SADEHA — 22

Publication: SADEHA · Issue: 22
Open original PDF at Internet Archive

ISSN 2229-547X विदेह सदेह २२ विदेह-सदेह २२, विदेह www.videha.co.in/ पेटार (अंक २७७-३००) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २५००/- संस्‍करण: २०२०, २०२२ Videha Sadeha 22: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 277-300 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-६३०) आशीष अनचिन्हार- लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता (आलोचना) (पृ. २०२०) दुर्गानन्द मण्डल- सोन्हगर (पृ. २१-२४) मुन्नाजी- बीहनि कथा (मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष) (पृ. २५-४२) प्रणव झा- लघुकथा (गिद्ध, एन.पी.एस.) (पृ. ४३-५०) डॉ. बचेश्वर झा- संस्मरण (पृ. ५१-५४) पूनम झा- बीहनि कथा- कुर्सी (पृ. ५५-५५) नागेश कुमार प्रेषित आशुतोषक- श्रीरामचरितमानस (पृ. ५६-१०४) रबीन्द्र नारायण मिश्र- बिहार शराबबंदी कानून (पृ. १०५-११२) उमेश मण्डल- मैथिली साहित्य-रचनाक क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलक आगमन, जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गामक जिनगी’, जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहै जोकर परिवार’मे परिवर्तनक स्वर, जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मुड़ियाएल घर’ , जगदीश प्रसाद मण्डलक अर्द्धांगिनी कथा संग्रह, जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बजन्ता-बुझन्ता’, जगदीश प्रसाद मण्डलक दर्जन भरि कथाक सामान्य परिचय, जगदीश प्रसाद मण्डलक औपन्यासिक कृति, जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष (पृ. ११३-२११) केशव भारद्वाज- किछु बीहनि कथा, किछु लघुकथा, एकटा दीर्घकथा आ एकटा उपन्यास, बीहनि कथा (ओ बच्चा, कमिटमेंट, मनु:गंध, सोच, गलत निर्णय, खाली हाथ, नबका धनिक, किस्मत, प्रेम विवाह-नब प्रयोग, दही वाली बुढ़ी, भुत-बंगला, मध्यस्थ, गामक माइट नसीब नञि), लघुकथा (कन्यादान, पछतावा, उपराग, अएना, हत्यारा, हुब्बा, इच्छा, मिशन एडमिशन, अपन लोक, बख्शीश, टीस, विश्वासघात, पापक फल, हाथक लकीर, छक्का-पुराण, सरप्राइज, अफेयर, केतकीक व्यथा- की कहू कथा, उठऊआ बियाह, बड़का घरक बहुरिया, दरबार, समयक चक्र, बदलल बेबहार, अनघोल, देहक नेह, लछमी बहुरिया, अजादी, गोलकी फ्रेमक चश्मा, अंत, फैसला, आत्मग्लानि, खेलौना, कल्पवास, बच्चनक बचन, रखबार, चंसगर, दोषी के?, बतहिया गाछी, डालडा प्रसाद), की सोचल- की लीखल (दीर्घकथा), पैबंद (उपन्यास) (पृ. २१२-६३०) पद्य-खण्ड (पृ. ६३१-७३४) आशीष अनचिन्हार- किछु गजल (पृ. ६३२-६५७) नन्द विलास राय- सरस्वती वन्दना, धनवान (पृ. ६५८-६६६) रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’- किछु झारू (पृ. ६६७-६७१) मुन्ना जी- गजल (पृ. ६७२-६७३) प्रदीप पुष्प- किछु गजल (पृ. ६७४-७२९) संतोष कुमार राय 'बटोही'- कमला-बलानक मारल, रौदी आओर दहार (पृ. ७३०-७३४) 2

गद्य खण्ड आशीष अनचिन्हार लाल लंगौटी केर पहचान करैत कविता (आलोचना) "सबद" मने शब्द। "मितारथ" मने मितार्थ। श्री कविराज विश्वनाथजी अपन पोथी "साहित्यदर्पण"मे तीन प्रकारक दूतक वर्णन केने छथि ताहिमेसँ "मितार्थ" दोसर प्रकारक दूत अछि आ एकर लक्षण ई जे कम बात कऽ जे ठीक काज कऽ लैत हो। मने कम बातमे बेसी काज। वेदमे एहन ॠचाकेँ धाय्या मानल गेल जे कि यज्ञ कालमे गाएल जाइत कोनो सूक्तमे अतिरिक्त रूपसँ जोड़ल गेल हो। धाय्या मने समिधा सेहो होइत छै "क्रोधाग्नौ निजतातनिग्रहकथाधाय्यासमुद्दीपिते"। समिधा मने fuel सेहो कि तँ सभ तरहँक। प्राचीन कालमे पत्नीक बहुत प्रकारक होइत छलै जाहिमे "महिषी"केँ सेहो धाय्या कहल जाइत छलै ( मूलतः भरण-पोषणक हिसाबें। हमर अनुमान अछि जे "धाय" शब्दक जन्म एही ठामक हएत। "सबद मितारथ धाय्या" अरविन्द ठाकुरजी द्वारा लिखल कविता संग्रह केर नाम अछि। १ पहिल कविता "सुनू जयद्रथ" अछि। प्रतीक रूपमे जयद्रथक तते ने प्रयोग भेल छै अछि जे एकर उपयोग करए बलाकेँ बहुत सावधानी राखए पड़ैत छै से सावधानी एहि कवितामे नै राखल गेल अछि। एहि कविताक अंतिम किछु पाँति एना अछि-- "सुनू जयद्रथ एहि बेर कृष्णक मायाक मुँह नहि जोहल जाएत शुरू करब अहाँ जँ समर सूर्यास्त धरि प्रतीक्षा नहि करब हम" आन प्रसंग बादमे पहिने तँ हम इएह कहब जे जाहि तेवरक संग ई पाँति अछि ताहिमे हमरा हिसाबें "मुँह" शब्दक उच्चारण सही नै छै। एहि कविताक पाठमे "मूँह" स्वतः एतै। बहुत संभव जे लोक एकरा वर्तनी दोष मानथि मानथि मुदा हम एकरा मैथिली कवितामे लय कोना उपेक्षित होइत अछि तकर उदाहरण मानि रहल छी। आब एहि कविताक पहिल किछु पाँति देखी-- "एकरा काठी जुनि देखायब कि हमर कविताक अनगिनत पृष्ठ सभहक बीच अखनि सूतल पड़ल अछि बारुद" कविताक शुरूआतसँ पाठक बुझैत छथि जे ई कविक अपन मनोभाव छै मुदा अंतिम पाँतिसँ ई बुझाइत छै जे कविक भीतर बैसल अर्जुनक मनोभाव छै आ तँइ हमरा बुझने कविताक शुरुआत ओ अंतमे संबंध नै छै। ई पूरा कविता एही तरहँक अछि। एकटा सकांक्ष पाठक लेल ई कविता साधारण हएत तँ साधारण पाठक लेल जटिल। दोसर कविता "हम हत्या करय चाहै छी" केर सभसँ नीक बात जे ई कविता कोनो स्थूल नायक लेल नै लिखल गेल अछि। ई कविता विभिन्न प्रवृतिपर लिखल गेल छै। आब ई अलग बात जे विभिन्न प्रवृति एकै नायकमे हो वा कि अलग-अलग नायकमे। ई तरीका कोनो कथनकेँ कविता बना दै छै खास कऽ ओहन स्थितिमे जखन कि कविता गद्यात्मक हो। एहि कविताक नकारात्मक पक्ष ई जे कवि हत्या करबा लेल तते ने व्यग्र छथि ( भने ई व्यग्रता चरम दुखसँ हो) जे ओ विभिन्न प्रवृतिकेँ साँप बनि सेहो डँसबाक लेल तैयार छथि। बदला लेबाक कोनो तरीका जायज भऽ सकैए मुदा कविसँ हम कहबनि जे साँप बनबाक क्रममे जहर तँ हुनकोमे आबि जेतनि तँइ बदला लेबाक लेल साँप बनबाक तरीका हमरा उचित नै बुझाइए। तेसरसँ सातम कविता इनार सिरीज अछि। वस्तुतः कविता संग्रह हम एहीठामसँ शुरु मानैत छी। मितार्थ एहिठाम पहिल बेर आएल अछि। इनार-1 मे वैष्णव सन शांतिप्रिय विरल ओ बहुअर्थी अछि। इनार-2 मे इनारक लालाटपर जे लिखल छै से वस्तुतः इनारपर नै आजुक आर्थिक परिवेशमे कमजोर लोकक ललाटपर लिखल छै। इनार-3 मे "अनठीया बेंग", "रक्तहीन क्रांति" आ "ढोरिया साँप"क प्रयोग कविताकेँ अलग दिशामे लऽ जाइत अछि जाहि ठामसँ प्रवासक चिंता सामने अबैए। इनार-4 कविता एहि सिरीजक कमजोर कविता अछि कामी पुरुषक दोष इनारपर नै थोपल जेबाक चाही। इनार-5 अकादेमी राजनीतिकेँ देखार करैए मुदा एहि कविताकेँ आर धरगर बनाएल जा सकैए। "अलिखित कविता सभहँक पक्षमे" नामक कवितामे ओहन साहित्य सभकेँ अकानल गेल अछि जे कि मुद्रित नै भऽ सकल, अथवा पुरस्कृत नै भऽ सकल। ई नीक गप्प मुदा ईहो कविता अपन बात मुद्रित भैए कऽ कहि रहल अछि। बहुत संभव जे भविष्यमे पुरस्कृत सेहो भऽ जाए। किछु दिन पहिने रवीश कुमार नामक हिंदी टी.वी पत्रकार सेहो टी.वीक माध्यमे बजैत छलाह जे टी.वी नै देखल जेबा चाही। खएर माध्यम जे हो वंचितक पक्षमे बाजब बेसी जरूरी छै। "बुद्धिबोर्धलक्षणा" नामक कवितामे कवि टी.वी चैनल आ अपन पोतीक माध्यमे स्क्रीनक पाछूक अन्हार देखेबाक प्रयास केलाह अछि। एहि कविताक नीक पक्ष ई जे आन कवि जकाँ जबरदस्ती नै देखने छथि। कवि ई स्वीकार करै छथि जे आने जकाँ हमर पोती सेहो एहि अन्हारमे फँसल अछि मुदा कविकेँ उम्मेद छनि जे एक दिन हमर पोती एहि अन्हारकेँ जरूर जानत। जँ हम पोती बदला पाठक पढ़ी तँ ई कविता आन अर्थ दिस लऽ जेबामे सेहो सक्षम अछि। "हलफनामा" कविता मैथिलीक आधुनिक कविताक सर्वथा विपरीत अछि आ एकरा हम बहुत नीक मानै छी। एहि कविताक माध्यमसँ कवि मम्मट (प्राचीन आचार्य)केँ नकारै नै छथिन बल्कि मम्मटक विचारसँ आगू बढ़ए चाहै छथि। मैथिलीक कथित प्रगतिशील कवि अरविन्द ठाकुरकेँ पारंपरिक आ जड़ कहि सकै छथिन कारण ई कथित प्रगतिशील सभ बिना जड़िक नवीनता चाहै छथि। एहि कवितामे जे सत्तामे कील ठोकबाक बात कहल गेल छै ताहि लेल बहुत कथित प्रगतिशील कवि अरविन्दजीकेँ साधुवाद देताह मुदा हमर अनुभव ई अछि अधिकांश कविक लिखल क्रांति पोथिए धरि रहि जाइत छै मुदा आलोच्य कविक तेवर जे कवितासँ बाहर रहल अछि ताहिसँ उम्मेद जरूर जागल अछि जे ई कवि सत्ताक माथमे कील जरूर ठोकताह। "बुद्धिजीवी सन ओ-1" नामक कवितामे कवि कोनो सुनिश्चित आशंकासँ दहलल ओ सिहरल छथि मुदा एकटा पाठकक तौरपर हम ई कहब जे जँ कविक आशंका सच भेल तँ कविकर्म लेल सौभाग्यदायक रहत। मितार्थ फेर आएल अछि "बुद्धिजीवी सन ओ-2" नामक कवितामे। भारतीय समाजमे बहुधा देखल जाइए जे कुकुरक अवशेषपर मजार अथवा गहूँम आदि अँकुरा कऽ मंदिर-मजार बना देल जाइत छै। एहि कवितामे "लाल लंगौटी" अपन एही अर्थमे अछि। जेना किछु दबंग उपरोक्त विधिसँ मंदिर-मजार बना अपन आय निश्चित कऽ लैत अछि जेहिते किछु बुद्धिजीवी अपन पिता-संबंधी-गुरूक ओ नायाब लाल लंगौटी पहीरि बुद्धिजीवी बनि अपन नाम-इनाम निश्चित कऽ लैत अछि। जरूरी नै जे ई लाल लंगौटी मात्र बुद्धिजीवी पहिरै छथि सत्ता ओ बेपार दूनूमे इएह लंगौटी पहिरल जाइए। मैथिली कविताक इतिहासमे "लाल लंगौटी" प्रतीक विरल अछि। "हमर चेहरा पर हिंदुस्तान" नामक कवितासँ हम प्रभावित नै भऽ सकलहुँ आ ई हमर सीमा सेहो भऽ सकैए। जरूरी नै छै जे माथपर टोपी, गट्टामे ताग आ कन्हापर किछु रहत तखने अहाँ सर्वधर्म समावेशी कहाएब। महात्मा गाँधी बिना ई सभ केने सर्वधर्म समावेशी छलाह एवं आजुक नेता ई सभ कइयो कऽ कट्टर छथि। "मुंबइमे स्वतंत्रता दिवस-1 एवं 2" नामक दूटा कविता अछि जकरा जोड़ि कऽ एकै कविता बूझब जरूरी बुझाएल हमरा। एहि दू कवितामे कवि अपन आ रेलिंगपर चहचहाइत फुद्दी बीचक स्वतंत्रताक वर्णन केने छथि आ अपनासँ बेसी स्वतंत्र फुद्दीकेँ मानै छथि। आगू बढ़बासँ पहिने हम पाठककेँ हिंदीक उपन्यास "चित्रलेखा" केर ओ अंश पढ़ए कहब जे कि नायक बीजगुप्त आ सहनायिका यशोधराक बीच भेल छै। कविए जकाँ यशोधरा सेहो कहै छथिन जे चिड़िया सभ कतेक आनंदसँ रहैत अछि ताहिपर बीजगुप्त कहलखिन जे चिड़िया सभ सेहो इएह सोचैत हेतै जे देखियौ आदमी सभ कतेक सुख-सुविधासँ रहैत अछि। आ ई नमहर कथन छै से देब अहिठाम संभव नै। कविकेँ एहि दुनियाँमे कतेक स्वतंत्रता भेटल छनि सेहो आकलन करब जरूरी। "वाहक महान घटनाक" नामक कविता किनको चरित्रगत खसबाक प्रक्रियापर अछि आ से नीक अछि मुदा किछु पाँति बेसी बेर एलाक कारणसँ प्रभाव कम भेलैए-- "सोचय छी सोचैत रहै छी उठबाक हुअए कूबत त खसैक खतरा मोल लएमे कोनो बुराइ नहि" ई पाँति सभ कवितामे दू बेर प्रयोग भेल अछि जे कि प्रभाव कम करैत छै। समझ कवितामे आएल भाव जे "केकरो बुझाबक लेल कनियों ओकरा सन होमए पड़तै" ताहिसँ हम सहमत छी। "अन्यपुरुष" केर नामसँ 5टा कविता अछि। अन्यपुरुष-1 मे कांता, प्रभु, आ सुहृद ई तीनी शब्द एहि कविताक जान अछि जकर फैलाव निच्चासँ उपर धरि होइत अछि क्रमशः "सेक्ससँ सेंसेक्स" आ "शिलाजीत-मुसली" धरि पहुँचैत अछि। ओना हम कनी-मनी आयुर्वेद शास्त्रक जानकारी राखैत छी तँइ हम पाठककेँ कहबनि जे शिलाजीत-मुसली-अश्वगंधा मात्र यौन रोग लेल नै समान्य दुर्बलता हटेबाक लेल सेहो देल जाइत छै तँइ एहि सभहँक अर्थ मात्र यौने रोग धरि नै राखथि। अन्यपुरुष-2 ब्राह्मणवाद विरोधी कविता अछि आ एहन समयमे एहने कविता लिखल जेबाक चाही। जे लोक ब्राह्मण आ ब्राह्मणवादकेँ एकै बूझै छथि तिनका लेल ई कविता पढ़बा योग्य नै अछि। अन्यपुरुष-3 नामक कविता दरभंगाक भूतपूर्व मठाधीशक वर्तमान पुत्र सभ लेल लिखल गेल अछि कि 60 बर्खमे किछु नै भेलै से प्रलाप करए बला राजनीतिक दल लेल से कहब कठिन अछि मुदा मितार्थ एहिठाम चरमपर अछि आ तकर परिणित अन्यपुरुष-4मे भेटत। अन्यपुरुष-4 नामक कविताकेँ हम वास्तु ओ ज्योतिषक किछु समान्य शब्दक माधयमसँ देखाएब। वास्तुमे दिशा तँ ज्योतिषमे ग्रह केर प्रधानता छै। वस्तुक हिसाबें हरेक दिशा लेल देवता आ ग्रह निर्धारित छै जकर विवरण निच्चा अछि-- उत्तर दिशा-देवता कुबेर, ग्रह बुद्ध ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व कोना) देवता शिव, ग्रह वृहस्पति पूर्व दिशा-देवता इंद्र, ग्रह-सूर्य आग्नेय दिशा (पूर्व-दक्षिण कोना) देवता अग्नि, ग्रह-शुक्र दक्षिण दिशा-देवता यम, ग्रह मंगल नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम कोना) देवता राक्षस, ग्रह राहु-केतु पश्चिम दिशा-देवता वरुण, ग्रह शनि वायव्य दिशा (उत्तर-पश्चिम)-देवता वायु, ग्रह चंद्र ऊर्ध्व -देवता ब्रह्मा, ग्रह उल्लेखित नै अधो-देवता शेषनाग, ग्रह उल्लेखित नै ई कविता ईशान दिशा (उत्तर-पूर्व कोना) कोनसँ शुरू होइत अछि। एहि कोनक देवता शिव छथि ग्रह गुरू जे ज्ञानक प्रतीक छथि। एकर बाद वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा अछि जकर देवता वायु छथि आ ग्रह चंद्र जे कि गुरूक पत्नी संग व्यभिचार केने छथिन। एकर बाद नैऋत्य दिशा (दक्षिण-पश्चिम कोना) अछि जकर देवता राक्षस ओ ग्रह राहु-केतु छथि। राहु-केतु चंद्रक दुश्मन। जँ राजनीतिकेँ मानी तँ दुश्मनक दुश्मन दोस्त होइत छै अर्थात बृहस्पति आ राहु-केतु दोस्त भऽ सकै छथि चंद्रक विरुद्ध। मुदा ई बृहस्पतिसँ शुरु कएल ई कविता आग्नेय कोन धरि नै पहुँचि सकल आ एकर कारण थिक जे आग्नेय कोनक ग्रह शुक्र छथि आ बृहस्पति ओ शुक्र दूनू दुश्मन दूनू दू ध्रुव। अकारण नहि जे कवि अपन कविताकेँ अध-सीझल कहै छथि। ई कविता विशुद्ध रूपसँ लोकक अपन मानसिक द्वंदक व्याख्यान कहैए। कविता अन्यपुरुष (5) मे सहज-सरल रहबाक कामना छै मुदा सहज-सरल रहब एते सरल कहाँ छै। "जँ अहाँ गुरू छी" ई कविता स्थूल भऽ गेल अछि। साफे-साफ पता चलि जाइत छै जे ई गुरूघंटाल सभपर लिखल गेल छै। एहि कविताक अंतिम पाँति अधिकांशतः फूसि थिक। असली चेला कहियो गुरू छोड़ि इजोत दिस नै जा सकै छथि। असली चेला रूकल रहै छै गुरुक वध कऽ गुरूआइक आसन लेल। लाल लंगोटी कविता मोन पाड़ू। "उन्टा साँस लैत लोक आ विद्यापति" एहि विषयपर बहुत विचार विभिन्न विधामे आएल अछि आ भरिसक तँइ प्रभावति नै कऽ सकल हमरा। पृष्ठ 49 सँ 61 धरि 11 टा कविता दरभंगाक विभिन्न भंगिमापर अछि मुदा काजक कविता मात्र पहिल कविता (दरभंगा राज आ ओकर विरासति) अछि। दरभंगापर दोहा सेहो अछि। किछु दोहामे मात्रा ओ यति-गति सही अछि मुदा किछुमे गड़बड़। "सहज सुमति माँगलनि विद्यापति" ईहो कविता सहज-सरल विषयपर अछि। हमरा विचारे ई कविता "अन्यपुरुष-5 सँ नीक अछि। आब फेर आएल अछि मितार्थ। दुर्योधनक कनियाँक नाम रहनि भानुमती आ भानुमती केर प्रयोग करैत 16 टा कविता अछि पृष्ठ 64 सँ 82 धरि। "तिरहुत आ भानुमती" नामक कवितामे मिथिलाक कथित महानता ओ मान्यतापर आक्षेप कएल गेल अछि। आ एकटा नमहर बहसक माँग करैत अछि। एहि कवितामे जँ "रिंग लीडर" शब्दक बदला "किंग मेकर" रहितै तँ बेसी नीक। "भानुमतीक लिंग" नामक कवितामे मितार्थ जुत्ता पालिशसँ चंडी पाठ धरि कऽ रहल अछि। कवि लेल भानुमतीक लिंग चाहे जे हो मुदा एकटा पाठकक तौरपर हमरा लेल भानुमतीक लिंग "गरीब आ प्राइभेट" नौकरिहारा अछि। पाठक समुदाय एहि कविताकेँ पढ़िए कऽ मजा लऽ सकै छथि। "भानुमती आ चुनाव" नकली वामपंथी सभपर अछि जे चुनाव वा आर कोनो तात्कालिक फायदा लेल अपन पुरुखाकेँ गरिआबैए। आ कविक मोताबिक भानुमती चुनाव लड़बा लेल एहन करैए। ओना बहुत बेर भूतकालक गलतीकेँ उजागर करबाक प्रक्रियाकेँ गरिआएब वा उकटब बूझि लेल जाइत छै। पाठक एहि कवितापर बिलमि एहि बिंदुपर सोचथि। "भानुमतीक पुश्तैनी क्रम" वस्तुतः एकट्ठे हमरे सभहँक क्रम अछि। ई कविता मितार्थक अद्भुत नमूना अछि। "भानुमतीक हँसब" एहि कवितापर जाएसँ पहिने हमरा एकटा लोककथा मोन पड़ल। एकटा गरीब बच्चा कोनो राजा लग सभ दिन जाइक आ राजा ओकरा लग सोना आ चानीक सिक्का राखि दै ओ बच्चा चानीक सिक्का उठा चलि दै। राजा ओ दरबारी से देखि हँसै जे देखियौ केहन निर्बुद्धि छै जे सोना रहितो चानी उठबै छै। एक दिन ओकर माए वा बाप पुछलकै जे सोना किए ने उठबै छीही तँ ओ बच्चा जबाब देलकै जे जहिया हम सोना उठा लेबै तहियेसँ ई खेल खत्म भऽ जेतै। तँइ हम मूर्ख बनि चानी उठा लैत छी। आब कवितापर आबी। कविताक अंतिम पाँति अछि "हँसी सन पवित्र वस्तुओ भानुमती सन चंगला लग आबि धंधा भऽ जाइत अछि। आ एहिठाम आबि पाठक बूझि सकै छथि जे कवि कोन खेलक रचना कविता माध्यमसँ केने छथि। एहि कवितामे भानुमती कियो भऽ सकैए लोकथाक बच्चा सेहो, गरीब सेहो आ चमचा सेहो। बेसी बुझबाक लेल पाठक कविता पठथि। "भानुमतीक उत्स" हम एहि कविताकेँ दू भागमे बाँटब। पहिल--- "गाछक जड़ि..........कंठस्थ कए उदरस्थ कएने अछि" आ दोसर- " जखनि कखनिओ उठैत अछि-----एकाकार भऽ जाइत अछि भानुमतीमे"। हमरा हिसाबें पहिले भाग कविता अछि। दोसर भाग एहि रचनाकेँ एकपक्षीय बना देलकै। जँ कवि एहि रचनाकेँ पहिले भागपर खत्म करतथि तँ ई दुनियाक हरेक भानुमतीक प्रतिनिधित्व करितै ओतबे शब्दमे मुदा एकर दोसर भाग आबि एहि रचनाकेँ एक भानुमतीपर केंद्रित कऽ कमजोर बना देलकै। "कवि भानुमती" नामक कविता जाहि विषयपर अछि ताहिपर बहुत रास व्यंग्य, चुटकुला आदि रचल जा चुकल अछि। आ प्रस्तुत कविताक शिल्पो तेहन नै जे आकृष्ट करए। "भानुमती आ काछु" नामक कविताक वएह दिक्कत जे ई दू भागमे अछि आ मात्र पहिले भाग कारगर अछि (काछु चारि इंचक-----कतेको साल तक)। जँ एहि कवितासँ दोसर भाग ( एहि धरतीपर---अपसियाँत भेल अछि भानुमती) हटा देल जाए तैयो एहि कविताक अभीष्ट पूरा भऽ रहल छै। "भानुमती आ घोंघा" नामक कवितामे भानुमतीकेँ घोंघा अपन लोक बुझाइत छै कारण घोंघेक दाँत सन भानुमतीक दाँत छै जाहिसँ ओ दुनियाँक हरेक वस्तुक भक्षण कऽ सकैए। "भानुमतीक चिन्ता" ईहो कविता दू भागमे अछि आ हमरा हिसाबें एकर पहले भाग (नवकी बहुरिया बिना गहना... नहि जीबि सकैत अछि किन्नहुँ) कारगर अछि आ एकर दोसर भाग (परम बूड़ि अछि ई प्रधानमंत्री...चिन्ताक हमशकल भेल भानुमती) एहि कविताकेँ एकपक्षीय बना दैत छै। "भानुमती आ समाजिक न्याय" एहि कवितामे भानुमती ओहन लोकक अवतारमे अछि जे लोकतंत्रमे समतावादकेँ पचा ने सकल। कविताक अंत एहिसँ होइत अछि जे तमाकू खाएब राड़-रोहियाक अमल छै आ एहिसँ हम ई मानैत छी जे कवि 95 कथित ब्राह्मणकेँ राड़-रोहिया मानै छथि एहि अमलक कारणे। "कापरेटिभ भानुमती" नामक कवितामे भानुमती जोगाड़ीक रूपमे अछि। आब ई जोगाड़ी कोनो क्षेत्रमे पहुँचि सकैए। पाठक अपन क्षेत्रक हिसाबें एकर व्याख्या कऽ सकै छथि। "इतिहासवेत्ता भानुमती" ई कविता भानुमतीक ओहन रूपपर अछि जाहिमे ओ अतीतजीवी बुझाइत अछि। मुदा जेना-जेना कविता अंत दिस बढ़ैत अछि तेना-तेना बुझबामे आबि जाइत छै जे भानुमती अतीतक आवरण वर्तमानक अपन स्वार्थपूर्ति लेल केने अछि। एहि कवितामे मितार्थ चरमपर अछि। भानुमतीक ई रूप कोनो राजनीतिक दल सेहो लऽ सकैए। "भानुमती आ खबासी" ई कविता मठ ओ मठशिष्यपर अछि। कविताक अंत एना अछि "जखनि जखनि नेत्रपट खोलताह / श्री कृष्णरूपी मठाधीश/ तँ पहिने देखथिन ओकरे युधिष्ठिर रूप" मुदा ई तथ्य तँ दुर्योधन-अर्जुन ओ कृष्णक बीचक छनि एहिमे युधिष्ठिर कोना एलाह से शोधक बात। बहुत संभव जे भावनामे बहि गेल हेता कवि। वा ईहो भऽ सकैए जे आर आन कोनो मिथक हेतै जे कि हमरासँ छुटि गेल हो। पाठक एहि कविताक एहि मिथकपर धेआन राखथि। "भानुमती आ बतहबा" ई कविता भानुमतीक ओहन रूपपर अछि जे कि कोनो अवसरपर किछु पाँति मैथिली बाजए बलाकेँ देवता मानि लैत अछि। पाठक एकर विस्तार कोनो संस्थाक वार्षिक आयोजनसँ लऽ कऽ चुनावी सभा धरि कऽ सकै छथि। "अयनामे भानुमती" एहि कवितापर एबासँ पहिने विश्व साहित्यमे अंतरात्माक अवाज देखी तँ पता लागत जे जे मात्र किछुए नीक लोक अपन अंतरात्माक अवाज सुनि सकलथि आ बहुत खराप लोक अपन अंतरात्माक अवाजकेँ अनठा देलाह। एखनो वएह स्थिति छै आ बादोमे वएह रहतै। एहि कवितामे भानुमतीकेँ सेहो आयनामे आएल अपने रूप पसंद नै पड़लै। बात पुरान छै मुदा कहबाक शैली नव, इएह एहि कविताक विशेषता भेल। "सूर्यकेँ चिन्हह भानुमती" नामक कवितामे कवि भानुमतीक डर दूर कऽ रहल छथिन मुदा कोन डर से अज्ञात अछि। समान्यतः डर वा तँ शारिरिक कमोजरकेँ होइत छै वा नैतिक कमजोरकेँ। भानुमती कोन तरहक कमजोर अछि से पाठक अपना समयपर जानि सकताह। "जाउ महाप्रकाश" एवं "कुमार शैलेंद्र" संस्मरणपरक कविता अछि आ मैथिलीमे एहन कविताक आवश्यकता छै। "प्रतकेँ मुक्ति चाही" ईहो कविता कुमार शैलेंद्रजीपर केंद्रित अछि मुदा एहि कविताक किछु पाँति पूरा संसार लेल बनल अछि-- "आब किन्तु मरलाक बाद पछताइत छी / जीवैतमे कयल अपन ओहि करनीपर" "जीवित प्रेत सभहक बनायल छल-छद्मक चक्रवातमे नहि फँसू" "मानसिक खबासीक महापात्रीय मकड़जालसँ मुक्त होउ"................. आदि। "श्रीमान् कपरगर" नामक कविता ओहन चरित्रपर लिखल गेल अछि जनिक बाहरी आवरण चिक्कन-चुनमुन मुदा भीतरक आवरण छल-छद्मक छनि। जेना जीवन बिंदुसँ बिंदु धरिक यात्रा अछि तेनाहिते ई कविता कपरगरसँ कपरजरू धरिक यात्रा अछि। "शहादत" कविता बुझबाक लेल कुंडलिनी योग बुझए पड़त कारण एहिमे एहि योगसँ संबंधित शब्दावलीक प्रयोग भेल अछि। मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र। मूलाधार चक्र सभसँ नीचा होइत छै आ सहस्रार सभसँ उपर। ई चक्र सभ पीठक पाछू रीढ़क हड्डीमे होइत छै। एहि कवितामे कविक बिंदु विसर्ग (सहस्रार)पर एकटा मच्छर बैसि जाइन छनि आ कवि ओकरा आज्ञा चक्रक, विशुद्धि चक्रसँ खेहारैत मणिपुर चक्र लग ओहि मच्छरकेँ मारि दैत छथिन। कविकेँ आशंका छनि जे ई मच्छर हुनके स्वाधिष्ठान चक्रक कोनो कीड़ा छलनि। कुंडलिनी साधाना नीचासँ उपर होइत छै मने मूलाधार जागरण करैत साधक सहस्रार धरि पहुँचै छै। एकर मतलब ई जे जेना-जेना साधनाक ज्ञान उपर बढ़ैत छै तेना-तेना अज्ञानता नीचा घटैत छै। जँ एहि कवितामे मच्छरकेँ अज्ञानता-दुर्गुणक प्रतीक मानी तँ ई सूचित होइए जे ओ नीचाक दू चक्र धरि नहि पहुँचि सकल आ अप्रत्यक्ष रूपसँ ई देखबैए जे साधक केर साधना एखन दू चक्र धरि उपर नहि पहुँचल अछि मने साधक एखन विशुद्धि चक्रपर जा कऽ अटकल छथि हुनका एखन आज्ञा चक्र ओ सहस्रार चक्रक भेदन करए पड़तनि। योगी सभहँक मोताबिक विशुद्धि चक्र कंठक पाछू होइत छै। आ एकरा भेदन कऽ देलासँ अपार उर्जा भेटैत छै। साहित्य केर हिसाबसँ देखी तँ साहित्यमे बिना रीढ़ बला सभ साहित्यकार बेसी भेटताह तेहन स्थितिमे प्रस्तुत कवि ई साबित केलथिहए जे हम रीढ़क हड्डी मामिलामे पाँचम चेतना स्तरपर छी। योगक मोताबिक सांसारिक आदमी मूलाधार चक्रमे जीबि मरि जाइत छै तेनाहिते साहित्योमे साहित्यकार बिना रीढ़क हड्डीक मरि जाइत छै।"चेत सम्हार" कविता मैथिली भाषा मध्य विजातीय शब्दक घुसपैठकेँ रेखांकित करैए आ कवि ताहि लेल अपने घरक उदाहरण देलथि ई एकटा नीक पक्ष भेल। अपना ओहिठाम तँ सभ अपने घरकेँ बारि अनका घरक उदाहरणसँ शुरू करै छथि। "नागफनी पंडित" एहन कविता मैथिलीमे लगातार एबाक चाही। प्रायः जीवकांतजीक बाद कियो एहि तरहँक कविता नै लीखि पाबि रहल छथि। ई कविता कवि ओ प्रकृतिक बीच मौन संवाद अछि। "हम कए रहल छी गीर्वाण नृत्य" "हम कए रहल छी गीर्वाण नृत्य" एहि कवितामे प्रयुक्त शब्द गीर्वाण केर मतलब छै "देव-देवता" मने कवि देव नृत्य कऽ रहल छथि मुदा किए? प्रस्तुत कवितामे कवि सुगंध, स्पदन, तरलता आदि जमा कऽ रहल छथि, विश्वामित्रसँ नव-नव रचबाक प्रेरणा लऽ रहल छथि। अधम-निकृष्ट आदिकेँ बाहर फेकि रहल छथि आ कवि अपन आंतरिक आनंदमे मग्न छथि स्वाभावतः एहन परिस्थितिमे कवि देवे-नृत्य करताह मुदा की देवता नीके छलाह? जँ पौराणिक कथा सभ देखबै तँ देवि-देवताक छल-छद्म सभ सामने आबि जाएत तखन ई गीर्वाण नृत्य छल-छद्मसँ दूर कोना रहत। एकर विपरीत बहुतो एहन मानव भेटत जे छल-छद्मसँ दूर रहि नैतिकतामे देवतोसँ आगू गेलाह। कविसँ आग्रह जे धरतीपर सहज-सरल मानव नृत्यक आयोजन करथि ओ। "कविता लिखैत गेलहुँ" नामक कवितामे कवि अपन लिखबाक कारण दै छथि। ओना तँ सभ कवि कविता लिखबाक कारण मोनक शांति-आत्मसुख गनबै छथि। प्रस्तुत कविक मनोभाव एहने सन छनि जे हम हलाहल पिबैत गेलहुँ आ कविता लिखैत गेलहुँ। एकटा भिन्न कविताक रूपमे ई साधारण कविता अछि मुदा जखन अहाँ एही कविता संग्रहक दोसर कविता "हम हत्या करय चाहै छी"सँ जोड़ि कऽ देखबै तँ सुखद अनुभूति हएत। आखिर जे कवि शुरूमे हत्या करए धरि उताहुल छलाह से अंतमे आबि कहै छथि "पीबैत गेलहुँ सभटा हलाहल/ कविता लिखैत गलहुँ/ छोड़ैत गलेहुँ सभटा प्रमाण"। नकारात्मकसँ सकारात्मक दिस एबाक संकेत अछि। "दृष्टि"। राजस्थान उच्च न्यायालयक न्यायाधीश महेश चंद शर्मा द्वारा बयान देल गेल छल जे मजूरक नोर पीबि मोरनी गर्भवती होइत छै। पक्षी विशेषज्ञ सभ एकरा गलत कहलाह। बहुत संभव जे शर्माजी जनमानसमे पैसल भ्रमकेँ अपन बयान बना लेलाह। "दृष्टि" कवितामे कवि सेहो मोरनीक संबंधमे एकटा बात कहला जे ओ अपन पएरक कुरूपता देखि खूब कनैत छै। मिथिला क्षेत्रमे कियो पक्षी विशेषज्ञ हेताह तँ कहियो एहिपर अपन मंतव्य देता। ओना कोनो वस्तुक सुंदरता स्थिति आ ग्रहण करबाक क्षमतापर निर्भर छै आ ई बात सच छै से हमहूँ मानैत छी। "टिमटिम" ई कविता जतबे केकरो प्रयास, संघर्ष, जीजिविषा आदिकेँ देखार करैत अछि ओतबे सुविधा, षड्यंत्र, ईर्ष्या आदिकेँ सेहो। मुदा प्रश्न ई जे ई बात सभ जनितो दीप असावधान ओ आश्वस्त किए रहैए? "तीनहि टा कविता" कवि अपन पुत्रपर केंद्रित कऽ लिखने छथि। "धन्य कुशहा" ई कविता 18 अगस्त 2008मे आएल कोशी बाढ़िपर अछि। कोशी बाढ़िपर बहुत साहित्यकार द्वारा लीखल गेल अछि ताही सिरीजक एकरो बूझू। एहि कविताक मर्म वएह बूझि सकत जे कि बाढ़ि देखनो हो आ से प्रायः सभ मैथिल देखिते छथि। "बड़की माँक बक्सा" कविता संभवतः दाइ वा बड़की काकीपर रचित अछि। तेनाहिते "माँ देलनि ओलहन" माए केंद्रित कविता अछि। पहिल कवितामे कवि अपन बचपन लेल औनाइत छथि तँ दोसर कवितामे माए केर ओलहनसँ हुनक रचना संसारमे कोना वृद्धि भेल तकर वर्णन अछि। "टाइगर हिल पर सूर्योदय" ई कविता भ्रमण कविता अछि। मुदा अंत धरि अबैत कवि एहि कविताक माध्यमसँ अपन पिताक स्मरण कऽ लै छथि। "हमरा नहि छल बूझल" कविता मोह भंगक कविता अछि। से मोह भंग चाहे जीवनक हो, सुख-सुविधाक हो। एहि कविताक अंतमे कवि एक बेर फेर अपन बचपन लेल औनाइत देखल जाइत छथि। "आयु, अंक, अभिलाषा आ जीव" कविता आशा केर कविता अछि। कवि कोनो हालतिमे निष्क्रिय नै रहए चाहैत छथि। "अहाँ उठू, जागू" कविता कवियत्री प्रतिभा लेल अछि मुदा लागू हरेकपर होइत अछि। "विदा कालमे" ई कविता कवि अनाम मुदा चिन्हार लेल लिखने छथि। कवि ओहि अनामकेँ चीन्है छथिन ओकरा बारेमे किछु स्वीकार करए चाहै छथिन मुदा लीखि कऽ नै। ई कविता कविक क्षण-विशेषक कविता होइते सभहँक कविता अछि। सभहँक जीवनमे एहन समय आबै छै जखन ओ बहुत किछु कहए चाहै छै मुदा से कहि नै पाबैत छथि। एहन कविता मैथिलीमे बेसी लिखल जेबाक चाही। "स्मृति मित्र अछि" कवितामे कवि स्मृतिसँ मैत्री करबाक सलाह दै छथि। कहै छथि "समृतिमे हम सभ/ बीतल घड़ीकेँ फेरसँ जीबैत छी/ बेर-बेर जीबैत छी"। मुदा ई अनुभवसिद्ध गप्प अछि जे अवस्था भेलापर स्मृति बेसी जरूरी भऽ जाइत छै युवाक मोकाबिलामे। अतीतजीवी सेहो स्मृतिक मित्रे होइत छथि। "खांहिस" कवितासँ पहिने हमरा शिकायत छल जे एहि संग्रह किछु कविता दू भागमे बाँटि देल गेल अछि जाहिमे ओकर पहिले भाग कारगर अछि। मुदा ई कविता "खांहिस" एकै भागक छोट कविता अछि आ अपन अर्थ देबामे समर्थ अछि। ई कविता कविक नास्तिक स्वरक अछि मुदा कवि एहि शर्तपर आस्तिक बनि सकै छथि जे केकरो वैधानिक संग हुनका अगिला जन्ममे सेहो भेटनि। एहि कवितासँ ईहो पता चलैए जे कविक अभीष्ट कवि लेल बहुत महत्वपूर्ण छनि अन्यथा के अपन वैचारिकताकेँ छोड़त। एहि कविताक दोसर अर्थ ईहो भऽ सकैए जे जँ अभीष्ट पूरा हो तँ वैचारिकताकेँ छोड़ल जा सकैए मुदा एहि कवितामे आएल "वैधानिक" शब्द कविताकेँ नैतिक उर्जा दैत अछि। "दू मित्र" कवितामे एकटा मंच भोगी तँ दोसर एकांत सेवी छथि। मंचभोगीक मोकाबिलामे एकांत सेवीक क्रियाकलापसँ साबित होइए जे दोसर बेसी संवेदनशील छथि आ असल कविता लेल इएह संवेदनशीलता चाही। "बजारसँ घुरैत काल" जँ पाठक एहि कवितामे आएक शब्द बजारक बदला जीवन पढ़थि तँ अर्थविस्तार हएत। बजारक हवा जँ गूँह-मूत-घामसँ गन्हाइत अछि तँ जीवन विभिन्न कुकर्मसँ। एहि कविताक अंत ओतेक समाधनल नै अछि। "जँ अहाँ कवि छी" नामक कवितामे कविक मंतव्य छनि जे वृद्धावस्था अबिते शारिरिक तौरपर लोक कमजोर होइत अछि मुदा जँ कियो कवि छथि तँ ओ मानसिक तौरपर बलगर भऽ जाइ छथि। बहुत संभव जे एहन होइत हो मुदा मैथिली भाषामे कतेक ताहि प्रश्नपर मंथन करब उचित। ई कविता एहि संग्रह अंतिम कविता अछि। २ मैथिली भाषाक परंपरानुसार विभक्ति सटबाक चाही, मैथिलीक सहोदरी भाषा (सहोदरी शब्द राजनैतिक बला नै)मे सेहो विभक्ति सटै छै,, एतए धरि जे गीता प्रेस, गोरखपुरसँ प्रकाशित सभ हिंदी किताबमे सेहो विभक्ति सटल रहै छै। प्रस्तुत संग्रहमे "पर" छोड़ि सभ विभक्ति मूल शब्दमे सटल अछि मुदा पता नै किए "पर"केँ छोड़ि देल गेलै। बहुत लोक मानै छथि (हमरा सहित) जे रचना सहज सरल भाषामे हेबाक चाही तँ बहुत लोक क्लिष्ट भाषाक प्रयोग सेहो करै छथि। ओना ई तँ निश्चिते कहल जा सकैए जे क्लिष्ट भाषाक एकटा फायदा ईहो जे ओकरा बुझबाक लेल मेहनति करए पड़ैत छै आ अंततः ई अध्य्यन पाठक-आलोचक सभ लेल नीक होइत छै। प्रस्तुत कविता संग्रहमे अधिकांशतः क्लिष्ट भाषाक प्रयोग भेल अछि। प्रायः एहन भाषा बला कविता संग्रह वा पद्य संग्रह बहुत कम प्रकाशित भेल अछि 1990 केर बाद (अपवादमे विजयनाथ झाजीक गजल संग्रह अछि जे कि 2008मे प्रकाशित भेल)। बहुत वर्तनी क्षेत्रीय उच्चारणक हिसाबसँ अछि आ कमसँ कम मैथिलीक हितमे अछि। बहुधा देखल जाइए जे कवि सभ अपन क्षेत्रीय उच्चारणकेँ बिसरि केंद्रिय उच्चारणपर बल देबए लागैत छथि (कारण जे हो) मुदा एहि संग्रहमे क्षेत्रीय उच्चारणकेँ राखल गेल अछि। हरेक लोकमे किछु ने किछु गुण-अवगुण रहिते छै, कवि सेहो लोके होइत अछि तँ कविक रचनामे सेहो गुण-अवगुण रहबे करतै। प्रस्तुत संग्रहमे सेहो नीक-साधारण कविता दूनू अछि। किछु कविताकेँ पुनर्लेखन कएल जेबाक चाही तँ किछु कविता मैथिलीक विरल कविता बनि कऽ आएल अछि। गुण-अवगुण समेत ई कविता संग्रह वर्तमानक नै भविष्यक अछि आ एकर अन्य पाठ निर्धारण बीस-पचीस बर्खक बाद संभव हेतै। दुर्गानन्द मण्डल सोन्हगर आधुनिक कथाकारक उच्चतम् श्रेणीक कथाकार श्री नन्द विलास रायजीक सम्बन्धमे ‘विदेह’क सह सम्पादक लिखै छैथ जे ग्रामीण रचनाकार अपन पात्रक संगे-संग जीवन जीबै छैथ, संगे-संग संघर्ष करै छैथ, संघर्षक महत्वकेँबेवहारिक तौरपर बुझै छैथ और तँएओ ‘सम्बन्ध-बन्ध’क खियाल करै छैथ, सदैव सम्बन्ध बना कऽ रहए चाहै छैथ। ई मिथिलाक संस्कार छी। मिथिला अपन कोखिसँ सदैव एहेन विचारकेँ जन्मल अपन पूत मानैत रहल अछि। ऐठाम लोक सम्बन्धकेँ बहुत महत् दैत अछि। ‘अपनेटा नीक’केँ कहियो नीक नहि कहैक इतिहास रहल अछि मिथिलामे। हँ! ‘अपनो नीक’ एहेन धारणा तँ अछिए। अही धारणाक अनुशरणमे मिथिलाक प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. शिव कुमार प्रसाद एक उदाहरणकसंगआइ मिथिलामे ठाढ़ छैथ। कहब जे एहेन पहिल अनुवादक शिवकुमारे बाबू भेला सेहो बात तँ नहि?ठीक! मुदा ई बुझि-सुझि कऽ कहबाक चाही जे मैथिली साहित्यक अनुवाद विधामे कएल अधिकतम काजक इतिहास की अछि। सभ जनै छैथ जे पारिश्रमिक एवम् पुरस्कारक लेल कएल गेल अनुदित पोथीमैथिली साहित्यमे बेसी अछि। प्राय: अनुवाद एसाइनमेन्ट लेल कएल गेलअछि। कहब जे शिवकुमारो बाबू भऽ सकैए ओही लेल लिखने नइ हेता तेकर कोन गारंटी? हँ, एकर दूटा गारंटी अछि। पहिल तँ ई जे नव मिडियाक सहारे बनल सम्बन्धक बीच मूल पोथीसँ अनुवाद करक लेल मैथिलीमे शिवकुमार बाबू स्वयं हृदयसँ तैयार भेला। आ ‘पिघलते हिमखंड’ केँ ‘पघलैत हिमखंड’क रूपमेसम्पूर्ण पोथीकेँ इच्छानुसार मनसँ अनुवाद केलैन अछि। आ दोसर गारंटी ई अछि जे डॉ. शिव कुमार प्रसाद सर्वहारा मंचपर बैसैबला गैर सर्वण रचनाकार सेहो छथिए।तहन हिनका सभपर, माने गैर योजनावद्ध ढंगसँ साहित्य अकादेमीकेँ संग देनिहार रचनाकारसभपर–भला ‘पुरस्कारक लोभ’ लिखब उचित नहि बुझै छी।डॉ. शिव कुमार प्रसाद‘सगर राति दीप जरय’सन मंच परहक वक्ता छैथ। जे मंच मिथिलिये नहि, समस्त भारतीय भाषा साहित्यमे असगरे अछि। ई बात हमरो बुझल अछि जे ऐ मंचक कल्पना पंजाबक एक मंचसँ कएल गेल अछि। मुदा हमर सबहक जे देह-हाथ अछि, खास कऽ नव मिडियाक बाद, ओइ रूपमे तँ आरो असगर पड़िए गेल अछि। मैथिली साहित्यगीत-कविता, काव्य आदिक लेल एकटा नव सुर्यक रचना ‘सोंहॉंत-अनसोंहाँत’रचनाकार डॉ. शिव कुमार प्रसाद आजुक समयमे आजुक पीढ़ीक लेल बड़ सोन्हगर लागल, आ पाठकोकेँ लगतैन। ई हमर आत्म विश्वास अछि। जइमे कविवर डॉ. प्रसाद अपन लेखनीसँ अनेकानेक, सभ तरहक रचना दऽ पाठक-प्रेमीक बीच अछप स्थान बनौलैन। ओना, वृततिये डॉ. प्रसार हिन्दी साहित्यक विद्वान छैथ आ हरि प्रसाद साह महाविद्यालय- निर्मलीमे हिन्दी विभागमे एसोसियेट प्रो. एवम् अध्यक्षपदपर सुशोभित। जइसँ आजुक पीढ़ीकेँ अपन ज्ञान दान दऽ समाज आ राष्ट्रक सेवा सेहो दऽ रहला हेन। सेवा मात्र नहि, अपितु अखन वर्तमान पीढ़ी जे शिक्षकक नामपर बौड़ा गेल अछि, जे जाएत केतए आ जेबाक केतए छै से ज्ञाने नहि, तैठाम डॉ. प्रसादजीक सारगर्भित ज्ञानसँ ओइ बोराएल पीढीकेँ एकटा उचित दिशा भेटतै। ओना, ई अलग बात जे एखुनका शिक्षा पद्यतिसँ डिग्री मात्रेटा भेटत, रोजगार सृजन आ ज्ञान नहि, तैठाम डॉ. शिवकुमार प्रसाद अपन ज्ञान दानसँ ऐ समाजक बीच ज्ञानोपदेश देबामे सफल बेकती छैथ। ई हमरा नीक नहाँति बुझल अछि। आ बुझलो केना नै रहत, हमहूँ तँ निर्मलीए माटिपर रहै छी। प्रस्तुत पोथीसँ पूर्व डॉ. शिवकुमार प्रसादक हिन्दी आ मैथिली- दुनू भाषामे अनेकानेक रचना सभ प्रकाशित भेल अछि। जे अपने सभ पढ़नहि हएब। एना ऐ दुआरे लिखलौं जे पढ़नहि हएब, जे नव मिडियाक समय अछि किने। आब ओ समय गेल जे अहॉंक रचना हम पढ़ब तइले पहिने मैथिलीक प्रिंट मिडियाक सम्पादकसँ फरिआउ। वर्तमान परिपेक्ष्यमे ‘सोंहाँत-अनसोंहाँत’अपनेक बहुत सोहनगर रचना अछि, ई रचना सभ पाठक-बन्धुकेँ सोन्हगरेटा लागत अनसोंहाँत नहि। किएक तँ अपने बहुत नीक जतनसँ ऐ काव्य संग्रहक रचना केलौं अछि। जइमे छोट-क्षीण मुदा अनुकरणीय आ कर्णप्रिय रचना सभ संग्रहीत केलौं। पोथीक आरम्भेमे रचनाकार मिथिला धाम लिख अपन गाम मोन पाड़लैन आ नेनपना सेहो। पढ़लाक बाद थोड़ेकाल धरिक लेल लागल जेना केतौ हेरा तँ ने गेलौं। जेतए लूखी, कचबचिया, मेना, पौरकी आदि रहै छल मुदा अखन दर्शनो नदारत, अखन सिर्फ पजेबा आ सिमेन्ट-बालुसँबनल बेश ऊँचकगर कोठा-सोफाटा देखाइत अछि। तहिना नवोदित रचनाकारक लेल डॉ. प्रसादक प्रोत्साहन जे किछु-ने-किछु लिखैत जाउ...। नीक लागल। जे ऐ तरहेँ जे छपैत-छपैत छैपिये जाएब। एक दिन लेखक बनियेँ जाएब। मंच आ इनामो भेटत...। एक दिस लेखक बनियेँ जेबै मंच आ इनामो भेटत..। तँए किछु-ने-किछु लिखैत जाऊ..। तहिना निर्मलीक निर्मलतामे शिर्षक कवितामे शिक्षाक ऐ महापंकमे गामक जिनगी लेटा रहल अछि कोचिंग, विद्यालय, कौलेजमे एक-एक जन लूटा रहल अछि शिक्षाक ऐहि महापंक...। वर्तमान शिक्षाक माध्यमसँ लूटाइत ग्रामवासी सबहक आर्थिक दुर्दशा देखेबामे कविवर सफल रहला अछि। अहिना ‘बौआक उबटन’सँ लऽ सॉंझ, ढोलकबोखार, छठि पाबैन लिख ठकुआ आ केरा सेहो मन पाड़लैन। रचनाकार दीप रचनाक मादे लिखै छैथ जे सगर राति हम दीप जरेलौं तैयो घर अन्हारे अछि। शिक्षा मेल विषयपर इजोत देलैन। तहिना ‘मन पछताय’, ‘झूठ-फूसमे बाझल छी’किएक से स्पष्ट केलैन अछि। देख एलौं हम पटना,ओझराहैट, ठनकल फेर ठनका, लिखलैन तँ सुमीता सन नारीक चित्रण करब सेहो नै बिसरलाह। रचनाकारक सरसता देखू जे फगुआआ फागुन लिखब सेहो नै बिसरला..! अपने तँ भाँग खा पटियापर ओंघराएल छैथ आ कनियॉं रंग खेलक लेल एलैन। ऐ प्रकारक सभ तरहक बीहैन काव्य रचना लऽ रचनाकार जाड़क कनकनीसँ लऽ जिनगीक झमेला, झूठ, भातक थारीसँ लऽ विद्याक अर्थीधरि लिख पाठक आ समाजकेँ उचित बाट देखौलैन। ऐ लेल रचनाकार श्री प्रसादजीकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद आ साधुवाद छैन। जे अपन रचनेक माध्यमसँ ओ आबए-बला पीढ़ीक लेल तमसोमा ज्योर्तिगमय साबित करैक परियास केलैन अछि। जे किनको अनसोंहाँत कहाँ सोन्हगरेटा लगलैत। बेस, अखन एतबे...। मुन्नाजी बीहनि कथा (मानकीकरण ओ तुलनात्मक पक्ष) मैथिली कथा साहित्य मूलत: संस्कृत भाषा साहित्य सं अनुदित भ'अपन पएर पसारने छल।एकर बीजारोपन चन्दा झा द्वारा विद्यापतिक 'पुरूष परीक्षा' सं भेल छल।कालान्तर मे मैथिली कथाकार बाङला कथा माध्यमे पाश्चात्य कथासाहित्य सं परिचित भेला।तत्पश्चात मैथिली कथा लेखनक कथ्य,शिल्प आ विषय परिमार्जित भ' मैथिली कथा साहित्य के नव दृष्टि देलक आ ओ संस्कृतक शब्द ,कथा/गल्प नामे लिखाइत रहल।पछाति प्रो. रमानाथ झा सदृश्य विद्वान/आलोचक ,अंग्रेजीक प्रभावे एकरा अंग्रेजी मे Short Story आ ओकर अनुवाद ' लघुकथा कहि संबोधित केलनि।तहिया सं इ कथा/ गल्प ,रचना त' ओही नामे होइत रहल मुदा विधागत ' लघुकथा ' (Short Story) विधाक अन्तर्गत मूल्यांकित होइत रहल।आ ताहि परिणामे मैथिलीक सब संग्रह पर अंग्रेजी मे Collection of Short Story अनिवार्य रूपें लिखल भेटत। तकर पछाति मैथिली साहित्यक इतिहासकार लोकनि सेहो कथा/गल्प नामक रचना कें लघुकथा विधाक श्रेणी मे राखि व्याख्या . करैत रहलाह।" संप्रति गल्प वा लघुकथा,उपन्यास सं अधिक लोकप्रिय भेल जा रहल ऐछ।तकर प्रबल कारण पाठक वर्ग मे क्रय शक्तिक क्षीणता वा पलखतिक अभाव, से नै जानि।" --डॉ. जयकान्त मिश्र-मैथिली साहित्यक इतिहास(प्रकाशक- साहित्य अकादमी)ऐ फरिछओठक पछाति अंग्रेजी साहित्यक विधाक पृष्ठभूमि मे ओहि विधा परिवारक अंग भ' स्थापित भेल। आगू ओकरा आओर फरिछबैत दुर्गानाथ झा श्रीश लिखै छथि--" आइ मैथिली साहित्यक एक मात्र उपलब्घि थिक लघुकथा(Short Story) पूर्वक कथाकार लोकनि गल्प आ उपन्यासक बीच शिल्पगत अन्तर नै बुझैत छलाह।मुदा आब इ स्पष्ट ऐछ।जाहि सं लघुकथा(कथा/गल्प नामे) विधागत स्वतंत्र परिचिति बना पओलक ऐछ।"--मैथिली साहित्यक इतिहास-दुर्गानाथ झा श्रीश।" हमरा मैथिली प्रतिष्ठा वर्गक छात्र रहने मैथिली साहित्यक इतिहासक अध्ययनक अनिवार्यता छल। एहि अध्ययनक क्रमे मैथिली कथा के विधागत ' लघुकथा( Short Story)बुझबाक अवगति भेल। हम आश्चर्य चकित रही अग्रज सबहक हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरणक रूपें अंधानुकरण पर, ई की ?पहिने सं जे विधा विद्यमान आ स्थापित ऐछ(कथा/गल्प नामे) ' लघुकथा(Short Story)।तहन ओइ विधाक दोहरीकरणक की खगता ?माने पिता आ पुत्रक एकहि नामे पुकार ! जहन की दुनूक चरित्र,प्रकृति आ क्रियाकलाप एक दोसराक विपरीत। फेर नकल वा मिझ्झरक अज्ञानता किएक ? ओही अज्ञानता वा अंधानुकरण सं पार पएबाक आ विधाक शुन्यता के भरवाक लेल अवतरित भेल बीहनि कथा विधा (1995)। सहयात्री मंच ,लोहना(मधुबनी)द्वारा भेल साहित्यिक बैसार मे सामूहिक रूपें सर्वसम्मति सं एहि विधाक अवतरण भेल छल। ऐ विधाक नाम की राखल जए ताहि पर बहसक पछाति श्री राज द्वारा ताकल नाम-" बीहनिकथा" पर सर्व सम्मति सं स्वीकृति द'आगू बढ़ाओल गेल।आ तहिया सं मैथिली कथा साहित्यक दू गोट विधा-पहिल,लघुकथा(Short Story)आ दोसर " बीहनि कथा(Seed Story)चलन सारि मे रहि गेल। 25 बरख सं कछुआ चालि सं चलैत बीहनि कथा विधा साहित्यिक छद्म खरहा सं टपि अपना के विजेता कहेबाक पात्रता आब हासिल क' लेने ऐछ।जन्मक पछाति ठेहुनिया मे कतेको के सैद्धांतिक पटकनिया दैत डेगा डेगी बढ़' लागल। तकर पछाति एकरा दबेवा/माटि मे गोड़बा लेल किछु तथाकथित/स्वघोषित विद्वान सक्रिय भ' गेला। फलत:एकर चालि बाधित होइत ठमकि सन गेल। सोझां मे ' एकला चलो रे' के उघैत करीब एक दशकक यात्रा एकरा हेरेबा लेल वेश रहल।2010 मे पुन: इ कान्ह उठेलक।आ ताहि मे पछिला सं जेरगर समूह नव आँखि-पाँखिक संग अंगेज पुन: सोझां आनि थिर केलनि।' विदेह , इ पाक्षिक' बनल राजपथ आ सारथी भेलाह संपादक-.गजेन्द्र ठाकुर आ सहायक संपादक-उमेश मण्डल। ऐ एक दशकक भीठ पड़ल साहित्यिक जमीन पर श्री राजक ' बीहनि कथाक साहित्यक बीराड़क बीहनि सं रोपनि भेल।तकरा हरियरी अनलनि गाम-घर, पत्रिकाक संपादक - शःरी रामभरोस कापड़ि भ्रमर।आ ऐ तरहें श्री राज भेलाह' वात्सल्य ' बीहनि कथा(2003)सं एकर पहिल प्रकाशनक स्वामी। बीहनि शब्दक उत्पत्ति संस्कृतक ' ब्रीही ' शब्दक अर्थ होइछ बीज आ मैथिली मे बीहनि/बीहन/बीहैन सेहो ओही शब्दक मूलार्थ मे निहित।--प. भवनाथ झा बीहनि कथाक अर्थ आ परिभाषा बीज/बीजम संस्कृत शब्द थिक।यथा-यज बीजै:सहस्त्राक्ष -महाभारत कथा सेहो संस्कृत शब्द थिक।यथा-कथासरित्सागर । अर्थात् बीहनि कथा पूर्णत: संस्कृत शब्दक उत्पत्ति थिक।जेना- लघुकथा मुदा साहित्यिक विधाक रूपें जाँची त' इ विधा मूलत:स्वतंत्र आ पूर्ण रूपे मैथिली साहित्य मात्रक विधा थिक।आयातित/ नकल नै। बीहनि माने बीज/बीया।जाहि मे विकास करबाक गुण निहित होइछ।मुदा ओ अविकसित रहैत ऐछ।समय अएला पर विकसित होइत ऐछ।ओकरा मे एक सं अनेक होएबाक गुण रहबाक चाही।बीहनि कथा-एहेन कथा,जे अनेक कथा(कथा/उपन्यास)के जन्म देबाक क्षमता राखए ओ बीहनि कथा भेल/हएत।अन्यथा नै। तें बीहनि कथा मे निष्कर्ष नै हेबाक चाही।---डॉ. भवनाथ झा बीहनि कथा विधाक नामकरण कर्ता श्री राजक मतानुसार- बीहनि कथा,ओइ बीयाक समान ऐछ जकरा मे झमटगर/पूर्ण गाछक संभावना हो।मुदा ओ गाछ पीपर/पाकैड़ नै,पौध रूप मे हो।परञ्च बोनसाइ नै। पौध रूप सं तात्पर्य जे कथ्य/शिल्पें गसल मुदा शब्दक संख्ये सए सं डेढ़ सए धरि हुअए।मुदा बन्हन मे बान्हल नै। रचनान्त निकसगर (निस्तार देने) नै हुअए।निष्कर्ष पाठक पर। बीहनि कथाक चर्चित आ लोक प्रिय कथाकार, संपादक आदरणीय घनश्याम घनेरो ऐ विधा के परिभाषित करैत कहै छथि--- कोना बुझबै जे इ रचना बीहनि कथा भेलै:-- (क)शब्दक मानक औसत सव सौ हो (ख) विषय मारक ,आ सोचबा पर विवश करैत हो। (ग) कथ्य एहेन,जेना लगैत हो कथा/उपन्यास वा कोनो गद्यक सार हो। (घ) कथा मे निष्कर्ष नै हो। कथा साहित्यक सशक्त हस्ताक्षर श्री राजकुमार मिश्र जीक विचारें-(क) आकारगत छोट सं छोट हो (ख) कथ्ये फरिछएल आ गसल हो (ग) संपूर्ण गद्यक संभावना निहित हो (घ) ऐ सं इतर, अव्यवस्थित रचना फोंक हएत।ओ बीहनि कथा नै। बीहनि कथा विधाक मानकीकरणक आधारभूत इकाइ गद्य साहित्य, मूलत: कथा विधाक मानकता तयकरणक आधार अंग्रेजी साहित्य ऐछ।अंग्रेजी साहित्यक अनुसार विश्व भरिक कथा ,अंग्रेजीक Flash fictionक अन्तर्गत निहित ऐछ।इ फ्लैश फिक्सन छ: खण्ड मे विभाजित ऐछ जकर तेसर खण्ड टेलब्रा(Tellbra )क अन्तर्गत मैथिलीक बीहनि कथा विधाक नियामकता सन्निहित ऐछ। फ्लैश फिक्सन(टेलब्रा)पर आधारित बीहनि कथा मापनक महत्वपूर्ण बिन्दू :- 01-कथ्य/शिल्पें पुष्ट जाहि कथाक न्यूनतम शब्द स. 20 आ अधिकतम 150 हो। 02-कथा साहित्यिक मानकताट परिपालक हो।यथा कोनो संस्मरण वा शब्द संग्रह मात्र बीहनि कथाक श्रेणी मे नै राखि सकैछ। 03-कथा,एकटा बीजक कथाक प्रतिदर्श हो।अर्थात एहेन कथा जाहि सं कथा/उपन्यास आदिक सर्जनाक संभावना प्रबल हो। 04कथा, निकस पर जा स्थिर नै हो। अन्त खूजल मुदा भावपूर्ण हो। 05-संपूर्ण कथा कोनो संदेशप्रद वा सकारात्म्क उद्देश्यक हो।शब्दक स्थूलकाय मात्र नै। उपरोक्त मानकता पर ठाढ़ रचना बीहनि कथा विधाक रचनाक रूपें अपन जग्गह पेबा मे सक्षम भ' पाओत।तकर पहिल मूल्यांकन लेखकक,पछाति संपादक ओ आलोचकक हाथ ऐछ। "कोनो नव सफलता हासिल करवा लेल पुरान मे पैस' पड़त।,खंघार'पड़त।तहन परिमार्जित फल सोझां आओत।जे भविष्यक नव बात गढ़ि मोकाम धरि ल' जएबा मे सक्षम बना पाओत।' एहि तरहें मैथिलीक लघुकथा विधा(कथा/गल्प)नामे लिखाइतक पछाइत बीहनि कथा विधा वैश्विक कथा मापदण्डें एकटा नव प्रतिमान गढ़ि,मैथिली साहित्य मे मैथिलीक अपन एक मात्र विधाक रूप मे स्थापित भेल।इ कोनो आन आयातित/नकल,विधाक विधान्तरण वा नामान्तरण नै।स्वयं मे मानक स्वतंत्र विधा हेबाक परिचिति कायम केलक। एहि प्रकारें मैथिली कथा साहित्यक दू टा स्वतंत्र विधा अपन अस्तित्व कायम क' रखने ऐछ।पहिल-लघुकथा (Short story)जे कथा/गल्प नामे लिखाइछ।ठीक ओहिना जेना कि अंग्रेजीक Poetry,मैथिली मे 'काव्य' नामक विधान्तर्गत-गीत,गजल,,कविता, हाइकु,क्षणिका आदि स्वतंत्र नामे/क्रियाकलापें/चारित्रिक गुणे अपन- अपन परिचिति बनौने ऐछ।मुदा विधागत सबटा काव्य परिवारक अंश वा अंग थिक। दोसर-बीहनि कथा(Seed Story) उपरोक्त दुनू विधा मध्य आओर कोनो वैध/ अवैध विधाक लेल जग्गह वाँचल नै ऐछ। मुदा लघुकथा नामे बलधकेली मे हिन्दी लघुकथा विधाक नकल मैथिली अवतरण के घोसियेबाक असफल प्रयास ठाम ठीम क' मैथिली साहित्य के उकरू बनेबाक षडयंत्र जारी ऐछ।इ भ्रम वा द्वन्द ऐ द्वारे भेल जे किछु मैथिली रचनाकार लघु कथा माने आकारे छोट कथा बूझि नकल करैत रहलाह।ध्यातव्य महत्वपूर्ण बात जे लघुकथा एकटा शब्द मात्र नै,ओहि नामक एकटा स्वतंत्र विधा थिख।जे मैथिली मे अदौ काल सं कथा/गल्प नामे लीखाइत पहिने सं स्थापित ऐछ।आब तहन विचार करी मैथिली सं इतर हिन्दी भाषा साहित्यक अपन विधा " लघुकथा "क मैथिली अंधानुकरण पर। कोनो व्यक्ति,विषय,बौस्तक गुणक अनुसरण/अनुकरण बेजए नै।मुदा अंधानुकरण कतेक उचित ? मैथिली साहित्य मे विद्यमान " बीहनि कथा " विधा सं इतर सब विधा कोनो ने कोनो अन्य भाषाक विधा सं आयातित ऐछ।मुदा जत' सं आयातित भेल,ओइ मे आ मैथिली मे अपन मानकता वा प्रामाणिकता सिद्ध केने ऐछ। हिन्दीक लघुकथा विधा जे स्वयं मे आइयो मानक वा प्रामाणिक सिद्ध नै भ' पावि घड़ीक पेण्डूलम जकां डोलि रहल ऐछ।ओइ मे आइयो कते शब्दक वा कोन रचना ओइ विधाट रचना ऐछ की नै,तै पर मंथन चलिये रहल ऐछ।एते दशकक लेखनक पछातियो मूल्यांकन मे लघुकथाक जग्गह लघुकहानी सं जोइर व्याख्या होइछ।जतेक मुड़ी ततेक पीरी बला गप्प।एहेन अव्यवस्थित विषय/बौस्तक अंधानुकरण ,हास्यास्पद आ कि उठल्लूपन ? "अपने आँखिगर रहैत, अन्हरा के सहारे बाट ताकब कतेक उत्कीर्णा बला बात।" हिन्दी लघुकथा विधाक अंधानुकरणक प्रबल पक्ष रहल हएत,हमर सबहक सामान्य शिक्षाक हिन्दी माध्यम।हम सब एकेडमिक शिक्षा ग्रहण सामान्यतया हिन्दी भाषा माध्यमे केलहुँ।किताब,पत्र/पत्रिका क पाठनक भाषा हिन्दी रहलाक कारणे हिन्दी साहित्यक विषय-वस्तु पर निर्भर स्वाभाविक छल।तें हिन्दी साहित्यक संतान(विधा)कें पोसपूतक रूप मेअवैध रूपें अंगेज लेब अस्वाभाविक नै।ओही देखाँउसे वा नकल क'मैथिली मे लघुकथा संग्रह नामे 1972 मे आयल पहिल पोथी-" जे की ने से "--डॉ. हँसराजक।आ ,1975 मे तत्कालीन नवतुरिया कथाकार डॉ. अमरनाथक " क्षणिका "।दुनू पोथीक रचनाकार(आमुख मे)ऐ संग्रहक एको टा रचना ,कोनो पत्र/पत्रिका मे प्रकाशित नै हेबाट बात स्वीकारने छथि।ऐ सं इ स्प्ष्ट ऐछ जे मैथिली मे एकर कोनो अस्तित्व नै रहै।इ तहिया के घटना/बात छैक जहिया मैथिली सं इतर अन्य भाषा मे कथ्य/शिल्पें मजगूत मुदा आकारगत छोट रचनाक एकटा स्वतंत्र विधाकरूपें/नामे सृजन भ' रहल छलै। यथा-संस्कृत -लघ्वी, हिन्दी-लघुकथा, पंजाबी-मिन्नी कहाणी/ कथावां, उर्दु-अफसांचे, ओड़िया-क्षुद्रकथा… आदि। मैथिली मे हिन्दी विधाक अंधानुकरण क शुभारंभ क' किछु मैथिली कथाकार स्वघोषित विद्वान हेबाक दंभ पोसलनि।तकर करीब पचीस बरख धरि अंधानुकरणित लेखन सेहो सुषुप्त वा शुन्य रहल।पुन: 1997 मे लघुकथा संग्रह नामे दू गोट पोथी,शिलालेख-तारानन्द वियोगी आ खण्ड-खण्ड जिनगी -प्रदीप बिहारीक आयल।से ताहि अवस्था मे जाहि सं दू वर्ष पहिने(1995 मे)मैथिलीक अपन एक मात्र विधा बीहनि कथा अवतरित भ' चूकल छल।ऐ विगत पचीस वर्षक नमहर अन्तराल मे अंधानुकरणित हिन्दी लघुकथा विधाक मैथिली अवतरण पर मैथिली मे कोनो मानकता तय नै भेल छल।(आइ एकैसम सदीक दोसर दशक धरि नै भेल)।जेना पहिने मिथिला मे सत्यनारायण भगवानक पूजन पर सुनता उपासक चलनि छल।तहिना मैथिली रचनाकार लघु कथा शब्द सुनि मात्र लघु कथा लिखबाक नकल करय लगलाह।जहन की हिन्दी मे लघु कथा शब्द मात्र नै,ओहि भाषाक एकटा स्वतंत्र विधा ऐछ।आ मैथिली मे कथा/गल्प नामे लिखाइत लघुकथा विधा पहिने सं विद्यमान छल।आब नकल क' लिखल जाइ बला रचना-जे बीस शब्द सं आठ सौ धरिक ऐछ।तखन प्रश्न उठैत जे कतेक लघु,ककरा सं लघु ?ऐ पर प्रकाशित कोनो तय मानकता नै छल(ऐछियो नै)जाहि सं इ सुनिश्चित कएल जए सकए जे कोन रचना लघुकथा विधान्तर्गत स्वीकार वा अस्वीकार कएल जा सकए।प्रसिद्ध कथाकार ओ इतिहासकार डॉ. मायानन्द मिश्र एकरा नकारैत लिखने छथि--" मैथिली मे लघुकथा नामे एक अन्य कथा लेखनक विकास भेल ऐछ जे समकालीन कथा/गल्प नै,अपितु चुटुक्काक निकट ऐछ।"- मैथिली कथाक विकास(संपादक- बासुकीनाथ झा) साहित्य अकादमी -2003 आधार हीन लेखने मठोमाठ हेबाक/कहेबाक परम्पराक निवहता मे किछु रचनाकार लीन रहलाह।जहन कि बेसुरा तान सं प्रसिद्धि पेनिहार गायक जकां बिना मानकताक लेखन मे लीन रहनिहार अपना के प्रयोगवादी आ प्रतिष्ठित बुझनिहारक रचना आ ओ तथाकथित विधा स्वय: खारिज ऐछ।ताहि लेल अदखोइ-वदखोइ आ माथा पच्चीक खगते कोन? हिन्दी विधाक मैथिली अवतरण लघुकथा नामक रचना आइ धरि बसात मे बौआइत ऐछ।जमीन पर अनबाक कहियो कोनो निश्तुकी प्रयास नै भेल।ओ तथाकथित विधा/रचना स्वत: खारिज होइत चेतना शुन्य भ' गेल।किएक त' जहन जमीन पर उतरबाक प्रयास केलक तहन आधारहीन हेबाक कारणे सूपक भाटा सन ओंघराइत रहल किएक त' स्थिरताक आधार पहिने सं नदारद!किछु स्वघोषित वा परपोषित विद्वान सब--" डाँरि पारि के ओकरा लक्ष्मण रेखा बुझ' लगलखिन,मुदा डाँरि सोझ भेल की वक्र तकरा सं दूर धरि सरोकार नै।"प्रसिद्ध रंगकर्मी श्री कुणाल ,कथा प्रसंग लिखल अपन आलेखक अन्तिम अनुच्छेद मे लिखै छथि--"आब मैथिली मे लघुकथा नामे किछु रचना सेहो देखाइछ,जे मैथिली साहित्य मे आधार हीन ऐछ।तें ओकर चर्च करब व्यर्थ सन।"--अंतिका-रजतजयन्ती अंक(2008)संपादक- अनलकान्त। लघुकथा नामित रचनाक भविष्य ? जेना अंग्रेज़ी मे पोएट्री,मैथिली मे " काव्य ' विधा ऐछ।आ ऐ काव्य विधान्तर्गत--गीत,कविता ,गजल,क्षणिका, हाइकु आदि स्वतंत्र नामे आ स्वतंत्र अस्तित्वे छैक।मुदा विधागत सब एकहि परिवार "काव्य "क अंग छै।तहिना अंग्रेजी क शॉर्ट स्टोरी विधा छै ,आ कथा/गल्प ओकर अंग। मैथिली मे लघुकथा सं इतर दोसर कथा विधा छै " बीहनि कथा "(Seed Story),हिन्दीक अंधानुकरणे लघुकथा नामे सृजित रचना बीहनि कथा विधान्तर्गत ग्राह्य ऐछ।परञ्च बीहनि कथाक तय मानकता पर ठाढ़ होइ बला रचना मात्र।से ओ लघु कथा नामे होइ वा बीहनि कथा नामे। बानगी स्वरूप देखल जए डॉ. सत्येन्द्र झा जीक लघुकथा नामे दू टा रचना इसकूल ओहि गाम मे एकटा दोकान नै छलै।तीन किलोमीटर जाय पड़ै छलै छोटो छीन चीज किनबा लेल।जे कियो कहियो दोकान फोलबाक साहस केलक ओकरा दोकान मे दोसरे -तेसरे राति चोरि भ' जाय आ तकर बाद दोकान बन्न भ' जाय।चोरवा गामक नाम सं परोपट्टा मे जानल जाइत छल ओ गाम।मुदा नरेशक साहस कहू वा दु:साहस ओ बाहर सं आबि दोकान फोललक ओहि गाम मे।घर मे पिता आ पत्नी विरोध कयलनि मुदा ओ ककरो नै सुनलक।दोकानक स्टाफक रूप मे सभ सँ सेसर चोर के रखलक।ओ चोर सेहो निश्चिंत छल जे जखने बेशी समान जमा होयत कि चोराक सभ किछु ल' जायब।।नरेश तीन सए टाका ओहि चोरकेँ दै छल।शहर सँ समान अनबाक हेतु नरेश ओही चोरबाकेँ पठबै छल। क्रमशः चोरवा कोन समान मे कते लाभ होइत छल सेहो धरि बुझय लागल। आइ ओहि दोकान मे समान भरल छल।आजुके राति चोरबा अपन संगी सभहक संग चोरिक योजना बनौलक।जखन दोकान बन्नक' नरेश चलि गेल तँ चोरबा अपन संगी सभहक संग दोकान मे घुसल।बोरा मे समान सब कसय लागल।एकटा संगी पुछलकै -" कते दामक समान हाथ लागल ?" दोसर चोर कहलकै-"पांच हजार सँ कम के नै हेतै।" "मुदा एहि पांच हजार मे तँ मालिक के पांच सयसँ बेशीक फयदा नै हेतै।साढ़े चारि हजार तँ मूलधन छै।"--चोरबा बाजल---फेर ओहिमे हमरो तीन सय के हिस्सा हेतै।" चोरबाक म़ोन तीत भ' गेलै।ओ अपन मित्र चोर सभके बुझबय लागल--चोरि त' तखने जायज होइछ जखन हमर हक छीनि क्यो अपन घर भरय,मुदा नरेश बाबू तँ ओतबे कमाइ छथि जतेक उचित अछि।ओ नाजायज लाभ कहाँ लै छथि?" चोरबा चोरि करबाक विचार बदलि लेने छल।संगी सभ ओकर निर्णय पर सहमति व्यक्त कयलक।बोरा खोलि चोरबा सभ सामान केँ पहिने जकाँ सैंतय लागल।नरेश एकटा कोन मे ठाढ़ भ' ई सभ देखैत रहल।ओकरा बचझना गेलै जे ओ कोनो दोकान नहि,एकटा इसकूल खोलने हो। विश्लेषण- उपरोक्त रचना शब्द संख्ये नमहर ऐछ!माने टेलब्राक निर्धारित शब्द संख्या-150 सँ उपर। कथ्य-प्रेरक,पंचतंत्रक कथा समकक्ष।प्रारम्भिक लेखनक करीब बाझल। शैली- कथा बला,सेहो पूर्ण नै।छेंट सन। तें बीहनिकथाक परिधि सं बाहर ऐछ। दोसर बानगी मौअति ओ ईमानदार छल।तेँ लोकसभ ओकरा मारय छल।लोकसभ कहलकै- तोरा कुकुरक मौअति मारबौ।ओ चुप्प छल,मुदा प्रसन्न।कारण- ओ मनुक्खक मौअति नहि मरय चाहैत छल। विश्लेषण- इ रचना निर्धारित शब्द संख्या मे बान्हल ऐछ। मुदा कथ्य - भाषण वा आदेशक हिस्सा मात्र। शैलीगत-निष्कर्ष पर पहुँचा देल गेल छैक। तें इहो बीहनिकथाक हद मे नै रहि रहल। उपरोक्त दुनू रचना--सत्येन्द्र कुमार झाक लघुकथा संग्रह-अहींकेँ कहै छी(2007)।पृष्ठ- 30/31 सँ उद्धृत। आब अही लेखकक इ तेसर कथा क बानगी नीचाँ ऐछ जे हुनकर नवका संग्रह-"जँ अहाँ सुनितहुँ"(2020) सँ ऐछ । भेटब डूबब " अहाँक जीवन मे सभ सँ नीक की लगैत अछि ?" "अहाँके भेटब...." "आ अहू सँ नीक.....?" " हमरा हेरा जएब...?" उपरोक्त रचना लिखल त' गेल ऐछ लघुकथा नामे मुदा बीहनिकथाक मानकताक करीब ऐछ। यथा-निर्धारित शब्द संख्या(अधिकतम-150)क भीतर कथ्य आ शिल्पें गसल। निस्तार विहीन। तें इ रचना पूर्णत: बीहनि कथा विधाक अंग मानल जा सकैए।शेष निंघेस सदृश्य।ठीक ओहिना जेना कोनो एक कक्षा मे पढ़ैत सब विद्यार्थी परीक्षा समय समान प्रश्न हल करैछ।परिणाम मे न्यूनतम अंक 30% प्राप्ति बला विद्यार्थी मात्र सफल आ शेष असफल घोषित होइत ऐछ। आब एहने बानगी बीहनि कथा नामे लिखल रचना सँ.... डागदर साहेब-- मिथिलेश सिन्हा बड्ड दिन सँ पत्नी कहैत छलीह जे,हमरा पर किछु धियाने नै दैत छी।खाली मोबाइल मे खुटूर-पुटूर करैत कविता-कहानी रचैत रहैत छी.....जखन बेमारी बढ़त,पलंग पकड़ि लेब...तखन सबटा कविगिरि घुसरि जएत। एहेन धमकी पर के नहि डरतै यौ?पत्नी केँ होमियोपैथिक दवाई पर पूर्ण विश्वास छैन्ह।पिछला मंगल दिन शहरक बड्ड पुरान एगो बंगाली डागडर ठाम हुनका ल' गेलहुँ। सांझुक बेर,लगभग आठ-नौ गोट रोगी बैसल छलाह।डागदर साहेब बयस सँ लगभग अस्सी-पचासीक हेताह।एकटा रोगी पर आधा घंटा पूछताछ करैत,अपन डींग डांग सँ रोगी आओर परिजनकेँ अपन बड़प्पनक खिस्सा कहैत समय आगाँ खींचि रहल छलाह।हमर नम्बर दोसरे छल,मुदा घंटा भरि डागदर साहेब लागल रहलाह। अगल-बगल मे बैसल आन रोगी अकछय लागल।आब हमर नम्बर आएल। " किनको देखाना हाय ?" " जी,हमर पत्नी केँ...।" " हूँ,इधर आइए" " हम हरि बाबूक बालक थिकहुँ.." "ओहो,तुम इंजीनियर का बेटा है । ओ हमसे ही अपना इलाज कराता था..कैसा है ओ..?"--आन रोगी दीसन तकैत बजलाह। " जी,ओ मरि गेलाह..." " ओ गॉड...,तोमहारा माई कैसा है?" "जी,ओहो मरि गेलीह...।" हमर जवाब सुनि क' बेंच पर बैसल आन मरीज,बहन्ना बना ससरय लागल....।---डागडर साहेब,आश्चर्यचकित भाव सँ खन हमरा,खन रोगी सबकेँ ससरैत देखय लगलाह। विश्लेषण:- उपरोक्त रचना बीहनि कथाक मानक शब्द स. सँ बाहर ऐछ। कथा मे उप कथाक समावेश। कथ्य-शिल्पें कथाक छेंट सन लघु कथा। -मिथिलांगन,अंक-38-39 निर्वहन--कल्पना झा --माय गे! दादी त' हाथे सँ लपे लप तिल-चाउर परसै छलीह,मुदा तों त' चम्मच सँ परसै छें ? --धुर्र ! ताहि सँ की हेतैक ? --नहि हेतैक की...?हमरो सबकेँ नीक रस्ता भेटल। --से की ? --"इएह जे ' निर्वहन 'मे सेहो 'चम्मच ' लगाओल जा सकैछ। मिथिलांगन---36-37 विश्लेषण:- इ रचना कथ्य-शिल्प आ शब्द स.मादे पूर्ण मुदा कथा सारक संग बन्न भेल।माने निकस पर कसैत।तें इहो कथा विधागत झूस ऐछ। बेटा निगम। --घनश्याम घनेरो लावारिस लहास पुछलकै : -- बेटा! नगर निगम? -- हम तोहर बेटा नहि, कर्मचारी छी। -- हमरा लेखा तोहीं बेटा। -- ठिक्के! लोक केँ लोक सँ मतलब नहि रहलै तँ... -- पहिने हमरा घिसिएबह आ की कुकूर केँ? -- तोरा। -- पहिने हमरे किए? -- एत्तेक मनुक्खता अखन छैक, तैं! -- मनुक्खक लहास केँ बादमे आ कुकूर पहिने कहिया सँ घिसिएल जेतै? -- ई काज हमर अगिला पीढ़ी करत। घिसिया क' ठेलापर चढ़बैत काल लहासक आँखि कुकूर दिस छलैक। इ रचना ऐ विधाक सब मानकता यथा- निर्धारित शब्दक भीतर। फरीछएल कथ्य आ गसल शिल्प मे निस्तार रहित पूर्ण ऐछ! अन्तत:मैथिली साहित्यक दू भाग भेल -लघुकथा (SHORT STORY)आ बीहनि कथा ,(SEED STORY )इ दुनू निर्धारित रूपें निरन्तरता बनौने रहत। शेष फोंक मात्र। पहिने बीहनि कथा, सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ैत रहल। आ आब.....पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ैत रहत। प्रणव झा गिद्ध (लघुकथा) “बाबी गै, घर पर गिद्ध बैस गेने की होईत छैक?” रमण अपन बालमन में उठल प्रश्न बाबी से पुछैत बाजल छल. भोरहे से गाम में अनहोर उठल छल जे सीडी झा के घर पर गिद्ध बैस गेलै य। "बाउ रे जै घर पर गिद्ध बैस जाइत छै ने तै घर में भूत-प्रेत के वास होमय लागैत छै. किएकि गिद्ध बड्ढ अधलाह जीव होइत छैक, मुइल जीव के नोचि के खाइत छैक”. रमण कइएक बेर गिद्ध नामक ऐ विशालकाय पक्षी के घरक पछुआर में बड़का ताड़ गाछ पर बैसल देखने छल, आ गोटेक बेर बाबी संगे खेत दिस गेला पर देखने छल मुइल जानवर के मांस नोचैत. ई घटना ओय समय के छल जखन रमण करीब छ: वर्षक बालक छलाह आ गाम में रहैत छलाह. समय बितला पर रमण अपन बाबी आ माय संगे बाबूजी लग रह गाजियाबाद चलि आयल छल. रमण के बाबूजी गाजियाबाद के एकटा फैक्ट्री में अकाउंटेंट के काज करैत छलखिन. रमण के नाम एकटा प्राइवेट इस्कूल में लिखा देल गेल छल. अब रमण 13 वर्ष के भ गेल छलाह. घर से इस्कूल करीब २ किलोमीटर छलै. रमण रोज सायकल से इस्कूल जाइत छलाह. रास्ता में एकटा चौर पड़ै छलै जै में रमण देखैत छलाह जे लोक अपन मुइल पशु सबहक लहास फेंक के चलि जाय छल. रमण देखैत छल जे अक्सरहां एकटा १६-१७ वर्षक छौरा ओय लहास के चमड़ा छोड़ाबैत रहे छल आ ओय लहास के गिद्ध-कुकुर सब मिल के खाइय छल, बाद में ओ छौरा ओय में से बचल हड्डी सब के सोहो अपना झोरा में भरि लैत छल. ई देख के रमण के ओ छौरा के प्रति बड्ड घिन आबैत छलै, मुदा मोन में जिज्ञासा सेहो उठैत छलै जे "ओ एहन अधलाह काज किएक करैत अछि?" ओय हड्डी सब के ओ की करैत अछि? काकरो-काकरो से ओ सुनने छल जे किछ लोक हड्डी से कालाजादू करैत छैक? कतेको बेर रमण के भेलै जे ओकरा जा के पूछी जे "तों ई की करैत छहक आ ऐ काज से तोरा की भेटैत छह?" मुदा रमण के अपन आ ओकर वेश-भूषा के अंतर सदिखन ओकरा लग जा क ओकरा विषय में बात करै के साहस करै से रोकि दैत छल. एक दिन रमण जखन इस्कूल जाय छल त ओकरा घर से कनिकबे आगाँ एकटा मोदियाइन के घर छलै, जे ३-४ टा माल जाल पोसने छल. ओ देखलक जे ओत किछु गोटे ओहि छौरा के घेरने छल आ अंधाधुंध लठियेने छलै. भीड़ से किछु सम्मिलित स्वर सुनबा में आबि रहल छल जे "मार सार के, ई गिद्ध थिकै, यैह बड्ड दिन से नजर लगउने छल फलां के माल पर जाहि कारणे ओ मरि गेल. बहुतो के माल जाल पर एकर गिद्ध बला नजैर रहैत छैक... आदि आदि।" मारि खाइत-खाइत छौरा अधमरू भ गेल छल। ओ त निक भेलै जे कियौ पुलिस के सूचित क देने रहै, तैं पुलिस आबि के भीड़ के तीतर-बितर केलकै आ ओहि छौरा के जान बचलै. किछु दिन बाद एकदिन रमण घर पर कोनो बात से रूसल छल. छुट्टी के दिन छलैक ओ नेहेनहो सोनेने नै छल. एहिना गंजी पैजामा पहिरने घर से परा गेल छल. घुमैत-घामैत ओहि चौर दिस पहुँचल. देखलक त ओ छौरा फेर नजैर एलै. बस फेर की, रमण ओकरा लग पहुँचलै. ओकरा पुछलकै हौ! तो एहन अधलाह काज किएक करै छहक? लोक के माल-जाल के काला-जादू से मारि दैत छहक, आ ओकर खाल खिंचैत छहक! ओहि दिन एतेक मारि लागलह तैयो फेर यैह काज! ओ कहलक मुइल माल-जाल के खाल-हड्डी निकालनाइ हमर खानदानी धंधा छियै. मुदा हमसब किनको माल-जाल के मारि दैत छियै आ की नजैर-गुजैर लगा दैत छियै ई सौ टका अनर्गल आरोप अछि हमरा सब पर. ऐ तरहे भीड़ अक्सरहा हमरा सब पर अत्याचार करैत अछि. हमसब जे ई चमड़ा छोड़ा के ल जाइत छी, ताहि के सफैया क के आ फेर पोलिस आदि क चमका के रंग रंगक, जुत्ता, बेल्ट, बैग, पर्स आ कतेको आन आन श्रृंगारक आ उपयोगक वास्तुजात बनायल जाइत अछि, जे सभगोटे के भोग्य आ शुद्ध बुझना जाइत छैक. आ अहाँ की कहलियै हड्डी.....हा..हा..हा.., यौ जी हड्डी के हमसब कालाजादू के उपयोग नै करैत छियै. सभटा माल दिल्ली के शाहदरा-उस्मानपुर एरिया में भेज देल जाइत छैक. जत ओकर सफैया होइत छैक फेर फैक्ट्री में कटाई-घिसाई-पोलिस क के रंग रंग के सजावट के वास्तु जात, भगवान क मूर्ति, स्त्रीगण के श्रृंगार के लेल माला-झुमका आदि कतेको आकर्षक वस्तुजात एहि हड्डी सभ के बनायल जाइत छैक. बड़का मेला आ मार्केट सब में जे सस्ता सस्ता में मोती माला सब देखैत छियैक, से कोनो असली होइत छैक! सभटा एहि हड्डी सब के बनाओल जाइत छैक. से ई वस्तु जात कियौ हो, पंडित, मुल्ला, बनिया-रार, साहेब-गुलाम सब के सिनेह्गर लागैत छैक, आ हमरा सन के काज केनिहार सभके लेल अधलाह होइत छैक! जौं हमरा सन के काज केनिहार नै होइ, आ ई गिद्ध कुकुर नै होइ त अहाँक ई समाज मुइल जानवर के सड़ल लहास से पटल पड़ल रहत आ ओकरा कियौ उठेनाहर नै भेंटत. हम सब छी त अहाँ सब ऐ सड़ांध से छुटकारा पाबैत छी. मुदा तैयो अहाँ सब हमरा सब के गिद्ध कहि प्रताड़ित करबै, मौक़ा पाबिते लाठियेबै, मारबाई, आ इज्जत के त खैर छोड़िये दिय! आब रमण सब किछु बुझि गेल छल, पारिस्थितिकि में गिद्ध के महत्वो, आ इहो बुझि गेल छल कि केना अहाँक पहिरन-ओरहन सेहो अहाँके कोनो लोक से संवाद करै में आ ओकरा विषय में वास्तविकता जानै में एकटा अवरोधक जेकाँ काज करै छैक. रमण के मोन पड़लैन जे कोना गांधीजी चम्पारण में किसानक दुखदर्द के देख अपन सूट-बूट त्यागि देने छलाह, तै के बाद हुनका देश के अंतिम आ सबसे कमजोर तबका सब के समस्या समझ में भांगट नै रहल छलैन्ह. एन.पी.एस. (लघुकथा) सुनु, जल्दी से हमरा किछ खाय लेल द दिय, हमरा नटवर बौआ लग जेबा के अछि, एनपीएस खाता खोलाबय लेल" दोकान से घुरिते विनोद मिशर अपन कनियाँ अंजलि देवी से कहलखिन. "एनपीएस! ई की होइत छै यौ?" अंजलि देवी प्रत्युत्तर में पुछलखिन. ई पेंशन खाता होइत छै जै में लोक अपन कमाई के किछु हिस्सा जमा करैत रहै छै आ साइठ वर्षक भेला मातर ओहि जमा पाई से लोक के पेंशन भेटैत छै. ऐ में आन खाता से बेसी ब्याज सेहो भेटैत छै जै से पैसा तेजी से बढ़ैत छै "ईह! तखन ऐ में की बुधियारी? जकरा फाजिल पाई होय तकरा लेल ई सब टिटम्भा भेल, हमरा सब के कमाई त सभटा खेनाइ-पिनाई दर-दवाई,धियापुता के पढ़ाई-लिखाई आ सर-कुटमैती में चलि जाय य त ई एनपीएस में पाई कत से देबै! धीया-पूता जे पढ़ि लिखि गेल त फेर बुरहारी में पेंशन के कोन काज पडत. आ फेर सरकारों त कहाँदिन वृद्धा पेंशन दैते छैक." प्रस्तावक प्रतिकार करैत अंजलि बजलीह. विनोद आ अंजलि मिथिलाक एकटा गाम स पलायित भ क दिल्ली आयल छलैथ. पहिने गाम में विनोद अपन पैतृक जमीन पर खेती-बारी क के गुजर करै छलाह. मुदा दिनानुदिन खेती-बारी के हालत खरापे भेल जा रहल छल, आमदनी घटल जा रहल छल. एही बीच ३ टा धियापुता सेहो नमहर भेल जा रहल छल, जकर पढ़ाई-लिखाई दर-दवाई सेहो आब हिनका जोड़य परै छल. माय-बाबू के मुइला के बाद भैयारी सब सेहो भिन्न भ गेल छलाह. ऐ परिस्थिति में अंजलि हिनका पाछाँ पड़ि गेल छलीह जे ई खेती-बारी से गुजारा केनाइ मुश्किल य आ धियापुता के सेहो ई गामक विद्यालय में पढ़ाई-लिखाई ठीक से नै भ पाबि रहल अछि तैं चलु दिल्ली ओत्तहि मेहनत मजूरी करब आ ओत्तहि रहब, अपना गामक आ हमर नैहरक कतेको लोक ओतय गेलाह य आ आई सुख से रहैत छैथ. खेत-पथार के बटाई लगा दियौक. खेत पथार आब के बटाई लैत छै आ जे लैत छै सेहो किछ ढंगक उपजा बारी कहाँ दैत छै. मुदा खेत-पथार के मोह कहिया तक. भगवान् भरोसे ई सब छोरहे पड़ैत छै अंततोगत्वा अपन स्त्री के बात मानि के एकदिन सपरिवार विनोद मिश्र दिल्ली के बाट धेलाह. मैथिल ब्राम्हणक लुचपुच देह छल स्वाइत विनोद कोनो फैक्ट्री में काज करय में नै सकलाह. अंततः हुनकर सासुर के एकटा लोक जे द्वारका के एकटा अपार्टमेंट में एकटा छोटछीन किराना दोकान चलबैत छलाह से कहलकैन जे हमर अपार्टमेंट में एकटा धोबी छल जे लोकक कपड़ा आइरन करैत छल ओ कतहु भागि गेलै य, त अहाँ कहि त ओत्तहि अहाँ के काज धरा दी. पहिले त भेलैन जे धोबी के काज कोना करब, मुदा मरता क्या न करता बला हिसाब छल. ओ काज शुरू केलाह. किछुए दिन में हुनकर दोकान चलि पड़ल छल. आब महीना के १५-२० हजार टाका कमा लेत छलाह. अंजलि सेहो एकटा अपार्टमेंट में २टा घर में भानस बनब वाली के काज पकरि नेने छलीह. आ ई सब पालम गाँव के एकटा कालोनी में किराया पर रहै लागल छलैथ. जिनगी ठीक ठाक कटै लगलै मुदा बचत के नाम पर हिनका सब लग ठनठन गोपाल छल. हिनके गाम के एकटा लड़का नटवर सेहो एही बीच में दिल्ली आयल छलाह पढ़ाई करै खातिर. कइएक बेर विनोद से कहने छल जे कक्का किछ बुढ़ारियो लेल बचाउ,एकटा एनपीएस खाता फोलि लिय. मुदा सदिखन विनोद हुनकर गप्प के हवा में उड़ा दैत छलाह. ओहो! हमहुँ कहाँ खिस्सा के फ्लैशबैक में ल क चलि गेलहु अछि. हं, त अंजलि के प्रतिकार केर उत्तर दैत विनोद बजलाह जे सरकारी पेंशन के आशा लोक कहिया धरि राखत! आ ओहुना ओ एकदम से निदान लोक सब लेल थीक. हम किये मनाबि जे बुढ़ारी धरि हम निदान रही. आ रहल बात धीया-पूता के पढ़ि लिख जेबा के बाद बुढ़ारी के कोन चिंता करबाक, त यै, हमहु पहिने यैह सोचैत छलहुँ, मुदा आई हमरा संगे एकटा घटना जे भेल तकरा बाद हमर ज्ञान फुजि गेल अछि. "एहेन की भेल अहाँ संगे आई? " अंजलि पुछलि हे हम जै बाटे दोकान पर जाय छी, ओहि रस्ता में एकटा लालबत्ती पर सबदिन एकटा बुरहा गाड़ीवाला सब से भीख माँगैत रहैत छै. कपड़ा लत्ता आ वेशभूषा से ओ निक परिवारक लागैत छल, तैं हमरा मोन में डेली जिज्ञासा होइत छल जे कोन परिस्थिति भेल हेतै जे ई बूढ़ा के भीख मांग पड़ैत छैक. आई हमरा नै रहल गेल त हम बुरहा से पूछि बैसलहुँ जे कक्का की बात जे अहाँ के भीख मांगे परै ये. ऐ पर ओ बुरहा कहै लागल जे ओ पहिने एकटा प्राइवेट नौकरी करैत छल. अपन बेटा के खूब मोन से पढ़ेलक -लिखेलक बेटा इंजिनियर बनि गेल. विवाह दान भेलै. फेर बेटा-पुतहु दुनू अमेरिका चलि गेल नौकरी करय लेल. बुरहि पहिनने स्वर्गवासी भ गेल छलीह. तैं बेचारे बुरहा एकसरे एतय रहि गेल छलाह. बाप-बेटा मिली के शुरुआती में द्वारका में एकटा छोट छीन फ़्लैट किनने छलाह ताहि में ओ एकसर रहैत छैथ. अपन सभटा कमाई ओ घर चलाब, बेटा-बेटी के पढाई विवाह आ ई घर में खर्च क देने रहथिन तैं एकाउंट पर कोनो पाई नै. पहिने बेटा बीच बीच में पाई भेज दैत छलैन्ह मुदा किछ मास पहिने कोनो बात पर बेटा संगे कहा-सुनी भ गेलै तकरा बाद बेटा फोन केनाइ छोड़ने छैन्ह आ पाई सेहो नै पठा रहल छैन्ह. अरोसी-पडोसी आब, के ककरा देखैत छै आ कत्तेक दिन! इहो अपन अपन ईड़ छोड़ि बेटा से बात नै केलाह. रहबाक कोनो चिन्ते नै मुदा खैबा लेल जे पाई चाहि ओहि लेल अपन ईड़ में ओ भीख मांगै लागलाह अछि. हम हुनका कहलियैन जे कक्का अहाँ चाहि त एकटा उपाय क सकैत छी अहाँ ऐ मकान के किराया पर चढ़ा दियौ आ हमर कालोनी में सस्ता में किराया पर मकान ल के रहु आ जे पाई बचत तै में खेनाइ पिनाई भ जैत. जौ मोन बनै त हमरा कहब, हम मकान खोजि देब. ई कहि हम आगा बढ़ि गेलहु मुदा हमरा बेर बेर हुनकर स्थिति मोन पड़ै लागल आ स्वाइत हम मोन बना नेने छी जे नटवर बौआ से कहि के ऑनलाइन एनपीएस एकाउंट खोलबा लेब, आ सब महीना में हजार-दू हजार-पांच सौ जैह हेतै से एनपीएस खाता में जमा करब. ई कहि विनोद भूजा के अंतिम कौर मुंह में घोंटि पानि पीबि के घर से बहरा गेलाह. इति. डॉ. बचेश्वर झा संस्मरण अवकाश प्राप्त कएलोपरान्त हम बोझ तरक दूबि जकाँ पड़ल रही। साहित्यक अभिरुचि रहलोपरान्त किछु नहि लिखि-पढ़ि रहलहुँ। जे गद्य-पद्य रचना छल ओकरा सहेज कऽ रखने रही। श्री उमेश मण्डल एक चिकित्सक रूपमे हमरा ओहिठाम बजाओल गेला। हुनकर तजुरबा तेहन सटीक छल जे नवजात शिशुक काया-कल्प सावित भेल। तहियासँ हमरा परिवारमे हुनका डॉक्टरक रूपमे समादृत कएल गेल। एहि तरहेँ समय बितैत गेल। हुनकर पिताजी श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक बहुत रास पोथी पढ़बाक अवसर सेहो भेटए लगल। क्रमश: सम्बन्ध बढ़ैत गेल। मैथिलीक एक ससक्त प्रहरी उमेशजी हमरासँ किछु निवन्ध ओ स्फूट कविताक मांग कएलन्हि। हम हुनका समर्पित कऽ अपनामे उत्साह ओ दबल स्फूर्णाक जाग्रत करबाक चेष्टामे छी। हम उमेशजीक दीर्घ जीवनक कामना करैत छियन्हि। अस्तु..! विगत जीवनक झाँकी- हम जखन नेना रही तँ बुढ़-पुरानक मुहसँ सुनैत रही जे हटनी गाम बड़ उपजाउ अछि। एहिठामक गाछी-बिरछी अति सघन छलैक। हमर पितामह बाबू प्रसाद झा वैष्णव धर्मक पालन करैत घरसँ फराक बुढ़िया पोखरिक महारपर कुटी वनाय रहथि। हुनक भोजन, माइनजन काका बनाबथि आ दुनू गोटए भोजन करथि। कालक्रमे हुनक अवसान भेलापर पिताजी चारि भाँइक भैयारी रहन्हि। खेतीक कार्य हमर पिताजी देखथि। माल-जालक कार्य पित्ती अनन्त झाक ऊपर संगहि जेष्ठ भाई उग्र मोहन झा मधुबनीमे अधिकांश समय बितबैत रहथि। हठात् कोसीक प्रकोप एहन भेल जे हटनीक रूप साफ बदलि गेल। ऊपजा-वारीक जगह काश-पटरेक बाहुलता सर्वत्र देखाए लगल। हमर मातृक भवानीपुर नरुआरमे स्व. वलदेव पाठकक तीन भाँइ भैयारीक बीच छल। मझिला नाना स्व. भुटकून पाठक अनन्य शिव भक्त छलाह। हुनकर सहृदयता हमरा मायक प्रति विशेष रहन्हि। हमरो बचपनक अधिकांश समय नरुआरेमे बितए। माम् स्व. राजकान्त पाठक ओ ममियौत दशरथ पाठक संगहि माम चुनचुन पाठक हमरा पिताजीक गृहस्तीमे महती योगदान रहन्हि। समय-समयपर हर-बरद ओ हरवाह पठाए खेतीमे मदैत करथि। संयोगवश, 1955 ई.मे कोसीक तटवन्ध बनल। हटनी प्रभृति इलाका पुनश्च जलमग्न भऽ गेल। पाँच वर्ष तक भूमि जलमग्न रहल। एहन स्थितिमे गाम-घरसँ लोक भागि कए कलकत्ता, जलपाईगुरी, दिनाजपुरइत्यादि जगहक भ्रमण कए रोजीक जोगारमे चल गेल। मोन अछि हटनीसँ प्रत्येक दिन 5 मीलक दूरी तय कए डेवढ़ हाई स्कूल अबैत रही। ओतहिसँ मैट्रिक प्रथम श्रेणीमे उत्तीर्ण भेलहुँ। आर्थिक स्थिति लचरल रहबे करए। पिताजी खेती-बारी कार्य आरम्भ कएलन्हि। हमहूँ गाम आबी तँ हमहूँ ओहि काज सभमे सहयोग करियन्हि। रामानन्द मिश्र भूगोलक शिक्षक कहलन्हि जे भूगोल विषय अबस्स राखू। राम कृष्ण महा महाविद्याल- मधुबनीमे भूगोल विषयक अंगीकार कएल। भूगोलमे प्रतिष्ठा तँ भेटल मुदा व्यर्थ भेल। स्नातक प्रतिष्ठा भेलापर नेपालक तराईमे एक हाई स्कूलमे शिक्षक भेलहुँ। तीन वर्ष धरि ओतए समय बिताउल। पश्चात् अपन मातृ भाषा- मैथिलीमे स्वतंत्र छात्रक रूपमे परीक्षा देलहुँ। हमरा सभक केओ मददगार नहि तँए स्व. रमानाथ झाजी द्वितीय वर्ग देलन्हि। मुदा मार्क 56% छल तँए जखन कमीशनमे उपस्थित भेलहुँ तँ स्व. गुरुवर बुद्धिधारी बाबूक आशीर्वाद ओ तात्कालीन एस. आर. अहमद चेयरमेन छलाह। हमरा अनेक तरहक प्रश्न पुछलन्हि आ हमर प्रश्नोत्तरसँ संतुष्ट भए हमर नाम सेवा अयोग द्वारा निर्मली कॉलेज निर्मली अग्रसारित कऽ देल गेल। स्व. रामसेवक सिंह तात्कालीन प्रधानाचार्य हमर नियुक्ति कऽ स्थायी हेतु अग्रसारित कऽ देलन्हि। 12 अगस्त 1972 ई. तक यथावत हमरालोकनि कार्यरत् रही। 1980 ई.मे तृतीय चरणमे डॉ. जग्रनाथ मिश्र मुख्य मंत्री रहथि ओ निर्मली कॉलेजकेँ सरकारी सूचीमे सामिल कऽ देलन्हि। तहियासँ हमरो लोकनिक आर्थिक स्थिति सुधरए लागल। 36 वर्ष धरि एहि महाविद्यालयमे सेवा देलहुँ। अन्तमे प्रधानाचार्यक कुरसीसँ 15 मार्च 2009 ई.मे अवकाश प्राप्त कएल। सम्प्रति कॉलेजमे अनवाक श्रेय प्रो. गोविन्द शरण सिंह ओ दिनेश प्रसाद सिंहकेँ छन्हि, जनिकर आभारी हम एखनहुँ छी। मैथिलीमे स्व. जय गोविन्द झा विभागाध्यक्ष रहथि। हमरा लोकनिक प्रयाससँ मैथिलीमे आनर्सक पढ़ाइ चालू भेल आ प्रथम बैचमे छह गोट छात्र मैथिलीमे प्रतिष्ठित भेला। बादमे जय गोविन्द झा प्रधानाचार्य भेला तँ मैथिलीक पूरा भार हमरा कान्हपर पड़ल। हम समय-समयपर आकाशवाणी दरभंगासँ सेहो 1982 ई.सँ साहित्यिक वार्तामे भाग लैत रहलहुँ। सर्व प्रथम जखन हमरा आकाशवाणी दरभंगासँ प्रसाणक हेतु बजाओल गेल तँ असमंजसमे पड़ि गेल रही। हठात् श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ जीक स्मरण भेल। हम निर्मलीसँ दरभंगा गेलहुँ। मिसर टोलमे हुनकर निवास स्थानक पता चलल। हम जाइत देरी हुनक चरण स्पर्श कएल। अह्लादित भए पूछलन्हि- अहाँक नाम-परिचय? हम कहलियन्हि- ‘बचेश्वर झा नाओं छी, निर्मली महाविद्यालयमे मैथिली विभागमे शिक्षक छी। हमरा आकाशवाणीसँ प्रसारणक हेतु पत्र प्राप्त भेल अछि। हम तँ कोरा कागज छी तँए अपनेसँ भेँट करए आएल छी। बड़ सिनेहसँ हमरा बैसा कए कहलन्हि जे समय निर्धारित रहैत छैक, तँए विषय-वस्तुक उद्घोष संक्षे9मे करब। कोशिश करब जे आवाज प्रष्ठ हुअए, घबड़ाएल सन नहि बुझना जाए। जाउ अहाँक प्रथम-प्रसारण थिक संतोष प्रद रहत...। हम हुनका ससिनेह नमन करैत निर्मली एलहुँ। हमर प्रसारण ठीक रहल। लगातार 16 वर्ष धरि आकाशवाणीसँ वार्ताकारक रूपमे हमर प्रसारण होइत रहल। साहित्यिक अभिरूचि एखनहुँ अछि। बोझ तरक दूबि जकाँ छलहुँ, संयोगसँ उमेश मण्डलजी हमरामे स्फूर्ति जगाओल आ हमर रचनाकेँ उजागर करबाक अथक श्रम कएल,फलाफल आइ अपने लोकनिक हाथमे ‘निवन्ध-निकुञ्ज’ अछि। संगहि काव्यक एक पोथी सेहो हिनका द्वारा मुद्रित भए रहल अछि। ‘निवन्ध-निकुञ्ज’अपनेक समक्ष अछिए तँए तत्सम्बन्धि किछु कहब आवश्यक नहि, अपनहि लोकनि ताहिपर विचार करब। पूनम झा, कोटा, राजस्थान बीहनि कथा- 'कुर्सी' उपनयन क घर पाहुन परख सब आबि रहल छलखिन|दिनू बाबू (जिनकर बच्चा के उपनयन छैन्ह) 22 साल सं बाहरे रहै छैथ|गाम पर भाय सब रहै छथीन|आई त भरि दिन मड़बा पर सबटा बिध हेबाक छै|टेंट बला कुर्सी बाहर बेसी आर अंगना में कम लगा क चलि गेल|दिनू बाबू कछु घर सब सं कुर्सी निकालि क अंगना में लगा देलखिन । किछु देर मे भैया एलखिन आर अप्पन कुर्सी बाहर देखि क बरबराइत--"ई कुर्सी के बाहर ध देलकै ?" से कहैत दुनू कुर्सी उठा क घर मे राखि एलैथ । ई सब तमाशा दिनू के कनियां 'रानी' देखैत छलीह । ओ सोचs लगली 'जखन हम दुरागमन क कय आयल छलहुं त एहि घर क केहन स्थिति छलै|अही भैया के बेटी सब हक बियाह आर पाहुन सबहक स्वागत में हमर नैहरक कुर्सी, टेबुल एते तक की बेटी जमाय हमरे कमरा में रहै छलैन्ह|हमर सब टा फर्नीचर व्यवहार क कय तोड़ि देलैन । एतेक काज भेलै ठीको नै करेलैथ आर आई हमर बेटा के उपनयन में पाहुन के बैसs लेल कुर्सी सेहो देबय में तकलीफ छैन्ह । गौर करय बला बात ई छै जे भैया के स्लिप डिस्क के कारण एखन किछु उठेनाई मना सेहो छलैन|तखनो ...। नागेश कुमार प्रेषित आशुतोषक- श्रीरामचरितमानस आशुतोष [kumarnagesh1008@gmail.com] श्रीरामचरितमानस श्रीहरि: श्रीरामचरितमानसक विषय क्रम मंगलाचरण। गुरु – वन्दना। ब्राम्हण – संत – वन्दना|खल – वन्दना|संत – असंत – वंदना|रामरूपसँ जीमात्रक वन्दना|तुलसीदासजीक दीनता आओर रामभक्तमयि कविताक महिमा|कवि – वन्दना|वाल्मीकि, वेद, ब्रम्हा, देवता, शिव, पार्वती आदिक वन्दना|श्रीसीताराम – धाम – परिकर – वन्दना|श्रीनाम – वन्दना आओर नाम महिमा|श्रीरामगुण आओर श्रीरामचरितक महिमा|मानसनिर्माणक तिथि|मानसक रुप आओर माहात्म्य|याज्ञवल्क्य – भरद्वाज – संवाद आ प्रयाग – माहात्म्य|सतीक भ्रम, श्रीरामजीक ऐश्वर्य आओर सतीक खेद|शिवजीद्वारा सतीक त्याग, शिवजीक समाधि|सतीक दक्ष – यज्ञमे जायब। पतिकेँ अपमानसँ दु:खी भय सतीक योगाग्निसँ दहन, दक्ष – यज्ञ – विध्वंस|पार्वतीक जन्म आओर तपस्या, श्रीरामजीक शिवजीसँ विवाहकेँ लेल अनुरोध। सप्तर्षिलोकनिक परीक्षामे पार्वतीजीक महत्व|कामदेवक देवकार्यमे जायब आओर भस्म होयब|रतिकेँ वरदान|देवतालोकनिक शिवजीसँ बिवाहक लेल प्रार्थना करब, सप्तर्षिलोकनिक पार्वती लग जायब, शिवजीक विचित्र बराति आओर विवाहक तैयारी|शिवजीक विवीह ष शिव – पार्वती – संवाद, अवतारकेँ हेतु|नारदक अभिमान आओर मायाक प्रभाव|विश्वमोहिनि स्वयंवर, शिवगणसभकेँ आ भगवानकेँ शाप आओर नारदक मोह – भंग|मनु – शतरुपा – तप एवं वरदान|प्रतापभानुक कथा|रावणादिक जन्म, तपस्या आओर हुनक ऐश्वर्य आ अत्यातार|पृथ्वी आओर देवतादिक करुण पुकार|भगवानक वरदान|राजा दशरथक पुत्रेष्टि यज्ञ. रानीसभकेँ गर्भवती होयब|श्रीभगवानक प्राकट्य आओर बाललीलाक आनन्द|विशवामित्रक राजा दशरथसँ राम – लक्ष्मणकेँ माँगब|विशवामित्र – यज्ञक रक्षा|अहलेया उद्धार|श्रीराम – लक्ष्मणसहित विशवामित्रक जनकपुरमे प्रवेश|श्रीराम – लक्ष्मणकेँ देखिकय जनकजीक प्रेम – मुग्धता|श्रीराम – लक्ष्मणक जनकपुर – निरीक्षण| पुष्पवाटिका – निरीक्षण, सीताजीक प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजीक परस्पर दर्शन,|श्रीसीताजीक पार्वती पूजन एवं वरदानप्राप्ति आ राम - लक्ष्मण संवाद|श्रीराम – लक्ष्मणसहित विश्वामित्रक यज्ञशालामे प्रवेश|श्रीसीताजीक यज्ञशालामे प्रवेश|बन्दीजनसभद्वारा जनकप्रतिज्ञाक घोषणा|राजासभसँ धनुष नहि उठब , जनकक निराशाजनक वाणी|श्रीलक्ष्मणजीक क्रोध|धनुषभंग|जयमाल पहिरायब|श्रीराम – लक्ष्मण आओर परशुराम – संवाद|दसरथजी लग जनकजीक दूत भेजब, अयोध्यासँ बरातिक प्रस्थान|बरातिक जनकपुरमे आगमन आओर स्वागतादि|श्रीसीता - राम - विवाह|बरातिक अयोध्या लौटब आओर अयोध्यामे अनन्द|श्रीरामचरित सुनब – गायबक महिमा । अयोध्याकाण्ड मंगलाचरण|रामराज्याभिषेकक तैयारि, देवतालोकनिक व्याकुलता तथा सरस्वतीजीसँ हुनक प्रार्थना|सरस्वतीक मन्थराक बुद्धि फेरब|कैकैयीक कोपभवनमे जायब|दशरथ – कैकेयी – संवाद आओर दशरथ – शोक, सुमन्त्रक महलमे जायब आओर ओतयसँ लौटकय श्रीरामजीकेँ महलमे भेजब|श्रीराम – कैकेयी – संवाद|श्रीराम – दशरथ – संवाद, अवधवासिलोकनिक विषाद, कैकेयीकेँ समझायब|श्रीराम – कौसल्या – संवाद|श्रीसीता – राम संवाद|श्रीराम – कौसल्या – सीता संवाद|श्रीराम – लक्ष्मण – संवाद|श्रीलक्ष्मण – सुमित्रा – संवाद|श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजीक महाराज दशरथ लग विदा माँगय जायब, दशरथजीक सीताजीकेँ समझायब|श्रीराम – सीता – लक्ष्मणक वनगमन आओर नगर – निवासिलोकनिकेँ सूतल छोडिकय आगू बढब|श्रीरामक श्रृंगवेरपुर पहुँचब, निषाद द्वारा सेवा|लक्ष्मण – निषाद – संवाद, श्रीराम – सीतासँ सुमन्त्रक संवाद, सुमन्त्रक लौटब|केवटक प्रेम आओऱ गंगा पार जायब|प्रयाग पहुँचब, श्रीराम – भरद्वाज – संवाद, यमुनातीरनिवसिलोकनिक प्रेम|तापस – प्रकरण|यमुनाकेँ प्रणाम, वनवासिलोकनिक प्रेम|श्रीराम – वाल्मीकि – संवाद|चित्रकूटमे निवास, कोल – भीलसभक द्वारा सेवा|सुमन्त्रक अयोध्याकेँ लौटब आओर सर्वत्र शोक देखब|दशरथ – सुमनत्र – संवाद, दशरथ मरण|मुनि वसिष्ठक भरतजीकेँ बजाबय लेल दूत भेजब|श्रीभरत – शत्रुध्नक आगमन आओऱ शोक|भरत – कौसल्या – संवाद आओर दशरथजीक अन्त्येष्टि क्रिया|वसिष्ठ – भरत – संवाद, श्रीरामजीकेँ लयबाक लेल चित्रकूट जयबाक तैयारि|अयोध्यावासिसभसहित श्रीभरत – शत्रुध्न आदिक वनगमन|निषादक शंका आओऱ सावधानि|भरत – निषाद – मिलन आओर संवाद एवं भरतजीक आ नगरनिवासिसभक प्रेम|भरतजीक प्रयाग जायब आओर भरत – भरद्वाज – संवाद|भरद्वाजद्वारा भरतक सत्कार|इन्द्र – बृहस्पति – संवाद|भरतजी चित्रकूटकेँ मार्गमे|श्रीसीताजीक स्वप्न, श्रीरामजीकेँ कोल – किरातसभकेँद्वारा भरतजीक आगमनक सूचना, रामजीक शोक, लक्ष्मणजीक क्रोध|श्रीरामजीक लक्ष्मणजीकेँ समझायब एवं भरतजीक महिमा कहब|भरतजीक मन्दाकिनी – स्नान, चित्रकूटमे पहुँचब, भरतादि सभलोकनिक परस्पर मिलाप, पिताक शोक आओऱ श्राद्ध|वनवालसलोकनिद्वारा भरतजीक मण्डलीक सत्कार, कैकेयीक पश्चाताप|श्रीवसीष्ठजीक भाषण . श्रीराम – भरतादिक संवाद|जनकजीक पहुँचब, कोल – किरातादिक भेंट, सभलोकनिक परस्पर मिलाप|कौसल्या – सुनयना – संवाद, श्रीसीतजीक शील|जनक – सुनयना संवाद, भरतजीक महिमा|जनक – वसिष्ठादि – संवाद, इन्द्रक चिन्ता, सरस्वतीक इन्द्रकेँ समझायब|श्रीराम – भरत – संवाद|भरतजीक तीर्थ – जल – ल्थापन आ चित्रकूटभ्रमण|श्रीराम – भरत – संवाद, पादुका – प्रदान, भरतजीक विदाई|भरतजीक अयोध्या लौटब, भरतजीद्वारा पादुकाक स्थापन, नन्दिग्राममे निवास आओर श्रीभरतजीक चरित्र – श्रवणक महिमा । अरण्यकाण्ड मंगलाचरण|जयंतक कुटिलता आओर फलप्राप्ति|अत्रि-मिलन एवं स्तुति|श्रीसीता-अनसूया-मिलन आओर श्रीसीताजीकेँ अनसूयाजीक पातिव्रतधर्म कहब|श्रीरामजीक आगू प्रस्थान, विराध-वध आओर शरभङ्-प्रसंग|राक्षस-वधक प्रतिज्ञा करब|सुतीक्ष्णजीक प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामक दण्डक-वन-प्रवेश आओर जटायु मिलन|पञ्चवटी-निवास आओर श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद|शूर्पणखाक कथा, शूर्पणखाक खर-दूषण लग जायब आओऱ खा-दूषणादिक वध|शूर्पणखाक रावणकेँ निकट जायब, श्रीसीताजीक अग्नि प्रवेश आओर माया सीता|मारीचप्रसंग आओर स्वर्ण-मृगरूपमे मारीचक मारल जायब|श्रीसीताहरण आओर श्रीसीता-विलाप|जटायु-रावण-युद्ध|श्रीरामजीक विलाप, जटायुक प्रसंग|कबन्ध-उद्धार|शबरीपर कृपा, नवधा भक्ति-उपदेश आओर पम्पासर दिसि प्रस्थान|नारद-राम-संवाद|संतलोकनिक लक्षण आओर सत्संग-भजनक लेल प्रेरणा । किष्किन्धाकाण्ड यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक प्रभुताकेँ सभ अहिना (अकथनीय) बूझैत छथि तथापि बिनु कहल कियो नहि रहल|एहिमे वेद एहन कारण बतयने अछि कि भजनक प्रभाव बहुत तरहेँ कहल गेल अछि|(अर्थात भगवानक महिमाक पूर्ण वर्णन तँ कियो कय नहि सकत ; परन्तु जकरासँ जतबा भय सकय ततबा भगवानक गुणगान करबाक चाही| किएकतँ भगवानक यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक प्रभुताकेँ सभ अहिना (अकथनीय) बूझैत छथि तथापि बिनु कहल कियो नहि रहल|एहिमे वेद एहन कारण बतयने अछि कि भजनक प्रभाव बहुत तरहेँ कहल गेल अछि|(अर्थात भगवानक महिमाक पूर्ण वर्णन तँ कियो कय नहि सकत परन्तु जकरासँ जतबा भय सकय ततबा भगवानक गुणगान करबाक चाही|किएकतँ भगवानक गुणगानरूपि भजनक प्रभाव अजीब अछि ओकर नाना प्रकारसँ शास्त्रसभमे वर्णन अछि|कनेको भगवानक भजन मनुष्यकेँ सहजेँ भवसागरसँ तारि दैत अछि) ।।1।। बालकाण्ड अक्षरक , अर्थसमूहक, रसक, छन्दक आओर मंगलकेॅ करनिहार सरस्वतीजी आओर गणेशजीकेॅ हम वन्दना करैत छी ।। 1 ।। ं श्रद्वा आओर विश्वासक स्वरुप श्रीपार्वतीजी आओर श्री शंकरजीक हम वंदना करैत छी, जनिक बिनु सिद्व जन अपन अंतःकरणमे स्थित ईश्वरकेॅ नहि देखि सकैछ ।। 2 ।। ज्ञानमय, नित्य, शंकररूप गुरुक हम वंदना करैत छी, जनिक आश्रित भेलेसॅ टेढ चान ;सेहो सर्वत्र वन्दित होईछ ।। 3 ।। श्रीसीतारामजीक गुणसमूहरूपि पवित्र वन मे विहार करयवाला , विशुद्व विज्ञानसम्पन्न कवीश्वर श्रीवाल्मीकिजी आओर कपीश्वर श्रीहनुमानजीक हम वन्दना करैत छी।। 4 ।। उद्भव , स्थित ;पालन आओर संहार करयवाली , क्लेशकेॅ हरयवाली आ संपूर्ण कल्याणकेॅ करयवाली श्रीरामचन्द्रजीक प्रियतमा श्रीसीताजीकेॅ हम नमन करैत छी ।। 5 ।। जनिक मायाक वशीभूत सम्पूर्ण विश्व , व्रम्हादि देवता आओर असुर छथि , जनिक सत्तासॅ रस्सीमे सर्पक भ्रमक भॉति ई सकल दृश्य - जगत् सते् बुझना जाईत अछि आओर जिनक केवल चरणे भवसागरसॅ तरक इच्छावालाक लेल एकमात्र नौका अछि, ताहि समस्त कारणसॅ पर ; सभ कारणक कारण आओर सभसॅ श्रेष्ठ राम कहावयवाला भगवान हरिक हम वन्दना करैत छी ।। 6 ।। अनेक पुराण, वेद आओर ; तन्त्र शस्त्रसॅ सम्मत जे रामायणमे वर्णित अछि आओर किछु अन्यत्रोसॅ उपलव्ध कथाकेॅ तुलसीदास अपन अन्तःकरणक सुखकलेल अत्यंत मनोहर भाषा रचनामे विस्त्रृत करैत अछि ।। 7 ।। जिनक स्मरण करयसॅ सभ कार्य सिद्व होईत अछि जे सभक स्वाामी आओर सुन्नर हाथीक मुखबाला छथि , वएह बुद्विक राशि आओर शुभ गुणसभक धाम ;श्रीगणेशजी हमरा पर क्रिपा करथि जनिक क्रिपासॅ बौका बड नीक बाजयवाला भय जाईत अछि आओर नांगर - लुल्ह दुर्गम पहाडपर चढि जाईत अछि , ओ कलयुगक सबटा पापसमूहकेॅ जरा देवयवाला दयालु ;भगवान हमरापर द्रवित होईथ दया करथि ।। 2 ।। जे नील कमलक भॅाति श्यामवर्ण छथि, पूर्ण फुलायल लाल कमलक भॉति जिनक नेत्र छन्हि आओर जे सदा क्षीरसागरमे शयन करैत छथि से भगवान ; नारायण हमरा हृदयमे निवास करैथ ।। 3 ।। जिनक कुंदक पुष्प आओर चानक समान ;गौर देह अछि , जे पार्वतीजीक प्रियतम आओर दयाक धाम छथि , आओर जिनक दीनसभपर स्नेह अछि , ओ कामदेवकेॅ मर्दन करयवाला ; शंकरजी हमरापर कृपा करथि ।। 4 ।। हम ओहि गुरू महाराजकेॅ चरणकमलक वन्दना करैत छी, जे कृपाकेॅ समुद्र आओर नररूपमे श्रीहरिये छथि आओर जनिक वचन महामोहरूपि घन अन्हारकेॅ नाश करबाक लेल सूर्य - किरणसभक समूह अछि ।। 5 ।। हम गुरूमहाराजकेॅ चरणकमलक रजक वन्दना करैत छी, जे सुरुचि ।सुन्नर स्वाद।, सुगंध तथा अनुरागरूपि रससॅ पूर्ण अछि ; ओ अमर मूलक संजीवनी जडी|सुन्नर चूर्ण अछि, जे सम्पूर्ण भवरोगक परिवारकेॅ नाश करयवाला अछि ।। 1 ।। ओ सुकृति ; पुण्यवान ्र पुरूष रूपि शिवजीक देहपर सुशोभित निर्मल विभूति अछि आओर सुन्नर कल्याण आओर आनंदक जननी अछि , भक्तकेॅ मनरूपि सुन्नर दर्पणक मैलकेॅ फराक करनिहार आओर तिलक करयसॅ गुणसभक समूहकेॅ वशमे करनिहार अछि ।। 2 ।। श्रीगुरूमहाराजक चरण - नखक ज्योति मणिसभक प्रकाशक ;इजोतक समान अछि, जकर स्मरण करितहि हृदयमे दिव्य दृष्टि उत्पन्न भय जाइत अछि ओ इजोत अज्ञानरूपि अन्हारकेॅ नाश करयवाला अछि ; ओ जकर हृदयमे आबि जाईत अछि, तकरे बड भाग्य अछि ।। 3 ।। ओहिकेॅ हृदयमे अबिते हृदयक निर्मल नेत्र खूलि जाईत अछि आओर संसाररूपि रात्रिकेॅ दोष - दुःख मेटाय जाईत अछि आ श्रीरामचरित्ररूपि मणि आओर माणिक्य, गुप्त आओर प्रकट जतय जे जाहि खानमे अछि, सबटा देखाय लागैत अछि - ।। 4 ।। जेना सिद्व जनकेॅ नेत्रसभमे लगाकय साधक, सिद्व आओर सुजान पर्वतसभ, वनसभ आओर प्रिथ्वीकेॅ तौरमे कौतुकेसॅ बहुत - रासि खानसभ देखैत छथि ।। 1 ।। श्रीगुरूमहाराजक चरणक रज कोमल आओर सुन्नर नयनाम्रित-अंजन अछि, जे नेत्रक दोषसभकेॅ नाश करयवाला अछि|ताहि अंजनसॅ विवेकरूपि नेत्रसभकेॅ निर्मल कय हम संसाररूपि बन्धनसॅ छोडावयवाला श्रीरामचरित्रक वर्णन करैत छी ।। 1 ।। सर्वप्रथम प्रिथ्वीक देवता ब्राम्हण लोकनिक चरणक वन्दना करैत छी, जे अज्ञानसॅ उत्पन्न सबटा संदेहक हरनिहार छथि|तखन सभ गुणक खान संत - समाजकेॅ प्रेमसहित सुन्नर वाणीसॅ प्रणाम करैत छी ।। 2 ।। संतसभक चरित्र कपासक चरित्रक ;जीवनक भॉति शुभ अछि, जकर फल नीरस,विशद आओर गुणमय होइत अछि|;कपासक डोडी नीरस होइत अछि, संत - चरित्रमे सेहो विषयासक्ति नहि अछि, ताहिसॅ ओ सेहो नीरस अछि; कपास उज्वल होइत अछि, संतक हृदय सेहो अज्ञान आओर पापरूपि अन्हारसॅ रहित होइत अछि, एहि लेल ओ विशद अछि, आओर कपासमे गुण ;तनु होइत अछि, एहि तरहेॅ संतक चरित्र सेहो सदगुणसभक भण्डार होइत अछि, एहि लेल ओ गुणमय अछि|जेनॉ कपासक धागा सूईक काएल छेदमे अपन तन दय झॉपि दैत अछि, अथवा कपास जेनॉ तूनय गेलासॅ, काटय गेलासॅ आओर बूनय गेलासॅ कष्टो सहिकय वस्त्रक रूपमे परिणत भय दोसराकेॅ गोपनीय स्थानसभकेॅ झॉपति अछि तहिना। संत स्वयं दुःख सहिकय दोसरकेॅ छेदसभ ; दोषसभ केॅ झॉपति अछि, जाहि कारणे ओ जगत ्रमे वन्दनीय यश प्राप्त कयने अछि ।। 3 ।। संतसभक समाज आनन्द आओर कल्याणमय अछि, जे जगतमे चलैत - फिरैत तीर्थराज ;प्रयाग अछि ं जतय ;ओहि संतसमाजसभक प्रयागराजमे रामभक्तिरूपि गंगाजीक धारा अछि आओर व्रम्हविचारक प्रचार सरस्वतीजी छथि ।। 4 ।। विधि आओर निष्ेाध ; ई क रु आओर ई नहि क रु रुपि कर्मसभक कथा कलयुगक पापसभक हरन्हिहार सूर्यतनया यमुनाजी छथि आओर भगवान विष्णु आओर शंकरजीक कथासभ त्रिवेनीरूपसॅ सुशोभित अछि जे सुनितहि सभ आनंद आओर कल्यााणसभक देनन्हिहार छथि ।। 5 ।। ।ताहि संतसमाजरूपि प्रयागमे। अपन धर्ममे जे अटल विश्वास अछि से अक्षयवट अछि, आओर शुभकर्मे ओहि तीर्थराजक समाज ।परिवार। अछि ओ ।संतसमाजरूपि प्रयागराज। सभ देश सभमे सभ समय सभकेॅ सहजहिमे प्राप्त भय सकैत अछि आओर आदरपूर्वक सेवन कयलासॅ क्लेशसभकेॅ नष्ट करयवाला अछि ।। 6 ।। ओ तीर्थराज अलोकिक आओर अकथनीय अछि, आ शीघ्र फल देवयवाला अछि; ओकर प्रभाव प्रत्यक्ष अछि ।। 7 ।। जे मनुष्य एहि संत - समाजरूपि तीरथराजक प्रभाव प्रसन्न मनसॅ सुनैत आओर बुझैत छथि आओर फेर अत्यंत प्रेमपुर्वक एहिमे डुब्बी लगावैत छथि , ओ एहि देहकेॅ रहितहि धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष - चारूटा फल पाबि जाइत छथि ।। 2 ।। एहि तीरथराजमे स्नानक फल तत्कंल एना प्रतीत होइत अछि कि कौआसभ कोईली बनि जाइत अछि आओर बगुलासभ हंस|ई सुनिकय कियो आश्चर्य नहि करय , किएक तॅ सत्संगक महिमा नुकायल नहि अछि ।। 1 ।। वाल्मीकिजी, नारदजी आओर अगस्त्यजी अपन - अपन मुखसॅ अपन होनि ;जीवनक वृत्तान्त कहने छथि|जलमे रहन्हिहार, थलपर चलन्हिहार आओर अकाशमे विचरयवाला नाना प्रकारक जड - चेतन जतेक जीव एहि जगतमे छथि ।। 2 ।। ताहिमेसॅ जे जाहि समय जतय कतहु जाहि कोनो जतनसॅ बुद्वि, कीर्ति,सद्गति, विभूति ;ऐश्वर्य आओर भलाई पओने छथि , से सभ सत्संगेक प्रभाव बुझबाक चाही। वेदसभमे आओर लोकमे एहि प्राप्तिक दोसर कोनो उपाय नहि अछि ।। 3 ।। सत्संगक बिनु विवेक नहि होइछ आओर श्रीरामजीक कृपाक बिनु ओ सत्संग सुलभ नहि|सत्संगति आनंद आओर कल्याणक जैड अछि। सत्संगक सिद्विये ;प्राप्तिये फल अछि आओर सभ साधन त‘ फूल अछि ।। 4 ।। दुष्टो सतसंगति पाविकय सुधरि जाइत अछि , जेनॉ पारसक स्पर्शसॅ लोहा सोहाय जाइत अछि ।सुन्नर सोना बनि जाइत अछि . किन्तु दैवयोगसॅ यदि कहियो सज्जन कुसंगतमे पडि जाइत छथि, त’ ओ ओतहुं सॉपक मणिकेॅ समान अपन गुणेक अनुसरण करैत छथि ।अर्थात जाहि तरहेॅ सॉपक संसर्ग पाबियोकय मणि ओहिक विषकेॅ ग्रहण नहि करैछ आ अपन सहज गुण प्रकाशकेॅ नहि छोडैत अछि, तहिना साधु पुरूख दुष्टोक संगमे रहियोकय दसेसरकेॅ प्रकाशे दैत छथि, दुष्टसभक प्रभव हिनकापर नहि पडैछ। ।। 5 ।। ब्रम्हा, विष्णु, शिव,कवि आओर पण्डित सभक वाणी सेहो संत महिमाक वर्णन करबामे सकुचाय छथि ; ओ हमरासॅ कोना नहि कहल जायत अछि, जेनॉ साग - तरकारी बेचयवाला बुतय मणिक गुणसमूह नहि कहल जा सकैछ ।। 6 ।। हम संतसभकेॅ प्रणाम करैत छी, जनिक चित्तमे समता छन्हि, जनिक ने कियो मित्र अछि आओर ने शत्रु! जेनॉ आंजुरमे राखलगेल सुन्नर फूल ;जाहि हाथसॅ फूल टूटल आओर जाहि हाथमे राखल गेल ताहि। दुनू हाथकेॅ समानरूपेॅ सुगंधित करैछ ताहि प्रकारेॅ संत शत्रु आओर मित्र दुनुक समानरूपेॅ कल्याण करैत छथि। ।। 3 ।क। ।। संत सरल हृदय आओर जगत्क हितकारि होइत छथि , हुनक एहन स्वभाव आओर स्नेहकेॅ जानिकय हम विनय करैत छी, हमर एहि बाल - विनयकेॅ सुनिकय कृपा करि श्रीरामजीक चरणमे हमरा प्रीति दियह ।। 3|ख| ।। आब हम सॉच भावसॅ दुष्टसभकेॅ प्रणाम करैत छी, जे बिनु प्रयोजनेॅ, अपन हित करयबालाक हेतु सेहो प्रतिकूल आचरण करैत छथि|दोसरक हितक हानिय जिनक दृष्टिमे लाभ अछि, जकरा दोसरकेॅ उजडयमे हर्ष आओर बसयमे विषाद होइत अछि ।। 1 ।। जे हरि आओर हरक यशरूपि र्र्पूिणमाक चानक हेतु राहुक समान ;अर्थात जतय कतहु भगवान् विष्णु वा शंकरकेॅ यशक वर्णन होइत अछि, ताहिमे ओ बाधा दइत अछि आओर दोसर सभक निंदा करबामे सहस्रबाहुक समान वीर छथि ; े दोसरसभक दोषसभकेॅ हजार ऑखिसॅ देखैत छथि आओर दोसरसभक हितरूपि घीकेॅ हेतु जनिक मन माछीक समान अछि अर्थात जाहि प्रकारेॅ माछी घीमे खसिकय ओहिकेॅ खराब कय दइत अछि आओर स्वयं सेहो मरि जाइत अछि, तहिना दुष्ट गण दोसरकेॅ बनल - बनायल कार्यकेॅ अपन हानि कइयोकय बिगारि दइत छथि ।।2 ।। जे तेज ;दोसरसभकेॅ जरावयवाला ताप मे अग्नि आओर क्रोधमे यमराजकेॅ समान छथि, पाप आओर अवगुणरूपि धनमे कुबूरक समान धनिक छथि, जिनक उदय सभक हितक नाश करबाक हेतु केतुकेॅ ;पुच्छल ताराकेॅ समान अछि, आओर जिनक कुम्भकर्णक भॉति सुतले रहबाटामे भलाई अछि ।।3।। जेनॉ हिम कृषिकेॅ उपटकय अपने सेहो गैल जाइत अछि, तहिना आं दोसरक कार्य बिगाडबाक हेतु अपन शरीरधरि छोडि दइत छथि|हम दुष्टसभकेॅ ;हजार मुखवाला शेषजीक भॉति बूझि प्रणम करैत छी, जे परक दोषकेॅ हजार मुखसॅ सहर्ष वर्णन करैत छथि ।।4।। पुनः हुनका राजा पृथुक ; जे भगवानक यश सुनबाक हेतु दस हजार मॉगने छलाह भॉति जानिकय प्रणाम करैत छी जे दस हजार कान दोसर सभक पाप सभकेॅ सुनैत छथि फेर इन्द्रक समान मानिकय हुनक विनय करैत छी, जिनका सुरा ;मदिरा नीक आओर हितकर बुझना जाइत छन्हि ।इन्द्रकेॅ लेल सेहो सुरा नीक अथर््ाात देवताक सेना हितकर छन्हि। जिनका कठोर वचन सदिखन पिअरगर लागैत छन्हि आओर हजारो ऑखिसॅ दोसरसभकेॅ दोषसभ देखैत छथि ।।6।। दुष्टसभक ई रीत अछि कि ओ उदासीन, शत्रु अथवा मित्र ककरो हित सुनिकय जरैत छथि|ई बुझिकय दुनू हाथ जोडिकय ई जन प्रेमपूर्वक हुनकासॅ विनय करैत अछि ।। 4 ।। हम अपन दिसिसॅ निहोरा कयलहुॅ, मुदा ओ अपन दिसिसॅ कहियो नहि चुकताह|कौआसभकेॅ कतबो प्रेमसॅ पोषू; तथपि ओ की कहियो माउसक त्यागी भय सकैछ ? ।। 1 ।। आब हम संत आओर असंत दुनुक चरणक वन्दना करैत छी; दुनूटा दुःख देवयवाला छथि, मुदा उभयक बीचमे किछु अन्तर कहल गेल अछि|आं अन्तर ई अछि जे एक ;संत त’ बिछुडैत काल प्राण हैर लइत छथि आओर दोसर ;असंत मिलैत छथि तखन दारूण दुःख दइत छथि|;अर्थात संतक बिछोह मरनक समान दुःखदायि होइत अछि आओर असंतक मिलान ।। 2 ।। दुनू ;संत आओर असंत जगमे संगहि जनमैत छथि; मुदा ;एकंे संग जनम लेनहार कमल आओर जोंकक भॉति हुनक गुण पृथक - पृथक होइत छन्हि|।कमल दर्शन आओर स्पर्शसॅ सुख दइत अछि, मुदा जोंक देहक स्पर्श पवितें सोणित चूसय लागैत अछि। |साधु अमृतक भॅाति ।मृत्यु रूपि संसारसॅ उबारयवाला। आओर असाधु मदिराक भॉति ।मोह, प्रमाद आओर जडत उत्पन्न करयवाला। अछि, ;शास्त्रसभमे समुद्रेमन्थनसॅ अमृत आओर मदिरा दुनूक उत्पत्ति बतायल गेल अछि ।। 3 ।। भॅल आओर बेजाय अपन - अपन करनीक अनुसार सुन्नर यश आओर अपयशकक सम्पत्ति पाबैत छथि|अमृत, चान, गंगाजी आओर साधु आ विष, अग्नि, कलियुगकें पापसभक नदी अर्थात कर्मनाशा आओर हिंसा करनिहार व्याध, हिनक गुण - अवगुण सभ कियो जानैत छथि; मुदा जकरा जे भावैत अछि तकरा सैह नीक लागैत अछि ।। 4 - 5 ।। भॅल भलाइये ग्रहन करैत अछि आओर ओछ ओछतेंकेॅ ग्रहण करैत अछि|अमृतक सराहना अमर करबामे होइत अछि आओर विषक मारयमे ।।5।। दुष्टसभकेॅ पापसभ आओर अवगुणसभक आओर साधुक गुणसभक कथा - दुनूटा अपार आओर अथह समुद्र अछि। एहिसॅ किछु गुण आओर दोषक वर्णन कायल गेल अछि, किएकतॅ बिनु चिन्हल हुनक ग्रहण वा त्याग नहि भय सकैछ ।।1।। नीक, बेजाय सभटा बिधिक बनायल अछि, परंच गुण आओर दांषसभकेॅ बिचारिकय वेद, इतिहास आओर पुराण कहैत छथि कि ब्रम्हाक ई सृष्टि गुण - अवगुणसॅ सानल अछि ।।2।। दुःख - सुख, पाप - पुण्य, दिन - राति, साधु - कुसाधु, सुजाति - अजाति, दानव - देवता, उॅच - नीच, अमृत - विष, सुजीवन ;सुन्नर जीवन -मृत्यु सम्पत्ति - दरिद्रता, रंक - राजा, काशी - मगध, गंगा - कर्मनाशा, मारवाड - मालवा, ब्राम्हण - कसाई, स्वर्ग - नरक, अनुराग - वैराग्य ।ई सभटा पदार्थ ब्रम्हाक सृष्टिमे छथि। वेद - शास्त्र सभ हिनक गुण - दोष सभक विभाजन कयने अछि ।।3-5 ।। करतार एहि जड - चेतन विश्वकेॅ गुण - दोषमय रचने छथि ; मुदा संतरूपि हंस दोषरूपि पानिकेॅ छोडिकय गुणरूपि दूधेटा ग्रहण करैत छथि ।।6।। बिधाता जहन एहि प्रकारक विवेक दइत छथि , तहन दोषसभकेॅ छोडिकय मन गुणसभमे अनुरक्त होइत अछि|काल - स्वभाव आओर कर्मक प्रबलतासॅ भॅल मनुष्य ।साधु। सेहो मायाक बश भय कहियो - काल भलाईसॅ चूकि जाइत छथि ।।1 ।। भगवानक भक्त जेनॉ ओहि चूकिकेॅ सुधरि लइत छथि आओर दुःख दोषसभकेॅ मेटकय निर्मल यश दइत छथि, तहिना दुष्ट सेहो कहियो - काल उत्तम संग पाबि भलाई करैत छथि; मुदा हुनक कहियो भंग नहि होबयवाला स्वभाव नहि मेटाइछ ।।2।। जे ।भेखधारी। ठग अछि, तकरो ;साधु जेकॉ भेष बनायल देखिकय भेषक प्रतापसॅ जगत पूजैत अछि; मुदा एक - ने - एक दिन ओ चौड आबिये जाइत अछि, अन्तधरि ओकर कपट नहि निमहैछ, जेनॉ कालनेमि, रावण आओर राहुक हाल भेल ।।3।। अधलाहो भेष बना लेबयसॅ सेहो साधुक सम्माने होइत अछि, जेनॉ जगतमे जाम्बवान आओर हनुमानजीक भेल|अधलाह संगतिसॅ हानि आओर नीक संगतिसॅ लाभ होइत अछि, ई बात लोक आओर वेदमे अछि, आओर सभ कियो एहिकेॅ जानति छथि ।।4।। बसातक सगसॅ धूल अकाशपर चढि जाइत अछि आओर ओ नीच ।नीचमे बहयवाला। पानिक संगसॅ थालमे मिलि जाइत अछि|साधुक घरक तोता - मैना राम - राम सुमिरैति अछि आओर असाधुक घरक तोता - मैना गनि - गनिकय गारि दइत अछि ।।5।। कुसंगक कारणे धुऑ कारिख कहाइछ, वएह धुऑ ।सुसंगसॅ। सुन्नर स्याही बनिकय पुराण लिखबाक काममे आबैत अछि आओर वएह धुऑ जल, अग्नि, वायु आओर पवनक संगसॅ मेघ बनि जीवनदाता बनि जाइत अछि ।।6।। ग्रह, औषध, जल,वायु आओर वस्त्र - ई सॅभ सेहो कुसंग आअेार सुसंग पाबिकय संसारमे अधलाह वा नीक पदार्थ भय जाइत अछि|चतुर आओर विचारशीले पुरुष एहि बातकेॅ जानि पाबैत छथि ।। 7।ख। ।। माहक दुनू पखमे इजोत अन्हार समाने रहैत अछि, मुदा विधाता एहिक नाममे भेद कयने छथि ;एकटाक नाम शुक्ल आओर दोसरक नाम कृष्ण रखलन्हि |एकटाकेॅ चानकेॅ बढावयवाला आओर दोसरकेॅ ओहिकेॅ घटावयवाला बूझिकय जगत एकटाकेॅ सुयश आओर दोसरकेॅ अपयश दय देलक ।। 7 ।ख। ।। जगतमे जतेक जड आाओर चेतन जीव छथि, सभकेॅ राममय बूझिकय हम हुनक सभकेॅ चरणकमलक सदिखन दुनू हाथ जोडिकय वन्दना करैत छी ।।7।ग। ।। देवता, दैत, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर आओर निशाचर सभकेॅ हम प्रणाम करैत छी|आब सभ हमरा पर कृपा करथु ।।7।घ। ।। चौरासी लाख योनिसभमे चारि प्रकारक ; स्वेदज, अण्डज, , जरायु जीव जल, पृथ्वी आओर अकाशमे रहैत छथि, ताहि सभसॅ भरल गेल एहि समस्त जगतकेॅ श्रीसीताराममय जानिकय हम दुनू हाथ जोडिकय प्रणाम करैत छी ।। 1 ।। हमरा अपन दास बूझिकय कृपाक खान अपने सभ गोटे मिलिकय छल छोडिकय कृपा करू|हमरा अपन बुद्वि - बलक भरोस नहि अछि, तेॅ हम सभसॅ विनती करैत छी ।। 2 । हम श्रीरघुनाथजीक गुणक वर्णन करय चाहैत छी, मुदा हमर बुद्धि ओछ अछि आओर श्रीरामजीक चरित्र अथाह छन्हि| तेँ हेतु हमरा उपायक एकहुटा अंग अर्थात किछुओ (लेशमात्र) उपाय नहि सुझाईछ|हमर मन आओर बुद्धि कंगाल अछि, मुदा मनोरथ राजा अछि ।।3।। हमर बुद्धि तँ अत्यंत नीच अछि आओर रुचि बड ऊँच अछि|रुचि तँ अम्रित पीबाक अछि, मुदा जगत् मे जुरईया छॉछो नहिं|सज्जन हमर ढिठईकें क्षमा करथु आओर हमर बालवचनकें मन लगाकय (प्रेमपूर्वक) सुनथु ।।4।। जेना बालक जहन तोतराति बात बाजैत अछि तँ ओकर माता – पिता ओहिकें प्रसन्न मनसँ सुनैत छथि|मुदा क्रूर, कुटिल आओर कुबिचारि लोक जे दोसरसभकेँ दोषेसभकेँ भूषणरुपसँ धारण कयने रहैत छथि (अर्थात जिनका दोसरक दोषे नीक लागैत छन्हि), हँसताह ।।5।। सरस हो अथवा फीक, अपन कविता ककरा नहि नीक लागैछ ? मुदा जे दोसरक रचनाकेँ सुनिकय हर्षित होईत छथि, एहन उत्तम पुरुष जगतमे बेसी नहि छथि ।। 6 ।। हे भाई ! जगतमे पोखरि आओर नदिक समान मनुष्ये बेसी छथि, जे जल पाबिकय अपने बाढिसँ बढैत छथि (अर्थात अपने उन्नतिसँ प्रसन्न होईत छथि)|समुद्र जेकाँ तँ बिरले कियो सज्जन होईत छथि जे चानकेँ पूर्ण देखिकय (दोसरक उन्नति देखिकय) उमडि पडैत छथि ।।7।। हमर भाग्य ओछ अछि आओर इच्चा बड पैघ अछि , मुदा हमरा एकटा विश्वास अछि कि एहिकेँ सुनिकय सज्जनसभ सुख पौताह आओर दुष्ट उपहास करताह ।।8।। मुदा दुष्टसभकेँ हँसलासँ हमरा हिते होयत|मधुर कंठबाली कोइलीकेँ कौआ तँ कठोरे कहैत रहैत अछि|जेनाँ बौकला हंसकेँ आओर बेंग पपीहकेँ हँसैत अछि, तहिना मलिन मनवाला दुष्ट निर्मल वाणीकेँ हँसैत अछि ।।1।। जे नहि तँ कविताक रसिक छथि आओर ने जिनका श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे प्रेम छन्हि, हुनक हेतु सेहो ई कविता सुखद हास्यरसक काम देत|प्रथम तँ ई भाषाक रचना अछि , दोसर हमर बुद्धि भोरि अछि ; एहिसँ ई हँसहो योग्य अछि , हँसयमे कोनो दोष नहि ।।2।। जिनका नहि तँ प्रभुक चरणमे प्रेम अछि आओर ने नीक बुझे छन्हि, हुनका ई कथा सुनयमे फीके लगतन्हि|जिनक श्रीहरि (भगवान विष्णु) आओर श्रीहरकेँ (भगवान शिव) चरणमे प्रीति अछि आओर बुद्धि कुतर्क करयवाला नहि अछि (जे श्रीहरि – हरमे भदक अथवा ऊँच-नीचक कल्पना नहि करैछ), हुनका श्रीरघुनाथजीक ई कथा मिठ लगतन्हि ।।3।। सज्जनगण एहि कथाकेँ अपन जीमे श्रीरामजीक भक्तिसँ भूषित जानिकय सुन्नर वाणीसँ सराहना करैत सुनताह|हम नहि तँ कवि छी, ने वाक्येरचनामे कुशल छी, हम तँ सभ कला आओर सभ विद्यासभसँ हीन छी ।।4।। नाना प्रकारक आखर, अर्थ आओर अलंकार, अनेक प्रकारक छन्द रचना, भाव आओर रससभक अपार भेद आओर कविताक भाँति-भाँतिक गुण-दोष होइत अछि ।।5।। एहि मे काव्य सम्बन्धी एकहुटा बातक ज्ञान हमरा नहि अछि, ई हम कोर कागजपर लिखिकय (शपथपूर्वक) सत्य-सत्य कहैत छी ।।6।। हमर रचना सभटा गुणसँ हीन अछि, एहिमे बस जगत्प्रसिद्ध एकटा गुण अछि|तकरा बिचारिकय नीक बुद्धिक पुरुष, जिनक निर्मल ज्ञान अछि, एहिकेँ सुनताह ।। 9।। एहिमे श्रीरघुनाथजीक उदार नाम अछि, जे अत्यंत पवित्र अछि, वेद-पुराणसभक सार अछि, जकरा पार्वतीजीसहित भगवान् शिवजी सदिखन जपल करैत छथि ।।1।। जे नीक कवि द्वारा रचल गेल बड नीक कविता अछि , सेहो रामनाम बिनु शोभा नहि पाबैछ|जेनाँ चान जेकाँ सुन्नर मुखबाली सुन्नर स्त्री सभ प्रकारसँ सुसज्जित भेलोसँ वस्त्र बिनु शोभा नहि दैछ।।2।। एहिक विपरीत, कुकविक रचल गेल सभ गुणसँ हीन कविता सेहो, रामक नाम एवं यशसँ अंकित जानिकय, बुद्धिमान् गण आदरपूर्वक कहैत आओर सुनैत छथि, किएक तँ संत मधुवनक भाँति गुणे ग्रहण करन्हिहार होइत छथि ।।3।। यद्यपि हमर एहि रचनामे कविताक एकोटा रस नहि अछि, तथपि एहिमे श्रीरामजीक प्रताप प्रकट अछि|हमरा मनमे इएह एकटा भरोस अछि|भल संगसँ भला, के नहि वडप्पन पौलक ? ।। 4।। धूआँ सेहो अगरकेँ संगसँ सुगंधितभय अपन स्वाभाविक कडुवापन छोडि दैत अछि|हमर कविता अवश्य भद्दा अछि, परन्तु एहिमे जगतक कल्याण करन्हिहार रामकथारूपि उत्तम वस्तुक वर्णन कायल गेल अछि|(ताहिसँ ई सेहो नीके बुझल जायत) ।।5।। तुलसीदासजी कहैत छथि जे श्रीरघुनाथजीक कथा कल्याण करन्हिहार आओर कलयुगक पापसभक हरन्हिहार अछि|हमर एहि क्रूर कवितारूपि नदीक चालि पवित्र जलवाली नदीक (गंगाजी) चालिक जेकाँ टेढ अछि|प्रभु श्रीरघुनाथजीकेँ सुन्नर यशकेँ संग सँ ई कविता सुन्नर आ सज्जनसभक मनकेँ भावयवाला भय जायत|श्मशानक अपवित्र राखो श्रीमहदेवक अंगक संगसँ सोहनगर लागैत अछि आओर स्मरण करिते पवित्र करन्हिहार होइत अछि । श्रीरामजीक यशकसंगसँ हमर कविता सभकेँ अत्यंत प्रिय लागत जेनाँ मलय पर्वतक संगसँ काष्ठमात्र (चानन बनिकय) वन्दनीय भय जाइत अछि, फेर की कियो काठक (तुच्छता) विचार करैत अछि ? ।।10(क)।। श्यामा गौ कारी भेलोसँ ओकर दूध उज्वल आओर बड गुणकारि होइत अछि|इएह बूझि सभ लोक ओहिकेँ पीबैत छथि|एहि प्रकारेँ गँवारु भाषामे भेलोसँ श्रीसीता - रामजीक यशकेँ बुझिकय लोक बड प्रेमसँ गावैत आओर सुनैत छथि ।।10(ख)।। मणि, माणिक आओर मोतीक जेहन सुन्नर छवि अछि , ओ साँप, पर्वत आओर हाथीक मस्तकपर ओहन शोभा नहि पावैछ|राजाक मुकुट आओर नवयुवती स्त्रीक शरीरकेँ पौलेसँ ई सभ बेशी शोभा पाबैत अछि।।1।। एहि तरहेँ, बुझनिक लोकनि कहैत छथि कि सुकविक कविता सहो उत्पन्न कतहु होइत अछि आओर शोभा कतहु पावैत अछि ( अर्थात कविक वाणीसँ उत्पन्न भेल कविता ओतय शोभा पाबैछ अछि जतय ओकर विचार, प्रचार व ओहिमे कथित आदर्शक ग्रहण आओर अनुसरन होइत अछि)|कविक अनुसरण करिते ओकर भक्तिक कारणे सरस्वतीजी ब्रम्हलोककय दौगल आबैत छथि ।।2।।सरस्वतीजीक दौगल आयलक ओ थकान रामचरितरूपि सरोवरमे हुनका नहबयने बिनु दोसर करोडोटा उपायसभसँ नहि जाइछ|कवि आओर पंडित अपन हृदयमे एहन बिचारिकय कलियुगक पापसभकेँ हरन्हिहार श्रीहरिक यशेक गाण करैत छथि ।।3।। संसारि मनुष्यसभक गुणगान कयलासँ सरस्वतीजी माथ धुनिकय पछताय लागैत छथि (कि हम किएक एकरा बजयलासँ एलहुँ)। बुद्धिमान लोकनि हृदयकेँ समुद्र, बुद्धिकेँ सीप आओर सरस्वतीजीकेँ स्वाति नक्षत्र जेकाँ कहैत छथि ।।4।। एहिमे जौं श्रेष्ठ विचाररूपि जल बरसैत अछि तँ मुक्तामणिकेँ समान श्रेष्ठ कविता होइत अछि।।5।। ताहि कवितारूपि मुक्तामणिसभकेँ युक्तिसँ बेधिकय फेर रामचरित्ररूपि सुन्नर तागमे पिरोकय सज्जनजनि अपन निर्मल हृदयमे धारण करैत छथि, जाहिसँ अत्यंत अनुरागरूपि शोभा होइत अछि (ओ आत्यंतिक प्रेमकेँ प्राप्त होइत अछि) ।।11।। जे कराल कलयुगमे जनमल छथि, जनिक करनि कौआक समान अछि आओर भेष हंस जेकाँ अछि, जे वेदमार्ग छोडिकय कुमार्गपर चलैत छथि, जे कपटक मूर्ति आ कलियुगकेँ पापसभक भाँड छथि ।।1।। जे श्रीरामजीक भक्त कहबाकय लोकसभकेँ ठकैत छथि, जे धन (लोभ), क्रोध आओर कामक गुलम छथि, आओर जे धींगाधीं करन्हिहार , धर्मध्वजी (धर्मक फुशि ध्वजा फहरावयवाला – दम्भी) कपटक धन्धासभक बोझ उघन्हिहार छथि, संसारक एहन लोकसभमे सभसँ पहिल हमर गनती अछि ।।2।। जौं हम अपन सभ अवगुनसभकेँ कहय लागू तँ कथा बड बढि जायत आओर हम पार नहि पायब|ताहिसँ हम बड अवगुणसभक वर्णन कयलहुँ अछि। बुझनिक जन कम्मेमे बूझि लेब ।।3।। हमर विविध प्रकारक विनतीकेँ बुझिकय, कियो एहि कथाकेँ सुनिकय दोष नहि देत|एतबहुपर जे शंका करताह, ओ तँ हमरोसँ बेसी मूर्ख आओर बुद्धिक कंगाल छथि ।।4।। हम नहि तँ कवि थिकहुँ, ने ने चतुर कहाबैत छी ; अपन बुद्धिक अनुरूपेँ श्रीरामजीक गुण गावैत छी|कतय तँ श्रीरघुनाथजीक अपार चरित्र, कतय संसारमे आसक्त हमर बुद्धि ।।5।। जाहि बसातसँ सुमेरु – जेकाँ पहाड डि जाइत अछि, कहू तँ ओकर आगूमे रुई कोन गनतीमे अछि|श्रीरामजीक असीम प्रभुता बूझिकय कथा रचयमे हमर मन बड हिचकैत अछि - ।।6।। सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रम्हाजी, शास्त्र, वेद आओर पुरान ई सभ ` नेति - नेति ` कहिकय (पार नहि पाबिकय एहन नहि, एहन नहि कहैत) सदा जनिक गुणगान करैत रहैत छथि ।।12।। यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजीक प्रभुताकेँ सभ अहिना (अकथनीय) बूझैत छथि तथापि बिनु कहल कियो नहि रहल|एहिमे वेद एहन कारण बतयने अछि कि भजनक प्रभाव बहुत तरहेँ कहल गेल अछि|(अर्थात भगवानक महिमाक पूर्ण वर्णन तँ कियो कय नहि सकत ; परन्तु जकरासँ जतबा भय सकय ततबा भगवानक गुणगान करबाक चाही|किएकतँ भगवानक गुणगानरूपि भजनक प्रभाव अजीब अछि, ओकर नाना प्रकारसँ शास्त्रसभमे वर्णन अछि|कनेको भगवानक भजन मनुष्यकेँ सहजेँ भवसागरसँ तारि दैत अछि) ।।1।। जे परमेश्वर एक छथि, जनिक कोनो इच्छा नहि अछि, जनिक कोनो रुप आओर नाम नहि अछि, जे अजन्मल , सच्चिदानन्द आओर परमधाम छथि आओर जे सभमे व्यापक एवं विशवरुप छथि, सैह भगवान दिव्य शरीर धारण कय नाना प्रकारक लीला कयलाह ।।2।। ओ लीला केवल भक्त सभक हितेक वास्ते अछि ; किएकतँ भगवान परम कृपालु छथि आओर शरणागतक बड प्रेमी छथि|जनिक भक्तसभपर बड ममता आओर कृपा छन्हि, जे एक बेर जकरापर कृपा कय देलन्हि, ओकरा फेर कहियो क्रोध नहि कयलाह ।।3।। ओ प्रभु श्रीरघुनाथजी गेल वस्तुकेँ फेर प्राप्त कराबयवाला, गरीबनवाज (दीनबन्धु), सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमान, आओर सभक स्वामी छथि|इएह बूझिकय बुझनिक लोकनि ओ श्रीहरिक यश वर्णन कय अपन वाणीकेँ पवित्र आओर उत्तम फल (मोक्ष आओर दुर्लभ भगवत्प्रेम) देवयवाला बनाबैत छथि ।।4।। ताहि बलसँ (महिमाक यथीर्थ वर्णन नहि, परन्तु महान् फल देवयवाला भजन बूझिकय भगवतेकृपाक बलपर) हम श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे माथ नवाकय श्रीरघुनाथजीक गुणसभक कथा कहब|ताहि विचारसँ (वाल्मीक, व्यास आदि) मुनिसभ पहिने हरिक कीर्ति गएने छथि, भाई ! ताहि मार्गपर चलब हमरालेल सुगम होयत ।।5।। जे अत्यंत पैघ नदी सभ अछि , जौं राजा ओहिपर पुल बान्हि दैत छथि तँ अत्यंत छोट चुट्टियो ओहिपर चढिकय बिनु परिश्रमे पार चल जाइत अछि ( ताहि प्रकारेँ मुनिसभक वर्णनक सहारासँ हम सेहो श्रीरामचरित्रक वर्णन सहजहिं कय सकब ) ।।13।। एहि प्रकार मनकेँ बल देखाकय हम श्रीरघुनाथजीक सोहनगर कथाक रचना करब|व्यास आदि जे अनेको श्रेष्ठ कवि भय गेल छथि, जे बड आदरसँ श्राहरिक सुयश वर्णन कयने छथि ।।1।। हम ओहि सभ (श्रेष्ठ कविसभ) केँ चरणकमलमे प्रणाम करैत छी, ओ हमर सबटा मनोरथसभकेँ पूर करथि|कलियुगक सेहो ओहि कविसभकेँ हम प्रणाम करैत छी , जे सभ श्रीरघुनाथजीक गुणसमूहक वर्णन कयने छथि ।।2।। जे बड सियान प्राकृत कवि छथि, जेसभ भाषामे हरिचरित्रसभक वर्णन कयने छथि, जे एहन कवि पहिने भय चुकल छथि, जे एखन वर्तमान छथि आओर जे आगू होयताह, तिनका हम सबटा कपट तेजिकय प्रणाम करैत छी ।।3।। अपने सभ प्रसन्न भय ई वरद्न दियॅ कि साधु – समाजमे हमर कविताक सम्मान होवय ; किएकतँ बुझनिक जन जाहि कविताक आदर नहि करैत छथि, मूर्खे कवि ओकरा रचबाक व्यर्थ परिश्रम करैत छथि ।।4।। कीर्ति, कविता आओर सम्पत्ति वएह उत्तम अछि जे गंगाजीक भाँति सबहक हित करन्हिहारहोवय|श्रीरामचन्द्रजीक कीर्ति तँ बड नीक (सभक अनन्त कल्याणे करन्हिहार) अछि, परंच हमर कविता कुरूप अछि|ई असमंजस अछि ( अर्थात् एहि दुनुक मेल नहि मिलैछ), एहिक हमरा अंदेस अछि ।।5।। परंच हे कविगण ! अपनेक कृपासँ ई बात सेहो हमरा लेल सुगम भय सकैत अछि |रेशमक सिअन टाटोपर सोहनगर लागैत अछि ।।6।। चतुर पुरुष ओही कविताक आदर करैत छथि, जे सरल होवय आओर जाहिमे निर्मल चरित्रक वर्णन होवय एवम जकरा सुनिकय शत्रुओ स्वाभाविक वैरकेँ बिसारि बखान करय लागय ।।14।। एहन कविता बिनु निर्मल बुद्धिक होईछ नहि आओर हमर बुद्दिक बल बड कम अछि|तेँ बेर – बेर निहोरा करैत छी कि हे कविगण ! अपने कृपा करी, जाहिसँ हम हरियशक वर्णन कय सकी ।।14 (ख)।। कवि आओर पण्डितगण ! अपने जे रामचरित्ररूपि मानसरोवरक सुन्नर हंस छी, हमर बालविनय सूनिकय आओर सुन्नर रूचि देखिकय हमरापर कृपा करी ।।14(ग)।। हम ओहि वाल्मीकि मुनिकेँ चरनकमलक वन्दना करैत छी, जे रामायणक रचना कयने छथि, जे खर (राक्षस) सहित भेलोसँ खर (कठोर) सँ विपरीत बड कोमल आओर सुन्नर छथि आ जे दूषण (राक्षस) सहित भेलोसँ दूषण अर्थात दोषसँ रहित छथि ।।14(घ)।। हम चारू वेदक वन्दना करैत छी, जे संसारसमुद्रकेँ पार होयबाक वास्ते जहाजक समान छथि आ जिनका श्रीरघुनाथजीक निर्मल यश वर्णन करैत सपनोमे खेद (थकान) नहि होईछ ।।14(ड.)।। हम ब्रम्हाजीक चरण-रजक वन्दना करैत छी, जे भवसागर बनयने छथि, जतयसँ एक दिशि मनुष्यरूपि विष आओर मदिरा उत्पन्न भेल ।।14(च)।। देवता, ब्राम्हण, पण्डित, ग्रह-एहि सभकेँ चरणक वन्दना कय हाथ जोडिकय कहैत छी जे अपने प्रसन्न भय हमर सबटा सुन्नर मनोरथसभकेँ पूर करी ।।14(छ)।। पुन: हम सरस्वतीजी आओर देवनदी गंगाजीक वन्दना करैत छी|दुनूक पवित्र आओर मनोहर चरित्र छन्हि|एकटा (गंगाजी) स्नान कयला आओर जल पीवयसँ पापसभकेँ हरैत छथि आओर दोसर (सरस्वतीजी) गुण आओर यश कहला व सुनलासँ अज्ञानक नास कय दैत छथि ।।1।। श्रीमहेश आओर पार्वतीकेँ हम प्रणाम करैत छी, जे हमर गुरु आओर माता-पिता छथि, जे दीनबन्धु आओर नित्य दान करन्हिहार छथि, जे सीतापति श्रीरामचन्द्रजीक सेवक, स्वामि आओर सखा छथि आ हमरा तुलसीदासक सभ तरहेँ कपटरहित (सत्) हित करन्हिहार छथि ।।2।। जे शिव-पार्वती कलियुगकेँ देखिकय, जगतक हितक लेल, साबर मन्त्रसमूहक रचना कयलन्हि, जाहि मन्त्रक आखर बेमेल अछि, जाहिक नहि कोनो ठीक अर्थ होईत अछि आओर नहि तँ जपे होईत अछि, तथापि श्रीशिवजीक प्रतापसँ जनिक प्रभाव प्रत्यक्ष अछि ।।3।। ओ उमापति शिवजी हमरापर प्रसन्न भय (श्रीरामजीक) एहि कथाकेँ आनन्द आओर मंगलक मूल (उत्पन्न करन्हिहार) बनयताह|एहि प्रकारेँ पार्वतीजी आओर शिवजी दुनूक स्मरण कय आओर हुनक प्रसाद पाविकय हम चावभरल चित्तसँ श्रीरामचरित्रक वर्णन करैत छी ।।4।। हमर कविता श्रीशिवजीक कृपासँ एना भाओत, जेना तरेगन समेत चानक संग भावैत अछि|जे एहि कथाकेँ प्रेमसहित आ सचेत भय समझि – बूझिकय कहताह-सुनताह, ओ कलियुगक पापसभसँ रहित आओर सुन्नर कल्याणक भागी भय श्रीरामचन्द्रजीक चरणक प्रेमी बनि जयताह ।।5-6।। जौं हमरापर श्रीशिवजी आओर पार्वतीजीक सपनोमे साँच प्रसन्नता हौइन्हि , तँ हम एहि भाषा, कविताक जे प्रभाव कहलहुँ से सभ साँच हो ।।15।। हम अतिपवित्र श्रीअयोध्यापुरी आओर कलियुगक पापसभक नाश करन्हिहार श्रीसरयू नदीक वन्दना करैत छी|फेर अवधपुरीक ओहि नर-नारिकेँ प्रणाम करैत छी जिनकापर प्रभु श्रीरामजीक थोड ममता नहि छन्हि (अर्थात बहुत अछि)।।1।। ओ (अपन पुरीमे रहयवाला) सीताजीक निन्दा करयवाला (धोबी) आओर ओकर समर्थक पुर-नर-नारिसभ) केँ पापसमूहक नाश कय ओकरा शोकरहित बनाकय अपन लोक (धाम) मे बसा देलन्हि|हम कोसल्यारूपि पूर्व दिशाक वन्दना करैत छी, जनिक कीर्ति समस्त संसारमे पसरि रहल अछि|जतय (कौसल्यारूपि पूर्व दिशा) सँ विश्वकेँ सुख देन्हिहार आओर दुष्टरूपि कमलक लेल पालक समान श्रीरामचन्द्रजीरूपि सुन्नर चान प्रकट भेलाह|सभ रानीसहित राजा दसरथजीकेँ पण्य आओर सुन्नर कल्याणक मूर्ति मानिकय हम मन, वचन आओर कर्मसँ प्रणाम करैत छी|अपन पुत्रक सेवक जानिकय ओ हमरापर कृपा करथि, जिनका रचिकय ब्रम्हाजी सेहो बडाई पौलाह आ जे श्रीरामजीक माता आओर पिता होयबाक चलते महिमाक सीमा छथि ।।3।। हम अवधक राजा श्रीदसरथजीक वन्दना करैत छी, जिनक श्रीरामजीक चरणमे सत्य प्रेम छल, ज दीनदयाल प्रभुकेँ बिछुडतहि अपन प्रिय देहकेँ मामूली तृण जेकाँ त्यागि देलाह ।।16।। हम सपरिवार राजा जनकजीकेँ प्रणाम करैत छी, जिनक श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे गूढ प्रेम छलन्हि, जाहिकेँ ओ योग आओर भोगमे नुका रखने छलाह, मुदा श्रीरामचन्द्रजीकेँ देखैतेँ ओ प्रकट भय गेल ।।1।। (भाईसभमे) सभसँ पहिने हम श्रीभरतजीक चरणमे प्रणाम करैत छी, जिनक नियम आओर व्रत वर्णन नहि कयल जा सकैछ आ जिनक मन श्रीरामजीक चरणकमलमे मधुप जेकाँ लोभायल अछि , कहियो हुनक संग नहि छोरैछ ।।2।। हम श्री लक्षमणजीक चरणकमलकेँ प्रणाम करैत छी, जे शीतल, नीक आओर भक्तसभकेँ सुख देवयवाला अछि|श्रीरघुनाथजीक कीर्तिरूपि विमल पताकामे जिनक (लक्षमणजीक) यश (पताकाकेँ ऊँच कय फहरावयवाला ) दंड जेकाँ भेल ।।3।। जे हजार मूडीवाला आओर जगतक कारण (हजार मूडीपर जगतकेँ धारणकय राखयवाला ) शेषजी छथि, जे पृथ्वीक भय भगावयलेल अवतार लेलाह, ओ गुनाकर कृपासिन्धु सुमित्रानन्दन श्री लक्षमणजी हमरापर सदिखन प्रसन्न रहथि ।।4।। हम श्रीशत्रुघ्नजीक चरणकमलकेँ प्रणाम करैत छी, जे बड वीर, सुशील आओर श्रीभरतजीक अनुगामी छथि|हम महावीर श्रीहनुमानजीक विनती करैत छी, जिनक यशक श्रीरामचन्द्रजी स्वयं (अपन श्रीमुखसँ ) वर्णन कयने छथि ।।5।। हम पवनकुमार श्रीहनुमानजीकेँ प्रणाम करैत छी, जे दुष्टरूपि वनकेँ भस्म करय लेल अग्निरूप छथि, जे ज्ञानक घनमूर्ति छथि आओर जनिक हृदयरूपि भवनमे धनुष-बाण धारणकय श्रीरामजी निवास करैत छथि ।।17।। कपिपति सुग्रीवजी, रीछसभक राजा जाम्बवानजी , राक्षससभक राजा विभीषणजी आओर अंगदजी आदि जतबा बानरसभक समाज अछि, सभक सुन्नर चरणक हम वन्दना करैत छी, जे लोकनि अधमो (पशु आओर राक्षस आदि) शरीरमे श्रीरामचन्द्रजीकेँ प्राप्त कय लेलाह ।।1।। पशु, पक्षी, देवता,मनुष्य, असुरसमेत जतेक श्रीरामजीक चरणक उपासक छथि , हम ताहि सभ लोकनिकेँ चरणकमलकेँ वन्दना करैत छी , जे श्रीरामजीक निष्काम सेवक छथि ।।2।। शुकदेवजी , सनकादि, नारदमुनि आदि जतबा भक्त आओर परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि छथि , हम धरतीपर माथ टेकिकय ताहि सभ लोकनिकेँ प्रणाम करैत छी ; हे मुनीश्वर लोकनि ! अपने सभ हमरा अपन दास बूझिकय कृपा कयल जाय ।।3।। राजा जनकक बेटी, जगतक माता अओर करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीकेँ प्रियतमा श्रीजानकीजीक दुनू चरणकमलकेँ हम मानैत छी, जनिक कृपासँ निर्मल बुद्धि पावी ।।4।। फेर हम मन, वचन आओर कर्मसँ कमलनयन, धनुष-बाणधारी, भक्तसभक विपत्तिक भंजन करय आओर ओ लोकनिकेँ सुख देवयवाला भगवान् श्रीरघुनाथजीक सर्वसमर्थ चरणकमलक वन्दना करैत छी ।।5।। जे वाणी आओर ओकर अर्थ आ जल आओर जलक लहरक भाँति कहयमे पृथक-पृथक अछि, परंच वास्तवमे अभिन्न (एक) अछि, ओहि श्रीसीतारामजीक चरणक हम वन्दना करैत छी, जिनका दीन – दुखी बड रास प्रिय छन्हि ।।18।। हम श्रीरघुनाथजीक नाम ‘राम ’ केँ वन्दना करैत छी , जे कृशानु (अग्नि) , भ्नु (सूर्य) आओर हिमकर (चान) केँ हेतु अर्थात ' र ' आ ' आओर ' म ' रूपसँ बीज अछि|ओ 'राम' नाम ब्रम्हा, विष्णु आओर शिवरूप अछि|ओ वेदसभक प्राण अछि ; निर्गुण, उपमारहित आओर गुणसभक भण्डार अछि ।।1।। जे महामन्त्र अछि, जकरा महेश्वर श्रीशिवजी जपैत छथि आओर हुनक द्वारा जकर उपदेश काशीमे मुक्तिक कारण अछि, आ जकर महिमाकेँ गणेशजी बूझैत छथि, जे एहि 'राम' नामक प्रभावेसँ सभँ प्रथम पूल जाइत छथि ।।2।। आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनामक प्रतापकेँ जानैत छथि , जे उलटा नाम ('मरा ' 'मरा') जपिकय पवित्र भय गेलाह|श्रीशिवजीक एहि वचनकेँ सुनिकय कि एक राम-नाम सहस्त्र नामक समान अछि , पार्वतीजी सदिखन अपन पति (श्रीशिवजी) केँ संग रामनामक जप करैत रहैत छथि ।।3।। नामक प्रति पार्वतीजीकेँ हृदयक एहन प्रीति देखिकय श्रीशिवजी हर्षित भय गेलाह आओर ओ स्त्रीसभकेँ भूषणरूप (पतिव्रतासभमे शिरोमणि) पार्वतीजीकेँ अपन भूषण बना लेलाह (अर्थात हुनका अपन अंगमे धारणकय अर्द्धांगिनि बना लेलाह)|नामक प्रभावकेँ श्रीशिवजी नीक जेकाँ जानैत छथि, जाहि (प्रभाव) केँ कारण कालकूट माहुर हुनका अमृतक फल देलक ।।4।। श्रीरघुनाथजीक भक्ति वर्षा - ऋतु अछि , तुलसीदासजी कहैत छथि जे उत्तम सेवकगण धान छथि आओर 'राम' नामक दूटा सुन्नर आखर साओन - भादवक महिना अछि ।।19।। दुनू आखर मधुर आओर मनोहर अछि, जे वर्णमालारूपि शरीरक नेत्र अछि, भक्तसभक जीवन अछि आ स्मरण करयमे सभक लेल सुलभ आओर सुख देवयवाला अछि, आओर जे एहि लोकमे लाभ आओर परलोकमे निर्वाह करात छथि (अर्थात् भगवान् क दिव्य धाममे दिव्य देहसँ सदिखन भगवत्सेवामे नियुक्त राखैत छथि)।।1।। ई कहय, सुनय आओर स्मरण करबामे बड नीक (नीक आओर मधुर) अछि ; तुलसीदासकेँ तँ श्रीराम-लक्षमण जेकाँ प्रिय छन्हि|हिनक ('र' आओर 'म' केँ) पृथक-पृथक वर्णन करयमे प्रीति बिलगावैत अछि (अर्थात बीजमन्त्रक दृष्टिसँ एहिक उच्चारण, अर्थ आओर फलमे भेद बूझि पडैत अछि) परंच छथि ई जीव आओर ब्रम्हकेँ समान स्वभावेसँ संग रहयवाला (सदा एकरूप आओर एकरस) ।।2।। ई दुनू आखर नर-नारायणकेँ सुन्नर भाई छथि, ई जगतक पालन आओर विशेषरूपसँ भक्तसभक रक्षा करन्हिहार छथि|ई भक्तरूपिणी सुन्नर स्त्रीक कानक सुन्नर गहना (करणफूल) अछि आओर गतक तक लेल निर्मल चान आओर सूर्य छथि ।।3।। ई नीक गति (मोक्ष) रूपि अमृतक स्वाद आओर तृप्तिक समान छथि, कच्छप आओर शेषजीक समान पृथ्वीकेँ धारण करन्हिहार छथि, भक्तसभक मनरूपि सुन्नर कमलमे विहार करयवाला भ्रम्रक समान छथि आओर जीहरूपि यशोदाजीकेँ लेल श्रीकृष्ण आओर बलरामजीकेँ समान (आनन्द देवयवाला) छथि ।।4।। तुलसीदासजी कहैत छथि- श्रीरघुनाथजीकेँ नामकेँ दुनू आखर बड शोभा दैत छथि, जाहिमेसँ एक (रकार) छत्ररूप (रेफ -) सँ आओर दोसर (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार -) रूपसँ सभ आखरसभकेँ उपर छथि ।।20।। बुझनामे नाम आओर नामी दुनू एक जेकाँ छथि, मुदा दुनूमे परस्पर स्वामी आओर सेवक जेकाँ प्रीति अछि, (अर्थात् नाम आओर नामीमे पूर्ण एकता भेलोपर जेना स्वामीक पाछू सेवक चलैत अछि ताहि प्रकारेँ नामकेँ पाछू नामी चलैत छथि|प्रभु श्रीरामजी अपन राम नामेटाक अनुगमन करैत छथि, नाम लैइतहि ओ आबि जाइत छथि)|नाम आओर रूप दुनू ईश्वरक उपाधि छथि, (भगवानकेँ नाम आओर रूप) दुनू अनिर्वचनीय छथि, अनादि छथि आओर सुन्नर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धियेसँ हिनक [ दिव्य अविनाशि] स्वरूप बुझना जाइत अछि ।।1।। एहि (नाम आओर रूप) मे कोन पैघ अछि, कोन छोट अछि, ई कहब तँ अपराध होयत|हिनक गुणसभक तारतम्य (कम-बेश) सुनिकय साधु जन स्वयं बूझि लेताह|रूप नामक अधीन देखल जाइत अछि, नामक बिनु रूपक ज्ञान नहि भय सकैछ ।।2।। कोनो विशेषरूप बिनु ओकर नाम जानल तलहथीपर राखलो चिन्हल नहि जा सकैछ आओर रूपकेँ बिनु देखलो नामक स्मरण कयल जा तँ विशेष प्रेमक संग ओ रूप हृदयमे आबि जाइत अछि ।।3।। नाम आओर रूपक गतिक खिस्सा (विशेषताक कथा) अकथनीय अछि|ओ बुझलामे सुखदायक अछि, मुदा ओकर वर्णन नहि कयल जा सकैछ|निर्गुण आओर सगुनकेँ मध्यमे नाम सुन्नर साक्षी अछि आओर दुनूक यथार्थ ज्ञान करोन्हहार चतुर दुभाखिया अछि ।।4।। तुलसीदासजी कहैत छथि, जौं तू भीतर आओर बाहर दुनू कात इजोत चाहैत छह तँ मुखरूपि द्वारक जीहरूपि दुहारिपर रामनामरूपि मणि-दियौरीकेँ राखह| ब्रम्हाकेँ बनायलगेल एहि प्रपञ्च (दृश्य जगत्) सँ बिरक्त भेल वैराग्यवान मुक्तयोगी पुरुष एहि नामकेँ जीहसँ जपैत (तत्वज्ञानरूपि दिनमे)जागैत छथि आओर नाम आ रूपसँ रहित अनुपम, अनिवर्चनीय, अनामय ब्रम्हसुखक अनुभव करैत छथि ।।1।। ओ परमात्माक गूढ रहस्यकेँ (यथार्थ महिमाक) बूझय चाहैत छथि, सैह नामकेँ जीहसँ जपिकय ओहिकेँ जानि लैइत छथि [लौकिक सिद्धिसभकेँ चाहनाहर अर्थार्थी] साधक लौ लगाकय नामक जाप करैत छथि आओर अणिमादि (आठू)सिद्धिसभकेँ पाबिकय सिद्ध भय जाइत छथि ।।2।। [संकटसँ अकुलायल] आर्त भक्त नाम जाप करैत छथि तँ हुनक बड भारी अधलाह-अधलाह संकट मेट जाइत छन्हि आओर ओ सुखी भय जाइत छथि|जगतमे चारि प्रकारक (1- अर्थार्थी - धनादिक चाहसँ भजन्हिहार, 2- आर्त - संकटक निवृत्तिक हेतु भजन्हिहार , 3- जिज्ञासु ः भगवानकेँ जनबाक इच्छासँ भजन्हिहार, 4- ज्ञानी - भगवानकेँ तत्वसँ जानिकय स्वभाविकेँ प्रेमसँ भजन्हिहार) रामभक्त छथि आओर चारूटा पुण्यात्मा, पापरहित आओर उदार छथि ।।3।। चारूटा चतुर भक्तसभकेँ नामेटाक आधार छन्हि|एहिमे ज्ञानी भक्त प्रभुकेँ विशेषरूपसँ प्रिय छन्हि|एनातँ चारू युगमे आ चारू वेदमे नामक प्रभाव अछि, परंतु कलयुगमे विशेषरूपसँ अछि|एहिमेतँ (नामकेँ छोडि) दोसर कोनो उपाये नहि अछि ।।4।। जे सभ प्रकारक (भोग आओर मोक्षकेँ सेहो) कामनासभसँ रहित आओर श्रीरामभक्तिक रसमे लीन छथि , ओ सेहो नामक सुन्नर प्रेमरूपि अमृतक सरोवरमे अपन मनकेँ मीन बनौने धयने छथि (अर्थात ओ नामरूपि सुधाक निरंतर आस्वादन करैत रहैत छथि, क्षणोभरि लेल ओहिसँ फटकि होवय नहि चाहैछ) ।।22।। निर्गुण आओर सगुण - ब्रम्हकेँ दूटा स्वरूप छन्हि|ई दुनूटा अकथनीय, अथाह, अनादि आओर अनुपम छथि |हमर सम्मतिसँ नाम एहि दुनूसँ पैघ अछि, जे पन बलसँ दुनूकेँ अपन वशमे कयने अछि ।।1।। सज्जनगण एहि बातकेँ हमर दासक ढिठई वा केवल काव्योक्ति नहि बूझैथ|हम अपन मनक विश्वास, प्रेम आओर रूचिक बात कहैत छी|[निर्गुण आओर सगुण] दुनू प्रकारक ब्रम्हक ज्ञान अग्निक समान अछि जे काठक भित्तर अछि , परंतु देखाइछ नहि; आओर सगुण ओहि प्रकट अग्निक समान अछि जे प्रत्यक्ष देखाइत अछि|[तत्वत: दुनू एके अछि ; केवल प्रकट - अप्रकटकेँ भेदसँ भिन्न बुझना जाइत अछि|तहिना निर्गुण आओर सगुण तत्वत: एके अछि|एतेक भेलोसँ] दुनूटा बुझबामे बड कठिन अछि, परंतु नामसँ दुनू सुगम भय जाइत अछि|एहिलेल हम नामकेँ (निर्गुण) ब्रम्हसँ आओर [सगुण] रामसँ पैघ कहने छी, ब्रम्ह व्यापक अछि, एक अछि, अविनाशि अछि ; सत्ता चैतन्य आओर आनन्दक घनराशि अछि ।।2-3।। एहन विकाररहित प्रभुक हृदयमे रहितो जगतक सभटा जीव दीन आओर दुखी अछि|नाँओक निरूपन कय (नाँओक यथार्थ स्वरूप, महिमा , रहस्य आओर प्रभावकेँ जानिकय) नाँओक जतन कयलासँ (श्रद्धापूर्वक नामजापरूपि साधन कयलासँ) वएह ब्रम्ह एना प्रकट भय जाइत अछि जेना रत्नकेँ जानिगेलासँ ओकर मूल्य ।।4।। एहितरहेँ निर्गुणसँ नाँओक प्रभाव अत्यंत पैघ अछि|आब अपन विचारक अनुसारे कहैत छी कि नाम [सगुण] रामसँ सेहो पैघ अछि ।।23।। श्रीरामचन्द्रजी भक्तसभक हितक वास्ते मनुष्य शरीर धारण कय स्वयं कष्ट सहिकय साधुसभकेँ सुखी कयलाह ; परंतु भक्तगण प्रेमक संग नाँओक जाप करैत सहजहिमे आनन्द आओर कल्याणक घर भय जाइत छथि ।।1।। श्रीरामचन्द्रजी एकटा तपस्वीयेटाक स्त्री (अहल्या)केँ तारलन्हि, परन्तु नाम तँ करोडोटा दुष्टक बिगडल बुद्धिकेँ सुधारि देलक|श्रीरामजी ऋषि विश्वामित्रक हितक वास्तेँ एकटा सुकेतु यक्षक कन्या ताडकाक सेना आओर पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति कयलन्हि; परन्तु नाम अपन भक्तसभक दोष, दु:ख आओर दुराशासभक एना नाश कय दइत अछि जेना सूर्य रात्रिक|श्रीरामजी तँ स्वयं शिवजीक धनुषकेँ तोडलन्हि परन्तु नाँओक प्रतापेटा संसारक सभटा भयसभक नाश करयवाला अछि ।।2-3।। प्ररयवाला अछि ।।2-3।। प्रभु श्रीरामजीक [भयानक] दण्डक वनकेँ सोहनगर बनौलन्हि, परन्तु नाम तँ असंख्य मनुष्यसभक मनकेँ पवित्र कय देलक|श्रीरघुनाथजी राक्षससभक समूहकेँ मारलन्हि , परन्तु नाम तँ कलियुगक समस्त पापसभक जडि उखाडयवाला अछि ।।4।। श्रीरघुनाथजी तँ शबरी, जटायु आदि उत्तमे सेवकसभकेँ मुक्ति देलन्हि; परन्तु नाम तँ अनगनत दुष्टसभक उद्धार कयलक|नाँओक गुणसभक कथा वेदसभमे प्रसिद्ध अछि ।।24।। श्रीरामजी सुग्रीव आओर विभीषण दुईएटाकेँ अपन शरणमे रखलन्हि, ई सभकियो जानैत छथि; परंतु नाम तँ अनेको गरीबसभपर कृपा कयने अछि|नाँओक ई सुन्नर विरद लोक वेदमे विशेषरूपसँ प्रकाशित अछि ।।1।। श्रीरामजी तँ भालु आओर बानरक सेना बटोरलन्हि आओर समुद्रपर पूल बान्हयलेल कनेक परिश्रम नहि कयलन्हि ; परंतु नाम लैतहि संसार-समुद्र सूखि जाइत अछि|मनमे विचार करू [कि जे दुनूमे कोन पैघ अछि] ।।2।। श्रीरामचन्द्रजी कुटुम्बसमेत रावणकेँ युद्धमे मारलन्हि , तखन सीतासमेत अपन नगर (अयोध्या) मे प्रवेश कयलन्हि|राम राजा भेलाह , अवध हुनक राजधानी भेल , देवता आओर मुनि सुन्नर वाणीसँ जिनक गुण गावैत छथि|परंतु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नामकेँ स्मरणमात्रसँ बिनु परिश्रम मोहक प्रबल सेनाकेँ जीतिकय प्रेममे मग्न भेल अपने सुखमे विचरैत छथि, नाँओक प्रसादसँ हुनका सपनहुमे कोनो चिंता नहि सताबैछ ।।2-4।। एहि तरहेँ नाम [निर्गुण] ब्रम्ह आओर [सगुण] राम दुनूसँ पैघ अछि|ई बरदान देबयवालाकेँ सेहो बर देबयवाला अछि|श्रीशिवजी तँ अपन हृदयमे ई जानियेकय सै करोड रामचरित्रमेसँ एहि 'राम ' नामकेँ [साररूपसँ चूनिकय] ग्रहण कयने छथि ।।25।। मासापारायण, पहिल विश्राम नमेटाक प्रसादसँ शिवजी अविनाशि छथि आओर अमंगल वेषवाला भेलोसँ सेहो मंगलक राशि छथि|शुकदेवजी आओर सनकादि सिद्ध, मुनि, योगीगण नामेटाक प्रसादसँ ब्रम्हानन्दकेँ भोगैत छथि ।।1।। नारदजी नामक प्रतापकेँ जानिगेल छथि|हरि समस्त संसारकेँ प्रिय छथि, [हरिकेँ हर प्रिय छन्हि] आओर आहाँ (श्रीनारदजी) हरि आओर हर दुनूगोटेकेँ प्रिय छी|नामकेँ जपलासँ प्रभु कृपा कयलन्हि , जाहिसँ प्रहलाद भक्तशिरोमणि भय गेलाह ।।2।। ध्रुवजी ग्लानिसँ (विमाताक वचनसँ दुखी भय सकामभवसँ) हरिनामकेँ जपलन्हि आओर ओकर प्रतापसँ अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त कयलन्हि| हनुमानजी पवित्र नाँओक स्मरण कय श्रीरामजीकेँ अपन वशमे कय रखने छथि ।।3।। नीच अजामिल, गज आओर गणिका (वेश्या) सेहो श्रीहरिक नाँओक प्रभावसँ मुक्त भय गेल|हम नामक बडाई कतय धरि कहू, राम सेहो नामक गुणसभकेँ नहि गाबि सकैत छथि ।।4।। कलियुगमे रामक नाम कल्पतरु (मनचाहल पदार्थ देवयवाला) आओर कल्याणक निवास (मुक्तिक घर) अछि, जकर स्मरण कयलासँ भाँग-जेकाँ (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसीक समाने (पवित्र) भय गेलाह ।।26।। [केवल कलियुगेटाक बात नहि अछि,] चारू युगमे, तीनू कालमे आओर तीनू लोकमे नामकेँ जपिकय जीव शोकरहित भेल छथि|वेद, पुराण आओर संतसभक मन ईयैह अछि कि समस्त पुण्यसभक फल श्रीरामजीमे [अथवा रामनाममे] प्रेम भेनाई अछि ।।1।। पहिने (सत्य) यूगमे ध्यानसँ, दोसर (त्रेता) युगमे यज्ञसँ आओर द्वापरमे पूजलसँ भगवान प्रसन्न होईत छथि; मुदा कलियुग केवल पापक जडि आओर मलिन अछि, एहिमे मनुष्यसभक मन पापरूपि समुद्रमे माछ बनल गेल अछि (अर्थात पापसँ कहियो फऱाक होबहेँ नहि चाहैछ ; एहिसँ ध्यान, यज्ञ आओर पूजन नहि बनि सकैछ) ।।2।। एहन कराल (कलियुगकेँ) कालमे तँ नामे कल्पवृक्ष अछि, जे स्मरण करितहि संसारक सभटा जंजालसभक नाश कय देवयवाला अछि, परलोक परम हिताषि आओर एहि लोकक माता-पिता अछि (अर्थात परलोकमे भगवानक परमधाम दैत अछि आओर एहि लोकमे माता-पिताक जेकाँ सभ तरहेँ पालन आओर रक्षण करैत अछि) ।।3।। कलियुगमे ने कर्म अछि, ने भक्ति अछि आओर ने ज्ञाने अछि ; रामनामे एकटा आधार अछि|कपटक खान कलियुगरूपि कालनेमिकेँ (मारबाक) लेल रामनामे बुद्धिमान आओर समर्थ श्रीहनुमानजी छथि ।।4।। रामनाम श्रीनृसिंह भगवान छथि, कलियुग हिरण्यकशिपु अछि आओर जाप करयवाला लोक प्रहलादकेँ जेकाँ अछि ; ई रामनाम देवतासभक शत्रु (कलियुगरूपि दैत्य) केँ मारिकय जाप करन्हिहारक रक्षा करत ।।27।। नीक भाव (प्रेम) सँ, अधलाह भाव (वैर) सँ, करोधसँ वा आलस्यसँ कोनो तरहेँ नाम जपलासँ दसू दिशामे कल्याण होईत अछि|ओहि (परम कल्याणकारि)रामनामक स्मरण कय क आओर श्रीरघुनाथजीकेँ माथ झुकाय कय हम रामजीक गुणसभक वर्णन करैत छी ।।1।। ओ (श्रीरामजी)हमर [बिगडल] सभ तरहेँ सुधारि लेताह; जनिक कृपा कृपा कयलासँ नहि अघाईछ|राम-सँ उत्तम स्वामि आओर हमराजेकाँ अधलाह सेवक ! ततबोपर ओ दयानिधि अपन दिसि देखिकय हमरा पोसने छथि ।।2।। लोक आओर वेदमे सेहो नीक स्वामीक ईएह रीति परसिद्ध अछि जे ओ विनय सुनितहि प्रेमकेँ चीन्हि लैत छथि|धनिक – गरीब , गँवार – नागर , पण्डित – मुरूख, बदनाम – यशस्वी ।।3।। सुकवि – कुकवि, सभ नर – नारि अपन – अपन बुद्धिक अनुसारेँ राजाक सराहना करैत छथि|आओर साधु, बुद्धिमान, सुशील, ईश्वरक अंशसँ उत्पन्न कृपालु राजा - ।।4।। सभक सूनिकय आओर हुनक वाणी , भक्ति, विनय आओर चालिकेँ चीन्हिकय सुन्नर (मिठ) वाणीसँ सभक यथायोग्य सम्मान करैत छथि|ई स्वभावतँ संसारि राजासभक अछि, कोसलनाथ श्रारामचन्द्रजी तँ चतुरशिरोमणि छथि ।।5।। श्रीरामजी तँ विशुद्ध प्रेमेँटासँ रीझैत छथि, मुदा जगत् मे हमरासँ बढिकय मुरूख आ मलिनबुद्धि आओर के होयत ? ।।6।। तथापि कृपालु श्रीरामचन्द्रजी हम दुष्ट सेवकक प्रीति आओर रूचिकेँ अवश्य रखताह, जे पाथरकेँ जहाज आओऱ बानर – भालुसभकेँ बुद्धिमान मंत्री बना लेलाह ।।28 (क)।। सभकियो हमरा श्रीरामजीक सेवक कहैत छथि आओर हम सेहो (बिनु लाज - संकोचकेँ) कहाबैत छी (कहनहारक विरोध नहि करैछ); कृपालु श्रीरामजी एहि निंदाकेँ सहैत छथ जे श्रीसीतानाथजी – जेहन स्वामिक तुलसीदास जेकाँ सेवक अछि ।।28 (ख)।। ई हमर बड पैघ ढिठई आ दोख अछि, हमर पापकेँ सुनिकय नरको नाक सिकोडि लेने अछि (अरथात नरकोमे हमरा लेल ठौर नहि अछि)|ई बूझिकय हमरा अपनहि कल्पित डरसँ ड र भय रहल अछि, मुदा भगवान् श्रीरामचन्द्रजी तँ सपनोमे एहिपर (हमर एहि ढिठई आओर दोषपर) ध्यान नहि देलाह ।।1।। वरं हमर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी तँ एहि बातकेँ सुनिक, देखिकय आओर अपन सुचित्तरूपि चक्षुसँ निरीक्षण कय हमर भक्ति आओर बुद्धिक (उनटे) सराहलन्हि|किएक तँ कहबामे चाहे बिगडि जाय (अर्थात हम चाहे स्वयंकेँ भगवानक सेवक कहैत – कहावैत रहू), मुदा हृदयमे नीकपन होयबाक चाही|(हृदयमे तँ अपनाकेँ हुनक सेवक बनय जोग नहि मानिकय पाप आ दीने मानैत छी, ई नीकपन अछि ।) श्रीरामचन्द्रजी सेहो दासकेँ हृदयक [ नीक] स्थिति जानिकय रीझ जाइत छथि ।।2।। प्रभुकेँ चित्तमे अपन भक्तसभक कयलगेल भूल – चूक याद नहि रहैछ (ओ ओहिकेँ बिसरि जाइत छथि) आओर हुनक हृदय (केँ अच्छाई - नीकी) केँ सै-सै बेरि याद करैत रहैत छथि|जाहि पापक कारणेँ ओ बालिकेँ व्याध जेकाँ मारने छलाह, तेहने कुचालि फेर सुग्रीव चलल ।।3।। वएह करनी विभीषणक छल, मुदा श्रीरामचन्द्रजी सपनहुमे ओकर विचार नहि कयलाह|उनटहि भरतजीसँ भेटकाल श्रीरघुनाथजी हुनक सम्मान कयलन्हि आओर राजसभामे सेहो हुनक गुणक बखान कयलन्हि ।।4।। प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तँ वृक्षक निच्चाँ आओर बानर डाल्हिपर (अर्थात कतय मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी आओर कतय गाछक डाल्हिसभपर कूदयवाला बानर ।) मुदा एहन बानरसभकेँ सेहो ओ अपने जेकाँ बना लेलन्हि|तुलसीदासजी कहैत छथि जे श्रीरामचन्द्रजी – जैकाँ शीलनिधान स्वामि कतहुटा नहि अछि ।।29 (क)।। हे श्रीरामजी ! अपनेक अच्छाईसँ सभक नीक अछि (अर्थात अपनेक कल्याणमय स्वभाव सभक कल्याण करयवाला अछि)|जौं ई बात साँच अछि तँ तुलसीदासक सेहो कल्याणे होयत ।।29 (ख)।। एहि तरहेँ अपन गुण दोषसभकेँ कहिकय आओर सभकेँ फेर माथ नवाय हम श्रीरघुनाथजीक निर्मल यश वर्णन करैत छी जाहिकेँ सुनलासँ कलियुगक पाप नष्ट भय जाईत अछि ।।29 (ग)।। मुनि याज्ञवलक्यजी जे सोहनगर कथा मुनिश्रेष्ठ भारद्वाजजीकेँ सुनयने छलाह, सएह संवादकेँ हम बखानिकय कहब, सभ सज्जन सुखक अनुभव करैत ओहिकेँ सुनू ।।1।। शिवजी पहिने एहि सोहनगर चरित्रकेँ रचलाह , फेर कृपा कय पार्वतीजीकेँ सुनयलाह|वएह चरित्र शिवजी काकभुशुण्डिजीकेँ रामभक्त आओर अधिकारि चीन्हिकय देलाह ।।2।। ओहि काकभुशुण्डिजीसँ फेर याज्ञवाल्क्यजी पौलाह आओर ओ फेर ओहिकेँ भारद्वाजजीकेँ गाविकय सुनयलाह|ओ दुनू वक्ता आओर श्रोता (याज्ञवलक्य आओर भरद्वाज) समान शीलवाला आओर समदर्शी छथि आओर श्राहरिक लीलाकेँ जानैत छथि ।।3।। ओ अपन ज्ञानसँ तीनू कालक बातकेँ तरहत्थीपर रखने धात्रीक जेकाँ (प्रत्यक्ष) जानैत छथि|आओर सेहो जे सुजान (भगवान् क लीलासभक रहस्य जानयवाला) हरिभक्त छथि, ओ एहि चरित्रकेँ नाना प्रकारसँ कहैत , सुनैत आओर समझैत छथि ।।4।। फेर वएह कथा हम वाराह – क्षेत्रमे अपन गुरुजीसँ सुनलहुँ; मुदा ताहिकाल हम बालपनक कारणेँ बड बेसमझ छलहुँ ताहिसँ ओहिकेँ ओहिप्रकारेँ (नीक जेकाँ) बुझलहुँ नहिं ।।30 (क)।। श्रीरामजीक गूढ कथाकेँ (कहयवाला) आओर श्रोता (सुनयवाला) दुनूटा श्रानक खजाना (पूर ज्ञानी) होईत छथि|हम कलियुगक पापसभसँ ग्रसल महामूढ जड जीव भला ओहिकेँ कोना बूझि सकितहुँ ।।30 (ख)।। तथापियो गुरुजी जखन बेरि-बेरि कथा कहलन्हि, तखन बुद्धिक अनुसारेँ किछु बुझना गेल|वएह आब हमरासँ भाषामे रचल जायत, जाहिसँ मरा मनकेँ सन्तोष हो ।।1।। जेनाँ किछु हमरामे बुद्धि आओर विवेकक बल अछि, हम हृदयमे हर प्रेरणासँ ताहिक अनुसारेँ कहब|हम अपन संदेह, अज्ञान आओर भ्रमकेँ हरयवाला कथा रचैत छी, जे संसाररूपि नदीकेँ पार करबाकलेल नाव अछि ।।2।। रामकथा पण्डितसभकेँ विश्राम देवय, सभ मनुष्यसभकेँ प्रसन्न करय आओर कलियुगक पापसभक नाश करन्हिहार अछि|रामकथा कलियुरूपि साँपक लेल मयूरनी अछि आओर विवेकरूपि अग्निकेँ प्रकट करबााकलेल अरणि (मन्थन करबाक लकडी) अछि, (अर्थात एहि कथासँ ज्ञानक प्राप्ति होईत अछि) ।।3।। रामकथा कलियुमे सभ मनोरथकेँ पूर्ण करन्हिहार कामधेनु गौ अछि आओर सज्जनवृंदक लेल सुन्नर संज्जीवनि जडी अछि|पृथ्वीपर इएह अमृतक नदी अछि, जन्म - मरणरूपि भयकेँ नाश करन्हिहार आओर भ्रमरूपि बेंगसभकेँ खयबाक लेल सर्पिणि अछि ।।4।। ई रामकथा असुरसभकेँ सेनाक जेकाँ नरकसभकेँ नाश करन्हिहार आओर साधुरूप देवतासभकेँ कुलक हित करन्हिहार पार्वती (दुर्गा) अछि|ई संत-समाजरूपि क्षीरसमुद्रक लेल लक्ष्मीजीक समान अछि आओर सम्पूर्ण विश्वक भार उठाबयमे अचल पृथ्वीक समान अछि ।।5।। यमदूतसभक मुँहपर करिखा लगेबा लेल ई जगतमे यमुनाजीक समान अछि आओर जीवसभकेँ मुक्ति देबाकलेल बुझू काशिए अछि|ई श्रीरामजीकेँ पवित्र तुलसी जेकाँ प्रिय अछि आओर तुलसीदासक लेल हुलसी (तुलसीदासजीक माय) जेकाँ हृदयसँ हित करन्हिहार अछि ।।6।। ई रामकथा शिवजीकेँ नर्मदाजीक समान प्रिय अछि, ई सभ सिद्धिसभक आ सुख - सम्पत्तिक राशि अछि|सद्गुणरूपि देवतासभकेँ उत्पन्न आओर पोषबाकलेल माता अदितिक समान अछि|श्रीरघुनाथजीक भक्ति आओर प्रेमक परम सीमा जेकाँ अछि ।।7। तुलसीसजी हैत छथि जे रामकथा मन्दाकिनि नदी अछि, सुन्नर (निर्मल) चित्त चित्रकूट अछि, आओर सुन्नर स्नेहेँ वन अछि, जाहिमे श्रसीतारामजी विहार करैत छथि ।।31।। श्रीरामचन्द्रजीक चरित्र सुन्नर चिनतामणि अछि आओर संतसभक सुबुद्धिरूपि स्त्रीक सुन्नर श्रृंगार अछि|श्रीरामचन्द्रजीकेँ गुणसमूह जगत् क कल्याण करन्हिहार आओर मुक्ति, धन, धर्म आओर परमधामकेँ देवयवाला अछि ।।1।। ज्ञान, वैराग्य आओर योगकलेल सदगुरु आओर संसाररूपि भयंकर रोगक नाश करबालेल देवतासभक बैद (अश्विनीकुमार) जेकाँ अछि|ई श्रीरामचन्द्रजीकेँ प्रेमकेँ उत्पन्न करबालेल माता - पिता छथि आओर सम्पूर्ण व्रत, धर्म आओर नियमसभक बीज छथि ।।2।। पाप संताप आ शोकक नाश करयवाला आओर एहि लोक आओर परलोककेँ प्रिय पालन करन्हिहार छथि|विचार (ज्ञान) रूपि राजाकेँ शुरवीर मन्त्री आओर लोभरूपि आपार समुद्रकेँ सोखबाकलेल अगस्त्य मुनि छथि ।।3।। भक्तगणक मनरूपि वनमे बसयवाला काम, क्रोध आओर कलियुगकेँ पापरूपि हाथीसभकेँ मारबाक लेल सिंहक बच्चा अछि|शिवजीक पूज्य आओर प्रियतम अतिथि छथि आओर दरिद्रतारपि दावानलकेँ बुतयबाक लेल कामना पूर्ण करन्हिहार मेघ छथि ।।4।। विषयरूपि साँपक विष उतारबालेल मंत्र आओर महामणि अछि|ई ललाटपर लिखलगेल कठिनतासँ मेटायवाला अधलाह लेखसभकेँ (मंग प्रारब्ध) मेट देवयवाला अछि|अज्ञानरूपि अन्हारकेँ हरण करबाकलेल सूर्यकिरिणक जेकाँ आओर सेरूपि धानकेँ करबालेल मेघकेँ समान अछि ।।5।। मनोवाञ्छित वस्तु देवयमे श्रेष्ठ कल्पवृक्ष समान अछि आओर सेवा करबामे हरि – हरकेँ जेकाँ सुलभ आओर सुख देवयवाला अछि|सुकविरूपि शरद् ऋतुक मनरूपि आकाशकेँ सुशोभित करबालेल तरेगणक समाने आओर श्रीरामजीक भक्तसभक तँ जीवनधने अछि ।।6।। सम्पूर्ण सुकृतक फल महान भोगक समाने अछि|सेवकसभक मनरूपि मानसरोवरकेँ लेल हंस जेकाँ आओर पवित्र करबामे गंगाजीक तरंगमालाक समाने अछि ।।7।। श्रीरामजीक गुणसभक समूह कुमार्ग, कुचालि आओर कलियुगक कपट, दम्भ आओर पाखण्डकेँ जरयबाक लेल ओहने अछि जेनाँ ईंधनक लेल प्रचंड अग्नि ।।32(क)।। रामचरित्र पूर्णिमाक चानक किरिणक जेकाँ सभकेँ सुख देवयवाला अछि, मुदा सज्जनरूपि कुमुदिनि आओर चकोरक चित्तक लेल तँ विशेष हितकर आओर महान लाभदायक अछि ।।32(ख)।। जाहि तरहेँ श्रीपार्वतीजी श्रीशिवजीसँ प्रश्न कयलन्हि आओर जाहि तरहेँ श्रीशिवजी विस्तारसँ ओकर उत्तर कहलन्हि, ओ सभ कारणेँ हम विचित्र कथाक रचना कय गाबिकय कहब ।।1।। जे ई कथा पहिने नहि सुनने होइथ, ओ एहिकेँ सुनिकय आश्चर्य नहि करौथ|जे ज्ञानी एहि विचित्र कथाकेँ सुनने छथि, ओ ई जानिकय आश्यर्य नहि करैथ कि संसारमे रामकथाक कोनो सीमा नहि अछि (रामकथा अनन्त अछि)|हुनक मनमे एहन विश्वास रहैत अछि। नाना प्रकारसँ श्रीरामचन्द्रजीक अवतार भेल अछि आओर सै करोड आ अपार रामायण अछि ।।2-3।। कल्पभेदक अनुसारेँ श्रीहरिक सुन्नर चरित्रकेँ मुनिश्वरगण अनेको प्रकारसँ गयलन्हि अछि|हृदयमे एहन विचारिकय संदेह जुनि करू आओर आदरसंग प्रेमसँ एहि कथाकेँ सुनू ।।4।। श्रीरमचन्द्रजी अनन्त छथि, हुनक गुण सेहो अनन्त छन्हि आओऱ हुनक कथाक विस्तार सेहो असीम अछि|तेँ जिनक विचार निर्मल छन्हि, ओ एहि कथाकेँ सुनिकय आश्चर्य नहि मानताह ।।3।। एहि प्रकारेँ सभ संदेहसभकेँ फटकिकय आओर श्रीगुरूजीक चरणकमलक रजकेँ माथपर धारणकय हम फेर हाथ जोडिकय सभक विनती करैत छी, जाहिसँ कथाक रचनामे कोनो दोष स्पर्श नहि करय ।।1।। आब हम आदरपूर्वक श्रीशिवजीकेँ माथ नवाकय श्रीरामचन्द्रजीकेँ गुणसभक निर्मल कथा कहैत छी|श्रीहरिक चरणपर माथ राखिकय संवत 1631 मे एहि कथाकेँ आरम्भ करैत छी ।।2।। चैत मासक नौमी तिथि मंगल दिनकय श्रीअयोध्याजीमे ई चरित्र प्रकाशित भेल|जाहि दिन श्रीरामजीक जन्म होईत अछि, वेद कहैत छथि जे ओहि दिन सभटा तीर्थ ओतय (श्रीअयोध्याजीमे) चल आबैत अछि ।।3।। असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि आओर देवता सभ अयोध्याजीमे आबिकय श्रीरघुनाथजीक सेवा करैत छथि|बुझनिकगण जन्मक महोत्सव मनावैत छथि आओर श्रीरामचन्द्रजीक सुन्नर कीर्तिक गान करैत छथि ।।4।। सज्जन सभक बहुत – रास समूह ओहि दिन श्रीसरयूजीक पवित्र जलमे स्नान करैत छथि आओर हृदयमे सुन्नर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजीक ध्यान कय हुनक नाँओक जाप करैत छथि ।।34।। वेद – पुराण कहैत छथि कि श्रीसरयुजीक दर्शन, स्पर्श, स्नान आओर जलपान पापसभकेँ हरैत अछि|ई नदी बड पवित्र अछि, एकर महिमा अनन्त अछि, जाहिकेँ विमल बुद्धि सरस्वतीजी सेहो नहि कहि सकैछ ।।1।। ई शोभयमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजीक परम धाम केँ देन्हिहार अछि, सभ लोकसभमे प्रसिद्ध आओर अत्यंत पवित्र अछि|जगत् मे (अण्डज, स्वेदज, उद्भिज आओर जरायुज) चारिटा खानि (प्रकार) केँ अनन्त जीव छथि , एहिमेसँ जे कियो अयोध्याजीमे शरीर छोरैत छथि ओ फेर संसारमे नहि आबैछ (जन्म-मृत्युकेँ चक्रसँ छूटिकय भगवानकेँ परमधाममे निवास करैत छथि) ।।2।। एहि अयोध्यापुरीकेँ सभ प्रकारसँ मनोहर, सभटा सिद्धिसभकेँ देन्हिहार आओर कल्याणक खान बूझिकय हम एहि निर्मल कथाक आरम्भ कयलहुँ, जाहिकेँ सुनलासँ काम, मद, आओर दम्भ नष्ट भय जाईत अछि ।।3।। एहि नाम रामचरितमानस अछि, जाहिकेँ कानसँ सुनलासँ शान्ति मिलैत अछि|मनरूपि हाथी विषयरूपि दावानलमे जरि रहल अछि, ओ जौं एहि रामचरितमानसरूपि सरोवरमे आबि जाय तँ सुखि भय जाय़ ।।4।। ई रामचरितमानस मुनिसभकेँ प्रिय अछि , एहि सोहनगर आओर पवित्र मानसकेँ शिवजी रचलन्हि|ई तीनू प्रकारक दोष, दु:ख आओर दरिद्रताकेँ आ कलियुगक कुचालिसभक आओर सभटा पापसभक नाश करन्हिहार अछि ।।5।। श्रीमहादेवजी एहिकेँ रचिकय अपन मनमे रखने छलाह आओर सुअवसर पाविकय पार्वतीजीकेँ कहलन्हि|ताहिसँ शिवजी एहिकेँ अपन हृदयमे देखिकय आओर प्रसन्न भय एहिक सुन्नर ‘रामचरितमानस’ नांव रखलाह ।।6।। हम सएह सुख देनहार सोहनगर रामकथाकेँ कहैत छी, हे सज्जनवृंद ! आदरपूर्वक मन लगाकय ई सुनू ।।7।। ई रामचरितमानस जेनाँ अछि, जाहि तरहेँ बनल अछि आओर जाहि हेतुसँ जगतमे एकर प्रचार भेल, आब वएह सभ कथा हम श्रीउमा-महेश्वरक स्मरण कय कहैत छी ।।35।। श्रीशिवजीक कृपासँ ओकर हृदयमे सुन्नर बुद्धिक विकास भेल, जाहिसँ ई तुलसीदास श्रीरामचरितमानसकेँ कवि भेल|अपन बुद्धिक अनुसारेँ तँ ओ एहिकेँ मनोहरे बनावैत अछि|मुदा तखनो हे सज्जनवृंद ! सुन्नर चित्तसँ सुनिकय एहिकेँ अपने सुधारि लेब ।।1।। सगुण लीलाक जे विस्तारसँ वर्णन करैत छथि, वएह राम-सुयशरूपि जलक निर्मलता अछि, जे मलक नाश करैत अछि; आओर जाहि प्रेमभक्तिक वर्णन नहि कयल जा सकैछ, वएह जलक मधुरता आओर सुन्नर शीतलता अछि ।।3।। ओ (राम-सुयशरूपि) जल सत्कर्मरूपि धानक लेल हितकर अछि आओर श्रीरामजीक भक्तसभक तँ जिवने अछि|ओ पवित्र जल बुद्धिरूपि पृथ्वीपर खसल आओर समटाकय सोहनगर कानरूपि मार्गसँ चलल आओर मानस (हृदय) रूपि श्रेष्ठ स्थानमे भरिकय ओतहि स्थिर भय गेल|वएह पुरनाकय सुन्नर, रुचिगर, शीतल आओर सुख देनहार भय गेल ।।4-5।। एहि कथामे बुद्धिसँ विचारिकय जे चारिटा अत्यंत सुन्नर आओर उत्तम संवाद (भुशुण्डि-गरुड, शिव-पार्वति, याज्ञवलक्य-भरद्वाज आओर तुलसीदास आओर संत) रचल अछि; वएह एहि पवित्र आओर सुन्नर सरोवरकेँ चारिटा मनोहर घाट अछि ।।36।। सातटा काण्डे एहि मानस-सरोवरक सुन्नर सातटा सिढी अछि, जिनकी ज्ञानरूपि आँखिसँ देखितहि मन प्रसन्न भय जाइत अछि, श्रीरघुनाथजीक निर्गुण (प्राकृतिक गुणसभसँ अतीत) आओर निर्बाध (एकरस) महिमाक जे वर्णन कयल जायत, वएह एहि सुन्नर जलक अथाह गहराई अछि ।।1।। श्रीरामचन्द्रजी आओर श्रीसीताजीक यश अमृतकसमाने जल अछि|एहिमे जे उपमासभ देल गेल अछि वएह तरंगसभक मनोहर विलास अछि|सुन्नर चौपाईयेसभ एहिमे घनगर पसरल पुरइन (कमलिनी) अछि आओर कविताक युक्तिसभ सुन्नर मणि (मोती) उत्पन्न करन्हिहार सोहनगर सीपसभ अछि ।।2।। जे सुन्नर छन्द, सोरठा आओर दोहासभ अछि, वएह एहिमे बहुरंगा कमलसभक समूह सुशोभित अछि|अनुपम अर्थ, ऊँच भाव आओर सुन्नर भाषे पराग (पुष्परज), मकरन्द (पुष्परस) आओर सुगंध अछि ।।3।। सत्कर्मसभ (पुण्यसभ) केँ पुंज भौंरासभक सुन्नर पाँति अछि, ज्ञान बिराग आओर विचार हंस अछि|कविताक ध्वनि वक्रोक्ति, गुण आओर जाईते अनेको प्रकारक माँछ अछि ।।4।। अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष- ई चारू, ज्ञान-विज्ञानक विचारिकय कहनि, काव्यकेँ नौटा रस, जाप, तप, योग आओर वैराग्यक प्रसंग- ई सभ एहि सरोवरकेँ सुन्नर जलचर जीव छथि ।।5।। सुकृति (पुण्यात्मा) गणलोकनिकें, साधुलोकनिकेँ आओर श्रीरामनामेक गुणसभक गाने विचित्र जलपक्षिसभक समान अछि|संतसभक सभे एहि सरोवरकेँ चारु दिशक अमराई (आमकगाछी) छथि आओर श्रदधा वसंत ऋतुकेँ समान कहल गेल अछि ।।6।। नाना प्रकारसँ भक्तिक निरुपण आओर क्षमा, दया, आ दम (इन्द्रियनिग्रह) लतासभक मण्डप अछि|मनक निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रम्हचर्य आओर अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय आओर ईश्वरप्रणिधान) टा हिनक फूल छन्हि आओर श्रीहरिकेँ चरणमे प्रेमे एहि ज्ञानरूपि फलक रस अछि|ई वेदसभक कहब थीक ।।7।। एहि (रामचरितमानस) मे आओरो जे अनेको प्रसंगसभक कथा सभ अछि , वएह एहिमे सूगा, कोईली आदि रंग-बिरंगक पक्षी अछि ।।8।। कथामे जे रोमाञ्च होईत अछि, वएह वाटिका, बाग आओर वन छथि ; आओर जे सुख होईत अछि, वएह सुन्नर पक्षीसभक विहार अछि|निर्मल मने माली अछि जे प्रेमरूपि जलसँ सुन्नर आँखि द्वारा हुनका पटावैत (सींचैत) अछि ।।37।। जे कियो एहि चरित्रकेँ सरियाकय गाबैत छथि, वेह एहि पोखरिक रखवार छथि आओर जे स्त्री-पुरुष सदा आदरपूर्वक एहिकेँ सुनैत छथि , वएह एहि सुन्नर मानसकेँ अधिकारि उत्तम देवता छथि ।।1।। जे अति दुष्ट आओर विषयी अछि ओ भाग्यहीन बौकला आ कौव्वा अछि, जे एहि सरोवरक समीप नहि जाईछ|किएकतँ एतय (एहि मानस-सरोवरमे) डोका, बेंग आ सेवार जेकाँ विषय-रसक नाना तरहक कथा नहि अछि ।।2।। तेँ बेचारा कौआ आओर बौकलारूपि विषयी लोक एतय आबयसँ हृदयमे हारि मानि जाईत अछि|किएकतँ एहि सरोवरधरि आबयमे बड कठिनाइ अछि|श्रीरामजीक कृपाक बिनु एतय नहि आयल जा सकैछ ।।3।। घोर कुसंगेटा भयानक अधलाह बाट अछि ; तहि कुसंगिसभक वचने बाघ, सिंह आओर साँप अछि|घरक काम-काज आ गृहस्तिक भाँति-भाँतिक जंजाले अत्यंत दुर्गम पैघ-पैघ पहाड अछि ।।4।। मोह, मद आओर माने बड रास बीहड वन अछि आओर नाना प्रकारक कुतर्के भयानक नदीसभ अछि ।।5।। जिनका संगमे श्रद्धारूपि बटखर्चा नहि छन्हि आओर संतसभक संग नहि छन्हि आओर जिनका श्रीरघुनाथजी प्रिय नहि छन्हि, हुनकालेल ई मानस अत्यन्ते अगम अछि|(अर्थात श्रद्धा, सत्संग आओर भगवत्प्रेमक बिनु कियो एहिकेँ नहि पावि सकैछ) ।।38।। जौं कोनो मनुष्य कष्ट उठाकय ओतय धरि पहूँचो जाय तँ ओतय जाइतहि ओकरा नींद्रारूपि जूडि आबि जाइत छैक|हृदयमे मूर्खतारूपि बड कडगर जाड लागय लागैत छैक, जाहिसँ ओतय जाइयोकय ओ अभागा स्नान नहि कय पावैत अछि ।।1।। ओकरा बूतेँ ओहि सरोवरमे स्नान आओर ओकर जलपान तँ कयल नहि जाइछ, ओ अभिमानसहित फिरि आबैत अछि|तखन जे कियो ओकरासँ [ओतयकेँ हाल] पूछय आबैत अछि, तँ ओ [अपन अभागक बात नहि कहि] सरोवरक कुचेष्टा कय ओकरा समझाबैत अछि ।।2।। ई सभटा विध्न ओकरा नहि व्यापैछ (बाधा नहि दैछ) जकरा श्रीरामचन्द्रजी सुन्नर कृपाक दृष्टिसँ देखैत छथि|वएह आदरपूर्वक एहि सरोवरमे स्नान करैत अछि आओर महान् भयानक त्रितापसँ (आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तापसँ) नहि जरैछ ।।3।। जिनक मनमे श्रीरामचन्द्रजीक चरणमे सुन्नर प्रेम अछि, ओ एहि सरोवरकेँ कहियो नहि छोरैछ|हे भाई ! जे कियो एहि सरोवरमे स्नान करय चाही से मन लगाकय सत्संग करौथ ।।4।। एहन मानस सरोवरकेँ हृदयक आँखिसँ देखिकय आओर ओहिमे डुब्बी मारिकय कविक बुद्धि निर्मल भय गेल, हृदयमे आनंद आओर उत्साह भरि गेल आओर प्रेम आ आनंदक प्रवाह उमडि आयल ।।5।। ताहिसँ ओ सुन्नर कवितारूपि नदी बहि गेल, जाहिमे श्रीरामजीक निर्मल यशरूपि जल भरल अछि|एहि (कवितारूपिणी नदी)क नाम सरयू अछि, जे सम्पूर्ण सुन्नर मंगलसभक जडि अछि|लोकमत आओर वेदमत एहिक दूटा सुन्नर किनार अछि ।।6।। ई सुन्नर मानस-सरोवरक कन्या सरयू नदी बड पवित्र अछि आओर कलियुगक [छोट-पैघ] पापरूपि तिनका आओर वृक्षसभकेँ जडिसँ उखारिकय फेकन्हिहार अछि ।।7।। तीनू प्रकारक श्रोतासभक समाजे एहि नदीक दुनू किनारपर बसल पुर, गाँव आओर नगर छथि ; आओर संतसभक सभाएटा सभटा सुन्नर मंगलसभक जडि अनुपम अयोध्याजी छथि ।।39।। सुन्नर कीर्तिरूपि सोहनगर सरयूजी रामभक्तिरूपि गंगाजीमे जा मिलिलन्हि|अनुज लक्ष्मणसहित श्रीरामजीक युद्धक पवित्र यशरूपि सोहनगर महानद सोन ओहिमे आबि मिलल ।।1।। सेवा करबामे [आशुतोष] रबीन्द्र नारायण मिश्र बिहार शराबबंदी कानून भारतीय संविधानक धारा ४७मे वर्णितनीति निर्देशक सिद्धांतक अनुसार राज्य पूर्ण मद्यनिषेधक हेतु प्रयास करत जाहिसँ लोकक जीवनस्तरमे सुधार होएत । यद्यपि संविधानक ई धारा बाध्यकारी नहि अछि तथापि एतबा तँ स्पष्ट अछि जे मद्य निषेध किंवा एही तरहक कोनो कानून संविधानक उपरोक्त भावनाक अनुकूल अछि ।मुदा व्यवहारिक कारणसँ देशक अधिकांश भागमे एहन कोनो कानून आइधरि लागू नहि भेल । बिहारमे सेहो ई कानून बहुत विलंबसँ सन्२०१६मे लागू भेल । मुदा जे कानून बनल से बहुत खोंचाह भए गेल । अपराध आ दंडमे संतुलन नहिरहि गेल । ई बात नहि छैक जे एहि कानून बनलाक बाद किछु फाएदा नहि भेलैक । सरेआम शराब पीनाइ वा नशा करब कम जरूर भेलैक ,मुदा आन-आन समस्यासभ ततेक भए गेलैकजे थोड़बे दिनमे ई कानून एकटा भार भए गेल । बिहारेमे नहि अपितु सौंसे देशमे एहन कतेको लोक अछि जे शराबक चलते अपन परिवारक भरण-पोषण नीकसँ नहि कए पबैत अछि। शराब वा कोनो प्रकारक नशा केनिहार व्यक्ति तकर जोगार करबाक हेतु कोनो हद धरि जा सकैत अछि । ओकरा शराब चाही चाहे जेना होइ । कतेको बेर ई देखल जाइत अछि जे जँ नशेरी वा शराबीकेँ नशा करबासँ केओ रोकैत अछि तँ ओ हिंसक भए जाइत अछि ,विरोध केनिहार पारिवारिक सदस्यक हत्या पर्यंत कए दैत अछि । शराबक नशामे नशेरीसभ अपन घरमे झगड़ा करैत रहैतअछि,अपशब्द तँ बजिते रहैत अछि। एहिसभसँ पारिवारिक माहौल खराप भए जाइत अछि । नेनासभक पढ़ाइ-लिखाइ चौपट भए जाइत छैक,ओकरसभक विकासपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत अछि ।हमर अधीनस्त एकटा कर्मचारी अपन खिस्सा कहलाह जे हुनकर पिता बहुत अधिक शराबक सेवन करैत छलाह । नशा चढ़ि गेलाक बाद ओ बेकाबू भए सभकेँ तंग करैत रहैत छलाह । एकदिन साँझमे ओ परीक्षाक तैयारी करैत छलाह । हुनकर पिता आबि कए भूगोल पढ़बए लगलखिन जखन कि काल्हि भेने इतिहासक परीक्षा हेबाक रहैक । ओ डरे किछु नहि बाजि सकलाह आ परीक्षामे ओही विषयमे असफल भए गेलाह जाहि कारणसँ हुनकर एकसाल बरबाद भए गेलनि । दिल्लीमे हम एहन कैकटा परिवारकेँ उजरैत देखलिऐक । कैक बेर तँ शराबी/ नशेरीक मृत्यु भेलाक बाद परिवार बेसी सुरक्षित आ सुखी भए जाइत अछि। ई बात सर्वविदित अछि जे शराब वा कोनो मादक बस्तुक अभ्यस्त लोककेँ नशाक जोगार चाही चाहे ताहि हेतु ओकरा जे करए पड़ैक। कतेको रिक्सा चालक,मजदूर, वा छोटमोट नौकरी केनिहार लोक नशाक चक्करमे अपन कमाइक अधिकाँश हिस्सा नशा सेवनमे खर्च कए लैत अछि । परिणामतः ओकर घरक स्थिति सदिखन गड़बड़ाएल रहैत अछि । नेनासभ बिलटल रहैत अछि । नशेरीसभक घरक माहौल ततेक विषाक्त भेल रहैत अछि जे ओहिमे के कखन मरि जाएत तकर कोनो ठेकान नहि । कैकबेर तँ विषाक्त शराब पीबि पचासो लोक एकहिठाम सुतले रहि जाइत अछि ।नशा करब गरीबे नहि अपितु ककरो लेल खराप होइत अछि । कैकबेर देखल जाइत अछि जे नशा कए कार चलओनिहार भयंकर दुर्घटनाक शिकार भए जाइत अछि । एहनमे कैकबेर तँ पूरा परिवारे सुडाह भए जाइत अछि । अस्तु,शराब वा अन्यकोनो प्रकारक नशाक नियंत्रण करबाक कोनो प्रयास स्तुत्य अछि । समाजक एहि स्थितिसँ उबारबाक हेतु बिहार सरकार सन् २०१६मे शराबबंदी कानून लागू केलक । कानून बनि गेल आ लागूओ भए गेल । मुदा एकर प्रावधानसभ आवश्यकतासँ बेसीप्रतिशोधी छल । परिणामस्वरुप, लोकसभ शराबक क्रय-विक्रय नुका कए करए लागल । एकबेर हम मधुबनीमे रिक्सापर जाइत रही । ओहि समयमे शराबबंदी कानून बिहारमे लागले रहैक । रिक्साबलाकेँ ओहि कानूनक बारे मे पुछलिऐक । ओ कहलक-“जकरा पीबाक आदति छैक से तँ पीबे करत चाहे ओकरा जे करए पड़ैक । पहिने दस रुपयामे जतेक तारी भेटि जाइत छलैक आब तकर आधा चारिगुना दामपर भेटैत छैक आ नशेरीसभ सेहो कीनैत अछि ,पीबैत अछि।” बिहार शराबबंदी कानून २०१६क धारा ३७क मुताबिक जे केओ कतहु शराब पीबैत अछि वा कोनो नशा करैत अछि वा कतहु निशा केने पकड़ल जाइत अछि तँ ओकरा कमसँ कम पाँच साल आ बेसी सँ बेसी सात सालक जहलक संगे कम सँ कम एक लाख आ बेसी सँ बेसीदस लाखक जुर्माना कएल जा सकैत अछि । तहिना जौँ केओ शराब पीबि कए वा कोनो निशा कए झंझट करैत अछि किंवा हिंसा करैत अछि, अपन घर वा बाहर शराब पीबाक हेतु उत्साहित करैत अछि,स्वीकृति दैत अछि,शराबी लोकनिकेँ अपना घरमे जमा करैत अछि तँओकरा कमसँ कम दस साल आ बेसी सँ बेसी आजन्म जहल आ एक लाख सँ लए कए दस लाख धरि जुर्माना कएल जा सकैत अछि। सन्२०१६मे शराबबंदी कानूनलागू भेलाक बाद तीन सालमे एक लाख सड़सठि हजार आदमी पकड़ल गेल आ बाबन लाख दू हजार अस्सी लीटर शराब जब्त कएल गेल । सबाल ई अछि जे एतेक मात्रामे शराब बनैत कोना अछिआओकरा एकठामसँ दोसर ठाम कोना पहुँचाएल जाइत अछि जखन कि एतेक सख्त कानून पूरा बिहार राज्यपर लागू अछि?एहनो सुनबामे अबैत अछि जेकैकबेर जब्त कएल गेल शराबकेँ पुलिस स्वयं चोरा कए राखि लैत अछि । कैमूर नामक स्थानपरजखनएहने घटना पकड़ल गेल तँ पुलिस कहलक जे मूस शराब पीबि गेल । शराबबंदी कानूनक तहत नार्थ बंगाल स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन बनाम बिहार सरकारक मामिलाक सुनबाइ करैत बिहार सरकारक खिलाफ बहुत सख्त टिप्पणी करैत पटना उच्च न्यायालयकहलथि जे बिहार पुलिस आँखि मूनि कए काज कए रहल अछि आ निर्दोष जनताकेँ बिहार शराबबंदी कानूनक तहत परेसान कएल जाइत अछि ।उपरोक्त मामिलामे बेगुसरायक नार्थ बंगाल स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशनक बस पुलिसएहि लेल जब्त कए लेलक जे ओहिमे एकटा यात्रीक संगमे शराबक बोतल पाओल गेल रहैक । माननीय उच्च न्यायालयक कहब रहनि जे चूँकि बस सरकारी छलैक तेँ ओकरा एना सोझे जब्त नहि करबाक चाहैत छलैक अपितु पुलिसकेँ कुर्कीक प्रकृया करबाक चाही ।पुलिस द्वारा एहि कानूनक तहत कएल जा रहल ज्यादितीक उदाहरण दैत कोर्ट कहलथि जे एकटा बैंक अधिकारी नोएडासँ बंगाल बदली भेलापर अपन घरक समानसभ परिवहन कंपनीक ट्रक द्वारा पठओने छलाह। ओहि ट्रकमे आनो लोकसभक सामान रहैक । पुलिसकेँ ओहि ट्रकमे शराबक बोतल भेटलैक । तकरबाद पुलिस पूरा ट्रकक समानसभ जब्त कए लेलक । परिणामस्वरुप,बैंक अधिकारीकेँ बिना कोनो गलती केनहि बहुत परेसानी भए गेलैक । एहन उदाहरण सभक चर्च करैत कोर्ट कहलथि जे पुलिस बिहार शराबबंदी कानूनक लोकसभकेँ आँखि मूनि कए जहल पठा दैत अछि । जहलसभ एहन लोकसभसँ भरि गेल अछि । कोर्टमे मोकदमाक संख्या बढ़िते जा रहल अछि । पुलिस कार्रवाइकरबासँ पूर्व जँ माथा लगाबए तँ बहुत रास परेसानीसँ लोक बँचि सकैतअछि । बिहार शराबबंदी कानूनक अधीनजहलमे बंद बेसी लोक समाजक निम्न वर्गक छल। जहलमे बंद रहलासँ ओकरसभक परिवारक पालन-पोषण मोसकिल भए गेल । जनता त्राहि माम करए लागल । तकर बाद बिहार सरकार केन्द्र सरकारक अनुमतिसँ आममाफीयोजना आनि बहुत रास कैदीसभकेँ जहलसँ छोड़ि देलकैक । कहक माने जे बिहार शरबबंदी कानूनक दुरुपयोग ततेक भेल जे सरकारकेँ स्वयं ओहि कानूनमे संशोधन करए पड़लैक । न्यायालयसभमे निरंतर बढ़ि रहल केससभक कारण पटना न्यायालय बिहार सरकारसँ पुछबाक हेतु वाध्य भेल जे आखिर दू लाख सड़सठि हजार शराबंदीसँ संबंधित मामिलाकेँ कोना खतम कएला जाएत? कोर्टमे जज एवम् अन्य जरूरी सुबिधाक अभावकेँ देखैत ई एकटा गंभीर समस्या भएगेल अछि ।सितम्बर २०१९ धरि मात्र २६२९ एहन मामिलाक निष्पादन भए सकल छलजखन कि लाखों केस कोर्टसभमे अखनोलंवित अछि । किछुगोटे बिहार शराबबंदी कानूनकेँ पटना उच्च न्यायालयमे चुनौती देलक । उच्च न्यायलय पटना एहि कानूनकेँ निरस्त कए देलक । एहि निर्णयक खिलाफ बिहार सरकार उच्चतम न्यायालयमे अपील केलक । उच्चतम न्यायालय बिहार सरकारक अपीलपर पटना उच्च न्यायालयक आदेशपर रोक लगा देलक । शराबबंदी कानूनक उल्लंघनक मामिलासभ लाखोंमे कोर्टसभमे लंवित अछि । कोर्ट सेहो परेसान अछि । जनता तँ परेसान छलहे । समाजक गरीब लोकसभकेँ एहि कानूनक प्रावधानसँप्रताणना बढ़ि गेलैक ।लोकसभ थाना-पुलिस,कोट-कचहरीक चक्करमे पड़ल रहैत छल । एहिबातसभक जानकारी बिहार सरकारकेँ भेलैक । उपरोक्त कानूनक कैकटा प्रावधानकेँ सन्२०१८मे बिहार सरकार बदलि देलक जाहिसँ लोकके परेसानी कम होइक । असलमे सन्२०१६क कानून ततेक कठोर छल जे लोकसभ परेसान भए गेल ।संगहि एहि कानूनक दुरूपयोगक सिकाइति सेहो सरकारकेँ प्राप्त भेलैक । ताहिसभ बातकेँ ध्यानमे रखैत एहि कानूनमे निम्नलिखित महत्वपुर्ण संशोधन कएल गेल- १.शराब पीबैत पकड़ल गेल व्यक्तिकेँ थानासँ जमानत भेटि सकैत छैक । २.पहिल बेर शराब पीबाक अपराधमे पकड़ल गेल व्यक्ति पचास हजार जुर्माना दए छुटि सकैत अछि । मुदा जुर्माना नहि देला पर तीन मासक कारावास हेतैक । ३.जौँ दोसर बेर केओ शराब पीबैत पकड़ल जाइत अछि तँ ओकरा एक लाख जुर्माना वा एक सालक जहलक दंड हेतैक । ४.शराब पीबैत पकड़ल गेल व्यक्तिक संपति जब्त करबाक प्रावधानकेँ समाप्त कए देल गेल अछि । मुदा शराबकेँ अपन घर वा गाड़ीमे संग्रह करए बला व्यक्तिकेँ कोनो छूट नहि देल गेल अछि । ५.सामुहिक दंडक प्रावधानकेँ समाप्त कए देल गेल अछि । ६.शराब पीबैत पकड़ल गेल व्यक्तिकेँ जिला बदर करबाक प्रावधानकेँ समाप्त कए देल गेल अछि । ७.सन् २०१६मे लागूभेल शराबबंदी कानूनक अनुसार जौँ केओ शराबक संग्रह केने पकड़ल जाइत अछि तँ ओकर परिवारक सदस्य(पत्नी,पति आ आश्रित संतान)केँ सेहो अपराधिक मामिला कएल जा सकैत अछि । संगहि मकान मालिककेँ खिलाफ सेहो अपराधिक मोकदमा कएल जा सकैत अछि । कानूनी प्रावधानक अनुसार अपराध साबित भेला पर कम सँ कम दस सा धरि जहल आ एकलाख जुर्माना कएल जाएत ।पारिवारिक सदस्य किंबा मकान मालिककेँ एहि तरहेँ प्रताड़ित करब भारतीय संविधानक धारा १४ एवम् २१क उल्लंघनहोइत छल ।उपरोक्त कानूनमे २०१८मे कएल गेल संशोधन द्वारा उपरोक्त प्रावधानकेँ हटा देल गेल अछि। ८.जौँ केओ शराब बनबैत पहिल बेर पकड़ल जाइत अछि तँ ओकरा दू साल धरिजहल हेतैक । मुदा दोबाराईगलती केलापर कमसँ कम दस सालक जहल हेतैक । ९.कोनो मकानमे शराब भेटलापर पहिलुका कानूनमे पूरा मकान सील करबाक प्रावधान छल । संशोधनक बाद आब मात्र ओहि कोठरी मात्रकेँ सील कएल जाएत जतए शराब राखल छल । १०.विषाक्त शराब पिलापर भेल मृत्युपर संबंधित दोषी व्यक्तिकेँ फाँसी देबाक प्रावधान कएल गेल अछि । बिहार सरकार शराबबंदी कानूनक उल्लंघनक सिकाइत हेतु टालफ्री फोन संख्या १५५४५ वा १८००३४५६२६८ पर कएल जा सकैत अछि । सिकाइति केनिहारक नाम गोपनीय राखल जाइत अछि । सिकाइति प्राप्त भेलापरओकरा संबंधित पुलिस अधिकारीकेँ कार्रवाइ हेतु अग्रेषित करैत अछि । पुलिससँ प्राप्त जानकारी/ प्रतिवेदनसँ सिकाइत केनिहार व्यक्तिकेँ अवगत कराओल जाइत अछि । जौँ ओ कएल गेल कार्रवाइसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओकर आग्रहपर दोबाराजाँच सेहो कएल जा सकैतअछि । बिहारक अतिरिक्त गुजरात,मिजोराम,नागालैंड आ केन्द्र शासित क्षेत्र लक्षद्वीपमे पहिनेसँ शराबबंदी कानून लागू अछि । मुदा कतहु एहन अव्यवहारिक कानून नहि बनल,ने कतहु कानून बनलाक बाद एतेक उठा-पटक भेल। ओहिराज्यसभमे शराबबंदी कानून लागू भेलासँ लोक शराब पीनाइ छोड़ि देलक से नहि कहल जा सकैत अछि । एहू राज्यसभमेकैकठाम शराबजेना-तेना बिकाइते अछिआ लोक पीबिते अछि । गुजरातमे तँ शराब तरकारी जकाँ घरे-घर पहुँचा देल जाइत अछि। कानून बनओनाइ एकटा बात थिक आ ओकरा लागू भेनाइ दोसर बात । एक सँ एक कानून बनि कए ब्यर्थ साबितभए चुकल अछि । बिआहमे दहेज देबा-लेबाक विरुद्ध कानून कहिआसँ बनल अछि मुदा ई सभ केओ जनैत अछि जे व्यवहारमे एकर बिना साइते कोनो बिआह होइत होइक । जतए सोझा-सोझी टाका नहिओ लेल जाइत अछि ओतहु आन-आन तरहें कन्यापक्षसँ उगाही होइते अछि । कहबाक माने जे सामाजिक क्षेत्रमे सुधार हेतु कानूनक अतिरिक्त चरित्र एवम् व्यक्तित्व निर्माण बहुत जरूरी अछि । तखने समाजमे सुधार भए सकैत अछि,तखने शराबसँ मुक्ति भए सकैत अछि । कैक बेर एहनो देखल जाइत अछि जे शराबीक संतान शराब छुबितो नहि अछि।दिन-राति पारिवारिक कलह देखैत-देखैत एहन नेनाक मोनमे कतहु-ने-कतहु शराब वा अन्य कोनो प्रकारक नशाक घृणा भए जाइत अछि। तकर कैक बेर सकारात्मक प्रतिकृयास्वरुप ओसभ शराबसँ जीवनभरि फटकी रहैत अछि।परिस्थितिवश ओकर व्यक्तित्वमे शराब वा कोनो अन्य निशाक प्रति एकटा अरुचि भए जाइत अछि । एहि बातमे कोनो संदेह नहि अछिजे शराब पीनाइ अधलाह थिक मुदा एकर आदति छोड़ेनाइ पहाड़चढ़ब थिक । जे होइक मुदा कानून बनि गेलासँ एकटा अवरोध तँ भइए गेलैक अछि । आशा अछि जे लोक एहि कानूनक जन कल्याणक भावना बुझैत सरकारकेँआवश्यक सहयोग देताह जाहिसँ एकर उद्देश्यपूर्ति संभव होअत । उमेश मण्डल मैथिली साहित्य-रचनाक क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलक आगमन श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक जन्म 5 जुलाई 1947 इस्वीमे मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे भेलन्हि। हिन्दी ओ राजनीति शास्त्र विषयसँ एम.ए. कए ई अपन जीविकोपार्जन हेतु कृषि कार्यकेँ अपनौलन्हि। एहि प्रसंगमे मण्डलजी स्वयं ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासक ‘अप्पन बात’मे लिखने छथि- “जहिया एम.ए. क विद्यार्थी रही तहिए नोकरीसँ विराग भऽ गेल। आठ बीघा जमीन रहए। खेतीसँ जीवन-यापन करैक बिसवास भऽ गेल। बिनु गार्जनक–पुरुष गार्जनक-परिवार 1960 ईस्‍वीमे भऽ गेल। पितेक अमलदारीसँ दू भाँइ पिसियौत रहै छला। तत्काल गार्जनी हुनके दुनू भाँइपर छेलैन। कोसीक उपद्रवसँ भागल पीसा बेरमे माने सासुरेमे रहि गेल रहैथ‍। ..पिताक मृत्युक समय तीन बर्खक हम आ छह बर्खक जेठ भाय छला। पिसियौत भाए 1960 ईस्‍वीमे अपन गाम ‘हरिनाही’ चलि गेला। दुनू भाय, श्री कुलकुल मण्डल 1954 इस्वीमे आ हम 1957 इस्वीमे गामक स्कूलसँ निकैल अपर प्राइमरी स्कूल कछुबीमे नाओं लिखौने रही। 1960 ईस्‍वीसँ परिवारक बोझ पड़ल। पुरुष विहीन भेनौं माए ओहन परिवारक छेली, जइ परिवारमे मामा 1942 ईस्‍वीमे अंग्रेजक गोली खा चुकल छला। साहसी माए। अपन गहना, जमीन बेच देल बच्चाकेँ पढ़बै खातिर। पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख ‍किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल।” 2000 इस्वी धरि जगदीश प्रसाद मण्डलजी समाजसेवामे संलग्न रहलाह। रूढ़ि एवम सामन्ती व्यवहारक खिलाफ लड़ाइ लड़ैत रहलाह, केस-मोकदमा, जहलयात्रादिमे हिनक लगभग चारि दसक समय बीतिलन्हि, पछाइत साहित्य लेखनमे एलाह। पहिल रचना औपन्यासिक कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’ थिकन्हि जे 2004 ईस्‍वीमे लिखलाह। 2008 इस्वी धरिक अवधिमे पाँच गोट उपन्यास, एक नाटक तथा किछु कथादि लीखि चुकल छलाह। मुदा कोनहु पत्र-पत्रिकादिमे एकहु गोट रचना प्रकाशित नहि भेल रहनि। तथापि हिनक कलम, लिखबाक क्रम जारी रहलन्हि- प्रस्तुत अछि एहि प्रसंगमे हुनकहि लिखल बात- “मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्‍वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन ‍से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटकलावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।” 8 नवम्बर 2008 मे मिथिलाक प्रसिद्ध ‘सगर राति दीप जरय’क 64म कथा गोष्ठी डॉ. अशोक अविचलक संयोजकत्वमे हुनक गाम- रहुआ संग्राम (मधेपुर)मे आयोजित भेल छल जाहिमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी उपस्थित भऽ ‘भैंटक लावा’ कथा केर पाठ कएलनि। एहि गोष्ठीमे भाग लेबाक आग्रह डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’ कयने रहनि। सगर राति दीप जरयक गोष्ठीमे भाग लेबए लेल आयोजक/ संयोजकक हकार अनिवार्य नहि होइछ। कोनहु माध्यमसँ पता चलल वएह थिक हकार। ‘वियोगीजी’सँ जगदीश प्रसाद मण्डलक पहिल भेँट 2008 इस्वीमे मधुबनीमे भेल छलन्हि। साहित्य क्षेत्रमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक पहिल मंच रहुआ संग्राम 64 सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीकेँ कहल जा सकैछ। जाहिठामसँ हुनक रचना सार्वजनिक हएब शुरू भेल। ओना, पहिने बेरमा पंचायत आ रहुआ संग्राम, दुनू मधेपुर ब्लौकक अन्तर्गत पड़ैत छल। जे कि जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कर्म क्षेत्र रहल छन्हि। समर्पित समाजसेवीक क्रिया-कलाप रहल छन्हि। “8.11.2008 लक्ष्मीनाथ गोसाँइक स्थानमे कार्यक्रम भेल छल। ओना, केतेक बेर राजनीतिक मंचपर रहुआमे बाजि चुकल छेलौं, कर्मक्षेत्र छल तँए कथा वचैमे संकोच नइ भेल।” 2008 इस्वीसँ पूर्व जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एकहु गोट रचना सार्वजनिक नहि भेल छलन्हि। कोनहुँ पत्र-पत्रिकादिमे प्रकाशित नहि भेल छलन्हि। पहिल रचना ‘घर बाहर- पटना’सँ प्रकाशित भेलन्हि। जाहि कथाक पाठ रहुआ संग्राममे कयने छलाह, आ प्रशंसा भेल छलन्हि। द्रष्टव्य अछि के सभ प्रशंसा कयने रहन्हि- “डॉ. रमानन्दझा ‘रमण’ जी ओ कथा मांगि लेलैन। किछुए मासक उपरान्त ‘घर बाहर’ पत्रिकामे प्रकाशित केलैन। सिद्ध पुरुषक स्थानमे प्रतिष्ठा भेटल। डायरी-कलम भेटल। गमछा-पाग भेटल। लक्ष्मीनाथ गोसाँइक मुर्ति सेहो भेटल।” घर-बाहरमे एक आर रचना (कथा) प्रकाशित भेलन्हि। पछाति ‘मिथिला दर्शन- कोलकाता’मे ‘चुनवाली’ नामक कथा प्रकाशित भेलनि। चुनवाली, भैंटक लावा आ बिसाँढ़, कथा प्रकाशित होइतहि ‘विदेह’क सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजीसँ सम्पर्क भेलन्हि। तकर बाद मण्डलजीक रचना सभ पुस्तकाकार रूपमे प्रकाशित हुअ लगलन्हि। एहि सन्दर्भमे जगदीश प्रसाद मण्डलजी ‘अप्पन बात’मे लिखलन्हि अछि- “घर बाहर मे भैंटक लावा आ बिसाँढ़ छपल आ फेर मिथिला दर्शनमे ‘चुनवाली’ कथा पढ़िते अनेको बधाइ फोन आएल जेना- पञ्जीकार विद्यानन्द झा जीक। एकटा महत्वपूर्ण फोन श्री गजेन्द्र ठाकुर जीक रहल। हिनकर फोन सुनिते जिनगीक ओहन चौबट्टी टपि गेलौं जे चौबीस घन्टाक खुशी मनमे आबि गेल।” 2009 सँ 2013 इस्वीक बीच जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल छन्हि। जाहिमे हिनका एक्कहु पाइ प्रकाशनक हेतु नहि देबए पड़लन्हि। ई चीज स्पष्ट होइछ दू ठामसँ, पहिल जे लेखक स्वयं अपन ‘तरेगन’ पोथीक मनमनियाँमे लिखने छथि- “समय-समय पर गजेन्द्रजी (श्री गजेन्द्र ठाकुर, मेंहथ) क आग्रह आ सुझाव आ संगहि श्रुति प्रकाशनक श्री नागेन्द्र कुमार झा आ श्रीमती नीतू कुमारीक भरपुर सहयोग भेटलासँ लिखैक नव उत्साहो आ आशो मनकेँ सक्कत बना देने अछि।” आ दोसर ‘अंशु’ समालोचनाक पोथीमे श्री शिव कुमार टिल्लू लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लघुकथा ‘बिसाँढ़’ आ ‘भैंटकलावा’ घर-बाहरमे आ ‘चुनवाली’ मिथिला दर्शनमे प्रकाशित होइते मैथिली पत्रिकाक संपादक मण्‍डलक संग-संग प्रबुद्ध पाठकक मध्‍य हड़होरि मचि गेल। ‘पहिने आउ आ पहिने पाउ’ क आधारपर विदेहक संपादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर हिनक रचना सभकेँ अपन पत्रिकामे छपबए लेल हथिया लेलनि। ऐ ‍प्रकारक शब्‍दक प्रयोग करबाक हमर तात्‍पर्य अछि जे जगदीश जी कोनो नव रचनाकार नै छथि, तिरसठि बर्खक माँजल साहित्यकार छथि, मुदा हिनक रचनाक प्रदर्शन नै भेल छल। समग्र रचना-संसार हिनक पुत्र श्री उमेश मण्‍डल जीक कम्‍प्‍यूटरमे ओझराएल छल किएक तँ छपबैले कैंचा केतएसँ आएत?” एहि तरहेँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आगमन मैथिली साहित्यक दुनियाँमे होइत छन्हि। बिनु पाइक अर्थात् बिनु खर्चेक पोथी प्रकाशन मैथिली साहित्यमे नव उदाहरण छल। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 27 गोट पोथी एक संग श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेलन्हि। वर्तमानमे ओहि तरहेँ पोथीसभक प्रकाशन पल्लवी प्रकाशन, निर्मलीसँ भऽ रहलन्हि अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘गामक जिनगी’ ‘गामक जिनगी’ एक पोथीक नाओं थिक। एहि पोथीक लेखक छथिश्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी। मण्डलजीक ई पहिल कथा संग्रह छियनि। एहिमे 19 गोट कथा संग्रहित अछि। भैंटक लावा कथासँ एहि संग्रहक आरम्भ भेल अछि। एहि कथाकेँमण्डलजी 2004 इस्वीमे लिखलन्हि। पुस्तकाकार रूपमे पोथीक पहिल संस्करण, श्रुति प्रकाशन- नई दिल्लीसँ 2009 इस्वीमे प्रकाशित भेल छन्हि। प्रसिद्ध ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर आ डॉ. सुभाष चन्द्र यादवजी एहि पोथीक आमुखकार छथि। कथा एवं कथाकारक विषयमे लिखने छथि- “वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ जगदीश प्रसाद मण्डलजीक कथा भिन्न अछि। कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। मण्डलजीजीवनमे प्राप्य जिजीविषा, मानवीयता एवं आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनर्प्रष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्राणित छथि।” लेखक मिथिलाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनिहार तथा नव विहान अननिहारलेल एहि पोथीकेँ समर्पित कयने छथि। ‘गामक जिनगी’ पोथीक लोकार्पण प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’क 70म कथा गोष्ठी, कबिलपुर, दरभंगामे, 12.06.2010क डॉ. श्रीमती कमला चौधरी, प्रसिद्ध लेखिका एवम् मैथिली विभागाध्यक्ष, बी.आर.ए.बी.यू. मुजफ्फरपुर द्वारा भेल अछि। वर्तमानमे पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल),सँ एहि पोथीक अग्रिम संस्करण सेहो उपलब्ध अछि। मैथिली साहित्यक एकल पुरस्कार- ‘टैगोर साहित्य पुरस्‍कार’ एवम् पहिल ‘विदेह साहित्य सम्‍मान’सँ एही पोथीपर श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीकेँ सम्मानित कएल गेल छन्हि। गामक जिनगी’ पोथीक अन्तिम पृष्ठपर ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षित ई-पत्रिकाक सम्पदकश्री गजेन्द्र ठाकुरजी लिखलन्हि अछि- “१९४२-४३क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइला (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओइमे नै भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाएल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ ऐ विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, तइ कारणसँ अमर्त्य सेन जकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओत्ते प्रभावित नै भेल हेता। आ एतऽ जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैए।” ‘गामक जिनगी’ कथा संग्रहक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकार श्री मन्त्रेश्वर झा लिखने छथि- “गामक जि‍नगीक सभ कथा ग्राम्‍य जीवनकेँ कि‍छु अनछुअल प्रसंगकेँ मार्मिक चि‍त्रण करैत अछि‍।” प्रस्तुत पोथीमे 19 गोट कथाकेँ कथाकार समायोजित कयने छथि। शब्द संख्या सहित सभ कथा-लेखनक विवरण क्रमानुसार निम्नांकित अछि- 1. भैंटक लावा- शब्द संख्या :3100 2. बिसाँढ़- शब्द संख्या :2516 3. पीरारक फड़- शब्द संख्या :2064 4. अनेरुआ बेटा- शब्द संख्या :3369 5. दूटा पाइ- शब्द संख्या :3294 6. बोनिहारिन मरनी- शब्द संख्या :3412 7. हारि-जीत- शब्द संख्या :2373 8. ठेलाबला- शब्द संख्या :2572 9. जीविका- शब्द संख्या :3655 10. रिक्साबला- शब्द संख्या :3963 11. चुनवाली- शब्द संख्या :2452 12. डीहक बटबारा- शब्द संख्या :4789 13. भैयारी- शब्द संख्या :4026 14. बहि‍न- शब्द संख्या :2688 15. घरदेखिया- शब्द संख्या :4021 16. पछताबा- शब्द संख्या :2663 17. डाक्टर हेमन्त- शब्द संख्या :4407 18. बाबी- शब्द संख्या :2167 19. कामिनी- शब्द संख्या :2289 ‘भैंटक लावा’, कथाकेँ 3100 शब्दमे कथाकार लिखने छथि। कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल मिथिलाक गाममे रहैत छथि। मिथिलाक बहुसंख्य लोकक जीवन कृषि कार्यपर निर्भर अछि। मण्डलजी सेहो किसान छथि, हिनकहु जीविकोपार्जन कृषि छियन्हि। अत: ई अपन पहिल कथा लिखलनि ‘भैंटक लावा’, जाहिमे मिथिलाक किसान-मजूदरक सभसँ पैघ समस्याकेँ चिह्नित कएल गेल अछि। सभकियो जनैत छी जे सभदिनसँ मिथिलांचल बाढ़ि-रौदीक चपेटमे पड़ैत रहल अछि। एहिठाम जहिना रंग-रंगक बाढ़िक रूप अछि, माने बाढ़िक एकरूपता नहि अछि तहिना रंग-रंगक रौदी सेहो अछि। अर्थात् जहिना बाढ़ि नम्हरो होइए आ छोटो होइए तहिना रौदीक सेहो अछि। रामायणिक हिसाबसँ रौदी बारह वर्ष धरिक भेल अछि। किएक तँ बारह वर्षक रौदीक पछाति राजा जनकजी हर जोतने छलाह जाहिमे सीताक जन्म भेल छलन्हि। मिथिलांचलमे अनेको तरहक पहाड़ी नदी सभ बहि रहल अछि। संख्याक हिसाबे करीब दू दर्जन धार (नदी) अछि जे मिथिलाक भूभागमे उत्तरसँ प्रवेश करैत दच्छिन मुहेँ बहि रहल अछि। जाहिमे किछु वरसाती धार अछि बॉंकी अधिकतर धार बारहो मास बहैबला अछि। अर्थात् जहिना बाढ़ि मिथिलांचलक किसानकेँ तोड़ैत रहल अछि तहिना रौदी सेहो किसानक जिनगीकेँ तबाह करैत रहल अछि। जाहिसँ एहिठामक किसानक उन्नैतिक दिशा अवरूद्ध भेल पड़ल अछि। मुदा किछु-किछु ओहन लोक एखनहुँ छथिए जे लाख समस्याक बावजूदो अपन किसानी संस्कृतिकेँ पकड़ि चलि रहला अछि। प्रस्तुत कथा- ‘भैंटक लावा’क लेखन कथाकार 1987 इस्वीक बाढ़िक रूप-रंगकेँ अपना आँखिसँ देखि कऽ कयने छथि। तँए, बाढ़िक एतेक सजीव चित्रण कथाकार कयने छथि। ओ कहैत छथि- “पैछला बाढ़ि मोन पड़िते देह भुटैक जाइए। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइए। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैए। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रूप बना नृत्य करैत। केकरा कहूँ बड़की धार आ केकरा कहूँ छोटकी, सभ अपन-अपन चीन-पहचीन मेटा समुद्र जकाँ बनि गेल। जेमहर देखू तेमहर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दच्छिन-मुहेँ दौगल जाइत। केतेक गाम-घर पजेबाक नइ रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखैर, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल। एहेन भयंकर दृश्य देख लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नइ भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भँसल। जेहने दुरगैत घरक तेहने गाइयो-महींस, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक।” प्रस्तुत कथा मुसना आ जीबछीक माध्यमसँ गढ़ल गेल अछि। मुसना आ जीबछी ओहन परिवारक अछि जकरा सम्पतिक नामपर किछु ने छैक। मात्र अपन हूनरअर्थात्लूरि आ श्रम करैक शक्तिटा छैक। जाहिक बले मुसना आ जीबछी जीवन-यापन करैए। दुर्कालकचलते गामक कतेको लोक आन-आनठाम जा कऽ जीवन-यापनक जोगार करैए मुदा मुसना दुनू परानी गामहिमे रहि अपन भोजनक जोगार ताकि लइए। ई कथाकारक खास विशेषता छन्हि। जे हिनकर पात्र कोनहुँ स्थितिमे भटकैत नहि अछि। एहि प्रसंगमे प्रसिद्ध आलोचक डॉ योगानन्द झा लिखने छथि- ‘मिथिलामे उपलब्‍ध प्राकृतिक उपादानक उपयोगितापर विमर्श प्रस्‍तुत करैत अछि। बाढ़ि‍ आ सुखारसँ पीड़ित मिथिलाक जनसमुदाय अपन जीवन रक्षाक हेतु कोन तरहेँ भैँट, बिसाँढ़, पीरार आदिकेँ अपन मेहनतिक बलेँ खाद्य पदार्थक रूपमे ग्रहन करैत रहल अछि तथा एहिठामक प्राकृतिक संसाधनक उपयोग द्वारा कोना मिथिलाक भूखमरी ओ बेरोजगारीकेँ दूर कएल जा सकैछ, एकर आर्थिक विकास कएल जा सकैछ तकर चित्र एहि तीनू कथामे भेटैत अछि। श्रमपर विश्‍वास, इमानदार प्रयास, कर्मण्‍यता ओ चातुर्यक संबलसँ विपन्नतापर विजयक ई गाथा सभ मिथिलाक लोकजीवनमे व्‍याप्‍त उत्साह ओ संघर्षक मर्मस्‍पर्शी चित्र प्रस्‍तुत करैत अछि। कथाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी प्रस्तुत कथामे समाजक अन्तिम व्यक्तिकेँ अगुआ माने ओहन पात्रकेँ आगाँ आनि निराशाक जीवनसँ निकालि आशावान बना जीवनक चर्च कयने छथि, जकरा अपना किछु ने छैक। 2. ‘बिसाँढ़’कथा गामक जिनगी संग्रहक दोसर कथा थिक। एहि कथाकेँ 2516 शब्दमे लिखल गेल अछि।एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार रौदीक विषद चर्च कयने छथि। जहिना रंग-रंगक बाढ़ि होइएमाने छोटो, मध्यमो आ नम्हरो होइए तहिना रौदी सेहो रंग-रंगक होइए। एहनो रौदी होइए जे एक मौसममे माने वरसातक मौसममे मौनसूनी वर्षा नहि भेने सालक बारहो मासकेँ प्रभावित करैए तँ एहनो रौदी होइते अछि जे दू-साल-तीन-साल धरिकेँ प्रभावित करैबला होइए। जहिना बंगालक 1942 इस्वीक रौदी छल तहिना बिहारमे 1966-67 इस्वीक रौदी सेहो भेल। जाहिसँ मिथिलांचलक किसाने टा प्रभावित नहि भेलाह, किसानक संग बोनिहारो आ मालो-जाल, गाछो-बिरीछ आ चिड़ैयो-चुनमुनी प्रभावित भेबे कएल। बहुतो किस्मक चिड़ै-चुनमुनीक उपटान भऽ गेल। तहिना गाम-गामक मालो-जाल आ गाछो-बिरीछ सुखि गेल जाहिसँ इलाकाक (मिथिलांचलक) चेहरा कुरुप भऽ गेल। प्रस्तुत कथामे कथाकार डोमन आ सुगियाक चर्च कयने छथि।एहि दुनू व्यक्तिक माध्यमसँ रौदीक विषद चर्च करैत कथाकार निराशासँ भरल जिनगीकेँ आशावान बनौलन्हि अछि। कथाकार एक दिसि रौदी-सुखारसँ त्रस्त भऽ गामक लोक ढाका, दिनाजपुरओ मोरंग आदि स्थानपर जा अपन जीविकोपार्जनक तालाश करैबला लोकक चर्चा कएलन्हि अछि तँ दोसर दिसि डोमन ओ सुगियाकेँ गामहिमे रहबाक आ सुगियाक मनक विश्वासक चर्च सेहो कएलन्हि अछि- “जे भगवान जन्‍म देलैन आ मुँह चीरने छैथ‍, अहारो तँ वहए ने देता।” तथा ओ रास्ता तखन साफ भऽ जाइत अछि जखन डोमनकेँ मोन पड़ैत छन्हि जे जहिना माटिक तरमे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ रहै छैक तहिना पुरैनक जड़िमे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनासुरती मुहसँ निकललै- “बाप रे! बाबन बीघाक पोखैरमे तँ केते-ने-केते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनैमे माछो भेटत।” एक पंथ दू काज। मनमे खुशी अबिते डोमन हाक पाड़ि अपन पत्नीकेँ कहलन्हि- “भगवान बड़ीटा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीव-जन्तुकेँ जन्‍म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।” श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक एहि ‘बिसाँढ़’ कथाकेँ लेखन-बिम्बपर ‘विदेह’ प्रथम मैथिली पाक्षित ई-पत्रिकाक सम्पदाक, गजेन्द्र ठाकुरजीअपन ‘प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना’ (भाग-२) मे लिखलन्हि अछि- “१९४२-४३क बंगालक अकालक विषयमे अमर्त्य सेन लिखै छथि जे ऐ अकालमे बंगालमे लाखक लाख लोक मुइला (फेमीन इन्क्वायरी कमीशनक अनुसार १५ लाख) मुदा अमर्त्यक एकोटा सर-सम्बन्धीक मृत्यु ओइमे नै भेल। तहिना मिथिलाक १९६७ ई.क अकालमे भारतक प्रधानमंत्रीकेँ देखाएल गेलन्हि जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अकालसँ लड़ि रहल छथि, मुदा ऐपर कथा लिखल गेल २००९ ई.मे। २००९ ई. मे जगदीश प्रसाद मंडलजी बिसाँढ़पर मैथिलीमे कथा लिखलन्हि। आ ऐ विलम्बक कारण सेहो स्पष्ट अछि। मैथिली साहित्यमे जे एकभगाह प्रवृत्ति रहल अछि, तइ कारणसँ अमर्त्य सेन जकाँ हमरो साहित्यकार सभ ओइ महाविभीषिकासँ ओत्ते प्रभावित नै भेल हेता। आ एतऽ जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा मैथिली कथा धाराक यात्राकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लैए।” एहि कथाक प्रसंगमे समीक्षक शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ अपन पोथी- ‘अंशु’ नामक प्रबन्ध-निबन्धमे लिखने छथि- “बिसाँढ़ कथाक इतिश्री सुखारक मध्‍य एहेन फलक शोधक रूपमे कएल गेल जकरा विषयमे बहुत कम लोक सोचने हेताह।” बिसाँढ़ पुरनि (कमलफूल) गाछक जड़िक सीरमे फड़ैए। जकरा लोक खाइए। ओही बिसाँढ़केँ खा डोमन आ सुगिया रौदीसँ अपन त्राण पबैए। 3. ‘पीरारक फड़’, ई कथा ‘गामक जिनगी’क तेसर कथा थिक। एहि कथाकेँ लगभग 2064 शब्दमे कथाकार गढ़लन्हि अछि। अहू कथामे ओहन लोकक जिनगीकेँ कथाकार सोझमे अनलन्हि अछि जकरा देहक अलावा किछु ने छैक। पिचकुन आ धनिया दुनू परानी पीरारक फड़ आ अनेरूआ माछसँ अपन आर्थिक तंगीकेँ दूर करैत अछि आ जीवनमे सभ किछु जोड़बाक प्रयास सेहो करैत अछि। कथाकेँ पढ़लापर बुझना जाइत अछि जे वास्तवमे प्रकृति अनेको चीज ओहन मनुक्ख लेल उपलब्ध कराओने अछि जकरासँ पाबि मनुक्ख जीवन जीवि सकैए। मुदा मनुक्ख स्वयं ओहन-ओहन चीजसँ बिमुख अछि। एकटा पीरारक गाछक प्रति कथाकारक जे नजरि छन्हि आ ओकर जे वास्तविक रूप अपना एहिठाम छैक तकरा देखल जाए- “एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोरि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकैड़-छुकैड़ गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोल्‍होअना देखभाल भगवानेक ऊपर। तँए पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे केकरो एहसान रूपी कर्ज जिनगीमे नै लेलौं। हरिदम पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झूमैत...। पहिने पाँचो गाछक फूल फुला फड़ बनि झड़ि जाइत, पछाइत फड़ पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अन्तिम अवस्थामे आबि पवन रूपी नौतहारीकेँ पठा चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा-बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धरम रहल। ...ओइ गाछसँ हटिए कऽ लोक अपन खेतक जोत-कोर आदि करैत जे ओइ गाछपर सुगबा साँप रहैए। सुगबा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छै किएक तँ ओ हरिअर-लत्ती जकाँ होइए। जेकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइ छइ। बीचमे केतौ कोनो रूकाबट‍ नै होइए।” सम्पूर्ण कथाकेँ पढ़लापर स्वत: भान होइत अछि जे जौं मनुक्ख लगनसँ कार्य करय तँ सभ किछु सम्भव छैक। एहि कथाक पात्रसभ अछि- धनियाँ, पिचकुन, मुनेसरीआ सोमनी दादी। 4. ‘अनेरुआ बेटा’, 3369 शब्दक कथा अछि। गरीब गृहस्‍त परिवारक कथा थिक। लगभग पचास वर्षक सन्तानहीन गंगाराम एहि कथाक पात्र अछि। गंगाराम हाटसँ अबैकाल जखन एकटा जनमौटी अनेरूआ बच्चाकेँ सड़कक कातमे फेकल देखि कोरामे लऽ कऽ घर अबैत अछि आ घरवालीकेँ कहैत छैक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि।‍” तँ अनायास दुनू परानीक बीच प्रसन्नताक माहौल बनि जाइत अछि। क्रमश: ओइ बच्चाकेँ अपन बेटा जकाँ पोसए-पालए लागल। ओहि बच्चाक नाओं ‘मंगल’ राखल जाइत अछि। आर्थिक विपन्नताक कारणे मंगल चाहक दोकान खोलि लैत अछि। दोकानदारीक संग मंगल अपन पढ़ाइ सेहो करैत अछि। अपन जीवनक अन्तिम समयमे गंगाराम अक्षरस: मंगलकेँ ओकर जन्‍मक सभ बात सुना देने रहैक। मंगल किताबक संग-संग समाजक बेबहारक अध्‍ययन सेहो करय लागल। पछाति मंगल एकटा उपन्यास लिखैत अछि, जकर शीर्षक अछि ‘मरल गाम’, जाहि सम्बन्धमे एक गोट पत्रकार मंगलक बात सुनैत छथि आ ओकरा छापि दैत छथिन। मंगल द्वारा लिखित ‘मरल गाम’क विषयमे सुनि सुनयना नामक एकटा पढ़ल-लिखल नायिका मंगल लग अबैत छथि आ मंगलक प्रतिभासँ प्रभावित भऽ अपन वकील पितासँ दलील दऽ मंगलसँ विवाह करय लेल पिताक सोझमे प्रस्ताव रखैत छथि। एहि कथामे कुल सात गोट पात्र अछि-1. गंगाराम, 2. भुलिया, 3. कबुतरी, 4. मंगल, 5. सम्पादक, 6. सुनयना, 7. ओकील साहैब। जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘रहै जोकर परिवार’मे परिवर्तनक स्वर रहै जोकर परिवार (2020) :एहि पोथीमे संग्रहित कथासभक लेखन 12 मार्च 2020 सँ 20 अप्रैल 2020 धरिक समयावधिमे कथाकार कयने छथि। ‘रहै जोकर परिवार’ कथा संग्रहकेँ पल्लवी प्रकाशन, तुलसीभवन, जे.एल.नेहरूमार्ग, वार्डनं. 06, निर्मली, जिला- सुपौलसँ प्रकाशित कराओल गेल अछि। उक्त पोथीमे संग्रहित सभ कथाक संक्षिप्त विवरण- कथाक शीर्षक, शब्द संख्याआलेखन तिथिनिम्नांकित अछि- 1. दहिबरी- शब्द संख्या : 2560, तिथि : 12 मार्च 2020 2. सघन बन- शब्द संख्या : 2697, तिथि : 17 मार्च 2020 3. हुसैत लोक- शब्द संख्या : 2602, तिथि : 23 मार्च 2020 4. हुसि गेलौं- शब्द संख्या : 2574, तिथि : 28 मार्च 2020 5. झूठक झालि- शब्द संख्या : 2352, तिथि : 01 अप्रैल 2020 6. दुष्टपन- शब्द संख्या : 2317, तिथि : 06 अप्रैल 2020 7. रहै जोकर परिवार- शब्द संख्या : 2297, तिथि : 15 अप्रैल 2020 8. परिपक्व निरलज- शब्द संख्या : 2232, तिथि : 20 अप्रैल 2020 क्रमश: सभ कथाक इंगित परिवर्तनक स्वर निम्नांकित अछि- 1.‘दहिबरी’,कथामे चैतक रान्हल बैशाखमे खेबाक जे परम्परा अपना एहिठाम अदौसँ आबि रहल अछि, तकर गुण-दोषक चर्च कथाकार कएलनि अछि। पूर्वमे जखन अविकसित लोकक अविकसित समाज छल, ताहि समयमे एहि परम्पराक चलैन शुरू भेल। मुदा आजुक समय आधुनिक अछि, जकरा वैज्ञानिक युग सेहो कहल जाइछ। वैज्ञानिक युगमे कोनहुँ वस्तुकेँ व्यवहारिक कसौटीपर देखल जाइत अछि, अर्थात् कोनहु चीजक नीक-बेजाकेँ देखब, वैज्ञानिक दृष्टिकोण सेहो कहबैत अछि। अत: वैज्ञानिक दृष्टिऍं बाइस-तेबाइस भोजनकेँ शरीरक लेल अहितकर मानल गेल अछि। वएह अहितएहि कथाक मूलमे अछि जे परिवर्तनक स्वर बनि गुंजित भेल अछि। 2. ‘सघन बन’,कथामे मनुक्खक अविकसित अवस्थासँ विकसित अवस्था लेल परिवर्तित स्वरक गूंज अछि। जेना-जेना मनुक्खमे जिनगीक विकासक सघनता बढ़ैए, तेना-तेना मनुक्ख साधारण जीवनसँ विशिष्ट जीवनक लेल अग्रसर होइत, विशिष्ट जीवन प्राप्त करैए। ओना, साधारणसँ विशिष्ट बनबाक जे प्रक्रिया अछि ओ सरपट नहि अछि, ओहिमे अनेको अवरोध सेहो अबैत छैक, जकरा प्रस्तुत कथामे नीक जकाँ कथाकार व्यक्त कयने छथि। निष्कर्षत: मनुक्खक साधारण-सँ-विशिष्ट जीवनक जे परिवर्तित स्वरुप अछि ओ एहि कथामे प्रदर्शित भेल अछि। 3. ‘हुसैत लोक’,कथाकेँ कथाकार वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ लिखलन्हि अछि। एखन धरि जे परिवार वा समाज रूढ़िवादी विचारसँ ग्रस्त चालिमे चलैत आबि रहल अछि, जाहिसँ परिवारक संग समाजक नोकसान सेहो होइत रहलैक, तकरा प्रस्तुत कथामे चित्रण करैत आजुक जे परिवेश अछि ताहि परिवेशक अनुकूल कोना परिवार आ समाजक गठन होयतताहि दिशामे कथाकार परिवर्तनक इशारा करैत कहलन्हि अछि- “कानून केहनो मोट-मोट किताबक किए ने हुअए जे ‘वयस्क भेला पछाइत अर्थात् अठारह बरख पुरला पछाइत, अपन-अपन विचारक मालिक सभ होइए, एहि लेल दोसरकेँ एतराज नइ हेबा चाही। मुदा की समाजोमे सएह अछि?” 4.‘हुसि गेलौं’,कथामे कथाकार जीवनक वर्णन करैत कहलन्हि अछि जे जीवन जीवन थिक। जीवनमे सम-विषम परिस्थिति अबैत रहैत छैक। जाहिसँ जीवन प्रभावित होइते अछि। आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक अनेकहु रंगक परिवर्तन जीवनमे होइत अछि। जेहेन परिस्थिति जीवनमे अबैए तेहने विचार आ व्यवहार सेहो बदैलते अछि। एही बिम्बकेँ पकड़ि प्रस्तुत कथामे जागेसर चर्च कएलनि अछि। जागेसर गरीबीक चलते अर्थात् आर्थिक मजबूरी भेलाक कारणे गामसँ दिल्ली गेलाह। किछु समयक पछाति पुन: गाम आबि गामहिमे रहैक विचार मोनमे रोपि लेलन्हि। जुगेसरक जीवनमे जे परिवर्तन भेल वएह एहि कथाक मूलमे अछि जकरा वैचारिक परिवर्तन कहल जा सकैछ। 5. ‘झूठक झालि’,कथाक माध्यमसँ कथाकार एकटा महत्वपूर्ण विचार दिसि इंगित कएलनि अछि। ओ विचार थिक जे आदियेकालसँ अर्थात् वैदिके युगसँ अपना एहिठाम सत्यकेँ छिपेबाक मनोवृत्ति विद्वत समाजक बीच रहल अछि। नारद, कालिदास, मण्डन मिश्र आ तुलसीदासकेँ आधार बना हुनका सभक प्रति जे झूठक प्रतिपादन होइत आबि रहल अछि तकरा चिह्नित करैत कथाकार ओहि झूठक जगह सत्यकेँ कोना स्थापित कएल जाए, ताहि दिशामे अपन विचार रखैत यथोचित परिवर्तनक स्वरकेँ इंगित कएलनि अछि। जाधरि समाजमे झूठक वर्चस्व बनल रहत ताधरि सत्यक संग अन्याय होइत रहत। जकर प्रभाव समाजक विचारधारापर पड़ैत रहत। 6. ‘दुष्टपन’,कथाक माध्यमसँ कथाकार समाजक ओहि मनोवृत्तिकेँ गहराइसँ पकड़ि अपन विचार प्रतिपादित कएलनि अछि जाहिमे दुष्टपनक क्रिया-कलापसँ इष्टपन प्रभावित होइत रहल अछि। आइये नहि, आदिये-कालसँ समाजमे एक दिसि जहिना इष्टपनक विचारधारा रहल अछि तहिना दोसर दिसि दुष्टपनक विचारधारा सेहो रहल अछि। दुष्टपनक जगह इष्टपन कोना स्थापित होयत, ताहि दिशामे कथाकार मण्डलजी गम्भीर चिन्तन-मननक संग महत्वपूर्ण परिवर्तनक विचार व्यक्त कएलनि अछि। ओ कहैत छथि जे जाबत धरि मनुक्खक संस्कारमे परतंत्र पकड़ने रहत ताबत धरि स्वतंत्र विचार दबल रहत जाहिसँ स्वतंत्र रूपे कियो अपन जीवन-यापन नहियेँ कय पाओत। 7. ‘रहै जोकर परिवार’,कथामे यात्राक वृतान्त अछि। एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार मिथिलाक समस्त समाजक ओहि मनोवृत्तिकेँ गहराइसँ पकड़ि प्रतिपादित कएलनि अछि जे मैथिल समाजक कोढ़-करेजकेँ खोखरि-खोखरि सभ दिनसँ खाइत रहल अछि। ओहि मनोवृत्तिसँ कोना समाजक इष्ट हएत, एही परिवर्तनक संग कथाक प्रारूप तैयार कएलनि अछि। कोना समाज अशान्तिसँ शान्तिक बाटपर औताह, कथाक मूल बिन्दु यएह थिक। 8. ‘परिपक्व निरलज’,कथामे कथाकार समाजक ओहि वर्गक लोकक जिक्र कएलनि अछि जे दोहरी चरित्र बना समाजमे अपनाकेँ ठाढ़ कयने छथि। ओहन लोकक विचार आ कार्य दुनूकेँ ताहि रूपेँ प्रतिपादित कएलनि अछि जाहिसँ परिवर्तनक दिशा केर रेखांकन भेल अछि। ओहन दोहरी चरित्रक लोक समाजक वैचारिक धरातलपर ताहि रूपेँ पसरल अछि जाहिसँ समाज दिनानुदिन कमजोर होइत अपन वास्तविक शक्तिसँ दूर भऽ गेल आ जेहो किछु बाँचल अछि सेहो दिनानुदिन क्षीण होइत जा रहल अछि। फलाफल समाजक अस्तित्व दिनानुदिन विकृत होइत जा रहल अछि। जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मुड़ियाएल घर’ मुड़ियाएल घर (2016) :एहि पोथीमे संग्रहित कथासभक लेखन 6 सितम्बर 2016 सँ 28 नवम्बर 2016 धरिक समयावधिमे कथाकार कयने छथि। ‘मुड़ियाएल घर’ कथा संग्रहक पहिल संस्करण 2016 इस्वीमे पल्लवी प्रकाशन, तुलसीभवन, जे.एल.नेहरूमार्ग, वार्डनं. 06, निर्मली, जिला- सुपौलसँ प्रकाशित भेल अछि। एहि पोथीक लोकार्पण दिनांक 31.12.2016क श्री अजय कुमार दास ‘पिन्टु’जीक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क 92म कथा गोष्ठी- नवानी (मधुबनी)मे मंचपर उपस्थित समस्त साहित्यकार एवम् साहित्य प्रेमीगणक द्वारा सामुहिक रूपे भेल अछि। उक्त पोथीमे संग्रहित सभ कथाक संक्षिप्त विवरण- कथाक शीर्षक, शब्द संख्याआलेखन तिथिनिम्नांकित अछि- 1. बगदल गाम- शब्द संख्या :2405, तिथि : 6 सितम्बर 2016 2. बत्तीसोअना- शब्द संख्या :890, तिथि : 8 सितम्बर 2016 3. कचहरिया रोग- शब्द संख्या :1651, तिथि : 12 सितम्बर 2016 4. दिन घटि गेल- शब्द संख्या :2425, तिथि : 5 अक्‍टुबर 2016 5. मुड़ियाएल घर- शब्द संख्या :2352, तिथि : 11 अक्‍टुबर 2016 6. गामक सुरता- शब्द संख्या :2265, तिथि : 19 अक्‍टुबर 2016 7. खतियाएल घर- शब्द संख्या :2057, तिथि : 09 नवम्बर 2016 8. बात-कथा सुनौलक- शब्द संख्या :1889, तिथि : 15 नवम्बर 2016 9. अनका बेर ओंघी- शब्द संख्या :2233, तिथि : 20 नवम्बर 2016 10. देव उठान- शब्द संख्या :2297, तिथि : 24 नवम्बर 2016 11. नमहर घरक चोरि- शब्द संख्या :2397, तिथि : 28 नवम्बर 2016 बगदल गाम’,कथा ‘मुड़ियाएल घर’क पहिल रचना थिक। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी सोच ओ अन्धविश्वाससँ जकड़ल समाजक चित्रकेँ प्रस्तुत करैत अछि। समाजक ओहन व्यक्ति तथा सोचकेँ रेखांकित करैत अछि जे मिथिलाक किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृतिकेँ कमजोर करैत रहल अछि। प्रस्तुत कथाक पात्र- घुरनकेँ देखि ओहि चीजकेँ अकानल जा सकैछ। घुरन, मनहि-मन सोचने छलजे पढ़ाइ समाप्त कएला बाद नोकरी नहि करब। जतेक अपन खेत-पथार अछि, बपौती सम्पति अछि ओहिमे रमि अपन परिवारकेँ ठाढ़ राखब। मुदा से नहि भऽ सकलैक। कारण, कोनहुँ चीजकेँ जाधरि अनुकूल परिस्थित नहि भेटैछ ताधरि ओकर विकास कोना सम्भव भऽ पाओत? ई शाश्वत सत्य थिक। खाएर.., पढ़ल-लिखल घुरन जखन खेतमे पहुँचला कि रंग-बिरंगक कुटि-चौल समाजमे चलए लागल..! खेती-किसानीक विरूद्ध मिथिलामे जे सामाजिक वातावरण रहल ओ किनकहुसँ छिपल नहि अछि। उदाहरणक रूपमे किसानक जिनगी आ खेती-बाड़ीक स्थिति सबहक सोझमे अछिए। ओना, वैचारिक दौरमे अपना एहिठाम कृषि संस्कृतिकेँ बहुत ऊपर मानि लेल गेल अछि। मुदा व्यवहारिक स्थिति ठीक विपरीत अछि। घुरनकेँ छीतन कहलकन्हि- “अहाँ तँ पढ़ल-लिखल छी, अहूँ जखन घासे छिलबै तखन हमरा सन मुरुख आ अहाँ सन पढ़ल-लिखलमे की अन्तर भेल?” खेती-किसानीक संग गाम-घरकेँ छोड़ि घुरन परदेस चलि जाइत अछि। छीतनक बात घुरनकेँ अपना प्रभावमे आखिर लऽ कोना लैत अछि? ई विचारणीय थिक। ‘बत्तीसोअना’,एक पढ़ल-लिखल यात्री गाय-घी लऽ कऽ कुशेश्वर स्थान विदा होइत छथि। ओहिठाम पहुँचए लेल नाहपर चढ़ि कोसी धार टपए पड़ैत छैक। नाहपर बैसल ओ यात्री आ मल्लाह दुइए व्यक्ति रहैत छथि। यात्री पुछलखिन खेबैयाकेँ- “भैया, तूँ फिजियोलोजी जनै छह?” खेबैया बाजल जे ‘नहि जनै छी’, ताहिपर यात्री कहलकनि, तखन तोहर 25 प्रतिशत जिनगी पानिमे चलि गेलह। ..एहिना आरो-आरो ओहन प्रश्न यात्री पुछैत रहल जाहिसँ ओ वेचारे अवगत नहि छल। यात्री कहैत-कहैत 75 प्रतिशत धरि कहि देलकैक जे तोहर जिनगी बेकार भऽ पानिमे चलि गेलह। किछुकालक बाद मौसमक रूखि बगदने नाहक स्थिति बिगड़ए लागल। खेबैया बाजल- “भाय साहैब, तैयार भऽ जाउ, हेलए अबैए?” यात्रीक मुहसँ ‘नहि’ सुनि खेबैया पुन: बाजल- “भाय साहैब, जिनगीक धार उकड़ू-सुकड़ू दुनू चलैए। हम तँ बारहेअना डुमब, मुदा अहाँ बत्तीसोअना डुमब! किए तँ अहाँकेँ पढ़ैओमे बहुत खर्च भेल अछि!!” एहि तरहेँ ‘बत्तीसोअना’ कथा बेस मार्मिक चित्र प्रस्तुत करैत ओहि मानसिकताक विरूद्ध ठाढ़ होइत अछि जे ज्ञानक अर्थकेँ अनर्थ करैत हीनभावनासँ ग्रस्त छथि। ‘कचहरिया रोग’, एहि कथामे मुख्यत: तीन गोट पात्रक चर्च अछि। पहिल श्रीकान्त, दोसर गौरी आ तेसर कथाकार। कथाकार अपनहुँ एक पात्र छथि। श्रीकान्त हालहिमे मोटर साइकिल किनलक ओकरे ड्राइवरियो लाइसेंस आ गाड़ियोक लाइसेंस बनेबाक छेलै, वएह पुरान कचहरिया बुझि हिनका लग (कथाकार लग) आबि कहलकनि जे कनी मधुबनी चलू। मधुबनीमे हिनकर एक संगी कोर्टमे मुंशीक काज करैत छथिन। जनिक नाओं अछि गौरी। कथाकारकेँ गौरी मोन पड़ैत छथिन। मोन पड़िते हुनकापर तामस चढ़ि जाइत छन्हि। तीस वर्ष पहिने गौरी आ कथाकार समेत गामक 28-30 व्यक्ति जमीनक आन्दोलनमे भाग लेने छलाह। ओहि समय गाम-गाममे जमीनक लड़ाइ चलि रहल छल। ईहो सभ जमीनक हेतु लड़ाइ लड़ला केस-मुकदमा चलल। ताहि क्रममे गौरी संकल्पित भेल छलाह जे गामहिमे रहि खेती करब। मुदा कोर्टक दौड़-बड़हासँ लिखै-पढ़ैक लूरि भऽ गेलन्हि आ ओ (गौरी) मुंशीक काज करय लगलाह। यएह सभ चीज कथाकारक स्मृतिमे आबि गेने मोने-मन तामसो उठि जाइत छन्हि। मुदा एक तँ श्रीकान्त भातिज छथिनआ दोसर विवाहमे दहेज नहि लेबक विचार सेहो हिनकर मानि लेने रहनि। दुनू व्यक्ति मधुबनी जा गौरीसँ भेँट कए काज करबैत छथि। आ सॉंझ धरि घुमि कऽ घर आबि जाइत छथि। ‘मुड़ियाएल घर’, उदयपुर गामक जागेश्वर काका आ रमणी काकीक बीचक ई कथा थिक। वाणीश्वरी भगवतीक दर्शनक हेतु दुनू परानी विदा होइत छथि। संगहि उदयपुरक आरो किछु लोक वाणीश्वरी भगवतीक दर्शनक संगबे भऽ जाइत छन्हि। सबा रूपैआ दक्षिणा दए जागेश्वर काका फुटे अपना दुनू परानी लेल एकटा कोठरी भाड़ापर लैत छथि। राति भरि रूकि भोरे स्नान कएडाली सजा भगवतीक पूजा करैत छथि। फलाहार कएला बाद गाम अबैत छथि। कथाक सामान्य पाठ यएह थिक। मुदा कथाक उद्देश्य बेस व्यापक अछि। वाणीश्वरी भगवतीक भक्त वएह छथि जनिक वाणीमे विवेक छन्हि, जनिक स्वर कर्मसँ बान्हल छन्हि। ई चीज कथामे तखन स्पष्ट होइत अछि जखन जागेश्वर काकाकेँरमणी काकी पुछलकन्हि जे गामेक कए गोटे संगे जाए चाहैत अछि वाणीश्वरी भगवतीक स्थान। ताहिपर जागेश्वर काका अपन विचार व्यक्त करैत छथि ओहिमे वाणीश्वरी भगवतीक महात्म्यसँ झलैक उठैत अछि। ओ कहैत छथि- “कहैले तँ सभ (गौंआँ) वाणीश्वरी भगवतीक दर्शन करय जेता मुदा घरसँ बाहर धरिक जे बोली-वाणीक रूप बना नेने छैथ, से की अपने वाणीश्वरी भगवतीक दर्शन करता, ओ तँ अप्पन दर्शन भगवतीकेँ देथिन। मुदा जे हौउ, एके गाममे सभ रहै छी, मुदा...।” जगदीश प्रसाद मण्डलक अर्द्धांगिनी कथा संग्रह (2013) : ‘अर्द्धांगिनी’ बीस गोट कथाक संकलन अछि। एहि पोथीक पहिल संस्करण, 2013 ईस्वीमे श्रुति प्रकाशन- नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशित भेल अछि। प्रसिद्ध कथाकार श्री दुर्गानन्द मण्डलजीक द्वारा एहि पोथीक लोकार्पण, ‘सगर राति दीप जरय’क80म कथा गोष्ठी- मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, निर्मली, (सुपौल),मे 30.11.2013क भेल अछि। एहि पोथीक कथा सभमे नोकरिहाराक जीवनक संत्रास, परिश्रमी कृषकक उल्‍लास, सांस्‍कृतिक पावनि-तिहारमे पैसल अन्‍धविश्वासक, ग्राम्‍य जीवनमे जातीय व्‍यवसायक महत्‍व, क्रमश: टुटैत सम्‍बन्‍ध-बन्‍ध, सामाजिक जीवनक विभिन्न समस्‍या तथा ओकर समाधानक बाट आदिक सूक्ष्‍म विश्लेषण लोकमंगलक कामना देखबामे अबैत अछि। एहि संग्रहक आमुखकार डॉ. योगानन्द झा छथि। डॉ. योगानन्द झा हिनका विषयमे कहैत छथिन- “युगीन समस्‍या ओ समस्‍याक कारण एवम् तकर समाधानक प्रति चिन्‍तनशीलता हिनक वस्‍तु-विन्‍यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि‍ अछि जाहिमे परम्‍परित कथाधाराक आदर्शोन्‍मुख यथार्थवादी दृष्टि‍कोण स्‍पष्ट रूपेँ प्रस्‍फुटि‍त देखि पड़ैछ। मिथिलाक लोकजीवनक उत्‍थानक प्रति सम्‍वेदनात्मक अभिव्‍यक्‍ति‍ कौशलक कारणे मण्‍डलजीक कथा सभ हिनका आधुनि‍क कथाकार लोकनि‍क अग्रि‍म पंक्‍ति‍‍मे ठाढ़ कऽ देलकनि‍ अछि।” वर्तमानमे चारिम संस्करण उपलब्ध अछि। चारिम संस्करण, पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल) सँ प्रकाशित भेल अछि। ‘गामक जिनगी’ पोथीक बाद कथाविधामे मण्डलजीक ई तेसर पोथी छियनि। एहि पोथीमे 20 गोट कथा अछि। जकर विवरण क्रमानुसार कथाक शीर्षक, शब्द संख्या सहित निम्नांकित अछि- 1. दोहरी मारि- शब्द संख्या : 1368 2. केना जीब? - शब्द संख्या : 1039 3. नवान- शब्द संख्या : 2306 4. तिलासंक्रान्तिक लाइ- शब्द संख्या : 2056 5. भाइक सिनेह- शब्द संख्या : 1201 6. प्रेमी- शब्द संख्या : 2526 7. बपौती सम्‍पैत- शब्द संख्या : 2350‍ 8. डंका- शब्द संख्या : 2401 9. संगी- शब्द संख्या : 1849 10. ठकहरबा- शब्द संख्या : 2349 11. अतहतह- शब्द संख्या : 2486 12. अर्द्धांगिनी- शब्द संख्या : 3057 13. ऑपरेशन- शब्द संख्या : 1616 14. धर्मनाथ- शब्द संख्या : 1968 15. सरोजनी- शब्द संख्या : 1810 16. सुभद्रा- शब्द संख्या : 1922 17. सोनमाकाका- शब्द संख्या : 1572 18. दोती बिआह- शब्द संख्या : 1822 19. पड़ाइन- शब्द संख्या : 1970, 20. केतौ नै- शब्द संख्या : 1203 ‘दोहरी मारि’, एहि कथामे अवकाश प्राप्‍त प्रोफेसर गुलाबक मनोविश्लेषण भेल अछि। प्रो. गुलाब कतेको वर्षसँ चीनी रोग तथा ब्‍लड-प्रेसरसँ ग्रस्त छथि। गामक सभ सम्पतिक संग घर-घराड़ी सहित बेचि शहरमे पति-पत्नी एकाकी रहैत छथि। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहैत छन्‍हि।‍ हिनकालोकनि‍क सुधि लेनि‍हार परिवारमे कियो ने छन्‍हि‍। शहरी जीवनक चाकचिक्‍यसँ सम्‍मोहित भऽ प्रो. गुलाब शहरी जीवनकेँ अपनौलन्हि। शुरूमे तँ बड्ड नीक लगलन्हि मुदापछाति जखन शहरी वातावारणक भान भेलन्हि, चोरी-डकैती, लूट-पाट, अपहरण, गन्दगी आदि समस्‍यासँ ग्रस्‍त शहरी वातावरणसँ रू-ब-रू भेलाह तखन ग्राम्‍य जीवनक सौहार्दपूर्ण वातावरणक प्रति आकर्षण जगलन्हि। जखन पुत्र द्वारा ई समाद भेटैत छन्‍हि‍ जे पौत्रक मुड़न घरपर नहि भऽ कऽ वैष्‍णो देवीमे होएतनि‍, जइ लेल हुनकोलोकनि‍केँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटैत छन्‍हि‍ आ ओ अपनाकेँ अशक्‍य बुझैत छथि। टुटल स्वरमे गुलाबबाबू बजैत छथि- “मोबाइल छोड़ि असिरवादो केना दऽ सकब। तीन दिनसँ‍ बजारमे करफू लागल अछि। सिपाहीसँ सड़क भरल अछि। एहेन स्थि‍तिमे घरसँ केना निकलब?” ‘नवान’,ई कथा अर्द्धांगिनी नामक पोथीमे तेसर स्थानपर अछि। नवान कथामे परिश्रमी कृषकक गाथा आएल अछि। अपन परिश्रमक बलेँ अपन भाग्यक निर्माण करैत अछि। एहि कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विभिन्न खण्‍डचित्र उपस्‍थि‍त कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल फड़ देवताकेँ चढ़ायब, गाए बिआएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभिषेक करब आदि। ग्राम्‍य जीवनमे पसरैत जातीय ओ साम्‍प्रदायिक विद्वेष दिस सेहो एहिमे संकेत कएल गेल अछि। मुदा एहि कथामे मिथिलाक लोकजीवनक आर्थिक स्‍थि‍तिकेँ बदहाल करएबला जइ समस्‍यापर विशेष दृष्टि‍नि‍क्षेप कएल गेल अछि, से थिक बाढ़ि‍क समस्‍या। एहि समस्‍याक कारणे मिथिलाक ग्राम्‍य जीवनक आर्थिक व्‍यवस्‍था अस्‍त-व्‍यस्‍त भऽ जाइत अछि। तथापि एहि कथाक नायक आधुनि‍क वैज्ञानि‍क पद्धति अपनाए नव किस्‍मक धान उगबय लगैत अछि, तीमन-तरकारीक नगदी फसि‍ल उपजाबय लगैत अछि आ नूतन नस्‍लक माल-जाल पोसि‍ अपन जीवनकेँ खुशहाल बना लैत अछि। ‘नवान’ कथाक विश्लेषणक क्रममे आमुखकार कहैत छथि- “वस्‍तुत: एहि वैज्ञानि‍क पद्धति द्वारा मिथिलाक कृषकक जीवन समुन्नति भऽ सकैत अछि, से संदेश देब कथाकारक उद्देश्‍य छन्‍हि‍।” ‘तिलासंक्रान्‍ति‍क लाइ’,एहि कथाक माध्यमसँ ग्राम्‍यजीवनमे पसरल अन्‍धविश्वासपर प्रहार कएल गेल अछि। तिलासंक्रान्‍ति‍ एकटा एहन पावनि थिक जे मिथिलाक घर-घरमे मनाओल जाइत अछि। एहि दिनसँ सूर्य उत्तरायण भऽ जाइत छथि आ क्रमश: शीत ऋृतु वसन्‍त आ गृष्म दिस बढ़य लगैत अछि। मुदा एहि पर्वक प्रसाद ग्रहण करबाक हेतु प्रात: स्‍नान जरूरी बूझल जाइत छैक। मिथिलामे ई अपवाद सेहो पसरल छैक जे एहि दिन जे कियो भोरे नदी वा पोखरिमे डूब दैत छथि हुनका नदी-देवता तत्‍काले लाइ धरा दैत छथिन। एही अपवादपर विश्वास कऽ गोपाल नामक एकटा नेना बारहे बजे रातिमे नदीमे डूम देबए चल जाइत अछि आ ठंढसँ ग्रस्‍त भऽ जाइत अछि। एहि कथाक मादे आमुखकार लिखैत छथि- “ग्राम्‍यजीवनक अन्‍धविश्वासी समाजकेँ एहि कथाक माध्‍यमसँ ई संदेश देल गेल अछि जे वस्‍तुत: ई पावनि‍ प्रकृति-परिवर्त्तनपर आधारित अछि आ एहिमे बिनु पाखण्ड कयने लोककेँ अपन सामर्थ्‍यक अनुसार समैपर स्‍नान करबाक चाही, नहि कि अन्‍धविष्वासमे पड़ि रोगग्रस्‍त भऽ जएबाक चाही।” ‘भाइक सि‍नेह’,कथामे शिष्टदेव आ विचारनाथ दुनू भँइ एक दोसराक प्रति अगाध श्रद्धा, भक्‍ति ओ बन्‍धुत्‍वक भाव रखैत छथि मुदा देयादिनी लोकनि‍क बीच खट-पटसँ परिवारमे भिन्न-भिनाउज भऽ जाइत छन्‍हि‍। भिन्न-भिनाउजक मूलमे अर्थसत्तापर कबजा रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक मनमे परस्‍पर प्रेमक भाव जगैत छन्‍हि‍ तँ दुनू एकदोसराक दु:ख बँटबाक हेतु तत्पर भऽ जाइत छथि। आमुखकार लिखैत छथि- “भाइक सिनेह कथामे कृषक जीवनमे पारस्‍परिक सहयोग, सद्भाव ओ शक्‍ति‍क अनुकूल श्रमपर आधारित संयुक्‍त परिवारक उपयोगिताक परम्‍परित अनुगायन देखि पड़ैछ।” जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बजन्ता-बुझन्ता’ बजन्ता-बुझन्ता (2013) :प्रस्तुत पोथी कथाकारक द्वितीय बीहैन कथा-संग्रह थिक। एहि पोथीक पहिल संस्करण; श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ 2013 ईस्वीमे प्रकाशित भेल अछि। 30.11.2013क शनि दिन 80म कथा गोष्ठी- निर्मलीमे अनुमण्डल पदाधिकारी श्री अरूण कुमार सिंहजीक, डॉ. बचेश्वर झा, डॉ. रामाशीष सिंह, प्रो. धीरेन्द्र कुमार, श्री रामजी प्रसाद मण्डल, डॉ. अशोक अविचल आदि विद्वानक संग कथाकार जगदीश प्रसाद मण्डलजीक समक्ष एहि पोथीक लोकार्पण भेल अछि। पछाति, पल्लवी प्रकाशन- निर्मली (सुपौल)सँ सेहो अग्रिम संस्करण प्रकाशित होइत रहल; वर्तमानमे चारिम संस्करण (2018) उपलब्ध अछि। प्रस्तुत संग्रहक प्रत्येक कथा अलग-अलग सामाजिक मुद्दाकेँ लए कऽ बुनल गेल अछि। आजुक परिवेशमे भऽ रहल सामाजिक परिवर्तन ओ उथल-पुथलकेँ एहि संग्रहक सभ कथा किछु-ने-किछु रेखांकित करैत अछि। कहल जा सकैछ,‘बजन्ता-बुझन्ता’ व्यक्तिगत ओ सामाजिक स्तरपर भऽ रहल उथल-पुथलक एकटा दस्तावेज थिक। एहि संग्रहमे 68 गोट बीहैन कथा (Seed Stories) आएल अछि। क्रमश: सभ कथाक शीर्षक निम्नांकित अछि- ‘कचोट’,‘काँच सूत’,‘बुधनी दादी’,‘खि‍लतोड़’,‘मुँह-कान’,‘अनदिना’,‘अपन काज’,‘दूरी’,‘पुरनी भौजी’,‘छुटि गेल’,‘काल्हि‍ दिन’,‘अप्पन हारि’,‘कनफुसकी’,‘मुँहक बात मुहेँमे’,‘कनीटा बात’,‘गति-गुद्दा’,‘बिसवास’,‘कचहरिया भाय’,‘गोहाइर’,‘शिवजीक डाक-बाक्’,‘सोग’,‘पनचैती’,‘कनमन’,‘अजाति’,‘पटोर’,‘फुसि‍याह’,‘गति-मुक्‍ति’,‘चौकीदारी’,‘झगड़ाउ-झोटैला’,‘घबाह ट्यूशन’,‘दादी-माँ’,‘पटोटन’,‘मुसाइ पण्‍डित’,‘भरमे-सरम’,‘देखल दिन’,‘फज्झैत’,‘अकास दीप’,‘बुधि-बधिया’,‘पहाड़क बेथा’,‘उमकी’,‘बजन्‍ता-बुझन्‍ता’,‘चर्मरोग’,‘शंका’,‘ओसार’,‘छोटका काका’,‘सीमा-सरहद’,‘रमैत जोगी बोहैत पानि’,‘गंजन’,‘सजए’,‘घटक बाबा’,‘आने जकाँ’,‘दान-दछिना’,‘उड़हैड़’,‘मत्हानि’,‘मेकचो’,‘झुटका विदाइ’,‘मुँहक खतियान’,‘कोसलिया’,‘हूसि‍ गेल’,‘पोखला कटहर’,‘सरही सौबजा’,‘तेरहो करम’,‘डुमैत जिनगी’,‘चोर-सि‍पाही’,‘दूधबला’,‘टाइपि‍स्ट’,‘समदाही’ आ अन्तिम कथा अछि- ‘बुढ़ि‍या दादी।’ 20 गोट कथाक सामान्य अर्थ प्रस्तुत कएल जा रहल अछि। संग्रह पहिल कथा थिक‘कचोट’,एहि कथामे कथाकार स्वयं एक पात्र छथि आ दोसर पात्र छथि दिनेश। एहि कथामे मध्यम वर्गक मजबुरीकेँ हू-ब-हू देखाओल गेल अछि। ओहन परिवारमे पढ़बाक-लिखबाक इच्छा रहितो विद्यार्थीकेँ जीवन-यापन सम्बन्धी आन-आन काजक मजबूरीमे कोना बाझल रहए पड़ैत छैक, जाहि कारणे स्कूल नहि जा पबैत अछि।तकर नीक चित्रण एहि कथामे दिनेशक माध्यमसँ कथाकार कएलनि अछि। 2. ‘काँच सूत’, कथामे दू जातिक मित्रमे छोट-छीन बात लऽ कऽ आपसी मत-भिन्नताकेँ देखार करैत कथाकार एहि कथामे देखौलन्हि अछि जे एकठाम रहबाक कारणे दू जातिक लोकमे भिन्नता तँ अछि मुदा ओ काँच सूतमे बान्हल अछि जे कखनहुँ टुटि सकैए। 3. ‘बुधनी दादी’, कथामे कथाकार गामक बुढ़-बुजुर्गक दशाकेँ देखेबाक प्रयास कएलनि अछि। धिया-पुता बाहर कमा रहल छन्हि आ ओ बुढ़-बुजुर्ग सभ किछु अछैत असगरूआ जीवन जीबाक लेल अभिशप्त छथि। बुधनी दादी बजलीह- “बुच्ची, जीबैक मन होइए मुदा तेहेन-तेहेन आपैत-विपैत सभ अछि जे होइए तइसँ नीक भरमे-सरमे मरि जाइ।” 4. ‘खिलतोड़’,कथाक माध्यमसँ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीसैद्धान्तिक ज्ञान ओ प्रायोगिक ज्ञानक बीचक अन्तरकेँ बुझेबाक प्रयास कएलनि अछि। संगहि आधुनिक शिक्षा आ ज्ञान प्राप्त केनिहार लोकमे प्रायोगिक ज्ञानक कमी कोन तरहेँ व्याप्त अछि तकरा सेहो एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार चिह्नित कएलनि अछि। एहि कथामे दू गोट पात्र अछि- 1. दिनानाथ, 2. दयाकान्त। 5. ‘मुँह-कान’, कथामे आजुक आर्थिक युगमे कर्जाक चक्रव्यूहमे फँसैत लोकक दशाक वर्णन भेल अछि। सुनरलालआमनधन काका नामक पात्रक बीच एहि कथाकेँ गढ़ि कथाकार इशारा कएलनि अछि जे आर्थिक युगमे कर्जा लेब तँ आसान अछि, मुदा ओकरा वापस करब कठिन किएक भऽ जाइत अछि। 6. ‘अनदिना’, अनदिना कथा आजुक शिक्षा-व्यवस्थाक दुर्दशाक उद्धघाटित करैत अछि। एक तँ स्कूल सभ शिक्षक विहीन अछि आ जे शिक्षक छथियो, हुनकासँ पढ़ाइ-लिखाइसँ बेसी आन-आन काज लेल जाइत अछि, जाहिसँ पढ़ाइ-लिखाइ रसातलमे जा रहल अछि। चहुतरफा ह्रास एकर उदाहरण थिक। रामकिसुन आ अमरनाथ मास्टर साहैब, एहि दू पात्रक बीच कथाकेँ गढ़ल गेल अछि। रामकिसुन कहलकन्हि- “होउ, अहीं सबहक जुग-जमाना छी, जे काटब से काटि लिअ।” रामकिसुनक ‘काटब’ सुनि अमरनाथ अह्लादित होइत बजला- “ठीके ने अहाँ कहै छी। अपना सभकेँ जे सभसँ छोटका दिन अछि, ओइमे कथीक छुट्टी होइए से बुझल अछि?”, रामकिसुन बजलाह- “नहि।” मास्टर साहैब कहलखिन- “बड़ा दिनक!” 7. ‘अपन काज’, कथाकेँ भोला आ कपलेसर नामक दू पात्रक बीच गढ़ल गेल अछि। अपना एहिठामक खेती-बाड़ीक बदलैत परिदृश्यक जीवन्त वर्णन एहि कथामे कएल गेल अछि। किसान पारम्परिक खेती छोड़ि व्यवसायिक खेती दिसि बढ़ि तँ रहल अछि, बढ़ाओलो जा रहल छैक, नीक बात, मुदा ताहि लेल ज्ञानसँ वंचित रहबाक वा रखबाक स्थिति सेहो व्याप्त अछि। ताहू तरफ कथाकार इशारा कएलनि अछि। 8. ‘दूरी’, कथामे बाबा-आ पोताक बीच वार्तालापसँ पति-पत्नीक बीचक नाजुक सम्बन्धक झलक देखाओल गेल अछि। एहि कथामे ई बताओल गेल अछि जे दू अलग-अलग माहौलमे पलल-बढ़ल पुरुख आ स्त्री बीच एहन दूरी रहितो कोना एकहिठाम रहैत अछि। 9. ‘पुरनी भौजी’, एहि कथामे गामक जिनगीक बीच पोता-पोतीक संग एकटा दादी केर दुलार-मलाड़क वर्णन कथाकार कयने छथि। दादी लेल दस बर्खक पोताक प्रश्न- ‘मीरा माने की भेल, दाय’ सँकथाक अन्त होइत अछि। एहि प्रश्नक माध्यमसँ कथाकार इशारा कएलनि अछि जे कोना ज्ञानक सहजता प्रभावित भेल जा रहल अछि। 10. ‘छुटि गेल’, कथाकेँ सावित्रीआ काशीनाथ नामक पात्रक बीच कथाकार मण्डलजी गढ़ने छथि। एक दिसि तँ छोट बच्चीक बाल-सुलभ वार्त्ता छैक, जे अपन बाबा दिया लोकक बजनाइ अपना बाबाकेँ सुना रहल छै, तँ दोसर दिसि बाबाक आत्मज्ञानक वर्णन अछि जे गरियाएब छोड़ि देलखिन्ह। “अबै छेलौं तँ अहाँ-दे लोक सभ बजै छला जे ओ आब केकरो नै गरियबै छथिन।” …गारिक नाओं सुनि सावित्रीकेँ अनुकूल बनबैत काशीनाथ कहलखिन- “बुच्ची, केतेकेँ गरियाएब। अपने मुँह दुखा जाइए। छोड़ि देलिऐ तँए छुटि गेल।” 11. ‘काल्हि दिन’, कथामे कथाकारस्वयं दुनू परानी पात्र छथि। कथाकार एहि कथाक माध्यमसँई बतेबाक प्रयास कएलनि अछि जे छुद्र कारणेँ दूटा गाम अपनहि भीड़ जाइए, लड़ि जाइए। तकर फलाफल नुकसान होइत छैक, जे कतेको लोककेँ व्यक्तिगत आ सामाजिक स्तरपर सेहो भुगतए पड़ैत छैक। कथाकार पत्नीकेँ कहलखिन- “पैछला सालक भोँट दिन की भेलै से अखनो ने बुझै छी। एतबे देखै छी जे दुनू गामक बीच खूब मारि भेल। दुनू गामक लोक झोरा लऽ लऽ कोट-कचहरी करैए। चाहे जेकर गोटी लाल होइ तइसँ हमरा कोन मतलब। छगुन्तामे पड़ल छी जे मारि केलक कोइ, रोजी-रोटी हमर केना छीना गेल, एकठाम रहितो दुनू गामक आबा-जाही किए बन्न भऽ गेल? अपना खेत-पथार अछि जे अपने आगिए-पानियेँ निमहब!” 12. ‘अप्पन हारि’, कथामे कथाकार स्वयं पति-पत्नीक बीचक सम्बन्ध आ धिया-पुताक प्रति माए-बापक व्यवहारक वर्णन कयने छथि। कथाकार बहुत अल्पहि शब्दमे व्यवहारक पूर्ण विवरण प्रस्तुत कएलनि अछि। 32. ‘कनफुसकी’, कथामे गामक दू व्यक्तिक बीच दोस्ती आ ओहि दोस्तीमे नुकाएल अविश्वासकेँ रेखांकन भेल अछि। पहिल व्यक्ति सोहन नामक नवयुवक आ दोसर स्वयं कथाकार एहि कथाक पात्र रूपमे उपस्थित भेल छथि। जे दोस्तीमे नुकाएल नीक-बेजा केर छोट-छीन आलेख सदृश प्रस्तुत करबामे सफल भेल छथि। 13. ‘समदाही’,कथाक माध्यमसँ कथाकार दूटा पत्नी राखैबला लोकक केहन दुर्दशा होइत छै आ ओ कोना दॉंत तरक जीह जकॉं जीबैत अछि, तकर सटीक वर्णन करैत ओकरापर आक्षेप सेहो कएलनि अछि। 14. ‘मुँहक बात मुहेँमे’,कथामे दू गोट पात्र अछि पहिल- बहिरा माएआ दोसर घटक। कथाकार एहि कथामे एकटा माइक वारदुताकेँ देखेबाक प्रयास कएलनि अछि। संगहि गाम-घरमे अजीब आ अजगुत नाओं रखबाक प्रथा दिसि सेहो ध्यान आकृष्ट करयबाक भरपूर प्रयास कएलनि अछि। 15. ‘कनीटा बात’ कथामे विश्वासघातक परिणामकेँ रेखांकित कएल गेल अछि। कथाकार आ पढ़ुआ काका एहि कथाक पात्र छथि। बहुत कम शब्दमे पैघ गप्प रखबाक कलाक प्रदर्शन सेहो एहि कथामे कथाकार कएलनि अछि। 16. ‘गति-गुद्दा’, कथामे दू गोट पात्र अछि, पहिल सुखदेव आ दोसर खुशीलाल बाबा। ई कथा वर्तमान समयमे जे गामक किसानक दुर्दशाक अछि, तकर छोट-छीन दस्तावेज सदृश अछि। सोलह वर्षपर आएल सुखदेवकेँ अपन हाल-चाल खुशीलाल बाबा सुनबैत छथि- “बौआ, ऐठामक गिरहस्तकेँ कोनो गति-गुद्दा अछि। धार माटि दुइर कऽ देलक! कोसी नहर ठीकेदार खा गेल! मौनसूनी बर्खाकेँ रौदी खा गेल! की कहबह..!” एहि कथामे कथाकार ईहो कहबामे पाछू नहि रहला जे खेती-बाड़ी छोड़ि गामसँ शहर पलायन कए नौकरी-चाकरी करैबला लोक आर्थिक रूपेँ किसानसँ बेसी नीक स्थानपर छथि। 17. ‘बिसवास’, कथाक माध्यमसँ कथाकार सम्बन्धक बीचक माया आ ममताकेँ नीक रेखाचित्र खींचलनि अछि। एकटा डॉक्टर जे पूरा दुनियॉंक रोगीक ऑपरेशन करैत अछिओ अपन सखा-सम्बन्धीक ऑपरेशन नहि कए सकैत अछि, किएक तँ शल्य-क्रियाक दौरान माया आ ममताक कारणे छाती दहलि सकैत छन्हि। ई सन्देह डॉक्टर परमेसरकजेठ भाय भागेसरकेँ भेलनि तँए ओ अपन भाएसँ ऑपरेशन नहि करा दोसर डॉक्टरसँ करबौलनि। पुछलापर कहबो केलखिन- “बौआ, अहाँ साधारण श्रेणीक लोक नइ छी जे किछु कहि देब। दू रूपमे ज्ञान काज करै छइ। गुण आ निर्गुण। अहाँ छोट भाए छी, जखन पेट काटितौं तखन छाती दहैलियो सकै छल। मुदा देखैक जे भार देलौं से अही दुआरे जे अपन जेठ भाय बुझि नीकसँ तकतियान करब।” 18. ‘कचहरिया भाय’, कथामे दू गोट पात्र क्रमश: ‘कचहरिया भाय’ आ ‘नीरस’ नामक व्यक्तिक बीच जीवनक अन्तिम अवस्थामे गप्प-सप्प जीवनानुभवक साझा करबौलनि अछि। किछु लोक मोकदमाबाज होइत छथि से पूरा जिनगी ओहि मोकदमाबाजीमे बरबाद कऽ लैत छथि आ बाल-बच्चा सेहो एहि पाछाँ बरबाद भऽ जाइत छन्हि। जकर उदाहरण कचहरिया भाइकेँ बनबैत कथाकार सचेत कएलनि अछि जे कोनहु चीजक आदति नहि हेबक चाही, आदत पश्चातापक कारण होइछ।अत: आवश्यकता भरि मतलब राखक चाही। 19. ‘गोहाइर’, कथामे ‘भगत’क संग ‘कथाकार’ स्वयं एक पात्र छथि। अनुभवात्मक शैलीमे कथाक चित्र प्रस्तुत कए कथाकार देखौलनि अछि जे अन्ध-विश्वासक जालमे फँसल लोकक दशा केहन अछि। संगहि ओहि जालसँ निकलबाक छटपटाहट ओ संघर्षकेँ सेहो कथाकार रेखांकित कएल मुदा पूरा जतन कएलाक उपरान्तहुँ परिस्थितिवश लोक ओहि जालसँ निकलि नहि पबैत अछि, बल्कि उत्तरोत्तर ओहि जालमे ओझराएले रहि जाइत अछि। 20. ‘पनचैती’, कथामे आमजनक बेथा आ ओहि बेथाक मजा लैत सरकारी तंत्र आ राजनेताक खेलवाड़क नीक चित्रण एहि कथामे भेल अछि। प्रसिद्ध इन्दिरा आवास कार्यक्रममे सरकारी तंत्रक घूस-पेंचक सजीव चित्रण करैत कथाकार सोनेलाल बाबाकबेथाकेँ तखन सोझा अनलनि जखन प्रतिनिधि कहलकैन- “आइक युगमे बिना खुऔने-पीऔने काज चलै छइ?” ताहिपर सोनेलाल बाबा अपनाकेँ निहत्था बुझि बजलाह- “ई बात ओइ दिन किए ने कहलौं जइ दिन हमरो हाथमे भोँट छल।” जगदीश प्रसाद मण्डलक दर्जन भरि कथाक सामान्य परिचय श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी प्रस्तुत विधामे बहुत रचना कयने छथि। हिनक कथा लेखनक संसार बेस व्यापक छन्हि। एहिठाम हम दर्जन भरि कथाकेँ अध्यायन कय ओकर सामान्य परिचय, सामान्य अर्थ प्रस्तुत कय रहलहुँ अछि- 1. ‘डीहक बटबारा’,श्रीकान्तआ मुकुन्द दुनू व्यक्ति एकहि परिवारक छथि। पितियौत भैयारी। दुनू व्यक्ति पढ़ि-लिखि कऽ इंजीनियर बनि गामसँ बाहर रहैत छलाह। गाम प्राय: छुटिये गेल छलन्हि। आबजखन अवकाश प्राप्त कएलनि आजीवनक बीचरंग-रंगक समस्या सभ आबए लगलन्हि, अर्थात् शहरी जीवनक मध्य समस्या आदिसँ भेँट हुअ लगलन्हि कि दुनू व्यक्तिकेँ गामक जिनगी आकर्षित केलकन्हि। गाम आबि पहिल कार्य घर बनाएबकेँ आरम्भ करैत छथि जाहिमे अपन-अपन सुविधायुक्त बुद्धिक नीक-जकाँ जहिना इस्तेमाल सभ दिन करैत रहथि तहिना करय लगलाह। पाँच कट्ठाक घराड़ी छन्हि जे बटबारा नहि भेल छल। वएह बटबाराक क्रममे गामक अमीन आ छह-पाँच करएबला लोकक संग फराक-फराक ढंगसँ दुनू इंजीनियर साहैब चाहैत छथि जे हमरा तीन कट्ठा हुअए तँ हमरा तीन कट्ठा हुअए। एही तरहेँ कथा आगू बढ़ैत अछि। गामहुँमे अनेको तरहक लोक छथिए। किछु लोक हिनका सबहक किरदानीसँ छुब्ध भऽ, किछु करय ताहिसँ हमरा कोन मतलबक विचारसँ खाली पश्चाताप कएलक आ किछु लोक ओहनो तँ अछिए किने जे ठककेँ ठकब अपराध नहि मानैए। माने, ओहन लोक अपन-अपन हाथ सुतारए लगल। आ जतयसँ अपराध बोध हुअ लगलैक कि गुरुकाका लग जा कऽ राय-विचार करैत अछि। गुरुकाका- “देखहक, गामक पढ़ल-लिखल वा बिनु पढ़ल-लिखल लोक, पेट भरै दुआरे नोकरी करैले बाहर जाइ छैथ‍, नीक बात। मुदा गामकेँ सोलहन्नी नै छोड़ि दैथ। अखन देखै छी जे अमेरिका, इंग्लैडसँ लोक तीन दिनमे गाम आबि सकै छैथ। तँए सालमे कम-सँ-कम एक्को बेर, नहि तँ हुनको गाम छिऐन, केतेको बेर आबि सकै छैथ। जइसँ गामक लोक आ खेत-पथारक संग सम्बन्ध बनल रहतैन। मुदा से नै कऽ गामकेँ सोलहन्नी छोड़ि, अनतहि घर बना रहए लगै छैथ, ओ गामक दुर्भाग्य छी। जेकर फल होइए गामक ज्ञान निर्यात भऽ जाइए। जइसँ सुतल गाम सुतले रहि जाइए। संगे गामक बेवहार, कला-संस्कृति सभ टुटि जाइए। रिटायर केला पछाइत‍‍ वा जिनगीक अन्तिम अवस्थामे, जँ कियो गाम आबि रहए चाहता तँ हुनका गाम केहेन लगतैन। डेग-डेगपर टक्कर आ बात-बातमे विवाद हेबे करतैन। ..दोसर बात सुनह, अपना गाममे वैदिकजी भेल छैथ। जिनके पोता शुभकान्त छिऐन। वेदक प्रकाण्ड विद्वान वैदिकजी। नाओं तँ छेलैन गंगाधर मुदा वैदिकजी नाओंसँ विख्यात भेला। अपनो राज्यमे आ आनो-आनो राज्यमे जहन‍ पण्‍डितक बीच शास्‍त्रार्थ होइ तँ हुनकर जवाब देनिहार कियो ने ठहरैत। अनेको तगमा आ प्रशस्ति पत्र भेटलैन। अखनो परोपट्टाक लोक हुनके नाओंपर अपना गामक नाओं ‘वैदिकजीक गाम’ बुझैए। हुनके चलौल अपना गामक पानि छी। पहिने पानिक छुआ-छूत अपनो गाममे छल, मुदा ओ सभकेँ बैसार करा कऽ बुझा देलखिन जे दुनियाँमे जेते मनुख अछि, सभ मनुख छी, तँए मनुख-मनुखक बीच छुआ-छूत नै हेबा चाही। थोपड़ी बजा सभ हुनकर विचारक समर्थन कऽ देलक। ओइ दिनसँ पानिक छुआ-छूत गामसँ मेटा गेल। तहिना दोसर भेल जोगिनदर, भिखारी दासक पक्का चेला। अजीब कला हुनकोमे छेलैन। जहिना नचैमे अगिया-बेताल, तहिना गीत गबैमे। जे पार्ट लऽ कऽ स्टेजपर अबैत, धऽ कऽ झहरा दइत। एहेन बिपटा अखन धरि कोनो नाचमे नइ देखलिऐ। ओकरे परसादे गाममे भिखारी दासक नाच केतेको बेर भेल। जहन‍ भिखारी दासक पार्टी छपरासँ पूब-मुहेँ असाम, बंगाल, नेपाल विदा होइ तँ अपने गाममे रूकइ। खाली खेनाइ आ इजोतक खर्च गौंआँक होइ। तहिना जब तीन-चारि मासमे घुमै तँ फेर अँटकै। तहिना भेल महावीर। वेचारा बड़ गरीब छल। नोकरी करैले कलकत्ता गेल। मुदा नोकरी नै कऽ रिक्सा चलबए लगल। अजीब संस्कार ओकरोमे छेलइ। रिक्शो चलबै आ गीतो-कविता बनबै। पहिने तँ लिखल-पढ़ल नै होइ, मुदा अ-आसँ सीखब शुरू केलक। किछुए दिनक पछाइत‍‍ लिखबो आ पढ़बो सीखि लेलक। रिक्सापर जहन‍ चलै तँ अपन बनौल गीत गाबए। एक दिन एकटा साहित्य प्रेमी रिक्सापर चढ़ल रहैथ आ महावीर रिक्शो चलबै आ गीतो गबइ। उतरै काल कवि पुछि देलखिन। सभ बात महावीर कहलकैन। ओ एकटा कवि गोष्ठीमे आमंत्रित कऽ देलखिन। ओइ गोष्ठीमे पहुँच‍ महावीर तीनटा कविता आ दूटा गीत गौलक। तइ दिनसँ ओ कवि गोष्ठीमे आमंत्रित हुअ लगल। बंगाल सरकार दस हजारक पुरस्कार आ प्रशस्तिपत्रसँ सम्मानित केलकैन। तहिना भेल कारी खलीफा। जेकरा इलाकाक लोक खलीफा मानैत। बड़का-बड़का दंगलमे पहुँच ओ आन-आन जिलाक केतेको खलीफाकेँ पटकलक। ओकरा चलैत गाममे कियो केकरो बहु-बेटीकेँ खराब नजैरसँ नै देखैत। एक बेर एकटा घटना जमीनदारक सिपाहीक संग घटलै। एक साए लाठी सिपाहीकेँ समाजक बीचमे मारलकै। तही दिन जमीनदार दू बीघा खेत ओहिना दऽ देलकै। एहेन-एहेन पण्‍डित, कलाकारक बनौल गाम छी, तेकरा हम सभ अपना जीबैत केना दुइर कऽ देबइ। आइ जँ गाम दुइर हएत तँ ऐगला पीढ़ी केकरा गारि पढ़तै। तँए जँ दुनू गोरे मनुख बनि गाममे रहए चाहता तँ बड़बढ़ियाँ, नहि तँ गाममे रहने कियो समाज तँ नहि बनि जाइत।” अमानत भेल। कोनो बेसी झमेल रहबे नहि करैक। पाँच कट्ठाकेँ दू भाग करब। बँटवारा कय रामचन्द्र अमीन बजलाह- “जिनका संदेह हुअए ओ चाहे कड़ीसँ वा फीतासँ वा लग्गीसँ आकि डेगसँ भजारि लिअ।” 4789 शब्दक एहि कथामे आठ गोट पात्रआएल अछि, यथा- 1. श्रीकान्त, 2. मुकुन्द, 3. बुचाइ, 4. रामचन्द्र, 5. खुशीलाल, 6. किसुनदेव, 7. सरूप, 8. गुरु काका। डॉ योगानन्द झा प्रस्तुत कथाक सन्दर्भमे लिखने छथि- श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक ‘डीहक बॅटबारा’, कथामेभ्रष्‍टाचार पूर्वक धन अर्जन कएनिहार समाजक अधोगतिक चित्रांकन करैछ।” 2. ‘भैयारी’, कथामे कथाकार ओहन लोकक चर्च कयने छथि जे परिवारक महत्वकेँ तँ नहियेँ बुझि पौलक जे गामो आ समाजहुसँ दूर भऽ मात्र धन अर्जनकेँ जिनगी बुझि ओहि पाछू लागि जाइत छथि। प्रस्तुत कथाक पात्र कुसुमलाल सेहो यएह कएलक। बी.ए. पास कए मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी शुरू कएलक। कोर्टक बड़ाबाबूक बेटीसँ विवाह भेलैक। मधुबनीए मे डेरा लऽ दुनू व्यक्ति रहए लागल। किछु दिनक पछाति नीक कमाइ हुअ लगलैक। धीरे-धीरे शहरी वसातमे कुसुमलाल उधियाए लागल। शराब पीबैक लत सेहो पकड़ि लेलकैक। विचार कएलक जे गाममे जे अपन सम्पतिक हिस्सा अछि ओ बेचि मधुबनीए आनि ली। सएह कएलक। किछु दिनक पछाति कुसुमलाल बीमार पड़ि जाइत अछि। तखन परिवार आ समाजक महत्वकेँ बुझैत अछि मुदा ताबत बहुत समय ससरि गेल रहैक। मनुक्खक जिनगीए कतेकटा होइए। एहि कथाक प्रसंगमे कैलाश कुमार मिश्र लिखने छथि ओ निम्नांकित अछि- “भैयारी कथा शहरी जीवनक चकाचौंधसँ लोककेँ सावधान करैत अछि। जे ऐ बातकेँ नहि बुझैत छथि आ अपन परम्परा आ संस्‍कारकेँ नै ध्यान मे राखि गामक जमीन जत्‍था बेचि, गामक जड़ि के समाप्त कए जे शहरमे बैस जाइत अछि तकर परिणाम नीक नै होइत अछि।” एहि कथाकेँ बुनबामे कथाकारकेँ चारि हजार छब्बीस गोट शब्द तथा पाँच गोट पात्र, यथा- 1. दीनानाथ, 2. रामखेलौन, 3. सुमित्रा, 4. कुसुमलाल, 5.ऑफिसक एकटा स्टाफ, केर संचयन करय पड़लन्हि। 3. ‘बहिन’,कथाकेँ ‘राधेश्याम’,‘रागिणी’,‘मामा’,‘सुनीता’,‘रीता’,‘डॉक्टर सुधीर’,‘उमाकान्त’, डॉक्टर सुनिता’,‘शबाना’,‘रेहना’ तथा सरोजनी नामक पात्रक माध्यमसँ कथाकार बेस मनोयोगसँ 2688 शब्दमे लिखने छथि। एहि कथाक सन्दर्भमे डॉ. योगानन्द झा समीक्षामे कहने छथि- “बहीन, कथामे सरोजनी नामक वृद्धाक कथा अछि जनिक मृत्‍युक अवसरपर बजाओलो उत्तर हुनक पुत्री रीता हुनक अन्‍ति‍म दर्शनक हेतु नहि अबैत छथि आ व्यस्‍त होएबाक लाथ लगा दैत छथि जखन कि परजातिक मुसलमानि बहिना शबाना हुनका देखबाक हेतु अबैत छथिन। राधेश्‍यामक एहि चिन्‍तनमे सम्‍बन्‍ध-बन्‍धक वास्‍तविकताकेँ उद्घाटि‍त करैत कहल गेल अछि- ‘दुनियाँमे बहिनक कमी नै अछि। लोक अनेरे अप्पन आ बीरान बुझैए। ई सभ मनक खेल छिऐ। हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैमे जे संग रहए, वएह अप्पन।” माता-पिताक प्रति धियापुताक कुभेलाक संगहि एहि कथामे मानवतावादक प्रतिपादन मण्डलजीक लक्ष्‍य बुझना जाइत अछि। उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त वर्गमे सम्‍प्रति विदेश गमनक लिलसा प्रबल देखल जाइत अछि। एहि प्रवृत्ति‍क कारणे ओ लोकनि स्‍वदेश सेवासँ तँ वंचित रहिये जाइत अछि, अपनो जीवनक परिवेश संकुचित बना लैत छथि।” क्रमश: डॉ कैलाश कुमार मिश्र- “बहीन कथाक माध्‍यमसँ मण्‍डलजी कहए चाहैत छथि जे केबल माइयक कोरासँ जन्‍म लेने बहिन या भाए नै भऽ सकैत अछि। एक दिसि जतऽ अपन बेटी अपना कार्यमे अतेक लीन अछि जे मरनासन्न माएकेँ देखबाले समए नै निकालि पाबि रहल अछि ओतहि दोसरठाम माइयक एक मुसलमान सखी हल्‍ला-फंसाद रहितहुँ रातिमे चोरा कऽ बहिनाकेँ देखए अबैत अछि। ई कथा हिन्‍दु-मुसलमानक संग आपसी प्रेमक गंगा-जमुनी प्रवाह कहल जा सकैत अछि। मैथिलीमे ऐ तरहक कथाक रचना हेवाक चाही।” 4. ‘घरदेखिया’,कथा चारि हजार एक्कैस (4021) शब्दक ऑंट-पेटबला कथा थिक, जकरा कथाकार ओहन पात्रक माध्यमसँ लिखलन्हि अछि जकरा कियो ने छैक। लुखिया, जे एक मसोमात छथि। एहि कथामे ‘लुखिया’क अलाबे ‘नागेसर’,‘भुरकुरिया’,‘पीहुआ, पुहुपलाल’,‘डोमन’ आ ‘बुचन’ नामक पात्र आएल अछि। कथाक सन्दर्भमे डॉ. योगानन्द झा लिखलन्हि अछि- “दहेजक सामाजिक समस्‍याक उन्‍मूलनक दृष्टिएँ ‘घरदेखिया’ कथा अत्यन्‍त हृदयस्‍पर्शी अछि। मिथिलाक उच्‍चवर्गीय समाजमे धनलोलुपताक कारणे उत्‍पन्न एहि समस्‍याक कुफल नारी प्रताड़नाक अतिरेकक रूपमे अत्यन्‍त गर्हित स्‍थि‍ति प्राप्‍त कयने अछि जकर कारणे कन्‍याक विवाह एकटा पैघ समस्‍या बनल रहल अछि आ एकर कोनो ठोस समाधान अद्यावधि समक्ष नहि आबि सकल अछि। मण्‍डलजी एहि समस्‍याक समाधान लोकजीवनक वैचारिक परिवर्त्तनकेँ मानैत छथि आ सर्वहारा वर्गक अतिशय दीन पात्र लुखियासँ कहबैत छथि- “नै। हम ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।” लुखियाक एही वाक्‍यमे दहेज समस्‍याक प्रति समाधानक दिशा-बोध होइत अछि।” 5. ‘पछताबा’, कथा भारतीय आजादीक लड़ाइमे योगदान देबयबला, गोली खेलहा परिवारक व्यक्ति शिवनाथक थिक। ओ समय छल। आब शिवनाथक पुत्र- ‘रघुनाथ’ पढ़ि-लिखि कऽ इंजीनियर बनि अमेरिका चलि जाइत अछि। सासुर पक्षसँ एहि तरहक निर्णय लेल प्रोत्साहन भेटैत छैक। बेटाकेँ अपन देश छोड़ि आन देश जएबाक निर्णयसँ शिवनाथकेँ दुख होइत छन्हि। पुछैत छथिन- “किए?तोरा-जोकर काज अपना ऐठाम नइ छइ?” मुदा रघुनाथ किछु ने बाजल आ ने अपना निर्णयमे संशोधन कएलक। उच्च शिक्षा प्राप्त रघुनाथक निर्णयकेँ पिता शिवनाथ स्वीकार करैत चुप रहि गेलाह। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र एहि कथाक समीक्षा करैत कहलन्हि अछि- “पछताबा एक एहेन कथा थीक जकरा माध्‍यमसँ ई कहक प्रयास कएल गेल अछि जे आधुनिक आ तकनीकि शिक्षा प्राप्‍त कए लोक बाहर भागि जाइत अछि। बाहर जाए जीवन मशीन भऽ जाइत छैक। रघुनाथ किछु एहने कार्य केलन्‍हि‍। चलि गेलाह अमेरिका। मुदा अन्‍तमे अपन गलतीक अनुभव भेलन्‍हि‍ आ अपने-आपकेँ बोनिहार-मजदुरसँ निषिह मानए लेल तैय्यार भेलाह- “हमरासँ सइयो गुना ओ नीक छथि जे अपना माथापर घैल उठा मातृभूमि‍क फुलवाड़ीक फूलक गाछ सींचि रहल अछि। अपन माए-बाप समाजक संग जिनगी बिता रहल छथि। आइ जे दुनियाँक रूप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अन्‍ति‍म पड़ावमे पहुँचि आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्‍हैक बुद्धि‍ भेल आ ने गाम समाजकेँ।‍” एहि कथाकेँ 2663 शब्दमे लिखल गेल अछि। जाहिमे कथाकार मात्र तीन गोट पात्रकेँ माध्यम बनौलन्हि, यथा- 1. रघुनाथ, 2. शिवनाथ, 3. रुक्मिणी। 6. ‘डॉक्टर हेमन्त’, एहि कथामे बाढ़िक चपेटमे जनमानसक राँइ-बाँइ होइत परिवार, जिनगी आ जिनगीक संघर्षक परिचय कराओल गेल अछि। संगहि समयपर ओहन लोककेँ मात्र एकटा चिकित्साक सुविधा उपलब्ध कराओने केहन खुशी होइत छैक तकर प्रमाण उपलब्ध करबैत कथाकार गाम-समाजक योगदानकेँ सेहो देखबैत छथि। व्यवहारिक रूपकेँ प्रस्तुत करैत देखा देलन्हि अछि जे एक्कोरती सहयोग भेटने कोना ओहनो परिस्थितिमे, बाढ़िमे अपन बिलटल परिवारकेँ बिसरि लोक समाजक सेवामे लोक तन-मनसँ लागि जाइत अछि। सुलोचनाक परिवार बाढ़िमे दहा गेल, तथापि सुलोचना डॉक्टर साहैबक संग आपदागस्त रोगीक सेवामे लागि जाइत अछि। संगहि एकटा डॉक्टरकेँ अपन कार्यक प्रति वास्तविक रूखिक वर्णन सेहो करैत अछि जाहिमे हुनक असुविधाकेँ सेहो सोझा आनल गेल अछि। कथाकेँ समीक्षा करैत डॉ. कैलाश कुमार मिश्र, प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना (विदेह-सदेह- 10)मे लिखने छथि- “डॉ. हेमन्‍त प्रतिनिधित्‍व करैत छथि ओइ तमाम डाक्‍टर समुदायकेँ जे अपन विधाकेँ मर्यादा बिसरि शहरी जीवन जीबैत अछि, पैसा कमाइत अछि, गाम-घर किंवा दुर्गम स्‍थानमे जेनाइ, जहल जेनाइ किंवा कालापानीक सजा बुझैत अछि। जखन डॉ. हेमन्त कोसि‍कन्‍हामे बसल बाढ़ि‍सँ प्रभावित गाम जाइत छथि तँ एक बारह वर्षक किशोरी सुलोचनाक व्‍यवहार आ गामक लोकक सि‍नेह पाबि ओ कृत-कृत भऽ जाइत छथि। अभावक सि‍नेह कतेक रमनगर आ सुअदगर भऽ सकैत अछि। सुलोचनाक मुँहसँ गाम आ शहरी जीवनक तुलना मि‍रचाइ आ चीनीक कीड़ासँ कए लेखक कहानीमे नव बिम्‍वक रचना करैमे सफल होइत छथि। कथामे सुलोचना डॉ. हेमन्‍तकेँ कहैत छन्‍हि‍- “हम तँ बच्चा छी डॉक्‍टर सहाएब तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तइयो एकटा बात कहै छी। जहिना चीनी मीठ होइत अछि आ मि‍रचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ै छै आ ओइमे जीवन-यापन करैत अछि। मुदा चीनीक कीड़ीकेँ जँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाइए तँ एको क्षण नै जीबित रहल। उचितो भेलै। मुदा की मि‍रचाइक कीड़ाकेँ चीनीमे देलाक बाद जीबित रहत? एकदम नहि रहत। तहिना गाम आ बाजारक जिनगी होइत।‍” कथाकार एहि ‘डॉक्टर हेमन्त’ कथाकेँ कुल छह गोट पात्र, यथा- 1. डॉक्टर हेमन्त, 2. कम्पाउण्डर, 3. रिक्साबला, 4. नैया, 5. सुलोचना, 6 जीयालाल केर माध्यमसँ लिखलन्हि अछि। जाहिमे 4407 शब्दक संचयनक खगता पड़लन्हि। 7. ‘बाबी’, एहि कथा केर पाठसँ स्पष्ट होइछ जे कथाकार हिन्‍दू-मुस्‍लि‍म सरोकारकेँ छठि‍ पावनिक ऐतिहासिक आधारकेँ उजागर करैत एकटा ठोस प्रमाण उपस्थित कएलनि अछि। एहि कथाक समीक्षामे डॉ. कैलाश मिश्रजी लिखलन्हि अछि- “बाबी कथाक माध्‍यमसँ लेखक एक एहेन सामाजिक महिलासँ परिचए करबैत छथि जे ओना तँ अपन नाओं लिखऽ नै जनैत छथि परन्‍तु व्‍यवहार आ बुद्धि‍सँ समस्‍त गाममे पूज्या थीकी। गामक लोक कुनो कार्य हुनका पुछने बिना नै करैत अछि। बाबी सबहक लेल छथि आ सभ बाबी लेल तत्‍पर। कथाक प्रारम्‍भमे एकटा उपमा खाँटी देसी आ औरिजनल लगैत अछि। कातिक मासक वर्णन करैत बाबी कहैत छथि जे ई एहेन मास थिक जैमे लुंगिया मि‍रचाइक घौंदा जकाँ पावनिक घौंदा अछि। एहेन उपमा हमरा अन्‍यत्र नै भेटल अछि। अही कथामे “पथियामे दूटा नारियल, पान छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमनि, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आंगन पहुँचि बाबीक आगूमे रखि बाजलि- बाबी अपनो डालीले आ हिनको-ले नेने एलिएनि हेँ।” ई कथा हिन्‍दु-मुसलमानक बीच प्रेम आ सांस्‍कृतिक एकताक कड़ी थीक। अपन बेटा रहमत जे कि बच्चामे बीमार भऽ गेलैक आ बाबी ओकरो लेल छठि‍ मइयासँ कबुला कऽ देलथिन्‍ह, तँए ओकर माए बाबीक माध्‍यमसँ पाँच वर्ष धरि निष्‍ठाक संग छठि‍ मनबैत अछि। ओहिना उपास, सभ चीजक पालन, छठि‍क प्रति आस्‍था। बाबी जखन खरनाक खीरक प्रसाद रहमतक माएकेँ दैत छथिन्‍ह तँ ओ खुशीसँ नाचि उठैत अछि। छठि‍ मइयाकेँ गोर लगैत छन्‍हि‍ आ बेटाकेँ निरोग जिनगी जीबैक आशा सेहो लगा लैत अछि।” कथाकेँ 2167 शब्दमे ‘बाबी, ‘सिरखरियावाली’, ‘रहमतक माए’ आ सोनरेवाली नामक पात्रक बीच कथाकार लिखलन्हि अछि। 8. ‘कामिनी’,कथामे कथाकार ओहन चित्र प्रस्तुत केलाह अछि जाहिमे लालबाबू सन लोकक किरदानी स्पष्ट भेल अछि। लालबाबू एहि कथाक एक पात्रक नाओं अछि जे नारीकेँ नारी नहि बुझि माने मनुक्ख नहि बुझि मनोरंजनक साधन बुझैत छथि। आ भैयाकाका सन लोक ओहन मनुक्खकेँ चिह्नित नहि कए पबैत छथि जाहिसँ भयानक परिणामक कामिनीकेँ भोगय पड़ैत छन्हि। भैयाकाकाकेँ अपन बेटी- कामिनी केर विवाह पाँच लाख रूपैआ खर्च कएलाक उपरान्तो बुझि पड़ैत छन्हि जे हम अपन बेटी-संग कंजुसाइ कएलौं हेँ। भैयाकाका अपना मुहेँ स्वीकार करैत छथि- “हमरा दस बीघा खेत अछि। तेकर बादो केते रंगक सम्‍पैत अछि। गाछ-बाँस, घर-दुआर, माल-जाल इत्‍यादि। मुदा ऐ सभकेँ छोड़ि दइ छी। खाली खेतेक हिसाब करै छी। अपना गाममे दस हजार रूपैए कट्ठासँ लऽ कऽ साठि हजार रूपैए कट्ठाक जमीन अछि। ओना, सहरगंजा जोड़बै तँ पैंतीस हजार रूपैए कट्ठा भेल। मुदा हम्मर एक्कोटा खेत ओहेन नै अछि जेकर दाम चालीस हजार रूपैए कट्ठासँ कम अछि। बेसियोक अछि। मुदा चालिसे हजारक हिसाबसँ जोड़ै छी तँ आठ लाख रूपैए बीघा भेल। दस बीघाक दाम अस्सी लाख भेल। तीन भाए-बहिन अछि। हमरा लिए तँ जेहने बेटा तेहने बेटी।” एहि कथामे पात्र सभ आएल अछि- ‘भैया काका’, ‘कथाकार’,‘कथाकार केर माय’,‘लालबाबू’, ‘मृगनयनी’, ‘मुरही बेचयवाली एक वृद्ध महिला’ तथादुखपुर गामक अनेको घसवाहिनी। 9. ‘ओ दिन’, एहि कथामे गामक झगड़ा, झंझट मारि-पीट आ केश-फौदारीक चर्चा भेल अछि। फगुआक दिन सुवल, किरण, अरूण, तरूण, वरूणआ करूण एकठाम बैस विचारैत अछि जे आशा नहि छल जे समाजक मरण भऽ जाएत। तरूण बजैत अछि- “भाय सहाएब, अनेरे तरङे छी, आब कि ओ दिन रहल जे मरद-औरत, धिया-पुता सभ मिलि गेबो करत, खेबो करत आ रंगो-अबीर खेलत।” गाममे केश-मोकदमाक चलते विषाक्त वातावरण बनि गेल अछि, ताहिमे आपसी प्रेम, भायचारा इत्यादि समाप्त भऽ गेल रहैत अछि। 10. ‘उरीन’,ई बुधना काकाक बेथा-कथाक कथा थिक। जकरा कथाकार फराक अन्दाजमे लिखलन्हि अछि। कथा अमैया भारसँ शुरू होइत अछि। जहिना लोक माए-बापक क्रिया-कर्म कएला पछाति ऋणसँ उरीन होइत अछि तेनाहिते बेटा-बेटीक विवाह कएलापर सन्तानक ऋणसँ सेहो उरीन होइत अछि। बुधना काकाक तेसर बेटीक विवाह छल। बुधना काकाकेँ दूटा पुत्र छन्हि, दुनू गामसँ बाहर रहि नौकरी करैत छन्हि। दुनू पुत्र अपन-अपन पत्नीकेँ सेहो अपना लगहिमे रखने छथि। तेसर बेटीक विवाहमे बुधना काकाकेँ दुनू पुत्रमे सँ क्यो ने गाम आएल आ ने आर्थिक सहयोग केलकन्हि। बुधना काका गाइक खटालक नाओंपर बैंकसँ तीन लाख टाका कर्ज उठा कए बेटीक विवाह कएलनि। 11. ‘देखौंस’, कथामे किसानी कर्मक उत्तराधिकारपर रघुवीर बाबा आ गौरीनाथक बीच गप्प भेल अछि। रघुवीर बाबा आब 80 वर्षसँ बेसी उम्रक भेलापर अपन जीवनक अन्तिम समयक कल्पना करैत छथि। एहेन गौरीनाथसँ अपन अन्तिम समयमे देखभालक कामना राखैए। मुदा गौरीनाथ रघुवीरबाबाकेँ अपन गुरु जकाँ मानैत अछि। ओ सामाजिक जीवनमे स्वीकार करैए जे जेँ हम बाबाक देखौंस केलौं तेँ हमरा खेती करबाक लूरि भेल। 12. ‘हेराएल जिनगी’, कथामे ओहन लोकक गप्प आएल अछि जे नियमित रूपे अपन कार्यकेँ सम्पादन करैत अपन जिनगीसँ बहुत उम्मीद तँ रखैत छथि, मुदा तेहन भऽ नहि पबैत छन्हि। हीरानन सुभ्यस्त किसानक पढ़ुआ बेटा छथि। हीरानन बी.एस-सी. धरि पढ़ि पबैत छथि मुदा कोनहुँ नोकरी नहि भऽ पबैत छन्हि। देखिते-देखिते हुनक बेटा-बेटी सेहो बालिग भऽ जाइत छन्हि। अपन पैतृक, साढ़े तीन बीघा जमीनक बदौलति हीरानन अपन बेटीक कन्यादान करब आ बेटाकेँ एम.बी.ए. कराएब असम्भव लगैत छन्हि। हीराननकेँ अपन जिनगी हेराएल सन लगैत छन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डलक औपन्यासिक कृति मैथिली साहित्यमे उपन्यास लेखनक आरम्भ होइत अछि 1914 इस्वीसँ। अनेकहु उपन्यासकार विद्वान लोकनि अपन-अपन औपन्यासिक कृतिसँ एहि विधाक सजबैत रहलाह। 1960 ईस्वीसँ पूर्व धरि मैथिलीमे निम्न-लिखित उपन्यासक सृजन भऽ चुकल छल- ‘निर्दयी सासु’ (1914), ‘शशिकला’ (1915), ‘पूर्ण विवाह’ (1926) ‘दुरागमन रहस्य’ (1946), ‘कलयुगी सन्यासी’ (1921),‘रामेश्‍वर’ (1915), ‘ सुमति’ (1918), ‘मनुष्‍यक मोल’ (1924) ‘चन्द्रग्रहन’ (1933),‘कन्यादान’ (1933), ‘चामुन्‍डा’ (1933), ‘मालती-माधव’ (1935) ‘सोन्‍दयोपासनक पुरस्कार’ (1938), ‘सुशीला’ (1943) ‘असहाया जाया’ (1945), ‘दुरागमन’ (1945), ‘जैबार’ (1946),‘पारो’ (1946),‘नवतुरिया’ (1956), ‘कुमार’ (1946), ‘भलमानुस’ (1947), ‘कला’ (1946), ‘विकास’ (1946), ‘चन्द्रकला’ (1950), ‘प्रतिमा’ (1950), ‘मधुश्रावनी’ (1956),‘वीरकन्या’ (1950), ‘विदागरी’ (1950), ‘अनलपथ’ (1954), ‘विद्यापति’ (1960), ‘कृष्णहत्या’ (1957), ‘रत्नहार’ (1957), ‘आन्‍दोलन’ (1958), ‘दुर्वाक्षत’ (1958), ‘आदिकथा’ (1958), ‘चानोदय’ (1959), ‘बिहाड़िपात-पाथर’ (1960) क्रमश: अनेकहु उपन्यासक सृजन अद्यतन भऽ रहल अछि आ आगूओ होइत रहत। कोनहु भाषा-साहित्यक सभसँ महान विधा उपन्यासकेँ मानल जाइछ। एहि विधाक श्रीवृद्धिमे मिथिलाक अनेकहु विद्वान उपन्यासकार लोकनि अपन-अपन अमूल्य योगदान दैत रहलाह अछि। जाहिसँ मैथिली साहित्यक उपन्यास-विधाक भण्डार दिनो-दिन विशाल होइत गेल अछि। एहि कड़ीमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी सेहो दू हजार इस्वीसँ रचना करय लगलाह। अन्यान्य विधाक संग उपन्यास विधामे सेहो हिनक योगदान महत्वपूर्ण अछि। अल्प समयावधिमे मण्डलजी दर्जन भरिसँ ऊपर उपन्यासक रचना कय सम्बन्धित विधाक श्रीवृद्धिमे योगदान कएलनि अछि। 1. मौलाइल गाछक फूल (2009), 2. उत्थान-पतन (2009), 3. जिनगीक जीत (2009), 4. जीवन-मरण (2010), 5. जीवन संघर्ष (2010), 6. नै धाड़ैए (2013), 7. बड़की बहिन (2013), 8. ठूठ गाछ (2015), 9. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं (2017), 10. लहसन (2018), 11. पंगु (2018), 12.आमक गाछी (2018), 13. भादवक आठ अन्हार- (अपूर्ण), 14. सधवा-विधवा- (अपूर्ण) क्रमश: सभ उपन्यासक पोथी परिचय द्रष्टव्य अछि- 1. मौलाइल गाछक फूल (2009):मण्डलजीक ई पहिल औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2004 इस्वीमे कयने छथि। लेखन कार्यक आरम्भक सन्दर्भमे उपन्यासकार अपन मंतव्य व्यक्त कयने छथि- “मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्‍वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन‍ से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।” प्रस्तुत उपन्यास, ‘मौलाइल गाछक फूल’क पहिल संस्करण 2009 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ भेल प्रकाशित अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। 03.04.2010क जनकपुर (नेपाल) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 69म कथा गोष्ठी आयोजित भेल छल। जाहिमे ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासक लोकार्पण डॉ. रामावतार यादव, प्रसिद्ध भाषाविद्, डॉ. रामानन्द झा ‘रमण’, डॉ. राजेन्द्र ‘विमल’, श्री राजाराम सिंह ‘राठौर’ तथा मंचस्थ अन्य विद्वान लोकनिक द्वारा भेल अछि। उपन्यासकारक समर्पण भाव विराट रूपमे अंकित भेल अछि। निम्नांकित हुनक समर्पण भावकेँ देखल जाए- “मिथिलाक वृन्‍दावनसँ लऽ कऽ बालुक ढेरपर बैसल फुलबाड़ी लगौनिहार तथा नव विहान अननिहारलेल...।” ई पोथी समर्पित अछि। एहि उपन्यासमे 13 गोट पड़ाव अछि। ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासमे उपन्यासकार समाजक विराट रूप प्रस्तुत कएलनि अछि। निम्नांकित 65 गोट पात्रक माध्यमसँ एहि उपन्यासकेँ मण्डलजी पूर्ण कएल- 1. बौएलाल, 2. रूपनी, 3. रधिया, 4. अनुप, 5. नथुआ, 6. मुसना, 7. रमाकान्त,8. शशि शेखर, 9. हीरानन्द, 10. अतिथि (मटकन) 11. सोनेलाल, 12. सोनेलालक बहिन, 13. सोनेलालक सारि, 14. फुद्दी, 15. सुगिया, 16. ड्राइवर, 17. झाड़ूबला, 18. डॉक्टर बनर्जी, 19. कम्पाउण्डर, 20. रमापति दास, 21. गंगा दास, 22. बुचाइ दास, 23. जुगेसर, 24. डॉक्टर महेन्द्र, 25. डॉक्टर रविन्द्र, 26. श्यामा, 27. डॉक्टर सुजाता, 28. डॉक्टर जमुना, 29. रमेश, 30. ब्रह्मचारीजी, 31. सुमित्रा, 32. रोगही, 33. कबुतरी, 34. बेंगबा, 35. राम प्रसाद, 36. टिकट मास्टर, 37. पैटमेन, 38. टमटमबला, 39. सुबुध, 40. सुकन, 41. मुनमा, 42. प्रधानाध्यापक, 43. विवेक बाबू, 44. राजिन्दर, 45. गुलबिया, 46. मंगल, 47. नवानीवाली, 48. किशोरी, 49. बुधनी, 50. सोमनी,51. बौका, 52. लखना, 53. बिलटा, 54. श्रीचन, 55. रूदल, 56. भज्जु, 57. झोली, 58. कुशेसरी, 59. मंगल, 60. एकटा ढेरबा बचिया, 61. ललबा, 62. सितिया, 63. जोखन, 64. भालेसर, 65. सोनमा। प्रस्तुत उपन्यासक परिचय दैत प्रसिद्ध साहित्यकारएवम् ‘विदेह’ ई पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुर ‘प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना’ (भाग-२) मे लिखलन्हि अछि- “जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मौलाइल गाछक फूल’ गामक, गामसँ पड़ाइनक आ गलल व्यवस्थाक पुनर्जीवनक लेल समाधानक उपन्यास अछि।” प्रसिद्ध रचनाकार स्व. जीवकान्त एहि उपन्यासक भाषाक विषयमे प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना (विदेह-सदेह- 10)मे लिखलन्हि अछि- “पोथीक भाषा खाँटी लो‍कक भाषा थिक, कि‍ताबी भाषा नहि‍‍ थिक। सेहो एकटा विशि‍ष्‍ट आ महत्‍वपूर्ण बनबैत छैक। साहि‍त्यमे एहेन घर-आँगनक पात्र नहि आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि‍।” प्रसिद्ध समीक्षक/आलोचक डॉ. योगानन्द झा एहि उपन्यास तथा उपन्यासकारक सन्दर्भमे लिखलन्हि अछि- “श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘मौलाइल गाछक फूल’ उपन्यासमे भाषाक कुशल ओ रचनात्मक प्रयोग भेल अछि जाहिसँ वर्णनमे सटीकता, सहजता, बिम्‍बधर्मिता, स्‍पष्टता ओ मनोवैज्ञानि‍क विश्‍लेषणक क्षमता प्रदर्शित होइत अछि। अपन गुणक कारणेँ मण्‍डलजीक कथा संसारमे विश्‍वसनीयता देखि पड़ैत अछि आ ओ अपन प्रौढ़ विचार ओ अनुभूतिकेँ पाठकीय मानसमे स्‍थानान्‍तरित करबामे सफल भेल छथि। अन्‍तत: महेन्‍द्रक उक्‍ति‍- ‘समाज रूपी गाछ मौला गेल अछि, ओहिमे तामि, कोड़ि, पटा नव जिनगी देबाक अछि जाहिसँ ओहिमे फूल लागत आ अनवरत फुलाइत रहत’मे उपन्‍यासक उद्धेश्‍य स्‍फुट भेल अछि। स्‍वभावत: मण्‍डलजी एहि कृतिक माध्‍यमे ग्राम ओ ग्रामेतर जीवनक संगहि व्‍यक्‍ति‍, परिवार, समाज ओ राष्‍ट्रक अभ्‍युन्‍नतिक हेतु एकर प्रत्‍येक इकाइकेँ त्‍याग ओ समर्पणक भावनासँ ओत प्रोत रहबाक आदर्श जीवन पद्धति अपनयबाक संदेश देलनि‍ अछि। हिनक ई संदेश ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्‍तु नि‍रामया:, सर्वे भद्राणि‍ पश्‍यन्‍तु मा कश्‍चि‍द् दु:खभाग भवेत्’क भावनाक पुन: उपस्‍थापन थिक।” एही कड़ीमे प्रसिद्ध समीक्षक श्री दुर्गानन्द मण्डल अपन ‘चक्षु’ पोथीमे उक्त उपन्यासक परिचय एहि तरहेँ प्रस्तुत कयने छथि- “मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यासमे सहजता, समरसता, यथार्थवाद, आदर्शवाद, धर्मभिरूता, एकल एवम् संयुक्‍त परिवारक रूप-रेखा खींच एकटा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण रूपमे उपन्‍यासकार हमरा लोकैनक मध्‍य उपस्थि‍त छैथ। हुनक ई विधासँ उपन्‍यास जगतमे एक्केठाम सभ तरहक सुख, आनंदक अनुभव होइत छैन। आजुक समाज जे सभ तरहेँ मौलाएल अछि। अपना उपन्‍यासक मादे उपन्‍यासकार मात्र एक आदमी रमाकान्‍तबाबूक हृदय परिवर्त्तन कऽ समाजमे एकटा नवका फूल खिलेबामे शत्-प्रतिशत सफल भेला अछि। रमाकान्‍त बाबू द्वारा अपन दू साए बीघा जमीन- सबहक माथपर एकहक बीघा खेत अर्थात् जेकरा सात गो बेटा ओकरा सात बीघा दऽ सभकेँ एकटा नव जिनगी प्रदान करैत छैथ। एक नव जिनगी जे पूर्णत: मौलाएल छल ओइमे फूल खिला दैत छैथ। हमरा आशा नै अपि‍तु विश्वास अछि जे श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी सन उपन्‍यासकार होथि आ रमाकान्‍तबाबू सन नायक तँ अपन समाज रूपी मौलाएल गाछ, मौलाएल नै अपि‍तु फूलसँ लदि सकैत अछि।” 2. जिनगीक जीत (2009) : जिनगीक जीत उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक द्वितीय औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि कयने छथि। मुदा पुस्तकाकार रूपमे एकर पहिल संस्करण ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ 2009 इस्वीमे प्रकाशित भेल छन्हि। वर्तमानमे एहि पोथीक अग्रिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ सेहो प्रकाशित अछि। ‘जिनगीक जीत’ उपन्यासकपहिल संस्करण केर लोकार्पण कबिलपुर (दरभंगा)मे भेल अछि। डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’क 70म कथा गोष्ठी 12.06.2010क आयोजित छल जाहिमे डॉ. मोहन मिश्रजी प्रस्तुत उपन्यास (जिनगीक जीत)क पहिल संस्करणक लोकार्पण कयने छथि। एहि उपन्यासक आमुखमे मैथिलीक सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. तारानन्द ‘वियोगी’ लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलजीक साहित्यमे मिथिलाक ग्रामीण समाजक अद्भुत चित्र आएल अछि। मैथिलीमे एहि वस्तुक खगता सभ दिनसँ रहल अछि। हमरा लोकनि अक्सरहां चिन्तित होइत रहै छी जे गाम उजरि रहल अछि, गामक सम्बन्धमे जतबे जे किछु लेखन भऽ रहल अछि से निगेटिभ फोर्ससँ भरल अछि, अधिकाधिक हताश करऽ बला अछि। हमरा लगैत अछि जे जीवनमे देखबाक जे दृष्टिकोण जगदीशजीक छनि से आम मैथिली साहित्यकारक दृष्टिकोणसँ फराक छनि तेँ ओ एहन चित्र रचि पबैत छथि जे सामान्यसँ हटि कऽ अछि।” वरीय साहित्यकार श्री मन्त्रेश्वर झा लिखैत छथि- “जइ ‍ गाम घरक कथा सभ मण्डलजी उठाए ओकरा परि‍णति‍ तक पहुँचओने छथि‍ तइ गाम घरक एतेक सूक्ष्‍म आ वि‍स्‍तृत वि‍वरण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ऐसँ पूर्व कमे भेल अछि‍।” उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकार,‘विदेह’ ई पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरजीफ्लैपमे लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डल शिल्‍पी छैथ, कथ्यकेँ तेना समेट‍ लइ छैथ‍ जे पाठक विस्मि‍त रहि जाइत अछि। मुदा हिनका द्वारा कथ्यकेँ (कथा, उपन्‍यास, नाटक, प्रेरक-कथा सभमे) उद्देश्‍यपूर्ण बनेबाक आग्रह आ क्षमता हिनका मैथिली साहित्यमे ओइ स्थानपर स्थापित करैत अछि, जेतए-सँ मैथिली साहित्यक इतिहास ‘जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व’ आ ‘जगदीश प्रसाद मण्डलसँ’ ऐ दू खण्डमे पाठित होएत। समाजक सभ वर्ग हिनकर कथ्यमे भेटैत अछि आ से आलंकारिक रूपमे नै वरन अनायास, जे मैथिली साहित्य लेल एकटा हिलकोर एबाक समान अछि। हिनकर कथ्यमे केतौ अभाव-भाषण नै भेटत, सभ वर्गक लोकक जीवन शैलीक प्रति जे आदर आ गौरव ओ अपन कथ्यमे रखै छैथ से अद्भुत।” एहि उपन्यासमे 15 गोट पड़ाव अछि। ‘जिनगीक जीत’ उपन्यासमे उपन्यासकार समाजक अन्तिम व्यक्ति अर्थात ओहन व्यक्ति जकरा देह छोड़ि किछु ने छैक, तकरा सभक माध्यमसँ अपन विराट भाव-भूमिकेँ प्रतिपादित कएलनि अछि। उपन्यासकार एहि उपन्यासकेँ लिखबामे निम्नांकित पात्र सभकेँ अनलन्हि अछि- “1. मखनी, 2. रूमा, 3. सुमित्रा, 4. बचेलाल, 5. पल्हैन‍, 6. अछेलाल, 7. जुगाय, 8. भुखनी, 9. दीनमा, 10. देवन, 11. भुटकुमरा, 12. राधाकान्त, 13. गुलेतिया, 14. रमुआ, 15. बुधनी, 16. नसीवलाल, 17. सजन, 18. जोगिन्दर, 19. फुसियाहा, 20. नवकी, 21. किसुनमा, 22. फुसियाहाकघरवाली, 25. जुगायक पत्नी, 26. . शिवकुमार, 27. रामनाथ, 27. दिनेशबाबू, 28. दोकानदार, 29. रमेसरा, 30. . देवीदत्त, 31. प्रधानाध्यापक, 32. धनिकलाल, 33. महंथजी, 34. पुजेगरी, 35. बबाजी, 36. बटोही, 37. शान्ति।” प्रो. वीणा ठाकुर, पूर्व विभागाध्यक्ष, मैथि‍ली वि‍भाग, ल.ना.मि.विश्ववि‍द्यालय- दरभंगा, ‘जि‍नगीक जीत उपन्यासक समीक्षा करैत लिखने छथि- “मिथिलाक लोक संस्‍कृति‍ संवाहक उपन्यास ‘जि‍नगीक जीत’मे उपन्यासकार जीवनक ओइ सत्यकेँ आत्मसात् करबाक प्रयास कयने छथि जइ‍मे जीवनक समस्‍त ‘सार’ नुकाएल अछि‍। उपन्यासक मध्‍यमे उपन्यासकार मनुष्‍य जीवनक समस्‍त राग-विराग, आशा-आकांक्षा, दीनता-हीनता, उत्‍कर्ष-अपकर्षक चि‍त्रि‍त करैत वस्‍तुत: जीवनक शाश्वत तथ्‍य- जीवाक इच्‍छाकेँ उजागर करवामे सफल भेल छथि। वस्‍तुत: ई उपन्यास भाषा अथवा वोलीमे जातीय स्‍मृति‍क आ साहि‍त्‍यि‍क रूप थिक जे हमर जातीय चेतना अथवा जातीय वोधकेँ सुरक्षि‍त राखने अछि‍। मिथिलाक सूच्‍चा चि‍त्र अंकि‍त करैत उपन्यासकार अपन जीवनानुभवसँ संचि‍त कएल ‘सार’ आओर ‘सत्य’केँ अभि‍व्‍यक्‍त कयने छथि। वस्‍तुत: ई उपन्यास मिथिलाक संस्‍कृति‍क प्रतीक थिक आओर एकर सार थिक शाश्वत। उपन्यास मध्‍य प्रकृति‍, परिवेश, आध्यात्म, समरसता आओर समन्‍वयक छवि आओर छटा सर्वत्र दृष्‍टि‍गोचर होइत अछि‍। वर्तमान साहित्यमे ई प्रवृति‍ प्रमुख अछि‍- एक समाजोन्‍मुख दोसर व्‍यक्‍ति‍ नि‍ष्ठा तथा आत्म केन्‍द्रीत। उपन्यासकारक प्रवृति‍ समाजोन्‍मुख अछि‍। सम्‍पूर्ण उपन्यास मध्‍य मिथिलाक गामक लोकक रहन-सहन, अचार-विचारक चि‍त्रण एतेक सजीव अछि‍ जे पाठककेँ ओइ‍ लोकमे लऽ जाइत अछि‍, जि‍नका गाम छुटि‍ गेल छन्‍हि‍। उपन्यास मध्‍य मिथिलाक समाजक चि‍त्र एतेक वास्‍तविक रूपमे चि‍त्रि‍त्र भेल अछि‍ जे मिथिलाक माटि-पानि‍क सुगन्‍धसँ पाठकक हृदए सहजहि आहलादित भऽ जाइत अछि‍।” 3. उत्थान-पतन (2009) : प्रस्तुत उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक तेसर औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि भेल अछि। ‘उत्थान-पतन’क पहिल संस्करण 2009 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘उत्थान-पतन’ उपन्यासक पहिल संस्करणक लोकार्पण डॉ. वीणा ठाकुरजी ‘सगर राति दीप जरय’क 70म कथा गोष्ठी कबिलपुर (दरभंगा)मे कयने छथि। उक्त आयोजन 12.06.2010क डॉ. योगानन्द झाक संयोजकत्वमे आयोजित भेल छल। प्रस्तुत उपन्यास ‘उत्थान-पतन’मे 15 गोट पड़ाव अछि। उपन्यासकार निम्नलिखित पात्रसभक माध्यमसँ उक्त पोथीकेँ लिखलन्हि अछि- 1. गंगानन्द, 2. पार्वती, 3. रीता, 4. दुखन सिपाही, 5. बचना, 6. फुलिया, 7. बचनाक सरहोजि, 8. बिशेसर, 9. भोलिया, 10. रतना, 11. रविया, 12. गुमश्ता, 13. बराहिल, 14. अमृतलाल, 15. सावित्री, 16. दीनानाथ, 17. बौआजी, 18. रूपचन, 19. सुशील वैद, 20. गुलबा, 21. तेतरी, 22. लेलहा, 23. ढोरबा, 24. दादी, 25. भालेसर, 26. मालि, 27. ज्ञानचन, 28. सुधिया, 29. प्रकाशचन्द, 30. चुनचुन, 31. विहारी, 32. बुधना, 33. बिशेसरक बहनोइ, 34. देवसुनरी, 35. माधुरी, 36. श्यामानन्द, 37. यमुनानन्द, 38. पटवारी, 39. लीला, 40. रामधन, 41. यमुनानन्दक पत्नी, 42. बेंगबा, 43. कुरहरिया, 44. नवकी दादी, 45. माला, 46. सुनयना, 47. गुलाब, 48. चंचल, 49. रामदेव, 50. गंगानन्दक नातिन, 51. मुनीलाल, 52. रेखा, 53. रेखाक माए, 54. बचनू, 55. मिस्त्री, 56. रघुनाथ दास, 57. सुकल, 58. फुलचन दास, 59. दिनेश, 60. महेन्द्र, 61. सरिता, 62. डॉक्‍टर नीलमणि सेन, 63. प्रोफेसर जफर, 64. हसीना, 65. डॉक्‍टर मुकुल, 66. पण्‍डित शंकर, 67. कपिलदेव, 68. कपिलदेवक पत्नी, 69. सुकन, 70. गणेशी, 71. बंगट, 72. त्रिवेणी, 73. रिक्शाबला, 74. चपरासी, 75. किरानी, 76. रामकिसुन, 77. सोनेलाल, 78. मंगला, 79. रघुवीर बाबा, 80. विदेसर, 81. मनचल, 82. भोलानाथ, 83. खुशीलाल, 84. दोकानदार, 85. रेशमा एहि उपन्यासक सन्दर्भमेबहुविधाविद् रचनाकार श्री राजदेव मण्डलजी कहैत छथि, अर्थात प्रस्तुत पोथीक सन्दर्भमे लिखने छथि- “केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। ऐ दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा केलैन अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम छी। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भेसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि। समाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहै छैथ‍ जे टुटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जइसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतै आ गामक सम्पूर्ण विकास हेतइ। सबहक संगे समाजिक न्याय हेतइ। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जइसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। ऐ माध्यमसँ लेखक देखबए चाहै छैथ‍ जे अपनो गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करय तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नै जाए पड़तै आ पड़ाइन रुकि जेतइ। अखनो गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नै पहुँच सकल अछि। तइ कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध केने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजे ऐ उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। ऐ तरहेँ देखै छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित केने छैथ‍, संगे आदर्श रूप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि।” प्रस्तुत उपन्यास तथा उपन्यासकारक सम्बन्धमे प्रसिद्ध साहित्यकारएवम् ‘विदेह’ ई पत्रिकाक सम्पादक श्री गजेन्द्र ठाकुरफ्लैपमे लिखने छथि- “जगदीश प्रसाद मण्डलक कथ्यमे नोकरी आ पलायनक विरूद्ध पारम्‍परिक आजीविकाक गौरव महिमा मण्डि‍त भेटैत अछि। आ से प्रभावकारी होइत अछि हिनकर कथ्य आ कर्मक प्रति समान दृष्टि‍कोणक कारणसँ आ से अछि हिनकर बेकती‍गत आ समाजिक जीवनक श्रेष्ठताक कारणसँ। जे सोचै छी, जे करै छी; सएह लिखै छी तइ कारणसँ। यात्री आ धूमकेतु सन उपन्‍यासकार आ कुमार पवन आ धूमकेतु सन कथा-शिल्‍पीक अछैत मैथिली भाषा जनसामान्‍यसँ दूर रहल। मैथिली भाषाक आरोह-अवरोह मिथिलाक बाहरक लोककेँ सेहो आकर्षित करैत रहल आ ओइ भाषाक आरोह-अवरोहमे समाज-संस्कृति-भाषासँ देखौल जगदीशजीक सरोकारी साहित्य मिथिलाक समाजिक क्षेत्रटामे नै वरन आर्थिक क्षेत्रमे सेहो कान्ति‍ आनत।” 4. जीवन-मरण (2010) : प्रस्तुत पोथी जगदीश प्रसाद मण्डलजीक चारिम औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि भेल अछि। ‘जीवन-मरण’ उपन्यासक पहिल/द्वितीय संस्करण 2010 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। 02.10.2010क बेरमा (झंझारपुर) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 71म कथा गोष्ठीमे ‘जीवन-मरण’ उपन्यासक लोकार्पण कुमार रामेश्वर लाल दासतथा मंचस्थ अन्य विद्वान लोकनिक बीच भेल अछि। सम्पूर्ण ग्रामीणक आयोजकत्व तथा जगदीश प्रसाद मण्डलजीक संयोजकत्वमे, मध्य विद्यालय परिसर- बेरमा गाममे उक्त गोष्ठी भेल छल। कहल जाइछ, सगर राति दीप जरय’क 71म आयोजनसँकथागोष्ठीमे खास बदलाव आबए लगल। नव-नव कथाकार, नव-नव सयोजकक संयोजकत्वमे ‘सगर राति दीप जरय’ गाम-गाममे, गौंआँ-समाजक साहित्य प्रेमीक सार्वजनिक स्थलपर आयोजित होएबाक दिशामे अग्रसर भेल। पल्लवी प्रकाशनसँ प्रकाशित 118 पृष्ठक ‘जीवन-मरण’ उपन्यासक संग उपन्यासकारक विषयमे प्रसिद्ध समालोचक श्री शिव कुमार झा ‘टिल्लू’जी ‘मैथिली उपन्‍यास साहित्यमे दलित पात्रक चित्रण’ विषयक आलेखमे एहि रूपे जिक्र कएलनि अछि- “कहैले तँ सभ साहित्यकार अपनाकेँ साम्‍यवादी कहै छथि मुदा साम्‍यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथिलीक सर्वकालीन साहित्यमे ध्रुवताराक स्‍थान श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीकेँ भेटबाक चाही। हिनक सभ उपन्‍यास (मौलाइल गाछक फूल, जिनगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्‍थान-पतन, नै धाड़ैए, सदबा-विधवा, बड़की बहिन, भादवक आठ अन्‍हार।)मे दलितक चित्रण अनायास भेट‍ जाइत अछि। लिखबाक शैली ओ बिम्‍बक चयन तेतेक पारदर्शी जे सवर्ण-दलितक मध्‍य कोनो खाधि नै। सम्‍पूर्ण समाजमे सकारात्‍मक तारतम्‍य स्‍थापित करबाक जगदीश जीक स्‍वप्‍न मात्र उपन्‍यासमे नै रहत, ऐ‍‍सँ मिथिलाक समाजिक परिस्‍थि‍तिमे भविसमे सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, सिद्धान्‍तक स्‍थापना अबस्‍स हएत। हिनक अविरल मर्मस्‍पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति ‘मौलाइल गाछक फूल’ मे दलित समाजक महादलित मुसहर जातिक रोगही, बेंगबा, कबुतरीक मनोदशा आ नित्यकर्मसँ समाजमे शांतिक ज्‍योति जगबैक कल्‍पना अनमोल अछि। दरिभंगाक प्‍लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मरीचिका एकठाँ भक्क दऽ उगि जाइत अछि। भजुआ, झोलिया आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जातिक छथि, जिनकर सहायता सम्यक् सोचबला ब्राह्मण रमाकान्‍तजी करै छथि। ऐ‍‍ कृतिक सभसँ अजगुत पात्र छथि रमाकान्‍तजी। हिनक छोट पुत्र कालक डांगसँ अधमरू, वनिता सुजाता जे धोबिन छथि, तिनकासँ बिआह कऽ लइ छथि। बिआहे टा नै, बिआहसँ शिक्षा ग्रहण करैले प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि, जइसँ ओ डॉ. सुजाता बनि गेली। गाममे रहनिहार आ अपन मातृभूमिक प्रति असीम श्रद्धा रखनिहार रमाकान्‍त जीकेँ अपन पुत्र महेन्‍द्रक ऐ‍‍ निर्णएसँ कोनो पीड़ा नै भेलनि। हिनक सम्‍पूर्ण परिवार ऐ‍‍ निर्णएकेँ सहृदए स्‍वीकार कऽ लेलकनि। ..जगदीश जीक दोसर उपन्‍यास ‘जीवन-मरण’मे हेलन-गुदरी डोम दम्‍पतिक चर्च कएल गेल अछि। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जातिसँ सम्‍बन्‍ध रखै छथि। जिनगीक जीत उपन्‍यासमे पलहनिक नेपथ्‍यक पात्रता दर्शित अछि।” प्रस्तुत उपन्यास ‘जीवन-मरण’केँ उपन्यासकार निम्नलिखित पात्रसभक माध्यमसँ लिखलन्हि अछि- 1. शीला, 2. डॉक्टर देवनन्दन, 3. सुभद्रा, 4. दयानन्द, 5. स्टाफ-सँ छात्र धरिक झुण्ड, 6. डॉक्टर कृष्णकान्त, 7. ड्राइवर, 8. आशा, 9. रघुनन्दन, 10. करिया काका (बटु), 11. रधिया दादी, 12. श्रीकान्त, 13. किसुन लाल, 14. सोधन, 15. लेलहा, 16. लेलहाक घरवाली, 17. घुरना भैया, 18. सुखदेव, 19. सुन्दर काका, 20. छीतन भाय, 21. छीतनक घरवाली, 22. जीबछ, 23. रंगलाल, 24. फोंच भाय, 25. बचनू, 26. सोहन भाय, 27. मनोहर, 28. मनोहरक माए, 29. अढ़ुलिया, 30. अपराजित, 31. बतहू, 32. चंचल, 33. झोली, 34. लोहनावाली, 35. शीला, 36. पढ़ुआ, 37. हुलन, 38. गुदरी, 39. कुसुमलाल, 40. राजेसर, 41. शंकरदेव। 5. जीवन संघर्ष (2010) :‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यास जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उपन्यास विधामे पाँचिम पोथी छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 2005 इस्वीसँ पहिनहि मण्डलजी कयने छथि। लेखन कार्यक आरम्भक सन्दर्भमे उपन्यासकार अपन मंतव्य व्यक्त कयने छथि- “पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख‍ किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल। ...मौलाइल गाछक फूल 2004 ईस्‍वीमे लिखल पहिल उपन्यास छी। अखन धरि पाँचटा उपन्यास आ किछु कथा, लघुकथा, नाटक सभ अछि। छपबैक जे मजबूरी बहुतो रचनाकारकेँ छैन‍ से हमरो रहल। मुदा तइसँ लिखैक क्रम नै टुटल। ‘भैंटक लावा’ कथा सेहो दू-हजार चारिक पहिल कथा छी।” ‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यासक पहिल/द्वितीय संस्करण 2010 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे पाँचिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। 02.10.2010क बेरमा (झंझारपुर) मे ‘सगर राति दीप जरय’क 71म कथा गोष्ठीमे ‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यासक लोकार्पण प्रसिद्ध रचनाकार उग्र नारायण मिश्र ‘कनक’, अशोक (कथाकार)तथा मंचस्थ अन्य विद्वान लोकनिक बीच भेल अछि। 145 पृष्ठक एहि उपन्यासक लिखयमे उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी निम्नांकित पात्र सभकेँ सोझॉं अनलन्हि अछि- 1. पवित्री, 2. कुसुमलाल, 3. कुसुमलालक बेटी, 4. मनधन बाबा, 5. जोगिन्दर, 6. प्रेमलाल, 7. अनुप, 8. रघुनाथ, 9. देवनाथ, 10. मंगल, 11. गणेशी, 12. झुनझुनावाली, 13. सोनमा, 14. ढोलबा, 15. तेतरी, 16. प्रोफेसर दयानन्द, 17. ललबा, 18. बरसपैतिया, 19. भगतजी, 20. डलिबाह, 21. मसोमात, 22. प्रोफेसर कमलनाथ, 23. दुखनी, 24. नवानीवाली, 25. श्यामा, 26. भुखना, 27. देवन, 28. सजना, 29. दुनियालाल, 30. मुनेसरी, 31. रूपलाल, 32. भुलिया, 33. नसीवलाल, 34. सुनरी, 35. राजेसर, 36. डॉक्टर, 37. डोमन, 38. फुलेसरी, 39. सुरतिया, 40. फुदना, 41. सितिया, 42. रघुनी, 43. दोकानदार, 44. भोला, 45. बलदेव, 46. ललित, 47. ललितक पत्नी, 48. सुरजी, 49. मकशूदन, 50. देवनाथक पत्नी, 51. जीबछ, 52. दुखा, 53. निरधन, 54. बौना, 55. नेंगरा, 56. बौकू, 57. बाबा एहि उपन्यास तथा उपन्यासकारक विषयमे प्रसिद्ध समीक्षक डॉ. कैलाश कुमार मिश्र ‘विदेह-सदेह, 10’ मे लिखलन्हि अछि- “श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक उपन्‍यास ‘जीवन संघर्ष’ एक नीक रचना थिक। एहेन रचना अगर मैथिली साहित्यमे लगातार हो आ ऐ तरहक रचनाक प्रचार-प्रसार नीकसँ कुनो जाति-पाति, वर्ग, सम्‍प्रदाय, स्‍थानीयता आदिक दुर्भावनासँ दूर भऽ कएल जाए तँ मैथिली साहित्य महिमा-मण्‍डि‍त भऽ एक गौरवशाली परम्‍पराकेँ प्रारम्‍भ कऽ सकैत अछि। ...‘जीवन संघर्ष’ पोथीकेँ अद्योपान्‍त पढ़ि चूकल छी तँ अनेक तरहक विचार मोनमे हिलोड़ लऽ रहल अछि। होइत अछि अगर कुनो कुशाग्र-बुधि‍बला शोध-विद्यार्थी भेटत तँ ओकरा उत्‍साहित करबैक जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलक रचनाशैली, जीवन-क्रम आ व्‍यक्‍ति‍गत इतिहास तीनूकेँ समेटैत मैथिलांचलक समाजक सन्‍दर्भमे एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन करए। ...साहित्यकेँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि। दर्पण तखन जखन साहित्यकार पारखी होथि। समाजक संग चलथि। सामाजि‍क बेवस्‍थाकेँ समैक संग विवेचना करथि। साहित्य सृजनक धर्मकेँ बुझथि। मण्‍डलजी ऐ कार्यकेँ इमानदारीपूर्वक केलनि अछि। ऐ उपन्‍यासकेँ हिन्‍दी, अंग्रेजी इत्यादि भाषामे अनुवादित कए प्रचार-प्रसार होमाक चाही। ई रचना समाजक दर्पण अछि। एक निश्चल आ आशावान विचारधाराकेँ प्रतिपादित करैत अछि। जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन कृतिमे Native intelligence केर अभूतपूर्व प्रमाण दैत छथि।” 6. नै धाड़ैए (2013) : उपन्यास बाल साहित्यपर केन्द्रीत ई मण्डलजीक पहिल औपन्यासिक कृति छियनि। ओना, ‘नै धाड़ैए’ 6म उपन्यास थिक, एहिसँ पूर्व पाँच गोट उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी लिखि चुकल छथि। बाल साहित्यपर केन्द्रीत एहि उपन्यासक लेखन 2010 इस्वीक पछाति कएलनि। एकर पहिल संस्करण 2013 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे चारिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘नै धाड़ैए’ उपन्यासक लोकार्पण श्री उमेश मण्डलक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क80म कथा गोष्ठीमे श्री गुरु दयाल भ्रमर, डॉ. अशोक ‘अविचल’, डॉ. रामाशीष सिंह तथा मचंस्थ अन्यान्य विद्वानक द्वारा उपन्यासकार करबौने छथि। उक्त आयोजन मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, निर्मली, (सुपौल),मे दिनांक 30.11.2013क आयोजित भेल छल। ओहि गोष्ठीमे प्रस्तुत पोथीक रचनाकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक एकसंग 21 गोट पोथीक लोकार्पण भेल रहन्हि। ‘नै धाड़ैए’ उपन्यासकेँ कुल पाँच पड़ावमे लिखलन्हि अछि। जाहिमे निम्नांकित पात्रसभक माध्यम बनाओल गेल अछि- 1.राधामोहन, 2. नन्दलाल, 3. पण्‍डाजी, 4. बुधनी, 5. बड़बड़िया, 6. फैजली, 7. पी.एन. बाबू, 8. दीनानाथ बाबू, 9. सुरेखा, 10. सुरेन्द्र बाबू...। 7. बड़की बहिन (2013) : केन्द्रीत उपन्यास थिक। एहि उपन्यासमे पाँच गोट पड़ाव अछि। एहि पोथीक लेखन 2010 इस्वीक पछाति कएलनि। एकर पहिल संस्करण 2013 इस्वीमे ‘श्रुति प्रकाशन’, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110008 सँ प्रकाशित भेल अछि। वर्तमानमे चारिम संस्करण ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘नै धाड़ैए’ उपन्यासक लोकार्पण डॉ. अशोक ‘अविचल’क अध्यक्षता आ श्री उमेश मण्डलक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क80म कथा गोष्ठी, मानिक राम-बैजनाथ बजाज धर्मशाला, निर्मली, (सुपौल),मे दिनांक 30.11.2013क भेल अछि। 8. ठूठ गाछ (2015) :‘ठूठ गाछ’ श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक 8म औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासकेँ 25 अक्टुबर 2015 सँ 16 दिसम्बर 2015 धरिक समयावधिमे लिखल गेल अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे एक रचनाकारक जीवनक बात कएल गेल अछि। वैचारिक आ क्रियागत जीवनमे गड़बड़ी भेलासँ प्रोफेसर रामकृष्ण बाबूक जीवन ठूठ गाछ सदृश भऽ गेलन्हि जाहिसँ हुनक मुँहक बोली बन्न भऽ गेलन्हि। ‘ठूठ गाछ’ उपन्यासक पहिल संस्करण 2015 इस्वीमे ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार :847452 सँ प्रकाशित अछि। तथा एहि पोथीक लोकार्पण ‘सगर राति दीप जरय’क 88म कथा गोष्ठी- डखराम (बेनीपुर)मे भेल अछि। उक्त गोष्ठी श्री अमरनाथ झाक आयोजकत्वमे तथा श्री कमलेश झाक संयोजकत्वमे दिनांक 30.01.2016क मध्य विद्यालय- डखराम (बेनीपुर) भेल छल। प्रस्तुत उपन्यासक समर्पण भावकेँ उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी, एहि तरहेँ व्यक्त कयने छथि- “जिनगीक तँ दुइएटा ने धुरी अछि, सुख आ दुख। अही दुनू धुरीपर ने दुनियाँक बीच आनो-आनो चरसँ अचर धरि नचबो करैए, उड़बो करैए, महकबो करैए आ महकेबो करैए। जेना एक दिस- बेली, चमेली आ जूही अछि जे धरतीसँ सटल अपन पातक पवित्रता आ फूलक सादगीक संग अपन जिनगीक आदि-अन्त करैत अकासकेँ अपन महकसँ महकबैत जीवन-लीला समाप्त करैए तँ दोसर दिस- राड़ी, डबहारी आ पटेर अछि जे अपन फूलकेँ अकासमे पसारि एक दिशासँ दोसर दिशा उड़ि-उड़ि अपन रंग-रूप देखबैए, मुदा महक केहेन रखने अछि से बेली, चमेली आकि जूही पुछौ कि नै पुछौ मुदा देखनिहारक दायित्व तँ बनियेँ जाइए..!” 9. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं (2017) : उपन्यासकार एहि उपन्यासकेँ 14 सितम्बर 2017 सँ 19 अक्टुबर 2017 धरिक समयावधिमे कुल दस पड़ावमे रचलन्हि अछि। पल्लवी प्रकाशन प्रकाशित एहि उपन्यासक लोकार्पण ‘सगर राति दीप जरय’क मंचपर 16.12.2017क कराओल गेल अछि। उक्त आयोजन श्री राधाकान्त मण्डलजीक संयोजकत्वमे धबौली (लौकही, मधुबनी)मे आयोजित भेल छल। प्रस्तुत उपन्यास ‘इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं’मेक्रमश: सभ पड़ावक पात्रसभक विवरण निम्नांकित अछि- एक-1. खुशीलाल, 2. रघुवीर, 3. घसवाहिनी, 4. घसवाह दू-1. खुशीलाल, 2. सिंहेसर, 3. बचनू तीन-1. खुशीलाल, 2. सोमन, 3. रजनी, 4. राम सुनरि चारि-1. बचनू, 2. रमेश, 3. खुशीलाल, 4. राम सुनरि, 5. विलास, 6. रोहिणी, 7. भोगिया देवी पाँच-1. खुशीलाल, 2. बचनू, 3. खुशीलालक माए छअ-1. बचनू, 2. बचनूक पत्नी, 3. सुरेश, 4. जीतन, 5. सुगिया सात-1. जीतन, 2. बचनू, 3. सुरेश, 4. खुशीलाल, 5. बुधनी, 6. गीता, 7. सुभावी, 8. बड़ाबाबू आठ-1. बचनू, 2. बचनू भाइक पत्नी, 3. सुरेश, 4. खुशीलाल, 5. जीतन, नअ-1. जीतन काका, 2. बचनू, 3. सुगिया काकी, 4. महात्माजी, 5. खुशीलाल, 6. सुमित्रा, 7. बचनूक मामा, 8. सुशीला दस-1. भोगिया देवी, 2. विलास, 3. बचनू, 4. जीतन काका, 5. खुशीलाल, 6. सुशीला सभ उपन्यासक पात्रक नामकरण उपन्यासकार बड़ सोचि-समझि कऽ कयने छथि। नामक शब्दक अर्थ पात्रक चरित्रमे निरुपित कयने छथि। चरित्रक अनुसार अर्थात् नामक अनुसार चरित्र (पात्र) आ ताहि अनुकूल पात्रक क्रिया-कलाप जहिना जगदीश प्रसाद मण्डलक सभ रचनामे भेटैत अछि तहिना उपन्यासमे अछि। ई नहि जे नीक नाओं राखि लेलौं मुदा क्रिया-कलाप ओहि शब्दक गुणक उल्टा भऽ चलैए, शब्दक संग खेल करैत शब्द-साहित्यक प्रति मात्र खाना-पुरी करैए। 10. लहसन (2018) : प्रस्तुत उपन्यास श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक दसम औपन्यासिक कृति छियनि। एहि उपन्यासक लेखन 10 नवम्बर 2017 सँ 25 फरवरी 2018 धरिक समयावधिमे कएलनि। ‘लहसन’क पहिल संस्करण 2018 इस्वीमे ‘पल्लवी प्रकाशन’, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार : 847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘सगर राति दीप जरय’क 97म गोष्ठीमे ‘लहसन’ उपन्यासक लोकार्पण भेल अछि। उक्त गोष्ठी, दिनांक 24.3.2018क प्रसिद्ध कथाकार श्री कपिलेश्वर राउतजीक संयोजकत्वमे बेरमा (झंझारपुर, मधुबनी)मे आयोजित भेल छल। प्रस्तुत उपन्यासक सन्दर्भमे प्रसिद्ध साहित्यकार श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र अपन ब्लॉग ‘भोरसँ साँझ धरि’मे लिखने छथि- “श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘लहसन’ उपन्यासकेँ पढ़लासँ पाठक थोड़बे कालमे समाजक निम्नतम पौदानपर ठाढ़ लोकक जिनगीक बारेमे बहुत किछु बुझि सकैत छथि। किछु एहन करबाक प्रेरणा प्राप्त कए सकैत छथि जाहिसँ मेवालाल सन-सन गरीब लोकसभकेँ गाम छोड़ि कलकत्ता सन महानगर पलायन नहि करय पड़नि। एहिसँ प्रेरणा लए समाजक समृद्ध लोकनि किछु करथि जाहिसँ गाम-घरसँ पलायन बन्द होअए आ गाम एकबेर फेर पल्लवित-पुष्पित भए जाए। ई उपन्यास हुनका लोकनिक हेतु एकटा मार्गदर्शकक काज कए सकैत अछि जे शहर गेलाक बाद आधुनिकताक प्रवाहमे अपनासन लोककेँ छोड़ि विशिष्ट बनबाक फिराकमे पैघ लोकसभसँ सटैत छथि आ ताहि क्रममे सभ किछु गमा लैत छथि। मिथिलाक अधिकांश लोक गुजर करबाक हेतु दिल्ली, पंजाब, कलकत्ता आ आन-आन शहरसभमे पसरि गेल छथि। कतेको गोटे तँ अरब चलि गेल छथि। किएक? तकर मूल कारण थिक अपना ओहिठाम रोजगारक अभाव।” एहि उपन्यासमे कुल नौ (9) गोट पड़ाव अछि। प्रत्येक पड़ावमे जाहि पात्रसभकेँ उपन्यासकार अनलन्हि, ओ क्रमश: निम्नलिखित अछि- एक- 1. मेवालाल, 2. सुभावी, 3. बुधिलाल, 4. मेवालालक पत्नी। दू- 1. मेवालाल, 2. सुभावी, 3. दोकानदार, 4. चाहबला, 5. मकैबला, 6. पानबला तीन- 1. मेवालाल, 2. रविनाथ चारि- 1. मेवालाल, 2. सुमनलाल, 3. नटुआ पाँच- 1. मेवालाल, 2. रविनाथ, 3. सुमनलाल, 4. दोकानदार, 5. भूषण, 6. बचनू, 7. बौन, 8. राघव, 9. मनोहर, 10. सुकदेव सात- 1. मेवालाल, 2. बौन, 3. बचनू, 4. दुखमोचन आठ- 1. मेवालाल, 2. मैनेजर नअ- 1. मेवालाल, 2. सुनीलपाल, 3. अंतिकापाल, 4. राधा, 5. वकील साहैब, 6. सुदामा 11. पंगु (2018) :‘पंगु’ उपन्यासक पहिल संस्करणक प्रकाशन वर्ष- 2018अछि। पल्लवी प्रकाशन : निर्मली (सुपौल)सँ एहि पोथीकेँ प्रकाशित कराओल गेल अछि तथा प्रसिद्ध कथाकार व समीक्षक डॉ. शिव कुमार प्रसादजीक संयोजकत्वमे आयोजित ‘सगर राति दीप जरय’क 97म कथा गोष्ठी, सिमरा (झंझारपुर)मे ‘पंगु’क लोकार्पण कराओल गेल अछि।उक्त आयोजन दिनांक 16.6.2018क आयोजित भेल छल। ‘पंगु’ उपन्यासमे कुल 9 गोट पड़ाव अछि। एहि उपन्यासकेँ 11 मई 2018 सँ 6 जून 2018 धरिक अवधिमे मात्र 8 गोट पात्रक बीच उपन्यासकार रचना कएलनि अछि। क्रमश: सभ पात्रक नाओं द्रष्टव्य अछि- 1. गुलाबचन, 2. बराहिल, 3. बालचन, 4. सोराजीलाल, 5. सिंहेश्वर, 6. देवचरण, 7. हरिचरणतथा 8. सिंहेसरी। प्रस्तुत उपन्यासक आरम्भ सीतापुर गामसँ होइत अछि। उपन्यासकार सीतापुरक परिचय एहि तरहेँ देलन्हि अछि- “हजार बीघा जमीनक ऑंट-पेटबला गाम सीतापुरमे जहिना सभ रंगक भूमि अछि–ऊँचगर-सँ-निचगर धरि, तहिना ओइ भूमिक उपज सेहो सभ रंगक अछिए। ओना, सालो भरि बहैबला धार, जेकरा चलन्त धार कहै छिऐ ओ सीतापुरमे एकोटा नहि अछि। तँए कि सीतापुर धार रहित गाम अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। सीतापुरमे दूटा धार अछिए। जइमे उत्थर रहने एकटा धार मात्र बरसाते भरि बहैए, जेकरा चौमसिया धार गौंआसँ लऽ कऽ अनगौंऑं तक कहै छैथ। गौंआँ ऐ दुआरे कहै छथिन जे गाममे रहने अपना-अपना ऑंखिये देखबो करै छैथ आ ओइसँ जे हानि-लाभ अछि सेहो भोगिते आबि रहल छैथ। आ अनगौंआँ ऐ दुआरे कहै छथिन जे आनो-आनो गाम देने होइत ओ धार बनलो अछिए आ बहितो अछिए। मुदा दोसर जे धार अछि ओ बरहमसिया चलन्त धार तँ नहि छी, मुदा गहींरगर रहने अखाढ़-सँ-अगहन तक बहैत अछि। तँए ओकरा छह-मसुआ धार सभ कहै छैथ। जहिना खेत-पथार अखाढ़मे अन्नसँ आच्छादित होइए आ अगहनमे उसरन भऽ जाइए तहिना ओ धार पहाड़ी पानिसँ लऽ कऽ धरतीक पानिक बीच अपन धारा बना बहिते अछि। वर्फसँ बनल पानि जहिना पवित्र होइए, माने ओइमे सुन्नरताक चमक रहै छै, तेकर विपरीत बर्खाक पानिक बहाब होइए, जे मेघसँ बरिस पाथरक स्थानसँ लऽ कऽ माटिक स्थानकेँ धोइ-पखारि बहैए, जइसँ ओकर रंग मटमैल रहैत अछि। मटमैल एक रूप भेल आ गन्दगीसँ भरल गन्दपन दोसर रूप भेल। मटमैल रहनौं बिना गंदपन रहने गन्दा दोसर रूप भेल। खाएर जे भेल जेतए भेल से भेल तेतए भेल। मुदा सीतापुरक बीच जे धार अछि ओ माटि-पाथरक धोन पानिक अछि, तँए ओकरा गन्दा नहियेँ कहल जा सकैए। गेन्दा फूल जकाँ ओकरो ऑंखिमे चमक छइहे। जइमे बहाउ धारक अतिरिक्त अनेको रंगक जलस्रोत सेहो अछिए। मिथिलांचलक बीचक गाम ने सीतापुर छी तँए गामक अनेको विशेषता अखनो सीतापुरमे चलिए रहल अछि। गामो तँ गाम होइते अछि। मुदा ओहूमे ने नकोर, सकोर आ कुकोरक गुण सेहो होइए। ओना, तीनू गुणसँ सम्पन्न गाम सभ सेहो अछि आ फुट-फुट गुणबला गाम सेहो अछिए। तइमे आन-आनसँ भिन्न सीतापुर गाम अछि। जहिना हजार बीघा रकवा जमीन छै तहिना अठारह गण्डा पोखैर सेहो छै तहूमे जाइठबला। जहिना अठारह गण्डा जाठिबला पोखैर सीतापुरमे अछि, तहिना दूटा नमहर पनिझाउबला आ दर्जनो छोट-छोट पनिझाउबला पोखैर सेहो अछिए, मुदा ओ सभ जाइठ रहित अछि। ओना तहूमे दुनू नमहरका जे अछि ओकरा लोक दैंतक खुनल पोखैर कहैए आ बाँकी छोट-छोट जे रंग-रंगक अछि तेकरा सभकेँ चभच्चा, कोचाढ़िसँ लऽ कऽ डोह-डाबर कहैए। भाय! भूमि तँ भूमि छी किने, तहूमे सीतापुर गामक, जे कि मिथिलाक मध्य बसल गाम अछि। ऐठामक भूमिक तँ ई गुण ऐछे जे कुइयाँ-इनारक रूपमे जहिना पतालसँ पानि अनैए तहिना खेत-पथारसँ लऽ कऽ अकास धरिक पानिकेँ सेहो संचित करिते अछि। साए-साए बीघाक दूटा चौरी सेहो अछि। जइमे छह-सात मास तक पानिक जमाव रहैए। जइसँ अन्न, फूल, फल उपैजतो अछि आ ओकर रक्षा सेहो होइत अछि। अन्न-फूल आ फल तँ धरतीक ऊपर होइए। ओहन धरतीपर, जइमे पानि आबि किछु दिन पहुनाइ करैत या तँ अकासमे उड़ि कऽ चलि जाइए वा रसे-रसे पताल दिस सटैक कऽ चलि जाइए वा ऊपरसँ टघैर-टघैर ओही नीचला खेतमे- माने चौरीमे चलि जाइए। ओना, अकाससँ धरतीपर उतैर वएह पानि उड़ि-उड़ि अकासो दिस बढ़ैए आ पतालो दिस ससरैत समुद्रसँ सेहो गड़ाजोड़ी करिते अछि। खाएर जे अपना मन फुरै छै से अपन करैए, अनेरे सीतापुरबलाकेँ एतेक हिसाब लइक कोन काज अछि। हमरा सभकेँ ओतबे से ने मतलब अछि जे नीक-नीक माछ उपजए, नीक-नीक सौरखी, करहर आ बर्री उपजए, तैसंग गाए-महींसकेँ नहाइ-पीबैले आ खेत पटबैले पानि भेटए। बस भऽ गेल जरूरतक पुरती..! लोककेँ अनेरे कोन खगता छै जे धरतीए जकाँ पानियोँक ऊपरमे ओछाइन ओछा कऽ सुतबो करत आ बैस-बैस कऽ ताशो भाँजत। कोन खगता छै जे पचीसीक घर बना पचीसियो खेलत आकि कोजगरा-दिवालीक उत्सवे मनौत। तइले तँ धरती अछिए।” 12.आमक गाछी (2018) : एहि उपन्यासक लेखन 2018 इस्वीमे 10 अगस्त सँ 30 सितम्बर धरिक समयावधिमे कएल गेल अछि। उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी एहि उपन्यासक निर्माणमे 9 गोट पड़ाव बनौलन्हि अछि। प्रस्तुत पोथी 122 पृष्ठक अछि। एहि पोथीक पहिल संस्करण, पल्लवी प्रकाशन, तुलसी भवन, जे.एल.नेहरू मार्ग, वार्ड नं. 06, निर्मली, जिला- सुपौल, बिहार : 847452 सँ प्रकाशित अछि। ‘आमक गाछी’क लोकार्पण शातांक कथा गोष्ठीमे सामुहिक रूपमेभेल अछि। सगर राति दीप जरय’क 100म कथागोष्ठी 22 दिसम्बर 2018कउमेश मण्डलक द्वारा श्री नवरत्न जैन वेंगानी, श्री मनीष जालान आयोजकत्वमे निर्मली (सुपौल)मे भेल अछि। एहि उपन्यासमे 9 गोट पड़ाव अछि। शब्द संख्याक संग प्रत्येक पड़ाव केर विवरणनिम्नांकित अछि- 1. शब्द संख्या : 3068, तिथि : 10 अगस्त 2018 2. शब्द संख्या : 3553, तिथि : 17 अगस्त 2018 3. शब्द संख्या : 2484, तिथि : 22 अगस्त 2018 4. शब्द संख्या : 2291, तिथि : 28 अगस्त 2018 5. शब्द संख्या : 2185, तिथि : 02 सितम्बर 2018 6. शब्द संख्या : 4701, तिथि 12 सितम्बर 2018 7. शब्द संख्या : 1805, तिथि : 15 सितम्बर 2018 8. शब्द संख्या : 1917, तिथि : 25 सितम्बर 2018 9. शब्द संख्या : 1914, तिथि : 30 सितम्बर 2018 13. भादवक आठ अन्हार (अपूर्ण) : प्रस्तुत उपन्यासक लेखन कार्य एखन पूर्ण नहि भेल अछि, अपूर्ण अछि। तथापि ‘भादवक आठ अन्हार’मे एखन धरि जतबा पात्र सोझा आएल ओ निम्नांकित अछि- 1. सुरजा काका, 2. चुनमुनियाँ काकी : उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजी,‘भादवक आठ अन्हार’ उपन्यासक आरम्भ एहि तरहेँ कयने छथि- “आने दिन जकाँ सुरजा काका जुन्ना आड़िपर राखि पाँज भरि जनेर कटने रहैथ आकि हल्ला जकाँ दूरक अवाज बुझि पड़लैन। जनेर काटब छोड़ि आड़िपर आबि ठाढ भऽ हियासए लगला। दूरक हल्ला दुरेमे, तँए कोनो तेहेन साफ नहि, घरघराएले बुझि पड़लैन। मन भेलैन जे कनी टहैल-बुलि हल्लाक भाँजो बुझि ली आ पानियोँ पीब लेब। पानि मनमे अबिते, मनेमे कटौझ उठलैन। एक मन कहैन- “पानि पीब” आ दोसर कहैन- “पानि नहि पीब।” दुनूक तर्को अपन-अपन आ चालियो अपन-अपन। एकक तर्क जे धरतीपर सभसँ शुद्ध पानि होइए। दोसराक तर्क जे पानि नहि, अन्न होइए। आनो-आनो गामक अन्नमे रोगक दोख नइ छै जे पानिमे छइ। एक्के गामक दोसर इनार वा कलक पानि पीने सरदी भऽ जाइ छइ। मुदा तैयो दुनू संगे शास्त्र-पुराणसँ लऽ कऽ चौक-चौराहा धरि तँ टहैलते अछि। देखनिहार तँ एक-दोसराक प्रेमी कहबे करत। ओना सुरजा काका जखन भोरुका उखड़ाहाक काज शुरू करै छैथ तइसँ पहिने अन्न-जल कइए कऽ शुरू करै छैथ। मनमे हल्लाक गुनधुनी लगले रहैन आकि एक गोटे मोटर साइकिलसँ सड़क धेने जाइतो आ बजितो जे कोसी बान्ह टुटि गेल। एक दिसनसँ गामक गाम डुमौने अबैए। बिना किछु दोहरौने सुरजा काका घासक आँटी बान्हि घर दिस बढ़ला। दस गोटेक परिवार सुरजा कक्काक। पाँच बीघा खेतक बीचक गिरहस्ती। ओना खेतक आँट-पेट छोट रहैन मुदा अपनाकेँ गिरहस्त मानैत। गिरहस्त तँ वएह ने जे अपन खेत-पथारसँ जीवन-यापनक लग घरि पहुँच सकए। पाँचे बीघाक रकबामे एकटा दस कट्ठाक पोखरियो छैन जोत जमीनमे एक बीघा घासोक खेती करै छैथ, जइसँ खुट्टापर गिरहस्ती जिनगीक एकटा उद्योग लगौने छैथ।” 14.सधवा-विधवा (अपूर्ण) उपरोक्त ‘भादवक आठ अन्हार’ सदृश अहू उपन्यासक लेखन कार्य एखन अपूर्ण अछि। एखन धरिक लेखनमे निम्नांकित पात्रसभक चर्च भऽ चुकल अछि- 1. सरोजनी मैयाँ, 2. रूक्मिणी, 3. हंशराज, 4. मदनेसर, 5. दमयन्‍तीक, 6.सुखदेव। प्रस्तुत उपन्यासक आरम्भ एहि तरहेँ कयने छथि- “सत्तैर वर्षीए सरोजनी मैयाँकेँ अखनो वएह सुधि-बुधि छैन जेना पहिने छेलैन। अखनो ओहने झोंकाह जकाँ जिनगीकेँ झोंकि चलै छैथ जेना जुआनीमे सभ चलैए। तहूमे मरणक ऐगला बेठेकान सीमा रहने ओ सीमाने हेराएल छैन। नर्क-निवारण चतुर्दशीक दिन। मरद तँ कमो-सम मुदा अधिकांश स्त्रीगण पाबैनक उपास केने। एक तँ किसान-बोनिहारक बैसारीयेक दिन दोसर दिनोक आँट-पेट छोट रहने उपासो असान। देखते-देखते दिन कटि जाइत अछि, तहूमे सूर्योदयसँ अस्ते भरिक ने उपास। किरिण डुमिते फलहार कऽ पाबैनक विसर्जन कए लेल जाइत अछि। बेर झूकिते सरोजनी-मैयाँ दिनक बाँकी काज दिस नजैर उठौलैन तँ भक-दे मन पड़लैन जे आन दिन समय पाबि खेनाइ खा विद्यालय देख अबै छेलौं मुदा बिसरैक कारण भरिसक उपासे तँ ने भेल। एक-सँ-साए धरिक गिनतीमे एकाएकी ऐगला संख्या अबैत जाइत अछि, भरिसक पैछला काज छुटने ऐगला ने तँ भोतिया गेल। मुदा छोड़लो तँ नहियेँ जा सकैए। तखन उपाय? हँ उपाय यएह जे, जे समय शेष बँचल अछि ओहीमे बीच बचा कऽ देख आएब नीक हएत।” श्री जगदीश प्रसाद मण्डल लेखन कार्यक प्रारम्भक संग अपना विषयमे मंतव्य व्यक्त कयने छथि- “जहिया एम.ए.क विद्यार्थी रही तहिए नोकरीसँ विराग भऽ गेल। आठ बीघा जमीन रहए। खेतीसँ जीवन-यापन करैक बिसवास भऽ गेल। बिनु गार्जनक–पुरुष गार्जनक–परिवार 1960 ईस्‍वीमे भऽ गेल। पितेक अमलदारीसँ दू भाँइ पिसियौत रहै छला। तत्काल गार्जनी हुनके दुनू भाँइपर छेलैन। कोसीक उपद्रवसँ भागल पीसा बेरमे माने सासुरेमे रहि गेल रहैथ‍। ..पिताक मृत्युक समय तीन बर्खक हम आ छह बर्खक जेठ भाय छला। पिसियौत भाए 1960 ईस्‍वीमे अपन गाम ‘हरिनाही’ चलि गेला। दुनू भाय, श्री कुलकुल मण्डल 1954 इस्वीमे आ हम 1957 इस्वीमे गामक स्कूलसँ निकैल अपर प्राइमरी स्कूल कछुबीमे नाओं लिखौने रही। 1960 ईस्‍वीसँ परिवारक बोझ पड़ल। पुरुष विहीन भेनौं माए ओहन परिवारक छेली, जइ परिवारमे मामा 1942 ईस्‍वीमे अंग्रेजक गोली खा चुकल छला। साहसी माए। अपन गहना, जमीन बेच देल बच्चाकेँ पढ़बै खातिर। पैंतीस साल धरि समाज सेवा केला पछाइत अपन हहरैत शरीर देख‍ किछु लिखै-पढ़ैक विचार जगल।” जगदीश प्रसाद मण्डलक जीवन-संघर्ष श्री जगदीश प्रसाद मण्डल साहित्यक अनेकहु विधामे रचना कएनिहार एक ओहन रचनाकार छथि जनिक लेखन अनवरत ओ अवाध गतिये चलि रहल छनि। जहिना गीत, कविता पद्य विधामे तहिना गद्यमेएकांकी, नाटक, कथा, बीहैन कथा, लघु कथा दीर्घ कथा, उपन्यास आदि नियमित रूपसँ लिखैत रहलाह अछि।‘जीबन-संघर्ष’ मण्डलजीक औपन्यासिक कृति छियनि। जीवन संघर्ष उपन्यासमे समाजक विराटरूपक झलक उपन्यासकार प्रस्तुत कएलनि अछि। जे अविकसित समाजसँ लऽ कऽ विकसित समाज धरिक बीचक अछि। जीवनमे द्वन्द्व एलासँ संघर्षक वातावरणक निर्माण होइछ, ओही वातावरणसँ संघर्ष शुरू सेहो होइछ। जीवन-संघर्ष उपन्यासक आरम्भ समाजक अत्याचारसँ भेल होइए। बँसपुरा एकटा गाम अछि जकरा बगलमे सिसौनी गाम अछि। सिसौनी गाममे दुर्गापूजा होइए। जकरा देखए लेल पास-पड़ोसक गामक अनेको लोक जाइत अछि। ओहने देखनिहारमे बँसपुराक एकटा लड़की सेहो अछि। जकर उमेर करीब अठारह-बीस वर्ष अछि। ओहि लड़कीकेँ सिसौनीक पूजा समितिक तीन गोट सदस्य फुसला कऽ भण्डारघर लऽ जाइए आ ओकरा संग बलात्कार करैए। भोरमे जखन ओहि लड़कीकेँ छोड़ि देल जाइए तखन ओ लड़की चुपचाप मेलासँ निकलि अपन गामक रस्ता पकड़ि विदा होइए। अपन गामक सीमामे पहुँचिते बपहारि काटि कानए लगैत अछि। जाहिसँ गामक लोक एक्के-दुइये पहुँच ओकरासँ पुछैत अछि। तखन ओ लड़की अपन बीतल रातुका सभ वृतान्त कहि सुनबैए। उपन्यासकार समाजक विराटरूपक चर्च करैत कहैत छथि जे इलाकामे बँसपुरा गाम सभ गामसँ पछुआएल अछि। बँसपुरासँ अगुआएल गाम सिसौनी अछि। दुनूक तुलना करैत कहैत छथि जे बँसपुरामे सार्वजनिक रूपक कोनहु काज (समारोह) नहि होइए। जखन कि सिसौनीमे मिडिल तकक पढ़ाइक स्कूलो छैक आ सार्वजनिक रूपमे दुर्गोपूजा होइए आ मेला सेहो लगैए। ओना, बँसपुरामे सेहो अष्टयाम कीर्तन, भनडाराइत्यादि होइत अछि। मुदा ओ व्यक्तिगत रूपमे होइत अछि। जहिना बँसपुरासँ अगुआएल गाम सिसौनी अछि तहिना सिसौनीसँ अगुआएल बरहरबा अछि। बरहरबामे हाइ स्कूल तकक पढ़ाइ सेहो होइत अछि आ सार्वजनिक रूपमे आनहु-आन समारोह इत्यादि होइत अछि। तहिना बरहरबासँ अगुआएल कटहरबा अछि। जाहि गाममे हाइ स्कूल धरिक पढ़ाइयो होइए आ अस्पताल सेहो अछि तथा सार्वजनिक समारोह सेहो कतेको तरहक होइत अछि। उपन्यासकारक दृष्टि ओहि बिन्दुपर छन्हि जे जाहि गाममे जतेक जीवनक बुनियादी जरूरतक पूर्ति होइए ओ गाम ओतेक अगुआएल भेल आ जाहि गाममे जतेक कम होइए वा नहि होइए ओ गाम ओतेक पछुआएल भेल। एहन दृष्टि उपन्यासकारक ओहिना नहि छन्हि, ओहि पाछू ईहो सत्य अछि जे जखनहि विद्यालय वा अस्पतालक प्रचार-प्रसार माने स्थापना होइए तखने ओहि गाम-समाजक लोककेँ लगमे सुविधा भेटिने लाभ होइते अछिजाहिसँ जीवन सुलभ बनिते अछि। सत्तैर-अस्सी वर्ष पूर्व बँसपुरामे कोसी धारक बाढ़िक प्रवेश भेल। जे साले-साल बढ़ैत गाममे धार फोरि देलक। धार बनिते पानिक बहाव शुरू भेल जाहिसँ गामक खेत-पथारक जजात दहाए लागल आ घर-दुआर सेहो कटि-कटि धारमे विलीन भऽ गेल जाहिसँ गाम उपटि गेल। गामक लोक अपन जान लऽ लऽ आन गाममे सेहो बसलाह आ बेसी लोक नेपाल जा-जा नोकरी-चाकरी करय लगलाह। जिनका अपना सम्पति छलन्हि, जे सुभ्यस्त किसानक रूपमे बँसपुरामे छलाह, ओहो सभ आनठाम जा नोकरी-चाकरी करय लगलाह किएक तँ अपन सम्पति नष्ट भऽ गेलनि। तीस वर्षक पछाति बँसपुरा गामसँ कोसी आगू बढ़ल। माने कोसी धार दोसर मुँह बनौलक। कोसी आ कमला एहन धार अछि जे एकठाम अस्थिर नहि रहैए। बँसपुरा गामसँ कोसीकेँ हटिते गाममे बाढ़ि आएब कमल। गाम पुन: जागल। गामक माटिकेँ जागिते कास-पटेर, झौआ, राड़ी इत्यादिक बोन भऽ गेल जे गौंआँ सभ अर्थात् बँसपुराबला सभकेँ सेहो भाँज लगलन्हि। जे पीढ़ी गाम छोड़ि पड़ाएल छलाह ओहि पीढ़ीक गोटे-आधे लोक जीवित रहला बाँकी सभ मरि गेलाह। हुनका सबहक धिया-पुता, जे जवान भऽ भऽ विवाह-दुरागमन सेहो कऽ लेने छलाह, धिया-पुता सेहो भऽ गेल छलन्हि, अपन बाप-दादाक गाम सुनि बँसपुरा आबि-आबि बसय लगलाह आ गामक बोन-झाड़केँ काटि-काटि खेत-पथार बनौलन्हि। वएह गाम बँसपुरा थिक। बँसपुरा गामक पहिलुका सभ किछु नष्ट भऽ गेल। अर्थात् गाछी-बिरछी, इनार-पोखरि, घर-दुआर इत्यादि सभ किछु। पुनर्जन्म गामक भेल। सिसौनी दुर्गास्थानक घटनासँ बँसपुराक सभक मनमे आक्रोश भेल। सभ कियो सिसौनीबलासँ बदला लइक खियालसँ एकमुहरी विदा भेल। गामक सभसँ बुढ़ मनधन बाबा छथि। मनधन बाबाकेँ अस्सी वर्षक जीवनक अनुभव छन्हि। ओ सोचलनि जे दू गामक विवाद छी। अनेकहु नव घटनाक जन्म हएत, जाहिसँ दुनू गाम नष्ट भऽ जाएत। अत: बीच-बचाव करैत मनधन बाबा सभकेँ रोकि चारि बजेमे बैसारक समय निर्धारित कएलनि। गाम ज्वालामुखीक आगि जकाँ धधैक रहल छल। चारि बजेक बैसारमे मर्द-औरत सभ एकत्रित भेलाह। बैसारमे रंग-बिरंगक विचार उठल। सभक मन अगियाएल रहनि। मरदसँ बेसी जनिजातिक मन अगियाएल रहनि। ओना, बैसारमे मरद एकभाग बैसलाह आ जनाना दोसरभागमे बैसलीह। दुनूकेँ एकठाम बैसैक विचार मनधन बाबा देलनि। एखन धरि समाजक बीच पुरुखेटाक बैसार होइत आबि रहल अछि। पुरुख-जनानाक बीच बैसार भेल। ई बैसार गामक विराटरूपमे दृष्टिपात भेल।मनधन बाबाक विचार मानि सभ कियो अर्थात् मरद-जनाना एकठाम बैसल। सभक मनमे आगि पजरले छलै तेँ सभ कियो अपन विचार राखए लेल तनफन कय रहल छल। जनानाक रूप देख मनधन बाबा पुन: अपन विचार रखैत बजलाह जे समाजक बैसार छी, तेँ जौं सभ अपने-अपन विचारमे घघौंज करब तखन काज आगूमुहेँ केना ससरत। ओना, मनधन बाबाक मनमे ई विचार रहनि जे जाबत धरि समाजमे लोक अपन अत्याचारकेँ अपनहि नइ रोकए लेल तैयार हएत ताबत धरि ओ अन्याय-अत्याचार रूकि कोना सकैए, तेँ समाजक लेल ई शुभ संकेत अछि। मनधन बाबाक मनमे ईहो विचार नाचि रहल छलैन जे कोन गाम एहन अछि जाहि गाममे लड़का-लड़कीक एहन घटना नइ होइए। नारी प्रति अन्यायिक कोनहु ई पहिल घटना छी, सभ गाममे होइए। अत: घटनाकेँ दोसर दिशामे मोड़ैत मनधन बाबा बजलाह जे कोनहु सबालक जवाब एहन नहि हुअए जे वास्तविक घटना तर पड़ि जाए आ आने-आन घटना विकराल रूपमे उपस्थित भऽ जाए। ताहि बीच बाबाक मनमे पछिला एकटा घटना मन पड़ि गेलनि। ओहि घटनाक चर्च करैत बजलाह- “एकटा नढ़ियाक खातीर बेला आ मैनही गामक शिकार खेलनिहारक बीच मारि भेल। धमगज्जर‍ मारि। परिस्थि‍तियो अनुकूले पड़लै। पाबैन मनबए सभ लाठी, सोहत, तीर-धनुष लऽ लऽ शिकार खेलए गेले रहए। ने लोकक कमी आ ने मारि करैक वस्तुक। मुद्दो तेहने भारी, एकटा मुइल नढ़िया। मुदा प्रतिष्ठाक प्रश्न तँ गामक रहबे करइ। अही प्रतिष्ठा लऽ कऽ केतेको लोकक कपार फूटल, केतेकोकेँ हाथ-पएर टुटल आ दुनू दिस एक-एकटा खूनो भेल। कियो केकरो देखैबला नै रहल। जे जेतइ से तेतइ कुहरैत रहए। केकरा के उठा कऽ लऽ जाइत आ इलाज करबैत। हो-ने-हो तहिना..!” विचारमे मोड़ दैत मनधन बाबा फेरि बजलाह- “भाय लोकैन‍! अपना गामक भाए-बहिन आन गामक मेलामे जा बेइज्जत होइए‍। एकर की कारण छइ? कारण छै जे अपना गाममे कोनो तेहेन सार्वजनिक काजे ने होइए‍। जखने अपनो सभ तेहेन काज करब तँ अनेरे आन गाम बलाकेँ दहसैत‍‍ हेतइ। वएह दहसैत‍ गामकेँ उजागर करत, प्रतिष्ठि‍त बनौत। गोसाँइ जी रामायणमे कहने छैथ‍‍, बिनु भय होइ न पीरिति।” मनधन बाबाक विचार सुनि गौंआँ सभ विचार कएलनि जे जहिना दुर्गापूजाक उत्सव सिसौनीबला करैए, तहिना अपनो सभ कालीपूजा करी। विचारकेँ सभ कियो, अर्थात् बैसारमे आएल सभ कियो मानि गेलाह, राजी भऽ गेलाह। लगले पूजाक आयोजनक कार्यक्रम दिस सभ कियो बढ़लाह। एकटा समितिक गठन भेल। एहि पूजा समितिमे सभ जातिक लोक सदस्य भेलाह। एखन धरि जाहि समाजमे किछु मुँहगर-कन्हगर लोक अगुआ बनि सार्वजनिक काज करैत छलाह ताहि जगहपर बँसपुरामे समाजक सभ जातिकेँ समान अधिकार भेटल जे समाजक विराट रूपमे ठाढ़ भेल। ओना, सिसौनी गाममे भेल घटनाक प्रतिक्रिया स्वरूप सेहो बैसार भेल। जकर अगुआ प्रो. दयानन्द भेलाह। ओहि बैसारमे मारि-पीट सेहो भऽ गेल जाहिसँ अत्याचारीक बीच दहसैत सेहो बनल। एहि अंकमे उपन्यासकार एकटा मसोमातक वर्णन कयने छथि। जनिक नाओं अछि दुखनी। सभ तरहेँ दुखनी गरीब लोक अछि। ओना, दुखनीकेँ दूटा सनतान सेहो अछि। एकटा बेटा आ एकटा बेटी। बेटी सासुर बसैत छन्हि। आ बेटा जे तीन साल पूर्व परदेश गेलनि ओ ने कहियो एकोटा पाइ पठौलकनि आ ने गाम एलनि। मुदा तैयो दुखनी अपन जीवन-यापन कए रहली अछि। दुखनीक घरमे जारनि नहि छल, दिवाली पावनिक दिन छल। देखू दुखनीक वर्णन उपन्यासकारक शब्दमे- “नीन टुटिते दुखनीक मनमे, ओछाइनेपर उपकल- आइए दीयोबाती छी आ गाममे काली-पूजाक मेलो। बेटी मन पड़लै। एना कऽ श्यामाकेँ समाद देने छेलिऐ जे एक दिन पहिनहि धिया-पुताकेँ नेने अबिहेँ, से कहाँ आएल‍। ओहो वेचारी की करत? अन-पानि घरमे हेतै मुदा तीनू तूर जे मेला देखत तइले तँ दसो-बीस चाही। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे से नइ होइ तेकरो इंजाम ने करय पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरियान नै भेल होइ। हँ, हँ, भरिसक सएह भेल हेतइ। ओना, आइ भरि अबैक समैयो छै, बेरो धरि एबे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैआ नेने आएत मुदा जारैन तँ नै आनत। अखन धरि हमहूँ तँ जारैनक कोनो ओरियान नहियेँ केलौं हेन। आब कहिया करब? भने मन पड़ि गेल। सोचने छेलौं जे श्यामा औत तँ घर-अँगनाक काज सम्‍हारि देत सेहो नहियेँ भेल। भरिये दिनमे की सभ करब। घरो छछारैले अछि, ओलतियो ओहिना पड़ल अछि। केना असगरे एते काज सम्हरत? ओलतीमे माटि भरब, आकि घर छछारब आकि जारैन‍ आनब..?” क्रमश: दुखनी जारनि तोड़ए गलीह। चारि बोझ सुखल ठौहरी तोड़ैत-तोड़ैत दुखनीकेँ दुपहर भऽ गेलनि। प्रस्तुत अंकमे उपन्यासकार दुखनीक मनोविश्लेषण एहि रूपे कयने छथि जे एकटा नि:सहाय गरीबक जीवन होइए। बेर झुकैत-झुकैत बेटी श्यामा सेहो दुनू बच्चाक संग पहुँचैए। आ बेटा ‘भुखना’ सेहो परदेशसँ आबि जाइत अछि। उपन्यासकार दुखनीक माध्यमसँ ओहन चित्र प्रस्तुत कएलनि अछि जाहिमे ई देखबामे अबैत अछि जे निराश लोकक मनमे कोना आशा जागैत अछि। बेटा-बेटी, नाति-नातिनकेँ देखि दुखनीकेँ अतिशय खुशी होइत अछि। अगिला अंकमे उपन्यासकार बँसपुरा समाजक ओ रूप प्रस्तुत कएलनि अछि जे विराट-सँ-विराटतम गाम-समाजक थिक। समुच्चा गौंआँ एकठाम बैस कालीपूजा आ मेला हेतु एहि तरहेँ निर्णय कएलनि- (1) गामेक कारीगर माने मूर्ति बनौनिहार मूर्ति बनबए। ओना, एक-पर-एक कारीगर दुनियाँमे अछि मुदा पूजाक मूर्तिमे कला नै देवी-देवताक स्वरूप देखल जाइए‍। दोसर जँ हम अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधला कहब तँ गामक कलाकार आगू केना ससरत? तँए जे गामक कला अछि ओकरा सभ मिलि प्रोत्‍साहित करी। (2) काली मण्डप गामेक घरहटिया बनबैथ‍‍। जिनका घर बनबैक लूरि छैन ओ मण्डप किए ने बना सकै छैथ‍‍। संगे ईहो हएत जे गामक अधिक-सँ-अधिक लोकक सहयोग सेहो होएत। (3) मनोरंजन-ले गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटैन‍। संगे बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा आनल जाए जेहेन ऐ परोपट्टामे नै आएल हुअए। (4) पूजा-ले, परम्परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटैन‍ जे पूजाक प्रेमी छैथ‍‍। (5) गामक जेते गोरे काज करैथ‍ ओइमे नीक केनिहारकेँ पुरस्कृत आ अधला केनिहारकेँ आगू मौका नै देल जाइन।” एहि तरहक निर्णयसँ समाजक महत्तेटा नहि बढ़त बल्कि समाजक गुणमे विराटपन सेहो आओत। जखनहि समाजमे सार्वजनिक काजमे जखन समाजक लोकक कलाक अर्थात् लूरिक पुछ हएत तखनहि ने गामक कलामे विराटपन आओत। से भेल। तहिना गामक मेला छी, ओना बाहरी व्यापारी सेहो अपन दोकान-दौरी करय लेल एबे करताह, ताहूमे मेलाक ततेक प्रचार भऽ गेलजे...। मुजफ्फरपुरक नाटक, वृन्दावनक रास, मेल-फीमेल कौब्बालीक संग महिंसोथाक मलिनिया नाच सेहो आओत। जाहिसँ परोपट्टाक लोकअर्थात् मेला देखिनिहारक भीड़ हेबे करत, ताहि संग गामक जे दोकान-दौरी करैबला छथि हुनकहु सभकेँ प्रोत्साहित कएल जाएत। एहिठाम दोकान-दौरी केनिहारक माध्यमसँ उपन्यासकार समाजक नव जागरण दिसि इशारा कएलनि अछि। मनुक्खमे नव चेतनाक संचार कएलनि अछि। जाहिसँ सुतल चेतनामे जागरूकता आओत। जखनहि सुतल चेतनामे जागरूकता अबैए तखनहि लोक आगू बढ़ि किछु करय चाहैत अछि। बँसपुराक मरदा-मरदी गामक सभ कियो अपन-अपन घरक काज अपन पत्नी वा आन समांगकेँ सुमझा, कालीपूजाक व्यवस्थाक पाछू भिनसरेसँ लागि जाइत गेलाह। व्यक्तिगत विचारकेँ समाजीकरण करैत, काली स्थानसँ लऽ कऽ गामक जतेक रस्ता-पेरा टुटल अछि तकरा सभकेँ मरम्मति करैत, काली स्थानक मैदानकेँ चिक्कन-चुनमुन बनबए लगलाह। मेलाक बीच दुनू रंगक बाजारक चर्च उपन्यासकार कयने छथि। नव फैशनक दोकानक संग पुरान ढर्राक दोकानक चर्च सेहो कएलनि अछि। जे सभदिना व्यापारी छथि ओ नव-नव वस्तुक दोकान कयने छथि मुदा गामक जे नव-नव लोक छथि ओ पुराने ढर्ड़ाक दोकान कएलनि अछि। ताहिमे ताड़क पातक झुनझुनाबला बुढबा सेहो अछि। जे चालीस वर्षसँ ऊपरेसँ गाममे झुनझुना बेचैत आबि रहल अछि। झुनझुनाबला बुढ़बाक विषयमे उपन्यासकारक वर्णन द्रष्टव्य अछि- “तोरा तँ कनी कऽ चिन्है छिअ हौ झुनझुनाबला?” “बौआ चसमा लगौने छी तँए धकचुकाइ छह। पहिने चसमा नै लगबै छेलौं। आँखियो नीक छेलए। दू साल पहिने आँखि खराप भऽ गेल, अही बेर लहानमे आँखि बनेलौं।” मुदा झुनझुनावाली परेख‍ कऽ कहलक- “बौआ सोनमा रौ? जहियासँ परदेस खटए लगलेँ तहियासँ नै देखलियौ। तूँ हमरा चिन्है छेँ?” “नहि।” “तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्के ठीन अछि, अँगने-अँगने झुनझुनो आ बिऐनो-पटिया बेचै छी। अहीसँ गुजर करै छी। आब तँ भगवान सभ किछु दए देलैन‍। दूटा बेटा-पुतोहु अछि। सातटा पोता-पोती अछि। दुनू बेटा घर जोड़ैया करैए, राज मिस्‍त्री छी। खूब कमाइए। आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा दुनू परानी तँ जिनगी भरि यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना, दुनू भाँइ मनाहियोँ करैए। मगर हाथ-पर-हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लगत। तँए जाबे जीबै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्चेसँ बहिना लगल अछि। जहिया तोरा घर दिस जाइ छी तहिया बिना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि दिहैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि। तोरा कएटा बच्चा छौ?” “एक्केटा अछि।” “एकटा झुनझुना बौआ-ले नेने जाही।” “ओहिना नै लेबौ मौसी। अखन हमरो संगमे पाइ नै अछि आ तहूँ दोकान लगैबते‍ छेँ। बिकरी बट्टा थोड़े भेल हेतौ।” “रओ बोहैनक सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बिद करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइले बोहैनक काज अछि। ले नेने जाही।” दोसर दोकान रमेसरा बढ़ीक छी, जे लोहोक समान आ लकड़ियोक समानक अछि। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरिया, कुरहैर‍, खनती, चक्कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्चा सबहक तीन पहिया गाड़ी इत्यादिक दोकान लगौने अछि। तहिना रौदिया भैया, जे गौंए छथि ओहो चाहक दोकान कएलनि अछि। तहिना कुम्हारक दोकान सेहो अछि जे माटिक वर्तनक दोकान कएलनि अछि। तहिना डोमक अछि जे अपन सभदिना कारोबार बाँसक छिट्टा, पथिया, कोनियॉं-सूप इत्यादिक दोकान कयने छथि। साँझू पहर, जखन पूजा शुरू नहि भेल छल, मुदा मेलाक रूप-रंग तँ तैयार भइये गेल छलैक। नाच-तमाशाक स्टेज सभ तैयार भऽ गेल छल, सभ पार्टी स्टेजपर जाइ लेल तैयारी कइये रहल छल, दर्शकक भीड़ लागि चुकल छल कि एकाएक मेघ उठल आ झॉंट-पानि सभ शुरू भऽ गेल। जहिना तेज हवा चलि रहल छल तहिना घनघोर बरखा सेहो भेल। गौंआँ-घरूआ तँ भागि-भागि, भीजैत-तीतैत अपन घर पहुँचि गेल मुदा अनगौंआँ फँसि गेल। ओना, किछु अनगौंआँ सेहो भागि-भागि गौंआ सबहक एहिठाम पहुँच गेल, मुदा अधिकतर अनगौंआँ मेलेमे अपन जान बँचबैक खियालसँ जहॉं-तहॉं अपन गर लगौलक। वृन्दावनक रासक मंच किछु बेसी खड़ा छल जकरा निच्चॉं माने तरमे लोक भरि गेल। ताहि संग मंचक ऊपरोमे, मंचक ऊपर तिरपाल-पर्दा लागल छल, ताहूपर तेते लोक चढ़ि गेल जे मंचे टुटि कऽ खसि पड़ल। जाहिसँ तरक लोककेँ हाथो-पएर टुटल आ कतेको मरबो कएल। मेलाक दृश्यक पछाति उपन्यासकार बँसपुरा गामक समाजक चर्च कएलनि अछि। झॉंट-पानि तेज रहने गामक घरो-दुआर खसल आ अनेकहु तरहक नोकसान सेहो भेल। रूपलालक घर खसि पड़ल। घरक तरेमे रूपलाल अपने पड़ि गेल। पत्नी दोसर घरमे, रहने बुझबे ने केलीह। झॉंट-पानिक तते अवाज होइत छलै जे घरक अवाज दबि जाइत रहैक। पत्नी (मुनेसरी) बुझबे ने केलीह। सजना मेला देखए गेल छल। ओहो तीतैत-भीजैत घरपर आबि गेल। दुनियॉंलाल आ रूपलाल सहोदार भाय मुदा दुनू भीन अछि। जीह-जानसँ दुनियॉंलाल आ बेटा सजनो दुनू बापूत मिलि कऽ मेहनत कय रूपलालकेँ घरसँ निकाललक। ओना, रूपलालकेँ चोट लगल रहैक मुदा शरीरक किछु अवघात नहि भेल छलैक। शान्त भेला पछाति जखन दुनू भाँइक बीच गप-सप्प शुरू भेल तखन दुनियॉंलाल तँ अपन दायित्व बुझलक मुदा रूपलालक मनमे सहोदर भाइक सिनेह उमैड़ पड़लैक। आ बाजए लगल- “भैया, धरमागती बात कहै छिअ। दुरागमनक पछाइत‍‍ जे विदागरी करबैले पठौने रहऽ, ओइ दिनक बात कहै छिअ। अपनो सासु आ टोलोक मौगी सभ आबि कऽ लगमे बैसल‍। अपना बुझि पड़ए जे जहिना वृन्दावनमे कृष्ण गोपी सबहक संग बैस कऽ गप-सप्प करै छला तहिना हमहूँ छी। एक-मुहरी सभ स्‍त्रीगण कहए लगल जे अहाँक भाए बड़ छनकट अछि। केतबो कमाएब तँ भाभन्स हुअ देत। अहाँ दुनू परानी कमाएब आ ओ कोसल करत। जखन हाथ-मुट्ठी गरमा जेतै तखन भीन कऽ देत। अखन दुनू परानी जुआन छी, कमाइ-खटाइ छी। अखन नै किछु बना लेब तँ जखन धिया-पुता हएत खरचा बढ़त, तखन कएल हएत। तँए नीक कहै छी जे अखने भीन भऽ जाउ। नै तँ पाछू पचताएब।” रूपलाल ईहो बाजल जे आइ बुझै छी जे सहोदर भाय की छी। प्रस्तुत घटनाक माध्यमसँ उपन्यासकार सहोदर भाइक प्रति की सिनेह हेबा चाही आ सामाजिक परिवेशमे की बनि गेल अछि तकर चर्च विस्तारसँ कएलनि अछि। विस्तारित रूपकेँ दृष्टिपात कएल जाए- “कियो जे तोरा किछु कहलकौ आ तूँ मानि गेलेँ से अपन बुधि केतए गेल छेलौ। तूँ नै देखै छेलही जे दुनू भाँइ संगे बोइन करैले जाइ छेलौं आ आँगनमे भौजाइ भरि दिन अँगना-घरक काज सम्‍हारि जारैन-काठीक ओरियान करै छेलखुन। तैपर एकटा नाङैरक घास-भूसा, खुऔनाइ-पीऔनाइसँ लऽ कऽ आश्रमी भानस-भात कऽ बरतन-बासन धरि मँजै छेलखुन, से सभ अपना आँखिए नै देखै छेलही। तोंही कह जे सत् बात की छेलै आ मौगी सबहक कान भरने तूँ की बुझलीही!” अपसोच कऽ मुड़ी डोला रूपलाल मिरमिराइत बाजल- “हँ भैया, ई तँ ठीके कहै छह।” “अपने आँखिसँ जे देखै छेलही से झूठ बुझि पड़लौ आ जे झूठ बात सुनलेँ ओकरा सत् मानि लेलही। एकरे कहै छै मौगयाही भाँज। तोरे जकाँ आनो-आन मौगयाही भाँजमे पड़ि कुल-खानदानक नाक-कान कटबैए। नैहरसँ सासुर जाइ काल जे मौगी सभ कानि-कानि बजैए से की कहै छै से बुझै छीही? ओ कहै छै जे जहिना बाप-माइक घराड़ीपर हम कनै छी, तहिना बाप-दादाक घराड़ीपर घरबलाकेँ कनाएब। अरे! एतबो ने बुझै छीही जे दुनियाँमे सभ कुछ मिलि सकैए मुदा सहोदर भाए नै मिलै छइ। भाइक खातिर लक्ष्‍मण स्‍त्री, परिवार आ समाज सभ छोड़ि देलखिन मुदा भाइक संग अन्तिम समय धरि रहलखिन। आइ तोरा के काज दइले एलौ। कनियोँ जँ हमरा मनमे पाप रहैत तँ तोरा घरेमे मरैले नै छोड़ि दैतियौ। नै तँ झीक‍-झाकि कऽ ठाठ देहेपर खसा दैतियौ। नइ मरितेँ मुदा हाथो-पएर तँ टुटबे कैरतौ।” नमहर साँस छोड़ैत रूपलाल अपन सिमसल आँखिकेँ मिड़ैत बाजल- “भैया, आइ बुझि पड़ैए जे सभ ठकि लेलक!” “कान पाथि कऽ सुनि-‍ले। जहिना मनुख सभसँ पैघ जीव ऐ धरतीपर अछि, जे बड़का-बड़का चमत्कारी काजो करैए‍, तहिना छुतहरो अछि। देखबीही जे जेकरा कनी बुधि-अकील छै ओ सदिकाल बुड़िबक सबहक कमाइ ठकि-ठकि मौजसँ खाइए, खेबेटा नै करैए‍ ओकर बोहु-बेटीक संग कुत्ता-बिलाइ जकाँ इज्जतो संग बेवहार करैए।” “भैया, आइ बुझि पड़ैए जे हमर बाप मरल नै जीबते अछि।” पिताक रूपमे अपनाकेँ पाबि दुनियालालक हृदय पसीज गेल। बाजल- “बौआ, जे समय बीत गेल ओ आब थोड़े घुमि कऽ औत। मुदा जाबे जीबैत रहब, तैबीच जे समय अछि ओ तँ बँचल अछि। हमरा तूँ मोजर दे आकि नै दे मुदा अपन सीमा तँ हमहूँ बुझै छी किने। अपन कमाइ खाइ छी, अपने औरूदे जीबै छी। तइले दोसराक कोन आश। अपन काज दुसैबला नै करब। जँ केकरो नीक कएल नै हएत तँ अधले किए करबै। तोरा प्रति जे काज अछि सएह ने करब।” एहि तरहेँ उपन्यासकार आगू अनुपक चर्च सेहो कएलनि अछि। अनुप ओहन किसान अछि जे खेतीक संग महींस सेहो पोसने अछि। जाहि दिन मेलाक आरम्भ भेल छल ताहिसँ एक दिन पहिने अनुपक महींस उठल, पाल खाइ लेल। चारि बजे भोरमे महींस लऽ कऽ अनुप पाड़ा ताकए विदा भेल। वौआइत-वौआइत बेरू पहरमे पाड़ा भेटलैक, जे महींसकेँ गछाड़ि लेलक। भूखे-पियासे अनुप लहालोट भऽ गेल मुदा करितए की। दोसर कोनहु उपाय रहबे ने करैक। जखन झॉंट-पानिमे अनुप पड़ि गेल छल। घरपर अबैत-अबैत मन खराव भऽ गेलैक। माने धाह-बोखार लागि गेलैक। पत्नीकेँ अनुप कहलक अही महींसक परसादे गुजरो चलैए आ हाथ-मुट्ठीमे दूटा पाइ सेहो रहैए। अनुपक अतिरिक्त उपन्यासकार राजेसर भाइक चर्च सेहो कएलनि अछि। राजेसर जरसी गाए रखने अछि जे ठाँठ भऽ गेल छैक। तेँ डॉक्टर लग मधेपुर लऽ गेल छल। अबेर भऽ गेलैक। झॉंट-पानि रस्तेमे पकड़ि लेलकैक मुदा कहुना-कहुना घरपर आबि गेल। घरपर एला बाद गाए मरि गेलइ। गाए मरैक कारण भेलैक जे झॉंट-पानिमे भीजब आ अकान्त हएब। कानैत राजेसर बेटाकेँ कहलक जे बौआ, गाए मरि गेल तेकर सोच ओते नहि अछि मुदा बैंकक कर्ज केना चुकाएब चिन्ता तेकर अछि। प्रस्तुत प्रसंगक विस्तारित रूप, जे उपन्यासमे आएल अछि। राजेसर बाजल- “गाए मरि गेल तेकर दुख ओते ने अछि जेते बैंकक करजाक अछि। एक तँ सरकार लोककेँ मदैत करैए आकि गरदैनमे फाँस लगबैए। जखन गाए नै नेने रही तखन कहलक जे तेकरी सरकार देत आ बाँकी दू हिस्सा बैंकसँ करजा भेटत। काज सुगम देख लेलौं। बुझबे ने केलिऐ जे गरदैनमे फँसरी लगबैए। छूट-ले बैंकबला कहलक जे मधमन्नीसँ कागत आनि कऽ दिअ तखन ओइ रूपैआक मिनहा लोनमे भऽ जाएत। जाबे तक ओ कागत नै देब ताबे तक सोल्‍होअना रूपैआक सूदि चलैत रहत। अपने देखल-सुनल नहि। कोटक मंशीकेँ जा कऽ सभ बात कहलिऐ तँ ओ तैयार भऽ कऽ ओइ ओफिस गेल। पाछूसँ अपनो गेलौं। ओफिस जखन गेलौं तँ कहलक जे पान साए रूपैआ लगत, तखन कागत देब। अहिना दौड़-बड़हा करैमे हजारसँ ऊपरे खर्च भऽ गेल। रूपैआक किस्त नै देने छेलिऐ। बैंकमे जखन हिसाब करबए लगलौं तँ कहलक जे छह मासक सूदि मूरमे जमा भऽ गेल, आब ओकरो सूदि लगत। तैबीच गाइयो मरि गेल! आब की करब?” अगिला घटना कुम्हारक अछि। जे अपन श्रमबलसँ खपड़ाक कारोबार ठाढ़ कयने छल। पावनिक शुभ दिन बुझि सुरतिया खपड़ाक भट्ठा लगौलक। खेला-पीला पछाति भट्ठामे आगि देलक। आगि जखन पजरि गेलैक तखन झॉंट-पानिक चलैत सभटा खपड़ा गलि गेलैक, माटि भऽ गेलैक। मास दिनक मेहनतकेँ डुमैत देखि सुरतियाक मन छहोंछित भऽ गेलैक। ओना, एहि घटनाकेँ सुरतियाक पत्नी डाइन-जोगिनक दोख लगबैत खूब गरियाबए लगलीह। मुदा तकरा रोकैत सुरतिया कहलक जे एक तँ मास दिनक मेहनत गेल तइपर अनेरे अहॉं की समाजमे दुश्मनी बढ़बै छी। ताहिसँ आगूक एक घटना फदनाक अछि। जे दूटा पोखरिमे माछ पोसने अछि। एकटा तँ बँचलै मुदा दोसर दहा गेलैक, एहि पोखरिमे महार नहि छलै। दुनू परानीक बीचक यथावत वार्त्तालापकेँ देखल जाए- “गलती अपनो सबहक भेल जे पोखैरक मुँह मजगूतसँ नै बान्हि देलिऐ। जँ से बान्हल रहैत तँ एहेन दिन थोड़े देखतौं। काल्हि‍‍ भोरे पाँचटा टल्लाबला जन कऽ कऽ मजगूतसँ मुँह बान्हि देबइ। अखन कातिके छी बहुत समय अछि। बैशाख-जेठमे मछहैर‍ हएत। भने पोखैर उपो-उप भरि गेल।” पत्नीक बात सुनि फुदना बाजल- “जँए एते पूजी लगेलौं तँए थोड़े आरो लगा देबइ। दू मन खैर आनि कऽ सेहो दइए देबइ। ओना, देखै छिऐ जे केते गोरे खादो दइए। मुदा अपना तँ ओते ओकाइत नइए। ऐ साल कहुना-कहुना कऽ लिअ। ऐगला सालसँ नीक जकाँ करब। कोनो की अग्‍गह-बिग्‍गह पोखैरे जोतलासँ थोड़े होइ छै, जेतबे करब नीक जकाँ करब।” तकर अगिला घटनामे भोलाक चर्च उपन्यासकार कएलनि अछि। कोबी, भाँटा, मिरचाइ इत्यादि बीहनिक कारोबार भोला करैए। ऊपरका खेतमे तेहन दनार फोड़लकैक जे सभ बीआ भँसियाएल माटिक तरमे परि कऽ झँपा गेल। भोलाक परिचय दैत एहि घटनाक प्रसंगमे उपन्यासकार लिखने छथि- “मंचक घटना सम्‍हारि भोला घरपर आबि बीरार देखए गेल। बीरारमे बिहैनक दशा बिगड़ल देख निराश भऽ गेल। आमदनीक आशा टुटि गेलइ।” जहिना भोला छोट किसान तहिना छोट कारोबारियो। पनरहे कट्ठाक आँट-पेटक किसान। मुदा दुनू परानी एहेन मेहनती जे सात गोरेक परिवार हँसी-खुशीसँ चलबैत। ओना, चारिटा बच्चा लिधुरिया रहै मुदा जेठका बारह बर्खक। जेठ बेटा बलदेब मिड्ल स्कूलमे पढ़बो करैत आ घर-गिरहस्तीक काजमे संगो-साथ दइत। स्कूलोक दशा तेनाहे सन। पाँच साए विद्यार्थीक स्कूलमे तीनिटा शिक्षक। तहूमे एकटा नेतागिरिये करैत। पढ़बै-लिखबैसँ ओते मतलब नहि, जेते आँफिसक दौड़-बड़हासँ। सिरिफ लोकेक काजे ऑफिस नै जाए, बल्‍कि‍ स्‍टाफो सबहक काज करैत। जइसँ आमदनियोँ नीक आ पैघ लोकक बीच बैस समैयो गूदस करैत। स्कूलसँ ओतबे मतलब जे मासो दिनक हाजरी बना दरमाहा उठबैत। समाजमे केकरो किछु कहैक साहसे नहि। थाना-बहानासँ लऽ कऽ कोट-कचहरी धरिक धुड़फन्दा लोक, तँए कियो आँखि केना उठा सकैए। तहूमे सरकारी पार्टीक नेतागिरी करैत। स्कूलक ढील-ढालसँ भोला खुशीए रहए। किएक तँ बलदेब माल-जालक पूरा भार उठा नेने। कुट्टी काटब, खाइले देब, पानि पियाएब, घर-बाहर करब, थैर खर्ड़ब, गोबर उठाएब बलदेवक बान्हल ड्यूटी‍। अइले ने पिताकेँ अढ़बैक जरूरत‍ आ ने कोनो चिन्ता। मुदा तँए की बलदेव पढ़ए नहि? पढ़बो करए। भरि दिन ने माल-जालक नेकरम करै मुदा बारह घन्‍टाक राति तँ बँचइ। दोसैर साँझ होइते भोला मुस्‍तैज भऽ धिया-पुता लग बैस नजैर‍ रखैत। पढ़ैमे बलदेव ओते चन्सगर नहि, रहबो केना करैत? जखन स्कूलेकेँ केन्सर धेने रहत, तखन हाथ-पएर केते क्रि‍याशील रहत। मुदा तँए कि बलदेव सोलहन्नी भुसकौले रहए से नहि। इमानदारीक छह घन्‍टाक मेहनतसँ कियो इंजीनियर तँ कियो डॉक्टर, कियो ओकील, तँ कियो प्रोफेसर बनि जाइए‍, तँ तीन‍ घन्‍टाक मेहनतसँ बलदेव किए ने पास करत। साले-साल किलास टपिते रहए। भोलो खुशी, किएक तँ बच्चेमे बाबाक मुहेँ सुनने रहए जे- ‘उत्तम खेती।’ नोकरी आ गुलामीमे की अन्तर छइ। कमा कऽ जिनगी जीबैक लूरि जँ भऽ जाए तँ ऐसँ बेसीक जरूरते की‍। जहिना राजतंत्रमे रजेक बेटा राजा होइत तहिना ने प्रजातंत्रोमे मंत्रियेक बेटा मंत्री आ हाकिमेक बेटा ने हाकिम बनत। तइले आनक सेहन्ता, सेहन्ता नै तँ आरो की भऽ सकै छइ?” पछाति सिसौनी गाममे सेहो काली पूजाक संग मेलाक आयोजन होइत अछि। मेलाक बीच जे नव-नव लोक, अर्थात ओहन-ओहन लोक जे एखन धरि कोनहु कारोबार नहि कयने छलाह, ओहनो लोक सभ व्यवसाय दिस बढ़ला। मुदा पानि-बिहारिक चलैत जे कारोबार असफल भऽ गेलैक। ताहि असफलताकेँ देखबैत उपन्यासकार ओहि असफल व्यक्तिक बीचक प्रतिक्रियाकेँ सेहो रेखांकित कएलनि अछि। दू तरहक प्रतिक्रिया भेलैक। पहिलप्रतिक्रियामे लोक अपन भाग्यकेँ कोसए लगल जे भाग्यमे लिखल जएह रहत सएह ने हएत। अर्थात जे काज जकरा भाग्यमे लिखल रहैत छैक ओ ओकरे भऽ सकैत छैक। मुदा सामुहिक रूपमे घटना भेलासँ, अर्थात घटनाक प्रभाव एकरंग भेलासँ लोकक मनमे दोसर प्रतिक्रियाईहो भेलैक जे जँ हमरेटा एहेन भेल रहैत तखन ने, से तँ ओकरो भेल जे जीवनी कारोबारी अछि। प्रस्तुत उपन्यासमे उपन्यासकार नव चेतनाक संग परिवर्तित होइत जीवनक विषद रूपमे चर्च कएलनि अछि। ताहिसंग साहित्य समाजक दर्पण थिक, जे एखन धरि मैथिली साहित्यमे एकाकी रूपमे आबि रहल छल ओकरा विराट रूपमे अर्थात् समाजक सभ वर्गक लोककेँ समाहित करैत उपन्यास गढ़लैन अछि। जे साहित्यक्षेत्रक लेल एकटा नव उपलब्धि सेहो कहल जा सकैए। जीवन-संघर्ष उपन्यासमे जे कोनहु घटनाक चर्च भेल अछि ओ जीवनक भविष्य दिस सेहो इशारा करैए। ताहि संग समाजमे जे वैमनस्यक रूप एक-दोसराक बीच सभ दिनसँ अबैत रहल अछि ओकरा सामंजस्य करैक भरपूर प्रयास भेल अछि। जाधरि समाजमे प्रेमपूर्ण सम्बन्ध नहि बनत ताधरि नव समाजक निर्माण कोना हएत। जाधरि समयानुकूल नव रूपमे समाज ठाढ़ नहि हएत ताधरि समयक संग समाज चलि कोना सकैए। ‘जीवन-संघर्ष’ उपन्यासक नामक सार्थकता सिद्ध करैत संघर्षक महत्वकेँ देखबैत उपन्यासकार संघर्षक मुख्य कारक तत्वकेँ सेहो प्रदर्शित कएलनि अछि। संघर्षक कारण द्वन्द्व होइत अछि। ओना, द्वन्द्व दुनू दिशामे होइए। माने सकारात्मक सेहो होइए आ नाकारात्मक सेहो होइते अछि। नकारात्मक द्वन्द्व पतन दिस बढ़बैत अछि जखन कि सकारात्मक द्वन्द्व उत्थान दिस बढ़बैत नीकसँ नीक दिशामे, उन्नतिसँ उन्नति दिशामे बढ़बैत अछि। केशव भारद्वाज- (आइ-काल्हि कम्पाला, युगाण्डामे) किछु बीहनि कथा, किछु लघुकथा, एकटा दीर्घकथा आ एकटा उपन्यास ओ बच्चा (बीहनि कथा) कमिटमेंट (बीहनिकथा) मनु:गंध (बीहनि कथा) सोच (बीहनि कथा) गलत निर्णय (बीहनि कथा) खाली हाथ (बीहनि कथा) नबका धनिक (बीहनि कथा) किस्मत (बीहनि कथा) प्रेम विवाह-नब प्रयोग (बीहनि कथा) दही वाली बुढ़ी (बीहनि कथा) भुत-बंगला (बीहनि कथा) मध्यस्थ (बीहनि कथा) गामक माइट नसीब नञि (बीहनि कथा) कन्यादान (लघुकथा) पछतावा (लघुकथा) उपराग (लघुकथा) अएना (लघुकथा) हत्यारा (लघुकथा) हुब्बा (लघुकथा) इच्छा (लघुकथा) मिशन एडमिशन (लघुकथा) अपन लोक (लघुकथा) बख्शीश (लघुकथा) टीस (लघुकथा) विश्वासघात (लघुकथा) पापक फल (लघुकथा) हाथक लकीर (लघुकथा) छक्का-पुराण (लघुकथा) सरप्राइज (लघुकथा) अफेयर (लघुकथा) केतकीक व्यथा- की कहू कथा (लघुकथा) उठऊआ बियाह (लघुकथा) बड़का घरक बहुरिया (लघुकथा) दरबार (लघुकथा) समयक चक्र (लघुकथा) बदलल बेबहार (लघुकथा) अनघोल (लघुकथा) देहक नेह (लघुकथा) लछमी बहुरिया (लघुकथा) अजादी (लघुकथा) गोलकी फ्रेमक चश्मा (लघुकथा) अंत (लघुकथा) फैसला (लघुकथा) आत्मग्लानि (लघुकथा) खेलौना (लघुकथा) कल्पवास (लघुकथा) बच्चनक बचन (लघुकथा) रखबार (लघुकथा) चंसगर (लघुकथा) दोषी के? (लघुकथा) बतहिया गाछी- (लघुकथा) डालडा प्रसाद (लघुकथा) की सोचल- की लीखल- दीर्घकथा (पहिल आ दोसर भाग), (अंतिम भाग) पैबंद- उपन्यास (पहिल सँ सातम भाग), (अंतिम भाग १-२) ओ बच्चा (बीहनि कथा) किछु लोक जीवन मे एहन होइत छइ जे कनियो काल मे अप्पन छाप छोड़ि जाइत छइ। उनकासऽ आहाकऽ कम्फर्ट लेवल कम्मे काल मेभऽ जाइत अछि।एना बुझाइत जे कहियाकऽ पुरान परिचित छी।कतउ किछु छइ जे खीचैत छइ एक दोसर के।विस्मृति मे ओ चेहरा अबइत रहइ छइ। ओही मेसऽ एककऽ विषय मे कहइ छी। बच्चा मे संबंधी कत गेल रही ओत ओइ बच्चासऽ भेंट भेल। ओ उमर मे हमरासऽ पैघ रहितो, हमरा पैघ जेका आदर दिअय। हमरा देखते ओ बच्चा खुशभऽ जाय। अप्पन सब संगीसऽ हमरा भेंट कराबय।तहिया ओतेक धनिक गरीब त नञि बुझियइ, मुदा ई बुझि गेल रहियइ की ओ परिवारकऽ आर्थिक हालात ठीक नञि छइ। हम जखइन ओकरा संग ओकर घर जाइ त ओकर पुरा परिवार खुब मान करय। अतेक मान, अप्पन गाम मे नञि भेटय ताहि लेल बेशिये नीक लागय। ओ बच्चा हमर संबंधी कतकऽ हाट-बाजार ,टहल- टिकोरा सेहोकऽ दिअय।हाट जायकऽ काल मे हमहु ओकरा संगे जाइ त ओ बड खुशभऽ जाय।जेतबा स्मृति अछि, ओ किछु सामानक खरीद मे गड़बड़ी करय, मुदा नञि हमरा खराब लागय आ नञि हम अप्पन संबंधीकऽ किछु कहियइ। कारण ई छल जे ओ बच्चा ओइ पाइसऽ अप्पन घर खातिर किछु सामान खरीदइ छलइ। दोकानदार आ ओकरा मे इशारा मे गप्पभऽ जाइ। हमरा पाहुन बच्चा कहि किछु चाकलेटदऽ दिअय। हमरा जन्तवे, हमर संबंधीकऽ सेहो ई गडबडी बुझल छेलइन, लेकिन कियो किछु नञि कहइ।गाम घर मे बाबू-भइयाकऽ बच्चा ओतेक अनुशासित नञि कि दोकानसऽ सामान आइन दय। नौकर चाकर भेटनाइ कमभऽ गेल छलइ। ओही स्थिति मे ईएह बच्चा पर सबके आस। ई त एक गुण भेल। दोसर जे ओ पढ मे सबस तेज सेहो छल। लेकिन जे बच्चा दोकानसऽ सामान आनऽ काल अतेक सज्जन, उएह बच्चा संगी संग खेल मे सबसऽ दबंग। खेल मे ओकरे चलती छलइ- कनी उम्र सेहो बेशी भेनाइ एक कारण। कहबाक जे कयेक टा ओकर रूप आ हम ओकर संग आनन्दसऽ बितबइ छलौं। समय अप्पन रफ्तारसऽ चइल रहल छल। कयेक बरख कऽ बाद जखइन फेर हम ओइ गाम गेलौं आ ओकर पुछारी कयलौं त पता चलल कि ओ बच्चाकऽ दिलकऽ बीमारी छलइ आ ओकर मृत्यु तीन बरख पहिनेहेभऽ गेलइ। हम सुइनकऽ स्तब्धभऽ गेलौं। हम संबंधीसऽ पुछलइन कि ईलाज नञि कराओल गेलइ। जवाब भेटल- खाय पर आफत छलइन, ईलाज कतऽ सऽ करयतिन।हम १/२ दिनक बादय गाम वापस आबि गेलौं। कतऽ हम सोचई छेलौं कि ओ बच्चा अप्पन माय बापकऽ कष्ट दूर करत, त कत ओ बच्चा सबकऽ छोड़ कर चइल गेल।गरीबक जिम्मेदार बच्चा। भगवानसऽ विनती जे ज्यों जन्म दइ छथिन त जीवन सेहो दियउन। कमिटमेंट (बीहनि कथा) कमिटमेट शब्दकऽ युवा सब सलमान खानकऽ डायलॉगसऽ जोइड़कऽ गाहे-बगाहे उपयोग करइत छथि। आइ हम एक टा मैथिल मनीषीकऽ कमिटमेटकऽ बारे मे लिख रहल छी। हाल तक मिथिला मे संयुक्त परिवार बहुल मे देखल जाइत छल। संयुक्त परिवारकऽ अप्पन किछु सीमा , अनुशासन व गरिमा होइत छइ जे कयेक बेर विकास विरोधीभऽ जाइत छल। कथाकऽ किरदारकऽ काल्पनिक नाम हम राम बाबू रखइ छी।आजादी पुर्वकऽ समय छल। राम बाबू सुभ्यस्त गृहस्थ संयुक्त परिवारकऽ छलाह। घरक सामुहिक खर्चसऽ कलकत्ता मे पढलाह उपरांत सरकारी सेवा मे कार्यरत छलाह। हुनक सहोदर छोट भाइ आ पितियौत भाइ दुनु एक रंगाहे विद्यार्थी छलाह । एक्के संगे मैट्रिक पास केलाह। आब सवाल ठार भेलइ कि आगु के, की, कोना।फैसला भेलइ कि चुंकि राम बाबूकऽ बाहर पठाकऽ घरक सामुहिक आमदनीसऽ पढावल गेल छइन, ताहि लेल अइ बेर आगुकऽ पढ़ाइकऽ मौका उनकर पितियौत भाइकऽ भेटतइन। आ पढ़ाइकऽ खर्च, राम बाबूकऽ देबाक छइन। राम बाबूकऽ विचार छलइन जे दुनु भाइकऽ आगु पढावल जाय। मुदा उनकर मत पर सहमति नञि भेलइन। राम बाबूकऽ सहोदर अनुजकऽ अंग्रेज सरकार मे नौकरी ज्वाइन कर परलइन। ओ चाहियोकऽ ग्रेजुएट नञि करा सकला अप्पन छोट भाइ के। मुदा ताहि समय अपने आपसऽ कमिटमेट कयलाह कि हम अप्पन भातिजकऽ जरूर ग्रेजुएट करायब। घरक फैसलाकऽ अनुसार पितियौत भाइकऽ ग्रेजुएट करेलाह, आ ओ भाइ सेहो सम्मानित पद प्राप्त कयलाह। राम बाबूकऽ अइ बीच अपनो परिवार बढलइन। तखनो ओ भातिज की भतीजीकऽ सेहो पढेलाह आ ग्रेजुएट बनेलाह। ई भेलइ कमिटमेट। हालांकि राम बाबूकऽ जीवन काल बेशी नञि रहलइन, मुदा परिवार खातिर हुनक त्याग आ योगदान अमिट छइन। आब जे हमर कहबाक आशय अछि जे अतेक त्याग की हमरा सब मे अछि? हम अप्पन कमाइसऽ इच्छाकऽ विरुद्ध पितियौत भाइकऽ पढबइकऽ खर्च उठा सकइ छी? परिवारकऽ अनुशासनकऽ एना पालनकऽ सकइ छी? कमिटमेटकऽ पुरा करबाक इच्छा शक्ति अछि? संयुक्त परिवार एना चलइ छलइ। त्याग पर परिवारकऽ गरीमा टीकल रहइ छलइ। आइ त कमउआ किनको सुनताह अप्पन खर्चकऽ बारे मे।ओइ मनीषीकऽ हमर नमन। हमर संबंधी सब बुझि गेल हेताह। मनु:गंध (बीहनि कथा) कयेक लोक युवावस्था मे बहुते सामाजिक रहइ छथि, मुदा बाद मे एकाकीभऽ जाइत छथि। ओही मेसऽ एक छथि- राम बाबू। आब दिल्ली मे रहइ छथि। बहुत कम अबरजात गामघर स। भगवती सब किछु देलखिन गामो मे, मुदा कियो देख बाला नञि। भम्म पड़इ छइन, घर - दुआर। जतऽ गाम- समाज के,के कहय, दुर दुरकऽ संबंधी सब परल रहइ छल, ओत कियो सांझ देबबाला नञि। हमर ओ संबंधी नञि , अनुबंधी छलाह। हुनक चला- चली हम देखने छलियन।ओ व्यक्ति एना असगरुआ किअए भऽ गेलाह। हमर जिज्ञासा बढइत गेल। एकसऽ एक खिस्सा हुनक रूख्खर स्वभावकऽ दिल्लीकऽ मैथिल समाज मे फैलल अछि। कियो कहइ छइ जे हम गेलौं भेंट करऽ त हमरा रामबाबू कहलाह- ई दिल्ली छइ । अतऽ एक सांझ लोक खुआ त दइ छइ, मुदा रहअकऽ नञि दइ छइ। हम सुनिते घुरी गेलौं। बरका छथि त अपना के। हमरो सारकऽ दिल्ली मे कोठा-सोफा छइ। हम ओत चइल गेलौं। अहिना दस मूंह- दस गप्प। जखइन मूल कारण पता लागल, त सोचऽ पर विवशभऽ गेलौं कीकऽ जिम्मेदार। रामबाबू वन विभाग मे पैघ अधिकारी छलाह। सब दिअयद-बाद, गौआ, संबंधी,ईस्ट मित्र, जे आग्रह केलकइन , छोट छिन सरकारी नौकरी दियेलकिन। ईहो कहू, कनिको कियो दरबारी केलक, किछु न किछु भेटलइ। ताहि लेल बुढ़ी दाई माई सब रामबाबूकऽ खुब आशीष दइ छलकिन आ कियो बेटा, कियो जमाय, कियो नाती, पोता, भागिनकऽ नौकरी खातिर कहतिन। रामबाबू अपना संग एक टा ललका डायरी रखइ छलाह। जिनकर नाम डायरी मे लिखा गेल- बुझु नौकरीभऽ गेल। उनकर पद त बढइत गेलइन लेकिन बाद मे सरकारी तंत्र मे आयल नियमावलीकऽ कारण नौकरी लगबऽ मे असमर्थभऽ गेलाह। बड जश- प्रतिष्ठा छलइन। ओतबे खाई जे मोछ मे नञि लागे- ई सिद्धांत पर चल बाला। जई शहर गेलाह, सामाजिक कार्य मे भरपूर योगदान कयलाह। रिटायरमेटकऽ एक साल पुर्व कर्मचारी यूनियन उनकर खिलाफ बड़का आन्दोलन केलकइन। ओइ मे किछु लोक माईकलऽ क उनकर घर पर गाइड़- गुप्ता सेहो देलकइन। अकर नेतृत्व उनके द्वारा लगावल नौकरी हुनके दोसर टोलकऽ गौआ करय छल। ओकरा नौकरी ओ बहूत कठिनाईसऽ दियौने छलाह- ओकर मसोमात दाईकऽ आग्रह पर। ई सबकऽ पाछु किछु लाबी काज करय छल- आ मोहरा नबका कामरेड हुनके लगायल लोक छल। ई घटना उनका अन्दरसऽ तोइड़ देलकइन। फेर उनका मनु: गंध लागऽ लगलइन। ओ कह लगलखिन की जेकरा आहा कवनो नीक नञि करबइ, ओ कमसऽ कम गाइड़ नञि पढत। आब सवाल ई सामने अइछ कि एकर जिम्मेदार के। अतेक सामाजिक लोक एहन एकाकी किअए भेल-जिम्मेदार के। जीवन मे ज्यों उपकृत कनियो छी, त उनकर खिलाफ नञि जाऊ। समाज मे उपकारी स्वभावकऽ कम्मे लोक बचल छथि। ओहो विमुखभऽ जयताह त सब सामाजिक व्यवस्था गड़बड़ा जाइत। सोच- (बीहनि कथा) पहिने राज, दरबार आ जमींदार सबकऽ कृतिसऽ आम लोक उपकृत होइत छल। जेना स्कूल, कालेज, धर्मशाला, मंदिर,खेलक मैदान, मेला, पढ़ वाला बच्चाकऽ वजीफा, पूजा, रामलीला, बड़का कलाकारकऽ कार्यक्रम सब अछि। लेकिन इनकर कृतिसऽ बेशी विकृतिकऽ खिस्सा, गांव-घर मे फैलल अछि। सच्चाई पता नञि। आब ओइ स्थान पर अधिकारी आ किछु नेता/नेत्री छथि। नेता सबहक अपने अतेक टा पेट जे ओ भरतइन तखइन ने समाजकऽ सोचताह। बचलाह अधिकारी सब।एक टाकऽ सोचऽ कऽ दृष्टिकोण आहा सबकऽ साझाकऽ रहल छी। किछु गोटेकऽ बुझलो होइत।हमर किरदार रामबाबू (छद्म नाम) छथि। राम बाबू भारत सरकार मे शीर्ष पद पर छलाह। एक बेर कोनो काज मे गाम गेलाह। दु दिनभऽ गेलइन, कियो गंउआ भेंट करऽ नञि अयलइन।कान ठार भेलइन। हमेशा लोकसऽ घिरल रहअ वाला लोक।पता लगलइन जे दिल्ली मे उनकर घर पर गेलाह पर उचित व्यवहार हुनका संग नञि कयल गेल छलइन। जाइनकऽ दुख भेलइन। ओ अपने सबहक कतऽ गेलाह आ दिल्ली आबऽ कऽ नोत देलखिन। आब की छल। शुरू भेल लोकक रेला। मिथिला मे बेरोजगारी सब दिनसऽ महामारी। कियैक त काज आ खेलकऽ सेहो छोटका बरका मे बाटल। दिल्ली मे उएह काज करताह मुदा दरभंगा मे कोना। रामबाबू एकटा कर्मचारीकऽ लगा देने छलखिन- मैथिल सबहक सत्कार मे। अपनहु खोज-खबर रखइ छलखिन। नौकरीकऽ प्रत्याशी सबकऽ पहिले दिन स्पष्ट शब्द मे कहि लेल जाइत छलइन। ठीक छइ नौकरी नीक- बेजाय, आगु- पाछु भेटत, मुदा ताबइत आहांकऽ श्रम करऽ परत। बहुत मैथिल श्रमकऽ नामे पर परा जाइत छलाह। जे बचई छलाह, हुनका सबकऽ झाड़ू, खुरपी, कोदाइड़, झरनादि थमा देल जाइ छलइन। परिसर बड़की टा छलइन आ आगंतुक मैथिल ओहोसऽ बेशी। खुब तरकारी उपजई, बिकाइ आ सरकारी एकाउंट मे जमा होइ। जे काजक नाम लइते भाइग जाइ छलाह ओ खुब नुन तेल लगाकऽ खिनान्स करय छलाह। जे सब टीकलाह, सबके नौकरी भेटलइन। एक आर खास गुण छलइन जे छुट्टीकऽ दिन ओ सब आगंतुकक संगहि भोजन करय छलाह। अइ काज करेबाक पाछु जे सोच छइ ओ प्रणम्य छइ। हुनक कहब छलइन जे ई सब बइसकऽ खाली खेताह से राष्ट्रीय क्षति छइ। किछु ओ उत्पादकता होबाक चाही। कहुं सब खाली बइसकऽ समय नञि बिताऊ। ई आहाक नञि राष्ट्रक क्षति अइ। हमरा तरफसऽ हुनक सोचकऽ सैल्यूट। गलत निर्णय (बीहनि कथा) रामबाबू दिल्ली मे सरकारी अस्पताल मे डाक्टर छलाह। ओतेक सामाजिक त नञि मुदा कियो पहुंच जाइ छलइन त किछु मददकऽ दइत छलखिन। सबसं पैघ ई विशेषता छलइन जे काज करथिन वा की नञि, बोली मधुर छलइन। मोहन मिश्रा जेका फीस देलोह पर उवाच कथा नञि कहइ छलखिन। अप्पन समाज मे बोली बानीकऽ लकऽ नीक इज्जत छलइन। रामबाबूकऽ एक टा संतान छलइन। नाम छइन - रिया। आब त धीयापुता कम्मे होइ छइ आ जे छइ से महा दुलारु। एकलौताकऽ त बाते अलग। ज्यों माय - बाप पाइ बाला, त ओ आबेश अलगेसऽ देखाई छइ। एक दिन रामबाबू लग गामक बगलक गामक एक गोटे देखबऽ एलखिन। गप्पकऽ क्रम मे चर्चा भेलइ की उनके गामक रमन नामक बच्चाकऽ दिल्ली मे MAMC मे नाम लिखेलइ अछि। रमनक पिताकऽ अस्था- पात बेशी नञि छइन। आरो बच्चा सब पईढ लिख रहल छइन।ओ चाहइ छथि की कियो रमनक पढाइक भार गछि लियाय आ बियाहक खर्चदऽ दिअयह त ओ कथाकऽ लेताह। रामबाबू जखइन दरभंगा मेडिकल कॉलेज मे पढइ छलाह त उनकर एकटा संगीकऽ अहीना बिबाह भेल छलइ। बड ठसकबाजी मे ओ संगी बियाहक बाद रहअ लागल छेलाह। बाद मे सासुरे वाला ओकरा सरकारी नौकरी बिहारे मे लगा देलकइ। रामबाबूकऽ ई कथा ठीक बुझेलइन। आ ओ ओइ सम्भ्रांत व्यक्तिकऽ गप्प बढबइ लेल कहलखिन। बिबाहक खर्चकऽ अर्थ सामने वालाकऽ हैसिइत पर निर्भर करइत छइ। जेना तेना बिबाह निश्चित भेल। घी कत हरायल, रहरी दाइल मे। रामबाबू एक टा संतानकऽ लेल पुरा खर्च कयलाह। बिबाह तभऽ गेल। मुदा रमन आ रियाकऽ सोच मे कतउ मेल नञि। रिया बिबाहकऽ सामाजिक समझौता बस मानञि छलीह। समाजक रीति-रिवाज कमजोरकऽ लेल होअइ छइ- ई हुनक मान्यता छल। समाजकऽ लेल रमन आ रिया दम्पति मुदा असल मे दुनु अलग । रामबाबू सब देखइत बुझइत छलाह। अप्पन संतानकऽ जनञित छलाह। ई भरोस छलइन जे सब ठीकभऽ जेतइ। इमहर रमन MBBS केलाक बाद MD करऽ लागल छलाह।रिया सेहो ग्रैजुएशनकऽ संग स्त्री शक्तिकऽ एक्टिविस्टभऽ गेल छली। ओ अपनाकऽ सेहो सामाजिक विसंगतिकऽ शिकार मानञि छलीह। हुनक कयेकटा रिपोर्ट अमेरिकाकऽ जर्नल मे छपि चुकल छलइन। मानवाधिकार पर आगुकऽ पढ़ाइकऽ वास्ते छात्रवृत्ति संग वजीफा सेहो भेटलइन। ओ अमेरिका चइल गेलीह। ओतइ एकटा आर एशियाई मूलक लोक सऽ हुनक विचार मिलइ छलइन। आ बाद मे पढ़ाइकऽ बाद दुनु संगे रहअ लगलीह। रमन सेहो MDकऽ बाद बड़का अस्पताल मे कन्सलटेन्टभऽ गेलाह । नीक दरमाहा भेटई छलइन। आब रामबाबूसऽ मासिक पाइ लेनाई छोड़ि देने छलाह। रमन आ रिया दुनुकऽ माय- बापकऽ असलिइत कमोबेश पता चइल गेल रहइन। उपाय की। जखन कखनो रामबाबूकऽ कनिया रियाकऽ फोन करथिन त रियाकऽ पहिल जबाब जे रमनकऽ छोड़िकऽ ज्यों कवनो आर गप्प अइ त ओ करू। माय लग आर कवनो गप्प नञि छलइन। बहुत साहसकऽ क रमन, रिया लग तलाकक प्रस्ताव पठेलाह, मुदा रिया ईहो लेल तैयार नञि। दुनु परिवार लोकक व्यंग्य बान सहइत छल। रियाकऽ रामबाबूकऽ धन सम्पत्तिकऽ सेहो कवनो लिप्सा नञि। रामबाबू साल दु साल पर कनिया संग अमेरिका जाइत । किछु समय रिया संग बितबइत आ वापस दिल्ली आइब जाइथ। ओ अपनाकऽ ई बेमेल बिबाहक दोषी मानञि छलाह। बहुते आग्रह पर रिया तलाक पर सहमति देलखिन आ रमनकऽ दोसर बियाह एकटा जुनियर डाक्टरसऽ भेलइन। रामबाबू अइ बियाह मे अपनहु शामिल भेलाह। रामबाबू रिटायरमेटकऽ बाद अपनाकऽ व्यस्त राखइ लेल एक टा प्राईवेट हास्पिटल जाय लगलाह । रमन सेहो नब जिनगी शुरू करबाक लेल लन्दनकऽ अस्पताल ज्वाइन केलाह ताकि इतिहास पीछा नञि करयन।एक टा गलत निर्णय दु परिवारकऽ देश निकालाकऽ देलक। अइ लेलकऽ दोषी। माय - बाप त नीके सोचइत अछि- संतानकऽ वास्ते मुदा ........होनीकऽ आगे ककर चललइ अछि। खाली हाथ (बीहनि कथा) रामबाबू प्रगतिशील गिरहथ छलाह।दु टा बेटा छलइन। दुनुकऽ पढ़ाइ बढ़ियासऽ होइन, अपनाकऽ ओही लेल झोंईक देने छलाह। शिमलाकऽ नामी स्कूल मे दुनु बच्चा पढलकइन। सोइच सकइ छी कि बिना नियमित आमदनीकऽ ई काज कतेक कठिन। इमहर उमहरसऽ जोर तोरकऽ क काज करय छलाह। सालों भरी अही मे लागल रहइ छलाह। कखनो बच्चा सबकऽ लकऽ शिमला जाइत छइत त कखनोलऽ क अबइ छथि।हरदम जतरे मे रहइ छलाह आ खाली हाथे। कनिया ओतेक सक्रिय नञि छलखिन जे ओहो कखनो असगर शिमला चइल जइतइथ। आइ काल्हि त माय सबकऽ ई बिभाग छइ। मजबुरी वा शौक, से स्पष्ट नञि। कयेक बेर त रेलवे टिकट वेटिंग मे रही गेलइन, तखनो बच्चा सबकऽ कवनो दिक्कत नञि होबऽ देलखिन। जुनुनी छलाह। गाम- घर मे सब कहइन जे अप्पन अतृप्त इच्छाकऽ बच्चाकऽ माध्यमसऽ पुरा करइत छथि। सत जे हुआय। शिमलाकऽ बाद दिल्ली विश्वविद्यालय मे बच्चा सब पढ़लकइन। बड़का बेटा दोसरे प्रयास मे संघ लोक सेवा आयोग मे उत्तीर्ण भेलाह आ IPS मे चयन भेलइन। रामबाबूकऽ तपस्या पुर्ण भेलइन। जे समाज मजाक उरबइत छलइन, आब ओकरा खातिर सबसं सफल लोक छथि। बेटा सेहो घरक स्थितिसऽ अवगत छलइन।ओ ट्रेनिंग मे जाइते, रामबाबूकऽ छोट भाइकऽ पाइ पठबऽ सऽ मुक्तकऽ देलकइन। बेटा पर बड्ड कथा सब आब लगलइन। रामबाबूकऽ बेटा अनुशासित छल। रामबाबू सब बड़का लोककऽ छोअइड़कऽ सामान्य परिवार मे कुटमइती कयलाह। उनकर अप्पन दर्शन छलइन जे बेटाकऽ बिबाह अपनासऽ आर्थिक आधारसऽ न्युन मे करी त पुतोहु मान देत। सब ठीक चइल रहल छलइन। पुतोहुसऽ सेहो रामबाबू पुरा प्रसन्न छलाह। पारिवारिक प्रतिष्ठा बेटाक लगभग आदर्श बिबाहकऽ बाद आर बढ़ि गेलइन। अहि बीच मे ककर नजर लाइग गेलइ। रामबाबूकऽ बेटा जे जिला पुलिस कप्तानभऽ गेल छलाह, एक दिन लैण्ड माइन्स बिस्फोट मे घायलभऽ गेलाह। दिल्ली रेफर कायल गेलइन, मुदा बइच नञि सकलाह। अस्पताल मे जाबइत भर्ती छलाह त मंत्री अधिकारीकऽ लाइन लागल छलइन। टीवी बला सब रामबाबू आ हुनकर पुतोहुकऽ हमेशा देखबइत छलइन। लोक सब इनका सबकऽ जानऽ लगलइन। बेटाकऽ मृत्युकऽ बाद रामबाबू गाम आइब गेलाह। सरकारीआ गैर-सरकारी तरफसऽ बहुत रास पाइ उनकर पुतोहुकऽ खाता मे जमाकऽ देल गेल। पुतोहु जे काजक बाद नैहर गेलीह से फेर नञि अयलीह। रामबाबू उनका बजबऽ गेलाह मुदा ओ नञि अयलीह।उल्टा शिकाइत। नैहर बाला सब उएह पाइकऽ हिसाब लगबऽ मे लागल। एक टा पेट्रोल पम्प सेहो भेटलइन। किछु दिनक बाद एक भलमानुषकऽ संग पुतोहुकऽ सेहो दोसर बिबाहभऽ गेल इन। रामबाबूकऽ कवनो खबर नञि। लोककऽ अनुसार, पाइकऽ लोभ मे ई बिबाह भेलइत अछि। बेटाकऽ यादकऽ अंतिम निशानी सेहो खत्मभऽ गेलइन। जे रामबाबू बेटाकऽ मृत्युकऽ बादो साहस रखने छलाह से आब टुइट गेलाह। अर्धविक्षिप्त जेकाभऽ गेल छलाह। सरकारकऽ केहन कानुन जे माय बाप अप्पन सर्वस्व बेटा पर न्योछावरकऽ दिअयह, ओकरा संतानकऽ सम्पत्ति मे कवनो भाग नञि। आर्थिक स्थिति त ततेक पातरभऽ गेलइन जे दोसरो बेटाकऽ सब छोअइरकऽ वापस गाम आबऽ परलइन। रामबाबूकऽ जीवन फेर खाली हाथभऽ गेलइन। नबका धनिक (बीहनि कथा) रामबाबू (छद्म नाम) टुटल जमींदार परिवारसऽ छलाह। ओही समय मे गाम घर छोड़िकऽ महानगर अयलाह, जहिया घरक आर्थिक स्थिति केहनो होइ, निजी कम्पनी मे चाकरीकऽ नीकसऽ नञि देखल जाइ छलइ।बाप कहलखिन जे आहांकऽ जेते पाइ ओ कम्पनी वाला देत, ओइसँ१०० टका बेशी हमही देब। सच्चाई ई छलइ कि जथा- जर बेचकऽ ही सब किछु होअइत छलइ। मुदा एक टा टशन छलइ। सब होइतो रामबाबू टिनही बक्सालऽ क गामसऽ बिदा भेलाह।ओ बुझि गेल छलाह जे ई हवा-पानीसऽ किछु होबऽ वाला नञि छइ। अप्पन अनुभव व अध्ययनकऽ आधार पर आगु बढ़इत गेलाह। एक तरहसऽ क्रान्तिकारी कदम उठेला। महानगर मे पहिने एक टा छोट घर, फेर बाद मे पैघ घर लेलाह। सामाजिक व सांस्कृतिक काज सब मे सेहो सहभागिता छलइन। व्यवहारिक लोक छलाह। गाम समाज मे सेहो यश छलइन। आब देखू बदलाव। दु टा बच्चा छलइन। बेटा IIT आ IIM केलाक बाद कम्मे समय मे ओइ पद पर पहुंच गेलइन, जईसँओ सेवानिवृत भेल छलाह। गौरवान्वित छलाह। बेटा अपने संगीसऽ अंतर्जातीय विवाहकऽ लेलकइन। पुतोहु, बेटोसँउच्च पद पर छलइन।DIG(double income group)भऽ गेल छलाह।आब सब कोई कोठी मे रहअ लागल छेलाह। भनसिया आ खबासिन दुनु छलइन। बेटा पुतोहुकऽ अलग अलग गाड़ी ड्राईवर छलइन। रामबाबू सपत्नीक अइ बदलल स्थिति मे डुबी गेल छलाह। जे कहियो काजबालीकऽ जोरसऽ बजितो नञि छलाह से आब सब पर रौब दाब करऽ लागल छलाह। अपनाकऽ आब स्टेटस वाला बुझअ लागल छलाह। सब जगह नञि जाइत छलाह। बेटा सेहो पुरनका समाजसऽ पुरा कइट गेल छलइन। अंतर्जातीय विवाह मे इ होअइ छइ जे ओकरा समाजक जरूरत नञि बुझाइत छइ। चयनित लोकसऽ अबरजात छलइन। पुरनका लोकसऽ दुरीभऽ गेलइन। आब देखू बदलइत बदलइत केहनभऽ गेलाह।नब दुनिया मे दुनु बेगत ड़इम गेल छलाह। बेटीकऽ विवाह अपने समाज मे कयने छलाह। कतेक बरख बाद बेटी जमाय सब अयलइन। ओ सब खातिर सनेश अनने छलइन। रामबाबू ,हुनक कनिया आ पुतोह सब खुश भेल- सनेश देख क, मुदा बेटा ओ सनेश(टाई-पिन) बहिनकऽ सीधा वापसकऽ देलखिन जे हम आब टाई नञि पहिड़इ छी। भाइ ई नञि देखलखिन कि बहिन भाइकऽ अफसर बुझिकऽ कतेक शौकसऽ मंथनकऽ क अनने रहइन। रामबाबू आ हुनक कनियाकऽ अतेक साहस नञि जे बेटाकऽ किछु बुझईबतिन।सब हंसकऽ गप्प बदइल देलकइ। नौकर चाकरकऽ संग रहबाक कारण भावना शुन्य सबभऽ गेल छलाह। आब बेटीकऽ वापस अपन शहर जयबाक छलइन। स्टेशन जाय खातिर ड्राइवरकऽ फोन केलखिन आ कहलखिन कि एक गेस्ट आयल छथि, उनका काल्हि ९ बजे स्टेशन छोड़ बाक अछि। बेटी ई फोन परहक गप्प सुइन लेलखिन्ह। माय सेहो सुनलखिन।घर मे चुप्पीभऽ गेल। माय माहौलकऽ हल्लुक करय लेल कहलखिन- जे छथि, जेहन छथि, आहांकऽ बापे छथि, कतेक दिन जीता, बड्ड उत्साह मे छलाह, की कहू।राइत भर बेटी परेशान, जे बाप एक आवाज पर हाजिर, उनका लेल हम गेस्ट कहियाभऽ गेलियइन। अंत मे निष्कर्ष पर पहुंचली कि ई किछु नञि- नबका धनिकक नशा छइ। बेटी माय मे की समझौता भेलइन, से ककरो नञि बुझल। रामबाबू सुतले छलाह आ बेटी सपरिवार टैक्सी बजेली आ साते बजे भोर मे सबके सुतले छोड़िकऽ स्टेशन लेल बिदाभऽ गेलीह। किस्मत (बीहनि कथा) ई ७०कऽ दशकक खिस्सा अइछ। रामबाबू (छद्म नाम) जहिया पटना विश्वविद्यालय पढअ गेल छलाह त हुनका बाबूजी (पिता) मोटरसाइकिल कीनकऽ देलखिन। तहिया ओ असकर छलाह क्लास मे जे मोटरसाइकिलसऽ अबइ छलाह। ओना बेशी दुर कालेजसऽ डेरा नञि छलइन। एकटा दिखावा छलइ , मोन मानयकऽ तैयार नञि जे ई फिजुलखर्च छइ। फिल्मी हीरो जेकां देख मे सेहो छलाह, ओहिने स्टाइल वाला कपड़ा लता आ शौक। सिगरेटसऽ गोल गोल धुआं निकालबा मे पारंगत। पाइ कतऽ सऽ अबइ छइ, से बुझबाकऽ फुर्सत ककरो नञि। पढ़ाइ कहूना चलइत रहइन। BSc करइत करइत एक अधिकारीकऽ कन्यासँविवाह सेहोभऽ गेलइन। जखइन कनिया सासुर बसलीह त असलिइत पता चललइन। इमहर रामबाबू सेहो घींच घांचकऽ MScकऽ लेलाह। आब पटना मे रहीकऽ की करताह।हुनक बाबु जीकऽ आरो जिम्मेदारी छलइन। बहिनक विवाह, भाइ सबहक पढाइ आ दहेज मे आयल जमीनकऽ मोकदमा। सब मे खर्चे खर्चा। रामबाबूकऽ कनिया निर्णय केलीह जे अइ जहाजसऽ निकली। मुदा जायब त जायब कत। अतेक योग्यता नञि जे कोनो अफसरीकऽ नौकरीभऽ जाइ।व्यवसाय मे एक बेर हाथ पका चुकल छइ, ताहि लेल इहो आप्सन नञि। दु टा संतान सेहोभऽ गेलइन अही बीच। रामबाबू अइ सबस अनभिज्ञ बाबू साहेब बनल पटना मे रही रहल छलाह। कनियाकऽ नहीं रहल गेलइन। जखइन रामबाबू गाम अयलाह त सब पता लगलइन।आब सिफारिश पर नौकरीकऽ सेहो समय चइल गेल छलइ। तहियो हुनक पिता अप्पन एकटा संबंधी आ अधिकारी , जे राजस्थान मे पदस्थापित छलाह,कऽ बेटाक लेल चिट्ठी लिखलखिन। रामबाबू ओतऽ गेलाह आ तृतीय वर्ग मे नौकरी ज्वाइन केलाह। किछु दिनक बाद परिवार सेहोलऽ गेलाह। ई नौकरीकऽ ओ मोनसऽ कइयो स्वीकार नञि केलाह। केना करतैथ, अखइन तकहक जीवन ड़इसी मे बीतल छलइन। अवसाद मे रह लगलाह। अधिकारी सबसऽ लइड़ लइ छलाह। तखनो दुनु बेटाकऽ सबसं महंग कान्वेंट स्कूल मे पढ़ेलाह। अप्पन अइ स्थितिकऽ लेल अप्पन बाबु जीकऽ जिम्मेदार मानऽ लागल छलाह। गाम घरसऽ पुर्ण रूपेण कइट गेल छलाह। ई मानसिक अवसादक असर एक टा बेटा पर सेहो परलइन। पढ़ाइ मे नीक रहलाहक बावजूद जयपुरकऽ स्वीमिंगपूल मे बेटाक लाश भेटलइन।ई घटना पुरा तोइड़ देलकइन। ६ महीनाकऽ बाद मामुली जरबोखारसँरामबाबूकऽ निधनभऽ गेलइन। समय खराब होइ छइ त चारु कात स। दोसर बेटा छोट छलइन। ओ जखइन BAकऽ लक त, अनुकंपा पर ओकरा नौकरी कनिया दियेलकीन। जे पाइ सब भेटलइन ओ बेटाकऽ द देलखिन। किछु बरख त सब ठीक छलइन। बाद मे पुतोहुसऽ नञि बनलइन। हारऽ वाली रामबाबूकऽ कनिया नञि। पेंशन त भेंटते छलइन। सरकारी क्वार्टर त बेटाकऽ नामभऽ गेल छलइन।ओ किराया पर घर लेलीह आ बेटा पर केस केलीह। अतेक जल्दी फैसला थोड़बे होइ छइ। आब ओत रहअ मे ठीक नञि बुझेलइन। नैहर सासुर सब जगह खबर कयलीह, कतउसऽ उत्साहजनक ज़बाब नञि भेटलइन। वापस पटना मे जई मकान मे रामबाबू विद्यार्थी समय मे रहइ छलाह, ओ मकान टुइटकऽ अपार्टमेट बइन गेल छलइ। मकान मालिककऽ परिवारकऽ सोलह टा मकान हिस्सा मे छलइ। रामबाबू ओइ परिवारसऽ सम्पर्क मे छलाह। ओही पुरनका संबंधकऽ मर्यादाकऽ आदर करइत मामुली किराया पर रहबाक घर देलकइन। ओही मे रही रहल छथि। भाइ, देवर आ ननञिद सबकऽ पटना मे आइकऽ समय मे घर छइन, मुदा मुंहछुआइनो कियो रहक लेल नञि कहलकेन। ईएह किस्मत छइ। प्रेम विवाह- नब प्रयोग (बीहनि कथा) राम बाबू कहकलेल वकील छलाह।वकालतसऽ आमद नहिये बराबर। मकान किरायासऽ बढ़िया नियमित आमदनीभऽ जाइत छलइन। खेत - पथार सेहो पर्याप्त छलइन। गाछी सलाना बेच कऽ सेहो चिक्कन पाइ आइब जाइ छलइन। छोट शहरकऽ बड़का लोक छलाह। विवाह सेहो ओइ समयक सांसदकऽ कन्यासऽ भेल छलइन। ईहो परिचय, प्रतिष्ठा बढ़ेने छलइन।दु टा कन्या आ एक टा बेटा छलइन। परिवार मे सब कियो एकसऽ एक सुन्दर। पाइ अपने-आप मे सुंदरता छइ। खायल पीयल घरकऽ सदस्यकऽ सुन्दरता दुरऽ सऽ देखाअ जाइ छइ। सुकुमार सब अतेक जे आंगुर घोंइप दियउ त शोणित बहरेबाक अंदेशा।एक टा बेटीकऽ बिबाह नीक दान-दहेज दकऽ पुरा शान शौकतसऽ क चुकल छलाह। जमाय डाक्टर छलइन। बेटाकऽ पढ़बक लेल दिल्ली पठा देने रहइत। छोट शहर मे बड़का लोकक धीया पुता सब पढ़ मे लुत्तिये होइत छइ। इनकर छोटकी बेटी जहिना पढ़ मे नीक, ओहिना सुन्नर आ संस्कारी सेहो। मैट्रिक मे जिला मे टौप केलाक बाद को- एड कालेज जाय लगलइन। पढ़ाइकऽ दौरान एकटा संगीसऽ किछु विशेष दोस्तीकऽ जानकारी भेलइन।पहल लड़का तरफसऽ छल। छोट शहर मे ई सब बात जल्दी फैलइ छइ।मिथिला मे पहिने विशेष दोस्तीकऽ कखनो सहर्ष स्वीकार नञि कायल जाइ छलइ। रामबाबू सुलझल लोक छलाह। ओ एक दिन ओइ दोस्त जे एकटा प्रोफेसरकऽ बेटा छल, कतऽ गेला। कहलखिन जे हम आहां सबकऽ जनञि छी। आहां आगु पईढ़कऽ किछु बइन जाऊ, हमरा आहांकऽ परिवारसऽ संबंध जोड़कऽ लेल तैयार छी। ई प्रस्ताव ओइ विद्यार्थी मे बड़का बदलाव अनलक।अकर बाद ओ विद्यार्थी मिशन मे लाअइग गेलाह। आगु बइढ़कऽ नीक पद प्राप्त कयलाह। दुनुकऽ बिबाह भेलइन। सम्प्रति ओ विद्यार्थी वरीय प्रशासनिक अधिकारी छथि आ रामबाबूकऽ कन्या जानल - मानल पत्रकार। रामबाबूकऽ नब प्रयोगकऽ शहर मे खुब ओइ समय मे चर्चा भेल आ हुनक निर्णयसऽ स्वाभाविक आकर्षणकऽ सुखान्त मे बदलल गेल। दही वाली बुढ़ी (बीहनि कथा) गामक अलग लोकाचार छइ। बयसक कवनों बंधन नञि। ज्यों छइ त ओ संबंधक।दही वाली बुढ़ी।ओकऽ छलीह। किअए अबइ छलीह। कतऽ सऽ अबइ छलीह। कहिया एतीह। कखन जयतीह। किछु ककरो नञि बुझल आ ओइ पर अजीब चुप्पी। नञि कहियो अबइत देखलियइन आ नञि कहियो जाइत। तहिया कारण नञि पता चलल, आब हमरा जन्तवे ओ सांझक बाद अबइ छलीह आ फरीच होबऽ सऽ पहिने चइल जाइ छलीह- त कोना देखइतैत। तहिया रहस्य छल। ओ बंगली पर बइसल भेटई छलीह। गोर धबधब, उज्जर साड़ी, चमकइत आंईख आ छोटकी मोटरी संग मेएक मटकुर दही। हमरा उनकर संग नीक लागय। ओ हम सब बच्चाकऽ देखकऽ खुशभऽ जाइत छलीह। हमरा सबकऽ खिस्सा सुनबइ छलीह। हुनकर सब खिस्सा मे मां-बेटा, पुलिस दुआरा निर्दोषकऽ पकरनाई, केस चलनाई आ अंत मे जज साहेबकऽ रिहाइकऽ फैसला, घर वापस गेनाई, दही- मिठाई बंटनाई रहइ छलइन। २/३महीना पर ओ अबइ छलीह। उनकर आनल दहीकऽ स्वाद हरदम मोन मे रहइ छल आ उनकासऽ बेशी दहीकऽ इंतजार रहइ छल। पुछला पर कहइ छलीह- हमर महीस खाली हरियर घास खाइत अछि। ओकर देल दुधकऽ हम अलग तरहसऽ दही पऊरकऽ आहां सब लेल आनञि छी। नीक कोना नञि होइत। उनकर मोटरी मे चुड़ा, सतुआ सब खायकऽ वस्तु रहइ छलइन। ओ घरबइया पर निर्भर नञि छलीह, तखनों खेनाई उनका लेल बंगली पर पठा देल जाइ छलइन। ओ ओत सुरक्षित राइत बितबऽ अबइ छलीह। जिज्ञासा कयलाह आ कनफुसकी सुइनकऽ अतबा पता लागल जे दुरसऽ अबइ छथि।इनका बड्ड जर जमीन छलइन।दिअयदी पहिने दिवानी मोकदमा फेर कयेक टा फौजदारी।बुढ़ीकऽ घरबालाकऽ ईएह मोकदमा मे हत्याभऽ गेलइन।बेटा छोटे छलइन। ताबइत ओ घरसऽ बाहर निकललो नञि छलीह। बेटा जखइन पैघ भेलइन तखने पिताकऽ आरोपीकऽ हत्याभऽ गेलइ। पुलिस सीधा ओकरा पकइड़कऽ जेल पठा देलकइन। आब एकलौता बेटा हत्याकऽ मोकदमा मे जेहल मे छइन।ओ बेटासऽ तारीख पर भेंट करय लेल अबइ छथि। दू मटकुर दही(बेटाकऽ प्रिय)लऽ क अबइ छथि। एक मटकुर बेटाकऽ द दइ छथिन आ दोसर हमरा सब लेल। तहिया जेहल मे खेनाई पिनाई जाइ छलइ। उनकर बेटा दुआरें, सब हमरो सबकऽ डराबय उनका लग जयबा सं।हम सब तइयो जाइ। कखनो डरक भाव मोन मे नञि आयल। कहियो ओ बड खुश रहइत आ कहियो गंभीर। उनका पुरा उम्मेद छलइन जे बेटाकऽ रिहाइभऽ जेतइन।जीवनक उद्देश्य सैह छलइन। बड़का वकील सेहो रखने छलीह।खिस्साकऽ लब्बोलुआब उएह जे निर्दोष बच्चाकऽ रिहाइ व ओकरा संग मायकऽ घर वापसी।बाद मे उनकर अयनाई बंदभऽ गेलइन। पता चलल की बेटाकऽ आजन्म जेहलक सजाभऽ गेलइ आ भागलपुर जेहल पठा देल गेलइ।उनकर मुस्की संग रिहाइ वाला खिस्सा आ दही, दुनु ओहिना स्मृति मे अछि। पता नञि ओइ फैसलाकऽ ओ कोना सामना कयलीह। भुत- बंगला (बीहनि कथा) सब भुत- बंगलाकऽ स्वर्णिम इतिहास रहइ छइ। कहियो ओकरो चला-चली छलइ। आइ कियो देखऽ बाला नञि। जेकरा जे मोन करय छइ, से बंगलासऽ उठा कलऽ जाइ छइ- ठसकबाजी संग। एना किअएभऽ गलइ। कियो सांझो देबऽ बाला रहितइ त भुतबंगले नञि कहइतइ। अइ बंगलाकऽ मालिक बिहार सरकार मे मध्यम स्तरकऽ अधिकारी छलाह। हुनक बाबूजी सेहो असगर, आ ओ सेहो असगर भाइ छलाह। बाकि बड़की टा दिअयदी। सरकारी अधिकारी बनला पर किनको खास मोजर नञि देलाह। अपनाकऽ अंग्रेज सरकारकऽ अधिकारी जकां बुझइत, मुदा दिअयद सब इनका किछु बुझइत नञि। अधिकारी छलाह त कियो विरोध खुइलकऽ नञि करयन, साथो नञि दइन। ओझा खातिर गामबला बताह, आ गामक लेल ओझा वाला स्थिति। सबसं हइटकऽ बंगला, पोखरा-पाटन सब बनेला।गामो मे अंग्रेज वाला टोप आ भरूआ सिगरेट पीबइ छलाह। मौका बेमौका सिगार सेहो दइ छलखिन। अतेक शानसऽ रहनाई, कतेको लोककऽ परेशान करय छलइन।एक टा बेटा आ बेटी छलइन। बच्चे मे तीर-धनुष खेल मे इनकर बेटाकऽ तीर बहिनकऽ आंखि मे लाइग गेलइन। बेटीकऽ एक टा आंखि पाथरकऽ लगाबल गेलइन। बेटा तखने शपथ खेला कि ओ डाक्टर बइनक बहिनकऽ आंखि बनेताह।काल क्रमेण बेटा डाक्टरभऽ क अमेरिका चइल जाइ छइन। पुतोहु बिहारक एकटा स्टेटक बेटी छलइन।न ऊधो को लेना, न माधो को देना। बेटी प्रोफेसरभऽ गेलइन, मुदा अविवाहित।अप्पन सम्पतिकऽ बेटा-बेटी मे बराबर बटलाह आ बेटीकऽ बारिस बनेलाह। ततेक प्रगतिशील छलाह जे कियो इनकर कन्यादान मे मध्यस्थता केबे नञि केलकइन। बहुत बाद मे बेटी अपने बिबाह केली, मुदा बिबाह नञि चइल पेलइन।संबंध समझौता छइ, ई कियो बुझबे नञि केलकइ।अइ बिबाहसऽ एक टा बेटा भेलइन। ई बच्चा नाना लग रहइ छलाय। एतऽ तक सब ठीक। कयेक बरख बाद बेटाकऽ मातृभूमि प्रेम जगलइन आ ओ गाम अयलाह। बाबुजी- बहिनकऽ आग्रह पर नजदीकी शहर मे नर्सिंग होम खोलनाईकऽ निर्णय कयलाह।विधाताकऽ किछु आर मंजुर। गाम आयल छलाह, किछु जमीनक विवाद सेहोभऽ गेल छलइन, हृदयाघातसऽ परलोक चइल गेलाह। पुतोहु पुरा पोस्टमार्टमकऽ वीडियोग्राफी (जे अमेरिका मे मेडिकल क्लेमक लेल जरूरी छइ) करेलीह आ जे अमेरिका गेलीह, घुइड़कऽ नञि अयलीह। उत्तराधिकारी बेटियेकऽ सब बुझइन।आब बाकी दिअयद सब ऊछन्नर मचेनाई शुरू केलकइन। असगर सबहक सामना करय छलाह। बेटाक मरलाक बाद बरखक भीतरे अपनो स्वर्ग सिधाइड़ गेलाह। बेटी प्रोफेसरीकऽ नौकरी करयथ या नैहरक झंझट सब देखइत। बेटा सेहो लायक नञि भेलइन। समस्या से जुझइत संघर्षशील बेटी बाद मे चिड़चिड़ा आ अवसादक चपेट मे आइब गेल छलीह। अही स्थिति मे जाहि कालेजकऽ क्वार्टर मे रहइ छलीह, ओतइ एकराइत सुतले रही गेलीह। ओतुके समाज दाह-संस्कार करेलकइन।गाम मे कतेक दिनक बाद लोक बुझलकइन जे हिनक मृत्युभऽ गेलइन। बेटा निपत्ता। आब भेल गामक खेल। कतेक केयरटेकरभऽ गेलाह।जे कहियो ओही बंगला मे गेलो नञि छलाह,आब ओइ पर खुट्टा गाइड़ देलाह। सब दिअयदी दावेदार सब पहिने अन्हार मे, बाद मे दिनदहाड़े समान सबलऽ जाय लगलाह। अंत मे चौखट केवार तक सबलऽ गेलइ। आब ओ बंगलासऽ भुत बंगलाभऽ गेल छइ। बच्चा सब ओइ परिसर मे खेलऽ जाइत छइ त माय कहइ छइ जे ओइ मे नञि खेलाऊ, ओतऽ भुत रहइ छइ। आब ई भुत बंगला कहाइत अछि। मध्यस्थ (बीहनि कथा) रामलाल गाम मे धाही बाला लोक छल। बाबू भैया बाला गाम मे चलती ओकरे। किनको पाइ चाही, रामलाल। जमीन बेचबाक हो, रामलाल।रोपनी- दौनीकऽ लेल जन चाही, रामलाल।जमीन भरना रखबाक काल, रामलाल।दुध-दहीकऽ काज जग परोजन मे, रामलाल। बरियाती मे खबास मे खास दरबार मे, रामलाल। जमीन बंटाई देबकाल, रामलाल। गाछी बेचऽ काल, रामलाल।घरहट लेल, रामलाल। मालिक कहइ लेल कयेक लोक, मुदा मनेजर सबहक रामलाल। कपड़ा लत्ता‌ ओकर साफ आ चकचक, कियो मालिकसऽ कम नञि, बेसिये कहू। कखनो ओकर चेहरा मलिन नञि।सबहक समस्याकऽ समाधान ओकरा लग। कतेकोकऽ बेटीक बियाहक लेल पाइकऽ व्यव्स्था ओ कयने छल गाम मे।ओ गामक धुरी छल। सामाजिक समरसता मे ओकर बड्ड योगदान। ओना ओकर समाज, पीठ पाछु खिन्नान्श करय, मुदा प्रभाव मे कवनो कमी नञि।ओ मनाकऽ दइ‌ त कियो जमीन बटाई लेल तैयार नञि। पंचइती मे अहम स्थान। चुनाव कहियो नञि लड़ल,लेकिन मुखियासऽ बेशी दम। पार्टी-पॉलिटिक्स मे बेशी दिलचस्पी नञि, लेकिन हंसुआ गेहूंकऽ भीतरिया समर्थक। अप्पन बेटाकऽ ओ पढ़ा लिखाकऽ मनुक्ख बनबऽ चाहइ छलाय। ओकरा अनुसार ओकर समाज गरीबी, अशिक्षा आ नशाक कारण मनुक्ख नञि अछि। ओ बेटाकऽ बाबू भैया संग रहइ लेल कहइ छल। जाबइत ओ लोककऽ जरूरत छल, महत्व छलइ। बाद मे बाबू सब अपने नौकरी खातिर गाम छोड़ि, महानगर ओगरऽ लगलाह।खेती अपने केनाई या त लोक छोड़ि देलक या हुंडा परदऽ देलकइ।खाली बइसल गाम मे सब प्रोपर्टी डीलरभऽ गेल।ओकरो समाज मे सब बाहर निकइल गेल। कियो ककरो बात मानञि लेल राज़ी नञि। सब कहइ जे रामलालकऽ सब डील मे हिस्सा भेटई छइ तखने नील- टिनोपाल वाला धोती कुर्ता मेनटेन करइत अछि। रामलाल देहसऽ कहियो काज केलक नञि। बी पी एल, ए पी ल, लाल कार्ड, मनरेगा तहिया छलइ नञि। एक्के बेर मनेजरसऽ ओ मजदूरभऽ गेल। घरामीकऽ काज मे श्रम कम छइ।बयस बढला स, देह से हो खइस गेल छलइ।सैह काजकऽ क पेट पोसई छल। बेटा सेहो जेकरा बड़का सब स्वीकार नञि केलकइ आ ओकर समाज मोन‌सऽ अपनेलकइ नञि, नशा करऽ लागल।ठीक जखइन रहय त राज मिस्त्रीकऽ काज करय। संग्रहकऽ स्वभाव ओकर समाज मे छलइ नञि, एहन स्थिति ओकरभऽ जेतइ से कियो सोचबो नञि केने छल। बाद मे लोक ओकर पुरान दिन यादकऽ क कियो भलमानुष किछु काजदऽ दइ। रामलाल ततेक स्वाभिमानी छल जे कहियो किनकोसऽ किछु मंगलक नञि। गुमनामी मे अहिना चइल गेल दुनिया सं। मध्यस्थक भुमिका समाज मे खत्म भेलाक पहिले शिकार रामलालभऽ गेल। गामक माइट नसीब नञि (बीहनि कथा) किछु लोक हर हालात मे खुश रहइत अइछ चाहे कतबो परीक्षा भगवान लेइथ। ओही मेसऽ एक छलाह रामबाबू। जखइन होश सम्हारलाह त सात टा दुध दइत महीस छलइन, मुदा घर मे चाऊर नञि। बग्घी सजल दलान पर, लेकिन घोड़ा बुढ़ायल। जमीन पर असामी सबहक कब्जा, किछु उपजादऽ दइ-ओकर मरजी। कहक लेल बावन बीघा मे पुदिना, असलिइत किछु आर। माय-बाप दुर्दिनक सामना करबाक लेल अफीमक सेवन करऽ लागल छलखिन। कहक लेल सब कियो अप्पन, लेकिन अपनापन किनको मे नञि। ई अपनापन भेटलइन मौजे पर जे चमाइन खबासिन छलइन, ओकर बेटी सं। अपन गामसऽ बेशी, मौजे पर रहअ लगलाह। एक कान, दु कान, धीरे धीरे लोक बुझि गेलइ। रामबाबू एक बेर बिन बियाह घुरायल सेहो गेलाह अही चमाइनक अपनापनक हल्ला कारणे। फेर दोसर गाम मे बियाह भेलइन। सच्चाईसऽ दुनु संबंध निभेलाह। कतबो संबंधी सब कहलखिन गाम छोड़ि शहर आऊ, नञि गेलाह। जीना यहां मरना यहां- कहतिन किछु समय बदललइ‌ त नाम गामक लेल मौजे परक सब जमीन बेचकऽ बस किनलाह।बससऽ नाम त भेलइन, लेकिन घाटाक सौदा भेलइन। एक टा फायदा भेलइन जे बस मालिककऽ कौनो बस मे टिकसकऽ पाइ नञि लागइ छइ, जाबइत जीलाह, फ्री मे घुमलाह आ बइसऽ कऽ सीट सेहो भेटलइन। उनकर बोली बानी एहन मीठ, जे लोकसऽ हमेशा घिरल रहलाह। कतबो भाग्य बाम भेलइन, संयम नञि छोरलाह। कहियो किनकोसऽ खिसियाकऽ नञि बजलाह। पाइकऽ काज त पाइये करतइ। आमदनीकऽ जरिया छलइन पुश्तैनी जायदादकऽ उलटफेर।दोसरोकऽ जमीन गोलकऽ दइ छलखिन।भोजभातक फिरीस्तक एक्सपर्ट छलाह। धन घटइत गेलइन, मान मे कनियो कमी नञि।ई सब भेल उनकर बोली बानीक कारणे।कियो चाणक्य कहि देन त तिरपितभऽ जाइ छलाह। बेटा सब पढ़ी लिखीकऽ बाहर चइल गेलइन। रामबाबूकऽ कतबो कहलकइन, नञि गेलाह। गामसऽ एहन लगाव। अपन श्राद्धक पाइ आ पुरहितक दक्षिणा सेहो अलगकऽ देने छलाह। संस्कारक लेल जमीन अलगसऽ रखने छलाह जे बेटा सारा पर मंदिर बनौताह। समयक चक्र देखियउ। मृत्युसऽ किछु दिन पूर्व बेटा ईलाजकऽ नाम पर अपना लगलऽ गेलइन। ओतइ दाह-संस्कार आ क्रिया कर्म केलकइन। गाम मे जे रामबाबू जमीन अपन चिताग्नि खातिर रखने छलाह, बेटा बेच लेलखिन्ह।अकरे कहइ छइ माईटो नसीब नञि। जे गामक संबंधकऽ भइड़ जीबन निभेलाह उनकर अंत एहन। मुड़नक केश (लघुकथा) रामबाबू भारत सरकार मे पैघ पदसऽ सेवानिवृत भेलाक बाद दिल्ली मे रही रहल छलाह। किछु दिन पूर्व दिल्ली मे उनकासऽ भेंट करऽ गेलौं। बड खुश भेलाह। हुनक धीया- पुताकऽ हाल चाल पुछला पर ओ त मौन छलाह मूदा हंसिते हुनक श्रीमती जी जे कहलीह से अहुं सब सुइन लियअ। खिस्सा आगु बढ़ाबऽ सँपहिने हिनक घर परिवारकऽ बारे मे कनी बुइझ लियअ। रामबाबूकऽ तीन टा बेटा छलइन। जेठ बेटा कनिक बेशी प्रगतिशील छलखिन। ओ पहिने लिव इन, बाद मे अपनासऽ संतान नञि करबाक वादा देलाक बाद विवाहित जीवन अलग रहीकऽ बितबइ छथि। दोसर बेटा विदेश मे रहइ छलइन आ ओतइ सड़क दुघर्टना मे अकाल मृत्युभऽ गेलइन। तेसर बेटा जे डाक्टर छलइन,के जल्दिये नीक कुल-शील देखकऽ मैथिल परिवार मे विवाह करा देलखिन। तेसर बेटा - पुतोहु संगही रहइ छलइन।एक टा पोता सेहो भेलइन। सब दुख बिसइड़कऽ रामबाबू पोता संग खुशीसऽ समय बितबइ छलाह। की भेलइ, से ककरो नञि बुझल, एक दिन छोटका बेटा कैरियर आ नीक मौका बताकऽ बम्बइ सपरिवार जायकऽ अनुमति मंगलाह।घर मे मातम जेकां हाल भऽ गेल छलइन। हारि कऽ रामबाबू परिस्थितिसऽ समझौताकऽ क अनुमतिदऽ देलखिन। फोन पर पोतासऽ भोर सांझ गप्प सप्प होअइत छलइन। एक दिन पुतोहुकऽ फोन सासकऽ एलइन जे मुड़नकऽ नीक दिन तका दइ लेल। रामबाबूकऽ कनिया तुरंत पण्डित जीकऽ बजा क, तीन टा दिन तकाकऽ पुतोहुकऽ बता देलखिन। आब रामबाबू सब तैयारी मे लाइग गेलाह कि फलां फलॉकऽ बजेबइ, एना भोज करब...। मोने मोने लिस्ट बजट सब बना नेने रहइत। रोज दुनु बेगत मे घमर्थन होइन जे ओकरा बजेबइ। ओकरा नञि। फलांकऽ मूंहछुआन कहीं देबइन।ओहो तऽ जनऊ मे अहीना कहने रहइत। रोज दुटा नाम जुड़इन आ एक टा कटइन। किछु अपन लोककऽ ओहिना नोतोदऽ देने छलखिन।अपन सोइच सोइच कऽ राम बाबू दुनु बेगत रमन चमन करइत छलाह। कनिया जखइन तखइन कहइ छलखिन जे आहां बेशी मधुर नञि खाय लागब। हम त पाहुन मे व्यस्त रहब आ आहां अपन मौका सुतारऽ लगइ छी। चीनी आहांकऽ बहुत बढ़ल अइछ। राम बाबू कहलखिन जे पहिल पोताकऽ मुड़न होइत आ हम मधुर नञि खाई, से नञि भऽ सकइत छइ। कनिया बजलखिन- बेशी नञि खायब। अंत मे दुनु गोटे मे समझौता भेलइन जे एकटा भोर आ एकटा सांझ मधुर खेताह। रामबाबूकऽ कनियाकऽ तऽ चीनीकऽ बीमारी नञि छलइन। ओ कहलखिन जे हमरा मधुर खाइत देख कऽ आहां डेकसी नञि करऽ लागब। अहिना गप सरक्का दुनु मे होइत रहइ छलइन। जे बाजा भुक्की बन्न भऽ गेल‌‌‌ छलइन, से कतऽ दन बिला गेलइन। जखइन मोन नञि लगइन, मुड़नकऽ चर्चा शुरू कऽ लइ जाइ छलाह। अही बीच बम्बइसँपुतोहुकऽ फोन सासकऽ एक दिन अयलइन जे मुड़न वाला केशकऽ केना भसबल जाइ छइ ? सुनीकऽ दुनु गोटे स्तब्धभऽ गेलाह। सास, पुतोहुकऽ विधि बता देलखिन।मोनक मनोरथ मोने रही गेलइन। पोताकऽ मुड़नकऽ मनोरथ। ई सब कहऽ मे कनिको रामबाबूकऽ कनियाकऽ चेहरा मलिन नञि भेलइन। हंसिते कहलिह- ईएह हाल छइन। आब की गामबाली आ की भदेश। सब एक्के। कहिकऽ ठहक्का मारलिह। कन्यादान (लघुकथा) आइ फेर मुरली मिसरक घर मे मातम बला हाल छइन। सब चुप। शांत बैसल।एना बुझाई जे कियो मइड़ गेल छइ। मरला पर तऽ बिलाप होइ छइ, आ बिलाप चुप्पीकऽ कटने घुड़इ छइ। अतुका चुप्पीकऽ कोनो थाहे नञि लगइ छलइन रामजी बाबु के। आन बेर घर मे घुसिते देरी सब धीया-पुता गोर लगइ छलइन आ घेर कऽ बइस रहइ छलइन। अइ बेर कियो गोरो लागऽ नञि एलइन, बइसऽ कऽ बात त दुर। मोन भेलइन जे एखने घुइड़ जाय के।फेर बिन कारण जनने घुरनाई उचित नञि बुझा परलइन।ओसारा परसँएकटा आराम कुर्सी अपने घींचला आ बइस रहलाह। रामजी बाबु संबंध मे मुरली मिसरक ससुर लगइ छलखिन। दुनु गोटे एक्के शहर मे काज करय छलाह, तैं अपेक्षा बेशी रहइन। गाम सेहो दुनुकऽ लग पास छलइन तैं अबरजात बेशी। कनी काल मे मुरली मिसरकऽ कनिया सरिता, जे रामजी बाबुकऽ भतीजी भेलखिन, भीतरसँएलीह आ पैर छुईब कं गोर लगलखिन। खुब सौभाग्यवती होऊ-के आशीर्वाद रामजी बाबु देलखिन। भतीजीकऽ नोरसँडबडबायल आंईख देख कऽ बुझा गेल छलइन जे ओ ह्रदय मजगुत कऽ कऽ एलीह अइछ। कनी काल मे बच्चा लोटा मे पाइन अनलकइन। धीरे धीरे माहौल हल्लुक भऽ रहल छलइ। रामजी बाबु खेहल मेहल लोक छलाह तैं अपने बजबासँबेशी सुनबा पर जोर देने छलाह।एहन स्थिति मे मोनक भरास निकलऽ कऽ जगह देने छलाह। दु घंटाक करीब बीत गेल छलइ। रुआबजाक ललका शरबत पी चुकल छलाह। आब चाह बइन रहल छलइन।सब बात खुइल कऽ सोंझा आइब चुकल छलइन। मुरली मिसर अपन बेटीक कथा स्थिर कऽ चुकल छलाह। टकाकऽ गिनतीकऽ दसे दिन बांचल छलइन। जमीन बेचऽ गाम गेल छलाह। ओतऽ औने पौने दाम पर लोक जमीन लेबऽ चाहइ छलइन। सब खगता बुइझ गेल छलइन।अही जमीनक भरोसे ओ होबऽ बाला कुटुम्बकऽ पाइ गछने छलखिन। आब त सब गड़बड़ा गेलइन। प्रोविडेंट फंडसँसब पाइ गाम मे जनऊकऽ मे खर्च कऽ चुकल छलाह। ततेक ने लंफलंफा गऊंआ सब कऽ देने रहइन जे अखनो हथपईंच बचले छलइन। बाकी जे रहल सहल छलइन से बच्चा सबहक पढ़ाइ आ बेटीकऽ कथाकऽ दौरहट मे गंवा चुकल छलाह। मोन मिजाजसँमुरली मिसर अपनाकऽ छोट नञि बुझई छलाह।किरानीकऽ नौकरी रहितो, धीया पुताकऽ अंगरेजिया स्कुल मे पढ़ेलाह। कहियासँसुनञि छलखिन जे जमाना बदलऽ बाला छइ। नीक पढ़ल लिखल बुच्चीकऽ बियाह मे आब गनऽ नञि पड़तइ।ओ बेटा-बेटीकऽ कहियो दु रंग नञि केलाह। उनका कनिया काकी कहबो करय छलखिन जे बेटीकऽ पढ़ाइ पर अतेक पाइ किअए फेंकइ छह। सरकारी स्कूल मे नाम लिखा दहक आ ओइ पाइकऽ जमा करह। गीनती काल काज एतह। मुरली मिसरकऽ तहिया ई बात बुढ़ियाकऽ फुंसि लगइ छलइन।कहथिन-"काकी सब अपन अपन भाग लऽ कऽ अबइ छइ। जमाना बदइल रहल छइ। पहिने बरागत, कन्यागतकऽ पाइ दइ छलखिन। फेर दिन बदललइ आ कन्यागत, बरागतकऽ पाइ गिनऽ लगलखिन। आब फेर दिन घुरतइ, बरागतकऽ गिनती करऽ पड़तइन।" ई त छलइये जे कियो गिनय, गिनती हेबे करतइ। मुरली मिसरकऽ पुरा भरोसा छलइन जे अपन बुच्चीकऽ ओ नीकसँपढ़ेला लिखेला अइछ, ऊपरसँघरो नामी छइन, कुल-शीलकऽ त कहबो नञि करी, सब बड़का घर मे कुटमैती, तैं कथा मे दिक्कत नञि हेतइन सब गलतफहमी धीरे धीरे दूर भऽ रहल छलइन। सब जगह बोली लगइ छलइ। कोनो ने कोनो कारणसँई हुईस जाइ छलाह। कतउ ससुर अफसर नञि होबाक कारण, त कतउ पाइ कम गनबाकऽ कारण, कतउ दुर होबाक कारण त कतउ लग होबाक कारण, कतउ शहर मे पढ़बाक कारण त कतउ महानगर मे नञि पढ़बाक कारण, कतउ बेशी पढ़ल होबाक कारण त कतउ कम पढ़ल होबाक कारण, कतउ रिक्शासँजेबाक कारण त कतउ मोटर मे जयबाक कारण। अइ स्थित मे एक जगह मोन मना कऽ कथा स्थिर केने छलाह। पाइ कौड़ीकऽ बेबसथा लेल गाम गेल छलाह- ओतऽ सब अटकऽ पट भऽ गेलइन। दु चाइर संबंधी लग हाथो पसारलाह, ओतउसँखाली हाथ भेंटलइन। आब बचल छलइन ई शहरक "घर"। बड्ड शान आ शौकसँमुरली मिसरक बाबु ई जमीन कीन कऽ घर बनेने छलखिन। पुरना घर त कच्चा माइट आ भीतक बनल छलइन, जकरा कालक्रमेण पक्का ईंटा मे मुरली मिसर अपन कमाइसँबदलबेने छलाह। घर पर पढ़ल लिखल गुणल बुच्चीकऽ देखइ छथि। ककरो संग हाथ तऽ नञि पकड़ा देथिन। मुरली मिसरकऽ घर मे घुसिते आंगनसँपुछलखिन जे भऽ गेल होइत पाइक बेबसथा। ई सुनिते सऊंसे देह मे आइग लाइग गेलइन- "गाम मे सब मौकेकऽ ताक मे अइछ। माइटक मोल सब मांइग रहल अइछ। उपरसँबंटवारा वाला कागज मे सेहो किछु कमी छइ। जेकरा दु टकाकऽ औकात नञि, ओहो तिरिंग भिरिंग देखा रहल अइछ। सब गामक घर घरारी बेच लेब तखनो गिनतीकऽ पाइ नञि पुइड़ रहल अइछ। " फेर चीकरइत बजलाह-" की करियई। बुच्चीकऽ माइड़ दिअय। जहर माहुर खुआ दिअय।" बुच्ची दोसर घर मे बिछान पर जा कऽ कनञित पइड़ रहलीह। सरिता एक बेर घरवालाकऽ देखऽ जाइत छइथ,फेर दोसर घर मे बेटीकऽ सम्हारऽ जाइत छथि। चारू तरफ अन्हार देखा रहल छलइन। कतउसँकोनो बोल भरोस सेहो नञि। नैहरे सासुर सब लेल बेटीकऽ माय भेने " अछोप" भऽ गेल छलीह। सब एनाई गेनाई छोड़ि देने रहइन। लोककऽ डर होइ कि कहीं बियाह मे पाइ ने मांइग लइस वा कतउ जायकऽ तऽ नञि पइड़ जाय। एहन समय भऽ जेतइ से सरिता सपनों मे नञि सोचने छलीह। तीन भाइकऽ एतऽ राईख कऽ पढ़ने छलीह। चाइर टा देवर अतइ पईढ़ लीख कऽ आइ पाइ बला बनल छइथ। ई सत्त छइ जे घर साबिकक छइ, मूदा बाकी सब खर्च त उएह करय छलीह। आइ देखू कियो झांखियो पारऽ नञि अबइत अइछ। बुझाइत छइ जे बेटीकऽ जन्म देने दोषी भऽ गेलीह। आइ रामजी ककाकऽ देख कऽ सरिताकऽ कोढ़ फाइट गेलइन। कहलखिन - "सबहक बेटीकऽ बियाह होइत छइ,हमर बेटी की कुमाईरे रहत। आहां हमर भाइ सबकऽ कहि देबइन जे उनका सब लेल हम मइड़ गेल छियइन।" रामजी बाबु कहलखिन- "आइ तक की एहनो भेलइ अइछ। बियाह, जन्म, मरण सब उपरसँलिखा कऽ अबइ छइ। घबराऊ नञि, कन्यादान हेबे करतइ।" बोल भरोस दऽ कऽ ओ विदा भेलाह। फेर अपन गाम मे सरिताकऽ भाइ सबकऽ जिम्मेदारीकऽ अहसास दियेलखिन। अइ बीच मे समय पर पाइक गिनती नञि होबाक कारण स्थिर भेल कथा गड़बड़ा गेलइन। सरिता बड्ड दुखी भेलीह। सरिताकऽ भाइ सबकऽ बहिनक घरक वस्तुस्थितिकऽ ज्ञान नञि छलइन।उनका सबकऽ ईएह बुझल छलइन जे ईएह सब मीन मेख निकाइल कऽ कथा निश्चित नञि करय छइथ। आब सब अइ विषय पर अपन जिम्मेदारीकऽ संग फुसिये सही, गंभीर भेल। अही बीच मे बगलेकऽ गाम मे एकटा सेनाकऽ अधिकारी लड़काकऽ कतउ बियाह निश्चित भेल छलइ। लड़का छुट्टी लऽ कऽ गाम आइब गेल‌‌‌ छल।‌कोनो कारणसँलड़की बाला ई कथासँमुकइड़ गेलइ।आब सेना अधिकारीकऽ घरवाला सब नीक कथा ताकऽ लागल। कोनो तेहन कथा नञि भेटलइ। छुट्टी खत्म होबऽ बाला छलइ। हाइरे कऽ मुरली मिसर कतऽ कथा पठेलकइन.........दस दिनक भीतर बियाह दान भेलइ आ बर- कनिया नब जिनगी शुरू करबाक लेल अतऽ सँविदा भेल। सरिताकऽ आब कहबी पर पुरा बिसवास भऽ गेलइन- बियाह, जन्म आ मरण उपरेसँलिखा कऽ अबइ छइ। अइ कन्यादानसँउनका सर समाजक असली चेहरा देखबाक अनुभव भेलइन। जाबइत काज नञि पड़इ छइ, सब नीके रहइ छइ। आइ फेर रामजी बाबु आयल छथि। ललका शरबत पी चुकलाह। मुरली मिसर,सरिता आ बचल पाहुन परख सब उनका घेर कऽ बइसल छइन। चाह जलखइ सब आइब रहल छइन। हंसी ठहक्काकऽ फुलझड़ी सब छुइट रहल छइ। रामजी बाबुकऽ याद पड़ई छइन जे एकटा ओ मातम बाला दिन छलइ आ एकटा ई दिन छइ। बजलाह- " सब दिन एक ना होत हो रामा।" जीतल काज बिन पाइये भेलइन। कनिया काकीकऽ मुरली मिसरक गप्प आइयो मोन छलइन- सब बच्चा अप्पन अप्पन भाग लऽ कऽ अबइ छइ। एहन नीक कथा मुरली मिसरकऽ हेतइन, से सब अचंभित अइछ। ईएह छइ "कन्यादान"।कहक लेल दान, ई त अइछ जीवनक असली ज्ञान। पछतावा (लघुकथा) आइ पुरा डीह टोल मे चहल पहल छइ। नरेन मिसरक पोता महेंद्र विदेशसँआइब रहल छइन। ओ गाम मे कुलदेवीकऽ पातइड़ सेहो देतइ। सब इंतजाम बात भऽ गेल‌‌‌ छइ।ओ पहिनेहेसँकनिया काकीकऽ बेटाकऽ बैंक एकाउंट मे पाइ पठा देने छइ। आब देरी छइ त बस ओकरा पहुंचबाक।भइड़ डब्बुक तसमई बनल छइ। पुरी छना रहल छइ। रसगुल्ला पहिनेहे बजारसँआइब गेल‌‌‌ छइ। कयेक बेर लोकककऽ गिनती भेल छइ। सब मुड़ी पाछु दु टा कऽ रसगुल्ला आयल छइ। जड़दा आम सेहो कटा कऽ राखल छइ। थोड़े काल पहिने फोन आयल छलइ जे ओ पहुंचऽ बाला अइछ।पुरा हुइल माल मचल छइ। कियो ओकरा देखनेहो नञि छइ। फेसबुक पर किछु लोक देखलकइ आ वाट्सएप पर गप्प सड़क्का भेल छइ। मऊगी महाल मे बेशी बेगरता छइ। कोइलख वाली कहलकिन -उनकर कनिया सेहो संग छइन। ओइ पर धमौरा बाली टिपलकिन- ओ तऽ आन जाइत छइ। रानीपुर वाली कहलकिन- आहांकऽ त सब बुझल अइछ। कहियो भेंटो भेल अइछ? बजेबो केने छल? धमौरा वाली - हमरा किअए बजैत। हम तीन मे की तेरह मे। जिनकासँअपेक्षा रहइन, ओ ने जेताह। हम त जे सुनल से कहल। हमरा तीन पांच नञि रहइत अइछ। किनको नीक लागय त लागय, अधलाह लागय त सेहो हमरा नञि परवाह। दु कौड़ अपना घर मे ओ बेशी खेतीह। जबदौल वाली बजलीह- छोड़ु ई जाइत आ अनजाइत बाला गप्प। गाम मे त आब अनजाइत कनिया सब आइब गेल‌‌‌ छइ। ओ सब तं सद्य विदेश मे रहइ छथि। सबदिना बाहरे बाहर पढ़ई आ रहइ गेलाह। आब की कोनो घर बांचल अइछ। रामजी आ सीताजीकऽ की एक जाइत छलइन? बस शुरू भऽ गेलइ। सब गामक अही तरहक विवाह आ नबकी कनिया सबहक चर्चा।कियो आटा साइन रहल अइ, कियो परथन दऽ रहल छइ, कियो मैन मे कंजूसी नञि करबाक लेल कहि रहल छइ, कियो पुरी बेल रहल अइ, कियो गिट्टी बना रहल अइ, कियो पुरी छाइन रहल अइ। सऊंसे टोलक स्त्रीगण अपने लागल अइछ। आखिर ईएह खानदानक लोक आइब रहल छइ।कनिया काकी सबकऽ थम्हने छथि। ताबिते मोटरकऽ हार्न बजलइ। सब माथ पर नुआ लइत दलान दिश लपकल। देखते अंदाज लाइग गेलइ जे महेंद्र, उनकर कनिया आ कोरा मे बच्चा छइ। महेंद्रक चेहरा अनमन रबिन्द्रक जेकां छलइन।" देह पर भुलकी रोईयां"- ई डीह टोलक चिन्हासी छइ। महेन्द्रकऽ देखते बुझा गेलइ जे ओ अइ परिवारक हिस्सा अइ। महेन्द्र आ उनकर कनिया सबके गोर लागऽ झुकलइ, तखने झट दं सुगांव वाली कहलखिन- पहिने भगवती घर चलु। उनका गोर लगियउन, फेर सबके लगइत रहब। कियो भागल नञि जाइ छइथ। सुगांव वाली मौका देख कऽ अपन बुधियारीकऽ दावा जता दइ छथिन। जतऽ भगवान भगवतीकऽ बात बीच मे आइब जाइ छइ, ओतऽ मऊगी मेहर विरोध नञि करत। सब हां मे हां मिलेलक आ विदा भेल भगवती घर। पुरना घर सबहक चौखट बेशी जगह नीचे रहइ छइ। कनिको ध्यान इमहर ओमहर भेल की माथ मे चोट लागल। आब खान-पान पर बेशी ध्यान लोक बच्चेसँदेबऽ लगलइ या। नञि तं पहिने ई छह फीट्टा लोक कहां होइ छलइ। घरक चौखट गिरहथक लंबाईसँचाइर आंगुर बेशी रहइ छलइ।अतउ भगवती घरक चौखट कम्म ऊंच छलइ।पुरना गिरहथ छोटे ऊंचाईकऽ हेताह। ईहो भऽ सकइ छइ जे भगवान भगवती लग माथ झुका कऽ जाइ, तैं जाइने बुइझकऽ दरवज्जा छोटे रहइत होइ। जे भी सच होइ, नब लोककऽ माथा मे चोट लइगते टा छइन। पहिनेहे महेन्द्रकऽ चेता देल गेलइन जे माथ झुका कऽ जायब। तखने पाछुसँसरयां बाली बजलीह- अतेक काल थम्हलऊं त कनी आरो थम्ह जाऊ। पातइड़ चढ़अ दियउ, तकर बादयभगवतीकऽ गोर लागु। ईहो प्रस्ताव एकमतसँपारित भऽ गेल‌‌‌। आइ कियो ककरो विरोध नञि कऽ रहल छइ। कहीं कोनो विचार दी आ ओ नञि मानल जाय। तखइन तऽ बेजती भऽ जाइत। महेन्द्रकऽ कनिया की बुइझ लेत?सब अपन अपन वेल्यु बढ़बऽ मे लागल अइ। आब‌‌‌ पातइड़क ओरियान शुरू भेल । इमहर खुसुर फुसुर चइल रहल छल। जे सब महेंद्रकऽ कनियासँकने दुर मे छलीह ओ सब आंईखे आंईख मे सब गप्प कऽ रहल छलीह।आंईख सऽ ओकर एक्सरे लिया रहल छलइ। आरो टोलकऽ बच्चा आ पुरूख पातर सब बहरी मे जमा छल। पातइड़ भेल। परसादी बंटायल। रमेश मिसर बजलाह- ई बंगलिया कतऽ कऽ रसगुल्ला छइ। महेश ज़बाब देलखिन- हं। हमरा कतऽ त ओकरेसँअबइत अइछ। रमेश मिसर- आब बंगलियोकऽ ओ बात नञि रहलइ अइछ। ओकर बाप जे बनबइ छल- "अद्भुत"। तखने जीवेन्द्र बजलाह- कका रहअ दियउ। हम सब त अकरे मिठाई खाइत बढ़लऊं अइछ। जखइन ओकर बापकऽ बनायल खेनहे नञि छी, तऽ चर्चा कऽ कऽ की फायदा। रमेश मिसर- कमाल करय छं तों सब। तु नञि खेलह त ओइ मे हम की करियह। हम खेने छी, तैं बजलऊं। तोहर बाप तऽ रोज सांझ मे बंगलिया कतऽ जाइते छलखुन। जीवेन्द्र- देखू बाप पर नञि जाऊ। हम आहांकऽ देखइ छी, आइ काइल बात बात पर आहां बापकऽ बीच मे घुसा दइत छी। कका छी तैं। नञि तं हम देखा दइतऊं। रमेश मिसर- तुं की देखेबह। हम तोरासँपुईछ कऽ बाजब! एलाह आय बड़का। तोहर बापकऽ त मुंह हमर सामने खुजिते नञि छलइन। ई दु टा पाइ ठीकेदारी मे कमा लेलाह अइछ त हमरे सीखबइ छइथ जे की बाजु आ की नञि बाजु। जीवेन्द्र- देखू कका हम अंतिम बेर आहांकऽ कहि रहल छी।आब अततः भऽ रहल अइछ। हमर संयमकऽ परीक्षा नञि लियह। ईएह गर्मा गर्मी भऽ रहल छलइ। बेचारे महेंद्र अपसियांत भऽ सब देख सुइन रहल छलाह। जोरसँबहस सुइन आंगनसँकनिया काकी दौड़लीह। फेर थोड़थाम लागल। सब परसादी खेलक। किछु लोक विदा भेल आ किछु बइसले रहल। महेन्द्रकऽ ई महानगरक " रोडरेज" जकां लगलइन। क्षण मे क्षणाक भऽ जाइ छइ। अखने लड़ाई होइत होइत बचलइ। महेन्द्र ताबइत देखइत छइथ जे रमेश मिसर आ जीवेन्द्र कोनो गप्प पर कोना मे ठार भऽ कऽ ठहक्का माइड़ रहल छइथ। महेन्द्र त बहसक शब्द सुअइन कऽ घबरा गेल छलाह। बाकी लोक खातिर धन सन। सब सामान्य भऽ गेल छलइ।देख कऽ बुझेबे नञि करीतय जे अखने मारा पीटीकऽ नौबत एतऽ भेल छलइ। महेन्द्र अतुका लोकक आबेश देख कऽ अभिभुत भऽ गेल‌‌‌ छलाह। ओ अपनाकऽ अइ भीड़क हिस्सा बुझअ लागल छलाह। कनिये काल मे ओ ओतऽ घुइल मिल गेल छलाह। बुझेबे नञि करय जे पहिले बेर ओ अयलाह अइछ।ओ कतऽ सँअबितैथ। उनकर पिता हरेन्द्र मिसर, अंतिम बेर बाबा नरेन्द्र मिसरक श्राद्ध मे आयल छलाह। ओइ समय महेंद्रकऽ जन्मो नञि भेल छलइन। आखिर कोन एहन टीस छलइ जे हरेन्द्र मिसरकऽ अपन पितृ भूमिसँविरक्ति भऽ गेल छलइन। बात तहियाकऽ छइ, जहिया असली मे जमींदारी चइल गेल‌‌‌ छलइ मूदा खूनक जमींदारी नञि गेल छलइ। ई खुनक जमींदारीसँकिनको हत्याक बात नञि छलइ, अकर अर्थ छलइ - " फुसियाही शान "। ई नरेन बाबुकऽ सब किछु लऽ कऽ डुबा देलकइन। नरेन बाबुकऽ बियाह अपनासँपैघ जमींदारक बेटीसँभेल छलइन। नरेन बाबु दु भाइ छलाह। छोटे मे टुगर भऽ गेल छलाह। जेठ भाइ चमन बाबु इनकर पालन पोषण केलखिन। नरेन बाबु अपन भाइ भौजाइकऽ परम भक्त भऽ गेल‌‌‌ छलाह।ई भक्तिकऽ किछु लोक आने रंगदऽ देने छलइन। नरेन मिसर आ उनकर भौजीकऽ संबंध पर कयेक टा खिस्सा पिहानी उनकर सासुरो मे घुमइत लुटन बाबुकऽ कान तक पहुंच चुकल छलइन। नरेन बाबुकऽ कनिया के, अतेक भाइ भौजाइकऽ आगांपाछु घुमनाई नीक नञि लगइ छलइन। उनका अनुसार आहांक भाइ त घरक धनसँआहांकऽ पलला पोसला। अहुंकऽ त आधा हिस्सा भेल। अइ मे उपकार की?सत्त की छलइ, ई तऽ उनकर सबहक संग दुनियासँविदा भऽ गेल छइ। अहिना छोट छीन गप्प पर टेना मेनी होइत छलइन। एकबेर नरेन बाबुकऽ कनिया अपन तीन टा छोट छोट संतान संग नैहर गेल छलखिन। विदागरी लेल खबास गेलइन। नरेन बाबुकऽ ससुर लुटन बाबु विदागरीसँमना कऽ देलखिन। फेर की छलइ। नरेन बाबुकऽ चट्टसँउनकर भाइ दोसर बियाह करा देलखिन।अइसँलुटन बाबुकऽ अपन शान मे गुस्ताख़ी लगलइन। ओ अपन बेटीकऽ ओतइ बसा लेलाह। चाइर बेटा आ एक बेटी छलइन। ओ अपन बेटीकऽ बेटा बुइझ पाचम हिस्सादऽ देलकिन।पाचम हिस्सा बक्तम छलइ, लिखतम नञि। नरेन बाबु क्षणिक शान मे आइब कऽ दोसर बियाह कऽ तऽ लेलाह लेकिन अपन पहिल कनिया आ बच्चा सबकऽ बिसइड़ नञि सकलाह। जमींदारी त पहिनेहे खत्म भऽ गेल‌‌‌ छलइन। ऊपरसँअइ तरहक परिवारकऽ छिन्न भिन्न होइत देख कऽ नरेन बाबु अर्द्धविक्षिप्त जकां भऽ गेल‌‌‌ छलाह। सब संपइत सब विलाय लागल छलइन। ऊमहर नैहर मे संपइतक बल पर हरेंद्र आ आर बच्चा सब नीक पढ़लकइन लिखलकइन। बापक जगह त आर कियो नञि लऽ सकइत छलइ।ई कमी ओकरा सब दिन लगले रहलइ। उपरसँ" भगिनमानक" तगमा।लुटन बाबु जाबइत जीलाह ताबइत त पाचम हिस्सा भेंटलइन। बाद मे माम सब दिअयद बइझ परेशान करऽ लागल छलखिन। हरेंद्र बाद मे विदेश मे नौकरी करऽ लगलाह।उनकर आर भाइ सब सेहो जतऽ जतऽ नौकरी केलाह, लालाभाइ जकां ओतइ बइस गेलाह। आपसी कोनो हेमक्षेम भेबे नञि केलइन। हरेंद्र अइ सब दुखक कारण अपन पिता नरेन बाबु आर कका चमन बाबुकऽ बुझई छलाह। किछु बरख बीतला बाद नरेन बाबु त अपन सासुर एनाई गेनाई शुरू कऽ देने छलाह लेकिन उनकर कनिया फेर कहियो सासुर नञि गेलीह। सऊतीन तर बसनाई उनका मंजुर नञि छलइन। तहिया दु तीन बियाह सामान्य गप छलइ। लेकिन ओ बड्ड स्वाभिमानी छलीह। ओ नरेन बाबुकऽ जीबइत सासुर नञिये एलीह। जखइन नरेन बाबु मरलाह त ओ उनकर श्राद्ध मे एलीह। हरेंद्रकऽ जेठ बेटा होबाक कारण बापक मुखाग्निकऽ अधिकार भेंटलइन। माछ मासक परात जे हरेंद्र, उनकर भाइ सब आ माय नैहर घुरलीह, से फेर कहियो सासुर नञि गेलीह। हरेंद्रकऽ ततेक ने कुंठा घेरने रहइन जे ओ मातृक मे सेहो मायकऽ मरलाकऽ बाद माम सबसँसंबंध नञि निभा सकलाह। सब भाइ सब मिल कऽ जमीन जथा बेच लेलाह।ओइसँओतुका समाज सेहो इनका सबकऽ निड़इस देलकइन। पैतृकक आर्थिक स्थिति नरेन बाबुकऽ मरलाहकऽ बाद जर्जर भऽ गेल‌‌‌ छलइ। अइ पचड़ासँबचऽ लेल ओ सब अपनाकऽ अलग थलग कऽ लेने छलाह।बाकी भाइकऽ त नञि लेकिन हरेंद्रकऽ कनियाकऽ बड्ड मोन करयन सासुरक गाम जयबाक, लेकिन हरेंद्र कहियो अनुमति नञि देलखिन। हरेंद्रकऽ कनिया मरऽ काल अपन बेटा सबकऽ कहलखिन जे आहां सब अपन कुलदेवीकऽ दर्शन जरूर कऽ लेब, भऽ सकाय तऽ ओतऽ पातइड़ देब। जीवन उतार चढ़ाव संग चइल रहल छलइन। आपसी सामंजस्यकऽ अभाव परिवार मे देखाइत छलइन। कीयो मध्यस्थ करऽ बाला नञि छलइन। मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना बाला हाल छलइन। हरेंद्र आ उनकर भाइ सबकऽ कियो सीखेबे नञि केलकइ जे कका काकी , गाम घर आ सखा संबंधी भी किछु होइ छइ। ओ सब संबंधी बुझबे नञि केलकइ। माय आ भाइसँसबहक कुचेष्टे सुनलकइ। ईएह सब मोन मे भरलइ आ ककरो प्रति ममत्वक भाव नञि पनपलइ। समयक अपन बहाव होइ छइ। उनकर पैतृक परिवार बहुतही आगु बइढ़ गेल छलइन। हरेंद्रकऽ घर मे पद आ पैसा भेलाक बावजुदो भाबंश नञि बुझा रहल छलइन। महेन्द्रकऽ उएह मायक गप्प सुतला मे झकझोड़इत रहइ छलइन। आब गाम जायसँरोकऽ बाला पिता हरेंद्र सेहो नञि जीबइ छथिन। गाम आइब अपनाकऽ बीच पाइब महेंद्र सब पहिलुका गला शिकवा बिसइड़ गेल छइथ। अफसोस होइ छइन जे मायक जीबिते किअए नञि एलाह। आइ नञि एला गेलाक कारण बहुत रास संबंध मे गांठ पइड़ गेल छलइ। आब सब गांठ खुइल गेल छइ। आब अफसोस ईएह होइ छइन जे कियैक ने एकटा ठांव उनको अपन पैतृक गाम मे छइन। जखने अकर चर्चा होइ छइ,नरेन मिसरक अइ घरक पुतोहु , जे आब कनिया काकी भऽ गेल‌‌‌ छथि, तिनकर कान ठार भऽ जाइ छइन जे कहीं ई दिअयद बइन संपइत ने बंटा लियाय।ई सोचिते सब आबेश फुर्र भऽ जाइ छइन।होइ छइन जे कहीं ई रहअ लेल तऽ नञि आयल अइछ। जायकऽ चर्चा नञि कऽ रहल अइछ।दिअयद बाद त चढ़ेबे करतइ। हमर संपइत बंटबाईये कऽ मानत। ईएह सब सोचिते छलीह की तखने मोटर फेर आइब गेलइ। महेन्द्र मोटर मे सपरिवार बइसल अपन डीह टोलकऽ देखइत जा रहल छलाह।ओकरा अपन पिताक निर्णय पर पछतावा भऽ रहल छइ। एकटा बिदागरी सनक छोट बातक कारण ओ अपन खानदानसँकइट गेल आ झुठक शानक बलि वेदी पर चईढ़ गेल।पछतावा तऽ नरेन मिसरकऽ सेहो भेल छलइन दोसर बियाहक बाद, लुटन बाबुकऽ सेहो भेल छलइन बेटीकऽ घर उजरलाकऽ बाद, हरेंद्रकऽ सेहो भेल छलइन सबसं कटलाकऽ बाद। आइ महेंद्रकऽ पछतावा भऽ रहल छइन, सबसं जुड़लाकऽ बाद। पुरान कहबी छैक- "अब पछतावे होत क्या, जब चिड़िया चुग गइ खेत", एहने लेल कहल गेल छइ।एहन आबेश त अपनेसँभेंट सकइ छइ, विदेश मेकऽ केकरा चिन्हइ छइ। ओतऽ तऽ आबेशोकऽ मोल छइ। भारी मोनसँमहेंद्र घुइड़ रहल छलाह। अइ संग संग किछु निर्णय सेहो लेबाक भाव अबइत जाइत रही रहल छलइन। उपराग (लघुकथा) दमन बाबु आइ बीसो पच्चीस बरखक बाद बहिनक सासुर एलाह अइछ। कतऽ सऽ अबितैथ। बहिन अपने शहर मे डेरा पर रहइ छलीह। पहिने बहिनोई मिसरकऽ जतऽ जतऽ बदली होइन, ओतऽ रहइ छलीह। बाद मे जखइन बच्चा सब पैघ भेलइन त ओकर पढ़ाइ दुआरे रांचिये धअ कऽ रहलीह। बहनोई अपन असगरे बदली बला शहर मे रहइ छलाह। जखइन शहर लग रहइन, तऽ शइन ड़इब मे रांची आइब जाइ छलाह........मूदा बाद मे जखइन बदली दूर भऽ गेलइन.........तखइन दरमाहा लऽ कऽ महीने महीना रांची अबइत छलाह। कष्ट त होइन लेकिन धीया पुताकऽ पढ़ाइ आ भविष्यकऽ लेल माय बापकऽ त्याग तऽ करहे पड़तइ।अहिना दिन बितइत छलइन। दमन बाबु सिन्दरीसँइंजीनियरिंग केलाक बाद बाहर निकइल गेल‌‌‌ छलाह। कोनो भी जग परोजन मे शामिल नञि होइ छलाह। आइ जेकां सस्त हवाई यात्रा तहिया नञि रहइ। दमन बाबुकऽ सोच छलइन जे जतबा आबऽ जाय मे खर्चा होइत, ओतबा जे घरबइयाकऽ पठा देबइ त बेशी मदद हेतइ। शुरू मे तऽ संबंधियो सबकऽ डालर भेटइन त नीक लगइन। किनको दमन बाबुसँकोनो शिकाइत नञि छलइन। जहिया ओ दिल्ली अबइ छलाह......सब सगा संबंधी भेंट करऽ अबइन। सबकऽ जाइत काल किछु ने किछु दमन बाबु देबो करतिन। खुब जश छलइन। नब नब कुटुम्ब सब सेहो डालरकऽ चक्कर मे भेंट करऽ अबिते छलइन।सब ठीक चइल रहल छलइ। दमन बाबुकऽ बिदेश कहियोसँनञि सोहाइ छलइन। दु टा पाइ बेशी भेटलइन, तैं ओतऽ गेल छलाह। बाद मे धीया पुता आ आंगन सं, भारत घुरबाक तैयार नञि भेलकिन, तैं ओतइ रही गेलाह। जखने बच्चा सब व्यवस्थित भेलइन, भारत घुरबाक सोचऽ लगलाह।बहुत रास बदलावकऽ बारे मे पढ़इत सुनञित रहइ छलाह। अइ बीच मे बहिन सेहो एकदिन बड्ड उपरागसँभरल चिट्ठी पठेलखिन- "तुं सब बड़का लोक भऽ गेल‌‌‌ छअ। हमर कोनो काज/ करदेवता मे नञि उपस्थित भेलह।गाम मे घर बनेलऊं सेहो नञि देखबाक सेहंता भेलह। हमरा तोहर डालर नञि चाही। हम तऽ पहिनेहे तोहर पठाओल पाइकऽ घुरेबाक चाहइ छलऊं..... मूदा तोरा तकलीफ हेतह, तैं नञि वापस केलियह। बहिन लेल भाइकऽ काज मे सदेह ठार रहनाई , सबल बनबइ छइ। हम सब कोनो भिखारी छी जे पाइ पठा दइ छअ। कहियो तोरा छगुन्ता नञि भेलऽ जे भगिन जमायकऽ देखी.....बहिनक पुतोहु आ पोता पोतीसँभेंट करी। ओकरा आइब कऽ जे आशीर्वाद देबऽ , ओइसँबइढ़ कऽ किछु नञि छइ। मिसर तोहर दुखिताह रहइ छथुन, से तऽ बुझले छह। आब गाम मे ओतेक दवाई - दारु नञि भऽ रहल छइन। आइब कऽ भेंट कऽ जहुन। हमर बियाहक बाद तोहर जन्म भेल छह। अपने बच्चा जेकां तोरा मानञि छलकुन...... से तों अबरजात बन्ने कऽ देलह। हमरा पाइ कौड़ी नञि चाही। मिसरकऽ पेंशन तऽ हम खर्चे नञि कऽ पबइ छी। पाइ बचिये जाइत अइछ। पहिने त बच्चा सबहक पढ़ाइ-लिखाईकऽ कारण हाथ शिकस्त भऽ गेल‌‌‌ छल। तैं तोहर पढ़ाइकऽ खर्चा नञि उठा सकलियअ। मुजौना बाला तोहर ससुर ज्यों पढ़ाइयक खर्चा उठेलकुन तऽ बदला मे एहन सुन्नर हमर भाइ सन जमाय भेटलइन। बेशी सासुरकऽ लटर शटर मे नञि पड़अ। बस एक बेर आइब जाह।देखबाकऽ बड्ड मोन कऽ रहल अइ।" ईएह चिट्ठी पढ़लाकऽ बाद दमन बाबु बहिनक सासुर आयल छलाह।बाहरो रहलाकऽ बाद दमन बाबु मे लंफलंफा नञि आयल छलइन।ओ अखनो गाम एलाह पर पैसेंजर ट्रेन मे चढ़ई छलाह। गामसँतऽ दुईये टीशन पर उनकर बहिनक सासुर छलइन।कतेक बेर ओ आयल गेल छथि। बड्ड भीड़ जखइन ट्रेनक बोगी मे भऽ जाइ छलइ त ओ पौदान पर लटईक कऽ जाइ छलाह। ज्यों एक ट्रेन छुइट जाइ त दोसर ट्रेन कखइन आइत, ओकर कोनो ठेकान नञि छलइ......ओहोसँबेशी जे ओइ मे अइ ट्रेनसँकम भीड़ हेतइ, तकर कोन गारंटी। किछु भऽ जाइ, दमन टीशन पर ट्रेन नञि कहियो छोड़लाह। एकबेर त ट्रेन छुइट गेला पर ओ चड़ुचन या एहने कोनो पाबइन मे सनेशक मोटरी कनहा पर उठा कऽ ट्रेनक पटरी धेने धेने बहिनक सासुर चइल गेल‌‌‌ छलाह। बाद मे बुझला पर गाम मे सब बिगड़नेहो रहइन अइ लेल। तहिया एत्ते कहां सोचाई छलइ।जायकऽ अइ त जायकऽ अइ। जे सवारी भेटल, पकड़ु आ पहुंच जाऊ। नञि किछु भेटल त " चरणदासक कार" छइये। अइ कारक ओ खुब उपयोग करय छलाह। ओ पैरे चललासँउनका " चीनी"कऽ बीमारी नञि भेलइन। अखनो उएह पहिलुका आत्मविश्वास पर कतउ आ कखनो विदा भऽ जाइ छथि। बहिनक सासुर मे बितायल गप शप सब आइ मोन पइड़ रहल छइन।उनकर मिसरक माय ( बहिनक सास ) बड्ड कड़गर रहथिन। तहिया जे बुढ़ी कड़क होइ छलइ, उनका सब इंदिरा गांधी कहइ। एक बेर गाम मे कोनो गप चललइ त दमन बाबुकऽ भागिन कहलखिन - " हमर बाबी लग बंदुक छइ। आहां सबकऽ उनकर डर नञि होइया। हमर मां त बाबीसँखुब डराई छथिन।" दमन बाबु भागिनकऽ बयसकऽ छलाह, मूदा छलाह त माम। ओ चटसँबजलाह- " हमरा लग तोप अइछ। जा कऽ कहि दियउन अपन बाबी के। हम सब नञि डराई छी।" तहिया दमन बाबु तोप देखनेहो नञि छलाह। गाम मे सुनथिन जे तोप, बंदुकसँभइड़गर तऽ बाईज देलाह। किछु महीनाकऽ बाद जखइन बहिनक सासुर गेलाह तं ओ बुढ़ी सास इंदिरा गांधी एलीह। कहलखिन-" ईएह तोपबाला पुरूख छथि। अइ बेर इनकर बिछान राइत मे हमरे घर मे कऽ देबैन कनियां।हम देखइ छियइन इनकर तोप"। आब डरक मारे सकदम छलाह बच्चा दमन। बुइझ गेलाह जे भगिना, इमहरसँऊमहर बात केलाह अइछ। गामक सुनल फकरा याद आइब गेलइन- "धी, जमाय आ भगिना, ई तीनु नञि अपना"। ओ त जे छइ से छइ, अखइन ई बुढ़ीसँकोना निबटल जाय।आब राइत होबऽ मे बेशी देरी नञि छलइ। डरक मारे दमनक हाल पातर भऽ रहल छलइन। खने मिसर लग जाइथ, खने बहिन लग जाइथ, हम त मजाक मे कहलियइन। हमरा लग कोनो तोप नञि अइछ। लेकिन एतऽ पाहुनकऽ सुनञिया के। सब इनकर गप सुइन कऽ मुस्किया रहल छल।अगर बुढ़ी राइत मे बंदुक निकाइल लेतीह त दमन की करताह। ऊयाह चिंता बेगड़ता मे बिन खेनहे दलान पर सुइत रहलाह। बाद मे लोक उठा कऽ खुयेलकइन। बुढ़ीसँबाद मे दोस्ती भऽ गेल‌‌‌ छलइन। ओ कहथिन जे आखिर उनकर बेटाक सासुर मे एकटा शेर जन्म लेलक जे ज़बाब देलक। बच्चा दमन अपनाकऽ शेर बुइझ गर्वान्वित होइत छलाह। खटिया पर पड़ल दमन, कने ऊंघाइत छलाह। ताबइत सुनञित छइथ जे बहिन बाईज रहल छलखिन- " कोन काज छलइ ट्रेनसँऐबा के। उपरसँअतेक दुर पैरे। हरही सुरही सब तं मोटरसऽ अबइत अइछ। हमर अफसर भाइ पैरे आइब गेल। आब तोहर देह पहिलुका थोड़े छह। बड्ड थाईक गेल छह।पइड़ रहअ।जखइन सांझु पहर उठबऽ त एक बेर मिन्नी दाईसँभेंट कऽ लियहुन। तोरा बड्ड मोन पाड़इ छथुन। मोन जुड़ा जाइ छइ जखइन नैहरक लोकक सासुर मे नीक लेल चर्चा होइ छइ। मिन्नी दाईकऽ नाम लइते दमन बाबुकऽ अपन हुनका संग बितायल दिन याद आइब गेलइन। बहिन कहि रहल छथिन- मिन्नी दाई अपन जीबन इज्जतकऽ संग अइ गाम मे बिता लेलीह। कहियो सुख नञि भेंटलइन। दु दु टा बियाहो भेलइन। नञि जाइन ककर नजइड़ लगलइन वा कोन नक्षत्र मे जन्म भेलइन। ओतेक टा घर नञि हवेली कहऽ , ओइ मे असगर पड़ल रहइत छइथ। राइत बिराइत किछु भऽ जेतइन तकऽ देखतइन। याद हेतह, दुसधा हजरा, ओकरे बेटा राइत कऽ दलान पर सुतइ छइन। मिन्नी दाई, बखारी चौधरीकऽ बेटी छलीह। बखारी चौधरीकऽ असली नाम दमनकऽ नञि बुझल छलइन। एतबा जनञि छलाह जे उनकर दलान पर कयेक टा बखारी छलइन। गाम की, पुरा परोपट्टा मे ओतेक बखारी किनको नञि छलइन। ओहीसँउनका सब " बखारी चौधरी" कहइन। अतेक बखारी रहइन, तैं बुइझ लियअ जे कतेक अन्न पाइन होइन।बखारी चौधरी बड़का कलामी लोक छलाह लेकिन दमनक मिसर आ उनका मे दुगोला छलइन। दुगोला मतलब खान पीन आपस मे बन्न। अबरजातो नञि। कर कुटुम्बकऽ एक दोसरा कतऽ एला पर पाबंदी नञि छलइ। बाकी सब पर लागू छलइ। बखारी चौधरीकऽ दु टा बियाह छलइन। बड़की कनिया ओतेक नीक देखबा मे नञि छलखिन। तखइन अपने देख कऽ सुन्नर दोसर कनिया केलाह। ओना तऽ नबकी कनिया बेशी दुलारु होइ छइ, लेकिन बखारी चौधरी कतऽ उल्टा छलइ। चलती बड़की कनियाकऽ बेशी छलइन। बखारी चौधरीकऽ दुनु कनियासँधीया पुता भेलइन। छोटकी कनियासँभेल धीया पुता सब चिक्कन चुनमुन आ बड़की कनिया स़ं भेल धीयापुता सब जमुनिया रंगक छलइन। जखइन धीया सब बियाह जोगर भेलइन तं बखारी चौधरी बर तकनाई शुरू केलाह। मिन्नी दाई बड़की कनिया स़ं भेल छलीह।उनके समवयस्क छोटकी कनियासँचुन्नी दाई छलीह। चुन्नी दाईकऽ कथा सुन्दरता लऽ कऽ एक जगह स्थिर भेलइन। लड़का धन सम्पइत बला छलइ। बड़की कनियाकऽ जखइन पता लगलइन जे उनकर सऊतीनकऽ बेटीकऽ अतेक नीक कथा भऽ रहल छइन.......ओ अट्ठाबज्जर खसा देलकिन। उनकर बात बखारी चौधरी माइनतो बेशी रहथिन, फेर की छलइ। ओइ लड़कासँमिन्नी दाईकऽ बियाह भऽ गेलइन। सिन्दुरदानक बाद जखइन बरकऽ ई धोखा पता लगलइ त ओ कोनो बहाने चतुर्थीसँपहिनेहे परा कऽ अपन गाम चइल गेल‌‌‌। ओतऽ सबकऽ ई बात बतेलकइ। ओ सब अपने लंगा छल। कहलकइन जे आब सासुर जेबाक नञि काज, हम सब देख लेबइन। इमहर बखारी चौधरी सब ई सोचइत - " भेल बियाह मोर करता की। धीया छोड़ि कऽ लेता की।" कयेक बेर पर पंचयतीकऽ सेहो प्रयास भेलइ, लेकिन बर पक्ष टससँमस नञि भेलइ। ईएह सब तेला बेलासँमिन्नी दाईकऽ बर ततेक ने परेशान भेलइ जे एकदिन माहुर पी कऽ मइड़ गेलइ। उड़न्ती समाचार बखारी चौधरी तक सेहो पहुंचलइन। मिन्नी दाईकऽ सासुरसँनञि कोनो खबर एलइन। नैहरे मे चुड़ी तुड़ी फोरल गेलइन आ जे कनी मनी लोकाचार छइ, से सब भेलइन। ऊमहर चुन्नी दाईकऽ दोसर जगह कथा भऽ गेलइन। अइ बियाहलऽ कऽ दुनु सौतीन मे बड्ड ऊकटापैंची भेलइन। बखारी चौधरीकऽ कयेक बेर थोर थाम करऽ पड़लइन। बखारी चौधरीकऽ देह आब उमर बढ़लासँखइस रहल छलइन। ओ चाहइत छलाह जे कहूना कोनो सुपातरक हाथे मिन्नी दाईकऽ बांईध दी। मौकाक तलाश मे सब बेर सभा गाछी जाइ छलाह। एक बेर कनीक बयसगर बर भेटलइन। बेशी ओकर खोज खबर नञि लेलकिन आ सोंझे सभागाछीसँऊठा कऽ लऽ अनलखिन। लड़काकऽ अतबे बतेलकिन जे बेटीकऽ बियाह राइत मे जमाय छोड़ि कऽ चइल गेलइ। नञि चतुर्थी भेलइ आ नञि मधुश्रावणी। शास्त्र आ लोकाचार दुनु लेखे ई बिबाह पूर्ण नञि मानल जेतइ आ ऊपरसँलड़का सेहो मइड़ गेलइ।ओ बयसगर बरकऽ फुसलां कऽ आ धनक लोभदऽ कऽ गाम परलऽ अयलाह। मिन्नी दाईसँपुछबाक काजो नञि। कपड़ाक गुड़िया जेकां मिन्नी दाईकऽ फेर बियाह दान भेलइन। सब ठीक-ठाक बुझाई छलइ। दस दिन बाद बिदाई लऽ कऽ लड़का ओतऽ सँचलल। जखइन ओतऽ सँपहुंचनामा आ कोनो खोज पुछारी नञि एलइ त इमहर चिंता भेलइ। मिन्नी दाईकऽ मोन त पहिनेहेसँसशंकित छलइन।जखइन बखारी चौधरी लड़का बारे मे पता लगेला त भेद खुललइ। ओ बर पहिनेहेसँबियाहल नञि, चौदह बरखक बेटो छइ। कोनो काज नञि करय छइ आ सब अवगुणसँआगर छइ। बहु बेटा जे मना केलकइ त खींस मे दोसर बियाह कऽ लेलकइ। बाद मे जखइन घर गेल त सब भूत ऊतइड़ चुकल छलइ।कानुनन सेहो नबका बियाह मान्य नञि छलइ। मिन्नी दाईकऽ जीवन फेर ओहिना सुन्न भऽ गेल‌‌‌ छलइन। बाद मे बखारी चौधरी थोड़ेक जमीन खोड़िसक रूप मे लिख देने छलखिन। बाकी भाइ सब बड़का बड़का हाकिम भऽ महानगर सब मे रहइत छइन। सबकऽ फड़ाक फड़ाक बड़का बड़का घर बनल छइन। मिन्नी दाई एक बेर कऽ सांझ बाती देखा अबइ छथिन। ईएह गप्प सब बहिन , दमनकऽ सुना रहल छलखिन। तखने लाठीकऽ सहारे घिसियाइत मिन्नी दाई जोड़सँबजइत एलीह- "कऽ आयल छथि। पार्टनर की?" दमन आ उनकर बहिन दुनु गोटे ठार भऽ गेलाह। उनकर लाठी हटा कऽ दमन हाथसँसहारा दऽ कऽ ‌ खटिया पर बइसलकिन। मिन्नी दाईकऽ ताशक गोंधिया हरदम दमने रहइ छलखिन। तैं ओ दमनकऽ आबेशसँ"पार्टनर " कहइ छलखिन। अतेक बरखकऽ बादो आवाज सुइन कऽ आइब गेलखिन। दमन उनकर हाल पुछलखिन। मिन्नी दाई ज़बाब देलखिन- " हमर छोड़। हमर हाल त भइड़ दुनिया जनञित अइछ। तु अपन कह पार्टनर। दमनकऽ किछु कहल नञि भेलइन।मिन्नी दाईकऽ बयससँबेशी देह खइस गेल छलइन। थोड़बाक काल बाद सांझबाती देबाक समय भऽ गेल छलइ। ओ चइल गेल छलीह। दमन बाबु, बहिनसँपुछलखिन आबो दुगोला छऊ। बहिन ज़बाब देलखिन- धुर्र छी। आब लोके कहां जे दुगोला। मरला पर कांध देबइ लेल मजुरी पर लोक बजावल जाइ छइ।हमरा जखइन समय भेटइत अइछ तं हम उनका कतऽ चइल जाइ छी। दु दिन नञि जेबइन त तेसर दिन टुघड़इत ई अपने पहुंच जेतीह। दमन बाबुकऽ बहिनकऽ सब उपराग आब खत्म भऽ गेल छलइन। दमन बाबु सोइच रहल छलाह कि दुगोला रहलो पर मिन्नी दाई कहियो पाहुन बुइझ कऽ , कहियो खेलबासँआ ताशक गोंधिया बनबासँमना नञि केलखिन। कनीक रंग दब उनकर दुखक कारण त नहिये भऽ सकइ छइन, पिछले जन्मक किछु लेखा जोखा मे बचल छइन, उएह हिसाब भऽ रहल छइन।आब उपराग ककरा सं। अएना (लघुकथा) महिनाथ बाबु दीवानी मामलाकऽ जानल मानल वकील छलाह।ओना उनकर पिता रमानाथ बाबु भी कानुनकऽ कम ज्ञाता नञि छलाह। लेकिन रमानाथ बाबुकऽ वकालतक प्रैक्टिस ठीक नञि चललइन। ततेक ने उनकर टिटम्भा छलइन जे मोवक्किल सब धीरे धीरे दुर होइत गेलइन। मोवक्किल आहांकऽ पाइ दइया, ओ नखरा थोड़बे सहत। आहांकऽ ओकर ध्यान राखऽ पड़त, नञि तऽ ओ दोसरकऽ धअ लेत। ऊयाह भेलइन, रमानाथ बाबु ज्ञानी रहितो, मोवक्किल सबकऽ नञि सम्हाइड़ सकलाह। व्यवहारिक पक्ष कमजोर रहबाक कारण उनकर घरक गाड़ी जेना - तेना डुगड़इत रहलइन। उनकर कनियाकऽ सेहंता लगले रहलइन जे वकीलाइन जेकां बनल ठनल, खुब देब-लेब करइत जीवन बीतइन।उनका अपन घरबालाकऽ पोछल पाछल सुखल बेबहार बुझल छलइन। रमानाथ बाबुकऽ सामने आयल वकील सबहक ठाट-बाट ओ देखथिन........ चर्चा सेहो करथिन ......... लेकिन अइ काठक मुरत रमानाथ बाबु के,कऽ बुझेतइन। रुस्सा फुल्ली, लड़ाई-झगड़ा, ऊकटा-पईंची, कन्ना-रोहट, नीक-बेजाय, सईज-धईज,अलार-मलार, शपता-शपती सब कऽ कऽ वकीलाइन थाईक गेल छलीह।आब ओ किछु कहनाई ओना ओ छोड़ि धेने छलखिन, लेकिन मौका भेटला पर अखनो छोड़ई नञि छलखिन। अइ घरक भीतरका संघर्षसँमहिनाथ रोज दु चाइर होइ छलाह। ओ मायक उपरागकऽ बुझअ सुझअ लागल छलाह। ओ कहिया ई निश्चय कऽ लेलाह जे उनका वकील बनबाक छइन, से अपनो नञि बुझेलइन।जखइन ओ वकालतक पढ़ाइ लेल कालेज मे नाम लिखा लेलाह, तखइन घरक लोक बुझलकइन। ओइ समय मे जे डाक्टरी, ईन्जीनियरी, आ सरकारी नौकरी मे नञि पास होइ छलाय, उएह वकालतक पढ़ाइ करय छलाह। लोक महिनाथक वकालती पढ़ाइकऽ फैसला जाइन कऽ अचम्भित भऽ गेल छल। सब ई बुझिये नञि सकल जे की निर्णयकऽ पाछु एकटा दृढ़ निश्चय छइ। महिनाथ वकालतक पढ़ाइकऽ संग संग आरो काज सब मे सक्रिय छलाह। जहिया परीक्षा पास कऽ कऽ वकालत ज्वाइन केलाह, तहिया पुरा तड़क भड़क संग बड़का पार्टी देलाह।अपन पिताकऽ जुनियर नञि बइन कऽ शहरक नामी वकील बीरेंद्र बाबुकऽ जुनियर मे ज्वाइन केलाह। बीरेंद्र बाबुकऽ जज सबसँघुट्टा सोहार रहइ छलइन। ओहिना महिनाथ कम्मे समय मे ओकर सबहक बीच मे लोकप्रिय भऽ गेल छलाह। अधिकारी सबहक कोनो भी काज होइ, ओइ मे महिनाथ सबसं आगु। अपन जान जी लगा दइ छलाह-ओकर सबहक लेल। पहिने तऽ वीरेंद्र बाबुकऽ जुनियरकऽ रूप मे पहचान रहइन, मूदा थोड़बे दिनक बाद अपन पहचान होबऽ लगलइन। वीरेंद्र बाबु अपने सेहो अही रस्ते आगु बढ़ल छलाह, तैं ओ इनका पीठ पर हाथ ठोकइत रहलकिन। महिनाथ जखने कनी सुभितगर भेलाह त ओ सबसं पहिने किछु पाइ इमहर ओमहर कऽ कऽ एकटा मोटर कीनलाह। तहिया मोटर वीरेंद्र बाबुकऽ सेहो नञि छलइन। ई मोटर आ ड्राईवर ओ जज सबहक तीमारदारी मे छोड़ि देलखिन। अखनो मंगनी मे मोटर ड्राईवरक संग ककरो भेटई त दस टा काज जरूरी भऽ जाइ छइ।अइ मोटरकऽ कारण इनका कोर्ट मे कयेक टा लोक सबसं नजदीकी भऽ गेल छलइन। अधिकारी सब हिनकर मोटरक भोग केलाक बाद हिनको कहूना ना कहूना उपकृत करऽ लगलइन। महिनाथकऽ जन्मे कानुनक पोथीसँभरल घर मे भेल छलइन। ओ गलती आ मजबुरीसँबनल वकील नञि छलाह। ओ अपन ध्येय बना कऽ अइ प्रोफेशन मे आयल छलाह। ओ लगितो छलइ। जखने समय भेटइन कानुनक पोथी सब पढ़इत रहलाह। ताईद आ मोहर्रिरक लंबा सुची हिनका लग छलइन। सबकऽ बेशिये कमीशन दऽ कऽ पटियेने छलाह।अइ सबकऽ संग अपन उदार आ अभिजात्य चेहरा सेहो समाजक सामने रखने छलाह। पब्लिसिटीकऽ कोनो मौका हाथसँनञि जाय दइ छलाह। प्रैक्टिस चलऽ लागल छलइन।अपन घरक लोकक जन्मक तारीख याद होइन वा नञि होइन, सब साहब की, मेमोसाहबक जन्म तारीख आ बियाहक दिन याद रहइन। कतउ मधुर, कतउ गुलदस्ता, कतउ उपहार, कतउ सनेश त कतउ खाली शुभकामना....... अधिकारीकऽ स्वभावक अनुसार ई बेबहार करय छलाह। ओ अपन घरे लग एकटा पुरना घर सेहो भाड़ा परलऽ लेने छलाह। अइ मे मोवक्किल सबकऽ रहबाक आ खेनाई पिनाईकऽ सेहो बेबसथा छलइ।दीवानी मुकदमा सबहक फैसला होबऽ मे बड्ड समय लगइ छइ।जकरा जमीन रहतइ, सैह ने मोकदमा लड़त। कयेक लोककऽ तऽ जमीनक संग भावनात्मक लगाव रहइ छलइ। अकरे सबकऽ महिनाथ भजबइ छलाह। आब बीरेंद्र बाबुसँअलग भऽ नीक प्रैक्टिस करऽ लागल छलाह। मोवक्किलक रहबाक बेबसथाकऽ कऽ नब शुरूआत भऽ गेल छलइ। रमानाथ बाबु बला भगलका मोवक्किल सब सेहो घुअइड़ कऽ इनका लग आइब रहल छलइन। आब शहरक प्रतिष्ठित लोक मे महिनाथ बाबु आइब गेल छलाह। शहरक कलक्टर, पुलिस कप्तान, जिला जज, विधायक, नेता, व्यवसाई, पैघ गिरहथ सब संग ऊठई बइसई छलाह।बाहरी दुनियाकऽ लेल, दहेज लेल बियाह मे शामिल नञि होइ छलाह। लंबा लंबा सैद्धांतिक आ आध्यात्मिक गप सब देबऽ आइब गेल छलइन। उनका कतऽ सँफायदा होबाक अइछ, अकर पहचान मे पटुता छलइन। जतऽ जई तरहसँबिना "ना " कहने निबटारा होइत, ओइ तरहक तर्क दइ छलखिन। कखनो दु प्रतिष्ठित परिवारकऽ बीच कथा-वार्ता सेहो करा कऽ अपन पैठ बना लइ छलाह। अहिना आगु बढ़इत जा रहल छलाह।महिनाथ अपन भातिजक बियाह एकटा अधिकारीकऽ बेटीसँकरवाबइल लेल जी जान लगेने छलाह। हिनकर भाइ दोसर जगह बेटाक बियाह ठीक कऽ लेलकइन। ई अपन झेंप मिटबऽ खातिर " पाइ लेब, कि भाइ लेब "कऽ डायलॉग समाजक सामने रखलाह।अइ मे भाइकऽ किरकिरी भेलइन, लेकिन महिनाथ बाबुकऽ प्रसिद्धि भेटलइन।हर स्थितिकऽ भजबं मे माहिर छलाह। अहिना महिनाथक गामक संगी एकबेर कोनो काज मे मददक इच्छा लऽ कऽ उनका लग एलखिन।महिनाथ अपनाकऽ सिद्धांतवादी दर्शबइत, सीधा कहबा मे लाचारी देखेलकिन।ओ कहलखिन- " ज्यों हमरा ओ पुछताह, त हम कहबइन।"महिनाथकऽ ई बात मोनो मे नञि एलइन जे अकरासँउनका कहियो कोनो काज पईरो सकइत अइछ। जेकरासँकाज परऽ बाला होइ छलइ, ओकरा लेल तऽ सर्वस्व समर्पण सिद्धांत छलइन।महिनाथकऽ ओइ संगीकऽ मोन मे एलइन जे काश हमरो एहन दिन होइता जे महिनाथ हमरा लग काज लेल अयताह। कहल जाइ छइ- कोनो चीज मोनसँचाहब तऽ , ओ पुरा हेबे करत।सब परिस्थिति चाहतक अनुकूल भऽ जाइ छइ। समयक पहिया घुईम रहल छल। थोड़े बरखक बाद महिनाथकऽ काज ओइ गऊआं संगीसँपड़लइन। ओ अपन पुरना संगीक संबंध लऽ कऽ उनका कतऽ बड़का मोटर मे मधुरक डिब्बा आ भइड़ पथिया मालदह आम लऽ कऽ पहुंचलाह। अइ सनेशक बल पर ओ केहन केहन काज करा चुकल छलाह। ओ संगीकऽ सब पिछला बात मोन छलइ। ओ कहलकइन-" हम त अहींसँनीक चीज सीखलऊं। ज्यों हमरा ओ पुछताह, त हम आहां बारे मे कहबइन "। महिनाथकऽ सब याद पइड़ गेलइन। अपन वाक्पटुता पर उनका बड्ड गुमान छलइन।आइ गामक अदना सन लोक उनका अएना देखा देलकइन। पुरा गाम समाज मे ईएह चर्चा चइल रहल छइ जे सबकऽ अपन दिन होइ छइ। बड़का होइ वा छोटका होइ, ककरो उम्मेदकऽ नञि तोड़ी। समयक चक्र एहन ने घुमई छइ जे सब केलहा मुंह बेने सामने ठार भऽ चिढ़बऽ लगइ छइ।ओकर मारल मे आवाज नञि होइ छइ। अइ घटनासँमहिनाथ पुरा तरहे बिफइड़ गेलाह। आब उनका सब गामक लोक अपन विरोधी बुझाय लागल छलइन। किनका कोना हानि पहुंचेबइन, अहीकऽ पाछु परल रहलाह। अही सब चक्रव्यूह मे फंसल ह्रदयाघातसँपरलोक चइल गेलाह। अएना उनका लेल भारी परलइन। हत्यारा (लघुकथा) नब कालोनी छलइ। चुन्नी महतोकऽ बेटा सेहो कालोनी मे घर बनेने छइ। बनिया सबहक नकलकऽ कऽ ओहो अइ कालोनी मे जमीन लेबा काल मेन रोड चुनलक। अकर पाछु एक्के टा कारण छलइ जे ओ दु टा दोकान बहरी दिस निकालत। सैह भेलइ। दोकान बनलाकऽ बाद एकटा तऽ किराया मे लगेलक आ दोसर मे चुन्नी महतो अपने दोकान खोलबाक फैसला केलक। ओना ओकरा अकर अनुभव सेहो छलइ। ई सत्त गप छइ जे ओकारा दोकानसँबरक्कत नञि भेलइ। चुन्नी महतो ताहि जमानाकऽ मैट्रिक पास छल। ओकरा हिस्सा तीन बीघा जमीन पड़ल छलइ। अपन समाज मे ओकर धाक छलइ।जोड़ा बड़द संग टायर गाड़ी सेहो ओकरा रहइ। ओकर घर अपना समाज मे नीक गिरहथ मे अबइ छलइ। दोसरोकऽ जमीन ओ भरना लइत छल। ई सब रहलाकऽ बादो ओकरा खेती मे मोन नञि लगइ। ओना सरकारी नौकरीकऽ परीक्षा सब देनहो रहइ लेकिन नौकरी नञि भेलइ। इमहर बियाह दान छोटे मे भऽ गेल छलइ। चाइर टा ननकीरबाकऽ लाइन लगा देने छल। कोनो काज तऽ दोसर रहइ नञि........आइ जेकां टीवी, मोबाइल, फोन- फान, सनिमा किछु नाई। बरख मे एक बेर दसमी मे नाच अबइ छलइ। कोनो कोनो बेर बाबु भैय्या सबहक कतऽ जग सब मे सेहो शहरसँनचनिया अबइ। गामक बाहर गाछी मे नाच-गानक प्रोग्राम होइ छलइ।चुन्नी महतो अइ सब मे जी जानसँलागल रहइ छलाह। ओ सब समाजक नाचक भार लेने रहइ छलाय। नचनिया ठीक करऽ सँलऽ कऽ ओकर सबहक खेनाई पीनाई सुतनाई- सब महतोकऽ जिम्मा। जाबइत नाच - पार्टी गाम मे रहइत छलइ, भुख पियास सब हरा जाइ छलइ चुन्नी महतो के। दु चाइर बरख पर जमीन बेचई छल आ ओइ पाइसँकिरानाकऽ दोकान खोलइ छल। साल दु साल दोकान चलबो करय.......फेर एक्के बेर दोकान बन्न भऽ जाइ। लोक सुनञि जे चुन्नी महतोकऽ घाटा भऽ गेलइ। ओकरा खेतीसँबेशी दोकनदारी मे रस भेटई छलइ।तैं अपन खेत पथार ओ बटईया दऽ देने छल। गाम मे ई चर्चा सब बेर अकर दोकान बन्न भेलाक बाद होइ- जे एना कियैक भेलइ। दोकान पर हरदम भीड़ रहिते छलइ, दामों अकर बेशी रहइ छलइ, मोल कम्मो नञि करय छलइ, उधारी देबहो मे करकर करइत छलइ, सोलकनक ईएह टा दुकानदार छल- तैं ओकर समाजक सब अतइसँकीनय। गाम मे ओना दु टा आर किरानाकऽ पुरान दोकान बाभन सबहक छइन। उनकर सबहक बोली बानी नञि नीक। तैं सोलकने नञि, बभनटोलियोकऽ लोक सब चुन्नी महतोकऽ दोकान पर अबइत छल। बाद मे कतउ कतउसँगप छुटलइ जे ई चुन्नी महतो ढेकाक कमजोर छल। ओ अइ चक्कर मे दोकान डुबेलकइ। भोर सांझ त दोकान मे भीड़ रहइ छलइ,तखइन मौका नञि लागइ, लेकिन दुपहरिया मे ओ गड़बड़ कऽ लइ छलाय।बजार जे ओ होलसेलसँसमान आनऽ जाय ओतउ ओ किछु किछु गड़बड़ कऽ लइ छलाय। गाम मे दबले ज़बान मे, लेकिन कहल जाइ छलइ। ईएह कोटा रहलो पर ओकरा नौकरी नञि भेटलइ, मूदा कपार जोरगर छलइ, एकटा बेटाकऽ रेलवे मे नौकरी लाइग गेलइ। ओकरे कतऽ रही कऽ दोसरो बेटा सब पढ़लकइ। आब त चारू कतउ कतउ नौकरी धेने छइ। छोटका त फौज मे छइ। ओकरासँचुन्नी महतोकऽ बड्ड सुख। ओ बेटा जखइन अबइ छइ, अंगरेजिया बोतल सब ट्रंक भइड़ कऽ अनञि छइ। जे पीलक पियेलक, बचलका जायकाल मे अपन बापक हवाले कऽ दइ छइ। फेर तऽ चुन्नी महतो चानी काटअ लगइ छथि। बड़का बेटा रेलवे टीशन पर मालबाबु लागल छइ। सब समान चढ़ला उतरला पर कमीशन बान्हल छइ। ऊयाह शहर मे जमीन कीन कऽ घर बनेलकइ, ओही मे चुन्नी महतो दोकान निकाललाह अइछ।आब फेर कयेक बरख बाद दोकान खोललाह अइछ।अपने त दोकानक नाम पर शहर मे रहअ लागल छल लेकिन ओकर घरबाली गामे मे धान गहुम सम्हाड़इ लेल रही गेलइ।ओ नञि अपन कनियाकऽ परवाह करय आ नञि कनिया ओकरे करय। पहिलुका गामक दोकान मे त असगरे ओ सब काज करय छलाह। आब तऽ चाइर टा कमासुत बेटाकऽ बाप छथि, अपने दोकान मे झाड़ु पोंछा आ बाकी काज कोना करताह।आब गल्ला पर अपने बइसई छथि आ एकटा टेल्हवाकऽ रखने छथि। कियो टेल्हवा दोकान मे टिकइ नञि छइन। ओना पाइ कम्मे दइ छथिन, तखनो सब भाइग जाइ छइन। किछु ने किछु तऽ झोल छइ। आब शहर मे घर पर समान पहुंचबइकऽ फैशन भऽ गेल छइ। अइ कालोनी मे सेहो अकर लसाइड़ लागल छलइ। गामसँएकटा छौंड़ा देबनाकऽ पकइड़ कऽ चुन्नी महतो दोकान पर रखने छल। ओ छौंड़ा बड्ड पइनगर छल। ओ दऊड़ दऊड़ कऽ काज करय। भरीगर आ दुर बला घर पर समान पहुंचबइ लेल साईकिलसँजाय।कतउ घर बाला सबसँज्यों ओ गप करबाक कारण देरी भऽ जाइ त माइड़ माइड़ कऽ छुटय ओकरा पर चुन्नी महतो। सब शान अइ छौंड़ा पर झारय। चुन्नी महतोकऽ ई दोकान चइल गेल छलइन। कालोनीकऽ बच्चा सबकऽ खेल खेलाइत देख कऽ देबनाकऽ सेहो खेलेबाक सेहन्ता होइ। चुन्नी महतो ओकरा खेल पर पड़िकऽ नञि देबऽ चाहइ छलइ। कतउ कतउ समान पहुंचेला पर घर बाला सब दु चाइर टका देबनाकऽ द दइ छलइ। देबना ओकरा जमा करय छल।ओ दोकानक सब तरी भिट्टी सीख रहल छलाय। ओकरो मोन रहइ जे कनी पाइ जमा कऽ कऽ शहर मे कतउ ओहो अपन ठीहा जमावत। अही धुन मे लागल रहइ छलाय। चुन्नी महतो अपन बेटाक देल अंगरेजिया बोतल मेसँकनी कनी रोज पीबइ छल। एक दिन देबनाकऽ सेहो पीयई लेल जोड़ केलकइ। देबना त ओकर नौकर छल,केना बात कइटतइ.........दु घुंट दऽ देलकइ। जहां तक ओकरा मोन पड़इ छइ, ओइ राइत चुन्नी महतो ओकरा संग किछु गलत बेबहार सुतली मे केलकइ। भोर मे जखइन देबना ऊठल त ओकरा सब बुझेलइ। ओ कनी काल बाद अपन झोड़ी ऊठेलक आ गाम पड़ा रहल। इमहर चुन्नी महतोकऽ अइ खराब सोभाव लऽ कऽ आर कियो ओकर दोकान मे काज करय लेल नञि गछइ छलइ। दु तीन हफ्ता बीतला बाद चुन्नी महतो अपन कनियासँभेंट करऽ गाम गेल। थाह लेबऽ देबना कतऽ सेहो गेल। देबना कतउ बाध दिस गेल छलाय।ओकर मायसँचुन्नी महतो चिक्कन चुपड़ल गप केलक। ओकरा पता चइल गेलइ जे अतऽ सब ठीक छइ। थोड़ेक काल बाद जखइन देबना आयल त ओकर माय अपन गरीबीकऽ कननाई शुरू केलक।हारि कऽ देबना फेर चुन्नी महतोकऽ दोकान पर काज करबाक गछलक। चुन्नी महतो एडबांसे मे करकरऊआ टका देबनाकऽ मायकऽ हाथ पर राईख देलकइ। महल्ला बाला चुन्नी महतोकऽ देबनाकऽ दोबारा अयलाकऽ बारे मे पुछइ त ओ कहइ - सब गर्मी आब ऊतइड़ गेलइ, त आइब गेल‌‌‌।गर्मीसँमतलब अतऽ जमा पैसा खत्म होबाकसँछलइ। देबनाकऽ मिसराजीकऽ कनिया सऽ बड्ड गप होइ। मिसराजीकऽ पोता देबनेकऽ बयसकऽ छलइ। उनका कतऽ हर बेर समान लऽ कऽ गेला पर पाइ त भेटबे करय, उपरसँखाय पीयई लेल सेहो भेटई। ओ सदिखन मिसराजी कतऽ जाइ लेल तैयार रहइ छल। जखइन ओ जाय तऽ घुरऽ मे बिलमा जाइ छलइ। चुन्नी महतो ओकरा अइ देरीक लेल एक दशा नञि छोड़ई। देबनाकऽ अइ बिगड़ाईकऽ कोनो असर नञि छलइ। मिसराजीकऽ घर सेहो कालोनी मे मेने रोड पर छलइन। चुन्नी महतोसँबेशिये रोखगर उनकर घर छलइन। मिसराजीकऽ घरक सब लोक ओकरा मानऽ लागल छलइ। मिसराजीकऽ कनिया देबनाकऽ गाम लगक छलखिन। ओकरा गाम मे बाभनटोली मे उनकर संबंधी सब रहइ छलइन।ओ ओकरा गाम गेल आयल छथि। बड्ड लोककऽ चिनहतो हथिन ओ। देबना चुन्नी महतोकऽ चाइल चलनक शिकाइत इनका सब लग केलकइन।कनी मनी शक उनको सबकऽ बुझा रहल छलइन, लेकिन अतऽ महल्ला बाला बात छलइ। सबदिनाकऽ झमेला बेमतलबकऽ ,कऽ ऊठाइत। ओ सब ओकरा दोसर जगह काज तकबा लेल कहलखिन। अइ लेल मददकऽ भरोसा सेहो देलखिन। देबना एकदिन उनकर घरक आगु तरकारीकऽ ठीहा लगबऽ कऽ बारे मे पुछलकइन। ओ सब तखने हं कहि देलखीन।उनका सबकऽ तऽ एकटा मंगनी मे विश्वासी चौकीदार भेंट जेतइन। अतबे नञि , बिन सुदक पाइ पईंच सेहो लइ लेल कहलखिन। देबना आब अपन गुमटी बनबऽ कऽ बारे मे सोचऽ लागल छलाय। स़स्कृतक एकटा मास्टर साहब कालोनी मे रहइ छलखिन, उनकासँदोकान खोलबाक दिन तकइ लेल कहि देने छलइन। आब पुरा जोश जोश मे देबना रहअ लागल छलाय।चुन्नी महतोकऽ सेहो दोकान खोलबाक भनक लाइग गेल छलइ। अहिना एक दिन राइत मे दोकान बन्न भेलाक बाद चुन्नी महतो, देबनाकऽ नब दोकान खोलबाक खुशी मे अंगरेजिया शराब पीयेलकइ। नशा मे अयलाकऽ बाद की भेलइ से अड़ोस-पड़ोसकऽ सेहो कियो नञि बुझलकइ। भोर मे दोकान नञि खूलला पर लोक घर मे तकलकइ त ओतऽ चुन्नी महतोकऽ निर्वस्त्र लाश भेंटलइ। छुरासँसऊंसे देह मे गंथने छलइ।शोणित पुरा घर मे फैलल। बाकी कोनो समानकऽ नञि अगरम्भार भेल छलइ। सब घर मे सब समान ओहिना संइतल राखल। दोकानक गल्ला सेहो सुरक्षित।खाली देबनाकऽ कोनो पता नञि। पुलिसकऽ खबर भेलइ। लाशकऽ कब्जा मे लेल गेलइ। टीशन पर दिल्ली बाला ट्रेन मेसँदेबनाकऽ पकइड़ कऽ पुलिस अनलकइ। देबना अपन अपराध माइन लेने छल। चुन्नी महतोकऽ बेटा सब आइब गेल‌‌‌ छलइ।ओकरा सबकऽ पुलिस बलासँलऽ दऽ कऽ सेटिंग भऽ गेल छलइ। दु दिन बाद अखबार मे निकललइ - "देबनाकऽ नब दोकान खोलइ लेल पाइकऽ जरुरत छलइ। ओइ लेल ओ अपन मालिककऽ जान लऽ लेलक। आबसँनौकर राखऽ सँपहिने जांच करा लेल करूं"।देबना कोनो नौकर थोड़े छल।ओ तऽ चुन्नी महतोकऽ गऊंआ आ समांग छलइन। ई बुझअकऽ फुर्सत ककरा छइ। महीना दिन अइ घटनाकऽ खोदबेद होइत रहलइ, फेर सब बिसइड़ गेल। जीवन कतउ रुकलइया। चुन्नी महतोकऽ बेटा सब दोकानक समान बेच कऽ पुलिस वालाकऽ रूपय्या उलीझ देलकइ। दोकानकऽ किराया पर उठा देलकइ। आब एस टी डी बुथ ओइ मे खुईज गेल छलइ। देबनाकऽ पुलिस बला ओइ घर पर जांच करय लेल अनलकइ। मिसराजीकऽ परिवारक लोक बाहरे मे ठार छलइन। सब बाल बच्चेदार लोक, हत्यारासँकेना संबंध रखतइ। अकरा देखिते सब घरक भीतर जा कऽ सांकल चढ़ा लेलकइ। देबनाक बात बाहर नञि आइब सकलइ।ओकर अपन दोकानक सपना जेहल तर दबा गेल छलइ।अइ सपना देखिते ओ कयेक राइत जगलाहे बितेने छल। क्षण मे क्षणाक भऽ गेल छलाई।केना ओ अपनासँबलिष्ठ चुन्नी महतोकऽ चक्कुसँगोंईध देलकइ, ओकरा अपन ताकत पर आश्चर्य होइ छलइ। कतेक बेर चक्कु गंथलकइ, ओकरा किछु मोन नञि छइ। ओ चक्कु चलबइत रहलउ। जखइन खुनसँसऊंसे ओ नहा गेल, तखइन छोड़लकइ। एना लगइ जे ओ खुन नञि ललका रंग होइ आ ओइ ललका रंगसँओ अपन गामक नबकी भौजाइ संग होली खेलने हुआय।सऊंसे घर मे लाले लाल शोणित फैलल। ओकरा सब हत्याराकऽ नाम दऽ देने छलइ। ओहन मोहक मुस्कान बाला छौंड़ा, आब हत़्यारा भऽ गेल छलाय। असल मे तऽ हत्या देबनाकऽ अरमानकऽ भेल छलइ। ओकरा अइ लेल विवशकऽ केलकइ, ओ जानऽ सुनऽ बाला अइ आन्हर बहीर संसार मे कियो नञि छइ। देबनाकऽ जीवन पहाड़ भऽ गेलइ। तारीख पर कहियो काल गामसँमाय अबइ छइ। तारीख पर तारीख लाइग रहल छइ। जखइन मिसराजीकऽ कतऽ कऽ लोककऽ गवाही लेल कहल गेलइन तऽ ओ सब देबनाकऽ चिन्हबासँइन्कार कऽ देलखिन।देबना आ मिसराजीकऽ बीच भेल गपक बात तऽ कोर्ट मे भईये नञि सकलइ। अंतिम उम्मेद ईएह सब रहथिन। सब खत्म भऽ गेल छलइ। सजा भेलाक बाद बाकी जीवन जेहल मे काइट रहल छल देबना।माय ओकरा जेहल मे भेट करऽ काल कहलकइ जे गाम समाज मे आब ओकर नबका नाम पइड़ गेल छइ " हत्यारा "। ओकरो लोक आब देबनाकऽ माय नञि कहइ छइ .......... "हत्याराकऽ माय " नब नाम ओकरो भऽ गेल छइ। देबनाकऽ मायकऽ पहिने होइ जे एहन हत्यारा ओकर कोखसँकेना जनमलइ।जनञिमते किअए नञि ओ नुन चटा कऽ माइड़ देलकइ। मूदा जखइन ओकरा चुन्नी महतो बाला गप सब देबनाकऽ वकील साहब बतेलकइ, तखनसँतऽ ओकरा " हत्यारा" नाम नीक लाइग रहल छइ। आब ओ अपने कहइ छइ-" हमरे देबना ओइ मुंहझौसाकऽ मारने छइ। हम ओकरे माय छीयई। हत्याराकऽ माय।" आब ओ आ़ईख चोराअ कऽ नञि, आंईख उठा कऽ गाम जाय बला बस मे बइस चुकल अइछ।गर्वसँभरल आ अकरल ओकर देह भऽ गेल छलइ। आइ ऊपरसँईहो देखियउ, ओकरा बस मे सीटो एकटा मंशा दऽ देलकइ। ओ मंशा आर कियो नञि मिसराजीकऽ बेटा छलइन।देबनाकऽ कोर्ट मे ओ सब नञि चिन्हलखिन लेकिन बस मे ओकर माय लेल सीट छोड़ि देलखिन। हुब्बा (लघुकथा) दुर्गा स्थान मे सब साल जेकां जतराकऽ परात बैसार भेल छलाय। पचपट्टिया मंदिर कमिटी बाला सब जमा छल। धीया-पुता सब सटले परती पर खेला रहल छलाय। कनीके काल पहिने टेंट बला समियाना, दरी, कनात आ आरो समान सब समेटने रहय। एक तोड़ बैलगाड़ी पर लदाकऽ थोड़े समान चइल गेल रहय। बाकी सब जमाकऽ क राखल गेल रहाय। समानक गिनतीभऽ गेल छल। अहु बेर दु टा जाजिम नञि भेठलइ।ई सब बेरक लीला छइ- किछु ने किछु हराईते छइ। मंदिर संकऽ चोरा कलऽ जेतइ। टेंट बाला सबकऽ अपन हिसाब बारी फाइनल करऽ काल मे दबाब बनबऽ कऽ तरीका छइ। ओ पुरना फटलाही जाजिम केकर काज के। ऊपरसँदस दिनसऽ ओइ पर ररधुम्मस भेल छइ। केहन हाल हेतइ‌ से सोइच लियह। अहु बेर टेंट बाला बजई छल जे अगिला बेरसँओ नञि आइत। ओकर सब सामान छिया लेदरभऽ जाइ छइ। ओ एक्को पाइ फायदा नञि कमबइ अइछ अइ पूजा सं। ओ त पुरनका बेबहार छइ जे ओ आइब जाइया। नबका कमिटी बाला सब त ओकरा हटबऽ चाहिते अइछ- सब बेर पुरान आ फाटल चीटल समान एतऽ लगबइ अइ। ओकर बातकऽ पतियेतइ। तखनो पुरना लोक सब ओकरे भार दइ छथिन। ओकरा सब बुझल सुझल।कहिया आ कखइन, कथीक जरुरत छइ- कहबाक काज नञि, ओ अपने नेने अबइत छइ। गामक समांगभऽ गेल अइछ ओ। सबके चिन्हइत अइछ। किनकासऽ कोना निबटल जाइ छइ-ओ पारंगत अइछ। कोन बच्चा कोन घरक अइछ- सेहो ओकरा बुझल। किनका बिगड़बाक काज, किनका आदर संग कहनाई आ किनका लाठी आ गाइड़ तरे भगेनाई-ओ जनञित अइछ। किछु बच्चा सब जमा कायल मसलंगकऽ पहाड़ बनाकऽ ओइ पर चढ़ई छलाह आ ओइ परसऽ कुईदकऽ उतड़इ छलाह। बेशी बच्चाकऽ बाप पित्ती सब बगले मे बैसार मे जमा छलाह, तैं टैंट बाला नञि किछु बजई छल। ओकरो हिसाब ओइ बैसार मे होइ छलइ। जे पाइ भेंट गेल से भेंट गेल, बकियौता त फेर परूक साल। तैं ओ अपन नम्बर आबऽ कऽ लेल साकांक्ष छल।टेंट बालाकऽ ई पचपट्टिया बाला सबकऽ डपोरशंखी गप्प पर हंसी अबइ छलइ। दस बरखसऽ बेशियेसऽ मंडिलक फिरीस्त बइन रहल छल‌‌‌। दमरी कियो निकालता नञि आ गप्प सुनु।ओकरो पाइ अखइन तक नञि बढ़ेलाह अइछ। सब बेर-अगिला बरख। आब त ओ कहितो नञि छइन। जेहने ढऊआ खरचता, तेहने ने सामान भेटतइन। बैसार मेसऽ आबाज एलइ जे रामा मायकऽ हिस्सा छोड़ि दियऊं।ओ बेचारी कतऽ सऽ देतीह। झटसऽ दोसर लोक ओकर समर्थन केला। बैसार मे पासभऽ गेल जे रामा मायकऽ हिस्साकऽ चंदा देबऽ कऽ नञि काज। "रामा " नाम सुनिते, ओतइ टेंट बाला जमा मसलंग पर कुदइत " दीना "कऽ कान ठारभऽ गेलइ। ओ सब छोड़ि क, बैसारक गप्प पीबऽ लागल। ओकरा ई फैसला ठीक नञि लगलइ। ओ किनकोसऽ कम कियैक। ओ दौडल घर गेल आ दाईकऽ कहलकइ ई हिस्सा बाला बात। दाई ओतेक बुझलखिन नञि। कहलखिन जे हम पता करय छी जे की बात छइ। - पता कि करबही। हमहु हिस्सा देबइ -मंडिल मे। ईएह गप्प छलइ। - ठीक छइ। दइयही। तु केकरासऽ कम। आबऽ दहुन पट्टी बाला सब के। हम कहबइन एना किअए केलाह। हमहु हिस्सा देबइ। ओना दुर्गा जीकऽ कहून‌ की अतेक पाइ दथुन जै तौं असकरे मंडिल बना लें। दीना ओतइसऽ मोनेमोन दुर्गा महारानीकऽ ई गप्प कहि‌ देलकइन। दाई ओकर कल जोइड़कऽ दुर्गाजीकऽ कहलखिन जे दीनोकऽ सूनियउ हे महरानी। रामाकऽ दाई कहि त देलखिन लेकिन कतऽ सऽ पाइयक बेबसथा हेतइ- से सोचऽ लगलीह। मोने मोन हंसियो लगलइन जे बाबा बला शान‌ पोता मे आयल छइ। हम किनकासऽ कम। रामाकऽ गाम त ओना बड़की टा छइ। सोलहो बरण ओइ गाम मे - एक्को दु घर भेटिये जाइत। दुर्गा पूजा पांच पट्टी मिलकऽ करय छइ। गाम मे इनका सबकऽ पचपट्टिया कहल जाइ छइन। पूजा ईएह सब शुरू केने छइथ, तैं पुरा बेबसथा इनके सबहक हाथ मे। गऊंआसऽ चंदा पूजा लेल नञि लेल जाइ छइ। पचपट्टिया मे हर सालक पार चलइ छइ- दुर्गा पूजाकऽ लेल। पूजाकऽ अलावा नाच गाना आ मनोरंजनकऽ बेबसथा गऊंआकऽ कमिटी छइ, से करय छइ।पहिने त नटुआ अबिते टा छलइ लेकिन आब त मुजफ्फरपुरकऽ कब्बाली पार्टी वा बेतियाकऽ बाईजी अबइ छइ। अइ गामक नाटक नामी छल।कयेक गामक लोग देखऽ अबइ छल। अबइ त अखनो अइछ - बाईजीकऽ नाच वा दुअर्थी कबाली सुनऽ कि देखइ लेल।आबकऽ खेलत नाटक आ कतऽ सऽ आइत नटुआ। सब किछु अतेक जल्दी बदइल जेतइ- कियो सोचने नञि छल। दुर्गा मंदिरकऽ भवन बड्ड पुरान छल। बरका बाईढ़ मे अकर थोड़े भाग खइस परलइ। ओकरे दोबारासँबनबऽ कऽ बारे मे सब साल जेकां अहु बेर सेहो बैसार मे चर्चा भेल छलइ। पचपट्टियाकऽ एकटा बिशेषता छइ- आपस मे खुब पट्टीदारी करत- सब एक दोसरकऽ लंगी मारऽ लेल तैयार बैसल, आपसी मोकदमाकऽ त पुछु नञि। लेकिन जों दोसरासऽ कोनो झमेल, त सब एकभऽ जाइत। गाम मे आब दोसर टोलकऽ कतेक पाइ बलाभऽ गेल छइ, जे पचपटियाकऽ जेबी मेलऽ क घुमतइन। ई सब ओकर पंसगो मे नञि छइथ, मूदा दुर्गा पूजा, गंवारी नञि होबऽ देलखिन। ओना हिंदू धर्म मे छइयो- आहां अप्पन गोसाउन घर वा पूजा घर वा मंदिर राईख सकइ छी, लेकिन मुसलमान जों मस्जिद बनेलक त ओ समाज कभऽ जाइ छइ। ककरो नमाज पढ़असऽ रोईक नञि सकइ छी। दुर्गा पूजा मे अपन चलती त पचपट्टिया देखइबते अइ- धर्मक पाछा छइजो जाइ छइ। आब देखू पचपट्टियाकऽ आपसी दांव-पेंच। दीनाक बाबा, बालचंद्र ठाकुर उर्फ बाला बाबु पुरना कांग्रेसी छलाह। आजादीकऽ लड़ाई मे सेहो भाग लेने छलाह। जेहल नञि गेलाह तैं रामा मायकऽ पेंशन नञि भेटलइन। कोशिश पैरवी खुब भेल- लेकिन नञिभऽ सकलइन। पटना मे एसेम्बलीकऽ टिकट फाइनलभऽ क नाम हिनकर दिल्ली गेल छलइन। तखुनका अध्यक्ष कहलखिन जे - "आहां अपन क्षेत्र मे जाऊ-परचार शुरु करु। टिकट बुझु की ने, आहांकऽ भेटिये गेल अइछ।" ओ क्षेत्र मे आइब गेलाह।मोटर कीनलाह।गामे गाम घुमनाई शुरू कयलाह। बाला बाबुकऽ कंग्रेसिया सब गच्चादऽ देलकइन। उनकर टिकट कइट गेलइन। दोसरकऽ भेंट गेलइ। बाला बाबु पाछु हटअ बाला लोक नञि।‌दिअयद बाद आर चढ़ा देलकइन। ओना पहिनेहेसऽ कहल जाइ छइ- किनकोसऽ बदला सुतारऽ कऽ हुवाय त, या बिधायकीकऽ इलेक्शन लड़ा दी वा पुरना मोटर गाड़ी खरीदा दी। प्रतिष्ठा आ वोट दुनु दु चीज होइ छइ। पोलिंग बूथ पर इनकर पैर छुअ बाला लोकक लाइन, वोटक लाइनसऽ पैघ छलइ। ओइ समय कांग्रेसकऽ एहन लहर छलइ जे कुकुरो बिलाई ओकर चिन्ह पर जीत जाइ। बालाबाबु आ कांग्रेसकऽ उम्मेदवार दुनु चुनाव हारि गेलाह। तेसरे जीत गेल। आब शुरू भेल बाला बाबुक दुर्दिन। पहिने मोटर बिकेलइन, फेर दोसर गामक जमीन,फेर गामक खरहोइड़, फेर नासी, फेर धनहर खेत, फेर पश्चिम भरक गाछी। कतेक कर्जा उठा लेने छलाह से अपनो‌ अंदाज नञि। घर- घरारी आ थोरेक बहुत सझिया गाछी , पोखइड़, खेत बचलइन। बाद मे बिक्षिप्तभऽ गेलाह आकऽ एल सहगलकऽ गाना गूनगुनबइत मइड़ गेलाह। अपना जीबते मे जेठका बेटा "रामा ठाकुर " केन्सरसऽ मइड़ गेलइन- आठ महीनाकऽ दीनाकऽ छोड़ि क। अइ गामकऽ बालाबाबुकऽ गामसऽ लोग जानय लागल छलइ। ई बात पचपट्टियाकऽ लोककऽ अखड़इ।बालाबाबु कांग्रेसी रहितो सामंती स्वभावक छलाह। पचपट्टियाकऽ कियो उनकर सामने ठाढ़ नञिभऽ सकइ छल।के नञि उनकर पटना बाला डेरा पर आयल छल। कियो आबय- भोजन भेटिते टा छलइ। हं ई सही छलइ जे पुछा-पुछी नञि छलइ। अपने जाऊ आ भनसियासऽ खेनाईलऽ लियह। तखइन त अतेक लोक अबइ।लोको मीन मेख नञि निकालइ। कोनो बाला बाबु किनको बजेने त नञि छेलखिन।अपन काजसऽ ककरो कतऽ जायब, त ओइ समय मे अइसऽ बेशी उमेदो लोक नञि करय छल। ऊयाह बदला आब ओ सब उनकर परिवारकऽ दीन-हीनकऽ रूप मे बाईज कऽ केलक। ई कमाल देखू- रामा मायकऽ त हिस्सा देबऽ सऽ बचा देलकइन । सहानुभूतिकऽ पात्र बनेलकइन, लेकिन अपनो कियो नञि देलक।देबऽ कऽ हूब्बा होइ छइ। ओ कतऽ सऽ होइतइन। सब बेर अहिना बैसार होइ। फिरीस्त बनञि-सीमेट, ईंटा, छड़ी, बालु, मजुरीकऽ हिसाब होइ आ साल बीत जाइ।बजट सुरसाकऽ मूंह जकां बढ़इत जाइ छलइ। दीना ठाकुर ओतेक पढ़ल लिखल त नञि। दिल्ली मे एमहर ओमहर बऊवेलाकऽ बाद आब कयेक होटल सब ठेका मे लेने अइ आ चलबइत अइछ। चिक्कन पाइ कमा रहल अइछ। नब भवन दुर्गा मंदिरकऽ बनबौलक अइछ गाम मे। बाला बाबुकऽ पुरखाकऽ बनाबल मंदिरकऽ पचपट्टिया ठीक तक नञि करा सकल। आइ संगमरमर पर लिखल पट्टी,दीनाकऽ दाईकऽ नामस, सेहो मंदिरक आगां मे लाइग गेल। गऊंआ कहि रहल छइ - जे हुब्बा बालाबाबु मे छलइन उएह हुब्बा दीना देखेलक। दीनाकऽ अफसोस होइ छइ - जे दाई रहितै त ओकरा कतेक खुशी होइतइ।ओ त अपन बाबाकऽ नञि देखने छल। लोक मजा लइ लेल ओकर बाबाकऽ खिस्सा कहइत रहइ छल। ई हुब्बा कखनोकऽ जानलेवा सेहोभऽ जाइ छइ। तैं बइचकऽ अइ हुब्बा सं। सोइच समइझकऽ काज करु। बाला बाबुकऽ त ईएह हुब्बा सब किछु "बिला" देलकइन आ दीनाकऽ हुब्बा समाज मे प्रतिष्ठा दियेलकइ। इच्छा (लघुकथा) सुतले रहइथ रमन, कि "बिपता"कऽ शोर पाड़इत सुनला- उठु ने, "घुरन बाबु" अपने आयल छथि- आहांसऽ भेट करबाक लेल। राईते रमन अयलाह आ भोरे घुरन बाबु आइब गेलाह। कतेक मजगुत उनकर खुफिया तंत्र गाम मे छइन- से बुझु। बिना कतउ गेने- सब खबर रही छइन। किछु खास लोक उनकर सब टोल मे छइन। पुरा घर मे दलमल मचल अइछ। लोक सब पर्दा हटाकऽ बहरी दलान दिश ताईक रहल अइछ। पाइन ओ पीब चुकला आ चाह उनकर सामने राखल छइन। कतबो ओ कहलखिन जे हम चाह अखने पीकऽ आइब रहल छी, तैयो चाह उनका लेल बइने गेलइन। जगक आंगन रहइ। कयेक लोक घुरन बाबुकऽ देखने नञि छइन-नाम त सब सुनने छइन। स्त्रीगण महाल मे त बेशीये फुस्सा फुस्सी।कियो कोनठा लग ठार त कियो खिड़की सं। पुरूख पाहुन सब सेहो नमस्कार नमस्कार करइत घुरन बाबु लग पहुंच गेल छलाह। अहु बयस मे अतेक भव्य लगइ छलाह। दुरेसऽ लगइ जे कियो बइसल छइथ। दरबज्जा भरल बुझाई। सब धनिकाहाकऽ अहिना चेहरा मोहराभऽ जाइ छलइ। चेहरा देखियेकऽ लाइग जईता, कि कते समपइत हिनका हेतइन। एकटा हैदराबादकऽ निजामे एहन छलाय, जेकरा देखला पर बुझईता जे कतेक दरिद्र अइ। घुरनबाबु बड्ड कम बजई छथि- सुनञि आ मुस्कियाई बेशी छइथ। ई मुस्की बड्ड मारूक छइ, थाहे नञि लागय दइ छलखिन जे खुश भेलाह आ किछु आर। कम बजनाई, सेहो धनिकाहाक गुण छइ। आब ई गुण ससइड़कऽ आइब गेल छइ- अफसर सब मे। जतेक बड़का अफसर, ओ ओते कम बजताह। आहां बजबासऽ अंदाज लगा सकइ छी, जे कोन पद पर छइथ। एना चुप रहइ जेता, जेना बजलासँदु कठ्ठा जमीन ककरो दिअय जेतइ। घुरन बाबु चुप्पे मुंहे सबसं परिचय पातकऽ रहल छलाह। बिपता, बच्चेसँउनके घर धेने छल। आब उमहर गड़बड़ेलइ त इमहर धेने अइछ। आब त सीधा सादा फर्मुला छइ- बाबू बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया। जे बेशी पाइ देतइ, ओकरे काज करतइ। बिपताकऽ पुरना मालिक छलखिन त ओहो- लल्लो चप्पो मे लागल छल। तैं रमनकऽ उठबऽ आयल। घुरन बाबुकऽ " हरि अनन्त हरि कथा अनंता" बाला खिस्सा सब छलइन। आजुक समय मे सरकार दु टा बियाह करऽ मे , ने रोक लगेने छइ- राखऽ मे त नञि। ओ अही सिद्धांतकऽ छलाह। शहर मे एकटाकऽ रखलखिन आ ओकर पुरा भार ताउम्र उठेलखिन। गाम मे सेहो एकटा नर्सकऽ पहिने रहइ लेल कोठली देलखिन आ बाद मे घरे मे आइन लेलकिन। लोकक लेल ओ नर्स, मोन खराब मे सेवा करऽ लेल आयल छलइन, बाद मे त सबदिना उनके कतऽ रहअ लगलइन। ओहो नर्सनिया जब्बर छल- पुरूख कियो किछु कहथिन‌ से त हिम्मते नञि, स्त्रीगण मेसँकियो किछु कहइ, त उनका तेहन ने ज़बाब दइन जे मुंहे बंदभऽ जाइन। ई नर्स त हाल तक छलइन।सबसं कमाल ई छलइ जे कहियो कियो शिकाइत नञि केलकइन। पीठ पाछु लोक मस्ती मे कहइ- घुरन बाबुकऽ बड्ड सूनर " डेबऽ " अबइ छइन। ईएह 'कला "कऽ कारण सबहक जिज्ञासाकऽ केंद्र बनल छलाह। उठअ पड़लइन रमन के। घुरन बाबु त कतउ जाय बला लोक नञि।ओ त अपन कोनो बहिनक सासुरो तक नञि गेल छइथ। अपन सासुर, बिबाहक बाद कतऽ सऽ जयताह।अही तरहक कयेक टा गुणक भंडार छलाह, तैं ने चुट्टी जेकां सऊंसे लोक उनकर लग ससइड़कऽ आइब गेल-बिन बजौने। ईएह त छइ "आकर्षण"। रमन जा कऽ गोर लगलखिन। हाल चाल पुछलाकऽ बाद घुरन बाबु कहलखिन- आहां हमर घर अबितऊं- त बड्ड खुशी होइताय। - कियैक नञि। हम कनीके काल मे अबइ छी। बस घुरन बाबु उठलाह। सबके नमस्कार केलाह आ चलइत बनलाह। रमन बुझई छलाह जे ओ कियैक अयलाह अछि। आइ तक त कहियो घर पर बजेला नञि। उनकर घरो जादुगरक तिलिस्म छइ। कतेक तरहक खिस्सा। कियो कहइ जे सब देबालक बीच मे घर गरम करबाक बेबसथा छइ। जारइन ओइ मे दइत रहु आर माघो मास उघारे देह सूतु। ततेक गर्म, घरभऽ जाइ छइ। कियो कहइ जे उनकर घर मे जे बंदुक छइन ओकर मुठ "सोना"कऽ छइ। उनकर दिअयद त कहियो उनकर कतऽ जाइये नञि सकइ छथि-रमन त सद्य दोसर टोलक। गामक लोक अंदाज लगा लेलक जे की बात छइ। कियो कियो तुरूपा फेंकइ छलाह - जे अही लेल- त कियो दोसर लेल। अंदाज लगेनाई शुरूभऽ गेल छलइ। उटक्कर पचे डेढ़ सै। घुरन बाबु आ रमनक समीकरण सबहक बुझबासँदुर छलइ लेकिन मानतइ के। घुरन बाबुकऽ बेटी किरण आ जमाय सुधीर बिदेश मे रहइ छलखिन।किरण ओतऽ दुखताईभऽ गेल छलखिन। आब उनका देश मे रहबाक शौक जागल छलइन। भेलइन जे पाइन बदलत तभऽ सकइत अइछ जे मोन ठीकभऽ जाय। ओतऽ सँदिल्ली आयल छलाह आ अतइ घर कीनबाक उधेरबुन मे छलाह। कतउ कतउ घर देखतो छलाह। अतुका समाजसऽ सबदीना कटले रहलाह। दुखित त किरण पहिनहेसऽ छलखिन‌, ऊपरसऽ दिल्ली मे अइ गर्मी मे मुहल्ले मुहल्ले छिछियेनाई। प्रोपर्टी एजेंट सब घुमबइत रहलइन। किरणकऽ लू लाइग गेलइन। अस्पताल मे भर्ती भेलीह , लेकिन बइच नञि सकलीह। सुधीरकऽ दिल्ली मे कियो नञि अपन। घुरन बाबुकऽ खबर भेल। ओ कयेक लोककऽ सुचना देलखीन- मदद लेल कोना कहथिन।कियो नञि टघरलइन। गऊंआ हिसाबे रमनो‌कऽ कहलखिन। रमन अस्पताल गेलाह। ओतऽ सुधीरसऽ भेंट भेलइन। सुधीरक दुनू बेटा सेहो बिदेशसऽ आइब चुकल छलइन। दुखितेकऽ खबर ओकरा सबकऽ छलइ।‌ओही पर ओ सब आयल। अस्पताले मे बापसऽ लड़अ लागल जे अहीं मारलऊं हमर माय के। कोन काज छल हुनका भारत अनबाक लेल। आहांकऽ अपन मोन भेल त आहां जाऊ। आहांकऽ छी अपन बिचार थोपअ बाला।व्यक्तिगत आजादीकऽ आहां सीमा लंघलऊं। अपराधी छी आहां ...... अहिना कतेक उपराग।........ हम सब पुलिसकऽ रिपोर्ट करबइ।.............. अहां योजना बनाकऽ मायकऽ मारलऊं।आरो आरो बात सब। सुधीर माथ पर हाथ देने गुम्म बैसल। अस्पताल मे आरो मरीजक तीमारदार सब ई तमाशा देखइ छलाय।रमन त किनको चिन्हइतो नञि छलाह। भीड़ देखकऽ उम्हर गेलाह त सब बुझा गेलइन। रमण सीधा सुधीर लग गेलाह आ घुरन बाबुकऽ समादकऽ बारे मे बतेलखिन। सुधीर बजलाह- -ईएह लीला छल हमर घर के। तैं पराअकऽ अतऽ अयलऊं। भाग्य हमर साथ नञि देलक। किरण संग छोड़ि देलीह। हमरा त दाह संस्कारकऽ कोनो ज्ञान नञि। आहां कहूना करबाअ दिय-कहि क-कलजोइड़कऽ ठारभऽ गेलखिन। -हमर कोनो भी निर्णय पर कहियो सबाल नञि उठेली आ ऊपरसँसंग सेहो देलीह। देश घुरऽ कऽ हमरे इच्छा छल, जैकरा ओ अपन कहलीह।हम ठीके दोषी छी। जे सजा दइ जैब से दीयह, मुदा पहिने उनकर दाह संस्कार अपना सबहक बिधिसऽ करबाऊ- दहोबहो कनञित सुधीर बाईज रहल छलाह। रमन दिल्ली मे त तीस बरखसऽ रही रहल छलाह। बहुत रास संस्था सबसँसेहो जुड़ल छलाह। लोक सबकऽ खबर केलखिन। दस लोक करीब भऽ गेलाह। सुधीरक बेटो सब, मोनक बिकार निकललाकऽ बाद शांत भेल। सब कियो निगमबोध घाट जाइ गेलाह। ओतइ चिता पर लकड़ीकऽ बीच मे किरणक देहकऽ जखइन राखल गेल छलइन तखने सुधीर बजलाह- - आब हमराकऽ सहारा अइ। हमर अंतिम इच्छा अइ जे किरणक एकटा फोटो लइतियइन। ऊयाह हमर जीवनक संबल‌ छलीह। हमरासऽ बयस मे छोट छलीह आ पहिने छोड़ि देलीह। धरफरी मे छलीह। हमर अंतिम इच्छा आहां कहूना पुराकऽ दी। ताहि जमाना मे कैमरा मैनकऽ बजेनाई आसान नञि छलइ। तखनो रमन, चांदनी चौकसँस्टुडीयो बालाकऽ बजबेलाह। ओ किरणक मृत्यु शैय्या परक फोटो खींचलक।फेर मुखाग्नि बेटा देलखीन। सुधीर स्टुडियो बालाकऽ पाइ देबऽ चाहलखिन लेकिन ओ नञि लेलकइन। सुधीर बाकी संस्कार हरिद्वार मे कयलाह। सब बेबसथा घुरनबाबु करवा देने रहथिन। हरिद्वारसऽ सुधीर सासुर गेल छलाह। ओतऽ अद्योपांत सब बात घुरन बाबुकऽ कहलखिन। अंतिम इच्छा सेहो पुरा भेलइन। अकरे धन्यबाद दइ लेल घुरन बाबु गेल छलाह। पहिले पहिल रमन‌ सेहो उनकर गर्म घर मे बइसलाह। ईएह त "डेबऽ " बाला कला छलइ , जईमे घुरन बाबु माहिर छलाह- रमन सेहो आइ बुझिये गेलाह। मिशन एडमिशन (लघुकथा) रमन मैट्रिककऽ इम्तिहान पासकऽ चुकला अइछ। नम्बर ठीक ठाक छइन। जेहने विद्यार्थी रहता, तेहने ने नमरों एतइन। आब शुरू भेल आगुक योजना। रमनक पिता बुधन बाबुकऽ सेहो अपन पढ़बाक इतिहास छलइन। सात बेर मे ओ तहिया मैट्रिक पास कयने छलाह। उनकर पढ़ाइकऽ पाछु पुरा हरदिअय मौजे बिका गेल‌‌‌ छलइन। सतमे मे जखइन छलाह तखनेसऽ उनका तासक नशा छलइन। जाबइत कोर्ट पीस मे "कोर्ट" आ ट्वेंटी एट मे "लालक सेट " नञि होइ, ओ सुतइ नञि छलाह। उनका मोन लगेबा लेल गामक चाइर गोटेकऽ सेहो उनकर कलकत्ता बाला घर मे रहबाक बेबसथा केल गेल छलइन। चाइर मे तीन गोटे त तासक गोधियें भेलाह आ बचला एक गोटे- से राजा दैव ज्यों अइ मेसऽ कियो नञि उपलब्ध छथि, तखन लेल। खेल त नञि रूकबाक चाही ने। ओहो गोधिया दुआरे। जे हाथ मे छलइन -से उनकर बाबुजी केलखिन। ई चारू गोटे पईढ़ लिख कऽ आगु बइढ़ गेलाह आ बुधन बाबु वापस गाम घुइड़ गेलाह। एको किलास आगु पास नञिकऽ पौलाह। नौवां पास कहियउन वा दसमा फेल - ईएह भेलइन उनकर शहरक कमाइ।ओ त कहिते छलखिन जे पढ़ाइ छोअइड़कऽ कोनो काज करा लियह। उनकर बाबुजी नञि सुनलखिन किछु। आब भुगतस। आब रमनक बेर आयल छलइन। हरदिअय सनक धनहर मौजे बुधन बाबुकऽ पढ़बा मे बिकेलइन त रमनो मे किछु बनिते छइ। आब त मौजे नञि रहलइ-सब सरकारलऽ लेलकइ।जैह छइ, ऊयाह बिकेतइ। बेबसथा त अहिने होइ छइ ने- "ओ पढ़ाइ की, जई मे जमीन नञि बिकाय।" कालेजक पढ़ाइकऽ खर्च कोनो हंसी ठठ्ठा छइ। बुधन बाबुकऽ गाम आब डिस्ट्रिक्ट बोर्ड मे आइब गेल छलइन। अखनो बड़की टा खरहोइरे छलइन। अकर बगल तक बस्ती आइब गेल छलइ। किछु लोक दिन राइत बुधन बाबुकऽ आगु पाछुकऽ रहल छल। ललका झंडाकऽ उत्पात सेहो शुरूभऽ गेल छलइ। उएह सब बुधन बाबुकऽ मोन मे डर बइसाबऽ लगलइन जे बजार मे सुनलऊं कि ने अहांक खरुहोर पर ललका झंडा लगाकऽ कब्जा करऽ बाला अइछ। बुधन बाबु चट दं ज़बाब देथिन -ई त हमर खतिहानी जमीन अइछ। कोना कब्जाकऽ लेत। -अरे आहां सुनलियई नञि जे बरगांव बालाकऽ कयेक बीघा पर झंडा लगा देलकइन। किछु नञिकऽ सकलाह। कयेक बेर हंसेरी सबकऽ जमा कयल गेल। लेकिन ओ टिड्डी दलकऽ की करतइ। ततेक ने लोक आइबकऽ बइस गेल जे नहिये उजाइर पेलाह। दोसर गोटे बजलाह- खुब थाना पुलिस भेल। पाइयो खुयेलखिन, लेकिन कब्जा नञिभऽ सकलइन। - आब केस चलइ छइन।कतेक बरख चलतइन, सेकऽ जनञित अइछ। सिविलक मोकदमे एहने होइ छइ। पीढ़ी बदइल जाइ छइ मूदा फैसला नञिभऽ पबइ छइ। -तेसर गोटे उपरसऽ टीपई छइथ - बेहरी बालाकऽ त ओतऽ कचहरी रहइन-ओहो हाथसऽ चइल गेलइन। अहिना सदिखन ओ शहर बाला सब बुधन बाबुकऽ डरबइत रहइ छइन। ओहो सोचऽ पर मजबुर छलाह जे बड़का बड़का कलामी घरबाला सबकऽ ई हाल, त उनकर की हेतइन। कोन भरोस, कहियो ललका झंडा उनके खेत पर नञि गाइड़ दइन। इमहर गऊंओ सब उनका बड्ड अंईठल बुझाई लागल छलइन। अपने मे सब मगन। बुधन बाबुकऽ कोनो मोजरे नञि। उमहर देखू शहरबाला सब के, कतेक आगु पाछु करइत अइछ। ललका झंडाकऽ बारे मे उएह सब बतेलक। अपन गऊंआ त किछु कहिते नञि अइछ। ओ किछु ने-डाह होइत हेतइ अकरा सब के। भीतरिया दिअयदी त चइलते छइ ने बुधन बाबुकऽ धीरे-धीरे पुरा गाम - समाज आन, आर शहर बाला सब अप्पन बुझाई लगलइन। एक दिन ओ सब कहबो केलकइन- अइ गाम मे आहांसऽ बड़का के? गामक नाम आहां पर होबाक चाही। -आहां खरहोइड़ वाला जमीन हमरा सबकऽ लिख दियह। हम सब आहांक नामसँकालोनी बनायब। ई गप्पक असइड़ आब बुधन बाबु पर पइड़ रहल छलइन। नामक नशा त सबसं बड़का नशा थीक। इमहर रमन सेहो मैट्रिक पास केलखिन। अपना बेर मे हरदिअय मौजे त बेटाक बेर मे खरूहौरे बेचनाई त बनिते छइ। बुधन बाबु चुपेचाप खरूहौरे, अपन नामक कालोनीक लोभे बेच देलाह। जखइन बिना मेहनतकऽ हाथ पर मोट पाइ अबइ छइ त ओ नञि रुकइ छइ। अपना संगे कतेक रास आदत आ शानकऽ सेहो अनञि छइ। जमीन कीनऽ बाला लोकक लाइन लाइग गेलइ। शुरू मे त सब बसऽ लेल हाथ जोईड़ कऽ अबइ छइ। रजिस्ट्री होइते गिरगिटोसऽ बेशी जल्दी रंग बदइल लइत अइछ। सस्ते मे कतेक लोक जमीन लिखा लेलकइन। आब सबाल उठलइ बुधन बाबुकऽ नाम पर कालोनी बनबऽ कऽ त ओकरा सबकऽ " बुधन" नाम ठीक नञि लगलइ। ओ बूधन बाबुकऽ बाबा "धनीलाल बाबु"कऽ नामसँ"लाल" लेलक आ कालोनीकऽ नाम "लाल बाग" रखलक। ई किछु नञि- फुसियाही गप्प बुधन बाबुकऽ नामक बारे मे कहि देलकइन। आब कयले की जा सकइत अइछ।कतउ "नामक" लिखा-पढ़ी त भेले नञि छलइ। "अपन हारल बहुक मारल कतउ कियो बजलक" - मोन मसोईसेकऽ रही गेलाह बुधन बाबु। आब शुरू भेल रमनक कालेजक पढ़ाइकऽ अध्याय। रमनकऽ गाम मे सब कहऽ लगलइन -" आहांक बाप त सब बेच देताह। घरो घरारी नञि बांचत"।ई बात उनका सुनबा मे अधलाह लगइन। अइ घरक जे परम्परा छलइ ओइ मे नञि बुधन बाबु अपन पिताकऽ किछु कहलखिन आ नञि रमने किछू बुधन बाबु के।अतबा मोन मे रमन निश्चयकऽ लेलाह जे अतऽ गाम मे ओ नञि रहताह आ नञि पढ़ताह। कयेक संबंधी सब गाहे-बगाहे अतऽ अबइ छलाह आ बुधन बाबुकऽ उदारतासऽ उपकृत होइत रहलाह। आब रमनक बेर छलइन। पैघ शहर मे एकटा संबंधी रहइ छलखिन। ओतुका कालेज सेहो नामी छल। रमन गामसँओतऽ पहुंचला। पहिल बेर असगर बहरायल रहइत। माय हुनकर कयेक टा सनेशक मोटरी संगकऽ देने रहथिन।ओ घरबइया, रमनकऽ देखिते बड्ड खुश भेलाह। ऊपरसऽ अतेक तरहक सनेश। पुरा मान-दान भेलइन रमन के। रमनोकऽ बुझेलइन जे अतेक दिन ओ किअएह नञि आयल छलाह। आब हुनका अपन परिवार पर गर्व बुझाय लगलइन। अपन आगुकऽ कालेजक पढ़ाइकऽ बारे मे सविस्तार गप्प सप भेलइन। अगले दिन ओ संबंधी कालेजसँएडमिशनकऽ फार्मलऽ क अयलाह। अगिला रविकऽ फुरसत मे फार्म भरबाकऽ बारे मे सोचल गेल। एक हफ्ता बीत गेल छल। रविकऽ फार्म भरबा काल छात्रावासक कालम अयलइ। ओ संबंधी आ रमन एक दोसरा दिश ताकऽ लगलाह। रमन त एडमिशन लेल आयल छलाह। रहबाक विषय मे त सोचने नञि छलाह। तखनो बजलाह - होस्टल त छइ ने कालेज मे। ओतइ रहब। संबंधी बजलाह-नञि नञि। अतइ रहब। तखनो फार्म मे होस्टल भरेलइ। सुतली राइत किछु कनफुसकीकऽ आवाजसँरमनक नींद टुटलइन- - आहां किअए कहलियई जे अतइ रहब। - ई केना ने कहितियई। -अपनो धिया-पुता अइछ। सेह बुझल अइ ने। धीरे धीरे खर्चा बढ़त। - अइ शहर मे रही कऽ होस्टल मे रमन रहताह त कतउ मुंह देखाबो जोगड़ रहब। -सबदिना अतऽ राखब से ओकाइत अइ आहां के। हमर भाइकऽ कते मोन छलइ अतऽ पढ़बाक के। ओइ बेर मे त नाक पर माछी नञि बइसऽ देलियई। अइ बेर देखू ने। - आहां बुझअकऽ कोशिश करु। -ओहो। हम बुझिते नञि।सब त अहीं बुझई छियई। -हम त कोदो खाकऽ पढ़ने छी ने। -कोनो जरूरत नञि छइ। मेजनी करऽ के। -आठ दिनसँबेशीभऽ गेलइन।कहिया जेताह। -हम केना पुछबइ। -कोनो काज नञि छइ अतऽ एडमिशन के। -------------- अहिना बड़ी काल फुसफसी चलइत रहल। किछु रमनकऽ सुनेलइन आ किछु निष्कर्ष निकाललाह। अगिला दिन रमनक फार्म कालेज मे जमाभऽ गेलइन। एक हफ्ता बाद एडमिशनकऽ लिस्ट निकललइ। रमनक नाम ओइ मे नञि छलइन। ओ संबंधी बड्ड अफसोस जाहिरकऽ रहल छलाह। आब रमनक सोझां गाम घुरबाक दोसर कोनो रस्ता नञि छलइन। तहिया त शहरक पहिले दुनिया देखने छलाह। आब होइ छइन जे कहीं उनकर एडमिशनकऽ फार्म जमे त नञि भेलइन। जमा नञि भेलइन त लिस्ट मे नाम कतऽ सँअऊतइन।उनका कालेज नञि जायल देल गेलइन- ई की स्नेह छल वा साजिश। ई पहेली उनका भइड़ जीवन खिहाड़इत रहलइन। ज़बाब नञिये भेटलइन। गाम मे सब उम्मेद लगौने जे ओइ शहर मे त कयेक टा नीक कालेज छइ। कोनो ने कोनो मे एडमिशन भईये जेतइन।ऊपरसँजे "फलां" ओतऽ छथिये- कोन बातक चिंता बेगरता।" फलां"कऽ अनुभवलऽ क रमन गाम मे छथि। लालबागकऽ बोर्ड लाइग गेल‌‌‌ छइ। रमनकऽ ओ बोर्ड कटहा कुकुर जेकां लगइन। उमहर गेनाई ओ छोड़ि देने छलाह।रमनकऽ घुरल देखकऽ , घर मे सब दुखी छल। मातम जेकां परिस्थितिभऽ गेल छलइ घर मे। उम्मेद टुइट गेलइ जेना। अगिला दिन भोरे भोर दोसर टोलकऽ बीरू ठाकुर रमनक घर पर आयल छलाह। अयबाक मकसद त जमीनक थाह लेल छलइन।देखार नञि भेलाह। बुधन बाबु लग बइसलाह। कालेजक पढ़ाइकऽ नाम पर जमीनो बिका गेलइन आ रमनक एडमिशने नञि भेलइन। बीरू ठाकुर दोसर शहर मे रहइ छल। अपनाकऽ छात्र-नेता कहइत छल। जेना "बाल कवि"कऽ अपनो बालकभऽ जाइ छइन- तइयो उपमा " बाल कवि"कऽ नञि छोड़ताह। "युवा नेता "कऽ धीया पुता, चेतनभऽ जाइ छइन, तखनो युवा नेता कहबइते रहइ छथि। ओहिना ई "छात्र नेता " छथि। नञि जाइन कहिया तक ई छात्र नेता रहताह। दस बरखसऽ उपरभऽ गेलइन मैट्रिक केलाह।गाम मे त सब कहइ छइन जे मिसिर जीकऽ ई सब लठैत छइथ। जे भी होइथ। बीरू ठाकुर बजलाह- चाइर टा कालेजकऽ प्रिंसिपल त हमर संगी अइछ आ कतेक रास प्रोफेसर सब त हमर जेबी मे अइछ। आहां रमनकऽ हमरा लग पठा दियऊं। ई त दु मिनटकऽ काज छइ। अहु लेल आहां चिंता मे छी। कहुं त। तखन हमरा सन भातिजकऽ रहने कोन काज। -आब एडमिशनकऽ तारीख खत्मभऽ गेल छइ। अप्लाईयो नञि भेल छइन। - आहां छोरु ने। ई सब, हमर कंगुरिया आंगुरकऽ बरोबइड़ काज छइ। आब आहां बुइझ लियह जे एडमिशनभऽ गेलइन। बस कनी हमरो सब पर ध्यान देने रहबइ। हमरा घरारी मे बड्ड कशमकश अइछ। ज्यों अपन छाया मे बसा लइतऊं त बड़का उपकार होइताह। आब आहां सब जेकां सोचऽ बाला लोक कहां। आहां अंतिम कड़ी छी। रमन सब लल्लो चप्पो बाला गप्प सुनञि छलाह। सबहक जईड़ मे उएह जमीन। आब उनका बचबे कतेक केलइन। एकटाकऽ हश्र अहिना देखने छलाह।गामेकऽ छलाह। पटना मे पढ़ई छलाह। पटना मे एडमिशन खातिर रमनसँपाइलऽ लेने छलइन। ओकर बादसऽ निपत्ता छल। बाद मे पता चललइन जे ओकर हर सालकऽ ईएह धंधे छइ। दु चाइरटाकऽ मुर्गा हर साल बनबइया। आब रमनकऽ सब ठगहा बुझाई लगलइन।गामक लग बाला कालेजक प्रोफेसर, जे गऊंआ सेहो छलखिन, उनको लग गेल छलाह। - हमर कालेज ई छइ। ओ छइ। सिस्टम छइ। विश्वविद्यालय मे छठम स्थान छइ। आहां अइ बेर छोड़ि दियउ। अगिला बरख आऊ। हम एडमिशन करा देब। अखइन हमरा मीटिंग मे जयबाक अइछ। चलइ छी। आर किछु नञि। असल मे टरकेलकिन। ओहो चपचपायल छलाह एक समय मे जमीन लेबाक लेल। नञि देल गेलइन- तकरे बिष छइन। एक साल बेकार बइसल रहस रमन, कतेक आसानीसऽ ओ कहि देलखिन। रमनक आंईख नोरा गेलइन। सबहक एडमिशनभऽ गेल छलइ आ ओ दुआरे दुआर बउआ रहल छलाह। आब अफसोस होइन जे कियैक शहरक चक्कर मे परलाह। उनका त बहुत नम्मर आयल छइन। अइ कालेज सब मे सोंझे एडमिशनभऽ जंइतइन। ईएह होइ छइ- बिनाश काले, बिपरीत बुद्धि। होनी हाथ धराकऽ करा दइ छइ। आब अपन बाहर पढ़बाक फैसला पर खीस बरइन। घरो मे कियो सलाह नञि देलकइन या नञि मंगलखिन। जे भी हो। कठिन समय बीत रहल छलइन। जीवनक पाठ पईढ़ रहल छलाह। अही समय मे बीरु ठाकुरकऽ गप्प मे किछु उमेद बुझेलइन। अगिला सोमकऽ भोरका चरबजिया ट्रेन पकइड़कऽ रमन शहर गेलाह। स्टेशनसऽ ओना बीरू ठाकुरकऽ डेरा दुर छलइन, मूदा रमन भोर मे टहलइत बिदा भेलाह। रिक्शा बाला बच्चा बुइझकऽ भारा बेशी बतेलकइन, तैं नञि लेलाह।आब आर ठगाय नञि चाहइ छलाह। सात बजेकऽ करीब ओकर लौज पर पहुंचलाह। ओ सुतले छल। इनका देखते जोश मे आयल। ओकरा गाम मे रमनक पट्टीसँकियो मोजर नञि दइ छलइ।आइ काजलऽ क कियो आयल छइ।अपन लंबा लंबा गप्प देनाई शुरू केलक। रमन त काजसँआयल छलाह। चुप चाप सुनञि छलाह। थोरेक काल बाद कहलकइन - कागज सब अनने छी ने। -हं -हं।देख लियह। - देखबाक कोन काज। रखने रहु। -आहां बइसु अतइ। हम कनी काल मे अबइ छी। रमन ओतइ बइसल छलाह। दु घंटाकऽ बाद ओ बुलेट मोटरसाइकिल पर एकगोटेक संग बइसल, हरहराकऽ पहुंचल। फेर तीनु गोटा लौजक सामने बाला भरभुजाक दोकान मे गेलाह आ चुड़ा-दही जलखइ कयलाह। फेर तीनु गोटे बुलेटसँबिदा भेलाह। ओ बुलेटकऽ पहिल वा दोसर गेयर मे चलबइ छल, जईसँआबाज फटफटकऽ बेशी होइ। बीरू ठाकुर बुलेट पर सीना तनने चलबइ छल। रमनकऽ बुझाई जे कोनो रणक मैदान मे जा रहल छलाह। पांचे मिनट मे एकटा कालेज मे पहुंचलाह। अइसऽ दसगुणा दुरी त रमन स्टेशनसँपैदल चइलकऽ आयल छलाह। बीरू हाथ मे बुलेटक चाभीकऽ छल्ला घुमबइत कालेजक कार्यालय मे गेलाह। किरानी बाबु ओकर जान पहचानकऽ छलखिन। कालेज मे एडमिशनकऽ सीट खालिये छलइ। बीरूसऽ उनका पहिने किछु गप्प भरिसंभव भेल छलइन। कागज सबलऽ लेलकिन। एडमिशन फीस बतेलखिन। रमन त पाइ लइयेकऽ आयल छलाह। तुरंते देलखिन।भऽ गेलइन एडमिशन। किरानी बाबु कहलखिन जे काइलसँकालेज आइब जाऊ। कोनो दिक्कत हुआय त हम छीहे। रमनक खुशीकऽ ठेकाने नञि। घर मे नञि पढ़ल लिखल रहलाहकऽ कारण कहू या बाहर नञि निकललाकऽ कारण- "फोंसरी बुझु की भोकन्नरभऽ गेल।" एना एडमिशन हेतइ से ओ सोचनेहो नञि छलाह। किरानी बाबुसँबीरूकऽ परनाम पाती भेलइन। फेर सब बुलेटसँबिदा भेलाह। प्रिंसिपल ओना कालेज मे छलखिन। उनका लग बीरू नञि गेलाह। की जाने, जान पहचान छइन कि नञि। आब अइ सब पर प्रश्न चिन्ह लगेबाक स्थति मे रमन नञि छलाह। उनका त बुझाइन जे जीबते बैतरणी पारकऽ गेलाह। एडमिशनभऽ गेल छलइन।आब होइन जे गाम बाला प्रोफेसरकऽ जाकऽ कहियइ जे देखू हमर एडमिशनभऽ गेल। आब अगिला बरख हमरा आहांक खुशामद नञि अइछ। अपन परफेसरी अपने लग राखु। ओकर बातसऽ बड्ड दुखी तहिया रमन भेल छलाह। मोन होइ छलइन जे ओकर मुंह नोइच ली। गाम लग रहितइन त बीरूकऽ कहितथिन जे ओइ परफेसरकऽ दलान बाटे बुलेटसँ चलु -फटफट करइत। आब रमन, बीरुकऽ ह्रदयसँबीरू भाइ कहऽ लगलाह। बीरू बुझई छल जे ओकरा अपन धाही देखेबाक ईएह मौका छइ। ओ रमनकऽ भइड़ दिन कतउ कतउ घुमबइत रहलइन। ओ जे तेसर लोक बुलेट पर बइसल छल, ओकरोसँरमनकऽ दोस्तीभऽ गेल छलइन। भरिसक बुलेट ओकरे छलइ। दिन मे होटल मे तीनु गोटे खेनाई खाई गेलाह। अखइन तक कतउ बीरूकऽ पाइ दइत नञि देखलखिन। ई सबसँरमनक सीना सेहो चौड़ा भेल जा रहल छइन। सांझ होइत होइत रमनक चाइल मे अकड़ आइब गेल छलइन। ओहो अपनाकऽ बीरू बुझअ लागल छलाह। बुलेटसँस्टाइल मे उतड़इ आ चढ़ई छलाह। कखनो डांर आ गर्दनकऽ ढ़ील नञि छोड़इ छलाह।कनी मनी दादा टाइप अपनाकऽ बुझबा मे आइब रहल छलइन।पहिल अनुभव छलइन। आइये एडमिशन भेलइन आ आइये सऊंसे शहर घुईम लेलाह। संझुका सतबजियासँगाम घुरबाक छलइन। बीरू सेहो कहलखिन जे गाम हमहु जायब। आइ विजयीभऽ क गाम घुरबाक छलइन। ईएह त मौका छलइन जे बुधन बाबुसँकिछु झीट ली। पांच बजेकऽ करीब स्टेशन तीनु गोटे बुलेटसँपहुंचलाह। बुलेट चलेबाक उएह अंदाज छलइन जे कतेक बेशी आबाज निकइल सकाय। पहिलसँदोसर गियर, तेसर गियर त बिरले लागल होइत।सतबजिया ट्रेन लाइग गेल‌‌‌ छल।ट्रेन अतइसऽ खुजई छलइ। रमन जाकऽ बैस रहलाह आ एक सीट बीरू लेल सेहो गमछा ध कऽ घेर लेलाह। अखइन त ट्रेन खुलबाक मे बड़ी काल बाकी छलइ तैं लेल बोगी खालिये जकां छलइ। ज्यों ज्यों ट्रेनकऽ खुलबाक टाईम लगीच अबइत गेलइ , लोक आबऽ लगलइ। बुलेटक आबाज सुइनकऽ किछु ओतुके छौंड़ा सब एलइ। ओकरे सबहक संग बीरू आ तेसर लोक कतउ चइल गेल छलाह। पहिने रमन अइ छौंड़ा सबकऽ लफुआ कहइ बुझई छलखिन। मूदा आइ त ओ सब स्टेशनक दादा लगइ छलइन। अपनाकऽ ओ ओकर सबहक समांग बुझई छलाह। जेना गाम मे कहबी छइ- " कालेज मे जा कऽ नालेजभऽ जाइ छइ " आइ एडमिशन होइते रमन सब नीक बेजाय बुझअ लगलाह-अपना मोने मोन। किनको ओ गमछा राखल जगह पर बइसह नञि देलखिन। आबाज मे रूआब आइब गेल छलइन। एना बुझाइन जे ट्रेन उनके जमींदारिये मे छइन। ओ गमछा बाला जगह त जेना ओ कबालाकऽ लेने होइत। ट्रेनक बोगी आब पुरा भइड़ गेल रहइ। बीरूकऽ कोनो पता नञि। ओकरा लेल जगह छेंकने छलाह रमन। खाली जगह देखकऽ कयेक लोग लुधकय, बइसय लेल। रमनक रौद्र रूप देखकऽ सीट सँहइट जाय। आब बोगी मे लोक ठार भेनाइ सेहो शुरूकऽ देने छल। रमन अकइड़कऽ बइसल, चारु कात तकइ छलाह। तखने अनायास आंधी तूफान जेकां धरधराइत एकटा मऊगी आयल आ धड़ाकसँओइ खाली जगह पर बइस रहल। रमन अकड़इत बजलाह- -देख नहीं रहे हैं जो सीट पर गमछा रखा है। - तो। -" तो क्या। खाली कीजिए। कोई बैठा है"। आबाजकऽ गंभीर करइत अकड़पन मे रमन बजलाह। - "ठीक है। आऐंगे तो उठ जाएंगे"। बहुतही धीरेसऽ ओ मऊगी रमनक आंईख मे आंईख मिलाकऽ बाजल। रमन आब ओकरा देखलाह। ओ तीसेक बरखक करीब छल। गोर त नञि लेकिन पीरसियामे मे सुन्नर धोआ काया छलइ। ओकरा मे ठहराब छलइ। रमनकऽ आंईख अपने दोसर दिश करऽ परलइन। बोगी मे जगह कम रहबाक कारणे ओइ मऊगीकऽ देहसऽ रमन सटल छलाह। बयस्क मऊगी संग सटल रहबाक पहिल अनुभव छलइन। सऊंसे देहक रोईंया ठारभऽ गेल छलइन। एना बुझाइन जे रोईयां नञि ई "साही "कऽ कांट अइछ। ततेक अकइड़ गेल छलइन जे अपनो गड़इ छलइन। ओ मउगी आर अपन देहकऽ इनका दिश खसा देने छल। आइ मे इहोभऽ सकइत छइ जे ओइ मऊगीकऽ दहिना कात जे अधबयसु पुरूख बइसल छल, ओ बेसी सटबाक प्रयास करइत होइ। ओकरासऽ नीक अइ मऊगीकऽ ई बच्चा रमन संग सटबाक मे लगइत होइ। तीनकऽ जगह मे पांच लोक बइसतइ त सटबाक त छइये। आब किमहर सटु, से ओइ मनुक्ख पर निर्भर। ईहोभऽ सकइ छइ जे ओइ मऊगीकऽ रमन दिश स्वतः अपन इच्छासऽ भार देने अइछ आ ओइ कात त कियो धकिअए रहल छइ। जेतह बलात् वा जबरदस्ती वाली बात नञि रहइ छइ, सदौंसऽ उम्हरे झुकाव बनल रहइ छइ। रमन अइ परिस्थतिकऽ आनंद उठा रहल छलाह। संगहि साकांक्षो छलाह जे कियो उनका इ नञि बुझइन जे ओ जाइन बुइझकऽ ओइ मऊगी मे सटल छैथ। ओ धीरे धीरे अपन देहक भार रमन पर खसेने जा रहल छल। रमनक रोईंया त ओकरो गड़इत हेतइ, तैयो ओ बेपरवाह छल। पुरा बोगी मे मौन पसरल छल। अंदरसऽ हिलकोर रमनलऽ रहल छलाह। ओ मऊगी आ दहिना कात बाला पुरूख, कखनो काल हिलइ डुलइ छलाह- कियो बुझय नञि। रमन त बुझअ लागल छलाह -अतबे काल मे। आब उनका बीरूकऽ कोनो चिंता नञि होइ छलइन। मोन मे होइन जे कहूना ओ नञिये आबस। सुनने आ देखनेहो छलाह जे कयेक बेर ट्रेन लेटभऽ जाइ छइ। आइ होइन जे कहूना ट्रेन लेटभऽ जाइ। उनकर देह हिलला डुललाकऽ बाद ओइ मऊगीकऽ देहसऽ कयेक जगहसऽ संइट गेल छल। ओ मऊगी कियैक नञि हटई छल, से रमनक समझसऽ बाहर। ओ मऊगी माथ पर साड़ी रखने संच मंचसँबइसल, छल आ शुन्य मे तकइ छल। चाइर पांचटा पहिलुका दादा आब लफुआ सब प्लेटफार्म पर अइ बोगीसऽ ओइ बोगी चहलकदमी करय छल। ककरो तकइ छल। कखनोकऽ आबाज रमन सुनबो करयथ-" अहु मे नञि छऊ। ओहु मे नञि छऊ। परा गेलइ की। -------"। बेचैनी ओइ लफुआ सबहक चेहरा पर देखाअ रहल छल। तखने एक टा लफुआ रमनक बोगी मे चढ़ल आ जोरसऽ हाक देलकइ-" हइया छऊ"। फेर की। आब चाइर पांच टा लफुआ सब बोगी मे आइब गेलइ आ हइया छऊ, हइया छऊ, फुसफुसाय लागल। रमनकऽ भेलइन जे कहीं बीरू ठाकुरकऽ दुश्मन सब त नञि अइछ। आइ त भइड़ दिन उनके संगे बुलेट पर सौंसे शहर घुमलाह अइछ। लोक सब तकिते छलइन। स्टेशन अबिते केना दु तीन टा बदमशवा सब पहुंच गेल छल। ओकरे सबहक संग बीरू गेल छलाह। सुआइत ने लोक कहइ छइ- " लंगाकऽ दोस्ती नीक नञि"। कोन काज छलइ ई बीरू संग अयबाक के। एडमिशन अइ साल नञि होइतइ त परूकाभऽ जइतइ। कोनो नौकरी छलइ। कोन चक्कर मे पइड़ गेलऊं। ई बदमशवा सब हमरे लेल आयल अइ। हमहु त अकइड़कऽ चलइ छलऊं। अकरा सबकऽ भ गेल हेतइ जे ओकर एरिया मे दोसर दादा के। जे रमनक अकरल देह छलइन, से शिथिल हुवअ लगलइन। ठोर पर फिफरी परऽ लगलइन। कंठ सुखाय लगलइन। पाइनो नञि छलइन लग मे जे पीताह। आब ट्रेनसँउतरताह, से ई बदमशवा सब जाय देतइन तखन ने। ई कतऽ बीरु ठाकुर मइड़ गेलाह। हम त कहि देबइ जे हम नञि चिन्हइ छियइन। फेर रमनकऽ भेलइन जे बुलेट पर संगे बइसल छलऊं, से जे कहत त कहि देबइ जे हम त पहिले बेर शहर आयल छलऊं एडमिशनकऽ लेल। हइया देखू कालेजक रशीद। देखला जे झोड़ा सामने अइछ-ओही मे त सब कागज-पत्तर सब छइन। हम टीशन अबइ छलऊं, रस्ता मे गाड़ी रोकलाह आ चढ़ा लेलाह। ओ दोसर टोलकऽ छथ।हम सब सौजनिया सेहो नञि छी। हमरा छोड़ि दियह। ईएह सब सोइच रहल छलाह। बोगी बला लोक की कहत। ककरो हम बइसऽ नञि देलियई आ आब बेजती होइत।बड्ड दादा बुझअ लागल छलऊं आब लियह। एक तरफ ओइ मऊगीकऽ स्पर्शसऽ गर्माहट त दोसर दिस सामने पांच पांच टा लफंडर बदमशवाकऽ देखक शोणितक सर्द भेनाइ। ओ मऊगी अखनो चुप्पी लगेने छल। कनी काल मे ओ छौंड़ा सब बाजय लागल-" चल ने", "उतर ने", " ट्रेन खुलतइ आब"। पहिने धीरेसऽ बजलक ओ सब। जखइन बोगी मे कियो किछु नञि प्रत्युत्तर देलकइ त ओ सब जोरसँबाजय लागल।रमन ट्रेनसऽ बाहर जाइन बुइझकऽ तकइ छलाह, कान त बोगिये मे पाथल रहइन। ओकर सबहक साहस बढ़अ लगलइ। आब ओ ओइ मऊगीकऽ छुकऽ कहलकइ-" चल उतर, बड्ड दौरेने छें आइ, ट्रेन खुईज जेतउ त लइत रहियें, पहुंच जेबें कतऽ दुन"। आब रमनकऽ जान मे जान अयलइन। कहाबतो छइ- " जान बची तो लाखों पाए"। ओ सब त अइ मऊगी लेल आयल अइछ। आब रमन धीरेसऽ अपन देहकऽ ओकरासँअलगकऽ लेलाह। अखइन तक ओ नीक लगइ छलइन, आब ओ जानक जपाल बुझाइन। अपनाकऽ पुरा तरहें अइ अध्यायसऽ बाहरकऽ लेने छलाह। जेना कि ओ अतऽ छइथे नञि। " नञि हर्ष नञि विस्मयो" बाला स्थिति बना लेने छलाह। आब बोगी मे चारु कात रमन तकलाह। देखइ छथि जे खायल पीयल धाकड़ देह बला पुरुष सब सेहो बैसल छथि। सब मौन धारण केने छथि। एक टा तऽ मुष्टंडा सेहो छलाह। कतेक रौबदार चेहरा छलइन। एक बेर घुड़इक दइतथिन त अइ लफुआ सबहक हिम्मत होइतइ-अतऽ ठार होबाक के। पेंट गीलभऽ जइतइ,अइ सिकटी पिल्ली सबहक। किनको कोनो मतलब नञि। आपसो मे नञि कियो गप्प करय छलाय, आ नञि ट्रेनसऽ नीचा -उपर, चढ़ई-उतड़इ छल। ओ मऊगी, बोगी मे चारू कात एकबेर गर्दन उठाकऽ देखलक। फेर ओकरा की नञि की फुरेलइ, सामान त किछु छलइये नञि, देहे टा छलइ, एक्के बेर उठल आ सरसराकऽ बोगीसऽ बाहर चइल गेल। जहिना धरधराकऽ सीट पर बइसल छल, ओहिना हरहराकऽ परा गेल। ओकर पाछु पाछु ओ लफंडरो सब भागल। तखने इंजन सीटी देलकइ। बीरु ठाकुर सेहो दौरल ट्रेन मे चढ़लाह। एक टा बदमशवा उनका कहइ छलइन-" जेकरा हम सब सऊंसे ट्रेन आ टीशन पर ताईककऽ हारि गेलऊं ओ त ईएह बोगी मे बैसल छल"। बीरू बजलाह- -" ओह। अजुका जतरे गड़बड़ छल।" फेर रमनकऽ कहलखिन जे आहां किअए नञि कहलऊं जे ओ अतऽ बैसल अइछ। रमन की बजताह। गमछा हटा लेलाह आ कहलखिन -"लियह । बैसु।" तखने फेर ओइ बदमशवा ग्रुपकऽ एकटा छौंड़ा एलइ आ बाहरेसँबीरूकऽ कहलकइन-" फेर ओ मऊगी गायबभऽ गेल। आइ दिनेसँओ चोरवा - नुक्की हमरा सब संगे खेला रहल अइछ। आब जे सिपाहीकऽ ड्युटी टीशन पर छइ, ओ बड कड़ा छइ। सबहक गत्तर गत्तर चिन्हइ छइ। अजुका जतरे खराब हमर सब के। आब अहुंके ट्रेन खुईज रहल अइछ। हमहु सब जा रहल छी। सोचने रही जे आहांकऽ किछु मजा दी, लेकिन नञिभऽ सकल"।ट्रेन चइल परल छल। रमन मोन मे सोचई छलाह जे मजा ओ लेलाह कि सजा मे समय बितेलाह। आइ पहिले बेर मे बहुते रास अनुभव लेलाह। बीरूकऽ नीक कहताह कि अधलाह। ठीके कालेज मे जाइते नालेजभऽ गेल छलइन। ई मिशन एडमिशन, पन्द्रह बरखक बच्चाकऽ जीबनक पाठ पढ़ा देलकइन। अपन लोक (लघुकथा) भवेशकऽ अनायास फेसबुक पर मैसेज एलइन। "आहां बंगाली टोला बला भवेश छी ने" भवेश सोच मे पइड़ गेलाह कि ईकऽ छथि। मैसेज पठबऽ बालाकऽ प्रोफाइल देखलखिन त ओ एकटा सुन्नञिर ललना छलीह। उनकर संगी सबहक सुची मे तकलाह- कियो इनकर जानऽ बला नञि। अतबा त निश्चित छल जे कियो मैथिलानी थिकीह। बंगाली टोला मे त आइसँचालीस बरख पहिने रहल छलाह। ओतऽ त कियो लड़कीसऽ उनका कोनो जान पहचान नञि छलइन। मूदा रहल त छइते बंगाली टोला मे। ईहो सत्ते थीक। तरह तरहकऽ बिचार सब दिमाग मे उमर घुमर करय छलइन। नञि छोरले बनञिन आ नञि किछु कैले बनञि। हरदम उएह मैसेज माथा पर नचइत छलइन। जखने मौका लगइन ......ओइ ललनाकऽ प्रोफाइलकऽ उलटबइत पलटबइत ...... किछु निष्कर्ष नञि निकलइन। मोन करयन जे ओ अइ मैसेजकऽ ज़बाब दकऽ पुईछ ली। फेर बिबेक एना करऽ सऽ मना करयन। ई मोन आ बिबेकक बीच कशमकश कसियाकऽ चइल रहल छलइन। अइ मे लटपटायल भवेश। जतेबे अइसँबहराय चाहइ छलाह, ओतबे ओझरा जाइ छलाह। ई त कांटक झाइड़- झंखारभऽ गेल छल.....ओइ मे एक बेर फंसलाकऽ बाद जेतेक हाथ पैर मारब, ओतबे बेशी कांट मे फंसब आ कांट गरबों करत। अखइन तक सुनञि छलखिन जे फेसबुक मे अहीना मैसेज अबइ छइ। संगी बनेबाक सेहो नोत अबइ छइ। संगीकऽ नोतकऽ गछिते आहांक सबटा समाद ओकरा लग चइल जाइ छइ। ओ तेहन ने एक टा अपन समांगकऽ कम्प्युटर मे बइसा दइ छइ........ समदिअय जेकां ओ सबटा समाचार पठबइत रहइ छइ। अइ ".बिन बजायल पाहुनक " डरक मारे भवेश आगु नञि बइढ़ पाइब रहल छलाह। दोसर गप्प इहो रहइन जे ज्यों ई मैसेज पठबऽ बाला पुरुख रहितइथ त ओ ज़बाब दकऽ पुईछ लइतथिन। उम्रक ओही पड़ाव पर ठार छथि जे अगर इमहर ओमहरकऽ कियो होइ आ ई बात पसइड़ जाइ त सेहो जुलूम। मैथिल समाज मे बात चिथारऽ सँबेशी दोसर कोनो काज मे मोनो नञि लगइ छइ। मुर्दा घर मे त एके बेर लहाशकऽ चीर-फाड़ कैल जाइ छइ .......... इनकर समाज मे त जाबइत चिथड़ा चिथड़ा नञिभऽ जाइ छइ, गप्पक पोस्टमार्टम चलिते रहइ छइ। फलां फसलाह। कोनो मउगीकऽ चक्कर मे पड़ल छलाह। पहिनेहोसँहेतइन। अइ बेर भंडा फुटलइन। लोककऽ बुझनाई अतेक आसान नञि। केकर भीतर कोन खिचड़ी पकइ छइ जेकऽ कहत। ओ त अइ बेर बात बढ़लइ त लोक बुझलक....... ई सब तेला बेलासऽ रेहल खेहल छलाह भवेश। नञि साहस जुटा सकलाह-जबाब देबइ लेल। किछु दिन बाद फेर मैसेज एलइ -" बुइझ पड़ईया जे आहां नञि चिह्न पेलऊं। हम धनहा गामक ललन बाबुकऽ बेटी छी। आब उमेद अइछ.....चिन्ह गेल होयब। " मैसेज पढ़िते सब किछु सनसनाकऽ याद आइब गेलइन। पुरा देह झनझना गेलइन।अपना पर अफसोस होइन भवेशकऽ जे कोना नञि चिन्हलकिन। फोटोसँसेहो नञि अंदाज लगलइन।ओ की बुझने हेतीह। चटसँअपन वाट्सएप नम्मर देलखिन.... ई लियह.....अइ पर गप्प करु या अपन नम्मर बताऊ। चालीस बरख पहिलका सब घटना आंखिक सोझा आइब गेलइन। सनीमाक रील जकां सब नाचऽ लगलइन। ओ चौदह - पन्द्रह बरखसँबेसीकऽ नञि छलाह। वार्षिक परीक्षादऽ देने छलाह। रिजल्ट नञि आयल छलइन। उनकर सब संगी सब कतउ कतउ घुमअ गेल छल। ओ सब त की शहर मे डेरा पर रहइत छल , तैं अपन गाम या कोनो दोसर शहर मे संबंधी सब कतऽ गेल छल। भबेशकऽ गाम-शहर सब ईएह छलइन। हुनकर कोनो संबंधी दोसर शहर मे नञि रहइ छलखिन। बच्चेसँपरीक्षाकऽ बाद घरे मे रहनाई भवेशकऽ नीक नञि लगइन। मूदा जेताह त कतऽ जेताह। उनकर बाबुजीकऽ अपन गामसँविरक्ति छलइन। बदली बाला नौकरी सेहो नञि छइन। मोन मसोईसकऽ रही जाइ छलाह भबेश। ई कोन नौकरी, जई मे बदली नञि। ओ त एहन नौकरी करताह, जईमे खुब घुमअ फिरऽ कऽ रहतइ।सब साल जकां, परीक्षाकऽ बादकऽ समय उनका पहाड़ जेकां लगइन......अहु बेर सैह छलइन। मूंह लटकाअ कऽ घर मे पड़ल छलाह। ओही समय हुनकर बाबुजीकऽ संगी ललनजी बम्बइसँआयल छलाह। ओना ओ उम्र मे भवेशक बाबुजीसँपैघ रहथिन, लेकिन दुनु मे दोस्ती रहइन। दोस्तीक कारण छलइन जे दुनु गोटे पहिने अतइ एक्के जगह नौकरी करय छलाह। ललनजी सीनियर छलखिन। बाद मे ओ कोनो दोसर परीक्षा पास कं बम्बइ चइल गेलाह। ओ जहिया कहियो गाम दिश अबइ छथि त अइ डेरा अयबे करताह। ओ सब बेर इनका सबकऽ बम्बइ अबइ लेल कहइ छथिन। बम्बइ जायकऽ भवेशोकऽ बड्ड मोन करयन लेकिन कियो जेब्बे नञि करय। ललनजी कहबो केलखिन जे हम आब रिटायरोकऽ जायब, आहां सब कहिया आयब। बड्ड नोन अतुका खेने छी, एक बेर हमरो कतऽ आऊ। अइ बेर ललनजी अप्पन छोटकी बेटी सीमाकऽ बियाह करक लेल अपन गाम आयल छलाह। उनका तीन बेटी आ दु बेटा छलइन। सबहक बियाह दानभऽ गेल छलइन। ई अंतिम काज छलइन.......तैं अयबाक आग्रह बेशी छलइन। भवेशक मां बुझई छलखिन जे एतऽ सऽ तऽ कियो जाय बला छइ नञि, आ भवेशकऽ परीक्षाक बाद घुमबाक मोनकऽ रहल छइन.....ओ कहलखिन- "ल जईयउन भवेश के। आब त ईएह सब ने संबंधकऽ आगु बढ़ौता। बाकी कियो त जाय बला अइछ नञि। आहांसऽ की छुपल अइछ। सब बुझिते छी।" फेर की छलइ। भवेशक कपड़ा लत्ता सब एकटा झोड़ी मे रखेलइन आ ओ ललनजी संग बिदा भेलाह। ई बिना मां बाबु जीकऽ असगर जयबाक पहिले अवसर छलइन भवेश के। पुरा उत्साह मे छलाह। पहिने ट्रेन, फेर टायरगाड़ीसँओ धनहा गाम पहुंचलाह। ओ त टायरगाड़ी पर हारिकऽ सुतियो गेल छलाह। पहिले बेर एहन गाड़ी पर चढ़ल छलाह।काजक आंगन छल। सब लोक भवेशकऽ देख कऽ बड्ड खुश भेल। ललनजीकऽ पुरा परिवार भवेशकऽ हाथो हाथ रखलकइन। आखिर छलाह त बच्चे ने भवेश। थोड़बाक काल त दलान पर संचमंच भऽ बैसल रहलाह। ललनजी सेहो कतउ ऊईठकऽ गेलाह। उनकर घरक आर बच्चा सब भवेशकऽ इशाराकऽ क बजेलकइन....... ओ उईठ बिदा भेलाह.....फेर शुरू भेल- खेलक दौड़। चोरवा नुक्की, बुढ़िया कबड्डी, ताश, लुडो,लाली, पिट्टो आर कोन कोन खेल.... बीच मे पकइड़कऽ लोक जलखइ करेलकइन। अइ बच्चा सब मे ललनजीकऽ बेटी सीमा सेहो छलीह। ओ अइ सबसँअनजान जे दसे दिनक बाद उनकर विवाह छइन आ ओकर सातम दिन दुरागमन। भोरेसँखेल शुरूभऽ जाइ आ राइत तक चलइ। ईजोरियाकऽ समय छलइ तैं कोनो ईजोतोकऽ बेशी काज नञि। खेल मे एक दिन त ओतुका बच्चा सब भवेशकऽ बात माइन लेलकइन....... दोसर दिनसँलड़ाई होबऽ लगलइ। कयेक खेल मे अतुका नियम अलग अलग छलइ। कियो झुकइ लेल तैयार नञि। भवेशोकऽ धमका देलकइन- "पाहुन बुझई छी अपनाकऽ त ओतऽ दलान पर बैसु गऽ , अतऽ अतुक्के नियम चलतइ। खेलऽ कऽ अइ त हमरा सबहक नियमसँखेलू।" भवेशकऽ समझौताकऽ अलावा दोसर चाऱा नञि छलइन। ओतुक्के नियमसऽ खेलाय लगलाह। गामक बच्चा सब बइमानियो करय........ई भवेशकऽ बर्दाश्त नञि। झगड़ाभऽ जाइ, फेर कनी काल मे मेल। अइ झगड़ा मे सीमा हरदम उनके तरफसँरहइन, बाकी सब अलग । सीमा बम्बइसँआयल छलीह। पांच भाइ बहिन मे सबसं छोट, ओइसँदुलारूओ बड्ड छलीह।दोसर उनके बियाह छलइन, तैं मोजर बेशी। एक दिन खेल मे सबके अप्पन अप्पन शहरक नाम लेबाक रहइ। भवेश बंगाली टोला बजलाह.....बसंत मुसरी घरारी बजलाह.....सीमा बंबइ बजलीह आ आर बच्चा आन आन जगह। सीमाकऽ "बंगाली टोला" सुनबा मे नीक लगलइन। फेर की छलइ ओ भवेश के" टोला" कहऽ लगलखिन आ बसंतकऽ "मुसरी"। ओ टोला आ मुसरी बाजस आ ठठाकऽ हंईस दइथ।भवेशो सीमाकऽ बंबइ कहला पर कहलखिन जे ई त "सबुजा आम"कऽ कहल जाइ छइ। ओ सब सीमाकऽ सबुजा आ सीमा इनका सबकऽ टोला आ मुसरी कहथिन। अहिना हंसइथ खेलाइथ दिन बीत रहल छलइ। बिना मां-बापकऽ भवेश आयल छलाह, तैं ललनजी आ घरक आन लोक, बेशी ध्यान दइन। सब बच्चा एक्के जगह सुतय,उठय, खाई पीयई छल। खाली नहाय मे बच्चा आ बुच्ची अलग अलग जगह, समय एक्के छल। सीमाकऽ लोक बिध बाध लेल बजा लइ छलइन। उनकर मां कहथिन -खेलऽ कुदऽ दियउ। फेर त अइ घर गिरहस्थीकऽ पचड़ा मे फंसहेकऽ छइ। जेतबा बुझबा मे अयलइन भवेश के, ओइ अनुसार ललनजीकऽ अही साल रिटायरमेट छलइन। ओइसऽ पहीने ओ सीमाक बिबाहकऽ कऽ जिम्मेदारीसँमुक्त होबाक चाहइ छलाह। ओना सीमाक मां अइ कथाक विरोध मे छलखिन। तहिया स्त्रीगणक बाते कथा वार्ता मे कतेक मानल जाइ छलइ। नञि कियो कान बात उनकर बातकऽ देलकइन। मोन माइड़कऽ अंत मे लाइग गेलीह बिबाहक तैयारी मे। लड़का एम टेककऽ कऽ वैज्ञानिकक नौकरीकऽ रहल छल। बड़क गुण देखी आ कनियाक रुप-ईएह सीमाक मां सबके कहइ छलखिन। ई सेहो उनका बुझल रहइन जे बरक बयस बेशी छइ........ ललनजीक रिटायरमेट वाला बातलऽ कऽ ओ चुप्पी लगा लेने छलीह। सीमाकऽ तं गाम अयलाहकऽ बाद बिबाहक बात बतायल गेल छलइन- ई सब गप सीमा कहने छलखिन भवेश के, तैं फुईस होबाक कोनों मतलब नञि। अहीना बिबाहक दिन आइब गेलइ। सीमा आइ नञि खेलेली। ओ मऊगी सबहक भीड़ मे घेरायल छलीह। सांझ मे बर बरियाती आयल। भवेश अपन नबका कपड़ा जे मां देने छलखिन, से पहिरलाह। जे काज लोक अढ़ा दइन, से काज कइयों दइ छलखिन। भवेशकऽ सीमाक बर देखबा मे नीक नञि लगलइन। ओ बेशी बयसक छल। ककरोसँकिछु बजितो नञि छल। भवेश दोसर दिन कत्ती काल ओकरा लग ठाढ़ छलाह, टोकबो नञि केलकइन। सीमाकऽ आब बाहर निकलनाई एकदम्मे बन्नभऽ गेल छलइन। सारा दिन लोक सबहक एनाई गेनाई लगले रहइ छलइ। आब भवेशकऽ खेलनाई सेहो बन्ने जकां छलइन। उनका मोन उचइट गेल छलइन। सीमाकऽ आब भवेशक लेल समय नञि छलइन। सीमा चुप्पी लगा लेने छलीह। हरदम जोर जोर से चिकरऽ वाली, गुम्मीभऽ गेल छलीह। दुरागमनसँएक दिन पहिने " टोला" सोर कऽ क भवेशकऽ बजेलखिन-" हम काइल सासुर चइल जायब। आहांक बुझल अइछ"। - हं। हमरा बुझल अइछ। - हमरा नोर नञि खसईया। की करु। - बीट्ठु जोरसऽ काइट लियह। -नञि नञि। -दोसर उपाय बताऊ।सब कहि रहल अइछ कि दुरगमनिया कनिया कनञि छइ। हम बड़ कोशिश केलऊं। नोर खसबे नञि कैल। मुसरी कतऽ छथि....... कहिकऽ हंस लगलीह। -हमर "बर" केहन लगलाह। -ठीक -ठीक की। एक नम्मर, दु नम्मर से कहू। - दु नम्मर। फेर कियो सीमाकऽ बजा लेलकइन। भवेश सेहो परेशान छलाह जे दुरागमान काल मे ज्यों सीमा नञि कनतीह त लोक की कहतइ। अगला प्राते सीमाक कननाईकऽ आवाजसँभवेशक निन्न टुटलइन।उनका दहोबहो नोर खइस रहल छलइन। कखनो ओ अपन मांकऽ गर लाइगकऽ त कखनो बहिन के, त कखनो काकी के, त कखनो पीसी के,कखनो भऊजाइ के, आरो लोक सब के, फेर ललनजी के। दुरगमनिया बरियाती सबहक आंईख सेहो नोरा गेल छलइन। कात मे ठार भवेश सेहो काइन रहल छलाह।सीमा ततेक कनलीह ...... सब बजई जे अतेक त कियो नञि कानल सासुर जाय काल। सबहक कोढ़ फाइट गेल छलइ। भइड़ गऊंआ जमा छल ललनजीकऽ दरबज्जा पर। नञि कनञि छल त ओ सीमाक बर छलाह। थोरबा काल बाद सीमा गाड़ी पर बैस गेल छलीह। लोटा मे पाइन आइनकऽ उनकर मां उनका दु घुंट पीयेलखिन। फेर गाड़ीकऽ तीन बेर आगु पाछु केल गेल आ ओ गाड़ी मे बइस कऽ चइल गेलीह। भवेश सेहो एकटा दोसर पाहुन संग अपन घर घुइड़ गेलाह। किछु दिन घर पर मोन नञि लगइन। सीमाक कनञित चेहरा उनका परेशानकऽ रहल छलइन। धीरे धीरे अपन दुनिया मे भवेश लौंट चुकल छलाह। कोनो हालचाल नञि पता लगलइन। सब बिसइड़ गेलाह।आइ चालीस बरखक बाद ई मैसेज उनका सब यादकऽ तरोताजाकऽ देलकइन। आब दुनु गोटेकऽ वार्ताक क्रम शुरू भेल। सीमाकऽ मां बाबु जी दुनु स्वर्गवासीभऽ गेल छलखिन। भाइ- भाऊज आ बहिन- बहिनोई सब अपन दुनिया मे व्यस्त छथि। सीमा लेल उनका सबके समय नञि छइन। कहियो कोनो फोनो नञि........आबऽ जायकऽ त दुरक गप। सीमा एकतरफा शुरू मे घरक लोककऽ फोन करय छलखिन........ बाद मे फोन केनाई छोड़ि देलखिन। अहिना एकदिसाह संबंध कहियो चललइ अइछ। लड़ाई नञि छइन लेकिन अबरजात बंदयजेकां। सीमाकऽ एकटा बेटा बेटी छइन। बेटी फैशन डिजाइनिंगकऽ कऽ विदेश मे रही रहल छइन। जमाय ओ अपने चुनलक।सीमा दोबारा गलती नञि करऽ चाहइ छलीह। अइ बियाहलऽ कऽ सीमाक बर प्रसन्न नञि छथि। ओ अखइन तक अइ संबंधकऽ स्वीकार नञि केलाह अइछ। ओकर डेरा पर बिदेश कहियो नञि गेलाह। सीमा अपन साल दु साल पर विदेश बेटी कतऽ जाइत अबइत रहइत छइथ। सीमाक घरबाला रिटायरकऽ गेल छइथ। कंसल्टेंटकऽ काज बंबइ मे शुरू कयलाह अइछ।बेटा बैंक मे नौकरीकऽ रहल छइन। ओकरा लेल लड़की ताईक रहल छइथ। अकरा बाद भवेशक बारी छलइन। बंगाली टोला बाला मकान बिका गेलइन। ओइ पाइसँभवेशक दुनु भाइ दोसर शहर मे घर कीनलाह अइछ। भवेशक मां बाबूजी जे भइड़ जीवन कहियो गाम नञि गेलाह, से बुढ़ारी मे दुनु गोटे गाम मे रही रहल छइथ। भवेश एक नौकरीसँदोसर नौकरी करइत, बिदेश मे पड़ल छइथ। गामकऽ छोड़ि कतउ घर दुआर नञि बनौने छइथ। छोट छोट धीया पुता छइन, से सब अतइ पढ़ई छइन। बदली बाला नौकरीकऽ शौक रहइन, से आब जानक जपालभऽ गेल छइन।पहिने शहरे शहर आब देशे देश छिछिया रहल छइथ। फेर मुसरीकऽ हाल पुछलखिन सीमा। एक बेर त सकपका गेलाह भवेश। बड़का सांस छोड़इत बजलाह- "नञि कोनो संपर्क। ठीके हेताह"। सच्चाई त ई छलइ जे सीमाक बियाहक तीन चाइर बरखक बाद बसंतकऽ ह्रदय मे कोनो बीमारीभऽ गेल छलइन। पटनासँडाक्टर वेल्लोर रेफर केने रहइन। घर मे अर्थक अभाव कारणे गामे लगक बैद्यक इलाज शुरू कयल गेलइन। छ महीना बितइत बितइत बसंत इलाजकऽ अभाव मे अपन गामे मे मइड़ गेल छलाह। सीमा गपशपकऽ बाद बड्ड खुश छलीह। कहलखिन जे बुझाइत अइछ नैहर मे छी जेना। भवेश कहलखिन-हं हं आहा़ं नैहरेसँगप्पकऽ रहल छी। ललन ककाजी चइल गेलाह त ओइसऽ की। हम आहांक भाइ छी। नैहर आहांकऽ सबदिना हमरा घर मे बनल रहत। भवेशक स्नेह देखकऽ सीमाक आंईखसऽ नोर खंसऽ लगलइन। कहलखिन- कोनो चीजक नञि कमी अइ आ नञि चाही। बस ईएह आबेशक लेल मोन घुरियाइत रहय आ आहांकऽ तकइत रही। सीमाकऽ अपन लोक आइ भेट गेलखिन। आइयो दहोबहो नोर बहइ छइन.........ई नोर खुशीक छइन-जे बड्ड दिनसँजमा छलइन। बख्शीश (लघुकथा) आइ काइल त बेशी कालेजिया बच्चा सब चरफर की, चलता पुर्जा होइत अइछ। कतउ आबऽ जाय आ गप करऽ मे अशौकर्य नञि लगइ छइ। फरहर सब अइछ। दिक्कत एक्के टा छइ जे ई बच्चा सब अपन आन बड्ड बुझई छइ। अपन घरक काज होइ त चट संकऽ लेत, दोसर घरक काज होइ तखइन ने देखू तिरिंग भिरिंग। एना नञि त ओना नञि। अपना बेर मे पैसेंजर ट्रेनसऽ बिना टिकसकऽ जाइत आ दोसर बेर मे त चइड़पहिया चाहियई....... नञि किछु त मोटरसाइकिलकऽ पेट्रोलकऽ नाम पर अवस्से। ट्रैन, बससँज्यों जाइत त केतबो पाइ दियउ, घुराकऽ नञि देत। कथी मे खर्च करय छइ से नञि जाइन। दमन अइ सबसं अलग छइथ। चलतो पूर्जा खुब छइथ। अप्पन आन ओ नञि बुझताह। सबहक काज अपने बुइझकऽ करताह। कथु लेल पाइ दियउन त जे बंइच जेतइन से घुरा सेहो देताह। आब त मुश्किलसऽ एहन लोक होइया जे दोसरकऽ काज अपन बुइझकऽ करइत अइछ। खाली निठल्ला बइसल रहत, कोनो काज कहि दियउ त कलक्टरोसँबेशी व्यस्तता देखा देत। दमनकऽ अहीसऽ बड्ड जश छइन अपन गाम समाज मे।ओ बुझितो छथि जे लोक दु टा बड़ाईकऽ कऽ , अपन उल्लु सीधा करयया.......तखनो लोककऽ हरसट्ठे ना नञि कहइ छथिन। परोपकारी लोककऽ ईएह हाल होइ छइ-दोसरकऽ काज मे लागल रहइत अइछ आ अपन सब काज ओझरायल रहइ छइ। दमनकऽ से हाल नञि। उनकर छोट भाइ सोहन घरक काज सब सम्हारने छलाह।दमन घरसँनिश्चिंत छलाह। किछु मास पहिने दुखित काकीकऽ ल का दिल्ली आयल छलाह। पुरा ठीकभऽ गेलखिन, तखइन गाम घुरलाह। दु महीनासँऊपर लाइग गेल छलइन।बड्ड सेवा केलखिन। काकीकऽ मुंह दमनक बड़ाई करइत थकइ नञि छइन। काकीकऽ अपन बेटा पुतोहु त दसे दिन लेल गुजरातसँदिल्ली अयलइन-फेर नौकरी मे छुट्टी आ बच्चाकऽ पढ़ाइकऽ बहाना बना चइल गेलइन। काकीकऽ जमाय आ दमन दु गोटे दिल्ली मे काकीकऽ ईलाजक लेल टीकल रहलाह। कथी लेल लोक बेटा - बेटा करइत अइछ, से नञि जाइन। बेटा काज नञि अयलइन, तखनो काकीकऽ मुंहे बेटेकऽ बड़ाई। दमन ओहो पर काकीकऽ किछु नञि कहइ छथिन। काकीकऽ लेखे उनकर बेटाकऽ नौकरी मे छुट्टी नञि आ दमनकऽ त नौकरी नञि, तैं छथि।सैह देखू -काज केलो पाछु ईएह सुनऽ कऽ भेटई छइ- " खालिये बैसल छलाह, तैं जाइ लेल कहलियइन।" काज करऽ बालाकऽ त काज खिहाड़इत घुड़इ छइ। आब मामी दुखिताहभऽ गेल छथिन। ओना बड़का लोककऽ किछु ने किछु होइते रहइ छइ। नञि किछु त "धरधरी"........ ओकर बाद "डिप्रेशन"। लोको आब ओतेक गंभीरतासऽ ई बीमारी सबकऽ नञि लइ छइ।अइ मे त आपरेशन होबाक छइ। दोसराइत लेल एक गोटेकऽ आर रहनाई जरूरी छइ। उएह संग जाय, जे चरफरिया हुआय। डाक्टर सबसँगपकऽ सकय...... रस्ता पेरा मे सकांक्ष रहय......चोर उचक्कासऽ बइचकऽ रहय........अपन बेशी टिटंभा नञि होइ.......पोन टिकल रहय बाला होइ आ अंतिम जे घरभइयाकऽ पाइकऽ अपव्यय नञि करय।काज पर चाइर लाइन अंग्रेजी बाईज लियैय त सोना मे सुगंध वाली बात। दमन अइ सब गुणकऽ बासन छलाह। मामा जे कहियो हुलकी नञि पाड़इ छेलखिन, तिनकर समाद पर समाद। दमन त सब लेल तैयार रहइ छलाह..... ई त अपने मामीकऽ गप छलइन। झटसँ"हंअ " कहि देलखिन। मामा अपना संग एसी बोगी मे टिकस कटा लेलाह। आइ तक कहियो एसी बोगी मे दमन नञि चढ़ल छलाह। खुशीकऽ मारे फुइलकऽ कुप्पा भेल छलाह। सबकऽ कहिते फिड़इ छलाह जे फलां दिन एसी मे दिल्ली जयबाक टिकस अइ।सब गोटे निइत दिन पर पटनासँबिदा भेलाह। एसी मे जायकऽ पहिल अनुभव छलइन। राइत मे जाड़ लागह लगलइन, मामा कम्बल देखा देने रहथिन पहिनेहे....अपन ओइढ़कऽ सुइत रहलाह। खेनाई पीनाईकऽ त पुछु ने। बुझाइन जे बरियाती मे आयल छी। अपने मोने खायक सामग्री सबदऽ रहल छलइन। अंत मे आइसक्रीम सेहो देलकइन। मामा कहलखिन जे राजधानी एक्सप्रेस छैक ई। सबटा पाइ पहिनेहेलऽ लइ छइ। एक्को गोटे फाजिल नञि छल बोगी मे। ओना दिल्ली बला ट्रेन मे त " ईधर घुसकिये, ऊधर घुसकिये, कहां घुसकें, माथा पर बैठियेगा- ओ बीमार है..... लेटा है ट्रेन है कि एम्बुलेंस है......सब बीमारे है ईएह सब ओ सुनञि छलाह। अइ बेर सब भिन्ने। बढ़िया जतरा बुझेलइन दमन के। दिल्ली मे स्टेशनसऽ सीधा टैक्सीलऽ क बत्रा अस्पताल जाइ गेलाह। डाक्टरसऽ समय पहिनेहेसऽ लेल छलइन। ई "प्लांड सर्जरी " छल। जहिया सुविधा हुअय.....करा लियह। अस्पताल मे मामीकऽ भर्तीकऽ लेलकइन। एकटा कोठरीदऽ देलकइन। नर्सक अलावा एकटा नर्सिंग औडर्ली, जेकरा दाई बुझु, सेहो मामी खातिर अलगसऽ रहइन। बेर बेर काकी बाला जे तरद्दुत भेल छलइन दमनकऽ इरविन मे,ओइसऽ मिलबऽ लागइथ। ओइ मे चाइर बेर जाइ छलाह तखइन नर्सिनिया आ दाई अबइ छलइन। अतऽ त पले पले हाल पुछाड़ी लेल अबइ छलइन।अस्पताले मे कैफेटेरिया छलइ। मामा जाकऽ रूम नम्मर लिखा देने रहथिन आ दमनकऽ कार्डदऽ देलखिन। उनका जे खेबाक होइन से खा लेताह-पैसा देबाक नञि काज।कार्ड मे चढ़ा देतइन। दिक्कत एक्के टा छलइ जे राइत मे एक्के गोटे कोठली मे रही सकइ छल। बाकी लोकक लेल सबजाना जगह बनल छल। मामा दमनकऽ विचार पुछलखिन।दमनकऽ त दस टा गऊंआ ओतइ संगम विहार मे रहइ छइन।तीन टाकऽ त अपने घर छइन। बाकी सब किराया मे कोठली लेने छइथ। दिन भइड़ दमन अस्पताल मे रहइथ आ राइत मे कोनो ने कोनो गऊंआ कतऽ चइल जाइ छलाह। गऊंआ सब बड्ड आबेश करयन। गाम मे सब दमनसँउपकृत रहइ छल। पिछलो जतरा काकी बला मे, संबंधी सब कतऽ गेल छलाह। गऊआं सब छुटल छलइन। ओना ई सब काकीकऽ देखऽ अस्पताल मे दुर रहितो कयेक बेर आयल छल।अइ बेर सबहक घर सेहो गेलाह। राइत मे रुकइ छलाह अपन संगी मोहन कतऽ । ओ असगरे एक कोठरी मे रहइ छल। राइत मे तरह तरहकऽ नीक बेजाय गप होइ....... फेर मनमाफिक खेनाई बनञि। भोरे, मोहन अपन आफिस जाय आ दमन अस्पताल। ओना दमनकऽ एतऽ अस्पताल मे अप्पन कोनो काज नञि बुझाइन। सब पाइयक खेला छलइ।पन्द्रह दिन मामी अस्पताल मे रहलीह। आपरेशन सब ठीकभऽ गेल छलइन। आब दोसर वार्ड मे शिफ्ट करतइन आ अगिला दिन डिस्चार्ज करबाक छलइ। चौदह दिन एक्के कोठरी आ एक्के नर्स आ दाई छलइन। ओ देखइ छलाह जे मामीकऽ ओइ दाईसँबड्ड खुसुर फुसुर होइन। नर्सिनिया त ओतेक भाव नञि दइन लेकिन दाई लल्लो चप्पो मे लागल रहइ छल। खुब दोस्तीभऽ गेल छलइन दुनु गोटा के। कोठरी छोड़बाक काल मामी, दमनकऽ कहलखिन - "अकरा चाइर टा धीया पुता छइ। अस्पताल मे ई एकटा एजेंसीकऽ माध्यमसँआयल अइछ। बड्ड कम पाइ दइ छइ। अपने दिसक छइ। पढ़ल लिखल सेहो छइ। घरबाला सेहो सिक्युरिटी गार्ड छइ। नुकाकऽ अकरा किछु पाइ बख्शीश मेदऽ दियउ। बड्ड सेवा केलक अइछ। नुकाकऽ देबइ। ककरो कहबइ नञि। ज्यों मनेजर अकर बुइझ जेतइ त सीधा नौकरीसऽ हटा देतइ।" किछु पाइ निकाइलकऽ कुमोनसँदमन ओकरा देबह लगलखिन। मामी कहलखिन- "हमरा देखाऊ। ........... आर दियउ। हम आहांकेदऽ देब। मामा जेकां अहुं पुरूख छी ने-मऊगीकऽ कतेक जरूरत होइ छइ से कोना बुझबइ"। दमनक हिसाबे मामी ओकरा बेशी पाइ देलखिन।दाईकऽ त ड्युटी छइ। कथीकऽ पाइ। उपरसँअत्ते डर। तखइन लइते किअए छैं। दमनकऽ भेलइन जे ई मामीकऽ पोटियाकऽ ठइग लेलकइन।राइत मे मोहन कतऽ घुरलाह। ओ केक आ मिठाई देलकइन खाई लेल। कहलकइन- हमर पड़ोसीकऽ बेटाकऽ आइ जन्मदिन छलइ। ऊयाह पठौलक अइ। बगल बाला घरसँआवाज अबइ छलइ -" अखनो दुनिया मे नीक लोक छइ जे गरीबोकऽ सुनञि छइ।" बख्शीशक पाइसऽ ओ बेटाक कपड़ा आ केक कीनलक अइछ।अपन पाइ त पहिनेहेसँजन्मदिनकऽ लेल महावीर जीकऽ लड्डू भोग लगबऽ लेल रखने छलाह। ई बेटाकऽ जन्मदिन त भगवाने अतेक नीकसँमनबा देलखिन। दमनकऽ केक आ मिठाई खेलाकऽ बाद ओइ बच्चासँभेंट करबाक मोन केलकइन। किछु आशीर्वादी ओहो देबऽ चाहइ छलाह।केक खेबाक उपरांत अतबा बनञि छलइ। ओकर बगल बाला कोठरी मे मोहन संग जखइन ओ जाइ छइथ त देखइ छथि जे उएह मामीकऽ अस्पताल बाली "दाई" सीधा पल्ला साड़ी मे माथ झंपने बेटा संग खेला रहल अइछ। दुनु गोटे स्तब्धभऽ गेलाह। दमन किछु पाइ बच्चाकऽ हाथ मे दऽ घुइड़ गेलाह। ओकर रतुका ड्युटी होइ। ओ राइत मे अस्पताल आ दमन ओकर पड़ोस मे मोहन कतऽ । अखइन तक देखा-देखी भेले नञि रहइन। आब अपन सोच पर अफसोस होइन। आरो "बख्शीश" मे मामी किअएह नञि देलखिन।दमने लग सब पाइ रहइन......जे चाहितइथ,दऽ सकइ छलाह......ऊपरसँमामियो कहिये देने छलखिन। ठीके पुरूख किछु नञि बुझई छइ। आब उनका बड़का लोकक उदारता नीक लागऽ लगलइन। मोने मोन सोइच लेने छलाह जे आब कहियो " बख्शीश" पर संदेह नञि करताह। टीस (लघुकथा) ककरो ककरो जीवन मे अतेक जल्दी जल्दी बदलावक बयार बहअ लगइ छइ जे ओ सोचऽ पर मजबुरभऽ जाइया कि कोनो कथाकऽ पटकथा त नञि तैयारभऽ रहल छइ।अहुना की कोनो जीवन छइ-क्षण मे अट आ क्षण मे पट। अखइन देवनाथ, नबका डेरा भेटअकऽ खुशीकऽ एको मिसिया आनंद लेबो नञि केलाह ....डेरा छुटियो गेलइन। आहां एना बुझु जे छोड़अ परलइन। ओ नञि छइ-"जायब नेपाल त कपार संगे जाइत।" गामसऽ नबे नब देवनाथ दिल्ली आयल छलाह। अतऽ ओ अपन संबंधी विद्यार्थी कतऽ ठहरल छलाह। आब एलाह उपरांत उनका लेल डेरा तकनाई शुरू भेल। तहिया दिल्ली मे लोक एक सांझ खुआ दइ छलइ, लेकिन रहअकऽ नञि कहइ छलइ। ओना अखनो ईएह हाल छइ। सब महानगर मे ईएह हवा बहल छइ। "मुंह देख मुंगबा" छलइ। खुबऽ लऽ दऽ कऽ अबइत छी, तखन त नञि कोनो दिक्कत। अन्यथा ज्यों कतउ धरना खसाअ देलियई त बाद मे सुनऽ पड़त- " खाता था और यहीं पड़ा रहता था। इतना हगा कि मेरा पाखाना का हौज भर गया।" ई सब खिस्सा ओ गामे मे सुनने छलाह। दु तरहक समाज छलइ। विद्यार्थी आ मजदूर वर्ग त अपन नब लोककऽ ह्रदयसँस्वागत करय छलइ लेकिन जे पांच- दस बरख पहिने दिल्ली आयल छलाह आ परिवार संग रही रहल छलाह- ओ त अपना घर पर किनको टपअ नञि दइ छलखिन। तखनो जे आइब गेलाह त उनका उच्छन्नर मचाकऽ ध दइ छलखिन। गलतीसँजे ओ घरबइया,अपन घर कीनने छलाह- तखइन त बुइझ लीयह, उनकासँबूधियार कियो नञि। सबसं बढ़िया उनके कलोनी आ सबसं बेहतर उनके मकानक नक्शा.....सबसं दामों बेशी उनके घरक।सुनञित रहु-प्रवचन.......। अपनाकऽ त कथी दुन बुझई छलाह घरबइया, मुदा आगंतुकभऽ गेलखिन " बिहारी।" उनकासँबेशी कर्मठ कियो नञि। बेचारा मोने मोन कान पकड़ई छल आ लगले बिदा होइत छल।ई असुरक्षाक भावना छलइ या किछु आओर-से नञि जाइन। अही सब हाल मे देवनाथ आयल छलाह।अबिते लाइग गेलाह "डेरा" ताकऽ । डेराकऽ त कोनो कमी नञि छलइ- जेकर कमी छलइ, ओ छल "ढऊआ"।ओइ बजट मे नोयडा मे घर भेटइन- तखइन होइन जे नोयडा त उत्तर प्रदेशभऽ गेल.......तखइन पटने कियैक नञि। नोयडाकऽ नाम फर नाक भौं सिकुड़अ लगइन। दौड़ धुपक बाद प्रीत बिहार मे एकटा चारिम मंजिल पर बंद फ्लैट भेटलइन। आब भेल- रुममेटकऽ तकनाई। ओतेक किराया असगर त संभव नञि छलइ। जिनका माध्यमसँडेरा भेटलइन-ओ सेहो संग रहबाक प्रत्याशी छलाह..... लेकिन दावेदारी खुइलकऽ नञि केने छलाह। तेसर एक गोटे आर नब विद्यार्थी माधव आयल छलाह,ओ एक कुड़ी सेहो भेलाह..... किरायाकऽ लेल। ई देखू - अखइन देवनाथकऽ अयलाह एक महीना नञि पुरलइन- उनकर एकटा गंऊआ प्रभात परीक्षा दइ लाय, ऊपरसँसेहो आइब गेलखिन। देवनाथ अपने पाहुन.....आब पाहुनकऽ पाहुन....... युद्ध स्तर पर इनका लेल डेरा ताकल गेल। डेरा लेल बुझु की सतगामा हकार पठाओल गेल छलइ। एजेंट त सट देने घर दिअय दइतइ, लेकिन ओ तऽ पैसा लेतइ, तैं ओकरा अइ मे नञि कहल गेल छलइ। "डेरा"कऽ चाभी भेंट गेल छलइन। देवनाथ आ माधव भोरे प्रीत विहार गेलाह। घर मे सऊंसे कबुतरक बीट छिड़ियाल......... महीनोंसँघर मे झाड़ू नञि पड़ल......गंदगीक अंबार लागल। एरिया बड्ड सुन्नर छल। कोठी चारु कात। ईहो कोठियेकऽ चारिम तल्ला छल। सबसं पहिने दोकानसँझाड़ू,फिनायल, पोंछा, बाल्टी, मग सब कीन कऽ दुनु गोटे अनञि गेलाह। फेर शुरू भेल सफाई अभियान। दसो बाल्टी कुड़ा कबाड़ा सब घर मे छलइ। अपन डेरा आ नीक एरिया देख कऽ दुनु गोटे जोश मे छलाह। जवानी मे त अपने नशा होइ छइ।खुब चमचमा देलखिन घर के। अइ डेराकऽ बालकोनीकऽ सामने वाला घरक छत पर चाइर टा सुन्दर लड़की सेहो ठारभऽ कऽ इनकर सबहक सफाई देखइ छल- आपस मे हंसी मजाक करय छल। किछु चुहलबाज़ीभऽ रहल छलइ ऊमहर। देवनाथकऽ नजइड़ जखइन ओमहर जाइन त ओ सब मुस्कियाईयो दइन। फेर की छलइ। भुख पियास सब दुनु गोटेकऽ हेरा गेलइन। आठ बजे भोरसँतीन बजे दिन तक ओ सब लागल रहलाह आ घरकऽ चमचमा देलाह। सामने बला छौंड़ी सब सेहो अधिक काल इनका सबके तकिते रहलइन। आब त देवनाथकऽ भेलइन जे असली दिल्ली त ओ आब एलाह अइछ। अतऽ बढ़िया समय बीततइन। अकरा सबहक आंईख मे उनका अपना लेल दोस्ती देखा रहल छलइन। ओ तऽ आब उमंग मे आइब गेल छलाह। जे सुनने छलाह जे दिल्ली मे एना होइ छइ.....ओना होइ छइ......सब पुरा बुझाय लगलइन। किछु किछु ओहो सब इशारा केलकइन आ ईहो इशारा मे ज़बाब देलखिन। होइन की सामान लइयेकऽ कीया नञि एलऊं। जायकऽ मोन नञिकऽ रहल छलइन। नब ताला, फ्लैट मे लगाकऽ दुनु गोटे घुरलाह।प्रभातकऽ सेहो अनबाक छलइन। ओ अतऽ सँअनभुआर छल। ओकर त देवनाथे ने अप्पन एतऽ । सात बजे सांझ मे देवनाथ, माधव आ प्रभात सब सामानलऽ क उमंगक संग प्रीत विहार अयलाह। फ्लैटकऽ बल्ब सब बदलला आ सामान सब रखलाह। घर आब बेशिये नीक लाइग रहल छलइन। बिछान तिछान सेट केलाकऽ बाद घुमअ निकललाह। उम्हरेसँतीनु गोटे खाअ पीअकऽ घुरलाह। नीचेसँदेखइ छइथ जे घरक लाइट जइड़ रहल अइछ। तीनु गोटेकऽ नीकसँयाद छलइन जे बत्ती मीझा कऽ आयल छलाह। सीढ़ीसँदौड़इत उपर चढ़लाह। देखइ छइथ जे उनकर सबहक सब सामान पैककऽ कऽ फ्लैटक दरवज्जा पर बहरी मे राखल। घरक अन्दर चाइर टा देवनाथसँकनी वयस मे बेशी लोक सब बैसल छल। सामने छत पर ऊयाह लड़की सब ओहिना ठार....हंसइत....अकरा सबसँबतियाइत। इनका सबके ओ कहलकइन जे हम "डेरा" भारा पर नञि लगायब। आहां सबहक सामान बहरी मे अइछ। सामान उठाऊ आ चलइत बनु। देवनाथ गामसँअखनेआयल छलाह। उनका अतुका ई रंग ढंग बुझा नञि रहल छलइन। ओ बहसा बहसी करऽ लगलाह। कहलखिन- हम त आहांसँचाभी नञि लेने छी। जे देने छइथ, उनकासँआहां सब गप्प करु। ओ बाजल- उनका खबरकऽ देने छियइन। ओ अबिते हेताह। -ताबइत हम सब नञि जायब। बरजोरी करब त ओ ठीक ककरो लेल नञि। -बरजोरी हमरा सब लेल नब नञि, लेकिन आहां पढ़अ आयल छी ......घरकऽ बड्ड नीक साफ केलऊं अइछ, तैं हमरा सबकऽ बरजोरीकऽ विचार नञि। ओना आहां चाहब त कऽ देब। ईएह सब गरमा गरमी चइल रहल छलइ ताबइत प्रभात, देवनाथकऽ धीरेसँकहइ छथिन - हमरा निन्नकऽ स्टीम बइन गेल‌‌‌ अइछ। जल्दी करय जाऊ..... हमरा सुतबाकऽ अइ। ई सुनिते देवनाथकऽ देह मे आइग लाइग गेलइन। ओ त सोइच रहल छलाह जे बदमशवाकऽ अइ चारिम तल्लाकऽ बालकोनीसँउठा कऽ नीच्चा फेंक दी। आ प्रभातकऽ देखू निन्न लाइग रहल छइन। एहनो मनुक्ख होइया।कतऽ मार पिटाईकऽ स्थिति छल, आ इनका निन्न लगइ छइन। देवनाथ त बुझई छलाह जे चाइर गोटे बदमशवा सब अइ, त तीन गोटे हमहु सब छी। एक गोटेकऽ ऊपरसँफेंकते ई दिल्ली बाला सनटिटही सब की टिकत। सबकऽ माइड़ कऽ भगा देबइ। जे हेतइ से देखल जेतइ। अइ छौंड़ी सबहक सामने बेज्जती कतउ बर्दाश्त होइ। माधव सेहो बहस मे देवनाथकऽ संग छलाह। प्रभात आब समस्या बुझाय लगलखिन।उनका कोनो मतलब नञि अइ सब सं। देवनाथ उनका डेरे डेरालऽ कऽ घुईम रहल छइथ आ इनका देखू। ओ ओतइ एकटा कुर्सी पर बैसल ऊंघा रहल छलाह। थोड़े काल बाद शैलेश जे चाभी दियेने छलखिन आ अपनो अतइ रहअ बाला छलाह- सेहो अयलाह। उनको बदमशवा सबसँअलगसँगप्प भेलइन। ओ अकरा सबकऽ देख कऽ डरा गेल छलाह। फ्लैटक ताला त ओ सब तोइड़ चुकल छल। देवनाथकऽ सामान पैककऽ देने छलइन। सुतली राइत सामानक संग संबंधी विद्यार्थी कतऽ घुरलाह। भइड़ दिन जे घर साफ करऽ मे जे मेहनत केने छलाह, से देह आब दुखाइत छलइन। कतेक खुशीसँसब काज केने छलाह......की की ख्याल मे आयल छलइन। एक्के बेर सब वज्रपातभऽ गेलइन। कानल कनिया .....घुरिये गेल........... बाला हाल भऽ गेल छलइन। मोन मे ईएह घुरियाइन कि घर साफ करबाबइ लेल तं ई कोनो योजना चल........वा उनका संग धोखा भेलइन........ओ छौंड़ी सबकऽ ई हस्र होइत, से बुझल छलइ- तैं हंसई छल......पहिनेहो आरो ककरो संग एना भेल छइ?...... जे भी होइ, धोखा त भेले छइन आ ओहोसँबेशी ह्रदय पर डाका।ई "टीस" सबदिना रहबे करतइन। विश्वासघात (लघुकथा) पहिलुका समय मे रामबाबूकऽ समाज मे सब कतऽ , नञि किछु त पइनभरनी वा रार- रारिन होइते टा छलइ। अहनो लोक जिनका कतऽ दुनु सांझ चुल्हा जरऽ पर संदेह- उनको कियो नञि कियो खबासिन छलइन।भोज भातकऽ बाद जुठ उठबऽ खातिर ककरो कहऽ कऽ नञि पड़ई.......खतबे टोलीकऽ स्त्रीगण आ बच्चा सब जुठ पात पर टुइट पड़ई आ बदला मे सब साफ़कऽ दइ। ओकरो सब मे ककरो पाइन चलइ आ ककरो नञि। ई वर्गीकरण सब समाज मे रहइ। रामबाबूकऽ परिवार मे त जेना जमीन-जथाकऽ बंटवारा होइ.......ओहिना नौकर-चाकरकऽ सेहो।ई नौकर सबहक घर, जिनकर जमीन पर छलइ, उएह ओकर मालिक भेलइ।ओइ नौकरक कनिया इनकर सबहक पइनभरनी आ जे तेज तर्रार नौकर, से खबासभऽ जाइ छल। कखनो आहां भोर मे सुइतकऽ उठ्ठू.....सब घइल पाइनसँभरले भेटत। ज्यों एक टा दुखित होइ त ओकरा दोसर संग गठबंधन रहइ..... ....ओ आइब कऽ भइड़ दइ छलइ। बिना नागाकऽ ई व्यवस्था चलइत छलइ। पाइनो की त, धार वा ईनारसँअबइ। खेनाई पिनाई ईनारक पाइनसँआ कपड़ा लत्ता, कनिया बहुरियाकऽ नहेनाई धोयेनाई, पाहुन परख-ई सब लेल पोखइड़ वा धारसँपाइन अबइ छल। ईएह ढर्रा पैघ छोट सब घर मे छल। पाहुन परख आ बेटीकऽ ऐला गेला मे एक दोसरसँमंगनचन होइ......अकरा खराब नञि मानल जाइ। पाहुन आ बेटी त समाजक होइ छल। जे रामबाबू, सर संबंधीकऽ टेल्हवा कहू वा नौकर, पठबइ छलखिन- से अपने आब बेलल्ल भेल छइथ।जहियासँसिकमी बटाई बाला केस हारलाह, सब नौकर चाकर ठेंगा देखा देलकइन। पछाइत एहन ने उजाही मचलइ- सब सोलकन गाम छोड़िकऽ चइल गेलइ। दु चाइरटा ओइ मे सऽ बम्बइ मे ततेक ने कमेलकइ जे ओकरे देखाऊंस सबके लाइग गेल छइ। आब त रामबाबूकऽ एकटा दिअयद ओकर बम्बइ बाला होटल मे खेनाई बनबइ छइथ। सब दुसधा सब नक्सलाइटभऽ गेल छइ। बाबु भैया सब डरे डरायल रहइ छइथ। मालिक कहि दइ छइन-ओतबेसँतिरपित। रामबाबू सबदिना नौकर चाकर रखलाह। कतउ नोता पिहानी मे जाइथ, तखनो एकटा संगे जाइन। कनिया उनकर जयथुन वा नञि, लेकिन नौकरबा जेब्बे करय।मालिशकऽ करितइन पहुनाई मे! आब अइ विकट समय मे उनकर समईध एक टा टेल्हवा जोगियाकऽ पठा देलखिन। ।उनकर समधियाना मे जोगिया माय पइनभरनी छल। बिधवा छलाय त सोचलक जे दु पेटसँएक पेटभऽ जाइत। एक गोटेकऽ तऽ कोनो हवेली बाला खुआ देतइ। घर होइ बेशी भीते के, मूदा कहाइ "हवेली"।एक्के दु घर कोनो गाम मे कोठा होइ छलइ। जोगिया बारह तेरह बरखक छल, जहिया रामबाबू कतऽ आयल। नीक नुकुत खेला उपर देह ओकर फुइट गेल छलइ। नौकर चाकर त गोर कम्मे होइ छलइ- लेकिन जोगियाकऽ रंग साफ छलइ। ओ देखबा मे रामबाबूकऽ घरक धीया पुतासँकनिको कम नञि लगइ छल। कतेक नब लोक त ओकरा उनकर बेटे बुझई छलइन। जोगियाकऽ रामबाबू माइनतो बड्ड छलखिन।ओ जोगियाकऽ ल कऽ अपनो धीया पुताकऽ बिगइड़ दइ छलखिन। रामबाबू जमाना देखने छलाह आ ओइ अनुसार अपनाकऽ बदइल लेने छलाह। उनकर कहबाक छलइन - " जोगिया दोसरकऽ बच्चा छइ....... ज्यों अपन बच्चा ओकरा नञि बुझबइ त एक दिन नञि टिकत। जे काज ओ कऽ दइया, से काज कियो अप्पन नञि करत। " अहिना जोगियो, रामबाबूकऽ ध्यान रखइन। जोगियाकऽ मायकऽ समय समय पर रामबाबू पाइ पठा दइ छलखिन।ओकर कखनो समाद नञि अबइ जे जोगियाकऽ घर पठा दियउ........देखबाकऽ मोन करइत अइछ। बस पाइ भेट जाइ आ ओ खुशभऽ जाय। तखनो रामबाबू दु-तीन बरखकऽ बाद जोगियाकऽ ओकर गाम घुमा दइ छलखिन। जोगिया सेहो अतऽ खुब खुश छल। ओहो कखनो मायकऽ मोन नञि पारय। जखइन जोगिया अठारह उन्नैस बरखक भेल त ओकरा किछु चोरऊका समाद अपन घरसँएलइ।ओ रामबाबूकऽ कहलकइन जे एक बरख करीबभऽ गेल.......हम गाम जाय चाहइ छी। ओइ समय मे रामबाबूकऽ हाथ मे ओते पाइयो नञि रहइन.....ओ ई बात ओकरा कहलखिन। जोगिया बाजल- की हेतइ। आहां बाद मे पठा देबइ। हम त लगले घुइड़ जायब। बुझु की...बेशीसँबेशी दस दिन मे अतइ छी। रामबाबू एकगोटे संग ओकरा घर भेजबा देलाह। दस दिन की बीस दिन बीत गेल। फेर महिना दु महिना ......तीनो महिना बीत गेलइ। जोगिया नञि आयल आ नञि अपन बकियौता पाइकऽ लेल कोनो तगेदा। आप रामबाबू अपन समधियानासँपता केलाह। जोगियाकऽ समाज मे बच्चे मे बियाहभऽ जाइ छइ। गौना छंटगर भेलाकऽ बाद होइ छइ। ओ जे जोगियाकऽ चोरऊका समाद छेलइ से ओकर कनिया पठेने छलइ-जोगियाकऽ बियाह सेहोभऽ चुकल छलइ.....अतऽ ककरो नञि बुझल। जोगियाकऽ समान मेसँपुर्जी निकललइ......लिखल छलइ-" अगर तौं अइ फागुन मे गौना नञि करेबऽ त ओकर बाबु ओकरा दोसरा संग बियाईह देतइ। तोहर मायकऽ कयेक बेर समाद पठावल गेलइ-ओ कान बात नञि दइ छइ। जल्दीसँदिन तका कऽ पठबियह..... ज्यों चाहइ छह। नञि तं लइत रहियअ घंटा"। ओ सैह बात रहइ। जोगिया माय गौना कराअ क, फेर एक पेटसँदु पेट नञि करऽ चाहइ छल। तैं ज़बाब नञि देने छलइ। जोगिया गौना करेलक आ घरबालीकऽ अनलक। खर्चा बइढ़ गेलइ। जोगिया माय सेहो बुढ़ भऽ गेल छल‌‌‌। ओकरोसँकाज धंधा नञि होइ। जोगियाकऽ नीक नुकुत खायकऽ आदतभऽ गेल छलइ। कनी जीभलाह ओ शुरुयेसँछल। ओकर एकटा ससुरक भाइ दरभंगा मे हलुवाईकऽ काज करय छलइ। ओ अकरा कहलकइ- "मेहमान! तौं दरभंगा आइब जाह। हम सब सीखा देबऽ । हुनर भऽ जेतऽ , त भइड़ जीवन बिना बोझा ढोने, नीक नुकुत खाइत पीयइत बीत जेतह।" जोगिया देखलक जे गाम मे त ओ आब जन बाला मजुरी कऽ नञि सकइत अइछ। रामबाबू जे पाइ दइ छलखिन ओइ मे ई दुनु सास पुतोहुकऽ निभनाई असंभवे छइ।ओकर समाज, घरवालीकऽ बभनटोली मे काज करऽ नञि देतइ।अइ हालात मे, होटल बाला काज ओकरा ठीक बुझेलइ। सोचलक जे गप्पकऽ कऽ देखी पहिने। दोसर दिन दरभंगा " सत्कार होटल" गेल। ओकर कुटुम्ब, होटल मालिकसँगप्प केने रहइ। चाइर दिन बादसँकाज पर अयबाक छलइ। जोगिया सोचलक जे रामबाबूकऽ समाददऽ दिअयन जे ओ दोसर काज पकइड़ लेने अइछ। ओकरा साहसे नञि भेलइ। ओकराभऽ रहल छलइ जे ओ उनका संग विश्वासघातकऽ रहल अइछ।ओ गाम चइल गेल। चाइर दिनकऽ बाद अपन कपड़ा लत्ता संग होटल पर आइब गेल। भोर सांझ ओ हलुवाईकऽ काज सीखय आ बाकी समय बैरा वाला काज करय। एहन ने चिक्कन चिनमुन ओकर हंसइत चेहरा रहइ जे गहकी सब आकर्षित होइ। बोली-बानी ओ रामबाबूसँसीखिये लेने रहय। होटल मालिक सब देखइ छल। ओ जोगियाकऽ काजसँखुश छल। जोगिया सेहो अइ नब परिवेश मे मजालऽ रहल छल। दिन भइड़ तरह - तरहकऽ लोक सब होटल मे अबइ जाइ छलइ। अहिना एकदिन रामबाबूकऽ एकटा गऊंआ मोहन ओइ होटल मे अयलाह। उनकासँआर्डर लइ लेल जोगिया आयल। दुनु एक दोसरासँपुरना गप्प शप्प कयलाह। जोगिया मालिकसँकहि कऽ किछु छुट सेहो दिअय देलकइन। रामबाबूकऽ बेटा रमेश सेहो दरभंगे मे रही कऽ पढइ छलाह। मोहन, जोगिया बाला गप्प रमेशकऽ कहलखिन।रमेश तखने सत्कार होटल गेलाह।ओतऽ जोगिया भेटलइन। ओ कहलखिन - कहिया जेबें। ओ बाजल- अतऽ सँनिवृत होइ छी, फेर जायब। बहुतही ठंडा व्यवहार छलइ जोगिया के। चाहो ताह लेल नञि पुछलकइन। ओ तऽ अपने आपकऽ दोषी बुझई छल। रमेश, होटलक मालिकसँगप्प केलाह। ओहो अनठियाले जेकां ज़बाब देलकइन। रमेश घुइड़ अयलाह अपन कमरा पर। आब जुगत भीरबऽ लगलाह जे केकरा कहलासँहोटल वाला बात मानत। उनकर एकटा संबंधीकऽ संगी दरभंगाकऽ बड़का बापक बेटा छलाह। उनकर बड़का टा मकान होटलकऽ लगे छलइ। रमेश ओइ संबंधीकऽ ल कऽ ओ बड़का लोक कतऽ गेलाह। ओ पुरा आगत स्वागत केलखिन आ इनकर सबहक संग सत्कार होटल अयलाह। ओतऽ होटल बालाकऽ बिगड़बो केलखिन जे आहां हमर संबंधीकऽ नौकरकऽ अपना कतऽ किअए रखने छी। होटल मालिक हफ्ता दिनकऽ समय लेलकइन, जे ओ जोगियाकऽ द देतइन। सात की दस दिनकऽ बाद जखइन रमेश होटल गेलाह त जोगिया कहलकइन - ओ जे फलां बाबूकऽ बेटा आहां संग ओइ दिन आयल छलाह, से बाद मे फेर आयल छलाह। होटल मालिककऽ केबिन मे ओ हमरा कहलाह -" जतेक पाइ आहांकऽ रामबाबू दइ छइथ, ओकर दुन्ना हम देबऽ । तौं हमरा कतऽ रह।" दु बरखसँउनको दरभंगा डेरा पर नौकर नञि छइन-परेशान छलाह। जोगिया उनका त़ किछु नञि कहलकइन लेकिन होटल मालिककऽ कहलकइ- " हम रामबाबू मालिक कतऽ नञि रहब त दोसरो कतऽ नञि रहब। हम आब बम्बइये जाइ छी, गऊंआ सब लग"। रमेशकऽ ततेक ने अइ बातक तकलीफ भेलइन जे देखू फलां परिवारकऽ भ कऽ ओ दरभंगा बाला केहन विश्वासघात केलाह। जोगियाकऽ कोनो गलती नञि, तखनो ओकरा अपन दोष बुझाई आ ई फलां बाबूकऽ बेटा भऽ कऽ पाछुसँगेम खेलाय लगलाह। ओ मोने मोन सोइच लेलाह जे आब बिना नौकरकऽ रहनाई सीखऽ कऽ अलावा कोनो चारा नञि। जे जतेक पैघ, उनकर दीन ईमान- ओतेक छोट। विश्वासघाती सबतर बैसल आ पैसल छइथ। पापक फल (लघुकथा) महेन्द्र मिश्र सुभ्यस्त लोक छलाह। बड़का बासडीह -अग्गहसऽ बिग्गह तक,पोखरा पाटन, मंदिर, कलम, खरहोइड़, बसबिट्टी, धनहर खेत आ छहइड़क कात कतउ सऽ कतउ जमीन उनका छलइन। जहिया जन्म भेलइन तहिया दु टा कोठरीकऽ दरबा जकां घर छलइन। अपने अर्जन कऽ कऽ सब ठार केलाह अइछ। अइसँई नञि बुइझ लेब जे खुब कमेला अइछ!कहक लेल वकालत करय छलाह। अपने केश लड़इत लड़इत वकीलभऽ गेलाह। ई सब सम्पइत, उनकर परिवार मे छलइन। मूदा की? कोना? तहिया उनकर दादाक( पिताकऽ ओ दादा कहइ छलाह) संग बंटवारा मे भेलइन। दु टा कोठरी टा हिस्सा मे पड़लइन। बच्चा महेन्द्र एक बेर अपन दादा संग सुदन बाबु कतऽ गेल छलाह। सुदन बाबु जिलाक बड़का मोख्तार छलाह। ओ इनकर दादासँपुछलखिन जे इनका कतउ पढ़ाकऽ मास्टरी धरा दियउन।हिनकर दादाकऽ जवाब छलइन जे मास्टरी ई मना करय छइथ। तइ पर उनकर जवाब छलइन-" त की मोख्तार बनताह "। घमंड मे डुबल सूदन बाबुकऽ ओ बात महेन्द्रकऽ आगु बढ़बा लेल प्रेरित कऽ रहल छलइन । महेन्द्र बच्चेसँजमीन जालकऽ बंटवाराकऽ लेल संघर्ष करइत छलाह। सुप्रीम कोर्ट तक गेलाह.....केश जीतलाह.......फेर धीरे धीरे सब किछु ठार केलाह। संघर्षकऽ संग संग वकालतोकऽ पढ़ाइ-लिखाई पुरा केलाह।मोख्तार त नञि, ओइसँएक डेग आगु वकील बइन गेलाह। आब त दादा नञि जीबइ छथिन। रहितथीन तं, बड्ड गर्व होइतइन। अपने ओ पढ़ल नञि छलाह, लेकिन पढ़बाक बड्ड सेहन्ता छलइन। जखइन सम्पइत अबइ छइ त ओ अपना संग फुसियाही "शान" सेहो अनञि छइ।ओइ मे ज्यों आहां किछु केस मोकदमा जीत जाऊ त अपनाकऽ "अजातशत्रु" लोक बुझअ लगइत अइछ। महेन्द्र मिश्र संग सेहो सैहभऽ गेल छलइन। अपनाकऽ आब जमींदार बुझअ लागल छलाह। उनकोसँबेशी उनकर धीया पुता सब मे ई बीमारी आइब गेल छलइन। एक दिन महेंद्र मिश्रकऽ पोखइड़ मे इनकर बेटा गजेन्द्र दतमइनकऽ कऽ कुरूरकऽ रहल छलाह। तखने एकटा मलाहिन खखार फेंक देलकइन पोखइड़ मे। पाइन मे दहाइत ओ खखार हिनकर सामने आइब गेलइन। गजेन्द्रकऽ खखार देखते पारा चईढ़ गेलइन। ओ ओइ मलाहिन पर बिगड़ला..... किछु अवाच कथा सेहो कहलखिन। ओहो मलाहिन उल्टा उरेब बाईज देलकइन। बस आब की छलइ। खीसे माहुर भेल गजेन्द्र ओकरा पर हाथ उठा देलकिन। एक त उनकर पोखइड़, दोसर खखार फेंकलक आ उपरसँमहेन्द्र मिश्रकऽ बेटा, कतउ बर्दाश्त होइ। ओ मलहिनिया कनञित अपन घर गेल। मलाह टोल आ दुसधा टोली दुनु सटले छलइ। ओना दुनु टोल मे बात बात मे माइड़ पीट होइ। दुगोला छलइ ओकरा सब के। लेकिन अतऽ त बभनटोलीकऽ गप्प छइ।आइ मलाहिन संग भेलइ त काइल दुसधिन संग सेहो हेतइ। ई रोग काटनाई जरुरी छइ। दुसध टोली आ मलाह टोलकऽ सब मऊगी -मर्द लाठी ,भाला, गड़ांस, जेकरा जे भेटलइ-लऽ कऽ महेंद्र मिश्रकऽ दरबज्जा पर आइब गेलइन। लोहा बाला बड़का गेटकऽ बंदकऽ कऽ अइ कातसँमहेन्द्र मिश्र लाईसेंसी बंदुककलऽ कऽ ठार आ उमहरसँओ भीड़। ओ सब कहइन जे आहांसँहमरा सबकऽ कोनो दुश्मनी नञि। हमरा सबकऽ गजेन्द्र चाही। ओकरा हिम्मत कोना भेलइ मलाहिन पर हाथ उठबऽ के। गजेन्द्रकऽ ताबइत घरसँपाछु मुंहे भगा देल गेल छलइन। बड़ी काल ई खेल चलल। आरो गऊंआ सब आइब गेल। अतइ पंचैती भेल आ किछु आर्थिक दंड गजेन्द्र पर ठोईक कऽ मामलाकऽ रफा दफा कयल गेल। महेन्द्र मिश्र जे आइ तक कहियो नञि हारल -अइ बेइज्जतीसँअपमानित महसूसकऽ रहल छलाह। उनका आब ईहो पता लाइग गेल‌‌‌ छलइन जे उनके दिअयदक लोक जिनकासँकेस मोकदमा चलल छलइन-उएह सब अकर पाछु छइथ। आब शुरू भेल "आपरेशन बदला"। महेन्द्र मिश्र अपन सब बेटा बेटीकऽ संबंध उएह घर मे करय छलाह जे लाठीसँमजगुत होइथ वा थाना पुलिस पर प्रभाव होइ। आब जे सब अगुआ छलइन उनकर घर पर चढ़ाइ करऽ मे ओकर सबहक सुची बनल। अलग अलग जिला कचहरी आ थाना सब मे मोकदमा दायर कैल गेल। आब ओतऽ कऽ पुलिसकऽ बजा कऽ ओकर सबकऽ गिरफ्तारी भेलइ। कोर्टकऽ नोटिस सब अबइ- अकरा सब पर। जेहल गेला पर जमानत करबहो मे बड्ड पाइ लाइग जाइ। ओ सब परेशानभऽ गेल छल। फेर पंचायती भेल। गजेन्द्र मिश्र पर जे आर्थिक दंड लगायल गेल छल से हटावल गेल। ओकर बाद जतेक जगह पर जे केस दायर छल- ओइ सब मे समझौता फाइल कैल गेल। पोखइड़ मे थुक फेकनाई पर रोक लागल। एनाकऽ कऽ दबाव बना कऽ समझौता भेलइ। ई परेशान करक लेल, झुठा केस केनाई तहिया आम बात होइ। कहबी छलइ- " बिन भय न होबे प्रीत।" महेन्द्र मिश्रकऽ एकटा जमाय रामा ठाकुर समस्तीपुर जिला मे सेहो छलखिन। ओतऽ महेंद्र मिश्र अपने गेल छलाह आ ओतुका कोर्ट मे केस फाइल भेल छलइ जे फलां मुखिया आ फलां मुखिया अतऽ समस्तीपुर डेरा पर आयल .......राइत मे ठहरल आ फलां सामान सब चोरा कऽ पराअ गेल। पुलिस जांच मे घटना सही पावल गेलइ। ओकरा सब पर वारंट निकललइ......सब गिरफ्तारभऽ कऽ समस्तीपुर जेहल भेजल गेल। जखइन समझौता महेन्द्र मिश्रकऽ गाम मे भेलइन तखइन अतउ ओकरा सबकऽ जमानत भेटलइ। ओ सब अइ बेर रामा ठाकुर कतऽ आयल छल। ओ मल्लाह सब लड़ाई मे थाईक गेल छल‌‌‌। रामा ठाकुर सबकऽ गोर लाइग कऽ गेल छल। जाय काल मे कहने रहइन जे हम सब त अपनेकऽ गामक कुटुम्ब बुझइत रही। अपने एना करब, से नञि उम्मीद छल। छोड़ु ।आब माइट दियउ सब पर। ओ सब जेहल गेलासँदुखी छल। रामा ठाकुरकऽ सेहो अफसोसभऽ रहल छलइन। ओ मलहा सब बड्ड आदर दइन उनका। तरह तरहकऽ माछ-मखान सब सासुर गेला पर खुआबइन ओ सब। आइ महेन्द्र मिश्र सेहो दुनियासँचइल गेल छइथ। समस्तीपुर मे एकटा हत्याक केस मे निर्दोष रामा ठाकुर गिरफ्तार भऽ जेहल गेलाह अइछ।रामा ठाकुर कतबो पुलिस वालाकऽ कहलखिन जे ओ निर्दोष छइथ। ओ कहलकइन -" जे कहबाक अइछ, कोर्ट मे जा कऽ कहब। हमरा सबकऽ ऊपरसँआदेश अइ"। रामा ठाकुर बुइझ गेलाह जे ई मलहाकऽ "आइह" अइछ। ओइ निर्दोषकऽ तहिया ई जेहल भेजबेलखिन, आइ ओ अपने जा रहल छइथ। ई सब उनके " पापक फल" छइन। सब अतइ भुगतऽ कऽ पड़ई छइ। अखइन नञि भुगतता त अगिला जन्म तक पाप खिहाड़इत रहतइन। हाथक लकीर (लघुकथा) जहियासँकबीर विदेशसँघुइड़कऽ अयलाह अइछ, बेशी काल ऋषिकेश जाइत रहइ छइथ। अकर पाछु दु टा कारण छइ- एक तं दिल्लीकऽ प्रदुषणसँमुक्ति आ दोसर गंगा माईकऽ कोरा मे रहबाक सौभाग्य। विदेशो मे नदी सबकऽ माय जकां बुझल जाइ छइ। ओतुको सब नदी उनका गंगेजी बुझाई छलइन...... अतऽ त असली गंगा माई छथिन। ओ कोनो ने कोनो बहाने उनका लग जाइत अबइत छलाह। ऋषिकेशकऽ दिल्ली सदन इनकर अड्डा भऽ गेल छलइन। दिल्ली सदन एकदमसँगंगा कात मे छलइ। दुरसँदेखला पर बुझईता जे गंगेजी अपन अंचरा मे अकरा लेने छथिन। अतऽ निश्छल गंगाजी बहइत रहइ छइथ। ओ धारा बहअकऽ जे कलकल ध्वनि छइ- से कबीरकऽ सम्मोहित कयने छइन। ओ अतऽ आर किछु नञि करय छइथ.......बस दिल्ली सदनक जे गंगा कात मे बेंच लागल छइ.......ओइ पर असगरे बइसल ओ धुन सुनञित रहइ छइथ।उनका ई धुन सब समयक अनुसार अलग अलग सुनाइत छइन। जेना शास्त्रीय संगीत मे भोरूका,दुपहरिया, संझुका, रतुका सब मे अलग अलग राग गाबल जाइ छइ, ओहिना हिनका सब बेर मे अलग अलग राग सुनाइत रहइ छइन। नदी उएह, धारा उएह, गति उएह, वेग उएह,स्थान उएह, समय उएह आ व्यक्ति उएह........तखइन एना किअए पाइनक बहाव उनका राग मे डुबल गीत लगइत छइन। सबके एक्के आवाज हहअ.....हहअ....हहअ लगइ छइ, इनके किअए राग लगइ छइन। जे भी अकर पाछुकऽ कारण विधान होइ......कबीरकऽ अपना नीक लगइ छइन आ ओ अबइत रहइ छइथ।एक्को राइत अतऽ बिता लइत छइथ त अपनाकऽ उर्जावान बुझाय लगइ छलइन।आब त दिल्ली सदनकऽ लोकसब इनका चिन्हो गेल छलइन। कयेक बेर नञि कमरा खाली रहला पर ओ सब अलगोसँइनका लेल व्यवस्था कऽ दइ छलइन। अतऽ जलखइ, चाह आ दुनु समय भोजन, सबहक इंतजाम छलइ। कहियो कऽ बाहरोकऽ दीन- दुखियाकऽ अतऽ खेनाई खुआवल जाइ छलइ। बेशी लोक त घुमअ वा किछु काजे ऋषिकेश अबइ छल.......कबीर एहन छलाह जे लोकक अनुसार ओहिना दिल्ली सदन अबइ छलाह।भइड़ भइड़ दिन गंगा कात मे बेंच पर बइसल बिता दइ छलाह। नञि कतउ जाइ छलाह आ नञि कियो भेंट करऽ अबइ छलइन।अतुको लोकक लेल पहेली बनल जा रहल छलाह। एक दुपहरिया मे बैसल देख रहल छइथ जे किछु भगवाधारी साधू संत सब दौरल खेनाई खाय लेल आइब रहल छइथ।एना ओ पहिनेहो अतऽ देखने छलाह जे दीन दुखिया सब लेल कहियो काल भण्डारा लगइ छलइ।अइ बेर ओइ भीड़ मे एक गोटे पर उनकर नजर टीक गेलइन। ओना भगवा वस्त्र मे उनका पहिने नञि देखने छलखिन....... लेकिन मूंह कान कतउ बदलइ छइ! कबीर उनका चिन्ह गेला।अखइन जे उनका टोईक दइतथिन तभऽ सकइत छलइ जे ताबइत खेनाई खत्मभऽ जाइ। पहिने आऊ आ पहिने पाऊ बाला हाल छलइ। दोसर भरल पेट मे पुछपाछ केनाई ठीक रहइ छइ। आब ओ इंतजार करऽ लगलाह.....उनकर घुरबाक। घंटा भइड़कऽ बाद ओ साधू जाय लगलाह त कबीर उनका बजेलखिन। - आहां गढ़ी माईकऽ पंडीजी थिकौंह? - हं । छी नञि, छलौंह। आहांकऽ छी? हमरा केना चिन्हइ छी? हम की आहांक बगल मे बइस सकइ छी? - हं हं पंडीजी एकदम बैसु। आहांसँहम आशीर्वादी लेने छी।चिन्हु हमरा! कतेक बेर भेंट भेल अइछ। कतबो जोर ओ साधू लगेला मूदा नञि चिन्ह सकलाह। - आहां कोनो धरफरी मे त नञि छी? अइ साधू सबहक संग त नञि कतउ जयबाक अइछ? -नञि नञि? ई सब त भोजनक संगी छइथ। अइ शहर मे भण्डारा लगइत रहइ छइ। जकरा पता लाइग जाइ छइ ओ दोसराकऽ सुचितकऽ दइ छइ। कियो ककरो संगी नञि छइ। पापी पेटक सवाल छइ, ततबे तक साथ छइ। देखबइ ने- दस मिनट मे खालीभऽ जाइत। सब अपन अपन अड्डा पर पहुंच जाइत। - चलु हमर कमरा मे। ओतऽ आरामसँगप्प करब। - हं हं। चलु। दुन गोटे कमरा मे अयलाह। आब कबीर अपन परिचय देलखिन.......छक दं ओ साधू चिन्ह गेलखिन। - आहां पंडीजीसँसाधू कहिया भेलऊं? - नञि हम पंडिये जी छलऊं आ नञि साधुये छी। सब कर्मक फल छइ।ओ जेना रखने छइथ.....जीब रहल छी। जहिया अरूदा पुरा भऽ जाइत, अपना लग बजा लेताह। - हम त अइ सदन मे अबइत रहइ छी। आहांकऽ कहियो नञि देखलऊं। - हमरे गल्ती। हम आहांक सोझा नञि अयलऊं। - नञि नञि। से नञि कहइ छी। हम त हुजुम मे अबइ छलऊं। कयेक बेर बेशी लोकभऽ जाइ छलइ तऽ बिना खेने घुराअ दइ छलाय। आब आहां छी त एना नञि भगाइत। - आब आहांक कहियो नञि भगाइत। निश्चिंत रहु। कबीरकऽ हिनकर छायावादकऽ बात आर अतीत जनबा लेल उत्साहित कऽ रहल छलइन। ई गढ़ी माई, नेपालक पंडीजी छलाह। कबीरक शहर मे लोक इनका अही रुपे चिन्हइन।कयेक टा हिनकर खिस्सा रहइन। एक बेर एकटा अधिकारीकऽ प्रोमोशन बड्ड दिनसँबाधित छलइ। ई पंडीजी, जहियाकऽ तारीख कहलखिन, तहियो उनकर प्रोमोशन भेलइन। ओ अधिकारी इनकर चेलाभऽ गेल छलाह। पंडीजीकऽ रात्रि विश्राम उनके कतऽ होइन।ओ चाइर लाइन इनकर प्रशंसा मे लिखबो केने छलखिन। प़डीजी ओकरा शीशाकऽ फ्रेम मे लगा कऽ अपन झोड़ी मे रखइ छलाह- कहला पर निकाइल कऽ देखबइ छलाह। एकटा प्रतिष्ठित ब्यापारीकऽ धीयापुता नञि होइ छलइ त पंडीजीकऽ ओ अपना कतऽ बजेने छलाह।जे तारीख कहलखिन- ओही दिन बेटा भेलइ। ओ व्यवसाई अपन हाथक घड़ी खोइल कऽ प़डीजीकऽ ईनाम मे देलकइन। पंडीजीकऽ हाथ मे उएह घड़ी बान्हल छइन। अहिना कतेक इनकर भविष्यवाणीकऽ सत्य होबाक बात फैलल छलइ। कबीरकऽ अपनो याद पड़ई छलइन जे एक बेर पंडीजी उनको कतऽ आयल छलाह। कबीर अपन पांच टा संगी संग बैठकखाना मे बइसल छलाह। मस्तीकऽ लेल पुछलखिन -" हमरा बारे मे किछु बताऊ।" पंडीजी किछु काल मौन रहला उपरांत बजलाह- " आहांकऽ बिदेशक योग अइछ।" -" बिदेशकऽ योग की! हम त जाइते रहइ छी- बीरगंज। नेपाल बिदेशे भेल नञि।" कहि कऽ कबीर अपन सब संगी संग हंसऽ लगलाह। पंडीजी गंभीर होइत बजलाह-" से जे बिदेश होइ। इनका प्रबल योग छइन। आ आहां चारु लोककऽ नञि अइ। लिखा कऽ लऽ लियह"। कबीरकऽ ओहिना मोन छइन जे उनकर संगी सबकऽ मोन हुस्सभऽ गेल छलइ- ई सुइन कऽ । कबीरक मां खुशीसँखुब अन्न पाइन पंडीजीकऽ देने छलखिन। तहिया बिदेश जयबाक अवसर कम्मे लोककऽ भेटई छलइ। आजुक जेकां नञि जे सब हरही सुरही मूंह ऊठौने बिदेश जा रहल अइछ। पूजा पाठ, ज्योतिष,भविष्यवक्ता, हस्तरेखा पढ़अ बाला- ई सब कयेक प्रकार छलइ- कहाइ छलइ सब...." पंडिते।" जेना सत्यनारायण भगवान, अनन्त आ सरस्वती पूजाकऽ लेल एक पंडित! मुड़न, जनऊ आ दुर्गा पूजाकऽ लेल दोसर पंडित! बियाह, गरूड़ पुराण आ श्राद्धक लेल तेसर पंडित !आ टिपइन, ग्रह महादशा आ एकादशी यज्ञ लेल अलग पंडित होइत छल। कियो लोकाचारकऽ ज्ञाता होइत छलाह त कियो ज्योतिषकऽ त कियो हाथक लकीरक त कियो ललाट पढ़अ बाला त कियो संस्कृतक विद्वान। ई पंडीजी अइ सब मेसँकिछु नञि छलाह- मूदा जे कहइ छलखिन से सत्तभऽ जाइ छलइ। ईहो कहल जाइ पहिने जे एक निश्चित संख्या मे जे गायत्री मंत्रकऽ जाप कऽ लइया, ओकरा मे अतेक प्रभावभऽ जाइत छलइ जे ओ कहइ छइ- से भऽ जाइ छइ।ई गायत्री मंत्र पढ़ई छलाह वा नञि- संदेहे। कबीरकऽ अपना बारे मे कहल गप्प सत्य भेलइन, तैं ओ आइ अतेक खोदबेद कऽ रहल छलाह। पंडीजी कहलखिन जे लोक उनका पकइड़ पकइड़ कऽ अपन घरलऽ जाइन आ कहऽ लेल दबाव बनाबइन। ओहो जजमानक खुशीकऽ देखइथ, कहि दइ छलखिन। जखइन ओकरा अनुसार फल नञि होइ त इनका अनाप शनाप कहऽ लगलइन। ई पंडीजी नञि ककरोसँकिछु मंगिते छलखिन आ नञि देला पर घुड़इबते छलखिन। बाद मे इनकर स्थिति खराब होबऽ लगलइन। जे बजेला पर जाइ छलाह पहिने , से बिन बजौने घरे घर जाय लगलाह। भीखमंगा जेकां लोक व्यवहार करऽ लगलइन। " जे नगर राज करी, से नगर भीख नञि मांगी"- ईएह सोइच कऽ ओ अउआइत बऊवाइत ऋषिकेश पहुंचल छइथ। अतऽ एकटा बनियाकऽ छोट छीन मंदिर छइ। ओइ मे ठाकुरजीकऽ दुनु सांझ पूजा करय छइथ। मंदिरकऽ संग चाइर टा दोकान सेहो छइ।ओकर किरायाकऽ किछु भाग पंडीजीकऽ सेहो भेटई छइन। ओही मे दुनु सांझ पूजा पाठ,प्रसाद, सांझ अगरबत्ती सब छइ। ज्यों भंडारा मे भोजनभऽ जाइ छइन तं ओइ पाइसँबढ़ियासँठाकुरजीकऽ भोग लगा लइ छइथ। ततेक ने पंडित ऋषिकेश मेभऽ गेल छइ जे "एक बुलाये, दस आये" बाला हाल छइ। ज्यों बनियाकऽ कम पाइ बाला बात कहथिन तऽ ओ तखने हटा देतइन। ओकरा त एहन पंडित चाही जे अइ स्थानक बदला किछू ओकरे दइ। भगवा वस्त्रकऽ अइ शहर मे चलती छइ आ "औल रुट पास " सेहो भलइ। कतउ जाय आबऽ मे टिकस नञि लेबऽ पड़ई छइन, तैं ई चोला ग्रहण केने छइथ। उजरा धोती मे तऽ धांई सने धअ लेतइन।पंडीजी समयक संग ढ़इड़ गेल छलाह। सब बात बतबइत पंडीजी निर्मगनभऽ गेल छलाह। पहिले बेर कियो उनकर हाल पुछलकइन। जे हाथक लकीर मे खींचल रहइ छइ- से होइते टा छइ। जन्म आ मरण- ईएह सत्य थीक। पंडीजी भावुकभऽ गेल छलाह। मंदिर मे सांझ देबाक समयभऽ गेल छलइन।जाइत काल बजलाह- "आहां बहुत ऊंचाई पर जायब- हम आहांक प्रशस्त ललाट देख रहल छी। हम अइसँनञि कहलऊं जे आहां हमरा अहु हाल मे चिन्हलऊं, हम जे देख रहल छी- से कहि रहल छी।" कबीर, पंडीजीकऽ भोजन लेल दिल्ली सदन वालाकऽ कहि देलखिन।जहिया आहांकऽ मोन करत आहां आइब कऽ भोजन कऽ लेब। आइ राइत मे जखइन गंगा कात मे कबीर बइसलाह त उनका कोनो" राग " नञि सुनाई छलइन। खाली हहअ.....हहअ......हहअकऽ आवाज अबइ छलइन।पंडीजीसँभेंट होबा खातिर ई सब सृष्टि ड़इच रहल छलीह। बुझेलइन जे आब ऋषिकेशकऽ अध्याय खत्मे जेकां छइन। अपन मोनकऽ कहलखिन- " हे कतउ आर चलु।" उईठ बिदा भऽ गेलाह- कोनो आर ठेकानाकऽ तलाश मे। छक्का-पुराण (लघुकथा) हारि कऽ जदु ठाकुर फैमिली कोर्ट मे केस फाइलकऽ देलाह। एतऽ सऽ ओतऽ , दौड़इत दौड़इत थाईक गेल छलाह। सोचने रहइत जे रिटायरमेन्टक बाद आराम करब, उल्टेभऽ गेलइन। आब त कतउ गेनाईयो उनका लेल अबग्रह। जेहो नञि चिन्हइ जनञि छलइन, ओहो साईकिल रोईककऽ " ओकर" की भेल, से पुछइत रहइ छइन। कतेक दिन नुकाकऽ रखितैथ। जाबइत संभव छलइन, नुकेबे केलाह। कानों-कान नञि बुझअ देलखिन। "दोषी " त उयैह छथि। कोन मति मारलकइन, जे ओ "हां" कहि देलखिन। ओइसऽ बेसिये पाइ रमपुरा बाला दइ छलइन। ओ सेबो सत्कार नीक करितइन।ओकर बेटियो सुन्नञिर छलइ। लाल काकी कहइ छलीह, ई कथाकऽ लियह......जीतल रहब। नञि कयलाह। आब बुझु। अपनेसऽ अपन बेटाकऽ गर्दन पर तरुआइड़ चला लेलह। आब प्रायश्चित मे केस केलाह अइछ आ तारीख पर दौर लगा रहला अइछ। जदु ठाकुर सरकारी अमीन छलाह। हाले मे रिटायर केलाह अइछ। पुरा परोपट्टा मे किनका कतेक जथा- जमीन छइन.........कतेक ओइ मे ओझराहा आ कतेक सोझराहा...........सबटा उनका बुझल छइन। कयेक जमीनक मालिक सबकऽ सेहो नञि बुझल जे कोन जमीन कतऽ अइ। बेचऽ कऽ होइ वा दाखिल-खारिज करबाक होइ, बांट-बखरा होइ वा बदलेन होइ........ लोक जदु ठाकुरकऽ पकइड़ते छलाह। थोड़ बहुत मेहनताना सेहो उपरसँभेट जाइ छलइन। अही चक्कर मे त ओ फंसी गेलाह। बगलेकऽ गामक जोहन पाठककऽ दिअयदी बंटवारा मे ओ गेल छलाह। चालीस बीघासऽ उपर उनका जमीन छल। सब खतिहानी मरौसी जमीन छलइन। कोनो झंझट, कतउ नञि। असगर जोहन पाठक, आ उनकर बापो असगरूए। बाकी दिअयद सबकऽ त बीघा कि, आब कट्ठा मे बचल छइन। जखने जोहनक कतऽ सऽ कथा एलइन, जदु ठाकुर लुसफुुसा गेलाह। भेलइन जे ई कुटमैतीभऽ जाइत त सब संपैत हमरे। ई नञि देखलाह जे जोहनकऽ चाइर टा बेटो छइन। किछु पतो ततो नञि केलाह। जानल घर छलइ। मोट पाइ देलकइन। सटसऽ "हं "कऽ लेलाह। पाइकऽ खुब छहर -महर भेल। जदु ठाकुरकऽ बेटा मोहन आइ टी आइकऽ कऽ टाटा मे फीटर अइछ। डेरा डंडा सब भेटल छइ। पाइन -बिजली सब मुफ्तउआ। बिजली सदिखन रहिते छइ। ओतेक टा डेरा त उनकर बीडिओ साहेबकऽ सेहो नञि छइन।आब की छइ।जदु ठाकुरकऽ जमीन नञि, लेकिन अपनो नौकरी आ बेटोकऽ नौकरी। जोहनकऽ जमीन छइन , लेकिन नञि अपने नौकरी, आ नञि बेटे सब के। बेटा सब अबंड जकां भरिदिन मोटर साइकिल पर इमहरसऽ उमहर उधियाइत रहइ छइन। अखनो उनकर समाज मे सरकारी नौकरीकऽ बड्ड मोजर।ओइ मे टाटाक नौकरी, ई त पुछबे नञि करू। सरकारी फेल ओकर सामने। बेटाकऽ ओतऽ सब "फीटर बाबु" कहइ छइन। बियाह दान सब संपन्न भेलाक बाद, जदु ठाकुरकऽ पुतोहु छह महीने सासुरे मे रहल।हर चारिमे दिन जोहनक एक ने एक बेटा अबिते रहलइन। हर जतरा मे खुब सर - सनेश सब सेहो अबइ। जदु ठाकुर खुब चपचप सनेश सब खाई छलाह। आब जोहन पाठकक समईधभऽ गेलाकऽ कारण अमीनी लेल बऊयेनाई सेहो छोड़ि देलाह। घर मे रहलाक कारण चिकनाअ गेल छलाह । कनी कनी धोईध फुइटनाई शुरूभऽ गेल छलइन। छह महीनाक बाद मोहन कनियाकऽ टाटालऽ गेलाह। कनिया डेरा पर जाइ लेल तैयार नञि छलइन। जदु ठाकुरकऽ खुशी भेलइन जे कतेक नीक पुतोहु जे गाम मे रहअ चाहइत अइछ ।मोहनकऽ त पहिनेहो किछु गड़बड़ बुझाई छलइन। ओतऽ अपन दोस-महीम आ अस्पतालक डाक्टर सबसँकिछु शंका समाधान केलाह। कनियाकऽ डाक्टर अनबाक लेल कहने छलैन। डाक्टर जरूरी जांच सब केलकइन। मोहनकऽ कहलकइन जे ई पुर्ण स्त्री नञि छथि। मोहन माथ पकइड़कऽ बइस रहलाह। आब करताह की। कनियो कानह लगलइन। कहलकइ जे ओ अपन मायकऽ कहने छलइ। ओकर कियो नञि सुनलकइ। बियाह करा देलकइ। दोसरो डाक्टरसऽ मोहन, कनियाकऽ देखेलाह। ओहो ईएह बतेलकइन। कनिया मे पुरूखक बेशी लक्षण छलइन। लक्षण की छलीहे पुरूख। मोहनक सार सब एहन अबंड्ड आ बदमाश सब छलइन जे ओकरा सबसँजबरदस्ती किछु करा नञि सकताह। किछु महीनाक बाद कनियाकऽ अपन छोट भाइ संग नैहर पठा देलाह। जदु ठाकुरकऽ धीरे-धीरे सब सच्चाई पता चललइन। मोहन दुखसँआधाभऽ गेल छलाह। जदु ठाकुरकऽ धोईध कतऽ सटईक गेलइन, ओकर पते नञि। दुखित रहअ लगलाह। डाक्टरसऽ देखेलाह। जांच सब भेलइन। बीपी, चीनी आर कथी कथी निकललइन। रोज भूखले पेटे गोटी सब खाई छथि, तखइन नित्य क्रिया कर्म करय छथि। जोहन पाठक सबकऽ त सच्चाई बुझले रहइन।ओ सब गुमकी लगा लेने छलाह। जदु ठाकुरकऽ सेहो मोहनक सार आइबकऽ कहि गेल रहइन, जे चुप रहबाक छइ। ज्यों बाजब तं घरक भीत भीत नोइच लेब। बुइझ लियह। ईएह गुमकी जदु ठाकुरकऽ तरे तरे जौंडिस जकां सुखा रहल छलइन। दवाईक डोज बढ़िते जा रहल छलइन। साल भइड़ त गुमकी सब लागल रहल- अइ विषय मे। फेर जदु ठाकुरकऽ नञि रहल गेलइन। ओ जोहन पाठक कतऽ प्रस्तावलऽ कऽ अपने गेल छलाह - जे बिबाह मे जोहन पाठक गिनती आ खर्च कयलाह अइछ , से वापसलऽ लैथ। अलगा-अलगी मोहनकऽ भ जाइन। जोहन त अपने चुप्पे रहलाह। उनकर छोटका बेटा मारऽ मारऽ उठलइन जदु ठाकुर के। ओ तऽ आर लोक सब पहुंच गेलइ जे जदु ठाकुरकऽ जान बंचलइन। सऊंसे गप्प पसइड़ गेल छलइ।दु बेर पंचइती सेहो भेलइ।बेशी लोक अइ पंचैतीसऽ अलगे रहल। जदु ठाकुर सब डाक्टरी जांचकऽ रिपोर्ट, पंच सबहक सामने रखलाह। नतीजा किछु नञि निकललइ। जोहन पाठक सबहक कहब छइन जे इनके बेटा मे कमी छइन। आर दहेज चाहियइन-ओकरे लेल ई तेल बेल केने छथि। हमर परिवारकऽ जे बेजती भेल अइछ ओकर बदला हम सबलऽ क रहबइन।के, ककरा आ कोना जंचतइ कि की सच थीक! शुरू मे त जदु ठाकुर डराइत छलाह। आब सऊंसे घरे घर आ गामे गाम लोक बुझिये गेलइ त आब कथीकऽ अढ़क काज। जे छइ से छइ- " छक्का बाला लीला", ईएह ने! मोहन अलग होयबाक लेल मोकदमा केने छथि। तारीख पर तारीख पइड़ रहल छइन। देखू ...... की फैसला......आ कहिया अबइ छइ। ई अजगुत कथा त आइ तक एना सुनबा मे नञि आयल छलइ। तरघुसिया भेलो होइ लेकिन एना हो- हल्ला नञि भेल छलइ।सब अकरा " छक्का" बला पंचैती कहइ छइ। समाज आ कोर्ट, दुनु जगह जदु ठाकुरकऽ दौड़इत दौड़इत चट्टी घिसा रहल छइन। दाई- माई सब सेहो कहइत रहइ छथिन- " धुर! एहनो कतउ भेलइ अइछ। जीबी त कीऽ कीऽ नञि सुनी।" अकरे संग जखइन दु बुढ़ीकऽ नजर मिलइ छइन....... ओ किछु आरे ईशारा करय छइ । ई कोनो पहिले घटना नञि भेल छइ। सदौंसऽ होइत रहलइ........ पहिने अकरा घरक छरदवालीकऽ भीतरे दबा देल जाइत छलइ।आब जुग आ जमाना बदइल गेल छइ........नुका छिप्पीकऽ समय चइल गेलइ ........जे सच छइ- से सोंझा छी। जदु ठाकुर सबके अपन दुखड़ा सुनबइत चइल जाइत रहइत छथि। लोककऽ त चर्चा मे मजा अबइ छइ, मूदा गुड़क माइड़ त धोकरबे बुझई छइ। लोक जदु ठाकुरसँपुछइ छइन- आहां कोना बुझलियई? अच्छा--- ......... ई भेलइ---- ........... ओहो------ ------------ अहिना कतेक गप। ई सब जाइन बुइझकऽ ओझरेने छइन, नञि त कहिया ने अलगा- अलगी भऽ जइतइ। छक्का पुराण पर सब नजर गरौने अइ। देखू अंतिम अध्याय कहिया बहराई छइ। सरप्राइज (लघुकथा) (गाम मे रहइत मां आ विदेश मे रहइत बेटाकऽ बीच भेल फोनवार्ता पर आधारित- चिट्ठी पत्रीकऽ जमाना चइल गेल।) कोना छें!- बेटा बजलाह। ठीक छी!- मां बजलीह। - आर कोनो विशेष। - नञि सब ठीक-ठाक।काइल नञि फोन केलह। - हम त कहनेहे छियउ जे शइन- ड़इबकऽ फोन करबऊ। - दु बेरसँशइन कऽ फोन अबइ छलइ, तैं भेल जे अहु बेर शइनकऽ आइत। - ओ त जहिया समय भेंट जाइया, तहिया कऽ दइ छियउ। अइ बेर शइन कऽ समय नञि भेटल तैं ड़इब कऽ केलियउ। दोसर जे समय मे पांच घंटाकऽ अंतर छइ- दुनु जगह मे। तकरो देखऽ पड़ई छइ। - हम त सब बुझिते छी जे बऊआकऽ आफिस मे शइन कऽ काज बेशी भऽ गेल हेतइन- तैं फोन नञि केलाह अइछ। जनञि नञि छउन बाबु जी के! काइलसँचाइर बेर पुईछ लेलाह- बऊआकऽ फोन नञि आयल.......बऊआकऽ फोन नञि आयल। मोन घोर भऽ गेल सुनञित.......सुनञित। कहलियइन जे खाली फोन केनाई काज थोड़े छइन। आफिस मे नञि फुरसत भेल हेतइन। देखइत नञि छेलियेन...... दिल्ली मे कत्ती राइत कऽ हारल थाकल अबइ छलाह। हमर बऊआ त विदेशोंसँफोन कऽ दइ छइथ। रामजी बाबुकऽ देखियउन- पटने मे बेटा पुतोहु छइन। कहियो फोन नञि। कनिया उनकर हक्कल नोरसँकनञित रहइ छइथ।एहन ने नबकी कनिया सब आयल छइ......काबिले आन्हर। हमर त पुतोहूओकऽ फोन अबइत अइछ। - सब गप तुहें बजई छें। सब बुझिते छें, तखइन परेशान नञि होबाक चाही। -नञि नञि। हम कियैक परेशान होयब। एहन बेटा भगवान सबके देथिन। आइ काइलकऽ माय बापकऽ अतेक खोज पुछारी करइत अइछ। अतइ देखऽ ने- सब बुढ़ा-बुढ़ी सब असगरे छइथ। जखइन कागज पर अंगुठा लगबऽ कऽ रहइ छइन, तखने गाम आ माय बाप याद अबइ छइन। -आर कहऽ । मोन ठीक रहइ छऊ। दबाई समय पर खाई छैं ने! -हं हं। हम सब दवाई समय पर खाई छी। ओइसँपहिने एक गिलास दूध सेहो पीबइ छी। याद हेतऽ " मड़र"। ओकरे पोता, खटाल खोलने अइछ। उएह आब बड़का दूधक कारोबारीभऽ गेल अइछ। एतऽ ओ अपने दूधदऽ जाइत अइछ। कहलकइ जे ई हमर सबहक पुरान दरबार अइछ। बाकी टोल मे ओकर आदमी दूध लऽ कऽ अबइ छइ। ओहो अतेक इज्जत दइत अइछ तं हमहु जखइन ओकरा नब गाय खरीदऽ कऽ रहइ छइ- जे कहइत अइछ..... पाइदऽ दइ छियई। दूध मे ओ मिनहा कऽ दइत अइछ। ओ अइ दुआरे नञि अपने अबइत अइछ जे पुरान दरबार छइ- ओ अइ दुआरे अबइ छऊ जे तुं एडवांस मे पाइ दइ छही! -भऽ सकइ छइ। बोली बानी ओकर बड्ड बढ़िया छइ।हमरा त कहियो दूध नागा नञि केलक। - बाबूजीकऽ मोन ठीक छइन? ओना तऽ ठीके छइथ लेकिन कफ्फक शिकाइत रहिते टा छइन। - ततेक ने एंटी बायोटिक खेने छथिन, जे दवाई असर नञि करय छइन। - दिल्ली बाला जे डाक्टर ओइ बेर दवाई देने रहइन, ऊयाह पर्ची देखा कऽ बीना फार्मेसीसँदवाई मंगा देलियइन। ओइसँकिछु आराम छइन। " दही" दुनु सांझ खेनाई छोड़ई नञि छेथिन।कऽ बुझेतइन। गरम दूध मे हड़इद मिला कऽ पीला पर आराम होइ छइ- लेकिन उनकाकऽ कहतइन। मोन होइ छइन त पीताह। नञि त ओहिना छोड़ि देताह। हमहुं तऽ बुढ़ेलऊं! अतेक हुच्ची हमरा सऽ आब नञि होइया। तुहें कखनो बुझईयउन जे दही छोड़ि दैस आ गरम दूध पीबइथ। अखइन नञि कहियउन- नञि त हमरे बिगड़ता जे बऊआकऽ हमही कहलियइन। - अच्छा बाद मे कहि देबइन। - एकटा खुशखबरी कहनाई त बिसईरे गेल। तुं जे कटहर रोपने छलह, से अइ बेर फइड़ गेलह। दु बरखसँमोंछी होइ छलइ- लेकिन कटहर नञि होइ। अइ बेर फरलइ। हमहु ओकर जइड़ मे माछक खोंईचा सब गड़बाअ देने छलियई। अइ बेर कम फरलइ। अगिला बरखसँबेशी फरतऽ । हम अइ बेर बुइझ गेलियई।कटहर, गिरह पर फड़ई छइ। पहिनेहे नीचा बला डाईढ़ सब पंगबा देबइ। - तु तं एकदम गिरहथभऽ गेल छंय। नारियल सबहक की हाल? - ठीक छअ। बीच मे गड़बड़ा गेल छलइ। बतिये मे नारियल सब ढनढना कऽ खसऽ लागल छलह। चुट्टी लाइग गेल‌‌‌ छलइ। दवाई स्प्रे भेलइ। आब जे बइच गेलह, से ठीक छह। - दु चाईरो टा बचलइ की नञि? - दु चाइर टा किअए? घुंघरू जेकां अखनो लुधकल छअ। ई बुजलहक जे स्प्रे केना दिबेलियई? तुं जे दिल्लीसँस्प्रे वाला मशीन अनने छलह, से राखल राखल खराब भऽ गेल छलह। दु सै टाका लागल ओकरा ठीक कराबऽ मे। - आम सब? - ओ तोहर बाबूजीकऽ जिम्मा छइन। जोगिया अपन पाइन ताइन दइत रहइ छअ।सब ठीक छअ। ई कहऽ ने कहिया " ऐबऽ "? - देख! निश्चित नञि अइछ। - अइ बेर बड्ड धान गहुम भेल छअ। बटाईदार नीक पकड़ा गेल अइछ। बाकी त सबहक खेत परती परल छइन। उनकर सबहक बोली एहन खराब जे कियो बटाई लेबइ लेल तैयार नञि। हमरा कतऽ सब बटाईदार तैयार। लेबानो जोगर धान तोहर कनिया काकीकऽ नञि भेलइन। हमही पठा देलियइन। बड्ड आशीर्वादी दइ छलखुन। बेटा सब एहन कुपात्र सब भऽ गेल छइन से बेचारो की करतीह? - की कुपात्र? - नञि बुझल छअ! निशा करय छइन। माय बापकऽ एक दशा नञि छोड़ई छइन। जेहन तोहर गाड़ी छलह दिल्ली मे, सैह गाड़ी खरीदने छइन। आमदनी एक पाइकऽ नञि, आ शौक सब साहबी! - कतऽ सँपाइ एलइन? - कतऽ सं! तोहर गाम मेकऽ ककरासँकम। जमीन बिका रहल छइ आ फुटानी बइढ़ रहल छइ। दिल्ली बम्बइ जेकां लोकक स्टेन्डर भऽ गेल छइ। लोक त मूंहे पर कहि दइ छइन........हमर बऊआ कमा कऽ कीनलक गाड़ी.....आ ई सब गंवा कऽ । कतउ छजई छइन दलान पर गाड़ी। हमरा सबकऽ ओना शहर बजार जाय मे सहुलिइत भऽ गेल अइछ। सब घर मे गाड़ीभऽ गेल छइ......आ सब एक समाद मे गाड़ी पठा दइ अइछ। बड्ड मानञि अइछ हमरा। कनिको नञि बुझाइत अइछ जे अपन गाड़ी नञि। आब जे तुं स्टेशन एबह त रिक्शा पर नञि आबह पड़तह। - वाह। बहुत विकास भेलइ। पहिने त रिक्शो बालाकऽ खुशामद करऽ पड़इ छइ। - देखऽ ने। एकटा आर गप सब बेरसँबिसरा जाइत अइछ। ओ जे दुमहला पर तोहर बाबूजी पोता- पोती लेल घर आ बिदेशी बाथरूम अलगसँबनबौने छलखुन....... ओ बंदयछलह......तौं सब एबे नञि केलह। ओइ घरकऽ साफ सफाई करेलखुन आ बाबूजी अपने ओइ बाथरूम मे जाइ छथुन। ओइ बाथरूम मे गीजर छइ......बाबूजी गरमे पाइनसँनहाइ छथुन आ थोड़े काल बच्चा बाला घर मे आरामो करय छथुन। ओना त ठेहुन धेने रहइ छइन- लेकिन कोठा पर चईढ़ जाइ छइथ। हमरा त नञि जाअ होइया। तुं सब एबऽ त भऽ सकइत अइछ जे तखने चढ़ी। - आइ तऽ बड्ड गप्प भेलइ। - अखइन आरो कतेक गप सब अइछ। तुं एबऽ तखइन कहबऽ । एकटा राज मिस्त्री आ दु टा जाना पिछला तीन महीनासऽ काज कऽ रहल अइछ। बहुत काज भेल अइछ.......आ बहुत बाकी अइछ। अखइन शुद्धक समय छी......एहन ने भारी लगन छइ जे जन सब नागा बड्ड करइत अइछ। - आनंद लेल काज करबिंहे। तनाव लऽ कऽ नञि! - नञि नञि। कोनो चिंता नञि। - पाइकऽ काज होऊ त कहिहें! - पाइकऽ कोनो काज नञि अइ। बस तुं सब जल्दिये आइब जईहअ......." सरप्राइज" रखने छियह। - ठीक छइ। जल्दिये एबऊ। बऊआकऽ पता लाइग गेल छलइन जे उनकर मां पुरना घरकऽ नबका डिजाइन मे बदलबा देलखिन अइछ। जे उनकर मांकऽ होइन जे जन मजुर सब उनकर बाबूजीकऽ हां मे हां मिला कऽ ठकइ छइन..........आब बाबूजीकऽ भऽ रहल छइन जे जन सब इनकर मांकऽ हां मे हां मिला कऽ ठकइ छइन। असल मे कियो ककरो नञि ठकइ छइ..........सब अपन बऊआकऽ स्वागत अपना ढंगे कऽ रहल अइछ। बऊआकऽ " सरप्राइज" देखबऽ कऽ इंतजार भऽ रहल छइन। अफेयर (लघुकथा) दासजी अइ शहरक कालेज मे लेक्चरर छइथ। लोक उनका परफेसर साहब कहइ छइन। सफाई दइत दइत परेशानभऽ गेलाह....लोक परफेसर साहब कहनाई नञि छोड़लकइन। ओ कहइ छलखिन जे हम लेक्चरर टा छी अखइन...... प्रोफेसर बड़का पद होइ छइ.........पुरा विश्वविद्यालय मे आंगुर पर गिना जाइत जे केऽ सब छैथ प्रोफेसर.... हम नञि छी। मूदा लोक तऽ उनका परफेसर साहब कहनाई नञि छोड़लकइन। आब ओहो अपनाकऽ माइन लेलाह। कतबो दलील देलखिन जे दरोगा आ पुलिस कप्तान जेना अलग अलग होइ छइ.........ओहिना लेक्चरर आ प्रोफेसर........ कोनो काज नञि अयलइन। अइ शहरकऽ ई मिजाज छलइ- सिपाहीकऽ हवलदार, किरानीकऽ बड़ा बाबु, दरोगाकऽ इंस्पेक्टर, वकीलकऽ पी पी साहेब, मास्टरकऽ हेडमास्टर साहब, बैंकक बाबुकऽ मनेजर साहब, रेलवेकऽ पैटमैनकऽ स्टेशन मास्टर, छुटभैया नेता सबकऽ विधायकजी, दोकानदार सबकऽ सेठजी, बदमशवा सबकऽ भैयाजी आ बाकी सब शक्तिशालीकऽ चौधरी साहब कहल जाइ छलइ। पहिल लोक दासजी नञि हेताह - जिनका पदकऽ बढ़ा कऽ कहला पर अनकट्ठल लागल हेतइन, लेकिन जे रेवाज छइ से छइ। ई रेवाज नञि एक दिन मे बनञि छइ आ नञि एक दिन मे टुटई छइ। दासजी अकरा अवधाइड़ लेलाह। आब दोसर परेशानी उनकर सामने मुंह बवने ठार छलइन। "दास" टाईटिल देख कऽ पहिने देवानजी सबकऽ भेलइन जे ई उनके समाजकऽ छइथ। पछाइत गप्प सबसँपता चललइन जे ई त " बंगाली" छियइथ। दासजीकऽ ज्यों कियो " बंगाली" कहइ छलइन तं तिलमिला जाइ छलाह। ई सत्य थिक जे उनकर प्रपितामह पोस्टमास्टरक नौकरी करइत बदली भऽ कऽ कलकत्तासँदरभंगा आयल छलाह। फेर ईएह शहरकऽ अपन घर बना लेलाह।अतऽ रहइत चारिम पीढ़ी दासजी छइथ। ओ त घरो मे मैथिलिये बजई छइथ। बंगला बुइझ जाइ छइथ, लेकिन बाईज नञि पबइ छइथ।ई बाहरे- बाहर रहलाक कारण बुझाईया भेल छइन। इनकर कहब छइन जे या तऽ "मैथिल " कहू या "बिहारी " कहू.... बंगाली त कोनो हाल मे नञि चलत। दासजी , बंगाली कहला पर खिसियाई छलाह, तैं कयेक गोटे बिखाहे " बंगाली" कहऽ लगलइन। पढ़ल लिखल लोककऽ त सब समाज अपना मे मिलेबाक प्रयास करय छइ। ओइ मे ई भ्रमित करऽ बाला नामक आगु " दास" टाईटिल- नब नब नेवता दिअयबइत रहइ छइन। अइ शहर मे किछु घर " केवट" जाइतक लोककऽ रहइ। ओकर सबहक टाईटिल सेहो " दास" छलइ- ओ सब दासजीकऽ अपन समाजक मानञिन। बड्ड अधिकारसँइनका ओ सब अपन पर्व त्योहार मे बजा कऽ लऽ जाइन। किछु आर दास परिवार ओइ शहर मे रहइ। ई सब अलग तरहक चंदनक टीका माथा पर करय। अलगे चिन्हासी ओकर सबकऽ रहइ। माछ माउस ओ सब नञि खाई। कने धार्मिक बेशिये ओइ सब घरक सब सदस्य होइ। नबो लोककऽ दीक्षा करा कऽ अपन समाज मे जोइड़ लइ छल। अतऽ त नामही मे दास लागल छलइ। ईहो सब " दासजी" पर बोर फेंकलकइन। दासजी, महानगरसँपढ़ल - लिखल- गुणल छलाह।ओ सबसँसमभाव मे मेलजोल रखइ छलाह।जाइत पाइत- धर्म, ऊंच- नीच, धनी-गरीब सब मे ओतेक विश्वास नञि करय छलाह। छोट शहर मे रहबाक उनकर पहिले अनुभव छलइन। उनकर नियुक्ति सरकारकऽ कमीशन द्वारा भेल छलइन।जतऽ पठा देलकइन, ओतऽ खुशी खुशी आइब गेलाह।जई विषयक, जतऽ जगह ख़ाली रहतइ, ओतइ ने उनका पठेतइन- सब बुझई छलाह। ओइ समय मे बेशी प्रोफेसर सब त उएह होइ छलाह जे मैनेजिंग कमेटीकऽ सदस्यकऽ परिवारक होइत वा लगुआ भगुआ वा ककरो अनुमोदन वा पाइ दऽ कऽ ।जे बेशी पढ़ल से प्रोफेसर, कम पढ़ल से किरानी आ बिना पढ़ल सब चपरासी मे रजिस्टर मे नाम चईढ़ जाइ। नब नब कालेज खुजई छलइ.....सब लोककऽ बहाली होइ........फेर सरकारी कराबइ लेल प्रयास शुरू। अइ मे सब खुश -खुश रहइ छल। बिधायक, कलक्टर, मंत्री, शिक्षा विभाग, ठेकेदार, व्यवसाई, पाइ बला सबहक वार्ड रहइ- तैं ककरो कोनो शिकाइत नञि। शिकाइत ककरा रहइ छल- ओ छलाह विद्यार्थी! उनकाकऽ पुछइया। दासजी अपनाकऽ अइसँअलग बुझई छलाह। ओ लोककऽ फरीछा कऽ कहइ छलखिन-" हम कमीशन बाला छी"। लोक तहिया की अखनो "कमीशनक" मतलब "देबलेब" बुझई छइ।ओकर आंईखक चमकी देख कऽ दासजी बुइझ जाइ छलाह जे ई गलते बुझलक। जेतबा ओ बुझेबाक प्रयास करय छलाह- ओतबे ओकरा" देबलेबसँभेल नौकरी" पक्का बुझनाई लागऽ लगइ छलइ। अंत मे हारि कऽ दासजी फरिछेनाई छोड़ि देलाह। जे बुझबाक होइ से बुझय, हम जे छी, से छीहे। दासजी विज्ञान विषयक प्रोफेसर छलाह। तहिया ट्युशनक बड्ड चलती छलइ। प्रोफेसर सब कालेज मे अइ दुआरे नञि पढ़बइ, जे पईढ़ जाइत तऽ ट्युशन कोना चलऽ त।दासजी कालेज मे बुझा कऽ पढ़बतिन आ ऊपरसँजेकरा नञि बुझाई, ओकरा अपन घरो पर बिना पाइ लेने पढ़बतिन। पहिने त सबकऽ भेलइ जे विद्यार्थी फसबंकऽ त ई कोनो चाइल त नञि छइ- लेकिन साल बितलो पर जखन पाइ नञि लेलखिन, तखइन सब विरोधीकऽ मुंह मे ताला लाइग गेलइन। एकतऽ मुफ्तउआ पढ़ाइ, उपरसँनीक सेहो- विद्यार्थीकऽ जमघट होबऽ लगलइन। कय विषय पर तऽ दासजी "व्यवस्था"कऽ खिलाफ खुइल कऽ कालेज मे बजितो छलाह। हरदमसँसत्ताकऽ ललकारऽ बाला लोक, छात्र सबकऽ बीच मे लोकप्रिय रहल अइछ। दासजी बेश चलती बाला प्रोफेसर भऽ रहल छलाह।अहुसँपैघ जे गुण रहइन - ओ छलइन " उत्सव/ सभा/गोष्ठी आयोजित करऽ के"। छात्रक फौज इनका संग छल- वक्ता नीक छलाह- आयोजन कर्ता नीक छलाह- मुफ्त मे घर पर पढ़बइ छलाह- आर आर गुण सब। इनकर प्रसिद्धि अइ शहरक स्थापित प्रोफेसर सबकऽ विस्थापित करऽ लगलइन। ओना मैनेजिंग कमेटीकऽ कृपा पात्र सबकऽ पढ़बऽ कऽ जगह "प्रबंधन" सदौंसँप्राथमिकता मे रहलइन। कोनो भी विश्वविद्यालयकऽ सुची उठाअकऽ ताकु- सब अहने लोक प्रशासनिक पद पर भेटताह। ई सब हक एकटा वर्ग होइ छइ। सब एकदोसराकऽ "वेलफेयर" करय छइ। ज्यों कियो वेलफेयर नञि करऽ बला आइब गेल‌‌‌ त सब मिल कऽ ओकर " फेयरवेल" कऽ दइ छइ। अतऽ ईएह भेल जा रहल छल‌‌‌। दासजीकऽ प्रसिद्धिकऽ ल कऽ इनकर सबहक दोकनदारी बन्न होबाक कगार पर पहुंच गेल छलइन। दासजीकऽ खिलाफ कय गोटे एकजुटभऽ गेल छलाह। मौकाकऽ तलाश मे छलाह। आखिर भेटिये गेलइन। दासजीकऽ घर पर पढ़अ बला विद्यार्थी मे बसंत दास सेहो छल। ई बसंत ओतुके केवट टोलीकऽ छल। ओना त केवट टोली मे कियो सुभ्यस्त नञि, लेकिन बसंतकऽ परिवार त सबसं गरीब। बसंत पढ़अ मे तेज छल, तैं दासजीकऽ नजर मे आयल। ओ पढ़बऽ कऽ अलावा किछु आर्थिक मदद सेहो बसंतकऽ कऽ दइ छलखिन। अकर बदला मे बसंत अपने मोने हिनकर घरक टहलुआ बाला काज जेना- तर तरकारी अननाई, बच्चाकऽ खेलेनाई, मेला ठेला घुमेनाई, बजार हाटक काज ईएह सब हल्लुक फल्लुक कऽ दइ छलइन। बसंतक माय बापक लेल त दासजी आ हुनक परिवार देवता तुल्य छलइन। हालांकि कयेक बेर दासजी, अपन कनियाकऽ मनो करय छलखिन- बसंतकऽ काज अढ़बऽ सं, लेकिन बसंत नञि मानञि छलइन। अपने आगु बइढ़कऽ काज कऽ दइन। ओना बड्ड काज त छेबो नञि करय- कोनो कुटिया पीसियाकऽ सवाले नञि त काजे कोन। ईएह- इमहर ओमहर वाला। दासजीक कनिया अणिमा सेहो प्रोफेसराइनकऽ पदवी भेटलासँखुश रहइ छलीह। दु टा छोट छोट बेटा छलइन- पांच बरखक अखिल आ दु बरखक निखिल। अखिल स्कुल गेनाई शुरू केने छल। दुनु बच्चा बसंतक संग खुब रितीया गेल छलइन। ओ सब बसंतक संग ओकर घर सेहो चइल जाय। बसंतक माय सेहो दुनु बच्चाकऽ जानसँबेशी मानञि छलीह।अणिमा अपुर्व सुन्दरी त नञि छलीह लेकिन भरल भरल देह छलइन, आंईख बड्ड तेज, केश बरकी टा आ चेहरा रमणगर रहइन। ओहोसँबेशी जे हंसमुख स्वभावकऽ छलीह। विद्यार्थी सबसँसेहो हंसी ठठ्ठाकऽ लइ छलीह। विद्यार्थी सब सेहो बड्ड आदर करयन। दासजी जहिना गंभीर ओहिना मजाकिअए अणिमाजी। सब कहइ जे दासजीकऽ हिस्साकऽ हंसी कनिया मे आयल छइन। हंसी खुशी दिन ससड़इ छलइ। अखिल बीमारभऽ गेल छलइन। डाक्टरकऽ ईलाज चइल रहल छलइ। देह मे किछु दाना जेकां निकलल छलइ। अणिमाजी त पहिले बेर एना दुखित बच्चाकऽ देखने छलीह। बसंतक माय सेहो एलखिन जिगेसा मे। ओ अखिलकऽ देखते कहलखिन -ई त " कोदबा" छइ। अणिमाकऽ अकर अनुभव नञि छलइन। ओ कहलखिन- ई तऽ आब कम भेलइया। डाक्टर कहला जे तीन चाइर दिन मे पुरा ठीक भऽ जेताह। बसंतक माय बजलीह- डाक्टर जे बाजय, अइ मे नीमक पात छुआबऽ पड़त। - अच्छा हम डाक्टर साहबसँपुईछ लेबइन। - "हं । अपन पुईछ लेबइन।" बसंतक माय बजलीह। फेर भेलइन जे नब जमानाकऽ लोकबेद छइथ। अपन जे नीक बुझेतइन से करतीह। इनका जे फुरेलइन, अपन कहि देलखिन। अइ गपशपकऽ समय बसंत ओतइ ठार छल। ओकरो एकबेर "कोदबा" भेल छलइ- ओइ मे नीमक पात ओकर देह पर राखल गेल छलइ। तखइन ओ ठीक भेल छल। अखिल दुखित भेलासँकमजोरभऽ गेल छलइ। बसंत , अखिलकऽ मानबो बड्ड करय छलइ। साईकिल पर सऊंसे शहरकऽ कैक चक्कर ओ अकरा घुमेने अइ। बसंतकऽ भेलइ जे नीमक पातसँअखिलकऽ छुआवल जाय त ई ठीकभऽ जेतइ। ई मोन मे अबिते ओ ओतऽ सँसाईकिललऽ कऽ बिदा भेल। ओकरा ई अंदाजे नञि छलइ जे ओकर शहर मे अतेक बदलावभऽ गेल छइ। पहिने कतेक ने नीमक गाछ चारू कात छलइ। आइ ताकऽ निकलल, त कतउ देखेबे नञि करय। कतऽ बिलाअ गेलइ नीम सब। तकइत आगु बढ़ल। दु ठाम नीम गाछ भेटबो केलइ- तं ओइ गाछक मालिक पात तोड़असँमना कऽ देलकइ। एकाध टा आर ठुठ नीमक गाछ भेटलइ- जेकर सब डाईढ़ पात लोग दतमइन आ खरिका मे सुड्डाहकऽ देने छलइ। आगु बढ़ल जा रहल छलाय बसंत। आइ ओकरा बुझेलइ जे अपनो शहरसँओ दुरभऽ गेल अइछ। नीम सन छोट छीन गाछ तककऽ ओकरा ठेकान नञि।कतऽ ओकर ध्यान रहइ छलइ- ओकरा अपने पर हंसी आबइ। अहिंना ओ पहुंचल स्टेशन गुमटीक बाद , बंद चीनी मिलक गोदाम लग। ओ खंडहर जकांभऽ गेल छलइ। पहिने ओतऽ ट्रकक लाइन लागल रहइ छलइ। ओतऽ पहुंचला पर एक फंका चीनी ओहिना ड्राईवर खलासी सबदऽ दइ। भीड़ लागल रहइ छलइ ओतऽ । ओतऽ चाहक दोकान सेहो छलइ- जे मंगनी वाला चीनीसँबनञि। सब ट्रक वाला दु चाइर किलो ओहिना ओ चाहक ठेहावालाकऽ द दइ। सब खत्म। बियाबान जंगल जेकां लगइ छइ। आइ ओ देखलक जे गोदामक देवार मे पीपरक गाछ सब भऽ गेल छइ। अपन दिमाग पर जोर दइया बसंत- देखू हम आयल छलऊं नीमक पात लेल......पीपरक पात देख रहल छी। गोदामक पछुआइत मे एकटा नीमक गाछ पहिने छलइ। ओ सब ओकर खसलका फर नीमरी खाई छलाय आ तखइन उपरसँजं चीनी भेंट जाइ त" तींता मीता" स्वाद ओकरा सबकऽ कहइ। बड़का नीमक गाछ छलइये। नीचा बाला ठाइड़ नञि छलइ लेकिन ऊपर पात छलइ। साईकिल गोदामक आगु मे बसंत लगेलक आ पाछु चइल गेल - जिमहर नीमक गाछ छलइ। दासजी कतऽ सँजे बसंत निकलल, ओकर बाद ओ अपन घर नञि पहुंचल।ओ कतऽ गेल? ओकर घरक लोक दासजी कतऽ आयल- एतऽ सँत ओ तखने चइल गेल‌‌‌ छलाय। सब जगह ताकल गेलइ। कतउ नञि भेटलइ। एक दु गोटे कहलकइ जे नीमक पात लेल आयल छल- लेकिन मना केला पर चइल गेल।ओकर साईकिल गोदामक बाहर भेटलइ। ओकर बाद कोनो खबर नञि। अंत मे हारि कऽ थाना मे रिपोर्ट लिखावल गेलइ। पुलिस घरक लोक, दोस महीम, विद्यार्थी आ दासजी सबसँपुछताछ केलकइ। आब ई त सत्त बाहर आइब गेल छलइ जे दासजी कतऽ सँबसंतकऽ बड्ड हेमक्षेम छलइ। आब दासजीक जे विरोधी लोक सब छल- से अइ घटना मे हवा देबऽ लगलइ। ओ सब हल्ला उड़ा देलकइ जे अणिमाजी आ बसंत मे नाजायज रिश्ताभऽ गेल छलइ तैं प्रोफेसर दासजी, बसंतकऽ मरवा देलखिन। ई बात पुलिसकऽ सेहो पता लगलइ। ओ दासजीसँपुछताछ करऽ लगलइन। दुनु गोटेकऽ थाना मे राखल गेल। अलग अलग पुछाई भऽ रहल छलइन। बीमार अखिल , पड़ोसी कतऽ छलाह। निखिलकऽ पुलिस थाना आनऽ सँमनाकऽ देलकइन। आब निखिल दोसर पड़ोसी कतऽ । दुनु बच्चा दु जगह आ अतऽ थाना मे दुनु प्राणी दु जगह परीक्षादऽ रहल छलाह। संक्रमणक दौर चइल रहल छलइन। उमहर जे बसंतक माय खातिर दासजी सब देवता छेलाह, से आब इनकर सबहक गिरफ्तारीकऽ मांगकऽ रहल छलीह। शहर मे केवट टोलीकऽ लोककऽ संग किछु आर संगठन सब दासजी आ अणिमाजीकऽ गिरफ्तारी खातिर दबाव बना रहल छल। अखबार आ टीवी मे समाचार इनकर सब पर आइब रहल छलइन। बिना गिरफ्तारीकऽ समाचारकऽ आधार पर दासजीकऽ विश्वविद्यालय प्रशासन निलम्बितकऽ देने छलइन। पुलिस टीम जांच करइत फेर ओइ गोदाम पर गेल। जखइन ओ नीमक गाछकऽ तकइत ऊपर चढ़ल त देखइत अइछ जे गाछक ऊपर जे खजखोहइड़ छल ओइ मे बसंतक लाश पड़ल छल। पुलिसकऽ अनुसार नीमक पात तोड़इत काल ओ ग्यारह हजार वोल्टक बिजलीकऽ करेंटक चपेट मे आइबकऽ ऊपरे टंगा गेल छलाह। पोर्स्टमार्टम मे सेहो बिजलीकऽ करेंटसऽ मौत अयलइ। तखइन जा कऽ दासजी आ अणिमाजीकऽ पुलिस छोड़लकइन। अइ सब पुछताछसँदासजी आ अणिमाजी अतेक टुइट गेल छलाह जे आब उनका ई शहर काटई छलइन। लोककऽ नजर मे ओ पुलिसकऽ पाइ खुआ कऽ निर्दोषक तमगा लेने छलाह। इमहर विश्वविद्यालय प्रशासन इनकर निलम्बनकऽ आदेश रद्दकऽ देने छल। दासजी तखनो कुलपतिकऽ अपने जाकऽ हाथ पैर जोईड़कऽ निवेदन केलखिन जे ओ कोनो आन शहरकऽ कालेज मे बदलीकऽ दइ लेल। जे दासजी ककरोसऽ कहियो किछु नञि याचना केलाह, सेअ अइ प्रताड़नाकऽ दौड़ मे हाथ जोड़नाई सीखा देलकइन। कुलपतिकऽ सेहो सच्चाई पता लाइग गेल छलइ। माहौल समान्य करबाकलऽ सेहो दासजीकऽ ओतऽ सँहटेनाई जरुरी छलइ। प्रशासनिक अनिवार्यताकऽ नाम पर बदलीकऽ आदेश निकइल गेलइन। विरोधी लोक सब एहन ने बदला लेलकइन , जे दासजी अपने बदली करा कऽ चइल गेलाह। आब उनका ई शहर मोन नञि पड़ई छइन.......मोन पड़ई छइन त बसंतक त्याग आ आदर। ओ इनका सबहक लेल अपन जीवनकऽ ईहलीला खत्मकऽ लेलक आ ओ एहन छइथ जे लोकक कुचेष्टाक डरे, ओकरा याद मे किछु चाहियो कऽ नञि कऽ पाइब रहल छइथ। पहिलूका दासजी रहितइथ त ओ जमानाकऽ परवाह नञि करितइथ। आब दु टा पैघ होइत बच्चाकऽ बाप छइथ, तैं मौन भऽ कालेज जाइ छइथ आ कालेजसँसीधा घर घुड़इ छइथ- नैराश्यसँपीड़ित अणिमाजीकऽ सेवा खातिर।सोझां सोझीं जीवनभऽ गेलइन। आब नञि "बंगाली " कहला पर खराब लगइन आ नञि परफेसर कहला पर। अपनाकऽ कमीशन वाला लेक्चरर कहनाई त बिसरिये गेलाह। ईएह कहाइ छइ- बदला मे बदलीभऽ गेलइन।लोक घर मे बइसल...... ई निष्कर्ष निकाइल लेलक जे बिन आइगक धुआं नञि निकलइ छइ। किछु तऽ चक्कर छइहे। किनको प्रतिष्ठा मटियामेट करबाक हुआय त " अफेयर " सबसं औचक हथियार सदैयसँरहल अइछ........ओकरे उपयोग दासजीकऽ विरोधी सब कयलाह आ एक आगु बढ़इत व्यक्तित्वकऽ समाज "अफेयर्स " कऽ नाम पर धराशाई कऽ देलक। केतकीकऽ व्यथा- की कहू कथा (लघुकथा) ओइ समय मे सब गाम मे विद्यालय नञि होइ छलइ। प्राथमिक विद्यालय कतउ कतउ भेटियो जइतइ, मुदा उच्च विद्यालय त गूलरक फूल। जई गाम मे उच्च विद्यालय,ओकर अंईठने अलग। अइ गाम मे बच्चिया सब सेहो पढ़ल लिखल होइत छल। केतकी अइ मे भागमंत छलीह। उनकर गाम मे उच्च विद्यालय छलइन। अगल बगल कयेक गामक विद्यार्थी सब ओइ गाम मे पढ़बाक लेल कियो संबंधी त कियो जोरूआ संबंधी त कियो अनुबंधी कतऽ रही कऽ पढ़ई छल। अही मेसऽ किछु विद्यार्थी ब्राह्मण भोजनक लेल टिपैल रहइ छल। केतकी नऊआं किलास मे पढ़ई छलीह। सबसं तेज त नञि, मुदा भुसकौलो नञि छलीह। केतकी जेहने सुन्नर फूल, ओहिना सुन्नर‌ देखबाह मे। ओहिना बात विचार व्यवहार। से कियैक नञि होइन- संस्कारी परिवारक छलीह। ओइ समय मे नउआं मे पढ़इत केतकीकऽ विवाह घरकथासँपंचकोसिये मे सुभ्यस्त परिवार मेभऽ गेलइन। चौदह बरखक केतकीकऽ घरवाला चौबीस बरखक कमऊआ मनोहर बाबू छलाह। कमऊआ बर मे कवनो अवगुण नञि- तहिया ईएह मानल जाइ छलइ। वयसक अन्तर तहिया कथा बारता मे नञि देखल जाइत‌ छलइ। सब ठीक छलइ। केतकी घरबाला संग दिल्ली मे रहअ आइब गेली। घरबाला पाइ जमाकऽ क‌ रखने रहइत। दिल्ली मे एकटा मकान सेहो किनलाह। मनोहर बाबूकऽ कवनो गंभीर बीमारी छलइन।ईलाज चलइ‌ छलइन। ई सब गप्प जाबइत केतकी बुझतीह, ताबइत एकराइत मनोहर बाबू सुतले केतकीकऽ छोड़िकऽ दूनियासऽ विदालऽ लेलाह।दु बरख विवाहकऽ भेल रहइन। सोलह बरखक नऊआं पास केतकी आब की करतीह। सासुर- नैहरकऽ सब लोक जमा भेल। ईएह घमरथन। केतकीकऽ की हेतइन। किनको विचार जे आगु पढ़ावल जाय,कियो नैहर मे रहबाक, कियो बरक आफिस मे पैघ भेलाह पर छोट नौकरी, कियो दोसरो बियाह। तरह तरहकऽ गप्प। केतकी मौनीभऽ जीवन ढ़ो रहल छलीह। उनकर सुन्दरता विवाहित भेलासँआरो निखइड़ गेल रहइन। सासुर बाला सब कुमार देबरसँविवाहकऽ इच्छा जतेलकइन। केतकी त जेना बऊकभऽ गेल छलीह।ओ नञि हं कहलखिन आ नञि । उनकर चुप्पीकऽ सासुर बाला नञि बुझलकइन आ लगलइन दुख देनाई। एही सबहक साक्षी छलाह दीपक। ओ केतकीकऽ दिल्ली वाला मकान मे किरायेदार छलाह। पढ़ाइकऽ संग नौकरीकऽ तैयारी करय छलाह। मनोहर बाबूकऽ संबंधी छलाह आ केतकीकऽ गाम मे रहीकऽ पढ़ाइ केने छलाह। बच्चा बाली केतकी, स्कुल वाली, विवाहित आ विधवा केतकी, अपन स्त्रीत्व बचबइ खातिर संघर्षरत केतकी- साक्षी छलाह दीपक। एक दिन केना की भेलइ, केतकी दीपक संग बाकी जीवन बितबइ लेल तैयारभऽ गेलीह। ओ दीपकक ढीम फलासी मे फंईस गेलीह। असली गप्प छल जे केतकीक सौन्दर्य आ दिल्लीकऽ संपत्तिकऽ लालसा मे दीपक ई चाइल चलने छल। दूनु गोटे चोरा कऽ कोर्ट मे विवाहकऽ लेलइन। किछु दिन बाद भेद खुललइ। पर पंचइती भेल। सासुर वाला अपने मूक्ति चाहइ छलाह विधवाकऽ जिम्मेदारी सं। कनीक हल्ला गुल्लाभऽ सब शांतभऽ गेल। दिल्ली वाला मकान, व्यवसाय शुरू करबाक नाम पर दीपक, केतकीसँबेचबा देलकइन। केतकीकऽ एहन दीपकक नशा छलइन जे बुझबइन किछु, ऊयाह दुश्मन बुझाइन। लोक सब सेहो छोअइड़ देलकइन। जाबइत मकानक पाइ छलइन, खुब छहर- महर करय गेलाह। किछु बरखक बाद जखइन पाइ खतम भेलइन, तखइन दीपककऽ असली रूप सामने अयलइन। अही बीच केतकी एक टा बेटाकऽ मायभऽ गेल छलीह। उचित-अनुचित बुझ लागल छलीह। बात बात पर दीपकक ताना आ किछु बजलाह पर माइड़ पिटाई सेहो सहअ पड़इ छलइन। केतकीकऽ आगु जीवन मे अन्हार बुझाय लगलइन। कयेक बेर जहर माहुर खयबाक मोन करयन। फेर ननकिरबाकऽ देखकऽ विचार बदइल लइथ। समय बितेबा लेल किछु पेंटिंग करय छलीह। एक दिन एक टा पाहुन घर अयलखिन । ओ कलाप्रेमी छलाह। केतकीकऽ पेंटिंग देखकऽ कहलखिन जे ई त विशुद्ध मिथिला पेंटिंग अइछ। केतकीकऽ घरक हालात ककरोसऽ नुकायल नञि छलइ। नैहरवाला सब सेहो दोसर बियाहकऽ बाद संबंध तोअइड़ लेने रहइन। सासुर मे सेहो कियो व्यवस्थित नञि। पेंटिंगकऽ बदला मे किछु टकाकऽ प्रस्ताव अयलइन। आन्हरकऽ की चाही, दु टा आंखि। केतकी मोन लगाकऽ पेंटिंग बनबऽ लगलीह। अहीसँदु टा टका अबइन, जईसँघरक चुल्हा जरइन। कहूना दिन बितबइ छलीह जे ननकीरबा पईघ होइत त दिन घुरत। दीपकक हाल आरो खराब। नशाकऽ क परल रहनाई आ चिल्लेनाई आ स्त्री पर हाथ उठेनाई-ईएह रही गेल छलइन। केतकी बेटाकऽ पढ़बकऽ पाछु पागल भेल छलीह। बेटाक संगत ठीक नञि भेलइन। दसवीं मे पढ़इत छलइन, तखने नशाकऽ क घर घुरलइन। ओही दिन पहिल बेर केतकी बेटाकऽ ई रूप देखलीह। पढ़ाइ मे सेहो साढ़े बाइस छलइन। आब कोन उम्मेद आ केकरा पर। पहिने सांयकऽ लातजुता तर आब उपरसँबेटो तेहने। जीवन ढो रहल छथि आइयो। कवनो पूर्व जन्मकऽ पापक फल छइन, आर की। केतकी कथा-व्यथे-व्यथा। उठऊआ बियाह (लघुकथा) आइ कतेक बरखक बाद शोभनसऽ भेंट भेल। ओ अप्पन बेटीकऽ दिल्ली विश्वविद्यालय मे नाम लिखबऽ आयल छलाह। हमरा बारे मे पता सब किछु छलइन। ताहि लेल सोचलाह जे बेटीकऽ परिचय सेहो करा देताह आ भेंट गांठ से होभऽ जाइत। राजा देब कखनो कोनों जरूरत पड़तइ त लग मे अपन लोक कतऽ ‌ चईलो जाइत। परिवार वाला सरकारी डेरा छल हमर। लोगक अबरजात छल।पहुंचनाई सेहो आसान छल। पहिने फोनकऽ क छुट्टीकऽ दिन आयल छलाह। बहुत तरहक गप्प शप्प भेल। पुरान पुरान लोकक चर्च भेल। अतबा बुझबा मे आइब गेल जे बेटी विदुषी छलइन। ओतबे सुन्नर आ ठांय पर ठांय वाली हाजिरजबाब। मजाक मे शोभनकऽ सेहो नञि छोड़इन ओ। अपने कहलक हम उठऊआ प्रोडक्ट छी। भइड़ दिन कोना बीत गेलइ, से पते नञि चलल। किछुये घंटा मे ओ अपन उपस्थिति जता देलक। ठहक्का पर ठहक्का। सांझ मे ओ दुनु गोटे अपन होटल घुरी गेलाह। तीस बरखक पुरान सब गप मोन पड़ी गेल।शोभन हमर संबंधी कतऽ रहइकऽ कालेजक पढ़ाइ करय छलाह। बदला मे घरबइयाकऽ धीया पुताकऽ पढ़बइ‌ छलाह। माने बच्चा सबहक सरजी। बीएससी ओतइसऽ केलाह। ओना एमएससी मे युनिवर्सिटी मे होस्टल भेंट गेल रहइन, मुदा घरबइयाकऽ आग्रह पर ओतइ रही गेलाह। परिवारकऽ समांगभऽ गेल छलाह। हमर संगतुरिया छलाह। समय उनके संग बितय। भलमानुष परिवारकऽ छलाह। गिरहथक बेटा छलाह। पाइक कशमकश घर मे देखने छलाह। ई सरजी वाला मौका जखने भेटलइन, बिना सोचने हामी भरी लेने छलाह। एक दिन शुद्धकऽ समय मे बेरु पहर जखइन युनिवर्सिटीसऽ घुड़इ छलाह। किछु लोक जबरदस्ती मोटरसाइकिल पर बइसा कलऽ गेलइन। ओ लंगा गाम छल। दिन मे कतउ आर रखलकइन। राइत भेलाह पर जबरदस्ती बियाह कराअ देलखइन। हामी भरऽ मे किछु ना नुकुर केलाह त मारबो केने रहइन। थोड़ेक काल मे हल्ला भेल। बिना मोबाइलोकऽ खबर चारु कात पसइड़‌ गेल। गाम मे माय पेटकुनिया लाईध देलकिन। किछु गामक नवतुरिया सब जमा भेल आ शोभनकऽ सासुर गाम गेल। ओतऽ आंगन मे लाल धोती पहिरने आ हड़इद‌ ठोप लागल गुम्म शोभन भेटलखिन। शोभनकऽ फेर मोटरसाइकिल पर बइसावल गेलइन आ उनकर गाम घुराकऽ ल जायल गेल।सबकऽ उम्मेद छलइन जे माइड़ पीट किछुओभऽ सकइत छइ। लेकिन कोनो विरोध नञि। शोभन अपन गाम मे आइब गेल‌‌‌ छलाह। आब लंगा गामक अगिला डेग पर सबहक नजर छल। शोभनकऽ नुकाकऽ कतउ कतउ राखल जाइन युनिवर्सिटीकऽ पढ़ाइ से हो छुटी रहल छलइन। किछु लोक थाना पुलिसक लग सेहो गेल। कतउ समाधान नञि। जिनका कतऽ रहइ छलाह, ओहो लंगा गामक दुआरें तटस्थभऽ गेल छलाह। करीब महीना बीतऽ लगलइ। आब शुरू भेल समझौताकऽ वार्ता। अहि बीच दुनु पक्ष कोर्ट मे नालिश केलक। लड़की सुन्नर छलइन, विधवाकऽ बेटी छल। नैहर सासुर कियो कथा लेल ध्यान नञि देलकइ। तखइन अइ उठऊआकऽ शरण मे गेल। पाइ कऊरी सेहो छलइ। बाद मे शोभनकऽ पुरा दान दहेज सेहो देल गेल। समझौता भेल। लड़कीकऽ भाग देखियउ। ओही साल शोभनकऽ बैंक मे नौकरी सेहोभऽ गेलइन। किछु दिन बाद सब सामान्यभऽ गेल। उठऊआ बियाहकऽ अहन‌ सुखांत होइत, कियो सोचबो नञि कयने छलाह। शोभनक कनिया सेहो व्यवहारसऽ सब सासुर वालाकऽ मोन जीत लेलक। सबहक मुंह मे एक्के बात- अइ मे लड़कीकऽ कोन दोख। अहिनो होअइत‌ छलइ। कियो बिसवास करत अजुका नबका पीढ़ी। बड़का घरक बहुरिया (लघुकथा) आइ फेर रामबाबूकऽ तुलसी पीड़ा लगसऽ उठाकऽ घर मे घुराकऽ राखल गेलइन्हि।भइड़ गामक लोक उनका जा कऽ देख अयलइन। कियो गोर लाइग अयलइन त कियो थोड़ेक काल ओतऽ बइसकऽ आइब गेल। देखनिहार सभकऽ चाह- पान सेहो उनका कतऽ भेंट जाइ छइन। ताहिक‌ लोभे सेहो किछु लोक नियमित चइल जाइत अइछ।ओना रामबाबू आ उनकर घरक लोकक बेबहार‌ एहन छलइन जे भइड़ गाम मे लोक याद करइत छइन। बिना कवनो लोभ लालच के, जे भी याद केलकइन, कम- बेशी मदद केलखिन। ओही परतापे, सब धीया पुता सुख मे छलइन। लोक कहइन जे फलमां आयल छथि- आहांकऽ देखइ लेल। बड्ड दुर सं। रामबाबू उनका दिस ताईक लेथिन। किनको देखकऽ मुस्कियाईयो दइ छलखिन। ओ अपनाकऽ भागमंत बुझइत जे हमरा देखकऽ मुस्कियेलाह।फेर चर्चा होइ जे फलां फलांकऽ देखकऽ खुशी भेलइन। बजई किछु नञि छलखिन। मुदा बुझाई जे किनको ताईक रहल छइन उनकर आंईख। आइ फेर तुलसी पीड़ा लगसँजखइन घुरावल गेलइन त सब कहऽ लगलइ जे किनको देखइ लेल हिनकर प्राण अटकल छइन। आइ त गऊदान सेहो करा देल गेलऽ इन हांई हांई मे। रामबाबूकऽ कनिया सब बुझई छलीह जे रामबाबू किनका जानसँबेशी चाहइ छथिन।उनकर आंईख किनका ताईक रहल छइन। ओ आर कियो नञि उनकर बड़की बेटी चान दाई छथि। दस बरख रामबाबूकऽ बिबाहक बाद चानदाई पहिल संतान जन्म लेलखिन। रामबाबूकऽ माय कतबो कहथिन जे दोसर बियाहकऽ लइ लेल मुदा रामबाबू मनाकऽ देलखिन। चान दाईकऽ बाद पांच टा आर संतान भेलइन मुदा अंखिदेखउआ दुलारु चान दाई रहलीह। सोलह बरखक जखइन चानदाई भेलीह त तखुनका बड़का घर मे कथालऽ क रामबाबू अपन बहनोई संग गेलाह। ओत वरागत जे सब कहलखिन, रामबाबू सब शर्त एक्के बेर मे माइन लेलखिन्ह। घुरती मे बहनोई कहबो केलखिन्ह जे आहां सब कियैक गइछ लेलियई। रामबाबूकऽ ज़बाब छलइन जे आइ काल्हि बाजारवाद छइ।जखइन बाजार जाइ आ कवनो सामान नीक लाइग जाय त ओकर मोल भाव नञि करीह। घुइड़कऽ ननदोईस सब बात सरहोइजकऽ कहलखिन। आब उपाय की। रामबाबू जमीन बेचकऽ बिबाह केलाह।सब कहइन जे अतेक कियो नञि देने छल बेटी के। बिबाहक बाद चानदाईकऽ बिदागरी मे सब बेर संशय। पहिल बेर रामबाबू अपने गेल छलाह बिदागरी लेल। बिदागरी त नञिये भेलइन, बेटीसऽ भेंट सेहो नञि भेलइन। गाम घुरीकऽ झुट्ठे चानदाईकऽ मायकऽ कहलकिन जे सासकऽ मोन खराब छलइन ताय नहीं अयलीह।फेर कहियो रामबाबू चान दाईकऽ सासुर नञि गेलाह। बाकि पांच धीयापुताकऽ बियाह दान मे सेहो चानदाई कनीक काल लेल अयलीह। बड़का घर बड़का व्यवहार।नैहरबालासँसीधा भेटगांठक परम्परा नञि। चान दाई कहियो सासुरकऽ कवनो शिकाइत नञि केलीह।ओही दुनिया मे ओझरायल छलीह। नैहर आबस त बाकि भाइ बहिनकऽ सासुर बालाकऽ बेबहार देखकऽ सेहन्ता होअइन कि उनको सासुरक लोक अहने आबेशी होअइतइन। उनकर बिदागरी लेल कियो नैहरसऽ आबइ‌ लेल तैयार नञि। बिन बिदागरीकऽ पठबऽ कऽ परम्परा नञि। अइ बीच मे झुलइत चान दाई। एक बेर मोन हल्लुक करक लेल मायकऽ कहबो केलखिन जे बराबरी वाला कथा नीक। धन सम्पत्ति सब किछु नञि। माय बुझि गेलखिन। आब उपाय की। जखन चान दाई रामबाबूकऽ सोंझा जाइ छलीह। दु चाइर टा नोर दुनु गोटाकऽ आंखिसऽ टपईके जाइन। निःशब्द सब। गाम समाज मे एकतरफ लोक कहइ जे बेटीकऽ बिबाहक मे रामबाबूसऽ बेशी कियो खर्च नञि कयलक। दोसर हुनकर मोन कहइन जे बड़का‌ मे संबंधकऽ क नीक नय केलाह। सब बेर सोचइत जे चानदाईसऽ माफी मांगब। मुदा सामने अबइन‌ त ज़बान मौनभऽ जाइन।चान दाई पढ़अ चाहइ छलीह तहिया। सोलहम बरख तहिया बड बुझाय। आइ छब्बीसम सेहो कम। अकर बाद कवनो बेटीकऽ ओ बड़का घरक बहुरिया नञि बनऽ देलखिन। बहुरिया आ मलकाइन मे अंतर सबके बुझबतिन। बहुरिया मे सास ससुरकऽ राजबाला...बर- घर आ मलकाइन मे लायक घरबाला। सब धीया- पुता, भाइ, बहिन, भातिज भतीजी, सखा - संबंधी नौकर चाकर, गंउआ सब आइबकऽ देख गेलइन मुदा चानदाई अखनो नञि अयलीह। माय चोरऊका संवाद कयेक बेर पठा देलखिन कि आइबकऽ देख लियउन। चान दाई कतसऽ खबास फलक मोटरीलऽ क आइब गेल, ओ नञि अयलीह। कहलकइ जे बहुरिया पठेलीह अइछ। आब मायकऽ से हो बुझाय लगलइन जे रामबाबूकऽ प्राण बिना बहुरियाकऽ देखने छुइट जेतइन।ऊयाह भेलइ राइत मे बहुरियाकऽ इंतजार मे रामबाबू गोकुल धाम चइल गेलाह। दरबार (लघुकथा) दरबार सुनिते राजा-महाराजा, बड़का जमींदार, मंत्री, अफसर ईएह सब ध्यान अबइ छइ। दरबारी ओहदा होइ छलइ। नवरत्न सब ओइ सब मे होइ छलाह। महाराजाक दरबारी छोटका राजा सब, राजा सबहक जमींदार, जमींदार सबहक गिरहथ- मजुर। अहीना बड़का लाला- व्यपारी सबहक फुटकर दोकानदार,दोकानदारक मुनीम अहिना क्रम चलइत छइ। दरबारीसऽ दरबारक मान होइ छलइ।कतउ कतउ रानी महरानी सबहक सेहो अप्पन अप्पन दरबारी छलइन। कोनो कोनो खबास सेहो चहटगर चर्चक नायक रहइ छल।बेशीतर अइ तरहक दरबार वाला सबहक आंगन मे परपुरूखकऽ गेनाई मे रोके जकां छलइ।जे घुसऽ मे सफल उनका बड़का दरबारीकऽ तमगा। जतेक मुंह ततेक गप्प आहांकऽ सुनऽ कऽ भेटत।मोटा मोटी धन जरूरी दरबारक लेल। आइ काल्हि लोक व्यंग्य मे दरबार वाला कहइ छइ। दरबारी कहबाव लेल त कियो तइयार नञि। ओना हां मे हां मिलबऽ बाला लोकक कमी नञि।दरबार मतलब त सीधा भगवान भगवतीकऽ दरबार, मनूक्खक कतउसऽ नञि। आब जई दरबारक बात हमकऽ रहल छी से सबसं भिन्ने अइछ। रामबाबू पहिने अंग्रेज सरकार बाद मे बिहार सरकार मे छोट-छिन्न मुलाजिम छलाह। समयक अंदाजा लाइग गेल होइत। कनियाकऽ मृत्युभऽ गेल‌‌‌ छलइन।असगरे रहइ छलाह। ओना ओइ समय मे अंग्रेज अधिकारीकऽ छोड़िकऽ कम्मे सरकारी लोक परिवार संग रखइ छल। ड़इब दिनकऽ रामबाबूकऽ दरबार लगइ छलइन। बेरू पहर होइत होइत दरी जाजिम सब बिछ जाइ।लोक अयनाई शुरूभऽ जाइ। रामबाबूकऽ अप्पन अलग आसन रहइन । रत्नआ दरबारी सबहक अलग। दरबारक बिना लिखल पढ़ल अपन संविधान रहइ। मोटका रजिस्टर रहइ।ओइ मे नाम लिखाई। किछु पाइ दकऽ आहां दरबारकऽ सदस्य बइन सकइ छी। गैर सदस्य सबकऽ बइसऽ कऽ अलग बेबसथा- कात मे। सदस्यसँरत्न बनऽ लेल पारदर्शी प्रक्रिया छल। रत्नकऽ बइसबाक अलग बेबसथा। जे नियमित अऊताह वा ढोल-संगीतक जानकार वा निश्चित सहयोग राशि, से सब रत्न दरबारी। लोक गर्वसँदरबारी कहाबइ छल। सब सदस्यकऽ गोलिया, फल आ लड्डू प्रसादी मे देल जाइ छलइ। महिला सदस्य सब सेहो होइ छलीह। आखिर ओइ दरबार मे की छलइ जे लोक अबइ छल। ओइ मे ढोल मृदंगकऽ संग निर्गुण आ विदेशिया गायल जाइत छल।रामबाबूकऽ एहन प्रभावी आवाज छलइन जे जखइन ओ विदेशिया गबइ छलाह त लोक तकिते सुनिते रही जाइ । भांग- गांजाक बेबसथा सेहो रहइ छल। ओतबा काल सब दोसरे दुनिया मे रहइ छल। अंग्रेज अधिकारी सब सेहो उत्सुकता वश अबइ छल। रामबाबू जई शहर मे बदलीभऽ क जाइत छलाह- ई दरबार अनवरत चलइत छल। ओ दरबारीकऽ अलावा किनको कतऽ अन्न जल ग्रहण नञि करय छलाह। हुनक संबंधी आ अधिकारी सब सेहो हुनक भावनाकऽ सम्मान करइत दरबारक सदस्य पहिने बनञि छल तखन आबऽ कऽ आग्रह करयन। रामबाबू सेहो अप्पन दरबारी सबकऽ पुरा ख्याल रखइ छलाह। भाइ भतीजासँबेशी दरबारी सबहक मान दइ छलखिन।आब नञि ओ दरबार आ नञि ओ दरबारी।एक सामान्य लोक अतेक सिद्धांतकऽ संग जिनगी जी लेलक। कियो कहलकइ जे एहन दरबार चलबऽ बाला लोक जन्म लइ छइ, बइन नञि सकइ छी। की अहुं सब अइ तरहक कवनो दरबारकऽ बारे मे सुनने छी? जिज्ञासा। सामाजिक व्यवस्था मे कतेक बदलावभऽ गेल। समयक चक्र (लघुकथा) आइ फेर बड़का बखेरा भेल रहइ। भइड़ गामक लोक रामबाबू कतऽ जमा भेल रहइन। बेशी त मजा लेबऽ खातिर आयल छल।कऽ कहइ छइ जे गाम खालीभऽ गेल छइ। कतऽ सऽ अतेक लोक आइब गेल। ब्राहमण भोजन मे लोक नोत बिजोह देलो पर नञि आबइत अइछ।मुदा अखइन देखू। सब बिन बजेने आइब गेलाह।कऽ मऊगीकऽ पुरूख। मुरी गिनञित रहु। उत्तर वारी टोलसऽ सबसं बेशी लोक आयल।कियैक नञि आइत। ओतइ सटले रामबाबूकऽ बड़का आमक गाछी छलइन।जई मे पहिने लोक निवृत होइ लेल ओइ टोलक लोक जाइत छल।सटले ईनार सेहो रहइन।ओतुके लोक ओकर उपयोग करय छलाह।कहबी ईहो छल जे अइ ईनारक पाइन मे दाइल नीक सींझई छइ। बस आब की दोसरो टोलक लोक पाइनलऽ जाय। पहिने हत्था आर बाद मे लोहाकऽ कांटसऽ पुरा घेरा देल गेलइ।रखबार सेहो रखा गेलइ। भारी आफत उमहरका लोक के। धन कहि सरकारकऽ जे आब सब घर मे ई सब बेबसथा छइ। रामबाबूकऽ बाप फूलबाबूकऽ सबसं बेशी जमीन अइ परोपाटा मे छलइन।संगही कांग्रेसी नेता सेहो छलाह। अजुका नेता जेकां नञि। अप्पन‌ घरक आंटा गिल्लाकऽ क राजनीति करय छलाह। कहियो नञि टिकट मंगलकिन, नञि पार्टी अपने देलकईंन, आ नञि चुनाव लड़लाह। धन भेलासँअनेरो चेहरो रौबदार लागऽ लगइ छइ। फूलबाबूकऽ जिनगी शान मे बितइ छलइन। रामबाबू विद्यार्थी नीक नञियो रहलाकऽ बादो बापक बदौलत रिजल्ट मे बढ़िया रहलाह। शहरक कालेज मे प्रोफेसरी सेहो भेंट गलइन, कियैक त फूलबाबू कालेजक कमिटी मे छलाह। अतेक तक त सब ठीक। इमहर रामबाबूकऽ शहर मे नौकरी लगलइन आ उमहर हुनक माय मामुली जर बोखार मे परलोक चइल गेलखिन। ओइ समय फूलबाबू पार्टीकऽ अधिवेशन मे छलाह। खबर भेलइन। तखन अयलाह।फेर क्रियाकर्म भेलइन।ताबइत बर्फक सिल्ली मे देहकऽ राखल गेल‌‌‌ रहइन। पहिल बेर लोक एना मृत देहकऽ सिल्ली मे राखल देखने छल। श्राद्ध मे चौगामा आ पचमेर भेलइ। आब फूलबाबू असगरभऽ गेलाह।ओतेक संपइत।ओइ समय मे दुटा तीन टा बियाह लोक करइत छल। फुल बाबू पहिने त बियाहकऽ लेल तैयार नञि होइ छलाह मुदा बाद मे स्वस्तिदऽ देलखिन। नीक कुल शीलकऽ कथा देख कऽ भलमानुष कहि वा गरीब कहि, दोसर बियाह भेलइन। अइ बियाह मे कन्या पक्षक बाकी जिम्मेदारी फूलबाबू गछलखिन आ ता जीवन निभेलकिन। रामबाबू भीतरिया बापक दोसर बियाहक खिलाफ छलाह।होबाके चाही मुदा किछु बजलाह नञि। बेशी अप्पन शहरे वाला घर मे रहइथ।इनको बियाह दान भेल आ परिवार संगे रखलाह। फूलबाबूकऽ दोसर बियाहसऽ तीन टा बेटा भेलइन। जखइन बच्चा सब छोटे रहइन त बीमारी आ उम्रदराज फूलबाबू स्वर्गवासीभऽ गेलाह। अखइन तक जे रामबाबू शांत आ शहर मे रहइ छलाह, द्वादशाकऽ पराते बापक पाइ कौरीकऽ हिसाब सत्मायसऽ मांगह लगलाह। गामक लोक कतबो कहलकइन जे माछ माऊस बांकिये छइ। थम्ही जाऊ। लेकिन उनकर माथ पर त अतेक दिनक हिसाब हावी छलइन। सबसं पहिने मोटरक चाभी लेलाह। फेर भरार घरक। ओकर बाद जतेक लगुआ भगुआ संबंधी सब रहथिन, सबके जयबाक आदेश। मालिक बनिते एहन आन्हरभऽ गेल छलाह जे सत्मायक मायकऽ सेहो जायक लेल कहि देलखिन। मनेजर, मास्टर,, मुहर्रिर सबके हटा देलखिन।उतरवारी टोल वाला गाछी मे लोहाक जाली आ ईनार पर मनाही अखने भेल। पुरा हवेली फूलबाबूकऽ जाइते सुन्न सपाटभऽ गेल। बड़का घरक बात छल। सब चुप्पे रहल तहिया।कऽ इनकासऽ बिगार लेत। समयक चक्र देखू। रामबाबूकऽ कनिया सेहो ईएह अवस्था मे मइड़ गेलखिन। दु टा बेटी छलइन। दुनु सासुर बसई छलइन। समय अजुका बदइल गेल‌‌‌ छलइ। कतबो बेटी- जमाय सब मना केलकइन। रामबाबू दोसर बियाहकऽ लेलाह। समझौता ई भेलइन जे‌ पाइ आ पेंशन नबकी कनिया आ समपइत बेटी सबकऽ द देल‌ जेतइ। अहिना सब चइल रहल छलइ। आइ चाइर दिन मुइला नञि भेलइन रामबाबू के, सतमाय आ बेटी सब मे पहिने बाता- बाती, फेर गारा - गरौवल, फेर झोंटा- झोंटऊल भेल। ज़बान धनिक बिधवाकऽ बड्ड शुभचिंतकभऽ जाइत छइ। दुनु पक्ष एक पर एकाले। बाद मे थाना-पुलिसकऽ कियो फोनकऽ देलकइ। महिला पुलिस सेहो आयल छलइ। ओकरो सामने मे मारा - पीटी भेल। सबके पकइड़कऽ पुलिसलऽ गेलइन। आब कोना क्रिया कर्म हेतइन रामबाबू के। उएह बइमातर भाइकऽ बेटा कर्म करतइन- ईएह पंचइती मे निर्णय भेल। तहिया रामबाबूकऽ सत्माय सब ज्यों सब्र नहीं रखने रहितइत त अहिना गिंजन होइतइन।सब जगह अकरे चर्चा। समयक चक्र छइ। ऊपरवाला सबटाह हिसाब बरोबर करय छइ। बदलल बेबहार (लघुकथा) आइ कतेक बरखक बाद रामबाबू दरभंगा एकटा बियाह मे आयल छलाह। संजोगसँकन्यागत आ वरागत दुनु हुनक अपेक्षित छलखिन। सोचलाह अइ बहाने कनिक मोनो बदलत आ लोक जे कहइत अइछ जे काज मे नञि अबइ छी से दोषो मिटा जाइत। दरभंगा आइबकऽ सीधा कन्यागत कतऽ गेलाह। कन्यागत एकटा बड़का घर आ सटले विवाह भवन बुक केने छलाह। रामबाबूकऽ देखते घरबइयाकऽ बड्ड खुशी भेलइन। आदरक संग अप्पन पाहुन परख सबसँपरिचय पांति करेलखिन। कनीक काल रामबाबूकऽ प्रभावी व्यक्तित्व कलऽ क गंभीरता रहल। फेर निधोख बहस चलऽ लागल। ओइ मे किछु लोक राज स्कुलकऽ बिदयारथी सेहो रहल छलाह। फेर की संस्कृतक शिक्षक पंडीजी सलऽ क हेडमास्टरकऽ रौब रूतबा, खेलक मैदानकऽ सफाई आ फस्ट डिवीजन वालाकऽ लोहा वाला जालीकऽ अंदर बोर्ड मे नाम लिखायलकऽ चर्चा। खुब भरी छांक पुरनका गप्प सब भेल। बिबाह दान संपन्न भेल। खुब उत्साहक संग दुनु पक्ष जिम्मेदारी निभेलाह। पहिल बेर रामबाबूकऽ अफसोस भेलइन कि कियैक ओ दुनु बेटीकऽ दिल्लीसँबियाह केलाह। शौक मनोरथ, बिध बाध देखकऽ अपनसऽ तुलना करऽ लगलाह। सब बेबसथा आ सुविधा अतऽ छइ। बेटाक बियाह अतइसऽ करब से मोने मोन निर्णय केलाह। बियाहकऽ पराते घुरबाक टिकट छलइन। होइ छलइन जे किछु दिन आर रही। दिल्ली घुरबाक लेल भारी मोनसऽ बिदा भेलाह। घरबइया अपने स्टेशन आयल छलाह छोड़ई लेल। फस्ट क्लास मे टिकट छलइन। समयसऽ आइबकऽ सीट पर बइस गेलाह।दोसर सीट एकटा बच्चियाकऽ छलइ। ओकर माय बाप ओकरा विदा करऽ आयल छल। ओकर सबहक गपसँई पता चइल गेलइन जे ई सुन्दर युवती सर्वजातीय छइन आ इन्जीनियरिंगकऽ क आइ टी कम्पनी मे काजकऽ रहल अइछ। असगरे दिल्ली जा रहल अइछ। ओ लड़की आधुनिकता आ पारंपरिकता दुनुक अद्भुत मेल बुझेलइन। अतेक ओ परिवारकऽ लोक सबहक लेल सोचई छइथ, सुइनकऽ रामबाबू भीतरे भीतरे उत्साहितभऽ रहल छलाह। उनका अपन जतरा सफल बुझायल लगलइन। ओ ओइ लड़कीकऽ अपन पुतोहु बनेबाक लेल सोचऽ लगलाह। ट्रेन से हो रिशिडुलभऽ गेल छलइ। लड़कीकऽ पिता रामबाबूकऽ परिचित कतऽ कथालऽ क गेल छलाह। रामबाबूकऽ परिचय जाइनकऽ ओइ लड़कीकऽ पिता फोनक देब लेब से हो कयलाह। रामबाबू ई सबकऽ संयोग बुझई छलाह। ट्रेन कनीक काल मे खुजल। ओइ लड़कीकऽ आंईख मे नोर भरल। माय बाप से हो कनञि छलाह। रामबाबू सेहो देखकऽ द्रवितभऽ गेल छलाह। जखने ट्रेन प्लेटफार्मसऽ बाहर भेल, ओ लड़की चटसऽ नोर पोछलक। आइब्रो ठीक केलक। फोन उठेलक। वार्तालाप सुनु। अरे कइसे फोन उठाती। मां पापा यहीं थे। ट्रेन तो कब का खुल चुका। ट्रेन रिशुडल हो गया था। मैसेज कर देती। नञि मौका मिला। मैंने चालीस कौल किअए। साइलेंट पर था। अब सबका फाइन देना पड़ेगा। आ ही रही हुं। ले लेना। सुद सहित लुंगा। हां-हां ठीक है। कोई और बैठा है। कोई नहीं। ........ भइड़ राइत गपक प्रवाह चलिते रहल। शब्दक मर्यादाकऽ सीमा त कखने लंघा गेल छल। फस्ट क्लासक कुप छल। दुईये गोटे ओइ मे। रामबाबू कंबल ओइढ़कऽ सुतऽ कऽ ढोंग केने रहइत। पहिल बेर अपन असेसमेट उल्टा लगलइन। अपनाकऽ कबिलतीकऽ बड्ड दाबा छलइन। जे लड़कीकऽ ओ आदर्श बुइझकऽ पुतहु बनबऽ कऽ सोचई छलाह ओकर असलिइत सामने छलइन। पुरा जतरा आब बोझ बुझाय लगलइन।बरका धोखा खाय‌सँओ बचलाह। ओकर मायबाप जे कथालऽ क घुईम रहल छइथ ओ कतेक धोखा मे छइथ।बेबहार कतेक बदइल गेल‌‌‌। लाज अइछ त कंबलसऽ मुंह झाइप लियअ। अनघोल (लघुकथा) आइ फेर भोरेसऽ गाम मे फुसफुसी चइल रहल अइछ।कियो ककरो सीधा किछु नञि कहि रहल छइ। पुछला पर कहत की नञि कोनो बात। मुदा सब व्यस्त। दिनसँसांझभऽ गेल।स्त्रीगण सब कानों फलां बाबूकऽ घरक दुमुंहा लग त कखनों महावीर मंदिर मे सांझ देबाक काल एकदोसरासऽ पुछइ छथिन। सब निरूत्तर। सबहक कान ठार। ऐना बुझाई छलइ जेना चुनावकऽ गिनतीभऽ रहल छइ।कऽ जितत आकऽ हारल। किनकर सरकार बनत-तेहने जिज्ञासा। जेना चुनाव मे पोलिंग एजेंट आ किछु पाइ पर काज करऽ बाला लोककऽ छोड़िकऽ कियो नञि कहत कि किनका तरफसऽ आहां छी, ओहिना आइ कियो अपन बिचार नञिदऽ रहल छल कि ओ कोन दिस।सबाले एहन छलइ। पहिल बेर एहन गप्प सामने आयल छलइ। गाम त गाम छी। अपना घर मे किछु हुआय मुदा दोसरक घर पर सबहक नजर। सब उचितवक्ते आ सब ज्ञानिये। कियो कहइ कि हमर नैहर मे ऐना भेल रहइ त कियो अपन सासुर त कियो अप्पन मातृक त कियो कोनो आर गामक। अइ गामक त पहिल घटना। अनघोल मचल छल। की हेतइ। आखिर एहन कोन गप्प छअइ जे सब हक ध्यान अही पर। रामबाबू अइ गामक सबसं कलामी लोक छलाह। हुनका जीबइत किनको हिम्मत नञि भेलइन जे हुनका घरक बिशेषकऽ स्त्रीगणक कियो चर्चा करय। समय बदइल गेल छइ। आब कियो ककरो मुंह पर जाबी लगा सकइ छइ। सब स्वतंत्र। आइ रामबाबू रहितइथ तखनो गप्प नोन तेल लगाकऽ होइबे करतइ। नीक भेलइन,चइल गेलाह।बाजु हुनकर पुतहुकऽ लोक मुद्दा बना देने छइन। जहिया अइ गाम आयल छलीह ओ कतेक मान- दान भेल छलइन। सुन्नञिर त ओहिना छलीह, पढ़लो लिखल सेहो। सब गामक लोक चाहइ छलाय कि कहियो ओ उनको कतऽ आबस। कम्मे दिनक लेल गाम अबय छलीह।अप्पन मोटर मे। तहिया गाम मे ककरो मोटर नञि छल। कियो कियो नबका धनिक भाडा परलऽ क अबइ छलाह।कहबाक जे अलगे उनकर अंदाज छलइन। रामबाबूकऽ बेटा राजा बाबू असम मे चाहक गार्डन मे मैनेजर छलाह। ओतइ ओ रहइ छलीह। ओतेक सुन्नर रहलाक बादो घरवाला उनका पर विशेष ध्यान नञि दइ छेलखिन। ई बात रामबाबूकऽ बुझल‌ छलइन। ताहि लेल देखकऽ पुतोहू चुनलाह कि बाद मे सब ठीकभऽ जेतइ। लेकिन से नञि भेलइ। तखनो संग रहलाहसँएक टा बेटी भेलइन।ओकरा राजा बाबू बड मानञि‌ छलाह। घरक माहौल अनुकूल नञि रहबाक कारणे बेटीकऽ हिमाचल मे बोर्डिंग स्कूल मे पढबइ छलाह। झांपल तोपल सब चइल रहल छलइन। इमहर‌ रामबाबूकऽ परलोक सिधारभऽ गेला पर मायकऽ सेवाकऽ नाम पर कनियाकऽ पठा देलखिन। कनिया जहिना देश तहिने परदेश, अपन हालत बुझिते छलीह। गामे आइबकऽ रहअ लगलीह। इमहर राजा बाबूकऽ आजादी भेंट गेलइन। जे किछु चोरा छुपाकऽ करय‌ छलाह, आब खुल्ला करऽ लगलाह। बातकऽ पसरह मे कतउ समय लगइ छइ। कंपनीकऽ मालिक नोटिस थमा देलकइन। नौकरी छुइट गेलइन। गाम घुइड़ अयलाह। किछु दिनकऽ बाद मोन उचटअ लगलइन। बहिनोई गुजरात मे अधिकारी छलखिन। ओत गेलाह। सब ठीक छलइन। नब नौकरीकऽ सेहो जोगार‌भऽ गेल छलइन। एक दिन राइत मे शराब पीकऽ आयल छलाह। बहिनोईकऽ ई ठीक नञि लगइ छलइन। ओ इनकर बहिनकऽ किछु नैहर पर कटाक्ष केलखिन। बहिन ई सब खीस‌ राजाबाबू पर उताइड़‌ देलखिन। राजा बाबू बहुत दुखी भेलाह। राइत मे सबकऽ सुतले छोअइड़कऽ चइल गेलाह। भोर भेलाह पर सब बुझलकइ। बहुत खोजबीन भेल। पुलिस मे सेहो रिपोर्ट भेल। अखबार, टीबी मे सेहो फोटो छपवावल‌ गेल। मूदा सब फेल। उम्मेद सबकऽ छलइ जे राजाबाबू बेटीकऽ जन्मदिन पर फोन करथिन, ओहो बीत गेल। कतउसऽ कोनो समाचार नञि। आइ बारह बरखभऽ गेल राजाबाबूकऽ निपत्ता भेलाह। आब जे कानाफूसीभऽ रहल छइ से उनके श्राद्धकऽ बारे मे। लोककऽ उनकर कनियाकऽ पहिरल ओढल आ सधवा वाला खान पियन पइच नञि रहल छइ। राजा बाबूकऽ कनिया त असगर जीवनक पहिनेहेसऽ आदी छइथ, से त सबके नञि बुझअ देलखिन। आब अनघोल मचल छइ गाम मे जे की हेतइ। की भइड़ जीवन राजाबाबूकऽ कनिया सधवा रहतिह या विधवा।अकरे कहइ छइ फुसियेकऽ घमर्थन। मुदा अनघोल त मचले छइ। देहक नेह (लघुकथा) बीरछाकऽ बेटी एकटा मनसाकऽ घर मे बइसा देलकइ। ओकरा त बियाह भेल छइ। त घरवाला कतऽ छइ। छोड़ि देलकइ। के छोरलकइ। आर के। बीरछाकऽ बेटी । लोक सब किछु कहलकइ नञि। किअए ने कहलकइ। सब कहलकइ। मुदा ओकर माये कहलकइ जे ई देहक नेह छइ। आइ मे कियो किछु नञिकऽ सकइ छइ। ओकरा जेना मोन करऽ दियउ। खुश रहअ दियउ। आब ककरा फुरसत छइ। लोक जमा त भेल छल मुदा ओकर मायक गप्प सुनबाकऽ बाद सब चइल गेल। तरका मुस्की सब माड़इ छलाय। नेनाभुटका सबकऽ त बरका मनोरंजनभऽ गेल छइ। सब ओते मंडराई रहल छइ। बीरछा अप्पन समाज मे मानल लोक छल। आन सब जेकां ओ दस दुआरी नञि छल। ओ एक्के घर पकरने रहल। ओ कयेक तरहक काजकऽ लइ छल। मजुर आ खबास दुनु बाला काजकऽ लइ छलाय। मालिकक भांग आ मलकिनीकऽ मशाला दुनु पीसई छलाय। घरामी, राजमिस्त्री, भानस भात, होलीकऽ लुकारी, भोज मे पुआरक बिट्ठी सलऽ क टहल टिकोरा तक मे मांजल छल। आमक समय मे रखबारी आ जमीनक खरीद बिक्रीसऽ सेहो किछु नगदी भेंट जाइ छलइ। किछु समय त एहनो एलइ जखइन ओ मालिककऽ कहलकइन जे आहां कतऽ जे मोटका भात बनञित अइछ से हमरा नञि खायल होइत अइछ। हम सब पतरका चाऊरक भात खाई छी। आब हमरा छोड़ि दियह। मालिक कहलखिन हमहु त उएह भात खाई छी। तोहुं हमरा छोड़ि देबें। जे बिचार। बीरछा विचारवान छल। मालिककऽ नञि छोरलकइन। भइड़ जीवन निभेलकइन। कतउ आर कमाय नञि गेल।अतऽ तक की ओर ट्रेनो पर नञि चढ़ल। बीरछाकऽ एक्के टा बेटी छलइ। ओ भइड़ गाम मे सबसं सुन्नञिर छल। बयस होइते बगलेकऽ गामसऽ समाद अयलइ। आ ओ बेटीकऽ बियाहकऽ देलक। जमाय ओकर गुजरात मे काज करय छल। बेटी गुजराते रहअ लगलइ। जं कोनो समाद किछु दिन नञि आबइ त बीरछा परेशानभऽ जाइ छलाय। कोनो कोनो फोन नम्बर पर बुथसऽ फोन करय। गप्प त नहिये होइ,पाइ सेहो लाइग जाइ। इंतजार मे बीरछा मईरो गेल। कोनो खबर नञि। कतेक बरखक बाद बेटी अयलइ। ओकरा संगे एकटा मनसा सेहो। पहिने त ओ मनसाकऽ अपन दिअयद कतऽ ठहरेलक। सुतबा लेल। लेकिन राइत बिराइत अबरजाइत देखकऽ ओ अपना कतऽ राखऽ सऽ मनाकऽ देलकइ। बीरछाकऽ कनिया त बऊकभऽ गेल छल‌ ई सब खेला देख क। इमहर जमाय सेहो एलइ बेटीकऽ ल जाइ लेल। बेटी साफ मनाकऽ देलकइ। पर पंचायतीकऽ नौबत आइब गेल छलइ। तखने बीरछाकऽ कनिया एलइ आ कहलकइ जे ई देहक नेह छइ। जेना रहइ छइ से रहअ दियउ। सब ओकर इशारा बुझि गेल। जमाय वापस असगरे गुजरात चइल गेल आ ओ मनसाकऽ बीरछाकऽ बेटी घर मे आइन लेलक रहबाक लेल। लछमी बहुरिया (लघुकथा) आइ गाम बला सब लछमी बहुरियाकऽ याद मे किछु करबाक खातिर बैसार केने अइछ। कियो कहइ की मूर्ति बनावल जाय, त कियो छोट छीन स्वास्थ्य केन्द्र, त कियो पढबाक लेल वजीफा, त कियो बेटीकऽ बिबाहक लेल बिन सुदक कर्ज, त कियो स्कुल, कियो धर्मशाला आदि आदि। सब कियो अप्पन विचारकऽ पक्ष मे तर्क दइ छलाह। फैसला नञिभऽ सकल। मूदा ई निश्चित भेल जे किछु ने किछु होयबे करत। आइ गाम समाज मे लछमी बहुरियाकऽ याद मे किछु करबाक किअए जरूरत बुझेलइ। नबका लोककऽ त किछु बुझले नञि।कऽ छलीह ओ। उनको किछु नाम हेतइन‌ जे माय बाप रखने हेतइन। किनको नञि बुझल। लछमी बहुरिया त सासुरक नाम छइन। वोटरलिस्ट मे सेहो ईएह नाम छइन। खेत खलिहानकऽ दस्तावेज मे सेहो ईएह नाम। सुनञि छियई की कोनो नबकी चुहुलबाज पुतोहु पुछलकइन की आहांकऽ किछु त नाम होइत। माय बाप हेताह तखने धरती पर अयलहुं ने। हमरे टा कान मे कहीं दियह। हम ककरो नञि कहबइ। लछमी बहुरिया कनी काल सोचली, फेर कहलकिन जे ठीके नञि मोन अइछ। ईएह नाम अइछ।कहींकऽ मुसका देलखिन। कियो सासुर मे अहनो ड़इच बइस जाइ छइ जे नामों बिसइड़ जाइ। बिसवास ककरो नञि लेकिन भेल छइ। ओ छलीह लछमी बहुरिया।आइ दुनियासऽ एतेक बरख गेलाकऽ बादो लोक नञि बिसरलइन अइ।आब त ओहन लोक बननाईये भगवान बंदकऽ देने छथिन। अतेक त बुझाईये गेल होइत जे लछमी बहुरिया अइ गाम मे पुतोह बइनकऽ आयल रहइत। ई नाम उनकर ससुर देने रहथिन। उनका अयलाकऽ बाद ओइ बरख बड्ड धान भेल रहइ। लोककऽ राखइ लेल कयेक टा कोठी बनबऽ परल छलइ। ओइ साल बाईढ मे एहन माइट आयल छलइ जे अन्न पाइनक संग आमो बड्ड फरल रहइ। जे भी भेल हो नाम परलइन लक्ष्मी, खुशहालीकऽ ल क। बाद मे लक्ष्मीसँलछमी बहुरियाभऽ गेलीह।कहल जाइ छइ जे कालाजारसँउनकर घरबालाक मृत्यु कम्मे बयस मेभऽ गेल छलइन। तहिया अइ बीमारीकऽ इलाज नञि छलइ। लछमी बहुरिया निसंतान छलीह लेकिन भइड़ गामकऽ माय जेना आबेश करय छलीह। उनकर भंसा घरक आइग मिझाई नञि छलइ। तहिया सलाईकऽ प्रचलन नञि छल। लोक एक दोसर कतऽ सऽ आइगलऽ जाइ छलाय। लछमी बहुरिया कतऽ सऽ लोक सब आइग टुटल खपरा मे सम्हाइड़ कलऽ जाइ छल। ओइ संगे किछु दुख सुख सेहो सांझा करय छल। उनका अपना मे त कते खर्चा, लोक सबके कोठी मेसऽ धान निकाइलकऽ दइ छलखिन। दइ त छलखिन पईंचे, मुदा तगेदा कइयों नञि। खेनाई कमसँकम पांच लोकक बनबइ छलखिन। जे रहइ छलइ खाय काल, सबके आबेश ककऽ खुआबइ छलखिन। बियाह दान मे सब बिध उनकेसऽ पुईछकऽ सब करय। पंडित पुरहितसऽ बिबाद भेला पर लछमी बहुरियाकऽ कहल मानल जाय। पुरहित सब सेहो हिनकर ज्ञानकऽ आदर करइत छलाह। कियो बीमार पइड़ जाय त घर सलऽ क डागदर आ अस्पताल तक संग दइ छलखिन। किनको कतऽ कोनो करदेवता हुअय, ओ असगर दु सय तीन सय लोककऽ खेनाई बना दइ छलखिन। कतउ किनको घरसँसैंय बहुकऽ बेशी लड़ाई पर ओतऽ पहुंचकऽ धमकाअ दइ छलखिन। अपने कहियो तीर्थाटन पर नञि गेलीह, लेकिन जौं पता लगइ छलइन जे फलां जा रहल अइछ त उनका रूपया कौड़ी दइ छलखिन आ कहइ छलखिन जे हमरो लेल किछु मांइग लेब। कियो पढअ बाला बच्चाकऽ कापी किताब, नाम लिखाबऽ मे दिक्कत होअइ त ओकरा मदद करय छलखिन। परसौतीकऽ खातिर त ओ डागदरसऽ कम नञि छलखिन। कतेक बच्चा उनके देख रेख मे दुनिया मे आयल। ओ डागदर, दाई आ पंडित तीनु भुमिका मे रहइ छलीह। बेटी सबहक खातिर त ओ बरका आश्रय छलीह। बच्चा सबहक लड़ाई मे ओ हरदम नाइत- नातिन, भागिन- भगिनीकऽ पक्ष मे रहइ छलीह। उनकर घर , घर नञि सराय छल। भोर सलऽ क राइत धइड़ लोकसऽ भरल रहइ छलीह।के बरका,कऽ छोटका,कऽ धनिक,कऽ निर्धन,कऽ पढ़ल,कऽ बिनपढ़ल,कऽ शहरी,कऽ गाम बला,कऽ काबिल,कऽ चपाट सबके लेल उनकर दरबज्जा खुजल रहइ छल। कयेक लोक त लोकाचार बिध बेबहार खातिर आन शहरों मेलऽ गेलइन। ओ सबहक सुख-दुख मे शामिल भेलीह। ओ बाप जे बेटीकऽ बिबाहक लेल प्रयास नञि करय छलाह, उनका ओ एक दशा नञि छोड़इ छेलखिन। उनकर बिगराईकऽ कियो खराब मनबो नञि करय। जे उनकर सबसं बरका गुण छलइन जे ओ उपकारकऽ ककरो नञि कहइ छलखिन आ नञि किनको उपरागे देलखिन। कतेक लोक पईढ़ लिखकऽ बनल अइछ ओइ मे उनकर योगदान सेहो छइन। ओ सब आब उनका याद मे किछु करबाक लेल लागल अइछ। एक्के लोक मे अतेक गुण कीभऽ सकइ छइ। सबसं कमाल देखू। किनकोसऽ कोनो ‌सेवा नञि करेलीह। चइलतेफिरते दुनियासऽ चइल गेलीह। चहुंओर उनकर चर्चाभऽ रहल अइछ। आजुक कलयुग मे अहनो लोक भेल। अप्पन सब बिसइड़कऽ समाजकऽ उपकार करऽ बाली लछमी बहुरियाकऽ हमर प्रणाम। अजादी (लघुकथा) ई कोन‌ अजादी छी। बुझबाकऽ अइछ त पुईछ लियउन रमन सं। किछु कहता त संयम राखब। रमन आब एतऽ कहां छथि। कतऽ गेला। लोकेसँबचऽ दुआरे गेला अछि त बताकऽ थोरे जेताअ। बाजु रमनक कनिया परा गेलइन। एहनो कतउ भेलइ अछि। रमन एक टा कम्पनी मे सुपरवाइजर छलाह। कनिया आ एक टा बेटी संग पटना मे रहइ छलाह। सोचलाह की सब दिल्ली मे रहइ छइ, ओहो दौड़-धूप कऽ कऽ बदली दिल्ली करा लेलाह। कनियेकऽ बेशी जोड़ छलइन। कतेक नीक पटना मे छलाह। दिल्लीकऽ एहन उजाही मचल छइ जेकऽ बचत। बाहरी दिल्ली मे एक टा नब कालोनी मे किरायाकऽ घर लेलाह। ओतइ लग मे अंग्रेजी स्कुल मे कनी भाग दौड़ कऽ कऽ बेटीकऽ नाम सेहो लिखा गेलइन। बीच सेशन मे ज्यों बच्चाकऽ दिल्ली मे एडमिशनभऽ जाय त बुझु बैतरणी पारकऽ गेलऊं।सब काज सुढ़िया रहल छलइन। जिमहर घर लेने छलाह, उमहर अपनों दिसक लोक सब रहइ छलइन। इनकर नौकरी टुर बाला छलइन,तैं सोचलाह जे अप्पन लोकक बीच परिवार रहतइन।राजा देव कोनो जरूरत परलाह पर दिक्कत नञि हेतइन। ओना अप्पन आफिस ओतऽ सऽ बड्ड दुर छलइन। लेकिन सोचलाह जे उनके टाकऽ ने परेशानी।बाकिकऽ सहुलिइत त छइ।फोन सेहो घर मे लगा लेलाह। मोबाइलक जमाना नञि आयल छलइ। अहिना सब ठीक चइल रहल छलइन रमनक हिसाबे। धीरे धीरे फोनक बिल बड्ड आबय लगलइन। टेलिफोन विभाग मे पता लगबइ लेल समय नञि छलइन। तखनो जखइन बिल बढ़िते रहलइन त काल रिकॉर्ड निकलबेला। सब फोन इनके घरसँभेल छलइन। समय छलइ जखइन ई टुर मे बाहर छलाह। कनियाकऽ जखइन ई सच्चाई रखलकिन त ओ गलती मानलखिन आ दुबारा नञि फोन‌ करबाक भरोसा देलखिन। अइ घटना मे आपसी बहुत द्वंद्ध भेल रहइन। किछु समय बाद एक दिन कनिया गायबभऽ गेलखिन। दुनु बाप बेटी सब जगह‌ पता लगेलाह, किछु थाह नञि लगलइन। हारि थाईककऽ पुलिस मे रिपोर्ट दर्ज करौलाह। सासुर बलाकऽ कहलखिन त ओ सब इनके दोषी कहऽ लगलइन। कहलकइन जे घर सम्हारऽ नञि अबइ छइन। छोट-छीन गप्प फोन बालाकऽ हल्ला मचा देनाअइ उचित नञि, आरो कतेक दोष। कोनो मदद रमनकऽ सासुरसऽ नञि भेटलइन। उल्टा बदनामीकऽ तोहमा लगबऽ कऽ बारे मे उपरागो देलखइन। निराशभऽ क दिल्ली घुरलाह। जतऽ जतऽ रमन मदद खातिर जाइथ, उनकासऽ पहिने उनकर खिस्सा पहुंच जाइन। सब हमदर्दी जतबइन मुंहछुआन, आ मजा लइन अंखिदेखार।हारिकऽ पुलिस बालाकऽ फोन बाला गप्प कहलखिन। ओकर आंईख चमकऽ लगलइ। ओइ नम्बर बाला लोक सबसँसख्तीसँपुछताछ केलकइ। त पता चललइ जे रमनकऽ कनिया एकटा सोलकन संग तेजपुर, आसाम मे पराकऽ रही रहल छथि। दिल्लीसऽ पुलिसकऽ संग तेजपुर गेलाह त ओतऽ घर मे ताला लटकल छल। कियो पुलिसकऽ अयबाक खबरदऽ देने रहइ। रमनकऽ शक अप्पन गऊंआ सब पर बुझेलइन। एकतरहक झुग्गी बस्ती छल। वापस दिल्ली घुरी गेलाह। तलाकक केस सेहो लगेलाह। आब सवाल पैघ होअइत बेटीकऽ भविष्यकऽ छलइन। नौकरी छोअइड़ नञि सकइ छलाह। गामसऽ बुढ़ मायकऽ बजेलाह।सब धीरे धीरे सामान्य दिश भेल जाइ छलइन कि एक दिन बेटी सेहो लापताभऽ गेलइन। कोनो उपाय नञि देखकऽ फेर पुलिस लग गेलाह। पता लगलइन जे बेटी सेहो माय लग तेजपुर पहुंच गेल छइन। रमन आब पुरा निराश छइथ जे बेटी ओतऽ ओअइ समाज मे कोनाकऽ रहथ। ओकर भविष्य की हेतइ। आब पता लगलइन जे पुलिसकऽ पहिले बेर तेजपुर जायबाला फोन बेटिये केने छलइन। ओ निरंतर फोनसँमायसँजुड़ल रहल आ बाद मे निर्णय ‌केलक जे उएह जीवन नीक। रमनक अड़ोसी-पड़ोसी आब कहइ छइन जे उनकर कनिया पुरखाह‌ छेलखिन। जेना पुरुख मऊगियाह होइत अइछ‌ ओहिना मऊगी सेहो पुरखाह। उनका सबके पहिलेसऽ आशंका छलइन। जे भी सत्त हो, रमनकऽ दिल्ली मे रहनाई आ ओ नौकरी केनाई दुनुं पहाड़ बुझाय लगलइन। कनियासऽ ओतेक दुख नञि जतेक बेटीकऽ छोड़नाईसऽ दुख भेलइन। तलाककऽ केसकऽ तारीख पर तारीख चइल रहल अइछ। रमन सब छोड़िकऽ दिल्लीसँचइल गेलाह। किनको लग नञि उनकर नम्बर आफ नञि पता-ठिकाना। ई कोन अजादी छइ जे घर परिवारकऽ ढाहि दइ। बेटीकऽ बापसऽ अलगा दइ। कियो कहइ जे एहन अजादीकऽ आइग लगा दी तो कियो अप्पन अप्पन पसंदक पक्ष मे। किछु दोष रमनोकऽ हेतइन। सबाल ई बेशी घुमई छलइ जे भगलखिन त भगलखिन, सोलकन संग किअए भगलखिन।बाह रे समाज। परेनाईयो मे वर्ग विभेद। की उचित की अनुचित। गोलकी फ्रेमकऽ चश्मा (लघुकथा) आशाकऽ जमानत हाइकोर्टसऽ भेटलइन। अखइन बरी नञि भेलीह अइछ। एकदम झोखइड़ गेल छइथ। बुढ़िया जकां चलइ छइथ। चिन्हाईते नञि छइथ। सब किछु बदइल गेलइन। नञि बदललइन त ओ गोलकी फ्रेम बाला चश्मा। हम त ओहीसऽ चिन्हलइन। केहनभऽ गेल छइथ। कतेक गंभीरभऽ गेल छइथ। किछु बजिते नञि छइथ। बड्ड खोंचारियोन त हुं हां। चेहरा पर कोनो भाव नञि। जेकर बुट्टी बुट्टी चमकइ छलइ, ओ एहनभऽ जाइत से पइच नञि रहल अइछ। लेकिन जे सामने देख रहल छी ओइ पर बिसवास त करहेकऽ परत। आब बेशी दिन नञि जीतीह। हाइकोर्ट मे जहिया आब इनकर केशक नम्बर अइतइन, ताबइत तक ई नञि जी पेतीह।आशा जेहल जेतीह, सजोभऽ जेतइन एहन अपराध करतीह से सोचो मे किनको नञि आयल हेतइन। ईएह त छइ जीवन। पता नञि की की लिखाकऽ आयल छइथ। आशा बच्चेसऽ खुब हंसमुख आ पढुआ छलीह। तहिया बेशी बेटीकऽ कालेज मे नामे टा लिखावल जाइ छलइ, रोज जयबाक प्रचलन नञिये। ओइ मे जे गाम मे रहइ छलीह, उनकर त सोचबो नञि करू। आशा जिद्दकऽ क कालेज मे नाम लिखेलिह। ट्रेनसऽ रोज जाइ छलीह। पास बना नेने रहइत, तांय बेशी पाइ नञि लगइ छलइन। डेरा भारालऽ क रहतइथ आ पढ़ाइ करतइथ, से घरक स्थित नञि रहइन। किछु आर समाजक लड़की बच्चा सब सेहो ट्रेनसऽ जाइ। आशाक दुश्मन उनकर सुन्दरता आ गोलकी फ्रेमकऽ चश्मा रहइन। किछु लफुआ सब उनका ट्रेन मे पीछा करयन। आशाकऽ बुझल छलइन जे ज्यों घर मे कहलखिन त कालेज गेनाई बंदभऽ जेतइन।ओहीलऽ क अपने जेना तेना सामना करय छलीह। बात कियो छुपलइ अइछ। एकदिन उनकर गऊंआ सब मिलकऽ ओइ बदमशवाकऽ पकड़लक आ जईमकऽ थकुचलक। ओ बदमशवा बड्ड हाथ पैर जोड़लक त ओकरा रेलवे पुलिसकऽ नञि सौंपल गेलइ। किछु महिना त ओकर बाद शांतिसऽ गुजरलइ। मुदा जखइन ओ बदमशवाकऽ घाव सब भरा गेलइ त ओ एकदिन फेर ओ रस्ताकऽ स्टेशन पर आशासऽ बदला लइ लेल किछु लोक लड्कऽ आइब गेल छल। अइ बातक खबर आशाकऽ दोसर लड़की सबसऽ पता लाइग गेलइन। आब केल की जाय। फोन फानकऽ कोनो जमाने नञि। पुलिसकऽ ट्रेन मे रहबाक सेहो कोनो बेबसथा नञि। ओइ ट्रेन मे किछु कुजरनी सब सेहो जाइ छल। ओ सब मिलकऽ एक टा मुसलमानक परिवार जाइ छलइ, ओकरासऽ नेहोराकऽ क ओकर बुर्का आशाकऽ पहिरावल गेल। गोलकी चश्मा उताइड़कऽ कोरा मे एकटा बच्चाकऽ बइसावल गेल। कियो आब चिन्ह नञि सकइ छल आशा के। उएह भेलइ। अगिला स्टेशन पर ट्रेनकऽ भेकम्पकऽ क बदमशवा सब रोकलकइ। आ सऊंसे ट्रेन मे तकलकइ चश्मावाली के। मुदा नञि ताईक पेलक। बड़का अनहोनी होबऽ सऽ बइच गेलइ। आब आशाक कालेज गेनाई बंदभऽ गेलइन। अगिला शुद्ध मे बिबाहकऽ देल गेलइन। पढ़ाइ छुइट गेलइन। आशाकऽ घरबाला सरकारी नौकरी मे छलाह। एक टा बेटा सेहो भेलइन। आशा सब बिसइड़कऽ बच्चाकऽ पढ़बऽ मे लागल छलीह। विधाताकऽ ई मंजुर नञि। एक दिन उनकर बेटाकऽ एकटा बच्चासऽ लड़ाईभऽ गेल छलइन। सांझ मे ओ बच्चाकऽ बाप किछु बदमाशकऽ लकऽ इनकर घर पर आइबकऽ बेटाकऽ मारऽ लगलइन। तखने आशाकऽ घरवाला आफिससऽ अयलखिन। लाइट गुलभऽ गेल छलइ। मारा पिटी दुनु तरफसऽ भेल। लाइट आयल त देखल गेल जे ओइ बच्चाकऽ बापक माथसऽ शोणित बहइ छल। अस्पताललऽ जायल गेलइ। दु दिनक बाद ओ मइड़ गेलइ। आब पुलिस आइबक आशाकऽ बर आ उनकर बेटाकऽ पकइड़ कलऽ जाय लगलइन। तखने आशा सामने अयलीह आ कहलखिन जे‌ हम ओकरा मारने रहियइ लाठी सं। लाठीकऽ जरा देलियई आ राईखकऽ नाली मे बहा‌ देलियई। बर आ बेटाकऽ आंईखसँनोर बहअ लगलइन- ई गप्प सुइन क। पुलिस आशाकऽ पकइड़‌ कलऽ गेल। कोर्ट मे आशा ईएह बयान देलखिन।केश चलल। लोअर कोर्टसऽ सजा सेहोभऽ गेलइन। ऐना किअए केलीह आशा। सच्चाई छल जे घरवालाकऽ नौकरी छुइट जंइतइन आ बेटाक जीवन बर्बादभऽ जंइतइन। उनकर सबहक दोष अपना परलऽ क अप्पन जीवन अन्हारकऽ लेलीह। जे कहियो जोरसऽ नञि बजलीह ओ किनको जान मारतीन। कतउभऽ सकइ छइ। ऐना जेहल मे अपनाकऽ दकऽ घर परिवार लय अतेक त्याग की संभव छइ। आशाकऽ आंखि कियो गोलकी चश्मा हटाकऽ देखतइन तखइन ने बुझतइ जे कतेक दर्द ओ‌ समेटने छइथ। अंत (लघुकथा) धनेश बच्चेसऽ चलता-पुर्जा छलाह। ओना उनकर गामोकऽ पाइनक असर छइ। लोक कहइ छइ जे ओइ गामक बच्चा, दोसर गामक चेतनकऽ जेबी मेलऽ क घुमई छइ। कतउ ककरो बेच देत ओ सब। धनेश ओहो मेसऽ चांगला छलाह। ओना उनकर बाप कम्मे बयस मे मइड़ गेल छलखिन। बाबा सब खर्च बर्च दइ छलखिन। पाइकऽ कोनो दिक्कत नहि छलइन। जखइन धनेश स्कुल‌ मे पढ़ई छलाह तखनेसऽ धुरफंदी मे लागल रहइ छलाह। बाबासँस्कुलक फीस लइ छलाह। बिन बापक बच्चा टुअर कहाइ छइ।ओ अइ टुअरकऽ आर मे पुअर ब्याज फंडसऽ फीसकऽ पैसा लइ छलाह। फेर बाबाक देल फीसक पाइसँमहाराजा होटल मे जाकऽ सिंघारा खाई छलाह।एहन मुंह बनाकऽ मास्साहेब लग ठारभऽ जाइ छलाह जे ओ एप्लीकेशन देखते फीस माफकऽ दइ छलखिन। जखइन स्कुलक बाद कालेज मे पढ़ई लेल गेलाह त ओतउ उएह खेला। पढ़ाइ छोड़ि सब काज मे उनका मोन लागइन। बाबा अन्न पाइन आ हिसाबेसऽ पाइ सेहो दइ छलखिन। धनेशकऽ कालेज मे आइबकऽ पांईख निकइल गेल छलइन। दोसर शहर छलइ। नञि कियो चिन्ह बाला। खुइलकऽ मटरगश्ती करय छलाह। युनिवर्सिटीकऽ चुनाव मे सेहो ठार भेलाह। एकटा कागज मे झुटफुसकऽ सब जाइतक अलग अलग नम्बर लिखने छलाह आ अपनाकऽ अपन जाइतक वोटक ठेकेदार बइन गेल छलाह। किछु लोक झांसा मे आइब गेलइन। वोटसऽ एक दिन पहिने मोटकश पाइलऽ क बइस गेलाह। ईएह त उनकर योजना छलइन। बाबा जखइन ईएह हाल देखलखिन त उनकर बिबाह पुरा दान दहेजलऽ क करा देलखिन। जतेक पाइ देने रहथिन अखइन तक ओ दहेजकऽ रूपया मेसऽ काइटकऽ धनेशक मायकऽ पठा देलखिन। आब धनेशक सब फुटानी हवा होबऽ लगलइन। युनिवर्सिटी वाला इलेक्शन मे एकटा कैनिडेटक बाप बिहार सरकारकऽ बोर्डक चेयरमैन छलइ। ओकरा पकइड़ धकइड़कऽ पटना मे किरानीकऽ नौकरीलऽ लेलाह। पहिने अस्थायी छलइन नौकरी बाद मे परमानेंटभऽ गेलइन। दरमाहा कम छलइन। कनिया गामे रहइ छलखिन। एक टा बेटा आ बेटी सेहो भेलइन। पटना मे पहिने एकटा गऊंआ कतऽ रहलाह छह माह धइड़।फेर एमहर उमहर किराया मे। राजेन्द्र नगर मे एकटा बिधवा मउगी किछु कमरा सब किराया पर लगबइ छलाय। इनको पता लगलइन। ओ ओकर बरसाती मे किराया पर शेयर मे घर लेलाह। कनिया गाम मे हल्ला करतिन पटना जाय लेल।उनका अलग घर नञि होबाक बहाना बना कऽ रोईक देथिन। धनेश सब काज सोइच बुअइझकऽ करय छलाह। धीरे धीरे ओ बरसातीसऽ अलग कमरा मे अयलाह। फेर ओइ बिधवाकऽ बहरी कमरा मे रहअ लगलाह। ओइ बिधवाकऽ दु टा बेटिये छलइ। धनेश ओकरा सबकऽ पढ़बऽ लगलाह। पाइ नञि लइ छलखिन। ऐनाकऽ क अपन विश्वास जमेला।ओहो मऊगी पढ़बऽ कऽ बदला मे इनका खेनाई देबऽ लगलइन। आबऽ धनेश बहरी घरसँभीतरका घर मे रहअ लगलाह। ओकर बेटी सब स्कुलसऽ कालेज मे आइब गेल छलइ। ओकरा सबकऽ सबटा बाहरबाला काज धनेश करऽ लगलाह। इमहर नौकरी मे उपरी आमदनी सेहो पुराभऽ रहल छलइन। सब ओकरा सब पर खर्च करय छलाह।बाकी किरायेदार सब किछु किछु कामेट करयन। आब बिधवाकऽ मकानसऽ सब किरायेदारकऽ हटा देलाह। बीच मे कनिया एलखिन पटना त एहन ने परेशानीकऽ नाटक केलाह कि ओ घुरिये गेलीह। कनिया बच्चा सब गामे मे रहअ लगलइन।इमहर अइ मौगीकऽ दुनु बेटी पारा पारी बिहार मेडिकल परीक्षा पासकऽ गेलइ।एकटा पटना आ दोसर रांची मेडिकल कालेज मे पढअ लगलइ। धनेशक मुंह मे अपन बच्चाकऽ नामक जगह पर सदिखन बबिताजी आ सबिताजी नचइत रहइ छलइन। बात धीरे धीरे पसरऽ लगलइ। सब कहइ जे ओ मऊगी धनेशकऽ पटाअकऽ अपन ऊल्लु सीधाकऽ रहल अइछ।ओकर संबंधी कहइ जे ई धनेश ओकरा मीठ मीठ बात मे फंसेने अइछ आ अतेकटा घरक मालिक बइनकऽ बइसल अइछ। धनेशक माथ पर त उएह सब नचैत छलइन। गाम किछु पाइ हर महीने पठा दइ छलखिन। गाम लोकक व्यंग्यवाणक डरे गेनाई लगभग छोड़िये देने छलाह। बेटी समर्थभऽ गेल छलखिन। कका सब मिल कऽ लड़का तकलक। खर्च बर्च जे भेलइ से धनेश देलखिन। अलगे अलग गामो मे रहलाह। बेटासऽ नहिंये जेकां गप भेलइन। बेटीकऽ बिबाहक बाद घुअइड़कऽ पटना अयलाह।गाम मे बाप माय मइड़ गेल छलखिन। बांट बखराभऽ गेल रहइन। किछु किछु बात पर भाइ सबसऽ सेहो झंझटभऽ गेलइन। इमहर बबीताजी आ सबिताजी दुनु डाक्टरभऽ गेल। ओकरो सबकऽ आब धनेशकऽ घर मे रहनाई नीक नञि लगइ।धनेश त अपन सब टा कमाइ ओकरे सबकऽ पढ़ाइ लिखाई, घुमाई फिराई मे गंवा चुकल छलाह। बबीताजी एकटा डाक्टरसऽ बियाहकऽ क रांची मे सेट्लभऽ गेल छल। सबीताजी सरकारी अस्पताल बिहटा मे पोस्टेड छल। धनेश कतेक लोककऽ मुफ्त मे इलाज करा दइ छलखिन। एक दिन धनेशकऽ पता चललइन जे राजेन्द्र नगर वाला मकान ओ‌ सब बेच देलक। धनेशकऽ मकान छोड़अ परलइन। रिटायर केला पर किछु पाइ भेटलइन। बाकि सब पाइ त ओ पहिनेहे निकाइल चुकल छलाह। आब यक्ष प्रश्न सामने छलइन- धनेश कतऽ जैताह। धनेश घुरीकऽ गाम अयलाह। बंटवारा मे उनकर हिस्सा मे घर नञि घरारी भेटल छलइन। जे किछु पाइ छलइन ओइसँएकटा छोट घर बनेलाह। उनकर नौकरी मे पेंशन नञि छलइन। कहिनाकऽ घींच तीरकऽ घर चलइ छलइन। बेटा सेहो बेरोजगार बइसल रहइ छलइन। दुनू बाप बेटा म मे खटबहस होइत रहइ छलइन। अहिना समय बितइ छलइन। धनेश सुविधा भोगीभऽ गेल छलाह। ई जीवन‌ जीबाक ओ आदी नञि छलाह। बड्ड जोरसँदुखित पड़लाह। इलाजक कमीसँमर्ज बढ़इत गेलइन। बाद मे देखेला पर पटना रेफरकऽ देलकइन। लाईद पाइद‌कऽ पटना भर्ती भेलाह। संयोगसँबबीताजीकऽ ‌बदली पटनाभऽ गेल छलइ। ओ तुरंत प्राईवेट वार्ड मे शिफ्ट केलकइन। मायकऽ खबर केलकइ। ओ हो सब रांचीसऽ अयलइन। दस दिनकऽ करीब अस्पताल मे रहलाह। ओतइ मृत्यु भेलइन आ ओकर सबहक देखरेख मे काजो ओतइ बेटा केलखिन। जेकर पाइ तकरे जुइत ने। दु दु टाकऽ डाक्टर बनेलाह आ ईलाजक अभाव मे धनेश मइड़ गेलाह।अपन योजना बनेलासऽ किछु नञि होअइ छइ। ऊपरवाला जे अंत जिनका लेल लिखने अइ, ऊयाह होइत। फैसला (लघुकथा) बेरु पहर काल बेल बाजल छलइ। ईकऽ भऽ सकइत अइछ। डाक्टर रागिनीकऽ अखने तऽ निन्न लागल रहइन। क्लीनिकसँएलाक बाद , नञि चाहितो थाकल थेहियाल रहइत छथि। दाईयो नञि छलइन। अनमने भावसँगेट खोलइत छथि। ईकऽ विकट पाहुन भऽ सकइत छथि। जहियासँपी एन जी भऽ गेल छइ, ई गैस बालाकऽ झंझट खत्म। नञि तऽ ओ, जखने सुतब, तखने आइत। बेटाकऽ स्कुलसँआबऽ मे अखइन समय छइ। अगल बगलसँबेशी अबरजात रखनेहे नञि छथि। ओना डाक्टर सबहक संग ई दिक्कत छइ, जखने लोककऽ बुझा जेतइ जे ई डाक्टर छथि- सबकऽ किछु ने किछु मंगनिया सलाह दइत रहु। सब लोके रोगी भऽ गेल छइ। मऊगी महाल मे तऽ आर हाल बेहाल छइ। मिस्टर कुमारकऽ बेशी लोकसँहेम क्षेम पसन्द नञि छइन। ओइसँरागिनी ककरोसँहाय हेल्लोसँबेशी संबंध नञि रखने छथि। भेलइन जे बेसिनक नाली जामक कम्पलेन मिस्टर कुमार केने छलखिन, भऽ सकइत छइ, जे उएह होइ? महानगर मे ई बड़का लीला छइ, आब तऽ रागिनीकऽ सेहो आदत भऽ गेल छइन.........मेन गेट खोलऽ सऽ पहिने मैजिक आइसँहुलकी दियउ। अइ मे किछु देखाई छइ? केकर भीतर की चइल रहल छइ सेकऽ जनञिया? ई चेहरा तऽ किछु चिन्हल जानल लगइत अइछ। गेट खोलिते देखइ छथि जे राजन ठार छथि। आऊ आऊ राजन बाबु। कोना आयल? आइ कोन दिशसँसुरूज ऊगला अइछ? राजन घर मे घुसला। सोफा पर धंईस कऽ बैसलाऽ । चाहइ तऽ कहियासँछलऊं। मूदा गरे नञि धड़इ छलाय। आइ मौका लागल तऽ आइब गेलऊं। अच्छा! मौकाकऽ तलाश मे छलऊं! हं हं। आहांकऽ कोना बिसरब। से कियैक? हमरा मे एहन की लागल अइछ जे आहां नञि बिसरब?- मुस्कियाइत रागिनी बजलीह। जे आहां मे अइछ, से हमहीं जनञि छी। अच्छा! अखनो बिसरायल नञि। रागिनीकऽ मुस्कीसँराजनकऽ बुझा गेलइन जे आइ फेर गोटी लाल अइ।कतेक सोइच विचाइर कऽ तऽ आइ बेरू पहर एलाह अइछ।गप्प सबसँपता चइल गेल‌‌‌ छलइन जे मिस्टर कुमार अखइन बंगलोरसँबाहर सेमिनार मे गेल छथि। बच्चा स्कुल गेल छलइ, घुरऽ मे तीन घंटा बाकी छलइ। राजन अइ लब्धक लब्ध, समयक सदुपयोग करऽ चाहइ छलाह। रागिनीकऽ सब ज़बाब उनका हरियर झंडी लाइग रहल छलइन। रागिनी जल्दी जल्दी चाह बना कऽ देलखिन। राजन उनका आर किछु बनबऽ सँमना कऽ देलखिन। आहां अतइ बइसु ने। अहींसँभेंट करऽ एलऊं अइछ। आब खेनाई पिनाई के,कऽ पुछइया ? की भेल? भूख पियास सब हेरा गेल? आहां सामने रहब तऽ , हरेबे करतऽ ने। हम तऽ सामनेसँजाइते छलऊं , भंसाघर मे जलखइ बनबइ लेल, अहीं तऽ रोईक देलऊं।आब सामने छी त कहइ छी एना ओना भऽ गेल। कहि कऽ चट दऽ उईठ कऽ रागिनी भंसाघर दिश जाय लगलीह। राजन तखने सही मौका देख उनका आगुसँरोईक लेलखिन। अच्छा बइसु। नञि किछु कहब! रागिनी अपन भाव भंगिमा सऽ राजनकऽ ऊकसबइ छलखिन। राजनकऽ भेलइन जे आरो देरी केनाई ठीक नञि। सब किछु उनकर साथ दऽ रहल छइन।असगर मे रागिनी दसो बरखक बाद भेटेलिह अइछ। कतेक कतेक राइत उनकर याद मे जगले बितेने छइथ।आइ सब बकियौता पुरा कऽ लीह। " आहां की सोच विचार मे पड़ल छी"- रागिनी बजलीह। रागिनीकऽ सवाल पर राजन सम्हड़इत बजलाह- नञि किछु। थाकल बुझाई छी? आराम करब तऽ , ओइ घर मे पइड़ रहु। परऽ कऽ तऽ मोन कऽ रहल अइछ, आहां संग दी तखइन ने? अइ मे हम की संग देब? हऊआ पलंग अइछ। जा कऽ पइड़ रहु। अहां पहुंचा दियह। चलु। राजन आब आगु बढऽ कऽ मोन बना लेने छलाह। ओ रागिनीकऽ ज़बाबकऽ आगु बढ़बाकऽ ईशारा बुझई छलाह।अइ बीच मे गप्पक दौरान रागिनीकऽ अस्तव्यस्त वस्त्रसँउनकर अंग प्रत्यंग सेहो कखनो काल झलकी दऽ दइ छलइन।राजनकऽ बुझबा मे एलइन जे रागिनी आ मिस्टर कुमार दुनु व्यस्त लोक छथि आ एक दोसरा लेल इनका सबकऽ समय नञि छइन। रागिनी अपन दाम्पत्य जीवनसँसुखी नञि छइथ, तैं कतेक...... लिफ्ट दऽ रहल छथिन। जखने ओइ पलंगक लगऽ दुनु गोटे पहुंचलाह त राजन "मत चुको चौहान" जेकां रागिनीकऽ हाथ पकइड़ लेलखिन। रागिनी झट दं हाथ झाड़लखिन। सख्तीसँकहलखिन- हम बुझइत रही जे आहां कतऽ जा रहल छी। कथी लेल आहां एलऊं अइछ। सन्नाटा छा गेल छलाह। राजन कथी दुन सोचने छलाह, आ भऽ गेलइन तेसरे। आहां आब दु मिनटक अंदर एतऽ सँरस्ता नाइप लियह। नञि तऽ हमरा पुलिसकऽ बजबऽ मे समय नञि लागत- रागिनी बजलीह। हमऽ आहांकऽ असली रूप देखऽ चाहइ छलऊं। अतेक बरखक बादो आहां मे बदलाव नञि भेल। जाऊ, अपन कनिया बच्चा संग समय बिताऊ।अतऽ आहांक सब कार्यकलाप कैमराक रिकॉर्डिंग मे आइब गेल हैत। राजन स्तब्ध भऽ ठार छलाह। मौसम ठंडा रहला बादो पसीनासँतर-बतर भऽ गेल छलाह। गरदन नीचा केने लजाइत धीरेसँबजलाह- "ओ जे पहिने भेल छलइ?ओइ मे अहुं शामिल रही।" रागिनी उनकर बातकऽ बीचे मे कटइत बजलीह- हमरा होइत छलाय जे अखइन तक आहां ओकर चर्चा कियै नञि केलऊं। बजइत हंफइत रागिनी सोफा पर आइब बइस रहइ छथि। पाछु - पाछु राजन सेहो सोफा पर बइसऽ लगलाह, ताबिते फुंफकाड़इत रागिनी बजलीह- खबरदार जे अतऽ कऽ कोनो चीज पर बइसऽ कऽ कोशिश करब। आहां पुरूख सब हमेशासँस्त्रीकऽ भोगक वस्तु बुझई छी। लल्लो चप्पो कऽ कऽ एक बेर फंसा लेलऊं, फेर जखइन मोन ओकरासँहवसकऽ पुरा केलऊं। स्त्री कऽ एक गलतीकऽ भइड़ जीवन ओकर फल भोगबइत रहइ छियई।हम गलती केने छलऊं, ओ हम भोइग लेलऊं। हम मिस्टर कुमारकऽ सेहो सब बात पहिनेहे बता देने छियइन। तैं ओइ चक्कर मे नञि परब जे बातकऽ फईला कऽ हमर जीवन नर्क कऽ देब। आब हम फैसला कऽ लेने छी जे आहांक सजा दी। बाजु सजा चाही? या हमर जीवनसँदूर रहब? राजन कल जोइड़ कऽ माफी मंगलाह। ........आइकऽ बाद हम कहियो नञि एहन गलती करब आ नञि आहांक जिनगी मे आयब। राजन गेट खोइल कऽ जाय लगलाह आ जाइत काल रागिनीकऽ पैर सेहो छुअइत बजलाह- "ई बातकऽ अतइ कब्र मे दफ़न कऽ देल जाय। कैमरा रिकार्डिंग सेहो डिलीट कऽ देबइ? " आहां निकलु? हमरा जे करबाकऽ होइत, से कऽ लेब। राजनकऽ गेलाकऽ बाद रागिनीकऽ बुझेलइन जे बड़का भारी बोझ उनकर माथा परसँउतइड़ गेलइन। बच्चाकऽ स्कुलसँघुरबा मे अखइन समय छलइ। ओना रागिनी , मिसेज कुमार बनलाकऽ बाद आजाद ख्यालक बइन गेल छथि। जीवन जीबा मे कोनो बंधन नञि छइन। मिस्टर कुमार तरफसँपुरा आजादी छइन। व्हिस्की पीनाई उनका मिस्टर कुमारे सिखौने छथिन।"वाइन तऽ पाइन छइ"- पहिल बेर ई लाइन सुनऽ मे केना दन लागल छलइन। मेडिकल कालेज मे जे छौंड़ी सब वाइन पीबइ, ओकरा सबसं ई कै लग्घा दुरे रहइ छलीह। आब की ओहिना लोक इनकोसँदुर रहइ छइन?ओ छोट शहर छलइ, ई महानगर छइ। देश- विदेशकऽ लोक छइ। नञि पीयऽ बाला बैकवर्ड कहाइ छइ। ओ दिन मे ड्रिंक घर मे नञि करय छथि, तखनो उनका नञि रहल गेलइन। बार कैबिनेट मेसँअपन पसंदीदा ब्रांड निकाललीह आ बोतलक कार्क खोललीह। आइ बिन सोडा, बिन आइस आ बिन पाइनक, नीट पी रहल छलीह। कनिको कंठ मे आइ नञि लाइग रहल छलइन। दसो बरखसँओ अइ दिनक इंतजार मे छलीह। राजन फेर एताह तऽ उनकासँकोना निबटब। कहीं हल्ला गुल्ला नञि भऽ जाइ। स्त्रीकऽ चरित्रे टा तऽ छइ, जई पर बिना किछु केने, कियो ढे़पा फेंक सकइ छइ। एतऽ तऽ उनकासँगलती भऽ गेल छलइन।बात मे फंईस कऽ ओ राजनकऽ देहसँखेलायकऽ आजादी दऽ देने छलखिन। बाद मे सब बुझेलइन। क्षणिक सुख, विवेक पर हावी भऽ गेल छलइन। ओना उनकर कयेक टा मेडिकलक संगी बिन्दास जीवन जी रहल अइछ। बियाह ओकरा सब लेल बेकारक " पचड़ा" छइ। शरीर की छइ? मांसक लोथड़े ने? अइ लेल कियैक अतेक प्रपंच? ईएह सब सोचइत, रागिनी पैग पर पैग खींच रहल छथि। सामने शीशा मे चेहरा देखा रहल छइन। हम तऽ बढ़िया नाटक खेल सकइ छी। राजन केहन डराऽ गेल छलाह। सटक सीताराम भऽ गेल छलइन। कहीं डरक मारे पेंट तऽ गील नञि भऽ गेल छलइन। हा हा हा- नशा मे अपने हंसऽ लगलीह। अपनेसँअपन पीठ ठोईक लेलीह।अपन सोचइत, हंसइत, मुस्कियाइत बिछान पर परऽ चइल गेलीह।माथ पर कोनो भार नञि छलइन, तैं बिछान पर जाइते निन्न भऽ गेलइन। ओ गल्ती की छलइ? राजनक चक्कर मे रागिनी कोना एलीह? ओ इंजीनियर, ई डाक्टर, केना? की? भेलइ? बुझऽ लेल आहांकऽ पिछला इतिहाससँगुजरऽ पड़त ........ ........... राजन आ रागिनी एक्के शहर मे शुरूआत मे रहइ छलीह। राजनक पिता किरानी छलखिन आ रागिनीकऽ पिता सरकारी पदाधिकारी। किरानीकऽ नौकरी बदली बला नञि, आ पदाधिकारी सबकऽ किछु किछु बरखक बाद बदली होइत छलइन। ओइ शहर मे पढ़बाक सुविधा नीक छलइ, मूदा अधिकारी आ किरानीकऽ बीच दूरी बेशी छलइ। आपसी आन- जान आ मेल- जोल नञिये बराबर। दसमी तक लड़का-लड़कीकऽ अलग स्कुल छलइ, लेकिन ग्यारहवींसँकालेज मे संगे पढ़ाइ होइ।दुनु गोटे एक दोसरकऽ नीक विद्यार्थी रूप मे नामसँजनञि छलीह। गर्ल्स कालेज ओइ शहर मे नञि रहइ। राजनकऽ दसमी मे नीक नम्मर आयल छलइन। रागिनी तऽ अपन स्कुलक टापर छलीह। कालेज मे आइब कऽ नीक दोस्ती भऽ गेल छलइन। ट्युशन सेहो सब संगे पढ़ई छलाह।दोस्ती कालेजे तक छलइन। बारहवींकऽ बाद राजन इंजीनियरिंग आ रागिनी मेडिकलकऽ कोचिंग लेल पटना अलग अलग संस्थान मे जाइ गेलाह। गाहे-बगाहे भेंट सेहो भऽ जाइन। रागिनीकऽ तऽ पटना मेडिकल कॉलेज मे डाक्टरीकऽ पढ़ाइ मे ,आर राजनकऽ टाटा मे इंजीनियरिंग मे नाम लिखा गेलइन। सब अपन दुनिया मे व्यस्त छल। राजनकऽ थर्ड ईयर मे खर्चाक लऽ कऽ धनिक बापक बेटीसँबियाह करा देल गेलइन। रागिनीकऽ परिवार ,ओ शहर छोड़ि कऽ कतउ आर चइल गेल‌‌‌ छल।आब दुनु मे कोनो संवाद नञि छलइन। इंजीनियरिंगकऽ पढ़ाइकऽ बाद राजन सरकारी नौकरीकऽ तैयारी गाम मे रही कऽ करऽ लगलाह।दु टा धीया पुता सेहो बेरोजगारी मे भऽ गेलइन। परीक्षा सब दइ छलाह , लेकिन सफलता नञि भेटलइन। इमहर पिता सेहो रिटायर कऽ गेल छलखिन। घरक जिम्मेदारी बइढ़ गेल छलइन। हारि कऽ बम्बइ जा कऽ प्राईवेट नौकरी करबाक फैसला केलाह।ईएह प्राईवेट नौकरी पहिने भेटई छलइन, तखइन नञि केलाह। आब कोनो नौकरी ताकऽ बहरेला।पछता रोटी खेने छलाह। जखइन पटना मे, ट्रेन मे बम्बइ जाइ लेल सीट पर बइसला तऽ देखइ छइथ जे सामने नव विवाहित रागिनी अपन घरबाला संग बइसल छलीह।गाम मे बेरोजगारीकऽ माइड़ झेललाकऽ कारण राजनक देह झोकइड़ गेल छलइन। ओ बयससँबहुत बेशी लगइ छलाह। इमहर रागिनी एम बी बी एस, फेर एम डी कऽ कऽ नौकरी करइत रहलीह। एतेक गुणी लेल बर तकनाई आसान थोड़बे छलइ।देरीसँबियाह भेलइन। बियाहक बाद बरक संग बम्बइ मे रहइत छलीह। राजन तऽ देखते रागिनीकऽ चिन्ह गेलखिन। रागिनी इनका दिश जाइन बुइझ कऽ या अन्जाने सं, तकबो नञि केलकीन। राजन इंतजारे करइत पहिल दिनक रस्ता बितेलाह।अगिला दिन भोर मे हल्का फुल्का रागिनीकऽ बरसँराजन गप्प शुरू कयलाह। तखइन संक्षेपे मे रागिनी बजलीह। राजनकऽ बेरोजगारीकऽ बात बुझला पर, रागिनीकऽ घरबाला अपन कार्ड देलखिन आ नौकरी तकबा मे मददकऽ भरोसा देलखिन। रागिनीकऽ घरबाला अपने प्राइवेट कालेजक पढ़ल इंजीनियर छलाह, सरकारी कालेज मे उनका एडमिशन नञि भेल छलइन। राजन सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज मे पढ़लाक बादो नौकरी नञि भेटबाक कारण उनका सहानुभूति छलइन। बाद मे रागिनी आ उनकर घरबालाकऽ सहयोगसँएकटा नौकरी राजनकऽ सेहो भेटलइन। रागिनी अपने डाक्टर छलीह आ ओतइ एकटा प्राइवेट अस्पताल मे नौकरी शुरू कऽ देने छलीह। राजनकऽ अपन कियो बम्बइ मे नञि छलइन, तैं ओ पाबइन तेहार आ छुट्टी मे रागिनी कतऽ जाइत अबइत छलाह। अहिना एक दिन बेरु पहर ओ रागिनी कतऽ गेल छलाह। ओतऽ गप्प सप्प, हंसी -मजाक करिते ओ कखइन आगु बइढ़ गेलाह........ रागिनी नञि बुझलीह........राजनकऽ तऽ सोचल छलइन...... रागिनी पर अपन शारीरिक बल शौष्ट देखबइत ओ मर्यादाकऽ सीमा रेखा तोइड़ लेलाह। ओना ओइ दिन कतउ असहमति नञि छलइ। विवाहित राजन, बहुत दिनसँस्त्रीकऽ संसर्गसँदुर छलाह, आइ मौका भेटला पर रागिनीकऽ संग सहवास कऽ लेने छलाह। किछु दिनक बाद रागिनीकऽ बरक बदली भऽ गेलइन। ओ सब गोहाटी चइल गेल‌‌‌ छलाह। राजनकऽ ओइ दिनक बाद रागिनीसँकहियो भेंट नञि भेल छलइन।एक दु बेर चाहबो केलाह- जाइ लेल, लेकिन नञि गेल भेलइन........कारण जे भी हो। रागिनी अइ घटनासँबाद मे दुखी छलीह। ओ अइ लेल अपनोकऽ दोषी मानञि छलीह। उनका होइन जे मिस्टर कुमारकऽ विश्वासकऽ ओ तोइड़ देलखिन।ऊपरसँजे फेर राजन एताह, तऽ कोना कऽ सामना करबइन। ओ बम्बइकऽ पाइन नञि सुट केलाक बहाना बना कऽ अपने दुखिताई होबाक नाटक केलीह। फेर हारि कऽ मिस्टर कुमार दोसर नौकरी गोहाटी मे तकलाह।ओतऽ ओ सब बिन बतौने चइल गेलीह। राजन आब व्यवस्थित भऽ गेल छलाह। कनिया बच्चाक संग बम्बइ मे रहऽ लागल छलाह मूदा उनकर माथ पर रागिनी नचइत छलखिन। राजनकऽ जखने मौका लगइन, ओ इनकर सबहक पता करइत छलाह। थोड़बे दिन पहिने पता लगलइन जे ई सब आब बंगलोर मे छइथ। राजन बंगलोरकऽ आफिसियल काज अबिते, ओतऽ पहुंच गेलाह। किछु ढेकाहारी कऽ कऽ इनकर सबहक घरक पता निकाइल लेलाह।ओकर बाद ऊयाह बेरु पहर पहुंचल छलाह। उनका बुझले नञि छलइन जे रागिनी " फैसला" लऽ लेने छथि। अपन गलतीकऽ अपने सुधार रागिनी कऽ कऽ निचिन्न सुइत रहलीह। आत्मग्लानि (लघुकथा) रंजीत नारायण, गंगा अपार्टमेट आर डब्ल्यू एकऽ प्रेसीडेंट छथि। रिटायर भेलाक बाद अपन सब उर्जा अपार्टमेटकऽ भलाई मे निश्वार्थ लगा रहल छलाह। इनका अइ सोसायटी मे एलाक बाद सोसायटीकऽ खर्चा चौथाई भऽ गेल छइ, आर सुविधा दुगुना। सब अपार्टमेट मे रहनिहार इनका या तऽ प्रेसीडेंट साहब कहइ छइन या मिस्टर आर एन।ई दुनु संबोधन मे गदगद रहइ छथि। कुकुरमुत्ता जकां भइड़ दिल्ली मे छिरियायल ई हाऊसिंग सोसायटी आ अकर आफिस बियर्रर्स सब सगरे भेटा जेताह।सब प्रेसिडेंटे छथि। आइनसँभरल रहताह सब। घर मे कनिया बच्चा सब टेड़इत नञि रहइत छइन, अतऽ सोसायटीकऽ आफिस मे तीसमार खां अपनाकऽ बुझबइत रहताह।अनेरोकऽ कनहा उचका उचका कऽ चलइत रहताह। सोसायटीकऽ गेटसँबाहर जाइते सुटक पिल्ली भऽ जाइ छइथ। ई उनका बुझले नञि छइन जे इनकर सबहक काजबाली सब टा भेद खोइल देने छइन।अकरा कतऽ कऽ गप ओकरा करऽ मे ई दाई सब पारंगत अइछ। मिस्टर आर एन , अइ सबसँअलग अपनाकऽ बुझई छथि।एक दिन सोसायटीकऽ आफिस मे केयरटेकर लग कोनो काजक सिलसिला मे गेल छलाह। ओतऽ पहिनेसँएकटा व्यक्ति किछु सोसायटीकऽ फार्म भड़इत छल। केयरटेकर कहलकइन- ई मिस्टर मिहिर राय छथि। २०१ मे एलाह अइछ। २०१ तऽ मिस्टर कुंवरकऽ छइन? हंं। ई किराया मे एलाह अइछ। मिस्टर आर एनकऽ तऽ मिस्टर मिहिरकऽ देखते जेना सांप सुंईघ गेलइन। एकदमसँसकपका गेलाह। आन कोई रहितइ त केयरटेकरकऽ निर्देश दइतथिन की- ई फार्म भराऊ, एना मिस्टर कुंवरसँएफिडेविट लियउन, इनकासँअंडरटेकिंग लियह, एना आऊ, एना जाऊ, ओतऽ गाड़ी पार्क करु, समय पर मेटेनेंसकऽ पाइ दियउ......... फलां चिलां। केयरटेकर तऽ मजा लइ लेल इनका परिचय करेलक। अतऽ तऽ ओ भेलइ जकर ओकरा आशा नञि छलइ। अइ सोसायटी की, सब हाऊसिंग सोसायटी मे किरायेदारकऽ दोयम दर्जा देल जाइ छइ। आन मेम्बर तऽ अइ बुढ़ियाकऽ फुईस बाला प्रेसिडेंटकऽ मोजर दइ नञि छइन, ई नबका किरायेदार पर इनका सबकऽ छजई छइन। नब लोककऽ तऽ ई सब ई करु आ ई नञि करु, सुना कऽ पका दइ छथिन। मिहिर किछु बजलाह नञि, लेकिन केयरटेकरकऽ थाह लाइग गेल‌‌‌ छलइ जे किछु तऽ किछु झोल छइ। मिस्टर आर एन चुपकेसँओतऽ सँनिकइल रहलाह। मिहिरकऽ सेहो भेलइन जे चलु अपनलोक अतऽ सोसायटी मे पहिले दिन भेंट गेलाह, ई नीक संयोग छइ। मिस्टर आर एन सोसायटीकऽ आफिससँसीधा घर घुरलाह। आन दिन तऽ इमहर ओमहर राउंड मारलाकऽ बादयअबइ छलाह। इनका डर सतबइ लगलइन जे कहीं ई मिहिर सबकऽ सच्चाई ने बता दइ। अतुका सब इज्जत एक्के मिनट नञि लगतइ, छु जेकां उड़िया जाइत। बेचैनी मे घर मे टहलऽ लगलाह। कनियाकऽ अइ परेशानीकऽ कारण पुछला पर शुरू मे तऽ नञि किछु बतेलखिन लेकिन बाद मे जोर देला पर मिहिरकऽ अइ सोसायटी मे रहअ बाला बात कहिये देलखिन। कनियो परेशान जे आब की हेतइ, सबकऽ असलिइत ई मिहिर बतेबे करतइ। ई जाइन बुइझ कऽ अइ सोसायटी मे आयल अइछ। ई तऽ किरायेदार अइछ, कतउ रही सकइ छलाय।ई बदला लेबाक इरादासँआयल अइछ। आइकऽ बाद मिस्टर आर एन आ उनकर कनियाकऽ सोसायटी मे निकलनाई कम भऽ गेलइन। महीना बितइत बितइत एक दिन सब देख रहल अइछ जे मिस्टर आर एनकऽ समान ट्रक पर लदा रहल छलइन।ओ किनको अपन पता नञि देलखिन आ ओतऽ सँकतउ आर शिफ्ट भऽ गेलाह। बाद मे सोसायटी बालाकऽ पता चललइ जे मिस्टर आर एन अपन फ्लैट सेहो बेच लेलाह अइछ।सब लेल ई एकटा रहस्य छलइ, सिवाय केयरटेकर के।ओकर अनुभवी आ़ईख, मिस्टर आर एनकऽ ओइ दिनक उतरल चेहरा बड्ड किछु कहि देने रहइ। जिज्ञासा सबकऽ ई बुझबाकऽ लेल लागल छलइ जे एहन " कारण " आखिर की छइ? रंजीत एकटा सामान्य नौकरी करय छलाह। उनकर कनिया तीन बहिन आ एक भाइ छलखिन। ससुरकऽ मृत्यु भऽ गेल छलइन। रंजीतकऽ सार संजीव बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मे पढइ छलाह। एक बेर संजीव अपन गाम छुट्टी मे गेल छलाह। ओतऽ एकटा पुश्तैनी जमीनकऽ लऽ कऽ दोसर टोलक लोकसँविवाद भेलइ। ओइ लड़ाई मे दुनु पक्षक लोक जमा छल। ओइ पक्षक एक गोटे संजीव पर गोली चला देलकइन। मौके पर संजीवक मृत्यु भऽ गेलइन। संजीवकऽ पिता पहिनेहे स्वर्ग लोक जा चुकल छलखिन। ई जवान बच्चाकऽ लहाश देख कऽ संजीवक बाबाक बुढ़ भाइ दलपति रायकऽ नञि रहल गेलइन। ओ अपन लायसेंसी बंदूक उठेलाह आ संजीव पर गोली चलबऽ बालाकऽ ओतइ ढेर कऽ देलाह।दु लोककऽ सरेआम हत्याकऽ खबर आइग जेकां चारु दिश फैल गेलइ। थाना पुलिस एलइ ।दलपति राय आ उनकर घरक सब पुरूख सदस्यकऽ पकइड़ कऽ लऽ गेलइ। ओइ पक्षक जे मारने रहइ, ओ तऽ मइड़ गेल छल।तैं उमहरसँआर कियो नञि जेहल गेलइ। संजीव आ उनकर दुनु साढु सपरिवार अइ दुखक घड़ी मे ढ़ांढस देबइ लेल पहुंचल छलाह।ई लड़ाई संजीवकऽ लऽ कऽ भेल रहइ आ ओकर मृत्युकऽ बदला लइ लेल दलपति राय बुढ़ भेलाक बादो ई कदम उठेलाह। उनका लाख कहलाकऽ बावजुदो पुलिस घरक सब पुरूख सदस्यकऽ नाम केश मे दऽ देने रहइ, कारण सीधा छलइ- दोसर पक्ष प्रभावशाली छलइ आ उपरसँपुलिसकऽ पाइ सेहो चढ़ा देने छलइ। श्राद्ध कर्मकऽ बाद ई सवाल उठलइ जे केसक खर्चा आ दलपति रायकऽ आश्रितक देखरेख कोना होइ। स़ंजीवक मां कहलखिन जे उनके बेटा लऽ कऽ सब फसाद भेल छइ आ बेटा परलोक चईले गेल अइछ।हम ई सब भार ओकर आत्माक शांति लेल उठायब।गामक स्कुलकऽ जमीन सेहो संजीवक माय देबऽ चाहइ छलखिन। उनकर बेटी सबकऽ आब संपइतक लोभ भऽ गेल छलइन।ओ सब अपन मायकऽ दिमाग मे बइसा देलखिन कि स्कुलकऽ जमीन देला पर ओतऽ अनेरूआ लोकक अड्डा भऽ जेतइ। आहां किछु आर सोचु, भाइकऽ नामसँसैह कऽ देल जतइन। अहिना स्कुलक जमीन देबाक प्रस्ताव टरका देल गेलइ। ओकर बाद संजीवक खेतक फसल दलपति रायकऽ घरकऽ लोककऽ दऽ देल जाइ छलइन। सब सामान्य चइल रहल छलइ। सब जेहल गेल लोकक जमानत लेल बड़का वकील राखल गेल छलइ। लोअर कोर्टसँतऽ जमानत नञि भेटलइ, लेकिन हाइकोर्टसँदु बरखक बाद किछु लोककऽ जमानत भेलइ। अइ सब कोर्टक दौर बरहा आ दलपति रायकऽ आश्रित सबहक खर्च संजीवक माय अपन दऽ रहल छलखिन। जवान बेटाकऽ मायकऽ रहिते गुजरलाकऽ शोकसँबड़का दुख किछु नञि होइ छइ। संजीवकऽ माय आब बेटी सबहक संग रहइ छलीह।ओ इकलौता बेटाकऽ याद मे गाम मे किछु करऽ चाहइत छलीह। बहुत सोच विचार केलाक बाद महादेव मंडिल बनबऽ निश्चित केलीह। उनकर ई निर्णय सुइन कऽ तीनु बेटी एहन ने जाल बुनऽ लगलइन जे सब पाइ इमहर आमहर होबऽ लगलइन।दोसर गामक पुश्तैनी जमीन बेचऽ कऽ जहां ककरो कहतिन कि जमाय ओकरा भड़का देथिन।नहिये मंडिल बनबऽ देलकइन सब।किछु बेटाक याद मे करबाक विचार ओ सोचिते रही गेलीह। दु बरख बितइत बितइत संजीवक माय चट दं एकदिन रंजीतक कतऽ रहलाक क्रम मे मइड़ गेलखिन।ओना गामक लोककऽ उनकर मृत्यु पर संदेह छइ। तीनु बहिन अपन जमा भेलीह आ उनकर श्राद्ध हरिद्वार मे कऽ दइ गेलखिन। मूंहछुआन गाम मे खबर भऽ गेल छलइ। आधासँबेशी लोक तं जेहल मे छलइ, नञि कियो आइब सकलइन। आब तीनु साढ़ुकऽ केस परक खर्च फालतू बुझा रहल छलइन। ओना ई पाइ उनका सबकऽ अपनासँदेबऽ नञि पड़इ छलइन। आब तऽ सासुरोकऽ संपइत उनका सबकऽ अपन बुझाय लागल छलइन। सब साढु मे बुझनिहार रंजीत छलाह। ओ दलपति रायकऽ घरक लोकसँसेहो संबंध रखने छलाह। आन जान होइत रहइत छलइन। अही सब मे एक गोटे इनका लग संजीवक हिस्साकऽ गामक घरारीसँलऽ कऽ सब संपइत लिखबइकऽ आफर देलकइन। जमीन खरीदऽ बाला आर कोई नञि छलाह, ई छलाह उएह लोक, जिनकर बेटा संजीवक हत्या केने छलइन। ई बात दलपति रायकऽ घरकऽ लोककऽ सेहो पता लगलइ। ओ सब रंजीत आ उनकर कनियाकऽ ओकरा बेचऽ सँमना केलखिन। रंजीत बदला मे बहुत रास पाइ मंगलखिन। दलपति राय त अपने जेहल मे छलाह।ओतेक पाइ कतऽ सँदइतथिन। पाइकऽ लोभ मे तीनु साढु आ उनकर कनिया सब मिल कऽ ओइ पक्षकऽ सब संपइत रजिस्टरी कऽ देलकइ। रंजीत आ दलपति रायकऽ परिवारकऽ बीच खुब झगड़ा दन भेलइन। आहांकऽ हाथ नञि कांपल ई हत्यारा सबकऽ रजिस्ट्री करऽ मे? हमर सम्पइत! जे मोन से करब! अइ खानदानक संपइत छइ। आहांक बाप नञि अरजने छथि। आहां सब बाप पर नञि जाऊ।हम आहां सबकऽ देखा देब। हं हं । करु ने, जे मोन करय। जेहलसँसबकऽ निकलऽ दियउ। आहांकऽ टपअ नञि देब। .............. अहिना रारिं बेटखऊंकी खुब भेलइन। रंजीत आ दुनु साढु ओकरा सब के, सब लिख देलखिन।ओ दुनु साढ़ु अइ मुफ्तउआ पाइकऽ उड़ा लेलक। आइ तक ककरो रहलइया? रंजीत बुधियार छलाह, ओ ई अपार्टमेट कीनलाह आ सम्मानित लोक जेकां अतऽ रहअ लगलाह।आबऽ उनका काजे कोन जे, सासुर जेताह। आब दलपति रायकऽ परिवारकऽ खाय पीयकऽ कष्ट होबऽ लगलइन। रंजीत ओइ पाइसँसोसायटी मे घर कीन लेलाह। सब संपर्क सासुरसँतोइड़ लेलाह। दलपति रायकऽ दुःखसँजेहल मे ही मृत्यु भऽ गेलइन। रंजीत आब मिस्टर आर एन भऽ गेल छथि। ऊयाह दलपति रायकऽ पोता मिहिर राय छथि। ओ तऽ अंचोके अइ सोसायटी मे किराया मे घर लऽ लेलाह। ऱजीत नारायण आ उनकर कनियाकऽ आत्मग्लानि भऽ रहल छइन। ओ सब अपने बुझई छथि जे कतेक निकृष्ट काज करय गेलाह अइछ। मरल भाइकऽ संपइत ओकरे दुश्मनकऽ हाथ बेचबे नञि केलाह, मायक देल बचनकऽ सेहो नञि निभेला। मिहिरक आंईख उनका सबकऽ खिहाड़इ छलइन। ओकरासँआंईख मिलबऽ मे एक टा गति नञि बाचइन। कहल गेल छइ- बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया। रूपैया तऽ रंजीत नारायणकऽ भऽ गेलइन लेकिन मिहिरक आंईखक सोझा उनका ठार नञि भेल जाइ छइन। ओकर आंईख जेना पुछइ छइन- संजीवकऽ मौतक बदला लेल आहां की केलियईे? दलपति रायकऽ मृत्युकऽ जिम्मेदारकऽ छइ? सासक बचनकऽ की भेल? ई आत्मग्लानिकऽ कारण रंजीत नारायणकऽ एक एक दिन गंगा अपार्टमेट मे भारी लागऽ लगलइन। सुतली राइत संजीवक आत्मा आबऽ लगलइन। ई सब मिहिरक अतऽ एलाकऽ बाद भेलइन। अइसँबचबाक एक्के टा उपाय बांचल छलइन- एहन जगह चइल जाइ, जतऽ मिहिरक सोंझा सोंझी नञि होबक परइन। पहिने तऽ मिस्टर कुंवरसँप्रयास केलाह जे ओ किरायेदारकऽ हटा दइ। ओ तैयार नञि भेलइन। आब कोनो उपाय नञि देख, रंजीत नारायण कतउ आर चोरा कऽ बाकी जीवन बीतबऽ चइल गेलाह। इनका ई बुझले नञि छइन जे संजीवक भूत इनका सब जगह अहिना खिहाड़इत रहतइन।भाइकऽ जमीनक अतेक स्नेह छलइ जे ओ जाना दऽ देलक आ बहिनकऽ देखू ओ मलिकाइन होइते हत्याराकऽ हाथे कबाला कऽ देलक। कतऽ निचिन्न संजीवक आत्मा होबऽ देतइन। ओमहर मिहिरकऽ जखइन रंजीत नारायणकऽ फ्लैट बेच कऽ चइल जेबाक पता लगलइन, तऽ उनका चिंता भेलइन। मिहिर तऽ नब जबानाकऽ लोक छथि, जिनका नञि ई सब अतेक बात बुझल छलइन। आ किछु उड़न्तु सुननेहो छलाह तऽ ओ पूर्वाग्रहसँअपनाकऽ अलग रखने छलाह। मिहिर दु चाइर दिन रंजीत नारायण लेल चिंतित रहलाह, फेर समयक डेग मे बढ़इत,सब बिसइड़ कऽ आगु जिनगी बढ़ा लेलाह। खेलौना (लघुकथा) जई बेर गाम जाऊ, खेलौना टपकिये जाइत। हमरा आब ओ सोहाइ नञि अइछ। आइब कऽ बइस रहत, आ तखइन तक बइसल रहत.......जाबइत किछु देबइ नञि। कयेक बेर त दलान पर अखरे चौकी पर निधंग सुईतियो जाइत। देला परलो, जाय काल मे दु बेर पुछत, जे फलां ट्रेनसँजायब ने? हम कहबइ हं, तखने मुस्कियाइत धीरे धीरे टुघड़इत बिदा होइत। कोन काज छलइ खेलौनाकऽ आबऽ के। चलल जाइ ने छइ, आंईखसँसुझाई नञि छइ, तखनो एब्बे करत। आंईख मे मोतियाबिन्न भेल छइ। एक आ़ंईखक आपरेशन तऽ " धरान " मे जा कऽ करा आयल। दोसर आंईख मे तहिया मोतियाबिन्न पाकल नञि छलइ, तैं नञि केलकइ। ईहो अचरजक बात- दुनियाकऽ लोक तऽ भारत मे अबइत अइछ, ईलाजक लेल। आ अतऽ देखू गामक गाम " धरान " , नेपाल जा रहल अइछ। ओतुका बेबसथा कहादुन बड्ड बढ़िया छइ। भीड़ उमड़ल रहइत छइ।बेशी अपने देशक लोक रहइत छइ। ऊपरसँरहबाक, खेबा-पीबाक आ मंगनिये मे चश्मा सेहो दइ छइ। कतऽ सँई सब होइ छइ। अतऽ कहइ लेल अपन सरकार, आ इलाजक कोनो इंतजाम नञि। खेलौनाकऽ जहिया देह मे हुब्बा छलइ, बड़का नेता बनञि छल। अपन समाज मे ओकर बात अंतिम होइ छलइ। किनको पर हाथ उठबो मे ओकरा सोचऽ कऽ नञि पड़इ।सब कहइ- अकर हाथ छुटल छइ।ई हाथ एकदिन मे नञि छुटलइ। अकर शुरुआत रामजीवन सिंह कतऽ सँभेल छइ। रामजीवन सिह कलामी लोक छलाह। गाम मे सबसं बेशी गाछी बिरछी छलइन। अही गाछी बाटे सब सोलकन दिशा- मैदान लेल सरेह मे जाइ छलाय। जे कनी तरी भिरी की केलकइन, ओकर बाध मे जेबाक रस्ता बन्न भऽ जाइ छलइ। गाम मे पहीने उनके धनरोपनी होइन, ओकर बाद किनको खेत मे हाथ लगइ। ओहिना कटनीकऽ समय मे सेहो होइ।उनकर खेत मे खेलौनाकऽ महीस किछु जजात जियान कऽ देने रहइन।अइ लऽ कऽ खेलौनासँरामजीवन सिंहकऽ बेटाकऽ बहस भेलइन। ओइ पर तमसा कऽ दु हाथ रामजीवन सिंहकऽ बेटा , खेलौना पर चला देलखिन। ओतइ खेलौनाकऽ संघतिया, ओकरे टोलक रमरतिया सेहो घास गढ़ई छल।रमरतिया दौरल एलइ खेलौनाकऽ बचबइ लेल। आब की छलइ, रमरतियाकऽ देखते, खेलौनाकऽ की जाने की भेलइ। पहिने तऽ चुपचाप माइड़ खा लेने छल।बात खत्मे जेकां छलइ। ओकर महीस जजात जियान केलकइ, तऽ ओकर जुर्माना मे माइड़ खेनाई बनञि छलइ।ई पाठ ओ बच्चेसँपढ़ने छल। लेकिन ओइ दिन तऽ दोसरे ग्रह लग्न रहइ। खेलौनाकऽ हाथ मे महीस चरबऽ लेल छऊंकी छलइ।ओ सटासट चाइर छऊंकी, रामजीवन सिंहकऽ बेटा पर ससाइड़ देलकइ। चिकरइत रामजीवन सिंहकऽ बेटा परेलाह।उनकर चिकरनाई पर उपरसँरमरतियाकऽ हंसी छुइट गेलइ। ओ पहिले बेर सियान बाबु भैय्याकऽ पिटाईकऽ बाद चिचियेनाई सुनने छलइ। ओकर समाज मे तऽ दस- बीस छऊंकी खेलाकऽ बाद कनी मनी आवाज निकलइ छलइ। अतऽ तऽ एक्के छऊंकी पर छटपटाय लागल। कथीकऽ मरद हइ, से नञि जाइन। खेलौनाकऽ बाप हमरा कतऽ दौरल आयल छलइ।पर - पंचयती भेलइ। सवाल ईएह छलइ- पहिने हाथकऽ उठेलक? जमाना बदइल गेल‌‌‌ छलइ। खेलौनाकऽ समाज मे कै टा लाठी भऽ गेल छलइ। आब गल्ती सहीकऽ फरीछौता हुवअ लागल छलइ। एकतरफे फैसला नञि होइ, चाहे कियो होइस। अही आधार पर खेलौना बांइच गेल। माफी मांइग कऽ छुइट गेल। आब ओकरा रामजीवन सिंह बाला गट्टीसँतरऊका दुश्मनी भऽ गेल छलइ। ओना गामक हीरो ओ भऽ गेल छल। आब किनको मजाल नञि जे ककरो पीट दैस।खेलौना अगल बगल गाम मे आब पंचइती मे जाय लागल छलाय। सब ओकर चिन्ह लागल छलइ। अइ माइड़ बाला घटनाकऽ बाद रमरतिया जे नैहर ओहिना मोन बदलऽ आयल छलाय, अतइकऽ रही गेल। खेलौनाकऽ संग ओ रहअ लागल।कऽ ककरा रखलकइ, से नञि फुजलइ। ओना कहऽ बाला ईहो कहइ छइ जे खेलौनाकऽ ई रामजीवन सिंहकऽ बेटाकऽ मारऽ बाला करेज देख कऽ , रमरतिया अपनाकऽ ओकरा निहुछ देलकइ। ओकर बर, बिदागरी लेल एलइ तं गऊंआ सब बेलगा देलकइ।ई रमरतियाकऽ सब बांझ बुझई छलइ, ओकरासँचाइर टा बेटा भेलइ खेलौना के। रमरतियाकऽ सोभाव एहन छलइ जे नञि अपने साऊस तर रहल आ नञि पुतउहे सब ओकरा संग रहलइ। दु टा बेटा डड़इवरी करय छइ आ एकटा घरभुजाकऽ दोकान खोलने छइ। चारिम जे सबसं बेशी पढ़ने रहइ ओ एकटा चिरान - मिल मे मुंशी छइ। सब अलगा- अलगी छइ। जाबइत रमरतिया जीबइत छलइ, खेलौनाकऽ नञि कोनो दिक्कत छलइ।ओ किछु ने किछु कमाइये लइत छल। ऊपरसँबकरी पोसने छल, मूंजक डलिया बीनञि छल,एकटा माल सबदिना पोसबे केलक आ ऊपरसँरोपनी- कटनी मे काज भेटिये जाइ छलइ। रमरतियाकऽ कोन बेमारी भेलइ से नञि जाइन........दसे दिनक जाड़ बोखार मे ओ चइल गेल। खेलौना सोचते रही गेल, प्राईवेट मे नहिये देखा सकलइ ओकरा। सरकारी मे देखेबा मे भइड़ भइड़ दिन लाइग जाइ छलइ। तखनो खेलौना लऽ जाइ ओकरा।कयेक बेर तऽ रमरतिया अपने ककरो दोसराइत मे लऽ कऽ चइल जाइ छलइ। नञि बचबाक छलइ, तैं नञि बचलइ रमरतिया। गरीब गुरबाकऽ कहियो बड़का बीमारी थोड़बे होइ छइ? बड़का बीमारी ओ भेल , जकर ईलाज मंहग! बीमारीकऽ पता तऽ जांचसँहोइ छइ। जतेक पैभ बीमारी, ओकर जांच ओतेक मंहग। गरीब लोक तऽ डागदरेसँने देखाइत, जांच ओकर बुतासँबाहरक गप होइ छइ। उएह भेलइ रमरतिया संग। डागदरसँतऽ खेलौना देखेलकइ, मूदा जांच नञि करा सकलकइ। कराईयो लइतइ त की दिल्ली बम्बइ ओ लऽ जा सकितइ। ई जे मोन मे अफसोस होइतइ, ओइसँनीक रमरतिया चलिये गेल। खेलौना काज केनाई रमरतियाकऽ जीबिते छोड़ि देने छल। आब खेलौनाकऽ बेटा सब कतऽ खेबाक पारी लागल छइ। भोजन तऽ दुनु सांझ भेंट जाइ छइ। चुन-तमाकुकऽ ओकरा तलब छइ। ओइ मे दिकदारी भऽ गेल छइ। देह आब चलइ नञि छइ। बेटा सब खेनाईकऽ अलावे किछु देबइ लेल तैयार नञि छइ। ओना सरकारी ललका कार्ड ओकरा बनल छइ। ओइ पर चाऊर, गहुम सब भेटई छइ। जकरा मे रहइ छइ, ऊयाह बेटा कोटा उठबइ छइ। सरकारक सौ दिना काज करौनिहार मे खेलौनाकऽ नाम सेहो छइ। सरकारी पोखइड़कऽ साफ-सफाई मे चेक बइन गेल छलइ। आब बस ओकर एकाउंट मे अबइये बला छलइ कि कोनो मूंहझौसा कलक्टरकऽ शिकाइत कऽ देलकइ। आब इन्क्वाईरी बइसल छइ। पाइ फईस गेलइ।तैं कनीक दिकदारी मे अइछ। हम सोचऽ लगलऊं। कोन पाइ फंसलइ? अकरा चलल तऽ जाइ नञि छइ। जन बनिहार मे नाम छइ? पोखइड़ मे कोनो काज भेले नञि छइ। आत्मविश्वास देखू अकर- देर सबेर पाइ भेटबे करतइ। बस ताबइत चुन तमाकु लेल किछु चाही। खेलौना बाईज रहल छल- हम आहां कतऽ छोड़ि कऽ दोसर घर नञि धेलऊं।अतउ आब पहिने बाला चुहचुही नञि छइ। पहिने कतेक तरहक काज होइ। मालिककऽ अपन नौकरी नञियो छलइन तइयो दु लोककऽ रोजगार दइ छलखिन। आहां सब पईढ़ लिख कऽ हाकिम भऽ गेलऊं, लेकिन ककरो रोजगार नञि दऽ पेलऊं। कथीकऽ हाकिम? हम सोचलऊं जे कतेक अकर उपदेश सुनुं। हमरे दलान पर बइस कऽ हमरे कहीं रहल अइछ जे पहिलका चुहचुही आब एतऽ नञि छइ। कोनो जन बनिहार नञि खइट रहल अइछ। सब तऽ मनखब पर दऽ देल छइ।कऽ खटतइ। जनऽ क मजुरी ततेक ने भऽ गेल छइ, जेकऽ सकताह खेती करबाव मे। हम कहलियई- ई पाइ लियह। चुन तमाकु कीन लेब। आहा़ं बुढ़ा गेल छी। टीशन अयबाहकऽ नञि काज। खेलौना परनाम पाती कऽ कऽ चइल गेल। जाय काल टीशन पर अबइ छी तऽ खेलौना गुमतिये लग भेटा जाइया।हमरा ओकरा देखते फेर मोन खौंझा गेल। फेर अकरा पाइ चहियई..........हमर पिंड ई नञि छोडते.......थेथर भऽ गेल अइछ........कहने रहियइ नञि ओ, तखनो आइब गेल‌‌‌। अतेक बुढ़कऽ कोना ऊवाच कथा कहबइ- हुं हां करइत रहलऊं। ओ कहलक- ढेबराकऽ बेटा अतइ टीशन पर टिकट कटई छइ। ओकरे लगसँहम आइब रहल छी। ट्रेन एक घंटा लेट अइछ। हम ईएह बतबऽ जाइ छलऊं।आब आहां आइब गेलऊं त चलु टीसने पर बइसब। स्टेशन पर ट्रेन लेट हेबाक कारण भीड़ बेशी छलइ। खेलौनाकऽ देखिते ढेबराकऽ बेटा एक गोटाकऽ इशारा केलकइ। हमरा सबहक लेल तीन टा कुर्सी कतउसँआइब गेल। फेर लस्सी। कनी काल मे चाह सेहो।बच्चा सब लेल कुरकुरे। कतबो पाइ देबऽ चाहलियई, ओ सब नञि लेलक। खेलौनाकऽ समाजकऽ चाइर गोटे तऽ टीशन पर दोकान खोलने छइ। खेलौना सबकऽ हमर जयबाक बारे मे बतेने छलइ।लोक एकाएकी अबइत छल। हमर धीया पुता ई आदर देख कऽ अभिभुत छलाह।ओकर हम बिदेशिया मालिक भेलियई। ट्रेनकऽ अबिते देख हमर हाथ जेबी मे गेल आ जे भी पाइ रस्ता लेल अलगसँरखने रही, ओ बंद मुट्ठी मे आइब गेल।हम ओ मुट्ठीकऽ खेलौनाकऽ जेबी मे हाथ दऽ कऽ खोइल देलियई। ट्रेन पर सब सामान हांई हांई कऽ कऽ रखा गेल छल। खेलौना कहलक- हम आब अ़ंतिमे छी बौआ जे आहांकऽ चहुंपावई लेल अबइ छी। अही लेल हमर बेटा सब हमरासँखिसियाल रहइत अइछ।हमरासँअइ अंत काल छोड़ल हैत।हम पाइ लेल नञि, स्नेह लेल अबइ छी। ओइ बुढ़ा मालिक- मलिकाइनकऽ याद मे अबइ छी।उनकर कर्जा चुका रहल छी। हमर बच्चा सब सेहो गामक पैघ बुजुर्गकऽ जेना पैर छु कऽ आशीर्वादी लइ छलाह, ओहिना खेलौनाकऽ सेहो पैर छुबइ गेलाह। खेलौनाकऽ आंईख छलछला गेलइ- जाऊ जुग जुग जीबइ जाऊ।बऊआ मालिकसँभी पैघ हाकिम बनञि जऊ। हमरा जनीकऽ नञि बिसरब। खेलौना ठीके कहइ छल। जाबइत ओ अइछ, ताबिते ने "बौआ मालिक "। आब गाम गेला पर दोसरकऽ कहत। चुन तमाकुल की, कतबो पाइ देला पर कियो अतेक आबेश करत आ बौआ मालिक कहत।ई ओइ पीढ़ीकऽ अंतिम लोक अइछ। आबऽ बला जमाना, पोथिये टा मे पढ़तइ, जे खेलौना जेकां लोक समाज मे होइतो छलइ। टीशन पर बिदा करय लेल खाली खेलौने ठार अइछ। आर कियो गोटे नञि आयल छथि। हम किनको छोड़अ जेबइन ने, तखने ओ सब अऊताह। अतऽ तऽ बरोबरी बाला गप छइ। पाइये सही, आखिर खेलौने मे अतबा माश्चर्य तऽ भेलइ। खेलौना तोरा हम चाहियो कऽ नञि बिसरबऊ। कल्पवास (लघुकथा) दहन बाबुकऽ आंगनसँबड्ड इच्छा रहइन - " एक बेर कल्पवास करितऊं "। उनकर नैहरे- सासुर सब मास दिनक लेल कल्पवास केने छलइन।ओइ कल्पवासक समय भोगल जिनगी, संत महात्माकऽ बोल- वचन, लोकक भीड़, सात्विक जीवन, साधु संतक बड़का बड़का टेंट, कुंभ मे लोकक रेला, ओ मोरक पंख, लोहाक हांसु, लोककऽ हरेनाई आ हरेला पर तकनाई, सरकारक बेबसथा, हड्डी गलबऽ बाला जार, भीजल जारइन, ईंटाक चुल्हा, सांझक बजार, तरकारी बाली सबहक मोल मोलइ , ओ मोटरा- मोटरी, ओ ठगहा स्वामी, ओ वस्तुजातक चोरी, अहीना कतेक रास खिस्सा पिहानी ओ सुनने छइथ। सासुरकऽ लोक गेल होइथ वा नैहर के, खिस्सा एकरंगाहे। कल्पवास उनका अपना दिश सम्मोहित करय छलइन। ओ एक दु बेर पहिनेहो मोने मोन जायकऽ तैयारी केनहो छलीह लेकिन ऐन मौका पर कोई न कोई विघ्न बाधा सामने ठार भऽ गेलइन। नञि जा सकलीह, मोन मसोईस कऽ रही गेलीह। अपनेकऽ मनेलीह- ओना अखइन तेहन बुढ़ थोरबे भेल छइथ, कल्पवास कोन भागल जाइ छइ। आब सब जिम्मेदारीसँमुक्त भेली अइछ। ओना त भइड़ जीवन किछु ने किछु लगले रहइ छइ।दुनु बेटी अपन सासुर बसई छइन। बेटाकऽ नीक नौकरी छइन। दु बरखक पोतो छइन। दिल्ली मे बेटा-पुतोहु रहइ छइन।नाइत, नतनी आ पोता भेलाक बाद उनका लागऽ लगलइन जे आब बुढ़ भऽ रहल छइथ। ओना देह- दशासँनीक छइथ। कियो नञि कहतइन जे घरबाला नौकरीसँरिटायर कऽ गेल छथीन। ओना ई दहन बाबुकऽ उपराग मे कहितो छथिन- आहां रिटायर भेल छी, हम नञि। से मोन राखु। कहलो गेल छइ जे पोता भेलाक बाद स्वर्गक रस्ता सीधा खुईज जाइ छइ। ईएह स्वर्ग सुनला पर तऽ कल्पवासक धुन सवार भेल छइन।अइ बेर सोइच लेने छलीह जे किछु भऽ जाय माघ मे प्रयागराज जेबे करतीह।एक दु टा धरम करम बाली बुढ़ी सबकऽ दोसराइत लेल पुछबो केलखिन, लेकिन ओ सब नञि तैयार भेलखिन।अंत मे हारि कऽ दहन बाबुकऽ कहलखिन- " आहां हमरा कल्पवास मे जा कऽ छोड़ि देब आ फेर एक महीना बाद लऽ आनब"। से कियैक? हम कै गोटेकऽ कहलियनि, कियो संग दइ लेल नञि तैयार भेल। अरे हम छी ने। हम संग देब! सकारात्मक ज़बाब भेटला पर दहन बाबुकऽ कनिया कनी आर जोशेली। बजलीह- से तऽ हमरा बुझल अइछ जे आहां संग हमर देबे करब।ओहीसँत कहलऊं। मूदा हम छोड़ि कऽ नञि आयब? कियैक? डर होइया। आहां कोनो बहुरूपिया साधुकऽ नञि पिछोड़ धअ लेबइ। आब कतऽ जायब। ओतऽ हम धरम करऽ जाइ छी। एहनो नञि छी जे कियो बहला फुसला लेत हमरा। बात बात मे दहन बाबु अपनो कल्पवास जयबाक इच्छा जतेलखिन। आब की छलइ। उनकर कनिया तऽ खुशीसँझुमअ लगलीह। सब बेटा बेटीकऽ अपन जायकऽ बारे मे बतेलखिन। सब बयस भेला पर बदलइत अइछ।दहन बाबु घरो मे कहियो पूजा पाठ नञि केलाह, ओ मास दिनक लेल कल्पवास करऽ जा रहल छथि। सबकऽ अचरज लगलइ। अगिले दिन इलाहाबाद बाला ट्रेन मे रिजर्वेशनकऽ टिकट अबिती- जयतीकऽ करा लेलाह। समान सबहक लिस्ट बनऽ लागल। जे बुढ़ी सब पहिने कल्पवास केने छथि, उनका सबसँब्रीफिंग पर ब्रीफिंग दहन बाबुकऽ कनिया लऽ रहल छलीह।जायसँएक हफ्ता पहिनेहे सब जरूरतकऽ समान कीना गेल छलइन। इलाहाबाद मे एकटा सीधा संबंधी तऽ नञि, लेकिन जोड़ुआ तऽ अबस्से कहबइन, उनकर पता आ फोन नम्बर सब लऽ लेने छलाह। उनकासँएकदिन फोन पर गप्प सेहो भऽ गेल छलइन। हुनका अपन आबऽ कऽ प्रोग्राम बता देने छलखिन। कोना की स्टेशनसँगंगा कात जेबाक छइ, कतेक की भाड़ा लगतइ, कोना आ कत्ते पाइ मे टेंट भेंटतइ, सब बुइझ- सुइझ लेने छलाह। दहन बाबुकऽ कनियाकऽ होइन की आब तऽ ओ सोझे स्वर्गे जेतीह। ओकरे लेल रस्ता सब बइन रहल छइ। जायसँएकदिन पहिने सब धीया- पुताकऽ " आलदऽ बेस्ट आ हैप्पी जर्नी" बाला फोन सेहो एलइन। आइ ओ नानी-दादी बाला खाड़ी मे अपनाकऽ असली मे बुइझ रहल छलीह। जखइन घरसँबिदा भेलीह तऽ भइड़ दिअयद बिदा करऽ आयल छलइन।बुझा रहल छलइन जे कोनो जंग मे जा रहल छइथ। लोक सब कुंभ आ कल्पवासक सुनल सुनायल गप कहइन आ डरबइतो रहइन। दहन बाबुकऽ कनिया पर अकर एक नबको असर नञि छलइन। उनका दहन बाबुकऽ अफसर बाला रौब पर भरोसा छलइन। जे काज ओ हाथ मे लइ छलाह, सफलता भेंटते छलइन। चाहे बच्चा सबहक एडमिशन होइ, ट्रेन मे जतरा होइ, बेटी सबहक कथा वार्ता होइ, सब जगह ई गोटी लालकऽ कऽ घुरल छलाह। रेलवे टीशन पर छोड़अ लेल एकटा भातिज आ उनकर कनिया मोटरसँआयल छलखिन।एसी बोगी मे रिजर्वेशन छलइन। बेशी भीड़भाड़ नञि छलइ। अपन आरामसँदुनु बेकती रिजर्व सीट पर बइस गेलाह। जखइन अगिला दिन भोरे इलाहाबाद पहुंचलाह त देखइत छइथ जे एक गोटे उनका सबकऽ लेबइ लेल स्टेशन पर ठार छथि। ई ऊयाह व्यक्ति छलाह जिनकर पितासँदहन बाबुकऽ गप भेल रहइन।ओतऽ सँओ सब सीधा संगम गेलाह, जतऽ कल्पवासक लेल टेंट सब लागल छलइ। पहिनेहेसँइनका सबहक लेल एकटा टेंट ठेकनायल रहइन।ओ व्यक्ति फाइनल अइसँनञि केने छलाह, इनका सबकऽ केहन नीक लगतइन? बढ़िया जगह पर ओ टेंट लागल छलइ। सब जगह ओतऽ सँलगे छलइ।थोड़ेक काल मे इनका सबकऽ व्यवस्थित केलाहकऽ बाद ओ व्यक्ति चइल गेलाह। उनकर अनुसार कल्पवासीकऽ किछु काज आइब कऽ ओ अपन खाता मे धर्मकऽ डेबिट कऽ रहल छलाह। कतउ भी स्थानीय अपन लोक रहलाह पर सब किछु आसान भऽ जाइ छइ। अखइन‌ प्रत्यक्ष मे ई सब देखलाह।थोड़ेक काल मे चुल्हा जड़ा कऽ चाह बनबइ गेलाह आ पीयई गेलाह। भानस भऽ गेल, तऽ बुझु सब भऽ गेल। बदली बला सरकारी नौकरी मे उनका सबकऽ अकर अनुभव छलइन। सबसँपहिने, घर मे घुसिते देरी ओ भंसे घर मे जाइ छलीह आ जै चुल्हा रहइ, ओकरा पजाइर कऽ चाह बनबइत छलीह। अतउ ओहिना भेलइ। अगिला दिन स़ं अपन अइ बालु परहक दुनिया शुरू भऽ गेल छलइन। गंगाजी मे प्रातः स्नानसँदिनचर्या शुरू होइन। दिनभर पूजा पाठ, भजन, खेनाई बनेनाई, आ गप्प सरक्का मे बीतइ। अद्भुते अनुभव रहलइन। केना भोरसँसांझ भऽ जाइ, कनियो नञि बुझाई। कोनो तरहक विकार मोन मे नञि अबइ। सुआइत ने लोक मास करऽ अतऽ अबइ छइ। दिन हो या राइत, चारु कात इजोते -इजोत, अलगे दुनिया छलइ। कोनो ओहन सुविधा नञि रहनेहो, खुब नींद होइ आ भुख सेहो लगइ। गंगा माईकऽ कृपा ठीके अपरम्पार छइन, ओहिने उनकर महिमा। सुर्यास्तसँपहिनेहे अतऽ लोक रतुका भोजन कऽ लइ छल। ओकर बाद साधु संतक प्रवचन सब सुनञित छल। कतउ कतउ भंडारा सेहो लागल छलइ। इनका सबकऽ पूर्वक संस्कारकऽ कारण लंगर मेकऽ खेनाई खाइत ठीक नञि बुझेलइन। ओना खाय बला प्रसादयकहइ छल। ओ सब अपने बनबइत आ खाई छलाह। पांचे सात दिनक बाद त कैक परिचित लोक भेटा गेलखीन। आब त सब कियो एकदोसरक टेंट मे जाय आबऽ लागल छलाह। ई कल्पबासीक नब दुनिया बइन गेल छलइ। कियो साते दिन लेल आयल छल त कियो दु हफ्ता लेल, कियो किनको पहुंचाबइ लेल त कियो कुशल क्षेम लेबऽ लेल। सब अपन दुनिया मे रमल छल। दहन बाबुकऽ कनियाकऽ तऽ कयेक टा मैथलानी चिन्हार परिचयबाली सब भेटा गेल छलखिन। पईंच उधारी सेहो गाम जेकां मऊगी महाल मे शुरू भऽ गेल छल‌‌‌। दहन बाबु चुपचाप सब देखइत रहइ छलाह। उनका होइन जे अतउ उनकर कनियाकऽ सब ठइग रहल छइन।ऊमहर कनिया उनकर कल्पवास मे दान-पुण्य करबाक चाही, सैह सोइच कऽ देब लेब करय छलीह। सांझ मे एकटा संतकऽ प्रवचन मे ओ सब जाइत। ओ कहइ- ई संसार मिथ्या थीक। बेटा-बेटी,अपन आन सब भ्रम छइ। जे सच छइ। ओ आत्मा छइ। ईएह अचर, अजर, अमर छइ। कहियो ओ संत प्रवचन मे कहइ छइ- ई सब माया छइ। आहां संग ई लोक तकने तक सटल अइछ, जाबइत ओकर स्वार्थ आहांसँजुड़ल छइ। जहिये मतलब खत्म,ओ घुरियो नञि ताकत।संगकऽ रहत? ओ रहत अपन सद्कर्म। अही सद्कर्मकऽ रस्ता पर कोना चलब? ओइलेल अपन सर्वस्व समर्पणकऽ भाव जगाऊ भगवानक प्रति। अहिना ओ संत तरह तरहकऽ खिस्सा पिहानी सब कहइ। ओकरा अनुसारे "अप्पन " किछु नञि छइ। जखन अइ देहेकऽ भरोस नञि त आर दोसर कथी के,? ओ संतक बाणी मे तऽ मिठास घोरल छलइ लेकिन ओकर शब्द दहन बाबुकऽ कनियाकऽ लोहछा दइ छलइन।बाकी सब पर ओतेक रंज नञि होइन, जखइन ओ बेटा-बेटी पर कहइ, त ओ इनका कनिको नञि गिराइन। एकदिन ओ प्रवचन मे कहइ छल- " मनुक्ख अपन स्वार्थ लेल ई माय- बाप आ संतानक जाल बनबइत अइछ। जालकऽ फेर पोखइड़ मे फेंकइत अइछ.......... जाबइत धइड़ ओकरा माछ फंसइत रहइत छइ............जाल नीक बुझाई छइ। जखने जाल मे माछ नञि फंसलइ, ओ जालकऽ ऊल्टबऽ - पल्टबऽ लगइत अइछ। ओकरा होइ छइ जे जाल मे कोनो दोख छइ, ताहि लेल माछ नञि फंसल। दोसर - तेसर जाल बदलइत रहइत अइछ।ओ पोखइड़ मे नञि तकइत अइछ जे ओइ मे माछ छइ वा नञि। माछ नञि जाल मे फंसलाक कारण पोखइड़ मे माछक नञि भेनाइ सेहो भऽ सकइत छइ। ओहिना ई संसार छइ। जाल भेल स्वार्थ। जाबइत माछ जाल रूपी स्वार्थ मे भेंटइत रहइ छइ.........ताबइत सब नीके छइ। जखने नञि भेटलइ, ओ बदइल लइत अइछ।अतऽ पोखइड़ अइछ आहांक सद्कर्म। ऊयाह आहांक काज पुरा करबइत अइछ। दोसर कियो किछ नञि करइत अइछ।आहां ई झुठहाकऽ मोह-मायासँनिकलु। अइ लोककऽ ज्यों नञि सम्हाइड़ सकलऊं, त ओइ लोककऽ सम्हारू। आहां जरूरतमंदकऽ दियउ, नञि की अपन कहल सखा- संतान के। आहा़ं अखनो देख सकइ छी। मूदा आहांके आंईख पर संतानमोहक पर्दा लागल अइछ.........ओ नञि किछु देखऽ देत। अहिना ओइ महात्माकऽ प्रवचन सुइन कऽ दहन बाबुकऽ कनियाकऽ मोन कनी काल लेल हिल-डुल जाइ छलइन।फेर मोन मे अबइन, भऽ सकइत होइ अइ सधुबा संगे बीतल होइ, तैं अपन राग अलापइत रहइत अइछ। दहन बाबु त प्रवचनक समय टेंट मे आराम कऽ कऽ बीतबइ छलाह। ओ नञि अइ पचरा मे फंसई छलाह। समय कतउ रूकलइया। कल्पवासक मास बीत गेलइन। आबऽ काल मे बैग मे भंसाक समान भरल आ आब सनेशसँभरल। मोरक पंख, लोहाक वस्तुजात,कयेक जगहक निर्माल, प्रसाद, गंगाजलसँभरल बैग लऽ कऽ टीशन आयल छथि, ट्रेन पकड़ई लेल। तखइन पता चललइन जे उनकर ट्रेन तऽ कुंभ लऽ कऽ कैंसिल भऽ गेल छइन। आर जे कीछु चिन्हल जानल लोक सब छलखिन, ओ सब दिल्ली जा रहल छलाह। उनकर सबहक ट्रेन मे रिजर्वेशन छलइन। ओ सब आग्रह सेहो केलखिन। दहन बाबु सोचलाह जे दिल्ली मे उनको बेटा छथिने। अखइन अतइ चइल जाइ छी.......संगत अइछ। मास दिन नीकसँबीतल........ जतरो नीक रहत।ई जे सनेश सब छइ, अखने दऽ देबइन। ओ मंदिरक निर्माल माथ पर सबकऽ टटका टटकी लाइग जेतइन।टिकट लेलाह आ दिल्ली उनकर सबहक संग आइब गेलाह। आब दहन बाबुकऽ कनिया दिल्ली टीशन परसँबेटाकऽ फोन केलखिन जे हम सब टीशन पर आयल छी।आइब कऽ लऽ जाऊ। बेटा तामसे घोर भऽ कऽ फोने पर ज़बाब देलखिन- हम सब दक्षिण भारत आइ जा रहल छी। आहां सबकऽ पहिने बतबऽ कऽ छलाय।एना कतउ हुलेले होइ छइ। हमर सबहक ई टूर छह महीना पहिने बनल छल। आहांके गामक टिकट छल त इमहर किअए एलऊं। जे बुझाइत अइछ करु।हम अपन यात्रा नञि कैंसिल कऽ सकइत छी।फोन पर पाछुसँपुतोहुकऽ बरबराइत अस्पष्ट बात सेहो सुना रहल छलइ। दहन बाबुकऽ कनियाकऽ चेहराक भाव देख कऽ पता लाइग चुकल छलइ जे की ज़बाब भेटल छइन। पटनाकऽ दोसर ट्रेन लागल छलइ। दहन बाबु ओकर टीटी लग गेलाह। अपन परिचय दइत दु चाइर टा रेलवे अधिकारी सबहक बारे मे कहलकिन। ओ टीटी, पटनाक टिकट दुनु गोटेकऽ बना देलकइन आ अपनबाला सीट एसी बोगी मे दऽ देलकइन। दहन बाबुकऽ कनिया कहलखिन- हमरा आहां पर भरोसा छल जे आहां रस्ता निकालबे करब। हम आहांके नेने छोड़ब।अतउ गोटी लाल करबे केलऊं। आब दहन बाबुकऽ कनियाकऽ ओइ साधुकऽ प्रवचनक सब शब्द मोन पइड़ रहल छइन। सब स्वार्थक संग छइ- संतान सेहो।कियो ककरो संग तखने तक छइ, जाबइत स्वार्थ पूर्ति भऽ रहल छइ। निश्वार्थ ऊयाह परम ब्रह्म अइछ।ओकरा पर यश अपयश, नीक बेजाय, उचित अनुचित , लाभ हान सब छोड़ि दियउ आ जतऽ जेना जहीया तक राखय.....खुशी खुशी रहु।जीवन रेतक टीला अइछ, अइ पर नञि कोनो घमंड आ नञि राखु कोनो भ्रम। कल्पवास इनका सबकऽ जीवनक पाठ पढ़ा देने छलइन। आब मोह मायासँअपनाकऽ परे बुझइत गाम घुइड़ रहल छलाह। कहिया तक ई कल्पवासक प्रभाव रहतइन, से नञि जाइन। बच्चनक बचन (लघुकथा) बच्चन मस्तमौला सोभावक छल।गामक लोक त उनका महादेव सेहो कहइ छलइन। मस्त मलंग छलाह। बेशी चिंता बेगरताकऽ चक्कर मे नञि पड़ई छलाह। नीक बेजाय जे बुझाई छलइन, मूंहे पर कहि दइ छलखिन। अही दुआरे कयेक लोक इनकासँदुरे रहइ छल।इनका ओकर कनिको परबाह नञि छलइन जे ,कऽ उनका लेल, की बाईज रहल अइछ। ईएह सोभावक कारण घरक लोक सेहो आजिज रहइत छल। जतऽ काज करय छलाह ओतउ बेशी लोक इनकासँपरेशाने छल।ई अलग-थलग अपन परल रहइ छलाह। इनका ओतेक हाब- डिब्बी रहितो नञि छलइन। भगवानकऽ त ई पुछिते नञि छलाह, मनुक्खक लेखे कतऽ । ओना अइ विचित्र सोभावसँकतेक लोक इनकर प्रशंसक सेहो छल।अपन दुनिया छलइन। ओही मे ओझरायल रहइत छलाह। कहियो नञि , अइसँबाहर जयबाक कोनो श्रम केलाह।कयेक बेर एहन ने सच गप किनको सामनेहे कहि दइ छथिन जे अगलाकऽ पचेनाई मोश्किल भऽ जाइ छइ।ई सब गुण - अवगुण रहला बादो मलंग जेकां अपन जी रहल छलाह।कियो "बच्चन" कहइन त कियो "बचन"सँकाज चला लियैह। बचनकऽ कियो आइ तक कोनो मंदिर मे माथ झुकबइत नञि देखने छइन। पूजा-पाठसँकोसों दूर रहइत छलाह। समय पर खेला-पीलाह आ सुतलाह। गामक लोक नञि इनकासँधार्मिक काज मे चंदा मंगइन आ नञि ई दइते छलखिन। ई सब लोककऽ सोचबा लेल बिबश कऽ दइ छलइ - एना कियैक।लोककऽ तऽ अखुनकासँमतलब छइ- टटका टटकी की भऽ रहल छइ। बड़की टा खिस्सा छइ अकर पाछु- जनबा बुझबाकऽ बेगरते ककरा। बचनक पिता रामबृक्ष बाबु पटना मे नौकरी करय छलाह। हर बरख महालयासँएक दिन पहिने ओ अपन गाम एक महिना लेल अबइत छलाह। दशमी-दीयाबाती बीतेलाक बाद पटना घुड़इ छलाह।उनकर घर पर कयेक टा पंडित सब तेरहो अध्याय दुर्गा पाठ करइत छलइन। रामबृक्ष बाबु आ हुनकर पिता सब कियो पुरा बिध - बिधानसँपाबइन मनबइ छलाह। मनेता कियैक नञि.......कथीकऽ कमी छलइन...... भगवती सब किछु देने रहथिन.......अपन आनंद लइत छलाह। रामबृक्ष बाबु सब साल जेकां महालयासँएकदिन पहिने पटनासँगामक लेल बिदा भेलाह। पनिया जहाजसँपहलेजा एलाह। ओतऽ सँट्रेनसँमुजप्फरपुर। आ फेर ओतऽ सँबस पकइड़ कऽ गाम जाइ छलाह।जकरा कम पाइ छलइ या सोम प्रवृत्तिकऽ छल ओ सब ट्रेन सँसमस्तीपुर बाटे सेहो जाइ छल। बससँसमय कम लगइ मूदा पाइ बेशी खर्च होइ। रामबृक्ष बाबु तऽ भरल पुरल घरक छलाह आ ऊपरसँउदार सोभाव के, बसेसँगाम घुड़इ छलाह।भोरे पटनासँचलइ छलाह आ देर राइत कऽ गाम पहु़चई छलाह।मनुआ पुल पर बससँउतड़इ छलाह आ ओतऽ सँघर पर स़ आयल टायरगाड़ी पर बइस कऽ गाम। सबसाला रूटीन छलइन। सबके बुझल जे कहिया एताह आ कहिया जेताह।निइत दिन पर जखइन नञि पहुंचलाह तऽ टायरगाड़ी बैलबान सहित भइड़ राइत मनुआ पुल पर इंतजार कऽ कऽ गाम घुइड़ गेल। उनकर पिता रामकिशुन बाबुकऽ चिंता भेलइन।इमहर आमहर पता केलाह। कोनो खबर नञि भेटलइन। आइ तक एहन कहियो नञि भेल छलइन।अगिला दिन महालया छलइ। पूजा पाठ सब साल जेकां घर मे भऽ रहल छलइन।रामबृक्षकऽ पठाओल चिट्ठी मे सेहो अयबाक बारे मे लिखल छलइन। कयेक बेर उल्टा पुल्टा कऽ चिट्ठी पढ़लाह, कोनो आर माने नञि निकललइन। ज्यों ज्यों दिन बितल जाइ , कोनो अनहोनीकऽ डर सताबइ रहल छलइन। तीन दिनक बाद दोसर टोल मे बिसुन बाबुकऽ जमायसँपता चललइन जे एकटा बसकऽ भारी एक्सीडेंट भऽ गेल छइ। एक्सीडेंटक समय रामबृक्षक अयबाक समयक लगीचे रहइ। गाम मे अखबार सेहो तीन दिन बाद अबइ छलइ..... ओहो मे एक्सीडेंटकऽ खबर छलइ। रामकिशुन बाबुकऽ कनियाकऽ पिछला चाइर दिन स़ं दुध मे जुरपित्ती जेकां बुझा रहल छलइन। किछु संतानक कष्टक आभास बुझाय लगलइन।जखने अखबारक समाचारकऽ चर्चा भेलइ.....चिंता बइढ़ कऽ बेचैनी मे बदइल गेलइन। आब सब हाल पता करय लेल कमतिया आ एकटा दिअयदक पढुआ भाइकऽ कुशल क्षेम पता करय लेल पठावल गेलइन। अखबारक खबरक अनुसार ई सब जखइन ओइ अस्पताल मे गेलाह त किछु पता नञि लगलइन। फेर पुलिस थाना होइत मुर्दाघर मे लहाश सबकऽ देखलाह त ओइ मे रामबृक्ष, उनकर कनिया आ बेटाकऽ ई सब चिन्हलखिन। इनका सब लग शिनाख्तक कोनो कागज पत्तर नञि रहबाक कारण लहाश सबकऽ सुरक्षित राखल रहइन।आरो किछु तारा- ऊपरी लहाश सब चिन्हबा लेल राखल छलइ।तीन दिन मे लहाश सब फुइल कऽ कुम्भा जेकां भऽ गेल छलइ। ओतइ कियो कहलकइन जे छह महीनाकऽ एकटा बच्चा अइ मरल मऊगीकऽ कोरा मे जीयइत भेटल छलइ। आब ओ कतऽ छइ से पता करु। पुलिस आ अस्पताल बालासँपुछला पर पता लगलइ जे एकटा नर्सिनिया ओइ बच्चाकऽ दुध पीयाकऽ जियेने छइ। ओतइ कियो बाजल- " अतेक बीभत्स आ भीषण एक्सीडेंट मे ओइ बच्चाकऽ माय एना कऽ रखने रहइ जे अपने त मइड़ गेल‌‌‌, मूदा अइ जन्मौटी बच्चाकऽ कतऊं खरोंच तक नञि एलइ।" कहूना कऽ कऽ सब कागजी खानापूर्ति भेलाक बाद ओ कमतिया आ पढ़ुआ भाइ तीनों लहाश आ छह महीनाकऽ बच्चा लऽ कऽ गाम एलाह। पुरा गाम की परोपट्टा मे तहिया मातम पसइड़ गेल छलइ।रामकिशुन बाबु आ उनकर कनियाकऽ शोकसँबड्ड खराब हाल भऽ गेल छलइन। ओइ अबोध बच्चाकऽ देख देख कऽ सब सबुर कऽ रहल छल। लोक सब अइ बच्चाकऽ देखऽ अबइ। बच्चाकऽ खोज-पुछारी होइत होइत ओकर नामे बच्चासँबच्चन पइड़ गेलइ। ईएह ओ बच्चन छलाह। एकटा खबासिनकऽ सेहो आठ- दस मासक बच्चा छलइ आ ओकरा दुध सेहो खुब होइ। ओकरे रामकिशुन बाबु कतऽ राखल गेलइ। ऊयाह खबासिन अपन दुध पिया पिया कऽ इनका पोसलकइन। अइ तीन- तीन टा लहाशसँभरल अंगना मे ,कऽ आ ककर पूजा हेतइ। पूजा पाठ बंद भऽ गेलइ। सब अइ बच्चनकटुअर टुअर कहइ। कियो अइ बच्चाकऽ देख कऽ कहइ - "अरूदा रहइ तऽ बइच गेलइ।" दोसर बाजई- " दुनिया मे अबिते माय बापकऽ खा गेलइ"।" दस मूंह दस बात। ककरा ककरा मूंह बंद करबइ। रामकिशुन बाबु बाद मे अइ बच्चा लग ककरो नञि जाइ दइ छलखिन। रामकिशुन बाबुकऽ अपना होइन जे भऽ सकइत छइ जे उनकासँगलती भेल हेतइन, जेकर सजा भगवान इनका अइ एक्सीडेंटकऽ रूप मे देलखिन। लेकिन अइ छह मासक अबोध कोन गलती केलक जे ओकर माय बापकऽ ओकरासँदुर कऽ लेलखिन। ई भगवान नञि छथि। कथी लेल इनका गोहरबियइन। घोर अनर्थ, दुबकी मारने देखइत रहलाह। आब भऽ गेलइन। ओही दिन स़ं रामकिशुन बाबु कतऽ पूजा पाठ बन्न भऽ गेल छलइन। कनीक छटगर भेला पर घरे पर मास्टर साहब अबथिन आ पढ़बथिन। जखइन बुझअ सुझअ जोगर बच्च्न भेला तऽ एकदिन रामकिशुन बाबु बच्चनकबजेलखिन- "आहां हमरा एकटा बचन दियअ।" कहू।हम बचन देलऊं। आहां कहियो बस पर नञि चढ़ब। ठीक छइ। नञि चढ़ब। जाबइत छोट छलाह बच्चन ताबइत तऽ नञि किछु बुझेलइन। गाम लगक स्कुलसँमैट्रिक केलाकऽ बाद सबसं पहिने शहर जेबाकऽ जरूरत पड़लइन। आगुकऽ पढ़ाइ त करबाक छलइन। जबानी आबऽ बला छलइन। ओकरे उमंग मे कयेक कोस साईकिल चला कऽ ट्रेन पकड़ई छलाह। फेर शहर जाइ छलाह- आगु पढ़बाक लेल। समय बीत रहल छलइ। बेटा पुतोहुकऽ मौतसँशोकायल बाबी जल्दिये मइड़ गेल छलखिन।आदमी जनकऽ भरोस पर रामकिशुन बाबु अपन टेक धेने छलाह। उनका मोन नञि छलइन जे बच्चन शहर जाइथ पढबाक लेल। मूदा बिना पढ़ने जीवन जंजाल भऽ जइतइन। लोकक समझेला बुझेला आ बच्चनकआगु पढ़बाक मोन देख कऽ शहर मे पढ़बाक अनुमति दऽ देलखिन। दु बरख बितइत बितइत रामकिशुन बाबु सेहो परलोक सिधाइड़ गेलाह। आब बच्चन बीए केलाकऽ बाद गाम आइब गेल‌‌‌ छलाह। बिना बसकऽ कतउ आब जाय बला" बचन" उनका बड्ड भारी बुझा रहल छलइन। कयेक लोक कहलकइन- " बचन" देबऽ बाला तऽ अपने चइल गेलाह।आब आहां बस पर चईढ़ सकइ छी।कऽ देखत आ किछु कहत। जाऊ बस पर चढ़ु। जतबे लोक उनका बचन तोड़बाक लेल ऊकसबइन, ओतबे ओ जिदिअयइत गेलाह। नञि चढ़लाह बस पर। ओ तऽ धन कहू जे नबका प्राईवेट कालेज दु कोस पर खुईज गेल छलइ। ओही मे किछु पाइ दऽ कऽ किरानीकऽ नौकरी भेंट गेलइन। बियाह दान सेहो बगलेकऽ गाम मे केलाह। महफा मे बइस कऽ बियाह करऽ गेल छलाह। बस बाला" बचन " बढइत बढ़इत मोटर तक पहुंच गेल छलइन। ओ मोटर मे सेहो नञि कहियो बइसलाह। बाद मे कालेज सरकारी भऽ गेलइ। बाद मे बढ़िया दरमाहो भेंटअ लगलइन। धीया पुता सब तऽ बस आ मोटर मे जाय लगलइन। बच्चन अपने आ कनिया हुनकर, सेहो बस आ मोटर मे नञि बइसई छइथ। कहऽ मे बड्ड आसान छइ जे की हेतइ नञि बइसला सं। मूदा आइ एहन कियो भेटत जे बस आ मोटर मे नञि बइसल होइत। बच्चन अखनो अपन" बचन " निभा रहल छथि। उनका भगवान भगवतीसँईएह शिकाइत छइन जे अइ अबोधकऽ जन्म लइते ओकर माय बापकऽ किअए अपना लग बजा लेलियई। ई केहन न्याय। आहां न्याय नञि कऽ सकइ छी त हमहुं आहांकऽ भगवान नञि मानब। अजुका लोककऽ जखइन बच्चनकरामकिशुन बाबुकऽ देल बचनकऽ निभावअकऽ प्रणक बारे मे पता चलइ छइन त आदरसँसबहक माथ उनकर सोंझा झुईक जाइ छइन।ओना कहऽ बाला मथछिन्नु सेहो कहइ छलइन। बच्चनकदुनु बेटीकऽ नीक घर- बर, हिनकर बचनबद्ध गुणक प्रसिद्धिसँभऽ गेलइन। आब एकटा बेटा छइन जे मोटर मे चढइ छइन आ शहर मे रही कऽ पढ़ाइ कऽ रहल छइन। भगवान मे ओकर आस्था छइ, लेकिन बाहरे बाहर ओ भगवानकऽ गोर लगइत रहइया........घर मे अकर अखइन तक नञि कोनो सुरसार छइ। आब नञि बचन लेबऽ बाला लोक भेटताह आ नञि बचन निभावअ बला लोक। रखबार (लघुकथा) गामसँसमाद आयल छल- " हरिया आब घर पर नञि रहइत अइछ। कोनो लोकक बेबसथा आब करऽ पड़तह।" ई समाद पर मोन भिन्ना गेल। आइ तक दिमागो मे नञि आयल छल जे हरिया हमर घर छोड़ि कऽ चइल जाइत। सबसं पहिने तऽ एकटा रखबारकऽ राखऽ पड़त। चोरी- चहारी कऽ हल्ला अलगे गाम दिश बइढ़ गेल छइ। मुनाई बाबु ओहन दबंग घर, जिनकर बेटो भारतीय पुलिस सेवाकऽ अधिकारी छइन, चोरी भऽ गेलइन। चौकीदारकऽ जान पर आफत बनल छलइ। पुरा जिलाकऽ थाना- पुलिस आयल छलइन। किछु भेलइन? किछु नञि भेटलइन। उपरसँअइ हाकिम सबहक आयल गेल पर सेवा- सत्कार मे कतेक खर्चा भेलइन। ओ सब कहइ- "गांवकऽ भीतर घर है। परदेश से चोर आयेगा? यही अगल बगलबाला सब किअए होगा?इस गांव मे चोर सब बसने लगा है।" दु चाइर टा अगल बगलकऽ दीयाद बादसँपुछोताछ केने रहइ। एकाधकऽ तऽ थानों पर बजेलकइ। भेटलइन तऽ नञि किछो। उपरसँअगल बगलसँआनो जान बन्न भऽ गेलइन।गाइड़ श्राप अलगे सुनऽ पड़लइन। बाजु! जई गाम मे अतेक तरहक अफसर भेल। ओइ गाम मे आब चोर बसइत अइछ। राइत बिराइत आब एक गिलास पाइनो देबऽ बाला गाम पर कियो नञि छइ। ईएह हरिया अइछ। जहिया घरसँहटबइ छलियई, नञि हंटल।ओ बजलक- " हमराकऽ अइछ? आब बुढ़ारी मे,कऽ दु सांझ खुआइत।अतेक दिनसँआहांकऽ दरबार मे रही आयल छी, रहऽ दियह। कतेक जिनगी आब बांचले अइछ।" हरिया ईमानदार अइछ। एक पाइ बिन पुछने आइ तक घरसँनञि उठेलक। ओकर सब जगह अपन कमीशन बान्हल छलइ। आमक गाछी बिकाइ। पैकार हरियाकऽ अलगसँकमीशन दऽ दइ। किरानाकऽ समान जकरा कतऽ सऽ आबइ, ओ हरियाकऽ सब महिना किछु दइ छलइ।घर मे कोनो टुट फुटकऽ मरम्मत होइ, हरियाकऽ हिस्सा सब बान्हल होइ। जे पाहुन स्टेशन छोड़ला पर ओकरा बख्शीश नञि देलकिन, उनका जाय काल दोसर बेरसँकोनो भंगठी माइड़ दइन।कतउ माइट भराई, ईंटा खसय, मोटर ठीक होइ, गंवारी चंदा होइ,गाछ बिकाइ, कोनो समानक लेब देब होइ, गाड़ी भाड़ा पर लेबाक होइ, बिजली बत्ती ठीक करेबाक होइ, हरियाकऽ जे महत्व नञि देलकिन, उनकर ओ पत्ता काइट दइ छलइन। बिन ओकर मर्जी, किछु भऽ नञि सकइ छइ। ओकर संपर्क एहन रहइ, जे एक समाद पर सब हाजिर। ओ गाम मे किनको मोजर नञि करय। हमर अड़ोसी पड़ोसी किछु बजतिन, तऽ सबहक खतिहान ओकरा लग छइ। ओ शुरू भऽ जाइ।कोनो जन मजुरकऽ जे बेशी काज करइत देखिताय, तऽ ओकर करेज फाटऽ लगितइ। ओकरा कियैक अतेक पाइ दइ छियई। हमरे दियह, हम काज कऽ देब। देह सकइ नञि, तैयो पाइयक लोभ मे काजक ठीका लऽ लियाय। ओकरा बिना हमर सबहक काज आ हमर सबहक बिना ओकर काज नञि चलइ छलइ। अइ करीब चालीस बरखक ओकर , हमर परिवारसँजुड़ाव मे कै बेर ओ रुसल, फुलल, खिसियाल, भागल अइछ। मूदा हफ्ताह दिनक भीतर फेर घुरि आयल। ओ स्वभावसँततेक ने टन्नुक अइछ, जे कनिको एमहर ओमहरकऽ बात ओकरा खराब लाइग जाइ छलइ। हमरा घर छोड़ि, ओ कतउ खैबो पीबो नञि छलाय। ओकरा अलगसँज्यों कियो कहतइ आ आदरसँलऽ जैतइ, तखने ओ उनका कतऽ खइतै। हमरा सबकऽ छोड़ि कऽ , बाकी लोकक ओ "हरिजी" छल। हमहुं सब कयेक बेर सोचलऊं जे ओकरा आब " हरिया " नञि कहियइ, नञि भऽ सकल। हम घर पर कहलियइन- " अपने पांच दस दिन मे आइब जाइत।" घर परसँज़बाब भेटल- " महिनासँऊपर भऽ गेलइ ओकर गेला। ओना भेटला पर पहिने मना नञि करइत छल, लेकिन आब ओ नञि आइत।तीन चाइर दिन पर टहलइत बुलइत अबइत छलाय, ओना आब रहत नञि।" ओ जाबइत छल, ओकर डरे एकटा नेबो, की आम, की अमरा, की लीची, की सरीफा, की लताम, घास तक गढ़ऽ कियो टपई नञि छल। आब तऽ हर दु दिन पर किछु ने किछु कियो टपा दइत अइछ। हरियाकऽ पुरा नाम हरिहर महतो छइ।आठ भाइ अइछ। बापो ओकर सात भाइ छलइ।अकर बच्चे मे बियाह भेल छलइ। चेतन भेला पर गौना भेलइ। कनिया अकर सासुर बसऽ लागल छलइ। एक बेर सरेह मे घास गढ़ऽ गेल छलइ, ओतइ सांप काइट लेलकइ। बहुत झाड़ा फुंकी भेलइ। पुरा देह ओकर नील भऽ गेल‌‌‌ छलइ। नञि बचलइ। मईरे गेलइ। ओकर लाशकऽ घइल संग उल्टा बाईंन्ह कऽ कमला बलान मे बहा देल गेलइ। ई उम्मेद छलइ जे बहइत पाइनक संग जहर देह मे सऽ उतइड़ जेतइ, तऽ ओ जी जेतइ। ई ककरो बुझल तऽ नञि छइ जे कियो एना जीब गेल छइ, लेकिन तहिया एहने भेलइ। हरिया ओकर बाद मतछिन्नु भऽ गेल‌‌‌ छलइ। ओकर बाप हमर सबहक जमीन बंटाई करय छल।अइ घटनाकऽ पांच - सात बरख बाद ओकर बाप हमरा कतऽ हरवाह मे हरियाकऽ पठवह लगलइ। धीरे धीरे ओ अतइ रहऽ लागल। जे ओकर भाइ सब हरियाकऽ एक सांझ खाई लेल नञि दइ, से एकरा लग पाइ भेला पर मान दान करऽ लगलइ। हरियाकऽ बाल न बच्चा, नीक पाइ पोस्ट आफिस मे जमा भऽ गेल छलइ। आब गामकऽ समीकरण बदइल गेल छइ। पंचाइतकऽ पिछला चुनाव मे गाम, महिला लेल आरक्षित भऽ गेल छइ। पच्चीस बरखसँमुखियाजी चुनाव मे जीतइत आइब रहल छलाह। महिला आरक्षित भेला पर उनकर पुतोहु चुनाव मे ठार भेल छलीह। इमहर हरियाकऽ भाभो तेतरीकऽ सेहो ओकर घरक लोक चुनाव मे देखाऊंस मे ठार करा देलकइ। तेतरी आब तेतरी देवी भऽ गेल‌‌‌ अइछ। देखहो मे पइनगर छइ आ बजितो ओहिना बढ़िया छइ। बातों बिचारकऽ बढ़िया छइ। बाबू भैयाकऽ सेहो इज्जत करय आ अपन समाजकऽ तऽ बाते अलग। हरियाकऽ गोतिया अपने बड़की टा छइ। पहिल बेर ओकर घरक लोक मुखिया चुनाव मे ठार भेल छलइ, ओहो मूखियाजीकऽ पुतोहुकऽ खिलाफ।सब जी जानसँलागल छलइ। हरियाकऽ कोनो खास मतलब अइ चुनाव आ घरसँनञि छलइ। चुनावक परिणाम निकललइ।तेतरी देवी किछु वोटसँचुनाव जीत गेलइ। आब ओ गामक मुखियाइन अइछ। ओकर दलान पर सब जाइत आ समाजक लोक पंचैती लेल अबइ छथिन। कतेक तरहक सर्टिफिकेट पर ओकर हस्ताक्षर लियाई छइ। मुखियाइन बनला पर हरिया लेल सेहो मधुर ओकर भातिज लऽ कऽ आयल छलइ। शुरू मे तऽ हरिया अपन भाइ भाभोकऽ दुसई छलइ। कोन काज छइ घरे घर बऊआइ के।ई चुनाव तुनाव सब झुट्ठेकऽ होइ छइ। जीततइ मुखियेकऽ पुतोहु। लेकिन जखइन वोटक गिनती भेलइ, तऽ सबहक सोचल फेल कऽ गेलइ। आब कहियो काल हरिया अपन घर जाय आबऽ लागल छलाय। भाइ- भातिज आब कहइ छलइ कि घरे पर रह। हरिया ओकरा सबकऽ डांट डपट कऽ हमरा कतऽ आइब जाय। फेर सब बात बताबय। आब हरिया, मुखियाइनकऽ भैंसुर कहाबइत अइछ। मुखियाइनकऽ बेज्जती बुझाई छइ जे ओकर घरक लोक दोसरा कतऽ दरबानी करय। ओ सब हर तरहसँप्रपंच कऽ कऽ देख लेलक, हरिया हमर घर नञि छोड़लक। गाम मे सबसं बेशी पाइ शराबक बिक्री मे भऽ गेल छलइ। जहियासँसरकार शराबबंदी केलकइ, तहियासँअकर भाव बइढ़ गेल छइ। मुखियाइनकऽ बेटाकऽ एक दिन पुलिस अइ अवैध शराबक गोरखधंधा मे शामिल होबाक लेल पकइड़ कऽ जेहल मे धऽ देलकइ। हरियाकऽ दु टा भाइकऽ सेहो अही केश मे बाद मे पुलिस पकड़लकइ। मुखियाइनकऽ कहब छइ जे पिछला मुखियाकऽ पुतोहुकऽ ओ चुनाव मे हरेलकइ, तैं ओ सब साज़िशकऽ तहत एकर घरक लोककऽ अइ शराबक केश मे फंसेलकइ।आब हरियाकऽ अपन परिवार पर आयल विपत्ति देखी कऽ नञि रहल गेलइ। ओकर घर पर कोनो पुरुख पातर नञि छलइ। हरिया ओही लेल अपन घर घुड़ल। आब बाकि सब लोक जमानत पर छुइट गेल‌‌‌ छइ। हरियाकऽ दिमाग मे बाबू भैयाकऽ खिलाफ जहर भइड़ देल गेलइ। आब ओ इमहर आइबतो नञि अइछ। पुछला पर साफ साफ रहबासँमना कऽ देलकइ। आब हरिहर महतो ओ कहबइ अइछ। अपन जाइत आ समाजकऽ मोछ ऊंचा रखबा लेल दिन राइत काज मे लागल अइछ। समाजक ई विभाजन, कहियो हिंसक संघर्ष मे बदइल जेबाक आशंका हरदम बनल रहइ छइ। ओही लेल जल्दीसँएकटा रखबार तका रहल अइछ। कोनो भेटाय तऽ कहब। चंसगर (लघुकथा) मिहिर गाम गेल छलाह।हाथ- पैर धोलाक बाद निश्चिंतसँबइसला। चाह- जलखइ सब भऽ गेल छलइन। भौजी उनकर किछु परेशान बुझेलखिन।मिहिर ई बात बुझई छलाह जे बेरोजगारक कनियाकऽ भाग्य मे परेशानी लिखैले रहइ छइ।नीक रहितइ तऽ ओकरो घरवालाकऽ नौकरी रहितइ।मिहिरकऽ पुछलो पर नञि किछु जवाब भेंटलइन। मिहिरकऽ अपन भौजीकऽ ओ हंसइत चेहरा याद आइब गेलइन।जखइन मिहिरकऽ भाइजी सुधीरक विवाहकऽ गप्प इनकासँचलइ छलइन। एक दिन चुपचाप मिहिर भौजीकऽ देखबा लेल उनकर छात्रावास चइल गेल छलाह। ओतऽ सब लड़की मे सुन्नर उनकर भौजिये छलखिन। बाद मे मिहिरकऽ भौजी कहलखिन - " से बात नञि छलइ। लड़की सब एकसँएक सुन्नर छलइ। आहां हमरा देखऽ आयल छलऊं, हमर होस्टलक वार्डेन बुइझ गेल छलीह।ओतऽ जाइन बुइझ कऽ सुन्नर लड़की सब अपने बाहर नञि निकलइ छइ, जखइन ककरो कियो देखऽ आबइ छइ। ई एकटा अघोषित परिपाटी छइ।" अच्छा ! से बात छलइ। हं! तऽ आर की। सुधीर कनी काल बाद ताश खेला कऽ घर घुरलाह।ताबइत मिहिर मायसँगपशप करइत छलाह। बीच बीच मे टोल पड़ोसकऽ लोक सब अयलइन।उनको सबसँकनी मनी बात भेलइन। सुधीर अबिते हाल चाल पुछलखिन।छोट भाइकऽ देखी कऽ प्रसन्न भेलाह। गाम मे तऽ अहिना दिन बीतइ छइ। सांझु पहर पेठियासँअपने जा कऽ बोआरी माछ अनलाह। बोआरी माछ मिहिरकऽ नीक लगइ छइन। ई सुधीरे टाकऽ बुझल छलइन। मिहिरकऽ तऽ सब माछे पहिने एक्के जेकां लगइन। बोआरी सस्त भेटई, तैं मिहिर बजारसँईएह खरीदइ छलाह। दोसर कनीक देखऽ मे ई माछ गोर लगइन। गोरका रंगकऽ प्रति आशक्ति बच्चेसँछलइन। अपन पीरसियाम छलाह।तैं मधुरो मे रसगुल्ले नीक लागइन। कियैक तऽ ई उज्जर होइ।मीठ तऽ अतेक नीक लगइन जे गुड़क भेल्लिये खा लइ छलाह आ चीनी तऽ कयेक फक्का, जकर गिनती नञि। रंगक प्रति एहन ने धुनी छलाह जे कतउ सुइन लेलकिन- " गर्भवती स्त्रीकऽ नारियल खेलाहसँसंतान गोर होइ छइ।" अपन कनिया जखइन माय बनऽ बाला रहथिन तऽ नारियल खुआ खुआ कऽ उनकर मोन अकच्छ कऽ देने रहथिन। गाम मे एकटा भातिज नमन छलखिन। ओकरा लेल कपड़ा लत्ता लऽ कऽ आयल छलाह। नमन देखते बड्ड खुश भेल। ओ चट्टसँनबका कपड़ा पहिरलक आ खेलऽ विदा भऽ गेल। नमन पढ़बा मे ठीके छल। गामे मे आब अंग्रेजी मीडियम प्राईवेट स्कूल खुईज गेल छलइ। ओही मे पढ़ई छलाह। एकटा रिक्शा अबइ छलइ। ओही मे दसियों बच्चा लदा कऽ स्कुल जाइ। ओना स्कुल गामे मे छलइ। दुर तऽ कतउसँनञि कहल जा सकइत छलइ, तखनो रिक्शासँनमन जाइ छलाह। एतनी दुर लेल रिक्शा? हं। आब सब बच्चा रिक्शेसँजाइ छइ। एतबा दुर पैदल या साइकिलसँजायकऽ चाही। स्वास्थ्य सेहो ठीक रहतइन। मोन तऽ रिक्शो पर गेलासँठीके रहइ छइन। स्कुल मे सबकऽ बतेनाई जरूरी थोड़े छइ जे नमनक बाप गरीब छथिन। अइ मे गरीबी आ अमीरीकऽ कोन बात? कियैक ने। खुब बात छइ। खतबे टोलीकऽ सेहो सबटा बच्चा रिक्शेसँअबइ छइ। ओहुसँगैर गुजरल हमर नमन? नञि नञि। से नञि कहलऊं। आब जमाना बदइल गेल छइ। सब अहिना स्कुल जाइ छइ। हमरो बेटा तहिना जाइत। बातकऽ दोसर दिश जाइत देख मिहिरक माय बीच मे बजलीह- छोड़ह ई सब बात। आर कहऽ । अखइन रहबऽ ने? हं चाइर दिनक छुट्टी अइछ। ड़इब कऽ चइल जायब। फेर सोमसँआफिस पकड़ा जाइत। मिहिरकऽ बुझल छइन जे गामक सब खर्चा मायक पेंशनसँचलइ छइन। च्यवनप्राश, टानिक,किछु फल आ दवाई सब माय लेल मिहिर लेने आयल छलाह। मायकऽ सब पाइ घरे मे लाइग जाइ छइन।फल, दुध, दवाई कतऽ सऽ हेतइन? मिहिर दुध ऊठौना ठीक कऽ देने छथिन।माय कोना सब दुध अपने पी लेथिन। सब तऽ उनकर संताने छइन। ओइ मे नमन तऽ बीन दुध- दहीकऽ एक्को सांझ नञि खा सकइत अइछ। सुधीरक जीह सेहो पातर छइन। घरक जेठ बेटा मांगल चांगल छलाह। ओ किछु बजई नञि छइथ, मूदा बिन दुध- दहीकऽ ससड़इत नञि रहइ छइन। गारा धऽ लइ छइन। हफ्ता मे एक दिन नोनञि हाट पर जेबे करताह आ घुरती मे करिया पन्नी मे कांट कुश रहबे करतइन। अकर मात्रा जेबी कऽ गर्मी देख कऽ । दुपहरिया मे मायसँमिहिरकऽ एकांती भऽ रहल छइन। कतबो मिहिर मायकऽ अपना संग दिल्ली चलय लेल कहइ छथिन, ओ तैयार नञि भऽ रहल छथिन। उनका ई भान छइन- पेंशनक पाइसँसुधीरकऽ आश्रम चलइ छइन। अगर माय नञि रहथिन तऽ कशमकश भऽ जाइ छइन। पाइकऽ दिगदारी भेलासँघर मे कल्लह सेहो होबऽ लगइ छइन। एक बेर दु महिना लेल मिहिर कतऽ गेल छलीह। घुरला पर सतलखा बाली सब हाल बतेलखिन। सुधीर तऽ हरखन तैयारे रहता- " तोरा जेतऽ जेबाक होइ, तों जो।" माय बुझई छथिन ई ऊयाह स्वाभिमानी बापक बेटा छइथ ।ओ भुख लगबा पर घर मे जखइन नञि किछु देखथिन तऽ कलम दिश चइल जाइ छलाह आ दु चाइर लग्गा कुसियार खा कऽ क्षुधा शांत कऽ लइ छलाह। घर मे केकरा की कहथिन? सब स्थिति सबके बुझले छइन। सुधीर कखनो मायसँपाइ नञि मंगइ छलखिन। मायकऽ तऽ जे संतान कष्ट मे रहइ छइ, ओकरे प्रति ओकर ममत्व देखाइत छइ।माय, सुधीरकऽ ओगइड़ कऽ अपन छांव मे रखने छलखिन। तुं कपड़ा लत्ता कियैह अनञि छहुन। ओकर बदला मे पाइये सुधीरकऽ दऽ देल करहुन। पाइ तऽ दइते रहइ छियइन। अत्ते नीक कपड़ा इनका सबकऽ अपनासँनञि कीनल हेतइन? तैं लेने अबइ छी। नीक कपड़ा? तोहर भौजीकऽ गामकऽ कोन - दन भाइ आयल छलइन। ओ कहलकइन- " ई तऽ दिल्ली मे रेहरी पर बिकाइ छइ" बस! फेर की छलइन। तोहर देल,नमनकऽ पहिरल टी-शर्टकऽ उतरबेलकिन आ पोंछा बना देलखिन। आंय। ओ पोंछा बइन गेलइ। ओ तऽ ब्रांडेड कपड़ा छलइ। छये महिना पहिने तऽ अनने रहियइन।ओतेक दामी कपड़ाकऽ ई हाल? दाम कहां लिखल छलह? दाम बला लेबल तऽ जाइन बुइझ कऽ हटा देलियई। इनका सबकऽ होइतइन जे दाम देखा कऽ अहसान कऽ रहल छइथ। कंपनीकऽ लेबल तऽ लागल छलइ। ओइ कंपनीकऽ कपड़ा तऽ तीन हजार रूपयासँशुरूये होइ छइ। सेह सुधीरकऽ कहइत सुनने छलियई-" ब्रांडेड कंपनी छइ। हमहुं सब अखइन तक देखने छी, पहिरने नञि छी।" ओ जे मुंहझौंसा भाइ आयल छलइन, से कहलकइन-" दिल्ली मे नकली लेबल लाइग जाइ छइ। असली रहितइन तऽ दाम बला लेबल सेहो रहितइ की ने? मिहिरकऽ ई सब जाइन कऽ बड्ड दुख भेलइन। फेर सोचलाह- भाइ तऽ भाइये होइ छइ। आइ भाइ, ज्यों अपना संग शहर मे नञि रखने रहितइथ, तऽ अइ स्थित मे मिहिर थोड़बे पहुंचतइथ। गाम मे रहलासँकेना बुद्धि भ्रष्ट भऽ जाइ छइ। जहिया पढ़ई छलाह भाइ, कतेक प्रगतिशील सोच छलइन। आइ गाम मे रहइत रहइत सब सोचो मे घुण लाइग गेलइन। माय फेर मिहिरकऽ बुझेलखिन। बाकी सब छोड़ऽ । सब घर मे अहिना होइ छइ।गाछकऽ कतउ पात भारी लगइ छइ। जहिना सुधीर लोकइन रखताह, हम रहबइन। चाइर दिन लेल अयलाह अइछ। खुशी खुशी अपन जाह।देखियह ने, नमन किछु बइन जेतइन। कतेक चंसगर देखबा मे लगइ छइ। तुहों नेना मे अहिना लगइ छलह।दुनु भाइ अहिना मिलजुल कऽ रहइ जाऽ । मायकऽ तऽ अपन बेटा केहनो देखबा मे होइ, सुन्दरे लगइ छइ। मिहिर बच्चा मे कतउसँसुन्दर नञि छलाह। आब कनी मोटेलाह आ पदक गौरव माथ पर एलइन, तऽ कपार चमकऽ लगलइन। ई नमनकऽ मैट्रिक पास करिते अपना लग राईख लहुन। तोरा लग रहतुन तऽ आदमी बइन जेताह। नञि तऽ गाम मे रही कऽ उजियागर नञि हेथुन। पहिने ईएह गामसँअतेक लोक पईढ़ लिखि कऽ हाकिम हुकुम बनल। नबका मे तऽ मुश्किले लगइत अइछ। मिहिर हां ना, किछु नञि कहलखिन। मैट्रिक केलाक बाद मिहिर, नमनकऽ अपना संग दिल्ली लऽ एलखिन।अतऽ ग्यारहवीं मे नाम लिखाबऽ सँपहिने स्कुल सब मे परीक्षा होइ छइ। ओइ परीक्षा मे नमन पास नञि कऽ सकलाह। आब दुईये टा रास्ता बचलइन, घुइड़ कऽ गाम मे आगुकऽ पढ़ाइ करस वा दिल्ली मे केहनो स्कुल मे नाम लिखावल जइन। नमन अपने निर्णय लेलाह जे आब हम गाम मे नीकसँपढ़ाइ करब आ बारहवींकऽ बाद दिल्ली मे रहब।पढ़ाइकऽ माध्यम सेहो एकटा समस्याकऽ रूप मे आयल छलइन। ईएह भेलइ। नमनकऽ परीक्षा मे असफलता उनका पढ़बाक ओर उन्मुख केलकइन। गामेसँबारहवीं केलाह। ओही साल इंजीनियरिंग मे एडमिशन सेहो भऽ गेलइन। सुधीर गामक अंगरेजिया स्कुल मे कम्मे पाइ पर पढ़बऽ लागल छलाह। नमनकऽ पढ़ाइकऽ खर्चा दादीकऽ पेंशनसँजाइ छलइन। नमनकऽ इंजीनियरिंगकऽ अंतिम साल मे कैम्पस सेलेक्शन भऽ गेलइन।दादीकऽ इच्छा लऽ कऽ नमनक विवाह गामसँभेनाइ तय कैल गेल छलइन। मिहिर सेहो सपरिवार ओइ विवाह मे शामिल होइ लेल गाम गेल छलाह। भौजीकऽ गोर लागऽ गेलाह। "हमर बेटाकऽ लोक तऽ दु सांझ खाई लेल नञि देलकइ।अपन घरसँघुरा देलकइ। आइ हमर भगवान सुनलाह। " ई बात सुनिते नमन बजलाह- " मां। ईएह कका छइथ जिनका लऽ कऽ हम अतऽ तक पहुंचलऊं।ओ हमरा दिल्ली डेरा पर रखबाक लेल तैयार छलाह, हमही नञि मनलियइन। हमरा इंजीनियरिंग मे हर महिना पढ़ई लेल पाइ पठबइ छलाह। इनकर निर्देश छलइन जे ई बात आहां ककरो नञि कहबइ।हमर असफलता, आंईख खोललक। समय समय पर हमरा रस्ता देखबइत छलाह।" मिहिरकऽ किछु देर बाद अइ बातक आशय बुझबा मे एलइन। ओ सन्न रही गेलाह। नमन तऽ बच्चेसँअपन मायकऽ बाजल ऊकटा पैंची सुनञित सुनञित पैघ भेल छल।ओकरा होइ छलइ जे समयक संग ओकर मायकऽ कटुवाणीकऽ धार मद्धिम हेतइ, मूदा ई बढ़िते गेलइ। मिहिरक माय सेहो उईठ कऽ एलीह। " हम तोरा कहने रहियह। मोन छह। ई नमन बड्ड चंसगर देखऽ मे लगइ छइ। देखह , आइ सच्च सबहक सोझां मे रखलक।" मिहिरकऽ भौजी अतेक बरखसँविकार अपन मोन मे रखने ढोअइत छलीह। आइ उनकर सब विकार धोआ गेलइन। ओ नोरसँडबडबाइत आंईखसँमिहिरकऽ तरफ देखइत बजलीह- " हमरा माफ कऽ दियह। अतेक कष्ट सहलो पर आहांकऽ परिवारक मान मर्यादा रखबाक प्रयास कयलऊं। ग़रीबीकऽ कारण हमर सोचऽ कऽ तरीका बदइल गेल छलाय। जहिया आहां हमरा देखऽ होस्टल मे आयल रही, तहिये आहांकऽ भोलापन देखी कऽ हमरा बुझा गेल छल जे आहांकऽ भाइ आ परिवार केहन भेटत। आहां सबहक सोच सच मे हमर नैहरोसँनीक अइछ।" सुधीर सेहो आंगन मे ठार भेल सब देख सुइन रहल छलाह। ओ भइड़ पांजि कऽ मिहिरकऽ पकइड़ कऽ कानऽ लगलाह। मिहिरकऽ मायकऽ आंईखसँसेहो नोर खइस रहल छलइन। इमहर दुनु बेटाकऽ बीच बढ़ल जाइत दुरीकऽ देखलासँउनकर आंईखसँहरदम पाइन खइसिये जाइन।लोको सब जाइन बुइझ कऽ एहने एहने गप करऽ आइब जाइ छलइन। " आब हम मरबो करब तऽ चैन सं। अपन संतानक बीच मे मतांतरकऽ हम अपन कमी बुझई छलऊं। ई सबहक पाछु गरीबी छइ। ईएह मनुक्खक दिमागकऽ खराब कऽ दइ छइ।" तइ पर नमन बजलाह- " सब कियो कनिते रहब तऽ हमर बियाहकऽ ओरियान कोना होइत।" ई सुनिते हंसीकऽ ठहक्का आंगन मे छुइट गेलइ। दोषी के? (लघुकथा) एना कहिया तऽ क चलत?- आशा बजलीह। जहिया तक चाहब, तहिया तक चलत।- अमन बजलाह। आब हमरा डर होइत अइछ। कथीक डर? आहां छोड़ि कऽ तऽ नञि चइल जायब? एना कियैक सोचई छी? की भऽ गेल अइछ? हमरा मे किछु बदलाव देखलऊं की? हमरा किछ भेल नञि अइछ। मूदा हमरा बुझा रहल अइछ। आब ई बेशी दिन नञि चलऽ त। " अतेक दिनसँचइलते अइछ ने। अहिना आगुओ चलऽ त। आब छोड़ु ई सब ढकपैंची। बुझाइत अइछ आहांकऽ आफिस मे बेशी काज नञि अइछ। तैं दिमाग मे अंटशंट बात उम्हड़इत रहइत अइछ"- ईएह कहइत अमन कसिया कऽ आशाकऽ दबोचला। फेर दु वयस्कक बीचक खेला शुरू भेल। आइ खेला मे आशा ओतेक सहयोग नञि करय छलखिन। अमन ई बुझई छलाह। ओ किछु नब तरीकासँखेलाय लगलाह। फेर धीरे-धीरे आशाकऽ नबका खेला नीक लागऽ लगलइन। बड़ी काल तक चलइत रहलइ। फेर थकला बाद दुनु गोटे एकदोसरा मे गहिया कऽ सुइत रहलाह। भोरे अमन - आशा एकबेर फेर प्रेमालाप कयलाह। अमनकऽ दिल्ली घुरबाक छलइन। ओ चाह पी कऽ चइल गेलाह। आशा असकर घर मे पड़ल छलीह। थोड़ेक देर बाद दाई अयलइन। एक बेर फेर कड़क चाह बनबइ लेल ओकरा कहलखिन। आइ काइल कियैक ई सब नीक बेजाय माथा पर नचइत रहइ छइन। आफिस मे सेहो ओतेक मोन नञि लगलइन।अतुका सबसं बड़का अधिकारी ओ छइथ। सब उनकासँछोटे छइन। आफिस जास वा नञि? कियो रोकऽ टोकऽ बाला नञि। आइ एकटा स्कुलक फंक्सन मे सेहो जायकऽ छइन। ईएह मूख्य अतिथि छथि। आदर्शवादी बात कहऽ मे कतेक नीक लगइ छइ। आशा शब्दक चयन मे महारथ हासिल केने छथि। इनकर संबोधन बड्ड सारगर्भित रहइत छइ।बच्चेसँई डिबेट सब मे प्राईज जीतइत रहलीह। माईक हाथ मे अबिते टोन ऊयाह प्रतियोगिते बाला भऽ जाइ छइन। जखइन समारोहकऽ मुख्य अतिथि मे प्रतियोगी बाला जोश खरोश होइ तऽ ओइ भाषणकऽ कहबे की। खुब लोकप्रिय भेल जा रहल छलीह। अतुका अखबार मे रोज इनकर कोनो ना कोनो समाचार सहित फोटो रहिते छइन। फेर सांझु पहर ओइ समारोह मे गेल छलीह। ओहिना ओजस्वी भाषण भेलइन। मंचसँआयोजक लोकइन आशा जेकां बेटी सब घर मे होयबाक बात कहलखिन। कतेक लोक इनकासँआशीर्वाद लेलक। जहिना इमानदार ओहिना सुन्नर , कर्मठ आ मृदुभाषी आशा छलीह। आशा पैघ प्रशासनिक अधिकारी छलीह।बच्चा सब देहरादून मे बोर्डिंग मे पढ़ई छलइन। आशाक घरवाला भरत दिल्ली मे एकटा प्राईवेट कंपनी मे काज करइत छलाह। उनका स्वाभिमान बड्ड छलइन।ओ आशाक दिन- दया पर नञि जीबऽ चाहइ छलाह। शइन ड़इब कऽ आशा लग पहिने अबइ छलाह। दिन पर दिन आशाक व्यस्तता बढ़िते जा रहल छलइन।भरत धीरे-धीरे एनाई गेनाई कम कऽ देने छलाह। भरत आ आशाकऽ विवाह घरकथासँभेल छलइन। जहिया बियाह भेलइन तहिया अतबे बुझल छलइन - " लड़की प्रतियोगिता परीक्षाकऽ तैयारी कय बरखसँकऽ रहल छइ।" आशाकऽ सफलता नञि भेट रहल छलइन आ बयस बढ़ल जा रहल छलइन। आशाकऽ माय बाप पर बिन बियाहल बेटीकऽ रखनाई आब असह्य भऽ गेल‌‌‌ छलइन। ओ सब प्राईवेट कंपनी मे काज करइत भरतसँबियाह निश्चित कऽ देलखिन। जखइन आशा परीक्षाकऽ बाद गाम गेलीह तऽ देखइ छथि जे बियाहक कार्ड तक छपा गेल छइ। घरक इज्जत बेटीक हाथ मे। आशा पर विश्वास कऽ कऽ माय बाप सेहो औकातसँबेशी खर्च दिल्ली मे राईख कऽ पढ़ाबऽ मे केलखिन।सफलता नहियो भेटला पर कोनो कुबाच नञि कहलखिन। आब आशाक पारी छलइन अपन जिम्मेदारी निभावऽ के। बियाह दान आशाकऽ भरत संग भऽ गेलइन। दिल्ली फेर आशा घुरली तऽ ओ प्रतियोगिता परीक्षाकऽ तैयारी अपने शुरु कऽ लेहली। भरत जखइन इनकर इच्छा देखलखिन तऽ ओहो इनका संग देलखिन।पढ़ाइकऽ संग गृहस्थ जीवन बीतबइत दु टा बच्चाकऽ माय सेहो भऽ गेलीह। विधिकऽ विधान देखियउ।परीक्षाक परिणाम इनकर पक्ष मे भेलइन। आशाकऽ प्रशासनिक सेवा मे चयन भऽ गेलइन। कैडर सेहो दिल्लीसँसटले हरियाणा भेटलइन। जई प्रखंड मे आशाकऽ पहिल बेर नियुक्ति भेलइन। ओतऽ एकबेर अमन पहुंचलाह। दिल्ली मे बियाहसँपूर्व परीक्षाकऽ तैयारी करय लेल आशा रहइत छलीह। ओतऽ उनकर की, आरो कतेक छौंड़ीकऽ अमन बड्ड नीक लगइ छलखिन। अमन आ आशाकऽ दोस्ती मर्यादासँआगुकऽ भऽ गेल‌‌‌ छलइन।अमन कयेक बेर आशा लेल अपनाकऽ कष्ट देने छलाह। ओना अमनकऽ दोस्ती आरो कयेक बिंदास छौंड़ी सबहक संग छलइन। अइ लऽ कऽ आशा- अमन मे नोक झोंक सेहो भऽ जाइन। अही बीच अमनकऽ दिल्ली सेवा आयोग मे नौकरी भऽ गेलइन । आशा तऽ गाम घुइड़ गेल छलीह। आशाकऽ हरियाणा मे ज्वाइन करिते अमन आइब धमकलखिन। आशा- अमन असगर होइते अपनाकऽ नञि रोईक सकलाह। आब शुरू भऽ गेल‌‌‌ छलइन इनकर सबहक पुरना संबंधक खेला। ओना सावधानी दुनु तरफसँबरतल जा रहल छलइ। भरतकऽ आब आशाक बर्ताव मे बदलाव लाइग रहल छलइन। समाज मे हैसिइत मे अतेक अंतर दुनु गोटे मे आइब गेल छलइन जे भरत अपनाकऽ अपमानित महसूस करऽ लागल छलाह।आशाकऽ बुझबऽ कऽ कोशिश कैला पर, आशा आक्रामक भऽ जाइ छलखिन। अमन जोड़ुकऽ गुलाम नञि कहाबऽ चाहइ छलाह। भरतकऽ गेनाई बहुतही कम भेल जा रहल छलइन। जखइन छुट्टी मे बच्चा सब घर रहइ, ततबे दिन भरत आशा संग रहस। आशा- अमनकऽ फोन पर कयेक बेर गप होबऽ लगलइन। एकदिन भरत आशा मे बहस अतेक बइढ़ गेलइन जे भरत आशा पर हाथ उठा देलखिन। आशा ततेक ने प्रतीकार मे आइब गेलीह जे तखने अमनकऽ फोन पर सब बात कहलखिन। " आब इनकर कोनो उपाय लगाऊ। हमरा आब बर्दाश्तसँबाहर अइछ।"- आशा बजलीह। "अच्छा। रुईक जाऊ। हमरा सोचऽ दियह।"अमन बजलाह। " कहिया तक सोचइत रहब? हमर जान लऽ लेत ई पगलबा, तहिया तक सोचते रहब।आइ गर्दन दबने छलाय। हमरा तऽ भेल की मरिये गेलऊं। ई मूर्ख चपाट कतऽ सँबथा गेल हमर कपारे।"- कहि कऽ कानऽ लगलीह आशा। अमन उनका बोल भरोस दऽ कऽ शांत केलखिन। दुनुकऽ बीच एकटा योजना बनलइ। अमनक योजना सुनतहि आशा जोश मे आइब गेलीह। अजुका खेल मे अमनकऽ बहुत आनंद आशा देलखिन। हफ्ताह बितइत बितइत एकदिन दिल्ली मे पुलिसकऽ सुचना भेटलइ जे भरत नशाकऽ कारोबार मे शामिल छथि। पुलिस उनका पर दबिश देलक आ नशाक पुड़िया उनकर गाड़ी मेसँबरामद भेलइ। भरत अइ सब पर्दाकऽ पाछुकऽ खेलांसँअन्जान छलाह। पुलिस उनकासँनशाकऽ कारोबार मे शामिल आर लोकक नाम लइलेल दबाव बनौने छल।आशा सेहो अमनक पकड़ेला उपर दऊड़ बड़हा करऽ लगलीह। नशाक समानकऽ केशक जांच करइत पुलिस अमन तक पहुंच गेल। शुरुआत मे अमन अपन अनभिझता जाहिर करइत रहलाह। पुलिसक सख्तीकऽ बाद अपन संलिप्तता तऽ गइछ लेलखिन लेकिन आशाकऽ नाम ज़बान पर नञि एलइन। अमनक कहब छलइन- " हम एकदिसाहे आशासँप्रेम करय छलऊं। हम भरतकऽ जेहलसँछोड़ा कऽ आशाकऽ दिल जीतबा चाहइ छलऊं। अइ अपराधक लेल हम दोषी छी।" भरत जेहलसँछुइट कऽ आइब गेलाह आ अमन जेहल मे बंद भऽ गेलाह। आशाकऽ घर आ प्रतिष्ठा टुटऽ सँबांइच गेलइन। अमनकऽ अइ अपराधकऽ लेल ओ बराबरकऽ सांझी छलीह। पढ़ाइकऽ दिनसँलऽ कऽ आइ तक अमन , आशा लेल त्याग करइत रहलखिन। आइ समय एहन आइब गेलइ जे आशा अमनक त्याग ककरो कहियो नञि सकइत छथिन। अपना नजर मे आशा दोषी त छथिहे। बतहिया गाछी ओकरा गाम मे सब "बतहिया" कहइ छलइ। कियो कियो "बताही " सेहो। ककरो गलती नञि छइ। ओकर करनिये एहने रहे। नञि ठीकसँचइल फिर सकइ छलइ, नञि बजबे स्पष्ट करय, नञि नुआ साया पहिरऽ कऽ ढंग, दिमागसँतऽ पैदल रहबे करय, कखइन लेर पोटा बहऽ लगइ तकर सेहो नञि ठेकान, हंसई सेहो अजबे छलइ। कियो कहइ जे "लोथबी" छइ, कियो अलबटाही त कियो आर किछो किछो। ओ बऊक बहिर नञि छलइ। नञि कहियो दुखित पड़ई, नञि खाय पीयऽ मे भाभट देखबइ, लाज- धाख सेहो बुझई।अपन दुख तकलीफ नञि ककरो कहइ, नञि हल्ले करय, नञि रूसई, नञि फुलइ, कखइन सुतइ, कखइन ऊठई, लोक तइकते रही जाइ। ओ छलइ सरदाकऽ बतहिया पुतोहु। सब ओकर मरबाक इंतजार करय छलइ। एहनो कतउ भेलइया।मरण जीयन अपन हाथ मे छइ। एतऽ ओकरा सास- ससुर फंझइतकऽ तऽ र रखने रहइ। एकरा मारबो पीटबो करय सब। तखनो एहन अक्खज रहइ जे किछु नञि होइ। फेर अगिला दिन दछिनबरिया असोरा पर चऊकी पर विराजमान भऽ जाइ।रोज मांग मे सिन्दुर केनाई नञि बिसड़इ। आंगन बड़की टा रहइ। दस फरिककऽ उएह एक टा अंगना। कियो दुबगलीकऽ कातसँपाछु मे फुसक घर बन्हने छथि तऽ किनको हिस्सा मे ओहो मड़ई नञि।कियो पाछु बला सरकारी पोखइड़कऽ महार भइड़ कऽ एकचारी खसा रहइ छलाय। तखनो सबहक दिन कटिते चलइ। पुरूख पातर लेल संझिया दलान छलाई। ओतऽ कियो टुटल चौकीकऽ पायाकऽ बदला ईंटा जोईड़ कऽ , तऽ कियो बांसक तख्ती बना, तऽ कियो बाबा आदम जमानाकऽ पलंग पर ओतऽ सुइत रहइ छलइ। कोन फरीककऽ कतेक हिस्सा ? नञि फरिछायल छलइ। ई दलान गोसवरिया बुझु। सबहक बरोबइड़ अधिकार। पाहुन परखकऽ एला पर ई खाली कहबाक लेल पलंगकऽ छोड़ि देल जाइ छलइ। सब नीभल जा रहल छलइ। सरदाकऽ सब गोतिये दरिद्र रहइ। सरदा ओहु मे सबसं सफाचट छलाह। सब चाइट पोईछ कऽ खा चुकल छलाह। आंगन मे एकटा मड़ई आ ई दलान छलइन जे अढ़ छलइन। बरसात मे ई दलानकऽ छबेतइ के? जे मालिक हेतइ, सैह ने छबेतइ? अही फेरी मे एकरो खसले हाल छलइन। दोसर टोल बला कहइ की ई गैरमजरूआ जमीन मे बनल छइ। सबहक हिस्सा भेलइ। कय बेर माइड़ पीटकऽ नौबत आइब जाइ। जतऽ गरीबी रहत, ओतऽ संतोनोत्पति बड्ड होइत। खंऊजखेहर जेकां सरदाकऽ गोतिया सब लाठी फट्ठा लऽ कऽ आइब जाइ। अइ लंगा संकऽ लागय। गंऊआ सब घुइड़ जाय। ओना नजर अइ दलान पर सब गड़ौने रहइ छलाय। सरदाकऽ बाप इनकर नाम श्रद्धानाथ रखने छलखिन। गरीबक पुरा नाम कहियोसँनञि लेल जाइ छइ। श्रद्धानाथकऽ बेटासँछोट सब सेहो इनका सरदयकहइन।कियो सरदा भाइ सेहो कहि दइ छलइन। गरीब लोककऽ अपमानजनक संबोधन खराब लगितो नञि छइ।सुनञित सुनञित कान आ माथ मे ठेहा पइड़ गेल रहइ छइ। अइ पर आब कोनो असर नञि। श्रद्धानाथकऽ बेटाक नाम इमहर उमहरकऽ थोड़े हेतइ। इनकर नाम ह्रदयनाथ छलइन। गंऊआ सब ह्रदयनाथकऽ हरदा कहइन। कियो हरदी सेहो।भइड़ गाम मे श्रद्धानाथ टा अपन बेटाकऽ ह्रदयनाथ कहइ छलाह। जखइन कऽ सरदा अपन बेटाकऽ शोर पाड़स, सब सुनऽ बालाकऽ अइ सैहबी पर हंसी छुअइट जाइ। देखू ने छगुन्ता इनकर - ह्रदयनाथ। सरदाकऽ नञि जमीन जाल छलइन, नञि बापे किछु छोड़ि कऽ गेल छलखिन। अइ हालत मे कोना घरक चुल्हा जड़ई छलइन, सैह अचरजक बात। बाद मे पता चललइ जे सरदाक कनिया गाम मे दु चाइरटा नीक घर पकड़ने छलीह। उनकर सबहक काज - धंधा कऽ दइ छलखिन। बदला मे पसेरी, दु पसेरी अन्न पाइन आ बचल खुचल खेनाई भेट जाइ छलइन। ओहीसँअपन घर चलइ छलइन। सरदाकऽ बेटा हरदा सेहो तीन बेरे मैट्रिक केलाक बाद इमहर ओमहर बऊआइत छल। एकदिन सरदाकऽ कनियाकऽ जतऽ काज करय छलीह, ओतऽ एकटा हरदाकऽ लऽ कऽ कथा एलइन।कथा की? एकटा अलब्धक लब्ध बाला बात। इनकर कान मे किछु कहल गेलइन। मऊगियाही कथा निश्चित भऽ गेल।नीक पाइ तखने सरदाकऽ कनियाकऽ हाथ मे राईख दियेलइन।अतेक पाइ ओ देखनेहे नञि रहथिन। आब पाइकऽ शक्ति बाजऽ लगलइ। हं। हं। हम तैयार छी। ककरो पुछबाकऽ काज नञि। जखइन मोन हुअय। ह्रदयनाथकऽ लऽ जाऊ। सरदाकऽ कनियाकऽ आइ बुझाय लगलइन जे बेटाकऽ जन्म देनाई सार्थक भेलइन। अही लेल लोग बेटा लेल मड़इत अइछ। दऊरल घर घुरलीह। फेर तीनु गोटे गाछी दिश जाइ गेलीह। ओतऽ सब बात कहलखिन। सुनिते सबकऽ खुशीकऽ ठेकाने नञि।हरदाकऽ सर्टिफिकीट सब उनका सबकऽ पठा देलखिन। दर दिअयद मे नञि ककरो कहल गेलइ। ककरो नञि बतेबइ। बुझत तऽ कथा मोइड़ देत। चुपेचाप दिन तकावल गेलइ। बाहरे बाहरसँकिछु बरियाती संग हरदा गेलाह। बियाह दान भेलइ। बरियातीकऽ बिदाई आ हरदाकऽ दु महीना बाद कारपोरेशन मे पक्का नौकरी भऽ गेलइन। हरदाकऽ पाइ भेटलइ आ ऊपरसँनौकरी भेट गेलइ। महीने महीने मनीआर्डर सरदाकऽ आबऽ लगलइन। मड़ईकऽ जगह पर पक्का ईंटाकऽ घर भऽ गेलइन। दशमी छुट्टी मे हरदा गाम आयल तऽ दलानकऽ छान्ही नब खरसँछड़वा देलकइ। अस्सी बरखक पितीया बजलखिन- हम आइ तक दलानक पुरा खर बदलाइत नञि देखने रही। ठीके कहल गेल छइ - जीबी तऽ की की नञि देखी। दलान परहक ईंटा लागल चौकीकऽ जगह सखुआकऽ पाया लाइग गेलइ। बांस बाला तख्त पर बढ़ई नब चौकी बना देलकइ। आब दलान बंगली जेकां लागऽ लगलइ। हरदा आब गाम मे ह्रदय बाबु आ ह्रदय भैया कहाय लागल छल। हरदाकऽ लोथ कनियासँबियाह भेल छलइ।धन सम्पइतकऽ कोनो कमी नञि छलइ। ओकर कका मंत्री छलइ। ओकरा नैहरा मे सब लोथही कहइ। ओ कय बेर बड्ड जोर दुखित पड़ई। डाक्टर वैद सेहो जवाब दऽ दइ। मूदा फेर लोथही जीब जाइ। इमहर लोथहीकऽ बयस बढ़इत गेलइ। देह मे अंग सब मे उभार आबऽ लागल छलइ।केदन जोतखी ओकर बापकऽ कहि देलकइ जे अकरा सिंदुर नञि पड़तइ तऽ तोरा दोख हेतह। ईएह दोख छोड़बइ लेल हरदाकऽ नौकरीकऽ लोभ दऽ कऽ सिंदुरदान करावल गेलइ। सबकऽ उमेद छलइ जे दुखित लोथही दु- तीन बरख मे मइड़ जेतइ। हालत देखऽ मे तहिना लागइ। भरण पोषण लेल एकट्ठे पाइ ओकर नैहरावाला सरदाकऽ दऽ देने रहइन। कहल गेल छइ- अपन सोचल नञि होइ छइ। लोथही तऽ सासुर अयलाकऽ बाद डेबा डेबी चलहो लगलइ। अपनेसँकपड़ा लत्ता कहूना बदइल लइ। पुरा देह झांपऽ ओकरा नञि आबइ। लोकक तांक झांक ओकरा नीक लगइ। ओ देह देखबऽ लगइ। हरदाकऽ माय शुरू मे तऽ झांप तोप कऽ दइ। बाद मे पहिने सरदा फेर ओकर माय लोथही पर हाथ उठाबऽ लगलइ।अकरा सासुर मे बतहिया सब कहइ। बतहियाकऽ कतबो सासुर मे दुख दइ, ओ ढीठ भऽ गेल छल,लोकक सामने नञि कानञि खीझई। गामक छौंड़ा बतहियाकऽ देखऽ आबइ। ऊं आं मे ज़बाब दइ। आंईख खुब मटकबइ।टोल परोसकऽ पुरूख पातरकऽ अइ अंगना मे अबरजात बढऽ लगलइ। दलान मे सब बेबसथा रहलाक बादो पुरुख सबहक नजर बतहिये दिश रहइत छलइन। बतहिया उनका सबके निराश नञि करयन।जाइन वा अनजाइन, कहियो किछु देखा दइन। ओकरो लोक नीक लगइ। हरदा चाइर बरख तऽ बतहियाकऽ मरबाक इंतजार केलक। ओकर बाद ओ बाहरे बाहर दोसर बियाह कऽ लेलकइ।गाम नबकी कनियाकऽ नञि आनञि,मूदा अपने आबय।दोसर बियाहसँनोकरी छुटबाक डर होइ। इमहर हरदाकऽ कमाइ बढ़ल जा रहल छलइ,ऊमहर बतहिया पर अत्याचार। ओही आंगन मे रहनिहार रमनकऽ बतहिया भौजीसँबड्ड गप होइन। ओना रमन बतहियासँबयस मे छोट छलाह, लेकिन दुनु गोटेकऽ पटान बड्ड।इशारे इशारासँसब गप भऽ जाइन। गंऊआ लेल सरदा निहाइत सज्जन लोक छलाह। घर मे अबिते ओ बतहिया लेल राक्षस भऽ जाइ छलाह। बतहिया अपन देहक चोट सब रमनकऽ देखबइन। बतहियाकऽ सासुर अयलाक बाद ओकर नैहरसँनञि कियो बजेलकइ आ नञि खोजे पुछारीक लेल कियो एलइ। ओकर नैहरा बला लेल पाइ दऽ देलाक बाद कर्त्तव्य खत्म। हरदाकऽ शहर मे रहिते धीया पुता भेलइन।सरदा आ उनकर कनिया मइड़ चुकल छलखिन। हरदा गामसँसंबंध तोइड़ लेने छलाह। बतहियाकऽ सब महीना नैहराकऽ जमा कयल पैसाक सुदीसँपोस्ट आफिससँपाइ भेंट जाइ छलइ। आंगन मे कनिया काकी ओकरा दु सांझ भोजन दऽ दइ छलखिन। बतहिया पाइकऽ महत्त्व बुझऽ लागल छलइ। थोड़ पाइ कंतोल मे जमा करय। कहियो दुखित पड़बे नञि केलइ जे ककरो सेवाक काज पड़तइ। रमन महानगर मे प्राईवेट नौकरी करऽ लागल छलाह। पढहो काल पाइकऽ काज पड़इन तऽ बतहिया भौजी दऽ दइन। आंईखक सुख लेल शुरू भेल दोस्ती धीरे धीरे स्नेह मे बदइल गेल छलइ। एकदिन रमनकऽ गामसँखबइड़ एलइन। बतहिया मइड़ गेली। लाश आंगन मे पड़़ल छइन। हरदा गाम आबऽ सँमना कऽ देलकइ। बतहियाकऽ नैहरबला सेहो नञि कान बात लेलकइ। संपइत किछु छइन नञि। घरारी हरदा कबाला कऽ चुकल छइ। अइ मे बिन धनक लोभ मे पोसपुतो बनऽ बाला कियो नञि छइ। गामक लोक एकाएकी एलइ आ तुलसी पीढ़ा लग राखल लाशकऽ देख कऽ घुरी गेल। रमन कहलखिन- हम बतहिया भौजीकऽ मुखाग्नि देबइन। हम आइब रहल छी। रमन तखने गाम बिदा भेलाह। जे पाइ कौड़ी छेलइन संग लऽ गेलाह। दाह- संस्कारकऽ बाद जखइन बतहियाकऽ कंतोल खोलल गेलइ तऽ ओही जमानाकऽ बारह हजार रूपया आ पचास भइड़कऽ करीब सोना चांदीकऽ गहना राखल छलइ। एकटा कागजकऽ परची पर लिखल छलइ- हमर दाह संस्कार करऽ बाला, अइ सम्पइतक बारिस हेताह। दु हजार खर्चा भेलइ। बाकी पाइसँजमीन कीन कऽ " गाछी" लगावल गेलइ। ईएह गाछी " बतहिया गाछी" कहबइ छइ।सद्योंसँगामक लोक थोड़ बहुत आम अकर खाइत छल। ओही गाछीकऽ रमनक बेटा सब गाछ बेच देलकइ आ जमीनकऽ प्लाट बना कऽ बेच रहल अइछ। बतहियाकऽ निशानी आब सब खत्म भऽ गेलइ। डालडा प्रसाद (लघुकथा) फेकु मिसर ओना कथा वाचक छथि। रामायणकऽ चौपाइकऽ नित दिन पाठ करय छथि। बहुते पांति कंठस्थे छइन। तखनो कहल जाइ छइ, जे कंठस्थ रहलो पर, पोथी सामने रहबाक चाही, तैं रामायण सामने रखइत छथि। इनकर रामायण, तुलसी रामायण नञि छलइन, लेकिन जे भी छइन.......छइन बड्ड कर्णप्रिय। जखइन ओ सांझ मे पाठ करइत रहइ छथि , तऽ राही- बटोही सेहो दु पल लेल रुईक जाइया आ श्रवणक आनंद लइया।जतबे काल फेकु मिसर रामायण बंचई छथि, ओतबे काल प्रसन्न मुद्रा मे देखबइन। बाकी तऽ , गऊंआ लेल ओ झनकटाह छथि। भइड़ दिन उनकर घरसँचिकरा- चिकरीकऽ आवाज अबइत रहत। पुरा घर मे कियो धीरे बजिते नञि छइ। कथा बंचलासँकी पेट चलइ छइ। आब कहां ओहन धर्मात्मा रही गेलाह अइछ, जे कथा सुइन कऽ किछु सीद्धा( अन्न) रोज हिनका देथिन। महीना दु महिना पर फेकु मिसर नञि जाइन कोन देश जाइ छइथ, ओतऽ सँघुरलाह पर अन्न पाइनक बोरा संग रहइ छइन। अकर बाद थोड़े दिन घर मे शांतिये नञि, चहल-पहल सेहो रहइ छइन। दस- पन्द्रह दिनकऽ बाद फेर उएह रामा- उएह खटोला। गऊंआ सब अभ्यस्त भऽ गेल छलइन इनकर घरक हाल के। घरक शांत माहौलसँपता लाइग जईताय जे फेकु मिसर अखइन नञि छथि। भगवान गरीबी तऽ दइ छथिन, मूदा ओकर संग कोनो गुण सेहो ओहि लोक मे गइढ़ दइ छथिन।फेकु मिसरकऽ घर मे सबहक गला, सुरीला छइ। हर मंगल कऽ , महावीरजीकऽ कीर्तन उनकर घरक लोक करय छल। ढोल मृदंग, हरमोनियम, झाल सब उनकर घरे मे छलइन। ऊपरसँ"थपरी"कऽ धुन, गीतकऽ आर महो महो कऽ दइ छलइ। परसादी सेहो रहइ छलइ- नञि भेल तऽ थुर्री लतामे! अगवे फुलायल खुद्दीकऽ चौरठ! अहिना किछ किछ। गामक अपन अपन दर्शन होइ छइ। बड़का कतऽ , नञि कियो बइसऽ कहत, तखनो भेड़िया धसान जेकां सब पहुंचत। गरीबहा कतऽ आबेश भेटलो पर हरसट्ठे लोक गेनाई पूजा- तुजा मे अंठियबइ छइ। लेकिन अकर संग, एकटा आर विशेषता छइ, बेटीक बियाह मे सब ओकरा तात्कालिक सम्हाइड़ दइ छइ। बाद मे भले ही बचल-खुचल गाछी- नासी, गड़हा- गुड़ही कबाला कराऽ लइ। फेकु मिसरकऽ गाम पचकोशी मे छलइन। सभागाछीकऽ लग बाला गाम सबकऽ लोग सब , कथा भजियाबऽ मे बड्ड माहिर होइया। ओ सब सभाकऽ शुरूये मे विवाह योग्य नीक लड़का " टिप" लेत। ओकरा पर नजर गरौने रहत। ओकर जहां कतउ बिबाह निश्चित होवअ लगतइ, ओइ मे भंगठी माइड़ कऽ , कथा गड़बड़ा देत। एना ओकर सबहक फूलप्रूफ ढंग छइ, जे ओकरा नामकऽ पंसगी भइड़कऽ चर्चा कतउ नञि हेतइ। जखइन सभाकऽ अंतिम एक दु दिन बचतइ, बर बाबूकऽ आब बिन बीयाहले गाम घुरऽ कऽ हालात भऽ जेतइन, तखइन ई सब कथा प्रस्तुत करत। फेर चारु तरफसँहाफ डिबकऽ कऽ , बरकऽ उठाइत आ चलइत बनत। फेकु मिसरकऽ चाइर टा बेटी छलइन। तीन टाकऽ बियाह अहिना भऽ गेल छलइन। सब नैहरसँबेशी सुखी घर मे गेल छलइन। सिद्धांतकऽ समय सब गइछ लइ छलखिन। देबऽ कऽ रहइन, तहैन ने सोचबाक काज। ओ तऽ बेटी सब सुन्नञिर आ सुघइड़ छलइन .........सब सम्हाइड़ लइन।आब अंतिम कन्यादान छलइन। अहिना एकटा पश्चिम दिशक कलकतिया बर टेबइ गेलाह। बेर पर हथपैंच किछु भेंट गेल छलइन। सभासँबर- बरियाती नेने गाम पहुंच गेलाह।गामक संझिया पोखइड़ मे एक आनाकऽ दसमा, फेकु मिसरकऽ सेहो हिस्सा पड़इ छलइन। कहियो मछैटा मे इनका एकटा माछ हिस्सा नञि भेलइन, लेकिन कहबा मे तऽ छलइन- " ई हमरे पोखइड़ अइछ।" बरियाती सब पोखइड़ पर दिशा मैदान कऽ कऽ जमा भेल। एकटा बरियाती माथ मे लगबइ लेल " तेल" मंगलकइ। समाद फेकु मिसरकऽ घर पठावल गेलइन। सभाकऽ समय छलइ.........कखइन कोन पाहुन टपकता........ई सोइच कऽ रोशनाई बला खाली दवात मे एक नम्मर करूआ तेल आ नारियर तेल बाला खलिका डिब्बा मे डालडा गिलेशनसँआइन कऽ रखने छलाह। राजा, देवकऽ आइब जेतइ, से ककरो बुझल थोड़बे रहइ छइ। ऊपरसँफेकु मिसरकऽ सोभाव छइन, किनको उठा कऽ घर लऽ एताह। एक बेर तऽ अहिना सिढ़ुल्ली बला चौधरीजीकऽ सभासँनेने चइल अबइत रहलाह। ओइ बेर मिसराइनकऽ समान जुटबऽ मे कतेक थक्का फजीहत भेल रहइन। तहियासँओ पहिनेहेसँकरु तेल आ डालडाकऽ बेबसथा केने रहइ छइथ। अपने किछु खाई? पाहुन परखकऽ सुख्खा सोहारी दइत मिसराइनकऽ अपरतित लगइ छलइन। जे बरियाती लगसँमाथ मे लगबऽ लेल तेल लइला आयल छलाह,ओ टाटाकऽ नारियल तेलक डिब्बा मे "जमल डालडा" राखल देखलाह। कियो पचमा पास कहू वा छठवां फेल, ओ नारियल तेलक ई डालडासँभरल डिब्बा पोखइड़ पर पठा देलकइ। बरियातीकऽ तऽ अलगे टशन होइ छइ। ओइ मे एक तऽ पश्चिम आ ऊपरसँकलकतिया सब। एकटा बरियाती तेल मंगने रहइ, लेकिन मूफ्तउआ तेल बुइझ कऽ , ओ सब बर- बरियाती, माथ के,कऽ पुछइया, भइड़ देह रगइड़ रगइड़ कऽ लगेलक।पुरा डिब्बा खाली कऽ देलकइ। सांझ मे चुन कैल मलमलक कुर्ता पहिरकऽ सब फेकु मिसरकऽ दलान पर आयल। आब डालडा, पेट्रोमेक्सकऽ गर्मी पर अपन करामात देखेनाई शुरू केलक। एक कान- दु कान होइत होइत , सब एक दोसराकऽ सुंघऽ लागल। ऊपरसँकोनो सरियाती टिहकारी दऽ देलकइ। परिछनसँपहिनेहे बर- बरियाती सब खिसिया गेलइ। सब पराय लागल। फेकु मिसरकऽ पहिने तऽ किछु बुझेलइन नञि। बाद मे डालडा कऽ गरियबइत ओतऽ बरियाती सब लग गेलाह। फेर खने दौड़इत घर पर आबइथ।कऽ नारियर तेलक डिब्बा मे डालडा रखलक? पुरा गामक लोक जमा भऽ गेल। फेकु मिसरकऽ कनिया डलडा डकुबा कहि कहि कऽ गाइड़ पढ़ऽ लगलीह। घर मे कन्ना रोहट मइच गेल छलइ। ऊचती- विनती हुअऽ लागल। एहन बढ़िया बर, डालडा दुआरे हाथसँचइल जाय, अइसँबेशी कुसंयोग की भऽ सकइत छइ। फेकु मिसरकऽ गउआं सब थोर- थाम लगेलक। बर बालाकऽ बाद मे बुझा गेलइन जे ई मजाक नञि, अनजान मे भेल गलती छी। सच पुछु तऽ गलती, डालडा देह मे लगबऽ बालाकऽ छलइन। ओ बरियातीकऽ मुफ्तउआकऽ लोभ मे गंधो नञि बुइझ पेलाह।।बाद मे कयेक टा ललका लाइफ ब्वाय साबुन पोखइड़ पर गेल। बर - बरियाती फेरसँरगइड़ रगइड़ कऽ नहाइ गेलाह। जुर्माना मे फेकु मिसरकऽ अगिला दिन एकटा छागरकऽ काटऽ परलइन। तखइन जा कऽ बर मनलाह। डालडा डकुबाकऽ चक्कर मे आइ एकटा भेल कुटमैती गड़बड़ा रहल छल। अंत भला तऽ सब भला। बाद मे सब सामान्य भऽ गेलइ। रुसा-फुल्ली खत्म भेल।आब ओइ जमायक नाम "डालडा प्रसाद" सबदिना लेल सासुर मे पइड़ गेल छइन। की सोचल- की लीखल - दीर्घकथा (पहिल आ दोसर भाग), (अंतिम भाग) की सोचल- की लीखल (पहिल भाग) आइ शिक्षा मंदिर स्कुलक नबका भवनक उद्घाटन भऽ गेल। जिलाकऽ सब नामी गिरामी महानुभाव सब पहुंचल छलाह। सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो स्तरीय छल। प्राचार्या रुचिका देवी अपने अतिथि सबकऽ स्वागत लेल ठार छलीह। एक एककऽ कऽ सबकऽ उत्कृष्ट जलपान कराऽ विदा केलीह। जेना लोक बेटीकऽ विवाह मे एक्के पैरे ठार रहइत अइछ, तहिना रुचिका देवी आइ काजक समापन केलीह। सब लोक समारोहक व्यवस्थासँबड्ड खुश छल। लोक सबकऽ विदा केलाकऽ बाद सोझे पलंग पर आइब कऽ अर्राऽ कऽ पइड़ रहलीह। कतबो सब कहलकइन जे किछुओ मूंह जुठिया लीयह....... नञि मोन केलकइन। रौबदार एहन छलीह जे दोबाराकऽ आग्रह करऽ कऽ दुस्साहस करितइन। मोलायम बिछान पर परलाकऽ बादो देह मे गड़अ लगलइन। पिछला संघर्ष सब आंईखक सोझा मे नाचऽ लगलइन। कतबो सुतऽ कऽ कोशिश करय छलीह.......नींद कोसों दूर बुझा रहल छलइन। परल परल जखइन थाईक गेलीह त ऊईठ कऽ टहलऽ लगलीह। तखइन नजर गेलइन जे ओ तऽ साड़ियो नञि बदलली। सजल धजल जहिना छलीह, तहिना छतिये। ड्रेसिंग टेबलकऽ सामने जा कऽ ठार भऽ कऽ अपनाकऽ निहारऽ लगलीह। आइ बुझेलइन जे ओ तऽ बड्ड सुंदर अखनो छइथ। ऊपरसँनीचा तक अपन अंग प्रत्यंग सबकऽ शीशा मे गौरसँदेखइ छलीह.......अपन देह उनका आइ अपने आकर्षित कऽ रहल छलइन। हम अतेक सुंदर अखनो छी।अपने पर दुलार आइब रहल छलइन। जखइन दुलार आइबे गेल........त दुलार कइये ली। अपनेकऽ दुलार करऽ लगलीह। कत्ती काल तक अही मे लागल रहलीह। आब गहना गुड़िया सब जे पहिरने रहइत......ओ सब खोलऽ लगलीह........ धीरे धीरे आब ओइ अवस्था मे आइब गेलीह......जखइन ओ आ उनकर देहक बीच मे किछु नञि। अपने देखइत.....अपने मुस्कियाइत....... अपने दोसरासँतुलना मे श्रेष्ठ बुझइत......अपने भिन्न भिन्न अदा देखाबइत........ अपने भाव भंगिमा बनबइत...... अपने अगराइत....... अपने पिछराइत.......अपने ईठलाइत.....अपन आनन्दक झुमर मे झुला झुइल रहल छलीह। अपूर्व आनन्दसँलबल डुबल , अलटइत पलटइत ओही लोक मे विचरण कऽ रहल छलीह। अखइन ओ मनुक्ख आ ओकर देह, ओकर गंध, ओकर रूप, ओकर रंग, ओकर कोण, ओकर निखार, ओकर नाक, ओकर नक्श, ओकर लंबाई, ओकर गोलाई, ओकर ऊंचाई, ओकर सिहरन, ओकर धड़कन, ओकर ऐंठन, ओकर मटकन, ओकर राग, ओकर विराग, ओकर संगीत आ ओकर धुन मे मदमस्त हाथी जेकां जंगल मे असगर बढ़ल जा रहल छलीह। ओ अइ स्वप्न लोकसँबाहर नञि आबऽ चाहइ छलीह। किछु आर बात दिमाग मे आबऽ चाहइ छलइन, तऽ बेरहमीसँओकरा झटईक दइ छलीह। आनंदकऽ एक एक पल ओ जीबऽ चाहइ छलीह। पहिले बेर उनका अपना देहसँअतेक लगाव भेलइन। आब त ओ इनकर संगी भऽ गेलइन। बड़ी काल तक अहिना अही अवस्था मे ओ पड़ल रहलीह।देह कशमशाइत रहलइन। भावक प्रवाह अबइत जाइत रहलइन। हारि कऽ उठअ चाहलीह लेकिन नञि उईठ पेलीह। ओना सब थकान दुरभऽ गेल छलइन। आब तरोताजा महसूस कऽ रहल छलीह।आइ ओ जीवन मे एकसंगे दु टा सुख भोगलीह। तकरे चमकी छलइन। एकटा सुखक लेल त ओ कहियासँलागल छलीह...... परिश्रम केलीह.......भाग्य आ समय साथ देलकइन .....उमेदो छलइन.......आ पुरो भेलइन। मूदा दोसर त अनायासे। ई आ इनकर देह त सदिखन संगे रहलइन, तखइन ई अनुभूतिसँकियैक वंचित छलीह। ई त भऽ गेल- एकक संग एक फ्री वाली बात। जे भी होइ ई " बात " - आब ओ अइ आनंदकऽ नञि छोड़तीह। सब बात जनञि लेल रूचिका देवीकऽ अखुनका तकक जीवनकऽ बारे मे जनला बिना काज आगू कोना बढ़त! रुचिका मे देवी नाम त बाद मे जुड़लइन। पहिने ओ सिर्फ आ सिर्फ रुची छलीह।उनका अपन पितासँबेशी भेंट नञि लेकिन पिता अपन नाम बहुत बाद मे देलखिन। ओ तखुनका समाज लेल अपन पिताकऽ अवैध संतान छलीह......कियैक उनकर माय बापकऽ बीच विधिवत विवाह नञि भेल छलइन। सामाजिक आ कानुनी व्यवस्था एहन छलइ जे उनकर पिता चाहियो कऽ इनका सबके अप्पन घर नञि लऽ जाअ सकल छलाह। ओ पहिने सँबियाहल छलाह आ धीया पुता छलइन।ई नञि छलइन जे प्रयास नञि केलाह मूदा सफल नञि भेलाह।रूचीकऽ माय दोसर जाइतक छलीह लेकिन छलीह बड्ड स्वाभिमानी। उनकर जाइत मे तहिया मऊगी आसानीसँदोसर तेसर बियाह कऽ लइ छलाय।उनको नैहरवाला सब कहलकइन जे विधिवत विवाह कतउ कऽ लीयह मूदा ओ टससँमस नञि भेलीह। बयस बढ़ल रहबाक बादो पढ़लीह लिखलीह आ सरकारी नौकरी पकड़लीह। अइ नौकरी भेटबा मे उनका सरकारक आरक्षण व्यवस्थासँमदद भेटलइन।ओ स्वावलम्बी भऽ गेल छलीह लेकिन उनकर इच्छा शिक्षिका होबाक छलइन......से नञि पुरा भऽ सकलइन। रुचीकऽ पिता एकमुश्त पैसा रूचीकऽ मायकऽ नामसँजमाकऽ देने छलखिन। रुचीकऽ माय ओइ मेसँएक ढेला अपना पर नञि खर्च केलीह। रूचीकऽ बच्चेसँबाहरे बाहर पढ़ावल गेलइन। ओतइ उनकर माता पिता अपन सुविधानुसार भेंट करबा लेल अबइत जाइत रहलखिन।जखइन रुची दसवीं मे छलीह त उनकर पिताकऽ मृत्यु भऽ गेलइन।ओ अपन मायकऽ संघर्ष करइत दुनियाकऽ देख चुकल छलीह। ओ आजन्म अविवाहित रहबाक निर्णय कऽ चुकल छलीह। महानगरीय शिक्षा लेबाक बाद ओ वापस अपन मायकऽ शहर मे रहबाक लेल आइब गेल‌‌‌ छलीह। सुन्दरता त रुचीकऽ बिन ब्याहल दहेज मे मायसँभेटले छलइन। चारु तरफसँलोक सब जीभ लपलपेने मंड़राइत रहइत छलइन।बिन पुरूखक घर आ ओइ मे बैंक बैलेंस- कतेक लोक तऽ शालीनता लांईघ कऽ धृष्टता तक केलकइन।" यहां न लगियें राऊर माया"- सबसं निबटइत रूची मजबुत होइत रहलीह। कालक्रमेण उनकर माय सेहो परलोक सिधाइड़ गेलीह। रुची सामाजिक कार्यकर्ताकऽ रूप मे शहर मे स्थापित भऽ गेल छलीह। मायकऽ जीबिते स्कुल खोइल लेने छलीह। अपन पुरा श्रम आ बुद्धिमता ओइ स्कुलक विकासक लेल समर्पित कऽ देने छलीह। अखनो नेतासँलऽ कऽ अधिकारी सब इनकासँअपेक्षा बढ़बइ लेल लालायित रहइ छलाय। सबके ईएह होइ जे "माये एहन त बेटी केहन"।कतउ नम्बर लाइग जाय। रुचीकऽ शिक्षा मंदिर मे एडमिशन भेनाइ प्रतिष्ठाकऽ बातभऽ गेल‌‌‌ छलइ। रूचीकऽ अपना समय मे बिना बापक नामकऽ कारण बड्ड दिक्कत भेल छलइन.... ग्लानिकऽ दौरसँउनका गुजरऽ कऽ पड़ल छलइन। बाद मे उनकर पिता अपन नाम देने रहथिन। अइ स्कुल मे अकर अलगसँकोटा छलइ। रूची आब प्रगतिशील महिला कहबबइ छइथ।अपन सब जमांपुंजीसँशिक्षा मंदिरकऽ नबका भवन आधुनिक ढंगसँबनबेलीह अइछ आ अपन मायकऽ इच्छा पुरा कयलीह.......तकरे खुशी छलइन.......अही लेल प्रयत्नशील छलीह। आब उम्रक ओइ पड़ाव पर मोन मे किअए भटकाव आइब गेल‌‌‌ छइन......सैह सता रहल छइन। कहीं जिला जज श्री मिश्रा त अकर पाछु मे नञि छइथ। ओ स्कुलक सब फ़क्शन मे अबइ छइथ......विधुर छइथ.....पिताकऽ समजाति छइथ। जिला पदाधिकारी हंसी कऽ कहितो छलाह जे श्री मिश्रा पर कृपा बनबियौन। रुची आब रूचीका देवी भऽ गेल छइथ। मोन मे अबइत भाव सबके दुरदुरा रहल छइथ। आब एना विचार कियैक। फेर मोन पड़इन जे पार्टी मे श्री मिश्राकऽ लोलुप नजर। ओ बजइत त कम्मे छलाह लेकिन संग रहबाक मौकाकऽ तलाश मे रहइ छलाह। कतउ कतउसँउड़इत गप्प रूचिका देवी सेहो सुनने छलीह जे श्री मिश्रा आर रूचिकाकऽ जोड़ी नीक रहतइ। आइ स्कुलक फंक्शनकऽ परात छुट्टी छलइ......तैं लेटसँउठबाक विचार मे छलीह। तखने घरक दाई उठबऽ एलइन जे जज साहब श्री मिश्रा आयल छइथ। नाम सुनिते रूची देवीकऽ देह सिहइड़ गेलइन। कहलखिन- बइसबियउन। हम अबइ छी। - ओ अपने बैठकी मे बइस चुकल छइथ। - ड्राईवर सेहो छइन! - नञि अपने ड्राईवकऽ कऽ अयलाह अइछ। घबराइत रूची देवी फेरसँड्रेसिंग टेबलकऽ सामने ठार भऽ बैठक मे जायसँपहिने अपनाकऽ निहारि रहल छइथ। आब की हैथ! जे हमर मोन मे घुमड़इ छलाय, सैह श्री मिश्राकऽ सेहो। पता नञि। की सोचल आ की लीखल। ईएह सोचइत अंदेशासँभरल बैठकखाना दिस जा रहल छइथ। की सोचल- की लीखल (दोसर भाग) परिणामकऽ अंदेशा स़ पीड़ित रूचिका देवी बैठकी मे गेलीह। ओ त एना डरायल घबरायल छलीह जेना कोनो नेना स्कुल मे गलतीकऽ दइ छइ.......आ ओकरा मरखाहा मास्टरकऽ सामने पठावल जाइ छइ। एक राइत पहिने तक त उनकर सामने लोक सबकऽ घिग्घी बन्हल रहइ छलइ......राइत बितते ई कीभऽ गेलइ। बैठकी मे इनका जाइते श्री मिश्रा चटसँठार भेलाह। परनाम- पाती भेलइन। कलुका समारोहकऽ बारे मे चर्चा चललइ। रुचिका देवीकऽ स्तुती गाण श्री मिश्राकऽ रहल छलाह। बीच मे दु बेर चाह एलइ। शहर बाजारकऽ गप शप भेलइ...... दुनिया दारी सबपर बहस सेहो भेलइ। धीरे धीरे रूचिका देवी सामान्य भऽ गेल छलीह। पुरा प्रभावशाली ढंगसँअपन पक्ष बहस मे रखइ छलीह........तखइन श्री मिश्रा श्रोता भऽ जाइ छलाह , लेकिन उठबाक नाम नञि लइ छलाह। बीच-बीच मे चुप्पी भऽ जाइ छलइ।रूचिका देवीकऽ बुझा रहल छलइन जे श्री मिश्रा जेना मौकाकऽ तलाश मे छलाह। रुचिका देवीकऽ तरफसँकोनो तरहक लिफ्ट नञि भेंट रहल छलइन। श्री मिश्रा किछु इमहर उमहरसँइशारा मे गप्प उठेबो केलाह। अंत मे हारिकऽ जायकऽ अनुमति मंगलाह। जाय काल मे भोजन पर नञि बजबऽ कऽ उलहना सेहो केलाह।अइ पर रुचिका देवी बजलीह- -ई कोनो बात भेलइ! आइये रूकु। भोजन भऽ जेतइ। श्री मिश्रा बजलाह- नञि नञि। एना नोत थोड़बे लेल जाइ छइ। - आर केना नोत होइ छइ! मिथिलाम छोड़ु। आब आहांकऽ खाईयेकऽ जाय पड़त। हम सबकऽ एना आग्रहो नञि करय छीयई। -हं हं। हमरा बुझल अइछ। हम आहांकऽ नीकसँचिन्हइ छी।आब आहां कहइ छी त हम रूईक जाइ छी। जे खुएब से खाईये कऽ जायब। - जे ?कऽ सोचबो नञि करु! खेनाई टा खुयाब। -हमहुं सै कहइ छलौं जे भोजन मे जे जे विन्यास रहतइ। - हम नीकसँबुझई छी .......ई जे जे ?? की छी! - अच्छा कहू त ? ई जे जे की छइ? - रहअ दियउ। हम पुरूखकऽ गत्तर गत्तर चिन्हइ छियई।हमरा सब बुझल अइछ जे आहांक अभिप्राय की अइछ। - जखइन बुझिते छियई तऽ आहांक की विचार अइछ। - कोनो विचार नञि अइछ! " heard and rejected."- आइ जज सबहक जेना रुचिका देवी बजलीह। -आहां त जज भऽ गेलऊं! - फैसला हमरा लेबऽ कऽ छलाय तऽ जजकऽ होइत! - फरियादीकऽ पक्ष त सेहो सुनऽ कऽ पड़त!एकदिसाह फैसला नञि दियउ। - ठीक छइ। फरियादीकऽ पक्ष रखबाक मौका देल जा रहल छइ। कहू जे कहबाक अइछ। आब श्री मिश्रा अपन कनियाक मरलाक बाद जे एकाकीपन जीवन मे भेल छइन - ओइ सब बारे मे खुइल कऽ कहलखिन। उनकर बेटा आ पुतोहु दोसर शहर मे रही रहल छइन।बरख दु बरख पर चाइर दिन लेल अबइ छइन।दूनु गोटे काज करइत छइन। श्री मिश्रा जखइन बेटा कतऽ जाइत छइथ त बेटा पुतोहुकऽ उनका लेल समय नञि छइन। तैं ओतऽ गेनाई छोड़ि देलाह। कनियाकऽ गुजरलाकऽ बाद एहन नञि छइन जे आर स्त्रीकऽ आमंत्रण नञि एलइन। सब गोटेकऽ नजर इनकर संपइत आ ओहदा पर छइन। कोर्ट मे फैसला करइत करइत मनुक्खक मनःस्थितिकऽ भांपअकऽ क्षमता आ शक्ति दुनु उनका भऽ गेल‌‌‌ छइन।दोसर मानसिक स्तरकऽ सेहो सवाल छइ- ओ हमरा एक्के जगह भेंट रहल अइछ। कहि कऽ मौन भऽ गेलाह श्री मिश्रा। आंईख डबडबा गेलइन। रुचिका देवी चटसँउईठ कऽ श्री मिश्राकऽ एक गिलास पाइन देलखिन आ उनकर पीठ पर हाथ धअ धेलकिन। श्री मिश्राकऽ गला रूंधल छलइन। रूचिका देवीकऽ स्पर्षसँश्री मिश्राकऽ नोर झहरऽ लगलइन। रूचिका देवी स्तब्ध छलीह। श्री मिश्रा, रुचिका देवीकऽ हाथ पकइड़ लेलकिन।रूचिका देवीकऽ ई स्पर्ष अचंभित कऽ रहल छलइन। पहिल बेर अइ तरहक स्थिति उनकर सोंझा आयल छलइन। ओ एकटा प्यादा जकां चलल जा रहल छलीह। नीक बेजाय, उचित अनुचित सबसं विलग ओ बढ़ल जा रहल छलीह। श्री मिश्रा भावुक भऽ उनका अपन छाती मे सटा लेने छलखिन। अतबो होश मे नञि रहइन जे घर मे काजबाली दाई सेहो अइछ। छोट बच्चा जेकां श्री मिश्राकऽ जिद्दक आगु रूचिका देवी बेबश छलीह। थोड़ेक काल बाद दुनु गोटे अलग भेलाह। पुरा घर मे मौनक पहरा परल छल। दुनु गोटे चुप्प। आब रुचिका देवी उईठ कऽ दोसर घर मे चइल गेलीह। दाईसँसमाद पठा देलकिन जे श्री मिश्राकऽ सेहो वापस घुइड़ जाइ लेल। रूचिका देवीकऽ आब अपनाआप पर पश्चाताप भऽ रहल छलइन जे ई की कऽ लेलीह। अतेक दिनक तपस्या आइ भंग भऽ गेलइन। अइ शहरक लोक बुझतइ त की कहतइ? दाईकऽ कोन भरोसा- ई त आर नोन मरचाई लगा कऽ सऊंसे ढ़िंढोरा पीटतइ। तखने मोटरगाड़ी स्टार्ट होबाक आवाज सुनेलइन। बुइझ गेलीह जे श्री मिश्रा जा चुकल छइथ। कतऽ दाईकऽ कहने रहथिन जे श्री मिश्राकऽ खेनाई बनबऽ लेल, आ फेर ओकरेसँसमाद पठेलकिन जे चइल जाइ लेल। की मोन मे सोचने हैत ई दाई। किछु नञि फुरा रहल छलइन। ओ जनञि छलीह जे अन्चिन्हार कुमार पुरूख संग रहअ मे बेशी सुरक्षा छइ, बियाहल पुरूख परिचित सं। तखनो गलती कऽ बइसली। फेर सोचली जे उनकर कोन गलती- ओ त परिस्थितिकऽ गुलाम छलीह। तेना ने सब किछु भेलइ जे ओ कोना अकरा रोईक सकइ छलीह। मर्यादाकऽ रेखा ओ पैघ खींचने छलीह, तैं ने ओ परेशान छैथ। देखू त अजुका लेखे किछु नञि छइ। ई बात दिमाग मे अबिते कनीक मोन हल्लुक भेलइन आ स्नानघर मे नहाइ लेल घुइस गेलीह। की सोचल- की लीखल (अंतिम भाग) झरना खोइल देलीह आ ओकर नीच्चा बइस कऽ नहाइत रहलीह। ठंडा पाइन देह पर खइस रहल छलइन....... तैयो तपिश नञि खत्म भऽ रहल छलइन। बड़ी काल तक नहेलाकऽ बाद बाहर निकललीह। मोन तखनो भरियाले रहलइन। माथ भारी - भारी बुझाइन। दवाईयक डिब्बा मे सऽ मथदुक्खीकऽ गोटी निकाइलकऽ खेबो केलीह..... तखनो नञि आराम भेलइन। अहिना भइड़ दिन कछमछ करइत दिन बितलइन। राईतो मे निन्न ठीकसँनञि भेलइन। अगिला दिन स्कुलो नञि गेलीह। ऊमहर श्री मिश्रा सेहो परेशान छलाह। सुख चैन हरा गेल छलइन। जखनो कोनो मोटरगाड़ीकऽ आवाज सुनाई दइन- चट दऽ पर्दा हटा कऽ बाहर ताकऽ लागस...........होइन जे कहीं पुलिसकऽ गाड़ी त नञि छइ। ई त अपना भान छलइन जे ओ रुचिका देवीकऽ निजता मे हस्तक्षेप केलकिन........स्त्रीकऽ बयान पुलिसकऽ अक्षरशः मानऽ कऽ पड़ई छइ। कहीं ओ पुलिस मे शिकाइत कऽ देलीह त सब नाम गाम, इज्जत मान एक्के बेर मे खत्म।उनकासँतऽ अतुका पुलिस अधीक्षक पहिनेहेसँखार खेने छइन। ओ कयेक बेर सम्मन पठा कऽ ओकरा कोर्ट मे बजौने छइथ।अगर ओकरा पता लाइग गेलइ त ओ तऽ चाइर टा आर धारा लगा देतइ।आबऽ काल मे रुचिका देवीकऽ देखियो नञि सकल छलाह जे केहन प्रतिक्रिया छलइन। ईएह सब सोचइत परेशान छलाह। ओना अगिला दिन ओ कोर्ट गेल छलाह। आइ जे पुलिस वाला सब गवाही मे आयल छलइन, ओकरा सबसँनीकसँगप्प केलाह.......आन दिन जेकां फटकारलकिन नञि। घर घुरलो पर कयेक बेर मोन केलकइन जे रूचिका देवीकऽ हाल पता करी..... लेकिन साहस नञि जुटा सकलाह। एक दिनक छुट्टीकऽ बाद रूचिका देवी स्कुल जाय लगलीह। ओतऽ त बच्चा आ स्टाफ मे समय बीत जाइन लेकिन घर अबिते परेशान भऽ जाइ छलीह।जखनो कोनो मोटरगाड़ी अबइ त बुझाइन जे श्री मिश्रा त नञि छथि? स्कुलो मे जखइन फंक्शनकऽ संदर्भ मे श्री मिश्राकऽ चर्चा भेलइन त अनमने जकां ओ अइ पर किछु बजलीह।फोनक घंटी बजइन त होइन जे कहीं श्री मिश्रा त नञि छइथ। हाल चाल लइ लेल फोन केने हेताह? मूदा उनकर फोन नञि एलइन। अहिना ड़इब आइब गेलइ। आइ फेर उएह समय मे मोटर गाड़ी एलइ......... दाई कहलकइन जे श्री मिश्रा छइथ.........ओहिना बैठकी मे बइसऽ कऽ समाद दाई मार्फत देलकिन ....... आ अपनो गेलीह। आइ कनी काल गंभीरता रहलाकऽ बाद सामान्य माहौल मे गप्प होबऽ लगलइन। दाई अपने चलितराईह रहय...........ओ झुठ्ठे कहि देलकइन जे ओकर बेटा दुखित छइ......... घर ओकरा जेनाई जरूरी छइ..............कहि कऽ ओ चइल गेलइन। अपना मोने ओ इनका सबकऽ एकान्ती देलकइन। रुचिका देवी हां वा नञि किछु कहितथिन, ओइसँपहिने ओ जा चुकल छल। आइ ओही दिन जेकां फेर गप्प शप आ प्रेमालाप भेलइन। बाहरसँखेनाई मंगावल गेलइ। सांझ मे फेर श्री मिश्रा अइ वादाकऽ साथ घुरलाह जे ओ फेर ड़इब कऽ आइब रहल छइथ। आब सब ड़इब कऽ श्री मिश्रा आबऽ लगलाह। भइड़ दिन ओतइ रहइ छलाह। बीच बीच मे आब ओ सब बाजार आ सिनेमा सेहो संगे जाय लागल छलाह। छोट शहर मे त जखने मऊगीकऽ दोसर पुरूखकऽ संग देखइ छइ.........खिस्सा बननाई शुरू भऽ जाइ छइ। आब जगह जगह इनकर सबहक संबंध पर चर्चा शुरू भऽ गेल छलइन........ओना दुनु गोटे व्यवहार मे पुरा सावधानी बरतइ छलाह, लेकिन ई सब कतउ छीपलइ आय।एक कान, दु कानसँहोइत, ईहो सब सुनलाह। आब श्री मिश्रा कहलखिन - हमसब विवाहक बंधन मे बंईध जाइ। - आहां एकबेर अपन बेटा आ परिवारकऽ लोक सबसँअइ विषय मे गप्पकऽ लीयह। रूचिका देवी बजलीह। -बेटाकऽ की पुछबइन। ओ तऽ अपने आप मे मस्त छइथ।हम जनञि छी ओ त खुशे हेताह। बात रहल बाकी लोक के, हम की उनकासँविचार लेबइन। - नञि नञि कमसँकम बेटाकऽ बता दियउन। -आहां कहइ छी त कहि दइ छियइन। राइत मे श्री मिश्रा अप्पन विवाहक संबंध मे बेटाकऽ कहलखिन। बेटा अकचकेलकिन लेकिन किछु क्हलकिन नञि। थोड़े कालकऽ बाद पुतोहुकऽ फोन, श्री मिश्राकऽ अयलइन। ओ त फोने पर लगलखिन श्री मिश्राकऽ उद्धार करऽ । -आहांकऽ अइ उम्र मे बेशी जबानी चईढ़ गेल अइछ। हमरा सबकऽ लोक की कहत? आहांकऽ कनिको विवेक नञि! ओइ मऊगीकऽ चक्कर मे आहां फंईस गेल छी। धुर छी। हमरा त आहां पर घिन्न आइब रहल अइछ। कोन परिवार मे हमर बाप बियाईह देलाह। ..आर बइजते रहलीह।.............. अगिला ड़इबकऽ भोरै भोर बेटा पुतोहु , श्री मिश्रा कतऽ आइब धमकलइन। दु बरखसँकोनो अबरजात नञि। एकदिसाहे श्री मिश्रा बेटा पुतोहुकऽ फोन करय छलखिन। आइ देखू ने। सब हाजिर। थोड़े काल मे श्री मिश्राकऽ बहिन - बहिनोई सेहो दोसर शहरसँआइब गेलखिन। बेरू पहर गामसँबुढ़ कक्का सेहो अपन पोता संग छड़ीलऽ कऽ आइब गेलाह। बड़का मजमा श्री मिश्राकऽ घर मे लागल छलइन। बेटा पुतोहु एकदिसाहे बाईज रहल छलइन। सब संबंधीकऽ उएह सब फोनकऽ कऽ बजौने छलखिन। आइ श्री मिश्रा अपने घर मे अपराधी जेकां कटघढ़ा मे ठार छेलाह आ उनकर पुतोहु सरकारी वकील जेकां इनकर खिलाफ सबुत सब दऽ रहल छलखिन। जजक कुर्सी पर कक्का बइसल छलाह- मौन। सब ड़इब कऽ श्री मिश्रा , रूचिका देवी कतऽ नियमित जाइ छलाह।आइ जखइन ओ नञि पहुंचलाह तऽ रुचिका देवी चिंतित भेलीह। फोन केलखिन त कियो नञि उठेलकइन- अइ हो हल्ला मे फोनक घंटी कतऽ सुनेतइ। तखइन अपने गाड़ीलऽ कऽ आइब गेलीह।अतऽ त दोसरे लीला चइल रहल छल। रुचिका देवीकऽ देखिते मातर श्री मिश्राकऽ पुतोहुकऽ पारा चईढ़ गेलइन। ओ अंटशंट बाजअ लगलीह- ई राक्षसी पाइकऽ लोभ मे इनका फंसेलकइन अइछ। -हमर सबकऽ की होइत? से नञि सोचलक ई हरा शंखनी। अकरे चाइल छइ। हम सब त सड़क पर आइब जायब। अकरे बच्चा राज पाठ सम्हारतइ। ई नागिन कतेककऽ डंसने होइत। आर कथी कथी................ बाकी सब गोटे ठकमूड़ी केने बइसल। आब रूचीका देवीकऽ नञि रहल गेलइन। ओ बजलीह- पुईछ लियउन, सामने बइसल छइथ। हमर नञि, इनकर प्रस्ताव छलइन। आहां सब दु बरखसँदेखबो केलियइन जे बापक की हाल अइछ। आइ पहुंचलऊं आय। ई जाइतो छलाह आहांकऽ डेरा पर, एक्को दिन छुट्टियो लेलियइन इनका लेल.........कतउ घुमेबो फिरेबो केलियइन कहियो। सब मे त जय जगन्नाथ। आब संपइत लेल दौरल आयल छी। त सुइन लियह- हमरा इनकर संपइतकऽ कोनो काज नञि अइ। हम त विवाह नञिये करऽ चाहइत रही। हम आहां सबकऽ लिख कऽ दऽ दइ छी जे हम कहियो " मां " नञि बनब। बच्चा पैदा नञि करब। आहांकऽ राज पाठ हमर बच्चा हेबे नञि करत त ओ लेबे नञि करत। हम काइल आपरेशन करा लेब। भऽ गेल समस्या समाप्त। कतबो लोक मना केलकइन- रुचिका देवी अगिले दिन आपरेशन करा लेलीह। ओकर बाद दुनु गोटे कोर्ट मैरिज कऽ लेलीह। जे लोक सब श्री मिश्राकऽ बुझाबऽ आयल छलखिन ओ सब अइ विवाह मे शामिल भेलाह। रूचिका देवीकऽ शिक्षा मंदिर मे बड़का रिसेप्शन पार्टीकऽ आयोजन भेल। भइड़ शहर मे रूचिका देवीकऽ त्यागक बखान भऽ रहल छइन।सबके मूंह पर एक्के चर्चा- सच मे रुचिका"देवी" भऽ गेल छलीह।जिला पदाधिकारी फेर रुचिका देवीकऽ कहलखिन- श्री मिश्रा पर तऽ कृपा कऽ देलियइन.........बकियौता हमरो पर कऽ दियह। फेर बड़ी जोरकऽ सब ठहक्का मारलक। पैबंद- उपन्यास (पहिल-सातम भाग), (अंतिम भाग १-२) पैबंद (उपन्यास) (पहिल भाग) आइ कनिया बाबी अग्निश्च वायुश्च भेल छथि। जे कियो दलान पर जाइ छइन सबके उएह गप्प " बदरी नाक कटा देलकइ "। कीकऽ देलकइ। भोर मे त पोखइड़ पर देखने रहियइ। बाध दिस जाइत रहय। " कीकऽ देलकइ"। हद्द करय छं तों सब। बेशी काबिलभऽ गेलह हय। स्टेशन गेल छलह। हं गेल छलहुं। तीन‌ चाइर दिन पहिने। रमपट्टी वाला पीसाकऽ छोड़ई लेल। कीछ देखलहक। नञि। तोरा सबके नजइड़ कतउ आर रहइ छह। की देखबहक। ककरो किछु बुझा नञि रहल छलइ कि की भेलइ। कनिया बाबी फेर देखलखिन ककरो जाइत। ओकरो बजेलखिन। ईएह गप्प फेर सं। तोहर बाप पुरखा सबकऽ नाक कटा गेलह। बड्ड शानसँजे कहइ छलह जे हम‌ फलां, हम चिल्लां परिवारकऽ छी से आबकऽ पतियेतह। बदरिया त सब नाशकऽ देलकह। धीरे धीरे कयेक गोटे कनिया बाबीकऽ दलान पर जमाभऽ गेल छल। पुरा बात अखनो नञि बुझल किनको। मुदा अतबा त बुझा गेल छलइ जे बदरी किछु करस्तानी केलकइ अइछ। फेर सब सोचईते, एहन कीभऽ गेलइ जे बदरी केलक आ किनको नञि बुझल। गाम मे हर नामकऽ पाछु किछु दर्शन रहइ छइ। जेना जिनकर नाम पढ़ुआ कका‌ ओ बुझु बेशी पढ़ल लिखल लोक, साहेब‌ कका माने ओ जे पैघ सरकारी पद पर छथि, बिड़ला कका माने नबका धनिक, मालिक कका माने जमीन बेचकऽ फुटानी करऽ बाला, बाऊ कका माने शांत लोक, लाल कका माने गोर नार लोक, छोटका कका माने सब भैयारी मे छोट, जर्मन कका माने अंगरेज बाला रंग, जे बामा हाथे लिखय ओ लटेरी कका। अही तरहे नामकरण होइ छइ। ई कनिया बाबीकऽ सेहो अहिना नाम पड़लइन। इनकर घरबाला सब दिअयदी भैय्यारी मे छोट। जहिया बियाहभऽ क अइ गाम अयलीह त इनकर बरसँपैघ जाऊत सभ। तुलसी पात छोट की पैघ। जाऊतक धीया पुताकऽ त ई बाबी भेलखिन। ओ सब कनिया बाबी कहऽ लगलइन फेर आरो लोक सब। शुरू मे त नबकनिया मे कियो बाबी कहइन त नीक नञि लगइन। धुर छी, धुर छी करऽ लगइथ। मुदा बाद मे सुनऽ कऽ अभ्यस्तभऽ गेल छलीह। नैहर बालाकऽ गर्वसऽ सुनबथिन। सुनु हमरा कतेक कतेक टा पोता-पोती अइछ। पैघ पैघ जाऊत जईधी सब पैर छुअइबकऽ गोर लगइ छलइन त तिरपितभऽ जाइ छलीह। नैहर मे सबसं छोट छलीह तैं बड्ड गोर लागत पड़य छलइन। सासुर मे त अबिते गिरथाइनभऽ गेल छलीह। कनिया बाबीकऽ घरबालाकऽ जल्दी त नञि कहबइ मुदा चलिते फिरते अधबयसे मे मइड़ गेलखिन। किछु दिन त सोगायल रहलीह। फेर घरकऽ सम्हारलीह। आब कनिया बाबी उज्जर चकचक सारी सटुआ पहिरऽ लगलीह। खेत पथार सेहो देखऽ लगलीह। उपजा बारीकऽ हिसाब राखऽ लगलीह। लोककऽ जरूरत परलाह पर सुद व्याज पर नुकऊआ पाइ सेहो देबऽ लगलखिन। दोसरोकऽ जमीन जथा भरना पर लेबऽ लगलीह। माल जाल सेहो पोसऽ लगलीह। दुध सेहो उठौना पर लगेलीह। बोरिंगसऽ ज्यों कोई पम्पिंग सेट लगबइ, ओहो मे घंटे हिसाबे पाइ लेथिन। आवाजों ओहिना टनगर रहइन।दलाने परसऽ बजथिन त गाछी मेसऽ जारइन बिछअ बाली, घास गढ़अबाली सब पराअ जाय। दुकऽ चाइर पाइकऽ खुब करऽ अबइन। पाइ भेलासऽ किछु लोक आगु पाछु करऽ इन। अपने त आगु बढ़ल छलीह मुदा बेटा सब पाछुये रहअ बाला बनलइन। ईएह गुनधुनभऽ रहल छलइ जे बदरी की केलकइ आखिर। ओना ओ तिरकाल छल। तिरकालक मतलब तहिया होअइ जे तीन समय जे भांग घोंटय। भोर, दूपहरिया आ सांझ। सब कहलकइन कनिया बाबी कहुं त की केलक ओ बदरिया। कहलखिन जे हमर बेटा स्टेशन लग बदरीकऽ देखलखिन रिक्शा चलबइत। बाजु त एहनो होअइ। आइ तक कियो चलेलक अइ रिक्शा। कहुं त पुरखाकऽ नाक कटल की नञि। लोक सोचऽ लागल जे कियो घरे घरे पंडिताई करय छथि, कियो दोकान मे मजुरी करय छथी, कियो ट्युशन पढबइ छथि, कियो दलाली करय छथि, कियो हेराफेरी करय छथि, कियो स्टेशन पर मटरगश्ती करय छथि, कियो तारी-दारु पीबकऽ दिने मे टुन्न रहइ छथि, कियो मायबाप आ स्त्रीकऽ सदिखन फजैतकऽ तर केने रहइ छथि, कियो पेटपोसुआ जेकां कोनो संबंधी कतऽ पड़ल रहइ छथि आरो कतेक बात। अइसऽ किछु नञि आ रिक्शा चलेलासऽ कीभऽ गेलइ। कनिया बाबी कहलखिन जे‌ आहां सब ओकरा बइलाऊ अतऽ सं। रहत त की की नञि करत ई बदरिया। कखनो बदरी कहथिन मुदा जखन बेशी खीस बरइन त बदरिया कहऽ लगइ छलखिन। गरीब लोककऽ पुरा नाम कहऽ कऽ कष्टकऽ करत। बदरी सांझ मे घर घुड़ल त सब पता चललइ ओकरा। ओ कहलक जे कनिया बाबी कय बेरसँओकरा घरारी आ गाछी कबाला करय लेल कहइ छलखिन। नञि त बदलेनेकऽ लियअ। कतेक बेर नोत दकऽ नीक नुकुत खुओबो केलखिन।ओ तैयार नञि भेल। ओकरा कहब छइ जे बाप सब जथा बेचिये देने छथि। दु कट्ठा घरारी, एक कट्ठासऽ कनी बेशी गाछी आ दस धुर बंसबिट्टी ओकरा बांचल छइ। ओ मइड़ जाइत लेकिन ओ ई नञि बेचत। ओकरा पांच बरखक बेटा छइ जे माय संग कलकत्ता मे रहइ छइ। सब दिन कि ओ‌ गरीबे रहत। ओकर बेटाकऽ काइल ज्यों पाइभऽ जाइ त ओ घर कतऽ बनेतइ। चाइर खाढ़ी मे दिन घुमई छइ। तेसरभऽ गेल छइ।भांगक नशा मे बदरी बाईज रहल अइछ। चारिम खाढ़ी आबऽ वाला छइ। ओ नञि बेचत घरारी। कनिया बाबीकऽ कोठाकऽ आगु ओकर कांच ईटाकऽ भीतक घर उनका पैबंद लगइ छइन। ओ‌ कोनो ने कोनो रुपे ओकरा उजाइरकऽ अपन बढ़बऽ चाहइ छथि।बदरी कलकत्ते रहइ अछि। ओतउ त ओ रिक्शे चलबइत अइछ। पेटक आइग बुझबइ लेल त किछु करहे परतइ। कलकत्ता मे जखइन मोन अजबजा जाइ छइ त गाम आइब जाइया बदरी। गामो मेकऽ एक्को दिन खुवेतइ। पाइ जाबइत छलइ, कीछु बांस बेचने छल ,बइसकऽ खेलक। आसानीसऽ त रिक्शे चलाकऽ पेट भरतइ ने। ओकरा त एकरे हुनर। सब बुअइझ गेल कनिया बाबीकऽ ई तेला-बेला। ओ पैबंद परिवारकऽ प्रतिष्ठाकऽ नामे हटबऽ चाहइ छलीह। पैबंद (दोसर भाग) आइ जतरा बेशी दिन गामे मे रहि गेल बदरी। पर पंचैती आ किदन सब। ओइ सब मे ओझरायल रहल ओ। कतेक बेर मोन मे अयलइ जे बेच बिकीनकऽ परा जाय गाम सं। फेर डीहक एहन मोहभऽ जाइ जे सब पर भारी पड़इ। जखने डीह बेचऽ कऽ गप चलइ त कनिया बाबी टा नञि, आरो लोक सब थाह लेबऽ लागइ। ओना ओकर समांग सब झखिते रहइ छलाय पाइ लेल, मुदा डीह कीनबा मे सब ताराउपरी तैयार। आनो टोलक लोक ओकर हाल चाल पुछह लगलइ। एक गोटे त ओकरा अतेक तक कहलकइ जे कनिया बाबीकऽ नञि बेचमे त नञि बेच, हमरादऽ दे। कियो कहइ जई ओ कनिया बाबीकऽ एजेंट छइन। जमीन कबाला तोरासऽ अपन नाम करोतउ आ बाद मे उनका नाम लिख देतइन। ओकरा अतेक पाइ कतऽ सऽ एतइ। ओ त उनकर बले फऊंकइ अइ। अही सब मे तीन महीनासऽ ऊपर लाइग गेलइ। बदरी किछुभऽ गेलइ, डीह नञि बेचलक। उमहर दिन पर दिन बीतल जाइ, बदरीक कोनो खबर नञि कलकत्ता मे। ओकर कनिया इमहर ओमहरसऽ हथपईंचलऽ क कहूना बच्चाकऽ पेट भड़इ छल। अपने ओ कखनोकऽ भुखलो सुअइत जाइ। ओकर कलोनी जे जे कलोनी कहबइ। जे जे मान झुग्गी झोपड़ी। अइ कलोनी सब मे सबकऽ सबहक हाल पता रहइ छलइ। सब किछु खुल्ले मे होअइ। दुलार मलार आ घिन्न घुनाईज आ मारा पिटी आ गारा गारी आ बेटी पेटखऊंकी-सब बिना अहर के। बदरीकऽ कनियाकऽ सेहो अपना देसक किछु लोकसऽ अबरजात रहइ। ओतऽ मरदयमऊगी बच्चा सब काज करय। बदरीकऽ ई पसंद नञि कि ओकर कनिया काज करय। ताहि लेल ओकर कनिया काज पर नञि जाइ। कयेक मऊगी सब ओकरा बोलियो दइ -ई जे महंथाइन बनल बइसल रहइ छें, देहकऽ हिलो डोलो, बरकत हेतउ तखने। ओ किनको जाबत जरूरत नञि होअइ नञि किछु कहइ। ओना कियो कियो बुझिये गेलइ जे ओकर सैंय मना केने छइ। अइ पर ओ सब कहइ तोरा मे कोन सुरखाबक पर लागल छऊ जे हमरा मे नञि अइ। जो धेकरी बनल रह। बाद मे बुझेतउ। आब बदरीकऽ कनियाकऽ पैंच उधारी सेहो भेंटनाई बंदभऽ गेल छलइ। राशनक दोकान बला सेहो सीद्धा उधारी मे देबऽ सऽ मनाकऽ देलकइ। ओना ओ दुकऽ चाइर लइ उधारीकऽ बदला मे, मुदा ओहो मनाकऽ देलकइ। ओकरा दोसर झुग्गी बला कहीं देलकइ जे कोन ठीक बदरिया कतउ मइड़ खइप त नञि गेल। ओ दोकान बलाकऽ कहबो केलकइ- नञि देबऽ त नञि दैय। ऐना अलच्छ बात नञि बाजअ। घर मे एक्को कनमा अन्न नञि। कतउसऽ किछूके उम्मेदो नञि। अपन पेटे टा रहितइ त भुखले सुअइत रहितै। लेकिन भगवान एकटा ननकीरबोदऽ देने छथिन। ओ केना भुखले रहतइ। किछु चटरंगी मऊगी सब अपन धंधा मे आबइ लेल कहबो केलकइ। बियाहल छैं- चामक देह छइ- की फरक पड़इ छइ।चइलकऽ देख ने। बदरीकऽ कनिया नीकसँचिन्हइ छलाय ई सब छिनाइड़ के। आब करय त की करय। सांझ भेल जाइ छलइ, ओ मोनेमोन अपन सोखाबाबाकऽ गोहराबय लागल। अहीं रस्ता देखायब।आंईखसऽ नोर सेहो बहइत छलइ। नोर बहिते बहिते निन्नभऽ गेलइ कि की भेलइ। जखइन आंईख खोलइ अइछ त देखइत अइछ जे ओकर ननकीरबा ओकर देह पर लटकल छइ। बगलकऽ एकटा ओकरे देशक मऊगी ओकर माथ पर पाइन छींटई छल। ओ दुनुकऽ भइड़ पांईज कऽ पकरलकऽ । कनी काल बाद मोन हल्लुक भेलइ। ओ सब बात बुझलकइ। दुनु मे किछु गप भेलइ। ओइ राइत ऊयाह मऊगी अपन झुग्गी कहुं या घर कहुं, ओतइसऽ पनपीयाई बनाकऽ अनलकइ। बदरीकऽ ननकीरबा बगलबाला मऊगीकऽ घर पर छोड़ि देल गेल। ओ ओइ मऊगी संग एकटा घर मे दुनुं सांझ खेनाई बनबऽ कऽ काज करऽ लागल। ततेक नीक जे ओ खेनाई बनबय जे ओ मालिक अपन संबंधी कतऽ सेहो लगा देलकइ। दुनु घर लगीचे छलइ। अइ मालिककऽ बुटीकक दोकान बाजार मे रहइ। बदरीकऽ कनिया त अखनो हाथेसँचट दं अपन ननकीरबाकऽ सब जामा लता सीब दइ छलइ। झुग्गी मे सेहो नुकऊआ कीछु कपरा सीबकऽ कखनो किछू कमा लइ छलाय। ओकर हाथ कपरा सीबऽ मे बड्ड साफ छलइ। किछु महीना अहुना बीत रहल छलइ। बदरीकऽ बेटा बिजईया मुसपैलटीकऽ सकुल मे पढ़ाइ शुरूकऽ देने छल। इमहर जखइन बदरी कलकत्ता पहुंचई या त कलोनी मे घुसिते राशनक दोकान बाला ओकरा कनियाकऽ कतऽ कतऽ जाय बला गप कहलकइ। कनी घर तरफ बढ़ल त फेर कियो किछु आर कहलकइ। ओकर दिमाग भिन्ना गेलइ। झुग्गी पहुंचल त ओतऽ ताला लागल छलइ। बेटा बिजईया खेलऽ धुपअ गेल छलाय।बगलकऽ झुग्गी बाली चाभी दकऽ चइल गेलइ। घर मे जखइन घुसल त सामने देखलक नबका बटलोही आ केटली। देखते मातर ओकर पारा ऊपर चईढ़ गेलइ। एक तऽ राकस दोसर नोतल। पहिनेहे राशनबाला आकऽ के सब की की कहने रहइ, ओइ पर घर मे नब बरतन। देखते ओकरा ऊर्री बिर्री लागऽ लगलइ। बटलोही आ केटलीकऽ पटईक पटईककऽ पचका देलक। सब सामान इमहर ओमहर फेंक फाईक देलक। जे जे कलोनी मे टेलीगरामोसऽ जल्दी समाद फैलइ छइ। बिजईया लग खबर पहुंचलइ कि ओकर बाबु आइब गेलइ। ओ लंके दंके दौरल घर आयल। ओकरा कयेक टा गप बाबुकऽ कहऽ कऽ रहइ। सकुल के, नबका दोस के, चश्मील्ली मस्टरनी के, खुसठ बुढबा लमनचुस बेचनिहार के, नबका मायक मेमसाब - साहेब के, तरह तरहकऽ खेनाईकऽ परकार सब के। अतऽ बापक रौद्र रूप देखकऽ डरा गेल आ केवारीकऽ बाहरे नुका गेल। मायकऽ अयबाक इंतजार करऽ लागल। सांझ मे माय कऽ जखने अबिते देखलकइ बिजईया। दौर कऽ सब गप बाबु बला रस्ते मे कहीं देलकइ। माय संगे डराईते डराईते ओ हो घुसल। बदरीकऽ खीस फेर कनियाकऽ देखते बइढ गेलइन। खुब चिल्ला चिल्लाकऽ बजई छलाह।गाईरे पढ्अ लागल छलाह। बिजईया‌ दिस तकबो नञि केलकीन।ततेक खीस मे छलाह। जखइन बजिते बजिते शांत भेलाह।तखन कनिया सब टा गप कहलकइ। कतेक दिन भुखले अपने सुतल। बदरी त कोनो खबरों नञि लेलकिन। कहलकइन जे आहां सोचलऊं जे हम बेटाकऽ मुंह मे जाबी लगा देबइ। ओ की खेतइ।‌ जखइन सब वस्तुस्थितिसँअवगत भेलाह त बदरी बिजईया आ ओकर माय दुनुकऽ एक्के संगे पांजा मे कसलाह। कतेक काल तक सब अहिना रहलइ। फेर बदरीकऽ कनिया उठल। खेनाई पिनाई बनेलक। बिजईया त बाबुक कोरे मे सुअइत गेल छलाय। माय ओकरा उठेलकइ। नञि खाई छलाय त माय कहलकइ -भुखले सुतमे त एक बगेरीकऽ बरोबइड़ माउस कमभऽ जेतउ। बिजईया त बगेरी देखनेहे नञि अइ। अंदाज लगेलक एहन ओहन होइत। बाद मे अपन बाबुसऽ पुईछ लेत। भोर भेलइ। सब अपन काज मे लाइग गेल। बिजईया सकुल गेल। माय अपन मेमसाब कतऽ खेनाई बनबऽ । मेम त अंगरेजक घरबाली सब होइ छलइ। आब त करिया भुजंग मऊगी सब सेहो मेमसाबभऽ गेल छलइ। जे होअइ। बदरीकऽ कनिया ओकरा मेमसाब कहइ। ओ अइसऽ कहइ जे जहिया ओ पहिल बेर ओकरा कतऽ काज करऽ गेल छलाय त ओकरा जे मउगी काज दियौने रहइ से सीखेने रहइ। पुरूखकऽ साब आ मऊगीकऽ मेमसाब कहबाक छइ। तैं ओहो कहइ छलाय। बदरी लेल खेनाई बनाकऽ गेल छलइ ओकर कनिया। अपन घरक त बदरियो साहेबे अइछ। अतऽ त ओकरे जुइत।आइ भइड़ दिन ओ साहेब सबकऽ ड़इब जेकां आरामे केलक। अगिला दिनसऽ ओहो अपन पुरनका काज पर लाइग गेल। रिक्शावालाकऽ काज मे कहियो बेरोजगारी नञि छइ। नञि कोनो सर्टिफिकेट आ नञि डिग्रीकऽ काज। आइ काल्हि गारेन्टर सेहो मांगइ छइ। ओ त कोनो रिक्शा बाला बइन जाइ छइ। ओकरा लग छइये कि जे बदला मेलऽ जेताह। नञि हरायकऽ डर, आ नञि चोरीकऽ खतरा। बदरीक कनियांक नाम रामरति रहइ। मेमसाबकऽ ई बरकी टा आ पुरान नाम लगलइन।ओ रति कहऽ लगलखिन। उनका बुटीक काज मे करीगर छुट्टी मे घर चइल गेल रहइन।ओ रतिकऽ किछु कपरा सीबाक लुइड़ सीखा देलखिन।ओ झटसऽ सीख लेलक। ओ आब रतिकऽ अपन बुटीक परलऽ जाय लगलखिन आ खेनाई बनबऽ लाय रति दोसरकऽ ठीककऽ देलकइन। बिजईया तेहन ने चंसगर छलइ पढ्अ मे जे पंचमे पास करइत ओकरा अगिला बरख चश्मा बाली मैडम नबोदयकऽ फारम भरा देलखिन। अपने संगेलऽ गेलखिन परीक्षा दियौलखिन। बिजईया पासोकऽ गेल। इमहर बुटीक बढ़िया चलइ छलइन। किछु बदमाश सब ओकर बाहर मे अड्डा जमावअ लागल छलाय। बदरीकऽ देह दशा त बलंठ छलइ। ओ एकदिन बुटीक पर रतिकऽ कोनो समाद कहइ लेल गेल छल। ओकर चाइल मे अकर छलइ। पुलिसक सिपाही जका ओ चलइ छल। ओकरा अबिते देखकऽ ओ दोकानक बाहर ठार छौंरा सब ससइड़ गेल। ई सब रतिकऽ मेमसाब शीशाकऽ तरसऽ देखइ छलीह। जखइन बदरी, रतिसँभेंटकऽ क चइल गेल‌‌‌ तखइन ओ रतिकऽ कहलखिन जे रिक्शाकऽ जगह ज्यो गार्डक काज करइत त कि बेजाय। रति अपन महादेवकऽ चिन्हइ छलीह। आब उनका नीक पाइ बुटीकसऽ भेंटई छइन। उनको रिक्शा उघनाई ठीक नञि लगइन। दोसर आब बयस सेहो बइढ़ रहल छलइन। कहने रहथिन बदरी के। ओ त ततेक सनियल जे कहलकइ -ओ,आब हम बहुकऽ कमायल खायब। हमर देह मे कि घुण लागल अइछ। ओ तहिया नञि तैयार भेल छल। फेर अइ बेर डराईते डराईते कहलखिन। ओ हंसऽ लागल आ तैयारभऽ गेल। कहलकइ आब रिक्शा मे ओ बात नञि रहलइ। बदरी कनीकटा मोछ बढ़ा लेलक आ एक टा लाठी किनलक। आब मोछ पर ताव दइत, लाठी हाथ मे लकऽ ओ बूटीकक बाहर स्टुल पर कखनो बइसय नञि त ठारे रहइ छलाय।अइ मे त कोनो काज नञि, आ पाइ महीना पुरिते चिक्कन। मजा आइब रहल छलइ आब ओकरा जिनगी मे। गाम आब मोनो नञि पड़इ। इमहर बिजईयाकऽ नवोदय मे नाम लिखा देल गेल छलइ। ओ आब ओतइ रहय। कहियो काल बदरी आ रति मेमसाबकऽ गाड़ी मे नबोदय स्कुल जाइ छलाय। आब ओ सब एकटा जनता फ्लैट किनलक। बदरी कलकत्ता मे मकान मालिकभऽ गेल। आब अप्पन घर मे रहइ छलाय। गऊंआ सब जे संबंध तोरने छलखिन जे कहीं बदरी किछु मांगि नञि लय।आब अबइ जाय लागल छलखिन। अपन लोक सबसँअबरजात शुरूभऽ गेल छलइ। एक दिन बदरीकऽ दोकानक बाहर एक टा पुरान बैग खसल भेटलइ। पहिने त ओकरा भेलइ जे कहीं बम नञि होइ। फेर की नञि फुरेलइ- बम भोलेकऽ नामलऽ क ओकरा खोइल देलकइ। ओइ बैग मे रुपये रूपया आ कतेक रास कागज सब। बदरी बैगलऽ जा कऽ मेमसाबकऽ देलकइ। ओ ओइ कागज पर लिखल फोन नम्बर सब पर फोनकऽ क ओकर मालिककऽ बजेलकइ। ओकरा पाइसऽ भरल बैग सोइप देलखइ। बैगक मालिक ईनाम मे बहुत रास पाइ बदरीकऽ देबऽ चाहलकइ। बदरी पाइ लेबऽ सऽ साफ मनाकऽ देलकइ। ओकर कहबाक छलइ जे चौकिदारी त हमर काज अइछ। अकर हमरा दरमाहा भेटई अछि। हम कोनो अलग काज नञि कयलऊं। ई हमर कर्तव्य थीक। ईनाम नईंहे टा लेलक बदरी। आइ घटनाकऽ पुरा बजार मे चर्चा। अखइन तक बरका अफसर सबकऽ ईमानदार आ कर्त्तव्य किछु होइ छइ, सैह बजार वाला सब सुनने छल। बदरी त हद्देकऽ देलकइ। सब कहइ पता नञि, कोन माइट पाइनकऽ बनल छइ। आइ घटनासऽ एक टा भेलइ। बदरीकऽ एकटा बरका बनिया अपन ओफिस मे नजर राखइकऽ काज लेल ओकर मेमसाबसऽ मांअइग लेलकइ। मेमसाब हाथ जोइड़ लेलकइ बदरीकऽ सामने। बदरी आब शीशाकऽ बाहर से भीतर, एसी मे ड्युटी करऽ लागल। दरमाहा दुगुनाभऽ गेलइ। एसी मे ड्युटीसऽ रंग सेहो साफ होबऽ लगलइ। समयक बहाव देखू। बिजईया दसमीकऽ बाद दक्षिण भारतकऽ स्कुल मे नवोदयकऽ विद्यार्थीकऽ अदला बदली योजना मे पढअ चइल गेल। ओत रहिकऽ अंग्रेजी बड्ड सुन्नर सेहो बाजअ लागल। बंगलोरकऽ कालेजसऽ ग्रेजुएशन केलक ओ घुरती बरख सिविल सर्विसेज मे IAS मे ओकर चयनभऽ गेलइ।कैडर सेहो बिहारे भेटलइ। जिलाकऽ कलक्टर आ पुलिस कप्तान ओकर गाम तकइत घर पहुंचलकिन। बधाई देबऽ बालाकऽ लाइन लागल छइ। कनिया बाबी घर पर दऊर दऊरकऽ सबकऽ चाह जलखइकऽ बेबसथा करय छथि। टेलिविज़न बाला सब टोलक लोककऽ इंटरव्यूलऽ रहल छइ। बदरीकऽ गामक कच्चा माइटक भीतक घरकऽ ईमानदारीकऽ प्रतीक मानल जा रहल छइ। बदरीकऽ त्यागक खिस्सा चइल रहल छइ। जे घर पैबंद छल से आब ओइ गामक पहचानभऽ गेल। बिजईया आब बिजय बाबुभऽ गेल छथि। पुरा गाम बिजयक गामभऽ गेल। कनिया बाबी सबकऽ फेर शोर पाइरकऽ बजा रहल छथिन आ टेलिविज़न परकऽ इंटरव्यू देखा रहल छथिन। पैबंद (तेसर भाग) बिजयकऽ IAS मे चयनक समाचार गाम-गाम फइल गेलइ। बदरी आ ओकर कनियाकऽ त खुशीकऽ ठिकाने नञि। दऊर कड् मधुर किनलक आ महाबीर मंदिर मे चढ़ेलक। गामो मे समाद देलकइ जे सोखाबाबा आ भगबतीकऽ मधुर चढ़ा दइला।‌भरी टोल मे परसादी मे मधुर बटवेलक। आब ओकरा कनिया बाबीकऽ बेटा-पुतोहुसँघुट्टा-सोहारभऽ गेल छइ। फोन पहिनेहुसँउनके कतऽ छलइन। ओ जखइन पहिने फोन करय त ओकर गप्प पर कियो धेयान नञि दइ। उल्टा कयेक बेर ओ फोन पर सुनने रहे कि ई भंगेरीकऽ हम सब समदिअय छी। एकर सपरतिब ने देखू, हमरा कतऽ फोन करय अछि-जेना अकर बापक गुलाम होइयई। अकरे ले जेना फोन लगेने होइ। कोनो काज नञि छइ- समाद कहबा के। पड़इक गेल अइछ। ताहि दुआरे रामरति, कहियो फोनकऽ क बदरीकऽ हाल नञि लइ। कयेक बेर करय लेकिन ओ सब कोनो कान बात नञि दइ छलखिन। तखइन आजिजभऽ क छोड़ि देलक। आब त उल्टे गंगा बहअ लगलखिन अइछ। उनके सबकऽ फोन आबऽ लगलइन। तैं रामरति कहियो देलकइन कनिया बाबीकऽ पुतोहु सं। से ठीके। ओ बारह सै रूपयाकऽ मिठाई कीनली, भगवान भगवतीकऽ ऊसरगाकऽ भरी टोल लोक पिछु एक एक टा बंटवेली। ऐना त आइ तक नञि भेलइ। दु टाकऽ मधुर बैनक चलन छलइ। कनिया बाबी त महो महोकऽ देलखिन। लोक गइन गइनकऽ मधुर पठबेलखिन। अबसरे एहन छलइ। मधुर खेलाक बाद ओकरा टोलक लोगकऽ सेहो फोन एलइ। ओकरा सबकऽ कहब छलइ जे कनिया बाबी बुढ़ारी मे टेलीविजन पर आयल छलीह, ओकरा बदला मे ई मधुर छइ। दिअयदी होइते सैह छइ।हर बात मे तेसरे खिस्साभऽ जाइ छइ। तैं ज्यों संयम रहय त किछु करी वा नञि करी, किछु शगुफा छोड़ि दी। देखू ओ घुमइत घमाइत, नाना परकारक एक्सपर्ट कौमेट आहांकऽ मंगनीये मे सुनऽ कऽ भेट जाइत। उएह भेलाई अहि बेर। बदरी समाद देलकइ मधुर चढ़बऽ के- लोक कनिया बाबीकऽ टेलिविज़नसऽ जोइड़ देलकइ। कोई त नबका दोस्ती पर किछु आरे तंज। त कियो लल्लो चप्पोकऽ तेसरे कारण- बिन कारण टिटही नञि बाजय। आहां रोईक नञि सकइ छी सबके अपन विश्लेषण करबा सं। लोक जे भी कहइ। बदरी त निश्चितकऽ लेने अइछ जे मधुरकऽ एक एक पाइ जोअइड़कऽ द देतइन कनिया बाबी के। जेना भदबारी अबैत, बेंग सब कतऽ ने कतऽ सऽ आइबकऽ टर्र टर्र करऽ लगइ छइ, ओहिना बदरीकऽ संबंधी सब ऊपर होबऽ लगलइ।अखइन तक सब निपत्ता रहइ।‌ अहन मीठगर गप्प सप्प सब करय जे बदरीकऽ बिसवासे नञि होइ कि ओकरे कान ई सब सुअइन रहल छइ। कयेक बेर भेलइ कि सपना त नञि छइ। अपना जांघ मे बिट्ठु काइटकऽ देखलक। ठीके सब सद्यःभऽ रहल छलइ। बिजय ट्रेनिंग मे मसुरी चइल गेलइ। जायसऽ पहिने कलकत्ता मे सब संगी साथीसऽ भेंट गांठ केलकइ। जेजे कालोनी वाला संगी सबकऽ पार्टी देलकइ। मुस्पैलिटी बाला सकुलकऽ मास्टरनीकऽ मधुर जाकऽ द एलकइ। आरो किछु नबोदय बाला संगी सब कतऽ गेल। रामरतिकऽ साहेब जेकर गाड़ी मे नबोदय जाइ, ओकरो कतऽ गेलइ। सबसँहिलल मिलल रहल। लोक ओकर सोभावकऽ प्रशंसा करय छलइ। बदरीकऽ परोछ मे बेटाकऽ प्रशंसा सुनऽ मे बड्ड नीक लगइ। सीना ओकर बइढ़कऽ 56 इंचकभऽ जाइ।बिजय अकदम्मे सरल छलाह। घमंडक एको मिसिया लेश नञि। बदरीकऽ आब ओकर बाबु जे चारिम पीढ़ी बला गप्प कहथिन, ओइ पर बिसबास होबऽ लगलइ। ओ याद करय छल कि आर कोन कोन गप्प कहइ छलखिन। मुदा किछु याद नञि परलइ। आब ओकर खाढ़ी बला चारिम चक्र पुराभऽ गेल छलइ। ओकर दिन घुइड़ गेलइ। आब कतउ ओ जाय, ओकरा अनकट्ठल मोजर भेटअ लगलइ। ई सब ओकरा सोहाइ नञि। ओकरा पहिलके जिनगी नीक लगइ छलइ। आब ई सब ओकर हाथ मे थोड़े छलइ। सोचनाई छोड़ि देबऽ चाहइ छलाय, लेकिन फेर उएह उधेरबुन। माथक ओधबाधभऽ जाइ छलइ ओकर। आब एकटा तेसरे खेला शुरूभऽ गेल छलइ। ओहो खुब खेलाय लागल।ओकर हाल ओहनभऽ गेल छलइ जेना जखइन बुनी पड़इ छइ तो राही बटोही, भीजअसऽ बचई लेल गाछ-बिरीछकऽ अढ़ लइ या। जखइन भीजअसऽ नञि बइच पबइया वा बुनछेक नञि होइ छइ त ओइ मुसली बरखा मे आगु निधोख बइढ़ जाइया-अगिला ठिकाना दिस। आब बरखा मे भिजनाअइ वा भिजकऽ तर भेनाइ ओकरा नीक लगइ छइ। ऊयाह हाल बदरीकऽ भ गेल छइ। ई खेल छइ। कथा-वार्ताक खेल। आब बदरी लग कन्यागतक लाइन लाइग गेल छइ। एक पर एक परिचय सब। बदरीकऽ बुझेबे नञि करय कि ई बाबु भैया सबकऽ की जबाब दइ। सब ओकर सामने दीन-हीन जकां कल सेहो जोइड़ लइ।कयेक लोकसऽ त ओकरा अइलऽ क टेना मेनी तकभऽ गेलइ। रामरति ओकरा सीखबइ । -एना नञि उसठल जकां जबाब देल जाइ छइ। भागक गप्प जे तोरा दुआरी ई लोक सब अबइ छह। चुप रहल करऽ । -फेर बदरीकऽ किछु अनटोटल बजाअ जाइ। ओ अइ जिनगी स़ अनघुआर रहल अइछ। पेट मे किछु आ ज़बान पर किछु। लोक सबसँगप्प सब करिते आब ओहो रेहल खेहलभऽ गेल अइछ। सीख गेल बदरी कि केना ज़बाब देल जाइ छइ। आब ओकरा लग सौ टासऽ बेशी कन्याक परिचय जमाभऽ गेल छइ। सब थाह लगबइ जे कतउ कथा ठीक त नञि भेल छइ। आब अप्पन भीतरका गप्प ओ किनको नञि कहय। अइ सौ टासऽ बेशी परिचय मेसऽ दस टा ओ अलग केलक। कोन आधार पर केने छल ओ रामरतिकऽ सेहो नञि बुझअ देने छलइन। कियो जं पुछइ त कहइ जे उपरका दस मे आहांक नम्बर नञि अइ। सामने वाला मुंह छोटकऽ क चइल जाय। ईएह नंबर ओकर तकिअए कलाम छलइ। अही मे ओ सबके ओझरेने छल। जेना नेना सब खेल मे माइटक महल बनबइ आ सांझु पहर घर जयबाक काल ओकरा ढाहि दइ छइ। फेर दोसर दिन नब घर, आ सांझ होइते ओकरे पहिलुका दिनक बाला हाल। ई क्रम चलिते रहइ छलइ, भरी गर्मी छुट्टी। ओहिना बदरी रोज ख्याली महल बनबय आ भोर नीन टुटीते सब ढही जाइ। लालाजीकऽ ओफिस मे जायकऽ तैयारी शुरूभऽ जाइ। आइ काल्हि लेटोभऽ जाइ त मनेजर नञि किछु कहय। कतउ बेबहार मे अंतर ओकरा देखाय लागल छलइ। अही सब मे ओ लागल रहइ छलाय।एक दिन त गाड़ी वाला ओकरा धक्का सेहो माइड़ देलकइ। ऊपर से उपराग सेहो जे मरऽ कऽ छह त कतउ आर जा। लोक सब कहलकइ जे ओ गाड़ी बला कतेक बेर हार्न देलकइ।माय ओकर खरजितिया केने छलइ तांय ओ बइच गेल। बदरियेकऽ गलती रहइ। जे भी हो। बदरीकऽ ई बुझाई लगलइ कि ओ बेशी सोचऽ लागल अइ। दिमागक खर्च ओकरा बइढ़ गेल छलइ। अपने पर हंसी आबइ। बदरी आ सोचनाई। सोचऽ सऽ बचई लेल त ओ भांग पीबइ छल। जखने दिमाग पर जोर बूझाई ओ झटसऽ दु गिलास खींच दइ। फेर मस्ती मे चइल जाइ छल। कयेक बरखसऽ ओ भांग छोड़ि देने छल। आइ ओकरा बुझेलइ जे अजुका एक्सीडेंट भांग छोरबाकऽ कारण भेल छइ।मोन मे फैसलालऽ लेलक जे आइ भांग पीइत। रसते मे दोकान छलइ पान बला के, ओ चोराकऽ भांगो बेचई छल। ओतइसऽ किनलक। ओकरा आब रामरति पर जोर कम चलइ छलइ। ओ त किन्नऊ ने भांग पीसतय ओकरा लेल। ऊपरसऽ चाइर टा पुरखाकऽ सुनाईयो दइतइ। घर जा कऽ भांगक छुटल कोटा अपन‌ पुरा केलक। आब ओ सीधा अपन पुरनका दुनिया मे चइल गेल। अतऽ दिमागक कोनो वार्ता नञि। जे देलकइ कनिया, अपन खेलक आ बिचरण करऽ लागल अहि लोक-ओहि लोक। बिजयक फोन अबइ त रामरति कहइ कथा सबहक बारे मे। बिजय कीछु ज़बाब नञि दइ। - एकटा कन्यागत त खाली चेकलऽ आयल छलखिन। -जे भरबाकऽ अइछ भरी लिया। हमरा ई लड़कादऽ दियअ। अहिना कोनो कोनो गप्प सब। बदरी आ रामरतिकऽ ई पुरा भरोसा छलइ जे बिजयक बिबाह ओकरे अनुसार हेतइ। तही मांदयकनी चुर, दुनु बेकती रहअ लागल रहय। एक दिन बिजयक फोन एलइन। फलां बाबु दिल्लीसऽ अऊताह। ओ जे जे कहताह, आहां सबकऽ लेब। बदरी घर मे दु दु फीट खीस मे कुदऽ लागल। बेटा हमर, जनम हम देलियई आ ओ जे कहताह सेकऽ लेब। दु चाइर दिन दिमागक खर्च बुझाय परलइ। तखने बदरी भांगक घुंटदऽ दइ। सोचबाक काजे खतम। दिल्लीसऽ फल्लां बाबु अयलाह। कहलखिन सब गप्प बिजय बाबुसऽ हमराभऽ गेल अइछ। हमरा दु टा कन्या छथि। बरका जमाय, बिजय बाबु जकां पद पर छथि। ऊयाह मध्यस्थ छलाह। आइसऽ हम आहां कुटुम्ब भेलऊं। ओहि धराने एक दोसरकऽ शुभचिंतक। एक हफ्ता नञि बितलइ कि गामसऽ समाद अयलइ जे फलां बाबू (दिल्ली वालाक )कऽ मनेजर पुरा ताम झामक संग आयल छल। बिजयक भीतक घर ढाहि देलकइन। ओहि पर तीन तल्ला नबका डिजाइन बाला घर बननाई शुरू छइ। थानाक दु टा सिपाही राइत दिन चौकिदारी मे लागल अइछ। अतरे दिन छोटा बाबु सेहो काज देखऽ अबइ छथि। चाइर महीना मे घर कि कोठी कहियउ, बइनकऽ तैयारभऽ गेल। गाछी मे एकटा बंगली सेहो बनलइ। फलां बाबू सेहो अंत मे आइबकऽ देख लेलाह। बिबाहक दिन निश्चितभऽ गेल छलइ। आब बरियातीक लिस्ट बनञि छलइ। कतेक काट-पीटकऽ बाद बदरी लिस्ट फाइनल केने छल। ओइ लिस्ट मे उधारी सीद्धा देबऽ बाला बनियाक नाम सबसं ऊपर रहइ, ओकर बाद जेकरासँरिक्शा भारा पर लइ छलाय-ओकर नाम, फेर रिक्शा गारेन्टर जे बनञि-ओकर नाम, जे रामरतिकऽ पहिल नौकरी दियेलकइ-ओकर नाम,फेर जे मास्टरनी बिजयकऽ मुसपेलटी स्कुल‌ मे बिन कागजकऽ नाम लिखलकइ-ओकर नाम, जेकर गाड़ी से नबोदय जाइ-ओकर नाम, कनिया बाबीकऽ बेटा सबहक नाम, अपन दिअयद सबहक नाम। अहिना बरकी टा लिस्ट रहइ। दिल्ली बाला फलां बाबू बदरीकऽ कहनेहो रहथिन जे जतेक लोककऽ आइन सकी, से आइन लेब। भगबतीकऽ देल हमरा सब किछु अइ। कहां अशौकर्य नञि करब। बिजय अइ लिस्टसऽ सहमत नञि छलाह।ओ नाम कम करऽ कहलखिन। कलकत्ता बाला लोककऽ अतइ बड़का होटल मे भोज देबऽ पर सहमति भेलाह। गामसऽ घर पिछु एक आदमी पर तैयार भेलाह। बिबाहक कार्ड थानाक छोटाबाबु गाम मे बंटला।उनके भार छलइन जे सब बरियातीकऽ हवाई जहाजसँदिल्ली अनबाक लेल। सात दिन पहिने एकटा गेस्ट हाउस मे बदरी आ रामरति चइल गेल छलि। कनिया बाबीकऽ लिआनकऽ क बजावल गेल रहइन। बदरीकऽ अतबे जिम्मेदारी देल गेल रहइन जे किछु बाजई लेल नञि। से ओ जखने बाजअकऽ मोन करयन जेबीसँभांग गोली निकालइथ आ सुखले घोअईंठ जाइथ। बिबाह बड्ड धुमधामसऽ भेलइ। सब बरियातीकऽ एक नम्बरकऽ धोती कुर्ता,तउनी, पाग, डोपटा, मिठाईकऽ डिब्बा आ जनऊ सुपारी संग पाइक लिफाफा भेटलइन। सब कियो जय जय करइत गाम घुरलाह। आइ फेर बदरी भांगकऽ नशा मे बाईज रहल अइछ से ठीके चारिम खाढ़ी मे ओकर दिन घुरलइ। कोठा बइन गेलइ। कथुक कमी नञि छइ। बस अतबे छइ जे किछु बाजय नञि। आब बदरीकऽ पहिलुके दिन याद पइड़ रहल छइ। मोनक गप तकऽ सकइ छल। आब त ओकरा ई सब घर ,दुआर, लोक,बेद,पावर, पैसा जीबनक पैबंद लगइ छइ। बदरी अर्र बर्र अहिना बरबरा रहल अइछ। डाक्टर माथ लग आ रामरति पैर लग ठार छइ। सब बुझिते कियो किछु बाईज नञि सकइत अइछ। जे बदरी अपन घरक साहेब छल से आइ पाबंदी मे जीब रहल अइछ। पैबंद (चारिम भाग) बिजय बिबाहक बाद घुमई फिड़इ लेल कनिया संग बिदेश चइल गेल छलाह। ई परिपाटीयेभऽ गेल छइ कि सोहाग राइत आब कोबरा घर मे नञि, बिदेश जाकऽ मनावल जाइ छइ। नञि कोनो उपाय त लोक काठमांडू वा पोखरा ओतइ चइल जाइत अइछ। नञि मामा त कनहा मामा। कोनो भी बिधकरीकऽ आब जरुरत नञि छइ। कनिया सब अपने पाकल परोर रहइ छइ। पहिनेहो त बिधकरी, कनियेकऽ मददक लेल होइ छलइ। पुरूखकऽ त बियाबान सासुर मे असगर धकेलकऽ छोड़ि दइ जाइ छइ। जेना माल-जालकऽ बच्चाकऽ हेलल नञि सिखावल जाइ छइ, सीधा जलकर मे हुला दियउ, अपने चारू पैर माड़इत, उबुक-डुबुक करइत, कात लाइग जाइया वा पारकऽ जाइया। ओहिनाहे हाल पुरूखकऽ सासुर मे होइ छइ।बिजय अपन ऊबडुब करइत बिदेश मे हनीमून मना रहल छलाह। इमहर बदरीकऽ दिमाग मे हलचल बइढ़ गेल छलइन। किछु भांगक असर सेहो। त्रिकाल जे पहिने छलाह, ओहो त अपन रंग देखेतइ। शरीर कमजोर पड़ला पर चारू तरफसऽ बीमारी सब खेहाड़इ छइ। कयेक टा जांच सब भेलइन। किछुकऽ रिपोर्ट तखने भेटलइन आ किछुकऽ लटकल रहलइन। रामरति, बदरीकऽ बेमारीलऽ क बुटीक गेनाई छोड़ि देने छलीह। बिजयकऽ कोनो फोन फान नञि अबइ छलइन। पाइ कौड़ी लग मे रामरतिकऽ रहइन। तैं सब निबहल जा रहल छलइन। कखनोकऽ मोन मे होइन, जे कोन लगन मे ई बियाह भेल। जहियासऽ भेल, किछु ने किछु अटपट भईये रहल छइ। ककरो नजर गुजर त नञि लाइग गेलइ। घर मे भगबानक पूजा सेहो बड्ड दिनसऽ नञि भेल छइ। बदरी ठीक हेताह त सत्तनारायण भगबानक पूजा करबे टा करब। मोने मोन रामरति ई निश्चयकऽ लेने छलीह।रामरतिकऽ बिजयक सासुरक रंग-ढंग नञि ठीक लगइन। कोना बिजय इनकर चक्कर मे फंईस गेलाह, से नञि बुझाई छलइन। जन्म, बियाह आ मरण ककर हाथ मे रहलइ, से ठीके। कतऽ दोसर दोसर कथा, कतऽ ई टपसऽ फाइनलेभऽ गेलइ। बिजयक ससुरक खिस्सा बड्ड रोचक छइन। नाम छइन रामबाबू। ई दु भाइ छथि।हिनकर जेठ भाइ बिदेश मे नौकरी करय छथि। उनकर बच्चा सबहक रंग दुधिया गोराई छइन। ऊपरसऽ बरका हाकिम सेहो छलाह। कयेक बरख पहिने ओ रामबाबूकऽ कहलखिन जे तोहर दुनु बेटीकऽ रंग झामर छह।ऊपरसँतो हाकिम सेहो नञि छह। तोरा बेटीकऽ नीक कथा मे दिक्कत हेतह। जैह भेटतह,कऽ लियह। बेशी मीन मेख नञि निकालियह। रामबाबू कहलखिन- -भैया। सब अपन अपन भागलऽ क अबइ छइ। जे लिखलाहा हेतइ, सैह ने हेतइ। बात आयल गेल, चइल गेल। सब बिसइड़ गेल लेकिन रामबाबू नञि बिसरलाह। ओ बेबसाई छलाह। दबाईयक कम्पनी हिमाचल मे खोलने छलाह। ओ चइल गेलइन। बड्ड पाइ बनेलाह। अठारह टा त उनके महानगर सब मे घरे छलइन। जकरा छु दइ छलखिन सोनाभऽ जाइ। मकान खरीद बिक्री मे सेहो खुब कमेला। जखइन जेठकी बेटी बियाह जोगर भेलइन त अपने मसुरीकऽ IASकऽ ट्रेनिंग सेन्टरकऽ बाहर ठारभऽ क अपन बिरादरकऽ कुमार लड़का सबकऽ ठेकनबइत छलाह। देखबाक मे सुन्दर हुआय, तकरे फिराक मे रहइ छलाह। जेठका जमाय अहिना भेठलखिन। आब बिजय बेर मे त ऊयाह ई भार ऊठालेलकिन। दुनु जमाय देखबा मे सिनेमाक हीरो सब जकां लगइन। रामबाबूकऽ भाइकऽ जमाय त देखऽ मे केहने दन छलइन। एक त अपन समाजक नञि, दोसर रांचीकऽ आदिवासी। कनिको मेल नञि। रामबाबू एकसुत्री कार्यक्रम मे लागल छलाह, आ सफलो भेलाह। नौ टा घर त उनकर कनिया बेटीकऽ खोंईछ मे देलखिन। ओना सब उनके सबहक। तखनो अपन मान मनोरथ पुरा केलीह। बदरी कऽ मोन ठीक भेलइन।बिजय सासुरसऽ सीधा मसुरी चइल गेलाह। उनकर जनता फ्लैट मे पुतोहु केना अयतिन। रामबाबू कलकत्ता मे एक टा मकान भाड़ा पर लेलाह। ओही मे बदरी आ रामरति सेहो रहअ लगलीह। सब सेट भेलाकऽ बाद पुतोहु सेहो एलखिन।तीन प्राणी ई सब घरबइया, आ पांच टा बहरिया। ड्राईवर, माली, भंसिया, झाड़ू पोंछा बाली आ मनेजर। ई आठ लोकक खेनाई बनञि। सब ओतइ रहइ। रहबाक घर ओकर सबहक अलगसऽ बनल रहइ। बिजयक आग्रह आ बीमारीकऽ देखइत बदरी दुनु प्राणी नौकरी छोड़ि देला। कोनो सरकारी त छेलइ ने जे ग्रेच्युटी आ पेंशन। गेनाई बंद, नौकरी खत्म। रिजाइन देबाक कोनो काजे नञि। जेबिये मे रिजाइन आ ज्वाइन। काज पर गेलऊं त नोकरी नञि त छुट्टी। आब सब दिना छुट्टी। बदरीकऽ त कलकत्ताकऽ हीर हीर बुझल। मनेजर जे रहइ से महग महग सामान सब खरीदइ। आखिर पाइ त ओकरे पुतहुकऽ लगइ छलइ। ओ मनेजरसऽ सामानक लिस्ट लइ आ अपने बस पकइड़कऽ चइल जाय आ सस्त चीज सबलऽ आबय। कतउ चाइर घंटा लाइन मे लागय पड़ई त ओहो लाइग जाय। घर मे परल परल की करिता।समय ऐना बीत जाइ आ अपना मोने दु टा पाइ बचेबो करय। बिजयकऽ ट्रेनिंग खतमभऽ गेल छलइन। आब पोस्टिंग पर जायकऽ रहइन। ई लंबा छुट्टी छलइ। कलकत्ता मे लोक उनका कहलकइन जे आहांकऽ बाबु समानक लाइन मे लागल देखलियइन अइछ त कखनो कांख पर झोड़ा ढ़ोइत। घर मे गाड़ी ड्राईवर, तखनो बदरी ई सब काज अपने करय। पुतोहुकऽ ई सब नीक नञि लागइन। ओ मनेजरकऽ बिगड़थिन। मनेजर बेचारा की करय। ओकर त नौकरी छइ।अपन सईह लय सबके।बिजयकऽ ई सब गप्प कहलकिन कनिया। बिजय कहिकऽ हारि गेलाह त एक टा रस्ता निकाललाह। बदरी आ रामरतिकऽ गाम रहबाक कहलखिन आ कनियाकऽ अपना संगे मसौढ़ी पोस्टिंग परलऽ गेलखिन। बदरीकऽ आब कलकत्ता मे नौकर चाकर संग रहबाक आदतभऽ गेल‌‌‌ छलइन। पुतोहुकऽ रोब दाब करइत सेहो देख लेने रहथिन।आब ओ गामो मे तकरे नकल करऽ लगलाह।उनका कनिया बाबीकऽ ढहल कोठासँसांप छुछुंदरकऽ आबऽ कऽ आशंका लगइन। उनकर घोठा पर जे मालजाल रहइन, ओकर दुर्गंध लगइन, काज करऽ लेल जे दाई अबइन ओकरो कोनो ने कोनो बहाने दुरगइत करइत रहइ छलाह।अपन बंगली लग ककरो टपअ नञि दइ छथिन। काज तेहार मे कयेक लोक मंगलकइन मुदा नञि देलखिन। निहोरा पर टस से मस नञि भेला। अपनाकऽ कथी दुन बुझअ लागल छलाह।सुख दुख मे ककरो कतऽ जाइतो नञि छलाह। गाम मे से छजितइन। कनी दिन त लोक बर्दाश्त केलकइन। देनाई एक पाइ ने आ रोब सऊंसे। ई कतऽ चलत। आइ भइड़ गऊंआ बइसल आ बदरीकऽ बाइड़ देलकइन।भतबरीभऽ गेलइन सब सं। ओकरा सबहक लेल बदरी फेर अछोपभऽ गेलाह। गामक पैबंद छथि बदरी आ मुफ्ते मे मारल गेलीह रामरति जिनका लोकक अते सनेह। पैबंद (पाचम भाग) समय अपन गतिसँचइल रहल छल। बिजय आब गामक बगल बाला जिलाक कलक्टरभऽ गेल छलाह। बिजईयासऽ बिजय आ बिजयसऽ आब बी एनभऽ गेल छलाह। अधिकारी वर्ग मे हुनका लोक आब बी एन कहइ छल। नबका फैशन छइ ईहो नाम बदलबाक। बिजय नारायण आब बी एन। घरबाली सेहो BN कहइ छलखिन। गरीब गुरबाकऽ त बी एनसँबियनभऽ जइतइ। ऊयाह बियन जे हथ पंखाकऽ कहइ छियई। बियन डोलबइत अखनो लोक गाम घर मे भेंट जाइत। ज्यों गरमीकऽ मौसम होइ आ बिजली गुल हुअय, त देख लियअ ई बियनक चलती। एक हाथसँदोसर हाथ घुमिते इनकर दिन बिततइन। बड्ड भाव बइढ़ जाइ छइन बियन के। कियो इनका छोड़अ नञि चाहइ अछि। सुतऽ बाला घर तक मे इनकर पहुंच अइछ। मुदा अखन जे BNकऽ चर्चभऽ रहल अइछ ओ कलक्टर बिजयक नबका नाम अइछ।आब बी एन जे बच्चा मे कंचा आ गुल्ली डंडा खेलाई छलाह से बिलियर्ड्स आ स्नुकर खेलाई छथि। एक बेर बड़का मेडल सेहो भेटलइन। BN कयेक टा पोस्टिंगकऽ लेलाह अइछ। सुखल आ तरिगर बिभागक थाह लाइग गेल छइन। पोस्टिंग केना होइ छइ, सेहो बुइझ गेल छथि। अतुका पोस्टिंग त उनका एकटा MP करबेलकइन अइछ।ओना ओ ईमानदार मे गनल जाइ छथि। शुरू मे जखइन पोस्टिंग भेलइन त लत्ती फत्ती जोइड़कऽ कयेक लोक, संबंधीभऽ गेलखिन। आब पहिनेहे BN कहि देथिन जे पुरा जिले हमर संबंधी अइ। अयबाक मूल बात बताऊ। सब कियो कोनो ने कोनो काजेसँअबइ छलाह। ई नञि किनको मददयलेल कहलखिन नञि बाधे बनलखिन। तखनो लोककऽ सही काजभऽ जाइ। उनका तक पहुंच, लोकक लेल बड़का उपकार छलइ। नहियो चाहिते, जश बढ़इत गेलइन। पहिल बेर राखी मे एकटा गामक बहिन एलखिन। आइ तक त बिजयक हाथ सुन्ने छलइन राखीक लेल। कहियो कोनो बहिन नञि आयल छलइन आ ने बजेने रहइन। ईहो बहिनकऽ संबंध उनका फरिछायल नञि छलइन।तैयो नीक लगलइन। बहिनकऽ जाइ काल किछु टाका जे जेबी मे रहइन से देलखिन आ पी एकऽ कहलखिन जे इनका घर छोड़बा दियउन।अफसर सबहक जेबी मे कखनो बेशी पाइ नञि भेटत। बिजयक सेहो उएह हाल। पाइकऽ जरूरत परला पर अपन पी एसऽ लइ छलाह। बहिनक मोन खुशीसँफुलल जाइ छलइन। लाल बत्ती बाला गाड़ी मे पहिल बेर जीबन मे बइसली।मोने मोन खुब आशीर्वाद देलखिन बिजय के। आब देखू अगिला बरख राखी मे कयेक गोटे आइब गेलखिन। अइ बेर पी एकऽ कहलखिन जे टेम्पु वा रिक्शा पर बइसबा दियउन। किराया हमरा सलऽ लेब। बिजयकऽ आब बुझाय लागल छलइन जे सब संबंध पद आ पाइसऽ जुड़ल छइ। कतेक नेता, अफसर, डाक्टर, ईन्जीनियर, ठेकेदार, प्रोफेसर , पत्रकार सब उनकासऽ कोनो ने कोनो संबंध जोइड़ लेने छलाह। उनको सरकारी काज मे टटका सुचना सब अइ नबका संबंधी सबसऽ भेट जाइ छलइन।दुनु एक दोसरकऽ उपयोग करय छलाह। बरका लोक अपन इर्द गिर्द रहअ बालाकऽ केना काज लइ छइ, तइ मे बिजय निपुणभऽ गेल छलाह। उनकर गामक लग एक टा राज्यकऽ मंत्रीकऽ सेहो गाम छलइन। ओ ओतुका बिधायक सेहो छलाह। अपन बेटीकऽ बिबाह गामेसऽ क रहल छलाह। अइ बहाने सब वोटरकऽ भोज सेहोभऽ जेतइन। ई नेता सब सदिखन, की केलाहसऽ फायदा होइत, ओकरे जोगार मे रहइत अइछ। अइ बिबाह मे पटनासँकमिश्नर सेहो आइब रहल छलाह। तैं बिजयकऽ उपस्थिति अनिवार्य छलइन। बिजय गेलाह आ घुरती मे सोचलाह जे गामो चइल जाइ। बहुत दिनसऽ भेट नञि भेल रहइन। गाम बिना‌ खबरकऽ पहुंचलाह। बदरी आ रामरतिकऽ खुशीकऽ ठिकाने नञि।बिजय असगरे आयल छलाह। कनिया दिल्ली गेल छथिन। बिजय किछु कालक लेल आयल छलाह। माय कहलखिन जे आयल छह त रुईक जा।किछु गप्प करबाक अइछ। थोड़े कालक बाद दुनु माय बेटा एकांती मे बैसलीह। रामरति सब गाम घरकऽ गप्प कहलकिन। बिजय सेहो अनुभवकऽ रहल छलाह जे पहिने गाम पहुंचते कतेक लोक उनकासऽ भेट करऽ पहुंचई छल। अइ बेर भइड़ दिन बीत गेलइ कोनो कऊओ तक पुछारी करऽ नञि अलइन। सांझु पहर, बिजय सबहक घर भेंट करऽ गेलाह। उनका देखते देरी सबके मोन गदगद भेलइ। अगिला दिन बिजयकऽ जाइ काल भइड़ गऊंआ छोरऽ अयलइन। बिजय त दिन राइत तरह तरहकऽ लोकक बीच मे रहइ छलाह। ओ बुझि गेलाह जे गांठ कतऽ छइ। अइ बेर अपना संग माय बापकऽ सेहो नेने अयलाह। बिजय जखइन नौकरी मे आयल छलाह त उनका एक टा जनता फ्लैट कलकत्ता मे रहइन। आब जे ओ सरकारकऽ सलाना सुचना देलखिन ओइ मे महानगरक आठ टा घरक बिबरण छलइ।ई घर तक उनकर कनियाकऽ खोईंछ मे भेटल छलइन। आब जे सब इनकर बिरोधी छलइन ओकरा सबकऽ मौका भेंट गेलइ। बिजयकऽ आब बुझेलइन जे कतेक लोग उनकासँखार खा कऽ बइसल अइछ। अकर मूल छल- बिजयक बिबाह। उनकर जाइतक मंत्री, अफसर, बिधायक, बेबसायी आरो कतेक शक्तिशाली लोक कथा पठेने रहइन।ओ सब कथा नञि भेला सं, अपन बेइज्जती बुझलक। आ कारण तकइ छल। ई सम्पत्तिक लेखा जोखा रोज अखबार मे छपअ लगलइ। टेलिविज़न पर बिजयक आमद खर्च पर बहस होबऽ लगलइ। उनकर खिलाफ नारेबाजी आ हो हल्ला शुरूभऽ गेल छल। अइ आइग मे घीकऽ काज केलकइ ओहो भ्रष्ट लोग सब, जेकर गलत काज मे बिजय साझेदार नञि छलाह आ किछु उनके अफसर वर्गकऽ लोक, जे इनकर प्रसिद्धिसऽ जड़ई छल। अतेक ईमानदार‌ रहलाहकऽ बादो बिजयक खिलाफ राज्य मे माहौल बइन गेल‌‌‌ छलइन। बिजय केन्द्र मे डेपुटेशन पर आइब गेलाह। बदरी आ रामरति सेहो दिल्ली मे इनके संग रहअ लगलीह। बिजय गाम समाजकऽ त आब नीकसँबुझअ लागल छलाह लेकिन बदरी त अइ सबसँअंजान। बदरी त गामो मे असगरुआभऽ गेल छल। तैं अइ बेर ओ खुशी खुशी दिल्ली मे रहअ लागल। दुनु बेकत मे ज्यों घरबाला बेशी सुन्नर रहइ छइ त एहन मे ओकर कनिया बड्ड आज्ञाकारी आ देखभाल करऽ बालाभऽ जाइ छइ। अतउ बिजय देखिते ततेक सुन्नर छथि आ कनिया उनका सामने बेश दबऽ । बिजयक कनिया अइ कमीकऽ अपन बेबहारसऽ भरने छथि। कियो कहि नञि सकइत अइछ कि अतेक पाइ बालाकऽ बेटी। जेकरा कहइ छइ ".सर्वस्य समर्पित" से हाल छलइन। बिजयकऽ पुरा खुश रहबाक प्रयास करय छलखिन। बिजय आब पिछला जिनगी बिसरल जा रहल छलाह। आब कियो कहलकइ जे चारिम पीढ़ी मे दिन त घुमत मुदा संग संग डीह सेहो बदलत। आब कि बिजयक बच्चा घुइड़कऽ गाम जेतइ। कथमपि नञि। आब बिजय दिल्ली बालाभऽ गेलाह। ईएह उनकर डीह डाबर भेलइन। पीढ़ीकऽ चक्र, ई सांप सीढ़ीकऽ खेल जकांभऽ गेल छइ । क्षण मे ऊपर, क्षण मे नीचा। बगलकऽ गामबला जे मंत्रीजी छलखिन, उनका बिजय अपन घर आ बंगलीकऽ बेचबाक भारदऽ देलखिन। डीह नञि, आब घरभऽ गेल छइ। सही दामक इंतजार छइन। घरारीकऽ बोली लाइग गेलइ। आब बिजयक घरकऽ पता भेलइन- मकान नं-420, नञि दिल्ली। पैबंद (छअम भाग) बिजय आब दिल्ली मे रहनाई शुरूकऽ देने छलाह। अइ महानगरकऽ उनका अनुभव नञि छलइन। कलकत्ता आ बंगलोरे उनका जीवन्त शहर लगइन। अतऽ आइबकऽ त ओ गुमभऽ गेलाह। आब बुझेलइन कि लोक दिल्ली अबइ लेल किअए आफनतोड़ने रहइया। गाम बला घर आ गाछी सब बिका गेलइन। अइ मे ओ मंत्री बड़का गेम खेलेलक। पिछला चुनाव मे बिजयकऽ दिअयदीसऽ ओकरा वोट नञि पड़ल रहइ। अखनो जाइतक समीकरण मे ओकरा वोट भेटअ बाला नञि छइ। ओ बिजयकऽ नीक गहकीकऽ बारे मे बतेलकइन आ सब पाइ पहिनेहेदऽ देलकइन। पाइ, बजार भावसऽ बेशी छलइ, तैं बिजय पुछताछ केनाई उचित नञि बुझला। जखइन रजिस्ट्री करऽ पहुंचला त देखलाह कि ओ त उनके गामक छट्टल बदमाश सोलकन अइछ। अकरा पर कै कीत्ता मोकदमा चइल रहल छलइ। गलत काजकऽ क पाइ जमाकऽ नेने अइछ। एको टा कुकर्मसँई बाचल नञि अइछ। आब मुदा अपन समाज मे पाइ खर्चक बदला मे जगह बना नेने अइछ। मंत्री जीकऽ चमचा - बेलचा छल ओ। अकर ईनाम ओ दिअय देलकिन। पढ़ल लिखल लोक सेहो कयेक बेर कनीक फायदा लेल अइ सब मे फंईस जाइ अइछ। चिट-फंड कंपनी सब ईएह छइ ने। बेशी फायदा शुरू मे दइ छइ। बस अपन सर्वस्य लोक बेशी फायदा लेल फंसा दइया। ओकर बाद कम्पनी बंद- घोटाला उजागर। अऊ बाबु, जखने कियो बेशी फायदा दियय त बुअइझ जाऊ, किछु राज छइ। बिन कारण टिटही नञि बाजय। मुदा सब किछु बुझितो लोक तात्कालिक फायदा कलऽ क फंईस जाइत अइछ। अतऽ देखू ने, बिजयसऽ बड़का अफसर के? पाइ कौड़ीकऽ सेहो कोनो कमी नञि। तखनो एहन आदमीसँकबालाकऽ रहल छइथ जे कतउसँउनका लेल सही नञि। रजिस्ट्री अफसरकऽ सेहो आश्चर्य लगलइ जे साहेब ककरा हाथे‌ बेच रहल छथि। आब ऊपाये की। मंत्रीजी अपन एकटा आदमीकऽ पठौने छलाह- ओइ सोलकन संग। बिजय रजिस्ट्री आफिससँपटना लेल घुरी गेलाह। चट दं गाड़ीकऽ दुनू शीशा उठा लेलाह आ किछु पढ़अकऽ नाटक करऽ लगलाह - ककरोसँआंईख नञि मिल जाय। आब बिजयक घर मे ओ सोलकनमा रहत। ई घर सब दिअयदक बीच मे पड़इ छइ। आइ तक कियो दोसर जाइत अइ मे एको धुर नञि कीनने छल। ज्यों किछु बिकेबो करय त आपसे मे सबकऽ लइ छलाय। मंत्रीजी बदला लेलक कसिया कऽ । बिजय दिल्ली आइब गेल छलाह- डीहक रजिस्ट्री सोलकन संकऽ क। बदरीसँपुछनाईयो उचित नञि बुझला। फोन परकऽ गप्प सुअइनकऽ बदरी आ रामरतिकऽ ई बुझा गेल छलइन जे बेचऽ जा रहल छथि। आब उनकर सबहक सबटा भार त बिजय उठेने छथिन- तखइन कथीकऽ पुछा-पुछी। घर मे सन्नाटा पसरल छइ। बिजय आइ तक किछु बेचने नञि छलाह। ई काज उनको ठीक नञि बुझेलइन। पाइलऽ क की करताह। कथीकऽ कमी छलइन। रामबाबू कतेक जतनसँई घर बेटी जमाय ले बनबौने छलाह। सब वस्तु एक नम्बरकऽ लागल छलइ। अकर नक्शा अपने इंजीनियर साहेब कतऽ जाकऽ फाइनल केने छलाह। रामबाबूकऽ ई निशानी छलइन। बिजयक कनिया तनुजाकऽ सेहो दुख भेलइन। ओहो घर मे कहियो बेचऽ बाला गप्प नञि सुनने छलीह। सबकऽ अपन अपन याद जुड़ल छलइ। रामरति केना दुरागमनकऽ क अइ घर मे आयल छलीह। पहिने रिक्शा पर नैहरसऽ बिदा भेलीह। फेर घर लग आइबकऽ महफा मे बइसल छलीह।ओना नैहरसँसीधा महफोसँआइब सकइ छलीह। ओ महफा बाला बेशी पाइ मंगलकइ। ताई लेल रिक्शा कयल गेलइ। रामरतिकऽ नैहर अर्थक हिसाबसँबड पातर। सौराठ सभासऽ बिबाह ठीक भेल छलइन। शुद्धक अंतिम दिन छलइ। नञि बदरीकऽ कोनो कथा आयल रहइन आ नञि रामरतिकऽ बाबूकऽ कोनो ठेहगर कथा अभरलइन। अंतिम दिन एकटा घटक कहलखिन जे ई बदरी बाला काजकऽ लियअ। बिबाहक खर्च टा लागत। रामरतिकऽ बाबूकऽ जेबी मे एको नबका पाइ नञि। फेर जेना तेना सब भेलइ। अहिना होइ ओइ जमाना मे । ककरो बेटी कुमाइड़ नञि छुटई-सबके घर बर होइ। बाकी त अपन भाग। एक बहिन सासुर हाथी पर जाइ आ दोसर कतऽ सब दिन चुलहो नञि जड़ई। रामरतिकऽ नैहर मे भीतक घर रहइ। अतऽ त कच्चा ईंटाक घर छलइ। नैहर मे बाबूकऽ दुटा घर भीतक अलावा किछु नञि, अतऽ त छोटे छिन गाछी त रहइ, बंसबिट्टी सेहो छलइ। ओना संझिया पोखइड़ मे दु पाइ ओकरो सबकऽ हिस्सा छलइ। लेकिन फरछायल नञि रहइ। सभा मे कियो कहलकइ ओकर बाबुकऽ जे बरकऽ जथा पात नञि छइन। ओइ पर ओकर बाबु झटदऽ कहलकइ जे दुत्ती बर त नञि छइ, कोनो अंग भंग त नञि छइ, सऊतिन तर मे त नञि रहबाक छइ। देह-दशासऽ स्वस्थ छइ। अपने कमेतइ खेतइ। बाकी अपन भाग। आइ सब टा गप रामरतिकऽ याद पड़इ छलइ। आंईख मे नोर भइड़ जाइ। ऊयाह हाल बदरीकऽ रहइ। कनिया बाबी बाला सब गप याद पड़इ छलइ। आब अफसोस होइ की उनके लिख देतियइन। बिजयक बिबाह‌ मे त ऊयाह एक पैर पर ठाढ़भऽ क सब समहारलीह। आब लोक की कहइत हेतइ-गाम मे। सब थु थु त करीते हैत। ई सब काज बिजय भाबना मे बहिकऽ केला। दु चाइर दिन कनी मातम जेकां छलइ। सब दुखी छल। कियो अइ बिषय मे ककरोसँचर्च नञि करय। सबकऽ सब गप बुझल। ओना मंगनी त कियो देलकइ नञि आ नञि कियो जबरदस्ती छिनलकइ। अपने सोइच समइझकऽ निर्णय लेल गेल, फेर अतेक पश्चाताप कियैक। ईएह छइ‌ लगाव। जतऽ जतेक स्नेह ओतऽ टुटला पर ओतेक टीस। समयसँपैघ किछु नञि।सब आब ओइ बातकऽ बिसइड़ गेल। जीवनक पहिया आगु बइढ़ रहल छल। बिजय आब गोल्फ खेलाय लगलाह अइछ। शूरू मे त शइन आ ड़इबकऽ खेलाई छलाह। आब त बेशी काल औफिससऽ सीधा गोल्फ कोर्स चइल जाइत छइथ। ओतऽ सऽ देरीसँघर घुड़इत छइथ। कनिया तनुजा सेहो किट्टी पार्टी सब मे सदिखन जाइत रहइत छइथ। कहियोकऽ इनको घर पर सब अबइ छइन। जहियाकऽ इनकर घर पर पार्टी होइ छइ तहिया त बुझु बदरी आ रामरतिकऽ जेलो मे जेल। एक कोना मे चुपचाप परल रहइ छथि दुनु गोटे। बिजयकऽ दु टा बेटा भेलइन। जन्मो ओकर सबहक मातृक मे भेलइ आ लटकल सेहो ओम्हरे बेशी रहइत अइछ। जखइन बिहार मे पोस्टिंग रहइन त उनका सबहक हिसाबे ओतऽ स्कुले नञि छइ। जतऽ नानाकऽ फैक्ट्री छइन हिमाचल मे, उम्हरे कतउ ओहो सब पढ़ई छथि। बिजय लग कम अबइ छथि। छुट्टी मे सेहो मातृके। बदरी लेल सब धन सन। जतऽ रहैथ नीके रहैथ। कलकत्ता मे कतेक नौकर चाकर रहइन। अतऽ त एक्के टा छइन, उएह खेनाईयो बनबइ छइन आर बजारो हाट करय छइन। कयेक बेर बिजयक ससुर चाहलकिन जे किछु नौकर चाकर पठा दइलाय। बिजय अकर सख्त बिरोधी। बिहार मे जे उनकर खिलाफ अखबार बाजी भेलइन, ओइसँओ हरदम सचेत रहइ छथि। बेटा सब पैघभऽ रहल छइन। बिजयक बारे मे कोनो भी अनट सनठ समाचार, ओकरा सबकऽ दिमाग पर खराब असर करतइ। ओ तनुजाकऽ बुझबइत रहइ छथिन जे ओ ऐना नञि करु। बदरी आ रामरति, बऊक बहीर जकां परल रहइ छथि। आब जाइथ त कतऽ जाइथ। कलकत्ता वाला जनता फ्लैट तहिये बेच लेने रहइत। गाम सेहो सुड्डाह। आब की रास्ता। कोना मे परल रहइ छथि। चलनाई फिरनाई छुअइट गेल छइन। मोनो खराबे रहअ लगलइन। उनका सबकऽ हिदाइत छलइन जे जखइन बाहरकऽ लोक वा किट्टी पार्टी होइ तखइन बहरी घर मे नञि अबइ लाय। ओना, नञि कोनो रोक छलइन। असली गप जे समये नञि छलइ ककरो लग। बदरी आ रामरति अपनाकऽ बिजयक घरक पैबंद बुझअ लागल छलाह। पैबंद (सातम भाग) बिजय आब बेशी काल घरसऽ बाहरे रहइ छलाह। तनुजा सेहो अपन सखी बहिनपा मे व्यस्त छलीह। कहियो काल गाम समाजकऽ हरायल भुतियाल कियो पहुंच जाइ छलइन- बदरी आ रामरतिकऽ जिगेसा मे। ज्यों आगंतुक किछु सलाह तनुजाकऽ बदरीकऽ बारे मे दइ छलखिन त उनकर नाक कान लालभऽ जाइ छलइन- आ उनका चाहो पर आफत। एहन देहक स्थिति रामरतिकऽ नञि रहइन जे ओ अपने उईठकऽ बना लइतइथ। नौकरबा त अपने देहचोर रहइन। जाबइत कियो कहितइ नञि -ओ नञि उठितय। दस बेर त तमाकुए खाय बालकोनी मे जाइ छलाय। ओना सामने बला घरक काजबालीसँओकरा घुट्टा सोहार छलइ। जखने मौका लगइ, गप्प करबाक मे लाइग जाय। घर मेकऽ ओकरा किछु कहितइ। ओ बुइझ गेल छल जे बदरी आ रामरतिकऽ जेहने रहने, ओहने नञि रहने। नौकर चाकरकऽ ई बुझबाकऽ शक्ति भगबान तरफसँअद्भुत भेटल छइ- कोन‌ पाहुनकऽ केहन आगत स्वागत होइन। कयेक लोककऽ त बिना चाहेकऽ जाय पड़इ छइन। आर नञि किछु त तखने बाथरूम मे घुअइस रहथ आ जखइन बुझा जेतइ जे पाहुन गेलाह, तखने निकलथ। ऊपरसऽ बजबो करत- जाह चइल गेलाह। हम त काफी बनबऽ जाइ छलऊं। सुइनकऽ त आइग लाइग जाइन बदरी के। मूदा उपाये की। बुझई छलाह जे कतेक परेशानीकऽ क दिल्ली मे कियो अबइ छइ। अपन बुझलक तखने ने आयल। आ अतबोसऽ ओ गेल। आब कम्मे उमेद जे ओ फेर आऊत। ईएह त तनुजा आ नौकरबा दुनु चाहइ छलाह। बिजयकऽ इमहर अपन साढ़ु कतऽ उपनैन मे जायकऽ मौका लगलइन। बड्ड नीक लगलइन ओतऽ ।दुनु दिशक लोक आयल छलइन। जगक सफलता अही पर ने, जे कतेक दुरक कुटुम्ब अयलाह। उनको सेहन्ता भेलइन कि हमरो बेटा सबकऽ उपनैन अहिना करी। जखइन बेटाकऽ स्कुल मे छुट्टी हेतइन, ओइ समयक दिन देखेबाक लेल पंडी जीकऽ कहलखिन। बदरी-रामरति त खुशीकऽ मारे पागल भेल छइथ। पहिल खुशी जे बेटा उपनैन बुझलखिन दोसर अइ मे कतेक लोकसँभेट होइत। बिजयकऽ उपनैन त ओ कपलेशर मे जाकऽ करौने छलाह। या त मनौती रहइ छइ या खगता रहइ छइ- लोक कपलेशर मे करयया।कऽ सब आइत, कतऽ रहत, केना भोज, की बिदाई,कऽ बनत ब्रह्मा, हजमाकऽ बेबसथा, केशक भसान आरो कतेक तरहक गप्प। पंडीजी ततेक चलता पुर्जा छल जे ओ सबहक संपर्क मे। ओकरे बेशी इमहरका भार देल गेलइ। बदरीकऽ सासुर दिशसऽ आयल छल, तैं तनुजाकऽ ओकर योग्यता मे कोनो संशय नञि छलइन। आब एकटा समस्या आइबकऽ सोझा ठारभऽ गेलइन। बरुआकऽ आचार्यकऽ बनत। कतऽ दन अपने खानदानक लोक बइन सकइ छइ। बदरीकऽ त गामसऽ संबंधे नञि। ओना पंडी जी कहलखिन जे शास्त्र मे सबहक बेबसथा छइ। कुशक आचार्य बइन जेताह। ऊपरसँसीताजी बला खिस्सा सेहो सुना देलखिन जे कोना कुशक बनाओल गेल छलइ। ई पंडीजी त संकटमोचन बनल जाइ छलाह। सब समस्याकऽ समाधान अपन पतरा मे रखने छलाह। उनकर मोजर हर जतरा मे बढ़ल जा रहल छलइन। रामरति एक दिन जखइन नञि कियो रहइ त पंडीजीकऽ कहलखिन- एहन कतउ भेलइ अइछ। कुशक आचार्य।। -आहां करौने छी एहन‌ उपनैन। पंडीजी चुप। रामरति आगु बिजली -आहां अपन जे मोन होइया करू बिजयक संग। मुदा कुशक आचार्य बाला सलाह नञि दियउन। आचार्यकऽ अलग स्थान होइ छइ। ओकरा मरला पर कर्ते जेकां चेलाकऽ सेहो कयेक कर्मक बिधान छइ। एक बेर गाम मे समाद देथिन बिजय। कियो ने कियो गछबे करतइन। पंडीजी त बुझिते छलाह ई सब। पंडित लग ज्यों समाधान नञि त लोक पंडित बदइल लइत अइछ। पंडीजी जजमानक खुशीकऽ लोकाचार कहइ छथिन। बिजयकऽ अयलाह पर पंडीजी कहलखिन- कियो अपन लोक आचार्यभऽ जाय त उत्तम।कुश वाला अंतिम, ओना निखिद्ध नञि। बिजय तखने कनिया बाबीकऽ बेटाकऽ फोन केलखिन आ आचार्यकऽ भार देलखिन। ओ सहर्ष गइछ लेलखिन। आरो दिअयद बादकऽ उनके जिम्मा देलखिनलऽ क अबइ लेल दिल्ली। सासुरबाला बरका लिस्ट छलइन। गामसऽ लोक आइत आ दिल्ली मे जे सब संबंधी छैत ओ नञि रहताह त केना दन लगतइ। सबहक‌ कतऽ बिजय दुनु बेकत गेलाह आ उपनैनकऽ लियैन कैलाह। असली बात त ई रहइ जे उनकर साढ़ुकऽ गऊंआ बड्ड आयल रहइन उपनैन मे। बिजय ओइसँकोन कम। डेकसी आ इड़खा, मनुक्खक सोभाव छइ।सब मे कमोबेश रहइ छइ। नीके कहू एकरा। अही बहाने सबसँभेट भेलइन। पहिल बेर संबंधी सबहक घर गेल छलाह। कियो नीको स्थिति मे छलाह आ कियो लचरलो त कियो संघर्षो। किछु जगह त गाड़ी जयबाक रस्तो नञि छलइन। ड्राईवर कहबो केलकइन- साहब पता नहीं कहां कहां संबंधी का घर ढुंढकऽ जाते हैं। बिजयकऽ जाइते मातर देखल सुनल एरिया लगलइन।बुझेलइन जे ओ एतऽ आयल छथि। दिमाग पर जोर देलाह त याद आइब गेलइन जे अहिना त उनकर कलकत्ताकऽ जे जे कलोनी छल। जे जे कलोनी कलकत्ताकऽ होअइ या दिल्ली या बंगलोर, एक्के रंग लोक आ एक्के रंग सब ताम झाम बेबसथा। कोठी बाला मोहल्ला मे से समानता नञि भेटत। "मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना " वाला हाल रहइ छइ। नञि दु लोकक बिचार मिलतइ आ नञि घर। उपनैनक दिन आइब गेलइन। एकटा घरे लगक मंदिर मे उपनैनक जगह निश्चित छलइन।सासुर बला आ अपन गाम बला दुनु पाहुनकऽ रहअकऽ फराक बेबसथा छलइन। ई सब मंदिरक लगे छलइ। टहलइतो आइब सकइ छी। तखनो दु टा गाड़ी दूनु जगह लागल रहइ- पाहुन सबहक सुविधा लेल।पंडी जी एक्के दिन मे उद्योग, चरकुट्टा चरकुट्टी, माइट मांगर, कुमरम सलऽ कऽ उपनैन तक करा देलखिन। एकऊ टा बिधि छुटअ नञि देलखिन। जयंती जनता एक्सप्रेस बनल छलाह पंडी जी। ऊपरसँकोल्ड ड्रिंक ब्रेक्स सेहो। सब खुशी खुशी भेल। आइ कम्मे ब्राह्मण भोजन छलइन। पंडी जी विद्यापीठसऽ बजौने छलाह। गाड़ी पठौलकिन, आ सब एक संगे आइब गेल। बरूआ हाथे सब ब्राह्मणकऽ दक्षिणा सेहो दियेलखिन। ब्राह्मण सब दक्षिणा भेटलाकऽ बाद खुब प्रशस्त मंत्रोच्चारकऽ संग आशीर्वाद देलखिन आ बिदा भेलाह।बिजय अपने एकटा आचार्य बइन गेल छलाह ई सब झंझटसँबचबा लेल। तनुजा, पंडीजी आ बिजयक एकटा सासुरक लगुआ भगुआ सब बेबसथासऽ जुड़ल छल। असली गप त काजक बाद निकलइ छइ। आब ई भेद खुजलइ जे बिजयक सासुरक लोक लेल एसी गेस्ट हाउस आ इमहरका संबंधी लेल धर्मशाला जेकां होटल। ऊमहर नौ छौकऽ बेबसथा आ इमहर सुखा-सुख्खी। उमहर बाला सबकऽ बिदाई मे पटोर आ ब्रासलेटक धोती आ इमहर चांदनी चौकक फुटपाथी कपड़ा लत्ता। उमहर बालाकऽ पुछारी पर पुछारी, इमहर कोनो ऊचावर्च नञि। नञि खाईकऽ कोई पुछअ बाला आ नञि कोनो आरे बार्ता। बदरी आ रामरति निरीह जकां‌ बइसल देखइ छलीह। ओ सब त अतबेसऽ प्रसन्न जे हमर पोताकऽ उपनैन त भेल। चारिम दिन रातिम छल। ओहि दिन दिल्ली बाला आन समाज आ बिजयक अतुका लोकबेदकऽ भोज नञि, पार्टी छलइ। अइ मे सब तरहक बेबसथा रहइ। गाम बला लोक सब सेहो शामिल भेल अइ पार्टी मे। जेना घुरती बरियातीकऽ कियो पुछइ नञि छइ। भेल बियाह मोर करताह की। आब त उपनैन‌भऽ गेलैन। शोभा सुनर अपना अनुसारे पुरा छलइन। आब किनको कुनो पुछारी नञि। लोक बिजय कतऽ सऽ बिदाभऽ क, आन आन संबंधी कतऽ चइल गेल। बिजय सेहो केना गामक लोकक भावनासऽ खेलेलाह- से देखू। कनिया बाबीकऽ बेटाकऽ आचार्य बनबा काल कहलखिन - जेना बाबी हमर बिबाह कलकत्ता आइबकऽ सम्हाइड़ देली, ओहिना आहां आइबकऽ हमर बेटाकऽ उपनैनकऽ जग सम्पन्न कराऊ। हमरा आहांकऽ छोड़ि क,कऽ अप्पन अइ। आइ तक बिजय किनको काज मे बिहार मे रहितो नञि उपस्थित भेल छलाह। कोन मुंहे ककरो अयबाक अपेक्षा रखितइथ। सब किछु बुझितो, गामक लोक आयल। फेर ओकरा सबकऽ उपयोग, अपना सेहन्ता पुरबइ लेल,कऽ लेल गेलइ।अइ उपनैनक बाद फेर कहियो कोनो संबंधी कतऽ बिजय वा उनकर परिवार नञि गेलइन। किछु लोक जे आदतसँमजबुर अइछ, हांजी हांजी करऽ मे, ऊयाह सबकऽ एकदिसाह संबंध छइन। गामक लोक अइ उपनैन मे अपनाकऽ पैबंद जेकां बुझई छल।फेरो छला गेल ओ सब। ईएह छइ समाज।आइये नञि, सबदिना ईएह रहिलइ अइछ। कहियो कनिया बाबी लेल बदरीकऽ जे स्थित छलइन, उयैह आइ बदरीकऽ बेटाकऽ लेल, कनिया बाबीकऽ बेटाकऽ स्थित छइन। जेकरा जेतऽ , जे भेटई छइ, दोसरसँफायदा उठबऽ कऽ ताक मे रहइ छइ।ई अर्थे तक सीमित नञि अइछ, अकर दायरा बढ़ल जा रहल अइछ।कहावत छइ- "मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं"। आब बिजय आ तनुजा,किनको नञि चिन्हइ छथिन। बिजय त टोकला पर लोक लाजे हाल चाल गऊंआकऽ पुछियो लइ छथिन। तनुजा त टोकलो पर कहइ छथिन- "हम नञि चिन्हइ छी"। लोक कहइ छइ जे तनुजाकऽ असली रुप आब बाहर एलइन अइ। ओ त बिजयक कारण, बदलल बदलल छलीह।आब बिजयकऽ समग्रसऽ काइटकऽ अपन आंगुर पर नचा रहल छथि। भोजपुरी मे सेहो तनुजा जेकां लोक पर कहल गेल छइ- " सियरा उहे बा, रंग बदलले बा"। बदरीकऽ होइ छइन जे अइ जीबनसऽ मरले नीक। जे सब कहियो नञि सोचलाह, से सब भगबान पुराकऽ देलखिन। आब जे चाहइ छइथ, ओइ पर किछुओ नञि। भगबानोकऽ लीला अपरम्पार। केकरा परतापे सब नीक भेलइन, आ केकरा सरापे ई दुर्दिन भेलइन- सोचइत दिन घसियाड़इ छथि। पैबंद (अंतिम भाग) १ बिजय घर मे कम्मे काल रहअ लगला अइछ।‌देर राइत घर अबइ छथि। पैर डगमगाइत रहइत छइन। कखनोकऽ ड्राईवर सेहो हाथ धेने रहइ छइन। आइबकऽ सीधे बेडरूम मे चइल जाइ छथि।बेशी तर रतुका खेनाई बाहरे खाकऽ अबइ छथि। तनुजा सेहो कयेक बेर इंतजारकऽ क सुइत रहइ छथि। बिजय लेल एक्के लोग जागल रहइ छइन घर मे। ओ छथि रामरति। बच्चेसँजाबइत बिजय नञि अबइ छलाह, ओ अपनो नञि खाई छलीह। अखनो खिड़कीकऽ शीशासँतकइत रहइ छथि। जखन बिजय आइब जाइ छथि, तखने बिछान पर परऽ जाइ छथि। बिन बिजयकऽ देखने निन्ने नञि होइ छइन। बिजय, रामरतिकऽ घरक बत्ती जड़इत देखकऽ बुइझ जाइ छथि जे मां जागल छथि। तनुजाकऽ सुतल देखकऽ त पहिने फझइत‌ करय छलखिन लेकिन धीरे-धीरे किनको किछ नञि कहइ छथिन। रामरतिकऽ बुझाई छइन जे बिजय, बदरी जेकां नशा करऽ लगला अइछ। बदरी जहिया नशाकऽ क घर घुरय त सटक सीतारामभऽ जाय। चुप्पी सधने रहय। बाजत त मुंह महकतइ, तैं चुप्पे रहय। बिजय पर ओकरा बिशबास नञि होइ छइ जे ओ निशा करताह। तनुजा बेटा सब लग गेल रहइत। सुतली राइत बदरीकऽ छाती मे दर्द उठलइ। रामरति तेल मालिशकऽ देलकिन। किछु आराम भेलइ। फेर कनी काल बाद बड़का उल्टी बिछाने परभऽ गेलइ। रामरति जाय लागल बिजयकऽ ऊठबइ लेल त बदरी ओकरा मनाकऽ देलकइ। ओकर बाद ओकर हाथ पकइड़कऽ कानऽ लगलइ। आब हम जा रहल छी। जमराज ठार छथि। तौं बिजयकऽ देखियौन। ई अनट बिनट गप सुअइनकऽ रामरति डरा गेल। कहबो केलकइ जे ऐना किअए बजई छं। ठीकभऽ जेबह। पहिल बेर कोनो दुखित परलह अइछ। गैसभऽ गेल हेतह। तैं ऐना उल्टी भेलह। बाईज त देलक रामरति, मुदा ओकरा लक्षण ठीक नञि बुझेलइ। ओ बिजयकऽ जा कऽ उठेलकइन। बिजय कहूना उईठकऽ एलाह। नौकर सेहो ऊठल। बिजय तुरत्ते डाक्टरकऽ फोन केलखिन। ओ आयल लेकिन ताबइत बदरी देह छोड़ि चुकल छलाह। तखने तनुजाकऽ फोन भेलइन। भइड़ राइत रामरति आ बिजय, बदरीकऽ लाश‌ लग बइसल रहल। आंईखसऽ नोर झड़इ लेकिन दुनु गोटा मे ककरो मुंह नञि खुजई। मोन करय रामरतिकऽ भोकासी पाइरकऽ कनञि के, अतऽ कऽ सुनतइ। बिजयकऽ अपने दहो बहो नोर खइस रहल छलइन। भोर भेल। किछु बिजयक कलोनी बाला आ आफिसक लोक आयल। तनुजा असगरे घुरलीह। बेटा सबकऽ नञि अनलखिन या नञि अयलइन, सेकऽ पुछतइन। दस-बारह लोक श्मशान घाट गेल। ओ उपनैन बाला पंडी जी सेहो पाछुसऽ दौरल एलाह। बिजयक कन्हा पर उतरी परल छइन। बिजयकऽ मोन भेलइन जे गाम मे सबकऽ खबर तकऽ दी। तनुजा चट ज़बाब देलखिन जे देखलियई उपनैन मे केहन लीला ओ सब केने रहय। कुनु काज नञि छइ- ओकरा सबकऽ बजबय के। बिजय मौनभऽ गेलाह। रामरति सकऽ पुछइया। पंडीजी फेर संस्कृत बिद्यापीठसऽ ब्राह्मण सबकऽ बजेलाह। एकादशा-द्वादशा मे ऊयाह सब आयल। कहूनाकऽ दरिद्र सबकऽ जेना कर्म सम्पन्न भेल। रामरति त एकदम्मे असकरुआभऽ गेलीह। बदरीकऽ टहल टिकोरा मे समय बीत जाइत छलइन। ऐना जीबन पहाड़ लगइन। बदरीकऽ पहिल बरखीसऽ पहिनेहे रामरति मइड़ गेलीह।उनका ई चिंता छलइन जे बिजय, बापक बरखी करताह की नञि। ओ पंडीजी उनका बुझबइ छलइन जे जे बजट होइन बरखी के, से बिजय उनकेदऽ दऊथ। ओ अपनकऽ देतइन। रामरतिकऽ ई सब ठीक नञि बुझना जाइ छलइन। ओहीसऽ परेशान रहइ छलीह। उनका त ई पंडित एक रत्ती नञि सोहाइन। तनुजाकऽ ओ ओहिना प्रिय। बजई जे छलीह-हंईस हंईस क- बाह रे पंडीजी, आहां त हमरा सब समस्यासऽ ऊबाइड़ लइ छी। रामरति मोन मे बजइत- कपार उबारतइन। बिजयक पाइ ठगइ छइन ई पंडितबा। बिजयकऽ साफ कहब छलइन जे माय घर मे असकर नञि रहत। अइलऽ क तनुजा, बहिन कतऽ वा नैहर नञि जा पबइ छलीह। आइसऽ उनका रामरतिकऽ अरूदा, पहाड़ लगइ छलइन। फोन पर कतेक बेर बजइत रामरति सुनने छलीह जे ई बुढ़ी नञि जानी कहिया टघरती। कतेककऽ अंकुरी खेतीह। रामरतिकऽ देह सिहइड़ जाइन ई सब सुअइन क। सोखा बाबा आ भगबतीकऽ गोहरबइत जे आबलऽ चलु। ज्यों बिछान पर पइड़ जायब त ई पुतोहु जीते माइड़ देत। भगबती सुनलकीन। सुतले रही गेली रामरति। चलिते फिरते चइल गेलीह।अगल बगल बाला उनका भागमंत कहइन। असली त उनके बुझल। बिजयकऽ बापक श्राद्धक अनुभव छलइन। अइ बेर सब चटपटभऽ गेलइन। पंडीजीकऽ जे संग छलइन। बिजयकऽ बेटा सब बाबा-बाबीकऽ किनको काज मे नञि आयल। ओ सब नाना नानी आ मौसा मौसीकऽ अलावा कोनो आर संबंधी होइ छइ, से बुझबे नञि केलकइ। बाकी सब लोककऽ अंकल आंटी मे ओ राईख लइ छेलाह। दुनु बेटा पारा पारी बिदेश गेल। एक टा पढ़ई लेल आ दोसर नौकरीकऽ लेल। छोटका जे पढ़अ गेल छलइन से ओतइकऽ अपनासऽ पैघ लड़कीसँबियाहकऽ लेलकइन। बिबाहक बाद बिजयकऽ खबर केलकइन। अतबे नञि, भारतक नागरिकता सेहो छोअइड़ देलक ओ। जेठका बेटाकऽ बियाह बाद मे भेलइन। अइ मे अतबे संतोख जे लड़की भारतीय त कमसँकम रहइन। अइ बिबाह मे बिजय गेल छलाह। बिजयकऽ ई सब बेटाकऽ फैसला सही नञि लगइ छलइन। तनुजाकऽ सब बुझल छलइन ओ बिजयकऽ नञि बतबइत छलखिन। उनकर पुर्व सहमइत छलइन। आब तनुजा, दिल्ली आ बिदेश अबइत जाइत रहइत। बिजय पर उनकर कोनो ध्यान नञि। कखनो अइ बेटा त कखनो ओइ बेटा। आइ देश त ओइ देश, अही मे ओझरायल रहलीह। बिजय अबसाद मे चइल गेलाह। लंबा छुट्टी पर जाय परलइन।ककरो मोनक गप कहि नञि सकइ छलाह। तनुजा बेटा पर ध्यान देलीह लेकिन बरकऽ गांठ नञि बुअइझ पेलीह। ईएह सबकऽ बीच,बिजय असगर अस्पतालकऽ बेड पर, अइ दुनियाकऽ छोड़िकऽ चइल गेलाह। एकटा उठइत घर, धरधराकऽ ढही गेल। अइ भीड़ मे सब ई परिवार कऽ बिसइड़ गेल। अप्पन लोकक आदेश छल जे मैथिल बड्ड आशावादी होइत छइथ। किछु बाम भईयो जाइ छइन तऽ ओकरा "लिखल" माइनकऽ स्वीकारकऽ लइ छइथ। पैबंदक अंत "नीक" होबाक चाही। २ बिजय बाबुकऽ मरलाकऽ बाद आब एकटा नब समस्या सोंझा एलइ। सासुरक जे अतेक सम्पइत छलइन .......ओकर व्यवस्था केना होइ। तनुजा त ललबबुनी छलीह। उनका लोक ठकनाई शुरूकऽ देने छल। नञि ठीकसँमकान सबसँकिराये अबइ छलइन आ नञि नैहरक जमीनसँउपजा बारी। जे कमतिया आ देबानजी सब छलखिन सब झूठ फुस कहिकऽ बहलबइ लागल छलखिन। बिजय बाबुकऽ रूतबाक आगु सब ठीकसँचइल रहल छलइ। आब कखनो अइ जमीन पर झंझट त कखनो ओइ जमीन पर, ईएह सब समाद अबइत छलइन। नैहर जईते सब समस्यालऽ कऽ आइब जाइ छलइन। तंगभऽ गेल छलीह तनुजा। होइन जे बिजयकऽ जाइते सब श्रेयंश खत्मभऽ गेल होइ जेना। एक बेर त हद्देभऽ गेलइन। समाद एलइन जे पटना बला मकानक किरायादार घर खालीकऽ देने अइछ। दोसर आइत त घर देल जेतइ। तनुजा दिल्ली अयलाकऽ बाद कहियो पटना वाला मकान देखहो नञि गेल छलीह। एकटा सबंधिये किराया वसूल कऽ आगु- पाछु पाइ पठा दइ छलखिन। दस महीनाक बाद ओहिना मोनभऽ गेलइन, त पटना गेलीह। घर पर जाइ छइथ त देखइत छथि जे किरायेदार त अछिहे। अगल बगलसँपता लगलइन जे घर कहियो खालीये नञि भेलइन। आब त उनका संबंधी सब परसँबिसवासे उठअ लगलइन। सब लुटहे लागल छलइन। एहन बिसवासी लोक , एना झुठ बाईजकऽ पैसा ठगत.....सोइचकऽ परेशानभऽ गेल छलीह। सब बात दुनु बेटा कऽ कहलखिन। बड़का बेटा बिपुलकऽ गाम घरसँलगाव बुझेलइन।छोटका विनयकऽ ओतेक मतलब नञि, अइ सब सं। महीना दिनक भीतर बिपुल सपरिवार भारत अयलाह। तनुजाकऽ संग बिपुल आ उनकर कनिया सब संपइत सब देखलाह। ओकर बाद मातृक गेलाह। गाम मे त किछु छलहेने नञि, तैं नञि गेलाह। आब अफसोस भेलइन जे एकटा ठांवो रहितै गामो मे। "जब चिड़िया चुग गइ खेत, फिर क्या पछताने।" आब ऊपाये की! मातृक मे बंटवाराकऽ बादो बड्ड संपइत छलइन। बिपुलसँबेशी उनकर कनियाकऽ गांव नीक लगलइन। बिदेशो मे कोनो बढ़िया स्थित मे ओ सब नञि छल। गामक जीवन ओकरा शुकुन वाला लगलइ। पहिले बेर ओ बिशनपुर गाम आयल छल। ततेक ने लोक भेंट करऽ अयलइ। लोकक आबेश देख कऽ ओ अभिभुतभऽ गेल छल। बिपुल आ उनकर कनिया दीप्ति निर्णय केलक जे ओ सब आब बिशनपुर मे रहत आ अतइसऽ सब संपइतकऽ देखभाल करत। तनुजाकऽ खुशीकऽ ठेकाने नञि। अपना लेल त उनका पेंशने बहुत छइन। संपइतकऽ जे छीछालेदर होइ छलइन, तइसँओ दुखी छलीह।आब सब सम्हइड़ जेतइन, से उनका भरोस छलइन।माय -बापकऽ मरलाकऽ बाद बहिन -बहिनोई संपइतकऽ चक्कर मे इनका दिअयद बुझअ लागल छलखिन। बिपुल आ दीप्ति एक महीना रही कऽ बिदेश गेलाह आ ओतऽ सँबोरिया बिस्तर बांईधकऽ भारत घुइड़ गेलाह। आब अप्पन आशियाना बिशनपुर मे बनेला। गाम मे खेती वैज्ञानिक तरीकासँशुरू कयलाह। सबसं पहीने माइट आ पाइनक जांच करेलाह जे की उपजा सकइ छइथ। ओकर बाद ओही अनुसारे फसल सब बाऊ कयलाह। जन सबहक संग अपने दुनु बेकती खेत मे रहइ छलाह। गामक लोककऽ त एकटा खिन्नांश करबाक मौका भेटलइ। बिपुल अइ सबसँकनियो नञि विचलित भेलाह। बिपुलसँबेशी दीप्ति अपन निर्णय पर डटल छलीह। धीरे धीरे सब शांतभऽ गेलइ। ततेक ने उपजा भेलइन जे खिन्नांश करऽ बाला सब बिपुल लग सलाह मांगऽ आबऽ लगलाह। बिपुल आ दीप्ति यथासंभव सबकऽ मदद करऽ लगलखिन। अइ परोपाटा मे ई नब प्रयोग छल। कियो आइ तक माइटक जांच कराकऽ खेती नञि कयने छल। बिपुलकऽ सफलता देख कऽ दोसरो गामसँलोक आबऽ लगलइन। बीच बीच मे बिपुल दोसरो शहरक संपइत सबकऽ देख सुअइन अबइ छलाह। सारा दिन त खेती नञि होइ छइ। बाकी समय मे दीप्ति गामक स्कुल मे बिना पाइकऽ अंग्रेजी बिषय पढ़बऽ लगलीह। लड़की बच्चा सबकऽ घर पर अलगसँबिना पाइकऽ पढ़बइ छलखिन। गामक आर सामाजिक काज मे बइढ़ चईढ़कऽ दीप्ति भाग लेबऽ लगलीह।चाहे स्कुलक समिति होइ वा अस्पतालक, चाहे सड़क बनञित होइ वा पुलिया, चाहे गरीब गुरबाकऽ कोनो कष्टक समय होइ वा धनिकहाकऽ कोनो सलाहक काज- सब जगह दीप्तिकऽ सेवा हाजिर रहइ छलइन। दीप्ति-बिपुलक जोड़ीकऽ प्रसिद्धि चहुंओर बइढ़ रहल छलइन। अइ मे चाइर चांद लाइग गेलइ जखन बिपुल दीप्ति अपन बेटाकऽ नाम गामक सरकारी स्कुल मे लिखेलाह।स्कुलक पढ़ाइकऽ स्तर बढ़इत जा रहल छलइ। उनकर सबहक काज आब समाजक सोंझा आबऽ लागल छलइ।कयेक छोट पैघ अखबार मे उनकर सबहक जीवनी आ कार्यकलापकऽ बारे मे लिखल छपल। जिलाक अधिकारी सब सेहो इनकर सबहक बुद्धिमताकऽ गाहे-बगाहे उपयोग करऽ लगलाह। आब इलेक्ट्रॉनिक मीडियाकऽ सेहो इनका सब पर नजर गेलइ। आब टेलीविजन पर इनकर बिषय मे समाचार अबइ। गामक प्रसिद्धि सेहो होबऽ लगलइ। अखबार आ टेलिविज़न मे समाचार अयलाकऽ बाद बिजयक गामक लोक अलगसँसंपादक सबकऽ चिट्ठी लिखकऽ कहइ जे बिपुल आ दीप्ति उनके गामक छथिन। बिजयकऽ वोटरलिस्ट बाला कागजक कापीलऽ कऽ कनिया बाबीकऽ बेटा टेलिविज़न पर इंटरव्यू देने छलाह। इनकर सबहक नाम गाम देख कऽ ओतुका नेता सबकऽ खतरा बुझाय लगलइ। ओ सब किछु किछु षड़यंत्र इनकर सबहक खिलाफ करऽ लागल। बिजय दीप्ति खुइलकऽ ओकरा सबकऽ कहलखिन जे राजनीतिसँउनका कोनो लेना देना नञि छइन। तखइन ओतुका नेता सब इनका सबकऽ सहयोग केनाई शुरू कयलक। ततेक ने इनका सबके ऊपर ओतुका लोककऽ विस्वासभऽ गेल छलइ जे आब पर पंचैती मे सेहो बजबइ छलइन। जिलाक अस्पताल मे दवाई आ खेनाईकऽ बेबसथा सेहो दीप्तिकऽ अगुवाई मे संपन्नभऽ रहल छल। आब इनका सबकऽ ततेक ने व्यस्तता बइढ़ गेल छलइन जे नियमित खेत पर नञि जा पाइब रहल छलाह। आब तनुजा ई सब सम्हारने छलखिन। कहियो खेतीकऽ ए बी सी डी नञि बुझअ बाली तनुजा आब खेती पथारीकऽ हीर हीर जानऽ बुझअ लगलीह। अतबे नञि, कोन नक्षत्रक बाद कखइन पाइन बुन्नी परबाक संभावना प्रबल रहइ छइ- सेहो उनका बुझल। उनका मे जे परिवर्तन भेल छलइन से सब अचंभित छल। छोट भाइ विनय सेहो बीच बीच मे आइबकऽ मनोबल बढ़बइ छलखिन। बिपुल आ दीप्ति फेरसँओइ परिवारकऽ ऊंचाई परलऽ गेल छलाह। कियो बिनोबा कहइन त कियो बाबा आमटे कहइ छलइन । सद्भावनाक संग समाजक सेवा ओ सब कऽ रहल छलाह। नब डीह आ नब सोचक संग, नब समाजक निर्माणभऽ गेल छल‌‌‌। जे परिवार कतउकऽ पैबंद छल......कतेककऽ संबल अइछ। पद्य खण्ड आशीष अनचिन्हार गजल घूसक संगे गबन करू टिक्का चानन हवन करू पीठक पाछू गारि बात आगू अबिते नमन करू हुनकर आँखि कोना उठल जेन्ना तेन्ना दमन करू किछु नै बँचतै दुनियाँमे रमन चमन के जतन करू छोट छोट या नमहर हो जिम्मेदारी वहन करू सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। गजल झाँपल गेलै सत्य वचन बारल गेलै सत्य वचन भोरे एलै औफिसमे थाकल गेलै सत्य वचन चारू कातक योजनासँ छाँटल गेलै सत्य वचन झुट्ठा सभहँक पौतीमे साँठल गेलै सत्य वचन ब्रह्मस्थानक वेदीपर आनल गेलै सत्य वचन सभ पाँतिमे मात्राक्रम 22-22-22-2 अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल माला बैसल तड़िखानामे ठोपो ढ़ूकल तड़िखानामे चिखना देखि कऽ लबनी देखि कऽ पंडित नाचल तड़िखानामे पूरा दुनियाँमे मरि गेलै जीवन बाँचल तड़िखानामे चानन घसलहुँ ठाँओ निपलहुँ हारो गाँथल तड़िखानामे बड़ दिनक बाद अनचिन्हारो अपने लागल तड़िखानामे सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल भुज्जा चिखना ताड़ी आ पासी चाही हमरा तड़िखाना चाही लबनी चाही हुनका भेटनि बड़का बड़का इनाम बस हमरा छोट छीन बदनामी चाही हम बोर भ' गेलहुँ चिक्कन चुनमुन खुशीसँ हमरा किछु लेढ़ाएल उदासी चाही तों ल' ले दछिनामे पूरा दुनियाँ मुदा हमरा खाली हुनकर जजमानी चाही खाली पहनावा बदलल छै इच्छा नै हुनका राजा आ हमरा दासी चाही सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल आँखि हमर दास हुनक अदना नै खास हुनक आब खरिहान संगे छै पूरा चास हुनक धेलकनि हाट बजार मोश्किल उगरास हुनक ऐठाँ दुइए टा सच आस हमर आस हुनक एना केने कहियो नै हेतनि बास हुनक सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल कियो पुछलक मोनक हाल कियो कहलक मोनक हाल खसल नोरक ठोपे गानि कियो बुझलक मोनक हाल कियो आनथि हीरा मोती कियो अनलक मोनक हाल कियो डाहैए संसार कियो डहलक मोनक हाल नुका पढ़तै अनचिन्हार कियो लिखलक मोनक हाल सभ पाँतिमे 122-22-221 मात्राक्रम अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबा छूट लेल गेल अछि। गजल हम सुंदर कहबौ तों कचनार बुझि लिहें सुंदरतम कहने सिंगरहार बुझि लिहें परदा रहबे करतै संसारक कारण सैंतल कहने तों बेसम्हार बुझि लिहें शब्दसँ पता चलि जाइ छै के कहने छै हम विकास कहबौ तों सरकार बुझि लिहें मतलब अपन अराध्यसँ छै चाहे जे हो हम करेज कहबौ तों दरबार बुझि लिहें भोरका लाली बनि हाथ छूतौ तोरा हम कोंढ़ी बुझबौ तों भकरार बुझि लिहें संन्यास केर मतलब चरम आसक्ति छै हम समाधि कहबौ तों संसार बुझि लिहें आब जरूरी नै छै संबंध निमाहब अपना सन लगितो अनचिन्हार बुझि लिहें सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल केहन छै ई लोकक आँखि फूलक मूँह काँटक आँखि सभहँक भूख एकै रंग ताकै खाद खेतक आँखि कोनो बिंदुपर मीलल छै शहरक आँखि गामक आँखि सुरजक बात कहिए देत भोरक देह साँझक आँखि अनचिन्हार एबे करतै रहलै जागि बाटक आँखि सभ पाँतिमे 2221-2221 मात्राक्रम अछि। मतलाक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि, तेसर आ पाँचम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल सपनाइत रहलहुँ हम डेराइत रहलहुँ हम मँजाइत रहल एड़ी चिकनाइत रहलहुँ हम जते जे सुनेलक से पतिआइत रहलहुँ हम अइ हाथसँ ओइ हाथ बदलाइत रहलहुँ हम हुनकर मोनक बाकस सैंताइत रहलहुँ हम इम्हर उम्हर सभठाँ उसनाइत रहलहुँ हम चुप्पे अनचिन्हारसँ बतिआइत रहलहुँ हम सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल ठोरक गिलास ठोरक शराब के राखत किछु ठोपक हिसाब अनधन लछमी हुनका हिस्सा हमरा हिस्सा गालक गुलाब उनटाबैए ओ चुप्पे चुप देहक पन्ना मोनक किताब सुंदर शब्द भेलै बेकार ओ अपने छथिन अपन जबाब अनचिन्हारक इयाद अबिते पूरा दुनियाँ लागै खराब सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल बान्हल भाषा बान्हल बोल अइ नाटकमे अतबे रोल हुनका कहने दुनियाँ टेढ़ हुनके कहने दुनियाँ गोल खाली पेटक छै फरमान भरलाहाकेँ खोलै पोल चुप्पे आबै चुप्पे जाइ हिनकर आँगन हुनकर टोल किछु ने जानै अनचिन्हार के पहिरैए नवका खोल सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। गजल संसार हमरो लेल छै अपकार हमरो लेल छै राजा बहुत रानी बहुत दरबार हमरो लेल छै जइमे भुजेतै आन से कंसार हमरो लेल छै तोहीं ठकेलह से तँ नै बटमार हमरो लेल छै पायल भने नै हो मुदा झंकार हमरो लेल छै सभ पाँतिमे 2212-2212 मात्राक्रम अछि। गजल भीजल कपड़ा गुदगर देह बिजली लागै सुंदर देह गौतम धेलथि इंद्रक भेष फेरो पाथर हुनकर देह हुनका ताकी कोने कोन हमरा लग छै जिनकर देह बज्जर सपना बज्जर आँखि बज्जर जीवन बज्जर देह सरकारक फाइल बहुते पैघ देखू घटलै किनकर देह सभ पाँतिमे 22 22 2221 मात्राक्रम अछि। गजल विषवंदन युगधर्म छै परिवर्तन युगधर्म छै जइमे खेने रोग हो से बरतन युगधर्म छै खाली अपने टा रही से कतरन युगधर्म छै खाली चाहथि मीठ रस मधुगुंजन युगधर्म छै बिन करने कल्याण नै गठबंधन युगधर्म छै सभ पाँतिमे 222-2212 मात्राक्रम अछि। गजल कियो डबल छै कियो ढ़हल छै सपन नयन के बचल खुचल छै गरीब लेखे पवन अनल छै सुगंध हुनकर रचल बसल छै कनी मनीपर बहुत झुकल छै सभ पाँतिमे 12-122 मात्राक्रम अछि। गजल कियो कारी बुझलक कियो उज्जर कहलक कियो शीशा बुझलक कियो पाथर कहलक जाइ अबै छी बिन रोक टोक ओइ ठाम कियो मालिक बुझलक कियो नौकर कहलक गलत काज भेलापर अंतर नै रहलै कियो साधू बुझलक कियो लोफर कहलक जीवन ईहो छै आ जीवन ओहो छै कियो अप्पन बुझलक कियो दोसर कहलक उपेक्षित रहब अनचिन्हारक कपारमे कियो चिंतक बुझलक कियो जोकर कहलक सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल हुनकर बात पिपरक पात देशक अगुआ भेलै कात तप्पत नोर बसिया भात जिवनक नाम झंझावात अनचिन्हार केलक घात सभ पाँतिमे 2221 मात्राक्रम अछि। गजल गदहा सभ सरकार चलेतै लुच्चा सभ दरबार चलेतै जकरा लग ने पैसा कौड़ी से कोना संसार चलेतै जखने जागत सूतल जनता आर चलेतै पार चलेतै काँपै जकर मोन इजोतमे ओ मार कि सम्हार चलेतै बनतै गृहस्थ साधू बाबा साधू सभ परिवार चलेतै सभ पाँतिमे 222-222-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि। गजल अइ संसारकेँ अनकासँ मतलब आ हमरा छलै अपनासँ मतलब पूल बनाउ नदी महानदीपर कातक धारकेँ लचकासँ मतलब भेटै आशीर्वाद या कि सराप छै भगताकेँ देवतासँ मतलब भूआ पसरल जमीनपर तैयो सिंगरहारकेँ खसबासँ मतलब जकरा लग कियो नै अनचिन्हार अनचिन्हारकेँ तकरासँ मतलब सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। गजल मोन मीलल बहुत बहुत नेह भेटल बहुत बहुत दूर गेलै जते जते नीक लागल बहुत बहुत साँच बजलहुँ कनी मनी संग छूटल बहुत बहुत बात करता जखन जखन खाद फेंटल बहुत बहुत साँझ खातिर कहीं कहीं भोर टूटल बहुत बहुत आइ हुनकर कथा व्यथा भाँज लागल बहुत बहुत आब भेलै महो महो रूप साजल बहुत बहुत गाछ देखै टुकुर टुकर काँच पाकल बहुत बहुत सभ पाँतिमे 2122 12 12 मात्राक्रम अछि। गजल बाहर जते फेम छै भीतर तते ब्लेम छै प्लेयर सहित फील्ड आ अम्पायरो सेम छै जैठाँ बहुत जौहरी तैठाँ कनी जेम छै अनकर हड़पि आनि लेब अतबे हुनक एम छै तोड़ब हृद्य मोनकेँ ई ओकरे गेम छै सभ पाँतिमे 2212-212 मात्राक्रम अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। नन्द विलास राय सरस्वती वन्दना सरस्वती माता हे किएक ने दइ छी हमरोपर कनियोँ धियान एक नजैर हमरा दिस तकियौ करियौ हमर कल्याण सरस्वती मैया हे...। मृगतृष्णामे हम भटकै छी जेतए जे सुतैर गेल से झटकै छी तेना स्वार्थमे आन्हर बनल छी भ्रष्टाचारक दलदलमे फँसि कऽ अपनो कऽ बुझै छी आन। सरस्वती मैया हे..। हम मूरख, लोभी, अधर्मी चरित्रहीन, कपटी, कुकर्मी कनियोँ नहि अछि ज्ञान। सरस्वती मैया हे...। मानव बनि धरतीपर एलौं जे नै करैक छल सेहो सभ केलौं दानबबला कर्म करै छी भऽ गेलौं शैतान। सरस्वती मैया हे...। जे माए-बाप जनम हमर देलक पालि-पोसि कऽ पढ़ेलक-लिखेलक हुनका सभक सेवो ने केलौं केहन भेलौं हम बेइमान सरस्वती मैया हे...। महल-अटारी बहुत बनेलौं मानवता केर सेवा नै केलौं केलौं ने कहियो दान। सरस्वती मैया हे...। अधला काजक अधला फल होइ छै ई बात हम खूब बुझै छी बुझियो कऽ छी अनजान सरस्वती मैया हे...। हाथ जोड़ि विनती करै छी हे मैया अहाँ छी दयावान हमरा सद्-बुद्धि दिअ हे मैया आओर दिअ सद्गज्ञान मृगतृष्णासँ हम निकैल कऽ बनिऐ नेक इंसान सरस्वती मैया हे कनियोँ दियौ हमरोपर धियान। एक नजैर हमरा दिस तकियौ करियौ हमर कल्याण। धनवान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान ओ छैथ बड़ पैघ विचारवान। बुढ़ होथि वा होथि जुआन करै छैथ सभकेँ आदर-सम्मान अपनासँ पैघकेँ करै छैथ दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम तँए तँ छथिन लक्ष्मीजी हुनकापर पूरा मेहरवान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। हिन्दुक घरमे शादी रहए वा मुसलमानक घर निकाह बिना बजौलो जा कऽ दइ छैथ नीक सलाह तँए सभ करै छैन हुनक गुणक गान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। बाग-बगीचा खेत-खरिहाँन पोखैर, गाड़ी, बंगला आलीशान जे बढ़ाबइ छैन हुनक शान मुदा हुनका कनिक्को नहि छैन अभिमान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। उमेर भऽ गेलैन हेँ हुनकर साठि करैत रहै छैथ योगक संग सभटा अपन काम तँए लगै छथिन अखनो जवान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। कखनो किनको नहि बजथिन बुराइ सत्य आओर अहिंसाक बड़ पैघ पुजारी यएह हिनक छिऐन धर्म आओर इमान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। गाँधीजीक विचारधारा अपनौने छैथ छैथ पूरा सदाचारी बुद्धक दर्शन जनै छैथ छैथ पैघ परोपकारी रामायण आओर गीताक छैन हुनका पूरा ज्ञान तँए छैथ ओ निष्ठावान हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। देह तँ कारी छैन हुनकर मुदा दिलक छथिन साफ केतबो पैघ कियो अपराध करए हुनकर कऽ दइ छथिन माफ आनक धनकेँ समझै छैथ बिल्कुल ओ हराम हमरा गाममे छैथ एकटा धनवान। रामदेव प्रसाद मण्डल ’झारुदार’ झारू करू नइ तुलना पर बच्‍चासँ भरू नइ ओकरा हीनता बात। ऐसँ बच्‍चा कुण्‍ठित होइ छै और होइ छै मानसिक आधात।। गीत- कनी देखही दिनेश कनी सुनही सुरेश कनी मानही महेश।-2 माता अज्ञान बस फँसलै कलेश।-2 नैनाकेँ नहि स्‍कूल धरबै छै घरक अपन सभ काम करबै छइ।-2 अपने नैनाकेँ गला मोकै छै तेकर रक्षा केना करतै गणेश।-2 कनी...। बकड़ीमे भरि दिन गोली खेलै छै अपना जिनगीकेँ दुखमे ठेलै छै।-2 माताजी ओइपर किछ नहि बोलै छै यै मॉं केर नाम दियौ माता भुलेश।-2 कनी...। समयसँ नहि कहियो खाना बनै छै स्‍कूल समयमे बौआ रोजे कानै छै।-2 देखै नइ छी हमर हाथ लगल छै रौ बजरखसुआ ले ने परैस।-2 कनी...। आलस नहि माता आप भगबै छै पढ़ैबलासँ घास कटबै छै।-2 सभटा जे एहने नीपले रहतै के हेतै देशक भावी नरेश।-2 कनी...। झारू साधुवाद मिथिला केर धरती साधुवाद मैथिल जनता। साधुवाद हे ताज मिथिला केर साधुवाद सम्‍प्रभुता।। गीत- हमर वन्‍दना माँ मिथिलासँ विनय करू स्‍वीकार हे। बनि अनाड़ी जीबै छी जगमे जिनगी भेल बेकार हे।। राजाजनक छल अहीं गर्भ-के।-2 जन्‍म देलौं विद्यापति सर्व-के।-2 हमरा छुपेबै अहाँ कहिया तक हमरो करू उद्घार हे। बनि...। नहि जानि अहाँ केतेकेँ तारलौं-2 अपना धुलसँ बहुत उबारलौं-2 कनियोँ धुल हमरो छीटि दइतौं हमहूँ होइतौं साकार हे। बनि...। ज्ञान देलौं अहाँ सौंसे जगत-के।-2 करू दया कनी अहूँ भगत-पे।-2 पूजब हे तोरा कण-कण मैया दियौ मौका एकबार हे। बनि...। मुन्ना जी गजल अजीबो गरीबी कहानी क' गेलै बच्चा जे छलै तें नदानी क' गेलै पहिने पता केलकै बाट ओतै छलै बिसरल जे जबानी क' गेलै पछाड़ैत कोना रहितै नढ़िया चढ़ि माथ देहो कटानी क' गेलै कहिया धरि रैहतै आस मे ओ रहि शेख काजो पठानी क' गेलै मंदिरोक शानो छलै जे तहिया ध्वजा के बचेबा अजानी क' गेलै पहिने छलै जे कतिया क' ठाढ़ो भगेबाक काजो मशानी क' गेलै बहर- ए- मुतकारिब. मात्रा क्रम-१२२ १२२ १२२ १२२ प्रदीप पुष्प गजल के की कहलक की कहू के की ठकलक की कहू हमरो उजरे रंग छऽल के की दगलक की कहू भेलै साधू आब सभ के की चिखलक की कहू माया बड़का पैघ ई के की रचलक की कहू अखनो नै छी पास हम के की जँचलक की कहू (2222212सभ पाँतिमे) गजल गप्प उठतै तँपहुँचबे करतै मेघ लगतै तँबरसबे करतै ओकरा रोकि सकत नै केओ गीत रचतै तँपरसबे करतै पाप आ पुण्य कथी नइ बूझै भूख लगतै तँभटकबे करतै छै अभिव्यक्तिक हक सभकेँतेँ दम्म फुलतै तँखखसबे करतै छै उमेरक गलती चालिक नइ डाँड़ हिलतै तँलचकबे करतै (2122 112222 सभ पाँतिमे) गजल के की कहलक की कहू के की ठकलक की कहू हमरो उजरे रंग छऽल के की दगलक की कहू भेलै साधू आब सभ के की चिखलक की कहू माया बड़का पैघ ई के की रचलक की कहू अखनो नै छी पास हम के की जँचलक की कहू (2222212सभ पाँतिमे) गजल गप्प उठतै तँपहुँचबे करतै मेघ लगतै तँबरसबे करतै ओकरा रोकि सकत नै केओ गीत रचतै तँपरसबे करतै पाप आ पुण्य कथी नइ बूझै भूख लगतै तँभटकबे करतै छै अभिव्यक्तिक हक सभकेँतेँ दम्म फुलतै तँखखसबे करतै छै उमेरक गलती चालिक नइ डाँड़ हिलतै तँलचकबे करतै (2122 112222 सभ पाँतिमे) गजल तोहर देल दाग मोन रहत टूटल प्रेम-ताग मोन रहत अनलेँ ओढनीमे झाँपि जे बथुआकेर साग मोन रहत गप्प करिते बितै छल कहियो भरि रातुक जाग मोन रहत नाओं हमर तोहर अँगना कुचरैत छल काग मोन रहत स्पर्शक अबीर लगलौ तोरा ओइ बरखक फाग मोन रहत जे दऽनइ सकलौं तोरा फेर एकटा उपराग मोन रहत (22222222सभ पाँतिमे।बहरे- मीर) गजल उघरल खाट छी उसरल हाट छी क्यो ने जाय छै बिसरल बाट छी खुट्टा ठाढ़ छै भसकल टाट छी भुखले भोजमे अन्तिम लाट छी सगरो मैल हम पोखैर घाट छी (22212सभ पाँतिमे) गजल टूटल लेल की रितुराज हूसल लेल की रितुराज हमरा आँखि नोरे नोर दूखल लेल की रितुराज की नब गाछ की नब फूल सूखल लेल की रितुराज पचकल गाल पाकल केश चूकल लेल की रितुराज यौवन गान कोना हैत भूखल लेल की रितुराज (2221 2221 सभ पाँतिमे) गजल राति छोट मुदा पिहानी नमहर केने जो रंगि मुँह -कान किरदानी नमहर केने जो तोरा उड़ीस मारैले कहने रहियौ हम उनटे तूँ मच्छरदानी नमहर केने जो संगतमे सुर कोनो विवादी लगौ तोरा तँगबैयाक ससरफानी नमहर केने जो भोँटक चन्दा भेटैत रहौ सभ दिस तेँ तूँ बेचि कऽतगमा जजमानी नमहर केने जो तूँ गाँधीकेँ फूल- माला सेहो चढ़ा आ गोड्से पर खर्चा- पानी नमहर केने जो (222222222222, बहरे-मीर) गजल आँखि बजलै ओकर की ठोर बजलै जहिया बजलै से बहुत जोर बजलै चान गगनक लगै छै झुझुआन किए देखि तोरा ई मन चकोर बजलै इज्जति कृष्णक सोझा लुटलै हम्मर कलपैत पाँचालीक पटोर बजलै मुँह कानसँ लागल ओ शरीफ जेना मुदा लोक नाम ओकर चोर बजलै बर्गर पिज्जा शहरमे भेटत बहुत हम नइ भेटब मुदा तिलकोर बजलै (2222222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) गजल साँझ रही हम पराती रही हम तोहर कबूला पाती रही हम तूँ मूँड़ी झुका बेदी तऽर छलेँ अक्षत छिटैत बराती रही हम आइ अन्हरिया नाम हमर अछि सुन कहियो दियाबाती रही हम सुरूज घोंटि देवता नइ बनलौं छी बानरे उत्पाती रही हम हमरा मतलब छऽल एक तोरेसँ नइ समाजक अवघाती रही हम ओ पोथी फाड़ि फेंक देलेँ की जाहिमे पहिलुक पाँती रही हम (222222222 सभ पाँतिमे, बहरे-मीर) गजल पाखड़ि तऽरक मचान मोन पड़ि गेल खपड़ा बला दलान मोन पड़ि गेल तोहर हमर पिरीत भेल अनघोल पीठक पड़ल निशान मोन पड़ि गेल तोरा रसिक निहारि बाजि देलक ई भादव बहय बलान मोन पड़ि गेल भुखले दिवस खटैत फेर बीतल तँ गामक अपन नवान्न मोन पड़ि गेल तोरे भऽजिनगियो कटैत ई ‘पुष्प’ जातिक मुदा सिमान मोन पड़ि गेल (221212121221सभ पाँतिमे,तेसर शेरक पहिल पाँतिक अन्तमे दीर्घकेँ ह्रस्व मानबाक छूट लेल गेल अछि) गजल नइ बरछी नइ भाला राखू अपन मूँह पर ताला राखू चरि- चरि महल केर घऽर बना कऽ नइ रस्ता नइ नाला राखू जा विदेश बड़ मौज उड़बियौ खाता-बऽही दिवाला राखू खोलू अनकर कच्चा चिट्ठा झाँपि अपन घोटाला राखू शासनमे नइ अन्तर बेसी बरु लल्लू वा लाला राखू खूब निहारू कञ्चन-काया मुदा हाथमे माला राखू (22222222सभ पाँतिमे।बहरे-मीर) गजल मूँह फेर लोक जहन जाए लगलै छै भाषण बेकार बुझाए लगलै घर मन्दिरक सटले बना लेलक जे सदिखन ‘अच्छे दिन’सपनाए लगलै रोग सेहो सिखलक राजनीति आब बैद्य बदलल तँचोट दुखाए लगलै पुल बनेबाक जहन भेल ओरियान नदी देलक धोखा सुखाए लगलै ओना तँहेमनि धरि निकम्मा छल ओ खादी पहिरि ठीके कमाए लगलै (2222222222- बहरे-मीर) गजल भेँट ओ अन्हारमे इयाद छौ ने गप्प ओ पूआरमे इयाद छौ ने कोन ईस्वी कोन साल कोन मास हम तूँ एलियै देखारमे इयाद छौ ने बन्द भेलौ आन जान आब सगरो गार्जनक फटकारमे इयाद छौ ने कऽबहाना मन्दिरक अबै छलेँ तूँ नवसँ नव सिंगारमे इयाद छौ ने ठाढ़ तोहर बाट ताकिते रहल के साँझ धरि पछुआड़मे इयाद छौ ने (212221212122सभ पाँतिमे) गजल प्रेमक डोर की गजल नइ जगले भोर की गजल नइ टटका फूल सन नरम ई पातर ठोर की गजल नइ चानी सोन केर चमक सन देहक पोर की गजल नइ मातल पैघ पैघ नैनक कारी कोर की गजल नइ तोहर मीठ मीठ वचनक मिसरी बोर की गजल नइ तोरा लेल जे बहल ओ पुष्पक नोर की गजल नइ (2221 2122 सभ पाँतिमे) गजल अपन किरदानी पैघ अनकर छोट लगैए बजलै केओ उचित कने बड़ चोट लगैए जानै के नै कर्म ककर छै श्वानक जगमे किदैन चाटि कऽबाजै जे अखरोट लगैए गन्ध अबै छै सत्ताक किए देहसँ धर्मक मंत्री जकाँ बाबाजीक लंगोट लगैए ककर चोरेलकै धन ककर जमीन छिनलकै छऽल जे दुब्बर लोक आइ बड़ मोट लगैए होइ पाठ नित धर्म- अधर्मक नीतिक तैयो देखि जगत व्यवहार हिय कचोट लगैए खन दहिना खन बामा होइत छथि नेताजी कुरता पजामा नव मन लोटपोट लगैए (222222222222सभ पाँतिमे।बहरे- मीर) गजल अजान बौक भसान बौक नचैत लाश मसान बौक मरैत गाछ मचान बौक सधैत पाय मिलान बौक खटैत लोक दलान बौक भरैत पेट थकान बौक बहैत गाम निशान बौक कटैत गाय बथान बौक बढ़ैत दाम निदान बौक जरैत खेत किसान बौक (12121सभ पाँतिमे) गजल कने ध्यान एम्हर आनल जाए घामक जाति कोन मानल जाए छै छाल्ही-दूध धोधिबला लेल भूखल लेल सत्तु सानल जाए चन्दा-चुटकी फेरो बटोरबै हँ यौ तेँ कीर्तन ठानल जाए सभा मध्य जे उचित गप्प कहता हुनका पंचे नै मानल जाए छागर-बकरी देने छै धरना बाघ हमर नेता गानल जाए (222222222,बहरे मीर) गजल लोक मरैत रहतै तंत्र चलैत रहतै तोप हँसैत रहतै पेन कनैत रहतै भात सधैत रहतै बात बढ़ैत रहतै पेट घटैत रहतै धोधि बढ़ैत रहतै बान्ह बनैत रहतै बाढ़ि अबैत रहतै भूत गबैत रहतै धैम नचैत रहतै (2112122सभ पाँतिमे) गजल स्नेहक सम्मान माए छै दैबक वरदान माए छै छै डूबल जोतमे दुनियॉं सय सय दिनमान माए छै कोनो पूजा कथी लेल पहिलुक भगवान माए छै जे हेरत बाट जगले ओ सबहक अनुमान माए छै जितिया छठि दशहरा संगे माहे रमजान माए छै जे हम्मर पेट भरलक ओ भूखल खरिहान माए छै (22221222सभ पाँतिमे।तेसर शेरक अन्तिम लघु दीर्घ मानल अछि) गजल टाटक घर छी बिहाड़ि सुनि डेरायल छी गगनक चान छी इजोरसँ चोटायल छी नै आदर नै सत्कार नै कुशल पूछै पैघ लोकक दरबारमे चलि आएल छी सगरो वैर आ हिंसा छै प्रपञ्च हँसैत अपनहिँ घरमे रहितो हम औनाएल छी शत्रुक गप्प पर चलितौं तँपहुँचल रहितौं मित्रक बाट धऽचललौं तेँ भुतिआएल छी पछता रोपल भाग्यक नै ई दोष हमर माघी फूल रही जेठमे फुलाएल छी (बहरे-मीर) गजल कने हिन्दू कने मुसलमानक देश लड़ैत दियाद जकाँ भगवानक देश हरियर छै जाति धरम नस्लक खेती उपटि गेलै सुच्चा इंसानक देश प्राण अखनो भात बिनु छूटै तैयो केस छेनाक लड़ै मिष्ठान्नक देश सुनतै के सगरो हिचुकी जौं उठतै छै कान बिनु आरती अजानक देश पुरना गेलै टोपी-टीका तँआब आत्मा बेचि दै वेद पुराणक देश (2222222222 सभ पाँतिमे। बहरे मीर) गजल अनठौने छी मुदा अनजान नै छी घरैये लोक छी मेहमान नै छी अहाँक मुँह देखि मूँगबा बूझल अछि चुप्प भेल छी तेँ कि निष्प्राण नै छी अहाँक कहलासँ राति- दिन नै हेतै अहूँ डिबिये छी कुनु दिनमान नै छी सुविधाक हिसाबसँ मानक नै रचियौ यौ अहूँ सभ दिनक पहलवान नै छी ओ नै डूबत जे हेलब जनैत छै अहाँ खत्ताक पानि छी बलान नै छी (बहरे- मीर) गजल के सुनेतै गरीबक गान कह के बढेतै गुदड़िया शान कह मोसि बेसी तँउजरे छै तहन पाठ हेतै केना करिछान कह गीत गिरहत बला सुनलौं बहुत बालचनमाक निज अभिमान कह जेहने छै घँसल आ की सही तूँ अठन्नीक निज सम्मान कह देलकै नाम कवि कोकिल बना ओइ उगनाक तूँ गुणगान कह लेकलम हाथ चल संगे निकल पुष्प मिथिलाक नव अभियान कह (2122122212सभ पाँतिमे) गजल राति सपना देखि गमेलौं तँकी भेटल नोर हमरा लेल खसेलौं तँकी भेटल फेर आपस हैब हमर नइ रहय सम्भव नैन बाटे बीच लगेलौं तँकी भेटल जाति सभ दिन माथ पर मारने पलथा टोलकेँ टोलेसँ सटेलौं तँकी भेटल छी अहाँ पपिआह तँकी ठोप आ चानन मास दिन गंगे जँ नहेलौं तँकी भेटल चित्र सभ ठाँ टांगल यात्रीक घर घरमे गीत बलचनमाक सुनेलौं तँकी भेटल प्राण काया केर बिना नइ रहय कखनो बिनु बहर गजले जँ कहेलौं तँकी भेटल (2122211221222सभ पाँतिमे) गजल किछु रौदीमे किछु दाहीमे बाँकी जरतै अगराहीमे सत्तैर बरखक भेलै चिलका एतै कहिया फगुनाहीमे धी माइक अनुपम नाता ई दुन्नू डुबलै पुरनाहीमे जे जत्ते बड़का लीडर छै से तत्ते बेपरबाहीमे मुइने भेटत अनुदानो ता भुखले नारा बहबाहीमे उपरे उप्पर दौरा करिहेँ नइ जइहेँकोसी मरखाहीमे (22222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग-अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानल गेल अछि) गजल अपनेसँ कान्ह पर अप्पन लहास लेने छी जिनगी ई भूत -बँगला हम बास लेने छी तूँ जाम दे जहर दे हमरा नै फिकर अछि हम आँखि मूनि हाथ फेर गिलास लेने छी वैह बीच सभामे बेईमान कहि देलक जकरा एकाबन दऽहम उनचास लेने छी बनि लंकेश कतेक अप्पन घेँट काटू हम भेल शिव छथि आन्हर ई विश्वास लेने छी गजल नोरक मोसि भरि कहैत रहब ‘पुष्प’हम अहाँ सुनबै जरूर हम ई आस लेने छी (222222222222सभ पाँतिमे।बहरे- मीर) गजल हेतै जहिया इजोर हम मोन पड़बौ लगतौ तोरा बकोर हम मोन पड़बौ तोरा पाछू चलैत चुप्पेसँ केओ धरतौ जहने पछोड़ हम मोन पड़बौ फेरो केओ निहारि चन्दा जकाँ मुख हेतौ तोहर चकोर हम मोन पड़बौ जे तोरा देखि भोजमे खूब रस लऽकऽ बनतौ डलना चटोर हम मोन पड़बौ बेदीतर बैसि मंत्र पढ़ऽलेल बहिना पहिरेतौ जे पटोर हम मोन पड़बौ (222212122122 सभ पाँतिमे) गजल उजड़ल मनक गाम बसाबऽपड़त एक दिन जाइ छी तँजाऊ फेर आबऽपड़त एक दिन सनेश हमर घुमा देलौं तकर कष्ट नै अछि मुदा देल सिनेह सेहो घुमाबऽपड़त एक दिन मनुक्ख रहैत ईश्वर जँ बनबाक लौल करब शोणित लालसँ कारी बनाबऽपड़त एक दिन जँ दूध आ पानिक भेद नै कऽसकलौं अहाँ तहन उल्लूसँ संसद चलाबऽपड़त एक दिन हम रहैत छी श्मशानमे भूत- प्रेत संग संग पाबऽलेल देह जराबऽपड़त एक दिन (222222222222- बहरे-मीर) गजल दर्दक दबाइमे भाव उपचार भेल प्रेमक पीड़ तेँ गजल भऽबहार भेल जतै दीर्घ लघु केर गाड़ी रूकल ओतै रूक्णक चौक आ बहरक बजार भेल अन्त नीक सऽब नीक नीक इ आदर्श तेँ मतलाक अन्तमे रदीफ संस्कार भेल रूचिगर सुआद होइ शेरक भोजमे छंदक सँचारमे काफिया अँचार भेल पन्नाक भीड़मे के कतय हेरा जायत तेँ मोन पाड़ैले मकता अवतार भेल अदब आँगनमे नव घऽर ठाढ़ होऊ गजलक गजल तेँ‘पुष्प’विचार भेल (सरल वार्णिक बहर,15 वर्ण सभ पाँतिमे) गजल दोसरक गीत उगबै अछि चान मीता हमर गजलो गबै भूखक गान मीता आब रूदल बऽनब ने हम गऽछब कहियो जरल पेटसँ उठै ने सुर तान मीता भेल बटुआसँ तगमाकेँ नीक दोस्ती बिन टका छी सभा मध्ये आन मीता जैह देबै अहाँ हम रखबै हुलसिकेँ गाय बूढ़ो खपै विप्र- दान मीता पाँतमे हम अछोपक छी भोज खाइत ‘पुष्प’केँ नइ फिकर आ ने मान मीता (2122 1222 2122 सभ पाँतिमे) गजल शब्द छौ भाव छौ अलंकार छौ तोर आँखि पिपनी तऽर साहित्य-संसार छौ तोर आँखि मन शान्तनु भेल ठमकै तोरे लग जा-जा कऽ की नव सुरसरिक अवतार छौ तोर आँखि जेना कोनो दरिद्रकेँ भेटल राज-पाट तहिना ऐ जीवनक आधार छौ तोर आँखि की कोना कथी कखन ककरा किए सन बहुत सद्य सजीव प्रश्नक बौछार छौ तोर आँखि छै विधाता हाथमे बाँचल बड्ड कौशल-कला ऐ शाश्वत तथ्यकेर प्रचार छौ तोर आँखि (222222222222- बहरे- मीर) गजल भाषा भिन्ने भिन्न बजै छै ई कोन गाम छै केओ केकरो नै चिन्है छै ई कोन गाम छै नै तरुआ तिलकोर नै दही चूड़ा गमकि रहल गन्ध चाउमिनकेर अबै छै ई कोन गाम छै नै सोहर नै लगनी आ छै नै नचारीक धुन सगरो मात्र डीजे बजै छै ई कोन गाम छै बूढ़माए बापकेँ कोन बेटा रखतै संगे धुर! सभ सबहक मूँह तकै छै ई कोन गाम छै सून छै दलान आ भकोभम्म भेल आँगन घर चढ़िकऽसोफा कुक्कुर हँसै छै ई कोन गाम छै (2222222222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) गजल दीप सभटा मिझा गेलै तोहर मिलनक आस केर तैयो भरि कऽरखने छी टाड़ा अपन विश्वास केर फूँकैत रहै जे हेमनि धरि शंख जनवादी भेल आइ ओ नटुआ भेल छै सोझामे किछु खास केर नव रहै व्यापार हमर सुगन्धकेर शिकारी रही बूझि गुलाब चूमि लेलौं तेँ ठोर हम पलास केर जे सोझा साष्टांग करै पान करै चरणोदककेँ पीठ पाछू ओ गाबै खिस्सा हमर उपहास केर भेँट अन्तिम कऽले आबो प्राण छूटि जेतैक हमर जा रहल पुष्प साड़ा सपना लेने रनिवास केर (22222222222222सभ पाँतिमे, दूटा अलग अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) गजल गमकैत घाम बला लोक चमकैत चाम बला लोक भाषण आमो पर दै छै थुर्री लताम बला लोक बाँटै दरद सगरो खूब ई झंडु बाम बला लोक मौंसो केर हाट लगबै गाँधीक गाम बला लोक करतै उद्धार मिथिलाक दिल्ली असाम बला लोक (2222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) गजल खेत बेचि कऽटाकाक ओरियान करतै माथ पर बेटी छै कन्यादान करतै जे रातिमे पी कऽकेने छल हो-हल्ला वैह भोरे नशा-मुक्ति अभियान करतै जकरा छै नइ बाँचल जोत एको धूर तकरा बाढ़ि -रौदी की नुकसान करतै जे अपने कात भऽबैसि गेल अछोप बनि ओकरा बारीक किए अपमान करतै ओ नेता छै सत्ताकेर बड्ड भूखल बाँटि कऽदेश हिन्दु आ मुसलमान करतै आइ पार्थक जयघोष पर नाचै दुनियॉं समय राधेयक सेहो गुणगान करतै (22222222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग-अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानल गेल अछि) गजल टुकटुका रहल जिनगी सुगबुगा रहल जिनगी गीत फेर अचिआपर गुनगुना रहल जिनगी तेल बिनु डिबिया सन टिमटिमा रहल जिनगी नोरकेर बरखामे उजगुजा रहल जिनगी सून भेल आँगनमे लटपटा रहल जिनगी (212 12 22 सभ पाँतिमे) गजल बीतलाहा बाटमे हेरा रहल छी ऐंठ छी हम चाह तेँ सेरा रहल छी पेरलक दैबा भऽतेना ने कसैया मेहमे बऽरदे जकाँ पेरा रहल छी देह भेलै आब अनमन टाँट सनठी आगि लागल ऊक सन फेरा रहल छी मीत मुसकी बीच कननी हैत अलगे नोर सुख दुखकेर हम बेरा रहल छी मन भेलै भोज करितौं गाम भरिक ‘पुष्प’गोलक बान्हमे घेरा रहल छी (2122 2122 2122 सभ पाँतिमे,मकताक पहिल पाँतिमे अन्तिम लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) गजल हम लिखै छी लोक लए विद्वान लए नय हम गबै छी गाम लए जजमान लए नय पेटमे कूदत मूस तहन पागे करतय की हम खटै छी भूख लए सम्मान लए नय हम जनै छी देव हमर जेबीक लचार हम पुजै छी भक्ति लए वरदान लए नय छैक हमरो लोभ अपन बनि जाइ अहाँक हम तकै छी नेह लए पकवान लए नय भूमिका छै छोट मुदा नमहर सपना छै हम कनै छी टोल लए खनदान लए नय (21222112221122सभ पाँतिमे।तेसर आ चारिम शेरक पहिल पाँतिक अन्तिम ह्रस्वकेँ दीर्घ मानल गेल अछि) गजल तपलौं जे रौद जेठक निखरि गेलौं हम एत्ते चललौं कि रस्ते बिसरि गेलौं हम मजरल हमहूँ रही फागुनक देहरिपर पी लेलौं कीटनाशी झखरि गेलौं हम बदलल छै लोक घऽर एत्तऽनइ छै हम्मर पाछू छै गाम आगू ससरि गेलौं हम छाती हमरो रहै निस्सने पाथर सन दोस्ती शीशाक केलौं भहरि गेलौं हम नै केओ मीत नै प्रेम छुच्छे टाका की भेटल आबि दिल्ली ठहरि गेलौं हम (222212212222सभ पाँतिमे) गजल लगलेमे हीया हारि लेबै हम छातीमे मुक्का मारि लेबै हम हमरा नै मिललै चान गगनक तेँ करबै की डिबिये बारि लेबै हम खगता कनिको नै दऽर दियादक आब आँगनमे अमती गाड़ि लेबै हम कलपै बाजै बेटी तिलक कारण डिब्बा पेट्रोलक ढारि लेबै हम जेबीमे रखने छी प्रशासन हम क्यो एगो लेतै चारि लेबै हम  (2222221222सभ पाँतिमे। तेसर शेरक अन्तिम लघु छूट तौर पर लेल गेल अछि) गजल फ्रेम टांगल छै चित्र उखाड़ि देलौं कानि भरि मोन तोरा बिसारि देलौं पएर ठमकल तोहर दलान लऽग जे छाती पाथर कऽडेग ससारि देलौं आस छल जिनगी रचबै गजल जेना बहर कठिन छै हम हिया हारि देलौं देखल नै गेल पराजय तोहर तेँ हम अपने अपनाकेँ बजारि देलौं तूँ पीठेमे चक्कू भोकबेँ कते तोरा लेल छाती उघारि देलौं चान धरि पहुँचब नै लिखल छल हमरा मोनकेँ हम सीढ़ीसँ उतारि देलौं  (2222222222सभ पाँतिमे।दूटा अलग अलग ह्रस्वकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि।) संतोष कुमार राय 'बटोही', रिसर्च स्कोलर (ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा), ग्राम-मंगरौना, पोस्ट- गोनौली, थाना-अंधराठाढ़ी, अनुमंडल-झंझारपुर, जिला-मधुबनी कमला-बलानक मारल मुसहरी लग टुटि गेल छै छहर कमाल-बलानक पानि अगिया बताल भेल छै किछु टा नहि बचलै मुसहरी में हो..हो पानि एलै हो भरि राति जागल छलहुँ आइ बैठौनी लग टुटि जैतै तs की कैरतियै इ पैघ प्रश्न छियैए । छोट-छोट नेनाक ठोर देख कs नोर बहि गेल से कहनै बेमानी छियैए नरूआर आओर रखवारी गामक स्थिति देखि कs करेज फाटि जाएत भूख सँ बिलबिलायत नेना आओर वृद्ध महिस,बकरी आओर गाएक जोर-जोर सँ कानब सचहों भगवान मरि गेल छथि। भ्रष्ट ठीकेदार आओर मंत्री मिल कs छहर रिपेयर केँ नाम पर खूब लूटलथि इ मौगा केँ देश छियैए जत सभ बनिया फौदैत छथि गरीब-गुरबा मरि रहल अछि जनता केँँ टैक्स पर जनप्रतिनिधि रंगरेली मनाबैत अछि सुशासन कुमार बौरा गेल छथि । बनौल आओर जोड़ल घर आँखिक सामने पानि मे बहलाक बाद अपन करेजा केँँ टुकड़ा बाढ़ि मे भसिएला पर दोख ककरा दियैए ? नसीब केँ ? लोकतंत्र केँ प्रहरी केँ ? सत्तासीन सरकार केँ ? भ्रष्ट-तंत्र केँ ? रौदी आओर दहार इंद्र भगवान सुति गेल छथिन्ह धानक बिया अखन धरि बाग नहि भेलै खेतिहर हताश-निराश छथि माटि मे बेबाय फाटि गेल छै अइ बेर की हेतै ? रौदी ! पोखरि सभ सुखि गेलै चापाकल केँ पानि सुखि गेलै भूमि तैप रहल छै आगि जकाँ कुक्कुर कानि रहल अछि साँझ-बिहनसर अन्न लेल तड़ैप रहल छै मूस बिलाय कs रहल अछि म्याऊँ । पाँच दिन बरखा भेला पर छोट-छोट बिया सभ डुबि गेल कहुना कs रोपल धान डुबि गेल इ बाढ़ि मिथिलाक नसीब लिखैत छै हमर-अहाँक दरद केँ बाँटत ? भसिया गेलै नसीब खेतिहर केँ । लिस्ट बनि रहल छै गामे-गामे दहार केँ नेता सभहक बिजनेस बढ़ि गेलैए एन एच 57 पर बाढ़िक बाद नसीब लिखल जा रहल छै मुसहरी टोलक लोकनि केँ सरकार आओर ओकर तंत्र हरिश्चंद बनि गेल छथि। विदेह सदेह:२२|| 733 734 || विदेह सदेह:२२

A