहो विश्वास छलैन्ह जे एक बार जमि गेला मातर हिनकर प्रैक्टिस निक चलतें. नबे-नबे क्लिनिक फुजले छल ताहि दुआरे एखन रोगी-मरीज कम्मे आबै छलैन्ह क्लिनिक पर. बेसी मरीज सब गरीब-गुरबा आ ग्रामीण परिवेश बाला सब छल. मध्यम आ उच्च वर्ग एखन धैर या त डॉक्टर विनय के क्लिनिक आ योग्यता से अनभिज्ञ छलाह आ नै त हुनकर छोट-छीन क्लिनिक आ हुनका, पहिने सं स्थापित डॉक्टर के मुकाबला में स्वीकारने नै छलाह. एहने सन में एकटा मध्यम वर्गीय जोड़ा अपन दू मासू बच्चा के ल क हिनका क्लिनिक पर आबय लागल छलाह, आ फेर हिनका सब सं विनय के लंबा नाता बैन गेल छल. गोर-नार कनियाँ आ लंबा-तगड़ा बर. यादवजी अपने त एकदम मॉडल सन लागै छलाह. दुनू के कहाँदिन लव मैरेज छल. यादवजी अपने बिल्डिंग मटेरियल के कारोबार करै छलाह आ कनियाँ बैंक में क्लर्क छलीह. सदिखन अपन बच्चा ल के दुनू बेक्ति संगे आबै छलाह. दुनू बड्ड खुशमिजाज छलाह आ विनय के बहुत आदरो करैत छलाह. दुनू लगभग तीन बरष धैर अपन बच्चा के ल क हिनका क्लिनिक पर आबैत रहल छलखिन मुदा तै के बाद लगभग दू बरष से हिनका क्लिनिक पर नै आयल छलखिन. हिनका होय छल जे कदाचित बच्चा स्वस्थ हेतैक या भ सकैअछि जे ओ सब जगह या डॉक्टर बदैल नेने होइथ. मुदा एक दिन बच्चा के माय एकसरे बच्चा के नेने हिनका क्लिनिक पर पहुँचलि. आबैत मातर विनय पुछलखिन "अरे वाह! एत्तेक दिन बाद एलहुँ अछि! की हाल चाल छैक?" "जी सब ठीके ठाक छै." हँसैत ओ बाजलि, मुदा हुनका चेहरा पर ओ खुशमिजाजी नै देखल जे पहिने देखना में आबै छल. "और, यादव जी के की हाल चाल? कत छैथ आई कैल्ह?" किछ काल मौन रहला के बाद ओ बात बदलैत बाजलि जे "सर एकरा चारि दिन सं बोखार लागि रहल छै." विनय के अंदाज लागि गेल छल जे हुनकर बात के जानी-बुझि के अनदेखल क देल गेल छल, स्वाइत ओहो ई बात के अंठिया क बच्चा के ट्रीटमेंट करै लागल छलाह. "सर यादव जी आ हम अलग भ गेल छी." ई सुनैत प्रेस्क्रिप्शन लिखैत विनय के कलम रुकि गेल छल. "ओह! मुदा से किएक? " विनय पुछलखिन. "सर ओ बड्ड तमसाय छलाह हमरा पर, बात-बात पर चिचियेनाइ आदति बनि गेल छल हुनकर. काज-धंधा सेहो बंदे सन क देने छलाह ऊपर से हम काज पर जाय छलहुँ ताहु में शक करै लागल छलाह." ई सब सुनैत विनय अपन भावना पर संयम राखैत एकटा प्रोफेशनल डॉक्टर जेका दवाई लिखि रहल छलाह. किये त पहिल त ई, जे ओ एखन धरि मामिला के एकै टा पक्ष सुनने छलाह आ दोसर जे ओ महिला हिनका से कोनो सलाह नै मांगने छलीह. "ई दवाई सब बच्चा के खुआबियौ आ तीन दिन बाद फेर से देखा लेब. साधारण वायरल बोखार लागि रहल अछि, तैं घबरेबा के कनियों नै छैक." एतेक कहि विनय चुप भ गेल छलाह मुदा जखन ओ उठि क जाय लागल छलीह त बिन मांगने सलाह नै दै के अपन सिद्धांत पर विनय के नियंत्रण नै रहलैन आ एत्तेक भरि कहि देने छलाह जे "एकबेर अहाँ दुनू के हमरो से पुछबाक चाही छल या कोनो मनोवैज्ञानिक कंसल्टेंट स सलाह ल लै के चाही छल, ख़ास क के बच्चा के भविष्य के लेल." "सर, आब त जे होय के छल से भ गेल. कोर्ट में सेहो मामला निबटै बला अछि. म्युचुअल डिवोर्स भेट जेतैक." २-३ दिन बाद यादवजी सेहो क्लिनिक पर एलाह. एकसरे. "सर हमर बच्चा आयल छल की अपन माय संगे?" "हँ आयल छलीह, मुदा अहाँ के की भेल अछि, बड्ड कमजोर लागि रहल छी?" यादवजी के प्रश्नक जवाब में हुनकर देह-दसा देखैत विनय जवाबक संग ई सवाल केने छलाह. "सर, हमर किडनी खराप भ गेल अछि, डायलिसिस पर छी. हमर बच्चा केहेन छै आ ओकरा की भेलै य " "बच्चा ठीक य, साधारण वायरल बोखार छै २-४ दिन में ठीक भ जेतै. अहाँ दुनू के बीच की भेल? कत्तेक निक लागय छलहुँ दुनू एक संगे." विनय बजलाह. "सर ऐ सब में हमरे गलती छल, पिछला दू साल सं हम ओकरा संगे बड्ड खराप व्यवहार करै लागल छलियै, बात-बात पर चिचियाइत छलहुँ, एक बेर त हाथो उठा देने छलिये, ताहि से ओ घर छोड़ि के चैल गेल छलीह." "विवाह के कत्तेक समय भेल छल?" "सर, छह साल भ गेल छल." "आ अहाँ कहिया से एना करै लागल छलहुँ?" "सर दू-एक साल से पता नै हमरा एत्तेक तामस किएक उठै लागल छल." "शायद अहाँ के बीपी बहुत दिन सँ हाई भेल छल" विनय बाजलाह "हमरा पता नै छल, एक बेर स्टोन आ इंफेक्शन भेल छल." "भ सकै अछि जे अहाँ हाई बीपी आ यूरिया बढ़ला के चलते खिसियाह भ गेल हेबै." "भ सकै अछि सर, ई त करीब सात महीना पाहिले तकलीफ भेल छल तखन पता लागल जे क्रिएटाइन ८ भ गेल अछि." " आ ओ अहाँ स कहिया अलग भेली?" "करीब एक साल पहिने" "हुनका पता छैन ई सब गप्प?" "नै सर, आब की फ़ायदा हुनका बताबय के. ओ अपन जिनगी निक से जीबैथ आ हमर बच्चा बस ठीक से रहै आर हमरा किछ नै चाहि.ओहुना ओ शायद दोसर बियाह क रहल छथिन आ संग रहितहु कोन हुनका हमर परवाहि रहितैन." यादवजी बाजला "डॉक्टर अपनेक किडनी के विषय में की कहै छैथ?" "सर ट्रांसप्लांट के लेल कहल गेल अछि, ता धरि डायलिसिस" अपन दयनीय परिस्थिति के बावजूद यादवजी पूर्णत: संयत, दृढ आ शांतचित भ जवाब देने जा रहल छलाह. "ट्रांसप्लांट करवा पेबै?" विनय पुछलखिन. " सर दू भाई अछि हमरा, दुन्नू पहिनहे भिन्न भ गेल अछि, माय बूढ़सूढ़ अछि. तथापि छोट भाय त किडनी देबय चाहै छल मुदा हुनकर कनियाँ आ सासुरक लोक सब कन्नारोहैट मचा देने अछि, अस्तु आब ओहो नै द सकत." ऐ तरहे ओ लंबा-चौड़ा, हट्ठा-कट्ठा नौजवान के जीवन विनय विनय अपना सामने ऐ तरहे बदलैत देखलखिन किछ देर आर गप्प केलाक बात ओ चल गेल छल. तीन दिन बाद हुनकर कनियाँ बच्चा के ल क फेर आयल छलीह. बच्चा ठीक छल. "सर एकटा बात पूछी?" चिरपरिचित चहचहाट के संग ओ बाजलि हँ हँ किएक नै पुछू. "हम यदि दोसर बियाह क लेब त हमर बच्चा के दिमाग पर खराप प्रभाव त नै पड़तैक?" ऐ बातक उत्तर विनय बहुत जल्दी आ संक्षिप्त में द क बचै चाहै छलाह. अस्तु बजलाह "ई त बहुत रास बात पर निर्भर करत पहिल त ई जे जकरा सं अहाँ विवाह करबै ओकर ऐ बच्चा के प्रति की व्यवहार रहैत छैक, किएक भ सकै अछि जे अहाँक बच्चा कइएक महीना या साल भरि हुनका बाप के रूप में नै देख पाबै. यादवजी के किछ खबर अछि अहाँके?" संक्षिप्त उत्तर दैत विनय ई प्रश्न केने छलाह. "नै बस कियौ कहै छल जे दारू पी पी के कमजोर भ गेल अछि." ओ बाजलि "एहन बात नै छैक, अहाँक पता होबाक चाहीए छल जे हुनकर दुनू किडनी खराप भ गेल अछि, पिछ्ला छः मास सं ओ डायलिसिस पर जीब रहल छैथ. आ जखन अहाँ दुनू संग छलहुँ हमरा लगै अछि जे तखने सं हुनकर किडनी के शिकायत प्रायमरी फेज में छल आ है बीपी आ शारीरिक बदलाव के कारणे ओ एहन खिसियाह भ गेल छलाह आ काज-धंधा पर ध्यान नै दैत छलाह." विनय बाजल छलखिन. ई सब गप्प सुनि के यादवजी के कनियाँ के मुंह अवाक भ गेल छल. विनय के हुनकर चेहरा पर बनैत बीतल समय में घटल घटना सब के तीव्र फ्लैशबैक के अंदाज लागय लागल छल. जेना कोनो प्रोजेक्टर पर कोनो फिल्म के रिपीट क देल गेल होय आ क्रिटिक ओकर सीन सब के नब दृष्टिकोण आ व्याख्या के संग देख रहल होय. फेर फ़टाफ़ट ओ उठली आ बच्चा आ इलाजक फ़ाइल लय ओ बाहर चल गेली. कदाचित ओ अपन मोनक भीतरी भाव के विनय तक नै पहुँच दैत चाहै छलीह, शायद ओ अपन व्यथा ककरो नै बतबै चाहे छलीह. अब विनय अपन कुर्सी पर पाछाँ धसि गेल छलाह आ अगिला मरीज के आबय के इंतज़ार करैत सोचे लागल छलाह जे व्यर्थे ओ हुनका ई सब गप्प बता देलखिन. बेचारी कतेक खुश छलीह. दोसर बियाह करै वाली छलीह, करितथि त अपन नव जिनगी के तलाश करितथि, हमर ऐ में की जाय छल...आदि..आदि.... ऐ घटना के करीब तीन महीना बीत गेल छल. एक दिन अचानक से ओ दुनू बेक्ति फेर अपन बच्चा संगे विनय के क्लिनिक पर उपस्थित छलाह. पहिलुके चिर-परिचित अंदाज में ओ बाजलि... "सर पन्द्रहम दिन हिनकर रीनल ट्रांसप्लांट करवा रहल छी" "अरे वाह, डोनर भेंट गेल?" उत्साह आ ख़ुशी मिश्रित भाव स विनय पुछलखिन "जी, सर हमर सभटा जांच भ गेल अछि, किडनी मैच क गेल छै" ओ बजली. ऐ पर यादवजी बाजला "जी सर ई किडनी द रहल छैथ हमरा". "दोसर बियाह क रहल छथिन ई.......हमरा सं" कनियाँ के खिसियाब के अंदाज में यादव जी बाजल छलाह. प्रेम, ख़ुशी आ उमंग के चमक हुनकर आँखि में साफ़ देखल जा सकै छल. आई विनय सेहो अपना आप में बहुत संतुष्टि के अनुभव क रहल छलाह...सोचि रहल छलाह जे मनुक्खक केहन केहन व्यवहार होइत अछि.... लघुकथा- चनमा सुधीर बाबू एकटा सहृदय, कर्मठ आ सफल आपीएस ऑफिसर छलाह. डीआईजी के पद से रिटायर भेला के बाद ओ राजनीति में आबि गेल छलाह. अपन सेवा के एकटा पैघ हिस्सा बिहार में बितेला के बाद ओ बिहार विधान सभा में विधायक आ फेर बिहार सरकार में मंत्री सेहो बनलाह. एकबेर कोनो सरकारी काज सं चंडीगढ़ गेनाइ भेलैन, संगहि पार्टी के कोनो कार्यक्रम सेहो छल. दिन भरि के कार्यक्रम से थाकल-ठेहिआयल सुधीर बाबू सांझ काल में जखन गेस्ट हाउस के अपन कमरा में सुस्ताईत छलाह तखने अर्दली हिनका लग आबि के एकटा विजिटिंग कार्ड दैत कहलक जे श्रीमान कोई आपसे मिलने की बहुत जिद कर रहा है, नाम चनमा बता रहा है और कह रहा है की आपके बिहार के बेगूसराय जिला से है और आपसे पुराना जान पहचान है. ओ कार्ड पढ़ल लगलाह...चंद्र प्रकाश यैह नाम लिखल छल कार्ड पर आ नीचा कोनो ढाबा के पता. बड्ड मोन पाडला के बादो हिनका ऐ नाम के कोनो लोक मोन नै पड़लै, थकनी से मोनो अलसायाल छल. एक मोन त भेलै जे कहि दी जे हम नै भेंट क सकै छी अखन. मुदा फेर नै जानि की फुरेलैन जे ओ बजलाह जे अच्छा बजेने आबह ओकरा. किछ काल में अर्दली ४५-४६ वर्षक एकटा लोक के संग नेने आयल. सुधीर बाबू ओकर चेहरो देख के कतबो मोन पाड़ला पर चिन्ह नै पेलखिन तखन ओ अपन परिचय देत सुधीर बाबू के अपन समक्ष साक्षात देख ख़ुशी के मारल काने लागल छल. 'चनमा' उर्फ़ चद्र प्रकाश से सुधीर बाबू के कोनो विशेष जान-पहचान या सम्बन्ध छल एहन कोनो बात नै छलै. मुदा दुनू के बीच सम्बन्ध जोड़ बला करीब २५-२६ बरष पुरान एकटा घटना छल. सुधीर बाबू के आँखिक आगा ओ घटनाक्रम आब एकटा सिनेमा जेकाँ चल लागल: बात करीब पच्चीस-छब्बीस बरष पहिने के छल जखन सुधीर बाबू बेगूसराय जिला में पदस्थापित छलाह. एकदिन जखन सुधीर बाबू गंगा दियारा एरिया में पुलिस के किछ जवान के संग छापामारी क के वापस लखीसराय जिला मुख्यालय घुरैत छलाह त रस्ता में हुंकार जीप ख़राब भ गेलैन. ओ एकटा भयंकर बरसाती राति छल. कत्तौ कोनो सुविधा नै. स्वाइत गाडी ठीक होय के संभावना भोर होय से पहिने किन्नहुँ नै छल. ताहि दुआरे ई ऑर्डर केलखिन जे रात्रि विश्राम एम्हरे कतौ कैल जाय. अस्तु बगल के गाम में किछ घर सं खाट मंगवा क ई सब एकटा किसान के पैघ सन दालान पर आराम करै लागलाह. पैघ पुलिस अ अफसर के एकटा अलगे रूतबा होय छैक आ ग्रामीण समाज में एहन सन अधिकारी के इज्जातो ततबे होइत छैक. स्वाइत एकटा ग्रामीण आबि हिनका पुछलकैन जे सर एकटा छौरा अहाँके देह-हाथ जाँते चाहैत अछि. थाकल त छलाहे, झट द हं कहि देलखिन. हिनका हँ कहते एकटा उनइस-बीस बर्षक छौरा आबि के हिनकर देह-हाथ जाँते लागल छल. नाम पुछला पर अप्पन नाम ओ बतेने छल जे सर नाम त ओना चंद्र प्रकाश अछि मुदा लोक चनमा-चनमा कहैत अछि. कनि काल जाँतेला मातर जखन सुधीर बाबू के देह किछु हल्लुक बुझेलैन तखन ओ चनमा से पुछलखिन जे तों एहि गिरहत के एतय काज करै छहक की? ओ कहलक "नै सरकार हमरा अहाँ सं किछु कह के छल ताहि से अवसर देखल मातर पैरवी लगा अहाँ समक्ष एलहुँ अछि. हम मैट्रिक पास छी, आ बड्ड निक विरहा गाबि लैत छी, एम्हर-आम्हार, मेला-ठेला में अपन कला के प्रदर्शन क के किछु रोजी-रोटी कमा लैत छी. अहाँ सुनबै हमर गाओल गीत?" सुधीर बाबू के हँ, कहला पर ओ लगभग आधा-पौना घंटा भरि बिरहा गाबि-गाबि के सुनेलकैन. चनमा के आवाज में सरिपहुँ बड्ड दर्द आ बुलंदी छल. स्वाइत गीत सुनैत-सुनैत सुधीर बाबू के कोरह फाटि गेलैन, नै त पुलिस क आँखि में कहिं एहिना नोर आबै! एहन गुणी कलाकार सं देह-हाथ जँताबैत आब सुधीर बाबू के मोने-मोन ग्लानि होमय लागल छल, आ ओ गीत सुनैत-सुनैत उठि बैसला आ ओकरा कहलखिन जे "तोहर गीत में बड्ड बुलंदी आ दर्द छह. आई कतेको दिन बाद तों हमरा कना देलह अछि. कह, तोरा की इनाम दी चनमा?" किछ काल सोचला उत्तर ओ बाजल "सरकार गाँव में एकटा बाबू साहेब छै. हमर बाबू एकबेर ओकरा से किछु टाका उधार नेने छलाह. मुदा बाबू साहेब के सुईद क जाल में ओ एहन ओझरेला जे बाबू साहेब के ड्योढ़ी पर १० बरष तक बेगार खटला, खटैत-खटैत बेचारे स्वर्ग चलि गेला मुदा हुनका मुइलो मातर, बाबू साहेब के कर्ज नै ख़तम भेल. बाबू साहेब चाहैत छलाह जे बाबू के बाद आब हम ओकरा ड्योढ़ी पर बेगार खटी. हम गाम-गमाइत घुमि-घुमि विरहा गाबि किछ आमदनी करैत छी, जौं हिनका एतय बेगार खटती त पेट कोना क भरितियै. ताहि सं हम हिनकर बेगार करय से मना क देलियै. बस यैह बात हिनका लागि गेलैन आ इ हमरा पर लागि गेल छैथ. पिछला किछु मास सं हमरा खिलाफ थाना म चोर-डकैती आ लूट-पाट के कइएक टा फुइस केस दर्ज करा देल गेल अछि, तहिया स हम मारल-मारल फिरि रहल छी. एकटा हरमुनिया मास्टरजी छैथ ओ अहाँ के विषय में बतेलैथ तखन हम बड्ड हिम्मत क क आ पैरवी लगा अहाँ सोझा उपस्थित भेलहुँ अछि, आब अहाँ स एतबे गोहराबै छी जे हमरा संगे इन्साफ क देल जाउ सरकार" इ कहैत ओ सुधीर बाबू के पैर धर लगलै. सुधीर बाबू ओकरा पकड़ैत कहलखिन जे हम अहाँक व्यथा सुनल, आ आश्वस्त करै छी जे भोरे-भोर हम एहि मामला के देखबै. भोरे लोकल थाना पर जा क सुधीर बाबू चनमा के खिलाफ दायर सबटा मामिला के रिपोर्ट मँगबा के देखलखिन. पुलिसिया ज्ञान आ आ अनुभव के बले रिपोर्ट पढले सं लगाओल आरोप सब झूठ छैक से बुझह में कोनो भांगट नै रहलैन. किएकि घटना स्थल सब फराक-फराक आ बेस दुरी पर छल मुदा केस के गवाह सब ओहि बाबू साहेब के परिवार के लोक आ नौकर-चाकर सब छल. चनमा स चोरी आ लूट के कोनो सामानो नै बरामद भेल छल. रिपोर्ट के वृहत्त निरिक्षण के बाद सुधीर बाबू थाना इंचार्ज के केस ख़तम करै के आदेश देलखिन. चनमा के इ सुनि क आँखि में ख़ुशी के नोर आबि गेल छल. सुधीर बाबू के चेहरा पर संतोषप्रद मुस्की छलैन्ह. ओ चनमा से कहलखिन जे आब तों आजाद छह, जे मोन से कर लेल. ऐ पर चनमा बाजल, "सर, एतेक भेला के बाद जँ हम एहि एरिया में रहि गेलि त बेसी दिन तक ज़िंदा नहीं बचब. तैं आब हम नियाएर लेलहुँ अछि जे आब हम पंजाब चलि जायब. जीब त ओत्तहि किछु मजूरी क के कमा-खा लेब. सुधीर बाबू के जेबी में जे किछु टाका छल से ओकरा हाथ के दैत कहलखिन जे राखि ले, बाट में काज ऐतौ, किछु सहृदय गौंआ सब सेहो चन्दा क के ओकरा किछ कैंचा द देने छल. समय के संगे सुधीर बाबू के स्मृति में ऐ घटना पर पर्दा परि गेल छलै य. आई बर्षो-बर्ष बाद चनमा स भेंट भेला पर ओ स्मृति फेर ताजा भ गेल छल. जखन चंद्रप्रकाश सुधीर बाबू के गोर लागय लेल झुके लागल त ओ ओकरा कसि क पकड़ैत गला लगाबैत कहलखिन नै-नै एहन जुलुम फेर नै, अहाँ सन कलाकार से एकबेर फेर पैर छुआब के पाप नै करब हम. एक अर्थ में त अहाँ हमर गुरुओ छी, किएकि करियर के शुरुआती समय में अहिं स हमरा ज्ञान भेंटल जे पुलिस आ अदालत में इन्साफ तखन तक संभव नै अछि जा धरि अधिकारी सब लग एकटा संवेदनशील ह्रदय नै होय आ रिपोर्ट आ गवाह से इतर सेहो किछ बात भ सकै अछि इ महसूस कर के इच्छा-शक्ति नै होय. गरा लगैत ओ सुधीर बाबू के भरि पांझ के ध नेने छल. ख़ुशी के मारल ओकरा आँखि से नोर ढब-ढब चुबै लागल छल. कनिक काल बाद मोन स्थिर भेला पर ओ बतेलक जे दस साल धरि एकटा रेस्टोरेंट में मजूरी केला के बाद ओ एतय अपन एकटा छोट छिन होटल(ढाबा) खोलि नेने अछि आ कैटरिंग के काज करैत अछि. अपने एरिया के एकटा लड़की से बियाहो केलक आ ओकरा दू टा बच्चो छै एकटा कॉलेज में पढ़ैत अछि आ एकटा स्कुल में. ओ कहै लागल जे ओकर परिवार हिनका हरदम याद करैत छैन आ एकबेर भेंट करै छैयत छल. अस्तु "आई राति के भोजन तखत तोरे घर पर हैतैक" सुधीर बाबू के इ बात कहैत दुनू के चेहरा पर एकबार फेर सुखद मुस्कान आबि गेल छल, जेना दिन भैर के यात्रा के बाद सांझुक पहर आमक झोंझेर में आदित्य एकबेर फेर लालिमा बीछेने होइथ! मैथिली कथामे स्त्री उपरोक्त विषय पर चर्चा केनाय एत्तेक हल्लुक बात नै अछि, तथापि हम जे किछु लेखक केर रचना पढलहुঁ अछि ओय माह्क किछ स्त्री पात्र वा नायिका क भूमिका के विवेचना के प्रयत्न क रहल छि। सर्वप्रथम हम यात्री बाबा के उपन्यास ’पारो’ के नायिका पार्वती उर्फ़ पारो केर चर्चा कय रहल छी। पारो के पहिल परिचय पाঁच छ: वर्षिय, श्याम वर्णिय बुचिया के रूप मे कैल गेल अछि, आ कथा के मार्मिक अन्त १७-१८ वर्षक पारो के अकाल मृत्यु क घटना के संदर्भ सঁ होय अछि। मैथिली कथा मे स्त्री पात्र सब मे पारो के चरित्र एकटा एहन चरित्र अछि जे पाठक के हृ्दय स्थली में भावना के तीव्र प्रवाह त लैए आबै अछि संगहि मिथिला क्षेत्र में ७०-८०-९०के दशक में(आ संभवत: किछु एखनो) स्त्री जीवन के दशा के कैएक टा परत खोलि के राखि दैत अछि। २-४ घंटा में पारो सन नायिका के नेन्पन केर खेलौर सঁ ल के किशोरी पारो के चमत्कृ्त क दै बला बुद्धि, विवेक, मर्यादा के निभाब वाली धिया आ अंतत: समाजक दोष के कारणे अपरिपक्ब अवस्था में अकाल मृ्त्यु के वरण करैत पारो के झलक कोनो चलचित्र जेकाঁ पाठक के आঁखि के आगा एक के बाद एक क के निकलि जाय अछि। पारो नेनपने स चंचल छलीह आ किशोरावस्था में पहुঁचैत पहुঁचैत लोक व्यवहार आ ग्यान मे पारंगत भ गेलि। कथावाचक कहै छैथ जे ओ पारो से १-२ वर्षक जेठ छलाह मुदा तैयो लोक व्यवहार के जे बात हुनका इंटर में गेला पर बुझ एलैन से पारो ओहि बयस में बुझै छलीह जखन कथावाचक आठमी में छलाह। ऐ प्रकारे यात्रीजी ई बात के इंगित करै छैथ जे मिथिला के नारी में मानसिक परिपक्वता बहुत जल्दी आबि जाय अछि। पारो पढ्बा लिखबा, कथा-कविता में सेहो बेस तेज छलीह, स्वाईत हिनकर पिताजी हिनका खूब पढैबा के इच्छा रखै छलाह, मुदा से हिनकर माय के पसिन्न नै छल। ई मैथिल समाज के एकटा आर चरित्र चित्रण अछि जेकरा यात्रीजी ऐ कथा में खोलि क देखेलथिन्ह अछि। ई चरित्र कमोबेस आजुक मैथिल समाज में सेहो व्याप्त अछि, स्वाइत मिथिला क्षेत्र में स्त्री साक्षरता दर कदाचित सगर देश में सभसঁ निम्न स्तर पर अछि। औपचारिक शिक्षा नैहो भेंटला पर पारो रामायण, गीता, अमरकोष, हितोपदेश आदि ग्रंथ के घोषि लैत छथिन। प्रेम विवाह आ विवाह सঁ पूर्व अपन जिवनसंगी के निक से जानि लै के इच्छा आ ऐ से जुडल दिवास्वप्न सेहो पारो के मोन मे उचरै छैन्ह आ एकरा ओ कथावाचक के जाहिर सेहो कर छथिन जे “बिरजू भैया, भाइये-बहिन में जঁ बिआह दान होयतैक त कतेक दिव होयतै। कत’ कहाঁदन अनठिया के जे लोक उठा ल अबै अछि से कोन बुधियारी!” किशोरी पारो के मोन मे पुरुष जाति के प्रति जे आशंका छल से ओकर लिखल कविता के ऐ लाइन में सेहो व्यक्त होय अछि: सखी हम करमहीन कोन विधि खेपब दिन कोन विधि खेपब राति निट्ठुर पुरूख क जाति कोन विधि काटभ काल हैत हमर की हाल। परिस्थिति के मारल पारो के विवाह किशोरावसथे में अपना सं दुना उमिर के दुत्ति वर सঁ भ जाय अछि। कथा के अंत होय अछि शारिरिक रूप सঁ अपरिपक्व पारो के प्रसव के कारण भेल अकाल मृत्यु सঁ। इ भाग पढैत काल पाठक के कोंरह फ़ाटि जाय से स्वभाविक अछि। ऐ प्रकारे देखल जाय त पारो एकटा तेजस्विनि मिथिलानी छथि जे मैथिल समाज में व्याप्त दोष के कारण जिबैत अपन अभिलाषा के समेट क रखै छथिन आ अंतत: अकाल मृ्त्यु के प्राप्त हौय छथिन। आब अबै छी प्रो० हरिमोहन झा के रचना पर। ओना त हिनकर कथा-उपन्यास सब में नाना प्रकार के स्त्री पात्र सब भरल परल अछि, मुदा हम एतय हिनकर उपन्यास कन्यादान आ द्विरागमन के पात्र बुच्ची दाई आ मिस बिजली बोस के चर्चा क रहल छि। बुच्ची दाई के चरित्र जत अपन समय के मैथिल समाजक स्त्री क वास्तविकता अछि त मिस बिजली कदाचित ओ चरित्र अछि जेहन लेखक मैथिल स्त्री के भविष्य देखय चाहै छलाह। बुच्ची दाई एकटा एहन अबोध बालिका के चरित्र अछि जिनका मानसिक आ शारिरिक परिपक्वता से पहिनेहे बिआह क देल जाय छैन्ह आ ताहि कारणे ऐ संबंध के बुझ आ निभाब मे ओ अक्षम छलीह। मुदा रूप आ गुण सঁ पूर्ण बुचिया समय बितला पर आ सिखौला पढौला पर आधुनिकता के लिबास ओढि लै अछि। मिस बिजली बोस काशी विश्वविद्यालय में पढै वाली ओ कन्या छलीह जे कुशाग्र बुद्धि के संगे ठाঁय पर ठाঁय बाजय के कौशल सेहो राखै छलीह आ एहि कौशल के बले सीसी मिश्र के दर्प चुड-चुड करै छथिन आ हुनका हुनकर गलति के एहसाह दियाबै छथिन। दू टा पुरूष लेखक के बाद दू टा स्त्री लेखक के रचना में स्त्री पात्रक चर्चा करै चाहै छी। सर्वप्रथम लिली रे के कथा उपसंहार के नायिका ’अपर्णा’ के चर्चा क रहल छी। लिली रे अपन विभिन्न रचना में स्त्री पात्र के मार्फ़त ऐ बात के उल्लेख कएने छथि जे मैथिल समाज स्त्री के विवाह, प्रेम-संबंध आदि के ल क अनुदार रहल अछि आ औखन तक अनुदार अछि। जे महिला वर्ग पितृ्सत्तात्मक समाज मे युग युग सঁ सीदित आ प्रताडि.त होइत रहल छथि, सेहो वर्ग अपन समाजक दोसर सदस्य के प्रति अनुदार बनल रहलीह, सहानुभुति के अभाव रहलनि। शिक्षित आ आधुनिक मानल जाय बला समाजक पुरूष वर्गक मानसिकता में परिवर्तन नै आयल। ’अपर्णा’ के चरित्र एहि अन्तरविरोधक मर्मस्पर्शी उद्घाटन अछि। अपर्णा के प्रति हुनक बहिनोइ विनयक आचरण भावनात्मक नहि, शोषणात्मक छैन। ओ डाक्टरी के प्रवेश परीक्षाक मार्गदर्शनक नाम्पर अपर्णाके अपन मोह जाल में फ़ाঁसि लैत छथि। अपर्णा के बहिन वसुधा के आचरण इर्ष्याभाव सঁ भरल अछि ओ अपन पति के लंपटता के दोष नै दैत अछि, अपर्णा के दोषी मानैत अछि। ओ अपर्णा के तेज से जरैत अछि। पित्ति लग शिकायत क अपन छोट बहिन के प्रति घरक सदस्य में घृणा घनिभूत क दैत अछि। घौल भेल पिता अपर्णा के दंडित करबाक हेतु कठोरतम निर्णय करैत हुनकर पढाई छोरा एकटा मजदूर संगे साहि दैत छथिन। अपर्णा डाक्टर नै बनि सकलि मुदा अपन परिश्रम आ विद्या के बल पर सासुर के खूब सुखी-सम्पन्न बना दैत छथिन। मुदा विडंबना अछि जे अपर्णहिक परिश्रम सঁ गिरथाइनि बनलि ननदि सब सब सेहो हुनकर कुचेष्टा करै अछि। अपर्णा त्यागमयि छथि, सेवाभावि छथि, सहानुभूतिशील छथि, अपन मोनक व्यथा कौखन प्रकट नै होमय दै छथिन। सबसঁ बढि के धैर्य आ स्वाभिमान छैक। इ स्वाभिमान पतिक देहावसानक जिग्यासा मे आएल पिता केঁ कहल वचन में (’एहिठाम हमरा सब मानैत अछि। अहाঁस बहुत बेसी!’) सेहो स्पष्ट अछि। अंतिम स्त्री चरित्र जेकर हम चर्चा एखन क रहल छि ओ अछि डा० शेफ़ालिका वर्मा के कथा ’मुक्ति’ के नायिका ’मेहा’। मेहा कोमल सदृ्श्य भाव वाली तेजस्विनी कन्या छथिन जिनका समाजक देखावटी उत्थान आ इळिटनेश नै पसिन्न छैन्ह। ओ अपन माঁ के महिला-मुक्ति आंदोलन आ ओय सঁ जुड.ल सदस्या सब के आलोचक छथिन जे महिला-मुक्ति के नाम पर बड.का बड.का जुलूस त निकालै छथिन मुदा ई बात के अन्तर्बोध नै छैन जे महिला के मुक्ति चाहि कथि सঁ। ओ अब अपनहि जानैत या अन्जान मे नारी के प्रतारणा के बढावा दै बला काज करै छथिन। एहि क्रम मे मेहा के विवाह एकटा प्रोफ़ेसर साहब से होय बला रहै छैन जे वास्तव मे पकरौआ विवाह छल आ तेकर बदला लै लेल प्रोफ़ेसर साहब मेहा संग हुनक पांच टा सखि के सिनुरदान क दैत छथिन। मुदा तेजस्विनि मेहा ऐ विकट परिस्थिति के अपन कुशाग्रता आ तेज से स्म्हारि लैत छथिन, ओ ऐ विवाह के अमान्य साबित क दैत छथिन आ प्रोफ़ेसर साहब के मुक्त करैत बजै छथिन जे “हम एहि विवाह के नै मानैत छी आ नै हमर संगी मानत। हम सब एत्तेक गेल-गुजरल नै छी । नारी के नियति मात्र विवाह छैक मुदा हम एकरा नै मानैत छी। विवाह स्त्री पुरूषक समर्पण थिक। जे बलजोरी देल जाय आ जे एक्कहि संगे पाঁच गोटे के देल जाय ओ सिन्दूर धर्मक दृ्ष्टिए मान भ जाए मुदा हम कहियो नै मनब। प्रोफ़ेसर साहब मेहा के ऐ तर्क-वितर्क से अवाक भ गेल। ओ एकटा अग्यात सम्मोहन सঁ आविष्ट भ मेहा से अपन अपराध लेल क्षमा मांगैत छथिन आ हुनका अपन जीवन संगिनि बनाब के वचन दैथ छथिन। एहि प्रकारे हम देखैत छि जे जत पुरूष लेखक सब स्त्री पात्र के द्वारा समाज मे स्त्री के अवस्था आ हुनका प्रति व्याप्त कुप्रथा पर चोट करै छथिन ओतय महिला लेखिका स्त्री समाजुक स्थिति के सुक्ष्म विवेचना करैत छथिन। एकटा जन्मेजय कथा (व्यंग) ओना त महाभारतsक सबटा कथा सब युग के लेल प्रासंगिक रहल अछि, एहि क्रम में राजा जन्मेजयक एकटा कथा सेहो आजुक समय के हिसाब सं खूब प्रासंगिक अछि. राजा जन्मेजय अर्जुन के पोता आ राजा परीक्षित के बेटा आ उत्तराधिकारी छलाह. एक बेर राजा परीक्षित कलयुगक प्रभाव सं ग्रस्त भs मरल सांप केर माला बनाय ऋषि शमीक के गर में धs क हुनकर अपमान क देलखिन. ऐ अपमान सं ऋषि के बेटा श्रृंगी पित्तिया गेलाह. ओ पित्ते आमिल पिने छलाह आ अपन बाबू के अपमानक बदला लेबय के ठानि नेने छलाह. एहि के लेल ओ नागराज तक्षक के बजाय, राजा परीक्षित के ठिकाना लगाबय के सुपारी द देलखिन. बस तखन की अर्जुन सं पराजित आ अपमानित तक्षक एहने मौक़ा के बाट जोहैत छलाह, स्वाइत ओ ऐ सुपारी उठब में कोनो कौताही नै रखलाह आ सही मौक़ा पाबि ओ परीक्षित के 'मर्डर' क देलाह. परीक्षित केर मर्डर के बाद हुनकर बेटा जन्मेजय गद्दी पर बैसलाह. बापक ह्त्या के सभटा पिहानी जानलाक बाद हिनका मोन में बदलाक भावना प्रज्ज्वलित भ गेलैन आ ओ तक्षक सहित सभटा नाग के समूल नष्ट करै के ठानि लेलैथ आ ऐ के लेल सर्प यज्ञ करेलैथ मुदा ऐ 'मर्डर' के मास्टरमाइंड यानी ऋषि श्रृंगी के छोड़ि देलखिन. "आब एकटा 'बाबा' से के पंगा लै! बदले लै के छैक त तक्षके सं ल लैत छी आ ओकर समूल नाश क दैत छी." (भ सकै अछि एहने किछु विचार हुनका मोन में आयल हेतैन, यद्यपि ऐ तरहक बात महाभारत में आधिकारिक रूप सं कतौ ने देखलहुँ पढ़लहुँ अछि). हं त भेल एना की सर्प यज्ञ में एक-एक क के सभटा निर्दोष सांप सब खसि खसि क भस्म होमय लागल. ओकरा सब के पतो नै छल जे ओकर सब के दोष की छैक जेकर सजा ओकरा सब के भेंट रहल छल. खैर. हजारो-लाख सांप के मुइला के बाद जखन तक्षक केर पारि एलै तखन पता नै ओ कुन देवता-पित्तर से सेटिंग क के आस्तिक नामक एकटा ब्राम्हण के भेज के सर्प यज्ञ रुकवा देलक आ तक्षक केर जान बचि गेल. कहल जाय छैक जे एकर बाद जन्मेजय आ तक्षक दुनू बर्षो-बरख जिबैत रहलाह आ अपन-अपन राज-पाट के भोग केलाह. कहाँदैन कहल जायछि जे तक्षक केर बाद में इन्द्रक दरबार में सेहो बड्ड निक पैठ बनि गेल छल. आ ऐ तरहे देखल जाय त मास्टरमाइंड ऋषि श्रृंगी, एक्सीक्यूटर तक्षक आ बदला लै पर उतारू जन्मेजय के त किछु नै भेल मुदा ऐ सब प्रक्रिया में मारल गेल बेचारा हजारो-लाख निर्दोष सांप सभ जेकर एकमात्र अपराध जे ओ तक्षक के समुदाय से छलाह. उपसंहार: आजुक समय में एहि कथा के प्रासंगिता चिन्हियौ आ विचार करियौ, अहाँ बुद्धिजीवी छी मृणाल आशुतोष, एरौत(समस्तीपुर) छुटकी बड़ दिनक बाद आय सब दोस्त क संग फुटबॉल खेलबाक परगराम बनल। विकास अपन संघी सबक साथ फुटबाल खेल रहल छल। अचानक सँ अपन नाऊ सुनि ओ इम्हर उमहर देख लागल। ओकर पड़ोसी विनय दौड़ल ओकरा लंग दौड़ैत पहुँचल। "विकास, रौ विकास!" "की भेलौ रौ! कीछ बजवें..." "ओ तोहर भतीजी..." "की भेलय हमर छुटकी क? बाज न रौ, की भेल हमर छुटकी क?" "ओ! ओ स्कूटी सँ एक्सीडेंट क गेलौ। गाम पर क लोग सब ओकरा झाजी नर्सिग होम ल गेल खिन हन।" "अरे बाप रौ बाप। ई की भ गेलै। यौ लाल भैया कनि अपन बाइक क चाभी दीअ। हमर बाइक गामे पर धाएल अछि। भागैत विकास हस्पताल पहुँचल त भैया गेट पर ठार छलैथ। शायद ओकरे प्रतीक्षा करैत छलाह। विकासक देखैत भैया भोकाईर पाइर क कानअ लगला,"रौ विकास, आब हम नय बचबौ।दखी न, छुटकी क की भ गेलेय।" "भैया,आब हम आईब गेलिये हन न। सब नीक भ जेतै। अहाँ बस भगवान पर भरोसा राखु। कत छै छुटकी?" ""आई! आईसीयू में अछि!" "अरौ बाप! कोन मंज़िल पर?" "दोसर मंज़िल पर।" भागि क विकास आईसीयू पहुँचला त ओतअ माँ, बाबुजी आ भौजी के प्राण सूखैत छल। मन त भेल कि पूछि जे ई एक्सीडेंट कोना भेल! मुदा मन मसोइस रहि गेल बेचारा विकास। बहुत कोशिश केलक मुदा तामस पर नियंत्रण बेसी देर तक नय राखि सकल आ मन के सब भड़ास बाहर आबि गेल। "मना करैत छलौं न अहाँ सब क कि अखन स्कूटी नय देल जाऊ। त नय हमर गुड़िया रानी अखने सँ स्कूटी चलेताह। तेरहो बरख ओकर भेलय हन कि। अब मन में शांति आबि गेल न! ...... "माँ, अहाँ की कहैत छलियै! ज़माना आगाँ बढ़ी गेलय हन। नर्सिनियाँ के बेटा चौदहहे बरिख में मोटरसाइकिल चलबैत अछि। कर्नल साहेब क बेटा त कारो चला लैत अछि। आबि और दिअ स्कूटी!" "हमरा माफ क दीअ, बच्चा। हम आन्हर भ गेल छलिए। बच्चा सभक चलबैत देख, हमरो मन भ गेल कि अपनो बच्चा चलावै। पूत आ धी मे अन्तर किछ अछि आबि की। देख न, तोहर बात नय मानेय क सज़ा हम सब भूगैत रहल अछि।" ""अहूँक कतेक समझेलूँ कि माँ बाबुजी क मनाबु जे अखन अपन छुटकी क उमर नय भेलय हन स्कूटी चलावै बला।अखन त ओकर पायेरौ न चुमहैत अछि।सभक दिन दुर्घटना क समाचार आवैत रहैत अछि।" ..... "भउजी, आ अहाँ कि कहनै छलियै? याइद अछि कि नय। हम जलय छि अपन छुटकी सँ। हम जलय अछि किया कि बाबुजी हमरा कॉलेज म मोटरसाइकिल नय देने छलाह। जेकरा हम अपन जान सँ बेसी मानैत अछि, ओकरा सँ जलब हम!" "हमरा सब सँ बहुत नम्भर गलती भ गेलय। चुपो भ जाऊ न आब। छुटकी हमर सभक क्यो नय अछि की? अहाँ, आब हमरासभक जान लेब की? "हाँ, जान ल लेब। अगर हमर छुटकी क किछ भ गेल त ककरो नय छोड़ब। याइद राखब ई बात।" अचानक सँ आईसीयू क दरबज्जा खुलल। सभक धकधक्की बैढ़ गेल। विकास तेज़ी सँ आगाँ बढ़ल। "आब अहाँ क बच्ची खतरा सँ बाहर अछि।" डागदर क शबद सुनि हक़ सँ सभ गोटा क प्राण में प्राण ऑइल। गीतेश शर्मा भारतीय मुसलमान आ भारतीयता (मूल हिन्दी लेख केर मैथिली अनुवाद- उमेश मण्डल) भारतीय मुसलमानक किछु एहेन खुबी रहल अछि जइ कारणेँ हुनका सभकेँ ‘मुसलमान नहि कहि ‘भारतीय मुसलमान’ कहब बेसी नीक होएत। दुनियॉंक कोनो देशक मुसलमान-समाजसँ हिनकर तुलना नहि कएल जा सकैत अछि। भारतक माटि-पानिमे रचल-बसल ऐ समाजक दैनंदिनक जीवन, आचार-बेवहारक इस्लामसँ दूरोक सम्बन्ध नहि, परन्तु दिक्कत तखन होइत अछिजखन इस्लामक केन्द्र सऊदी अरबकेँ ई लोकैन अपन सोचक केन्द्र मानि लइ छैथ आ ओतए-सँ आबि रहल हवाक सुगन्धकेँ महसूस करैक दाबी करै छैथ, जखन कि सच्चाइसँ एकर कोनो सरोकार नहि होइत। जेना किकहल गेल अछि, ई अपन रोजमर्राक जिनगी आ बेवहारमे इस्लामक ऐसी-तैसी करै छैथ, मुदा जँ कियो अन्तिम पोथी- ‘कुरान-ए-पाक’आ अन्तिम पैगम्बर ‘हजरत मुहम्मद’केँलऽ कऽ कियो सबाल उठबए तँ मरै-मारैले उताहुल भऽ जाइ छैथ। मजगर बात ई अछि जे ई सभ भारतमे जे करि लइ छैथ, यएह जँ सऊदी अरब मक्का-मदीनामे करैथ तँ या तँ हिनका सजा-ए-मौत मिलतैन वा बिना कोनो हीले-हवालेक हिनका ओतएसँ निकालि कऽ बाहर करि देल जेतैन। ई कहैमे कनिक्को परहेज नहिजे ऐ समाजक लोक निरपवाद रूपमे ओ सभ सभ काज करै छैथजेकर कुरान-ए-पाकमे सख्त मनाही(मुमानियत)कएल गेल अछि, संगे अल्लाह आ हजरत मुहम्मद सेहो जैपर सख्त पाबन्दी लगौने छला। ऐ मुद्दाकेँ आगू बढ़ेलासँ पहिने हम एकटा छोट-छीन उदाहरण देबए चाहब, हमर एक शुभेच्छु मित, जे जनै छैथ जे हम साए प्रतिशत नास्तिक छी, एक दिन साँझू पहर हमरासँ भिड़ गेला आ इस्लामकेँ लऽ कऽ बहस करए लगला। मौका पाबि हम लगे-हाथ कहलयैन- “अहॉंक मुहसँ इस्लामक बात शोभा नइ दैत अछि, किएक तँ नियमसँ अहॉं मुसलमान छीहे नहि!” हुनकर ऑंखि लाल भऽ गेलैन। ओ तमसाकऽ बजला- “ई कहबाक अहॉंक हिम्मत केना भेल?” हम कहलयैन- “दोस (मियां), हमरा बजैक मौका तँ दीअ आर ताबेतक अपन तामसपर कंट्रोल राखू।” हम सबालक ढेप बरिसबैत पुछलिऐ- “अहॉं शराब पीने छी?” निच्चॉं नजैर केने ओ धीरेसँ बाजल- “हँ।” हमर दोसर सबाल छल- “अहॉं पथिया लगबै छी। माने फुटपाथिया दोकान। भिनसर-सँ-साँझ धरि गहिंकीसँ मात्र झूठे नहि बजै छी, बल्कि सप्पत खा-खा कऽ झूठ बजै छी। मुदा जखन सौदा नइ पटैए तँ अधलाह जबानसँ ओकरा अधलाह गारि सेहो दइ छिऐ,की ई छी अहॉंक इस्लाम?” ऐठाम ई साफ करि दिअ चाहै छी जे ई बात हिंदुओ भाय लोकैनपर लागू होइते अछि। खास कऽ ओइ हिन्दूपर जे अपने-आपकेँ धर्मक ठीकेदार मानै छैथ। हम अपन मुस्लिम मितकेँ कहै छिऐन जे अहॉं अपना-आपकेँ भारतक माटिमे तइ तरहेँ रचा-बसा नेने छी जे ऍंड़ी-सँ टिकासन तक अहॉं सुच्चा भारतीय छी, मात्र देखाबाक लेल अहॉं इस्लामी मुखौटा लगबै छी, जइसँ हिंदु आ मुसलमानक बीच ऐ तरहेँ दूरीक जन्म होइए जइसँ रोटी-बेटीक रिश्ता-नाता तँ दूर जे एक थारीमे बैसकऽ खेना-पीनाइ तक असान नहि, जखन कि सच्चाइ ई अछि जे भारतक तहजीबक नीक-बेजाए कोनो एहेन पहलू नइ अछि जेकरा अहॉं अपनेने नहि होइ, बल्कि कतेको मामलामे तँ अहॉंकेँ महारत हॉंसिल अछि। आउ किछु बिन्दूपर खुलिकऽ चर्च करी। इस्लाममे जाति-पाति नहि अछि, परन्तु भारतीय मुसलमानमे तँ अछिआ सेअइछे नहि, बहुत बेसी तर तक अछि। आपसमे बेटीक बिआह नइ होइए। शेख सैयद, खान-पठान ऊँच जातिक, कुंजरा-जुलाहा-अंसारी नीच जातिक मानल जाइ छैथ। शादी-बिआहक रस्म-रेबाज मजहबी दूरीक बावजूद हिंदु आ मुसलमानमे ऐ तरहेँ मिलल-जुलल अछि जे ई कहब बहुत कठिन, जे ई रेबाज केकरासँ के लेलक। किएक तँ ‘वेद’ आ ‘कुरान-ए-पाक’मे ऐ रेबाजक केत्तौ कोनो जिकिर नहि। शेरवानी पहिरब, सेहरा लगाएब, चुहलबाजी करब, मेहदी-उबटन लगाएब, जुआ खेलब इत्यादि-इत्यादि सभ रेबाज अहीठामक छी, कोनो सऊदी-अरब, ईरान-इराकसँ थोड़े आएल अछि। नाच-गान, ऐक्टिंग करब, पेंटिंग करब, एतए तक कि शास्त्रीय संगीत आ भजन गायनमे मुसलमान अव्वल दर्जापर अछि। फिल्म हुअए कि नाटक आकि चित्रकला, एतए तक कि मूर्ति बनाएब ऐ सभ क्षेत्रमे मुस्लिम कलाकार आ कारीगर माहिर रहल अछि। जखन कि ऐ सबहक ‘कुरान-ए-पाक’मे सख्त मनाही कएल गेल अछि। अधिकतर मुस्लिम देशमे ऐ सभपर सख्त पाबंदी अछि। उदाहरणक तौरपर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां लिअ, की बिस्मिल्लाह खां सऊदी अरबमे शहनाइ बजा सकै छला? फ़िदा हुसैन अगर मक्का मदीनामे चित्रकारी करितैथ तँ हुनका ता-उम्र जेलमे बितबए पड़ितैन। मुदा ऐ कलाकार सभपर भारतकेँआत्म-सम्मानक भान भेलै आ हुनका सभकेँ पैघ-पैघ इनामसँ नवाज़ल गेलैन। भजन गायन? तौबा-तौबा। गबैबला मुसलमान, भजन लिखलैन मुसलमान, मौसीकार मुसलमान, पर्दापर गबैबला मुसलमान आ ऐ सभकेँ पेश करैबला प्रोड्यूसर सेहो मुसलमान। आइयो जखन ओइ भजनकेँ कियो सुनैए, तँ आस्तिक होथि वा नास्तिक भक्ति रसमे डुमि जाइए। केतेक नाओं गिनाबी कलाकार सबहक, समुच्चा पोथी लिखए पड़त। मुदा तैयो किछु कलाकारक नाओंकेँ जिक्र करब जरूरी अछि जेना- ‘गुलाम अली खां, अलाउद्दीन खां, उस्ताद अमीर खां, बेगम अख्तर, बिस्मिल्लाह खां, उस्ताद अल्ला रखा, आगा हश्र कश्मीरी, नौशाद, मुहम्मद रफ़ी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, सुरैया आदि। लेखन जगतमे ‘अमीर खुसरो’, पहिलहिन्दीमे लेखक छला, जिनकर लिखल गीत आइयो हिंदुक शादी-बिआहमे गाएल जाइत अछि। मलिक मुहम्मद जायसी नइ होइतैथ तँ कि रानी पद्मावती होइतैथ? रहीमक दोहा सभसँ के परिचित नइ छैथ? श्रीकृष्णपर रसखानक लिखल गीतक आइयो कियो बराबरी नहि। कबीर रहीम गोस्वामी तुलसीदासक समकालीन छला। तुलसीदास जखन रामचरित मानस लिख लेलैन तँ पोथीक पहिल प्रति कवि रहीमकेँ भेँट केलैन आ हुनक राय मंगलखिन। पोथी पढ़ि रहीम जे टिप्पणी केलैन, पाठककेँ जनतब हेतु ओकरा हम एतए छापि रहल छी- “रामचरित मानस बिमल सेतन जीवन प्राण हिंदुआन को वेद सम जमनहिं प्रकट कुरान।” (अब्दुर्र रहीम खानखाना) सैयद महफ़ूज़ हसन रिज़वी ‘पुण्डरीक’हमर करीबी मीत तँ नहि मुदा मीत छला। हमर हुनकासँ मित्रता ग़ज़लकार जितेन्द्र धीरक ओजहसँ भेल। नास्तिक होइतो रामचरित मानसपर हम अनेको प्रवचन सुनलौं। हमरा नजैरमे पुण्डरीक सभसँ अव्वल रहला। रामचरित मानसपर जखन ओ बजै छला तँ लोक सभ सम्मोहित भऽ कऽ हुनक व्याख्यान सुनैत छल। लगबे ने करै छल जे कोनो मुसलमान रामचरित मानसपर बाजि रहल छैथ। ओ निखालिस भारतीय मुसलमान छला आ भारत वर्षक तहज़ीबकेँ ओ आत्मसात कऽ नेने छला। ई बहुत कम लोक जनै छैथ जे उर्दूमे मोहब्बत आ मुल्क परस्तीकेँ लऽ कऽ बहुत बेसी गजल-शायरी लिखल गेल,आन-आन जबानक तुलनामे। मुस्लिम कारीगर अगर तीन मासक अवकाश लऽ लैथ तँ महल-झोंपड़ी, मन्दिर-मस्जिद बनब बन्द भऽ जाएत। जेवरात बनबैसँ लऽ कऽ हीरा तराशब, जड़ी-बुटीक कारीगरी, दर्जीगिरीक क्षेत्रमे सत्तर प्रतिशतसँ बेसी कारीगर भारतीय मुसलमान छैथ और हुनकर कारीगरीक बेपार करैबला हिंदू। मध्यपूर्वक देशमे लाखो मुसलमान कारीगर काज करैले जाइ छैथ आओर अपन कमाएल कमाइक निवेश भारतमे करै छैथ न कि यूरोप, अमेरिकाक बैंकमे। भारतीय मुसलमानक त्रासदी ई अछि जे ओ जनबे ने करै छैथ, भारतीय तहज़ीबमे सोल्होअना रंगल भारतीयताक स्वतंत्र देन रहल अछि। ओइ कौमक लोकक भारतीय तहज़ीबकेँ बेइन्तहा देन रहल अछि। जइ दिन ओ ऐ सच्चाइसँ बावस्ता भऽ जेता आ ऐपर फक्र करए लगता, हिन्दू मुसलमानक बीचक दूरी बहुत हद तक मेटा जाएत। कवि नज़रूल इस्लामकेँ लेल जाए, ओ अपन लेख आ कविताक माध्यमसँ ‘सनातन धर्म’ आओर ‘इस्लाम’पर हथौरीसँ चोट केलैन। ओ लिखलैन- दंगाक दौरान मन्दिर और मस्जिद तोड़ि देल जाइत अछि। मनुखक जान लऽ लेल जाइत अछि, ईश्वर आओर अल्लाह चुपचाप ई दृश्य देखैत रहि जाइ छैथ। मन्दिर-मस्जिद तँ फेर बनि जाएत, मुदा मनुखक जान आपस भऽ सकत? मुसलमनक सभसँ पैघ मसला ई अछि जे हुनकामे सही लीडरशिप नइ अछि। पढ़ल आ अनपढ़ल मौलवी-मुल्ला मजहबक नाओंपर हुनका भड़काबै आ भटकाबै छैन। हालक किछु वर्षमे ई देखल जा रहल अछि, हिंदू लीडारशिपक एक पैध तबका ऐ बदगुमानीक शिकार भऽ मुल्ला-मौलवीक रस्तापर चलि पड़ला अछि। दुनूक जुआन एक अछि, भड़काबै आओर भटकाबैक तरीका सेहो एक अछि, मुदा हुनकर बदकिस्मतीसँ हिंदूमे अखनो मुस्लिम कौम जकॉं कट्टरता नइ आएल अछि। ‘हिंदू धर्म’केँ लऽ कऽ बहुत हद तक खुलि कऽ चर्चाक गुंजाइश बँचल पड़ल अछि। मुस्लिम कौमक तँ ई हाल अछि जे कुरान शरीफ आओर हजरत मुहम्मदकेँ लऽ कऽ, अल्लाहकेँ लऽ कऽ नुक्ताचीनी तँ दूरक बात जे कोनो सबाल तक उठबैक इजाजत नइ अछि। मुसलमानक की प्राथमिकता तालीम, सेहत, गरीबी नहि बल्कि मस्जिद अछि। कुरान शरीफकेँ कंठस्थ करैबलाकेँ हाफ़िज मानल जाइए आओर इज्जतक नजैरसँ देखल जाइए। मात्र कंठस्त करि कऽ ‘कुरान-ए-पाक’केँ बिना समझने-बुझने..! छै ने कमाल..! मुसलमानक एक त्रासदी आओर अछि जे ओ जखन नमाज पढ़ै छैथ तँ मक्का-मदीना माने सऊदी अरब दिस मुँह घुमा कऽ, जखन कि सऊदी अरब कोनो कीमतपर हिनका अपनबै आ नागरिकता दइक लेल तैयार नहि। रहल अल्लाह केर प्रश्न, अगर ओ छैथ तँ सभ जगह छैथ। शहर कलकत्ताक एक इलाका खिदिरपुर आओर मटियाबुर्ज अछि, जेतए अस्सी प्रतिशत आबादी मुसलमानक अछि। ओतए लमसम साएसँ बेसी मस्जिद अछि, जइमे पनरहसँ बेसी मस्जिद पूर्णत: एयरकंडीशनसँ लैश अछि। करोड़ो रूपैआ लगा कऽ ओकर रौनकमे निखार आनल गेल मुदा समुच्चा इलाकामे एक्कोटा नीक स्कूल, एक्कोटा नीक कौलेज आकि नीक अस्पताल नहि अछि। मुसलमान सबहक पिछड़ापनक लेल केवल सरकारपर तोहमत लगाएल जाए आकि मुस्लिम कौमकेँ सेहो एकरा लेल जिम्मेदार ठहराएल जाए? भारतीय मुसलमान जखन अपन भारतीय सोचक जगह ‘मजहब परस्ती’केँ अन्हार-कूपमे रहब पसिन करता तँ अल्लाह सेहो हुनका ऐ सभ समस्यासँ छुटकारा नइ दिआ पौतैन। हिंदू समाजक ई खासियत अछि, विशेषता अछि जे केतेको सदिसँ एक-पर-एक केतेको समाज सुधार आन्दोलन भेल, एतए तक कि स्वामी दयानन्द सरस्वती मूर्तिपूजा (बुतपरस्ती) केँ ई कहि मुखालफ़त केलैन जे ई रेबाज वैदिक युगक पछातिक विकृति छी। ओ अपन पोथी- ‘सत्यार्थ प्रकाश’मे राम कृष्णकेँ एहेन ऐसी-क-तैसी केलैन अछि। राजा राममोहन राय, विद्यासागरआदि बाल-बिआहक विरोध आओर विधबा-बिआहक समर्थन केलैन। एतए तक कि सती-प्रथाक सेहो डटि कऽ विरोध केलैन। एकटा कानून ‘शारदा एक्ट’क तहत बाल-बिआहपर कानूनन रोक लगौल गेल। कट्टरपंथी सबहक विरोधक बादो ई कानून अमलमे लाओल गेल। ऐ मुहिमकेँ आगू बढ़ौलैन बामपंथी आ प्रगतिशील चिंतक-विचारक। मुसलमानक तुलमामे हिंदूमे जे बदलाव आएल, भलेँ सीमिते तौरपर, मुदा ओकर असर समाजपर पड़ल आ समाजकेँ ओइसँ नोकसान नहि भेल बल्कि लाभे भेल। मुदा विगत किछु बर्खसँ हिंदू कौमक चक्का उल्टा घूमि रहल अछि। रूढ़िवादी पुरातनपंथी तत्त्वक सोझहामे ई घुटना टेकने जा रहल अछि, जेकर सभसँ बेसी लाभ ओकरा भऽ रहल अछि, जे इस्लाम आ पश्चिमसँ आबि रहल खतराक नाओपर समुच्चा कौमकेँ अतीतोन्मुखी बनबैमे सफल भऽ रहल छैथ। मजगर बात तँ ई अछि जे हिंदुत्ववादी विचार पैघ-पैघसँ तायदादमे ओइ पख्श्चिममे जा कऽ बसि रहल छैथ, जिनका एतए राति-दिन कोसल जाइए। मुस्लिम कौमक नेता सभ जकॉं हिंदुत्ववादी नेता सेहो ‘हिंदू धर्म खतरामे’ अछि, ऐ नाओंपर समुच्चा कौमकेँ गुमराह कऽ रहल छैथ आओर बहुत हद तक हुनका कामयाबी सेहो भेटलैन अछि। लगैए, ईश्वर-अल्लाह एतेक कमजोर पड़ि गेल अछि कि हुनकर शख्सियतकेँ बँचबैक कोशिशमे दुनू कौमक लोक मिलिकऽ एक-दोसरक विरोधमे मोर्चा सम्हारि नेने छैथ। फलाफल ई भेल अछि जे दुनू कौमक लोक अपन बुनियादी हक- रोजी, रोटी, शिक्षा, चिकित्सा,गरीबीइत्यादिअनेको अमानवीय बेवहारककीमतपर मजहबी जुनून पैदा करि कऽ घृणाक आगि सुनगा रहल छैथ। उमेश मण्डल बीहैन कथा- भिनसुरका गप-सप्प सभ दिन भिनसरे-भिनसर बुलैले निकलै छी। कौलेजक फिल्डपर पहुँच ऐ कातसँ-ओइ-कात पाँच-दस चक्कर लगबै छी। ओना तँ अनेको लोक फिल्डपर चक्कर लगैबते छैथ मुदा चारि-पाँच बेकतीक मित्र-मण्डलीमे हमहूँ रहै छी। कहियो अपने पहिने पहुँचलौं, कहियो वएह सभ पहिनेसँ पहुँचल रहै छैथ। संगे सभ कियो टहलै-बुलै छी। पछाइत सबहक बैसार चाहक दोकानपर होइत अछि। दोकानोपर खाली हमहीं सभ रहै छी सेहो नहियेँ कहल जाएत, आरो-आरो लोक सभ रहै छैथ। किछु लोक पहिनौंसँ बैसल रहै छैथ आ पछातियो अबिते छैथ। चाहक दोकानपर रंग-बिरंगक गपो-सप्प चलिते अछि। रंग-बिरंगक माने विषयगत सेहो आ बेकतीगत-सामुहिक सेहो। बेकतीगत गप-सप्प तँ बेकती-बेकतीक बीच चलैए, मुदा तैसंग किछु एहनो बात चलिते अछि जे सामुहिक रहल। सामुहिक बात जखन किमहरोसँ चलैए तँ ओइमे कोनो समुहक लोक अपन विचार राखब उचित बुझै अछि। ओना, समुहो समुहमे अन्तर अछिए। नवयुवक, अर्द्धवृद्ध आ वृद्धसँ लऽ कऽ सहरगंजाक संग तगमाबला धरिक समूह अछिए। मुदा विषयो तँ बहुत एहेन अछिए जे करीब-करीब सभ तरहक लोकक कानकेँ ठाढ़ कइये दैत अछि। आजुक गप-सप्पक विषय छल- आरक्षण। किछु लोकक कहब रहैन आरक्षण अनुचित अछि आ किछु लोक आरक्षणकेँ उचित कहै छला। कए गोरे अपन-अपन बात बाजि-बाजि चुप भऽ गेल छला आ कए गोरे बाजियो रहल छला। किछु गोरे पक्षमे आ किछु गोरे विपक्षमे बाजि रहल छला। माने आरक्षण नहि रहक चाही ई एक समूहक कहब रहैन। कहबे नहि रहैन, साबित कहैत एक गोरे स्पष्ट विचार रखबो केलाह- “आरक्षण अनुचित अछि। मानि लिअ, डाक्टरीए पढ़ाइमे जे आरक्षण अछि। ऐसँ क्षति हेबे करैए किने। जइ काजमे कुशाग्र बुधिक जरूरत अछि ओ काज आरक्षणक चलैत मन्द बुधिक हाथ पड़ने की क्षति नइ होइए। हेबे करैए।” बेसी गोरेकेँ ऐ विचारपर जेना सहमैत बनलैन। वास्तवमे आरक्षण नइ रहक चाही। जेना चुप्पी पसैर गेल। मुदा चुप्पी रहल नहि। बिच्चेमे हमर मित्र- शिबुजी सेहो थोड़ेक सह लगा देलखिन- “देखै नइ छिऐ, आएदिन केहेन-केहेन घटना ऑफिस-कार्यालयसँ लऽ कऽ अस्पताल धरिमे होइत रहैए।” ओना, शिबुजी किछु आर बातकेँ गप-सप्पमे आनए चाहि रहल छला, मुदा हुनका, माने जे पहिनेसँ बाजि रहल छला तिनका बुझि पड़लैन जे आरक्षणक विरोधेमे शिबुजी बजला अछि। ओ अपन मुड़ी डोलबैत बिच्चेमे शिबुजीकेँ कहलखिन- “तँए ने कहलौं, आरक्षण बेकार अछि। आरक्षण हटि जेबा चाही।” हुनकर बात सुनिते शिबुजी हमरा दिस ताकए लगला। हमहूँ शिबुजीक चेहरा देखए-पढ़ए लगलौं। बुझि पड़ल जेना इशारेमे कहि रहला हेन- “देखियौ, आरक्षणक मात्र एक पहलूकेँ कनी-मनी जनैए कि नहि जनैए, मुदा पंनचैती केना करैए!” बुझि पड़ल किछु बजबाक चाही। ओइ बेकतीकेँ पुछलयैन- “अँइ यौ भाय साहैब, डोनेसनपर जे नामांकण होइ छै, ओ की एक प्रकारक आरक्षण नइ छी? की ओइमे सभटा कुशाग्रे बुधिक नामांकण होइ छइ?” कए गोरे अपन-अपन कपकेँ देख बुझि गेला जे आब चाह सठि गेल, मुदा कए गोरे से बिनु देखनहि मुँहमे लगा-लगा बुझला- जा! चाह तँ सठि गेल। जहिना सबहक कपक चाह सठि गेल तहिना गपो सठि गेल। सगर राति दीप जरय ९९ म आयोजन दिनांक 22 सितम्बर 2018, शनि दिन। प्रो. प्रीतम कुमार 'निषाद'जीक संयोजकत्वमे सगर राति दीप जरय'क 99म कथा-साहित्य गोष्ठी सुुसम्पन्न भेल। 21 गोट कथाक पाठ आ तैपर समीक्षा भेल। 'सगर राति दीप जरय- मिथिला-मैथिलीक एक मात्र मंच अछि जैपर सभ वर्गक लोक (साहित्यकार) सहृदय उपस्थित होइत रहल छैथ। सभ वर्गक साहित्यकारोमे सोचै-विचारैबला बात अछि जे स्थापित साहित्यकारसँ ल' क' नवांकुर रचनाकार धरि। मिथिला साहित्यक श्रीवृद्धिमे पोथीक लोकार्पण सेहो अनवरत रूपे ऐ मंचपर होइत रहल अछि। अहू गोष्ठीमे- माने 99म आयोजनमे- चारि गोट पोथीक लोकार्पण भेल। संक्षेपमे सम्पूर्ण समाचारक विवरणक संग सम्बन्धित किछु फोटोग्राफ सेहो देल जा रहल अछि। -उमेश मण्डल संयोजक : प्रो. प्रीतम कुमार ‘निषाद’ उद्घाटन सत्र- दीप प्रज्जवलन : श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, चण्डेश्वर खाँ, श्री कमलेश झा, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री नारायण यादव, श्री राम विलास साहु, श्री आनन्द कुमार (विद्यालयक निदेशक), श्री उमेश पासवान, श्री जगदीश साहु गोसौनिक गीत : कुमारी अर्चना, कुमारी अंजलि स्वागत गीत : कुमारी पुनम (शिक्षिका) राम देव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ स्वागत सम्बोधन : प्रो. प्रीतम कुमार ‘निषाद’ (संयोजक) दू शब्द : श्री कमलेश झा, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, डॉ. शिव कुमार प्रसाद मंच संचालक : उमेश मण्डल पोथी लोकार्पण सत्र- लोकार्पित पोथी : (1.) गपक पियाहुल लोक (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल (2.) विविध प्रसंग (प्रवन्ध-निवन्ध) : रबीन्द्र नारायण मिश्र (3.) गामक सुख (पद्य संग्रह) : राम विलास साहु (4.) गावय मिथिला गीत प्रगीत (पद्य संग्रह, दो.सं.) : प्रीतम कुमार ‘निषाद’ लोकार्पण कर्ता : श्री आनन्द कुमार, श्री कमलेश झा, श्री नारायण यादव, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री चण्डेश्वर खाँ, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राम विलास साहु, श्री मनोज कुमार मण्डल दू शब्द : कमलेश झा, नारायण यादव मंच संचालक : उमेश मण्डल कथा सत्र- अध्यक्ष मण्डल श्री कमलेश झा, श्री नारायण यादव, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, श्री चण्डेश्वर खाँ, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, श्री राम विलास साहु, संचालन समिति : आनन्द कुमार झा, नन्द विलास राय, मनोज कुमार मण्डल कथा पाठ- प्रथम पाली- 1. पतन : आनन्द कुमार झा 2. चौदहो देवान : उमेश मण्डल 3. सियानक मारि दही-चूरा : नन्द विलास राय समीक्षा : नारायण यादव, विनोद कुमार, बद्रीनाथ राय, चण्डेश्वर खॉं, डॉ. शिव कुमार प्रसाद दोसर पाली- 4. मोह : चण्डेश्वर खाँ 5. खगता : उमेश नारायण कर्ण ‘कल्पकवि’ 6. मान सरोवरक यात्रा : जगदीश प्रसाद मण्डल समीक्षा : कौशल किशोर, मनोज कुमार मण्डल, पवन झा, नारायण यादव, डॉ. शिव कुमार प्रसाद, प्रीतम कुमार ‘निषाद’, शारदा नन्द सिंह तेसर पाली- 7. हृदय परिवर्त्तण : नारायण यादव 8. पुरनकी भौजी : उमेश पासवान 9. आन्हर : डॉ. शिव कुमार प्रसाद समीक्षा : आनन्द कुमार झा, जगदीश प्रसाद मण्डल, कपिलेश्वर राउत चारिम पाली- 10. इमानदारीक मोल : पवन झा 11. कंगन : मनोज कुमार मण्डल 12. त्रिशंकू मनक मलि : कपिलेश्वर राउत समीक्षा : नारायण यादवजी, प्रीतम कुमार ‘निषाद’जी, डॉ. शिव कुमार प्रसाद पॉंचम पाली- 13. चतुरसेना दाव : राम विलास साहु 14. त्रिशंकू मनक मलि : क 15. पितृ ऋृण : अमरकान्त लाल समीक्षा : नारायण यादवजी, नन्द विलास राय, राम विलास साहु, उमेश मण्डल छठम पाली- 16. थैंक्यू पापा : लक्ष्मी दास 17. प्रेममेव जयते : शारदा नन्द सिंह 18. भिखमंगा : चण्डेश्वर खाँ समीक्षा : आनन्द कुमार झा, उमेश मण्डल, नारायण यादव, उमेश नारायण कर्ण ‘कल्पकवि’ सातम पाली- 19. सनकल बम : प्रीतम कुमार ‘निषाद’ 20. भक्ति कथा : राधाकान्त मण्डल 21. आँखि : डॉ. शिव कुमार प्रसाद समीक्षा : प्रीतम कुमार ‘निषाद’जी, कमलेश झा, नारायण यादव, राम विलास साहु, पवन झा अध्यक्षीय भाषण : श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, कमलेश झा धन्यवाद ज्ञापन : प्रो. प्रीतम कुमार ‘निषाद’ ऐगला आयोजन : सगर राति दीप जरय'क 100म आयोजन उमेश मण्डलक संयोजकत्वमे, निर्मली (सुपौल) मे...। ९८म कथा गोष्ठी सगर राति दीप जरय- सिमरा (झंझारपुर) संयोजक : डॉ. शिव कुमार प्रसाद उद्घाटन सत्र- दीप प्रज्जवलन : श्री महावीर प्रसाद, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री श्यामानन्द चौधरी, श्री अरविन्द ठाकुर, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, पो. प्रीतम ‘निषाद’, श्री उमेश नारायण कर्ण, श्री नारायण यादव आ श्री योगेन्द्र राउत। उद्घाटन भाषण : श्री अरविन्द ठाकुर, श्री श्यामानन्द चौधरी, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ आ श्री महावीर प्रसाद। मंच संचालक : श्री संजीव कुमार ‘शमा’ पोथी लोकार्पण सत्र- लोकार्पित पोथी : (1.) मरजादक भोज (कथा संग्रह) : नन्द विलास राय (2.) दुधबेचनी (कथा संग्रह) : राम विलास साहु (3.) देखल दिन (कथा संग्रह) : जगदीश प्रसाद मण्डल (4.) कथा कुसुम (क.सं. दो.सं.) : दुर्गानन्द मण्डल (5.) सोंहॉंत-अनसोंहाँत (काव्य संग्रह) : डॉ. शिव कुमार प्रसाद (6.) पघलैत हिमखंड (काव्य संग्रह, अनु.) डॉ. शिव कुमार प्रसाद (7.) नमस्तस्यै (उपन्यास) : रबीन्द्र नारायण मिश्र (8.) पंगु (उपन्यास) : जगदीश प्रसाद मण्डल लोकार्पण कर्ता : श्री महावीर प्रसाद, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री श्यामानन्द चौधरी, श्री अरविन्द ठाकुर, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, पो. प्रीतम ‘निषाद’, श्री उमेश नारायण कर्ण, प्रो. शुभ कुमार वर्णवाल, श्री नारायण यादव आ श्री योगेन्द्र राउत। दू शब्द : श्री महावीर प्रसाद मंच संचालक : उमेश मण्डल कथा सत्र- अध्यक्ष मण्डल डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’, श्री श्यामानन्द चौधरी, श्री अरविन्द ठाकुर, श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, पो. प्रीतम ‘निषाद’ संचालन समिति : सूर्य नारायण यादव, दुर्गानन्द मण्डल, नन्द विलास राय, अनील ठाकुर कथा पाठ- प्रथम पाली- 1. प्रेमक अश्रुधार : नारायण यादव 2. बोझ : दुर्गानन्द मण्डल 3. देखल दिन : जगदीश प्रसाद मण्डल समीक्षा : श्यामानन्द चौधरीजी, राम विलास साहुजी, अरविन्द ठाकुरजी, योगेन्द्र पाठकजी दोसर पाली- 4. दहेज पाप छी : नन्द विलास राय 5. संघर्ष : अरविन्द ठाकुर 6. भिनसुरका गप-सप्प समीक्षा : दुर्गानन्द मण्डलजी, उमेश नारायण कर्णजी, शिव कुमार प्रसादजी, नारायण यादवजी तेसर पाली- 7. घरतोड़नी : प्रो. प्रीतम कुमार ‘निषाद’ 8. ऐगला पड़ाव : ललन कुमार कामत 9. ई केकर दोख : राम विलास साहु समीक्षा : कपिलेश्वर राउतजी, उमेश मण्डलजी, श्यामानन्द चौधरीजी चारिम पाली- 10. मराएल जिनगी : कपिलेश्वर राउत 11. केकरो कियो नहि : लक्ष्मी दास 12. काबू : उमेश नारायण कर्ण समीक्षा : नारायण यादवजी, प्रीतम कुमार ‘निषाद’जी, योगेन्द्र पाठकजी पॉंचम पाली- 13. प्रेत लेल लड़ाइ : अमर कान्त लाल 14. जाएब नेपाल मुदा कपार जाएत संगे : शिव कुमार मिश्र 15. पुत्र मोह : लक्ष्मी नारायण प्रसाद समीक्षा : नारायण यादवजी, प्रीतम कुमार ‘निषाद’जी, राम विलास साहुजी छठम पाली- 16. टिप्स : रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ 17. नसीहत : नारायण यादव 18. आमक चोर सगर शोर : अच्छेलाल शास्त्री समीक्षा : नन्द विलास रायजी, शिव कुमार प्रसादजी, सूर्य नारायण यादवजी सातम पाली- 19. वाइफ : लक्ष्मी नारायण प्रसाद 20. अनुशासित प्रतिष्ठान : श्रीमती ज्योति कुमारी 21. कोचिंग : श्रीमती ज्योति कुमारी समीक्षा : प्रीतम कुमार ‘निषाद’जी, श्यामानन्द चौधरीजी, नारायण यादवजी अध्यक्षीय भाषण : श्री जगदीश प्रसाद मण्डल, पो. प्रीतम कुमार ‘निषाद’ धन्यवाद ज्ञापन : डॉ. शिव कुमार प्रसाद। ऐगला आयोजन : प्रो. प्रीतम कुमार ‘निषाद’क संयोजकत्वमे, स्थान- मुरहदी (बाबूबरही) डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ हमर गाम १.हमरो गाम मिथिले मे छै हम कोनो पढ़ल-लिखल लोक नहि छी, अपितु यदि कहियै जे हमरा गाममे एकटा केँ छोड़ि कियो पढ़ल लिखल नहि अछि तऽ बेसी उचित होएत। घीच-घाँचि कए कहुना दशमा पास केलहुँ आ चल गेलहुँ दिल्ली रोजगारक खोजमे। शुरुएमे बुझा गेल जे एतए अपनाकेँ दशमा पास कहलासँ लाभ नहि नोकसाने अछि तें एहि बातकेँ नुका रखलहुँ आ जे काज हाथमे आएल से धरैत करैत गेलहुँ। अवसर देखैत काज छोड़ैत पकड़ैत कहुना दस साल बाद लगलहुँ टेम्पू चलबए। ताबत गाम दिश सेहो सड़क सब सुधरि रहल छलैक, फोर-लेन बनब शुरू भऽ गेल रहै तऽ सोचलहुँ जे गामे घुरि चली, ओतहि टेम्पू चलाएब। कने कमो कमाइ हैत तऽ बेसिए लागत कारण गाममे कमसँ कम दिल्लीक सड़लाहा बसातसँ त्राण भेटत। कतबो किछु महग होउ, गाममे एखनहु बसात साफे छैक आ फ्री सेहो कारण एखन तक ओहिपर कोनो मालिक हक नहि जतौलक अछि। हमर नीक कि खराप लति बूझू एतबे जे भोरमे तीन टाकाक एकटा अखबार कीन लैत छी आ टेम्पूपर जखन बैसल रहैत छी तखन ओकरा पढ़ैत रहैत छी। एक दिन एहने अखबारमे पढ़ल जे मिथिलामे नवका चलन एलैक अछि अपना अपना गामक महान विभूतिक वर्णन करैत किताब लिखब। किछु एहने किताब बजारसँ कीन अनलहुँ। देखलहुँ तऽ हर्षो भेल आ ताहिसँ बेसी इर्ष्यो आ ग्लानि भेल। हर्ष एहि लऽ कए जे पहिल बेर बुझलहुँ मिथिलामे एहन महान विभूति सब भेलाह आ इर्ष्या आ ग्लानि एहि लेल जे हमरा अपन गाममे एहन कोनो विभूति किएक नहि भेलाह। हमरा चिन्ता भेल- की सत्ते हमरा गाम मे कोनो विभूति नहि भेला? किछु बूढ़ पुरान सँ गप कएल। एक गोटे पूछि देलनि- “खाली पढ़ले लीखल लोक विभूति होइ छै की?” हम सोचए लगलहुँ। ठीके, से रहितै तऽ सिनेमा स्टार आ कि खिलाड़ी सब कें कियो चिन्हबे नहि करितै। हमरा बुझा गेल जे आन गामक विभूति सन तऽ नहि, तैयो एतेक जरूर जे हमरा गामक विभूति सब एक हिसाबें कतबो विचित्र रहथु मुदा ओहो लोकनि अपना समय मे गामक नाम कोनो तरहें उजागर करबे केलनि । सेहन्ता भेल जे हमहूँ अपना गामक बारेमे किछु लीखी। मुदा की लीखब? लिखबाक लुरियो तऽ नहि भेल। तैयो हम ठानि लेल जे लिखबे करब। विभूति लोकनि जे छलाह, जेहन छलाह, भेलाह तऽ मिथिलेक सुपुत्र/सुपुत्री ने। आ हमरो गाम जेहने अछि, अछि तऽ ओही माटिपर कमला बलान कोशीसँ घेराएल, रौदी दाही भोगैत अशिक्षा आ गरीबीमे उबडुब करैत। तें हम निश्चय कएल जे हिनका लोकनिक कीर्तिक गाथा लीखल जाए। एखुनका युगे विज्ञापन आ प्रचारक छिऐ, से गामक नुकाएल छिड़िआएल रत्न सबकेँ बहार करबाक चाही। हम गौआँ भऽ कए यदि नहि लिखबनि तऽ अनगौआँकेँ कोन मतलब छैक? ओना तऽ लिस्ट पैघ बनि गेल मुदा हम बहुत पुरान लोककेँ पहिने छाँटि कए मात्र दसटाक वर्णन एतए प्रस्तुत करए जा रहल छी। एहिमे पहिल नौटा छथि हमरा गामक नवरत्न आ दसम भेलाह विशिष्ट अतिथि रत्न। आशा करैत छी गौआँ लोकनि हमर एहि प्रयासक प्रशंसा करबे करताह। यदि किछु अनगौआँ मैथिल समाजकेँ हमर गामक एको गोटेक कीर्ति नीक लगलनि तऽ हमर प्रयास खूबे सफल बूझल जाएत। नहि तऽ कमसँ कम किछु लिखित तऽ रहिए जाएत जे एखनुक बूढ़ पुरानक दिवंगत भऽ गेलाक बाद नवका पुस्तकेँ पूर्वजक यशक किछु ज्ञान देतैक। हमर लिखल वस्तु सबकेँ मटिकोरबा गामक मिडिल स्कूलक हेडमास्टर साहेब बहुत कटलनि छँटलनि आ शुद्ध केलनि ताहि लेल हुनका बहुत धन्यवाद। बिना हुनकर सहयोग के ई अपने सबकेँ पढ़बा योग्य नहिए भेल रहैत। हम अपना गामक विभूतिक फोटो नहि छापि रहल छी। एकर कारण अपने सब पूरा पुस्तक पढ़लाक बाद बुझिए जेबैक। विनीत रामलाल परदेशी (गामक एक उत्साही युवक) गाम : खकपतिया डाकघर : मटिकोरबा जिला : मधुबनी। २. बीए मूल नाम : राम किसुन सिंह पिताक नाम : अजब लाल महतो जन्म तिथि : 1 जनवरी 1940। ई हुनकर सर्टिफिकेटमे लिखल छनि, मुदा हुनक पिताक अनुसार ओ तीन चारि बरख जेठ जरूरे छथि। जखन ओ मटिकोरबा गामक मिडिल स्कूलमे नाम लिखौलनि तऽ हेडमास्टरकेँ जे बूझि पड़लै से लीख देलकै। हुनकर जन्म तऽ भरदुतिया दिन भेल छलनि। शिक्षा : यथा नाम, माने ओ बी.ए. पास छथि। ओ गौरवसँ एखनहुँ लोककेँ सुनबै छथिन जे मैट्रिक, आइ.ए. आ बी.ए.मे लगातार ओ तृतीय श्रेणीमे पास केलनि। संगहि मैट्रिकमे दू बेर, आइ.ए.मे तीन बेर आ बी.ए.मे चारि बेर फेल केलनि। उपलब्धि : हुनक सबसँ पैघ उपलब्धि छनि हमरा गामक पहिल आ एखन तक के अन्तिम ग्रेजुएट भेनाइ। पछिला करीब पचास बरखसँ एहि रेकॉर्डकेँ पकड़ने छथि। ओहू पुरान जमानामे ग्रेजुएट भैयो कए हुनका जखन दस साल तक कतहु नोकरी नहि भेलनि तखन ओ हारि कए पुस्तैनी काज, खेती,मे लागि गेलाह। एहन नहि जे सत्ते कतहु नोकरी नहि भेलनि। पुर्णियामे एक ठाम हाइ स्कूलमे अध्यापक भेलाह मुदा पहिले दिनक हिनक पढ़ाइ देखि कए ओतुका विद्यार्थी सबकेँ हिनक योग्यताक बेस अन्दाज लागि गेलैक आ ओ सब हड़तालपर बैसि गेल। एमहर साँझमे हिनका जे मच्छर कटलक से बोखार भऽ गेलनि। दोसर दिन स्कूल जाइ के काजे नहि पड़लनि। कहुना एक हप्तापर गाम घुरि एलाह। विद्यार्थी सबकेँ विचारल बात विचारले रहि गेलैक। फेर दोसर बेर एहन योग्य शिक्षकसँ भेँट नहिए भेलनि हुनका सबकेँ। स्वस्थ भेलाक बाद ओ नियारलनि जे मास्टरी हुनका बुते पार नहि लगतनि। चल गेलाह कलकत्ता भाग अजमबै लेल। कलकत्तामे एखनहु बीए पैघ योग्यता बूझल जाइत छलैक। ओना जाहि समय बीए बीए केलनि ताहि समय बिहारक परीक्षा पद्धतिक चर्चा आन आन ठाम शुरू भऽ गेल छलैक आ किछु लोक बिहारी बीएकेँ ओकर उचित हक देबा लेल तैयार नहि छल। कलकत्तामे मटिकोरबा गामक एक गोटे कोनो सेठक ड्राइवर छल। ओ हिनक पैरवी केलक सेठ लग। किछु बेसिए बढ़ा चढ़ा कए कहि देलकै सेठकेँ। फल ई भेल जे सेठ हिनका बिना कोनो पूछताछ के अपना गद्दीपर मनेजर बना देलकनि। ई बहुत खुसी भेलाह। मुदा भाग्यकेँ किछु दोसरे रस्ता देखेबाक छलैक। तेसर दिन सेठक एकटा मित्र आबि गेल आ ओकरा अनुपस्थितिमे ओहिना हिनका संग गपसप करए लागल। ओकरा मोनमे कोनो दुर्भाव नहि छलैक मुदा समस्या छल घेघ कतहु नुकाएल रहए ! सेठक मित्रकेँ बीएक असली घिबही बीए हेबापर कने सन्देह भऽ गेलै आ एकर चर्चा ओ साँझमे अपना मित्र लग केलक। अगिला दिन जखन बीए गद्दीपर बैसलाह तखन सेठ आबि कए हुनका पछिला तीन दिनक हिसाब किताब पूछि बैसल। बीए घबरा गेलाह। ओना ओ कोनो गड़बड़ी नहि केने छलखिन मुदा हिनका ई बात सिखले नहि छलनि जे यदि किओ हिसाब किताब पूछत तऽ उत्तर कोना देल जाए। एखन तक ओ खाली किताबी प्रश्नक उत्तर रटैत आएल छलाह। व्यावहारिक काजक उत्तर देब सिखबे नहि केलनि। से एतए ओ गड़बड़ा गेलाह। फल जे ओही दिन दुपहरियामे गामक गाड़ी धेलनि। एहिना ओ पटना, दिल्ली मुम्बइ आदि कतेको छोट पैघ शहरमे सेहो भाग्य अजमौलनि मुदा भाग्य तऽ हुनका गाम घीचऽ चाहैत छलनि से पुर्णिया रहओ कि पटना, लखनउ कि लुधियाना, सब ठाम कोनो ने कोनो एहन परिस्थिति भइए गेलनि जे दू चारि दिनसँ बेसी नहि टिक सकलाह। बीए सौंसेसँ बौआ कए गाममे खेती करए लगलाह। खेतीमे खूब नाम कमौलनि। दस किलो के मूर आ सात किलो के बैगन हुनके खेतमे उपजल छलनि। हमरा गाममे गुलाब आ गेंदा फूलक खेती हुनके शुरू कएल छिएनि। एखन हमर गाम एकर नीक व्यवसाय कऽ रहल अछि। आब तऽ देखादेखी अगल बगलक गाम सबमे सेहो फूलक नीक खेती भऽ रहलै अछि। एहि प्रयास लेल हुनका गामक पंचायतसँ विशेष पुरस्कार भेटलनि। बीएक सबसँ पैघ उपलब्धि भेलनि गामक लोककेँ स्कूली आ कौलेजिया पढ़ाइक प्रति अविश्वास करौनाइ। तकर बाद कियो अपना धीया-पूताकेँ स्कूल कौलेज नहि पठौलक। मात्र साक्षर बनै लेल मटिकोरबाक मिडिल स्कूल तक। हमहू जे दशमा पास केलहुँ से एही कारण सम्भव भेल जे बाबूजी गुजरि गेला आ माएकेँ हम कहियो ई बूझऽ नहि देलियै जे हम कतए जाइ छी आ की करै छी। दस साल तक विभिन्न शहर सबमे घुमैत ठोकर खाइत बीएकेँ किछु नीक बुद्धि तऽ भैए गेलनि। एकर उपयोग ओ केलनि गाममे झगड़लगौनाक रूपमे। हुनकर विशेषता अछि जे हुनका संग जे लोक पाँचो मिनट बैसि गेल आ हुनकर देल एक खिल्ली पान खा लेलक ओ अपना दियादी आ कि पारिवारिक झगड़ामे जरूर फँसत। आ ओहि झगड़ाक पंचैतीमे बीए जरूरे रहता। बेसी झगड़ा गामक पंचैतीसँ उपर नहिए जाइ छैक। किछुए एहन घटना भेलैक जे बीए बादमे सम्हारि नहि सकला आ मोकदमा भऽ गेलै। कतबो माँजल ओझा गुणी रहथु, किछु भूत हुनको हाथसँ छुटिए जाइ छनि ने। तहिना बूझू। हमरा गामक सीमामे जे चारू कातक चारि पाँच गामक लोकक जमीन जाल छैक ओहो सब एहि झगड़लगौना प्रेतक चक्करमे फँसिये जाइत अछि। सबकेँ बूझल छैक जे बीए संग बैसनाइ आ हुनकर पान खेनाइ माने भेल कपारपर दुरमतिया सवार। मुदा कहाँ कियो बचि पबैत अछि? बीएक मधुर सम्भाषणक आगू सब फेल। बीए एहि लूड़िसँ कोनो कमाइ नहि करैत छथि, ई तऽ मात्र हुनकर मनोरंजन छिएनि। एहन उदार चरित्रक लोक परोपट्टामे नहि भेटत। एहि किताब लिखबाक क्रम मे एक दिन हम पूछि देलिएनि- “एखन तक कतेक लोकक बीच झगड़ा लगा देने हेबै?” ओ तऽ सबटा लीख कए रखने छला। एकटा पैघ लिस्ट हमरा आगू पसारि देलनि। हम चकित भऽ गेलहुँ। बीए तऽ नारदोक कान कटलनि मुदा किनको बूझल नहि। जरूर एकरा एक बेर गिनीज बुक अथवा लिमका बुक मे छपबैक कोशिश करबाक चाही। से भऽ गेला सँ अहीं कहू हमर गाम अपना जिला आ कि प्रदेश मे नाम करत की नहि? ३. खुरचन ठाकुर मूल नाम : किसुनलाल ठाकुर, प्रसिद्धि खुरचन ठाकुर पिताक नाम : तिरपित ठाकुर जन्म तिथि : अज्ञात मृत्यु : सन उनैस सौ सतासी सालक बाढ़िमे उपलब्धि : खुरचन ठाकुरक प्रसिद्धि खुरचने लऽ कए भेल। हुनका लेल अस्तूरा बेकार छल। अनेरे लोक टाका खर्चा करत। ओ खुरचनकेँ पिजा लैत छलाह आ केहनो बढ़ल केस-दाढ़ी रहओ, काटि दैत छलाह। ओहीसँ नह सेहो काटि दैत छलाह। जखन केश छँटबैक प्रचलन बढ़लै तखन खुरचन ठाकुर अपन ओही औजारसँ केश छाँटब सेहो शुरू केलनि। केशमे ककबा सटा दैत छलखिन आ ओहि उपरसँ खुरचन चला दैत छलखिन। देखनिहारकेँ चकचोन्ही लागि जाइ छलनि जे बिना कैंची के केश कोना एतेक सुन्दर छँटा जाइत छलैक। आ केहनो फोरा-फुन्सी रहओ खुरचन ठाकुरक डाकदरीक आगू सब जेना सरेंडर कऽ दैत छल। फोराक डाकदर रूपमे खुरचन ठाकुर परोपट्टे नहि दश कोसमे नामी छलाह। कहियो कए तऽ हुनका दूरापर लोकक लाइन लागि जाइत छल। खुरचन ठाकुरक खुरचनक स्पर्श होइतहि लोककेँ आरामक बोध होमए लगै छलै। बीए जखन एक बेर कोनो शहरसँ घुरलाह तऽ खुरचन ठाकुर हुनका देखलक ओतुका सैलूनमे केश छँटेने। बीएकेँ एखनहुँ मोन छनि खुरचन ठाकुरक हुथान। आ ओहि ‘अलूरि’ नापितक लेल प्रयोग कएल गेल अपशब्द सब जे बीए हमरा सुना तऽ देलनि मुदा लिखबासँ मना कऽ देलनि। पूरा गाममे खुरचन ठाकुर एकसर, सौंसे गाम हुनकर जजमान। मुदा मात्र एकटा औजार, खुरचन, आ गाम नेहाल। एहन छलाह रत्न हमर खुरचन ठाकुर। ४. टहलू दास मूल नाम : सियाराम मण्डल पिताक नाम : जगदेव मण्डल जन्म तिथि : अज्ञात मृत्यु : अकालक वर्ष (सम्भवतः उनैस सौ छियासठि) उपलब्धि : टहलू टहलैत तऽ कमे छलाह मुदा हुनक चालिमे बड़का बड़का हारि जाइत छल। बूढ़ लोक सब खिस्सा कहैत छथि जे एक बेर ककरो सार साइकिलपर चढ़ि कए हमरा गाम एलाह। हुनकर गाम करीब सात-आठ कोस (एखुनका लोक लेल बूझू चौबीस-पचीस किलोमीटर) दूर। साइकिल ओहि समय ककरो ककरो रहैत छलै, हमरा गाममे ककरो नहि छलै से बूझू सौंसे गाम जमा भऽ गेल साइकिल देखबा लेल। टहलू हुनका पूछि देलखिन- “कतेक समय लागल साइकिलसँ हमरा गाम अबैमे?” ओ गर्वसँ बजलाह- “इएह गोटेक घंटा बूझि लिअऽ।” ओहो अन्दाजे बजलाह कारण हाथमे घड़ी तऽ छलनि नहि आ ने टहलूएकेँ बूझल छलनि जे एक घंटा कतेक समय होइत छैक। टहलू हुनका दूसैत बजलाह- “एतेक कालमे तऽ हम पएरे चल जाएब आ घुरि कए चलो आएब, आ यदि इन्तजाम कएल रहत तऽ अहाँक घरपर भोजनो कऽ लेब।” सारकेँ भेलनि जे अनगौआँ बूझि कने डींग हँकैत छथि। ओहुना लोक गाममे आएल ककरो सारक संग हँसी मजाक कऽ लैते छल। एहनो कतहु भेलैए जे लोक साइकिलसँ दूनोसँ बेसी चलि लेत? मुदा एकर फरिछौहटि कोना होअए? ओ जमाना तऽ मोबाइल टेलीफोनक छलै नहि जे तुरत्ते ई ककरो खबरि कऽ दितथिन गाममे जँचै लेल जे सत्तेमे टहलू ओहि गाम पहुँचलाह कि नहि। योजना बनल जे बड़की पोखरिक चारू कात दूनू गोटे घुमता। सार साइकिलसँ आ टहलू पएरे। पोखरिक चारू कात रस्ता साइकिलो चलबै लेल नीके छलैक। जेना कि ओहि समय सब ठाम रहैत छलै, कच्चिए मुदा समतल आ पीटल-पाटल। जतेक तेज अपन चलि सकथि से चलथु। यदि टहलू सत्तेमे बड़ तेज चलैत छथि तऽ चक्कर लगबैमे कमे समय लगतनि। ओ चक्कर लगबैत रहताह जाबत सार महोदय साइकिलसँ एक चक्कर पूरा नहि कऽ लेथि। यदि सारे महोदय पहिने एक चक्कर लगा लेताह तऽ ओहो ताबत तक चक्कर लगबैत रहता जाबत टहलू एक चक्कर पूरा नहि कऽ लेथि। अन्तमे जे जतेक बेसी चक्कर लगौने रहत से ततेक सौ टाका जीतत। माने भेल जे एक चक्कर के समयमे यदि कियो दू चक्कर लगा लेत तऽ एक चक्कर बेसी भेलैक ताहि लेल एक सौ रुपैया जीतत। यदि आधा चक्कर बेसी लगाओत तऽ पचास रुपैया जीतत। एहिसँ कम भेलापर दूनूकेँ बरोबरिए बूझल जाएत। गौआँ जमा भऽ गेल देखबा लेल। सारक बहिनोकेँ कहल गेलनि हुनके पक्षमे रहै लेल जे कोनो तरहक बेइमानीक गुंजाइस नहि रहै। खेला शुरू भेल। जतेक ताकत छलनि ततेक पैडिलमे लगबैत सार महोदय साइकिल दौड़ेलनि। मुदा टहलू तऽ निपत्ता। जाबत ओ एक मोहार टपथि ताबत टहलू एक चक्कर पूरा कऽ लेलनि। साइकिल आ पएरे दौड़ चलैत रहल। अन्तमे सार महोदय पूरे तीनसौ टाका हारि गेलाह। ओ जे हमरा गामसँ पड़ेला से फेर घुरि कए कहियो नहिए एला। टहलू दासक एहि गुणक जानकारी गामोमे बहुतो लोककेँ नहि छलैक। आब तऽ हिनकर गुणक बखान सबतरि होमए लागल। डाक विभाग हिनका दौड़हाक नोकरी देबा लेल तैयार भऽ गेल आ एहि आशय के चिट्ठी सेहो हिनका पठा देलकनि। मुदा ई अस्वीकार कऽ देलखिन। “उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी, भीख निदान” बला फकरा जे रटने रहथि। ओ कोनो दशामे चाकरी नहि करताह। नहिए केलनि। एहन महान छलाह टहलू दास। ५. चिलमसोंट भाइ मूल नाम : केवल राउत पिताक नाम : बनारसी राउत जन्म तिथि : अज्ञात मृत्यु : करीब चालीस साल पहिने। उपलब्धि : नाम गुण काज छलनि हुनकर। चिलमसोंट नामे पड़लनि जखन हुनका चिलमसँ बीत भरि धधरा उठए लगलै। गामैक गजेरी साहुक अभिन्न मित्र। गजेरी साहु गाजा बेचथि आ चिलमसोंट कीनथि आ ताहिपर सोंट लगाबथि। सोंट लगबैमे किछु गोटे आर संग दैत छलखिन मुदा ओ सब हमरा संकलन लेल महत्वपूर्ण नहि छथि। एक बेर गाममे दूटा बबाजी एला। ई दूनू एक नम्बर के गँजेरी। ओ बरकी पोखरिक पाकरि गाछ तर अपन आसन जमा लेलनि। एकटा गौआँकेँ चेला मुड़लनि, ओहि दिनक बुतातीक जोगार सेहो केलनि आ चिलम लेल गाजाक जोगार सेहो। अपनामे मस्त ई दूनू लगलाह चिलम सोंटए। किछु गौआँ हिनक चिलमक सोंट देखि रहल छल। अति साधारण रूपें ई सब सोंट लगा रहल छलाह। ओ टिप्पणी कैए देलक- “अहाँ दूनूसँ नीक तऽ हमर गौआँ चिलम धुकैत अछि, ओकर नामे पड़ि गेलैक चिलमसोंट भाइ।” बबाजी सबकेँ लगलनि जे गौआँ सब हिनकर निन्दा कऽ रहल छनि। ओ चिलमसोंटकेँ बजबै लेल कहलखिन। चिलमसोंट बजाओल गेलाह। फोकट के गाजा आ तकर सोंट – ई बात सोचिए कए ओ मुदित भेल छलाह। तैयो अपन गुणकेँ नुकबैत बबाजी दूनूकेँ टिटकारी देलखिन नीकसँ सोंट लगबै लेल। ओ सब पूरा दम लगा कए सोंट खिचलनि तऽ एक बेर कने दू-तीन आँगुर धरि धधरा उपर उठलैक। चिलमसोंट विनम्र भावें अपन चिलम सुनगौलनि आ लगला सोंट खीचए। जेना जेना गाल धँसैत गेलनि तेना तेना धधरा उपर उठैत गेलै। अन्तमे पूरे हाथ भरि धधरा उठि गेलै। एहन चमत्कार तऽ पहिने कोनो गौआँ नहि देखने छल। बबाजी सब तऽ चकित आ डराएल। ओहिमे एक गोटे दोसरकेँ कहलखिन- “एकरा चेला बना लेब ठीक रहत।” चिलमसोंटकेँ गाजा चढ़ि गेल छलनि। ओ उनटे ओहि बबाजीकेँ भरि पाँज कऽ धेलनि आ बजलाह- “रौ सार, चिलम सोंटैक लूरि तऽ छौके नहि, हमरेपर गुरुआइ करमे? हमरा चेला बनेमे? ढहलेल नहि तन। चल, आइसँ तो दूनू हमर चेला बनि जो आ हमर नोकर जकाँ काज कर। साँझुक पहर हम तोरा दूनूकेँ चिलम सोंटैक लूरि सिखाएल करबौ।” आब तऽ दूनू बबाजीक बोलती बन्द। कहुना अपनाकेँ छोड़ा कए ओ दूनू नाङरि सुटकबैत गामसँ भगलाह। चिलमसोंट भाइ अपना काजमे अद्वितीय छलाह। इलाकामे करीब दस गामक बीच हुनकासँ हाथ मिलबै बला कियो नहि भेल छल। ६. नक्कू पहलमान मूल नाम : परमेसर यादव पिताक नाम : शीतल यादव जन्म तिथि : अज्ञात मृत्यु : सन उनैस सौ बेरासी साल उपलब्धि : नक्कू कने नकिआइत छलाह बजबामे तें ई नाम भेलनि। हुनका हनुमानजीक सराप आ आशीर्वाद छलनि जे कोनो कुश्ती खेलामे पहिल दू बेर तोरा हारए पड़तौ। जखन तों दू बेर हारि जेमे तखन तेसर बेर केहनो पहलमानसँ भिरमे, जितबे करमे, से ओ साक्षात भीमे किएक नहि आबि जाथु। बूझि ले हम अपनहि तोरा शरीरमे प्रवेश कऽ जेबौ। ई बात ककरहु नहि बूझल छलैक हुनकर बाबूजीकेँ छोड़ि। साधारण भिड़न्तमे हारि-जीत चलिते रहैत छलैक। लोक एतेक ठेकान नहिए करैत छल जे कोना दू बेर हारलाक बाद नक्कू निश्चिते तेसर बेर जीत जाइते छथि। एक बेर दरभंगा राजक पोसुआ कैलू पहलमान हमरा गाम दिससँ जाइत छला। हुनका गुमान जे पूरा जिलामे हुनकासँ हाथ भिरबै बला कियो नहि छनि। ई गप ताहि दिनक छी जहिया मधुबनी जिला नहि बनल छलै आ दरभंगे जिलाक सवडिविजन छलै। हमरा गाममे कियो अगत्ती छौंड़ा हुनका टिटकारि देलक जे गामक नक्कू पहलमानसँ एक बेर हाथ भिरा लेथि। पहिने तऽ ओ अपन प्रतिष्ठा बूझि एकरा अनठबए चाहलाह मुदा गौआँक जिदपर अखाड़ामे उतरि गेला। नक्कू सेहो उतरला आ हनुमानजीकेँ स्मरण केलनि। खेला शुरु भेल। कैलू आ नक्कू अखाड़ामे चक्कर्घिन्नी कटैत आ एक दोसरापर दाओ बजारैक चेष्टामे लागल। कियो दोसराक देहमे सटि नहि रहल छल। आ कि नक्कू किछु केलनि आ क्षणेमे कैलू चित, नक्कू हुनका छातीपर सवार। लोक अकचकाएले रहि गेल। तालीपर ताली परए लागल। कैलूकेँ किछु बुझाइये नहि रहल छलनि जे की भेलै, कोना भेलै, कोन दाओ लगलै जकर ओ सम्हार नहि कऽ सकला। दूनू पहलमान उठलाह, देह झाड़लनि, हाथ मिलौलनि आ अपन अपन गन्तव्य दिस विदा भेला। नक्कू जीत गेलाह मुदा हुनका एकर कोनो गुमान नहि छलनि। हुनका बूझल छलनि जे अगिला दू कुश्ती हुनका हारबाक छनि। ओ अपनाकेँ कहियो महान नहि कहलनि, ई हुनकर नम्रता छलनि। ७. पण्डितजी मूल नाम : राधाकृष्ण मिश्र पिताक नाम : लक्ष्मण मिश्र जन्म तिथि : उनैस सौ पचास सालक फगुआ दिन। उपलब्धि : हमरा गामक एकमात्र ब्राह्मण पुरोहित परिवार, पण्डितजी खाली नामेसँ पण्डित छथि। हिसाबें औंठा छापे रहि गेला। भरि गामक जजमनिका सम्हारै लेल भागिनकेँ बजा अनलनि। अपने ओकरा संग खाली नोंत खेबा लेल जाइ छथि। मुदा पण्डितजी अद्वितीय भैए गेलाह। ई भेल हुनक अद्भुत गुणक कारण। ओ महिंसलेट भऽ गेला। महींसपर बैसल बाधे बाध बौआइत रहबामे ओ ककरो कान काटि सकैत छथि। बच्चहिंसँ ओ महींसपर जे चढ़ए लगलाह से एखन तक कइए रहल छथि। महींसे पोसब हुनक मुख्य व्यवसाय भेलनि। एकटा ब्राह्मण कुलमे जन्म लइयो कए ओ कोनो यादव परिवारसँ बेसी दूधक व्यापार केलनि आ ओहिना कोनो यादव परिवारसँ बेसी पानि दूधमे मिलबैत रहला। तैयो हिनक दूधक बिक्री कम नहि भेल। महींसक खरीद बिक्री केलनि, ओकर दवाइ दारू सेहो बुझैत छथि आ सब तरहें महींसक विशेषज्ञ रूपें इलाकामे प्रसिद्ध छथि। हिनका प्रसादें कतेक महींस कें प्राण बचलै। ब्लॉक के मवेसी डाकदर सेहो हिनकर ज्ञानक प्रशंसा करैत छनि। पण्डितजी एकटा आर गुण लेल प्रसिद्ध छथि– आशीर्वाद देबाक हिनक शब्दकोष बिल्कुल अलग अछि। ‘जीबू जागू ढनढन पादू’ तऽ हिनकर तकिया कलाम अछि मुदा जखन कियो कोनो तरहक छोट पैघ गलती कऽ बैसैत अछि तखन हिनक मुह सँ बहराएल शब्द विश्वक कोनो कोष मे भेटऽ बला नहि। आ सुननिहार केहनो मोट चामक बनल रहओ, कान मूनहि पड़ैत छैक। ओ आशीर्वाद-वर्षा लोकक धैर्यक परीक्षा सेहो लैत छैक। आ जे कने अधीर भेल तकरा तऽ भूलुण्ठित भेनहि कल्याण। महींसक संग संग ई गायक व्यापार सेहो करैत छथि। गाय दरबज्जापर पोसैत कमे छथि, खाली खरीद बिक्रीक काज हाटपर करैत छथि। मटिकोरबा गामक हाटपर मरदुआरि कैल गाय सस्त दामपर कीनैत छथि, ओकरा दस दिन नीक जकाँ खुआ पिआ कए आ जहिना आइकालि लोक केश रंगैत अछि तहिना नवका तरीकासँ रंग चढ़ा कए कारी गायक रूपमे दुन्ना-तिगुन्ना दाममे बेचि लैत छथि। बेचबा काल ध्यान रखैत छथि जे ग्राहक बेस दूरक इलाकासँ रहए। लग पासक ग्राहककेँ ओ कारी गाय नहि बेचैत छथि। एक दू बेर गौआँकेँ सर सम्बन्धीक मारफत सुनबामे एलै जे मासे दिनक भीतर गायक रंग बदलए लगलै। मुदा ई शिकाएति सीधे पण्डितजी लग कियो नहि पहुँचेलक। आशीर्वाद-वर्षा मे भिजबाक डर जे रहैत छैक। एखन तक पण्डितजी बेदाग अपन व्यवसायमे लागल छथि। ८. लम्बोदर मूल नाम : दरिद्र नारायण झा पिताक नाम : पलटू झा जन्म तिथि : अज्ञात मृत्यु : पाँच वर्ष पहिने उपलब्धि : लम्बोदर नाम गुण पैघ उदर बला छलाह। हमहूँ देखने छिऐनि हुनकर शरीर। कण्ठसँ डाँड़क बीच मात्र एक तिहाइमे छाती आ दू तिहाइमे लम्ब उदर। से कोनो पैघ धोधि फूटल नहि, सपाट। आइ कालि हीरो सब सिक्सपैक चमकबैत रहैत अछि मुदा लम्बोदरकेँ छाती आ पाँजरक सबटा हाड़ लोक सौ मीटर दूरोसँ गनि सकैत छल। हुनका बुझलो नहि छलनि जे ई शारीरिक सौष्ठवक विशेषता छिऐ। वृत्तिएँ लम्बोदर मरणोपरान्तक संस्कार करबैत छलखिन। आ पोखरिपर भोजन करब हुनक एहि वृत्तिक अंश छल। मुदा एक बेरक खिस्सा जे बूढ़ लोक कहैत छथि से अद्भुत छल। लम्बोदर अपन जजमनिकामे कोनो गाम गेल छलाह। ओतए चूरा-दही भोज छलैक। इन्तजाम तऽ ठीके छलैक मुदा हिनका सबहिक भोजन बेर किछु कुव्यवस्थाक कारण दही कने कम पड़ि गेलै कारण पोखरि पर सामान हिसाबे सँ पठाओल गेल छलै। लम्बोदर लगलाह अखरा चूरा फाँकए। जाबत घरवारी दहीक व्यवस्था केलनि ताबत ई करीब पाँच सेर चूरा सधा देलखिन। आब हाल ई छल जे जाबत दही आबए ताबत हिनका पातमे चूरा सधि जाए, ई छुच्छे दही सुड़कथि आ तकर बाद फेर अखरा चूरा फाँकथि। ई अपना दूनू कात माटिपर चेन्ह दऽ कए आन लोककेँ उठि जेबाक संकेत देलखिन आ अपने खाइते रहलाह। जखन करीब एक बोरा अखरा चूरा आ चारि तौला दही सधा देलनि तखन घरवारी हाथ जोड़ि कए ठाढ़ भऽ गेलखिन। तैयो ई ढकार नहिए लेलनि मुदा परिस्थितिकेँ बूझि घरवारीकेँ कहि देलखिन- “अहाँ पार उतरि गेलहुँ, हम आब तृप्त छी।” एतबा कहि ओ उठि कए हाथ धोलनि, पान सुपारी लेलनि आ दस किलोमीटर टहलैत टहलैत गाम आबि गेलाह। कियो कखनहु हुनकर पेट उठल कि फूलल नहि देखलक। अगिला दिन लम्बोदर फेर कोनो भोज खेबा लेल तैयार। हिनके भोजन देखि ने कियो फकड़ा बनौने छल – पाँच पसेरी अखरा चूरा, दही छाँछ भरि जलखै जकरा की हैत चटने पाभरि जोड़न? ऊँटक मुहमे जीरक फोड़न ! हमरा अपना गाममे हुनका के खुअबितए? मुदा ओ परिस्थितिकेँ बुझैत छलखिन आ गामक भोजमे कहियो छूटल घोड़ा जकाँ व्यवहार नहि केलनि। हमरा गाममे किएक ककरो बूझल रहतैक जे गिनीज बुकमे हुनकर नाम रेकॉर्डमे लिखबितए। हमसब एहि गौरवसँ चूकि गेलहुँ तें हम नियारल जे अपन संकलनमे हुनकर चर्चा जरूर करब। ९. नटवर लाल मूल नाम : जयन्त कुमार लाल दास पिताक नाम : शिव मोहन दास जन्म तिथि : सन उनैस सौ अठतालीस के चौरचन दिन उपलब्धि : नटवर लालक पिता अल्प वयसमे मरि गेलखिन। माताक एकमात्र सन्तान ई गामक बिगड़ल छौंड़ा सब के संगतिमे फँसि गेलाह। यद्यपि हमरा गाममे बीएक असफलताक बाद सब गार्जियन अपन धियापूताकेँ स्कूल जेबासँ परहेज करबए लागल मुदा जयन्त कुमार लाल दास स्कूल गेला जहिना कि हिनका टोलक किछु आर बच्चा सब करैत छल। कहुना अठमा तक घुसकला तकर बाद हाथ उठा देलनि। बच्चहिंसँ हिनकामे विशेष लूरि छलनि लोककेँ ठकबाक। पहिने तऽ बहुत दिन तक माएकेँ ठकलनि आ मटिकोरबा गामक हाटपर झिल्ली कचरी बतासा लड्डू खाइत रहलाह। तकर बाद अनकोपर अपन मंत्रक प्रयोग केलनि। लम्बोदरक पितियौतकेँ जजमनिकामे भेटल रंगल धोती सब ई कामति टोलक लोककेँ किना दैत छलखिन, बेसी दामपर जे तोरा रंगक खर्चा बचि गेलहु, आ धोती बलाकेँ कहि दैत छलखिन जे रंगल धोती कियो नहि कीनत, ओ तऽ धन्य कहू जे हम एक गोटेकेँ फुसला कए राजी केलहुँ। धोती बेचनिहार कहियो नहि बुझलनि जे के किनलक आ कीननिहार कहियो नहि बुझलनि जे ककर धोती ई किनलक। एही तरहेँ पुरना किताब विद्यार्थीसँ लऽ कए ओकरा नवका भावें बेचथि। एहि व्यवसायमे हिनका नीक आमदनी होमए लागल। अपने ई लील टिनोपाल देल नीक धोती गंजी पहिरए लगलाह। एहि बीच किशोर वयसमे प्रवेश करिते हिनक आदति सब बिगड़ए लागल। ई सुनसान गाछी बिरछी आ पटुआ कुसियारक खेतमे शिकार करए लगलाह। हाथमे पाइ रहितहि छलनि से शिकार भेटिए जाइ छलनि। सब गाममे सब तरहक लोक होइ छै आ हमरो गाम एहिसँ बचल नहिए छल। मुदा जखन एक गोटेकेँ किछु भऽ गेलै आ ओकर बाप हिनका तंग करए लागल बियाह कऽ लेबा लेल तखन ई पहिल बेर डरा कए गामसँ भागि गेला। छओ मास बाद घुरला तऽ माएकेँ सब बात बुझबामे आबि गेल छलनि। ओ बेचारी नीक रस्ता धेलनि आ हिनकर बियाह करा देलखिन। नटवर लाल पत्नीमे रमि गेला। साले साल पुत्र रत्नक बरखा होमए लागल। तेरह साल पुरैत पुरैत हिनका लग छोट पैघ तेरहटा बच्चा छल– एकछाहा पुल्लिंग। घरमे जगह तऽ नहिए छलनि, बुतातोपर आफत आबि गेलनि। ताबत माताराम उपरक रस्ता धेलनि आ ई लगला पुस्तैनी जायदादकेँ बेचि गुजर चलबए। एहि बीच हिनकर भाग्य जागल जखन मात्रिकक एक गोटे बैंक मनेजर बनि कए राजनगर एलखिन। हिनकर दुर्दशा देखि ओहि बेचाराकेँ दया लागि गेलै आ हिनका बैंकमे चपरासीक नोकरी भेटि गेलनि। आब की छल? राति दिन हिनका आङ्गनसँ माछक सुगन्ध उठए लागल। बैंकमे पहुचि नटवर लालकेँ अपन असली रूप देखेबाक अवसर भेटि गेलनि। हमरा गामसँ राजनगर दस किलोमीटर। ताबत ने रोड नीक भेल छलै आ ने टेम्पूक चलन भेल छलै। ई लोककेँ फुसिया फुसिया बैंकमे खाता खोलबौलनि आ तकर बाद ओकरा सबकेँ लघु बचत योजनासँ जोरि नित्य साँझमे एकटकही दुटकही, जकरा जेहन जुड़ै, से जमा करए लगला। पासबुक बनि गेलै मुदा सबटा पासबुक ई अपनहि संग राखथि। लोककेँ विश्वासमे लेने। जरूरति पड़लापर सौ पचास उधार सेहो दऽ दैत छलखिन ई कहि जे बैंकसँ लोन भेटलहु। लोक लोन सधबए लागल आ अगिला किस्त उठबए लागल। एहि बीच ई गामक संचित टाका निजी काजमे लगाबए लगला। पासबुकपर किछु चढ़ै नहि। लोककेँ किछु बुझबामे अबै नहि। प्रायः पाँच साल तक ई खेला चलैत रहल। कियो यदि कहियो पासबुकक चर्चो करए तऽ ई बहन्ना बना देथि जे बैंकमे राखल छै। दश किलोमीटर बिना कोनो साधन के चलि कए जाएब कठिन छलै आ लोक अनठा दैत छल। एक बेर ककरो बेटीक बियाह लेल पाँच हजार टाका निकासी करबाक जरूरति भेलै। ओकरा हिसाबें जतेक टाका ओ जमा करैत गेल छल ओहिसँ पाँच हजार जरूरे उठाओल जा सकैत छलै। नटवर लाल किछु दिन टालमटोर करैत रहला। मुदा बेटी बला कते दिन मानितए? अन्तमे हारि कए ओ एक दिन पहुँचि गेल राजनगर बैंक। तकर बाद जे हेबाक छलैक सएह भेलै। सबटा भेद खुजि गेलै आ बेटी बलाक खातामे मात्र अढ़ाइ सौ टाका भेटलै। गामक प्रायः सब के टाका डुबलै। सब अपन कपार पीट कए रहि गेल। नटवर लालपर विभागीय कारवाइ भेलनि, ओ जेल गेला। एहि बीच तेरह पुत्र सेहो बढ़ैत गेलखिन आ सौंसे भारतमे छिड़िया गेलखिन। हुनका लोकनिक लेल बापक पापक बीच गाममे रहब कठिन भऽ गेलनि। पत्नी सेहो अस्वस्थ रहए लगलखिन आ करीब चारि सालक बाद स्वर्ग गेलीह। पेरोलपर आबि नटवर लाल पत्नीक संस्कार केलनि। करीब सात साल जेलमे सरलाक बाद ओ गाम घुरला। मुदा हुनका मुखरापर कोनो ग्लानिक भाव कहियो नहि एलनि। एखन गामे रहैत छथि आ बेटा सबहक पठाओल टाकापर गुजर करैत छथि। कोशिश तऽ ओ एखनहु करैत छथि लोककेँ ठकबाक, पुरान आदति जे छनि, मुदा आब लोक हिनका चीन्हि गेल अछि से हिनका नहि सुतरै छनि। १०. झलकी देवी मूल नाम : अज्ञात, सब दिन लोक ओकरा एही नामसँ जनैत छैक। पिताक नाम : रतन सदाए जन्म तिथि : ठीकसँ नहि बूझल मुदा हमर समवयस्के अछि झलकी। उपलब्धि : झलकी अपन माए-बापक एकमात्र सन्तान। बच्चेसँ कने गौरवाह। कहियो कोनो समवयस्क छौंड़ाकेँ गुदानलक नहि। बियाह भेलाक बाद एतहि रहि गेल। पति घर-जमाए बनि गेलखिन। झलकी सुन्नरि अछि एखनहु। जखन ओ यौवनक देहरिपर डेग देलक तखन गाममे बहुतोकेँ मोन डोललै। कसल देह, सुगठित बाँहि आ यौवनक अन्य सब लक्षणसँ युक्त जखन ओ अल्हर भावें बाध दिस जाइत छल तखन हमरा उमेरक छौंड़ा सब ओकर पछोड़ धऽ लैत छल। ओकरा लेल धन सन। एक बेर चौरमे रहमतबा कने नजदीक आबि गेलै, झलकी पाछू घूमि ओकरा तेहन चाट मारलकै जे ओ ठामहि खसि पड़ल, दाँती लागि गेलै। तकर बादसँ हमरो सबकेँ बूझल भऽ गेल आ झलकी अपनहुँ आश्वस्त भेल जे कियो ओकरा देहमे भिरबाक साहस नहिए करतै। हम जखन दिल्ली चलि गेलहुँ तखनुक घटना थिक। झलकी एकसरिये छल घरमे। एहि बातक फाएदा उठा मटिकोरबा गामक भूतपूर्व मुखियाक बेटा अपन एकटा उद्दंड संगीक संग ओकरा घरमे प्रवेश केलक बलात्कारक उद्येश्यसँ। मुदा चल गेल यमलोक। झलकी कचिया हाँसूसँ दूनूकेँ दू टुकड़ी कऽ देलकै आ घरेमे गारि देलकै। ओतबे नहि, शोणित लगले कपड़ामे रातिएमे हाँसू हाथमे लेनहि सौंसे टोलमे चिकरि कए कहि देलकै जे कियो यदि गवाही देतै तऽ ओकरो यमलोक जाए पड़तैक। तकर बाद पोखरिमे नहा लेलक, हाँसू धोलक आ आबि कए निश्चिन्त भऽ कए सूति रहल। ओकर एहि धमकीसँ कानूनक काज तऽ रुकितै नहि। अगिला दिन थाना पुलिस ओकरा ओहि ठाम पहुँचि गेलै। झलकी घरसँ बहराएल तऽ गरदनिमे सातटा कचिया हाँसूक माला पहिरने। एहन रौद्र रूप तऽ पुलिसो कहियो नहि देखने छल। दूनू पुलिस दरोगाक पाछू सुटकि गेल जेना मरखाहा साँढ़केँ अबैत देखि छोट बच्चा माएक पाछू सुटकि जाइत अछि। ककरो हिम्मते नहि होइ ओकरा लग जेतै, आ कि घरमे किछु सर्च करतै। दरोगा ओकरा पुछलकै- “तों रातिमे ककरो खून केलही?” झलकी निडर भावें उत्तर देलक- “एखन तऽ दुइएटा केँ कटलइयैए, जँ छौंड़ा सब आबहु नहि सीखत तऽ दू सैइयोकेँ काटि देबै एही कचिया हाँसूसँ। जकरा जे करबाक छैक से कऽ लिअए। हम ने कतहु जेबै आ ने ककरो अपना देहमे हाथ लगबए देबइ।” दरोगा मुश्किलमे पड़ि गेल। ओ दूटा सिपाही लेने आएल छल जे खूनीकेँ हथकड़ी लगा कए घिचने आओत थाना, जेना ओ सब दिनसँ करैत आएल छल। एहन काली माइसँ भेँट हेतै तकर सपनोमे कोनो अन्दाज नहि छलै। एकेटा उपाय छलै जे महिला पुलिस बजाओल जाए नहि तऽ ई मौगी की कऽ बैसत से नहि जानि। दरोगा हेडक्वार्टरकेँ फोन लगेलक आ ओतहि बैसल रहल, झलकी चल गेल आङ्गन अपन काज करै लेल। ककरो हिम्मत नहि भेलै ओकरा आङ्गन ढुकै के। करीब तीन घंटाक बाद मधुबनीसँ जीपपर सवार चारिटा महिला पुलिस एलै। ओ सब जखन झलकीकेँ हथकड़ी लगा पकड़ै लेल गेलै, झलकी ओकरो सबकेँ डाँटि देलकै आ हाथ तेना ने झटकि देलकै जे एकटा महिला पुलिस खसिए पड़ल। ओ बेपरवाहि ओहि चारूसँ पुछलकै- “तों सब मौगी छें ने। कह जे यदि रातिमे कियो तोहर इज्जत लूटै लेल तोरा लग पहुँचतौ तऽ की करबही? अपन बचाव करमे, ओकरा पाठ पढ़ेमे कि उतान भऽ कए पड़ि रहमे?” सब सकदम। ककरो कोनो जबाबे नहि फुरा रहल छलै झलकीक प्रश्नक। जबाब फुरेबो करतै तऽ कोन भाषामे झलकीकेँ उत्तर देतै? बड़ी कालक नाटक के बाद झलकी अपनहि मोने थाना विदा भेल। कियो ओकरा देहमे नहिए भिड़लै। आगू आगू झलकी, ओहिना सातो कचिया हाँसूक हँसुली पहिरने, केश खूजल, उड़ियाइत, आ पाछू दरोगा सिपाही आ किछु गौआँ सब। जिनकर बेटा कटलनि तिनका लोक एखन तक कतहु नहि देखलक। झलकी हाजतमे बन्द भेल, फेर मधुबनी पठा देल गेल। मोकदमा चललै मुदा सरकारी ओकील कोनो तरहक साक्ष्य जुटेबामे असमर्थ रहलाह। पूरा गाम झलकीक समर्थनमे जुटि गेल। छओ मासक बाद झलकी बरी भेल आ गाम घुरि आएल। पछिला पंचायत चुनावमे झलकी निर्विरोध सरपंच चूनल गेल। आब ओ ब्लॉकपर आ इलाकामे झलकी देवी नामे प्रसिद्धि पाबि रहल अछि। एखन गामक पंचैतीपर ओकर रौद्र रूपक प्रभाव झलकैत रहैत छैक। फल ई जे अपराधो कम भेलैए। हम सब लागि गेल छी प्रयास मे जे अगिला विधान सभा चुनाव मे झलकी कें एमएलए बना पटना पठाबी । हमरा सबहक विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति लेल आरक्षित छैके । ब्लॉक पर ओकर लोकप्रियता देखैत ई लक्ष्य असम्भव नहि बुझाइत अछि । ओ अपनहुँ एहि दिस ध्यान देलक अछि आ किछु पढ़ब लीखब शुरू केलक अछि। गामक लोकक कहब छैक जे झलकी साधारण महिला नहि, कालीक अवतार अछि। जखन ई मरत तखन एकरा सारापर काली मंदिर बनाओल जाएत। ११. राजा-रानी हमरा गाममे एकटा एलाह राजा। आ हमरे गामक पुत्री भऽ गेलखिन हुनकर रानी। एतए हिनक मूल नाम, जन्म तिथि आदिसँ हमरा सबकें सरोकार नहि अछि, मात्र हिनक अद्भुत चरित्र लीख रहल छी जे हिनका दूनूकेँ वास्तविक अर्थमे हमरा गामक पूज्य राजा-रानीक रूपमे स्थापित कऽ देलक आ इलाकाक अन्य गाम सबमे सेहो हिनकर ख्याति बहुत पसरल। राजा तऽ जहिना नाम तहिना हुनक विशाल शरीर आ उदात्त चरित्र। हुनकर चरित्रक प्रशंसा सुनि बहुतो कुमारि कन्या अपन भाग्य अजमौलनि मुदा राजाकेँ तऽ एकेटा पसिन्न पड़लनि। भऽ गेल राजा आ रानीमे प्रेम। से एहन प्रेम जे लोककेँ विश्वासे नहि होइ। बूढ़ पुरान सब बाजए लगलाह- “हौ, ई कोनो साधारण प्रेमी-युगल नहि छथि, जरूर कोनो देव अंश छथि। गामक ई उत्तरदायित्व जे हिनका दूनूक रक्षा करए।” बस, तहिना भेल। हिनकर आवास बनाओल गेल, सब तरहक सुख सुविधाक इन्तजाम कएल गेल। पार बाँटि गौआँ सब हिनकर भोजन पठबए लागल। जहिया जकर पार होइ ओ अपनाकेँ धन्य बूझए जे आइ ओकरे अन्न-पानिसँ राजा-रानी तृप्त भेलाह। राजा-रानी एक दोसराक लेल प्राण दैत। रानी तऽ अपनाकेँ अति भाग्यशाली बूझथि जे सब किछु होइतो हुनकर कोनो सौतिन नहि छलनि। बहुतो लोक प्रयास केलक जे एको नजरि राजा अन्य कन्यापर दऽ देथि मुदा बेकार। राजा तऽ रानीक प्रति समर्पित छलाह। आब हुनका एहन आत्मतृप्ति भेलनि जे ककरो अनका दिस तकबो नहि करथि। जेना कि प्रकृतिक नियम छिऐक, राजा-रानीक प्रेमक फल भेल हुनकर तीन पुत्र आ एक पुत्री। पुत्र लोकनि जेना जेना पैघ होइत गेलाह, अपन अपन व्यवसाय सम्हारलनि। बचि गेलखिन पुत्री। ओहो तीव्र गतिए बढ़ए लगलखिन। रानीकेँ चिन्ता भेलनि एकर बियाह कोना करौतीह। कहियो बियाह नहि करौलनि। अपने तऽ तेहन राजकुमारक प्रेममे फँसलीह जे बियाहक प्रश्ने नहि उठलैक। मुदा बेटी? रानीकेँ डर छलनि जे जवान बेटीकेँ देखि कतहु राजाक मोन डोलि ने जानि। मुदा राजा अपनहि अपनाकेँ सम्हारने रहलाह। ऋतुमासक समय पर बेटीकेँ पुरुषक जरूरति भेलैक। ओ एम्हर-आम्हर तकलक। कतए जाएत? ओकरा माए-बापक प्रेमक खिस्सा तऽ बूझल नहि छलैक। ओ लागल ओही पुरुषक चारू कात चक्कर काटए जे सबसँ लगमे ओकरा भेटलैक। ओ बिसरि गेल जे ओ पुरुष ओकर जन्मदाता छलैक। पुरुष अर्थात हमरा गामक राजा अपनाकेँ बहुत सम्हारलनि मुदा भावीकेँ के रोकि सकलए? ओ नवयुवतीक चालिमे फँसिए गेलाह। ओकरा शरीरसँ उठैत मादक गन्ध हुनका मदमत्त कऽ देलक। हुनक संयमक बान्ह टुटि गेलनि। नवयुवतीक काम-पिपासा तृप्त भेलैक। ई दृश्य रानीसँ नुकाएल नहि रहलैक। रानी बजली किछु नहि मुदा बहुत दुखी जरूर भेलीह। ई घटना हमरा सबकेँ देखल अछि जे ओही राति रानी मरि गेलीह। राजा अपनाकेँ दोषी मानए लगलाह। एहि नवयुवतीकेँ अपन दोसर रानीक रूपमे ओ स्वीकार नहिए कऽ सकलाह आ एक मासक भीतरे शोकसँ डूबल ओहो शरीर त्याग केलनि। राजा-रानीक एहि अमर प्रेमक खिस्सा इलाकाक आनो गाममे लोक सबकेँ बूझल छैक। १२. अन्तमे एखनुक समय जकाँ यदि पहिने रियलिटी शो के प्रचार भेल रहितै आ हमरा गामक लोककेँ किछु बूझल रहितैक तऽ खुरचन ठाकुर आ चिलमसोंट भाइ जरूरे स्टेजपर सिनेमा स्टारक सामने अपन करतब देखा कए इनाम लूटने रहितथि। तहिना जँ ओलिम्पिक आ अन्य खेल महोत्सव सबमे भाग लेबाक अवसर भेटल रहितै आ कि मैराथनक प्रचार भेल रहितैक तऽ के टहलू दासकेँ हरा सकैत छल? आइ मिल्खा सिंहक बदला टहलू दासक नाम लोक जपितए। हमरा गामक नामे ओलिम्पिक मेडल रहितए। लम्बोदरक भोजनक खोराक जरूरे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्डमे लिखा गेल रहितै। बिग बॉस सन शो लेल बीए अति उपयुक्त व्यक्ति होइतथि, सब प्रतिभागीमे झगड़ा लगा अपने जीत जइतथि। यदि कियो ढंगसँ पैरवी केने रहितै तऽ हुनका सरकारक कृषि पण्डित पुरस्कार सेहो भेटि जइतनि। पण्डितजीक आशीर्वचनक शब्दकोष यदि छपि गेल रहितनि तऽ जरूरे अपने सब हमरा गामक एहि विभूतिसँ परिचित भऽ गेल रहितहुँ। छपेबाक प्रयासमे लागल छी। ईहो अद्वितीये होएत से हमरा विश्वास अछि। फूलन देवीक ओतेक नाम भेलै मुदा हमरा बुझने साहसमे ओ झलकीक पासङ्ग नहिए होइतए। झलकी एखन अछिए आ ओकरा बहुत नाम कमेबाक छैक। हमहूँ एहिमे ओकर मदतिमे लागि गेल छी। जे समय बीत गेल से समय तऽ घुराओल जेतै नहि, वर्तमानकेँ तऽ सुधारी। जहिया झलकी एमएलए बनि जाएत तहिया हमर खकपतिया गामक नाम अपनहि देश मे सबतरि प्रचारित भऽ जेतै। आब अपने सब बुझिए गेल हेबै जे हमरा गामक एहि रत्न सभक फोटो किएक नहि देल गेल। दिवंगत लोक सबकेँ फोटो अबितै कतए सँ? विभिन्न कारणसँ बीए, नटवर लाल आ पण्डितजी फोटो नहि खिचौलनि। झलकीक फोटो तऽ छैक मुदा एखन ओ फोटो छपबए नहि चाहैत अछि। ओकर लक्ष्य पैघ छै। फूलन देवीपर सिनेमा बनलै तऽ झलकी पर किएक नहि? जखन झलकी एमएलए बनि जाएत तखन अपनहि ओ ई काज कऽ लेत। ओकरो पूर्ण इच्छा छैक जे गामक नाम उजागर होअए। एकर तैयारी लेल ओकर जतेक प्रोग्राम होइत छैक तकर भीडियो बना कए हम सब रखने जाइ छी। हमरा आशा अछि जे कहियो ओकर उपयोग झलकीपर सिनेमा बनौनिहार करबे करता। देवेश झा, एन० डी० कॉलेज रामबाग ,पूर्णिया, प्राध्यापक (मैथिली विभाग) हिन्दू विवाह : एक समीक्षा प्रमुख विचार विंदु : 1॰ विवाह 2॰ कर्तव्य 3॰ यौवनक आवेग 4॰ ज्ञान 5॰ प्रतिस्पर्धाक संवेग 6॰ आदर्श संबंध 30 जून 2018 के दैनिक जागरण पत्र विवाहक अदभूत दर्शन करौलक । किछू घंटाक विवाहक विधि नवोढ़ा कन्याक (नायिकाक) समग्र स्वच्छ्न्द अस्तित्वकें शून्यक धरातल पर आनबा मे सक्षम भऽ जाइत अछ । कतऽ नवयौवनक निश्चिन्त आ मस्त जीवन आऔर कतऽ अपर पक्षक कर्त्तव्यक कारख़ाना । पत्नी एवं गृहिणीक जीवन कोनो घरक आबालबृध्द घर में पधारल पत्नी रूपी बहूकें देखि परमानंदक अनुभूति करैत बजै छैथि- आब की ? कोन चिंता ? घरमे नव कनिया आबिये गेल छैथ, सब काज करबे करती आ सब भार सहबे करती, चलू मिठाई खाऊ आ खुशी मनाउ। किन्तु एतहिसॅ असंतुलनक आर्त्तनाद मुखरित होइत अछि जे कन्या यौवनक आवेगमे ज्ञान एवं प्रतिस्पर्धाक संवेग संबलसॅ अनुस्यूत उच्चपदाकांक्षाक संग “सुपर वुमेन “ बनवाक कामनासॅ स्फुरित आर स्पंदित होइत रहैत छैथि ओ पत्नी तथा गृहिणीके दायित्वसॅ दबिकें आहत होइत अपना जीवनके धिक्कारय लागैत छथि । जखनकि हमरा सभक मध्य कियो एहेन दुखद भाव नहि रखैत छथि । ते आवश्यक बुझना जाइत अछि जे पति-पत्नीक आदर्श संबंधके बुझबाक लेल विवाह एवं विवाह विधि केर पुरातन-नूतन रूपके बुझल-बुझाओल जाय।यथा- हिन्दू विवाह धर्ममे विवहके एक प्रकारक संस्कार मानल गेल अछि, जकरा दाम्पत्य जीवनक उत्तरदायित्व कहल जा सकैत अछि। अन्य धर्मक अनुसारे विवाहके पति-पत्नीक बीच एक प्रकारक समझौता सेहो कहितॅ उचिते। ओना विवाह एक समझौता त थिकिए, मुदा विवाहोपरांत पति-पत्नीक संबंध मे अग्निके साक्षी मानिके सात फेरा लगाबैत छी जे हम सदा दुनू साथ रहब, मुदा आजुक जमाना किछु और अछि। हम अग्निके साक्षी मानि पवित्र बंधनमे त बंधि जाइत छि मुदा समयके बदलैत क्रममे किछू दिनमे एहि पवित्र संबंधक निर्वहन करयमे आजुक युवावर्ग (युवक-युवती) के किछु उकरू बुझि पड़ैत अछि। वैदिक कालमे विवाह संस्कार एक महत्त्वपूर्ण संस्कार मानल गेल अछि । ऐहि संस्कार मे स्वागत- सत्कार, विवाहक उद्घोष, वस्त्रादि उपहार, वर- वधुक प्रतिज्ञा, कन्यादान, गुप्तदान, दहेज, पाणिग्रहण, ग्रंथि बंधन, विवाहक विशेष यज्ञ, सात-परिक्रमा, शिलारोहण, ध्रुव आ सूर्यक दर्शनक, शपथ आश्वासन आदि क्रियासॅ निवृत्त होमय पड़ैत अछि । हिन्दू धर्ममे गृहस्थ जीवन मनुष्य के दायित्व निर्वहणक योग्य बनबाक एक मार्ग थीक, जाहिमे शारीरिक, मानसिक आ आर्थिक परिपक्वताक ज्ञान होइत अछि । एहि क्रममें अनेक वरिष्ठ व्यक्ति, गुरुजन, कुटुम्ब संबंधी सबसॅ धर्म, पुजा-पाठ, देवताक आवाहन, अनुष्ठान करयबाक ज्ञान प्राप्त होइत अछि । ओना तॅ विवाह आठ प्रकारसॅ सम्पन्न होइत अछि। 1॰ ब्राह्म विवाह :- सुयोग्य वरसॅ कन्याक विवाह बिना कोनो दान दहेजक करबाक प्रथा दुनू पक्षक सहमति सॅ होएब ब्राह्म विवाह कहाबैत अछि । 2॰ दैव विवाह :- कोनो सेवाक भावसॅ किछू मूल्य लऽ क पहिने अपन कन्याके दानमे दैत छ्थिन्ह ई दैविवाह भेल। 3॰ आर्ष विवाह :- ओना तॅ ई विवाह पहिने कन्यादान बदला गौदानक रुपमे होइत छल। पहिने पुत्रीक विवाहक लेल वर पक्ष गायक दान करैत छलाह। एकरे आर्ष विवाह कहैत छी। 4॰ प्रजापत्य विवाह :- मैथिल संप्रदायमे कन्याक विवाह दोसर वर्गक वरसॅ करा देव प्राजापत्य विवाह कहबैत अछि । 5॰ गंधर्व विवाह :- दुनू पक्षक सहमतिसॅ कोनो रीति रिवाजक अनदेखी करैत वर- कन्याक विवाहके गंधर्व विवाह कहल जाइत अछि। एकरा ई युगमे प्रेम विवाह सेहो कहैत छी । जेना :- दूष्यन्त-शकुन्तलाक विवाह गंधर्व विवाह कहल गेल जिनक पुत्र भरत भेलाह। हुनके नाम पर हमर देशक नाम पड़ल भारत । 6॰ असुर विवाह :- वर्त्तमान सामयमे विवाहक जे प्रथा चलैत अछि, ओकरा असुर विवाह कही तॅ कोनो हर्ज नहि । ज़ोर जबरदस्ती भगाक दान कार्यक दहेजक बिना विवाह असुर विवाह कहबैत अछि । 7॰ राक्षस विवाह :- कन्याक सहमतिक बिना विवाह करब राक्षस विवाह कहबैत अछि । 8॰ पिशाच विवाह :- कन्याक मदहोसक अवस्थामे वा वरक किछू नशाक अवस्था मे किछू खुआके लऽ जा के विवाह कराएब पिशाच विवाह कहबैत अछि । भारतीय सांस्कृतिक अनुसार विवाह कोनो शारीरिक आ सामाजिक अनुबंध मात्र नहि अछि अपितु दूनूक दाम्पत्य जीवनकें एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधनाक रुपमे दर्शाओल गेल अछि । ठीके कहल गेल अछि :- “ धन्यो गृहस्थाश्रम: ”। मिथालमे पहिने सॅ विवाहक प्रथा अनेक दृष्टिकोणसॅ देवताक आवहानक उपरान्त अग्निदेवके साक्षी रुपमे संकल्प आदि करकें वरुण देवसॅ कृपालाभक बड़ अदृष्ट फल होएत अछि अहि दुनू शक्तिके एक हिएबाक एक गंभीर बात आर्य विवाहमे राखल गेल छल । विवाहक संबंधमे आर्ययूगसॅ पत्नीक दिशिसॅ पतिकें शतायु होयबाक प्रार्थना आ पतिक दिशसॅ अभिन्न दाम्पत्य प्रेम प्रार्थना कएल गेल अछि जेना । राघवेन्द्रे यथा सीता विनीता काश्यपे यथा । पावके च यथा स्वाहा तथा त्वं मयि भर्त्तहि । आदि आदि (धर्मविज्ञान,पृ0156) एहिप्रकारें जेना रामक प्रति सीताक कश्यपके प्रति विनताके, अग्निक प्रति स्वाहाक, दिलीपक प्रति सुदक्षिणाक, वासुदेवक प्रति देवकीक, अगस्तक प्रति लोपमुद्राक, अत्रिक प्रति अनुसूइयाक, यमदग्निक प्रति रेणुकाक आ श्रीक़ृष्णक प्रति रुक्मिणीक पवित्र प्रेम छलैन्ह ओएह प्रेम आजुक वर कन्या मे मधुर प्रेम जीवनक ई प्रार्थना आर्य विवाह कालसॅ अछि जे एहि युगमे संभव नहि बुझाबैत अछि । एतय हमर मंतव्य अछि जे विवाह एक पति पत्नीक बीच परस्पर विश्वासक एक समझौता तॅ थिकिए संगे- संग एक प्रकारक कर्त्तव्य सेहो थीक जे विवाहोपरान्त व्यक्तिक जीवन शैलीमे कतेक प्रकारक उतार-चढाव अबैत अछि जाहि मध्य मनुष्य जीवन गाड़ीक दूनु पहियाक सदृश घुमैत ई जिनगी सुख-दुखक अनुभव करैत बितैत अछि । विवाहक विषयमे किछू मिलल-जुलल तथ्य युक्तिसंगत बुझि पड़ैत अछि। यथा: जे पहिने एक दोसरसॅ आनठिया (अनचिन्ह) पुन: क्रमश: एक दोसर पर आश्रित, उत्तरोत्तर सौंसे (संपूर्ण ) जिनगिक संग, शनैह-शनैह परस्पर अभिन्न अपनामे, एक उदात्त आनंदयुक्त मधुर स्पर्श, अकस्मात् अपनामे रुष्ट नोक- झोंक, उच्चावच मति पर चलैत बढ़ैत विरक्ति-, विभेद-तलाकक किनार तक। कतहु जिद आ कतहु मानक अहम भाव , तथापि रकम-रकम दुनु निकट सूत्रमे बन्हैत एक पुष्प माल, इ मधुर अज्ञातसॅ ज्ञातक दिशामे, चलैत प्राणान्त पर्यन्त समय साध्य यात्रा, कनिया वरक इ कटु मधुर संबंध कखनहु, अचार कखनहु तिक्त चटनी तॅ संगहि मधुर , रसायनक शाही भोग कखनहु लावण्य कखनहु नीम, सब कीछु मिली भौतिक जगतक रुपें परिणत होइत अछि। काव्यक नवरश रुचिर भोगमे, दु:खहुमे आनंद, परमानंद जाहिमे व्याप्त, दुखज जीवनक सुख । पुन: विवाह थीक: एक आश विश्वास मिलनमे आनंद, समाजमे जीवनक समर्पण, भल हो ओहि नवोढ़ा नारि केर, जे आनक लेल अपनाके त्यागि देलैथ, अपना लेलैथ, सर्वथा अनभिज्ञके, अपना आँचर मे समा लेलैथ। ताहिना धन्य छैथ ओ पुरुष सिंह, जे नवागता अनचिन्हारि अबला पर, स्नेहिल विश्वास करैत अपना घर धरा, समग्र ऐश्वर्य आ स्वयंके सौपि देलैथ, आओर की कहू-वाह रे विवाह, आह रे विवाह । मैथिली पत्रिकामे अनुवाद साहित्य अनुवाद थिक एक भाषाक वाक्य केँ दोसर भाषामे कहब लिखब । पहिलकेँ मूल भाषा आ दोसरकेँ लक्ष्य भाषा कहल जाइछ । अभिप्राय अछि मूल भाषाक भावकेँ शत-प्रतिशत लक्ष्य भाषामे उचित शब्द सहित अंतरण करव, किन्तु समस्या होइत अछि जे सभ भाषाक प्रकृति, परम्परा, शब्द सम्पदा आ स्वभाव अपन-अपन होइत अछि । एतबहि नहि ; भाषागत नियममे से हो भिन्नता रहैत अछि । तकर मुख्य कारण अछि जे कोनो भाषाक प्रकृति, परम्परा शब्द सम्पदा आ ध्वनि ओहि स्थान विशेषक जलवायु, भौगोलिक स्थिति, वातावरण, धर्म, आचार-विचार, उच्चारण ध्वनि आदि तत्व सॅ प्रभावित रहैत अछि । तेँ मूल भाषाक शब्दक हू-ब-हू समान अर्थबला शब्द दोसर भाषामे नहि रहैत अछि । एहना स्थिति में एक भाषा दोसर भाषा सँ शब्द उधार लैत अछि । आ मूल रूपक शब्दकेँ लक्ष्य भाषा मे ओहि रूप मे प्रयुक्त करैत अछि । यथा, आंग्रेजी सँ हम लैत छी स्टेशन, कोर्ट, पेंट आदि आ हम दैत छी छौंकी, झाँझन, धोती, साड़ी आदि । यद्यपि अनुवाद जटिले कार्य अछि आ फराक सँ विवेचनीय अछि, किन्तु से हमर हिस्साक विषय नहि । तखन एतेक कहब अवश्यक जे आइ विश्व मानव एक दोसारक सम्पर्क मे बहुत तीव्र गति सँ अबि रहल अछि । तेँ एक दोसराक सामाजिक जीवन, सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, रहन सहन, जीवन पध्दति सॅ परिचित होयब आवश्यक, जकर मुख्य स्रोत थिक ओ तुक्का साहित्य । सामाजिक प्रतिविंब देखवाक हो तँ साहित्य बिनु देखने कचरेटा देखल जा सकैछ । तत्पर्य ई जे आजुक संदर्भ मे अनुवाद साहित्येक नहि, जीवनक अपरिहार्य अंग बनि गेल अछि । मैथिली पत्र-पत्रिका देखला सॅ ज्ञात होइत अछि जे अनुवाद साहित्य अपेक्षाकृत संतोषप्रद नहि अछि से तखन मिथिलाक जन जीवन ओ ओकर सभ्यता- संस्कृति मे अनुवादक प्रवृति रचल-बसल अछि । नेना वा अबोध सन्तान केँ बढिया पितामही, मातामही, पितामह आदि विभिन्न प्रकारक संस्कृत श्लोकक अथवा ग्रन्थक कोनो -कोनो अंश अपन भाषा मे सुनाऽ निक संस्कार सॅ संपर्क करैत आइल छथि । किन्तु एही अनुवाद-प्रवृतिक अछै तँ पत्र-पत्रिका मे अनुवादक अल्पता सोचनीय अछि। भारत मे पत्रिका पदार्पणक शुभ काल थिक आठारहम शताब्दीक उत्तरार्ध जखन कम्पनी सरकारक आधिपत्य स्थापित भ गेल छल । किन्तु मैथिली पत्रकारिताक स्वर्णिम विहानक किरण प्रस्फुटिक होइछ तखन-जखन 1905 मे जयपुर सँ “मैथिली हित साधन” नामक मासिक प्रकाशित होइछ, जाहिमे अनुवाद तँ नहि टीका अवश्य रहैत छल । पुन: दोसर शुभ मुहूर्तक क्षण अबैछ 1906 मे जखन मैथिली पत्रिकाक इतिहास मे नव संकल्प, नवचेतना अ नव दिशा ल क आयल ‘मिथिला-मोद’ मैथिली साहित्यक उध्यान मे नवल बसंत, नवल मलयानिल सदृश महमह करैत आयल । एकर प्रकाशन मे विभिन्न बाधाक फलस्वरूप अवरुद्धता तॅ आयल मुदा 1936 सँ पुर्नप्रकाशन प्रारम्भ भेल । मिथिला मोदक माध्यमे अनुदित ग्रन्थ सभक प्रकाशन सँ अनुवाद विधि प्राणवन्त भ उठल । एहिमे महत्वपूर्ण अछि (क) हितोपदेश (अनुवादकक नाम अंकित नहि अछि) (ख)कपाल कुण्डला (अनु॰ पं० शिवनन्दन चौधरी पुर्णिया ) (ग) श्री मदभगवतगीता( अनु० पं० त्रिलोचन झा) (घ)मुद्राराक्षस (अनु० पं० चेतनाथ झा) (ङ) उत्तर रामचरित (अनु० मुंशी रघुनन्दन दास), पं० कुशेश्वर कुमर आ बाबू भोलालाल दसक संयुक्त संपादकत्वमे ‘मिथिला’ मासिकक प्रकाशन प्रारंभ भेल जे अच्युतानन्द दत्त द्वारा अनूदित ‘महाभारतक’ कतिपय अंश तथा गुणवंत लाल दास द्वारा ‘दुर्गा सप्तशतीक’ अंशक रूपान्तर धारावाहिक रुपे प्रकाशित कयलक / पं० छेदी झा ‘मधुपक मेघदूत क अनुवाद प्रकाशित होबय लगल छल जे पुर्ण नहि भ सकल | इलाहाबाद सँ बाल मासिक पत्रिका ‘बटुक’ के प्रकाशन श्री सुधाकांत मिश्रक संपादकत्व मे होइत छल | ऐहि बाल पत्रिका में अनुवाद साहित्य विशेष महत्व रखैत अछि | ओहि मे म० म० उमेश मिश्र द्वारा उपाख्यानमालाक ‘नचिकेतोपाख्यान’ क अनुवाद रुसी कथा बरखा आयन बेगं, जवाहर लाल नेहरुक ‘पिताक पत्र पुत्रीक नाम’ क अनुवाद तथा श्री रमाकांत मिश्र द्वारा रवीन्द्रनाथ टैगोरक ‘कबूलीवाला’ क अनुवाद एवं टाल्सटायक कथाक अनुवाद ‘तीनिटा बाबाजी’ (अनु० श्री रमाकांत राय) महत्वपूर्ण एवँ अविस्मरणीय अछि। एहिना श्री धीरेश्वर झा ‘धीरेन्द्र’ क सम्पादन मे विशेश्वर साहित्यकुटीर लोहना सॅ ‘धियापुता’ नामक दोसर बाल मासिक पत्रिका प्रकाशित होएत अछि । मैथली पत्रिकारिता मे एकरहु स्थान अति महत्व रखैत अछि । एहि पत्रिका मे धियापुताक रुचि जगयबा लेल तथा संस्कार भरबाकउदेश्य सॅ बाल साहित्य रूप मे अनूदित रचनाक बहुलता देखबा मे अबैछ । एहिमे पंचतंत्र कथाक यथा ‘माइक बोल’ ‘सूर्य उगि रहल छथि’ आ स्वर्ग तथा कीछु आत्मकथा, वैज्ञानिक कथा, गल्पक अनुवाद भेल अछि । मैथिली पत्रिकारिताक इतिहास मे नव आयाम जुड़ैत अछि तखन, जखन 1950 मे ‘वैदेही’ मासिकक प्रकाशनक श्रीगणेश होइत अछि । एहिठाम एतेक कहब आवश्यक प्रतीक होइछ जे मैथिली पत्र-पत्रिकाक प्रयोगात्मक तथा अस्तित्व स्थापना प्रक्रिया अति विकट एवं संघर्षमय होइतो विकाशोन्मुखी तँ रहल अछि । किन्तु जीविका सँ जुड़ल नहि रहवाक कारणे आ राजकीय उपेक्षापूर्ण नीतिक परिणाम स्वरूप पत्रिका सभ अल्पजीवी होइत आयल अछि। बोद्धितावादी विद्वान, साहित्यसेवी आ कीछु उत्साही मातृभाषानुरागी लोकनिक द्वारा नव-नव पत्र-पत्रिका अबैत रहल मुदा स्वजनो सँ अपेक्षित सहयोग नहि भेटबाक कारणे काल कवलित होइत गेल । एहि प्रसंग पं० चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’ जीक कथा सर्वथा समीचीन अछि जे “मैथिली पत्रकरिता रूपी लत्ती मे कुम्हड़ेरक बतिया देखबा मे अबैत अछि जे आड्गुर देखौला सँ सड़ैत आबि रहल अछि (मे० पत्र का इतिहास )। बात सदर्थ अछि, मुदा एहिजड़ता केँ बहुत दूर धरि तोड़ैत अछि ‘वैदेही’ मासिक पत्रिका। ‘वैदेही’ मे अनुवाद विधा केँ जाहि प्रमुखताक संग स्थान देल गेल ओ अनुकरणीय अछि । सर्वप्रथम बंगला साहित्यक पुरोधा शरतचंद्र चटर्जी रचित ‘रमेर-सुमति’ (बंगला उपन्यासक अनुवाद) एवं 1856 क कथा विशेषांक मे ठाकुर पाठक चोधरी द्वारा क्रमिक रूसी कथाक अनुवाद बंगलाक ‘शेफाली’ तथा हिन्दी कथा ठाकुरक कूपक अनुवाद मैथिली पत्रिकारिता जगत मे विशेषता आनि गोरवान्वित कायलक। वैदेही मसिक अपन पचास-बावन बर्खक दीर्घ यात्रा मे मैथिली पत्र-पत्रिका साहित्यक इतिहास मे जे विशिष्ट आ महत्वपूर्ण योगदान कयलक अछि तकर लेखा-जोखा थोड़ में संभव नहि किन्तु, एतेक तँ कहले जा सकैछ जे ई मैथिली साहित्यक विभिन्न विधाक संगहि अनुवाद साहित्यक केँ अभिन्न अँगन रूप मे समायोजित करैत आयल अछि । यथा 1966 क नवम्बर-दिसम्बरक संयुक्ताँक अनुवाद विशेषांक थिक । एहिमे काव्य मर्मज्ञ नेपाल नरेश महाराज महेंद्र रचित नेपाली काव्य संग्रह “उसैकोलागी” क अनुवाद श्री अनन्त बिहारी दास इन्दुजी कयने छथि । अनुवाद शीर्षक थिक “तोरे लागी” सम्पूर्ण संयुक्तांक अनुदित काव्यक अछि । प्रो० आनन्द मिश्रक संपादन मे ‘अभियान’ मासिक पत्रिकाक प्रकाशन होयब प्रारंम्भ भेल जाहि मे गोर्कीक ‘शाल्टमार्ग’ क अनुवाद श्री हंसराजजिक सशक्त लेखनी सँ कयल गेल अछि जे मैथिली साहित्यक भंडार केँ समृद्ध करबा मे अमूल्य योगदान कयलक । भरती भक्तक संपादन मे बहुचर्चित मैथिली मासिक ‘सोनामाटि’ क आठ अंक में फ्रेंच कथाक (अनुवादक श्री मायानन्द मिश्र), बंगलाक दु गोट कथाक (अनुवादक श्री भद्रनाथ ओ श्री ब्रज किशोर ठाकुर) खलील जिब्रानक एक कथाक (अनुवादक श्री भद्रनाथ), नागालैंडक लोक कथाक (अनुवादक श्री गणेश शंकर खर्गा) एवं जीमकार्वेट लिखित शिकार कथा “रुद्र प्रयागक नरभक्षी चीताक (अनुवादिका मधुमिता) अनुवाद भेल अछि । शिवाकान्त पाठकक संपादन मे प्रकाशित ‘बागमती’ मासिक मे ऋग्वेदक दान सूक्त, समाज सूक्त आदिक अनुवाद पं० सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ द्वरा कयल गेल । कलकत्ता सँ प्रकाशित ‘मिथिला दर्शन’ मे हिन्दीक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीक निबंध ‘साहित्य’ क अनुवाद उग्रकान्त झा ‘उग्र’ द्वारा भेल अछि । मिथिला दर्शन मे ‘अनुवाद कथा विशेषांक’ क प्रकाशन सेहो कैल गेल अछि । यध्यपी मिथिला दर्शन मे कीछु और अनुवाद कार्य भेल अछि । मुदा से खोजे कयला सँ उपलब्ध भ सकत । ‘देसिलबयना’ मासिक मे श्यामलदास गुप्तक बंगला नाटक क इसाइ हाइनेकक एक गाही जर्मन कविताक अनुवादक श्री रामलोचन ठाकुर छथि । मैथिली मासिक माटिपानि, मासिक ‘कर्णामृत’ मासिक ‘देसकोस’ तथा त्रैमासिक ‘आरंभ’ आदिक मैथिली पत्रिकाक इतिहास मे महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि, मुदा एही सभ मे अनुदित रचनाक संख्या बड़ थोड़ अछि । अंत मे मैथिलीक सर्वाधिक नियमित बहुप्रशंसित आ सर्वप्रिय जाहि पत्रिकाक विवरण प्रस्तुत क रहल छी ओकर नाम थिक ‘मिथिला-मिहिर’। मैथिली पत्रकारितक मेरुदंड मानल जाइछ मिथिला मिहिरकेँ । पत्रकारिताक रूप मे सर्वोच्च नामधारी मिथिला मिहिरकेँ एहि साहित्यिक अनुष्ठानमे सर्वप्रमुख मानैत विभिन्न दृष्टि सँ अंतिम स्थान पर राखल गेल अछि । पहिनहि कहल अछि जे मैथिली पत्र -पत्रिका मे अनूदित रचनाक स्थिति संतोषप्रद नहि अछि | तकर प्रमुख कारण अछि पत्र-पत्रिका अल्पजीवनक फलस्वरूप बरमहल अवरुद्धता | सोच आ परिकल्पनाक स्वरूप साकार नहि भ सकल | तथापि अनुवाद होईत रहल अछि | प्रश्न उठेत अछि जे ई अनुवाद सभ मूल भाषासं प्रत्यक्ष अनुवाद भेल अछि वा अप्रत्यक्ष रुपे दोसर भाषासं ? एकर खुलासा होयबाक चाहैत छल जे नहि भेल अछि । तेँ अनूदित साहित्यिक कृतिकेँ देखब आ ओकर गुणवत्ता केँ परखब तेँ और कठिन । तकर हेतु ई जे मूल भाषासँ लक्ष्य भाषाक मिलानक उपरान्त सँ संभव होयत । मुदा स्थिति ई अछि जे अधिकांश अनुवाद मूल सँ नहि, अपितु माध्यमे भाषा सँ भेल अछि । मैथिली पत्र-पत्रिकामे अनुदिश साहित्यक पक्ष दुर्बल रहबाक सभसँ महत्वपूर्ण कारण अछि जे एको व्यक्ति ने त भावसायिक अनुवाद केने छथि आ ने एकोटा अनुवाद पत्रिकाक फारक सँ व्यवस्थे अछि। प्रश्न इहो अछि जे अनुवाद कार्यकेँ के ओ अपन ‘केरियर’ बनाबथि तँ कोना? जीविका सँ बिना जोड़ने श्रमक फलीभूत होयबाक संभावना कम| इएह कारण अछि जे मैथिली मे ने अनुवाद पत्रिका अछि आ ने कोनो पत्र पत्रिका अनुवाद साहित्यक लेल स्थायी स्तम्भ रखने अछि । मैथिलीक साहित्यकार लोकनिक भावावेश, रुचि आ मातृभाषाक सेवा भाव सँ स्वान्त: सुखाय अनुवाद कृतिक प्रणयन होइत अछि । पत्र-पत्रिकाक प्रकाशक संपादक जखन मन भेलनि, ओकरा छापि देलनि मैथिली मे विशेष रूपेँ पत्र-पत्रिका मे सोद्येश्य अनुवाद कार्य होयबाक चाही जे नहि भ रहल अछि। आजुक युग मे अनुवाद-कार्य एकटा मिशन थिक । दुनिया केँ जनबाक-परखबाक सभ सँ पैघ माध्यम थिक । आजुक बहुत लोक अनुवाद पर जिबैत अछि । एकटा बात और अनुवाद कार्यक जे आर्थिक पक्ष छै, ताहि लेल बाजार चाही, मुदा सँ अछि नहि । बाजारक अभाव अनुवादक अभाव, पत्र-पत्रिका मे अनुवादक अभाव सभ एक दोसरा पर निर्भर अछि । मैथिली पत्र-पत्रिका मे बेसी वा कम जे कीछु अनुवाद कार्य भेल अछि से तँ भिन्न बात थिक, किन्तु एतबाक तँ स्पष्ट परिलक्षित होइत अछि जे अनुवाद विशेषत: साहित्य सँ सम्बधिंत अछि । एतेक तँ अवश्ये जे मैथिली पत्र-पत्रिका मे अनुवाद साहित्यक स्थिति विकासोन्मुखी अछि । अवश्यकता छैक एकर गतिशीलता बढ़यवाक। ‘दू-पत्र’ उपन्यासक विश्लेषणात्मक अध्ययन पत्रात्मक शैली में लिखल गेल एवं 1969 ई0 में साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत कएल गेल ‘दू-पत्र’ उपन्यास उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’ क विषय तथा शिल्प दुनू दृष्तिएँ अत्यंत महत्वपूर्ण लघु उपन्यास थिक एहि उपन्यास में दुई गोट महिलाक दुई टा पत्र अछि जाहिमें एक पत्र भारतीय महिला श्रीमति इन्दु देवी नौ वर्ष सॅ अमेरिका में रहैत अपन स्वामी कँ लिखने छथि ओ पहिल पत्र थिक । एकर अंग्रेजी अनुवादक प्रतिलिपि इन्दु देवी क ममियौत भाई रमेश छथि । रमेश सेहो किछू वर्ष पूर्व स्वयं अमेरिका चलि गेल छलाह ओ अपन पत्रक संग पठा दैत छथिन्ह । ओ दोसर महिला जे इन्दु देवी के हुनक पत्रक उत्तर दैत छथिन्ह से थिक अमेरिका निवासी जेसिका अमेरिका मे इन्दु देवी क पति सुरेन्द्र क संगी रहथि । आ ई थिक एही उपन्यासक दोसर पत्र । एहि उपन्यासक सभ सँ पैघ विशेषता थिक पत्रक माध्यम सँ दू संस्कृतिक विवेचना दुनू पत्रमें दुनू देशक सभ्यता, सांस्कृति ओ संस्कार आदि साकार भ उठल अछि । पाश्चात्य सांस्कृतिक प्रतिमूर्ति जेसिका कोन रूपँ आपन पत्र में अपन सांस्कृतिक कएने छथि से वर्णनीय अछि । ओ अपने सांस्कृतिक अनुरूप पत्र लिखने छथि । तहि लेल एहि पत्रक निम्न अंश द्रष्टव्य थिक स्वामिक लग रहला सँ सुख चैन प्राय: छैक , परंतु बन्धनौं तँ कम नहीं । आ ई त ध्यान में रखक थिक जे जतै कतहु रही, अपन मायर्यादा स्वतंत्रता बड़ प्रिय अछि । ओहि पर आधार होयब हमरा आदि हुनक काज त हुनको हमर काज, नहीं तँ हुनक तरवा चटैत, नौकरानी भेली किए रहथिन्ह ? ई थिक पाश्चात्य संस्कृतिक झलक । मुदा भारतीय सांस्कृतिक विशेषता थिक जे किछू भ जेतैक मुदा भारतीय नारी अपन पति कँ सर्वोपरि बूझिते रहत जकर उदारहण थिक इन्दु देवी द्वारा लिखल गेल पत्रक अन्तक विद्यापतिक पद । जकरा दोहराबैत इन्दु देवी पत्र कँ समाप्त करै छंयि । पति द्वारा एतेक गलती केएलाक बादो हुनका द्वारा एतेक अपमान, अत्याचार सहलाक बादो हुनका द्वारा एतेक अपमान, अत्याचार सहलाक बादो हुनको पर कोनो दोष नहिं लागल । अपन माथ पर सभ दोष लड कर पति कँ जुग-जुग जिवाक हेतु कामना करैत छथि । एहिठाम इन्दु देवी द्वारा लिखल पत्रक किछु अंश द्रष्टव्य अछि – “युग-युग जिबयु बसयु लाख कोस, हमर अभाग, हुनक नहि दोष ।“ एहि उपन्यासक महत्व ओ विशेषता कँ प्रतिपादित करैत डॉ0 दुर्गानाथ झा श्रीश लिखने छथि- “एहि उपन्यासक महत्व अछि मैथिलि उपन्यास-क्षेत्र मे पत्रात्मक । रचना प्रणालीक नवप्रयोग एवं नवीन वस्तु-विषय ग्रहणक दृष्टि सँ । उपन्यासकर इन्दु , सुरेन जेसिका एवं रमेश चारि गोट मात्र पात्रक वृतान्त-प्रस्तुत कए बड़ कौशलक संग दुई संस्कृतिक तुलनात्मक विवेचना कएल अछि, विशेषतः भारतीय ओ पश्चात्य दृष्टिकोण में स्त्रीगणक सामाजिक ओ मानसिक स्थिति ओ आदेश में की अन्तर छेक, तकरा स्पष्ट करैत अन्तत: भारतीय ललनाक शालीनताक ओ श्रेष्ठताक बड़ सजीव प्रतिपादन भेल अछि | मानसिक द्वन्द ओ संघर्षक सूक्ष्म ओ कलात्मक आकलन एहि उपन्यासक प्रमुख विशेषता थिक | दू पत्र उपन्यासक ममेके बुझबाक हेतु उपन्यासक प्रकृति एवं ओकर प्रयोजनके बुझब आवश्यक ते एहि प्रसंगे अंगरेजीक उपन्यासक प्रसिध्द समालोचक समरसेट माँमक कथन द्रष्टव्य थिक – “I think it an abuse to use novel as pulpit or platform, and I believe readers are misguided when they suppose they can thus easily acquire knowledge.it would be fine If we could swallow the powder of profitable information made palatable by the jam of fiction.” डॉ० अमरेश पाठक एहि उपन्यासक प्रसंग लिखने छयि-साधारणतः मैथिलीक उपन्यासकार लोकनि अपन सीमित अनुभव एंव उपन्यास कलाक हेतु अपेक्षित ज्ञानक अभावक कारणे ओहि पक्षक चित्रणों नहि कए सकलाह अछि जकर चित्रण दू पत्रमें संभव भए सकल अछि | चारि गोट मात्र पात्र पर सम्पूर्ण वृतांत आधारित अछि | ओ पात्र छयि -इन्दु देवी ,सुरेन्द्र जेसिका एवं रमेश |भिन्न-भिन्न परिस्थितिमें एहि पात्र सभके राखि मानसिक द्वन्द एवं संघर्षक चित्रण द्वारा जे चित्र व्यास जी अंकित कएल अछि से सत्यानुरूप भेल अछि | संघर्षहिक स्थितिमे पात्रक चरित्रमे निखार आबि सकैत आ अछि |जेसिका , रमेश एवं सुरेन्द्रक व्यक्तित्वक चित्रण जे कएल गेल अछि से प्रशंसनीय अछि | एहि करणवश अपन संस्कृति,सभ्यता ओ आचरण विश्वमे सर्वोपरि अछि| तहि से अपन देशक अनेकताओ में एकताक देश कहल जाइत अछि | वस्तुतः ई उपन्यास दुनू देशक संस्कृति कें दर्शबैत भारतीय ललनाक शालीनता ओ श्रेष्ठता कें बड संजीव ओ कलात्मक ढंग स उपस्थिति करैत अछि | ‘दू पत्र ‘ पत्रात्मक शैलीमे लिखल गेल एक सफल उपन्यास थिक | संदर्भ: दू-पत्र , पृ0-84 तथैव , पृ0-45 मैथिली साहित्यक इतिहास-श्रीश , पृ0-353 मैथिली उपन्यासक आलोचनात्मक आध्ययन पृ0-172 राकेश प्रेमचन्द्र ‘पीसी’, पूरा नामःराकेश प्रसाद चौधरी, जलेश्वर नगरपालिका ६, पत्रकार एवं अनुसन्धानकर्ता, प्रकाशित ः खिचडी कविता संग्रह एवं फुटकर कथा, कविता, लेख। अप्रकाशित ः फुलगाछ कविता संग्रह लघुकथा- किसानकेँ डुबौलक लखन ठेकेदार लखन ठेकेदारक परिवार अंग्रेजक गुलामी जंजीरमे रहल सीमापारसँ पीनीक कारोबार करबाक बास्ते मधेसक जलसरमे अएल बहुतबेसी दिन नभइ भेल रहे । हुक्काक लोलीमे खैनीकेँ डाँठसँ बनल पीनी राखि धुमपान करयवाला सामन्त आ सम्पन्न किसानक संख्या धिरेधिरे पैर पसारैत समयमे कैयन परिवार अंगे्रजक हुकुमत सँ बचवाक लेल जलसर होएत आन गामशहरसभमे घरद्वार बनाइव ब्यापार करय लागल छलथि पीनिकेँ । नारियलक खोपरैयाकेँ सुखा ओहिमे पानि भरल जाएत छल आ ओहि भितरमे एक हावा पइसयवाला नली बनाएल जाएत छल । ओहि नलीके मुहमे एकटा लकडीकेँ पाइप राखल रहैत । माटिक लोलीमे गोइठाक आगिसँगे पीनी राखि हुक्काक मज्जा लेल जायत छल । दशरथ किसान जलसरक कनिक उदार सामन्तमे गिनती होइत छलाह। ओ जनमजदूरसभक लेल अलगे हुक्काकेँ ब्यबस्था सेहो क’ देने रहथि । भोर , दूपहर आ सँझियाके गुर्रर, गुर्ररक हुक्काक आवाज सुनल जा सकैत छलै । लखनक माय दैनिक दशरथक घरसँ पीनी द’ बदलामे धान लजाकेँ परिवार चलबै छली । सय बिग्हा खेतीहर जमीन, भखारी, जत्रतत्र अन्नपात । टोलपरोसक धियापूता ओहिठाम चोरानुकी खेल खेलवाक लेल दशरथकेँ खरिहान आ भखारीक दौडधुप लगबैत छल । जखन लखनक माय दशरथके तुलना त्रेतायुगक राजा दशरथ सँ करैत छल त लखनकेँ चेहरा देखय लायक रहैत छल, पित्तसँ लाल । डमरस अमधुर जकाँ । राणासभ राजकाजक लेल मधेशमे कर असुली करवाक बास्ते अंग्रेजक सेहो विश्वासक पात्र बना जा सकवाक बास्ते मधेशीया जेहन चेहरा मिलयवालाकेँ ठेकेदार बना मालगुजारी असुलबाक लेल ठेक्का बन्दोबस्तीमे दैत छलथि । ओसभ कर असुलीकेँ लेल दिनरात खटैत छल आ कर नइ बुझाववालाके मालजाल खोइल ल’ जाएत छल । मालगुजारी असुल करवाला ठेकेदार लठैत आ धकरिया रखैत छल। तेल पियल करिया करिया बाँसक लाठी रखैत छल ओसभ । मालगुजारी असुली करवा लेल अंग्रेजक गुलामी करहल अपन भगिनमानसभके जलसरमे बोलावाके सुरु क’ देलक । लखन सेहो भगिनमान रहथि । फरक इहे रहे जे ठेकेदारक बाप पहिने मधेशमे जंगल फरानी करय बास्ते जलसरमे एक दूदिन रहिजाय। समयमे कर बुझाव वाला सामन्ती किसान दशरथक जमीन कोना कब्जा होएत ओहि योजनामे परोसीराम ठेकेदार दिनराति मेहनत करथि । योजना अनुसार पहिला अन्नपातक डकैती करवा लेल सेन खनय वाला काजमे लखनके लगाएल गेल । ओ दुइए दिनमे सेन खनि देलक । हठ्ठाकठ्ठा लठैतके सम्पन्न आ सामन्त किसान दशरथक घरके कोनाकोना मालुम रहे । जमिनभितर सँ बनायल जाएवाला रास्ताके सेन कहल जाइत छैक । दशरथसँ पहिने सेहो हरिराम, राधव, सिताराम, मिठु, नथुनीसहितक सम्पन्न किसानक घरमे डकैती करबा चुकल रहे । डकैत अंग्रेजक गुलाम देशसँ आएल विदेशी रहल वात राणाक जर्नेल रिपोर्ट तयार क’ दैत छल । ओहि वापत जनरल ठेकेदारसँ दाम आ दमडी पवैत छल । पहरियाको धाकधम्की आ कर असुली कर’ वाला ठेकेदारक डकैती सँ बज्जीसंघक बनिमा समुदाय गरिब बनैत गेल । बज्जीसंघक बनिमा समूदाय ओ छलथि जिनकर पुवर्जके जनेउ तोडल गेल रहे । युद्धकर्म छोडि ब्यापार व्यवसायमे लागल समूदायके सतयुगी राजा अपन हरवाहा चरवाहा सँ जनेउ तोड्वौने रहथि । सम्पन्न दशरथ किसानक घरमे तीन बेर सेन खनि डकैती भगेल छलैक । समय पर कर चुक्ता नइ कयने कारणे आधा जमिन अर्थात पचास बिग्हा खेत पर कर असुली करयवाला ठेकेदार परोसीराम कब्जा कयने छल । सेन राज्य एवं दरभंगा महाराजक समयमे लोहिया पैसा द’ क’ सर्राफी कारोबार सँ जम्मा भेल पुर्खौली असर्फी सेहो डकैत लगेल छलैक । अंग्रेजक कब्जा रहल क्षेत्रके नजदिक दोसर देशके जलसरमे नेपाली सेनाक एक टुकुडी रखवाक पत्र जर्नेल धरि अएलावाद कर असुली करयवाला ठेकेदारसँग छलफल कायल गेल। परोसीराम अप्पन लठैत लखनसँ बात क’ सेनाक लेल जमीन उपलब्ध करौला पर बक्सीसके रुपमे पक्की घर देवाक आश्वासन देने छल । साथे सेनाक रासन ठेक्का देवाक प्रक्रिया आगू बढादेलक । दशरथकेँ जानकीपुर जाएवाला डगरक नाके पर रहल जमीन कब्जा करवाक परोसीराम र लखन बनाचुकल छल । किएक त सैनिक जमीनक बदला किछ सोनाक सिक्का देवाक बाचा कयने रहैक । लखन पुरान हित भेल नाटक क ’ दशरथके घर पहुँच रासन ठेक्कापट्टामे बनवाक आग्रह कयलक । रासन ठेक्कामे बहुत रास आमद होवाक लालच सेहो देखौलक। लेखनदासी करय सकवाक क्षमता बराबरके पढाई कयला बाबजुद ऐहन जालझेलक बात सँ दशरथ अलग रहलवालमे दशरथ छलथि । जेनतेन दथरथ ठेक्कापट्टामे लखनकेँ साथ देवाक सहमत भेल । साथे एकटा शर्त रखलक जे कहियो ओ थाना, ब्यारेक आ सैनिक कहाँ नइ जाएव । अहि शर्तमे दुनुगोट सतप्रतिशत सहमति भेलावाद ठेक्काक धरौटीवास्ते नाके परके जमिन धरौटीमे देवाक आग्रह अस्विकार करय नइ सकल । तीन महिनाकबाद ठेक्कामे लिखत शर्त बमोजिम रासन आपूर्ती नइ कसकवाक आरोप लतबैत धरौटीमे रहल जमीनकेँ डाक पर चढावल देल जानकारी दशरथके देलगेल । लेखनदासीधरिकेँ पढाई कयलावादो राजकाजक बहुत बात नबुझने दशरथ राजाधरि बिन्ती पत्र हुलाक सँ पठौलक मुदा वो सरकार धरि पहँच सँ पहिनही चोरी भगेल । अन्ततः नाके परके जमीन पर सेना कब्जा क अप्पन ब्यारेक खडा कयलक आ धिरे धिरे ओहिठाम रहल दशरथके बीस बिग्हा जमीन पर सेना अभ्यासके नाम पर कब्जा कलेलक । दशरथसँ कहियो राजमार्ग बनाब त कहियो शहर बसएवाक नाम पर बाँकि रहल सम्पूर्ण जमीन कब्जा करावमे परोसीराम आ लखन सफल भेल । जलसरमे रहल राजस्थानी आ राजकाजक कर असुली करयवाला ठेकेदारक जमीनमे दिन दुगुना रात चौगुना करवाक काजमे सरकारी लोकसभ सेहो साथ देलक । सय बिग्हा जमीन राखयवाला दशरथ धिरेधिरे सम्पन्नता सँ विपन्नतामे परिणत भगेलथि । नवनागरिक आ शासककेँ चालबाजी सँ चौघरा हवेली सेहो बेचके स्थितीमे पहुँचा देलगेल । एक बरषके बाद अंग्रेस अप्पन शासन छोडि भागि गेल । किछ समयक बाद जलसर आ जनकपुरीमे प्रजातन्त्र आएवगेल । मुदा विपन्न भेल दशरथ बालबच्चाके भोजनक ब्यबस्था करय लेल सम्पूर्ण परिवार विहार बिस्थापित भगेलाह । छोटमोट रोजगार क’ अप्पन आ परिवारकेँ गुजारा चलाब लागल समय परिवर्तन भेल । दशरथक बेटा, पोता धनिक बनिगेल । आब ओकरासभके नेपाली बनवाक मन होइछनि । मुदा जालसाजक दूनियामे ओसभ फेर सँ नइ परय चाहि छथि । अखनो हुनकसभक घरमे सेन र शाहकालिन राजाक भोजपत्ता आ कागजकेँ फाइल सनुक्कीमे राखल अछि । अरुण लाल बीहनि कथा- कुंभ स्नान .....परीछन छह ....। आबह आबह। हौ ! राम जी इच्छा स' कत' गेल छलह, मने गोटेक सप्ताह स' गायब छलह । कत' अलोपित्त भ' जाइत छह।किछु थाहे ने चलैए । .....कि कहियह ! तों जे नै रहैत छह ने , मोने ने लगैत अछि , एकदम खालीपन महसूस होमय लगैत अछि ।आर सब त' कुकुर बानर अछि ककरा स बतिआउ । सब स बेसी दिक्कत अखबारक होइए । तोरा इसकुल गेलाक बाद धरौरा बाली आनि लै छथि तोरा आंगन स'। कहैत कहैत चौधरी जी महींस कें पुचकारय लगला।फेर कहय लगला ई जे महींस अछि ने से बड़ पौस मानैत अछि ,एकदम बकेन, बुझलह किने । राम जी इच्छा स' पक्का तीन सेर सबा तीन सेर दूध दैए , एकदम गढगर बुझलह किने । धरौरा चौक पर त' एकरे पांच सेर बना क बेच लेत ।हमरा त' तोरे सन सन चारि टा गाहक अछि ।राम जी इच्छा सँ एकहक सेर सबकें दैत छी आ किछु चाहो लै रहि जाइत यै । अच्छा छोड़ह इ सब बात ।बतौलह नै, कत्त' गेल छलह रामजी इच्छा स। .....कि कहू बाबा ।हमरा इसकुल स' बस कें टिकट कटैत छै कुंभ स्नान के बुझलियै। हमरो टिकट कटा देलक जबरदस्ती । हमहूँ सोचलौं भइये आबी एक बेर । सब पाप कटा ली । मुलकी बाली त' जरि क' मरल छलै ने ।अहाँ कें त बुझलै अछि सबटा। परेशानी त भेल जाइत काल । मुदा कि कहू बाबा, एक डूम देलाक बाद लागल जेना जिनगी सकारथ भ' गेल । सब पाप ओतहि बिला गेल ।देह एकदम हल्लुक,फूल जकाँ आ मन शान्त भ' गेल। बुझायल जेना हम किछु नै छी। एक टा कनौसियो बरोबरि नहि ।निमित्त मात्र छी ।हमर वजूदे कतेक ।संसार हुनके स चलैत अछि।लोक झुठे हाइ हाइ करैत अछि। सबहिं नचाबत राम गोसाईं । बहुत संतोष आ दृढ़ इच्छाशक्ति जागल अछि । जिनगीक अर्थ आब समझि मे आबय लागल ।भला होइन्ह जोगी जी कें ।अद्भुत संसार और संस्कृति रचलन्हि अछि कुंभ घाट पर । हमरा त' लगैए बाघ आ बकरी एकहि घाट पर निर्भिक भ' पाइन पीब रहल अछि ।अखंड शांति ।निर्मल कलकल बहैत गंगा, जमुना आ सरस्वतीक संगम मे डूम दैते अनन्त सुखक प्राप्ति होइछ ।पूछू नै फेर फेर जाइ के मन करैयै । ओह गदगद भ' गेल मन । ...से बात ।ओह! तखन हमरो नेने जइतह ने अपने संगे रामजी ईच्छा स। बूढ सूढ आदमी हम सब कोना जा सकब । किए नै । कुंभ मे अइबेर बहुत नीक बेबस्था सरकार केने छै । आ जानै छिऐ बाबा अइ कुंभ मे जबाहर लाल सँ ल'क' जोगी , मोदी सब स्नान क' चुकलाह ।आ देखा देखी राहुल ,प्रियंका सेहो स्नान करती ।हिन्दुत्वक भावना हुनको सबकें किछु किछु जगलन्हि अछि ।भले देखाबटी ही सही । धरोराबाली हुलकी द' सब बात खिड़कीक दोग सँ अकानि रहल छलीह ।चौधरी जी संग धर्म युद्ध पर अड़ल छलीह जे किछु बीत जाय ओ कुंभ स्नान करबे करती ।हुनका मोन मे खुदबुद्दी लागल छलन्हि आ प्रायश्चित करय चाहैत छली आखिर दूध मे सबदिन एक लोटकी पाइन वएह त' मिलबैत छलीह ,राम जी इच्छा स । बीहनि कथा- ग्राहक आइ भोरे भोर चौधरी जी नहा सोना क' जल्दी जल्दी दोकानक शटर अपने स' कहुना क' उठा रहल छलाह कि रेंजर सैहेबक ड्राइवर तखने दोकान मे लिस्ट ल' क' पहुँचल । ...यौ सोइंठ अछि , आ मरीच सेहो लेबै। कनी लाल मेरचाइ ,आ बाबा रामदेब बला हिंग अछि न । ...आबय दही मनटुनमा के ।कने धुपबत्ती देखाबय दे । ...यौ बासमती चाउर केना दैत छिऐ। ...अबै छौ मनटुनमा बता देतौ।जय गणेश जय गणेश जय गणेश .......... ...यौ चिकेन मसाला अछि न ? ...आ सर्फ एक्सेल , डाबर हनी , बिसलरी बोतल । ...चुप ने कनी मनटुनमा अबिते हेतै। कत' रहि जाइत छै, ईहो छौंड़ा ,राम जी इच्छा स ,से नहि जानि । ...यौ जूता के फित्ता सेहो रखै छिऐ,आ फिनाइलक बोतल। ...हँ हँ सब छै।तों कनी दम धर । जय गणेश जय गणेश जय गणेश देबा। ...कखन आओत ओ। हमरा त देरी होइए । यौ किचेन किंग आ किचेन मसाला मे कोन बढियां होइत छै । ...कत्ते बजै छैं , बाप रे बाप । ...यौ कखन मनटुनमा आओत ।हमरा त सैहेब बाजय लगता । कहता कत' एतेक समय लागि गेलौ त की कहबै ।बताउ। ...ओम नमः शिवाय।कनी चुप रहय ने ।अगरबत्ती देखाब' दे न । यौ बासमती चाउर बढियां अछि कि कतरनी । कनी देखाउ न। कोन सस्ता छै आ बढियां , मेमसैहेब पोलाउ बनेथिन ।बहुते लोक सब आयल छै । ...कहलियौ ने सब बात मनटुनमे के बुझल छै आ ओकरे रखलो छै। ...यौ ओकरा कत्ते दरमाहा दैत छिऐ । ...से कियै । चौधरी जी कनी गरमाइत बजला। मोन आब खिसियानी बिल्ली सन भेल जा रहल छलन्हि। ...अहाँ के किछु बुझले ने अछि ।तखन ओकरे काउंटर पर बैसय दिऔ , पैसा अधिक भेटतै त अपने समय पर आओत आ अहाँ किछु दिन ओकर बला काज करु जाहि स' रखरखाव आ सब जिनिस के दाम सेहो पता रहत अहाँ कें । ...ऐं ! कि कहलैं ।चौधरी जी लाचार भेल शून्य मे तकैत मनटुनमा कें अखनो एबाक इन्तजार बहुत बेसब्री स' क' रहल छलाह। मने मन सोचय लगला सैह देखू कनियें ओहदा पाबि क' केना लोक इतराय लगैत छैक ।रेंजर के एक टा मामूली ड्राइवर कतेक पैघ बात कहि देलक । एबाक एबे करत मनटुनमा ,लेकिन बेइज्जत कराए देलक । ठीके लोक कहैत छै जे मौत आ ग्राहक कखनो आबि सकैए, राम जी इच्छा स । मोहनराज "गगन" बीहनि कथा-१ ---नव प्रयोगक विवाद व्यर्थ थिक, आऊ नव सदस्यक स्वागत अपनेक सभगोटे करी ---अहाँ बड़ बुझै छियै सभसँ पिछला पाँतिमे बैसल जोगिंदरा तामसे बाजल ---की कहबाक अर्थ अछि अपनेक खुलिकेँ बाजू, कथीक विरोध? ---किछु नए, मुदा एहि बगीचामे कोनो नवका गाछ आब नए लगब' देव, किछ भए जाय। बीहनि कथा-२ "हरियाणा पंजाबमे फेर अहि बेर कोर्ट रबासि फोरबाक समय सीमा निर्देशित कएने छैक कथी लँ कीन रहल छह?" राजेश अपन दोस राजू सँ। "पिछला बरख सेहो दिल्ली मे बन्न कएने रहैक मुदा कहा मानै छैक लोक" "कथी लोक मानते होली मे इकोफ़्रेंडली होली! दियावाती मे शुद्घ बसात केर नाम पर बिन रबासिक दियावाती अकिल सभटा हिन्दू पर छजै आकि आआरो कतौ..? "हँ होऊ वियाह मुरन हिंदुस्तान पाकिस्तान केर मैच उपनयन सभमे ठीक मुदा दियावाती मे ज्ञान तखन की कहूँ" "स्वस्थ हवामे सांस लेब' के नेँ चाहइ छैक मुदा मात्र दियावाती मे रोकि..? रबासिक कारखाना बन्न क' न दौऊ" "चलु छोड़ू नेँ कीनब कोर्टक आदेश छैक मुदा पराली जरा शुद्ध हवा बाँटबाक प्रयास सेहो स्वीकार नेँ" "से बन्न ने हेतैए नाक रगड़ि मैरि जाऊ" उदास होइति दुनूगोटे मुँह हप कएने बैसि गेल। राम विलास साहु लघुकथा- घुमि गाम चलु रबिया पत्नी संगे खेत आ चौमासमे तरकारी उपजा कऽ परिवार चलबैए। बैसारी समयमे घर-घरहटीक मजूरी सेहो करैत अछि। तइसँ भरि पेट भोजन तँ भेट जाइए मुदा बाहरी खर्चाक लेल कोनो आमदक साधन नै अछि। रबियाक पत्नी गर्भवती अछि। एक राति भोरबेमे पत्नी रधियाक पेटमे जनमासुतक दरद शुरू भऽ गेल। रबियाक हाथ छुच्छ, एको छदाम नै जे कोनो वैदकेँ बजा दवाइ-दारू करैत। मुदा भगवान ऐ बिपैतमे मदैत केलखिन आ सुहरदे बेटाक जन्म भेल। भोरे अन्हारेमे रबिया उठि गामसँ पल्हैनकेँ बजा देख-भालमे लगा आ दोकानसँ उधारे रधियाक किछु दवाइ, करू तेल आनलक। खुशी मने रबिया रधियाकेँ सोइरी घरमे खेनाइ-पिनाइपर धियान दैत रहल। बेटाक जन्मक खुशीमे गुड़-आदी गाममे बाँटलक। मुदा छठमा दिन छठीहारक लेल रबियाकेँ चिन्ता रहए जे छठीहारक समान आ नवका वस्त्र इत्यादी केना आएत। रबियाकेँ एकटा उपाय सुझल जे किछु खेत भरना राखि महाजनसँ रूपैआ उठा सभ काज सम्पन्न कऽ दइ छी आ फेरो कमा कऽ रूपैआ महाजनकेँ सठा खेत आपस लऽ लेब। ऐ तरहेँ रबिया काज सम्पन्न केलक। बेटाक जन्म गरीबी आ दुखक समय भेल तँए नाओं रखलक- दुखना। दुखनाक जन्म भेने रबियाकेँ परिवारक खर्च बढ़ि गेल। कहियो दवाइ तँ कहियो तेल-कुर आ कहियो नुआँ तँ कहियो खेलौना। खेत पहिने भरना लगल रहए, चौमाससँ खर्चा पुंगबे ने करइ। आ अपनो घरेमे ओझराएल रहए। बोइन-मजूरी करि कऽ कोनो धरानी पेट भरैत गेल। दू बर्खक पछाइत बेटीक जन्म भेल। दुखक घड़ीमे परिवारक खर्चा बढ़ैत गेल। एक दिन रबिया पत्नी रधियासँ विचार केलक जे आब आगू दिन केना कटत? रधिया बजली- “बेटा-बेटी नमहर हएत तँ काजक मदद अहूँकेँ आ हमरो करत। ताबे कोनो तरहेँ दिन खेपु आ हमहूँ सकताइ छी तखन दुनू गोरे कमाएब। तइले किए मन छोट करै छी।” दिनो बढ़ल आ बेटो-बेटी बढ़ि सियान भऽ गेल। रबिया विचार केलक जे पहिने बेटीक बिआह कऽ लेब पछाइत बेटाक बिआह करब। किए तँ बेटीक बिआहमे दान-दहेज लगत। जँ पहिने बेटाक बिआह करब तँ बेटीक बिआह बेरमे बेटा-पुतोहु अरंगा करत। रबियाक बेटी अड़हुलिया बड़ सुन्नर, चतुर आ काजमे कुशल अछि। गामो-समाजक लोक अड़हुलियाकेँ देख सराहैए। बगलेक गामक धनिक लाल बाबू प्रतिष्ठित बेकती छैथ। ओ अपन बेटा लेल अड़हुलियाक हाथ मंगै खातिर रबियाक घर पहुँचला। रबिया बाजल- “हम गरीब छी, अहाँ धनीक। हम केना अहाँमे सकब जे अहाँक बेटासँ अपन बेटीकेँ बिआहब।” मुदा धनिक लाल बाबू अपन घरमे कुशल गृहणीक अत्यन्त जरूरी बुझि आ सुन्नर कन्या देख, सोचैत-विचारैत रबियाकेँ कहलक- “देखू रबि, सम्बन्ध दिलक मिलानीसँ होइए धनसँ नहि। हमरा अहूँ किछो नै देब। मात्र कुल लक्ष्मीसन कन्या खुशी-खुशी देब बाँकी सभ काज हम समझब। अहाँक कोनो खर्च नै करए पड़त। हम अपना बेटा आ परिवारमे सभकेँ समझा-बुझा लेब।” रबिया सभ बात सुनि मने-मन सोचलक धनिकलाल बाबूक विचार उत्तम छैन। हमरा नै कोनो खर्च हएत, हमर बेटी सुखी घर जाएत। तहि क्रममे गप-सप्प चलिते रहए कि धरक बनल अड़हुलिया हाथक स्वादिष्ट जलखै आ चाह भेल। रबिया उठि आँगन जा कऽ पत्नी आ बेटासँ विचारि दरबज्जापर आबि धनिकलाल बाबूसँ बाजल- “देखू, हम अपनेक प्रतिष्ठा राखलौं। शादीक रिस्ता मंजूर करै छी मुदा हमरो इज्जत अहाँ राखब।” जखने बिआहक बात गामक लोक सुनलक तँ दाँते औंगरी काटए लगल। कियो कहए जे बिआह केना हेतै, किएक तँ अमीरी-गरीबीमे बड़ फर्क होइ छइ। मुदा अधिक लोकक सोच रहै जे अहिना सम्बन्ध अधिक लोक करत तखन ने ऊँच-नीचक खाधि मेटाएत आ समाजसँ दहेज प्रथाक अन्त हएत। किछु लोक तँ परोक्षेमे विरोध करए मुदा गामक अधिक लोक प्रसन्न अछि जे गरीबक बेटीक बिआह नीक घर-बर आ प्रतिष्ठित परिवारमे भऽ रहल अछि। रबिया बेटीक बिआहक तैयारीमे जुटि गेल। मुदा सोचैत रहए दहेज ने नै दिअ पड़त, तैयो तँ बेटीक बिआह आ विदाइ करबामे बहुतो समानक जरूरत पड़बे करत किने। बरियाती आ कुटुम सबहक मान-मर्यादा, खान-पानक लेल रूपैआक इंजाम करैये पड़त किने। रबियाक किछु खेत पहिने भरना लगल छल आ शेष जे पाँच कट्ठा बँचल छेलै ओहो भरना लगा अपन बेटीक बिआहक काज सभ मिलि करए लगल। बिआहक दिन बरियाती समयपर पहुँचल। गामक लोक सभ आ उपस्थित कुटुम सभ मिलि बरियातीक स्वागत करए लगल। नाश्ता-पानि, चाहक पछाइत वर्तमान रीति-रेबाजसँ दुल्हा-दुल्हिनक बरमाला भेल। दुल्हा-दुल्हिनक जोड़ी देखैले गामक लोक उमैड़ पड़ल। सभ मने-मन राम-सीता सन जोड़ीकेँ असिरवाद देलक। बिआहक काज शुरू भेल आ बरियाती-सबहक भोजनक बिजौ भेल। बिआहक काज सम्पन्न भेला पछाइत रबिया बेटीक विदाइमे लगि गेल। बेटी आइ नैहरसँ सासुर जेती तिनकर भार-दौर बरदगड़ीपर साँठि आ दोसर गड़ीपर पलंग, कुर्सी, अलङा, पीढ़िया, आलमारीक संग अनेकानेक चीज-वौस लादि बान्हि तैयार केलक। तेसर संफनीबला गड़ीपर ओहार दऽ दुल्हा-दुल्हिनक विदाइ कऽ रबिया अपन समधी- धनिकलाल बाबूक देहपर साल ओढ़ा कऽ गला-सँ-गला मिलल आ बाजल- “समधी बाबू, अड़हुलिया आब हमर बेटी नहि, आब अहाँक छी। हम जे सकलौं से पुरा केलौं। कुल लक्ष्मी अहाँक देलौं।” धनिक लाल बाबू रबियाक धिरज बान्हैत वचन देलखिन- “अहाँक बेटी आब हमर इज्जत आ लक्ष्मी छी। हमरा रहैत कोनो तरहक कष्ट नै हएत।” अड़हुलिया अपन सासुर पहुँच कऽ खूब खुशीसँ रहए लगली। कुशलतासँ सासु-ससुर आ पतिक सेवा, घरक काज, सुन्दर विचार आ बेवहार देख सभ कहए जे एहेन पुतोहु भगवान सभकेँ देथुन जे सबहक घर स्वर्ग बनल रहत। अड़हुलियाक कमी रबियाक घरमे हुअ लगल। घरक काज आ ऊपरसँ मजदूरियो करबाक चिन्ता रबियाकेँ बढ़ि गेल। काजक भारसँ रधिया बेमार पड़ि गेल। रबिया विचार केलक जे बेटा- दुखनाक बिआह कऽ लइ छी। पुतोहु घरक काज करती, तइसँ पत्नीक काजक भार सेहो कमि जाएत आ किछु आराम सेहो भेटत। मुदा पुतोहु अपने बेटी सन काजुल बेवहारी आ सुन्नर करब। एक दिन रबिया सनेश नेने बेटीसँ भेँट-मुलाकात करैले जाइत रहए। रस्तामे सोचबो करए जे समैधसँ बेटाक बिआहक चर्च करब। समैधक घर पहुँच बेटीसँ भेँट करि समैध लग रबिया बैसल। गप-सप्पक क्रममे रबिया अपन बेटाक बिआहक चर्च केलक । समैध बजला- “हमरा गामेमे पुबरिया टोलमे हमर पुरान मित्र रघुनीजी छैथ। हुनकर बेटी बुधिया बड़ सुन्नर, बड़ काजुल आ सुशील सेहो अछि। जखन अहाँ अपना बेटाक बिआह केतौ करब तइसँ नीक रघुनीजीक बेटीसँ करू। दुनू गोरे घुमैत-फिरैत चलू हम मित्रसँ भेँटो कऽ लेब आ बिआहक चर्च सेहो करब।” टहलैत दुनू समैध रघुनीजीक द्वारिपर पहुँचला। चाह पीबैक क्रममे बुधियाक बिआहक चर्च भेल। रघुनीजी बजला- “धनिकलाल बाबू, बुधिया कोनो हमरेटा बेटी छी आ अहाँक नहि छी। जेतए बढ़ियाँ हुअए, हमरो विचार रहत। हमरा-अहाँमे फर्के की अछि। मुदा एकटा बातक धियान राखए पड़त, हम गरीब छी गरीबे कुटुम करब। किए तँ गरीब-अमीरमे विचार आ बेवहारमे फर्क होइत अछि।” तखने रबिया लड़की देखबाक इच्छा व्यक्त केलक। तैपर रघुनीजी अपन बेटीकेँ बजा देखौलक आ बाजल- “इहए छी हमर बेटी- बुधिया, बजा-भुका कऽ देख लिअ।” रबियाकेँ लड़की पसिन भऽ गेल। रघुनीजी बेटीकेँ कहलक- “बेटी, तूँ पहिने अपन हाथक बनल जलखै आ चाह नेने आबह, पछाइत खैनी-सुपारी सेहो नेने अबिहह।” रघुनीजी मिथिलाक रिति-रेबाजसँ नवका कुटुमकेँ सम्मान करैत बेटीक हाथसँ बनल जलखै-चाह करा खैनी-सुपारी दऽ बिआहक दिन निसचित करबाक लेल गामक पण्डित दीनानाथ जीक घर पहुँचल। पण्डीजी शुभ बिआहक मुहुर्त पत्रामे देख बजला- “बिआह पंचमीक दिन बड़ शुभ लगन अछि। मुदा एकटा विचार मानी तँ कहब।” रघुनीजी बजला- “बाजू ने पण्डीजी! अपनेक विचार कोनो कि गलत थोड़े हएत।” पण्डीजी बजला- “कम खर्चमे मन्दिरमे बिआह करू। की झेल-झटारमक लटारममे पड़ब।” रघुनीजी रबिया आ धनिकलाल बाबू पण्डीजीक विचार मानि गामक मन्दिरमे बिआहक कार्यक्रम सम्पन्न करबाक निर्णय लेलैन। बिआह पंचमी दिन गामक मन्दिरमे मिथिलाक रीति-रेबाजसँ बिआह सम्पन्न भेल। बेटा-बेटीक बिआह भेने रबियाकेँ खुशी तँ भेल मुदा चैन नहि भेल। खेत भरना लगने घर-खर्च पुंगबे ने करइ। खेतो कमि गेलै आ मजूरी सेहो। ऊपरसँ कपड़ा-दवाइक खर्च केना चलत। ऐ चिन्तामे रबिया दिन-राति डुमल रहै छल। एक दिन बेटासँ विचार करैत रबिया बाजल- “गामक लोक सभ पंजाब-दिल्ली कमाइले जाइए, चलह ओकरे संगे दुनू बापुत अपनो सभ बाहरे कमाएब। घरमे दुनू सासु-पुतोहु मिलि काज करती। बाहरी कमाइसँ भरनाबला खेतो छोड़ा लेब आ कर्जो चुका लेब।” दुखना अपन पिताक विचारसँ सहमत भेल। दुनू बापुत गामक संगबेक संग पंजाब चलि गेल। रबिया दुनू बापुत पहिल बेर पंजाब आएल। ऐठामक वातावरण, जलवायु आ रीति-रेबाजसँ परिचित नइ अछि तँए ओ संगीक संगे काज करए लगल। लोक घर छोड़ि परदेश ऐ लेल अबैए जे कम समयमे बेसी मजूरी करि बेसी रूपैआ कमा घर भेजब। दुनू बापूत रबिया कमाइ खातिर दिन-राति परिश्रम करए लगल। पंजाबमे धन-रोपनी करए लगल। धनरोपनीमे दुनू बापुत कुशल, कीलाक-कीला धनरोपनी कऽ खूब कमेलक। मुदा पंजाबक भीषण गरमी, एक दिन कीलेमे रबिया बेहोश भऽ गिर गेल। दुखना अपना पिताकेँ खेतमे गिरल देख झट-दे उठा कनहापर लादि डाक्टरक क्लिनीकपर पहुँचल। डॉक्टर दू-चारिटा इंजेक्शन आ कतेको रंगक टेबलेट देलखिन आ दुखनाकेँ बजा समझाबैत कहलखिन- “देखू अहाँक पिताकेँ कालाजार बोखार भेल अछि। हिनका एक मास धरि इलाज चलत, अराम करत आ समयपर भोजन-दवाइ खा सुतत। खूनक कमी सेहो अछि।” डॉक्टरक बात सुनिते दुखनाक होश उड़ि गेल। मुदा धिरजसँ मास भरि इलाज पिताक करौलक। जे कमेलहा रूपैआ छल से सभटा खर्च भऽ गेलइ। छुच्छे हाथे आगू इलाज केना चलत। सोचमे दुखना पड़ि गेल, असगर कमाएब कि पिताक सेवा करब। दुखनाक परेशानी देख मने-मन रबिया सोचए जे गाम-घरमे जे कियो बेमार पड़ैए तँ घरक सभ सदस्य मिलि सेवा करैए आ गामोक लोक आबि-आबि हाल-चाल पुछैए। दुख-सुखमे सहयोग करैए। मुदा परदेशमे सभ अपन-अपन कमाइक पाछू लगल रहैए। संगी सभ सेहो हाल-चाल नै पुछैए, मदैतक तँ बाते दूर। मदैत करत किए। ऐठामक लोक कोनो हमर गामक छी आकि दियाद-वाद छी जे दू-चारि छेबो करए ओ अपन-अपन मजूरीमे लागल रहैए, हमरा लग किए औत। रबिया बेटाकेँ कहलक- “बौआ, ऐठामसँ घुमि अपन गाम चलह। अपना गाम-घरक जिनगीमे जे दया-धर्म, प्रेम-भाव आ सहयोग करैक विचार अछि से एतए नहि अछि। रहल कमाइ-खाइक बात तँ अपने गाममे एतेक मेहनत-मजूरी करब तँ ऐठामसँ बेसीए हएत। अपन गाम परदेश छोड़ि लोक आन परदेश आबि कऽ दिन-राति मेहनत कऽ ओतुक्का विकास करैए मुदा एतेक मेहनत जखन अपने देश आ अपने गाममे करत तँ अपनो देश आ गामक विकास हएत किने। घुमि गाम चलु बौआ, अपने घर रहि सभ मिलि मेहनतसँ गाम आ देशक विकास करब। ई बात बहुत पहिने डाक कहने छला- ‘घरक आधा रोटी नीक आ बाहरक सौंस रोटी नहि नीक।” नन्द विलास राय लघुकथा- सियानक मारि दही-चूरा हमरा गामसँ दू-अढ़ाइ किलोमीटर दूरीपर एकटा गाम अछि मझौरा। हमरा सबहक डीलरक घर मझौरा गाममे छैन। हँ, हँ वएह डीलर जेतए मोटिया तेल आ चाउर-गहुम भेटैत अछि। डीलरेक घरक बगलमे एकटा शिक्षक छथिन त्रिलोक वर्मा। भगवानक कृपासँ पत्नियो शिक्षिका छथिन। घरोक सुखी सम्पन्न लोक छैथ। त्रिलोकजी आ हम निर्मली कौलेजमे इन्टरमे संगे पढ़ैत रही। मुदा त्रिलोकजी सतर्की ई केलैथ जे इन्टरक पढ़ाइ बिच्चेमे छोड़ि रॉंची जा ओतएसँ टीचर्स ट्रेनिंग कऽ लेला। बादमे बी.ए. धरि सेहो पढ़ला। तँए ओ शिक्षक छैथ। हम ईनिंग नै केलौं तँए पढ़ि-लिखि कऽ बकरी चरबै छी। अखनो त्रिलोकजी जेतए-केतौ भेटै छैथ तँ कुशल-क्षेम हेबै करैए। मार्च मासक गप छी। हम आ हमर दियादीक एकटा भैयारी- मदनजी राशन आनए डीलर ओतए गेल रही। मदन भाइ सेहो शिक्षक छैथ आ जइ विद्यालयमे त्रिलोकजीक पत्नी शिक्षिका छथिन ओही विद्यालयमे मदनो भाय छैथ। हम आ मदन भाय डीलर ओइठाम ब्रेंचपर बैसल रही, डीलर रजिष्टरमे आ कार्डमे राशनक खानापूरी कऽ रहल छला। तखने त्रिलोकजीक बेटा मदन भायकेँ बजा कऽ लऽ गेलैन। हमरा नै बजेलैथ तँए हम डीलरे ओतए बैसल रहलौं। जखन राशन लेल भऽ गेल तँ त्रिलोकजी दरबज्जा दिस देखए गेलौं जे मदन भाय की करै छैथ। हम सड़केपर सँ कहलिऐ- “मदन भाय, गामपर नै जाएब?” मदन भाय कहलैथ- “आउ-आउ चलै छी।” त्रिलोकजी सेाहे दरबज्जेपर बैसल रहैथ। ओ कहला- “पॉंचे मिनट आओर रूकियौ मदनजी चाह पीने अबै छैथ।” तखने देखलिऐ जे त्रिलोक जीक बेटा दू कप चाह नेने आएल। एक कप चाह त्रिलोकजीक हाथमे देलकैन आ दोसर कप मदन भायकेँ। मुदा त्रिलोकजी हमरा चाह पीबैले आग्रह नै केलैन। हम चोट्टे डीलरक दरबज्जापर आबि ब्रेंचपर बैस गेलौं। हम सोचए लगलौं, मदन भाय शिक्षक छैथ तँए हुनका बजा कऽ त्रिलोकजी चाह पियौलकैन आ हम साधारण किसान छी तँए हमरा बैसबाको लेल आग्रह नै केलैन। जखन कि त्रिलोकजी हमर संगीए छैथ...! हमरा त्रिलोकजीक बेवहारक बड़ दुख भेल। हम सोचए लगलौं- एकर बदला त्रिलोकजीसँ केना लेल जाए। हम बहुत सोच-विचार केलौं। पनरहे दिनक बाद त्रिलोकजी मदन भायकेँ खोजए हुनका दरबजपर गेलाह मुदा मदन भाय दुनू परानी नेपाल गेल छला। त्रिलोकजी जखन आपस भेला तँ हमरा देखला तँ मोटर साइकिल रोकि कऽ मदन भाइक सम्बन्धमे पुछए लगला। हम सोचलौं आइ गर अछि, किए ने ओइ दिनक बदला सधा ली। हम बड़ आदरसँ त्रिलोकजीकेँ अपना दलानपर लऽ जा कऽ बैसौलयैन आ कहलयैन- “मास्टर साहैब, कनेक रूकू ऑंगनसँ भेल अबै छी।” ऑंगन जा पत्नीकेँ कहलयैन- “कनी दू कप नीक चाह बनाऊ। बुच्ची केतए अछि?” पत्नी इशारासँ पुबरिया घर देखा कहलैन बैस कऽ पढ़ैए। बेटी मैट्रिकक विद्यार्थी छी। ताबए ओ लगमे आबि कहलक- “की बाबूजी?” एकटा पचसटकही दैत एकटा बिकाजी भुजियाक पैकेट आ एकटा नमकीन बिस्कुटक डिब्बा आनए कहलिऐ। पुन: पत्नीकेँ कहलयैन- “जखन बुच्ची देाकानसँ भुजिया आ बिस्कुट आनि कऽ देत तँ दूटा प्लेटमे भुजिया आ बिस्कुट दऽ दरबज्जापर पठाएब।” हम दरबज्जापर चलि गेलौं। एतए त्रिलोकजीसँ दुनियादारीक गप-सप्प करए लगलौं। कनिक्केकालक बाद हमर बेटी दूटा प्लेटमे भुजिया आ नमकीन बिस्कुट दऽ गेल। हम अपना बेटीसँ कहलिऐ- “बुच्ची चाचाकेँ प्रणाम करहुन।” हमर बेटी त्रिलोकजीकेँ प्रणाम कऽ ऑंगन चल गेल। ऑंगनसँ एक जग पानि आ दूटा ग्लास आनि टेबुलपर रखि गेल। हम त्रिलोकजीकेँ एकटा प्लेट बढ़बैत कहलयैन- “लिअ मास्टर साहैब, कनेक पानि पीब लिअ। पछाइत चाह पीब।” तैपर त्रिलोकजी बजला- “चाह तँ गामेपर सँ पीब कऽ आएल रही।” हम कहलयैन- “चाहो कोनो पेटभरा चीज छी। जे एकबेर भरिपेट पी लोलौं तँ फेर ओ समयेपर पीअब।” त्रिलोकजी किछु लजाइत प्लेट हाथमे लेलैथ आ खाए लगला। जाबे हम दुनू गोरे भुजिया-बिस्कुट खा पानि पीलौं तैबीच बेटी एकटा ट्रेमे दू कप चाह दऽ गेल। हम ट्रेमे सँ एकटा कप चाह उठबैत त्रिलोकजी दिस बढ़बैत बजलौं- “लिअ मास्टर साहैब, चाह पीबू।” ओ फेर लजाइते चाह लेला। चाहक बाद हमर बेटी पान दऽ गेल। दुनू गोरे पान खेलौं। हम त्रिलोकजीसँ कहलयैन- “मास्टर साहैब हम तँ कहब जे जलखै खा कऽ जइतौं तँ नीक होइतए।” तैपर त्रिलोकजी बजला- “जलखै, चाह, पान सभ भऽ गेल आब कोन जलखै हएत।” ई कहैत ओ फटफटिया स्टार्ट कऽ चलि गेला। तीन दिनक बाद जखन मदन भाय त्रिलोकजीकेँ भेटलखिन तँ त्रिलोकजी मदन भायकेँ सभ बात बतौलखिन आ कहलखिन- “हम नन्दजी लग बड़ लज्जित छी। ओइ दिन अहॉंकेँ डीलर ओइठामसँ बजा कऽ चाह पियेलौं मुदा नन्दजीकेँ बैसबाको लेल आग्रह नै केलिऐन। तेकरे बदला नन्दजी हमरा जलखै आ चाह-पान करा कऽ लेलैन। एकरे कहै छै ‘सियानक मारि दही-चूरा।” लघुकथा- दहेज पाप छी भोरका उखराहा। समय नअ बजैत। लालबाबूक दलान बेस साफ-सुथड़ा भेल रहए। चौकीपर नवका जाजीम बिछौल रहए आ नबाक खोल लागल सिरमा सेहो लगौल रहए। दलानक निच्चॉंमे स्नानी चौकीपर एक बाल्टीन जल आ एकटा लोटा सेहो राखल रहइ। दलानक ओसारापर पॉंचटा कुर्सी सेहो राखल रहै आ दलानक रभीतरमे एकटा बड़ाक टेबुल आ टेबुलक दुनू भाग दू-दूटा कुर्सी लागल रहइ। लालबबूक नजैर बेर-बेर देबालमे टॉंगल घड़ीपर चलि जाइत रहैन। ओ सोचै छला- आठे बजेक नाओं चुनचुन बाबू कहने छला आ अखन नअ बजि रहल अछि। अखैन तक ओ सभ नै एला हेन, पता नहि की भऽ गेलइ। कियो दोसर लड़कीबला नै तँ उपरौंझ कऽ देलक...। लालबाबू ई सभ सोचिते छलाक कि एकटा अपाची मोटर साइकिल आबि दलानक आगॉंमे रूकल। ओइ मोटरसाइकिलसँ चुनचुन बाबू आ एक गोरे आरो उतरला। लालबाबू बजला- “आएल जाऊ, आएल जाऊ, हमरा तँ चिन्ता भऽ गेल रहए जे एतेक देरी किएक भऽ गेलैन।” तैपर चुनचुन बाबू हाथ जोड़ैत बजला- “नमस्कार..! लालबाबू, नमस्कारकजबाब दैत बजला- “नमस्कार!” चुनचुन बाबू अपन संगबे दिस इशारा करैत कहलखिन- “ई हमर मित्र छैथ, गोपी बाबू। उ. वि. बाबूबरहीसँ सेवा निवृत प्रधानाध्यापक, हिनको घर मौआहीए छैन।” लालबाबू गोपी बाबूकेँ हाथ जोड़ैत बजला- “अहो भाग्य!नमस्कर-नमस्कार..!” गोपी बाबू बजला- “नमस्कार।” लालबाबू बजला- “होउ, पएर-हाथ धोइ जाइ जाऊ।” दुनू गोरे हाथ-पएर धो कऽ कुर्सीपर बैसला। चुनचुन बाबू बजला- “किए देरी भऽ गेल से नै बुझलिऐ।” तैपर लालबाबू बजला- “कहब तखन ने बुझब। हमरा तँ होइत रहए जे गाड़ी नै तँ रस्तामे खराप भऽ गेलैन।” चुनचुन बाबू बजला- “की पुछै छी। तंग भऽ गेलौं हेन। एकटा ने एकटा बरतुहार दरबज्जापर अबिते रहै छैथ। आजुके गप लिअ, ठीक साढ़े सात बजे विदा होइले गाड़ी निकाललौं कि नेहराबला एकटा बुलेट मोटर साइकिलसँ आबि गेला। कुटमैती केनाइ तँ बादक बात भेल मुदा जे दरबज्जापर कियो जाति-कुटुम आबि जेता तँ हुनकर स्वागत-बात नै करबैन सेहो केहेन एहत। तहूमे अपना सभ मिथिलावासी छी। तँए देरी भऽ गेल।” ई गप-सप्प होइते रहए तखने लालबाबूक भातीज रोहित दूटा प्लेटमे भुजलाहा काजू, किसमिस, मनक्का आ नुनगर बिस्कुट अभ्यागतकेँ लऽ कऽ आएल। लालबाबू आग्रह केलखिन। तीनू गोरे दलानक भीतर जा कऽ बैसला। रोहित दुनू प्लेट लऽ पानि आनए अंगना चल गेल। लालबाबू टेबुलपर सँ प्लेट उठा लालबाबू आ गोपी बाबूक हाथमे दैत बजला- “लेल जाए, कनेक पानि पीब लेल जाए।” रोहित दूटा गिलास आ एक जग पानि टेबुलपर रखि गेल। जाबे दुनू गोरे यानि चुनचुन बाबू आ गोपी बाबू काजू-किसमिस खेलैथ ताबेमे रोहित तीन कप कॉफी लऽ कऽ आबि गेल। कॉफी पीलाक दसे-पनरह मिनटक पछाइत फलक प्लेट आएल जइमे सेब, समतोला, अनारक दना, अंगूर आ पँच-पँच छीमी मालभोग केरा रहए। फलहारक बाद मिठाइ आ नमकीनक प्लेट नेने रोहित पहुँचल। प्लेट देख चुनचुन बाबू बजला- “फलेसँ तँ पेट भरि गेल आब मिठाइ कोन पेटमे खाएब।” तैपर नूनू बाबू बजला- “अहूँ हद करै छी, फलोसँ केतौ पेट भरलै हेँ। लाबह हौ रोहित, मिठाइ आ नमकीनबला प्लेट दहुन सबहक हाथमे।” रोहित नूनूबाबू आ गोपी बाबूकेँ आगॉं मिठाइ आ नमकीनबला प्लेट रखि देलक। मिठाइमे अमूलक रसभरी, काजूक वर्फी, शुद्ध खोआक पेरा, नारियलक लड्डू आ नमकीनमे विकानेरी भुजिया छल। नाश्ताक बाद छाल्ही देल चाह तीनू गोरे पीलैन। चाह पीला पछाइत चुनचुन बाबू बजला- “आब कन्याकेँ बजौल जाए। किएक तँ हमरा लोकैनकेँ आपस गामो जेबाक अछि।” तैपर लालबाबू बजला- “किएक, ऐठाम घर नै छै कीजे एतेक औगुताइ छी।” चुनचुन बाबू बजला- “से तँ छैहे। जँ कुटमैती भऽ जाएत तँ केतेको दिन रहब।” लालबाबू बजला- “जँ कुटमैती करऽ चाहब तँ किएक ने हएत।” चुनचुन बाबू- “दस कोससँ जे एतेक हरान भऽ कऽ एलौं हेन से तँ कुटमैतीए करए लेल ने, आकि अहॉंक गाम देखए।” ई गप होइते रहए कि वीणा एकटा तश्तरीमे पान, सुपारी, इलायची, जर्दा आ तुलसी पत्ती लऽ एली। ओ तश्तरी टेबुलपर रखि सभकेँ पएर छुबि गोड़ लगली। गोड़ लगलाक बाद सबहक आगॉं पानक तश्तरी बढ़ौली। सभ गोरे पान-सुपारी इलायची खाइ गेला। वीणाकेँ एकटा कुर्सीपर बैसौल गेल। चुनचुन बाबू अपन मित्र गोपी बाबू दिस तकला। गोपी बाबू चुनचुन बाबूक इशारा समैझ गेला। गोपी बाबू वीणासँ पुछलखिन- “बुच्ची अहॉं की संज्ञा छी?” वीणा बजली- “वीणा।” गोपीबाबू- “बाबूजीक नाओं?” वीणा- “श्री लालबाबू राय।” गोपी बाबू- “कोन क्लासमे पढ़ै छी?” वीणा- “बी.ए. फज्ञइनलमे।” गोपी बाबू- “कोन विषयसँ आनर्स कऽ रहल छी?” वीणा- “गृह विज्ञान विषयसँ।” गोपी बाबू- चुनचुन बाबू दिस ताकए लगला। चुनचुन बाबू वीणासँ कहलखिन- “जाऊ बुच्ची। अहॉं ऑंगन जाऊ।” वीणा उठि कऽ ऑंगन चल गेली। तैबीच चुनचुन बाबू बजला- “लड़की हमरा पसन्द अछि। लड़की देखबा, सुनबामे सुन्नैर आ सुशील अछि।” तैपर गोपी बाबू बजला- “एकरा के काटत।” लालबाबू पुछलखिन- “तखन आगॉं?” गोपी बाबू बजला- “देखियौ मंगरौनीबला बीस लाख, एकटा बुलेट मोटर साइकिल आ पॉंच भरि सोन दइले तैरूार छला। मुदा लड़कीक ऑंखि कुइर छेलै तँए कुटमैती नै भेलइ।” चुनचुन बाबू बजला- “यो विवेककेँ इंजीनियर बनेबामे हमर बारह लाख टका खर्च भेल अछि। अखन ओ रेलबेमे इंजीनियर अछि आ आइ.एस.क तैयारी सेहो कऽ रहल अछि। पिलखबाड़बला पच्चीस लाख टाक नगद, एकटा अपाची गाड़ी आ सात भरि सोनाक अलाबे फ्रिज, कूलर, गोदरेज, वासिंग मशीन, टी.भी सभ दइ लेल तैयार छला मुदा लड़कीक कद छोट छेलइ। तँए हमरा लड़की पसिन नै भेल।” गोपी बाबू आ चुनचुन बाबूक बात सुनि लालबाबू सोचमे पड़ि गेला। ओ सोचए लगला जे ई सभ कहै छथिन तइ हिसाबे तँ कमतीमे तीस लाख टकासँ ऊपरे खर्च हएत, मुदा अपना तँ दसो लाखक सकरता नइ अछि। लालबाबूकेँ चुप देख गोपी बाबू बजला- “आब अहूँ तँ किछ बजियौ। एना चुप रहलासँ काज चलत?” तैपर लालबाबू बजला- “यौ मास्टर साहेब, चुनचुन बाबूकेँ बुझले छैन जे हम साधारण किसान छी। चटिया सभकेँ टीशन सेहो पढ़बैत छी। बेआ हमर एकटा छोट-क्षीण दवाइ देकान चलबैत अछि। हमरा तँ दसो लाखक सकरता नै अछि तँए चुप छी।” चुनचुन बाबू बजला- “तखन कुटमैती केना हएत। जँ इंजीनियर लड़कासँ बेटीक बिआह करबै तहूमे सरकारी जॉवबला, तँ तीस लाखसँ ऊपरे खर्च करए पड़त।” लालबाबू बजला- “यौ सरकार, हम दस लाखसँ बेसी खर्च करबामे अक्षम छी। अपने लोकैन जे हमरा दरबज्जापर एलौं तइले अपने लोकैनकेँ धैनवाद।” चुनचुन बाबू बजला- “हम तीन दिनक समय दइ छी, फोन नम्बर लऽ लिअ। अपन सभ परिवार विचारि लेब। जँ अपनो विचार भऽ जाएत तखन हमरा फोन कऽ देब। अहॉंक कन्या सुन्नैर आ सुशल अछि तँए तीन दिन समय दऽ रहल छी, नहि तँ हमरा बेटापर बरतुहारक लाइन लागल अछि।” फोन नम्बर लिखबए लगलखिन, लालबाबू अनमनस्क भावसँ फोन नम्बर लिखि लेला। वरतुहार सभ गेला। लालबाबू उदास भऽ गेला। ओ खेनाइयो ने खेलैन। ऐगला दिन भोरमे लालबाबूक बेटाक संगी विनय आएल। विनय निर्मली बजारमे मोबाइल रिपेयरिंगक दोकान खोलने अछि। लालबाबूक मुँहक उदासी देख विनय पुछलकैन- “काका, मोन बड़ खसल देखै छी। की बात छिऐ। काल्हि जे वीणा बहिनकेँ देखए बरतुहार सभ आएल छला से की भेल।” लालबाबू सभ बात जे पैछला दिन चुनचुन बाबूक संगे भेल रहैन, विनयकेँ कहलखिन। तैपर विनय बाजल- “अँइ यौ काका, ओइ बरतुहार सभकेँ ई नै बुझल छैन जे दहेज लेब-देब कानूनी अपराध छी। अखुनका जे नीतीशजीक सरकार अछि ओ तँ ऐ कानूनकेँ कड़ाइसँ पालन करबा रहल अछि। देखिलेऐ नहि जे बाल-विवाह आ दहेजप्रथाक उन्मूलन हेतु 21 जनवरीकेँ केहेन मानव श्रृंखला बनल छेलइ।” लालबाबू बजला- “हौ बाबू, ई सभ देखाबटी बात छी। एकटा बात कहह ई जे 31 जनवरीकेँ मानव श्रृंखला बनल तइसँ की दहेज लेनाइ-देनाइ रूकि गेल आकि रूकि जाएत। देखने छेलहक किने जे पैछला साल दारू बन्दीपर केहेन मानव श्रृंखला बनल रहइ, तँए की दारू बन्न भऽ गेल? सरकार दारू बेचनाइ आ पीनाइपर प्रतिबन्ध लगौलक मुदा बनबैबला बनैबते अछि, बेचैबला बेचते अछि आ पीबैबला पीबते अछि। हँ, आब ने खुल्लम-खुल्ला बिक्रीए होइए आ ने लोक खुल्लम-खुल्ला पीबे करैए। चोरा-नुका कऽ बिक्री होइए आ चोरा-नुका कऽ लोक पीबैए।” विनय बाजल- “पेपरमे नै देखै छिऐ केतेक पीनिहार आ बेचनिहार जेल जाइत अछि। तेनाहिये दहेजो लेनिहार आ देनिहार जेल जाएत।” लालबाबू बजला- “हौ कहॉं कोनो दहेज लेबए-बला जेल गेल हेन। टुनटुन बाबूक बेटाक बिआहमे एकटा स्कार्पिओ गाड़ी, दस लाख टका नगद, फ्रिज, गोदरेजक अलाबे कनियॉंक सभ जेबर लड़ियेबला देलकैन, कहॉं किछु भेलइ।” विनय बाजल- “यौ काका, जखन कियो प्रशासन ओतए शिकायत करत तखन ने कोनो कार्रवाई हएत, नहि तँ की हएत?” लालबाबू बजला- “प्रशासन ओतए जे लोक शिकायत करत तइले पुख्ता सबूतक जरूरत हेतै, तइमे शिकायत केनिहारकेँ बेसी फिरीशानी छइ। लाक बेटीक बिआह करत आकि केश-फौदारी लड़त। केहेन भ्रष्ट शासन बेवस्था अछि से नहि देखै छहक। एकटा गप आओर कहै छिअ। हमरा मामा गाममे एकटा पंचायत सेवक अपना बेटीक बिआह केने रहए, तेहेन भव्य पण्डाल लगौने रहए जे आन-आन गामक लोक पण्डाल देख आएल छेलइ। बी.डी.ओ, सी.ओ., एम.ओ., दरोगा आओर केतेक ने केतेक हाकिम सभ सेहो बिआहमे आएल रहैथ। खूब दारू आ मूर्गाक मासु चलल। सुनै छिऐ ओ ग्राम सेवक चारिटा पंचायतक पंचायती सचिवक प्रभारमे अछि।” विनय बाजल- “से तँ ठीके कहै छिऐ काका। मुदा बेटियोबलाकेँ तँ किछ फिरीशानी उठबए पड़तै तखने ने कोनो रसता निकलतै। अच्छा ई कहू, मौआहीसँ जे बरतुहार आएल छला, हुनका सभकेँ लड़की पसिन भऽ गेल छेलैन मुदा दहेजक चलते कुटमैती नै भऽ रहल अछि। सएह ने?” लालबाबू बजला- “हँ, सएह बात अछि।” विनय पुछलकैन- “अच्छा ई कहू जे अहॉं मौआही वीणा बहिनक बिआह करए चाहै छी?” लालबाबू बजला- “के एहेन अभागल हएत जे रेलबे नौकरी करए बला लड़ाकसँ बेटीक बिआह नै करत, तहूमे इंजीनियर लड़काक बाप डिग्री कौलेजक प्रोफेसर।” तैपर विनय बाजल- “काका अहॉं चिन्ता जुनि करू। वीणा बहिनक बिआह ओही लड़कासँ हेतइ। हम जेना कहै छी तेना करू।” ई कहि विनय लालबाबूकेँ किछ समझाबए लगलौन मुदा बड़ कम जोरसँ जइसँ तेसर कियो नै सुनए। लालबाबू मौआहीबला चुनचुन बाबूकेँ फोन पर कहलखिन- “काल्हि प्रात: आठ बजे हम आ एक गोरे आर बिआहक गप-सप्प करए मौआही आबि रहल छी।” चुनचुन बाबू बजला- “स्वागत अछि, आऊ। मुदा बेवस्था तीस लाखसँ ऊपरेक राखब।” लालबाबू बजला- “अच्छा-अच्छा ठीक छइ।” देसर दिन लालबाबू आ विनय मोटर साइकिलसँ ठीक सबा आठ बजे चुनचुन बाबूक दरबज्जापर पहुँच गेला। पहुँचते देरी चाह-नास्तासँ स्वागत भेलैन। गोपी बाबू सेहो रहैथ। लालबाबू विनयक परिचय करबैत कहलखिन- “ई हमरा बेटाक संगी छैथ। यएह कहला जे लड़का योग्य आ इंप्लायड छैथ, तँए किदु बेसियो खर्च करए पड़ए तैयो कुटमैती कऽ लिअ।” तैपर गोपीबाबू बजला- “ठीके ने कहलैन। यौ सरकारी जॉवबला लड़का भेटब बड़ मोश्किल छइ। तहूमे रेलबेमे इंजीनियर।” विनय चुनचुन बाबू आ गोपीबाबूकेँ हाथ जोड़ि कऽ प्रणाम केलकैन आ कहलकैन- “दहेजपर खुलेआम बात कहनाइ नीक नहि, कानून बड़ खराप छइ। तूंए दलानक भीतरमे चारिये गोरेमे गप हेबा चाही।” चुनचुन बाबू बजला- “ठीक छइ। चलू दलानक भीतरे। भीतरेमे चारिये गोरेमे गप करब।” विनय बाजल- “हम कनेक लघुशंका केने अबै छी ताबेत अपने सभ दलानक भीतर बैस कऽ गप-सप्प करू।” चुनचुनबाबू दलानक पाछॉं शौचालय देखबैत कहलखिन- “ओही लेटरीनमे चल जाउ।” विनय शौचालयमे जा मोबाइलमे टपरेकर्ड ऑन कऽ सर्टक उपरका जेबीमे रखि लेलक आ पेशाब कऽ दलानक भीतर आबि गेल। विनयकेँ अबिते लालबाबू बजला- “आबह, तोहरे दुआरे गप-सप्प बन्न छल।” विनय कुर्सीपर बैसैत चुनचुन बाबूकेँ पुछलकैन- “अपनेकेँ लड़की पसीन अछि किने?” तैपर चुनचुन बाबू बजला- “हमरा सोलहअनासँ बत्तीसअना लड़की पसिन अछि।” गोपीबाबू बजला- “एहेन सुन्नैर आ सुशील कन्या पसिन नै हेतैन तँ केहेन पसिन हेतैन।” विनय पुछलकैन- “जखन लड़की पसिन अछि तखन आगॉंक बेवस्था बात की हेतइ?” चुनचुन बाबू बजला- “हम तँ फोनपर परसूए लालबाबूकेँ कहि देने रहिऐन जे कमतीमे तीस लाखसँ ऊपरे खर्च हएत।” विनय पुछलकैन- “तीस लाखमे केना की, से कनी फरिछा लिअ।” चुनचुनबाबू- “देखू, हमर बेटा रेलबेमे इंजीनियर अछि। सरकार तरफसँ ओकरा चारि चक्का गाड़ी भेटल छइ। तँए बीस लाख टका नगद, कनियॉंक सभ जेबर, कमतीमे एगारह भरि सोन, एकटा अपाची मोटर साइकिल, फर्नीचर, सोफा, गोदरेजक आलमीरा, वासिंग मशीन, फ्रिज आ टी.भी. दियौ आ बरियाती जतबेक कहबै तेतबेक आएब।” लालबाबू बजला- “अपनेक सभ मांग हमरा मंजूर अछि, मुदा नगदीमे पॉंच लाख कम कऽ दियौ।” चुनचुन बाबू बजला- “पॉंच लाख कि पॉंच टका कम नै हएत। यौ ठाढ़ीबला पच्चीस लाख नगद आ एगारह भरि सोनाक अलाबे सभ समान दइक प्रस्ताव लऽ कऽ काल्हि आएल रहैथ, लड़कियो ए-वन छै, मुदा हम अपनेकेँ कहि देने रही तँए ठाढ़ीबलासँ गप्पो ने केलौं।” विनय कहलकैन- “ठीक छै, अपने लड़काकेँ बजा लियौन, औझका आठम् दिन हम सभ लड़काकेँ फलदान करब।” गोपीबाबू पुछलकैन- “आठम दिन कोन दिन पड़ै छइ।” चुनचुन बाबू बजला- “आठम दिन नअ तारीख आ सोम दिन पड़ै छइ। ठीक छै, हम रबिये दिन लड़काकेँ मंगा लेब। अहॉं सोमकेँ फलदान कऽ लेब। फलदानमे आएब केतेक गोरे?” तैपर लालबाबू बजला- “यौ कुटुम नारायण, हम चेल्हबासँ खैर लुटाएब नीक नै बुझै छी। तँए पॉंचे गोरे आएब। अहूँ बेसी लाम-काफमे नै जाएब। हम सभ सबेरे नअ बजे तक आएब आ पॉंच बजे बेरमे चल जाएब।” गोपीबाबू बजला- “एकदमउत्तम बात कहलिऐ।” तैपर लालबाबू बजला- “जखन सभ बात भइये गेल तखन हमरा सभकेँ विदा करू। बहुत इन्तजाम-बात करए पड़त।” गोपीबाबू कहलखिन- “से तँ ठीक्के। बेटीबलाकेँ बड़ इंतजाम करए पड़िते छइ। चलू कुटमैती नीक भेल। बेटी रानी बनि कऽ रहत।” चुनचुन बाबू बजला- “अच्छा खाना खा कऽ चारि बजे चल जाएब।” तैपर विनय कहलकैन- “नहि, हमरा सभकेँ किछ जलखै करा दिअ, हम सभ चलि जाएब।” सएह भेल। जलखै खा दुनू गोरे यानी विनय आ लालबाबू विदा भऽ गेला। आइ नअ मार्च छी। चुनचुन बाबूक दरबज्जापर डी.जे बाजा मधुर स्वरमे बजि रहल अछि। दरबज्जापर चुनचुन बाबू, गोपीबाबू आ चारि-पॉंच गोरे आर छथिन। कुटुम सभकेँ खाइ वास्ते दस किलो रहु माछक बेवस्थाक अलावे सुधा दुखक रसगुल्ललाक ओरियान सेहो कएल गेल अछि। ऑंगनमे गीतहारि सभ एकाएकी पहुँच रहली हेन। समय नअसँ साढ़े नअ बजल। घड़ी दिस ताकि चुनचुन बाबू बजला- “नअए बजेक समय लालबाबू देने रहैथ, साढ़े नअ बजि रहल अछि मुदा कोनो पता नहि छैन। अखन धरि तँ हुनका सभकेँ पहुँच जेबक चाहिऐन..!” तैपर गोपी बाबू बजला- “एक-आध घन्टाक कोनो बात नहि, सभ कियो अबिते हेता।” गप-सप्प चलिते छल कि बाबूबरही थानाक बोलेरो गाड़ी आबि कऽ चुनचुन बाबूक दरबज्जापर रूकल। गाड़ीसँ थाना प्रभारी आ पुलिस सभ उतरिते छला कि एकटा स्कार्पिओ गाड़ी आबि कऽ सेहो ठाढ़ भेल। ओइ गाड़ीमे लिखल रहए डी.एस.पी- मधुबनी। गाड़ीसँ डी.एस.पी. साहैब उतरा, हुनका पाछाँ चारि-पॉंचटा चितकबरा ड्रेस पहिरने शशस्त्र पुलिस सेहो उतरला। चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूकेँ किछु समझमे नहि एलैन। डी.एस.पी. साहैब दलानमे आबि कऽ पुछलखिन- “चुनचुनजीकौन है?” चुनचुन बाबू हाथ जोड़ैत बजला- “सर, हमहीं छी चुनचुन राय। की सेवा कएल जाए?” डी.एस.पी. साहैब कहलखिन- “आपको दहेज मांगने के अपराधमे गिरफ्तार किया जाता है।” आब तँ चुनचुन बाबूकेँ काटू तँ खून नहि। गोपी बाबू भागैले रस्ता खोजए लगला। डी.एस.पी. साहैब पुछलखिन- “गोपीजी कौन है?” गोपी बाबू हाथ जोड़ैत कहलखिन- “सर, हम छी गोपी।” डी.एस.पी. साहैब कहलखिन- “आपको भी गिरफ्तार किया जाता है।” डी.एस.पी. साहैब थाना प्रभारीकेँ कहलखिन- “बड़ाबाबू, इन दोनो आदमीकेँ गिरफ्तार कर गाड़ीमे बैठाइये।” थाना प्रभारी पुलिसकेँ आदेश देलखिन- “इन दोनो आदमी को हथकड़ी पहनाकर गाड़ीमे बैठाओ।” पुलिसक गाड़ी देख अँगनामे लाबा-फरही हुअ लगल। विवेको अँगनासँ निकैल दरबज्जापर पहुँच गेल छल। थाना प्रभारी बाबूबरहीक बात सुनि विवेक बजला- “सर, हमर नाओं विवेक छी। हम चुनचुन बाबूक बेटा छी। गोपी बाबू हमरा पिताजीक मित्र छथिन। सर, कोन अपराधमे हमरा पिताजी आ गोपीबाबूकेँ एरेस्ट केलिऐन हेन?” तैपर डी.एस.पी. साहैब बजला- “आपका पिताजी आपकी शदी के लिए लड़कीबलासँ बीस लाख रूपैआ नगद ओओर दस लाख का सोना तथा अन्य समान दहेजमे मांगे है। लड़कीबला मुख्यमंत्रीकेँ यहा आवेदन दिए हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय से एस.पी. मधुबनी को एफ.आइ.आर. दर्ज कर कठोरत्तम कार्रवाई करने के लिए वाइरलेस से आदेश दिया गया है।” तैपर चुनचुन बाबू बजला- “नै सर, हम दहेज नै मांगलयैन हेन। लड़कीबला झूठ-फूसक इलजाम हमरापर लगौलक हेन।” डी.एस.पी. साहैब बैगसँ एकटा टेपरेकर्ड निकालि चालू केलखिन। चुनुचन बाबू, गोपी बाबू, लालबाबू आ विनयक बीच जे गप-सप्प भेल रहए सभ सुनाए लगल। जखन सभ बात सुनाएल भऽ गेल तखन डी.एस.पी. साहैब बजला- “कहिये चुनचुनजी, अब क्या कहते हैं!झूठ क्यों बोल रहे थे?” चुनचुन बाबूक बोलती बन्न भऽ गेलैन, गोपीबाबूक चेहरा दिस देखैत चुनचुन बाबूक समुच्चा देह घामसँ नहा रहल छेलैन। गोपीबाबूक मनमे बेर-बेर उठैत रहैन- केकर खेती केकर गाए, कोन पापी रोमए जाए। नाहँकमे फँसि गेलौं। आब जेल गेने बिना कोनो उपाय नै अछि। विवेक सोचए जँ पिताजी जेल चलि जेता तँ सभ प्रतिष्ठा माटिमे मिलि जाएत। जखने लोक सभ बुझत कि कुटिचौल शुरू करत। रेलवेमे नौकरी करै छी। के कहलक नौकरियोपर ने पड़ि जाए। बिआहो करैमे दिक्कते हएत। अँगनामे विवेकक माए जखन बुझलैन तँ ओ कानए लगली। विवेककेँ किछु फुरेबे ने करइ। ऑंगनमे माइक कानब सुनलक तँ ऑंगन गेल। माएकेँ समझौलक। माएसँ कहलक तों जुनि कान। हम डी.एस.पी साहैबसँ निहोरा करए जाइ छिऐन। तूँ असथिरसँ बैस। विवेक दरबज्जापर आएल तँ देखलक चुनचुन बाबू आ गोपीबाबूकेँ गाड़ीमे बैसल छेला। डी.एस.पी. साहैब दरोगासँ कहैत रहथिन- “बड़ाबाबू, चलियेथानापर चलिए।” विवेक डी.एस.पी.क आगॉं हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेल आ बाजल- “सर, हमरा बाबूजी आ गोपीबाबूकेँ छोड़ि देल जाए। हम बिना दहेजकेँ बिआह करैले तैयार छी।” विवेकक विनम्रतापूर्वक निवेदन सुनि डी.एस.पी. साहैब बजला- “ठीक है। आप अपने पिताजीकेँ साथ गाड़ीमे बैठकर मधुबनी कोर्ट चलिये। मैं लड़कीबला को भी लड़की लेकर मधुबनी कोर्ट आने के लिए कहता हूँ। वहॉं आप की शादी कोर्ट में लालबाबू राय की बेटी से होगी। शादी के बाद इनलोगों के विषय में सोचा जाएगा।” एक घन्टाक बाद लालबाबू, लालबाबूक पत्नी, विनय आ लालबाबूक बेटी वीणा एकटा बोलेरो गाड़ीमे बैंस कऽ मधुबनी कोर्ट पहुँचला। कोर्टमे वीणा आ विवेकक बिआह भेल। बिआहक बाद वीणा डी.एस.पी. साहैबसँ कहलकैन- “सर, हिनका दुनू गोरेकेँ माफ कऽ दियौन।” लालबाबू सेहो कहलखिन- “हँसर, चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूकेँ माफ कऽ दियौन। हमरा हमरा बेटीक बिआह बिना दहेजक भऽ गेल।” तैपर डी.एस.पी. साहैब बजला- “ठीक है, पहले आप जो कानूनी कार्रवाइ करने का आवेदन दिये हैं उसके सम्बन्ध में एक आवेदन मामला आपस लेने काऽ दीजिये, फिर इन दोनों व्यक्तियों के विषय में सोचा जाएगा।” सएह भेल। माने लालबाबू मामला आपस लऽ लेला। डी.एस.पी. साहैब चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूसँ एकटा सपथ पत्र लेलखिन जइमे भविसमे फेर एहेन गलती नै करब तइ बातक जिक्र रहए। डी.एस.पी. साहैब चुनचुन बाबू आ गोपी बाबूसँ कहलखिन- “आप लोग कान पकड़कर पॉंच बार बोलिये- दहेज पाप है।” चुनचुन बाबू आ गोपी बाबू दुनू गोरे कान अपन-अपन कान पकैड़ बाजए लगला- “दहेज पाप छी। दहेज पाप छी...।” आशीष अनचिन्हार "इश्क को दिल में दे जगह अकबर" आ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल गजलमे बहर ओ व्याकरण विरोधी लोक सभ अधिकतर एहि शेरक बेसी उदाहरण दै छथि (एहि शेरक बहुत पाठांतर छै) इश्क को दिल में दे जगह अकबर इल्म से शायरी नहीं आती मने ओहन लोक सभकेँ कहनाम जे गजलमे खाली इल्म नै हेबाक चाही मुदा ई कतेक बड़का विडंबना छै जे एहू शेरमे पूरा पूरी बहरक पालन भेल छै मने ईहो शेर इल्मक उपज अछि। आब ई बात अलग जे विरोधी सभकेँ बहर अबिते नै छनि तँ ओ एकरा गानि कोना सकताह। वास्तविकता तँ ई छै जे हमर मैथिल "महान" गजलकार सभ अभिधामे बेसी बूझै छथि आ तँइ एहि शेरक अर्थकेँ अभिधामे ल' लेने हेताह। जँ एहि शेरक तहमे जेबै तँ एकर अभिधा बला अर्थक अलावे अन्य अर्थ सेहो छै जकरा एना व्यक्त कएल जा सकैए इल्म को दिल में दे जगह अकबर इश्क से शायरी नहीं आती मने जँ खाली इल्मसँ शाइरी नै हेतै तँ खाली इश्कोसँ शाइरी नै भ' सकैए। इएह एहि शेरक मूल बात छै। हरेक चीजमे संतुलन हेबाक चाही तखने ओ नीक काव्य हएत। ई बात इल्म बला आ इश्क बला दूनूकेँ नीक जकाँ बूझए पड़तनि अन्यथा दूनूक काव्य बौके टा रहत। निच्चा एहि शेरक बहर देखा रहल छी इश्क को 212 दिल में दे 212 जगह अकबर 1222 इल्म से 212 शायरी 212 नहीं आती 1222 आब एक बेर कने जगदीश चंद्र ठाकुरजीक एहि शेरकेँ देखू बहरक बन्धन अछि,हमरा आजाद करू हम त गजल छी, हमरा नै बरबाद करू एहि शेरकेँ पढ़िते बहुतों बहर पीड़ित लोकक आह निकलि गेल। मुदा ओहि पीड़ित लोक लग दृष्टि छैने नहि जे ओ देखता जे अनिल जीक एहि शेरमे सेहो बहर छै (22222222222)। गजलक सौंदर्ये इएह छै जे ओ अपन तत्वक विरोध नियमक भीतर करैत छै। से चाहे इल्मक प्रसंग हो कि बहर बंधनक प्रसंग। दूनू शेरक मंतव्य इएह जे ने बेसी इल्मसँ शाइरी हएत आ ने बेसी इश्कसँ। हमरा जतेक अनुभव अछि ताहि हिसाबसँ बेसी इल्म बला आ बेसी इश्क बला लोक अनुपयोगी भ' जाइत छै। बेसी इल्म बलाकेँ पागल हेबाक खतरा बेसी रहैत छै तँ बेसी इश्क बलाकेँ आवारा आ बदचलन होइत देरी नै लागै छै। आब अहाँ सभहँक अनुभव जे हो। हिंदी फिल्मी गीतमे बहर १-८ हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-१ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" ओना अंग्रेजी कवितासँ प्रभावित उर्दूक कविताकेँ सेहो नज्मे कहल जाइत छै मुदा उर्दूक प्राचीन नज्म सभमे सेहो बहरक पालन कएल जाइत छलै। उदाहरण लेल साहिर लुधियानवीजीक ई नज्म देखू जे कि "धूल का फूल" नामक फिल्ममे फिल्माएल गेल छै जाहिमे राजेन्द्र कुमार ओ माला सिन्हाजी नायक ओ नायिकाक रूपमे छथि। एहि नज्म केर बहर 122 122 122 122 अछि आ ई हरेक पाँतिमे निमाहल गेल अछि। साहिर जते फिल्म लेल प्रसिद्ध छथि ताहिसँ बेसी उर्दू शाइरी लेल सेहो। वस्तुतः उर्दू शाइरी आ फिल्मी गीतमे अंतर नै कएल जाइत छै तँइ प्रसिद्ध फिल्मी पटकथा लेखक ओ गीतकार जावेद अख्तर फिल्मक अतिरिक्त उर्दूक साहित्य अकादेमी लेल सेहो हकदार मानल जाइत छथि (2013 मे "लावा" नामक पोथी लेल)। मैथिलीमे तँ सभ कामरेड क्रांतिकारी छथि की कहि सकै छी। तँ पढ़ू ई नज्म आ देखू एकर बहर- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ हसीनो से अहद-ए-वफ़ा चाहते हो बड़े नासमझ हो ये क्या चाहते हो तेरे नर्म बालों में तारे सजा के तेरे शोख कदमों में कलियां बिछा के मुहब्बत का छोटा सा मन्दिर बना के तुझे रात दिन पूजना चाहता हूँ, ज़रा सोच लो दिल लगाने से पहले कि खोना भी पड़ता है पाने के पहले इजाज़त तो ले लो ज़माने से पहले कि तुम हुस्न को पूजना चाहते हो, कहाँ तक जियें तेरी उल्फ़त के मारे गुज़रती नहीं ज़िन्दगी बिन सहारे बहुत हो चुके दूर रहकर इशारे तुझे पास से देखना चाहता हूँ, मुहब्बत की दुश्मन है सारी खुदाई मुहब्बत की तक़दीर में है जुदाई जो सुनते नहीं हैं दिलों की दुहाई उन्हीं से मुझे माँगना चाहते हो, दुपट्टे के कोने को मुँह में दबा के ज़रा देख लो इस तरफ़ मुस्कुरा के मुझे लूट लो मेरे नज़दीक आ के कि मैं मौत से खेलना चाहता हूँ, गलत सारे दावें गलत सारी कसमें निभेंगी यहाँ कैसे उल्फ़त कि रस्में यहाँ ज़िन्दगी है रिवाज़ों के बस में रिवाज़ों को तुम तोड़ना चाहते हो, रिवाज़ों की परवाह ना रस्मों का डर है तेरी आँख के फ़ैसले पे नज़र है बला से अगर रास्ता पुर्खतर है मैं इस हाथ को थामना चाहता हूँ, 2 “सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है" शैलेंद्रजी द्वारा लिखल आ फिल्म "तीसरी कसम"मे राज कपूरजीक उपर फिल्माएल ई नज्म देखू। ई नज्म निर्गुण अछि। एहि नज्मक बहर 1222 1222 1222 1222 अछि। एहि नज्ममे महल शब्दक बहर उर्दू शब्द "शहर" केर हिसाबसँ अछि। शैलेंद्रजी फिल्मी गीतक अतिरिक्त अपन मार्क्सवादी गीत लेल सेहो प्रसिद्ध छथि आ हुनक मार्क्सवादी गीत आधुनिक गीत सेहो अछि आ बहरमे सेहो। तँ देखू शैलेंद्रजीक ई नज्म आ ओकर बहर। मैथिलीक जे गजलकार ई सोचै छथि जे बहरसँ गेयता खत्म भ' जाइत छै तिनका लेल ई विशेष रूपसँ अछि-- सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है न हाथी है ना घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है तुम्हारे महल चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे अकड़ किस बात की प्यारे ये सर फिर भी झुकाना है भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा बही लिख लिख के क्या होगा, यहीं सब कुछ चुकाना है लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया बुढ़ापा देख कर रोया, वही किस्सा पुराना है (सजन रे झू 1222 ठ मत बोलो, 1222 खुदा के पा 1222 स जाना है 1222 न हाथी है 1222 ना घोड़ा है, 1222 वहाँ पैदल 1222 ही जाना है 1222) 3 "तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ" साहिर लुधियानवी द्वारा लिखल नज्म "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" केर बहर 122 122 122 122 छै से पछिला पोस्टमे तक्ती द्वारा देखने रही। आइ अही बहरमे शैलेंद्रजीक लिखल नज्म देखा रहल छी। ई "हरियाली और रास्ता" नामक फिल्ममे मनोज कुमार ओ माला सिन्हापर फिल्माएल गेल छै। मात्रा निर्धारणमे उर्दू ओ हिंदीक नियम लागल छै--- तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ के खुद अपनी हस्ती मिटाने चला हूँ घटाओं तुम्हें साथ देना पड़ेगा मैं फिर आज आंसू बहाने चला हूँ कभी जिस जगह ख्वाब देखे थे मैंने वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ गम-ए-इश्क ले, फूंक दे मेरा दामन मैं अपनी लगी यूं, बुझाने चला हूँ (तेरी या 122 द दिल से 122 भुलाने 122 चला हूँ 122 के खुद अप 122 नी हस्ती 122 मिटाने 122 चला हूँ 122) हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-२ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी- 1 हसन कमालजीक लिखल आ "निकाह" फिल्म केर ई नज्म जकर बहर 2122 2122 212 अछि। मात्रा निर्धारणमे उर्दू ओ हिंदीक नियम लागल छै। (ओना तेसर शेरक दोसर पाँतिक शब्द "शायद" केर मात्राक्रम 21 करबाक लेल एकरा शाय्द मानल गेल छै) आन नज्मक अपेक्षा एकर शेर सभमे विविधता अछि तँइ हम एकरा गजल कहब बेसी उचित बुझैत छी। दिल के अरमां आँसुओं में बह गए हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए ज़िंदगी एक प्यास बनकर रह गयी प्यार के क़िस्से अधूरे रह गए शायद उनका आख़री हो यह सितम हर सितम यह सोचकर हम सह गए ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मगर फ़ास्ले जो दरमियाँ थे रह गए एहि नज्मक तेसे शेर बहुत मारुक अछि। शेरमे वर्णित "सितम" शब्द किछु भ' सकैत छै। ई प्रेमक सितम सेहो हेतै तँ व्यवस्थाक कि दैवक सितम सेहो भ' सकैए। फिल्म देखि क' एकरा मात्र प्रेमी प्रेमिका लेल बूझए बला लोक अबोध छथि से हम साफ साफ कहब। 2 राजेन्द्र कृष्णजीक लिखल आ "खानदान" फिल्म केर ई नज्म जकर बहर 2122 2122 212 अछि। मात्रा निर्धारणमे उर्दू ओ हिंदीक नियम लागल छै। कल चमन था आज इक सहरा हुआ देखते ही देखते ये क्या हुआ मुझको बरबादी का कोई ग़म नहीं ग़म है बरबादी का क्यों चर्चा हुआ एक छोटा सा था मेरा आशियाँ आज तिनके से अलग तिनका हुआ सोचता हूँ अपने घर को देखकर हो न हो ये है मिरा देखा हुआ देखने वालों ने देखा है धुआँ किसने देखा दिल मिरा जलता हुआ (कल चमन था 2122 आज इक सह 2122 रा हुआ 212 देखते ही 2122 देखते ये 2122 क्या हुआ 2122) 3 "तवायफ" फिल्म केर ई नज्म जे कि आशा भोंसले द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि हसन कमाल। संगीतकार छथि रवि। ई फिल्म 1985 मे रिलीज भेलै। एहिमे अशोक कुमार, ॠषि कपूर, रति अग्निहोत्री,पूनम ढ़िल्लन आदि कलाकार छलथि। बहुत देर से दर पे आँखें लगी थी हुज़ुर आते-आते बहुत देर कर दी मसीहा मेरे तूने बीमार-ए-ग़म की दवा लाते-लाते बहुत देर कर दी मुहब्बत के दो बोल सुनने न पाए वफ़ाओं के दो फूल चुनने न पाए तुझे भी हमारी तमन्ना थी ज़ालिम बताते-बताते बहुत देर कर दी कोई पल में दम तोड़ देंगी मुरादें बिखर जाएँगी मेरी ख़्वाबों की यादें सदा सुनते-सुनते ख़बर लेते-लेते पता पाते-पाते बहुत देर कर दी एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 122 122 122 122 अछि। एहि नज्मक पहिल शेरक दोसर पाँतिमे आएल "हुजुर" शब्दक सही रूप "हुजूर" अछि मुदा बहर निर्वाह लेल "हुजुर" उच्चारण लेल गेल छै। ओनाहुतो ई नज्म छै। जाहिमे बहुत नीक जकाँ बहरक निर्वाह भेल छै। एहि नज्मक ई शेर बहुप्रयोगी अछि........ मसीहा मेरे तूने बीमार-ए-ग़म की दवा लाते-लाते बहुत देर कर दी ई शेर जतबे सांसारिक प्रेम लेल छै ततबे राजनीतिक व्यंग्य सेहो छै। घरक कोनो सदस्यक उपराग सेहो ई शेर भ' सकैए। हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-३ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 "सूरज" फिल्म केर ई नज्म जे कि मो. रफीजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि हसरत जयपुरी। संगीतकार छथि शंकर जयकिशन। ई फिल्म 1966 मे रिलीज भेलै। एहिमे राजेंद्र कुमार, वैजयन्तीमाला आदि कलाकार छलथि। बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है हवाओं रागिनी गाओ मेरा महबूब आया है ओ लाली फूल की मेंहँदी लगा इन गोरे हाथों में उतर आ ऐ घटा काजल, लगा इन प्यारी आँखों में सितारों माँग भर जाओ मेरा महबूब आया है नज़ारों हर तरफ़ अब तान दो इक नूर की चादर बडा शर्मीला दिलबर है, चला जाये न शरमा कर ज़रा तुम दिल को बहलाओ मेरा महबूब आया है सजाई है जवाँ कलियों ने अब ये सेज उल्फ़त की इन्हें मालूम था आएगी इक दिन ऋतु मुहब्बत की फ़िज़ाओं रंग बिखराओ मेरा महबूब आया है एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222 1222 1222 1222 अछि। पहिल अंतरामे "मेंहँदी" शब्दमे मात्राक्रम गलत अछि हमरा हिसाबें मुदा उर्दूमे "शब्दक बीच बला "ह" केर उच्चारण पहिल शब्दमे मीलि क' ओकरा दीर्घ बना दैत छै जेना कि "लहरि" केर उच्चारण "लैर" सन आदि, "मेंहँदी" केर उच्चारण तेहने भ' सकैए (पक्का पता नै) ओनाहुतो ई नज्म छै आ ताहूमे फिल्मक लेल लिखल गेल। शाइर एकरा गजल घोषित नै केने छथि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 2 "आप आये बहार आई" फिल्म केर ई नज्म जे कि मो. रफीजी ओ लता मंगेशकरजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनन्द बक्षी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। ई फिल्म 1971 मे रिलीज भेलै। एहिमे राजेंद्र कुमार, साधना आदि कलाकार छलथि। दिल शाद था कि फूल खिलेंगे बहार में मारा गया ग़रीब इसी इंतज़ार में मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता अगर तूफ़ाँ नहीं आता किनारा मिल गया होता न था मंज़ूर क़िस्मत को न थी मर्ज़ी बहारों की नहीं तो इस गुलिस्ताँ में कमी थी क्या नज़ारों की मेरी नज़रों को भी कोई नज़ारा मिल गया होता ख़ुशी से अपनी आँखों को मै अश्को से भिगो लेता मेरे बदलें तू हँस लेती तेरे बदलें मैं रो लेता मुझे ऐ काश तेरा दर्द सारा मिल गया होता मिली है चाँदनी जिनको ये उनकी अपनी क़िस्मत है मुझे अपने मुक़द्दर से फ़क़त इतनी शिकायत है मुझे टूटा हुआ कोई सितारा मिल गया होता एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222 1222 1222 1222 अछि। बहुत काल शाइर गजल वा नज्मसँ पहिने माहौल बनेबाक लेल एकटा आन शेर दैत छै ओना ई अनिवार्य नै छै। एहि नज्मसँ पहिने एकटा शेर "दिल शाद था कि फूल खिलेंगे बहार में मारा गया ग़रीब इसी इंतज़ार में" (एहू शेरमे बहर छै) माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 3 "दो बदन" फिल्म केर ई नज्म जे कि मो. रफीजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि शकील बदायूँनी। संगीतकार छथि रवि। ई फिल्म 1966 मे रिलीज भेलै। एहिमे मनोज कुमार, आशा पारेख आदि कलाकार छलथि। भरी दुनियाँ में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जाएं मुहब्बत हो गई जिनको वो दीवाने कहाँ जाएं लगे हैं शम्मा पर पहरे ज़माने की निगाहों के जिन्हें जलने की हसरत है वो परवाने कहाँ जाएं सुनाना भी जिन्हें मुश्किल छुपाना भी जिन्हें मुश्किल ज़रा तू ही बता ऐ दिल वो अफ़साने कहाँ जाएं नजर में उलझने, दिल में है आलम बेकरारी का समझ में कुछ नहीं आता सुकूँ पाने कहाँ जाएँ एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222 1222 1222 1222 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-४ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 "शराबी" फिल्म केर ई नज्म जे कि किशोर कुमारजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि प्रकाश मेहारा। संगीतकार छथि बप्पी लाहिड़ी। ई फिल्म 1984 मे रिलीज भेलै। एहिमे अमिताभ बच्चन, जयाप्रदा आदि कलाकार छलथि। मंज़िलों पे आ के लुटते, हैं दिलों के कारवाँ कश्तियाँ साहिल पे अक्सर, डूबती है प्यार की मंज़िलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह जब कदम ही साथ ना दे, तो मुसाफिर क्या करे यूं तो है हमदर्द भी और हमसफ़र भी है मेरा बढ़ के कोई हाथ ना दे, दिल भला फिर क्या करे डूबने वाले को तिनके का सहारा ही बहुत दिल बहल जाए फ़क़त इतना इशारा ही बहुत इतने पर भी आसमां वाला गिरा दे बिजलियाँ कोई बतला दे ज़रा ये डूबता फिर क्या करे प्यार करना जुर्म है तो, जुर्म हमसे हो गया काबिले माफी हुआ, करते नहीं ऐसे गुनाह तंगदिल है ये जहां और संगदिल मेरा सनम क्या करे जोशे जुनूं और हौसला फिर क्या करे एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 2122 2122 2122 212 अछि। बहुत काल शाइर गजल वा नज्मसँ पहिने माहौल बनेबाक लेल एकटा आन शेर दैत छै ओना ई अनिवार्य नै छै। एहि नज्मसँ पहिने एकटा शेर "मंज़िलों पे आ के लुटते, हैं दिलों के कारवाँ" (एहू शेरमे इएह बहर छै) माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। उर्दूमे "और" शब्दक मात्रा निर्धारण दू तरीकासँ कएल जाइत छै "और मने 21" आ "औ मने 2"। एहि नज्मक संगे आन नज्म लेल ई मोन राखू। जरूरी नै जे ई नियम मैथिली लेल सेहो सही हएत।अंतिम बंदक दोसर पाँतिक अंतिम शब्द अछि "गुनाह" जाहिमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि। ई छूट उर्दू गजलक संग मैथिली गजलमे सेहो अछि। 2 "मदहोश" फिल्म केर ई नज्म जे कि तलत महमदूजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि राजा मेंहदी अली खान। संगीतकार छथि मदन मोहन। ई फिल्म 1951 मे रिलीज भेलै। एहिमे मनहर (देसाइ), मीना कुमारी आदि कलाकार छलथि। मेरी याद में तुम न आँसू बहाना न जी को जलाना, मुझे भूल जाना समझना के था एक सपना सुहाना वो गुज़रा ज़माना, मुझे भूल जाना जुदा मेरी मँज़िल, जुदा तेरी राहें मिलेंगी न अब तेरी-मेरी निगाहें मुझे तेरी दुनिया से है दूर जाना ये रो-रो के कहता है टूटा हुआ दिल नहीं हूँ मैं तेरी मोहब्बत के काबिल मेरा नाम तक अपने लब पे न लाना न जी को जलाना, मुझे भूल जाना एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 122 122 122 122 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। ई बहर संस्कृतमे सेहो भुजंगप्रयात (मात्राक्रम 122+122+122+122) केर नामसँ छै। उर्दूमे एकरा “बहरे मोतकारिब मोसम्मन सालिम” कहल जाइत छै। एहि बहरपर बहुत नीक रचना अनेक भाषामे रचल गेल छै। प्रसंगवश एहिठाम हम गोस्वामी तुलसीदास जीक ई रचना (रुद्राष्टकम्) द' रहल छी............. नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् | निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेङहम् ||१|| एहि रुद्राष्टकम् केर छंद भुजंगप्रयात अछि। एकरा एना देखू.. नमामी 122 शमीशा 122 न निर्वा 122 णरूपं 122 आन पाँति सभकेँ एनाहिते देखि सकैत छी। हमरा द्वारा लिखल एहि सिरीजमे तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ, तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ, बहुत देर से दर पे आँखें लगी थी सन नज्म एही बहरपर अछि। 3 "खिलौना" फिल्म केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकरजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि राजा आनंद बख्शी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत प्यारे लाल। ई फिल्म 1970 मे रिलीज भेलै। एहिमे संजीव कुमार, मुमताज, जितेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा आदि कलाकार छलथि। ई फिल्म गुलशन नंदाजीक उपन्यासपर आधारित अछि। अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंजूर हो जाये सनम तू बेवफ़ा के नाम से मशहूर हो जाये हमें फ़ुर्सत नहीं मिलती कभी आँसू बहाने से कई ग़म पास आ बैठे तेरे एक दूर जाने से अगर तू पास आ जाये तो हर ग़म दूर हो जाये वफ़ा का वास्ता देकर मुहब्बत आज रोती है न ऐसे खेल इस दिल से ये नाज़ुक चीज़ होती है ज़रा सी ठेस लग जाये तो शीशा चूर हो जाये तेरे रंगीन होंठों को कमल कहने से डरते हैं तेरी इस बेरुख़ी पे हम ग़ज़ल कहने से डरते हैं कहीं ऐसा न हो तू और भी मग़रूर हो जाये एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222 1222 1222 1222 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। उर्दूमे दू दीर्घक बीच बला संयुक्ताक्षरकेँ एकटा लघु मानि लेबाक छूट सेहो छै मुदा ई मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय भाषामे नहि भेटत। एहि नज्मकेँ सुनलाक बाद सेहो बुझि सकबै जे "ए" केर उच्चारण "इ" मने "एक" केर उच्चारण "इक" जकाँ छै आ ई उर्दूक विशिष्टता छै। हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-५ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 "खिलौना" फिल्म केर ई नज्म जे कि मुहम्मद रफीजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनंद बख्शी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत प्यारे लाल। ई फिल्म 1970 मे रिलीज भेलै। एहिमे संजीव कुमार, मुमताज, जितेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा आदि कलाकार छलथि। ई फिल्म गुलशन नंदाजीक उपन्यासपर आधारित अछि। तेरी शादी पे दूँ तुझको तोह्फ़ा मैं क्या पेश करता हूँ दिल एक टूटा हुआ खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी बेवफ़ा ही सही दिलरुबा है मेरी जा मैं तनहा रहूँ तुझको महफ़िल मिले डूबने दे मुझे तुझको साहिल मिले आज मरज़ी यही, नाख़ुदा है मेरी उम्र भर ये मेरे दिल को तड़पाएगा दर्दे दिल अब मेरे साथ ही जाएगा मौत ही आख़िरी बस दवा है मेरी एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 212 212 212 212 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। बहुत काल शाइर गजल वा नज्मसँ पहिने माहौल बनेबाक लेल एकटा आन शेर दैत छै ओना ई अनिवार्य नै छै। एहि नज्मसँ पहिने एकटा शेर "तेरी शादी पे दूँ तुझको तोहफ़ा मैं क्या" माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। समान्यतः दीर्घक बाद बला "ए" केर उच्चारण लघु भ' जाइत छै आ मैथिलीमे सेहो एकर हम स्थितिनुसार लघु मानबाक सिफारिश केने छी। 2 खिलौना" फिल्म केर ई नज्म जे कि मुहम्मद रफीजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनंद बख्शी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत प्यारे लाल। ई फिल्म 1970 मे रिलीज भेलै। एहिमे संजीव कुमार, मुमताज, जितेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा आदि कलाकार छलथि। ई फिल्म गुलशन नंदाजीक उपन्यासपर आधारित अछि। खिलौना जानकर तुम तो, मेरा दिल तोड़ जाते हो मुझे इस, हाल में किसके सहारे छोड़ जाते हो मेरे दिल से ना लो बदला ज़माने भर की बातों का ठहर जाओ सुनो मेहमान हूँ मैं चँद रातों का चले जाना अभी से किस लिये मुह मोड़ जाते हो गिला तुमसे नहीं कोई, मगर अफ़सोस थोड़ा है के जिस ग़म ने मेरा दामन बड़ी मुश्किल से छोड़ा है उसी ग़म से मेरा फिर आज रिश्ता जोड़ जाते हो खुदा का वास्ता देकर मनालूँ दूर हूँ लेकिन तुम्हारा रास्ता मैं रोक लूँ मजबूर हूँ लेकिन के मैं चल भी नहीं सकता हूँ और तुम दौड़ जाते हो एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222 1222 1222 1222अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। उर्दूमे दू दीर्घक बीच बला संयुक्ताक्षरकेँ एकटा लघु मानि लेबाक छूट सेहो छै मुदा ई मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय भाषामे नहि भेटत। उर्दूमे "और" शब्दक मात्रा निर्धारण दू तरीकासँ कएल जाइत छै "और मने 21" आ "औ मने 2"। एहि नज्मक संगे आन नज्म लेल ई मोन राखू। उर्दूमे "शब्दक बीच बला "ह" केर उच्चारण पहिल शब्दमे मीलि क' ओकरा दीर्घ बना दैत छै जेना कि "लहरि" केर उच्चारण "लैर" सन आदि, "मेंहँदी" केर उच्चारण तेहने भ' जाइत अछि। जरूरी नै जे ई नियम मैथिली लेल सेहो सही हएत। 3 "शक्ति" फिल्म केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकरजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनंद बख्शी। संगीतकार छथि आर.डी.बर्मन। ई फिल्म Sept 22, 1982 मे रिलीज भेलै। एहिमे अमिताभ बच्चन, स्मिता पाटिल, दिलीप कुमार, राखी आदि कलाकार छलथि। हमें बस ये पता है वो बहुत ही खूबसूरत है लिफ़ाफ़े के लिये लेकिन पते की भी ज़रूरत है (एहि दू पाँतिक मात्राक्रम अछि 1222 1222 1222 1222) हम ने सनम को ख़त लिखा, ख़त में लिखा ऐ दिलरुबा, दिल की गली शहरे वफा (एहि स्थायीक मात्राक्रम अछि 2212 2212 2212) पीपल का ये पत्ता नहीं, काग़ज़ का ये टुकड़ा नहीं इस दिल के ये अरमान हैं, इस में हमारी जान है ऐसा ग़ज़ब हो जाये ना रस्ते में ये खो जाये ना हम ने बड़ी ताक़ीद की, डाला इसे जब डाक में ये डाक बाबू से कहा हम ने सनम को खत लिखा बरसों जबाबे यार का, देखा किये हम रास्ता एक दिन वो ख़त वापस मिला और डाकिये ने ये कहा इस डाकखाने में नहीं, सारे ज़माने में नहीं कोई सनम इस नाम का कोई गली इस नाम की कोई शहर इस नाम का हम ने सनम को खत लिखा (उपरक दूनू अंतराक मात्राक्रम 2212 2212 2212 2212 अछि) एहि नज्मक ई विशेषता जे एहिमे "शहर" शब्दक गिनती हिंदी जकाँ कएल गेल छै अन्यथा उर्दूमे शहर केर मात्रा दीर्घ लघु होइत छै। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-६ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 "नगीना" फिल्म केर ई नज्म जे कि मोहम्मद अजीज जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि आनंद बख्शी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। ई फिल्म 1986 मे रिलीज भेलै। एहिमे ऋषि कपूर, श्रीदेवी, अमरीश पुरी, प्रेम चोपड़ा आदि कलाकार छलथि। आज कल याद कुछ और रहता नहीं एक बस आपकी याद आने के बाद याद आने से पहले चले आईये और फिर जाइये जान जाने के बाद अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये अपने दिल में मेरा घर बना दीजिये क्या करूँ दिल कहीं और लगता नहीं प्यार में आपसे दिल लगाने के बाद इश्क़ के मैंने कितने फ़साने सुने हुस्न के कितने किस्से पुराने सुने ऐसा लगता है फिर इस तरह टूट कर प्यार हमने किया एक ज़माने के बाद आपका नाम दिल से निकलता नहीं दिल्लगी में कोई ज़ोर चलता नहीं आपको भूल जाने की कोशिश भी की और तड़पा हूँ मैं भूल जाने के बाद पहिल आ तेसर पाँतिक मात्राक्रम अछि 212-212-212-212 तेनाहिते दोसर आ चारिम पाँतिक मात्राक्रम अछि 212-212-212-212+1 मूल मात्राक्रम अछि 212-212-212-212 मुदा उर्दूमे (मैथिलीयोमे) छूटक तौरपर अंतिम लघु मान्य छै। एकर बादक बंद सभमे पहिल तीन पाँतिक मात्राक्रम 212-212-212-212 आ चारिम पाँतिक मात्राक्रम अछि 212-212-212-212+1 एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। एहि नज्मकेँ शेरमे सेहो बदलि सकैत छी जेना निच्चा बदलल गेल छै-- आज कल याद कुछ और रहता नहीं एक बस आपकी याद आने के बाद याद आने से पहले चले आईये और फिर जाइये जान जाने के बाद अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिये अपने दिल में मेरा घर बना दीजिये क्या करूँ दिल कहीं और लगता नहीं प्यार में आपसे दिल लगाने के बाद मतलाक दूनू पाँति मात्राक्रम छै 212-212-212-212 212-212-212-212+1 आ तकर बाद दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम छै 212-212-212-212 212-212-212-212 जे कि उर्दू सहित मैथिलियोमे छूटक तौरपर मान्य छै मने जँ एहि नज्मकेँ गजल कहल जाए ताहूमे कोनो दिक्कत नहि। 2 "अनारकली" फिल्म केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि राजेंद्र कृष्ण। संगीतकार छथि सी.रामचंद्र। ई फिल्म 1953 मे रिलीज भेलै। एहिमे प्रदीप कुमार, बीना राय आदि कलाकार छलथि। इस इंतेज़ार-ए-शौक को जनमों की प्यास है इक शमा जल रही है तो वो भी उदास है मुहब्बत ऐसी धड़कन है जो समझाई नहीं जाती ज़ुबां पर दिल की बेचैनी कभी लाई नहीं जाती चले आओ, चले आओ तक़ाज़ा है निगाहों का किसी की आरज़ू ऐसे तो ठुकराई नहीं जाती मेरे दिल ने बिछाए हैं सजदे आज राहों में जो हालत आशिक़ी की है वो बतलाई नहीं जाती एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222-1222-1222-1222 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। मुदा एहि पाँति "मेरे दिल ने बिछाए हैं सजदे आज राहों में" मे बहर टूटल छै आ शाइर एकर गजल कहियो नै रहल छथिन। बहुत काल शाइर गजल वा नज्मसँ पहिने माहौल बनेबाक लेल एकटा आन शेर दैत छै ओना ई अनिवार्य नै छै। एहि नज्मसँ पहिने एकटा शेर "इस इंतेज़ार-ए-शौक को जनमों की प्यास है" माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। 3 "प्यासा" फिल्म केर ई नज्म जे कि मोहम्मद रफी जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर लुधियानवी। संगीतकार छथि सचिन देव बर्मन। ई फिल्म 1957 मे रिलीज भेलै। एहिमे गुरू दत्त, वहीदा रहमान, माला सिन्हा आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 122-122-122-122 अछि। ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनियाँ, ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनियाँ, ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनियाँ, ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी ये दुनियाँ है या आलम-ए-बदहवासी ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . यहाँ इक खिलौना है इंसाँ की हस्ती ये बस्ती हैं मुर्दा परस्तों की बस्ती यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . जवानी भटकती हैं बदकार बन कर जवाँ जिस्म सजते है बाज़ार बन कर यहाँ प्यार होता है व्योपार बन कर ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . ये दुनियाँ जहाँ आदमी कुछ नहीं है वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है जहाँ प्यार की कद्र कुछ नहीं है ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है . जला दो इसे फूक डालो ये दुनियाँ जला दो इसे फूक डालो ये दुनियाँ मेरे सामने से हटा लो ये दुनियाँ तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनियाँ ये दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। "हर इक" केर मात्राक्रम लेल अलिफ-वस्लक नियम देखल जाए मने एकर मात्राक्रम "हरिक" केर हिसाबसँ लेल जेतै हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-७ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 गोवर्धन राम त्रिपाठीजीक गुजराती उपन्यास "सरस्वतीचन्द्र"पर आधारित फिल्म "सरस्वतीचंद्र" केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर। संगीतकार छथि कल्याणजी-आनंद जी। ई फिल्म 1968 मे रिलीज भेलै। एहिमे नूतन, मनीष, विजय चौधरी आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 2122-122-122-12 अछि। एहि नज्मक पहिल दू पाँति "कहाँ चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के...." माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। कहाँ चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के किसी एक दिल के कारण, यूँ सारी दुनियाँ त्याग के छोड़ दे सारी दुनियाँ किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं खुशबू आती रहे दूर ही से सही सामने हो चमन कोई कम तो नहीं चाँद मिलता नहीं सबको संसार में है दिया ही बहुत रौशनी के लिए कितनी हसरत से तकती हैं कलियाँ तुम्हें क्यूँ बहारों को फिर से बुलाते नहीं एक दुनियाँ उजड़ ही गयी है तो क्या दूसरा तुम जहाँ क्यूँ बसाते नहीं दिल न चाहे भी तो साथ संसार के चलना पड़ता है सबकी खुशी के लिए एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 2 फिल्म "हमराज" केर ई नज्म जे कि महेन्द्र कपूर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर लुधियानवी। संगीतकार छथि रवि। ई फिल्म 1967 मे रिलीज भेलै। एहिमे सुनील दत्त, राज कुमार, मुमताज आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 212-212-212-212 अछि। तुम अगर साथ देने का वादा करो मैं यूँ ही मस्त नग़मे लुटाता रहूँ तुम मुझे देखकर मुस्कुराती रहो मैन तुम्हें देखकर गीत गाता रहूँ कितने जलवे फ़िज़ाओं में बिखरे मगर मैने अब तक किसीको पुकारा नहीं तुमको देखा तो नज़रें ये कहने लगीं हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो मैं हर एक शै से नज़रें चुराता रहूँ मैने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो तुम न समझो तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं मैं समझता हूं तुम मेरी तक़दीर हो तुम अगर मुझको अपना समझने लगो मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ मैं अकेला बहुत देर चलता रहा अब सफ़र ज़िन्दगानी का कटता नहीं जब तलक कोई रंगीं सहारा ना हो वक़्त क़ाफ़िर जवानी का कटता नहीं तुम अगर हमक़दम बनके चलती रहो मैं ज़मीं पर सितारे बिछाता रहूँ एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 3 फिल्म "बहारें फिर भी आएंगी" केर ई नज्म जे कि महेन्द्र कपूर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि कैफी आजमी। संगीतकार छथि ओ.पी.नैयर। ई फिल्म 1966 मे रिलीज भेलै। एहिमे धर्मेंद्र, तनुजा, माला सिन्हा आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222-1222-1222-1222 अछि। पूरा नज्म जीवन-दर्शन आ गेयतासँ भरल अछि मुदा हरेक पाँतिमे बहरक पूरा पालन भेल छै।ई नज्म ओहन-ओहन लोकक मूँहपर थापर अछि जे कहै छथि जे बहरक पालनसँ कथ्य आ गेयता घटि जाइ छै। बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं खाली बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी थकन कैसी घुटन कैसी चल अपनी धुन में दीवाने खिला ले फूल काँटों में सजा ले अपने वीराने हवाएं आग भड़काएं फ़िज़ाएं ज़हर बरसाएं बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी अँधेरे क्या उजाले क्या ना ये अपने ना वो अपने तेरे काम आएँगे प्यारे तेरे अरमां तेरे सपने ज़माना तुझसे हो बरहम ना आये राह पर मौसम बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। "चल अपनी" एकर तक्ती अलिफ-वस्ल केर नियमसँ छै। हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-८ गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 1 फिल्म "हाँ मैंने भी प्यार किया" केर ई नज्म जे कि उदित नारायण जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि समीर। संगीतकार छथि नदीम-श्रवण। ई फिल्म 2002 मे रिलीज भेलै। एहिमे अक्षय कुमार, करिश्मा कपूर, अभिषेक बच्चन आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 122-122-122-122 अछि। पूरा नज्म प्रेम-विरह आ गेयतासँ भरल अछि मुदा हरेक पाँतिमे बहरक पूरा पालन भेल छै।ई नज्म ओहन-ओहन लोकक मूँहपर थापर अछि जे कहै छथि जे बहरक पालनसँ कथ्य आ गेयता घटि जाइ छै। एहि नज्मक रुबाइ "तेरे माथे की बिंदिया चमकती रहे...." माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै। संगे-संग नज्मक अंतिम पाँति "जा मैंने भी प्यार किया है" फिल्मी सिचुएशनकेँ देखेबाक लेल छै। तेरे माथे की बिंदिया चमकती रहे तेरे हाथों की मेंहदी महकती रहे तेरे जोड़े की रौनक सलामत रहे तेरी चूड़ी हमेशा खनकती रहे मुबारक हो तुम को ये शादी तुम्हारी सदा खुश रहो तुम दुआ है हमारी तुम्हारे कदम चूमे ये दुनिया सारी तुम्हारे लिए है बहारों के मौसम न आये कभी ज़िन्दगी में कोई गम हमारा है क्या यार हम है दिवाने हमारी तड़प तो कोई भी न जाने मिले ना तुम्हें इश्क़ में बेक़रारी के जन्मो के रिश्ते नहीं तोड़े जाते सफर में नहीं हमसफ़र छोड़े जाते न रस्मों रिवाजो को तुम भूल जाना जो ली है कसम तो इसे तुम निभाना के हमने तो तन्हा उमर है गुजारी जा मैंने भी प्यार किया है हाँ मैंने भी प्यार किया है एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। 2 फिल्म "बाबुल" केर ई नज्म जे कि तलत महमूद ओ शमशाद बेगम जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि शकील बदायूँनी। संगीतकार छथि नौशाद। ई फिल्म 1950 मे रिलीज भेलै। एहिमे दिलीप कुमार, नरगिस, सुलताना आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 22-22-22-22-22-22-2 अछि। पूरा नज्म प्रेम-विरह आ गेयतासँ भरल अछि मुदा हरेक पाँतिमे बहरक पूरा पालन भेल छै।ई नज्म ओहन-ओहन लोकक मूँहपर थापर अछि जे कहै छथि जे बहरक पालनसँ कथ्य आ गेयता घटि जाइ छै। मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी का अफ़साना मेरा बन गया, अफ़साना किसी का पूछो ना मोहब्बत का असर, हाय न पूछो दम भर में कोई हो गया, परवाना किसीका हँसते ही न आ जायें कहीं, आँखों में आँसू भरते ही छलक जाये ना, पैमाना किसीका एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। आधुनिक मैथिली गजलक संक्षिप्त आलोचनात्मक परिचय प्रस्तुत आलेख हम मैथिली गजलपर लिखने छी। वर्तमान शोधकेँ मानी तँ आब मैथिली गजल लगभग112 बर्खक भऽ गेल अछि। एहि 112 बर्खमे मैथिली गजलमे बहुत रास प्रयोग आ स्थापना भेलै तकरे निरूपण करब एहि लेखक उद्येश्य अछि। एहि लेखकेँ पढ़बासँ पहिने किछु तथ्य सामने राखि दी जाहिसँ मैथिली गजलक सभ प्रयोग आ स्थापनाकेँ अहाँ सभ नीक जकाँ परखि सकब-- 1) गजल लेल बहर ओ काफिया अनिवार्य छै (बहरक पालनमे किछु छूट सेहो भेटै छै गजलकारकेँ मुदा धेआन राखू जे बहरमे लिखते नै छथि हुनका लेल ई छूट कोन काजक)। पं.जीवन झासँ आधुनिक मैथिलीक गजलक जन्म मानल जाइत अछि आ स्वाभाविक छै जे पहिल चीजमे सही आ गलत दूनू तत्व रहै छै तँइ पं.जीक किछु गजलमे बहर ओ काफियाक नीक प्रयोग भेटत तँ किछु गजल गीत जकाँ भेटत। मुदा तकर बाद कविवर सीताराम झा आ काशीकांत मिश्र मधुपजी मैथिलीक गजलक भार उठेला आ मैथिली गजलकेँ विस्तार देला। कविवर आ मधुपजीक गजल सभ पूर्णरूपेण बहर ओ काफियासँ सजल अछि। हिनक दूनूक गजल यथार्थमे मैथिली गजल अछि (भाषा मैथिलीक आ गजल व्याकरणकेँ मैथिलीक अनुरूप देल गेल अछि)। कविवरजी आ मधुपजी दूनू कम्मे गजल लिखलाह मुदा हमरा जनैत ई गजल सभ व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजलक पृष्ठभूमि अछि। 2) लगभग 1970-75सँ मैथिली गजल ओहन धाराक लोक सभहँक हाथमे आबि गेल जे कि गजल बारेमे किछु नै जनैत छलाह। ओ मात्र दू पाँतिक बहर-काफियाहीन पाँति सभसँ बनल कविताकेँ गजल कहए लगलाह। कोनो विधामे प्रयोग खराप नै छै मुदा पाठककेँ भ्रमित कए कऽ कएल प्रयोग हानिकारक होइत छै। एहि धाराक लोक सभ कहैत छलाह गजलमे कोनो नियम नै होइत छै। किछु गोटे कहैत छलखनि जे मैथिलीमे गजल भैए ने सकैए। जखन कि हुनका सभसँ पहिनेहें कविवर आ मधुपजी व्याकरणयुक्त गजल लीखि चुकल छलाह। उपरेमे कहने छी जे एहि धाराक लोक सभकेँ गजलक ज्ञान नै छलनि संगे-संग हिनका सभकेँ मैथिली गजलक इतिहासक बारेमे सेहो पता नै छलनि अन्यथा "गजलमे कोनो नियम नै होइ छै" वा " मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैए" एहन-एहन बयान देबासँ पहिने ओ सभ जरूर पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा, काशीकांत मिश्र मधुपजीक गजलमे प्रयोग भेल नियम सभकेँ जरूर देखितथि। 3) एहि आलेखमे हम दूनू धाराक उल्लेख करब। दूनू धाराक गजलमे की-की अंतर अछि, दूनू धाराक गजलमे कोन-कोन काज भेल अछि। दूनू धाराक की कमजोरी अछि। दूनू धाराक प्रतिनिधि गजलकार सभहँक किछु शेर सभ सेहो हम देब। मैथिलीमे व्याकरणयुक्त धारा पहिनेसँ अछि तँ पहिने ओकरे वर्णन हएत बादमे बिना व्याकरण बला धाराक। जे गजलक नियम पालन नै करै छथि हुनकर कहब छनि जे व्याकरणसँ विचार ओ भाव बन्हा जाइ छै (ई मोन राखू जे एहन कहए बला लोक सभ मात्र साम्यवादी वा कथित प्रगतिशील भावक बात करै छथि)। हम एहि लेखमे व्याकरणयुक्त गजल सभहँक उदाहरण दैत साबित करब जे कोना व्याकरणसँ भाव कि विचार आदि पुष्ट होइत छै। 4) मैथिली गजल मने ओ गजल जे कि मैथिलीमे लिखल गेल चाहे ओकर देश कोनो किएक ने हो। 5) एहि आलेखक सभ तथ्य हमर पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे आबि चुकल अछि जकरा हम एहिठाम प्रसंगक हिसाबें पुनर्लेखन केलहुँ अछि। आधुनिक मैथिली गजलक इतिहास मैथिलीमे गजल उर्दू भाषाक माध्यमें आएल। उर्दूमे फारसीसँ आ फारसीमे अरबीसँ। पं.जीवन झा (जन्म आ मृत्युः 1848-1912) अपन नाटक "सुन्दर संयोग" आ "सामवती पुनर्जन्म"मे पहिल बेर गजल लिखलाह। सुन्दर संयोग 1905 इ.मे प्रकाशित भेल छल। तकर बाद कविवर सीताराम झा (जन्म 1891 ई.मे तथा निधन 1975 ई) गजल लिखलाह। कविवरजीक "जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी" ई गजल 1928मे प्रकाशित कविवर सीताराम झा जीक " सूक्ति सुधा ( प्रथम बिंदु )मे संग्रहीत अछि। काशीकांत मिश्र मधुप (जन्म-मृत्युः 1906-1987) "मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी" नामक गजल लिखलाह जे कि 1932मे मैथिली साहित्य समिति, द्वारा काशीसँ "मैथिली-संदेश" नामक पत्रिकामे प्रकाशित भेल। व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजलक इतिहास पं.जीवन झाजीसँ एहि धाराक शुरुआत भेल आ तकर बाद कविवर सीताराम झा, काशीकांत मिश्र मधुप, योगानंद हीरा, जगदीश चन्द्र ठाकुर "अनिल", विजय नाथ झा, गजेन्द्र ठाकुर, मुन्नाजी, शान्तिलक्ष्मी चौधरी, ओमप्रकाश झा, अमित मिश्र, जगदानन्द झा मनु,, कुन्दन कुमार कर्ण, श्रीमती इरा मल्लिक, राम कुमार मिश्र, नीरज कुमार कर्ण, प्रदीप पुष्प, राजीव रंजन मिश्रा, चंदन कुमार झा आदि भेलथि। एहि धाराक अंतर्गत सरल वार्णिक बहरमे लीखए बला किछु गजलकार एना छथि-- इरा मल्लिक, सुनील कुमार झा, पंकज चौधरी नवल श्री, मिहिर झा, अनिल मल्लिक, दीप नारायण विद्यार्थी,प्रवीन नारायण चौधरी प्रतीक, भावना नवीन, रवि मिश्रा भारद्वाज, अजय ठाकुर मोहन, प्रभात राय भट्ट, सुमित मिश्रा "गुंजन" आदि। एहि ठाम स्पष्ट करब बेसी जरूरी जे सरल वार्णिक बहर मात्र आरंभिक अनुशासन लेल अछि। एकर उद्येश्य ई अछि जे पहिने गजलकार हल्लुकसँ सीखथि आ तकर बाद गजलक मूल बहरपर जाथि। ओना ई कहबामे हमरा कोनो संकोच नै जे बहुतो बिना व्याकरण बला गजलकार सभसँ नीक ई सरल वार्णिक बला गजलकार सभ लीखै छथि। सरल वार्णिक बहर मूल वैदिक छंद अछि जाहिमे गजलक हरेक पाँतिमे अक्षरक संख्या एक समान देल जाइ छै जखन कि गजलक मूल बहर वर्णवृत अछि जाहिमे गजलक हरेक पाँतिक मात्राक्रम एक समान रहै छै मने हरेक पाँतिक लघुकेँ निच्चा लघु आ दीर्घक निच्चा दीर्घ। उपरक नाम सभहँक अलावे हम अपने व्याकरणयुक्त गजलक समर्थक छी आ किछु गजल सेहो लीखि/कहि लै छी। व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजलमे भेल काज 1905सँ लगातार व्याकरणयुक्त लिखाइत रहल आ 11/4/2008केँ “अनचिन्हार आखर” नामक ब्लाग इंटरनेटपर आएल। एकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए https://anchinharakharkolkata.blogspot.in/। अनचिन्हार आखर केर छोटका नाम " अ-आ " राखल गेल अछि। ई ब्लाग हमरा द्वारा शुरू कएल गेल छल आ समय-समयपर आन-आन गजलकार सभकेँ जोड़ल गेल। वर्तमानमे ई ब्लाग हमरा आ गजेन्द्र ठाकुर द्वारा संपादित भऽ रहल अछि तँ देखी व्याकरणयुक्त आधुनिक मैथिली गजल लेल भेल किछु एहन काज जे अ.आ द्वारा भेल --- 1) अ-आ प्रिंट वा इंटरनेटपर पहिल उपस्थिति अछि जे की मात्र आ मात्र गजल एवं गजल अधारित विधापर केन्द्रित अछि। 2) अ-आ केर आग्रहपर श्री गजेन्द्र ठाकुर जी गजलशास्त्र लिखला जे की मैथिलीक पहिल गजलशास्त्र भेल। एही गजलशास्त्रमे ठाकुरजी सरल वार्णिक बहरक जन्म देलाह। 3) अ-आ द्वारा "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानन्दा सम्मान" केर शुरूआत भेल। जे की स्वतन्त्र रूपें गजल विधा लेल पहिल सम्मान अछि। 4) अ-आ केर ई सौभाग्य छै जे ओ मैथिली बाल गजल नामक नव विधाकेँ जन्म देलक आ ओकर पोषण केलक। मैथिली भक्ति गजल सेहो अ-आ केर देन अछि। विदेहक अङ्क 111 पूर्ण रूपेण बाल-गजल विशेषांक अछि आ अङ्क 126 भक्ति गजल विशेषांक। 5) बर्ख 2008 आ 2015 माँझ करीब 30टासँ बेसी गजलकार मैथिली गजलमे एलाह। ई गजलकार सभ पहिनेसँ गजल नै लिखै छलाह। संगे-संग करीब 6-7टा गजल समीक्षक-आलोचक सेहो एलाह। 6) पहिल बेर मैथिली गजलक क्षेत्रमे एकै बेर करीब 16-17 टा आलोचना लिखाएल। 7) अ-आ मैथिली गजलकेँ विश्वविद्यालय ओ यू.पी.एस. सी एवं बी.पी.एस. सीमे स्थान दिएबाक अभियान चलौने अछि आ एकटा माडल सिलेबस सेहो बना कऽ प्रस्तुत केने अछि। 8) अ-आ प. जीवन झा जीक मृत्यु केर अंग्रेजी तारीख पता लगा ओकरा गजल दिवस मनेबाक अभियान चलौने अछि। 9) अ-आ 1905सँ लऽ कऽ 2013 धरिक गजल सङ्ग्रहक सूची एकट्ठा ओ प्रकाशित केलक (व्याकरणयुक्त एवं व्याकरणहीन दूनू)। 10) अ-आ अधिकांश गजलकारक (व्याकरण युक्त एवं व्याकरणहीन दूनू) संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत केलक। 11) अ-आ 62 खण्डमे गजलक इस्कूल नामक श्रृखंला चलौलक जे की समान्य पाठकसँ लऽ कऽ गजलकार धरि लेल समान रूपसँ उपयोगी अछि। 12) अ-आ मैथिलीमे पहिल बेर आन-लाइन मोशयाराक आरम्भ केलक आ ई बेस लोकप्रिय भेल। 13) मैथिली गजल आ अन्य भारतीय भाषाक गजल बीच संबंध बनेबाक लेल "विश्व गजलकार परिचय शृखंला" शुरू कएल गेल। 14) एखन धरि अ.आ केर माध्यमें मैथिली गजलमे गजल-1386, रुबाइ-417, बाल गजल 207, बाल रुबाइ-47, भक्ति गजल-47, हजल-21, आलोचना-28, कसीदा-3, नात-2, बंद-4,भक्ति रुबाइ-1, माहिया-2, देल जा चुकल अछि। जतेक गजलकार अ.आ केर माध्यमें आएल छथि हुनका सभ द्वारा रचित गजलक संख्या जोड़ल जाए तँ लगभग 3000 गजलक संख्या पहुँचत। अनचिन्हार आखरक एही काज सभकेँ देखैत मैथिली गजलक पहिल अरूजी गजेन्द्र ठाकुर 2008क बाद सँ लऽ कऽ वर्तमान कालखंडकेँ "अनचिन्हार युग" केर नाम देलाह (1905सँ लऽ कऽ 2007 धरिक कालखंडकेँ गजेन्द्रजी आधुनिक मैथिलीक पहिल गजलकार जीवन झाजीक नामपर "जीवन युग" नाम देलाह)। मैथिली गजलमे विदेह केर योगदान विदेह इंटरनेटक प्रसिद्ध मैथिली पत्रिका अछि जे कि गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा संचालित अछि आ हरेक मासक 1 आ 15 तारीखकेँ प्रकाशित होइत अछि। एकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए http://videha.co.in/ विदेहक किछु एहन काज जै बिना आधुनिक व्याकरणयुक्त मैथिली गजलक उत्थान सम्भव नै छल-- 1) विदेहक 21म अंक (1 नवम्बर 2008)मे राजेन्द्र विमल जीक 2 टा गजल अछि। राम भरोस कापड़ि भ्रमर आ रोशन जनकपुरी जीक 11 टा गजल अछि। संगे-संग धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक 1 टा आलेख मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना। अछि संगे-संग ऐ आलेखक संग 1 टा गजल सेहो अछि प्रेमर्षि जीक। विदेहक ऐ अंकमे कतहुँ ई नै फड़िछाएल अछि जे ई गजल विशेषांक थिक मुदा विदेहक ऐसँ पहिनुक अंक सभमे गजलक मादें हम कोनो तेहन विस्तार नै पबै छी तँए हम एही अंककेँ विदेहक गजल विशेषांक मानलहुँ अछि। 2) विदेहक अंक 96 (15 दिसम्बर 2011)मे मुन्नाजी द्वारा गजल पर पहिल परिचर्चा भेल। ऐ परिचर्चाक शीर्षक छल मैथिली गजल: उत्पत्ति आ विकास (स्वरूप आ सम्भावना)। ऐमे भाग लेलथि सियाराम झा सरस, गंगेश गुंजन, प्रेमचंद पंकज, शेफालिका वर्मा, मिहिर झा ओमप्रकाश झा, आशीष अनचिन्हार आ गजेन्द्र ठाकुर भाग लेलथि। ऐकेँ अतिरिक्त राजेन्द्र विमल, मंजर सुलेमान ऐ दूनू गोटाक पूर्वप्रकाशित लेखक भाग, धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक पूर्व प्रकाशित लेख) सेहो अछि। 3) विदेहक अंक 111 (1/8/2012) जे की बाल गजल विशेषांक अछि जाहिमे कुल 16 टा गजलकारक कुल 93 टा बाल गजल आएल। 4) विदेहक 15 मार्च 2013 बला 126म अंक भक्ति गजल विशेषांक छै। 5) 15 नवम्बर 2013केँ विदेहक 142म अंक "गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा" विशेषांक छल। एहि सभहँक अलावे विदेह समय-समयपर विभिन्न विधाक गोष्ठी करबैत रहल अछि जाहिमसँ एकटा गजल सेहो अछि। आधुनिक व्याकरणयुक्त मैथिली गजलक आलोचना आधुनिक व्याकरणयुक्त गजल आलोचनाक बात करी तँ सभसँ पहिने रामदेव झा जी द्वारा लिखल ओ रचना पत्रिकाक जून 1984मे प्रकाशित ओहि लेख केर चर्चा करए पड़त जकर शीर्षक "मैथिलीमे गजल" छल। हमरा जनैत ई लेख ओहि समयक हिसाबें मैथिली गजल आलोचनाक सभ मापडंद पूरा करैत अछि (वर्तमान समयमे रामदेव झाक जीक पुत्र सभ एही आलेखसँ वर्तमान गजलकेँ मापै छथि आ ई हुनकर सीमा छनि। ईहो कहब उचित जे वर्तमान समयक हिसाबें ओ आलेख औसत स्तरक अछि मुदा एही कारणसँ एकर महत्व कम नै भऽ जेतै)। ओना ई उल्लेखनीय जे ईहो आलेख गजलक विधानकेँ ओझरा कऽ राखि देने अछि कारण एहि लेखमे गजलक बहरकेँ मात्रिक जकाँ मानल गेल छै जे कि वस्तुतः लेखक महोदय केर सीमा छनि। वर्णवृत छंदमे हरेक पाँतिक मात्राक जोड़ एकै अबै छै आ मात्रिक छंदमे सहो। हमरा जनैत रामदेव झा जी एहीठाम भ्रममे फँसि गेलाह। वर्णवृतमे लघु-गुरू केर नियत स्थान होइत छै मुदा मात्रिक छंदमे लघुक स्थानपर दीर्घ सेहो आबि सकैए आ दीर्घक स्थानपर लघु सेहो। मुदा गजलक बहर वर्णवृत छै। तथापि कमसँ कम ओहि समयमे ई कहए बला कियो सेहो भेलै जे गजलमे विधान होइत छै आ सएह एहि आलेखक पहिल विशेषता अछि। एहि आलेखक दोसर विशेषता ई जे रामदेव झाजी प्राचीन मैथिली गजलकार सभहँक नाम देने छथि जे कि सभ गजलक इतिहासकार ओ पाठक लेल उपयोगी अछि। एहि आलेखक तेसर विशेषता अछि जे रामदेव झाजी स्पष्ट स्वरमे ओहि समयक बहुत रास कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक गजलकेँ खारिज करै छथि जे कि ओहि समयक हिसाबसँ बड़का विस्फोट छल। ई आलेख ततेक प्रभावकारी भेल जे ओ समयक बिना व्याकरण बला गजलकार सभ छिलमिला गेलाह आ एहि आलेखक विरोधमे विभिन्न वक्तव्य सभ देबए लगलाह। उदाहरण लेल सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश ओ देवशंकर नवीनजीक संपादनमे प्रकाशित साझी गजल संकलन "लोकवेद आ लालकिला" (वर्ष 1990) केर कतिपय लेख सभ देखल जा सकैए जाहिमे रामदेव झाजी ओ हुनक स्थापनाकेँ जमि कऽ आरोपित कएल गेल अछि। ओही संकलनमे देवशंकर नवीन अपन आलेख "मैथिली गजलःस्वरूप आ संभावना"मे लिखै छथि जे "............पुनः डा. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्ध मे दू टा बात अनर्गल ई भेल जे गजलक पंक्ति लेल छंद जकाँ मात्रा निर्धारित करए लगलाह आ किछु एहेन व्यक्तिक नाम मैथिली गजल मे जोड़ि देलनि जे कहियो गजल नै लिखलनि" आन लेख सभमे एहने बात सभ आन आन तरीकासँ कहल गेल अछि। रामदेव झाजीक आलेखक बाद एहन आलेख नै आएल जाहिमे गजलकेँ व्याकरण दृष्टिसँ देखल गेल हो कारण ताहि समयक गजलपर कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक कब्जा भऽ गेल छल। कोनो विधा लेल आलोचना प्राण होइत छै तँइ "अनचिन्हार आखर" अपन शुरूआतेसँ आन काजक अतिरिक्त गजल आलोचनापर सेहो ध्यान केंद्रित केलक आ मैथिली गजलक अपन आलोचक सभकेँ चिह्नित कऽ बेसी आलोचना लिखबेलक। आ एही कारणसँ मैथिली गजल आब ओहन आलोचक सभसँ मुक्त अछि जे कि मूलतः साहित्य केर आन विधाक आलोचक छथि आ कहियो काल गजलक आलोचना कऽ गजलपर एहसान करै छथि। ई पाँति लिखैत हमरा गर्व अछि जे मैथिली गजलकेँ आब छह-सात टासँ बेसी अपन आलोचक छै। अनचिन्हार आखर जे-जे गजल आलोचना लिखबा कऽ प्रकाशित करबेलक तकर विवरण एना अछि---- 1) गजलक साक्ष्य (तारानंद वियोगी जीक गजल संग्रह केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल गेल आलोचना) 2) बहुरुपिया रचनामे (अरविन्द ठकुर जीक गजल संग्रह केर ओमप्रकाश जी द्वारा कएल गेल आलोचना) 3) घोघ उठबैत गजल (विभूति आनंद जीक गजल संग्रह केर ओम प्रकाश जी द्वारा कएल गेल आलोचना) 4) विदेहक 103म अंकमे प्रकाशित प्रेमचंद पंकजक दूटा गजलक समीक्षा जे की ओमप्रकाश जी केने छथि 5) मुन्नाजीक गजल संग्रह "माँझ आंगनमे कतिआएल छी"- समीक्षक गजेन्द्र ठाकुर 6) मैथिली गजल आ अभट्ठाकारी 7) अज्ञानी संपादकक फेरमे मरैत गजल (घर-बाहर पत्रिकाक अप्रैल-जून 2012 अंकमे प्रकाशित गजलक समीक्षा) 8) मैथिली बाल गजलक अवधारणा 9) कतिआएल आखर (मुन्ना जीक गजल संग्रह केर अमित मिश्र जी द्वारा कएल गेल आलोचना) 10) गजलक लेल (विजयनाथ झा जीक गजल ओ गीत संग्रह- अहीँक लेल के ओमप्रकाश जी द्वारा कएल समीक्षा) 11) भोथ हथियार (श्री सुरेन्द्र नाथ जीक गजल संग्रह केर ओमप्रकाश जी द्वारा कएल गेल आलोचना) 12) पहरा अधपहरा (बाबा बैद्यानथ जीक गजल संग्रह केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल गेल आलोचना) 13) गजलक लहास (स्व. कलानन्द भट्टजीक गजलसंग्रह केरजगदानन्द झा मनु द्वारा कएल गेल आलोचना) 14) सूर्योदयसँ पहिने सूर्यास्त (राजेन्द्र विमल जीक गजल संग्रहक आशीष अनचिन्हार कएल गेल आलोचना) 15) बहुत किछु बुझबैएः कियो बूझि ने सकल हमरा (ओमप्रकाशजीक गजल संग्रहपर चंदन कुमार झाजीक आलोचना) 16) प्रतिबद्ध साहित्यकारक अप्रतिबद्ध गजल (सियाराम झा सरसजीक गजल संग्रहपर जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक आलोचना) 17) अरविन्दजीक आजाद गजल (अरविन्द ठाकुरजीक गजल संग्रहपर जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजीक आलोचना) 18) छद्म गजल (गंगेश गुंजनजीक गजल सन किछुपर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना) 19) कलंकित चान (राम भरोस कापड़ि भ्रमरजीक गजल संग्रहक आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना) 20) मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग (गजेन्द्र ठाकुरजीक गजल संग्रह "धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छँ" केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना) 21) चिकनी माटिमे उपजल नागफेनी (रमेशजीक गजल संग्रह "नागफेनी" केर आशीष अनचिन्हार द्वारा कएल आलोचना) 22) नवगछुलीक प्रांजल सरस रसाल: नव अंशु (अमित मिश्र केर गजल संग्रह "नव-अंशु" केर शिव कुमार झा"टिल्लू" द्वारा कएल गेल समीक्षा) 23) सियाराम जा सरस जीक गजल संग्रह "शोणिताएल पैरक निशान"पर कुंदन कुमार कर्णजीक टिप्पणी 24) श्री जगदीश चन्द ठाकुर ऽअनिलऽ जीक लिखल गजल संग्रह "गजल गंगा" केर जगदानंद झा"मनु" द्वारा कएल समीक्षा 25) मैथिली गजलक संसारमे अनचिन्हार आखर (आशीष अनचिन्हारक गजल संग्रहक जगदीश चंद्र ठाकुर अनिलजी द्वारा कएल आलोचना) 26) थोड़े माटि बेसी पानि (सियाराम झा सरसजीक गजल संग्रहपर कुंदन कुमार कर्णजीक आलोचना) आधुनिक व्याकरणयुक्त मैथिली गजलक किछु उदाहरण एहि ठाम आब हम किछु शेरक उादहरण देब आ एहिमे हम अरबी बहर जे कि गजलक मूल बहर अछि आ सरल वार्णिक बहर दूनूमे लिखल शेर सभ प्रस्तुत करब। हम उदहारणमे सभ विचार बला शेर राखब जाहिसँ पाठक सहजहिं बुझता जे बहर-व्याकरण गजलक विचारमे बाधक नै होइत छै। गजलक पहिल पाँतिमे जे मात्राक्रम रहै छै तकर ओ पूरा गजलमे पालन करब छंद वा बहरक निर्वाह केनाइ भेलै। ऐठाम हम स्पष्ट करी जे मैथिलीक आधुनिक व्याकरणयुक्त गजलकारक संख्या बहुत बेसी अछि मुदा हम एहिठाम मात्र ओतबे गजलकारक शेर लेलहुँ अछि जाहि हमर उद्येश्य पूरा भऽ जाए (उदाहरणमे आएल शेर सभ एकौ गजलक भऽ सकैए आ अलग अलग गजलक सेहो। संपादक महोदयसँ आग्रह जे उदाहरणमे देलग गेल शेर सभहँक वर्तनीकेँ यथावत् राखथि)।-- पं जीवन झाजीक एकटा गजलमे वर्णित विरहक नीक चित्रण देखू— अनंङ्ग सन्ताप सौं जरै छी अहाँक चिन्ता जतै करै छी सखीक लाजे ततै मरै छी जतै कही वा जतै कहाबी एहि शेरक मात्रक्रम 12+122+12+122+12+122+12+122 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। झाजीक दोसर गजलक एकटा आर विरहपरक शेर देखू— अहाँ सों भेंट जहिआ भेल तेखन सों विकल हम छी उठैत अन्धार होइए काज सब करबामे अक्षम छी एहि शेरक मात्राक्रम 1222+1222+1222+1222 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। उपरक एहि तीन टा उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे पं. जीवन झाजी मैथिली गजल आ गजलक व्याकरणक बीच नीक ताल-मेल रखने छलाह। फेर हुनक तेसर शेरक एकटा आरो शेर देखू जे कि प्रेममे पड़ल नायक-नायिका मनोभाव अछि-- पड़ैए बूझि किछु ने ध्यानमे हम भेल पागल छी चलै छी ठाढ़ छी बैसल छी सूतल छी कि जागल छी एहि शेरक मात्राक्रम 1222+1222+1222+1222 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। कविवर सीताराम झाजीक किछु शेरक उदाहरण देखू— हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़तीतल` मतलाक छंद अछि 2212+ 122+2212+ 122 आब एही गजलक दोसर शेर मिला लिअ- अछि देशमे दुपाटी कङरेस ओ किसानक हम माँझमे पड़ल छी बनि कै बिलाड़ि तीतल पहिल शेर आइयो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल। आइयो नव साल गरीबक लेल नै होइ छै। दोसर शेरकेँ नीक जकाँ पढ़ू आइसँ साठि-सत्तर साल पहिलुक राजनीतिक चित्र आँखि लग आबि जाएत। स्पष्ट अछि जे बिना व्याकरण तोड़ने कविवरजी प्रगतिशील भावक गजल लिखला जे अजुको समयमे ओतबे प्रासंगिक अछि जतेक की पहिने छल। जे ई कहै छथि जे बिना व्याकरण तोड़ने प्रगतिशील गजल नै लिखल जा सकैए हुनका सभकेँ ई उदाहरण देखबाक चाही। काशीकान्त मिश्र "मधुप" जीक दूटा शेर देखल जाए— मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी एहि गजलमे 2212-122-2212-122 मात्राक्रम अछि जे कि गजलक हरेक शेरमे पालन कएल गेल अछि। देखू मधुपजी भिन्न स्वर लऽ कऽ आएल छथि मुदा बिना व्याकरण तोड़ने। योगानंद हीराजीक गजलक दू टा शेर— मोनमे अछि सवाल बाजू की छल कपट केर हाल बाजू की मतलाक दूनू पाँतिमे 2122-12-1222 अछि आ दोसर शेर देखू- छोट सन चीज कीनि ने पाबी बाल बोधक सवाल बाजू की हीराजी दोसर गजलक दू टा आर शेर देखू— शूल सन बात ई संसदे जेल अछि आब हीरा कहै जौहरी खेल अछि एहि गजलक हरेक शेरमे सभ पाँतिमे 2122+12 मात्राक्रम अछि। आब अहीं सभ कहू जे हीराजीक गजलमे समकालीनता, प्रगतिशीलता आदि छै कि नै। पहिल शेरमे शाइर वर्तमान जीवनमे पसरल अजरकताकेँ देखा रहल छथि तँ दोसर शेरमे अभावक कारण बच्चा धरिकेँ कोनो चीज नै दऽ पेबाक विवशता छै। तेसर शेर आजुक विडंबना अछि। संसद वएह छै जे पहिने छलै मुदा सांसद सभ आब अपराधी वर्गक अछि तँइ शाइरकेँ ओ जेल बुझा रहल छनि। चारिम शेरमे शाइर प्रायोजित प्रसंशाक खेलकेँ उजागर केने छथि। ई खेल साहित्य कि आन कोनो क्षेत्रमे भऽ सकैए। जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" जीक गजलक दू टा शेर— टूटल छी तँइ गजल कहै छी भूखल छी तँइ गजल कहै छी मतलाक दूनू पाँतिमे 2222 +12 + 122 छंद अछि आ एकर दोसर शेर देखू— ऑफिस सबहक कथा कहू की लूटल छी तँइ गजल कहै छी भूख केर कथा सेहो व्याकरणयुक्त गजलमे। सरकारी आफिसक कथा सभ जनैत छी। अनिलजी एहू कथाकेँ व्याकरणक संग उपस्थित केने छथि। समकालीन स्वरे नै कालातीत स्वरक संग विजयनाथ झा जीक ऐ गजलक दूटा शेर देखू— चिदाकाश मधुमास मधुमक्त मति मन विभव अछि विविधता उदय ह्रास अपने मतलाक छंद अछि 122-122-122-122 आब दोसर शेरक दूनू पाँतिकेँ जाँच कऽ लिअ संगे संग भाव केर सेहो- खसल नीर निर्माल्य निधि नोर जानल सकल स्रोत श्रुति विन्दु विन्यास अपने जँ आदि शंकराचर्य केर मातृभाषा मैथिली रहितनि तँ शायद विजयनाथेजी सन लिखने रहितथि ओ। राजीव रंजन मिश्रजीक ई गजल देखू— जिनगी खेल तमाशा टा आसक संग निराशा टा के जानल गऽ कखन केहन दैबक हाथ तऽ पासा टा उपरक दूटा शेरक मात्राक्रम 2221 1222 अछि आ एहि गजल सभ शेरमे एकरे पालन कएल गेल अछि। जीवनक गूढ़ बातकेँ सरल शब्दमे कहल गेल अछि सेहो व्याकरणक संग। आस आ निराश दूनू जिवनक भाग छै। दोसर शेरमे भग्य केखन पलटत तकर वर्ण अछि। अहीं कहूँ विचार कतए बन्हा गेल छै व्याकरणसँ। ओमप्रकाशजीक ई दूटा शेर देखू— कखनो सुखक भोर लिखै छी कखनो खसल नोर लिखै छी मिठगर रसक बात कहै छी संगे करू झोर लिखै छी 2-2-1-2, 2-1, 1-2-2 मात्राक्रम प्रत्येक पाँतिमे अछि। शाइर अपन निजी जीवनक बातकेँ बहर-व्याकरणमे कहलथि आ नीक जकाँ कहलथि अछि। कोनो शाइरकेँ जीवनमे भऽ रहल सभ बातकेँ लिखबाक चाही मुदा अफसोच जे लोक किछु क्षणिक लाभ लेल ने सच बाजए वाहैए आ ने सूनए चाहैए। मुदा शाइर अपन मीठ-तीत सभ बात व्याकरणमे कहि रहल छथि। कहाँ कोनो दिक्कत छै। अमित मिश्रक दूटा शेर देखल जाए— जाहि घरमे भूखल दीन अहाँ देखने होयब हाड़ मांसक बनल मशीन अहाँ देखने होयब एक पाइक लेल परान अपन बेच दै छै ओ गाम घरमे एहन दीन अहाँ देखने होयब एकर मात्राक्रम 2122-2112-1122-1222 अछि। एहि गजलमे प्रगतिशीलता सेहो अछि आ बहर-व्याकरण सेहो। एखनो कतहुँ-कतहुँसँ समाद आबि जाइए से फल्लाँ किछु पाइ लेल अपन बच्चा बेचि लेलक वा अपन बच्चा संग जान दऽ देलक। ई सभ बात गजलमे अमितजी व्याकरणक संग रखने छथि। प्रदीप पुष्प केर एकटा गजल देखल जाए आ समकालीनता, व्यंग्य आ व्याकरण तीनू एकै संग देखू--- गमकैत घाम बला लोक चमकैत चाम बला लोक भाषण आमो पर दै छै थुर्री लताम बला लोक बाँटै दरद सगरो खूब ई झंडु बाम बला लोक करतै उद्धार मिथिलाक दिल्ली असाम बला लोक मौंसो केर हाट लगबै गाँधीक गाम बला लोक 222-222-2 सब पाँतिमे मात्राक्रम अछि। प्रदीपजीक ई गजल समग्र रूपें ओहन गजलकार सब लेल अछि जे कि अनेरे गजलक व्याकरणकेँ खराप मानै छथि। प्रदीपजी जखन दोसर शेरमे "थुर्री लताम बला लोक" कहै छथि तँ व्यंग्यक पराकाष्ठा भऽ जाइत अछि। अंतिम शेरमे प्रयोग भेल "गाँधीक गाम बला लोक" पाँति ओहन लोकक नकाब उतारैत अछि जिनकर जीवनमे भीतर किछु छनि आ बाहर किछु। राम कुमार मिश्रजीक टूटा शेर देखू— जाति- धर्मक जुन्नामें अँटियाइते रहलहुँ छूत-अछुतक अदहनमें उधियाइते रहलहुँ पेट कोना जड़लै पतियौलक कियो कहिया झूठ-साँचक भाषण धरि पतियाइते रहलहुँ सभ पाँतिमे मात्राक्रम 2122+222+2212+22 । जाति-धर्म एखनो अपना समाज लेल भयावह सपना अछि। आ शाइर रामकुमार मिश्रजी व्याकरणक संग एकर वर्णन केने छथि। दोसर शेरमे ओ झूठ भाषणसँ जनता कोना तृप्त होइ छै से कहने छथि। अहीं सभ कहू की व्याकरणसँ भाव बन्हा गेलै? दू टा शेर कुंदन कुमार कर्णजीक देखू जाहिमेसँ पहिल शेर निश्चिते रूपें उपनिषद् केर मोन पाड़ि दैए -- भाव शुद्ध हो त मोनमे भय कथीके छोड़ि मृत्यु जीव लेल निश्चय कथीके जाति धर्मके बढल अहंकार कुन्दन रहि विभेद ई समाज सुखमय कथीके एकर मात्राक्रम 212-1212-122-122 अछि। भय कि डर ओकर होइ छै जे गलत काज करै छै। कुंदनजीक पहिल शेर एकरे उद्घाटित करैए। दोसर शेरमे शाइरक विश्वास छनि जे जा धरि जाति भेद ने हटत ता धरि समाज सुखमय नै भऽ सकैए। प्रसंगवश कही जे कुंदन कुमार कर्ण नेपालमे मैथिली ओहन पहिल गजलकार छथि जे कि अरबी बहरमे गजल लिखै छथि। आगू बढ़बासँ पहिने सरल वार्णिक बहर बला गजलक किछु उदाहरण देखि ली। मुन्नाजीक दूटा शेर देखू- केखन धोखा देत ई समान बजरुआ गारंटी नै ई केखनो हँसाएत केखनो देत कना गारंटी नै सरकार बनाबै एहन योजना गरीबक लेल केखन जेतैक गरीबक अस्तित्व मेटा गारंटी नै (19 वर्ण हरेक पाँतिमे।) मुन्नाजी आजुक बजारवादसँ उपजल कमगुणवत्ता बला समानक हाल अपन पहिल शेरमे कहलथि। दोसर शेरमे ओ सरकारी योजनका मूल उद्येश्यपर व्यंग्य कऽ रहल छथि। आब देखू सुमित मिश्र गुंजनजीक दूटा शेर— नै कहू कखनो पहाड़ छै जिनगी दैबक देलहा उधार छै जिनगी भारी छै लोकक मनोरथक भार कनहा लगौने कहार छै जिनगी (वर्ण-13) गुंजनजीक पहिल सेर आसासँ भरल अछि। ओ जीवनकेँ भारत मानबाक ओकालति नै करै छथि। दोसर शेरमे ओ लोकक अनेरेक सेहंताक संकेत देने छथि। सरल वार्णिक बहरक उपरका उदाहरणक अतिरिक्त विजय कुमार ठाकुर, नारायण मधुशाला, रामसोगारथ यादव , विद्यानंद बेदर्दी आदि सभ सेहो सरल वार्णिक बहरमे गजल लिखबाक प्रयास कऽ रहल छथि। एही क्रममे मैथिल प्रशांतजीक नाम सेहो जोड़ जा सकैए। मुदा चिंता ई जे ई सभ विभिन्न विधामे सेहो लिखैत छथि तँइ हिनकर सभहँक गजलक प्रभाव केर आकलन एखन तात्काल नै भऽ सकैए। दोसर चिंता ईहो जे व्याकरणक मूल भाव रचना सुंदर करब छै केकरो आलोचनामे स्थान भेटबाक कि पुरस्कार प्राप्ति कि आन कोनो प्रयोजन नै। तँइ बहुत रास गजलकार एहनो भऽ सकै छथि जे कोनो अभीष्ट पूरा नै भेलापर व्याकरणक पालन छोड़ि सकै छथि। मुदा फेर दोहरा दी जे "व्याकरणक मूल भाव रचना सुंदर करब छै आन कोनो प्रयोजन सिद्ध करब नै"। मैथिली बाल गजल मैथिली बाल गजल शब्दक निरूपण हमरा द्वारा भेल छल मुदा एहि विषय-वस्तुक गजल कविवर सीताराम झा पहिने लीखि गेल छथि। तँइ ई मानब उचित जे बाल गजलक अस्तित्व मैथिलीमे पहिनेसँ छल मुदा ओकर नामाकरण अनचिन्हार आखर कालखंडमे भेलै। उपर जतेक गजलकार सभहँक उदाहरण देने छी वएह सभ बाल गजल सेहो लिखने छथि तँइ बेसी नै तँ दू-चारि टा बाल गजलक शेर राखि रहल छी। पहिने कविवर सीताराम झाजीक ई बाल गजल देखू— बाउजी जागू ठारर भरै छी कियै व्यर्थ सूतल कि बैसल सड़ै छी कियै 2122+ 122+ 122+ 12 मात्राक्रम अछि। आब कुंदन कुमार कर्णजीक बाल गजल देखू— गामक बूढ हमर नानी छै ममतासँ भरल खानी 2221-1222 मात्राक्रम अछि। आब अमित मिश्रजीक देखू— हाट चल हाथकेँ पकड़ि भैया हमर भीड़मे जाउँ नै बिछड़ि भैया हमर 212-212-212-212 मात्राक्रम अछि। आब पंकज चौधरी नवलश्रीजीक देखू— देख भेलै भोर भैया आब आलस छोड़ भैया दाय-बाबा माय-बाबू लाग सभके गोर भैया 2122+2122 मात्राक्रम अछि। मैथिली भक्ति गजल मैथिली भक्ति गजल शब्दक निरूपण अमित मिश्र द्वारा भेल छल मुदा एहि विषय-वस्तुक गजल कविवर सीताराम झा पहिने लीखि गेल छथि। तँइ ई मानब उचित जे बाल गजलक अस्तित्व मैथिलीमे पहिनेसँ छल मुदा ओकर नामाकरण अनचिन्हार आखरक बाद भेलै। उपर जतेक गजलकार सभहँक उदाहरण देने छी वएह सभ बाल गजल सेहो लिखने छथि तँइ बेसी नै तँ दू-चारि टा भक्ति गजल क शेर राखि रहल छी, पहिने कविवर सीताराम झाजीक— जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी 1222+1222+1222+1222 मात्राक्रम मने बहरे हजज। आब जगदानंद झा मनुजीक भक्ति गजल देखू— हम्मर अँगना मैया एली गमकै चहुँदिस अड़हुल बेली धन हम छी धन हम्मर अँगना मैया जतए दर्शन देली 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। आब कुंदन कुमार कर्णजीक भक्ति गजल देखू— हे शारदे दिअ एहन वरदान हो जैसँ जिनगी हमरो कल्याण 2212-222-221 मात्राक्रम अछि। आब अमित मिश्रजीक देखू— सजल दरबार छै जननी भगत भरमार छै जननी किओ नै हमर छै संगी खसल आधार छै जननी 1222-1222 मात्राक्रम अछि। उपरक एहि उदाहरण सभसँ ई स्पष्ट भऽ गेल हएत जे व्याकरण केखनो भाव वा विचार लेल बाधक नै होइ छै। हँ, हजारक हजार रचनामे किछु एहन रचना बुझाइ छै जाहिमे व्याकरणक कारण भाव बाधित भेलैए मुदा ई तँ रचनाकारक सीमा सेहो भऽ सकै छै। गजल, भक्ति गजल ओ बाल गजलक अतिरिक्ति मैथिलीमे व्याकरणयुक्त रुबाइ, बाल रुबाइ, भक्ति रुबाइ, कता, हजल, नात आदि विधा सेहो लिखल गेल अछि आ ओकर उदाहरण प्रचुर मात्रामे अछि आ अहाँ सभ एकरा अनचिन्हार आखरपर नीक जकाँ देखि सकै छी। बिना व्याकरण बला मैथिली गजलक इतिहास लगभग 1970-75सँ एखन धरि बहुतो गजलकार ओहन गजल लिखलथि जाहिमे गजलक नियमक पालन नै भेल अछि। ई कहब बेसी उचित जे ओहि धाराक गजलकार सभ नियम पालन करहे नै चाहैत छथि। ओ हुनकर अवधारणा हेतनि। एहिठाम ओहि धाराक किछु प्रतिनिधि गजलकार सभहँक नाम देल जा रहल अछि -- 1) रवीन्द्र नाथ ठाकुर, 2) मायानंद मिश्र, 3) कलानंद भट्ट, 4) सियाराम झा "सरस", 5) अरविन्द ठाकुर, 6) सुधांशु शेखर चौधरी, 7) धीरेन्द्र प्रेमर्षि, 8) बाबा बैद्यनाथ, 9) विभूति आनन्द, 10) तारानन्द वियोगी, 11) रमेश, 12) राजेन्द्र विमल…आदि। उपरमे देल प्रतिनिधि गजलकारक अतिरिक्त बहुतों एहन शाइर सभ छथि जे की छिटपुट आजाद गजल लिखला आ अन्य विधामे महारत हासिल केलाह। एहि सूचीमे बाबू भुवनेश्वर सिंह भुवन, रमानंद रेणु, फूल चंद्र झा प्रवीण, वैकुण्ठ विदेह, शीतल झा, प्रेमचंद्र पंकज, प.नित्यानंद मिश्र, शारदानंद दास परिमल, केदारनाथ लाभ, तारानंद झा तरुण, रमाकांत राय रमा, महेन्द्र कुमार मिश्र, विनोदानंद, दिलीप कुमार झा दिवाना, वैद्यनाथ मिश्र बैजू, विलट पासवान विहंगम, सारस्वत, कर्ण संजय, अनिल चंद्र ठाकुर, श्याम सुन्दर शशि, अशोक दत्त, कमल मोहन चुन्नू, रोशन जनकपुरी, जियाउर रहमान जाफरी, धर्मेन्द्र विहवल्, सुरेन्द्र प्रभात, अतुल कुमार मिश्र, रमेश रंजन, कन्हैया लाल मिश्र, गोविन्द दहाल, चंद्रेश, चंद्रमणि झा, फजलुर रहमान हाशमी, रामलोचन ठाकुर, विनयविश्व बंधु, रामदेव भावुक, सोमदेव, रामचैतन्य धीरज, महेन्द्र, केदारनाथ लाभ, गोपाल जी झा गोपेश, नंद कुमार मिश्र, देवशंकर नवीन,मार्कण्डेय प्रवासी,अमरेन्द्र यादव, नरेन्द्र आदि। बहुत रास नाम धीरेन्द्र प्रेमर्षि जी द्वारा संपादित गजल विशेषांक पर आधारित अछि। किछु दिन धरि गीतल नामसँ सेहो प्रयोग भेल मुदा हम एकरा अजादे गजल मानै छी आ वस्तुतः ओ अजादे गजल छै। आ तँइ निच्चा हम ओकरो समेटने छी एहिठाम। बिना व्याकरण बला मैथिली गजलमे भेल काज बिना व्याकरण बला मैथिली गजलमे एखन धरि कोनो एहन काज नै भेल अछि तँइ एहि आधारपर एकर मूल्याकंन करब असंभव तँ नै मुदा बहुत कठिन अछि। एहि धाराक शाइर सभ बस अपन-अपन गजलक पोथीकेँ प्रकाशित करबा लेबाकेँ काज मानि लेने छथि। आगूसँ हम "बिना व्याकरण बला मैथिली गजल" लेल “अजाद गजल” शब्दक प्रयोग करब। अजाद गजलक इतिहासमे जे पहिल जगजियार काज देखाइए ओ अछि एहि1990मे सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश आ देवशंकर नवीनजी द्वारा संकलित ओ संपादित साझी गजल संग्रह "लोकवेद आ लालकिला" केर प्रकाशन। एहि संकलनमे कुल 12 टा गजलकारक 84 टा गजल अछि। भूमिका सभहँक अनुसारे ई संकलन प्रगतिशील गजलक संकलन अछि आ जाहिर अछि जे एहिमे सहभागी गजलकार सभ सेहो प्रगतिशील हेबे करता। बारहो गजलकारक नाम एना अछि कलानंद भट्ट, तारानंद वियोगी, डा.देवशंकर नवीन, नरेनद्र, डा. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य धीरज, रामभरोस कापड़ि भ्रमर, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनंद, सियाराम झा सरस, प्रो. सोमदेव। एहि संकलनक अलावे धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी द्वारा संपादित पल्लव केर "गजल अंक" जे कि 2051 चैतमे मैथिली विकास मंच, माठमांडूक मासिक साहित्यिक प्रकाशन अंतर्गत प्रकाशित भेल (वर्ष-2, अंक-6, पूर्णांक-15) सेहो अजाद गजलक धारामे नीक काज अछि। जँ अंग्रेजी तारीखसँ बूझी तँ मार्च,1995 केर लगभगमे पल्लवक "गजल अंक" प्रकाशित भेल अछि ( नेपालक तारीख बदलबामे जँ हमरासँ गलती भेल हो तँ ओकरा सुधारल जाए)। आगू बढ़बासँ पहिने पल्लवक गजलक अंकक किछु बानगी देखि लिअ--एहि गजल विशेषांकमे कलानंद भट्ट, फूलचंद्र झा प्रवीण, रमानंद रेणु, सियाराम झा सरस, राजेन्द्र विमल, रामदेव झा, बैकुंठ विदेह, रामभरोस कापड़ि भ्रमर, रमेश, शेफालिका वर्मा, शीतल झा, गोपाल झाजी गोपेश, प्रेमचंद्र पंकज, पं.नित्यानंद मिश्र, शारदानंद परिमल, रमाकांत राय रमा, महेन्द्रकुमार मिश्र, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, चंद्रेश, विनोदानंद, दिलिप कुमार झा दीवाना, वैद्यनाथ मिश्र बैजू, रोशन जनकपुरी, सारस्वत, कर्ण संजय, श्यामसुंदर शशि, अजित कुमार आजाद, ललन दास, धर्मेन्द्र विह्वल, सुरेन्द्र प्रभात, अतुल कुमार मिश्र, रमेश रंजन, कन्हैयालाल मिश्र, गोविन्द दहाल आदि 34 टा गजलकारक एक एकटा गजल अछि मने 34 टा गजलकारक 34 टा गजल अछि। एहि विशेषांकक संपादकीय अजादक गजलक हिसाबे अछि। ई पत्रिका कुल चारि पन्नाक छपैत छल आ ओहि हिसाबें चौंतीस टा गजल कोनो खराप संख्या नै छै। नेपालसँ प्रकाशित पल्लवक "गजल अंक" आ भारतसँ प्रकाशित "लोकवेद आ लालकिला" दूनूक समयमे करीब 6-7 बर्खक अंतराल अछि (प्रकाशनसँ पहिनेक तैयारीकेँ सेहो देखैत)। दूनूक संपादको अलग छथि। दूनू काजक स्थान ओ परिस्थितियो अलग अछि मुदा ओहि के अछैत एकटा दुर्योग दूनूमे एक समान रूपसँ विद्यमान अछि। ई दुर्योग अछि ओहि अंक कि संकलनमे पुरान गजलकारकेँ स्थान नै देब। जँ दूनू संपादक चाहतथि तँ ओहि अंक कि संकलनमे पुरान गजलकारकेँ समेटि कऽ एकटा संपूर्ण चित्र आनि सकै छलाह मुदा पता नै कोन परिस्थिति कि तत्व छलै जे दूनू ठाम एहि काजमे बाधक बनल रहल। प्राचीन गजल बेसी अछिए नै तँइ ने बेसी पाइ लगबाक संभवाना छलै आ ने बेसी मेहनतिक जरूरति छलै। भऽ सकैए जे हिनका सभ लेल ई प्रश्न महत्वपूर्ण नै हो मुदा एकटा गजल अध्येताक रूपमे हमरा सभसँ बेसी इएह बात खटकल अछि। किछु एहन तत्व तँ जरूर रहल हेतै जाहिसँ प्रभावित भऽ कऽ दूनू संपादकक एकै रंगक सोच रखने छलाह। खएर सूचना दी जे वर्तमान समयमे हमरा ओ गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा संपादित पोथी "मैथिलीक प्रतिनिधि गजलः1905सँ 2016 धरि" जे कि ई-भर्सन रूपमे प्रकाशित अछि ताहिमे उपरक दुर्योगकेँ दूर कऽ देल गेल अछि। एहि संकलनमे सभ प्राचीन गजलकारकेँ स्थान देल गेल अछि जाहिसँ मैथिली गजलक संपूर्ण छवि पाठक लग आबि जाइत छनि। उपरक काजक अलावे एक-दू बर्ख पहिने मधुबनीमे सेहो अजाद गजलकार सभ द्वारा गजल कार्यशाला आयोजित भेल रहए मुदा ओकर समुचित तथ्य हमरा लग नै अछि तँइ ओहिपर हम किछु बजबासँ बाँचि रहल छी। अजाद गजलक शाइर सभ काजमे नै “प्रयोग”मे बेसी विश्वास राखै छथि आ तकर बानगी थिक "गीतल"। गीतल (जे कि वस्तुतः अजादे गजल अछि) केर जन्मदाता छथि मायानंद मिश्र। ओ अपन गीतल विधा केर पोथी "अवातंतर" केर भूमिकामे(पृष्ठ 6 पर) लिखै छथि-- "अवान्तरक आरम्भ अछि गीतलसँ। गीतं लातीति गीतलम्ऽ अर्थात गीत केँ आनऽ बला भेल गीतल। किन्तु गीतल परम्परागत गीत नहि थिक, एहिमे एकटा सुर गजल केर सेहो लगैत अछि। गीतल गजल केर सब बंधन ( सर्त ) केँ स्वीकार नहि करैत अछि। कइयो नहि सकैत अछि। भाषाक अपन-अपन विशेषता होइत अछि जे ओकर संस्कृतिक अनुरूपें निर्मित होइत अछि। हमर उद्येश्य अछि मिश्रणसँ एकटा नवीन प्रयोग। तैं गीतल ने गीते थिक, ने गजले थिक, गीतो थिक आ गजलो थिक। किन्तु गीति तत्वक प्रधानता अभीष्ट, तैं गीतल।" ई पोथी 1988मे मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा द्वारा प्रकाशित भेल। उपरका उद्घोषणामे अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे कतेक दोखाह स्थापना अछि। प्रयोग हएब नीक गप्प मुदा अपन कमजोरीकेँ भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उचित नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का अपराध छनि। जँ ओ अपन कमजोरीकेँ आँकैत गीतल केर आरम्भ करतथि तँ कोनो बेजाए गप्प नै मुदा मायाजी पाठककेँ भ्रमित करबाक प्रयास केलाह जे कि तात्काल सफल सेहो भेल। ई मोन राखब बेसी जरूरी जे 2011मे प्रकाशित कथित गजल संग्रह " बहुरुपिया प्रदेश मे " जे की अरविन्द ठाकुर द्वारा लिखित अछि ताहूमे ठीक इएह गप्पकेँ दोहराओल गेलैए। गीतल विधाक उद्घोषणापर सभसँ बेसी आपत्ति सियाराम झा सरसजीकेँ छनि जकरा ओ अपन पोथी "शोणिताएल पएरक निशान" केर भूमिकामे लिखलनि अछि आ एहीठाम अजाद गजल दू ठाम बँटि गेल। पहिल सियाराम झा सरस एवं अन्य जे कि गजलकेँ गजल मानै छलाह जाहिमे तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीन आदि छथि। दोसर गीतल जाहिमे मायानन्द, तारानन्द झा तरुण, विलट पासवान विहंगम, आदि एला वा छथि। ऐठाँ हम ई स्पष्ट करऽ चाहब जे नाम भने जे होइ मायानन्द जी बला गुट वा सरसजी बला गुट दूनू गुटमेसँ कोनो गोटा गजल नै लिखै छलाह कारण ओ व्याकरणहीन छल। आ व्याकरणहीन कथित गजलकेँ गजल नै गीतले टा कहल जा सकैए। मैथिलीक अजाद गजलमे नै भेल काज 1) गजलक संख्या वृद्धि दिस धेआन नै देब-- गजलक संख्या वृद्धिसँ हमर मतलब अपनो लिखल गजल आ अनको लिखल गजल अछि। कथित क्रांतिकारी सभहँक विचार अछि जे कम्मे लिखू मुदा नीक लिखू। मुदा सवाल ओतत्हि रहि जाइ छै जे नीक रचना निर्धारण केना हो जखन कि लोक लग सीमित संख्यामे रचना रहै। हमरा हिसाबें ई भ्रांति अछि जे कम रचलासँ नीके होइत छै। हमर स्पष्ट विचार अछि जे रचना संख्या बढ़लासँ अपना भीतर प्रतियोगिता बढ़ै छै आ भविष्यमे नीक रचना लिखबाक संभावना बढ़ि जाइत छै। जाहि विधामे बेसी लिखाइत छै ओकर प्रचार-प्रसार ओ लोकप्रियता बेसी जल्दी होइत छै। मुदा अजाद गजलकार सभ एहि मर्मकेँ नै बुझि सकलाह। हमरा बुझाइए जे मैथिलीक अजाद गजलकार सभ प्रतियोगितासँ डेराइत छथि। हुनका बुझाइ छनि जे जँ कादचित् प्रतियोगितामे हारि गेलहुँ तँ हमर की हएत। मुदा हुनका सभकेँ बुझबाक चाही जे साहित्यमे जीत-हारि सन कोनो बात नै होइ छै। 2) गजलकारक संख्या वृद्धि दिस धेआन नै देब--- कोनो विधाक नियम टुटलासँ ओ विधा सरल बनि जाइत छै आ ओहि विधामे बहुत रास रचनाकार आबै छथि जेना कि कविता विधामे भेलै। तखन मैथिलीमे बिना नियम केर गजल रहितों ऐमे शाइरक कमी किएक रहल? मैथिलीक अजाद गजलकार सभ कते नव शाइरकेँ प्रोत्साहित केलथि। जबाब सुन्ना भेटत। मैथिलीक अजाद गजलकार सभ अपने लीखै छथि आ अपनेसँ शुरू आ अपनेपर खत्म। आखिर गजल विधामे नव शाइर अनबाक जिम्मा केकर छलै? ईहो कहल जा सकैए जे मैथिलीक अजाद गजलकार सभ जानि बूझि कऽ अपन वर्चस्व सुरक्षित रखबाक लेल नव शाइरकेँ प्रोत्साहित नै केलथि। हुनका सभ डर छनि जे कहीं हमरासँ बेसी ओकरे सभहँक नाम नै भऽ जाइ। 3) मैथिली गजलक आलोचना दिस धेआन नै देब-- जेना कि सभ जानै छी जे आलोचना कोनो विधा लेल प्राण होइत छै मुदा आश्चर्य जे मैथिलीक अजाद गजलकार सभ गजल-आलोचनाकेँ हेय दृष्टिसँ देखला। मैथिलीमे अजाद गजलक प्रतिनिधि गजलकार सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीनजीक संपादनमे बर्ख 1990मे " लालकिfला आ लोकवेद " नामक एकटा साझी गजल संग्रह आएल। एहि संग्रहमे गजलसँ पहिने तीनटा भाष्यकारक आमुख अछि। पहिल आमुख सरसजीक छन्हि आ ओ तकर शुरुआत एना करै छथि -- " समालोचना आ साहित्यिक इतिहास लेखनक क्षेत्रमे तकरे कलम भँजबाक चाही जकरा ओहि साहित्यिक प्रत्येक सूक्ष्तम स्पंदनक अनुभूति होइ......."। अर्थात सरसजीकेँ हिसाबें कोनो साहित्यिक विधाक आलोचना, समीक्षा, वा ओकर इतिहास लेखन वएह कए सकैए जे की ओहि विधामे रचनारत छथि। जँ हम एकर व्याख्या करी तँ ई नतीजा निकलैए जे गजल विधाक आलोचना वा समीक्षा वा ओकर इतिहास वएह लीखि सकै छथि जे की गजलकार होथि। मुदा हमरा आश्चर्य लगैए जे ने 1990सँ पहिले सरसजी ई काज केलाह आ ने 1990सँ 2008 धरि ई काज कऽ सकलाह (सरसेजी किए आनो सभ एहन काज नै कऽ सकलाह)। 2008केँ एहि दुआरे हम मानक बर्ख लेलहुँ जे कारण 2008मे हिनकर मने सरसजीक एखन धरिक अंतिम कथित गजल संग्रह "थोड़े आगि थोड़े पानि" एलन्हि मुदा ओहूमे ओ एहन काज नै कऽ सकलाह। ई हमरा हिसाबें कोनो गजलकारक सीमा भए सकैत छलै मुदा सरसजी फेर ओही आमुख के तेसर आ चारिम पृष्ठपर लिखै छथि" मैथिली साहित्यमे तँ बंगला जकाँ गीति-साहित्यिक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि। गजल अही परंपराक नव्यतम विकास थिक, कोनो प्रतिबद्ध आलोचककेँ से बुझऽ पड़तैक। हँ ई एकटा दीगर आ महत्वपूर्ण बात भए सकैछ जे मैथिलीक समकालीन आलोचकक पास एहि नव्यतम विधाक आलोचना हेतु कोनो मापदंडिके नहि छन्हि। नहि छन्हि तँ तकर जोगार करथु........" आब ई देखल जाए जे एकै आलेखमे कोना दू अलग अलग बात कहि रहल छथि सरसजी । आलेखक शुरुआतमे हुनक भावना छन्हि जे " जे आदमी गजल नै लीखै छथि से एकर समीक्षा वा इतिहास लेखन लेल अयोग्य छथि मुदा फेर ओही आलेखमे ओहन आलोचकसँ गजल लेल मापदंड चाहै छथि जे कहियो गजल नहि लिखला। भए सकैए जे सरसजी ई आरोप सरसजी अपन पूर्ववर्ती विवादास्पद गजलकार मायानंद मिश्र पर लगबथि होथि। जे की सरसजीक हरेक आलेखसँ स्पष्ट होइत अछि। मुदा ऐठाम हमरा सरसजीसँ एकटा प्रश्न जे जँ कोनो कारणवश माया जी ओ काज नै कए सकलाह वा जँ मायानंद जी ई कहिए देलखिन्ह मैथिलीमे गजल नै लिखल जा सकैए तँ ओकरा गलत करबा लेल ओ अपने (सरसजी) की केलखिन्ह। 2008 धरि मैथिलीमे 10-12 टा कथित गजल संग्रह आबि चुकल छल। मुदा अपने सरसजी कहाँ एकौटा कथित गजल संग्रह समीक्षा वा आलोचना केलखिन्ह। गजलक व्याकरण वा इतिहास लेखन तँ बहुत दूरक बात भए गेल। ऐ आलेखसँ दोसर बात इहो स्पष्ट अछि जे सरसजी कोनो समकालीन आलोचककेँ गजलक समीक्षा लेल मापदंड देबा लेल तैयार नै छथि। जँ कदाचित् कनेकबो सरसजी आलोचक सभकेँ मापदंड दितथिन तँ संभवतः 2008 धरि गजल क्षेत्रमे एहन अकाल नै रहितै। आब हम आबी विदेहक अंक 96 पर जाहिमे श्री मुन्ना जी द्वारा गजल पर परिचर्चा करबाओल गेल छल। आन-आन प्रतिभागीक संग-संग प्रेमचंद पंकज नामक एकटा प्रतिभागी सेहो छथि। पंकजजी अपन आलेखमे आन बातक संग इहो लिखैत छथि -“ कतिपय व्यक्ति एकटा राग अलापि रहल छथि जे मैथिलीमे गजलक सुदीर्घ परम्परा रहितहु एकरा मान्यता नै भेटि रहल छैक। एहन बात प्रायः एहि कारणे उठैत अछि जे मैथिली गजलकेँ कोनो मान्य समीक्षक-समालोचक एखन धरि अछूत मानिकऽ एम्हर ताकब सेहो अपन मर्यादाक प्रतिकूल बूझैत छथि। एहि सम्बन्धमे हमर व्यक्तिगत विचार ई अछि, जे एकरा ओहने समालोचक-समीक्षक अछूत बुझैत छथि जिनकामे गजलक सूक्ष्मताकेँ बुझबाक अवगतिक सर्वथा अभाव छनि। गजलक संरचना, मिजाज आदिकेँ बुझबाक लेल हुनका लोकनिकेँ स्वयं प्रयास करऽ पड़तनि, कोनो गजलकार बैसि कऽ भट्ठा नहि धरओतनि। हँ, एतबा निश्चय जे गजल धुड़झाड़ लिखल जा रहल अछि आ पसरि रहल अछि आ अपन सामर्थयक बल पर समीक्षक-समालोचक लोकनिकेँ अपना दिस आकर्षित कइए कऽ छोड़त “ अर्थात प्रेमचंद जी सरसे जी जकाँ भट्ठा नै धरेबाक पक्षमे छथि। सरसजी 1990मे कहै छथि मुदा पंकजजी 2011केर अंतमे मतलब 22साल बाद। मतलब बर्ख बदलैत गेलै मुदा मानसिकता नै बदललै। ऐठाम हम ई जरुर कहए चाहब जे भट्ठा धराबए लेल जे ज्ञान आ इच्छा शक्ति होइ छै से बजारमे नै बिकाइत छै। संगे-संग ईहो कहए चाहब जे मायानंद मिश्रजीक बयान आ अज्ञानतासँ मैथिली गजलकेँ जतेक अहित भेलै ताहिसँ बेसी अहित सरसजी वा पंकजजीक सन गजलकारसँ भेलै। ऐठाम ई स्पष्ट करब बेसी जरूरी जे हम ऐ बातसँ बेसी दुखी नै छी जे ई सभ बिना व्याकरणक गजल किए लिखला मुदा ऐ बातसँ बेसी दुखी छी जे ई गजलकार सभ पाठकक संग विश्वासघात केला। जँ ई सभ सोंझ रूपें कहि देने रहितथिन जे गजलक व्याकरण होइ छै आ हम सभ ओकर पालन नै कऽ सकै छी तखन बाते खत्म छलै मुदा अपन कमजोरीकेँ नुकेबाक लेल ई सभ नाना प्रकारक प्रपंच रचला जकर दुष्परिणाम गजल भोगलक। हमरा जहाँ धरि अध्य्यन अछि तहाँ धरि लगभग मात्र 4-5 टा गजल आलोचना स्वतंत्र लेखक रूपमे अजाद गजलकार सभ द्वारा लिखल गेल अछि (जँ पोथीक भूमिका सभकेँ सेहो जोड़ी तँ एकर संख्या 8-9 टा भऽ सकैए)। एहि कड़ीमे तारानंद वियोगीजीक "मैथिली गजलः मूल्याकंनक दिशा", देवशंकर नवीनजीक "मैथिली गजलःस्वरूप आ संभावना", धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक "मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना" आदि प्रमुख अछि। मैथिलीक अजाद गजलक किछु उदाहरण जेना कि पहिने कहने छी अजाद गजलमे व्याकरण नै अछि तँइ हम एकर उदाहरणमे शेर सभहँक खाली भाव संबंधी विवेचना करब (उदाहरणमे आएल शेर सभ एकौ गजलक भऽ सकैए आ अलग अलग गजलक सेहो। संपादक महोदयसँ आग्रह जे उदाहरणमे देलग गेल शेर सभहँक वर्तनीकेँ यथावत् राखथि)-- सुधांशु शेखर चौधरी जीक दू टा शेर-- अपने बेसाहल बाटसँ पेरा रहल छी हम अपने लगाओल काँटसँ घेरा रहल छी हम xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx हम पल ओछौने बाट छी निराश नै करबै नितुआन सन अधार छी हताश नै करबै पहिल शेरमे शाइर सुधांशुजी अपनेसँ जन्मल समस्या कोना परैशान करै छै तकर नीक संकेत देलाह अछि। दोसर शेर हिनक गजलक मूल भाव (खुदा-बंदा बला, एकरा संसारिक रूपमे सेहो लऽ सकै छियै) समेटने अछि। अरविन्द ठाकुर जीक दू टा शेर— संसद केर फोटो मे किछुओ नहि हेर फेर सांपनाथ नागनाथ इएह दुनू बेर बेर xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx लीक छोड़ि जे चलल सियार बनि गेल एक दिन चौकीदार पहिल शेरमे शाइर अरविन्द ठाकुरजी देशक जनताक विडंवनाक चित्रण केने छथि। जनता बरू कोनो पार्टीकेँ भोट किए ने दै सभ पार्टीक चरित्र एकै रंगक भऽ जाइ छै। दोसर शेरक हिनक व्यंग्य अछि जाहिमे नकली क्रांतिकारिताकेँ उजागर कएल गेल अछि। विभूति आनंद जीक दू टा शेर— एकेटा धारणा अछि एकेटा उदेस क्यो ने होए रंक आ ने क्यो नरेश xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx फूलो मे फूल, अड़हूल केर रंग जकाँ चारूभर तेजी सँ पसरि रहल जनता पहिल शेरमे शाइर विभूति आनंदजी सभहँक मोनक बात रखने छथि। आ दोसर शेरमे ओ कम्यूनिष्ट पार्टीक प्रतीक लाल रंगक तुलना हड़हूल फूलसँ केने छथि। कलानंद भट्ट जीक दू टा शेर— शंकामे विध्वंसक आइ जीबि रहल लोक अविवेकी अधिकारमे अणुबम भेल छै xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx अछि बटोही सशंकित बनल बाट पर दिन मे आभास रातुक अभरि गेल अछि पहिल शेरमे शाइर कलानंद भट्टजी वर्तमान समस्याक वर्णन केने छथि। कोन देश कोन बहन्नासँ कतए कहिया आक्रमण कऽ देत तकर कोनो ठिकान नै। दोसर शेरमे सेहो एहने सन भाव अछि। बाबा बैद्यनाथ जीक दू टा शेर— कोन एहन हम काज करू जे लागय कोनो पाप नहि भूखक आगिसँ बेसी भैया अछि कोनो संताप नहि xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx कहियो जँ मोन पड़ए अपन अतीतक जीवन बस आँखि मूनि दूनू कनियें लजा लिअ अरब देशक एकटा कहबी छै जे पाथर वएह मारए जे कोनो पाप नै केने हो। एही भावकेँ शाइर वैद्यनाथजी अंकित केने छथि पहिल शेरमे। दोसर शेर हिनक कमालोसँ कमाल अछि। कोनो कुकर्मीकेँ एहिसँ बेसी धुतकारल नै जा सकैए। रवीन्द्र नाथ ठाकुर जीक दू टा शेर— हँसैत भोर सजल साँझ लोक सदा चाहैए उदास भोर मरल साँझ तकर की होयत xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx जे पानि पीबि बैसल हो घाट घटा केर पता तकरहिंसँ जाय पूछी बजार हाट केर शाइर रवीन्द्रजी पहिल शेरमे घटल लोकक संकेत देने छथि प्रतीकक रूपमे। पाइ घटिते समांग सेहो घटि जाइ छै अइ दुनियाँमे। दोसर शेरमे कमालक प्रतीकक प्रयोग भेल अछि। हाट-बजारमे वएह ठठि सकैए जे कि घाट-घाट केर पानि पीने हो। ई बात प्राचीन हाटसँ लऽ कऽ एखनुक आधुनिक स्टोरपर सेहो लागू अछि। मायानंद मिश्र जीक दू टा शेर— एखन तँ राति अछि आ राति केर बातो अछि कतेक राति धरि कतेक राति केर चलतै xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx देखक बाद नहि देखैक बड़ बहाना अछि चलैत भीड़ मे एकसगर जेना हेरायल छी शाइर मायानंदजी पहिल शेरमे समयचक्रसँ संदर्भित बात कहने छथि। दोसर शेरमे हुनकर ओहन दुख सामने आएल अछि जाहिमे पहिचानल लोक सेहो अनचिन्हार बनि जाइ छै। सियाराम झा सरस जीक दू टा शेर— पूर्णिमा केर दूध बोड़ल ओलड़ि गेल इजोर हो श्वेत वसनक घोघ तर धरतीक पोरे पोर हो xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx माथ उठबए सवाल सोनित के काल लीखैछ हाल सोनित के सियारामजीक पहिल शेर शाश्वत सौंदर्यक वर्णनमे अछि तँ दोसर शेर प्रगतिशील। रमेश जीक दू टा शेर— सींथ जए टा चाही तए टा छूबि लिय टीस मुदा ताजिन्दगी रहैत छै xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx जामु आ गम्हारि केर छाह तर मे बाँस केर कोपर सुखैल जा रहल शाइर रमेश जीक पहिल शेर असफल प्रेम आ ओकर टीसक नीक वर्णन अछि। दोसर शेर उन्टा अछि। व्यावहारिक रूपसँ बाँसक छाहमे कोनो आर गाछ नै नमहर होइत छै मुदा शाइर अपन शेरमे जामु आ गम्हारि केर छाहसँ बाँसक भयक वर्णन केने छथि। दोसर शेरक विविध व्याख्या भऽ सकैए। राजेन्द्र विमल जीक दू टा शेर— डारिसँ जे चूकत तँ बानर बङौर लेत बेरपर हूसत से केराके घौर लेत xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx चानीक बट्टा सन नभमे संचित नक्षत्रक मोती अहीं लेल बस अहीं लेल सृष्टिक सतरंगी जोती शाइर राजेन्द्रजीक पहिल शेर हमरा जनैत जनतापर व्यंग्य अछि। जनते एहन अछि जे सभ समय हो-हो करैए मुदा बेरपर हुसि जाइए। हिनक दोसर शर प्रेमक सौंदर्य वर्णन अछि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक दू टा शेर— जिनगी अछि बड़ घिनाह नाक चुबैत पोटासन सुड़कि–सुड़कि तैयो छी ढोबि रहल मोटासन! xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx कोन विजय लए खेल ई खुनियाँ जइमे सभक सिकस्त भेल छै जीवनकेँ निमाहिए कऽ कियो महान बनै छै। आ जीवन निमाहए लेल नीक-बेजाए सभ करए पड़ैत छै धीरेन्द्रजीक पहिल शेरक मूल भाव इएह अछि। दोसर शेरमे धीरेन्द्रजी ओहि अज्ञात मजबूरी दिस संकेत केने छथि जाहि कारणसँ लोक एक दोसरक दुश्मन बनि गेल अछि। आ मात्र अपन जय लेल सभहँक पराजय केर जोगाड़ करैए मुदा अंतमे सभहँक संग ओहो हारि जाइए अनेक कारणसँ। तारानंद वियोगी जीक दू टा शेर— घिचने घिचाइछ नहि जिनगी के गाड़ी एक खंड मुस्की आ बहुते लचारी xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx ओहिना के ओहिना जिनगी मरैत गेलै एक्के सन फोटो सँ एलबम भरैत गेलै पहिल शेरमे शाइर तारानंद वियोगी जीवन ओहि सीमापर पहुँचि गेल छथि जतए आदमी हताश भऽ बैसि जाइए। किछु लोक एहि सेरकेँ निराशावादी कहि सकै छथि मुदा हमरा जनैत निराशा सेहो जीवनेक अंग छै। दोसर शेरमे शाइर जीवनक एकरसतासँ उबिआएल बुझाइत छथि। रोशन जनकपुरी जीक दू टा शेर— आङनमे अछि गुम्हरि रहल कागजके बाघ घर घरमे अछि रोहटि-कन्ना, डर लगैए xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx जानि ने कहिया धरि बूझत ई लोक जे वधशालामे आत्माक जोर नहि होइत छै पहिल शेरमे शाइर जनकपुरीजी लोकक भीतरक अज्ञात अदंकक वर्णन केने छथि। सभकेँ बूझल छै जे बाघ कागज केर छै मुदा एखनुक लोक असगर भऽ चुकल अछि आ ओही कारणसँ ओकरा कागजक बाघसँ सेहो डर लागि रहल छै। कोनो हत्या करए बला आदमिए होइत छै से दोसर शेरसँ बुझा जाइत अछि जखन कि शाइर हत्याराक पैरवी करै छथि। आब ई हत्यारा कोनो रूपमे कोनो कारणसँ कियो भऽ सकैए। मात्र आदमिएकेँ मारए बला हत्यारा होइत छै से मानब एकभगाह अछि। उपरमे देल गेल अजाद गजलक उदाहरणसँ ई बात स्पष्ट अछि जे सभ अजाद गजलकार सभहँक भाव नीक छनि। भावमे बसल बिंब खाँटी मैथिल छनि। प्रतीक सेहो नव छनि मुदा बस गजलक व्याकरण नै छनि। जखन कि शुरुआतेमे कहने छी बिना काफिया बहरक गजल नै होइत छै। आश्चर्य ईहो जे अजाद गजलकार सभ दुष्यंत कुमार कि अदम गोंडवी की फैज अहमद फैज केर उदाहरण दै छथि मुदा दुष्यंत कुमार कि अदम गोंडवी की फैज अहमद फैज केर गजलमे प्रयोग भेल व्याकरणकेँ नै देखि पाबै छथि। अजाद गजलकार सभहँक तर्क छनि जे जखन रचनामे भाव, बिंब, विचार सभ किछु छै तखन ओकरा गजल मानबामे की दिक्कत। मुदा हम उन्टा पूछब जे ओकरा कविते मानबामे की दिक्कत? अंततः कोनो कवितामे भाव, बिंब, विचार होइते छै ने। तँइ ओकरा कविते मानू। मुदा दुखद जे अजाद गजलकार सभ कहता जे ई कविता नै गजल अछि मुदा कोना तइ लेल हुनका तर्क नै छनि। किछु तँ तत्व हेतै जे कविता, गीत आ गजलकेँ अलग-अलग करैत हेतै। हमरा हिसाबें बहर-काफिया, व्याकरण ओ तत्व छै जाहिसँ कविता, गीत आ गजलमे अंतर कएल जा सकैए। उपरमे हम कहने छी जे अजाद गजलकार सभ दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी आदिकेँ बहुत मानै छथि तँ एक बेर कने ईहो देखि ली जे दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी सभ गजल व्याकरणक पालन केने छथि की नै--- सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीक ई शेर देखू- भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि-- 2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह अछि। निरालाजीक ई गजल ताकि कऽ पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक तक्ती देखू--- हो गई है / पीर पर्वत /सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए। अइ शेरक मात्राक्रम 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि। दुष्यंतजीक ई गजल ताकि कऽ पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। आब कने अदम गोंडवी जीक दू टा गजलक तक्ती देखू— ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में अइ शेरक मात्राक्रम 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि। भूख के एह / सास को शे / रोसुख़न तक /ले चलो या अदब को / मुफ़लिसों की / अंजुमन तक /ले चलो अइ शेरक मात्राक्रम 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि। अहाँ सभ अदमजीक दूनू गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। एकटा ओहन गजलकारक गजल केत तक्ती देखा रहल छी जिनक नाम लऽ सभ अजाद गजलकार सभ बहर ओ छंदक विरोध करै छथि। तँ चलू फैज अहमद फैज जीक ई गजल देखू— शैख साहब से रस्मो-राह न की शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की अइ शेरक मात्राक्रम 2122-1212-112 अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। तेनाहिते आजुक प्रसिद्ध शाइर मुनव्वर राना केर ऐ गजलक तक्ती देखू— बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है अइ शेरक मात्राक्रम 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजल देखू--- चुपकेचुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है अइ शेरक मात्राक्रम 2122+2122+2122+212 अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। अंतमे राहत इन्दौरी जीक एकटा गजलक दू टा शेरकेँ देखू देखू— चरागों को उछाला जा रहा है हवा पर रौब डाला जा रहा है न हार अपनी न अपनी जीत होगी मगर सिक्का उछाला जा रहा है अइ दूनू शेरक मात्राक्रम गजल (1222 / 1222 / 122) (बहर-ए-हजज केर मुजाइफ) अछि। अहाँ सभ पूरा गजल ताकि पढ़ू आ मिलाउ जे पूरा गजलमे व्याकरणक पालन भेल छै कि नै। उपरमे देल गेल हिंदी-उर्दू गजलकार सभहँक शेर सभकेँ देखलासँ पता चलत जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै। अदमजी भखूक एहसासकेँ शेरो-सुखन धरि लऽ गेलाह मुदा ओही व्याकरणक संग। दुष्यंतजी अपन गजलक माध्यमे हिमालयसँ गंगा निकालि देलाह मुदा व्याकरण ने तोड़लाह। फैज अहमद फैज अपन गजलमे धार्मिक कट्टरताक विरोध केलाह मुदा ओहो व्याकरण नै तोड़लाह। तेनाहिते आनो शाइर सभ नव भाव-भंगिमाक गजल लिखने छथि सेहो व्याकरणक पालन करैत। तखन ई मैथिलीक अजाद गजलकार सभ कहै छथि जे व्याकरणसँ भाव-विचार बन्हा जाइ छै या गजलमे व्याकरण नै होइ छै से कते उचित? एहिठाम आबि हमरा ई कहबा / स्वीकार करबामे कोनो संकोच नै जे जँ ई अजाद गजलकार सभ अपन जिद छोड़ि एखनो गजलक व्याकरण स्वीकार कऽ लेता तँ मैथिली गजलक सुदिन शुरू भऽ जाएत कारण हिनका सभ लग भाव-बोध, विचार ओ अनुभव बहुत बेसी छनि मुदा विधागत व्याकरण ने पालन करबाक कारणे हिनकर सभहँक लिखलपर विधाक रूपमे प्रश्नचिह्न लागि जाइत अछि। सियाराम झा सरसजीकेँ दुख छनि जे गीत विधा वर्तमानमे मैथिलीक केंद्रीय विधा किए नै अछि (देखू हुनकर पोथी आखर-आखर गीत केर भूमिका)। ई दुख हमरो अछि गजलक संदर्भमे, गीतक संदर्भमे आ सभ छंदयुक्त काव्यक संदर्भमे। हमरो ई इच्छा अछि जे गजल-गीत-अन्य छंदयुक्त काव्य मैथिली साहित्य केर केंद्रीय विधा बनए। बनियो सकैए। जँ अनचिन्हार आखर-विदेह मात्र दस बर्खमे किछुए गजल कार्यकर्ताक संग अपन गजल संबंधी लक्ष्य पूरा कऽ सकैए तँ फेर अनुमान करू जे जँ सभ अजाद गजलकार सभ अपन जिद छोड़ि व्याकरण बला गजल लिखनाइ शुरू कऽ देथि तँ कतेक कम समयमे ई लक्ष्य पूरा हएत? मुदा ताहि लेल जरूरी छै विधागत छंद ओ व्याकरणकेँ माननाइ। एकटा गजल कार्यकर्ताक तौरपर हमरा विश्वास अछि जे जँ सभ नै तँ अधिकांश अजाद गजलकार जिद छोड़ि विधागत छंद के मानता तँ मात्र 15-20 बर्खमे गजल-गीत-अन्य छंदयुक्त काव्य मैथिली साहित्य केर केंद्रीय विधा बनि जाएत। ई विश्वास हमरा एनाहिते नै अछि एकर पाछू अनचिन्हार आखर ओ विदेहक विश्वास सेहो अछि। गजलक एकटा कार्यकर्ताक तौरपर हम प्रतीक्षा कऽ रहल छी जे कहिया मैथिली गजलकेँ ई सौभाग्य भेटतै जे ओ मैथिली साहित्यक केंद्रीय विधा बनत आ ताहूसँ पहिने हमरा अइ बातक प्रतीक्षा अछि जे कोन-कोन अजाद गजलकार सभ हमर एहि सपनाकेँ यथार्थमे बदलबाक लेल सहयोग देता। प्रतीक्षारत..................... नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलक तुलनात्मक विवेचना एहिठाम समीक्षा लेल हम नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलकेँ चुनलहुँ अछि। ई समीक्षा एकै गजलकारक दू भाषामे लिखल गजलक तुलना अछि। पहिने हम दूनू भाषाक गजल आ ओकर बहरक तक्ती ओ रदीफ-काफियाक समीक्षा करब तकर बाद भाव, कथ्य ओ भाषाक हिसाबसँ। नरेन्द्रजीक चारि टा मैथिली गजल जे कि मिथिला दर्शनक Nov-Dec-16 अंकमे प्रकाशित अछि--- १ राज काज भगवान भरोसे अछि सुराज भगवान भरोसे मूलधनक तँ बाते छोड़ू सूदि ब्याज भगवान भरोसे खूब सभ्यता आयल अछि ई लोक लाज भगवान भरोसे देह ठठा कऽ करू किसानी आ अनाज भगवान भरोसे अपना भरि सब ब्योंत भिराऊ किंतु भाँज भगवान भरोसे एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु (तँ) अछि। हमरा लगैए शाइर तँ शब्दकेँ दीर्घ मानि लेने छथि जे कि गलत अछि। पं. गोविन्द झाजी अपन व्याकरणक पोथीमे एहन शब्दकेँ लघुए मानने छथि जे कि सर्वथा उचित तँइ एहि गजलमे सेहो ई लघु हएत। कोनो लघुकेँ दीर्घ मानि लेबाक परंपरा गजलमे तँ नै छै मुदा मैथिली गजलमे हमरा लोकनि संस्कृतक नियमक अनुसार अंतिम लघुकेँ दीर्घ मानै छी मुदा एहि गजलमे तँ बीचक लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि जे दूनू परंपरा (गजल आ संस्कृत) हिसाबें गलत अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक दूनू पाँतिमे आठ-ठ दीर्घ अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि (कऽ) एहिठाम हम दोसर शेरक पहिल पाँति लेल जे हम बात कहने छी तकरे बुझू। दोसर शेरमे आठ टा दीर्घ अछि। पाँचम शेरक दूनू पाँतिमे आठ-आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलक रदीफ "भगवान भरोसे" अछि आ काफिया "आ" ध्वनि संग "ज" वर्ण अछि जेना काज-सुराज, ब्याज, लाज, अनाज मुदा पाँचम शेरक काफिया अछि "भाँज" जे कि गलत अछि। "भाँज" केर ध्वनि "आँ" केर ज छै मुदा मतलामे "आ" ध्वनिक संग ज छै। तँइ पाँचम शेरक काफिया गलत अछि। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। मुदा बहरे मीरक हिसाबसँ सेहो एहि गजलमे कमी अछि। २ फोड़त आँखि दिवाली आनत कान काटि कनबाली आनत अहींक हाथ पयर कटबा लय टाका टानि भुजाली आनत देश प्रेम केर डंका पीटत केस मोकदमा जाली आनत पेट बान्हि कऽ करू चाकरी एहने आब बहाली आनत पूरा पूरी दान चुका कऽ सबटा डिब्बा खाली आनत एहि गजलक पहिल आ दोसर शेरक हरेक पाँतिमे आठ-आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा लघु फाजिल अछि तेनाहिते दोसर पाँतिमे सेहो एकटा लघु फाजिल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिमे छह टा दीर्घ आ दू टा लघु अछि। कऽ शब्दक विवेचना उपर जकाँ रहत। दोसर पाँतिमे "ए" शब्दकेँ लघु मानि लेल गेल अछि जे कि हमरा हिसाबें उचित नै। पाँचम सेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। कऽ लेल उपरके विवेचना देखू। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलक काफिया ठीक अछि। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। मुदा बहरे मीरक हिसाबसँ सेहो एहि गजलमे कमी अछि। ३ लाख उपलब्धिसँ ओ घेरा गेल अछि बस हृदय आदमी के हेरा गेल अछि सब समाजक चलन औपचारिक बनल लोक संबंधसँ आन डेरा गेल अछि सबटा चेहरा बनौआ अपरिचित जकाँ मूल चेहरा ससरि कऽ पड़ा गेल अछि भोरसँ साँझ धरि फूसि पर फूसि थिक लोक अपने नजरिसँ धरा गेल अछि देशक सोना पाँखि बनत एक दिन फेर अनचोके मे ई फुरा गेल अछि एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-1122-2212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-1222-2212 अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-1221-2212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-1121-22212 अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2121-2122-12212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2121-2122-12212 अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 211212212212 अछि आ दोसर पाँतिक 212212112212 अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 22222112212 अछि आ दोसर पाँतिक 212222212212 अछि। एहि गजलक तेसर, चारिम आ पाँचम शेरक काफिया गलत अछि। एहि गजलकेँ हमरा बहरेमीरपर मानबासँ आपत्ति अछि आ से किए ई पाटक लोकनि मात्राक्रम जोड़ि देखि सकै छथि जे अलग-अलग लघु जोड़लाब बादो लघु बचि जाइत छै। तँइ हमरा आपत्ति अछि संगे-संग ई गजल आर कोनो बहरपर आधारित नै अछि सेहो स्पष्ट अछि। ४ डिब्बा सन सन शहरक घर अछि पानि हवा मे मिलल जहर अछि गाम जेना बेदखल भऽ रहल बाध बोन धरि घुसल शहर अछि आजुक युगमे कोना पकड़बै चोर साधु मे की अंतर अछि देश बनल शो केश बजारक जनतंत्रक बेजोड़ असर अछि अजब दौर अछि लक्ष्य निपत्ता दिशा हीन ई भेड़ सफर अछि मतलाक दूनू पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। चारिम आ पाँचम शेरक दूनू पाँतिमे आठ आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलमे आएल "भेड़ सफर" शब्द युग्मपर आगू चलि भाषा खंडमे चर्चा हएत। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। एहि गजलक मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "घर" केर उच्चारण हिंदी सन कएल जाए तखने सही हएत अन्यथा मैथिली उच्चारण हिसाबें गलत हएत। बाद बाँकी शेरक काफिया मतलाक काफियापर निर्भर करत तँइ ओकर विवेचना हम नै क' रहल छी। नरेन्द्रजीक चारि टा हिंदी गजल जे कि हुनक फेसबुकक वालसँ लेल गेल अछि---- १ यह जो चौपट यहां का राजा है कुछ नहीं वक़्त का ताकाजा है हम लड़ाई से बहुत डरते हैं क्यूं कि कुछ घाव अभी ताजा है. देश उनके लिए खिलौना है हमको इस बात का अन्दाजा है जैसे चाहे इसे बाजाते हैं गोकि जनतंत्र एक बाजा है अब उठा है तो धूम से निकले यारो आशिक का ये जनाजा है एहि गजलक पहिल पहिल आ दोसर दूनू शेरक शेरक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। एहि शेरक दोसर पाँतिमे शायद टाइपिंग गलती छै तँइ सही शब्द "तकाजा" हम मानलहुँ अछि। दोसेर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-112222 अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-2222 अछि। चारिम शेरक पहिल आ दोसर दूनू शेरक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। एहि शेरक दोसर पाँतिमे शायद टाइपिंग गलती छै तँइ सही शब्द "बजाते" हम मानलहुँ अछि। पाँचम शेरक दूनू पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। कुल मिला देखी तँ एहि गजलक दूटा शेर बहरसँ खारिज अछि (दोसर आ तेसर)। एहि गजलमे काफिया ठीकसँ पालन भेल अछि। २ क़यामत ऐन अब दालान पर है नज़र दुनिया की रौशनदान पर है. न जाने रौशनी आयेगी कब तक अभी तो तीरगी परवान पर है. पिघल जाता है उनके आँसुओं पर मेरा गुस्सा दिले नादान पर है. शगल उनके लिए है शायरी भी मगर मेरे लिए तो जान परहै. मुहब्बत की वकालत करने वाला अभी नफ़रत की इक दूकान पर है. एहि गजलक हरेक शेरक हरेक पाँतिमे 1222-1222-122 मात्राक्रम अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। एहि गजलक काफिया सेहो ठीक अछि। ३ बाढ़ में लोग बिलबिलाते हैं रहनुमा बाढ़ को भुनाते हैं घोषणाओं पे घोषणाएं हैं नाव वह काग़ज़ी चलाते हैं इस तरफ़ भुखमरी का आलम है और वह आँकड़े गिनाते हैं फंड जो भी जहां से आता है ख़ुद ही वो बाँट करके खाते हैं साल दर साल बाढ़ आ जाये दरअसल ये ही वो मनाते हैं एहि गजलक हरेक शेरक हरेक पाँतिमे 2122-12-1222 मात्राक्रम अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। एहि गजलक काफिया सेहो ठीक अछि। ४ आकाश से टपके हुए किरदार नहीं हैं हम भी मक़ीन हैं किरायेदार नहीं हैं | उनके इरादों की भी मालूमात है हमें ऐसा नहीं कि हम भी ख़बरदार नहीं हैं वह नाम हमारा मिटायेंगे कहाँ कहाँ बुनियाद की हम ईंट हैं दीवार नहीं हैं | इंसान हैं अपनी हदों का इल्म है हमें हम आपके जैसा कोई अवतार नहीं हैं | हम अपनी मुहब्बत की नुमाइश नहीं करते रिश्ते निभाते हैं दुकानदार नहीं हैं | पढ़ना ही अगर हो तो पढ़ो इत्मीनान से अदबी किताब हैं कोई अख़बार नहीं हैं | एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2212-2212-221122 अछि। दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2212-1212-221122 अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2212-2212-221212 अछि। दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2212-122-122-1122 अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि मुदा तइ बादो ई गजल बहरमे नै अछि। मतलाक दूनू शेरेमे एकरूपता नै अछि। तँइ हम मात्र दू शेरक तक्ती केलहुँ अछि बाद-बाँकी शेरक विवेचना पाठक बुझिये गेल हेता। काफिया सेहो गलते अछि। बहरक हिसाबसँ नरेन्द्रजीक गजल-- चारू मैथिली गजलकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे नरेन्द्रजी अधिकांशतः बहरे मीरपर आश्रित छथि आ ताहूमे कतेको ठाम हूसल छथि। जखन कि बहरे मीर बहुत आसान बहर छै आ एहि बहरमे छूट बहुत छै। तेनाहिते जँ चारू हिंदी गजलक बहरकेँ देखल जाए ई स्पष्ट होइए जे नरेन्द्रजी बहरे मीरक अतिरिक्त आन बहर सभपर सेहो हाथ चलबै छथि आ ओहूमे कतेको स्थानपर हूसल छथि। तथापि ई उल्लेखनीय जे आनो बहरपर ओ गजल लीखि सकै छथि। नरेन्द्रजी मैथिली-हिंदीक देल उपर बला गजलक बहर संबंधमे हमर ई स्पष्ट मान्यता अछि जे नरेन्द्रजी मात्र लयकेँ बहर मानि लै छथि जखन कि लय आ बहरमे अंतर छै। लय मने गाबि कऽ, गुनगुना कऽ। लयपर लिखलासँ केखनो बहर सटीक भैयो सकैए आ केखनो नहियो भऽ सकैए। बहर ओ काफियाक आधारपर नरेन्द्रजीक गजलकेँ एकै बेरमे हम गलत नै कहि सकै छी कारण मैथिलीक कथित गजलकार सभसँ बेसी मेहनति नरेन्द्रजी अपन गजलमे केने छथि आ जँ ई थोड़बे मेहनति करतथि वा करता तँ हिनक गजल एकटा आदर्श गजल भऽ सकैए। ओना एहि बातक संभावना कम जे ओ एहि तथ्यकेँ मानताह। करण वएह जिद जे व्याकरण कोनो जरूरी नै छै। रचनामे भाव प्रमुख होइत छै आदि-आदि। मैथिलीमे नरेन्द्रजीक गजल अपन पीढ़ीक अधिकांश गजलकार (सरसजी, तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीन एवं ओहने गजलकार) सभसँ बेसी ठोस गजल छनि से मानबामे हमरा कोनो शंका नै मुदा बहर ओ काफियाक हिसाबें पूरा-पूरी सही नै छनि (मने नरेन्द्रजी मात्र अपन समकालीनसँ आगू छथि)। एहिठाम हम नरेन्द्रजीक चारि-चारि टा गजल लेलहुँ मुदा आन ठाम हुनक प्रकाशित वा हुनक फेसबुकपर प्रकाशित मैथिली आ हिंदी गजलक अनुपातसँ ई स्पष्ट अछि जे नरेन्द्रजी मैथिलीमे मात्र संपादकक आग्रहपर गजल लिखै छथि। मने मैथिली गजल हुनकर ध्येय नै छनि। अइ बादों आश्चर्य जे हिंदी गजलमे हुनकर कोनो विशेष स्थान नै छनि। ई बात हम एकटा हिंदी गजल पाठकक तौरपर कहि रहल छी। हुनकर समूहक किछु लोक हुनका भने बिहारक हिंदी गजलकारक लिस्टमे दऽ दौन मुदा वास्तविकता इएह जे हिंदी गजल संसारमे नरेन्द्रजीक कोनो स्थान नै छनि। आ एकरा मात्र राजनीति नै कहल जा सकैए। हिंदी गजलमे एहतराम इस्लाम, नूर मुहम्मद नूर, जहीर कुरैशी सभ पुरान छथि एवं नवमे गौतम राजरिषी, स्वपनिल श्रीवास्तव, वीनस केसरी, मयंक अवस्थी आदि अपन स्थान बना लेला मुदा की करण छै जे नरेन्द्रजी असफल रहि गेला। हम फेर कहब जे हरेक चीजमे राजनीति नै होइ छै। हिंदी गजलक नव शाइर गौतम राजरिषी, स्वपनिल श्रीवास्तव, वीनस केसरी, मयंक अवस्थी आदिक पाछू कोनो संपादकक हाथ नै छलनि मुदा नीक लिखलासँ कोन संपादक नै छापै छै। आ हिनकर सभहँक सभ गजल व्याकरण ओ भाव दृष्टिसँ संतुलित रहै छनि आ तँइ ई सभ बहुत कम समयमे हिंदी गजलमे अपन स्थान बना लेला मुदा नरेन्द्रजी नै बढ़ि सकला आ ताहि लेल मात्र हुनक बहर ओ व्याकरण नै पालन करबाक जिद जिम्मेदार छनि। मैथिली गजलमे तँ ई अपन समकालीन गजलकारसँ आगू बढ़ि जेता मुदा ई हिंदीमे पिछड़ले रहता कारण ओहिठाम बहर सेहो देखल जाइ छै जखन कि मैथिली गजलमे बहर देखानइ आब शुरू भेलैए। किछु एहन बात जे कि प्रायः हम, सभ आलोचनामे कहैत छियै " मैथिलीक अराजक गजलकार सभ हिंदीक निराला, दुष्यंत कुमार आ उर्दूक फैज अहमद फैज केर बहुत मानै छथि। एकर अतिरिक्तो ओ सभ अदम गोंडवी मुन्नवर राना आदिकेँ मानै छथि। मैथिलीक अराजक गजलकार सभहँक हिसाबें निराला, दुष्यंत कुमार आ फैज अहमद फैज सभ गजलक व्याकरणकेँ तोड़ि देलखिन मुदा ई भ्रम अछि। सच तँ ई अछि जे निराला मात्र विषय परिवर्तन केला आ उर्दू शब्दक बदला गजलमे हिंदी शब्दक प्रयोग केला, तेनाहिते दुष्यंत कुमार इमरजेन्सीक विरुद्ध गजल रचना क्रांतिकारी रूपें केलथि। फैजकेँ साम्यवादी विचारक गजल लेल जानल जाइत अछि। मुदा ई गजलकार सभ विषय परिवर्तन केला आ समयानुसार शब्दक प्रयोग बेसी केला। एहिठाम हम किछु हिंदी गजलकारक मतलाक तक्ती देखा रहल छी ( जे-जे मतला हम एहिठाम देब तकर पूरा गजल ओ पूरा तक्कती हमर पोथी मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहासमे देखि सकै छी)--- सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाजीक एकटा गजलक मतला देखू-- भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि--2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरे रमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। मौलाना हसरत मोहानीक गजल “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है” अही बहरमे छै जकर विवरण आगू देल जाएत। ऐठाँ ई देखू जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै। आब हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजलक मतला देखू--- चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है एकर बहर 2122+2122+2122+212 अछि। आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक मतलाक तक्ती देखू--- हो गई है / पीर पर्वत /सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए। एकर बहर 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि। फैज अहमद फैज जीक ई गजलक मतला देखू-- शैख साहब से रस्मो-राह न की शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की एहि मतलाक बहर 2122-1212-112 अछि। आब कने अदम गोंडवी जीक एकटा गजलक मतलाक तक्ती देखू— ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में एकर बहर 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि। एहिठाम हम ई मात्र भाव ओ कथ्यसँ संचालित गजलकारक कुतर्कसँ बँचबा लेल देलहुँ अछि। जखन दुष्यंत कुमार सन क्रांतिकारी गजलकार बहर ओ व्याकरणकेँ मानै छथि तखन नरेन्द्रजी वा आन कथित क्रांतिकारीकेँ व्याकरणसँ कोन दिक्कत छनि सेनै जानि। भाव, कथ्य, विषय ओ भाषाक हिसाबसँ नरेन्द्रजीक गजलक सीमा--- उप शीर्षकमे "सीमा" एहि दुआरे लिखलहुँ जे भाव, कथ्य ओ विषय लेल कोनो रोक-टोक नै छै जे इएह विषयपर लिखल जेबाक चाही वा ओहि विषयपर नै लिखल जेबाक चाही। अइ ठाम देल गेल नरेन्द्रजीक मैथिली-हिंदी गजलक भाव ओ भाषासँ स्पष्ट भेल हएत जे नरेन्द्रजी चाहे मैथिलीमे लिखथि वा हिंदीमे हुनकर विषय मार्क्सवादी विचारधाराक आगू पाछू रहैत छनि। ओना ई खराप नै छै मुदा दुनियाँ बहुत रास "भूख"सँ संचालित छै चाहे ओ पेटक हो, जाँघक हो कि धन, यश केर हो। जतबे सच पेटक भूख छै ततबे आन भूख सेहो। तँइ एकटा भूखक साहित्यकेँ नीक मानल जाए आ दोसर भूखकेँ खराप से उचित नै। नरेन्द्रजीकेँ सेहो कोनो विपरीत लिंगी आकर्षित केने हेथनि आ कोहबरमे हुनकर करेज सेहो धक-धक केने हेतनि। ओना विचारधाराकेँ महान बनेबा लेल ओ कहि सकै छथि जे ने हमरा कोनो विपरीत लिंगी आकर्षित केलक आ ने कोबरमे करेज धक-धक केलक। ई हुनकर सीमा सेहो छनि हुनकर विचारधाराक सेहो। अइ ठाम एकटा महत्वपूर्ण प्रश्न राखए चाहब जे नरेन्द्रजी वा हुनके सन क्रांतिकारी गजलकार सभ व्याकरणक ई कहि विरोध करै छथि जे व्याकरण कट्टरताक प्रतीक थिक मुदा आश्चर्य जे विषय ओ भावक मामिलामे नरेन्द्रजी वा हुनके सन गजलकार सभ कट्टर छथि। हमरा जतेक अनुभव अछि ताहि हिसाबसँ हम कहि सकैत छी कथित रूपसँ छद्म मार्क्सवादी सभ दोहरा बेबहार करै छथि अपन जीवन ओ साहित्यमे। व्याकरणक कट्टरताक विरोध आ विषय ओ भावक कट्टरताक पालन इएह दोहरा चरित्र थिक। एकै कथ्यपर कोनो विधाक रचना लिखलासँ ओहिमे दोहराव केर खतरा तँ होइते छै संगे संग पाठक इरीटेट सेहो भ' जाइत छै। कोनो रचना जखन पाठके लेल छै तखन पाठकक रुचिक अवमानना किए? हँ एतेक सावधानी लेखककेँ जरूर रखबाक चाही जे पाठकक अवांछित माँग जेना अश्लीलता, दंगा पसारए बला रचना नै लीखथि। एक बेर फेर हम हिंदीक संदर्भमे कहए चाहब जे हिंदी गजलक कथ्य बहुत विस्तृत छै। हिंदी गजलमे साम्यवादी विचारधारा बला गजलक अतिरिक्त आनो विषयपर गजल छै आ हमरा हिसाबें नरेन्द्रजी हिंदी गजलमे नै बढ़ि सकला आ ताहि लेल बहर ओ व्याकरण संग एकै कथ्यपर लिखबाक जिद सेहो जिम्मेदार छनि। एहिठाम देल नरेन्द्रजीक मैथिलीक चारिम गजलमे "भेड़ सफर" मैथिलीमे अवांछित प्रयोग अछि। नरेन्द्रजीक भाषा प्रयोग खतरनाक अछि। हम जानै छी जे एना लिखलासँ लोक हमरा शुद्धतावादी मानए लागत मुदा हम ई चिंता छोड़ि लिखब जे हरेक भाषामे आन भाषाक शब्दक प्रयोग हेबाक चाही मुदा एकर मतलब नै जे सभ शब्दक प्रयोग मान्य भऽ जेतै। उदाहरण दैत कही जे मैथिलीमे "वफा" शब्द प्रचलित नै अछि मुदा "वफादार" शब्द बहुप्रचलित अछि। एहिठाम प्रश्न उठैत अछि जे जखन वफा शब्दक प्रचलन नै तखन वफादार कोना प्रचलित भेल। ई बात शुद्ध रूपसँ आम जनताक बात छै। आम जनताक जीह आ संदर्भमे "वफा" शब्द नै आबि सकलै जखन कि वफादार उच्चारणक हिसाबसँ आ संदर्भक हिसाबसँ प्रयोग होइत रहल अछि। निष्कर्ष- नरेन्द्रजी गजल बहर ओ काफियाक हिसाबसँ दोषपूर्ण तँ अछि मुदा मैथिलीक अपन समकालीन ओ परवर्ती गजलकार यथा सरसजी, रमेश, तारानंद वियोगी, विभूति आनंद, कलानंद भट्ट, सुरेन्द्रनाथ, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, राजेन्द्र विमल संगे एहने आन गजलकार सभसँ बेसी ठोस अछि। हिनक हिंदी गजल सभ सेहो बहर ओ काफियाक हिसाबसँ दोषपूर्ण अछि आ ओहिठाम हिनकासँ पहिने बहुत रास व्याकरण ओ भाव बला गजलकार अपन मूल्याकंन लेल प्रतीक्षारत छथि तँइ हिंदी गजलमे हिनकर टिकब बहुत मोश्किल छनि। विश्वास नै हो तँ हिंदी गजलक गंभीर पाठक बनि देखि लिअ। जँ नरेन्द्रजी व्याकरण पक्षकेँ सम्हारि लेथि आ आनो विषयपर गजल कहथि तँ निश्चित ई बहुत दूर आगू जेता। आ जेना कि उपरक विवेचनसँ स्पष्ट अछि जे हिनका बेसी मेहनति नै करबाक छनि। किछु अहम् ओ व्याकरणकेँ हेय बुझबाक चक्करमे हिनक नीको गजल दूरि भेल अछि। ओना हम उपरे आशंका बता देने छी जे आने कथित क्रांतिकारी जकाँ ईहो व्याकरणकेँ बेकार मानता। नोट---- 1) एहि समीक्षामे जतेक संदर्भ लेल गेल अछि से हमर पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"सँ लेल गेल अछि तँइ कोनो प्रकारक संदर्भ जेना पं गोविन्द झाजीक कोन पोथीक कोन पृष्ठपर चंद्रबिंदु युक्त स्वर लघु होइत छै आदि जनबाक लेल ओहि पोथीकेँ पढ़ू। 2) बहरक तक्तीमे जँ कोनो असावधानी भेल हो तँ पाठक सभ सूचित करथि। हम ओकरा सुधारब। बयानक संदर्भमे मैथिली गजल हरेक भाषा साहित्यिक हरेक विधासँ संबंधित बयान अबैत रहैत छै आ ई स्वाभाविक छै। बयान दूनू तरहँक मने सकारात्मक ओ नकारात्मक रहैत छै। मैथिली गजल लेल सेहो समय- समयपर बयान अबैत रहलैक अछि। जँ छोट-मोट बयानकेँ छोड़ि देल जाए तँ मैथिली गजलमे मुख्यतः तीन-चारि टा बयान अछि जे कि अपना समयमे मैथिली गजलकेँ आन्दोलित केलक। पहिल प्रो. आनंद मिश्रजीक बयान, दोसर रमानंद झा रमणजीक बयान, तेसर रामदेव झाजीक बयान आ चारिम मायानंद मिश्रजीक बयान, हम एहिठाम चारू गोटाक बयान राखब आ ओकर विश्लेषण करब एहि विश्लेषणसँ पहिने कहि दी जे ई सभ बयान ओहन-ओहन रचना वा पोथीपर आधारित अछि जे कि प्रकाशित भेल। बहुत रास एहन शाइर जे कि प्रकाशनमे रुचि ने छलनि वा जिनका संपादक कात कऽ दै छलखिन (जेना विजयनाथ झा ओ योगानंद हीराजीक गजलकेँ संपादक सायास नै छापै छलखिन तिनकर सभहँक गजलकेँ एहि बयान देबा कालमे धेआन नै राखल गेल अछि)। ईहो बात धेआनमे राखब जरूरी जे ई बयान सभ मधुपजी, कविवर सीताराम झाजीक वा पं.जीवन झाजीक गजलकेँ बिना व्याकरणपर नपने देल गेल अछि। जँ ई सभ बयान देबासँ पहिने मधुपजी, कविवर सीताराम झाजीक, पं.जीवन झाजीक, विजयनाथ झाजी वा योगानंद हीराजीक गजलकेँ व्याकरणक हिसाबें देखने रहितथि तँ संभवतः हिनक बयान सभ किछु अलग रहैत। तँइ एहि बयान सभकेँ समग्र तँ नै मानल जा सकैए मुदा ओहि अधिकांश गजलक प्रतिनिधित्व तँ करिते अछि जे ओहि कालखंडमे अधिकांश गजलकार द्वारा लिखल गेल। एहि बयान सभहँक विश्लेषणकेँ हम ओहि कालखंडसँ जोड़ि कऽ देखि रहल छी जाहिकालमे ई बयान देल गेल रहै। वस्तुतः इएह सही तरीका छै कोनो तथ्यकेँ जनबाक लेल। तँ देखी बयान आ ओकर विश्लेषण ------ 1) प्रो. आनंद मिश्रजीक हिसाबें मैथिलीमे गजल संभव नहि (संदर्भ- 2015 मे मोहन यादवजीक गजल संग्रह "जे गेल नहि बिसरल"मे उदयचंद्र झा विनोदजीक भूमिका। संभवतः ई बयान 1980-85 बीचक अछि)---एहि बयानक मूल रूप हमरा लग नै अछि। तँइ एहि बयानकेँ दू रूपमे लऽ रहल छी। पहिल तँ जे देने छी मने "मैथिलीमे गजल संभव नै"। ई बयान निश्चित रूपें ओहि समयक जे गजलकार सभ सक्रिय छलाह जेना सुधांशु शेखर चौधरी, गोपेश, मायानंद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, केदार नाथ लाभ, कलानंद भट्ट, सियाराम झा सरस, महेन्द्र, छात्रानंद सिंह झा, तारानंद वियोगी, राम चैतन्य धीरज, केदार कानन, रमेश, विभूति आनंद आदिक गजल सभकेँ देखि कऽ देल गेल अछि। जँ हिनकर सभहँक गजल देखल जाए तँ प्रो. आनंद मिश्रजीक उक्ति सौ प्रतिशत सच अछि। कनियों झूठ नै। मानि लिअ जँ प्रो. जी एहन नै कहने हेथिन तैयो ई सच अछि ओहि समयक सक्रिय गजलकार सभहँक गजल देखि कियो ई बात कहि सकैत छल। गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य छै (बहरमे किछु छूटक संगे)। मुदा ओहि समयक सक्रिय कोनो गजलकार (ओहिमेसँ एखनो किछु सक्रिय छथि) बहर आ काफियाक पालन नै केने छथि। हिनकर सभहँक कथन छनि जे भाव मुख्य हो मुदा जँ भावे मुख्य मानल जाए तखन कोनो रचनाकेँ गजल कहबाक बेगरते किए? ओकरा कविते किए ने कहल जाए? आखिर कोनो एहन तत्व तँ हेतै जे कविता आ गजलक बीच अंतर आनैत हेतै। कोनो गजलकेँ नीक वा खराप हेबासँ पहिने ओकरा "गजल" होबए पड़ैत छै आ कोनो रचनाकेँ गजल हेबा लेल ओहिमे बहर ओ काफिया अनिवार्य छै। जँ बहर ओ काफिया नै छै तखन ओ गजले नै भेल भने ओकरा नीक वा खराप गीत या कविता कहू से मंजूर मुदा बिना बहर ओ काफियाक गजल नै हएत (रदीफ कोनो गजलमे भैयो सकैए आ नहियो भऽ सकैए मुदा जाहि गजलमे रदीफ लेल जाएत ताहिमे अंत धरि पालन हएत)। एक दू गोटेसँ चर्चा केलापर पता चलल जे प्रो. आनंदजी ई मानै छलाह जे मैथिलीमे हुस्न-इश्क नै भऽ सकै छै तँइ मैथिलीमे गजल संभव नै। जँ एहन बात तँ हम प्रो. साहेबसँ असहमत छी कारण हमरा लग विद्यापति छथि जे कि पूरा उर्दू शाइरीसँ बेसी आ पहिने प्रेमपर बात केलाह। किछु विद्वान ई कहि सकै छथि जे विद्यापतिक प्रेम पारलौकिक छल मुदा तखन ई प्रश्न उठै छै जे फेर उर्दू शाइरीक प्रेम पारलौकिक किए नै भऽ सकैए? जे किछु हो मुदा प्रो. आनंदजीक बयान ओहि समयक गजलकार सभ लेल एकटा चुनौती छल जकरा लेबामे और गलत साबित करबामे ओहि समयक गजलकार सभ असफल भऽ गेलाह। जहाँ धरि एहि बयानक प्रभाव छै हमरा नै बुझाइए जे एहि बयानक कोनो बेसी असरि पड़लै कारण ओहि समयक कथित गजलकार सभ अपन "गलत गजल"मे मग्न छलाह आ प्रो. आनंद मिश्रजी अपन सहविचारक संग प्रोफेसरे टा बनल रहलाह। दूनू पक्षमेसँ किनको ई जनबाक चिन्ता नै रहलनि जे आखिर गजलक असल पक्ष की छै। 2) रमानंद झा रमणजीक हिसाबें वर्तमान गीत गजल मंचीय अर्थलाभक औजार थिक (मिथिला मिहिर फरवरी 1983 ई हमरा लोकवेद आ लालकिलामे सियाराम झा सरसजीक लेखमे उल्लेखित भेटल)- जँ ओहि समयक सक्रिय गजलकारक गजल देखब तँ पता चलत जे ओ सभ गजलकेँ गेबाक एकटा उपक्रम मानि लेने छलाह। हुनका सभकेँ बुझाइत छलनि (वा छनि) जे गायिकी गजल लेल अनिवार्य छै। जँ गायिकी गजल लेल अनिवार्य रहितै तँ उर्दू गजलमे गालिब आ फिराक गोरखपुरीसँ बेसी महान सुदर्शन फाकिर रहितथि। मुदा से नै भेलै कारण गायिकी गजल लेल अनिवार्य नै। हँ जँ गजलक सभ शर्त पूरा करैत गजलमे गायिकी छै तँ सोनमे सुगंध बला बात भेलै। ओहि समयक गजल सभ गायिकी लऽ कऽ कते मोहग्रस्त छलाह तकर दृष्टांत हमरा विभूति आनंदजीक गजल संग्रह (उठा रहल घोघ तिमिर)मे हुनके भूमिका आ तारानंद वियोगीजीक गजल संग्रह (युद्धक साक्ष्य) केर नव संस्करणक नव भूमिकासँ भेटल। विभूति आनंदजी ओहि भूमिकामे लिखै छथि जे "एगो महत्वपूर्ण प्रसंग.............। तत्क्षण किछुकेँ स्वरो देलथिन।" उम्हर वियोगीजी अपन संग्रहक नव संस्करणक नव भूमिकामे लिखै छथि जे "तखन मोन पड़ै छथि जवाहर झा...........जे हमर छांदस प्रयोग सभहँक संगीत शास्त्रीय व्याख्या करथि।" ई अलग बात जे वियोगीजीक गजलमे कोनो छांदस प्रयोग नै अछि। शास्त्रीय संगीत केर बंदिश तँ कोनो रचनाक पाँति भऽ सकै छै। एहि दूक अतिरिक्त आन गजलकार सभ सेहो गजलकेँ गायिकीसँ अनिवार्यतः जोड़ि देने छथि जाहि कारणसँ ओहि समयक गजल सभ गजल कम आ गीत बेसी लागै छै। अधिकांशतः साहित्यकार ई बुझै छथि जे मंचपर गाबि देलासँ जनता बेसी थपड़ी पीटत आ बहुत संदर्भमे ई बात सच छै। मुदा ओहि समयक गजल लिखनाहर सभ मंचपर हिट हेबाक चक्करमे कथित गजलकेँ गीतक भासमे गाबए लगलाह जाहिमेसँ किछु लोकप्रिय सेहो भेल (जनता द्वारा गीत मानि आ सुनबामे चूँकि ओ गीतेक भास छलै तँइ) जेना सियाराम झा सरसजीक "एक मिसिया जे मुस्किया देलियै," आ एहने सन आर। खास कऽ जे कथित साहित्यकार गीत आ गजल दूनू लिखै छलाह तिनकामे ई गायिकी बला बेमारी बहुत अछि। कलानंद भट्ट गजले लिखै छलाह तँइ हुनक गजलमे एकटा स्थायित्व भेटत ओना ई बात अलग जे भट्टजीक गजलमे सेहो बहर नै छनि आ बहुत ठाम काफिया गलत छनि।तात्कालीन कथित गजलकार सभ गजलकेँ मंच छेकबाक हथियार बना लेला जाहि कारणे ओहि समयक गजलमे कथ्यक गंभीरता छैहे नै। एक बात स्पष्ट कऽ दी खाली लाल झंडा, पसेना, अमीर-गरीब लीखि देलासँ गजल की कोनो रचनामे गंभीरता नै अबै छै। जँ एहि वास्तविकताक भीतर घुसि कऽ देखल जाए तँ रमणजीक बयान बहुत हद धरि सही अछि आ सटीक अछि। रमणजीक एहि बयानक असरि भेल आ गीत सन गजल लिखए बला सभ छिलमिला गेलाह। सरसजी अपन लेखमे एहि बयानकेँ गैर जिम्मेदारी बला बयान मानै छथि (लोकवेद आ लालकिलामे सियाराम झा सरसजीक लेख) मुदा हम रमणजीक एहि बयानकेँ गजलक दृष्टिएँ पूर्ण जिम्मेदारी बला बयान मानै छी। जँ ओहि समयक तात्कालीन गजलकार सभ एहि बयानपर मंथन करितथि तँ आजुक मैथिली गजलक परिदृश्य बहुत निखरल आ विस्तृत नजरि अबैत। पुरने गजलकार नै बल्कि एखनुक गजलकार सेहो (अनचिन्हार आखरसँ संबंधित किछु गजलकार सेहो) मंच छेकबाक लेल गजलमे गायिकीकेँ अनिवार्य करए चाहै छथि। जखन कि सच बात तँ ई छै जे मंचपर गजल हिट होइत छै मुदा मंच लेल गजलक प्रयोग असफल भऽ जाइत छै से कतेको उर्दू मोशायरामे श्रोताक तौरपर भाग लऽ कऽ हम देखि चुकल छी। उर्दूक प्रसिद्ध शाइर हसरत मोहानीक गजल "चुपके चुपके रात दिन" 1910-1930 मे लिखाएल छै मुदा एहि गजलकेँ गुलाम अली भेटलै 1982मे। तेनाहिते गालिब केर गजल लिखेलै 1820क बाद मुदा ओकर गायिकी रूपमे लोकप्रियता भेटलै जगजीत सिंह द्वारा गेलाक बाद (जगजीतजीसँ पहिने सेहो गाएल जाइत छलै मुदा हम लोकप्रियताक बात कऽ रहल छी)। गायिकी रूपमे हरेक आधुनिक हसरत मोहानीक नसीबमे गुलाम अली आ हरेक आधुनिक गालिब केर नसीबमे जगजीत सिंह लिखाएल रहै छै मुदा आजुक शाइर अपने गेबा लेल आ मंच छेकबा लेल तते उताहुल रहै छथि जे ओ गजलक मूल तत्वकेँ बिसरि जाइ छथि। हमर ई अनुभव अछि जे गजल लेल बहरकेँ अनुपयोगी कहए बला लोक गजलकेँ गेबाक चक्करमे रहै छथि। अन्यथा किछु प्रयासक बाद बहरक निर्वाह केनाइ एकदम आसान होइत छै। 3) रामदेव झाजी मानै छथि जे "साम्प्रतिक गजल रचनाक क्षेत्रमे सुधांशु शेखर चौधरी, गोपेश, मायानंद मिश्र, रवीन्द्रनाथ ठाकुर,केदार नाथ लाभ, कलानंद भट्ट, सरस, महेन्द्र, छात्रानंद, वियोगी, धीरज,केदार कानन, रमेश,अनिल इत्यादि नाम देखल जाइत अछि। हिनका लोकनिक गजलमेसँ किछुमे अवश्ये गजलत्व अछि। परंतु अधिकांशकेँ गजल शैलीमे रचल गीत मात्र कहल जाए तँ अनुपयुक्त नहि। (संदर्भ “मैथिलीमे गजल” डा. रामदेव झा, रचना जून 1984मे प्रकाशित)"-- रामदेव जीक मत रमणजीक मतक विस्तारित रूप अछि। रमणजी मंचपर गजलक प्रवृतिपर बात केने छथि मुदा रामदेवजी गीत सन गजलकेँ सेहो देखार केने छथि जे अधिकांशतः गजलकार गजल नै गीत सन गजल लिखै छथि। रामदेव झाजी स्पष्ट स्वरमे ओहि समयक बहुत रास कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक गजलकेँ खारिज करै छथि जे कि ओहि समयक हिसाबसँ बड़का विस्फोट छल। ई आलेख ततेक प्रभावकारी भेल जे ओ समयक बिना व्याकरण बला गजलकार सभ छिलमिला गेलाह आ एहि आलेखक विरोधमे विभिन्न वक्तव्य सभ देबए लगलाह। उदाहरण लेल सियाराम झा सरस, तारानंद वियोगी, रमेश ओ देवशंकर नवीनजीक संपादनमे प्रकाशित साझी गजल संकलन "लोकवेद आ लालकिला" (वर्ष 1990) केर कतिपय लेख सभ देखल जा सकैए जाहिमे रामदेव झाजी ओ हुनक स्थापनाकेँ जमि कऽ आरोपित कएल गेल अछि। ओही संकलनमे देवशंकर नवीन अपन आलेख "मैथिली गजलःस्वरूप आ संभावना"मे लिखै छथि जे "............पुनः डा. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्ध मे दू टा बात अनर्गल ई भेल जे गजलक पंक्ति लेल छंद जकाँ मात्रा निर्धारित करए लगलाह आ किछु एहेन व्यक्तिक नाम मैथिली गजल मे जोड़ि देलनि जे कहियो गजल नै लिखलनि" आन लेख सभमे एहने बात सभ आन आन तरीकासँ कहल गेल अछि। रामदेव झाजीक आलेखक बाद एहन आलेख नै आएल जाहिमे गजलकेँ व्याकरण दृष्टिसँ देखल गेल हो कारण ताहि समयक गजलपर कथित क्रांतिकारी गजलकार सभहँक कब्जा भऽ गेल छल। 4) मायानंद जी अपन पोथी “अवान्तर” केर भूमिकाक (ई पोथी 1988मे मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा द्वारा प्रकाशित भेल)। पृष्ठ 6 पर मायानंदजी लिखै छथि “अवान्तरक आरम्भ अछि गीतलसँ। गीतं लातीति गीतलम्ऽ अर्थात गीत केँ आनऽ बला भेल गीतल। किन्तु गीतल परम्परागत गीत नहि थिक, एहिमे एकटा सुर गजल केर सेहो लगैत अछि। गीतल गजल केर सब बंधन (सर्त) केँ स्वीकार नहि करैत अछि। कइयो नहि सकैत अछि। भाषाक अपन-अपन विशेषता होइत अछि जे ओकर संस्कृतिक अनुरूपें निर्मित होइत अछि। हमर उद्येश्य अछि मिश्रणसँ एकटा नवीन प्रयोग। तैं गीतल ने गीते थिक, ने गजले थिक, गीतो थिक आ गजलो थिक। किन्तु गीति तत्वक प्रधानता अभीष्ट, तैं गीतल।” उपरका उद्घोषणामे अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे कतेक दोखाह स्थापना अछि। प्रयोग हएब नीक गप्प मुदा अपन कमजोरीकेँ भाषाक कमजोरी बना देब कतहुँसँ उचित नै आ हमरा जनैत मायानंद जीक ई बड़का अपराध छनि। जँ ओ अपन कमजोरीकेँ आँकैत गीतल केर आरम्भ करतथि तँ कोनो बेजाए गप्प नै मुदा मायाजी पाठककेँ भ्रमित करबाक प्रयास केलाह जे कि तात्काल सफल सेहो भेल। हम अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे बहुत रास एहन मैथिली कहबी केर उदाहरण देने छियै जकर दूनू पाँतिमे वर्णवृत मने बहर छै। जाहि भाषाक कहबी धरि बहरमे हो ओहि भाषामे गजल लिखब-कहब सभसँ आसान छै। मुदा हम जेना कि ओही पोथीमे लिखने छी जे माया बाबू लग मैथिल माटि-पानिक परंपराक कोनो जानकारी ने रहनि ओ बस शब्द सजेबाक फेरमे अपन मजबूरीकेँ भाषाक मजबूरी बना देलाह। माया बाबूक एहि बयानक घोर विरोध भेल सरसजी आ हुनक टीम द्वारा मुदा अफसोच जे सरसजी वा हुनक टीम मायाजीक एहि बयानकेँ गलत करबा लेल कोनो सार्थक डेग नै उठा सकल। माया बाबू जाहि फार्मेटक गजल लिखै छलाह तही फार्मेटमे सरसजी आ हुनक टीम लिखै छलाह। मने दूनू टीम बिना बहरक बहर गजल लिखै छल आ एखनो लिखा रहल। मायानंद मिश्र बनाम सियाराम झा "सरस" बला लड़ाइ गजलक लेल नै ई विशुद्ध रूपें नाम आ सत्ताक लड़ाइ छल। वर्तमान मैथिलीमे "बीहनि कथा" आ "लघुकथा" केर लड़ाइ सन छल ई। वर्तमान समयमे एहि बयान सभहँक सार्थकता प्रो.आनंद मिश्रजी आ मायानंद मिश्रजीक बयानक एखन कोनो सार्थकता नै अछि। दूनू गोटाक बयान मैथिली गजलक असल धाराकेँ छोड़ि कऽ देल गेल छल। मैथिली गजलक असल धारा पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा, काशीकांत मिश्र "मधुप" विजयनाथ झा, योगानंद हीरा, जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" आदिकेँ छुबैत आगू बढ़ल अछि। मुदा हिनकर सभहँक गजलकेँ तात्कालीन संपादक ओ आलोचक द्वारा बारल गेल। जँ हिनकर सभहँक गजलक ओहि समयमे व्याकरणक हिसाबसँ व्याख्या भेल रहैत तँ मैथिली गजलक नकली धाराकेँ आगू बढ़बाक मौका नै भेटल रहितै आ मैथिली गजल गन्हेबासँ बचि गेल रहैत। मुदा दुनियाँक कोनो काज बाँचल नै रहै छै से आब मैथिली गजल आलोचनाक छूटल काज सभ भऽ रहल अछि। डा. रमानंद झा "रमण" ओ डा. रामदेव झाजीक बयानक एखनो सार्थकता अछि कारण ई दूनू बयान गजलक बाहरी पक्षपर छलै। एहन नै छै जे गजल गायिकीसँ मोहग्रस्त पहिनुके गजलकार छलाह। किछु एखुनको गजलकार एहि मोहमे बान्हल छथि आ आगूक किछु गजलकार सेहो बान्हल रहता। तँइ ई दूनू गोटाल बयान भविष्योमे सार्थक रहत। (नोट---- गजलक वा अन्य विधाक संदर्भमे हम किनको नीक विचारकेँ अपना सकै छी। मुदा गलत विचारकेँ सदिखन हम आलोचना करैत रहब। एहि आलेखमे जिनकर मतक समर्थन कएल गेल अछि जरूरी नै जे हुनकर सभ मतसँ हम सहमत होइ आ हुनकर गलतो विचारकेँ नुकबैत रही। काल्हि भेने फेर कियो गजलक असल पक्षक विपरीत जेता हुनकर हम आलोचना करबे करब। कोनो विधामे प्रयोग खराप नै मुदा अपन कमजोरीकेँ विधा वा भाषाक कमजोरी बना देबए बला हमर शिकार होइत रहता।) रबीन्द्र नारायण मिश्र अशांतस्य कुतः सुखम् जीवनमे सभ किछु भेटलाक बादो कखनहुँ काल लोकक मोन होइत रहैत अछि जे कोनो एहन ठाम चली जाहिसँ मोन निचैन भए जाए, सभ किछु बिसरि किछु दिन शान्ति सँ बिताबी आ झंझटिसभकेँ कात कए दी। कखनो-कखनो चिज वस्तुसभ व्यर्थ लागए लगैत छैक, होइत छैक जे कहुना ओहिसभसँ पिंड छोड़ाबी किंवा किछु एहन कए ली जे निश्चिंत रही। से किएक होइत छैक? सबदिन हमसब अपन धीया-पुताक सुख-सुबिधाक हेतु काज करैत रहैत छी। समाजमे, अपन लोक-बेदक बीचमे मान-सम्मान हो, हमरा श्रेष्ठ बुझल जाए, अनकासँ हम सेसर रही, एही लफड़ा सभमे जीवनक मूल्यवान समय चलि जाइत अछि आ अन्तमे हाथ अबैत अछि फोकला। मनुक्खक मोहवंधन ततेक मजगूत होइत अछि जे ओ अन्त-अन्त धरि ओकरे फाँसमे फँसल मेहिआ बड़द जकाँ बहैत रहि जाइत अछि आओर एकदिन मुट्ठी बन्हने एहि दुनियाँसँ प्रस्थान कए दैत अछि। सभ किछु ठामहिँ रहि जाइत अछि।क्यो एकर अपवाद नहि रहैत अछि। आया है सो जाएगा, राजा-रंक फकीर। एक सिंघासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर।। एकबेर एकटा महिलाकेँ लकबा मारि देलकै। ओ अस्पतालमे भर्ती रहथि। बाजल नहि होनि। कै दिनक प्रयासक बाद हुनका कनी-मनी होश भेल। कहुनाक मुँहसँ आवाज फुटलैक। होश होइतहि पहिल बात ओ इएह बाजल जे सूदि वसूलल गेल कि नहि? सोचियौ, जे टाकासँ केहन मोह छलेक ओकरा! जान जाए पर छलैक, अस्पतालक आपत्तिकालीन विभागमे भर्ती छल, हैथ-पैर सुन्न भेल छलैक, मोसकिलसँ कहुनाक आवाज फुटलैक तँ सभसँ पहिने की बाजल? इएह थिक माया। ई जनितो जे सभटा एतहिँ रहि जाएत, लोक अन्त-अन्त धरि टाका बटोरबामे, लूट-खसोटमे लागल रहैत अछि। तखन शान्ति कतएसँ होएत? एकटा राजाक महल लग एकटा लोहार दिन-राति खट-खट करैत रहल छल। राजा एहि बातसँ तंग भए गेलाह। कोनो उपायसँ चाहथि जे एहि खट-खटीकेँ बंद कराबी। एक दिन ओ ओहि लोहारकेँ बजओलथि।लोहार डरा गेल। ओकरा नहि बूझएमे अबैक जे ओकरासँ कोन अपराध भेल जे ओकरा राजा बजा रहल छथि। खैर! ओ राजासँ भेँट करए पहुँचल। ओकरा देखिते राजा कहलखिन जे तोरा जतेक टाका चाही से लए लएह मुदा ई खटर-पटर बंद करह। राजाक बात काटत के? ओ राजासँ यथेष्ट टाका लेलक आ ओहि दिनसँ अपन काज केनाइ बंद कए देलक। काज बंद तँ कए देलक मुदा ओकरा तहिआसँ निन्ने नहि होइक। की करए? कतेको राति करोट बदलैत बीति गेलैक। एहिसँ ओ ततेक तंग भए गेल जे होइक जे जान चलि जाएत। हारि कए ओ राजाक ओतए दौड़ल गेल आ जे टाका लेने छल से आपस कए प्रार्थना करए लागल जे ओकरा अपन काज फेरसँ शुरु करबाक आज्ञा देल जाइक। राजा छगुंतामे पड़ि गेलाह। पुछलखिन जे बात की थिक, ओ किएक टाका आपस कए रहल अछि? लोहार कहलकैक- “सरकार! जहिआसँ काज छोड़लहुँ, हमर सुख चैन हरा गेल। हमरा माफ कएल जाए, हम अपन पहिलका जीवन जीबए चाहैत छी। ओहीसँ हमरा शान्ति भए सकैत अछि।” राजा ओकर समस्या बूझि गेलाह आ ओकर बात मानि लेलाह। तकर प्रातेसँ ओ लोहार अपन काज शुरु केलक। ओहि राति ओ बहुत चैनसँ सुतल। फेरसँ वएह ठक-ठकी सुनि कए राजा बहुत जोरसँ हँसलाह। ई कथा बहुत लोककेँ बूझले होएत, मुदा एहिमे बहुत गंभीर शिक्षा भरल अछि। धन-संपत्तिसँ सुख चैन नहि भेटि सकैत अछि। लोभ-लालचसँ नहि, अनकर हक मारि लेलासँ नहि अपितु परिश्रमपूर्वक उपार्जित धनसँ जीवन-यापन केनेसँ मोनमे शान्ति भेटि सकैत अछि। समस्या अछि जे लोकसभ सभ किछु बूझितो एतेक फिरसान किएक रहैत अछि जखन कि क्यो से चाहैत नहि अछि? कारण सहजे ताकल जा सकैत अछि। अधिकांश व्यक्ति अनकर सुखसँ दुखी रहैत छथि। ओ किएक बढ़ि रहल अछि, ओकर मकान हमरासँ पैघ किएक छैक, ओकर बच्चा कतहुँ पढ़लकैक अछि, ओ सभतँ सभ दिन हमरासभसँ दव रहल आब कतएसँ पैघ भए जाएत? एहीठाम हम मारि खाइत छी। जँ हम सकारात्मक सोच-बिचार राखी, अनको उपलव्धिसँ प्रशन्न हेबाक भाव राखी तँ निश्चय हमरा प्रशन्न हेबाक बेसी अवसर भेटि सकैत अछि। छै ने सत बात? नान्हिटा जीवनकेँ के कोना बिताबए चाहैत अछि से बात बहुत हद धरि ओकरेपर निर्भर करैत अछि। समयतँ बीतिए जाएत चाहे जेना बीता लिअ, हँसिकए बीता लिअ चाहे कानि कए। असलमे कोनो घटना विशेष ककरा पर केहन प्रभाव करत से ओकर प्रवृतिपर निर्भर करैत अछि। ई ओहिना भेल जेना एकटा गिलासमे आधा पानि भरल अछि तँ क्यो कहत जे आधा पानि खतम भए गेल, तँ क्यो कहत जे एखन तँ आधा पानि बाँचले अछि, चिंता कथीक? एकटा अपन मकान बनलासँ कतेक खुशी होइत छैक। तहिना जँ अनको मकानसँ हम खुश हेबाक प्रवृति विकसित कए ली तँ नित्य-निरंतर प्रशन्नताक वरखा होइत रहत एहिमे कनिको शंका नहि। चमक-दमकमे रहनिहार अनेको लोककेँ देखलासँकै बेरि मोनमे होइत छैक जे ई बहुत भाग्यवान अछि, बेस मौजमे जीवि रहल अछि। मुदा ई बात कै बेरि कपोल-कल्पना साबित होइत अछि। कतेको फिल्मी कलाकार आत्महत्या करैत छथि। जौं धन-संपत्ति, ओ सामाजिक प्रतिष्ठासँ लोक सुखी रहैत तँ वएह सभ रहितथि। मुदा से असलियतमे नहि अछि। लोक दिन-राति पूजा-पाठ करैत रहैत अछि, कथी लेल? जाहिसँ मनोकामना पूरा होअए, परिणाम होइत अछि जे पूजा करितो काल हम शांत नहि रहि पबैत छी। हम गाममे कै बेरि पूजा करैत काल लोककेँ चिकड़ैत-भोकरैत देखने छी, महादेवपर जलढ़री करैत काल अनका श्राप दैत सुनने छी, आ कबुला-पाँती करैत तँ के-के ने देखने होएत। जखन माथमे एतेक ओझर लए कए पूजा-पाठ कएल जाएत तँ शान्ति कोना भेटि सकत? भेटत-अहीँ कहू? इएह थिकैक समस्याक जड़ि। यद्यपि आयु बढ़िते जाइत अछि, लोकक मोह घटिते नहि अछि। सभकिछु हमरे भए जाएत से कतहुँ संभव होइक! ई जीवन अपूर्णतासँ भरल अछि। सभ किछु नहि भेटि सकैत अछि। तखन मर्जी अहाँक अछि जे हाय! हाय! करैत रही किंवा जे किछु अदिष्टसँ भेटल तकरा सहर्ष स्वीकार कए संतुष्ट रही। ई बात तँ बूझि गेलिऐक जे शान्तिसँ रही, एकर बहुत नफा छैक, मुदा शान्ति प्राप्त कोना भए सकैत अछि? ताहि हेतु की कएल जाए? की नहि कएल जाए? असलमे उपदेश देलासँ किंबा किताबमे पढ़ि लेलासँ शान्ति प्राप्त नहि कएल जा सकैत अछि। ई तँ जीवन कला थिक एवम् निरंतर अभ्यासेसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। तथापि किछु बात मोटा-मोटी जँ ध्यानमे राखल जाए तँ बहुत रास झंझटिसँ बँचल जा सकैत अछि आओर ओही अनुपातमे शांत जीवन बिताओल जा सकैत अछि। मोनमे संतोखक भाव एवम् अनावश्यक प्रतिस्पर्धासँ बचबाक चाही। आवश्यकताकेँ सीमित करबाक चाही। आय ओ व्ययमे संतुलन हेबाक चाही आ सभसँ जरूरी अछि जे मोनमे लोक कल्याणकारी भावना विकसित करबाक चाही। जे बात अपना नीक नहि लगैत अछि, से अनका संग नहि करी। अनकर उपलव्धिसँ ओहिना प्रशन्न होइ जेना अपनसँ। अनकर निंदासँ बची। परिवारमे सभक उचित महत्व दी। खाली अपने बात चलओनिहारकेँ अन्ततोगत्वा निराशा हाथ लगैत अछि। शान्तिक हेतु जरूरी थिक जे मन कल्याणकारी विचारसँ ओत-प्रोत हो। दोसरक हितकारी भावना हो। जहिना हम अपन प्रगति चाहैत छी, तहिना अनको लेल सोचिऐक। से सभ जौं हमर मोनमे रहत तँ निश्चय हम शान्ति ओ आनंदक अनुभव कए सकैत छी। तखने सुखी रहि सकैत छी। गीतामे कहल गेल अछि जे जकर शान्ति नहि तकरा सुख कतए? नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयत: शान्तिरशांतस्य कुत: सुखम्।। सफलताक रहस्य एहि दुनियाँमे क्यो एहन लोक नहि भेटताह जे अपन अधलाह चाहैत होथि, अपितु सभ एही प्रयासमे लागल रहैत छथि जे संसारक अधिक सँ अधिक सुख-सुविधा हमरा भेटए, सभ मनोकामना पूरा होअए, बाल-बच्चा सुखी रहए। एही प्रयासमे हमसभ निरंतर लागल रहैत छी। एहिमे किछु गलत नहि छैक मुदा समस्या तखन होइत अछि जखन सभ प्रयास केलाक बादो मनोवाँछित फल नहि भेटैत अछि। एहि परिस्थितिमे कतेको गोटे निराश भए जाइत छथि, प्रयास छोड़ि दैत छथि आ कतेको बेर अनुचित रस्ता सेहो अख्तियार कए लैत छथि। कै बेर एहन होइत अछि जे हम कोनो काजमे बर्खोसँ लागल रहैत छी आ जखन लक्ष्य एकदम लगीच रहैत अछि तँ थाकि कए, निराश भए अपन प्रयासकेँ सिथिल कए दैत छी किंबा आधा-अधूरा छोड़ि दैत छी। परिणाम अनुकूल कोना होएत?से नहि होइत अछि, तँ विधाताकेँ दोख देबए लगैत छी। दुनियाँमे ज्यादातर असफल लोक आत्म-चिंतन करबाक बजाए अपन असफलताकेँ हेतु दोसरकेँ जिम्मेदार ठहराबए लगैत छथि। मुदा ताहिसँ की होएत? कोनो प्रकारक काजक सफलताक हेतु जरूरी अछि जे हमर समस्त शक्तिक रचनात्मक उपयोग हो, एकहि संगे दसठाम हाथ देलासँ किछु नहि भए सकैत अछि। कखनो किछु, कखनो किछु जँ करैत रहब तँ बानर बला हाल भए जाएत जे जाही डारिपर जाइत अछि ओकरा दोसर डारि बेसि हरियर लागए लगैत अछि। एकरा लोक कहैत अछि-बनरकूद। कहबाक तात्पर्य अछि जे सबसँ पहिने अपन गंतव्यक निर्धारण करबाक चाही आ तकर बाद संपूर्ण शक्तिसँ ओकरा प्राप्त करबाक प्रयास करबाक चाही। एकटा बात तँ तय अछि जे सफलताक कोनो लघुपथ नहि भए सकैत अछि। आइ धरि जे क्यो व्यक्ति सफल आदमीमे सुमार कएल जाइत छथि तिनक जिनगीसँ ई बात बुझल जा सकैत अछि। अपना देशक भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम साहेब अखबार बेचि कए पेट भरैत छलाह। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी महोदय नेन्नामे चाह बेचैत छलाह। एतेक विपन्नता अछैत ओ सभ अद्वितीय कोना भए गेलाह? ई सोचबाक विषय थिक। एहन कम लोक होइत छथि जे सुविधाक अंबारमे जनमिओ कए पैघ-पैघ काज कए यशस्वी होइत छथि। पैघ उद्येश्य जँ रखने छी तँ ताहि प्राप्त करबाक हेतु तेहने सघन प्रयासो चाही। अर्जुन जकाँ सभकिछु बिसरि मात्र पंक्षीक आँखिपर ध्यान केंद्रित हेबाक चाही आ जँ भीम भाइ जकाँ एकहिबेर सभ किछु देखए लागब तखन की भेटत? फोकला! महान उपलब्धिक हेतु तेहने कड़गर मेहनति करए पड़ैत अछि। तेहने दृढ़ संकल्पक संग दिन-राति एक करए पड़ैत छैक। एहन नहि भए सकैत अछि जे हल्लुक परिश्रमसँ उत्कृष्ट उपलव्धि भए जाइक। अंग्रेजीमे एकटा कहाबत छैक जे “If wish be the horses, poor ride the first” कहक माने जँ इच्छे केलासँ होइक तँ गरीबे सबसँ पहिने घोड़ा चढ़ए। इच्छाक संग-संग प्रयत्नो तेहने घनघोर हेबाक चाही। जेठक दुपहरिआमे जखन रौदसँ मोन आकुल भए जाइत अछि तखन होइत छैक जे कहुना गाछक छाहड़िमे चली। जखन पिआससँ मोन बेकल भए जाइत अछि तखन इच्छा होइत छैक जे हे भगवान! कहुना कतहुँसँ पानि भेटए। तखन लोक ई नहि देखए लगैत अछि जे पानि डबड़ाक अछि कि गंगाजल। केहनो पानि अमृत लगैत अछि। तहिना जीवनक संघर्षक तपिससँ मोन जखन व्याकुल भए जाइत अछि तँ लोक थाकल-ठेहिआएल कहि उठैत अछिः” हे भगवान! आब अहीं पार लगाउ”! संघर्षक समयमे भगवानपर विश्वास बड़का शक्ति दैत अछि। काज करैत रहू आ फलक चिंता हुनका पर छोड़ि दिअ, इएह बात भगवान गीतामे बारंबार कहने छथि। एहि काज करबाक शक्ति बढ़ैत अछि। कने-मने असफलतासँ निराशा नहि होइत छैक आ अन्ततः सफलता तँ भेटिते अछि। मनुक्खक मोनमे परमात्माक बास होइत अछि। तेँ जँ ओ सही प्रयास करए तँ किछु दुर्लभ नहि रहि सकैत अछि। ताहि हेति जरूरी थिक जे लक्षयक प्रति पूर्ण समर्पण होइक। आधा-अधुरा मोनसँ कएल गेल प्रयाससँ सिद्धि नहि भए सकैत अछि। ई बात अक्सर देखल गेल अछि जे हम उत्तम सँ उत्तम फल चाहैत छी, जकरा ककरो लग किछु नीक छैक से हमरा लग किएक नहि रहत? हमसबसँ औअल किएक नहि रहब? से सभतँ ठीक, मुदा जखन प्रयास करबाक गप्प होइत अछि तँ हम पाछा रहि जाइत छी। रामकृष्ण परमहंससँ एकबेर क्यो पुछलकनि जे भगवानक दर्शन कोना होएत? ओ ओहि व्यक्तिकेँ पानिमे डूबा देलखिन आ पुछलखिन जे आब की चाही? ओ चिचिआए लागल-किछु नहि चाही, बस हमरा पानिसँ निकालु। ओकरा तुरंत पानिसँ निकालल गेल। पानिसँ बाहर अबितहिँ ओकरा कहलखिन जे जहिना पानिमे डुबि गेलाक बाद तोरा खाली पानिसँ बाहर हेबाक इच्छा रहि गेलह आओर किछु नहि सुझाह तहिना जखन भगवानकेँ प्राप्त करबाक हेतु एकाग्र हेबह तँ ओहो भेटि जेथुन। एहने खिस्सा एकलव्यक अछि। गुरु द्रोणाचार्य द्वारा शिक्षा नहि देबाक निर्णयसँ आहत ओ गुरुक प्रतिमा बैसाए दिन-राति साधना करए लगलाह आ अपन लक्ष्यकेँ पाबि तेहन निपुण धनुर्धर भए गेलाह जे द्रोणाचार्यो घबरा गेलाह आ ओकरासँ अंगूठा मांगबाक नीचता कए गेलाह। सफलताक कुंजी थिक, आत्मविश्वास। स्वामी रामतीर्थ एकबेर घोर जंगलसँ जाइत रहथि कि एकटा बाघ हुनका सामने आबि गेल। मुदा ओ बिना बिचलित भेनहि ओहि बाघक आँखिमे घुरैत रहलाह आ बाघ अपन रस्ता बदलि लेलक।स्वामीजीक आत्मविश्वाससँ बाघोकेँ रस्ता बदलि लेबाक हेतु विवश कए देलक। जौं हमरा विश्वास अछि जे हम ई काज कए सकैत छी तँ बुझि लिअए काज हेबे करत। देर-सवेर भए सकैत अछि, मुदा होएत। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी हो जाता है। जीवनमे सफल आदमीमे एकटा गुण सभठाम देखबामे आएत जे एहन लोकक रुखि सकारात्मक होइत अछि, ओ दोसरकेँ टंगघिच्चु नहि करैत छथि, अपितु अपन समस्त शक्तिसँ लक्ष्यकेँ प्रप्त करबाक हेतु लागल रहैत छथि। असफलतासँ ओ निराश भए बैसि नहि जाइत छथि अपितु आओर जोरसँ काजमे लागि जाइत छथि। एहने दृढ़ संक्लपी व्यक्ति कठिन सँ कठिन काजकेँ सरल बना लैत छथि आओर सफलताक पराकाष्ठाकेँ प्राप्त करैत छथि। मनः पूतं समाचरेत जीवनमे बहुतरास अप्रिय, अरुचिकर घटनासब घटैत रहैत अछि। कतेको बेर ऐहन घटना घटित भए जाइत अछि जे मनुक्खकेँ हिला कए राखि दैत अछि मुदा एहने समयमे संस्कार ओ ज्ञानक परीक्षा होइत अछि। तकर अभावमे व्यथासँ विचलित लोक गलत रस्ता पकड़ि लैत छथि आ कै बेर अनर्थ कए बैसैत छथि। हालमे दिल्लीक बुरारीमे घटित लोमहर्षक घटना समस्त जागरुक व्यक्तिकेँ हिला कए राखि देलक। ऐकहिटा परिवारक एगारह गोटे दूपहर रातिमे फाँसी लगा कए मरि गेलाह। सभगोटे एकदम स्वस्थ छलाह। परिवार आर्थिक रुपसँ समृद्ध छल। राजस्थानसँ बीस-बाइस साल पहिने दिल्ली आबि कए ठीक-ठाक हालतमे छलाह। परन्तु की भेल जे पूरा-क-पूरा परिवार स्वयं फाँसीक फंदा बना झुलि गेल? जाँच-पड़तालमे ई बात आबि रहल अछि जे ओ सभ तंत्र-मंत्रक चक्करमे पड़ि गेल छलाह। हुनकासभकेँ ई अंधविश्वास छल जे एहि तरहेँ मरलासँ हुनका सभकेँ मुक्ति भए जाएत। कहि नहि सत्य की छल मुदा भेल तँ अनर्थे। सभतरहेँ जूड़ल-अटल परिवार सदा-सर्वदाक हेतु नष्ट भए गेल आ सेहो धर्मक नामपर। तेँ मनुक्खकेँ चाही जे आँखि खोलि कए राखथि। ककरो बातपर बिना सोचने-बिचारने विश्वास नहि करथि। सोचएबला बात थिक जे फाँसी लगा कए मरि गेलासँ मुक्ति कतएसँ भेटत। एहन सुन्दर जीवनकेँ व्यर्थमे गमा देब मूर्खता नहि तँ की थिक? आँखि मूनिकए ककरो चेला भए जाएब कोनो हिसाबे उचित नहि अछि। आई काल्हि बहुत रास ढ़ोंगी बाबा सभ धर्मक नामपर लोककेँ ठकैत देखल जाइत छथि। ककरो बातकेँ बिना सोच-विचारकेँ नहि मानक चाही। अपन माथा जरुर लगाबक चाही। कहब छैक जे मनः पूतं समाचरेत। जखन अपन मोन मानि जाए तखने कोनो काज करी। अपन जीवन-यापन करबा जोग वुद्धि भगवान सभकेँ देने छथि। तकर सही उपयोग कएल जाए तँ बहुत रास दुर्घटना सँ बचल जा सकैत अछि। कहक माने जे अंधभक्त नहि हेबाक चाही। बहुत रास लोकसभ फिरसान भए बाबा सभहक चक्करमे पड़ि जाइत छथि। एहन बाबा सभक आइ-काल्हि कमी नहि अछि। जतहिँ देखू, जटा-जूटधारी बाबा तृशूल चमकबैत भेटि जएताह। हुनका सभसँ बचिकए रही एहीमे कल्याण अछि। कारण ओ धन-धर्म सभ पर हाथ फेर दैत छथि। कै बेर तँ जानोसँ लोक हाथ धो लैत छथि। सोचएबला बात अछि जे कै बेर पढ़ल-लिखल लोको एहन बाबा सभक चक्करमे पड़ि जाइत छथि। तकर की कारण? असलमे जखन लोक वास्तविकताकेँ नहि स्वीकार करैत छथि किंबा परिस्थितिसँ ताल-मेल नहि बैसा पबैत छथि, तखने एहन मानसिकता जोड़ मारैत अछि आ गलत-सलत काज लोक करए लगैत अछि। कहल जाइत अछि जे जँ अपना मोनक हो तँ नीक, जँ अपना मोनक खिलाफ भए जाऐ तँ आओर नीक। कारण जे अपना मोनक नहि भेल से बुझु जे भगवानक मोनक छनि किंवा हुनकर आदेश छनि, से बुझि आगतकेँ स्वीकार करैत आगा बढ़ि जाउ। जीवनमे नीक बेजाए होइत रहैत अछि। क्यो एहन व्यक्ति नहि भेटत जे सभ दिन नीके देखने होथि। नीक-बेजाए समयकेँ साहस पूर्वक झेलैत जे चलैत रहि जाइत छथि, बीच रस्तामे थाकि कए, हारि कए काजकेँ आधा-अधूरा छोड़ि नहि दैत छथि,वएह कीर्ति करैत छथि,यशक भागी होइत छथि। सही रस्तापर चलनिहार व्यक्तिकेँ बहुत याचना होइत अछि। बच्चामे हमरासभ सत्य हरिश्चन्द्रक नाटक देखने रही। केहन,केहन दिक्कतिसँ हुनका सामना करए पड़ल। एकटा प्रसिद्ध राजा सत्यक रक्षा करैत-करैत भिखमंगा भए गेलाह। ई हालत भए गेलनि जे पुत्र रोहितक मृत लहासकेँ जड़ेबाक हेतु कोनो व्योत नहि गेलनि। ऐहन दारूण दुख भगवान ककरो नहि देथि। मुदा ओ सत्यक मार्गपर अडिग रहलाह आ अन्ततोगत्वा विजयी भेलाह। कहक माने जे जीवनमूल्यक रक्षाक हेतु जँ कष्टो सहए पड़ए तँ अगुतेबाक नहि चाही, अपितु दृढ़तापूर्वक न्यायक मार्ग पड़ चलैत रहबाक चाही। अपना देश-समाजमे कमे एहन लोक होइत छथि जिनका सभ किछु बनल-बनाएल भेटि जाइत छनि। अधिकांश लोककेँ सभ किछु हेतु संघर्ष करए पढैत छनि। जीवनक मूलभूत आबश्यकता जेना आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य हेतु सेहो मोसकिल रहैत अछि। अधिकांश लोक तँ संघर्ष करतहि जनमैत छथि आ ओही हालमे दुनियाँसँ चलि जाइत छथि। किछु एहनो लोक छथि जिनका भगवान ततेक दए देने छथि जे फुराइते नहि छनि जे की करी? एहन लोककेँ विवेकसँ काज लेबाक प्रयोजन अछि। जँ सही व्यक्तिक हाथमे संपदा आबि जाइत अछि तँ ओ बहुत कयाणकारी भए सकैत अछि, हजारो, लाखोक तायदादमे जरुरतमंद, दुखी, ओ आर्तलोकक जीवनकेँ बदलि सकैत अछि, मुदा से होइक तखन ने? लोकसभ अपने धरि सीमित रहि जाइत छथि आ तखन कहताह जे मोनमे शान्ति नहि अछि, फिरसान छी, आदि, आदि। जरुरी एहि बातक अछि जे परिस्थितिसँ तालमेल बैसा कए चली। जाहि बातपर अपन बश नहि अछि तकरा स्वीकार करी एवम् जीवनमे आशावादी रुखि राखी। सभसँ जरुरी अछि जे ईश्वरमे विश्वास राखी। भगवानक घरमे देर अछि अन्हेर नहि अछि। अस्तु, धैर्यपूर्वक कर्तव्य कर्मकेँ करैत रहब तँ देर-सवेर जरुर सफलता भेटत। एहि बातकेँ ध्यानमे रखैत जीवन यात्राकेँ यथासाध्य शान्तिपूर्ण ढ़गसँ बिताबक चाही। जीवनमे सही दृष्टिकोण एवम् आशावादी रुखि रखलासँ बहुत रास संकटसँ बचल जा सकैत अछि, कमसँ कम ढ़ोंगीबाबाक चक्करसँ तँ जरुरे बचब। अस्तु, सबसँ जरुरी अछि जे हमर बुद्धि शुद्ध होअए जाहिसँ हमसभ नीक-बेजाएक बिचार करैत जीवन यात्राकेँ मर्यादापूर्वक बिता सकी। दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्। शास्त्रपूतं वदेद्वाक्यं मनः पूतं समाचरेत् ॥ -चाणक्य नीति ई समय ककरो नहि हम श्यामा भगवतीक दर्शनक हेतु गेल रही। महाराजा रामेश्वरक चितापर बनल ओहि भव्य मन्दिरक अद्भुत सौन्दर्य अछि। टुह-टुह सिंदुरिआ रंगमे रंगल मन्दिरक दहिना कात पोखरि अछि जकर जमकल पानिमे हाथ देलासँ स्वच्छता बढ़क बदला घटि सकैत अछि। मोन पड़ि गेल जे जखन सी.एम. कालेज दरभंगामे विद्यार्थी रही तँ एठि ठाम आबी, भगवतीक दर्शनक बाद पोखरिक घाटपर बैसल करी। ओहि समय पोखरिक हालक बेहतर छल। श्यामा मन्दिरमे माँकालीक भव्य मूर्ति ओहिना चमकैत, दमकैत छल। भक्तगणक श्रद्धा ओहिना वा कि पहिनहुँसँ बेसी बुझाइत छल। मन्दिरमे कै ठाम भक्तसभ पूजा पाठमे तल्लीन छलाह। “मिथिलेश रमेशस्य चितायं सुप्रतिष्ठित। श्यामा रमेश्वरीपातु रमेश्वर कुलोद्रवान्।” मन्दिरक मुख्य द्वारपर लिखल उपरोक्त श्लोक कतेक बेर पढ़ैत रहलहुँ। श्यामा मन्दिरक बाहर आ अंदरमे प्रसादक विक्रय होइत अछि। अन्दरेमे प्रसाद किनलहुँ। भगबतीकेँ प्रसाद चढ़ओलाक बाद कनीकाल ओतहि बैसि गेलहुँ। कनी कालक बाद बाहर भेलापर चिंता भेल जे प्रसादकेँ बानरसँ कोना बचाबी कारण एकबेर एहिना प्रसाद चढ़ाकए निकलल रही कि एकटा बूढ़बा बानर कहाँसँ दौरल आएल आ प्रसाद लुटि लेलक। हम अबाक देखैत रहि गेल रही। अस्तु, प्रसादकेँ अंगाक अंदर कहुना कए नुकौलहुँ। बाहर आगू बढ़लापर चारूकात कोनो-ने-कोनो महराजक चितापर बनल मन्दिर सभकेँ देखैत मोनमे दरभंगा महराजक अकूत संपत्ति आ ओकर अपव्ययपर ध्यान हठात चलि जाएब कोनो भारी बात नहि। जँ एहि धनक उपयोग एतेक रास मन्दिरक बजाए जनताक कल्याणमे खर्च कएल जाइत तँ लोक समृद्ध होइत, आ महाराजो यशस्वी होइतथि। मुदा जे हेबाक छल से भेल। महराजक राज चलि गेल। बड़का-बड़का देबार सभ ढहि गेल। राजक हाताक अन्दरक जमीन सभ बिका गेल। आब ओहिठाम होटल अछि, दोकान अछि, सामान्य व्यक्ति सभक घर अछि। ने वो रामा ने वो खटोला। महाराजाक गौरब-गरिमाक बखान करए हेतु ढहैत, ढनमनाइत राज परिसरक दुर्दशा अन्तहीन भए गेल अछि। श्यामा मन्दिरक आस-पास बनल आओर मन्दिर सभ कतेको बेर गेल छी। तें रिक्सा पकड़ि सोझे शुभंकरपुर बिदा भए गेल रही। मोनमे होइत छल जे जँ महराज वा हुनकर सलाहकारक जन कल्याणमे कनिको रूचि रहैत तँ आइ मिथिलाक लोकक भविष्ये किछु आओर होइत। काली मन्दिरसँ आगा बढ़लापर मिथिला विश्वविद्यालयक विशालकाय परिसर आएल। दरभंगा महराजक ओहि महल सभकेँ सरकार अधिग्रहण कए ओहिमे विश्वविद्याल स्थापित कए देलक। महराजक राज-पाट नाम सभ चलि गेल। एतबो नहि भेल जे वोहि विश्वविद्यालयक नाममे महराजक नाम रहैत। मुदा भावी प्रवल। समय बलबान होइत अछि। “जो उग्या सो अन्तवे, फूल्या सो कुमलाही जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाही।” कबीरदासक उपरोक्त कथन ध्यानमे आबि रहल छल। संसारक नियम अछि जेकर उदय भेल तकर अस्त होएत। समय रहिते जे किछु कए गेल वएह रहि जाइत अछि। विश्वविद्यालयक दहिनाकात बदरंग भेल इन्द्रपूजा स्थली आ तकर सामने बड़ीटा खाली मैदान- बिना कोनो देखरेखकें। आश्चर्यक बात थिक जे एहि ऐतिहासिक, सांसकृतिक धरोहरक रखरखावक उचित व्यवस्था किएक नहि भए रहल अछि? कनीक आगा बढ़ब तँ बड़का-बड़का देबार जे महाराजा सभ बना गेलाह, ओहिमे यत्र-तत्रगाछ सभ जनमि रहल अछि। देबारक बीचमे बनल हनुमानजीक मूर्तिकेँ लोक सभ पूजा करैत देखाइत। आश्चर्यक बात ई थिक जे बिना कोनो देखरेखकेँ एतेक पुरान देबार सभ अखनो ठाढ़ कोनो अछि? श्यामा मन्दिरसँ शुभंकरपुर लौटबाक क्रममे महराजी पूलसँ पहिने जाम लागि गेल छल। रिक्सा आगू नहि बढ़ि सकैत छल। संगहि साइकल, स्कूटर, ठेला, पैदलयात्री, कार आ पैदलयात्री तेना ने लदमलद भए गेलाह जे कनी काल लेल भेलैक जे आब एतहिसँ आपस होमए पड़त। पैरे जेबाक सेहो जगह नहि बाँचल छल। चुप-चाप रिक्सा पर बैसल रहि जेबाक अतिरिक्त किछु विकल्प नहि छल। जाबत ओहि जामकेँ हटि जेबाक प्रतीक्षा करैत रही ताबतेमे किछु गोटे “राम नाम सत्य है, सबका यही गत्त है” बजैत एकटा मृतककेँ कान्हपर उठौने ओतहि आबि कए अटकि गेलाह। हुनका पाछा- पाछा कतेको लोक चलि रहल छलाह जे मृतकक अन्तिम संस्कारक हेतु वएह सभ बजैत चलि रहल छलाह। कहुना कए कनीक जाम खुजलै। उसास पबिते अन्तिम यात्रापर निकलल वोहि मृतक आ तकरा कान्ह देनिहार सभकेँ लोक सभ आगा जाए देलक। महराजी पूल पार करैत वो सभ आगा बढ़ि गेलाह। हम ताधरि रिक्सेपर थामहि प्रतीक्षा करैत रही जे आब लोक आगा बढ़त तँ ताब। कनीके कालक बाद फेर वएह ध्वनि। “राम नाम सत्य है, सबका यही गत्त है...।” किछु गोटे मृतककेँ कान्ह देने छलाह। आगा आगा गोरहाक सुनगैत आगि, कोहा लेने कर्त्ता आ तकर पाछा पाछा मृतकक महायात्राक गवाह सभ राम नामक महिमा गबैत आगा बढ़ि नहि सकबाक कारणें ओहिठाम ठमकि गेल रहथि। हम रिक्सापर रही आ ठीक हमरा सामानान्तरमे पीताम्बरीसँ आवृत, गेनाक फूलसँ लादल वोहि मृतकक निष्प्राण शरीर छल। ओहि दिवंगत आत्माकेँ मोने-मोन प्रणाम कएल। किछु-किछु सोचाए लागल। मोन कनी एमहर ओमहर भेल। ताबे जाम कनी ढील भेलैक। ओ सभ राम नाम सत्य है, सबका यही गत्त है, बजैत आगा बढ़ि गेल। आ हम रिक्सासँ महराजी पुलपर चढ़ि गेलहुँ। कनीके आगा पुलपर रिक्सा चढ़ले छल कि फेर वएह ध्वनि। राम नाम सत्त है, सबका यही गत्त है। किछु गोटे एकटा मृतकक शवयात्राक संगे राम नामक महिमा गबैत आगा बढ़ि रहल छलाह। मृतकक फूलक मालासँ लादल चारि गोटेक कान्हापर आगा बढ़ि गेल। अगल-बगल कतेको लोक मूकदर्शक छलाह जेना कोनो खास बात नहि भेल हो। तरकारी वाली तरकारी बेचि रहल छल। माछक दोकानपर ओहिना माछक खण्ड बिका रहल छल। कोन पर चाहक दोकानपर लोक चाह पीबि रहल छलाह। कतहु कोनो प्रकारक आलाप, प्रलाप नहि। रिक्साबला गप्पक क्रममे कहलक जे एहिठाम तँ नित्य एहने दृष्य रहैत अछि। आगा बनल श्मशान घाटमे ओकर दाह संस्कार होइत अछि। संभवत: मृत व्यक्ति सभ वृद्ध छलाह जाहिसँ वातावरणमे, संगे कटिहारी गेनिहार लोकोमे कोनो भाव विह्लता देखबामे नहि आएल। ओहि दिन साँझमे ओही सड़क बाटे फेर जेबाक अवसर भेटल। हम सभ बरिआती जा रहल छलहुँ। महराजीपुलसँ पहिने जाम लागि गेल छल। लोक ठसाठस भरल छल। हमरा आगा पाछा दोसर बिआहक बरिआती छल। लोककेँ आगू पाछू घसकबाक रस्ता नहि भेटि रहल छल। सजल- धजल बरक कार ठामहि छल कि आगूसँ अबैत कोनो दोसर गाड़ी पों-पों’क आबाज करए लागल। के आगा बढ़त, के पाछा जाएत, कोनो ठेकान नहि। आधा घण्टा धरि ई स्थिति बनल रहल। फेर केना-ने-केना रस्ता खुजल। लोकसभ आगा बढ़ल। हम अपन कारमे आगा बढ़लहुँ। शेष बरिआती, बर पाछा छुटि गेल छल, तथापि ओहिठाम ठाढ़ भाए प्रतीक्षा करब उचित नहि छल। एक्के दिनमे एकहिठामसँ तरह तरहक दृष्य गुजरि गेल छल। राम नाम सत्य है’सँ लए शहनाइक धूनपर नचैत गबैत जाममे थकमकाएल बरियातीक धमाचौकरी देखएमे आबि रहल छल। मुदा ओही स्थानक चारूकात बैसल, ठाढ़ लोक सभ हेतु धनि सन। ने हर्षो न च विष्मय :। असलमे कोनो घटना विशेष अपने आपमे ताधरि कोनो माने नहि रखैत अछि जाधरि हम ओहिसँ कोनो- ने-कोनो कारणसँ जुड़ि जाइत छी। तात्पर्य ई जे कोन वस्तु हमरा कष्ट देत आ ककरासँ सुख होएत ओ पूर्णत: ओहि वस्तु विशेष वा घटना विशेषक प्रति हमर रूखिपर नर्भर करैत अछि। अस्तु, एकहि दिनमे श्यामा मन्दिरसँ शुभंकरपुरक मध्य कतेको तरहक दृष्य देखबामे आएल। कतेको पुरान घटना सभ स्मृति पटलपर फेरसँ उगि आएल। ई समय ककरो नहि अछि। दरभंगा महराजक नहि अछि, आम आदमीक नहि अछि। मोन हो कठिआरी जाउ, मोन हो बरियाती भए जाउ। मुदा समय ठाढ़ नहि रहत। भोर साँझमे बदलि जाएत। छोड़ि जाएत मोनक कोनो कनतोसमे एकटा आओर निसान जे दिन भरिक घटनाक क्रम देने गेल। काल्हि फेर प्र:काल ओहिना सूर्य उगताह, दिन भरि किछु ने किछु होइत रहत, साँझ होएत। सभटा होएत, मुदा हमर अहाँक जिनगीक एकटा आओर दिन कम भए जाएत। समयकेँ की हेतै? ओ तँ एहिना आगू चलैत जाएत। गुजरि जाएब हम ओहिना जेना कतेको गुजरि गेलाह आ लोक राम नाम सत्य है..., कहैत महराजीपूलक एहि पारसँ ओहि पार भए जाएत। घमंड जीवनमे बहुत रास अनुभव होइत रहैत अछि। नित्य किछु ने किछु एहन घटना घटित होइत अछि जे हमर आँखि खोलि सकैत अछि मुदा से होइत कहाँ अछि? हमसभ नियतिवश चलिते जा रहल छी, सोचि नहि पबैत छी जे हम एना किएक कए रहल छी? ई बात प्रायः सभ जनैत अछि, जे जन्मल अछि से मरत। मृत्यु अवश्यंभावी अछि, तथापि हमसभ सोचैत रहैत छी जे हम तँ अहिना रहब। युधिष्ठिर द्वारा यक्षकेँ देल गेल एहने प्रश्नक उत्तर एखनो ओहिना सार्थक अछि जहिना ताहि समयमे रहल होएत। आखिर एना कोना होइत अछि जे हम सद्यः घटित होइत घटनाक प्रति अनजान बनल रहि जाइत छी आओर एकदिन सभ किछु एतहि छोड़ि कए सभदिनक हेतु एहि दुनियाँसँ आँखि मुनि लैत छी। आखिर किछु तँ छैक जे मनुक्ख मात्रकेँ निरंतर ओझरौने रहैत अछि। हम निरंतर अपन आस्तित्वक रक्षाक हेतु संघर्षशील रहैत छी। हम जे कहैत छी से लोक मानए, हमर महत्व बुझए एवम् हमर श्रेष्ठत्वकेँ स्वीकार करए। एहिसभक पाछा हमर घमंड प्रमुखतासँ मुखरित होइत रहैत अछि। जीवनसँ लए कए मृत्यु पर्यंत हमरा लोकनिक व्यवहारकेँ पाछा ई तत्व विद्यमान रहैत अछि। हम जाने-अनजाने दोसरसँ अपनाकेँ श्रेष्ठ साबित करबाक फेरमे पड़ि अपन जीवनकेँ तँ अशांत केनहि रहैत छी, संगहि दोसरोकेँ तंग कए दैत छी कारण एहन स्वार्थमूलक सोचसँ व्यक्तिक अहंमे टकराव उतपन्न होइत अछि आओर लोक अपनाकेँ पैघ देखेबाक प्रयासमे दोसरकेँ छोट साबित करए लगैत अछि। परिणाम होइत अछि, व्यर्थक अनवरैत चलैत अन्तरद्वंद। मान-सम्मान, प्रतिष्ठाक लिप्सा मनुक्ख मात्रमे ततेक बलबती रहैत अछि जे ओ कोनो हालातमे ताहि हेतु किछु करए हेतु तैयार रहैत अछि। लोक हमरा बुझए, मान्यता दिअए, हम समाजमे देखगर लोकमे गनल जाइ, एहि समस्त भावनाक पाछा जँ देखल जाए तँ ओकर घमंडे काज करैत रहैत अछि। एहन घटना नित्य-प्रति देखएमे अबैत अछि जे कतेको गोटे बेबजह अनकर मामलामे टांग अरबैत रहताह। जेना कि ओ चैनसँ रहिए नहि सकैत छथि। एहन आदमी हेतु इहो कहल जा सकैत अछि जे ओ अपन चालिसँ लाचार छथि। कोनो, ककरो बात उठल कि ओ अपनाकेँ ओहि बीचमे ठाढ़ कए देताह। तरह-तरहक ब्यर्थ उदाहरण दैत रहताह जाहिसँ ई कहुना सिद्ध होउक जे हुनके टा सभबातकेँ बुझए अबैत छनि किंबा ओ जे कहैत छथि सैह व्रह्मसत्य थिक। एहन आदमीकेँ अहाँ की कहबैक? “एकोहं द्वितीयो नास्ति” -एहि तरहक सोच कोना कारगर भए सकैत अछि? हमर गाममे एकबेर श्राद्ध भोज होइत रहए। एकटा प्रतिष्ठित व्यक्तिक देहावसान भए गेल छल। अपना जीवन कालमे ओ खूब संपत्ति अर्जित कएलाह। बहुत संघर्ष कए आगा बढ़लाह। तखन तँ मृत्यु सभक होइत अछि से हुनको भए गेलनि। अपने जीवनमे लीखसँ लाख करबाक पुरषार्थ हुनकामे भगवान देलखिन। मृत्युक बाद लोकसभक आग्रह जे जबार होउक, एतेक संपत्ति अरजि कए गेल छथि। मुदा से तँ नहि भेलैक, गामे लए कए भोज हेबाक निश्चय भेलैक। संयोगसँ हमहूँ हालेमे सेवा निवृत भेल रही आ गामे पर रही। भोज खेबाक हेतु गेलहुँ तँ देखैत छी एकटा हमर ग्रामीण, जे भरि जिनगी बाहर कमाइत रहलाह, घरक दरबाजाकेँ गछारि कए ठार भेल छथि, गरजि रहल छथि, बारंबार चेता रहल छथि जे एक-एक कए लोक अन्दर जाथि। हुनकर चिकरब-भोकरब ततेक प्रखर चल जे अनेरे ककरो ध्यान हुनका पर पड़ि जाइत छल। एवम् प्रकारेण हुनका अपन महत्वक प्रदर्शन करबाक आ ताहिसँ संतुष्टिबोध प्राप्त करबाक पर्याप्त अवसर भेटलनि। जँ ओ नहि चिकरितथि, किंवा घरक केबार धए ठाढ़ नहि रहितथि, लोक अपने अबैत जाइत, तैओ भोज भए जैतैक, प्रायः बेसी नीकसँ होइतैक कारण ओ तँ अनेरे केबारकेँ पकड़ि चिकरि कए महौलकेँ गड़बड़ा रहल छलाह, मुदा हुनका तँ देखेबाक रहनि जे ओ एतेक महत्वपूर्ण व्यक्ति छथि, सबके कस्तन कए रहल छथि, हुनके आज्ञासँ लोक भोज खाए अन्दर जाएत नहि तँ ओतए बबाल भए जाएत। बिचारि कए देखबैक तँ एकरा व्यक्ति विशेषक घमंडक अतिरिक्त किछु आओर नहि कहल जा सकैत अछि। की पैघ, की छोट सभ क्यो कतहुँ ने कतहुँ, कहुना ने कहुना घमंडक चपेटमे पड़िए जाइत छथि। शास्त्र-पुराणसभमे सेहो कतेको एहन प्रसंगक वर्णन अछि जाहिमे एक सँ एक संत महात्मा, देवी-देवता एकर प्रकोपमे पड़ि गेलाह। महाभारतमे एहि सम्बन्धमे बहुत मार्मिक घटनाक वर्णन अछि। एकबेर हनुमान बूढ़ बानरक रूपमे भीमके रस्तामे बैसि गेलाह। भीम हुनका अपन नाङरि हटेबाक हेतु कहलखिन कारण हुनका जल्दी जेबाक रहनि मुदा ओ बानर टस सँ मस नहि भेल, उल्टे व्यंग करैत कहलकनि जे जखन अहाँ एतेक बलवान थिकहुँ तँ नान्हिटा हमर नाङरिकेँ उठाए किएक नहि आगू बढ़ि जाइत छी? भीमकेँ ई बात बहुत अनर्गल बुझेलनि आओर ओ ओहि बूढ़ बानरक नाङरिकेँ हटबएमे लागि गेलाह, सभ प्रयत्न कए थाकि गेलाह मुदा नाङरि ठामहि रहल। हारि कए भीम कहलखिन जे अहाँ साधारण बानर नहि छी, के छी से सत-सत बाजू। तखन हनुमानजी अपन भेद खोलि कहलखिन जे हम आहीँक भाए हनुमान छी। भीम बहुत लज्जित भेलाह आ हुनकासँ घट्टी मानलथि। एहि तरहेँ हनुमानजी हुनकर घमंडकेँ चकना चूर केलाह। कहक माने जे घमंड एकटा एहन व्याधि थिक जे अनेरे हमरा लोकनिक आँखिपर पट्टी लगा दैत अछि आ हम सत्यकेँ देखितहुँ ओकरासँ फराक रहि जाइत छी। घमंड किंवा अहं केर टकरावसँ कतेको लोकनिक पारिवारिक जीवान नर्क भए जाइत अछि। हम ककरासँ कम? हमरा ई कहलक, ओ कहलक, हम ओकर बात किएक सहबैक, एहने-एहने छोट-छोट बातकेँ पकड़ि कए लोक धए लैत छथि जाहिसँ आपसी प्रेम ओ विश्वास नष्ट भए जाइत अछि, बात ततेक बढ़ि जाइत अछि जे सम्बन्ध विच्छेद धरि भए जाइत अछि। जौं एहन समयमे क्यो बुझनिक होथि, एक डेग पाछा भए जाथि, हारि मानि लेथि तँ बहुत रास परिवार खंडित हेबासँ बँचि सकैत अछि, बहुत रास धीया-पुताकेँ पारिवारिक आश्रय बनल रहि जाएत एवम् परिवारमे समन्वय, शान्ति बनल रहत। मुदा ई बात बुझब आ बुझिओ कए व्यवहारमे आनब कै बेर बहुत मोसकिल भए जाइत अछि कारण क्यो अपन अहंकेँ छोड़बाक हेतु तैयारे नहि होइत अछि। परिणाम सामने अछि। नान्हिटा टेल्हकेँ माए-बापक बीच कलहक दृष्य देखए पड़ैत छैक। बच्चासभ घरक वातावरणसँ तंग भए घरसँ भागल-भागल रहए लगैत अछि आ गलत संगतिमे पड़ि कए कै बेर नशेड़ी भए जाइत अछि। सोचए बला बात अछि जे माए-बापक व्यर्थक अहंक कारण एहन वच्चाक भविष्यक संगे कतेक अन्याय होइत अछि? एहन नहि अछि जे कमे पढ़ल-लिखल लोक घमंडक प्रदर्शन करैत छथि अपितु एक सँ एक विद्वान ओ पैघ-पैघ लोकमे एकर व्यापक प्रभाव देखएमे अबैत अछि। जे जतेक पैघ तकर घमंड ततेक विनासकारी भए सकैत अछि। इराकक राष्ट्रपति सद्दाम ओ अमेरिकाक राष्ट्रपति बुशके बीच जे एतेक भारी युद्ध भेल तकर पाछु की छल? महज अहंक टकराव? जहिना गाम-घरमे मूर्ख लड़ैत अछि तहिना ओ सभ आपसमे ताधरि लड़ैत रहलाह जाधरि सद्दामक विनाश एहि हदधरि नहि भए गेल जे ओ अपन प्राणोसँ हाथ धोलक। बादमे पता चलल जे ओकरा लगमे कोनो रासायनिक हथियार नहि छल जकरा आधार बनाए इराकपर अमेरिका आक्रमण केलक। कार्यालयमे अधिकारी लोकनि कए बेर अहं पर चोट पड़लापर अधीनस्त कर्मचारीकेँ तबाह करबाक कोनो ब्योंत बाम नहि जाए दैत छथि। बदली कएदेब.काजसँ हटा देब आ ताहुसभसँ संतोष नहि भेलनि तँ नौकरीसँ मुअत्तल कए देब सामान्य बात थिक। जे ततेक पैघ अधिकारी तिनक अहंसँ ततेक बेसी सावधान रहब जरुरी थिक। काज करी वा नहि करी मुदा हुनकर सलामीमे कोनो कमी नहि हेबाक चाही। जँ से भेल तँ अहाँक भगवाने मालिक। असलमे घमंडी व्यक्ति भीतरसँ असंतुष्ट होइत छथि। हुनका लगैत रहैत छनि जेना सौँसे दुनियाँ हुनका पाछा पड़ल अछि, जेना क्यो हुनका संगे न्याय नहि कए रहल अछि, एहि तरहक फिजुल बातसभ हुनकर मोनमे बैसल रहैत अछि जाहि कारणसभ हुनकर व्यवहार स्वयं असंतुलित भए जाइत अछि किंवा लोकसँ बहुत बेसीक अपेक्षा रखैत अछि। परिणाम ई होइत अछि जे ओ बात-बात पर लोक सभसँ मरए-कटए हेतु तैयार रहैत छथि। सोचबाक बात थिक जे एहन लोककेँ शान्ति कतएसँ भेटि सकैत अछि आ “अशांतस्य कुतो सुखम्?” एहि तरहक अशांत प्रवृतिक लोकमे घमंड भरल रहैत अछि। जाहिर अछि जे एहम लोक आस-पासकेँ लोककेँ तरह-तरहसँ कष्ट पहुँचबैत छथि। अपने तँ दुख कटिते छथि दोसरोक जीवनकेँ नर्क कए दैत छथि। घमंड कतेको कारणसँ भए सकैत अछि आ कए बेर तँ बिना कोनो औचित्यकेँ स्वभाववश सेहो लोक घमंडी भए जाइत अछि। एहन उदाहरण अहाँकेँ कतेकोठाम देखबामे आएत। हमरा गाममे एकटा भिखमंगा कहिओ काल अबैत छलाह। यद्यपि ओ भिख चाहैत छलाह मुदा हुनक बाजबाक चहटिसँ क्यो नहि कहैत जे ओ भिखमंगा थिकाह। असलमे ओ पहिने बहुत धनीक छलाह मुदा कालक्रमे गरीब भए गेलाह। जमीन-जायदाद बिका गेलनि। कहबी छैक जे जौर जड़ि गेल मुदा एंठन अछिए। सैह गप्प छलैक। महाभारतमे खिस्सा अछि जे द्रोपदीकेँ अपन सौंदर्यपर बहत घमंड रहनि आओर गाहे-बगाहे ओ एहि कारणसँ कतेको शत्रु बना लेलीह। परिणामसभकेँ बुझल अछि। मामला द्रोपदी चीर हरणधरि पहुँचि गेल। की-की तमाशा ने भेल। भयानक युद्ध भेल आओर समस्त परिवार विनाशकेँ सीमानधरि पहुँचि गेल। कहक माने जे घमंड चाहे जिनका होनि, आओर जाहि कोनो कारणसँ होनि, एकर परिणाम खराबे होइत अछि। घमंड एकटा मानसिक रोग थिक जे मनुक्खकेँ सत्यक दर्शन करएसँ ओहिना रोकि दैत अछि जेना सीसीमे कोनो वस्तुकेँ पैसबासँ ठेपी। घमंडी व्यक्ति एक हिसाबे आन्हर होइत अछि जे मदांध भए सही विचारकेँ कदापि नहि सुनैत छथि। एहने मानसिकता रावणकेँ रहैक जाहि कारणसँ घरहंज भए गेलैक, सभ किछु नष्ट भए गेलैक। मेघनाद सन बीर ओ तेजस्वी संतानसँ हाथ धोअए पड़लैक, कुंभकरण सन भातृभक्त भाए मारल गेलैक, विभीषण घर छोड़ि भागि गेलाह। सभ ओकरा बुझबैत रहलैक, एहि हद धरि जे मंदोदरीक कथन धरिकेँ ओ सौतिआ डाह कहि अपमानित केलक। परिणाम सभकेँ बुझल अछि। अस्तु, घमंड सर्वथा त्याज्य थिक। जँ बिचारि कए देखल जाए तँ एहि दुनियाँमे कोनो तरहेँ पार पाएब आसान नहि अछि। पढ़ले देखू तँ एक सँ एक विद्वान छथि। आइन्सटाइन, सेक्सपीयर, कालीदास, राधाकृष्नन, कतेको नाम अछि, ककर नाम लेब, ककर छोड़ब, पन्नाक पन्ना भरि जाएत। धनिकमे गिनती करब तँ गनिते रहि जाएब। एहिना पद, सौंदर्य, वुद्धि सभ तरहेँ एकसँ एक लोक एहि संसारमे भेलाह आआोर छथिहो। तखनो जँ क्यो कथुक घमंड करैत छथि तँ की करबै? हँसबे करबै ने? अस्तु, विनम्र होएब सबसँ नीक ऐश्वर्य अछि जे सही कही तँ भाग्यवाने लगमे होइत अछि। बरसहि जलद भूमि निअराए, नबहि यथा बुध विद्या पाए। विनम्रता विद्वताक परिचायक थिक। जरुरी अछि जे सही ज्ञान प्राप्त कए स्वभावमे विनम्रताकेँ आनल जाए आओर घमंडसँ मुक्ति पाओल जाए, जाहिसँ जीवन सुखमय होएत। कलनाबला बाबा मिथिलांचलमे रहनिहार सायदे किओ एहन हेताह जे कलनाबला बाबाक नाम नहि सुनने होथि। अत्यंत साधारण लिवास मे निरंतर प्रसन्न ओ कलना मे कतेको साल सँ रहैत छलाह। ओहि समयमे हम कालेजक विद्यार्थी रही। परीक्षा भए गेल रहए। गामपर खाली रही। नौकरी ताकबाक प्रयासमे बहत चिंतित रही। मोन बेचैन रहैत छल। हमर मित्र स्वर्गीय विश्नुकांत मिश्र(लाल बच्चा) बहुत आस्थावान लोक छलाह। हुनकासंग कए पैरे दुनू गोटे कलना विदा भेलहुँ। सुनने रहिऐक जे बाबा बहत नियम निष्ठासँ रहैत छथि। जौं हुनका लेल किछु प्रसाद लए जा रहल छी तँ बहुत पवित्रता पूर्वक लए जेबाक रहैत छल। रस्तामे यत्र-कुत्र नहि हेबाक चाही, अन्यथा कहाँदनि अनिष्ट भए जाइत छल। हम सभ तँ खाली हाथे जाइत रही तँ चिन्ताक बात नहि रहए। कलना बाबा केँ दर्शन हेतु पहिलबेर हम अपन मित्र लालबच्चाक संगे गेल रही। रस्ताभरि पैरे-पैरे गप्प-सप्प करैत हम दुनू गोटे दूपहरिआमे ओहिठाम पहुँचलहुँ। बाबा नान्हिटा फूसक घरमे रहथि। ओहिमे बाँसक फट्टक लागल छल। एक-दू गोटे आओर ओहिठाम बैसल रहथि। बाबा अत्यंत सहज रूपमे सभसँ गप्प-सप्प करैत छलाह। गप्पक क्रममे ओ कहलाह – “एकटा सेठ एकबेर हुनका लग आएल आ कहलक जे भगवान झुठ छथि। हम ओकरा कहलिऐक जे तोँही झुठ छैँ।" ओ कहथि जे हुनका लग लोक कबुला कए लैत अछि आ ओकर अनुपालन नहि करैत अछि जाहि कारणसँ ओकरा अनिष्ट होइत अछि। कैटा भक्त हुनका लेल प्रसाद अनैत छलाह। ताहि काजमे बहुत संयम ओ स्वच्छताक प्रयोजन रहैत छल। बाबाक कहब रहनि जे जौँ क्यो हुनका हेतु अशुद्ध बस्तु अनैत अछि तँ ओकरा अपने अनिष्ट भए जाइत अछि। ताहि प्रसंगे ओ कैटा उदाहरणसभ देलथि। कलनाबला बाबा सँ हमरा तीन बेर भेँट भेल। दू बेर तँ हुनके कलना आश्रम पर आ एक बेर ओ हमरा ओहिठाम आएल रहथि तखन। दुनू बेर कलना हम अपन मित्र लालबच्चाक संगे पैरे गामसँ कलना गेल रही। एकबेर हम जखन बाबाक दर्शनक हेतु गेलहुँ तँ रस्तामे मोनमे भेल जे बाबाक एतेक नाम सुनैत छिअनि, किछु सद्यः देखतिऐक। बाबाक ओतए हम दुनूगोटे पहुँचलहुँ तँ बाबा कहलाह जे आइ रहि जाह। हमसभ हुनकर आज्ञानुसार रुकि गेलहुँ। रातिमे सामनेक पोखरिक घाटपर हम सभ सुति गेलहुँ।अर्धरात्रिमे देखैत छी जे एकटा बाँस हीलि रहल अछि आ ओकर फुनगीपर धोती सुखा रहल अछि। डर भए गेल जे की बात छैक? उठिकए ठाढ़ भेले रही की देखैत छी जे लगेमे बाबा हँसि रहल छथि आ हुनकर हाथमे धोती छनि। बाबा किछु-किछु कहबो केलाह। एकबेर हमर अनुज(सुरेन्द्र नारायण मिश्र) बाबाकेँ अपना ओतए चलबाक हेतु आग्रह केलखिन। बाबा मानि गेलाह। कारसँ बाबाक संगे हमहुँ रही। बाबाक सिपहसलारसब सेहो रहथि। बाबा पहिने गिरजा स्थान गेलाह। ओहिठाम माताक दर्शन केलाह। फेर कार गाम विदा भेल। गाम पहुँचलाक बाद ओ हमरा ओहिठाम चौकीपर बैसलाह। कोनो ओछाओन नहि ओछबए देलखिन। अखरा चौकी पड़ बाबा पड़ल-बैसल रहलाह। ताबे तँ सौंसे गामक लोकक करमान लागि गेल। ततके भीड़ जमा भए गेल जे माइकसँ ओकरा शांत कएल गेल। माइकेपर बाबा किछु उपदेश देलाह। सभकेँ आशीर्वाद देलखिन। हमर अनुज(सुरेन्द्र नारायण मिश्र) केँ आशीर्वाद देलखिन जे तोरा बेटा होइ।से सत्य बेल। हुनका दूटा पुत्र तकर बाद जन्म लेलखिन। कतबो कहल गेलनि ओ किछु नहि खेलथि आ थोड़ेकालक बाद कारसँ आपस चलि गेलाह। बाबाक देहपर मात्र एकटा धोती रहैत छल जकरा ओ ठेहुनधरि पहिरने रहैत छलाह। लोककेँ देखि कए ओ अद्भुत निर्मल हँसी हँसैत छलाह। खेबाक कोनो चिंता नहि रहैत छलनि।नान्हिटा खोपड़ीमे माटिपर बाबा पड़ल वा बैसल रहैत छलाह। ओतहुँ लोक अपन स्वार्थसँ आन्हर भेल हुनका तंग केने रहैत छल। “हौ बाबा! किछु करहक ने...।” जखन बड़ तंग कए दैन तँ कहथि-"का कहली? की भैल?"। मुदा जकरा ओ बाक दए दैत छलाह से जरुर उद्धार भए जाइत छल। बाबाक कहब रहैत छलनि जे जँ क्यो किछु कबुला करैत छथि तँ काज सिद्धि भेलापर ओकरा तुरंत पालन करक चाही अन्यथा अनिष्ट होइत अछि। बाबाक आश्रममे कतेको गोटे रहैत छलाह वा अबैत-जाइत रहैत छलाह। ओहिठाम रहनिहार लोकसभ एकहि साँझ अपनेसँ रान्हि भोजन पबैत छलाह। जखन ओसभ बहुत गोहराबथि तँ बाबा हँसैत कहितथिन –“ ठीक, बनाब भोजन”। भोजन जहन बनि कए तैयार भए जाए तखन बाबाक आज्ञा चाहै छल जाहिसँ ओ सभ भोजन शुरु करथि। बाबा किछु बजबे नहि करथि। लैह, आब तँ बड़का विपत्ति। भोजन पड़सल धैल अछि आ बाबाक आदेशक प्रतीक्षा भए रहल अछि। बाबाके ओ सभ गोहरा रहल छथि। बाबा बड़ छगुन्तासँ हुनकासभकेँ देखथि। जखन ओसभ बाबाकेँ आग्रह करैत-करैत थाकि जाथि तखन ओ कहि दितथि- "शुरु करह"। एहि तरहेँ बाबा हुनका लोकनिक धैर्यक परीक्षा लैत छलाह।तकरबाद बाबा ओहिठाम बैसल ओकरासभकेँ खाइत देखि बहुत प्रशन्न होइत छलाह। बाबाक आश्रममे किछु गोठे निरन्तर रहैत छलाह। किछु गोटे अबैत जाइत रहैत छलाह। खिछुगोटेतँ मात्र पेट पोसबाक हेतु ओतए पड़ल रहैत छलाह। कैटा भक्त बाबा लेल कंबल वा आन-आन चीज-वस्तु अनितथि। बाबा ओकरा छुबितो नहि छलाह। आस-पास रहनिहारसभ ओहि वस्तुसभकेँ लुझि लैत छलाह। बाबा आश्चर्यचकित भए देखैत रहैत छलाह। बाबाक दरबारमे पैघ सँ पैघ लोकसभ अबैत रहैत छलाह। जौँ बाबाकेँ इच्छा नहि होनि तँ हुनकर पट खुजिते नहि छल। जाबे बाबा जीबैत रहलाह, ओहि परिपट्टाक लोकक अपन आशीर्वादसँ कल्याण करैत रहलाह। बिना कोनो लोभ लालच केँ संपूर्ण जीवन ईश्वरक आराधनामे लगा देलाह। हुनक निधनसँ एकटा महान संत एहि संसारसँ मुक्त भए गेलाह संगहि बहुतरास लोकक मोनमे अथाह श्रद्धा छोड़ि गेलाह। हुनका शत-शत प्रणाम! डॉ. सुभद्र झा (संस्मरण) इलाकाक चर्चित व्यक्तित्व छलाह-डा० सुभद्र झा। धोती, मिरजइ सन कुर्ता पहिरने अत्यन्त सरल, साधारण लिबासमे डाक्टर साहेब अड़ेर हाट चौकपर बरोबरि देका जएतथि। गप्प-सप्पमे ओ अपन बिचार अति स्पष्टतासँ रखैत छलाह।ताहि क्रममे जौं कने-मने विवादो भए गेल किंवा क्यो कटाक्षो कए देलक दँ कोनो बात नहि। मिथिलेटा नहि, अपितु समस्त भारतवर्षमे तत्कालीन विद्वान लोकनिमे हुनकर प्रतिष्ठा छलनि। हुनकर विषयमे किछु कहब आ लिखब कठिन काज अछि तथापि स्मरणमे किछु घटना अछि जे लिखि रहल छी। घटना सन् १९६५-६६ ई० क थिक। नवतुरियासभ गाममे एकटा पुस्तकालय स्थापित करए चाहैत चलाह। किछु दिनक प्रयासक वाद किछु पोथी, किछु पैसा चंदा भेल। किछु आलमारी सेहो बनाओल गेल। तकर बाद भेलैक जे ओकर उद्घाटन कएल जाए। उद्घाटन के करताह? आपसी विचार- विमर्शक बाद डा० सुभद्र झाक नाम पर आम सहमति भेल। डा० सुभद्र झा किछु दिन पूर्व सेवा निवृत भए गामे रहए लागल छलाह। आ यदा-कदा हमर गामक चौकपर अबैत-जाइत देखा जाइत छलाह। उद्घाटन कार्यक्रममे डा० सुभद्र झाकेँ सेहो किछु कहबाक आग्रह कएल गेल। बहुत दुराग्रह कएलापर ओ बजबाक हेतु तैयार भेलाह। संक्षिप्त भाषणक क्रममे ओ कहलनि जे एहि इलाकामे अनुसंधानक हेतु पर्याप्त सामग्री यत्र-तत्र पसरल अछि। ओकरासभ केँ एहन पुस्कालयमे सुरक्षित राखल जा सकैत अछि। संगहि कबीरदासपर उपलव्ध सामग्रीक उल्लेख करैत ओ कहलाह जे एहि बातक प्रमाण अछि जे कबीरदास मैथिल छलाह आ मैथिलीमे कतेको रचना कएलनि अछि। १९७३ ई०मे लगभग एक मास डा० सुभद्र झाक राँची स्थित आवास पर रही। तखन ओ योगदा सतसंग विद्यालयक प्राचार्य रहथि। ओही परिसरमे प्राचार्यक निवासमे ओ रहैत छलाह। हुनका संगे परिवारक आर सदस्य नहि छल। घरक काज करबाक हेतु एकटा नौकर छल। भोजन ओ स्वयं बनबैत छलाह। प्रातःकाल भात-दालि-आलूक सन्ना बनाबथि। रातुक भोजनक व्यवस्था सेहो तखने कए लेथि। रातिमे बेसी काल आँटाक चोकरकेँ दूधमे उसनि कए खाइत देखिअनि। रातिमे सूतबासँ पूर्व ओ नियमित रूपसँ पढ़ैत छलाह।साँझमे तिन-चारि गोटे बैसि कए शास्त्र चर्चा करैत छलाह।एक दिन साँझमे डाक्टर साहेबक संग कतहु जाइत रही।रिक्साबला सब जतेक पाइ मांगै, से देबाक हेतु ओ तैयार नहि होथि।रिक्सातकैत-तकैत अन्ततः सौंसे रास्ता बिति गेल। एक दिन एहिना संगे टहलैत रही तँ साईबाबाक चर्चा उठल। ओ हुनकर बहुत प्रशंसा करथि आ कहथि जे साईबाबा सरिपहुँ सिद्ध पुरुष छथि जकर हुनका प्रत्यक्ष अनुभव तखन भेल रहनि जखन ओ बाबाक आश्रममे सिरडी गेल रहथि। कहलाह जे आश्रममे हुनका पहुँचते देरी बाबा हुनकर मोनक प्रश्नक उत्तर देबय लगलखिन। आरो कएकटा प्रसंगसभ ओ सुनओलथि। योगदा सतसंग महाविद्यालय नवे बनल छल। डाक्टर साहेब पूर्ण तत्परतासँ ओहि विद्यालयक विकासमे लागल रहैत छलाह। परिसरमे आश्रमक आबास होइत छल। चारूकात गाछ सभक बीचमे बनल भाषण मंडपसभ। ओही परिसरमे एकदिस आश्रम छल जाहिमे एक दिन माँ आनन्दमयी आयल रहथि। हम डाक्टर साहेबक संगे ओतए रही। माँ आनन्दमयीक अबितहि पूरा हाँलमे शांति पसरि गेल। ओ किछु बजली नहि। चुपचाप सभगोटे ध्यान केलक।कोनो भाषणबाजी नहि भेल। एकदिन डाक्टर साहेबक डेरापर आंगनमे ठाढ़ रही। हमरा देखि डाक्टर साहेब गंभीर भए गेलाह आ कहला जे नीकसँ पहिरल-ओढ़ल करह। जीवनमे सफलताक हेतु एहिसभकेँ बहुत महत्व अछि। ताहीक्रममे कहलाह जे एही कारणे ओ कएक बेर उच्च पदसभक चयनमे पछड़ि गेलाह यद्यपि ओ पदक हेतु पूर्ण योग्य रहथि। डाक्टर साहेबक दोसर पुत्र भास्करजी इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे जर्मन भाषाक व्याख्याता छलाह। हुनकर डेरापर डाक्टर साहेब अबैत -जाइत रहैत छलाह। सन्१९८३ ई० क गप्प अछि। एकदिन हम हुनका दुनू गोटेकेँ नोत देने रहिअनि। दुनूगोटे कोनो कारणसँ आगा-पाछा भए गेलाह। डा० झा पहिने चलल रहथि। भाष्करजी पाछू चललाह आ डेरापर पहुँचि कए बहुत परेशानीमे रहथि जे आखिर ओ कतए चलि गेलाह। हमसभ गोटे हुनका ताकए लगलहुँ। कतहु नजरि नहि आबथि। रातुक समय छल। भोजनमे विलंब भए रहल छल। ताबत थोड़े कालक बाद मकानक नीचासँ ओ जोर-जोरसँ हमर नाम लए कए चिकरि रहल छलाह।हमरा सभकेँ जानमे जान आएल। पता लागल जे ओ हमर डेरा तकैत-तकैत धोबी घाट चलि गेल रहथि। हमर मकान मालिक धोबी छल आ तकरे अनुमानमे ओ धोबी घाट चलि गेल छलाह। डाक्टर साहेब अति अध्ययनशील छलाह। जखन कखनो फुरसतिमे रहितथि तँअध्ययन करए लगितथि। एकदिन प्रातः एगारह बजे इलाहाबाद मे भाष्करजीक डेरा पर गेलहुँ। डाक्टर साहेब ओतहि रहथि। कहलाह जे हम एगारह घंटासँ निरन्तर पढ़ि रहल छी। मैथिलीमे शव्दकोशक निर्माणमे लागल छलाह। एकदिन हम डाक्टर साहेबक संगे इलाहाबादमे कतहुँ जाइत रही। रस्तामे पुछलिअनि जे भगवान छथि कि नहि? ओ उत्तर देलनि जे ई कहब तँ कठिन अछि जे भगवान छथि कि नहि परन्तु जौँ भगवान छथि तँ बहुत बइमान छथि, कारण दैत ओ कैटा उदाहरण देलनि। जेना पेटमे बच्चा किएक मरि जाइत छैक? आखिर ओ जन्मसँ पूर्वे की गलती केलक?आ जौँ गलती केलक तँ जनमि कए ओकरा भोगए। गप्पक क्रममे ओ कहलाह जे सम्प्रति जीबैत लोकमे बिहारमे संस्कृतक सभसँ पैघ विद्वान छथि। साहित्य अकादमीक तत्कालीन अध्यक्ष डा० सुनीति कुमार चटर्जीक ओ बहुत प्रशंसा करथि आ कहति जे हमरा लेल ओ भगवाने छलाह। डाक्टर साहेबक संगे एकदिन टहलैत रही। गप्पक क्रममे ओ अपन प्रवासक दौरान भेल दू गोट घटनाक चर्चा कएलनि। डाक्टर साहेब ट्रेनसँ कतहुँ जाइत रहथि। कोनो टीसनपर गाड़ी रूकल तँ डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्नन ओहिमे सवार भेलाह।डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्नन बैसबाक हेतु घुसबाक हेतु कहलखिन।डाक्टर सुभद्र झा अड़ि गेलाह एवम् डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्नन केँ जगह नहि देलखिन।राँचीमे गप्पक क्रममे एकदिन डाक्टर साहेब कहलाह जे ओ पुस्तकालयमे नौकरी करैत रहथि। ओही क्रममे हुनकासँ जे श्रष्ठ पदपर अधिकारी छलाह से हुनकासँ किछु गलत काज कराबए चाहैत छलाह।ओ से करबाक हेतु सहमत नहि भेलाह। ताहिसँ कुपित भएकए ओ अधिकार हिनका बहुत तंग करैत छलनि। डाक्टर साहेबकेँ पता रहनि जे ओ अधिकारी गलत काज करैत अछि। चुपचाप ओकर गलत काज बला कागजातक प्रतिलिपि ओ रखैत गेलाह। पुस्तकक क्रय-विक्रय मे ओ अधिकारी बहुत हेरा-फेरी केने छलाह, जकर कागजी सबूत डाक्टर झा लग छलनि।बादमे एहि बातक आरोप भेल एवम् जाँचक बाद ओ अधिकारी दोषी साबित भेल। अपनाकेँ बचाबक हेतु ओ चाहलक जे पुस्तकालयकेँ जे क्षति भेल रहैक से आपस करी मुदा ओकर परिवारक लोक पैसा आपस नहि कएलक। एहिबात सभसँ दुखी ओ भयभीत भए ओ आत्महत्या कए लेलक। डाक्टर झा सँ जे कनी-मनी हमरा संपर्क भेल ओकरा संयोग कहि सकैत छी। बच्चेसँ हम हुनकर नाम सुनैत रही। सौँसे इलाकामे ओ चर्चाक विषय रहथि आ छोटसँ पैघ लोकक संपर्कमे सहजतासँ अबैत छलाह। ओ धुनक पक्का छलाह। जाहि काज मे लागि जाथि तकरा पूर्ण करबाक हेतु प्राण-प्रणसँ जुटि जाथि। हुनका अपन गाममे गाछ सब रोपबाक इच्छा रहनि। कहि नहि, कतए-कतएसँ आनिकए सालक साल ओ आमक गाछ रोपैत रहलाह। हुनक प्रतिभा ओ विद्वताक वर्णन करबाक कोनो आवश्यकता नहि बुझा रहल अछि।आडम्वर रहित जीवन शैली एवम् अतिशय सहज व्यवहारक संग स्पष्टवादिताक लेल ओ सभ दिन मोन पड़ताह। धोती-कुर्ता पहिरने, पैरे खेतक आरिए-आरिए चलैत-चलैत पता नहि ओ निरन्तर कोन चिंतनमे ध्यानमग्न रहैत छलाह। अपन मौलिकता एवम् अपन बातकेँ दृढ़तासँ रखबाक लेल ओ सभ दिन मोन पड़ैत रहताह। डॉ. जयकान्त मिश्र (संस्मरण) सन् १९७८ इस्वीक जनवरी मासमे दिल्लीसँ स्थान्तर भए हम इलाहाबाद गेल रही। ओहि समय प्रथम बेर डॉ. जयकान्त मिश्रजी सँ हुनकर तीभूक्ति, सर पीसी वनर्जी रोड स्थित घरमे भेँट भेल। बिना कोनो पूर्व परिचय रहितौं ओ सभ काज छोड़ि हमरासँ भेँट केला। एकटा मैथिलकेँ हमर डेरा तकबाक हेतु कहलखिन। ओतहिसँ हमर हुनका संग परिचय ओ सम्पर्कक क्रम प्रारंभ भेल जे अन्त धरि चलैत रहल। जखन-कखनो हम हुनकर डेरापर जाइतँ ओ सभ काज छोड़ि हमरासँ अत्यन्त अपनत्व भावसँ गप्प करथि। अपनेटा नहि, अपितु हुनक पत्नी, ओ संगे रहनिहार परिवारक अन्य लोकनि सभ सेहो ओहिना गप्प-सप्पमे संग देथि। जलखै, चाह, पान तँ हेबे करइ। ओही क्रममे कतेको गणमान्य मैथिल लोकनिसँ हुनकर डेरापर भेँट भेल। हुनकर अध्ययन, अध्यापन, लेखन सबहक अवलोकन करबाक अद्भुत अवसर भेटल। कए दिन हुनका संगे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजी विभाग गेलहु, जाहिठाम ओ अंग्रेजी विभागक अध्यक्षक पदपर कार्यरत छलाह। इलाहाबादमे रहनिहार मैथिल समाज डॉ. जयकान्त मिश्रसँ पूर्ण परिचित छलाह। अधिकांश मैथिल सभसँ हुनकर व्यक्तिगत सम्पर्क छलनि। प्रत्येक साल विद्यापति समारोह मनाओल जाइत छल। डॉक्टर जयकान्त मिश्र ओहिमे अवश्यमेव रहैत छलाह। हुनकर डेरापर निरन्तर मैथिलीक विकास केना हो, तकर चर्चा होइत रहैत छल। ओ सदिखन बजैथ- “मैथिलीमे लिखल करू। मैथिलीक हेतु काज करू।” संगे मैथिलीक हेतु कएल गेल अपन अनवरत संघर्षक चर्चा सेहो होइत, जाहिसँ मैथिली विकास यात्राक साक्षात अनुभव होइत छल। मैथिली भाषाकेँ बिहार लोक सेवा आयोगमे हटा देल गेल रहइ। तकरा पुनश्च आपस अनबामे, मैथिलीकेँ बच्चा सबहक शिक्षाक अनिवार्य माध्यम बनेबाक हेतु ओ कहि नहि, कतेको बर्ष संघर्ष करैत रहलाह आ अन्ततोगत्वा अपन प्रयासमे सफल रहलाह। मैथिलीक विकास हेतु ओ गाम-गाम घुमैत रहलाह। ततबे नहि, जतए कतहु मैथिलीक चर्चा होइत आकि कोनो कार्यक्रम होइत तँ ओहिमे डॉ. जयकान्त मिश्रजी अबस्से भाग लेथि। आयु बढ़लासँ नाना प्रकारक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या रहैत छलनि। हुनका कतेको साल पूर्व पेसमेकर लागल छल तथापि जँ कतहु मैथिलीक कार्यक्रममे हुनका बजाओल जाइत, तँ ओ अबस्स जाथि। परिवारक लोक चिन्तित भए जाइत छलखिन। एकबेर हम इलाहाबादसँ पटना जाइत रही। स्लीपरमे हमर आरक्षण छल। डॉक्टर जयकान्त मिश्रजी केँ देखलहुँ। ओहिना ठाढ़, बिना सीटेक यात्रा कए रहल छलाह। बहुत आग्रह केलापर ओ हमर सीट लेबाक हेतु तैयार भेलाह। कहथि जे ओ अहिना चलि जेता। ई छल हुनकर उत्साह- मैथिली कार्यक्रमे भाग लेबाक। ओहि दिन पटनामे कोनो मैथिली कार्यक्रममे भाग लेबाक हेतु जाइत छलाह। डॉ. जयकान्त मिश्रजीक भाषा ओ व्यवहारमे अद्भुत मधुरता छल। कखनो नहि लगैत जे एतेक पैघ विद्वानसँ गप्प कए रहल छी। जे जेहने स्तरक लोक रहैत, तेकरा संग तेहने भए गप्प करितथि। पूरा घ्यान देथि। घरक सदस्य जकाँ ओकर पूर्ण स्वागत करथि। घरक प्रथम तलपर हुनकर पुस्तकालय छल। ओहिमे बैस कए ओ अध्ययन, लेखन करैत रहैत छलाह। इलाहाबादसँ लघुकाय एकटा मैथिली पत्रिकाक सम्पादन सेहो करै छलाह। हुनकर नाति, भातिज सभ ओहि पत्रिकाक मैथिल लोकनिमे वितरणक व्यवस्था करथि। एकाध बेर हमरो ओहि काजमे ओ लगा लैत छलाह। माघ मासमे प्रयागमे संगमतर पर ओ सपरिवार मास करैत छलाह। मिथिलाक प्रसिद्ध माछबला झण्डा मैथिल पण्डा सबहक पहिचान अछि। ओहि झण्डाकेँ देखि कए जयकान्त बाबू डेराक ठेकान लागि जाइत छल। नवम्बर २००७ इस्वीमे हम इलाहाबाद गेल रही। हुनकर डेरापर गेलहु। परन्तु ओ काशी मास करए चल गेल रहथि। हुनकासँ भेँट नहि भए सकल। हुनकर डेरापर हुनकर नाति, एवम् परिवारक अन्य सदस्य सभ छलाह। डेरा उदास-उदास लगैत छल। परिवारमे कएटा दुर्घटना भए गेल छल। किछु साल पूर्व हुनक ज्येष्ठ पुत्र डा. रूद्रकान्त मिश्रक आकस्मिक असामयिक निधन भए गेल छल। आओर कएटा गप्प-सप्प...। एहि सबहक आभास घरमे भए रहल छल। किछुकाल बैसला बाद हम सभ ओतए-सँ अपन स्मृतिकेँ पुनश्च जगा कए ओहिठामसँ विदा भए गेलहु। डॉक्टर साहेबसँ भेँट नहि भए सकल। डॉक्टर जयकान्त मिश्रजीक पिता महामहोपाध्याय डॉ. उमेश मिश्रक बर्षी बहुत यत्न पूर्वक मनाओल जाइत छल। ओहिमे डॉक्टर साहेब ओतए हम (जाधरि इलाहाबादमे रहलहुँ) नियमित आमंत्रित होइत छलहुँ। हुनकर सम्पूर्ण परिवार अत्यन्त मनोयोग पूर्वक ब्राह्मण भोजनक व्यवस्था करैत रहलाह। नाना प्रकारक भोजनक व्यंजन सबहक स्मरणे मात्रसँ मन आनन्दित भए जाइत अछि। भोजनक संग-संग कतेको गप्प-सप्प मैथिल लोकनिसँ ओहि अवसरपर भेँट भए जाइत छल। इलाहाबादमे गप्प-सप्पक क्रममे ओ मैथिलीकेँ साहित्य अकादेमीमे मान्यताक सम्बन्धमे हुनक कएल गेल प्रयासक वर्णन करथि। ओहि हेतु ओ दिल्लीमे तत्कालिन प्रधान मंत्री द्वारा मैथिली पोथीक प्रदर्शनीमे भाग लेब, दिल्लीक उपराज्यपाल स्व. आदित्यनाथ झाजीक प्राप्त समर्थन एवम् सहयोगक चर्चा सेहो करैत छलाह। एकबेर हम डॉ. शुभद्र झाजीक संग इलाहाबादमे डॉ. जयकान्त मिश्रजीक ओहिठाम जाइत रही। रस्तामे डॉ. जयकान्त मिश्रजीक मैथिलीक प्रति अनुराग ओ मैथिलीक विकास हेतु संघर्षक प्रशंसा करैत डॉ. शुभद्र झा कहलाह- “मिथिलामे डॉ. जयकान्त मिश्रक एवम् हुनक पूर्वज लोकनिक अद्भुत योगदान अछि।” संगे ईहो कहलाह- “एहन बहुत कम परिवार भेटत जाहिमे लगातार छह पुश्त सरस्वतीक एहन आर्शीवाद प्राप्त रहल हो।” ओ दिल्ली आबथि तँ हमरा सूचित करथि। कतेको बेर तँ ओ हमरे ओतए ठहरैत छलाह। कए बेर हवाइ यात्रासँ उतरि लबनचूस बच्चा सबहक लेल नेने अबैत छलाह। जाधरि ओ डेरापर रहथि, निरन्तर मैथिली सम्बन्धी चर्चा होइत रहैत। मैथिली आन्दोलनक संघर्ष यात्रा आओर अनेकानेक लोकनिक योगदानक चर्चा सेहो होइत। एकबेर ओ (डॉ. जयकान्त मिश्र) दिल्लीमे मैथिलीक प्रश्न पत्र बनबए खातिर आएल रहथि। संगमे स्व. सुमनजी एवम् डॉ. नवीन बाबू सेहो रहथिन। ओ तीनू गोटे हमर आग्रहपर पुष्पबिहार, दिल्ली स्थित हमर आवासपर अएला आ एकसंग हुनका सभकेँ भोजन करेबाक सौभाग्य प्राप्त भेल। ओहि अवसरकेँ स्मरण करैत अखनो रोमांचित भए जाइत छी। तीनू गोटेक एकट्ठे हमरा ओतए आएब आओर हुनकर वार्तालाप सुनि मोन आनन्दित भए गेल। आनन्दितो केना ने होइत, डॉ. सुमनजी एवम् डॉ. नवीन बाबू सी.एम. कौलेज- दरभंगामे हमरा मैथिली पढ़ौने रहथि। डॉ. मिश्रजी अत्यन्त समाजिक व्यक्ति छलाह। इलाहाबाद किंवा बाहरोक मैथिल लोकनिकेँ व्यक्तिगत स्तरपर ओ मदति करैत छलाह। नयाकटरा, इलाहाबाद स्थित हमर डेरापर कएक बेर पएरे चलि आबथि। कतेको मैथिल विद्यार्थी सभकेँ ओ अपना ओहिठाम राखि कए हुनकर शिक्षामे सहायता करैत छलाह। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजी विभागक अध्यक्ष पद हेतु हुनका बहुत विरोधक सामना करए पड़ल छलनि। ताहि खातिर ओ इलाहाबाद उच्च न्यायालयमे केस सेहो केने रहथिन। अन्तोगत्वा हुनकर विजय भेल, आ ओ अंग्रेजी विभागाध्यक्ष भेलाह। हुनकर विरोधी सबहक कहब रहैक जे ओ मैथिलीमे लिखै छथि। हुनकर पी.एच-डी.क विषय ‘मैथिली भाषाक इतिहास’ छल तखन ओ अंग्रेजी विभागक अध्यक्ष केना भए सकै छथि? जयकान्त बाबू दिल्ली आएल रहथि। तहिया हुनकर पोती रोहिनीमे रहैत छलखिन।। हुनकासँ भेँट करबाक रहनि। हमरा संगे चलए कहलनि। बसपर ठाढ़े हम दुनू गोटे रोहिनी विदा भेलौं। इलाहाबादसँ एकटा पोटरी अनने रहथि। तेकरा उपहार स्वरूप अपन पोतीकेँ देलखिन। किछु कालक बाद हम सभ ओहिठामसँ आपस भए गेलहु। ओहि पोतीक बिआह दिल्लीए मे भेलनि एवम् बिआहक हकार हमरा देबाक हेतु डॉ. रूद्रकान्त मिश्र (कन्याँक पिता) स्वयं आएल रहथि। हम बिआहक अवसरपर गेलो रही। बिआहमे डाक्टर साहेबक सभ भाए आएल रहथिन। कोनो प्रकारक दहेज नहि लेल गेल छल। डॉक्टर साहेब दहेज रूपी लेन-देनक खिलाफ छलाह एवम् एकरा मिथिलाक संस्कृतिक प्रतिकूल कहथि। डॉक्टर जयकान्त मिश्रजीक पिता महामहोपाध्याय- डॉ. उमेश मिश्रक बनाओल मकानमे डॉक्टर साहेब एवम् हुनकर भैयारी लोकनि सेहो रहैत छलखिन।। सभसँ शुरूबला हिस्सामे डॉक्टर साहेब रहथि आ तकर बाद बलामे आर भाए सभ। डॉक्टर साहेबक व्यक्तिगत जीवनमे, परिवारोमे भोजन आ रहन-सहनमे मिथिलाक संस्कृतिक अमिट छाप छल। मकानक ओसारपर माछक मूर्ति लटकल, सदैव झूलैत रहैत छल। घरमे भोजन बनबएकाल देहपर वस्त्र नहि रहक चाही। ब्राह्मण भोजनकाल परसनिहार आ भोजन केनिहार गंजी, कमीज नहि पहिरथि। भोजनमे पियाजु-लहसुन नहि पड़ए। जखन कखनो ओ बाहर यात्रापर जाथि तँ अपन नियम सबहक पालन कठोरतासँ करथि। बाहरमे बेसीकाल चुरा-दहीसँ काज चलबथि। इलाहाबादमे रहितो ओ गामसँ सम्पर्क बनओने रहथि आ सभ साल मास-दू मास गाम जा कए रहथि। गामसँ लौटैत काल सभ ग्रामीणक ओहिठाम जा कए भेँट करथि एवम् पुनश्च गाम एबाक इच्छा रखैत सभसँ विदा लेथि। एहि क्रममे किछु साल पूर्व ओ गाम गेल रहथि, ओतहि बहुत जोरसँ बिमार पड़ि गेला। हर्ट अटैक भए गेल रहनि। ओहिठामसँ लोक सभ उठा-पुठा कए दरभंगा अनलकनि। दरभंगामे थोड़ेक सुधार भेला पछाइत इलाहाबाद आपस अएला। इलाहाबादमे हुनकर मासो इलाज चलल। बहुत मुश्किलसँ हुनकर जान बॉंचल। बिमारीसँ उठलाक बाद एक दिन फोनपर गप्प भेल रहए। बहुत दुखी बुझाइत रहथि। अबल भए गेल रहथि, तथापि मैथिलीक विकासमे अभिरूचि बनल छलनि आ ओहि विषयमे गप्प करैत रहलाह। मैथिलीक विकासक हेतु डॉ. मिश्रजीक अद्भुत योगदान अछि। संविधानक अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीकेँ सामिल करबाक हेतु ओ कतेको साल प्रयास करैत रहलाह। अन्ततोगत्वा हुनकर ईहो स्वपन्न साकार भेल एवम् मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम् सूचीमे सामिल कएल गेल। इलाहाबाद विश्वविद्यालयसँ सेवा निवृत्त भए ओ मध्यप्रदेशमे चित्रकुट स्थित ग्रामीण विश्वविद्यालयमे विभागाध्यक्ष भेलाह। ओहिठाम ओ कएक साल धरि रहि संस्थानक शिक्षण व्यवस्थाकेँ उत्कृष्ट बनेबामे संलग्न रहलाह। नानाजी देसमुख विश्वविद्यालयक उपकुलपति रहथि। देसमुखजी डॉ. मिश्रक कार्यसँ अतिशय प्रभावित रहथि। हुनकर इच्छा रहनि जे डॉ. मिश्र ओतए बनल रहथि परन्तु मैथिलीक काजमे विशेष रूचि ओ व्यस्तताक कारणेँ ओ विश्वविद्यालयक काजसँ त्याग-पत्र दए देलनि। डॉक्टर मिश्र अत्यन्त अध्ययनशील व्यक्ति छलाह। रातिमे जखन-तखन ओ उठि जाथि आ पढ़ल लागथि। हुनकर स्वास्थ्यक चिन्तासँ फिरसान भए परिवारक लोक कएक बेर आपत्ति करथि जे एतेक परिश्रम नहि करथि, मुदा ओ अपन कार्यक्रममे अनवरत लागल रहैत छलाह। मैथिलीक नाम सुनिते जेना हुनका स्फुर्ति आबि जाइत छल। पेसमेकर लगलाक बादो ओ मैथिलीक आन्दोलनक हेतु समर्पित रहलाह आ जतए कतहु हुनका एहि काजे बजाओल जानि तँ ओ सहर्ष जाथि। २००८ इस्वीमे, नव वर्षक आगमनक अवसरपर हम हुनका नव वर्षक मंगल कामना पत्र पठौने रहिएनि। तकर जवाबमे ओ पोस्टकार्ड लिखने रहथि जाहिमे थर-थर कँपैत हाथसँ लिखल गेल अक्षर ओ हस्ताक्षर देखि हुनक एहू अवस्थामे सकृयताक प्रमाण भेटल। तकर बाद लगभग साल भरि कोनो सम्पर्क नहि रहल। जनवरी (२००९) मे एक दिन डॉ. धनाकर ठाकुरजी पत्र इन्टरनेट पर पढ़ल, जाहिमे डॉक्टर मिश्रक प्रयागमे मासक दौड़ान निधनक समाचार छल। कतेको बेर ओहि समाचारकेँ पढ़ल। मैथिलीक एकटा अनन्य सेवकक चिर संघर्षक बाद देहावसान भए गेल छल। मिथिलाक गाम-गाममे शोक सभा मनाओल गेल। श्रर्द्धांजलि देनिहार लोक सबहक हुनक प्रति सिनेह अवर्णनीय छल। डॉ. जयकान्त मिश्र अपने-आपमे मिथिलाक इतिहास छलाह। मिथिलाक कोनो एहन गाम नहि हएत जतए ओ मैथिली कार्यक्रमक हेतु नहि गेल होथि। विद्यापति समारोह हो, किंवा मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम सूचीमे सामिल करबाक हेतु आयोजित आन्दोलन हो, वा मैथिलीकेँ शिक्षाक अनिवार्य माध्यम बनेबाक प्रयास हो, सभठाम हुनकर नाम अबिते छल एवम् ओ व्यक्तिगत रूपसँ सभ कार्यक्रमे भाग लइते छलाह। जखन-कखनो ओ भेटितथि, मैथिलीमे लिखबाक हेतु प्रेरित करबे करथि, मैथिलीक सम्मानक हेतु कएल जा रहल प्रयासक चर्चा करितथि, सभ काजपर मैथिलीसँ जुड़ल आन्दोलनकेँ प्राथमिकता देबे करथि। मैथिलीक एहि अनन्य सेवकक कतेक उपकार अछि तकर वर्णन असंभव। हुनक साहृदयता, वाणीक मधुरता एवम् अपनत्व सदिखन मोन पड़ैत रहत आ मोन रहत हुनका संग बितौल गेल अद्भुत क्षण। ओ आब नहि छथि, मुदा कोटि-कोटि मैथिलक हृदयमे ओ सदिखन विद्यमान छथि ओ रहताह। पं. परमानन्द झा (एक संस्मरण) लोक एहि दुनियाँमे अबैत अछि, चलि जाइत अछि मुदा ओकर कएल काज ओकरा जिबैत रखैत अछि। कतेको व्यक्ति एहि संसारमे एहने भेलाह अछि जे अपन संघर्षसँ अपन जीवनमे एकटा नव दृष्टान्त उपस्थित केलाह आ हुनका गेलाक बादो लोकसभ हुनक कृतित्वक चर्च कए गौरवक अनुभव करैत छथि। एहने लोक छलाह हमर ग्रामीण-स्वर्गीय पण्डित परमानन्द झा। हमसब जखन नेने रही तँ हुनका कतेको बेर पैरे अबैत-जाइत देखिअनि। पैरे चलब ओहि समयमे कोनो अजगुतक गप्प नहि छलैक। मुदा ओ पैरे-पैरे मुजफ्फरपुर साक्षात्कर देबए चलि जाइत छलाह। लौटि कए ओहिना दन-दन करैत रहैत छलाह। कहिओ हुनका बैसल, आराम करैत नहि देखलिअनि। दिन-राति ओ किछु-ने-किछु करैत भेटताह। व्यर्थ आडंवर किंवा प्रदर्शन करबामे हुनका कोनो रुचि नहि छल। सौंसे दुनियाँ जँ खिलाफ भए जाए आ हुनका लगतनि जे ओ सहीपर छथि तँ ओ अपन निश्चयपर अडिग रहैत छलाह। सत कहल जाए तँ एहन कर्मठ लोक बिरलैके देखएमे अबैत अछि। खेत कोरब, धान रोपब, धान काटब, दाउुन करब सँ लए कए इसकूलमे मास्टरी करब फेर विद्यार्थीसभ केँ ट्युशन करब, ततबे नहि पंडिताइ करब, सभटा काज ओ एकसुरे करैत रहैत छलाह। हमसभ जखन नेना रही तँ हुनके घरक पाछा ब्रम्ह स्थानमे हमर सभक इस्कूल छल। ओतए हमसभ पढ़ए जाइत छलहुँ। कै दिन पानि पीबाक हेतु हुनका ओहिठाम आबि जाइत छलहुँ। जखन कखनो ओतए जइतहुँ ओ निरंतर काजमे व्यस्त रहैत छलाह। छोट-छीन फूसक घरमे अपन साधनामे लागल रहैत छलाह। कोनो काज करबासँ हुनका परहेज नहि छल। लोक की कहत से हुनका सुनबाक समय नहि छल। जे अपना ठीक बुझाइन से ओ करथि, जकरा जे मोन हो से कहैत रहए। “हाथी चलए बजार, कुत्ता भुकए हजार।” जीवन भरि ओ घोर संघर्ष करैत रहलाह। कठोर परिश्रम ओ मितव्यितासँ गामक आस-पास चिक्कन जमीन-जाएदाद बनओलनि। अड़ेरचौकपर सेहो बहुत कीमती जमीन ओ कीनलथि। सुनबामे आएल जे अट्ठारह बीघा जमीन ओ अपना जीवनमे मेहनति एवम् इमान्दारीसँ कीनलथि। एतबे नहि जाहिठाम एकटा मामूली फूसक घर छल ओतहि पता नहि कतेको कोठरीक घर बना देलथि। ओहिठाम गेलापर अहाँकेँ चारू कात घरे-घर देखएमे आएत। गाम-घरमे जकरा पोखरिआ-पाटन कहैत छैक, ताही तरहक हुनकर ग्रामीण आवास अछि। आ से सभटा मेहनतिसँ केलाह, कोनो ककरो वइमानी नहि, अपितु अपन विद्या ओ वुद्धिसँ निरन्तर समाजकेँ सेवा करैत उपार्जन केलाह। ओ निट्ठाह कर्मयोगी छलाह। कखनो बैसल नहि रहितथि। कोदारि पारवसँ लए कए इसकूलक मास्टरी भावसँ ओ जीवन पर्यन्त करैत रहलाह। अगहन मासमे माथपर धानक बोझा लदने सीताराम-सीताराम कहैत डेगार दैत अपन धानक खेतसँ खरिहान धरि अबैत- जाइत हम हुनका देखिअनि। जकरा जे बाजक होइक से बाजए, हुनका लेल धनिसन। ओ खाली धने अर्जित करैत रहलाह से बात नहि, अपितु घनघोर संघर्ष कए विद्योपार्जन सेहो केलाह। कतेको विषयमे आचार्य केलाह। फेर अंग्रेजी माध्यमसँ सेहो उच्च शिक्षा प्राप्त केलनि। बहुत दिन धरि रहिका उच्च विद्यालयमे संस्कृतक शिक्षक रहलाह आ प्रधानाध्यापकक पद धरि प्रोन्नति प्राप्त केलनि। धर्म ओ अध्यात्मक सेहो हुनका बहुत नीक जानकारी छलनि। कतेकोठाम धार्मिक सभा सभमे प्रवचन सेहो करैत छलाह। दड़िभंगामे संत-समागममे प्रवचन करैत हमहुँ हुनका सुनने रही। ओहि समयमे हम ओतए सी० एम० कालेजमे पढ़ैत रही। कतेको दिन हमसभ हुनका साइकलपर इंटा बन्हने, आ स्वयं ओकरा गुरकबैत पैरे-पैरे चलैत देखिअनि। कहिओ सीमेन्टक बोरा, कहिओ बाउल, कहिओ इंटा ओही साइकिल पर ढ़ो-ढ़ोक ओ पक्का मकान बना लेलथि। एहन धुनकेँ पक्का, कर्मकीट ओ संकल्पक धनी व्यक्ति डिविआ लए कए तकनहुँ नहि भेटि सकत। व्यक्तिगत जीवनमे कै बेर हुनका प्रतिकूल परिस्थितिक सामना करए पड़ल, तथापि ओ धैर्यपूर्वक जीवनयात्रामे लागल रहलाह। आस-पासक गामक बहुत रास लोक हुनकार अध्यात्मिक चेला छल। हुनकासँ मंत्र लेने छल। हुनका प्रति श्रद्धाक भाव रखैत छल आ हुनक मृत्युसँ बहुत दुखी भेल छल। आब ओ एहि दुनियाँमे नहि छथि। खिछु साल पूर्व एकाएक हुनकर किडनी खराप भए गेल। मास दिनक भीतरे ओ मार्च २०१४मे चलि गेलाह। ओहि समय हुनकर बएस अस्सीसँ उपरे रहल होएत। मृत्युसँ किछुमास पूर्वे हम गाम गेल रही तँ हुनकासँ भेंट भेल रहए। ओ पूर्णतः स्वस्थ लगैत छलाह। अपितु बरी काल धरि अध्यात्मिक विषयपर अपन मंतव्य दैत रहलाह। हमर माएसँ सेहो गप्प करैत रहलाह। तकर किछुए दिनक बाद हुनक मृत्युक समाचार भेटल। आश्चर्यमे पड़़ि गेलहुँ। हुनक देहावसानसँ गामेक नहि अपितु परोपट्टाकेँ एकटा अपूर्णीय क्षति भेल। कर्मठता एवम् सफल संघर्षक एहन जीवंत उदाहरण भेटब बहुत मोसकिल काज अछि। हुनका हमर शत-शत प्रणाम! संपत्ति हस्तांतरण संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 १ जुलाइ १८८२सँ लागू भेल। संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम स्वैच्छिक हस्तांतरण-बिक्री, बन्हक (भरना), उपहार, अदला- बदली, चार्ज पर लागू होइत अछि। विरासात, दिवालिआपन, जव्ती, न्यायलयक आदेशक अनुपालन हेतु,, वा इक्षा पत्र द्वारा कानूनक अनुपालनक हेतु कएल गेल संपत्तिक हस्तान्तरणपर संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम लागू नहि होइत अछि। क्यो अपन संपत्ति किएक बेचैत अछि? पैसाक प्रयोजन भेला पर-जगजाहिर जबाब अछि। बेचएबलाकेँ उचित पैसा भेटि जाइक आओर किननाहरकेँ सही सलामत संपत्ति जेना जमीन, मकान, फ्लैट, भेटि जाइक जाहिपर किननाहर निर्वाध रूपसँ मालिकाना हक प्राप्त कए सकए, ओकर स्वेक्षा एवम् कानून सम्मत तरीकासँ ओकर ऊपभोग कए सकए। एहन नहि होइक जे कीननाहर सभटा पैसा दए दैक मुदा कीनल गेल संपत्तिपर क्यो आन अपन हक लए ठाढ भए जाइक, किंबा बलपूर्बक ओहि संपत्तिपर कव्जा बनओने रहए। कएबेर एहनो होइत अछि जे एकहिटा संपत्ति कैगोटाक हाथे बेचि देल गेल हो किंवा ओहि संपत्तिपर बैंक वा कोनो आओर व्यक्तिक कर्जा होइक आओर ओहि तरे ओ संपत्ति बन्हक पड़ल हो। ताहि हेतु ई आवश्यक अछि जे कोनो संपत्ति कीनबासँ पूर्व क्रेता उचित पूछताछ कए सुनिश्चित कए लेथि जे ओहि संपत्तिपर कोनो लफड़ा तँ नहि अछि। संपत्तिक हस्तान्तरणक समय मूलतः निम्नलिखित बातक ध्यान राखब जरूरी थिकः १.बेचनाहरकेँ ओहि संपत्तिपर पूर्ण कानूनी अधिकार हेबाक चाही, ताहि हेतु ओकरासँ संपत्तिक मूल दस्ताबेजक मांग जरूर करबाक चाही, मात्र फोटोकाँपी देखिकए सौदा नहि तय कए लेबाक चाही। २.सब-रजिष्ट्रारक कार्यालयसँ एहि बातक पक्का जानकारी लेबाक चाही जे ओ संपत्ति भरना/बन्हकतँ नहि अछि। ३.सब-रजिष्ट्रारक कार्यालयसँ एहि बातक एहि बातक जानकारी सेहो लेबाक चाही जे ओ संपत्ति कहीं पहिने ककरो हाथे बेचि देल गेल तँ नहि अछि? ४.एहि बातक जानकारी लेबाक चाही जे बेचनाहर ओहि संपत्तिकेँ कतएसँ आ केना प्राप्त केलक, ताहि दस्ताबेजकेँ देखि कए सुनिश्चित करबाक चाही जे बेचनाहर सही आदमीसँ ओ संपत्ति कीनने अछि, माने जे जकरासँ ओ ओहि संपत्तिकेँ कीनलक तकर ओकरा बेचबाक पूर्ण अधिकार रहैक कि नहि, अन्यथा काल्हि भेने क्यो सामने आबि कए कहि सकैत अछि जे ओहि संपत्तिमे हमरो हिस्सा छल, तकरा क्यो आन कोना बेचि देलक? एहन नहि हो जे पैसा खर्चो केलाक बाद लफड़ा भए जाए। कोनो संपत्ति कीनबासँ पहिने की करबाक चाही? १. पहिने ई पता करी जे ओ संपत्ति बेचनहारकेँ कतएसँ प्राप्त भेल? की ओ ओकरा कानून एवम् दस्ताबेजक अनुसार अधिकार प्राप्त व्यक्तिसँ कीनने अछि? ताहि हेतु विक्रयक अनुवंधक बजाप्ता निवंधन (सेल डीडक निबंधन) भेल अछि कि नहि? तकर प्रमाणस्वरूप दस्ताबेज देखल जाए। २. बेचनहारक ओहि संपत्तिपर कव्जा अछि के नहि? ३. ओहि संपत्तिकेँ बन्हक राखि कर्ज तँ नहि लेल गेल अछि, जँ लेल गेल अछि तँ कर्जक आपसी भेल कि नहि, ४. संपत्तिक उपर कोनो टैक्स बाँकी तँ नहि अछि? ५. जौं संपत्ति स्वअर्जित नहि अछि तँ ओहिमे आनो लोकक हिस्सा छैक कि बेचनहार एसगरे ओकर हकदार अछि, ६. संपत्तिक दाखिल खारिज बेचनिहारक नामे अछि कि नहि, ७. संपत्तिक वास्तविक नापीक अनुसार ओकर रकबा दस्तावेजमे देल गेल विवरणसँ मेल खाइत अछि कि नहि? संपत्ति बेचनिहारक ओहि संपत्तिपर अधिकार सुनिश्चित कएलेलाक बाद कीननाहर एवम् बेचनिहार आपसमे एकटा सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करताह। ओहिमे क्रय विक्रयक सभटा शर्त लिखल जाएत, जेना संपत्तिक मूल्य, भूगतानक शर्त। उचित मूल्यक स्टांप पत्रपर सहमति पत्र पर बेचनाहर किननाहरक अतिरिक्त दूटा गवाहक हस्ताक्षर होएब जरूरी थिक। कोनो संपत्तिक हस्तान्तरण हेतु निवंधनसँ पूर्व ओहि राज्यमे लागू कानूनक तहत सटांप पेपर लेब आवश्यक थिक। आइ-काल्हि स्टांप पेपर आनलाइन भेटि जाइत अछि। ताहि हेतु आनलाइन भूगतान कए ओकर जानकारी आनलाइन स्टांप पेपर विक्रेताकेँ देब जरूरी थिक। पेमेंटक सूचना प्राप्त होइते ओहि सुविधा केन्द्र द्वारा स्टांप पेपरकेँ आनलाइन निकालि लेल जाइत अछि। एहि तरहे आसानीसँ भारी मूल्यक स्टांप पेपरकेँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। स्टांप ड्युटीक गणना हेतु बेचल जा रहल संपत्तिक सर्किल रेटक आधार पर कएल जाइत अछि। जौं जमीनपर मकान सेहो बनल अछि तँ ओकर अलग-अलग गणना कएल जाइत अछि। विक्रय मूल्य, सरकारी सर्किल रेट दुनूमे जे ज्यादा होएत ताहि हिसाबसँ स्टांप ड्युटी लागत। तकर अलाबा निवंधन शुल्क सेहो अलगसँ देबए पड़ैत अछि। जौं सर्किल रेटक हिसाबसँ उचित स्टांप ड्युटी नहि देल जाइत अछि तँ निवंधन खारिज भए सकैत अछि। मुख्तारनामा (power of attorney) : मुख्तारनामा/वकालतनामा (पावर आफ अटर्नी)क आधारपर कएल गेल संपत्तिक हस्तानान्तरण : माननीय उच्चतम न्यायलय सूरज लैम्प एवम् इन्डस्ट्रीज बनाम हरियाणा सरकार एवम् अन्यक मामलामे निर्णय देलक अछि जे मुख्तारनामा (पावर आफ अटर्नी)क आधारपर संपत्तिक हस्तानान्तरण गैरकानूनी थिक। मुख्तारनामा (पावर आफ अटर्नी) मूलतः निकट सम्बन्धी जेना पिता, पुत्र, पत्नी वा खास मित्रक पक्षमे एहि हेतु कएल जा सकैत अछि जे संपत्तिक मालिक कोनो खास वजहसँ ओहि संपत्तिक क्रय विक्रयक निवंधनमे उपस्थित नहि भए सकैत अछि, (जेना कि क्यो विदेशमे हो ) (R.V. Raveendran, A.K. Patnaik, H.L. Gokhale IN THE SUPREME COURT OF INDIA CIVIL APPELLATE JURISDICTION SPECIAL LEAVE PETITION (C) NO.13917 OF 2009) निवंधनक समय कीननाहर, बेचनाहरक अलाबा दूटा गवाहक उपस्थिति जरूरी अछि। ओहि गबाहक हस्ताक्षर कबाला (सेल डीड) पर जरूरी थिक। संपत्तिक क्रय विक्रयक निवंधनक समयमे कोनो कारणसँ बेचनिहार किंवा कीननाहर स्वयं उपस्थित नहि भए सकैत अछि तँ कोनो सम्बन्धी वा मित्रकेँ उचित मुख्तारनामा (power of attorney) दए ई काज करावोल जा सकैत अछि। जौं विक्रय मूल्य पचास लाखसँ बेसी अछि तँ कीननाहरक ई कर्तव्य अछि जे विक्रय मूल्यक एक प्रतिशत काटि कए उचित चालान प्रपत्र द्वारा आयकर विभागमे आनलाइन वा बैकमे जमा कए देथि अन्यथा ओ आयकर विभागक चपेटमे आबि सकैत छथि। एहि तरहेँ काटल गेल टाका आयकर विभाग द्वारा आयकर रिटर्न भरलापर कुल देय आयकरमे मिन्हा कए देल जाइत अछि। सेल डीडक मसौदा : सेल डीडक मसौदा तैयार करबामे प्रचुर सावधानी राखब जरूरी थिक। ओहिमे संपत्तिक चौहद्दी, रकबा, खाता नंबर, खेसरा नंबर, सहित ओकर पूर्बक मालिकक वर्णन हेबाक चाही। विक्रयमूल्य सहित वेचनिहार एवम् कीननाहरक विवरण हेबाक चाही। बेचनिहार द्वारा स्पष्ट घोषणा हेबाक चाही जे ओ ओहि संपत्तिक पूर्ण मालिक अछि, जे ओहि पर कोनो आन व्यक्तिक अधिकार नहि अछि, जे कोनो तरहक कानूनी विवाद ओहि संपत्तिपर नहि अछि, जे ओ संपत्तिपर कोनो कर्ज नहि बाँकी अछि, आदि, आदि। सेलडीडमे इहो लिखल जेबाक चाही जे ओ संपत्ति बेचनिहारक स्वअर्जित अछि, जौं से नहि अछि आओर ओ संपत्ति संयुक्त परिवारक पुस्तैनी संपत्तिक हिस्सा अछि तखन ओकरा दियादी बटबाराक संगे ई प्रमाण देबाक चाही जे ओ संपत्ति ओकरे हिस्साक अछि आओर ओहिपर कोनो आन पटिदारक हक नहि छैक। जौं ओहिमे आनो पटिदारक हिस्सा सामिल छैक, तखन ओहि संपत्तिक विक्रय पत्र (सेल डीड) पर सभ पटिदारक दस्तखत जरूरी अछि आन्यथा भविष्यमे ओहिपर कानूनी झंझटि भए सकैत अछि। सेलडीड (विक्रय पत्र)क निवंधनक बाद कीननाहर द्वारा बेचनिहारकेँ विक्रय मूल्यक पूरा भूगतानक बादे सेलडीड (विक्रय पत्र) कीननाहरकेँ देल जाइत अछि। जमीन-मकानक क्रय विक्रय सामान्यतः कमे काल होइत अछि जाहिमे जीवन भरिक कमाओल धन लागि जाइत अछि। तेँ जरूरी अछि जे ई काज पूर्ण सावधानीक संगे कएल जाए। कागज-पत्तर ठीकसँ बनाओल जाए आ कीनल संपत्तिक कव्जा ठीकसँ लेल जाए जाहिसँ बादमे कोनो प्रकारक झंझटिमे नहि पड़ी। क्रान्तिदूत : कबीरदास ओहि युगमे जखन धार्मिक कट्टरवाद चर्मोत्कर्षपर छल, जखन कि जाति-पातिक भेदबाव समाजक मान्यता प्राप्त केनहि छल संगहि समस्त विधि-विधानकेँ प्राभावित केने छल, कबीर दास एकहिबेर विद्रोहक विगुल बजा देलाह! ओहि युगमे जखन उच्च जातिक लोकक संपूर्ण समाज पर वर्चस्व छलैक, जखन धार्मिक, सामाजिक एवम् आर्थिक शक्ति पूर्णतः किछु व्यक्तिक हाथमे सिमटल छल, -कबीरदास बाजि उठलाहः एक बूंद एक मल-मूतर, एक चाम एक गूदा। एक जातिसे सव उपना, कौन वाभन कौन सूदा।। व्यक्ति-व्यक्तिमे भेदभाव करब कबीरदासकेँ एकदम पसिन नहि छलनि। एहि दृष्टिसँ देखल जाए तँ ओ भक्तिकालक महान साम्यवादी छलाह। मानव-मानवमे विभेद उतपन्न करएबला धर्म, अन्धविश्वास वो वाह्य आडंवरक प्रति जतेक कठोर रुखि कबीरदास अपनओलनि ततेक किओ नहि अपना सकल। हुनकर कहब छलनि जे मानव मात्र एकहि ईश्वरक अंश अछि। प्रकृति सभकेँ एकरंग वनओने अछि, सभक सोनित एकहि रंग अछि, तखन ई विभेद किएक? एकै पवन एक ही पानी, करी रसोई न्यारी जानी। माटी सूँ माटी लै पोती, लागी कहौ कहाँ धूँ छोती।। कबीरदासकेँ जाति विभेद एक्कोरत्ती पसिन नहि छलनि। जन्मभरि ओ पाखंड, सामाजिक अन्याय, जातीय विद्वेष, एवम् आर्थिक शोषणक विरोधमे लड़ैत रहलाह। वाभन, शुद्रक कथे कोन ओ तँ हिन्दू, मुसलमानक विभेदकेँ सेहो स्वीकार नहि करैत छलाह। जौं तूँ वाभन वभनी जाया, तौ आन बाट है क्यो नहि आया। जौं तूँ तुरक तुरकनी जाया, तौ भीतर खतना क्यो न कराया।। कबीरदास उपदेशक वा पुजारी नहि छलाह। जीविकाक हेतु वो जुल्हाक धंधा करैत छलाह, जकरा सामाजिक धरातलपर पैघ काज नहि मानल जाइत छलैक। स्वयं कपड़ा बूनब एवम् दोसर हेतु मजूरी कए कपड़ा बूनबामे अन्तर छैक। कबीरदास कोनो मालिकक काज नहि करैत छलाह। ओ गृह उद्योगक स्वाभिमानक रक्षा करैत पेट भरैत छलाह। ओ अपन व्यवसायमे ततेक रमि गेल छलाह जे हुनक काव्यमे सदति ओही प्रकारक वस्तुसभक वर्णन अछि। एवम् प्रकारेण व्वसायजनित प्रतिष्ठाक सेहो हुनका कोनो परवाह नहि छलनि। ओ सगर्व कहलाहः जाति जुलाहा मति को धीर, हरषि-हरषि गुण रमै कबीर। मेरे राम की अभै पद नगरी, कहे कबीर जुलाहा। तू वाभन मैं कासी का जुलाहा।। कबीर दास मौलिक विचारक छलाह। धर्मक वास्तविक तात्पर्यकेँ ओ बुझलाह आओर साधारण जनता धरि ओकरे भाषामे तकरा रखलाह। ताहि हेतु हुनका कोनो दुर्गति वाँकी नहि रहलनि। प्राणोक रक्षा कठिन भए गेलनि। परंतु ओ निर्भयतापूर्वक अपन विचारपर अडिग रहलाह। तत्कालीन समाजक किछु शक्तिशाली लोक कबीरदासक प्रवल विरोध कएलक। तेँ कबीरदासकेँ कहए पड़लनिः कबिरा खड़ा बजारमे, लिआ लकुटि हाथ। जो घर जारे आपना, धरै हमारे साथ।। तमाम विरोधक बाबजूद कबीरदास रूकलाह नहि, अपन विचार लए कए आगू बढ़ैत रहलाह एवम् समयक कसौटीपर सही उतरलाह। भक्त कबीरक ई अनुभव छलनि जे शास्त्र मर्यादाक संग संप्रदाय निष्ठा जुड़ल होइत अछि। शास्त्र एवम् संप्रदायक सीमानमे रहि कए मानव मात्रक हेतु भक्तिक सर्वसुलभ पथ प्रस्तुत नहि कएल जा सकैत अछि। भक्तिपथक दूटा महान अवरोध थिक-शास्त्र एवम् संप्रदाय जे भक्ति भावनाकेँ सरल सहज रहए नहि दैत अछि। कबीर सहजमे आस्था रखैत छलाह। हुनक लगाव कोनो प्रकारक रुढ़ि एवम् अन्ध मर्यादासँ नहि छलनि। अनुभवकक तराजूपर तथ्य एवम् सत्यकेँ परखि कए ग्रहण त्याग करब हुनकर जीवनक्रम छलनि। धार्मिक अन्धविश्वास एवम् ढ़ोंगकेँ ओ प्रवल विरोधी छलाह। कंकड़ पाथर जोड़ि कए मस्जिद दिओ बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग देइ क्या बहिरो भयो खुदाइ।। संगहि ओ इहो कहलाहः पाथर पूजे हरि मिले तोँ मैं पूजूँ पहाड़। तासे तो चक्की भली पिसे खाय संसार।। प्रखर मानवतावादी कबीर धार्मिक प्रपंचकेँ चुनौती देलाह। निर्भीक एवम् तटस्थ भावसँ ओ समाजमे वढ़ि रहल ढ़ोंगक विरोध केलाह- यह सब झुठी बंदगी, बिरथा पंच नबाज। साँचै मारै झुठि पड़ि, काजी करै अकाज।। करसे तो माला जपै, हिरदै बहै डमडूल। पग तो पालामे गिरया, भजण लागी सूल।। जप-तप संजम पूजा अरचा, जोतिग जग बौराना। कागद लिखि-लिखि जगद भूलाना, मन ही मन न समाना।। कबीरदास युग निर्माता छलाह। ओ पारंपरिक लीकसँ हटि कए समाजकेँ एकटा क्रांतिक मार्गपर अनलाह। गरीब-धनीक, ब्राह्मण-शूद्र, आदिक बीचमे वर्ग समन्वयक सहज मार्ग प्रस्तुत केलाह। मानवतावादक प्रचार कए धर्मक वास्तविक अर्थकेँ लोक बूझए, तकर प्रयास केलाह। ओ अपन समस्त जीवनकेँ परोपकार एवम् मानव कल्याणमे लगा देलाह। मानवमात्रक कष्ट निवारणक हेतु ओ चिंतित रहैत छलाह। सुखिआ सब संसार है, खाबे अरु सोबै। दुखिआ दास कबीर है, जागे अरु रोबे।। अस्तु, ई तय अछि जे कबीरदास संत आ कवि तँ छलाहे सभसँ बढ़िकए ओ क्रान्तिकारी छलाह। समस्त समाजमे ओ एकटा नवचेतना आनए चाहैत छलाह। वर्ग विभेदकेँ नष्ट कए समाजमे मानवतावादक स्थापना चाहैत छलाह। ईश्वर एक छथि, मनुक्ख एक अछि, विभेद मानव निर्मित अछि-से हुनकर मंत्रवाक्य छल। समाजक स्थितितँ तेहने छल जे ईश्वरक केबार किछुए लोक हेतु खुजैत छल। तेहन समाजमे ताल ठोकि अपन विचार कहि देब एवम् ओकरा व्यवहारमे आनब एकटा क्रान्ति नहि तँ की छल? प्रयोजन अछि समाजमे एहने व्यक्तित्वकेँ, जे हमरा लोकनिकेँ वर्तमान सामाजिक अन्त्रद्वंदसँ मुक्ति दए सकए। मकर संक्रांति मकर संक्रान्ति सम्पूर्ण भारत ओ नेपालमे सर्वत्र कोनो-ने-कोनो प्रकारसँ मनाओल जाइत अछि। पौष मासमे जखन सूर्य मकर राशिमे अबैत छथि तखने ई पावनि मनाओल जाइत अछि। प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति १४ वा १५ जनबरीकेँ पड़ैत अछि। तमिलनाडूमे मकर संक्रान्तिकेँ ‘पोंगल’ कहल जाइत अछि। कर्नाटक, केरल एवम् आँध्रप्रदेशमे एकरा संक्रान्तिये कहल जाइत अछि। पंजाब आ हरियाणामे ‘लोहड़ी’ कहल जाइत अछि एवम् एक दिन पहिने अर्थात् १३ जनबरीकेँ मनाओल जाइत अछि। उत्तर प्रदेशमे एकरा मूलत: दानक पावनिक रूपमे मनाओल जाइत अछि। प्रयागमे प्रतिवर्ष १४ जनबरीसँ माघमेला प्रारंभ होइत अछि। माघ मेलाक प्रथम स्नान १४ जनबरीसँ प्रारंभ भए कए अन्तिम स्नान शिवरात्रिकेँ होइत अछि। महाराष्ट्रमे एहि दिन विवाहित महिला अपन पहिल संक्रान्तिपर तूर-तेल वा नून अन्य सुहागिनकेँ दइ छथि। बंगालमे एहि दिन स्नानक बाद तिल दान करबाक प्रथा अछि। एहि अवसरपर गंगासागरमे प्रतिवर्ष विशाल मेला लगैत अछि। असममे मकर संक्रान्तिकेँ ‘माघ-विहू’ अथबा ‘भोगाली विहू’क नामसँ जानल जाइत अछि। राजस्थानमे एहि पर्वपर सुहागिन महिला अपन सासुकेँ वियनि दए आशीर्वाद प्राप्त करैत छथि। संगे कोनो सौभाग्य सूचक वस्तुकेँ चौदहक संख्यामे पूजन एवम् संकल्प कए चौदहटा ब्राह्मणकेँ दान दइ छथि। मकर संक्रान्तिक माध्यमसँ भारतीय सभ्यता एवम् संस्कृतिक विविध रूपमे आभास होइत अछि। एहेन धारणा अछि जे मकर संक्रान्तिक दिन शुद्ध घी एवम् कम्बलक दान केलासँ मोक्षक प्राप्ति होइत अछि। माघे मासे महादेव: यो दास्पति वृहकम्वलम् स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते माक्ष प्राप्पति।। पुराणक अनुसार मकर संक्रान्तिक पर्व व्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आधशक्ति आ सूर्यक आराधना एवम् उपासनाक पावन व्रत अछि जे तंत्र-मंत्र-आत्माकेँ शक्ति प्रदान करैत अछि। संत-महर्षि लोकनिक अनुसार एकर प्रभावसँ प्राणीक आत्मा शुद्ध होइत अछि, संकल्प शक्ति बढ़ैत अछि, ज्ञान तंतु विकसित होइत अछि। मकर संक्रान्ति अही चेतनाकेँ विकसित करएबला पावनि अछि। ई सम्पूर्ण भारतमे कोनो-ने-कोनो रूपे मनाओल जाइत अछि। पुराणक अनुसार मकर संक्रान्तिक दिन सूर्य अपन पुत्र शनिक घर एक मासक हेतु जाइत छथि, कारण मकर राशिक स्वामी शनि छथि। यद्यपि ज्योतिषीय दृष्टिसँ सूर्य आ शनिक ताल-मेल संभव नहि अछि, तथापि एहि दिन सूर्य स्वयं अपन पुत्रक घर जाइत छथि। पुराणमे आजुक दिन पिता पुत्रक सम्बन्धमे निकटताक प्रारंभक रूपमे देखल जाइत अछि। मकर संक्रान्तिक दिन गंगाकेँ पृथ्वीपर आनएबला भगीरथ अपन पूर्वजक तर्पण केने छलाह। हुनक तर्पण स्वीकार केलाक बाद एही दिन गंगा समुद्रमे मिलि गेल रहथि। तँए एहि दिन गंगा सागरमे मेला लगैत अछि। विष्णु धर्मसूत्रक अनुसार पितरक आत्माक शान्तिक हेतु एवम् अपन स्वास्थवर्द्धन ओ सबहक कल्याणक हेतु तिलक प्रयोग पुण्यदायक एवम् फलदायक होइत अछि। तिल-जलसँ स्नान करब, ‘तिल’क दान करब, तिलसँ बनल भोजन, जलमे तिल अर्पण, तिलक आहुति एवम् तिलक उवटन लगाएब। एहि दिन भगवान विष्णु असुरक अन्त कए युद्ध समाजिक घोषणा केने छलाह। ओ राक्षस सबहक मुड़ीकेँ मंदार पर्वतमे दबा देने रहथि। एतदर्थ एहि दिनकेँ अशुभ एवम् नकारात्मकताकेँ समाप्त करबाक दिनक रूपमे देखल जाइत अछि। सूर्यक उत्तरायण भेलाबाद देवता लोकनि व्रह्म मुर्हुत उपासनाक पुण्यकाल प्रारंभ होइत अछि। एहि कालकेँ परा-अपरा विधाक प्राप्ति काल कहल जाइत अछि। साधनाक हेतु एकरा सिद्धिकाल सेहो कहल जाइत अछि। एहि समयमे देव प्रतिष्ठा, गृह निर्माण, यज्ञकर्म आदि पवित्र काज कएल जाइत अछि। रामायण कालसँ भारतीय पत्र-पत्रिकामे दैनिक सूर्योपारायणक प्रचलन अछि। रामचरितमानसमे भगवान राम द्वारा गुड्डी उड़ेबाक कार्यक उल्लेख सेहो अछि। मकर संक्रान्तिक वर्णन वाल्मिकी रामायणमे सेहो भेल अछि। राजा भगीरथ सूर्यवंशी छलाह। ओ भगीरथ तप-साधनाक द्वारा पापनाशिनी गंगाकेँ पृथ्वीपर आनि अपन पूर्वजक उद्धार केने छलाह। राजा भगीरथ अपन पूर्वजक गंगाजल, अक्षत, तिलसँ श्राद्ध-तर्पण केने छलाह। तहिआसँ मकर संक्रान्तिक स्नान आ मकर संक्रान्तिक श्राद्ध-तर्पणक परंपरा चलि रहल अछि। कपिल मुनिक आश्रमपर मकर संक्रान्तिक दिन माँ गंगाक पदार्पण भेल छल। पावन गंगाजलक स्पर्श मात्रसँ राजा भगीरथक पूर्वजकेँ स्वर्ग प्राप्ति भेलनि। कपिल मुनि वरदान दैत बजलाह- “मातृ गंगे त्रिकाल तक लोक सबहक पापनाश करतीह एवम् भक्तजनक सात पुश्तकेँ मुक्ति एवम् मोक्ष प्रदान करतीह। गंगाजलक स्पर्श, पान, स्नान ओ दर्शन सभ पुण्यदायक फल प्रदान करत।” सूर्यक सातम किरण भारतवर्षमे आध्यात्मिक उन्नतिक प्रेरणादायी अछि। सातम किरणक प्रभाव भारतवर्षमे गंगा-जमुनाक मध्य अधिक समय तक रहैत अछि। एहि भौगोलिक स्थितिक कारण हरिद्वार आ प्रयागमे माघमेलाक आयोजन होइत अछि। पितृतुल्य भगवान भास्कर दक्षिणायनसँ उत्तरायणमे जाइत काल उर्जामयी प्रकाश पृथ्वीपर वर्षा करैत छथि। अतुल्य शक्ति श्रोत प्रकृति रातिकेँ छोट एवम् दिनकेँ पैघ करए लगैत छथि। पृथ्वीमाता उदरस्थ आनाजकेँ पकबए लगैत छथि। चारू तरफ शुभे-शुभ होइत रहैत अछि। एहेन अद्भुत समयमे मकर संक्रान्तिक पर्व मनाओल जाइत अछि। सक्रान्तिक दिन पंजाबमे ‘लोहड़ी’क नामसँ मनाओल जाइत अछि। पंजाबक अतिरिक्त ई पावनि हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश आ जम्मू काश्मीरमे सेहो धूम-धामसँ मनाओल जाइत अछि। पारंपरिक तौरपर ‘लोहड़ी’ फसलक रोपनी आ ओकर कटनीसँ जुड़ल एक विशेष पावनि अछि। एहि दिन वॉंनफायर जकाँ आगिक ओलाव जरा कए ओकर चारूकात नृत्य कएल जाइत अछि। बालक सभ भांगड़ा, वालिका सभ गिद्धा नृत्य करैत छथि। लोहड़ीक आलावक आसपास लोक एकट्ठा भए दुल्ला-भट्ठी प्रशंसामे गायन करैत छथि। केतेको गोटेक मान्यता अछि जे ‘लोहड़ी’ शब्द लोई (सत कबीरक पत्नी) सँ उत्पन्न भेल मुदा अनेक लोक एकरा तिलोड़ीसँ उत्पन्न मानै छथि, जे बादमे लोहाड़ी भए गेल। लोहड़ीक ऐतिहासिक सन्दर्भ सुन्दरी-मुंदरी नामक दूटा अनाथ कन्या छली। ओकर काका ओकर विवाह नहि करए चाहैत छल अपितु ओकरा राजाकेँ भेँट कए देबए चाहैत छल। ओही समयमे हुल्ला भट्टी नामक एकटा उफाँइट छौड़ाकेँ नीकठाम बिआह कए देलक। वएह उफाँइट वरपक्षकेँ बिआहक हेतु मनाओलक आ जंगलमे आगि जरा कए दुनू कन्याँक बिआह करओलक। कहल जाइत अछि जे दुल्ला शगुनक रूपमे गुड़ देलक। भावार्थ जे उफाँइट होइतो दुल्ला भट्टी निर्धन वालिका सबहक कन्याँदान केलक एवम् ओकरा अपन कक्काक अत्याचारसँ बँचओलक। लोहड़ीक दिन बच्चा सभ दुल्ला भट्टीक सम्मानमे गीत गबैत घरे-घर घुमैत अछि। बच्चा सभकेँ मिठाइ एवम् अन्य वस्तु सभ दैत अछि। जँ कोनो परिवारमे कोनो खास अवसर जेना बच्चाक जन्म, विवाह आदि अछि तँ लोहड़ी आर धूम-धामसँ मनाओल जाइत अछि। सरिसवक साग आ मकईक रोटी खास कए एहि अवसरपर बनाओल जाइत अछि। तामिलनाडूमे एहि समय ‘पोंगल’ मनाओल जाइत अछि। प्रचूर मात्रामे अन्नक उपजापर भगवान सूर्यकेँ धन्यवाद ज्ञापन हेतु पावनिक आयोजन कएल जाइत अछि। तामिलनाडूक अलावा पुडुचेड़ी, श्रीलंका, विश्व भरिमे पसरल तमिल लोकनि एकरा मनबैत छथि। ओइ पोंगलमे चारि दिन तक–माने १४ सँ १६ जनवरी तक–मनाओल जाइत अछि। इन्द्र देवताक सम्मानमे पहिल दिन भोगी उत्सव मनाओल जाइत अछि। पोंगल दोसर दिन माटिक वर्तनमे दूधमे चाउर पका कए खीर भगवान सूर्यकेँ आन-आन वस्तु संगे चढाओल जाइत अछि। एहि अवसरपर घरक आगूमे कोलम (अपना ओइठामक अरिपन जकाँ) बनाओल जाइत अछि। पोंगलक तेसर दिन मट्ठू पोंगल कहल जाइत अछि। एहि दिन गायकेँ नाना प्रकारसँ सजा कए ओकरा पोंगल खुआएल जाइत अछि। चारिम दिन कन्तुम पोंगल कहल जाइत अछि। घरक महिला सभ स्नानसँ पूर्व हरदिक पातपर मिठाइ, चाउर, कुसियार हरदि आदि राखि कए अपन भाय लोकनिक कल्याण कामना करैत छथि। भाइक हेतु हरदि, चून, चाउरक पानिसँ आरती करैत छथि आ ई पानि घरक आगूमे बनल कोलमपर छिड़कि देल जाइत अछि। जल्लीकट्टू मट्टू पोंगल दिन पोंगल पर्वक एक हिस्साक रूपमे खेलल जाइत अछि। एहि लेल ग्रामीण सभ पहिनेसँ साँढ़केँ खुआ-पिआ कए तैयार केने रहैत छथि। एहिमे मूलत: केतेको गामक मन्दिरक साँढ़ (कोविल कालइ-तमिल नाम) भाग लैत अछि। जल्लीकट्टूक तीन अंग होइत अछि : वाटि मन्जू विराट्टू, वेली विराट्टू आ वाटम गन्जु विराट्टू। वाटि मन्जु विराट्टूमे साँढ़केँ जे व्यक्ति किछु दूरीपर किछु समय तक रोकि लइ छथि, से विजेता होइ छथि। वेली विराट्टूमे साँढ़केँ खाली मैदानमे छोड़ि देल जाइत अछि आ लोक ओकरा नियंत्रणमे करबाक प्रयास करैत अछि। वाटम मन्जुविराट्टूमे साँढ़केँ नमगर रस्सीसँ बान्हि देल जाइत अछि, आ खिलाड़ी सभ ओकरा नियंत्रित करबाक प्रयास करैत छथि। सम्पूर्ण देश जकाँ मिथिलांचलमे सेहो मकर संक्रान्तिक पर्व मनाओल जाइत अछि। गाम-घरमे एकरा तिला संक्रांति सेहो कहल जाइत अछि। अंग्रेजी नया सालक ई पहिल पावनि होइत अछि। लोकक घरमे नव अन्न भेल रहैत अछि। पहिनहिसँ लोक चूड़ा कुटा कए एहि पावनिक तैयारी केने रहैए। अपना एहिठाम माघ मासकेँ अत्यन्त पवित्र मास मानल जाइत अछि। बूढ़-बूढ़ महिला सभ भोरे-भोर जाड़-ठाढ़केँ बिसरैत पोखरिमे डुबकी लगबै छथि। गाममे कएटा मसोमात, वृद्धा सभकेँ थर-थर कँपैत स्नान करैत देखैत छलिएनि। सभसँ मनोरंजक दृश्य तँ तखन होइत छल, जखन ओ सभ महादेवक माथपर जल ढाड़ैतकाल गाम-घरक सभटा झगड़ा सोझराबएमे लागल रहैत छली। जानह हे महादेव! हमरा पेटमे किछु नहि अछि। हमर मोन गंगासन निर्मल अछि मुदा एहेन अत्याचारक निपटान तूँहीं करियह। ..पता नहि, महादेव सुनितो छलखिन की नहि। मुदा हमरा ई सभ सुनि कए जरूर वकोर लागल रहैत छल। बच्चामे पावनि सभ अद्भुत आनन्दक विषय रहैत छल। सभसँ सरल ओ आनन्ददायी होइत छल तिला संक्रांति। भोरे-भोर पोखरिमे जा कए डुबकी लगाउ। माइक हाथे तिल-चाउर खाउ। तिल-चाउर खुअबति काल माए पुछथि- “तिले-तिले बहब की नहि?” ताहिपर कहिअनि- “खूब बहब।” विध समाप्त। तकरबाद चुरलाइ, तिलबा इत्यादि भरि मोन खाउ...। कएक दिन पहिनहिसँ चुरलाइ, तिलबा (तिललाइ) आ लाइ (मुरहीक लाइ) बनेबाक कार्यक्रम प्रारंभ भए जाइत छल। घरक वातावरण चुरलाइक सुगन्धसँ परिपूर्ण। एहि पावनिमे सभसँ विशेषता ई अछि पावनिक सामग्री बनि गेल तँ ओकरा लेल बेसी प्रतीक्षा नहि करए पड़ैत अछि। दिनमे व्राह्मण भोजन होइत छल। व्राह्मण कियो आसे-पासक लोक होइत छलाह, कारण भरि गाममे भोजे रहैत छल। बट्टा भरि-भरि घी खिचड़िमे देल जाइत। संगे तरह-तरह केर पकवान सभ सेहो रहैत छल। हमरा गाममे किछु गोटे ओइठाम तिला संक्रान्तिमे जिलेबी बनैत छल। भोजमे खिचड़िक संग जिलेबी खेबाक बच्चा सभकेँ अद्भुत उत्साह रहैत छल। खिचड़िमे ततेक प्रचूर मात्रामे घी रहैत छल जे भोजनक बाद हाथ साफ-साफ धोनाइ कठिन। पावनिक कएक दिन बादो धरि चूरालाइ आ तिलबाक आनन्द भेटैत रहैत छल। एहि पावनिमे चूड़ा, दही, खेबाक सेहो परंपरा अछि। चूरा-दहीक वर्णन करैत खट्टर कका कहलखिन जे जखन पातपर चूड़ाक संग आम, धात्रीक अँचार ओ तरकारी परसल जाइत अछि तँ बुझू जे अन्हरिया आबि गेल। तकर बाद जखन दही परसाएल तँ बुझू जे इजोरिया। जेना पातपर चन्द्रमा उतरि गेलाह। ऊपरसँ जँ मधुर राखि देल जाए ओ कौर पेटमे गेल तँ पुछू नहि। पुरा सोनित ठण्ढा जाइत अछि आ आत्मा तृप्त भए जाइत अछि। मिथिलांचलमे एहि पर्वकेँ मनेबाक अद्भुत परंपरा अछि। चुरलाइ खाउ, चुरा-दही खाउ, खिचड़ि खाउ, जे खाउ, जखन खाउ...। वस्तुत: ई आनन्दक पर्व थिक जे कोनो-ने-कोनो रूपे सम्पूर्ण भारतपवर्षमे मनाओल जाइत अछि। सूर्यक तेजक मकर संक्रान्तिसँ जहिना बढ़ैत रहैत अछि, तहिना सभ लोक-वेदक सुख बढ़ैत रहए, सएह एहि पावनिक ध्येय थिक। घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 घरेलू हिंसा की थिक? आमतौर पर घरेलू हिंसा मात्र घरमे मारि-पीट बुझल जाइत अछि। सही मानेमे बालिकाक अरमानकेँ दबा देब, घरक अंदर परिवारक सदस्य द्वारा रोज-रोज मानसिक प्रताड़ना देब, तामसमे ओकर परसल भोजन फेँकि देब, ओकरा संगे गार-मारि करब, ओकर इच्छाक विरुद्ध ओकर पढ़ाइ रोकि देब, सेहो घरेलू हिंसाक रूप अछि। एकर अलावा यौन उत्पीड़न सेहो भारी हिंसा अछि, जाहि हेतु आम तौरपर दूरक रिश्तेदार वा पड़ोसक लोग जिम्मेदार होइत अछि। एहनमे जखन बालिका विरोध करैत अछि, तँ बदनामीक हवाला दए ओकर मुँह बंद कए देल जाइत अछि। एहि तरहक प्रतारणा नैहर, सासुर सभठाम होइत अछि। घरेलू हिंसा पारिवारिक सम्बन्धक परिपेक्ष्यमे एहन व्यवहार ओ सम्बन्धसँ जुड़ल अछि जे अपन जीवन संगीपर अधिकार जताबए एवम् मनमाना नियंत्रण करबाक हेतु कएल जाइत अछि। प्रताड़ना मनोवैज्ञानिक, शारीरिक, भावात्मक, आर्थिक, किछु भए सकैत अछि। घरेलू हिंसा विवाहित किंवा आपसी सहमतिसँ प्रेम सम्बन्धसँ जुड़ल जोड़ी, ककरो संगे भए सकैत अछि। घरेलू हिंसाक कारण की थिक? घरेलू हिंसाक प्रारंभ तखने होइत अछि जखन बालिका अपने माए-बापसँ खिलौना मांगैत अछि। हमर समाज ओकरा नेन्नेसँ कमजोर बनबैत अछि। जखन बेटा छोट रहैत अछि, तँ हम ओकरा हाथमे बैट-बाल वा स्पोर्टस क सामान दैत छी, जाहिसँ ओ शारीरिक आओर मानसिक रूपसँ मजगूत बनैत अछि। मुदा बालिकाक खेलक हेतु गुड्डा-गुडि़या वा चूल्हा बर्तन बला खेलौना देल जाइत अछि जाहिसँ ओ शारीरिक आओर मानसिक रूपसँ कमजोर होइत चलि जाइत अछि। एकर संगे भावनामे भसिआएल चल जाइत अछि। अब बालिका जेना- जेना पैघ होइत अछि घरक पाबंदी आओर समाजक यातना ओकरापर हावी होइत चलि जाइत अछि। दाम्पत्य जीवनमे घरेलू हिंसाक कारण हीन भावना, ईर्ष्या, क्रोधपर नियंत्रणक अभाव, जीवनसंगीसँ शिक्षा किंवा सामाजिक परिवेशमे न्योन होएब किछु भए सकैत अछि। घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 किएक लागू करए पड़ल? घरेलू हिंसाक अनगिनत घटना हमर देशमे होइत अछि, मुदा महज सौ-पचास दर्ज होइत अछि, ओहो चरम पर पहुँचलाक बाद। कतेकोठाम बालिकासभ साँझक बाद घरक अपेक्षा सड़कपर अंजान लोकसंग रहब ज्यादा सुरक्षित अछि कारण घरमे अपन लोक द्वारा बेसी दुर्घटना, हत्या आओर हिंसा करबाक संभावना रहैत अछि, बालिका जखन रस्ता पर बहराइत अछि, तँ ओकरा पता नहि होइछ कि शहरक चकाचौंधमे ओकरा संगे कखन कोनठाम छेड़खानी भए जाएत। बात अगर गामक करी तँ बालिका सुन्न रस्ता पर जएबासँ डराइत अछि मुदा ओहि डरक की करी, जकर जड़ि घरक अंदर होइत अछि आओर बालिकाक संगे पैघ होइत अछि। ओहि डरक की करी जे ओकरा जनमिते ओकर माथामे बैसि जाइत अछि आओर आधा जिनगी धरि रहैत अछि। घरेलू हिंसा क बात करैत काल ऑनर किलिंगक घटनासभकेँ फराक नहि कए सकैत छी। ऑनर किलिंगक जड़ि असलमे घरेलू हिंसा अछि। किएक तँ कोनो माए-बाप, भाए, काका कखनो सेहो अपनी बेटी वा बहिनके, सोझे मारि नहि देत, ओहिसँ पूर्व नाना प्रकारक यातना ओकरा देल जाइत अछि। एकटा सांख्यिकीय गणनाक अनुसार : (i) नित्य चारिटा महिला, एकटा पुरुष, आओर पाँचटा बच्चा घरेलू हिंसाक कारण अकाल मृत्युक शिकार भए जाइत छथि। (ii) अपन जीवन कालमे प्रत्येक चारिटामेसँ एकटा महिला घेरलू हिंसाक शिकार भए जाइत छथि। (iii) २०-२४ बर्खक महिलाक उपर घरेलू हिंसाक सभसँ बेसी खतरा रहैत अछि। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 स्त्रीक सुरक्षा, ओ स्त्रीक अधिकारक अधिक प्रभावी ढंगसँ लागू करबाक हेतु आनल गेल। एहि अधिनियमकेँ पारित करएसँ पहिने कानूनी स्थिति की छल? (i) घरेलू हिंसा कानूनमे कोनो स्पष्ट मान्यता नहि छल, (ii) (आईपीसी की 498 ए) क तहत घरेलू हिंसाक संपूर्ण अवधारणा विवाहित स्त्रीपर कएल गेल क्रूरताक धरि सीमित छल, (iii) दुखसंतप्त बहिन, माए, बेटी वा अविवाहित स्त्री एहिमे सामिल नहि छल, (iv) प्रताड़ित भेलापर विवाहित स्त्रीकेँ सीमित विकल्प छल: तलाक लए लिअए वा धारा 498 ए क अनुसार मोकदमा करए, घरेलू हिंसा दू प्रकारक होइत अछिःआपराधिक आओर गैर-आपराधिक: आपराधिक घरेलू हिंसा: बिना सहमतिकेँ शारीरिक संपर्क जेना यौन उत्पीड़न, लात मारब, अनावश्यक पछोड़कए भयभीत करब, कंप्यूटर हैकिंग, आपराधिक अलगाव गैर-आपराधिक घरेलू हिंसा: मित्र वा आन सामाजिक सरोकारीसँ संपर्क बाधित करब, टेलीफोनक संपर्क नहि होमए देब, घरेलू हिंसा कानूनक तहत कोनो पीड़ित महिलाजे अपराधिक संगे रहैत छथि, एहि कानूनक अनुसार मोकदमा कए सकैत छथि। घरेलू हिंसाक सबसँ खराब प्रभाव ओहि परिवारक छोट बच्चासभ पर होइत छैक।बच्चा वातावरणक उपज होइत छथि, एहने बच्चा बादमे जाकए घरेलू हिंसा करैत छथि वा ओकर शिकार भए जाइत छथि। घरेलू हिंसा अधिनियमक धारा२ (क्यु): घरेलू हिंसा अधिनियमक धारा२ (क्यु)क तहत मात्र पुरुष अपराधीक खिलाफ कार्रबाइक प्रावधानके असंबैधानिक घोषित करैत सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और रोहिंटन एफ नरीमन पीठ निर्णय देलक जे एहि कानूनक तहत महिला अपराधीकक खिलाफ सेहो मोकदमा चलि सकैत अछि।माननीय न्यायाधीश लोकनिक कहब छनि: “स्त्रीगणक खिलाफ कतेकोबेर स्त्रिए साजिसक तहत काजकए घरेलू हिंसामे सामिल होइत छथि, तेँ एहि कानूनक उपरोक्त धारा कानूनक मूल उद्दयेश्यसँ भुतिआ गेल लगैत अछि, तेँ ओकरा कानूनसँ हटा देल जाइत अछि।” घरेलू हिंसा कानूनक तहत केना मदति लेल जा सकैत अछि? (१) कोनो प्रकारक हिंसासँ वचाव हेतु आदेश प्राप्त करब, (२) निवास करबाक अधिकारक हेतु आदेश प्राप्त करब, (३) मौद्रिक राहत (४) हिरासतमे लेब (५) क्षतिपूर्तिक हेतु आदेश (६) अन्तरिम आओर एकपक्षीय आदेश सुरेश बनाम जयबीर (२००९): सुरेश बनाम जयबीर (२००९)क मामलामे न्यायलय ई आदेश देलक जे घरेलू हिंसा कानूनक धारा 12 क उपखंड (1) क तहत आवेदनक निपटारा करैत अन्तरिम आदेशमे न्यायिक दंडाधिकारी गुजाराक हेतु अन्तरिम राहत दए सकैत अछि। प्रथम श्रणी न्यायिक दंडाधिकारी वा महानगर दंडाधिकारीक ओतए सिकाइत कएल जा सकैत अछि: (१) जतए दोषी व्यक्ति रहैत हो, (२) जतए अपराध कएल गेल होइक, (३) जतय प्रताड़ित व्यक्ति रहैत हो, न्यायिक दंडाधिकारीक समक्ष सिकाइतक निपटान: पीड़त व्यक्ति संरक्षण अधिकारी, पुलिस किंवा सेवा प्रदाता (कल्याण अधिकारी)क मदति लए सकैत छथि। हिनका लोकनिक कर्तव्य अछि जे पीड़त व्यक्तिक जरुरी मार्गदर्शन करथि एवम् न्यायलय द्वारा देल गेल मौद्रिक क्षतिपूर्तिक आदेशक पालन सुनिश्चित कराबथि। संरक्षण अधिकारीक दायित्व अछि जे वो प्रताड़ित व्यक्तिक सिकाइतक घरेलू हिंसा प्रतिवेदन (DIR) तैयार कए न्यायालयकेँ उपलब्ध कराबए। संगहिँ प्रताड़ित व्यक्तिकेँ सेवा प्रदाताक वारेमे उचित मार्गदर्शन दैक जाहिसँ ओ ओहि कानूनी सुविधाक लाभ उठा सकए। सेवा प्रदाता कोनो कंपनी, महिलाक कल्याण हेतु कार्यरत गैर सरकारी संगठन, भए सकैत अछि। सेवा प्रदाताक ई कर्तव्य थिक जे प्रताड़ित व्यक्तिकेँ कानूनमे निहित ओकर अधिकारक बारेमे जानकारी देथि एवम् कानूनी उपचार लेबाकक हेतु उचित व्वस्था करएमे ओकरा मदति करथि। पुलिसक कर्तव्य थिक जे ओ प्रताड़ित व्यक्तिकेँ संरक्षण अधिकारी एवम् सेवा प्रदाताक बारेमे जानकारी देथि। संगहिँ भारतीय दंड संहिताक अनुक्षेद ४९८ (अ) मे प्राप्त अधिकारक जानकारी सेहो देथि। न्यायिक दंडाधिकारीक समक्ष पीड़िता द्वारा सिकाइत प्राप्त भेलाक तीनदिनक भीतर मामलामे सुनबाइक तारिख तय होएत। न्यायालयसँ समन भेटलाक दूदिनक भीतर संरक्षण अधिकारी तकर जानकारी प्रतिवादीकेँ देत। प्रतिवादीकेँ देल गेल समनक संग घरेलू हिंसा कानूनक धारा 12 क उपखंड (३)क तहत सिकाइतक प्रतिलिपि सेहो देल जाएत। प्रतिवादी द्वारासे प्राप्त भेलाक बादे एकतरफा सुनबाइ भए सकैत अछि आ स्थाइ अन्तरिम आदेश कएल जा सकैत अछि। जरुरी बुझलापर न्यायलय एकतरफा सुनबाइ कए अन्तरिम आदेश दए सकैत छथि। न्यायिक दंडाधिकारी ६० दिनक भीतर एहन सिकाइतक निपटान करताह। हुनकर आदेशक खिलाफ सम्बन्धित पक्ष ३० दिनक भीतर सेशन कोर्टमे अपील दाएर कए सकैत छथि। प्रतिवादी द्वारा संरक्षण आदेश किंवा अन्तरिम संरक्षण आदेशक पालन नहि करब संज्ञेय एवम् गैर जमनती अपराधक श्रणीमे अबैत अछि। हुनका ताहि कारणसँ एक साल धरि जेल किंवा बीस हजार रुपया जुर्माना भए सकैत अछि। जौं संरक्षण अधिकारी दंडाधिकारी द्वारा देल गेल आदेशक पालन करबामे बिना कोनो वाजिब कारणके आनाकानी करैत छथि तँ हुनको एहि तरहक दंड देल जा सकैत अछि, मुदा ताहि हेतु विभागीय अधिकारीकेँ पूर्व अनुमति आवश्यक थिक। पीड़ित व्यक्तिकेँ संयुक्त परिवारक साझी निवासमे रहबाक हेतु न्यायलय निवास करबाक आदेश दए सकैत अछि भले ओहि घरमे प्रतिवादीक हिस्सा होइक वा नहि होइक। एस आर बतरा एवम् अन्य बनाम श्रीमती तरुना बतराक मामलामे उच्चतम न्यायालय ई फैसला देलक जे घरेलू हिंसा अधिनियमक धारा १७ (१) क अनुसार प्रताड़ित महिला मात्र साझी आवासमे रहबाक हकदार भए सकैत अछि। साझी आवासक माने पति द्वारा कीनल किंवा किरायापर लेलगेल घर अछि वा एहन साझी घर अछि जाहिमे पतिक हिस्सा होइक। कहक माने जे जाहि घरमे ओकर पतिकेँ कानूनी अधिकार नहि छैक ताहिमे प्रताड़ित व्यक्तिकेँ रहबाक अधिकार न्यायलय एहि कानूनक तहत नहि दए सकैत अछि। घरेलू हिंसा रोकबाक समाधान : घरेलू हिंसा रोकबाक एकटा समाधान ई भए सकैत अछि जे पति न्यायिक दंडाधिकारीक समक्ष शपथ-पत्र देथि जे ओ आगा अपन पत्नीक संग सम्मानपूर्ण व्यवहार करताह, एहन किछु नहि करताह जाहिसँ ओकरा कोनो प्रकारक यंत्रणासँ फेर गुजरए पड़ैक, तकर संपूष्टिमे अपन संपत्तिकेँ गारंटी देथि जाहिसँ घरेलू हिंसाक पुनरावृति भेलापर ओकरा जब्त कए लेल जाएत। उपसंहार आपसी सम्बन्ध प्रेम, आदर, ईमान्दारी, एवम भावुक लगावसँ सराबोर हेबाक चाही। आपसी अविश्वाससँ हिंसा ओ दुराचर बढै़त अछि, एहन दंपति निरंतर आशंकाग्रस्त रहैत छथि जाहिसँ जीवन नर्क भए जाइत अछि। जीवनक ई कटुसत्य अछि जे अहाँ दोसरकेँ नहि बदलि सकैत छी, हम अपनेटाकेँ बदलि सकैत छी। कमसँ कम एतबातँ कइए सकैत छी जे जाहि सम्बन्धमे लज्जति नहि रहि गेल अछि, जतए अविश्वासक पराकाष्ठा पहुँचि गेल अछि, ओतए फसाद बढे़नाइ छोड़ि कानून सम्मत तरीका अख्तिआर करी। महिला संगठन सिर्फ जागरूकता पैदा कए सकैत अछि, पुलिस सिर्फ उत्पीड़न करएबलाकेँ जेल पठा सकैत अछि, कोर्ट सिर्फ न्याय दए सकैत अछि, एहिमे सँ कोनो अहाँक घरक हालत ठीक नहि कए सकैत अछि, घरमे पैसि नित्य-प्रतिक समस्याक समाधान नहि कए सकैत अछि। अस्तु सिर्फ सोच बदलक जरूरत अछि। जीवनक दुखमय परिस्थितिसँ हारि नहि मानि नव ओ सुंदर जीवन जिबाक हेतु सचेष्ट रहैत पिड़ित व्यक्तिकेँ ई विश्वास बनओने रहक चाही जे सुंदर समय आवहिँबला अछि, अएबे करत। गिरफ्तारी ओ जमानत कोनो-ने-कोनो झंझटिमे नहिओ चाहैत कए बेर लोक फँसि जाइत अछि। केबेर निर्दोष लोकक खिलाफ झूठ-फूसके मामला बना देल जाइत अछि जाहिमे पुलिसके घाल-मेल सेहो भए जाइक से भारी बात नहि। टेलेविजनकेँ गाम-गाम पसरि गेलासँ अपराधक नव-नव स्वरूप गामो-घरमे फैलि रहल अछि। कैटा कानूनो एहन भए गेल अछि जे बिना गलतिओकेँ कैबेर लोक जहल धरि पहुँचि जाइत छथि एहन परिस्थितिमे लोकके जहल ओ जमानतसँ सम्बन्धित कानूनक जानकारी बहुत आवश्यक भए गेल अछि जाहिसँ व्यर्थक फसादसँ बचि सकथि आ जरूरी भेलापर समाधान कए अपन जीवन ओ इज्जतिक रक्षा करथि। कैटा कनून एहन अछि जाहिमे पुलिस मामला दाखिल होइते अभियुक्तकेँ गिरफ्तार कए सकैत अछि। उदाहरणस्वरूप भारतीय दणड संहिताक धारा ४९८ (ए)क तहत कएल गेल मोकदमामे अभियुक्तक हालत बहुत पातर भए जाइत छल। ओकरा सभसँ पहिने पुलिस गिरफ्तार करैत छल, तखन आर किछु। बहुत रास मामलामे देखल गेल जे कएल गेल सिकाइत झूट छल, कोर्टमे साबूतक आधारपर साबित नहि भेल, अभियुक्त बरी भए गेल, मुदा ताबति ओकर सभ दशा भए जाइत छल, ओकर इज्जतिक मटियामेट भए जाइत छल। उच्चतम न्यायलय एहि बातक संज्ञान लैति दिशा-निर्देश जारी कए सुनिश्चित करबाक प्रयास केलक जे निर्दोश लोकके एहन मामलामे वेबजह गिरफ्तारी नहि होइक। संविधानक धारा २२ क अनुसार पुलिस द्वारा गिरफ्तार कएल गेल व्यक्तिकेँ अधिकार अछि जे ओ गिरफ्तारीक कारण जानए, जौं गिरफ्तारी वारंटक आधारपर भेल अछि तँ ओकरा वारंट देखाओल जाए, वकील वा निकट सम्बन्धीकेँ संपर्क कए सकए। ओकरा गिरफ्तारीक चौवीस घंटाक भीतर मजिष्ट्रेटक सम्मुख उपस्थित करब जरुरी थिक। ओकरा इहो बताएब जरुरी तिक जे ओ जमानतपर छोड़ल जा सकैत अछि कि नहि। गिरफ्तार कएलगेल व्यक्तिकेँ हथकड़ी लगाएब: ऊच्चतम न्यायलयक दिशा निर्देशक अनुसार गिरफ्तार कएलगेल व्यक्तिकेँ हथकड़ी लगाबएसँ बचबाक चाही, कारण एहन व्यक्ति सजाआफ्ता नहि होइत छथि। हथकड़ीक प्रयोग अपवादिक परिस्थितिमे तखने कएल जाए जखन कि अभियुक्त हिंसक हो, पुलिसक गिरफ्तसँ भागि जेबाक संभावना होइक, किंवा आत्महत्यापर उतारु हो। सीआरपीसीक धारा ७४क अधीन पुलिस अभियुक्तकेँ गिरफ्तार करबाक हेतु घरमे घुसि कए ओकरा पकड़ि सकैत अछि, ताहि लेल जरुरी भेलापर घरक खिड़कीकेँ तोड़ि सकैत अछि। कोनो व्यक्तिकेँ गिरफ्तार केलाक बादे ओकर तलाशी कएल जा सकैत अछि, पहिने नहि। जौं गिरफ्तार कएल गेल व्यक्ति महिला छथि तखन महिले पुलिस ई काज कए सकैत अछि। महिलाक गिरफ्तारी हेतु उच्चतम न्यायलय द्वारा जारी कएल गेल दिशा निर्देश: उच्चतम न्यायलय द्वारा जारी कएल गेल मार्गदर्शनक अनुसार सामान्यतः कोनो महिलाकेँ साँझक बाद आ भोर हेबासँ पहिने गिरफ्तार नहि कएल जाएत। जौं ततबे आवश्यक भए जाइक आ रातियेमे महिलाक गिरफ्तारी जरूरी होइक, भोरधरि रुकब कानूनक अनुपालन हेतु दिक्कति भए जेबाक संभावना प्रवल होइक, तखन मजिष्ट्रेटक पूर्व अनुमति लए एवम् महिला पुलिस द्वारा ई काज कएल जाएत। गिरफ्तारीक बाद जौं महिलाकेँ तलाशी करब जरूरी होइक तखन ई काज महिला पुलिस द्वारा कराओल जेबाक चाही। पुलिस हाजतिमे महिलाकेँ अलग राखबाक चाही जौं महिलाक हेतु अलग हाजति नहि होइक तखन ओकरा अलग कोठरीमे राखल जेबाक चाही। विना वारंटकेँ गिरफ्तारीः आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1 9 73 क धारा 41 क अनुसार पुलिस कोनो व्यक्तिकेँ निम्नलिखित परिस्थितिमे बिना वारंटकेँ गिरफ्तार कए सकैत अछि: (१) जखन ओ कोनो संज्ञेय अपराध केने हो, (२) कोनो पुलिस अधिकारीकेँ कर्तव्य निर्वहनमे व्यवधान ठाढ़ केने होइक, (३) ओकर घरसँ कोनो चोरीक माल पकड़ल गेल होइक, (४) कानूनी हिरासतसँ मटिआ रहल हो, (५) सेना, वायु सेना, जलसेनासँ भागि आएल हो, (६) जौं ओकरा अपराधी घोषित कएल गेल हो, (७) जौं ओ अभ्यस्त अपराधी अछि, (८) जौं ओकरापर संज्ञेय अपराध करबाक शक छैक, (९) जौं न्यायलय द्वारा छोड़ल गेल अपराधी न्यायलयक शर्तक अनुपालन नहि करैत अछि, कैटा आओर एहन कानूनसभ अछि जाहि सिकाइत भेलापर पुलिसकेँ अभियुक्तकेँ गिरफ्तार करबाक अजस्त्र अधिकार भए जाइत अछि। संज्ञेय अपराध की थिक? संज्ञेय अपराधमे पुलिस बिना कोर्ट आदेशकेँ अभियुक्तकेँ गिरफ्तार कए सकैत अछि। हत्या, वलात्कार, चोरी, राष्ट्रद्रोह, सन अपराधक मामला एहि श्रेणीमे अबैत अछि। असंज्ञेय अपराध की थिक? असंज्ञेय अपराध क मामलामे कोर्टक आदेश भेलाक बादे ककरो गिरफ्तार कएल जा सकैत अछि। जौं अभियुक्त पुलिसक गिरफ्तसँ भागवाक प्रयास करैत अछि, तँ ओकरा पुलिस उपयुक्त वल प्रयोग कए पकड़ि सकैत अछि, परंतु वलक अनावश्यक प्रयोगसँ पुलिसकेँ बचबाक चाही। मुदा आवश्यक भेलापर पुलिस जानो लए सकैत अछि, वशर्ते ओकर अपराध मृत्युदंड देबए जोगर होइक। अग्रिम जमानत: अग्रिम जमानतदेबाक अधिकार उच्च न्यायलय वा सेशन कोर्टकेँ अछि। अग्रिम जमानत हेतु आवेदन निचला कोर्टमे नहि कएल जा सकैत अछि। अग्रिम जमानत देबा काल न्यायलय सुनिश्चित करैत अछि जे आवेदक मामलाक विवेचनामे वांछित सहयोग करताह, देश छोड़ि बाहर नहि चलि जेताह, कोनो गवाह वा सबूतकेँ प्रभावित नहि करताह। आवेदककेँ जौं आशंका होइक जे ओकरा कोनो मामलामे फँसाकए गिरफ्तार कएल जा सकैत अछितँ ओ उचित न्यायालयकेँ अग्रिम जमानत हेतु आवेदन कए सकैत छथि। अग्रिम जमानत ताबते धरिक हेतु देल जेबाक चाही जा धरि चालान कोर्टमे प्रषित नहि कएल गेल अछि, तकर बाद अभियुक्तकेँ नियमित जमानत हेतु सम्बन्धित न्यायलयमे आवेदन देबाक चाही (सजलुद्दीन अब्दुल समद शेख बनाम राज्य महाराष्ट्र) न्यायक तकाजा थिक जे अग्रिम जमानत देबासँ पूर्व विरोधी पक्षकेँ न्यायलय नोटिस जारी करए जाहिसँ अभियुक्त गलत जानकारि दए किंवा वांछित जानकारीकेँ दबाकए अग्रिम जमानत नहि लए सकए (बालचंद जैन बनाम मध्य प्रदेश ) जमानती वारंट: गिरफ्तारीक वारंट कोनो कोर्टक पीठासीन अधिकारी द्वारा लिखित रूपमे जारी कएल जाइत अछि। ओहिमे स्पष्ट रूपसँ ई लिखल हेबाक चाही जे कानूनकक कोन धाराक अनुसार ओकर गिरफ्तारीक वारंट जारी कएल गेल अछि, ओकरा कहिआ आ कखन ओहि कोर्टमे हाजिर हेबाक छैक। ओहि आदेशमे इहो लिखल रहत जे ओकरा उचित जमानात देला पर एहि शर्त संग गिरफ्तारीसँ छूट देल जाइत अछि जे ओ नियत दिन/नियत समय पर कोर्टमे हाजिर भए जाएत, ताहि हेतु एकटा निश्चित रकमक बौंड सेहो ओकरा देबए पड़ैत अछि, एकाधिक व्यक्तिकक जमानात सेहो दबए पड़ि सकैत अछि। गैर जमानती वारंट: गैर जमानती वारंटमे पुलिस अभियुक्तकेँ गिरफ्तार कए सम्बन्धित कोर्टमे हाजिर करैत अछि, तकर बादे ओकर जमानत पर छोड़वाक आवेदनपर कोर्ट विचार करत।कोनो मामलामे जमानत पर अभियुक्तकेँ रिहा करबासँ पूर्व कोर्टकेँ मामलाक गंभीर छानबीन कएल जाइत अछि, कोर्ट ई सुनिश्चित करए चाहैत अछि जे जमानतपर छोड़ि देलाक बाद ओ न्यायिक प्रकृयाकेँ प्रभावित नहि करए, जरुरत भरि मामलाक अनुसंधानमे सहयोग करए, गवाहसभकेँ तोड़बाक प्रयास नहि करए। संगहि ओकर इतिहास एवम् चरित्रक विषयमे सेहो जानकारी लेबाक प्रयोजन होइत अछि जाहिसँ बाहर गेलाकबाद ओ समाजक हेतु समस्या नहि भए जाए। सेशन कोर्ट वा उच्च न्यायालयसँ जमानत: जौं अभियुक्त एहन अपराध केलक अछि जाहिमे मृत्युदंड वा आजन्म कारावासक प्रावधान थिक, तखन ओकरा जमानत सेशन कोर्ट वा उच्च न्यायालयसँ भेटत, ताहिसँ निचला कोर्टसँ नहि। न्यायलयकेँ जमानत देबाक समय बहुत सावधानीपूर्वक विचार करबाक प्रयोजन अछि कारण अपराध सिद्ध होयबासँ पूर्वे ककरो जहलमे सड़ादेब मानवीय अधिकारक सरासर उल्लंघन थिक मुदा संगहि समाजके व्यापक हितकेँ ध्यान राखब सेहो जरूरी अछि, जे ओ व्यक्ति बाहर आबि कए एहन ने कए देथि जे कोनो आन व्यक्तिक सम्मान ओ जीवन पर संकट उत्पन्न भए जाइक। उपसंहार संविधानक अनुक्षेद २१ एवम २२ क तहत प्राप्त मौलिक अधिकारक रक्षाक हेतु आवश्यक अछि जे बेबजह ककरो स्वतंत्रता पर आघात नहि होइक, लोक निर्वाध अपन जीवनक रक्षा कए सकए। गिरफ्तारी निश्चय एहि संवैधानिक अधिकारकेँ सद्यः सीमिते नहि करैत अछि अपितु ग्रहण लगा दैत अछि। मुदा ककरो स्वतंत्रता एहि हद धरि नहि भए सकैत अछि जे कोनो निर्दोष आदमीक जिनाइ कठिन कए दैक, किंबा कोनो अपराधी बेटछुट्ट भेल घुमैत रहए। अस्तु, पुलिस एवम् न्यायालयकेँ एकटा संतुलित रुखि राखि प्रत्येक मामलामे नीर- क्षीर विवेक रखैत काज करक चाही जाहिसँ कोनो निर्दोष व्यक्तिकेँ फिरसान नहि होबए पड़ैक आ दोषी खुल्ला नहि घुमैत रहए।निश्चय ई संतुलन बनाएव एकटा कठिन काज थिक मुदा समस्त कानून ओ न्यायालय एहि प्रयासमे लागल रहैत अछि। सूचनाक अधिकार भारतक संविधानक अनुक्षेद १९ मे निहित मौलिक अधिकारसँ भारतक नागरिककेँ सूचनाक अधिकार प्राप्त अछि। ताहि अधिकारकेँ प्राप्त करबाक व्यवस्था सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अन्तर्गत कएल गेल। सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 प्रत्येक नागरिककेँ ई अधिकार दैत अछि जे ओ सरकारसँ ओकर काजक बारेमे जानकारी मांगि सकैत अछि। एहि तरहें आब भारत सेहो विश्वक ओहि ६० देशमे सामिल भए गेल अछि जे अपन नागरिककेँ सूचनाक अधिकार प्रदान कए पारदर्शी, जवाबदेह एवम् सुशासन स्थापित करबाक चाक-चौबंद व्यवस्था केने अछि। केन्द्रीय सूचना आयोग सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 मे ई व्यवस्था कएल गेल अछि जे केन्द्र सरकार द्वारा एक केन्द्रीय सूचना आयोगक गठन कएल जाएत जाहिमे एक मुख्य सूचना आयुक्त एवम् अधिक सँ अधिक दसटा केन्द्रीय सूचना आयुक्त होएत। मुख्य सूचना आयुक्त एवम् अन्य सूचना आयुक्तक नियुक्तिक हेतु एकटा समिति गठित होएत जकर अध्यक्ष प्रधानमंत्री एवम् लोकसभामे विपक्षक नेता एवम् प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत केन्द्रीय मंत्रीमंडलक एकटा मंत्री एकर सदस्य हेताह। एकर अतिरिक्त प्रत्येक राज्यमे राज्य सूचना आयोग अलगसँ गठित कएल जाइत अछि। जौं कोनो केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी बिना कोनो वाजिब कारणसँ सूचनाक हेतु आवेदन नहि लैत अछि, किंवा वाँछित सूचना देबएमे आना-कानी करैत अछि, किंवा जानि-बूझि कए गलत वा अधूरा जानकारी दैत अछि, वा सूचना नष्ट कए देल गेल अछि तँ केन्द्रीय सूचना आयोग सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अनुक्षेद ७ (१) अन्तर्गत ओकरा खिलाफ सम्बन्धित विभागकेँ अनुशासनात्मक कारवाई करबाक आदेश दए सकैत अछि। एहन परिस्थितिमे आयोग सम्बन्धित दोषी अधिकारीकेँ सूचना देबाक दिन धरि २५० टाका प्रतिदिनक हिसाबसँ पचीस हजार टाका धरि जुर्माना लागा सकैत अछि। आयोगक समक्ष सिकाइत सोझे दाखिल कएल जा सकैत अछि? जौं हँ, तँ कोन आधारपर? निम्नलिखित परिस्थितिमे सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क धारा १८ क अन्तर्गत आयोगक समक्ष सोझे सिकाइत दाखिल कएल जा सकैत अछि:- (क) जौं ओ ओहि कारणसँ अनुरोध प्रस्तुत करबाक हेतु असमर्थ रहल अछि, कि ओहि अधिनियमक अधीन एहन अधिकारीक नियुक्ति नहि कएल गेल अछि वा केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी ओहि अधिनियमक अधीन सूचना वा अपीलक हेतु धारा 19 क उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी वा ज्येष्ठ अधिकारीकेँ पठेबाक हेतु स्वीकार करबासँ मना कए देलक अछि; (ख) जौं ओकरा ओहि अधिनियमक अधीन अनुरोध कएल गेल कोनो जानकारी धरि पहुंचएसँ मना कएल गेल अछि; (ग) जौं ओकरा ओहि अधिनियमक अधीन विनिर्दिष्ट समय-सीमाक भीतर सूचनाक हेतु वा सूचना धरि पहुँचक हेतु अनुरोधक उत्तर नहि देल गेल अछि; (घ) जौं ओकरासँ ओहन फ़ीसक रकमक संदाय करबाक हेतु अपेक्षा कएल गेल अछि, जे ओ अनुचित बुझैत अछि; (ङ) जौं ओ विश्वास करैत अछि कि ओकरा ओहि अधिनियमक अधीन अपूर्ण, भ्रमित करएबला वा मिथ्या सूचना देल गेल अछि; आओर (च) ओहि अधिनियमक अधीन अभिलेखक हेतु अनुरोध करबाक हेतु वा ओकरा प्राप्त करबासँ सम्बन्धित कोनो अन्य विषयक सम्बन्धमे। सूचनाक अधिकारक तहत सरकारी विभाग, सरकारी सहायतासँ चलएबला गैर सरकारी संगठन, वा शिक्षण संस्थानसँ जानकारी प्राप्त कएल जा सकैत अछि। सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 धारा 2 (एच) क तहत लोक प्राधिकरण अथवा सार्वजनिक संस्थाक लग उपलब्ध सूचनाक मांग कए सकैत अछि। सार्वजनिक संस्थासभमे संविधान द्वारा स्थापित या गठित, संसद या कोनो राज्य विधायिकाक कानून द्वारा स्थापित वा गठित, केन्द्र वा राज्य सरकारक कोनो अधिसूचना वा आदेशक द्वारा स्थापित वा गठित, राज्य व केन्द्र सरकारक स्वामित्व बला, ओकरा द्वारा नियंत्रित वा पर्याप्त मात्रामे सरकारी धन पाबएबला निकाय सभ, गैर सरकारी संगठन व निजी क्षेत्रक निकाय जे सरकारक द्वारा प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूपसँ वित्तपोषित अछि, सामिल अछि। आवेदक द्वारा सूचनाक अधिकारक उपयोग करैत केहन जानकारी मांगल जा सकैत अछि? १. कोनो सरकारी दस्ताबेजक प्रति मांगि सकैत छी। २. कोनो सरकारी दस्ताबेजक जाँच कए सकैत छी। ३. कोनो सरकारी काजकेँ जाँचि सकैत छी। ४. कोनो सरकारी काजमे प्रयुक्त बस्तुक प्रमाणित नमूना मांगि सकैत छी। एहि कनूनक तहत अहाँ कोनो जानकारी हासिल कए सकैत छी जेनाकि : कोनो सड़ककेँ बनाबएमे सरकार कतेक खर्च केलक, प्रधानमत्रीक रहन- सहन पर कएल गेल खर्च, राष्ट्रपति भवनमे कएल गेल खर्च, कोनो सरकारी योजना पर कएल गेल खर्च, पंचायत द्वारा कोनो योजनामे कएल गेल व्यय वा कोनो प्रकारक अन्य जानकारी वा ओहिसँ सम्बन्धित दस्तावेजक छायाप्रति मांगल जाए सकैत अछि। सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अनुक्षेद ६ (२) अन्तर्गत आवेदकसँ ई नहि पूछल जा सकैत अछि जे ओ सूचना किएक मांगि रहल छथि। संगहि व्यक्तिगत विवरण, आय, पैन नंबर, विभिन्न पैरामीटरक तहत विशेषज्ञक व्यक्तिगत पैनल द्वारा देल गेल प्राप्तांक, संपत्तिक रिटर्न आओर संपत्तिक विवरण, आकलन रिपोर्ट, मेडिकल रिपोर्ट, बैंक खातोंका विवरण, प्राधिकरणसँ स्पष्टीकरण मंगैत प्रश्न नहि पूछल जा सकैत अछि। सूचनाक अधिकारक क्षेत्रमे नहि आवएबला विभाग : –कोनो खुफिया एजेंसीक ओहन जानकारी, जकरा सार्वजनिक भेलासँ देशक सुरक्षा आओर अखंडताकेँ खतरा हो – दोसर देशक संग भारतसँ जुड़ल मामला – थर्ड पार्टी यानी निजी संस्थान सम्बन्धी जानकारी जे सरकारक पास उपलब्ध अछि ओहि संस्थाक जानकारीकेँ सम्बन्धित सरकारी विभागक मार्फत हासिल कएल जा सकैत अछि। स्वेक्षासँ जानकारी प्रकाशित कएल जाएत: सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अनुक्षेद ४ (बी) अन्तर्गत प्रत्येक सरकारी विभाग अपन विभागसँ सम्बन्धित अधिकसँ अधिक जानकारी स्वेक्षासँ विभागक वेवसाइटपर प्रकाशित करत। अन्यथा भारतक कोनो नागरिक सूचनाक अधिकारक तहत अनुक्षेद ६क तहत आवेदन दए सूचना प्राप्त कए सकैत छथि। सूचनाक अधिकारक तहत आवेदन कोना कएल जाएत? सूचनाक अधिकारक तहत आवेदनक हेतु कोनो निश्चित प्रपत्र नहि अछि। सादा कागज पर अपन आवेदन लिखि कए वांछित जानकारी मांगल जा सकैत अछि। आवेदन शुल्कक भुगतान कोना कएल जाएत? सूचनाक अधिकारक तहत आवेदन करबाक हेतु केन्द्र सरकारक अधीन आबएबला मंत्रालय विभागसँ जानकारी प्राप्त करबाक हेतु दसटाकाक शुल्क लगैत अछि जकर भूगतान पोस्टल आर्डर, बैंक ड्राफ्ट, द्वारा कएल जा सकैत अछि। राज्य सरकार सभ अलग- अलग शुल्क रखने अछि। आरटीआइ ऑन लाइन आवेदक सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अन्तर्गत सूचना प्राप्त करबाक हेतु, सूचनाक अधिकार (आरटीआई) ऑनलाइन पोर्टलक माध्यम https://rtionline.gov.in.सँ केन्द्रीय मंत्रालय/ विभागसँ एवम् “ऑनलाइन सूचनामे उल्लिखित अन्य केन्द्रीय लोक प्राधिकरणकेँ अनुरोध कए सकैत छथि।” आरटीआई नियम, 2012 क अनुसार गरीबी रेखासँ नीचाक लोककेँ आरटीआई शुल्कक भुगतान करबाक आवश्यकता नहि अछि। तथापि, बीपीएल आवेदककेँ अपन आवेदनक संग- संग एहि सम्बन्धमे, उपयुक्त सरकार द्वारा जारी प्रमाण-पत्रक एक प्रति संलग्न करब जरुरी अछि। प्रथम अपीलीय प्राधिकारीकेँ अपील करबाक हेतु, आवेदककेँ आरटीआई ऑनलाइन पोर्टलमे “सबमिट फर्स्ट अपील” नामक विकल्पक चयन करए पड़त आओर सामने आबए बला फार्मकेँ भरए पड़त। प्रथम अपीलकेँ दायर करबाक हेतु मूल आवेदनक पंजीकरण संख्या आओर ई-मेल आईडीक आवश्यकता पड़ैत अछि। आरटीआई अधिनियमक अनुसार, प्रथम अपीलक हेतु कोनो शुल्क नहि देबाक अछि। ऑनलाइन दायर आरटीआई आवेदन या प्रथम अपीलक स्थिति/ जवाब “स्थिति” पर क्लिक कए आवेदक द्वारा देखल जाए सकैत अछि। सूचना के देत? प्रत्येक सरकारी विभागमे एकाधिक लोक सूचना अधिकारी/सहायक लोक सूचना अधिकारी नियुक्त कएल जाइत छथि जिनकर जानकारी सम्बन्धित विभागक वेबसाइट किंबा सूचना पट्ट वा विभागमे पूछ-ताछ कए प्राप्त कएल जा सकैत अछि। लोक सूचना अधिकारी/सहायक लोक सूचना अधिकारी विभागक हेतु सूचनाक अधिकारक अधीन कएल गेल आवेदन प्राप्त करैत छथि, ओकरा सम्बन्धित अधिकारीकेँ पठाए सूचना संकलित करैत छथि एवम् नियत समय (आवेदन केलाक वाद एक मासक अधीन, कोनो- कोनो मामलामे ४५ दिन) मे जानकारी आवेदककेँ पहुँचवैत छथि। सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अनुक्षेद ६(३) अन्तर्गत जौं मांगल गेल सूचना आंशिक वा पूर्ण रूपसँ कोनो दोसर लोक प्राधिकरणसँ सम्बन्धित अछि तँ आवेदन प्राप्त केनिहार लोक प्राधिकरण ओकरा संविधित लोक प्राधिकरणकेँ पाँच दिनक भीतर स्थानान्तरित कए सकैत अछि। तकर सूचना आवेदककेँ सेहो देल जाएत। प्रथम अपील सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अनुक्षेद १९ (१) अन्तर्गत प्रत्येक सरकारी विभाग ओहि अधिकारीक नाम अधिसूचित करत जकरा लग प्रथम अपील कएल जा सकैत अछि। जौं आवेदककेँ तीस दिनक भीतर जबाब नहि भेटैत छैक, किंबा भेटल जबाब अपूर्ण वा भ्रामक छैक तँ आवेदक तीस दिनक भीतर प्रथम अपीलीए अधिकारीक ओतए अपील कए सकैत अछि। एहि हेतु ओकरा फेरसँ फीस नहि देबए पड़तैक। द्वितीय अपील प्रथम अपीलीय प्राधिकारीक द्वारा देल गेल निर्णयसँ जौं आवेदक संतुष्ट नहि छथि तँ ओ द्वितीय अपीलीय प्राधिकारी (राज्य सूचना आयोग किंवा केन्द्रीय सूचना आयोग)केँ द्वितीय अपील कए सकैत छथि। ध्यान रहए जे एजन कोनो अपीलक समय सीमा ९० दिन अछि। सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अनुक्षेद २३ अन्तर्गत कोनो न्यायालय ताधरि कोनो मामला नहि सूनत जाधरि प्रथम अपील द्वितीय अपील/ क प्रकृया पूरा नहि भेल अछि। उच्चतम न्यायलयक किछु महत्वपूर्ण निर्णय : उच्चतम न्यायलय हालमे सिवील अपील संख्या ६१५९-६१६२(२०१३)मे संघ लोक सेवा आयोग बनाम अग्नेश कुमार एवम् अन्यक (CIVIL APPEAL NO.(s).6159-6162 OF 2013 मामलामे स्पष्ट केलक अछि जे अनर्गल, अनावस्यक एवम् अव्यवहारिक सूचनाक मांग कए सरकारी विभागकेँ एतेक फिरसान नहि कएल जा सैत अछि जे सरकारक अधिकांश समय ओहि सूचनाकेँ उपलब्ध करेबामे एहि हद तक नष्ट भए जाइक जे रचनात्मक/सकारात्मक काज केनाइ पराभव भए जाए। उच्चतम न्यायालयक न्यायमुर्ति आदर्श कुमार गोयल एवम् न्यायमुर्ति उदय उमेश ललितक पीठ द्वारा २० मार्च २०१८क एनजीओ कॉमन कॉजक याचिकाक निस्तारण करैत फैसला देलक अछि जे कोनो हालतमे पचासटा टकासँ बेसी शुल्क नहि लेल जा सकैत अछि। एकर अतिरिक्त जौं कोनो दस्तावेजक प्रतिलिपिक मांग कएल जाइत अछि तँ प्रति पृष्ठ पाँच टका अतिरिक्त शुल्क लेल जा सकैत अछि। ई आदेश उच्च न्यायालय, विधान सभा आओर अन्य सरकारी आओर स्वायत्त निकाय सहित सभ संस्थापर बाध्यकारी होएत जे सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 क अन्तर्गत अबैत अछि। उच्चतम न्यायलय हालमे सिवील अपील संख्या ९०१७(२०१३) थालप्पलम सहकारी बैंक एवम् अन्य बनाम् केराल राज्य एवम् अन्य (मामलामे स्पष्ट केलक अछि जे सहकारी समिति सभ सूचनाक अधिकार अधिनियम, 2005 क अन्तर्गत नहि अबैत अछि। सूचना अधिकार कानून स्पष्टताक आवश्यकता : सूचना अधिकार कानूनक सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू लोक प्राधिकरणक मुद्दा पर स्पष्टताक आवश्यकता अछि। सूचनाक अधिकारमे अखनो कैटा त्रुटि अछि, जेना सरकारी अधिकारी द्वारा जबाब देबाक हेतु भारी भरकम फीसक मांग कए देब, आवेदनकेँ एहि विभागसँ ओहि विभाग स्थानान्तरिक करैत रहब, सामिल अछि। प्रथम अपील विभागेकक अधिकारीक समक्ष कएल जाइत अछि जाहिसँ मामलामे कोनो नव बात नहि भए पबैत अछि। समान्यतः ओ पहिने लेल गेल निर्णयक पुष्टि कए दैत छथि। तकर बाद दोसर आ अन्तिम अपील राज्य वा केन्द्रीय सूचना आयोगक समक्ष करबाक प्रावधान अछि। मुदा समस्या अछि जे ओहिठाम आवेदनक भरमार अछि आ निर्णय लेबामे बहुत समय लागि जाइत अछि जाहिसँ कैबेर गलत लोक बँचि जाइत अछि। सरकारकेँ बहुत रास मामलामे सूचना नहि देबाक छूट भेटि जाइत अछि। कानूनक एहि प्रावधानक कतेको मामलामे दुरूपयोग होइत अछि। कोनो-ने- कोनो बहाना बनाए सूचना नहि देबाक प्रयास होइत रहल अछि। हलाकि आयोग एहन मामलामे बहुत सख्त रुखि रखैत अछि आ दोषी अधिकारीकेँ जुर्माना सेहो लगबैत अछि।मुदा तैँ की? विलंब तँ भैए जाइत अछि। फेरसभ लोक ओतेक धैर्य पूर्वक लागलो नहि रहि पबैत छथि। जे होउ, सूचनाक अधिकार कानूनकेँ बनि गेलासँ भारतक नागरिककेँ सरकारी काम-काजक जानकारी लेब आसान भए गेल अछि। कतेको तरहक जरूरी सेवामे निर्णयमे पारदर्शिता आएल अछि। बहुत तरहक कदाचारक मामला सभ पकड़ल गेल अछि। सरकारी अधिकारी गलत काज करबामे डराइत छथि। कतेको मंत्री धरिकेँ इस्तिफा दबए पड़लनि अछि। निश्चय एहि कनूनसँ आम नागरिकक महत्व वढ़ल अछि। मुदा दिक्कति एहि बातक अछि जे एखनो बहुत रास नागरिक एहि कानूनक जानकारीसँ वंचित छथि। ताहि हेतु जरुरी अछि जे एकर पर्याप्त प्रचार होइक। सूचना लेबाक आ आवेदन करबाक प्रकृयाकेँ आओर सरल बनाओल जाइक। गया गेल रही बहुत दिन सँ माएक बारंबार सपना अबैत रहैत छल। एहि सपना सभक रहस्य नहि बुझा रहल छल। तथापि मोनमे भेल जे गया चली, पिणडदानक बड़ महत्व सुनैत छी। ओहिठाम पिणडदान केला पर पितरसभ मुक्त भए जाइत छथि।मुक्त भेल पितरसभ अपन वंशजकें आशीर्वाद दैत छथि जाहिसँ सभक कल्याण होइत अछि।पंडितजीसँ गप्प कए गया जेबाक दिन तकौलहुँ। विचार विमर्षक बाद फरबरीक अन्तमे, २५ फरबरीकेँ जेबाक कार्यक्रम बनल, आपसी २८ फरबरीक। तिन मास पूर्बे रेल टिकटक आरक्षण करौलहुँ। क्रमशः गया जेबाक समय लगीच आबि रहल छल। चिन्ता रहए जे कोना की करी। कखनो काल होइत जे एखन स्थगित कए दी। फेर भेल जे जखन कार्यक्रम बना लेने छी तँ ई काज कइए लेल जाए। पण्डितजीसँ परामर्श कए चीज-वस्तुक ओरिआनमे लागि गेलहुँ। मुदा सभसँ चिन्ता छल पणडासभसँ कोना निपटल जाएत? सुनैत रही जे ओहिठाम टीशनेपरसँ पणडाक आदमीसभ घेर-बार शुरु कए दैत अछि। गयामे रहबाक चिंता सेहो होइत छल। संयोगसँ ओहि दिन हमर मित्र मिसरजी भेटि गेलाह। ओ पहिने गया पिंडदान हेतु गेल रहथि। हुनकर परिचित पंडा आ एकटा महापात्रजीक फोन नंबर भेटल। ओ अपनो स्तरसँ पंडाजीसँ एवम् महापात्रजीसँ गप्प कए हमर काज हल्लुक कए देलाह। महापात्रजीसँ गप्प भेल तँ सभसँ पहिने ओ कहलाह जे दिन उपयुक्त नहि अछि, पितृपक्षक समय फगुआक बाद हेतैक, तकरबाद कोनो दिनक टिकट लए सुचित करु। हम कहलिअनि जे हम तँ चारि माससँ दिन तकओने छी। “के दिन तकलाह अछि? हमरा गप्प कराउ।” आब कि करी? दिन तकनिहार पंडितजी विद्वान छथि, समय दए दिन तकलथि, ताहि हिसाबे टिकट लेने छी। आब जखन जेबाक समय लगीच आबि गेल तँ दोसरे बात सुनि रहल छी। पंडितजीसँ फेर गप्प कए सभ बात कहलिअनि। ओ अपन निर्णय पर दृढ़ छलाह, दिन सही अछि, महापात्र की कहताह। हमरा हुनकर बातमे दम बुजाएल। ओ निश्चय सही दिन तकने हेताह। महापात्रजीकेँ फोन कए कहलिअनि जे हमर कार्यक्रम तय अछि, दिन सही छैक, अपने ओहि दिनक हिसाबसँ उपलव्ध भए सकब कि नहि से कहू। असलमे हुनका पहिने सँ किछु काज गछल रहनि, ओ ई अवसर सेहो नहि जाए देवए चाहथि। जखन बुझा गेलनि जे हम अपन कार्यक्रम पर अड़ि गेल छी, तँ ओ तैयार भए गेलाह। कहलाह जे हुनका २६ फरबरीक उपनायन करेबाक छनि, तें २६क रातिमे गयेमे रहताह आ सभटा काज नीकसँ करा देताह। कहलाह : “चिन्ता नहि करु। सभटा भए जेतैक।” ओ समान सभक सूची लिखा देलाह। ओहि सूचीमे ततेक तरहक अंट-बंट सभ चीज-बस्तुक नाम छल जे एकट्ठा करब बहुत कठिन बूझाएल। तैँ समानसभ आनबाक भार हुनके दए हम निश्चिन्त भेलहुँ। समान सभक वाजिब दाम देबाक आश्वासन हम देलिहनि। ओ सहर्ष ताहि हेतु तैयार भए गेलाह। तकरबाद हम अपन तैयारीक अनुसार बिदा भए गेलहुँ। ओहिसँ पहिने महापात्रजी कैबेर फोन कए आश्वस्त होइत रहलाह जे हमर कार्यक्रम पक्का अछि, ओहिमे कोनो परिवर्तन नहि भेल अछि, जे निश्चित तिथिक हमसभ ओतए पहुँचि रहल छी, जे हुनकासँ भोरे भेँट होएत। गयासँ पंडाजीक सेहो फोन आएल। ओ हमर कार्यक्रमक बारेमे आश्वस्त होमए चाहैत छलाह। हम कतए ठहरब सेहो जानए चाहैत छलाह। इहो कहलाह जे रहबाक व्यवस्था हुनके ओहिठम भए सकैत अछि। मुदा जखन ओ एहि बातसँ आश्वस्त भए गेलाहजे हम हुनकेसँ संपर्क करब तखन निश्चिन्त भए गेलाह। संगहि कहलाह जे टीशनपर पहुँचते हुनकासँ संपर्क कएल जाएत जाहिसँ कोनो आओर पंडाक आदमी तंग नहि करत आओर हुनकर आदमी ओतहिसँ हमरा होटल लए आनत। हम अपन रहबाक व्यवस्था होटलमे केने रही। ताहि हेतु पहिनहिसँ आनलाइन आरक्षण करओने रही। हम पंडाजी ओहिठाम नहि रहए चाहैत रही कारण ओतए पता ने केहन की होएत, से मोनमे शंका रहए। २५ फरबरी २०१८क साँझमे भुवनेश्वर राजधानीसँ हम आ हमर श्रीमतीजी गया विदा भेलहुँ। ओहिसँ पूर्व होटलमे फोनकए सूचना दए देल जे हमसभ भोरे पाँच बजे होटल पहुँचब। तदनुकूल हमरा सभलेल व्यवस्था कएल जाए। रस्ता भरि खाइत-पिबैत हमसभ यात्राक आनंन्द लैत रहलहुँ। सासारामक लगमे ट्रेन छलैक कि एकटा सहयात्री चिचिआ उटलाह जे गया आबयबला अछि। कैटा यात्री हुनक डाक सुनि उठि कए समान लए गेट पर आबि गेलाह। रातिक समय छलैक, क्यो जोखिम नहि उठाबए चाहए, कारण गयामे ट्रेन चारि बाजि कए बीस मिनटपर पहुँचक छल, आ जौँ राति मे सुता गेल, सुतले रहि गेलहुँ, तहन तँ गेल महिंस पानिमे परड़ु समेत। एहि चक्करमे चारि-पाँचबेर गेट धरि गेलहुँ आ आपस सीट पर अएलहुँ। अन्ततोगत्वा लगभग एक घंटा बाद ट्रेन गया टीशनपर पहुँचल। हम सभ भोरे गया टीशनपर पहुँच गेल रही। होटल ग्रैंड पैलेस टिशनसँ सटले छल। ततबे लग रहैक जे टीशनपर होइत उद्घोषणा होटलमे सुनाइत छल। होटलमे पहुँचि हमरा लोकनि थोरेकाल विश्राम कएल। नित्यक्रमसँ निवृत भए बैसले छलहुँ कि पंडाजीक फोन आएल। होटलक पता पुछलाह। थोरे कालक बाद ओ होटल पहुँचि हमरसभक हाल-चाल लेलाह, आ सभ तरहे निश्चिंत रहबाक हेतु कहलाह। महापात्रजीके रातिमे अएबाक कार्यक्रम रहनि। महापात्रजी बारंबार फोनपर कहैत रहलाह जे एकभुक्त कए लेब। केस कटा लेब। हमसभ समान लए रातिए पहुँच जाएब। काल्हिसँ पिण्डदान होएत। ओहिदिन, माने २६ फरबरीक उपयोग हमरा लोकनि वोधगया देखएमे केलहुँ। गयासँ बोधगया जेबाक हेतु टेम्पू 200 टाकामे भेटल। गयासँ बोधगयाक दूरी करीब-करीब १३ किलोमीटर अछि। रस्ताक हालत खस्ता अछि। लगबे नहि करत जे अन्तर्राष्ट्रीय महत्वक तीर्थस्थान जा रहल छी। गया शहरक हाल मधुबनी, दड़िभंगे जकाँ अछि। नाला सभ नर्कक प्रतिरूप भेल, वातावरण दुर्गंधसँ भरल। होइत जे कतए आबि गेलहुँ। करीब आधाघंटामे टेम्पु बोधगया मन्दिर लग पहुँच गेल। कनिके काल पैरे चलि हमसभ मन्दिर लग बनल मालखानामे पहुँच गेलहुँ। ओहिठाम मोबाइल फोन सभ जमा करब अनिवार्य, कारण से सभ लए मन्दिरक अन्दर नहि जा सकैत छी। मोबाइल फोन जमा कए हम सभ कनिके आगू बढ़लहुँ कि एकटा टेम्पूबला सौंसे बोधगया घूमाबक प्रस्ताव देलक, २०० टाकामे। हम सभ मानि गेलहुँ आ ओहि टेम्पूसँ आस-पासक वोध मन्दिर सभ देखए निकललहुँ। भूटान, तिब्बत, चीन, बर्मा, श्रीलंका, वियतनाम, थाइलैंड, जापान, थाइलैण्ड आदि अनेको देश, बुद्धक अनुयायी संगठन सभ अपन-अपन बुद्धक मठ बनओने छथि। ओहिमे भव्य बुद्धक प्रतिमा स्थापित अछि। कैटा मन्दिर तँ अत्यंत शोभनीय थिक। मुदा बाहर ढाकक तीन पात। सड़क सभ खण्डहर भए रहल अछि। लगबे नहि करत जे एतेक प्रमुख स्थानमे घुमि रहल छी। आश्चर्यक बात जे एतेक महत्वक स्थानक एहन उपेक्षा भेल अछि? टेम्पोबला काते-काते सभठाम घुमा-फिरा हमरासभकेँ महाबोधि मन्दिर लग उतारि देलक। मोबाइल पहिने जमा कए देने रहिऐक, तेँ फोटो नहि खीचि सकलहुँ। महाबोधि मन्दिरमे जाइत काल हाथक बैगक जाँच भेल। ओहिमे चार्जर, हेडफोन छलैक। कतबो कहलिऐक जे ओकरासबकेँ रहए दैक, मुदा नहि मानलक, गेट पर असबार सिपाही अड़ि गेल। हारि कए दोबारा ई बस्तुसभ जमा करए गेलहुँ। तकरबादे मन्दिरक परिसरमे प्रवेश भए सकलहुँ। मन्दिरक मुहथर लग एक गोटा नवका दसटकही, बीसटकही, नोटसभक गड्डी बेसी पैसा लए कए विदेशी सभके दैत देखलहुँ। आगा बढ़ला पर विदेशी तीर्थयात्री सभक भरमार देखाएल। आगन्तुक वौद्धसभक हेतु प्रसाद भिक्षापात्रमे देबाक ओरिआन भए रहल छल। अन्दर मन्दिरमे ठाम-ठाम विदेशी वौद्धसभ ध्यान कए रहल छलाह। मन्दिरमे अपूर्व शान्ति छल। एकटा गोर-नार विदेशी महिला सूतल वा ध्यानस्थ छलीह। लगैत छल जेना कोनो मुरूत पड़ल अछि। गर्भगृहमे अपार शान्ति छल। अगल-बगलमे वौद्धसभ माला फेरि रहल छलाह। ओहिठाम दर्शनकए हमसभ आपस आबि गेलहुँ। मोबाइल छोड़ौलहुँ। फेर टेम्पो पकड़लहुँ, आ आपस गया टीशन लग स्थित होटलमे आबि गेलहुँ। प्रातःकाल नित्यकर्मसँ निवृत भए महापात्रजीकेँ फोन लगाओल। हमरा उमीद चल जे ओ रातिएमे आबि कए पंडाजी ओतए ठहरल हेताह, जेनाकि पहिने कहने रहथि। मुदा ओ तँ ट्रेनेमे छलाह। “जहनाबाद पहुँचि गेल छी। ट्रेन लेट भए गेलैक, नहि तँ पहुँचि गेल रहितहुँ। दू घंटामे आबि जाएब। चिंता नहि करब। हम सभ समान लए कए आबि रहल छी।” महापात्रजीकेँ विलंब होइत देखि दू-तिनबेर फोन केलिअनि। ओ तँ ट्रेनमे बैसल रहथि, बेर-बेर कहथि: “आब लगे अछि। सभटा भए जेतैक।चिंता नहि करब। दू दिनमे सभटा काज भए जेतैक।” आखिर ओ दूटा झोरामे समान सभ लए ९ बजे सोझे हमर होटल पहुँच गेलाह। मोन आश्वस्त भेल जे आब काज भए जाएत। नित्यकर्मसँ निवृत भए महापात्रजी हमरासभक संगे पंडाजीक ओतए बिदा भेलाह। पंडाजीक ओतए हेतु टेम्पु कएल। सड़कपर उतरि पाँच मिनट पैरे चललाक बाद हुनकर घर आएल। मधुबनी, दड़िभंगा जिलाक लोकसभक इएह पंडा छथि, से ओ कहलाह। निसान झंडापर माछक, दड़िभंगा महराजक देल। गलीक एक तरफ पुरना घर छैक, जे दड़िभंगा महाराज बनओने रहथि। तकर ठीक सामने नव पक्का घर बनल अछि, जाहि मे यात्री लोकनिक ठहरबाक इंतजाम अछि। नीकसँ बनल ओ सुविधापूर्ण कोठरीसभ अछि। से देखि भेल जे एतहुँ रहि सकैत छलहुँ। मुदा मुख्य रस्तासँ बहुत चलए पड़ैत छैक, फेर ओही वातावरणमे दिन-राति रहू। होटलमे चलि गेलाक बाद एकटा नवीनताक अनुभव होइत छल। सभसँ पहिने पंडाजीसँ आज्ञा लेल गेल। ताहि हेतु हुनकर पैर पूजल जाइत अछि। किछु संकल्प कएल जाइत अछि, जे एतेक ने एतेक दान, दक्षिणा करब। तखन ओ आशीर्वाद दैत काज करबाक स्वीकृति दैत छथि। हमसभ आगा बढ़ैत छी। पंडाजी बएसमे हमरासँ बहुत छोट छलाह, तेँ कनी कोनादनि लागल। बादमे महापात्रजीकेँ ई गप्प कहलिअनि। कहलाह जे एहिठामक अधिकारी इएह थिकाह, हिनके चलत, आदि, आदि। पंडाजीसँ आज्ञा लए हमरा लोकनि फल्गु नदीक कछारपर पहुँचैत छी। ओतए छोटसन महादवक मन्दिर छल। सामनेमे खालि स्थान देखि कर्म शुरु भेल। पिण्डदान हेतु हमर श्रीमतीजी गोल- गोल पिण्ड बनौलथि जतेक पुरखासभ ज्ञात, अज्ञात मोन पड़ैत गेलाह सभकेँ लेल पिण्डदान देलहुँ। जतेक काल हम पिण्डदान करैत रहलहुँ ततेक काल एकटा बुढ़िया आ दूटा छौड़ा मिलि ओतए हल्ला करैत रहल। ओकरा लेल धनि-सन। ततेक हल्ला करैत गेल जे मंत्रो सूनब पराभव रहैत छल। महापात्रजी कहलाह : “अहिसबपर ध्यान नहि दिऔक, काजमे लागल रहू। ई सभ एहीठामक वासी छैक।” पिण्डदानक बाद पिण्डकेँ फल्गु नदीमे पानि देखि कए फेखबाक हेतु हमर श्रीमतीजी आगु बढ़लीह। कहल गेलनि जे फल्गु नदी मे चलल एक-एक डेग आश्वमेध यज्ञक बरोबरि होइत आछि। फल्गु नदी तँ रेतसँ भरल अछि। कहि नहि एकरा नदी किएक कहल जा रहल अछि। कोनो समयमे भए सकैत अछि ई नदी रहल होएत, मुदा आब तँ निट्ठाह रेतसँ भरल अछि। बहुत आगु गेलाक बाद कनिक पानि छल जे बालुमे खधिआ कए निकलल छल, ओतहि पिण्ड फेकि ओ लौटि गेलीह। अगल-बगल ठाढ़ छौड़ासभ आओर ओ बुढ़िआ पैसा मांगए लागल आ जाबत लेलक नहि चुप्प नहि भेल। महापात्रजी आपना छोरि ककरो पैसा देल जाए ताहि हेतु तैयार नहि छलाह, मुदा कोनो उपाय नहि छल, ओकरा सभके किछु, किछु दए जान छोरा हमसभ ओतएसँ आगु बढ़ि सकलहुँ। ओहिठामसँ आगा जएबाक हेतु भरिदिनक बास्ते २५० टाकामे एकटा टेम्पू महापात्रजी ठीक केलाह। टेम्पूबला बेस जोसिला आदमी छल। बीच-बीचमे बेस मनोरंजक मुद्रा बनाए तरह-तरहक गप्प-सप्प करैत बढ़ैत रहल। कनीकालमे हमसभ प्रेतशिला पर आबि गेल रही। ओतए पहिने घाटपर पिण्डदान भेल। ओहिसँ सटल पोखरि कही, ताल कही, जे कही, छल जे नर्कक दोसर रूप लगैत छल। ओहिमे सँ जल लए पिण्डदान होएत से सोचिएक रोँआ ठाढ़ भए गेल। खैर! जे करबाक छल से छल। ओहिमे सँ जल आनल गेल। कतेको गोटे आस-पास पिण्डदान करैत छलाह। हुनका स्थानीय लोकसभ पैसा लेल कोनो कर्म बाँकी नहि रखने छल। पाई नहि देबै आ पिण्डदान करब, भए नहि सकैत अछि। हमसभ जखन ओतए पिण्डदान कए लेलहुँ तँ एकटा बेस मजगूतगर, कारी भुसुंड लोक आबि पैसा देबाक आग्रह करए लागल जे महापात्रजीकेँ पसिन्न नहि रहनि। ओहिबातसँ ओ व्यक्ति महापात्रजीकेँ गरिआबए लागल, बात बढ़ए लागल, महापात्रजी सेहो किछु कहलखिन। ओहो चुप्प नहि रहल। महापात्रजीक गट्टा धेलक आ गरजए लागलः “आब तूँ अबिअह झाजी! अगिलाबेर सँ टपए नहि देबह। आदि, आदि।” बात बिगड़ैत देखि हमसभ जल्दीसँ ओकरा एकसए टाका दए जान छोड़ौलहुँ। हमसभ तँ पहिनेसँ ओकरा पैसा देबए हेतु मोन बनओने रही, कारण ओकरा दोसर सभक संगे फसाद करैत हम देखैत रही मुदा महापात्रजी रोकैत रहलाह, तकर फलो ओ भोगलाह। कनी-मनी धक्का-मुक्की तँ भेबे केलनि। ओहो पाछा नहि रहल रहथि। तकरबाद हम सभ प्रेत शिला दिस बढ़लहुँ। चारि सए सीढ़ी चढ़ए पड़त, ताहि हेतु पालकी सेहो उपलव्ध छल। दोसर विकल्प छल जे बीस सीढ़ीक बाद एकटा छोटसन स्थान छल। ओतए महादेवक मन्दिर सेहो बनल छल। ओतए कैगोटा पिण्डदान करैत छल। महापात्रजीक सलाहपर हमसभ दोसर विकल्प चुनि ओतहिँ पिण्डदान करबाक निर्णय कएल। जगह साफ चल। बैसबाक हेतु आसनी सेहो भेटि गेल। ओहिठामक पण्डाजी सरल व्यक्ति बुझेलाह। चैनसँ पिण्डदान भेल। कनिके हटिकए एकटा परिवारकेँ हवन करैत देखलहुँ। महापात्रजी कहलाह जे ओहि महिलाकेँ प्रेतबाधासँ मुक्ति दिआबक हेतु होम भए रहल छल़। पिण्डकेँ फेकबाक हेतु तए स्थानपर पहिने सँ एकटा बंगाली अधबएसू लोक अपन बेटाक अकाल मृत्युक बाद ओकर फोटोके ओतए राखि किछु- किछु कए रहल छलाह। पण्डाजी दूसए टाका देबाक आग्रह पर अड़ल छलाह, जेकर बाद ओहि मृत व्यक्तिकेँ प्रेतयोनिसँ मुक्ति भए जएतेक। ओ अपन गरीबीक बारंबार हबाला दैत एकसए टाकासँ आगा नहि बढ़ रहल छलाह, अन्तमे डेढ़सए टाकामे बात तए बेल। मंत्र पढ़ि ओहि फोटो पर फूल चढ़ौलथि। कतेक क्रूड़ छल ओ दृश्य, की कहू? तकर बादे हमसभ ओतए पिण्ड रखलहुँ। टाका दए जल्दीए ओतएसँ खसकलहुँ। लगेमे पीपड़क गाछक जड़मे बहुत रास मृत व्यक्तिसभक फोटो टांगल छल। महापात्रजी चिकरलाहः “जल्दी बिना पाछा तकने आगा निकलि जाउ।” सएह कएल। प्रेतशिलासँ उतरि हमरा लोकनि नीचामे भोजनालयमे बैसलहुँ। महापात्रजीकेँ भूख लागि गेल छलनि। ओ भोजन करताह। हमसभ राबरी खाएब। सभगोटे चाह पीब। से सभ बिचारि हमसभ ओतए बैसलहुँ। महापात्रजी भरिपोख भोजन केलाह, फेर पावभरि खोआ सेहो देलखिन। हमहुँसभ खोआ खेबामे पाछा नहि रहलहुँ, कारण भूख जोर मारि रहल छल। भोजन तँ नहि कए सकैत छलहुँ कारण अखन आओर ठाम पिण्डदान देबाक छल। महापात्रजीके गया महात्म्यपर एकटा पोथी किनबाक हेतु एकटा बच्चा कतेक गोहरओलक, मुदा ओ नहि मानथि। हारिकए ओ एकसएसँ दाम घटबैत-घतबैत बीसटका पर आनि देलक, तैओ ओ अपन बातपर अड़ल रहथि। “धुर्र, ई की लेब, बेकार थिक।” अन्तमे हमरे दया आबि गेल आ हुनकासँ नुकाकए बीसटकामे गया महात्म्य कीनि लेलहुँ। भोजन करितहिँ महापात्रजीकेँ फुर्ती आबि गेल। हमसभ तुरंत टेम्पूसँ रामशिलाक हेतु विदा भए गेलहुँ। पहिने रामशिला घाटपर आ तकरबाद उपरमे बनल मन्दिरमे पिण्डदान भेल। तालाबक हालत पर नहिए चर्च करी सएह नीक। उपर मन्दिरपर कनिके चढ़लाक बाद पिण्डदेबाक स्थान भेटि गेल आ ओतहिँ पिन्डदान देल गेल। एकरबाद काकबलिकेँ पिण्ड दैत हमसभ गोटे टीशन रोड स्थित होटल पहुँच गेलहुँ। महापात्रजी संगमे छलाह। ओ जे समानसभ अनने रहथि तकेर गोट-गोटक दाम जोड़ि दए हुनकासँ ओहि दिनक हेतु छुट्टी लेल। ओ पंडाजी ओहिठाम रहए हेतु चलि गेलाह। काल्हि अन्तमे ब्राह्मण भोजन हेतु पंडाजीकेँ कहलिअनि। कहल जाइत अछि जे गयामे एकटा ब्राह्मण भोजन करेलापर एक हजारक फल होइत आछि। हम एगारहटा ब्राह्मण भोजनक व्यवस्ता करबाक भार हुनका देलहुँ, तकर खर्चा प्रात भेने हम हुनका देलिअनि। प्रेतशिला लगक होटलमे जे खोआ खेने रही, से डेरा अएलाक बाद रंग देखबए लागल। ताबरतोर पेट झड़ए लागल। संगमे दबाइ छल, से खेलहुँ। कहुनाक मामला सम्हरल। दिनभरिक धमाचौकड़ीक बाद आब आराम जरूरी छल, से कएल। प्रातभेने हमसभ विष्णुपाद मन्दिर विदा भेलहुँ। महापात्रजी ओतए पहिने पहुँचि गेल रहथि। “पहिने घाटपर पिण्ड पड़त, तकर बादे विष्णुपाद मन्दिरमे” महापात्रजी बजलाह।हमसभ ओतए पहुँचलहुँ। पोखरिक कातमे बैसि पिण्डदानक काज शुरु भेल। एक-दूटा युवक ओतए ठाढ़ रहथि। जहन पोखरिमे पिण्ड फेकि हमसभ जेबाक हेतु उठलहुँ कि ओ तीन गोटे भए गेल रहथि आ पैसाक मांग भेल। “ओकरा सभकेँ किछु नहि देबाक छैक” महापात्रजी कहैत रहलाह। से सुनि ओ सभ हुनका गरिआबए लागल, मारि करए पर उतारू भए गेल। महापात्रजी सेहो गरमाए लगलाह। तावत एकटा क्यो स्थानीय व्यक्ति अएलाह। ओ हमरासभकेँ ओतएसँ घसकबामे मदति केलाह। ओ युवकसभ महापात्रकेँ गाढ़ि पढ़ैत रहल। तकरबाद पैरे-पैरे हमसभ विष्णुपाद मन्दिर पहुँचलहुँ। ओतए बेस गहमा-गहमी छल। बड़काटा मन्दिर, ततबे पैघ ओकर प्रागण। निचा उतरब तँ बालुसँ भड़ल फल्गु नदी। बालुए-बालुए हमसभ फल्गु नदीकेँ टपि गेलहुँ। ओकर दोसर छोड़पर सीताकुंड थिक। कहबी छैक जे भगवान राम अपन पिता दसरथके पिंडदान हेतु ओतहि आएल रहथि। पिण्डदानक चीज-वस्तुक ओरिआओन हेतु गेल रहथि कि सीताजी मंत्र पढ़ि दसरथकेँ बजा लेलखिन। सीताजी की करितथि? कहलखिन जे राम तँ पिण्डदानक चीज-वस्तुक ओरिआओन हेतु गेल छथि। मुदा दसरथ कहलखिन जे आबतँ हम आबि गेल छी। तखन सीताजी स्वयं बालुएसँ पिण्डदान केलीह। ओहिठाम सीताजीक नाम पर छोटसन मन्दिर अछि जाहिमे दसरथक हाथ बनल अछि। फल्गु नदीमे ओहिठाम कैगोटे पिण्डदान करैत रहथि। ओतए दूटा पंडितमे दक्षिणा हेतु झगड़ा होइत रहलनि। हमसभ पिण्डदानमे लागल रहलहुँ। महापात्रजी हमर श्रीमतीजीकेँ चीज-वस्तु, गहना, टाका दान करबाक हेतु प्ररित केलाह। से सब यथासाध्य भेलनि। हुनकर कहबाक हिसाबे हमसभ समान सभ लए गेल रही। पिन्डदानक बाद उपर मन्दिरमे दर्शनकए, पिण्ड चढ़ाए हमसभ फेर बालुए- बालुए विष्णुपाद मन्दिर लग पहुँच गेलहुँ। फल्गु नदीमे पानि नहि अछि। मुदा जँ तीन-चारि हाथ गहीँर कएल जाए तँ पानि भेटि जाइत छैक। तेहन कूप दू-तीन ठाम बनाओल देखाएल। यत्र-तत्र लोकसभ पिण्डदान करैत छलाह। उपर अएलाक बाद महापात्रजीकेँ चाहक तलब अएलनि। चाह आनए हमसभ उपर गेलहुँ। ताबते एकटा मुर्दाके “राम नाम सत्य है” कहैत लोकसभ ओहिठाम रखलक। किछु विध-विधान सभ केलक। तकरबाद ओकरा अन्तिम संस्कार हेतु फल्गुक कछारपर लए गेल। हमसभ चाह पिबैत ई सभ देखैत रहलहुँ। तकरबाद एक कप चाह महापात्रजीक हेतु अनलहुँ। चाह पीवि ओ टनगर भेलाह। हमसभ आगाक काज हेतु विष्णुपाद मन्दिरमे पहुँचलहुँ। विष्णुपाद मन्दिरमे देशक विभिन्न भागसँ तीर्थयात्रीसभ आएल रहथि। करीब पचास गोटे तँ आंध्र प्रदेशक रहथि। ओहिना बहुत रास वंगालीसभ सेहो देखेलाह। सभ गोटे पिण्डदानमे लागल रहथि। स्थानीय पंडा जोर-सोरसँ मंत्र पढ़बएमे लागल रहथि। आंध्रासँ आएल तीर्थयात्रीसभ बहुत अनुशासित रहथि। मन्दिरमे ओकर द्वार पर ठाढ़भए बड़ीकाल हुनकासभके मन्दिरक पंडाजी मंत्र पढ़बैत रहलनि, ओसभ पढ़ैत रहलाह। तकरबाद सभ दस-दस टका दैत गेलाह आ पंडाजी बेरा-बेरी सभकेँ मन्दिरमे प्रवेश करबैत रहलाह। बिना टाका देने एक्को गोटे अन्दर नहि जा सकैत छल। ओ मन्दिरक मुहथर छेकने ठाढ़ छलाह। ओहिठाम ततेक हल्ला होइत रहल जे हमरा महापात्रजीक कहल मंत्रसभ सुनबामे आ सुनि बजबामे बहुत दिक्कति होइत रहल कहुना-कहुना कए पिण्डदान समाप्त भेल। “मन्दिर बंद भए जाएत, जल्दी करू।” महापात्रजी बारंबार चेतावथि। हमसभ धरफराइत मन्दिरक गर्भगृहमे पहुँचलहुँ। मन्दिरक गर्भगृहमे बहुत लोक छल। अन्दर जाएब, आ मुर्तिलग जाएब पराभव छल। कहुना कए ठेलमठेला करैत ओतए पहुँचलहुँ। ओहिठाम एकटा पंडाजी पहिनेसँ एकगोटेसँ पैसा लए झंझट कए रहल छलाह। ओकरासँ जखन बात फरिछाएल तखन हमरा पर ध्यान गेलनि। ओ पींड चढ़एबाक हमर प्रयासपर हुंकार भरैत महापात्रपर बिगड़लाह। “एतए तोहर नहि चलतह। ई हमर जगह अछि।” ओ पैसा तए करए चाहैत छलाह, महापात्र किछु मामुली रकम देबाक हेतु कहैत छलाह। एहि बातसँ ओ बहुत तामसमे छलाह कि कोनो दोसर जजमानक फोन आबि गेल, ओ एकदमसँ फोन करैत बाहर भगलाह, कारण ओहिठाम ततेक हल्ला होइत रहैक जे किछु नहि सुनाइ पड़ि रहल छल। बाहर मन्दिरक गेटपर ओ गप्प करैत रहला ह आ हमसभ पिंड चढ़ाए ओतएसँ, हुनका सामनेसँ, निकलि गेलहुँ। हुनका किछु नहि हाथ लागल। ओहिठामसँ हमसभ दक्षिणाग्निपद पहुँचलहुँ। ओतए पिंडदान दए हमसभ वैतरणी पहुँचलहुँ। ओहिठामक पोखरि आने पोखरिसभ जेना नर्क लगैत छल। ओतहुँ ओहिना पिंडदान भेल। सभसँ अन्तमे पिंडदान भेल अक्षयवटपर। अक्षयबटपर बेस पैघ बरक गाछ अछि। ओहि गाछक जड़िमे बहुतरास लालडोरा, पीअर कपड़ा, सभक गेँठी कएल अछि। ओहि गाछक छाहरिमे हम पिण्डदान केलहुँ। पिण्डकेँ गाछक जड़िमे फेकि ओहिठामसँ बिदा भेलहु। पंडाजीके पहिने फोनकए देने रहिअनि जे आब हमसभ घंटाभरिमे पहुँचि रहल छी। ओहिठामसँ हमसभ मंगला भगवतीक दर्शन कएल। मंगला भगवतीक दर्शनकए बाहर निकलल रही की बहुत रास भीखमंगासभ पैसा मांगए लागल। हम किछु दसटकिआ निकालि देबए लगलिऐक। एतबेमे भिखमंगाक पथार लागि गेल। एक डेग आगा बढ़ब मोसकिल भए रहल छल। कनिक आगा बढी आ जोरसँ किछु टाका फेकि दिऐक जाहिसँ फेर कनिक आगा बढी। बहुत मोसकिलसँ टेम्पूधरि पहुँच सकलहुँ। तैओ ओ सभ घेरने छल। फेर जुमाकए किछु दसटकही एहि हिसाबसँ फेकलहुँ जाहिसँ टाका लुझबाक चक्करमे ओसभ कनी फटकी होमए आ टेम्पू आगा बढ़ि सकए। टेम्पू आगा बढ़ैत अछि, तथापि किछु वच्चा बहुत दूर धरि पछोड़ धेने अछि : “बाबा! हमरा किछु नहि भेल।” फेर किछु टाका निकालैत छी, ओकरासभकेँ किछु- किछु कए दैत छिऐक। ताबे टेम्पूबला आगा बढ़ि गेल। तकरबाद ठोकले पंडाजीक ओतए पहुँचलहुँ। भरिदिन मंत्र पढैत, पढैत मुँहमे सपटी लगैत छल। भूख से लागि गेल छल। मुदा अखन एकटा महत्वपूर्ण प्रकरण बाँचल छल। तकरा पुरा करबाक हेतु हमसभ पंडाजीक ओतए पहुँचि गेल रही। पंडाजीक ओतए पहुँचैत छी। ओहिठाम पहिनेसँ सभटा इंतजाम भेल अछि। सज्जादानक हेतु सभटा बस्तु एकटा कोठरीमे राखल अछि। पंडाजी अपने एहि काजक हेतु अबैत छथि। हम पहिने गछल टाका देबाक गप्प दोहरबैत छी। तकरबाद सज्जा दान कएल गेल। एहिठाम एकटा गप्प कहब जरुरी बुझा रहल अछि जे सभ समानकेँ एकहिबेरमे मंत्र पढ़ि दान कए देल गेल। श्राद्धमे एक-एक बस्तुक हेतु अलग-अलग मंत्र पढ़ाओल जाइत छल। ओ बहुत श्रमसाध्य एवम् उबाउ तरीका छल। सज्जा दानकबाद पंडाजी कहलाह जे गयामे एकटा ब्राहमण आनठामक एक हजारक बरोबरि फलदायी होइत अछि, से कहू कतेक ब्राहमणक भोजन हेतु दान करब। एकटा ब्राहमण हेतु यथोचित टाका अलगसँ गछलिअनि। अन्तमे फूलक मालासँ हमर दुनू व्यक्तिक हाथ बान्हैत कहलाह जे एकर तोड़ाइ हेतु किछु अलगसँ कहिऔक, सेहो गछलिऐक, तखने ओहिठामक विधसभ पूरा भेल। हुनका प्रणाम कए चैनसँ बैसलहुँ। पण्डाजीक ओहिठाम आगन्तुकसभक बहुत नीकसँ हिसाब राखल जाइत अछि। सभक नाम-गाम, पता, गया अएबाक तिथि लिखल जाइत अछि। गाम-गामक अलग-अलग पृष्ठ अछि। हमरा गाम पछिला सए सालमे गया गेनिहारक सूची ओ देखेलाह। बहुत नीक लागल। ओहिमे अपन गामक कतेको गोटेक नाम देखल। ई अपना-आपमे एकटा इतिहास छल। ताबत ब्राहमणसभ आबि गेल छलाह। पंडाजी कहलाह जे संयोग नीक अछिजे एगारहटा ब्राहमण पुरि गेल अन्यथा एहिठाम से कठिन रहैत अछि। भोजनक सामग्री तैयार छल। भरिपोख ब्राहमणसभ भोजन केलाह। तकरबाद सभ गोटेकेँ किछु कए दक्षिणा देल गेल। एहि प्रकारे गयामे पिणडदानक कार्यक्रम विधिवत संपन्न भेल। पंडाजी के गछल टाका देलहुँ। ब्राहमण भोजनमे भेल खर्चाक हिसाब भेल, से गोट- गोट कए चुकता केलहुँ। महापात्रजीकेँ दक्षिणा देलहुँ। हुनकर आपसीक हेतु यात्रा व्यय अलगसँ देलहुँ। ओसभ प्रशन्न देखेलाह। मोनमे एकटा बरका संतोख भेल। मूलतः माताक स्वर्गवाससँ व्याकुल हृदयकेँ कनि शान्ति भेटल। प्रेतशिलापर जखन तरह-तरहसँ मातृ ऋणसँ उरिन हेबाक हेतु पिण्डदान देल जाइत छल तँ कानबाक मोन भए रहल छल। की कोनो पिण्डदानसँ माताक ऋणसँ उरिन भए सकैत छी? नहि भए सकैत छी। तथापि ई अपन धर्मक विधान छैक। गयामे पिणडदानसँ पूर्वजक आत्मा मुक्त भए जाइत छथि। एहि विश्वास ओ श्रद्धासँ हम ओतए गेल रही आ दू दिन धरि ठाम- ठाम घुमि-घुमि पिण्डदान करैत रहलहुँ। प्रार्थना करैत रहलहुँ जे माता सहित हमर सभ पूर्वजक आत्माकेँ मुक्ति होनि। अपन धर्ममे आस्था रखनिहार विश्व भरिसँ लोकसभ एतए पिण्डदान करए अबैत छथि। मुदा ओहिठामक व्यवस्था खासकए पोखरिसभक खास्ता हाल देखि कए निराशा होइत छैक। अन्तर्राष्ट्रीय महत्वक एहि स्थानक उचित देख-भाल नहि भए रहल अछि। ओहुसँ चिन्ताक बात थिक सबठाम पैसाक वर्चस्व। जे से पैसाक खातिर तंग करैत अछि। शुरुसँ अन्तधरि ई समस्या बनल रहल। एकर की समाधान होएत? एतबा जरूरी लगैत अछि जे शान्तिपूर्ण महौलमे लोक श्रद्धापूर्वक अपन पूर्वजक आराधना कए सकथि, से व्यवस्था होइक। मुदा बिलाड़िक गरामे घण्टी बान्हत के?? बिधवा विआह समाजक मान्यता, विधि-विधान एवम् लोक व्यवहार समय साक्षेप अछि। जे बात-विचार पचास सय साल पहिने अनिवार्य चलैत छल से आइ-काल्हि जँ लोक करए तँ हस्यास्पद भए जाएत। पहिने बाल विआह आम बात छल। बेटीकेँ जनमिते जँ माए-बापकेँ कथुक चिन्ता होइक तँ ओकर विआहक। कहुना कए विआह भए जाइक आ माए-बाप गंगा नहा लेथि। सोचल जा सकैत अछि जे समाजमे बेटीक स्थिति कतेक दयनीय छल..! ई बात सभ जनैत छथि जे स्त्रीक बिना पुरुष कतएसँ आएत। जे आइ ककरो बेटी छैक सैह काल्हि ककरो स्त्री, ककरो माए बनतै। तथपि लोकमे अखनहुँ बेटाक प्रति मोह कम नहि भए रहल अछि। पहिने कतेको गोटा बेटाक चक्करमे आठ-नौ सन्तान कए लैत छलाह। लिंग आधारित एहि भेद-भावकेँ कम करबाक किंवा जड़िसँ दुरुस्त करबाक निरन्तर प्रयास होइत रहल। एक समय छल जखन पतिकेँ मरलाक बाद ओकर पत्नीकेँ ओकरे संगे जरा देल जाइत छल किंवा वो स्वयं जरि जाइत छल। समाज ओकरा सतीक रूपमे महिमा मण्डित करैत छल। ओकर चितापर सती मन्दिर बना देल जाइत छल। सोचल जा सकैत अछि जे वो कतेक क्रूड़ प्रथा छल। एकटा स्वस्थ जीबन्त व्यक्तिकेँ जरा कए एहि लेल मारि देल जाइत छल वा वो स्वयं मरि जाइत छल जे ओकर पतिक देहावसान भए गेल, जाहि लेल वो कोनो प्रकारसँ दोषी नहि छल। मरनाइ, जिनाइ ककरो हाथमे नहि छैक। ई एकटा संयोग होइत अछि मुदा तकर एतेक दुखद् परिणाम होइत छल से सोचियो कए रोंआ ठाढ़ भए जाइत अछि। एकटा विदेशी पर्यटक जखन अपन देश घुमैत रहथि तँ संयोगसँ श्मशान घाटपर एकटा मुर्दाकेँ लए जाइत देखलथि। मुर्दा संगे ओकर पत्नी चिकरैत-भोकरैत श्मशान धरि संगे गेल। लोक सभ तमासा देखैत रहल आर वो पतिक लहासक संगे जारनिसँ लादि देल गेल। जोर-जोरसँ ढोल बजा-बजा कीर्तन करए लागल जाहिमे ओहि जीवित महिलाक करूण क्रंदन दबि कए गुम रहि गेलैक आ थोड़बेकालमे ओहो पतिक लहासक संगे छाउर भए गेल। (ई सैंकड़ो साल पूर्वक थिक एवम् एकर वर्णन Beyond the seas–माइकल एच. फीसर द्वारा सम्पादित–पुस्तकमे अछि) एहि तरहक घटना ओहि समयमे आम बात छल। स्त्रीगण सभ अपन नियति बुझि एकरा स्वीकार करैत छलीह। प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम मोहन रायक एहिपर ध्यान गेल आ वो ब्रिटिश सरकारसँ गोहार कए एहि सामाजिक कुरुतिकेँ बन्द करौलाह। समाजमे विधवाक स्थिति बेटीक स्थितिसँ जुड़ल अछि। जँ बेटी पढ़तै, लिखतै, बेटा जकाँ ओकरो अवसर भेटतै तँ ओहो ककरोसँ पाछा नहि रहत। आइ-काल्हि एहिमे किछु परिवर्तन भेल अछि। लोक बेटीकेँ स्कूल-कालेज पठा रहल अछि। डाक्टर, इन्जिनीयर, अफसर सभ किछु बेटीओ बनि रहल अछि। कानूनमे परिबर्तन भेल अछि। पैत्रिक सम्पत्तिमे बेटा ओ बेटीक हक बरोबरि भए गेल अछि। घरेलू हिंसा कानूनक तहक कोनो महिलाकेँ शारीरिक, मानसिक यातना नहि देल जा सकैत अछि। दहेज लेब देब गैर कानूनी भए गेल अछि। प्रश्न ई उठैत अछि जे एतेक रास कानूनसँ लैस भारतीय महिला की सभ तरहेँ अधिकार सम्पन्न, सुरक्षित ओ प्रतिष्ठिापूर्ण जीवन-यापन करबाक स्थितिमे आबि गेल छथि? ई सोचिये कए कलम ठाढ़ भए जाइत अछि। समाजमे बेटीक स्थितिमे सुधार मूलत: शहरी क्षेत्र धरि सीमित अछि। गाम-घरक हाल मोटा-मोटी ओहने अछि। अपना ओहिठाम शिक्षाक स्तर तेहन गड़बड़ायल अछि जे जँ क्यो स्कूल-कालेज जाइतो छथि, किंवा डिग्रीओ हासिल कए लैत छथि तैयो हुनका कोनो रोजगार भेटि सकत से संदेहास्पद। जँ आर्थिक निर्भरता बनल रहत, सम्पत्तिक अधिकार मात्र कानूनक किताबे तक सीमित रहि गेल तँ बेटी कोना बढ़त? जाहि समाजमे बेटीकेँ शिक्षाक समान अवसर भेटल, पैत्रिक सम्पत्तिमे अधिकार भेटल ओहिठामक महिला निश्चित रूपसँ सभ तरहें आगा भए गेलीह। एहिमे केरल राज्यक चर्चा कएल जा सकैत अछि। पुरना समयमे (आ किछु हद तक अखनहुँ) विधवा होइते जेना ओकरापर विपत्तिक पहाड़ टुटि जाइत छल। तत्कालीन समाजक समस्त मान्यता, बिध, व्यवहार ओकरा अपमानिते नहि करैत छल, अपितु अशुभ बुझैत छल। केस कटा लिअ, नीक- नीकुत खाउ नहि, साधारण कपड़ा पहिरू, उपास-पर-उपास करैत रहू। तेतबे नहि, कोनो शुभकाजमे आगा नहि रहू। आखिर ओकर की दोष रहैक जकर दंड ओकरा समाज दैत छलैक? लगैत अछि, समाजक पुरोधा सभ असुरक्षा भावसँ ततेक ग्रस्त रहथि जे हुनका आगा-पाछा किछु आओर सोचेबे नहि करनि। कतेको ठाम तँ नवलिग बिधवा भए जाइत छलि आ आजीवन धोर कष्ट एवम् विपत्तिमे जीवन-यापन करैत छलीह। गरीबी, सामाजिक प्रताड़नासँ तंग भए कतेको बिधवा गाम-घर छोड़ि वृन्दावन किंवा आन-आन तीर्थ शरण धए लैत छलीह। अखनो हजारोक संख्यामे वृन्दावनमे बिधवा सभ पड़ल छथि। भारतक उच्चतम न्यायालय हुनका सभक स्थितिपर विचार केने छल। सुलभ इन्टरनेशनल द्वारा हुनका सभ लेल किछु कल्याणकारी योजना सभ सुनबामे आएल छल। मुदा ई सभ ऊँटक मुँहमे जीरक फोरन थिक। जरूरी तँ ई अछि जे समस्याक जड़िमे जाए ओकरा समूल नष्ट कएल जाए। आखिर पुरुष बिधुर भेलापर विआह करैत छथि की नहि? तहिना महिलोकेँ ई अधिकार समाज स्वीकृत हेबाक चाही। यद्यपि यत्र, तत्र सर्वत्र महिला सशक्तीकरणक चर्च होइत रहैत अछि, तथापि व्यवहारिकतामे संकट अछिए। जँ दुर्भाग्यवश क्यो बिधवा भए जाइत छथि तँ अखनो हुनका नाना प्रकारक यातना, सामाजिक प्रताड़ना भोगए पड़ैछ। अस्तु, ई विचारणीय थिक जे बिधवा लोकनिक स्थितिमे गुणात्मक सुधार हेतु हुनकर पुनर्विवाहक व्यवस्था हो। एहिमे सभसँ बाधक विआहसँ जुड़ल खर्चा एवम् जातीय स्वाभिमान अछि। मुदा ई विचारणीय प्रश्न थिक जे समाजक कोनो व्यवस्था जँ एक निर्दोष जीवनकेँ कष्टमय केने रहैत अछि तँ ओकरामे संशोधन किएक नहि हेबाक चाही? ओना, कतेको जातिमे बिधवा विआह पहिनहिसँ चलनमे अछि। कतेको महिला एहिसँ एकटा नूतन जीवन जीबाक अवसर प्राप्त करैत छथि। मुदा किछु जाति विशेषमे अखनो एकरा पारिवारिक प्रतिष्ठासँ जोड़ि कए देखल जाइत अछि। आखिर, ओ प्रतिष्ठाक जे गति होइत अछि, ताहिपर चर्चाक आवश्यकता नहि अछि। एहन बिधवा जकरा सन्तानो नहि छैक, एकरा व्यर्थ निष्ठाक नामपर लगातार कष्ट सहैत रहए, जीवनक समस्त सुख, सम्पदासँ वंचित रहए से कहाँ तक जायज अछि? कतेको समाजमे ई व्यवस्था अछि जे बिधवाकेँ ओही परिवारक अविवाहित भाए किंवा समव्यस्क सम्बन्धीसँ विआह कए देल जाइत अछि। निश्चित रूपसँ वो सभ बेसी व्यवहारिक एवम् वुधिआर लोक छथि। मुदा जँ सेहो सम्भव नहि होइक तखन तँ परिवारक वयस्क सदस्यकेँ आगा आबि ओहि महिलाक जीवनमे पुन: स्थापित करबामे सहयोग करथि आ सुयोग्य, सही व्यक्तिसँ विआह करबामे सहयोग करथि। जँ बिधवाकेँ सन्तान छैक तखन पुनर्विवाहसँ दिक्कति भए सकैत छैक मुदा एहनो परिस्थितिमे ओहि बच्चा सभक संगे बिधवाकेँ स्वीकार करब सर्वोत्तम समाधान भए सकैत अछि। हम एकबेर यूरोप गेल रही तँ हमर सभक वाहन चालक अपन परिवारक चर्चा करैत कहए लगलाह जे हुनकर स्त्रीक ई दोसर विआह छनि। पहिल विआहसँ दूटा सन्तान छनि। हुनकासँ विवादक बाद एकटा सन्तान छनि। एवम् प्रकारेण वो तीनटा सन्तानक पिता छथि आ सभक भरण-पोषण सहर्ष एवम् समान्य रूपसँ करैत छथि। विदेशमे ई आम बात अछि। ओहिठाम विआह विच्छेद जहिना होइत अछि तहिना पुनर्विवाह सेहो भए जाइत अछि। फेर अधिकांश महिला पुरुष ओहि स्थिति हेतु तैयारो एहि मानेमे रहैत छथि जे आर्थिक निर्भरता सामान्यत: नहि रहैत अछि। ईहो बुझय जोगर गप्प अछि जे ओकर सभक समाजक मूल्य अछि जे ओकर सभक समाजक एवम् पारिवारिक संरचना अलग अछि। अपन भारतीय मूल्यक रक्षा करैत एवम् परिवारक संरचनाकेँ कोनो तरहें बिना दुबर केने विशेष परिस्थितिमे सामाजिक सामंजस्यक व्यबस्था जरूरी अछि जाहिसँ संयोगवश जँ क्यो बिधवा भए जाइत अछि तँ हुनका तरह- तरहक कष्टसँ बचाऔल जा सकए आ हुनक भावी जीवनकेँ सुखद कएल जा सकए। ओना अपने देशक कतेको राज्यमे बिधवा विआह आम बात भए गेल अछि। अपनो समाजमे किछु जाति विशेषमे एकरा लोक अखनो ढो रहल अछि जखन कि कतेको जातिमे पहिनहुँसँ ई व्यबस्था रहल अछि। अस्तु, एहि कुप्रथाक कोनो मजगूत धार्मिक पक्ष नहि लगैत अछि। ई एकटा जाति विशेषक किंवा वर्ग विशेषक अहंसँ पोषित सामाजिक अभिशाप थिक जकर सुधारपर सभक ध्यान जा रहल अछि, मुदा व्यबहारमे अखनो स्वीकार्य नहि अछि। एहन नहि अछि जे बिधवा विआह होइते नहि अछि, गाहे-वगाहे उच्च वर्गीय मैथिलोमे ई भए जाइत अछि मुदा अखनो ई एकटा स्वभाविक, सर्वमान्य चलनक रूप नहि लेने अछि, जाहि कारणें कतेको कम वयसक कन्या जीवनक समस्त सुख, सुबिधासँ वंचित रहि दुखमय जीवन बीतेबाक हेतु विवश छथि। किछु एहन घटना सभ देखएमे आएल जतए परिस्थितिवश पतिक देहान्त भए गेलाक बाद हुनके परिवारक लोक विआहक व्यबस्था केलाह आ आइ वो एकटा सुखी परिवारिक जीवन जीबि रहल छथि। पूर्व पतिसँ जे सन्तान छलैक ओकरो नीकसँ पालन-पोषण भए रहल अछि। नव विआहमे सेहो सन्तान भेलैक। हमर कहबाक तात्पर्य अछि जे सभ किछुकेँ हठाते धर्म-कर्मसँ जोड़ि कए मनुक्खक जीबन नर्क कए देब कतहुँसँ उचित नहि अछि। गाम-गाममे एहन दृश्य देखएमे अबैत रहल अछि जे अपने लोक बिधवाक शोषण करैत छथि। कतेकठाम तँ ओकर हत्या तक भए गेल। ओकर सम्पत्ति अपने लोक लुटि लेलक वा ठगि लेलक आ जखन ओकरा प्रयोजन भेलैक तँ सभ कात भए गेल। तथाकथित मर्यादाक उल्लंघन जखन आम बात भए गेल हो, ताहि मर्यादाकेँ व्यर्थ होइत रहब सर्वथा अनुचित। पारिवारिक जीवन हेतु, भारतीय मूल्यक रक्षा हेतु, वैवाहिक जीवनक महत्वकेँ कमतर नहि आँकल जाए सकैत अछि। परन्तु ओकर आधार मजगूत बनल रहैक ताहि हेतु सोचमे परिवर्तन जरूरी अछि। पूरा दुनियाँ बदलि रहल अछि। इन्टरनेट, मोबाइल, टेलीवीजन, फेसबुक, ह्वाट्सअप सौंसे दुनियाँकेँ एक आँगन (Global Village) मे परिवर्तित कए देलक अछि। एहि परिवर्तनसँ क्यो बाँचल नहि रहि सकैत अछि। गाम-गाम वएह टेलीवीजन, वएह गीत नाद, वएह सीनेमा चलैत अछि। स्वाभाविक अछि जे गामोक धिया-पुतामे आधुनिकताक मानसिकता उत्पन्न होइक। एकरा एकदमसँ छोड़लो नहि जा सकैत अछि। अस्तु,आधुनिकताक बिहाड़िमे सभटा उड़िया जाए ओहिसँ पूर्वे हमरा लोकनि स्वत: स्वभाविक रूपसँ परिस्थितिजन्य कारणसँ बिधवा भेल महिलाकेँ पुनर्वास हेतु, ओकर सम्मानपूर्ण जीवन-यापन हेतु सोचबाक चाही। समाज जे गतिशील होइत अछि, जे बदलैत परिवेशसँ सामंजस्य स्थापित करबाक हेतु प्रयत्नशील रहैत अछि, सैह टिकैत अछि। ओकरे विकास होइत अछि। जँ से नहि भेल तँ अपने बनाओल नियम, कानून वो मर्यादाक बोझसँ स्वत: चरमरा जाइत अछि। जरूरी अछि जे समयक संग तादाम्य स्थापित कए हम सभ नूतन विचारकेँ सहर्ष स्वीकार करी ओ प्रगतिक पथपर आगा बढ़ी। उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६ उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६क मूल उद्देश्य जिला, राज्य एवम् राष्ट्रीय स्तर पर अर्धन्यायिक संस्थाक स्थापना करब अछि जाहिसँ उपभोक्ता विबादकेँ शीघ्र ओ त्वरित समाधान भए जाइ। ई संस्था न्यायक नैसर्गिंक सिद्धांतक आधारपर मामलाक औचित्यक ध्यान रखैत उपभोक्ताकेँ उचित क्षतिपूर्तिक आदेश दए सकैत अछि। एकर आदेश नहि मानलापर उचित दंड देल जा सकैत अछि। उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६ ग्राहककेँ अपन सिकाइतक निपटान करबाक एकटा वैकल्पिक समाधान प्रदान करैत अछि मुदा ताहिसँ कानूनमे प्राप्त अन्य न्यायलयमे मोकदमा करबाक अधिकार समाप्त नहि भए जाइत अछि। जौँ अन्य न्यायालयमे ई सिकाइत सुनल जा चुकल अछि तैयो एहि कानूननक अनुसार उचित फोरममे सिकाइत कएल जा सकैत अछि। (धनबीर सिंघ बनाम हुडको, २०१२ (५) एसएलटी ३५) एहि कानून क धारा ९क अनुसार राज्य सरकार उपभोक्ता विबादक निपटान हेतु जिला एवम् प्रान्तीय स्तर पर जिला फोरम आओर राज्य आयोगक गठन करत, संगहि केन्द्र सरकार राष्ट्रीय आयोगक गठन करत। जिला फोरम मे जिला जज रहल, कार्यरत जिला जज, किंवा जिला जजक योग्यता रखनिहार व्यक्ति अध्यक्ष भय सकैत छथि। ओहिमे दूटा आओर सदस्य हेताह, जाहिमे एकटा महिलाक होएब जरूरी। राज्य आयोगक अध्यक्ष उच्च न्यायालयक कार्यरत वा सेवा निवृत न्यायाधीश होइत छथि। एकर अतिरिक्त दू वा अधिक सदस्य सेहो होइत छथि, जाहिमे एकटा महिलाक होएब जरूरी। राष्ट्रीय आयोगक अध्यक्ष उच्चतम न्यायालयक कार्यरत वा सेवा निवृत न्यायाधीश होइत छथि। एकर अतिरिक्त चारि वा अधिक सदस्य सेहो होएत छथि। सदस्य बनबाक हेतु बएस 35 सँ कम नहि हेबाक चाही, योग्यता स्नातक, एवम् अर्थ शास्त्र, कानून, वाणिज्य, लेखांकन, उद्योग, जनसेवा, वा प्रशासनमे दस बर्खक अनुभव होएब जरूरी थिक। जिला फोरममे एहन सिकाइत कएल जाएत जाहिमे संदर्भित वस्तुक मूल्य वा आपेक्षित क्षतिपूर्तिक मूल्य २० लाख टाकासँ बेसी नहि होएत। जौं कीनल गेल बस्तुक मूल्य किंवा क्षतिपूर्ति २० लाखसँ बेसी एवम् एक करोड़ सँ कम अछि तँ सिकाइत सम्बन्धित राज्यक आयोगक ओतए करए पड़त। ताहूसँ बेसी दामक बस्तुक हेतु किंवा क्षतिपूर्ति हेतु राष्ट्रीय आयोगक ओहि ठाम सिकाइत करब जरूरी थिक। एहि तरहक कोनो सिकाइत सम्बन्धित घटनाक दू सालक अधीन करब जरुरी थिक, परंतु सम्बन्धित फोरम/ आयोग लिखित कारण दए वाजिब मामलामे एहि समय सीमामे छूट दए सकैत अछि। उपभोक्ता कानूनक तहत सम्बन्धित उपभोक्ता, वा उपभोक्ताक हितक रक्षाक हेतु काज केनिहार मान्यताप्राप्त संगठन वा एकाधिक उपभोक्ता (जतए बहुत रास ऊपभोक्ताक एकरंगाहे सिकाइत होइक), वा राज्य किंवा केन्द्र सरकार स्वतः किम्वा प्रभावित ऊपभोक्ताकक हितरक्षाक हेतु सिकाइत कए सकैत छथि। जिला फोरम/राज्य आयोग/राष्ट्रीय आयोगक ओतए सिकाइत करबाक हेतु निर्धारित शुल्क: जिला फोरम वस्तु/सेवा/क्षतिपूर्तिक कुल दाम लागत शुल्क एक लाख धरि (जे गरीबी रेखासँ नीचा छथि) किछु नहि एक लाख धरि (जे गरीबी रेखासँ उपर छथि) एक सए टाका एक लाखसँ उपर ओ पाँच लाख धरि दू सए टाका पाँच लाखसँ उपर ओ दस लाख धरि चारि सए टाका दस लाखसँ उपर ओ बीस लाख धरि पाँच सए टाका राज्य आयोग बीस लाखसँ उपर ओ पचास लाख धरि दू हजार टाका पचास लाखसँ उपर ओ एक करोड़ धरि चारि हजार टाका राष्ट्रीय आयोग एक करोड़ सँ उपर पाँच हजार टाका (उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, २०१८क अनुसार जिला फोरम/ राज्य आयोग/ राष्ट्रीय आयोगक आर्थिक अधिकार क्षेत्र बढ़ा कए क्रमशः एक करोड़, दस करोड़, आ ताहिसँ उपर करबाक बिचार अछि)। जिला फोरम द्वारा सिकाइतक निपटान: सिकाइत प्राप्त केलाक २१ दिनक भीतर सिकाइतक प्रतिकेँ जिला फोरम प्रतिवादीकेँ पठाओत। प्रतिवादी अधिकसँ अधिक ४५ दिनक भीतर ओकर जबाब देताह अन्यथा जिला फोरम एकतरफा उपलव्ध सबूत ओ कागजातक आधारपर मामलाकेँ तय कए सकैत अछि। वादी वा प्रतिवादीकेँ वकील राखबाक जरुरत नहि होइत अछि। ओ स्वयं किंवा कोनो प्रतिनिधि द्वारा अपन बात फोरममे राखि सकैत छथि। जिला फोरमकेँ कार्यवाहीकेँ ई कहि चुनौती नहि देल जा सकैत अछि जे मामलामे नैसर्गिक न्यायक सिद्धांतक पालन नहि भेल अछि। जौँ उचित जाँच पड़ताल एवम् प्रस्तुत सबूतक आधारपर जिला फोरम वादीक सिकाइतसँ सहमत भए जाइत अछि तँ ओ प्रतिवादीकेँ ओहि बस्तुकेँ ठीक करबाक आदेश दए सकैत अछि, नव बस्तु देबाक हेतु कहि सकैत अछि, वा ओकर मूल्य आपस करबाक हेतु, किंवा प्रतिवादीक लापरवाहीसँ सिकाइतकर्ताकेँ भेल कष्ट वा क्षतिक क्षतिपूर्ति करबाक हेतु निर्णय दए सकैत अछि। जिला फोरम सिकाइतकर्ताकेँ प्रतिवादी द्वारा देल गेल सेवाकेँ दोषपूर्ण साबित भेलाक स्थितिमे उचित क्षतिपूर्ति देबाक आदेश दए सकैत अछि। संगहि वाजिब मामलामे दंडात्मक क्षतिपूर्तिक आदेश सेहो कए सकैत अछि। प्रतिवादीक लापरवाहीक कारण सिकाइतकर्ताकेँ भेल क्षति वा अवघातक हेतु जिला फोरम क्षतिपूर्तिक आदेश दए सकैत अछि। (एस.के.लकोटिआ बनाम नेशनल इनस्योरेंस कंपनी लिमिटेड) क्षतिपूर्तिक हेतु सिकाइतकर्ताकेँ साबित करब जरूरी अछि जे प्रतिवादी द्वारा देल गेल सेवामे त्रुटिक संग- संग ओकर लापरवाही सेहो छल, जौँ से नहि छल तखन क्षतिपूर्तिक मांग खारिज भए जाएत (निदेशक, एच.आइ.इ.टी बनाम अनिल कुमार गुप्ता, १९९४ (१) सीपीआर १८२ )। उपभोक्ता फोरम अन्तरिम आदेश नहि दए सकैत अछि। अपील जौँ कोनो पक्ष जिला फोरमक आदेशसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओ तीस दिनक भीतर राज्य आयोगमे निर्धारित प्रपत्रमे अपील कए सकैत छथि। मुदा जँ जिला फोरम आर्थिक क्षतिपूर्ति किंवा दंडक आदेश देने अछि तँ ओहि आदेशकेँ चुनौती देबासँ पूर्व ओहि रकमक आधा वा पचीस हजार जे कम होइक, जमा करए पड़त। मामलाक निपटान हेतु राज्य आयोग मोटामोटी जिला फोरमक पद्धति एवम् प्रकृयाक अनुसरण करैत अछि। जौँ कोनो पक्ष राज्य आयोगक आदेशसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओ तीस दिनक भीतर राष्ट्रीय आयोगमे निर्धारित प्रपत्रमे अपील कए सकैत छथि। मुदा जँ राज्य आयोग आर्थिक क्षतिपूर्ति किंवा दंडक आदेश देने अछि तँ ओहि आदेशकेँ चुनौती देबासँ पूर्व ओहि रकमक आधा वा पैंतीसहजार जे कम होइक, जमा करए पड़त। जौँ कोनो पक्ष राष्ट्रीय आयोगक आदेशसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओ तीस दिनक भीतर उच्चतम न्यायलयमे निर्धारित प्रपत्रमे अपील कए सकैत छथि।मुदा जँ राष्ट्रीय आयोग आर्थिक क्षतिपूर्ति किंवा दंडक आदेश देने अछि तँ ओहि आदेशकेँ चुनौती देबासँ पूर्व ओहि रकमक आधा वा पचास हजार जे कम होइक, जमा करए पड़त। राज्य आयोग, राष्ट्रीय आयोग नब्बे दिनक भीतर ओकरा समक्ष कएल गेल अपीलक निपटान कए देत, मामलाक सुनबाइक दौरान सामान्यतः स्थगन नहि देल जाएत। जौं नब्बे दिनमे फैसला नहि भए पबैत अछि तँ तकर कारण लिखित रूपमे देल जाएत। जिला फोरम / राज्य आयोग/राष्ट्रीय आयोग द्वारा देल गेल निर्णयकेँ जौँ तय समय सीमाक भीतर अपील नहि कएल जाइत अछि तँ ओ निर्णय अन्तिम भए जाएत। सिकाइतकर्ताक आवेदनपर किंवा स्वयं राज्य आयोग कोनो जिला फरममे चलि रहल मामलाकेँ दोसर जिला फोरममे पठा सकैत अछि। ग्राहकक कर्तव्य : ग्राहकक कर्तव्य अछि जे ओ कीनएबला बस्तुक बारेमे उचित जानकारी प्राप्त करए, ओकर गुणवत्ता बारेमे स्वयं जाँच पड़ताल करए एवम् दोकानदारक बातपर आँखि मूनिकए विश्वास नहि करए अपितु वस्तु विशेषपर बनल चेन्ह जेना आइएसओ आदिकेँ नीकसँ ठेकानि लेथि। देश भरिमे करीब पाँचसए स्वयंसेवी संगठन उपभोक्ता संरक्षणक हेतु काज कए रहल छथि। ग्राहककेँ उचित सलाह देबाक हेतु एवम् ओकर वाजिब हितक रक्षाक हेतु एहन संगठनसभ सकृय योगदान करैत छथि। ग्राहक जरूरी भेलापर हिनका लोकनिक मदति लए सकैत छथि। मिथिलाक संस्कृति बहुत पहिने मिथिलाक नाम विदेह छल आओर ओहिमे वर्तमान मिथिला, वैशाली, कतेको राज्यसभ सामिल छल। चारिम वा पाँचम शताव्दीमे ई मिथिला किंवा तीरभुक्तिक नाम ग्रहण कएलक। मुगल साम्राज्यक काल मे एकर एकटा भाग (उत्तर दिसिसँ)नेपालक राजाक अधीन चल गेल। शेष भाग तिरहुत कहल जाइत छल। मिथिलाप्रान्तक व्याख्या जे ग्रिअरसन महोदय केलनि अछि, तदनुसार एकर क्षेत्रफल लगभग तीस हजार वर्गमील अछि आओर एहिमे विहार राज्यक मुजफ्फरपुर, सितामढ़ी, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहर्षा, उत्तर मुंगेर, उत्तरी भागलपुर, आओर पुर्णिाक किछु भाग सामिल अछि संगे नेपालक रौताहट, सरलाही, सप्तरी, मोहातारी, आओर मोरंग जिला ओहिमे अवैत अछि। मिथिलाक वर्तमानक दरिद्रता आओर भूतकालक ऐश्वर्यमे कोनो साम्य नहि अछि। सन् १९३४ ई०क भूकंपक बाद एहिठामक लोकक स्थिति आओर खराव भए गेल छलैक आओर भूकंपक कारणे ओहिठामक आबोहवापर सेहो प्रतिकूल प्रभाव पड़ल। आलसी आओर खोचाँह स्वभावक कारण एहिठामक लोक संप्रति कष्टमे छथि, मुदा प्राचीनमे ई स्थिति नहि छल। लोक प्रशन्नचित्त समय बितबैत छल आओर धने-जने पूरल रहए। प्रयाप्त सुख-सुविधाक उपलव्धक संग लोकक ध्यान कला ओ संस्कृतिक विकासपर जाएब स्वबाविक अछि आ तेँ ई कोनो आश्चर्य नहि थिक जे लोक पर्याप्त साहित्यिक ओ सर्जनात्मक प्रतिभाक परिचय देलक। प्राचीन कालसँ मिथिलाक प्रशस्तिक आधार विद्वता रहल अछि। षड़दर्शनमेसँ चारिटा दर्शन, न्याय, वैशेषिक, मिमांसा आओर सांख्यक रचनाकार लोकनि क्रमशःगौतम, करणाद, जैमिनी ओ कपिल मिथिलेमे भेलाह। मुगल आक्रमण कालमे आचार-विचार शुद्धिपर ध्यान देव आवश्यक भए गेल तेँ मध्यकालमे नव्य न्याय, पूर्व मिमांसा आओर स्मृति निवंध रचनापर बेसी तुल देल गेल। मिथिलाक प्रतिष्ठा बाहरक विद्वान लोकनिमे बनल रहए तेँ ओतए कतेको प्रकारक पदवी विद्वान लोकनिकेँ देबाक प्रथा चलल, मुदा ओहि हेतु बहुत क्लीष्ट परीक्षा होइत छल-जेना कि श्लाका परीक्षा, उपाध्याय, महामहोपाध्याय आदि। मिथिलाक प्राचीनमे विदेह राजाक प्रतिष्ठाक आधार हुनक ज्ञान एवम् विद्वते छल। तहिना महेश ठाकुर ओ खांडववंशीय अन्य राजा लोकनि एवम् अन्य विद्या अनुरागी भेलाह आ मिथिलाक कीर्ति बढ़एबाक हेतु सभ तरहेँ प्रयास कएलनि ओ तदनुकूले प्रतिष्ठो प्राप्त कएलनि। मिथिलाक सोनितमे भगौती जानकीक अंश सर्वत्र विराजमान अछि। घर-घरमे पसरल गोसाउनिक शिर भगवतीक आराधना स्थल अछि। प्रत्येक शुभ अवसरपर भगवतीक वंदना गएबाक प्रथा मिथिलाक संस्कार भए गेल अछि। विद्यापतिक वंदना “जय जय भैरवि असुर भयाउनि, पशुपति भाविनी माया”, मिथिलाक राष्ट्रगानक तुल्य अछि। यत्र-तत्र पसरल भगवतीक सिद्धपीठ जेना उच्चैठ, उग्रतारा आदि शक्तिक आराधनाक सार्थकताकेँ प्रमाणित करैत छथि। उच्चैठक कालीक कृपासँ कालीदास मूर्खसँ एकटा महान विद्वान भए गेलाह। कहबी अछि जे ओ तेहने मूर्ख छलाह जे भदवारिक झर-झर पानि बहैत कालमे भगवतीक मुँहमे करिखा लेपए लगलाह जाहिसँ प्रसन्न भए भगवती हुनका वरदान देलथिन। मिथिलाक त्रिपुंडकसंग लालठोप ओ चाननक उर्ध्वपुणड करबाक परंपराक अर्थ ओकर शाक्त, वैष्णव ओ शैव संप्रदायमे समन्वय स्थापित करब छल। प्रति वर्ष हजारक हजार कमरथुआ वैद्यनाथधाम जाए महादेवकेँ गंगाजल ढ़ारि अवैत छथि। संगे गाम-गाम बनल महादेवक मन्दिर शिवक प्रति आस्थाकेँ प्रमाणित करैत अछि। “कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ” गबैत-गबैत कतेको भक्त लोकनिकेँ अश्रुपात भए जाइत छनि। एतबा होइतो शालीग्रामक रूपमे भगवान विष्णुक पूजा सगरे मिथिलामे पसरल अछि। तुलसी चढ़ाय चरणामृत लए भोजन ग्रहण करैत छथि। जँ गंभीरतासँ कहल जाएतँ मिथिलाक माटि-पानिमे अध्यात्म कुटि-कुटि कए भरल अछि। जन्मसँ मरण धरि हिन्दू धर्मशास्त्रमे जतबा संस्कार कएल जाइत अछि से मैथिल लोकनि बड़ धार्मिक भावनासँ निष्पादित करैत छथि। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणसँ सेहो मिथिलाक मुड़न, उपनायन ओ विआहक परंपरा समाजक विभिन्न घटकमे समन्वय ओ धार्मिक भावनाक अभ्युदयक हेतु अतिशय महत्वपूर्ण कहल जा सकैत अछि। भारत भरिमे मिथिलाक विआहक परंपरा अपनामे विचित्रताक हेतु प्रसिद्ध अछि। बर्खक बर्खधरि पसरल अनेकानेक प्रकारक पर्व ओ त्योहार मिथिलामे विआहक अनिवार्य अंग थिक। विआह होइते चतुर्थी, चरुचन, मधुश्रावणी, कोजागरा, विदाइ, पुछारी, नागपंचमी ओ द्विरागमनक अवसरपर नाना प्रकारक भार पठएवाक परंपराकेँ लोक आबो ओहिना लदने चलि आवि रहल अछि जेना अठ्ठारहम शताव्दीमे रहल होएत। एहि दृष्टिकोणसँ मिथिलाक लोक अखनो पछरले छथि। दहेजक प्रथा तेहन संक्रामक ओ घातक भए गेल अछि जे जिनका दू-तीन टा बेटी होन्हि तिनका दरिद्र बनबासँ भगवाने रक्षा कए सकैत छथि। आवश्यकता एहि बातक अछि जे मिथिलामे कन्यालोकनिक प्रति जे अन्याय भए रहल अछि से आबो बंद होइक। बोराक आम आ घरक कनिआमे भेद करब कठिन थिक। एहि सम्बन्धमे सौराठसभा ओ ओकर परंपरागत इतिहासक वर्णन करब उचित होएत।ई भारतवर्षमे अपना-आपमे एकमात्र संस्था थिक जे बिना कोनो राजकीय हस्तक्षेपकेँ प्रतिवर्ष दस हजार मैथिल व्रहमण लोकनिक विआह-सम्बन्ध स्थापित करबाक आधार बनैत अछि। एहिठाम एक निश्चित अवधिमे करीब लाख व्रहमण जमा होइत छथि। सौराठसभाक स्थापना करीब सए साल पूर्व भेल छल। ओतए पंजिकार लोकनो होइत छथि जे कन्यापक्षकेँ सिद्धान्त दैत छथिन। ओकरा अस्वजन-पत्र सेहो कहल जाइत अछि। नियमानुसार सात पीढ़ी पाछा देखला संता पंजकार ई प्रमाणपत्र दैत छथि जे सम्बन्धित वर ओ कन्या पक्षमे सम्बन्ध भए सकैत अछि। यद्यपि ई व्यवस्था वंश परंपराक प्रतिष्ठा ओ शुद्धता वनयबाक हेतु कएल गेल, मुदा एकर जड़िमे पंजी व्यवस्था छल जे १३१० ई०मे महाराजा हरिसिंघ द्वारा चलाओल गेल। एहि व्यवस्थाक अनुसार मिथिलाक व्राहमण लोकनिकेँ चारिभागमे बाँटल गेलाह। (१) श्रोत्रिय, (२) योग, (३) पंजीवद्ध, (४) जयबार। प्रथम तीन कोटिक व्राहमण भलमानस कहल जाइत छलाह आ अन्तिम याने जयबार लोकनि कुलशीलक हिसाबे छोट व्राहमण कहल गेलाह। सौराठ साभामे बैसबाक स्थान ओहि हिसाबे निर्णीत भेल छल। ऐहि प्रथामे सबसँ बड़का दोष ई छल जे भलमानुष लोकनिक सामाजिक प्रतिष्ठा बहुत बढ़ि गेल आ ओ लोकनि क्यो सए क्यो पचास एनाकए विआह सम्बन्ध स्थापित करए लगलाह। कतेकठामतँ इहो सुनबामे अबैत छलजे भलमानुष लोकनिकेँ विआह केलाकबाद दोहराकए सासुर जेबाक समय ओ स्मृति नहि रहैत छलनि। विभिन्न प्रकारक पाँजि रखनिहार लोकक मूलक संग गाम विशेष वा व्यक्तिविशेषक नाम जोड़ल रहैत अछि। जेना-महादेव ठाकुर पाँजि, शीलानाथ झा पाँजि आदि। यद्यपि आब एहि परंपराक कोनो सामाजिक महत्व नहि रहि गेल अछि तथापि पंजिकारलोकनि एकर भष्मावशेषकेँ उठओने फिरि रहल छथि कारण ओहिसँ हुनका लोकनिक जीविका चलैत छनि। आबक मिथिलाक पाँजि थिक-इन्जीनियर, डाक्टर, प्रोफेसर ओ खूब धनिक लोक। कोनो ठामक संस्कृतिपर ओके लिपि ओ भाखाक बड़ प्रभाव होइत अछि। मिथिलाक भाखा मैथिलीकेँ अपन लिपि तिरहुता किंबा मिथिलाक्षर कहल जाइत अछि। दुर्भाग्यक बात थिक जे मैथिलीमे देवनागरी लिपिक प्रयोग संग ओकर मौलिक लिपिक प्रयोगमे प्रचूर ह्रास भेल। एतबा धरि जे मिथिलाक्षरमे लिखा-पढ़ी करएबला लोक आंगुरपर गनलेसँ भेटि सकैत छथि। मैथिली भाखामे साहित्यक प्रत्येकविधापर काज भेल अछि। प्राचीनकालसँ आइ धरि कतेको विद्वान लोकनि अपन कलमक जोड़सँ एहि भाखाकेँ कृतार्थ कएलनि अछि। चर्यापदमे दार्शनिक तथा धार्मिक मान्यताकेँ लौकिक रूपमे प्रस्तुत करबाक चेष्टा कएल गेल अछि। एकर पद सभमे चौबीस प्रकारक राग-रागिनी सभक प्रयोग भेल अछि। ज्योतिरिस्वरक वर्णरत्नाकर, धर्तसमागम ओ पंचशायकक मैथिली भाखाकेँ अपूर्व योगदान अछि। वर्णरत्नाकरक ई विशेषता थिक जे हमरा लोकनिक आद्य ग्रंथ होइतो ई गद्यमे लिखल अछि जखन कि आन-आन भाखाक आदिग्रंथ पद्यमे अछि। मध्यकालमे मैथिली साहित्यक युग प्रवर्तक भेलाह विद्यापति जे संस्कृत, अवहट्ट, ओ मैथिली भाखामे कतेको सोरहि रचना कए अमर भए गेलाह। गाम-गाम पसरल विद्यापतिक सोहर, समदाउन, वटगबनी ओ नाना प्रकारक भक्ति गीत अखनो हुनकर साहित्यिक स्वरुपकेँ ओहिना जीवित रखने अछि जे चारि-पाँच सए बर्ख पूर्ब रहल होएत। विद्यापतिक बाद गोविन्ददास झा, उमापति, मनबोध, लोचन, हर्षनात झा धरि अपूर्व शृंखला चलल जाहिमे विद्यापति साहित्यक शृजनात्मक छाप सतति परिलक्षित भेल। चंदा झाकेँ आधुनिक युगक प्रवर्तक मानल जाइत अछि। ओ बहुमुखी व्यक्तित्वक लोक छलाह। हिनक सात गोट प्रकाशित ग्रंथ भेटैत अछि तथा पाँच गोट एहनो ग्रंथसभक उल्लेख भेटैत अछि जे अप्रकाशित अछि। हिनक प्रकाशित ग्रंथक नाम थिक- (१) मिथिलाभाषा रामायण, (२) गीति सुधा, (३) महेषवाणी, (४) अहिल्या चरित नाटक (५) चंद्र पद्यावली, (६) लक्ष्मीश्वर विलास, (७) विद्यापतिक पुरुष परीक्षाक गद्य-पद्यमय अनुवाद। हिनक अप्रकाशित रचना अछि- (१) गीत सप्तशती, (२) मूलग्राम विचार, (३) छन्दोग्रन्थ, (४) वाताव्हान, (५) रसकौमदी। विद्यापतिकेँ जँ मैथिली साहित्यक सूर्य कहल जाए तँ निश्चय चंदा झा ओहि साहित्यमे चन्द्रमाक स्थान प्राप्त करबाक योग्य छथि। चन्दा झाक बाद जीवन झा, म.म.परमेश्वर झा वख्सी, रघुनंन्दन दास, म.म.मुरलीधर झा, जनार्दन झा जनसीदन, ओ लालदासक नाम प्रमुख साहित्यकारक रूपमे अविस्मरणीय अछि। लाल दास क रचित रमेश्वर चरित रामायणमे सीताक महिमा बेसी स्थान पओने अछि अर्थात ई शक्तिक प्रधानता देलनि अछि जे मिथिलाक परंपरा ओ संस्कृतिकक अनुकूल अछि। महाकाव्यक क्षेत्रमे सीताराम झाक अम्व चरित, बद्रीनाथ झाक एकावली परिणय, मधुपजीक राधा विरह, तंत्रनाथ झाक झाक कीचक वदओ कृष्णचरित, सुमनजीक प्रतिप्रदा स्वतः स्मरण भए जाइत अछि। एकरे संगे अंग्रेजी, संसकृत ओ मैथिली साहित्यक प्रकाण्ड विद्वान होइतो मैथिली साहित्यकेँ गौरवान्वित करबामे डा. रमानाथ झा ओ डा. जयकांत मिश्रक नाम स्वर्णाक्षरसँ लिखए जोगर अछि। हास्यरसावतार प्रो० हरिमोहन झाक कृतिसँ मैथिली भाखाक कोष भरल-पूरल अछि। ओ अपन उपन्यास कन्यादान एवम् द्विरागमनक माध्यमसँ मिथिलाक कुप्रथापर अपूर्व चोट कएलनि। खट्टरककाक तंग, प्रणम्य देवता, रमगशाला, चर्चरी, आदिक रचनासँ ओ मैथिली साहित्यमे अमर भए गेलाह अछि। डा. शैलेन्द्र मोहन झा, कांशीनाथ झा किरण, श्री वैद्यनाथ मेश्र ‘यात्री’क सेहो अपन-अपन योगदान अछि।यात्रीजी अपन साम्यवादी विचारक पुष्टि करैत बहुत रास ओजस्वि ओ क्रान्तिकारी विचारसँ पूर्ण रचना कएलनि। उदाहरणस्वरूप- अगड़ही लगउ बरु वज्र खसौ, एहन जातिपर धसना धसौ, भूकंप होउक फटौक धरती, माँ मिथिले रहि कए की करती? डा. सुभद्र झाक'फारमेसन आफ मैथिली लिटरेचर”, 'हिस्टोरिकल ग्रामर आफ मैथिली ओ प्रवास, हुनक तीनटा पोथी मैथिली साहित्यके प्राण प्रतिष्ठा देबएमे अद्वितीय योगदानक रूपमे अविस्मरणीय अछि। आधुनिक कालमे मिथिला मिहिरक संपादकगण एहि प्रकारे स्पष्ट अछि जे साँस्कृतिक दृष्टिए मिथिलाक माटि-पानि बड़ हरिअर अछि। मुदा दुर्भाग्यक बात ई थिक जे आलस्य किंवा प्रमादवश हमरालोकनि अपने साँस्कृतिक उपलव्धिकेँ बिसरि रहल छी। स्व० राजेश्वर झा, योगानन्द झा, स्व. चन्द्रनाथ मिश्र, राजकमल चौधरी, ललित, ओ रमानन्द रेणु, श्री सोमदेव आदि कतेको लेखक लोकनि ओ कवि लोकनि मैथिली साहित्यकेँ हिष्ट-पुष्ट करबामे सहायक सिद्ध भेलाह अछि। एही क्रममे पिलखवाड़वासी गंगेश गुंजनक चर्च सेहो उचित अछि जे अपन कथासंग्रह- “अन्हार इजोत” ओ कविता संग्रह” हम एकटा मिथ्या परिचय”क हेतु प्रसिद्ध छथि। एकर अलावा हिनक रेडिओ रुपक “जय सोमदेव” श्रोतालोकनिकेँ कतेक आनंदित कएलक अछि से वर्णन करब कठिन थिक। एहि प्रकारे स्पष्ट अछि जे साँस्कृतिक दृष्टिए “मिथिलाक माटि-पानि बड़ हरिअर अछि। मुदा दुर्भाग्यक बात ई थिक जे आलस्य किंवा प्रमादवश हमरालोकनि अपने साँस्कृतिक उपलव्धिकेँ बिसरि रहल छी। “बारीक पटुआ तीत” जे कहल गेल अछि से सगरे मिथिलामे प्रयुक्त अछि। सीकींसँ नीक-नीक बासन बनाएब वा उपनायन, बिआह ओ आन-आन शुभ अवसरपर सुन्दर-सुन्दर कढ़ाइ करब मिथिलामे हजारक हजार वर्खसँ प्रचलित अछि। गाम-गाम एकसँ एक कलाकार एहि कलाके जीवित रखने रहलाह मुदा एकर महत्व लोक तखन बुझलक जखन कि हजारक हजार संख्यामे एहि वस्तुसभक मांग किछु वर्ख पूर्वसँ विदेशीसभ करए लगलाह। जाहि मिथिलाक ध्वजा न्यायशास्त्रमे देशभरि मे फहराइत रहल, जतएक गायक लोकनि देशभरिक राज परिवारमे संमानक पात्र छलाह ओ कलाक दृष्टिसँजे सर्वत्र सम्माननीय छल ओहीठाम लोक भरि जाढ़मे घूरतर ओ गर्मीमे पीपड़क छहड़िमे गप्प मारि-मारि दरिद्राक सेवन करैत सब तरहेँ क्षीणशक्ति भए रहल छथि से चिन्ताक बात अवश्य अछि मुदा एकर अर्थ ई कदापि नहि जे हम अपन आत्मविश्वासकेँ परित्याग कए दी आ अन्धाधुन्ध आन-आन साँस्कृतिक ऐब सभकेँ अपना जीवनमे प्रश्रय दी। (१४ अगस्त १९८३क मिथिला मिहिरमे प्रकाशित) लघुकथा- पढ़ू पूत चण्डी समय एक गतिसँ आगा बढ़ल जा रहल अछि। मुदा हम-अहाँ ओकर प्रवाहमे कहि नहि कतए पहुँचि जाइत छी। जेना कोनो तेज धारमे छोट-मोट कतेको वस्तु स्वत: दहाइत कहाँ-सँ-कहाँ पहुँचि जाइत अछि, वएह हाल एहि जिनगीक अछि। “अहाँ की केलहुँ? घूरतर बैसल प्राय: नित्य साँझमे गामक कैटा बूढ़सभ आपसमे चर्चा करैत छलाह।” क्यो किछु, क्यो किछु कहैत। गप्प-सप्प बिबादक रुप धरैत आ अन्ततोगत्वा कहिओ काल झंझटोक संभावना भए जाइत। सभसँ ढीठ ओ दबंग ठीठरकका पहलमान वो अपढ़ छलाह आ ओहि घूरक महफिलमे डंकाक चोटपर कहितथि- “पढ़ू पूत चण्डी जासे चले हण्डी।” सद्य: लाभमे पूर्ण आस्था छलनि। भोरमे बच्चा महिष चरौलक आ साँझमे एक डाबा गरम-गरम दूध। एहिसँ नीक शास्त्र की भए सकैत छल? सभ पढ़ाइ-लिखाइ व्यर्थ। कहिआ पढ़त आ कहिआ कमाएत..? मुदा, ओहीठाम हीरा कक्काक स्वर एकदम दोसर रंग छल। धिया-पुता पढ़त तँ विचारवान होएत आ सुखी रहत। गाममे ओहि घूरक चर्चा चर्चित छल। दूनू गोटासँ साँझमे जँ बैसितथि तँ अपन-अपन दर्शनक अनुसार जरूर बजितथि आ परिणाममे विवाद होइत। ठीठरकका दबंग ओ लठैत छलाह। जबरदस्त खेती-पथारी रहनि। धिया-पुता सभ बेस मोट-सोंट आ लंठ। सभ खेतीमे लागल रहैत छल। परिवार सुखी छल। हुनका तुलनामे हीरा कक्काक हालत पातर छल। धिया-पुता सभ स्कूल-कॉलेजमे पढ़ि रहल छल। खेती-पथारी कोनो खास नहि। तेँ कखनो काल ठीठर कक्काक कथन ठीक बुझाइत छलनि। मुदा दूनू गोटे अपन-अपन विचारपर दृढ़ छलाह। हीरा ककाकेँ अपन धिया-पुताक बड़ आशा छलनि। आ तेँ अपन सम्पूर्ण शक्तिसँ धिया-पुताकेँ शिक्षा व्यवस्थामे लागल रहैत छलाह। समय बितैत गेल आ हुनकर सभ नेना सभ पढ़ि-लिखि यथायोग्य नीक-नीक स्थानपर पहुँचलाह। ओमहर ठीठरक गृहस्ती दिन-प्रति-दिन गड़बड़ाइत गेल। वृद्धावस्थाक जोर पकड़ितहि पुत्र सभ आपसमे लड़ैत रहैत छलाह। बात बिगड़ैत देखि वो सभकेँ फराक-फराक कए देलखिन। जमीन-जथा बँटि गेल। बीस बर्खक बाद आइ ने हीरा बाबू छथि आ ने ठीठरकका। मुदा सुनबामे बहुत किछु आएल। ठीठरकका बड़ कष्टमे मरि गेलाह। बेटा सभ खेत-पथार बेचि लेलक आ पेट पोसबाक हेतु गामसँ पड़ा गेल। हीरा बाबू सेहो सुखी नहि भए सकलाह। धिया-पुता सभ पढ़लक-लिखलक जरूर मुदा सभ अपनामे व्यस्त। ककरो बूढ़ाक व्यथापर सोचबाक समय, इच्छा ओ सामर्थ्य नहि भेलैक। क्यो कलकत्ता तँ क्यो बंबई। पाँचो बेटा पाँचटा शहर धेने छलाह। सुनबामे ईहो आएल जे मझिला बेटा लखनउमे मकान बना लेलक अछि। हीरा बाबू ओहिना एसगर टकटक तकैत बिदा भए गेलाह। ओहि स्कूलमे मौलाना-जोलहाक बेटा सेहो हमरा सभहक संगे पढ़ैत छल। पढ़एमे सामान्य छल मुदा अत्यन्त सज्जन वो संवेदनशील। कै दिन गामसँ स्कूल जाइत काल वो भेटि जाइत। मुदा वो स्कूल नियमित नहि जाइत छल। कै दिन बाधमे ओकरा हम सभ हर जोतैत देखियैक। हँसियो लागय आ दुखो भए जाए। कहिओ काल ओकर पिता सेहो भेटि जाइत, एकटा आग्रहक संग- “बौआ, माहटर साहेब बाबूसँ कहि देबै जे हमर बचबा आज नै जाएत।” पुछिऐक- “किए?” तकर जवाबमे पनपिआइ गमछामे बन्हने हर जेातइत अपन बेटा दिसि इसारा करैत। कै दिन हमरा संगे वो स्कूल जाइत। रस्तामे भेँट भए जाइत छल। गमछामे पाँच-छहटा किताब ओ किछु कॉपी बन्हने हमरा देखैत घरेसँ आबाज दैत- “हमहँ चलब। ठाढ़े रहब।” आबाज सुनि कए हम-सभ पाकरी गाछक तरमे सुस्ताए लगैत छलहुँ। स्कूल पहुँचि सभसँ पछिलका सीटपर वो बैसि जाइत छल। आ कै दिन तँ सभ घण्टीमे मारि खाइत रहैत छल। बिना कोनो आक्रोश आ प्रतिकृयाक कै दिन कहितिऐक- “एना मारि किएक खाइत रहैत छह! नीकसँ पढ़ाइ करह।” मुदा वो हमर-सभहक बात सुनि किछु-किछु अकाट्य तर्क दए दैत छल। बहुत दिनक बाद ओकरा एक दिन चौकपर रिक्सा लगौने देखलियैक। हमरा देखि ओकरा उत्साह भेलैक। प्राय: ओकरा भेलैक जे ई यात्रीपर ओकरा बिशेष अधिकार छैक। एक बेर हमरा मोन भेल जे ओही रिक्सासँ चली मुदा आत्मा सिहरि गेल। हमर वो सहपाठी रिक्सा चलाओत आ हम ओहिपर बैसल रहब। आ हम कात भए गेल रही। किछुए कालक बाद ओकर बूढ़ पिता एक गठ्ठर कपड़ा लेने आएल। प्राय: हमरा नहि चिन्हि सकल। ओहि रिक्सापर गठ्ठर राखि बाप-बेटा मिलि कए बीड़ी पीबए लागल। समयक एतेक अन्तरालक बादो बाप-बेटाक स्नेह बनल छल। हमरे सभहक संगे किछु वरिष्ठ विद्यार्थी सभ सेहो स्कूल जाइत छलाह। जाहिमे सँ कै गोटा मैट्रिकमे चारि-पाँच बेर फेल कए क्रान्तिकारी भए गेल छलाह। गाममे छोटका लोक सभकेँ संगठित कएक ओ सभ महा उपद्रव ठाढ़ कए देने छल। कैटा पैघ गृहस्थक हर-जन बन्द भए गेल छल। पनिभरनी सभ आँगनमे काज नहि करत आ भरिआ भार लए कए नहि जाएत। जकर घर जाहि जमीनपर छैक से तकर हेतैक। ई हेतै वो हेतै आ भए कए रहतै। दिन राति गाममे घोल-फचक्का होइत रहैत...। सभसँ बड़का आफद बड़का मालिककेँ भेल रहनि। वो एकदम चिंतित भए गेल रहथि। दिन-राति हुनका ओहिठाम भण्डारा चलैत रहैत छल। इलाकाक पहलमान ओ लंठक जमघट रहैत छल। समय बीतलाक संग-संग वो क्रान्तिकारी सभ शान्त भए गेलाह। अधिकांश कतहुँ-कतहुँ चाकरी कए रहल छलाह आ एकाधटा अकाल मृत्युक सेहो शिकार भए गेलाह। बड़ीकाल बैसल इएह सभ सोचैत रही कि दिनेश भाए भेट भए गेलाह। ओ हीरा बाबूक जेठ भातिज छलाह आ अंतकालमे वएह बेचारेक सेवा केने रहथि। हीरा बाबूक छोट पुत्र टुना हमर सहपाठी छलाह। हुनके प्रति गप्प होमए लागल। कहलाह जे वो तँ बहुत दिनसँ लंदनमे रहैत अछि। बड़का हाकिम भए गेल अछि आ बहुत रास पैसा कमाइत अछि। मुदा कै बर्खसँ गाम नहि आएल अछि। पुछलियनि- “हीराबाबूक काजमे आएल रहथि की नहि?” “नहि आएल रहथि।” छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ। पुछलऐक- “किएक?” “कहि नहि! मुदा मृत्युसँ दू-तीन बर्ख पूर्व आएल छलाह। गाम डोलि गेल रहए। जाइत काल बहुत रास टाका पिताकेँ दैत रहथिन मुदा ओ नहि लेलखिन।” बिच्चेमे चौंकैत पुछल- “कारण?” “कहाँ दनि कहलखिन जे ई पैसा अहीं राखू। काज आओत। जाहि पैसाक कारण अहाँ एतेक दूर चलि गेलहुँ, गाम-घर,माए-बाप ओ सभ किछु त्याग कए देलहुँ ताहि पैसाकेँ व्यर्थ हमरापर किएक नष्ट कए रहल छी। टुना तहिआसँ घुरि कए गाम नहि अएलाह।” “मुदा ठीठर ककाकेँ की भेल?” “की कहूँ! सभ बेटा घर छोड़ि पड़ा गेल। करबो की करितैक। गामपर किछु नहि बाँचल रहैक। असगर ठीठर कका काहि कटैत रहैत छलाह। जेठकी पुतोहु थोड़-बहुत सेवा कए दैत छलखिन।” एक बेर फेर ठीठर कका भीमकाय ओ हुनक आप्त वाक्य मोन पड़ि गेल- “पढ़ू पूत चण्डी, जा से चलए हण्डी।” शरीरमे बड़ थाकान बुझि पड़ैत छल, कहि नहि कखन नीन्न आबि गेल। लघुकथा- मुख्यमंत्रीक स्वप्न “की करी किछु फुरा नहि रहल अछि..! प्रेसबला सभ पाछू पड़ि गेल अछि। जतए जाउ ओतहि ई सभ पहुँचि जाएत।” मुख्यमंत्रीजी बाजि उठलाह। पुन: अपन प्रेस सचिवकेँ बजौलखिन- “मिस्टर सिंह। अहाँ एकटा विज्ञप्ति अखबारमे प्रकाशित करबा दियौक जे प्रेसक आदमी मुख्यमंत्रीसँ सम्बन्धित ओही समाचारकेँ प्रकाशित कराबथि जे हुनकर सरकारी कारोबारसँ सम्बद्ध होइक आ जकरा छापब जनताक हेतु नितान्त आवश्यक होइक। संगहि ईहो समाचार प्रकाशित करबाओल जाए जे हमर व्यक्तिगत कृया कलाप छापए बला समाचार पत्र ओ सभ व्यक्तिक विरूद्ध कार्रवाई कएल जाएत।” उत्तरमे प्रेस सचिव बाजि उठलाह- “ठीक सर। प्रेस बला सभकेँ कहि नहि की भए गेल छैक? एकरा सभकेँ सबक सीखेनाइ बेस जरूरी थिक। हम आइए ई विज्ञप्ति प्रकाशित करबा दैत छियैक।” “हद भए गेल! कहि नहि, प्रेसबला सभकेँ की भए गेलैक अछि।” अहीं कहू अपना सभमे बलिदान देबाक तँ पुरान प्रथा छैक आ ताहि बातकेँ लए कए प्रेसबला सभ छापि देलकै अछि आ सौंसे देशमे हरविर्ड़ो मचि गेल। जे तिवारीजी अपन कुर्सी बचएबाक हेतु छागरक सोनितसँ स्नान कएलनि अछि। लगैत अछि जे प्रेसबला सभकेँ सबक सीखबहि पड़त। मुदा कोना? काल्हि एहि विषयपर बिस्तारसँ विचार-विमर्श कएल जएतैक। “मैडम। प्रेस विल तँ अहींक आज्ञासँ लगाओल गेल।” मुदा जाहि तरहक विरोध एकर भए रहल अछि से तँ अप्रत्याशित अछि। लगैत अछि हमरा नव मुख्यमंत्रीक नियुक्ति करहि पड़त।” “हम तँ अहाँक शरणमे सदिखन रहलहुँ अछि। कही तँ एहि विलकेँ आपस लए ली?” “एकर बादो हम ई आश्वासन नहि दए सकैत छी। फेर गप्प कएल जेतैक।” -क्यो महिला स्वर एतबा कहि कए टेलीफोन काटि देने छल। एकर बादे माननीय भूतपूर्व मुख्यमंत्रीजीक निन्न उपटि गेलनि। सभटा बीतल गप्प सीनेमाक रील जकाँ सपनामे देखार भए रहल छलनि। असलमे हुनकर कुर्सीसँ हटब एकटा तेहन मार्मिक प्रसंग छल जे हुनका निरंतर ओझरौने रहैत छल। ओना जहिआसँ ओ मुख्यमंत्री भेलाह तहिएसँ हुनका भयावह स्वप्न सभ आबए लागल छलनि। विपक्षी दलक नाकेबन्दी मजबूत भए गेल छलनि आ सत्तादलमे सेहो कै गूट भए गेल छल मुदा साहसक बले ओ आगा बढ़ैत जाइत छलाह। अकस्मात गाड़ीक पहिया धसैत देखलनि तँ वो ओकरा उखारबाक कोनो कम प्रयास केलनि से बात नहि, मुदा भावी प्रवल। कर्णोक रथ तँ एहिना धसि गेल रहनि। बेस संक्रमण कालमे ओ जहाँ ने आगू बढ़लाह कि रथक पहिआ धसए लागल। ठीक एकदम वएह हाल माननीय भूतपूर्व मुख्यमंत्रीजीकेँ भेलनि। भए सकैए जे हमर गप्प अहाँकेँ तीत लगैत हो। अपने लोकनि भावुक नहि होइ। माननीय भू.पू. मुख्यमंत्रीजी कुर्सी बचएबाक हेतु कोन कुकर्म छोड़लाह? कहबी छैक जे ने दौड़ चली ने ठेसि खसी। मुदा मुख्यमंत्रीजीकेँ ई गप्प के बुझेतनि। ओहि दिन अखबार पढ़ैत छलियैक तँ एकटा बेस नमगर अपील पढ़लहुँ। धूर्तताक चरम सीमा छल। मैथिलीमे समाचार पत्र निकालताह। यौ महामहोपाध्यायजी। अपनेकेँ ई बुद्धि किछु दिन पूर्व किएक नहि भेल? की अहाँ जनताकेँ ओतेक मुर्ख बुझि रहल छियैक जे अहाँ ओकरा भुतिएने फिरिऐक। एकदम नहि। आब जमाना बदललै। खैर! देर अएलहुँ दुरुस्त अएलहुँ। मुदा ई तँ कहू जे ओहि समाचार पत्रमे की की खबरि छपतैक? मुख्यमंत्री पदक पुन: प्राप्तिक हेतु जँ अहाँ कोनो यज्ञ करबैक तँ ओकरा प्रमुखतासँ छपबैक वा नहि? आशा अछि जे एहि बेर ओ समाचार मैथिलीमे प्रकाशित समाचार पत्रक मुख्य पृष्ठपर अपने छापब। ओहि दिन गाममे बैसार रहैक। नवतुरिआ सभ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक हेतु बेस आन्दोलन केने छलाह। माननीय भू.पू. मुख्यमंत्रीजी प्रमुख वक्ता छलाह। वो बाजक लेल ठाढ़े छलाह कि क्यो दौड़ल आएल। कहलक- “दिल्लीसँ फोन आएल अछि।” ओ मंचपरसँ धड़फड़ाइत उतरए लगलाह ओ एही क्रममे लूढ़कियो गेलाह। फेर वएह नारी स्वर। फेर वएह हतप्रभ भू.पू. मुख्यमंत्री...। एमहर बैसारीमे हल्ला छलैकजे भू.पू. मुख्यमंत्रीजी किछु महत्वपूर्ण घोषणा करताह। सम्भवत: ओहि अप्रत्याशित फोनक कारणसँ बैसारक कर्यवाहीपर गम्भीर प्रभाव पड़ल आ बैसार साधारण भाषणक बाद स्थगित भए गेल। ओहि दिनुका बैसारक बाद भू.पू. मुख्यमंत्रीजी बहुत दिन धरि चुप रहलाह। पछिला महिना मुख्य पृष्ठपर समाचार छपल छल। ओकर किछु महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत अछि- दिनांक २ मई सन् १९७६ आइ मुकुल पटना अएलाह। परम सन्तोष अछि जे हम हुनका प्रशन्न कए सकलहुँ। ओना हमर प्रतिद्वन्दी लोकनि हमरापर लागल छथि मुदा जाधरि मुकुल हमरापर नहि विगरताह ताधरि क्यो किछु नहि कए सकैत छथि। तेँ हुनका प्रशन्न करबाक हेतु जान लगा दी। दिनांक १२ सिदम्बर १९८१ मैथिलीक अधिकार हेतु किछु मैथिल आएल छलाह। आखिर मैथिलीक की महत्व अछि? हमरा ई सभ तँ एकदम नीक नहि लगैत अछि, मुदा कएल की जाए। व्यक्तिगत हमरा मैथिल, मैथिलीसँ कोनो लगाव नहि अछि। हँ, जँ क्यो अपन सम्बन्धी होथि वा दोस्त-महिम होथि तँ तिनका नीक-सँ-नीक पद दिआबी आ मदतिओ करी। मैथिली, मैथिली चिचिएलासँ की होएत? १४ अक्टुबर १९८२ बिहार बेस विवादास्पद राज्य अछि। मोन तँ होइए जे एहि पदकेँ छोड़ि जा कए आराम करी, वा पुन: अपन पहिलुका पेशामे लागि जाइ। मुदा एतेक आमदनी छैक एहि काजमे जे अन्यथा सातो जन्ममे नहि भए सकैत अछि। प्रेसबला सभ पाछू पड़ि गेल अछि। की करी बुझा नहि रहल अछि? १ जनवरी १९८४ देखा चाही नव बर्ख की की रंग लबैत अछि। मुख्यमंत्री पदसँ हटलाक बाद तीव्र वैराग्य भए रहल अछि। खने मोन करैत अछि जे राजनीतिसँ सन्यास लए ली। खने मन करैत अछि जे ‘युद्वाय कृत निश्चय’क पुनरावृत्ति कए दी। एकटा उपाय सुझि रहल अछि। मैथिलीक प्रचारमे पदयात्रा किछु सज्जन चला रहल छथि। हुनके संग धरी। गामे-गाम मैथिलीक नामे हमरो प्रचार भइए जाएत। सुनबामे आएल अछि जे दड़िभंगा लग एकटा बड़ सिद्ध तांत्रिक छथि। हुनकोसँ किछु परामर्श करब। आगा जगदम्बाक ईच्छा। कैदिनसँ थाकल-झमारल भू.पू. मुख्यमंत्रीजी ओहि दिन दुपहरियामे कनेके आँखि मुनने छलाह कि सपनाए लगलाह। साक्षात् महिषासुर मर्दिनी कत्ता लए घुमि रहल छलीह। शत्रुक संहार करैत छलीह। नवका मुख्यमंत्रीक नाशक हेतु षडयंत्र जोर-सोरसँ चलि रहल छल। जतहि देखू ततहि भू.पू. मुख्यमंत्रीजीक स्वागतमे स्वागतद्वार सभ बनल छल। मैथिलीक प्रचार खूब भेलैक। भू.पू. मुख्यमंत्रीजीक नामक नगारा चारूकात बाजि रहल अछि। चुनाव घोषणा भए गेलैक। बड़का-बड़का उद्योगपति सभ अपन भविष्यक आशापर पर्याप्त चन्दा दए रहल छथि। एहि सबहक परिणामो बहरेलैक आ हम पुनश्च मुख्यमंत्री भए गेलहुँ। सपथ ग्रहण समारोहमे किछु मैथिल सभ उपद्रव करए चाहैत छलाह कि पुलिस लाठीचार्ज कए देलक...। एतबहिमे भू्.पू. मुख्यमंत्रीजी सपनेमे गरजए लगलाह कि हुनक नीन्न खुजि गेल। उठलाह तँ वएह रामा वएह खटोला। पुनर्मुषिकोभव। लघुकथा- यमलोकक दल-बदलू ओहि दिन यमलोकमे जबरदस्त गहमा गहमी छल। भेल ई जे मृत्यु लोकसँ हालमे आएल बहुत रास लोक ओतए पहुँचलाक बाद जनतंत्र बहालीक मांग पर अड़ि गेल रहए। नित्य प्रतिक हंगामासँ तंग भए यमराज यमलोकक नव संबिधानक हेतु अध्यादेश जारी केलाह। तकर बाद मृत्यु लोकक तर्जपर चुनावक कार्यवाही प्राम्भ भेल। यम प्रतिनिधि बनब कतेक कठिन बात थीक से भुक्तभोगिये कहि सकैत छथि। यद्यपि सत्तारूढ़ दलसँ लए कए विपक्षी धरिक सभ व्यक्ति अपन-अपन सेवाक प्रति समर्पणक भावनाक चर्च करैत-करैत अपसियाँत रहैत छथि मुदा असलमे जे वो करैत छथि से जगजाहिर अछि। इएह सभ गप्प हम ओहि दिन सोचैत रही कि यमलोकक अखबारमे प्रतिनिधि सभा चुनावक समाचार निकललैक। समाचार देखिते एक बेर हमरा जेना करेन्ट जकाँ लागि गेल। कोना ने लागए। यमलोकमे जहिआसँ चुनावक सिलसिला अएलैक तहिआसँ कतेक घर बसि गेल। कतेको बेरोजगार सभ रातिये-राति धनिक भए गेल। इएह कारण थिक जे आब लोक जहाँ यमलोकमे चुनावक हल्ला सुनैत अछि कि टिकट लेबक हेतु एड़ी-चोटीक पसेना एक कए दैत अछि। यमलोकक प्रतिनिधि सभाक चुनाव भेला एक मास भेल छलैक। कोनो दलक स्पष्ट बहुमत नहि आएल छलैक। प्रधान बनए लेल बेस घमरथन भए रहल छलैक। यद्यपि दल सभहक संख्या तँ ९ टा छल मुदा मूलत: तीनटा दलक सदस्य बेसी छलाह- पिसाँच दल,भूतनाथ दल ओ प्रेत दल। नव निर्वाचित सदस्यमे सँ कमसँ कम पचासटा सदस्य एहन छलाहजे कमसँ कम पाँच-सात बेर दल बदलि चूकल छलाह। यम प्रतिनिधि सभामे कोनो दलकेँ स्पष्ट बहुमत नहि भेटलासँ हिनका सभहक लेल स्वर्णिम अवसर छलनि। नवका यम प्रतिनिधि सभ अपन-अपन भविष्य सुधारबाक हेतु बेस उत्सुक छलाह। प्रमुख महोदयकेँ से बेस परेशानी छलनि। हुनका तीनू दलक नेता बेरा-बेरीसँ अपन-अपन समर्थनमे आधासँ अधिक सदस्यक सूची प्रस्तुत केने छलाह। तीनू सूचीमे पचासटा सिद्धहस्त दल-बदलू आ पचीसटा नवका यम प्रतिनिधि केर नाम सामिल छल। प्रमुख महोदय भूतपूर्व इमानदार छलाह। मुदा जनताक हिसाब देखि कए रंग बदलि लेने छलाह। ओहो मामला नीकसँ बुझि रहल छलखिन। आखिर इमानदारीसँ होइते की छैक? नून रोटी चलि सकैत अछि। घरवाली कहथिन जे कहि नहि कोन करम केलहुँ जे अहाँक संग भेल। जहिआसँ प्रमुख महोदय अपन चालि-ढालि बदललाह तहिआसँ दुनियाँ दोसर भए गेलनि। जेम्हरे देखू तेम्हरे लक्ष्मीक दर्शन। ई मौका हुनका हेतु स्वर्णिम अवसर छल। जनसेवाक व्रतधारी लोकनिक प्रथम अवतार भए रहल छल। यमराज तीनू नेतासँ गप्प-सप्प करबाक हेतु तिथि निर्धारित कए सूचित कए देलखिन आ अपने भूमिगत भए गेलाह। प्रेत दलक नेता रातिक बारह बजे यमराजक पत्नीसँ भेँट करए गेलाह। दोसर-तेसर ओहिठाम क्यो नहि छल। सूटकेशसँ नोटक सभ गड्डी निकालि धराधर टेबुलपर राखि देलखिन। “ई थिक पुतोहुक मुँह देखाइ।” फेर गप्प-सप्प आगा बढ़ल कहए लगलखिन- “राजनीतिक हाल-चाल तँ अहाँकेँ बूझले अछि। पिसाँच दल ओ भूतनाथ दलक नेता सभ हमर पक्षक यम प्रतिनिधि सभकेँ फोरि रहल छथि। अहाँ यमराजकेँ हमर सिफारिश कए हमरा न्याय दिआउ।” यमराजक धर्म पत्नीजीकेँ तीनू लोक सुझि रहल छलनि, मुदा तैयो बजलीह- “अवश्य कहबनि। अहाँसँ बेसी योग्य, कर्मठ ओ इमानदार के भए सकैत अछि। प्रधानक पद तँ अहींकेँ भेटबाक चाही।” प्रेत नेता सहर्ष ओहिठामसँ बिदा भेलाह। मुदा ओ समस्याक अन्त नहि छल। आखिर मास दिनक बादे सही, यम प्रतिनिधि सभाक सामना तँ करैक छलनि। तेँ कमसँ कम पचासटा आओर यम यम प्रतिनिधि के अपनामे मिलायब जरूरी छलनि। राता-राती ओ अपन विश्वासपात्र प्रेत नेताक सचिवक ओहिठाम पहुँचलाह। ओमहर पिसाँच दल ओ भूतनाथ दलक लोक सभ सेहो बैसल नहि छलाह। राति भरि हुड़दंग होइत रहल। असलमे बीस-पच्चीसटा यम प्रतिनिधि कै गोटेसँ टाका लए लेने छलाह। तीनू नेता सोचथि जे ओ सभ हमरा संगे छथि मुदा असलमे वो सभ ककरो संगे नहि रहथि। ओ सभ चुनावमे खर्च भेल अपन पूँजी ऊपर करबाक हेतु अपसियाँत छलाह। मुदा यमराज सेहो आब घवरायल छलाह आ यम प्रतिनिधि लोकनिकेँ साफ कहलखिन- “जँ अहाँ लोकनि स्पष्ट स्थिति नहि उत्पन्न करब तँ हम यमलोक प्रतिनिधि सभाकेँ भंग करबा देब।” ई बात सुनि नवका यम प्रतिनिधि सभहक मनमे हड़बड़ी मचि गेल। ओ सभ गोटे प्रेत दलकेँ अपन समर्थन देबाक निर्णय प्रमुख महोदयकेँ अवगत करा देलखिन। प्रात:काल प्रेत दलक नेता मंगनूकेँ प्रधान पदक हेतु सपथ कराओल गेल। प्रात:काल सपथ ग्रहण समारोह प्रारम्भ भेल। मनोनीत प्रधानजी अपन जेबीमे सँ एकटा चिट निकालि कए अपन पी.ए.केँ देलखिन। पी.ए. साहेब ओहि कागजकेँ प्रमुखक आप्त सचिवकेँ दए देलखिन। ओमहर यम प्रतिनिधि लोकनि मंत्री पद प्राप्तिक संभावनासँ अपसियाँत छलाह। किछुए कालमे घोषणा प्रारम्भ भेल। नव मंत्रीमण्डलमे तीस गोट कैबीनेट, बीसटा राज्यमंत्री ओ बीसटा उपमंत्रीक नामक घोषणा कएल गेल। एवम्-प्रकारेण यम प्रतिनिधि सभा क एक तिहाइ सदस्य मंत्री बनि रहल छलाह। शेष सदस्यमे सँ सत्तापक्षक समर्थक यम प्रतिनिधिकेँ कोनो-ने-कोने पद अवश्य देबाक स्पष्ट आभास भेटि गेल छलनि। प्रमुख निकेतन खचाखच भरल छल। सपथ ग्रहण समाप्त होमएपर छल कि सत्तापक्षक एकटा यम प्रतिनिधि गरजि उठला- “मंत्री पदक हेतु चयनमे पक्षपात कएल गेल अछि! आदि-आदि...।” प्रधानजी मुड़ी उठेलाह आ इसारासँ किछु कहलखिन। प्रधान विक्षुब्ध यम प्रतिनिधि सभक गुप्त बैसार कए रहल छलाह। रात्रिमे बारह बजे बैसार शुरू भेल से प्रात: छह बजेमे सम्पन्न भेल। बैसारमे पचासटा यम प्रतिनिधि छलाह जे कहैत गेलाह जे जौं अहाँ अपन बात नहि राखब तँ हमहूँ सभ अपन बात बदलबाक हेतु मजबूर भए जाएब। हारि कए प्रधानजी ओहिमे सँ पन्द्रह गोटेकेँ विभिन्न कैबिनेट मंत्रीक दर्जा संगे अपन-अपन जिलाक प्रशासनिक मुखिया सेहो बनाओल गेल। सभा विसर्जित भेल। ओमहर पिसाँच दल आ भूतनाथ दलक नेता प्रेत दलक नेताकेँ प्रधान पदक सपथ केर विरोधमे संपूर्ण यमलोकमे हड़ताल कए देलन्हि। यमलोकमे कानून/व्यवस्थाक गम्भीर समस्या उत्पन्न भए गेल। असलमे दूनू नेताकेँ प्रधान पद छुटि जयबाक आक्रोश तँ छलनिहे। सभसँ बेसी कष्टक गप्प छल जे हुनका लोकनिकेँ गम्भीर आर्थिक क्षतिसँ सामना करए पड़ल छलनि। यमलोकक पचासो यम प्रतिनिधि तीनू नेतासँ यथेष्ट पाइ टानि लेने छलाह। प्रधानकेँ अपन कुर्सी बचायब पराभव भए रहल छलनि। प्रमुखक खिलाफ दूनू विरोधी दल यमलोक भरिमे गम्भीर हड़ताल कए देने छलैक। स्थिति सम्हरने नहि सम्हरि रहल छलैक। अन्ततोगत्वा प्रधानजी विरोधी दलक नेता सभसँ गोपनीय बैसार करबाक निर्णय केलनि। दोसर दिन विरोधी नेतासभ एक-एक कए प्रधानजीसँ फराक-फराक भेँट करए लगलाह। पाँचटा छोट-मोट नेताकेँ शान्त केलनि। मुदा पिसाँच दल ओ भूतनाथ दलक नेता किछु सुनबाक हेतु तैयार नहि छलाह। अन्ततोगत्वा प्रधानजी पिसाँच दलक नेताकेँ विपक्षक नेता बनएबाक घोषणा केलनि। हुनको कैबिनेट मंत्रीक दर्जा देल गेल। संगहि भूतनाथ दलक नेताकेँ यम प्रतिनिधि सभा क उप-सभापति बनएबाक निर्णय कएल गेल। दूनू नेताकेँ पॉंच-पाँच कड़ोर टाका अपन-अपन जिलाक बिकासक नामपर खर्च करबाक अधिकार देल गेल। एवम्-प्रकारेण मंत्री मण्डलक कृयाकलाप प्रारम्भ भेल। प्रमुख महोदय सहित यम प्रतिनिधि लोकनिके हरियरी आबि गेल। यमलोकमे यम प्रतिनिधि सभा क अधिवेशन प्रारम्भ भेल। कतेको नव गोटे एहि बेरक अधिवेशनमे देखबामे आबि रहल छल। सदस्य सभकेँ सपथ दिआवोल गेल आ तकर बाद प्रमुख महोदयक भाषण भेल। यमलोकक अगिला बर्खक बजट केर प्रस्ताव प्रस्तुत कएल गेल। एतबा कार्यक्रम भेल छल कि विपक्षी नेता सभ वर्तमानमंत्री मण्डलमे अपन अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत केलनि। यम प्रतिनिधि सभामे जबरदस्त हंगामा होमए लागल। हंगामा नियंत्रणसँ बाहर भए गेल आ अध्यक्षकेँ यम प्रतिनिधि सभाक कार्यवाही स्थगित कए देबए पड़ल। ओमहर विपक्षक नेता अपन चेला-चाटीक संगे यम सभा अध्यक्षक निर्णायक विरूद्ध यम प्रतिनिधि सभासँ वहिगर्मन कए देल। यमलोकक राजनीतिक स्थिति कहुना ठहरिये ने रहल छल। प्रधानजी परेशान छलाह। प्रतिपक्षक नेता सभ यमलोकमे हड़तालक आह्वान कए देने छलाह। मुदा प्रधानजी कोनो कीमतपर कुर्सी छोड़बाक हेतु तैयार नहि छलाह। दोसर दिन यम प्रतिनिधि सभा क सत्र फेर प्रारम्भ भेल आ सत्ता पक्ष ओ प्रतिपक्षक नेता एवम् सदस्य लोकनि हंगामा करए पर अड़ल छलाह। प्रधानजी जतबोकेँ मंत्री बना सकलाह ततबो लोक गड़बड़ी नहि करताह तकर कोनो ठेकान नहि छल। शेष लोकनिक कहब मोसकिल। ओहि दिन सेहो यम प्रतिनिधि सभा क बैसार स्थगित भए गेल। एवम्-प्रकारेण प्रधानजी पाँच दिन काटि लेलाह। ताधरि अनेको उद्योगसँ मंत्रीमण्डलक गठनमे जे आर्थिक दबाब पड़लनिसे आपस भए गेल छलनि। विपक्षक सदस्य सभ यमराजकेँ विज्ञापन-पर-विज्ञापन दैत छलाह जे यम प्रतिनिधि सभा क अधिवेशन शीघ्र बजाओल जाए। अन्ततोगत्वा यमराज प्रधानजीकेँ बजा कए साफ कहलखिन जे अहाँ सात दिनक भीतर प्रतिनिधि सभामे अपन बहुमत सिद्ध करू अन्यथा अहाँक कुर्सी चलि जाएत। प्रधानजी अपसियाँत छलाह। नवका यम प्रतिनिधि-क गुटक कोनो भरोस नहि छलनि। मुदा झख मारि कए यम प्रतिनिधि सभामे विश्वास प्रस्ताव रखलाह। निर्णय भेल जे काल्हि एहिपर मतदान होएत। विपक्षक सदस्य सभ हर्षसँ थपड़ी पीटए लगलाह। राति भरि क्यो यम प्रतिनिधि सुतल नहि। प्रात:काल दस बजे यम प्रतिनिधि सभा क बैसार प्रारम्भ भेल। यम सभा अध्यक्ष महोदय आशनपर विराजमान भेलाह। मत विभाजनक घन्टी बाजल। गुप्त मतदानक व्यवस्था छल। आधासँ अधिक सदस्य प्रधानक विरोधमे मतदान कए देलाह। यम सभा अध्यक्ष एहि निर्णयक घोषणा कए देल। प्रधान दल बदलक गम्भीर शिकार भए गेल छलाह। मुदा ई सभ कोना भेल से नहि कहल जा सकैत अछि। प्रधानजी अपन त्याग पत्र यमराजकेँ दए देलखिन। मास दिनक भीतर एक बेर फेर नव मंत्रीमण्डलक गठनक तैयारी जोर-सोरसँ प्रारम्भ भेल। मुदा आब यम प्रतिनिधि सभ सेहो चितिंत छलाह। प्रतिनिधि सभा भंग होयबाक समाचार जोर-सोरसँ चारूकात पसरि गेल छल। यमराज सेहो सख्त रूखि अपनौने छलाह। तेँ हेतु सभक मत भए गेल छलैक जे एकटा ठोस मंत्रीमण्डल बनाओल जाए। भूतनाथ ओ पिसाँच दलक नेता आपसमे बन्द कोठरीमे बैसार केलाह। तय ई भेल जे पिसाँच दलक नेता प्रधान बनताह। मंत्रीमण्डलमे दूटा उपप्रधान हेताह। एकटा उपप्रधान भूतनाथ दलक हेताह आ दोसर नव यम प्रतिनिधि गुटक नेता...। येन-केन प्रकारेण नव मंत्रीमण्डलक गठन भेल। यम प्रतिनिधि लोकनि आश्वस्त भेलाह जे जन सेवाक आब नीक अवसर हुनका सभहक हाथसँ नहि सरकतनि। यम प्रतिनिधि सभामे एहि मंत्री मण्डलकेँ विश्वास सेहो प्राप्त भए गेलैक। किछु दिन दोबारा यमलोकमे जनतंत्र बहाल भेल। लघुकथा- नर्कक संसद “सुनैत जाइ जाउ सभासद सभ। आजुक कार्रवाही प्रारम्भ हेबासँ पूर्व सभाक रपट पढ़ल जाएत। तदुपरान्त नव सदस्यक उद्घोषणा होएत आ फेर आन-आन कार्यवाही। नवगठित सदनक अध्यक्षताक भार नर्कक वरिष्ठतम सदस्य मनमोहन केँ देल जाइत अछि।” ई ध्वनि होइत अछि। जनता दिसिसँ आवाज आएल- “अध्यक्षजी अपन परिचय देथि।” मुदा ताबते संसदक सचिव उठलाह- “बेस तँ सुनि लिअ। ई अत्यन्त निष्ठावान, नर्कक वयोवृद्ध आ वरिष्ठतम सहयोगी थिकाह। हिनका मर्त्यलोकमे फाँसीक सजाए भेटल छलनि। आ ओतए ई सिद्धहस्त खूनी छलाह। इलाका भरिमे हिनक यश पसरल छल। ओना, हिनकर खाता सभ दिन लाले रहलनि अछि, मुदा एतय अएलाक बादो वो कतेको कीर्तिमान स्थापित करैत रहलाह जाहिसँ यमराजक विशेष आज्ञासँ नर्क लोकमे रहबाक अवधि बढ़ैत रहलनि। हिनक दक्षताक सभसँ पैघ प्रमाण तँ इएह थिक जे एहू अवस्थामे नर्क लोकक सभटा सामान भयादोहन कए देल आ ककरो एकर भनकी तक नहि लगलैक। सौभाग्यवश कही वा जे कही, वो सभ सामान तस्करीक छलैक आ मृत्युलोकमे क्यो प्राणी अपन पूर्वजक प्रोन्नतिक हेतु परमात्माकेँ घूस स्वरूप गाया जा कए दान केने छल। चूँकी ई सभ सामन तस्करीक छलैक, तेँ एकरा नर्क लोकसँ गुजरए पड़लैक। वो पारगमनमे छलाह कि नर्क लोकक चुंगीक सिपाहीकेँ मेन्डेक्सक गोली खुआ निशामे बुत्त कए मनमोहनजी सभटा सामन ब्लैक कए देल। मुदा धर्मराजक खुपिया विभाग बड़ चौकस अछि आ मनमोहनक एहि सुकृतिक पुरस्कार भेटलनि। पाँच बर्ख अतिरिक्त नर्क बाससँ।” “बाह-बाह..! एकदम सही आदमीकेँ अध्यक्ष बनाओल गेल।” “जय हो़ !जय हो़!” आबाज आएल चारूकातसँ। ई निश्चय नर्कक गरिमा बढ़ओताह। थपड़ीक गड़गड़ाहटक बीचमे अध्यक्ष महोदय आसन ग्रहण कए उद्घोषणा कएल- “मान्यवर नर्कवासी लोकनि, अहाँ सभ जे हमर सम्मान कएल अछि से युगानुकूल अछि। कलियुगमे पापक पुरस्कार धड़ाकसँ भेट जाइत छैक। तस्करी करू कोठा पीटू, घूस लिय, इन्जीनीयर जमाए करू। त्याग, तपस्या ओ चरित्रक महत्वक जमाना चल गेलैक। आब तँ लूटि लाउ, कुटि खाउ। एहि बातमे अहाँ सभ गोटे पारंगत थिकहुँ। ओना, मृत्युलोकक नियम सभ किछु आओर थिक। ओतए कानूनक राज थिक, मुदा नामे के। से जँ सत्ते रहैत तँ एहिठाम नर्कमे कतेको भूतपूर्व महामहिम नहि पड़ल रहितथि। अहाँ लोकनिक सामने जे मंचपर छथि से मृत्युलोकमे बेस सम्मानित जन नेता रहि चूकल छथि। जय-जयकार होइत छलनि हिनकर। मुदा काजक हिसाबे नर्कमे तृतिय श्रेणी भेटल छनि। हुनका नर्कक गेटक रखबारी करबाक भाड़ भेटलनि। हमर कहब जे जहन मृत्युलोकमे सभ किछु दनादन चलिए रहल छैक, तँ नर्क लोक कथि लेल पाछा रहए। एही बातकेँ ध्यानमे राखि कए हम नर्क लोकमे पुन: भयादोहन कएल आ एकर परिणामो अनुकूले भेल।” चारू दिससँ थपड़ी पड़ए लागल। तदुपरान्त सचिव महोदय पूर्व सभाक कार्यवाही सदनक संपुष्टिक लेल प्रस्तुत करए लगलाह- “मान्यवर, पूर्व सभाक प्रमुख-प्रमुख कार्यवाही प्रस्तुत अछि-१. नर्कक बढ़ैत जनसंख्या वृद्धिकेँ देखैत एहिठाम यथाशीघ्र परिवार नियोजन पखवारा मनायल जाए। वस्तुत: मर्त्यलोकमे अपराधक संख्याक भारी वृद्धिक कारणेँ नर्कक संतुलन गड़बड़ायल अछि आ एहिसँ नर्कक वरिष्ठ वासी लोकनिकेँ नाना प्रकारक भयंकर कष्टक सामना करए पड़ि रहल छनि। अस्तु, ई प्रस्ताव पारित भेल जे सामान्य कोटिक पापीकेँ नर्कसँ फराक एकर सीमानसँ बाहरे उपनगरी बनाओल जाए।” (हर्ष ध्वनिक बीचमे लोक प्रस्तावक सहमतिमे थपड़ी पीटैत छथि।) “नर्कक चाहरदिवारी छोट अछि जाहि कारणसँ स्वर्गलोकसँ कतेको लोककेँ असानीसँ एहिमे फना देल जाइत अछि। हमरा लोकनि एहि तरहक प्रकृयाक घोर विरोध कए रहल छी। संगहि ई प्रस्ताव पारित कएल जाइत अछि जे नर्कसँ ओतबे संख्यामे लोककेँ स्वर्ग जेबाक प्रावधान कएल जाए।” आवाज होइत अछि- “हमरा लोकनि स्वर्ग हरगिज नहि जाएब। हमरा सभकेँ नर्के नीक लगैत अछि। एहिठाम पाकिटमारीक खूब गुंजाइश छैक। स्वर्गमे तँ ककरो पाकिटे नहि छैक। ई प्रस्ताव मंजूर नहि अछि।” सचिव महोदय एकाएक प्रस्ताव सभ पढ़ैत गेलाह आ उपस्थित नर्कवासीगण बेरा-बेरी थपड़ी पीटैत गेलाह। एतबहिमे नर्कक घन्टा सभ घनघनाय लागल। पता लगलैक जे नर्कमे एकटा महापापीक प्रवेश भेल अछि। ओकरा यमदूत नाना प्रकारक यातना दए रहल छलैक। मर्त्यलोकमे ओ गम्भीर अपराधी छल। मुदा ओकरा लेल धनि-सन। नर्कलोकमे एहन यातनाक मध्यो वो कनखी मारैत हँसैत आगू बढ़ैत सभहक अभिनन्दन करैत चलि रहल छल। ताबतिमे नर्कवासीक किछु उचक्का ओकरा गोलिओलक आ ओकरा जेबीमे ओकर संतति द्वारा दान कएल गेल जे किछु कैंचा आ वस्तु छलैक से छीनि लेलक। ओ कनीके आगा बढ़ल की ओकरा अपन कका नजरिमे अएलैक। ओकरा बड़ आश्चर्य लगलैक। ओकर कका तँ बेस भक्त छलैक। तीन फट्टा चानन करैत छलैक। भोर-साँझ स्नान करैत छलैक। ओ घन्टा-घन्टा भरि पूजा करैत रहैत छलैक। अरे! ओकर ककाका पाछा तँ एकटा वोर्ड लागल छलैक। “मर्त्यलोकमे ढोंग करबामे कुशल रंजनजी अपना जीवन कालमे कतेको डकैती वो हत्या काण्डमे सम्मिलित रहला।”- भातिज गुम्म। “बाह रे कका! ओहिठाम तँ बेस हवा बनौने छलाह।” संसदक अधिवेशन जोरपर छलैक। नव-नव सदस्यक परिचय कराओल जाइत छलैक। पण्डालक अग्रभागमे नव सदस्य सभकेँ राखल गेल छल। “ई थिकाह ‘ब्रजमोहन’। भूतपूर्व मुख्य मंत्री। ई अपन शासन कालमे फुसि बजबाक कीर्तिमान बनौलथि। कहिओ बैमानी करबासँ नहि हिचकला। मुदा पहिरन-ओढ़न बेस स्वच्छ सात्त्विक। हिनका नर्कमे स्थायी स्थान भेटलनि अछि। ओना सामान्य कोटिक पापीकेँ दोसर ओ तेसर सालपर कागज-पत्रक समीक्षा होइत छैक। मामलाकेँ फेरसँ जाँच-पड़ताल होइत छैक, मुदा हिनकर मामलामे यमराज एकतरफा निर्णय सुना देल जे ई नर्कक स्थायी सदस्य हेताह आ हिनकर कागज-पत्रकेँ गोपनीय कए देल जाए ताकि चित्रगुप्तक सहायक लोकनि ओहिमे कोनो प्रकारक हेरा-फेरी नहि कए सकथि।” ‘तिलक ’क पार आएल। टांग टुटि गेल छलनि। यमराजक पूत सभ लादि कए नर्क पुरी आनि रहल छल कि अकस्मात ओकर टांग नक्षत्रमे घुमि रहल स्काइलैवक टुकड़ीसँ टकड़ा गेलैक जाहिसँ भयंकर दुर्घटना भेल ओ तिलक प्रेतक टांग कटि गेलनि। ओना,तिलक मृत्युलोकमे मुखिया छलाह। ब्लौक डेबलपमेन्ट कमीटीक कार्यकारिणीक सदस्य छलाह ओ गाममे बेस धाख छलनि। गाममे राजनीति कए इलाकाक लोककेँ अपना दिसि कए अपन सहोदर भाएकेँ रातिये-राति निपत्ता कए देलनि। ओना, बाहरमे बेस बिलाप कएलनि। छाती पिटलनि। थानामे रिपोर्ट दर्ज करेलनि। इत्यादि-इत्यादि। मुदा संयोग जे ओहि समयमे नर्कमे समयोपरि काज चलि रहल छलैक आ भारतक विभागक किरानी काज कए रहल छलाह। नर्कलोकसँ वो सभ घटनाक दूरदर्शनपर देख रहल छलाह। नर्कक कागज-पत्रमे सभ लिखल छल। यमराजक कोर्टमे पहुँचि कए वो अवाक रहि गेलाह। “के बाहर केलक ई सभ..!” सोचैत छलाह। एवम् प्रकारेण एकसँ एक नवागन्तुक सदस्यक परिचय होइत गेल। एतबहिमे भयंकर हल्ला सुनबामे आएल। दर्शक दीर्घासँ कूड़ा फेकल जा रहल छल। क्यो गोटे जोर-जोरसँ उद्घोष कए रहल छल- “भाई लोकनि! यमराजक अत्याचारसँ हमरा लोकनि उबि गेल छी। नर्कक व्यवस्था साफ गड़बड़ा गेल अछि। हमरा लोकनि २५ बर्खसँ बिना सुनबाइ-के हाजतमे पड़ल छी।” एतबहिमे दसटा बेस नमगर पोरगर जवान सभ हाथमे हथकड़ी लेने प्रवेश कएलक। हाथमे डंटा छलैक ओ आँखि लाल कए रहल छल। संसदमे विरोधी पक्षक नेता गड़जि उठला- “ई संसदक घोर अपमान थिक। संसदक अध्यक्षक अनुमतिक बिना एहिमे पुलिसक एहि प्रकारक प्रवेश निंदनीय थिक।” चारू दिससँ सदस्य सभ फानय लगलाह। यमराजक प्रतिनिधि टीक पकड़ने हुनका अगत-अगत कए रहल छल। भयंकर कोलाहलसँ जखन किछु श्रुतव्य नहि रहि गेल तँ अध्यक्ष महोदय हारि कए सदनक कार्यवाही, ओहि दिनक हेतु स्थगित कए देल। संसदक किछु भाँगठ सदस्य भीड़मे डगमगा कए खसि पड़ि रहल छलाह। धक्कम-धुक्कीमे किछु नांगड़ सदस्यक दोसरो टांग आहत भेल जा रहल छलनि। बड़ी मोसकिलसँ वोहि दिन नर्कवासी अपन-अपन डेरा आपस पहुँचलाह। लघुकथा- जीबी तँ की की ने देखी ! लोक की की ने देखलक। मुदा दू-चारि बर्खसँ जे सभ गाममे भए रहल छल से एकदम अप्रत्याशित छलैक। नव-नव गुलंजर नित्य उठैत रहैक। रबि दिन हाट लगल रहैक। सभ पुरुष हाट करए गेल रहए। अरूण बाबू सपरिवार गाम आएल छलाह। हुनकर भाए मोहन बाबू बेस अगरजित छलाह। मैट्रिक उतीर्ण केने छलाह। ओना, खेत-पथार बहुत तँ नहि रहनि मुदा गुजर होयबामे कोनो दिक्कत नहि होइक। गाम घरक झगड़ा फड़िछाबएमे ओस्ताद छलाह मुदा अपना घरक झगड़ा नहि फड़िछा पबैत छलाह। घरवाली बड्ड तेज छलखिन। गोर-नार दप-दप। बी.ए. केने छलखिन। पिता गरीब मुदा विवेकी छलखिन। हुनकर एक मात्र कन्या छलखिन शीला, जिनक बिआह मोहन बाबूसँ भेल छलनि। मुदा बिआहक बाद हुनका लोकनिक आन्तरिक मतभेद बढ़ले चल जाइत छलनि। एहि बातसँ शीला बड़ दुखी ओ उदास रहैत छलीह। अरूण बाबू बहुत दिनक बाद आएल छलाह। दूनू भाए आपसमे गप्प-सप्प करैत छलाह कि क्यो स्त्रीगण रिक्सापर आएल आ ओकरा संगे दोसर स्त्रीगण घरसँ बहराएल आ रिक्सापर बैस चुप्पे चलि गेलथि। किछु कालक बाद मोहन बाबू आँगन गेलाह तँ घरक जिंजीर बन्द छल। आँगन सुन्न। कतहुँ क्यो नहि। मोहन बाबू गुम्म। ने हुनका आगा सुझनि आ ने पाछा। की करी, की नहि करी किछु फुराइते ने छलनि। क्रमशः ई गप्प सौसे गाम पसरि गेल। ई घटना कोनो नव नहि छल। एक मास पहिने एकटा एहने घटना भेल जे पूरा इलाकाकेँ झकझोड़ि देलक। पूरबरिया गामवाली बड़ सात्विक छली। दुरागमनसँ पहिने बिधबा भए गेल छलीह। तहिआसँ आइ धरि सात बर्ख बीति गेल। मुदा कतहुँ हुनक चर्चा नहि भेल। नित्य प्रात: चारिये बजे उठि जाइत छली। गामक सभ लोक सूतले रहए कि अन्हरिएमे नहा-सोना कए पूजा-पाठ करए लगैत छलीह। सम्पूर्ण शरीर तेजमय। मुदा किछु दिनसँ दर्द दर्दक सिकाइत करैत छलीह। लोककेँ होइक जे पेटमे अल्सर भए गेलनि अछि। लाजे ओ किछु बजथिन नहि। अन्ततोगत्वा पढ़ुआ काका नहि मानलखिन। हुनका जबरदस्ती अस्पताल लए गेलखिन। डाक्टर अस्पतालमे भर्ती कए देलकनि। ओकरा भर्ती करा कए पढ़ुआ काका किछु पैसा-कौड़ी जोगार करए गाम आपस अएलाह। प्रात:काल अस्पताल पहुँचला तँ रोगीक कतहुँ पत्ते नहि। पता नहि रोगी केतए चल गेलीह। सौंसे इलाकामे एहि बातक गर्द पड़ि गेल। ओना तँ गाम-घरक लोक बेस नेम-टेमबला। मुदा बेसीलोकक मोन सिआह। क्यो ककरोसँ कम नहि मुदा भीतरे-भीतर सभकेँ घून पकड़ने। मुदा इलाकामे एक्के बिहाड़ि। स्त्रीगण सभ घोघ उठाबए लेल बेहाल। बेटा सभक पिताक कुंजी छिनए लेल बेहाल। पुतोहु सभ सासुक गट्टा पकड़ए लेल बेहाल। घरे-घरे भिन्नक हाबा से जोरगर बहल अछि जे बयन परसैत-परसैत सभ परेशान। घरे-घर कै-कै गोट चूल्हा भए गेलैक अछि। खैर ! ई तँ जे भेलैकसे भेलैक। मुदा सभसँ आश्चर्य ओहि दिन भेल जहन पुरुषोत्तम बाबूक घरवाली हनहनायल थाना पहुँचि गेलैक। ओकरा देखए लेल चौगामका हजारो लोक जमा भए गेल। करमान लागल लोक आ तैयो दनदनाइत दरोगाजीक ऑफिसमे प्रवेश कए गेल। दरोगाजी पुलिसकेँ आदेश देलखिनजे भीड़केँ भगा दौक आ अपने ओहि कन्याक इजहार लेबए लगलाह। सँए-बहुमे गम्भीर मतभेद भए गेल छलैक। घरवाली कनिक्को रौ सहए वाली नहि छलैक। बाते-बातमे दूनू व्यक्तिमे मारि -पीट भए गेलैक। घरवाली थानामे आबि कए एफआइआर कए देलकैक- “हमारा जान का खतरा है।” तकर बाद ओ रिक्सा पकड़ि मधुबनी चल गेलि। बहुत दिनक बाद सुनल गेल जे ओ कतहुँ आनठाम बिआह कए लेलक अछि। गाममे ओझा-गुनी आ भगैतक चर्चा अखनो जोर पकड़ने छल। फुदरक घरवालीकेँ हाथक चाटी चलैत छलैक आ कनेक-मनेक मंत्र-तंत्र सेहो ओ जनैत छल। मुदा एहि बेर अष्टमीक दिन बेस ताल भए गेलैक। ओकर घरवाली साफे बकए लगलैक। खुलि कए देवी खेलाए लगलैक। गाम-गामक भगता आएल। मुदा ककरो बुते देवी नहि पकड़मे अएलैक। गाममे ओहि दिन पछवारि गामक ओझाजी आएल छलाह। हुनको तंत्रे-मंत्र बेस जोरगर छलनि। दौड़ल-दौड़ल लोक हुनका बजौने आएल। ओझाजी अएलाह। अनुष्ठान भरि राति भेलैक। देवी बन्हेबे नहि करैक। अन्ततोगत्वा भोरुकबा रातिमे आबि कए ओ देवी पकड़मे अएलैक। गटागट बाजए लगलैक- “एक मास धरि अनुष्ठान कर। ई कर, ओ कर, नहि तँ सौंसे गामकेँ पीस कए धए देबौक।” इत्यादि-इत्यादि...। औ बाबू! आब तँ सौंसे गौंआ ओझाजीक अनुनय-विनय करए लागल। ओझाजी अपन भाव बढ़बए लगलाह- “हमरा तँ ओतए जेबाक अछि। ई करबाक अछि, ओ करबाक अछि। हम परसू जेबे करब। एक्को दिन नहि रूकि सकैत छी।” बड्ड मोसकिलसँ ओ रूकलाह। नित्य साँझसँ देवीक अनुष्ठान घरमे शुरू होइक आ भोर धरि चलैत रहैक। ओहि अनुष्ठानक दौरान ओतए ककरो आएब मनाही छलैक। देवी रहि-रहि कए गरजै- “सभकेँ देखबौ। एक-एककेँ देखबौ..!” फूहर बाबू बाहर दरबाजापर सभ सुनैत रहथि आ देवीक आराधना करैत-करैत औंघा जाथि। ओमहर ओझाजी अनुष्ठानमे लीन। अनुष्ठानक अन्तिम दिन छल। नि:शब्द राति। ओझाजी आ फूहरक घरवाली अनुष्ठानमे लीन। सभ क्यो औंघाइत छल। एही समयमे दूनू देवी-देवता एकाएक गाएब। गामसँ पूब दिस सड़क छलैक। से पकड़ने-पकड़ने ने जानि कतए चल गेल। भोर भेने गाममे फेर एकटा गुलंजर छुटि गेल। गाममे आब की की ने अछि। इंजीनियर, प्रोफेसर आ बीए-एमए केर तँ गप्पे जाए दिअ। गामक लोक बेस टेटियाह। एकदम नियमसँ रहब आ नियमसँ जीब। भोरे उठि कए सुतबाक काल धरि मंत्रोच्चार करैत रहताह। गरीबक घर कोनो अधलाह काज भेल नहि कि ओकरा चट्टे बारि देताह। मुदा धनिक लेल सातटा खूनो माफ। प्रोफेसर साहेबकेँ घरवालीसँ नहि पटलनि। तलाकक मोकदमा भए गेल। घरक लोकमे सँ क्यो कनियाँक पक्षधर नहि भेलैक। तलाक पास भए गेलैक। प्रोफेसर साहेब धराक दए दोसर बिआह केलाह। ओहिसँ बच्चो भेलनि ओ ओहि बच्चाकेँ विआहो भए गेलैक। सोचियौक समय कतए-सँ-कतए पहुँचि गेल। जीबी तँ की की ने देखी ! लघुकथा - तुषारपात सभागाछीसँ बरक सिद्धान्त लिखाकए आबि गेल छलैक। सौंसे गाम हँगामा भए गेलैक। हीराबाबूक बेटीक बिआह आइ.ए.एस. अधिकारीसँ हेतैक। पिता हो तँ एहन। लाख रूपैआ तिलक लगलैक। हीराक पिता शीतल बाबू नामी ठीकेदार छलाह। एक मात्र सन्तान एक बेटी छलखिन। कतेको बरखसँ बरक खोजमे भिरल छलाह मुदा कतहुँ किछु कमी तँ कतहुँ किछु...। ओहि दिन पुरबारि गाम दिस बिदा भेल छलाह कि रस्तामे अकस्मात किछु गोटेसँ परिचय भए गेलनि। वएह सभ ओहि बरक परिचय देलकनि। बर जहिना देखैत सुन्नर तहिना सौम्य स्वभाव। शीतल बाबू तय कए लेलाह जे जान रहए कि जाए मुदा ई काज करक अछि। अन्तोगत्वा एक लाख टकापर गप्प गेल। पन्द्रह जुलाईक दिन सेहो निश्चित भेल। बड़ उत्साहसँ बिआहक विधि सभ पूर्ण भेल ओ शीतल बाबूक ओहिठामसँ चौगामा लोककेँ हकार देल गेल। हीरा बाबू नीलिमाक बिआहक चर्च इलाका भरिमे पसरि गेल। जकरे देखू सएह ओहि बिआहक चर्च करैत छल। बिआहक चारि-पाँच दिनक बाद हीरा बाबू आइ.ए.एस.क प्रशिक्षण करए चल गेलाह। बेस मौज कटलैक ओहि प्रशिक्षणमे। हीरा बाबू गोरनार ओ अतीव सुन्दर छलाह। हुनक व्यक्तित्वमे आकर्षण छलनि। बेस मौजी लोक छलाह एवम् विचारसँ अत्याधुनिक। आइ.ए.एस.क प्रशिक्षण करैत-करैत ओ दुनियाँसँ पूर्ण परिचित भए गेल छलाह। प्रशिक्षण समाप्त भेलापर हुनकर पदस्थापन लखनउ भेलनि। हीराबाबूक पराक्रम दिन दुगुन्ना ओ राति चौगुन्ना बढ़िते जा रहल छल। नीलिमाक पालन-पोषण संयत वातावरणमे भेल छल। ठीकेदार साहेब यद्यपि सुखी सम्पन्न लोक छलाह, मुदा स्वभावसँ अतिशय संयत। धिया-पुतापर हुनके संस्कारक छाप छल। नीलिमा जहिना देखैत सुन्दर छलीह, स्वभावो ओहिना मधुर। बिआहसँ साल भरि पूर्वे वो स्नातकक परीक्षा प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण केने छलीह। बिआहक बादसँ हुनका अपूर्व प्रशन्नता छलनि। यद्यपि वो सभ काज पूर्ववते करैत छलीह। मुदा मोन सदिखन हुनकेपर टांगल रहनि। ओमहर हीराबाबू भोग-विलासमे नीलिमाकेँ बिसरि गेलाह। प्रयोजने कोन छलनि जे वो नीलिमा हेतु व्यग्र होइतथि। नीलिमाक आँखि चिर प्रतीक्षासँ असोथकित भए गेल छलनि। एक दिन अपन माएकेँ संग कए हीराबाबूक डेरापर स्वयं पहुँच गेलीह। डेरापर पहुँचिते ओतएसँ एकटा बेस सुन्दरिकेँ बाहर जाइत देखि हुनकर माथा ठनकलनि। हीराबाबू ओकरे संग कोठरीसँ बहराएल छलाह। नीलिमाकेँ देख वो गुम्म पड़ि गेलाह। फेर बजलाह- “हलो! नीलिमाजी। आउ, आउ। हम तँ अहींक प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ।” किछु दिन हीराबाबूकेँ नीलिमाक संग खूब नीक लगलनि। किन्तु मासक धक लगिते हीराबाबूक पुरना आदति सभ पछोड़ करए लगलनि। किछु दिन नीलिमा चुप्प रहलीह, किन्तु जहन मामला हदसँ बाहर भए गेल तँ वो सोचलीह जे हीराबाबूकेँ बुझाएल जाए। “अहाँ एतेक राति धरि कतए रहैत छी?” “कतहुँ रहैत छी ताहिसँ अहाँकेँ मतलब?” “जरूर मतलव अछि! आखिर हम अहाँक अर्द्धांगिनी थिकहुँ। अहाँक सुख-दुखमे हाथ बटायब हमर हक ओ कर्तव्य अछि।” नीलिमा सेहो तावमे आबि गेल छलीह। बाते-बातमे हीराबाबू शराबक नशामे धुत एक चाटी चला देलखिन। नीलिमा ओतहि पसरल ओछाओनपर जा खसलीह। हीरा बाबू दोसर कोठरीमे जाए किदनि बजैत आराम करए लगलाह। ओहि दिनसँ जे दूनू गोटेमे शास्त्रार्थ शुरूआत भेल से अविरल चलिते रहल। घरक वातावरण कलहसँ नर्क भए गेल छल। नीलिमा हीराबाबूकेँ सुधारक हेतु कृतसंकल्प छलीह ओ हीरा बाबू सेहो अपने रस्तापर चलबाक हेतु अड़ल रहलाह। निरन्तर तनाव ओ कलहमे रहलासँ नीलिमाक स्वास्थ्य खसए लगलनि। ओ एक मास धरि लगातार ज्वरसँ पीड़ित रहलीह। नीलिमाक विमारीक खवरि ठीकेदार बाबूक कान धरि पहुँचल। पहिने तँ हुनका विश्वासे नहि भेलनि मुदा जखन हुनका नीलिमाक पत्र प्राप्त भेलनि तँ ओ गुम रहि गेलाह। तेजस्वी, चंचल ओ सतत प्रशन्न रहए वाली नीलिमा पीयर, निस्तेज ओ शुष्क पड़ि गेल छलीह। फटकियेसँ अपन पिताकेँ अबैत देखि जान-मे-जान आबि गेलनि। ओ दौड़लीह आ अपन पितासँ स्नेहवश सटि गेलीह। ठीकेदार साहेबकेँ अश्रुपात होमए लगलनि। हीराबाबूक कार सेहो संयोगसँ ओहि समयमे बाहरसँ आएल एवम् ओहीठाम ठहरल। बाप-बेटीक एहि मधुर मिलनक कोनो प्रभाव हीराबाबूपर नहि पड़ल आओर वो ससुरकेँ बिना गोर लगने अपन निवास स्थित कार्यालयमे दनदनाइत चल गेलाह। ठीकेदार साहेब बुजुर्ग छलाह। हीरा बाबूक रंग-ढंग ओ नीलिमाक निस्तेज देहकेँ देखि ओ स्थितिकेँ तुरन्त बुझि गेलाह। मोनमे भयंकर क्रोध होमए लगलनि। मुदा अपन आवेगकेँ बेस मोसकिलसँ रोकलाह। फेर नीलिमाक संगे हुनकर कोठरीमे चलि गेलाह। पता नहि, कतेक काल धरि ठीकेदार साहेब नीलिमाक संगे बैसल रहलाह। स्नेह मिश्रित अपन गप्पसँ हुनका सुखी करैत रहलाह। एहि गप्प सभसँ नीलिमाकेँ प्रर्याप्त मानसिक विश्राम भेलनि। वो सुति रहलीह। ठीकेदार साहेब पता नहि, की की सोचैत रहलाह? भोरे आठे बजे ओ ओहिठाम पहुँचल रहथि। दुपहरियाक एक बाजि रहल मुदा हीरा बाबू अखन धरि ससुरक पुछारि नहि केलाह। नीलिमाक संग भोजन कए ठीकेदार साहेब स्वयं हीरा बाबूसँ भेँट करए गेलाह। हीरा बाबू अपन आवासीय कार्यालयमे फाइलक बीच डूबल छलाह। ठीकेदार साहेब हुनका देखि ठिठकि गेलाह। मुदा हीरा बाबू अविचल रहि हुनक तिरस्कार करैत रहलखिन। नीलिमा आगू बढ़ैत कहलखिन- “बाबूजी, अएलाह अछि।” हीरा बाबू ठीकेदार साहेबकेँ इसारा कए बैसबाक आग्रह कएलनि। ठीकेदार साहेब पुछलखिन- “की हाल अछि?” “ठीके। कोना अएलहुँ?” हीरा बाबू बाजि उठलाह। “ओहिना शहरमे किछु काज छल। सोचलहुँ अहुँसँ भेँट केनहि चली।” नीलिमाकेँ अपन पिताक उपेक्षा नहि सहल गेलनि। ओ तमतमाइत अपन पिताकेँ घिचने ओहिठामसँ उठि गेलीह। हीरा बाबू पुन: फाइलमे डुवि गेलाह। गाड़ी मधुबनी टीशनपर आबि गेल छलैक। नीलिमाकेँ औंघी लागि रहल छलनि। ठीकेदार साहेब उठौलखिन- “उठू नीसू उठू। मधुबनी आबि गेल।” नीलिमा थाकल, झमार लउतरलीह। निस्तेज, उत्साहहीन, नीलिमाक एक्का जौं-जौं गाम दिसि बढ़ए लागल, नीलिमाकेँ भूतकालक दृश्य सभ मोन पड़ए लगलनि। कतेक दुलारू छली ओ। गामक लोक सभ जे क्यो ओमहरसँ गुजरए, नीलिमा दिस तकिते रहि जाए। जेहने सज्जन तेहने सुन्दरि। स्वभाव ओ गुणक अपूर्व समन्वय। पिताक एकलौता सन्तान। ठीकेदार साहेब जे किछु कमेलाह तकर प्रेरणा नीलिमेक छल। कतेक गरीब छलाह वो। नीलिमा लक्ष्मी बनि कए आएल छलि हुनका ओतए। नीलिमाक जन्म होइतहि ओ बढ़ए लगलाह। मुदा आइ संगे-संग एक्कापर चलैत-चलैत ओहो गुम छलाह। किछु कालमे गाम आबि गेल। ठीकेदार साहेब ओ नीलिमा एकपेरिया रस्तापर अपन घर दिस बढ़ैत गेलाह। लगैत छलैन जेना हुनकर सभ आशापर तुषारपात भए गेल हो। लघुकथा- असगुन गाम-घरमे कतेको प्रकारक असगुन सभ प्रसिद्ध अछि। जेना क्यो यात्रापर बिदा हो आ नढ़िया रस्ता बाँमासँ दायाँ काटि दिए, किंवा क्यो बिदा होइत काल पाछासँ टोकि दिए। बुढ़बा बाबाकेँ एहि सभहक बेस विचार छलनि। जँ घरक क्यो बिदा होइत आ कतहु क्यो छीक दैत तँ ओ ‘चिरंजीवी भव:’ अवश्य कहितथि। तहिना आओर-आओर अपशकुन जँ होइतैक तँ ओकर निवारण कए लितथि। ओहि दिन गाममे हाट लागल रहैक। तीमन-तरकारी सभटा हाटेपर सँ कीनल जाइत छलनि। ओहुना हाट दिनक ओ नियमसँ ओतए पहुँचैत छलाह। रविक दिन छलैक। हाट जएबाक तैयारी ओ दुइए बजेसँ प्रारम्भ कए देने छलाह। जहाँ चारि डेग आगा बढ़ैत कि एक ने एकटा अपसगुन भए जानि। एवम् प्रकारेण चारि बाजि गेल। सूर्यास्त करीब छल। हारि कए ओ बेंत घुमबैत बिदा भेलाह। कनिके आगा बढ़लाह कि मुनेसरा सामनेमे पड़ि गेलनि “प्रणाम पंडीतजी!” –बाजल मुनेसरा। “नीके रह”- मुनेसराकेँ आर्शीवाद दैत पडितजी आगा बढ़लाह। मोने-मोन कहि नहि की की घुनघुना रहल छलाह। मुनेसराकेँ एकेटा आँखि छलैक। गाममे दाहाक दिन मारि भए गेल रहैक। बेस फनैत छल ओ। लाठी लेने फानि गेल छल। ताबतमे क्यो ओकरे निशाना बना कए एकटा सीसाक बोतल फेकलकै। ओकर सौंसे आँखि लहु-लुहाम भए गेल रहैक। ओही घटनाक बाद ओ असगुन भए छल। प्राय: सएह सभ सोचैत पण्डितजी आगा बढ़लाह। हाटपर बेस भीड़ छलैक। तीमन-तरकारीक भरमार छल। मुदा पण्डितजीक आदति छलनि जे कोनो चीज ओ ठोकि-ठोकि कए करितथि। बीच बजारमे सजमनिक दाम मोलबति-मोलबति पहुँचलाह कि चारि गोटेमे एक दिससँ धुक्का मारैक आ चारि गोटे दोसर दिससँ। सामनेसँ दू-तीन गोटे हाँ-हॉं करैत पण्डितजीक रक्षा करए आबि गेलाह। धक्का-धुक्की खतम भेल तँ पण्डितजी आगा बढ़लाह। सजमनिक दाम मोलेलनि आ भाव पटि गेलापर जेबीसँ पैसा निकालए लगलाह कि अबाक रहि गेलाह। जेबी नदारद। पण्डितजी ठोह पारि कए कानए लगलाह। सौंसे ई खबरि बिजलौका जकाँ पसरि गेल। पण्डितजी माथा हाथ देने घर आपस अएलाह। तहिआसँ ओ असगुनक डरे छीह कटने फिरथि। पण्डितजीकेँ तीनटा कन्या छलनि। प्रथम कन्याक कन्यादान ठीक भए गेल छलनि। नीक कुल-शीलक बर रहैक। अगहनक पुर्णिमाक बिआह तय भेलनि। बरक हाथ उठएबाक हेतु बिदा होइत छलाह कि कियो तराक दए छींकलक। छींक...छींक...छीक...। हुनकर माथामे ई छींक घुमए लगलनि। पण्डितजीक टांग एकाएक गतिहीन भए गेलनि ओ आगा बढ़ए हेतु एकदम तैयार नहि छलाह। सौंसे गामक लोक करमान लागि गेल छल। पण्डितजी गुम। किछु बजबे नहि करथि। तेहन शुभ मुहुर्त्त छल जे छींकक चर्चो करब असगुन लगनि। लोक सभकेँ किछु फुराइक नहि जे आखिर बात की भेल। अखने तँ पण्डितजी टप-टप बजैत छलाह..! गाम भरिक लोक पण्डितजीकेँ घेरि लेलकनि। “पण्डितजी की भेल?” मुदा ओ तैयो गुम्म। अन्ततोगत्वा लोक हुनका उठा-पुठा कए डाक्टरक ओहिठाम लए गेल। ओतए डाक्टर हुनकर अवस्था देखि गंभीर भए गेलाह आ कहलखिन जे हुनका गम्भीर भावनात्मक अवधात भेलनि अछि। तात्कालिक उपचारक हेतु जहाँ ओ सूई देबए लगलाह कि पण्डितजीकेँ नहि रहि भेलनि ओ गरियबैत ओहिठामसँ गामपर भगलाह। ताबत भोरक चारि बाजि गेल छल। बरक ओहिठाम जएबाक कार्यक्रम रद्द भए गेल। ठीके असगुन भए गेलनि, ताहि दिनसँ पण्डितजी असगुनसँ बड्ड डराथि। ओहि दिन हुनकर मझिली बेटीक तहिना आँखि बड़ फरकए लगलनि। पण्डितजी एकदम अपसियाँत भए गेलाह। अबश्य कोनो गड़बड़ी होमए जा रहल अछि। ओ अपन बेटीकेँ तुरन्त अपना लग बैसा लेलथि कि ताबतेमे एकटा गिरगिट हुनकर बायॉं हाथपर खसल। पण्डितजी ठामहि फानलाह। पैरमे खराम छलनि। दरबज्जा बेस ऊँच छलैक। दलानपर ठामहि चितंग भए गेलाह। बायाँ पैरक हड्डी टुटि गेल छलनि। पण्डितजी बाप-बाप चिचिआए लगलाह। सभ गोटे हुनका लादि कए अस्पताल लए गेल। लाख प्रयासक बाबजूद ओ हड्डी नहि जुटल। पण्डितजी जन्म भरिक हेतु नाँगर भए गेलाह। तहिआसँ पण्डितजी नित्य भोरे उठैत देरी भगवानकेँ गुहारि देथि- “हे भगवान! असुगनसँ जान बचायब।” मुदा भावी प्रवल होइत छैक। होइत वएह छैक जे हेबाक रहैत छैक। एकादशीक दिन छलैक। महादेवक दर्शन करए जाइत छलाह। झलफल होइत छलैक। ताबतमे एकटा नढ़िया वामाकातसँ आएल आ सामने बाटे दायाँकात गुजरि गेल। पण्डितजी ठामहि खसलाह। “हे महादेव! आब अहीं प्राणक रखा करू।” कहैत-कहैत पण्डितजी वेहोश जकाँ भए गेलाह। बो एकहुँ डेग घुसकए हेतु तैयार नहि छलाह। आ ने घुसकबाक हुनकामे तागति रहि गेल छलनि। पण्डितजीकेँ फेर कहि नहि कहाँसँ हिम्मत अएलनि। ओ चोटे पाछा घुमलाह। ताहि बीच एक बेर फेर वएह नढ़िया वायाँसँ दहिना भेल। पण्डितजी ओहि नढ़ियाकेँ गरियबैत, नाँगर टाँगे दौड़ैत, खसैत-पड़ैत घर दिस बढ़ए लगलाह। बीच-बीचमे ओहि नढ़ियाकेँ कहैत- “ई सरबा, नहि जीबए देत। एकर हम की बिगारने छलिऐक से नहि जानि!” ताबतेमे मुखियाजी पोखरि दिसिसँ आपस अबैत छलाह। पुछि बैसलखिन- “की भेल पण्डितजी?” “की कहू की भेल। कहबी छैक जे गेलहुँ नेपाल आ कर्म गेल संगे। सएह परि अछि हमर। एकादशीक दिन छलैक। सोचलहुँ जे महादेवक दर्शन करी। आधा रस्तासँ जहाँ आगा बढ़लहुँ कि औ बाबू! ई चण्डाल नढ़िया रस्ता काटि देलक।” ओहिसँ पहिने की मुखियाजी किछु बजितथि, पण्डितजी धराम दए खसलाह। मुखियाजी चिकरलाह। अगल-बगलसँ सेहो लोक सभ दौड़ल। पण्डितजीकेँ उठा-पुठा कए दरबाजापर राखि देलक। लोक सभ पुछनि- “की भेल?” मुदा ओ अपस्याँत आकाश दिसि तकैत रहि गेलाह। असगुन, असगुने होइत अछि। तेँ ने लोक सगुन करैत फिरैत रहैत अछि। पण्डितजी भोर होइतहि पनिभरनीकेँ बजौलखिन आ आदेश देलखिन जे आइसँ नित्य प्रात: काल ओ एक घैल पानि भरि कए दरबाजापर राखि देल करए, जाहिसँ हुनक दिन नीक जेना कटि जानि। पनिभरनी हुनकर आज्ञाकेँ सिरोधार्य कएलक आ नित्य हुनकर सामनेमे बेस बड़का घैलमे पानि भरि-भरि राखए लागलि। एक दिन अन्हरोखे पनिभरनी पानि भरि कए राखि गेल। ओकरा गहुँमक कटनी करबाक छलैक। पण्डितजी उठि जहाँ चारि डेग आगा बढ़लाह कि वोहि घैलसँ टकरा चारूनाल चित्त भए खसि पड़लाह। चारू कातसँ लोक सभ दौड़ल। मुदा मण्डितजी किछु नहि बजलाह। आब ओ चुप्पे रहबाक सपथ खा लेने छलाह। समय विपरीत भए गेल छलनि आ सगुनो असगुन भए गेल छलनि। लघुकथा- गाम गाममे बहुत गोटे अनचिन्हार भए गेल छल। धिया-पुता सभ जे धरिया पहीरने घुमैत रहैत छल, से सभ फुटि कए जबान भए गेल छल आ बुढ़-पुरान लोक क्रमश: बिदा भए रहल छलाह। क्रमिक किन्तु अनवरत परिवर्तन प्रकृत्तिक नियमक पराक्रमसँ सभ प्रभावित छल। लोचन बाबा, तिला बाबू, बुढ़िया काकी सभ एक-एक कए चल गेलाह। बहुत कम पुरना लोक बँचि गेल छल। मुदा ई गप्प हमरे किएक एतेक पड़िछायल बुझा रहल छल। गाममे बहुत लोक अछि। सभक समक्ष ई घटना भेलैक अछि आ होइत रहलैक अछि। प्राय: समयक अन्तरालक कारण बारह बर्खक अवधिक कारण हमरा बेसी अन्तर बुझा रहल अछि। छोटो-छोटो घटना सभ एकटा आकार ग्रहण कए लेने अछि। पोखरिक भीड़पर बैसल हम इएह सभ सोचि रहल छलहुँ, गामसँ बहुत किछु निपत्ता भए गेल छल। दुपहर रातिमे गुलचनमा चौकीदारक जबरदस्त आबाज- “जगले रहब। यौ ऽऽऽ।” दुपहरिया रातिमे घरे-घर घुमि जाइत छल। आ चिकरैत- “फल्लाँ बाबू छी औऽऽऽ।” भोरुकबा उगैत त्रिकण्ठ बाबाक परातीक स्वर सौंसे गामकेँ भोर हेबाक सूचना दैत आ किछु कालक बाद बाद झमा झम, झमाझम, टन-टन टनटन घड़ी-घण्टा सुनबामे अबैत। मन्दिरपर बाबा भगवानक आरती करितथि। भोरे-भोर सभ ठिठुरैत मन्दिरसँ बाहर होइतथि। फेर भोर भेल छल। मुदा १२ बर्खक अन्तराल छल। हम ओहिना ओही पोखरीक भीड़पर गेल रही। की भए गेल? सात बाजि गेल। घड़ी-घण्टाक स्वर नहि, प्रातीक एकहुटा आखर नहि सुनायल। चौकीदारक कतहुँ कोनो पता नहि। जे पोखरि हरियर कंचन पानिसँ भरल रहैत छल सएह उजारसन लगैत छल। इएह सभ सोचि रहल छलहुँ कि बड़ी जोरसँ हल्ला भेल। जएह-सएह चौक दिस दौग रहल छल। कै गोटासँ पुछलिऐक। क्यो किछु कहबा लेल तैयार नहि छल। ककरा फुर्सति छलैक। सभ अफसियाँत..! हल्ला जोर पकड़ने जा रहल छल। ताबे देखबामे आएल जे १५-२० गोटे लाठी-भाला लेने गरजैत आगाँ बढ़ि रहल छलाह। ओमहरसँ मरर कका अएलाह। “की भेलैक मरर कक्का?” “लड़ाई भए गेलैक अछि। कै दिनसँ तनातनी छलैक, मुदा आइ फैसला भए कए रहत। ” “मुदा झगड़ाक कारण?”- हम पुछलिऐक। अहाँ बाबू बाहर रहैत छी। अहाँ की बुझबैक। अहिठामक हवा विचित्र अछि। अनीनमा क बेटा गोवर्धन बाबूक प्रौत्रक काज नहि गछलक। बसकि गोवर्धन बाबू पुरनका अबाज देलखिन। छौड़ा अरि गेल। लाठी पकड़ि लेलक। ताहिपर ओ किछु बजलाह- “कि छौड़ा लेने लाठी मारि देलक। ओहि दिनसँ समा बन्हा रहल अछि।” ओ बाजिए रहल छलाह कि ठाँय- ठाँयक आबाज भेल। कनिके कालमे थानामे तीनटा लाश पड़ल छल। लोक जहाँ-तहाँ भागि रहल छल। दू-तीन दिन धरि एकरे चर्चा होइत रहल। गामक बहुत रास जबान सभ भागि गेल। कहाँ दनि बहुत गोटेपर वारन्ट भए गेल छलैक। साँझ भए गेल छल। गामसँ बहुत रास लोक भागि गेल छल। मन्दिरपर एसगर बैसल रही कि मरर कका पहुँचलाह। “की बाबू, किएक गुम-सुम छी?” “आउ, मरर कका।” मरर कका बैसलाह। गामक एकटा वृद्धतम लोकमेसँ अवशेष मरर कका ओहि गाममे बहुत किछु देखलाह आ कहि नहि की की आओर देखताह। “आओर गामक की हाल?” “गामक की हाल रहत। समय बहुत बदलि गेल। आब तँ हमरा लोकनि चलबे करी ओहीमे कल्याण।” “धिया-पुता की कए रहल छथि?” “सभ कमाइ छथि। सबहक परिवार फराक-फराक छनि।” “अहाँ ककरा संगे छी?” “ककरा संगे रहब? हम तँ पेण्डुलम भए गेल छी। एक-एक मासक पार लगैत अछि। जहिआसँ अहाँक काकी स्वर्गवासी भेलीह तहिआ घिघरी काटि रहल छी। आँखिमे मोतिआबिन्द भए गेल अछि। साँझ परितहि अन्हार भए जाइत अछि। फेर गप्प होएत।” ई बजैत-बजैत ओ उठि गेलाह। १२ बर्ख पहिनहि मरर ककाक समय मोन पड़ि रहल छल। गामक प्रतिष्ठित लोकमेसँ छलाह। सभ बालक प्रतिभाशाली एवम् होनहार। साँझे-साँझ नित्य ओहि मन्दिरपर कीर्तन होइत छल आ मरर कका अवश्य ओहिमे रहितथि। कनिक काल आओर बैसल रहलहुँ। आठ-दसटा अधवयसू सबहक हल्ला बुझाएल। सड़कपर सभ गरिअबैत आगा बढ़ि रहल छल। सभ तारी पीबि कए बुत्त। काते-कात गामपर पहुँचलहुँ। मोन थाकल लागि रहल छल। सुति रहलहुँ। भोर भेने पोखरि दिसि जाइत रही। गामक अन्तिम छोरपर पाँच-सातटा छोट-छोट खोपड़ी ओहिना-क-ओहिना छल। अपरिवर्तित। कतेक गोटे धनिक भेल, कतेक गरीब भए कए गामसँ बिलटि गेल मुदा वो सभ ओहिना-क-ओहिना बाँसक बासन बनेबामे तल्लीन छल। ओकर बच्चा सभ उघारे पड़ल छल। इएह सभ सोचि रहल छलहुँ कि फोकना डोम हमरा देखलक। चीलमक सोंट लगा कए खोंखैत बाजि उठल- “परिणाम मालिक, कहिआ अलियै?” “तीन दिन भए गेलैक। “ आ हम आगा बढ़ि गेलहुँ। पोखरि दिसिसँ आबि स्नान-ध्यान कएल। मधुबनी जेबाक छल। कनिके आगा बढ़ल छलहुँ कि फूटरक माएक कनबाक आबाज सुनलहुँ। खोपड़ी तर बैसल कानि-कानि किछु कहि रहल छलीह। हमरा देखि सोर पारि लेलीह। “की भेल काकी? किएक कानि रहल छी?” “की कहूँ, अपना घरक बात बजैत संकोच होइत अछि। तीन साँझसँ घरमे किछु नहि भेल अछि। हमरा लोकनि दूनू गोटे फराक छी। मालिकसँ दसटा टका मंगलिअनि तँ गरजि उठलाह।” ई कहैत-कहैत ओ ठोह पारि कए कानए लगलीह। हमरा नहि रहि भेल। हुनका प्रणाम कए आगा बढ़ि गेलहुँ। हे भगवान! की भए गेल एहि गामकेँ? मनुष्यता जेना भागि गेल। जतै देखू उलटे हबा बहि रहल छल। रिक्सासँ मधुबनी जाइत रही। इएह सभ सोचैत-सोचैत निन्न परि गेल। रिक्सा आर.के.कालेजसँ आगा छल। एतबेमे तिलक भाए नजरि पड़लाह। मुदा टोकबाक साहस नहि भेल। कहि नहि की की आओर सुनए पड़ए। दिन भरि मधुबनीमे रहलहुँ। साँझ भए रहल छल। मुदा गाम जयबाक साहस नहि भए रहल छल। दू दिन धरि मधुबनियेमे रहि गेलहुँ। साँझमे टहलैत काल मन्दिर गेल रही। भगवतीक दर्शन कएल। घाटपर बैसल रही। साँझो उत्तर दिसि बड़ नीक घर सभ नजरिमे आबि रहल छल। मोन भेल घुमी। आगा बढ़लहुँ। सुन्नर-सुन्नर सुसज्जित घर। पीच रोड। स्ट्रीट लाइट। छोटी पटना लागि रहल छल। बारह साल पूर्व ओहिठाम खत्ता छल। बाढ़िक समयमे समुद्र भए जाइत छल वो जगह। चारूकातक गामसँ श्रीमान लेाकनिक जमघट भए गेल छल ओहिठाम। संयोगसँ अपना गामक देबन बाबू नजरिमे अएलाह। घरक दरबज्जासँ निकलि रहल छलाह। कहि उठलाह- “कहिआ अएलह?” कहलियनि- “चारि-पाँच दिन भेल।” गप्प आगा बढ़ए लागल। कहलाह- “की कहैत छह? आब गाम रहए-जोकर नहि रहल। तँए एहीठाम एकटा छोट-छीन घर बना लेलहुँ। कोठरीसँ बड़की भौजी आबाज देलीह- “ठाढ़ किएक छी? अहाँक तँ अपन घर अछि।” घरमे प्रवेश करितहि छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ।सोफासेट - टीभी, डाइनिंग टेबुल ..की की नहि छल। गप्प-सप्प होइत रहल। चाह-जलखै सभ भेल। गप्पक क्रममे पुछलिअन्हि- “मरर ककाकेँ एतहि किएक नहि राखि लैत छिऐन?” तर-दए बाजि उठलीह- “हुनका गाम छुटिते नहि छनि! की करी?” मरर ककाक ज्येष्ट पुत्र देबन बड़ प्रतिभाशाली छलाह। मुदा एक युगक अन्तराल पिता पुत्रकेँ धारक दू कातपर राखि देने छल। रातिक आठ बाजि गेल छल। हम हुनका सभसँ बिदा लए पुन: मधुबनीक डेरापर चल गेलहुँ। रस्ता भरि अपन गाम आ काली मन्दिरक आगूक खत्तामे भेल एक युगक अन्तरालक परिवर्तन मोनमे बेर-बेर अबैत रहल। गामकेँ की भए गेल? हे भगबान! कोन भूत एकरा धए लेलक? लोक एना किएक कए रहल अछि? काली मन्दिरक चभच्चा छोटी पटना भए गेल। गाम एना किएक रहि गेल। गाम माने की? संघर्ष, शोषण, ईर्ष्या, द्वेषक अतिवाद। छुट्टी समाप्त भए रहल छल। रेलगाड़ीपर बिदा भेलहुँ। अपन संघर्ष स्थली दिसि- जहिठामसँ दूरीक कारण चन्द्रमाक धरातल जकाँ अपन गाम सुन्नर लागए लगैत अछि। लघुकथा-फसाद भोरसँ साँझ धरि ओ टीशनपर प्रतीक्षा करैत रहल। जतेक बेर गाड़ी अबैक ओ सचेष्ट भए जाइत छल। आबए बला लोक सभ दिस टकटकी लगौने रहैत छल। मुदा सभ बेर ओकरा निराशे होमए पड़ैक। साँझमे ओ थाकल-झमारल गाम लौटल तँ देखलक जे पलटनमाक घरवाली ओ पलटनाक माएमे मचल छलैक।लगैक जेना गंभीर विवाद भए गेलैक अछि। आँगन आएल। मुदा दूनूमे सँ क्यो सुनए लेल तैयार नहि छलैक। मामला बढ़ैत देखि ओ गरजल। मुदा बेकार। दूनू आपसमे एक-दोसरक गड़ा गाटि देबाक निश्चय कए चूकल छल। रमुआकेँ नहि रहि भेलैक। ओ उठौलक लाठी आ पलटनमा माएकेँ लगलैक सटाक, सटाक। पलटनमाक माए गरियबैत भागल। मामला शान्त भेलैक। आइ तीन साँझसँ घरमे क्यो नहि खेने छलैक। पलटनमाक अबाइ छलैक आ तेँ ओ टीशन गेल छल। एमहर पलटनमा घरवाली मालिकक आँगनमे काज कए आएल छलैक। अबैत काल मालकिनी किछु देने छलखिन तकरे बटवारा करैत-करैत सासु-पुतोहुमे विवाद पसरि गेल छलैक। साल भरिसँ पलटनमा बाहर छलैक। जहिआसँ गाम छोड़लकै तहिआसँ आइ धरि कोनो खोज-खबरि नहि आएल छलैक। गामक बहुत लोक कलान्तरमे भोज करैत छलैक आ ओहिठामसँ सभ मास क्यो ने क्यो अबिते रहैत छलैक। ओकरे सभसँ पलटनमाक समाचार गाममे पहुँचैत रहैक। पूरबारि टोलक कए गोटा पछिला मास आएल छलैक आ ओकरा दिया पलटनमा समाद देने रहैक जे आगा मास पुर्णिमा दिन गाम आएत। मुदा नहि अएलैक। एहि बातक अंदेशा रहैक रमुआकेँ। टीशनसँ घुरैतकाल ओ बड़ अछता-पछता रहल छल। एही गुन-धुनमे गाम आएले छल रमुआ कि घरक गरम वातावरणमे आओर गरमा गेल। पलटनमा माएकेँ तामसपर नीक मारि पड़ि गेल छलैक आ ओ मारि खा कए पता नहि कतए निपत्ता भए गेलि। रमुआक कतेको पुस्त ओही गाममे गुजर केने छल। मुदा पलटनमा गामक सीमान नांघि देलकै। पलटनमाक एहि काजसँ मालिक सभ बड़ अप्रशन्न भेल रहैक। मुदा ओ ककरो नहि सुनलक। माए जाए काल बड़ कनैत रहैक। मुदा की कए सकैत छलैक। पलटनमा कलकत्ता पहुँचते देरी काज शुरू कए देलक। आमदनी नीक होइक। मुदा रखबाक लूरि नहि रहैक। संगी-साथी सभ आगत-भागत कए ओकरासँ सभटा पैसा खर्च करा लैक। एक दिन ओहि मीलमे आन्दोलन भेलैक। मजदूर सभ मालिकक अत्याचारक खिलाफ अबाज उठौलक। ओहि आवाजक पलटनमाक मोनपर बेस प्रतिकृया भेल रहैक। पलटनमा लोककेँ नारा लगबैत देखि चिकरि उठल- “नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, यह बैमानी नहीं चलेगी।” पूरा मीलमे तालाबन्दी भए गेलैक। मजदूर सभ मील मालिकक घरक घेरा कए देलक। मीलक मालिक लाख प्रयास केलक मुदा पलटनमा टससँ मस नहि भेलैक। मीलक गेटपर एक सएसँ अधिक मजदूरक संग अनशनपर बैस गेलैक। आन्दोलन तीव्रतर होइत गेलैक। अन्ततोगत्वा पलटनमा गिरफ्तार भए गेल। ओकर संगी सभ सेहो जहल गेल। नारा लगैत रहलैक- “नहीं चलेगी, नहीं चलेगी...।” ई सभ घटना अनायास भए गेल छलैक। पलटनमा तेँ अपन रोजी-रोटीक कमाइमे लागल छल। मुदा ओकर सोनित कहि नहि किएक एकाएक खौल उठलैक। पलटनमा जहल गेल मुदा जेना एहि घटनासँ ओकर संस्कारमे अप्रत्याशित परिवर्तन आबि गेल छलैक। गामक वातावरणमे रहैत रहैत ओ मौन सभ प्रकारक प्रतारणा ओ अन्याय सहैत रहल। मुदा एहि घटनासँ जेना ओकर अन्तरात्माक ज्वालामुखी फुटि पड़ल छलैक। ज्वालामुखी जे संघर्षक आगिसँ अन्यायकेँ जरा देबए चाहैत छल। जाहि दिन ओकरा जयबाक प्रोग्राम छलैक ओहि दिन ओ पकड़ल गेल। जहलमे एकान्तमे ओकरा कहि नहि की की फुराइत रहलैक। रमुआक टुटल खोपरी आ चारूकात गामक मालिक सभहक बड़का-बड़का दलान। पण्डितजीक बड़का दलान। दनानक अगवासमे बैसार होइक। साँझक साँझ गामक सभ प्रतिष्ठित व्यक्ति सभ अबैत छलाह आ अपन-अपन विचार व्यक्त करैत छलाह। लहना-तकादा सेहो ओतहि होइत छलैक। बुधदिन छलैक गाममे हाट लागल छलैक। पण्डितजीक ओहिठाम बैसार भेल। पूरा गामक लोक जमा भेल छल। रमुआ ओतए बुधन बाबूक किछु कर्ज छलनि। ओही कर्जकेँ सधएबाक हेतु बैसार छलैक। पँच लोकनि ई फैसला केलनि जे रमुआ अपन घराड़ी बुधन बाबूक नामे कए देथि आ पलटनमा हुनका ओहिठाम चरबाही करए। कारण जे घराड़ीक मुल्यसँ मात्र मूर सधैत छलैक आ सूदक तरीमे ओ चरवाही करत। एहि निर्णयक संग ओहि दिन बैसार खतम भए गेल। रमुआ आँगन पहुँचले हेताह कि पलटनमाक माए देहरियेपर भेटलनि आ समाचार पुछि गरजए लागलि- “नहि जानि ई सभ की की करत? गे दाइ !गे दाइ !हमर घराड़ी एकरा सभ नहि देखल जाइत छैक।” मुदा किछु ने चललैक। दोसर दिन रमुआ बेनीपट्टी जा कए अपन घराड़ी बुधन बाबूक नामे रजिष्ट्री कए देलखिन। रजिष्ट्री घरसँ निकलैत हुनका होनि जेना आँखिक डिम्हा क्यो बहार कए लेने हो। सगतरि अन्हारे अन्हार। साँझ पड़ैत-पड़ैत रमुआ गाम पहुँचल। मुदा एतबेसँ बुधन बाबूक मोन नहि भरलनि। पलटनमाकेँ खबरि देबए लगलखिन जे तोरा हमरा ओतए काज करए पड़तौक। हँसि कए कर आ कि कानि कए कर। पलटनमाक मोनकेँ ई सभ असहज लगलैक ओ दोसर दिन दुपहर रातिमे चुप्पे-चाप गामसँ पड़ाएल। पलटनमा जहलमे पड़ल-पड़ल ई सभ सोचैत रहल मोन कहैक- “छोड़ पलटनमा ई रस्ता। कमो खो। की राखल छैक फसादमे। आखिर हमरा लोकनिक कै पुस्त तँ एहिना बीति गेल। सभ अपन चैनसँ जिनगी कटलक। फेर ई आफद किएक।” दोसर मोन कहैक- “नहि, नहि लड़ पलटनमा लड़। संघर्ष केनहिसँ परिवर्तन हेतैक। आखिर अपने लेल लोक नहि जीबैत अछि। भविष्यक हेतु भावी पीढ़ीक हेतु आधारशिला तँ वर्तमाने पीढ़ी तैयार करैत अछि किने।” इएह सभ सोचैत रहए कि जेलर साहेब आबि गेलखिन आ ओकर चिंतन क्रम टुटि गेलैक...। जेलमे सात दिन बिता चूकल छल पलटनमा। मीलक मालिक मीलमे तालाबंदी कए देलक आ संगे मीलमे काज केनिहार नवका कर्मचारी सभकेँ छँटनी सेहो कए देलक। ई सभ समाचार पलटनमाकेँ जेलेमे भेटैत रहैत छलैक। ओहि दिन रातुक बारह बाजि रहल छलैक। जेलर पहरेदार फोंफ काटि रहल छल। पलटनमा आ ओकर दूटा संगी जेलक चाहरदीवारी फानि गेल। जेलमे खतराक घण्टी बाजए लागल। मुदा पलटनमा ओ ओकर संगी नदारद। कतहुँ ओकर थाह पता नहि चललैक। पलटनमा दौड़ैत गेल, दौड़ैत गेल आ बहुत दूर एकटा अज्ञात जगहमे जा कए अचेत खसि पड़ल। ओकर दूनू संगी ओकर पछोर देने ओतए पहुँचलैक। दुपहर छलैक। बारह घन्टा लगातार दौड़ैत रहलाक बाद तीनू गोटे असोथकित भए गेल छल। पलटनमा अचेत छल आ ओकर दूनूटा संगी गमछीसँ ओकरा हवा करैत छलैक। संघर्ष, संघर्ष, संघर्ष। पलटनमा अपढ़ छल। गरीब छल। मुदा हालतसँ लड़ए चाहैत छल। ओकर सभसँ बड़का अपराध इएह छलैक। गाममे ओकरा सन-सन कतेको मजदूर ओहि हालातसँ गुजरिकए नियतिसँ सामंजस्य कए चूकल छल। मुदा ओ नहि सहि सकल। तेँ गाम छोड़ए पड़लैक। शहरमे पुनश्च ओकरा असह भए गेलैक। यातना, शोषण ओ प्रतारणाक खिलाफ नारा लगा देलकैक। मुदा आब कतए जाएत! गाम छुटलैक, तँ शहर आएल। शहरसँ पड़ा कए जंगल आएल। आब कतए जाए। की करए। खैर! अखन तँ ई सभ सोचबाक समय नहि छलैक। चेतनतासँ कष्टक अनुभूति होइत छैक। तकरो अखन ओकरामे अभाव भए गेल छलैक। ओ अचेत पड़ल छल। ओकर दूनू संगी ओकरा गमछासँ हवा करैत रहलैक। दिन लुक-झुक कए रहल छलैक। पलटनमा सुगबुगेलै। पलटनमाक संगी सभ खुश भेल। कनी-मनी कछमछ कएलाक बाद पलटनमा फुरफुरा कए उठि गेल जेना किछु भेबे नहि कएल रहैक। पलटनमा ओहि राति जंगलेमे बितौलक। चारूकात जंगलक भयानक जानवर सभक आवाज अबैत रहल। भोर होमए पड़ छलैक। पलटनमा गंभीर चिन्तनमे लीन छल। की गरीबक हार-काठ पाथरक बनल होइत छैक? नहि, तखन ओकरापर जनमिते समाज एहन कठोर किएक होइत छैक। एक-एक पल जीवनक हेतु संघर्षमे बीत जाइत छैक। की संसारक सौन्दर्यक आनन्द लेबाक ओकरा कोनो अधिकार नहि? जीबाक हेतु प्रयत्न करैत-करैत ओ मृत्यु दिस अग्रसर भए जाइत अछि। इएह छिऐक गरीबक जीवनवृत..? इएह सभ सोच-विचारमे ओ छल कि कनेक दूरपर पुलिसक जीप अबैत ओकरा नजरि अएलैक। एक बेर पुन: पलटनमा अपन संगी सभक संगे भागल। मील मालिक पलटनमाक पकड़बाक हेतु पुलिसकेँ जेब गरम कए देने छलैक आ पुलिस ओकरा पाछू हाथ धो कए पड़ि गेल छल। पलटनमा भागिते जा रहल छल। मुदा जंगलकेँ चारूकातसँ घेर लेल गेल छलैक। पलटनमा ओ ओकर संगी पकड़ल गेल। पकड़लाक बाद ओकर हाथ पाछू कए बान्हि देल गेलैक। थानामे पलटनमाकेँ एकटा घरमे एसगर बन्द कए देल गेलैक। प्रात भेने ओहि घरसँ पलटनमाक लाश निकललैक। कहि नहि राति भरि ओकरा की की यातना देल गेलैक। पलटनमा आब एकटा मुर्दा छल। पोस्टमार्टम रिपोर्टक अनुसार ओकर मृत्यु जंगलमे कोनो जहरीला जानवरक कटलासँ भेलैक। प्रात:काल अखबारमे छपि गेलैक- “भगोरा कैदीक लाश जंगलसँ आनल गेल।” पलटनमाक पिता ओहि राति सूति नहि सकल छल। प्रात: काल ओकरा एकटा तार भेटलैक। “पलटनमा जंगलमे जानवरक प्रकोपसँ मरि गेल। लाश लए जाउ।” पलटनमाक पिता सुन्न पड़ि गेल। शून्यतामे ओकर आँखि देखैत रहि गेलैक। पलटनमाक माए एक बेर फेर चिचिआ उठलैक आ तुरन्त शान्त भए गेलैक। एक दिस पलटनमाक माए आ दोसर दिस पलटनमाक पिता निस्तब्ध, चुप, चेतना विहीन पड़ल रहल। गामक लोक कनीकाल तमासा देखलक आ अपन-अपन काजमे लागि गेल। क्यो-क्यो कहैत रहैक- “पलटनमा अनेरे फसाद केलक। गाममे एतेक गोटे गुजर करैत अछि, मरि जाइत अछि। गरीबो बहुत अछि मुदा एना उजाहटि तँ ओकरे ने छलैक आ तकर फलो तँ वएह भोगत।” लघुकथा- पुनर्मिलन ओकरामे प्रतिभाक कतहुँसँ अभाव नहि छलैक। पूरा गाम ओकर यशगान करबाक लेल तत्पर छलैक। नीक, सुन्दर, सुशील आ मेघावी छल अरूण। माए और बापक कोनो स्मृति ओकरा नहि छलैक। जीबनक प्रत्येक डेग ओ लड़ि कए आगा बढ़ल छल। अपमानक अलावा समाजसँ ओकरा किछु प्रतिदान नहि भेटल छलैक मुदा ओ ओकरे, प्रेरणाक आधार बना जीबनमे विजयश्री प्राप्त करबाक हेतु कृतसंकल्पित छल। ओकर जन्मसँ लए कए अखन धरि जतेक घटना घटल छलैक सभ स्वयंमे एकटा वृतान्त छल। प्रतिभा जेना ओकरा प्रकृतिसँ पुरस्कारक रूपमे भेटल होइक। बच्चेसँ छात्रवृत्ति ओकरा भेटए लगलैक। शिक्षक लोकनि एक पृष्ठ पढ़ावथि तँ ओ दू पृष्ठ स्वयं पढ़ि लैत छल। ओकर प्रतिभासँ सभ क्यो दंग रहैत छलाह। यद्यपि ओकरा रस्ता देखौनिहार क्यो नहि छलैक, ओ स्वयं जेना सभ किछु जनैत हो, की करक चाही, ककरासँ की बाजक चाही आ की करी जाहिसँ आबएबला समय नीक हो से ओकरा खूब नीकसँ बूझल छलैक। हाई स्कूलक परीक्षा प्रथम श्रेणीसँ उतीर्ण केलक आ पूरा राज्यमे प्रथम स्थान ओकरा प्राप्त भेलैक। कालेजक शिक्षा प्राप्त करबाक प्रबल आकंक्षा ओकरा छलैक मुदा आर्थिक परिस्थिति अति दुखद छलैक। गामपर घराड़ीटा बाँटल छलैक। माए, बाप,भाए, बहिन ककरो कोनो सहारा नहि छलैक। थाकल, ठेहिआएल, ओ दरिभंगा महराजक राजधानीक महल सभमे घुमि रहल छल। पैरमे पनही नहि, देहपर एकटा नीक कपड़ा नहि, मुदा अपनापर तेज, स्वभावमे सौम्यता ओ व्यवहारक नम्रता अनेरे लोकक ध्यान ओकरापर आकृष्ट कए लैत छल। संयोगसँ चौधरीजी रिक्सासँ उतरलाह। अरूण हुनका नमस्कार केलक। अरूणक प्रतिभाशाली मुखमण्डल देखि ओ चकित भए गेलाह। चौधरीजीक धिया-पुताकेँ पढ़एबाक काज ओकरा भेटि गेलैक। हुनकासँ ज्येष्ठ सन्तान उर्मिला नवम् वर्गमे पढ़ि रहल छलीह। देखयमे खूब सुन्दरि, स्वभावसँ विनम्र ओ प्रतिभामे अद्वितीय। उर्मिलाकेँ देखितहि अरूणकेँ ठकविदरो लागि गेलैक। जेना पूर्व जन्मक संगी रहल हो। उर्मिलाक पढ़ाइमे अद्भुत प्रगति भेलैक। अरूण सेहो प्रशन्नचित्त अपन गाड़ी आगा पढ़बए लागल। मुदा एक दिन बड़ विचित्र घटना घटलैक। अरूणक सभटा स्वप्न देखिते-देखितेमे भंग भए गेलैक। उर्मिला स्कूल गेलैक आ ओहिठामसँ लौटितहिँ दर्द-दर्द कए चिचिआए लगलैक। कतेको ओझा-गुनी, डाक्टर-वैद्य अएलैक मुदा ओकरा कोनो सुधार नहि भेलैक। हालत बदतर होइत गेलैक आ ओ प्रात: होइत-होइत निष्प्राण भए गेल। सौंसे गर्द चढ़ि गेल। दुर्भाग्य ओकरा ओतहुँ संग नहि छोड़लकै। उर्मिलाक आकस्मिक निधनसँ ओकर सपना सभ छिन्न-भिन्न भए गेलैक। अरूणकेँ आब एकहुँ दिन ओतए रहब असम्भव भए रहल छलैक। ओ चुप-चाप ओतएसँ खसकल। पैरे-पैरे दड़िभंगासँ समस्तीपुरक रस्तामे ओ बहुत दूर आगा आबि गेल छल। पाकरीक गाछतर छाहरिमे बैसल। कण्ठ जरि रहल छलैक। कतहु पानिक दर्शन नहि छलैक। थाकियो नीक जेना गेले छल। बैसल कि आँखि लागि गेलैक। सुतले-सुतल ओ स्वर्ग लोकक परिभ्रमण कए रहल छल। उर्मिला अत्यन्त प्रशन्न मुद्रामे ओकरा नमस्कार कए रहल छलैक। “आ अरूण तों। बड्ड नीक छेँ तूँ। तोरे ताकि रहल छियौक। जहिआसँ एतए एलहुँ एकहु दिन चैन नहि अछि। दिन-राति बस तोरे ताकि रहल छी। आ जल्दी आ। देख हम कतेक परेशान छी। देख हमर कण्ठ जरि रहल अछि। हमर हृदयक पियास कण्ठ तक पहुँच रहल अछि। एक गिलास पानि दे। अरूण पानि दे। कनी सुन।” कहि नहि ओ की की कहैत रहि गेलैक। अरूण किछु नहि बजलैक आ क्रमशः ओ नेपत्ता भए गेल। अरूणक निन्न सेहो उचटि गेलैक। मुदा ताधरि किछु नहि रहि गेल छलैक। अरूणक अन्तर्मनमे दिन-राति ई सपना घुमैत रहैत छल। उर्मिलाक स्नेहिल व्यवहारक अमिट छाप ओकर हृदयसँ मेटने नहि मेटा रहल छल। सएह सभ गुन-धुनमे ओ आगा बढ़ैत रहल। समस्तीपुर टीशन बहुत करीब आबि गेल छलैक। रेलगाड़ीक चलबाक आबाज कान तक पहुँचि रहल छलैक। मिथिला एक्सप्रेस लागल छलैक। दौड़ल दौड़ल ओ टीकस कीनलक आ गाड़ीमे कहुनाक ठूसा गेल। गाड़ी झिक-झिक करैत छलैक। एक कदम आगा बढ़ैक, दू कदम पाछा बढ़ैक आ ठामहि ठाढ़ भए जाइक। आगू घुसकैत-घुसकैत गाड़ी रूकि गेलैक। ड्राइभर साहेब चाह पीबैत छलैक कि गार्ड साहेब हरी झंडी देखौलकै आ गाड़ी स्पीड धए लेलकैक। छक-छक-छक...। अरूणकेँ बैसबाक जगह भेटि गेल रहैक। बगलमे एकटा महिला सहयात्री ओकर, दूटा बच्चा, एकटा अधबयसू पुरूष आ कहि ने के के सभ..? कलकत्ता जाएबला गाड़ीक समय विशेषता ओहि गाड़ीमे छलैक। आधासँ आधिक यात्री नौकरीक खोजमे महानगरीक प्रयाण कए रहल छलाह। बरौनी जक्सनसँ गाड़ी आगा बढ़ि गेल छलैक। ओकरा फेर आँखि लागि गेल छलैक। फेर आबि गेलैक उर्मिला। एहि बेर आओर व्यथित आओर अधिक करूण स्वरमे निवेदन करैत एक तरफा अपन मोनक बात ओ कहैत गेलैक। “अरूण। अरूण। हम नहि रहि सकब। हम नहि रहि सकब एसगर अरूण। देख हमर की हाल भेल अछि। देहक आभा झूस पड़ि रहल अछि। अरूण चल, हमरे गाम चल, मुदा...। मुदा...। मुदा...।” गाड़ी सरपट आगा बढ़ैत गेल। आसनसोल स्टेशन करीब आबि गेल छल। गाड़ी टीशनपर रूकल आ बहुत रास यात्रीक चढ़ब ओ उतरब सुनि ओकर निन्न उचटि गेलैक। सपना एक बेर फेर सपना भए गेलैक। दोसर दिन साँझमे ओ कलकत्ता शहर पहुँचि गेल। मुदा रस्ताक सपना ओकर माथासँ हटि नहि रहल छलैक। कलकत्ता शहरक नाम बड़ सुनने छल। मुदा कतए जाए? ककरा ताकए? कुनु ठौर ठेकान नहि रहैक। आगा बढ़ल जाए। चारूकात बंगला भाखाक सोर। चलैत-चलैत थाकि गेल। ताबतमे उर्मिलाक आबाज ओकर कानमे पहुँचलैक। अरूण अकचका गेल- “ई तँ उर्मिला लागि रहल अछि!” आश्चर्यचकित ओ ऊपर ताकए लागल। किछु देखा नहि रहल छलैक। ताबतमे फेर वएह आबाज- “डरा नहि। हमहीं छी- उर्मिला, तोहर चिंर परिचित संगीनी। देख हम कतेक परेशान छी। तोरा पाछू-पाछू बिहारि जकाँ गाड़ीक संगे आबि रहल छी। मुदा घबरो नहि। आखिर हम तोहर विद्यार्थी छियौक ने। ले दस हजार टाका। एहिसँ काज चल जेतौक ने? बाज! बजैत किएक नहि छेँ?” अरूण अपन आगामे नोटक पुलिंदा सभ देखि कए गुम रहि गेल। फेर वएह आबाज- “उठा। जल्दी उठा। लुच्चा, बदमास आबि रहल छौक। अच्छा तँ हम जा रहल छी।” अरूण झट दए टाकाकेँ फाँड़मे राखि लेलक। राखिते देरी मनमे उठलै- एतेक रास टाका कतएसँ अनलक उर्मिला? नाना प्रकारक प्रश्न अरूणक मनमे उभरि रहल छलैक। संगे डरो भए रहल छलैक। मुदा पासमे टाका आबि गेलासँ हिम्मत सेहो बढ़ि गेल छलैक। एतेक आसानीसँ ओकर आर्थिक समस्याक समाधान भए जेतैक से ओ सपनोमे नहि सोचने छल। टांग तेज ओ मोन सुस्त भए रहल छलैक। आगामे एकटा होटल नजरि अएलैक। होटलक कोठरी नम्बर पाँचमे ओ डेरा ललेक। बेस थाकि गेल छल। विश्राम करबाक तीव्र आवश्यकता छलैक। कपड़ा-लत्ता खोललक। हाथ-पैर धोलक। घंटी बजबैत नौकर दौड़लैक। मीनू हाथमे दए देलकै आ किछु-किछु पूछए लगलैक। मुदा बंगला बजैक। अरूण किछु नहि बुझलकै। नोकरबा तमसा कए चल गेल। अरूण स्नान कएलक आ कपड़ा-लत्ता पहीरि कहि नहि कतेक गाढ़ निन्नमे सुति रहल। उर्मिला फेर हाजिर। अरूणकेँ भेलैक जेना क्यो ओकरा उठौने चल जाइत होइक। ओ चुप-चाप सन देखि रहल हो। बहुत दूर एकटा झीलक कातमे ओकरा राखि देलकै। बहुत काल धरि ओ सभ कहि नहि की की गप्प सप करैत रहल। ओ कहैत रहलैक- “अरूण, तूँ बड़ नीक लोक छेँ। तोहर स्मृति एक क्षणक लेल हमर मोनसँ नहि जाइत अछि। सून, एकटा काज करऽ। हमरे संगे चल। तोरा सभ किछु भेटतौक।” पता नहि आओर की की ओ कहैत रहलैक...। भोर होमए पड़ छलैक। अरूणक आँखि खुजलैक तँ ओ आश्चर्यचकित भए गेल। ओकर कोठरीमे उर्मिलाक वएह वस्त्र राखल छलैक जे ओ मरबासँ किछु पूर्व पहिरने छल। वोहि वस्त्रकेँ ओ हटौलक तँ आओर आश्चर्यचकित भए गेल। बहुत रास हीरा-जबाहरात ओतए राखल छलैक। अरूण परेशान छल जे ई सभ की भए रहल छल। देखिते-देखिते अरूण कड़ोर पति भए गेल छल। सभ सामानकेँ ओ सावधानीसँ रखलक आ चुप-चाप होटलसँ प्रस्थान कए गेल। मास-दू-मासक अन्दरमे ओ एकटा नीक होटलक मालिक भए गेल। दस-बीस नोकर-चाकर ओकर आगा-पाछा करैत छलैक। प्रतिदिन हजारो टाका कमाइ ओ करैत छल। छह मासक भीतरेमे ओ गाममे १० बीघा जमीन कीनलक आ इलाकाक संमपन्न व्यक्तिक रूपमे प्रतिष्ठित भए गेल। अरूणक समय देखिते-देखिते साफ बदलि गेलैक मुदा ओकरा खूब नीक जकाँ एकर रहस्य बूझल छलैक। ओ जखन कखनो एकान्त होइत कि उर्मिलाक छाया ओकर सामनेमे उपस्थित भए जएतैक। अस्त-व्यस्त,भाव विह्वल, उर्मिलाक आकर्षक मुद्रामे आह्वान देखि अरूण स्तब्ध रहि जाइत छल...। ओहि दिन अरूणसँ नहि रहल गेलैक आ पूछि बैसलैक- “उर्मिला, एतेक परेशान किएक छेँ? हम तोरा संगे कोना भए सकैत छी? हम जीवित छी। तों शरीर मुक्त छेँ। हमरा तँ शरीर चाही।” उर्मिला ई गप्प बड़ ध्यानसँ सुनलकै। ओ बेर-बेर बजैत रहलैक- “हमरा तँ शरीर चाही। हमरा तँ शरीर चाही।” आ ठहाका मारि कए हँसय लगलैक। अरूण डरा गेल। उर्मिला ओतएसँ गाएब भए गेलैक। अरूणक बिआह एकटा संपन्न परिवारक सुन्दरि कन्यासँ भए गेलनि। कनियाँक द्विरागमन बेस धूम-धामसँ बिआहक ९ दिनक भीतरे संपन्न भेलैक। पूरा भरल-पूरल परिवारमे आबि ओ कनियाँ बेस प्रशन्न छल। रातिमे अरूण जखन ओकरासँ भेँट करए गेलाह तँ ओकर आबाजमे आश्चर्यजनक परिवर्तन देखि दंग रहि गेलाह। ओ कनियाँ हँसल आ हँसिते रहल- “नहि चिन्हलौं हमरा..! हम छी उर्मिला। अहाँक पुरान संगीनी। अहाँ तँ हमरा बिसरि गेलहुँ मुदा हम अहाँकेँ नहि बिसरि सकलहुँ। हमरा शरीर नहि अछि आ अहाँकेँ तँ शरीर चाही। मुदा अहाँ ई गप्प नहि बुझलहुँ जे शरीर सीमित अछि। मोनक कोनो सीमान नहि अछि। छोड़ू ई क्षुद्र शरीरकेँ। आउ। अएबे करू। मौन भए जाउ।” गाममे सौंसे हल्ला भए गेलैक। अरूणक शरीर चेतना शून्य पड़ल छल। नव कनियाँ ओकरा देखि-देखि कानि रहल छलीह। कतेको डागडर, वैद्य, ओझा, गुनी आँगनमे पथरिया देने छलाह। मुदा अरूण नहि उठल। ओ मौन भए गेल छल। शरीरक सीमानसँ ऊपर उठि गेल छल। उर्मिला अरूणक मोन एकाकार भए गेल। लघुकथा- पंचैती जमाना कतए चल गेल मुदा गाम-घरक लोक अखनहुँ दू सौ बर्ख पाछा अछि। लोककेँ अखनहुँ चन्द्रमामे एकटा बुढ़िया चर्खा कटैत देखाइत छैक। लोक अखनहुँ ग्रहण लगिते स्नान करए चल जाइत अछि। किएक तँ ओकरा छुति भए जाइत छैक। लोकक संस्कार-संस्कृति सेहो आधुनिक ओ पुरातनक द्वंदक बीच चलि रहल अछि। पुरना पीढ़ी आ आधुनिक लोकमे अखनहुँ बड़ अन्तर छैक। तेँ एकटा स्वत: सर्वत्र विद्यमान तनाव कोनो क्षण झगड़ाक रूप लए लैत अछि। एही कारणसँ गाम-घरमे पंचैतीक जबरदस्त गुंज़ाइश छैक। मुरली पाँच भॉंइ छलाह। घरक हिसाब-किताब श्याम रखैत छलखिन। मैट्रिक तक पढ़ल छलखिन। बेस चलाक-चुस्त। लगानीक असूल करबामे पारंगत। हुनकासँ छोट तीन भाए- मोहन, रूदल आ लखन। लखन कमे बएसमे दिवंगत भए गेला। हुनकर एक मात्र पुत्र जीवनकेँ पित्ती सभ पहिनहि फराक कए देलकनि। पाँच बीघा जमीन हिस्सामे पड़लनि। लगानी-भिरानी जे किछु छलनि, सभटा श्याम बैमानी कए लेलखिन। शेष चारू भाएमे शुरूमे तँ खूब भेल छलनि मुदा किछु दिनक बाद रूदलक स्वर्ग बास भए गेलनि। हुनका मात्र तीनिटा कन्या छलनि। तीनूक बिआह पित्ती सभ केलखिन। बिआह करएबाक क्रममे सभटा जमीन तीनू भाए अपना-अपना नामे करा लेलनि। मसोमातकेँ किछु नहि रहि गेल छलैक। गामक किछु फनैत सभ ई गप्प मसोमातक कानमे दए देलकनि। मसोमात तँ ओहि दिनसँ अगिआ-बेताल छथि। एक्को दिन एहन नहि भेल जे हंगामा नहि भेल। बुध दिन रहैक। गाममे हाट लगैत छलैक। गाम-गामक लोक हाटपर जमा छल। सरपंच साहेब उर्फ पलटू बाबू चिकरि-चिकरि कए सैकड़ो लोककेँ जमा कए लेलनि। सभ गोटे तय कएल जे मसोमातक संगे बड़ भारी अन्याय भेलैक अछि। परिणामत: दोसर दिन तीन बजे सरपंच साहेबक दलानपर पंचैती करबाक निर्णय भेल। दोसर दिन दुपहरियेसँ सौंसे गामक लोक सह-सह करए लागल। सरपंचक ओहिठाम बैसारी रहैक।बेर खसैत-खसैत सौंसे दरबाजा लोकसँ भरि गेल। अगल-बगलक गामक प्रमुख-प्रमुख लोक सभ सेहो बजाओल गेल छलाह। मुखियाजी एखन धरि नहि आएल छलाह तेँ ओहि टोलपर आदमी पठाओल गेल। चारि बजैत-बजैत लोकक करमान लागि गेल। सरपंच साहेब अपन स्वागत भाषण कही या जे कही, प्रारम्भ केलनि। मसोमात सेहो कोनटा लागल ठाढ़ि छलीह। चारू भाएकेँ कोनो फज्झति बाँकी नहि रहल। गाम-गामक पंच सभ सेहो ‘छिया-छिया’ कहय लगलखिन। मुदा श्याम बेस चलाक लोक छलाह। ओ मुखियाकेँ रातियेमे पाँच साए टाका दए अपना गुटमे कए लेने छलखिन। मुखियाजी सरपंचपर कड़कि उठलाह- “ई अन्याय नहि चलत। आखिर तीनटा जे कन्यादान पित्ती सभ केलखिन ताहिमे खर्चा तँ अवश्ये भेल हेतैक। फेर मसोमात तँ असगर छथि। जमीन लए कए करतीह की? बारह मोन खोरिश हिनका अवश्य भेटक चाही। बाजू यौ श्याम बाबू, अपने एहिपर तैयार छी?” श्याम बाबू स्वीकृतिमे अपन मुड़ी हिला देलखिन। ई बात सरपंचकेँ एकदम नहि रूचलैक। ओ बमकए लागल। संगे जे ओकर चारि-पाँचटा लठैत सभ छलैक सेहो सभ बमकए लागल। जबाबमे चारू भाए सेहो भोकरए लागल। सरपंचक दरबाजापर बेस हंगामा बजड़ि गेल। अन्ततोगत्वा ई निर्णय भेल जे दूनू गोटे एकादशी दिन पाँच प्रमुख-प्रमुख व्यक्तिक समक्ष हरिवंशक पोथी उठा कए सप्पत खाथि आ ओहीसँ बात फड़िछा जाएत। प्रात:काल सरपंच साहेबक ओहिठाम गाएक गोबरसँ ठाँव कएल गेल। ओहिपर हरिवंशक पोथी राखल गेल। पाँचो पंच बैसल रहथि। श्याम मोने-मोन खुश छलाह। पता नहि, कतेक बेर ओ एहिना हरिवंशक पोथी उठाए लोकक घर-घड़ारी घोंटि गेल रहथि। हनहनाइत, फनफनाइत अएला आ हरिवंशक पोथी उठा लेलाह। पंच सभ तकैत रहि गेला। मसोमात ओहीठाम अचेत खसि पड़लीह। मसोमातकेँ बारह मोन खोड़िसक अधिकार मात्रक घोषणा पंच समुदाय कए देलक। पंचैती समाप्त भए गेल। बुधन गामक मानल लठैत छलाह। परमा बाबू बी.डी.ओ. साहेबसँ एकटा चापा कलक व्यवस्था करौने छलाह। कलक तीन-चौथाइ खर्चा सरकारी मदतिसँ भरल जएतैक। बुधन ओ परमा बाबूक घर सटले छल। कल कतए गाड़ल जाए ताहि हेतु जबरदस्त झगड़ा बजरि गेलैक। तय भेलै जे हीरा बाबूकेँ पंच मानि लेल जाए। ओ जे फैसला कए देथिन से मानि लेल जाए। हीरा बाबू प्रतिष्ठित, पढ़ल-लिखल एवम् ओजस्वी लोक छलाह। सम्पतिक नीक संगह कएने छलाह। प्रात: काल ओ घटना स्थलक निरीक्षण कएलाह। बुधन लठैत छल। कखनो ककरो गरिया सकैत छल। बेर-कुबेर ओ लाठी लए कए ठाढ़ो भए सकैत छल। परमा बाबू पढ़ल-लिखल सभ्य ओ शान्त स्वभावक लोक छलाह। परिणामत: हीरा बाबू फैसला कए देलनि जे कल बुधनक घर लगक खाली स्थानपर गाड़ल जाए। बुधन प्रशन्न भए गेलाह। परमा बाबू चुप, समाजक लोक चुप। सोमन बाबू कामरेड छथि। गाममे कतहु क्यो कोनो गड़बड़ी करैत तँ ओ अवश्य ओहिठाम पहुँचि जाइत छलाह। गरीब लोक हुनका अपन नेता मानैत छल। अमत टोलीक एकटा स्त्रीगण अपन घरबलाकेँ छोड़ि कए निपत्ता भए गेल छलि। चारि-पाँच दिनुका बाद सौंसे गाममे जबरदस्त हंगामा भए गेल। शोभा बाबू ओहि मौगीक संग निपत्ता। मुदा एहि बेर कोनो पंचैती नहि भेलैक। जे जतहि सुनलक ओ ओतहि गुम्मी लादि देलक। समरथकेँ नहि दोष गोसाई सद्य: चरितार्थ भए गेल। जीबछ क अबाजमे बेस टीस छनि। लोक कहैत अछि जे हिनकर पिता बड़ सुखी-सम्पन्न छलखिन। मुदा देखिते-देखिते ओहने दरिद्र भए गेलखिन। ओहि घटनाक पाछू सेहो एकटा पंचैतीक हाथ छलैक। जीबछक पिताक श्राद्ध छलनि। गामक प्रमुख-प्रमुख लोकक बैसार भेलैक। जीबछ बाबू सन प्रसिद्ध ओ धनीक लोकक श्राद्धमे कमसँ कम जबार तँ खेबेक चाहैक छलैक। सएह भेलैक। चारि दिन धरि भोज होइते रहलैक। जीबछ एहि काजमे बीस हजार टका घरसँ निकाललाह। दस हजार टका कर्ज लेबए पड़लनि। अमरू दियादे छलखिन। धर दए बिना कोनो हिचकसँ हुनका पैसा दए देलक। काजक बाद कहलक- “कोनो बात ने। जखन पैसा हो तखन दए देब।” दू साल बीति गेल। जीबछक हालत दिन-दिन बत्तर होइत गेल। तीन सालक बाद अमरू एकाएक चढ़ाइ कए देलक। ओकरा हिसाबे सूद सहित ३५००० टाका कर्ज भए गेल छलैक। अमरू अपन लठैत सभक सहायतासँ ओकर सभटा जमीन जोति लेलखिन। गाममे बेस बबंडर भेल। पंचैती बैसल। सौंसे गामक नीक लोक सभ जमा भेलाह। अमरूक विजय भेल। सभ पंच अमरूक पक्षमे हाथ उठा देलखिन। अमरू सभ जमीन जोति लेलाह। सएह भेल पंचैती। जीबछ ओही पंचैतीक परातसँ फक्कर भए गेलाह। कहबी छैक जे पति-पत्नीक पंचैती नहि करी। कारण कहि नहि, ओ कखन झगड़ा करत आ कखन एक भए जाएत। मुदा आइ-काल्हि एहनो कलाकार सभहक कमी नहि अछि जे दूनू व्यक्तिमे झगड़ा लगा कए मटरगस्ती करैत रहैत छथि। बेरपर पंचैती सेहो कए दैत छथि। बतहु मिसर एहने व्यक्ति थिकाह। पुवारि गामवाली बेस हराहि छलीह। दूनू व्यक्तिमे खटपट होइते रहैत छनि। ओहि दिन पुरवारि गामवाली कतहु हकार पुड़ए गेल छलीह, घुरैत-घुरैत अबेर भए गेल रहनि। घुमैत-फिरैत बतहु बाबू पहुँचलाह। पुरवारि गामवालीक घरबलाकेँ लोक खलीफा कहैत छल। खलीफा दरबाजापर गरमाएल छलाह। बतहु मिसर पुछलखिन- “की बात छैक? आइ बड़ गरमाएल लागि रहल छी?” एतबा ओ पुछलखिन की खलीफा अपन घरवालीकेँ एक हजार फज्झति करए लगलखिन। ताहि पर बतहु मिसर टीप देलाह- “हँ बेस कहैत छी भाए। आइ-काल्हिक स्त्रीगण सभ तँ एहने होइत छैक। हुनका तँ हम जट्टाक घरमे गप्प हकैत देखलियनि अछि।” एतबा गप्प बाजि ओ ओतएसँ हटि गेलाह। थोड़ेक कालक बाद पुरवारि गामवाली लौटलीह। दूनू व्यक्तिमे महाभारत जे भेल से देखएबला छल। चारूकातसँ लेाक सभ दौड़ल आएल। पुरवारि गामवाली बजैत रहि गेलीह। अन्ततोगत्वा, खलीफेकेँ लोक उठा कए दोसरठाम लए गेल। दूनू व्यक्ति ओहि दिनसँ फराक-फराक रहए लगलाह। घरमे खान-पान बन्द। बतहु मिसर फेर उपस्थित भेलाह आ खलीफाकेँ कहलखिन- “भाइ! एहि तरहेँ केते दिन चलत? आपसमे बैसार कए लिअ आ मेल-जोलसँ समय बिताउ।” तय भेल जे काल्हि आठ बजे बैसार होएत। दोसर दिन बैसार भेल। दूनू व्यक्ति अपन-अपन पक्ष कहए लगलखिन। बहुत रास गप्प-सप्प भेलाक बाद बतहु मिसर ई तय कए देलखिन जे आइ दिनसँ खलीफा अपन घरवालीक गंजन नहि करताह। ताहि पर पुरवारि गामवाली कनखी मारलखिन। खलीफा मुँह तकैत रहि गेलाह। बतहु मिसर तमाकुल चुनबैत-चुनबैत थपरी मारलाह आ ओहिठामसँ घसकि गेलाह। गाम-घरमे पंचैती एहिना होइत अछि। जकर लाठी तकर महिष। लघुकथा- मुखिआक चुनाव साँझ कए गाममे समाचार-पत्र आर्यावर्त अबैत छलैक। गाम भरिक लोक चौकपर एकट्ठा भए जाइत छलैक। चाहक दू-तीन दोकानपर लोक भन्न-भन्न करैत रहैत छल भादो जकाँ। अखबार अबैक कि गामक पढ़ुआ सभ ओहिपर टुटि पड़ए। ओहि दिन अखबारमे सरकारक एकटा सूचना बहराएल रहैक जे राज्य भरिमे मुखियाक चुनाव एक मासक भीतर सम्पन्न भए जाएत। औ बाबू! ई समाचार कि आएल जे सौंसे गाममे जेना करेन्ट लागि गेल। ओहि गाममे एकसँ एक सरगना लोक छलाह। धने-जने परिपूर्ण। मोहन बाबू, पलटन बाबू, हीरा बाबू, झगड़ू बाबू आदि-आदि। मुखिया के बनए, सरपंच के बनए। विभिन्न गुटमे इएह घोल-फचक्का शुरू भए गेल। सौंसे गाम खण्ड- खण्डमे बँटल छल। पूबाइ टोलक सरगना मोहन बाबू छलाह। पलटन बाबू ओ हीरा बाबू दक्षिणवाइ टोलक प्रभावी लोक छलाह आ झगड़ू पछबाइ टोलक मानल लठैतमेसँ एक छलाह। उत्तरवाइ टोलक क्यो नेता नहि छल, कारण ओतए बेसी जन-बोनिहार रहैत छल आ अपनेमे ताड़ी पीब कए कटा-कटी करैत रहैत छल। ओकरा सभहक भगबान रोटिये छलैक। मालिक सभहक ओहिठाम जाए, जखन जे काज भेटैक से करए आ बोनि लए कए चल आबए। एमहर जहिआसँ चुनाव सभ होमए लगलैक अछि ओहो सभ किछु सुगबुगाएल जरूर अछि, मुदा कोनो खास नहि। कहिओ काल बाहरसँ नेता सभ अबैत छैक तँ ओहू टोलमे चहल-पहल रहैत छैक। चारू टोलमे झगड़ू बाबूकेँ बेस चलाचलती छैक। लाठीक बल छैक। पाँचटा बेटा छनि। सभकेँ पहलमानीमे पारंगत कराओल गेल। बेस लठैत सभ छल पाँचू बेटा। ओकरा सभहक डरे इलाका शान्त भए जाइत छल। तँए केहनो पढ़ल-लिखल लोककेँ झगड़ू बाबकेँ नमस्कार करए पड़ैत छलैक। चुनावक समाचार पबिते झगड़ू बाबू बमकए लगलाह। प्रात भेने हुनका टोलक सभ लठैत अपनामे बैसार केलक। मुखिया आ सरपंचक नामक फैसला तँ नहि भए सकलैक मुदा एतबा तय भए गेल जे वर्तमान मुखिया आ सरपंचकेँ अबश्य हराबक अछि। झगड़ू बाबू भोरे सात बजे नहा-सोना कए चौकपर पहुँचलाह आ बमकए लगलाह- “सभ चोर है, मुखिय चोर है। सरपंच चोर है, सभ को ठीक करेगा।” आदि आदि...। चारूकात भन्न-भन्न करैत लोक सभ जमा होमए लागल। “की बात छैक झगड़ू बाबू?” -किओ ओहिमे सँ पुछलखिन। “की बात छै से तोरा सभकेँ कोना बुझेतह? एहन बैमान सरपंच आ मुखिया आइ धरि एहि इलाकामे नहि भेल। कहिओ गामबलाकेँ कोटाक चीनी ठीकसँ भेटलैक? एहि बेरक चुनावमे एहि बैमान सभकेँ हरेबाक अछि..!” लोक अबैक, लोक जाइक मुदा झगड़ू बाबू भाषण ओहिना अनबरत चलिते रहनि। रेलगाड़ीक पहिया जकाँ घुरा-फिरा कए ओतहि पहुँचि जाइत छला : “इस बैमान सभको हराना है।” झगड़ू बाबूक भाषण चलि रहल छलनि कि ताबतेमे सरपंच साहेब घुमैत-फिरैत आबि गेलाह। चारूकातक लोक हुनका दिस तकैत छल। मुदा झगड़ूक भाषण यथावते चलि रहल छल। सरपंच साहेब एक-दू बेर झगड़ूकेँ बुझाबक प्रयास केलथि। ताबतेमे सरपंचक भातिज मुनमा पहुँच गेल। हाथमे बेस मोटगर एकटा लाठी छलैक। ओ ने आब देखलक ने ताव आ धराम-धराम दू लाठी मारलक झगड़ूकेँ। झगड़ू बाबू असगर पड़ि गेलाह। गरियबैत गाम दिस दौड़लाह आ पाँचो बेटाकेँ हॉंकि देलखिन। सौंसे चौकपर गरमा-गरमी भए गेल छलैक। झगड़ू बाबू मारि बिसरि फेरसँ गरजए लगलाह- “कहाँ भागा। आए सामने तो जानें।” झगड़ू बाबूक पाँचो बेटा सेहो फराके गरजैत एवम् प्रकारेण चुनाव अभियान शुरू भेल। पर्चा भरबाक समय करीब आबि रहल छल। घरे-घर गुटपैंची शुरू भए गेल। वर्तमान मुखिया आ सरपंच बेस टकाबला लोक छलाह। कोनो कीमतपर चुनाव जीतबाक हेतु कृतसंकल्प छलाह। मुदा नवतुरिआ सभ हुनकर विरोधी छल। गामक आरो लोक सभ सेहो हुनका सभसँ सन्तुष्ट नहि छल। अन्ततोगत्वा पर्चा भरबाक अन्तिम दिन धरि मुखिया आ सरपंचक हेतु पाँच-पाँच गोट उम्मीदवार पर्चा भरलनि। ओहिमेसँ मुखियाक हेतु तीन आ सरपंचक हेतु दू गोटाक पर्चा सही पाओल गेल। नवतुरिआक उम्मीदवार पलटू बाबू आ मोहन बाबू भेलाह। वर्तमान मुखिया ओ सरपंच सेहो एक बेर फेर मैदानमे अड़ल छलाह। ओकर अलाबा उत्तरवाइ टोलसँ गरीब लोक सभक उम्मीदवार बलचनमा सेहो अखाड़ामे उतरल छल। मुखियाक चुनाव गाममे तूफान अनलक से कोनो नब बात नहि छल। सभ बेर एहिना होइत छलैक। जहिआ कहिओ चुनाव होइक तऽ लोक सभ एहिना घोल-फचक्का करए लागय। मुदा एहि बेरक चुनावमे विशेषता ई छलैक जे उत्तरवाइ टोलक गरीब लोक सभ सेहो फॉंर बन्हने छलैक। बाहर-बाहरसँ नेता सभ अबैत दलैक। नित्य ककरोने ककरो ओहिठाम बैसार अबश्य होइतै। मतक हिसाबे आधासँ अधिक मत गरीबक छलैक आ जँ ओ सभ एक भए जाए तँ बलचनमाकेँ मुखिया बनबासँ कियो नहि रोकि सकैत छल। एहि बातक प्रतिक्रिया आन तीनू टोलमे सेहो भेलैक। मुदा कोनो हालतमे वर्तमान मुखिया चुनाव दंगलसँ हटए नहि चाहैत छलाह आ नवतुरिआ सभ हुनका अपन नेता मानबाक लेल तैयार नहि छल। एवम् प्रकारेण संपन्न वर्गक मत दूठाम बँटब स्वाभाविक भए गेल छलैक। मुदा बलचनमाक प्रचार जोर पकड़ने छलैक। झगड़ू बाबूक हेतु स्वर्णिम अवसर छल। खने बलचनमाक संगे घुमितथि तऽ खने पलटन बाबूक ओहिठाम आ खने वर्तमान मुखियाक ओतए। पर्चा भरलाक बाद चुनाव दिन धरि झगड़ू बाबूक हेतु अगहन रहैत छलनि। हुनका ईहो कोनो ठेकान नहि छलनि जे कखन कोन दलक संग भए जेताह। बड़का लोक सभहक मत दू ठाम बटबासँ रोकबाक हेतु साँझमे पूबाइ टोलमे बैसार भेल। क्यो किछु बजितथि ताहिसँ पहिने झगड़ू बाबू बमकए लगलाह। वर्तमान मुखियाकेँ एक हजार फज्झति कएल। अन्ततोगत्वा ई निर्णय लेल गेल जे नवतुरिआक उम्मीदवार पलटन बाबूक समर्थन करताह। सरपंचक पदक हेतु मात्र दूटा उम्मीदवार छलाह- मोहन बाबू आ वर्तमान सरपंच नवत राय। नवत राय कमे पढ़ल-लिखल मुदा बेस फनैत लोक छलाह। कतहु किछु होइतैक कि भदवरिया बेंग जकाँ टर्र-टर्र बाजए लगितथि। घर-घर झगड़ा लगेबामे ओस्ताद छलाह। जँ किछु खर्च-बर्च कए दियैक तँ पंचयतीमे फैसला अहाँक पक्षमे सुनिश्चित कएल जा सकैत छल। जँ नीक-निकुत भेटि जान्हि तँ कतहुँ खा सकैत छलाह अन्यथा बेस नेम-टेमसँ रहैत छलाह। एहि सभ कारणसँ गामक लोक ओकरासँ एकदम ना-खुश छलैक। मुदा क्यो ओकरा नाराज नहि करए चाहैत छलैक कारण ओ बेस फचाँरि छल आ ककरहुँ कतहु बइज्जत कए सकैत छल। झगड़ू बाबू नवतुरिओपर चिकरए लगलाह। नवतुरिआ सभ सरपंचक हेतु मोहन बाबूकेँ समर्थन देबाक आश्वासन देलखिन। प्रात भेने नवतुरिआ सभ इन्नकिलाब, जिन्दाबादक नारा दैत गाम भरिमे पलटन-मोहन जिन्दाबादक स्वर गुंजित कए देलक। एमहर गरीब लोक सभ एकदम एक भए गेल छल। लाठी लए कए सभ करे कमान छल। एवम् प्रकारेण सपष्ट लगइत छल जे मुखिया पदक हेतु बलचनमा आ सरपंचक हेतु मोहन बाबू चुनाव जीतताह। वर्तमान मुखिया ओ सरपंचजी बेचैन छलाह। रातिक बारह बजे झगड़ू बाबूक घर पहुँचलाह। दूनू गोटे झगड़ू बाबूक पैर पकड़लखिन। “झगड़ू बाबू, अपने हमरा सपोट करू।” “किएक नहि। हमर सपोट तँ सभदिन अहींक संगे रहल अछि।” “से तँ ठीके मुदा एहि बेर हालत बेसी गड़बड़ छैक।” फेर कहि नहि, दूनू गोटे की फुस-फुसेलाह। २००० टाकापर सौदा भए गेल। प्राते भेने झगड़ू बाबू चौकपर फेर गरजए लगलाह- “मुखियाजीक जे विरोध करत से हमर दुश्मन। एहन मुखिया सरपंच तँ ने कहिओ भेल छल आ ने होएत।” आदि आदि। सुननाहर सभ गुम्म। काल्हि चुनाव होएत। राति भरि गाममे धोल-फचक्का होइत रहल। सभठाम काना-फुसी बेस जोर पकड़ने छल। पुस्तकालयपर चुनाव दल आबि गेल छल। चारिटा पुलिस लाठी लेने सेहो गश्त लगाबए लागल। पहिलुका चुनावमे उत्तरवाइ टोलपर चुनावक मतदान केन्द्र नहि होइत छलैक। मुदा एहि बेर गरीब लोक सभ बी.डी.ओ. साहेबक ओहिठाम धरनाधए देलक। एहि बेर उत्तरवाइ टोलमे सेहो मतदान केन्द्र बनल छलैक। झगड़ू बाबू आ हुनक बेटा सभ बेस मजगुतगर लाठी फनैत चुनाव मतदान केन्द्र सभपर चक्कर लगा रहल छलाह। पुवाइटोलक मतदान केन्द्र पर नवतुरिआ सभ कब्जा कए लेने छल। कसिकए वोगस मतदान भए रहल छलैक। ई खबरि झगड़ू बाबूकेँ जहाँ भेटल कि ओ अपन लठैत बेटा सभकेँ संग कए ओतए पहुँचला आ पलटन एवम् मोहन बाबूकेँ धराम-धराम दू-दू लाठी लगाओल। पीठासीन पदाधिकारी अकबका गेलाह। चारू दिस हरविर्रो मचि गेल। ओहि बीचमे झगड़ूक दूटा बेटा आगा बढ़ल आ सभटा मतपत्र छीनि जबरदस्ती मोहर मारि खसा कए खसकि गेल। मुदा एकर जबरदस्त प्रतिक्रिया उत्तरवाइ टोलक मतदान केन्द्र पर भेल। एक-एकटा मतपत्रपर बलचनमा अपने मोहर मारि कए खसौलक। कोनो दोसर उम्मीदवारक पोलिंग एजेन्ट ओहिठाम नहि टिकि सकल। बलचनमाक जीतब निश्चित प्राय छलैक ओही मतदान केन्द्र क, कारण आधासँ अधिक मत ओही टोलक छलैक। सरपंचक सभटा मत नवत रायकेँ भेटलैक। आन मतदान केन्द्र सभपर सामान्य रूपसँ मतदान भेल आ कने-मने मत सभकेँ भेटलै। साँझमे मत गणना प्रारम्भ भेल। बारह बजे रातिमे जा कए चुनावक परिणाम बहार भेलै। बलचनमा ओ नवत चुनाव जीति गेलाह। गरीब लोक सभ विजयक खुशीमे मत्त छल। नारा बुलन्द होमए लागल- “जीत गया जी जीत गया, बलचन जीत गया।” पुबारि टोलसँ लए कए पछबारि टोलक सभ लोक सन्न छल। लघुकथा- हम बौक छी पाकड़ी गाछ तर ओ पसीना पोछि रहल छल। आगा-पाछा ओकर क्यो नहि छलैक। अगसरे छल। नित्य भोरे उठैत छल आ साँझ धरि परिश्रम करैत छल। बदलामे किछु अन्न-पानि भेटि जाइत छेलैक। दुपहरियामे जहन कनेक उसास होइक तँ गामक जे पूव दिस पाकरिक गाछ छेलैक ओकरे छाहरिमे बैसि पसीना पोछए लगैत छल। दस साल बएस ओकर हेतैक। पता नहि, कहिआ ओकर माए-बाप मरि गेलैक। ओकरे संगतुरिया सभ कैटा छैक जे स्कूल जाइत रहैत छैक। माए-बाप सभ ओकरा रंग-बिरंगक कपड़ा कीनि दैत छैक। किताब कीनि दैत छैक। केहन भागबंत छैक ओकर संगी सभ। सएह सभ अर्र-दर्र ओ सोचैत रहि जाइत अछि। पता नहि अखन धरि कतेक मालिक ओहिठाम ओ काज केने अछि। जतहि गेल ओतहि लात-जुत्तासँ स्वागत भेलैक। मुदा ओ की कए सकैत छल? पेटक सबाल छलैक। जाधरि सहि सकैत छल, सहैत छल। आ कहिओ चुप्पे भागि जाइक। पाछू लागल मालिक गरजैत उठैत छलैक। जेना-तेना कए ओ अपन पेट पोसैत गेल। आगा बढ़ैत गेल। जीबनक एक-एक दिन एकटा उपलब्धि जकाँ बीतैत गेलैक। क्रमश: ओ जवान भए गेल। एमहर सरकार नया-नया योजना सभ लागू केलक अछि। गाम-गाममे बैंक सभ खुजि गेलैक अछि। एक दिन ओहो बैंक गेल आ मनेजर साहेबक आगू उचिती-विनती केलक। मनेजर साहेब ओकरा एकटा रिक्सा कीनि देलखिन। ओकरो नाम मनेजरे छलैक मुदा गामक लोक मनेजरा कहैत छलैक। मनेजरा रिक्सा चलबए लागल। नित्य दससँ पन्द्रह टाका आमदनी भए जाइत छलैक। ठाठसँ जिनगीक गाड़ी सरकए लगलैक। ‘मनेजर राय’ लिखल रहैक रिक्सापर। भोरे उठए मनेजरा आ घण्टी बजबैत दनादन निकलि पड़ए। मनेजराक प्रतिष्ठा छोटका लोक सभमे बढ़ए लगलैक। कैटा कथा सेहो ओकरा बिआहक लेल आबए लगलैक। आ अन्ततोगत्वा मनेजरा बिआह कए लेलक। गामसँ पाँच कोस पच्छिम सासुर छलैक। अमन-चैन भए गेल रहैक ओकर जिनगीमे। भोरे छह बजे रिक्सा लए कए बिदा भए जाइत आ साँझमे सात बजे एक ढेरी कैंचा लेने आपस होइत। मुदा ओकर ई जिनगी बेसी दिन नहि चलि सकलैक। सात-आठ बर्ख पहिने ओ फूल बाबूसँ दसटा टका पैंच लेने छलैक। संयोगसँ वो पैसा आइ धरि आपस नहि भए सकल छलैक। ओकर हालतमे सुधार देखि गौंआ-घरूआ सभ अनेरे ओकरासँ जरए लागल छलैक। ओहि दिन साँझमे आपस भेल। बेस आमदनी भेल रहैक। घर पहुँचले छल कि फूल बाबूक गर्जन सुनेलैक- “मनेजरा छेँ, मनेजरा छेँ?” “की है मालिक।” “तों अपन हिसाब किएक नहि फड़िछा रहल छेँ।” “कोन हिसाब?” “कोन हिसाब! केना बजैत अछि जेना एकरा किछु बुझले ने होइक। दस बर्ख भए गेलौ ओहि कर्जाकेँ। कहिओ देबाक सुधि अएलौक? सुदि समेत ओकर आब पाँच सौ टाका भए गेल अछि! काल्हि भोर तक टाका चूका दे, नहि तँ...।” मनेजरा तामसे बुत्त भए गेल। नहि सहि भेलैक ई सरासर अन्याय ओ बैमानी। तामसमे ओहो गरजए लागल- “होशमे बात करू मालिक..! बुझलौं जे बड़ टाकाबला छी।” एतबा ओ बाजल कि फूल बाबू गरिआएब शुरू केलखिन। मनेजराकेँ सेहो टाकाक गरमी रहबे करैक। ओ अत्याचारक प्रतिकार करब कर्तव्य बुझि गेल छल। एहले-वएहले फूल बाबूकेँ गट्टा पकड़लक आ गर्दनियाँ दैत अपना दरबाजापर सँ भगा देलक। फूल बाबू बेस तावमे आबि गेल छलाह। मैथिली छोड़ि हिन्दीमे गरजए लगलाह- “कल देख लेंगे। ऐसे-ऐसे कितने पाजी को मैंने ठीक किया हूँ।” जबरदस्त हल्ला गाममे बजरि गेलैक। चारूकातसँ लोक सभ दौड़लैक आ दूनू गोटेकेँ फराक कए देलक। फूल बाबू अर्ड़-बर्ड़ बजैत आपस अएलाह। प्रात भेने मनेजरा पूर्व जकाँ रिक्सा निकाललक। ठाठसँ ओकर सीटपर बैसल आ घण्टी टनटनबैत घरसँ बिदा भेल। गामसँ बहराएल कि रिक्साक चालिकें तेज कए देलक। रिक्सा हवामे उड़ए लगलैक। किछु दूर आगा बढ़लापर रस्तापर जारनि राखल भेटलैक। मनेजरा रिक्सा रोकलक आ जारनिकेँ हटबए लागल। एतबेमे चारि-पाँचटा लठैत दन-दन कए दूनू कातसँ धानक खेतसँ बहरेलैक। दन-दन-दन। मनेजराक कपारपर लाठी पड़ए लगलैक। मनेजरा ठामहि खसि पड़ल। ओ लठैत सभ रिक्सा पकड़लक आ ओकरा मारि लाठीसँ, मारि लाठीसँ ओतहि खण्ड-खण्ड कए देलक। फेर पता नहि, ओ लंठ सभ कतए निपत्ता भए गेलैक। बहुत काल धरि मनेजरा एहिना अचेत बीच रस्तापर पड़ल रहल आ ओकर रिक्सा टुकड़ी-टुकड़ी भए कए बगलमे राखल रहैक। माथपर सँ खुन टपकैत रहैक आ मारिसँ सौंसे देह भुजरी-भुजरी भए गेल रहैक। धण्टा भरिक बाद एकटा रिक्साबला ओही रस्तासँ गेल। मनेजराकेँ ओतए पड़ल देखि ओ सन्न रहि गेल। ओकरा रिक्सापर दूटा यात्री छलैक हुनका सभकेँ रिक्सेपर छोड़ि ओ उतरल। मनेजरा रिक्सा चलबैमे ओस्ताद भए गेल छल आ तेँ रिक्साबला ओकरा 'गुरु' कहि कए बजबैत छलैक। 'गुरु'क ई दशा के केलक? किछु काल धरि ओ रिक्साबला क्षुब्ध रहल। आ तकर बाद जेना ओकरा अकिलमे सभटा फुराय लगलैक। धराक दए मनेजराकेँ रिक्सापर लदलक आ आपस अस्पताल दिसि रिक्साकेँ तेजीसँ चलबए लागल। मनेजरा तीनि दिन धरि लगातार अस्पतालमे पड़ल रहल। ऑक्सीजन देल गेलैक। बहुत रास दवाइ करए पड़लैक। चारिम दिन साँझमे ओ आँखि खोललक। होश अबिते अपन रिक्साकेँ ताकए लागल। मुदा क्यो किछु नहि कहलकै। मनेजरा फेर चुप्प भए गेल। अस्पतालमे ओकरा एक मास समय लागि गेलैक। गामपर बच्चा सभ अन्न-पानिक अभावमे मरणासन्न रहैक। घरवाली मालिक सभबहक आँगनमे काज कए कए गुजर करैक। मुदा जाहि दिन मनेजरा आपस अस्पतालसँ अएलैक तँ ओकर घरवाली खुशीसँ दौड़ए लगलैक। मनेजरा घुरि तँ आएल मुदा ओकर बाँमा पैर नेंगराय लागल छलैक। रिक्सा थकूचल गेल रहैक। आगा कि करए से नहि फुरा रहल छलैक। घरमे दूटा बच्चा सेहो भए गेल छलैक। सभ अन्न बिना रोगा रहल छलैक। डाक्टर मनेजराकेँ मास दिन आराम करबाक परामर्श देने छलैक। मुदा घरक परिस्थिति देखिकए ओकरा बैसल नहि गेलैक। मनेजरा साहस केलक आ आँगनसँ निकलल। मुदा जाए तँ कतए? टांग टुटि गेल छलैक। रिक्सा थकुचाएल राखल छलैक। गाममे मात्र फूले बाबू लहनाक कारोबार करैत छलाह। की करए? झख मारि कए फूल बाबूक ओहिठाम पहुँच गेल। ओकरा अखन धरि नहि बुझल छलैक जे ओकर घरवाली फूले बाबूक ओतए काज करैत छैक। फूल बाबू ओकरा बेस ध्यान करैत छलखिन। ओकर घरवालीक नाम सुनरी छलैक। तेहने गुणो छलैक। मुदा सौन्दर्य गरीबीसँ दागल छलैक। फूल बाबूक कहि ने कहिआसँ ओकरापर नजरि गरि गेल रहनि। मनेजरा पहुँचते फूल बाबूकेँ सुनरीसँ असगरेमे हँसी-ठठा करैत देखि लेलक। ओ कतहुँ दोगमे नुका गेल आ तमासा देखए लागल। सुनरी नै नै करैत रहलैक। मुदा फूल बाबूक आक्रमकता बढ़ले गेलनि। एहिसँ आगू मनेजराकेँ देखबाक शक्ति नहि रहि गेल रहैक। प्रत्याक्रमणक सामर्थ्य नहि रहैक। तेँ ओ चोट्टे घुरि गेल आ घरमे आबि कए धराम दए खसल। किछु बाजल नहि होइक। ओ बौक भए गेल। लघुकथा- फाटू हे धरती ! पण्डितजी बेस कर्मकाण्डी छलाह। भोरसँ साँझ धरि जतेक काज करितथि सभमे भगवानकेँ स्मरण अवश्य करितथि। मंत्रोच्चार करैत उठितथि आ मंत्रेच्चारेक संग सुतितथि। त्रिपुण्ड आ ताहि पर लाल ठोप हुनक ललाटकेँ सुशोभित केने रहैत छल। ताहिपरसँ हरदम मुँहमे पान कचरैत, लाल-लाल पानक पीक फेकैत ओ साक्षात् कालीक अवतार लगैत छलाह। कारी चामपर ललका वस्त्र धारण कए जखन ओ भगवतीक बन्दना करए पहुँचैत छलाह तँ वातावरणमे एकटा अपूर्व सनसनी पसरि जाइत छल। पण्डितजीक बएस करीब ४५ बर्ख होएतनि। परिवारमे दुटा बेटी आ एकटा बेटा छलनि। घरवालीक स्वर्गवास आइसँ दस साल पहिने भए गेल छलनि। पण्डितजीक दूनू बेटी बेस सुन्नरि आ लुड़िगर छलनि। मुदा हुनका पासमे टाकाक अभाव छलनि तेँ कतहु कन्यादान पटैत नहि छलनि। बेटा भिन्न भए गेल छलखिन आ पण्डितजी अपन दूनू बेटीक संग एकठाम छलाह। पण्डितजीक घरक आस-पासमे बेस सम्पन्न परिवार सभ छलैक। पण्डितजीक गुजरो हुनके सभहक माध्यमसँ होइत छलनि। बेटा अपन घरवालीक संग दरिभंगामे रहैत छलखिन। ओहिठाम डिस्ट्रीक्ट बोर्डमे खजांचीक काज करैत छलाह। मुदा पण्डितजीकेँ किछु मदति नहि करैत छलखिन। ओ अखनो पण्डिताइक बले जीवैत छलाह। दूनू बेटी समर्थ छलखिन। गामेक हाइ स्कूलसँ मैट्रिक धरि सभकेँ पढ़ौलखिन। आगा पढेबाक सामर्थ्य नहि रहनि। बिआहक लेल छटपटाएल छलाह मुदा कतहु टाका नहि भेटैत छलनि। बिना टकाक कोनो बर बिआह करए हेतु तैयार नहि छलनि। इएह सभ चिन्तामे ओ चिन्तित रहैत छलाह। ओना पण्डितजीक सम्बन्ध पूरा गामसँ मधुर छलनि। मुदा दू-तीन परिवारक लोक हुनका बेसी आदर करैत छलखिन। हीरा बाबूक ओतए तँ भोर-साँझ दू घन्टा जरूर बैसार होइत छलनि। मुदा पण्डितजी ककरो कहिओ अपना हेतु किछु कहलखिन नहि। हीरा बाबूकेँ चारिटा बेटा छलखिन। दूटा तँ बाहर रहैत छलखिन मुदा छोटका दूनू मैट्रिक उतीर्ण केने छलखिन आ बससँ नित्य मधुबनी जाइत छल किलास करए। सरोज ओ मीरा सेहो ओकरे सभहक संगे मैट्रिक उतीर्ण केने छल। एक दिन सौंसे गाम सुतल आ सुति कए उठल तँ गुम्मे रहि गेल। सरोज चुपचाप घरसँ निपत्ता भए गेल छलैक। घरे-घर तका-हेरी भेलैक मुदा कोनो पता नहि। आन्हर हीराबाबूक दोसर बेटा सेहो काल्हिएसँ गाएब छलैक। सौंसे गाममे कनाफुसी होमए लगलैक। पण्डितजी गरीब जरूर छलाह मुदा हुनका अपन प्रतिष्ठाक पूरा ध्यान छलनि। ओ अहि गम्भीर चोटकेँ नहि सहि सकलाह आ रातिमे सुतलाह से सुतले रहि गेलाह। गुम्म, सुम्म आश्चर्यचकित ओ सोचि नहि पाबि रहल छलीह जे की करथि। मीरा आब एकसरि छलि। आगू-पाछू क्यो नहि। पिताक मरला चारि दिन भए गेल छलै। सौंसे गाममे सरोजक भगबाक समाचार बिजली जकाँ पसरि गेल रहैक। मीराक तँ बकारे नहि फुटैत छलैक। की करए ? पाँचम दिन सभ दियाद-वादक बैसार भेल। तय भेल जे गाम लए कए श्राद्ध भए जाए। पैसा-कौरी हीराबाबू गछलखिन। मीरासँ मात्र एतबा गछबा लेल गेलैक जे काज भेलाक बाद घर-घराड़ी हीराबाबूक नाम कए देल जएतनि। वएह पण्डितजीक एक मात्र सम्पत्ति छलनि। बैसार खतम भेल मीरा गुमसुम एकचारी दिस देखि रहल छल। पण्डितजीक श्राद्ध नीक जकाँ समपन्न भेल। हीराबाबू रजिष्टारकेँ गामेपर बजा अनलाह। लिखा-पढी सम्पन्न भए गेल। हीराबाबू मीराकेँ कहलखिन- “मीरा, मास दू मास अही घरमे रह। तोरे घर छौक ने।” मीरा चुपचाप सुनैत रहलि जेना ठकबिदरो लागि गेल हो। अपने गाममे, अपने घरमे मीरा बेघर भए गेल छल। गामक लोक ओकरा प्रति सहानुभूति तँ देखबैत छलैक मुदा महज मात्र देखौटी। धीरे-धीरे ओहो खतम। पन्द्रह दिन भए गेल छलैक घरक रजिष्ट्रीक। मीराकेँ आब ओहि घरमे एक पल बिताएब असम्भव लगैत छलैक। एक दिन सएह सभ सोचि रहल छल कि लगलैक जेना दरबाजापर क्यो ठाढ़ होइक। “हीराबाबू, अपने एतेक रातिमे..?” हीराबाबू किछु बजबाक हिम्मति नहि कए पाबि रहला छलाह। मीराक तामस अतिपर पहुँच गेलैक। ओ चिचिआएलि – “चोर! चोर!” हीराबाबू भगलाह। अगल-बगलक लोकक ओहिठाम भीड़ एकट्ठा भए गेल छलैक। मीरा भोकासि पाड़ि कए कानि रहल छलि। दाइ-माइ सभ दस रंगक गप्प-सप्प करैत पहुँचि गेल छलैक। जकरा जे मोन होइक से बजैक। मीरा चुपचाप सभ किछु सुनैत रहल। क्रमशः भीड़ ओहिठामसँ हटैत गेलैक। राति गम्भीर भेल जाइत छलैक। सौंसे गामक लोक सुति रहल छलैक। मीरा चुपचाप गामसँ बाहर भए गेलि। ओकरा किछु नहि बुझल छलैक जे ओ कतए जा रहल अछि मुदा कोनो दोसर बिकल्पो नहि रहि गेल छलैक। मीरा बड्ड पढ़लो नहि छलि। शहरमे कहिओ रहल नहि छलि। मुदा तकर बादो ओकरा कोनो गम नहि छलैक। टीशनपर गाड़ी आबि गेल छलैक आ आओर अधिक सोच-विचार करबाक अवसरो नहि छलैक। ओ तरदए टीकट कीनलक आ गाड़ीपर चढ़ि गेल। ट्रेनमे बेस भी छलैक। किछु काल तँ ओ ठाढ़े रहल मुदा ताबते ओकरा चिर-परिचित अमित सेहो ओकर सामनेक सीटपर बैसल भेटलैक। हीरा बाबूक ज्येष्ठ पुत्र अमित। मीराकेँ ट्रेनमे धक्कम-धुक्की करैत देखि ओ तुरन्त उठि गेलैक। “मीरा तूँ कतए जा रहल छेँ?” पुछलकै अमित। मीरा ओकरा देखि कए अवाक् रहि गेल। किछु बजबे नहि करैक। अमित ओकरा अपना सीटपर बैसा देलकै। अगिला टीशनपर किछु यात्री उतरलैक। अमित सेहो ओहिठाम उतरए चाहैत छल मुदा मीराकेँ एकसरि छोड़ि देब ओकरा नीक नहि लागि रहल छलैक। ओ मीरासँ ओकर गन्तव्य पुछए चाहलकै। मुदा मीरा किछु बजबे नहि करैक। बड़ मोसकिलसँ मीरा ओकर कहब मानि ओतहि उतरि गेल। गाड़ी सीटी दैत ओहिठामसँ आगा बढ़ि गेलैक। ट्रेनपर सँ उतरि कए मीरा कानए लागल। अविरल अश्रुक प्रवाह देख अमितक मोन करूणासँ भरि गेलैक। ओ मोनहि मोन निश्चय केलक जे मीराकेँ ओकर घर आपस दिआ कए रहत चाहे ओकरा कतबो संघर्ष किएक नहि करए पड़ैक। ओ बड़ मोसकिलसँ मीराकेँ चुप केलक आ अपना संगे गाम आपस नेने अएलैक। ओहि दिन पूरा गामक बैसारी भेलैक। सभ हीराबाबूकेँ ‘छिया-छिया’ कहलकनि। ताबतमे अमित कतहुसँ आएल आ साफ-साफ घोषणा कए देलक जे ओ मकान मीराक छैक, ओकरे रहतैक। सौंसे गौंवा प्रसन्न भए ओकर जयगान करए लागल। मुदा हीराबाबूकेँ जेना नअ मोन पानि पड़ि गेलनि। बैसारीसँ लौटि ओ छटपटाएल रहथि। साँझमे बाप-बेटामे बेस विवाद पसरि गेलनि। मुदा अमित हुनकर गप्प सुनबाक हेतु तैयार नहि छल आ एक बेर फेर साफ-साफ कहि देलकनि जे एहि अन्यायमे ओ हिनकर संग नहि देतनि। बाद-विबाद बढ़िते गेल। अन्ततोगत्वा हीराबाबू कम्बल, बिछाओन आदि सरिओलनि आ गामसँ बिदा भए गेलाह। क्यो टोकलकनि नहि। अमित मोने-मोन सोचैत रहल- भने ई आफद टरि रहल छथि। हीराबाबू तँ चलि गेलाह मुदा मीराकेँ तैयो चैन नहि भेटलनि। सौंसे गाममे दुष्ट लोक सभ मीरा आ अमितक बारेमे नाना प्रकारक कुप्रचार करए लगलैक। नित्य एकटा नव अफवाह गामक एक कोनसँ निकलैत आ दोसर कोन धरि पसरि जाइत। मीराकेँ ई सभ गप्प क्यो-ने-क्यो आबि कए कहि दैक। ओ बड़ संवेदनशील छलि, भावुक छलि, तँए एहन-एहन गप्प-सप्प सुनि कए कानए लगैत छलि। एक दिन अहिना एसगरे अँगनामे कनैत रहए। अमित कतहुसँ आबि गेलै। ओकरा एना कनैत देखि बड़ तकलीफ भेलै अमितकेँ। “मीरा नहि कान!” जेना कि सभ बात ओकरा बुझले होइक। “सुन! हमर बात मानि ले। हमरासँ बिआह कए ले।” मीरा आओर जोरसँ कानए लगल। अमित ई सभ नहि देखि सकल आ चुप्पे ओतएसँ सरकि गेल। तकर बाद अमित दोबारा घुरि कए नहि अएलैक ओकरा लग। पूरा गाममे हल्ला भए गेलैक जे अमित कतहु चल गेल। मीरा ओतेकटा गाममे फेर एकसरि भए गेल छल। गाममे कोनो थाह पता नहि छलैक। बच्चा सभकेँ ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कए गुजर करैत छल। मुदा अमितक एकदम गामसँ निपात भए गेलाक बाद ओ अत्यधिक दुखी छलि। ककरोसँ किछु गप्प करबाक इच्छा नहि रहैक। एतबेमे ककरो गरजब सुनेलैक। हीराबाबूक पितियौत अगिआ बेताल छलाह। “कहाँ गेल पण्डितक बेटी..!” इत्यादि-इत्यादि। मीराकेँ ई सभ गप्प नहि सहि भेलैक। मोन कहैक: “फाटू हे धरती आ समा लिअ”। मुदा ओ किछु बाजिओ नहि सकल। असोरापर करोट भए गेल। चारूकातसँ लोक सभ दौड़ल। हल्ला भए गेलैक जे ‘मीराक हार्ट फेल कए गेलैक। ओ घराड़ी सुन्न भए गेलैक।’ लघुकथा- उपकारक भार ओ निम्न मध्यवर्गीय परिवारमे पालल-पोसल गेल छल। मुदा सभ दिनसँ ओकर महत्वाकांक्षा पैघ छलै। गाममे मिडिल स्कूल रहै। महींस चरा कए आबए आ फटलाही अंगा पहीरि कए फक्का फँकैत स्कूल बिदा भए जाइत छल। सातमामे जहन ओ प्रथम आएल छल तँ मास्टर सभ ओकर पीठ ठोकि देने रहथिन। पीठ ठोकैत प्रधानाध्यापकजी सेहो कहलखिन- “बाह रे बेटा, अहिना आगू करैत रह..!” सौंसे गाममे ओकर नाम तेजस्वी, सुशील ओ प्रतिभाशाली बच्चाक रूपमे ख्यात भए गेल छलै। आ लोकक लेल धरि ई सभ धनिसन। ओकरा पढ़बाक धुन लागि गेल छलै। किताब लए लैत, महींसपर चढ़ि जाइत आ पढ़ैत रहैत। खेबा-पीबाक कोनो सुधि नहि। मैट्रिकक परीक्षामे ओ जिला भरिमे प्रथम स्थान प्राप्त कएलक। सरकारक दिसिसँ ओकरा ३०० टाका प्रति मासक छात्रवृति सेहो भेटलैक आ ओ गामसँ दूर बहुत दूर पढ़क लेल चल गेल। कलकत्ता विश्वविद्यालयक ओ सम्मानित छात्र भए गेल छल। एवम् प्रकारेण ओ पढ़िते गेल, बढ़िते गेल। कलकत्तामे ओकरा रहए जोगर कोनो नीक स्थान नहि भेटि रहल छलै। मास दिन भए गेल रहैक कलकत्ता अएला। मुदा कोनो ठौर-ठेकान नहि भेल छलै। कहिओ ककरो ओहिठाम, कहिओ कतौ। एहिना मास दिन बीति गेलै। एक दिन विश्वविद्यालयक वाचनालयमे एसगरे बैसल छल। गुमसुम। एतबेमे ओकरे वर्गक एकटा छात्रा ‘मालती’ अएलै आ ओकरा एकटा हल्लुक सन चाटी मारलकै आ एकसुरे बजैत रहि गेलै- “एना किएक गुमसुम रहैत छेँ?” आलोककेँ ओकर सभटा बातसँ जेना छगुन्ता लागि गेलै। ओ मालती दिस एकटक तकैत रहल। मुदा किछुए कालमे ओ आत्मलीन भए गेल। मालतीकेँ ओकर एहि अन्तर्मुखी आकृतिसँ बड़ असमंजस भए गेलै। कनीकाल ओहो गुम्हरल आ फेर ओहि ठामसँ चोट्टे घुमि गेल। आलोक किछु नहि कहलकै। चुप-चाप कहि नहि की की सोचैत रहि गेल? साँझक समय लगीच छलै। वाचनालयक चपरासी कहलकै- “बाबूजी। आब समय समाप्त छैक। कोठरीमे ताला लगतैक।” आलोक चुप्पे ओहि ठामसँ बिदा भेल। आलोकक जिनगी अहिना अन्हरियामे बीतैत रहल छलै। इजोरियाक प्रत्याशामे जीवि रहल छल। एक-एक डेग संघर्षक पृष्ठभूमिमे कहि नहि ओकरा केमहर लए जाइत छलै। मुदा ओ चलिते रहल छल। नेनासँ अखन धरि कष्ट कटैत-कटैत ओकर संवेदनशीलता शीथिल भए रहल छलै। प्रकृतिक सौन्दर्यसँ दृष्टि हटल जा रहल छलै। ओहि समयमे मालतीक संग ओकर भेँट जेना ओकर दृष्टिकेँ एकदम बदलि देबाक हेतु तत्पर भए गेल होइक। यद्यपि ओ मालतीसँ भरि पोख गप्पो नहि केने छल, मुदा कहि नहि ओकरासँ किएक एहन आत्मीयता बुझाइत छलै। मालती सौन्दर्यक प्रतिमूर्ति छल। ओकर स्वभावक संतुलन, एवम् दृष्टिक मार्मिकता एक-एक शब्दसँ अन्दाजल जा सकैत छल। ओ कोनो बहकल लोक नहि छल। मुदा ओकरा आलोकक प्रति एकटा स्वत: स्फूर्त, स्नेह उभरैत छलै। संभवत: ओ आलोकक संघर्षक प्रति अधिक संवेदनशील भए गेल छल। आलोककेँ कलकत्ता अएला डेढ़ माससँ ऊपर भए गेल छलै। मुदा ओकरा अखन धरि रहए जोगर मकान नहि भेटि सकल छलै। मालतीक मकानमे बहुत रास जगह छलै। आसानीसँ ओ एकटा कोठरी आलोककेँ दए सकैत छल। मुदा आलोकसँ किछु कहबाक ओकरा साहस नहि होइत छलै। आलोकक गंभीर मौन ओ तजस्वी व्यक्तित्व जखन कखनो ओकरा सामने पड़ैत छलै, ओ ओहिनाक ओहिना रहि जाइत छलि। एही क्रमे मास दिन आओर बीति गेल। वाचनालयमे एक बेर फेर आलोक भेट गेलै। बेस दुखी बुझाइत रहैक। मालतीकेँ नहि रहल गेलै। पुछलकै- “की बात छै? आइ बड़ उदास लागि रहल छेँ?” आलोक चोट्टे कहलकै- “गाम घुरि रहल छी। लगैत अछि आब आगा पढ़ब भागमे नहि लिखल अछि।” मालती पुछलकै- “किएक?” आलोक गुम्म रहि गेलै। मालती कहलकै- “चल हमरा संगे।” आलोक ओकरा पाछू-पाछू बिदा भेल। मालतीक पिता पुलिसक एकटा वरिष्ठ अधिकारी छलखिन आ पश्चिम बंगाल कैडरमे काज कए रहल छलखिन। मात्र दूटा कन्या छलनि। शीला ओ मालती। शीलाक बिआह, द्विरागमन सभ किछु सम्पन्न भए गेल छलै। मालती कलकत्ता विश्वविद्यालयक आइ.ए.क. छात्रा छलि। बड़ीटा मकान खाली खाली रहैत छलै। डी.आइ.जी साहैब आलोककेँ देखिते प्रभावित भए गेलाह। गंभीर, तेजमय व्यक्तित्व। संघर्षक समयमे आलोक व्यक्तित्व आओर तेजस्वी भए गेल छल। मालती ओकर गुम्मी, ओकर प्रतिभा आ सभसँ बेसी ओकर सौम्यतापर मंत्रमुग्ध छल। डी.आ.जी. साहेब तेज लोक छला। आलोकक प्रतिभाकेँ ओ एकदम तारि गेलाह। आलोकक सभ वृतान्त मालतीक मुहेँ सुनने छलाह। कहलखिन- “आलोक। ई अहींक घर अछि। निश्चिन्त भए रहू। कोनो बातक प्रयोजन हो तँ नि: संकोच बता देल करब। संगहि मालतीकेँ कखनोक पढ़ा देल करबै। गणित कमजोर छैक। सुनैत छी अहाँ गणितमे बेस मजगूत छी।” अपना बारेमे एकटा अतिचर्चित व्यक्तिसँ एतेक रास गप्प सुनि कए आलोक गुम रहि गेल। मालती अपन पिताक गप्प-सप्पसँ बेस प्रसन्न छल। ओकरा सएह उमीदो छलै। आलोक आ मलती आब संगे संग रहैत दल। संगे पढ़ैत छल, कालेज जाइत छल आ कहि नहि कतेक काल धरि संगे गप्प-सप्प करैत रहैत छल। आलोक निश्छल भावसँ कहि नहि ओकरा की की कहि जाइत छल। मुदा मालती लेल धनि-सन। ओ सभ चुप्पे सहि जाइत छलि। आइ.ए.क परीक्षा लगीच छलै। दूनू गोटे परीक्षाक तैयारीमे भिड़ल छल। आलोकक सहारा भेट गेलासँ मालती सेहो नीक पढ़ाइ कए रहल छल। दूनू गोटे परीक्षा देलक आ नीकसँ परीक्षा उतीर्ण कए गेल। आलोक विश्वविद्यालयमे प्रथम स्थान प्राप्त केने छल। मालती प्रथम श्रेणीमे नीक नम्बर अनलक। डी.आइ.जी. साहेब आलोकसँ बड़ प्रशन्न छलखिन। मुदा आलोक लेल धनि-सन। जाहि आदमी लए कए शहर भरिमे धूम मचल छल, सएह आदमी गुमसुम कोठाक ऊपरी मंजिलपर कहि नहि की की सोचबामे व्यस्त छल। डी.आइ.जी. साहेब मालती सहित हुनकर पूरा परिवार आलोककेँ मदति करबामे जान लगा देने छल। मुदा आलोककेँ ई सभ कोना दनि लगै। ओकरा आवश्यकतानुसार सभ किछु भेट गेल रहैक मुदा तैयो ओ कहि नहि किएक दुखी रहैत छल। मुदा करए की? अभावक असीम समुद्रमे कतेको काल धरि हेलैत-हेलैत एकटा सहारा भेटल छलै। मुदा लागि रहल छलै जे समुद्रसँ तँ उवरि गेल मुदा ओहि टापूक कोनो गहींर कूपमे डुबि जाएत जाहिसँ फेर ओ नहि निकलि सकत। आखिर डी.आइ.जी. साहेब आ हुनकर परिवार ओकरा एतेक मदति किएक करैत छैक? मुदा करितै की? कोनो दोसर विकल्पो नहि छलै। आगू बढ़ए, सहारा छोड़ि दिए तँ फेर वएह असीम समुद्र देखाइत छलै- अभाव, कष्ट ओ संघर्षक चरमोत्कर्ष। कतए जाए? की करए? असमंजसमे जीवि रहल छल। इएह सभ सोचैत छल की मालती ऊपर आबि गेलै। मौन एकाएक भंग भेलै। ओकरा एना गुम्म देखि मालती कहि उठलै- “चल, चल नीचा चल। आइयो एहिना गलफुल्ली रखबैं की? तोरे कारण तँ हम एतेक नीक नम्बर लए कए उतीर्ण भेलहुँ अछि। चल, तोरा भरि पेट मिठाइ खुएबौ।” आलोक हँसल आ मालतीक पछोर धए लेलक। नीचामे डी.आइ.जी. साहेब आ ओकर परिवारक सभ लोक आलोकक प्रतीक्षामे छलाह। ओ सभ आलोकक स्वभावसँ परिचित भए गेल छलाह आ तेँ किछु कहलखिन नहि मुदा ओकर अन्यमनस्कताकेँ तँ ओ निश्चित रूपसँ तारि गेलाह। डी.आइ.जी. साहेब बात बदलैत कहलखिन- “बी.एस-सी.मे कतए नाम लिखैब आलोक? अखन किछु सोचलियैक नहि? हमर विचार तँ अछि जे एहीठाम कलकत्ता विश्वविद्यालयमे नाम लिखाउ। कारण ई नीक विश्वविद्यालय अछि।” आलोक चुप्पे रहि गेल। फेर आन-आन बात होमए लगलैक। ताबतेमे टेलीफोनक घन्टी बजलैक आ डी.आइ.जी. साहेब जरूरी काजसँ ऑफिस बिदा भए गेलाह। मालतीक माए सेहो कतहु उठि कए चलि गेलै। आब मात्र मालती आ आलोक ओतए रहि गेल छल। मालती गप्प शुरू करैत कहलकै- “आलोक। तूँ बड़ नीक लोक छेँ।” आलोक एहि बातपर हँसि देलकै। कहलकै- “नीक तँ छी मुदा...।” “मुदा, मुदा किछु नहि! जे कहि रहल छियौ से सुन। एहीठाम रह आ संगे संग दूनू गोटे बी.एस-सी. करब। कोनो बातक चिन्ता नहि कर।” आलोक कहि नहि कोना- ‘हँ’ कहि देलकै। मालतीक खुशीक ठेकान नहि छलै। ओ दौड़ल घर गेल आ एक बाकुट मिठाइ आनि कए आलोकक मुँहमे ठुसि देलकै। आलोक मधुर खाइत चल गेल। मालती आ आलोक एकटा नामक दू अंश भए गेल छल। भावुकताक संग परिस्थितिक सामंजस्य कए लेने छल आलोक। मुदा भावनाक तरंगमे बहि जाएब सेहो ओकरा पसिन नहि छलै। ओ अपन लक्ष्यपर अडिग छल। जीवनमे ओकरा बढ़बाक छलै। एही कारण ओ बहुत किछु स्वीकार कए लेने छल। मुदा ओ अपनहिसँ लगाओल लत्तीमे ओझराए नहि चाहैत छल। ओमहर मालतीक भावत्मकता सीमोल्लंघन करबाक हेतु उफान केने छल। आलोक एही कसामसीसँ परेशान छल। मुदा बीचमे संग्रामसँ भागि जाएब ओकरा मंजूर नहि छलै। ओ मालतीकेँ पढ़ए-लिखएमे भरिसक मदति करैक। गप्पो-सप्प कए लैक मुदा ओहिसँ बेसी किछु नहि। मालतीक मोन ओहिसँ भरैक नहि। असंतोषक रेखा ओकर चेहरापर स्पष्ट देखार भए जाइत छलै। संतुलन बनएवाक दृष्टिसँ आलोक कहिओ काल डाँटिओ दैक। मुदा मालतीकेँ ओकर डाँटो मीठे लगै। आलोकक स्वभावसँ मालतीक पूरा परिवार प्रभावित छल। मुदा ओकरा लेल धनि-सन। ओकर पूरा ध्यान पढ़ाइमे लागल छलै। जे किछु समय बाँचल रहैक से मालतीकेँ पढ़बएमे लगा दैक। आओर किछु नहि। मालती ओ आलोकक प्रगाढ़ अन्तरंग सम्बन्ध ओकर माए-बापकेँ छलै मुदा ओ सभ आलोकक स्वभावसँ परिचित छलाह। मालती भलेँ बड़ भावुक छल, मुदा आलोकक संतुलित, संयत ओ अन्तर्मुखी व्यक्तित्व अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय छलै। ओमहर आलोकक अन्तर्मन ओकरा प्रति कएल गेल उपकारक भारसँ दबल छलै। ओकर किछुओ सहारा सधि जाइक ताहि हेतु ओ मालतीकेँ पढ़बैत रहैत छल। बी.एस-सी. परीक्षाक मात्र दू मास शेष रहि गेल छलै। प्रतिदिन १०-१२ घन्टा ओ स्वयं पढ़ैत छल आ शेष समयमे मालतीकेँ पढ़बैत रहैत छल। परीक्षाक समय ज्योँ-ज्योँ निकट अएलै, ओ मालतीक पढ़ाइक प्रति अपेक्षाकृत अधिक सचेष्ट होमए लागल। ओकर एहि परिश्रमक परिणाम भेलै जे मालती पुनश्च प्रथम श्रेणीमे उतीर्ण केलक, संगे आलोक विश्वविद्यालयमे प्रथम स्थान प्राप्त केलक। एक बेर फेर ओकर घरक वातावरण आनन्दमय भए गेलै। ओहि राति मालतीकेँ निन्न नहि भेलै। कहि नहि की की सोचैत रहि गेल। भोर भए गेल रहैक। चारू कात लोक काजमे लागि गेल रहैक। मुदा आलोकक कतहु पता नहि रहैक। किएक भेलै एतेक अबेर उठबामे? से सोचैत ओ आलोकक घर दिस बढ़ल। घरक केबाड़ी खूजल छलै। चौकीपर एकटा चिट्ठी राखल छलै। मालती चिट्ठी खोलि कए पढ़ए लागल- “प्रिय मालती! बहुत रास गप्प करबाक मोन छल। मुदा कहि नहि किएक किछु बजाइत नहि छल। तोरो बहुत रास गप्प करबाक इच्छा रहल होएतौक सेहो हमरा बूझल अछि। तोरा लोकनिक उपकारक भारसँ हम ततेक दबि गेल छी जे आब एक्को घड़ी एहिठाम नहि रहि सकब। कहि नहि तोहर सभहक कर्जा किछुओ सधा सकबौक की नहि? माफ करिहेँ।” तोहर आलोक। मालती आकाश दिस शून्य भावसँ देखैत रहि गेलि। लघुकथा- सनकल नहरिक काते-काते वो चल जाइत छल। फाटल-चीटल नुआसँ देहक लज्जावरण दैत दूनू हाथे दूनू बच्चाकेँ कोरतर दबने एक सुरे बढ़ल जाइत रहए। जेठक ठहा-ठही रौद। चारूकात कतहुँ क्यो नहि। मुदा ओ अपसियाँत भेल बढ़ले जाइत छलै। कि भेलै ओकरा से नहि कहि? प्राय: ओ सासुरसँ रूसि गेल छल। थाकल, ठेहियाएल वो पाकड़िक छाहरि देखि बैसि गेल। ओकर आँखिसँ नोर झर-झर खसए लागल। के पोछत ओकर नोर? सुनैत छल जे सासुरमे लोककेँ बड़ सुख होइत छैक। सासु-ससुर, दिओर, दियादिनी सभ छलै ओकरा। मुदा सभ जेना जन्मी दुश्मन रहैक ओकर। ओकर अनेरे खिदांस करब जेना ओकरा सभक धर्म रहैक। खेबो-पीबोक ओकरा कष्टे छलैक। घरबला कमासुत छलैक। मुदा भैयारीमे सभसँ छोट होयबाक कारण परिवारक ऋृण ओकरापर बहुत रहैक। भाए सभ गरीबीमे छलैक। तेँ जे चारि-कौरी कमाइतो छल से कैठाम बँटि जाइत छलैक। स्त्रीसँ ओकरा प्रेम तँ छलैक मुदा कालक प्रभाव ओकरो नहि छोड़लकै। समय बीतलासँ ओकरा सौन्दर्य-सौष्ठव कम भए गेल छलैक आ ओकर ध्यान क्रमश: कोनो आन स्त्रीपर केन्द्रित होमए लागल छलैक। ओ स्त्री सुन्नरि तँ छलै, संगहि ओकरामे आधुनिकताक पुट सेहो छलैक, आंगिक चमत्कार छलैक आ यौवनक मादकता ओकरा आकर्षणक केन्द्र बना देने छलैक...। कोना-ने-कोना इएह बात सभ ओकरा कानमे पड़लैक जे ओकरा पचाओल नहि भेलैक। दरिद्राक भार फराक, तंदुरूस्ती घटैत से छलैक आ ओमहर घरबलाक उपेक्षापूर्ण आचरण...। मोन जेना बेरक्त भए गेल रहैक आ तँए एक दिन वो सासुरसँ काँखक तर बच्चाकेँ दबने भागि गेल। नैहर धनिक तँ छलै मुदा भाए सबहक राज। पिता मरि गेलै आ माए सेहो बुढ़ भए गेल छलैक। क्यो घरमे मोजर नहि करइ। मुदा बेटीक तँ की नहिरे की सासुरे। आ तँए जखन वो नैहर पहुँचल तँ चारूकात गामक नव-पुरान लोक ओकरा घेरि लेलक। “किछु सुनलिऐ? फलनमाक बेटी सासुरसँ भागि अएलैक अछि।” इत्यादि-इत्यादि, जकरा जे फुराइक से बाजैत छलै। आओर वो हतप्रभ बीच अँगनामे ठाढ़ रहए। के खोंइछ खोलत आ के पटिया ओछा कए बैसए कहतैक। अपने घरमे वो आन बनल छल। क्यो सहारा नहि बुझाइ। ताबतमे प्राण दाइ कतहुँसँ एलखिन आ कहलखिन- “दूर जाइ जाउ। केहन पाथर भए गेलहुँ अहाँ लोकनि..! बेटी डाटी छइक आइ आएल, काल्हि चल जाएत। तकर अनादर किएक करैत जाइत छी।” कैटा कनियाँ सभ आबि गेल छलैक ओहि आँगनमे। तीनटा ओकर भाए छलैक। भरि-भरि दिन वो जेठकाकेँ कोरा खेलबैत रहैत छलैक। जाड़क मासमे रौदमे तेल लए देह मलैत रहए आ कनेको जहाँ बच्चाकेँ सर्दी होइक तँ जेना ओकर प्राण सन्न दए रहि जाइत रहैक। मुदा आइ चारि-पाँच दिन अएला ओकरा भए गेल छलैक आ ताधरि जेठकासँ टोका-चाली नहि भेलैक। भाए सभ तीनू तीन ठाम भए गेल छलैक आ माएकेँ तीनू गोटे मिलि कए फराक खोड़िस दैत छलैक। हारि कए जखन ओकरा कोनो भाए नहि पुछलकै तँ माएक संगे रहए लागल। माए तँ माए होइत छैक किने। रहि-रहि कए नोरक धार बहाबए लगैत छलैक। उच्च सुनैत छलैक आ तेँ ओकरासँ जे खुलि कए गप्पो करैत सेहो नहि होइक। कारण जे ओकर बात कनियाँ सभ सुनबाक हेतु टाट लागल रहैत छलैक। कहबी छैक जे गेलहुँ नेपाल आ कर्म गेल संगे। सएह परि ओकरो भेलैक। सासुरमे सासु, ननदि आ दियादिनी तँ नहिरामे ई कनियाँ सभ ओकर जानक जपाल भए गेल छलैक। तैयो माए लग छल। अहिठाम किछु स्वतंत्रता तँ छलैक। “सएह की हाल अछि ओकरा सन-सन हजारो कन्याक जकरामे सासुर ने नहिरे- क्यो कतहुँ सहारा नहि होइत छैक?” सएह सभ सोचैत रहए। सोन दाइ सोन दाइ, सौंसे गाममे सोर रहैत छलैक। गोर नार दप-दप छल वो। ओकरामे सभ गुण छलैक। मुदा गुणसँ की हो? टाकाक बिआह होइत छैक। पिता धनिक तँ छलैक मुदा कंजूस छलखिन। बेटीक भाग नहि देखलखिन आ एकटा साधारण लोकसँ ओकर बिआह करा देलखिन सौंसे गाम छिया-छिया कहलकै। “सएह हौ, लोचनो बाबू, विचार घोरि कए पीबि गेलाह। बेटीक भविष्यक कनियोँ विचार नहि केलाह। पाइ तँ अबैत जाइत रहैत छैक।” इत्यादि-इत्यादि। बेटा सबहक भविष्यक चिन्ता जबरस्त छलनि। की होएत की नहि? बेटी तँ दोसर धर चल जाइत छैक। ओकरासँ वंशक रक्षा तँ नहि होइत छैक। मुदा बेटा तँ कुलक आधार छैक। सएह सभ हुनकर पुरनका मिजाज सोचैत रहैत छल। सासुरमे दरिद्रा चरम सीमापर छलैक। सभ दियादिनी मरूआ कूटए। रोटी ठोकए। धनकुट्टी करए। द्विरागमनक पन्द्रह-बीस दिन धरितँ ओकरा क्यो किछु नहि कहलकै। मुदा कालक्रमे सभक व्यवहार कठोर होइत गेलैक। पटिदारी छलैक किने। “गे मैयो भरि दिन बैसल रहतौ जेना फरफेसरक बहु हो..!” घरबला जाबत काल रहैक ताधरि क्यो ओकरा किछु नहि कहितै। ओकरा काजपर जाइते फेर वएह रामा वएह खटोली। ओकरा बासन छुआओल गेल आ क्रमश: ओ पार लगा कए चौका-बासनक काज करए लागल। मुदा ओहि घरमे तँ पटिदारी छलैक। जेठकी दियादिनी बड़ क्रूड़ छलैक। ओकर इच्छा जे कुटनी-पिसनीमे सेहो पार लगौक। किछु दिनक बाद ओकरा सन्तान हेबाक सम्भावना भेलैक। मुदा ताहिसँ की? भानस-भात, कुटनी-पिसनी आ ताहिपर सँ सासु ओ ससुर तथा दियादिनी सबहक कटाह गप्प-सप्प। सुनैत-सुनैत ओकर दम फुलैत छल। मुदा करए की? ककरा कहितै अपन दुख। चारूकात अन्हारे-अन्हार बुझाइक। जकर घरोबला ओकर पक्षमे नहि होइक ताहि स्त्रीगणक भगबाने मालिक होइत छैक आ सएह परि ओकरो छलैक। ओना, नवमे ओकर घरबला बड़ आव-भाव रखलकै। नव-नव कपड़ा-लत्ता सभ चीज आनि-आनि दैत छलैक। मुदा ओकरा ध्यान जेना क्रमश: हटैत गेलैक। ओ एसगरे हकासलि-पियासलि भरि दिन आ दुपहर राति धरि काज करैत रहैत छल। क्यो एहन नै भेटलैक जकरा अपन मोनक भाव कहितै, जकरा लग मोन भरि कनितै। “उपाय तँ छलैक। मुदा बोराक आम आ बेटीमे मिथिलामे कोनो अन्तर नहि छैक। साँठि देनहि कल्याण। आ जँ एक बेर ककरो गारामे बान्हि देलिअनि तँ फेर जन्म भरिक लेल निचैन भए जाउ। धन्यवाद कही मिथिलाक समाजकेँ जे एखनो धरि अपन स्त्री समाजकेँ एतेक निरघीन जीबन वितएबाक हेतु मजबूर कए दैछ।” इएह सभ बात ओकर मोनमे उठैत रहैत छलैक। ओमहर ओकर भाए सभ अपनामे भिन्न-भिनाउज कए लेलकै आ सभ अपना-अपनीक धन जमा करैत छलैक। सभकेँ कोठा छलैक। जहिआ ओ नैहरसँ कनैत बिदा भेल छल तहियो ओकर पिताकेँ कोठा छलैक। मुदा अखन तँ ओकरा बुझाइत जेना दोसर ठाम आबि गेल हो। चारूकात पोखरिया-पाटन छलैक। सएह, धन एतेक आ मोन कतेक छोट छै ओकर भाए सबहक। ठीके छै कहबी जे टाका आगू लोक सभ सम्बन्ध बिसरि जाइत अछि। किछु दिन नैहरमे रहलाक बाद ओकर सासुरक लोक अएलैक। बड़ उपरागा-उपरागी भेलैक। आ ओकरा फेर लोक सासुर लए गेलैक। मुदा एहि बेर तँ ओकर सासु बाढ़निये नेने ओकर स्वागत केलक। एवम्-प्रकारेण आनो-आनो लोकक आचरण ओकरा प्रति कठोर होइत गेलैक। ओकर गहना सभ बेचि देल गेल रहैक। ओ क्रमश: अकान ओ सुन्न भेल जाइत छल। एक दिन ओकरा ने आगू फुराई आ ने पाछू। दिमाग बिजलीक करेन्ट जकाँ फेल कए गेलैक। ओ फेर भागल नैहर। एहि प्रकारे नैहर-सासुरओ कै बेर केलक। सभठाम ओकरा उपेक्षा भेटैत छलैक। नैहरोसँ ओकर मोन उचटि गेल रहैक। तेँ ओ सोचलक जे बरे लग चली। जेना-तेना हराइत-भुतियाइत ओ बरक डेरापर पहुँचलतँ जे देखलक से देखि कए गुम्मे रहि गेल। भोरक समय छलैक ओकर घरबला कोनो दोसर स्त्रीक संग एसगर घरमे रहैक। ओ चोट्टे घुमि गेल आ भागल भागल-भागल नहि जानि ओ कतए गेल। एमहर ओकर खोज-पुछारि होमए लगलैक आ कएक दिनक बाद एकटा टीशनपर ओकरा लोक बैसल किछु-किछु रखने फाटल-चिटल कपड़ा पहिरने देखलक। ओ ठहाका भरि कए हँसैत छलैक- जेना समस्त समाजपर हँसि रहल हो। ओकरा ने कथुक लाज छलैक आ ने धाक। मुदा लोक सभ कहए लगलैक जे ओ एकदम सनकि गेल छल। ओ एकदम गुम्म भए गेलैक। तकर बाद फेर कहिओ ककरोसँ नहि बजलकै। लघुकथा- क्रान्ति विसर्जन सौंसे गामक नवतुरिया सभ एकटा बैसार केलक। छोटका लोकक तथाकथित आक्रमकताक पुरजोर विरोध करबाक दृढ़ निश्चय कएल गेल। नेमी बाबू गामक गामक नामी लोक छलाह। चारू बेटा एक-सँ-एक पदपर छलखिन। सभ कमासुत। वो बैसारमे बीचमे बमकि उठलाह- “जतेक जे जुलुम भए रहल अछि ओहिमे बड़के लोकक हाथ अछि। छोटका लोकक ई साहस जे हमरा लोकनिक हरबाही छोड़ि दिए। खबासिनी सभ आँगन अएनाइ छोड़ि देलक। ई सभ छोटका लोकक करनामा नहि थिक अपितु एहि समस्त काजमे सुधीर बाबूक प्रगतिशील बिचारक पुत्र बेचनक हाथ थिक। छोटका लोक सभकेँ भाषण दए-दए सनका देलक अछि। “जब तक भूखा इन्सान रहेगा, धरती पर तूफान रहेगा आदि-आदि नारा के सिखौलक?” चारू कातसँ थपड़ी पड़ए लागल। तय भेल जे सुधीर बाबूकेँ उपराग देल जाए। संगे ईहो तय भेल जे गामक कोनो खबासकेँ आर्थिक सहायता नहि देल जाए। सभा विसर्जित भेल। सौंसे रस्ता लोक अर्र-बर्र बजैत चल जाइत रहल। बेचन बेस फनैत छलाह। बैसारक एक-एक बात घरे बैसल पता लगा लेलाह। एमहर बैसार खतम भेल ओ ओमहर फेर नारा बुलन्द भेल- “जब तक भूखा इन्सान रहेगा, धरतीपर तूफान रहेगा...।” सौंसे गाम डोलि गेल। कारण ओहि स्वरमे पर्याप्त शक्तिक प्रस्फुटन भए रहल छलैक। चारू कातसँ एक्के बात जे ‘बड़का लोक सभकेँ रस्तापर आनेके है। जान रहे कि जाए।’ एहि जिनाइसँ मरबे नीक। एवम्-प्रकारेण गाम एकटा सिभिल नाफरबानीक दृश्य देखि रहल छल। एक दिस गामक धनीक, सशक्त लोक सभ दोसर दिस छोटका लोक सभ खाली देह, खाली पेट लेने बमकि रहल छल- “…धरतीपर तूफान रहेगा।” छोटका लोकमे आघात प्रतिघातक सरिपहुँ शक्ति नहि छल। जहिआसँ वो सभ अबाज बुलन्द केलक तहिआसँ कतेको घरमे डिबिया नहि बरल। कतेको राति कोराक बच्चा भुखले सूतल। मुदा तैओ ओ सभ कोनो बड़का लोक क खेत जोतए नहि गेल...। ओहि दिन हाट लागल रहैक। दामोदर बाबू हाट करए जाइत छलाह। गामक सभसँ धनीक लोक दमोदर बाबू। हाटे-हाट तरकारी उठौना अबैत छल। मुदा जहिआसँ छोटका लोक सभ हड़तालपर चल गेल छल तहिआसँ अपने गमछामे तरकारी बान्हि कए दमोदर बाबू लबैत छलाह। तरकारी लए कए उठहि पर छलाह कि निरसनमा पर नजरि पड़लनि। मुदा टोकलकनि नहि। कए बेर बजौलखिन- “निरसनमा..? निरसनमा..?” मुदा ओ अन्ठिया कए चल जाइत रहल। दामोदर बाबूकेँ नहि रहि भेलनि। झटकि कए आगू बढ़ि ओकर गट्टा पकड़ि लेलखिन। एतबेमे औ बाबू जतेक ओकर दियाद-वाद सभ छलैक सभ दमोदर बाबूकेँ घेरि लेलक। दामोदर बाबू जेना-तेना जान लए कए भगलाह। रस्ता भरि प्रतिशोधक आगिसँ धधकैत रहलाह। ओहि घटनाक दस दिन भए गेल छल। दामोदर बाबू इलाकाक नामी-गामी पहलवानकेँ जमा कए लेने छलाह। बारह बजे रातिमे सभ पलहवान निरसनमाक घर घेरि लेलक ओ निरसनमाक घरसँ निकलैत देरी खाम्ही लगा बान्हि ओकरा मुँहमे गोइठा ठुसि देलक। निरसनमा निस्सहाय, ओतएसँ देखैत रहल। ओकर आँखिक सामने ओकर घरवाली चिकरैत रहल। मुदा निरसनमा हाथ-पैर पटकि कए रहि गेल। असगर वो १५टा दैत्यक सामना नहि कए सकल। भोर भेला पर ओकर घरवाली बीच आँगनमे बेहोस पड़ल रहैक। निरसनमा धारक कातमे बेहोश छल। सौंसे गाममे हल्ला भए गेलैक। बेचन दौड़ल अएलाह। ओ गरजि उठलाह। मुदा जे हेबाक छल से भए गेल छल। छोटका लोक सभ एकट्ठा भए गेल। बेचन फेर नारा देलकै- “धरती पर तूफान रहेगा..!” अहि नाराक कोनो प्रतिकृया निरसनमा ओ ओकर घरवालीपर नहि पड़लैक। ओ दूनू गोटे ओहिना बेसुध ठामहि पड़ल छल। गामक बुढ़ सभ ओहि घटनाक बारेमे सुनलक आ अनठिया देलक। गामक लेल ओ कोनो नव बात नहि छलैक। हँ,एतबा अवश्ये जे वर्तमान परिपेक्ष्यमे ई घटना एकटा दुस्साहस सन लगैत छल। मुदा एकर बाद फेर नारा कहिओ नहि सुनाइ पड़लैक। ‘धरती पर तूफान रहेगा।’ केर संकल्प जेना केतहुँ दहा गेलैक। ओहि घटनाक बाद छोटका लोक सबहक बैसारी भेल रहैक। सभसँ सीनीयर माइन्जन बमकि उठल छल नवतुरियापर। मालिक लोकनिक वो बेस चमचा छल। गरजि कए कहलक- “तोरा लोकनिकेँ गिरगिटिआ नचैत छौ। एतेटा जिनगी ईहे मालिक लोकनिक संग बिता देलिऐक। कहिओ कोनो झगड़ा-दन नहि भेलैक। खबासिनी आँगन सभमे काज करैत रहलैक। कहिओ कोनो बातक सिकाइत नहि केलक। मुदा ई छौड़ा सभ अगिआ-बेताल बनल हेँ!” कोनो नवतुरियाकेँ साहस नहि भेलैक जे माइन्जनक विरोधमे किछु बाजए। सभ चुप्प भए एकदम गुम्मी लादि देलक। बैसार खतम भेलैक। गामक बड़का लोकमे हरिअरी अएलैक। सभ कियो दामोदर बाबूक प्रशंसा करैत छल। सरिपहुँ दामोदर बाबू बड़ नीक लोक छथि। आदि-आदि...। आ फेर ओहि दिनसँ पनिभरनी सभ गिरहथक ओहिठाम काज केनाइ सेहो शुरू कए देलक। सौंसे गाममे फेर ओहिना चहल-पहल रहए लागल...। पछबारि गाम बालीकेँ तीनटा बेटी छलैक। तीनू तीनटा मालिकक अँगनामे काज करैत छलैक। सभ सासुर बसि आएल छलैक। मुदा गरीबक की सासुर आ की नैहर? ककरो बास सासुरमे नहि भेलैक आ सभ कए बर्खसँ माए लग रहैक। कहि नहि कैटा धिया-पुता छलैक तीनू बहिनकेँ। मुदा सबहक धिया-पुता गोर-नार। देखैमे सुन्नर तँ छलैहे। बेस तेजो सभ छलैक। पछबारि गाम बालीकेँ लोक चुटकी मारै जरूर मुदा ओकरा लेल धनि-सन। ओ अपनो तँ ओही रस्तासँ गेल छलि। पछबारि गाम बाली अपना समयमे सुन्दरि छलि। ओकरापर दामोदर बाबूक नजरि गरि गेलनि। ओकर बिआह अपन खबाससँ करा देलनि। खबास शुरूएसँ नंगराइत छल। एक दिन हल्ला भेलैक जे तेतरि तर केदनि सभ ओकरापर आक्रमण कए देलकै जाहिमे ओ गम्भीर रूपसँ घायल भए गेल। बादमे मास दिन जेना-तेना खेपि ओ स्वर्गवासी भए गेल। तहियेसँ पछबारि गाम बाली दामोदर बाबूक क्षत्रछायामे पोसाइत रहल। पछबारि गाम बालीकेँ ओकर बादो कैटा धिया-पुता होइत रहलैक। मुदा कैक बेर गाममे गुल्लर उठलैक। दामोदर बाबूकेँ चला-चलती रहनि। के बाजत हुनकर विरोधमे। पछबारि गाम बालीक तीनू बेटीकेँ ई गप्प बूझल छलैक। ओ सभ अपन आचरणोमे एहि बातकेँ पुष्टसँ स्पष्ट कए रहल छलि। दामोदर बाबूकेँ तीनटा पुत्र छलखिन। आ तीनू फराक। तीनू बहिन तीनू मालिकक घरमे काज करए। काज तँ जे से ओहुना ओकरा सभहक आएब-जाएब रहिते छैक। मुदा पछबारि गाम बाली असगरे ओहि टोलमे हो से गप्प नहि। एकटा खिस्सा सबहक नामक संगे जुड़ल छैक। ओना ई सभ ततेक सामान्य घटना भए गेल छलैक जे ककरो विशेष ध्यान ओमहर जेबाक प्रश्ने नहि छलैक। ओहि दिन छोटका लोक सभमे बेस हल्ला भेलैक। ओना सामान्यत: ओहि टोलमे हल्ला होइते रहैत छलैक। तेँ ककरो ध्यान ओहि हल्लापर नहि जाइक। पुरवारि गामवाली उत्तरवरिया टोलक एकटा बड़का लोक छौड़ाक संगे कतहुँ रातिमे भागि गेल छलैक। ओना काना-फुसी तँ होइते रहैत छलैक। मुदा गप्प एतबा धरि बढ़ि गेल अछि, तकर अन्दाज ककरो नहि रहल होयतैक। भरि दिन टोलमे एही बातक चर्चा होइत रहलैक। एवम्-प्रकारेण सौंसे गाम पुरनका लोकपर फेर सरकए लागल। मुदा बेचनक आत्मा एहि सभ गप्पसँ दुखी छल। ओकर मोनमे क्रान्तिक आगि सुनगि रहल छल। एम.ए. उतीर्ण छल अर्थशास्त्र लए कए। आर्थिक परिपेक्ष्यमे गरीब सबहक सामाजिक शोषण ओकरा बड़ पैघ जुलुम लगैत छलैक। मुदा वो लड़त ककरा लेल। क्यो ओकर गप्प सुनबाक हेतु तैयार नहि छलैक। गरीब सभ दाना-दानाक मोहताज छल। ओकरा रोटी चाही से जेना हो। ने ओकरा हेतु कोनो सामाजिक मान्यताक कोनो महत्व छलैक आ ने नैतिकताक ओकरा छुति छलैक। मात्र रोटीटा चाही। मुदा बेचन बुझैत छलैक जे ओ सभ भूखक आवेशमे रोटीमे जहर मिला कए गिरि रहल अछि। समाजक नामी लोक सभ जे प्रतिष्ठाक पात्र मानल जाइत छथि, तिनके लोकनिक आचरण देखि वो क्षुब्ध छल। मुदा कइये की सकैत छल? असगर वृहस्पतियो झूठ। जे शोषित वर्ग छलैक तकरा लेल धनि-सन। ओ सभ ओहीमे रमि गेल छल। मालिक सबहक नेकरम करबमे। दूटा रोटी खाएब ओ मालिकक हुकुम बजाएब। ई सभ एकटा सामान्य घटना भए गेल छल। ओकरा सभ हेतु ने देशक आजादी कोनो रंग अनने छल आ ने बेर-बेर होमए बला चुनाव सभ। अलबत्ता जखन चुनाव होइत छलैक तँ लॉडस्पीकरक आवाजसँ ओ सभ एक बेर चौंक जरूर जाइत छल। छोटका लोकक नेता सभ माइन्जन लए कए घरे-घरे राति भरि घुमैक। सभकेँ पाँच-दसटा रूपैया दैक ओ सभकेँ नीकसँ सीखाबैक जे कतए मतक मोहर मारबाक छैक। साइकिल छाप, तराजू छाप, घोड़ा छाप आदि-आदि। एकटा रोचक प्रसंग होइत छलैक चुनाव ओकरा सभ लेल। मुदा कै बेर जाधरि छोटका लोक सभक लोक सभ मतदान खसबए जाइत छलैक ताधरि ओकर सबहक मत खसि पड़ल रहैत छलैक। ओ सभ मतदान केन्द्रपर जमा भीड़क तमासा देखि कए आपस भए जाइत छल। कोनो प्रतिकृया नहि। स्त्रीगण सभ अपनामे गप्प करैत- “गे दाइ, हमरा तँ बड़ डर लगै रहइ। कोना कए मोहर मारितिऐ। कहीं हाकिम पकड़ि लइत।” किछु स्त्रीगण सभ अहिना गप्प-सप्प करैत छलैक कि पैट्रोलींग करैत पुलिसक जीप भीड़क कारणे ओतहि ठाढ़ भए गेलैक। सभ क्यो जान-बेजान भागल। बाह रे मतदाता! बेचन ई सभ देखि रहल छल्। ओकर मोन कसमसा रहल छलैक। मुदा की करए। एहिना कहि नहि, कैक बेर चुनाव अएलैक, गेलैक। मुदा ओकरा सबहक लेल धनि-सन। एवम्-प्रकारेण सौंसे गाम दू खण्डमे बँटल रहल। शोषक ओ शोषितक बीच एहन सौमनस्य देखि बेचन क्षुब्ध छलाह। ओ सोचलाह जे एक बेर फेर प्रयास कएल जाए। रातिक ९ बाजल रहैक। ओ छोटका लोक सबहक घरे-घर घुमि कए अपन घर लोटि रहल छलाह। बड़का लोक ओ छोटका लोक सभक बीचमे नान्हिटा कलम छलैक। धराम-धराम। चारू दिसिसँ बेचनक कपारपर लाठी बरसए लागल। “आब बोलो बड़ा चला है हीरो बनने। यह कालेज नहीं है। गाम है।” पता नहि की की बजलै वो। आ परिणामत: बेचन धारासाही भए गेलाह। सौंसे गाममे हल्ला भए गेल। छोटका लोक सभ नि:सहाय भए ओहिना अपन-अपन मालिकक काजपर चलि गेल। बेचनक लाश ओहिना एसगर राति भरि पड़ल छलैक। भोर भेने दामोदर बाबू थानामे रपट लिखा अएलाह। मामला रफादफा भए गेल। ओहि गामक क्रान्तिक स्वर सभ दिनक लेल गुम्म भए गेल। दुर्गानन्द मण्डल लघुकथा- सीख नान्हियेटा मे बुधुआ बुढ़िया दादीकेँ एक दिन तंग-तबाह केने छल। “दाय यइ दाय एकटा खिस्सा कहियौ। नीमन खिस्सा कहियौ। झब-दे कहियौ, नहि तँ ठोँठ दाबि कऽ मारि देब।” “रउ सरधुआ, छोड़ ने रौ। गरदैन छोड़ ने, नहि तँ मरि जाएब।” दाय जोरसँ चिचिआ-चिचिआ ई कहैए। “अरौ बाप रौ बाप। ई छौड़ा हमरा मारि देलक!” बुधुआ दाइक गरदैन छोड़ि देलक आ जा कऽ दाइक कोरामे बैस जाइए, खिस्सा सुनैले। दाय खिस्सा शुरू केलैन। एक नगरमे एकटा राजा छेलइ। ओकरा फूलक एकटा बड़का फुलबाड़ी छेलइ। जइमे सभ तरहक फुल रोपल छेलै आ बहुत रास फूल फुलाएलो छेलइ। जइमे एकटा बड़ सुन्दर फूल खिलल छल। नमहर आ सुन्दर सेहो छेलइ। सभ फूल ओकरा राजा-गुलाब कहै छेलइ। रसे-रसे राजा गुलाब आन-आन फूल सभसँ अपन प्रसन्नता पाबि अंहकारी भेल जे छल। ओ एतेक अहंकारी भऽ गेल जे आब ओ आन-आन फूलसँ बातो ने करए चाहै छल। मुदा आन-आन सभ फूल राजा गुलाबक ऐ बेवहारकेँ ओकर नादानी बुझि ओकरा सम्मान दइते रहल। ओइ राजा गुलाबक जड़िमे एकटा बेश नमहर करिया पाथर गाड़ल छेलइ। अकसरहॉं ओइ करिया पाथरकेँ ओ राजा गुलाब डॉंटैत रहै छेलइ। जे तोरा कारण हमर रूप आ सौन्दर्य खराप भऽ रहल अछि। तों केतौ किए ने चलि जाइ छेँ। ओ पाथर कएक बेर राजा गुलाबकेँ समझौलक। जे एतेक घमण्ड नीक नइ होइ छइ। मुदा राजा गुलाब अहंकारमे मातल अकैड़ कहलक- “अरे काला पाथर, हमरा आगॉं तोहर कोन तुलना। तूँ तँ हमरा शरणमे पड़ल छेँ।” समय बीतैत गेल। किछु दिनक पछाइत एक बेकती ओइ फुलबाड़ीमे आएल। घुमैत-घुमैत ओकर नजैर ओइ पाथरपर पड़लै। ओ ओकरा उखाड़ि अपना संग नेने चलि गेल। राजा गुलाबक खुशीक कोनो ठेकान नहि रहलै। ओ सोचए जे नीक भेल ई पाथर ऐठामसँ हटि गेल। अनेरे ई हमर सुन्दरताकेँ खराप करै छल। समय बीतैत गेल। थोड़बे दिनक पछाइत ओही फुलबाड़ीमे एक आदमी ओइ फुलबाड़ीमे आएल। ओकरा ओ राजा गुलाब फूल खूब नीक लगलै। ओ ओकरा तोड़ि एकटा मन्दिरमे जा भगवानक मूर्तिक चरणमे समर्पित कऽ देलक। राजा गुलाबकेँ ओतए एकदम नीक नै लगै छेलइ। ओकरा अपन पैछला दिन-राति मोन पड़ए लगलै। ओकरा फुलबाड़ीमे भेटए-बला सम्मान सेहो मोन पड़ए लगलै। ताबत ओकरा केतौसँ हँसी सुनाइ पड़लै। ओ गुलाब एमहर-ओमहर चारूकात तकलक मुदा केकरो ने देलक। ताबत ओकरा एकबेर दिव्य आवाज सुनि पड़लै- “राजा गुलाब, तूँ एमहर-ओमहर की देखै छेँ। हमरा देख। हम वएह पाथरक मूर्ति छी, जेकरा तूँ ओइ फुलबाड़ीमे तुच्छ बुझि सदिखन कटैत रहै छेलेँ। आइ देख जे तूँ हमरा शरणमे पड़ल छेँ।” राजा गुलाब तँ आश्चर्यचकित छल। बाजल- “भाय पाथर, तूँ एतए एलेँ केना?” ओ मूर्ति रूपी पाथर बाजल- “सून राजा गुलाब, जे बेकती हमरा एतए अनलक ओ एकटा मूर्तिकार छल। ओ हमरा छेनी-हथौरीसँ तोड़ि-ताड़ि पाथरसँ भगवान बना ऐ मन्दिरमे स्थापित कऽ देलक। आ तूँ..?” राजा गुलाब आत्म ग्लानिसँ भरल ओइ मूर्ति रूपी पाथरक सामने सिर झूका क्षमा याचना करैत बाजल- “भाय, अहंकारीक सिर सदिखन निच्चॉं होइते छइ। अत: मानवकेँ अपन अहंकारक त्याग कऽ देबाक चाही। ताकि ओकरा अपन हस्तीक पता रहइ।” से सुन बौआ रौ बुधुबा, एतए बदमाशी नइ कर। सुन कहबी छै- मेटा दिअ अपन हस्ती यदि मतिवा चाही कि दाना, माटिमे मिल कऽ गुले-गुलजार होइए। सीख- कखनो फूलक समान नै जीबू, जइ दिन जरूर खिलब आ तोडल जाएब। जीनाइ यदि छह तँ पाथर बनि जीबह, जइ दिन तराशल जेएब, भगवान बनि जाएब। बुधुबा तँ तात दाइक कोरमे अलिसा गेल छल। लघुकथा- बोझ अशर्फी बाबाकेँ मात्र दू गोट सन्तान। एकटा बेटा आ एकटा बेटी। दुनू नैन्हियेटा सँ पढ़ै-लिखैमे बड़ तेजगर। छेटगर भेलाक बाद बेटीकेँ बिआहि अशर्फी बाबानिचेन भऽ गेला। किछु दिनक पछाइत बेटोकेँ बिआहि निचेन भेला। बेटा बी.कम केने छेलैन तँए दिल्लीमे एकटा नीक प्राइवेट फार्म नोकरी भऽ गेलइ। कनी दिन तँ बेटा जेना-तेना दिल्लीमे असगरे रहलै, बादमे ओ अपना घरवालीकेँ सेहो गामसँ दिल्ली लऽ गेल। आब घरपर रहि गेला अशर्फी बाबा आ हुनकर घरवाली। भगवतीक कृपासँ घरवाली निरोग पड़ि लागल छेलैन जे खेती-पथारी नीक नहाँति कऽ लइ छल। बीस बीघा जथा रहबाक कारणे अशर्फी बाबाकेँ कथुक खगता नहि बुझना जाइ छेलैन। अन्न-पानिसँ साल भरिक बुतात निकालि फील फाजिल भेलाक बाद बेच-बिकैन कऽ नीक पाइयो भऽजाइ छेलैन। नून-तेल-तीन-तरकारी लेल तँ धानेक पान तँ मोर सैंयाकेँ किए न पान। जीवन-यापन बड़ बढ़ियाँजकाँ चलै छेलैन। मुदा एते भेलाक बादो कहियो-काल जीवनबड़ा एकाकी बुझना जाइ छेलैन। किएक तँ घरमे ने तँ नाति-नातिन रहै छेलैन आ ने पोता-पोती। बेटियो-जमाए आ बेटो-पुतोहु अपन-अपन जिनगीमे मस्त रहै छल। केकरो माए-बापक सुधि लेबाक पलखैत कहाँ। बेटी-जमाए तँ दोगा-दोगी फोन-तौन कैयो लैन मुदा बेटा-पुतोहु सोल्हन्नी अपनेमे मस्त। ऐबेर समय-साल नीक भेलाक कारणे खेरहीक फसिल नीक छल। तीन छोहेन सम्हैर कऽ तोड़लाक बाद अशर्फी बाबा ओकरा तैयार कऽ नीक दाम पाबि करीब दू मन घरबेद-ले रखि करीब पाँच बेरा बेच लेलैन। चारि हजार रूपैआक हिसाबसँ बीस हजार रूपैआ अशर्फी बाबाकेँ भेलैन। मने-मन हिसाब बैसा पाँच हजार रूपैआ घर-बेद समय-कुसमय-ले रखि पनरह हजार रूपैआलऽ अशर्फी बाबा दिल्ली अपना बेटालग चलला। दिल्ली पहुँच डेराकपतासँ बस लऽ बेटाक डेरापर पहुँच केबाड़कँ ढक-ढकौलैन। केबाड़ खेलैत एकटा बच्चा भीतरेसँ पुछलकैन- “कौन है?” ओ बच्चा अशर्फी बाबाकेँ नै चिन्हैन। पछाइत पुतोहु घरसँ निकैल, ससुरकेँ देख गोर लागि केबाड़क पट्टाकेँ भीतरे दिस खोलैत भीतर एबाक लेल कहलकैन। अशर्फी बाबा भीतर जा टेबुलपर राखल प्लाष्टिकक बोतलमे भरल पानि उठा बेसिनमे कुकुड़-आचमैन कऽ गमछासँ हाथ-मुँह पोछि कुर्सीपरबैसला। आगामे चाहक कप एबासँ पहिने कनियाँ अपन घरबलाकेँ फोन केलैन जे गामसँ बाबूजी एला हेन। पता नै किए? से ऑफिससँ सोझे डेरा चल आउ। बेटा माथपर हाथ लैत किछु सोचैत बजला- “अच्छा ठीक छइ।” आ तखनसँ गुम-धुनमे पड़ि गेला। जे बाबू किए एला हेन। डेरा पहुँचला, परनामे-पाती केलाक बाद वातावरण एकदम शान्त भऽगेल। दुनूपरानी मने-मन सोचैथ एक तँ वित्तीय वर्ष भेलाक कारणे हाथ खाली-खाली। बेतनक कोनो थाह नहि। ऊपरसँ ऐ बेरक नोटबन्दीक मारि, बेटाक रिजल्ट एला बाद ओकर एडमीशनक समस्या। बेटीक सेहो ऐ स्कूलसँ बदैल दोसर स्कूलमे नाओ लिखाएब। कनियाँ सेहो नैहर जेती। किएक तँ बहिनक बिआह छैन। एहेन समयमे बाबूजी एला हेन। पता नहि की मंगता आ केते मंगता। ऐ बीचमे कोनो फौनो-तौन नहियेँ केने छेलिऐन, पता नहि की सोचैत हेता..? अही उहापोहमे एक दिन आ एक राति बीत गेल। मुदा वातावरण बिल्कुल गमगीने छल। बापक सोच किछु और छल आ बेटा-पुतोहुक किछु आर। ओ सोचैत जे देखियो, केहेन समयमे बाबूजी कपारपर आबि बसि गेला। की करी आ की नहि करी, समस्या बनल छल। दुनू परानीकेँ किछु फुरबे ने करैन। अशर्फी बाबाक वास्तविक ओजनसँ कइ गुणा ओजन गर हुनका दुनू पानीकेँ बुझना जाइन। दोसरे दिन जखन कोनो तरहक खास गप-सप्प नै भऽ सकल तँ अशर्फी बाबाकेँ होइन जे हमर बेटा-पुतोहु कोनो तकलीफमे अछि। ओम्हर दोसर दिन जखन गाम एबाक लेल अशर्फी बाबा कोनो चर्चेने केलैन तँ आरो भारी समस्या भऽ गेल। आब तँ हुनकर बेटा-पुतोहु देवो-पित्तरकेँ कोसए लगलखिन।एक तँ हाथ खाली ऊपरसँ बाबूजी आबि बैसल छैथ। अशर्फी बाबाक ओजन तँ जेना बढ़ले जाइन। थाकि-हारि तेसर दिन जलखैक उपरान्त अशर्फी बाबा गामेसँ आनल पनरहो हजार रूपैआ बेटाक हाथमे दैत बजला- “बौआ, हे ई राखह। पनरह हजार छह। ऐबेर बड़ सुन्दर खेरही भेल छल। पाँच बोरा बेचलौं। दू मन घरो-वेद समय-कुसमय-ले रखलौं। पनरह हजार रूपैआ छह। तूँ अखनी दिक्कतदारीमे छह समयपर काज औतह।” ई कहैत अशर्फी बाबा जे स्वयं बेटा-पुतोहु लेल बोझ बनल छला से बेटा-पुतोहुक बोझ उतारि गाम एबाक लेल विदा भऽ गेला। बेटा-पुतोहु तँ अबाक्..! की ठीके एहेन जमाना चलि एलै जे अपन पाँच आदमी परिवारमे छठम आदमी बापक रूपमे बोझ बोझ छै, बोझ? डॉ. बचेश्वर झा मौलाइल गाछक फूल : जगदीश प्रसाद मण्डल ‘मौलाइल गाछक फूल’क लेखक श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ हम साधुवाद दैत छियन्हि जे हिन्दी आ राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्त होइतहुँ अपन मातृभाषाक प्रति अटुट सिनेह राखि मैथिलीमे लेखन करबाक भगिरथी प्रयास कएल अछि। ओना तँ मैथिलीमे अनेकानेक साहिन्यकार लोकनि चेष्टा कएल अछि। हुनका लोकनिक भाषामे फेंट-फाँट भेटल अछि, किन्तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि। प्रान्जल भाषा गमैया भाषाक आगाँ घुटना टेक दैत अछि, जन साधारण अल्पो शिक्षितकेँ गुद-गुदीक संग विषय अन्तस्थलीकेँ छुबि लैत अछि। वैचारिक दृढ़ता एवम् हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीशजीमे विरल अस्तित्वक परिचय दैछ। उपन्यासक प्रत्येक लेखपर माने उपकथापर दृष्टि दैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्यक्षदर्शी भऽ विषयक निरूपण कएल अछि। ओना तँ शिक्षाक सीढ़ीकेँ पार कऽ लेखक कलाक बलवती इच्छा राखि मैथिलीक वाटिकाकेँ पल्लवित-पुष्पित करक भरपूर प्रयास कएलनि अछि। गाम ठामक बिलक्षण चित्रण हिनक लेखनीक विशेषता ऐ पोथीमे देखल जाइछ। हिनका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सिनेही कही तँ सर्वथा उपयुक्त होएत। ऐमे सामाजक ओइ वर्गक समीक्षा कएल अछि जकरापर आइधरि कियो सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीक मैथिलीमे समाहित कएने छथि। हमरा तँ लगैत अछि माए मैथिली लेखकक माथपर चढ़ि कऽ एहन चमत्कारी उपन्यास लिखक हेतु प्रेरित कएल अछि। फणिश्वर नाथ रेणु आ यात्रीजीक उपन्यासमे सामाजिक रहन-सहन वैचारिक भिन्नता अर्थाभावक कारणे स्वाभिमानक हनन जौं देखबामे अबैत अछि तँ सम्प्रति उपन्यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्यक्ष दिग्दर्शन अति मार्मिक अन्तर मोनकेँ सोचवाक लेल उत्प्रेरित करैछ। मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे जन्म नेनिहार लेखक एतेक सुन्दर, सुवोध आ सुगम्य ढंगसँ विषएकेँ निरूपित कऽ पाठकक जिज्ञासाकेँ अन्त धरि बढ़बैत गेल छथि जे चिक्कन, चोटगर आ चयन लेल वाध्य करैत अछि। मैथिली साहित्याकाशक ई ज्योर्तिमान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथिली साहित्यक भंडारकेँ समृद्धता अनबामे योगदान कएल अछि। ओना तँ औपन्यासिक विचारानुसार ऐ उपन्यासमे त्रुटि अछि। एकरा उपन्यास कहल जाए वा सामजिक निबंध तइ परिप्रेक्ष्यमे विद्वान पाठके निर्णए कऽ सकैत छथि। मुदा हमरा तँ लेखकक ऐ उपन्यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चित्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि जेना- एक ओर अनुप वोनिहारक बेटा बौएलाल भूख-पियाससँ आकुल अछि इनारक पानि भरबामे डोरी डोलक प्रयोजन छैक तँ दोसर दिसि रमाकान्त आ हीरालालकेँ आधुनिक कालमे शराब चुस्कीक चर्चा होइत अछि तँए उपन्यासक विषए-वस्तु समए बद्ध नै रहलासँ औपन्यासिक दोष लक्षित होइत अछि। स्वीकार करए पड़ैत अछि जे हिनक ई उपन्यास विषय-वस्तुकेँ तइ रूपेँ समेटने अछि जेना सितुआमे समुद्र समाएल हो। लेखक जगदीश प्रसाद मण्डलजीक प्रयास आ आयास दुनू साराहनीय छन्हि। हम माँ मैथिलीसँ प्रार्थना करैत छी जे हिनकामे स्फूर्ना बनल रहनि जाहिसँ मैथिली साहित्यक सम्वर्द्धन होइत रहए। मिथिलाक विभूति आयाची मिश्र मिथिलाक भूमि एहन अछि जाहिठाम अदौसँ माँ मैथिलीक कोखिसँ विद्या भास्कर लोकनि जन्म ग्रहण करैत रहलाह अछि। एहि सरिसबक माटिमे माँ मैथिलीक कोखिसँ एक एहन सूर्यक उदय भेल जे जन्म-ग्रहण करितहि अपन रश्मिसँ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक क्षेत्रकेँ आलोकित कएल। विद्याध्ययन कऽ कौलिक मर्यादाक रक्षा कएलन्हि। एहन प्रात: स्मरणीय संतोषी, तपस्वी, निर्लोभी एवम् निरासक्त व्यक्ति भवनाथ मिश्र छलाह। हिनकासँ पूर्व आ पछातियो अनेक सरस्वतीक वरद पुत्र लोकनिक नाम लेल जा सकैछ जे मिथिलाक रहितहु मिथिलेत्तर प्रान्तोमे अपन नामोज्वल कएने छलाह ओ लोकनि थिकाह- “गौत्तम, कणाद, याज्ञवल्क्य, उदयनाचार्य, पक्षधर, मण्डन मिश्र, वाचस्पति, जय कृष्णा, त्रीलोचन, हरि मिश्र, गंगेश, विद्यापति, चन्दा झा, भारती, गार्गी, लक्ष्मीनाथ प्रभृति।” एहूमे अधिकांश सरिवसक माटिमे उत्पन्न भेनिहार छलाह। तप: पूत, परम ज्ञानी, शास्त्रानुसार चलनिहार एवम् नवन्यायक निष्णात भवनाथ मिश्र आजीवन ककरोसँ किछु याचना नहि कयल तेँ ई अयाचीक नामसँ बहु चर्चित भऽ गेलाह। अपन उपनाम अयाची सँ जगत विख्यात भेलाह। अभाव ओ असंतोषकेँ अपना लग कहियो फटके नहि देलन्हि। मात्र सवा कट्ठा बाड़ी जगह खेत ओ खरिहानक काज करैत छलन्हि। एहीसँ जीविका चलैत छलन्हि। दुर्वासा दूभिक रस खाय रहैत छलाह। तेँ अयाची साग-पात खाय काया ठाढ़ रखने छलाह। भव नाथक ‘अयाची’ टेक तोड़बा लए दैविक आ लौकिक प्रलोभवन सभ आएल मुदा ई टस-सँ-मस नहि भेलाह। एहि तरह संकल्पक पालनमे हिनक धर्म पत्नी भवानीक सेहो सराहनीय सहयोग रहल। एहन आस्तिक दम्पतिक कोखिसँ अद्भुत संस्कारी पुत्रक जन्म भेल कहबी छैक ‘बाढ़े पूत पिता के धर्मे’ बालकक नाम शंकर मिश्र राखल गेल। शंकर शंकरे समान छल। त्यागसँ अमरत्वक प्राप्ति होइछ। असली सुख त्यागेसँ भेटैछ। त्यागी लोकक तुलना ककरोसँ नहि कएल जा सकैछ। अयाची द्वारा सांसारिक सुखक त्याग एक प्रेरणा पुंजक रूपमे अछि। वास्तविक ओ विशिष्ट आनन्दक अनुभूति त्यागीकेँ होइछ। बिना संकोच कहल जा सकैछ जे अयाची पारखी छलाह तेँ ने ओ त्याग मय जीवन जीबाक आदर्श उपस्थित कएल। एहि सन्दर्भमे कविक उक्ति अछि- “धन्य-धन्य मातृभूमि, सकल ज्ञान-गुणक खान कतहु सबा कट्ठा मात्र बाड़ीक साग-पात, औखन चमकैत अछि अयाचीक स्वाभिमान।।” पूजा-पाठमे लीन रहनिहार अयाची पलखति भेलापर विद्या विलासमे लीन होथि। हुनक ख्याति सर्वत्र पसरि गेल छल। जखन दूर-दूरसँ जिज्ञासू छात्र लोकनि शंकाक समाधानार्थ हिनका लग अबैत छल तँ ई अपन बालककेँ भिड़ा देथि। आगन्तुक छात्रकेँ झुझुआइत देखि अयाची बुझि जाथि जे बालक शंकरक वयस कम तेँ ई लोकनि अपन अपमान बूझैत छथि तखन ओ कहि देथिन्ह जे शंकरक वयस नहि देखू। बालक शंकरक प्रखड़ विद्वताक थाह पाबि ओ लोकनि स्वीकारैत छलाह जे मिथिलाक जतेक नाम सुनल ताहिसँ बेसी एहिठामक विशेषता अछि। अयाची पुत्र शंकरक संस्कार देखि मुक्त कण्ठसँ हिनक भाग्यक भूरि-भूरि प्रशंसा करथि। भवनाथ जौं महादेव तौं भवानी सद्य: पार्वती प्रतीक छलीह। निर्धन पतिक अनुगामिनी, सती साध्वी ओ परम सहिष्णु छलीह। टकुरीसँ सूत काटि वस्त्र अपन आ पतिक हेतु ओरिआउन कऽ लैत छलीह। अभावी घर रहितो आतिथ्य भावमे अग्रगणी छलीह। जनश्रुति अछि एक समय अतिथि-सत्कारक हेतु घरमे ओरिआउन नहि भेलापर लोटा बन्धकी राखि भोजन सामग्री जुटाए बाड़ीसँ खम्हारू उपाड़ैत छलीह कि एक तमघैल स्वर्ण मुद्रा प्राप्त भेलन्हि। भवानी पुलकित भऽ गेलीह जे आब दरिद्रीक अन्त भऽ जाएत। मुदा अयाची लोहि स्वर्ण मुद्राक तमघैलकेँ अपन पुत्र शंकरक द्वारा राजाक कोषमे जमा करा देलन्हि किएक तँ माटिक धन राजकोष थिक। एहिपर हुनक पत्नी विचलित रहि गेलीह। एकरा दैवी प्रलोभन कहि सकैत छी। मिथिलाक सभ्यता ओ संस्कृति संसारक सभ्यता ओ संस्कृतिसँ श्रेष्ठ अछि। विभिन्न ठामक विद्वान एहिठाम वर्षे रहि अपन ज्ञान पिपासाकेँ शान्त करैत छलाह। एहिठामसँ सभ्य ओ सुसंस्कृत भऽ जाइत छलाह। अपन संस्कारक परिचय लग-भग पाँचे वर्षक अवस्थामे अयाची पुत्र शंकर मिथिलेशकेँ जखन देल तँ ओ अवाक् रहि गेलाह आ अयाचीक तपश्ययाक प्रसादात् बालक बुझि नतमस्तक भऽ अभिनन्दन कएलन्हि- शकरक उक्ति : “वालोहं जगदानन्द, नमे बाला सरस्वती, अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णेयाम जगत्रयम्।” भवनाथ ओ भवानी दुहुक कर्म-कमलसँ धर्मक जे पराग झड़ल ताहिसँ मिथिलाक माटि अपलखित अछि। अयाचीक निर्लोभता प्रस्ट प्रमाण तखन भेटैछ जखन मिथिलेश बालक शंकरक संस्कारसँ संतुष्ट भऽ अपन वेश कीमती रत्नक माला दर्गनि उतारि शंकरक गरामे पहिरा देल आ एक मोटरी स्वर्ण मुद्राक संग स्वयं हाथीपर बालक शंकरकेँ अयाचीक डीहक माटि माथमे लगएबाक हेतु नेने एलाह। मिथिलो चित ढंगसँ तत्कालीन महाराजक सम्मान कएल। महाराज हिनक दैन्य दशा देखि खोरिस हेतु प्रर्याप्त धन प्रदान करबाक ईच्छा प्रगट कएल तँ अयाची करवद्ध कहल- “अपने हमर टेककेँ नहि तोड़ू। हमरा कोनो वस्तुक प्रयोजन नहि अछि। ई व्रत निमहि जाय इएह हमर आकंक्षा।” मिथिलेश हुनक चरण रज लऽ अपना कए धन्य मानल। बादमे भवानी बालक शंकरक कमाइ पुरस्कारसँ भिज्ञ करोलन्हि तँ प्रसन्न भेला जे आब दरिद्रता भागि जाएत मुदा तत्क्षणहि बालक शंकरक जन्मक समय मरनी चमैनकेँ निछाउर किछु नहि देने छलीह से मोन पड़ि गेलन्हि। ताहि समय सहर्ष कहल जे ई सभटा रत्न स्वर्ण मरनीकेँ बाजा कए देल जाय। दुनू प्राणीक मतैक्यसँ मरनी डरीनकेँ दऽ देल गेल। ओहो एहि प्राप्त धनकेँ धर्म काज बुझि पैघ पोखरि खुनाए देलक। जे मधुबनी जिलान्तर्गत विद्यमान अछि, मुदा काल-क्रमे ई पोखरि विकृत ओ भथन भऽ गेल अछि जे औखन चमनिया-डावर नामसँ जानल जाइछ। एखनहुँ ई श्लोक अयाची मिश्र पुत्र शंकर आ पक्षधर मिश्रक प्रति अछि- “शंकर वाचस्पतियो: शंकर वाचस्पति सदृशी, पक्षधर प्रति पक्षी भूतो न भवति।” अर्थात् शंकर ओ वाचस्पति तँ महादेव आ वृहस्पतिये छलाह। कहल जाइछ जे अयाचीक शंकर पक्षधर मिश्रक बाद भेल छलाह। ईहो अनुमान अछि जे मिश्र उपाधि- ओहि समयमे विद्वान लोकनिक होइत छल। खेदक विषय अछि जे एहन उद्भट न्यायक पण्डित अयाचीक कीर्त्ति गाथाक कोनोटा प्रमाणिक पोथी- आ हिनक जन्म सम्बन्धी ई. सनक परिचय- ठोस रूपमे नहि प्राप्त अछि। अयाचीक निर्माउल भूमि सरिसब अद्यावधि म.म. सर गंगा नाथ झा एवम् हुनक पुत्र लोकनि सन विभूतिक जन्म देने अछि। कवि सेहो अयाचीक डीहक माटि माथमे लगबैत कहि उठैत छथि- “हे डीह! अमर कीर्त्तिक निधान जकरा कण-कणमे स्वाभिमान। थिक विप्र अयाचीक वर्त्तमान से माटि थिक चन्दन समान। सबा कट्ठा बाड़ीक साग रखने छल अयाचीक पाग।।” अन्तमे श्रद्धा सुमन चढ़बैत एहि मिथिलाक विभूतिकेँ नमन करैत छी। मैथिली साहित्यमे यदुनाथ झा ‘यदुवर’क देन सहरसा जिलाक प्राचीन लेखक वा कवि लोकनिक विस्तृत परिचय प्राप्त करबाक साधन नहि अछि। यद्यपि हुनका लोकनिक रचना अधिकांशत: प्रकाशित होइत छल ‘मिथिला मोद’मे परन्तु कोनो साहित्यकार अपन परिचयक प्रसंगमे नहि लिखैत छलाह। यदुनाथ झा ‘यदुवर’ मैथिली भाषा एवम् साहित्यक विकासक लेल ‘मोद युग’मे जे कोनो अनवरत साहित्य रचना करैत रहलाह ताहिमे सँ एक प्रमुख व्यक्ति रहथि ‘यदुवर’ सहरसा जिलाक मुरहो गामक वासी, शिक्षे संस्कृतक विद्वान डाक-तार विभागमे जीविकापन्न रहथि। मिथिला मोदक एक सशक्त लेखक आ व्यापक अर्थमे जातीय हित चिन्तक छलाह। हिनक जन्म अनुमानत: 1888 ई. तथा मृत्यु 1932 ई.मे भेलन्हि। मोदक जन्महिसँ हिनक रचना उपलब्ध भेल छल। डॉ. जयकान्त मिश्र हिनक प्रसंगमे कहैत छथि- ‘Enthusiasm for Maithili unbound, Very few well Parallel to him’ मैथिली साहित्यमे गीतक जे एकटा सशक्त परम्परा अछि ताहि क्रममे यदुवरजी बहुत गीतक रचना कएने छथि। ओकर विषय वस्तु प्रतिपादन करबाक शैली आदिमे परिवर्त्तन कऽ देलन्हि। गीतहुमे हुनक नव दृष्टिकोणक अभिव्यक्ति भेल अछि। गीतक अतिरिक्त अनेको कविता, कैकटा निवन्ध मिथिलाक एक जटिल समस्या, वैवाहिक समस्याकेँ प्रस्तुत करैत कथा आदि प्रकाशित छनि। हिनक विचारधारा कतेक प्रगतिशील एवम् आधुनिक छलनि से स्पष्ट रूपेँ अभिव्यक्त भेल अछि। मैथिलीक राष्ट्रीय गीतक संकलन मैथिली गितांजलीक भूमिकामे संकलन एवम् प्रकाशन कय यदुवरजी एकटा नव दिशाक संकेत कयलन्हि जकर ऐतिहासिक महत्व छैक। भूमिकामे स्पष्ट कहने छथि : ज्ञान श्रृंगारिक सम्बन्धी कविता पराकाष्ठा धरि पहुँचि गेल अछि आब राष्ट्रीय विषयक कविता पराकाष्ठा धरि पहुँचेबाक अछि। आब राष्ट्रीय विषयक कविताक प्रकाशन होयब परमावश्यक अछि। एहिसँ सिद्ध होइछ जे मैथिलहुमे राष्टीय भावना एवम् आधुनिक विचारधाराक प्रादुर्भाव होमए लागल। शंकरक विवाह नामक गल्प, प्रभात प्रभा, मैथिलीक आरती नव युगक लोकनिसँ। गृष्म ऋृतु वर्णन भ्रमर आदि काव्य रचना तथा वसन्त आदि निवन्ध प्रकाशित छनि जकर उल्लेख आगाँ कयल जाय। मैथिली समाजक व्यापक रूपेँ हित चिन्तक मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक उन्नतिक हेतु सतत संघर्षशील। यदुवरजी कतहु कतहु परंपराक पालन करितहु विषय-वस्तु एवम् शिल्प दूहूमे नवीनता आनि देलनि। देश भक्ति भावनाकेँ स्पष्ट रूपेँ मुखरित कयने छथि। सर्व प्रथम प्रस्तुत अछि हिनक किछु गीत। स्वभाविक धार्मिक प्रवृत्तिक रहबाक कारणेँ भक्ति गीतक रचना करब स्वाभाविक। थोड़ शब्दमे हृदयक भक्तिभाव अभिव्यक्ति करैत- ‘दुर्गाक वन्दना : जय जय दुर्गे, दुरित निवारणी, भव भय हारिणी रिपु संहारिणी, जन सुख कारीणि तारीणि, वढ़ु तनु धारिणी जगदुपकारीणि, शिव संग सतत विहारीणि, जय नारायणी नरक निवारीणि यदुवर अधम उधारीणि।। तीनटा गीतमे चण्डीक वन्दना कयने छथि। जाहिमे देश भक्तिक भावनाक जे अभिव्यक्ति भेल अछि से पाँतीएसँ स्पष्ट होइछ। “मिथिलाक मान राखू भारतमे चण्डी, एरहु सभ पाप हो रामा।।” दोसर गीतमे भगवतीकेँ उपराग दैत छथिन्ह जे जाहि भूमिसँ अहाँ जन्म लेलहुँ तकरे आइ दुर्दशा अछि आ से अहाँ देखैत छी। विषम वस्तु एवम् विचारधारामे कतेक आधुनिकता छलनि तकर उदाहरण अछि- “मैथिलीक आर्ती नामक कविता।” एहिमे मैथिली अपन सन्तानकेँ करूण स्वरेँ अपन दुर्दशा दूर करबाक लेल कहैत छथिन्ह। मिथिला शिक्षित समाजकेँ जे अपनाकेँ प्रवुद्ध मानैत छलाह हिन्दीए प्रिय छलैन्ह। हुनका लोकनिपर ने अंग्रेजक मातृभाषाक प्रेमक प्रभाव आ ने बंगालक नव जागरणक। अपने घरमे अपन मातृभाषा छोड़ि हिन्दीक भक्त बनि अपनाकेँ गौरवान्वित बुझनिहार मैथिल छलाह। स्वदेश, स्व भाषा, स्वजातिसँ विमुख मैथिल सन दोसर जाति भरिसके छल होएत। तेँ ओहन प्रवुद्ध मैथिलक हेतु- “की अपराध हमर अछि कहु-कहु मिथिलाक सपूत सुजान। भए रहलहुँ अछि पतन दृष्टि सौं हम अवनत दुर्दिन खरिहान।। चूभि-चूभि मुख हमहि सिखाओल बाजब माय-बाप अछि। विलरै छी सभ हमर आई किए हा ओ अहाँ लोकनि प्रेमादिया।। ताकू ऑंखि उठाय कनेको थिकहुँ मैथिली माय अहाँक। खैने लात फिरै छी घर-घर, कोनहुँ विधिए जीवन राखि।। दोसर कविता अछि ‘नवयुवक लोकनिसँ नम्र निवेदन’ कवि नवयुवक लोकनिसँ आग्रह करैत छथि जे ओ लोकनि आलस्य छोड़ि भाषा, जातिक विकासक लेल कटिवद्ध भय जाथि ताहि हेतु केओ उपहासो जौ करए तँ करए दियौ। हँसय देखि यद्यपि केओ अहाँकेँ हँसय दियौ मरि पोख, देश, जाति ओ धर्म हेतु निज किछु तँ समय बँचाउ, कोनहु विधि देशक सेवाकेँ सबथल राम जँचाउ। साहियमे भ्रमरक चर्चा उत्यधिक होइत रहल। भ्रमरक गुंजन कानकेँ तृप्त मनहि करओ, मुदा ओकर स्वभाव निन्दनीय मानल जाइछ। लोभी, मुदा यदुवरजी रूपेँ उदार चरित्र व्यक्तिवक संग तुलना कएल। एहि मान्यताक खण्डन कय नव दृष्टिकोणक स्थापना कयलन्हि अछि। हुनक मते भ्रमर कपटी नहि अछि ओ तँ गुणक अन्वेषण करैत रहैछ। एक फूलसँ दोसर फूलपर जायब गुणक अन्वेषण करब थिक। समाजहुमे गुणवान व्यक्तिक आदर होबक चाही। गुणवान व्यक्तिक गुण ग्राहकक अभाव नहि। “कारी देखि भ्रमर सब तोहर, करइत छथि उपहास, कपटी रूप कहै छथि सब और दैत अछि त्रास। कारी रूप विचित्र यद्यपि तो किन्तु सकल गुण ख्यात् गुणिए जन करइत छथि जगमे गुणी जनक सम्मान।” जहिना भ्रमर चर्चि तहिना कोइली आदृत। ऋृतुराज वसन्तक वर्णन। वसन्तक आगमन संदेश बाहक कामदेवक एक शसक्त सैनिक थिक कोइली। परंच यदुवरजी एहू मान्यताकेँ खण्डित कय जागरणक दूतमानलन्हि अछि। एकटा ओ कोइलीसँ भारतवासीक पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेषकेँ व्यक्त करैत कहैत छथिन्ह। “सुमरि सुमरि तोहरा हे कोकिल, नयन नीर वरिसाबै, भाग्यहीन भारतवासीकेँ जनु कहियो विसराउ। सभकेँ बचन सुनाय हितक पुनि वैर, विरोध हैटाउ।” विषय-वस्तुमे नवीनता अनवाक क्रममे उपेक्षित तुच्छ वस्तुक वर्णन कय एकटा नव दिशाक सूत्र पात कयलनि। उल्लू, रेलबे स्टेशनक सिंगनल, मोसियानी, कुकुर आदिपर काव्य रचना करब हिनक मौलिकताक परिचायक थिक। उदाहरण स्वरूप- मोसियानी : “शान्ति भरल छुए जे मोसियानी, तोहर गुणकेँ सभ केओ मानी, कलमक मारि खाइओ ढेरि, तथापि दैत छ मसि प्रतिवेरि।” एहि प्रकारेँ यदुवरजीक काव्य रचनाकेँ सर्वत्र कोनो ने कोनो प्रकारक मौलिकता, नवीनता अछिए। स्वदेश, स्वभाषा आ सभ जातिक हित चिन्तन, ओकर उन्नतिक हेतु अथक प्रयत्न करब संगहि ओकर अधिकार प्राप्तिक लेल संघर्षशील रहब प्रधान उद्देश्य छल। मिथिला, मैथिल एवम् मैथिलीक लेल कतेक प्रेम छलनि तकर उदाहरण स्वरूप चारिटा पाँती- “सूनू औ बन्धुगण त्यागू ई विषधर निन्दकेँ कर्त्तव्य पालनमे लागू, भजु मातु पद अरविन्दकेँ गाँथि एकताक सूत्रमे, हिनका जगाउ सब मिलि कए, निज देश मिथिला, जाति मैथिल, मातृ भाषा मैथिली...।” अस्तु शुभम्...। मैथिलीक विकासमे नेपालक योगदान सन्दर्भ बोध- मैथिली साहित्यक उत्पत्तिक जनमानसक हृदयसँ भेल अछि तेँ एहिठाम जनमानसक हेतु मनोरंजक गीत काव्य ओ नाटकक प्रधानता रहल अछि। एहि कारणेँ मैथिली साहित्यक विकासधारा मिथिलहिटामे नहि प्रवाहित भेल प्रत्युत् मिथिलाक अतिरिक्त एकर प्रधानधारा उत्तर नेपालमे एवम् दोसर पुर्वांचल प्रदेशमे प्रवाहित भेल। जहाँ तक वास्तविकता छैक नेपाल आ मिथिलाक सम्बन्ध सदा-सर्वदासँ आबि रहल अछि। कर्णाट् वंशीय राजा हरि सिंह देव मुसलमान आततायी गयासुद्दीन तुगलकसँ पराजित भऽ मिथिलासँ भागि नेपाल गेला ओतहि राज्यक स्थापना कएल। मिथिलाक विद्वान लोकनि सेहो अपनाकेँ असुरक्षित बुझि नेपालेमे आश्रय लेलनि। नेपालक तत्कालीन राजा लोकनि मैथिल विद्वावनक बड़ सम्मान कएलनि। ओहिठामक राजा संगीत आ नाटकक विशेष प्रेमी छलाह। कला मर्मज्ञ मैथिल विद्वान अपना संग अनेको विषय-वस्तुक पाण्डुलिपि लेने गेल छलाह तेँ हुनका सभक समादृत हएब उचिते छल। संगीतसँ परिपूर्ण मैथिली नाटकक रचना नेपालक तत्कालीन राजा लोकनिक अवधिमे मैथिल विद्वान द्वारा भेल। यैह कारण जे नेपाल मैथिला विद्वान आ भाषाक केन्द्र भऽ गेल रहए। नेपालमे मैथिली भाषाकेँ राजकीय भाषा मान्यता भेटि गेल छलै। मुख्य भाषाक रूपमे मैथिली गनल जाइत छल। साहित्यक हरेक विधा एहिठाम अनुप्राणित भेल। एहुखन नेपालक तराई क्षेत्रमे मैथिली भाषी कए मिथिलाक संस्कृतिक स्पष्ट प्रभाव देखल जाइत अछि। ‘नाट्यम् रसात्मक काव्यम्’ काव्य क्षेत्र तँ आरो चमत्कृत भेल। खास कऽ हृदय काव्यक भरपूर सामग्री नेपालमे ओरिआओल अछि। सातम् आठम् शताब्दीक वौद्धगानसँ लऽ कऽ जे क्रम नेपालक धरतीपर मैथिलीक विकास हेतु चलि पड़ल छलैक ओ मध्य कालमे आबि अति समृद्ध अवस्थामे देखल जाइ अछि। म.म. हर प्रसाद शास्त्री 1916 ई.मे सिद्ध साहित्यक अन्वेषण नेपाल मध्य कएल, जेकरा बंगला भाषाक प्राचीनतम साहित्य आनि वौद्धगान ओ दोहाक नामसँ प्रकाशित कएल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक ‘वर्णरत्नाकर’ नेपालहिमे प्राप्त भेल। विद्यापतिक प्रमाणिक पदावली एतुक्के देन थिक। कर्णाट् वंशीय राजालोकनिक संग मल्लवंशीय राजा लोकनि सेहो मैथिली साहित्यक अनन्य प्रेमी छलाह। देखल जाइछ जे जय स्थित मल्लसँ लऽ कऽ रंजित मल्ल धरि एतए मैथिलीक सर्वांगीण विकास कएल। मल्लकालीन मैथिली साहित्यमे गीत तथा नाटकक प्रधानता रहल अछि। गीत काव्य भक्ति प्रधान अछि। भक्तपुर (भात गाँव)क राजा भूपतीन्द्र मल्ल (1687-1731) ई. राज्यकाल विष्णु, शिव आ भवानी आदिपरक शतश: मैथिली गीतक रचना कएने छलाह। एहिठामक रचित मैथिली गीतपर महाकवि विद्यापतिक रचनाक पूर्ण प्रभाव अछि। भाषा परिमार्जित एवम् सुललित देखल जाइछ- “हे देवि! शरण राखू भवानी, तुअ पद कमल भ्रमर मोर मानस जनम जनम ईहो मानी। भूतीन्द्र मल नृप ईहो गाओल जय गिरिजा पति स्वामी।।” मिथिलाक छिन्न-भिन्न भाषा, साहित्यक आकारकेँ सुरक्षित सम्वर्द्धित नेपालेक राजवंश द्वारा भेल। एहुखन नेपालक लाइव्रेरीमे अमूल्य ग्रन्थ ओ दुर्लभ ग्रंथ सभ ठेकनाओल अछि जे जीर्णवस्थाकेँ प्राप्त कएने अछि। विश्व साहित्यक पर्यालोचन कएलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे साहित्यक समस्त प्रभेदमे नाटकक स्थान अति महत्वपूर्ण अछि। संस्कृतक आचार्य लोकनि काव्येषुनाटकम् रम्यम्क अन्तर्गत नाटककेँ अनेक विषयक दृष्टिए रमणीय कहि एकर सत्यतापर मोहर लगा देलन्हि। नाटकमे अनुकरणात्मक अभिनय दृश्यमान होइछ तेँ एकरा रूपक कहल जाइछ। उन्मेष युगक प्रमुख नाटक केन्द्र भक्तपुर बनेपा कान्तिपुर अछि। हरि सिंहदेवक नेपाल आगमनसँ इतिहासमे नाना प्रकारक परिवर्त्तन भेल तथा नेपाल आ मिथिलाक अनेक प्रकारक सम्बन्ध भऽ गेलैक। हरि सिंह देवक मृत्युक पश्चात् हुनक पुत्र मान सिंह देव तथा श्याम सिंह देव नेपालमे राज्य कएलन्हि। श्याम सिंह देव नेपालमे राज्य कएलन्हि। श्याम सिंह देवक कन्याक विवाह मिथिलामे भेल। एकर फल ई भेल जे मैथिल विद्वानक आदर सत्कार नेपालक राजदरवार एवम् अन्य विशिष्ट समाजमे बराबर होइत रहल। बादमे नेपालक मल्लवंशी राजाक पारिवारिक सम्बन्ध सेहो मिथिलामे भेल। एहिसँ मिथिलाक भाषाक प्रभाव नेपालपर नीक जकाँ पड़ल। मिथिलासँ विशिष्ट विद्वान, पण्डित, कवि, धर्मशास्त्री, संगीतज्ञ सभ नेपाल जाय लगलाह। मिथिलामे हुनका लोकनिक संरक्षणक सेहो कोनो व्यवस्था मुसलमान सवहिक निरंतर आक्रमणसँ नहि रहि गेल। इहए कारण भेल जे मैथिल विद्वान लोकनि मिथिलासँ मैथिली नाटकक बीज नेपाल लऽ गेलाह। मैथिली नाटकक जन्म वस्तुत: मिथिलामे भेल मुदा विकास नेपालमे। नेपालमे मैथिली नाटकक विकासक संक्षेपत: निम्नलिखत कारण भेल- पारस्ववर्ती क्षेत्र होएबाक कारण मिथिला आ नेपालक सांस्कृतिक सम्बन्ध बरोवरि अछि। नेपाल सभ दिन हिन्दूराज्य रहल आ मिथिलामे सेहो हिन्दूत्वक प्रति मोह। नेपालक राजा एहिठामक विद्वान ओ पण्डितक सम्मान कएलन्हि। नेपालक मल्लवंश ओ मिथिलाक कर्णट् वंशक रक्त सम्बन्ध दूनू क्षेत्रक निवासीमे, भाषा आ संस्कृतिकेँ आओर निकट अनवामे सहमत भेला। मुसलमानी आक्रमणक कारणेँ एहि भू-भागक विद्वान आ पण्डित नेपाल जाय स्वस्थ चित्त भए सकलाह। हरि सिंह देव एतए 1324 ई. गमासुद्दीन तुलकसँ पराजित भए नेपालमे भात गाँवक निकट अपन राज्य स्थापित कएलन्हि जे पाँच पीढ़ी धरि चलल। एहि कर्णट शासन कालमे कवि साहित्यकारक पर्याप्त आदर भेल। मल्लवंशक राजा सभ सेहो मैथिल विद्वान, पण्डित, कवि संगीतज्ञ आदिकेँ सम्मानित करैत छलाह आ वसवाक हेतु पर्याप्त भूमि आ सम्पत्ति देलन्हि। मल्लवंशक शासनकालमे मैथिली नेपालक राज भाषा भए गेल तथा मैथिलीकेँ विकसित होएबाक अवसर भेटल। इतिहास साक्षी अछि जे मुसलमानी प्रभुत्वमे नाटक नहि विकसित भेल। हिन्दू राज्य नेपाल तकर नीक वातावरण प्रस्तुत कएलक। नाटकक विषय-वस्तु नेपाल आ मिथिलाक प्रचलित कथाक आधारपर लेल गेल। मल्लवंशक राजा जय स्थित मल्ल स्वयं बड़ कलाप्रिय छलाह। हिनक समय 1394 ई. धरि कहल जाइछ। हिनक पश्चात् मक्षमल्ल (1474) ई. धरि नेपालमे मैथिली नाटकक रचनाक कोनो पुष्ट प्रमाण नहि भेटैछ। मक्षमल्लक पश्चात् नेपाल तीन भागमे विभक्त भऽ गेल आ तीनटा राजधानी भात गाँव, बनिकपुर तथा कान्तिपुर आ ललित पाटन आ काठमाण्डू स्थापित भेल। एहि तीनू राज्वंशक राजा लोकनि स्वयं नाटकार छला तथा ओ लोकनि कवि एवम् नाटककारकेँ प्रश्रय देलन्हि। विभिन्न अवसरपर नाटकक अभिनयक आयोजन करबैत छलाह। नाटककेँ रचनिहारकेँ प्रोत्साहन दैत छलाह। भाग गाँव शाखामे विश्व मल्लक समय (1533) मे नाटकक बहुत विकास भेल। प्रसिद्ध नाटक ‘विद्या विलाप’क रचना ओही समयमे भेल। एहि नाटकक अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सेहो ‘विद्या विलाप’ नाम विधा सुन्दर नामसँ कएल। जगज्योर्तिमल्ल (1618-1833) राज्यकालमे मैथिली नाटक खूब विकसित भेल। हिनक राज्यकालमे मुदित कुवलमश्व वंशमणिक लिखलन्हि। हर गौरी विवाह एवम् कुंज विहारी नाटक सेहो कम प्रसिद्धि नहि पओलक। हिनक पौत्र जगत्प्रकाश मल्लक समयमे छौटा मैथिली नाटक लिखल गेल। उषाहरण, नलीय नाटकम्, पारिजात हरण, पार्वती हरण, मलय गन्धिनी एवम् मदन चरित्र। सुमति निता मित्र मल्ल स्वयं एक पैघ नाटककार छलाह जनिक लिखल आठ गोट नाटक भेटैत अछि। हिनक पुत्र भुपतीन्द्र मल्ल स्वयं कवि छलाह जनिका समय चौदहटा रचना भेल रंजित मल्लक समयमे तँ चरम सीमापर नाटकक रचना पहुँच गेल छल ई मल्ल वंशक अन्तिम राजा छलाह। 1921 ईस्वीमे मल्लवंशक अन्तिम राजा रंजित मल्लक समयमे (1921) मैथिली नाटक रचना एक प्रमुख बात थिक। नेपालमे शहवंशक उदय आ एकीकरणक पश्चात् भाषाक नामपर गौण काज लेल अछि। गोरखा बोलीक प्रभावमे पड़ि मैथिली तँ लग-भग मेटाय गेल। खाली नाच, गीत कतहु-कतहु लेखन आदिमे एकर रूप सुरक्षित रहलैक। राणाकालीन नेपाल भाषा साहित्यक हेतु अन्धकारक युगक रूपमे मानल जाइत अछि। मैथिलीक अवस्था तँ नेपालमे विचारणीय रहल। 2007 सालक मुक्ति राणा शासनसँ आ बादमे 2017 साल धरि उथल-पुथलक समय होएबाक कारणेँ मैथिलीक विकास हेतु नेपालमे कोनो ठोस काज नहि भऽ सकल। 2014-16 सालमे एकटा ‘नव जागरण’ पत्रक एक मात्र अंकक प्रकाशन संतोष दिया सकैत अछि। 1960 ई.क बाद कनेक स्थिरता तँ आएल मुदा सरकारी संरक्षणक अभावमे गत 30 वर्षमे जतेक साहित्यिक काज होएबाक चाही ओ नहि भऽ सकल। कोनो साहित्यानुरागी आ पिपासु मोनकेँ आ अहलादित करएबला सामग्रीक अभाव सदैव खटकैत रहल तथापि एहि अवधिमे जे किछु भऽ सकल अछि तकर साहित्यक विधागत लेखा-जोखा कएल जा सकैछ। आधुनिक काल : मध्यकालीन मैथिली साहित्यक जएटा उपलब्धि अछि से आधार स्तभक रूपमे मानल जाइछ। मुदा नेपालमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण काज 1960 ई.क बादे भेल जकरा हमरा लोकनि आधुनिक कालक प्रारंभ मानि कऽ चलैत छी। एहिसँ पूर्व पचासेक दशकमे पं. सुन्दर झा शास्त्री अपन मूल जन्म स्थान दरभंगासँ मैथिली लेखकक रूपेँ प्रतिनिधित्व करैत छलाह। गलीक कुकुर आदि एखनो दरबार नै खुजलैए सन रचना करैत छलाह। पं. जीवनाथ झा सेहो अपन प्रवन्ध काव्य आदि रचनासँ प्रतिष्ठित भऽ चुकल छलाह। वस्तुत: जनकपुरमे पं. जीवनाथक प्रवेश एतुक्का वातावरणमे साहित्यक प्रति अनुराग जगौलक आ ओ साहित्यक गुरुजीक रूपमे सर्वत्र चर्चित भेलाह। डॉ. धीरेन्द्र साठिक बाद जनकपुरमे आधुनिक मैथिलीक शुरूआत कएलन्हि। ओ एहिसँ पूर्व मैथिली लेखकक रूपमे प्रतिष्ठित भऽ गेल छलाह। 1962 ई.मे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन नेपालक मैथिली सहित्यक इतिहास लिखलन्हि, जाहिमे प्राचीन साहित्यक रूपमे चर्चा भेल अछि ओतेक आधुनिक कालक साहित्य हल्लुक प्रतीत भेल अछि। तेँ हिनकासँ तुलनात्मक दृष्टिए डॉ. जयकान्त मिश्रक इतिहास लेखन श्रेष्ठतर अछि। पहिल कारण तँ एक दशकमे साहित्य लेखन ओतेक समृद्ध नहि छल। दोसर सूचनागत त्रुटि सेहो प्रफूल्ल सिंहकेँ भेलन्हि। आब तँ तीन दशकमे किछु-किछु एहन रचना सभ भेल अछि जकरा आंगुरपर गनल जा सकैत अछि। प्रवन्ध काव्यमे पं. रमाकान्त झाक ‘व्यथा’ डॉ. धीरेन्द्रक ‘त्रिपुण्ड’ पं. मथुरानन्द चौधरी माथुरक खण्ड काव्य ‘त्रीशूली’ प्रमुख अछि। मुक्तक काव्यमे डॉ. धीरेन्द्रक ‘हैंगरमे टाँगल कोट’ करूणा भरल ई गीत हमर’ राम भरोस कापड़ि भ्रमरक बन्न कोठरीमे औनाइत धुँआ, नहि आब नहि, मोमक पिघलैत अधर, अपन्न-अनचिन्हार, विनोद चन्द्र झाक ‘कृषक बाला, पं. शुभ नारायण झाक ‘यंत्रणा’, पं. सुरेश झाक मैथिली रस कलश काव्य प्रमुख कृति देखना जाइछ। पं. झा मैथिली गीता सेहो लिखने छथि। चन्द्र शेखर झा शेखरक ‘हम नेपाल हमर नेपाली’ कविता संग्रह आएल अछि। अनुवाद विधा : नेपालक कतिपय साहित्यकार विभिन्न रचनाक अनुवाद मैथिली भाषामे कएलनि अछि, जे हुनक मैथिली प्रेमक प्रतीक थिक। यदुवंश लाल चन्द्र सप्तरी जिलाक तिलाठी ग्रामवासी द्वारा ‘उसैको लागि’क चॉंदनी साहक रचनाकेँ लोकेश्वर व्यथित, पं. कृष्णा प्रसाद उपाध्यायक द्वारा विद्यापतिक पदावलीक, डॉ. धीरेन्द्रक ‘उमर खैयानक’ महाकवि भनुभक्तक रामायण मैथिलीमे अनुवाद कऽ वद्रीनायण वर्मा अद्भुत कएल अछि। प्रकाशनक बाटपर अछि पं. सूर्यकान्त झाक मेघदूतक, डॉ. रमेश द्वारा सात जापानी कथा अनुवाद मैथिलीमे चमत्कारी प्रयास थिक। कथा-उपन्यास आ साक्षात्कार विधा : वस्तुत: नेपालमे मैथिली कथाक क्षेत्रमे सेहो नीक काज भेल अछि। किछु प्रतिबद्ध कथाकारक संग्रह एखन धरि समक्ष नहि भेल अछि तेँ छुछुन्न लगैत अछि। एखन धरि प्राप्त कथा संग्रहमे डॉ. धीरेन्द्रक ‘कूहेश आ किरण’, ‘पझाइत धूरक आगि’, ‘शतरूपा आ मनु’ राम भरोस कापड़ि भ्रमरक तोरा संगे जयवो रे कुजवा, रेवती रमण लालक ‘पाधवनहि एलाह मधुपुरसँ’ प्रमुख अछि। डॉ. धीरेन्द्रक सम्पादनमे नेपालक प्रतिनिधि गल्प संग्रह, प्रो. सुरेन्द्र लाभक संपादनमे नेपालीय मैथिलीक उत्कृष्ट गल्प प्रकाशित भेल अछि। उपन्यास : एहि विधामे श्यामाझाक ‘बिनु माइक बेटी’, कुमरकान्तक ‘सेहन्ता’क अतिरिक्त एम्हर डॉ. धीरेन्द्रक भोरुकवा, कादो कोयला, ठुमुकि चल, पाठककेँ सेतोष दैत अछि। साक्षात्कार : साक्षात्कार विधामे रेवती रमण लालक साक्षात्कार एक मात्र पोथी अछि, ओना एहि क्षेत्रमे राम भरोस कापड़िक नीक काज सभ भेल अछि। जकरा अनतर्गत अश्रेय, केदारनाथ व्यथित, विजय मल्ल, मातृका प्रसाद कोइरालाक साक्षात्कार खूब चर्चित भेल अछि। नाटक : एहि विधामे आधुनिक नाटककारमे महेन्द्र मलंगिया लेखनमे भिड़ल छथि। प्रारंभिक रचना ‘लक्ष्मण रेखा खण्डित’, जुआएल कन-कनी, ओकरा आंगनक बारह मासा, टूटल तागक एकटा छोर, एकांकी संग्रह हुनक प्रमुख पुस्तकाकार छन्हि। काठक लोक फिलहाल चर्चामे आएल अछि। ‘देहपर कोठी खसा दिअ’ आलुक बोरी सन बहुतो रेडियो रूपक ओ लिखने छथि। एकांकी लेखकक रूपमे डॉ. धीरेन्द्र, राम भरोस कापड़ि, डॉ. लक्ष्मण शास्त्री, श्याम सुन्दर शशि, ललनक प्रमुख स्थान अछि। निवन्ध समालोचना तथा संस्मरण : एहि विधामे प्रो. ब्रज किशोर ठाकुरक अध्ययन ओ विवेचन छोड़ि आन रचना पुस्तकाकार रूपमे नहि आबि रहल अछि। ओना, डॉ. धीरेन्द्रक साहित्य सम्बन्धी, भ्रमरक लोक संस्कृति सम्बन्धी, डॉ. विमलाक साहित्य सम्बन्धी महेन्द्र मलंगियाक, रेवती रमण लालक राजेन्द्र किशोरक विविध सामयिक निबन्ध सभ प्रकाशित भेल अछि। यात्रा संस्मरण : एहि विधामे राम भरोस कापड़ि भ्रमरक अत्यन्त महत्वपूर्ण रचना आएल अछि। प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौनक, रेवती रमण, श्याम शशि सेहो एक दिस संलग्न छथि। समालोचना संग्रहमे राम भरोस कापड़ि भ्रमरक सम्पादनमे नेपालक मैथिली पत्रकारिता आएल अछि। पत्र साहित्य : 2025 सालसँ प्रारम्भ भेल नेपालक सामयिक संकलन युग आब एकटा ठोस रूप लऽ चुकल अछि। प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’क सम्पादनमे मैथिली विराटनगरसँ डॉ. हरिदेव मिश्रक सम्पादनमे ईजोत काठमांडूसँ, पं. सुन्दर झा शास्त्रीक सम्पादनमे फूल-पात काठमांडूसँ, वाणीक हिलकोर जनकपुरसँ संगहि दुविधान एतहिसँ एम्हर 2019 सँ राम भरोस कापड़िक सम्पादनमे गाम-घर साप्ताहिक निरन्तर प्रकाशित भऽ रहल अछि। अर्चना द्वैमासिक गत 16 वर्षसँ प्रकाशन आ ‘ऑंजुर’ आब मासिक रूपमे प्रकाशित भऽ रहल अछि। नेपाली भाषी साहित्यकार द्वारा मैथिली साहित्य सेवामे डॉ. कृष्णा प्रसाद उपाध्यायक नाम आदरसँ लेल जा सकैछ। ओना, हिनके भाइ डॉ. लक्ष्मण शास्त्री तँ अद्भुत काज कएलनि अछि। ई अपन दू गोट पोथी दऽ एक धर्म काव्य युधिष्ठीर महाकाव्य आ दोसर धीकताम् गीत काव्य। रामेश्वर प्रसाद अर्याल द्वारा रचित शिव-मधुक भाग्य रेखा नामक कथा काव्य देखि पड़ैत अछि। फुटकर रचनामे मनुव्राजकी, केवेर धिमिरे, जगदीश धिमिरे आदि प्रमुख छथि। उपसंहार वा निर्णयात्मक बिन्दु : एहि तरहेँ विभिन्न विधामे गत तीस वर्षसँ भेल विकासक रूप रेखा पूर्ण संतोष तँ नहियेँ दैत अछि मात्र आशा टा जगबैत अछि। विकासक संभावना नीक छैक। अवसर पाबि चिक्कन काज कऽ सकैछ। नेपालमे संवैधानिक राजतंत्रक अन्तर्गत पूर्ण प्रजातंत्रक बहाली भेलासँ भाषा विकासक गति अपना ढंगसँ संचालित कएल जा सकैछ। राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठानसँ सरकार ‘मैथिली विभाग’ खोललक अछि जाहिसँ किछु महत्वपूर्ण रचना सभक प्रकाशन होएब सम्भव थिक। खास कऽ मैथिली साहित्यक इतिहास, शब्द कोषओ विधागत संग्रह प्रमुख रहत। तहिना अनुसंधानक हेतु विद्वत वृतिक संभावना सेहो छैक जाहिसँ सरकारी वा नीज पुस्ट सामग्रीमे सुरक्षित मैथिलीक पुरना महत्वपूर्ण पाण्डूलिपिक उद्धार कएल जा सकैछ। सम्पूर्ण मैथिली संसारक हेतु अपन रचनासँ योगदान पहुँचेबाक लेल एहिठामक साहित्यकार तल्लीन छथि। अस्तु...। मैथिली साहित्यक अवदान- मिथिला भाषा रामायण- चन्दा झा कविवर मैथिली साहित्याकाशक चन्द्र थिकाह। मैथिली साहित्यकेँ अपन शीतल ज्योत्सनाक अमर वरदान देलन्हि। इएह कारण थिक जे ओ मैथिलीक महान् कविक रूपमे समादृत होइत आधुनिक मैथिली साहित्यक जनक मानल जाइत छथि। वस्तुत: विद्यापतिक पश्चात् इएहटा कवि भेलाह जे मातृभाषाक वास्तविक महत्व बूझि ओकर विकासक दिशामे प्रयत्नशील भेलाह। उन्नैसम शताब्दीमे पुन: कवीश्वरे जनभाषाकेँ काव्य भाषाक रूपमे मण्डित कैलन्हि तथा अपन सशक्त लेखनीसँ अनवरत साहित्य सृष्टिमे योगदान दैत मातृवाणीक अर्चनामे सुवर्ण वर्णावलीक उपहार चढ़बैत रहलाह। हिनक वहुमुखी प्रतिभा, प्रगाढ़ पाण्डित्य, साहित्यक रूचि, पुरातत्व-प्रेम एवम् दीर्घ जीवन विविध प्रकारेँ मैथिली साहित्यक सम्वर्द्धनमे सहायक सिद्ध भेल। हिनक जन्म सन् 1931 ई.मे सप्तमी वृहस्पतिकेँ दड़िभंगा जिलाक पिण्डारूछ गाममे भेल छल। प्रारम्भिक शिक्षा मातृक बड़ गाँव सहरसा जिलामे भेल। बादमे संस्कृतक उच्च शिक्षाक हेतु पवित्र नगरी काशी गेलाह। काशीसँ प्रत्यागत भेलापर पाण्डित्यक अतिरिक्त हुनक कवित्व शक्तिक यशोवल्लरी चतुर्दिक पसरए लागल। बाल्यकालहिसँ प्रतिभापूर्ण प्रतीत भेलाह। मिथिला भाषा रामायणक मूल प्रेरक स्व. महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह छलाह। मातृभाषा मैथिलीमे धर्म ग्रंथक अभाव खटकलैन्ह। चन्दा झा शिवक समर्पित भक्त छलाह। शिवक प्रिय राम तेँ भक्ति भावना हुनक साहित्यक कृतिक विधा थिक। मातृभूमि ओ मातृभाषा प्रेमक पुष्पाञ्जलि दय ओ अपन काव्य देवताक अर्चना कैलन्हि। एहि दृष्टिए मिथिला भाषा रामायण हुनक सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रिय कीर्त्ति थिक। चन्दा झाक नामोल्लेख मात्रसँ हिनक रामायणक उद्घोष होइछ। ग्रन्थक नाम करणेसँ मिथिला-मैथिलीक प्रति कविक सहज अनुरागक परिचय भेटैत अछि। प्राय: ई शौभाग्य कोनो आन ग्रंथकेँ नहि हएत जेकर प्रत्येक शब्दपर विद्वत मण्डली विचार कएने हो तथा जे पाण्डित्यक कसौटीपर परिशुद्ध प्रमाणित भेल हो। रामायण भारतीय वाङमय केर आदर्श कृति थिक। देशक चारित्रिक आदर्शकेँ अनुप्राणित करबाक लेल राम चरितक अवतार मैथिलीमे आवश्यक छल। वस्तुत: जाहि सांस्कृतिक संघर्षक युगमे चन्दा झाक आर्विभाव भेल छल तकर ई अनिवार्य प्रतिक्रिया छल। कवीश्वरक एहि कृतिक केँ सर्व प्रथम महा काव्यो हैबाक सौभाग्य प्राप्त छैक। चन्द्र कवि जहिना काव्यात्मकतामे बाल्मीकि तहिना रचना करबामे प्रमुख। चन्दा झाकेँ युग जागरणक प्रतीक मानल जाइछ। ओना तँ मिथिला भाषा रामायणक मूलाधार थिक अध्यात्म रामायण मुदा अटूट श्रद्धाक कारणेँ मौलिकताक निर्वाहमे त्रुटि नहि होए देल अछि। विशेष कय मिथिलाक वर्णन, लक्ष्मण-परसुराम सम्वाद, लंका दाह वर्णन, राम अंगद-सम्वाद आदि कतेक स्थल अछि जतए कविक मौलिक प्रतिभा स्फुट भेल अछि, तथा मनोरम सिद्ध भेल अछि। वभिन्न रसक प्रयोग लेल राम कथाक महत्व सर्वोपरि अछि तहिना भाव प्रकाशनक क्रममे विविध अलंकारक प्रयोगसँ ओ एकर कला पक्षकेँ समृद्ध बनौने छथि। एतए स्पष्ट अछि जे रामायण मूलत: भक्ति काव्य थिक। मिथिलाक गौरवक गुणगान नहि बिसरलाह अछि रामक मुँह कहबैत छथि- “सत्य तिरहुति यज्ञभूमि पुण्य देनिहारि, शास्त्रकेँ बजैत बेर कीर बैसि डारि-डारि।” पुन: सीताक चरितक प्रसंगमे ओ एहि विषयकेँ नहि बिसरल छथि जे सीता मिथिलाक बेटी छलीह। सीता स्वयं कहलैन्ह- “जनक जनक जननी अवनि, रघुनन्दन प्राणेश देवर लक्ष्मण हमर छथि, नैहर मिथिलादेश।” एकर भाषा ओ शैली माधुर्य जन साधारणकेँ आकृष्ट कएलक। ओ शीघ्रहि विद्वानसँ लऽ कऽअशिक्षित समाज मध्य ई प्रिय भए गेल। एहि गंथक अध्ययनसँ मैथिली विद्वानकेँ अपन मातृभाषाक गौरव ओ गंभीरताक ज्ञान भेलन्हि। एहि क्रममे देखब जे अशोक बाटिकाक वन्दिनी सीताकेँ अपन विपन्न जीवनसँ विशेष कठोर बचन कहबाक भनस्ताप छन्हि जे मनो वेदना विगलित भए उठल अछि- हे रघुनाथ! अनाथ जकाँ दश कंठकपूरी हम आइलि छी सिंहक त्रास महावनमे, हरि नीक समान हेराय छी। एकैसम शताब्दीक प्रारंभ जनवृद्धिमे भारत प्रथम आ चीन दोसर प्राय: कहल जाइत अछि जे ‘बहुलोका: दोषा:’ भारतक विशाल जनसंख्या आ एकर लगातार वृद्धिक गति एक समस्रूा बनि सभसँ भयावह आ विस्फोटक सिद्ध भेल अछि। जतए भारतक हेतु सर्वमान्य सिर दर्द एवम् गहींर चिन्तनक विषय बनि गेल अछि, ओतए इएह समस्या भारतमे गरीबी, वेरोजगारी, कुपोषण संगहि भूमि विखण्डन एवम् अपखण्डनक समस्याकेँ दिनानुदिन अति शोचनीय स्थितिमे पहुँचा देलक अछि। एतबे नहि, भारत जनाधिक्यक सीमापर आबि गेल अछि। ई जनाधिकय पछिला दू दशाब्दीक आर्थिक विकासक सुखद प्रयासकेँ पकारि देलक अछि। गरीबी आ बेकारीक समस्या एकरे द्वारा पल्लवित भऽ रहल अछि। खेदक संग कहए पड़ैत अछि जे एक ओर तँ भारी जनसंख्या हमरा सभक गरीबीकेँ बढ़ा रहल अछि तँ दोसर ओर गरीबी सेहो जनसंख्यामे वृद्धि कऽ रहल अछि। जोसेफ डी. कास्ट्रो अपन प्रसिद्ध पोथी ‘Geognaphy of hunger’ मे चीन, जापान आ भारतक उदाहरण प्रस्तुत करैत एहन विचार प्रगट कएल अछि। 1981 क जनगणनाक अनुसार भारतक जन संख्या अड़सठि करोड़केँ पार कऽ गेल अछि। जाहिमे आसाम, जम्मू एवम् कश्मीरक जनसंख्या शामिल नहि अछि। एक करोड़ चालिस लाख मानबक वृद्धि प्रति वर्ष भारतमे भऽ रहल अछि। देखल जाइछ जे आस्ट्रेलियाक क्षेत्रफल भारतक क्षेत्रफलसँ दोबरसँ अधिक अछि। एखन तक भारत चीनक बाद संसारमे सर्वाधिक जनसंख्याबला देश अछि। संसारक कुलजन संख्याक 15 प्रतिशत भाग भारतमे रहैत अछि। जखन संसारक कुल क्षेत्रफलक अढ़ाइ प्रतिशत भू-भाग मात्र एकरा प्राप्त छैक। तेँ जौं भारतक ई जन संख्या अपन वर्त्तमान अढ़ाइ प्रतिशतक दरसँ बढ़ैत गेल तँ वींसवी शताब्दीक अन्त तक एक अरबक जनसंख्याकेँ छूबि लेत। सन् 1831 इस्वीक बादसँ भारतक जन संख्यामे जे वृद्धि आरंभ भेल अछि ओकर गतिकेँ देखैत भारतक आजादीक बाद स्वतंत्र भारतक आर्थिक विकासक योजनामे सर्तकता बरतल गेल। इएह कारण भेल जे सन् 1952 ई.मे परिवार नियोजन नीतिकेँ सरकारी कार्यक्रमक रूपमे अपनाओल गेल आ विश्वक पहिल देश छल जे अपन आर्थिक विकासक योजनामे परिवार नियोजनकेँ स्थान देलक। एकर बावजूदो एहि कार्य-क्रमक प्रति उदासी देखल गेल जे कष्टप्रद विषय थिक। यद्यपि प्रथम आ द्वितीय पंचवर्षीय योजनामे पाँच करोड़ पैंसठि लाख टाकाक द्वारा एकर संगठन कएल गेल जाहिमे शोध, संचार एवम् केन्द्र आ राज्य सरकारक अन्तर्गत चिकित्सा सेवा प्रदान करैत राखल गेल। समय-समयपर जनगणना देशमे भेलासँ सरकार आ समाजकेँ जगाओलक। तेँ तेजीसँ एहि ओर प्रयास चलल। गर्भ निरोधक प्रचार-प्रसार शुरू भेल। तेसर योजनामे 25 करोड़क लागत आयल। एहि तरहेँ बीचक तीन वार्षिक योजनामे परिवार नियोजनकेँ ‘King fin of the plan’ मानल गेल। संगहि कार्यक्रमकेँ प्रर्याप्त राशि द्वारा Time bound एवम् Target oriented क रूपमे अपनाओल गेल। भारतक चतुर्थ योजनामे बहुत अधिक प्राथमिकता देल गेल। एहि कार्यक्रमपर 315 करोड़ टाका खर्च कएल गेल तथापि न्यून सफलता भेटल। पाँचमी योजना 516 करोड़ टाकाक आवंटन कऽ जन्म दरकेँ 35-30 प्रति हजार कम करबाक लक्ष्य राखल गेल जेकरा हेतु वन्ध्याकरण हेतु प्रस्तुत भेल नर-नारीकेँ तकरा चन्द्र किस्मक प्रलोभन देल गेल। एतए तक जे छठवीं सातवीं योजनामे तँ भ्रूण हत्या गर्भ-पात आदिक वैध करार कऽ देल गेल। जइसँ जनसंख्याक वृद्धिमे ह्रास आबए। सन् 1974 ई.मे विश्व जनसंख्या नियंत्रण सम्मेलन रूमानियॉंक राजधानी बुखारेस्टमे भेल। भारतक तात्कालीन परिवार नियोजन मंत्री डॉ. कर्ण सिंह ओहि सम्मेलनमे बाजल छलाह जे विश्वक गरीबी तखने दूर होयत जखन विश्वक जनसंख्यामे कमी आओत। भारतमे जनसंख्याकेँ नियंत्रित करबाक संकल्पकेँ दोहरबैत स्व: प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधीक बीस-सूत्री कार्यक्रमकेँ परिवार नियोजनपर विशेष जोर देल गेल। पाँचम योजनामे Minimum needs programme क अन्तर्गत स्वास्थ्य, परिवार नियोजन एवम् पौष्टिक आहारकेँ एक संग विकसित करबाक प्रयास कएल गेल। एहि समेकित योजना द्वारा बाल-मृत्युकेँ कम कऽ संगहि माताकेँ स्वास्थ बनाकए कम बच्चा उत्पन्न करबाक प्रवृत्तिकेँ जगाओल गेल। सरकार द्वारा सर्वोत्तम गर्भ-निरोधक दवाइकेँ उपलब्ध करएबाक प्रयास जारी राखल गेल अछि। एतबे नहि, कमसँ कम मूल्यपर हरेक ठाम गर्भ निरोध उपलब्ध करेबाक व्यवस्था कएल गेल अछि। गरीब देशमे एहि कार्य-क्रमक अन्तर्गत वन्ध्याकरणक हेतु आर्थिक प्रलोभन सेहो देल जाय रहल अछि। जनसंख्या वृद्धिमे 80 प्रतिशत देहातक योगदान रहैछ। जकरा हेतु रेडियो, सिनेमा, टेलीविजन आदि द्वारा प्रचार-प्रसारसँ देहाती नर-नारीकेँ नियोजन करएबाक हेतु अन्मूख कएल गेल अछि। ऐं ई स्वीकार नहि काएल जा सकैछ। जे भारतमे परिवार-नियोजन कार्य-क्रम पूर्ण रूपेण असफल रहल, मुदा एतेक प्रयत्नक बावजूदो जनसंख्याक वृद्धि दिनानुदिन चौगुन्ना होइत जाए रहल अछि तेँ लऽ कऽ ई कहल जाए रहल अछि जे अणु विस्फोट ओतेक खतरनाक नहि जतेक जनसंख्याक वृद्धि विस्फोट भऽ सकैछ। आइ जनसंख्याक वृद्धिमे संसारक साम्यवादी देश चीन अपन जनसंख्याकेँ नियोजित करबामे कमाल हासिल कएलक अछि। हमरो सभकेँ एहिसँ प्रेरणा लेबाक चाही। 1953 ई.मे चीन अपन विकासक अभिन्न अंगक रूपमे परिवार-नियोजन लागू कएलक। एहि कार्य-क्रमक अन्तर्गत देरसँ विवाह, बच्चाक जनम्मे अन्तराल संगहि अन्तिम रूपसँ दू बच्चाक लक्ष्य जन तांत्रिक अधिकार कायम कऽ देलक। एतए तक जे विवाहक संगहि Contraceptative क प्रयोग करबाक प्रेरणा देल गेल। तेतबे नहि, मुफ्तमे Contraceptives क वितरण करा कए जनसंख्यामे ह्रास आनबाक महती प्रयास कएलक अछि। नव विवाहित दम्पतिक हेतु अनिवार्य नियम लागू कएने अछि जे Contraceptives क प्रयोग ओ लोकनि करए। एतबे नहि, बूढ़-बुढ़ानुस द्वरा सामाजिक सभामे युवक युवतीक ध्यान एकर लाभक ओर आकृष्ट करोओल जाइछ। ई कार्य-क्रम चीनमे व्यक्तिकेँ छोट परिवार राखक ओर सराहनीय कार्य कएलक अछि। छोट परिवारक प्रवृतिकेँ जगेबामे सरकारक द्वारा उठाओल गेल कानूनी प्रयास कम महत्वपूर्ण नहि अछि। पसिद्ध अर्थ शास्त्री J.Myrdal सेहो Asian drama मे चीनमे सरकार द्वारा एहि क्षेत्रमे उठाओल गेल कानूनी प्रयासक चर्चा कएलन्हि अछि। जकरा हेतु सरकार एक Grash family planning programme अपनौलक अछि ताकि 2000 ई. तक रूसक समान जनवृद्धि शून्य प्रतिशत तक लाओल जाय सकैछ। आब ओहिठाम दू बच्चाक बदलामे एक बच्चाबला परिवारक व्यक्तिकेँ वेतनमे वृद्धि आवासीय सुविधा, संगहि पेंशन आदिमे सुविधाक प्रलोभन देल अछि। दोसर ओर एक बच्चाक बादसँ वेतनमे आंशिक दरसँ कटौती तथा अन्य सुविधासँ वंचित कऽ देबाक नियम लागू कऽ देल गेल छैक। एहि तरहेँ चीन अपन जनसंख्याक वृद्धि गतिमे 1975 ई.मे 25 प्रतिशत प्रति हजारसँ 1979 ई.मे 18 प्रतिशत. पुस्तक समीक्षा- साकेतानन्दक ‘गण-नायक’ प्राचीन परम्पराक अनुरूप साहित्यक ...... क्षेत्रमे कथाक रचना अवाध् रूपसँ भऽ रहल अछि। हर्षक विषय अछि जे मानव मोनक चिरसंपोषित अभिलाषा आइ साहित्यक अनुभूति आ विवेचनक रूपमे फलीभूत भऽ रहल अछि। मैथिलीमे लघुकथाक विकास जतेक तीव्रगतिसँ भेलैक ताहिमे लघुकथाकेँ लोक प्रिय बनेबाक श्रेय स्व. हरिमोहन झाकेँ छन्हि। आधुनिक साहित्यक सर्वतोभावेन गुण सम्पन्नता भारतीय अन्य कोनो भाषा साहित्यक समकक्षताकेँ मैथिलीक कथा प्राप्त करैछ। कथा, समय काल सिमित परिवेशक दृष्टिए कष्ट साध्य अछि तँ संगहि महत्वपूर्ण यथेष्ठ। इएह एक एहन विधा अछि जे दिन-प्रति-दिन प्रगतिक ओर अग्रसर, गतिशील आ उर्द्धमुख अछि। ‘गणनायक’क कथाकार साकेतानन्दजी विलक्षण प्रतिभा पुरुष छथि जे अपन सारस्वत साधनासँ हिन्दी आ मैथिली साहित्यमे अक्षय कीर्ति, अशेष गौरव आ निस्सी अर्थवत्तासँ श्रीमंत कएलन्हि अछि। विभिन्न पत्र-पत्रिका सभमे प्रकाशित रचना सभकेँ कलाविद्, समीक्षक आ विचारक निर्लाज भावसँ सराहलन्हि अछि। विद्वान, कथा मर्मज्ञ सभ हिनक कथाकेँ साहित्यक श्रेष्ठ उपलब्धि मानि कऽ खुलेआम स्वीकृतमे अविचल हाथ उठाकए साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत भेलापर सोल्लास समर्थन कएलन्हि अछि। ‘गणनायक’क कथा मानव जीवनक विसंगतिक ठोस धरातलपर ठाढ़ अछि। कथाकारक मूल चेतना, प्रगतिशील आ विचारोत्तेजक अछि। युग सापेक्ष आ लोक जीवनक एहन शास्वत चित्र अछि जे साहित्यमे अविस्मरणीय तँ रहबे करत संगहि भावी पीढ़िक हेतु प्रतिक ओर उनमुख होएबामे आत्ममंथन करक हेतु विवश करैत रहत। समीक्षक लोकनिक दृष्टिमे कथा जे हो मुदा हमरा दृष्टिमे कथा सुग चित्रकेँ अपना ‘अलबम’मे समेटि कऽ चलि रहल अछि। जे आबएबला युगक ओर ऑंगुर उठाकए संकेत सेहो करत। हम पबैत छी लेखकक भावना एच.जी वेल्सक भावनासँ अनुप्राणित अछि। ओना तँ ‘गणनायक’क कथानक सेहो जनजीवनक एक गोट नव पक्षकेँ समक्ष अनलक अछि। धरातलपर गति लएबाक हेतु गद्यहिक मंद-चंचल चरण चलबए पड़ैछ। तेँ उपयोगिताक दृष्टिसँ ई गद्यक युग कहबैछ। कथा कहबाक सुनबाक प्रवृत्ति लोकक रागात्मक सम्बन्ध समानान्तर चलैत आबि रहल अछि, तेँ कथाकेँ प्रागैतिहासिक कालसँ श्रृंखलाबद्ध करबाक प्रयास कएल जाइत रहल अछि। स्पष्टत: कथा आदर्शवादक खण्डहरसँ बहार भऽ यथार्थक खड़िहान दिस बढ़ि रहल अछि। सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना ‘गणनायक’मे वेरोजगारी, आर्थिक विपन्नता, शोषण, चोर बाजारी, दमनात्मक प्रवृत्ति एवम् नोकरशाहीक यथार्थ चित्रण अछि। मुख्यत: शिक्षित वर्गक मोह भंग एवम् ओकर निरीहता आ पीउ़ासँ जुड़ल संघर्षक कथा कहैत अछि। कामाख्या ओहिसँ प्रबल संघर्ष करैत एक स्वाभिमानी युवक अछि। एहिठामक लेखक कामाख्याकेँ ‘उपक्रम’ कथा केर मुख्य पावक रूपमे उपस्थित कऽ आदर्श स्थापित कएलनि अछि, किएक तँ विपन्नताक पीड़ा झेलैत ओ कालक चारण नहि बनैत अछि। एहि कथामे जीवनक सम्मानजनक संकल्प अछि। ‘आलुक विमा’ कथामे प्रशासन तंत्रक विकरालताक दुस्साहसिक प्रतिरोध कृषक प्रतिनिधि जय मंगल, रामशरण आ रहमतुल्ला द्वारा देखल गेल अछि। एतबे नहि, प्रदर्शनपर उतारू आक्रोशित कृषक आ कृषक प्रतिनिधिपर पुलिस द्वारा लाठी गोली तक चलाओल जाइछ, जाहिसँ कृषक प्रतिनिधिकेँ जानसँ हाथ धोमए पड़ैछ। कथामे प्रजातंत्रक माखौल, त्रुटिपूर्ण व्यवस्थाक जिम्मेवार पदाधिकारीक विषद विर्णन करबामे लेखक निर्भिक एवम् निस्संकोच देखल गेलाह अछि। ‘कचोट’ कथामे जीवनक नग्न सत्य प्रतिभासित होइछ। जकर मुख्य पात्र बौआ झा छथि। जौं एहि कथामे एकओर भारतीय सम्मताक निर्मम हत्या भेल अछि तँ दोसर ओर मोनीक अव्यक्त प्रेमक पीड़ा पाठककेँ स्पन्छित करैत अछि। ‘एक डेग आगू’ कथामे सामन्तवादीक खूनी पंजासँ धाइल रामजीक कुरूप चित्रण अछि। सामन्ती सन्तापसँ सन्तरत जवान बेटी गुलबियाक ठानल विवाह नहि कऽ कर्जासँ मुक्त होएबाक प्रयास ओकर अग्रिम सोचकेँ समक्ष अनलक अछि। ई कथा पाठककेँ अतिसंवेदनशील बनबैत अछि। ‘पकड़ वियाह’ कथामे सम सामयिक विद्रुप संस्कृतिक सबाक चित्रण अछि। अभावग्रस्त मैथिलक पुत्री उम्रक सीमा टपि कए अभिभावककेँ विचार शून्य बना दैछ जकर कारण दहेज प्रथाक विकल्प रूपमे ‘पकड़ वियाह’ शुरूए भेल अछि। कथाकार कथामे धड़फरा कऽ रोचक आ भाव प्रधान होइतहुँ समस्याक समाधानक हेतु अल्पकालीन, असौकर्य गुझना जाइछ। कथाक परायणसँ कथा अध बटियेमे पाठककेँ छोड़ि दैछ जाहिसँ पूर्ण तृप्ति नहि होइछ। अगिला कथा ‘आब भेटने की’ मे नारीक संवेदनाक सन्तप्त रूप भौतिक सुखक निरसता, प्रेम, स्नेह, दया, सहानुभूतिसँ रिक्त मर्मान्तक पीड़ाक अभिव्यक्ति अछि। ई एकटा सरल सहज रोमांटिक कथा अछि जे बड़ रोचक शैलीमे आगाँ बढ़ैत अछि। आ अन्तमे आबि समग्र रूपमे एकटा विलक्षण प्रभाव छोड़ि जाइत अछि। भव प्रवण्ता एवम् मधुबर विन्यास एहि रोमांटिक कथाक विशिष्ट गुण अछि। लेखक एहि कथामे माँजल मनोविश्लेषक प्रतीत होइत छथि। ‘त्रिवेणी समाहार’ सामाजिक बोधसँ जुड़ल कथा अछि। कथाक मुख्य पात्र भिखारी साहु सम्पूर्ण कथामे चर्चित भेल छथि। अथक प्रयास, श्रमसाध्य जीवन, साहस आ समयसँ जुझैत निर्धन लोक पूर्ण धनवान होइत अछि, ओकर सम्पन्नतासँ सीदित गामक डाही दुष्ट पंचैती करनिहार रामेश्वार बाबू आ शिवजी सिंह अपन प्रपंचक चपेटमे आनि भिखारीक समटल आ समृद्ध परिवारकेँ कहलपूर्ण बना दैत देखल जाइत छथि। तेसर साम्यवादक दोहाइ देनिहार दरिद्र फूल झा भिखारीक दोहन गाहे-वगाहे करैत कथामे देखल जाइछ। ई कथा एकहि संग अनेक विषय वस्तु, व्यक्ति आ तत्सम्बन्धी घटनाक वस्तुत: समाहार बुझाएल मुदा मुख्य तीन परिस्थिति आ परिवेशक दिशा बोध करबैत अछि। कथा अपना-आपमे विड़ल अछि। विसंगति आ समाजक छद्मकेँ उघारि कऽ पाठकक समक्ष राखि दैछ। ‘मचकल खुट्टा’ लोकोक्तिक आधार लए लिखल गेल कथा अछि। खास कऽ अनमेल विवाहक कारणेँ उत्पन्न परिस्थितिक बोध कथा अछि। मचकल खुट्टासँ तात्पर्य अछि कमजोर पतिसँ। कथाकारक कमाल जौं-जौं आगाँ बढ़ैत अछि पाठककेँ कौतुहलपूर्ण बनबैत रहैछ। कथा मुख्य पात्रक रूपमे कजरैलावाली गोरि-नारि सुडौल, सुनमनी आ तारूणक तेजसँ क्षीजित मुख्यमण्डलवाली छथि, जनिक विवाह दूबर-पातर, कारी खेड़नाठ आ झाँमर मुँह संगहि विकृत बगेवानि रेलक खलासीसँ होइत कथामे देखाओल गेल अछि। नपुंसक पतिक कारणेँ तेरह वर्ष धरि दागल साँढ नि:सन्तान कजरैलावाली लोकक बीच बाँझी कहबए लगैछ। जखन बर्दास्त नहि भेलैक तँ दाबल मोन विकल्पक ओर आकृष्ट भेलै। जहिना पानि पनिबट ढूढि लैछ तहिना बगलक पड़ोसी पाचो मनगर, बलगर, सुडौल सुन्दर युवक भेटि गेलासँ रमबामे भाँगठ नहि भेलै। कथाक रोचकता आरो बढ़ैत अछि जखन कजरैलावाली एक सुन्दर बालकक जन्म दऽ अपना संग पतिक दोषसँ मुक्त होइछ। एहि तरहेँ कथामे देखल जाइछ जे एक दोषसँ मुक्त होइत अछि तँ लोकापचार आ कुचर्चाक आब सद्य: भाजन बनैत अछि। खुजल मुँहकेँ ओ बन्द कऽ नहि सकैत छल किएक तँ ओकर खुट्टा मचकल रहै। अन्तिम निष्कर्षपर पहुँचैत पाठक आकर्षणक कारणेँ अचाएल रहैछ। हृदयपर स्थायी प्रभावक अनुभव करैछ। ‘गणनायक’ अन्तिम कथा चिन्तनीय, रोचक, समयानुकूल बदलैत राजनीतिक परिदृश्यक सटीक चित्रण अछि। एहि कथाक मुख्य पात्र नरेबाबू सामन्ती गुणग्राही छथि। चुनावमे छल-बल-कलसँ जीतैत छथि। वएह एकर गणनायक थिकाह। अपन आधार सीढ़ी छीतन दासकेँ बिसरि जाइत छथि। छीतन दास हरिजनक माइनजन (मुखिया) अपन हानियोँकेँ ताकपर राखि हिनका चुनावमे एड़ी-चोटी एक कऽ दैत अछि, चारि कट्ठा जमीनक त्रासदीक कारणेँ ओ डिल्ली अन्नजल तेजि कोनहुना जाइत अछि। ओतए विस्फारित आँखिसँ नरेबाबूकेँ ढूढ़ि हिनका राजकीय आवासपर पहुँचैत अछि, दुलर्भ भेँट जखन होइत छैक तँ सुख-सुन्दरीक अठखेल कएनिहार, नरेबाबू छीतन दासक व्यथाकेँ सुनबाक बदला डॉंट-फटकारसँ नकारि कऽ दैत छथि। एहि तरहेँ कथामे छीतन दासक अवहेलना हैब, अनभुआर, अनपढ़ मैथिल छीतन दासक दिल्लीसँ आपसीक गुंजाइश कथामे नहि हैब पाठककेँ संदेहक सीमामे बान्हैत अछि। कथा शिक्षाप्रद संग-संग वर्तमान समयक गणनायकक रंग बदलैत चरित्रक प्रण्ट चित्र कथा थिक। समस्त कथाक परायणसँ सुस्पष्ट प्रतीत होइछ जे समाजवाद, साम्यवाद वर्तमानकालीन सांस्कृतिक परिवेश, राजनैतिक संरचना आर्थिक परिस्थितिक ठोस धरातलपर आधारित एहन शास्वत भावनासँ जनमानसकेँ अवगत करौलन्हि अछि जे संजीविनी बुटि बनिकए प्रगतिशील साहित्यकारक हेतु आदर्श उपस्थित करैत अछि। हिनका रचनामे यथार्थवाद नहि अपितु यथार्थ अछि। हिनक पात्र काल्पनिक भऽ सकैए, मुदा कल्पनाशीलताक कायामे कटुजीभ लगाओल गेल अछि तथापि क्रान्तिकारी आ यथार्थमयी छन्हि। संगहि संग वर्त्तमान समयक चोट, बढ़ैत सभ्यताक रंग, जमानाक क्रुर थापड़ आ समग्र जीवनक कटु-मधु अनुभवकेँ विवेकक तराजूपर तौलि कऽ उकेरल गेल अछि। भाषाक सहजता, शिल्पगत वैशिष्ट्य हिनक कथाक अपन फराक पहचान बना दैत अछि। कथाक कलात्मकता पाठकक अन्तस्थलकेँ छुबि लैत अछि। मिथिला मैथिलक मानदण्डकेँ नव-नव सौवर्णी प्रतिभासँ मढ़बाक महनीय गुण साकेतानन्दजीमे पाओल जाइछ। निष्पक्ष भावेँ स्वीकार करए पड़ैछ जे शण्य-श्यामल सधन आग्रहुज लोक कलाक आर्वजक सम्पदासँ संरक्षित कोसी, कमला, गण्डकी आ वागमतीक पावन जलसँ अभिसिंचित एवम् विभिन्न वन सम्पदासँ आच्छादित मिथिला भूमि जतेक श्रीसम्पन्न रहल अछि, प्रतिभाक दृष्टिए सेहो एहि क्षेत्रक प्रतिस्पर्धी कतहु होअए से अनुपम जकर साकेतानन्दजी प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरूप छथि। अपन प्रतिभाक प्रकाश विस्तृत कऽ प्राचीन कथाकारसँ सर्वथा भिन्न कथाक रचना कएल अछि। भाव, भाषा, संवेदनशीलता आ सम्प्रेषणीयताक संग भाव संग्रहण अभिव्यक्तिक दृष्टिसँ यथार्थकेँ कथा वस्तुसँ जोड़बाक दुस्साहस कथा कलाकेँ नव आयाम देलक अछि। कथा कर्मीक हेतु एक आदर्शक उपस्थापना थिक। साकेतानन्द जीक रचनाक एहि विशिष्टताक आकलन प्रस्तुत करब सलाध्य नहि अपितु तथ्यकथन अछि। एकहि शब्दमे हिनका शलाध्य तँ अनाआसे उपलब्ध भेल छनि। तथास्तु।। कन्यादानक भीषण समस्याक कारण मध्य मिथिलांचलमे वैवाहिक परम्पराक पालन आइसँ अनुमानत: सय वर्ष दोसर रीतिसँ होइत छल। ताहि समयक हेतु ई रीति-रेवाज हितकर रहल होएत, मुदा तकर प्रभाव बादक मैथिल सन्तानपर ताहि तरहेँ पड़ल जे एखनहुँ तकर छाप अमिट अछि। ओना तँ कन्यादानक समस्या प्राय: सभ दिनसँ एक कठीन समस्या रहल अछि। समयानुसारे भलेँ ओकर रूप परिवर्त्तित होइत गेल हो। महाकवि विद्यापति अपन ‘पुरुष-परीक्षा’मे एही समस्याक सन्दर्भ चचर्चा कएलन्हि- “कन्या ककरा दी? पुरुषकेँ?” पुरुष शब्दक प्रयोग ओ विशिष्ट अर्थमे कएने छथि। अन्यथा सभ पुरुषाकार थिकाह। वीर, ध्यर्यवान, विद्वान आ वुद्धिमान, चारिटा पुरुषक लक्षण होइछ, एकर अभाव जकरामे छैक से पूँछ हीन पशु थिक। तेँ कन्याक विवाह पुरुषसँ हो। खास कऽ कन्यादानक समस्या आजुक समस्यासँ भिन्न होएबाक कारण ओहि समयमे जनसंख्या कम आ भूमि अधिक रहलोपर सन्ताँ भूमिसँ भरण-पोषण सहजहि भऽ जाइत छल। आजुक अपेक्षा आवश्यकता कम आ उपभोगक पदार्थो परिमार्जित नहि। विज्ञान अपन प्रभाव ओतेक नहि देखओने छल। आइ तँ विज्ञान मिथिलाक कथे कोन सम्पूर्ण धरतीक देश लोक, संस्कृतिकेँ जोड़ि देलक अछि। तेँ ओहि समयमे मिथिलाक लोकक उक्ति छल- “उत्तम खेती, मध्यम वाण। निषिद्ध चाकरी, भीख निदान।।” अर्थात् खेतीकेँ उत्तम, व्यापारकेँ मध्यम, चाकरी वा नौकरीकेँ निषेध तथा भीख मांगव सभसँ नीच कर्म मानल जाइत छल। इएह कारण छल जे एहिठाम कहल जाइत अछि- “कर खेती घरही भला।” कहबाक तात्पर्य घरेमे रहू, खेती करू अमोधमंत्र छल। एतबे नहि, ओहि समयक हेतु अधिक सन्तानवान होएब मान्य छलैक। किएक तँ प्राकृतिक प्रकोपक कारण जनाधि आ नहि होमए पबैत छल, जाहिसँ जन संख्याक वृष्टिक ऊपर अंकुश स्वत: लागि जाइत छल। एतए तक जे परिवारक कोन कथा? गामक गाम जनशून्य भऽ जाइत छल। तेँ अधिक सन्तानबला लोक पुण्यवाण कहबैत छलाह। बेटा नहि रहलापर बेटीक सन्तान वंशक टेक रखैत छल। काल-क्रमे बेटी-होपरान्त जमीन-जथा दऽ घरेमे राखब परिपाटी चलल जे ‘कनेदानी’ कहबैत छल। कनेदानी राखब प्रतिष्ठाक बात बुझल गेल। कनेदानीक सन्तान भगिनमान कहबैत छथि। जनिक पुरुषा कनेदानी रखलन्हि से डीही कहबैत छथि। कनेदानीक सन्तान डीही पक्षक परम भक्त होइत छलाह। बिना दरमाहाक नोकर ई भगिनमान होथि, संगहि डीहीक कृपाकांक्षी सेहो। तेँ जनहासक कारण नहि बुझाइत छल। कनेदानीक प्रति प्राय: भलमानुष होइत छलाह, जे बादमे बिकौआक नामसँ जानल गेलाह। बिकौआक सन्दर्भ किछु चर्चा : हरि सिंह देव महाराजक द्वारा पञ्जी-प्रवन्ध कएल गेल। एहिसँ मैथिल-व्राह्मणक पञ्जीकृत भेलापर श्रेणी बनल। ओहिमे योग, श्रोत्रभ्, भलमानुष प्रभृतिक उदय भेल। पञ्जीक अनुसार जे निम्न श्रेणीकेँ प्राप्त कएलन्हि ओहिमे सँ किछु सम्पन्न व्यक्ति उच्च श्रेणीक व्राह्मणसँ सम्बन्ध कए सर्व साधारणक दृष्टिमे प्रतिष्ठा हासिल करबाक चेष्टा कएलन्हि। एतए तक जे निम्न श्रेणीक व्राह्मण पैघसँ पैघ जमींदार रहितहुँ ओहि प्रतिष्ठाकेँ प्राप्त नहि कए सकैत छलाह। फलत: अर्थ अपन प्रभाव देखओलक अन्तरालमे एक बाट प्रशस्त भऽ गेल जे निम्नो श्रेणीक ब्राह्मण वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा अपनाकेँ ऊपर उठा सकैछ। स्पष्ट अछि कनेदानी राखब एहि पञ्जी-प्रथाक कारणे चलाउल गेल। सुखी सम्पन्न लोक एहि सुविधाक उपयोग करए लगलाह। उत्तरोत्तर देखा-देखीमे एक तरहक उपरौंझक स्थिति उत्पन्न भऽ गेल। किन्तु, ओहिकालक मान्यताक कारणेँ एहन बहुत कम लोक छलाह जे निम्न श्रेणीक लोकसँ सम्बन्ध करए चाहैत छलाह। फल ई भेल जे एहि अल्पसंख्याक व्राह्मणक मांग बढ़ि गेल। एहि वर्गक लोककेँ समाज तेहन ने टीकासनपर चढ़ा देलक जे सभ व्याहकेँ मात्र पेशा बनाए लेलक। इएह वर्ग बिकौआ कहाओल अर्थात् जे बिकथि। विक्रयबला पदार्थसँ ई वर्ग भिन्न छलाह। पूर्ण मूल्य देलहुँ सन्ताँ क्रय कएनिहारक जूतिमे ई नहि रहथि। ई बिकौआ बिकथि मात्र विवाहक हेतु। विवाहोपरान्त ई पूर्ण स्वतंत्र रहथि। ने स्त्रीक प्रतिदायित्व आ ने सन्तानक प्रति स्नेह। मतलब रहन्हि केवल विदाइसँ कोनोटा त्रुटि सासुरमे भेलापर रूखि एहन तँ साधारण बात रहन्हि, अपन सन्तानक जन्मक सम्बन्धमे भ्रामक प्रचार कऽ देबामे संकोच नहि करथि। एहन तरहक दन्त कथा वल्हमीझाक आदिक सम्बन्धमे प्रचलित अछि। बिकौआक लक्षण : ई बिकौआ आजुक तुलनामे कम नहि किन्तु, मुद्रा मोचन हजार-लाख जँ नहि नहि करैत छलाह तँ दान जैतुक सँ लेथि। जाहि कन्यासँ विवाह होइन्ह तकर पालनक भारसँ मुक्त रहबे करथि, संगहि अलाबा ऊपरसँ हिनक धाक कड़गर रहन्हि। उत्तम भोजन, वस्त्र आ ढेउवा विदाइक रूपमे भेटि जाइन्हि। एतए तक जे बाप-पुरुषा वा नीज रीन-कर्जा लेल सेहो सासुरेसँ चुकाएब उद्देश्य रहन्हि। सालमे एक-आध बेर सासुर जाथि ताहि सहवाससँ जे सन्तान उत्पन्न होइन्हि वएह कनेदानीक वा डीहीक उपलब्धि बूझल जाइत छल। ई बिकौआ आकर्मण्य जीवनक अभ्यासी भऽ गेल छलाह, किछु नहि मात्र पेट पोशव उद्देश्य रहन्हि। तम्बाकू, भांगक पूर्ण अभ्यासी रहथि। शरीरिक चेष्टा घिनौन बनौने रहथि। चालि-ढालि पूर्ण असभ्य जेकाँ रहैत छलन्हि। माथमे चानन-ठोप लगौने रहथि। पैरक वेमाय विदरल ठोर नमरल पेट चुबैत कनेरक टारी रथि तथापि एहनो अश्रद्ध रूप भेलापर महग रहथि, किएक तँ पञ्जीक प्रमाण पत्र भेटल रहन्हि। तेँ कन्या पक्ष हिनक रूप, गुण वैभवक मूल्यांकन नहि कऽ सोन सन कन्याकेँ ढेंग संग बान्हि दैत छल। बादमे ई बिकौआ वदु-विवाही होमए लगला, जाहिसँ मैथिल व्रह्मणमे कन्यादानक मुख्य समस्या छल। बहुविवाहक समस्या बिकौआ द्वारा केवल उत्पन्न भेल से नहि आओरो कारण भऽ सकैछ, जेना राजकुलक संसर्गसँ व्राह्मणमे कुप्रथा अएबाक संभावना। पहिने व्राह्मण तपी, त्यागी होथि किन्तु मंत्री अथवा राजपुरोहित भेलापर देखाउससँ बहु विवाहक अभ्यासी भेलाह। किएक तँ राजभवनमे रानिक अतिरिक्त सुन्दरीक झुण्ड निवास करैत छल। परञ्च, मैथिलक ई बिकौआ वर्ग अर्थक लोभसँ निम्न कुलमे पच्चीस-तीस स्त्रीसँ विवाह करैत छलाह। एतबे नहि, श्मशानघाट जेबासँ पूर्वो विवाह कऽ लैत छलाह। जँ प्रथम स्त्रीकेँ घर अनितो छलाह तँ शेषकेँ नैहरेमे छोड़ि दैत छलाह। इएह जीवन निर्वाहक उत्त साधन छलन्हि। एहि बहु विवाहक प्रथाकेँ तोड़बाक चेष्टा प्यारेलाल मुंशी 1870 ई.मे कएने छलाह। हुनका आन्दोलन जोर-शोरसँ चलल छल। ओहि परिप्रेक्ष्यमे 1878 ई.मे तिरहुतमे 54 बिकौआ व्राह्मण मृत्युसँ 665 स्त्री विधवा भेल छल जाहिमे अधिकांश युवतीमे छल। एतए तक जे मधुबनी जिलाक कोइलख निवासी एक बिकौआ 50 वर्षक आयु तक 35 विवाह कऽ नेने छलाह। सन् 1875 ई. दरभंगा जखन सवडिविजन बनल तँ तात्कालीन पदाधिकारी मेटलाक आदेश कएल जे प्यारे लाल मुंशीक आन्दोलनक अनुसार बहु विवाह बन्द हो। एहि तरहेँ बिकौआ द्वारा बहु विवाहक समस्या उत्पन्न भेल से कही वा मिथिलाक लोक द्वारा बनाओल गेल। रूढ़िवादी विचारक कारण कन्याक भविष्यक समीक्षा नहि कऽ अपन उत्तरदायित्वकेँ समाप्तिक बहानामे बिकौआक ठोंठमे कन्या बान्हब थिक। बंगालक कुलीन प्रथा सेहो मिथिलाक बिकौआ प्रथाक समान छल। वार्ड (Ward) महोदयक अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे वंगपराक उदय चन्द्रकेँ 65 स्त्री छलन्हि, कुशदाक राम किंकरकेँ 72 स्त्रीसँ विवाह रहन्हि। एक एहनो घटना भेटैत अछि जे दुगलीक रामचन्द्र मुखर्जीकेँ 32 स्त्री रहैन्ह आ वो 65 वर्षक अवस्थाकेँ पार कएने छलाह, दैवात् यक्ष्माक शिकार भऽ गेलाह, मृत्युक निश्चितता जानि बालक कहलथिन्ह- “दीन भावसँ बाबूजी अपने तँ मरैत छी घरमे एको चुटकी अन्न नहि अछि, एहन हालतमे श्राद्धो कोना होएत?” पिता किछु गंभीर भऽ निहसंकोच भऽ कहलथिन्ह- “अविलम्ब नव गोपाल चटर्जीक 9 वर्षीय कन्यासँ हमर विवाहक व्यवस्था करू, किछु दिन पूर्व प्रस्ताव आएल छल, एखनो ओ कन्या अविवाहिते अछि।” पुत्र सम्वाद पठा कए 250 रूपैया पर बात निश्चित कएलथिन्ह। विवाहक 9 मासक अभ्यंतरे रामचन्द्र मुखर्जीक मृत्यु भऽ गेलन्हि। एहि तरहेँ ओ अपन श्राद्धक इन्तजाम विवाहे द्वारा पूरा कए मुइलाह। ई सभ छल बहु विवाहक कुपरिणाम! विवाह सन पवित्र रेवाजकेँ दुषित करब समाजक कुचालि कहू वा कलंक। बिकौआ द्वारा विवाहित कन्याक जीवन झाँकी : एहि प्रथाक प्रकोप तँ तेहन छल जे बूढ़, बकनेर, अकर्मण्य वरक संग तरूणीक विवाह एक प्रकारक विडम्वना कहल जा सकैछ। अनेको कोम लांगी जीवनक सोलहम वसन्तक पहिने विधवा भऽ कठीन जीवन जीबाक अभ्यासी होइत गेल। राजा राम मोहन रायक शती-प्रथा उन्मूलनसँ अनेको विधवा वा बूढ़क स्त्री काम पिपासावश कुत्सित कर्मक भाजन भेल। एतबे नहि, बिकौआ द्वारा विवाहित किशोरी पिताक घरमे आजीवन थोपल रहलासँ कुमार्ग गामी भऽ जाइत छल। एहिसँ दारूण स्थिति ई भेल जे मैथिलक दरिद्र समुदाय बिकौआक वंशधर एखनो अछि। हिन्दूस्तानक अधिकांश शहरमे भनसिया, भीमंगा वा ताईं नीच कर्ममे प्रवृत मैथिल ब्राह्मण बिकौआक सन्तान थिकाह। इहए कारण अछि जे मिथिलेत्तर प्रान्तमे मिथलाक कुख्यातिक कुचेष्टा लोक करैत अछि। आब बिकौआ प्रथाक अन्तो आवश्यक छल। बिकौआ प्रथाक अन्त कहू वा विकल्प दहेज प्रथाक आरंभक कारण- अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसारसँ लोक नैतिक स्तर ऊपर उठए लागल। विज्ञान विकाल भेल। वैज्ञानिक आविष्कारसँ लोक जीवनमे आमूल परिवर्त्तन होमए लागल। चिकित्सा विज्ञान प्राकृतिक प्रकोपकेँ रोकि देलक। जनह्रास नहि भेलासँ जनवृद्धि अवाध गतिमे होमए लागल। स्वाधीनताक कारणेँ जन जीवन उर्द्धगामी होइत गेल। तेँ आब कनेदानी राखब आ ओकर सन्तानक भार उठाएब असौकर्ज भऽ गेल। शिक्षित समुदायमे वैचारिक क्रान्ति आएल तेँ पुरना प्रथा, रूढ़िवादिता, कुलीन प्रथा वा बिकौआक समूल नष्ट करब आवश्यक प्रतीत भेल। अनमेल विवाह, वृद्ध विवाह, बाल विवाहक परम्पराकेँ अपन वैभवक अंश नगद रूपमे दऽ कन्याक विवाह कराएबक परिपाटी शुरू भऽ गेल। दहेजक दारूण स्वरूप : जहिना बिकौआक श्रेणी छल तहिना शिक्षित वर्गक माप दण्ड कायम भेल व्यवस्था रूपमे। डाक्टर, इंजीनियर, ओभरसियर, टेकनीसियन श्रेणी सरकारी सेवक प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय श्रेणी ओ चतुर्थवर्गीय गैर सरकारी सेवकक संगहि शिक्षण संस्थाक सेवक श्रेणी कायम भेल। आब की छल वरक विक्री उपर्युक्त आधारपर होमए लागल। बरदहटा जकाँ वरक हाट सेहो लागल रहैछ जेन सौराठक सभा गाछी। जाहि कन्याक पिताकेँ जेहन उपाय रहैछ तेहन श्रेणीक वरकेँ खरीद कऽ विवाह करबैत छथि। दिनानुदिन दहेजक प्रकोप बढ़ले जाय रहल अछि। एहि दहेजक दारूण रूप तँ ई भेल जे गरीब कुमार व्रह्मण जे अयोग्य अछि ओ अविवाहिते मरैत अछि। अनेको उदाहरण भेटैत अछि। बिकौआ प्रथामे एहन बात नहि भेल रहए। खैर! दहेज-प्रथामे सक्ष्मक संग विवाह करायब युग-धर्म मानल गेल अछि, मुदा दहेजक विकराल रूप सामने अछि। बिकौआ रूसैत छल तँ ओ मनौती कएलापर मानि जाइत छल, किन्तु ई दहेज-प्रथाक शिक्षित वर्ग तँ रूसलापर स्त्रीक जान लऽ लैत अछि। एतबे नहि, कन्याक अपमान, तिरस्कार ओ अवहेलना करब स्वाभाविक होइछ। मनोनुकूल विदाइ वा दहेजक राशिमे कमी भेलापर सासु, ससुरक संग आगत व्यवहार तक कऽ दैत छथि। पहिलुका बिकौआ मांग, तमाकू खाइत छल तँ आजुक वर मदिरा, सिगरेट, चरस अभ्यासी होइत अछि। बिकौआ एक आध बेर सासुर अबैत छल, मुदा आजुक ई बिकौआ सालो भरि सासुरे रहबाक आकंक्षी अछि। अन्तर सिर्फ एतबाटा जे बिकौआक स्त्री पितेघरमे रहैत छल जाहिसँ मर्यादित छल, मुदा एखनुका वरक स्त्री संगहि रहैत अछि, किन्तु एहि पढ़लाहीक शील, स्वभाव रहन-सहन चालि-ढालि वातावरणक कारणेँ विकृत भऽ जाइछ। अधिकांश स्त्री तँ शीलहरणक शिकार भऽ जाइत अछि। कोना बूझब जे बिकौआ प्रथाक अन्त भेल? आजुक ई दहेज प्रथा तँ ओकरोसँ विभिन्न रूपमे सामने आएल अछि। आजुक दहेज प्रथाक कारणेँ कन्याक पिताक धर्म, धन ओ इज्जत सभ नीलाम भऽ जाइत अछि। पाईक अभावमे कन्याक पिता बोझ तरहक दूभि जकाँ पिअरगात कृशकाय भऽ समय काटि रहल अछि। कतबो रूप-गुणसँ युक्त कन्या छन्हि, मुदा पाईक अभावमे हुनक पिताकेँ केओ मोजर नहि दऽ सकैछ। पैसाक पिशाची लोक योग्य-अयोग्य कन्याक सीमाकेँ सन्दिग्ध कऽ देने अछि। अनेको पिता-पुत्रीकेँ शिक्षित करैत छथि, ताकि हुनका बेटाबला दहेजमे छूट देताह मुदा से सम्भव नहि। योग्य वर कन्याक वरण करथि से ख्याल केओ नहि करैत छथि जाहिसँ निर्मल दाम्पत्य जीवन नशीव होएब कठीन भऽ गेल अछि। एकर प्रतिफल की होएत? मैथिल समाजक श्रृंखला टूटि जायत, आर्थिक विषमता सामाजिक जन्म देत। एक दिसि जँ कन्या पक्ष बालक भीत जकाँ ढहल जाय रहल अछि तँ दोसर दिसि वरक पक्ष मनोरथ्ज्ञक पूल बिनु सिमेन्ट-बालुक जोड़बामे तल्लीन अछि। कहिया धरि ई दहेजक दाहसँ सन्तप्त रहत से नहि जानि। दहेजक कारण अविवाहित कन्याक जीवन झाँकी : दहेजक दर्दनाक असरि तेहन तरहेँ पड़ि रहल अछि जे अधिकांश सम्भ्रान्त परिवारक कन्याक कौमार्य अवस्था विवाहक पतिक्षेमे समाप्त भऽ जाइछ। एतए तक जे यौवनकालमे नारकीय अवस्थाक अनुभव करैत अछि। प्राय: बेटीबला ओ बेटाबला दूनूक समक्ष ई समस्या उत्पन्न छन्हि।केओ एहिसँ मुक्त नहि छथि मुदा टाका गनाएब आ गानबकेँ आइ मर्यादाक विषय जानल जाइत अछि। जे जतेक टाका गनबैत छथि ओ ओतेक गर्वोक्तिसँ समाजकेँ बुझबैत छथि, संगहि जे गनैत छथि से अप्पन बड़प्पनक विशद् वर्णन करैत छथि। सभसँ खेदक विषय तँ ई जे गरीब लोक जे बेटीक प्रति ताका लैत अछि वा छल, तकरा लोक बेटी बेचबा कहैत छल। घृणाक दृष्टिसँ देखैत छल, आइ ओकर उनटा हवा बहि गेल अछि। बेटा बेचनिहारकेँ लोक बेटा बेचबा नहि कहि समाजमे उच्चासन दैत अछि जाहिसँ बेटाक विवाह टाका लऽ कए करबामे गौरवान्वित होइत अछि। ई समाजक लोकक विचारहीनता नहि तँ आर की? एहिसँ निन्दनीय बात आइ की होएत? तखन तुलसीक पाँति स्मरण भऽ जाइछ- “समरथकेँ नहि दोष गोसाईं।” अर्थात् पैघ लोककेँ दोषी नहि कहल जाइछ। ओइ दहेजक पृष्ठपोषक समाज पैघे लेाक छथि तेँ एकर उन्मूलन सम्भव कोना? नहि जानि बिकौआक जगह दहेज आएल आ ई कहिया धरि लोककेँ खिहारैत रहत? आइ तँ आइ तँ अधिकांश ललना अभावी पिताक छातीपर दुर्गम पहाड़ बनि बैसलि अछि। कतेक तँ विवाह सूत्रमे बान्हलोपर भाग्यपर झखैत अछि। मनोनुकूल घर-वरक अभवमे संघर्षरत जीवन बिता रहल अछि। सुख सुविधामे पलल बालिका पतिक घरमे गंजन, दुव्यर्वहार, व्यंग्यपूर्ण वाक् वाणसँ विद्ध होइत रहैछ जकर कारण होइछ लेन-देनक गड़वरी, दान जैतुकमे मनचाही वस्तुक आपूर्त्तिमे कमी। एतबे नहि दहेजक उपरान्त वरियातक विशिष्ट सेवा नहि भेलासँ वा कोनो तरहक विघटन भेलापर कन्याकेँ सासुरमे पति द्वारा वा पतिक घरक लोक द्वारा अमर्यादित व्यवहार कएल जाइछ। कतेकठाम तँ कन्याक हत्या कऽ देल जाइछ आ नहि तँ कन्या स्वयं आत्म हत्या कऽ लैत अछि। सभक मूलमे दहेजे अछि जे कन्याक पिताकेँ विवश कऽ दैछ, विवशताक कारण होइछ द्रव्याभाव, अर्थाभाव। कोजागरा, जड़ाडरक संग-संग साल भरि तक व्राह्मण समाजमे बेटीबलाक तनोतरी ढील भऽ जाइछ तेँ विवाहसँ विध भारी कहल जाइछ। दहेज-प्रथाक उन्मूलनक उपाय- यद्यपि वर्त्तमान सरकार दहेज लेनिहार ओ देनिहार दुनूकेँ कठोर दण्ड देबाक अध्यादेश जारी कएल अछि, मुदा ई नैतिक पतनबला लोक एखनहुँ कम्बल ओढ़ि कऽ घी पीबएबला बात रखने अछि। सरकारक ऑंखिमे तँ गर्दा दैते अछि संगहि समाजोकेँ उल्लू बना रहल अछि। लेन-देन कऽ लइए। गुप्त रूपसँ ताकि हम आदर्श रूपमे कुटमैती कएल अछि। तेँ सरकारक द्वारा एकर उन्मूलन कथमपि सम्भव नहि। एकरा लेल वैचारिक क्रान्ति चाही, समाजक हरेक व्यक्तिक नैतिक समर्थन चाही। ई एक कलंकपूर्ण रेवाज थिक जतए पाइपर दू आजीवन मिलि कए रहए बला जीव तकर प्रेमक आकलन पाइपर हो। निश्चय एहि तरहक समाजकेँ कलंकित समाज घोषित कएल जाय जतए टाकाक आधारपर दाम्पत्य सम्बन्ध बनाओल जाइछ। एक शब्दमे कहए पड़त जे विवाहक पवित्रताकेँ तखने कायम राखल जायत जखन हरेक वर्गक लोक आत्मगत विचार कऽ विवेकपूर्ण निर्णय लेथि। आडम्वरपूर्ण विवाह प्रक्रियाक संग दहेजक विकृत परिपाटीक विरोध करथि। भविष्यक जननी सृष्टिक संरचना करनिहारि आजुक कन्या काल्हि पूर्ण अभिशप्त भए जाएत। यत्र नार्य वस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता। मनुस्मृतिक ई वाक्य सर्वथा अमान्य भऽ जाएत आ एक दिन हमरा लोकनिकेँ अवनतिक महान गर्तमे लऽ कए चल जायत! विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि जाहि समयमे विद्यापतिक आर्विभाव मिथिलामे भेल छल ओ संक्रमणक काल छल। सामाजिक विश्रृंखलताक कारणेँ किछु लेाक काज-धन्धा करबासँ मुँह मोड़ने छल। जे केओ काजुल, परिश्रमी छलो ओहो कर्त्तव्यहीन जीवन बितेनिहार भऽ गेल छल। मिथिलामे खेती आ पशुपालनक सिवाय दोसर जीविकाक साधनो तँ नहि छलैक। सीमित साधनो अछैत खेती करनाइ असौकर्ज बुझि दिनानुदिन आर्थिक दुर्वलताक शिकार होइत रहल। इएह कारण भेलै जे एतुका लोकक आर्थिक अवस्था लचड़ि गेलैक। एतबे नहि, किछु लोक कृषिक उमेक्षा कऽ भीख मांगब श्रेयस्कर बुझए लागल। एहन लोककेँ समाज घृणाक दृष्टिसँ देखैत छल। तेँ एहि प्रवृतिक लोकक ध्यान खेतीक ओर आकृष्ट करबाक निमित कहबी चरितार्थ भेल- “उत्तम खेती मध्यम वाण, निषिद्ध चाकरी भीख निदान।” तात्पर्य ई जे खेती करब सभसँ उत्तम मानल गेल। व्यवसाय करब मध्यम। नौकरी करब अधम मानल गेल। सभसँ अधलाह- भीख मांगब बुझल गेल। जहाँ तक नौकरीक गप्प छैक, आजुक समयमे नौकरियेकेँ प्राथमिकता भेटल छैक। ओ भलेँ सम्पन्न परिवारक किएक ने होथि, नौकरी हेतु अपस्यॉंत देखल जाइछ। एहनो समय छलैक जखन नौकरी कएनिहारकेँ समाजमे कुचर्चा होइत रहैक। एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे आत्म निर्भरताक शिक्षा देल जाइत छल। महा कवि विद्यापति अपन रचना ‘लिखनावली’ आ ‘वर्षकृत्य’मे मिथिलाक कृषिक बहुविधिवर्णात कहल अछि। संगहि कृषिकेँ उपेक्षाक दृष्टिसँ देखनिहारकेँ एहि ओर आकर्षित करबा लेल अपना रचनामे शिव आ गौरीक माध्यमसँ उपदेश देल अछि। विद्यापतिक मात्र उद्देश्य अकर्मण्यताक अन्मूलन करब छल। “बेरि-बेरि अरे शिव मो तोय बोलो, किरिणी करिअ मनलाई, भिखि मांगिए पर गुण गौरव दूरिजाय, निर्धन जन बोलि सबे उपहासे, नहि आद। अनुकम्पा। तोहें शिव पाओल आक-धतूर, एहि पाओल फूल चम्पा।।” भूमिक अधिकता आ जन संख्याक न्यूनताक कारण खेती अदलि-बदलि कऽ होइत छलैक। जाहि खेतमे एहि वर्ष धान गृहस्थ करैत छल, ओकरा परती छोड़ैत छल। ई करलासँ साल भरिमे खेतक ऊपज शक्ति बढ़ि जाइत छलैक। भूमि तीन श्रेणीक मानल गेल छल। विद्यापतिक समयमे पहिल श्रेणीमे गोचर, दोसर श्रेणीमे ऊपजाउ आ तेसर श्रेणीक वंजर। गोचर भूमिमे अनेक प्रकारक घास लगाओल जाइत छल जे पशुपालनक हेतु प्रमुख छल। ई गोचर भूमि साधारण गाममे एक सय दंड, पैघ गाममे दुई सय दंड एवम् नगरमे चारि सय दंड छोड़ल जाइत छल। वंजर भूमिकेँ तोड़ि कऽ खेतीक योग्य बनाओल जाइत छल। एहन भूमिकेँ विद्यापति खील भूमि कहलखिन्ह। एहन प्रकारक भूमिमे खेती कएनिहार भू-स्वामीकेँ सात वर्ष धरि ऊपजक आठम भाग दैत छल। तत्पश्चात् भू-स्वामीक अनुसार उपजक स्वामीत्वमे परिवर्त्तन भऽ जाइत छलैक। एखनहुँ परती जमीनमे खेती कएनिहारकेँ सुविधा देल जाइत छैक। एहि सुविधाक समय निर्धारित नहि छैक। जगह-जगहपर अन्तर देखल जाइत अछि। ओहि समयक समाज दू वर्गमे बँटल छल। एक वर्ग राजा महाराजाक सामन्तादिक छल। एहन वर्गक लोकक खेती-पथारी दूर-दूर धरि होइत छलनि। ओतए ओ लोकनिक खेती करबाक कर्मान्तिक अर्थात् कमतियाकेँ रखैत छलाह। एकर अतिरिक्त आरो अधिकारी वर्ग ओकर काजक निरीक्षण करबाक लेल राखल जाइत छल। समाजक दोसर वर्ग दलित वर्ग छल जे स्वयं अपन खेती करैत छल। एहन वर्गकेँ खेतीमे अपन पत्नीसँ सेहो सहयोग भेटैत छलनि। खास कऽपशुक हेतु सभ प्रकारक व्यवस्था स्त्रीगणे द्वारा होइत छल। महादेवकेँ मैथिल होएबाक प्रमाण कहक ईहो भऽ सकैछ। हुनक सासु मैना स्पष्ट रूपसँ कहैत छथिन्ह- “हमर धिया जखन सासुर जयतीह तखन ओ घास काटि लौती आ बसहा चरौती।” खेती-परती हर एवम् कोदारिसँ ओहू समयमे कएल जाइत छल। हरक व्यवहार विद्यापति साहित्यक संगहि तत्कालीन साहित्यमे सेहो कतेको स्थलपर कएने छथि। विद्यापति अपन वर्ष कृत्यमे हरक मुहुर्त्तक उल्लेख कएने छथि। ओहि दिन बरदक सिंहमे मक्खन गूड़ आदि रगड़ल जाइत छल। प्राय: ओहि दिन धनी-मनी व्यक्ति हरक-फारक आगूमे सोना लगबैत छल। विद्यापति कहैत छथि सोन लगायब एक विधान छल। एक तरहक कहबी छैक वा लोक धारणा जे पंचमीक मुहुर्त्तमे हर जोतबा काल जौं बरद चित्कार करए वा मेमिया तँ चारि गुणा उपज होएबाक संकेत भेटैछ। ओहि दिन पॉंच सिरोर जोतबाक विधान छलैक। विद्यापतिक लिखनावलीक एक पत्रमे हरक हेतु धुरन्धर बरदक चर्चा आयल अछि। खगौट भेलापर गृहस्थ एहन धुरन्धर बरदकेँ बन्हकी रखैत छल। एहिसँ ओहि समयक समाजक लचरल अवस्थाक परिचय भेटैत अछि। सम्पन्न गृहस्थ हरबाह खेत जोतबाक निमित रखैत छल। हरवाहीक अलाबा अन्यो काज हरबाहसँ करबैत छलाह। विद्यापतिक एक पद्यमे उल्लेख आएल अछि जे गौरी शिवसँ खेती करबाक लेल कहैत छथिन्ह, तखनुक ई पॉंति अछि- “खटंग काटि हर हर जे बनाविअ, त्रीशूल तोड़ि करू फार। बसहा धुरन्धर हर लए जोतीय, खेत खोला पहाड़।” धनी-मनी व्यक्तिक ओहिठाम कमतियाक ऊपर महत्म होइत छल जकरा निरीक्षक समान पद होइत छलैक। कामत परक खेती-पथारीक सभ प्रकारक खबरि कमतियासँ लैत रहैत छल। कोन खेतमे कोन तरहक अन्न उपजाओल जाय संगहि खेत कोना जोतल जाय, कोन खेतमे आरि ऊँच्च कए बान्हल जाय संगहि कोन खेतमे कतेक लागत लगाओल जाय इत्यादि इत्यादि तकर जिज्ञासा महतम कमतियासँ करैत छल। विद्यापतिसँ पूर्व मैथिली डाक आ घाघ भेल छलाह जनिका मिथिलाक कृषि कार्यक उद्गेता कहल जाइछ। मै. डाककेँ प्रकृतिक गहन अध्यययन छलन्हि। एखनहुँ डाक वचनावलीक अनुसार मिथिलाक गृहस्थ कृषि कार्यक समीक्षा कऽ समेत भऽ जाइत छथि। डाकक कहब छल- गृहस्थ छोट-क्षीण बरद नहियोँ राखथि मात्र दुई गोट धुरन्धर बरद कीनि खेती करथि। अपन खेती भेलापर अनको खेतीक हेतु मंगनी देथि। हुनक शब्दमे- “नाटा बरद बेचि कए, दुई धुरन्धर कीन, अपन खेती करि कए आनकेँ मंगनी दीन।” एतबे नहि, ओ कहने छथि खेतक उपजा जोतपर निर्भर करैत अछि। थोड़ के जोतिए अधिक मइ अविए, ऊँच के बान्हिए आरि। जौं खेत तैयो नहि उपजए तँ डाक के परिएह गारि। एहि लेल विद्यापतिकालीन ममहत्तम कमतियाकेँ सलाह दैत छलाह जे हरसँ तैयार कएला बाद खेतकेँ कोदारिसँ साधब उत्तम होइछ। मिथिलाक कृषिमे पर्याप्त वर्षाक अभाव प्राग ऐतिहासिक कालहिसँ रहल अछि। मानसून एतुका हेतु जुआवाजी कहल गेल अछि। किएक तँ अति वृष्टि अनावृष्टि आ दुर्भिक्षक शिकार एतुका गृहस्थ होइत रहलाह अछि। तेँ पटौनीक प्रभाव समय-समय पर होइत छलैक। विद्यापति साहित्यमे सेहो पटौनीक उल्लेख भेटैत अछि। पटेबाक एक यंत्र विशेषक चर्चा कएने छथि। यथा- रहट संस्कृत अरधदृ आ प्राकृतिक अरहट्ठ। एहि मंत्रसँ अहुखन इनार वा कूपसँ पानि बहार कएल जाइछ। एकर अतिरिक्त चर, चॉंचर, डबरा, खत्ता आ पोखरिसँ करीन द्वारा पटौनीक काज लेल जाइत छल। तत्कालीन राजा द्वारा बड़का-बड़का पोखरि खुनाओल गेल छल।। मिथिलामे एहन अनेको पोखरि विद्यमान अछि, जकर सकल आब बदलि गेल छैक। एहि तरहक पोखरि रजोखोरि कहबैत छल। किवदन्ति छल जे दैत्य द्वारा एहन विशाल पोखरि खुनल गेल छल। विद्यापति तँ भाव नदीक उल्लेख कएने छथि- गौरी जखन शिवसँ खेती करबाक आग्रह कएलनि तँ शिव कहलथिन्ह- “सभ बात मानल मुदा पानिक अभाव भेलापर की होयत? तखन खेती तँ करब असौकर्ज होएत।” एहिपर गौरी उत्तर देलनि- “पाटय सुसरि धारा।” एहिसँ ज्ञात होइत अछि जे तत्तयुगीन मिथिलामे पटौनीक काज गंगानदीसँ कएल जाइत छल। ओहि समयक कृषकमे प्रगाढ़ प्रेम होइत छलनि। एक-दोसरक हित चिन्तनक संग अति आदरक भाव रखैत छलाह। खेतसँ उपज निर्विघ्न आब तेँ बाधक हेतु रखवार राखल जाइत छल। अहुखन मिथिलाक गाममे रखवार रखबाक प्रथा अछि। रखवारकेँ विशेष अधिकार गृहस्थक द्वारा देल गेल छल। कहुखन ई रखवार खेतक पूर्ण उपजकेँ हथिया लैत छल जे विद्यापतिक पदसँ ज्ञात होइछ- “खेत कएल रखवारे, लूटल ठाकुर सेवा भोर।” यदा-कदा एहनो होइत छलैक जखन खेतीक समय बीति जाइत छल तखन वर्षा होइत छल। जेकर विद्यापतिक पदसँ पुष्टि होइछ- “समय गेले मेघे वरिसब, की दहु तेँ जलधार।” एहना स्थितिमे वर्षाक पानिकेँ रोकबाक हेतु खेतमे ऊँच्च आरि बान्हल जाइत छल ताकि खेतसँ पानि ससरि नहि जाय। विद्यापतिक पद्यसँ संकेत भेटैछ- “गेला पीड़ पिरोधक की फल।” पुन: विद्यापति अपन रचनामे प्रेम रूपी फूलक हेतु शीलक आरि बान्हि मर्यादाक रक्षा कएने छथि- “फूल एक फूलवारि लगाओल मुरारि, जतने पटओलन्हि सुवयन वारि। चौदिस वॉधलि सीलक आरि, जीव अवलम्वन करू अवधारि।” एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे लोक भूमिकेँ छोट-छोट टुकड़ीमे बाँटि खेती योग्य बनबैत छल। विद्यापतिक समयक कृषकक समस्त उपजाक अन्नक उल्लेख कतहु एकठाम नहि भेटैत अछि। तखन एतए मसूरी, राहड़ि, सरिसो, तिल जौ आदिक अवश्य उत्पादन होइत छलैक। जतेक प्रकारक अन्नक उल्लेख भेल अछि ओ सभ अन्न विभिन्न अवसरपर मिथिलामे विभिन्न देवी देवताक प्रसन्नताक हेतु दान कएल जाइत छल। एकर सांगोपांग वर्णन विद्यापतिक ‘वर्षकृत्य’मे भेटैत अछि। अनुकूल समयसँ यथेष्ट उपज होइत छलैक। गृहस्थी नीक हालतमे भेलासँ मिथिलाक लोक बाहर नहि जा कऽ घरहि रहैत छल। कहबी छलै- “कर खेती घरही भला।” इएह कारण छल जे एतुका जनमानस वाह्य परिवेशक अनुभवसँ वंचित रहक। विद्यापतिक पूर्व जहिना गृहस्थीसँ उदास लोक छल तहिना कविक रचनाक प्रभावसँ गृहस्थीक ओर झुकाव भेल छल। खेतीसँ उत्पन्न अन्नक उपयोग मोला व्यवस्था द्वारा चलैत छल। मोलाक अन्तर्गत क्रय-विक्रयक विधान छल। एकरो उल्लेख विद्यपतिक लिखनावलीमे आयल अछि। तौल-नापक व्यवस्थामे टंक और मानी पांथी चलैत छल। 4 मानी एक टंक होइत छलैक। ओहि समयक 1 मानी आजुक 16 सेरक बरा-बर होइत छलैक। खेतसँ पर्याप्त धानक प्राग्रिक प्रमाण छलैक जे पैघ गृहस्थ डेढ़िया वा सवाईपर कर्जा लगबैत छलाह। कर्जाक अदायगी अगहन मासमे नवका धान भेलापर होइत छलैक। विद्यापतिक लिखनावलीमे कृषि सम्बन्धी चर्चा विलक्षण ढंगसँ कएल गेल अछि। अस्तु...! विद्यापतिक रचनामे विरह वर्णन विद्यापति अपन वहुमुखी प्रतिभाक परिचय अपन रचनामे देलन्हि अछि, मुदा काव्य प्रतिमाक वास्तविक परिचय सुनक विरह गीतसँ होइत अछि। प्रेमक प्रगाढ़ता संयोगमे नहि वियोगेमे होइत छैक। महाकवि राधाक विरह-वेदनाक सजीव आ मर्मस्पर्शी वर्णन कएलन्हि अछि। जौं सूर विप्रलम्भ श्रृंगारमे गोपीक वेदनाक टीसकेँ भ्रमर गीतक अन्तर्गत उजागर कएलन्हि तँ विद्यापति सूक्ष्म दृष्टिसँ राधाक मनोदशाक विछोहावस्थाकेँ विरह गीत रूपमे उजागर कएल अछि। समयानुकूल विरहिणीक स्थितिक स्वाभाविक वर्णनमे विद्यापतिक कलम माजल छन्हि। साहित्य शास्त्रमे श्रृंगार रसकेँ रस राजक संज्ञा देल गेलैक अछि। कमनीयताक कारणेँ अन्य सभ रससँ एकर स्थान उच्च मानल गेलैक अछि। कविक वर्णनमे सत्यता रहबाक ई सत्यता प्रेम वर्णनमे सर्वाधिक पाओल जाइत अछि। प्रेमक चित्रणमे ‘विरह’केँ महत्वपूर्ण स्थान देल जाइत छैक। विरहक द्वारा प्रेमक प्रगाढ़ताक पूर्ण परिचय भेटैत छैक। विरह ओ कसौटी थिक जाहिपर प्रेम सुवर्णक परीक्षा होइत अछि। एकर अधिकतामे प्रेमी एवम् प्रेमिकाकेँ एक दोसराक प्रति वास्तविक भावावेश एवम् तन्मयता होइत अछि। विरह प्रेम जीवक एक मर्मस्पर्शी घटना थिक। एहिसँ प्रेमक परिपुष्टि होइत अछि। विरह एक प्रकारक पुट थिक। बिनु पुटे वस्त्रपर रंग नहि चढ़ैछ। साहित्य-दर्पणमे उल्लेख अछि- “न बिना विप्रलम्भेन संयोग: सुखमश्नुते, कषामिते हि वस्त्रादो भूयान राग: प्रवर्त्तेत।” अर्थात् बिनु विरहक प्रेमक स्वतंत्र सत्ता नहि। एही रूपेँ बिनु प्रेमक विरहक अस्तित्व नहि। प्रेमक अग्निकेँ प्रज्जवलित करैछ विरह-पवन, प्रेमक अंकुरकेँ बढ़बैछ विरह जल, प्रेम दीपक वर्त्तिकाकेँ उस कबैछ विप्रलम्भ। विरह-वेदना मधुममी होइछ। एहिमे रूदन एवम् आमोद सामने मालित होइछ। संयोगक अवस्थामे हृदयमे आशा एवम् निराशाक ओतेक द्वन्द्व नहि होइत अछि जतेक विरहक अवस्थामे। वरहमे वासनाक अन्धकार प्राय: लुप्त भए जाइत अछि तथा प्रेमक विशुद्ध अनुभूतिमे विरही डूबि जाइत अछि। श्रृंगार तथा विरहक एतेक महत्वकेँ जनैत विद्यापति अपनाकेँ ओहिसँ फराक कोना रखितथि? एहि विरह वर्णनक हेतु विद्यापतिक लेखनी सेहो चलल आ चलबेटा नहि कएल अपितु अपना रचना शक्तिक भाव एवम् अनुभूतिक बलसँ सम्स्त भारत वर्षकेँ भाव-विभोर कए देलक। विरह-वर्णनमे विद्यापति हृदयक अनेक भावकेँ निरलंकारिक भाषामे रखि सरलतासँ चित्रित कएल अछि जे ओ भाव सभ हृदय पटलपर स्वभावत: अपन अधिकार स्थापित कए लैछ। विद्यापतिकेँ महाकवि कहएबाक एक प्रधन कारण ईहो थिक जे विरह एवम् विरहक पश्चात् मिलनक वर्णनमे हिनकर स्थान उच्चत्तम रहल अछि। एहि मिलनमे ओ जे अपन स्वाभाविकता भवुकता सुन्दर कल्पना तथा पद्य योजनामे कमनीयता देखाओल अछि से एक महान कविए सँ सम्भव भए सकैछ। प्रेम सूत्रमे ग्रथित नायक लोकनिक चित्र हुनक काव्यमे सहसा जीवनक यांयलय प्रदर्शित कए देलक। पं. जगन्नाथ साहित्य दर्पणमे विरह अथवा काम दशाक दश अवस्था कएल गेल अछि- अभिलाषाश्चिन्ता स्मृति गुण कथनो द्वंग संप्रलाप उन्मादो व्याधिर्जड़ता मृति रिति दशात्रश्य कामदशा अर्थात् स्मरण, गुण-कथन, अभिलाषा, मूर्च्छा, व्याधि, उद्वेग, प्रलाप, जड़ता, उन्माद एवम् मरण। एहि दस अवस्थाक अतिरिक्तो अनेक भावक चित्रण विद्यापतिक कएलन्हि अछि। विरहक महत्वपर दृष्टिपात करैत विद्यापति लिखैत छथि- “जेहन विरह हो तेहन सिनेह।” प्रेमक असली स्वादक अनुभव विरहेक अवस्थामे वास्तविक रूपसँ भेटैत अछि। विद्यापतिक विरह व्यथिता राधिका अनभिज्ञ छथि। हुनका समीपमे नहि छथिन्ह। राधा हुनक वियोगमे शुक्क शीर्षा सुमनक सदृश्य धाराशालिनी छथि। हुनक अश्रुप्रवाहसँ भूमि कर्दमचुक्त भए गेल अछि। राधा ओहि थालबला भूमिपर लेटा रहली अछि। हुनक सखी सभ कृष्णक आगमनक आश्वासन दैत छथिन्ह परन्तु ई आश्वासन विरहग्निमे घीक काज करैत छन्हि। हिनक यौवन विरहक वेदनासँ दिनानुदिन क्षीण भए रहलन्हि अछि, हुनक व्यथा अधिकतर भए जाइत छन्हि। विद्यापति राधाक हृदयक मनोवैज्ञानिक वर्णन करैत छथि- “अंकुर तपन ताप यदि जारब, कि करब वारिदमेहे, ई नव यौवन विरह गमाएब कि करब से पिया ने हे। हरि हरि की इए दैव दुराशा, सिन्धु निकट यदि कंठ सुखाएब के दूर करत पिया सा।।” एहिठाम दृष्टान्त दए राधिका जे अपन हृदयक दुख रखलन्हि अछि से सहृदय संवेध थिक। सहसा भावावेशमे आबि विधाताकेँ ‘हरि-हरि की दए वैव दुराला’ कहि भर्त्सना करैत अछि। एतए मधुमणी वेदनाक चित्रण कएल गेल अछि। सखीक सम्वादसँ जखन काज नहि चलैत छन्हि तखन राधा स्वम कृष्णकेँ रोकबाक प्रयास करैत छथि- “माधव तोहे जनु जाए विदेशे हमरो रंग रभस लए जएबए लएवह कोन संदेशे, बनहि गमज करू होइत दोसर मति विसरि जएवए पति मोरा। हीरा मणि माणिक एको नहि मांगव फेर मांगव पहु तोरा।।” एतए राधाक प्रेमक अलौकिक रसास्वाद अछि। तर्कक अनुसार आदान-प्रदान सेहो होएबाक चाही। रंग-रभसक प्रति बदल की दए सकताह? ओ थिक कृष्णक प्रेम। राधाक याचना। फेर मांगव पहु तोरा, नि:स्वार्थ प्रेमक भाव स्पष्ट रूपसँ प्रदर्शित भेल अछि। कृष्ण मथुरा प्रस्थानक वार्तासँ सम्पूर्ण गोकुल शोका कुल भए गेल अछि। सर्वत्र अश्रुक प्रवाह एवम् करूण चीत्कार प्रारम्भ भए गेल- अव मथुरापुर माधव गेल, गोकुल गोकुले उछलला करूणाक रोल नयन जले देख बहए हिलोल। राधा बहुत दिनसँ आशा लगौने छलीह जे कृष्ण औताह। अवधिक अवसान भऽ गेल, बाट तकैत-तकैत भए गेलन्हि। अन्तमे निराश भऽ विलाप करए लगलीह। लोचन धाम फेदायल हरि नहि आएल रे, शिव-शिव जिवओ ने जाए आस अरू झाएल रे। पहिने राधिका कृष्णक प्रेमक केन्द्र विन्दु छलीह। एखन सभटा विपरीत भए गेलन्हि अछि। तखन अपनाकेँ सॉंझक तारा बुझैत छथि। जकर दर्शन अशुभ होइछ, संगहि भादवक चौठीक चान अपन मुखकेँ बुझैत छथि जकर र्दन अशुभकारी मानल जाइछ- विरहाग्निमे दग्ध राधिकाक लेल ई जतबा आश्चचर्यक विषय भेल ओतबए लाजोक। विरहाग्निसँ जर्जरित राधाक हृदयक टीस स्पष्ट अछि- “की हम सॉंझक एकसरि तारा, भादवचौठीक शशी, इथि दुहु झांझ कओन मोर आना जे पदुहँखि न हेरलि।।” कालिदासक श्ति अपना विलापमे कहैत छन्हि- “मदनेन विना कृतारति: क्षण मात्र किल जीवितेतिमे, वचनीय मिदं व्यवस्थितं रमणस्वा मनुयामि।” यद्यपि। एतएव देखैत छी जे विद्यापति कालिदासहुक विरह-वर्णनसँ टपि जाइत छथि। एतए विरह वर्णनमे कविक कल्पनाक चातुर्यादर्शनीय अछि- “लोचन नीर तटनि मिर माने, ततहि कलामुखि करए सनाने। सरस मृणाल करहजप माली, अएनिस जप हरिनाम तोरूनी।।” अर्थात् विरहिणी राधिका नयनक अश्रुसँ नदीक निर्माण कए ओहीमे स्नान कए रहल अछि, तात्पर्य जे ततेक अश्रुपात भेलन्हि अछि जे ओ नारीक रूपधारण कए लेलक अछि। कृष्णक मिलनक आशा समाप्त भए गेलापर नायिका राधा अपन सौन्दर्यक त्याग करए लगलीह अछि। मात्र शरीर एवम् स्नेह बचि गेल छन्हि- “सरदक रसधार मुख रूचि सोपलक हरिन के लोचन लीला। केसपाल लए भामरि के सोपलक पाए मनोभव पीला।।” पावसकालीन विरहोद्वेगक एकसँ एक उत्तम पद्य पदावलीमे पाओल जाइत अछि। दु:खाभिभूत राधाक करूण क्रन्दन हृदय विदारक एवम् करूणोत्पादक अछि। एहि समयक प्रत्येक वस्तु जे संयोगक अवस्थामे आनन्द दायक अछि राधाक हृदयकेँ विदीर्ण कए रहलन्हि अछि। प्रियतमक विरहमे ओ सभ वस्तु कष्टदायक छन्हि। सखि हे हमर दुखक नहि ओर...। विद्यापति कह..... दिन रातिया।। एहि पदक अक्षर अक्षरसँ मग्न हृदयक हाहाकार प्रति ध्वनित भए रहल अछि। दुखक आगि ज्वालामुखी बनि फूटि पड़ल अछि। हरि बिनु केसे गमाओल दिन रातियाक भावक कविता रवीन्द्रनाथ सेहो लिखलन्हि अछि- तुमि यदि नादाओ, करो अमाम हेला। केमन करे कारबे आमार एमन बादल बेला।। संस्कृत साहित्यमे एहि प्रकारक अनेक वर्णन अछि- “इतो विधुद्वल्ली विलसित मित: केतकितरो, स्फुरद्गन्ध प्रोधजलद निनाद स्फूर्जितमित: इत: केलिक्रीड़ा कलकलख: पक्ष्मलद्वशां कथं भात्स्यन्तेते विरह दिवसा: संमृतरसा:।।” राधाक प्रेमक तन्मयता एतेक बढ़ि गेल अछि जे ओकर वर्शान्त नहि भए सकैत अछि। ओ कृष्णक नाम लैत-लैत एतेक तन्मय भए गेल छथि जे ओ अपनाकेँ स्वयं कृष्ण मानए लगैत छथिन तथा राधा-राधा जपए लगैत छथि। तत्क्षणहि हुनका अपन वास्तविक दशाक ज्ञान भऽ जाइत छन्हि। तथा विरहक तीव्र वेदनासँ ओ आुल भए उठैत छथि। अहुखन माधव-माधव रटइत राधा भेलि मधाई। भेल सन्देह।। एतए प्रेम पराकाष्ठापर पहुँचि गेल अछि। नायिका राधाक रूपमे सेहो तथा कृष्णक रूपमे सेहो दुनू अवस्थामे मर्मव्यथा सहैत छथि। एहि पदमे विद्यापति प्रेमक तन्मयताक एहन चित्र उपस्थित करैत छथि जे संसारक सम्पूर्ण साहित्यमे अपन सभता नहि रखैत अछि। इहि प्रकारसँ विरहमे मिलन एवम् मिलनमे विरहक वर्णन विद्यापतिहिक उत्कृष्ता थिक। विद्यापतिक विरह वर्णन कएक विशेषता ई अछि जे हुनक नायिका विरहमे रहितहु अपन भाग्यक दोष दैत छथि नायकक नहि। हिनक राधिका कुलवती ललना छथि तेँ प्रेममे जतेक बाधा, यातना आर जतेक व्यथा सहैत जाइत छथि हुनक प्रेम सोना जकाँ ओतेक चमकैत जाइत छन्हि। स्वप्नोमे ओ कृष्णकेँ कटुक्ति नहि कहैत छथि। अप्पन कर्मक दोष तथा कि करत नाए दैव भेलवाम। एहि प्रकारे अछि- “सखि कहि कहब अपतोष, हमर अभाग पियाक नहि दोष।।” अन्तमे युग-युग जीवथु लख कोष हमर अभाग हुनक नहि दोष।। विरहिणीक चित्रण कालिदासक शब्दमे- “कल्याण वुद्धैरथवा तवाणं न कामचारी ममिशंक नीय:। ममैव जन्मान्तर पातकानां विपाक निस्फूर्जथुर: प्रसक्ष्य।।” सीता सेहो पूर्ण जन्म पापकेँ अपन दुखक कारण मानैत छथि। एक स्थलपर तँ राधा निराश लऽ मृत्युक अभिलाषा करैत छथि जे भावोत्पूर्ण अछि- “आन करह हिय विहि कएल आन, अवहु न निक सभ कठिन परान।।” विद्यापतिक विरहमे प्रकृतिक उद्दीपन, रूपक चित्रण श्रृंगार रसक स्थायी भाव रतिकेँ जाग्रह करबामे सफल भेल अछि। जाग्रतावस्थामे तँ कृष्णसँ मिलन असम्भव अछिए, स्वप्नहुमे नायिकाकेँ कृष्णसँ मिलन नहि भऽ पबैत छन्हि। तेँ नीन नहि होइत छन्हि- “सपनहुँ संगम पाओल, रंग बढ़ाओल रे से मोर विहि विधटाओल नीन्दओ हेरायल रे।।” निन्द होइतन्हि कोना? ओ तँ प्रियतक संग विदेश चल गेलन्हि- “सपनेहु तिलाएक तन्ह सों रंगे, निन्द विदेसल तन्हि पिआ संगे।।” कालिदासक मत्तिणी- ‘त्वंहितस्म प्रियेति’ कहि कऽ पतिक विरहकेँ वर्णित करैत छथि। किन्तु एतए काकक भाषासँ प्रियतमक आगमनक प्रतीक्षा एवम् आकुलताकेँ नव जीवन देल गेल अछि- “काक भाष निज भाषहु रे, पिय आओत मोरा क्षीर खीर........................ कनक कटोरा सोमे चलु.................. पिआ आओत मोरा।।” जखन विरहक कष्ट असहय भऽ जाइत छन्हि तँ सन्देश पाठवए चाहैत छथि- “के पतिया ले जाओत रे...। पास भेल साओन मास।” विद्यापति विरहक सूक्ष्मसँ सूक्ष्म दशाकेँ देखलन्हि तथा ओहिसँ अपन हृदयक सम्बन्ध स्थापित कएलन्हि। ई विरहक प्रत्येक दशाक वर्णनमे अनुभूति पक्ष सर्वथा ऊँच स्तरक एवम् मनोग्राही रहल अछि। विद्यापति नायक-नायिका दुनूक विरहक चित्रण कएलन्हि मुदा स्मरणीय जेहन आकर्षक राधाक विरह वर्णन भेल अछि तेहन कृष्णक नहि यथा- “अइसन नागर अइसन नव नागरि अइसन सम्प मोर, राधा बिनु सब बाधा मानिए नयन तेजिअ नोर।।” वास्तवमे राधा एवम् कृष्णक प्रेम ‘सागर सागरोपम्’ थिक। विरहमे सज्जनक प्रेम आओरो अधिक निखरि जा उठैत अछि। विद्यापति स्वयं लिखैत छथि- “सुजनक प्रेम हेम समतूल, दरूइते कनक दुगुन होए मूल।। टुटइते नहि टुट प्रेम अद्भुत, ये सन बढ़ए मृणालक सूत।।” विद्यापतिक विरह वर्णन विश्व साहित्यमे अपन स्थान मूर्घन्य बनौने अछि। हिनक भाव प्रारम्भमे लौकिक स्तरक तथा वैयक्तिक रहैत अछि, किन्तु जखन गम्भीरताकेँ प्राप्त करैत अछि तखन अलौकिक, समष्टि सूचक एवम् विश्वक निधि भए जाइत अछि। भाव पक्षक संगहि संग विरह वर्णनमे हिनक कला पक्षक समावेश सेहो पूर्ण रूपसँ भेल अछि। कलात्मकता कृत्रिम नहि अपितु स्वाभाविक अछि। अनुभूति व्यक्त करबामे सरलता अपनाओल गेल अछि। शब्द चयन, वाग्वैदग्ध, एवम् सुन्दर उक्तिसँ हिनक वर्णन अलंकृत एवम् विभूषित अछि। कलापक्षक रसक परिपाकमे सर्वत्र सहायक भेल अछि। एहि प्रकारेँ देखैत छी जे विद्यापति अन्य भाषाक विरह-वर्णनसँ अधिक उत्कृष्ट वर्णन कएने छथि। अन्य विशेषताक संग भाव पक्ष श्रेष्ठ रहितहु कलापक्षक उपेक्षा नहि भेल अछि। भावक गम्भीरताक अभिव्यक्तिक मनो वैज्ञानिक ढंगसँ कएल गेल अछि। मिथिलाक संस्कृतिक अनुपालन सर्वत्र करैत विरहिणीक शब्द-शब्दसँ वेदना नि:श्रृत भेल अछि। नारायण यादव लघुकथा- पंचैती रामपुरमे एकटा जमींदार छलाह। पैघ जमींदारी, नौकर-चाकर, खेती-पथारीक अम्बार लागल छल। हुनका तीन गोट बेटा छल। बहुत दिन धरि परिबारक भरण-पोषण करैत वृद्धावस्थाकेँ प्राप्त कयलन्हि। बुढ़ाड़ी अवस्थामे नाना प्रकारक बीमारी तंग करय लगैत अछि। जमींदार धातक बीमारीक इलाज करैत रहलाह। ओहि इलाजमे बहुतरास जमीन-जथा सेहो बिक गेलैन्ह। ठीक नहि भेलाह। स्वर्गवासी होइसँ पहिनहि गामक चारि-पॉंच प्रतिष्ठित व्यक्तिकेँ बजाय कहलनि- “हमरा सम्पति के दू भागमे बॉंटि देबैक।” श्राद्ध कर्म समाप्त भेल। गामक प्रतिष्ठित लोकनि सभ जमा भेलाह। बँटबारासँ पहिनहि। बुड़हाक कहल बात पर मंथन होमय लागल। बेटा छन्हि तीन आ बँटवारा होयत दू भागमे। सभ सोचय लगलाह। बुढ़ा मृत आत्माकेँ ठेंस नहि लागबाक चाही। बुढ़ाक बातक पालन होयबाक चाही। गणमान्य व्यक्तिक के किछु फुरा नहि रहल छलन्हि। सभ कियो एहि तारतम्यमे लागल रहलाह, जे एहि बातक निराकरण कोना होई। गणमान्यमे सँ एक व्यक्ति बजलाह- “नरारमे राम लषण बाबू बड़ पैघ पंचैतिया छथि। एहि वषय पर हुनकेँसँ राय विचार कय ली।” चारू-पांचू गणमान्य व्यक्ति राम लषण बाबूसँ राय विचारक लेल नरार पहुँचलाह। किनको हुनकर घर देखल नहि छल। राम लषण बाबूक घरक बगलमे एकटा इनार छल। ओहि इनार पर एकटा नव युवती पानि भरि रहल छलीह। युबतीक उम्र तकरीबन 17-18 वर्ष छलैक। गणमान्य व्यक्तिमेसँ एक व्यक्ति ओहि पानि भरैत नव युबतीसँ पुछलथिन्ह- “दाई, राम लषण बाबूक घर कोन छैक।” ओ युबती जवाब देलन्हि- “जिनकर अहॉं नाम लैत छी ओ तँ मरि गेलाह।” सभ कियो उदास भय गेलाह। ताबत् एकटा प्रौढ़ा इनारक नजदीक पहुँचलीह। ओ गणमान्य व्यक्ति सभकेँ देखि पुछलन्हि- “अहॉं सभ की खोजैत छी?” गणमान्य व्यक्तिमे सँ एक व्यक्ति कहलैन- “राम लषण बाबूक घर खोजैत छी।” प्रौढ़ा हाथसँ इशारा करैत घर देखबैत बजलीह- “ओ तँ आन्हर भय गेलाह।” गणमान्य व्यक्ति सभ ऑंगा बढ़लाह। कनेक दूर पर एकटा दरबाजा छल। ओतय राम लषण बाबू बैसल छलाह। गणमान्य व्यक्ति लोकनि राम लषण बाबूकेँ नमस्कार कय दरबाजापर राखल कुर्सी आ चौकी पर बैस रहलाह। हिनका लोकनिक मनमे नबयुवती आ प्रौढ़ाक जवाब पहेली बनल छल। होइत छलन्हि जे राम लषण बाबू जखन जीवित छथि तँ ओ नबयुवती कियैक बजलीह जे राम लषण बाबू एहि संसारमे नहि छैथ। प्रौढ़ा कियैक कहलीह जे राम लषण बाबू आन्हर छैथ। गणमान्य व्यक्ति लोकनिकेँ एहि प्रश्नक जवाब हेतु जिज्ञासा बढ़ि गेलैन्ह। कुशल-क्षेम परिचय-पात भेलाक बाद राम लषण बाबू हुनका लोकनिक स्वागत-सत्कारमे लागि गेलाह। नैना सभक सहयोगसँ पानि आ चाहक फरमाईश आंगनमे भेज देलन्हि। राम लषण बाबू बजलाह- “अहॉं लोकनि कोन प्रयोजनार्थ एतय अयलहुँ?” गणमान्य व्यक्तिमे सँ एकटा बजलाह- “सरकार हमरा लोकनिक समस्या बादमे कहब। ताहिसँ पहिनहि एकटा दोसर प्रश्न सामने आबि गेल। पहिने एकर समाधान करू।” राम लषण बाबू बजलाह- “बाजू कोन तरहक समस्या अछि?” गणमान्य व्यक्ति बजलाह- “एकटा बच्चिया इनार पर पानि भरैत छलीह। हुनकासँ अपनेक बारेमे पुछलयैन्ह। नबयुबती कहलैन- ओ तँ मरि गेलाह। एहि बातक कोनो अर्थ नहि लागल।” राम लषण बाबू बजलाह- “ओ बच्चिया तँ ठीके ने कहलक। ओहि बच्चियाक हम बाप छिऐक। ओ बियाहक योग्य भय चुकल छथि। हम ओकर बियाह नहि करा रहल छियैक तँ ओकरा लेल तँ हम मरियै ने गेलियै। ओ ठीके ने कहलक।” पुन: गणमान्य व्यक्ति बजलाह- “एकटा प्रौढ़ासँ पुछलयैन्ह तँ ओ बजलीह जे ओ आन्हर भय गेलाह तकर की रहस्य छैक?” राम लषण बाबू बजलाह- “ओ प्रौढ़ा हमर पत्नी थिकीह। ओ साज श्रृगांरसँ रत रहैत छथि आ ओकरा दिश ताकितो नहि छियैक, ओकर अभिलाषाक पूर्ति नहि होइत छैक। तेँ ओकरा लेल तँ हम आन्हरे ने छियैक। आब अहॉं सभक मूल समस्या की अछि से बाजू।” ताबत् ऑंगनसँ स्वागतक हेतु पानि आ चाह आबि गेल। सभ गणमान्य व्यक्ति पानि चाह पीब बजलाह। हमरा गॉंवमे कपिल बाबूकेँ तीन गोट बालक छन्हि। ओ जखन स्वर्गवासी होमय लगलाह तखन हमरा लोकनिकेँ बजा कहने छलाह जे हमरा सम्पति के दू भागमे बॉंटि देबैक। हमरा लोकनिकेँ कपिल बाबूक बातक अर्थ नहि लागल। बेटा तीन आ बँटबारा दू जगह। यैह समस्या लय हम सभ अपनेक शरणमे आयल छी। कोना दू भागमे बॉंटि, से बुझाऊ। राम लषण बाबू बजलाह- “एकर तँ सोझ हिसाव अछि। तीनू बेटामे सँ एकटा कपिल बाबूक बेटा नहि अछि। तेँ ओ कहि गेलाह जे हमर सम्पतिक बँटबारा दू भागमे करब। आब कोन बेटा कपिल बाबूक नहि छन्हि। ओकर पता लगेबाक उपाय बता दैत छी। एकटा कपिल बाबूक फोटो लय लेब आ ओहि फोटोकेँ एकटा कोनो घरमे कुर्सी या टेबुल पर राखि देबैक। तीनू भाईकेँ कोनो एकान्त जगहमे बैसा देबैक। बेरा बेरी कपिल बाबूक फोटो लग भेजब आ ओहि बेटाकेँ कहबैक जे एहि फोटोकेँ 10 जूता मारब ओकरा हिस्सा भेटत। जे बेटा बापक फोटोकेँ जूता नहि मारय ओकरा बुझब जे ओ कपिल बाबूक बेटा अछि। आ जे फोटो पर जूता मारत ओकरा बुझब जे ओ कपिल बाबूक बेटा नहि अछि। मुदा ई भेद दोसरकेँ नहि बुझय देब।” गणमान्य व्यक्ति सभ ओतयसँ घर अबै गेलाह। राम लषण बाबूक कथनानुसारक पिलबाबूक फोटो एकटा घरमे राखल गेल। सभसँ छोट बेटाकेँ गणमान्य पंच लोकनि घरक अन्दर प्रवेश करौलन्हि आ कहल गेल जे बापक फोटो पर जूतासँ मारब ओकरा हिस्सा भेटत। घरक अन्दर छोटका बेटा प्रवेश कयलन्हि। फोटोक बगलमे जूता राखल छल। छोट बेटा बापक फोटो पर फूल चढ़ौलक आ प्रणाम् कय किछु सोचय लगलाह। सोचैत बाजल जे बाप हमरा जन्म देलैन्ह, पालन, पोषण कयलन्हि। हुनका हम जूतासँ नहि मारब। एहेन पाप हम नहि कय सकैत छी, चाहे हिस्सा हुए वा नहि। बाहर जा नौकरी चाकरी कय जीवन बिता लेब। बाजैत घरसँ बाहर भय गेलाह। पंच लोकनि छोटका बेटाकेँ दोसर कोठरीमे लय गेलाह। आब मझिला बेटाक बारी एलैक। मझिला बेटा छोटका बेटा जकॉं कयलक ओहो अपन हिस्सा लेबसँ इन्कार कयलक। हिस्सा हुअ अथवा नहि मुदा बापकेँ जूता नहि मारब। पंच लोकनि मझिलो बेटाकेँ दोसर कोठरीमे लय गेलाह। आब जेठका बेटाक बारी एलैक। जेठका बेटाकेँ बुझौल गेल। जे बापक फोटोकेँ जूतासँ मारत ओकरे जमीन-जयदादमे हिस्सा भेटतैक। जेठ बेटा कोठरीमे प्रेवश कयलक। फोटोक वगलमे राखल जूता लय तावर-तोर बापक फोटो पर जूता बरसाबय लागल। आब पंचलोकनि एहि निष्कर्ष पर अयलाह जे जेठका बेटा कपिल देब बाबूक नहि अछि। पंच लोकनि कपिल देव बाबूक पत्नीसँ दरयाप्त केलन्हि। कपिल देव बाबूक पत्नीक कथन ई भेलैन्ह। हमर बियाह दोसर मर्दसँ भेल छल। पहिलुका घरबला स्वर्ग वास भय गेलाह। कपिल बाबू अबिबाहित छलाह। हमरे डेराक नजदीक हुनको डेरा छल। पतिक मुइलाक बाद कपिल बाबूसँ हेम-छेम बढ़ि गेल आ बादमे दुनू शादी कय ललहुँ। जेठका बालक पूर्वहि पक्षक अछि। ई बात हमही दुनू प्राणी जनैत छलहुँ दोसर कियो नहि। जेठको बेटाक जे बाप छल हुनको ओहि शहरमे ढेर रास सम्पति अछि। पंच लोकनि आश्वस्त भय कपिल बाबूक सम्पतिकेँ दू भागमे बॉंटि जवाबदेहीसँ मुक्त भय गेलाह। लघुकथा- स्वाद परिवर्तन अवकाश प्राप्त कर्मचारीक जे क्रिया कलाप होइत अछि। ताहुसँ हमहु वंचित नहि छी। परिवारो छोट-छीन अछि। पेंशनक पैसासँ कहुना दिन काटिये लैत छी। चारि गोट बालक अछि। पहिल- डॉक्टर, दोसर- इंजीनियर, तेसर- मास्टर आ चारिम- नेता। पहिल डॉक्टर जे बीमार अछि, दोसर इंजीनियर जे अछि। तेसर- मास्टर लाचार अछि। चारिम जे मैट्रीक फेल ओ देशक कर्णधार अछि। प्राय: सभ शहर बाजारक जिनगी जी रहल अछि। दुनू जीव ग्रामीण परिवेशमे रहि रहल छी। किछु खेती-पथारी सेहो अछि। आब तँ खेतो-पथार लोककेँ जानक जंजाल भय गेल अछि। कियो बटाई करक लेल तैयारो नहि होइत अछि। बहुत रास खेतमे पेड़-पौघा लगा देलियैक। बाल-बच्चा ग्रामीण परिवेशमे रहबाक लेल तैयारे नहि अछि। नीक-नीक आमक गाछ, लीचीक गाछ आ कटहरक गाछ रोपि देने छियैक। गाछ सभ पैघ भऽ गेल, आब फरनाई शुरू भेल अछि। गाम घरमे किसानक हालत बड़ खराब स्थिति रहल अछि। कोनो साल रौदी तँ कोनो साल दहारे भय जाइत अछि। धन रोपणीक लेल जन-मजदूर नहि भेटैत अछि। जँ भेटबो करैत छैक तँ उपजासँ बेसी मजदूरिये लय लैत अछि। वर्षा होबाक प्रतिशत बहुत कम भऽ गेल अछि। धानक उपज नहि भेल आ रबीक फसल गेहूँ, चना आ मसूरक उपज नीक भेल अछि। जे बेटा मास्टर अछि हुनक परिवार आ ओकर बाल-बच्चा गामेमे रहैत अछि। उपज नहि भेलाक कारण रोटी, सत्तू, दालि खाय पड़ैत अछि। चनाक उपज नीक भेलाक कारण, बेसी खाय पड़ैत अछि। सत्तू खाइत खाइत मन अकछा गेल अछि। सत्तू जखने ऑंगामे अबैत अछि तँ देखि मन कोना दन करय लगैत अछि। करब की कोनहुना खा लैत छी। कहावत छैक जे अपन हारल आ बहुक मारल कियो कत्तौ थोरे बाजैत अछि। बाल-बच्चा अपन-अपन कमाईमे सँ एक पाई नहि खर्च करत। घरक सभ खर्च नून, तेल, हरदी, मिरचाई आ सब्जीसँ लय पोता पोतीक पढ़ाईक खर्च हमरे वहन करय पड़ैत अछि। तँए पैसा नहिये के बराबर बचैत अछि। तैयो कभी कभार दू-चारि किलो चावल खरीद स्वाद परिवर्तन करा लैत छी। सत्तू देखि मन भिन्ना जाइत अछि। पत्नीसँ कहलियैन- “हम काल्हि पटना जायब। पटनाबला बौआ आ बौआसीन, पोता-पोतीक आ ओतयसँ रॉंची बेटी आ नातीनकेँ सेहो भेंट घॉंट कय लेब। मनमे तँ छल जे ओतय जायब तँ कमसँ कम सत्तूसँ पिंड छुटत आ स्वाद परिवर्तन सेहो भय जायत। इन्टर सीटी ट्रेनक टिकट कटेलौं। छ: बजे जयनगरसँ खुजि मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर,मुजफ्फरपुर, हॉंजीपुर, सोनपुर होइत डेढ़-दू बजे पटना पहुँचैत छैक। मनमे बड़ पैघ आशा नेने ट्रेनमे बैसलहुँ। गाड़ीमे भीड़ो भार कमे रहैत छैक। खिड़की लग जगह पकड़लहुँ। बाहरक दृष्यक आनन्द लैत आगा बढ़लहुँ। मनमे ई सोचैत छलहुँ जे पटना जायब तँ बेटा पुतोहु नाना प्रकारक फल, दूध, दही, बासमती चाबलक भात,अरहरिक दालि, आलू-परोरक तरकारी आ नाना प्रकारक तरूआ खूब खुऔत। पोता-पोतीक लेल मिठाई सेहो खरीद लेलौं। मनमे नाना प्रकारक ख्वाब देखैत पटना पहुँचलौं। मने मन सोचैत रही जे डेरा पर जायब तँ पहिने हाथ-पैर धोय चाह पीअब। किछु फल सेहो खायब। तकर बाद स्नान कय भात-दालि आ नाना प्रकारक स्वादिष्ट तरूआ, तिलौरी आ पापड़ खाइब। सत्तू खाइत खाइत मन अकछा गेल अछि तेँ स्वाद परिवर्तन भय जायत। स्टेशन पर उतरि टेम्पू पकड़लहुँ। टेम्पूसँ राजा बाजारक चौक पर उतलहुँ। डेराक नम्बर पता संगेमे छल। पुछैत-पुछैत डेराक नजदीक पहुँचलहुँ। 10-15 मिनट प्रतिक्षा कयलहुँ। तखन ऊपरसँ पुत्र-बधु देखलन्हि। तखन बेटा-पोता-पोती नीचा आबि झोरा हाथसँ लय सभ कियो पैर छू प्रणाम कयलक। सभक संगे ऊपर डेरा पर पहुँचलहुँ। पुत्र-वधु आबि पैर छू प्रणाम कयलन्हि। सौभाग्यवती भव: क आशीर्वाद दयलहुँ। तुरत एक गिलास पानि आयल। बाथ रूम जा हाथ-पैर धो पुन: कुर्सीपर आबि बैसलहुँ। फ्रीजसँ एक गिलास स्प्राइट टेबुल पर राखि देलक आ कहलक- “दादाजी, ठंढा पीब लिअ।” ग्लास उठा मुँहमे लगेलहुँ। कोनादन स्वाद लागल। बुझना गेल जे हमरा दारू कियैक पिबैक लेल देलक। आई धरि एहेन पेय पदार्थसँ दर्शन नहि भेल छल। पोता कुहय लागल- “दादाजी-दादाजी, ठंढा पीजिए। अच्छा है।” हम पोता आ पोतीकेँ स्प्राइट पीआ देलहुँ। गिलास खाली भय गेल। पुतोहु खाली गिलास लय खूब नीमन नहाति एक गिलास सत्तू आगूमे टेबुल पर राखि देलन्हि। सत्तू देखि मनमे भेल जे हम तँ ट्रेनसँ पटना अयलहुँ मुदा ई सत्ततु हमरासँ पहिनहि कोना एतय पहुँच गेल। बुझना गेल जे सत्तू हमरासँ पहिनहि शायद हवाई जहाजसँ एतय पहुँच गेल। किछु देरक बाद मनमे आश लगेने रही जे भोजनमे भात-दालि आ तरकारी भेटत तँ स्वाद परिवर्तन भय जाइत। आधा घंटाक बाद सत्तूसँ भरल लिट्टी, सेबईक खीर,आलू-गोभीक तीमन आगामे टेबुल पर आयल। ओना, भोजन बड़ प्रेमसँ बनल छल। मनहि मन सोचलहुँ जँ जायब नेपाल तँ कपार संगहि जायत। जाहि डरे भिन भेलहुँ सैह पड़ल बखरा। स्वाद परिवर्तनक लेल अयलहुँ पटना मुदा स्वाद परिवर्तन भाग्यमे लिखलो रहे तखन ने। लघुकथा- गिफ्ट ब्रह्मानन्द काकाक उमर ढलल जा रहल छल। बियाह भेला बहुतो दिन भय गेल छलैक। कोनो बाल बच्चा नहि भय रहल छल। कतेको बेर डॉक्टरसँ देखा चुकल छलाह। एतेक रास धन-सम्पतिक उपभोग के करत? ताहि सोचमे पड़ल रहैत छलाह ब्रह्मानन्द काका। बहुतो ओझा-बैद्यसँ सेहो आशीर्वाद लय चुकल छलाह। हिनक पत्नी सेहो बहुतो देवी-देवताकेँ कबुला-पाती कय चुकल छलीह। स्त्रीगणक विचारसँ कतेक धामीक हाथे कायल छलाह। सासु ननद सभ ओकरा पत्नीकेँ बड़ उपराग दैत कहैत छल जे ई मौगी अभागिन अछि, बाँझ अछि तेँ बाल-बच्चा नहि भय रहल छन्हि। दुनू पक्षसँ माने लड़का आ लड़की पक्षक स्त्रीगण बहुतो देवी-देवताकेँ कबुला पाती केयने छल। भगवानक महिमाकेँ कियो नहि जानि सकैत अछि। मखना सन मुसहरकेँ सत्ता सोरे धिया-पुता छैक। सुभेश्वर मण्डलकें जेकरा ने रहैक लेल घर छै आ ने घराड़ी सरकारी जमीन यानि गैरमजरूआ जमीनमे घर बनेने अछि। राति खाइत अछि तँ दिन लय झखैत अछि आ दिन खाईत अछि तँ रातिक लेल चिन्ता लागल रहैत छन्हि। शुभेश्वर मण्डल ब्रह्मानन्द काकाक लगुआ जन अछि। ब्रह्मानन्द काका हरबाही कय जे चारि सेर धान भेटै छलै ताहिसँ सभ बाल बच्चाक भोजन साजन चलैत छैक। शुभेश्वर मण्डल मिहनतिया जन अछि। ब्रह्मानन्द काकाक दू बिगहा खेत बटाई करैत छल। 25-30 मन धान सालमे बटैया खेतसँ आ धन-कटनी कय 10-20 मन धान कमा लैत छल। ओहि धानसँ सालभरिक लत्ता-कपड़ा, तेल, साबुन आदिक व्यवस्था भय जाइत छलैन्ह। अधिक खर्चक लेल गिरहत मदद करबा लेल तैयार रहिते छन्हि। व्रह्मानन्द काका शुभेश्वर मण्डलकेँ बड़ मानैत छथि। ब्रह्मानन्द काकाकेँ उदास देखि शुभेश्वर मण्डल सेहो चिन्तित रहैत छल। मण्डलजीक धिया-पुता भरि दिन ब्रह्मानन्द काकाक अँगना घरमे टहल-टिकोरा करैत रहैत अछि। मालिक ओकरा धियापुताकेँ बड़ मानैत छथि। कहियो-कहियो पैंट-शर्टक व्यवस्था सेहो कय दैत छथि। मण्डलोजी भगवानसँ गोहार लगबैत रहैत अछि। जे हमरा गिरहतकेँ बाल-बच्चा होइन्ह। किछु दिनक पश्चात् ब्रह्मानन्द काकाक शुभचिन्तकक प्रार्थना भगवान सुनलैन्ह। व्रह्मानन्द काकाक पत्नी (लाल काकी) गर्भवती भेलीह। ई शुभ समाचार सुनि सभ शुभचिन्तकक मन प्रफुलित भय गेलैन्ह। चारू तरफसँ शुभकामनाक संदेश आबय लागल। समय बितैत गेल। महिला डॉक्टरक संरक्षणमे लाल काकी रहय लगलीह। समयपर बच्चाक जन्म भेल। जच्चा-बच्चा सही सालामत रहल। घरमे खुशहाली आबि गेल। सासु-ननदिक उलहन-उपराग बन्द भय गेल। बच्चाक छठिहारमे हित-अपेक्षित आमंत्रित भेलाह। खूब नीक जकाँ भोज भात भेल। बच्चाकेँ ढेर रास उपहार भेटलैक। रातिमे सभ रश्म पूरा कय बच्चाक नाम भोला राखल गेल। क्रमहि भोला किशोरावस्थामे पदार्पण कयलक। भोला बड़ संस्कारी बच्चा निकलल। एक समयक बात छल। भोला बीमार भेल। व्रह्मानन्द काका आ लालकाकी ओकरा नीक डॉक्टर लग इलाजक हेतु लय गेलाह। डॉक्टर साहेब सभ तरहक जॉंच लिखलक। पौथोलजिक जॉंच रिपोर्ट आयल। डॉक्टर साहेब रिपोर्ट देखलैन। जॉंचमे ई ज्ञात भेल कि दिलमे सहस्त्र छेद अछि। डॉक्टर साहेब कहलैन जे एकर दिल वदलऽ पड़त। किछु दिन ठीक रहत, तकर बाद भोलाकेँ दिक्कत होमय लागत। व्रह्मानन्द काका आ लाल काकी खूब कनलैथ। लालकाकी मनहि मन निश्चय कयलक जे हम अपन कलेजा दय बेटाक जान बचायब। दबाई लिखल गेल। दबाई चलऽ लागल। भोला पूर्वक स्थितिमे आबि गेल। डॉक्टर साहेबक सलाह छलैन्ह जे चारि-पाँच वर्ष धरि ठीक रहत। तकर बाद दिल बदलबा देबैक। चारि-पाँच वर्षक बाद जखन भेालाक उम्र सत्रह वर्षक छलैक तखन मायकेँ कहलैन जे माय हमरा उठारहम जन्म दिनपर कोन तरहक गिफ्ट देबही। लाल काकी बजलीह- “बौआ, तोहर अठारहम जन्म दिनपर जे गिफ्ट देबऽ से आलमारीमे राखल रहतऽ। तौ लयलीह।” भोला जिज्ञासा कयलैन्ह- “माय हमरा कहि दे जे की देमे।” लाल काकी बजलीह- “बेटा, आई धरि गिफ्ट कियो नहि देने हेतैक से तोरा देबह। अखन गिफ्टक नाम कहलासँ मजा किरकिरा भय जेतह।” भोला चुप भऽ गेलाह। समय बितैत गेल। जहिया भोलाक अठारहम साल पुरितै, ताहिसँ किछु दिन पूर्वे ओ बीमार भऽ गेलाह। माय-बापक एकलौता सन्तान। सभक ऑंखिक तारा। फेर ओकर माय-बाप भोलाकेँ पूर्वक डॉक्टर लग लय गेलाह। ओ डाक्टर साहेब भोलाकेँ पहचैन गेलाह। ओ हुनका अभिभावककेँ दिल प्रत्यारोपणक सलाह जे पूर्बहिमे देने छल पुन: दोहरौलैथ। भोला माय अपन दिल देबाक लेल तैयार भेलीह। ऑपरेशनक तैयारी हेतु माय-बाप घर अयलाह। ऑपरेशनक फीसक व्यवस्था कयल गेल। भोलाक माय एकटा पत्र लिखि एकटा डिब्बामे बन्द कय आलमारीमे राखि देलक। ऑपरेशन करयबाक हेतु भोलाक माय-बाबू डॉक्टर ओतय पहुँचलाह। भोलाक दिल निकालि, ओकर मायक हृदयमे आ मायक दिल भोलाक हृदयमे प्रत्यारोपित कयल गेल। माय-बेटा दुनू दुरुस्त छलाह। भोलाक स्वास्थ्य दिनानुदिन ठीक होमय लगलैक। ओ भोला मायक स्वास्थ्य दिनानुदिन छीन होयम लगलैक। जहिया भोलाक जन्म दिन छल ताहिसँ 25-30 दिन पहिनहि भोलाक माय स्वर्गवासी भय गेलीह। श्राद्ध कर्म नीक जकाँ सम्पादित भेल। भोलाक जन्म दिन खूब धूम-धामसँ मनाओल गेल। भोलाकेँ अपन मायक द्वारा देल गिफ्टक बात मन परलैन्ह। ओ आलमीराकेँ खोललैन्ह। तँ देखलक जे एकटा डिब्बापर लिखल छैक जे हैपी बर्थ डे टू यू बेटा। भोला डिब्बा खोललैन्ह। डिब्बामे एकटा पत्र लिखि राखल छल। भोला मोरल पत्रकेँ पसारि पढ़य लगलाह। पत्रमे लिखल छल- “बेटा, हमर जिगरक टूकड़ा यदि तोँ एहि पत्रकेँ पढ़ि रहल छह तँ तू बिल्कुल ठीक भय जेबह। तोरा याद होयतह जे जखन तौं बीमार भेल छलह तखन हम तोरा डॉक्टर साहेबक पास लऽ गेल रही। डाक्टर साहेब बजलाह जे एकरा दिलमे बहुत रास छेद छैक। दवाई सँ ई ठीक नहि होयत, ओहि दिन हम बहुत कनलहुँ। आ निर्णय लेलहु जे बेटाकेँ हम अपन दिल दय ओकरा जीवन प्रदान करब। तोरा इहो याद हेतह जे एक दिन तूँ बाजल छलह जे मॉं हमरा अपन 18म जन्म दिनपर कोन प्रकारक गिफ्ट देबही, से बेटा हम तोहरा गिफ्टक रूपमे अपन दिल दय रहल छीह। एकरा सम्हारि कऽ रखियह। हैपी बर्थ डे टू यू बेटा।” लघुकथा- भाय-बहिन मगध देशक राजा वरुणदेव छलाह। ओ महान प्रतापी, योद्धा, वीर, नीति-निपुण, कुशल प्रशासक आ प्रजा पालक राजा छलाह। वरुणदेवक न्याय प्रियता आ कला कौशलक प्रसंशा दूर-दूर तक फैलल छल। राजाक वियाह महान विदुषी आ सुन्नरि राजकुमारीक संग भेल छल। राजकुमारी दोसर देशक राजा अरुणदेवक जेष्ठपुत्री छलथिन्ह। रूप-रंग आहार-व्यवहार एतेक नीक छलख् जे राजा-पत्नी प्रति समर्पित छलाह। वियाहो बड़ धू-धामसँ भेल छल। बहुत दिन धरि दाम्पत्य जीवनक निर्वहन करैत एक पुत्र आ एक पुत्री रत्नक प्राप्ति भेलैन्ह। पुत्रक नाम शिवधर आ पुत्रीक नाम गायत्री छल। शिवधर जेठ आ गायत्री छोट छलीह। राजा वरुणदेवक लार-प्यार आ मायक वात्सल्य प्रेमसँ शिवधर आ गायत्री परिलालित होइत रहलाह। राजा दुनू सन्तानकेँ शिक्षा ग्रहण करयवाक हेतु योग्य शिक्षकक सानिध्यमे दय देने छलथिन्ह। समयक गति ससरैत रहल। राजा किछु आवश्यक कार्यार्थ राज्यसँ बाहर गेल छलाह। रानी अपन रनिवासमे पलंगपर सुतल छलीह। तावत् देखैत छथि जे मकानक भेटिलेटरपर जे खाली जगह छलैक, ओहिपर एकटा बगड़ा आ बगरनी खोंता लगाकय सुखपूर्वक जीवन व्यतित करै छल। दुनू पत्ति-पत्नीमे बड़ प्रेम छल। वगरनी गर्भवती छलीह। दू-चारि दिन वाद ओ अंडा देलक। अंडा जुएलाक बाद बच्चा सेहो भेलैक। बगरा आ बगरनी अपना बच्चाकेँ चोंचसँ खाना खुआवैत छल। कोनो दुर्घना बस बगरनीक निधन भय गेलैक। आब बगरा दोसर शादी कय दोसर बगरनीकेँ अपना घर (खोंता)मे अनलक। बगरनी जखन नव घरमे अयलीह तँ पूर्वसँ पालित बच्चाकेँ देखलक। बच्चाकेँ देखिते बगरनी ईर्ष्यासँ जरय लगलीह। एकान्त पावि ओ गराक बच्चाकेँ चोंचसँ नींचा गिरा देलक। ई दृश्य देखि रानी व्याकुल रहय लगलीह। बड़ चिंतित रहय लगलीह। सदिखन मनमे सोचथि जे एहि जिब्बगीक कोनो ठेकान नहि। जँ कहीं हमरो निधन भय जाए तँ हमरो वाल-बच्चाक संग एहि प्रकारक घटना न घटित भऽ जाए। एहि हालतमे रानी सोचलक जे ई बात राजाकेँ कहि राजासँ प्रतिज्ञा करावी जे हमरा मुइलाक बाद ओ दोसर वियाह नहि करथि। राजाकेँ बाहरसँ अयलाक बाद रानी सभ बात राजासँ कहि सुनौलैन्ह। आ ओहो राजासँ प्रतिज्ञा करौलैन्ह जे जँ हमरा किछु भय जाय तँ अहॉं दोसर वियाह नहि करब। राजा रानीक बात सुनि अचंभित भय गेलाह। राजा बजलाह- “अहॉं ई अशुभ बात कियैक बजैत छी।” रानी बजली- “एहि जिनगीक कोन ठेकान।” कालक्रममे समय बितैत गेल। समयक प्रवाहमे बहुतो परिवर्त्तन भेल। रानी महामारीक प्रकोपमे पड़ि गेलीह। डाक्टर इलाज करय लगलाह। मुदा ईश्वरक मर्जीक आगा ककरो किछु नहि चलैत अछि। हदीशक एक पॉंति अछि- लाइलाही इल्लाह महमदे रसूल्लाह। ईश्वरक मर्जीक वगैर एकटा पत्तो नहि हिलैत अछि। आ रानी तेहेन रूसान ने रूसलीह जे बौसव कठिन भय गेल। श्राद्ध कर्म सम्पन्न भेल। राजा अपन प्रतिज्ञाक अनुसारे विवाह करब मनसँ निकालि देने छलाह। साल-दू-सालक वाद कुटुम्ब, महामंत्री आ शुभ चिन्तकक आग्रह पर राजा विवाह करवाक हेतु विचार करय लगलाह। लोक सभक कथन छल जे राजाक राजपाट विना रारा-रानीक चलौनाइ असम्भव अछि। राजाक मन डोलि गेलैन्ह आ ओ शादी कय लेलैथ। व्याहीसँ सगही वेशी दुलारू होइत अछि। राजाक सगही किनिया रानीक रिक्त पदकेँ भरलैथ। रानी अपन काम काज सम्यलैन्ह। विाही कनियॉंक बाल-बच्चाक प्रति मनहि मन ईर्ष्याक भाव राखय लगलैन्हि। राजा बुद्धिमा छलाह। ओ अपन पुत्र शिवधरकेँ शिक्षा प्रदान करवाक लेल कोनो नीक स्कूलक छात्रावासमे रखबा देने छलथिन्ह। संयोगसँ विद्यालय किछु दिनक लेल बन्द भेल छल। तेँ शिवधर छात्रावाससँ घर आवि गेल छल। एक दिनक बात छलैक। शिवधर गेन्द खेलाइत छल। गेन्द उछलि कऽ राजाक आंगनमे रानीक गोदमे आवि खसल। शिवधर दौगल अयलाह आ अपन सौतेली मॉंक गोदसँ गेन्द लय पड़ेलाह। रानी नौकरानीसँ पुछलथिन्ह जे ई वालक के छल जेकरा ऐतेक हिम्मत भेलैक जे हमरा गोदीसँ गेन्द लय लेल। नौकरानी बाजलि- “मालकिन ई बच्चा अहिंक सौतेला बेटा अछि आ एकटा बेटी सेहो अछि।” रानी ईर्ष्यासँ अभिभूत भय दु:खी रहय लगलीह। हमेशा यैह सोचथि जे राजा अपना बाद एकरे राज पाट देथिन्ह। हमरासँ जनमल पुत्रकेँ राजा नहि बनौथिन्ह। ई धृतराष्ट्र जकॉं पुत्र मोहमे पड़ि गेलीह। दिनानुदिन रानी रूग्न रहय लगलीह। कतेक डॉक्टर-वैद्य आबय लगलाह आ इलाज करय लगलाह। मुदा दवाईक कोनो प्रभाव रानीपर नहि पड़लैन्ह। राजा सेहो दु:खी रहय लगलाह। राजा आब अधिक समय रानीपर देमय लगलथिन्ह। रानीकेँ कोनो रोग रहत तखन ने दवा-दारूसँ ठीक हेतैन्ह। राजा रानीसँ बार-बार पुछथिन्ह जे अहॉं कोना ठीक होयब। रानी राजासँ प्रतिज्ञा करौलैन्ह तकर बाद कहलैन्ह जे हमरा शिवधरक कोढ़-कलेजी आनि दिअ। तखन वीमारी ठीक होयत। राजा प्रतिज्ञा कय चुकल छलाह। तें विवश भय जल्लादकेँ आदेश देलैन्ह जे शिवधरकेँ जंगलमे घुमयवाक हेतु लऽ जाऊ आ ओकरा मारि ओकर कोढ़-कलेजी नेने आऊ। एमहर शिवधरक बहिन अपन सौतेली मॉंक मनोदशाकेँ भापि चुकल छलीह। गायत्री राजा-रानीक सम्वादसँ अवगत छलीह तेँ ओ मायक बगहना-जेवर आ किछु रूपया-पैसा लय जल्लादक पाछू-पाछू जंगल पहुँचलीह। शिवधरक बहिन कहय लगलथिन्ह जे यौ जल्लाद भाई लोकनि हमर माय अहॉं सभकेँ कतेक मानैत छलीह। अहॉं लोकनि जे धन सम्पति लेब से लीअ आ हमरा भाईकेँ छोड़ि दीऔन्ह। हमरा सौतेली मायकेँ कोनो वीमारी नहि छैक। ओर हमरा भाईकेँ मारबाक प्लान अछि। तेँ अहॉं लोकनि कोनो जानवरक कोढ़-कलेजी लय लीअ आ हमरा सौतली मायकेँ दय देबैन्ह आ कहबैन्ह जे ई शिवधरक कोढ़-कलेजी अछि। गायत्रीक बात सुनि पहिने तँ जल्लाद लोकनि नाकर-कुकर केलैन्ह। मुदा बादमे धनक लोभसँ लोभित भय शिवधरकेँ एहि शर्तपर छोड़वाक हेतु तत्पर भेलाह जे ई कहियो अपना देश घुमि कऽ नहि आबथि। शिवधर दुनू भाए-बहिनकेँ ई शर्त मानय पड़लैन्ह। आ गहना-जेवर रूपया पैसा लय शिवधरक जान बकैस देल गेल। शिवधर अपन देशकेँ छोड़ि दोसर देश चल गेलाह। आ शिवधरक बहिन गायत्री घुमि कऽ राज दरवारमे आवि रहय लगलीह। एमहर चांडाल लोकनि कोनो जानवरकेँ मारि, ओकर कोढ़-कलेजी लय रानीकेँ दय देलनि। रानी बड़ खुश भेलीह। ओेमहर शिवधर अपन देश छोड़ि दोसर देश चल गेलाह। राजदरवारमे जा राजा सेवा-सुश्रुषामे रहय लगलाह। राजा बेटा छलाहे बड़ पैघ संस्कारी सेहो छलाह। राजा नि:सन्तान छलाह। तेँ शिवधरकेँ अपना बेटा जकॉं मानय लगलाह। शिवधरकेँ उच्च शिक्षा देबाक व्यवस्था कयलैन्ह। किछुए दिनमे शिवधर सर्वगुण सम्पन्न भय गेलाह। राजा सेहो वृद्ध भय गेलाह। शिवधर मे राज्योचित गुण देखि राजा हुनका अपन उत्तराधिकारी नियुक्त कय संयास धारण कय लेलथि। एमहर राजा वरुणदेव सगही पत्नीक संग मिलि राजपाट चलबय लगलाह। वरुणदेवक पत्नी राजाकेँ अपन परिणय लीलामे जकरने रहली। राजा हर हमेशा पत्नीक जी-हुजुरीमे लागल रहैत छलाह। गंगा दशहराक दिन छल। गंगा स्नानक बहाना बना कय अपन संतौली बेटी गायत्रीकेँ संग लय गंगाकात अयलीह। दुनू माय-बेटी गंगामे स्नान करय लगलीह। रानीक नियतमे खोंट छल। ओकर गायत्रीक प्रति ईर्ष्याक भाव जागि उठल। आ रानी गंगाक तेज धारामे गायत्रीकें धकेल देलक। गायत्री गंगामे दहा गेलीह। रानी कानैत-खिझैत घर अयलीह। किछु दुरक बाद राजा शिवधर राज्य पड़ैत छल। संयोग नीक छल। शिवधर किछु सैनिककेँ लय शिकार खेलवाक प्रयोजनार्थ गंगाक किनारमे आयल छलाह। शिवधर गंगामे भसियैत वच्चियाकेँ देखि सिपाहीकेँ आदेश कयलाह जे एकरा गंगासँ ऊप्र कर। सिपाही भसियाइत गायत्रीकेँ ऊपर कयलक। गायत्री र्निवस्त्र भय गेल छलीह। राजा ओहि र्निवस्त्र कन्याकेँ अपन चादर पहिरा अपना दरवारमे बहिकरनीक रूपमे राखि लेलथिन्ह। गायत्री अपना भाइकेँ पहचानि गेलथिन्ह। ओ सोचय लगलीह जे ई तँ हमर भाई शिवधर थिकाह। राजा शिवधरोकेँ गायत्रीक प्रति विशेष स्नेह रहैत छल। एक समयक बात छल। राजा शिवधरक राज्यमे बड़ पैघ मेला लागल छल। राजा ओहि मेलामे भाग लेबाक हेतु चललाह। ओ बहिकरनी लग जाकय पुछलथिन्ह- “गै बहिकरनी, मेलासँ तोरा लेल की नेने अयवौ से कह।” वहिकरनी बजलीह- “मालिक, हमरा वास्ते एक काठक बनल हंस नेने आयब।” राजा शिवधर अपना राज्यक सभसँ पैघ मेलाक उद्घाटन कय बहुतो रास रस-समान खरीद बहिकरनीक हेतु काठक बनल हंस सेहो खरीदलैन्ह। नहि जानि जे बहिकरनीक प्रति राजाक स्नेह अनायासे कियैक बढ़ि गेल छल। राजा गायत्रीमे अपन बहिनक रूप देखैत छल। आ अपन बहिनहुसँ अधिक ध्यान रखैत छलाह। संध्याक समय जखन राजा शिवधर घर पहुँचलाह तखन किछु समानक संग काठक बनल हंस सेहो बहिकरनीकेँ देलथिन्ह। गायत्रीक शयन कक्ष बहरधारामे छल। जखन निशि भाग राति भय जाइत छल, सभ कियो सुति रहैत छल तखन बहिकरनी काठक बनल हंसकेँ अपना सामनेमे राखथि आ संगहि सूप आ वारहनि सेहो राखथि। सभ वस्तुकेँ सामने राखि वाजथि- “हे हौ हंस, ई सूप वारहनि छियैक की नहि?” हंस बाजथि- “हँ तँ हँ।” वहिकरनी बाजथि- “ई राजा हमर भाई शिवधर थिकाह की नहि?” काठक बनल हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “हमरा भाईकेँ जल्लाद मारबाक हेतु जंगल लय गेल की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” एहि प्रकारे बहिकरनी अपन व्यतित घटना हंसकेँ सुनाबथि आ हंस सभ करूण कथामे हुँहकारी भरथि। नोकर-चाकर, सर-सिपाही आ खुपिया विभाग राजाकेँ कहलथिन्ह जे सरकार बहिकरनीकेँ अपने की खरीद देलयन्हि जे भरि राति हँ मे हँ करैत रहैत अछि। सभक निन्द हमराम कय दैत अछि। राजा प्रतापी आ संस्कारी छलाह। ओ एक राति जखन सभकियो गाड़ी निद्रामे छल तखन अपना शयन कक्षसँ उठि बहिकरनीक बहर धाराक ओठमे आबि ठाढ़ भय गेलाह। राजा शिवधर बहिकरनीक सभ बात सुनय लगलाह। वहिकरनी सूप, वारहनि काठक हंसक सामनेमे राखि बाजलि- “हे हौ हंस, ई सूप वारहनि छिऐक की नहि?” हंस बाजल- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “ई राजा शिवधर हमर भाई थिकैक की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “हम एक भाई आ एक बहिन थिकहु की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “हमर अपन माय बचपनेमे मरि गेली की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “हमर बाबूजी दोसर वियाह कयलैन्ह की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकनी- “हमर भाई गेन्द खेलाइत छलाह की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “गेन्द उछलि कऽ हमरा सौतेली मायक गोदीमे चल गेल की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “जल्लादक माध्यमे हमरा भायक कोढ़-कलेजी लेवाक लेल कहलक की नहि?” हँस- “हँ तँ हँ।” बहिकरनी- “हमर भाई हमरा गंगासँ छानि वाहर लौलैन्ह की नहि?” हंस- “हँ तँ हँ।” वहिकरनीक मुँसँ ई शब्द सुनि राज शिवधर विह्वल भय गायत्रीक गर्दनि पकड़ि कानय लगलाह आ गायत्री सेहो गलामे गला लगा कानय लगलीह। राजा शिवधरक खुपिया विभागक पदाधिकारी जे राजाक पाछॉं राजाक गति विधिपर नजरि रखवाक हेतु छपल छलाह। ओ तुरत महामंत्रीकेँ वस्तु स्थिति सँ जानकारी करौलैन्ह। महामंत्री दौगल राजाक समीप आवि राजा आ गायत्रीकेँ बोल-भरोस दैत दुनूकेँ रनिवामे लय गेलाह। लघुकथा- इमानदार चोर चोर-चोर मसियौत भाय। दूटा चोर एक पैघ व्यापारीक घरमे चोरी करबाक हेतु पहुँचल। दुनू चोरक नाम पनमा आओर मखना छल। दुनू चोरी करवाक कलामे निपुण छल। कतबो सतर्क घरक मालिक कियैक नहि होथि। मुदा जखन पनमा, मखनाक विचार ओहि मालिकक घरमे चोरी करवाक हेतैक तँ चोरी कइये लैत छल। ओहि इलाकाक सवसँ पैघ व्यापारी छल। ओकर नाम करोड़ीमल छलैक। पनमा, मखना करोड़ीमलक घरमे चोरी करवाक लेल पहुँचल। जखन करोड़ी मलक पहरेदार सुति रहल तखन निशा भाग रातिमे पनमा मखना व्यापारीक घरमे सेंध काटय लागल, सेंध काटल भय गेल। तखन मखना सेंघमे अपन दुनू पैर दय सेंघक जॉंच कयलक। पैरसँ ससेंघक अगिला भागक जॉंच कय, पुन: पैर वाहर कयलक। जखन ई बुझुना गेलैक जे आब घरमे पैइसवामे कोनो बाधा नहि होयत। तखन ओ सेंघक वाटे घरमे पैइसवाक प्रयास करय लागल। जखन ओ पूरा सिर सेंघमे देलक आकि देबाल नीचा धसि गेल। मखना देबालक तरमे दवा कय मरि गेल। पनमा कतबो प्रयास कयलक जे मखनाकेँ खिंची ली से नहि भय सकल। अन्तमे भोर भय गेल। पनमा दोसर दिन राजाक ओतय जा कय नालिश कयलक, राजाक ओतय फर्द वयान ई देलक जे राति हम सभ करोड़ी मलक घरमे चोरी करबाक हेतु गेल रही। हमर संगी सेंघ कटलक आ ओहिमे प्रवेश करबाक हेतु घुसल आकि देबाल धसि गेल आ हमर निर्दोश संगी मारल गेल। मालिक करोड़ी मलक कमजोर देबालक कारणेँ हमर संगी मारल गेल। हम सभ जावत चोरी नहि कयलहु तावत तक तँ निर्दोषे छलहुँ। चोरोक एक अजीब दुनिया होइत छैक। राजाक बुद्धिसँ चोरक बुद्धि पैघ होइत अछि। राजा पनमाक फर्द वयान (नालिशी) केँ स्वीकार कयलक। राजा चोकर नालिशीकेँ सुनवाई शुरू करय लगलैन्ह। राजा सिपाहीकेँ हुकुम देलैन्ह जे ओहि व्यापारीकेँ एतए उपस्थित करू। सिपाही राजाक आदेशानुसार ओहि व्यापारीकेँ न्यायालयमे बजाओल गेल। राजा व्यापारीसँ पुछलथिन्ह- “सेठजी, अहॉंक मकानक दिवाल कमजोर कियैक छल जे एकटा निर्दोष चोर सेंघमे दवा कय मरि गेल?” व्यापारी वाजल- “सरकार, चोर निर्दोष कोना छल?” ताहिपर राजा बजलाह- “जावत चोर चोरि नहि कयने छल तावत तँ ओ निर्दोषे छल। चोरीक वादे ने ओ दोषी होइताह। चोर मरि गेल अहॉंक दिवालक कमजोरक कारणेँ तेँ हेतु अहॉंकेँ फाँसीक सजा भेट रहल अछि।” व्यापारी बजलाह- “सरकार, एहिमे हम कोनो दोषी भेलहु। हम तँ अपने मकान नहि वनौने छलहुँ। मकान तँ राजमिस्त्री वनौने छल।” राजा बजलाह- “हँ, अहॉं दोषी नहि छी, एहिमे राजमिस्त्री दोषी अछि। सिपाहीकेँ आदेश देलैन्ह जे व्यापारीकेँ छोड़ि दियौक आ ओकरा बदलामे राज मिस्त्रीकेँ फाँसी दय देल जाए।” राजाक हुकुम सुनि सिपाही व्यापारीकेँ बरी कय देलक। आ राजमिस्त्रीकेँ पकड़ि राजाक दरवारमे उपस्थित कयलक। राजा बजला- “राज मिस्त्री अहॉं केहेने दिवाल जोड़लहु जे एकटा निर्दोष चोर दिवालमे दवि मरि गेल। दिवाल कमजोर जोड़लाक जूर्ममे अहॉंकेँ फाँसी भेटल।” राजमिस्त्री बजलाह- “सरकार एहिमे हमर कोन दोष। हम तँ राजमिस्त्री थिकहु। गारा (मशाला) बनेनाई काम तँ हमर काज नहि अछि। हमर लेवर जे मशाला बना कय हमरा देत तकरे सने हम जोड़व। मशाला कमजोर बना कऽ दयलक तेँ दिवाल कमजोर भऽ गेल। एहिमे तँ हम निर्दोष छी। सरकार हमरा सन निर्दोष लोककेँ फाँसी दय कोन लाभ। फाँसी तँ दोषीकेँ देबाक चाही।” राजा बजलाह- “ई राजमिस्त्री ठीके कहैत छथि। राजमिस्त्रीकेँ छोईर दहक आ ओहि मजदूरकेँ फाँसी पड़वाक चाही।” सिपाही लोकनि राजमिस्त्रीकेँ छोइड़ देलक आ ओहि मजदूरकेँ पकड़ि अनलक। राजा, मजदूरकेँ सामने बजौलक। राजा राजमिस्त्रीक बदला ओहि मजदूरकेँ फाँसीक सजा सुनौलक। मजदूर अपन सफाईमे बाजल- “सरकार, एहिमे हमर कोनो दोष नहि, कियैक तँ जखन हम मशाला (गारा) सिमेंट-वालु) मे पानि मिला रहल छलहु तखन हमरा पाछॉंमे एकटा हाथी भरकि हमरा तरफ दौबल तँ पानि गाड़ा (मशाला)मे अधिक पड़ि गेल। तेँ महशाला गीला भय गेल आ तेँ दिवाल कमजोर भय गेल।” राजा मजदुरक बात सुनि हाथीक महाउथकेँ बजाबक आदेश देलैन्ह। तुरंत सिपाही हाथीक महाउथकेँ बजौलक। आ आदेश पारित कयलक जे मजदूरकेँ माफ कय हाथीक महाउथकेँ फाँसी देल जा सकैत अछि। हाथीक महाउथकेँ फासी देल जा सकैत अछि। हाथीक महाउथकेँ अपन सफाई देबाक लेल कहल गेल। हाथीक महाउथ अपन सफाईमे बाजल- “सरकार एहिमे हमर कोन दोष। हम हाथी लय कऽ आबि रहल छलहु ताहि बीच एकटा महिला झुनझूना बाला जेवर पहिर पहिर हाथीक वगलमे आयल। हाथी कंगनक आवाज सुनि भरकि गेल तँ एहिमे हम कतय दोषी भेलहु।” राजाकेँ महाउथक बात ठीक बुझैल। महाउथ निर्दोष सावित भेल। आब महाउथक बदला ओहि महिलाकेँ दोषी मानलक। ओहि महिलाकेँ सिपाही राजाक दरवारमे उपस्थित कयलक। महिलासँ अपन सफाई देबाक आदेश भेल। महिला बाजलि- “सरकार, एहिमे हमर कोन दोष। हम जे गहना पहिरने छलहु से तँ अपने नहि बनौने छलहु। ओ तँ हम बाजारक सोनारसँ खरीने छलहु। ई गलती तँ सोनारक छैक जे एहेन झुनझुनावाला गहना कियैक बनौलक। जे हम ओकरासँ खरीद कय पहिरलहु। ओ एहेन गहना नहि वनौतथि तँ हम झुनझुनावाला गहना नहि खरीदतहु आ नहि पहिरितहु। जँ ई गहना हम नहि पहिरतहु तँ हाथी नहि भरिकैत ने गाड़ामे अधिक पानि पड़ितैक आ ने सेठजीक दिवाल कमजोर होइतैक।” राजा ओहि महिलाक वयानसँ सन्तुष्ट भेलाह। सैनिककेँ आदेश देलथिन्ह जे एहे महिलाकेँ बरी कय देल जाय आ एकरा बदलामे गहना बनौनिहार सोनारकेँ फाँसी देल जाय। तुरत सैनिक सोनारक खोजमे लागि गेल। गहिना बनौनिहार सोनारकेँ पकड़ि लौलक। राजाक सामने हाजिर कैल गेलैक। सोनारसँ राजा सफाई देबाक लेल कहलक। सोनारकेँ अपन बचावमे कोनो जवाब नहि फुरैलैन्ह। राजाक सामने सोनार दोषी सावित भेल। राजा सोनारकेँ फाँसिक सजा सुना देलैन्ह। एहि तरहे जल्लादकेँ सूचित कयल गेल जे सोनारकेँ फाँसीपर लटका दे कियैक तँ राजाक आदेश छलै जे हत्याक बदला हत्यासँ लेल जाय। जल्लाद सोनारकेँ लय फाँसीक फन्दा ओकरा गर्दनमे लगौलक आ रस्सीकेँ ऊपर तरफ खिचिलक। संयोग नीक छल जे बार-बार फाँसीक फन्दा सोनारक गर्दनमे लगाओल जाय आ जहॉं ऊपर खिंचल जाय तँ फाँसीक फन्दा सोनारक गर्दनमे सँ निकलि जाय। किछु देर ई सिलसिला जारी रहल मुदा सोनारक गर्दनमे फाँसीक फन्दा नहि टिकल। जल्लाद राजाक समीप पहुँचल तँ कहलक- “सरकार, एहि सोनारक गर्दनमे फाँसीक फन्दा काम नहि करैत अछि। राजाक आदेश भेल मोट गर्दन वालाकेँ पकड़ि ला आ ओकरा फाँसी दय दहिन।” आब दू गोट सिपाही मोटका गर्दन वलाकेँ खोजमे लागि गेल। किछु दूर गयलाक वाद एकटा मन्दरिपर बाबाजी चेला जकर गर्दन बड़ मोट छल तकरा पकड़ि लय गेल। बाबाजी चेला आ चेला गुरु किछु दिन पूर्वमे ओहि मन्दिरपर दोसर देशसँ आएल छल। चेलाक कथन छलैक ओ अपन गुरुकेँ कहलथिन्ह जे अपना सभ बर्त्तमान मन्दिरपर चलू कियैक तँ ओहि राजमे टके सेर भॉंजी आ टके सेर खाजा छैक। सस्ता मधुर खरीद ओ दुनू गुरु-चेला खाय लागल। यद्यपि गुरुजी ओहि मन्दिरपर जयबासँ रोकलक। मुदा चेलाक जिद्दपर ओहो राजी भय गेल छलाह। आब गुरुजी एकटा तरकीव सोचलक। ओ चेलाकेँ कानमे किछु कहलैन्ह। कहलैन्ह- “जखन तोहरा गर्दनमे फाँसीक फंदा लगौतुन्ह तखन हम तोहरा गर्दनसँ फाँसीक फन्दा हम अपना गर्दनमे लगा लेव। जखन हम फाँसीक फन्दा लगवय लाव तखन हमरा गर्दनमे सँ फाँसीक फन्दा निकालि अपना गर्दनमे लगा लिहअ। ई शिलशिला तावत धरि चलय दिहक जावत राजा नहि पहुँच जाथि।” राजाक सिपाही गुरुजीक चेलाकेँ पकड़ि राजाक दरवारमे उपस्थित कयलक। चेलाक संग गुरु सेहो दरवारमे उपस्थित भेलाह। राजाक हुक्मक आधारपर चेला जकर गर्दन वड़ मोट छल फाँसीक तख्तपर लय गेल आ फाँसीक फन्दा ओकरा गर्दनमे लगाओल गेल। एक, दू, तीनक आवाजक संग रस्सी खिंचत आकि गुरु दौड़ि कऽ ओहि तख्तपर पहुँच गेलाह। चेलाक गर्दनसँ फॉंसिक फन्दा अपना गर्दनमे लगा लेलक आ सिपाहीकेँ कहलक हमरा फॉंसी दिअ, एकरा छोइर दियौ। सिपाही सैह करय लागल। मुदा पूर्व नियोजित कार्यक्रमक अनुसार गुरु-चेला बेरा-बेरी गुरुक गर्दनिसँ चेला आ चेलाक गर्दनिसँ गुरु फॉंसीक फन्दा अपना गर्दनिमे लगावक हेतु प्रयासरत रहय लगलाह। एहि बातक सूचना सिपाही राजाकेँ देलैन्ह। राजा स्वयं आवि एहि गुरु-चेलाक कारनामाकेँ देखलैन्ह। ओ सिपाहीकेँ आदेश देलैन्ह जे फॉंसीक प्रक्रिया तावत बन्द करू जावत हम अगिला आदेश पारित नहि करी। राजा ओहि दुनू गरु-चेलाकेँ अपना लग बजौलैन्ह। आ गुरुसँ पुछलैन्ह जे अहॉं दुनू व्यक्ति एना कियैक फॉंसीपर झुलबाक हेतु तत्पर छी। गुरु राजाकेँ कानमे कहलक जे सरकार अखन एहेन मुहुर्त छैक जे फॉंसी फन्दापर झूलि जाइत ओ इन्द्र लोकक राजा होयत तेँ हम चाहैत छी जे हम फॉंसीपर झूलि आ जाहिसँ इन्द्रलोकक राज बनी औ चेला एहि मर्मकेँ जानैत छथि तेँ ओ इन्द्र लोकक राजा बनबाक आकांक्षा करैत छैथ। तेँ अपने निर्णय कय दीअ जे के इन्द्र लोकक राजा वनवाक योग्यता रखैत छथि। राजा सोचलक जे एहि छोट-छीन राज्यक राजसँ बढ़िया जे हमहीं ने कियैक इन्द्र लोकक राजा बनी। ओ सिपाहीकेँ आदेश देलैन्ह जे एहि दुनू गुरु-चेलाकेँ छोड़ि एहि नीक मुहुर्त्यमे हमरे फॉंसी फन्दापर झुला दे। सिपाही एहि दुनू गुरु-चेलाकेँ बकसि देलक आ राजाकेँ फॉंसीक फन्दापर झुला देलक। गुरु-चेला राम-राम करैत अपना देश भागि कऽ चलि अयलाह। लघुकथा- नसिहत राधाक बेटाक वियाह बड़ धूम-धामसँ भेल छल। राधाक छोट वेटा मनीष पढ़ऽ–लिखऽमे बड़ तेज छल। मैट्रीकक परीक्षामे सर्वोच्च स्थान प्राप्त कयने छल। क्रमागत इन्टर, वैचलमे सेहो नीक स्थान प्राप्त कयलैन्ह। मनीषकेँ नीक नौकरी भेट गेलैन्ह। आब हुनक माय राधा देवी व्याकुल रहय लगलीह। जे कखन मनीष्ज्ञक शादी करावी। मनीष विवाह समीपेक गाँवक गिरधारी बाबू जे शहरमे रहैत छलाह। गिरधारी बाबूक पत्नी सुमित्रा देवी पैघ विचारवान महिला छलीह। कहियो सुमित्रा वाणीसँ केकरो कष्ट नहि भेल हेतन्हि। हिनक सिद्धान्त छलैन्ह जे कम खाऊ, गम खाऊ, कम बाजू, जे बाजू नापि-तौलि कऽ बाजू। हिनका कवीर साहेव ओ वाणी हमशा दिमागमे नचैत रहैत छल जे वाणी ‘ऐसी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।’ सुमित्राजीक कथन छल जे खुशी बाटनैसँ दू गुना वापस अबैत अछि आओर कनेक त्याग कयलासँ बहुकेँ पूरा घरपर राज भय जाइत अछि। एहि प्रकारक विचार सदिखन सुमित्राक मानस पटलपर नचैत रहैत छल। तेँ मुहल्लावासीपर ओकर राज चलैत छल। सभक विचारी सुमित्रे छल। सुमित्रा देवीकेँ एकटा बेटी छल। जेकर नाम रूपम छलैक। रूपम सभ दिन शहरे-वाजारमे रहल कियैक तँ हुनक पिताजी शहरेमे नौकरी करैत छल। रूपम पढऽ–लिखऽमे तेज छलीह। शहरक हवा-पानि लागल छल। मुदा मायक नसिहतकेँ सदिखन याद रखने छल। रूपम जखन 20-22 वर्षक भेलीह तखन सुमित्रा देवीकेँ वियाहक लेल उड़ी-विरी लागि गेलैन्ह। जखन तखन यपमक बापकेँ खोधियबै लगलीह। लड़का वाला सभ लड़की देखवाक लेल आबय लागल। वियाहक दरम्यान कतेको लड़का वाला लड़की देखक वास्ते आयल। कतेककेँ लड़की नहि पसिन भेलैन्ह तँ कतेककेँ घर नहि पसिन भेलैन्ह। एक-दू साल बहुतो खोज-बीन कैल गेल। तखन एकटा संभ्रान्त परिवारक लड़का जे सरकारी नौकरी करैत छल। तकरा संग वियाह ठीक भेल आ वियाह शहरेमे भेल। बाराती वाला गामक छल। वियाह राधाक बेटा मनीषक संग सम्पन्न भेल। रूपम जे शहरक वातावरणमे पलैल-पोसैल छल। रूपम जे कॉलेजमे नाना प्रकारक प्रतियोगितामे भाग लैत छल आ प्राइज प्राप्त करैत छल। अखवारक कूपन काटि ओकरा पेपरक फार्मेटपर साटि, अखवार वालाकेँ भेटैत छल। अहूमे ओकरा र्व श्रेष्ट पुरस्कार भेटलैक। आब ओ सोचय लागल जे एहेने-एहने कम्पेटिशनमे प्राइज जितलहुँ। अभिनय कय पुरस्कार हॉंसिल कय ली। जे शहरमे रहय वाली ओ आब गाम-घरक आबो हवामे रहय लगलीह। रूपम धीरे-धीरे अपनाकेँ गामक रंगमे धुलय लगलीह। ओकरा अपन मायक नसिहत याद छलैक जे ‘खुशी वॉटि तँ दुगुना वापस होइत अछि’ आ जँ सासुरमे कनेक त्याग करी तँ पूरे घरपर राज कय ली। ओ सोचैत छलीह जे जेहेन बहय बयार पठी ओम्हरे ओरी। तेँ ने वियाहमे 51 पल्ला साड़ी जे मैके मे भेटल छल। ताहिमे सँ नीक-नीक साड़ी आधासँ अधिक सासु, ननदि निकालि लेलक मुदा ओ किछु नहि बजलीह। कयैक तँ ओकरा माय सुमित्रा देवी ओकर बाजऽ सँ रोकलक। ससुरारिक रंगमे रंगा गेल। से आब ओकरो एहि बातक पता नहि चलल। रूपमक तुरियाक एकटा ओकर ननदि रहथिन्ह। जकर शादी-वियाह नहि भेल छल। ओकरा संग हंसी-मजाक करैत, घरक सभ काम करैत समय गुजैर रहैत छल। ननदि सेहो भाउजकेँ सभ काममे भरपुर मददमे लागल रहैत छलीह। सासुक सेवा सर्वोपरि छल। सासु राधा अपन काम-धाममे मग्न रहैत छलीह। परिवारक वातावरण स्वर्गोसँ बढ़ि कऽ भय गेलैक। परिवारक हालत एहेन भय गेल जे कोन काज कोना भय जाइत छल से ककरो पता नहि लगैत छल। राधा देवी बेटी आ पुतहुक संग खूब नीक जकॉं घुलि मिली गेल छलीह। ओकरा सभक संग ओहो दैत छलीह। सभ कियो खूब हसि मजाक करैत रहैत छल आ खूब जोड़-जोड़सँ ठहक्का दय हसैत छलीह। रूपमक ससुर पुरान विचारधाराक छलाह। तेँ ठहाका सुनि दरबाजापर सँ खराम पटपटबैत आंगन अबैत छलाह। तँ सभ ठहाका बन्द भय जाइत छल। अंगना अबैत देरी दुनू ननदि-भौज नि:शब्द भय जाइत छलीह। ओ ससुरकेँ अवितहि देरी रूपम माथापर नुआ लय चटदय पैर छूबि गोर लागि लैत छलथिन्ह। एहिपर ससुर महराजक तामस, सहानुभूतिमे बदैल जाइत छल। आ पुन: चाह पीब दरवाजापर आबि जाइत छलाह। घरमे पुतोहु अयलापर हरसठे आंगन जायव उचित नहि बुझना जाइत छल। बुढ़-पुरानकेँ दिक्कत भय जाइत छैक। गप्पो-शप्पो करत तँ ककरा संग जँ पत्नी जीवित रहैत छन्हि तँ ओकरा संग सुख-दुख बॉंटि लैत छथि। जिनका पत्नी नहि छन्हि ओकर जीवन तँ पहाड़ भय जाइत छैक। महिला अपन बेटी-पुतोहु संग जीवन नीक जकॉं विता लैत छथि। मुदा बुड़हाक जीवन पहाड़ भय जाइत अछि। जँ बेसी घर-आंगन कयलक तँ नाना प्रकारक अवलट लागय लगैत छैक। एहि प्रकारे रूपम अपन नसिहतसँ पूरा परिवारकेँ अपना कब्जामे कय लेलक। किछु दिनक वाद रूपमक पति जे सरकारी नौकरी शहरमे करैत छलाह, ओ रूपमकेँ शहर लय जेवाक जोगारमे छलाह। घरक सभ परिवारकेँ एहि बातक जानकारी भय गेलैक। सासु मॉं राधा देवी, ननदि पिंकी आ प्रिया सेहो उदास भय गेलीह। रूपम ओकरा सभकेँ उदास देखि ओकरो सभकेँ अपना साथ चलवाक आग्रह केलकन्हि। सभक मन भीतरसँ छेबे छल। सभ कियो शहर आवि गेलीह। मनीष समयसँ ऑफिस जाइत छलाह आ ऑफिससँ समयपर अबैत छलाह। आब हुनका ने कोनो खाइक चिन्ता आ ने रिफिन चिन्ता रहैत छलैन्ह। समयसँ सभ किछु भेटि जाइत छलैन्ह। मनीषकेँ ऑफिस जेवाक बाद सासु-बहु आ ननद-भौजाईक प्रेम देखि अरोसिया-परोसिया आश्चर्य चकित रहैत छलीह। अरोस-परोसक महिला सभ रूपमक खूब प्रसंशा करय लागल। रूपम अपन प्रशंसा सुनि आर अधिक प्रेमसँ सासु-ननदिकेँ मान-दान करय लगैत छलीह। रूपकेँ अपन मायक नसीहत हर हमेशा याद रहैत छल जे खुशी बॉंटलासँ दुगुना भय जाइत अछि आ कनेक त्याग कयलासँ पूरा घरपर राज भय जाइत अछि। तेँ केनो ड्रेस जे रूपमक ननदिकेँ पहिरा दैत छलथिन्ह या खरीद दैत छलथिन्ह। सासु मॉंकेँ अपन नीक साड़ी पहिरऽ लेल दैत छलथिन्ह आ बाजार घुमा दैत छलथिन्ह। सासु ननद अति प्रसन्न रहैत छलथिन्ह। सास-ननदिक मन मुताविक स्वादिष्ट भोजन वनबैत छलीह। विना-सासुसँ पुछने ओ कोनो काज नहि करैत छलीह। कहियो कहियो रूपमक प्रति मनीष अपन माय आ बहिनकेँ चिढ़बैत बाजैत छलाह कि माय ई रूपम जादूगरनी छौ। तोरो सभपर जादू ने कऽ दौ से संभरि कऽ रहियै। जादूक चक्करमे नहि पड़ि जइयैह। ई कहैत सभ कियो हसै लगैत दल। एहि तरहेँ रूपम सभक दिल जीति नेने छल। एहि प्रकारे सभक दिन खुशी पूर्वक वितय लागल। आब रूपमक ननदक वियाहक चर्चा होमय लागल। पिंकीक शादी एकटा संभ्रान्त परिवारमे ठीक भेल। दुलहा कोनो नीक पदपर पदस्थापित छलाह। पिंकीक शदीमे रूपमक भूमिका बढ़िया रहल। राधा देवी रूपमकेँ अपना गलासँ लगबैत बजलीह जे बेटी भगवानक घरमे पूर्व जन्ममे नीक कर्म कयने छलहु जाहि कारणे अहॉं सन पुतहु भेटल। ईश्वर सभकेँ एहेने बहु देथिन्ह। एतबे कहलासँ रूपमकेँ होइत छलैन्ह जे हमरा पूरा सम्राज्य भेट गेल आ सासुक पैर घुबि रूपम बाजैत छलीह जे माय अहॉं सन सासु सभ बहुकेँ भेटै से हम भगवानसँ प्रार्थना करैत छी। पिंकीक विदाईक समय रूपम बहुत कानल आ ओकरा आर्शीवाद देलक कि भवान करै जे तोरो सासु एहेने होतहुन। पिंकीक वियाहक वाद रूपमकेँ मन नहि लागय लगलैक तँ दिनमे कैक बेर फोनसँ हाल-चाल पुछैत रहैत छलीह। शुरू-शुरूमे तँ सभ किछु ठीक ठज्ञक रहल। शुरूमे पिंकी सासु, ननद आ परिवारक सभ सदस्यक तारीफ करैत रहैत छल। किछु मिनक वाद जखन रूपम, पिंकीसँ बात करथि तँ पिंकीक नजरिया बदलल देखलक। पिंकी ससुरालक सभ सदस्यक शिकायत करैत रहल। पिंकीक माय यानी रूपमक ससु पिंकीकेँ मोबाइलपर फुटानी वाला बात सिखबैत रहैत छलीह। जाहिसँ ओकर स्वभाव विगरि गेल छल। परिवारमे एक दोसरासँ ताल मेल, सामजस्य नहि रहल। परिवारमे धीरे-धीरे कलहक पदार्पण भय परिवार टूटि गेल। रूपम जखन पिंकीसँ सम्वाद करथि तँ पिंकी भाषा विगरले जकॉं बुझाइन। पिंकी वाजथि- “भाभी, सभ अहीं जकॉं नहि भय सकैत अछि।” पिंकी घमंडी भय गेलीह। ओकरा हाकिमक घरवाली होयवाक घमंड छल। रूपम अपन माय वाली बात नसियत पिंकीकेँ कहैत छल- “पिंकी, खुशी वॉंटलासँ दुगुना होइत छैक आ थोरेक त्याग कयलासँ बहुकेँ पूरे घरपर राज भय जाइत छैक। तँ अहॉं एहि मूल मंत्रसँ परिवारकेँ एक कय चलू।” मुदा पिंकीक माय ओकरा पृथक-पृथक ढंगसँ घर फुटयवाक मंत्र दैत छलथिन्ह तँ ओकर पिंकीक नियतमे खोट आवि गेल छल। तेँ घर नरक बनि गेल छलैक। एक दिन रूपम चाह लय सासु राधा देवीकेँ देबाक हेतु आकि रहल छलीह। जेना बुझना गेलैन्ह जे सासु मॉं फोनसँ गप्प कय रहल अछि। रूपम दरवाजाक ओरमे ठाढ़ भय सभ बात सुनय लगलीह। शायद सासुकेँ पिंकीसँ बात भय रहल छल। राधा देवी अपना बेटी पिंकीकेँ सिखबैत छलीह जे तों अपन सासुकेँ वाहर घुमयवाक हेतु नहि लऽ जैहे। जखन तू आ जमाय बाबू एक साथ रहि एक-दोसराकेँ समझ। ननदि आकि सासुकेँ ने अपना संग कतौ लय जो आ ने ओकरा अपना संग बैसा कऽ खाइक लेल दही। तोहर भाभी तँ सुधगर महिला छौक ओकरा सन नहि बनबाक प्रयास करिहेँ। रूपम चाहक ट्रे लय मने-मन सोचैत छली जे हमर सासु हमरा बेवकूफ आ सुधगर बुझैत अछि। रूपम चाहक ट्रेसँ चाह सासु-मॉं केँ दैत बाजलि- “किनकासँ गप्प करैत छलखिन्ह?” राधा मिरमिराइत बाजलि- “पिंकीसँ।” रूपम अपन सासुक किरदानी देख नेने छल। सॉंझू पहर जखन रूपमक घरवला मनीषजी घर पर अयलाह, तखन सभ बात हुनका कहलथिन्ह। दुनू प्राणी विचार कयलैन्ह जे रवि दिन पिंकीक घर जाकय सभ परिवारकेँ मिला-जुला दियैक आ सासु-मॉंकेँ सेहो सभझा बुझा दियैक। राधाकेँ मनीष बहुत बुझौलक आ ओकरा अपना गलतीक एहसास करौलक। रवि दिन रूपम आ मनीष पिंकीक घरपर पहुँचल। मनीष रूपमक नसीहत केँ दोहरावैत पिंकीकेँ समझौलक जे खुशी बॉंटलासँ दुगुना होइत छैक आ कनेक त्याग कयलासँ पूरे परिवारपर राज भय जाइत छैक। एहि सिद्धान्तपर चलबाक नसिहत दय पिरवारक सभ सदस्यकेँ मिला देलैन्ह। सभक बीच जे दू बोला छल से समाप्त करा पुन: शामे पिंकी केँ अपन मायक नसीहतक पालन करबाक आग्रह करैत घर आबि गेल। लघुकथा- प्रेमक ऑंसु बात ओहि समयक थिक। जखन रामू काकाकेँ तेसर बेटीक जन्म भेल छलैन्ह। हम भोरमे टहलवाक शौकीन छी। भोरे उठि जखन दू-तीन किलोमीटरसँ टहलि वावस भेल रही तँ देखै छी जे राम काका माथपर हाथ नेने, मुँह लटकौने बैसल छथि। हम तँ पहिने बड़ आश्चर्यचकित भेलहु। जे रामू काका एकटा हसमुख चेहरा आ मजकियल छलाह। गाम भरिक लोक सभ हुनकासँ खुश रहै छल किएक तँ ओ कहनो आफद-विपत आ मुसिवतमे पड़ल लेाकककेँ हसबैत रहै छलाह। से आई मनहुस कियैक भेल छथि? हम हिनकर चिनताकेँ भॉंपि नहि सकलहु। मुदा एकाएक पुछि देबैक सेहो नीक नहि बुझना जाइत छल। कियैक तँ जखन ओ भेटत छलाह तँ कहैत छलाह जे मौरनिंग-वाकसँ आबि गेलहु। कहु तँ स्टेशन कय डेग भेल। स्टेशनकेँ नपबाक भार रामू काका हमरेपर छै जे अहॉं कहै छी। तँ ककरापर छैक भोरे उठि स्टेशनपर चक्कर अहॉं दैत छी आ नपबाक भार हमरापर रहत। सुवहमे टहलवाक मजा दोसर छैक रामू काका। आ हमहींटा थोरे टहलै छी। हमर मित्र लोकनि अपन घरवालीक संग टहलैत छथि। आर जे अकेले रहैत छथि हमरा संग जाइत छथि जेना सत्य नारायण बाबू, जय नरायण बाबू, राजवीर बाबू, बड़ा बाबू, लाइव्रेरियन साहेव, दीपकजी, विजय बाबू, युगेश्वर बाबू। सुवहक मौरनिंग वाक् सँ बड़ लाभ होयत छैक। रामू काका जकरा कोनो तरहक ब्लड प्रेसर छैक, मधुमेह , थाइराइड छैक, डिप्रेशन छैक, आदि-आदि सभ विमारीक दवाई छैक मॉंरनिंग वाक। आ जकरा कोनो बीमारी नहि छैक तकरा लेल तँ सोनामे सुगन्ध भय जाइत छैक। ओहि आदमीकेँ जावत टहलैत रहत तावत् कोनो बीमारी भैये नहि सकैत अछि। रामू काका जखन भेटि जाइत छलाह तँ एहि प्रकारक गप्प-सप हंसी-मजाक होइत छल। मुदा आजुक माहौल अजीव छल। रामू काकाक चिन्तित मुद्रा देखि हम हुनका नजदीकमे बैसि रहलहु आ कहलहु- “रामू काका कने तम्बाकू खुऔ।” रामू काका चून-तम्बाकू दैत बजलाह- “हौ तो तँ तम्बाकू नहि खाइत छलह। कहियासँ खाय लगलह?” हिनक चिन्तित मुद्रा भंग भेल। हम बजलहु- “रामू काका से तँ ठीके कहलहु। हम तँ तम्वाकू नहि खाइत छी। मुदा अहॉंक उदास मुद्रा देखि, हमहु चिंतित भय गेल छलहु। अहॉंक चितिंत आ उदासी मुद्रा देखि ओहि मुद्राकेँ भंग करवाक हेतु चून-तम्बाकूसँ बात शुरू कयलहु।” हम चुनौटीसँ तम्बाकू निकालि ओहिमे चून दय लगवय लगलहु। आ रामू काकाकेँ दैत बजलहु- “रामू काका, सभ ठीक-ठाक अछि की नहि?” “की ठीक रहत फेर बेटिये भेल।” हमरा हंसी लाइग गेल आ हम खुब जोरसँ हसैत बजलहु- “रामू काका, अहॉं बड़ भाग्यशाली लोक छी। जे तीनटा बेटी भेल। साक्षात लक्ष्मी-सरस्वती आ पार्वतीक जन्म अहॉं ओहिठाम भेल अछि। हम एहिशीक अवसरपर अहॉंकेँ मुवारक दैत छी। एहिमे दु:खी होयबाक कोनो प्रश्ने नहि अछि। बेटी एहेन सुख थिक, जकरापर ईश्वर मेहरवान छथि, ओकरे बेटी होइत अछि।” बेटी स्त्री अछि, बेटी नारी अछि, बेटी फुलवारी अछि, बेटी दर्पण आ दर्शन अछि। बेटी सीता अछि, बेटी सावित्री अछि, बेटी माता अछि, बेटीवलिदानक गाथा अछि, बेटी श्रमद् भागवत गीता अछि, बेटी अछि तँ संसारमे सभ सुख भेटत। माय-पावक जे सेवा बेटी करत ओ बेटा कथमपि नहि करत। तेँ, बेटी भेल ताहि लेल अपने एतेक दुखी छी? रामू काका हमरापर खौझाइत बजलाह- “यौ मास्टर साहेब, अहूँ हमरासँ मजाक करैत छी, हमरा खौझा रहल छी। अहॉंकेँ होइत अछि की हम बेटी जनमावऽ बाला मशीन छी। देखू मंगलाकेँ ओ केहेन मरियल अछि आ ओकरा दू-दूटा बेटे छैक। हमर ई तेसर बेटी अछि। सभ हमर मजाक उड़बैत होयत। आब हम एहि समाजमे मुँह देखयवाक नहि रहि सकलहु। हमरा बेटीसँ बड़ नफरत भय गेल अछि। आओर हमरा तीन-तीनटा बेटिये अछि।” रामू काका अहॉंकेँ बेटीसँ कियैक एतेक नफरत भय गेल अछि। बेटी नहि रहत तँ एहि संसारक श्रृष्टि कोनो होयत। यहि बेटीसँ नफरत अछि तँ वियाह कियैक कयलहु। बेटीसँ नफरत अछि तूं मायक कोखसँ जनम कियैक लेलहुँ मॉंओ तँ बेटीक रूप थिक। रामू काका, ओ आब युग-जमाना नहि अछि जे बेटी समाजक कोढ़ बनत। बेटीक उँचाई आब बेटासँ बेसी छैक। कोन एहेन विधा अछि जाहिमे बेटी, बेटासँ कम छैक से देखू तँ बेटा जखन जबान होयत तँ की करत की नहि से कियो नहि जानैत अछि। जुआरी राखी, व्यभिचारी, लूच्चा, लम्पट आदि भय सकैत अछि। बेटी कहियो शरावी, जुआरी, चोर, डकैत नहि भय सकैत अछि। देखू जे डकैती, लूट, अपहरण बेटे नहि करैत अछि। पैघ-पैघ लोकक जेना- पैघ हाकीम, मंत्री, विधायक आ सांसद बेटा लूट, डकैती, अपहरणक अंजाम दय रहल अछि। तेँ बेटीकेँ पोसू-पालू आ शिक्षित बनाउ। एकटा बेटी शिक्षित होयत तँ एकटा परिवार शिक्षित होयत। आ एकटा बेटा शिक्षित होयत तँ मात्र एकटा पुरुष शिक्षित होयत। रामू काका, अहँ अपन चिन्ताकेँ त्यागू आ बेटा-बेटीमे फर्क नहि राखू। देखैत नहि छिऐक जे शशिकान्त बाबक बेटी यू.पी.एस.सी. परीक्षामे तेसर स्थान प्राप्त कयलक अदि। एै यौ रामू काका, अपना गाममे बेटाक कमी छैक कहाँ ककरो बेटा एहेन पद प्राप्त कयलक अछि। रामू काका जे मनहूस छलाह से आब मन हुलसगर भेलैन्ह। ओ मनोयोगसँ तीनू बेटीक लालन-पालन आ समुचित शिक्षाक व्यवस्था केलैन्ह। किछु दिनक उपरान्त तीनू बेटीक पढ़ाई-लिखाई चलय लागल। तीनू बेटीक नाम सीता, गीता आ सावित्री छल। पढ़य-लिखयमे तीनों एकपर एक छल। पहिल बेटी सीता पी.पी.एस.सी. कम्पीट कयलैन्ह। दोसर बेटी- गीता डॉक्टर भेलीह आ तेसर सेवा करय लगलीह। तीनू बेटीक वियाह-शादी योग्य बरसँ विनु दान-दहेजेक भय गेल। रामू काकाक तीनू बेटीक शादीमे हम गेल छलहुँ। आई रामू काकाक खुशी देखि हम कहलियैन्ह- “रामू काका, जाहि दिन तेसर बेटीक जन्म भेल छल ताहि दिन अहॉं कतेक उदास रही। आब कहू जे बेटा पैघ आकि बेटी? आई एहि परोपट्टामे अहॉंक परचम फहरा रहल अछि की नहि? माय-बाप, बाल-बच्चाकेँ जन्म दैत छैक। मुदा भाग्यक निर्माण ओकर कर्त्तव्य करैत छैक।” रामू काका हमरा आगाँ हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ बजलाह- “बौआ तोहरे बोल भरोसपर हम जिंदा छी, एहिमे तोहर बड़ पैघ योगदान छल।” रामू काकाक ऑंखिसँ प्रेमक अश्रु बहै लगलैन्ह। गुरुमैता-सल्हैता (जीवनी) मिथिलाक विभूति भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक जन्म 24 अप्रील 1930 ई.मे ग्राम भवटियाही जिला सुपौलमे भेल छल। स्व. विहारी गुरुमैता बड़ पैघ देश भक्त, क्रान्तिकारी, जुझारू, कर्मठ आ देशक प्रति समर्पित वतंत्रता सेनानी छलाह। भुवनेश्वर गुरुमैताक व्यक्तित्व आ कृतित्व जानवाक लेल हुनक वंशावलीक जानकारी आवश्यक अछि। वंशी गुरुमैता सोनाई गुरुमैता विहारी गुरुमैता नागेश्वर गुरुमैता मोतीलाल गुरुमैता विश्वनाथ गुरुमैता कुशेश्वर गुरुमैता राज कुमार गुरुमैता राम कु. गुरुमैता राम नारायण गुरुमैता देवनारायण गुरुमैता भुवेश्वर गुरुमैता लक्ष्मी ना. गुरुमैता जयकृष्ण गुरुमैता स्व. विहारी गुरुमैताक सुपुत्र रामनारायण गुरुमैता और देवनारायण गुरुमैता स्वतंत्रताक आन्दोलनक दिवाना छल। राम नारायण गुरुमैता कलकत्ता विश्वविद्यालसँ बी.ए. पास कयने छलाह। मिथिलांचलक प्रथम स्नातक छलाह। पढ़ाइक दरम्यान सुभाषचन्द्र वोस, महात्मा गाँधी आदि स्वतंत्रता सेनानीसँ पहचान भेलैन्ह। क्रमश: राजेन्द्र प्रसाद आदि राजनेताक सभासँ अएलाह। बी.ए. पास कएलाक बाद ओ विहार अएलाह आ गाँधीजीक रचनात्मक कार्यक प्रचार-प्रसारमे लागि गेलाह। ओहि अन्तरालमे (1939-1942) दरभंगा कॉंग्रेस कमिटी आओर आर्य समाजक मंत्री पदकेँ सुशोभित कयलैन्ह। अपन विद्वताक वलपर राम नारायण गुरुमैता राम चरित्र मानसक, अंग्रेजीमे अनुवाद (पद्यानुवाद) कयलैन्ह। दरभंगा महाराजक चीफ मैनेजर डेनबी साहेव ओहि अंग्रेजी अनुवाद राम चरित्र मानसकेँ राम नारायण गुरुमैताक मुँहसँ प्रतिदिन सुनय लगलाह। मिस्टर डेनवी साहेव गुरुमैताजीपर बड़ खुश छलाह। दरभंगा महाराजासँ पैरबी कय रामनारायण गुरुमैताकेँ दरभंगा राजक फिल्ड इन्सपेक्टिंग ऑफिसरक रूपमे बहाली करौलैन्ह। मुदा किछुए दिनक पश्चात् ओ ओहि पदसँ इस्तीफा दय देलैन्ह, कियैक तँ राजक अधिकांश कर्मचारी सभ बड़ भ्रष्ट छल। भ्रष्ट कर्मचारीक संग काम केनाई राम नारायण गुरुमैताकेँ नीक नहि लगलैन्ह। ओ ओहि पदासँ इस्तिफा दय का्रेसक पूर्णकालिक कार्यकर्त्ताक रूपमे समाजक सेवामे लागि गेलाह। एहि दौरान ओ शिक्षाक अधिकसँ अधिक प्रचार प्रसारक लेल पुस्तकालय आ विद्या आ विद्यालय खोलौलैन्ह। ठाम-ठाम पुस्तकालय आ विद्यालय खोलल गेल। ओहिठाम गरीब-गुरबा, मजदूर किसान बैसि अध्ययन करैत छल। एहि क्रमे स्व. स्वनाम धन्य ललित नारायण मिश्र, स्व. श्याम नारायण मिश्र आ हुनक भाई लोकनि राम नारायण गुरुमैताजीक शिष्य बनलाह। भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू भेलापर पूर्ण सक्रियतासँ एहि कार्यमे लागि गेलाह। सन् 1939 ई.मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीजीक भवटियाहीमे विशाल सभाक आयोजन राम नारायण गुरुमैता करौने छलाह। एहि सभमे हजारो हजार लेाक भाग लेलैन्ह। सभक भोजनोक व्यवस्था कयल गेलैक। राम नारायण गुरुमैताक माताश्री अपन हाथसँ चरखा द्वारा सूत तैयार कऽ गाँधीजीकेँ भेँट केलैन्ह। राम नारायण गुरुमैताक सुपुत्र डा. भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता जे 8-9 वर्षक अवस्थाक छलाह, ओ गाँधीजीक स्वागतमे ‘विजय विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमरा’ गीत गावि फूलक माला गर्देनमे पहिराबय लगलाह। कद-काठीमे छोट रहवाक कारणे हाथ गाँधीजीक गरदनि तक नहि पहुँच सकलैन्ह । गाँधीजी भुवनेश्वर गुरुमैताजीकेँ गोदीमे उठा लेलैन्ह आ गुरुमैताजी गाँधीजीकेँ माला पहिरा देलैन्ह। सन् 1940 ई.मे राम गढ़मे काग्रेसक बैसार छल। राम नारायण गुरुमैता कॉंग्रेसक जुझारू, कर्मठ आ समर्पित कार्यकर्त्ता छलाह। तेँ दरभंगा तखन समस्तीपुर, वेगुसराय आ मधुबनीक एक मात्र जिला छल। कॉंग्रेस जिला कमेटीक प्रतिनिधिक रूमे ओहि बैसारमे राम नारायण गुरुमैतीजीकेँ भेजने छला। राम नारायण गुरुमैता ओहि बैसारमे ससमय पहुँचलाह। ओहि बैसारमे देश भरिक कॉंग्रेसी नेता पहुँचल छलाह। महात्मा गाँधीक अध्यक्षतामे बैसार भेल छल। एहि बैसारमे निर्णय भेल जे सुभाष चन्द्र वोसक जगहपर पट्टामि सीता रमैयाकेँ अध्यक्ष बनाओल जाय। राम नारायण गुरुमैता एहि प्रस्तावक विरोध कयलैन्ह आ ओ गाँधीजीक खेमासँ बाहर भय नेताजीक खेमामे आबि गेलाह। राम नारायण गुरुमैता स्वावलम्बी, क्रान्तिकारी, न्यायवादी, स्पष्टवादी, सत्यवादी आ जुझारू विद्वान नेता छलाह। जमींदार सेहो छलाह। हिनक पिता विहारी गुरुमैताक रग-रंगमे स्वाधीनताक आन्दोलन समायल छल। विहारी गुरुमैताक पिता भाईलाल गुरुमैताक सहयोगसँ कतेको गाममे जमीन खरीद कामत बनौने छलाह। जेना भवटियाही, गोढ़ियारी, मालिन बेलहा, सुग्गापट्टी मटियारी आदि। स्वतंत्रता प्राप्तिसँ पहिने कोसीक रेलवे पुल बरकरार छल। दरभंगासँ फारविसगंज बीच छोटी रेलबे लाइन छल। दरभंगासँ फारविसगंज रेल जाइत छलैक। 1942 ई.क आस-पास तेहेन ने भीषण बाढ़ि आबि गेलैक जे कोसीक भीतर रेल लाइनकेँ तहस-नहस कय देलक आ निर्मलीसँ आगाँ रेलक सवारी बन्द भय गेल जे अखन धरि बन्दे अछि। भवटियाही कामत सेहो तहस-नहस भय गेल। आब राम नारायण गुरुमैताक रहनाइ गोढ़ियारी कामतपर भऽ गेल। ओहिठामसँ स्वतंत्रता आन्दोलनक गति-विधि चलवय लगलाह। हिनक प्रथम पुत्र भुवनेश्वर भुवनेश्वर गुरुमैता जिनकर उम्र तकरीवन 12 वर्षक छलैन्ह। अपन पुत्रकेँ पढ़यवाक लेल राम नारायण गुरुमैता फुलपरासक अन्तर्गत म.वि. हुलासपट्टीमे नाम लिखा देलैन्ह। नाम सप्तम वर्गमे लिखल गेल। भुवनेश्वर गुरुमैता ओहि विद्यालयमे पढ़य लगलाह। 1942 ई.क स्वतंत्रता आन्दोलनमे जखन भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता अपन विद्यालयमे एकटा नीक छात्रक रूपमे ख्याति प्राप्त कय चुकल छलाह। तखन एक दिन हिनक पिता राम नारायण गुरुमैता हुलासपट्टी मध्य विद्यालयपर पहुँचलाह आ भुवनेश्वर गुरुमैतासँ कहलैन- “बौआ, एहि आन्दोलनमे पटनामे राष्ट्रीय झंडा फहिरावयक दरम्यान 07 सात बच्चा शहीद भऽ गेल। आब आठममे तोहर बारी छल।” स्वतंत्रताक दिवाना राम नारायण गुरुमैता, जे भारतकेँ स्वतंत्र करबाक हेतु अपना बेटाकेँ बलिदान देबाक लेल तैयार छल- के ओ कहलैन- “तो अपन विद्यालयक छात्रक नेतृत्व करैत फुलपरास थानापर राष्ट्रीय झंडा पहरावह। हम अपन एकटा बेटाकेँ भारत माताक लालक रूपमे वलिदानक लेल सूपूर्द कय रहल छी। गोली चलत तकर डर नहि करियहह।” ई बात 11 अगस्त 1942 ई.क छल। 12 अगस्तकेँ अपना विद्यालयक छात्रक नेतृत्व करैत हाथमे झंडा लय भारत माताक जय-जयकार करैत फुलपरास थापर पहुँचलाह। हजारो-हजारक संख्या छात्र, नौजवान, किसान, मजदूर आ इलाकाक ग्रामीण जनता सभ थानाकेँ घेरने छल। भुवनेश्वर प्र. गुरुमैता हाथमे झंडा लय भारत माताक जय-जयकार करैत थानापर पहुँचलाह। थाना पहुँचैत देरी पुलिस भीड़केँ छिड़ियेबाक बास्ते हवाइ फायरिंग करय लागल। जखन मंचपर चढ़ि भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता झंडा फहरावय लागल तखन थानाक दरोगा ओहि बचापर गोली चलवय लागल। बच्चाकेँ कोनो परबाह नहि छल। गोली चलैत रहल। दरोगा निशाना बनौलक आ भुवनेश्वार प्रसाद गुरुमैताकेँ मारए लागल, तावत दरोगाक पत्नी जे सदृदय छली। ओ दरोगाक पैर छान्हि लेलकनि आ दरोगाक निशाना चुकि गेलैक जाहिसँ ओ बच्चा गोलीक शिकार होमयसँ बॉंचि गेल। एहिठाम ई पॉंती चरितार्थ भेल- ‘जाके राखे साईयॉं मारि सके ने कोई’ उग्र भीड़ दरोगापर टूटि पड़ल। ओ सभ दरोगाकेँ धमकी देवय लागल कहलक- जँ ई बच्चा अहॉंक गोलीसँ मरत तँ अहूँकेँ निर्वश कय देव। भ्ज्ञीड़ भारत माता की जयक नारा देबय लागल। स्थिति बड़ तनाव युक्त भऽ गेल। 12 अगस्तकेँ झंडा फहरौल गेल आ तेरह अगस्तकेँ थानामे आगि भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक नेतृत्वमे लगा देल गेल। 12 अगस्त 1942 ई.केँ भारतमे प्राय: सभ सरकारी संस्थापर तिरंगा झंडा फहरौल गेल। जयनगर थानापर झंडा फहरावयमे जे गोली चलल। जाहिमे नथुनी साह नामक युवक शहीद भऽ गेल। अखनो थानाक नजदीकक चौककेँ शहीद चौक कहल जाइत छैक। जकर स्मारक शहीद चौकपर बनल छैक। फुलपरास थानापर गागि लगलाक बाद चारू तरफ हाहाकार मचय लागल। भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताकेँ अंग्रेज छौटे गुरुमैता कहि स्मबोधित करय लागल। आ छोटे गुरुमैतापर शूट वारंट जारी भऽ गेल। म.वि. हुलासपट्टीसँ भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक नाम कटा देल गेल। राम नारायण गुरुमैतापर सेहो वारण्ट भय गेल। आब राम ना. गुरुमैता भूमिगत रहि आन्दोलनकेँ सक्रिय रखलैन्ह। मुदा राम नारायण एहि आपा-धापी आ नुक्की-छिपीमे बीमार भय गेलाह। अंग्रेजी समान आ अंग्रेजी दवाईसँ ओ परहेज करय लगलाह। झंझारपुरमे एकटा डॉक्टर हिनक मित्र रहथिन्ह। ओ हुनकर इलाज करैक लेल लालायित रहलाह। मुदा ओ अंग्रेजी दवाईयो खेवाक लेल शपथ खेने रहैथ। तुलसीक पात, वाकसक पात, काली मीर्च सेंधा नून इत्यादि जड़ी-बुटी मिला कय काढ़ा बनाओल गेल। ओ काढ़ाक सेवन करय लगलाह। मुदा बीमारी ठीक नहि भय सकलैन्ह। बीमारी खतरनाक रूप धारण कय लेलक। ओ मिथिलाक विभूति 20 अक्टूवर 1942 ई. केँ वाइसी गढ़ी (सुपौल) मे 35 वर्षक अवस्थामे एहि लौकिक शरीर के त्यागि परलोक सिधार लाह। स्वर्गवासी होमयसँ पहिनहि अपन सुपुत्र श्री भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताकेँ तीन कार्य करवाक हेतु आदेश देलैन्ह। जे निम्न अछि- बेटा, मदन मोहन मालवीय जीक हिन्दू विश्व विद्यालयसँ एम.ए. करियहह। मॉं केँ तीर्थाटन करा दियहक। पढ़ाई सम्पन्न भेलाक वाद देश सेवामे लागि जइयह। एहेन परिस्थितिमे भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता जिनका अंग्रेज छोट गुरुमैताक नामसँ सम्वोधित करैत छलाह, विचलित नहि भेलाह। दाह संस्कार सम्पन्न भेल। दाह-संस्कारमे बहुत संख्यामे आन्दोलनक कार्यकर्त्ता भाग लेलैन्ह। एहि घटनाक जानकरी अंग्रेजी फौजकेँ भय गेलैन्ह। थानापर राष्ट्रीय झण्डा आ थानामे आगि लगेलाक जूर्ममे श्री भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक (छोटे गुरुमैता) नामसँ वारण्ट जारी भेल छल ओहि समयमे छोटे गुरुमैताक गिरफ्तारी हेतु वारण्ट लय अंग्रेजी फौज दरबाजापर आबि घर घेर लेलैन्ह। ओहि समयमे संयोग नीक छल जे भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता अपन चाचाक संग अस्थि कलश चुनबाक हेतु समीपहिक दाह संस्कार स्थलपर गेल छलाह। घर लोकक मारफते हुनका गुप्त सूचना देल गेलैन्ह। सूचना मिलतहि ओ अस्थि लय चाचाक संग नेपाल भागि गेलाह। आ ओम्हरहिसँ सिमरिया जा अस्थि-कलशकेँ गंगामे प्रवाहित कयलैन्ह। ग्रामीण सभ दु:साहस कय सिपाही सभकेँ बड़ फटकारलैन्ह। तथापि क्रूर सिपाही लोकनि हुनका घरमे आगि लगा देलक। ई कारूणिक दृश्य देखि इन्द्र भगवानक हृदय द्रवित भय गेलैन्ह। आ झमाझम वारिस होमय लागल। घर जरऽसँ बॉंचि गेल। सिपाही लेकनि निरास भय वापस चलि गेलाह। राम नारायण गुरुमैताक निधनक पश्चात भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक अपन चाचा देवनारायण गुरुमैता स्वतंत्रता आन्दोलनमे सक्रिय भूमिका निभौलैन्ह। आब एहि स्वतंत्रताक आन्दोलनक नेतृत्व कर्त्ता खुटौना थानाक नहरी निवासी स्व. राम लषण सल्हैता भेलाह। राम लषण सल्हैता कर्मठ, सुयोग्य, क्रान्तिकारी निर्भिक, ज्योतिष शास्त्रक ज्ञाता, हिन्दी भाषी विद्वान एवम् स्पष्ट वक्ता छलाह। आब राम लषण सल्हैताक नेतृत्वमे देव नारायण गुरुमैता, सूर्य नारायण सिंह, सुवोध झा, गुलावी सोनार, उपेन्द्र मिश्र, यमूना सिंह, जिलवी खड़गाह आ सल्हैताजीक दुनू छोट भाई रामकृष्ण सल्हैता आ जयकृष्ण सल्हैता आन्दोलनकेँ सक्रिय बनेबामे सहयोग करय लगलाह। राम लषण सल्हैताक वंशावलीक चर्चा मुनासीव बुझना जाइछ। आत्मा सल्हैता आ परमात्मा सल्हैता दुनू भाई सितहर बरहाक निवासी छलाह। जे अखन सुपौल जिलामे पड़ैत अछि। ओहि दुनू भाइक पास बहुत रास गाय (गोधन) छल। गायकेँ चरेवाक हेतु बहुत दूर-दूर तक चलि जाइत छलाह। गायक झुण्ड जतय-जतय जाइत छल ओकरा पॉंछा ओकर मालीक आ चरवाहा अपन डेरा डालि रहैत छलाह। ओहि क्रममे आत्माक सल्हैतका गाय खुटौना थानाक सिडुला गाँव पहुँच गेल। घनगर जंगल रहलाक कारणेँ गाय सभ भरि वरसात एहिठाम ठहरि गेल। सिडुलासँ पूरब एकटा बड़ ऊँचगर जगह छलैक। वाढ़िक पानि आ जाड़सँ बचवाक हेतु मालीक आत्मा सल्हैता आ ओकर नौकर सभ ओहि ऊँचगर जगहपर अपन स्थायी निवास स्थान वनाकय रहय लगलाह। किछु दिनक वाद जंगल आ परती भूमिकेँ उपजाऊ भूमि बना कय खेती वाड़ी करय लगलाह। गोधनसँ अधिक आमदनी होमय लगलैक। खेती नीक जकॉं करय लगलाह। खेतीसँ वढ़िया जकॉं आमदनी होमय लगलैक। किछु जमीन खरीद नीक जकॉं घर बनाकय रहय लगलाह। आत्मा सल्हैताक छोट भाए- परमात्मा सल्हैता जे सितहर-बरहा (सुपौल) मे रहैत छलाह ओ हिनका लय जयवाक हेतु प्रयास केलैन्ह मुदा आत्मा सल्हैता वापस नहि गेलाह। सिडुलासँ पूरब एकटा छोट नदी जे नहरक सदृश्य छल ओकरहि नामपर एहि गामक नाम नहरी राखल गेल। वर्त्तमानमे ई गाँव बड़ सुखी सम्पन्न आ विद्वानक वस्ती बनि गेल अछि। एतय प्रारम्भिक शिक्षासँ .......... शिक्षण संस्थान अवस्थित अछि। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सेहो अछि। आत्मा सल्हैताक एक मात्र पुत्र रघु सल्हैता भेलाह। आत्मा सल्हैता : वंशावली निम्न अछि- आत्मा सल्हैता रघु सल्हैता फुद्दी सल्हैता लेल्हाई सल्हैता मनरूपी सल्हैता गुदर सल्हैता बच्चू सल्हैता बाबूलाल सल्हैता जिन्त्री सल्हैता मिन्त्री सल्हैता जिन्त्री सल्हैता मिन्त्री सल्हैता जिन्त्री सल्हैता मिन्त्री सल्हैता जिन्त्री सल्हैता मिन्त्री सल्हैता सचिदानन्द सल्हैता कमलेश सल्हैता इन्द्र कुमार सल्हैता सचिदानन्द सल्हैता कमलेश सल्हैता इन्द्र कुमार सल्हैता विशेश्वर सल्हैता विशेश्वर सल्हैता राम लषण सल्हैता रामकृष्ण सल्हैता जयकृष्ण सल्हैता राम लषण सल्हैता रामकृष्ण सल्हैता जयकृष्ण सल्हैता लालजी सल्हैता रामजी सल्हैता लालजी सल्हैता रामजी सल्हैता सचिदानन्द सल्हैता कमलेश सल्हैता इन्द्र कुमार सल्हैता सचिदानन्द सल्हैता कमलेश सल्हैता इन्द्र कुमार सल्हैता विशेश्वर सल्हैता विशेश्वर सल्हैता राम लषण सल्हैता रामकृष्ण सल्हैता जयकृष्ण सल्हैता राम लषण सल्हैता रामकृष्ण सल्हैता जयकृष्ण सल्हैता लालजी सल्हैता रामजी सल्हैता लालजी सल्हैता रामजी सल्हैता आब बाबू लाल सल्हैताक तीन सुपुत्र राम लषण सल्हैता राम कृष्ण सल्हैता, जयकृष्ण सल्हैतामे सभसँ जेठ भाई राम लषण सल्हैताकेँ एकटा विशाल हाथी छल। तकरीवन 10 हाथक छलैक। ओकरा पैघ-पैघ दॉंत सेहो छलैक। हाथी पैघ देश भक्त आ स्वामी भक्त सेहो छल। राम लषण सल्हैता दोसर बेटी जे दू सालक छल। एक दिन संध्याक समय ओ बच्ची हवेलीसँ निकलि हाथीक घर चलि गेल छल। हाथी बान्हल छल। हाथी ओहि बच्चीकेँ सूढ़सँ उठा लेलक आ ओकरा झूलबय लागल। बच्ची आस पाबि सुति रहल। तखन हाथी बैसि रहल आ अपना दुनू अगिला जॉंघ बीचमे राखि सूढ़सँ झॉंपि देलक। बच्ची हाथीक सायामे सूतल रहलीह। जखन हवेलीक अन्दर बच्चीक खोजवीन होमय लागल तँ ओ नहि भेटलैक। चारू तरफ खोज-पुछारि हाफय लागल। कतहु अता-पता नहि लागल। पोखैर-इनारमे सेहो खोजल गेल। हवेलीक अन्र कना-रोहट शुरू भय गेल। मुनहारि सॉंझ भय गेल छल। बच्चीक खोज-पुछारिक लेल बाड़ी-झाड़ी माल-जालक घरक तलासी भेल। सभ कियो हारि-थाकि कऽ संख्या समय निरास भय एक जगह जमा भेल। सॉंझ देमय लेल दीप, लालटेन वा डिविया जराओल जाय लागल। ओहि समयमे विजलीक सेवा नहि छल। लोक सभ लालटेन युगमे जी रहल छल। अंग्रेजी शासनक अत्याचार चरम सीमापर छल। ग्रामीण लोकनि पढ़नाइ-लिखनाईकेँ वहिष्कार करैत छल। हाथीक महाउथ हथिसार यानी हाथीक घर सॉंझ देबाक लेल गेल। सलाईसँ काठी निकालि डिविया जरौलक। महाउथ देखलक जे हाथी असमयमे बैसल किएक अछि? महाउथ तँ पहिने घवरेलाह। हाथीक लग पहुँचलाह। तँ देखैत छैथ जे हाथीक अगिला दुनू जॉंघक बीचमे बच्ची सुतल अछि आ हाथी अपन सूढ़सँ ओकरा झपने अछि। जाड़क समय छल। बच्चीक देह गर्म भऽ गेल छलैक। तँए ओ निश्चिन्तसँ सुतल छलीह। महाउथ दौगल मालीक लग। मालीक मालीक एमहर आउ। निरास भने सभ कियो हाथसार दिस दौड़ल। मालिक हाथीकेँ बैसल देखलक, तँ ओ घवरेलाह जे हाथी असमयमे किएक बैसल अछि। मनहि-मन सेाचए लगलाह जे हाथी बीमार न भऽ गेल। महाउथ मालीककेँ देखौलक जे हाथी अपना जॉंघक बीच कोना कऽ बच्चीकेँ झपने अछि। परिवारक सभ सदस्य देखलक सभ अचंभित भय गेल। मालीक हाथीसँ बच्चीकेँ देबाक लेल आग्रह केलैन्ह। हाथी अपन सूढ़सँ बच्चीकेँ मालिकक राम लषण सल्हैताजीक गोदीमे दय देलक। सभक निराश मन प्रफुल्लित भय गेल। राम लषण सल्हैता हाथीकेँ नहि बेचबाक प्रण कयलैन्ह। हाथी वफादार देशभक्त आ स्वामीभक्त छल। एकर एक उदाहरण प्रस्तुत कय रहल छी। राम लषण सल्हैता जे दरभंगा महाराजक द्वारा जूरी पंच मनोनित कएल गेल छलाह। गामक नजदीकमे अंग्रेजक कचहरी छल। ओतएसँ एकटा देवनजी राम लषण सलहैताकेँ पंचैती हेतु बजाबक लेल हाथीसँ आयल छल। राम लषण सल्हैता पंचैतीमे जयवाक हेतु तैयार होमय लगलाह। महाउथकेँ आदेश देलैन्ह जे तौं हाथीकेँ तैयार कर महाउथ हाथीक हौदा कसय लागल। राम लषण सल्हैता सेहो तैयार भेलाह। महाउथवार हाथी लय उपस्थित भेल। सल्हैताजी हाथीपर सवार भय पंचैती हेतु विदा भेलाह। तावत देवानजी हाथीपर चढ़ि आगाँ बढ़ि चुकल छल। सल्हैताजी सोचए लगलाह जे ई देवानजी केहेन असम्य अछि। हमरा चललाक बाद ओ पाछॉंसँ चलितैथ। हुनका आत्म सम्मानपर ठेस पहुँचलैन्ह। ओ महाउथवारकेँ ईसारा देलैन जे हाथीकेँ जोड़सँ चलाउ। हाथी नमहर छल। पैघ-पैघ डेग दैत देवानजीक हाथीकेँ पकैड़ लेलनि। आगाँ एकटा नाला छल देवानक हाथी नाला टपए लागल। तखन राम लषण सल्हैता महाउथवारकेँ इशारा कय देलनि जे देवानक हाथीकेँ पाछॉंसँ दाइब दे। महाउथक ईशापर सल्हैताजीक हाथी पाछॉंसँ सूढ़सँ डॉंरपर जोरसँ चापि देलक। देवानक हाथी नेंगराय लागल। पंचैती भेल। ओतयसँ सल्हैताजी घर अयलाह। देवानजीक हाथीक डॉंर टूटि गेलैक। एहि बातक जानकारी दरभंगा महाराजकेँ देल गेलैक जे राम लषण सल्हैताजीक हाथी दरभंगा महाराजक हाथीक डॉंर तोइर देलक। दरभंगा महाराज राम लषण सल्हैताकेँ दरभंगा बजौलक। राम लषण सल्हैता दरभंगा महाराजक ओय पहुँचलाह। महाराजाकेँ खबर पठाओल गेल। दरभंगा महाराज सल्हैताजीकेँ कहलनि जे अहॉंक हाथी बदमाश अछि। हमरा कचहरी परहक हाथीक डॉंर तोइर देलक। सल्हैताजी अपन सफाई देलक जे अहॉं देखू सल्हैताजी हाथीकेँ कुहलनि जे पट होजा। हाथी लेट गेल। सल्हेताजी हाथीक दॉंतपर चढ़ि दोसर दॉंतकेँ पकैर हाथीक दॉंतपर चढ़ि गेलाह। दरभंगा महाराजा खुश भय सल्हैताजीकेँ अभय दान दय देलैन्ह। ई दृश्य महारानी कोठाक ऊपरसँ देखि रहल छलीह। ओ ऊपरसँ आदेश देलैन्ह जे अहॉं ई हाथी हमरा दय दीअ। एहि बदलामे अहॉं चारिटा हाथी लय लीअ। महारानीक हठपर सल्हैताजी हाथी दय देलैन्ह। जहिया सँ ई हाथी सल्हैताजीक घर छोड़लक, तहियासँ सल्हैताजीक घरमे उड़ी-विड़ी लागि गेलैक। एमहर राम नारायण गुरुमेताक निधनसँ जतेक स्वतंत्रता आन्दोलनक क्रान्तिकारी लोकनि सभ छलाह, ओ राम लषण सल्हैताक ओतय रहि आन्दोलन करैत रहलाह। अंग्रेज सरकार एहि क्रान्तिकारी लोकनिकेँ गरफ्तार करबाक मुहिम चला रहल छल। नहरी गामक किछु असमाजिक तत्व जकरा लाम लषण सलहैतासँ दुश्मनी छल ओ अंग्रेज सरकारकेँ एहि बातक सूचना दय देलक। 1944 ईस्वीक दीपावलीसँ एक दिन पहिनहिक लगभग 9 बजे रात्रिमे 8 स्वतंत्रता सेनानी सवेरे भोजन कय सुतल छलाह। पहरापर देवनारायण गुरुमैता छलाह। पॉंच सौ मीटर दूरहिसँ अंग्रेजी फौज टार्च देलक आ राम लषण सल्हैताक नाम लैत दरबाजापर अयबाक कोशीश कयलैन्ह। मुदा देवनारायण गुरुमैता हुनका सभ सामना करैत रहलाह। बादमे ओ ओतयसँ बन्दुकक साथ भागि गेलाह। सभ आन्दोलनकारी सेहो परा गेलाह। आंगनसँ पाछॉं दय बहरेवाक एकहिटा रास्ता छल। आ वगलमे ढेकी घर छलैक। ओहि ढेकी घरमे दू क्रान्तिकारी यमुना सिंह आ उपेन्द्र मिश्र फँसि गेलाह। मुदा ओ दुनू घरक धरैनपर छुपि रहलाह। घरक तलासी होमय लागल। कतौ कोनो क्रान्तिकारी नहि मिलल। सभ अंग्रेजी फौज दरबाजापर जमा भय गेल। राम लषण सल्हैता सभ सिपाही आ पुलिस अफसरकेँ ततेक ने डॉंट-डपट कयलक जे सभ पुलिस पानि-पानि भय गेल। मुदा गामक जे राम लषण सल्हैताक प्रतिद्विन्दि छलाह, जे अंग्रेजी फौजकेँ बजा कऽ अनने छलाह। ओहि आदमीसँ अंग्रेज अफसर पानि पियेबाक आग्रह केलैन्ह। ओ आदमी लोटा लय ठेकी घरसँ पानि आनबाक हेतु गेलाह। धरैनपर बैसल क्रान्तिकारी द्वय हुनकासँ पुछलनि जे सिपाही सभ चलि गेल। ई सुनितहि ओ प्रतिपक्षी आबाज दय फौजकेँ बजौलक आ दुनू क्रान्तिकारीकेँ पकड़बा देलक। ओहि दुनूकेँ पकड़लाक बाद राम लषण सल्हैता, जय कृष्ण सल्हैता, विन्देश्वर सल्हैता, जीलेवी खड़गाह आ टीमू मण्डलकेँ गिरफ्तार कय जहल लऽ गेल। घरक सभ सामान लूटा गेल। घरक सभ सदस्य घर छोड़ि भागि गेल। अंगेजी फौजक उपद्रव बढ़य लागल। घरमे जतेक वत्रन वासन, सोना-चान्दी, गहना जेवर छल सभ लूटि कऽ अंग्रेज आ गामक विरोधी सेहो लऽ गेल। घरक तलासीमे राम लषण सल्हैताक एक मात्र पुत्र विशेश्वर सल्हैताकेँ पकड़बाक हेतु एड़ि-चोटी एक कय देलक। विशेश्वर सल्हैता घर छोड़ि अपना मामा गाम गोईत परसाही चल गेल। विरोधी लोकनि विशेश्वर सल्हैताक रहबाक पता सेहो अंग्रेजी फौजकेँ बता देलक। अंग्रेजी फौज विशेश्वर सल्हैताकेँ पकड़वाक हेतु परसाही पहुँचल। ओतयसँ ओ बाधे-बाघ पूरब तरफ भागि गेलाह। अंग्रेज सिपाही हुनका पकड़वाक हेतु खदेरऽ लागल। बाघमे एकटा हरवाहा हर जोतैत छल। अंगेज सिपाही हरवाहाकेँ जोड़सँ हल्ला कय विशेश्वर सल्हैताकेँ पकड़बाक हेतु कहलक। हरवाहा विशेश्वर सल्हैताकेँ पाछॉंसँ खदेरऽ लागल। आ हरवाहा विशेश्वर सल्हैताकेँ धीमी आवाजमे कहलक बौआ अहॉं जोरसँ भागू। हम अहॉंकेँ खदेरवाक नाटक करब। हरवाहा डरे विशेश्वर सल्हैताकेँ खदेरय लागल। आ ऊचगर मेड़पर ओंघरा कऽ गिरअ लागल। एहि तरहेँ विशेश्वर सल्हैता भागि कय पुलिसक पछाड़सँ छुटि गेलाह। भागल-भागल अपन जेठ बहिनक ओतय पहुँचलाह। बहिनक दरवाजापर आइत देरी एकटा तेहल्ला बाजल जे सल्हैता तँ अपने विलटिये गेल आब एकरो बिलटौत। ई सुनितहि विशेश्वर सल्हैता जे आत्म सम्मनक रक्षार्थ ओतय नहि रूकलाह आ आगाँ बढ़ि गेलाह। हिनक जेठ बहिन जँ बुझलक तँ विशेश्वर सल्हैताक पाछॉंसँ आवाज दय रोकलीह। मुदा सल्हैताजी वापस नहि भेलाह। एहि प्रकारे विशेश्वर सल्हैता भागैत-भागैत कोसीक ओहि पार जा अपन मौसीक ओतय शरण लेलैन्ह। एमर राम लषण सल्हैता सहित तथाकथित गिरफ्तार व्यक्तिकेँ जेलमे डालि देल गेल। राम लषण सल्हैता जेलमे अनसन करय लगलाह। अठरहम दिन ओ शरीरकेँ त्यागि देलक। क्रुर अंग्रेज सल्हैताजीक लाशकेँ हिनक परिजनकेँ नहि दय सकल। किछु गिरफ्तार व्यक्तिपर मुकादमा चलय लागल। एहि प्रकारे सल्हैताजीक परिवार आ धन सम्पतिक नाश भय गेल। स्वतंत्रता आन्दोलनमे जे क्षति राम लषण सल्हैता आ राम नारायण गुरुमैताकेँ भेलैन्ह ओ इतिहासक पन्नामे स्वार्णक्षरमे लिखवाक योग्य अछि। एमहर राम नारायण गुरुमैताक सहोदर भाए देव नारायण गुरुमैता जे किछु दिन धरि जेलमे बन्द रहलाह, तकर बाद जेलक चाहरदिवारीकेँ फानि जेलसँ बाहर निकलि अपन पितियौत भाय जे बेगूसरायमे बैंकक नौकरी करैत छलाह, ओतय चलि गेलाह। भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता अपन पिता राम नारायण गुरुमैताक श्राद्ध-कर्म सम्पन्न कय बेगूसराय आगाक शिक्षा ग्रहण करवाक लेल चल गेलाह। बेगूसरायमे दूटा उच्च विद्यालय छल एकटा बी.पी. उच्च विद्यालय आ दोसर जे.के. उच्च विद्यालय। बी.पी. उच्च विद्यालयक प्राचार्य नामांकन नहि लेलक। तखन नामांकन हेतु जे.के. उच्च विद्यालय पहुँचलाह। ओतयक प्रचार्य भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता जीक जॉंच परीक्षा लेन्हि। 100 अंकक प्रश्न पत्र देल गेल। परीक्षा सम्पन्न भेल। 100 अंकमे 100 अंक गुरुमैता जीकेँ प्राप्त भेलैन्ह। प्राचार्य हिनक प्रतिभा देखि गद-गद् भय गेलाह। नामांकन भय गेल। जे.के. उच्च विद्यालयमे श्री गुरुमैतजी पढ़य लगलाह। गुरुमैताजी बगूसरायमे पढ़बो करथि आ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघक शिविरमे सेहो भाग लैथ। हिनक चाचा जे जेलसँ भागि कऽ बेगूसराय चल गेल रहैथ ओ भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैतापर समसैल रहैत छलाह। किएक तँ ओ आर.एस.एस. शिविरमे भाग लेबाक हेतु जाइत छलाह। ओ ओहि शिविरमे भाग लेबासँ सदिखन मना करैत छलैन्ह। धीरे-धीरे भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघक प्रचारक बनि गेलाह। देश सेवामे लागल रहलाह। पिताक आज्ञाक पालन करैत काशी हिन्दु विश्व विद्यालयसँ एम.एक. पास कयलैन्ह। माताकेँ तीर्थाटन करौलैन्ह। पद्म विभूषण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीजीक संरक्षणमे शोध कार्य सम्पन्न कयलाह। बहुत रास पा..... सभ लिखलैन्ह। हिनक शोधक विश्ज्ञय छल ‘वर्णरत्नाकरक ऐतिहासिक पृष्ठि भूमि।’ एहि तरहेँ गुरमैता-सल्हैता परिवारक धन-सम्पति नष्ट भेलाक वादो स्वतंत्रता प्राप्तिमे अपन अहम भूमिका निभौलैन्ह। जे आइ धरि मिथिलांचलक आन, वान और शान अछि। कैलाश कुमार मिश्र लघुकथा- पण्डिताइन राघबक मोबाइल केर घंटी बाजि उठलनि। देखैत छथि जटा फ़ोन कऽ रहल छनि। फोन उठा हेलो कहलथिन। ओमहर सँ जोश मे मुदा एक अव्यक्त पीड़ा सँ भरल शब्द: “हर हर महादेब राघब जी। सब समाचार नीक ने?” राघब: “हर हर महादेब! कहल जाओ। जय महाकाल?” जटा: “सब किछु चलि रहल अछि। जिनगी जीब रहल छी। काल्हि हरे कृष्णक दोसर बरखी छनि। अहाँ सँ बहुत नेह रखैत छलीह। सोचल नौत दऽ दी।” राघब: “ओह! दू बरख भऽ गेलनि अनुराधा केँ अहि नश्वर काया केँ त्यागि अनश्वर जगत मे प्रवेश केना! समय कोना दौड़ल चलल जा रहल छैक?” जटा: “हाँ राघब जी। अहाँ केँ की कहू, अहाँ स्वयं विद्वान छी। सब बात बुझैत छियैक। आचार्य मदन सेहो सुतले रहि गेलाह! बिसरे सभी बारी-बारी!” राघब: “सही कहैत छी। यएह छैक संसार। लोक जनैत अछि जे ओकरा चलि जएबाक छैक तथापि झूठ-फ़रेब मे, अपन आन मे लागल रहैत अछि। छोड़ू इ बात सब। हम काल्हि अवश्य आबि जाएब।” इ कहैत राघब फोन काटि देलथिन। आब राघब जटा आ अनुराधाक दुनिया मे, ओहि छोट सन संसारक इतिहास मे चल गेलाह। समय जेना घूमए लगलनि..... जटाक जन्म प्रथम पुत्रक रूप मे एक महादरिद्र मैथिल ब्राह्मण परिवार मे भेलनि। नामक अतिरिक्त ओहि परिवार मे कोनो संस्कार ब्राह्मण बला नहि रहैक - ने माता पिताक शिक्षा, ने परिवारक संस्कार, ने गामक नाम आ ने कूलक विचार। जटाक पिता आ माताक बीच एकैस वरखक अंतर रहनि। जटाक पिता भोला प्रचण्ड मूर्ख आ भूमिहीन। लोकक महिस पोसिया रखैत छलाह। पैतीस बरखक भऽ गेल रहथि। सब बेर चानन काजर लगा ललका धोती आ कुरताक सँग पाग दोपट्टा धारण कय सौराठ सभागाछी जाइत छलाह। टुकटुकी लगेने रहैत छलाह जे कोनो कन्यागत ओकरा दिस देखतैक। मुदा सब बेकार। ऊपर सँ मुँह कान सेहो दैवक देल। बज्र कारी चाम, उचगर दाँत, तमाकुल आ पान सँ दाँत मे खईंठी पड़ल, आँखि धसल, रिछ सन पूरा देह मे केस, कान पर विशेष झमटगर ठाढ़ भेल रोआँ, चेड़ा जकाँ हाथ, हाथ मे खुरपी, हाँसू आ कोदारि चलबैत-चलबैत ठेला पड़ल, पैर मे बेमाय फाटल, लेढाएल मोटका धोती सँ महिसक गंध अबैत भोला कोनो रूप सँ ब्राह्मण नहि लगैत छलाह। गामक संस्कार ई जे बिना गारि केँ दू पुरुख निको बात नहि कऽ सकैत छल। भोला भला अपवाद कोना रहितथि खूब गारिक प्रयोग करैत छलाह। लगातार सात बरख सँ भोला तैयार भऽ सौराठ सभा शुद्धक समय मे जाइत छलाह आ टकटकी लगेने बैसल रहैत छलाह मुदा दुर्भाग्य ई जे बियाहक बात केँ पुछैत अछि हुनका दिस कोनो कन्यागत देखितो नहि छलनि। अंततः सभा समाप्त भेला पर भोला निराश मोन सँ वापस गाम आबि जाइत छलाह। एहिबेर भोलाक बूढ़ पिता ठानि लेलाह जे चाहे जेना होइक़ भोलाक बिआह अहि शुद्ध मे अवश्य करा देथिन्ह। कियोक कहि देलकनि जे नीरस झा बहुत नीक दलाल छथि। भोलो सँ अधलाह बरक बिआह करा चुकल छथि। मुदा नीरस झा बिना टका केँ कोनो काज नहि करैत छथि। एहिबेर सभा लागब सँ बीस दिन पहिने भोलाक पिता नीरस झा केँ अपन घर बजा अनलाह। बकाएन महिसक शुद्ध दूध मे चाह बना भोलाक माय एक फुलही गिलास मे नीरस केँ आ छोटकी बाटी मे भोलाक पिता केँ देलथिन। नीरस केँ आर की चाही। मोन प्रफुल्लित भऽ गेलैक। जाड़क समय मुँह सँ फूकि-फूकि चाह सुरकय लागल। नीरस केँ होइक़ जेना चाह नहि अमृत पिब रहल हो! ओमहर भोलाक पिता आ माय नीरस दिस एक लाचार याचक बनि अशाक किरण जगेने ताकि रहल छलथिन। जखन आधा चाह सुरका गेलैक तऽ नीरस बाजि उठल: नीरस : "हाँ बौकू काका! की कहऽ चाहैत रही?"। बौकू काका: "बौआ, पहिने चाह पिब लीय फेर गप्प करैत छी। अहाँ कोनो आन थोड़े ने छी!" नीरस चुपचाप चाह पीबय लागल। चाह सूरकला बाद नीरस फेरो बाजल: "हाँ बौका का, कहू की कहए चाहैत छी?" बौकू काका चुपे रहलनि। भोलाक माय आँखि सँ गरम-गरम नोर चुअबैत बजली: "बौआ नीरस, अहाँ सब सन दियामानी लोक केँ अछैते हमर भोलबा कुमारे रहि जाय!" नीरस: "की कहैत छी काकी, ई एहेन अपाटक अछि जे अपन नाम तक नहि बाजि पबैत अछि। ओहि दिन चौक पर एक घटक नाम पुछि देलकैक। ई बृजबोध चौधरी केँ --जीबोध चौधरी कहि देलकैक। ओतय सब आदमी हँसै लगलैक। एकर बिआह कनि झंझट बला चीज़ छैक।" बौकू काका: "हौ नीरस किछु करह। एकर बिआह हमरा जिबैत भऽ जएबाक चाही। सब किछु तऽ सुईद मे चलि गेल, आठ कट्ठा बँसबिट्टी आ कलम रहि गेल अछि। तकरे बेचि एकर बिआह करा देबैक। गरीबक मिहनती बेटा छैक। लोकक महिस पोसतैक, खेत बटाई करतैक आ अपन जीबन चला लेतैक।" बौकू काका केँ मुँह सँ ई बात सुनिते देरी नीरस मोने-मोन प्रसन्न भऽ गेल। ओकरा भऽ गेलैक जे आब ओकरा भोलाक बिआहक दलाली मे नीक पाई भेटि जेतैक। नीरस : "बौकू कक्का, किछु ने किछु तऽ करय पड़त। आहाँकेँ जमीन बिका जाएत तकर दुख हमरा की अहाँ सँ कम हएत। मुदा दोसर कोनो उपाय नहि। खैर! बेटा सँ संपत्ति भऽ जाइत छैक, संपति सँ बेटा नहि होइत छैक। की पता भोला केँ एहेन संतान विधाता दऽ देथिन जे पाँच दस बिघा जमीन किन दैक, पक्का मकान बना दैक, पैसा सँ घर भरि जाइक।" भोलाक माय आ पिता मुड़ी गोतने नीरस केर बात सुनैत रहलनि। जतेक अंतिम टुकड़ी जमीन बिका जएबाक दर्द नहि भेलनि ओहि सँ अधिक अहि बातक आश जगलनि जे भोलाक बिआह भऽ जएतैक आ ओकर घर बसि जएतैक। नीरस किछु सोचैत बाजल: "बौकू काका, एक तऽ भोला केँ कहि दियौक जे ई लोककेँ अपन नाम बृजवोध चैधरी केँ बदला भोला चौधरी कहैक। ई शब्द सहज छैक। एहि मे बात नहि लगतैक। आ पाँच सात दिनक भीतर हमरा लेल किछु टका केँ ब्योत कऽ दिय जे हम बगलक गामक छेदी झा केँ जाकऽ पहिने सँ दऽ अएबैक। छेदी झा अगर हाँ कहि देलक तऽ बात पक्का। ओ एहन लोक अछि जे ब्रह्माक लिखल लेख मेटा सकैत अछि।" ओ कहैत नीरस अपन घर दिस बिदा भेल। बौकू का, भोलाक माए आ भोला केँ बिआहक आश जगलैकछ कोउ काहू मगन कोउ काहू मगन। भोलाक परिवार अहिमे मगन जे भोलाक बिआह भऽ जेतैक। जमीन तऽ हाथक मैल छैक। नीरस अहि मे मगन जे भोलाक बिआह मे ओकरा नीक दलाली भेट जेतैक। बौकू काका दोसरे दिन गामक महाजन सँ दू सए टाका अपन कलम केँ नाम पर अगता लए नीरस केँ दऽ देलथिन। नीरस ओहि मे सँ एक सए अपने राखि लेलक आ एक सए छेदी झा केँ दऽ अएलैक। छेदी झा जोगार मे लागि गेल। तकैत-तकैत छेदी झा केँ एक कन्यागत एहन भेट गेलैक जकर तेरह बरखक बेटी रहैक। छेदी आ नीरस ओहि कन्यागत केँ समझा बुझा भोला सँ बिआह लेल मना लेलक। ओना पहिने तऽ भोलाक बगै देख कन्यागत कनि बिदकि गेलैक मुदा छेदी आ नीरस अपन रचल मायाजाल मे ओकरा फँसा लेलकैक। अहि तरहे पैतीस बरखक भोलाक बिआह सभा गाछी मे पहिने दिन फाइनल भऽ गेलैक। भोलाक कनिया गोदा गोर अततह मुदा मरगिल्ली जकाँ खियाएल। देह अन्नक मारल रहैक। घर मे भरि पोख अन्न केँ पुछैत अछि कुअन्न तक नहि भेटैक। सोझे साले दुरागमन भेलैक। भोलाक माय अपन मरगिल्ली पुतहु लेल बहुत उदार। दरबज्जा पर पोसिये सही चारि-चारि लगहैर महिस रहैक। दूध दही केर कोनो कमी नहि। गोदाक पूरा नाम रहैक गोदावरी मुदा लोक प्यार सँ गोदा जे कहनाइ शुरू केलकैक से गोदा रहि गेलैक। से जे हो। गोदा सासुर मे भरि पेट भोजन करैत छलि। सासू कहियो कोनो तरहक कमी नहि देलूथिन। सोझे साले गोदाक देह चिक्कन भऽ गेलैक। चाम चमकि उठलैक। बेर सन पयोधरि नीक भोजन आ भोलाक नेहक उत्पात सँ समतोलो सँ नमहर भऽ गेलैक। अचानक अतेक परिवर्तन आबि गेलैक गोदाक शरीर मे जकर कियोक कल्पनो नहि कऽ सकैत छल। गोदा भोलाक दुनिया बदलि देलकैक। बोलीक मधुर तऽ गोदा नैहरे सँ छलि। घर मे खूब काज धंधा करथि। सास ससुरक सेवा मे कोनो कमी नहि। भोलाक माए दरबज्जाक काज जेना गोबर सँ चिपड़ी पारब, दरबज्जा निपब, महिसक थान साफ़ करब, अन्न सब फटकब, सुखाएब आदि करथि आ गोदा घर आंगन साफ़ करब, निपब, भानस करब, सासु सँग धान कुटब, दालि दरडब आ पूजा पाठ करथि। दुनू मे कहियो कोनो तरहक फसाद नहि भेलनि। भोला तऽ अपन गोदा केँ सदैव माथ पर रखैत छलाह। समयक चक्की चलैत रहलैक। गोदा सोलहम चढ़ैत गर्भवती भऽ गेलीह। नौ मासक बाद एक बेटा भेलनि। भोलाक बेटाक मुँह कान नाक तऽ नीक रहैक मुदा चामक रंग भोलो सँ सियाह। मुँह आयताकार। मुदा भोला, गोदा, भोलाक माता पिता ख़ुशी सँ बताह। एक महिला जतले जिभे बाजि देलकैक “बच्चा कनि कारी छैक”। भोलाक माय झट दनि कहि देलथिन: “रह दियौक, बेटा छैक ने। मुँह कान सोझ छैक ने। घीबक लडडू टेढो नीक। हमर वंश बचि गेल। महादेब खूब कऽ औरदा देथिन आ काया निरोग रहैक। आर की चाही। बच्चा चूँकि भोलाक माय कलना बाबा सँ मंगने छलीह ताहि ओकर नाम राखल गेलैक मंगेश चौधरी। मंगेश केँ घुरमल घुरमल जटा बला केश रहैक ताहिं गाम घरक लोक जटा कहि सम्बोधित करए लगलैक। मंगेश कतौ बिला गेलैक आ जटा नाम जगजियार भऽ गेलैक। भोला परिश्रम करैत रहलाह। जटा केँ दबाई बीरो लेल नगद टाका के दरकार भेलैक। लोक सब सँ पैंच उधार शुरू भेलैक। आठे मासक बाद गोदाकेँ पुनः गर्भ ठहरि गेलैक। फेरो बेटा भेलैक। हालाँकि तकर छह बरख धरि गोदा केँ कोनो सँतान नहि भेलनि। अहि बीच भोलाक पिता अर्थात् बौकू काकाक निधन भऽ गेलनि। भोला पर कर्जा आरो बढि गेलनि। दूनू बेटा जटा आ सत्यव्रत सरकारी बेसिक स्कूल मे जाईत रहल। नहुँ-नहुँ अन्न पानिक दिक्कत शुरू भेलैक कारण भोला लोकक कर्ज अन्न बेचि सधेबाक जोगर लगेने छलाह। अही बीच ककरो सँ पता चललैक जे महर्षि रमेश योगी कानपुर मे तीन बरख लेल अखण्ड यज्ञ करताह। ताहि लेल ब्राह्मण कुमार चाही। बच्चा सभकेँ रहनाइ खेनाइ मुफ़्त उपर सँ गुरुकुल मे नामो लिखा देल जेतैक। किछु टाका सेहो भेटतै। गोदा भले दरिद्र परिवार सँ छलीह मुदा शिक्षाक प्रति साकांक्ष छलीह। भोला केँ कहलथिन: “बुझलौं, अपने सब दिक्कत मे छी। दुनू भाई केँ भरि पेट अन्नो ठीक सँ नहि दऽ पबैत छी वस्त्र पोथीक चरचे छोड़ि दियौक। बढियाँ रहत जे दुनूकेँ कानपुर रमेश जोगी केँ आश्रम पठा देबैक। भरि पेट भोजन, देह झाँपक वस्त्र आ पढ़बाक जोगार तऽ भऽ जेतैक। अपन सभक जीवन कटैत रहत।” भोला बात गंभीर भेल सुनैत रहला आ अंतिम निर्णय इ लेलनि जे जटा आ सत्यव्रत केँ दिल्ली पठा देथिन। सएह भेलैक। जटा आ सत्यव्रत दुनू भाई महर्षि रमेश योगीक आश्रम कानपुर आबि गेल। पहिल बेर शेब देखलक। पहिल बेर पनीर ककरा कहैत छैक से बुझलक। गेरुआ शुभ्र वस्त्र भेटलैक। भोरे स्नान पूजा, वैदिक मन्त्रक समवेत पाठ आ तकर बाद फल आ भरि गिलास छालीयुक्त दूध। दिनमे रोटी, भात, दालि, तरकारी, सलाद, आचार, दही, मिठाई; राति कऽ रोटी, दालि तरकारी। सुतए सँ पहिने दूध। सँस्कृत व्याकरण, वेद पाठ, कर्मकाण्डक शिक्षा विख्यात गुरूक देखरेख मे। दू हजार विद्यार्थी मे दुनू भाई जेना घुलि मिल गेल। वेद पाठ सँ कंठ खुजि गेलैक। व्याकरणक सूत्र जिह्वा पर चढ़ि गेलैक। जखन एक बरख मे गाम गेल तऽ गोदा अपन दुनू ब्राह्मण कुमारक मुखाकृत देखि अचम्भित भऽ गेलीह। सासु तुरत हिंग, सौंस मिरचाई आ नोन झड़का दुनू पौत्रक नजरि उतारि लेलनि। डर इ रहनि जे कखनोकल अपनो लोकक नजरि लागि जाइत छैक! नित्य वेद पाठ केलाह सँ दुनू भाई केर कंठ फूटि गेलैक। स्वरक सन्धान नीक भऽ गेलैक। गेयता प्रखर भऽ गेलैक। दु बरख मे जेना परिपक्व भऽ गेल होइक। दुनू भाई आब क्रमशः बारह आ दस बरखक भऽ गेल। सब किछु नीक रहैक। इमहर गोदा केँ फेरो एक बेटा आ एक बेटी भऽ गेलनि। एकाएक रमेश योगीक आश्रम मे यज्ञ आ पढ़ाई बन्द भऽ गेलैक। आब की हो? ओहि मे अधिकांश विद्यार्थी मिथिला आ उत्तराखंड सँ अति निर्धन परिवार सँ रहैक। माता पिता लग कोनो उपाय नहि। कियोक कोनो फैक्ट्री तऽ कियोक कोनो आन मजदूरी शुरू केलक। किछु नीक विद्यार्थी सबहक नामांकन कानपुर आ अगल बगल केर सँस्कृत विद्यालय (महाविद्यालय) मे भऽ गेलैक। ओहने विद्यार्थीक हेंज मे जटा आ सत्यव्रत छ्ल। मिथिलेक एक गुरुजी अपन प्रभुत्व सँ दुनूक नामांकन एक सँस्कृत विद्यालय मे करा देलथिन। ओहि विद्यालय मे छात्र सभकेँ दुनू साँझ भरि पेट रोटी दालि भोजन भेटैक। खोराकी अगल बगल केँ सेठ साहूकार सब धर्मक नाम पर दान मे दैक। कहियो काल तरकारी आ खीर मिठाई सेहो विशेष लोकक कृपा सँ भेट जाइक। लोक सभ विद्यालय केँ छात्र सभकेँ ब्राह्मण भोजन, पूजा पाठ लेल सेहो बजबैक। अहि मे नीक निकुत भोजनक अलावा वस्त्र, वर्तन आ नगद सेहो हासिल भऽ जाइक। ई दुनू भाई अपन पैसा बचा माय केँ पठाबय लागल। कर्जा सँ कनि आफ़ियत होमय लगलैक। दुनू भाई पढ़ैत रहल। पढ़ाई मे नीक करैत रहल। जटा कनि मुँहक जोर छ्ल आ सत्यव्रत कनि मृदुभाषी मुदा गम्भीर आ चुस्त चालाक लोक। देखैत-देखैत जटा अठारह बरखक भऽ गेलैक। ओकर दाई अर्थात भोलाक माय जिबैत छलथिन। एकदिन भोला सँ अरि गेलथिन: "हौ बौआ, बाप तऽ पोता सबहक उपनैनो नहि देख सकलथुन, हमरा कम सँ कम जटा केँ बिआह करा ओकर कनिया देखा दएह! मरलाउत्तर तोहर पिता भेटता तऽ कहि देबनि जे एहन अछि अहाँक पोताक कनिया!" ई कहैत ओहि बूढ़ीक धसल आँखि सँ नोर माटि पर टप-टप खसए लगलैक। भोला तुरत अनमोल मास्टर लग अंतर्देशी लेने पहुँच गेलाह। बजलाह, "माहटर साहेब, हमर माय आई एक कचोटक बात बाजि देलक। ऊपर सँ ओकर नोर थमहक नामे नहि लऽ रहल अछि। कहैत अछि जे आब बहुत दिन नहि जीत। मरए सँ पहिने जटाक कनिया देखऽ चाहैत अछि। कनि अहाँ एक चिट्ठी मे सब बात जटा केँ लिख ओकरा जनतब दऽ दियौक। " भोलाक हाथ सँ अंतर्देशी अपन हाथ मे लैत अनमोल मास्टर सब बात चिट्ठी मे जटा लेल लिख देलथिन। चिट्ठी भेटला पर जटा बिआह लेल तैयार भऽ गेलैक। तीन मासक भीतर जटाक बिआह अपना सँ दू बरख छोट लड़की सँ भऽ गेलैक। सोझे साले दुरागमन सेहो भऽ गेलैक। जटाक कनियाक नाम रहैक अनुराधा। लंबाई मे जटा सँ लगभग बराबर। रंग सामरि, देह गदरायल। नागिन सन लट, डोका जकाँ आँखि, छरगर नोकगर पतरगर नाक, गस्सल-गस्सल छोट-छोट दूध जकाँ चमकैत दाँत, वक्षक वयस ज्ञाने कनिक अधिके उभार, नारिकेर तेल सँ गूथल जुड़ा, रंग बिरंगी नुआ मे अधकटी आंगी आ कखनोकाल पारदर्शी आंगी सँ छटकैत ओकर कसल पयोधरि देखार लगैक एना जेना सब बंधन तोड़ि बाहर आबि जेतैक! जटा तऽ अपन रसगर कनियाक काया केर प्रेम आ ओकर नेह मे बताह भऽ गेल। कखनो ओ अनुराधा केँ छोड़ि कतौ जएबाक नामे नहि लैत छ्ल। मासे दिन पर कानपुर सँ गाम आबि जाइत छ्ल। अनुराधा एक नंबर के खेलाड़ि। रंग रभसक बात आ विधान जटा सँ अधिक बुझैत छलि। कतेक क्रिया प्रतिक्रिया आ खेलक गूढ़ नियम आ प्रयोग बुझल रहैक अनुराधा केँ। बिआहक बाद ओहि मे उत्तरोत्तर वृद्धि होइत गेलैक। परिणाम ई भेलैक जे अनुराधा बिना जटा केँ कानपुर मे मोने नहि लगैक। जटा आचार्यक अंतिम परीक्षाक बाद अनुराधा केँ कानपुर अनबाक उपक्रम करए लागल। पंडिताई सँ नीक कमाई भऽ जाइत रहैक। तांहि ई चिंता नहि रहैक जे अनुराधा केँ कोना रखते की खेतैक, की खुएतैक। अनुराधा ओना तऽ कनिया बनि आयलि छलि मुदा जेठ आ कमौआ बेटाक पत्नीक होबाक़ कारणे लजवन्ती सासु गोदाक लेल सासुओ सँ पैघ बनि गेल छलि। सबदिन जटा एक चिट्ठी अनुराधा केँ लिखैक आ सबराति अनुराधा ओकर उत्तर लिखैक। बेचारा भोला सबदिन डाकघर चिट्ठी ख़सेबा लेल अनुराधाक चरबाह जकाँ जाइत छलाह आ डाकिया हुनका जटाक चिट्ठी थमहा दैत रहनि। अहि बेर पितृपक्ष मे जे जटा गाम अएलैक से अनुराधा केँ गर्भ ठहरि गेलैक। जखन जटा कानपुर गेल तऽ डेढ़ मासक बाद ओकरा अनुराधाक चिट्ठी सँ ई जानकारी भेटलैक। अनुराधा चाहैत छलि जे ओकर बच्चा कानपुर मे होइक़ आ जखन बच्चा होइक़ तऽ जटा ओकरा बगल मे रहैक। मुदा विधनाक विधान किछु आरे लिखल रहैक। एक दिन घनघोर अन्हरिया राति मे कोनो उपद्रवी लोक एक विद्यार्थीक हत्या कऽ देलकैक। आब की हो? पुलिस पर दबाब पड़लैक जे कोनो घराने खुनिया अपराधी केँ चौबीस घंटाक भीतर जेहेल मे डालि देबाक छैक। जटाक मुँहजोर भेनाइ काल भऽ गेलैक। ऊपर सँ विद्यालय मे गुरुजी सब मे गुटबाजी चलैत रहैक। जटा जाहि गुरुक गुट मे छल से गुरुजी कतौ बाहर गेल छलाह आ हुनकर प्रतिद्वंद्वी अहि बातक लाभ उठबैत जटाक नाम पुलिस मे लिखा देलकैक। फेर की अर्ध रात्रि मे पुलिस जटा केँ हिरासत मे लऽ लेलकैक। भरि राति थाना मे यातना दैत रहलैक। लाठी, बन्दूकक कुंडा आ घुसा सँ पीटैत रहलैक। नाना तरहक यातना। थर्ड डिग्रीक सब यातनाक प्रयोग पुलिस जटा पर तेना केलकैक जेना जटा बहुत कुख्यात आतंकवादी अथवा क्रिमिनल हो। जटा दैहिक आ मानशिक यातना सं टूटी गेल। अहि यातना सँ मृत्युदण्ड नीक इ सोचैत अंततः जटा अपन जानक चिन्ता मे ई गछि लेलकैक जे वएह खूनी छैक। वएह ओहि विद्यार्थी केँ मारलकैक। सब ओकरे प्लोटिंग रहैक। पुलिस केँ भेलैक जे ओकरा बहुत पैघ कामयावी हाथ लागि गेलैक। सब बात कागत पर लिखा भोला सँ हस्ताक्षर लऽ लेलकैक। दोसरे दिन पुलिस ओकरा हाजत मे लऽ गेलैक। मजिस्ट्रेट लग सेहो भोला पुलिस केर भय सँ अपन गुनाह स्वीकार कऽ लेलकैक। प्रजातंत्रक अमानवीय तंत्र मे एक निर्दोष दोषी बनि गेलैक आ दोषी खुल्ला सांढ जकाँ घुमैत रहलैक! जखन अनुराधा केँ पता लगलैक तऽ बेचारी बेहोश भऽ गेलि। घर मे मातम वातावरण भऽ गेलैक। अनुराधा छलि पुरखाहि। हिम्मत रखलक। क़मर कसि लेलक। निर्णय लेलक जे कानपुर जा अपन पति केँ निर्दोष साबित करत। लोक मनो केलकैक मुदा अपन निर्णय पर रणचण्डी जकाँ ओ दृढ़ छलि। दोसरे दिन बिना कोनो आरक्षण केँ जनरल टिकट सँ अनुराधा अपन एक पन्द्रह वर्षीय देओर सँग कानपुर लेल रेलगाड़ी मे बैस रहलि। अनुराधाक माथ पर एक दैविक आभा छलकि रहल छलैक। अनुराधा कानपुर आबि अपन देओर सत्यव्रत सँग जटाक निर्दोष होमाक लड़ाई लड़ऽ लागलि। ई दुनू देओर भाउज लेल महाभारतक धर्म युद्ध सँ कम नहि छलैक। छह मास जेहेल मे रहलाक बाद जटा जमानत पर बाहर आबि गेल। अहि बीच कानपुर मे अनुराधा एक सुन्दर सन पुत्रीक जन्म देलकैक। जटा जेहेल सँ बाहर अबिते मातर बताह जकाँ करऽ लागल। अनुराधा यद्यपि विचलित नहि भेलि। लागलि रहल। सत्यव्रत पढ़ाई आ धनार्जन एकै सङ्गे करैत रहल। समयक सुई घुमैत रहलैक। जेना अन्हारक बाद इजोत होइत छैक तहिना एहन समय एलैक जे असली खूनी पकड़ा गेलैक आ जटा सकुशल अहि केश सँ मुक्त भऽ गेल। मुक्त भेलाक़ बाद आचार्यक परीक्षा पास केलक। एक दिन एक नव मंदिर केर भगवानक प्राण प्रतिष्ठा मे एक गुरुजी सँग जटा सहायक पण्डित बनि कर्मकाण्ड करबा हेतु गेल। मनोयोगपूर्वक सब काजक सँचालन मे गुरुजी केँ मदति केलकनि। गुरुजी बहुत प्रभावित भेलाह। बाद मे जटा केँ ओही मन्दिरक मुख्य पुजारी बना देलथिन। जटा मंदिर मे पूजा पाठ मे लीन भऽ गेल। एकबेर उज्जैनक महाकाल मंदिर गेल छल जटा। ओतय केर छटा, भस्म आरती, पूजाक पद्धति जेना ओकर मोन मे बसि गेलैक। महाकालक अनन्य भक्त भऽ गेल जटा। अनन्त बेर अपन यजमान सबहक पूजा पाठ आ अन्य तरहक सँकल्प ओहि प्रांगण मे करोलक। नितहिं जटा साँझ मे भाँगक गोला खाइत छल। अपन मन्दिर केर प्रस्तर मूर्ति केँ नीक सँ सजबैत छल। नीक करैत छ्ल। मन्दिरक गर्भगृह मे बेरु पहर शिवलिंग लग कतेक काल सुतल रहैत छ्ल। शिवलिंग सँग एना लगैत छलैक जेना जटा जीवित मनुख सँग वार्तालाप करैत हो! लोक केँ आस्था नहुँ नहुँ जटा दिस बढ़ल गेलैक। अहि मंदिर पर अबैत देरी जटा नामक व्यक्ति समाप्त भऽ गेल आ महाकाल पण्डित शाश्वत भऽ गेल। समस्त क्षेत्र मे लोक ओकरा महाकाल पण्डित जी कहि सँबोधित करैक। ई क्षेत्र बनिया लोकक रहैक तांहि जटाक भाव कनि अधिक भऽ गेलैक। महिला सबमे जटाक क्रेज कनिक अधिके रहैक। एक महिला तऽ अतेक प्रभावित भऽ गेलैक जे जटाक पत्नी अनुराधा केँ ई शंका होमय लगलैक जे जटा आ ओहि महिलाक बीच किछु ने किछु बात जरूर छैक। किछु लोकक जे अपना आपकेँ प्रत्यक्षदर्शी बैतबैत छ्ल केर दावा रहैक जे मंदिर के भीतर पाछा बला घर मे अन्हार मे ओहि महिला सँग जटा किछु करैत रहैक। सत्य की रहैक से रामहि जानथि मुदा एहि सब बात सँ अनुराधा कनि अधिके साकांक्ष भऽ गेलि। जटा पर चौकसी बढ़ि गेलैक। जटाक भाई आब मुम्बई चलि गेलैक। ओहो मुहगर लोक रहैक। वेदक उच्चारण बढियाँ रहैक। एक मंदिर अपने सँ बना ओकर मठाधीश भऽ गेल। यजमान सेहो नीक सँख्या मे बना लेलक। जीवन चलैत रहलैक। जटा जखने खुनिया केश सँ बरी भऽ गेल सत्यव्र्यक विवाह सेहो भोला अर्थात ओकर पिता करा देलथिन। अंतिम निर्णय यद्यपि एहिबेर जटाक रहैक। अनुराधा आब दोपहर मे जटा लग बैसय लागलि। ओ महिला जे जटा पर लाइन मारय सेहो आब कनि डरे मे रहैक। जटा पाँच भाई भऽ गेल। जटाक अंतिम भाई ओकर बेटी आ बड़का बेटा सँ सेहो छोट रहैक। अहि बात सँ अनुराधा अपन सासु ससुर सँ तमसाएल रहैत छलि मुदा की कऽ सकैत छलि? सत्यव्रत छोड़ि सब भाई जटा लग आबि गेलैक। एक बहिनक बिआह सेहो भऽ गेलैक। गाम पर जटा आ सत्यव्रत दुनू भाई मिल कऽ पक्का घर बना लेलक, पाँच छह बीघा जमीन किन लेलक। आर्थिक स्थिति नीक भऽ गेलैक। कानपुर मे एक बिक़ट समस्या - अतय पंडिताई वृत्ति मे लागल मैथिल ब्राह्मण सब यजमानक डरे या तऽ माछ माउस नहि खाइत छथि अथवा चोरा नुका कऽ खाइत छथि। कानपुरक लोक, विशेष रूप सँ बनिया, माड़वारी, पंजाबी आदि यएह सोचैत अछि जे पण्डित कहीं मांसाहारी भेलैक अछि! पण्डित छथि तऽ शाकाहारी हेबे करताह। आ अहि सोच मे मारल जाइत छथि पण्डित कर्म मे सँलग्न मिथिलाक कर्मकाण्डी। बेचारा जटा आ ओकर कनिया दुनू प्राणी एक नंबर केर माछगिद्ध मुदा अपना घर मे नहि खा सकैत छ्ल आ ने बना सकैत छ्ल। जोगार ई रहैक जे एक आदमी जे ओकर दूरक सँबंधी रहैक ओ अपन घर मे बनाबैक आ दस बजे राति केँ बाद जटाक घर पर दऽ अबैक। जखन सब सूति रहैक तखन जटाक पूरा परिवार चुपचाप माछ खेलाक बाद रातिये मे कांट कुस बाहर फेंक आबय, घर मे सेंट, अगरबत्ती जड़ा सब गंध (मैथिल सुगन्ध पढ़थि!) समाप्त कऽ दैक। ई कनि झंझट बला काज रहैक ताहिं मास दिन मे मुश्किल सँ एक या दू दिन अहि तरहक ब्योत करबैत छल जटा। अनुराधा छलि ओहि परिवार सँ जतय पुरुख, ताहू मे कमौआ पुरुख केँ बहुत सम्मान भेटैत छैक। सम्मानक परिकल्पना उटपटांग जकाँ रहैत छैक। पुरुखक भोजन सामान्य सदस्य सँ विशिष्ट रहैत छैक। ओकर पहिरब, ओढब, चलब, ओकर ओछायन बिछायन सब किछु मे अंतर। जटा लेल सेहो एहने व्यवस्था अनुराधा केने छलि। घर मे सब लोक लेल रोटी तरकारी अथवा भात दालि एक सामान्य तरकारी बनैक। जटा लेल एक अलग सँ तरकारी अथवा भुजिया अथवा चटनी बनैक। छलिगर दूधक दही अनिवार्य रहैक। जटाक वस्त्र प्रतिदिन धोल जाइक, आयरन होइक़। सब तरहेँ जटा केँ देखला सँ घर मे ओकर विशिष्ट होबाक़ बात स्पष्ट भऽ जाइक। अनुराधा बुधियारि बड्ड। सब दिन जटाक भोजन केलाक बाद जटा बला थाड़ी मे भोजन करैत छलि। जटा अनुराधा लेल सब समान छोड़ि दैत छलैक। बासन मे जे कनि मनि बाँचल रहैत छलैक सेहो अनुराधा अंत मे खा लैत छलि। अनुराधा केँ एक बातक बहुत तामस रहैक। ओकरा ओहि ठामक लोक - बाल, वृद्ध, स्त्रिगण, पुरुख सब कियोक पंडिताइन कहि सम्बोधित करैक। अहि बात पर अनुराधाक सृंग चढ़ि जाइक। मुदा छलि लाचार। अनुराधा ओना बहुत रोमांटिक प्रकृति केँ महिला छलि। आरो अनेक बात रहैक जाहि पर अनुराधा केँ तामस चढ़ैक। एक बेर पितृपक्षक समय मे एक आदमी एलैक आ बहुत समान अपन मृत पिताक नाम पर ओहि तिथि कऽ दान केलकैक। समान सँग पैसा सेहो दान केलकैक। अंत मे ओ आदमी अपन झोड़ा सँ बीड़ीक दू गठरी निकालि जटा दिस बढ़ैत बजलैक: "महाकाल पंडितजी, हमर पिता बीड़ी पिबैत छलाह। हम प्रतिवर्ष हुनक नाम पर पितृपक्ष मे अन्य सामग्री सँग बीड़ी सेहो दान करैत छी।" ओकर बात पर जटा हर-हर महादेब कहैत बीड़ी ओकर हाथ सँ लऽ लैत छलैक मुदा अनुराधा तामसे भेर भऽ जाइक। एकबेर अनुराधा राघब सँ मजाक मे कहलकन्हि: "कहू राघब जी, ई कोनो बात भेलैक जे लोक सब माता पिताक नाम पर पितृपक्ष मे बीड़ी सिगरेट दान करैत अछि। ऊपर सँ तर्क अनमोल। कहत, हमर पिता पीबैत छलाह ताहिं चढ़ा रहल छी। भाई पिता दारू पिबैत छलाह तऽ अहाँ दारू दान करब? पिता लड़की सँग सुतैत छलाह तऽ अहाँ लड़की दान करब? बजरखसुआ नहितन! अनेड़े केँ चोचला ठाढ़ केने अछि! तँग आबि चुकल छी!" राघब चुस्की लैत कहथिन: "चलू ने, अहि सँ तऽ फायदा अछि ने आहाँकेँ! आ लड़की दान केलकैक तऽ अहाँक पण्डित जी केँ!” अनुराधा: "कपार फायदा! लोक हँसैत रहैत अछि। ककरा लग बेच जाउ? लोक हंसत। सब बीड़ी सिगरेट केँ फेंकि दैत छी। रहल लड़की बला बात तऽ पण्डित जी खूब आनंदित हेताह। एकरंगाह चीज़ सँ नव चीजक रस भेटतनि। मुदा से हम थोड़े ने होमऽ देबनि!” जीवन चलि रहल छलैक। जटा आ अनुराधा केँ एक बेटी आ दू बेटा रहैक। दोसर बेटा भेलाक़ बाद अनुराधा नशबंदी केँ ऑपेरशन करा लेलनि। अपन सौन्दर्यक प्रदर्शन मे अनुराधा बहुत साकांक्ष रहैत छलि। हमेशा चमक दमक मे मातलि। देह कहियो झुर नहिं भेलैक। कसल-कसल आंगी, नागिन जकाँ जुड़ा आ चलबाक अंदाज अनुराधा केँ गजगामिनी बनेने रहैक। अगर पंडिताइन केँ तगमा नहिं भेटल रहितैक तऽ कतेक आदमी लाइन मारैत रहितैक! मारऽ बला एखनो की रुकैक! ताहि पर सँ कातिल बनि बड़का-बड़का आँखि सँ ताकब एहेन चीज़ रहैक अनुराधा केँ जे बूढों लोक केँ जुआन बना दैक। अनुराधा नख शिख सिंगार करैक। ओकरा बुझल रहैक जे जीवन मे स्त्री पुरुख केँ सब सुख करक चाही। अनुराधा बुझैक जे केलि पुरुख केँ बान्हि कऽ रखबाक सर्वोत्तम यन्त्र छैक। ओकरा बूझल रहैक जे उदासीन पुरुख केँ सेहो एक चतुर महिला अपन सौंदर्य, उभार आ उत्तेजना सँ प्राण आनि सकैत अछि। ओकरा बुझल रहैक जे अगर पुरुखक मोन नहियो छैक तऽ सयानि आ खेललि नारी अपन कन्त केँ शरीर मे काम ज्वालाक आगि फूँकि सकैत अछि। ओकरा काम क्रिया मे लीन कऽ सकैत अछि। अनुराधा केलि क्रिया केँ खेलब कहैक। पता नहि ई सोनहाएल देसी खांटी शब्द अनुराधा कतऽ सँ सीखने छलि? अपन किछु खाश महिला सँग जखन बात करैत छलि तऽ खेल शब्दक प्रयोग करैत छलि अनुराधा। एकबेर एक नव स्त्री केँ जे अनुराधा केँ दूरक सम्बन्ध मे ननदि लगतैक अनुराधा पुछि देलकैक: " अहाँक तऽ टटका बिआह भेल अछि। कतेक बेर खेल करैत छी?" बेचारी नव व्याहलि नारि, कानपुर मे रहलि, कानपुर मे पढ़लि, नहि बुझि सकलैक अनुराधाक बातक अर्थ। मुँह भकुएने ठाढ़ रहलैक। जखन अनुराधा केँ लगलैक जे ओकर बातक आसय ओ लड़की नहि बुईझ सकलैक तऽ अपन बत्तीसी देखबैत बाजलि: "दूर अलूरि नहितन! एकरो माने नहि बुझलौ अहाँ! हम आब खोइल कऽ कहि दैत छी। हम पुछैत रही जे घरबला सँग कतेक बेर "ओ" करैत छी?" अनुराधाक बात पर लाजे लाल भेल नायिका मुँह झपैत घर दिस भागि गेलैक। अनुराधा दाँत देखबैत नितराइत फेरो ओकरा पाछा-पाछा जाइत पकड़ि लैक आ कहैक: "अरे, अहि मे लाजक कोन बात! हम की कोनो कतौ बाजब? हम तऽ ई जानय चाहैत छी जे अहाँ सब एक दोसर केँ कतेक चाहैत छी, कतेक सँतुष्ट करैत छी। आखिर ई काज तऽ भगवानक देन छनि। केँ नहि खेल करैत अछि से कहू? अहि सँसारक वृद्धि स्त्री पुरुखक खेले सँ होइत छैक।" अनुराधाक बातक स्पष्टीकरण सँ ओहि नवब्याहता केँ हिम्मत बढलैक। लज्जा भाव कनि तिरोहित भेलैक। उमंग कनि जगलैक। स्त्री पुरुखक केलि पर कनि जिज्ञासा बढ़ि गेलैक। अनुराधा केँ सँबोधित करैत बजलैक: "हमर छोड़ू। पहिने अपन कहू जे अहाँ सब जखन बिआह भेल तखन कतेक बेर खेल करैत रही?" अनुराधा पकठोस भेल खुजल कामायनी बनैत बाजलि: "हम सब तऽ ओही मे मगन भऽ गेल रही। की दिन आ की राति। सदैव ओकरे जोगार, ओकरे प्रयोजन। कतेक बेर होइक़ तकर कोनो गिनती नहि। कखनो अपन मोन नहि रहैत छ्ल तऽ पति महोदय केँ मोनक रक्षार्थ ओहि प्रक्रिया मे लागि जाइत रही। से जे होइक़ मुदा एहि आनंदक कोनो बरनेका नहि।" आब नवब्याहता कनि सलज्ज बनल उत्तर देलकैक: "हमरो सबहक स्थिति अहिंक सन अछि। कखन दिन आ राति पते नहि चलैत अछि। कतेक राति एहि चक्कर मे भोजनों नहि बना पबैत छी।" अनुराधा: "बाह, ई भेल ने बात!" नायिका: "लेकिन हमरा सँ अधिक हमर पतिदेवक ध्यान अहि दिस रहैत छनि। कतेक बेर हम हारि मानि लैत छी। कतेक बेर थाकि जाइत छी।" समय चलैत रहलैक। बच्चा सब बढ़ैत रहलैक मुदा अनुराधा आ जटाक प्रेम नित नूतन होइत रहलैक। जँ-जँ बयस बढ़ल गेलैक दुनूक़ मध्य प्रेमक सघनता बढ़ल गेलैक। एक बात कनि गड़बड़ भऽ गेलैक। जखन जटा मर्डर केश मे फ़सलैक तांहि क्षण अनुराधा गर्भवती रहैक। ओहि समाचार सँ अनेक तरहक शंका, भय आदि सँ ओकर मोन चिन्तित रहैक। तकर असर ई पड़लैक जे दुनूक पहिल सँतान बेटी कनि मंद भऽ गेलैक। जखन बेटी अठारह बरखक भेलैक जटा ओकर बिआह करा देलकैक। बिआह मे नीक जकाँ ठका गेलैक। ख़ैर, बिआह भेलैक तऽ बच्चो भऽ गेलैक। बेटा रहैक। जटा आ अनुराधा नाना नानी बनि गेल। समय कट लगलैक। नाति सदैव नाना नानी लग रहैक। जटा क बेटी किछु कोर्स शुरू केलकैक जाहि सँ अपन पैर पर ठाढ़ होइक़। दोसर बच्चा नहि करतैक तकरो निर्णय लऽ लेलकैक। जटाक दुनू बेटा पढ़य मे ठीक नहि रहलैक। बड़का कहुना बारहवीं केलाक बाद कोनो कंपनी में छोट मोट नौकरी शुरू केलकैक। छोटका प्राइवेट कॉलेज सँ इंजीनियरिंग केलाक बाद बैसल रहैक। ओना कानपुर मे दुनु बेटा लेल मकान, नीक सम्पति किन देलकैक जटा। अहि बीच एकाएक एक चमत्कार भेलैक। एक बेर भागवत कथा सुनि ततेक ने विभोर भेलैक अनुराधा जे शुद्ध शाकाहारी भऽ गेलैक। गला मे तुलसीक माला धारण कऽ लेलकैक। सदैव हरे कृष्ण हरे कृष्ण भजैक। ओकरा भगवान मे, भगवत भजन मे चित लागि गेलैक। प्याज, लहसुन सब किछु सहर्ष त्यागि देलकैक। जटा अपने तऽ शाकाहारी नहि भेल मुदा अनुराधा लेल कोनो व्यवधान नहि ठाढ़ केलकैक। समय चलैत रहलैक। अनुराधा लेल जटा एक कार सेहो किन देलकैक। एकदिन कार सँ जटा आ अनुराधा हरिद्वार जाइत छ्ल। नाति सेहो सँग रहैक। मध्य रास्ता मे कारक बैलेंस गड़बड़ा गेलैक। कार एक बेर उलटि कऽ फेरो ठीक भऽ गेलैक। कार पर सँ अनुराधा आ ओकर नाति खसि पड़लैक। अनुराधाक कपार फुइट गेलैक। नाति ओतहिं दम तोड़ि देलकैक। महा अनर्थ भऽ गेलैक। लोकक सहायता सँ जटा अपन पत्नी अनुराधा केँ एक अस्पताल लऽ गेलैक। बहुत खून चढलैक। ऑपरेशन भेलैक। घाव ठीक भऽ गेलैक मुदा वाक बंद भऽ गेलैक। अनुराधा अपन मुँह सँ खेनाइ बन्द कऽ देलकैक। नली लगा लिक्विड वस्तु देल जाइक। जटा अपन सब किछु छोड़ि अनुराधाक सेवा मे लागल रहल। छह मासक बाद अनुराधा उठइ बैसय लगलैक। मुदा याददाश्त वापस नहि एलैक। वाक सेहो बंदे रहलैक। ककरो नहिं चिन्हैक। कोनो उचाबच नहि। कोनो सुधि नहि। सब कर्म होइक़ मुदा पता नहि चलैक। अंत मे जटा जेठ बेटाक बिआह करा लेलक। पुतहु आबि गेलैक मुदा अनुराधा केँ कोनो प्रगति नहिं भेलैक। इमहर अपन पुतहु केँ समस्या सँ द्रवित भेल भोला अन्न पानि छोड़ि देलनि। एक बरखक बाद भोला बिरासी बरखक अवस्था मे अहि सँसार केँ छोड़ि देलाह। भोलाक श्राद्ध कर्म भेलाक़ दस दिनक बाद एक दिन अनुराधाक हालत देखि जटा छोट नैना जकाँ ठोहि पारि काने लागल। एकाएक बाजि उठल: "हे महाकाल, हे केशब! कतेक परीक्षा लऽ रहल छी! हरे कृष्ण आब लाचार छथि। हिनका मुक्ति दियौन!" ई कहैत जटा अपना हाथे एक मंत्रक जाप करैत गंगाजलक चारि बून्द अनुराधा केँ मुँह मे डालि देलकैक। राति केँ ठीक एगारह बजे एक हिचकी उठलैक आ अनुराधा गोलोक लेल बिदा भऽ गेलि। जटा अंतिम नोर ख़सा बेटा केँ कर्मक तैयारी मे लगा देलकैक। एक अध्याय समाप्त भऽ गेलैक। महाकालक आराधना मे एखनो लागल अछि जटा। शायद जिनगी मे फेरो हेतैक कोनो करामाती घटना। हर-हर महादेबक स्वर सँ अनघोल भेल रहैत छैक मन्दिरक प्रांगण। ओहि निनाद मे जेना अबैत रहैत छैक अनुराधाक स्वर - ओकर गीत, भजन, हरे कृष्णक नाम, ओकर प्रेमक अलाप, ओकर चूड़ीक खनखन, ओकर पाजेबक रुनझुन, ओकर प्राती आ साँझक भक्तिमय गान, ओकर बटगमनीक हुल्लसित तान। ओह, कतऽ छी भगबान! बुरिराज (लघुकथा) राघब विश्वविद्यालय केर छात्रावासमे रहैत पीएचडी करैत छलाह। सँयोगसँ राघबक ममियौत भाईक लड़का मुदा उमेरमे मित्रवत सोहन राघब लग कॉम्पिटिटिव परीक्षा सबहक तैयारी लेल आयल छलनि। चारिए वर्षक अंतर होबाक कारणे दूनूक बीच काका-भातिजक कम आ सँगतुरिया वर्ताव अधिक छलनि। सोहन राघबक होस्टलमे पाइल ऑन गेस्टक रूपमे रहैत छलाह। सोहन यूनिवर्सिटीमे टुटपुंजिया नेता सब सँग घुमय लगलाह। राघबक भतीजा बुईझ लोक कनि भाव जरूर दैत छलनि। एकदिन सोहन सङ्गे निर्भय राघब लग एलाह। निर्भय बिहारक कोनो यूनिवर्सिटीसँ इतिहासमे बी ए केलाक बाद राघबक यूनिवर्सिटीमे प्राचीन इतिहाससँ एम ए’मे नामांकन लेने छलाह। निर्भय राघब लग विनम्रतासँ बैसलाह। निर्भय बीच-बीचमे राघब लग अबैत रहलनि। निर्भय यूनिवर्सिटी केर एम ए प्रीवियस केर परीक्षामे बहुत खराप अंक अनलाह। हिनक माता-पिता दूनू कोनो यूनिवर्सिटीमे प्रोफेसर छलथिन। तकर फायदा उठबैत निर्भय ओहि यूनिवर्सिटीसँ प्राचीन इतिहाससँ एम ए कऽ लेलाह। मुम्बईमे कोना ने कोना निर्भय एक सँस्थानमे कला इतिहास सँ एम ए’मे नामांकन लऽ लेलाह। दू वर्षक कोर्स निर्भय पाँच वर्षमे पूरा कएलाह। निर्भय छलाह भाग्यक सांढ़। माता पिताक असगरुआ बेटा। दू बहिन पर एक भाई। जखन हिनक एम ए केर रिजल्ट निकलए बला छलनि ताहि समय एक कला संस्थानमे एक लाला जी लोचन लाल दासकेँ पकड़लाह। दासजी हिनके शहरक छलथिन जिनका निर्भयक माय राखी बनहैत छलथिन। निर्भय दास जीकेँ मामा कहैत हुनकर शरणमे नतमस्तक छलाह। दास जी धुरफन्दी लगा निर्भय केँ कला संस्थानकक अभिलेखागारमे नौकरी लगा देलथिन। एक वर्षमे राघब सेहो कला संसथानमे आबि गेलाह। सँयोग एहेन जे निर्भय आ राघबक विवाह एकै साल, एकै मास आ एकै दिन भेलनि। अंतर अतबे जे राघबक विवाह माता-पिता द्वारे निर्धारित आ निर्भयक विवाह प्रेम नामक रोगक अंतिम परिणाम जाहिमे अनेक भाभट, नाटक आदिक भूमिका प्रबल। निर्भय केर जेठ बहिनक ननदि हेमा निर्भयसँ नौ वरखक छोट मुदा पोखगर छलीह। हेमा दूधिया गोड़ाईसँ गज्जब सुन्नरि लगैत छलीह। दुबर पातर चमकैत चेहरा छलनि हेमाक। बड़की- बड़की आँखि, तेहने सुन्दर ठोड़, घुरमल-घुरमल केश, छोट मुदा गस्सल-गस्सल विकसित आ प्रस्फुटित होइत वक्ष। नितम्ब यद्यपि ओतेक विकसित नहि छलनि। नितम्बक विकसित नहि भेनाईक अर्थ ई नहिं जे हेमा आकर्षण, सौन्दर्यमे कोनो तरहेँ कम छलीह। हेमा सत पूछी तऽ निर्भय लग खिच्चा छलीह। ताहिसँ की, सँबंधमे हेमा निर्भयकेँ बहिनक ननदि छलीह से निर्भयकेँ परिहासक अवसर दैत छलनि। एकबेर हेमा इंटरमीडिएट केर परीक्षा देमय निर्भय ओतय एलीह। निर्भय हेमाक समीप आबय लगलाह। सामान्य हास-परिहास नहुँ-नहुँ प्रेममे परिवर्तित होमय लगलनि। बातक प्रेम आब आँखि, भंगिमा आ मुद्रासँ होमय लगलनि। शुरूमे हेमा ओतेक गम्भीर नहिं छलीह लेकिन निर्भय हुनको गम्भीर बना देलथिन। प्रेम शब्दक बाटसँ देहक सीमा पर आबि गेल छल। दूनूकेँ बयसक अंतर समाप्त भऽ गेलनि। जाड़क मासमे अपन सीरकमे घुसल हेमा पोथीक सामीप्य कम आ निर्भयक हाथ, मुँह आ ने जानि कोन-कोन अंगक सामीप्य अधिक करय लगलीह। दूनूक जीवनमे एक अपूर्व रस भेटनाई शुरू भेलनि। किताबक पथ हेमाक सँग छोड़ि देलक आ आब प्रेमक बाट हिनका दूनूकेँ अपना लग बजा लेने छ्ल। एक दिन जखन हेमा अपन सीरकमे घुसल छलीह आ निर्भयक हाथ हुनक अंगक विशेष भाग दिस हलचल कऽ रहल छल तखन हेमा प्रेमक रसमे डुबकी लगबैत कनि अपन प्रेमक प्रति साकांक्ष होइत बजलीह: "यौ निर्भय ! अहाँ जे अतेक आगा बढ़ल जा रहल छी हमरा सङ्गे से एक बात बुझल अछि?" निर्भयक हाथ एकाएक चहलकदमी छोड़ि देलक। कनि चिन्तित होइत बजलाह: "से की?" हेमा: "यएह जे अहाँ अतेक आगा बढ़ल जा रहल छी। अहाँक माता-पिता आ ओहूसँ आगा हमर भैया-भौजी अहाँ आ हमर विवाह लेल तैयार हेताह?" निर्भय : "एक बात कहु।" हेमा: "पुछू"। निर्भय : "देखु हेमा, अगर अहाँ तैयार छी तऽ बाँकी काज हमरा पर छोड़ि दिय। हम सबकेँ सम्हारि लेब। हमरा बुझल अछि जे एकर सबसँ पैघ विरोध हमर बहिन आर्थत अहाँक बड़की भौजी करतीह। लेकिन देखल जएतैक। हम अपन छोटकी बहिन आरती एवम बहिनोईकेँ मना लेब अपना दिस। ओकरे सबहक सहयोगसँ माय सेहो मानि जेतीह। एक बेर मायक हृदय पसिज गेलनि तऽ ओ हमर पिताकेँ सेहो तैयार कऽ लेतीह। हम अहाँकेँ कोनो अवस्था मे असगर नहि छोड़ि सकैत छी।" निर्भयक हाथ बात करैत-करैत फेरो हेमाक सीरक दिस घुइस गेलनि आ अपन काज शुरू कऽ देलक। हेमाक शरीर आनंदक स्पर्शसँ सिहरय लगलनि। प्रेमक ताप केहेन होइत छैक तकर अनुभव हेमा आ निर्भयसँ बढियाँ के बुईझ सकैत छल? निर्भयक हाथ चलैत रहल। कखनो जोर तऽ कखनो कनि हल्लुक मुदा अनवरत। हेमाक पोर-पोर प्रफ़ुल्लित। बिना कोनो व्यवधान केने हेमा बाजि उठलीह: "जनैत छी, हमर भैया चूंकि हमर बेमातर भाय छथि, तांहि कारणे सेहो ओ आ हमर भौजी हमर अहाँक विवाह लेल तैयार नहिं हेतनि। ओना हम अपन मायकेँ मना सकैत छी।" निर्भय अपन हाथकेँ गतिमान रखैत बजलाह: "देखू हेमा! अहाँक भैया अहाँक ने बेमातर छथि, हमर तऽ अपन बहिनक पति छथि। हम जनैत छी कोना हुनका सबकेँ मनाबी। अहाँ चिंता नहिं करु।" आब निर्भय हेमाक सीरकमे पूरा घुइस गेलाह। दूनू ओहि यात्रामे तल्लीन भऽ गेलनि जाहिमे पति-पत्नी भऽ जाइत अछि। एहि तरहे एहि तइस दिनक प्रवासक अवधिमे हेमा आ निर्भय एक दोसरक देहक आ मोनक प्रीत आ प्रेमक धारमे कतेक बेर डुबकी लगेलनि तकर कोनो हिसाबे नहिं। उचितो यएह। प्रेमक कही मात्रा, सँख्या अथवा घनत्व देखल गेल अछि? जखन हेमा निर्भयक शहरसँ वापस अपन गाम चलि गेलीह तऽ निर्भयकेँ राति काटब मुश्किल। हेमाकेँ सेहो निर्भय बिना अपन जीवन पहाड़ बुझना जाइन। अन्ततः निर्भय हिम्मत करैत अपन छोट बहिन आ बहिनोईसँ बात कएलाह। हुनकर छोटकी बहिन तैयार भेलीह। मायकेँ बहुत प्रेमसँ बतेलनि। माय मना कऽ देलथिन तऽ आरती बजलीह: "अहाँ नहि तैयार हएब तऽ भाईजी किछु कऽ सकैत छथि। घर त्यागि सकैत छथि।" निर्भयकेँ माय आब तैयार भऽ गेलीह। अतबे नहि ओ अपन पतिकेँ सेहो मना लेलनि। निर्भयक पिता एहि लेल मानि गेलाह जे निर्भयसँ एक पैघ भाय सतरह बरखक भेलाक बाद मरि गेल छलथिन। कोनो माता पिताक लेल अहिसँ पैघ दुर्भाग्य की भऽ सकैत छलनि? निर्भयकेँ माता-पिता जखन अपन बेटी जमायसँ एहि बारे मे गप्प कएलाह तऽ ओ दूनू अग्निश्च वायुश्च। कतबो माय, छोटकी बहिन बहिनोई आ पिता मनेलथिन, ओ दूनू नहिए तैयार भेलाह। आब की हो? कोना कऽ मिलन विधना दूनूक़ करतै रे की? निर्भयकेँ जखन कोनो उपाय नहिं भेटलनि तऽ झटदनि मूसक दबाई आनि लेलाह। ओकरा घोरि पी गेलाह। सौभाग्यसँ छोट बहिनोई देख लेलथिन। घरमे कोहराम मचि गेलनि। तुरत डॉक्टर लग लऽ गेलनि। बहुत उपायसँ निर्भयक प्राण बचाओल गेल। जखन निर्भय ठीक भऽ गेलाह तऽ जेठ बहिन आ बहिनोई हुनका लग अबैत नोरायल मुँहै कहि देलथिन: "अहाँक प्रेम जीतल। हमर जिद हारि गेल।" हेमाकेँ सेहो निर्भयकेँ देखबा लेल गामसँ शहर बजाएल गेल छल। हेमाक आँखि कनैत-कनैत लाल भऽ गेल रहनि। निर्भय केर माता पिताक चर्च नहि हो तऽ नीक। मुदा आब सब कल्याणक पथ पर आबि गेल छलाह। अहि तरहेँ निर्भय आ हेमाक विवाह सामान्य तरहेँ बिना कोनो दहेजक भेलनि। दूनू एक सँग जीवन जीबाक हेतु तैयार भेलाह। विवाहक किछुए दिनक बाद निर्भयकेँ नौकरी लागि गेलनि। घर पर कोनो कमी छलनि नहि – माता-पिता दूनू प्रोफेसर। निर्भय अपन जीवन जिब रहल छलाह। सब तरहें सम्पन्न। निर्भय केर एक कमी छलनि। हिनक अंग्रेजी बहुत अधलाह। हिंदी यद्यपि बहुत नीक बजैत छलाह। लिखियो नीक लैत छलाह। मुदा एक कुंठा पोसि लेने छलाह। कुंठा इ जे जँ हिंदीमे लिखता तऽ लोक इलीट, ज्ञानी, मॉडर्न नहि बुझतिन। एहि कुंठाक कोन उत्तर? एक बात आरो, निर्भय अंग्रेजी सिखबाक यत्न कहियो नहि केलनि। ओना विद्वान लोक बुझय ताहि लेल बहुत साकांक्ष रहैत छलाह। नाना तरहक स्वांग रचैत रहैत छलाह। बहुत तरहक पोथी जे कला, इतिहास, हेरिटेज, साहित्य, पुरातत्व, मीमांशा, नाटक, आदि पर होइत छलैक तकर जोगार करैत छलाह आ अपन घर आ ऑफिसक रैकमे सजेने रहैत छलाह। लोक बुझ जे निर्भय विद्वान छथि। ओहिमेसँ अधिकांश पोथीक पाँचो पन्ना ओ कहियो नहि पढलाह। पोथीक जोगार निर्भय तीन तरहें करैत छलाह; पहिल, किताबक दोकान अथवा पुस्तक मेलासँ कीनकऽ, दोसर, मित्र अथवा ककरो लग गेलाह तऽ पढबाक लाथे मांगि कऽ, जे कहियो वापस नहि करैत छलाह, आ तेसर, चोराकऽ। निर्भय पोथी चोरीकेँ कोनो पाप अथवा दुष्कर्म नहि बुझैत छलाह। हुनका कियोक कहि देने छलनि जे दिल्ली यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी आ कोलकाता यूनिवर्सिटी केर प्रोफेसर सब सेहो पोथी कखनो झोरामे, कखनो छत्तामे तऽ कखनो कोनो आन चीज़मे चुपे चाप राखि पुस्तकालय अथवा सार्वजानिक स्थानसँ लऽ जाइत छलाह। फेर की निर्भय एकरा अपन मौलिक अधिकार मानि लेलनि। पोथी चोरी कतौ चोरी भेलैक अछि! किन्न्हुँ नहि। निर्भय अहि तीन युक्तिसँ बिपुल पोथीक स्वामी भेल जा रहल छलाह। निर्भय लग कियोक पहिल बेर अबैत छल तऽ ओकरा लगैत छलैक जे कतेक महान पढ़ाकू आ विद्वान लग आबि गेल अछि! निर्भयकेँ कपड़ा पहिरक कोनो ज्ञान नहि छलनि। छलाह लेकिन कला संस्थानमे ताई रंग-विरंगक विचित्र परिधान पहिरैत रहैत छलाह। कहियो हदसँ अधिक पैघ कुरता आ पायजामा, तऽ कखनो किछु। आर जे हो लंगोटक बड़ जोरगर छलाह निर्भय। जखन कला इतिहाससँ एम ए करैत छलाह तऽ एक बेर गोवा, मुंबई, एलोरा, एलीफैंटा आदि स्थान पर समस्त विद्यार्थिक टोली सँग गेल छलाह। हिनक विषय एहेन छल जाहिमे तथाकथित मॉडर्न, इलीट आ नव धनाढ्यक बेटी, पत्नी आदि समय जियान करबा लेल नामाकन लऽ लैत छलीह। हुनका सबलेल शारीरिक अथवा यौन सुख बस ओहिना समय काटक एक युक्ति मात्र छलनि। अगर विवाहसँ पूर्व कोनो लड़की अथवा विवाहित नायिका कोनो पर पुरुख सँग यौन सुखक प्राप्ति कऽ लेलक तऽ एहिकेँ पाप पुन्यसँ जोरिक देखब हिनका सबलेल पाप छलनि। इ क्षणिक सुख छैक। भेल, क्षणिक सुखक आनंद भेटल। दूनू प्रेमक रससँ रसप्लावित भेलनि। बात खत्म। एकरा खिचनाई अथवा एकर इतिहासमे घुसनाई व्यर्थ। एहेन धुरंधर विचारक महिला आ नायिका निर्भय सँग एम ए शिक्षा लैत छलीह। ओहि महिला मण्डलमेसँ एक महिला सौम्या जे सांवरि, सुंदरि छलीह। अति मॉडर्न छलीह। चिकित्सक माता-पिताक बेटी छलीह। कोनो तरहक फ्रेम अथवा वन्धनसँ मुक्त छलीह। सौम्याक उरोज भरल सुराहीसँ एकौ रत्ती कम नहि छलनि। गाल भरल-भरल, केश ओतेक पैघ नहि किन्तु झमटगर, खूब कारी, कमर बहुत पातर, नितम्ब सुडौल, अतेक कलात्मक जे बुढो प्रोफेसर सब एक बेर ओहि पर आँखि अवश्य गड़ा दैत छलनि। लोक सौम्याकेँ देखिते सपनाक अलौकिक सँसारमे भेर भऽ जाइत छल। नाना तरहक सोच उफान मारए लगैत छलैक। मुदा तुरते अपन अवस्था, पद, प्रतिष्ठाक भान होइते ओ वापस अपन विज्ञक सँसारमे आबि जाइत छलाह। सौम्याक सबसँ पैघ बात हुनकर सांवरि रंग आ वस्त्रसँ अपना आपकेँ सजेबाक कला छल। सौम्याकेँ देखलासँ सांवरि नारी कतेक सुन्दरि, कामुक, उत्तेजक भऽ सकैत अछि; कोना दुग्ध धवल नायिकाकेँ अपन सौन्दर्य, वस्त्र विन्यास, कनखी-मटकी, आ चामक पानि सँ पछारि सकैत अछि, तकर जिवंत प्रमाण भेटैत छल। खैर निर्भय अपन ग्रुपक लोक सबहक खूब ध्यान रखैत छलाह। हुनकर एहि गुणक ग्राहक सब छल। एक राति लड़का-लड़की सब बोन फायर केलक। सालक अंतिम दिन आ नव वर्षक प्रथम दिन सबकेँ एक संग मनेबाक अवसर भेटलैक। की सब नहि एलैक। मांस-मदिरा-नृत्य-गीत-मस्ती-भयमुक्त वातावरण। ने घरक लोकक धाख ने यूनिवर्सिटी केर प्रोफेसरक चिंता – सर्वतन्त्र स्वतन्त्र। एक मालिनी मात्र जे ओना तऽ बहुत सुन्दर छलीह मुदा बहुत सौम्य आ शालीन बनबाक अभिनय करैत छलीह। प्रेमक बात तऽ सुनैत छलीह मुदा लज्जा भावक अभिनयमे हिनक उत्तर नहि। एकबेर भरत मोगा नामक स्मार्ट, सुंदर आ वैभवशाली युवक हिनक सौन्दर्यसँ आकर्षित भेल हिनका दिस मित्रताक हाथ बढ़बैत कहि देलथिन: “हेलो! यू आर सो एंटरक्टिव एंड ब्यूटीफुल गर्ल!” मालिनी मोने-मोने प्रसन्न भेलीह मुदा भेलनि एकाएक कोना हाँ कहि देथिन। झटदनि उत्तर देलथिन: “हमरा एहि तरहक मजाक नहि पसिन अछि। हम कनि दोसरे तरहक लोक छी।” तावेत धरि भरत एक पेग ढारि नेने छलाह। केजुअल भेल बजलाह: “कम ऑन मालिनी! ज़माना कतऽसँ कतऽ चलि गेल आ अहाँ एखनो पंद्रहवीं शदीक भारतक मानशिकतामे जीब रहलि छी। हमरालोकनि कला जगत केर लोक छी। अतए उन्मुक्तता छैक। लोकक विचार आ व्यवहार ग्लोबल छैक। लिवइन रिलेशनशिप आम बात छैक। आ अहाँ एहेन बात कहैत छी!” इ कहैत भरत बहुत प्रेमसँ अपन हाथ मालिनीक कान्ह पर राखि देलाह। मालिनी झटदनि हुनक हाथ हटबैत बजलीह: “माइंड योर बिज़नस भरत! हम सड़कछाप लड़की नहि छी। जे केलहुँ से केलहुँ। भविष्यमे एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हो से ध्यान राखब।” भरत बुइझ गेलाह जे मालिनी दोसरे होपलेस स्टफ छथि। इ मिथ्याक अहंकारमे जीबी रहलि छथि। मोगा कोनो दोसर लड़की जे मस्त भेल नृत्य करैत छलीह लग चल गेलाह। सौम्या टाइट जीन्स आ शर्ट पहिरने छलीह। उत्तेजक-आकर्षक-मादक! ओहिराति निर्भय बहुत उत्साहित छलाह। मुदा ओहि ग्रुपमे दू मनुखझर छल: स्त्रीगनमे मालिनी आ पुरुखमे निर्भय। निर्भय आ मालिनी दूनूमे कियोक मदिरापान नहि करैत छलनि। मालिनी चारि डेग आगा छलीह – मांस भक्षण सेहो नहि करैत छलीह। वेचारा निर्भय शीतल पेय केर दस बोतलक जोगार केने छलाह। जखन लोक हाथमे मदिराक गिलास लेने जाम हेरा रहल छल, निर्भय ओकरे सबहक तालमे ताल शीतल पेय केर गिलाससँ कऽ रहल छलाह। हुनकोसँ अलग सिंगल पीस बनलि मालिनी एक कोनमे दोसरे दुनियाँमे विचरण करैत शीतल पेयक चुसकी आधे मोने लऽ रहलि छलीह। कार्यक्रम चलैत रहलैक। बिना पीने लोक सबकेँ पिबैत आ झुमैत-गबैत देख निर्भयकेँ शीतल पेयसँ रमक नशा आबए लागि गेलनि। निर्भय मस्त भेल गेलाह। जेना-जेना राति भेल जाइक तेना-तेना लोक स्वतंत्र-उच्चश्रृंखल भेल गेल। स्त्री-पुरुख, छोट-पैघक, स्थानीयता आदिक दूरी खत्म भेल गेलैक। सौम्या बहुत कम चीज़क उपयोग अपन मूँह कानकेँ सुन्दर बनेबाक लेल करैत छलीह। लेकिन काजर, मस्करा, बिंदी, साड़ी, सूट, शर्ट आदिक रँगक अनुकूल अथवा कंट्रास्टक झुमका अवश्य धारण करैत छलीह जे हुनका विशेष सेक्सी आ आकर्षक बनबैत छलनि। हिनक देखब आ ककरो निहाराब बहुत मारुक छल। ऊपरसँ मुक्तांगी आ मस्त छलीह सौम्या । सौम्याकेँ देख निर्भय सेहो मादक आ उत्तेजित भऽ गेलाह। सौम्या कनि बेसी मूडमे छलीह। दोसर पैगकेँ बाद सौम्या जेना संतुलन समाप्त करए लगलीह। देह काँपय लगलनि। ठोड़ लड़खड़ा गेलनि। माथ भारी भऽ गेलनि। कखनो की बाजथि तऽ कखनो किछु आरो। उन्मुक्तता सेहो अपन रँग देखाबय लागल। सौम्याक मस्ती बढ़ल गेलनि। भाषाक व्यर्थ अनुशासनसँ ऊपर उठए लगलीह। बहुत बात सब जे नारी होबाक कारण आ सामाजिक मर्यादाकेँ कारण अपना पेटमे, आंतमे, माथमे, करेजमे दबेने रहैत छलीह से जोर-जोरसँ भयमुक्त वातावरणमे बाजय लगलीह। सब यएह सोचैत रहल जे सौम्या अपन सम्हारमे नहि छथि, नशामे भेर छथि तांहि जे मोनमे अबैत छथि से सब बजने जा रहलि छथि। ताहि राति सौम्या केँ सात खून माफ़ छलनि। बीच-बीचमे सौम्या साकांक्ष भऽ जाथि। होनि, ई की कऽ रहलि छथि! कनिकबेकालमे फेरो मत्त। पेग लेकिन नहि थमलनि। जखन पांच भऽ गेलनि तऽ रंग विरंगक विभत्स गारि बजनाई शुरू केलीह। आब हुनका लोक कहि देकलन्हि जे बोतल खाली भऽ गेल छैक। राति बहुत भऽ गेल छैक। आब मदिराक सब दोकान बन्द भऽ गेल छैक। ई बात सुनि तामसे भेर भेलि सौम्या आयोजककेँ माए-बहिन लगा गारि पढ़ैत रहली। लोक सब मनहि मोन हँसैत रहल। एहि बातसँ एक बात स्पष्ट होइत अछि जे हम सब समाजक ठेकेदार बनि रहल छी। नारी स्वतंत्रता एखनो दूरसँ भले जे लगैत हो, यथार्थमे अग्गब सपना जकाँ अछि। सौम्या सन नारी जखन उन्मुक्त नहि तऽ ककरा कहि स्वतंत्रताक अधिकारी। नारी मोन शिक्षा सँग अधिकार मनैत अछि, स्थान मङ्गैत अछि, ओकरो बात पर लोक अमल करैकसे व्यवस्था मङ्गैत अछि, पुरुखक सँग आ समकक्ष चलए चाहैत अछि। सब तरहेँ स्वच्छन्द रहए चाहैत अछि। जहिना पुरुख कतऽ जा रहल अछि, की कऽ रहल अछि, कखन खाइत अछि, कतए आ कखन सुतैत अछि से कियोक पुछनाहर नहि, तहिना तऽ स्त्रीकेँ सेहो अपन जीवनक संचालित करबाक सुविधा, स्वतन्त्रता भेटक चाही ने! से नहि भेटलैक तऽ केहेन स्वतंत्रता? तांहि तऽ मदिराक नशासँ मातलि सौम्या चिचिया कऽ कहैत छथि, "फक यू मेन! यू आर बुलशिट! डोंट चीट मी। केवल पाई देनाइ, नीक स्कूलक शिक्षा, सुविधासँ स्वतंत्रता नहि भेटैत छैक। असली स्वतंत्रता अहाँक दिमागमे नुकाएल रहैत अछि। अहाँ कायर छी। घटिया छी। अहाँ डरपोक छी। अगर एक पुरुख कोनो स्त्री संग देह बांटि सकैत अछि तऽ फेर स्त्री कियैक नहि? इ पाप पुण्य सब पुरुखक ढ़कोसला अछि। कोनो महिला कियैक नहि अपन मोनक आनंद अपन मोनक पुरुखक संग उठा सकैत अछि? चुतिया...” सौम्या अतहिं नहि थमहली। बहुत बात बजैत रहलनि। बहुत बात लिखब तऽ मर्यादा चकनाचूर भऽ जाएत। सौम्या भोजन मोनसँ नहिं केलीह। थोड़ेक कालमे निर्भय सौम्या केर हाथ पकड़ि हुनक घर दिस लऽ गेलाह। सौम्या घर पहुंच गेलीह। निर्भय सौम्याकेँ हाथसँ पकड़ि हुनक बेड पर सुतेबाक प्रयत्न करए लगलाह। एहि प्रक्रियामे कतेक बेर निर्भयक हाथ सौम्याक उंन्नत भरल पयोधरिसँ टकराएल। जतेक बेर स्पर्श होइक़ ततेक नीक लगैक। निर्भयकेँ आब सेहो नशा लागि गेल छलैक। ई नशा मदिराक नशा नहि, सौम्याक सौन्दर्यक नशा, सौम्याक सेक्सी शरीरक स्पर्शक नशा छलनि। पुरुखक मोन, निर्भय एक आध बेर नशामे धुत भेल सौम्याकेँ सम्हारबाक बहाने जकड़ि कऽ धेलाह। लेकिन अपन नीक लोकक छविक रक्षा करक जोगारमे निर्भय किछु नहि कऽ पेलाह। आब कनि सौम्या साकांक्ष भेलीह। निर्भय केर शरीरक ठोस बनावट हुनका नीक लगलनि। एक क्षण लेल भेलनि, अगर अहि पुरुखक सँग एखन अभिसार होइत अछि तऽ मोन आ तन, आत्मा आ देह दूनू तिरपित-तिरपित भऽ सकैत अछि। एकर बाँहिक जकड़न हमरा बैकुण्ठक आनंद दऽ सकैत अछि! यैह सोचैत तुरत एक्ट केर मूडमे आबि गेलीह सौम्या । सौम्या निर्भय केर झमटगर केश हाथमे बकुटैत बजली: "निर्भय! साले एक बात बताओ?" निर्भय: "की?" सौम्या : "अहाँ हमरा ताड़ि रहल रही ने? जानि बुईझ कऽ अपन हाथ हमर ब्रा लग अनैत रही ने?" निर्भय: "बकबास"। सौम्या : "सार तोरा हम देह तोड़ि देब। सबहक समक्ष चुम्मा लऽ लेब। चुपचाप सत्य स्वीकार करु।" सौम्या बजैत रहली। निर्भय चुपचाप सुनैत रहला। सौम्या : "कम ऑन निर्भय! अहाँ जुआन छी। हम जुआन छी। अगर अहाँक मोन हमरा पर आबि गेल तऽ अहिमे की खरापी?" निर्भय: "सौम्या माइंड योर लैंग्वेज! की अँट शंट बजेने जा रहलि छी अहाँ? ई सब बात छोड़ू आ चुपचाप आब आँखि मुईन सुइत रहू।" सौम्या : "एकर मतलब की भेल? अगर हमर अधखुला वक्ष देखि अहाँक मोन नहिं केलक एकर अर्थ ई भेल जे अहाँ नामर्द छी!" "स्टॉप दिस नॉनसेंस!", निर्भय चिचिया उठलाह। मुदा सौम्या लेल धन सन। सौम्या निर्भयकेँ अंगाक कॉलर पकड़ि अपना दिस घिचलनि। आब निर्भय मूडमे आबि गेल छलाह। ताबर तोर चुमाक प्रहार करए लगलाह। कखनो अपना दिस खिंच लेथि तऽ कखनो सौम्याक गर्दनि पकड़ि सौम्याक दूनू ठोरक मध्य अपन जीभ डालि सौम्याक जीभक मधु स्पर्श आ स्वादसँ आनंदित होइत रहलनि। सौम्या सेहो विरोधक बदले और सहयोगे करैत गेलथिन। सौम्याक दैहसँ मदिरा, सेंट, आ प्रकृतिक स्त्रिजन्य सुगन्ध आबि रहल छलनि। ओहि सुगंधक सब कतरा निर्भयकेँ मादक बनेने जा रहल छलनि। निर्भय आवेगक अतिरेकमे सौम्याक सब वस्त्र हटा देलथिन। सौम्या कनि संकोच तऽ केलनि कारण संकोच आ नारी एक दोसरक पूरक होइत अछि। मुदा सौम्याक मोनमे निर्भय सँग देह बाटक ततेक उग्र ज्वाला धधकि रहल छलनि जे कनिकबे कालमे अपना आपकेँ निर्भय लग समर्पित कऽ देलीह। जखन सौम्या निर्वस्त्र भऽ गेलीह तऽ निर्भय केर वस्त्र अपने हाथे खोलय लगलीह। निर्भय केर उत्तेजना आ सौम्याक सँग देह बाँटब केर अभिलाषा सेहो उग्र भेल गेलनि। सौम्या निर्भयक अंतिम वस्त्र हटा रहल छलीह तऽ एकाएक निर्भय केर जेंटलमैन बला चरित्र जागि उठलनि। निर्भय सौम्याकेँ झकझोड़ि देलाह। सौम्याकेँ पते नहि चलि पेलनि कि निर्भय अचानक एहेन बेवहार कथिलेल केलनि। कामक ज्वरसँ धू-धू जड़ि रहलि छलीह सौम्या । तामस तऽ अतेक भेलनि जे निर्भय केर खून कऽ देतीह। इमहर निर्भय बिना किछु कहने सौम्याक शरीर पर वस्त्र राखि देलथिन। निर्भयक मर्यादा, लज्जाभाव एकाएक जाग्रत भऽ गेलनि। कहि देलथिन: "नहि सौम्या, हमरासँ ई संभव नहि अछि। ई चरित्र लंघन हम नहि कऽ सकब। स्टॉप इट। आई एम सॉरी। हम अपन मर्यादा बिसरि गेल रही।" कामक अग्निसँ जड़ैत सौम्या एकबेर शेरनी जकाँ निर्भय पर गरजैत बजली: "तखन कथिलेल अतेक आगा बढ़लहुँ? अहाँ मर्द नहिं छक्का छी। बहाँ...द एहिसँ पहिने जे हम तोरा गां----- पर लात मारि भगा दी तों अपने तुरत हमर घरसँ भाग ।" निर्भय देह झारैत भागि गेलाह। राति भरि कोना समय सौम्या व्यतीत केलनि से वैह बुईझ सकैत छलीह। वैह निर्भय अपन पत्नी हेमा सँग बहुत रोमांटिक छलाह। कामकलाक अनेक आसनक प्रयोग करैत छलाह। कखनो प्रयोगक नाम पर स्थापित सीमाक अतिक्रमण सेहो करैत छलाह। निर्भयकेँ दू बेटा भेलनि। दुनुक मध्य अंतर मात्र सवा बरखक। एक बेर राघबकेँ पता लगलनि जे निर्भय केर कनिया हेमा विमार चलि रहल छथिन। हुनकर डाँरमे दर्द छनि। गम्भीर इलाज चलि रहल छनि। बादमे निर्भय केर दोसर मित्र जे राघबक मित्र सेहो छलथिन आ निर्भय सँग हुनकेँ सोसाइटीमे रहैत छलाह, राघबकेँ बतेलखिन जे निर्भय केर पत्नी हेमा हुनकर पत्नीसँ कहलथिन जे निर्भय पृष्ठभागसँ संभोग करबाक जिद ठानि देलथिन। ओहिक क्रममे नश चढ़ि गेलनि। खैर! ई निर्भय केर निजी मामला छलनि। निर्भय हमेशा कोनो नीक पढ़य बला केर संगतिमे रहबाक यत्न करैत छलाह। हुनकर एक मित्र कोनो जोशी नामक छलथिन । बहुत तेज, सुन्दर। मुदा सबकर्मी आ एक नंबर केर फ्रॉड। चोरीक कलामे प्रवीण। एकबेर जोशी महोदयकेँ लकऽ निर्भय राघब केर होस्टलमे आबि गेल छलाह। राघबकेँ कतौ जेबाक रहनि। निर्भयकेँ अपन घरक चाभी राघब दऽ देलथिन। बादमे जखन राघब अएलाह तऽ पता चललनि जे जोशी जी राघबक अनेक वस्त्र, पोथी आदि चोराकऽ चलि गेल छलाह। हेमा, अर्थात निर्भय केर पत्नी बहुत सांस्कृतिक आ श्रृंगारिक स्वभावक छलीह। अधिक काल नुआ ब्लाऊज पहिरैत छलीह। दूधिया गोड़ाई। एक तऽ निर्भयसँ नौ वरखक छोट ऊपरसँ बहुत छरहरि, दूभर पातर। कतेक समय तऽ निर्भय आ हेमाक जोड़ी विपरीत अर्थात पिता पुत्री सँग लगैत छल। हेमा भोजन, संगीत, मिथिला चित्रकला, योग, नृत्य सबमे प्रयोग करए चाहैत छलीह। ओ जीवनक संगीत देखय चाहैत छलीह। वस्त्रकला केर नीक ज्ञान छलनि हिनका। ब्यूटी पार्लर केर ज्ञानमे पारंगत छलीह हेमा। एक आध बेर हेमा नौकरी करबाक यत्न केलीह मुदा निर्भय तकर अनुमति नहि देलथिन। हेमा ओना ई मनैत छलीह जे निर्भय बहुत प्रवुद्ध लोक छथि। जाहियासँ राघब कला कला संसथान जॉइन कएलाह निर्भय लेल वरदान भऽ गेलनि। अपन सङ्गी सबकेँ पीएचडी उपाधिसँ निर्भय बहुत उत्प्रेरित भेलाह आ पीएचडी लेल कोनो यूनिवर्सिटीसँ पंजीयन लऽ लेलाह। समस्या ई छलनि जे कोना लिखताह? अपने कोनो स्थितिमे नहि लिखताह से बुझल छलनि। कतेक बेर राघबसँ प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूपमे कहि देलथिन मुदा राघब टालैत रहलथिन। संयोगसँ निर्भयकेँ माता पिता राघबसँ परिचित छलथिन। एकबेर कोनो प्रयोजनसँ राघब हुनका लग गेलाह। रातिमे ओतए रुकलाह। रातिमे भोजनक बाद निर्भयक पिता राघब लग दूनू हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेलथिन्ह। राघब घोर आश्चर्यमे परि गेलाह। तखन निर्भयकेँ पिता कहलथिन: "राघब, अहाँ हमर पुत्रतुल्य छी। हम आ निर्भयक माए अहाँमे अपन पुत्र देखैत छी। हम नौकरीसँ सेवानिवृत भऽ चुकल छी। हृदय रोगक रोगी छी। जीवनक की भरोसा? ई निर्भय नालायक अछि। एकरा बूते पीएचडी एहि जन्म के कहैत अछि, सात जन्ममे नहि हेतैक। अहाँ हमरा सबपर एक उपकार करु आ एकर पीएचडी लिख दियौक। अहाँक अहि योगदानकेँ हम जीवन पर्यंत नहि बिसरब। " निर्भयक माय सेहो मौन भेल अपन आँखिसँ बहुत किछु कहि देने छलथिन। राघब उठि गेलाह। निर्भयक पिताक हाथ अपना हाथमे लैत बजलाह: "हमहुँ अहाँ सबमे अपन माता-पिताक छवि देखैत छी। ओना ई बहुत दुष्कर कार्य अछि। निर्भय किछु तऽ करत नहि, सब काज हमरे करय पड़त। लेकिन हम तीन मासमे पीएचडी थीसिस लिख दैत छी।" ई बात सुनि निर्भयक माता-पिताक नेत्र एक दोसरे आभासँ चमकि उठलनि। राघब एक भारसँ दबि गेल छलाह। राघब कलाकेन्द्र आबि गेलाह। निर्भयकेँ बजा सब सामग्री अपना लग मंगा लेलाह। पीएचडी थीसिस लिखनाई राति-दिन शुरू केलनि। अहि तरहेँ राघब तीन मासमे निर्भय लेल पीएचडी लिख निर्भय केर माता-पिताक भावनात्मक ऋणसँ उऋण भेलाह। निर्भय पुरा थीसिसमे पूर्ण विराम के कहैत अछि अर्ध विराम तक नहिं लिखलनि। ऊपरसँ निर्भयकेँ राघब कहलथिन जे अपन धन्यवाद ज्ञापन लिख लेथि। निर्भय ओहू लेल तैयार नहिं भेलाह। राघबक आगा अस्त्र राखि देलनि। लाचार अपन माथक केश नोचैत राघब निर्भय केर धन्यवाद ज्ञापन सेहो लिखलनि। ओहिमे राघब जानि बुईझ कऽ अपन नाम नहिं लिखलाह। विश्वास छलनि जे निर्भय या तऽ स्वयं लिख लेताह अन्यथा राघबकेँ कहथिन जे अहाँ अपन नाम लिख लीय। मुदा निर्भय कृतघ्न प्राणी छलाह। राघबक योगदान हुनका लेल अतबे महत्वपूर्ण लगलनि जतेक योगदान एक हरबाहक कृषिकार्यक संपादन मे। बल्कि ओहू सँ कम। कारण हरबाहकेँ काजक बदला ओकर बोइन भेटैत छैक। लेकिन निर्भय अतबो जरूरी नहि बुझलनि जे राघबक प्रति कृतज्ञता अर्पित करथि। ऊपरसँ अपन पत्नी मेधा, आ हित मित्र लग अपन प्रशंसक पुल बनहैत रहला निर्भय। संयोगसँ कनिकबे दिनक बाद निर्भयक माता पिता निर्भयसँ भेट करक हेतु दिल्ली एलथिन। राघबकेँ जखन पता लगलनि तऽ राघब भेट करऽ गेलाह। भेट होइतहिं निर्भयक पिता बाजि उठलनि: "कतेक आशीर्वाद दिय अहाँकेँ राघबजी! अगर अहाँ नहि लिखबा लेल तैयार भेल राहितौं तऽ सातो जन्ममे निर्भय बूते पीएचडी थीसिस लिखल नहि होयतैक।" राघब विनम्रतासँ सब बात सुनैत रहला। फेर निर्भयकेँ पिता बजलाह: "लेकिन अहाँक नाम कतौ धन्यवादमे नहिं अछि राघबजी?" राघब: "पता नहि, शायद निर्भय बिसरि गेल हेताह।" निर्भयक पिता: "ई कोना भऽ सकैत अछि? हमरा बुझल अछि जे सम्पूर्ण थीसिसमे निर्भयक नाम सेहो राघबजी लिखने छथि। फेर निर्भय नाम कथिलेल नहि देलाह?" निर्भय सकपकाईत बजलाह: "हम पूछने रही। राघब जी नहि लिखलाह।" निर्भयक पिता कहलथिन: “अहाँ अपन अकर्मण्यता अहूमे प्रदर्शित केलहुँ। अहाँक हम पिता छी हमरा अहि बातक घोर दुःख अछि।” निर्भय मुड़ी गोतने बात सुनैत रहला। किछु मासक बाद निर्भय केर पीएचडी पूर्ण भऽ गेलनि। अवार्ड भेटि गेलनि। निर्भय आब डॉ निर्भय भऽ गेल छलाह। एकबेर हेमासँ कोनो बात पर गप्प भेलनि तऽ राघबक पत्नी कहि देलथिन जे राघब निर्भय केर पीएचडी थीसिस लिखने छलाह। हेमा निर्भयसँ पुछ्लनि। निर्भय चुप भऽ गेलाह। हेमा मुरझा गेलीह। पहिल बेर हेमाकेँ निर्भयक पत्नी बनबा पर ग्लानि भऽ रहल छलनि। “अहाँ हमरा एखन असगर छोड़ि दिय! बस।” अतेक कहैत हेमा अपन हाथ कपार पर धऽ लेलनि। निर्भय निरर्थक गंभीर बनल ओतएसँ दूर भऽ गेलाह। दोसर दिन निर्भय एकबेर पुनः राघबसँ पुछि देलथिन: “राघब! अहाँ अपन पत्नीकेँ बता देने छलयनि जे अहाँ हमर पीएचडी थेसिस लिखने रही?” राघबकेँ इ प्रश्न जेना तामस चढ़ा देलकन्हि –“अहाँ की बुझैत छी! ओ हमर पत्नी छथि हम हुनका नहि सूचित करबनि तऽ ककरा कहबै? अहाँ अतेक निर्लज्ज छी जे हमर नामक कतौ उल्लेख तक नहि केलहुँ। अपन पत्नी हेमा लग अपन वैदुश्यक बखान करैत छी। आ हम ओतेक मदति केलाक बादो चोर जकाँ रही! एहने बात छल तऽ अपनेसँ लिख लितहुँ।” एकर बाद दूनू चुप भऽ गेलाह। खैर, किछु दिनक बाद राघब नौकरीसँ त्यागपत्र दऽ देलाह। निर्भयसँ मुक्ति भेट गेलनि। समय चलैत रहलैक। पाँच मासक भीतर एकदिन निर्भय दस बजे रातिमे कनैत फोनसँ सूचित केलथिन जे निर्भयक पिताक निधन एकाएक हृदयगति थम्हि गेलासँ भऽ गेलनि। राघब बहुत दुखी भेलाह। जतबे दुःख अपन पिताक मृत्यु पर भेल छलनि ओतबे दर्द तखनो भेलनि। एक बातक संतोष जरुर भेलनि – नीक भेल निर्भय केर पीएचडी भऽ गेलनि अन्यथा हुनक पिताक आत्मा भटकैत रहितनि जे हुनक पुत्र कुमार निर्भयसँ डॉ निर्भय नहि भऽ सकलाह! समयक चक्र चलैत रहलैक। किछु व्यक्तिगत विवशतासँ राघब नौकरीसँ त्यागपत्र दऽ देलनि। निर्भय संस्थाँकेँ धेने रहलाह। सरकारी तंत्रमे जेना होइत छैक, होइत रहलैक। निर्भयक तरक्की हुनक पीएचडीक कारण होइत रहलनि। कुरता-जीन्स पहिरने निर्भय अपन देहक आ वस्त्रक सम्प्रेषणसँ विद्वान भेल रहैत छथि। भीतरक निर्भयकेँ के देखैत अछि? ककरा लग समय छैक? नोट: इ कथा पुर्णतः काल्पनिक अछि। एकर सम्बन्ध कोनो जीवित अथवा मृत व्यक्ति या संस्थानसँ नहि छैक। फकड़ाक संग यात्रा करैत मैथिलानीक मनोदशाक: मानवशास्त्रीय विवेचना लोकक सँसार अनंत महासागर जकाँ अछि। लोक जखन मिथिलाक लोक हो अथवा मैथिलिक लोक हो तऽ एकर विस्तार कल्पना सँ बाहर भऽ जाइत छैक। मिथिलाक लोकक जड़ि छथि मैथिलानी। हुनक जीवन आइओ लोक सँ छनि, लोक सँगे छनि। आजुक भौतिक आ वैश्विक समाज मे सेहो मैथिलानी लोक केँ धेने छथि: लोक मैथिलानी सँ बढैत अछि, मैथिलानी लोकक गति सँग गतिमान छथि। गति मुदा दिशाहीन नहि अछि। गति एहेन अछि जे जड़ि सँ जुड़ल अछि। ओकरा उड़ब, घुमब, दौड़ब, बाहर-भीतर करब नीक लगैत छैक मुदा ओ अन्ततः अपन जड़ि लग बेर-बेर आबि जाइत अछि। ठीक ओहिना जेना प्रवासी चिरै एक वर्ष मे 40,000 किलोमीटर अपन पारिस्थितिकी सँ दूर उड़ला, घुमला आ प्रवास केलाक बाद पुनः अपन भूमि अर्थात मूल पारिस्थितिकी मे आबि जाइत अछि। ओहिना जेना सूरदास (1478 – 1573) केर जहाजक चिरै बेर-बेर उड़लाक बाद जहाज पर अबैत रहैत अछि: “जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आबै” मिथिलाक अथवा आजुक वैश्विक युग मे मैथिलक लोकक प्रथा, परम्परा, खान-पान, बिध-बेबहार, गीत-नाद, अनुष्ठान, पूजा-पाठ, व्रत-पाबनि, खिस्सा-पिहानी, फकड़ा, सब किछु अधिकांशतया मैथिलानी बचा कऽ रखने छथि। ताहू समय मे जहिया हुनका पढबाक स्वतंत्रता पुरुष जकाँ नहि छलनि अथवा नाम मात्र महिला केँ छलनि तहियो इ सब लोक परम्परा केँ अपन भावना – प्रेम, विरह, वेदना, कष्ट, यातना, ज्ञान, उद्वेग, शोषण, दोहन, आर्थिक बिपन्नता, पुरुषक उत्पात, आदि – व्यक्त करबाक पब्लिक स्पेस केर रूप मे व्यवहार करैत छलीह। ओ स्पेस एहेन स्पेस छल जाहि मे हिनकालोकनि केँ अपन कथ्य व्यक्त करबाक स्वछंदता छलनि, बल्कि एखनो छनि। पुरुषक कोनो दखलन्दाज़ी ओहि स्पेस पर नहि छलैक आ ने आइओ छैक। इ बात कनि गंभीर लिखा गेल आ मानवाधिकार सँ शुरू होइत नारी स्वतंत्रता, नारीवाद आ स्त्री विषयक अध्ययन, विवेचन दिस टघरि गेल। बात अनेड़े बहुत पैघ स्वरुप लऽ सकैत अछि। ओना एहि बात पर मंथन आ घमर्थन केर जरुरत अपन मैथिल समाज मे अछि लेकिन ताहिलेल इ प्लेटफार्म हमरा उचित नहि लागि रहल अछि। तखन की हो? किछु नहि, बात केँ लोकक जाग्रत मनःस्थिति मे राखि आगा बढ़ि जाइ। जखन अर्धजाग्रति सँ पूर्ण जाग्रति दिस ध्यान जेतनि तऽ अहि पर विचार शुरू हएत। विचारक घमर्थन असगरे नारी नहि करती, पुरुष सेहो ओहि भाव, इतिहास, पितृसत्तात्मक समाजक सँरचना आ ओहि सँरचना मे कालक अनुरूप परिवर्तन आदि लेल उदार हेताह आ स्त्री-पुरुख दूनू मिलि जीवनक गाड़ीक दू पहिया बनि एकर सम्यक निदान दिस अग्रसर हेताह। बात पर अबैत छी जे कोना लोकक एक विधा फकड़ाक माध्यम सँ मैथिलानी अपन सब तरहक मनोभाव केँ अदौ सँ व्यक्त करैत आबि रहल छथि। फकड़ा केँ ‘कहबी’, ‘लोकोक्ति’ सेहो कहल जाइत छैक। सबसँ पहिने इहो जानब आवश्यक जे फकड़ा’क अर्थ की भेल? एकर कोनो सर्वमान्य परिभाषा सेहो भऽ सकैत अछि की? सर्वमान्य परिभाषा अछि तऽ मैथिली लोक सँसारक फकड़ा ओहि वैश्विक परिभाषा सँग कतऽ धरि चलि पेबा मे सक्षम अछि? फकड़ा खांटी लोकक वस्तु थिक – लोकक उक्ति अर्थात “लोकोक्ति”। लोकक कहब अर्थात “कहबी”। लोक पुरान फकड़ा केँ सहेजने रहैत अछि आ नवक निर्माण करैत ओकरा ठोसगर आधार दैत रहैत अछि जाहि सँ आजुक गढ़ल फकड़ा भविष्य मे सार्वभौमिक बनि सकय। सँस्कृत मे “लोकोक्ति” अलंकारक एक भेद सेहो मानल गेल अछि। अंग्रेजी मे फकड़ा अथवा लोकोक्ति केँ Proverb कहल जाइत छैक। ताहि ज्ञाने अंग्रजी Proverb केर परिभाषा किछु अहि तरहें करैत अछि: “A proverb is a saying without an author.” एकर अर्थ भेल फकड़ा एहेन उक्ति अछि जकर कोनो रचनाकार नहि होइत छथि। मैथिली लोक मे व्याप्त फकड़ा केँ देखला सँ इ ज्ञात होइत अछि जे मैथिलिक फकड़ा अपन स्वरुप मे एहि सँ अधिक व्यापक अछि। हमरालोकनि अनेक एहनो फकड़ाक प्रयोग करैत छी जकर रचनाकारक नाम हमरा सबकेँ ज्ञात रहैत अछि: गोनू झा, विद्यापति (1352-1448), तुलसीदास (1511-1623), मीराबाई (1498-1557), कबीरदास (1398- ?) आदि। रामचरितमानस सँ अनेक दोहा कें मिथिला आ मिथिला सँ बाहर फकड़ा’क रूप मे व्यवहार होइत अछि। जेना कि “यहाँ न लागै राउर माया” अथवा “लंका निसिचर निकर निवासा यहाँ कहाँ सज्जन केर बासा” इ दूनू तुलसीदासक रामचरितमानस सँ लेल गेल अछि। अहि तरहें “पुरुखक नहि विश्वासे” “एकसर तारा कियो नहि देख लिखल कुमास अमंगल लेख” “भनहि विद्यापति सुनू हे सुनयना सब बेटी सासुर जाथि” महाकवि विद्यापतिक रचित पद सँ लेल गेल अछि। किछु फकड़ा गाम विशेष आ स्थान विशेष मे प्रचलित होइत अछि। ओहि फकड़ाक निर्माण मे गामक कोनो विशेष घटना अथवा ओहि घटना सँग व्यक्ति विशेषक नाम जुड़ल रहैत अछि। उदाहरण लेल मधुबनी जिलाक अरेड़ गाम मे 55 वर्ष पहिने नाथ बाबू नामक एक आशु कवि आ सभालोचन भेलाह। ओ अपन प्रत्युत्पन्नमति लेल विख्यात छलाह। ओ किछु-किछु एहेन पदक रचना केलनि जे फकड़ा बनि गेल। सब फकड़ा हुनक नाम सँ जानल जाइत अछि। नाथ बाबू केँ तीन बीघा खेत छलनि। एकबेर ओ अपना खेत मे मौथा घास उखाड़ैत छलाह। बाट चलैत गामक लोक पुछि देलकन्हि: गामक लोक: “नाथ! की करैत छी?” नाथ: “नाथ बाबू छथि काल गिरहस्त तीन बीघा केर जोता सबहक खेत मे धान उपजैत अछि नाथक खेत मे मौथा” तहिया सँ इ फकड़ा प्रसिद्ध भऽ गेल: “सबहक खेत मे धान उपजैत अछि नाथक खेत मे मौथा” अहि तरहें मिथिलाक अधिकांश गाम मे किछु ने किछु लोक भेल छथि जे फकड़ा निर्माण केने छथि आ ओ फकड़ा गाम मे प्रचलितं अछि। ओहि फकड़ा सँग ओकर निर्माता सेहो गामक लोकक कंठ मे रचल बसल छथि। उदाहरण हमरा लग अनंत अछि मुदा विषय सँ विषयांतर नहि होई ताहिं आगा बढब जरुरी। वृहद् हिंदी कोश मे लोकोक्ति केर परिभाषा कनि विस्तार सँ भेटैत अछि: “विभिन्न प्रकार के अनुभवों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं कथाओं, प्राकृतिक नियमों और लोक विश्वासों आदि पर आधारित चुटीली, सारगर्भित, सँक्षिप्त, लोकप्रचलित ऐसी उक्तियों को लोकोक्ति कहते हैं, जिनका प्रयोग किसी बात कि पुष्टि, विरोध, सीख तथा भविष्य-कथन आदि के लिए किया जाता है।” एहि सँ एक बात दिस स्पष्ट सँकेत इ भेटैत अछि जे हमरा लोकनि अपन मिथिला मे उपलब्ध फकड़ा के देखैत एक स्थानीय अथवा काजक परिभाषा बना ली। इ परिभाषा हम अपन ज्ञान, मानवशास्त्र, लोकविद्या (फोकलोर) मे प्रशिक्षण आ मिथिला सँ प्राप्त फकड़ाक सँचयन आ ओकर सँरचना के आधार पर गढ़बाक यत्न कऽ रहल छी: “मैथिली फकड़ा जकरा लोकोक्ति सेहो कहल जा सकैत अछि, लोकक द्वारा प्रचलित एहेन कथन अछि जे पौराणिक कथा, ग्रन्थ, धर्मशास्त्रक दृष्टान्त, घटना विशेष सँ विकसित शिक्षा, हास, परिहास, मनोभाव, दुःख-दर्द, प्रेम, अपनत्व, लिंग भेद, जातीय अथवा सामुदायिक स्वाभाव आ गुण, छोभ, वैराग्य, उदासी भाव, प्रकृति सँ तारतम्य, जड़ि सँ जुड़ाव, पूर्वज सँ सिनेह, ज्ञानक सँचरण, आदि भाव व्यक्त कएल जाइत अछि।” फकड़ा केँ स्वरुप केँ अगर गंभीर बनि देखी तऽ स्पष्ट हएत जे फकड़ा’क उद्धरण देमय बला लोक ओहि सँग व्यक्ति अथवा परिस्थिति केँ ओहिना सीब लैत अछि जेना कोनो महिला सुई मे ताग घुसा ओहि सँ कोनो वस्तु अथवा कलाक निर्माण करैत अछि। तीनू – सुई, ताग आ वस्त्र – आपस मे एना गुथा जाइत अछि जे तीनूक अलग-अलग अस्तित्व ताकब दुष्कर। तीनूक समग्र अस्तित्व सँ कला बनैत छैक। सएह भेल फकड़ा। फकड़ा कें एकाएक उमडल मनोदशाक सम्प्रेषण सेहो कहल जा सकैत अछि जाहि मे सम्प्रेषण केँ अधिक प्रमाणिक आ प्रभावोत्पादक बनेबा लेल उद्धरणक मदति लेल जाइत छैक। कनि फकड़ा केर स्वरुप आ ओकर अनेक रूप पर विचार सेहो करक चाही। मिथिला मे व्याप्त फकड़ा केँ स्वरुप आ उपलब्धता देखैत कहल जा सकैत अछि जे फकड़ा केँ चारि भाग मे विभक्त कएल जा सकैत अछि: (क) वैश्विक फकड़ा (ख) अखिल भारतीय स्वरुपक फकड़ा (ग) मिथिलाक फकड़ा (घ) स्थानीय फकड़ा आब कनि उपर्वर्णित फकड़ाक स्वरुप पर विचार करैत छी। (क) वैश्विक फकड़ा वैश्विक फकड़ा, जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, एहेन फकड़ा भेल जे समस्त विश्व मे प्रचलित अछि। अहि तरहक फकड़ाक प्रयोग मैथिली मे मूल फकड़ा केँ अनुवाद कए होइत अछि। उदाहरण हेतु: Rome was not built in a day। -“रोमक निर्माण एक दिन मे नहि भेल” Child is the father of a man। - बच्चा पैघ लोकक पिता होइत अछि Necessity is the mother of invention। - “आवश्यकता अविष्कारक जननी होइत अछि”। वैश्विक फकड़ा अपन वैश्विक स्वभावक कारणे आ सांस्कृतिक आदान-प्रदानक कारणे मैथिली आ आन भाषा आ सँस्कृति मे सदैव प्रयुक्त होइत रहल अछि। लोकक विभिन्न देश मे भ्रमण, दोसर देश आ सँस्कृतिक मध्य आदान-प्रदान, साहित्य आ भाषाक अध्ययन आदि एकर फैलाव आ व्यवहारक कारण बनैत छैक। (ख) अखिल भारतीय स्वरुपक फकड़ा अहि तरहक फकड़ा समस्त भारत आ ताहू मे हिंदी बहुल क्षेत्र मे प्रयुक्त होइत अछि। मिथिला मे सेहो ओकर मूल रूप मे एकर प्रयोग होइत अछि। कखनोकल भाषाक अनुवाद सेहो कऽ देल जाइत छैक। किछु उदाहरण देखैत छी आ ओकर विवेचना करैत छी: ना राधा को नौ मन घी होगा ना राधा नाचेगी – नहि राधा के नौ मोन घी हेतनि ने राधा नचती। ऊंट के मुँह मे जीरा – “ऊंटक मुँह मे जीरक फोड़न” ऊपर के उदाहरण मे मूल हिंदी फकड़ा के मैथिली मे अनुदित कए कहल गेल अछि। आब दोसर देखू: “लेना देना कुछ नही मुहब्बत एक चीज़ है।” “का वर्षा जब नदी सुखाने/ समय चुक पुनि क्या पछताने” “कबिरा खरा बाजार मे लिए लुकाठी हाथ/ जो घर ज़ारे आपना चले हमारे साथ” “ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय” “बड़े मिया तो बड़े मिया/ छोटे मिया सुभानअल्लाह” “मिया की जुत्ती मिया का सर” उपरोक्त सब फकड़ा अपन भाषा आ ओकर सँस्कार सँग मिथिला मे अबैत अछि। मैथिली भाषी एकर प्रयोग अपन भाषा आ व्यवहार मे एकर मूल रूप मे बिना कोनो जोड़-तोर केने, बिना कोनो अनुवाद केँ करैत छथि आ एकर भाव सेहो बिना कोनो झंझट केँ स्पष्ट होइत जाइत छैक। अखिल भारतीय फकड़ा मे कोनो भाषा जेना मगही, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली, अवधी, उर्दू आदिक फकड़ा आबि सकैत अछि। अखिल भारतीय कहक अर्थ हिंदी मात्र नहि लागक चाही। (ग) मिथिलाक फकड़ा मिथिलाक फकड़ा कहब केँ तात्पर्य भेल जे कोनो फकड़ा जे समस्त मिथिला क्षेत्र मे बाजल जाइत अछि (ओ देवघर, सँथाल परगना, दुमका, भागलपुर, मुंगेर सँ लऽ कऽ नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्र धरि पसरल लोकक फकड़ा), व्यवहरित होइत अछि से फकड़ा। इ फकड़ा सब कमोवेश एक स्वरुपक अछि। अहिमे यद्यपि एक बातक सम्भावना भऽ सकैत अछि जे किछु फकड़ा जे अखिल मिथिलाक स्वभावक अथवा प्रकृति केँ अछि तकर सँचयन सब मैथिली भाषी क्षेत्र सँ लोक परम्परा सँ लिखित परम्परा मे नहि भेल हो। अगर से नहि भेल अछि तऽ मैथिली साहित्य आ सँस्कृति के शोधकर्मी एवं साहित्यजीवी लोकनि एहि बात केँ गंभीरता सँ लेथि आ समस्त मिथिला क्षेत्र सँ लोक परम्परा मे व्याप्त फकड़ा सबहक सँचयन कए ओकर सँरचना आ व्यवहार पर शोध करथि। (घ) स्थानीय फकड़ा स्थानीय फकड़ा ओ फकड़ा भेल जे कोनो विशेष गाम अथवा ओकर अगल-बगल मे कोनो घटना विशेष, अथवा कोनो व्यक्ति विशेष द्वारा रचल गेल हो आ ओहि परोपट्टा मे लोक व्यवहार मे प्रचलित हो। स्थानीय फकड़ा के सम्बन्ध मे एक बात कहब अनिवार्य जे कालक यात्रा सँग नहु-नहु महत्वपूर्ण फकड़ा किछु समयक बाद अखिल मिथिला आ बाद मे अखिल भारतीय आ कखनो काल अंतिम डेग फानैत वैश्विक फकड़ा सेहो बनि जाइत अछि। स्थानीय फकड़ा केर उदाहरण शुरू मे देल गेल अछि ताहि एकरा फेरो सँ देमाक दरकार नहि अछि। अहि तरहें दू बात एक सामान्य पाठक लेल स्पष्ट भऽ गेल: • पहिल, फकड़ा की अछि, एकर परिभाषा विशेषरूप सँ मैथिली भाषा आ सँस्कृतिक सन्दर्भ मे की होबक चाही। • दोसर, मैथिली सँस्कृति मे प्रचलित फकड़ा के कतेक श्रेणी मे बांटी देखल जा सकैत अछि। आब अहि प्रारम्भिक जानकारीक बाद अहि लेख केँ आत्मा अर्थात फकड़ा द्वारा मानवी या मैथिलानी के मनोदशाक सम्प्रेषण कोना होइत अछि। कोना ओ सब अपन मोनक भाव, उतार-चढ़ाव, नीक-अधलाह, प्रेम, वेदना, विरह, सामाजिक स्थिति, उमंग, दुःख, आर्थिक बिपन्नता, आदि कें व्यक्त करैत छथि। व्यक्त करब एक बात भेल आ ओहि अभिव्यक्ति कें बुझब आ ओकरा सँग आत्मसात करब दोसर बात। इ दूनू बात अगर मैथिली फकड़ा आ नारी मनोदशा के देखब तऽ भेटत। भाव अधिकांश अवस्था मे एकक अथवा व्यक्ति विशेषक नहि अपितु समस्त नारी समाज लेल, तऽ कखनोकाल एक वर्ग विशेषक नारी समाज लेल होइत अछि। समाजक सँरचना जे आइ तीव्र गति सँ बदलि रहल अछि ताहि मे सामाजिक-सांस्कृतिक-इतिहासिक आ जेंडर डिस्कोर्स केँ ध्यान मे रखैत अहि विषय पर गहन शोधक दरकार अछि। हम अपन सीमित ज्ञान आ साधन केँ हिसाब सँ अहि पर किछु लिखबाक यत्न कऽ रहल छी। लिखबा सँ पहिने इ स्पष्ट कऽ देनाइ आवश्यक जे समाज बदलि रहल अछि। परिवर्तन अपन गति पकड़ि रहल अछि। परिवर्तन सँग मैथिल मानशिकता सेहो बदलि रहल अछि। लोक बेटा बेटीक विभेद कम कऽ रहल छथि। सब क्षेत्र मे आन समाज जकाँ मिथिलाक धिया सेहो प्रगतिक पथ पर साधल डेग दऽ रहलि छथि। हालहि मे मिथिलाक एक बेटी भारतीय वायु सेना मे पायलट केँ रूप मे चयनित भेलीह अछि। हुनकर चयन पर समस्त मैथिल समाज अपना आपकेँ गर्वान्वित अनुभव कऽ रहल अछि। ओहि धिया केँ चारू दिस सँ शुभकामना भेटि रहल छनि। इ घटना बदलैत मनःस्थितिक परिचायक अछि। एकर अर्थ इहो नहि जे सब किछु ठीक भऽ गेल अछि। विश्व समुदायक बाते छोड़ी दी, भारतवर्ष मे सेहो हम सब बहुत समुदाय, समाज, वर्ग आ राज्य सँ नारी सँचेतना, विकास मे एखनो बहुत पछुआएल छी। समाजक सँरचना देखला सँ एहेन सन लगैत अछि जे समाज मात्र बेटा लेल बनल अछि। ककरो अनेक बेटा भेलैक तऽ ओ भागवंत आ एकर बिपरीत किनको अनेक बेटी भेलनि तऽ बड्ड अधलाह। अहि स्थिति मे समाज ओहि बेटी सभक तुलना पिलुआ सँ करैत कहैत अछि जे फलां स्त्रिगन अथवा पुरुख केँ “खद-खद बेटी” छनि। स्मरणीय तथ्य इ अछि जे खद-खद शब्द पिलुआ लेल कएल जाइत अछि। बातक अंत अतए नहि होइत अछि। सम्मर गीत जे बेटीक बिआह सँ पहिने गाएल जाइत अछि मे माय अपन व्यथा बतबैत कहैत छथि, ‘बहुत भऽ गेल कोनो ढंगक बर नहि भेट रहल अछि। बेटीक जन्म पहाड़ भऽ गेल! की करी कि नहि?’ बेटी मायक दुःख सँ द्रवित होइत अपन नारी होबाक अवस्था सँ पश्चाताप करैत गीत आ फकड़ा केँ मादे कहैत छथि ‘माय, अनेड़े हमरा जन्म कथिलेल देलहुँ? अहि सँ बढियाँ तऽ इ रहैत जे हमरा अर्थात बेटीक जन्म सँ पहिने चालीस पचास मरीच बुकि कऽ खा लितहुँ जकर झांस सँ बेटी गर्भहि मे तुबि जाइत आ जिनगी भरि लेल धियाक सँताप सँ मुक्ति अहाँकेँ भेट जाइत! “कथि लए आहे अम्मा धियाक जनम देल खैतहुँ मरिच पचास मरिचक झाँस सँ धिया दूरि जैतय छुटि जाइत धियाक सँताप” समाज एहि मानशिकता मे जीबैत अछि जे बेटी घर मे अधिक भेलाक अर्थ भेल धनक क्षय आ लक्ष्मीक प्रस्थान। एक फकड़ा मे अहि बातक स्पष्ट प्रमाण भेटैत अछि: “विप्र टहलुआ मेष धन या बेटीके बाढ़ी ताहू सँ धन नहि घटए करू पैघ सँ राडि” इ फकड़ा प्रमाणक सँग डंकाक चोट पर कहैत अछि जे ब्राम्हणक बालक केँ नौकर टहल टिकोरा करक हेतु राखब सँ, छागर-बकरी पोसला सँ आ बेटीक सँख्या बढ़ला सँ धनक क्षति होइत अछि; तकर बादो अगर सम्पति बांचि गेल तऽ अपना सँ पैघ हैसियत केर लोक सँ लड़ाई ठानि लिय, सम्पति बरबाद भऽ जेबे टा करत। फकड़ाक विवेचना सँ लगैत अछि जे बेटी केँ लोक सिनेह करैत अछि, मुदा बेटी कोखि मे अबैक तकर कामना नहि करैत अछि। भले बेटीक सुरक्षा घिबही घैल जकाँ कएल गेल होइक मुदा ओकर प्यार आ दुलार बेटा जकाँ केल जाइत छैक। अर्थ भेल, बेटा अधिक महत्वपूर्ण। अन्यथा, बेटी केँ बेटी जकाँ दुलार किएक नहि? “घीबक घैला जकाँ पोसलहु गे बेटी बेटा जकाँ कएल दुलार” मिथिला मे कोनो महिला लेल बेटाक कामना अतेक प्रबल होइत छैक, तकर उत्तर देब कठिन। एक चिरै बहुत कारुणिक स्वर उत्पन्न करैत रहैत अछि। ओहि चिरै केँ सम्बन्ध मे प्रचलित मान्यता इ छैक जे कोनो जन्म मे ओ चिरै एक मानवी छलि। ओकरा अनेक बेटा होइत गेलैक आ सब मरल गेलैक जखन कि जतेक बेटी भेलैक सब जिल गेलैक। जखन ओ महिला मरलि तऽ बहुत दिन धरि ओकर आत्मा बेटा लेल भटकैत रहलैक बाद मे ओकर स्वरुप बदलि गेलैक आ ओ चिरै बनि जनम लेलक। एखनो ओकरा पूर्व जन्मक बात सब स्मरण छैक ताहिं ओ कारुणिक स्वर मे अपन व्यथा कथा कहैत रहैत अछि: “टी टी टी तिसी तेल बेटा भेल मरि मरि गेल बेटी भेल जीब जीब गेल” अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ उपलब्ध फकड़ा सबहक विवेचन कएल जाय तऽ पता चलैत अछि जे फकड़ा तत्कालीन समाजक दर्पण अछि; समाजक ऐतिहासिक दस्तावेज अछि। अहिबातक पुष्टि निम्नलिखित फकड़ा सँ होइत अछि: “जनक नगर सँ चलली हे सीता अम्मा देलनि रोदना पसार के मोरा सीता लए बसिया जोगेतै के मुख करत दुलार” इ फकड़ा जेना भक्क सँ लोकक आँखि खोलैत हो! इ कहैत अछि जे ताज़ा, तप्पत भोजन खेबाक अधिकारी बेटा अछि, आँठि, बसिया भोजन बेटीक भाग मे लिखल रहैत अछि। बेटी जखन बिआह केँ बाद सासुर जा रहलि अछि तऽ माय कनैत सोचैत छथि, ‘आब सासुर मे हमर बेटी लेल इ बसियो अन्न केँ जोगा’क राखत आ के एकर गाल पकड़ि दुलार करतैक?’ इ फकड़ा बहुत पैघ यात्रा लेल चलि पड़ैत अछि। लड़की मायक चिंता एहि फकड़ा मादे देखू। ओ कहैत छथि जे आब हुनका बेटी लेल इ बसियो भोजन ओकर सासुर मे केँ रखतैक? केँ ओकरा सँ प्रेम सँ बजतैक? यएह सब सोचि-सोचि मायक छाती बेर-बेर फाटि रहल छनि। इ फकड़ा बतबैत अछि जे कोना लड़की सासुर जाइते देरी उत्तरदायित्वक भार सँ दबा जाइत अछि। इ फकड़ा देखन मे छोटन लगे/ घाव करे गंभीर जकाँ अछि। एक आर फकड़ा ऊपर वर्णित फकड़ाक अर्थ स्पस्ट करैत अछि आ बेटीक बिआह भेलाक बाद सासुर गेला पर की स्थिति होइत छैक तकर खाका खीचैत छैक: “जब डारि चलल ससुर घर देस घरक चालनि होयबो हे” अर्थ इ भेल जे आइ धरि जे धिया नैहर मे सुकुमारि छलीह से आब दोसर देस दोसर लोक मे जा रहलि छथि, ओतय हिनकर की गति हएत! काज करैत-करैत आ लोकक बात सुनैत-सुनैत अपसियात रहतीह। मोन चालनि जकाँ अनेक खंड मे विखन्डित भऽ जेतनि। मतलब, इ फकड़ा भविष्यक यातना दिस इशारा करैत अछि। मिथिलाक नारी एक विचित्र मनोदशा आ परिवेश मे जीबैत छलीह। किछुके जीवन मे परिवर्तन आबि रहल छनि अधिकांश एखनो पिता, ज्येष्ठ भ्राता, श्रेष्ठ एवं अभिभावक पर आश्रित छथि अथवा हुनक निर्णय केँ बलधकेल स्वीकार करबा लेल विवश छथि। आश्चर्यक बात इ छैक जे लड़की केँ कहेन लड़का चाही आ ओकरा मोन मे की बात घुमि रहल छैक तकर वर्णन सेहो गीतगाइन सब अपन गीत आ फकड़ाक माध्यम सँ बजैत छथि: “जखन चलला बाबा वर ताकय आगा भए रुक्मिणी ठारि हे कर जोड़ि मिनती करै छी यौ बाबा सुनू बाबा मिनती हमार यौ जुनि बाबा ताकब चोर चंडाल के जुनि आनब तपसी भिखारि यौ” नायिका अपना लेल अपन श्रेष्ठ सँ एक सामान्य बर जे सिनेहक अर्थ जनैत होथि केँ आकांक्षा रखैत छथि। हुनका चोर, चंडाल, लुच्चा- लफंगा अथवा कोनो नंग धरंग साधू सन्यासी नहि चाहियनि। इ फकड़ा एक महिलाक दासताक जीबैत साक्षी अछि। फकड़ा पढ़ैत चलू आ समाजक गढ़नि देखैत चलू। फकड़ा एक-एक तह खोलैत चलत। स्थिति इ भऽ जाइत अछि जे कोनो महिला अगिला जनम मे फेरो महिला नहि बनए चाहैत छथि। दिनकर दीनानाथ सँ निहोरा करैत कहैत छथि जे आब कहियो हुनका तिरिया अर्थात नारी रूप मे जन्म नहि देथि: “बेर-बेर अरजलौं हे दीनानाथ दीनानाथ तिरिया जनम जुनि देहु” पित्रसत्तात्मक समाज अपन मायाजाल मे तेना ने स्त्रिगन केँ फंसा लेने अछि जे ओ सब छरपट- छरपट तऽ करैत रहैत छथि, मुदा ओहि मायाजाल के तोड़ि कहाँ पबैत छथि! समाज सुग्गा जकाँ रटा देने छनि, रटि लेने छथि: “बेटी ससुरे नीक की सरगे नीक” फेर की सब मैथिलानी इ मानि लैत छथि जे कोनो विषम परिस्थिति हो, प्रताड़ना हो, शोषण हो, पति सौतिन लऽ अबैथ, भोजन सम्मान भले ने भेटए, कोनो स्थिति मे सासुर नहि छोड़ी आ नैहर के तऽ चर्चे बेकार! बेटीक डाला नैहर सँ सासुर लेल उठैत अछि आ सासुर सँ बेटीक लाशक डोली उठक चाही। फेरो एकरा समाजिक सँरचना सँगे जोड़ि देल जाइत अछि। बिआह होइते देरी नैहर मे बेटीक अधिकार समाप्त आ भाउजक वर्चस्व प्रारम्भ। अगर बिआहलि आ सासुर बसैत बेटी नैहर मे किछु दखल देलनि तऽ इ अमान्य। फकड़ा एकरा एहि तरहें प्रमाणित करैत अछि: “घर आँगन भौजी के छल छल करथि ननदो” अर्थ स्पष्ट भेल आब जे बेटी बिआह सँ पूर्व पिताक घर पर अपन अधिकार बुझैत रहैत छलीह से हुनकर नहि अपितु हुनक भाउजक भऽ चुकल छनि। ओ अधिकारहीन भऽ चुकलि छथि। कोनो पुरुख ज अहि बातक अनुभव करए चाहैत छथि तऽ एकबेर इ कल्पना मात्र कऽ लेथि जे बिआहक बाद एकाएक हुनका सम्पति सँ बेदखली कऽ देल जाइत छनि, सामाजिक व्यवहार मे ओ निष्कासित भऽ जाइत छथि। फेर कहेन अवस्था मे रहि सकैत छथि। इ कल्पना मात्र हमरा सबके कष्टकारी लगैत अछि आ तकरा एखनो धरि मैथिलानी जीब रहलि छथि से कतेक दुखक बात! आ अहि बातक भान फकड़ा कोना खोलिकऽ स्पष्ट करैत कहैत अछि। एक अवस्था एहेन होइत छैक जखन एक महिला अपना आपकेँ असहाय पबैत अछि आ लगैत छैक जे सब सँस्था, सामाजिक मर्यादा, बिआह-दान, कुल-पलिवार सब किछु बेकार छैक! लोक अनेड़े मायाक बंधन मे बन्हा जाइत अछि! इ सोच कखन होइत छैक? तखन जखन ओ प्रसवक वेदना सँ लहालोट भेल इमहर-ओम्हर ओंघरिया मारैत रहैत अछि। तखन ओकरा लगैत छैक जे अहि सँ बढियाँ ओ बिआह नहि केने रहैत आ पिता-पितामाहक घर मे जीवन भरि कुमारि बनल रहैत: “कथिलेल बाबा बियाहलनि देलनि ससुर घर रे ललना रे रहितहुँ बारी कुमारि दरद नहि जनितौं रे” अनेड़े बाबा हमर बिआह करा ससुर घर भेज देलनि। नीक रहैत जे कुमारि भेल नैहर मे रहितहुँ। कम सँ कम अहि प्रचण्ड दर्द सँ बंचि तऽ जैतहुँ! मिथिलाक सब स्त्रिगन अपना आपमें सीता देखैत छथि। हुनका सबके लगैत छनि जे सीता सँगे रामक व्यवहार उचित नहि रहलनि। अतेक कोमल सीता केँ कोना कठोर भेल राम नाना तरहक यातना देलाह! एहेन राम सँग बिआहक की लाभ? जिनगी भरि सीता केँ सुख कहाँ भेटलनि: “राम बियाहने कोन फल भेल सीता जन्म अकारथ गेल” आ अन्ततः सीता केँ राम धोबी केँ कहला पर तखन घर सँ भगा देलथिन जखन सीता रघुकुलक कुल दीपक केँ जन्म देबा लेल गर्भ सँ छलीह! एहनो कहीं कतौ भेलैक अछि: “राम बियाहने कोन फल भेल सीताक जन्म बियोगे गेल” बात अतए समाप्त नहि होइत अछि। कहल जाइत अछि जे जखन सीता वेदनाक अधिकता सँ भरि गेलीह आ राम हुनका बाल्मीकि आश्रम सँ लव कुशक सँग अयोध्या चलबा लेल जिद ठानि देलथिन तऽ सीता पुछि देलथिन: “हमर अयोध्या मे आब कि प्रयोजन, हमरा तऽ अहाँ निकालि देने छी?” एहि बात पर राम उत्तर दैत छथिन: “अहाँक बिना हमर अश्वमेध यज्ञ सँभव नहि अछि।” सीता: “फेर एखन धरि अहाँ कोना करैत रही अश्वमेध यज्ञ?” राम: “अहाँक कोनो उदेस हमरा लग नहि छल। हम मानि लेने रही जे अहाँक निधन भऽ चुकल अछि। एहेन अवस्था मे शास्त्र इ विधान दैत अछि जे यजमान सोनाक पत्नी बना यज्ञ पर बैस सकैत अछि। हम सएह कएल। सोनाक सीता बना अश्वमेध यज्ञक वेदी पर बैसल रही।” रामक इ बात सुनितहि सीताक करेज फाटि गेलनि। आँखी नोरा गेलनि। भेलनि, ‘रामो सन पति अतेक मतलबी भऽ सकैत छथि!’ भावावेश मे अबैत सीता बाजि उठलीह: “एकर मतलब इ भेल जे अहाँ हमरा अपन यज्ञक लोभे अयोध्या लऽ जेबा चाहैत छी?” राम चुप रहला। सीता फेरो बजलीह: “एकर अर्थ तखन इ भेल जे अहाँक यज्ञ मे हमही वाधक छी?” राम एखनो चुपे छलाह। आब सीता निर्णय दैत बजलीह: “ठीक छैक, हम अहाँक समस्याक तुरत समाधान करैत छी।” राम कनि गंभीर तऽ भेलाह मुदा मौन भेल रहलाह। सीता धरती माता दिस हाथ जोड़ि बैस गेलीह आ निवेदन केलनि: “हे धरती माँ! अहिंक कोखि सँ हमर जन्म भेल अछि। हम आब अधिक वेदना नहि बरदाश्त कऽ सकैत छी। अहाँ आब हमर उपाय तत्क्षण करू। फाटू! एखन फाटू! अतए फाटू! हमरा अपन कोरा मे सुता लिय। आब हम अहि लोक सँ उबि गेल छी!” वनदेवी सीताक गोहार धरती माता तुरत स्वीकार केलनि। धरती मे तुरत दरार परि गेलैक। जाबेत राम सीता केँ रोकैथ तावेत सीता धरती मे प्रवेश कऽ गेलीह। धरतीक पुत्री धरती मे विलीन भऽ गेलीह। धरती पुनः यथावत भऽ गेलीह। एखनो जखन कोनो मैथिलानी कष्ट सँ भरि जाइत छथि तऽ एकाएक हुनका मुँह सँ निकलि पड़ैत छनि: “फाटू हे धरती”। से कहिते ओ सीताक मिनिएचर भऽ जाइत छथि। फकड़ा प्रकृति सँ उद्धरित सेहो होइत अछि। कखनोकाल जखन स्त्रिगन अपन सँतान आ पति सँ तंग भऽ जाइत छथि तऽ अपन तुलना काकोर सँ करैत छथि। तहिना जेना अनेक बच्चा सबके जन्म दैत काल काकोर अपन जान गमा दैत अछि तहिना मैथिलानी सब बाल-बच्चा, पति आ परिवार लेल अपन शरीर आ इच्छा केँ गला लैत छथि। दुखक भार बढ़ला पर बाजि उठैत छथि: “क़कोरबा बियान क़कोरबै खाय” महिला मनक मनोदशा नहुँ-नहुँ अनेक तरहेँ फकड़ा मादें प्रवाहित होइत रहैत अछि। दुख मे, सुख मे, आनंदातिरेक मे, वेदनाक सघनता मे मैथिलानी स्वतःस्फूर्त होइत अपन परिस्थिति केँ कोनो ने कोनो फकड़ा सँ जोड़ि लैत छथि। तथाकथित निम्न जाति अथवा समुदायक लोक सँ ओना तऽ तथाकथित उच्च वर्गक लोक सामाजिक मेल मिलापक दूरी रखैत छथि अथवा सीमित अवस्था मे करैत छथि लेकिन जखन प्रहसन अथवा मजाक प्रदर्शित करबाक होइत छनि तऽ ओहि समाजक स्त्री सँ साम्पियक आकांक्षा रखैत छथि आ मर्यादाक अतिक्रमण करबा मे सेहो सँकोच नहि करैत छथि। महिला सेहो बुईझ लैत छथि जे पुरुखक इच्छा आ आकांक्षा की छनि। जखन पुरुख मर्यादा केँ त्याग करैत छथि तऽ हुनका इहो भान नहि रहैत छनि जे ओ महिला हिनका गाम अथवा समाजक प्रचलित मानदण्ड पर भाउज, भावहु, पुतोहु अथवा की हेतनि! अहि क्षण ओ स्त्रिगण हुनका भाऊज सन लगैत छनि जकर बहुत मुंहतोड़ जवाब फकड़ा दैत अछि: 'रारक बहु सबहक भौजी" अहि दशा केँ देखैत विद्यापतिक एक पद श्मरण अबैत अछि जाहि मे अस्पृश्य सुन्नरि युवतीक पति बिदेस गेल छैक, सासु बहिर तऽ छैके, ओकर आँखि मे रतौंधी सेहो भेल छैक। ओना तऽ समाजक उच्च जातिक उच्च लोक, पुरुख ओकर देह सँ सटब पाप बुझैत छथि लेकिन राति मे वएह पुरुख ओहि कामिनी सँग अपन काम पिपासा शान्त करबा लेल उताहुल छथि, ओहि क्षण लेल ओ महिला हुनक सजाति भऽ जाइत छनि: "अधियन कर अपराधहुँ साति पुरुख महते सब हमर सजाति" महाकवि विद्यापति आगा बढ़ैत कहैत छथि: "भनहि विद्यपति एहि रस गाब उकितहुँ अबला भाव जगाब" विद्यापति तऽ अतेक आगा बढ़ैत ई तक बाजि लैत छथि जे लोक अनेड़े हुनका रसिक कवि कहैत छनि, प्रेमक-श्रृंगार, मिलन-अभिसार आ रतिक्रिया केँ कवि कहैत छनि; असली रस तऽ ओ शोषित आ अर्थहीन युवतीक दुखक बयान करब छनि। ओ अबलाक भाव केँ प्रदर्शित करए बला कवि छथि: "भनहि विद्यापति एहि रस गाब उकितहुँ अबला भाव जगाब" कखनोकाल स्थिति एहेन भऽ जाइत अछि जे दर्द आ भावनात्मक शोषण आ दोहन सँ जखन मैथिलानी भरि जाइत छथि, हिम्मत जखन जवाब देमय लगैत छनि, माथ जखन भिन्नाय लगैत छनि, तखन ओ अपन भड़ास निकलैत बजैत छथि: "नहुँ नहुँ मुती तऽ सन्न-सन्न उठय" उपरोक्त फकड़ा प्रदर्शित करैत अछि जे जखन चारु दिस सँ मोनमे नाना तरहक द्वन्द चलैत रहैत छनि, शोषणक अधिकता एकठाम ढ़ेर भेल जाइत छनि, एक निश्चित अवधिक बाद ओ अपन भड़ास निकालि लैत छथि। ओ कतऽ करतीह। लोकपटल पर लोक धारणाक हेतु। सएह करैत छथि। एक अवस्था एहेन होइत अछि जखन कियोक अपन बैभव केँ बारे मे अनेड़े बखान करैत छथि, ताहि क्षण किछु घोर सत्यवादी महिला केँ अनेड़े फुइसक बड़ाई अथवा पदबड़ाई अनसोहाँत लगैत छनि। बात जखन बहुत आगा बढ़ि जाइत छैक तऽ बाजि उठैत छथि: "गाँरी कहलक पटोर पहिरने रही आँखि कहलक सङ्गे रही" उपरोक्त फकड़ा यथार्थ आ फेकब मे अंतर स्पष्ट करैत अछि। नारी मानशिकताक यथार्थ आ कल्पित मानशिकता केर द्वन्द स्पष्ट करैत अछि। एक सँ दोसरक परिस्पर्धाक विवेचन करैत अछि, समाजक मानशिकता देखबैत अछि। कोनो महिला (अथवा विशेष अवस्था मे पुरूष) जखन व्यर्थक शोर आ अनघोल करैत छथि, अपन कृत्य (अथवा कुकृत्य) केँ झपबाक यत्न मे नीक अथवा भद्र महिला केँ दोख तकैत छथि तऽ उचितवक्ता स्वभावक मैथिलानी हुनका पर तंज कसैत बाजि उठैत छथि: "बट हगनी ने लजाय उपराग देमय जाय" गुनमंती मैथिलानी नारीक महत्व नीक जकाँ बुझैत छथि। हुनका ज्ञात छनि जे मायक भूमिका मात्र माय निभा सकैत छथि। पिता अर्थात पुरुष तऽ मतलबी होइत अछि, भमरा होइत अछि। पुरुख केँ सँतति सँग पत्नी सेहो चाही। महिला केँ सँतति आगा किछु नहि। कोनो तरहक बात भेला पर पुरुख लेल निम्नलिखित फकड़ा पढ़ल जाइत अछि: "माय मुइने बाप पितिया" अर्थ भेल मायक मरैत मातर पिताक व्यवहार सँतानक प्रति बदलि जाइत छनि। पिता दोसर पत्नी केर जोगार मे लागि जाइत छथि। पिता कतबो करुणाशील होथि मायक स्थान लेब असँभव छनि। एक फकड़ा देखु तऽ अर्थ स्पष्ट भऽ जायत: "जे मायक दूध सँ नहि हएत से बापक आंड़ चटने कतऽ हएत" ई फकड़ा जखन कखनो सुनैत छी तऽ हिंदी सिनेमाक एक गीत स्वतः श्मरण आबि जाइत अछि: "बाप का जगह माँ ले सकती है माँ की जगह बाप ले नही सकता लोरी दे नहीं सकता सो जा सो जा" बेटी सामान्यतया मायक गुण आ बेटा पिताक गुण आ स्वभाव किछु ने किछु स्वतः ग्रहण करैत अछि। एकर प्रमाण निम्नलिखित फकड़ा सँ भेटैत अछि: "माय गुण धी पिता गुण घोर नहि किछुओ तऽ थोड़बो थोड़" दोसर फकड़ा माय आ बेटीक बात करैत कहैत अछि जे मायक गुण बेटी सहजे ग्रहण करैत अछि: "भनहि विद्यापति बाँसक टोटी जकर जेहन माय तकर तेहेन बेटी" आब पुरुखक बारी अबैत अछि आ फकड़ा कहैत अछि जे जहिना मायक गुण बेटी करैत छथि तहिना बापक गुण बेटा ग्रहण करैत छथि: "भनहि विद्यापति बाँसक टोटा जकर जेहन बाप तकर तेहेन बेटा" महिलाक़ेँ जतेक अधिकार अपन पति पर रहैत छनि ततेक पुत्र अथवा पुत्री पर नहि। पतिक सम्पति आ टाका पर हुनका पूर्ण अधिकार, सर्वत्र स्वतंत्रता रहैत छनि, ने रोक ने टोक। लेकिन बेटाक सम्पति आ राशि पर मायक अधिकार एकाएक जेना सीमित भऽ जाइत छनि। अहि बातक पुष्टि निम्नलिखित फकड़ा सँ होइत अछि: "सइयां राज अरु राज बेटा राज मुहतककी" पितृसत्तात्मक समाजक सँरचना लोकक मोन मे ई धारणा स्थापित कऽ देने अछि जे बेटी आ बेटीक लोक -पति आ पुत्र - आन होइत अछि, अपन नहि। यएह बात फकड़ा सेहो स्थापित करैत अछि। निम्नलिखित फकड़ा देखला सँ ई बात नीक जकाँ फ़रिछा जाइत अछि: "धी, जमैय्या भगिना ई तीनू ने अपना" मैथिलानी सेहो सहज मोन सँ एकरा स्वीकार कऽ लैत छथि। वैधवयक जीवन बहुत दुःखद होइत रहल अछि। महादेब बर, भंगिया भिखारी प्रवृत्तिक वर सदैव मैथिलानी केँ विशेष रूप सँ ब्राह्मण बालिका केँ भेटैत रहलथिन्ह अछि। बेमेल बिआह एखनो कतौ-कतौ दृष्टिगोचर होइत अछि। हालहि मे हम एक विवाह मे गेल रही। लड़की बहुत सुन्दरि, देहगरि, कटगर, देखनूत रहैक। लड़का कनि दब। ऊपर सँ एक हाथ मे कनि समस्या। राति भरि कतेक बेर स्त्रिगण सब चारि पंक्ति केर गीत गबैत रहली आ पश्चाताप करैत रहलनि। गीतक दू पंक्ति हमरा जीवन भरि लेल स्मरण भऽ गेल जे फकड़ा जकाँ व्यवहरित होइत रहैक: "लोहा मे जड़ि गेल सोना हम जिबै कोना" ज्ञातव्य इ जे अतए लोहा बर आ सोना कनिया छैक। प्रसँग विधवाक छल। चलू अहि दिशा मे चर्च करैत छी। वैधव्यक स्थिति बहुत खराप होइत छल। अगर इ घटना ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ अथवा आन उच्च वर्ग मे होइत छल तऽ स्थिति भयावह भऽ जाइत छल। बारह, तेरह, पन्द्रह वर्षक लड़की विधवा कतेक ठाम भऽ जाइत छलि। विधवा होइतहि पुनर्विवाहक तऽ कल्पनो नहि कएल जा सकैत छल, उपर सँ ओहि लड़कीक सब सुख-सिंगार, नीक भोजन आदि छीना जाइत छलैक। कतेक ठाम तऽ विधवा केँ अंग्रेजी दबाई तक ग्रहण करबाक आज़ादी नहि छलैक। ओकरा सुगधित तेल, साबुन, आदिक व्यवहार करब पर प्रतिबंध लागि जाइत छैक। ओ केश विन्यास नहि कऽ सकैत अछि, नव व्याहल बर कनियाक चुमान करब तऽ दूर, ओकरा लग ठाढ़ तक नहि भऽ सकैत अछि। जेहिना प्रथम सांझ मे असगर तारा देखब अशुभक लक्ष्ण अछि तहिना तऽ विधवा सेहो आब असगर तारा बनि गेल छथि! समस्त हाहाकार मचल अछि। यएह स्थिति केँ देखैत विद्यापति लिखैत छथि: “असगर तारा केओ नहि देख अमंगल लेख” विधबा पर प्रतिबंधक झड़ी लागि जाइत छनि। प्याज-लहसुन, माछ-मांस के पुछैत अछि गरिष्ट भोजन तक करबाक आज़ादी नहि रहैत छनि। हुनक जीवनक ऋतुचक्र जेना एक रंगाह भऽ जाइत छनि जाहि मे सब ठाम दुखक डंका बजैत रहैत छैक! निम्नलिखित फकड़ा के देखला सँ स्थिति स्पष्ट भऽ जाइत छैक: “विधवा घर मे सभ दिन भादब निरधन घर मे कातिक राजा घर मे सभदिन अगहन फागुन घर अहिबातिक” अहि तरहक विपत्तिक सामना करैत विधवाक करेज कराहि उठैत छैक। कुहेस फाटि कानए लगैत अछि। आ भगवान सँ कहैत छनि कोन पापक कष्ट ओ भोगि रहल अछि? ओ अपन वेदना ककरा कहतैक: “हे भगवान कोन कसूर विधना भेल बाम कहब दुःख ककरा सँ” एकर विपरीत पुरुख लेल कोनो प्रतिबंध नहि। पत्नीक निधन भेलाक बाद ओ सब किछु खा सकैत अछि। फेरो बिआह कऽ सकैत अछि। पत्नी मरलैक तऽ की भेलैक! फेर दोसर बिआह भऽ जेतैक। दोसरो पत्नी मरि गेलैक तऽ चिंताक कोनो प्रयोजन नहि, फेरो बिआह भऽ जेतैक! पत्नीक स्थिति अखरा नोनक ढेप सन होइत छैक – खसि पड़ल तऽ उठा लिय: “नोनक ढेप खसल उठा लेब” अति वृष्टि आ अनावृष्टि सँ मिथिला अदौ सँ परेशान रहैत आबि रहल अछि। लोक भूखे रहैत छल। स्त्रिगणक दशा तऽ आरो दयनीय छलनि। ओ बाहर जा नहि सकैत छलीह। भीख कोना मंगती? कखनो कुअन्न, कखनो साग पात, कतेक सांझ उपास करैत जीवन चलबैत छलीह। अहि तरहक स्थितिक विभत्सता दर्शा रहल अछि निम्नलिखित फकड़ा: “बिपत्ति जानि के आनल बजाय अरिपन के चाउर गेली चिबाय” स्थितिक गंभीरता देखू। घर मे स्त्रिगन नाना तरहक कष्ट सहैत रहैत छथि। अतेक खाराप स्थिति भऽ जाइत छनि जे अरिपन लेल जे चाउर राखल छनि सेहो चिबा जाइत छथि। कोनो महिला केँ अगर कियोक अनेड़े मजाक अथवा तंग करैत छनि आ हुनका लग काजक, मूलरूप सँ गृहकार्यक तऽ ओ बाजि उठैत छथि: “घरबला सँ फुरसत ने देओर माँगए चुम्मा” बाल विवाह एक समय मे बहुत पैघ समस्या बनि गेलैक। बेमेल विवाह जेना पसरि रहल छलैक। तकर विवरण कोना फकड़ा दैत अछि से देखू: “तिरिया तेरह, मरद अठारह कन्याक चमकए आँखि, बिआह होअय तमाम छौड़ी बेर-बेर देखए अएना” एक फकड़ा इ इंगित करैत अछि जे कोना महिला कुअन्न खा अपन प्राणक रक्षा करैत छथि आ कोना बूढ़ सँ बिआह कए बिआहक पतिया छोड़ा लैत छथि: “गुडा-खुद्दी खेलौं उपास भंग भेल बूढ़ बिआहलक कुमारि पद गेल” बेमेल विवाहक परिणिति नीक नहि होइत छैक। स्त्रिगन जीवन पर्यन्त ओहि वेदना आ सामाजिक उपहासक पात्र भऽ जाइत छथि। अनेड़े हुनका सँ पैघ उमेरि केँ लोक- स्त्री आ पुरुख सब हुनका जेठ कहि अपमानित करैत छनि। एहने मनोदशाक चित्रण निम्नलिखित फकड़ा मे देखाएल गेल अछि: “हम नहि बूढि गे हम नहि बूढि बूढबा बिआहलक तें हम बूढि” अर्थ स्पष्ट अछि, ओ महिला बूढि नहि छथि, परिस्थिति जाहि करणे हुनक विवाह बुढ़बा सँ भऽ गेल छनि ताहिं ओ बूढि छथि। उपरोक्त फकड़ा नारी मनोदशाक ओहि विशेष अवस्थाक गूढ़ मनोवैज्ञानिक सम्प्रेषण छैक। नारी मनोदशाक अनेक परत होइत छैक। अपन कष्टक सम्प्रेषण एक महिला लोक मात्र मे लोक व्यवहार मात्र सँ कऽ सकैत छलीह। लोक व्यवहार हुनका लेल ब्लैकबोर्ड छलनि। ओ मात्र हुनक स्पेस छलनि। महिला लोक आ किछु पुरुष बच्चा मात्र हुनक श्रोता। वेदनाक अधिकता सँ जखन करेजक कुहेस फाटैत छनि तऽ स्त्रीक दग्धल छाती सँ श्राप निकलैत छनि: “जे मोरा खेलनि खीरिया पुरिया तिनको होइहनु नाश” आर ओ की कऽ सकैत छलीह। हुनका लगैत छनि जे पुरुखक एहने कुकृत्य, अहँकार, निरंकुश व्यवहार सँ संसार मे अकाल, महामारी आदि भऽ रहल अछि। इ बात लोक सँ कखनोकाल मैथिली साहित्य मे सेहो अपन स्थान बना लैत अछि। बैद्यनाथ मिश्र “यात्री” आ काशीकांत मिश्र “मधुप”क रचना मे लोक जेना चढ़ि कऽ बजैत हो! लोक भाव साहित्यक प्रबल पक्ष बनि उठैत अछि। यात्रीक कलम नोर आ शोणितक धार बहबए लगैत अछि। नारी आ विधवा मनोदशा मे जेना ओ तह धरि घुइस जाइत छथि। एक-दू-सौ-सैकड़ा केँ पुछैत अछि, हजारक हज़ार विधवा हुनक माथ पर अपन व्यथा लेने सवार भऽ जाइत छनि। “बिलाप” कविता मे यात्री सत्यक अन्वेषण करैत कविता लिखैत छथि। यथार्थ चार चढ़ि बाजय लगैत अछि। केँ नहि कनैत अछि! पाठक, समाज आ कवि सब बहाबैत अछि नोरक धार: “विधवा हमरे सन हज़ारक हज़ार बहौने जा रहलि अछि नोरक धार ओहि मे ई मुलुक डूबि बरु जाय ओहिमे लोक-वेद भसिया बरु जाय अगड़ाही लगौ बरु बज्र खसौ एहेन जाति पर बरु धसना धसौ भूकम्प हौक बरु फटो धरती माँ मिथिले रहिये क’ की करती!” यात्री नहि रुकैत छथि दोसर-तेसर-चारिम विवाह करयबला बूढ़बा बर सब पर कलम उठा लैत छथि। अग्गब सामाजिक कुरीति पर प्रहार करैत रहैत छथि। नारी शोषण केँ पाठक हेतु पढबाक सामग्री बनबैत छथि। हुनक दोसर कविता “बूढा वर” सेहो एकर प्रमाण अछि। मुदा स्त्रिगन अपन बात ताबेत धरि लोक पटल मात्र पर करैत रहलनि। जमिन्दारक शोषण सँ तंग भेल बुचनीक प्रतिनिधि बनि अपन अमर रचना “घसल अठन्नी” मे मधुप बुचनीक मुँह सँ कहा लैत छथि जे शोषण आ अन्याय केँ चलते जगत मे भऽ रहल अछि अकाल। इ लोकक अभिव्यक्ति नहि तऽ की भेल? घसल अठन्नी केर बुचनी डरल जरुर रहैत छैक लेकिन अपन बात आ श्राप दुनू व्यक्त करैत अछि: आहा! देह तोड़ि क’ कएल काज सुपथो न बोनि अछि भेटी रहल तें जगमे ई पड़लै अकाल उठबितहिं डेग लागए अन्हार मरि जाएब एतइ ककरा कहबै? हित क्यो ने हमर अनुचितों पैघ जनके शोभा भगवान आह!” मधुप नारी शोषण केँ देखैत छथि, अनुभव करैत छथि, अपन ह्रदय मे ओहि परिस्थिति केँ आत्मसात करैत छथि, आ कलम हुनका स्त्रिगणक स्पोकपर्सन बना दैत छनि। कविता बनि पड़ैत अछि। मैथिली लोक परम्परा मे फकड़ा अनंत अछि – विपुल निधि जकाँ। कतबो ताकि लेब तैओ बहुत रहिये जाएत। लेकिन लोक व्यवहार मे ताकब तऽ कोनो निरर्थक नहि लागत। इ भेल फकड़ाक प्रयोजन आ उपयोगिता। जखन महिला कोनो वेदना सँ द्रवित होइत छथि आ हुनक बात कियोक नहि बुझैत छनि तऽ अनायास बाजि उठैत छथि: “गुड़क मारि धोकड़े बुझैत अछि” इ फकड़ा कतेक सार्थक छैक तकर अनुभूति या तऽ महिला कऽ सकैत छथि अन्यथा ओ जे नजदीक सँ ओहि वेदनाक प्रत्यक्षदर्शी रहल अछि। किछु एहि तरहक भाव निम्नलिखित फकड़ा मे कहल गेल छैक: “समाठक माइर उखैरे बुझैत छै” स्मरण इहो राखब जरुरी जे सब भाव अधलाहे नहि होइत छैक। मनोदशा प्रेमक सेहो होइत छैक। लोक जखन अधिक उधियाइत अछि तऽ कहल जाइत छैक: “टिटही टेकल पहाड़” अर्थ भेल अपन औकात सँ अधिक ने बाजी ने करी। कतेकबेर पति पत्नी अथवा कियोक आर अपन स्वयम केँ जीवन आ प्रेम अथवा व्यवस्था मे अतेक लीन भऽ जाइत छथि जे हुनका दोसरक जीवन अथवा सामाजिक मर्यादा केर भान खत्म भऽ जाइत छनि। एहन लोक लेल निम्न फकड़ा कतेक सटीक होइत छैक: “हम सुनरी की पिया सुनरी गामक लोक बनरा बनरी” उदाहरण अनेक अछि – बहुत अज्ञात आ कतेको ज्ञात। सबहक समावेश केनाइ पहाड़ सन लगैत अछि। एहि पर गंभीर काज करक दरकार छैक। इ विषय अनंत महासागर जकाँ अछि। अहि पर साहित्यक अतिरिक्त समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, नारीवाद विज्ञानं, मानवाधिकार, मानवशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास आदिक शोधकर्मी के विभिन्न उदेश्य आ परिकल्पना संग काज करक चाही। इ एक अलग संसारक रचना कऽ सकैत अछि। हमर आलेख केँ अनंत महासागर मे खसल किछु बुंद मात्र मानल जा सकैत अछि जकर समय पड़ला पर अपन उपयोग भऽ सकैत अछि। सन्दर्भ: मिश्र, कैलाश कुमार (2017). “मैथिली लोकगीतमे नारी-दुर्दशाक चित्रण”, घर-बाहर, वर्ष 17, अंक 61, जुलाइ-सितम्बर: 11-17. मिश्र, कैलाश कुमार (2018). “मिथिलाम अर्थात लोक सँस्कृति: एक परिचय” तीरभुक्ति, वर्ष 1, अंक 1, जुलाइ-सितम्बर: 29-35। मिश्र, पंचानन (2017). “मैथिली लोकोक्तिमे स्त्री-जीवन”, घर-बाहर, वर्ष 17, अंक 61, जुलाइ-सितम्बर: 18-20. वर्मा, रामचन्द्र (2009). लोकभारती बृहत् प्रामाणिक हिन्दी कोश. दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन. यात्री, बैद्यनाथ मिश्र (--). “बिलाप”, कविता कोश: kavitakosh.org यात्री, बैद्यनाथ मिश्र (--). “बूढ़ा वर”, कविता कोश: kavitakosh.org मधुप, काशीकांत मिश्र (---) “घसल अठन्नी”: गजेन्द्र ठाकुरक सँ कविता भेटल जगदीश प्रसाद मण्डल पंगु (उपन्यास) साहित्य अकादेमी पुरस्कार (२०२१) सँ सम्मानित कृति ई उपन्यास पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ ISSN २२२९-५४७X VIDEHA मे धारावाहिक रूपेँ ई-प्रकाशित भेल। १. मध्य मिथिलाक सीतापुर गाममे हरिचरणक जन्म भेल। जहिना आन-आनक जन्म गुलाम देशमे–माने अंगरेजी शासित देशमे होइत आबि रहल छल तहिना हरिचरणक पूर्वजोक जन्म होइत आबि रहल छल आ हरिचरणोक जन्म भेल। ओना, गुलामो देश भौगोलिक दृष्टिमे एक्के रंग नइ होइए, ओइ बीच नीकसँ नीको आ अधलासँ अधलो माटि-पानिक गुण रहिते अछि, जइसँ नीकसँ नीको आ अधलासँ अधलो उर्वर शक्ति रहने नीक-अधला दुनूक पैदाइस होइते अछि। सीतापुर गाम ने राजस्थान सन अछि जैठाम झाड़ीनुमा गाछ-बिरीछ छोड़ि खाली छीपगरे-सरगर गाछ बिरीछ हएत आ ने साइबेरिया सन ठंढ मुल्क जकाँ अछि जैठाम काई-लिचेन सदृश बौना गाछ-बिरीछ छोड़ि दोसर कोनो छीपगर-सरगर गाछे नइ हएत। सीतापुर ओहन मुल्क अछि जैठाम छोट-सँ-छोट आ पैघ-सँ-पैघो गाछ-बिरीछ सभ दिनसँ होइते आबि रहल अछि। ऐठामक माटि-पानि मीठ-सँ-मीठगर फलो पैदा करैए आ सुकाठ-सँ-सुकाठ लकड़ियो दइते अछि। जे कि घरक साज-सज्जासँ लऽ कऽ गामक शोभा सेहो बढ़ौने अछि। तहिना भूमि सेहो ने दू रंगक होइए। एकटा भेल सुभूमि आ दोसर भेल कुभूमि। सुभूमिक माने भेल जीवित भूमि आ कुभूमिक माने भेल मरुभूमि। जेकरा रेगिस्तान सेहो कहै छिऐ। दुनूक अपन-अपन गुण-धर्म सेहो अछिए। ओना, गुणो आ धर्मो अविभक्त वस्तु छी मुदा ओहो जगह पेब अपन रूप बदैलते अछि। जहिना मिथिलाक उत्तरवरिया सीमा पर्वत श्रृंखलासँ भरल अछि जैबीच हिमालय पर्वत सन पर्वतो अछि आ कैलाश सन भूमि सेहो अछिए, तैबीच मानसरोवर सन सरोवरो नइ अछि सेहो केना नइ कहल जाएत। तहिना दच्छिनी सीमाक नदीक समूहक बीच गंगा सन पवित्र नदी सेहो अछि। जैबीच सुलतानगंज, सिमरिया घाट सन अनेको पवित्र घाट- सेहो अछिए। सीतापुर गामक सिमान सेहो मिथिलेक सीमाक बीच ने अपन सिमान निर्धारित केने अछि। जहिना गामक नाओं ‘सीतापुर’ अछि तहिना गामक भौगोलिक बुनाबट सेहो अछिए। जइमे सैंकड़ो रंगक फूल-फलसँ लऽ कऽ सैंकड़ो किस्मक अन्नो-अन्नक आ तरकारियोक उपजा-बारी होइते अछि। ओना, मिथिलांचलमे अनेको धार सेहो बहिते अछि जेकर पानि पवित्र-सँ-पवित्र आ अपवित्र-सँ-अपवित्र सेहो अछिए। ओना, दुनूक पहुँच गंगामे होइते अछि, जइसँ दुनू एकबट्ट होइत पवित्र बनि संगे-संग बहैत गंगासागरमे पहुँच समुद्रमे विलीन भइये जाइए। हजार बीघा जमीनक ऑंट-पेटबला गाम सीतापुरमे जहिना सभ रंगक भूमि अछि–ऊँचगर-सँ-निचगर धरि, तहिना ओइ भूमिक उपज सेहो सभ रंगक अछिए। ओना, सालो भरि बहैबला धार, जेकरा चलन्त धार कहै छिऐ ओ सीतापुरमे एकोटा नहि अछि। तँए कि सीतापुर धार रहित गाम अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। सीतापुरमे दूटा धार अछिए। जइमे उत्थर रहने एकटा धार मात्र बरसाते भरि बहैए, जेकरा चौमसिया धार गौंआसँ लऽ कऽ अनगौंऑं तक कहै छैथ। गौंआँ ऐ दुआरे कहै छथिन जे गाममे रहने अपना-अपना ऑंखिये देखबो करै छैथ आ ओइसँ जे हानि-लाभ अछि सेहो भोगिते आबि रहल छैथ। आ अनगौंआँ ऐ दुआरे कहै छथिन जे आनो-आनो गाम देने होइत ओ धार बनलो अछिए आ बहितो अछिए। मुदा दोसर जे धार अछि ओ बरहमसिया चलन्त धार तँ नहि छी, मुदा गहींरगर रहने अखाढ़-सँ-अगहन तक बहैत अछि। तँए ओकरा छह-मसुआ धार सभ कहै छैथ। जहिना खेत-पथार अखाढ़मे अन्नसँ आच्छादित होइए आ अगहनमे उसरन भऽ जाइए तहिना ओ धार पहाड़ी पानिसँ लऽ कऽ धरतीक पानिक बीच अपन धार बना बहिते अछि। वर्फसँ बनल पानि जहिना पवित्र होइए, माने ओइमे सुन्नरताक चमक रहै छै, तेकर विपरीत बर्खाक पानिक बहाब होइए, जे मेघसँ बरिस पाथरक स्थानसँ लऽ कऽ माटिक स्थानकेँ धोइ-पखारि बहैए, जइसँ ओकर रंग मटमैल रहैत अछि। मटमैल एक रूप भेल आ गन्दगीसँ भरल गन्दपन दोसर रूप भेल। मटमैल रहनौं बिना गंदपन रहने गन्दा दोसर रूप भेल। खाएर जे भेल जेतए भेल से भेल तेतए भेल। मुदा सीतापुरक बीच जे धार अछि ओ माटि-पाथरक धोन पानिक अछि, तँए ओकरा गन्दा नहियेँ कहल जा सकैए। गेन्दा फूल जकाँ ओकरो ऑंखिमे चमक छइहे। जइमे बहाउ धारक अतिरिक्त अनेको रंगक जलस्रोत सेहो अछिए। मिथिलांचलक बीचक गाम ने सीतापुर छी तँए गामक अनेको विशेषता अखनो सीतापुरमे चलिए रहल अछि। गामो तँ गाम होइते अछि। मुदा ओहूमे ने नकोर, सकोर आ कुकोरक गुण सेहो होइए। ओना, तीनू गुणसँ सम्पन्न गाम सभ सेहो अछि आ फुट-फुट गुणबला गाम सेहो अछिए। तइमे आन-आनसँ भिन्न सीतापुर गाम अछि। जहिना हजार बीघा रकवाबला जमीन छै तहिना अठारह गण्डा पोखैर सेहो छै तहूमे जाइठबला। जहिना अठारह गण्डा जाठिबला पोखैर सीतापुरमे अछि, तहिना दूटा नमहर पनिझाउबला आ दर्जनो छोट-छोट पनिझाउबला पोखैर सेहो अछिए, मुदा ओ सभ जाइठ रहित अछि। ओना तहूमे दुनू नमहरका जे अछि ओकरा लोक दैंतक खुनल पोखैर कहैए आ बाँकी छोट-छोट जे रंग-रंगक अछि तेकरा सभकेँ चभच्चा, कोचाढ़िसँ लऽ कऽ डोह-डाबर कहैए। भाय! भूमि तँ भूमि छी किने, तहूमे सीतापुर गामक, जे कि मिथिलाक मध्य बसल गाम अछि। ऐठामक भूमिक तँ ई गुण ऐछे जे कुइयाँ-इनारक रूपमे जहिना पतालसँ पानि अनैए तहिना खेत-पथारसँ लऽ कऽ अकास धरिक पानिकेँ सेहो संचित करिते अछि। साए-साए बीघाक दूटा चौरी सेहो अछि। जइमे छह-सात मास तक पानिक जमाव रहैए। जइसँ अन्न, फूल, फल उपैजतो अछि आ ओकर रक्षा सेहो होइत अछि। अन्न-फूल आ फल तँ धरतीक ऊपर होइए। ओहन धरतीपर, जइमे पानि आबि किछु दिन पहुनाइ करैत या तँ अकासमे उड़ि कऽ चलि जाइए वा रसे-रसे पताल दिस सटैक कऽ चलि जाइए वा ऊपरसँ टघैर-टघैर ओही नीचला खेतमे- माने चौरीमे चलि जाइए। ओना, अकाससँ धरतीपर उतैर वएह पानि उड़ि-उड़ि अकासो दिस बढ़ैए आ पतालो दिस ससरैत समुद्रसँ सेहो गड़ाजोड़ी करिते अछि। खाएर जे अपना मन फुरै छै से अपन करैए, अनेरे सीतापुरबलाकेँ एतेक हिसाब लइक कोन काज अछि। हमरा सभकेँ ओतबे से ने मतलब अछि जे नीक-नीक माछ उपजए, नीक-नीक सौरखी, करहर आ बर्री उपजए, तैसंग गाए-महींसकेँ नहाइ-पीबैले आ खेत पटबैले पानि भेटए। बस भऽ गेल जरूरतक पुरती..! लोककेँ अनेरे कोन खगता छै जे धरतीए जकाँ पानियोँक ऊपरमे ओछाइन ओछा कऽ सुतबो करत आ बैस-बैस कऽ ताशो भाँजत। कोन खगता छै जे पचीसीक घर बना पचीसियो खेलत आकि कोजगरा-दिवालीक उत्सवे मनौत। तइले तँ धरती अछिए। सभ किछु रहितो सीतापुर गामकेँ दुश्मनक डर नइ होइ छै, सेहो बात नहियेँ अछि। कोसी-कमलाक बीचबला गामकेँ तँ एते डर छइहे किने जे जँ कहीं कूदि-फानि कऽ कोसीए आकि कमले चलि औत आ गामक माटिकेँ काटि अपन घर बना गामक बासकेँ उपटा देत, ई डर तँ बनले अछि। तहिना मौसमोक डर तँ बनले अछि किने जे उग्र रूप छोड़ि ओहन मरियले रूप बना लिअए जइसँ अकाले पड़ि जाए, जँ से भेल तखन तँ गाछ-बिरीछक संग माछो-कौछ आ गाइयो-महींस ने पियासे परान तियागए लगत। मुदा तैयो हमरा सभकेँ एतेक आत्मबल तँ अछिए जे ज्ञानबलक संग कर्मबलसँ सेहो हम सभ अपन-अपन आत्मबलक रक्षा करिते छी। तँए, आन-आन गामक अपेक्षा हम सभ अपनाकेँ सबल बुझि निर्भय छीहे। निर्भीक बनि अपन गामक रूप-रंगकेँ सजौनहि छी। सजेनौं किए ने रहब? जइ पानिक गति सभदिना अछि ओ जँ खिसिया कऽ रूसबो करत तँ एक साल रूसत, चाहे दू साल आकि तीन साल रूसत सएह ने, मुदा हमसभ तँ बारह सालक रूसलकेँ बौसैक लूरि रखने छी। ओहिना नहि ने गामक नाओं सीतापुर अछि..! हजार बीघाक सिमानमे बान्हल सीतापुर गाममे जहिना ऊपर-निच्चाँ खेत बनल अछि, जेकरा लोक उपरारि भीठसँ लऽ कऽ मध्यम नीचरस आ चौरी कहैए, तहिना अनेको रंगक माटियो अछि जे नीकसँ नीक आ अधलासँ अधला अछि। माने अधिक उर्वर शक्तिबला माटिसँ लऽ कऽ कमसँ कम उर्वर शक्तिबला माटि सेहो अछिए। पचीसोसँ ऊपर रंगक माटि गाममे अछि, जेना- खरिआए, मटियार, उस्सर, बलुआही, चिक्कैन, धुसरी, दोरस, तेरस, गाबीस इत्यादि...। ओना, उपज माटियोक हिसाबसँ होइए आ जमीनक ऊपर-निच्चाँ आकारक हिसाबसँ सेहो होइते अछि। जइसँ धान, गहुम, मरूआ, मकइ, खेसारी, मौसरी, राहैर, केराउ, बदाम, तीसी, सेरसो इत्यादि पचासो रंगक जजाति उपजैत अछि। तैसंग खैहन, दलिहन, तेलहनक अनेको रंगक जिनिसक उपज सेहो होइत अछि। तेतबे नहि, रंग-रंगक तीमन-तरकारी जेना- अल्लू, कोबी, बैगन, टमाटर, झिमनी, रामझिमनी, सजमैन, कदीमा, घेरा इत्यादि सेहो उपैजते अछि। रंग-बिरंगक मात्र अन्ने-तरकारी नहि, पचासोसँ ऊपर रंगक फलो आ फूलोक उपज सेहो होइत अछि। आम-जामुन, लताम-लीची, सरीफा, ऑंता, बेल, धात्री इत्यादि वृक्षनुमा गाछक संग झाड़ीनुमा गाछक फल सेहो उपैजते अछि, जेना- नेबो, दारीम इत्यादि। जहिना नमगर-छरगर फलक वृक्ष अछि तहिना बौना किस्मक फलक गाछ सेहो अछि जेना- सरीफा, अनरनेबा इत्यादि-इत्यादि। तेतबे नहि, अन्न-तीमन-तरकारीक संग अनेको किस्मक साग-पातक उपज सेहो होइत अछि, जेना- गेनहारी, ठढ़िया, पटुआ, घौका, लफ इत्यादि। संग-संग लत्तीनुमा तरकारीक अलाबे जहिना गाछनुमा तरकारीक उपज होइए तहिना फूलोक अछि। चम्पा, शिवलिंग, करबीर, अड़हुल इत्यादि जहिना वृक्षनुमा गाछक फूल होइए, तहिना जूही, चमेली, बेली इत्यादि झाड़ीनुमा गाछक होइए आ तहिना लत्तीनुमाक सेहो अनेको फूल फुलाइते अछि...। मोटा-मोटी यएह कहि सकै छी जे सीतापुरमे जहिना पचासो रंगक अन्न, पचासो रंगक फल, पचासो रंगक तीमन-तरकारीक संग पचासो रंगक फूलोक उपज होइत अछि। अन्न, फल, फूल, साग-पात आ तीमने-तरकारी जकाँ सैंकड़ो किस्मक माछ सेहो पोखैर-चौरी आ डबरा-कोचाढ़िमे होइत अछि। जहिना रंग-रंगक अन्न तहिना रंग-रंगक माछो होइए। तहूमे सुअदगर-सँ-सुअदगर माछ, जेना- रोहु, भाकुर, गैंची इत्यादि होइए तहिना मध्यम स्वादक- बुआरी आ भुन्ना माछ सेहो होइते अछि। जहिना तीमन-तरकारी आकि फल-फूल रंग-बिरंगक आकारक होइत अछि तहिना माछो अनेक रंगक आ अनेक आकारक होइत अछि। रोहु, बुआरी, भुन्ना आ भाकुर नमहर आकारक माछ होइत अछि तहिना नैन, सौरा इत्यादि मध्यम आकारक माछ सेहो होइते अछि। आ छोट आकारमे कोतरी, इचना, मारा, डेढ़बा, पोठी इत्यादि अनेक माछ अछि। तैसंग माटि-पानिक बीच बसैबला काँकोर, डोका, घोंघी इत्यादि सेहो होइते अछि। गाए, महींस, बकरी, भेड़ा, घोड़ा, हाथी, गदहा इत्यादि अनेको रंगक जानवर सेहो होइत अछि। ओना, जानवरो-जानवरमे गुणो आ उपयोगोक दृष्टिसँ अन्तर सेहो होइए। मुदा पालतू जानवर तँ छीहे। अन्ने-फल आ तरकारीए जकाँ किछु जानवर खाइयोबला होइते अछि। तैसंग दुधारूओ आ सवारियोबला नइ होइए सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। जहिना एक दिस बकरीक दूधो होइए आ दोसर दिस ओकर मौसु सेहो खाएल जाइत अछि। ओना, आरो जानवर सबहक मौसु खाएल जाइए, मुदा किछु एहेन जे दुधारूए रूपमे अछि, जेना- गाए-महींस इत्यादि। तहिना किछु एहनो अछि जे सवारियेक उपयोगमे अबैए, जेना- घोड़ा, हाथी...। ओना, घोड़ाकेँ मनुखक सवारीक संग चीजो-वौस उघैक काजमे आनले जाइए। तहिना गदहो अछिए, जे मनुखक सवारीमे तँ कम-सम्म उपयोग होइए मुदा वस्तु-जातक लेल बेसी होइए। तहिना गाइयोक अछि, मादा पक्ष जहिना दूधक काजमे अबैए तहिना नर पक्षसँ हरक संग गाड़ियो जोतैक काजमे लगौले जाइए। तैसंग कुत्ता-बिलाइ सेहो अछि जेकर उपयोग ऐछो आ नहियोँ अछि। जहिना अनेको रंगक घरैया जानवर अछि, माने पोसै-पालैबला जानवर तहिना अनेको रंगक बोनैया जानवर सेहो अछिए। ओना, सीतापुर गाममे हाथी, बाघ, सिंह, भालु सदृश जानवरक बसै-जोकर वन तँ नइ अछि मुदा बोन-झाड़ ऐछे नहि, सेहो केना कहल जाएत। भलेँ ओहन वन नइ हुअए जइमे हाथी, सिंह अपना अधिकारे, अपन पूर्ण स्वतंत्रताक संग सिंहभूमिक बोन जकाँ आकि असामक बोन जकाँ नइ बसि सकए, मुदा तँए कि ओइ बोनैयाकेँ पालल-पोसल नइ जाइए सेहो बात नहियेँ अछि। हँ! एकरा ऐ रूपमे देख सकै छी जे जहिना हाथी बोनोमे बास करैबला अछि, तहिना गृहवासूओ छीहे। तहिना हरीनक सेहो अछि। ओना, जहिना पालतू गाए अछि तहिना बोनैया गाए सेहो अछि मुदा ओइ गाएकेँ ‘नील गाए’क नाओंसँ जानल जाइए। नीलो गाइक संख्या कम अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। आन गाममे जेते हुअए वा नइ हुअए, मुदा सीतापुर गाममे नील गाइक संख्या पोसैबला गाएसँ बेसीए अछि। जँ नइ अछि तँ गामक हजार बीघाक खेतक उपजा केना खा जाइए? जँ ओकरो पकैड़ कऽ दुधारू गाए बनौल जाए तँ अनेरे ने गाममे दूधक बाढ़ि भदवरिया पानिक बाढ़ि जकाँ दूधेसँ भरि जाएत। मुदा केते लोक खेबे करत, तहूमे आब सीतापुरक लोककेँ तेतेक ने मोबाइल, टी.भी, कम्प्यूटर-सभ भऽ गेल अछि जे दुहै-औंटैक छुट्टी छइ। आब तँ बजारेक रेडीमेड दूधक पैकेट आनि आसानीसँ अपन काज चला लइए। एक दिस ऑंखि मोबाइलपर देने रहैए आ दोसर दिस अन्दाजेसँ बर्तनमे उझैल तीनकेँ तेरह करैए आकि तेरहकेँ तीन करैए आकि की करैए से तँ ओ जानए, मुदा एना नइ करैए सेहो केना नइ कहल जाएत। किए लोक अनका-ले भोरे-भोर झूठ बाजत। खाएर जे अछि से गाममे अछि, गामक बात भेल। अपन गामक कुचिष्टा करब पातकिये लोकक काज भेल। हम ओहन छी नहि, तँए खाली सपनौतीए कहलौं, देखनौती आकि करनौती बनि नहि कहलौं। सीतापुर गाममे जहिना घरबास अछि तहिना बनबासो अछिए। बनो तँ वन छी, जेकर माने भेल अधिक संख्याक समूह। जहिना वृन्दावन वृन्द लोकक वन छी, जइमे कृष्ण लीला केलैन तहिना रामो जइ बनमे चौदह बरख बितौलैन, जेकरा तत्काल रामवन कहि सकै छी, सेहो तहिना अछिए। गाछ-बिरीछक वन सेहो होइए। जइमे फलो-फूल लगैए आ सुगन्धित वृक्ष रहने सुगन्धक उपयोगमे सेहो अबैए आ इमारती वृक्षसँ घरक साज-सज्जा सेहो बनौले जाइए। तहिना ओहन वृक्षक वन सेहो अछिए जे मीठ-सँ-मीठगर फल दइए। गाछे-बिरीछ जकाँ घरोक वन होइए, किएक तँ ओहो समूह रूपमे रहैए आ ओइमे रहैबला मनुखोक वन तँ कहले जा सकैए। खाएर जे अछि कि नहि अछि मुदा फलदार वृक्षक वन तँ परियाप्त अछिए। एक बेर चतुराबाबू– चतुरानन मिश्र जे भारत सरकारक पूर्व कृषि मंत्री रहैथ, पोलैंड गेला। पौलैंडमे फलक अनेको किस्मक उपज होइए, पोलैंडक सुप्रीमक संग जखन बैसला आ देशक बड़प्पनक बात उठल तँ पोलैंडक सुप्रीमक विचारक ऊपरमे अपन विचार लदैत चतुराबाबू बजला- ‘हमरा देशक कनौसियो-बरबैर अहाँक देशमे फलक उत्पादन नइ अछि!’ चतुराबाबूक बात सुनि पौलैंडक सुप्रीम अपन नजैर उठौलैन। उठल नजैर देख चतुराबाबू बजला- ‘ओना नहि फरिछाएत। एक फलक एक किस्मक नाओं अहाँ बाजू आ एकटाक नाओं हमहूँ बाजब। अनेरे ने अन्तो-अन्त फरिछा जाएत।’ पौलैंडक सुप्रीम राजी भेला। गिनती शुरू भेल। पहिने ओ अपन एकटा फलक नाओं बजला। तैपर चतुराबाबू कहलखिन- ‘आम।’ फेर ओ दोसर बजला। पुन: चतुराबाबू कहलखिन- ‘आम।’ अहिना जखन सात-आठ बेर ‘आम’ कहलखिन। लगातार आमे-आम सुनि पोलैंडक सुप्रीम चौंकैत पुछलखिन- ‘अहाँ खाली आमे-आम कहै छिऐ, दोसर-तेसर कहाँ कहै छिऐ?’ तैपर चतुराबाबू मुस्की दैत जवाब देलखिन- ‘हमरा ऐठाम गाछोक रंग-रूप, फलोक रंग-रूप आ सुआदो-गुणक हिसाबे आमक एतेक किस्म अछि। तैसंग आमे जकाँ आन-आन जामवन्तो फलक वन अछि।’ हजार बीघाक सीतापुरमे चारि आकारक भूमि अछि। पहिल आकारक जे ऊँचरस भूमि अछि, ओकरा उत्तम कोटि भूमि मानल जाइए। ऊँचरस भूमि प्राय: बासक उपयोगमे अछि, तँए ओकरा बासभूमि सेहो कहै छिऐ। ओना, केतेको गाममे बालुक ढेरसँ टीलानुमा ऊँचगर भूमि सेहो अछि, मजबुरिये ओइठामक लोक ओहूपर घर बनैबते छैथ मुदा ओ घटिया माटिक भूमिक बास भेल, से सीतापुरमे नहि अछि। सीतापुरक अधिकांश बासभूमि करिया माटिक अछि, तँए ओ नागभूमि सेहो कहाइत अछि। दोसर आकारक जे भूमि अछि ओ आकारक हिसाबसँ तँ बासे भूमि जकाँ अछि मुदा ओकर उपयोग ओना घरो बनबैमे भइये सकैए मुदा से नहि, ओइमे लोक गाछी-कलम लगबैक संग अन्न, तीमन, तरकारी लगबै छैथ। जेकरा चौमासो कहै छिऐ आ भीठ सेहो कहल जाइत अछि। तेसर अछि नीचरस भूमि, माने गहींर जमीन जेकरा धनहरो कहै छिऐ आ गोरहा सेहो कहै छिऐ। गोरहामे बरसातक समय पानिक बास भऽ जाइए जइ कारणे ओइमे तीमन-तरकारी आकि गाछ-बिरीछ लोक नइ लगबै छैथ। ओइमे खाली पनिसहू अन्न जेना- धान होइए। ओना, बारह मासक सालमे मात्र तीनिए-चारि मास ओइमे पानि बसैक सम्भावना रहै छै, बाँकी समय ओहो सुखले रहैए। ओहूमे आन-आन अन्नो आ तीमनो-तरकारीक खेती होइते अछि। चारिम आकारक भूमि ओहन अछि जइमे बारहो मास पानिक बास रहैए। ओना, आन गाम जकाँ सीतापुरमे एहेन भूमि नहि अछि, मुदा छह मास पानिक बासबला भूमि नहि अछि सेहो तँ अछिए। खाएर जे अछि जेहेन अछि से अछिए, मुदा आठ साए परिवारक घरो आ भोजनो तँ ओही हजार बीघासँ प्राप्त होइत रहल अछि। ओना, किछु गोरे बाहरसँ अन्न खरीद कऽ सेहो अनै छैथ, तँ किछु गोरे बहरबैयाक हाथे बेचबो तँ करिते छैथ। तँए दुनूक जोड़-घटाव भेने बराबर भेल। सीतापुर मिथिलांचलक अदौक गाम छी, नवघरिया वस्ती नहि। ओना, कोसी-कमला धारक भीरमे नवघरक वस्तियो अछिए, मुदा ओहो नवघरिया गाम तँ नहियेँ भेल। ओना मनुखक पीढ़ी बदलने बुझिमे तेहेन आबिए सकैए। मुदा छी ओहो मिथिलांचलक प्राचीने गाम, जे कोसी-कमला धारक कटनियासँ कटि गेल आ धारकेँ घुसकने पुन: गाम बसि गेल। तँए, कोसी-कमलाक कटिनियाँ दुआरे गामक इतिहास हेरा जाएत सेहो तँ उचित नहियेँ भेल। भलेँ ओकरा ‘नवघरिया गाम’ नहि कहि ‘पुनर्वास गाम’ कहि सकै छिऐ। मुदा तहूमे एकटा बाधा उपस्थित भइये गेल अछि। ओ ई जे गामक नाउए बदैल दोसर-तेसर नाओं रखि देल गेल अछि। खास कऽ नवटोलक नाओंसँ कएटा नवटोल गामे भऽ भऽ गेल अछि। खाएर जे अछि, जेतए अछि से अछि तेतए अछि। मुदा सीतापुर अदौक गाम छी, जेकर रूप अखनो ओहिना झलैक रहल अछि। से दुनू दृष्टिये, घरक रंग-रूपक दृष्टिये सेहो आ मनुखक दृष्टिये सेहो। घरक दृष्टिये सीतापुरमे जहिना अदौमे गामक घर-दुआर घास-पात आ खरही-बाँससँ बनैत छल तहिना अखनो ओगरबाह-रखबारक संग गरीबक घर अछिए। अखनो ओहने घर बनैए, जइमे बरसातो आ शीतलहरियोमे लोक बास करिते छैथ। तँए कि गाममे पक्का मकानक दू-मंजिला, तीन मंजिला घर नहि अछि सेहो अछिए। सभ तरहक सुख सुविधा- पानि-बिजलीक संग हवा-ले पंखा, भोजन बनबैले गैस चुल्हि वा बिजली चुल्हिसँ सम्पन्न अछि। मुदा तँए कि सीतापुरमे लकड़ीक जारैन वा गोबरक गोरहा-गोइठा आकि गाछक-पातसँ भानस नइ होइए, सेहो होइते अछि। तहिना बिजली पंखाक जगह ताड़क पातक पंखा, डोमौआ बिअनि नइ अछि, सेहो अछिए। तेतबे नहि, बिजलीक इजोतक जगह लालटेन, लेम्प, डिबियाक उपयोग सेहो होइते अछि। तहिना पानिक इनार-पोखैर सेहो अछिए। भलेँ गाममे टंकी आ चापाकल सेहो अछि, मुदा सौंसे गाममे नहि। खण्डित गाममे जरूर अछि। जइसँ कखनो बिजलीसँ तँ कखनो गैस चुल्हिसँ गाम खण्डित होइते अछि। ओना, आरो-आरो बहुत एहेन चीज अछि जइसँ गामकेँ खण्डित रूपमे देखल जा सकैए जेना- शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि-इत्यादि, मुदा अखन से सभ नहि अखन मात्र एतबे। एक दिस जहिना दू-तल्ला, तीन-तल्ला नमगर-चौड़गर पक्का मकान अछि तहिना दोसर दिस छोट-छोट एक-तल्ला मकानक संग भीतघर, टटघर सेहो अछिए। समुद्रे जकाँ ने गामो होइए। समुद्रमे जहिना नमहर-नमहर माछ-कौछु होइए तहिना ने नमहर-नमहर गोहि, नकार, सोंसक संग आनो-आन जल-जानवर सभ सेहो रहिते अछि, जे मनुखोकेँ खाइत अछि। हजार बीघा जमीनबला सीतापुर गाममे आठ साए परिवारक बास अछि। आठो साए परिवारक बीच पाँच हजार लोक छैथ। माने सीतापुरक आवादी पाँच हजार अछि। ओना, आठो साए परिवारमे ने एके-रंगक लोक अछि आ ने एके रंग खेत-पथार अछि। ओना, लूरि-बुइधिक हिसाबसँ सेहो अन्तर अछिए, मुदा से अखन नहि। अखन खाली जनसंख्या आ सम्पैतक हिसाबसँ जे भेद अछि मात्र तेतबे। सीतापुरमे जहिना अदौमे संयुक्त परिवार छल तहिना अखनो अछि मुदा से अछि मात्र पाँचेटा परिवारमे। ओना, ई कहब जे सभ दिनसँ पाँचेटा ओहन परिवार रहल से बात नहि अछि। पहिलुका हिसाबसँ ओइमे कमियो आएल आ बढ़ोत्तरियो भेल, जे अखन दस-बारह परिवारपर आबि अँटकल अछि। ओना, ओहू परिवारमे सभ तरहेँ एकरूपता नहियेँ अछि, किछु-किछु जहिना समता अछि तहिना विषमता सेहो अछिए, मुदा किछु अछि संयुक्त परिवार तँ अछिए। सीतापुरमे पाँचटा ओहन संयुक्त परिवार अछि जइ परिवारमे गामक तीस प्रतिशत जमीन अछि। ओना, ओहू तीस प्रतिशत खेत-पथारमे पाँचो परिवारकेँ एकेरंग नहियेँ अछि, कम-बेस अछिए। सभ तरहेँ ओ पाँचो परिवार भरि गाममे नीक मानल जाइत अछि। जहिना घर-दुआर तहिना बास-अगवास आ तहिना गाछी-कलम, बाड़ी-फुलबाड़ीक संग अन्न-तीमन, फल-फलहरी उपजक हिसाबसँ सेहो बेसियो अछि आ नीको अछि। बाँसक बीट जकाँ ओ परिवार सघन अछिए। सघनो केना ने रहत, आमक गाछ जकाँ बाँस थोड़े होइए जे सदिकाल असगरे रहए चाहत। आम-कटहर इत्यादिक गाछ एकपुरखिया होइए, तेकर कारणो अछि जे ओ माटिपर एकटा रहितो जेना-जेना निच्चासँ ऊपर जाइए, तेना-तेना डारि फुटैत सघन होइत मेघ डम्बर जकाँ चतैर जाइए, जइसँ दोसराक चतरब बाधित भऽ जाइ छइ। तैसंग नमहर भेने ओकर माटिक निच्चाँमे सिरो तेहेन भऽ जाइ छै जे दोसराक वृद्धिकेँ रोकि दइए। मुदा बाँस से नहि अछि, ओ तँ केरा-खरही जकाँ जहिना निच्चामे माटिपर रहैए तहिना अपना ऊपर चतरल पातकेँ सेहो ऊपर उठबैत जाइए, जइसँ ऐगला पीढ़ीकेँ अपन वृद्धिमे बाधा नइ भेने ओहो बढ़िते अछि। दोसर कारण ईहो अछि जे आम-कटहर ओहन नपुंसक सन्यासी जकाँ होइए जेकरा सन्तानोत्पत्तिक शक्ति रहितो ओकर रूपे बदैल जाइ छै। माने भेल जे आम-कटहरकेँ सन्तानोत्पत्तिक जे रस्ता छै तइमे पहिने फूल होइए, जेकरा बीच फड़ होइ छै आ ओइ फड़क बीच बीआ होइ छै, जइ बीआसँ गाछ होइए। तँए अपना शरीरमे, माने अपन गाछमे सन्तान उत्पत्तिक शक्ति रहितो शरीरसँ वंशक वृद्धि नइ कऽ पबैए। मुदा से अवगुण बाँसमे नहि अछि। ओना, केरे-खरही जकाँ बाँसोमे एहेन अवगुण अछिए जे फूल-फड़ होइतो ओकरा उत्पादित शक्ति नइ छइ। दोसर बात ईहो अछि जे जहिना आम-कटहरक औरुदा बेसी अछि तहिना बाँसोक छइ। जहिना बाँस साल भरिक पछाइत धिया-पुता जनमाबैए, माने कोंपर दइए, तहिना आमो-कटहर साल भरिमे तँ नहि, मुदा पान साल पुरैत-पुरैत ओकरोमे धिया-पुता जनमाबैक शक्ति आबिये जाइ छै, आबिये नइ जाइ छै, जनैमतो छइ। तैबीच एहेन अन्तरो तँ अछिए जे कौआ-मेना जकाँ बाँस अपन अण्डाकेँ सेबैत बच्चोक ऑंखि फोरि संग छोड़ैए, मुदा आम-कटहरक बीच लोकक प्रवेश भेने, माने ओकर बीआकेँ रोपैक क्रिया भेने, बाँस जकाँ सम्बन्ध नहि रहैए। ओना, औरुदाक हिसाबसँ आमे-कटहर जकाँ बाँसोक औरुदा देखैमे नइ अबैए मुदा जैठाम आम-कटहरमे पाँच सालक पछातिये फूल-फड़ होइ छै तैठाम बाँस महान साधक जकाँ भऽ जाइए, किएक तँ बाँसमे चालीस बर्खक पछाइत फूल-फड़ होइए। खाएर जे होइए, जेकरामे होइए से होइए तेकरामे होइए। अनेरे बाँस-गाछक हिसाबमे लोक किए पड़त जे ओइ चालीस बर्खक बाँसक फूल-फड़सँ आम-कटहर जकाँ गाछो होइ छै की नहि होइ छइ। पाँचो संयुक्त परिवारमे जनसंख्यो आ ओकर गुणोमे अन्तर अछिए। जनसंख्याक हिसाबसँ जहिना दू परिवार सघन बोन जकाँ बुझि पड़ैए, माने पचाससँ ऊपर जनसंख्या दुनूक परिवारक रहने, तहिना जे शेष तीन परिवार अछि ओहो तीन रंग अछि। दू परिवार ओहन अछि, जेकरा समाजमे एकपुरखिया परिवार कहल जाइए, ओ पाँच पुस्तसँ एकठाम संयुक्त रूपमे रहितो पाँचे पुरुख आ पाँचे नारीक बीच बनल अछि। ओना, बेटाक बाढ़िमे घटबी भेने असगरुआ होइत गेल, जखन कि बेटीक बाढ़ि तँ भेबे कएल। जे अपन पिताक परिवार छोड़ि-छोड़ि सासुर बसैत गेली जइसँ संयुक्त परिवार पतराएले रहल। गुणक हिसाबसँ सेहो पाँचो परिवारजनक बीच अन्तर अछिए। दू परिवारक लोक ओहन अछि जे किसानी जिनगीसँ जुड़ल रहल, जइसँ किसानी लूरि-बुधि तँ जरूर भेलै मुदा से खेत उपजबैक लूरि धरि सीमित रहि गेल। बाँकी तीन परिवारमे दू परिवारक हिसाब-किताब एकरंगाह रहने एकरंगाहे रहल, मुदा एक परिवारक वृद्धि अगिया-बताल जकाँ भऽ गेल अछि। अगिया-बताल ई जे जहिना शास्त्र-पुराणकेँ धँगनिहार सभ छैथ तहिना ज्ञान-विज्ञानकेँ सेहो धॉंगैत आबि रहला अछि, तँए गामक सभ परिवारसँ देखबोमे आ चालियो-ढालिमे अन्तर बुझि पड़िते अछि। गामोक लोक सभ आ अड़ोसी-पड़ोसी, ओइ पाँचो परिवारकेँ अगुआएल बुझिये रहल छैन। सीतापुर गामक दू साए परिवार ओहन अछि जेकरा बीच गामक पाँच साए बीघा जमीन अछि। ओना, ने सभ परिवारकेँ एके रंग जमीन छै आ ने परिवारे एकरंगक अछि। ओ दुनू साए परिवार किसान परिवारक रूपमे जानलो जाइए आ अपनो बुझैए। किछु परिवारकेँ पाँच बीघासँ दस बीघाक बीच जमीन छै जे जन-बोनिहारक हाथे अपन खेती करैए, बाँकी परिवारकेँ दस कट्ठासँ पाँच बीघाक बीच खेत छै जे बेर-बेगरतामे जनो-बोनिहारक उपयोग करैए आ अपनो हाथे खेती-बाड़ीक संग मालो-जाल पोसैए। शेष जे छह साए परिवार अछि ओकरा बीच मात्र दू-साए बीघा जमीन छइ। किछु परिवारकेँ अपन बासो भूमि नहि छै आ किछु परिवारकेँ बास भूमि छइहो तँ जोतसीम जमीन नइ छइ। तहिना किछुकेँ बास भूमिक संग दस कट्ठा-पाँच कट्ठा जोतो जमीन छइ। ओना, ओ सभ खेत-मजदूरक रूपमे जानल जाइए, जे गामोक किसानक खेतमे काज करैए आ मौका-कुमौका पूभर सेहो चलि जाइए। पूभरक माने भेल- आसाम, बंगाल। पूभर ओ सभ दू सिजिनमे जाइए। डेढ़ मास, दू मास ओतए रहैए आ ओमहरसँ कमा कऽ आनि परिवार चलबैए। अखन जे चर्च भऽ रहल अछि ओ देशक अजादीसँ पूर्वक, माने १९४७ इस्वीसँ पहिने आ १९४० इस्वीक पछातिक। ओइ समैयक बोनिहार पंजाब नइ देखने छला। जहिना रंग-रंगक जाति आन-आन गाममे अछि तहिना सीतापुरमे सेहो अछि। ओना, कोनो गाम एहेन नहियेँ अछि जइ गाममे सभ जाइतिक लोकक बास हुअए, आ ने कोनो गाम एहेन अछि जइमे खाली एक्के जाइतिक लोक बास करैत होथि। तँए जाइतिक आधारपर एक जाइतिक एक्कोटा गाम नहियेँ अछि। किछु जाति कोनो गाममे अछि आ कोनो गाममे नहियोँ अछि। खाएर जे जेतए अछि, मुदा सीतापुर गाममे पच्चीस-छब्बीस रंगक जाति अछि। जाइतिक हिसाब जेना सभ बुझिते छी जे उच्च जाति, मध्यम जाति आ निम्न जाइतिक रूपमे जाति सभ अछि, तइ हिसाबसँ सीतोपुरमे सभ जाति छथिए। आने गाम जकाँ सीतापुरक लोक सेहो छैथ जे खेती-पथारीक संग आनो-आन वृत्ति करै छैथ। किछु नोकरिहारा छैथ, तँ किछु पुरहित-पुजेगरी सेहो छैथ आ अधिकांश जाति ओहन छैथ जे अपन जातीय वृत्तिकेँ अपनौने छैथ। जेना केशकट्टीक काज नौआ करै छैथ, कपड़ा धोइक काज धोबी करै छैथ, लकड़ीक काज बरही, लोहाक काज लोहार, बाँसक बरतन बनबैक काज डोम करै छैथ आ माटिक बरतन बनबैक काज कुम्हार करै छैथ। इत्यादि-इत्यादि जातीय वृत्ति आने गाम जकाँ सीतापुरक लोक सेहो करिते आबि रहल छैथ। आइसँ आठ साए बर्ख पूर्व सीतापुर गामक नामो-निशान नइ छल। शुरूमे माने आठ साए बर्ख पूर्व, मात्र दू गोरे अपन परिवारक संग सीतापुर गाम एला। एक-दोसरसँ दुनू अनठिया छला। गामक भूमि सोहनगर छेलैहे, तैसंग कटनियाँ धार-धुरसँ सेहो हटल रहबे करए। ओना, छोट-छोट दूटा धार तँ रहबे करइ। जइमे एकटा मरने जकाँ छल आ दोसर बहता छेलइ। ओही धारक महारपर दुनू परिवार अपन-अपन रहैक ठौर बनौलैन। दुनू परिवारकेँ एकठाम बसने चिन्हा-परिचय सेहो भेल। एक गोरे किछु विशेष होशियार छला आ दोसर परिवारक दोसर गोरे ओइ हिसाबे कम होशियार छल। जिनगी तँ दूनूक एकरंगाहे छेलैन। दुनू परिवार अपन-अपन जीविकोपार्जनक लेल किछु भूमिक उपयोग सेहो करए लगला। मोटा-मोटी हुनका सबहक जीविकाक साधन छेलैन साग-पातक संग छोट-छोट जानवरक मांस आ गाछक फल इत्यादि। पानि पीबैक साधन घरक आगूए-मे बहता धार छेलैहे। घास-फुसक घर बना दुनू परिवार रहए लगला। जेना-जेना समय बीतैत गेल तेना-तेना दुनू परिवारसँ सेहो परिवार बढ़ल आ देखा-देखा आन-आन ठामसँ सेहो कएटा आरो परिवार आबि-आबि बसल। ताधैर गामक नामकरण सीतापुर नइ भेल छल। जखन एक-दोसर गामक परिचय भेल तखन आपसमे सबहक बीच सम्बन्धो बढ़ल। मोटा-मोटी जंगली जीवनसँ किसानी जीवन दिस उन्मुख भेल। गाममे लोक अबैत गेल आ अपन-अपन जीवनो-यापन आ रहैयो-सहैयोक ठौरक ओरियान करए लगल। दरभंगा राजक द्वारा १८६१ इस्वीक बाद राज्यक इलाकामे किछु विद्यालयक स्थापना भेल। एहेन विद्यालय करीब २६ टा बनल। ओही लाटमे एकटा विद्यालय सीतापुरमे सेहो बनल। जइमे किछु परिवारक धिया-पुताक प्रवेश लेलक। प्रवेश लेनिहारमे बेसी उच्च जाइतिक परिवारक धिया-पुता छल। तैसंग मध्यम श्रेणीक जाइतिक बच्चा सेहो प्रवेश केलक मुदा बहुत कम संख्यामे। मुदा निम्न जाइतिक, जेकरा हरिजन कहै छिऐ हुनका सबहक धिया-पुताक प्रवेश स्कूलमे नहि भेल। ओना, शताब्दीक अन्त होइत-होइत विद्यालय टुटि गेल। जे भेल से भेल मुदा किछु परिवारमे विद्याक आगमन तँ भइये गेल। जइसँ धीरे-धीरे पढ़ै-लिखैमे वृद्धि भेबे कएल। सीतापुर गामक आठ साए परिवारमे डेढ़ साए परिवार उच्च जाइतिक अछि। उच्च जाइतिक माने भेल- ब्राह्मण, राजपुत, कायस्थ आ भूमिहार। ओहू उच्च जातिमे कायस्थ नहियेँ छैथ, बाँकी तीन जातिमे राजपुतक संख्या सभसँ कम आ भूमिहारक संख्या राजपुतसँ बेसी आ ब्राह्मणसँ कम अछि। तीनूमे सभसँ बेसी ब्राह्मण छैथ। शिक्षाक प्रचार-प्रसारमे अनुपातक हिसाबे तीनू एकरंगाहे भेला मुदा संख्याक हिसाबसँ ब्राह्मण बेसी भेला। मध्यम श्रेणीक जे जाति अछि ओकर संख्या, जातियोक हिसाबसँ आ जनसंख्योक हिसाबसँ बेसी अछि। जहिना उच्च जातिमे तीन जाति अछि, तहिना मध्यम जाइतिक संख्या करीब बीस अछि आ निम्न जाइतिक, माने- हरिजनक संख्या जहिना जाइतिक हिसाबसँ मात्र चारि अछि तहिना जनसंख्याक हिसाबसँ सेहो कम अछि। ओहूमे चारि जातिमे मुसहरक संख्या बेसी अछि बाँकी तीन जाइतिक संख्या कम अछि। ओहू चारूमे आर्थिक दृष्टिये दू जाति–दुसाध आ चमारक बीच अपन घर-घराड़ीक संग किछु जोतसीमो जमीन छै आ गाछियो-बिरछी छै मुदा दू जाइतिक बीच–डोम आ मुसहरक बीच, अपन जमीन नइ छइ। शुरूमे जखन दुनू जाइतिक प्रवेश सीतापुरमे भेल छल तखन गामक आधासँ बेसी जमीन परतिये-परात छेलै, जेकर कियो ने मालिक छल, ओहीमे ओ सभ बसल। ओना, वृत्तिक हिसाबसँ डोम मुसहरसँ अगुआ गेल। किएक तँ डोम मवेशी पालनकेँ अपन जातीय वृत्ति बनौलक, तैसंग बाँसक वस्तु-जात सेहो बनबए लगल, जेकर जरूरत लोककेँ छेलैहे, मुदा से मुसहरकेँ नहि भेल। ने जातीय वृत्तिक हिसाबसँ कोनो निसचित काज मुसहरकेँ भेल आ ने खेतीए भेल। ओना, छोट-छीन कारोबार- पशुपालनक जरूर भेल से भेल बकरी पोसब। ओकरा सबहक सोल्होअना जीवन बोनिये-बुत्तापर रहल, जे अखनो अछिए। आने गाम जकाँ सीतापुरक जमीनक अधिकार सम्बन्धी इतिहास सेहो अछि। ब्रिटिश राज भारतमे जमीनक बन्दोवस्त १७९३ इस्वीमे केलक। जइ प्रावधानक मुताबिक राजस्व संग्राहककेँ जमीनक मालिक बना देल गेल। अही तरहेँ जमीन्दारीक प्रथा शुरू भेल। ओना, तइसँ पहिनौं राज दरभंगा द्वारा जमीनक मालगुजारी ओसलल जाइ छल, तँए ओइ प्रावधानकेँ राज दरभंगा विरोध केलक। ओना, ई दीगर बात भेल जे मालगुजारीमे एकरूपता ने पहिनहि छल आ ने पछातिये रहल। उच्च जाइतिक ओहन जमीनक मालगुजारी कम छेलइ। जेहने जमीनक मालगुजारी मध्यम श्रेणीक जाइतिक लेल बेसी छल। तैसंग ईहो जे ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ आ मुसलमानकेँ विवाहदानी टेक्स नहि लगैत रहै, जे आन जातिकेँ लगैत रहइ। विवाहदानी टेक्सक माने भेल- लड़का-लड़कीक बिआहक टेक्स। जिनकर बेटीक बिआह हेतैन हुनका सबा रूपैआ आ जिनकर बेटाक बिआह हेतैन हुनका दसअना टेक्स दिअ पड़ैन। आने गाम जकाँ सीतापुरमे सेहो गामक आधारपर एक समाज बनल आबि रहल अछि, मुदा समाजक भीतर शुरूए-सँ बिखण्डनक रूप सेहो चलैत आबि रहल अछि। ओ बिखण्डनक रूप अछि- जाति-धर्मक बेवहार। ओना, जँ जातिकेँ मनुख जाति आ धर्मकेँ जिनगीक तृप्तिक हिसाबसँ देखल जाए तखन भेद-भावक कोनो बेवहारिक पक्ष नहि रहैत। मुदा से तँ अछि नहि, जाति-जाइतिक बीच निच्चाँ-ऊपर सीढ़ीनुमा खाँच बना देल गेल अछि, जइसँ एक-दोसरमे भेद अछि, ओ भेद सिर्फ वैचारिके क्षेत्रटा मे नहि अछि, बेवहारिक क्षेत्रमे सेहो अछिए। तहिना धर्मोक अछिए। रंग-रंगक देवी-देवताक सृजन कए जाइतिक बीच बँटवारा कऽ देल गेल अछि, जेकर परिणाम अछि जे एक-दोसरमे एतेक दूरी बनि गेल अछि जइसँ एक-दोसरमे जे समाजिक सरोकार हेबा चाही ओ मेटा गेल अछि। तेतबे नहि, मनुखे जकाँ देवी-देवतामे सेहो छूत-अछूतक बेवहार बनि गेल अछि। फलस्वरूप जाति-धर्मक प्रभाव समाजपर एतेक पड़ि गेल अछि जे ऊपर-सँ-निच्चाँ तक खाधि बनि गेल अछि। तेकर फलाफल एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखबैक खियालसँ अधिक काल गाम-गाममे झगड़ा-झंझट होइते रहैत अछि। देश स्वतंत्र भेला पछातियो आ पहिनौं शासन क्रियाक ओहन रूप रहल जे सौंसे समाजक हिसाबसँ, माने समुच्चा गामक लेल ने कोनो योजना बनैए आ ने कोनो काज होइए। जइसँ समाजक किछु लोक सुविधा सम्पन्न छैथ, बाँकी सुविधा हीन। फलाफल गाम-गामक समाजमे विघटनक वातावरण बनैत रहल अछि। विघटनक वातावरण आने गाम जकाँ सीतापुरमे सेहो अछिए। मुदा किछु अछि तँए कि सीतापुरक समाजिक सम्बन्ध नइ अछि, सेहो केना नइ कहल जाएत। किछु मामलामे एकमुहरी सम्बन्ध अछिए। जँ केकरो घरमे आगि लगै छै तँ सौंसे गामक लोक मिझबैले जाइते अछि। तैठाम जातीय छूआ-छूत, भेद-भाव मेटाएल रहैत अछि। मुदा लगले जखन गाममे कोनो समाजिक वा धार्मिक क्रिया-कलाप होइत अछि तखन ओ भेद-भाव नीक जकाँ जागि कऽ जगजिआर भऽ जाइए। तहिना बिआह-दान आ भोज-काजमे सेहो नीक जकाँ जातीय बन्धन जगले अछि। मुदा तँए कि कियो अपनाकेँ सीतापुरबला कहब छोड़ि देने अछि, सेहो बात नहियेँ अछि। देशक आने भाग जकाँ मिथिलांचलमे सेहो अंगरेजी शासनक विरूद्ध आन्दोलन चलिये रहल छल। आन्दोलनकर्तामे दू रंगक विचार नीक जकाँ उजागर भेल। एक पक्षक विचार छेलैन जे अंगरेजी शासककेँ देशसँ भगाएब। जे रंग-रंगक शोषणो करैए आ जनताक बीच जोर-जुल्म सेहो करैए। ओना, अंगरेजी शासक दू रूपक हथियारक प्रयोग करैत छल। एक तँ शासन सूत्र ओ सभ अपना हाथमे रखने छल, तैसंग देशक भीतर जे राजा-रजबार छला तिनका सभकेँ शोषणक हथकण्डा बनौने छल। हिनके सबहक माध्यमसँ अनेको तरहक शोषण करैत छल। अनेको तरहक शोषणमे प्रमुख छल आर्थिक शोषण। तँए आन्दोलनकारीक दोसर पक्ष जे छला ओ अंगरेजक संग देशी राजा-रजबार आ जमीन्दारक विरोधमे सेहो ठाढ़ भेला। १९३५ इस्वीक लखनऊ अधिवेशन–माने काँग्रेस अधिवेशनमे खुलि कऽ दू ग्रुपमे आन्दोलनकारी विभाजित भऽ गेला। गॉंधीजी जे अखन तक आन्दोलकारीकेँ एक सूत्रमे बान्हि नेतृत्व करैत आबि रहल छला ओहो विभाजित भऽ दू ग्रुपमे बँटि गेल। दोसर ग्रुपक नेता सुभाष बाबू भेला। अधिवेशनमे गॉंधीजीक उम्मीदवार–सीता रमैयाकेँ सुभाष बाबू हरा देलैन। जइसँ आन्दोलनकारीक बीच जबरदस भूचाल जकाँ भऽ गेल। तइसँ पहिने केतेको क्रान्तिकारी सभ फाँसियोपर चढ़ि गेल छला आ कालापानी सेहो पहुँच गेल छला। किसानक देश भारत, ऐठामक मूल उत्पादनक साधन जमीन छेलैहे। पच्छिमी देश जकाँ कल-कारखाना नहियेँ छल। गनल-गुथल किछु कारखाना छल, बाँकी लोक खेतीपर आश्रित छला। खेतो राजा-रजबारक संग जमीन्दार, महंथानाक बीच घेराएल छल। अधिकांश लोक या तँ भूमिहीन छला वा किछु-किछु जमीन छलैन। ओना, जिनका जे जमीन छेलैन तेकर मालगुजारी जमीन्दारोक माध्यमसँ आ राज्योक माध्यमसँ ओसुलल जाइ छल। मालगुजारी ओसुलैक ओहन हथकण्डा अपनौने छल जे जँ दू-साल मालगुजारी समयपर नइ देलिऐ तँ जमीने नीलाम करा लेल जाइत छल, जमीनक रैयती अधिकार समाप्त कऽ देल जाइत छल। माने ओ जमीन आब अहाँक नहि रहल। ओना, समयपर मालगुजारी नइ दइक कारण गरीबी छेलै, जेकर आधारो प्राकृतिक छल। बाढ़ि-रौदीक चलैत फसल नइ उपजने रैयत मालगुजारी नइ दऽ पबै छला। तैसंग शासन-तंत्रक भाषा सेहो बेवधान उपस्थित करिते छल। किएक तँ शासनक भाषा अरबी-फारसी छल। ओना, पैघ-पैघ भूपति आ महंथानाकेँ मालगुजारी नइ लगैत रहैन, किनको ब्रह्मोत्तरक नाओंपर, किनको शिवोत्तर वा अन्य देवी-देवताक नाओंपर छूट छेलैन। मुदा निम्न आ मध्यम श्रेणीक किसान (रैयत) प्राकृतिक आफदसँ सेहो त्रस्त होइते रहै छला। ओना, गामो-समाजमे ब्राह्मण, राजपुत आ मुसलमानकेँ जमीनक मालगुजारी नइ लगै छेलैन। जइसँ हुनका सबहक सम्पैत (जमीन-जयदाद)केँ कोनो राजा-दैव नहि छेलैन। तैसंग हुनका सभ लेल आरो सम्पैत एकत्रित करैक बाट सेहो खुजले छल। माने ई जे रैयतक नीलाम कएल जमीनकेँ ओ सभ किछु-किछु कीमत दए कीन लइ छला। सर्वे-सेटलमेन्ट आ बंगाल टेनेंसी एक्टसँ पहिने तक जमीनक अधिकारक कोनो मजगूत आधार नहियेँ छल। १८८५ इस्वीमे बंगाल टेनेंसी एक्ट कानूनक प्रावधान भेल। १८९६ इस्वीसँ लऽ कऽ १९०३ इस्वी तक जमीनक सर्वे-सेटलमेन्ट भेल। सर्वे-सेटलमेन्टक ऑपरेशनक माध्यमसँ दरभंगा जिलामे सेहो सर्वे-कार्य आरम्भ भेल। जइमे दू पक्ष छल, सर्वे आ सेट्लमेन्ट। गाम-गाममे कैम्प लगा जमीनक बारेमे पुछल जाए लगल। स्थायी बन्दोवस्त भेने एक दिस जमीनदारक जन्म भेल तँ दोसर दिस रैयतकेँ सेहो किछु कानूनी अधिकार भेटल। ओ भेटल ऐ रूपमे जे जे रैयत बारह बर्खसँ ऊपरसँ जइ जमीनकेँ जोति रहला अछि ओ ओइ जमीनक मालिक भेल। मुदा से भेल छल केवल कानूनीए प्रावधानक बीच। जइमे अनेको खामी सेहो छेलइ। जइसँ जमीन रैयतक हाथ नहि आबि जमीन्दारे, भूपतिक बीच बनल रहल। रैयत अपन जमीनसँ बे-दखले रहला। जँ खेत जोतितो छला तँ भूधारीकेँ उपज बाँटि कऽ दिअ पड़ै छेलैन। १९३५ इस्वीक पछाइत जन-आन्दोलनक बीच मोड़ आएल। बकास्त जमीन आन्दोलनक मुद्दा बनल। ओना, वैचारिक रूपमे शान्तिसँ सेहो आन्दोलन सफल भऽ सकै छल, जँ इमानदारीसँ क्रियान्वित कएल जाइत। मुदा से भेल नहि। हेबो केना करैत, आने क्षेत्र जकाँ ने मिथिलावासी सेहो महाभारत पढ़ै छैथ। तँए, सूई अग्रे ने दातव्य, सूत्र बुझले छेलैन। जएह चेहरा सार्वजनिक मंचपर आन्दोलनक मुद्दा बनबै छला, वएह चेहरा जमीनपर बन्दूक उठा गोलियो चलबै छला। जएह भोजैतनी सएह चटैतनी..! अही बीचमे मिथिलांचलक समाज जबरदस फँसान फँसि गेल। १९३९ इस्वीक पछाइत अंगरेजक खिलाफ आन्दोलनक रूप उग्र भेल। रेलक पटरी उखाड़ि रेल बाधित कएल गेल, डाकघर जरौल गेल, टेलीफोनक तार तोड़ि संचारतंत्रकेँ बाधित कएल गेल। इत्यादि-इत्यादि। ओना, आन्दोलन मात्र अपने देशटा मे नइ चलै छल, दुनियाँक आनो-आनो देशक बीच लड़ाइ फँसि गेल रहइ। दुनियाँ दू भागमे बँटा गेल छल। दोसर विश्वयुद्ध अपन उग्र रूपमे फुटल। ओना, अपना देशमे जे पैघ-पैघ भूपति छला तइमे किछुकेँ छोड़ि बाँकी सभ भूपति अंगरेजक संग खुलि कऽ देलैन। गाम-गाममे आन्दोलनकारी देश-प्रेमी सबहक घरक सम्पैत लूटल गेलैन, गाम-गाममे आगि लगौल गेल। दमन बिराट रूपमे चलए लगल...। अंगरेजक संरक्षक ऐठामक भूपति सभ तँ छेलाहे जे जासूसी सेहो करैत रहैथ आ गोरा-पल्टनकेँ खाइ-पीबैक संग रहैक बेवस्था सेहो करिते छला। मुदा तैयो जन-जागरण एहेन प्रवल रूप पकैड़ लेलक जे १९४२इस्वी अबैत-अबैत आन्दोलन निर्णायक मोड़क करीब पहुँच गेल। गाम-गाममे अंगरेजक खिलाफ जबरदस अबाज उठि चुकल छल। बकास्त जमीनक लड़ाइ सेहो शुरू भऽ गेल। गाम-गाममे जमीन्दार, भूपतिक खिलाफ लड़ाइ जोर पकड़लक। ओना, छोट आ मध्यम किसान सभ अपन-अपन रैयती अधिकार लेल उठि कऽ ठाढ़ भइये गेल छला मुदा जातीय जाल आ भूपति सबहक अख्तियार कएल रंग-रंगक लोभ-प्रलोभन बीचमे बाधा रहबे करए। मुदा तैयो रैयतक बीच एहेन उत्साह बनि गेल छल जे अपन अधिकारक लेल जान दइले तैयार भेला। ओना, एकरंग लड़ाइ सभ गाममे नहि चलल। जैठाम भूपति अपन चालबाजीसँ रैयतक बीच फूट पैदा करैत अपन अस्त्र-शस्त्रक प्रयोग केलक, तैठामक रैयत कमजोर पड़ल, जइसँ लड़ाइ सफल नइ भेल। मुदा तँए कि सभ गाममे अहिना भेल, सेहो बात नहियेँ अछि। शानदार जीत रैयत हाँसिल केलैन। आने गाम जकाँ सीतापुरमे सेहो बकास्तक लड़ाइ जोर पकड़लक। तइमे आन गामसँ भिन्न रूपक लड़ाइ सीतापुरमे भेल। हँसेड़ा-हँसेड़ी आकि मारिये-पीट आकि केशे-मोकदमा आन गाम जकाँ नहि भेल। शान्तिपूर्ण ढंगसँ जहिना कोनो सरकारी आदेश लागू होइए, तहिना भेल। रैयत सभकेँ अपन रैयती अधिकार भेटने अस्सी प्रतिशतसँ अधिक जमीन मध्यम आ निम्न किसानक हाथमे आबि गेल। बाँकी बीस प्रतिशत जमीन, जे पाँचटा पैघ किसान छला, हुनका सबहक हाथमे रहलैन। ओना, ओहो सभ अपनो हाथे खेती करै छला आ छिट-फुट रूपमे बटाइ सेहो लगौने छला। जे बटाइ लगौने छला ओ जमीन सर्वेमे बटेदारक नामे नामित नहि भेल छल, तँए ओइ जमीनक वैधानिक अधिकार नहि भेटने हुनके सबहक हाथमे रहलैन। ओही सीतापुरमे देवचरण नामक एकटा रैयत सेहो छला। पाँच पुस्तसँ हुनका तीन बीघा जमीनक जोत रहलैन। ओना, चारिम पीढ़ीमे–माने पिताक अमलदारीमे जे तीन बीघा जमीन छेलैन ओ नीलाम भऽ गेलैन। गामेक एक गोरे ओ नीलामी जमीन कीनलैन। मुदा समाजिक सम्बन्ध ओइ दुनू परिवारक बीच एहेन बनल रहलैन जे ने बटाइ रूपमे अधा-अधी उपज बाँटै छला आ ने सोल्होअना अपन बुझि खाइ छला। दुनूक बीच आपसी विचारसँ, माने दुनू घर अबाद रहै तइ हिसाबसँ समझौता भेल छेलैन। जहिना एक दिस भूपतिक जमीनक कानूनी अधिकारक रक्षाकेँ धियानमे राखल गेल तहिना देवचरणक पूर्वजक उपार्जित सम्पैतसँ देवचरणक परिवारक भरण-पोषणकेँ सेहो धियानमे राखल गेलैन। जइसँ सालमे चौंथाइयोसँ कम उपज देवचरण भूपतिकेँ दैत रहथिन। समय बीतल। १९४८ इस्वीमे ओइ भूपतिकेँ तीनू बेटाक बीच खेतो-पथार आ धनो-सम्पैतक झगड़ा शुरू भेल। ओना, झगड़ाक कारण परिवारिक छेलैन, मुदा गामक लोक बुझै छल जे हुनकर जेठका बेटा जे अपन पत्नी-बाल-बच्चाक अछैत एकटा वेश्यासँ बिआह कऽ लेलकैन से। ओना, समाजिक रूपमे सेहो आ परिवारिक विचारधाराक रूपमे सेहो ओकर विरोध भेबे कएल। तैसंग छोटका दुनू भाँइयो आ जेठका भाइक पत्नियो आ बेटो सभ विरोध केनहि रहैन। जइसँ परिवारमे भिनौजीक वातावरण तैयार भेल। ओना, बीचमे जे गामो आ परोपट्टोक किछु लोक रहैथ ओ तीनू भाँइमे मेल-मिलान करैक भरि पोख परियास केलैन मुदा से सफल नइ भेल। परियासक क्रममे गाम-गामक महंथाना आ महंथक अनेको उदाहरण दैत रहलखिन मुदा एतेपर आबि कऽ परिवारक लोक गिरह दऽ देलकैन जे जँ अपना जातिमे दोसर बिआह केने रहितैथ तँ छोड़लो जा सकै छल, किएक तँ जैठाम अस्सी-अस्सी बर्खक बुढ़ सभ दोसर-तेसर बिआह करैए तैठाम ई साठि बर्खक बिआह कोनो अनसोहाँत नहियेँ भेल। मुदा कोन-कहाँ जातिसँ बिआह केलक तँए नइ छोड़बैन, परिवारसँ फराक कइये देबैन। जमीन-जत्था छैन्हे, अपन फूटमे घर बना रहौथ। सएह भेल। देश स्वतंत्र भेला पछाइत एक संग केतेको रंगक हवा वायुमण्डलमे उठल जइसँ भूपति सबहक करेज डोलए लगल। खास कऽ पुरना दरभंगा जिलाक मधुबनी-सब्डिवीजन आ अखुनका मधुबनी-जिलाक सौभाग्य रहल जे केरले आ बंगाल जकाँ अहुठाम जमीनक लड़ाइ सघन रूपमे उठि चुकल छल। जमीनक जोत-कोरक प्रतिबन्ध–माने जमीनपर १४४दफा लागब आम बात भऽ गेल। संग-संग कानूनक धज्जी सेहो उड़ौल गेल। मुदा से भेल दुनू दिससँ, भूपति दिससँ सेहो आ रैयत दिससँ सेहो। एक दिस भूपति सभ सरकारी तंत्रक संग मिलि १४४दफा लागल जमीनक फसल काटए लगला तँ दोसर दिस रैयतो सभ सरकारी कानूनकेँ अनदेख करैत फसल काटए लगल। दुनू दुनू दिस फसल हथियाबए लगला। तेतबे नहि, केतौ-केतौ थानामे जे फसल जमा भेल ओ थानेदार सभ हथियौलक। खाएर जे भेल, मुदा १९४० इस्वीक पछाइत मिथिलांचलक किसानो-बोनिहार अजादीक लड़ाइमे अपन-अपन उपस्थिति जबरदस रूपमे दर्ज करौने छला। बामपंथी राजनीति एक प्रवल शक्तिक रूपमे सक्रिय छल। १९४० इस्वीक पछाइत खेती करैक काजमे कमी आएल। मुदा ओइ कमीकेँ ऐठामक किसान सहर्ष स्वीकार केलैन। पेट बान्हि-बान्हि लोक अजादीक लड़ाइमे अपन उपस्थिति दर्ज करौने रहला, आन्दोलनमे हाथ बटौने रहला, जहलक यात्रा करैत रहला। आइ धरि जे समाजिक संस्कारमे जहलकेँ नर्क आ पापीक स्थान बुझल जाइ छल, तइ संस्कारमे जबरदस धक्का लगल। जमात करए करामात..! गाम-गामक अधिकांश मुड़हन लोक जहल जाइत-अबैत रहला, जइसँ ओ नर्कसँ बदैल स्वर्ग भऽ गेल, जे पापीक स्थान छल ओ धर्मात्माक स्थान भेल। तीनू भाँइ- सिंहेश्वर, गौरीनाथ आ शिवशंकरक बीच जे वेश्यासँ बिआहक विवाद उठल ओ गामे नहि, परोपट्टाक महंथानो आ जमीन्दारोक शीलकेँ हिला देलकैन। एक्के-दुइए दर्जनो महंथो आ जमीनदारो, जे अखन तक धर्मात्मा बनि धन-धरम पुजबै छला ओ सभ समाजक बीच देखार भऽ गेला। ओना, महंथानोक बीच जमीनक लड़ाइ उग्र रूपमे चलल। केते जमीनदारोसँ नमहर-नमहर महंथाना छेलैहे। लड़ाइ-लड़ाइ जकाँ भेल। लाठी उठल, केश-मोकदमा भेल, हँसेड़ा-हँसेड़ीमे खून सेहो भेल। सिंहेश्वरक किरदानी–वेश्याक संग बिआह करबसँ–अस्सी बर्खक पिता- राम किशोरक मन टुटि गेलैन। टुटबे नहि केलैन, विक्षिप्त जकाँ अपन होश-हवास सेहो गमा चुकल छला। मुदा गौरीनाथो आ शिवशंकरो अपन-अपन परिवारकेँ असथिर करैत समाजिक सम्बन्धमे नव रूप देलैन। नव रूप ई देलैन जे तीन साए बीघा जमीन नीलामपर बन्दोवस्त जे करौने छला, ओ कोसिकन्हा जकाँ रेन्ट फिक्स करैत सबहक जमीन आपस करैक विचार तय कऽ लेलैन। डेढ़ साए रूपैआमे देवचरणकेँ सेहो अपन जमीन आपस लइले कहलखिन। ओना, देवचरण अपन पूर्वजक देल सम्पैत गमा चुकल रहैथ, मुदा ओकर जोत-कोर केने अपन परिवारक गाड़ीकेँ घीचैत आबि रहल छला। खेत जोतैले बरदक जरूरत होइ छइ। अपन समांगक संग जँ जोड़ भरि बरद भऽ गेल तँ किसानी जिनगीक एकटा मुख्य अंग भइये गेल, तँए देवचरण गाए सेहो पोसै छला। अपन बरद बेचैत रहला जे कीनैक खगता नइ भेलैन। ओना, जइ बरदसँ खेत जोतै छला ओ पुरनकन्ह भइये गेल छेलैन, मुदा जोड़ा भरि बच्छा-बरद सेहो भऽ गेल छेलैन। ओही बच्छा-बरदकेँ बेच देवचरण अपन पूर्वजक देल जमीन पुन: आपस लेलैन। अजादीक तूफानी दौड़मे–माने १९४० इस्वीमे हरिचरणक जन्म भेल। ओ, ओ समय छल जइमे केतेको परिवारक बच्चा अन्न बेतरे मरल, केतेको माए अपन शक्तिसँ निरोग बच्चाक जन्म नइ दऽ सकली। हरिचरणक छठिहारमे, जखन समाजक दाय-माय एकठाम बैस भाग्य-रेखा लिखए लगली तँ सर्वसम्मैत निर्णय केलैन जे बच्चाकेँ औरुदा भेटौ, जीबैत रहत तँ एक लोढ़ी बोनियोँ कए कऽ समाजमे परिवारकेँ ठाढ़ करबे करत। तिथि : ११ मई २०१८ जारी... २. १४ जनवरी १९३४ इस्वीक दिनक एक बजेमे जबरदस भुमकम भेल। अखुनका जकाँ भुमकमक नाप-जोख करैबला कोनो यंत्रक अविष्कार नहियेँ भेल छल जइसँ लोक बुझैत जे केहेन भुमकम भेल, मुदा एते तँ भेबे कएल जे बड़का-बड़का गाछो सभ खसल, भीतघर सेहो खसल आ खेत-पथारमे दारारि फटि-फटि जमीनक भीतरसँ बाउल ऊपर आबि-आबि बाधक-बाध जमीनमे पसरबो कएल। पानिक मोकर सभ सेहो फुटल। गाम-गामक शकल बदैल गेल। घर खसने लोको मरल। आने गाम जकाँ क्षति सीतापुरमे सेहो भेल। ओना, सीतापुरमे एकोटा घर पजेबाक तँ नहियेँ छल खाली पान-सात परिवारकेँ कँचका पजेबाक घर छेलै, ओहो सभ खसल। सीतापुरमे अधिकांश घर टटघर छल जे लकड़ी-बाँसक खुट्टापर ठाढ़ छल, ओ हिल-डोलि जरूर गेल मुदा खसल नहि। ओना, सीतापुरमे लोअर प्राइमरी स्कूल सेहो छेलै मुदा सरकारी नहि, एकटा शिक्षक स्कूल चलबै छला। बीस-पच्चीसटा विद्यार्थी छल। सभ विद्यार्थी शनियेँ-शनि हुनका सनिचराक रूपमे पाभैर चाउर आ एक-एकटा पाइ सभ दैत रहैन। एक गोरे ऐठाम शिक्षक रहै छला जे खाइयो-पीबैले दइ छेलैन आ बदलामे परिवारक बच्चा सभकेँ दरबज्जेपर पढ़बैत रहथिन। गौंऑंक सहयोगसँ पनरह हाथ नमती भीतघरक रूपमे स्कूल छल। भुमकममे ओहो खसि पड़ल। स्कूल खसला पछाइत बहरबैयाक कचहरीमे पढ़ाइ हुअ लगल। तीन-चारि सालक पछाइत स्कूलक जगह बदैल, माने जैठाम स्कूल छल ओइ जगहसँ हटि दोसरठाम एकटा परतीपर गौंएक सहयोगसँ पुन: भीतघर बनल। स्कूलक जगह बदलैक कारण भेल जे ओइ जगहकेँ लोक अशुभ मानलक। अंगरेजक विरोधमे एहेन माहौल बनि गेल छल जे स्कूलक जे शिक्षक छला, ओहो चोरा-नुका कऽ लोक सभकेँ देशक अजादीक विषयमे बुझबै छला। गाम-गाममे अंगरेजी शासनक समर्थक सेहो छेलाहे। वएह सभ चुगली करि देलकैन जइसँ १९४२इस्वीमे शिक्षक पकड़ा गेला। स्कूल बन्न भऽ गेल। ओना, साल भरिक पछाइत जहलसँ शिक्षक निकलला मुदा घुरि कऽ सीतापुर नहि एला। स्कूलक भीतघर ओहिना ठाढ़ भेल रहल। तीन सालक पछाइत दोसर शिक्षक एला। हरिचरणक नाओं सेहो पिता स्कूलमे लिखा देलखिन। देश स्वतंत्र भेल, मुदा अखन तक आमजन स्वतंत्र शब्दक अर्थ बुझबे ने करै छला। सीतापुर गाममे बेसी-बेसी जमीनबला सेहो छला मुदा मालगुजारी असुलनिहार जमीन्दार मालिक नइ छला। जइसँ पाहीपट्टीक मालिक अपन पटवारी, गुमस्ता आ बराहिलक माध्यमसँ कचहरियो चलबै छला आ मालगुजारी सेहो असुलै छला। कचहरी चलबैक माने भेल, गाममे जे झगड़ा होइ, तेकर पनचैती करब। ओना, तइ मानेमे जमीन्दार कमजोर छला। तँए गामक मुँहगर सभकेँ सेहो पनचैतीमे बजबै छला। कचहरीक कारोबारीकेँ कमजोर होइक कारण छल जे दू परिवार वा तीन परिवारक बीच जे झगड़ा होइ छल ओइमे जे मारि-पीट होइ छल, ओ टटका रहै छल तँए कनियोँ अनुचित भेने पार्टी मानबे ने करैत रहए। माने पनचैती स्वीकार नइ करैत छल। जइसँ कचहरीक आदेश टुटि जाइ छल। देश की स्वतंत्र भेल की नइ भेल, से बुझनिहारक अभाव तँ रहबे करइ। मुदा रंग-रंगक भाषणो गाममे चलिते छल जइसँ किछु हेराएल-भोथियाएल मुद्दा सभ सेहो जगिते छल। जमीन्दारी टुटि गेल, जमीन्दारक शासन सेहो टुटि गेल। आब मालगुजारी सरकार असुलत आ ओइ पाइक खर्च समाजक काजमे लागत इत्यादि...। अखन तक गाममे ने एकोटा नीक सड़क छल, ने एकोटा पुल, आ ने स्कूल बनल। आम जनक नजैरमे सेहो नव-नव विचार जगबे कएल। पुलक नाओंपर दसटा ईटा रस्ता परहक कोनो-कोनो खाधिमे बिछा देल जाइत रहै, जैपर होइत लोक बरसातमे चलैत छल। आम-कटहरक खुदरा गाछो आ गाछीमे सेहो जमीन्दारक ऐमला-फेमलाक संग लड़ाइ उठल। ओना, अखन धरिक जे कचहरीक रूतबा छेलै ओ वौद्धिक रूपमे कमल मुदा बेवहारिक रूपमे ओहिना छल माने पूर्वते। माने ई जे देश स्वतंत्र भेला पछातियो गारि पढ़ब, मारब इत्यादि कचहरीक ऐमला-फेमलाक बेवहार रहबे कएल। आमक गाछीक लड़ाइ गाछक तड़ी-फड़ीक लेल भेल। तँए एकरा आन गाममे जे कहल जाइत होइ मुदा सीतापुरमे ‘आमक गाछीक लड़ाइ’ कहल जाइत अछि। से केबल आमक गाछीक लड़ाइये कहल जाइए से बात नइ अछि। आमक गाछीकेँ बिआहोक सभा-गाछी आ दोस्तियारीक धरम-गाछी सेहो कहले जाइए। आमक गाछीक लड़ाइ कचहरीक पटवारी-गुमस्ता-बराहिलक संग गुलाबचनकेँ भेल। गुलाबचनकेँ तीन भॉंइक भैयारी, तीनू भॉंइ कातिक-सँ-फागुन धरि अपने गाछीमे अखड़ाहा खुनि कुश्ती लड़ैत छल। गुलाबचनक पिता गोपीचनकेँ अपन बुद्धि-अकिल छेलैन तँए अपन सोच-विचार सेहो छेलैन्हे। तेकर एकटा कारण ईहो छल जे दस कट्ठा खेतकेँ गोपीचन चारू बापूत मीलि कोदारीए-सँ उनटा लइ छला, माने तामि लइ छला। तैसंग अपन चारिटा महींस सेहो पोसने रहैथ, जेकर दूध-दही खाइते छला। तँए जिनगीमे ऐसँ बेसी आरो चाही की? कोनो कि गोपीचन शास्त्र-पुराण पढ़ने छला जे मनुखक देहपर हाथीक माथा आ बिनु घटकैतिये राम-सीताक जोड़ी नगर बधू केना धनूष टुटैसँ पहिने लगा लेलैन, ऐ सभपर विचार करितैथ। ई तँ छी शास्त्र-पुरानक विचार। अपन विचार शास्त्र-पुरानमे रहअ। ऐसँ गोपीचन आ गोपीचनक तीनू बेटाकेँ कोन मतलब? मतलब छै अपन मेहनतक संग बापक देल सम्पैतकेँ सुरक्षित राखबसँ। पैछला साल गोपीचन मरि गेला। गोपीचन जा जीबै छला ता मालिककेँ अपन जमीनमे अपन रोपल आम-कटहरक फड़ अपना हाथे बाँटि-बाँटि दइ छेलखिन। बेटा सभ एतबे करै छेलैन जे गाछक आधा-छिधा आमो आ कटहरो तोड़ि आगूमे आनि राखि दइ छेलैन आ महींस चरबए चलि जाइ छल। जइसँ मालिकक संग बँटबाराक महिरम बुझबे ने केने छल। आम-कटहर तोड़बए कचहरीक बराहिल पहुँचल। गुलाबचनकेँ एतबे अनुमान छेलै जे अपन गाछी-कलम छी। आन गामक लोक सभ कचहरीमे रहैए, ओकरो खेनाइ-पीनाइ तँ गौंए ने देत। तँए पाँचटा दसटा आम हमहूँ देबइ। तीनू भॉंइ गुलाबचन मड़ुआ रोपि कऽ आएले छल। दुपहरक समय रहै, बराहिल आबि गुलाबचनकेँ आम तोड़ए कहलखिन। तैपर गुलाबचन बाजल- “अखन मड़ुआ रोपि कऽ तीनू भॉंइ एबे केलौं हेन, निचेनसँ गाछीक आम तोड़ब। पछाइत पाँचटा आम अहूँकेँ कचहरीमे पहुँचा देब।” अखन धरि थाना-पुलिस जकाँ बराहिलो अपनाकेँ बुझिते छल। पटवारीक नाओं कहैत बाजल- “सरकारक हुकुम छह, आम आइये तोड़बह।” तहीकाल गुलाबचनक मझिला भाए- बालचन पहुँचल। तीनू भाँइमे बालचन सभसँ बूफगर। जेहने छिपगर जबान तेहने हाथो-पएर। बराहिलक मुँहक बात ‘सरकारक हुकुम छह’ सुनिते बालचनकेँ देहमे देशी सरकार बनैक विचार जगि गेल। जगैक कारण ईहो रहै जे काल्हिये साँझमे सोराजीलालक मुहसँ सुनने छल जे देश-स्वतंत्र भेल, सबहक देश भेल तँए केकरो कियो मालिक नहि रहल। सबहक देश भेल, सबहक शासन भेल। बराहिलकेँ बालचन कहलक- “हम अपना चीजक अपने मालिक छी की तोहर सरकार छह। जा, नइ देबह एकोटा आम।” बालचनक बात सुनि बराहिल ठमकल, मुदा जहिना शासनक कुर्सीपर बैसल अफसर वा थानाक वर्दी पहिर एको लीबरक आदमीकेँ ढोड़ साँपक फुफकार होइत अछि तहिना बराहिलक सेहो भेल। तैबीच गुलाबचन अपन भाएकेँ चुप करैत कहलक- “बालचन, दरबज्जापर आएल दुश्मनोकेँ लोक नीके बोल कहै छै, तूँ किए अनेरे झगड़ा बेसाहै छँह।” ने गुलाबचने अपन विचारक भावार्थ बुझलक आ ने बालचने बुझलक मुदा बराहिल बुझि गेल। बुझबो केना ने करैत, जिनगी तँ बीतै छेलै शासकीय भाषा-शास्त्रीक बीच ने...। जँ गुलाबचनकेँ एतबो होश रहितै जे दरबज्जापर आबि बराहिल ऑंखि देखबैए आ हम ओकरा अभ्यागत बुझै छिऐ! जँ से बुझैक शक्ति रहितै तखन जेठ भाइक भाषा नै बजैत। ओना, बराहिल बालचनक धुआ-काया देख सहैम गेल छल, मुदा जमीन्दारीक मंत्र जे मनकेँ पकैड़ नेने छेलै, तइसँ फुफकार रहबे करइ। गुलाबचनक दरबज्जापर सँ बराहिल कचहरी दिस विदा होइत बाजल- “आइ तोरा सभ भॉंइकेँ देखा दइ छियौ। तीनू भॉंइकेँ हथकड़ी लगा जेल जखन पठेबौ तखन अपने बुझि जेबही!” बराहिल चलि गेल। गुलाबचन सेहो नहाइ-खाइ दिस बढ़ल। कचहरी पहुँच बराहिल पटवारीकेँ सभ बात सुना देलकैन। ढहैत सामंती सोच आ उठैत जनवादी विचारक बीच पटवारीक मनमे द्वन्द्व पसैर गेल। मुदा समाजिको सत्ता तँ सत्ता छीहे, ओहूमे केतेको भत्ता अछिए। समाजोमे तँ एहेन लोकक विचारक सत्ता रहले अछि जे राज-काजसँ या तँ जुड़ल रहल अछि वा ओइमे सटल रहने अपन सत्ता बनौने रहल अछि। स्कूली शिक्षा तँ पटवारीकेँ कम्मे रहैन मुदा जमीन्दारी सूत्रक नीक अनुभव रहबे करैन। बराहिलकेँ राजक हथियार बना लड़ाइयक सूमा बनौलैन। गाममे जेतेक मुँहगर-कन्हगर लोक छल, जेना- मैनजन, देबान इत्यादि जे सभ कचहरीसँ जुड़ल रहए–सबहक बैसार पटवारी केलक। अपनो गुमस्ता, बराहिलक संग गामक असेसरकेँ बजा एकठाम केलक। सर्वसम्मैतसँ काल्हि आम तोड़ैक निर्णय भेल। समयक हिसाबसँ सभ गुलाबचनक गाछी पहुँच बलजोरी आम तोड़ब शुरू केलक। गुलाबचनकेँ बुकौर लगि गेल। मुदा बालचनक हिम्मतमे मिसियो भरि कमी नइ आएल। बालचनक हिम्मत देख गुलाबचन बाजल- “बौआ! धन, धरम दुनू जेतह। आम तोड़ै छै ते तोड़ए दहक। छोड़ि दहक। भगवानकेँ दइक हेतैन ते ऐगला साल अहू बेरक साती आम दए देथुन।” जहिना गर्म आगिमे पानि ढारने मिझा तँ जरूर जाइए मुदा ओकर परितापकेँ ठण्ढा होइमे किछु समय लगिते अछि तहिना बालचनक मनमे ईहो उठैत रहै कचहरीक झगड़ा गाममे पसैर जाएत। हेबो केना ने करितै गौंओ तँ संग छेलैहे। तेतबे नहि, वेचारा ने कहियो स्कूले देखने आ ने तेहेन पुरुखक सतसंगे भेल छेलै जइसँ पुरुखपनाक बोध होइतै। मुदा एकटा विचार बालचनक मनमे जरूर जगलै जे जखन गौंऑं सभ हँसेड़ीक रूपमे कचहरीक संग हमर सम्पैत लूटए आएल अछि तखन ओकरा संग हमर समाजिक सम्बन्ध केहेन हएत? की हम ओइ समाजसँ ई नहि पुछि सकै छी जे समाज जखन विचारसँ चलैए तखन हँसेड़ी बनबैक की प्रयोजन भेल? जरूर किछु-ने-किछु भीतरमे रहस्य अछि...। संजोग बनल। जखन गुलाबचनक गाछीमे आम टुटब शुरू भेल, तखने जेठुआ बिहाड़ि जकाँ भरि गाममे बिर्ड़ो उठल। एकाएक नवतुरिया सभ सेहो गुलाबचन-ऐठाम पहुँचए लगल। गामक नवका पीढ़ी जे अखड़ाहापर खेलाइ छल ओ सभ बालचनकेँ गुरु कहै छेलैन। सोराजीलाल सेहो गुलाबचनक ऐठाम एला। अबिते सोराजीलाल सबहक बीचमे गुलाबचनकेँ कहलखिन- “गुलाबचन, अहाँ संग अन्याय होइए, एकरा रोकू।” सोराजीलालक विचारक प्रभाव जेते बालचनपर पड़ल तेते गुलाबचनपर नइ पड़ल। पड़बो केना करैत, जेकर विचार पहिनहि हारि मानि चुकल छल ओ केना लगले उठि कऽ ठाढ़ होएत। घरसँ कड़ुतेल पिऔलहा लाठी निकालि बालचन बाजल- “भैया, तूँ घरेपर रहह। घर-दुआरक संग स्त्रीगणो आ बालो-बच्चाकेँ देखैत रहिहह। हम छोटका भैयाक संग जा कऽ आम तोड़बकेँ रोकबै।” जहिना देशक ओइ सिमानपर जे शक्तिशाली देशक सीमा सेहो छी, जाइत सिपाहीकेँ परिवारक लोक अन्तिम विदाइ बुझैए तहिना गुलाबचनक मनमे उठए लगल। एक दिस समांगक जिनगी देख रहल छल आ दोसर दिस सम्पैत। रंग-बिरंगक विचार गुलाबचनक मनमे चकभौर लिअ लगल। जिनगी-ले सम्पैत अछि वा सम्पैत-ले जिनगी? मुदा अखन सोचै-विचारैक लेल ओते समयो नहियेँ अछि जे आनो-आनसँ बुझि विचारब। तहूमे जखन लड़ाइयक मोर्चा बनि रहल अछि तखन सभसँ बुझबो-विचारब केतेक नीक हएत? लड़ाइक मोर्चाक विचारक अनुभवो सभकेँ एक्केरंग नहियेँ होइ छइ। जे लड़ाइयक मोर्चापर उतरनिहार अछि वा जे मोर्चापर कहियो गेबे ने कएल, दुनूक विचारोमे भिन्नता हेबे करत किने..! सोचैत-विचारैत गुलाबचन अपन दुनू भॉंइकेँ–माने ज्ञानचनो आ बालचनोकेँ कहलक- “बौआ, आम अपन परिवारक तोड़ि रहल अछि, मुदा जखन समाजो पीठपोहु छैथ तखन पाछुओ हटब नीक नहि। तँए पहिने दरबज्जापर आएल सहयोगी सभकेँ पुछि लहुन जे आगू की करब।” गुलाबचनक विचार सुनि जहिना दुनू भॉंइ–ज्ञानचन आ बालचन–ठमकल तहिना समाजक नवतुरिया सभ सेहो ठमकल। मुदा सोराजीलाल, जे दर्जनो बेर जेल-यात्राक करैत गुलाम देशसँ मुक्ति पाबि चुकल छैथ, हुनका विचारमे मुक्तिक ओ रूप ओहिना झलैक रहल छेलैन जेना पौने छला। अगुआइ करैत सोराजीलाल बजला- “गुलाबचन, जिनगीक बाटमे केहनो आफद-असमानी वा केहनो रोड़ा-पाथर किए ने आबि कऽ रोकए मुदा पाछू नइ हटी। किएक तँ ओ निर्णायक दौर होइत अछि। ओइठाम पाछू हटने लोक पछुआ जाइत अछि। ओना, तइमे थोड़ेक होशियारीक खगता जरूर अछि मुदा पाछू हटब किन्नहु नीक नहि।” सोराजीलालक विचारमे गुलाबचनकेँ की भेटल से तँ गुलाबचने जानत, मुदा बिच्चेमे बालचन बाजल- “सोराजी भैया, अहाँक विचार जँ संग रहत तँ सम्पैत बँचबैले हम अपन जानकेँ अराधि लेब। अहाँ जे कहब हम तइ हिसाबसँ करैले तैयार छी।” बालचनक विचार सुनि सोराजीलाल बजला- “बालचन, लड़ाइक मोर्चाक एक-एक क्षण ओ क्षण छी जे क्षणमे छनाक कऽ सकैए। तँए एको क्षण गमौने बिना चलह आम तोड़बकेँ रोकैले।” सोराजीलालक विचार सुनि बालचनक मनमे लहरैत आगि जकाँ एकेबेर धधरा उठल। अपन लाठी सम्हारि बालचन गाछी दिस आगूए-आगू दौड़ल। पाछू-पाछू समाजक नवतुरियो, सोराजियोलाल आ परिवारक बाल-बच्चा सहित जनिजातियो सभ गरियबैत विदा भेल। आमक गाछीमे गुमस्ता, पटवारी, बराहिलक संग असेसरो आ समाजक पाँचटा मुँहगर-कन्हगर लोक सेहो छला। गामक हँसेड़ीकेँ दौड़ैत अबैत सभ कियो देखलैन। एक्के-दुइये गुमस्तो, पटबारियो, बराहिलो आ असेसरो आमक गाछीसँ भागल। मुदा गामक जे पाँचो गोरे छला ओ पूर्ववते गाछीमे रहला। ओना, हुनका सबहक मनमे मारिक डर नइ पैसल रहैन। डर नइ पैइसैक कारण हुनका सबहक मनमे रहैन जे हम तँ समाजक लोक भेलौं किने, बीच-बचाउ करैत रहब। मुदा ई विचार मनमे जगबे ने केलैन जे जे बात अखन मनमे उठि रहल अछि ओ तँ आम तोड़ैसँ पहिनौं उठि सकै छल। जँ से उठल रहैत तँ एहेन परिस्थितीए किए बनैत? जमीन्दारक ऐमला-फमिलाकेँ भागैत देख सोराजीलालक मन अड़हुलक फूल जकाँ फुला गेलैन। गाछी पहुँच टुटल आमक ढेरीकेँ देखबैत सोराजीलाल बजला- “गुलाबचन, अहाँक आम छी लऽ जाउ।” तही बीच सिंहेश्वर–माने गामेक एक जातिक मैनजन, बाजल- “गुलाबचन, अनेरे ने लाठी-लठौबैल करए चाहै छी। समझौता मानि लिअ।” सिंहेश्वरक विचार सुनि गुलाबचन थकथकाएल मुदा सोराजीलाल बालचनकेँ कहलखिन- “बालचन! समाजक यएह लुच्चा-लम्पट सभ गरीबक सम्पैत्तियो आ इज्जतो-आबरूकेँ सभ दिनसँ लूटैत आएल अछि। अखन ई समाज नहि राजक हँसेड़ी छी, तँए जे भागल से अपन जान बँचौलक, मुदा जे पकड़ा गेल तेकरा छोड़ब उचित नहियेँ हएत।” सोराजीलालक विचार बालचन मानि लेलक। मुदा विचारमे कनी संशोधन जरूर केलक। संशोधन ई केलक जे कड़ुतेल पिऔल लाठी अछि, तँए ओइ लाठीसँ अवघात बेसी हएत। अवघात ई जे जहिना लोहाक तीर बनबैकाल करूतेल पिऔलासँ ओ विषाक्त भऽ जाइए तहिना बाँसक लाठियोमे होइए। जइसँ साधारण लाठीक अपेक्षा ओइसँ बेसी अवघात भऽ सकैए। लाठी रखि बालचन सिंहेश्वरक दुनू गालमे दू चाट मारलक। सिंहेश्वरकेँ गालमे चाट लगिते जेतेक नवतुरिया छल, भुआ जकाँ बाँकी चारूपर लटैक हाँइ-हाँइ सभकेँ चोटियाबए लगल। दुनू हाथ उठा सोराजीलाल सभकेँ शान्त केलैन। मुदा एक दिस जहिना मारिक चोटसँ चोटाएल गहुमन साँप जकाँ पाँचो फुफकार काटि रहल छल तहिना दोसर दिस गनगुआरि-साँप जकाँ समाजोक सिपाही सभ सीटी बजाइये रहल छल। लड़ाइ जीतला पछाइत लड़ाइ लड़निहारक विचार सर्वोपरि भइये जाइए। सर्व-सम्मैतसँ निर्णय भेल जँ पाँचो गोरे साए-साए बेर कान पकैड़ समाजक बीच उठए-बैसए तँ जान छोड़ि देबइ। आगू-पाछू पाँचोकेँ करैत देख सोराजीलाल पुन: विचारमे संशोधन करैत बजला- “कान पकैड़ कऽ उठब-बैसब छोड़ि पाँचोकेँ थूक चटबाउ।” तिथि : १५ मई २०१८ जारी... ३. १९४५ इस्वी अबैत-अबैत गाम-गामक जे स्कूलक शिक्षक सभ जहल चलि गेल छला जइसँ स्कूल सभ बन्न भऽ गेल, ओहो सभ जहलसँ निकलला आ स्कूलो सभ खुजल। ओना, ने सभ गाममे स्कूले छल आ ने सभ स्कूलक शिक्षक जहले गेल छला। हँ, ई बात जरूर छल जे अधिकांश स्कूलक शिक्षक जहल गेल छला, बाँकी डरे पड़ा कऽ घर धऽ नेने छला। घर धड़ैक कारण खाली अंगरेजी शासन द्वारा चलौल गेल दमन चक्रे नहि छल, ओहूमे दू रंगक विचारक छला। पहिल जे अंगरेजी शासनक समर्थक छला, तँए जनजागरणसँ डरि गेल छला आ दोसर ओहन विचारक लोक छला जे प्राचीन पद्धतिक विचारसँ प्रभावित छला। ओ सभ पुरान विचारसँ एतेक प्रभावित रहैथ जे अपनाकेँ मात्र एक निष्पक्ष गुरुतुल्य मानै छला, जइसँ देशक अजादीक आन्दोलनसँ ओ सभ अपनाकेँ सोल्हन्नी अलग रखने रहला। मुदा विषम परिस्थिति, माने लड़ाइ-दंगाक परिस्थिति देख अपन जिनगीक विचारकेँ समेट अपनाकेँ सुरक्षित रखैले स्कूल छोड़ि-छोड़ि घर धऽ चुकल छला। स्कूल खुजिते दोसर-तेसर शिक्षक सभ आबि शिक्षण कार्य संचालित केलैन। सीतापुरक स्कूलमे सेहो पढ़ौनी शुरू भेल। पहिलुका स्कूलक सभ कागज-पत्तर जब्त भऽ चुकल छल। किएक तँ पहिलुका जे शिक्षक छला हुनकापर शासनद्रोहक अभियोग लगि चुकल छेलैन जइसँ साल भरिसँ ऊपरे जहलोमे रहला। स्कूल खुजला पछाइत पुन: विद्यार्थी सबहक नामांकन भेल। देवचरण सेहो अपन पौत्र–हरिचरणक नाओं लिखा देलैन। ओना, बच्चाकेँ केतेक उमेरमे विद्यालय पठौल जाए, प्राचीन पद्धति की कहैए? मुदा तइ सभपर कोनो विचार नहि कएल गेल। बिना कोनो प्रमाण पत्रे, बिना कोनो जन्म-कुण्डलीए विद्यार्थी सबहक नामांकन भेल। पाँच बर्खक बच्चासँ पनरह-बीस बर्खक बच्चा, जेकरा वौद्धिक रूपमे अक्षर-बोध नहि छल, सबहक प्रवेश स्कूलमे भेल। पढ़ल-लिखल, विचारवान शिक्षक भेने हुनका सबहक मन एतेक तँ मानिते रहैन जे समाजक प्रवुद्ध अंग होइक कारणे देशक सेवा हमरो कर्तव्य भेल। तँए बिना कोनो भेद-भाव केने अधिकांश शिक्षक विद्यालयमे पढ़बैत रहैथ। ओना, समाजक बीच विद्योपार्जनक लेल समाजिक रोक-राक नहि छल एकरो नकारल नहियेँ जा सकैए। किछु शास्त्रीय ज्ञान एहेन तँ छेलैहे जेकरा महिला आ बच्चासँ परहेज मानल जाइ छल। ओना, भागवतकथा गाम-गाममे चलैत रहइ। जइ आसनपर बैस व्यासजी ध्रुव-प्रहलादक कथा सुनबैत रहथिन ओही आसनपर ऋृषिकाक कथा सेहो कहिते रहथिन मुदा समाजक बीच जे चलैन छल, माने समाजक जे गति-विधि रहै तइमे खोंच-खरोच नहि छल एकरो नकारल नहियेँ जा सकैए। शिक्षकक बीच सेहो जातीय बेवहारक प्रभाव रहैन जइसँ शिक्षक शिक्षकक बीच सेहो किछु-ने-किछु दूरी बनले छल। १९४५ इस्वी बीतैत-बीतैत १९४२इस्वीक जे तूफानी आन्दोलन छल ओइमे किछु नरमी आएल। अंगरेजो बहादुर महसूस कइये चुकल छल, जे आब शासन सत्ता बँचाएब कठिन अछि। तँए सत्ताक हस्तांतरण करबे विकल्प अछि। जहलसँ आन्दोनकारी सभकेँ निकालल जाए लगल। गाम-गाममे जे गोरा-पल्टनक घोड़-दौड़ चलि रहल छल ओहो समटा कऽ केन्द्रित हुअ लगल। अपन देशक सत्ता अपन देशवासीक हाथ औत जे अपना ढंगे चलौत। अखन धरिक जे देशक शासनक इतिहास रहल ओ सिर्फ अंगरेजीए शासनटा नइ रहल, ओइसँ पहिनौं विदेशी शासन रहल। मुदा से अखन नहि, अखन एतबे जे मुगल शासनक पछाइत अंगरेजी शासन आएल। जहिना जेठ-अखाढ़मे रौदसँ जरल जमीनक जे धरतीसँ जुड़ल घास-पातक संग छोट-छोट जे गाछ-लत्ती छल ओहो सभ जरि-सुखि चुकल छल, मुदा वादलक बर्खासँ धरती तेना सिंचाएल जे जरल-मरल, मौलाएल-टटाएल सभ गाछ-लत्ती जगि-जगि कऽ ठाढ़ भेल। देशक अजादीसँ पहिने देशक जे-जे समस्या छल ओ १९४५ इस्वीक पछाइत जखन देशक जन-गणक बीच बिसवास जगल जे आब अंगरेजी शासन टुटबे करत अपन शासन हेबे करत। बिसवास जगिते सबहक नजैर अपन-अपन जिनगीक बाधा-रूकाबटपर पड़लैन। पहिने निज समस्याक निदान आवश्यक, लोकमे ऐ तरहक विचार जगिते हजारो समस्याक उदय गाम-गामक समाजमे हुअ लगल। किसानक देश भारत, किसानक बेटा देशकेँ अंगरेजी शासनसँ मुक्त करा अपन कल्याणकारी रस्ता पकैड़ आगू मुहेँ चलता, तँए किसानी लेल माटि-पानि, बीआ-बाइलिक संग खेती करैक लूरि सेहो चाही, तखने खेती अपना गतिये संचालित हएत। दिनानुदिन नव लूरियो आ साधनो भेने उपार्जन बढ़बे करत, जइसँ देश शक्तिशाली बनत। जखने देश शक्तिशाली हएत तखने देशक लोक शक्तिवान हेता। सबहक मनमे यएह आशो आ बिसवासो छेलैन्हे। बकास्त जमीनक आन्दोलन उठि चुकल छल। मुदा ओइमे एकरूपताक अभाव रहल। गाम-गामक समाज वैचारिक रूपमे सेहो आ बेवहारिक रूपमे सेहो बँटाएल रहला। खेतक मर्मकेँ बुझनिहार जे किसान छैथ ओ इंच-इंच भरि जमीनक उपार्जित शक्तिकेँ नीकसँ बुझै छैथ, तँए ओहन किसान नहि छैथ सेहो नइ नहियेँ कहल जाएत जे अपन खेतकेँ हगनार बना रूआबसँ बजै छैथ- ‘जँ हम हगनार नइ दिऐ तँ लोकक हगब बन्न भऽ जाएत।’ अजादीक अन्तिम दौड़ अबैत-अबैत देशक समस्या दर्जनो राजनीतिक दल सेहो बनौलक। समस्याकेँ कोन रूपे समाधान कएल जाए, अधिकांश वेद-वक्ता सभ विचार करिते रहैथ। जइसँ पोखरिक जाठि लगक माटि उखाड़ि पोखरिक पानिकेँ थाहि लेता, ईहो तँ विचारक क्षेत्रमे अछिए। बकास्त आन्दोलन कोनो-कोनो गाममे शत-प्रतिशत सफल भेल आ कोनो गाममे खिच्चैड़ नइ भेल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। भेल दुनू। खाएर जे भेल, किछु लोक अपना-अपना हाथे अपन-अपन भाग्य सेहो लिखलैन आ किछु गोरे या तँ लिखबे ने केलैन वा लिखि कऽ मेटा लेला। गाम-गामसँ जमीनबला किसानक बेटा गाम छोड़ि बजार दिस भागिये रहला अछि। अधिकांश लोक, चाहे ओ बुद्धिजीवी परिवारक हुअए वा मसिजीवी परिवारक, चाहे ओ किसान परिवारक हुअए वा औद्योगिक परिवारक वा खेतिहर-बोनिहारक परिवारक, गाम-घरसँ पड़ा कऽ किए बजारोन्मुख भेल अछि? लाखो-करोड़ो जीव-जन्तुक बीच मनुख सभसँ ऊपर विवेकवान जीव मानल जाइत अछि, मानल नहि जाइत अछि वास्तवमे अछियो। कहैक क्रममे, जहिना मंचपर वक्ता बजै छैथ जे बरद बहैले आ विवेकवान कहैले जन्मे नेने छैथ, तखन जँ से नइ हुअए तँ सेहो जुलुमे बात भेल। खाएर जे भेल, जहिना एक वक्ताक विचार ऊपर अछि तहिना दोसरो वक्ता तँ एहेन छथिए जिनक कहब छैन- ‘जहाँ बसी तँह सुन्दर देशू। जहि प्रतिपालल सोइ नरेश।’ विचारणीय प्रश्न तुलसियो बाबाक छैन्हे, भलेँ ओ खिसिया कऽ कहने होथि वा भावसँ भवित होइत प्रेमाभावमे कहने होइथ। साढ़े तीन हाथक मनुखकेँ दुनियाँ दिस देखैसँ पहिने अपन शकल-सूरत आन-आन जीव-जन्तुक शकल-सूरतसँ भजाइर लेबा चाही। कहैकाल तँ कहिये सकै छिऐ जे हाथी हुअए कि बाघ, भलेँ जंगलमे अपना शक्तिये ओ राजा किए ने बनल अछि, मुदा अपना रहैक घर बनबैक लूरि ने हाथीकेँ छै आ ने बाघकेँ, मुदा माटिमे रहैबला मूसो आ खिखिरो-नढ़िया ओहने अछि सेहो केना कहल जाएत। बजार दिस गाम-घरक लोककेँ पड़ाइन करैक जरूरत किए पड़लैन? चाहे ओ कोसीक कछेरक लोक होथि वा कमला-बागमतीक कछेरमे रहैबला, की ओ सभ ई नइ जानि रहला अछि जे दुनियाँक समृद्धिशाली शहर नदियेक कछेरेमे बसल अछि। दुनियाँक बात छोड़ू, अपने बिहारक जे प्रमुख शहर अछि ओ केतए अछि? सभ कियो तँ यएह ने चाहै छी जे अधिक-सँ-अधिक शान्तचित्तसँ जीवन व्यतीत अपनो करी, परिवारो करए आ समाजोकेँ शान्ति भेटौ। मुदा तइले की खगता अछि आ केतए कोन रस्ता किए बाधित अछि, तैपर विचार के करत? विचारणीय विषय अछि जे केहेन जीवन चाही? जखने धरतीपर जन्म लेलौं, तखने भूख लगबे करत, जँ भूख नहि मेटाएब तँ शरीर खसैत-खसैत खसि पड़बे करब। ओना अन्नोसँ बेसी जरूरत पानिक अछि आ तहूसँ बेसी खगता हवाक अछि जे साँस लइ छी। मुदा ओ तँ प्रकृति अपन अकवालसँ सौंसे दुनियाँकेँ भरि देने अछि। ओना, अछि पीबैक पानियोँ आ भोजनो सामग्रीक पैदा करैक माटियो, मुदा ओइमे कनी मेहनतक जरूरी पड़िये जाइत अछि। धरतीसँ अन्न पैदा होइए आ निच्चाँ पताल आ ऊपर अकाससँ पानि टभकैए। तइमे मनुखक अपन तर्रदुत एते तँ बढ़िये जाइए जे तइले इनार, चापाकल इत्यादिक बेवस्था करए पड़ै छइ। ओना, अकासक पानि जहिना पवित्र बेसी अछि तहिना ओकर तर्रदुत सेहो कठिन अछि, मुदा असाधे अछि सेहो कहब उचित नहियेँ हएत। जखन कि तीनू साधन भरपुर अछिए। तखन अन्नक अभाव किए होइए? पानि दूषित केना भऽ जाइए? वायु प्रदूषित किए भऽ जाइए..? विवेकवान मनुख रहितो जिनगीक मूल-भूत ढाँचासँ ओझल भेल छी। ओना, ओझल होइमे सोल्हन्नी अपने दोख अछि सेहो नहियोँ कहल जा सकैए। सर्वविदित अछि जे कोनो बच्चाक जन्म अज्ञानावस्थामे होइते छै, जेकरा जीता-जीवनक सभ शक्तिक बीज रहितो ओहन शारीरिक अवस्था होइ छै जे कछुआक बच्चा जकाँ नहि जे पानिक ऊपर देने दौड़ैत गेलौं आ अण्डा खसबैत गेलौं। ओइ अण्डाक शक्ति ओहन छै जे माए-बापक खोज नहि करैए, खगतो नइ होइ छइ। लगले अपने फुटि बच्चा भऽ जाइए। बच्चा होइते दौड़ैक शक्ति ओकरामे आबि जाइ छइ। दौड़ैक शक्ति अबिते अपन जीवनक भार उठा लइए। मुदा केतबो कछुआक बच्चा पनिगर किए ने हुअए मुदा ओ अपन माइयो-बापकेँ कहाँ चीन्हि पबैए? मनुख तँ से नहि छी। एकरा माता-पिता परिवारसँ लऽ कऽ समाज धरिक सहारा छइहे। मनुखक जीवनक लेल भोजन मूल छी। भोजनक उपरान्त सभ्य समाजमे जन्म नेने जुगानुकूल वस्त्रक आवश्यकता दोसर आवश्यकता भेल। जंगली जीव तँ मनुख आब रहल नहि, आबक मनुख तँ बहुत ऊपर उठि गेल अछि। जइ अनुपातमे जीवन अछि तही अनुपातक ने आवासो चाही, तहिना पढ़ाइ-लिखाइ, बर-बेमारीक इलाजक संग साहित्य-कला इत्यादि सेहो सभ चाहबे करी। यएह भेल मनुखक जिनगीक ढाँचा। अखन धरि जे अन्धकार मनुख समाजक बीच व्याप्त अछि ओ प्रकृतिगत सेहो अछि आ कृत्रिमगत सेहो। समाजमे रूढ़वादी विचार, अन्ध-बिसवास जे पसरल अछि ओ कृत्रिमगत अन्धकारक भारी स्रोत छी। रंग-रंगक अन्ध-बिसवास पसरलो अछि आ नव-नव शिरासँ पसारलो जाइते अछि। अखन बेसी नहि, अखन एतबे जे मिथिलांचलक मध्य जे दरभंगा-लहेरियासरायमे स्वास्थ्यक लेल अस्पताल बनल आ ओइमे आधुनिक ढंगक इलाजक जे बेवस्था भेल, की ओकर विरोध नइ भेल? खूब विरोध भेल। गाम-घरक जेतेक ठक-फुसियाह छल, सभ अपना-अपना ढंगे विरोध केलक। तँए की आइक मनुख ओकरा अधला बुझत। जीवनक एक मूल-भूत आवश्यकताक पूर्ति तँ भइये रहल अछि। दुनियाँक बीच आजुक परिवेशक जिनगी केहेन बनए? ई तँ विचारणीय प्रश्न अछिए। अखन जेकरा शहर-बजार बुझै छी, ओइमे जिनगीक सभ मूल-भूत आवश्यकताक साधन बनि गेल अछि, जइसँ जिनगी असान भऽ गेल अछि। मुदा सीतापुर सन-सन गाम जे मिथिलांचलमे हजारो अछि, ओइमे किछु ने अछि! गामक जिनगी भारी बनि गेल अछि। तँए अपन मातृभूमिकेँ तियागि अपन शारीरिक मानसिक शक्तिकेँ जगा अपन-अपन परिवारक भरण-पोषण लेल एका-एकी सभ कियो दुनियाँक कोण-कोणमे जा बसि रहला अछि। वैचारिक रूपमे अखनो हम मिथिलाक ओ रूप देखिये रहल छी, जे अदौक चिन्तनधाराक अनुकूल अछि। तँए हम सभ आजुक मिथिलाक चित्रांकन जँ नइ करब, तँ खाली जादू-टोना वा छू-मन्तर कहि देलासँ भए जाएत ई सम्भव नहि अछि। हजार-लाख बरख पहिलुका सतजुग-त्रेतासँ निकैल आइ हम सभ एकैसम सदीमे पहुँच चुकल छी। बकास्त आन्दोलन सीतापुरमे शत-प्रतिशत सफल भेल। शत-प्रतिशत सफल होइक पाछू दू कारण भेल। ने आन गाम जकाँ सतरह रंगक राजनीतिक दल छल आ ने अजादीक आन्दोलनमे सतरह रंगक विचार। काँग्रेस आ वामपंथी–माने पूजीवादी आ समाजवादी–मात्र दुइये विचारधारा गाममे छल। जखने काँग्रेस महाधिवेशनसँ बकास्त जमीनक प्रस्ताव पास भेल तखने सीतापुरक दुनू दल मिलि आन्दोलन रूपमे आन्दोलित भेल। जइसँ सफल भेल। ओना काँग्रेसी कार्यकर्त्ता जे छला ओ स्वामी सहजानन्दजीक विचारसँ प्रभावित छला आ अपनाकेँ स्वामीजीक भक्त सेहो बुझै छला। सीतापुर गामक समाज सेहो देशकेँ कल्याणक दिशामे एक कदम बढ़ाएब बुझलैन। तँए आन गाम जकाँ ने सुदि-सवाइबला महाजन उठि कऽ ठाढ़ भेला आ ने भरना-बन्हकीबला भरनदार वा बन्हकीदार। तँए शान्तिपूर्ण ढंगसँ बकास्त आन्दोलन सीतापुरमे सफल भेल। मुदा बगलेक गाम रूक्मिणीपुरमे गधकिच्चैन भऽ गेल। बीसमी शताब्दीक दोसर दशकमे गाँधीजी बिहार आबि चुकल छला। जमीनक सिस्टम आ जमीन्दारी शोषण सुनला पछाइत आएल छला। तइसँ पहिने १८८० इस्वीमे काँग्रेस पार्टी विदेशी ह्यूम द्वारा बनि चुकल छल। जइक भीतर गाँधीजी अपन कार्य संचालन केलैन। १९२५ इस्वीमे वामपंथी पार्टी सेहो देशमे बनि चुकल छल। १९२७ इस्वीमे सोसलिस्ट पार्टी सेहो बनि गेल। रूक्मिणीपुर गामक सौभाग्य बुझी वा दुर्भाग्य वामपंथी पार्टी नइ बनल। वामपंथीक रूपमे समाजवादी आ दच्छिनपंथीक रूपमे काँग्रेस बनल। दुनूक आधार बदैल जातीय आधार बनि गेल। सभ तरहक–माने ओकातिक हिसाब, सम्पैतिक हिसाब–लोक दुनू पार्टीमे विभाजित भऽ गेला। ओना रूक्मिणीपुरक आमजन सेहो अंगरेजी हुकूमतक विरोधमे ठाढ़ भेल, मुदा नेतृत्व रहल सम्पैतशाली लोकक हाथमे। बकास्त आन्दोलन उठिते रूक्मिणीपुरमे जातीय उन्माद उठि कऽ ठाढ़ भेल। जइसँ जातीय सत्ता जोड़ पकड़लक। देश स्वतंत्र नइ भेल छल मुदा जातीय उन्मादक केतेक रंगक विवाद गाममे ठाढ़ भइये गेल छल। मालगुजारीक लेल बैशाख-जेठ मासक रौदमे ईंटापर ठाढ़ करब सदृश केतेको घटना भऽ चुकल छल। छोट-छोट गल्तीमे पानिमे नहा घोरनक छत्ता देहपर झाड़ि चुकल गेल छल। गोला-लाठी भरि, भरि-भरि दिन रौदमे सजाए देल जा चुकल छल, वएह गाम छी रूक्मिणीपुर। बकास्त जमीनक आन्दोलनक हवा उठिते रूक्मिणीपुरक सूदिखोर-महाजन उठि-उठि ठाढ़ भेल। जहिना काँग्रेस जातीय आधारपर भीतरे-भीतर विभाजित छल तहिना सोसलिस्ट पार्टी सेहो भइये गेल छल। नरमदल-गरमदल कऽ कऽ काँग्रेस आ सोसलिस्ट, प्रजासोसलिस्ट, संयुक्त सोसलिस्ट इत्यादि इत्यादि केतेको विभाजन दुनूक बीच भऽ चुकल छल। बकास्त जमीनक आन्दोलनसँ अगुआ गेल सूदिखोरी, महाजनी। ओना, दुनू पार्टीक बीच एहेन सेहो भेबे कएल जे एक-दोसरकेँ अँखिया-अँखिया माने जातीय आधारपर बकास्त जमीनक आन्दोलन छिट-फुट रूपमे जरूर जागल। मुदा ओ सामुहिक नहि, राजनीतिक दलक अनुकूल जागल। जे मात्र विचारधाराक अनुकूल रहल, आन्दोलनक अनुकूल नहि। गामो तँ गाम छी। कोनो गाम एक जाइतिक तँ अछि नहि, जे किछु मुद्दापर एक भऽ चलबो करत। तहूमे रूक्मिणीपुर तँ आरो अजीव अछि। ऐ गाममे देवी-देवता, स्थान-धर्मशाला सभ किछु बँटाएल अछि। रूक्मिणीपुरमे आठ कट्ठा जमीन दखल करैक प्रश्न उठल। गामक ई पहिल घटना छल। भेल ई जमीन दखल करैक प्रश्नपर एक जाइतिक शूमा बनल। काल्हि जमीनपर हर चढ़ौल जाएत। रातिये भरिमे रंग-रंगक योजना गाममे बनए लगल। आठ बजे भिनसरमे हर चढ़ैक समय जे निर्धारित छल, तइसँ पहिनहि, माने छबे बजेमे दू जाइतिक बीच एहेन मारि फँसि गेल जे दुनू दिससँ लहासे नइ खसल, एक दिससँ एकटा आ दोसर दिससँ दूटा मरबो कएल। अंगरेजक लड़ाइमे तँ रूक्मिणीपुरक एको गोरे जहल नहि देखने छला मुदा साल भरि दुनू जाइतिक लोक जहलेमे रहला, ईहो हिसाब तँ अजादीक आन्दोलनेक अंग ने भेल। आकि नइ? तिथि : २१ मई २०१८ जारी... ४. सीतापुर गामसँ लऽ कऽ मिथिलांचल होइत सौंसे देशे स्वतंत्र भेल। देशक जन-जनमे स्वतंत्रताक जे खुशी होइ छै ओ खुशीक लहैर उठबे कएल। ओना, शासकक रूपमे अंगरेज सत्ता छोड़लक, मुदा देशक जे अपन समस्या हजारो बर्खसँ जनमैत आबि रहल छल ओ तँ आरो जटिल भइये गेल छल। जइसँ आगू बढ़ैक बदला पाछूए मुहेँ देश ससैर रहल छल। तैसंग अंगरेज बहादुर हिन्दु-मुसलमानक बीच भारत-पाकिस्तान बना नमहर झगड़ाक बीआ छीटिये देने छल। ओना, जँ देखल जाए तँ भारतक पच्छिमी सीमापर पच्छिमी पाकिस्तान भेल आ पूबसँ बंगाल कटि पूर्वी पाकिस्तान भेल, जे समुद्रसँ सेहो सटल अछिए। ओ भूभाग पाकिस्तान देशक रूपमे भेल, मुदा ऐठामक समाज माने मिथिलांचलक संग सीतापुरक समाज अदौसँ हिन्दू-मुसलमान, एक्के गाममे मन्दिरो आ मस्जिदो बना अपन पूजा-इबादत करैत आबिये रहल अछि। धर्मक नाओंपर जखन देशक विभाजनो भेल आ नव देशक रूपमे सेहो स्वतंत्र भऽ कऽ ठाढ़ भेल, तखन जातीय उन्माद नइ जगै सेहो तँ असम्भव नहियेँ अछि, सम्भव अछिए। एक-दोसरकेँ एक दोसर कहैत रहबसँ विवादक जड़ि मोटाइते छल। जइसँ दुनूक बीच जहाँ-तहाँ मारि-पीटि, खून-खच्चरसँ लऽ कऽ सम्पैतिक संग इज्जत-आवरूक लूट-पाट सेहो भेबो कएल आ अखन धरि होइतो आबिये रहल अछि। देशक अजादीक लेल जे देशभक्त छला हुनका सबहक सोझामे देश स्वतंत्र भेलासँ पूर्व जेतेक समस्या छेलैन तइसँ कतेको गुणा बेसी स्वतंत्रता प्राप्तिक पछाइत आगूमे एलैन। उजरल-उपटल, शोषित-पीड़ित देशक बागडोर देशवासीक हाथमे एलैन। जइसँ सबहक विचारमे द्वन्द्व उठबे कएल। ओना, अजादीसँ पूर्व वैचारिक चिन्तनधाराक ओ रूप नहि छल जइसँ समस्याक समाधान होएत। एकमुहरी कहियौ आकि एकसूत्री, सभ आन्दोलनीक उदेस अंगरेजी शासनक विरूद्ध छेलैन, तँए दोसर-तेसर समस्या गौण पड़ि गेल छल, जे स्वतंत्र भेला पछाइत प्रमुखतासँ आगू आएल। आइक जे देश भारत छी, वएह अजादीक समय १९४७ इस्वीमे सेहो छल, किसानेक देश भारत तहियो कहबै छल आ आइयो कहबैए। भलेँ लोक अपन जमीन-जत्था, गाम-घर छोड़ि शहर-बजार किए ने पकैड़ रहला अछि। खाएर जे अछि, मुदा एते तँ हमरा सभकेँ बुझए पड़त किने जे औझुका जकाँ १९४७ इस्वीमे देशक जनसंख्या नइ छल मुदा तैयो खाएब-पीब नइ घटै छल सेहो केना नइ कहल जाएत। आन-आन देशसँ अन्न, कर्जक रूपमे अबै छल आ हम सभ जनेर-गहुम खा-खा प्राण बँचबै छेलौं। किसानक दशा-दिशा देखाएबो आ सुघारबोमे स्वामी सहजानन्दजीक जबरदस भूमिका रहलैन। किसानक समस्याकेँ ओ अति सुक्ष्म दृष्टिसँ देखै छला। सीतापुर गामक जे काँग्रेसी कार्यकर्त्ता सभ छला, ओ सभ स्वामीजीक भक्त रहथिन, जइसँ आन गामक अपेक्षा सीतापुरमे बकास्त जमीनक वापसी सफल रूपमे संचालित भेल। ओना, गाममे वामपंथी विचारधारा सेहो प्रवल रूपमे रहबे करइ। जेकर प्रमाण अखनो सद्य: सबहक सोझमे अछिए जे मिथिलांचलेक आन-आन गाममे अखनो बास भूमिक समस्या अछि, मुदा सीतापुरमे से नहि अछि। ओना किसानक जे निम्न-कोटि होइए माने सीमान्त किसान ओ सीतापुरमे बेसी अछि। किसान परिवारक जे नव पीढ़ीक लोक छैथ, ओ अपन-अपन खेतो-पथार आ घरो-दुआर छोड़ि शहर-बजारमे घर-दुआर बना रहए लगला अछि। मुदा गामो तँ गाम छी, जहिना एक दिस जमीन छोड़निहार छैथ तहिना खेती केनिहारक अभाव सेहो भइये गेल अछि। सइयो रंगक ओझरी जमीनक बीच ठाढ़ अछिए। एक दिस अजादीक किछुए दिनक पछाइत गाँधीजीक हत्या भेलैन तँ दोसर दिस देशक शासन-बेवस्था चलबैले संविधान सभ सेहो बनि, कार्यरत भेल। किसानी-ले जहिना माटिक जरूरत अछि तहिना पानियोँक अछिए। पानिक साधन बनबैले पच्छिमी-पूर्वी कोसी नहरक चर्च जोर-शोर चलिये रहल छल। तैसंग धार-धुरक बाढ़िक बचाउ-ले धारकेँ घेरबोक जरूरत छेलैहे। तैसंग सिंचाइक जरूरत सेहो छेलैहे। बोरिंगसँ पतालक पानि ऊपर आनि खेतकेँ पटौल जाइए, ई लोक मात्र सुनितेटा छल। वास्तविक रूपमे केतौ छल नहि। ओना, गाम-गाममे चरो-चाँचर आ पोखरियो-झॉंखैर अछिए मुदा ओइसँ सिंचाइक समुचित बेवस्था हएब सम्भव नहि छल। एक तँ गाम-गामक पोखैर कोसी-कमला धारमे कटबो कएल आ भथानो भेल, मुदा जइ गाममे नहि भेल तहू गाममे छोट-छोट पोखैर रहने ओइमे ओते पानि जमा रहितो ने छल जइसँ सिंचाइक पूर्ति सम्भव होइत। ओना, गाम-गाममे पोखैरबला, माने जिनकर पोखैर छिऐन ओ खेत पटबैक कोन बात जे लोककेँ नेहेबोमे रोक लगेने छल। किछु गामक पोखैरमे नहाइ-ले घाट फुटा-फुटा बनौल गेल छल तँ किछु गाममे किछु जाइतिक समुदायकेँ नहाइसँ रोकल जाइ छल। ओना, अट्ठारह गण्डा पोखैरबला सीतापुर गाममे सिर्फ पाँचेटा पोखैर ओहन छल जइमे किछु जातिकेँ नहाएबसँ रोक छेलइ। ओना, सहजानन्द स्वामीजीक छत्रछायामे गाम-गामक किछु पोखैर सार्वजनिक भऽ गेल, मुदा अधिकांश गामक अधिकांश पोखैर बचले रहल। ओना, जहिना माटि उपजाक बखारी छी तहिना पानियोँ छीहे। मुदा से तँ समुचित बेवस्था भेला पछाइत हएत। गुलामीसँ अजादीक सीमापर तँ देश ठाढ़ भेल मुदा हजारो रंगक अन्ध-बिसवासो आ रूढ़िवादितो चिन्तन धाराकेँ जकैड़ कऽ पकड़नहि छल जइसँ नव चिन्तनधारा बनियेँ ने पेब रहल छल। हजारो बर्खक विदेशी शासनसँ त्रस्त समाज अखनो स्वतंत्रताक महत बुझिये ने पेब रहल छल। जइसँ मनुखक जिनगीक आधार मजगूत होएत। जहिना किसानी जिनगी अनबिसवासू छल तहिना आन-आन छोट-मोट धन्धोक छेलैहे। एक दिस जहिना गाम-समाजक किछु चुनल-चानल लोक समाजक आधारकेँ मजगूत बनबैक विचारक संग क्रियागत रूपमे सेहो दिन-राति एकबट्ट केने छला, तहिना अज्ञानक अन्धकारमे पसरल समाजकेँ अन्ध-बिसवासक अन्धकारे दिस समाज विरोधी शक्ति धकेल रहल छल, जइसँ देश आगू बढ़त आकि पाछू जाएत से निर्णय करब कठिन छेलैहे। किसानक दुर्भाग्य छेलैहे जे जे पानि कृषि लेल अमृत छी ओ मौनसूनपर निर्भर छल। सालक मात्र तीन-चारि मास ओहन अछि जइमे बरखो होइए आ बर्खाक सम्भावित मास सेहो मानल जाइए, मुदा मौनसूनोक एहेन निसचित ठेकान नहियेँ अछि जे एते बरखा साले-साल हेबे करत। सम्भावित बर्खासँ कोनो साल बेसियो भऽ जाइए आ कोनो साल कम्मो होइए। तैबीच एहनो तँ होइते अछि जे कोनो साल नहियोँ भेल। पैछला शताब्दीक सबहक ऐतिहासिक अनुभव लोककेँ छैन्हे जे जहिना उनैसमी शताब्दीमे पचीसटा रौदी भेल तहिना अठारमी शताब्दीमे सेहो भेबे कएल। रौदी तँ रौदी छी, ओकरो कि कोनो ठेकान अछि जे एत्ते हएत कि एतबे हएत? एक मौसमक सेहो होइए आ दू-तीन-चारि-पाँचक संग बारह बर्खक सेहो भेबे कएल अछि। बारह बर्खक रौदीक अनुभव मिथिलांचलक मिथि मालिनिकेँ सेहो छैन्हे। बुझले अछि जे बारह बर्खक रौदीक पछाइत सीताक जन्म भेलैन सेहो जखन जनकजी अपने हाथे हर पकैड़ जोतलैन, तखन। किसानक लेल जहिना माटि पूजनीय सम्पदा अछि, तहिना पानियोँ अछि। मुदा ओ तँ तखन पूज्य हएत जखन ओकर विधिवत् अराधना करब। मुदा ऐठाम से तँ छल नहि। मिथिलांचलमे अनिसचित जीवन सभ जीब रहल छला जइसँ कोनो साल समुचित बरखा भेने जहिना खुशहाली अबै छल तहिना समुचित बरखा नइ भेने ओकर विपरीत स्थिति सेहो होइते छल। तैसंग समाजमे पसरल रूढ़वादी चिन्तनधारा भाग्य-तकदीरकेँ अगुआ समाजक पछुआ पकैड़ सेहो पछुऐबते छल। माने नव चेतनाक उदयकेँ रोकिते छल। मनुखक जिनगीक एक-एक समस्याकेँ हजार-हजार रंगक विचार तेना ओझरा देने छल जे अपनो जीवन-मरण लोक अपनेसँ नइ बुझि रहल छला। बरखा नइ भेल तँए कियो जटा-जटीनक नाच नाचि-नाचि बेंगकेँ उखैरमे कुटि, ओहन लोकक ऑंगनमे फेकै छल, जेकर गिनती समाजमे झगड़ाउ लोकमे होइ छल। रौतुका घटना भोर होइते झगड़ा-लड़ाइक रूप लइ छल। तहूमे सामुहिक रूपसँ फेकल बेंग, एकाकी परिवारक बीच विवाद ठाढ़ होइते छल। तेतबे नहि, बरखा नइ भेने पैघ-पैघ भगताइयो होइते छल आ जगो-जाप होइते छल। एक तँ उपजा नइ भेने लोकक घर खाली रहै छेलै जइसँ जीवन कठिन छेलै, तैपर सँ परियाप्त खर्च सेहो होइते छेलइ। माटि-पानिक संग किसानी जिनगी-ले नीक-नीक बीजक संग नीक-नीक लूरिक जरूरत सेहो अछिए। कोनो देशक, माटि-पानि-खान-पहाड़ मूल उत्पादित सम्पदा छी। ओना ऐ चारूक हिसाबे, माने माटि-पानि-खान-पहाड़सँ अप्पन देश बहुत सम्पन्न अछिए। तहूमे मिथिलांचल तँ आरो बेसी सम्पन्न अछि। मिथिलांचलक जेहने माटि पवित्र अछि तेहने पानि सेहो गुनगरक संग परियाप्त सेहो अछिए। दर्जनो नदी जहिना सालो भरि बहता अछि, तहिना मौसमक अनुसारे बरखा सेहो होइते अछि। दुनियाँक कोनो देश एहेन नहि अछि जेकर माटि एहेन उर्वर होइ। जँ कोनो देशक माटि एहेन उर्वर अछियो तँ ओकर दोसर साधन ओहन नइ अछि, जेहेन अपना सबहक अछि। कृषिक पैदावार मौसमक अनुकूल सेहो होइते अछि। तहूमे अपन देश आन-आन देशसँ बेसी नीक अछि। किएक तँ किछु देश एहेन अछि, जैठाम सालो भरि एकरंगाहे मौसम रहैए वा एकसँ आगू बढ़ि डेढ़-दू मौसमक होइए। माने ई जे कोनो देश सालो भरि ठण्ढे रहैए तँ कोनो देश सालो भरि गरमे रहैए। तहूसँ विचित्र ई अछि जे कोनो देशमे बरखा होइते ने छै, तँ कोनो देशमे सालो भरि बरखा होइए। जइ देशमे सभ साल, सालो भरि बरखे हएत तइ देशमे कृषि कार्य केना हएत? मुदा ओइठाम प्रकृतिक अनुकूले पैदावार होइए। तथापि अखन धरि माने बीसमी सदीक पाँचम-छठम दशक धरिक बीच जे किसान देश भारतक किसानी जिनगी रहल ओ आन बहुतो देशसँ पछुआएल रहल, जइसँ जे उत्पादन हेबा चाही, से नहि भऽ पबै छल। तेकर अनेको कारण छल। जहिना समुचित जानकारक अभाव छल तहिना समुचित खेती करैक सम्बन्धित औजारक संग समुचित बेवस्थाक अभाव सेहो छेलैहे। जुग-जुगसँ अबैत जहिना कृषि औजार छल तहिना जुग-जुगसँ अबैत कृषि कार्यक तकनीको छेलइ। बेवस्था ओहन छल नहि जे समुचित ढंगसँ कृषि संचालित कएल जाइत। ओना, बेवस्थाक एक नहि दू दिशा अछि, मुदा दुनू दिशा अन्धकारपूर्णे छल। जहिना नव सरकार गठित भेने साइयो-हजारो रंगक नव-नव समस्या उठैए, तहिना देशी सरकार गठित भेने, तहूमे अंगरेजी हुकुमतक तुरन्त पछाइत देश भरिमे अनेकानेक समस्या आगूमे आएल। ओना, सरकारी तंत्रकेँ मजगूत आ कमजोर हेबाक सेहो कारण अछि मुदा से अखन नहि। अखन एतबे जे जैठाम पेटक समस्या विकराल रूपमे मुँह बौने छल, तैठाम जिनगीक जे दोसर मूल आवश्यकता छल तैपर धियान केना जाएत? तहूमे अंगरेजी शासनक खिलाफ साधारण लड़ाइयो तँ नहियेँ भेल। कोनो दू देशक बीच लड़ाइ भेने जेकरा जमीनपर लड़ाइ होइए, ओकर अर्थबेवस्था कमजोर होइते अछि। तँए सरकारी बेवस्था कमजोर छेलैहे जइसँ कृषि पंगु बनले रहल। ई भेल एक दिशा, दोसर दिशा अछि समाजिक बेवस्था। अपना देशक समाजिक बेवस्था सेहो कृषि क्षेत्रक प्रतिकूले छल। समाजिक रूपमे कहियो कृषिकेँ समुचित ढंगसँ बेवस्थित करैक विचार समाजक मनमे उठबे ने कएल। ओना, सोल्होअना नहि उठल, सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। गामक-गाम बीच जखन रौदी पसरैत छल तखन ओइ गाम होइत जे बहता धार सभ छेलै, ओकरा समाजिक रूपमे बान्हि गामक खेत पटौल जाइ छल। मुदा तोहूमे जबरदस बाधा उपस्थित भेल। बाधा ई भेल जे जिनका जेतेक बेसी सिंचाइ होइतैन तिनकर सहयोग तेतेक कम भऽ जाइत छल। माने ई जे जिनकर खेत बेसी पटै छेलैन, जइसँ बेसी उपजा होइ छेलैन, ओ रौदी-दाहीक ताकमे रहै छला। ताकक कारण ई जे महगकेँ अन्नो बेचलौं आ सूदि-सबाइक संग बन्हकी-भरनाक लाभ सेहो उठेलौं। मुदा मध्यम किसानसँ लऽ कऽ सीमान्तो किसान आ खेतमे काज केनिहार मजदूरोक दशा कमजोरे होइ छल। जइसँ जहिना कृषि क्षेत्र पंगु बनल छल तहिना खेतीपर जीवन धारण करैबला किसानो-बोनिहार पंगु बनले छला। ओना, जएह साधन वा जएह सम्पदा छल ओकरो उपयोग समुचित ढंगसँ कएले जा सकै छल। कम्मो साधनसँ नीक काज होइए आ बेसियो साधन रहनौं जँ करैक इच्छा नहि रहल तँ किछु ने होइए। नव सरकार गठित भेला पछातियो कृषि क्षेत्रकेँ अनदेखी कएल गेल, जइसँ अछैते साधनक रहने पेटक भूख रहबे कएल। यएह देश छी जे १९७१ इस्वीक पछाइत भूखक समस्या मेटौलक से तँ उन्नैस साए पचासो-बावनमे मेटाएल जा सकै छल। जे समस्या भूत बनि देशकेँ पछुएने रहल। कृषि क्षेत्रमे विशाल साधन मौजूद अछि। जे ओहिना-क-ओहिना पंगु बनल रहल। ने पानिक उपयोग समुचित ढंगसँ भेल आ ने माटिक भेल। दुनियाँक अनेको छोट-पैघ देश ओहन अछि जे कृषि पैदाबारसँ सम्पन्न आइये नहि, बहुत पहिनहिसँ रहल अछि। १९५२इस्वीक चुनाव भेल। बहुत किछु अधिकार आमजनकेँ देल जा चुकल छल, मुदा समाजिक ढाँचा ओइ अनुकूल नइ छल, तँए बेसी अधिकार-कर्तव्यक बोधो आ बेवहारो संविधानक पन्नेमे दबल रहि गेल। ओना, सौंसे देशमे चुनावक पद्धतिकेँ अपना चुनाव भेल, मुदा नेंगरा देशक नेंगरी अजादीक जे होइ छै, सएह भेल। सीतापुर गाममे मात्र लोअरे प्राइमरी स्कूलटा छल, आगूक नहि छल। ओना, सीतापुरक बगलक गाम–रोहितपुरमे मिडिल तकक पढ़ाइ होइ छल। ओहू गाममे हाइ स्कूल नहि छल। सीतोपुर आ रोहितोपुरसँ दस कोस हटि नन्दपुरमे हाइ स्कूल छल, मुदा ओइठाम पढ़ैले छात्रावासमे रहब जरूरी छेलैहे। १९५३ इस्वीमे हरिचरण मिडिल पास केलक। ओना, देवचरण सेहो साठि बर्खक उमेर पार कइये चुकल छला जइसँ जेना पहिने काज-उदम करै छला तेना आब नहियेँ कएल होइ छेलैन। जेहनो खेती पहिने होइ छेलैन, तेहनो आब नइ भेने उपजा-बाड़ी सेहो कमए लगलैन। देवचरणक बेटा- राधाचरण अकिंचन छला। खेती करैक अपना कोनो ऊहि नहि छेलैन आ जेहो छेलैन तहूमे देह चोरबै छला। देह चोराएब भेल काजसँ छॉंह काटब, माने नइ करब। राधाचरणक बेटा- हरिचरण सेहो तेरह-चौदह बर्खक भइये गेल छल। साधनक अभावमे हरिचरण हाइ स्कूलमे नाओं नहि लिखा सकल। अपन गिरैत शक्तिकेँ देखैत देवचरण हरिचरणकेँ कहलैन- “बौआ, आब हमर कोनो आशा नइ करह। तखन तँ खेती करैक जे लूरि अछि, बेसी-सँ-बेसी ओ तोरा बुझा देबह।” हरिचरणक मनमे अखन तक नोकरी करैक कोनो विचार नहि उठल छल। उठबो केना करैत, एक तँ बेसी पढ़ल-लिखल नहि, दोसर- गामक-गाम बेरोजगार युवकसँ भरल छल। बाबाक विचार हरिचरण मानि बाजल- “बाबा, अपन काज हुअए आकि अनकर काज, केतौ तँ मेहनतेक फल भेटत। तहूमे जखन अपना खेत-पथार अछि तखन जँ नोकरी करए जाएब तँ अपन खेती-पथारी केना हएत?” हरिचरणक नव उदित विचारकेँ देवचरण नीक जकाँ विचारलैन। जेते विचारमे गम्भीरता अबैत जानि तेते मन मुदितसँ प्रमुदित होइत वा फुलितसँ प्रफुलित वा फलित होइत बढ़ल जाइन। अपन परिवारसँ परिचित करबैत देवचरण बजला- “बौआ हरि, पूर्वजक अरजल जे सम्पैत छह ओ बीचमे बोहा गेल छेलह, माने निलाम भऽ गेल छल, ओकरा हम पुन: जीवित करैत अपन बनेलौं। गामेमे नजैर उठा कऽ देखह जे केते परिवार अछि जेकरा तीन बीघा खेत छइ। से तँ अपना भइये गेलह।” बिच्चेमे हरिचरण बाजल- “हँ, से तँ भइये गेल बाबा।” हरिचरणक स्थिर होइत विचारक वृक्षकेँ देवचरण आरो सिंचित करैत बजला- “बौआ हरि, अखन तूँ नव-उदित सूर्य जकाँ लौहित लाल तँ नहि मुदा पीड़ित पिरौंछ लालीक रूपमे जरूर छह, जेना-जेना समय आगू बढ़ैत जाएत, तेना-तेना लालीपन धबैत जेतह। तँए, अखन बेसी नइ कहबह। एकेटा अन्तिम बात अछि से पुछि लइ छिअ।” पिपाशु पक्षी जकाँ हरिचरण बाजल- “की पुछए चाहै छी बाबा?” देवचरण बजला- “बौआ, मौखिक परीक्षा जकाँ पुछबेटा नइ करै छिअ। संकल्पित रूपमे पुछै छिअ। अपन समर्पण अपना-ले करबह आकि अनका-ले?” बाबाक विचार सुनि हरिचरण बाजल- “बाबा, अखन अहाँ जीबै छी तखन हमर संकल्प आकि विकल्पे की।” तिथि : २४मई २०१८ जारी... ५. पन्द्रह अगस्त १९४७ इस्वीकए लालकिलापर स्वतंत्र देशक तिरंगा झण्डा फहरा गेल। ३० जनवरी १९४८ इस्वीकए गाँधीजीक मृत्यु गोली लगलासँ भऽ गेलैन। २६ जनवरी १९५० इस्वीकए देशक अपन संविधान लागू भऽ गेल। १९५२इस्वीमे लोको सभा आ राज्यक विधान सभा-ले सेहो चुनाव भऽ गेल। १९५२इस्वीक आम चुनाव देशक ऐतिहासिक चुनाव छल। ऐतिहासिक ऐ मानेमे जे जेतेटा देश भारत आइ अछि ओतेटा भारत शासनक दृष्टिसँ पहिने नइ छल। राजा-रजबारसँ लऽ कऽ जमीन्दार, महंथानासँ देश भरल छल। किसानक देश भारत रहितो किसानक मूल पूजी राजा-रजबारसँ लऽ कऽ महंथाना-जमीन्दार धरिक हाथमे घेराएल छल। ओना, लोक सभाक चुनावमे जहिना देशक शासन (केन्द्र शासन) काँग्रेस सरकारक हाथ आएल तहिना राज्यक शासन सेहो काँग्रेसक हाथमे आएल। मुदा केन्द्रोमे आ राज्योमे एकछाहा काँग्रेसेक प्रतिनिधिटा नहि पहुँचला, अनेको राजनीतिक पार्टीक प्रतिनिधि सभ पहुँचल छला। दिल्लीक शासनमे जहिना पण्डित जवाहरलाल नेहरूक नेतृत्वमे काँग्रेसी सरकार बनल, तहिना अनेको पार्टीक बीच कम्युनिष्ट पार्टीक प्रतिनिधि सेहो विरोधी दलक नेतृत्वमे ठाढ़ भेला। काँग्रेस पार्टीक अलाबे आन सभ पार्टीसँ बेसी कम्युनिष्ट पार्टीक प्रतिनिधि छला। चुनावसँ पूर्व सभ पार्टी अपन-अपन घोषणा पत्रक माध्यमसँ अपन-अपन कार्यक्रम निर्धारित कऽ नेने छल। देशोक बीच आ राज्यो सभक बीच समाजिक-आर्थिक विषमता तँ छेलैहे। कोनो-कोनो राज्य औद्योगिक क्षेत्रमे अगुआ जिनगीक मूल समस्याक समाधानमे सेहो अगुआ गेल छल, जइसँ ओइठाम रोजगारसँ लऽ कऽ स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सभ किछु अगुआ गेल छेलइ। मुदा अधिकांश राज्य पछुआएल छल। पछुआएबो एक्के रंगक नहि छल, रंग-बिरंगक छल। कोनो राज्य अपन जमीनकेँ प्रगतिक पटरीपर चढ़ा नेने छल, तँ कोनो राज्य पाछुए मुहेँ ससैर रहल छल। केरल-बंगालक संग आनो-आनो राज्य सभ अपन अर्थ बेवस्थाकेँ पटरीपर चढ़बए लगल छल। ओना, अपन बिहारो तइमे पाछू नहि छल। घराड़ीक जमीनकेँ बेलगान करबा चुकल छल। बकास्त जमीनक आन्दोलन सेहो मिथिलांचलमे जमि कऽ भेल। मुदा बकास्त जमीन तँ ओ जमीन ने भेल जेकरा अंग्रेज बहादुर सर्वे-सेटलमेन्टसँ १९०३ इस्वीमे फाइनल केने छल। मुदा तँए कि पुस्त-पुस्ताइनसँ लोक खेती करैत नइ आबि रहल छला, सेहो बात तँ नहियेँ छल। मुदा हुनका सबहक लेल जमीनक कोनो अधिकार पत्र नइ छेलैन, तँए ओ सभ बँटेदारक रूपमे अपनाकेँ बुझै छला। जमीन उपजबैत रहला, अगो-जनारसँ लऽ कऽ अधिया-बॉंट बॉंटैत खेतबलाकेँ अपन कर्जक सुदि-सबाइ चुकबैत खाली हाथे घर घुमैत रहला। तँए एहेन खेतिहर लेल नव सिरासँ बटाइ कानूनक जरूरत भेल। ओना, किछु परिवारकेँ बेलगान घराड़ी छेलैन मुदा हुनको सबहक घराड़ीक लूट-पाट होइते रहैन। ओना, बेलगान घराड़ीपर रहनिहार आ खेत उपजौनिहारक नाओंसँ ‘सिकमी बँटाइ’क खतियान सर्वेमे बनि चुकल छल मुदा तेकर अतिरिक्तो आधासँ बेसीए बँटेदार छुटलो छलाहे। मिथिलांचलक साम्यवादी पार्टी अपन चुनावी घोषणा पत्रमे अपन समस्या-समाधानक प्रस्ताव रखि चुकल छल, खेतीक लेल माटि मूल पूजी छीहे। लिखितसँ मौखिक धरि अपन मूल समस्या जेना- भूमिहीनकेँ बासभूमि, खेत उपजौनिहारकेँ सिकमीक बटाइक अधिकार, अधिक जमीन रखनिहार जमीन्दार-महंथानाकेँ भूमि हदबन्दीक भीतर आनब आ ओकर शेष जमीन उपजौनिहारक हाथमे देब इत्यादि। तैसंग पीबैसँ लऽ कऽ खेत पटबै धरिक पानिक बेवस्था, अइले कोसी नहरिक संग गाम-गाममे पसरल पोखैरिक जे समस्या सभ छल तेकर समाधान सार्वजनिक रूपमे हुअए, इत्यादि-इत्यादि। ऐ सभ समस्याक समाधानक लेल साम्यवादी पार्टी उठि कऽ ठाढ़ भेल। मिथिलांचलक सौभाग्य रहल जे ऐठाम महान-महान साधक लोकनिक आवाजाही सदिकाल होइत रहल। खाली आबाजाहिये टा नहि भेल, ओ सभ मिथिलांचलकेँ अपन कर्मभूमि बना जीवन भरि सेवा करैत रहला। सन् १९५५ मे विनोबा भावे झंझारपुर एला। नमहर सभा भेल छेलैन। अखन जे थानासँ पच्छिम औद्योगिक क्षेत्रक रूपमे देखै छी, ओइ समय ओ नमहर फिल्ड छल, जैपर फुटबॉल सेहो खेलल जाइत छल, ओही फिल्डपर सभा भेल छल। भूदान आन्दोलनक रूपमे जमीनक आन्दोलन विनोबाजी ठाढ़ केलैन। हुनक माँग रहैन अपन जमीनक छबम् हिस्सा जमीन दान करू। एक दिस तेलांगनाक सशस्त्र लड़ाइ जारी छल आ दोसर दिस भूदानी आन्दोलन शुरू भेल। ऐ आन्दोलनमे प्रेम-पूर्वक स्वेच्छासँ अपन जमीन दान कएल जाइ छल। गाम-गाममे भूदान कमिटीक गठन भेल छल। परिवारक रूपमे जहिना जीविकाक लेल खेत आ खेतीक समस्या छल तहिना गाम-समाजक रूपमे सेहो अनेको समस्या छल। एक दिस नव स्वतंत्र देश, दोसर दिस धरतीसँ अकास धरि अनेको समस्या सबहक सोझामे उपस्थित भेल। गाममे एक दिस जहिना पेटक समस्या छल तहिना दोसर दिस वस्त्र, आवास, शिक्षा आ चिकित्साक समस्या सेहो छल। गाम-गाममे हैजा, चेचक, मलेरिया इत्यादि अनेको संक्रामक बेमारीक प्रकोप होइत रहै छल। जइसँ अनेको लोक मरै छला। ने पढ़ाइ-लिखाइक लेल विद्यालय छल आ ने बेमारीक लेल चिकित्सा सुविधा। तैबीच अन्ध-बिसवास तेना पसरल जे मनुखकेँ समुचित दिशा दिस बढ़ए नहि दैत छल। अन्हार घर साँपे-साँप सदृश वातावरण बनल छल। राज्यो सरकार आ केन्द्रो सरकारक बीच अपन-अपन एहेन-एहेन समस्या सभ छल जे अर्थाभावमे किछु कइये नहि पेब रहल छल। ओना, अर्थाभाव सेहो छल मुदा मूल अभाव छल कुशल केनिहारक। मिथिलांचल सभ दिनसँ धार-धुरक इलाका रहबे कएल अछि। दर्जनो धार मिथिलांचलक बीच अछिए। ओहू धार-धूरमे सभ धारक गति-विधि एक्के रंग सेहो नहियेँ अछि। किछु धार एहेन अछि जे बेसी काट-खोंट करैए आ किछु एहेन अछि जे बहैत तँ अछि सालो भरि मुदा समटल गतिये। तैसंग मरल धार सेहो अछिए। मरल धारक माने भेल, ओहन धार जे बरसातमे तँ किछु दिन बोहितो अछि मुदा रहैए सभ दिन सुखले। जइसँ ने ओइ जमीनमे उपजा-बाड़ी होइए आ ने उपयोगक कोनो दोसरे काज। तैसंग माटिक रूपमे सेहो दुभाग्य रहल अछि जे उपजाउ माटि माने उर्वर शक्तिबला खेतक माटि भँसि गेल आ ओकरा ऊपर दोखरा बाउल भरि गेल। कोसी-कमला नदीक उपद्रव सबहक सोझमे छेलैहे। ओकरो रोक-थामक लेल मिथिलाक किसान उठि कऽ ठाढ़ भेला। कोसी नदीकेँ दुनू भागसँ बान्हि ओइ पानिक उपयोग सिंचाइ-ले करैक योजना बनल। बान्हक संग फाटकबला पुलो आ नहरोक योजना बनल। तैसंग बिजली उत्पादन लेल डैम बनबैक अवाज सेहो उठले छल। ओना, देश नव-नव स्वतंत्र भेले छल। जइसँ देशवासीमे स्वतंत्रताक उत्साह सेहो बनले छेलैन। कोसी नदीक दुनू तटबन्ध बनबैले एकाएक जन-सैलाव उमैड़ गेल। माने जन-आन्दोलनक रूपमे सहयोग भेल। गाम-गामसँ लोक अपन श्रमदान करैले पहुँचल। बान्हो बनल, नेपाल सीमाक बीच फाटकबला पुलो बनल। सबहक मनमे बिसवास भेल जे दुनू देशक जमीनक सिंचाइ हएत। मुदा आइ लक-धक साठि बर्ख बीतलोपर कोसी नहरक योजनाक की गति अछि, ओ सबहक बीच अछिए। देशक अजादीक लड़ाइमे जे पीढ़ी बलिदान देलैन हुनकर आइ तेसर पीढ़ी गुजैर रहल अछि, गाम-घर छोड़ि-छोड़ि ओ सभ पड़ाइन कए रहला अछि। जहिना अपना देशमे अंगरेजी शासनक विरूद्ध १९३५ इस्वीक पछाइत जन-आन्दोलन उग्र भेल छल तहिना दुनियाँक बीच सेहो युद्ध जारी छल, जेकरा द्वितीय विश्व युद्धक रूपमे जनै छी। दू भागमे बँटि दुनियाँक बीच जबरदस लड़ाइ फँसि चुकल छल। पहिल विश्व युद्धक भुक्तभोगी जर्मनी भऽ चुकल छल। १९१७ इस्वीमे रूसमे साम्यवादी पार्टीक बीच सत्ता आबि चुकल छल। दोसर विश्वयुद्धमे एक दिस साम्यवादी देश आ दोसर दिस साम्राज्यवादी देशक समूह आमने-सामने भऽ चुकल छल। ओना, दुनियाँक इतिहास लड़ाइयेक घटनासँ भरल अछि, मुदा अखन धरिक जे लड़ाइ–दू देशक बीच–रहल ओ एक विचारक कहियौ आकि एकधाराक, बीच रहल। किएक तँ एक्के विचारधाराक शासन-तंत्र अपन-अपन बजार-ले लड़ल छल। मुदा द्वितीय विश्व युद्ध, जेकरा शीत युद्ध सेहो कहै छिऐ, ओ वैचारिक रूपमे लड़ाइ भेल। द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त भेला पछाइत नव-नव केतेको देश साम्यवादी शासन अंगीकार कऽ लेलक। तीस सितम्बर १९४९ इस्वीकए माओत्से तुंगक नेतृत्वमे चीन सेहो साम्यवादी शासन अंगीकार कऽ लेलक। जे देश ओहू समयमे दुनियाँमे सभसँ अधिक जनसंख्याबला देश छल। द्वितीय विश्व युद्धसँ पूर्व दुनियाँक अनेको देश साम्राज्यवादी देशक उपनिवेश छल। अपन देश सेहो छेलैहे। ओइ सभ साम्राज्यवादी देशक एक्केटा मनसा छेलै जे उपनिवेश देशक लूट-खसोट कऽ अपने समृद्धशाली बनल रही। आम-जनक जीवनसँ कोनो मतलब नहि छल, मनुखक जिनगी जानवारोक जिनगीसँ बत्तर बनले छल। ओही बत्तर देशमे अपनो सभ छेलौं। द्वितीय विश्व युद्धमे किछु साम्राज्यवादी देश पस्त भेल आ साम्यवादी देश- सोवियत संघ सेहो सभ तरहेँ जर्जर भऽ गेल। मुदा किछु भेल, तैयो सोवियत संघक आम-अवाम अपन देशक सत्ता कायम रखलैन। दुनियाँक जन-गण अपन अस्तित्वकेँ सेहो चिन्हलैन। जइसँ युद्ध समाप्त भेला पछातियो देश-देशक भीतर जन-आन्दोलन सेहो जोड़ पकड़लक। दुनियाँक बीच दुनू विचारधारा–माने पूजीवादी-साम्राज्यवादी आ समाजवादी-साम्यवादी–अपना-अपना गतिये बढ़ए लगल। एका-एकी केतेको देश साम्राज्यवादी जालसँ निकैल साम्यवादी विचारधाराक अनुकूल अपन प्रगतिक बाट स्वयं बनबए लगल। जइसँ दर्जनो देश साम्यवादी बेवस्था अपनौलक। अपना सभ एशिया महादेशमे छी। जे आन सभ महादेशसँ सघन अवादीबला महादेश अछि। चीनमे साम्यवादी शासन स्थापित भेला पछाइत, वियतनाममे साम्यवादी आन्दोलन जोर पकड़लक। ओना, छोट-छीन देश वियतनामो अछि आ कोरिया सेहो अछि, मुदा दुनूमे जबरदस लड़ाइ साम्राज्यवादी देशक संग फँसल। कोरिया बँटा कऽ दू भाग भऽ दू देश बनि गेल। मुदा वियतनाम बँटाएल तँ नहि, मुदा आइ धरिक दुनियाँक ऐतिहासिक लड़ाइमे सभसँ अधिक दिन तक लड़ैबला देशमे अपन प्रथम स्थान तँ बनौनहि अछि। वियतनाम लक-धक ३४बर्ख धरि लगातार लड़ैत रहल। हो-ची-मिन्हक नेतृत्वमे वियतनामक युद्ध भेल छल। बम-बारूदक प्रभाव वियतनामक एक-एक इंच जमीनक उर्वराशक्तिकेँ नष्ट कऽ देलक। मुदा साम्यवादी शासन बनिते ओइठामक जन-गण देशभक्त सभ अपन-अपन पूर्ण शक्ति लगा देशकेँ समृद्धशाली आ उन्नतशील बनेबे केलैन। देवचरण जहिना अपना ऑंखिये देशक शासनक उतार-चढ़ाव देखने छला तहिना अपन परिवारक उतार-चढ़ाव सेहो देखते आबि रहल छला। १९२० इस्वीसँ पूर्व जे देशक अजादीक आन्दोलन छल ओ शुरूआती अवस्थामे छल, तँए आम जन-गण तक नहि पहुँचल छल। मुदा गाँधीजीक जे चम्पारण सत्याग्रह भेलैन, तइ दिनसँ देशक जन-गणक बीच नव शक्ति पैदा लेलक। १९१७ इस्वीमे गाँधीजी चम्पारण आएल छला। स्पष्ट मुद्दा हुनकर छेलैन। मुद्दा छेलैन जमीन्दारक शोषण। केना जमीन आ जमीनक उपजाक लूटक संग आरो-आरो केतेको लूट धनीक वर्ग गरीबक करै छल, से विचार सार्वजनिक मंचपर उठल। ओना, ओइसँ पूर्व अंगरेजी नीलहा वेपारी जमीनक छीना-झपटी केना करै छल से बात नीलक कोठीक इर्द-गिर्दक किसान खूब नीक जकाँ जनिते छला मुदा ओ शोषण सीमित दायरामे छल, तँए कम लोकक नजैर ओइ दिस बढ़ल। नीलक उपजाक लेल अन्नक उपजसँ अधिक उर्वर शक्तिबला जमीन चाही। एक बेर जइ खेतमे नीलक खेती भऽ जाइ छल, ओ खेत चारि-पाँच बर्खक लेल उस्सर जकाँ भऽ जाइ छल। तेपटाक हिसाबसँ किसानक खेत नीलहा वेपारी लइ छल। तेपटाक माने भेल जे जँ छह कट्ठाक कोला अछि तँ ओइमे मात्र दू कट्ठामे पहिल साल नीलक खेती करबै छल। लक-धक दू बर्ख एक खेपक नीलक फसलमे समय लगै छेलइ। मुदा से आन्दोलनसँ पूर्वहि, माने १९२० इस्वीसँ पूर्वहि समाप्त भऽ गेल छल। नीलक खेतीसँ लऽ कऽ सिकमी, भाउली इत्यादि जमीनक निलामी तक देवचरण देख चुकल छला। अपनो पूर्वजक जमीन केना निलाम भेलैन सेहो पिताक मुहेँ सुननहि छला। तैसंग अपने केना पुन: अपन पूर्वजक जमीन आपस करौलैन सेहो बुझले छेलैन। अपन परिवारिक अस्तित्वकेँ जीबैत देख देवचरणक मनमे जहिना खुशी होइत रहैन तहिना अपन ऐगला पीढ़ी- अकिंचन राधाचरणकेँ देख दुख सेहो होइते छेलैन। राधाचरणकेँ कमाइ-खटाइक कोनो ऊहि नहि छल। ओना, देवचरण अपना जनैत राधाचरणकेँ सुधारैक कम परियास नहि केलैन मुदा मनुखक सोभावो तँ सोभाव छी। जइ अनुकूल लोक अपन जिनगी सेहो बनैबते अछि। गाममे केतौ कीर्तन, अष्टयाम, नवाह होइत छल तँ माता-पिताकेँ बिनु कहनौं राधाचरण ओइठाम पहुँच जाइ छल। खाइ-पीबैक बेवस्था सेहो रहिते छेलइ। ओहीठाम रहि खेबो-पीबो करै छल। तहिना केतौ नाचे भेल आकि भोजे-भन्डारा भेल तँ राधाचरण चुपचाप, माने परिवारमे बिना केकरो किछु कहने ओतए चलि जाइ छल। भलेँ ओकरा अधला नजरिये सेहो देखल जा सकैए मुदा से तँ अछि नहि। देवचरणकेँ लाख कोशिश केला पछातियो राधाचरणमे कोनो सुधार नहि भेल। माने राधाचरणकेँ ने श्रम करैक बोध भेल आ ने श्रम-जीविक ज्ञाने भेल। ओना, देवचरण अपन परिवारो आ अपन कारोबारक संचालन अपना विचारे करिते छला जइसँ कोनो वैचारिक बेवधान नहियेँ होइ छेलैन मुदा परिवारक बीच मनुखक जिनगी तँ नदीक धारा सदृश प्रवाहित होइते रहैए, तइमे किछु बाधा तँ देवचरणक नजरिक सोझमे पड़िते छेलैन। पड़बो केना ने करितैन? मनुख धरतीपर बहैत धार थोड़े छी, ओ तँ चेतनशील जीवनक धार छी। जइसँ चेतनशील मनुखक चेतनापर प्रभाव पड़ब सोभाविके छल। ओहुना देखै छी जे धार सभमे जखन धाराक मध्य बाउल भरि जाइए माने पानिक बहावक बीच बाउल जमा भऽ जाइए–तखन पानिक धाराकेँ रोकिते अछि, जइसँ धाराक प्रवाह ठमैक दोसर-तेसर दिस मुँह बना बहए लगैए, तहिना ने मनुखोक वंशगत विचारक प्रवाहमे श्रमहीनता एलासँ दिशाहीनता अबिते अछि। तँए देवचरणकेँ चिन्तित हएब सोभाविके छेलैन। संयोग बनल, जहिना एक दिस देशक शासन विदेशीसँ स्वदेशीक हाथ आएल तहिना अपन पूर्वजक अरजल जमीनक अधिकार सेहो दोसराक हाथसँ देवचरणक अपना हाथ एलैन। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र किसानक रूपमे देवचरण अपनाकेँ देखए लगला। भलेँ राधाचरणक स्थितिसँ सेहो ऐगला पीढ़ीक भविसक चिन्ता सोभाविके रूपमे होइ छेलैन। ओना, हरिचरण सेहो तेरह-चौदह बर्खक भइये गेल छल, मुदा जइ परिवारमे पिता, बाबा, परबाबा जीवित रहै छैथ तइ परिवारमे तेरह-चौदह बर्खबलाकेँ लोक बच्चे बुझैए, जेकर अवस्थाकेँ खाइ-खेलाइबला सेहो मानले जाइए, मुदा से सभ परिवारमे नइ होइए। एहनो परिवार सभ अछिए जइमे पैछला पीढ़ीकेँ असमायिक मृत्यु भेलापर वा कोनो कारणे पिता-बाबाक छाया हटलापर परिवारक भार बच्चापर पड़िते अछि। जइसँ खाइ-खेलाइक स्थान परिवारक चिन्तो-फिकिर आ भारी-भारी काजक बोझ सेहो काँच उमेरबला बच्चाक सिरपर चढ़िते अछि। ओना, हरिचरणकेँ गात देख देवचरणक मनमे एते आशा बनले छेलैन जे भीरो-कुभीरक भार पोता उठाइये सकैए मुदा से ओकरा संग अन्याय-अनुचित भेबे कएल। जैठाम विकल्प रहैए तैठाम तँ संकल्पक धरो सेहो गतिमान रहिते अछि, मुदा जैठाम विकल्पे नहि, तैठाम तँ धारामे थोड़-थाड़ रूकाबट होइते अछि। खाएर, ई मात्र एकटा देवचरणेक संग हएत सेहो बात नहियेँ अछि। ओना, देवचरणक जे समस्या छैन ओ आनसँ थोड़ेक सटलो छैन आ थोड़ेक हटलो छैन्हे। सटै-क माने भेल जे जइ परिवारमे बाबा, पिता आ पुत्र- तीनू पीढ़ीक तीनू जीवित छैथ। तहिना हटल ऐ दुआरे छैन जे देवचरण अपने उमरदार भऽ गेला अछि, जइसँ समरथाइक सामर्थक ओ रूप दुर्बल भइये गेल छैन, जइमे कठिन शारीरिक श्रम करै छला। तहिना दोसर पीढ़ीमे राधाचरण जीवित रहितो श्रमचोर भेने श्रमहीन भइये गेल अछि। मुदा परिवार तँ परिवार छी। ओकर अपन नियमित क्रिया छै, जइ बलपर ओ ठाढ़ भऽ आगू मुहेँ बढ़ैए। भिनसुरका उखड़ाहाक आठ बजेक समय। परिवारक पतराएल काज, माने खेती-बाड़ीक काज नइ रहने, देवचरणकेँ निसचिन्ती रहबे करैन। ओना, माल-जालक सेवा-काज आगूमे छेलैन्हे मुदा जे समय खेती-बाड़ीक छेलैन, ओइमे कमी ऐने काज पतराएले छेलैन। दरबज्जाक ओसारक चौकीपर बैस देवचरण चाह पीब नेने छला। तहीकाल हरिचरणकेँ ऑंगनसँ निकलैत देखलैन। देखते हरिचरणकेँ शोर पाड़ैत बजला- “बौआ, एमहर आबह।” बाबाक बात सुनि हरिचरण लगमे आबि चौकीपर बैसैत बाजल- “की कहलौं, बाबा?” हरिचरणक बात सुनि देवचरणक मन जेना पतालसँ उड़ि अकासमे पहुँच गेल होनि तहिना भेलैन। मुदा उमेरो तँ उमेर छी, ओकरो अपन गुण-धर्म अछिए। तहूमे देवचरण इमानदारीसँ अखन तक परिवारक गाड़ीक जुआ खिंचैत आएल छैथ, तँए असथिर चिते बजला- “बौआ, अखन तक परिवारक भार अपन सिर सजि गाड़ीक जुआमे कन्हा लगा खिंचैत एलौं, मुदा आब ओ सामर्थ नहि रहल जेकर खगता परिवारकेँ अछि। तँए...।” ‘तँए’ कहि देवचरण चुप भऽ गेला। मुदा हरिचरणक मनमे जिज्ञासा उपैकिये गेल। हरिचरण बाजल- “बाबा?” ‘बाबा’क अतिरिक्त हरिचरण किछु ने बाजल। मुदा हरिचरणक मनक छीपल विचार देवचरणक मनकेँ हौंर देलकैन। जइसँ रंग-रंगक विचार, संकल्प-विकल्पक संग उठए लगलैन, जइसँ नवाकुंर पोताकेँ की कहितैथ आ की नइ कहितैथ, तइ बिच्चेमे देवचरणक मन फँसि गेलैन। मुदा लगले देवचरणक मनमे उपकलैन जे जिनगीक कोनो ठेकान थोड़े अछि, ओ तँ बेठेकान अछि। अखनो मरि सकै छी आ पचीस-पचास बर्ख जीवियो सकै छी। तखन तँ बीचमे एकटा समस्या उपस्थित भइये गेल अछि, जे जइ रूपे परिवारकेँ हमर श्रमक खगता छै तेकरा पुरबैमे आब अपन दैहिक शक्तिक अभावक कारणे किछु-किछु बाधा उपस्थित हेबे करत। मुदा हरिचरण सन नव शक्तिक उदय तँ परिवारमे भइये गेल अछि, एकरा जँ सही ढंगसँ उपयोग करब तँ कोनो तरहक बाधा परिवारमे उपस्थित नहि हएत। देवचरण बजला- “बौआ, अखन तँ काजक बेर अछि तँए अखन एतबे राखह। साँझू पहर जखन दुनियाँदारीसँ निचेन हएब तखन सभ कियो- तोहूँ, तोहर माइयो आ दादियो एकठाम बैस विचारि लेब जे आगू केना चलैक अछि। जहिना हल्लुकसँ भारी काज परिवारक मध्य अछि तहिना नव-पीढ़ीसँ पुरान पीढ़ी धरि सेहो सभ छीहे।” हरिचरण बाजल- “से तँ छीहे। मुदा अहाँ किछु भेलिऐ तैयो तँ धान-गहुम दौन करैबला खोहक जोतल बरद जकाँ मेहौता छीहे। जेना-जेना खोहपर अहाँ घुमबै तेना-तेना ने अहींक लागल बीचलो आ पैटक बरद जकाँ हमहूँ सभ घुमबै।” मुस्की दैत देवचरण बजला- “अखुनका विचारकेँ कानपर रखिहह। साँझूपहर सभ एकठाम बैस कोनो-ने-कोनो रस्ता निकालिये लेब।” तिथि : २७ मई २०१८ जारी.... ६. जखनसँ देवचरण अपन पोताकेँ कहलैन जे ‘बौआ, साँझू पहर, परिवारक सभ एकठाम बैस आगूक विचार करब’ तखनसँ हिनका मनमे बेर-बेर वएह प्रश्न घुरियाए रहल छैन जे परिवारमे जहिना अवोध-अनाड़ी हरिचरण अछि, तहिना तँ आनो-आन अछिए, मुदा परिवारक भार तँ ओकरे सबहक ऊपर ने पड़त। तँए केतेक भार कोन रूपे केकरा देल जाए, तेकर निर्णय करब साधारण बात नहियेँ अछि। मुदा नइ रहितो भार तँ ओकरे देब अछि। ओना, अखन अपनो जीबै छी आ पिता-माताक संग दादी सेहो हरिचरणक सोझामे छइहे, जइसँ कोनो काज जँ गरुगर बुझियो पड़तै तँ दोसर-तेसरसँ पुछि ओइ काजकेँ सही ढंगसँ कएलो तँ जाइए सकैए। जैठाम से नहि रहैए तैठाम ने काजक सफलतामे किछु-ने-किछु गड़बड़ी होइक सम्भावना सेहो रहिते अछि। ओना, मनुखक समाजिक जीवन ओहन अछिए जेकर जीवन धार समाजक धार होइत प्रवाहित होइए जइसँ देखैक, जनैक आ करैक सम्भावना सेहो रहिते अछि। हँ, जैठाम समाजिक जीवन नइ रहल, माने बेकतीगत जीवनधाराक धार ओइसँ भिन्न रहल तैठाम बेकती औआ-वौआ जाइते अछि। मुदा जैठाम बेकतीक जीवन धार समाजिक जीवन्त धाराक संग प्रवाहित होइए, तैठाम तँ किछु-ने-किछु सिखबो आ सम्हरैयोक उपाय रहिते छइ। जहिना देवचरणक मन अपन पोताक भविसक दिशा निर्धारित करैमे ओझराएल छेलैन तहिना हरिचरणक मनमे सेहो बेर-बेर प्रश्न उठि रहल छल जे बाबा की कहता, की पुछता आकि की करैले कहता। खाएर जे कहता मुदा बुझब तँ सुनला पछातिये ने आ बुझला पछातिये ने ओकरा सम्हारबोक कोशिश करब। बिनु बुझल आकि बिनु विचारल काज करैमे किछु-ने-किछु ओहन विघ्न-बाधा एलापर समस्यामे लोक पड़िते अछि। जहिना नव जगह, माने बिनु देखल-जानल जगह वा बिनु बुझल-जानल काज, नव लोकक लेल अन्हराएल जकाँ रहिते अछि, मुदा वएह काज सफलतापूर्वक केला पछाइत जीवन-शक्तिमे तीव्रतो तँ अबिते अछि। दिन बीतल। ओना, देवचरण अपन पत्नीसँ आ पुतोहक बीच परिवारिक आन-आन गप-सप्प करैथ, मुदा सौंझुका बात-विचार करैक योजना अखन तक दुनूमे सँ किनको ने देवचरणे कहने छेलखिन आ ने हरिचरणे कहने छेलैन। तँए हरिचरणक दादियो आ माइयोक मनमे कोनो विचारक बिन्दु उठबे ने कएल छेलैन। ओना, जखन सभ एक्के परिवारमे छी आ परिवारेक जिनगीक बातो अछि, जे किछु-ने-किछु सभकेँ बुझलो छैन्हे, तैबीच सौंझुका बैसारक जानकारियो देब ओते महत् नहियेँ रखैए, जेते आनक संग रहैए। जिनगीक नीक-बेजाए बातो आ काजोक तँ किछु-ने-किछु जानकारी रहने सुगमसँ विचारोकेँ बिकछाएब आ काजोकेँ फरिछाएब सहायक होइते अछि। मुदा ऐठाम तँ से नहि अछि। ऐठाम तँ परिवारिके विचारो छी आ काजो छीहे। हँ, जँ कोनो नव काजे आकि नव विचारे रहैत तखन सामान्य जिनगीसँ हटलो रहैत जइसँ किछु-ने-किछु नीक-बेजाइक सम्भावना रहबो करैत, मुदा सेहो तँ नहियेँ अछि। साँझक आगमन भेला पछातियो, ने देवचरणेक मनमे कोनो तरहक उथल-पुथल छेलैन आ ने परिवारक आने-आन जनक बीच। सासु-पुतोहुकेँ बुझले ने छेलैन तँए हुनका दुनूक मनमे उथल-पुथलक कोनो सम्भावनो किए रहितैन। देवचरण तँ सहजे परिवारमे सहयोगीक रूपमे पोतापर नजैर गड़ौनहि छला तँए हिनका मनमे कोनो तरहक मलिनता किए रहितैन। हँ, हरिचरणक मनमे किछु-ने-किछु उथल-पुथल जरूर छल। बाबा की कहता की नहि..! बर्खाक पानिक बुलबुला जकाँ हरिचरणक मनमे विचार उठबो करै छेलै आ अपने फुटि-फुटि मेटेबो करै छेलइ। अपन निर्धारित समयक हिसाबसँ किछु पहिनहि देवचरण दरबज्जापर बैस मने-मन विचारए लगला जे कोन रूपे हरिचरणकेँ बुझौल जाए। ओना, परिवार सभमे एहनो होइते अछि जे जे परिवारक सिरजन रहला ओ सबहक काजकेँ ऑंकि-ऑंकि फुटा-फुटा सभकेँ करैले कहिते छैथ, जइसँ परिवारक सम्मिलित काज रहितो एक-दोसराक बीच दूरी रहिते अछि, माने ई जे सभकेँ सभ काज नहियोँ बुझल रहल। ओना, एहेन भेलासँ एकटा एहेन विचार जगिते अछि जे आनक काज नहि बुझल रहने दोसरक मनमे उठि जाइए जे हमहींटा काज करै छी आ दोसर-तेसर बैसले रहैए, तँए परिवारक जँ सभकेँ सबहक काजक जानकारी रहल तँ सबहक मनमे एहेन विचारक आगमन भइये जाइए जे सभ अपन-अपन काजक पाछू लागल छैथ, जइसँ किनको मनमे काज नइ करैक शंकाक आगमन नहियेँ होइए। तैसंग ईहो लाभ तँ होइते अछि जे परिवारक सभ काज सबहक नजरियोपर रहल आ केकरो बैसल रहैक शंका नइ रहने सबहक प्रति सबहक मनमे प्रेमो बढ़ल। देवचरण ई सोचि काजक निर्धारित समयसँ पहिने काजक पाछू लगि गेला जे जँ कोनो काज करैसँ पहिने ओइ काजक भूत-भविसपर नजैर दौड़ा देब तँ ओइ काजकेँ सफल होइक बेसी सम्भावना बनियेँ जाइए। जँ से नइ भेल तँ काजक बहुतो बिन्दु गप-सप्पक क्रममे नजैरपर नहियोँ चढ़ैए, जइसँ विचार केला पछातियो किछु-ने-किछु बिन्दु छुटल रहि गेने काजमे कमी होइते अछि। देवचरणकेँ दरबज्जापर बैसल देख हरिचरण सेहो आबि कऽ बैसल। मुदा बाजल किछु ने। हरिचरणकेँ चुपचाप बैसल देख देवचरणक मनमे जगलैन जे जखन दुनू गोरे काज करैक क्रममे उपस्थित भइये गेल छी, तखन जँ चुपचाप समयकेँ निकलए दिऐ सेहो नीक नहियेँ हएत। देवचरण बजला- “बौआ, जखन दुनू गोरे काजक विचार करैले एकठाम बैस गेलौं तखन माइयो आ दादियोकेँ बजा लहुन।” बाबाक आदेशमे बिना किछु जोड़-घटाउ केने हरिचरण ऑंगन जा दादियो आ माइयोकेँ कहलक। ओना, ओहो दुनू गोरे बिना किछु बजने-भुकने हरिचरणक संगे दरबज्जापर पहुँचली। राधाचरण सेहो परिवारक प्रमुखजनक सीढ़ीपर छल तँए ओकरो रहब अनिवार्य होइतै मुदा ऊहि नइ रहने परिवारक गौण-पात्र बनि गेल अछि। होइतो अहिना छै जे जइ परिवारमे जे जन जेहेन ऊहिगर रहल ओ अपन ऊहिक हिसाबसँ परिवारक क्रियामे ओत्ते संलग्न भइये जाइए। तीनू गोरेकेँ देख देवचरण बजला- “बौआ, जइ परिवारमे अपना सभ छी ओ परिवार एक्के गोरेक नहि, सबहक छी। तँए सभकेँ अपना-अपना उकितिये ऐ विचारकेँ नीक जकाँ मनमे रोपि अपना-अपनाकेँ ओइमे संलग्न रखबाके चाही। जँ से नइ हएत तँ किछु गोरेकेँ काजो आ जवाबदेहियोमे उदासीनता औत आ किछु गोरे जे अपन परिवारकेँ अपन बुझि सेवा करत ओ दोसरसँ अपनाकेँ महत्पूर्ण बुझबे करत। तँए सबहक बीच सबहक काजक जानकारी रहब जरूरी अछि।” ओना, हरिचरण अछि तेरहे-चौदह बर्खक, मुदा देवचरणक विचारकेँ नीक जकाँ बुझि गेल। बाजल- “बाबा, ई तँ भेल वैचारिक क्षेत्रक बात, मुदा बेवहारिक क्षेत्र तँ ऐसँ अलगो भऽ सकैए किने?” हरिचरणक विचार सुनि अपन सहमत जतबैत देवचरण मुड़ी डोलबैत बजला- “बेस बात बौआ कहलह। परिवार तँ काजक धुरी बना कऽ ने चलैए। तेही सबहक विचार करैले ने कहने छेलियह जे सभ कियो एकठाम बैस एक मतक रस्तासँ परिवारकेँ आगू दिस बढ़ाएब।” देवचरणक विचार सुनि हुनक पत्नी–सिंहेसरी बजली- “हम दुनू सासु-पुतोहु स्त्रीगणे भेलौं, केतबो हएब तँ अपन घरे-अँगना आ खेते-पथार धरि हएब। तहिना हरिचरण सेहो बाले-बोध भेल। राधाचरणक कोनो ठेकाने ने अछि जे ओ की अछि आ की करत।” पत्नीक विचार सुनि देवचरण मुस्की भरैत मुड़ी डोला-डोला मने-मन विचारए लगला। पत्नीक विचार सेल्होअना सत् अछि, मुदा सत् रहितो सोल्होअना उचित केना कहल जाएत? हँ, जइ परिवारमे पुरुख जीवित रहला, माने पुरुख प्रधान परिवारमे एहेन विचार सम्भव भइयो सकैए, मुदा जइ परिवारमे पुरुख नइ रहला तइ परिवारमे तँ महिलेक ने प्रधानता हएत। तैठाम हिनक विचार केना सम्भव भऽ सकत। मुदा अखन तँ गाम-समाजक विचार करए नहि बैसल छी, अखन तँ मात्र अपन परिवारक विचार करए बैसल छी, तँए अखन तँ पुरुखे प्रधान परिवार भेल। नीक हएत जे पहिने अपन परिवारक भूतक जानकारी संक्षेपमे सभकेँ दिऐ। जहिना कोनो धारक उद्गम स्थलसँ बीचक प्रवाहित होइत धाराक धार अन्तिम कोनो अगम धारे वा समुद्रेमे समाहित होइए तहिना ने परिवारोक अछि। ओना, पहाड़क दोसर रूप अछि। ओ धरतीपर उठल रहैए, जेकरा चोटीपर चढ़ैमे बहुत अघिक भीरो होइए, मुदा ओइठामसँ पुन: निच्चाँ उतरैमे, माने धरतीपर अबैमे, चढ़ाइ काल जेहेन मेहनत भेल रहत तेहेन ढलानपर ढलकैत उतरैमे भीर नहियेँ होइए। जखन कि रस्ता दुनूक चढ़ैयो आ उतरैयोक एक्के रहैए। मुदा ऐठाम तँ परिवारक विचार करैक अछि। परिवारक रस्ता धारो आ पहाड़ोसँ भिन्न अछिए। किए तँ धारे-पहाड़ जकाँ परिवारोक गति-विधि तँ अछि नहि। ऐठाम मनुखक बीचक रस्ता अछि। जइमे समाजिक परिवेशक संग शासकीय परिवेश सेहो अछि। शासन तंत्रक अनुकूल परिवारक परिवेश बनैए। जँ शासन-तंत्र परिवार पक्षी रहल तँ सुगम रहल आ जँ शासन-तंत्र प्रतिकूल रहल तँ विपरीत परिवेश बनिते अछि। खाएर जे अछि जेतए अछि से तेतए रहह। ऐठाम तँ अपन बाप-दादाक निरमौल परिवार अछि, जेकर अपन इतिहास अछि। मुस्कियाइत देवचरण पत्नी दिस देखैत बजला- “अहाँक विचार तँ नीक अछिए मुदा जखन सभ कियो मनुखवंशक मनुख छी, तखन देह-हाथ छीपलासँ थोड़े हएत।” बजैक क्रममे देवचरण बाजि तँ गेला मुदा लगले मनमे उठए लगलैन जे अनेरे कोन विचार दिस भँसि गेलौं। अखन तँ हरिचरणकेँ परिवारक प्रमुख कर्त्ताक रूपमे ठाढ़ करैक अछि...। बिच्चेमे हरिचरण बाजल- “बाबा, अखन जइ विचारे सभ कियो एकठाम बैसलौं हेन, पहिने ओकर विचार करू, पछाइत समय रहलापर आरो-आरो बात-विचार करब। ने कियो आन छी आ ने आइये भरि समयो अछि।” ओना, हरिचरणक विचारसँ दादीक मनमे कनी कुवाथ जरूर भेलैन। कुवाथक कारण छेलैन अपन विचारपर सँ नजैर हटाएब, मुदा बाल-बोध हरिचरणकेँ बुझि मुँह बन्ने रखली। जे बात देवचरण बुझि गेला। मुदा ओइ विचारकेँ पुन: जागृत नहि करैत अपन परिवारक विचार उठबैत बजला- “बौआ हरि, साठि बर्खक परिवारिको जिनगीक आ शासनोक चढ़ाव-उतारक अनुभव अछि, जे तोरा नइ छह। तँए, संक्षेपमे पहिने ओ विचार भूमिका रूपमे जानि लेब बेसी नीक हेतह।” जहिना असथिर भेल पोखैरक पानिमे आ प्रवाहित होइत धारक पानिमे हेलैक अलग-अलग लूरिक जरूरत होइ छै, माने पोखैरक हेलब जकाँ धारमे हेलब तँ डुमिये जाएब। किएक तँ प्रवाहित होइत धारक धारामे हेल कऽ पार करैमे दोहरी सावधानीक जरूरत होइ छइ। पहिल, धारक धारेमे ने भँसि जाए, आ दोसर पार करब तँ अछिए। जे पोखैरमे नइ होइए। पोखैरमे मात्र एकटा सावधानीक खगता रहैए, एक महारसँ दोसर महारपर जाएब। हरिचरण बाजल- “बाबा, परिवारक जे पैछला धारा रहल माने इतिहास, ओ तँ आब भूत बनि चुकल अछि, ओकरा तँ वर्तमानक नजैरसँ नहियेँ देखल जा सकैए, मुदा जहिना वर्तमान भूतपर ठाढ़ अछि आ भविस दिस बढ़ैले हियासि रहल अछि, तहिना ने ओकरा मजगूतीक संग पकड़ैयोक अछिए।” ओना, परिवारमे हरिचरण बाले-बोधक श्रेणीमे अछि मुदा यएह बाल-बोध ने भविसमे परिवारक मेह रूपमे ठाढ़ हएत। जहिना भिनसुरका सुरुज देख लोक अनुमान करैए जे आजुक दिन केहेन हएत तहिना हरिचरणक बातकेँ सीमांकित करैत देवचरण बजला- “बौआ हरि, परिवारमे दू रंगक सदस्य होइए, पहिल पुरुख आ दोसर महिला। अखन तक जे अपना सबहक परिवारक धारा रहल, ओइमे जहिना पुरुखक लेल घर-बहार जाइ-अबैले, करै-धड़ैले सगतैर खुजल रहैए तहिना महिलाक लेल सगतैर तँ बन्धन लगले अछि। पुरुखक अछैत जँ महिला परिवारसँ निकैल परिवारिक क्रिया-कलाप करैयो चाहती तँ परिवारक संग समाजोक लोक ऑंगुर बतेबे करतैन।” बिच्चेमे हरिचरण बाजल- “एकरा के काटत! एहेन तँ सभ दिन होइते आबि रहल अछि!” पैछला विचारकेँ देवचरण सोल्होअना कबुल लेलैन, मुदा भूतक कबुल कएल विचारकेँ भविसमे केना कबुलनामा बनौल जाए, ऐठाम आबि अँटैक गेला। देवचरण एक दिस जखन पाछू दिस हिया कऽ देखए लगैथ तँ साफ देखा पड़ैन जे परिवारक जे पैत्रिक सम्पैत अछि ओ तँ नष्ट भऽ गेल छल, मुदा परिवेश एहेन बनल जे ओ पैछला पीढ़िक अरजल सम्पैत पुन: परिवारमे जुड़ि गेल। तहिना आइ धरिक जे समाजिक राज-सत्ता रहल ओ गुलामीक रहल, माने विदेशी शासनक, जे मटियामेट भऽ पुन: स्वतंत्र रूपमे जीवित भऽ गेल। मुदा अपन जे जिनगी रहल तइमे आ आगूक जे हरिचरणक जिनगी हएत ऐमे विपरीत सम्बन्ध अछिए। तँए, पैछला जिनगीकेँ इतिहासक पन्नामे समैट ऐगला जिनगीक ने दिशा बोध करब जरूरी अछि...। देवचरण बजला- “बौआ हरि, अखन धरिक जे परिवारक इतिहास रहल ओ पंगुक रूपमे रहल। माने जेहेन जिनगीमे लेाक स्वच्छन्द साँस लैत बिचड़ैए से तँ नहियेँ रहल। तैयो अपन साठि सालक जिनगी कटि गेल। मुदा आब जखन अपना दिस तकै छी तँ बुझि पड़ैए जे देहमे ओहन शक्ति नहि अछि जेकर उपयोग करैत परिवारक गाड़ीकेँ आगू मुहेँ ससारब, तँए जाबे जीबै छी ताबे जहाँ धरि सम्भव हएत से तँ करबे करब, मुदा...।” ‘मुदा’ कहि देवचरणकेँ चुप होइत देख हरिचरण उत्सुक होइत बाजल- “तखन?” देवचरण बजला- “तखन यएह जे परिवारक जे पंगुपन रहल ओकरा पूर्ति करैत, ओइ पंगुपनकेँ मेटबैत जहिना चिड़ै अकासमे स्वच्छन्द जीवनक साँस लैत उड़ैए तहिना परिवारोकेँ बनाएब छह।” देवचरणक विचार सुनि जेना सभकियो पंगुपनक गम्भीरताकेँ बुझि गेल तहिना सभ सभ दिस नजैर दौड़बैत, गम्भीर होइत चुपचाप उठि-उठि अपन-अपन जीवन-क्रिया दिस बढ़ए लगल। तिथि : ३० मई २०१८ जारी.... ७. देश स्वतंत्र भेला पछाइत, जमीनक लड़ाइ सौंसे देशमे पसैर गेल। १९४७ इस्वीसँ पूर्व जहिना एकमुरही लड़ाइ अंगरेजी शासनक खिलाफ उठल छल तहिना स्वतंत्र भेला पछाइत देशमे जमीनक लड़ाइ पसैर गेल। लड़ाइ केना ने पसरैत, आखिर कृषि प्रधान देशो तँ छीहे किने। बिनोवा भावेक नेतृत्वमे भूदानी आन्दोलन शुरू भेल। आन्दोलनक नारा छल- जमीनबला अपन कुल जमीनक छठम हिस्सा स्वेच्छासँ दान करैथ। ओ जमीन खेतीपर जीवन बसर करैबला भूमिहीनक बीच देल जाए। ओना, जमीनक लड़ाइ दू रूपमे चलल। पहिल, जमीनबलासँ बकास्त जमीन खेती करैबला बँटेदारकेँ देल जाए, आ दोसर भूदानमे प्राप्त जमीनक बँटबारा सेहो हुअए। भूदानकेँ यज्ञ रूपमे स्थापित कएल गेल। खेत ओहन सम्पैत छी, जइमे एक धुर-आध-धुर लेल खून-खराबी, मारि-पीट गामे-गाम होइते आबि रहल छल। हजारो मुकदमा जहिना कोर्टमे फँसल छल तहिना हजारो भूमिहीन सेहो कानूनी शिकंजामे फँसि जहल जाइत-अबैत रहला। ओना, गाम-गामक संग जिला आ राज्य स्तरपर सेहो भूदान कमिटी बनल छल, तैसंग सरकारी कार्यालय सेहो बनल, मुदा जइ ढंगसँ भूदानी नारा छल तेकर ठीक विपरीत ओकर कार्यान्वयन हुअ लगल। लेन-देनक अड्डा सरकारियो कार्यालय आ भूदानियो कमिटी बनि गेल। जेकर परिणाम हुअ लगल जे एक-एक जमीनक सबूत तीन-तीन, चारि-चारि आदमीकेँ भेटए लगल। एक दिस जमीन देनिहार दाता अपन जमीन छोड़ए नहि चाहै छल, तँ दोसर दिस प्राप्तकर्ताक बीच सबूत लऽ कऽ तेहेन ओझरी लागि गेल जे गामे-गाम लड़ाइ फँसि गेल। भूदान कमिटीक जे सदस्य लोकैन छला ओहो आगिमे घी दइक काज करबे केलैन। ओना, गामे-गाम किछु एहेन दाता सेहो छेलाहे जे अपन देल जमीन, अपना विचारसँ भूमिहीनकेँ सुपुर्दो केलैन आ अपने हाथे दखल-कब्जा सेहो करबा देलखिन। मुदा एहेन लोक एक्की-दुक्की भेला। गाम-समाजक जेहेन समस्या जमीनक छल ओइ अनुपातमे पॉंच-दस प्रतिशत एहेन भेल। छठम हिस्सा, जमीनदान करैमे सेहो एकरूपता नहि रहल। हथ-उठाइ भीख जकाँ छठम हिस्साक जगह मात्र किछु जमीनक नाम-पत्रटा दऽ देलखिन। सेहो ओहन जमीन देलखिन जे उपजाउ भूमि नहि छल। चौर-चाँचर, परती-पराँत जमीन छल। ओना, गाम-गाममे गरीबकेँ मात्र जमीन उपजबैयेक समस्या नहि, बसो-बासक समस्या सेहो छल। गामक चौथाइ आवादी ओहन छल, जेकरा घर बन्हैक अपन घरारियो ने छेलइ। गामे-गाम तँ नहि, मुदा किछु गाम मिला-मिला खादी भण्डार सेहो बनल। गाम-गामक समाजक किछु जाति विशेष ओहन छल जे खादी कपड़ा बुनै छल। खादी भण्डार ओकरा कच्चा माल दइ छेलै आ ओकरासँ बुनल कपड़ा कीनै छल। ओना, कपड़ा बुनैक लूरि मात्र किछु जाति-विशेषकेँ छल, एकर समाजीकरण नइ भेल छल, जइसँ किछु जाति-विशेषक बीच उद्योग सीमित भऽ गेल। कपड़ा बनबैक जे कच्चा माल छेलै ओ जातिक बन्धन तोड़ि अधिकांश जातिक बेवसाय जरूर बनल छल, मुदा वएह बेवसाय आगू बढ़िते कपड़ा बुनब समाजिक बन्धनमे फँसि गेल छल। तहूमे खास कऽ मुस्लिम जातिक बीच ‘जोलहा आ धुनिया’क बेवसाय बुझए जाए लगल। हिन्दू-मुसलमानक बीच समाज बनले अछि। हिन्दू ऐ बेवसायकेँ नहि अपनौलक। मुसलमानोक बीच सैयो जाति अछि। ओइ सैयो जातिमे मात्र दू जाति- जोलहा-धुनियाक रोजगार मात्र बनि कऽ रहि गेल। जोलहा-धुनिया सभ गाममे अछि सेहो बात नहियेँ अछि। किछु-किछु खास गाममे अछि। तहूमे परिवारक संख्याक हिसाबसँ सेहो ठेकान नहियेँ अछि। जइसँ सभ गामक जोलहा-धुनियाक बेवसायो नहियेँ बनल। जइ-जइ गामक जोलहा-धुनियाक रोजगार कपड़ा बुनब नहि छल, ओ सभ अपन-अपन आन-आन रोजगार जीवकोपार्जन लेल करबे करै छल। गाम-गामक खादी भण्डार भूदानी सबहक अड्डा बनि गेल। माने ई जे भूदान कमिटीक जे सदस्य सभ छला, ओ सभ खादिये भण्डारमे खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ अपन डेरा रखै छला आ खादिये भण्डारक वस्त्र सेहो प्राप्त करै छला। जइसँ एकाएकी खादी भण्डार टुटए लगल, अन्तो-अन्त सभ टुटि गेल। गाम-गामक एकटा बेवसाय मरि गेल। खादी भण्डारकेँ टुटने जहिना कपड़ा बुनकरक रोजगार गेल तहिना सूत कटनिहारक रोजगार सेहो मरबे कएल। एक तँ ओहिना गाम-गाममे बेरोजगारी पसरल छल, तैपर एकटा आरो बढ़ि गेल। ओना, मिथिलांचलमे अनेको साधन कल-कारखानाक लेल मौजूद अछि मुदा साधन रहितो कल-कारखानाक अभाव रहबे कएल। ठाम-ठीम चीनीक मिल आ धानसँ चाउर बनबैक मिलटा मात्र छल। ओना, लघु उद्योगक रूपमे सेरसो-तोरीसँ तेल बनबैक संग कुशियारसँ गुड़ बनबैक हथकर्घा रूपमे सेहो छल, मुदा ओहो वृहत् रूपमे नहि छल। चीनी मिल सेहो सालो भरि नहियेँ चलै छल, सालक मात्र छह मास चलै छल। छह मास बन्न रहै छल, जइसँ मिलमे काज करैबला श्रमिक सबहक बीच ईहो समस्या छेलैहे। ओना, कहैले बैसारीक समय श्रमिककेँ आधा वेतन देल जाइ छेलै, मुदा ओहूमे अनेको रूकाबट छेलइ। ओहो नियमित रूपसँ नहियेँ चलै छल। गाम-गाममे नगदी खेतीक रूपमे कुशियारक फसिल छल, मुदा कुशियारो तँ सभ खेतमे नहियेँ उपजैए। नीचरस खेत, जइमे पानि बसैए तइमे कुशियारक खेती नहियेँ होइए। कुशियारक खेती-ले ऊँचरस जमीन चाही। जे सभ गाममे नहियेँ अछि। ओना, जैठाम-जैठाम चीनी मिल बैसौल गेल ओ कुशियार उपजैबला जमीन देख-देख बैसौल गेल, मुदा मिलसँ दूर-दूर हटलो गाम सबहक किसान, नगदी खेती बुझि कुशियारक खेती थोड़-थाड़ करबे करै छला। गामक खेतसँ मिल तक कुशियार पहुँचबैक साधन रेलोक माल गाड़ी छल आ बैल गाड़ी सेहो छल। रेलक स्टेशने-स्टेशन मिलक राटन बनल छेलइ। जैठाम इलाकाक किसान बैलगाड़ीसँ कुशियार पहुँचबै छला। ओना, कुशियारक रेट मिलक जेते रहै छल तइमे ढुलाइ खर्च सेहो ओही मूल्यमे कटौती होइ छेलै, जइसँ स्थानीय किसान आ दूरक किसानक दरमे अन्तर होइते छल। तहूमे नगद कारोबार सेहो नहियेँ होइत छल। कुशियारोक खेती करैमे किसानकेँ अनेको समस्या छेलैन्हे। एक तँ सीजनल फसिल रहने एकेबेर सभ किसानक कुशियार तैयार होइ छेलैन, जे समयपर नहि कटने वजनमे कमी अबै छल, तैसंग मिलक जेतेक क्षमता, कुशियार पेरैक छल तेही अनुकूल कुशियारक पुर्जा भेटै छेलै जइसँ किसानकेँ अबै-जाइक समस्या छेलैन्हे। तेकर पछातियो नगदा-नगदी कारोबार नहियेँ छल। मासक-मास, सालक-साल किसानक कुशियारक दाम पछुआइत छल, जइसँ कुशियार उपजौला पछातियो समयपर किसान अपन पाइसँ काज नहि कऽ पबै छला। ओना, जइ मिलकेँ जेतेक कुशियारसँ चीनी बनबैक क्षमता छल, ओ ओतबे ने पेरत। जँ किसान बेसी खेती केलैन तँ ओहिना खेतमे रहि जाइ छेलैन, जइसँ खेती अनबिसबासू बनैत गेल आ मिलो बन्न हुअ लगल। तिथि : ३० मई २०१८ जारी.... ८. बीसम शदीक छठम दशकक अन्तिम समयमे, माने करीब १९५८ इस्वीमे कोसी नदीमे फाटकबला पुल नेपालक सीमामे भारत सरकार बनौलक। कोसीक दुनू कात, माने उत्तरे-दच्छिने कोसी बहैए, पूबो आ पच्छिमो बान्ह सेहो बनल। कोसी पुलक संग-संग, पच्छिमी आ पूर्वी मुख्य नहर बनबैमे सेहो हाथ लगौल गेल। तैबीच १९५८ इस्वीमे कोसीमे बाढ़ि आएल। ओना, बरखो बेसी भेल छेलै जइसँ कोसीक बान्ह कतेकोठाम टुटि गेल। इलाकाक फसल जे दहाएल से तँ दहेबे कएल जे गाम-गामक घरो-दुआर खसल आ इनार-पोखैर सेहो भराएल-भोथाएल। तेतबे नहि, धारो जैठाम बहै छल तइसँ थोड़ेक पच्छिम घुसकल। केते गाम ओहन छल जइमे कोसीक बाढ़ि नइ अबै छल, तोहू सभ गाममे बाढ़ि आबए लगल। तैसंग ईहो भेल जे ओ बान्ह साले-साल केतौ-ने-केतौ टुटौ लगल आ ओ इलाका दहाइत रहल। कोसीक जे पूर्वी आ पच्छिमी मुख्य नहर छल, जइसँ शाखा नहर सभ बनैक योजना छेलै, ओइ सभ जमीनक सर्वेक काज सेहो हुअ लगल। माने नहर बनैक, नापी-जोखी शुरू भेल। मुदा ने अखन तक मुख्य नहरे पूर्ण रूपेण बनि सकल छल आ ने शाखा नहर सभमे हाथे लागि सकल। बीसमी शदीक सातम दशक चढ़िते, माने १९६२इस्वीमे चीनक संग भारतक सीमा-विवाद लऽ कऽ लड़ाइ भऽ गेल। जे देशक अर्थ बेवस्थाकेँ आरो चरमरा देलक। तैसंग गाम-गाममे अफवाह पसरल जे अनेको ग्रह एकठाम भऽ गेल, जइसँ जबरदस हानि मनुखो आ मालो-जालकेँ हएत। गाम-गामक देवालयमे अष्टयाम, कीर्तन, नवाहक संग सबा मास, अढ़ाइ मासक कीर्तनक संग यज्ञ-जाप सेहो हुअ लगल। सीतापुरमे सेहो सबा मासक कीर्तन ठकुरबाड़ीमे भेल। मुदा समय बीतैत गेल कोनो तरहक दैवी प्रकोप तेहेन नहियेँ भेल। १९६७ इस्वीमे जबरदस रौदी भेल। अखन तक देश अन्नक मामलामे आत्म-निर्भर नहि बनल छल। आन-आन देशसँ अन्नक आयात होइत रहइ। १९६७ इस्वीक रौदी चारि सालक भेल। जइसँ केतेको पोखैरक संग इनारोक पानि सुखि गेल। जइसँ खेतीक संग पीबैक पानिक समस्या सेहो उपस्थित भऽ गेल। सीतापुरमे एकटा बड़की पोखैर अछि, जेकर पनिझाउसँ लऽ कऽ भिण्डा सहित बाबन बीघाक अछि। किंवदन्ति अछि जे ओ पोखैर दैंतक खुनल छी। गामक जे आन पोखैर आ इनार छल, ओ तँ सुखिये गेल जे ओइ बड़की पोखैरक पानि सेहो सटैक कऽ पाँच कट्ठापर चलि गेल, जइमे मात्र भरि ठेहुन पानि बँचल। तहूमे तेतेक गादि छल जे पानि तक पहुँचब कठिन छेलइ। अन्न-पानिक बेतरे केतेको मालो-जाल मरल आ लोको मरबे कएल। गाम-गामक जमीन ओहिना परती-पराँत बनि गेल। उपजा-बाड़ीक कोनो ठेकान नहि रहल। अन्तमे गामक लोक ओइ बड़की पोखैरसँ बिसाँढ़ खुनि-खुनि आनि-आनि उसैन-उसैन खा-खा कऽ प्राण बँचौलक। सरकारक दोसर पंचवर्षीय योजनामे दरभंगा-लहेरियासरायमे अस्पताल बनल। जइसँ दुनू तरहक लाभ आमजनकेँ भेल। जहिना बिमारीक इलाजक सुविधा भेल तहिना डॉक्टरी पढ़ाइ भेने नव-नव डॉक्टरक निर्माण सेहो हुअ लगल। ओना, जइ हिसाबसँ दुनूक जरूरत छल, माने डॉक्टरो आ बिमारीक इलाजोक, तेतेक पूर्ति तँ नहियेँ भेल मुदा किछु तँ भेबे कएल। १९४२इस्वीमे जे देशक जन-आन्दोलन अंगरेजी शासनक खिलाफ उठल ओ अपन चरम सीमापर पहुँच गेल। अंगरेजी शासनक खिलाफक संग-संग अंगरेजी वस्तुक सेहो वहिष्कार भेल। ओइ समय इंगलैंडक मेनचेष्टरक कपड़ा उद्योग दुनियाँमे बहुत आगू छल। भारत सन विशाल देशक विरोध भेने इंगलैंडक कपड़ा उद्योगकेँ जबरदस धक्का लगल। ठीक ओकर विपरीत देशक हथकर्घाकेँ अवसर भेटल, जइसँ गाम-गाममे सूत काटैक संग-संग कपड़ा बुनैक रोजगारकेँ नीक मौका भेटल। जमीन्दारी उन्मूलनसँ खेतक मालगुजारी जमीन्दारक हाथसँ निकैल बिहार सरकारक हाथ आएल। अपन-अपन जमीन्दारीक चार्ज दइमे जमीन्दार सभ सेहो रंग-रंगक अरंगा लगा-लगा देरी करबे केलैन। मुदा जे भेल से भेल, जमीनक मालगुजारी बिहार सरकारक हाथ एबे कएल। ओना, गाम-गामक सभ जमीनक मालगुजारी एकरंग नहियेँ छल, मुदा कम कि बेसी तँ छेलैहे। कम-बेसीक माने भेल जे जे जमीन ब्रह्मोत्तर, शिवोत्तर वा अन्य कोनो कारणे मालगुजारीसँ मुक्त छल, ओहू जमीनक मालगुजारी टैक्स रूपमे तँ नहि मुदा ‘शेष’ रूपमे लागए लगल। ओना, ‘शेष’ नाम-मात्रे रूपमे छल। टैक्सक अतिरिक्त जे टैक्स लगैत रहै, शेष मात्र ओतबे छल। बिहार सरकारक कर्मचारीक माध्यमसँ मालगुजारी असुलल जाए लगल। गामक किसान सभ जमीनक निलामीसँ बँचैक नमहर साँस लेलक। ओना, अंगरेजक समयमे–१८८८ इस्वीसँ १९०३ इस्वीक बीच–जमीनक सर्वे भेल छल, जइ आधारपर अखन तक जमीनक हिसाब-किताब चलैत आबि रहल छल, ओइमे अनेको रंगक ओझरी लगले जा रहल छल। माने ई जे किछु ओझरी सर्वेक पहिनेसँ आबिये रहल छल तेकर अतिरिक्तो अनेको रंगक नव-नव ओझरी उठि-उठि ठाढ़ भेल। तँए, सर्वेक जरूरत भेल। बीसम शदीक सातम दशकमे जमीनक सर्वेक काज शुरू भेल। गाम-गाममे सर्वेक पहिल सीढ़ीक काज किश्तवार रूपमे शुरू भेल। मुदा किश्तवार करैबला कर्मचारी जे आएल ओ भीतरे-भीतर तेहेन हवा बनौलक जे गामक लोक, जमीनबला सभ ऑंखि मुइन कऽ अपन-अपन खेतक नक्शा बढ़बैले ओकरा घूस दिअ लगल। जइसँ सर्वे की हएत जे पैसाक खेल शुरू भेल, जइसँ गाम-गाममे आरो विवाद फँसि गेल। १९६७ इस्वीक रौदी आमजनसँ लऽ कऽ सरकारोकेँ कृषिक लेल पानिक की जरूरत अछि, तइ दिस धियान खिंचलक। ओना, अखन धरिक किसानक संस्कारमे सिंचाइक कृत्रिम बेवस्थाक प्रति ओ आकर्षण नहि आएल छल, जेकर जरूरत छेलइ। मुदा रौदी से अनलक। ओना, कोसी नहरक चर्च किसानक कान तक जरूर पहुँच गेल छेलै मुदा ओइ रूपमे नहि, जइ रूपक खगता छेलइ। कोसीक पच्छिमी मुख्य नहर जे छल, ओकर खुनाइयो समुचित ढंगसँ नइ भेने, अखनो धरि ओहिना लटकले छल। तैबीच विदेशी सहायतासँ स्टेट बोरिंग गाड़ैक योजना बनल। ओइ बोरिंगक ओहन पाइप आ इंजिन अछि जे हजारो बीघा खेतक सिंचाइ कइये सकैए। ओना, बोरिंग तेहेन इंजिनसँ गाड़ल जाइ छेलै जे एक्के दिनमे माने आठसँ दस घन्टामे बोरिंग गड़ा जाइत रहइ। मुदा जइ इंजिनसँ पानि निकालल जाइत ओ बिजली चालित छल। जे बिजली केतौ छेलैहे नहि, आ कनी-मनी जँ छेलैहो, से बहुत कम मात्रामे छल, जइसँ बोरिंगक इंजिन चलब कठिन छेलइ। तेकर अतिरिक्त बोरिंगक पानिक लेल नाला चाहै छल, से केतौ बनबे ने कएल। जँ केतौ-केतौ कनी-मनी बनबो कएल तँ तेहेन घटिया काज भेल जे ढहि-ढुहि गेल। एक तँ ओहुना लोक बुझैए जे सरकारी काज आ जेठुआ गरेक कोनो भरोस नहि। से भेबो कएल। दर्जनो बोरिंग गामे-गाम गड़ाएल मुदा सिंचाइ केतौ ने भेल। सरकारोक नजैर जखन रौदीपर पड़ल तँ ओहो बोरिंग गड़बैक योजना बनौलक। बैंकक माध्यमसँ एक-तिहाइ, एक-चौथाइ सब्सिडीपर बोरिंगक पाइपो आ पानि निकालैबला पम्पसेटोक बेवस्था करौलक। केतौ-केतौ गोटि-पंगरा गड़ेबो कएल, मुदा जेते जरूरत छल से नहियेँ भेल। १९६७ इस्वीमे आम चुनाव भेल। ई चारिम आम चुनाव छल। पहिल १९५२इस्वीमे, दोसर १९५७ इस्वीमे, तेसर १९६२इस्वीमे भेल छेलै आ चारिम १९६७ इस्वीमे। क्रमश: केन्द्रमे सरकार बनल पहिल प्रधानमंत्री पण्डित जवारलाल नेहरू, दोसर- लाल बहादुर शास्त्री, ओना, किछु दिनक लेल गुलजारीलाल नन्दा सेहो प्रधानमंत्री बनला, आ तेकर बादक प्रधानमंत्री पदपर आसिन भेली इन्दिरा गाँधी। चारिम आम चुनावमे बिहारक शासन बदलल। ओना, केन्द्रमे काँग्रेसी शासन रहबे कएल मुदा बिहारमे काँग्रेस विराधी सरकार बनल। ओना, कएटा आनो-आनो राज्यमे काँग्रेसी सरकार बदलबे कएल। काँग्रेस छोड़ि सभ पार्टी मिलि बिहारो सरकार बनौलक। नव सरकार बनिते बिहार सरकारक ३३ सूत्री कार्यक्रम बनल। मैट्रिकमे अंगरेजी विषयकेँ उठौल गेल। मैट्रिक तकक शिक्षा सेहो फ्री कएल गेल। तेकर अतिरिक्तो कार्यक्रम सभ छल मुदा सरकारमे जहिना एक दिस वामपंथी शामिल छल तहिना दोसर दिस दच्छिणपंथी सेहो रहबे कएल। दुनूक बीच तेना विवाद फँसल जे अठारह मास बीतैत-बीतैत सरकार टुटि मध्यावधि चुनाव भेल। १९७१ इस्वीमे पाकिस्तानमे सेहो चुनाव भेल। ओइ चुनावमे पूर्वीयो आ पच्छिमियो पाकिस्तानक बीच लड़ाइ फँसल। पच्छिमी पाकिस्तान कश्मीर, पंजाब आ राजस्थान कटि कऽ बनल छल, आ बंगालसँ कटि कऽ पूर्वी पाकिस्तान बनल रहइ। ओना, अजादीसँ पूर्व १९४७ इस्वी तक भारत देश जेतेटा छल तइमे पाकिस्तान कटने कमी एबे कएल। जे एकटा देश छल ओ दूटा बनि तीन टुकड़ी भऽ गेल। ओना, १९३१ इस्वीमे, अंगरेजीए शासनमे बर्मा सेहो अलग भेल, जे भारतेक पूर्वी भाग छल। पछाइत सिक्किम जे कि एकटा छोट देश छल ओ भारतमे मिलबो केबे कएल। इन्दिराजीक नेतृत्वमे केन्द्र सरकार छल, ओ पूर्वी पाकिस्तानकेँ संग देलैन। ओना, चारि सालसँ जे रौदी आबि रहल छल ओ १९७१ इस्वीमे सालो भरि बरखा भेने समाप्त सेहो भेल। जहिना भारत पूर्वी पाकिस्तानकेँ मदैत केलक तहिना अमेरिका पच्छिमी पाकिस्तानकेँ केलक। अमेरिका शक्तिशाली देश छेलैहे। जेकरासँ मुकाबला करब कठिन छेलइ। सोवियत संघ सेहो शैन्य-शक्तिमे शक्तिशाली भइये गेल छल। इन्दिराजी सोवियत संघसँ शैन्य-सन्धि केलैन। सोवियत संघक सहायतासँ लड़ाइ जमगर भेल। अन्तो-अन्त बंगला देश स्वतंत्र देशक रूपमे जन्म लेलक। पाकिस्तान दू टुकड़ीमे विभाजित भऽ पाकिस्तान, बंगलादेशक नाओंसँ दू देश बनि गेल। अखन तक, माने १९७१ इस्वी तक भारत जे अमेरिकासँ अन्नक आयात करैत आबि रहल छल, तेकरा अमेरिका रोकि देलक। जइसँ पेटक समस्या अपना देशमे उठबे कएल। जइ सभ देशमे अमेरिका अन्नक निर्यात करै छल ओ सभ देश अमेरिकाक प्रभावमे रहै, तँए ऐगला मुँहरा बनि कोनो देशसँ अन्नक आयात करब कठिन छेलैहे। सोवियत संघ सेहो अन्नक उपजमे ओतेक सशक्त नहियेँ छल जेते आन-आन शक्तिमे छल। ओना, सोवियत संघ ठण्ढ देश अछि, तहू कारणे ओइठाम अन्नक उपज कम होइ छल। खास कऽ साइबेरियाक जे भाग सोवियत संघमे छल ओइ भागमे तीन माससँ नअ मास तक जमीन बर्फमे डुमल रहै छल, जइसँ ओइठाम कृषि कार्यमे बाधा छेलैहे। भारतमे अनेको राज्य अछि आ सभ राज्यक अपन-अपन समस्या अछि। किछु राज्य एहेन अछि जइमे बरखो कम होइ छै आ माटियो उपजाउ नहियेँ अछि। तहिना किछु राज्य एहनो अछि जैठाम अधिक बरखो भेने ओइठामक पैदावार सीमित भऽ गेल अछि। तैसंग किछु राज्यमे खाइबला अन्नक उपज तँ कम होइए मुदा तेलहन, कपास इत्यादिक उपज अधिक होइए। सभ किछु होइतो किछु राज्य एहनो तँ छेलैहे जे अपन भरण-पोषण करैत आनो-आन राज्यकेँ अन्न दइ छल। पंजाब राज्य, जैठाम माटियो ओहन उर्वर शक्तिबला नहि अछि आ बरखो कम होइ छै, मुदा ओइठाम एहेन कृत्रिम बेवस्था केने छल जइसँ अपेक्षाकृत नीक पैदावार छेलइ। आजुक बिहारक नक्शा तँ बदैल गेल अछि मुदा जखन उत्तर बिहार आ दच्छिन बिहार छल, माने बिहार आ झारखण्ड मिला कऽ जखन एक राज्य छल तखन उत्तर बिहार जहिना धार-धुरसँ भरल छल, जइसँ दाहियो होइते अछि, तहिना दच्छिन बिहार पहाड़, खानसँ सेहो भरल छल जइसँ कृषि क्षेत्र कम रहने कृषिक पैदावार कम रहबे करए। मिथिलांचल सहित उत्तर बिहारमे धार-धुर तँ अछिए मुदा कृत्रिम बेवस्था–नहर, बोरिंग–क तँ अभाव अछिए, जइसँ ऐठामक कृषि-कार्य अनबिसवासू बनले अछि। रौदी-दाहीक खेल साले-साल चलिते अछि। जइसँ अपना ऐठाम कृषि कार्य पंगु बनल अछि। अखन धरिक जे कृषि बेवस्था अपना ऐठाम रहल ओ प्राचीन पद्धतिक अनुकूल रहल। जइसँ उपजक मात्रा निम्नसँ निम्नतर स्तरमे रहल। देशक सोझा जखन अन्नक समस्या उठि कऽ ठाढ़ भेल तखन केन्द्रो सरकार आ राज्यो सरकारक नजैर कृषि दिस उठल। ओना, अनेको रंगक अन्नक खेती-बाड़ीक लेल अनुकूल क्षेत्र बिहार छीहे मुदा उपजाक जे रेशियो हेबा चाही से नहियेँ छल। सरकारक नजैर उठने किसानकेँ रंग-रंगक सहायताक सुविधा भेटल। पूसा, ढोली, सबौर इत्यादि जगहमे कृषि फार्म सेहो बनल, जैठाम कृषिक पढ़ाइक संग-संग अनुसन्धान सेहो हुअ लगल। जइसँ अन्नक नीक-नीक बीजक अनुसन्धान भेल, जे परम्परासँ अबैत पैदावारमे धक्का मारलक। माने डेढ़िया-दोबर-तेबर उपजाक बढ़ोत्तरी भेल। जइ खेतमे कच्ची मन कट्ठा उपजै छल, तइमे तीन-तीन, चरि-चरि पक्की मनक उपज हुअ लगल। तैसंग कोसी नहरक लाटमे आनो-आन नहरक खुनाइ हुअ लगल जइसँ खेतक सिंचाइ होइत। बैंकक माध्यमसँ एक-तिहाइ, चौथाइ अनुदानित रूपमे बोरिंग-पम्पसेट लॉनक माध्यमसँ किसानकेँ भेटए लगल। जइसँ गाम-गाममे किछु बोरिंग भेने उपजमे किछु-ने-किछु बढ़ोत्तरी सेहो भेबे कएल। अखन धरि जइ खेतमे मात्र छाउर-गोबर देल जाइत छल, रसायनिक खादक प्रयोग नहि भेल छल, तइ सभ खेतमे रसायनिक खादक संग-संग गोबर-घास-पातसँ निर्मित जैविक खाद सेहो पड़ए लगल। तेतबे नहि, किसानकेँ जैविक खाद बनाएबो सिखौल गेल। अखन धरि जे सरकारी विभागमे कृषि विभाग मृतप्राय छल ओइमे जान फूकल गेल। ब्लॉकमे कृषि विभागक अलग कार्यालय बनल। गाम-गाममे कृषि विभागक कर्मचारीक बहाली भेल, जेकरा माध्यमसँ गामक किसानकेँ नव तकनीकक जानकारी देल जाए लगल। ब्लॉक स्तरपर सरकारी कृषि फार्म सेहो स्थापित भेल। सरकारी माध्यमसँ किसानकेँ खाद-बीज, कृषि-यंत्र अनुदानित दरपर कर्ज रूपमे सेहो भेटए लगल। पूसा, ढोली, सबौर फार्मक माध्यमसँ अन्नक संग तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक बीजक संग गाछ सेहो उपलब्ध करौल जाए लगल। ‘जय-जवान, जय किसान’क नारा देशमे बहल। अखन धरिक जइ किसानक शकल-सूरत बिगैर गेल छल ओइ किसानमे नव उत्साह जगल, कृषि पैदावार बढ़ल, देश अन्नक मामलामे आत्म-निर्भर भेल। आत्म-निर्भर भोजनक मामलामे जरूर भेल मुदा कृषि पैदावारमे पंगुपन बनले रहल। जैठाम कृषि आधारित माने कृषि पैदावारसँ पैंतालीस प्रतिशतसँ अधिक कच्चा माल कारखानाकेँ भेटै छै, ओ उपज ठमकले रहि गेल। जइसँ कल-कारखानाक विकास बिहारमे नइ भेल। ओना, जहिना एक दिस प्रगतिक दिशामे देशक शक्ति बढ़ल तहिना समाजक किछु लोक ओकर विरोध नहि केलैन सेहो बात नहियेँ अछि। रंग-रंगक अफवाह सभ उठबे कएल जइसँ प्रगतिमे बाधा नइ भेल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। अन्ध-बिसवास आ रूढ़िवादी विचार सेहो जमि कऽ विरोध करबे केलक। तिथि : ४जून २०१८ जारी.... ९. उमेरक चलैत अपन गिरैत दैहिक शक्तिकेँ अँकैत देवचरण हरिचरणक बिआह करब अनिवार्य बुझलैन। अनिवार्यक दू कारण भेलैन, पहिल- अपन आगू बढ़ैत परिवारकेँ अपना आँखिये देखब, जइसँ मनमे तृप्ति जगैत अछि। दोसर कारण मनमे ईहो भेलैन जे ओना हरिचरणकेँ पढ़ाएब-लिखाएबसँ लऽ कऽ ओकर बिआह-दान करब धरिक काज राधाचरणक कर्तव्यक सीमामे अछि मुदा ऊहिगर बेटाकेँ नहि रहने आ तैसंग हरिचरणक जीवनचर्याकेँ देख देवचरणक मनमे ईहो भेलैन जे जेहेन पोता क्रियाशील अछि, ओहने क्रियाशील लड़कीक संग जँ बिआह कए देबै तँ ऐगला पीढ़ीक जीवन-यापन संतोषप्रद हेबे करत। यएह इच्छा ने सभ परिवारमे वृद्धजनक होइ छैन जे अखुनका जे परिवारिक जिनगी अछि ओ दिनानुदिन अगुआइत चलए। ओना, मिथिलांचलो तँ मिथिलांचले ने छी। जहिना कुशाग्र बुधिक लोक अनुकूल परिस्थिति भेटने नीक-सँ-नीक विद्वता, नीक-सँ-नीक कलाकारिता, नीक-सँ-नीक टेकनोलॉजी आ नीक-सँ-नीक जिनगीक पारखी बनैए तहिना ने नीक-सँ-नीक भोगवादियो आ नीक-सँ-नीक जोगवादियो बनिते अछि। अपना सबहक मिथिला वएह ने छी जे जइ पत्नीकेँ सहयोगी-संगी बुझै छी ओइ पत्नीकेँ परिवारिक कोनो क्रिया-कलापक भार नइ पड़ैन, तँए भानस करैले भनसिया, पानि भरैले पनिभरनी, कपड़ा-लत्तासँ लऽ कऽ घरक निपाइ-पोताइ तक अनके सिरे-हाथे होइ। मुदा से नहि, ओहनो मिथिलांचल तँ अछिए जैठाम बेटा-पुतोहु अपन पाछूसँ अबैत खनदानी परिवारमे पिताक अनुसरण करैत सहयोगी बनि तिल-तिल, कण-कणक अनुभवक अभ्यास करैत तिले-तिल, कणे-कण अबैबला काल्हुक अनुकूल बनबैत अपन भविसकेँ अनुकूलतामे पीअबैत, निर्माण करैत आगू बढ़ैए। मिथिलांचलक ओइ हिस्सामे देवचरण हरिचरणक बिआह करब मनमे रोपि लेलैन जेतए अपने सन सीमान्त किसान परिवार हुअए। जइ परिवारक जन-जन अपन भविसक पाछू लगि श्रम-संस्कृतिकेँ अंगीकार करैत श्रमशील-शिलाक क्रमगतिसँ निर्माण-कार्यमे लागल हुअए। ओना, ई इच्छा तँ अपन मनक भेल, मुदा जैठाम बरपक्ष छी तैठाम अपने उपकैर कऽ केना कन्यागतकेँ कहब जे अहाँ अपन कन्याक बिआह हमरा परिवारमे करू। एक तँ अनेरे लोकक मनमे उठत जे जाबे लड़का खोमाह नइ छै ताबे एहेन चर्च किए करै छैथ। तैसंग ईहो तँ अछिए जे मनोनुकूल कन्या नइ रहने एकटा-दूटा कन्यागतकेँ तँ बहटारि सकै छी, मुदा जँ तइसँ बेसीकेँ बहटारए चाहब तँ अनेरे ने सभ कहबे करत जे फल्लॉं लड़काक सिरे तेहेन बौगली सिया कऽ रखने छैथ जे कन्यागत जँ अपन डीहो-डाबर बेच कऽ लगा देत तैयो ने भरतैन...! संजोग बनल, हरिचणक बिआह समस्तीपुर जिलाक ओहन गामक किसान परिवारमे भेल, जे परिवार अपन कृषि क्षेत्रकेँ ओहन बिसवासू रूपमे बना कऽ ठाढ़ केने अछि, जइसँ इंजीनियर, डॉक्टर तकक समावेश परिवारेमे होइक सम्भावना बनल अछि। जेहने देवचरण खेतिहर पुतोहु चाहै छला तेहने पुतोहु भेटने अपन सोलह सालक पोताक बिआह सोलह सालक कन्या- परमेसरीक संग केलैन। भुखाएल-दहेजियाएल मन देवचरणकेँ रहबे ने करैन, तँए हरिचरणक बिआहसँ सोल्होअना तृप्ति देवचरणकेँ भेलैन। समयक अनुकूल तँ राधाचरणक सुधार नहियेँ भेलैन मुदा बेवहारिक रूपमे दूटा महींसिक सेवा करैक भार सिरचढ़ भेने धीरे-धीरे सुधरए लगलैन। सुधार देख देवचरण समयक अनुकूल महींसिक सेवाक संग आरो-आरो काज करैले राधाचरणकेँ चरिया-चरिया चरैबेति बना लेलैन। ओना, उमेर पाबि सेहो राधाचरणक मनमे परिवारक प्रति प्रेम जागल, जइसँ बकलेल-ढहलेल जकाँ जे वौआइत रहै छल तइमे सुधार भेल। ओना, परिवारमे परिवारजनक बीच जे सम्बन्धसूत्र अछि, माने पैछला पीढ़ीक बेटा-भातीज, नाइत-पोतासँ लऽ कऽ वर्तमान पीढ़ीक भाए-भौजाइ आ तहिना ऐगला पीढ़ीक काका, पिता, बाबा-नाना इत्यादि, सेहो अछिए। जहिना भक्त आ भगवानक बीच अभक्त रूप अछि तहिना ज्ञान आ कर्मक बीच सेहो अछिए। जखने दुनूक बीचक अभक्त रूप मेटा भक्त रूपमे परिणत होइए तखने जिनगीक सार्थकता सफल हुअ लगै छइ। जे हरिचरण आ देवचरणक बीच भेल। ओना, देवचरण किसानी जिनगीक मर्मभेदी रहनौं अपन जिनगीमे पंगु बनल रहला, मुदा अपन पंगुपनक कारणकेँ बुझि देवचरण अपनाकेँ ओही जिनगीमे समावेश करैत परिवारक गाड़ीक जुआकेँ कन्हेठ आगू मुहेँ खिंचते रहला, जइसँ अभावोकेँ कुभाव नहि बुझि सुभाव बना जीवन-बसर करबे केला, जे अपन सभ गुण-शील हरिचरणकेँ दान-दैछनामे दैत ऐ दुनियासँ विदा भेला। देवचरणकेँ चौदह बर्ख मृत्यु भेना भऽ गेलैन। हरिचरण बतीस-तैंतीस बर्खक भऽ गेल। तीनटा सन्तानो भेलइ। राधारचरण सेहो चारिमपनमे पहुँच गेला। देशमे हरित क्रान्तिक रूपमे नव जागरण भेल। परम्परासँ अबैत कृषि-कार्यमे बदलाउ आएल। जेतए सिंचाइक करीन छल ओ बदैल पम्पसेट आएल। खेत जोतैक जे जनकजीक समैयक तीनबित्ता हर छल ओइक जगह ट्रेक्टर आएल। तेतबे नहि, धान कुटैक ढेकी बदलल, चुड़ा कुटैक उक्खैर बदलल, पाथरक जत्ता बदलल, तेल पेड़ैक कौल्हु बदलल इत्यादि-इत्यादि किसान परिवारसँ लोप भेल आ नव-नव तकनीकसँ सिरजल लोहाक इंजिन लोकक हाथमे आएल, जेकर रफ्तार दसगुणासँ लऽ कऽ हजारगुणा धरिक अछि। ओना, जइ गतिये किसानी तकनीक आगूसँ उतरल तइ हिसाबे किसान नहि उतैर सकल मुदा साफे नहियेँ उतरल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। कियो उतरल वा नहि उतरल, चढ़ल वा नहि चढ़ल मुदा हरिचरण, जे बतीस-तैंतीस बर्खक जवान किसानक रूपमे उतरबे कएल। से ओइ भाव-रूपमे उतरल जहिना एक जवान हाथमे बन्दूक उठा अपन मातृभूमिक रक्षार्थ सीमापर माघक शीतलहरीक पाला, जेठक रौद आ भावदक बर्खाक अट्ठा-बज्जर सहैत अपन दायित्वक निर्वहन करै छैथ, तहिना ने जवान किसान सेहो अपन मातृभूमिक सेवार्थ भूख-पियास मेटबैले माघक पाला, जेठक रौद आ भादवक गर्जन-तर्जनकेँ अङ्गेजैत अपन दायित्वक निर्वहन करै छैथ। हरिचरण अपन तीनू बीघा जमीनकेँ समाजिक रूपमे अदैल-बदैल, रकबाक हिसाबसँ दस कट्ठा घाटा उठबैत अढ़ाइ बीघा खेत एकठाम केलक। अपन जिनगीक सूत्रकेँ पकैड़ चारि इंचबला बोरिंग आ पाँच हॉर्स पावरबला इंजिनक साधन बना अपन फसिल सिंचाइक बेवस्था सेहो केलक। तैसंग अढ़ाइयो बीघा खेतमे ओतेक काज ठाढ़ केलक जइमे भरि दिन दुनू परानी अपन दुनियाँ बुझि अपनाकेँ सोल्होअना समर्पित केलक। तेतबे नहि, अस्पतालक डॉक्टर आ कृषि फार्मक कुशल किसान जकाँ अपन बाल-बच्चाकेँ सेहो देखा-सुनी कराइये रहल अछि। तैसंग सालो भरिक खेतीपर दैत सुअन्न, सुफल आ सुसाग-सब्जीक केतेक जरूरत मनुखकेँ अछि, तहूक उपार्जन कइये रहल अछि। मिथिलांचलक बीच अपन मिथिला बना फलक नाओंपर खाली आमेक गाछी-कलम नहि, सालो भरिक जे फलक क्रम अछि तइ हिसाबक फल, तहिना ओइ हिसाबक तीमन-तरकारीक संग अन्नो उपजाइये रहल अछि। अपन साधक जे क्रिया अछि तइमे तँ हरिचरण अपन सफल स्वरूप देख रहल अछि, मुदा आगूक जिनगीकेँ देखैत हरिचरण जखन अपन वृहद् स्वरूप देखए लगैए तखन पंगुपन आगूमे नचिते छइ। ओना, केतबो पंगुपन हरिचरणक आगूमे किए ने नाच करए, मुदा किसानक समाजमे किसान वृन्द कहेबाक अधिकारी तँ अछिए। तिथि : ६ जून २०१८ पद्य खण्ड आशीष अनचिन्हार बाल गजल केहन काहन ढ़ुलढ़ुलिया बच्चा फेकल फाकल फुलफुलिया बच्चा ढ़ुनमुन ढ़ुनमुन गुलगुलिया बच्चा हुलबुल हुलबुल हुलबुलिया बच्चा छन छन कूदै थुलथुलिया बच्चा सदिखन बूलै बुलबुलिया बच्चा छै इम्हर उम्हर किम्हर किम्हर चुलबुल चुलबुल चुलबुलिया बच्चा की नवका आ की पुरना पुरना चीन्है सभकेँ भुलभुलिया बच्चा सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। गजल मोन पड़लै नोर खसलै अर्थ दिव्यांग शब्द टहलै बात बजिते जीह कटलै देह छुबिते देह गललै लोक अप्पन आन लगलै सभ पाँतिमे 2122 मात्राक्रम अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। गजल एकै आदमी चोर फकीरक सरदार बड़ हरीफ लागैए शरीफक सरदार बाहर टूटल फूटल भीतर चकमक छै बड़ अमीर लागैए गरीबक सरदार एना पसरल हेतै गुप्त बात सौंसे कनपातर लागैए बहीरक सरदार मोती केर आसमे गहलहुँ धार मुदा बड़ उत्थर लागैए गँहीरक सरदार रहि जेतै ई आसन बासन सिंहासन आ चुप्पे उड़ि जेतै शरीरक सरदार सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि गजल हुनका लेल सिंदुर एलै हमरा लेल जहर देखू नेह कोना भेलै हमरा लेल जहर अमरित एकरा हम कोना ने मानू कहू से अपने हाथें देने गेलै हमरा लेल जहर जीवन धारने छै जहरक कर्जा तइँ तँ सखी बहुते देर धरि घुरिएलै हमरा लेल जहर खिस्सा सुनि कऽ किछु ने बजलै चुप्पे रहलै तखन बहुते कनलै आ पछतेलै हमरा लेल जहर मोनक बात कहने रहियै अपना लोकसँ आ अनचिन्हार सेहो लेलै हमरा लेल जहर सभ पाँतिमे 2221-22-22-2221-12 मात्राक्रम अछि। दोसर आ चारिम शेरक दूनू पाँतिमे एक-एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल मोन सभहँक अचंभित छलै चोर ऐठाम मंडित छलै काज हुनकर बिलंबित मुदा साज तँ द्रुतबिलंबित छलै हाथ जोड़ल बहुत भेटि गेल मोन सभहँक विखंडित छलै ठोर केनाहुतो चुप रहल तथ्य रखबासँ वंचित छलै दुख बला पाँतिमे देखि लिअ सुख बहुत रास टंकित छलै दर्द बाँटब सहज नै बंधु दर्द मोनक अखंडित छलै सभ पाँतिमे 2122-122-12 मात्राक्रम अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर अछि। गजल चुपचाप देखब कपारमे चुपचाप चाहब कपारमे ओ जे जे कहथिन सएह सभ चुपचाप मानब कपारमे सपना अपन आँखि के बहुत चुपचाप डाहब कपारमे ई नोर हुनके हँसी सनक चुपचाप कानब कपारमे देखा कऽ लिखलहुँ ई पाँति आ चुपचाप मेटब कपारमे सभ पाँतिमे 2212-212-12 मात्राक्रम अछि। दोसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानि लेबाक छूट लेल गेल छै। गजल हुनके विकास जनता उदास संसद बनलै चोट्टा निवास अपने अर्थी अपने लहास जेबी जानै हाटक हुलास बूड़ल देशक दर्शन झकास सभ पाँतिमे 22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल किछु काज भगवान भरोसे किछु काज शैतान भरोसे किछु लोक नोरेसँ भरल अछि किछु लोक मुस्कान भरोसे किछु आँखि सोनासँ सजल छै किछु आँखि दुभिधान भरोसे बहुते मजा आबि रहल छै किछु बात अनुमान भरोसे लाभक कथा के क' रहल अछि किछु लाभ नुकसान भरोसे सभ पाँतिमे 2212-21122 मत्राक्रम अछि। राजेश मोहन झा "गुंजन" नवदुर्गा सिंह पीठ असवारि लगै छी अहॉ बऽर वढ़ियॉ । अति सुन्नरि सुकुमारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़िया । हस्त त्रिशूल चक्र अति चकमक, रक्त पिपासित खप्पड़ भक् भक्, अखिल लोक अवाक् सभ ठकमक, चललहुँ बनलि विहाड़ि लगै छी अहॉ बऽर बढ़ियॉ । गत्र गत्र पर रक्तक छिटका, असुरक पीजु चरण तर टटका, क्रुद्ध नयन कर सॉपक सटका, ठाढ़ि महिष केॅ मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ । भऽरल सभटा राक्षस सेना, तीतल ऑचर बहल पसेना, आऊ हौकि दी वॉसक बेना, बैसू मुँस्की मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ । हे दुर्गे जगदम्ब व्यथा हरू, अपना कोर माय हमरा करू, रामक भक्ति सुधा मुँख मे भरू, हे पयस्विनी नारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़ियॉ । गाछक गोहारि- (विश्व पर्यावरण दिवस पर) प्राण वायु संग ममताक आंचर छांह रूप मे दै छी कहू हे मनुक्ख अहां सँ, बदला मे किछु मांगैत छी? हमर हाथ काटि चूल्हि जरबैत छी पात काटि क' चार छारैत छी एतबहु पर संतोष नहि जे चढि कऽ शीष काटैत छी। देखू धरती केर रूप बदलि गेल सजल सरोवर सूखि रहल जीवन रस हाट दोकान बिकाय "शुद्ध जल" कीनि पीबैत छी। बाबा सिनेह सँ रोपि गेला सूखल काया वृद्ध भेलहुं अहाँक नेना केर मुस्कि देखि मरि मरि हम जीबैत छी। आबहु सुधरि जाऊ हे मानव! गाछ रोपल जाऊ हे मानव! विलोपित वोन बरखा नहि होयत एते तऽ अहूं बूझैत छी। हे सुनू एतबहि हम चाहैत छी।। किनकर विकास? (पूंजीवाद कि सर्वहारा) (यात्रीजी "बाबा नागार्जुन" कें जन्म दिन पर) सभ किछु बिकाय त' चाने कें कीनि लेल चमकैत धरा केर इजोरिया के छीनि लेल। सोती कें सोखि ओ पानि बेचै छथि बटुआ रहै भरल एतबहि बूझै छथि अपन दिन महमह क' दोसर के दुर्दिन देल। रस हुनक हिस्सा हम आंठी चूसै छी भाग विधि सँ भेटय जानै सूनै छी हे विधना तोहूं बिकैलह तोरो हम चीन्हि लेल। सर्वहारा तोरा ढ़ौआ केर महिमाक ज्ञान नहि तंत्र बंदूक कान्ह पड़ल छूटय से भान नहि लोकतंत्री फसील मे तों भूस्से छें बूझि ले। भूस्सा! हां भूस्सा! मशीन वा डांग सँ कूटतौ ओसयतौ चैतक सूखल पछबा मे तोरा उड़ैयतौ ढ़ेरि भ' खरिहान मे कोनो आश मे रहबें त अपन मुरूख बरदक भूख तोरे सँ मेटयतौ घूर मे जरयतौ सर्वहारा छें तोरा पर प्रदूषण-कलंक लगैतौ। प्रीतम कुमार निषाद यात्रीक स्मृति हे साकेती जनकवि बाबा यात्रीजी लियऽ स्नेह सुमन। मोन पड़ल अछि अपनेक प्रतिभा तैं अनुरागी भेल सुजन।। हे साकेती जनकवि बाबा...।। संत कबीरक अक्खरता लऽ फक्कर भऽ घुमलौं सगरो मिथिलासँ सिंहल लंकाधरि यात्री भेलौं काशीनगरो साम्यवाद क्रान्तिक वाणीसँ काव्यकथा कए देल सृजन मोन पड़ल अछि अपनेक... हे साकेती जन कवि बाबा...।। गाम-कुरीत औ घर-चुल्ही संग विधवा-विलापक दरद कहल सत्ताक सनकीसँ निर्भय भऽ अपनेक लेखनी मरद रहल तैं काव्यार्थी प्रीतम अर्चए निवसू यौ बाबा अन्तर्मन। मोन पड़ल अछि अपनेक... हे साकेती जनकवि बाबा...।। अमर शहीदक श्रद्धांजली भारत मिथिलाक राष्ट्रपूतसँ मर्यादित माऽए मैथिली... अमर शहीद विकास मिश्रकेँ अछि अर्पित श्रद्धांजली।। रईमा गाम समाजक गरिमा गौरवसँ किछु सीखली... अमर शहीद विकास मिश्रकेँ अर्पित अछि श्रद्धांजली।। 0।। एहने सन शत सापूत सैनिक मिथिलाक धरती दैत रहल इतिहास भूगोल मैथिल पूतसँ घटना वृत्ति कहैत रहल कर्णाट तुरक मोगलिया युद्धक मिथिला योद्धाक रीत ली... अमर शहीद विकास मिश्रकेँ कए अर्पित श्रद्धांजली।। 1।। हजारो बरिससँ मिथिलाक आभा असलान ओइनवार रण पसरल कामेश्वर वंशज कीर्त्तिसिंह औ शिवसिंह धरि यश पसरल कन्दर्पीघाट युद्धक गाथा मैथिल शहीदक सीखली अमर शहीद विकास मिश्रकेँ अर्पित करू श्रद्धांजली।।2।। तहिना नवयुग काल संगोरए मिथिला वीर सपूतन केँ राष्ट्र धर्म औ जन्मभूमि धरि सहजल सैनिक कर्मणकेँ मातृ कुक्षिकेँ नमनए प्रीतम शहीद कीर्त्तियश लिखली अमर शहीद विकास मिश्रकेँ दैत रहब श्रद्धांजली...।। 3।। सार बहिनोई (हँस्सी-चौल) सार : सुसुसुसु... सुनियौ पाहुन... दीदीक कहब संगे जाहुन पड़लहुँ अपनेक पाला, अंगरेजीक ब्रॉदर इनलॉ छी दुन्नू जीजा-साला...।। 0।। बहनोई : स-स-स-सड़बे... हेहरई करब... अहाँक दीदी सँ हम लड़ब... अहाँ छी गड़बड़ झाला... अंगरेजीक ब्रादर इन लॉ छी... दुन्नू जीजा-साला...।। 1।। चाइल-कुचाइल कियऽएदेखबै छी, अल्हड़ असटाइलमे, हेल्लो वेल्लो ओके थैंक्यू कहै छी मोबाइलमे...।। बुझलौं अपने छी बड़ काबिल कम्प्यूटर सिस्टमछी। हम्मर लाइफकेँ बेस मिनिस्टर केर अपने कस्टम छी।। सार : तैं एहि सारकनामे हे पाहुन बहिन करू केवाला... अंगरेजीक ब्रॉदर इन लॉ छी दुन्नू जीजा-साला।।2।। बहनोई : शहर-बजारक नेना छी मुदा भऽ गेलहुँ बुरहाठी। टीवी-टेबलेट-लैपटॉप फेसबुक सँ बनलौं कवि-काठी।। सार : धऽत्तुरि केहन बुड़बक छी अहाँ माऽए-बाप शान गिनएलौं नामी-गामीक सन्तान भऽ कऽ पुरखोकेँ नाम घिनएलौं।। बहनोई : पुरखा-माऽए-बाप केर जुनि ऊकटू मुँहपर लगबू ताला अंगरेजीक ब्रॉदरइन लॉ छी दुनू जीजा साला...।। 3।। सार : हँसी-मजाक केर अछि रिवाज तैं पाहुन हम हुत्थै छी। सरहोइज-साइरक बत गड़हीमे, अहाँ सदिखन कुत्थै छी।। बहनोई : लाजे हम सकदम्म भऽ सभकेँ देल-फजहैतो सुनै छी। सासुरक मौजक मत्था-पच्ची गुण-अवगुणकेँ गुनै छी।। सार : चलियौ-भोजन करए पाहुन गमकए चिकेन मसाला अंगरेजीक ब्रॉदरइन लॉ छी दुन्नू जीजा साला...।। 4।। आहत अगस्त भारत देशक धरती करुणित शहीदाञ्जली दऽ प्रणमए हस्त। धुजातिरंगा दुलरैत बाजए अछि एखनो आहत अगस्त।। चहुँदिशि गूंजए पन्द्रह अगस्त नेना-भुटका संग-लोक व्यस्त आजाद हिन्द भए रहल त्रस्त स्वारथ सह-सह देखैछ मस्त तैं अछि आहत पन्द्रहअगस्त आहत अगस्त आहत अगस्त...।। 0।। अछि जन प्रतिनिधि मौका परस्त। भारत मिथिला अछि अस्त-व्यस्त।। सत्ता सेवक खुशहाल मस्त। कोन भष्ट पतिक अछि वरद हस्त।। आहत अगस्त आहत अगस्त...।। 0।। किछु संविधान सुख अछि निरस्त मर्यादित अछि-फिरका परस्त किए, आतंकी दिन-दिन प्रशस्त राष्ट्रीयताकेँ देवए शिकस्त...।। 0।। आशाक तिरंगा कोटि हस्त झण्डोत्तोलन भए रहल सस्त औ, सर्व धर्म समभाव पस्त हाय, राष्ट्र पर्व केर उदय-अस्त आहत अगस्त आहत अगस्त...।। 0।। हाय भूकम्प माऽए गै बाप रौ सुनैत देखलौं मचैत छल हड़कम्प थड़ थड़ गूंजैत धरती हिलल चिकरल जन भूकम्प तन मन थड़ थड़ हमरो काँपल डँरल दिल दिमाग। नेना भुटका जनि पुरुखकेँ देखल भागम-भाग।। हमहूँ थकमक करैत सोची हेहरि कत्त जाऊ। जाँघो काँपैत थिर नहि होअए कोन सहारा पाऊ।। किछु मिनटेपर लोक हकमितें सकपक्की संग बाजल केक्कर घर गिड़लै बाजै ने कालचक्र छल साजल।। केओ कहथि जे हम्मर औरदा नहिं छल एक्खन पूरल। मृत्युकालकेँ मुँहसँ जेना देह प्राण अछि धूड़ल।। आइ शनिचरा ग्रह खेलैछल देश विदेशमे सगरो। अपने हाल व्यथामे हकमैत सुइध कहाँ छल केकरो।। बेरा-बेरी देखैत रहलौं सभ मोबाइलमे भींड़ल। घर-कुटुमैताक जिज्ञासामे अपस्याँत टहलल फिड़ल।। केओ बाजए सन चौंतीस ईस्वीसँ भूकम्प छल बड़का। कहए केओ फेर हिललै धरती लगतै कत्तहुँ दड़क्का।। बूढ़ पुरान कहथि हे बौआ भागि कऽ कत्तऽ जएबह। सभतरि एहने हाल बनल छै नव बुइध कोन लएबह।। दिन भरि गुनधुन भय आशंका जनमन भेल हेहरू। किछु नहिं फूरए अल्लाह ईश्वर हे दैबा किछु करू।। टीभी रेडियोक समाचार संग जनजीवन भऽ गेल बेहाल। अखबारोक सुर्खीमे दारूण तहस-नहस देखल नेपाल।। हिलल हिमालय केर हिम खण्डो काठमाण्डूकेँ फूटल कपार। तिब्बत चीन भूटान औ यूपी काँपल रहि-रहि बंग-बिहार।। एवरेस्टक पर्वत आरोही बेस कैम्पमे चिकरि मरल। हिम खण्डक चट्टान पिघलिते पैघ प्रलयसँ रहय अड़ल।। धरहारा मीनार नौ मंजिला काठमाण्डूकेँ कुतुब मीनार। गिरल धड़ाम ओ जमीन्दोज भऽ झहुड़ा होइते लागल किनार।। मन्दिर-मण्डप कोठा-सोफा दरकैत गिरैत मलवा भेल। मलवा संगे सैंकड़ो मुर्दा प्रलय कालकेँ बलवा भेल।। एहि घटना केर हाल बखानै नासा केर वैज्ञानिकगण। सात दशमलव नौ रिक्टर संग घटना चक्रसँ सिसकए मन।। भेल चौकन्ना विश्व मित्रजन भारत अमरीका चीन सकल रैस्क्यू ऑपरेशन रत भारत देखा देलक सहयोग अकल।। भू-वैज्ञानिक आंकि बतौलक विमुख प्रकृतिकेँ देखल कोप। मानव अपनेहि प्रलय पुकारल तैं धमकए भूकम्प प्रकोप।। प्रीतम गोहरए विश्वमान्यवर ग्लोबल वॉर्मिंग हड़पैए। आपदा-विपदा धरती कोइखसँ भू-तापीय द्रव तड़पैए।। विकासक दम्भ हम विकास कऽ रहल छी मुदा ह्रास भऽ रहल अछि। ई, विसंगतिकेँ मानय केँ यश-अपयश के लऽ रहल अछि। की..! हम अहिना विकास कऽ रहल छी? सभ देखैछ कालचक्र युग चापक प्रभावसँ प्राकृतिक पराभव औ प्रभाव सेहो आजुक पिछलग्गू जकाँ सदिखन चटपटाएल, धड़फड़ाएल... कखनों अलसाएल, तँ कखनो महुराएल... हम्मर स्वार्थक बलैया लऽ रहल अछि। ई, विसंगतिकेँ जानय के..? यश-अपयश के? लऽ रहल अछि की..? अहिना हम विकास कऽ रहल छी? हम, उसास कऽ रहल छी मुदा खटास भऽ रहल अछि। ई, विसंगतिकेँ मानय के? उपकार-जनसेवा सिनेह आ मम्मत जानए के आई-माई, मित्तिन सासुक, सम्मत मानए के गोतनी सौतिन ननदि नटिनियाँ देखि पड़ोसिन जरए डकिनियाँ गौरवे आन्हर गृहिणी कनियाँ उकटा पैंची सभ कऽ रहल अछि की..? एहने हम विकास कऽ रहल छी..? हम, उसास कऽ रहल छी मुदा खग्रास भऽ रहल अछि..! जहिना, चान-सुरुजक ग्रहणसँ पसरल अन्हार तहिना, अन्धविश्वासक चौपाइरमे कहाली बनल परिवार सरकारी संग्रहणक पंजीमे अछि दर्ज ढोवैत, रोवैत रहए लोग जिनगी भरि कर्ज... जाहिसँ फलय-फूलय... छल-प्रपंचक राजनीति... फूइस, पेंच, गलबैहिया धेने गाम-घरमे रीत-कुरीति ज्ञानक मन्दिर इसकुल जर्जर दसगरजा घर सभटा गड़बर जत्तय अन्हरा डिठरा बमकै चतुर चलाको चुगला चमकै दाँव-पेँच दोगलई केँ दलाली औनी पथारी सभ दऽ रहल अछि तैँ नेँ हम विकासक प्रयास कऽ रहल छी मुदा सर्वग्रास भऽ रहल अछि ई विसंगति केँ मानए के? ई विसगतिकेँ जानए के? कीऽऽऽ एहने हम विकास कऽ रहल छी? जे सर्वग्रास औ ह्रास भऽ रहल अछि? हँसनी-खेलनी हँसनी-खेलनी आगु आऊ कननी-खिजनी पाछु जाऊ। मिथिलाक चिन्ता त्यागैत मैथिल नव आशा केर दीप जराऊ।। हँसनी खेलनी...। घर-आँगन दुअरा सुत्थड़ कए गौंआँ-गोंधियाक मीत बनू नेना-भुटकाक नव जिनगी लेल करम योगी श्रमजीत बनू ज्ञानी गुणी सपूत जनक भऽ गामे गाम उपदेश सुनाऊ।। हँसनी-खेलनी...। शिक्षा औ संस्कारक रक्षण दायित्त्वक संग कर्त्तव्य करू। दारू नशा दहेज कुवृत्तिकेँ त्यागि लोक दुर्भाग्य हरू।। तहिना बाल-विवाह कुग्रह केर कालग्राससँ गाम बचाऊ।। हँसनी-खेलनी...। राजनीतिकेँ धरम-करम संग विश्व देश औ प्रान्त चलए मुदा दुष्टपतिकेँ कटुनीति नवतुरकेँ सौभाग्य छलए ताहिसँ ईर्ष्या द्वेष औ लालचसँ भटकल नव पीढ़ीकेँ बँचाऊ हँसनी-खेलनी...। एखनुक धरम धकेलू सन्तक अजब-गजब लीला चमकल यज्ञ समारोह उत्सव मंचसँ भजन प्रवचनमे छल छमकल जिनगी लोक नियमरत प्रीतम ढोंगसँ घर-कुटुम्ब बचाऊ हँसनी-खेलनी...। हिस्सा-बखड़ा अजब-गजब भेल हिस्सा-बखड़ा सुख लपकए सभ दु:ख दए ककरा बुझनुकहो सभ देखबए नखरा साँच नै मानत बूझत फकरा...।। 0।। जिनगीक हँसी-खुशी भेल हम्मर श्रम-दु:ख भोगथि माऽए बाप बम्मर शौक-सेहन्ताक सेज आडम्बर मरम-दरद सभ जानै दिगम्बर दु:ख जोगथि जेँ श्रम पूजक छथि- 2 तेकरे सेज बिछाओन अखरा...।। 1।। लोक-समाजोक रीतिअजब भेल ज्ञान धरम विपरीत तरफ गेल करमयोगी सन्तन अपयश लेल कलह कुचाइल गाम-घर भरि गेल गाइर गरव्वैल माइर मरव्वैल- 2 छाड़लकपटीक जल्ला-मकड़ा...।। 2।। करमचारी-हाकिम आओर नेता चोरनुक्की कए घूस कमेता कोर्ट-कचहरी-थाना-संड़ेता बेबस जनकेँ कष्ट बढ़ेता छल-बल देखैत प्रीतम कलपए- 2 नेता-प्रशासन सेवत ककरा...।। 3।। हम नारी छी..! हम नारी छी..! सुकुमारी छी, सुखकारी छी...। मातृशक्ति जगसृष्टि संगिनी लोक-पुरुष-श्रम प्रण प्यारी छी...। हम नारी...।। 0।। वेद-पुराण-उपनिषद ग्रंथ सभ आदि शक्ति अकानैए ऋृषि-मुनी-कवि-साहित्य सापूत हमरो सुयश बखानैए सावित्री-अनुसूया-अहल्या सीता सन दुखियारी छी...। हम नारी...।। 1।। इतिहास औ भूगोल वृत्ति संग जननी जन्मभूमि हम छी अर्द्धनारीश्वरकेँ हम अंशिनी ममत त्रिवेणीक संगम छी प्रणय पर्व संग वामा उर्वशी जकाँ दैव मनोहारी छी...। हम नारी...।। 2।। युग परिवेश समाज बदलितेँ हमरो नव नव रूप देलक लक्ष्मीवाई-पद्मावती केँ आभा कीर्त्ति कुरूप केलक सावित्रीवाइफूले रजिया- बेगम इन्दिरा प्यारी छी...। हम नारी...।। 3।। ज्ञान-विज्ञानसँ हमहूँ सजलहुँ गार्गी-मैत्रेयी भारती भऽ एलौं नभ साकेतीनि-कल्पना प्रण लऽ सफल सुनीताविलियम्स भेलौं निरुपमापाण्डेय एवरेस्ट यात्रिणी केर प्रण पालनहारी छी...। हम नारी...।। 4।। एखनुक युग केर केहन सराप अछि गामे-गाम सनकी बमकए निशाखोर दारू लए उमकए दहेजक दैत्य सेहो रमकए तैं माऽए केर गर्भहिमे बेटीक भ्रूण पलैत लाचारी छी... हम नारी...।। 5।। एहि युगमे स्त्री-अस्तित्त्वक मर्यादा अछि घिना रहल चकरचाइल छलिया धनपति जन विज्ञापन तन बना रहल प्रीतम कलम बखानए नारीक प्रण श्रम दुनियाँदारी छी... हम नारी...।। 6।। हमरा के मारलक गै? माऽए गै..! हमरा के मारलक गै?? तोहर कोइखक भ्रूण स्वरूपे विधना जे अनलक गै... माऽए गै हमरा के मारलक... कएलेँ शौक-सेहन्ताक खेला बनलौं पापक हमहीं झमेला दुन्नू पराणीक दुर्मति कोप सँ गरभ जँचा हमरे सँ डेरेला सुन निष्ठुर दम्पति सम्भोगी दुर्र! कोन पापी जँचलक गै... माऽए गै हमरा के मारलक गै...।। 1।। तों जेना अएलेँ हमहूँ अबितौं तोरे जकाँ एहि लोककेँ देखितौं ब्रह्माण्डकेँ सृष्टिक साधन भऽ हमहूँ जुग-जग गुण यश पबितौं बेटी-बुझि उपचार बहन्ने प्राण केँ छिनलक गैऽऽ माऽए गै... हमरा के मारलक गै...।। 2।। देख दिन-दिन हम घटल जाइ छी दहेज तराजूपर जोखाइ छी। चतुर बधिक बाजहु नहि दैए अच्छैति औरदे हम जरि जाइ छी काँचे उमेरमे दण्ड समाने कोना कऽ बियाहलक गै माऽए गै हमरा के मालक गै...।। 3।। समझ-सिखावए देश-सुशासन लोक पूत शुभचिन्तक भाषण कहै प्रीतम सम्हरू जगवासी कन्याक अस्तित्त्व अछि मरणासन्न ठोहि पारैए गर्भक बेटी विधना पठौलक गै माऽए गै हमरा के...।। 4।। ओ, के छथिन्ह? ओ, के छथिन्ह कने हमरो चिन्हऽ तँ दियऽ ओ, किछु कहि रहल छथि से हमरो सुनऽ तँ दियऽ हुनकर गप्प दू टप्पी शान्तचित्तसँ गुनऽ तँ दियऽ ओ के छथिन्ह...।। 0।। हुनक मोनमे किछु भड़ाँस छन्हि एहि लोकक संस्कारसँ जे, गौंआँ-समाज, घर-परिवार वा रिश्तेदार संगे सदिखन धर्म सम्प्रदाय स्वार्थ ईर्ष्या द्वेष आओर विषकुम्भी कलश लऽ जीवन यज्ञकेँ विष्षाह बनाबऽमे अगुआ बनैए तैं- हुनक भड़ाँस अनुचित नहि तैं हिनक सहयोगमे अलच्छा लोक सभकेँ बिढ़नी-बिसपिपरी जकाँ हमरो कनेँ बीन्हऽ दियऽ ओ, के छथिन्ह हमरो चिन्ह दियऽ... ओ, के छथिन्ह...।। 1।। लागैए जेना, हुनका मोनमे बहुतो संकल्प अछि जे, आगत भविष्यक सार्थक विकल्प अछि हुनकर योजनामे सेवा.... स्नेह... सहयोग... वा सहिष्णुताक... कर्मोन्मुखी.... समर्पण भाव अछि आवऽ वाला पीढ़ीक लेल प्रागैतिहासिक अयनामे गुणात्मक कार्य कौशलक प्रतिबिम्ब अछि तैं, फुसराहैट जुनि करू आ एकाग्र होऊ हुनकर दूटप्पीपर हे यौ, देखू नेँ हमरो मोन उमकैत अछि जे, च्योट्टहिं हुनकर अनुगामी बनि जाइ हुनके जकाँ... एहि देश समाजक संवेदना औ तृषा हेतु संजीवनी रस तत्त्वकेँ रोगियाहा शासक प्रशासक वा चुप्पा लोकक लेल त्रासदीक तृषा रसकेँ कलजुगहा-कौलहापर रिन्हऽ दियऽ ओ, के छथिन्ह कने हमरो चिन्हऽ दियऽ...।। ओ, के छथिन्ह...।। 2।। सुत्थड़ समाज पुरखा धरम माऽए-बापक पुन यौ सुत्थर समाज देल आशिष सगुन यौ पुरजन-परिजन चेतबए त्यागु अवगुन यौ पुरखा धरम...।। 0।। ब्रह्मा विधाता केर रचना-विधान सभ सृष्टि-प्रकृति संग युगचक्र काल नभ हमरे जकाँ आओर जीव जन्तु जन्मल ब्रह्माण्डक घटनासँ तारा-ग्रह हलचल धरती-आकाश देलक रीत-गीत धुन यौ सुत्थड़ समाज देल आशिष सगुन यौ पुरखा धरम...।। 1।। जेहन समाज भेटल तहने हम बनलौं पितृज अग्रज गुण करमो केँ छनलौं टोलिया-पड़ोसियासँ लुइर-बुइध जनलौं गौंआँ-संगतिया संग धार-बाँध फनलौं गुरु ज्ञानी हित लग बनौलक निपुण यौ सुत्थड़ समाज देल आशिष सगुन यौ पुरखा धरम...।। 2।। आजुक युग सनकी सँ चिन्ता बढ़बैए सुख-शौक नवतुर मन दुविधा चढ़बैए दानव दहेज केर बेटी घटवैए दारू-तम्बाकू मीत-रोग पटवैए तैँ प्रीतम बेकल भऽ करए गुनधुन यौ सुत्थड़ समाज देल आशिष सगुन यौ पुरखा धरम...।। 3।। सुनबै-गुनबै कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै नीक बेजायकेँ कत्तेक गुनबै देश-राज-गृह लोक लेल केहन नेता-मुखिया सरपंच चुनबै कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै...।। 0।। गाम-शहर-नर-नारीक खिस्सा एखन अजब-गजब भऽ गेल अच्छे दिन औ सुशासन नारा जीएसटीक कोनटा धऽ लेल इसकुलिया या हाकिम-मास्टर सभ बनियौटी ऑफिस रमि गेल शिक्षा-समिति संगवे संगे हिस्सा बखरा कए जमि गेल कत्तेक दिन धरि शिक्षाक अंचिया शमशानक घाटहुँ मे खुनबै कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै।। 1।। जनप्रतिनिधि भऽ अजगुत लीला, बलात्कार कए नाम करय मीडिया-कर्मी कलम दूतकेँ, गरियैवितेँ बदनाम करय संगहि गजब करै नव तुरिया बूढ़ पुरानकेँ दुत्कारए नव स्टाइलसँ छौंड़ा-छौंड़ी कलजुग-कपटसँ फुफकारए मोबाइल-इयर फोनक चलती बमकैत जीजे-डिस्को सुनबै कहु श्री मन की पढ़बै-सुनबै...।। 2।। एक्खन ज्ञान-विज्ञान लड़ैए थ्योरीक चोर बढ़ए दिन-दिन पैरवी-पाइसँ प्रैक्टिकल हँसए देखू परीक्षा केर दुर्दिन कम्प्यूटर-इन्टरनेट उमकए स्किलइण्डियाक भ्यू-दुरबिन अलक्ष्ये नवतुर चौंकैए पूब-पच्छिम-उत्तर दक्षिण तैं सम्हरैत-सम्हारू युगकेँ प्रलय काल आँइखेटा मुनबै कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै...।। 3।। आब सुनू बुधियार श्री मैथिल, लोककेँ बढ़ल-चढ़ल अदिन्ता मिथिलाक शीलहरण भेल दिन-दिन, कानए युगक नियन्ता पुरखौंती-संस्कृति-मन्हुआएल, सनकल शौख-सेहन्ता मिथिला राज्यक सपना सिसकए ठोहि पारैए बेगरता आश अगोड़ने प्रीतम हकमए बज्जर खेतमे की सभ बुनबै कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै...।। 4।। बुझवाक चाही एक्खन देखल गाम-गाम शहर-बजारो सभठाम मनुक्ख सभ अपन ऐश्वर्य देखबक फेरमे भेल जा रहल अछि क्रूर उद्याम... ओकरा सभकेँ सनकल संकल्प अछि, संगे, बहुत रास विकल्प अछि, ताहि लेल किछु सोचवाक चाही, बुझनुककेँ तँ ई, बेसी बुझवाक चाही... से.., हमरो सभकेँ बुझवाक चाही... बुझनुककेँ तँ...। सहठुल सुपातर सभकेँ सेाहनगर बैसार चाही बैसारक जग्गहपर ज्ञान औ इमानक पैसार चाही एहने सोचकेँ अँगने दुअरे पोसवाक चाही बुझनुकजन केँ तँ ई भाव पोसवाक चाही। से हमरो सभकेँ सोचवाक चाही।। बूढ़क अनुभव गुम्म नहि होअए नवतुरिया बेदम्म नहिं होअए नारी-सशक्ति वृद्धि वहन्ने... पुरखौंती संस्कार नहि रोअए... नव घर उठ्ठए तँ किए खस्सए... पुरना घर देखि नवतुर हँस्सए... तैं जुग-जुगकेँ बाट-घाटपर... सम्हरि-सम्हरि कऽ चलबाक चाही... से हमरो सभकेँ ई बुझवाक चाही... बहुजन हिताय वा सुखाय संग सुख-शान्तिकेँ उपाय चाही... छोटका-बड़का भावकेँ त्यागैत सुच्चा मैथिल समुदाय चाही... कहए ‘प्रीतम’ कहियो किए! गाम-घारमे आइ! चाही... से हमरा सभकेँ ई बुझवाक चाही।। कत्तऽ तकै छी? धाकर सन-सन मैथिल बाबू ढहैक सुनितेँ हुम्मैर ढकै छी जुगक कलम अँड़पेना दैछ तेँ दुलकैत-दौड़ैत बैसि थकै छी गाम छोड़ि परदेशी बनितेँ अपनेहिं मरजी खूब अँकै छी तेँ मिथिला आब सोर पाड़ैए एत्तहु देखू ने कत्तऽ तकै छी।। एतहुँ देखू ने... कतऽ तकै छी।। 0।। जानल-मानल-पुरखा-पिहानी कहए गरोसैत दादी-नानी मूड़ैत-ममहर-जूड़ैत बपहर खेलैत-कुदैत हँसल जुआनी मुदा बथाएल-मिथिला-महिमा भूत खेलि सभ झूठ बकै छी तेँ मिथिला..! सोर पाड़ैए...।। 1।। वैह देसिल बयना अवहट्टा बनल मैथिली भाषा-मिट्ठा साहित्य व्याकरणअदौसँ पढ़ैत भेल मनीषी ज्ञानक पट्ठा देव भाषा संस्कृतो थुड़ाएल मैथिलीश बाजैत खूब ठकै छी तेँ मिथिला ‘आब सोर पड़ैए’ ...।। 2।। एक्खन बुझनुकहो हकमैए अन्वेषक बनि कच्छड़ कटैए अप्पन मैथिली टूअर भेल अछि जाहि लेल किए नैँ माइल फटैए कहैछ प्रीतम सुनू मैथिल जन कोन सेहन्ताक घूर पकै छी तेँ मिथिला...। आब सोर पाड़ैए...।। 3।। आद्यार्चना नवरात्र जगल, धूप-दीप सजल मॉं जगदम्बे सुर गीत भजल विजया दशमीक दशद्वार खुजल नर-नारीक हियहरषित बिहुँसल। नवरात्र जगल धूप-दीप सजल....। जुग धर्म अधर्मक द्वन्द्व डगर जगवासी डरय सन्तान नगर। कबुला-पाती मनसा रोपल जगतारिणी दर भगतन कुहसल विजया दशमीक दशद्वार खुजल नवरात्र जगल...। सदिखन कृपाशिष दैत रहू जीवन सदगतिकेँ सम्हारि अहूँ सृष्टिक सन्तान पुकारि रहल असरा केर पोटरी खोलि कहल विजयादशमीक दशद्वार खुजल नवरात्र जगल...। दिवसास्तार्चना अम्बाक आभा पसरल सगरो भगत श्री ज्योति जलावि रहए..। तैयो कुमतिजन अछि अन्हराएल कलपि सुता-सुत गावि कहए..। अम्बाक आभा पसरल सगरो...। निशि दिन सुरगण महिमा बखानए शूलेश्वरी माऽए करए भ्रमण असुरनिकन्दिनी कात्यायिनीकेँ यश गाथा करए जगत श्रमण शुम्भ-निशुम्भ महिषासुर मर्दिनी जया विजया माऽए भावि रहए...। अम्बाकआभा पसरल सगरो...। छन्दोक्ति : नव दुर्गा माऽए नाम जेकर अछि, पार कहाँ केओ पाओल पाप विनाशिनी माऽए जगतारिणी, अद्भुत् रूप रचाओल शैलसुता ओ स्कन्द माता, माऽए चन्द्र घण्टा कहओली ब्रह्मचारिणी, कुष्माण्डा औ सिद्धिदात्री यश पओली कात्यायिनी कालरात्रि भऽ मैया, महागौरी जग भावए विश्व धारिणी आदि शक्तिनी,तीनहुँ लोक बचावए सिंहवाहिनी-वैष्णोदेवी सन्तति हृदय धएली बरिख-बरिख कृपा आशिष संग विजयादशमी लऽ अएली धृत-वाती-कर्पूर निराजन सुमन समर्पण भगत करए कंचन थाल सजल मधुव्यंजन भोग लगा व्रती माथ धरए लोक शोक संग कुहुसए प्रीतम करूणालाप सुनावि रहए अम्बाक आभा पसरल सगरो...। सांध्यार्चना दोहालाप : अनेक अनाथ सनाथहुँ होवए भगवती जागरण भक्तिसँ..। शोक मेटाएब अम्बे शरणमे विनती करए मां शक्तिसँ..।। केओ पूजए केओ भोग लगावए केओ संकल्पकेँ दोहरावए..। केओ पुष्पांजली मधुमेवा दए केओ सुदीपसँ गोहरावए..।। कोरस (गुंजन) : श्री मातु शरणम्.., श्री अम्बे शरणम्…।। माऽए केर मन्दिरमे ज्योति जराएब...। सॉंझ दऽ मंगल दीप सजाएब...। माऽए केर....। अड़हुल.. संझा.. चम्पा.. चमेली जगदम्बा पग फूल चढ़ाएब..। माऽए केर...। मनोकामना सन्तान हृदयमे रहियौ सहाय माऽए कोप प्रलयमे..। धरम-करम कलियुग छलिया संग तमस-तामस केर युद्ध विजयमे... परिऽक्रमारत.. व्रती नर-नारी सभ मिलि-विजया ध्वज फहराएब..। माऽए केर मन्दिरमे.. ज्योत जराएब...। छन्दालाप : कूदए कवित्त छन्द.. सनकए सवैया..। जय अम्बे.. सुर-भगत.. जय हो गवैया।। आऽऽऽ लाली लालेँ लालक मुखसँ.. मगन अछि माऽएक लाल..। भूषण-कवि विद्यापति-वर संग.. लखए-बिहारी लाल..।। छन्छ : जय अम्बे जय हो लाल.. माऽए केर चुनर लाल भक्तक मृदंग-झाल सुरताल झमके..। ब्रह्माणी ज्ञान लाल, वैष्णोवरदान लाल गौरी-गणेश लाल बाल-चान बमके..।। दिशा-दिग्पाल लाल.. अम्बर भूचाल लाल महिषासुर रम्भ लाल, काल भाल धमके..। दानव गुमान लाल, मंगला-मुस्कान लाल कात्यायिनी कत्ता लाल, रक्त लाल टपके..।। सिंहक नाखून लाल, राक्षस केर खून लाल श्यामाकाली मुँह लाल,लाल जीभ लपके..। निशा-श्मशान लाल, तांत्रिक मशान लाल भैरव-श्वान जीभ लाल, भूंक काल झपके..। पूजा केर फूल लाल, संझा अड़हूल लाल गेन्दा-गुलाब लाल, धुजा लाल चमके..।। दुर्गाक त्रिशूल लाल.. कलियुग कबूल लाल प्रीतम बातुल लाल सुर-ताल रमके..।। अन्तरा : माऽए मंगला.. दरसन दियऽ अनुखन असरा लगौने रहलौं सदिखन..। अम्बेक आगम दिव्य ज्योत संग सिंहवाहिनी-गोहरावै भक्तन..।। माऽए आशिष लऽ.. कहए सुत प्रीतम संकल्पित सिंह संग खेलाएब..। माऽए केर मन्दिरमे.. ज्योत जराएब...।। निशार्चना दोहालाप : शुभनवरात्रक विजयादशमी.. पर्व मनोरम् जग बिहुँसल। जगतारिणी माऽएक लीला महिमा गामेगाम त्योहार सजल।। कोरस : आऽऽऽ... ऊँ द्यौ.. दुर्गे माऽए काली..। अहाँक लीला अजब.. अम्बे शेरावाली..।। ऊँ द्यौ... दुर्गे माऽए काली...।। हे माऽए खप्पड़वाली जय-जय जोतावाली..। ऊँ द्यौ...। अन्तरा : दानव कोपसँ देवता कानल इन्द्र डरल-घबराएल। असुर रम्भ महिषासुर बल केँ कोपसँ सुर थर्राएल..।। तप कए महिषासुर ब्रह्मासँ ‘अमरत्त्वक’ वर मॉंगल। ‘एवमस्तु’वर देबऽए सँ पहिले, ब्रह्माक मानस जागल।। बेटा सृष्टिक नियमसँ ई कोना हेतै..? जे केओ जन्म लेतै.. ओ तँ मरबे करतै..। तखिने अम्बरसँ देव-किन्नर.. मारए लागल ताली..।। 1।। ऊँ द्यौ...।। अन्तरा : ब्रह्मा वचन सुनितेँ महिषासुर.. निजमन सोच बढ़ौलक। ‘कन्याकुमारी’ मारए हमरा.. छल मन बुइध बतौलक।। तब चतुरानन कहल ‘तथास्तु’ गगन पुष्प बरसौलक। सुरगण-आदि शक्ति समेटैत शर्व शक्ति निरमौलक दरसए सुरलोक सीमा-योगमाया छाया। दिव्य-शक्ति दरसए.. जगदम्बेश्री माया।। दैव दुन्दुभि ध्वनि गुंजन, संग-प्रगटल शेरावाली...। ऊँ द्यौ...।। 2।। छव्यालाप : शिव शक्ति ‘मुँह’विषणु शक्ति ‘कर’ ब्रह्माशक्तिसँ बनल चरण। धर्मराज केर शक्ति केश भेल चन्द्रमाक शक्ति द्वै स्तन।। पृथ्वीक शक्ति रचै नितम्ब द्वै जंघा रचलनि शक्ति वरुण।। वसुकै शक्ति हस्तांगुली औ पादांगुली देल शाक्ति अरूण।। संध्याक शक्ति देल दुन्नु भौं वायुदेव द्वै रचल श्रवण। दाँत बनल प्रजापतिक शक्तिसँ अग्नि-शक्ति-त्रिनेत्रनयन..।। आयुधालाप : ब्रह्मा देलनि कमण्डल माऽए केर विष्णु चक्र प्रदान केलनि। शंकर देलनि त्रिशूल पिनाकी अग्नि शक्तिवाण देलनि।। शंख औ पाश वरुणजी देलनि इन्द्रहु वज्र दऽ ध्यान केलनि। काल दण्ड यमराजो देलनि पर्वत श्रृंखला सिंह देलनि।। रवि, रश्मि दए रोम कूपमे ज्योति शक्तिनी माऽए दरसल। मांगलिक मणिमाला प्रजापति दऽ भक्त आँजुर माऽए वर परसल।। अम्बुज-रत्न श्री कुडल-कंगन हँसुली नुपूरसँ माऽए सजल। पृथ्वीक अंऊँठी-हार पहिर माऽए ‘रण-चण्डी’ हुँकार भरल।। अन्तरा : रणमे राक्षस सबल माऽएसँ युद्धो प्रबल महिषासुर जेँ मरल, माऽए केर जयगान बढ़ल।। रणमे राक्षस विह्वल माऽएसँ युद्धो प्रबल महिषासुर जेँ मरल, माऽए केर जयगान बढ़ल।। माऽए विजयाक यश गावए प्रीतम जय-जय शेरावाली...। ऊँ धै...।। 3।। विद्यापति स्मृति विद्यापति पर्वागत श्रीमन दएलहुँ दर्शन तँ कुशल कहू...। मिथिला आशिष दए हुकरि रहल जुनि स्वारथ कोपमे घुसल रहू...।। दएलहुँ दर्शनसँ तँ...।। 0।। तिरहुत मिथिलांचल अपनेहिकेँ बाटो जोहए मन्हुआएल जकाँ...। संस्कार गिरल-लोक-लाज मरल डाही देखए कन्हुआएल जकाँ...।। कुटनी-लुटनी सभ दुइस रहल बुधियार छी तैं सभ दुसल रहू...। मिथिला आशिष दए हुकरि रहल...।। 0।। गौंआँरी मितौरीक खटपट्टी बाबाक खिस्सा खिसिआएल छै। बेसुध अछि पंचो-परमेसर जँहि-तँहि लेरहल घिसियाएल छै, रूसना विधना देल कोप करम अभिशापित भऽ किएँ रूसल रहू...। मिथिला आशिष दए हुकरि रहल...।। 0।। हथटुट्टा कुरसी हकैम कहए अबियौ कनि गाम अहाँ बौआ हेहरूघर दरबज्जा हुचकए शहरी सुख नाचए झमकौआ सुख रोगी पूत सेहन्तेसँ बड़बेस नगरमे हुस्सल रहूँ मिथिला आशिष दए हुकरि रहल...।। 0।। डीह-डाबर माटिसँ नेह करू कहियो-कहियो बनु घरमुहाँ पोखैर गाछी देव थान कहए पावैन लाथे सेहो आऊ अहाँ प्रीतम कर जोड़ए सुनू मैथिल शुभकाल अछि तैं नहि हुस्सल रहू मिथिला आशिष दए हुकरि रहल...।। 0।। वरद वसन्त वरद वसन्त सुमन्त सुहावन स्वागत मृदुकोकिल स्वरकेँ विहुँसल कुसुम सरस ऋृतु भावन मुदित कएल भू अम्बरकेँ वरद वसन्त, सुमन्त सुहावन...।। 0।। धन्य वसन्त अनन्त दिगन्तक व्यग्र बुलन्त महन्थक रूपेँ सुमनक सौरभ, ललित पलाशक मधुकर मधुप जयन्त सरूपेँ श्रुति सुर सरगम राग विरागहिं पिक पंचम सुर पिऊपिऊ गावए गीत-संगीत औ थाटक बाटहिं काफी वसन्त बहार सुहावए सुन्दरि छमकावए पग पैजनि फागुन सुमिरए ईश्वर केँ विहुँसल कुसुम... वरद वसन्त...।। 1।। मदनोत्सव मृदंग मंजीरन डम्फक संग नचए रंगरसिया रति पति मदनक पंचवाण संग कामोन्वेषी टेरय बँसिया युगश्री कविजन जेहि वसन्तक काव्याधार सँ स्नात भएल विद्यापति ज्योतिरीश्वर संगहि कालिदास ऋृतु रीत धएल आजु अहर्निश प्रीतम अरचए मिथिला मैथिली सुर गहवरकेँ बिहुँसल कुसुम...। वरद वसन्त...।। 2।। सरस वसन्त बौरए वसन्त कन्त करय बरजोरी फनकैत फागुन धुन-गावैए होरी।। रंग-विरंग अंग-ओढ़नी-ऑंचर संग उमकए उमंग तंग-भावैए गोरी।। बौरए....। युगबोध स्नेहक संगतिया संगोरए स्वारथ मितौरीकेँ सद्भाव तोड़ए उत्सव उड़ेहि लोक-लाज देह ओड़ए डम्फा-जोगीरो आब जनमन झकोरए सनकए मंजीर-ढोल करए सीना-जोरी फनकैत फागुन धुन... बौरए वसन्त कन्त...।। 1।। कवित्त : ऋृतुराज वसन्त और मस्त पवन फागुन मधु मासक रंग रमल कामिनी-भामिनी-मदनोत्सव रत होलीक हुड़दंग केर संग जमल तरुणीक जौवन तरुकेँ पल्लव नव ललित शुभ्र रक्तिम-हरियर कलशल बैगनी अलसी-अड़हर तोड़ी-सरिसो पीयर-उज्जर गहुमो केर शीष आशीष भरल सुखदा-वरदा धरती बिहुँसल सतरंगी छटा जँहि-तँहि हलचल खग दल कलरव जगती निहुँछल पपिहाक पंचम सुरतान सजल संगीत थाट हिय ‘काफी’ हँसल मृदुराग ‘वसन्त-बहार’ नवल सुरभित गायन हिय मुग्ध बसल आऽऽऽ... रंग-विरंग अंग, ओढ़नी आँचर संग...। बौरए वसन्त कन्त...। आहत अबीर कएल बे रंग-कुरंग सँ सीखल पहुनाई पवन रतिपति अनंगसँ परसल पकवान रस पूछए प्रसंगसँ दुबकए प्रीतम किए, होलीक हुड़दंगसँ बेसुर मनुक्खोकेँ रंग संग...। गीतल मिथिला उगना-विद्यापति महिमासँ सरस सजाएल अछि मिथिला। गीत गोसाओनिक चढ़ए चढ़ौना सुरभि समाएल निज मिथिला।। मैथिलपूत जँ छी संकल्पित आऊ सजाऊ पुनर्निज मिथिला। मिथिलांगन भू लोक न्योतैए रहत कियए माऽए शिथिला-मिथिला।। जेक्कर ऐतिहासिक यश पसरल हजार बरिखसँ उमकैत मिथिला। तेक्कर सन्तान मैथिलीश भाखए तँए अछि हुचकैत-ठुनकैत मिथिला।। कहैयऽ ई मिथिला... गहैयऽ ई मिथिला... जुगक भार सदिखन सहैयऽ ई मिथिला... कुडाहीकेँ डाहेँ, डहैयऽ ई मिथिला... कतेक नारी करुणा- कहैयऽ ई मिथिला... मनुक्ख वेदना संग- बहैयऽ ई मिथिला... सिसकि नोरेँ-झोरेँ- दहैयऽ ई मिथिला... तैयो दैत आशिष- रहैयऽ ई मिथिला... पोखैर थान गाछी- छँहैयऽ ई मिथिला... कोइलि कागा सुग्गा-चहैयऽ ई मिथिला... नदी-खेत शीषो- लहैयऽ ई मिथिला... प्रीतम आश गीतल- गवैयऽ महैयऽ ई मिथिला...। गीतल आब अपनो मोन दैए उपराग कहियो-कहियो। इहलोक हाक पारए करू त्याग कहियो-कहियो। विषधर औ अजगरो सभ दुबकल छै गाम घरमे। 2। निसबद्ध सूइत कएलौं रतिजाग कहियो-कहियो।। निकहा विचार एक्खन सुनए कहाँ केओ चाहए- 2 बूढ़ो-पुरान सुनबए खटराग कहियो-कहियो।। नवतुर कुसंगतिसँ बेरथे बमैक बौड़ए- 2 आगत भविष्य आंकए दुरभाग कहियो-कहियो।। बुधियारो गप्प गढ़ए गोष्ठी सभामे अगबे- 2 स्वारथ सेहन्ते समटए सिरपाग कहियो-कहियो।। मिथिला सपूत सम्हरू एखनो सुहरदे भावे- 2 तखने सुनाओत प्रीतम अनुराग कहियो-कहियो। गौंआँ-गीतल गौंआँ समाज बाजए कलजुग बेकार एलै। पुरखा सभहक कहबी सभटा देखार भेलै।। गौंआँ-समाज... समाज... देवता बनैत सभ केओ मनुक्खोसँ होइए ऊपर। पूजा नमाज देखबए निकहा विचार गेलै। पुरखा... गौंआँ...। जहिँ-तहिँ देखै छी सनकी, मम्मत सिनेह कानए बिन बातो-के बतंगर अँगना-दुआर खेलै पुरखा... गौंआँ...। नेतघट्टू नेता बनि कऽ जनताकेँ दैए धोखा करबए ठकुरसोहाती सप्पत उचार गेलै पुरखा... गौंआँ...। सरकारो भऽ बेमातर दरखासो नहि पढ़ैए घुसहा नदीमे उबडुब प्रीतम पुकार हेलै...। पुरखा... गौंआँ...। हाय हौ हितलग सौंसे गाम हितारे तैयो खेत अफारे बेर-कुबेरक हित लग मीता सभटा भेल देखारे सौंसे गाम हितारे...।। तहिना मिथिलाक बुझनुक बाबू...। ऐंठैत जुग दुत्कारे...। सौंसे गाम हितारे...।। 0।। एक तँ धरती दिन-दिन रूसए दोसर दैबो करए कमाल ताहुसँ बढ़ि कऽ नीति-धरम सभ मनुक्खक जिनगी कएल बेहाल भूकम्प रौदी दाही संगे, बेढ़ब थाल खिचाड़े...। सौंसे गाम हितारे...।। तहिना मिथिलाक...।। 1।। टोला-टपड़ा भेल झंझटिया, जेना मरघटिया लागैए गाम उजड़िते शहर पड़ाइए, पढुओ गामसँ भागैए बचल-खुचल हितलग्गुओ सदिखन, उपनेहि जूइत सुतारे...। सौंसे गाम हितारे...। तहिना मिथिलाक...।। 2।। ज्ञान-विज्ञानक अजबे सनकी नव उपक्रम संग ऐंठैए मशीनक मोजर-मनुक्खसँ बेसी लुइर-बुइध सभ बैठैए सोगे-पित्ते-सोचए प्रीतम आलसी जनम बेकारे...। सौंसे गाम हितारे...। तहिना मिथिलाक...।। 3।। सीखऽ तँऽ दियऽ सुकीर्त्तिक हकारसँ हकमैत अएलहुँ सिनेह प्रसादोकेँ चीखऽ तँऽ दियऽ सदतिसँ जनल अछि अहाँ कीर्त्ति यशकेँ वैहेए आचरण हमरो सीखऽ तँऽ दियऽ कनेक ठाढ़ होइयौ औ छल छद्म संगे करम-ज्ञान-गुण कनियो लिखऽ तँऽ दियऽ अपन आचरण हमरो सीखऽ तँऽ दियऽ...।। 0।। अहाँक सुख सदिखन सिहौलक-सिखौलक ताही लेल हमहूँ तँऽ पाछू लागल छी अहाँ दर्प गौरव सँ खाहे केओ जरए मुदा हम सेहन्ता केर संगे जागल छी कोना दर्प ऐश्वर्य एतेक जल्दी भेटल तेकर पेंच-बुइधोकेँ ठीकऽ तँऽ दीयऽ सदतिसँ जानल अछि अहाँ कीर्ति यशकेँ वैहेए आचरण हमरो सीखऽ तँऽ दियऽ...।। 1।। अहाँ सभ तरहेँ सँ सुविधा भोगै छी हमर कछमछीकेँ अहूँ किछियो बूझू अहाँक बाल-बच्चा सनक हमरो नेनाक भवतव ममत स्नेह आशिष दऽ जूझू।। नगर गाम बाजय अहूँ होइ छी बिकरी तैं हमरो खुशामद लऽ बिकऽ तँ दियऽ सदतिसँ जनल अछि अहाँ कीर्त्ति यशकेँ वैहेए आचरण हमरो सिखऽ तँ दियऽ...।। 2।। ईर घाट, वीर घाट आजुक समाज केर अजबे अछि ठाठ बाट कखनो केओ ईर घाट कखनो केओ वीर घाट कमाल बवाल करै लोकतंत्र राज-पाट कखनो केओ...।। 0।। शिक्षा-संस्कार सदति लट-पट करैए गोबर गणेश सभ अट-पट करैए जनी पुरुख सेहो गुन-धुन करैए नवतुर बाऊर होइतेँ परिजन डँटैए इरखे आन्हर लोक मरैए हाट-बाट कखनो केओ...।। 0।। गणतंत्रक नारा लऽ सनकैए सत्ता संसद विधानक बखान अलबत्ता शासन विचौलियाउड़ाहैए खत्ता सामाजिक स्नेहभेल दिन-दिन निपत्ता हाकिम-हुकुम सेहो मारए धोबिया पाट कखनो केओ...।। 0।। हँसनी-खेलनी अँगना घरसँ हेराएल सहठुल सुपातर सभ दु:खसँ घेराएल अगत्तीक ढीठपनसँ बुइधो पड़ाएल हेत्तै की..? जुग-जगमे जनमति डेराएल सभतरि देखए प्रीतम दुरकलह मार-काट कखनो केओ...।। 0।। खगता-बेगरता जीबै छी! तैं सुख-शान्तिकेँ, गाम-घरमे खगता अछि। माऽए-बाप संगे, नेना-भुटकाक, सुख सौभाग्य सेहन्ता अछि। दुर्योगे दु:ख दूर करऽमे, बहुतो रास बेगरता अछि। हमरेटा नहिं हमरे जकाँ, सभकेँ एहन बेगरता अछि।। पहिलुक गाम समाजमे सदिखन लोक लेहाज औ ममत रहल धरम-करम सभटा छल सुत्थड़ कुटुम सम्बन्धीक स्नेह सजल मुदा एखन तँ अजबे हाल अछि अपस्याँत करता-धरता अछि।। दुर्योगे दु:ख...। हमरेटा नहिं...।। 0।। पैंच उधार पहिलुका जकाँ कहाँ कत्तहु आब भेटैए गौरबे-आन्हर मीत-पड़ोसी दु:ख-दुविधा कहाँ मेटैए तैं कलजुगहा हाल सँ कलपैत टूटल मोनक छगुन्ता अछि। दुर्योगे दु:ख...। हमरेटा नहिं...।। 0।। आजुक बूढ़-पुरान अवाक्के नवतुरियाक सनकी देखए ओक्कर माऽए बाप सेहो गुम्मे पुरखौंती प्रण फेंकैए केहुना जिनगी खेपए प्रीतम दैबेटा दु:खहर्त्ता अछि दुर्योगे दु:ख...। हमरेटा नहिं...।। 0।। नीक-बेजाय जोड़ल हाथ अगोरल आशा, श्री मन आगत ध्यान देबै..। एखनुक युगवासी करतब सँ, श्रोता-पाठक ज्ञान लेबै...।। हम कलजुगहा गप्प कहै छी सुनियौ बुझनुक लोक सदिखन दाँत चियारैत कलजुग बाँटए लोक मे शोक बुइधक बधिया लोके करैए दैए दैवक दोख बुझू तँ की नीक भेलैए कहू तँ की ठीक भेलैए हम कलजुगहा...।। 0।। दिन-दिन अजगुत लीला एक्खन गाम-गाम मे बिहुँसैए पोथी-पतरा वेद-ग्रंथ सभ बूढ़-पुरान संग कुहुँसैए ममहर-बपहर सभतरि देखल जनीपुरुख सभ बहसैए नव घर उठए- पुरनका खस्सए संग सेहन्ता रबसैए नेकी धरम-करम-मरणासन्न बकुआएल सुर लोक बुझू तँ की...। हम कलजुगहा...।। 1।। एक्खन दारू दहेजक चर्चा जन-मनमे अछि पसरि रहल वाह-वाह नीतिश कहैत नारी आन्दोलन दिशि ससरि रहल खड़रा बढ़नी लैत बहुरियो कहै दरुपीबा रहियौ हटल सम्हरत धिया-पूता जिनगी घर सुख-शान्ति लेल रहू अटल नशा मुक्ति अभियानमे सभकेयो दौड़ियौ पीठियाठोक...। बुझू तँ की...। हम कलजुगहा...।। 2।। शासन-मीडियो खूब कराबए कलमदूत सँ ठकुर सोहाती नेता कविकाठी पिछलग्गू छपबए अप्पन दम्भक पाँती कलमकार प्रीतम रचना अछि साँच संवदिया बनि उत्पाती अहिना लेखनी चलिते रहतै चाहे केकरो फाटौ छाती गाम-घर जनमंच सँ साँचक गप्प कहब निद्धोख बुझू तँ की...। हम कलजुगहा...।। 3।। हम के? और की? हम के? की छलहुँ आओर की की भेलहुँ आब की होयब किछियो सुझाइए कहाँ। कोप धरती गगन, चान सुरुजो किरण प्रार्थना औ भजन, किछु बुझाइए कहाँ।। आब की होयब किछियो सुझाइए कहाँ...।। 0।। इष्ट वा शिष्ट विशिष्ट केँ फेरमे, राति-दिन सभ अपशिष्ट होइते गेलौं ज्ञान-विज्ञान संज्ञानसँ घूमिते, क्रूर कालकेँ गाल प्रविष्ट भेलौं सभ अपने बेगरतेसँ अन्हराय केँ दोष दोसराकेँ दए कहथि जानए जहाँ कोप धरती गगन.., प्रार्थना औ भजन...।। 1।। लोक सुधरल कि बिगड़ल से कहि नञि सकी दिनो-दिन गाम उजड़ल गिरल सन लगल कानि कहए जनम डीह सापूत कत्तय? स्वार्थ सेजक शयनसँ ओ नहिएँ जगल सभ तरहेँ प्रदूषित धरांगन एखन ई करुण भाव प्रीतमक बुझाबू अहाँ कोप धरती गगन.., प्रार्थना औ भजन...।। 2।। केकरो केकरो माऽए केर मम्मत दूधक कर्जा मोन रहैए केकरो-केकरो मिथिला-महिमा भाषा बोली मोन रहैए केकरो-केकरो जनक जागवल्क्य कपिल कणादक प्रतिभा जोहए केकरो-केकरो सीता अहिल्या गार्गी मैत्रेयीक अभिधा मोहए केकरो-केकरो उगना महादेव विद्यापतिकेँ कृपा मोहए केकरो-केकरो भगवती कालीदास सुव्रतकेँ विद्या जोहए केकरो-केकरो भारती-भामती-लखिमारानीक प्रज्ञा टोहए केकरो-केकरो मण्डन-वाचस्पति-अयाची पुरखा सोहए केकरो-केकरो कॉमरेड भोगेन्द्र-चतुराननकेँ सपना जोहए केकरो-केकरो ताराकान्त-चुनचुन-बैजू सन क्रान्ति सोहए केकरो-केकरो ममहर-बपहर संगतुरियासँ प्रेम रहैए केकरो-केकरो नवतुर-मीताक मोनमे कुशल क्षेम रहैए केकरो-केकरो तहिना मनुक्खोक जनमडीहसँ नेह रहैए केकरो-केकरो ओहि माँटि केर भाव गेह संग देह रहैए केकरो-केकरो मिथिला-मैथिली खातिर सुच्चा कर्म रहैए केकरो-केकरो मैथिल श्रीमन यश कीर्त्ति केर धर्म रहैए केकरो-केकरो देसिल बयना सभजन मिठ्ठाक मर्म रहैए केकरो-केकरो मैथिलीश बजैत प्रीतम संगे शर्म रहैए केकरो-केकरो। जय गंगाजल स्वर्गक सलिला शिवजटासँ आ, भारत भू सहेजल गंगाजल..। कहबथि भगीरथि गंगा जुग-जुग, पुण्या स्नाता वैह गंगाजल..।। हिमगिरि गंगोत्री वन उपवन, सुखदा श्रोतस्विनी गंगाजल..। जलचर-थलचर-खेचर जीवन, केर पूत पयस्विनी गंगाजल..। प्राणी केर अमृत धार बनल, खाद्यान्नो उगावथि गंगाजल..। आस्था केर आशा घट भरि-भरि, आस्तिको जोगावथि गंगाजल।। धर्मातुर नर-नारी भक्तन केर पूजन साधन गंगाजल।। पतितोद्घारिणी जगमातु बनल वसुधांगन सुमिरन गंगाजल।। युग सदी बितावैत ममत लूटा आब हुचैक रहल अछि गंगाजल।। युगपति केर सुविधा सनकी सँ आब मँहैक रहल अछि गंगाजल।। हर-हर गंगे शुभ जापन सँ अछि गर्वित सदिखन गंगाजल।। मुदा नमामि गंगेक नारासँ भेल भ्रमित बेकल ई गंगाजल।। आब गादि सँ उत्थर-बदतर भेल तैं सभ करू निर्मल गंगाजल।। गोहराबए प्रीतम भारतकेँ देखू ने गन्हाएल गंगाजल।। दीप प्रज्ज्वलन हे आगत श्री दीप जराबू करू आशाक इजोत यौ... अपने सबहक ज्ञानाशिष अछि तिरलोकी युगश्रोत यौ...। हे आगत श्री...। अहाँक प्रतिभा प्रेरणा सम्बल सँ ई उत्सव मचलैए तैँ शुभ दीप शिखा संग अपनेक हाथक आँगुर उछलैए तमस हरण हेतु घृतबाती विचरै नभ खद्योत यौ...। हे आगत श्री...। सृष्टि त्रिकाल प्रकृति गगनसँ जग सुख आभा पसरैए... ज्ञान धरम साधना सुकर्मण उपदेश वाणी ससरैए वैह पावन ज्ञानामृत जलसँ लोक प्रीतम मन धोत यौ...। हे आगत श्री...। अहो अभिनन्दन हे परमागत श्री श्रवणार्थी सुनूँ श्रीवर मिथिला सन्तान। अपनेक बहु प्रतिभा यश सुनलौं तैं अर्पित अछि स्वागत गान।। अहाँक स्वागत स्वरूप तान पुष्प अनूप..। गीत माला सहित होइछ अभिनन्दन..।। मिथिला मन्दिर भ्रमण लोक सेवा नमन..। ज्ञान कुंकुम ललाटेँ करब चन्दन..।। गीतमाला सहित।। कर्मदूत अहाँ.. कर्मवीर सबल.. शान्तिदूत जकाँ यशव्रती छी सफल।।2।। स्वागतम् गान रूपेँ अहाँक वन्दन...।। गीतमाला सहित।। नान्हियेटा सँ अहाँक तपस्या सबल नवक्रान्ति संक्रान्ति नव कीर्ति नवल। 2 । अहाँक प्रतिभा अटल देखि जीवन पटल..। 2। मुग्ध प्रीतम कहल- धन्य राष्ट्र नन्दन..। गीतमाला सहित।। सीतार्चना जगदम्ब श्री जानकी कृपाकरू... मिथिलेश्वरी बनि जग छाएल छी...।। अपनेहि केर आशिष अमृत लए... हम नतमस्तक भऽ आएल छी...।। जगदम्ब श्री जानकी कृपा करू..।। जँ सुत सुर भक्तिकेँ स्वीकारब लवकुश जकाँ ज्ञानक वीर बनब..। मर्यादा पुरुषोत्तमकेँ लऽ छटा सदिखन हम सीता राम जपब...। एतबेहि शुभ आशाक पोटरी लऽ हे माऽए थाकल-मन्हुआएल छी.. जगदम्ब श्री जानकी कृपा करू...।। 1।। सिखबैत रहल पूर्वज-अग्रज पिंजरा केर सुगनो सीखि रहल...। सीता रामक रटना रटितेँ दिन-राति हमर मोन लिखि रहल...। रावणवध कारण तत्त्व अहाँ, श्रद्धा भक्तिक धुन लाएल छी अपनेहि केर आशिष अमृत लए...।। 2।। दियर लक्ष्मण कहै मातेश्वरी भारतो-शत्रुघ्न श्री मातु कहल कौशल्या-सुनयनाक मम्मत लऽ बहु-बेटीक सभटा स्नेह सजल वैदेही-विदेहक दुहिता सुनूँ- 2 सुत प्रीतम काव्य समाएल छी... अपनेहि केर आशिष अमृत लए...।। 3।। उमेश पासवान ई की होइ छै थानापर रही हम सुखल रहए मोन शनि दिनक बात अछि पाँच बजे साहित्य अकादेमीसँ आएल हमरा फोन घर जाइ माइक पएर छुइब हम कहलिऐ- भेटल साहित्य अकादेमी पुरस्कार माए कहलकै- ई की होइ छइ अइमे पाइ लगै छइ आकि पाइ दइ छइ सभकेँ भेटै छइ ढौआ-कौरी तोरा भेटलौ पुरस्कार! जो रे कपर-जरूआ तोहर कामे रहै छौ बेकार केत्ता सालसँ डिबियाक सभटा तेल जरौलेँ हमरा मोन छैल जे तूँ डाक्टर बनितेँ रौदमे जरल देहक सौख-सेहन्ता पुरा करितेँ बन्हकी लागल खेत छोड़ैबतेँ मुँह-पेट बान्हि तोरा पढ़ेलियौ बनि गेलेँ चौकीदार आब हम ई की सुनि रहल छी ई की होइ छै साहित्यकार साहित्य अकादेमी पुरस्कर..? बताह वादल ऐ दुनियासँ रिश्ता तोड़ि देलौं अहाँ दुखसँ रिश्ता जोड़ि देलौं अहाँ बताह वादल जकाँ घुमल फिड़ै छी हम नहि जानि एना किए केलौं अहाँ की कमी छल हमरामे अन्हारमे छोड़ि कऽ हमरा दोसराक घरकेँ इजोत केलौं अहाँ कहियो किछु केलौं नइ वस अपना जकाँ मानै छेलौं तैयो समुद्रक नोर आँखिसँ बहा देलौं अहाँ खेललौं हमर जिनगी आ खुनसँ होली जखन तेरह अक्टुबरकेँ हमर जनम दिन छल खुशीक समयपर सनेसमे कफन भेँट देलौं अहाँ जिनगीक ऐ युद्धमे ओही कफनकेँ ओढ़ि कऽ जीवित छी आस अखनो बाँकी अछि मुदा अहाँक बेबफाइसँ लजाइ छी हम ऐ दुनियासँ रिश्ता...। ◌ घा फुलोपर नइ अछि भरोस बिनु मौसमक फुलाइए ओ सावनकेँ अबैसँ पहिनहि केतेको रंग बदलैए ओ। सभ भौंरासँ दोस्ती अछि हुनक सभ कियोसँ मिलैए ओ मुदा अपन बना कऽ काँटसँ घाइल कऽ दैत अछि ओ सभ भौंरा शिकाइत करैत अछि हुनक किए एहेन बेवफाइ चालि चलैए ओ हुअए केतौ और घा तँ बरदास कऽ लेब मुदा दिलमे काँट जकाँ गड़ैए ओ दवाइ करब मुदा दवाइ मिलैए कहाँ कियो खुदासँ दुआ करैत अछि कियो बिसरए चाहैत अछि कियो पाबए चाहैत अछि केकरा कहबै के पतियाएत कियो सुनौ ने चाहैए किएक तँ कोमल मौलाएल लगैए ओ फुलोपर नइ अछि भरोस। ◌जिद्द ई दुनियाँबला बेर-बेर देखौलक प्रेमी सभकेँ अपन तागत किए अछि दुनियाँबलाकेँ प्रेमी सभकेँ दिल दुखबैक आदत हम लैला-मजनू नइ छी जे हुनका छोड़ि देब हम तँ प्रेमक आगिमे जरै छी पत्थरक देवालोकेँ तोड़ि देब कियो हुनका समझा दियौ दुगो प्रेम केनिहारक बीचमे नहि आबए नै तँ हम हुनको दुनियाँमे आगि लगा देब शायद हुनका ई मालूम नै हम माथपर कफन बान्हि कऽ चलै छी अप्पन प्रेमक लेल जीबै-मरै छी जखन हम जिद्द कऽ देब प्यारक ई दुश्मनकेँ दुनियासँ उठा देब ई दुनियाँबला बेर-बेर देखौलक...। ◌ सड़क हम सड़क छी किछु बाजि नइ सकै छी मुदा किए लोक हमरा बदनाम करैए कियो खुनक इलजाम लगबैए जखन कि अपने चलबैए गाड़ी-घोड़ा रेसमे आम लोककेँ कुचलैए। हम सड़क छी किछु बाजि नइ सकै छी मुदा किए लोक हमरा बदनाम करैए। रखैत अछि बान्हि कऽ बोडर-सीमा-सरहदसँ तखनो नै अछि हमरा मुदा डर तँ ऐठामक नेता-ठीकेदारक ओ घोटाला कऽ लैत अछि हमरा ऊपर खर्च होइबला खरचा जे दैत अछि ई देशक जनता। हम सड़क छी किछु बाजि नै सकै छी मुदा किए लोक हमरा बदनाम करैए सभ कियो अछि अप्पन स्वार्थमे लीन सड़ल-गलल फेकैत अछि अपने संग सेहत हमरो बिगाड़ैत अछि काटि-छाँटि कऽ हमरा आइर-खुड़पेरिया बनबैत अछि हम सड़क...। ◌ मैथिली मैथिलक पहचान अछि मैथिली स्वर-लहरी भाषा विश्व भरिमे मधुसँ मीठ अछि मैथिली जे भाषा भगवान श्रीरामकेँ नीक लागल हमर माइक बोली महान अछि मैथिली जेतुक्का संस्कृति देखैले देवो ललाइए ओ मिथिला महान अछि मैथिली विद्यापति मण्डन आयाची रहैथ ओतैक शान छी मैथिली। ◌ बिसैर जाउ जे भेल ओकरा बिसैर जाउ नसीबमे जे नइ छल अहाँक ओकरा आब नइ बोलाउ पाछू घुमि कऽ नइ ताकू जे भेल ओकरा बिसैर जाउ। कहियो काल एना होइत अछि अगर पड़ि गेल किनको प्रेमक नशाँ तँ छाँहो हुनका बोलबैत अछि जे भेल ओकरा बिसैर जाउ। किनको भेटैत अछि किनको हेराइत अछि दू क्षनक जिनगी अछि फेरो ओकर यादि अबैत अछि। पाछू घूमि कऽ नइ ताकू जे भेल ओकरा बिसैर जाउ। ई जे देख रहल छी मुरदासँ पटल असमसान सभ किछु छोड़ि आएल अछि ई सभ इंसान पाछू घूमि कऽ नै ताकू जे भेल ओकरा बिसैर जाउ। ◌खिस्सा दुखमे डुबि कऽ भेटल हमरा एगो किनार बेवफाइक जैपर बैस कऽ कनै छी हम कोसै छी हम अपने-अपनाकेँ खोजै छी हम ओइ बितलाहा दिनकेँ जे बितेने छेलौं सहज भावसँ शिकाइत नइ अछि हमरा बेवफा केर बेवफाइसँ मन पड़ैत अछि हमरा लिखल ओइ चिट्ठीक पन्ना जइमे लिखने छलि ओ हमर नाओं अप्पन लहूसँ बिसैर गेलौं रातिक जगनाइ इजोरिया रातिमे चान देखैक बहन्ने हुनकासँ मिलैले हुनक पाइजलक खनक सुनि कऽ जगि-जगि जागल रही पुरान भऽ गेल ओ सभ खिस्सा अप्पन प्रेमक जइमे रहै छेलौं दुनू गोरे ओ रूसनाइ ओ मनेनाइ चुपचाप चिट्ठी लिखनाइ आब सदिका, बितलाहा दिन दिलमे छूरी बनि कऽ भोंकैए की भेटल हमरा? दुखे-दुख? ◌ फाँसी काल्हि हमरा फाँसी भेटतै की अहाँकेँ ई बुझल अछि अहाँ एगो बेवफा छी तइ खातिर अहाँकेँ बजौने छी हमर नाओंसँ जे मेहदी लगौने छी अपन हाथमे ओकरा आइ हमर खूनसँ धोइक दिन आएल अछि की अहाँकेँ ई बुझल अछि अही दुनियाँमे सभ प्रेमी बहुत नीक होइत अछि मुदा अहाँकेँ मालून नइए आइ हम अहींक प्यारमे मौतकेँ गला लगौने छी की अहाँकेँ बुझल अछि हम जिन्दा लहाश बनल छी अहाँक बेवफाइसँ साँस हमर कखन चलि गेल नोर आ लहू एके संगे बोहेने छी ई अहाँकेँ मन अछि हम और अहाँ मिलल छेलौं फुलक बगियामे? मुदाआइ हमरा सुलीपर चढ़ेने छी नीकसँ देखू अहाँ अप्पन सूरत जे अहाँकेँ वफासँ बेवफा बनौने अछि। ◌ गलती कखनो लग अबै छी अहाँ कखनो दूर चलि जाइ छी की गलती भेल हमरासँ किए एहेन जुलुम अहाँ करै छी नीन हमर, चैन हमर सभ छीन लेलौं अहाँ आँखि-सँ-आँखि मिला कऽ आब आँखि किए चोरबै छी बेचैन भऽ जाइए ई दिल हमर जखन नाओं हम अप्पन अहाँक मुहसँ सुनै छी मन करैए आइए अप्पन बना लूँ जीवन भरिक लेल मुदा सपना केकरो औरक अहाँ देखै छी। ◌ रोग चलि जाउ अहाँ हमरा अहाँसँ नफरत अछि प्रेममे तँ लोक हँसैत अछि मुदा अहाँ कनै छी चलि जाउ अहाँ मौसम जकाँ अहाँ बदैल गेलौं अप्पन जवानीक आ जानमारूख चालिसँ जेकर कोनो इलाज नइ अछि ऊ रोग अहाँ दऽ गेलौं चलि जाउ अहाँ अहाँक ई बेवफाइक गम हम, सहि नै सकलौं जहरक कोन जरूरत हम तँ ओहिना मरि गेलौं मन पाड़ू ओ दिन जे बितेने छेलौं संग-संग तैयो आइ हम नोरक जगह आँखिसँ लहू बहेने छी चलि जाउ अहाँ हमरा अहाँसँ नफरत अछि। ◌ बटोही अपने शहरमे हेरा गेल छी हम खोजैले निकलल छी स्वयं अपनाकेँ लऽ कऽ हाथमे डिबिया मुदा टिमटिमाइत इजोतक गरमीसँ जरल जा रहल छी हम बेखबर भऽ गेल छी ऐ शहरसँ बटोही सन लगै छी हम कियो बता दिअ हमर घरक पता-ठेकान नहि जानि केतएसँ केतए चलि कऽ, चलि एलौं हम बिना कोनो मतलबक ऐ अन्हार रातिमे अइमे दोख अहाँक नै दोख हमर अछि परिस्थितिये एहेन चलि आएल अछि हमर। ◌ हवा मनमौजी अछि ई हवा सम्हैर कऽ कहाँ चलैए ठोकर मारैए पहाड़मे नहि जानि केतएसँ आएल ई हवा सनसनाइत-ऐंठैत ई हवा गरदा उड़बैत निडर भेल चलैए लाज-शर्मक परदा चेहरासँ हटा कऽ चलैए ई हवा ने कोनो दुख आ ने कोनो चिन्ता छै जेम्हरे बहड़ाइए तेम्हरे हल-चल मचबैए डारि-डारिकेँ हिलबैए ई हवा। ◌ दोख मंजिल लगसँ घूमि आएल छी हम अपने जिनगीमे आगि लगा आएल छी हम जरै छी अही आगिमे अपनोपर दया नै अछि हमरा केहेन परीक्षा अछि हमर जिनगीक कोन दोख अछि हमर ओ हँसैए हमर ई हाल देख कऽ कियो हुनकासँ पुछियौ बेवफा हम छी आकि छैथ ओ? ◌ गुमान दुखक नदीमे डूब लगबए लगलौं चाहियो कऽ पार नै करि सकब ई दर्द भरल याद सभ बेवफा यादक चीता सजबए लगलौं अधूरा रहि गेल ओ कहानी जे लिखनै छेलौं दुनू गोरे मिलि कऽ निश्छल प्रेमक आब ई ऐना साँच बाजए लगल गुमानक प्रेमक धुलमे मिलए लगल जे देने छल, निशानी प्रीतक सभ चिट्ठीक पन्ना आगिमे जराबए लगल लूटि कऽ हमर जिनगी खुशी ओ मनबए लगल यादि सभ चिन्ताक, चादैर बनि कऽ रहि गेल जिनगीक सभ आशा दुखक नदीमे डुबए लगल। ◌लड़की मासुम सूरत हुनक कनैल, गुलाब जकाँ हँसी जेकरा चेहरापर झलकै छल ओ लड़की किए उदास रहैए साउन मासमे सुनसान रातिमे चान जखन वादलक संग लूका-छिपि करैत रहै छल नट-खट परि सन चुपचाप नंगे पएरे हमरासँ मिलैले अबै छल ओ लड़की किए उदास रहैए हुनक आँखिमे भरल नोर किछु कहैए आब नजैर झूकल-झूकल हुनक रहैए जेना किछु तेहेन हेराएल होइ सभ दुख डुबल दर्द पीब कऽ नोरमे डुबल रहैए ओ लड़की किए उदास रहैए कखनो ई हम सोचने नइ छेलौं कियो केकरो संग एते प्रेम करैए समए बित गेलाक बादो फेर वएह दिन अबैक इन्तजार करैए जनु तँए ओ लड़की उदास रहैए। ◌ आदत जीयब केना हँसी तँ कोसो दूर चलि गेल आब नोर पीऐक आदत भऽ गेल भरोस केकरापर करी दिलमे रहनिहार कातिल बनि गेल केकरासँ दिल लगाबी सुनरकी गेल दिल तोड़ि भरि दैत अछि दिलमे जख्म ओ दोसरेक खुशी देख-देख हमरो जीबैक आदत भऽ गेल समुच्चा राति ओनाहिते चानकेँ देख-देख जगैक आदत भऽ गेल। ◌ अनजान कियो हमरा बजा रहल अछि अही अनजान जगहपर अखन आधा राति बित चुकल अछि फेर केकरो कनैक अवाज सुना रहल अछि ई केहेन सनसनाहट अछि उज्जर कपड़ा ओढ़ने कियो परी जकाँ लगैए मुदा ओकर चेहरा ठीकसँ हम देखलौं नहि मन होइए लगसँ जा कऽ देखूँ मुदा हमर दिल काँपि रहल अछि बस एगो शकल हमर मनमे आबि रहल अछि ई के भऽ सकैए एहेन दृश्य, नै देखलौं कहियो की केकरो मरि गेला बाद आत्मा फेरसँ जीबित लोक जकाँ हल्ला कऽ सकैए फेर हँसैक अवाज आब कनी धुआँ जकाँ उठल हम देखैत रहि गेलौं कियो ओही जगहसँ उठल आ चलए लगल बस एक्के बात बजैत जा रहल अछि अहाँ चलि आउ, अहाँ चलि आउ... आखिर ओ भऽ के सकैए? ◌ लोभ कनी कनी कऽ सभ अलग-अलग रहैए सभपर जेना कोनो आरोप रहैए ई देख फुलैए दम, मुँहगरहा सभकेँ दुतकारैत-फिड़ैत नजैर आबि रहल अछि सभ घमण्ड अछि केकरो अप्पन दादा-पुरखाक घरमे दुबकल रहैए सभ चुप-चाप बैसल रहैए गुज-गुज अनहरिया रातिमे दौड़ैत-भागैत रहैए- अनेरे सुखक तलाशमे मेहनतसँ कोसो दूर रहैत अछि मुदा लोभ भरल नजैरसँ। ◌ स्वार्थी कोनो पुरान याद फेरसँ दिलमे उतैर आएत ई कहियो सोचनै नइ छेलौं ओ दिन अखनो याद अछि जे देखै छेलौं फुलक कियारीमे भँवरा फुलक संग अटखेल करैत रहै छल ओ दिन आ आइक दिनमे काफी फरक अछि फुलक गाछमे फूल आब फूल नहि रहल ओकर कोमलता काँटमे बदैल गेल बस गाछ कनी पुरान भऽ गेल आब कोनो भँवरा ओही गाछ लग नइ जाइए बुझना जाइए औझका मनुखे जकाँ ओहो स्वार्थी भऽ गेल। ◌ करिछौन केतए हेरा गेल ओ याद ओ सभ आब रातिमे सपनो देखब भुलि गेलौं दूर चलि गेल जेना छोड़ि कऽ अप्पन छॉंहो हमरासँ आशाक निकलल किरण डुबि गेल पियासल हम रहि गेलौं मनक समुद्र सुखि गेल घरक कोणमे दुबकल रहै छी कैदी जकाँ अपनो नइ चिन्ह रहल छी समयक ऐना बदैल गेल ओ नीक समए करिछौन भऽ गेल पत्थल भऽ गेल ओ छाती जइमे रहै छल ओ कहियो। ◌ एकबेर जंगलगे-जंगले जा रहल छेलौं हम अहाँकेँ खोजै-ले बदहबास बताह जकाँ गाछो सभ रूसल छल जे हमरासँ खबैर नहि छल जे अहाँ केतौ और छी गाछक रूसनाइ भीतरे-भीतरे हमरा हिला रहल छल जेना ओ कहि रहल जे यएह मनुख सभ तँ सावनक हमरासँ कोसो दूर केने अछि शकल-सूरत तँ देखू आजुक दुश्मन बनि कऽ बैठल अछि दोख दऽ रहल अछि हमरा आ निकलल अछि खोजैले ओकरा। ◌ साँच झगड़निहारकेँ की पता हमर चुप्पी कहियो रंग लाएत। बिना मतलबे उलैझ कऽ बितौने अछि अप्पन समए हम तँ एक-एक पल बितबै छी काजमे, नीक काजमे जे समैझ लेत ऐ रहस्यकेँ समए-सुत्रकेँ ओ सभ दुख पार कऽ गेल ने दुश्मनी केकरो संग भेल ने कहियो दुखमे केकरो आगू झुकए पड़ल कोमल-बेवहार हुनक निशानी रहल सभसँ अछि प्रेम दोसर देख-देख कऽ जरैत-जरैत मरैत रहैए झूठ-झूठे रहत आ साँच-साँच रहत। ◌ यादमे अखनो डुबि जाइ छी हम मन पाड़ि कऽ ओइ दिनकेँ जे हम कियो सोचने नै छेलौं की अहाँ हमरासँ केते दूर चलि जाएब प्रेमक धागामे गुथल ई प्रेमक मोती टूटि जाएत हमर जगैत आँखि अहाँकेँ सपनामे देखैले तरैस जाएत पिजड़ाकेँ खुलिते देरी चिड़ै जकाँ उड़ि जाएत अहाँक यादमे ई महल। ◌ जमाना यादक दीप मिझा देलौं अहाँ हम भटकैत रहलौं, पागल जकाँ डुबि गेलौं वियोगमे अहाँक प्रेममे मिलल नै किच्छो छुलौं अहाँ खाली हाथ भेटल तोफामे बेवफाइ आ जखम मुदा देखाएब ई केना आब तँ जमानापर भरोस नहि अछि बस भेटैए निशानीमे धोखा बेवफाइक दुख जे सहि कऽ जीबैए आशिक जे सम्हैर जाए ओ जमाना। ◌ पछताएब आँइखो आब थाकि चुकल अछि कब्र सेहो मरना सन भऽ गेल यादो हुनक दफन भऽ जाएत अन्तिम घड़ीमे कफन भऽ जाएत मेटा जाएत सभ निशानी हम कहाँ फेर भेट सकब दर-दर ठोकर खाएब पछताएब आ नोर बहाएब फेर भेटत नइ ई समए के कहलक आइ हम छी तँ काल्हि अहाँ नइ। ◌ चिट्ठीक पन्ना यादमे डुबल रहैए ओ नजैर झुका कऽ चुप-चाप नोर बहबैए ओ डेग मानू रूकि गेल अछि देखल बरिखो बित गेल कहियो काल भेँट-मुलाकात होइए चिट्ठीक पन्नामे, आ सपनामे खुजल आँखिसँ नजैर कहाँ अबैत अछि ओ सभ सपना टूटि गेल बरखो बित गेल दिलक हँसब आ खुशी दिलेमे दफन भऽ गेल नइ जानि हमरासँ मिलैसँ डरैए किए ओ। ◌ कविता जखमक देबालसँ अनहत मनसँ निकलैए एगो अनजान शब्द जेकरा अप्पन भावनासँ जोति-कोरि कऽ बनबै छी कविता किछु अप्पन रहैत अछि किछु दोसराक शब्द जे समाजक सच्चाइकेँ देखबैत अछि किछु शब्द तलवार सन धारदार रहैत अछि किछु मौध सन मीठ कोनो शब्द भावनासँ दलमलित रहैत अछि जे पढ़ि कऽ खिस्सा जकाँ कनबैत अछि सभ शब्दसँ अप्पन दिलकेँ होइए भेँट तँए कोनो शब्द दिलकेँ झँकझौरैए आ किछु समा जाइए सीनामे सादा कागत, कलम आ जखमसँ भऽ गेल दोस्ती तइ दुआरे लिखै छी कविता। ◌ गामसँ कियो लड़की चुप-चुप हमर घरक खिड़कीसँ चिट्ठी लिख कऽ फेकने अछि के छल ओ लड़की कियो नइ देखने अछि जखन खोललौं ओइ चिट्ठीकेँ चिट्ठीक ऊपरमे हमर नाओं लिखने अछि एगो सुन्दर सन गुलाबक फूल बना कऽ फुरसतमे प्रेमक पैगाम लिखने अछि घर केतए अछि ओकर मालुम नइ। मुदा अही गामसँ लिखने अछि अप्पन कोमल हाथसँ प्रेमक ढ़ाइ आखर भरि इतमीनानसँ लिखने अछि अन्तमे हमर प्रसंसो केने अछि नइ जानि कोन रिश्ताअछि हमर गजलकेँ ओ अप्पन नोर लिखने अछि कियो लड़की चुप-चाप हमर घरक खिड़कीसँ चिट्ठी लिख कऽ फेकने अछि। ◌तरहत्थी खुदासँ मँगने छेलौं अहाँकेँ किए हमरा अलग कऽ देलक जीए देत कनी जिनगी हमरो कनैए कनी हमरा दया कऽ देने रहैत देख कऽ अहाँ हथेली ओहीपर हमर नाओं लिख देने रहैत खुदासँ मँगने छेलौं अहाँकेँ किए हमरा अलग कऽ देलक, जइ दिन उठल अहाँक बिआहक डोली ओही दिन हमरो जनाजा उठा देने रहैत हमहूँ जैतौं संग-संग अहाँ अप्पन सासुर जैतौं आ हम भगवानक लग चलि गेल रहितौं किए हमरा आइ अलग कऽ देलक पुछितौं हम ओइ भगवानसँ किए परीक्षा लइए प्रेमीकेँ प्यारमे दिल लगबैसँ पहिने काटि देने रहैत खुदासँ मँगने छेलौं अहाँकेँ किए हमरा अलग कऽ देलक। ◌ डुबैत जे मँगने छेलौं हम भगवानसँ से नइ भेटल हमरा डुबैत गेलौं हम गम केर गहराइमे चीर कऽ सीना राखि देलौं दिल, अप्पन वएह पैरपर जरैत रहलौं हम बेवफाइक रौदमे गली आ चौराहापर बितल दिन आएल फेर तुफान जकाँ तोड़ि हमर जिनगीकेँ फेक देलक लबारिस लाश जकाँ भऽ गेलौं हम जखन फेर मन पड़ल पुरना प्रेमीकेँ तब खोजने फिड़ै छी ताज-महल आ कब्रिस्तानमे हम तँ बस प्रेम छी। ◌ तागत प्यारक दुश्मन छी ई दुनियाँबला हमरा हिनका लऽ जाए दियौ कन-कनमे बसल अछि प्यार अहाँक तखने हम जिन्दा छी तइ दुआरे एकरा हमरा जराबए दियौ प्यारक दुश्मन छी ई दुनियाँबला हमर आँखिसँ जे गिर रहल अछि नोर अहाँ अपना-ले हमरा छोड़ि कऽ जाए दिअ हमर तागत अछि प्रेम अहाँ असर एकरा देखबए दियौ प्यारक दुश्मन छी ई दुनियाँबला सुनै छी खिस्सा हम लैला-मजनू-सिरी फरीहादक हँसि-हँसि कऽ मरए दिअ गम आ प्यारमे तागत हमहूँ देख लइ छी कम्बख्त ई तलवारमे प्रेमीक फेर अजमौने अछि हँसैत आइ सुलीपर चढ़ए दिअ प्यारक दुश्मन अछि ई दुनियाँबला सभ जखमपर अहाँक नाओं होएत सभ खूनक बुन्नपर अहींक नाओं होएत सभ प्रेमीक लेल प्यारक पैगाम होएत। ◌हालत हेरा जाएब हम एक दिन छोड़ि कऽ जाए दिअ निशानी अप्पन फेर के जनलक कहियो आएब मिलैले हम ई वादा अछि जवानीक दौड़त रग-रगमे रवानीक मुदा तखनो भुलि जाइ छी हम जखन लग अबै छी अहाँ रूकि जाइए नजैर अहाँकेँ देखते की करूँ हम केकरा सुनावी ई दिलक खिस्सा एतए लोक सभ मतलबी अछि जखम दिलक केकरा देखाबी हम कनै छी सदिखन हम, पागल जकाँ लोक हँसैए हमरापर हम तँ कनै छी एतुक्का हालत देख कऽ। ◌ जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ गीत छागर कटैत रहलै कनैत कलपैत रहलै भगवती प्रसन्न भ गेलीह लोक सभ बुझैत रहलै. परम्पराक मंचपर हत्याक खेल बाघकेर बलि कहियो ने देल गेल ढोल-पिपही बजैत रहलै आ नटुआ नचैत रहलै भगवती प्रसन्न भ' गेलीह लोक सभ बुझैत रहलै. सत्य आ अहिंसाक ग्यान मौन भेल भरि गां तमाशा देखैछ ठाढ भेल लिधुर जे बहैत रहलै बखरा लगैत रहलै भगवती प्रसन्न भ गेलीह लोक सभ बुझैत रहलै. कहलनि जे बुद्ध महावीर आबिक' सुतलोमे सदिखन रहू जागिक' हिंसा जे होइत रहलै विपदा अनैत रहलै भगवतीक आँखिकेर नोर क्यो नहि देखैैत रहलै. माउसकें प्रसाद मानि लेल हर्षमे विषाद सानि देल धररती फटैत रहलै गर्द आसमानमे भेलै दुनियामे व्याप्त चीत्कार मौत बनि अबैत रहलै. गजल बथान हमर नै छी, दलान हमर नै छी ई दस कोठलीके मकान हमर नै छी पदबी हमर ओगरबाह एहि गाछीक खेत खोपड़ी और मचान हमर नै छी लोकक लहासपर फुनगीपर चढ़बाले’ लुत्ती लगबैत ई परान हमर नै छी बलतकार हत्या तलाक आ मोकदिमा ई विधि हमर नै छी विधान हमर नै छी पुत्र बिना मोक्षकें कहैत हो असंभव त शास्त्र हमर नै छी, पुराण हमर नै छी मात्रा-क्रम : 2222 2222 222 दू टा लघु कें एक दीर्घ मानल गेल अछि | रजनी छाबड़ा (हिन्दी कविता संग्रह ’पिघलते हिमखण्ड’ सँ मैथिली अनुवाद- अनुवादक डॉ. शिवकुमार प्रसाद) साँसक संग खनकै कंगना छनकै पायल ओझरल केश छितरल काजर। टुटल-फुटल साँसक हलचल धरतीक पियास मेघक तरपब। रौद सोहनगर कुनमुनाइत सन ओकर छुअब। एक आँचमे पघलए तन-मन। सपना बनि गेल सपनौती जीवन। साँस-साँस संग बहब बिनु कहने सभ कहब। चर्चा ओ संसार हमर नहि भऽ सकैत अछि जेतए अहाँक गमक नहि हो अहाँक स्मृति नहि हो, चर्चा नहि हो जेतए अहाँकेँ ओ सभा हमरा अनसोहाँत लगैए। दिगंतक नजीक दिगंतक नजीक करै छी हमर उमेद जेतए दू संसार मिलियो कऽ नहि मिलै छइ। अपूर्ण अछि आस अपूर्ण अछि मिलन केर आग्रह आब तँ फूल फुलाइयो कऽ नहि फुलैत छै फुलाएलो-फुलाएल नहि लगैए। केहेन उपराग लाल जागल आँखि पैछला रातिक करोट रात्रिक जागरण कहियो खतम नहि होमए बला सत्तैर। वियोगनिक यएह अमाबसक भाग्य छै किनकासँ शिकाइत केहेन उपराग..! सुख-दुख समय केर अन्हारसँ जुनि डेराउ हे मन। मेघक अन्तिम छोरपर चमकैत बिजुरिक अहाँ अन्दाजि कऽ करू अपन नाप-जोख। जखन निकसै छै गुनगुनाइत रौद ठरल बसातक पछाइत ओकर मृदुल-मृदुल स्पर्शसँ फुलवारीक कोण-कोण अबाद भऽ जाइ छइ। सुख आ दुखकेँ संगे-संग सहैमे जीवनक सहजता छै। काँटक नमहर बाट पारे कऽ कें ने गुलाब शानसँ महकै छइ। आन जाहि आँखिमे हिलैत रहै छल सपना आब ओहू आँखिमे बस बिराने-बीरान नजैर अबैए। देखै छी जखन पूर्वकालिक छबि हमरा अपनहिमे आन देखैत अछि। कारण ओ पुछै छथि चुप रहै छी किए ठोर गुम्मे रहल नोर छलैक जाइए। की दिऐ हम जवाब सबाल दुनियाँक सुनि जखन जिनगीए हमर सबाल बनि कऽ रहि गेल-ए। सतरंगा आनन्द सभ ऋृतुमे फुटपाथपर ठाढ़ ओ काँच उमेरक नेना बेचैत अछि सतरंगा बेलुन आ छिड़ियाबैत अछि आनन्द केर रंग। नन्हकिरबा सभ कुदैत अछि नान्हिटा हाथमे पकड़ने बेलुन। बेलुन ओकरो ललचाबै छै मुदा ओ कहियो अपनो लेल कीनि पौत? गरीबी अभिशाप छै सतरंगा सपनाकेँ चुरमचूर करए-बला। ओकरा बचेबाक छै एक-एक गोट कैंचा आनए लेल बेराम माइयक दबाइ। छोट भाइयक लेल एक कपटी दूध सभ दिन पुड़ेबाक छै अपनाकेँ तँ बस काममे खटेबाक छै। एहि सोचमे डुमल ओकरासँ किछु कीनि कऽ बेलुन पकड़ा दइ छिऐ ओकर नान्हिटा हाथमे ई छोट-छीन उपहार। ओकर बिमल मुँहपर चमकलै आनन्द हमरो दैत अछि ओ सतरंगा आनन्दक अभास। अहाँक थाती हम जोगा कऽ राखब अपन देशक खातिर पैरुखक थाती अहाँ जे हमरा नाम कऽ गेलौं। मुस्किया कऽ सहब सभ समय केर धाह देशभक्तिक मनसूबा ने कहियो हएत कम। बलिदानक फूल देलौं जे अहाँ आँचरमे ओकर गमकसँ गमकतै हमर बतन। हमहीं जीजाबाई हमहीं अमर सिंह राठौड़क छी माए लोरी केर बदला कहबै बेटाकेँ हम बलिदानक कथा। जँ फेर कोनो आफत एतै देशक मानिपर आ मंगतै जँ बलिदान देशक मानि लेल कऽ देबै हँसैत-हँसैत अपन दुलरुआ बलिदान। जे जान दइ छथि देशक लेल ओ छोड़ि जाइ छथि बलिदानक चिन्हासी जइपर चलि कऽ अक्षुण्ण रखै छथि नवतुरिया मुक्त राष्ट्र, मुक्त संसार। बिसबासक मूर्ति सभ शहरक सभ गलीमे किछ प्रार्थना-घर आ मण्डिल होइत छै जेतए लोक अपन-अपन बिसबासक मूर्ति बना दैत छथि, अपन-अपन बेवहार आ चलैनसँ ओकरा सजा लइ छथि। शेष संसारक धरम-करमसँ फेर ओ अजान भऽ जाइ छथि। नहुँ-नहुँ ओ एना हेरा लइ छथि सतही प्रार्थनामे, अपन धरमकेँ ओ अपन इमानसँ पटेबाक बदला रंगि दइ छथि हुनक लेहुसँ जे हुनक धरमसँ इतर छैन। बिसबासक मूर्ति बनबैत-बनबैत हुनका पतो ने चलै छैन कि ओ अपनहि कखन मूर्ति बनि जाइ छथि। ई केहेन नाता ई केहेन नाता अछि खुशी अहाँकेँ भेटैत अछि खोइछ हमर भरि जाइत अछि। करोट जखन अहाँ घुमै छी हमर सुख हेरा जाइत अछि। चोट अहाँकेँ लगए नोर हमर आँखिमे डबडबा जाइत अछि। अहाँक आँखिमे नोर छल-छलाइसँ पहिनहि अपन पिपनीमे समेटबाक मन होइत अछि। अट्टखेल करैत लहैरमे किएक अहाँक छवि अभरऽ लगैत अछि। चुपे-चाप मौसम गुनगुनाए लगैत अछि अहाँक स्मृति हमरामे बसि जाइत अछि। कानमे मिठगर घन्टी सन बाजए लगैत अछि जखन अहाँक बोलक जादू पसरैत अछि। जिनगीक आधा खाली जाम आधा भरल नजैर अबैत अछि। अनाम सम्बन्धकेँ नाम देबए-मे शब्दो भण्डार खाली भऽ जाइत अछि। अहीं कहू ने अहाँसँ ई केहेन नाता अछि? मनक पखेरू आकुल नैन व्याकुल बाट अलोपित होइत आड़ि-धूर, क्षितिजकेँ छुबाक आस अतृप्त पियास। तबधल रेगिस्तानमे सौनक बात नेहक मेघकेँ बरसब जिनगीक भीजब, छद्म सपना फुजल आँखिक छल। मनक पखेरू केर पाँखि कतरब यएह अछि यथार्थ केर धरातल। कचोट अधखड़ु जिनगीक चोट एना जिनगीमे सन्हिया रहल अछि, जेना करिया रातिक गाढ़ रोशनाइ नोरोसँ नहि धुआ रहल हो। स्मृति अहाँक गुम्मी अहाँक आँखिक जिह्वासँ अनकहलो बात कथा बनि जाइत अछि। नहुसँ छुबि कऽ बात फुला जाइत अछि अधफुलल कलिकाकेँ ओ छुअब जिनगीक मस्ती बनि जाइ छै। अहाँक गमक लऽ कऽ अबैत अछि वात ओ क्षण बनि जाइ छै जिनगीक स्मृति। आसक चिड़ै मन तँ आसक चिड़ै छै एकरा किए बान्है छी कैदी बनैले मनुषक देह की कम अछि? केहेन भटकब सगर धरणीक सभ कोण आइ ने काल्हि फुलेबे करतै तखन काँटबला बाटसँ किएक भटकब? सुनै छी काँटोमे छै फूल फुलेबाक चलैन। बेमन जिनगी अचानक जखन लागए लगए बेमन जिनगी, ठमैक जाय एकाएक उल्लास, तँ बुझि ली हम बनि रहल छी कथा। बीतल कथा बनैसँ नीक अछि इन्द्रधनुषक अन्तिम कोरसँ लाल रंग लऽ जिनगीकेँ पुनि आसक रंगमे रंगि आयास आ बिसबासक दीप बारि ली। हिमखंड पघलै छै बरफक पहाड़ ठिठुरलो सिनेहकेँ, मधुआएल बिसबासक रौद तँ दऽ कऽ देखियौ! ई केहन सत्तैर कखनहुँ तऽ नेहक दू बुन्न दऽ जाएत छै सिन्धु सन तोष। कखनहुँ समुद्रो पियास नहि मेटा पबैत छै। नै जानि पियासक ई केहन सत्तैर आ नाता छै! बन्न ठोर बन्नो ठोरक सेहेा अपन जिह्वा होइत छै गोट-गोट खिस्सा आँखिये कहि दैत छै। ई बुझि सकैत अछि एसगरे नेहसँ भरल हृदय सगर संसार एहि बातसँ अनभिज्ञ रहैत छै। केना बिसैर सकै छी? हम बिसैर सकै छी हुनका जे हमरा संग हमर सुखमे साझी भऽ ठहक्का लगौने छथि। मुदा हम किन्नहुँ बिसैर सकै छी हुनका जे हमर दुखक संग बिनु कहने नोर बहेने छथि? घरक पाग वृद्धजन छथि घरक पाग के नकारत एहि सत्यकेँ कोनो टा सभ्य समाज। ओ छथि घर-आँगनक बरक गाछ, सुकुमार लतासन भविषक खारही हुनकेसँ लटपटाइत पाबि सकैत अछि अधार बढ़ौने रहि सकैत छथि लिलसा। अनुभवक बोझ अतिभारी तहूसँ दोहरी भेल छैन डाँर। किछु कड़ू किछु खटगर मिठगर अनुभव दोहराबैत चुप भऽ सोनसन रौदमे लैत खुमारी। अनुभवक ओ खान संजोगने टकटकी लगा ताकि रहल छथि अपन हिस्सा केर विरानी। पुतोहु बेटा केर सभ किछु भेटैन घर-बाहर संग किट्टी-पाटी बच्चा पढ़ैले जाइ छैन पाठशाला वा होस्टलमे तैयो डर एकान्त बासमे बिगाड़ि देतैन ई दादा-दादी। घरक अन्हरिया कोणमे समेटल खाट-पलंग सन आकुल-व्याकुल मनक किनका सुनेता बेथा। संस्कार नहि घरक बात ई केना निकालता बाहर वृद्धाश्रमसं बाँचल छथि ओ बँचबैत घरक लाज। अपननहि घर अवहेलित आइ अछि घरक ऊँचका पाग। जेठ नागरिक दिवसपर बेटा-पुतोहुक संग पाबि मान केर मंच क्षण भरिक खुशी पाबि, पुनि सन्हिया जाइ छथि अपन हिस्साक कोणमे बनि बितलाहा काल्हि। बितलाहा काल्हि आ आजुक आइ जँ मिलि सकए एकसंग विकासक बाटपर बढ़ि सकैत अछि अपन समाज। खेलौना सन हे भगवान! सभ घरमे खेलौना सन बच्चा दियौ आ बच्चे सन खेलौना। सुखक नीन आ बिछौना सेहो दियौ नेहक छाँह तैसंग सुन्नर सपना दियौ। किल-किलाइत रहए खिल-खिलाइत रहए आँखिमे ने कहियो नोर भरए दियौ। घर आओर मकान जाहि नगरमे हमर घर हमरा जतए तेज आ दाना भेटल वएह हमरा लेल स्वर्ग सन असरा अछि। जाहि शहरमे हमर मकान आ जीबाक समान ओतहि जीबाक सुख आ एसगरुआ जिनगीक ठेकान अछि। एहेन कोन जीयब एहेन कोन जीयब कि जीयब एकटा लचारी लगए। किएक ने करी एहेन किछु काज कि हमरा मुइला पछाइत ई संसार हमरा बिनु अधखड़ू लगए। बहए दियौ जिनगीकेँ दर्शनक फेरिमे जुनि ओझराउ विचारकेँ शब्दक मकड़जालमे जुनि ओझराउ चालिकेँ। बहए दियौ जिनगीकेँ विमल अबाध धार सन कहए दियौ मनकेँ भाव सोझ सहज कविता सन। कुहेस उदासिक पड़ल पपड़ी-पर-पपड़ी कोनो कुहेस नहि जे छैट जेतए कोनो उज्जर भिनसरसँ। ओ तँ एना घोंसियाएल अछि हमर करेजमे जे जएत हमरे संग। साँचक धरातल सपनाक संसारमे जीबैत छेलौं हम नहि छल कोनो साँचक धरातल अपन। जिनगीक दहकैत दुपहरियामे नहि छल माथपर सिनेहक आँचर। सरापल तबधल मन लेने सौनक बात लेल तरसै छल मन बातोमे छण छण भीजल छल नैन फूलो गरैत छल काँटे समान, दुनियाँक मेलामे एसगर हकासल छल मन। अहाँक फेन घुमि आयब एतए सुनसान जिनगीमे हमर स्वर्ण किरिण निकसैत जेना छँटि गेल कुहेस गमकए लगल जिनगीमे चाननक सुवास। हमरा संग आब अछि हमर खुशीक आँगन पाँखि हम पसारी किए पबैले असमान। साँचक धरातल अछि आब हमर पहिचान। एहि प्रकारें समय केर सागरक बालुसँ मुट्ठीमे बटोरल किछु बालुक कण जे सटल अछि हमर तरहत्थीक मध्य ओही कणसँ सागरक अनुभूति संजोगि लइ छी। एहि प्रकारें जीबि लइ छी छिण-छिण केर जिनगी। नेनपनक घुमब ठहक्काक अहाँ झरना जे देलौं हमर आँगनमे, किलकारीक कुँजनसँ मुदित कएल घर-आँगन। आभारी छी हे परमेसर एहि नन्हकी देवदूतक लेल। नान्हिटा ई बिरबा जे लहलहैत अछि घर आँगनमे हमर बेटो केर नेन्हपन घुमि आएल आँगनमे। मेलामे एसगर दृष्टिक अन्तिम छोरि धैर जखन हमर आकुल आँखि अहाँकेँ हियाबैत अछि आ अहाँ जखन लगीचमे केतौ नहि अभरै छी तँ आरो भीषण भऽ जाइत अछि मेलामे एसगर भीड़ोमे भुतिएल हेबाक भान! हमहुँ जीबि रहल छी यै बसात यौ वसन्त हमरो हेबाक कने भान तँ कराऊ। साँस लऽ रहल छी हम मुदा जीबित रहबाक बिसबास नहि। जिनगीक बिरोधमे ई जघन्य अपराध नहि? छणेमे जीबि लेब भरि जनम, हरेक साँसमे सरगमक स्वर हरेक कम्पनमे पायलकेर झनक रेशमी आँचरकेँ नहुसँ सरसराएब, आँखिसँ आँखिमे सभ किछु कहि देब, बे पाँखिए अकासकेँ नापि लेब, पूर्णताक अभास तँ सपने भऽ गेल। खाली पल पल, खाली जिनगी, जिनगी तँ बनबासे भऽ गेल। सोन्हगर स्मृतिक फुलवारी कने फेनसँ महकाऊ यै बसात यौ वसन्त हमरो हेबाक कने भान त कराऊ। लहैर साँझक सघन धुइनमे सागर केर लहैर आ धक्का खाइत हमर देह आ मन। अहाँक संग रहैत, मन अभासैत छल सागरमे सागर सन विस्तृत, अनन्त सुख, भरल पुरल नेह। समय केर निष्ठुर बाटपर अहाँ आब छी जिनगीक सीमाकेर ओहिपार। साँझक तरेगनमे, अहाँक छबि देखै छी। वएह सागर तँ आइयो छै ओहिने साँझक कुहेसो सघन लहैरमे ने हलचल सतहो अचंचले सन। स्थिर समुद्र सन मनकेर गहनता खान अछि अशान्तिक वैचारिक सघनता। मनक बजार टुटि कऽ जुड़ियो जाइ तैयो दराइर देखाइत छै मनक बजारमे फेन नहि ओ बौस बिकाइ छै! जिनगीसँ की चाहै छी हम जिनगीसँ की चाहै छी हम अपनो किछु नहि जनै छी किछु करबाक लेने लिलसा मनमे अधखरुए लिलसे जीबै छी। हम जिनगीसँ...। होइए जखन मनमे लिलसा बाटसँ हटि किछु काम करी संस्कार नेह केर लोरीसँ ओहि लिलसोकेँ सुतबैत जाइ छी। हम जिनगीसँ...। सोन सन रौदसँ भरल अकास सोझहेमे अछि मनक बन्न अन्हरिया कोठलीमे तैयो हम सुटकल जाइ छी। हम जिनगीसँ...। चाहै छी विस्तार सिन्धु केर जिनगीमे सरिपहुँ कुँइयाँक बेंग सन जीने जाइ छी। हम जिनगीसँ...। चाहै छी नदी सन बेग हम जिनगीमे नोरोकेँ आँखिसँ नहि टघरए दइ छी। हम जिनगीसँ...। लिलसा अछि जीती जिनगीक खेल टेकठीक मदैतसँ चलैत जाइ छी। हम जिनगीसँ...। किछु नीक करबाक लिलसा लेने किछु नहि कऽ पेबाक कचोट लेने एहि अजब द्वन्द्व केर हालैतमे ओहिना जिनगी जीने जाइ छी। हम जिनगीसँ की चाहै छी हम अपनो किछु नहि जनै छी। आजुक नारी आजुक जनानी अबला नहि जे बिपैत पड़लापर टुटलाहा माला जकाँ छिड़िया जाइ छै। आजुक जनानी सबला अछि जकरा टुटियो कऽ जुड़ब आ जोड़बाक कला बूझल छै। हम केतए छेलौं हम जखन ओहिठाम रही तखनो ओतए नहि रही। अपनहि संसारक मेलामे हम हेरागेल रही नहि जानि केतए रही। पैघक गुणक नकल करैत छल हमर व्यक्तित्वक अपहरण, हमर निजत्व पपड़ी दर पपड़ी कब्बरमे झँपाएत रहए आ हम अपन छीण होइत स्वसँ फिरसान रही। काँच उमेड़मे कनहाक बेगरता रहै छै। अपन पैरपर ठाढ़ भेला पछाइत कनहा धऽ चलब अपन बेकूफी छैक। सोनजूही सन पुनकब अपन क्षमता रहितहुँ दोसराक बले चलब किए मानि लेने छल भाग्य हमर। निःशब्द बेथा आ नोरसँ धैरज रखनिहार जगतीक छाती पटा कऽ बरखो-बर्खक पछाइत हम अँकुरलौं अछि आब मनमे संजोगने पुनकबाक इच्छा । झौंखरा जकाँ नहि, हम चाहै छी नीर-निधि सन पसार। नहि जीबए चाहै छी गुड्डीक जिनगी, लेने अकासक पसार, जुड़ि कऽ साँचक धरासँ बनए चाहै छी अपन जिनगीक अपनहि अधार। बिसबास अहाँ अपनापर बिसबास राखू संसार अहाँपर बिसबास करत पकड़ने रहू आसाक डोरि अहाँक आस निरास नहि करत। रौदसँ सुनगैत होए जे आँगन कहियो ने कहियो इसरक किरपाक मेघ, छाँह बनि एबे करतै। कारी सियाह रातिकेँ छाती चिरबाक तागैत जइ दियारीमे छै ओइ दियारीकेँ अन्हरो निरास नहिएँ करतै। अन्हरकेँ मुकैबला जे कऽ लइ छै मलाह हुनका जिबाक ढंग अपने आबि जाइ छै। आस, बिसबास आ हिम्मतक जखन होइए छै मिलान तँ दुनियाँक कोनो कलेस नहि रहै छै कलेस। बिसरा जाइ छै पैछला झंझैटक समय। बैस जाइ छै फेनसँ खुशीक घर। जिनगी गाबए लगै छै राग आ मलार। मनक कनकौआ कनकौआ सन सौखीन मन लेने चुलबुलीक पहाड़ छूबए चाहैत अछि सौंसे अकासक बिस्तार। पहाड़, समुद्र, अटारिक बिस्तार सन सभ झंझैटकेँ अन्ठियाबैत आगुए आगू पएर बढ़बैत अछि। जिनगीक थकाबैटकेँ मेटेबा लेल चाही मनक कनकौआ आ सपनाक अकास जाहिमे मन भरि सकै निधोख सतरंगा उड़ान। मुदा किए दी दोसराक हाथमे अपन डोइर? छण छण लागल रहत शंकाक परेत कखन हम कटि जाय कखन हम लुटि जाय? चुलबुलाहैट, चपलता नेने देखए मन कल्पनाक एना, साँचक जमीनपर टिकल पएरे ने दइ छै जिनगीक अर्थ। घर सिनेह आ आतमीयता जखन देबालक चार बनि जाइ छै। वएह घर घर कहाइ छै। सुनसान जे छुटि जाइ छथि एहि जिनगीक जेहलसँ पाबि जाइ छथि एकटा नब जिनगी। बेजान तँ ओ रहै छथि जे ओकर बादो जिबैत छथि। ने रहै छै कोनो उत्साह ने उमंग रहि जाइ छै बस सुनसान, हरेक खुशीक छण सेहो कऽ जाइ छै उदास। अकास भरल छै अकास भरल छै दहों-दिस बेकल छै नहि जानि आइ प्राकृत कोन लीला करतै! बेसुध बेसुधिक हालैतमे अपनाकेँ हम ओहिना बजबै छी जेना अहीं बजाबैत होय हमरा। नहि जानि कहिया जएत ई पगलपन होश हएत कहिया। नारी जनानीकेँ मात्र जनानी किए नहि बुझल जाइ छै! समाज स्थापित कऽ देलकै ओकरा लेल जिनगीक किछु आदर्श किछु शर्त ओकरा जे निभौती ओ देबी कहौती। अपेक्षाक सिंघासनसँ उतरिते भऽ जेती पतिता। कखनो तँ देबी सन पूजलक कखनो पाएरक पनही बनौलक कखनो कठपुतरी सन मन माफिक नचौलक अपेक्षा एतेक ऊँच भऽ गेलइ जे जनानीक जिनगी ओछ भऽ गेलइ। किए नहि मानै छी सभ ओ मात्र जनानी छी! सहज सरस सरलमैत सम्वेदनाक जननी आ सृष्टिक सिरजनहारि। अपना मने जिबाक ओकरो अधिकार छै जनानी बस जनानी अछि। एकटा हेराएल जनानी शिकाइत की अनकासँ अपने सभ छीनि लेलक हमरासँ हमर पहिचान। बेटी पुतौह कनियाँ माए मे ओझराएल मेटा लेल हम अपनेसँ अपन पहिचान। बाटपर जाइत काल्हि सोर पाड़लक संगी नेन्हपनमे राखल छल जे हमर नाओं। खुजए लागल तखन हमर स्मृतिक झरोखा रौदक चालैनमे किरिणसँ निकसल धुँआएल-धुँआएल नाओं। हमहुँ कहियो हम छेलौं माए-बापक फुदकी चिड़ै हास विलाससँ भरल उड़ैत रही अँगना-घर गामक गलीसँ गामक सिमान धरि। हमर अजादीक खिस्सा पसैर गेल काँचक किरिच सन गरए लगलैन अड़ोस पड़ोस संग सर-सम्बन्धीकेँ हमर पसरल पाँखिक अजादी। नोचैले पाँखि अजादिक हमर सुन्नर सुन्नर बहन्नासँ करौल गेल बिआह नेनपनेमे हमर। पढ़ब-लिखब सपना भेल हमरा पोल्हाएल गेल घरेक सेवामे मेवा भेटै छै, जाबत सुतल छल अपन पहिचानक इच्छा ताबत किछु बर्ख धरि रहलौं गिरहस्थीमे लीन। बच्चा अपन जिनगी आ पुरुष अपन काज संग पलखैत ने हुनका हमरा लेल एको छण। पाकैत बाउल सन तपैए मन। धधकैत मरूभूमिमे ढन-ढनाइत घैल सन मन हमर खाली अछि जिनगिक मरीचिकामे तकै छी अपन पहिचान। फल्लाँक बेटी हम फल्लाँक बहुरिया फल्लाँक कनियाँ आ फल्लाँक माए बनि हम गेलौं हेराए। शिकाइत की अनकासँ अपने सभ छीनि लेलक हमरासँ हमर पहिचान। राजभाषा भुगतानक बेर बैंकमे कहल गेलइ नाओं राजभाषा नाओं देखि भेटल मनकेँ अराम। अहाँसँ तँ देशोकेँ बढ़ल अछि शान अहाँ बिनु रहने की होएत हिन्दुस्तानक पहिचान। भुगतान लेबए काल जखन लगौलनि ओ औंठा निशान झमान भऽ खसल मन भेलौं मृयमान। नाओं आ गुणक केतौ ने कोनो मेल बिधाता की केला केहन केला खेल। मनमे लेने ओकर पढ़ेबाक अभिलाषा माए-बाप रखने हेतए नाओं राष्ट्रभाषा। परिस्थितियो राजभाषासँ केलकै मजाक अक्षरोक बोधसँ ओकरा केलकै फराक। बिद्याक बाट गबरा, धापू, लिछमी आ रामी पैघ पैघ डेग बढ़बैत पाठशालाक बाटपर बढ़ि रहल अछि। आइ बहिनजी सिखेती हाँसिल-जोड़ जेकरा सिखला बुझला पछाइत बनियाँक चलाकी नहि चलतै। आखर ज्ञानसँ फैदे-फैदा बनियाँक जोर नहि चलतैन जादा। गबरा, धापू, लिछमी आ रामी आब तोरा सभसँ मनक बात कहियौ कहबौ किए ने गामक सभ जनानी पढ़ए चाहै छै हमहीं किए अनपढ़ रहब? चुलही पजारैत, दालि भात रान्हैत बिजलोका जकाँ मनमे लौकैत अछि धधकैत आगिकेँ निहारैत सुनगैत मन नेने चुल्हिसँ कचका कोयला निकालि देबालेपर ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ ‘घ’ लिखने जाइ छी। सेन्टरपर नहि जा पबैछ तँ की अपन बेटिये सभकेँ गुरू बनबैत धापली बिद्याक बाटपर बढ़ि रहल अछि। छौरमे सुनगैत चिनगी आहूत करैत शिक्षाक महायज्ञक हमरा गामक सभ जनाना महान यज्ञमे आहूति दैत बिद्याक ठेकान पाबि सुखद जीबनक बाटपर बढ़ि रहल अछि। बन्हकी हाथ जोड़ने माथ झुकौने सिकुड़ल समटल सन ठाढ़ छल ओ खिड़कीसँ झरैत किरिण लग अपन कलाकीर्तिक आगू चित्रपट देखबैत छेलइ क्षितिज छुवाक आसमे पेंग भरैत उन्मुक्त पाखी आर सोझामे बिनु पाँखिक चिड़ए सन आहैत भाव नेने ओ चित्रकार बन्हक राखि चुकल छल अपन अनुभूतिकेँ कल्पना सम्वेदना अपन कलाकेँ संरक्षक लग। की जानि छितराएल छै अकासमे ऊँन सन मेघक गोला की जानि आइ परमतमो कोन गुण धुनमे लागल छथि! परिचय अन्हारकेँ अपन छातीमे समेटने जेना दीप बनबै छै अपन दीपित परिचय। ओहिना अन्तरमे अपन नोर नुकेने संसारकेँ देमए पड़त मात्र अपन हँसी । अपन बेनाओं जिनगीकेँ देमए पड़त अहिना नव परिचय। हमर दियारी सेहन्ताक बातीसँ जरेलहुँ एकटा दियारी अहाँक नाओं। लाखक लाख दियारी अहाँक सिनेहक अपनहि झिलमिला गेलइ। मनक बन्न केबाड़ एहिसँ पहिने की अपन अधखरुआ कचोट अहाँकेँ चकनाचूर कऽ दिए सगर जिनगी हँसबासँ कऽ दिए नचार फोलि दियौ मनकेर केवाड़ आ निकालि दियौ अपन मनक विषाद। दरद तँ सभकेँ हृदयमे रहिते छै दरदकेँ पुरबे पुरुषासँ सभकेँ सम्बन्ध छै किछु अपनो कहू किछु हमरो सुनू दरदकेँ मिल जुलि सहू। एहिसँ पहिने कि ओ बहैत बहैत बनि जाए भोकन्नर सिनेहक मलहमसँ करू ओकरा फराक सिनेहक अमृत पटा सुख दुख लिअ बाँटि मनक संग जीवन सिनेहसँ करू पूर फोलि दियौ मनक बन्न केबार आ बिषाद करू दूर। घा मन आ आँखिक बीच बड़ गहींर नाता छै मनक घा आँखिक नोरे बनि ने बहै छै। बहुत अछि एक गोट सपना निस्तेज आँखिक लेल। एकटा सिसकी निःशब्द ठोरक लेल। एकटा चिप्पी फाटल छातीकेँ सिबाक लेल। बहुत छै एतेक समान हमरा जीबा लेल। बौआइत मन बौआइत मनकेँ जखन जिनगीक कोनो अनभुआर रस्तापर अपन मनक संगी मिल जाइ छै, तँ ओकर चाह रहै छै कहियो नहि रूकै ओ रस्ता एक एक क्षण बनि जाए जुग सन यात्रा अहिना चलैत रहए चलैत रहए जुग जुगान्तर धरि। अहाँ बिनु अहाँ बिनु हिरदे एना बेकल रहैत अछि जे दिन उगिते साँझ बितबाक बाट ताकए लगै छी। केकरा चिन्ता रहै छै केकरा चिन्ता रहै छै बिहाड़िक बड़का अन्हरक पछाइत। सभटा दुख छोट भऽ जाइ छै कोनो बड़का बिपैत एलाक पछाइत। सन्तोषमे ओ सुआद केतऽ! सन्तोषमे ओ केतऽ पाबी जे बेकलतामे सुआद छै सनकल बेकलतेसँ भेटए सदैत सफलता छै। सन्तोष जँ ठेकान तँ रस्ता बेकलता छै। मधुबन बुन्न बुन्न नेहक अमियसँ जिनगीक घैल भरै छै। स्मृतिक बसात आ नेहक फुहारसँ बनै छै जिनगीक मधुबन। बन्दगी भावना कखनो मरैत नहि छै भाव जीवित अछि तँ जिनगी अछि। समयक आँचरमे सहेजल छिन-छिन केर भाव ईश्वरक अरधना छै। उन्मुक्त झरनाक कलकल चिड़य केर चहकब उन्मुक्त उड़ब चानन सुवासित बसात सौनक झींसी यएह तँ अछि अहाँक हँसबाक चिन्हास। मोती जड़ित घर केर दुआर तँ खोलू ओढ़ल मुस्कीकेँ आबो तँ छोड़ू। ई सेहन्ता ई सेहन्ता अहाँकेँ हमर घर ओ हँसैत सपना अछि नीन हमर खुलए ने कहियो जँ ई बात साँच अछि नीन कखनो ने आबए। खाली अप्पन खुशीपर सदैत जुगक पहरा रहै छै दुखेटा मात्र अपन होइ छै जौं बहुत गहींर हो। डॉ. शिवकुमार प्रसाद मैथिल नहि आबैत छनि शंख बजाब घड़ी घन्टोसँ भेँट नै छनि पूजा पाठ शास्त्र ज्ञान आओर पूज्य अपुज्यक धियान नहि छनि। मैथिल ओ मिथिला केर जिनका रतियो भरि परवाह ने छनि मिथिला केर मैथिल ओ कहावैथ अपनो कूलक मान नहि छनि। छोटकी-बड़की छोटकी जँ बड अगराए बूझू बाबू छथि पौगराएत। बड़की सभ दिन चुलही निपए छोटकी पान तमाखू खाय हर बरदकेँ करए चाकरी पनपियाए लऽ खेतो जाय जो गए बड़की नेना कानउ छोटकी नित्य सिनेमा जाए मायक ममता देल हेराए। आइ जेठकी केर बेटा बनि कऽ सरिपहुँ लिलसा देलक पुराए अपन माय बेमातर भेलए बेमातर भेलए अपन माय जनम जे देलकए गाम ओगरने बड़की बेटा पाबि मुस्काय। घाघस अथवल सोंच चलय गुड़कुनियाँ देखनहुँ देखए ने देह झूठहि मेघ देखावए घाघस ओहिना करए ओ खेल। बात करममे मेल कतहु नहि करए घिनौना मेल स्वार्थक पाछू अछि बताह ओ कोना रहत कहु मेल। परम्परा तिमिराच्छादित सकल शुभ चिंतन डेग डेग गति रोधक घटाटोप कज्जल बिच कखनहु कोना मिलत शुभ शोधक बाट घाट सभ अछि सकबेधल परम्पराकेँ बोधक हमहूँ परम्पराकेँ गछारल ऊँच नीच बिच गोलक। सभ दिन अहिना मिथिला रहलै अपन बीच विष घोलक अपन अपन सभ पीठ ठोकैत जाऊ भविष ने किनको छोड़त। राग सुर बिनु राग रूप बिनु रचना सकल पदारथ अछि कुरचना। यामिनी गंधा फुलएल भकरार गमगम गमकय बारिक अँगना। चम्पा गुलाब फुलल फुलबारी नाचए वृंतपर पाबि सुरचना। मैथिल भाषाक सरस सुभाव तें संसारक बनल अछि गहना। रागमे बान्हल सोहर समदाऊन सुख दुख वर्णित मैथिल बयना। बौआइत मनुज हृदयक गहन गहवरमे आर्त क्रन्दनक स्वर भरल अछि मनुज मनुजकेँ दुतकारैए सदिखन दस्युकेँ अभिनन्दन करैत अछि। मनुऑं किए बौआइत रहैत अछि। अगम अछि ई सृष्टिक रचना दिनकर तँ उगिते रहतइ किन्तु ई निश्चित हुनका संगे नित अन्हारो संगे रहैत अछि। मनुआँ...। जँ इजोरियाक संग पुर्णिमा तँ अन्हरिया संग अमावस्या जनमसँ जिनगी जौं जुड़ल तँ मृत्यु कहाँ फराक रहैत अछि। मनुआँ...। जग संगे जन-जन अछि जुड़ल नेहक भूखल जग टौआइत अछि अपन आन आ जाति-पाति संग मनुआँ किए बौआइत रहैत अछि। मनुऑं किए बौआइत रहैत अछि। झूठ झूठक ओढ़ना झूठेक बिछौना खेनाए पीनए झुठ्ठे, झूठक सभतैर हाट लागल छै ऑंखियो भऽ गेल झुठ्ठे। हम छी झूठ झूठ अछि दुनियाँ काज बेपार अछि झुठ्ठे, किनको नहि छैन महल अटारी आँखि मुनैत सभ झुठ्ठे।। झुठ्ठे सभ उपछै छथि पोखैर अपसियांत छथि झुठ्ठे, झूठक हाट साँचो भेल झुठ्ठे गुरु गोंसांइ सभ झुठ्ठे।। सत्य करम आ सत्य विचार बिनु जिनगी सबहक झुठ्ठे, अपन करम अपने सभ भोगब नहि हमर बात ई झुठ्ठे। भातक थारी गमकि रहल गामक फुलवारी मेघक कृपा रहल शुभकारी। चननचूर तुलसीफूल गमकए धानक एहिबेर भरल बखारी। रोम रोम सुख पाबि रहल छै भूख सुतत एहिबेर गोरथारी। गाम दलान सुहावन शुभकर सबहक आगू भातक थारी। उसना भात साग बथुआ केर अल्लुक चोखा अछि सुखकारी। लाल चटनी धनिया केर पत्ता खाइत रहू भरि भरि सभ थारी। मधुर प्रात जागू हे मधुर प्रात। पुष्पकेँ पराग धएल मधुकरकेँ करैत याद फुलैत छए पाबि किरण सुरुज दऽ रहल धाहि कण कण स्पंदित छै पाबि क अहिंक राग। जागू हे मधुर प्रात। जुग-पुरुष जुग पुरुष बाते नहि करमे होइत छैक। गाए चरबऽ बला सभ किसुनमे नहि भऽ जाएत छैक ताहि लेल गोबरधन सेहो उठबऽ पड़ैत छैक। राखऽ परैत छै गीताक ज्ञान लड़ऽ पड़ैत छै गाण्डीवधारी संग रथवाह बनि भीष्म द्रोण कृपाचार्य आ अश्वथामा संग आ वंश बचेबा लेल जेष्ठ भ्राता कर्ण संग। मारए पड़ै छै स्वकेँ एकटा दोसर वंशकेँ बचेबा लेल नव राष्ट्र केर निर्माण आर नव धर्मक स्थापना लेल। शकुनी सन चरित्रकेँ कुत्तो नहि पुछै छै। दीप दीप नेसलहुँ बुच्ची दीपे सन तँ अहूँ छी अपनाकेँ जरा कऽ एहि आँगनमे इजोत कऽ ओहि आँगन तक अपनाकेँ जारैत तन मन ज्योतित करैत रहलहुँ एहि कुलसँ ओहि कुल तक आइसँ नहि अदौ कालसँ..! भोग हम जे भोगि रहल छी ओकरे भाखि रहल छी फाग दियारी ओ अगहन केर कातिक सन हम काटि रहल छी जिनगीक सभ मनोरथ नोरक तरे आँकि रहल छी। जाड़ सौंसे दिन अगियासिये बीतल रातिक कोन ठिकाना कम्मर तोसकसँ तँ नीक छल नारे-पुआर बिछाना कहुना कऽ जारसँ बाँची टोपीसँ नीक छल गाँती। मनक मन जरना नित जड़ए तैयो जाड़ नहि मानए कतबो देहपर कपड़ा लादी तैयो जाड़ नहि भागए कोना क जाड़सँ बाँची टोपीसँ नीक छल गाँती। गाए महींस थैरपर काँपय गुदरा कम्मर ओढ़ने गाछपर चिड़ए विकालक मारल देऽह लोल सटौने सबहक चिन्ता भारी टोपीसँ नीक छल गाँती। कनकनी छुटै छै बोखार सबहक किछ नहि फुरैत छै दिनोमे छै राति जकाँ कन कनी बढ़ले जै छै। छुटै छै...। बूढ़ बच्चा खेन्हरामे तैयो कँप कँपैत छै मालजालक कोना के कहत केहेन ओकर हाल छै। छुटै छै...। घरसँ बाहर सगरे तन मन कँपैत छै हेतए अनर्थ एहि बेर तेहने आब बुझैत छै। छुटै छै बोखार सबहक किछु नै फुरैत छै। रिजल्ट नाच गान आ शान सपटहि बाबू सभ मशगूल पढै लिखैमे लालबुझकर छोड़लक सभ इस्कूल। छोड़लक सभ इस्कूल ने जानै पोथियोकेर ओ नाम तीन तीन बेर परीक्षा देलक भेटय ने रिजल्टमे नाम। भेटय ने रिजल्टमे नाम मस्टरबा सभ एक्के छै कोनो बिषयमे नम्बर दस से ऊपर नै छै। जिनगीक झमेला जिनगीक मेला आब खेला लगैत अछि आगि कि पानि हो झमेला लगैत अछि। किनका की कही किनका लग बैठी काम निष्काम बेकामे लगैत अछि जिनगीक....। जड़ैत छै पुआर तँ लपकै छै धधरा मन जखन जड़ै तँ देह जाएछै पझहा नोरक ठेकान कोन कखन पघैल जाए देह मन दुनु आब बेकाबू लगैत अछि। जिनगीक....। पढ़लहुँ जे गुनलहुँ अछि एखनहुँ सहोदर भाइये बहिन सन नेहगर आ पोरगर ओकरे बदोलैत जिनगी खेपाइत अछि ऊँच नीच टेढ़ -मेढ़ एक्के लगैत अछि जिनगीक....। गाम छूटल फेर आइ गाम छूटल। नैत छल नातिन छल सुग्गा सन मेना सन बेटी छल बेटा छल आँगन बनल कचबचिया मचान छल आइ ओ बथान छुटल फेर आइ गाम छूटल। नार पुआर संग गोरहा गोरहन्नी मोट पातर ठाढिसँ घूरा बना कऽ हँसैत खेलाइत छलहुँ सभ किछ आइ छूटल फेर आइ गाम छूटल। जाड़ संग ठार्हो छलै रोटी संग सागो छलै मारा संग मरूआ रोटी दूध संग छाल्ही छलै चलैत खन नैत नातिन संग नोरक टघार छूटल फेर आइ गाम छूटल। छितिर-बितिर कन कन मन संग घुमलहुँ सगरो कन कनाइत छल देह मन नहि मानय तैयो घुमि घुमि आबी पुरने गेह मन अपचंक रहै अछि सदिखन केतए हेराएल नेह। सभ दिन सभ केर मन पुरेलहुँ बनि-बनि अदराक मेघ अन्त समय आब आसिनक मेघ सन छितिर-बितिर भेल गेह। जातिक छाऊर छौरक ढेरीमे तकैत रहलहुँ अपन आदर सनमान ई जनैत कहाँ छेलिऐ छाऊर छाऊरे रहैत छै। पानि सुखिते उड़ए लगै छै। कतबो जल किएक ने छिटल जाय। आखिर ई जातिक छाउर कतेक दिन अहिना उड़िया-उड़िया सभ किछु झॉंपैत रहतइ! ईहो तँ जिनगीए छै जखन देखैत छी जिनगीक ओल झोल मोल तोल ऊँच नीच अपनकेँ आन सन आनकेँ समांग सन अपनेमे टेंढ़ लाख दू लाखपर छाँटैत बड़प्पन तँ देख देख कखनो हँसैत समाज बीच कहुना जीबि लैत छी अपनेमे सन्हियाइत ईहो तँ जीनगीए छै। गामक बात ई मौसम अछि कतेक नीक धात्री फरल बैगन फरल आलू उखरब अछि नजीक कुरथी दालिक पुछू ने बात अपना गामक राखी आश की कहू अपन गामक बात। बथुआ संग खेसारी साग मटर पालक भेल भकरार धनिया आ धात्री केर चटनी नबका चौरक मीठगर भात की कहूँ अपन गामक बात। डिल्ली बम्बई बड़का नगर अपना गामक सुटकल डगर बड़का नगर आब धरऽ दौड़ए अपने गामक राखि आश की कहूँ अपन गामक बात कोबी-मूड़-मटर केर छिम्मी खेत-खेतमे हँसैत गुम्मी कन-कन सागक संग सोहनगर लागए केहन सुन्नर गात की कहूँ अपन गामक बात। मनोरथ सभ दिन बीतल जिनका संगे ओ सभ कोसो दूर बसैथ मन रहितो हम पहँच ने पाबी मनमे बलू नजीक रहैथ। ओ दिन आब फेर घूरि ने औतै नेहक फाँस अछि कूहि रहल जे जतए छी चाहैत छी औहिना क्यो कतबो बलु दूर रहथि। वेलेनटाईनक बात जेहने तोँ छेँ तेहने सेंए छौ दुनू छेँ बुड़बक, सभ कोइ वेलेनटाईन मनेलकै तोँ रहलेँ अलबट्ट। एकटा कोढ़ही तोड़ि कऽ लऽ आन साँएक दहिन हाथ, कहिहैन हेप्पी वेलेनटाईनजी बुझलहिन खह्रकट्ट। बसंत आबए बसंत गाबए बसंत मन मधुकरकेँ फुसलाबए बसंत अलिकुल उड़ैत गाबैत बसंत टिकुलिक पाँखिपर उड़ैत बसंत आबए बसंत...। आमक पल्लव लागल बसंत मधुमाछिक मन उड़बैत बसंत सरिसबक हँसैत पियर पियर फूलोक संग हिलसैत बसंत आबए बसंत...। हर्षित बसंत पुलकित बसंत पल्लव पल्लव मंजरित बसंत हरियर-पियर धरणी जननी सबके मनमे सिहकैत बसंत आबए बसंत गाबए बसंत। बसंती भोर बसंती भोर सिहकैत ठोर गाबैत अछि नाचैत अछि ता धिन्ना ता धिन्ना धिन्न धिन्ना मनक मोर। कर्मक बाट चल रे मनुआँ कर्मक बाट कर्म बिना किछु मिलए ने जगमे कर्मे बिकतए जगकेर हाट। सुरुजो चान नित्तहुँ उगए बाट बटोही तहिना हमहूँ किएक ने पकड़ी बाट। चल रे मनुऑं...। रोग बियादि नित्त लगले रहतए झगड़ो-झंझट लगले रहतै हम किएक बैठब बिन काज। चल रे मनुऑं...। कर्मेसँ संसार चलै छै चुट्टी पिपरी जीवो-जन्तू सभ चलै छै करमे बाट चल रे मनुऑं कर्मक बाट...। बिसबास शरम भरमसँ जीबि ली कलयुग अछि अतिकाल बिना केने किछु मिलत की केने भेटत तत्तकाल। खूब गुलछर्ड़ा उड़ा लेलहुँ जा छल तनमे शक्ति, तीन पनक आब अन्त अछि करबाक अछि आब भक्ति। हम छी प्रेमी प्रेम केर प्रेम बिना सभ सून टाका कैंचा की करब ऑंखि लेब जब मुइन। करजा लऽ कऽ नहि मरी मनमे अछि अभिलाष। पाँच लोक मिलि जारि देत अछि एतबा बिसवास। थकावैट रतुका जागल नीनक मातल एखनहु भासैत देह नव वर्षमे नव-नव चिन्तन नव-नव देखल भेष। राजनीति केर कपट कोरमे क्यो नहि रहता चैन के अछि गुरु के अछि चेला किनको अछि नहि मानि। बहुत कठिन अछि लंगर झंगर झुझुआएल अछि मऽन बात करब आब नहि अछि सम्भव थाकि गेल सभ तन। गुलाब लाल-पियर देह संग मनमे उमंग छौ वाह रे गुलाब तोहर केहन सुगंध छौ। काँटसँ देह भरल तैयो हँसैत छेँ केहन छौ मन सुन्नर सभ कियो चाहैत छौ। वाह रे...। हावाक संग संग झूमैत रह अहिना शीत रौद वात घाम तोरा लेल एक छौ। वाह रे...। तोरा सन मन धन केकरा मिलैत छै तोरा तँ देख देख दुनियाँ ललैत छौ। वाह रे...। अहिना तँ मनुषोक जिनगी मिलैत छै सुख दुखक पाटमे सभ ओझराएल छौ वाह रे गुलाब तोहर केहन सुगंध छौ। अपन चिन्हल रेह अप्पन गेह सिनेहक मेह घुप अन्हरियोमे भेटिये जाइत छैक। अगहन पूष कखनहुँ अगहन कखनहु पूष भेल नेवान फेर भेल पुषौंठ कखनहुँ चूड़ा गूड़ विशेष कखनहूँ बगिया लाई सनेस मन हुए तँ पबितो जाउ नहि तँ दिनक दिन जलखै खाउ। जुआनिक बोखार साँझ भेल ओझल भेल जहादोक मस्तूल संगहि छै डुमए लेल सुरजो अन्हारमे, सभ किछ डुमि जेतै साँझक विलासमे जेना जाइ छै डुमि सभ किछु जुआनिक बोखारमे। आश विहीन हास विहीन अगनित काज,एसगर कर्ता भिनसरसँ साँझ भूत बनल भिरल छी बेटी ट्यूशन जेती चलू बुच्ची। बेटाकेँ बस छुटि रहल छै, एलहुँ जल्दी नहऊ, नहाए छी। जल्दी आएब, छः बजे मीता ओहिठाम। हम छी पिता हकासल पियासल अपन संततिक लेल नट बनल नाचि रहल छी आश वहीन हास विहीन! कुदीन हमर नगरमे प्रेम रोग केर सभसँ नीक निदान झट-दे दुनुकेँ बान्हि कऽ कूटू निकसै जावत प्राण। साँझमे आरती भोर पराती गाबए छल अनुरागी, दुनु कहुना जान छोड़ा कऽ भागल संगहि काशी। रजनी-सजनी केर गेलै जमाना राग-विराग गरासी अर्थयुग हाबी भेलए सुदिनपर कुदिन भेलए अविनासी। जनमलकेँ नहि समटल नेहक धार सुखायल मनसँ कर्मक बाट नहि परखल आन्हर भेल परिवार समाज बीच जनमलकेँ नहि समटल। कामुक बनल किशोर मूर्ख जन कर्म-कुकर्म नहि परखल सभसँ दोषी हम अभिभावक धनक गर्वमे भटकल। जनमलकेँ...। एखनहु चेतु आँखिक काजर बहि ने जाए जे अटकल अन्त एकर नीक नहि होएत मन हमर कहै परखल। जनमलकेँ नहि समटल। ठनकल फेर ठनका ठनकल फेर ठनका हाथ धरू माथपर बचाउ जुनि अनका। पथलक चोट खाए अपने चोटेलहुँ बरखाक पानिकेँ आरि काटि बहेलहुँ पानिमे डूबल लगए अहु बेरक लगता हाथ धरू माथपर ठनकल फेर ठनका। अपनेसँ सभ छै अपनाकेँ गछाड़ू अनका डुबए दियौ अपनाकेँ सम्हारू, अपनापर धियान दियौ छोड़ू ने हुनका हाथ धरू माथपर ठनकल फेर ठनका। विरान कियो अपन ने आन हएत संसारो विरान सभसँ मिल कऽ रही अपन मनकेँ कही सभ किछु रहत एतए भऽ कऽ जाएब विरान। मन नहि लगैत अछि मन नहि लगैत अछि हल्ला धुम धराक बीच अप्पन कि आन बीच शीत वात ताप बीच। सिनेह हीन स्वार्थ बीच टुटैत सपना आ देखावटी हुलास बीच। चतुर्दिक कल्मष आ अपनहुँ विरान बीच जोगल सिनेहक मरैत थकान बीच। तीत मीठ कटु कोमल राग ओ विराग बीच प्राणो कण्ठगत अछि मर्मक कचोट बीच। सुमीता भोरे उठती बारहनिए हाथे बाल बोध केर चिन्ता गेएली चुलही पोछैए तँ दूधक एलनि सुरता। बौआकेँ स्कूल जेबाक छै अपनो आपिस जेता हाँए हाँए कऽ चाय बनौली बर्तन राखल छिट्टा। नित दिन हिनकर य्एह अछि जीबन अपना लेल नहि चिन्ता पति पुत्र केर सेवा धर्मे जीली हमर सुमीता। अनसोंहाँत देखा देखी जुनि करी बेचि लोक अरु लाज होटल मोटल जहाँ तहाँ आँठि कूठ भेल भाग। जगतमे ज्ञानी हम छलहुँ कहैत अछि इतिहास आजुक पीढ़ी देखि कऽ किनकासँ राखी आश। सएमे पाँच दस भेटि रहल जनिका अछि किछु धियान गाम गाममे जाँचि लिअ किनका घर बाँचल मान। लिखब बाजब बहस करब बिन बाती बिन तेल टिम टिम डिबिया कहि रहल नहि अछि संगी कोइ। पुत्र-पिता परिवारमे कैंचा भेल अभिशाप भाए भाएकेँ गीड़ रहल अपनहिसँ अछि त्रास। फगुआ सख सेहन्ते एलि कनिया फगुआ रंग खेलाएब भौरेसँ भाँगि पीबि ओ पटिया पर ओंघराएल। कहू तँ नीक केला ओ हमरो द्विर केला ओ। घरमे पाबैन नहि छैन मतलब भंगबतहासँ संग एक्के टाँगे नाचल दुनू फेर भाँगे भकुआएल। कहू तँ नीक केला ओ हमरो द्विर केला ओ। फागुन रस बरसए हो रस बरसए हो रस बरसए फगुआमे बलम घर आएल हो रस बरसए। संगमे लौलनि नब नब साड़ी लाल पियर बिच झलकै किनारी नब नब रीत रचै बालम रस बरसए फगुआमे बलम...। सरिपहुँ फाग मन भावन लागए आइ भवन मनभावन लागए मनक मनोरथ पूरल हो रस बरसए। फगुआमे बलम घर आएल हो रस बरसए। देख एलौं हम पटना हलसल-फुलसल बसमे बैस कऽ पहुँचि गेलौं हम पटना देख एलौं हम पटना। भरि रस्ता हम उड़िते गेलौं रातिक नीन भेल सपना केतबो गुहारि देव-गोसाओनकेँ मन पड़ैत छल फेकना देख एलौं हम पटना। बाप जनम नै देखने छलौं एहेन मनुक्खक जंगल भोजे बेरमे पहुँचि गेल ओ पपिआहा घर-घुसना देख एलौं हम पटना। चोर-उच्चका डेग-डेगपर भीड़ देखि कऽ जी उड़ैत छल बाहर-भीतर जाएब कठिन छल बेथाक नाओं अछि पटना देख एलौं हम पटना। हुनकर बात काटि हम एलौं बाल-बोधकेँ छोड़ि कऽ एलौं नेताजी की बात बनौता मोन रहत ई घटना देख एलौं हम पटना। मन होइत अछि उड़ि कखन हम पहुँची अपन सोहागक अँगना मेटा रहल अछि झँपा रहल अछि अपन हुलासक सपना देख एलौं हम पटना। नेह भोरे भोर जँ आगि उठैत छै कोना मेटत बिनु पानिक मेह कोना कतहु प्रेम उपजतै किनका लग भेटत ओ नेह। जिनगी भरि सिनेहक आसे गाछे गाछ घुमि एलहुँ एक-आधकेँ छोड़ि जँ पूछी बाँझे बाँझ बौएलहुँ। निर्मल मनकेँ निर्मल एना ओहिमे रूप सलोना ओहि रूपकेँ पागल सुगना ताकए कोना कोना। किनको क्यो नहि भेल माया-मोह ममतामे फॉंसल जिनगी रहल हेराएल नीत-अनीत ने मानल कहियो ताहुसँ तोष नहि भेल। जगतमे किनको कियो नहि भेल। जिनगिक जोंक सदैत लेहु पीलक दिन दिन मोटगर भेल देह सुखाएल पएर निह तागैत किनको कहल नहि गेल जगत मे किनको...। नैन रहैत देखल नहि किछुओ श्रुतिपथ करए ने काम चर्म रुधिर करए मनमानी कर्मे बैरी भेल जगतमे किनको कियो नहि भेल। पियास अपनहि मने धार उपछै छी कखनहुँ उड़ी अकाश ताल तलैया जंगल पर्वत उड़ी पवनकेँ लाथ सगर जनम औनाएते बित गेल तैयो ने मुइल पियास। अत्मा केर छोलिका छिलैत अछि सभ दिन अत्मा केर छोलिका राजनीति कूटनीति भेल जेना ओरिका। सभटा मलाय खाएत नितौ मुटाइत अछि खुरचन आ छोलनीसँ छिलाएत कोना सभटा छिलैत अछि...। बकरी दुहैत छै पाठी मेमियाइ छै अपन अपन पठरू लेल औना रहल सभटा छिलैत अछि...। माइयेक पेटसँ सभ सीख एलै राजनीति राजनीति पढ़ुआ सभ धेने अछि कोन्टा छिलैत अछि सभ दिन...। हे जगत गुरु जन खोंटि कऽ एको टुक हमरो जँ दैतिऐ पढ़ल लिखल राजनीति घुमि अबितै सभटा। छिलैत अछि सभ दिन अत्मा केर छोलिका। ओझराहैट करचिक ओझराहैट सन जिनगिक अछि झंझैट एकटासँ छुटैत दोसरामे ओझराइत छी। देह गेह नेह संग डूमैत आ थाहैत कखनहुँ अकाश खन बसाते उड़ि जाइत छी। एकटासँ छूटैत दोसरा...। लोभ मोह सोग केर महिमोकेँ जानैत माया केर फाँसमे तैयो बन्हाइत छी एकटासँ छूटैत दोसरा...। जिनगी उड़ि रहल बनि कऽ ककोहा तैयो नव खड़ही बनि जीबैले छटपटाइत छी एकटासँ छुटैत दोसरामे ओझराइत छी। भुमकम चारि दिवस ओ सगर यामिनी नीनक मातल भेल हताश किनकहुँ कतहु त्रास भेटए नहि भुमकम भेल गरदनिक फाँस। कोना जीयब? की करत विधाता? ज्ञान-विज्ञान सभ भेल अथाह दरकल भीत भियौन लगैत अछि घरो बाँचक नहि अछि आश भुमकम भेल...। किनको छुटल प्राण क्यो बाँचल क्यो-क्यो दुखे भेल बताह मनक बेथा किनकासँ बाँटी घरक-घर भऽ गेलै नाश भुमकम भेल...। धरतीक संग थरथर काँपइ गाछ-बिरीछ संग मानव जाति की हम केलहुँ की हम पेलहुँ किनको नहि बुझबाक अवकाश भुमकम भेल...। दू-चारिक बात रहल नहि हजारक-हजारकेँ लऽ गेल काल केतबो क्यो कलोल कए थाकल बैठला थाकि-हारि-कऽ आश भुमकम भेल...। पाथरक नव जंगल बनाओल जानक ग्राहक ओ बनि गेल सर-सम्पैत संग छीनि कए लऽ गेल जीवनक सभटा हास-विलास भुमकम भेल गरदनिक फाँस। दीप सगर राति हम दीप जरेलौं तैयो घर अन्हारे अछि राति-राति भरि दिनक आशमे मन हमर ओझड़ाएले अछि तैयो घर अन्हारे अछि। तमसो मा ज्योर्तिगमय केर पाठ सभ नित्य दोहराबैत अछि तैयो नित्य इजोतक चाहमे एखनो सभ अन्हाराएल अछि तैयो घर अन्हारे अछि। मैथिली संगे मिथिला जीतल देशक भाषामे नाम जुड़ल भाषा केर सम्मानो बढ़ने सबहक ऑंखि किए मुनल अछि तैयो घर अन्हारे अछि। भाषा ओ साहित्यकेँ जे जन आगू आइ बढ़ाबै छथि हमरा बुझने वएह छथि मैथिल हुनके नाम आइ गाबक अछि राति-राति भरि दिनक आशमे मन हमर ओझड़ाएल अछि सगर राति हम दिन जरेलौं तैयो घर अन्हारे अछि। मन पछताय कन-कन माटि कन-कन देह कन-कन पानि कनकन छै खेत अगली-बगली खेत पाटि गेल ऊँचका पाटी भेल बलाय की करी नै करी मन पछताय। हाथ-पएर केर ऑंगुर ठिठुरल छिपली मानए नहि ऑंगुरक बात खेतक आड़िपर राखल जलखै कौआ अलगे खेल-खेलाय की करी नै करी मन पछताय। धानक बुट्टी जरि गेल भोरे आगि-छय केर कोन उपाय बिनु पटौने खेत छोड़ि कऽ आगिक भॉंजमे कतए जाय की करी नै करी मन पछताय। बड़ झंझटिया खेती-बाड़ी गहुमक खेती बड़ दुखदाय जाड़ै-जनमए जाड़े बाढ़य जाड़े मे ओ फरए-फुलाए की करी नै करी मन पछताय। जाड़े-जड़ेलहुँ खेत भेल हरियर धरती भेली परम सहाय पछबासँ जँ बाँचि गेल तँ सभटा मेहनत जाएत भुलाय की करी नै करी मन पछताय। सभ झूठ-फूसमे बाझल छी सभ झूठ-फूसमे बाझल छी कियो अपन डीह नहि ताकै छी। अपन चास-बास छोड़ि सभ अनकर चास सम्हारै छी अपन गाम सुनसान लगैत अछि अनकर गाम बसाबै छी सभ झूठ-फूसमे...। अपन सहोदर दुआरपर अँटकल दोसर सहोदर ताकै छी गाम-गाम केर एक्के खिस्सा दुआरो दीप नहि बारै छी सभ झूठ-फूसमे...। भाषा भेष बदैल रहल छै नित-नित नूतन मिथिला केर अपन भाषा बिसैर रहल छी आने भाषापर आश्रित छी सभ झूठ-फूसमे...। हाकिम, अमला मील मजूर बनि जीबू जेतए जे काज मिलए अपन भूमि-भाषा नहि बिसरी मिथिले केर अहाँ बेटा छी सभ झूठ-फूसमे बाझल छी। शहर ओ गेल शहर ओ गेल मनुक्ख बनए लेल गाममे रहि बन-मानुख छल शहरक पाथर केर जंगलमे ऊहो आबि आइ पथरा गेल। शहरक पाथर केर...। गाममे छल भाए-बहिन सभ कियो बाबू कियो काका छल भैया-भौजी बेटी-भतीजी नै कियो बिनु नाता छल। शहरमे जाइते रिश्ता-नाता सभटा मटिया-मेट भऽ गेल शहरक पाथर केर....। पथराएल शहरी पाथरमे कनिको मानवता नै बाँचल चारि बर्खसँ चालीस बर्ख केर बुच्ची, जननी बलि चढ़ि गेल शहरक पाथर केर...। बाट-बटोही देखतो आन्हर सुनितो रूदन बहिर भऽ गेल पशुतो एहेन कुकर्म सुनि-सुनि चुड़ुक पानिमे डुमि मरि गेल शहरक पाथर केर जंगलमे सभकेँ सभ आइ पथरा गेल। साँझ साँझक संगे भागि रहल अछि चिड़ै-चुनमुन बाँसपर बरद-गाए केर जेबर तहिना दौड़ि रहल अछि बाटपर। गौधूलिसँ पाटि रहल छै नभ-ऑंगन घर-गामकेँ बछा-बाछी चिकरि रहल छै टोलक-टोल बथानपर। सुरुज सिनुरिया अलोपित भेल धूरा केर एहि मेघमे बेटी-बहुरिया दीप नेसने साँझ देथि ऑंगन-दुआरपर। बाट-बटोहिक डेग भेल नमहर गाछी-बिरछी भेलै भियौन नेना-भुटकाक दीठि उतारथि दाइ-माइ ओसारपर। आ गइ निनिया बाट तकैत छौ हमर बौआ ओछैनपर कथा-पिहानी घुमि रहल छै बौआ केर लिलारपर। ढोलक बोखार सुनलक ढोलिया टिक भेल ठाढ़ गुणमन्ती भेल गामक भार गाम-गाममे गुणमन्तीकेँ छुटि रहल अछि आब बोखार सुनलक ढोलिया...। अगड़ा-पिछड़ा फेंटम-फेंट बाप-दइयासँ होइ छै भेँट पॉंच बर्खसँ नीनक मातल घुमि रहल कुरयाबैत पेट कोना हएत आब नैया पार सुनलक ढोलिया...। दूरक ढोल सोहनगर छेलै लगक ढोल छेलै भेल बेकार दंगलक डगर सुनिते मातर गुणमन्तीकेँ चढ़ल बोखार सुनलक ढोलिया टिक भेल ठाढ़। खेबैया सबहक नाहकेँ भेटल खेबैया बिनु खेबैया हमरे नाह अछि देखू पार आब केना लगैत अछि बिनु खेबैया हमरे नाह अछि। किनको टाका पार लगौतन्हि किनको नेता पार लगौतन्हि अपन-अपन बाँस भिरौने बहुतो पार उतरलौ जाइ छथि बिनु खेबैया हमरे नाह अछि। दूर-दूर धरि नजरि खिरौने ताकि रहल छी आँकि रहल छी किनका पछुऔने पार लगत आव कियो संगी नै भेटि रहल अछि बिनु खेबैया हमरे नाह अछि। किनको बड़का पैघ हबेली किनको बड़का पागक डौड़ही किनको सार किनको छनि साढ़ू धोती जिनक अकास सुखाइत अछि बिनु खेबैया हमरे नाह अछि। माय हमर नव-कुम्भ नहेली माय हमर नव कुम्भ नहेली नै हुनका मन पापक गेठरी नै हुनका मन बाँझक धोकरी नेना-भुटुकाक साँस हास संग जिनगी भरि ओ खूब नहेली माय हमर नव कुम्भ नहेली। नै कहियो ओ चानन केली नै कहियो संन्यासिन भेली गिरहस्थीकें स्वर्ग बूझि ओ कर्मक संग प्रभु कें गुण गेली माय हमर नव कुम्भ नहेली। नै ओ विदुषी नै ओ सुन्नरि नै आडम्वरी नै कनसोही बाट-बटोही सभ जन हिनका मनुक्ख रूपमे भेटल सिनेही माय हमर नव कुम्भ नहेली। मनक प्रयागमे त्रिविध तापकेँ कर्मक हुलासमे अपन गर्वकेँ अपन मनोरथ परक सुख लेल आजीवन ओ डुमौने रहली माय हमर नव कुम्भ नहेली। छठि पाबैन सबहक केरा सबहक नारियल सबहक ठकुआ एक्केरंग सबहक मनमे भक्ति-भावना ठकुए सन छै एक्केरंग सबहक ठकुआ एक्केरंग। बाँसक पथिया बाँसक कोनिया माटिक दिया एक्केरंग मोट हौउ वा हौउ ओ पातर सबहक मुड़ै एक्केरंग सबहक ठकुआ...। अल्हुआ-सुथनी, हरदी-आदी सेब-समतोला एक्केरंग नवका साड़ी नवका धोती भुवन भाष्कर एक्केरंग सबहक ठकुआ...। पोखरि हो कि कछेर धार केर आँगनक पोखरि एक्केरंग सभठाम पानिमे ठाढ पबनैतिन सबहक व्रत छन्हि एक्केरंग सबहक ठकुआ...। सबहक अँगना गोबरे नीपल नेना-भुटका एक्केरंग सभकेँ छठि परमेशरी देथिन अभिलाषित वर एक्केरंग सबहक ठकुआ एक्केरंग। प्राकथन काँट आ फूल हमर जिनगीक सहोदर अछि। उपेक्षा-अपेक्षा अछि सहचर सत्य दिस आकर्षण असत्यसँ विकर्षण मनमे सदैत बनल रहैत अछि। विविध कला आ सौन्दर्य हमर आकर्षण केर केन्द्र विन्दु अछि। हम स्वीकार करैत छी। मिथिला धाम अपन गाछक छाहमे अपन मिथिला धाममे अपनहि माटिपर बैठल छी अपन सिमरा गाममे। मधुर लगए अछि अझुका रौद पछबा बहै झिहिर झिहिर लुक्खी मेना कचबचिया सभ संगहि अछि आई गाममे। पौरकी सेहो देखल आइ बहुत दिनपर सीसो तर काज करै छी कैव करै छी स्वर्गसँ सुन्नर गाममे। अपन मिथिला धाममे। तँए किछु ने किछु लिखैत जाउ लिखैत-लिखैत किछु लिखिये देबै मैथिलीक उपकारी हेबै तैं किछु-ने-किछु लिखैत जउ। छपैत-छपैत छैपिये जेबै एकदिन लेखक बनिए जेबै मंच आर इनामो भेटत तैं किछु-ने-किछु लिखते जाउ। मौलिकता केकरा कहैत छी किनकामे मौलिकता छनि सभ कियो एक्के बात लिखै छथि सबहक नीयत साफ देखाइत अछि तैं किछु-ने-किछु लिखते जाउ। नीर-क्षीर विवेक किनका छन्हि लिखनिहारमे हंसत्व किनका छनि पूर्जा-पूर्जी जोड़ि-तोड़ि कऽ किछु-ने-किछु घँसैत जाउ तैं किछु-ने-किछु लिखैत जाउ। निर्मलीक निर्मलतामे निर्मलीक निर्मलतामे मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि शिक्षाक ऐ महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि। कैंचा-पैसा जोरि-जोरि कऽ माए-बाप सभ पठा रहल अछि कोचिंग, विद्यालय, कौलेजमे एक-एक जन लुटा रहल अछि। शिक्षाक एहि महापंक...। के पठौतइ केकरा लग जा कऽ नेना भुटका पढ़ि रहल अछि नै सुधि बुधि ई केकरो छनि अपने झंझट ओझराएल अछि। शिक्षाक एहि महापंक...। चटिया सभ चटिसारक लाथे गुरुजी पायबटोरक बाटे अपन-अपन भॉँजमे सभकोइ डरीर छुबए लेल अपसियाँत अछि। शिक्षाक एहि महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि। गामक जिगनी लेटा रहल अछि। बौआक उबटन कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर उबटन बिला गेल। सोइरी केर अशौचक संगे मिथिलाक संस्कार हेरा गेल। कजरौटी केर...। नव युगक नव संस्कारमे जॉनसन बेबीक पाउडर मिलि गेल माइक स्तन छोड़ि कऽ नेना बोतल संगे माए भुला गेल। कजरौटी केर...। सिनेहक डोरि तोड़ि कऽ ममता सुन्दरता केर मोल बिका गेल दाइ नौरिनक संग पाबि कऽ नेना माइक नेह भुला गेल कजरौटी केर...। अपन आन सभ पाइपर बिक गेल सम्बन्धक सभ आँच बुता गेल धन लक्ष्मीक चकाचौंधमे तन मन रागक रंग मेटा गेल कजरौटी केर...। सोहर जन्म बधैया संगे मूड़न उपनैनक महत मेटा गेल लकदक गाड़ी वस्त्राभूषण संग बरूआ केर आचार्य भुला गेल कजरौटी केर काजर संगे बौआ केर उबटन बिला गेल। राहुल कुमार चौधरी, रुद्रपुर, मधुबनी हेलैत प्राण शोणितक पोखेर मे हम हेल रहल छी आ अहाँ, बारुदक महार पर बैसि माछ मारि रहल छी । बंसी केँ त' बातें छोड़ु अहाँ त महाजाल फेक रेहूँ, भाकुर जेना मारि रहल छी मनुक्खक प्राण दुनू विश्वशक्ति केर बीच हमर अंगना, बेन गेल ऐछ सझिया खेत आ, कर्बला के मैदान । धू-धू कऽ जरि रहल य' हमर इतिहास आ, सभ्यता । लागल अछि अहाँ केँ आँखि पर अन्हारजालि, मुहँ पर जाबी, कान पर पर्दा। नाक सेहो बन्द ऐछ की दुर्गन्ध ने लागेत य'। मनुक्खक माउसक जे चाहुँदिश पसरल अछि हमर माइयक शोणित जे पिछला दस दिनसँ, जमल अछि माटि पर इराक, लीबिया आ अफगानिस्तान केँ बाद हमर अंगना बनल अहाँ केँ, युद्ध मैदान । भसिआएल जिनगी मे, जे किछ शेष अछि सब छी मात्र, अवशेष जरल इतिहासक आ सभ्यता केँ । मुदा परती ने रहत शोणित सँ, भीजल माटि पर, नव कोपर निकलट । शोणितक पोखेर हेलैत-हेलैत हम घाट पर पहुँचब आ तखन लेब बचल अवशेष आ शोणितक एक-एक ठोपक सुइद जोरि हिसाब । बृषेश चन्द्र लाल ठंढाउ, हिड़ला लगाउ ! जाउ ठंढाउ ! पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगाउ !! १. बौआ आओत दिन ताकिकए संगे लाओत केक, घुटुघुटुकए मुँह खुआओत करब फेसबुक चेक ! जाउ ठंढाउ ! पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगाउ !! २. चन्दा मामा दूरसँ पूआ पकाबथि गुंड़सँ ओहिना पकाउ, गामक दलानसँ थपड़ी बजाउ । असगर हँसू लाइव चलाउ, बिचकू कूदू गाल फुलाउ !! जाउ ठंढाउ ! पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगाउ !! ३. आ आ रे खंजन चिड़ैया नेटबाके अवतारमे, कुहुर काटे बाबु–मैया घर–बारीके झारमे । रंग सजल बजारमे । आ आ रे नेट चिड़ैया धरैत अन्हार भगा, देखा–देखाकए सुस्त लालसा झुर्री आँखि सुता !!! जाउ ठंढ़ाउ ! पोखरिके भीड़पर हिड़ला लगाउ !! रामदेव प्रसाद मण्डल ‘झारूदार’ झारू देख-देख दुनियाँ केरि रीति असगर दुख हम करब केतेक। शिक्षा तँ असमान छुबैत अछि पुरी पाताल धँसि गेल विवेक।। गीत- माए-बाप भऽ गेल नीम करैला कनियाँ तँ वर मीठ छइ।-2 देखू यौ बाबू आबि गेल आगू केहेन जमाना ढीठ छइ।-2 इलम छै नहि काम काजकेँ बुझै नहि किछु लोक लाजकेँ।-2 जौं बुढ़िया बेवहार बुझबै टुटै-ले ओकर पीठ छइ।-2 देखू यौ बाबू...। जबसँ गेलै दिल्ली दुल्हा फेर नहि फुकलक घुरि ओ चुल्हा।-2 बुढ़ियासँ सभ हटल करबै अपना धेने सीट छइ।-2 देखू यौ बाबू...। लक्सक खुशबू तन गमकै छै साड़ी सीतारा सोन चमकै छइ।-2 फाटल-पुराणमे बुढ़िया जीबै कनियाँ झाड़ै जीट छइ।-2 देखू यौ बाबू...। हरदम ककही हाथ रहै छै माथसँ आँवला तेल बहै छइ।-2 अलता-टिकुली-रीबन चोटी ठोरक लिपीस्टिक हीट छइ।-2 देखू यौ बाबू...। झारू बेवहारे पहिचान कराबै बेकती और इंसान केर।-2 कियो देखाबै रूप दानवी केकरो गुण भगवान केर।-2 प्राती- उठू जागू बेटोही भिनुसर भेल छुपि गेल निशाँ आब जागू ने। बहि रहल पवन अमृत धारा निज तनमे एकरा लगाबू ने।। आलस बिसतर खटिया छोड़ू नित्त क्रियामे तनकेँ जोड़ू।-2 दिशा दतमैनक राखू याद स्नान करू तेल मलला बाद।-2 मलि तन पोछू निज गमछासँ कपड़ा कालादेशक पाबू ने।-2 उठू जागू...। मन्ने-मन्न हरिक धियान धरू माए-बाबूकेँ प्रणाम करू।-2 आशिष लिअ सत्त सेवा केर बोलीमे बाँटू मेबा केर।-2 निजसँ जानू पर पीड़ाकेँ दुखियाकेँ गला लगाबू ने।-2 उठू जागू...। झारू साधुवाद हे देशक धरती साधुवाद हे सभ जनता। साधुवाद हे ताज देशक साधुवाद हे सम्प्रभुता।। गीत- हमरा देशक धरती महान छै गइ बहिना। तँए सोनासँ भरल भण्डार छै की ओहिना।। केतौ लोहा केतौ ताम्बा भरल छइ।-2 केतौ चानी केतौ हीरा गड़ल छइ।-2 केतौ कोयलाक भण्डार छै गइ बहिना तँए सोनासँ भरल भण्डार छै की ओहिना।-2 जेतए छै किमती आनि जानसँ। झूकै नहि ई बस टुटै शानसँ।-2 राष्ट्र हित लऽ सेफ छै प्राण गइ बहिना तँए सोनासँ भरल भण्डार छै की ओहिना। सेवा केर जेतए परम्परा छइ। सभ मानव लेने हाथ खड़ा छइ।-2 घर आएल मेहमान लगै भगवान गइ बहिना। तँए सोनासँभरल भण्डार छै की ओहिना।-2 झारू जीयो और जीने दो मन्तर जँ जपतै ई जग संसार।। जग अमनकेँ जड़ि जुएतै हरिएतै मानव अधिकार।। गीत- जीयो और जीने दो मन्तर राखू हरदम याद यौ।-2 किए केकरोसँ झगड़ा हेतै हेतै किए विवाद यौ।-2 किए...। आसमान छी सबहक पिता भू मण्डल छी सबहक माता।-2 तँए भैयारी सभ जग वासी मनमे करू सुआद यौ।-2 किए...। बढ़बू जन-जनमे सभ प्रीत हेतै मानवता केर जीत।-2 एक बनि जीबै सभ जग वासी घर-घर दियौ समाद यौ।-2 किए...। दियौ जग अमनपर जोर चलू विश्व शान्ति केर ओर।-2 केकरो नै कियो करै गुलामी सभ जीबतै अजाद यौ। किए...। झारू मान नै केकर मन मानै छै केकर मन मानै अपमान।। अपनाबू सभ जीव जगतकेँ पूरत अहूँकेँ ई अरमान।। गीत- शिक्षाक बौछार लागल छै घर-घर पढ़ाइ-लिखाइ छै।-2 बड़ी सरम केर बात आबो लोकसँ लोक छुबाइ छै।।-2 केकर लहु केकरासँ कम छै सभ लहुमे एके दम छै।-2 श्रद्धा और सिनेहमे सबहक बड़बैर हक देखाइ छै।।-2 बड़ी...। जेकरा नै जीवनक आधार की बुझतै मानव अधिकार।-2 ऊँच नीचक हथियार उठा कऽ जगसँ लड़ै लड़ाइ छै।।-2 बड़ी...। मानवताक शासन मानू सभ मानवकेँ बड़बैर जानु।-2 जीबैक हक छै सभकेँ बड़बैर अन्धोकेँ ई देखाइ छै।-2 बड़ी...। झारू काल्हिकेँ के देखलकै बाबू काल्हिक करिश्मा बड़ा महान।। काल्हि हाथमे हेतै खप्पर आ की करब अहाँ कंचन दान।। गीत- आब की कड़ी हम सामने खड़ा सवाल छै।-2 जीनगी भेल दबाल छै ना।।-2 जँ फँसि जाइ छै ई मशला की करबै होइ नै फैसला।-2 ऐ सँ वंचित नै कियो राजा रंक कंगाल छै। जी...। भेटल समयसँ नै जवाब कल्लर बनि जाइ छै नबाब।-2 या खोजि गलत हल जीनगी करै हलाल छै। जी...। हल लालच केलक सवाल जिनगी फँसि गेल ओझड़ी जाल।-2 आब के छोड़तै केकरो कहाँ मजाल छै।-2 जी...। उत्तर समय चाहै छै कम जीयब या की घेरत जम रक्षा करू विधाता मौत जिनगी के सवाल छै। जी...। खोजै समय रहैत सच उत्तर बिरला छै जगमे ई पुत्तर। दुख से पाबै, जिनगी तेकर बबाल छै। जी...। झारू जागू बाबू देश बँचाबू लबका खुनक बोलीसँ।। जे मानवमे फुट कराबै तेकरा मारू गोलीसँ।। गीत- आधा रोटी खेबै यौ देशकेँ बँचेबै यौ।-2 ज्ञान-विज्ञानक डोर पकैड़ हम दुनियाँकेँ नचेबै यौ।-2 देशमे पसरल भ्रष्टाचारी गमन घोटाला अत्याचारी।-2 एकता के तलवार बना हम सबहक घेँट कटेबै यौ।-2 आधा...। सत् अहिंसा गाँधीसँ लेबै हिंसाकेँ नै बढ़ए देबै।-2 सुख शान्तिक महल बना हम दुनियाँकेँ बसेबै यौ।-2 आधा...। सेवाकेँ जन-जन बुनबै मानवताक मन्तर गुनबै।-2 जग अमन केर माला लऽ कऽ घर-घर धूम मचेबै यौ।-2 आधा...। झारू झारू बिनु नहि घरक शोभा झारू बिनु नहि होएत हवण।। हमरा बिनु नहि मन्दिर-मश्जिद आर ने देशक संसद भवन।। गीत- झारूसँ जुनि घृणा करू ई तँ अनुचित बात छी। -2 जइसँ मिलै छै जगमे शान्ति तेकर हम शुरूआत छी।। -2 जइ घर नहि छै हम्मर आदर तइ घर घुसतै दुक्खक बादर। -2 पएर पसारत रोग बेमारी ओघर भूतक जमात छी। -2 जइसँ मिलै...। की हमरा बिनु तनक शोभा फुटतै की मन ऐ बिनु आभा। - 2 के कहौत हमरा बिनु मानव केकर ई औकात छी। - 2 जइसँ मिलै...। के नहि लइ छइ हमर सेवा राजा रंक दानव आ देवा। -2 के गीन सकतै रूप-रंग हम्मर सोचैवाली बात छी। - 2 जइसँ मिलै...। झारू रहि नै गेल आजुक शिक्षामे ज्ञानकर्मक महान उदेस। भ्रष्टाचारसँ धनार्जण कऽ जड़ीया बँचि गेल बाँकी शेष।। गीत- शिक्षा भऽ नै जाउ बदनाम गै बेटी भार तोरापर छौ- 2 भैया बाबूक ठोरक लालीकेँ श्रृगार तोरापर छौ- 2 शिक्षासँ ले ज्ञान सुकर्मक राख परख मानवता धर्मक। 2 निष्ठा नीति इमानक मलार तोरापर छौ। 2 शिक्षा...। शील शुशिलता गढ़ा-ले गहना मानवता केर पहीरिले कंगना। -2 सिनेह प्यार सभ छोट पैघक बेवहार तोरापर छौ। -2 शिक्षा...। जगमे पसरल दहेज बेमारी वैद्य बनै केर कर तैयारी।-2 कुष्ट समाजिक दहेजक तलवार तोरापर छौ।– 2 शिक्षा...। झारू भूल करै जँ वनक पंछी पशु करै तँ औ छै बात। ऐसँ वंचित जीव जगत केर मात्र छोड़ि कऽ मानव जात।। गीत- दुइए फूलसँ घर सजाबू सुखी रहत संसार यौ।-2 करू नियोजित सभ कियो बाबू अपन-अपन परिवार यौ।-2 दू गोटे हम हमरा दूटा लक्ष्मी बेटी आ भोलबा बेटा।-2 नीकसँ मिलतै शिक्षा दिक्षा रोटी कपड़ा दुलार यौ।-2 करू नियोजित...। कान धरू विज्ञानक हल्ला भरल जोगार छै एकरा झोला।-2 नहि तँ होएत ककोड़बा वाणी खोधि कऽ खाएत कपार यौ।-2 करू नियोजित...। जनसंख्याँ केर बोझ भेल भारी नाकोदम केलक बेकारी।-2 आबो नै चेतब नर नारी फेल कऽ जाएत सरकार यौ।-2 करू नियोजित...। झारू सुति उठि लागू भोरे बाबू माए-बाबूकेँ गोड़ यौ। एकड़ा सन जगमे नै कियो सेवापर दियौ जोर यौ। गीत- माए गइ बोल तोहर छौ, बाइबिल वेद कुरान गइ। शान्तिकेँ बरदान गइ ना-2 तूँ तँ जगमे अनुपम, केकर उपमा देबै हम। सौंसे दुनियाँमे नै, कियो तोरा समान गइ। शान्ति...। आगू तूँ पाछू भगवान, जगमे तुहीं एक महान। तोरे नाओंसँ पुज्जित मन्दिरक भगवान गइ। शान्ति...। तूँ तँ ममता केर अकास। पहिल गुरु केर प्रकाश। तुहीं जगमे देखेलही, जीबै केर सामान गइ। शान्ति...। तूँ तँ अल्ला, ईषू, महेश, कार्तिक गणपति और गणेश। माए गइ चरण तोहर छौ, गंगामे स्नान गइ। शान्ति...। झारू गरीब भूखल कम रहै छै भूखल बेसी रहै धनवान। गरीब भूख बस सुखल रोटी अमीर भूखल हीराक खान। गीत- तूमलोग केना कऽ जीबतै ओतए आपलोग जतए बेमार छै। असंतोषमे माथ दुखाइ छै स्वार्थक चढ़ल बोखार छै। अहाँ बाबू बनू बरूआर हम छी सेवा-ले तैयार। मान-सम्मानमे सभकेँ बरोबैर जीबैक अधिकार छै। असंतोषमे......। आप उरू मोटर गाड़ी साइकिल हमरो रहए तैयारी। एक दोसरक घाट उतारनाइ दुनियाँक बेवहार छै। असंतोषमे......। अहाँ पाबू पुआ-खीर चुल्हा बुझै ने हमरो भीड़ इज्जतसँ दू वक्तक रोटी हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे......। अहाँ पहिरू सूट-सफारी फाटए हमरो ने पढ़िया साड़ी तन झाँपि कऽ हमहूँ जीबी हमरो तँ सरोकार छै। असंतोषमे......। अहाँ शोभा महल अटारी झोपड़ी हमरो रहै तैयारी। सीर छुपबैले छत होइ ऊपर हमरो तँ दरकार छै। असंतोषमे...। झारू की करी अपनेक सेवा घर खाली किछु छै नै धन। बैसू बिछा दी अहाँ नीचाँ श्रद्धा रंजीत अप्पन मन।। सुआगत गान- अर्पण करै छी चरण-कमलमे करू सुआगत स्वीकार यौ। हम अदना सन धुल घरा कऽ अहाँ छी देव अवतार यौ।-2 दर्शन देलौं हमरा हुजुर नाचि उठल मन मजूर।-2 मनसा पुरलैन हमर विधाता सुनलैन हमर पुकार यौ।-2 हम अदना...। अहाँ चरणकेँ धुऐत धुल मनमे समा रहल नै फूल।-2 पावन भेल हमर घर-अँगना हम भेलौं साकार यौ।-2 हम अदना...। घर हमरा नै पकवान सुखल रोटी छै नीदान।-2 पाबि बिसारब देव अतिथि हम छी गरीब अपार यौ।-2 हम अदना...। झारू सफल करब जँ जिनगी बाबू कसि पकड़ू ई दू आधार। पहिला जानू सादा जिनगी दोसर जानू उच्चविचार।। गीत- चालि चली सादा निमहे बाप-दादा-2 कहि गेला बुढ़ पुरनियॉं अहीमे छै फायदा-2 देखती नै खाउ पीबू देखती नै पीनहुँ-2 रहू औकात धरि अपनाकेँ चिन्हुँ-2 जिनगी आनन्द हाएत हम करै छी वादा।-2 चालि चली...। दोसरकेँ नीक देख किन्नौं नै जरू-2 अपनो आनन्द रहू दोसरो-ले मरू-2 ज्ञानी पुरुषक यएह छी कायदा।-2 चालि चली...। फाटलकेँ लाज कोन मैले लजाबु।-2 झूठक वेपार छोड़ि सच गाल बजाबू।-2 बात करू कम-सम काम करू ज्यादा-2 चालि चली...। परक उपकार करू, करू नहि निन्दा।-2 जीवितेमे मरू नहि मरि कऽ रहू जिन्दा।-2 जिनगी शीतल करू किनू नहि रौदा।-2 चालि चली...। कुमोद रंजन चौधरी, ग्राम- विह्नगर, प्रखंड- पंडौल, जिला - मधुबनी उठु मैथिल चलु मैथिल उठु मैथिल चलु मैथिल पाञ्चजन्य के प्रयोग करू हुंकार भरू शंखनाद स अपना लेल अपने किछ काज करू मिथिला के गौरब गाथा जूनी खाली बखान करू इतिहास बैन गेला मैथिल कनी अपन इतिहास पढू जनक बाबा कैन रहल छैथ देख मिथिला के दूरदाशा कोना मैथिल विषैर रहल छैथ अपन बोली अपन मिठगर भाषा उठु मैथिल चलु मैथिल ...... .....…...... मिथिला लेल ज मैथिल नई बजता अर्जुन बैन ज गाण्डीव नई धरता कलजुग छी ई सुइन लिय यौ मैथिल अहा के लेल कि कोनो कृष्ण ओता संघ में शक्ति कलयुग के गुण छै ई बुझबै लेल कि अहा के गौतम ओता उठु मैथिल चलु मैथिल ..... गाम घर सब खाली भ गेल खेत खलिहान सब गाछी भ गेल टुकुर टुकुर बाट तकैत छैथ बड़की काकी बुड़बा काका गप करै लेल लोग तकैत छैथ नित्य एक्के चर्च करइ छैथ सब स पुछथिन कहिया ओता बड़का बौवा आर नुनु बच्चा उठु मैथिल चलु मैथिल ..... निमी के मिथिला मिथि के मिथिला नेतागण एकरा नोइच खेला जेकरे देखु बुधियारे बढ़ छैथ चैर गोटे नई कखनो एक संग रहै छैथ निज स्वार्थ में सब डूइब जीबैत छैथ अपने स अपने सब लैर मंरै छैथ उठु मैथिल चलु मैथिल .... ........... जाही ठाम प्रगट भेली सीता मैया हमहू सब त छी जन्मोंटी वैदेहीया पेट रोटी लेल बौख रहल छी बैन क सब परदेशिया भैया गामक आम काकी बला गाछी बढ़ मोन होइ अइछ जै हाटक गाछी गाम स दूर कि कोनो जीब रहल छी मोन मैर क बुझु त कैन रहल छी उठु मैथिल चलु मैथिल प्रभाष अकिंचन महाकवि लाल दास महाकवि पंडित लाल दास वीरे-तारालाही खडौआ-वास मैथिली-साहित्यक आकाश-दीप आइओ फहराईत उच्चाकाश जन्म-काल अठारह सौ छप्पन मैथिली-क्राँतिक पडल अरिपन कुशाग्र-बुद्धिक अग्रदर्शी सपूत खिलल आंगन दास बचकन संस्कृत फारसी मैथिलीक जानकार महाराज दरभंगाक प्रिय पेशकार प्रशासनिक कौशल में प्रवीणतम ज्ञान प्रतिभाक अद्भुत अवतार साहित्य-सृजनक' कएल भंडारण रमेश्वर-चरित जानकी-रामायण चण्डी-चरित सावित्री-सत्यवान स्त्री-शिक्षा सम अतुल काव्यायन उन्नैस सौ एकैस में महाप्रयाण ओहि महामानव के कोटि-प्रणाम अकिंचन कलमस' उच्चभावयुक्त कायस्थ-ऋषिक शत-शत सम्मान राकेश कर्ण सृजन अपन लेखनीक संग एकसरि संवेदना साझी करैत अहां बिसरि जाइत छी सभटा कटु वृष्टि आ लोक-बेद राकेश कर्ण अंतिम अध्याय धरि पहुँचबा लेल लिखैत छी अहां चिर अद्यतन भूमिका बिसरि जाइत छी बिडम्बनाक अनुक्रम किएक कि अहां अश्रुक स्याही सँ रंग भर' चाहै छी समग्र वेदना-प्रसंग आ पात्र मे अहां ईहो त' नै बिसरि सकैत छी जे चिर पुरातन कथा सँ फराक होइते सगरो होइछ जर्जर परंपराक वक्र दृष्टि मुदा जँ अहां रच' चाहै छी धवल परिवेश तँ ताहि लेल एकटा पारदर्शी आरेख खींच' पड़त ओझरायल रेखाक समानांतर ... अरुण लाल ६ टा क्षणिका आ ६ टा कविता क्षणिका १. हास ठमकि गेल छी तहिये स' हमरा मन मे अहाॅक उनमुक्त हॅसी छल वा परिहास थाह कहाॅ लागल हम तं सूरदास , मन मे अंटबैत रहलौं सुनैत रहलौं अहाॅ केर हास . २. खास लोक तं सड़को पर मरैत अछि वा स्वाभाविक मौत सेहो मुदा ककरो मन मे पइस क' जे मरैत अछि ओ मौत ओकरा बनबैत छैक खास . ३. बात शब्द ब्रह्म होइत छै जॅ निकलि गेल मूॅह स' अनायास जॅ सोचि -बिचारि क' संधानि- तानि क' बजलौं तं तीर जकाॅ चुभैत छैक भ' जाइत छैक बात ४. तेसर नयन क्यौ नञि अपन बढि रहल सबतरि अश्लीलताक प्रदशॅन दिन दूगुना राति चौगुना असहज सब घटना हे त्रिलोचन ! खोलू अपन तेसर नयन . ५. उफाइंट जिनगी जॅ भेल उफाइंट भांजब कतबो गोटी नञि हएब लाल लागत पवन्नी मन पर स हटाउ गदाॅ नञि त कोरैत रहू माइट ६. शूल ककरो जिनगी मे शूलहि शूल ककरो जीवन कते समतूल ककरो ब हिस्से बराबर ककरो हिस्से बराबर कविता १.घर घर त' सबदिन जाइत छलौं हम , बस स उतरि राति के बारहो बजे निभीॅक भेल झटकि क' एक पेरिया खुरपेरिया बाट पकरने, पकरने थाल कीच पिछ्छड़ मे बरखा पानि बुन्नी के सामना करैत टह टह रौद मे घामे पसीने नहाइत पूस माघक राति मे सदीॅआयल ठिठुरैत कनकनाइत अन्हरिया वा होइ इजोरिया मुदा एक राति ठकमुरिया लागि गेल थकमका गेलौं , आब कत' जाऊ कि बाजू ककरा शोर करू के सूनत नदी के बेग मे विलीन भ' गेल घर हमरा स कत्ते दूर भ' गेल घर,,,,,. २. जीब लए छी हम (ई रचना अपन छोटकी बेटी आभाकें समपिॅत केलहुं।) हंसैत हंसैत कले बले जीब लए छी हम जीवन जं एक जहर छै तं पीब लए छी हम अहांक सतरंगी दुनियां अहां कें मुबारक बहुत हमर फाटल जं चादरि अपन सीब लए छी हम खसा क' देखलौं बहुत कोनो छोड़लौं नै दाव मुकाबिला केर शअख एखनो रखने छी हम प्रेम स्वगॅहु स' कम नै करै छी अगर सांच मे कहियो सोचब ई बात आई कहैत छी हम हम हंसी वा कानी मतलव की अछि अरैज लए छी ओतबा जतेक चाहैत छी हम दोख हमरे गिनाबी से कोनो बात ने अहांक लचरल हंसी पर हंसैत छी हम ३. प्रेमक बाट प्रेम एकांत भेल चुपचाप गबदी मारने अपलक निहारैत मगन भेल कात मिलिन्द माली के आहट मे , घुरिया घुरिया तकैत रहल बाट कांट मे ओझरायल गुलाबक कली मने मन प्रस्फुटित होयबाक उमंग मे नाचि रहल उझकि उझकि उठा रहल गरदनि निहारि रहल अपन सौंसे शुभ्र देह लोबान केर खूशबू जेना पसरि गेल कली सब गमकि उठल अभिसारक आतुरता मे माली स' लगा रहल गुहारि , मुदा, बसंत एखन कहाॅ आयल . ४.अहीं तं प्राण छी... हरियर काँच कली रूप रुचिर मोहिनी हे सुंदर सुकुमारी ! अहाँक निश्छल हँसी चिर परिचित मुद्रा मे मुस्की दय मुहथरि पर एना किए ठाढ छी के छी अहाँ ! किए ने बजैत छी डारि डारि पात पात पीत वस्त्र विभूषित सिहराबय तन मन ठुमकय नाचय उमंग कन्हैयाक बाँसुरीक मधुर सुमधुर तान छी कि राधाक आँखि केर बिरह मिलन गान छी जे छी अहाँ ! से भेद आब फोलि दिअह कहीं अहाँ बसंतक सुकोमल तं ने प्राण छी आउ आउ घर आउ कोनटा किए धयने छी अहीं हमर प्रियतमा अहीं त प्राण छी . ५. खेलब चैन सँ होली फेर सँ अहाँक देह बसंती बयार लागि गमकि उठल हैत सोन्हगर माटिक खुशबू जकाँ उड़ैत हैत आँचर हवा मे लहराइत हैत हारैत हारैत जीत जाइलए आकुल हैत सब बात बुझै छी लागि गेल अछि अहाँक आँचर कें फगुनहटि टुह टुह लाल होइलए आतुर अछि फुर्सति कहाँ अछि सीमा पर बहुत गोलीबारी पटकम पटका उठापटक छै जारी जवान सब टेसूक फूल जकाँ टेसुआएल लाल भेल अछि एमकी होली फिच फिच छै पिचकारी मे रंगक बदला बारूदी धमक आओर गोली छै मार काट ,कटमारि मे होली गीत कहाँ मोन परैए डम्फाक थाप रडार सऽ बाहर मन सिनुरिया आम जाँकित रंगैए अहाँ बला होली कहाँ सजैए एमरीदा सीमा कें साजब बारूदी गुलाल सऽ अपन लहू कें गर्म करब दुश्मन कें गाॅजब चुनि चुनि मारब गोली अगिला साल हम फेर खेलब चैन सँ होली ६. गरम गरम गोनरि गुड़कि गेलै गुड़का अनन्त काल लए गोनरि मे मिसी मिसी दुनू अगिलका दांत बाहर केने कनी हँसैत कनी सकुचाइत हँसै केर अनवरत कोशिश करैत सरकि गेल नुआ कें माथ पर लैत उघार भेल देह कें फेर फेर झंपैत गुड़का केर गामबाली उनटाबैए पुनटाबैए मोने मोन बतियाबैए झाड़ि झाड़ि गोनरि कें उलटि पुलटि , सैंत सैंत सुखाबैए बरख तेसरे जाड़ मे बहुत मेहनति स' केने छलै तैयार बहुत सोचि क' जे आब भागि जेतै ओकर दूनू प्राणीक जाड़ चाहे होइ माघक कनकनी या होइ पूसक ठाड़ एकमहले लागल छै भूख पिआस तिआगल छै जाड़क ठिठुरन मे ठिठुरले हाथे तीन दिन स गोनरि बनाबै छै सब काम बरदिएलै माल जाल खुट्टा पर सरदिएलै बतकही मे गामबाली रूसि क' भेलै उदास ओइ राति टुक टुक तकैत रहलै गुड़का गरम गरम निन्न लै काछर कटैत रहलै नै भेटलै ओकरा गामबालिक नरम नरम एहसास गुरैक गेलै गुड़का अनन्त काल लै गोनरि मे एखिन्तो ओकर बनाओल गोनरि मे गमीॅ बाँचल छै ओकर गामबाली सुखा सुखा सैंतय छै डबडबायल आँखिये मोन के पतियबए छै ई गोनरि एखिनतो ओकरा ठिठुरैत जाड़ मे गरम गरम एहसास दियबै छै इन्द्रकान्त लाल कक्का तोर अंगना कक्का तोर अंगना, माँछ गम गम करौ 2 तोर अंगना। रेहु बुआर छियह आ की भून्ना 2 खुएबह पड़ोसिया के 2 फल दुना कक्का तोर अंगना................... दुनू बापूत मिलि बैसल मांझ अंगना 2 हमर ताड़ी हौ 2 तोहर चिखना... कक्का तोर अंगना............. खेने पिने मस्त रहऽ बनल भोकना 2 औथिन काकी तं 2 खइयह बेलना... कक्का तोर अंगना... माँछ गम गम करौ तोर अंगना। सृजन शेखर ’अज्ञेय’ ककरा अबिते जादू भऽ जाय रे कोन हँसय फूल झरय कोन बाजय मोती गिरय ककरा अबिते जादू भऽ जाय रे ककरा जाइते सब हेराय रे किओ ओकरा चीन्है छै कि रे किओ ओकरा बुझय कि रे कोना मोन बेइमान कऽ देलकै रे कोना धरम ज्ञान सब छीन लेलकै रे किए गमगम सौंसे गमकि गेलै रे किए चमचम चम चमिक गेलै रे कि बंद घरक ताला तोड़ि देलकै रे कि सिंगरहार चंदा गुलाब उझिलि देलकै रे संतोष कुमार राय 'बटोही', एम.ए.हिन्दी(JAMIA MILLIA ISLAMIA,New Delhi),UGC-Net qualified, दूटा विश्वविद्यालयी पत्रिकाक, संपादन,अन्यान्य पत्रिका मे रचना प्रकाशित, शोधरत। ग्राम-मंगरौना,थाना-अंधराठाढी, अनुमंडल-झंझारपुर, जिला-मधुबनी, बिहार-847401 गहमा- गहमी राफेलक फाइल चोरी भेला पर संसद सँ चाह दोकान धरि बवाल भेल छै रक्षा-मंत्रालयक दस्तावेज गुम हेनै मतलब सत्तासीन सरकार केँ नियति पर सुभान-अल्लाह । सत्ता लेल अतेक गहमा-गहमी चोर-चोर मसियौत भाई भs रहल छै इ राजा हरिश्चंद्रक मुलुक छियैय, परञ्च इतिहास-पुराण सभ चूल्ही में जरि रहल छै । अगिया बताल नेता सभ भेल छै लतम-जूतम केँ खेल भ रहल छै हिन्नू-हिन्नू,मियाँ-मियाँ केर हो-हल्ला मुलुक केँ श्मशान बनेवाक काज भs रहल छै । आउ मित, मातम मनाउ आब इ मुलुक मरि गेल अछि ठठरी बान्हु, मुख मे आगि लगाउ श्राद्ध करु, पिण्ड-दान देल जाउ ! सुन्नर कनिया नहि आब ओ कहार रहलै नहि आब ओ डोलिया रहलै रसन-चौकी आओर घोड़ाक नाच आब नहि डफला-वंशी आओर नेंगड़ा नाच आब नहि । गाड़ी मे ठुसि-ठुसि कs बरियाती जाउ ठुसि-ठुसि केँ खाउ, रातिए मे फेर गाम पराउ मरजाद केँ आब उठान भेलै आब सभ किछु विधि पुरौवा भेलै । छुपि-छुपि केँ चोर-नुकबा देल जाउ गाय-महीस नहि,नहि साइकिल-रेडियो घड़ी केँ कुत्तो नहि पूछैत छै आब चारि चक्का सँ कम नहि चाही । हाट-बाजार गरमाएल छै जोड़-घटाव-गुणा भs रहल छै बाप केँ बोरा भरि कs रुपया चाही ओझा केँ हौ बाउ सुन्नर कनिया चाही । गाल पर थप्पड़ अन्याय केँ खिलाफ बाजला पर गाल पर पड़ल थप्पड़ मारबाक धमकी भेटल इएह छियैय दुनिया । समाजक दुःख-दर्द केँ दूर करबा मे पाँछा रहनिहार मुँह पर पुरुख बनवाक लेल फिरिशान छथि नीक लोकनि केँ बदनाम करैत छथि । एकटा नव चुनौती अछि आब जीनगी लेल की करू- छुतहर घैल हम थोड़े छी ? हम दलित बनाउल गेल छी । साहित्य मे भिनभिनौज चुप रहला सँ आओर गड़बड़ होएत अकादमी सँ लऽकऽ गाम-घर तक इ हल्ला भऽ रहल छै पुरूस्कार मे घोटाला भेल छै। साहित्य मे गोंधियागिरी भ रहल छै जमीन-जायदाद जँका बाँट-बखरा गुहाँ-गिज्जर भऽ रहल छै भऽ रहल छै साहित्य मे भिनभिनौज । इ नीक नहि कहल जा सकैए 'बेटखौकी' झगड़ा-झंझट विद्यापति समारोह मे मूल्यहीन राजनीति केँ छकरबाजी साहित्यक धरोहर लेल सबको कुछ करबाक अछि। मीठगर गप हमरा फिरिशान केने अछि चमचागिरी सँ देश बिकायल आबो ज्ञान करबाक चाही फेर नहि तँ गुहाँ-गिज्जर लिखले अछि। लोकतंत्रक प्रहरी कुरसी सँ चिपकल लोकनि भूलि गेलथिन्ह अपन इतिहास मुल्क इ सभक छियैए बपौती इ सभक छियैए । सभ किछु पर सभहक अधिकार छन्हि बेर-बेर ठगि रहल छथि सत्ता मिललाक बाद परञ्च आब हिटलरगिरि नहि चलतन्हि । जाति-धरम मे बाँटि कs लोक केँ संविधान सँ खेलवाड़ मंदिर-मस्जिद केर राजनीति नहि चलतन्हि तानाशाही । पढ़ल-लिखल भटैक रहल अछि नागरिक सेवा मे घुन लगलै जनताक टाका चोरी केनिहार शासन केँ सीना पर मूंग दररैत छथि । घुसखोर आफिसर फौदैत छथि लूटिस भs रहल छै सरकारी खजाना लोक सभ चिचियैत छथि जंतर-मंतर पर अखबार मे लिखल गेल छै ढेर रास । गरीबक कियो नहि होएत छै रोटी, कपड़ा,मकान,दवाई आओर शिक्षा सभ किछु बिकाउ छै टाका नहि अछि तँ मरि जाउ । सरकारी अस्पताल दम तोड़ि रहल छै मनरेगा मे आगि लगलै गामक मुखिया आओर वार्ड मेंबर सभ घुसखोर प्रधानमंत्री आवास योजना मे घुसखोरी । किसान,मजदूर तबाह भेल छथि अहाँ सत्ता मिलला पर मलफै उड़ाउ संवैधानिक संस्था केँ तोड़ू-फोड़ू पुलिस केँ बल पर खूब कुदू । इ लोकतंत्र छियैए से जुनि भूलियौ जनता मुल्कक प्रहरी होएत छै ओ जखन चोट करताह तँ निर्मूल भs जायब सावधान हे कुरसी बाबू ! बहि रहल अछि फगुआक बयार कुहुकी-कुहुकी कs हिया मे दरद उठैए घर जाइत छी बाहर अबैत छी मोन परैत छथि स्वामी आजु थोड़ गे माइ कखन हेतै भोर । हमरा नहि टाका चाही हमरा नहि गहना चाही बिनु स्वामी डायन भेल चहुँ ओर आँखि सँ बहि रहल अछि दिन-राति नोर। अइ बेर के खेलताह हमरा संग होरी रंग-अबीर के लगौतिहिन हमरा किनका लेल बनौबै अइ बेर भांगक घोर गे माइ टुटि रहल अछि परेमक डोर । फूलेलै बाग-बगीचा हिलै छै आमक-जामुनक पत्ता पिया आबो पकड़ू परेमक एकटा छोर पुलिस अहाँ हमर हम अहाँक चोर । बहि रहल अछि फगुआक बयार गुदगुदि भेल सभतरि देह मे टुटि रहल अछि पोर-पोर हे कहिया धरि एबै यौ हमर चित-चोर । दलित छी हम बेवस्था केँ मारल सभ दिन सँ दुत्कारल अखनो अछूत बनौने छथि- दलित छी हम । डोम कहावति छी। सूप-डगरी-कोनिया-चंगेरा, डाला,मेघंबर आदि बनावति छी। शिक्षा मे अखनो पिछड़ल छी। चर्मकार छी हम। मरलाहा माल-जाल केँ उठावति छी। चामक कारोवार हमर बनि गएल अछि जिनगी नरक। रजक छी हम। कपड़ा धोनै हमर काज हगनी-मूतनी केँ बास सँ नाक फाटि रहल अछि। प्रहरी हम सभक सभ रूपे पिछड़ल दुसाध छी हम। दलित छी हम। कानून सँ की हेतै ? किछु हमर दोख किछु बेवस्था केँ किछु हमर लोकनि केँ। कतेक दिन धरि चलतै- एना सुतला सँ रास्ता देल जाउ नीक सँ हमरो जीबअ दिअ । अबोध नेना हँसि रहल अछि खसि रहल अछि कोमल काया छन्हि छथि भाषाविहीन अबोध नेना । गिरैत-परैत चलैत छथि हाथक इशारा सँ सभ किछु कहैत छथि इ लेब,ओ लेब,सभ किछु लेब सभ किछु हुनका चाहियैन्ह। पी-पी लेताह मम लेताह सुगा,कौवा,पिल्ला आदि चाहियैन्ह खाय लेल हुनका पहिने चाहियैन्ह । दूध-मिसरी हुनका चाहियैन्ह ओ नहि खायब,इ खायब घुमि-घुमि क' खेताह खाय सँ बेसी छिड़ियेताह । नोर बहि रहल छन्हि जिद्द केने छथि ओम्हर जायब 'पा,हुनकर जेम्हर गेलथिन्ह इ नेना केँ नहि पता 'पा' आब नहि औतैन्ह। कनफुस्सी बिगाड़लक घर मोन होइए की करू की बनाउ की धरू देह कँपैए थर्र-थर्र कनफुस्सी बिगाड़लक घर माए गै कोना बसब सासुर तरकाई भेलै मँहग मँहग भेलै एस्नो-पाउडर कनफुस्सी बिगाड़लक घर खाता खोला क कोनहु फैदा नहि भेल जे टका आयल से गेल सासु लड़ैत अछि साँझ-विहंसर कनफुस्सी बिगाड़लक घर ननदि मुँह फूलौने रहैत अछि नीक निकुत सभ अपने खैए मारै लेल छुटैए देवर कनफुस्सी बिगाड़लक घर अतेक पढ़ौलैंह आई ए-बी ए आब चुल्ही निपबैत अछि पथाबैए गोबर कनफुस्सी बिगाड़लक घर पिया कमैए परदेश इ जबानी मे आगि लगलै के बुझतै दरदिया हमर कनफुस्सी बिगाड़लक घर नौकरी मोन नहि होइए नौकरी करू हम कमैत छी दोसर खाइए एको टा टाका नहि बचैए घरवाली एतेक रास कहैए देवता-पितर पूजलहुँ बाबाधाम काँवरिया बनि गेलहुँ दिन दूना राति चौगुना सरकारी अफसर करैत अछि जोड़-घटाव-गुणा नहि पढ़लहुँ तकर साफल भोगैत छै दिल्ली, मुंबई, पंजाब खटैत छी हम कमैत छी तैं हम नौकर उ हीरो कहाबैत अछि हम जोकर कारखाना मे काज कके टी बी भेल गुटखा खाके कैंसर भेल दोसर केँँ नौकरी कके खून पानि भेल की कहू, की की नहि भेल इ बड़का मकान मे हमरो हिस्सा छै इ बैंकक टाका मे हमरो हिस्सा छै इ कारखाना में हमरो हिस्सा छै इ गाड़ी मे हमरो हिस्सा छै यौ उद्योगपति मजदूरी नहि, हमरा हिस्सा चाही बड़ि हम सहलहुँ अहाँ केर मारि-गारि बड़ि भेलै नौकर-मालिक केर खेल गामक दुर्गा मंदिर गामक लोकनि केँ सोच पर हँसी आबि रहल अछि आइ की उचित आओर की अनुचित हेतै कियो नहि कहनिहार आब रहलै सरिपहुँ सभ कियो मद्य पीने छथि गाम मौगिया गेल छै सभ किछु मे राजनीति नीक नहि होएत छै श्रद्धा सँ पैघ किछु नहि होएत छै पूजा केँ पूजा रहअ दियौ फुसियौंह मे गामक बँटवारा जुनि करू गामक इज़्ज़त माटि मे नहि मिलबियौ बाबू-भैय्या गामक संस्कृति केँ बँटनै गामक आत्मा केँ हरण करनै जँका छै इ ज़मीन किनकर छियैन्ह जखन सभ कियो केँ टिकट कटले छन्हि फसाद करनै कोनहु नीक गप नहि छियैए सभ कियो इएह माएक संतान छी माएक मंदिर जुनि बँटियौ। गाम-घरुआ गामक तीसी सेहो अमरित लगैत छै नवका धानक चिउरा आओर गुँड़ मुनगा आओर बरहरक फूलक तरकारी पोठी माछक संग मरुआक रोटी बथुआ साग आओर मूरही तुलसी-फूलक खीरक जवाब नहि आउ भाई,मिल-बाँटि क' खाउ जिनगी केर कोन ठिकान सभ किछु सोहनगर छै अपन महिंंषक दूध आओर घी पोखरिक मखान आम,जामुन,कटहर,गुल्लैर सभ किछु अपन छी जीभ सँ पानि टपकैत अछि करब-त-करब की परदेश ओगरने छी परञ्च हम सरिपहुँ गाम-घरुआ छी। किसानी पानि बिनु खेत सुखल नहरक पानि चोरनुकबा भएल खेत मे बिबाय फाटल किसानी भएल कठिन. फसलक उचित दाम नहि भेटैत अछि, खादक कोनहु बेेवस्था नहि अन्न घर मे सड़ि रहल अछि सरकारक कान बहिर भएल. के हरवाही करत आब? के उपजाउत अन्न देशक अराजकता बीच किसानी भएल कठिन बिन ब्याहले रहति सिया बड़ि दुःख होएत अछि पढ़ि क' इ ख़बर, कि दहेज केँ लेल फलाँ केँ हत्या भ गेलै, बहिन-बेटी केर कोनहु मोल नहि अइ समाज मे, टाका सँ बढ़ि क' किछु नहि बुझना जैत अछि। सिया केँ भूमि बहिन-बेटीक खून सँ रंगा रहल अछि, मौगा बनि क' घूमि रहल छथि निमोछिया सभ, पुरुख नहि रहलाह मिथिला मे आब कियो, सभ कियो माटिक मूरती बनि गेल छथि। एहेन सुन्नर बुच्ची केँ ब्याह नहि करू आब कियो, बिन ब्याहले रहति सिया जग राम बिनु विहीन भेल, भूतहा भेल गामक-गाम, बौरा गेल छै मरद सभ। बाप रौ बाप इ की भेलै सभ कियो केँ, आँखि किएक नहि आनहर भेलन्हि हुनकर, जिनका हिया मे दोसरक बेटी लेल दरद नहि छन्हि, ओ मनुख नहि राक्षस छथि। नन्द विलास राय हमर होली फगुआक उमंग सभपर चढ़ल रंग कियो पीबै दारू कियो पीबै भंग मुनसाकेँ की कही मौगी सभकेँ रंग खेलाइत देख हम रहि गेलौं दंग। चारूकात मचल छल हूरदंग कियो पीटैत डम्फा कियो पीटैत मृदंग सभ अपनेमे मतंग लोक सभकेँ होली खेलाइत देख हमरो मनमे उठल तरंग मनमे आएल हमहूँ खेलितौं होली अपन संगी सबहक संग मुदा आब केतए पाबी सभ संगी गाम छोड़ि शहर जा लगेने अछि अपन-अपन डाली छी बुड़बक तँए गाममे रहि ताकए चाहै छी होली आ दिवाली अपन बचपनक यारी...। केना खेलब होली किनका लगाएब रंग कियो कहि ने दिअए एना किए भऽ गेल छी उदंड रंगक खातिर भऽ नै जाए केकरोसँ जंग। मनमे आएल होली खेलब अपन पत्नियेँक संग ओकरे रंगब अंग-अंग। यएह सोचैत हम अँगना गेलौं पत्नीकेँ लगमे बजेलौं ओ बजली- की यौ अहॉंक रंग लगैए आइ बड़ बेढ़ग दारू पीलौं हेन आकि पीलौं अछि भंग? कहलयैन- आइ होली खेलब अहींक संग अहींकेँ लगाएब रंग। पत्नी बजली- टोला-पड़ोसाक छौंड़ासभ हमरा कऽ देने छल अपचंग आब अहॉं हमरा जुनि करू तंग। हमर राखले रहि गेल लाल-हरियर सभटा रंग। फेर मनमे आएल किएक ने बाबाकेँ पैरमे अबीर लगा हुनकासँ आशीष पाबी। हम दलानपर गेलौं बाबाकेँ पैरमे अबीर लगेलौं हुनक दुनू पैर छुबि अपन दुनू हाथसँ केलौं प्रणाम ओ बजला- जीबह नीके रहअ रोशन करह अपन मातृभूमिक नाम। दहेज दहेज पाप छी दहेज अभिशाप छी दहेज छी बड़ पैघ कलंक सभ मिलि करू ऐ समस्याकेँ अन्त। दहेज समाजक लेल भऽ गेल अछि कोंढ़ दहेज अछि एड्सोसँ पैघ रोग दहेजसँ बढ़ि कऽ नै अछि कोनो रोग जे भोगने अछि एकर भोग ओकरा अखनो तक अछि तेकर सोग। दहेजक कारण बेटी मरैए दहेजक कारण बेटी जरैए फँसरी लगाकऽ जान गमबैए धार-पोखैरमे सेहो डुबैए दहेजेक कारण कन्या-भ्रूण हत्या होइए आउ, सभ मिलिकऽ ऐ समस्यापर विचारू दहेजकेँ अपना समाजसँ खिंधारू जे कियो दहेजक मांग करए ओकरा खर्ड़ा-बाढ़ैन आ झारूसँ मारि भगाउ। हमर चारूधाम एक दिन एला हमर दोस जेकर नाओं छिऐन हरेराम हम आदरसँ बैसौलिऐन नेबोबला चाह पियौलयैन स्पेशल पत्ती आ जर्दाक संग खियौलयैन पान। हमर दोस बजला चलू मीत एमकी काँवर लऽ कऽ बाबाधाम बाबाधाम गेलासँ नहि हएत किछो हानि यौ भोलाबाबा छैथ बड़का औधरदानी सभ मनोकामना पूर करता हमरा बातक करू बिसवास जे-जे मंगबै सभ देता पूरा करता सब आश। हम बिच्चेमे बजलौं यौ दोस हमर माए छथिन साक्षात पार्वती आओर बाबू छैथ शंकर भगवान हुनका सभक सेवाकेँ धर्म बुझै छी कथी-ले जाएब हम बाबाधाम। सुति उठि सभ दिन करै छिऐन माए-बाबूकेँ प्रणाम ऐ काजसँ पैघ नहि बुझै छी हम गंगा स्नान जाबे धरि माए-बाबू जीबै छैथ नै जाएब तीर्थ स्थान माए-बाबू जेतए बसै छैथ वएह छी हमर चारूधाम। सभसँ पैघ माए-बाप सुनू यौ बाबू, सुनू यौ भैया सुनू लगा कऽ धियान यौ माए-बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे आन यौ। माएकेँ बुझू माता पारबती पिता शंकर भगवान यौ पएर छुबि दुनूकेँ करियौ सुति-उठि कऽ प्रणाम यौ। नअ मास धरि अपन पेटमे माए अहाँकेँ रखलैन यौ अहाँ खातिर, अपन सुख-सुविधा दिस घुरियो कऽ ने तकलैन यौ पिताक कोरामे केलौं पैखाना तेकर ने कोनो ठेकान यौ माए बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे...। कन्हपर लऽ कऽ पिता अहाँकेँ समूचा गाम घुमबए यौ माए अहाँकेँ गोदीमे लऽ कऽ लोरी गाबि सुनबए यौ अहाँकेँ नीक भोजन भेटए से हरदम रखलैन धियान यौ अहाँक जिनगी नीक बनए केलैन नइ कहियो आराम यौ माए बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे...। गरीब रहितो माए-बाप अहाँक कन्वेंटमे नाओं लिखौलैन यौ अपन माथपर चाउर-दालि सभ होस्टलमे पहुँचेलैन यौ माए अहाँक गहना बेचलैन पिता बेचलैन जमीन यौ बेटा हमर हाकिम बनतै हेतै हमर सुदिन यौ जिनगीमे कहियो यौ बाबू करब नइ एहेन काज यौ माए-पाक माथ झूकत आओर भऽ जाए अपमान यौ हुनका सभकेँ आशा बड़ छैन आओर पूर्वक काज करब सभ करब समाजक विकास यौ करबैन रौशननाम हुनक अहाँ आओर बढ़ेबैन शान यौ अहूँकेँ भेटत सम्मान यौ माए-बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे...। दस लाख टकाक दहेज बुड़ौलिऐ अपने पसिनक कनियाँ अनलिऐ तैयो केलैन कबूल यौ केतबो बड़का गलती करैथ ओ सभ देबैन नइ कहियो तूल यौ माएकेँ बुझब माता जानकी पिताकेँ भगवान राम यौ माए-बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे...। माए-बाप जखन अथबल भऽ जाइथ भऽ जाइथ जखन लाचार यौ हुनका सबहक भार उठेबैन बनि कऽ श्रवण कुमार यौ पुरा करबैन हुनक मनोरथ देखेबैन चारू धाम यौ माए-बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे...। सेवासँ बढ़ि कऽ नइ कोनो व्रत अछि आ ने धार्मिक अनुष्ठान यौ तीनू लोकमे सभसँ पैघ माए-बाप आओर छथिन बड़ महान यौ माए-बापसँ पैघ नइ अछि कियो तीनू लोकमे...। इन्दिरा आवास एक दिन मुखियाजीक चमचा एलैथ ओ हमरासँ हाथ मिलौलैथ हम हुनका कुर्सीपर बेसौलयैन प्योर दुधक चाह पियौलयैन खैनीमे चुन मिलेलौं अपनो खेलौं हुनको खियेलौं खैनी खा कऽ ओ बजला अपना असंवाक भेद खेललाह। बड़ मोसकिलसँ मुखियाकेँ मनेलौं हेन अहॉंक नाओं हुनका डायरीमे लिखेलौं हेन ओ कहॉं मानै छला अहॉंकेँ कहॉं जानै छला जँ करेबाक हुअए काम तँ जल्दी करू इन्तजाम जुनि करू सोच-विचार लाउ टका पॉंच हजार नहि तँ दोसरो अछि तैयार मुदा अहॉं अपन छी खास अहॉंपर अछि पूरा बिसवास दियाएब अहॉंकेँ इन्दिरा आवास की यौ अहॉंकेँ नहि लागल हमर बात रास। ऐ बकलेल बनि जाएत मोफतमे अहॉंकेँ मकान भऽ जाएत धिया-पुताक कल्याण समाजमे बढ़ि जाएत अहॉंक मान अहॉं बुझब एकरा अपन शन जँ हमर गप्प अहॉंकेँ कनीको पसन अछि तँ जल्दी करू भैया किएत समय चन्द अछि। नहि तँ बादमे बड़ पचताएब आ हमर दिमाग खाएब मुदा हम की किछु कऽ सकब अहॉंकेँ की किछु दऽ सकब। आखिर हम चमचाजीक बातमे एलौं महाजन लक्ष्मी भैयाक ओइठाम गेलौं हम केलिऐन हुनकासँ अर्ज यौ महाजन दिअ हमरा पॉंच हजार टका कर्ज लऽ लिअ कागजपर औंठा निशान मुदा टाका करू जल्दी भुगतान। ई लिअ रूपैआ करू अपन काम समयेपर आपस करब नहि तँ भऽ जाएत अहॉंक महींस नीलाम। हम देलिऐन चमचाजीकेँ टका पॉंच हजार ओ मुस्की दैत भऽ गेला फटफटियापर सवार हम केतेको बेर ब्लॉकक चक्कर लगेलौं मुदा आइ धरि इन्दिरा आवासक राशि नहि पौलौं। ब्लॉक दौड़ैत-दौड़ैत हमर चप्पल घिसल ओमहर महाजनक टाका आपस करबाक समय बीतल हम चमचाजीसँ कहलयैन अपना बोलीमे साए मन मिश्री घोरलयैन यौ नेताजी अन्नतादा, बड़का बौआ कृपाकय आपस कऽ दिअ हमर पॉंच हजार ढौआ मुदा ओ करए लगला टाल-मटोल किएक तँ हुनकर नेति छेलैन, करब पॉंच हजार टाका गोल हम सोचलौं जे हमरा ठकलक आ हमर महींस नीलाम करौलक ओकरो बिगाड़ि दिऐन खेल आ चमचाजीकेँ पहुँचए दिऐन जेल मुदा हम ई काज नहि करि सकलौं चमचाजीसँ लड़ाइ नहि लड़ि पेलौं किएक तँ आजादीक 72म बर्खक बादो हमरा जकॉं गरीब असहाय अनाथ छै जबिक चमचाजीकेँ माथपर एम.एल.ए; एम.पी.क हाथ छै आखिर हमर महींस भऽ गेल नीलाम नहि बनि सकल हमर मकान बिगड़ल हमर सभ काम दुख बेचि कऽ करै छेलौं गुजर आब जीरी रोपैले करै छी पंजाब प्रस्थान। अछैत पुत्र निपुत्र पेट पीठमे सटल कपड़ा ठाम-ठाम फटल केश-दाढ़ी बढ़ल डॉंर सेहो झुकल गाल पचकल ऑंखि धँसल बिनु ठेंग नइ होइत रहैन चलल छातीक हार झक-झक देखाइत देह कँपैत दमाक रोगी जकॉं हँफैत अँगने-अँगने भीख मंगैत मुहसँ कहैत मलिकाइन किछ दअ दियौ निपुतराहाकेँ मास-दू मासपर अबैत आ यएह बात बजैत...। हम जलखै खा, खेलौं पान आ जाइत रही दलान तखने ओ देढ़ियापर आएल आ देलक अवाज मलिकाइन किछु दअ दियौ निपुतराहाकेँ। तैपर हमर पत्नी बजली ऐ भिखमंगाकेँ कनिक्को नहि होइ छै लाज से नहि होइ छै जे करतै केकरो कोनो काज। पत्नीक बात सुनि हम भिखमंगा दिस ताकि देखलौं ओकर काया ओकर देह-दशा देख लागल हमरा बड़ माया। हमरा मनमे भेल किए नहि सुनिऐ भिखमंगाक बेथा अपनाकेँ निपुतराहा किए कहैत अछि की छै ओकर जीवनक कथा। की वास्तवमे नै छै ओकरा बेटा आकि छै ऐमे कोनो राज? हम ओकरा दलानपर लऽ गेलौं बड़ आदरसँ जलखै करेलौं पछाइत ओकरासँ पुछलिऐ ‘बाबा, अहॉं अपनाकेँ किए कहै छी निपुतराहा की नइ अछि अहॉंकेँ बेटा? हमर बात सुनि ओकरा ऑंखिसँ गिरए लगल दहो-बहो नोर। बाबा जुनि कानू कनलासँ नहि हएत समस्याक निदान ई कहैत आरो देलिऐ बोल-भरोष हमरा बातसँ भेलै ओकरा बड़ संतोष। बौआ चारि बेटा रामकेँ एको नहि काम-केँ बौआ रहमर नाम छी राम परसाद आ घर अछि लदनियॉं जहिये पत्नी मरल हमर तहिये अन्हार भऽ गेल हमर सौंसे दुनियॉं बौआ हमरो छल चारिटा जमीन-जत्था बेच सभकेँ पढ़ेलौं पढ़ा-लिखा कऽ मनुख बनेलौं चारू बेटा नौकरी करैए सभ अपन परिवारक संग बाहरे रहैए मुदा हमरा कियो ने देखैए मान दिन पहिने ओ भगवानक घर चल गेली मुदा हमरा भीख मांगऽ लेल छोड़ि गेली। बौआ, जेठका बेटा अपन सासुक मृत्युपर केलक रसगुल्ला-लालमोहनक भोज मुदा माए-बापक नहि कहियो केलक खोज। दोसर बेटा सारिक बिआहमे लाख टाक खर्च करि केलक कन्यादान मुदा ओहो नहि कहियो देलक हमरा सभपर धियान तेसर बेटा अपना सारकेँ पूनामे एमबीए पढ़बै छै सुनै छिऐ दस हजार टका मासे-मास पठबै छै सभसँ छोटका बेटा अछि पत्नीक बड़का भक्त हमरा जे चिट्टियो लिखैत सेहो ने भेटलै वक्त। सासु-ससुरकेँ संगे राखि करैत अछि पतिपाल एम्हर बाप भीख मंगै छै तेकर नहि छै कनिक्को खियाल। हम पुछलिऐ की अहॉंकेँ नै अछि बेटी तैपर ओ बाजल बेटी अछि वएह तँ केलक माइक क्रिया-कर्म भगवान नीक करथुन ओकरा ओकरे भेलै सभसँ पैघ धर्म। फेर पुछलिऐ- बेटीए ओइठाम किए चलि जा रहै छी गामे-गाम भीख किए टहैल-टहैल मंगै छी? तैपर ओ बाजल- बेटीक दुआरिपर रहबकेँ हम कखनो नै बुझै छी नीक तइसँ बढ़ियॉं गुजर करै छी मांगि-चॉंगि भीख। डॉ. शशिधर कुमर "विदेह" ।।स्व. अटल बिहारी वाजपेयीजी - एकटा मैथिलक सादर, विनम्र श्रद्धांजलि ।। छलाह मंत्री- प्रधान, बात अपना जगह । राजसम्मान - मान - दान, अपना जगह । हम छी मैथिल, हमर मनमे हुनिकर स्थान, राजनीतिसँ अलग, थीक अपना जगह ।। दल - खेमा - विपक्ष- पक्ष, अपना जगह । छाप छोड़ल स्पष्ट नीक, अपना जगह । हम छी मैथिली अकिञ्चन, हमर नोरपर, ध्यान देलन्हि, से बात दीव, अपना जगह ।। भेलै सौंसे बिकास साँच, अपना जगह । तकनीकीक बताह नाँच, अपना जगह । हम छी मिथिला, आँचरक फाटल नुआ, सीबि देलन्हि ओ, भाव से, अपना जगह ।। राम विलास साहु किछु हाइकू/ शैर्न्यू अमृत वाणी छानि कऽ पीबू पानि नै कोनो हानि गरीबक छी मरूआ खान-पान बँचबे प्राण रोटी, कपड़ा मकान, शिक्षा, स्वास्थ सभकेँ चाही मनक प्यास बुझे ने मजबुरी आदत बुरी एक तँ चोरी दोसर सीना जोरी की छै जरूरी? ज्ञानक खान वेद पुराण अछि ज्ञानी महान कर्मे चलैए जिनगीक सवाड़ी नै तँ भिखाड़ी जीबाक इच्छा सभकेँ छै दीर्घायु कम छै आयु नाचे बानर माल खाए मदारी की छै लचारी? तुलसी एक साए गुण भरल पूज्य बनल ऑंवला फल अमृत फल अछि गुण भरल आमक फल अछि फलक राजा खाइतो माजा ज्ञान दानसँ पैघ नै कोनो दान कर्म महान धैलिक पानि ज्ञानी संतक वाणी नै कोनो हानि मेघ बरसै वादल गरजैत बेंग बजैत हवा बहैत दिन-राति चलैत जीवन दैत? रोगसँ रोगी तड़ैप मरैए तँ प्राण के देत राम नामकेँ बदनाम करैए सभ भजैए सॉंझ समय सुरुज डुमैत-ए दीप जरैए अन्नक संगे घुनो पिसाइत-ए तन संगे मन पुरान पोथी इतिहास, साहित्य बँचा कऽ राखू नशा करैए विनाशकारी काज लइए प्राण नशा सेवन शरीर आ आत्माकेँ हानि करैए रंग नै कच्चा ओहेन रंग रंगु जे होइ पक्का जन्म मरण निश्चित होइत-ए नाश्वार किए? देशक राजा प्रजा मिलि चुनैए मुदा, आन्हर दूतीया चान बढ़ैत ऊपर चढ़ै पूर्णसँ घटै मेघ बरसै धनरोपनी करै अन्न उपजै फसल पकै कटनी दौनी करै कोठी भरैए अन्नक दान सभकेँ बँचै प्राण करू कल्याण सभक मान रखै छइ किसान धानसँ मान धान मखान माछक खान पान पानसँ मान हवा दोमैत इजोरिया जरैत प्रेमी तरसै दुखित मन अन्हरिया छै राति दिल धड़कै माया नगरी पहुना हेराएल केना खोजब? फलमे केरा सभक राखे मान सस्ता समान नारियलक फल बड़ कठोर बीचमे जल हाटक चौर बाटक पानिसँ, नै कटत दिन ऑंखिक नोर आ ओश चटनेसँ नै मिटै प्यास दिलक बात कहै भौंरा फूलसँ प्रेम अमर चिड़ै चहकै एकताक पाठ छै उत्तम गुण संकल्प नेने चींटी चढ़ै उतरै लक्षक ओर नेता, नायक झूठे करै वणिज मूर्ख बनबै बालुक भित शीतसँ पटौनी नै होइत अछि जीवन मृत्यु निश्चित होइत छै तै अमर के बाट चलैत मुरि-मुरि देखैत संगी नै कोइ लाठी ठेंगैत ठोकरसँ बँचैत आगू बढ़ैत ऑंखि नै सुझै बिनु सहयोगीकेँ बाट चलैत प्रेमक भूख भोजनसँ नै मिटै आत्मा भटकै जीवन नैया मजधार फँसल धर्म खेबैया गाए-माइक सेवासँ मिलैए उत्तम मेवा सुखक खान कर्म अछि प्रधान सभक मान ज्ञानसँ करू जगतक कल्याण भेटत मान ज्ञानक खान गीता, वेद, पुराण पढ़ु मनसँ आम लताम सभक राखै मान गुणक खान खान पानमे दूध, दही, फलसँ शान बढ़ैए माए-बापकेँ भोरे करू दर्शन हरि दर्शन गीत संगीत मन हर्षित करै दुख हरए नदी कातक चास-बासकेँ नहि कोनो आश कागजपर लिखलाहा नाम तँ अमर नहि वन पर्वत नै मिलै भगवान मनमे राम बुढ़ पुरान अनुभवी होइए करू सम्मान मिथिलामे छै पाबैन तिहारक बेसी चलैन लेखक, कवि दुनियाँकेँ बनबे जनकेँ ज्ञानी रोटी कपड़ा मकान शिक्षा स्वास्थ जरूरी अछि दिवाली संगे अबैत अछि जाड़ होलीमे जाए कर्मक मान दुनियाँमे होइ छै कुकर्मक नै गाछक फल खाए जुराए गाछ नै खाए जीबाक इच्छा सभकेँ छै दीर्घायु कर्ममे पाछू हिंसा नै करू अहिंसासँ कल्याण कर्म महान मान सम्मान सबहक करियौ सभ सीखतै वृक्षा रोपन सर्व हितक काज जीव जन्तु ले नेत्र दानसँ नै कोनो पैघ काज जग देखैले अंग दानसँ दोसरकेँ कल्याण उत्तम काज रक्त दानसँ दोसरकेँ बँचैए जिनगी प्राण ज्ञानी, सज्जन समाजक अमृत बढ़बे ज्ञान मीठ वचन अकुर काज करे नै कोनो हानि दोस्त करैए दुखमे हितकाज नै बदनाम लालची मित्र कुकुर समान-ए हानि करैए तन बदैल रूप देखबैत-ए आत्मा एक-ए समाजमे नै बुजुर्गक मान छै करू सम्मान नीमक गाछ रोगक किटाणुकेँ मारि भगाबे माटिक मूर्ति फूल फल ने खाए बलि पड़ैए अनरनेबा पित्त वायु नाशक पैघ पाचक ऑंखि रहितो जे आन्हर होइए तँ की कहबै? खजूरक छै राजस्थानमे मान शक्तिवर्द्धक अछि ताड़ गाछसँ ताड़ी चुबबैत छै नशा खातिर पानसँ राखे मेहमानक मान मिथिला जन फूलक सेज नीन चैन नै होइ मरणासन कुकर्म अछि नरकक समान छे बदनाम श्रमदानक छै दुनियाँमे मान होइ कल्याण फूलक शोभा गंध उड़ै अकास स्वर्गक वास श्रमिक बले देश भेल महान मुदा गरीब खेत उपजै छै अन्न, फल, साग सभक लेल झूठ वचन बोलि जँ हित हुए नै कोनो हानि फलक राजा आम जे खाइए से पहलवान बासि भोजन नै खाउ जानि प्राणि हएत हानि पानि दूध छै दुनू अमृत सन बँचाबे प्राण खीरा छी हीरा भोर खाउ नोनसँ नहि तँ पीड़ा राति जगैए दिन सुतै नित्य केतए बास देश कंगाल दलाल केने अछि माल हरैप घासमे दुभि धनमे गाए अछि कल्याणकारी माघक जाड़ दीनकेँ सतबैए हिलबे हाड़ जाड़क रौद सभकेँ मन भाबे जाड़ भगाबे मालिक चोर मुंशी कोतबाल-ए संत भण्डारी भोज भारी दालि अछि खेसारी खाए भैयारी अन्हरा राजा बहिरा अछि मंत्री बौक छै प्रजा रोगीकेँ भावे से वैद्य फरमाबै जान गमबै घड़ी चलै छै दिन-राति समान लोक कीए ने? दुखसँ भारी मनरोग होइ छै लाइलाज छै ज्ञानक सुख असल सुख अछि धन सुखसँ कर्मक फल सभ भोगैत अछि कर्मवीर के? धन खर्चासँ कर्मक खर्चा नीक जेना बरखा फुटल भाग्य कर्मसँ बनैत-ए जँ धर्मी होइ खेलसँ बढ़ै धिया-पूतामे मेल नै कोनो भेद भजन करै साधु, संत, पुजारी खाए महंथ फल खाइक सभकेँ इच्छा अछि रोपे ने गाछ अन्हरा नाचे बहिरा सुनि हँसे डीठरा सुते सोना चानीसँ अमीर मालोमाल देश कंगाल भोजनमे छै साग पातक मान केकरा लेल? गाइक दूध दही, घी, गोंत अछि दबाइ सन नीमक छाल पत्ता, फड़ दबाइ राखे निरोग लाजक खान लजैनी छै महान अनेको काज विद्वानक छै मिथिलामे खान तेँ जगमे नाम मिथिला नाम बड़ पैघ पुरान छी कर्म स्थल विवेकी ज्ञानी बुधिसँ करै काज अनका लेल जल सभक जिनगी बँचबैए भूमि सींच कऽ बहु विवाह गरमेल जोड़ी तँ अभिशाप छी यौन शिकार देहक बेपार तँ देशक मुद्दा स्त्री उत्पीड़न समाजक शोषण अपराध छी संघर्षशील गतिशील होइए जिगनी लेल सुविद्या अछि गुणवत्ता घटल महग भेल स्तनपानसँ बच्चा निरोग छै कोनो नै हानि युगक जुआ कवि लेखक खींचे मरितोदम खेतीक काज दुनियाँक राखैए सभक लाज पानि छुबाइ दूध नै छुबाइए कारण की छी? अन्न जलसँ पोसाइत-ए काया लोभसँ माया कुकर्माहाकेँ नरको जाइत नै लाज होइ छै अनुभवसँ मिलैए रोजी रोटी पोथीसँ ज्ञान सभ चाहैए अनकर हरैप धनिक बनी इनसाफ नै मिलैए अदालतमे न्याय बिकै छै खुदा जनैए इनसाफक बात इनसान नै राति खाइ छै दिन लेल झखै छै नेक मरै छै मौसम जकाँ बदैल खेलु खेल शरीर लेल रोगी रोगसँ पीड़ीत रहैत छै भोगीकेँ दूना भाग्य नै बाँटै नहि चोराबै कोइ जाने ने कोइ? भाग्यक खेल चमतकारी होइ जाने विधाता हिन भावना विकासक बाधा छी कुकर्म सन जलक मान सभसँ छै महान बँचाबे प्राण खेल-खेलमे सभसँ राखू मेल नै कोनो झेल शैतान करे जानि कऽ परेशान मारए जान माइक गोद धरतीक बिछौना नै छै तुलना दीप जरिते फतींगा जरि मरे कोन गलती? विद्या धन तँ खर्चासँ बढ़ैत-ए संगे कल्याण खान-पानमे सचेत रहु जानि नै हुए हानि पैघ चुनौती दऽ रहल कुरीति तोड़ैत नीति सतीत्व लेल सीता देली परीक्षा बिनु धोखेसँ जीव जन्तुक जिनगी गतिशील मरणशील खेल कूद छै बच्चा लेल जरूरी विकास लेल काम अराम भोजन दुनू सॉंझ नैए समान सुख दुख छै सभकेँ जनमेसँ मरने मिटै सियार भालू पैघ होइए चालु नै ए कमाउ कलम लिखे तकदीरक खेल खुदा हुक्मसँ सेवा संस्थान करैए काज कल्याण लेल फॉंसीक फंदा गर्दनिमे पड़िते देख मरैए बाहर मान घरमे बदनाम करैए हानि हितक काज अपन हुए हानि बढ़बे मान प्रेमक मार्ग स्वर्ग समान अछि शान्तिक मार्ग जेहने खाए अन्न तेहने होइ छै तन मन पोथी पुराण पढ़े ज्ञानी महान ज्ञानक खान ज्ञानीक मान महाज्ञानी करैए राजा शलाम सौनक राति बिजुरी चमकैत मेघ बरसै भादोमे कादो धान रोपे किसान बाढ़िसँ हानि आसिन मास हथिया झॉंट बहै घर खसबै कातिक मास किसान देखे चास मन उल्लास धानक खेत लहलहाति देख सजै खम्हार धान पकए कटनी दौनी करि कोठी भरए अगहनमे चोरो साधु बनि कऽ अन्न समटे पुसक मास दिन राति पड़ैए ओस कुहेस माघक राति कनकनी जाड़सँ हिलैए हाड़ फागुन मास वसंत करै राज गमकै बाग चैत मासमे चना गहुम पकै गाछ कलशै बैशाख मास धरती जरैत-ए तबा समान जेठक मास धरतीकेँ बुझबै मेघ पियास अषाढ़ मास धानक बीआ गिरा खेत गजारे सौनक बून मोती बनि गिरैए धरा सजैए सोना बिकैए तौल-तौल महग माटि अमुल्य इमान घटि बेमान तँ बनैए पेट खातिर आम लताम दीनक राखे मान बढ़बे शान धान मखान मिथिलाक छी शान पानसँ मान गुलाब फूल कॉंटक संग रहि मन लुभाबे दुख सुखक बीच गुलाब रहि सुगंध बाँटे मैथिली बोली मधुर जनभाषा सभक आश आगि पानिकेँ जरबैए, पानि तँ बुझबे आगि कुकुर कहीं आगि पकैए ठग कही उपास एक मार्ग-ए सुमार्ग मनुखक सत्य अहिंसा सुखक फल हित सेवा कल्याण मिलत त्राण कोइली कूक सुनि मन हुलसै नैन बरसै धनी बनब सभक इच्छा अछि दीन किए ने? जेल जुर्माना सुधारे ने जमाना नहि इंसान हाथ आएल शिकार छुटि गेल छगुन्ता भेल नहि भेटल माए-बापक प्रेम छी भाग्यहीन संघर्षशील कर्मशील जिनगी श्रेष्ठ होइए फटीचरक पहिचान बेढंगा बुझू लफंगा अश्रु पीब कऽ जेना शोकाकुल छी मरले बुझू समस्या भारी बेमारी फौजदारी छी कष्टकारी अनरनेबा फल गुणकारी औषध भारी पेटक दुख हरै अनरनेबा खाइमे मेबा अनरनेबा उपजै बाड़ी झाड़ी हरे बेमारी अनरनेबा पेट भरूआ फल छी हितकारी सुखले सौन कारी मेघ रूसल कृर्षि मरल सुखल खेत देख किसान काने भूखे पियासे दरारि देख माथा ठोके किसान तेजए प्राण अन्न अम्बार जे खेत उपजाबे सुख नै पाबे भूखले पेट मजदुर मरैए देखैबला के? मन मोहिया मोह मायामे फँसि लोभी मरैए मांगत भीख केना जीअत दीन की उचित छै? शोक संताप गरीबकेँ भेटल वरदानमे गरीबसँ तँ भगवान बेमुख सुखसँ दूर केना जीबत गरीबक संतान नै छी इंसान नै छै खिलौना खाइले नै छै खाना पृथ्वी बिछौना दुख भोगैले गरीब जनमल विषके पीतै? सभ इंसान हैवान बनल-ए सुधारत के? मोह-मायामे फँसि लोक मरैए बँचाएत के? लोभ-मोह तँ मनुखक दुश्मन तियागत के? क्रोध आगिसँ ज्वलनशील अछि बँचि कऽ रहू दुख भरल लोकक जिनगीए खोजैए सुख सुख दुखक जिनगी मधुर छै मध्यम मार्ग जे दुख सहि जीबैए शुद्ध सोना सन होइए जे नै सहैए भूख ओ की बुझत आनक दुख खुआ खाए कऽ जे चैनसँ सुतैए दुख के लेत फुटहा खाए दुख काटि जे जीलै केकरा लेल सभक हिस्सा मारि जे खेलक दोषी के हेतै? कहै लेल तँ सभ संतोषी अछि अधक्की के छी? रोग निदान संयमसँ होइए भोगी सृजैए पोड़ो, बथुआ गरीबक साग छी सेहत लेल पोष्टिक साग पोड़ो, बथुआ खाए गिरहतुआ साग पतार देहक रक्षा करि रूचि बढ़ाबे सागक गुण सभ नहि बुझैए सस्ता भेटैए सुखक बाट भोगी पकड़ैए तँ दुख के लेत? कर्महीन नै पुरुषार्थ होइए नर्क भोगैए विपत्ति सहि इमान बँचबैए स्वर्ग पाबैए बिगड़लकेँ साहित्य सुधारै छै ढोंगी छोड़ि कऽ अपन हित दोसरकेँ अहित स्वार्थी करैए प्रेम मार्गसँ देश समाज सजि आगू बढ़ैए प्रेमक बाट पकैड़ जे चलैए सुख पाबैए ई जिनगी नै नहि जीबै मरै छी अधमरू छी सत्य बात आ अमृतवाणि बाजु नै हेतै हानि जीवन मृत्यु सभक सत्य अछि माया घेरैए दुख सुखकेँ समरूप भोगैत जीबैत चलु मनक शुद्धि साहित्य करैत-ए सुख दइए किछु टनका ज्ञानक खान समाजक दर्पण साहित्य अछि अमृतक खजाना पढ़ि बनू विद्वान श्रेष्ठ साहित्य सागरसँ गहींर गोंता लगाऊ जिनगी बदलत भेटत आत्म ज्ञान भाषा ज्ञानक जननी कर्मभूमि देशक मान जनगण कल्याण विकासक निर्माण मधुर भाषा सभक मन जीत उच्च आसन सम्मान दियाबैए दुखसँ बँचबैए मनक मैल विचार बदलैए समाज देश दुनूकेँ बिगाड़ैए मन रोग बढ़ा कऽ मनक मैल छबिकेँ बिगाड़ैए जनहित नै स्वार्थी बनबैए कुबाट चलबैए अमृत वाणी जनहित करैए नदीक पानि शीतल, नहि हानि पोखैर राखै मान जन्मदातासँ पालनकर्त्ता पैघ मारैबलासँ बँचबैबला श्रेष्ठ जन्मभूमिसँ के छी? माता कुमाता कहियो ने होइए पिता पुत्रक हत्यारा नै होइए कहै छैथ विद्वान कर्मयोगीकेँ भोगी निर्वल कहि जोंक बनि कऽ हकमारी करैए उन्टे नर्क भेजैए श्रमशीलकेँ लोक हीन बुझैए हिस्सा लूटि कऽ भोगी जोगी खाइए स्वार्थ सिद्ध करैए परिश्रमक मोल अनमोल छै नै बिकै तौल जे जानैए ई मोल से जन ज्ञानी होय दुख सहैले गरीब जनमैए सुख भोगैले भोगी ठग महंथ तियागी संत अछि असल सन्त जनहित करैए सुर, तुलसी कबीर, रैयदास चारू युगक दास सत्यक वाणि नै होइए उवाणि हेतै कुवाणि धर्मकेँ हेतै हानि बढ़ि जेतै अज्ञान बाट बटोही संग मिलि चलैए एक थकैए दोसर अछि थीर के होइए अधीर चोर कहियो इजोत नै सहैए भोगी कहियो दुख नहि सकैए के भोगत ई दुख? मनक शान्ति साहित्यसँ भेटैए राष्ट्र निर्माण समाज कल्याण-ले ज्ञानी बाँटैए ज्ञान असल प्रेम साहित्यसँ करियौ ज्ञान बढ़त समाज सुधरत सुख शान्ति भेटत बिनु बजने लोक बुझत केना जँ बाजै छी तँ होइए नकीहानि उन्टे जाइए जान बरसु मेघ एहि बाग-बोनमे पानिक त्रास बेसी बनि गेल-ए खेत सुखि जरैए रूसल मेघ मन नहि मानए मानत केना जखैन बरसत तखने ने बिश्वास मेध देख मन हरिया गेल जे गरजत से बरसत नहि केना बँचत प्राण जे गरजैए से नहि बरसैए चुप्पे रहने खेत बाग जरैए प्यासे लोक मरैए लोक कहैए इंसान पत्थरसँ कम नै अछि अखनो तँ विवेक बुझू मरले अछि कहै लेल तँ विवेक मरल-ए मुदा कठोर इंसान जगलासँ आतंक तँ बढ़ैए किए इंसान लूट हत्या करैए रावण कंस बनि खून पीबैए इमान की कहैए? एते निष्ठुर मनुख किए भेल दुश्मन बनि मनुखे मनुखक हत्यारा बनि गेल धरती डोलि कानि-कानि कहैए सभ डरल सामन्तक जड़िमे आतंक जनमल जवाब देतै सहए तँ दोषी छै चुप्पी सधने मुँह सीने रहै छै दीन दुख सहै छै जे जनमल एक दिन मरत किए होइए लोभी स्वीर्थे अधीर जगत अछि धीर सोच बदैल नेक इंसान बनु घिनौना काज छोड़ि कल्याण करू हेतै नव निर्माण सत्यक बाट चलए जँ इंसान आगू बढ़ैत आगि नहि पकत नहि पानि सड़त कर्मकेँ छोड़ि लोक धर्म खोजैए भवलोकमे भगवान खोजैए नर्क भोग भोगैए हारल दिल थाकल तन मन अकैर गेल जिनगी अगहए जगत छुटि गेल मनक मैल नै छुटल तीर्थसँ स्वर्ग खोजैमे मरणासन भेल कर्त्तव्यक खेलमे मोह बन्धन फँसि वौआए गेलौं बाट भुलि कऽ लक्ष्यहीन बनलौं आडम्बर देख कऽ ठगक मेला पाखण्डीक दोकान सज्जन जन पाप कीनै-बेचैए पुण्य-पापक खान अपन बात लोक दाबि रखैए अपन दुख अपनेसँ सिरैज ओझरा कऽ मरैए स्वर्ग कहि कऽ गामकेँ लजबैए नहि सुविधा सड़क बिजलीक खेती पछारू अछि गाम छोड़ि कऽ परदेशिया बनि खटैए लोक गाममे नै उद्योग पेटक समस्या-ए सभक पेट भरैबला मरैए भुखले पेट धिया-पुता बिलैट अनाथ बनल-ए कहै लेल तँ रीढ़ अछि किसान मुदा जीवन देखू बेवस्था खेल खेती चौपट्ट भेल उत्तम खेती कहैबला नै कियो साधनहीन खेतीक काज भारी माथ पीटै किसान मरि जीबि कऽ किसान खेती करै खा गेल रौदी धिया-पुता कनैए भुखै सॉंझ-विहान केना बँचत इज्जत आ आबरू नहि सुरक्षा दिन अपहरण राति हत्या होइए देश अजाद मुदा खेती उद्योग नै सुधरल नै भेटल सुविद्या की करत विधाता गामक गाम खाए सुते बलान बालुक ढेर उड़बै आसमान केना बँचत प्राण कोसी बलान कमलामे उफान एलै तूफान भँसिया गेल गाम मरल स्वाभिमान विकराल छै कोसीक बाढ़ि-पानि पेटे समेलै गाम-घर-दलान लाखक गेल जान कोसी त्रासदी विकराल निर्मम तांडव नृत्य महाकाल बनल धोइ पोछि खेलक लूटेरा सभ मिलि माल खेलक शोषण हत्या नारीजनकेँ भेल बच्चा दहए गेल धनक क्षति जनक मति गेल देखैबला नै डुमि मरल बच्चा गाम भेल निपत्ता प्रकृति कहि चेतबैए लोककेँ अचरज नै प्रदूषित धरती जहर उगलैए देख प्रकृति चेतावनी दइए धरती पानि हवा प्रदूषित भऽ संकट छै जीवक पावस रीतु अमाबस राति छी मेघ बरसै बाढ़िमे डुमैत छी के बँचेतै हमरा ठेँस बाट चलैत लगल ठेँस फुटि गेल पएर ठेंगा ठेँगहैत बाट चलै छी देख-देख केना पहुँचब एतेक दूर गाम-घर अछि दूर पेटमे एगो दाना नहि पियाससँ सुखि गेल कण्ठ, मुँह-ठोर ऊपरसँ चैतक रौद गरम हवा लू चलैए तबधल धरती फूटल पएर बाटपर चलब केना कोसक-कोस दूर मन घबड़ाइत रहए देह दइए जवाब मुदा हमर कोन कसूर ई तँ ठेँसक छी दोष मुदा हम छी लचार ई बाट बनल अछि दुर्गम अगम अपार ठेंगासँ ठेँगहैत चलै छी तैयो लगैए बेर-बेर ठेँस गीरैत पड़ैत भेलौं बेजान बीच बाटपर तेजलौं प्राण। आजुक दिन आजुक दिन मनुख कर्त्तव्यसँ चुकल अछि अपनाकेँ बीरान आ बीरानकेँ अपना बुझैए तइसँ नीक तँ जानवर अछि जे जीवित आ मुइलोपर सभक उपकार करैए मुदा मनुख एक दोसरकेँ जानक दुश्मन बनल-ए उचित अनुचित नै बुझि आफदे-आफद कीनैए आजुक दिन...। आइसँ पहिने नीक काल्हि की हएत से के जनैए अखनो विचार करू वर्त्तमान किए बिगड़ल-ए विज्ञानेटा नहि इतिहासोकेँ देखियौ दुनू मिला कऽ अमृत बना कऽ दुनियाँ लेल बाँटियौ जरूरत अछि मानवकेँ सुधारियौ देश समाज लेल आजुक दिन...। धनक खातिर धन कमेबाक लेल सभक मनसा अछि मुदा, ज्ञान कमेबाक नहि जनैए कियो माए-बाप परिवार छोड़ि दिन-राति एक बनौने परदेशमे खटैए धनक खातिर। ज्ञानक महत् जेना भूलि गेल की उचित की अनुचित नइ रहल कोनो ठेकान धिया-पुताक जिनगी बिगैड़ चौपट्ट भेल परिवार-समाज सेहो छुटल नइ रहल साविकक पहचान सभ टुटि छिड़ियाए गेल धनक खातिर।। शिवक नचारी भोला अहॉं छी बड़ रूसना कोठा महलमे मनो ने लगैए वन-जंगल छी अहॉंक अँगना बाघ बघम्बर ओढ़ना-बिछौना मृगछल्ला छी अहॉंक पहिरना भोला अहॉं छी बड़ रूसना। दूध-मलाइ अहॉंकेँ मनहु ने भाबैए मेवा मिठाइ छोड़ि कऽ घरसँ भागै छी भरि दिन घोटबै छी भंग घोंटना फूलक सुगन्धसँ दूरे रहै छी आक-धूथूर भांग छी चखना भोला अहॉं छी बड़ रूसना। भरि दिन रहै छी धुनी रमौने नाग साँपसँ भरल घर-अँगना देह बनौने रहै छी भूतना भरि दिन खाइ छी भांगक गोला केना रहब हम एहि घर अँगना भोला अहॉं छी बड़ रूसना। सखी-सहेली मिलि हमरा लजबैए पिया छौ तोहर केहेन भूतना तोड़ासँ घोंटबै छौ भंग घोंटना केना दिन काटब हे भोलेनाथ केतेक दुख सहब तोरे संगे-ना भोला अहॉं छी बड़ रूसना। दिनक दोख दिनक कोन दोख? दोख तँ लोकक छी जे हरदम बदलैत रहैए रीति-रिवाज विचारसँ मौसम बदलैए हवा-पानि-रौदसँ रितु बदलैए समयसँ ऐमे दिनक कोन दोख? चान-सुरुज धरती नै बदलैए कीए बदलैए लोकक इमान-धर्म जँ दिनक दोख होइए तँ पानि, दूध, खून किए ने बदलैए माए-बाप छोड़ि कऽ जाति-धर्म बदलैए ऐमे दिनक कोन दोख? हँ, दिनक नाओं बदलैए दिन-राति बितलापर भोर-साँझ सभ दिन होइए जे हेबाक छै होइत रहैए ऐ अद्भुत प्रकृतिमे सभ दिन एक समान सत्य छी की झूठ ऐमे दिनक कोन दोख? हमरा मोन पड़ैए बच्चामे बादशाह जकाँ घुमै छेलौं चौरी-चाँचरमे कड़हड़ खुनि भैँट तोड़ि खाइ छेलौं बाड़ी-झाड़ी घुमि-घुमि कऽ पकल तिलकोर भुटका तोड़ि-तोड़ि खाए झुमै छेलौं आम-लताम बरहर कटहर बैर तोड़ि हम खाइ छेलौं बिनु धनि-फिकीरक रहै छेलौं सभ किछु हमरा मोन पड़ैए। नाच देखै आ महराइ सुनैले जाइ छेलौं हम कोसो दूर सलहेश, हल्हारूदल, बिहला गोपीचन, राजा कुंबर-वृजवान भिखारी ठाकुरक विदेशिया नाच राति-राति जगि देखै छेलौं धर्मराज, दीनाभदरी, लोरिक-मनियारक महराय संगी सेंगे सुनैत छेलौं नाचैत-गबैत घर अबै छेलौं ओहिना सभटा हमरा मोन पड़ैए। मुदा अखैन कौल्हुक बरद जकाँ दिन-राति परिश्रम करैत रहै छी जिनगीक गाड़ी क्षणे-क्षणे आगू कहुना बढ़बैत चलै छी परिवारक बोझ पहाड़सँ भारी माथपर लऽ मरितो सहै छी कखनो नइए दम मारैक पलखैत जे घुमि देखब दुनियॉं-दारी ई बनल अछि सदिखन लचारी तैयो ने भेल अखनो समझदारी हराएल हमरा बेवहार पुश्तैनी मिथिलाक रीति-रिवाज संस्कृति अखनो ओ दिन रहि-रहि कऽ सभटा हमरा मोन पड़ैए। अनजनुआँ भोरक पहर उठि कऽ जखने गेलौं पोखरिक कात करीनसँ पानि भरि-भरि गहुम पटबै छेलौं एकान्त माघक कुहेस केने अन्हार किछु दूरेक अबाज कान पाथि जनमौटी बच्चाक सुनलौं करीनक पानि करीनेमे छोड़ि अबाज अकानैत खोजैत बढ़ैत पहुँचलौं पोखरिक दोसर महार झाड़ी-झंखारमे घास-पातपर राखल लहुआएल जनमौटी लाल जननी छोड़ि भेल रहए निप्पता जे बुझना गेल छी अनजनुऑं केहेन निष्ठुर छल ओ माता माइक धर्म-कर्म छोड़ि ओ केलक कुकर्म जानि अंजानि मुदा बच्चा देखते हमरा मोनमे उपजल दया धर्मक भाव बच्चा उठा कऽ कोरामे लेलौं झटसँ लेलौं हृदय सटाए ओढ़नासँ झॉंपि जाड़सँ बँचबैत हर्षित मनसँ अनलौं अपना घर अबाज देलौं घरवाली पहुँचल दरबज्जापर आबि कहए लगली गहुमक पटौनी छोड़ि अहॉं किएक एलौं घर जानि-प्राणि कहलौं हम छेलौं नि:संन्तान सभ कहै छेलए निपुतराहा मुदा भगवान बनला दयावान आब बनलौं हम पुत्रवान पालि पोसि कऽ बनाउ महान इहए करत वंशक कल्याण अनजनुऑं बच्चा नै कहतै एकरा धर्मक माए बाप छै जेकरा। धरतीक बोझ देश प्रेम, मातृ-पितृ भक्ति जे नर नहि कऽ सकल ओ मानव नै दानव छी धरतीक बोझ समान छी। जे करैए जन-जनसँ प्रेम से नर देव समान छी जे दुखियाकेँ दुख हरैए ओ साक्षात भगवान छी। जे दोसरकेँ दुख दइए वएह नर रावण-कंस छी जे दुख सहि सुख बँटैए ओ मानव नै महामानव छी। जे अपने सुखमे बेहाल रहैए वएह नरकक भोग भोगैए जे भुखलकेँ रोटी नै दइए से मानव केना कहा सकैए। जे मातृ, मातृभूमि, मातृभाषाक सेवा जीवनमे नहि कऽ सकैए से इंसान नहि, शैतान कहाइए तेकरा केना स्वर्गक सुख भेट सकैए। जे सभ दिन देशकेँ लूटि खेलक तेकरा धरती केना समाए सकत गरीबक हक जे मारि खेलक वएह धरतीपर मलेछ बनल। जे सभ दिन अनके खेलक अपन कहियो दोसरकेँ नै देलक ओकर जिनगी अकारथ भेल धरतीक बोझ बढ़बैत गेल। । हरबाहाक जिनगी जाड़क समय ठीठुरैत खाटपर दुबकल पड़ल रहए फाटल चद्दैरमे सोचैत रहए कखन हएत भोर गाए बरदकेँ खुआ जाएब खेत मुदा जाड़सँ कॉंपैत रहए सौंसे देह ओस-कुहेससँ झाँपल छल धरती संतोख बान्हि सोचलक जाएब खेत जाड़क ठंढसँ देह झुलैत देख थोकरा बुटी ओलि धुरा जरा कऽ देह सेकलक जखन भेल गरम फुरफुरा उठि हर जोतए लगल खेत जेातबाक तँ बहुत रहए मुदा उघारे देह ठरि भऽ गेल शरद मालिकक डरसँ केना खोलत बरद चिन्ता रहै घरक, की खाएत धिया-पुता हूबा बान्हि खेत जोतैत रहल भूखसँ लूत्ती छिटैक अन्हार लगैत रहए एक तँ जाड़क मारल देहक हारल भूखसँ लगैए आब निकलत प्राण भोरसँ दुपहर भेल, बेर खसल तखन जलखै लऽ मालिक पहुँचला खेत बजला- एतबे खेत भोरसँ जोतलेँ जलखै खाए सभ खेत जोइत दिहक हरबाहा दुखीत मने कुहरैत बाजल भूखे मरब जखन स्वर्ग पहुँचब तखने जोइत देब सभटा खेत। माछ हम छी जातिक माछ नै बिगाड़ै छी किनको तैयो तड़पा मारै छी पोखैर-नदीक कात सभ मिलि कऽ हमरा जातिकेँ करै छी जानि विनाश हम निश्छल जीव छी सभक करै छी उपकार मुदा निष्ठुर भऽ मारि खाइ छी केतेक निर्दयी बनि कऽ हमर जिनगी उजारि रहल छी हम पानिक जीव छी धरतीक अधिकारी अहीं छी की मजबूरी अछि अहॉं सभकेँ हमर वंश उजारै छी केना बुझब दयावान छी की जीव जीवक हत्यारा छी विवेकशील छी मुदा निर्दोषक संघारा छी अखनो चेतु सीखू अपनो जीब आ आनोकेँ जीबैक अधिकार दियौ हमरो जातिपर उपकार करियौ दया धर्मक मान रखियौ आब हम किछु नै कहब अपने विवेकसँ लिअ काज हम छी जातिक माछ। मनक मोलि तन-मनकेँ केतबो धोलौं छुटल नहि कहियो मनक मोलि तीर्थक पूण्य बहुत कमेलौं नदी, कुण्डमे स्नानो भेल तन रंगेलौं मन रमेलौं तैयो ने छुटल मनक मोलि तन-मनक मोलि रहए खरकटल कुपित मन जे छेलाए बेकल तखने एकटा युक्ति भेटल गोंता लगा साहित्य पढ़लौं ज्ञान रूपी गंगामे डुमकी लगेलौं मिथिला धामक तीरपेखन केलौं गामे-गाम भरल छला विद्वान जे करै छला जगतकेँ ज्ञानवान दूर कऽ देलैन मनक कलेश बिनु जप-तप केनहि हमरा तन-मन निर्मल भऽ गेल तखने छुटि गेल मनक मोलि। तृष्णा तृष्णाक तृप्ति जलसँ होइए अन्नसँ मिटैए पेटक भूख दूध फल मेवा काया पोसैए औषधि करैए दुख दूर हीरा-मोती छी धनक भूख मनक तृष्णा कहियो ने मिटैए मरने जाइए संगे क्रिया-कलाप सत्यक सौरि पतालमे होइए यश स्वर्ग धरि पसरैए सभ किछु छोड़ि सुरधाम जाइए मुदा कर्म-कुकर्म दुनू संगे रहैए नहि बाँटैए अपनो कियो अधर्मी फलहीन वृक्ष सन सुकर्मी अमृत सभ दिन पीबैए अज्ञान अन्हरिया राति होइए ज्ञान पूनमक चान कहबैए लोभ पापक असली खान छी सत्य जीवनक प्राण होइए धनक तृष्णा जंजाल बनैए तृष्णा मृगतृष्णा बनि कऽ लोभीकेँ लइए क्षणमे प्राण तृष्णाक तृप्ति स्वर्गोमे नै होइए भटैक जीव नरक भोगैए संतोखसँ परमानन्दक सुख भेटैए। बेटी बेटी देख किए झखै छी नै छी बेटी अभिशाप यौ दिन बहुड़लै सभ बेटीकेँ घरमे हेतै लक्ष्मी समान यौ माइयो बापक मति सुधरलै सरकारो दइ छै धियान यौ बेटा-बेटीमे फर्क नै रहतै अधिकार लेतै समान यौ शिक्षा पाबि दहेज मिटतै बढ़तै समाजक मान यौ बेटी बचाउ केर नारा लगै छै हेतै सरस्वतीक घरमे बास यौ जनक नन्दनी सीता बनि कऽ देशक रखती मान यौ एक्कैसम सदी बेटीक युग एलै बनतै देशक नव इतिहास यौ देशक बेटी देवी स्वरूपा जगत केर करत कल्याण यौ उपेक्षित भऽ बेटी जान गमेती केना हेतै सृष्टिक निर्माण यौ दुखित भऽ कवि कहै छैथ बचाउ बेटीक जान-मान यौ बेटी देख किए झखै छी नै छी बेटी अभिशाप यौ। वसंतक गीत आएल वसन्त कोइली कुहकैए मधु बरसैए चहुओर हे मह-मह महुआ रस टपकैए आमक मज्जरसँ मधु बरसैए हे पूरबा-पछिया मस्ती मारैए गुंजैत भ्रमरा मन भरमाबैए हे खग कलख वसन्त गीत गाबए तोड़ीक फूलसँ खेत करैए सृंगार हे आएल वसन्त कोइली कुहकैए मधु बरसैए चहुओर हे...। सखी-सहेली बगिया घुमैए कली खिल करैए सृंगार हे मातल मधुकर तांडव करैए रितुराज बाँटैए पुष्प पराग हे मनक पियाससँ करेज जरैए पिया बिनु मन तरसैए हे वसन्त बनल अछि चित्तचोर जखन केकरापर करब सृंगार हे आएल वसन्त कोइली कुहकैए मधु बरसैए चहुओर हे। केकरा लेल महगी घूसखोरीसँ चैन उड़ल दहेजसँ समाज दबल टुटल भेद-भावक बीच जिनगी मरल लूट हत्या अपहरण होइत रहल ई देश केकरा लेल बनल। धर्मक नामपर कट्टरपंथी लड़ल जाति-पातिमे समाज बँटल धनीक-गरीबक बीच खाधि बढ़ल काज बिनु मजदुर मरि रहल ई देश केकरा लेल बनल। देशक मालिक नेता, अधिकारी बनल काला धनमे बेहाल नेहाल रहल खान खजाना कारखाना हुनके सटल गरीबक बेटा शहीद होइत रहल ई देश केकरा लेल बनल। पानि बिनु खेत परती पड़ल घर छोड़ि किसान परदेश खटल सुखले नहर टुटले पड़ल सुभाष, भगत, चन्द्रशेखर, गाँधी केकरा ले बलिदान पड़ल। गरीबक नाओंपर योजना बनल शिक्षा स्वास्थमे घुन लगल माटि-पानि दवाइमे जहर घोरल धरासँ अम्बर धरि इंसान बदलल ई देश केकरा लेल बनल। धर्मक उपदेश की भेल जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए विवेक अविवेकक द्वन्दमे फँसल-ए सूर तुलसी कबीर मीराकेँ बिसैर गेल नीति उपदेश वेद पुराण शास्त्र जेना कलियुगमे तर पड़ि गेल-ए जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए। सज्जन संत महंथ तपसी बनि कऽ वन पर्वतमे नुकाएल फिरैए रावण रामपाल, गुरमित सिंह राम रहीम नारी संग अत्याचारक रास नचैए चारू युगमे कलियुग भारी पडल-ए धर्मक आड़िक पाछू इंसानो शैतान जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए। जेतए माय मातृभाषा पछुआएल-ए दहेजक खातिर बेटी जीबिते जरैए अपन कलंक लोक गंगामे धोइए देवी देवताक पूजा सभ दिन करैए वल धन ज्ञानक वरदान मंगैए तेतए इंसानक इंसान किए मरल-ए जेतए इंसानक इमान इंसाने होइए तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए। जीबिते जी मरै छी की कहूँ सखी पियाक वियोगमे जुआनी जरबै छी जीबिते जी मरै छी। चढ़ल यौवन ढरल जाइए जेना सौन भादोमे मेघो ने देखाइए। नहि पड़ल बून्न झिसियो ने पड़ैए धरती पियासे धधैक जरैए। बून्न-बून्न लेल बेकल प्राण तियागने जाइए तहिना हमर मन पियासे पिया बिनु जरैए। आशक बाट तकै छी आँखि ताकि निरारि हिया हारि बैसल छी आँखिसँ नोर झरैए। उमरल यौवन मनमे लहैर मारैए तन मनक आगि सहजे सहल नै जाइए। दुनियाँक नजैर बदलल लगैए लोक देख-देख कऽ नजैर-मे-नजैर लड़बैए। मजधारमे जिनगी दलदलमे फँसल-ए भविष्यक बाट अन्हाराएले सन लगैए। पियाक सनेस बाटे हेराएल-ए केना कटत दिन-राति सौंसे देह आगि लगल-ए। केकरा देख जीअब दुनियाँ अन्हार लगैए की कहूँ सखी कहल नहि जाइए जुआनी जरबै छी जीबिते जी मरै छी।। माघक जाड़ बाप रौ बाप माघक जाड़ गलेलक हाड़ छुबैए प्राण लेत जान ओस-कुहेसमे धरती डुमल चिड़ै चुनमुन खोंतामे सुटकल कहुना बँचबैए अपन जान बिलसँ निकैल फणधारी सभ मुँह पटैक-पटैक तेजैए प्राण जीब जन्तु सभ ठिठुर रहल-ए सुटकल पड़ल-ए अवग्रहमे अछि सभक जान कनकनी चलैए काल समान सुरुज-चानक दर्शनो ने होइए दिन-राति अछि एक्के समान पानि छुबै छी देह सिहरैए कान ठरि गलि कटैए देहक रूईयॉं काँटो-काँट होइए संकटमे अछि जान केना बँचाएब प्राण एहेन जाड़ जिनगीमे देखलौं बुढ़ो-पुरान सभ अद्भुते कहैए केतेकोकेँ लेलक क्षणेमे प्राण कलपैत मुहेँ सभ कियो कहैए भगवानो दुख दइए बाप रौ बाप माघक जाड़। किसानक मजबुरी बाप रौ बाप, केना जीअब आब रौदे बसाते खेत खटै छी अदहे पेट खाए सुतै छी दुखे पकैड़ लेलौं खाट रौदी-दाहीसँ लड़ैत महगीक मारि सहैत शोगमे कुहरैत माथ ठोकैत रहै छी कर्जामे डुमल छी दुखे-दुख सहै छी जिनगी ढहैत कोसीक धारमे बहै छी चौपट्ट भेल खेती धिया-पुत्ता बिलैट गेल जीवन तबाह भेल मजदुरियो ने भेटैए मजबुरीमे परदेश खटै छी पढ़लो-लिखल विदेश रहैए गाम-समाजकेँ के देखत केना बँचत गामक इज्जत किसानी जिनगी दुखदायी भेल के सुधारत किसानक समस्या सौंगरपर सरकार चलैए कमीशनपर योजना बनैए पूजीपतिक खेल होइए कृषि काज नै सुधरल आइ धरि ओकरे बिगाड़ैमे सभ भिड़ल-ए उपजासँ लगता बेसी नै उचित बजार मिलैए अधमरू जीवन जीबै छी आत्महत्या करैले सोचै छी केतेक दुख सहब जिनगी धरि की दुखे सहैले जनमल छी आब आगूक जीवन हारि चुकल छी डुमि मरैले मजबूर छी। बैशाखक विष चैत बितल बैशाख चढ़ल मुरझल फूल सुखल पात बाँसक पात सेहो झड़ल घास सुखि मरल पड़ल चौर-चॉंचर सुखि फटल खत्ता-डबरा मरता पड़ल धार नदी सेहो सुखल खेतमे दरारि दरकल चढ़ल गर्मी दुख बढ़ल तबधल धरती तबा समान चिड़ै-चुनमुन पानि खोजैले वौआए रहल-ए कोसक कोस पोखैर-इनार पहिने सुखल पतालक पानि तर पड़ल पानि बिनु जीवन केना चलत त्राससँ सभक मन तरसैए बैशाखक विष चढ़ले जाइए केना बँचत जीवक जान सभ खोजैए पानिए-पानि प्रदूषित धरती अपने दुखी अछि बैशाखक रौद उगलैए विष सभकेँ लेत अखने प्राण। कोसीक कहर आएल कोसीक कहर पसैर गेल बाढ़िक पानि विलिन भऽ गेल गाम-घर नहि बँचल नाम-निशान मचि रहल कोसीक कोहराम देखते भॉंसि गेल बच्चा-बेदरू गाए-महींसक गेल जान अपन जान बँचबै खातिर लपैक पकड़लौं मोटका गाछ तैपर लपटल फणधारी फुफकार काटैत करैए पहरेदारी देखते हमर प्राण उड़ि गेल मुदा दयावान बनेलक शरणधारी मानवसँ ओ साँप हितकारी प्राण नै लऽ रक्षा केलक संगे केतेक दिन-राति बितल नीचामे अथाह बाढ़िक पानि ऊपर बहै छल बर्खाक झॉंट जाड़क मारल भूखक हारल मौतक मुँहमे फँसल रहूँ भूखले प्राण टगै छेलौं केतेक दिनक भूखल कोसी लाखक लाख जान खाए गेल हमरो हाथ छुटि गेल गाछसँ धब दए गीरलौं बाढ़िक पानि सभ दिनक लेल कोसीमे समाए गेलौं। केकरापर करब श्रृंगार अपन घर छोड़ि पिया किए गेलौं जानि परदेश मनमे बढ़ेलौं कतेक कलेश मुदा नै देलौं बोल भरोष मन हमर अपचंग होइए रहि-रहि करेज डोलैए सिनेह बिनु देह हहरैए जिनगी बनल-ए दुखक पहाड़ की वैरणी केलक अहॉंक शिकार बिनु अहॉं केकरापर करब हम श्रृंगार। पात जकाँ तन-मन डोलैए धीर मन अधीर होइए सबूरक बान्ह ढहि गीरैए प्रेम विरहमे जरै-मरै छी अबगरहमे अछि हमर जान जगतमे देखै छी शैताने शैतान आशक बाट लगैए सुनशान जिनगी बनल अछि बीरान आब केते करब आओर इंतजार बिनु अहॉं केकरापर करब हम श्रृंगार। अछैते औरुदे दुख सहै छी चढ़ल उमेर ढहल जाइए केतेक करब अहॉंसँ परहेज केकरा लगाएब हम करेज नि:सन्तान छी मन वौआइए बाट देखैत भेल छी निराश जेना फूलसँ तूबि गेल पराग दोसर देख कऽ अबलट जोड़ैए प्रेम रोगक हम छी शिकार बिनु अहाँ केकरापर करब हम श्रृंगार। करमक खेल देखू भाइ करमक खेल कियो बेचए नून तेल अमीर करैए कठखेल गरीबसँ नै रहल मेल केकरो रोटियोपर ने तेल अखनो बेवस्था अछि गरमेल कियो खेलैए होरी खेल देखू भाइ करमक खेल। अखनो धरि खेती नै सुधरल मजदूर सभटा पलायन भेल राम भरोसे जनता जीबैए हिंसक करैए हिंसाक खेल नीति-कुनीतिक बीचबिचौआमे गरीब जनता पिसाए गेल समाजसँ सरकार बेमुख भेल देखू भाइ करमक खेल। शिक्षाक नाओंपर ठगी होइए शिक्षालयमे होटल खुजि गेल पढ़ै बेरमे खेलैए गदहाक खेल धिया-पुत्ताक करम फुटि गेल स्वास्थ्य सेवा अछि नाओं लेल अस्पतालसँ भरोस उठि गेल देखू भाइ करमक खेल। देखियौ देशमे नोटक खेल एकरे बलपर भोँट कीनैए गदहाक माथपर ताज शोभैए विद्वतजनकेँ राखैए कात मूर्खासन धृष्ट्रराष्ट सुतल रहैए जनताक खून बिका रहल-ए जनतंत्रक परिभाषा बदैल गेल देखू भाइ करमक खेल। खेत सुखि फाटल पड़ल-ए पानि बिनु खेतमे फसल जरैए पेट खातिर पेटबोनिया मरैए गरीबक समस्या बढ़ले जाइए समाजक लोक छिड़िया रहल-ए सरकारी तंत्र जेना फेल भेल-ए देशक विकास अधूरे रहि गेल देखू भाइ करमक खेल।। भीखमंगनी भीखमंगनीकेँ देख कऽ छगुन्तामे पड़ि गेलौं चिरखल चेथरीमे सुटकल अंग झलकैत देखलौं हाड़-पाँजर सुखल फुरकल केश आँखि धँसल मुँहपर फुफरी पड़ल मुदा बत्तीसी चमकैत ठेंगासँ कुकुर भगबैत भूख पियाससँ तड़पैत कुहरैत पथपर बढ़ैत हाथमे पचकल टीनही बाटी आशमे हाथ आगू केने खाइले किछु भीख मांगैत डेढ़ियापर ठाढ़ भऽ बेर-बेर जोर-सँ बजैत कने खाइले किछु दीअ हमर बेटी बेचनी रोटी-चटनी दैत बजली बैस खा कऽ पानि पीब लीअ दलानमे हम बैसले-बैसल देखलौं नयन निरारि भीखमंगनी रहए लचार बुझि पड़ल नीके घर-खनदानक पुछलिऐ कियेक भेल ई हाल भीखमंगनी डबकल आँखिकेँ ऑंचारसँ पोछैत बजली- नहि छी कुलक्षणी, छी कमसुतनी मुदा दहेजक खातिर पीट-पीट हमरा केलक ई हाल निष्ठुर पतिकेँ दया-धर्म नइ-ए सासु-ससुरकेँ नै अछि लाज सभ दिन मारैए घूसा-लात के पोछत हमरा नोरकेँ कखनो निपुत्री-कुलक्षणी कहैए लाठी मारिसँ देह तोड़ैए घरसँ भगबैए साँझ-विहान बड़ गंजन सहैत रहलौं मुदा मरब तँ नइए असान जाधैर अछि घटमे प्राण भिखो मांगि राखै छी मान सुरुजकेँ हाथ जोड़ि कहै छी केकरो नइ दिहक एहेन ज्ञान सासु-ससुर पतिदेवकेँ दीहक सुमति-सद्ज्ञान हमरो बँचाबह इज्जत प्राण। राहुल झा "आर.जे." बटगवनी कदम पर बैसल माधव रे देखत बृज के नारी मंद मंद बंसी फुकत रे नाचत गुणमति नारी लाज भाव त्यागल रे बिसरल नव साड़ी फसल कदम पर आँचर रे फाटल नव साड़ी हरी मंद मुसकाबय रे देखि फाटल नव साड़ी रोकल कन्हैया जखन बंसी रे साड़ी देखल सब नारी साड़ी देख सब बिगरल रे घर जायत कोना सब नारी कहल गोविन्द जुइन डरु रे हे बृज के नारी आज अमावस दिन में रे तोहे नय रहब उघारी एहन अमावस होयत रे दामिनी गिरत अन्हारी लिखत राहुल दूय पद रे सुनु गुणमति नारी हरी संग किछु डर नहीं रे इहे गोवर्धन गिरधारी राकेश प्रेमचन्द्र ‘पीसी’, पूरा नामःराकेश प्रसाद चौधरी, जलेश्वर नगरपालिका ६, पत्रकार एवं अनुसन्धानकर्ता, प्रकाशितः खिचडी कविता संग्रह एवं फुटकर कथा, कविता, लेख । अप्रकाशितः फुलगाछ कविता संग्रह पी.सी.क पाँच हाइकु सासुर घर सञ्जीवनक गाछ अनूना पानि अंग्रेजी बैध छागर भोग लिला घरैया रोग प्रेमक मोह शिवजी बम भोला उलट फेर जय श्री राम संसार लेनदेन भोजन गृह हारक भोज जीत पित्त लडाई जन विधान मिसिदा [मिथिलेश सिन्हा "दाथवासी" (मिसिदा), (मिथिलेश कुमार सिन्हा), अधिवक्ता, मोहल्ला/पोस्ट : लक्ष्मीसागर, जिला : दड़िभंगा, पिन : 846009] स्मृति शेष बुढ़बा पाकरि, एखनो ठाढ़ अहि, गामक सीमान पर, उगि गेलैए आब, बोन-झार.... सर्पक केचुआ फहिरा रहल, पाकरिक ठाढ़ि पर ! नहि अबैए आब एत', किनको पन-पियाय, नहि मचैए एत', नेना-भुटका केर किलोल, नहि करैए विश्राम, आब कोनो पथिक, एहि पाकरि'क छांह तर !! मरर पोखरि पर, अहि एखनो, पिपरि गाछ झमटगर, जाहि त'र बनल छल, नीक सन चबूतरा, जेठ मासक दुपहरि मे, खेलै छलियै ताश ! एखन टूटि-फुटि गेलैए, बनल ओ चबूतरा, जत' होइत छल, सांझ खन बैसार, गामक पुरोधा, जानल मानल पंच, होइत छलाह खास !! घरक कनियां-मनियां, निकसैत छलीह, लाब' ल' पानि, लेकिन, बुढ़-पुरान लेल, माथ पर राखि आंचर, दैत छलीह सम्मान ! आधुनिकता केर, परिवेश आब, ओढ़ि लेलक अहि गाम, बाबू जी,डैडी बनलाह, माय बनि गेलीह मॉम, देसी कें कफन ओढ़ा क', करै छथि अभिमान !! रसगर मीठगर, पियरगर, मैथिल बोली, सोनगर लागै छल कान, कोयली केर मधुर स्वर सं, गुंजित होइत छल, सगर सकान !! अंगरेजी केर, लोभ मे त्यजल आब, देशज भाषा, मैथिली भाषी, कहब' मे, कियैक बुझै छथि, अप्पन अपमान ? बेर-बेर, नजरिक आगू, घूम' लगैछ, गाम परहक, पाकरिक पेड़, पीपरि तर'क, बनल चबूतरा ! रहि गेल, आब "स्मृति-शेष" !! रवि भूषण पाठक छौड़ा अजगुत कंप्यूटर छै लौत उदास परखैत पासंग वौआ क्षणेक्षण साइड बदलै छै ! कत्ते वाह ! आ कत्ते कमाल कहू बस तीन मिनट पहिले बीचोबीच रहै एक मिनट पहिले वाम भेलै मिनटे पंचर जाम भेलै दहिने छौड़ा गाम गेलै मतलब पूरा कलाकारी बीचोबीचक कत्ते जल्दी गुट बदलै छै ! कोना के गुटपिट ? गुट तोड़ै छै छौड़ा अजगुत कंप्यूटर छै गुरुओ संग नोच्चा-नोच्ची कोना-तीत्ती सिंघीपताली खनेखन छौड़ा गुरु बदलै छै ! महाकवि विद्यापति-१ युवाकवि विद्यापतिक पुरूषपरीक्षा कवि सँ बेशी ओइ जुगक मांग पुरूषार्थ आ ओइ पौरूषक प्रशंसा ओइ दरबार आ बूढ़रसिक समै केर छन्द तैयो ओइ कवि के शत्रु साओन बिढ़नी के छत्ता केओ किताब चोराबै ,केओ पांड़ुलिपि पोखरि मे फेंकि दै कतेको चेतावनी ,रस्तारोकी ,छीनाछोरी विद्यापति जानैत रहथिन कि पुरनका पोथी बिसरले सँ नवपोथीक आगमन पुरूषपरीक्षा लिखै काल हुनकर बैठकी भरल रहै वेद-पुराण ,व्याकरण ,न्याय-स्मृतिक ग्रंथ सँ जयदेव ,वात्स्यायन आ भामहक भार सँ दाबल पाणिनी आ पिंगलक बान्ह सँ पिसाइत कल्पैत युवाकवि सबसँ पहिले फेंकलखिन पुराण आ स्मृति तखने प्रकट भेलखिन कीर्तिलता आ कीर्तिपताका मुदा एखनो संतोष नइ ऐ कीर्ति के तुच्छ बूूझैत बढि़ गेलखिन आगू कवि विद्यापति फेर फेंकलखिन छंद-काव्य आ दर्शनक शताधिक पोथी फेकैतो काल प्रणाम करैत ओइ पोथी सभ के महल आ बैठकी कें त्यागि आबि गेलखिन जन आ जनपदक मध्य जनपदक संगे-साथ चिन्ह' लागलखिन जनमन तखने त' दुखहि जनम भेल ,दुखहि गमाओल ऐ दुख के गमिते उदित भेलखिन महाकवि महाकविक कविता राजा जनकक नइ आरक्षित बस जनजनक लेल जइ कविताक छाती मे धुकधुकाइत रहै मिथिलाक श्वास ई अमरकविता तुरूकक कागज पर लिखाइ सँ बेशी अमर भ' गेलै कोटिजनक ह्रदय मे, रक्त मे, माटि मे महाकवि विद्यापति-२ हयौ साहेब अहां के एखनो एहनेसन लागै कि विद्यापति बाभनक कवि आ विद्यापति कें जियेने रहलेन बाभन सब अपनेने आ माथ पर चरहेने रहलेन बाभन सभ हयौ महराज विद्यापति त' भ' गेलखिन चारू लोक सँ बाहर महराजक दरबार सँ पंडितक चुटपांति सँ शास्त्रार्थक झूठ-अखाड़ा सॅ अहॉं नीक-हमहूं नीक सँ मुदा महाकविक कविता जीयत रहलै माथ पर सम्हरल बोझक हुंकारी सँ काशी आ नेपालक व्यापारी सँ जहिना प्रिय असोम आ बंग मे तहिना अराकान आ अंग मे महाकवि बरहैत गेलखिन महफा उठेने कहारक पदचाप संग मखान तोड़ैत मलाहक अलाप संग महाकवि आगि भ' गेलखिन अगहन-पूसक घूर मे महाकवि पाथर भ' गेलखिन दुसाधक दुख संग महाकवि गामबदर डोम-हलखोरक टोल-टापरि मे अधमरू महाकवि कें आश्रय भेटलेन नारीजनक कंठ मे दुख आ कष्टबोधक जांता-गीत बनि मुदु प्रतिशोधक उक्खडि़-समाठ छंद मे महादुख पर लेपैत सोहरक लेप मे महाकवि जी गेलखिन विषम-विवाहक व्यंग्य मे महाकवि जी गेलखिन बूढ़-छिनारक ललैठी धरबा लेल सभ पोथी-पतरा फेकैत पुर्नजीवित महाकवि बस रूकि गेलखिन मैथिलानीक लोर संग यैह लोर शालिग्रामी ,बागमती कें भरैत कोशी ,गंडक कें तोड़ैत सभ साल दहबै-दहाबै छै मिथिला के नीलमाधव चौधरी की ई प्रकृति क नियम अछि ? गाछ, रूग्नतासँ नग्नता धारण करैत अछि कि प्रकृति केर चिर नियम के पालन करैत अछि यश नाम ओकरे साम दाम ओकरे जे सीख गेल धूर्तइ अछि फोड़ैत रहू कपार जपैत रहू शिक्षा संस्कार जे चलि गेल से कहाँ घुरैत अछि मरैत अछि लोक अभावसँ भुखमरीसँ बीमारीसँ मरैत अछि लोक ज्ञानसँ विवेकसँ लाचारीसँ अप्पन की आनक उचित अधिकार लेल कत’के मरैत अछि लोक सब दिन एहिना अपना लेल जीवैत छल लोक आइयो ओहिना अपना लेल जीवैत अछि। मुँह भरे खसब कहाँ एतेक मुश्किल छै सीधा चलब किएक होएय ड'र जे मुँह भरे खसब करू अपनापर विश्वास ई चीज बड्ड खास खखार बुझि खूनकेँ एना जे फेकब खखरीकेँ चाउर बुझि एना जे समेटब बेटाक आसमे बेटीक हत्या केहन भविष्य होयत की आशा करब पढेबन्हि जे पाठ बौआ वएह पढताह देखेबन्हि जे बाट बौआ ओहीपर चलता जतबे जरूरी स्कूलक पोथी सम्हारब ततबे आवश्यक घर आँगन बहारब निज़ भाषा संस्कृतिकेँ जँ नहि राखब ज्ञान पायब कतहुँ कोना सम्मान यथार्थ अमावस्याक डर छोट-छोट बात कते पैघ-पैघ खुशी दैत अछि पैघ बात मोन मे अबिते मोन एना किएक व्यथित भ जाइत अछि नहि इ नीक नहि ओ नीक मुँह क स्वादे जेना अछि भेल तीत कोन मिष्ठान्न कोन पकवान कहाँ किछ लगैत रुचिगर घर आँगन कि बहरी दलान कहाँ कतहूँ किछ प्रियगर रोज बनैत, रोज टुटैत बीतल जा रहल व्यर्थ जीवन दुःख मे कि सुख मे लोक-समाज त जुटिते अछि शुभकामना मे सद्भावना क जेना अभाव सन बुझाइत अछि | हाल बदलत जेना पहिने सँ बदलल अछि , आटा-दालि क अकाली मोबाइल लैपटोप पसरल अछि दिव्य पुर्णिमा क ईजोरिया राति क स्वप्न जुआनी पर यथार्थ अमावस्याक डर मुदा छनो भरि लय मोन सँ कहाँ जाइत अछि छाँह जकाँ अन्हार घरमे छाँह जकाँ हेरा गेल छी अपने घरमे हम अपने बिला गेल छी गाँव टोल पोखरि नहि जानि कहिया छुटल नींदमे एखनो बड़बड़ा गेल छी भ्रष्टाचार तिरंगा जे प्रतीक स्वाधीनताक ओकर हरियर आ केसरिया रंग तँ ओहिना गाढ़ अछि मुदा उज्जर रंगक आगू जेना कियो ठाढ़ अछि कनी गौर करियो वएह भ्रष्टाचार अछि सत्ताक स्वाद टिकट तँ भेटि गेल प्रश्न आब एतबे लोकप्रियता कोना भेटत ? समय बड्ड कम रातो राति प्रसिद्धि कोना भेटत ? बिना स्टंट बिना पब्लिसिटीकेँ कोना भेटत सत्ताक स्वाद बिना नव नव आवरणकेँ कोना भेटत जिंदाबाद फेर वएह पुरनका खेल तू चोर तू भ्रष्ट तू अराजक तू बैमान तू आतंकी तू सांप्रदायिक तू पागल तू नपुंसक परोक्षसँ बजैत सुनैत आब खुल्लमखुल्ला एक दोसरापर ढेला फेकैत नेपथ्यमे झाँकबाक जरुरत बुझायल कहाँ कहियो राजनीति कि राजनेता जानबाकक फुर्सत भेल कहाँ कहियो एहि कादो कोयलासँ सभ्य लोक बचिते रहल जिम्मेदार बनि देश लेल सब कष्ट उठबिते रहल मुदा एहि बेर आमसँ खास धरिमे भरल अछि उन्माद नपुंसक लोकतंत्रक प्रदर्शनमे छद्म मर्दानगीक पार्टीवाद जिनगीक माने गप्प जखन करब हम अप्पन करब बुझैत छी हमर गप्प अहाँ बुझि नहि सकब सह्स्त्रो भ्रम अछि कोटि-कोटि अहम अछि अहाँक मार्गमे कहाँ कतहुँ श्रम अछि उपलब्धिक खजानासँ भरल अछि अहाँक घर हमर हिस्सामे बस ओकरा निहारैत रहब हम बुझब कोना अहाँक तगमाक महत्व जिनगीक माने हम बुझलहुँ बस त्यागैत रहब हेरैत प्रश्नक उत्तर प्रकृति क खोहमे बौआइत दिन राति तकैत छी अपने सन कोनो बताह प्राणी जे हमरा असगर छोडि नहि चलि जाय जेना संग छोडि दैत अछि सूर्य चाँद तारा तकैत छी कोनो ज्ञानक डारि प्रकृतिक झुरमुट कोनमे तकैत छी कोनो अपसरा कोनो सुंदरीक नग्न मूर्ति जकरा बिना बुझाइत अछि सम्पूर्ण वन अपूर्ण तकैत छी कोनो भावपूर्ण युक्ति तकैत छी ह्रदयमे उठल पीड़ाक कारण करैत नव नव कविताक श्रृजन किएक नव नव कोमल पल्लव रौदमे जरैत जरैत झरि जाइत अछि ई देखि बिना बादल ई आकाश किएक नहि बरसि जाइत अछि तिकड़म आ पराक्रम हमर अधिकार की हमर अधिकारपर तँ पहिनेसँ कब्ज़ा कएने छी अहाँ हम सहैत छी जिवैत छी बनल अहाँक शिकार अपन शोणितकेँ बनौने अहाँक आहार नित्य बढैत अछि अहाँक अत्याचार बिना कोनो विरोध प्रतिकार करैत छी स्वीकार जेठक दुपहरिया हो वा माघक भोररिया हो बितैत अछि कठिन श्रमक संग जीवन स्वीकारैत छी क्रूरसँ क्रूर संताप बिना केने देहक कोनो परवाह दिन रति साँझ भोर खटैत छी खटैत रहल छी आ अहाँ वातानुकूलित बंद कोठरीमे करैत छी हमर मजुरीक हिसाब खुशीसँ पिबैत शराब विलायती धुनपर अलापैत गान बिना रखने सभ्यता संस्कृति केर मान जेना जेना बढैत अछि हमर सहनशीलता दुन्ना वेगसँ बढैत अछि अहाँक लुटबाक क्षमता हमरे रुधिरक कमाइसँ करैत छी हमारे संग व्यापार दस टका दैत छी लैत छी हज़ार मुदा हम बुझियो क' करैत अयलहुँ स्वीकार अहाँक छल प्रपंचसँ भरल व्यवहार जखन कि हमरो अछि ज्ञात अहाँक गुप्त बात कोना बनलहुँ अहाँ फेखनासँ फेकू बाबू किएक अहाँक बेटी करैत छथि फर्स्ट पहिरने बिना ब्लाउजकेँ स्कर्ट अहाँ करैत छी ओबामा, जिनपिंग केर बात भाषणमे करैत छी मार्क्स लेनिनकेँ मात करैत छी मजूर कृषक नेता संग गठबंधन जे नहि बुझैत अछि अहाँक तिकड़म़ आ जखन वो फँसि जाइए अहाँक तिकड़म़बाजीमे ओकरे हथियारसँ करैत छी ओकर संहार वाह वाह कहि उठय जग अपने धन्य छी सरकार बाढ़ भूकंप अकालसँ पीड़ित हम जखन करैत छी क्रंदन अहाँ करैत छी विमान सर्वेक्षण आकाशसँ खसबैत छी रोटीक टुकड़ा तहियो लेल एतय होइत अछि झगड़ा आहि रौ बाप भेटल कहाँ हमरा भेटल कहाँ हमरा एतय तँ सभ किछमे मुँहजोड़गरक जीत जकरे कैंचा छै तकरे जीत छैक गोधूलि बेला जँ माने ताकब तँ मजा छुटि जाएत जीवनक अद्भुत कथा छुटि जायत हेतै आब की एहिसँ खराब बात मोनमे अबिते अछि खतम सब जबाब जे बचल अछि नेह सेहो टूटि जाएत जँ माने ताकब तँ मजा छुटि जाएत जे होइ छै से सब बुझले प्रभुक अछि माया हुनक देल धड़कन हुनक देल काया जे लिखल अछि करममे कहूँ के मिटायत जँ माने ताकब तँ मजा छुटि जाएत अतृप्त प्यास चिर शांति पसरल छल मानस पटलपर जाहिमे नहि छल कोनो कथा कविता किम्बा व्यथा जेना कोनो शांत सरिता नहि कोनो तूफानक तरंग छल नहि धाराक गति नहि उल्लास, नहि हर्ष नहि चिंता,नहि विस्मय जिनगी चलल जा रहल छल नाव बढल जा रहल छल अथाह समुद्रक सम पटलपर शनैः शनैः अनंत दिस नहि ज्ञान आदिक नहि अंतक परिचय नहि जीबाक ध्यान नहि मरणक निश्चय अकारण अनिश्चित दिशामे बढल जा रहल छल छोट छीन जिनगीक नाव अथाह समुद्रक सम पटलपर कतहुँसँ उड़ि आयल कोनो पीड़ा सोन्हिया गेल जिनगीक पोर पोरमे हरियरसँ भेल मोन पीयर गरि गेल सीसा मोनक कोर कोरमे कतहुँसँ उठल बसंती बयार खसल सरिताक निश्छल पटलपर जोरसँ शोर भेल घोर गर्जनाक संग रातिसँ भोर भेल सूर्यक पहिलुक किरण सरिताक ठोरक जल चुम्बित करबाक लेल व्यग्र भ' गेल छल बात चलैत बटोहीक अबोधता स्वीकार नहि क' सकल एहन प्रेम परिणयकेँ क्रोधाग्निसँ भरल मुखसँ दुर्वासाक श्राप निकलल जा सरिते सूर्यक तापसँ भरि जिनगी जरैत रहब' आशा नित्य दिन रहत सूर्यक पहिल किरणक संग ढहि जाएत तोहर स्वप्नक महल आ ओहि दिनसँ जड़ि रहल अछि सरिताक अतृप्त मोन दिवाकरक पवित्र प्रेम परिणयकेँ लेल क्षणिक दैहिक प्रणयकेँ लेल जरैत छल जरैत अछि जरैत रहत सनातन सरिताक प्रेममेँ डूबल हृदय जिनगी जे सुतल चल चिड़ शांतिमे बनि गेल कल्लोल कोलाहलक रंगभूमि कल कल निनाद सरिताक शांत स्वर तूफानी तरंगमे हेरा गेल पानिक तीव्र हिलकोरमे डगमगा गेल जीवनक छोट छीन नाव चिर शांति पसरल छल मनस पटलपर जाहिमे कोनो कथा कविता किम्बा व्यथा नहि छल भरि गेल अछि करुणा दया सपनासँ संकल्प संकल्पित छी जिनगीक बाटपर चलबाक लेल बुझल अछि आगा खाधि हेतैक अछि बुझले नहि हम तडपि सकब मोनक ज्वालाक शांति लेल बढ़ि रहल छी अप्स्याँत भेल कएक बेर लागल ठेस मुदा नहि संतुष्ट भेल हमर क्षुधा उठल बेदनाक तृप्ति लेल बढ़ि रहल छी अप्स्याँत भेल जगह नहि छै चुट्टियों ससरबाक तैयो चाहैत छी घोसिया रही प्रगति केर आसमे भ्रमित हम बढ़ि रहल छी अप्स्याँत भेल ई आगि एहन अछि बढ़बाक सुख शांतिकेँ जे जरा देलक गाम-घर, सर-संबन्धी सब छोड़ि बढ़ि रहल छी अप्स्याँत भेल जिनगीक छै नइ ओर छोर सब रातुक बाद होइछ भोर रातुक तिमिरमे डूबल हम बढ़ि रहल छी अप्स्याँत भेल की चाही ओ कोना भेटत ई तँ कहियो सोचलहुँ नहि अप्पन प्रणकेँ अर्पित हम बढ़ि रहल छी अपस्यांत भेल विश्वास महान वएह जे अपन जीवनसँ दसक उपकार करैत अछि ओजस्वी वाणीसँ मुर्दामे शक्ति संचार करैत अछि अपना लेल तँ सब करैया ओरदा रहैत के मरैया दुःख कियो अपनाइए क' ककरो उद्धार करैत अछि परम सत्य जे लिखल विधाता सैह टा होयत कतबो पीटब कपार विधिक विधान नहि बदलत तैँ कि मानव कर्तव्य छोड़ि भाग्य लेल दौरय अपन कर्मक फल तँ सब कियो अपने भोगय मन्दिर आ मसजिद के तँ लागल अछि अंबार एतय भक्त लोकक तँ देखू लागल अछि बाज़ार एतय नहि बुझाइत भगवान केर वास हेतैन्हि पुजारियो के रहि गेल विश्वास हेतैन्हि जनतंत्र? पौधसँ गाछ भेल गाछसँ जारनि झरकल पजरल आब धुधुँआ रहल अछि। जीवन-सार पहिले डेगपर भ्रमर गुंजन यौवनक अंतिम छोर तक खुशीसँ भरल जीवन छौडैत यौवनक संग मधुप करथि दूर विचरण इएह जीवन गाथा इएह जीवन दर्शन ओ सोच' लागल सम्पूर्ण जीवनक सार की यौवन जकर बीत गेल ओकरा लेल संसार की कोन बिधिये यौवन कतेक दिन संग देत संग जँ छोड़बे करत तखन एकर सिंगार की ? प्रकृतिक नियम एतेक क्रूर किएक छैक साँझसँ भोर एतेक दूर किएक छैक एहि संसारसँ भेटत किछ नहि तखन एतेक मोह किएक क्षणिक सुखक लेल लोक एतेक व्यथित किएक छैक संसार के रचनिहार की एहि बातसँ अनभिज्ञ छथि नहि कथमपि नहि इएह तँ जीवन क सार थिक जतहि प्रगति रुकि जाय ओतहि जीवनक संहार थिक जरूरत बढैत गेल अहाँ लिखैत रहलहुँ पाथरपर फुल उगेबाक खिस्सा हम गहुँमक पटौनी हेतु पानि लेल लड़ैत रहलहुँ खेत-खरिहान तँ सिमटैत गेल आ अन्नक जरूरत बढैत गेल मँझधार थिक सुख दुख तँ जिनगी क शृंगार थिक जिनगी जँ किछ तँ मँझधार थिक किएक हम बैसि जाय किछ बेसी बुझि क' जिनगी बुझबाक नहि अनबुझ रफ्तार थिक कतेक कोस कतेक मील तकर ककरा कोन ठेकान की भेटल की छुटल कतेक राखब एकर ध्यान चानीक थारीमे परसल महुअक खीर जँ तँ जेठक रौदमे जड़ैत खेत पथार थिक की ई आधुनिकता अछि? पेट के दुख देब देह के सुख देब देह के दुख देब पेट के सुख देब बच्चे मे इ बात ओकरा माय कंठस्थ करा देने रहइ बहुत दिन तक ई बात तर्कसंगत सेहो बुझेलैय मुदा शीघ्रे भ्रम टूटि गेलै किछ दिन स' वो देखि रहल छल जतैक बेसी देह के दुख दैत अछि पेटो ततबहि दुख दैत छैक जे देह के दुःख देतैय ओकरा एतैक पैघ पेट कोना हेतैक ? त' की हम सभ आधुनिक भ' रहल छीं ? की ईएह आधुनिकता अछि ? आर कतैक दूर भ' सकैत अछि बाहर क हवा किछ दूषित होमय किछ लोक अप्प्न स्वार्थ लेल व्यथित होमय मुदा बिन प्रयासे की किछुओ भेटत जे अछि कि सेहो बाँचल रहत ऐना जे खिड़की किबाड बंद केने रहब हवा आ रोशनी पर पैबन्द लगेने रहब कहूँ कतैक दिन हम सब सही सकैत छि आर कतैक दूर तक रही सकैत छि ? इक्कीस फरवरी : मातृभाषा दिवस कोना हेतै एक रंग भोर आ साँझ क किरण निन्न तोडि दुनियाँ लागल जकर प्रतीक्षा मे की होइत छय मातृत्व के सपूत जखन छोडि जाइत छय आन ककरो रक्षा मे अश्रुपूर्ण भ जाइछ लोचन होइछ आहत अंतर्मन मर्म मुदा जागल रहैत छय मौन उम्हरे टांगल रहैत छय कहैत छथि राहुल देव मातृभाषा, भाषा के जीवंतता प्रदान करैत अछि कोनो मातृभाषा के कतेक प्रतिशत लोक बजैत अछि बजबे टा नहि, लिखैत-पढैत अछि आधुनिक कि प्रगति क मातृभाषा मे कतेक समावेश अछि भाषा के बचेबा के अछि त एकर ध्यान कर' पडत तीन सौ भाषा लुप्त भ चुकल अछि नौ सौ द्वारि पर जखन डा. रमेश चन्द्र मेहता कहैत छथि दू शब्द इंग्लिश बाजि दीयों इज़्ज़त मे इजोरिया आबि जाइत छय मोन पडि जाइत अछि कान दूनू ऐंठ ली जावत ई मानसिकता रहत मातृभाषा के बचनाय कठिन अछि मुदा हम सब विवश छि सामाजिकता पर आर्थिक आघात तेहेन बज्रघात सावित भेल जे भाषा आ संस्कृति हम सब अपने नष्ट-भ्रष्ट क रहल अछि | उचिते व्यवहार करूँ झडकल मुँह नहि झाँपल नीक आबहूँ ओकरा उघार करूँ एक सँ एक डाक्टर बैद एक सँ एक दवाई चलल अछि बोक बहीर बाजैत ,सुनैत अछि नाँगर लूल्ह आसमान उडैत अछि की नहि आब संभव बस उचित व्यवहार करूँ जँ कतहूँ ग़लत देखैत सुनैत छी आबहूँ ओकर प्रतिकार करूँ बिना आचरण नहि संभव खत्म होयत आतंक , भ्रष्टाचार ई प्रगति -सम्पत्ति , आत्मघाती बिना उचित शिक्षा संस्कार बीतल बात बिसरूँ लाऊँ मोन मेँ नव नवीन विचार जग के समेटियो ने दियो एकरा पूर्ण विस्तार विश्व के विकास के फेर के रोकि सकत छइ ककर मजाल जे फेर कियो टोकि सकत मोन के स्थिर करूँ आत्मा के सत्कार करूँ झडकल मुँह नहि झाँपल नीक आबहूँ ओकरा उघार करूँ कारी कारी केश के बीच ई सिन्नुरक लाल रेख बेचैन क देलक मौन के सखी कि कहूँ विधाता क लेख जिनगि क सुंदर सपना रही गेल कल्पैत कल्पना अपने काज मे निकालि अपने हम मीन मेख सखी की कहूँ विधाता क लेख चलूँ दीअय एक धक्का आर एहि पार कि ओहि पार चलूँ नाव उतारू धार एहि पार कि ओहि पार तखन ने झुमरि खेलायब ढेका बान्हु फाँड मे तखन ने हिम्मत जुटाएब अहा बढ़ूँ त' आगु संगी सभ बहुत भेटत एक पीह्कारी पर पूरा देश जुटत मुँह नही मलिन करूँ पिछला सभ सोचि क' आब ज' कियो बाजत त' खा जेबें नोचि क' मिथिला क' सपूत नइ आब रुकी सकत रणभेरी बाजी गेल आब नही झुकी सकत गिलेबा लेपैत छी आई जँ मिथिला मैथिली क ई हाल अछि कमोबेसि हमरे अहाँक कमाल अछि भौतिक सुखक लेल छी भेल व्यग्र आन्तरिक आनंद के कहाँ कनेको खयाल अछि जखन समय छल भूर मुनबाके तखन त दुनियाँ क उदार बनि बैसिलहू आब खाली कोठी मे गिलेबा लेपैत छी मुट्ठियो भरि अन्न नहि समय विकराल अछि अप्पन आन क बात की लोक दुनियाँ समाज की धिया पुता क भविष्य क चिन्ता तँ सबके माय बाप मुदा बनल सवाल अछि काज सब स्वीकार्य अछि कहूँ कोना पेट मानत मोन मे जे उठल अछि बिर्रो कहूँ एकर के लेत जमानत बच्चा आ बुढक की जुआनी बेहाल अछि आई जँ मिथिला मैथिली क ई हाल अछि कमोबेसि हमरे अहाँक कमाल अछि जीवन-धारा नही छल प्रेमबाट चलबाक पूर्ण ज्ञान हृदय सम्पूर्णताक बोध अबोधता द्यौतक बनल छल , अपूर्व अनुपम मुखडा सँ कोकिल स्वर सुनि हृदय डुबि गेल छल . सौन्दर्यक प्रेम पचीसी मे नव आकुलता क संग विकसित भेल छल प्रेम परिचय जिनगि जीबाक निश्चय साँझ खन तुलसी चौडा लग दीप जडाय गवैत छली ओ गीत स्वर सँ अमृत झहरि रहल छल. उदास मोन डुबि गेल हुनकर स्वर सजावट मे मोनक भाव विह्वल छल प्रेमक नवश्रृगांर करबा लेल जीवन वाटिका मे बहार अनबा लेल . थाकल प्यासल उपेक्षित मोन के जीबाक पवित्र साधन भेटलै मादकताक संग सलजताक समावेश छल जिनगि क लेल तँ ई सबसँ पैघ आवेश छल नि:शब्द , नि:स्वर , निश्छल भॅ स्वीकार कयलहुँ एहि तरहे ई दरिया पार.कयलहुँ तीक्ष्ण क्रान्ति सँ बुझैत छी भाय अहाँ जीब चाहैत छी सुख शाँति सँ होइत अछि डर हल्ला गूल्ला तीक्ष्ण क्रान्ति सँ मुदा ई बुझि लीअय आब नहि ई शाँति बरकरार रहत पैघ भ गेल खाइधि बिना भरने नहि काज चलत जाति रहल दूइये टा धनिक की गरीब बडका क पैघ कपार छोटका क छोट नसीब आब नहि फर्क कौआ आ कोईली मेँ दूनूँ क मोन मे बस धन केर चाह अछि प्रकृति क देल रंग रूप भाग्य प्रवृति आब कहाँ मिसियो भरि तकर परवाह अछि कर्म जे करतय वएह आगु बढतय मंत्र क छद्म बोल पर आब नहि थाप चलतय मंत्र पर अछि विश्वास त बिल मे अपने हाथ दीअय साँप के खीचू बिल स पूर्ण यश माथ लीअय | निन्न मे बड़बड़ाइत हम सब टूटि नहि रहल छी टूटि चुकल छी वैह टा करैत छी जे सरकार चाहैत अछि गाम घर दुनिया समाज प्रेम-घृणा, लोक-लाज लोक वेद टोल परिवार रीति रिवाज पर्व तिहार सब छूटि चुकल अछि सत्ता वर्ग बुझैत अछि हम सब किछ एहेन बन्हन मे बन्हि जाइत छीं जे तोडि नहि सकइत छी मोह-माया हित-अहित लोक-परलोक वाय-पित्त छोडि नही सकैत छीं एहेन ई शासन सत्ता क गुप्त षड़यंत्र कि हम सब आलासी , स्वार्थी नपुंसक भेल जां रहल छीं कतहुँ कोनो प्रतिरोध के आवज नहि ज अइछो त समवेत नहि हजारों ,लाखो , करोडो क भीड़ मे सब एसकर आ एसकर त वृहस्पतियो झूठ | पैघ पैघ लक्ष्य जे कष्ट छल अछि से त रहिये गेल झूट्ठे फुसलेबा कोशिश करैत अछि कखनहूँ एमहर त कखनहूँ ओमहर टहलेने अछि अनेरे अजमेबा क कोशिश करैत अछि जंग लागल छय सत्ता जर्जर छय भेल तन्त्र चाही पारदर्शिता डेगे डेग भरल षड्यंत्र सब चोर संसद मे मुलुर-मुलुर तकैत अछि शाह क शाह जोडी कि कियो आने फसैत अछि पैघ लक्ष्य छय कने कष्ट बरदाश्त करूँ ऊँच-नीच छोडूँ एकता क बात करूँ मामला गंभीर छय नित्य बुझेबा के कोशिश करैत अछि प्रयोजन समुद्र क लहर के की प्रयोजन किएक बुझत कि, की स्थिर कूल मे अछि ? अंत (मृत्यु) त यथावत ओहिना के ओहिना रहत परिवर्तन त' जिनगीक मूल मे अछि ? प्रेमक आतुर मोन वीणाक झंकार सा झँकृत हमर जीवन अहाँक यौवन मे डूबल रहय सदिखन क्रीडा कौतुक स भड़ल रहय उपवन अछि प्रयास तइयों नहि बह्कय हमर मोन आसक्त भेल अहिंक रूप पर हमर चंचल यौवन जीवन सागर मे बरसा गेल प्रेम क सावन प्रिय पात्र महि छवि हमर ह्रदय अहांक किंचन हम मदहोश मधुप छी अहां गंधयुक्त कंचन मन मदिरा लय आनय मधुगंध मधु बयार अहां बसंत क सार नही बुझल बुझलहु बस संसार हम अबोध नही बुझल प्रेम बानल व्यपार नहि अछि अंत प्रेम के की अई पार की ओय पार.. बेतुकक सवाल थमकि जाइत छी देख क अपने अपन हाल कहूँ कोना धिया पुता स करी बेतुकक सवाल नहि किताब नहि ट्यूशन नहि आधुनिकता क फैशन स्कूल दूर जाएब समस्या विकट मुदा आनैत अछि शत प्रतिशत रिजल्ट कोना क कहियो बाऊ गे , नहि तोरा पढेबाक इच्छा नहि जानि भगवती किएक लैत छैथ बेर बेर परीक्षा कोशिश कम नहि जे हमहूँ पोजिटिव होय , बनल रहय धिया पूता क अबोधता बुद्धि ज्ञान निक होय मुदा छनहि चिक्कन चेहरा विकृत भ जाइत अछि नहि कोनों स्पष्ट , प्रत्यक्ष कारण बुझाइत अछि | रूग्नता सँ नग्नता गाछ, रूग्नता सँ नग्नता धारण करैत अछि कि प्रकृति केर चिर नियम के पालन करैत अछि यश नाम ओकरे साम दाम ओकरे जे सीख गेल धूर्तइ अछि फोडइत रहूँ कपार जपैत रहूँ शिक्षा संस्कार जे चलि गेल से कहाँ घुरैत अछि मरैत अछि लोक अभाव सँ भुखमरी सँ बीमारी सँ मरैत अछि लोक ज्ञान सँ विवेक सँ लाचारी सँ अप्पन की आनक उचित अधिकार लेल कत’ के मरैत अछि लोक सब दिन एहिना अपना लेल जीवैत छल लोक आइयो ओहिना अपना लेल जीवैत अछि | लालटेन क ईजोत मे रूस फ्रांस अमेरिका कहिया स लागल अछि बगदादी क भाग्य जे एखनो ओ बांचल अछि शकील ,खुर्शीद , अय्यर पाकिस्तान दिस देखैत छथि भारत क छोडि पाकिस्तान मे शान्ति तकैत छथि नीतीश संग तेजस्वी की तेज प्रकाश एहि लालटेन क ईजोत मे नहि जानि कोना होयत विकास हे भगवान उठूँ युग के आश्वस्त करूँ आतंक क गाढ अन्हार मे हेरायल अछि दुनियाँ प्रकाश पूंज बनि शांति क मार्ग दूरूस्त करूँ | लोके बदलय साल बदलल हाल बदलत सोचैत तँ सब साल छी हम कि बदलब लोके बदलय ततबे लेल बेहाल छी नियमे नित्य धँसि रहल छी डेग डेग पर फँसि रहल छी बढल अछि क्लेष भेटैत अछि उपदेश सब कहैत अछि हम की करबै अपने ओझराएल महाजाल छी राम के पढलहूँ कृष्ण के पढलहूँ गीता बाइबिल कुरान उलटलहूँ सबतरि लीखल एक्के भाषा जीवन कि प्रकृति ईश्वर के देल अमूल्य धन नष्ट करबा लेल हम सब स्वयं बनल महाकाल छी ।. विलापक बखान कतेक रास झुठ फेर पसरल फेर कतेक पुत्र क करेज मे मातृ-प्रेम उमडल मुदा सत्य बहुत दूर बहुत चिंतनीय अछि इतिहास कहत एहि काल खंड मे पुत्र क प्रकोप बहुत निंदनीय अछि मानल देश भरल अछि जुआनी स नाम करै अछि दुनियाँ मे रहैत अछि फुटानी स मुदा वो संस्कार कि समय कहाँ जे माँ-बाप क सम्मान करय देवता होइत छल कि होइत हेताह कहियो आब त दूरे सँ देख विलापक बखान करय | की पायब सम्मान ? हम सभ एखनहु किएक पाछु ? नहि कोनो षड़यंत्र नहि कोनो विद्वेष क परिणाम अछि ई मात्र आलस अकर्मण्यता आ अज्ञान अछि आन के अछि ? शत्रु त' देश के अपनहि संतान अछि स्वार्थ के वशीभूत मातल आ शिथिल पैघ-पैघ तोंद तीव्र निद्रा स व्यथित लागल छीं मात्र अप्पन मरण के ओरियान मे मात्र अप्पन तृष्णा के समर्पित सम्मान मे सरिपहूँ बचल रहत पहिने लोक टूटैत अछि तखन घर टूटैत अछि तखन समाज टूटैत अछि आ फेर देश भाषा संस्कृति सभ सुड्डाह भ जाइत अछि । तैँ हे बंधु जँ चाहैत छी देश भाषा संस्कृति बचल रहए तँ चलूँ करी प्रयास लोक के बचेबाक लोक जे अपने उपजाएल समस्या सँ पार नहि पबैत अछि समस्या क अम्बार क पहाड क बीच झुलैत अछि कोनो ना कोनो तरहे जीवन यापन त सुरक्षित होय ओहिमे नहि सरकार नहि अनुकम्पा के जरुरी होय लोक क आत्मविश्वास ज बनल रहत देश भाषा संस्कृति सरिपहूँ बचल रहत | हम की गाम खराब ? बदलि गेल गाम कि बदलि गेलहूँ हमसब रास्ता बदलि गेल कि गामक लोकसब मुदा भगवती ताराक स्थान त' वेएह अछि मंडन व राजकमल क' गाम त' वेएह अछि की अप्पन दोष की कारण कहूँ कोना अपना के नून रोटी क सतायल कहूँ गाम मे घर नहि की कहूँ की वजह दर्जनो बीघा खेतक मालिक मुदा पैर रखबाक नहि जगह की भ गेल किएक नहि गाम हम्मर गाम रहल बाबा-पिता क नाम संग किएक नहि हम्मर नाम रहल बाबा बनौने छलाह सब स' पाहिल दुमहल्ला जे आब खण्डहर बनल खसबाक' लेल बेताब नहीं बुझि सकैत छी हम की गाम खराब ? 1332 || विदेह सदेह:२१ विदेह सदेह:२१|| 1331
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