SADEHA — 23

Publication: SADEHA · Issue: 23
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह २३ विदेह-सदेह २३, विदेह www.videha.co.in/ पेटार (अंक ३०१-३१६) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. ३५००/- संस्‍करण: २०२१, २०२२ Videha Sadeha 23: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 301-316 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-९५१) गजेन्द्र ठाकुर- एडिटर्स चोइस सीरीज, मैथिली सी.डी. एल्बम, मिथिलाक इतिहास भाग-२, भाषा आ प्रौद्योगिकी (संगणक,छायांकन,कुँजी पटल/ टंकणक तकनीक), अन्तर्जालपर मैथिली आ विश्वव्यापी अन्तर्जालपर लेखन आ ई-प्रकाशन, तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास, मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली, मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) (पृ. २-१३४) इरा मल्लिक- बीहनि कथा (असमंजस, पाहुन एलखिन) (पृ. १३५-१३७) अरुण लाल दास- कर्म प्रधान विश्व करि राखा- राजस्थानी लोक लघु कथा, बीहनि कथा (लहास, गाछ बिरिछ सँ प्रेम, दर्शन) (पृ. १३८-१४४) आभा झा- पिघलैत हिमखण्ड, कनियें, साम्राज्य, भरोस, नाटक, भय, विमोचन, स्वार्थक रंग, बौक (पृ. १४५-१६०) श्याम सुन्दर शशि- कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह (पृ. १६१-१६४) उमेश कुमार महतो- (पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज स’ रिपोर्ट) (पृ. १६५-१६६) सुमित आनन्द- भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना (पृ. १६७-१६९) सुभाष कुमार कामत- बीहनि कथा (तनखाह, भूख, बुढवा पेंशन, मैथिली, औंठा, मुनाफ़ा) (पृ. १७०-१७५) मनोज झा मुक्ति- अस्तित्वक कटघेरामे मिथिला-मैथिलीक संघ संस्थासब, निष्कर्षविहीन सम्मेलन ! (पृ. १७६-१८५) नवेन्दु कुमार झा- अस्तित्वक लेल संघर्ष करैत पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व (पृ. १८६-१८९) सुशांत झा- की बलिराज गढ़ मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि?, मिथिला मंथन (पृ. १९०-१९८) सुभाष साह- लन्दनमे नेपाल मेला २००८ (लन्दनसँ श्री सुभाष शाहक रिपोर्ट) (पृ. १९९-१९९) हितेन्द्र गुप्ता- आब नहि खुलत नवका शराबक दोकान (पृ. २००-२०१) गंगेश गुंजन- भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ, मैथिलीक उर्वर क्षेत्रमे कॉरपोरेट-जगत धाप, किछु एहनो बात विषय (पृ. २०२-२१०) डॉ कैलाश कुमार मिश्र- यायावरी (पृ. २११-२२८) जितेन्द्र झा- रिपोर्ताज (पृ. २२९-२४५) उमेश मण्डल- लोक-नाट्य-वाद्य मण्डली- संकलन, मैथिलीमे ई-पत्रकारिता (पृ. २४६-२८४) कीर्तिनाथ झा- लघुकथा-नपुंसक (पृ. २८५-२९६) आनन्द कुमार झा- मैथिलीक वर्तमान रंगमंच, धर्मिता आ स्वतन्त्रता, मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच, कने हंसि लिअ, एक बाल नाटक- बोलूक बेदना (पृ. २९७-३१६) नबोनारायण मिश्रजीक रचना- प्रस्तुति आशीष अनचिन्हार (तीन खेपमे) (पृ. ३१७-३२१) आशीष अनचिन्हार- बीहनि कथा (पत्नीभक्त, अंतर, लक्ष्मी, खाए बला पार्टी, भविष्य, प्रतिभाशाली, सोति, मतलब, नर्क), लघुकथा (सपना आ भ्रम, घर), दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै, मिथिला-मैथिलीक प्रारंभिक Apps, यूट्यूब आ मैथिली, मैथिली वेब-पत्रकारिताक इतिहास, मैथिलीमे इंटरनेट, फेसबुकक दू टा फीचर आ दू टा भ्रम, दू टा गीतक चर्चा उच्चारण केर आँगनमे, एकटा "मैथिली गजल" जे बदलि देलकै 'मैथिली गीत-संगीतक' इतिहास (पृ. ३२२-४८६) प्रणव झा- की छै 'डीएनबी' आ की लाभ छै “डीएनबी इन डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल प्रोग्राम" केर (पृ. ४८७-४९१) लालदेव कामत- भूगोलमे मिथिलाराज कहियाधरि (पृ. ४९२-५००) ज्ञानवर्द्धन कंठ- खेत, डॉलीक नामांकन, गदहाक इलाज, बोंगहा मिठाइ, कुसियारक गाड़ी, मोबाइलक रुटीन, कैमरामैन, हॉर्लिक्स, मेंटल, बुढ़िया दाइ, गहूमक रखबारी, पचहीबाली काकीक यात्रा-वृत्तांत (पृ. ५०१-५२४) कंचन कंठ- मुक्ति (पृ. ५२५-५२५) मुन्ना जी- लघुकथा (बीचला लोक), बीहनि कथा (हिक) (पृ. ५२६-५३७) विन्देश्वर ठाकुर- बीहनि कथा (न्याय, छुवाछुत) (पृ. ५३८-५३९) प्रभाष अकिंचन- बीहनि कथा (रिलीफ, जतरा) (पृ. ५४०-५४१) पूनम मण्डल- टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ (प्. ५४२-५४४) मीना झा- मैथिल समाज ऑफ़ यु. के. केर तेसर वार्षिक समारोहसमाचार: ९.४.२०११ (पृ. ५४५-५५०) प्रियंवदा तारा झा- परंपरा, अजगुत, मोनक गप्प, पर उपदेश कुशल बहुतेरे, सम्मान, स्वाभिमान, की बुझबै, दूरक ढोल सोहाओन, विकल्प, वापसी(पृ. ५५१-५६१) संतोष कुमार राय ’बटोही’- गाम (पृ. ५६२-५६५) डॉ. अर्पणा- नारी शब्दक लेल किछु प्रमुख शब्दक विवेचना, रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे ‘कौशल्या’, रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे पुष्कर काण्डक विशेषता, लालदासक रामायणमे विधि-व्यवहारक वर्णन (पृ. ५६६-५८७) डॉ. चित्रलेखा- मिथिलामे गीत नादक महत्व, मिथिलामे पावनि-तिहार, मिथिलाक परिचय, मिथिलाक भाषा एवं साहित्य, मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव, मिथिलाक प्रसिद्ध लोक पर्व सामा-चकेबा (पृ. ५८८-६२६) विष्णु कान्त मिश्र- महादेवक कूटनीति, चारि पत्र (पृ. ६२७-६४१) डा. सुभाष चन्द्र झा- वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क साहित्य यात्रा (पृ. ६४२-६४४) अनुपम रैना- यात्रीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व, यात्रीक गद्य-साहित्यमे मिथिला समाज, यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज, यात्रीजीक मैथिली रचनामे समसामयिक जीवनक अभिव्यक्ति (पृ. ६४५-७३५) डॉ ललन कुमार झा- पं. तेजनाथ झा ओ संस्कार : एक समीक्षा, म. म. राजनाथ मिश्र ओ तिथि निर्णय : एक अध्ययन, पं. कुशेश्वर कुमर ओ पर्व निर्णय: एक समीक्षण, म.म. उमापति ओ शुद्धि निर्णय, पुत्र ओ पितृकर्म (पृ. ७३६-७८५) नन्द विलास राय- सरस्वती पूजाक परसाद, बुढ़क दुख, प्रायश्चित, पत्नीक फरमाइस, बरबैरेपर छी, अदरश विआह, हमरे पार्टीक लोक, एमेली साहैब, स्वाभिमान (पृ. ७८६-८२३) योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’- नरक विजय (पृ. ८२४-९०९) डॉ विनीत उत्पल- लघु कथा- नागा फकीर (पृ. ९१०-९२४) कुसुम ठाकुर- अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक? (पृ. ९२५-९२८) अमरेश कुमार लाभ- (बीहनि कथा- लेबलीटिये बड्ड छन्हि, बेटी बचाबू) (पृ. ९२९-९३१) ममता कर्ण- उपराग (पृ. ९३२-९३२) सुचिता कुमारी- पोतीक बियाह (पृ. ९३३-९३७) दीपा झा- दादी परी (नेन्ना -भुटका लेल) (पृ. ९३८-९३९) विद्या रश्मि- गलतीक बोध (संस्मरण)(पृ. ९४०-९४३) डॉ मालती मधु- स्तन कैंसरक शुरूआती लक्षण आ रोकथाम (पृ. ९४४-९४५) पल्लवी सिन्हा- तीसी गुणक खान अछि (पृ. ९४६-९४७) जवाहर लाल कश्यप- स्ट्रेश बस्टर (पृ. ९४८-९५१) पद्य-खण्ड (पृ. ९५२-१२६८) जयंती कुमारी- गजल (पृ. ९५३-९५४) कल्पना झा- अम्मा, साओन, हम कतय छी? (पृ. ९५५-९५७) आशीष नीरज- कोरोना (पृ. ९५८-९५९) आभा झा- जोड़- घटाव, चेतना, अपन घेर, व्यथा, कृष्ण केर माहात्म्य, श्रमिक, मतिविशेख (पृ. ९६०-९६७) बाबा बैद्यनाथ- "कुण्डलिया छंद", किछु गजल (पृ. ९६८-९७३) आनन्द दास- चिठ्ठी, नींद आबि जाइत अछि (पृ. ९७४-९७७) प्रियंवदा तारा झा- उम्मीदक आश्रय, हम गाम छी, व्यूह, मोन होइछ (पृ. ९७८-९८३) सविता 'सुमन'- स्त्री (पृ. ९८४-९८५) कंचन कंठ- हमर नानीगाम, अजगुत बुचिया (पृ. ९८६-९९०) प्रभाष अकिंचन- पंच राम दीप, पावस मिलन (पृ. ९९१-९९४) संतोष कुमार राय 'बटोही'- आउट इनकम (पृ. ९९५-९९५) आशीष अनचिन्हार- किछु गजल, किछु भक्ति गजल (पृ. ९९६-१००९) विजय इस्सर "वत्स"- अपराधी छी हम, बचबिहऽ हो कक्का, आजाद गजल (पृ. १११०-१११३) नबोनारायण मिश्र- ई कीर्तिमान बनल, नवगीत, बिडम्बना (पृ. १११४-१०१८) ज्ञानवर्द्धन कण्ठ- मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै, के छथि?, नरक, हमर मुनियाँ सुतैये टुनमुनियाँ, भगवान अहाँ सँ की बाजी, सम्हरिक' रस्ता चलिहह हौ!, रहमत आजु उपासल, बिरजू पियासल हे... (पृ. १०१९-१०२७) आशुतोष- कोना कहू? भारत एक कृषि प्रधान देश अछि।(पृ. १०२८-१०२८) जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' - किछु बाल गजल, किछु गजलब्(पृ. १०२९-१०३८) मुन्ना जी- पथराइत डीह (पृ. १०३९-१०४३) अमरेश कुमार लाभ- संतान, राग अलापने किछु नहि भेटत, लागल छथि, सब के बापु, मिझल आगिकेँ खोड़ने की, किछु गजल (पृ. १०४४-१०५२) इरा मल्लिक- ३३ टा कविता-गीत, ७ टा श्रृन्गार गीत, ६ टा बाल गीत/ कविता, ५ टा गजल, तीन टा शेर, २ टा बाल गजल, ५ टा शृंगार गजल (पृ. १०५३-११६८) अशोक जे. दुलार- बाल-कविता- प्रिया रानी, ८ टा कविता (पृ. ११६९-११८२) विष्णु कान्त मिश्र- चीर हरण, बालबोध, सामा – चकेबा, अनुत्तरित प्रश्न, पथिक, कुरसी (पृ. ११८३-११९२) डा जियाउर रहमान जाफरी- किछु आजाद गजल (पृ. ११९३-११९५) प्रदीप पुष्प- किछु रुबाइ, किछु गजल (पृ.११९६-१२००) बिनय भूषण- कोरोना-अवकाश, ठौरक जोगारमे घरमूँहा मजूर, महाप्रलयमे मृत्युसँ साक्षात्कार (पृ. १२०१-१२२४) आनन्द कुमार झा- प्रतिमुख, एकटा नव कहानी गढबाक अछि, दुर्दशावस्था, मात्सर्य, मुक्तिक तरास (पृ. १२२५-१२३०) रमन कुमार झा- नेनपन, करम कुटय छी ढेंकी मे नऽ, केबार (पराती), कहिया एबय हमरा आंगन, टपटप नोर चुबैये, मनभावन मइया मोरी, रूसा-फुली (भगवती वंदना) (पृ.१२३१-१२४५) शशि महेंद्र (शशि प्रभा)- स्त्री (पृ. १२४६-१२४६) तनुजा दत्ता- नारीक अंनत रूप (पृ. १२४७-१२४७) चंदना दत्त- फागु, माँ (पृ. १२४८-१२५०) दीपा झा- मुढ़ी- कच्छ (पृ. १२५१-१२५१) अम्बिका मल्लिक- हंसी, हम छी काली हम छी दुर्गा, विरांगना (पृ. १२५२-१२५५) निर्मला कर्ण- ममताक सम्मान करु, नारीक सम्मान, सशक्त नारी सशक्त समाज (पृ. १२५६-१२६२) प्रीति प्रभा- पंखुड़ी, अप्पन मिथिलाधाम (पृ. १२६३-१२६४) बबली मीरा- हम मिथिला के नारी छी (पृ. १२६५-१२६७) रागिनी प्रीत- गीत (पृ. १२६८-१२६८) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर एडिटर्स चोइस सीरीज एडिटर्स चोइस सीरीज-१ विदेहक १२३ म (०१ फरबरी २०१३) अंकमे बलात्कारपर मैथिलीमे पहिल कविता प्रकाशित भेल छल। ई दिसम्बर २०१२ क दिल्लीक निर्भया बलात्कार काण्डक बादक समय छल। ओना ई अनूदित रचना छल, तेलुगुमे पसुपुलेटी गीताक एहि कविताक हिन्दी अनुवाद केने छलीह आर. शांता सुन्दरी आ हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद केने छलाह विनीत उत्पल। हमर जानकारीमे एहिसँ बेशी सिहराबैबला कविता कोनो भाषामे नहि रचल गेल अछि। सात सालक बादो ई समस्या ओहने अछि। ई कविता सभकेँ पढ़बाक चाही, खास कऽ सभ बेटीक बापकेँ, सभ बहिनक भाएकेँ आ सभ पत्नीक पतिकेँ। आ विचारबाक चाही जे हम सभ अपना बच्चा सभ लेल केहन समाज बनेने छी। एडिटर्स चोइस सीरीज-१ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-२ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच ब्रेस्ट कैसरक समस्यापर विदेह मे मीना झा केर एकटा लघु कथा प्रकाशित भेल। ई मैथिलीक पहिल कथा छल जे ब्रेस्ट कैसर पर लिखल गेल। हिन्दीमे सेहो ताधरि एहि विषयपर कथा नहि लिखल गेल छल, कारण एहि कथाक ई-प्रकाशित भेलाक १-२ सालक बाद हिन्दीमे दू गोटेमे घोंघाउज भऽ रहल छल कि पहिल हम आकि हम, मुदा दुनूक तिथि मैथिलीक कथाक परवर्ती छल। बादमे ई विदेह लघु कथामे सेहो संकलित भेल। एडिटर्स चोइस सीरीज-२ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-३ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिलक किछु बाल कविता प्रकाशित भेल। बादमे हुनकर ३ टा बाल कविता विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल जाहिमे २ टा कविता बेबी चाइल्डपर छल। पढ़ू ई तीनू कविता, बादक दुनू बेबी चाइल्डपर लिखल कविता पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-३ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-४ विदेहक ५०-१०० म अंकक बीच जगदानन्द झा मनुक एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह शिशु उत्सवमे संकलित भेल, ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे एहि उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॊडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह। एडिटर्स चोइस सीरीज-४ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-५ एडिटर्स चोइस ५ मे मैथिलीक "उसने कहा था" माने कुमार पवनक दीर्घकथा "पइठ" (साभार अंतिका) । हिन्दीक पाठक, जे "उसने कहा था" पढ़ने हेता, केँ बुझल छन्हि जे कोना अहि कथाकेँ रचि चन्द्रधर शर्मा ’गुलेरी’ अमर भऽ गेलाह। हम चर्चा कऽ रहल छी, कुमार पवनक "पइठ" दीर्घकथाक। एकरा पढ़लाक बाद अहाँकेँ एकटा विचित्र, सुखद आ मोन हौल करैबला अनुभव भेटत, जे सेक्सपीरिअन ट्रेजेडी सँ मिलितो लागत आ फराको। मुदा एहि रचनाकेँ पढ़लाक बाद तामस, घृणा सभपर नियंत्रणकेँ आ सामाजिक/ पारिवारिक दायित्वकेँ सेहो अहाँ आर गंभीरतासँ लेबै, से धरि पक्का अछि। मुदा एकर एकटा शर्त अछि जे एकरा समै निकालि कऽ एक्के उखड़ाहामे पढ़ि जाइ। एडिटर्स चोइस सीरीज-५ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-६ जगदीश प्रसाद मण्डलक लघुकथा "बिसाँढ़": १९४२-४३ क अकालमे बंगालमे १५ लाख लोक मुइला, मुदा अमर्त्य सेन लिखैत छथि जे हुनकर कोनो सर-सम्बन्धी एहि अकालमे नहि मरलन्हि। मिथिलोमे अकाल आएल १९६७ ई. मे आ इन्दिरा गाँधी जखन एहि क्षेत्र अएली तँ हुनका देखाओल गेल जे कोना मुसहर जातिक लोक बिसाँढ़ खा कऽ एहि अकालकेँ जीति लेलन्हि। मैथिलीमे लेखनक एकभगाह स्थिति विदेहक आगमनसँ पहिने छल। मैथिलीक लेखक लोकनि सेहो अमर्त्य सेन जेकाँ ओहि महाविभीषिकासँ प्रभावित नहि छला आ तेँ बिसाँढ़पर कथा नहि लिखि सकला। जगदीश प्रसाद मण्डल एहिपर कथा लिखलन्हि जे प्रकाशित भेल चेतना समितिक पत्रिकामे, मुदा कार्यकारी सम्पादक द्वारा वर्तनी परिवर्तनक कारण ओ मैथिलीमे नहि वरण् अवहट्ठमे लिखल बुझा पड़ल, आ ओतेक प्रभावी नहि भऽ सकल कारण विषय रहै खाँटी आ वर्तनी कृत्रिम। से एकर पुनः ई-प्रकाशन अपन असली रूपमे भेल विदेहमे आ ई संकलित भेल "गामक जिनगी" लघुकथा संग्रहमे। एहि पोथीपर जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ टैगोर लिटरेचर अवार्ड भेटलनि। जगदीश प्रसाद मण्डलक लेखनी मैथिली कथाधाराकेँ एकभगाह हेबासँ बचा लेलक, आ मैथिलीक समानान्तर इतिहासमे मैथिली साहित्यकेँ दू कालखण्डमे बाँटि कऽ पढ़ए जाए लागल- जगदीश प्रसाद मण्डलसँ पूर्व आ जगदीश प्रसाद मण्डल आगमनक बाद। तँ प्रस्तुत अछि लघुकथा बिसाँढ़- अपन सुच्चा स्वरूपमे। एडिटर्स चोइस सीरीज-६ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-७ मैथिलीक पहिल आ एकमात्र दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफी। सन्दीप कुमार साफीक दलित आत्मकथा जे अहाँकेँ अपन लघु आकाराक अछैत हिलोड़ि देत आ अहाँक ई स्थिति कऽ देत जे समानान्तर मैथिली साहित्य कतबो पढ़ू अहाँकेँ अछौं नहि होयत। ई आत्मकथा विदेहमे ई-प्रकाशित भेलाक बाद लेखकक पोथी "बैशाखमे दलानपर"मे संकलित भेल आ ई मैथिलीक अखन धरिक एकमात्र दलित आत्मकथा थिक। तँ प्रस्तुत अछि मैथिलीक पहिल दलित आत्मकथा: सन्दीप कुमार साफीक कलमसँ। एडिटर्स चोइस सीरीज-७  (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-८ नेना भुटकाकेँ रातिमे सुनेबा लेल किछु लोककथा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-८ (डाउनलोड लिंक) एडिटर्स चोइस सीरीज-९ मैथिली गजलपर परिचर्चा (विदेह पेटारसँ)। एडिटर्स चोइस सीरीज-९ (डाउनलोड लिंक) मैथिली सी.डी. एल्बम धनीराम महतो (सल्हेश आदि दरभंगा रेडियो स्टेशन- आब अनुपलब्ध- दरभंगा रेडियो स्टेशन अपन आर्काइवसँ एकरा निकालत तहूपर संदेह) कारिक झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (गंगा कैसेट्स) सोखा झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (टी सीरीज) गोविन्द झूमर- जागे महतो आ जागे राउत (गंगा कैसेट्स) गहील माता के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) काली माइ के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) भुइंया बाबा के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) गंगा माइ के पूजा- बिरासी सदा (गंगा कैसेट्स) भुइया बाबा -भगैत प्रसंग- रमाकान्त पजियार (गंगा कैसेट्स) बाबा बख्तौर भुइया बाबा- सकलदेव दास आ साथी (सुप्रीम वीडियो) भक्त ज्योति (भगैत प्रसंग)- रंजीत पजियार (नीलम वी.सी.डी.) बैताली यादव- तपेश्वर यादव आ कामेश्वर यादव (गंगा कैसेट्स) कुँवर बृजवान- (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी] भुखना-भुखनी- राम खेलावन महतो, नेथल मण्डल, महीन्दर यादव, राम असेश्वर दास, हेमू मुखिया आ बिल्टु मुखिया [गीत मैथिली संवाद मैथिली] रेशमा चूहड़मल- रामवृक्ष ठाकुर एण्ड पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद मैथिली आ हिन्दी] राजा सल्हेश- विदेशिया नाच पार्टी, देवेन्द्र साहनी आ पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी] आल्हा रुदल झगरू बध- - विदेशिया नाच पार्टी, देवेन्द्र साहनी आ पार्टी (गंगा कैसेट्स) [गीत मैथिली संवाद हिन्दी] संत बाबा करू खिरहरी- रुदल पजियार (जयश्री कैसेट्स) [गीत मैथिली आ हिन्दी संवाद हिन्दी] मिथिलाक इतिहास भाग-२ १ मिथिलामे बाहरी लोकक आगमन आ मिथिलासँ दूर देशमे पलायन, ई दुनू घटना निरंतर होइत रहल अछि। मुदा आइ कालिक पलायन एहि अर्थें विकट रूप लऽ लेने अछि कारण विगत तीस सालक अवधिमे भेल पलायन मिथिला गामकेँ खाली कऽ देलक। 1981 ई. मे पटनापर बनल महात्मा गाँधी सेतु आ पटना दरभंगा डीलक्स कोच सभक पाँती मिथिलावासीक हेँजक–हेँज बाहर बहरएवामे योगदान केलक। तत्कालीन सरकार सभक राजनैतिक आर्थिक शैक्षिक सामाजिक आ सांस्कृतिक एहि सभ क्षेत्रमे विफलता एकटा आधार तँ बनबे कएल, स्वतंत्रताक बादक तीस साल बिहार स्थित मिथिला आ नेपाल स्थित मैथिली भाषी क्षेत्रक बीचमे एकटा विभाजक रेखा सेहो खींचि देलका। 1960 ई. मे बनल कमला बान्ह आ एखन धरि अपूर्ण कोसी परोयोजना मिथिलाक ग्रामीण आर्थिक आधारकेँ तोड़ि कऽ राखि देलक। प्राचीन कालक पलायन आ आइ काल्हिक पलायन मध्य एकटा मूल अंतर सेहो अछि। मिथिलाक मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण काएस्थ अपन विद्वत्ताक प्रदर्शन, पठन पाठन आ दोसर राजाक दरबारमे जीविकोपार्जन निमित्त प्राचीन कालहि सँ जाइत छलाह, तँ गएर मैथिल ब्राह्मण–कर्ण कायस्थ जाति वाणिज्य, अंगरक्षक आदिक कार्य लेल दूर देशक यात्रा करैत छ्लाह। प्राचीन कालमे मोरंग आ पछाति भदोही मिथिलाक बोनिहारक श्रम किनबाक केन्द्र बनल, मुदा एहिमे मोरंग नेपालक मिथिलाञ्चलमे पड़ैत अछि मुदा एकरा प्रवास एहि लेल कहल जाए लागल कारण ओतुक्का शासक गएर मैथिल गोरखा भऽ गेल छलाह। पलायनक विभिन्न स्वरूपः- पलायन एकटा ऐतिहासिक प्रक्रियाक अंग अछि। अहाँक क्षेत्रक भौगोलिक स्थिति कोन देशमे अहाँकेँ पटकि देने अछि ताहिपर सेहो। से मोरंग लग रहलोसँ भारतक मिथिलाञ्चलक वासीक लेल पछाति कम लोकप्रिय भेल कारण ओ दोसर देशमे अवस्थित भेलाक कारण विभिन्न कारणसँ पलायनक लेल अनुपयुक्त भऽ गेल। कोलकाता स्वतंत्रताक बाद निकटवर्त्ती मेट्रो नगर रहए से लोक ओहि नगरमे खूब पलायन केलन्हि मुदा जखन विभिन्न राजनैतिक–आर्थिक नीतिक संकीर्णताक कारणसँ बंगालक उद्योग–धंधा चौपट भऽ गेल, शैक्षिक केन्द्रक रूपमे ओकर महत्व कम भेल तखन पलायनक केन्द्र मुम्बइ आ दिल्ली भऽ गेल। बोनिहार आब भदोही आ मोरंग नञि वरन पंजाब–हरियाणा आ पश्चिमी उत्तरप्रदेश जाइत छथि आ बनिजार बाहरसँ मिथिलामे भरि गेल छथि। दरभंगा राजक गलत आर्थिक नीतिक कारण आरा छपराक लोक सभ भूमि आ कामतक अधिपति कोना भऽ गेलाह से जगदीश प्रसाद मण्डल जीक साहित्यमे पूर्ण रूपसँ देखार भेल अछि। 1936-37मे बर्मासँ सेहो भोजपुर बक्सरक लोक पूर्णियाँ, अररियामे भागि कऽ एलाह, डुमराँवक हरि बाबू हिनका सभकेँ बर्मामे बसेने छलाह आ बर्माक भारतसँ अलग भेलाक बाद ई लोकनि शरणार्थी बनि एहि क्षेत्रमे आबि गेलाह। कतेको बर्मा टोल एहि क्षेत्र सभमे अहाँकेँ भेटि जाएत। एहि क्षेत्रमे कृषि–वाणिज्यपर हिनको सभक दखल भेलन्हि। मिथिलामे भेल पलायनमे 1971 ई. मे बांग्लादेशक निर्माणक लगाति ओतुक्का हिन्दूक किशनगंजमे आ बादमे ओतुक्का मुस्लिमक पूर्णियाँ किशनगंजमे आगमन भेल। बाहर भेल पलायनक विरूद्ध भीतर आएल ई पलायन मिथिलाक बोली–वाणी सभ वस्तुकेँ प्रभावित कएलक। जाति–धर्म आधारित विवाह मुस्लिम, राजपूत आ भूमिहार मध्य मिथिलाक भौगोलिक परिधिसँ बाहर हुअए लागल ताहिसँ सेहो बोली–वाणीक अंतर दृष्टिगोचर भेल। पलायन नीक आकि अधलाहः- पलायन जे बाहर जाइ वला आ भीतर आबै वला दुनू तरहक अछि केँ अहाँ कोनो तरहेँ नहि रोकि सकै छी। मुदा एक खादी मध्य भेल ई विकट पलायन मूल मैथिल बोली–वाणीक पलायन विकट समस्याकेँ जन्म देलक। भुखमरी जे वादि-अकाल आनलक, तकरासँ तँ मुक्ति भेटल मुदा सांस्कृतिक अकाल सेहो ई आनलक। गामपर बोझ घटल, लोककेँ बटाइ लेल जमीन नै भेटै छलै, आब से बै छै, मुदा तकर विपरीत मिथिलाक भीतर शैक्षिक केन्द्रक पूर्ण समापन भऽ गेल, बाहरी बनिजार एतुक्का आर्थिक बाजारपर कब्जा कऽ लेलन्हि। विशालकाय सड़क परियोजना, आ सूचना प्रौद्योगिकी, टेलीविजन, अखबार, पत्रिका आदि ततेक पूँजी केन्द्रित भऽ गेल जे ई स्थानीय वणिकक औकातिक बाहरक वस्तु भऽ गेल। क्षेत्रक राज्य–सभा आ विधान परिषदमे जखन बाहरी पूँजीपति प्रवेश कऽ गेल छथि तखन आर कथूक चर्च की करी? पलायनक निदानः- हा पलायन केने काज नै चलत। जेना इस्रायलक प्रवासी ओकर शक्ति–सिद्ध भेल छथि तहिना मैथिल प्रवासी सेहो मिथिलाक लेल ओतुक्का भाषा–संस्कृति–साहित्य आ अर्थनीतिक लेल सहायक सिद्ध हेताह मिथिला राज्यक मांगमे बीचक स्थिति जेना बिहारक अंतर्गत मैथिली भाषी क्षेत्रमे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मैथिली हो, मैथिलीक रेडियो स्टेशन, टी.वी, चैनल लेल कम लाइसेंस फीस राखल जाए, इ मैथिली पत्र–पत्रिकाकेँ सरकारी विज्ञापन भेटए आदि मांग–आदि सेहो धोंसियेबाक चाही। राज्य जहिया भेटत तहिया भेटत उपरका 2-3 बिन्दु जे भेटि जाएत तँ एकटा उपलब्धि होएत आ लोकमे तखने जागृति आएत तखने ओ मिथिला राज्य एकर आर्थिक–शैक्षिक राजनैतिक स्थितिपर ओ विचार कऽ सकताह आ आंदोलनक भाग बनि सकताह। २ मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ जुझैत रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक, बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ केर बादक छी। पहिने ओ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भए गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बाढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता-चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कऽ कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक २००८ ई.क प्रकोप ओहि दुष्प्रचारकेँ खतम कए पाओत आकि नहि से नहि जानि ! पहिने हमरा सभ ई देखी जे कोशी आ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण ककरा लग अछि। ई नियन्त्रण अछि बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग आ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन अएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। किएक? सामयिक घटनाक्रम- कोशीपर भीमनगर बैरेज, कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल ? छहरक बीचमे जे रेत जमा भए जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जएत, तखन सभ साल बान्हक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त। एहि साल ई कार्य समयसँ किएक नहि शुरू भेल? फेर शुरू भेल बरखा, १८ अगस्तकेँ कोशी बान्हमे २ मीटर दरारि आबि गेल। १९८७ ई.क बाढ़ि हम आँखिसँ देखने छी। झंझारपुर बान्ह लग पानि झझा देलक, ओवरफ्लो भए गेल एक ठामसँ, आ आँखिक सोझाँ हम देखलहुँ जे कोना तकर बाद १ मीटरक कटाव किलोमीटरमे बदलि जाइत अछि। २७-२८ अगस्त २००८ धरि भीमनगर बैरेजक ई कटाव २ किलोमीटर भए चुकल छल। आ ई कारण भेल कोशीक अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़बाक आ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करबाक। नासाक ८ अगस्त २००८ आ २४ अगस्त २००८ केर चित्र कौशिकीक नव आ पुरान धारक बीच २०० किलोमीटरक दूरी देखा रहल छल। भीमनगर बैरेज आब कोशीक एकटा सहायक धारक ऊपर बनल बैरेज बनि गेल रहए। राष्ट्रीय आपदा: जाहि राज्यमे आपदा अबैत अछि, से केन्द्रसँ सहायताक आग्रह करैत अछि। केन्द्रीय मंत्रीक टीम ओहि राज्यक दौड़ा करैत अछि आ अपन रिपोर्ट दैत अछि जाहिपर केन्द्रीय मंत्रीक एकटा दोसर टीम निर्णय करैत अछि, आ ओ टीम निर्णय करैत अछि जे ई आपदा राष्ट्रीय आपदा अछि वा नहि। बिहारक राजनीतिज्ञ अपन पचास सालक विफलता बिसरि जखन एक दोसराक ऊपर आक्षेपमे लागल छलाह, मनमोहन सिंह मंत्रीक प्रधानक रूपमे दौड़ा कए एकरा राष्ट्रीय आपदा घोषित कएलन्हि। कारण ई लेवल-३ केर आपदा अछि आ ई सम्बन्धित राज्यक लेल असगरे - नहि तँ वित्तक लिहाजसँ आ नहिए राहतक व्यवस्थाक सक्षमताक हिसाबसँ- पार पाएब संभव नहि अछि। आब राष्ट्रीय आकस्मिक आपदा कोषसँ सहायता देल जा रहल अछि, किसानक ऋण-माफी सेहो सम्भव अछि। उपाय की होअए ? कुशेश्वर स्थानक आपदा सभ-साल अबैछ, से सभ ओकरा बिसरिए जेकाँ गेलाह। मुदा आब की होअए ? दामोदर घाटीक आ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल ? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि ? नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब ? एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ह बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आ त्वरित समाधन। आ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि से करब, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब, आ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कोशीकेँ पुरान पथपर अनबाक हेतु कैकटा बान्ह बनाबए पड़त आ ओ सभ एकर समाधान कहिओ नहि बनि सकत। कमला धार नहरिसँ लाभ हानि- एक तँ कच्ची नहरि आ ताहूपर मूलभूत डिजाइनक समस्या, एकटा उदाहरण पर्याप्त होएत जेना-तेना बनाओल परियोजना सभक। कमलाक धारसँ निकालल पछबारी कातक मुख्य नहरि जयनगरसँ उमराँव- पूर्वसँ पछबारी दिशामे अछि। मुदा ओतए धरतीक ढ़लान उत्तरसँ दक्षिण दिशामे अछि। बरखाक समयमे एकर परिणाम की होएत आकि की होइत अछि ? ई बान्ह बनि जाइत अछि आ एकर उत्तरमे पानि थकमका जाइत अछि। सभ साल एहि नहर रूपी बान्हसँ पटौनी होअए वा नहि एकर उतरबरिया कातक फसिल निश्चित रूपेण डुमबे टा करैत अछि। फलना बाबूक जमीन नहरिमे नञि चलि जाए, से नहरिक दिशा बदलि देल जाइत अछि ! कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल, ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भए गेल। कमला धार जे बलानमे –पिपराघाट लग १९५४ मे- मिलि गेलीह, हिमालयसँ बहि कए कोनो पैघ लक्कड़क अवरोधक कारण। आब हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी धरि बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए ! कोशी: कोशीक पानि माउन्ट एवेरेस्ट, कंचनजंघा आ गौरी-शंकर शिखर आ मकालू पर्वतश्रृंखलासँ अबैत अछि। नेपालमे सप्तकोशीमे, जाहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी (भोट कोसी), तांबा कोसी, लिक्षु कोसी, दूध कोसी, अरुण कोसी आ तामर कोसी सम्मिलित अछि। एहिमे इन्द्रावती, सुनकोसी, तांबा कोसी, लिक्षु कोसी आ दूध कोसी मिलि कए सुनकोसीक निर्माण करैत अछि आ ई मोटा-मोटी पच्छिमसँ पूर्व दिशामे बहैत अछि, एकर शाखा सभ मोटा-मोटी उत्तरसँ दक्षिण दिशामे बहैत अछि। ई पाँचू धार गौरी शंकर शिखर आ मकालू पर्वतश्रृंखलाक पानि अनैत अछि। अरुणकोसी माउन्ट एवेरेस्ट (सगरमाथा) क्षेत्रसँ पानि ग्रहण करैत अछि। ई धार मोटा-मोटी उत्तर-दक्षिण दिशामे बहैत अछि। तामर कोसी मोटा-मोटी पूबसँ पच्छिम दिशामे बहैत अछि आ अपन पानि कंचनजंघा पर्वत श्रृंखलासँ पबैत अछि। आब ई तीनू शाखा सुनकोसी, अरुणकोसी आ तामरकोसी धनकुट्टा जिल्लाक त्रिवेणी स्थानपर मिलि सप्तकोसी बनि जाइत छथि। एतएसँ १० किलोमीटर बाद चतरा स्थान अबैत अछि जतए महाकोसी, सप्तकोसी वा कोसी मैदानी धरातलपर अबैत छथि। आब उत्तर दक्षिणमे चलैत प्रायः ५० किलोमीटर नेपालमे रहला उत्तर कोसी हनुमाननगर- भीमनगर लग भारतमे प्रवेश करैत छथि आ कनेक दक्षिण-पच्छिम रुखि केलाक बाद दक्षिण-पूर्व आ पच्छिम-पूर्व दिशा लैत अछि आ भारतमे लगभग १३० किमी. चललाक बाद कुरसेला लग गंगामे मिलि जाइत छथि। कोसीमे बागमती आ कमलाक धार सेहो सहरसा- दरभंगा- पूर्णिया जिलाक संगमपर मिलि जाइत अछि। कोसीपर पहिल बान्ह १२म शताब्दीमे लक्ष्मण द्वितीय द्वारा बनाओल वीर-बाँध छल जकर अवशेष भीमनगरक दक्षिणमे एखनो अछि। भीमनगर लग बैराजक निर्माणक संगे पूर्वी कोसी तटबन्ध सेहो बनि गेल आ पूर्वी कोसी नहरि सेहो। कुँअर सेन आयोग १९६६ ई. मे कोसी नियन्त्रणक लेल भीमनगरसँ २३ किमी. नीचाँ डगमारा बैराजक योजनाक प्रस्ताव देलक जे वाद-विवाद आ राजनीतिमे ओझरा गेल। एहि बैराजसँ दू फायदा छल। एक तँ भीमनगर बैरेजक जीवन-कालावधि समाप्त भेलापर ई बैरेज काज अबितए, दोसर एहिसँ उत्तर-प्रदेशसँ असम धरि जल परिवहन विकसित भऽ जाइत जाहिसँ उत्तर बिहारकेँ बड़ फाएदा होइतए। मुदा एहि बैरेज निर्माण लेल पाइ आवंटन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री डॉ के.एल.राव नहि देलखिन्ह। पश्चिमी कोसी नहरि एकर विकल्प रूपमे जेना तेना मन्थर गति सँ शुरू भेल मुदा एखनो धरि ओहिमे काज भइये रहल अछि। कोसी लेल किछु नहि भऽ सकल। विचार आएल तँ योजना अस्वीकृत भए गेल। जतेक दिनमे कार्य पूरा हेबाक छल ततेक दिन विवाद होइत रहल, डगमारा बैराजक योजनाक बदलामे सस्ता योजनाकेँ स्वीकृति भेटल मुदा सेहो पूर्ण हेबाक बाटे ताकि रहल अछि ! विश्वेश्वरैय्या पड़ैत छथि मोन : हैदराबादसँ ८२ माइल दूर मूसी आ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्ह, हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कए देलन्हि। विश्वेश्वरैय्या निचुलका भागक चौड़ाई बढ़ा कए ई कमी पूरा कए लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कए आ मलेरियाग्रस्त आ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाज लए डॉक्टर बहाली कए, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कए आ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा समयक क्षतिपूर्ति केलन्हि। देशभक्त तेहन छलाह जे सीमेन्ट आयात नहि केलन्हि वरन् बालु, कैल्सियम, पाथर आ पाकल ईटाक बुकनी मिला कए निर्मित सुरखीसँ , एहि बान्हक निर्माण कएलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहि द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कए लेल गेल। दिल्ली अछि दूर एखनो ! : प्रधानमंत्री आपदा कोष आ मुख्यमंत्री आपदा कोषक अतिरिक्त स्वयंसेवी संगठन सभक कोषमे सेहो दिल्लीवासी अपन अनुदान दए सकैत छथि। मुदा दीर्घ सूत्री काज होएत, निम्न बिन्दुपर दिल्लीमे केन्द्र सरकारपर दवाब बनाएब। १. स्कूल कॉलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए छुट्टी देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? सी.बी एस.ई आ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नहि कए सकल अछि। दिल्लीवासी सी.बी एस.ई आ आइ.सी.एस.ई.सँ एहि तरहक कार्यान्वयन कराबथि तँ लाजे बिहार बोर्ड ओकरा लागू कए देत। २. भारतमे डगमारा बैराजक योजनाक प्रारम्भ कएल जाए, कारण भीमनगर बैरेज अपन जीवन-कालावधि पूर्ण कए लेने अछि। एहिमे फन्ड, रेलवे आ सड़क दुनू मंत्रालयसँ लेल जाए कारण एहिपर रेल आ सड़क सेहो बनि सकैछ/ आ बनबाक चाही। ३. बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाए। ४. कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कए हटा देल जाए आ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए। ५. बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य होअए जेना देखा पड़ि रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कए, युद्ध-स्तरपर एहि सभपर काज शुरू कएल जाए। उपरोक्त बिन्दु सभपर दिल्लीमे लॉबी बना कए केन्द्र सरकारपर/ मंत्रालयपर दवाब बनाएब तखने बिहार अपन नव छवि बना सकत। १२म शताब्दीमे शुरू कएल बान्ह तखने पूर्ण होएत आ धारसभ मनुक्खक सेविका बनि सकत। ३ सर्वहारा मैथिल संस्कृति एकटा विप्लवक दौरसँ चलि रहल अछि। माइग्रेशन एकटा नीक गप होइत अछि मुदा जाहि संस्कृतिमे एक पीढ़ीमे गामक गाम सुन्न भऽ गेल ओहिमे माइग्रेशन एकटा अभिशाप बनि आएल अछि। मैथिल संस्कृतिक बीस प्रतिशत भाग नेपालमे आ अस्सी प्रतिशत भाग भारतमे पड़ैत अछि। आ एहि माइग्रेसनसँ एतए आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक आ सांस्कृतिक संकट उत्पन्न भऽ गेल अछि। कारण: १९६७ ई. क अकाल आ तकर बादक कएक सालक शिथिल प्रशासन आ फेर १९८७ ई.क बाढ़ि आ तकर बादक कएक सालक शिथिल प्रशासन ई सभ मिलि कऽ एकटा आर्थिक संकट उत्पन्न कएल जाहिसँ माइग्रेशन अपन विकट रूपमे सोझाँ आएल आ एकटा सांस्कृतिक संकट उत्पन्न भेल। आर्थिक स्थिति खराप भेने जातिगत कट्टरता बढ़िते अछि।आ एहि संकट लेल आ एकरासँ निकलबाक लेल मिथिलाक संस्कृतिमे बहुत रास सहायक आ विरोधी तत्व सेहो उपलब्ध अछि। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता, ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो सम्मिलित अछि । एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्व सेहो रहल। शिक्षा, जाति-पाति आ स्त्रीक दशा: जातिक भीतरक स्तरीकरण, दू जातिक बीचमे मतभेद, बहु-विवाह, बाल-विवाह, बिकौआ विवाह। बाल-विवाहक विरोध आ विधवा विवाहक पक्षमे कोनो सांकेतिक आन्दोलन धरि नहि भेल। शूद्र कवि ऐलूष वैदिक ऋचा लिखलन्हि तँ ओ समाज एतेक सुदृढ़ छल जे शुद्दक गण द्वारा एलेक्जेन्डरकेँ कड़गर विरोध सहए पड़लैक। मिथिलाक सन्दर्भमे सेहो जखन अपन शिल्पी लोकनि आ सभटा तथाकथित समाजक निम्न स्तरक लोक जखन सुदृढ़ छल तखन जनकक नामकरण जन सँ भेल आ फेर सिमरौनागढ़, पजेबागढ़, बलिराजपुर किला, असुरगढ़ किला, जयनगर किला, नन्दनगढ़, कटरागढ़, नौलागढ़, मंगलगढ़, कीचकगढ़, बेनूगढ़, वरिजनगढ़, आदिक एकटा शृंखला मिथिलाक स्थापत्य कलाक रूपमे उद्घाटित भेल। आ ई किला सभ शत्रुकेँ मथए बला मिथिलाक नामकरणक अनुरूप रहल। बौद्ध खोह, ताराक मूर्ति आदि शिल्पी कलाक अन्य रूपक चर्चक रूपमे सेहो उपस्थित अछि। मुदा जे ई कट्टरता बढ़ैत गेल तँ आइ मिथिलामे स्थापत्यक नामपर उपलब्धि सेहो शून्य भऽ गेल। आर्थिक स्थिति एहन भऽ गेल जे एक साँझ उपास रहए लागल। माइग्रेशन भुखमरी रोकलक मुदा किछु मूल्यपर। तहिना मैत्रेयीसन विदुषी सहस्राब्दी भरि विलुप्त रहलीह से जातिगत कट्टरता (जाति मध्य आन्तरिक अतरीकरण आ दू जाति मध्य- दुनु प्रकारक) कारणसँ। शिक्षाक ह्रास तँ तेहेन भेल जे षड दर्शनमे चारि टा दर्शन मिथिलासँ निकलल मुदा आइ गामक गाम मैट्रिक परीक्षामे पास नहि केनिहारसँ भरल अछि। बाढ़ि आ अर्थव्यवस्था: मिथिलाक धरती बाढ़िक विभीषिकासँ सेहो जुझैत रहल अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका क्षेत्र तँ बिन बाढ़िक, बरखाक समयमये डूमल रहैत अछि। मुदा ई स्थिति १९७८-७९ क बादक छी। पहिने ओ क्षेत्र पूर्ण रूपसँ उपजाऊ छल, मुदा भारतमे तटबन्धक अनियन्त्रित निर्माणक संग पानिक जमाव ओतए शुरू भऽ गेल। मुदा ओहि क्षेत्रक बाढ़िक कोनो समाचार कहियो नहि अबैत अछि, कहियो अबितो रहए तँ मात्र ई दुष्प्रचार जे ई सभटा पानि नेपालसँ छोड़ल गेल पानिक जमाव अछि। कुशेश्वरस्थान दिसुका लोक एहि नव संकटसँ लड़बाक कला सीखि गेलाह। हमरा मोन अछि ओ दृश्य जखन कुशेश्वरस्थानसँ महिषी उग्रतारास्थान जएबाक लेल हमरा बाढ़िक समयमे अएबाक लेल कहल गेल छल कारण ओहि समयमे नाओसँ गेनाइ सरल अछि, ई कहल गेल। रुख समयमे खत्ता-चभच्चामे नाओ नहि चलि पबैत अछि आ सड़कक हाल तँ पुछू जुनि। फसिलक स्वरूपमे परिवर्तन भेल, मत्स्य-पालन जेना तेना कऽ कए ई क्षेत्र जबरदस्तीक एकटा जीवन-कला सिखलक। कौशिकी महारानीक २००८ ई.क प्रकोप सोझाँ आएल। कोशी आ गंडकपर जे दू टा बैराज नेपालमे अछि ओकर नियन्त्रण बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक लग अछि आ एतए बिहार सरकारक अभियन्तागणक नियन्त्रण छन्हि। पानि छोड़बाक निर्णय बिहार सरकारक जल संसाधन विभागक हाथमे अछि। नेपालक हाथमे पानि छोड़बाक अधिकार तखन अएत जखन ओतुक्का आन धार पर बान्ह/ छहर बनत, मुदा से ५० सालसँ ऊपर भेलाक बादो दुनू देशक बीचमे कोनो सहमतिक अछैत सम्भव नहि भए सकल। कोशीपर भीमनगर बैरेज कुशहा, नेपालमे अछि। १९५८ मे बनल एहि छहरक जीवन ३० बरख निर्धारित छल, जे १९८८ मे बीति गेल। दुनू देशक बीचमे कोनो सहमति किएक नहि बनि पाओल ? छहरक बीचमे जे रेत जमा भऽ जाइत अछि, तकरा सभ साल हटाओल जाइत अछि। कारण ई नहि कएलासँ ओकर बीचमे ऊंचाई बढ़ैत जाएत, तखन सभ साल बान्हक ऊँचाई बढ़ाबए पड़त। कोशी अपन मुख्य धारसँ हटि कए एकटा नव धार पकड़ैत अछि आ नेपालक मिथिलांचलक संग बिहारक मिथिलांचलकेँ तहस नहस करैत अछि। मैथिली भाषा: मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक आधारपर मैथिली सेवी संस्था सभ जे विद्यापति पर्व आ संस्थाक निर्माण, पुरस्कार वितरण कए रहल छथि ओहिमे गएर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक प्रवेश सीमित अछि मुदा एम्हर ओ बढ़ि रहल अछि। आ ई मैथिलीक लेल एकटा शुभ लक्षण अछि। साहित्यमे सेहो गएर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ लेखक आ पाठक बढ़ल छथि। मीडिया आ शिक्षा व्यवस्था एहि आधुनिक इन्फॉरमेशन सोसाइटीमे अपन हस्तक्षेपसँ मैथिली भाषा आ मैथिल संस्कृति लेल एकटा प्रहार सन अछि मुदा सौभाग्य मिथिला सन टी.वी. चैनल आ नेपालक कान्तिपुर एफ.एम., जानकी एफ.एम. आ रेडियो मिथिला सन रेडियो स्टेशन एहि प्रहारकेँ सीमित रूपमे रोकलक अछि। बाल साहित्यक निर्माण सेहो बढ़ल अछि। अन्तर्जाल सेहो एकभगाह मैथिली साहित्यमे हस्तक्षेप कएलक अछि। उपाय की होअए ? स्थानिक विशेषताक आधारपर स्त्री-शिक्षा, संगणक शिक्षा आ व्यवसाय आधारित शिक्षा देल जाए। प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मिथिला भरिमे मैथिली भाषा द्वारा देल जाए। बाढिक समस्याक समाधान होअए। दामोदर घाटीक आ मयूरक्षी परियोजना जेकाँ कार्य कोशी, कमला, भुतही बलान, गंडक, बूढ़ी गंडक आ बागमतीपर किएक सम्भव नहि भेल ? विश्वेश्वरैय्याक वृन्दावन डैम किएक सफल अछि ? नेपाल सरकारपर दोषारोपण कए हमरा सभ कहिया धरि जनताकेँ ठकैत रहब ? एकर एकमात्र उपाए अछि बड़का यंत्रसँ कमला-बलान आदिक ऊपर जे माटिक बान्ह बान्हल गेल अछि तकरा तोड़ि कए हटाएब आ कच्चा नहरिक बदला पक्का नहरिक निर्माण। नेपाल सरकारसँ वार्ता आ त्वरित समाधन। आ जा धरि ई नहि होइत अछि तावत जे अल्पकालिक उपाय अछि से करब, जेना बरखा आबएसँ पहिने बान्हक बीचक रेतकेँ हटाएब, बरखाक अएबाक बाट तकबाक बदला किछु पहिनहि बान्हक मरम्मतिक कार्य करब, आ एहि सभमे राजनीतिक महत्वाकांक्षाकेँ दूर राखब। कमला नदीपर १९६० ई. मे जयनगरसँ झंझारपुर धरि छहरक निर्माण भेल आ एहिसँ सम्पूर्ण क्षेत्रक विनाशलीलाक प्रारम्भ सेहो भए गेल। झंझारपुरसँ आगाँक क्षेत्रक की हाल भेल से तँ हम कुशेश्वरक वर्णन कए दए चुकल छी। मधेपुर, घनश्यामपुर, सिंघिया एहि सभक खिस्सा कुशेश्वरसँ भिन्न नहि अछि। कमला-बलानक दुनू छहरक बीच जेना-जेना रेत भरैत गेल, ताहि कारणेँ एहि तटबन्धक निर्माणक बीस सालक भीतर सभ किछु तहस-नहस भऽ गेल। कमला धारक हाल ई अछि जे दस घण्टामे पानिक जलस्तर एहि धारमे २ मीटरसँ बेशी धरि बढ़ि जाइत अछि। १९६५ ई.सँ बान्ह/ छहरक बीचमे रेत एतेक भरि गेल जे एकर ऊँचाइ बढ़ेबाक आवश्यकता भए गेल आ ई माँग शुरू भए गेल जे बान्ह/ छहरकेँ तोड़ि देल जाए ! एतए विश्वेश्वरैय्या मोन पड़ैत छथि। हैदराबादसँ ८२ माइल दूर मूसी आ ईसी धारपर बान्ह बनाओल गेल आ नगरसँ ६.५ माइलक दूरीपर मूसी धारक उपधारा बनाओल गेल। संगहि धारक दुनू दिस नगरमे तटबन्ध बनाओल गेल। कृष्णराज सागर बान्ह, हुनकर प्रस्तावित १३० फुट ऊँच बनेबाक योजना मैसूर राज्य द्वारा अंग्रेजकेँ पठाओल गेल तँ वायसराय हार्डिंज ओकरा घटा कए ८० फीट कए देलन्हि। विश्वेश्वरैय्या निचुलका भागक चौड़ाई बढ़ा कए ई कमी पूरा कए लेलन्हि। बीचेमे बाढ़ि आबि गेल तँ अतिरिक्त मजदूर लगा कए आ मलेरियाग्रस्त आ आन रोगग्रस्त मजदूरक इलाज लए डॉक्टर बहाली कए, रातिमे वाशिंगटन लैम्प लगा कए आ व्यक्तिगत निगरानी द्वारा समयक क्षतिपूर्ति केलन्हि। देशभक्त तेहन छलाह जे सीमेन्ट आयात नहि केलन्हि वरन् बालु, कैल्सियम, पाथर आ पाकल ईटाक बुकनी मिला कए निर्मित सुरखीसँ , एहि बान्हक निर्माण कएलन्हि। बान्ह निर्माणसँ पहिनहि द्विस्तरीय नहरिक निर्माण कए लेल गेल। दिल्ली अछि दूर एखनो ! निम्न बिन्दुपर दिल्लीमे केन्द्र सरकारपर दवाब बनाएब। स्कूल कॉलेजमे गर्मी तातिलक बदलामे बाढ़िक समए छुट्टी देबामे कोन हर्ज अछि, ई निर्णय कोन तरहेँ कठिन अछि? सी.बी एस.ई आ आइ.सी.एस.ई. तँ छोड़ू बिहार बोर्ड धरि ई नहि कए सकल अछि। स्थानिक विशेषताक आधारपर स्त्री-शिक्षा, संगणक शिक्षा आ व्यवसाय आधारित शिक्षा आ प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मिथिला भरिमे मैथिली भाषा द्वारा देल जाए। बैरेज बनबाक कालवधियेमे पक्की नहरि धरातलक स्लोपक अनुसारे बनाओल जाए। कच्ची बान्ह सभकेँ तोड़ि कए हटा देल जाए आ पक्की बान्हकेँ मोटोरेबल बनाओल जाए, बान्हक दुनू कात पर्याप्त गाछ-वृक्ष लगाओल जाए। बिहारमे सड़क परियोजना जेना स्वप्नक सत्य होअए जेना देखा पड़ि रहल अछि, तहिना सभ विघ्न-बाधा हटा कए, युद्ध-स्तरपर एहि सभपर काज शुरू कएल जाए। ४ विदेशी पूँजीक भारतमे सोझ निवेश दोसर देशक फर्मसँ मिलि कऽ वा ओकर सम्पत्ति वा ओकर स्टॉक कीनि कऽ होइत अछि। ओ ऐ लेल स्वॉट अनेलिसिस करै छथि आ अपन प्रवेशक लेल अपन कम दाममे उत्पादन आ सेहो तीव्र गतिसँ कएक तरहक उपाय द्वारा करबाक क्षमताकेँ देखैत करै छथि। कोन देशमे विदेशी पूँजी निवेश होएत से किछु गपपर निर्भर करैत अछि। चीनमे भारतक बनिस्पत बेशी विदेशी पूँजी आओत कारण भारतमे कार्य करबा लेल ढेर रास लोकतंत्रीय प्रक्रिया सभ छै जे उत्पाद केर दाम बढ़बैत छै। ई एना बूझि सकै छी जापान आ स्विटजरलैण्ड आदि देशमे विदेशी पूँजी कम आएल बनिस्पत स्पेनक। आ ऐ तरहेँ तुलना करी तँ नेपालमे भारतक अपेक्षा तुलनात्मक पूँजी निवेश बेशी आओत। मैथिली आ आन भाषामे विदेशी पूँजी निवेशक आगमनक सम्भावना देखी तँ तुलनात्मक रूपमे मैथिलीमे बेशी पूँजी आओत, नेपाली वा हिन्दीक तुलनामे। आ मैथिलीक सन्दर्भमे नेपालक मैथिलीक भविष्य भारतक मैथिलीक भविष्यक तुलनामे बेशी नीक बूझि पड़त जँ विदेशी पूँजीक गप आओत। मुदा विदेशी पूँजी मात्र प्रबन्धन वा अर्थशास्त्रक उपरोक्त सैद्धांतिक प्रतिफल टा नै अछि। एतए हम राजनैतिक स्थिरता आ सामाजिक संकट दुनूकेँ सोझाँ पबै छी। भारतक भयंकर लाइसेंस फीस जेना सूचना आ प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे मैथिलीक दुर्दशाक लेल जिम्मेद्दारी लेलक से नेपालमे नै अछि। से ओतए रेडियो आ टी.वी.पर मैथिली नीक दशामे अछि। मुदा राजनैतिक अस्थिरता कखनो काल नेपालमे पूँजी निवेशमे बाधक भऽ जाइए। तहिना नेपालक मैथिलीक सामाजिक आधार विस्तृत अछि मुदा भारतक तेहन नै अछि। से भारतमे मैथिलीक लेल पूँजी निवेशक ई ऋणात्मक गुणक अछि। जेना ऊपर कहने छी जे कोनो विदेशी पूँजी निवेश होएत तँ पाइ लगेनहार पहिने स्वॉट एनेलिसिस करत। मैथिलीक सन्दर्भमे स्वॉट एनेलिसिस:- मैथिलीक स्वॉट Strenghth- Weakness- Opportunity- Threat (SWOT) एनेलेसिस (हमर गुरुजी चमू कृष्ण शास्त्री जीक ऐमे बड़ पैघ योगदान छन्हि।) मैनेजमेन्टमे एकटा विषए छैक स्वॉट अनेलिसिस। मैथिलीकेँ ऐ कसौटीपर कसै छी। S- Strenghth- शक्ति, सामर्थ्य, बल – मैथिली लेल हृदएमे अग्नि छन्हि, से सभक हृदएमे, परस्पर एक दोसराक विरोधी किएक ने होथु। जनक बीचमे ऐ भाषाक आरोह, अवरोह आ भाषिक वैशिट्यकेँ लऽ कऽ आदर अछि आ ऐ मे मैथिली नै बजनिहार भाषाविद् सम्मिलित छथि। आध्यात्मिक आ सांस्कृतिक महत्वक कारण सेहो मैथिली महत्वपूर्ण अछि। ऐ भाषामे एकटा आन्तरिक शक्ति छै। बहुत रास संस्था, जइमे किछु जातिवादी आ सांप्रदायिक संस्था सेहो सम्मिलित अछि, एकर विकास लेल तत्पर अछि। ऐ भाषाक जननिहार भारत आ नेपाल दू देशमे तँ रहिते छथि आब आन-आन देश-प्रदेशमे सेहो पसरल छथि। W- Weakness- न्यूनता, दुर्बलता, मूर्खता – प्रशंसा परम्परा जइमे दोसराक निन्दा सेहो ऐमे सम्मिलित अछि, एकरे अन्तर्गत अबैत अछि- माने आत्मप्रशंसाक। परस्पर प्रशंसा सेहो ऐमे शामिल अछि। सरकारपर आलम्बन, प्राथमिकताक अज्ञान- जकर कारणसँ महाकवि बनबा/ बनेबा लेल कवि समीक्षक जान अरोपने छथि- जखन भाषा मरि रहल अछि। कार्ययोजनाक स्पष्ट अभाव अछि आ जेना-तेना किछु मैथिली लेल कऽ देबा लेल सभ व्यग्र छथि, कऽ रहल छथि। स्वयं मैथिली नै बाजि बाल-बच्चाकेँ मैथिलीसँ दूर रखबाक जेना अभियान चलल अछि आ ऐमे मीडिया, कार्टून आ शिक्षा-प्रणालीक संग एक्के खाढ़ीमे भेल अत्यधिक प्रवास अपन योगदान देलक अछि। मैथिलीक कार्यकर्ता लोकनिक कएक ध्रुवमे बँटल रहबाक कारण समर्थनपरक लॉबिइंग कर्ताक अभाव अछि। मैथिलीकेँ ऐमे की लाभक बदला अपन/ अप्पन लोकक की लाभ ऐ लेल लोक बेशी चिन्तित छथि। मैथिली छात्रक संख्याक अभाव। उत्पाद उत्तम रहला उत्तर सेहो विक्रयकौशलक आवश्यकता होइत छै। मैथिलीमे उत्तम उत्पादक अभाव तँ अछिए, विक्रयकौशलक सेहो अभाव अछि। O- Opportunity- अवसर, योग, अवकाश – विशिष्ट विषयक लेखनक अभाव, मात्र कथा-कविताक सम्बल। मैथिलीमे चित्र-शृंखला, चित्रकथा, विज्ञान, समाज विज्ञान, आध्यात्म, भौतिक, रसायन, जीव, स्वास्थ्य आदिक पोथीक अभाव अछि। ताड़ग्रन्थक संगणकक उपयोग कऽ प्रकाशन नै भऽ रहल अछि। छात्र शक्तिक प्रयोग न्यून अछि। संध्या विद्यालय आ चित्रकला-संगीतक माध्यमसँ शिक्षा नै देल जा रहल अछि। दूरस्थ शिक्षाक माध्यमसँ/ अन्तर्जालक माध्यमसँ मैथिलीक पढ़ाइक अत्यधिक आवश्यकता अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ वर्तमान विषय सभपर पुस्तक लेखन आ अप्रकाशित ताड़ ग्रन्थ सभक प्रकाशनक आवश्यकता अछि। मैथिलीक माध्यमसँ प्रारम्भिक शिक्षाक आवश्यकता अछि। प्रवासी मैथिल लेल भाषा पाठन-लेखन-सम्पादन पाठ्यक्रमक आवश्यकता अछि। T- Threat- भीषिका, समभाव्यविपद् – हताशा, आत्महीनता, शिक्षासँ निष्कासन, पारम्परिक पाठशालामे शिक्षाक माध्यमक रूपमे मैथिलीक अभाव, विरल शास्त्रज्ञ, ताड़पत्रक उपेक्षा आ विदेशमे बिक्री, भाषा शैथिल्य, सांस्कृतिक प्रदूषण आ परिणामस्वरूप भाषा प्रदूषण, मुख्यधारासँ दूर भेनाइ आ मात्र दू जातिक भाषा भेनाइ, शिक्षक मध्य ज्ञान स्तरक ह्रास, राजनैतिक स्वार्थवश मैथिलीक विरोध ई सभ विपदा हमरा सभक सोझाँ अछि। ई सभटा ऊपरवर्णित बिन्दु प्रबन्धन-विज्ञानक कार्ययोजनाक विषय अछि आ भाषणक नै कार्यक आवश्यकता अछि। सम्भाषण, मैथिली माध्यमसँ पाठन, नव सर्वांगीन साहित्यक निर्माण लेल सभकेँ एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। धनक अभाव तखने होइत अछि जखन सरकारी सहायतापर आस लगेने रहब। सार्वजनिक सहायताक अवलम्ब धरू, दाताक अभाव नै स्वीकारकर्ताक अभाव अछि। यूनेस्को कहैत अछि जे भारत विश्वक ६ठम सभसँ पैघ पुस्तक प्रकाशक अछि जतए अंग्रेजी लगा कऽ २५ मान्यताप्राप्त भाषामे पोथी प्रकाशन होइ छै। अंग्रेजीक पोथी प्रकाशनमे भारत संयुक्त राज्य अमेरिका आ ग्रेट ब्रिटेनक बाद तेसर स्थानपर अछि। मुदा चौबीस मुख्य भाषामे सँ यूनेस्कोक अनुसार पुस्तक प्रकाशन लेल मात्र १८ भाषा महत्वपूर्ण अछि आ ऐ १८ भाषामे मैथिली नै अछि। मैथिली ऐ १८ मे नै अछि। फेडरेशन ऑफ इण्डियन पब्लिशर्सक अनुसार मोटामोटी भारतमे १६००० प्रकाशक छथि जे सालमे ७०००० पोथी प्रकाशित करै छथि। ऐमे २१,००० पोथी अंग्रेजीमे छपैए आ तहूसँ बेशी पोथी हिन्दीमे छपैए। भारतमे साक्षरताक स्थिति जेना-जेना नीक हेतै, तेना-तेना पोथी पढ़ैबलाक संख्यामे सेहो वृद्धि हेतैक। नेपालमे मुख्यतः नेपालीक पोथी छापल जाइत अछि। भारत आ नेपाल दुनू ठाम मैथिली पोथीक प्रकाशन गुण आ संख्या दुनूमे पछुआएल अछि। सरकारी संस्थाक संग विदेशी निवेशकक सहयोग: आब प्रकाशन उद्योगसँ आगाँ बढ़ी आ सूचना-प्रसार माध्यमक आन क्षेत्र जेना टी.वी., रेडियो आ ऑनलाइन भाषाइ उपकरणपर आउ। एतऽ विदेशी निवेशक हमरा सभ लेल डॉक्यूमेन्टरी, मनोरंजन आ भाषाइ उपकरणक निर्माणमे सहयोग दऽ सकै छथि। सरकार मान्यताप्राप्त भाषा लेल बिना बजारकेँ ध्यानमे रखने खास कऽ मैथिली सहित ओइ छह भाषाकेँ ध्यानमे राखैत काज करए तँ बजारक दृष्टिसँ जे सांस्कृतिक ह्रास सूचना-प्रौद्योगिकी मध्य देखबामे आबि रहल अछि से मैथिलीमे नै आओत। अरबी भाषाकेँ फंडक कोनो कमी नै छै मुदा ओ भाष किए मरि रहल अछि, जखन ओकरा पक्षमे सरकारी कामकाज छै, मस्जिद छै, शिक्षा पद्धति छै। लेबनान, जोर्डन आ इजिप्टक अतिरिक्त सउदी अरब आ आन गल्फ देशक एकरा संरक्षण छै। मुदा पाइ एकरा लेल आफत बनल छै। सभ शेख विदेशसँ पढ़ि कऽ अबैत छथि आ मिश्रित अरबी बजै छथि आ तकरा फैशन मानल जा रहल छै। जै अरबीमे कुराण लिखल गेल आ आइ काल्हिक शैक्षिक “आधुनिक मानकीकृत अरबी- मॉडर्न स्टैण्डर्ड अरेबिक- (एम.एस.ए.)” मे बड्ड पैघ भेद आबि गेल छै। ई “आधुनिक मानकीकृत अरबी” बाजै जाए बला अरबीसँ फराक भऽ गेल अछि आ एकर काज मात्र सभ अरब देशक बीच सूत्रबद्ध करबा धरि सीमित भऽ गेल छै, जइसँ सभ एक दोसराकेँ बुझि पाबए। मुदा यएह “आधुनिक मानकीकृत अरबी” दृश्य-श्रव्य-प्रिंटमे अछि जे ककरो मातृभाष नै छिऐ वरन व्याकरण पढ़ि कऽ सीखल जाइ छै। विदेशी निवेशककेँ जे सरकार मैथिली लेल मनोरंजक कार्यक्रमकेँ मैथिलीमे डब करबाक लेल सहायता करए तँ कार्टून चैनल सभक कार्यक्रम आ धारावाहिक सभ मैथिलीमे प्रसारित भऽ सकत भने ओकरा विज्ञापन भेटौ वा नै। आ एक बेर जे ई पहिया घुमत तँ मैथिली जीबि उठत। आ ई पहिया तखने घुमत जखन मधुबनी-दरभंगा-सहरसा-सुपौलक ब्राह्मण-कायस्थ-सवर्ण मैथिलीकेँ जीबि उठऽ देताह, अपन ऋणात्मक ऊर्जाकेँ विराम देताह, समाजक सभ वर्ग जे मैथिलीसँ जुड़ि रहल अछि ओइमे बाधा देबाक बदला सहयोग करताह। समाजक राक्षसी प्रतिभायुक्त ई सर्वहारा वर्ग मैथिलीक रक्षा लेल समर्पित हसेरी बनत तखने ई भाषा आब बचत। मुख्य विदेशी निवेशक: अखन धरि हार्पर कॉलिन्स, पेंगुइन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मैकमिलन, रैंडम हाउस, पिकाडोर, हैचेट आ रुटलेज हावर्ड बिजनेस पब्लिशिंग अपन शाखा वा भारतीय सहयोगीक माध्यमसँ भाषायी क्षेत्रमे निवेश केने अछि। मुदा से निवेश अंग्रेजी धरि सीमित भऽ गेल अछि। भारतमे प्रकाशन उद्योगमे विदेशी खिलाड़ी अएलाक बाद एकटा पेंगुइन हिन्दीकेँ छोड़ि देल जाए तँ विदेशी निवेश भारतीय भाषामे लगभग नगण्य अछि। एकर कारण सेहो स्पष्ट अछि। भारतीय भाषाक प्रकाशक सरकारी खरीदपर निर्भर छथि आ गएर सरकारी खरीदमे ओ टेक्स्टबुक छपाइपर जोर दै छथि। विदेशी निवेशक सरकारी खरीद आ टेक्स्टबुक छपाइक आधारपर अपन नीति निर्धारित नै करै छथि। मैथिलीक लेल ई वरदान होइतए मुदा जे भविष्यक साक्षरता वृद्धिक अनुमान लैयो कऽ चली तँ नव साक्षर मैथिली पढ़ताह तकर आशा वर्तमान शिक्षा प्रणालीमे मैथिलीक कतिआएल स्थितिकेँ देखैत असम्भवे बुझा पड़ैत अछि, आ मैथिलीमे ने सरकारी लाइब्रेरीक खरीदक आशा छै आ ने टेक्स्ट बुक छपाइक। पाठकक संख्या तखन इन्टरनेटपर बढ़ाबए पड़त, आ जे पाठक कहियो सरकारी शिक्षा प्रणालीमे मैथिली नै पढ़ि सकल छथि तिनका प्रारम्भमे मंगनीमे डाउनलोडक सुविधा देबऽ पड़त। मैथिलीसँ अंग्रेजी आ संस्कृत आ तकर माध्यमसँ आन भाषामे अनुवाद द्वारा सरकारी आ संस्थागत पुरस्कार पद्धति द्वारा कतिआएल पोथी सभकेँ सोझाँ आनए पड़त जइसँ मैथिली साहित्यक उत्कृष्टता विदेशी निवेशकक सोझाँ आबए। आ ओम्हर सरकारी स्कूलक अतिरिक्त पब्लिक स्कूल सभमे सेहो मैथिलीक पढाइ हुअए तइ लेल समर्पित हसेरी तैयार करए पड़त। एक दोसरापर प्रत्यारोप लगेलाक बदला (कायस्थ आ ब्राह्मण द्वारा एक दोसरापर, मधुबनी-सहरसा-मधेपुरा-समस्तीपुर-बेगुसराय, पूर्णियांक लोक द्वारा एक दोसरापर आरोप-प्रत्यारोप जे मैथिलीक दुर्दशा लेल हम नै ओ जिम्मेवार छथि- तइसँ हटि कऽ) एकमुखी, एक स्तरीय आ एक यत्नसँ प्रयास करए पड़त। आ जनताकेँ जोड़ए पड़त। हा पुरस्कार केलाक बदला जन साहित्यकारकेँ चिन्हबापर, जन नेताकेँ चिन्हबापर, जन विक्रेताकेँ चिन्हबापर अपन जान-जी लगाबऽ पड़त। विदेशी निवेशसँ छोड़ू भारतीय प्रकाशक जे कहियो ऐ क्षेत्रमे आबऽ चाहलक वा सरकारी खरीदक मशीनरी जे कोनो मैथिलीक पोथी कीनऽ चाहलक वा अनुवाद लेल कोनो स्वयंसेवी संस्था मैथिली पोथी सभक चयन करऽ चाहलक तखनो मैथिली साहित्यक पुरोधा लोकनि द्वारा, जे सलाहकार बनलाह, द्वारा भ्रमित सूची देल गेल, कतेक रास मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि देशक बाहर टपा देल गेल आ मारते रास लोक द्वारा ढेर रास बखेरा ठाढ़ कएल गेल। से सभ कियो भागि गेलाह, बाहरियो आ मैथिली सेवी सेहो। सरकारी खरीद गुणक आधारपर नै भेल, पैरवी-पैगाम आ ढेर रास आन गुणकक आधारपर भेल। विदेशी निवेशकक लग ई सभ ऋणात्मक पक्ष लऽ कऽ हमरा सभ कोना जा सकब। विदेशी निवेशसँ मैथिलीपर अप्रत्यक्ष प्रभाव: मैथिलीपर विदेशी निवेशक अप्रत्यक्ष प्रभावक रूपमे मैथिली बाजैबलाक संख्याक घटोत्तरी आ मैथिलीक शब्दावलीक ह्रासकेँ राखल जाइत अछि। ओना ई सभ भारत आ नेपालमे पैघ नग्रक अनियन्त्रित विकास आ छोट नग्रक बिना अपन आर्थिक आधारक मात्र जमीनक खरीद-बिक्रीक कारणसँ विस्तारक कारण बेसी भेल अछि। मैथिली भाषीक एके खाढ़ीमे जतेक पड़ाइन भेल अछि से आन वर्गमे तीन-चारि खाढ़ीमे भेल (जेना तमिल वा बांग्लाभाषीकेँ लऽ सकै छी।)। मुदा आनो भाषा-भाषीमे विदेश पड़ाइनसँ भाषाक लोप भेल अछि मुदा संस्कृतिक लोप नै तँ आन वर्गमे भेल अछि आ ने मैथिलीभाषी वर्गमे। मैथिली भाषीकेँ लऽ कऽ दिल्लीमे ई कहबी भऽ गेल अछि जे आन वर्ग पाँच साल दिल्लीमे रहलापर पंजाबी बाजऽ लगै छथि आ हुनकर घरक स्त्रीगण करवा-चौथ करऽ लगै छथि मुदा मैथिलीभाषी नै तँ पंजाबी सिखै छथि आ ने हुनकर घरक स्त्रीगण करवा-चौथ करै छथि। हँ जखन अहाँ पत्नीसँ मैथिलीमे नै बजबै आ बच्चाकेँ गामक दर्शनो नै करऽ देबै तँ ओ मैथिली बाजब छोड़बे करत। विदेशी निवेश जाइ तरहेँ हिन्दी आ अंग्रेजी कार्टून चैनलमे भेल अछि, ओइसँ मैथिलीटा नै पंजाबीपर सेहो संकट आबि गेल अछि। मुदा ई एकटा फेज छिऐ, आ ई फेज बीस बर्खमे खतम भऽ जाएत। जे परिवार ऐ बीस बर्खमे मैथिली बाजब छोड़ि देताह हुनका हम मैथिली दिस सोझ रूपमे नै घुरा सकब। मुदा सांस्कृतिक सन्निकटताक कारणसँ मैथिलीक परियोजना, अनुवाद, ऒडियो-वीडियो आ संचार परियोजनाकेँ ओ समर्थन करबे करताह, तकरा सम्मान देबे करताह। आ ई अप्रत्यक्ष रूपमे मैथिली लेल वरदान सिद्ध हएत। आ एकटा पुनर्जागरणक काल अखन चलि रहल अछि तकर पुनरावृत्ति बीस बर्ख बाद हएत। मैथिली युद्धसँ बहार भऽ जीवित निकलत आ सुदृढ़ हएत। विदेशी निवेशककेँ मैथिलीमे निवेश केलासँ लाभ: विदेशी निवेशक कल्याणकारी कार्य सेहो करै छथि। हुनका मैथिलीक विशेषता बुझाबए पड़त। विश्व प्रसिद्ध वायोलिन वादक स्व. येहुदी मेनुहिन मैथिलीकेँ संसारक सभसँ लयात्मक आ मधुर भाषा कहने छलाह। विदेशी निवेशकक किछु निवेश यूनेस्कोक भाषा सम्बन्धी नीतिक आधारपर सेहो करैत अछि। आ ई कल्याणकारी निवेश लाभपर आधारित नै होइत अछि, सरकारी खरीदपर आधारित नै होइत अछि, विज्ञापनपर आधारित नै होइत अछि। अन्तर्राष्ट्रीय सर्टिफिकेशनपर आधारित गएर सरकारी संस्था सभक माध्यमसँ मैथिलीमे शैक्षिक पोथी आ मनोरंजन आ स्वास्थ्य आधारित फिल्म डोक्यूमेन्टरीक मैथिली भाषी क्षेत्रमे ग्राम पंचायतक स्कूल सभक माध्यमसँ कएल जाए तँ मैथिली भाषी लोकक हीन भावनामे कमी आओत आ भाषायी क्रान्तिक संगे आर्थिक क्रान्ति सेहो आएत। भाषा आ प्रौद्योगिकी (संगणक,छायांकन,कुँजी पटल/ टंकणक तकनीक), अन्तर्जालपर मैथिली आ विश्वव्यापी अन्तर्जालपर लेखन आ ई-प्रकाशन गूगल आ वर्डप्रेस द्वारा जालवृत्त खोलबाक लेल बहुत रास बनल बनाएल परिकल्पित नमूना स्थल निर्माण लेल उपलब्ध अछि आ ओतए लेखन, संदेश आ टिप्पणीक लेल असीमित दत्तांशनिधि उपलब्ध अछि जतए जालोद्वहन मँगनीमे देल जा रहल अछि। ई सभ जालवृत्त निर्माण स्थल उपभोक्ता केन्द्रित अछि आ एतए सरल लेखन-पद्धतिक व्यवस्था सेहो कएल गेल अछि मुदा जे अहाँ संविहित पृच्छन भाषा (एस.क्यू.एल.) आधारित जालस्थलक निर्माण आ प्रबन्धन करए चाहैत छी तँ ओहि लेल ई निबन्ध अहाँक लेल उपयोगी रहत। पहिने मिथिलाक्षर आ देवनागरीक यूनीकोडमे लिखल जएबाक प्रक्रम दए रहल छी आ से अन्तर्जालपर पढ़ल जा सकबा योग्य कोना होएत तकरो चरचा होएत। तकर बाद जालस्थल निर्माण पद्धतिपर विस्तृत चरचा होएत। देवनागरी लिपिकेँ रोमन टाइपराइटरपर कोन टाइप करी- पहिने www.bhashaindia.com पर जा कए हिन्दी IME V.5 अवारोपित (डाउनलोड) करू । एहि विधि (प्रोग्राम) केँ अपना संगणक (कंप्युटर) पर प्रतिष्ठापित (इंस्टॉल) करू । फेर नियन्त्रण पटल (कंट्रोल पैनल) मे क्षेत्रीय आ भाषा (रेजनल आ लंग्वेज) पर जा कए लंग्वेज प्लावक (टैब) केँ दबाऊ । देखू जे कॉम्प्लेक्स स्क्रिप्ट/ राइट टू लेफ्ट लैंगुएज पर सही केर निशान लागल छैक आकि नहि । नहि छैक तँ करू आ संगणक ( कंप्युटर) ताहि लेल जे जे कहैत अछि से करू । एकरा बाद लंग्वेज प्लावक (टैबकेँ) आ डिटेल्स केँ दबाऊ । फेर ओतए ऐड क्लिक करू आ ओतए लंग्वेज मे हिन्दी आ कीबोर्ड मे HINDI INDIC IME 1[V.5.1] सेलेक्ट कए अप्लाइ दबाऊ । कंप्युटरकेँ रीस्टार्ट करू । आब वर्ड डोक्युमेंट खोलू । वाम Alt+Shift केँ सम्मिलित दबेला उत्तर H कुँजीपटल (कीबोर्ड) आओत नहि तँ नीचाँ लंग्वेजक़ेँ क्लिक करू आ हिन्दी चुनि लिअ । कुँजीपटलमे हिन्दी transliteration आ आन तरहक विकल्प जेना रेमिंगटन/ इन्सक्रिप्ट कुँजीपटल उपलब्ध अछि । चुनि कए टाइप शुरू करू । आब transliteration कुँजीपटलपर राम टाइप करबा लए raama टाइप करए पड़त । क् (हलन्त सहित) टाइप करबाक हेतु k दबाऊ आ माउसक लेफ्ट बटन क्लिक करू अन्यथा स्पेस पिञ्जक आकि एंटर पिञ्जक दबेला पर हलंत उड़ि जाएत । विकीपीडिया पर मैथिली पर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाक स्वीकृति नहि भेटल छल । हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ ई सूचित करैत हर्षित छी जे २७.१०.२००८ केँ मैथिली भाषामे विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक । एतए संगणक शब्द सभक स्थानीयकरणमे बहुत रास अंग्रेजी शब्दक अनुवाद हम कएने रही आ ताहिसँ एह क्रयमे रुचि बढ़ल आ मदति सेहो भेटल । देवनागरीमे टाइप करबाक हेतु एकटा आर तन्त्रांश साधन (सॉफ्टवेअर टूल) उपलब्ध अछि टूल अछि जे http://www.baraha.com/BarahaIME.htm लिंक पर उपलब्ध अछि । एकर विशेषता अछि एकर संस्कृत कुञ्जी फलक जे आन कोनो तन्त्रांशमे उपलब्ध नहि अछि । एहिमे उदात्त, अनुदात्त स्वरित आ किछु आन संस्कृत अक्षर उपलब्ध अछि मुदा एतहु स्वास्तिक, ग्वाङ, अञ्जी इत्यादि उपलब्ध नहि अछि । स॑ , स॒ , स॓ , सऽ केँ स लिखलाक बाद सिफ्ट ३,२,४ आ ७ दबेलासँ लिखि सकैत छी । तिरहुता लिपि लिखबाक हेतु एहि लिंक पर जाऊ। http://www.tirhutalipi.4t.com/ मुदा एकरा हेतु एहि लिंक पर जे प्रीति फॉंन्ट छैक तकरा सेहो अवारोपित कए प्रतिकृति करू आ दुनू केँ ध्रुववृत्त चालक (हार्डडिस्क ड्राइव) C/windows/fonts मे लेपन करू । एहिमे जे फॉन्ट अछि से Ascii मे अछि । क्रुतदेव , शुशा ई सभ फॉण्ट सेहो एहि तरहक अछि, पहिने उपयोगी छल मुदा आब सर्च इंजिनमे यूनिकोड-यू.टी.एफ.8 केर सर्च होइत छैक आ Ascii मे लिखल देवनागरीक सर्च नहि भए पबैत अछि । विन्डोजमे मंगल वर्णमुख (फॉन्ट) अबैत छैक से यूनीकोडमे छैक आ एहिमे लिखल देवनागरी सर्च भए जाइत अछि । मिथिलाक्षरक यूनीकोड रूपक आवेदन (अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल गेल) लंबित अछि जाहिमे बर्कले विश्वविद्यालयक प्रोफेसर डेबोराह एन्डरसन, Project Leader, Script Encoding Initiative, Dept. of Linguistics, UC Berkeley क आग्रहपर हमहुँ योगदान देने रही । आब किछु बात यूनीकोड आ जालस्थल (वेबसाइट) केर संबंधमे । कोनो फाइलकेँ पढ़बाक हेतु कंप्युटरमे आवश्यक फॉंट होएब जरूरी अछि, नहि तँ सभसँ सरल उपाय अछि, शब्द-संसाधकमे बनल लेख (वर्ड डोक्युमेंट) केँ पी.डी.एफ. फाइलमे परिवर्त्तित करू । एहिमे नफा नुकसान दुनू अछि । नफा जे बिना कोनो फांटक झंझटिक पी.डी.एफ.फाइल जाइ काँटा/ वर्णमुख/ लिपिमे लिखल गेल अछि, ताहिमे पढ़ल जा सकैत अछि । एकर नुकसान जे जखने फाइलमे जा कए सेव एज टेक्स्ट करब तँ अंग्रेजीतँ सेव भए जाएत मुदा देवनागरी तेहन सेव होएत जे पढ़ि नहि सकी । दोसर यूनीकोडक मंगलमे टाइप कएल लेखकेँ एडोब अक्रोबेटसँ पी.डी.एफ.मे परिवर्त्तित करबामे दिक्कत होए तँ संपूर्ण फाइलकेँ खोलि कए सभटा चयन करू, यूनीवर्सल यूनीकोड एम.एस.फांट ड्रॉप डाउन मेनूसँ सेलेक्ट करू फेर प्रिंटमे जा कए प्रिंटर (मुद्रक) एडोब एक्रोबेट सेलेक्ट करू । आब ई फाइल परिवर्त्तित भए जाएत पी. डी. एफ.मे । माइक्रोसॉफ्ट वर्डसँ pdf मे परिवर्त्तनक सोझ तरीका अछि, फाइल, प्रिंटमे जाऊ, आ फेर प्रिंटरमे एक्रोबेट डिस्टीलर सेलेक्ट कए प्रिंट कमांड दए दिअ । मुदा एहिमे कखनो काल pdf डॉक्युमेंट नहि बनैत छैक । तखन प्रिंटर एक्रोबेट डिस्टीलर सेलेक्ट कए प्रोपर्टीज मे जाऊ । ओतए अडोब pdfसेटिंग सेलेक्ट करू । ओतए ऑपशन डू नॉट सेंड फॉन्ट्स टू डिस्टिलर मे टिक लगाएल होएत । ओकरा अनचेक करू । आ से कए बाहर आऊ आ प्रिंट कमांड दिअ । आब pdf डॉक्युमेन्ट बनि जाएत । एहि फाइलमे कखनो काल घ हलन्त आ ज कखनो काल चतुर्भुज रूपमे नञि पढ़बा योग्य अबैत अछि । पी.डी.एफ. स्प्लिटर आ’ मर्जर सॉफ्टवेयर ( जेना फ्रीवेयर सॉफ्टवेयर ‘पी.डी.एफ. हेल्पर/ सैम) केर मदतिसँ आसानीसँ पी.डी.एफ. फाइल जोड़ि आ तोड़ि सकैत छी। आब वेबसाइट बनेबाक पूर्व किछु मुख्य बातकेँ देखि लिअ । पाँच तरहक अन्तरजाल गवेषक (इंटरनेट ब्राउजर) अछि, शेष सभटा एकरा सभकेँ आधार बना कए रचित अछि । तखन सभसँ पहिने ई चारू अपना कंप्युटरमे प्रतिष्ठापित (इंस्टॉल) करू- १.ओपेरा , २.मोजिल्ला , ३. माइक्रोसॉफ्टक इंटरनेट एक्सप्लोरर (ई तँ होएबे करत) , ४. गूगल क्रोम आ ५. एपलक,अखन धरि ई मेकिनटोसक लेल छल आब विन्डो लेल सेहो अछि, सफारी । आब जखन जाल पृष्ठ (वेब पेज) उपारोपित (अपलोड) करू वा पहिनहुँ तँ एहि सभपर खोलि कए अवश्य देखि लिअ । देवनागरी लिखबामे बराह आइ.एम.ई. केर योगदान विशिष्ट अछि । एहिमे संस्कृतक उदात्त , अनुदात्त आ स्वरित केर संगे बिकारी, देवनागरी अंक आ किछु संगीतक स्वरलिपि लिखबाक सुविधा अछि । विदेहक संगीत शिक्षा स्तंभ बिना एकर सहयोगक संभव नहि छल । मंद्र सप्तक, तीव्र आ कोमल स्वरक नोटेशन एहिमे अछि । ऋ,ॠ आ ऌ,ॡ आ ऍ, ऎ अ, ~ हलन्तक बाद जोड़क सुविधा एहिमे सुविधा छैक । अनुदात्त क॒ उदात्त क॑ आ स्वरित क॓ सेहो उपलब्ध अछि । ई विस्टामे सेहो कार्य करैत अछि । आ यूनीकोड फॉंटमे रहबाक कारण इंटरनेट पर पठनीय अछि । अ सँ ह तक वर्णमाला अछि । क्ष, त्र ,ज्ञ ओनातँ संयुक्त्त अक्षर अछि मुदा बच्चेसँ हमरा सभ अ सँ ज्ञ तक वर्णमालाक रूपमे पढ़ने छी । श्र सेहो क्ष, त्र, ज्ञ जेकाँ संयुक्त अक्षर अछि । ज्ञ केर उच्चारण ताहि द्वारे हमरा सभ ग आ य केर मिश्रण द्वारा करैत छी से धरि गलत अछि । ई अछि ज आ ञ केर संयुक्त । ऋ केर उच्चारण हमर सभ करैत छी, री । लृ केर उच्चारण करैत छी, ल, र आ ई केर संयुक्त्त । मुदा ऋ आ लृ स्वयं स्वर अछि, संयुक्ताक्षर नहि । विदेहक आर्काइवमे शुद्ध उच्चारणक आवश्यकताकेँ देखि कए अ सँ ज्ञ तक सभ वर्णक उच्चारण देल गेल अछि । भारतीय अंकक अंतर्राष्ट्रीय रूपक प्रयोगक देवनागरीमे चलन भऽ गेल अछि । भारतीय संविधानक अनुच्छेद 343(1) कहैत अछि जे संघक राजकीय प्रयोजनक हेतु प्रयुक्त होमए बला अंकक रूप, भारतीय अंकक अंतर्राष्ट्रीय रूप होएत। मुदा राष्ट्रपति अंकक देवनागरी रूपकेँ सेहो प्राधिकृत कऽ सकैत छथि । http://www.bhashaindia.com पर tbil converter सॉफ्टवेयर डाउनलोड करू । मंगल फॉंटमे आन फॉटसँ परिवर्त्तन करबाक अछि तँ डॉक्युमेन्ट .doc चयन करू इनपुट भाषामे हिन्दी आ ascii फॉन्टमे फॉन्ट चयन करू । आउटपुटमे भाषा हिन्दी आ फॉन्ट Unicode mangal चयन करू । आब ब्राउज कऽ कए फाइल सेलेक्ट करू । अहाँक कम्प्युटर मे ऑफिस २००७ अछि आ वर्ड डॉक्युमेन्ट .docx एक्सटेंशन अछि , तखन एक्सटेंशनकेँ रिनेम करू .docआब ब्राउजमे डॉक्युमेन्ट आबि जाएत । अहाँक कम्प्युटर मे ऑफिस २००७ नहि अछि तखन रिनेम केलासँ कोनो फाएदा नहि । आब कंवर्ट क्लिक करू । नूतन फाइल Unicode Mangal फॉन्टमे बनि जाएत । अहाँक शब्द संसाधक सञ्चिका )(वर्ड डॉक्युमेन्ट फाइल) मे यूनीलोड आ ascii वर्णमुख (फॉन्ट) मिलल अछि, तखन अंदाजीसँ ascii वा बेशी प्रयुक्त होएबला ascii केर चयन करू । कंवर्ट क्लिक करू कन्वर्ट भऽ जाएत यूनीकोड मंगल वर्णमुखमे। जालस्थल निर्माण पहिने कोनो ऑनलाइन प्रतिष्ठित संस्थासँ प्रदेश नाम (डोमेन नेम) कीनू । उदाहरणस्वरूप रिडिफ डॉट कॉम पर जाऊ आ रिडिफ होस्टिंगपर क्लिक करू । ओतए बुक यूअर डोमेन पर जा कए इच्छित नाम ट्कित कए देखू जे ओ उपलब्ध अछि आकि नहि । अहाँ अपन जालस्थलक हेतु उपयुक्त डोमेन नेम क्रेडिट कार्डसँ ऑनलाइन कीनि सकैत छी । ई सस्ता छैक दश डॉलर प्रतिवर्ष एकर अधिकतम मूल्य छैक । तकरा बाद जालोद्वहन सेवा (वेब होस्टिंग सर्विस) केर लिंकपर जाऊ । ५ वा दस साल लेल १०० एम.बी. स्थानक संग जालोद्वहन सेवा लिअ आ एकरा संग माय एस.क्यू.एल. सेवा मुप्त छैक मुदा ओहिमे लाइनक्सपर काज करए पड़त जे कनेक कठिनाह/ तकनीकी भए सकैत अछि से माइक्रोसॉफ्ट एस.क्यू.एल. सेवा किछु आर पाइ लगा कए अहाँ कीनि सकैत छी । आब अहाँ लग २० एम. बी. केर एस.क्यू.एल. दत्तनिधि (डाटाबेस) आ ८० एम.बी.केर साइट लेल जगह बाँचत (माने पूरा १०० एम.बी.) आ से पर्याप्त अछि। आर स्पेसक जोगार मँगनीमे भए जाएत, तकर चरचा आगाँ होएत। माइक्रोसॉफ्ट एस.क्यू.एल. सेवा लेबाक उपरान्त अहाँ अपन माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल सञ्चिका ओतए चढ़ा सकैत छी आ तकर उपयोग अपन जालस्थलपर एकटा मध्यस्थ (इन्टरफेस) बना कए अहाँ कए सकैत छी । आब जालस्थल (वेबसाइट) बनेबाक विधिपर विचार करी। माइक्रोसॉफ्ट फ्रन्टपेज ऑफिस एक्स.पी. क संग अबैत अछि । ऑफिस २००३ मे सेहो ई अलग सँ उपलब्ध अछि । प्रन्टपेजमे बनल-बनाओल वेबसाइट विजार्ड चलाऊ । मोटा-मोटी पाँच पृष्ठक जाल-स्थल बनि जाएत। एहिमे वाम कात राइट क्लिक कए पृष्ठक संख्या बढ़ा सकैत छी । ऊपरमे स्थित थीमसँ अपन इच्छा मोताबिक बनल-बनाओल डिजाइन सेहो लए सकैत छी । साइटक कोनो पृष्ठकेँ अहाँ फोटो एलीमेन्ट द्वारा फोटो गैलरीमे परिवर्तित कए सकैत छी आ ३-४-६ स्तम्भमे फोटो सभ सजा सकैत छी । ओहि पृष्ठपर डबल क्लिक कए अपन संगणकसँ फोटोकेँ आनू आ यूनीकोड टाइपराइटर द्वारा वर्णन टंकित करू । पृष्ठ सुरक्षित करबा काल चित्रक गुणवत्ता जे.पी.जी. फोटोमे १ सँ १०० धरि चुनबाक विकल्प छैक । जतेक पैघ फाइल चुनब ततेक बेशी जगह छेकत ।वाम आ नीचाँमे लिक लेल चिल्ड्रेन सेटिंग विकल्प चयन कएला उत्तर जालस्थलक सभ पृष्ठक सूचना ओतए आबि जाएत । बेशी पृष्ठ भेला उत्तर कोनो पृष्ठक भीतर पृष्ठ सभक श्रृंखला दए सकैत छी । आब अहाँक संगणकमे अहाँक जालस्थल माय डोक्युमेन्ट्स/ माय वेबमे सुरक्षित अछि । अपन वेबसाइटक वास्तविक स्वरूप प्रीव्यू विकल्प द्वारा ऊपर वर्णित ५ प्रकारक गवेषकमे देखू । किछु आवश्यक परिवर्तन प्रन्टपेजपर कएला उत्तर एहि साइटकेँ अपन सर्वरपर उपारोपित कए दियौक। एहि लेल फाइलजिला डॉट कॉम पर जाऊ जे मुफ्त तंत्रांश उपलब्ध करबैत अछि । एतए क्लाइन्ट आ सर्वर मे सँ क्लाइन्ट विकल्प चुनू आ तंत्रांश अपन कम्प्यूटरमे प्रतिष्ठापित करू । एकरा बाद यूजर नेम आ पासवर्ड दिअ आ एफ.टी.पी. डॉट डोमेन नेम पर पूर्ण जालस्थल वितरक (सर्वर) केर मूल फोल्डरमे पर उपारोपित कए दिअ। अहाँक जालस्थल अन्तरजालपर नियत जालस्थल पतापर देखाइ पड् लागत। अपन अपन दत्तसङ्ग्रह कोनो तन्त्रांश जेना ई.एम.एस. एस.क्यू.एल.मैनेजर केर माध्यमसँ अपन वितरकपर चढ़ाऊ आ एहि लेल अपन सेवा प्रदातासँ दूरभाषपर गप कए किछु विशेष ओर्टक जानकारी लिअ। सभटा सामग्री चढ़ि गेलाक बाद अपन जालस्थलक पृष्ठपर बनाओल मध्यस्थ पृष्ठपर कोडमे यूजर नेम आ पसवर्ड देनाइ नहि बिसरू। कोनो पृष्ठपर पृष्ठसँ संगीत अन्बाक लेल कम्प्यूटरसँ ओहि पृष्ठपर संगीतक सञ्चिका आयात करू मुदा आइ काल्हि मात्र ओपेरा आ इन्टरनेट एक्सप्लोररपर प्रन्टपेजसँ बनल जालस्थलमे संगीत बजैत अछि। आब किछु गप पृष्ठ शैली (स्टाइल शीट) पर। अहाँ सम्पूर्ण जालस्थलक डिजाइन जे एक्के रंगक राखए चाही तँ एहि लेल सभ पृष्ठमे एकर विधिलेख दए दियौक आ एकटा फोल्डरमे डिजाइन राखि दियौक। एहिमे पृष्ठभूमिमे बाजए बला संगीत सेहो रहि सकैत अछि । एहिसँ ई फायदा अछि जे सभ पृष्ठ खुजबा काल फेरसँ तागति नहि लगबए पड़त मात्र एक बेर डिजाइन आ संगीत खुजबामे जे समय लागत सएह टा। दोसर पृष्ठपर जे लिखित अंश वा फोटो आदि रहत ताहिमे जतेक देरी लागत सएह समय मात्र लागत। माने अहाँक जालस्थल हल्लुक भए जाएत आ जल्दीसँ खुजत। आब आर.एस.एस.फीडक विषयमे जानकारी ली। जालस्थल तँ बनि गेल आब एकर प्रचार प्रसार सेहो होएबाक चाही। आर.एस.एस. फीड अछि रिअल सिम्पल सिन्डिकेशन फीड केर संक्षिप्त रूप। एकटा वा कैक टा .xml फाइल बना कए अहाँ अपन वितरकपर चढ़ा दियौक। अहाँ .css डिजाइन तकर बाद ई एक तरहेँ जालस्थलक नक्शा बना दैत अछि आ जखने एहिमे कोनो परिवर्तन अबैत छैक तँ फीड-रीडर/ एग्रीगेटरकेँ जालस्थलपर नव सामग्री अएबाक सूचना भेटि जाइत छैक। एहिमेमे मुख्य घटनाक/ लेखक सारांश रहैत छैक जे लिंकसँ जुड़ल रहैत अछि। ओहि लिंककेँ क्लिक केला उत्तर अहाँ विस्तृत जानकारी प्राप्त कए सकैत छी। .xml युक्त पृष्ठकेँ जालवृत्त (ब्लॉग) पर ऐड गाडजेट/ फीड/ मे पताक रूपमे लिखि कए ५ सँ २० धरि नूतन सामग्रीक (क्रमशः गूगल आ वर्डप्रेस ब्लॉगमे) अद्यतन जानकारी लेल जालवृत्त (ब्लॉग) पर राखल जा सकैत अछि। एकर आर उपयोग छैक जेना फीडबर्नर केर माध्यमसँ ई-पत्र द्वारा सदस्यकेँ सूचना देब, हेडलाइन एनीमेटर जालस्थल/ जालवृत्तपर लगाएब/ ई-पत्र द्वारा इच्छित सामग्रीक लिंक संगीकेँ पठाएब आ गवेषक वा फीड/ न्यूज रीडरक माध्यमसँ पढ़ब। तकर बाद अपन जालस्थकेँ गूगल, याहूसर्च, लाइव सर्च आ आस्क डॉट कॉमपर सबमिट युअर साइट केर अन्तर्गत दए दियौक जाहिसँ ई सभ अन्वेषण यन्त्र अहाँक साइटकेँ ताकि सकए। .xml फाइलबला विश्वव्यापी अन्तर्जाल पता/ संकेत तकबामे एहि यन्त्र सभकेँ आर सुविधा होएतैक से अहाँ साइटक मुफत प्रचार होएत। .xml फाइल .htm केर स्थान लेत से नहि छैक मुदा एहिसँ फीड एग्रीगेटर/ अन्वेषण यन्त्र सभकेँ जालस्थलपर नव सामग्री तकबामे सुविधा होइत छैक। जखन अहाँक जालस्थलमे परिवर्तन आबए तँ अपन मूल .xml फाइलकेँ परिवर्तित कए वितरकपर चढ़ाऊ, शेष कार्य फीड एग्रीगेटर/ अन्वेषण यन्त्र स्वयं कए लेत। अहाँक अन्तर्जाल गवेषक सेहो साइटमे फीड रहला उत्तर विकल्प चुनलाक बाद जालस्थलक पृष्ठकेँ रिफ्रेश कए लैत अछि, कारण कखनो काल कऽ टेम्परोरी फाइल संगणकमे रहने पुरनके सामग्री इन्टरनेटपर देखाएल जाइत रहैत अछि। मुदा एहि लेल सभ पृष्ठमे एकटा कूटसंकेत देमए पड़त। आब किछु चरचा ४०४ एरर पृष्ठक। अहाँक जालस्थपर कोनो फोटो/ लिंक जे पहिने छल मुदा आब नहि अछि केँ टाइप कएला उत्तर ४०४ एरर संकेत अन्तर्जाल गवेषक दैत अछि। अपन सेवा प्रदातासँ कन्फ्युगरेशन सम्बन्धी जानकारी लऽ कए अपन जालस्थलक स्टाइलसीटक हिसाबसँ एरर पृष्ठ बनाऊ जतए किछु व्यक्तिगत संदेश जेना- अहाँ द्वारा ताकल सामग्री आब उपलब्ध नहि अछि केर संग जालस्थलक दोसर लिंक सभ राखू। मुदा एकर ध्यान राखू जे एहि पृष्ठपर एहन कूटसंकेत रहए जाहिसँ अन्वेषण यन्त्र ओकरा सर्च नहि करए। अपन जालस्थलपर girgit.chitthajagat.in वा google translate गाडजेट राखि सकैत छी जाहिसँ मैथिलीक सामग्री दोसरलिपि सभमे एक क्लिकमे परिवर्तित भए जाए। साइटक प्रचार अपन ब्लॉग/ ग्रुप बना कए आ ऑनलाइन कमेन्ट सबमिशन लेल सेवा प्रदातासँ डॉट नेट सुविधा लए-जाहिसँ वितरक कमेन्ट अहाँक ई-पत्र संकेतपर पाठकक कमेन्ट प्रेषित कए सकए आ फीड एग्रीगेटरमे अपन फीड पंजीकृत कराए पाठकक संख्या बढ़ाओल जा सकैत अछि। कमेन्ट सबमिशन टाइपपैड डॉट कॉम (पेड ब्लॉगर सेवा प्रदाता) सँ सेहो प्राप्त कएल जा सकैत अछि, ई ब्लॉग लेल तँ पाइ लैत अछि मुदा प्रोफाइल बनबए लेल नहि आ ओहि संगे ब्लॉग आ साइट लेल कमेंट फॉर्मक कोड आ सुविधा दुनू उपलब्ध करबैत अछि, एहिमे अहाँ जालस्थलपर कमेंटक एक पृष्ठपर सँख्या, कमेंटपर आपसी वार्तालाप, आ कमेंट मॉडेरेशन विकल्प चुनि सकैत छी। अपन जालस्थलक आर्काइव लेल गूगल साइट आ वर्डप्रेस १० आ ३ जी.बी. क्रमशः स्थान मुफ्त दैत अछि। फाइल ओतए अपलोड करू मुदा अपन साइटपर ओकर लिंक दए दियौक। एहिसँ अहाँ अपन बजट ठीक कए सकैत छी। ब्लॉगक यू.आर.एल. यदि नीक नहि लागए तँ मोनमाफिक यू.आर.एल. सुविधा १० डॉलर सालानापर उपलब्ध अछि, मुदा ब्लॉगक सुविधाक अतिरिक्त कोनो आर सुविधा एहिसँ नहि भेटत। मुदा जे अहाँक बजट बहुत कम अछि तँ एकर उपयोग करू। अहाँ लग जे पूर्ण साइट अछि तँ ओकर एकटा पृष्ठ पर एफ.टी.पी. अपलोडसँ डिसकसन फोरम आदि अपन साइटक ऊपर राखि सकैत छी आ ब्लॉगकेँ अपन साइटमे सम्मिलित कए सकैत छी। ब्लॉगरक भीतर प्रकाशनक अन्तर्गत यू.आर.एल. सुविधा १० डॉलर सालानापर आ एफ.टी.पी. अपलोड ई दुनू सुविधा उपलब्ध छैक। आब चरचा फेव आइकनक। अपन लोगो ब्राउजरक पताक संग देबाक लेल .ico प्रारूपमे लोगोक चित्र बनाऊ आ अपलोड करू, संगमे स्टाइलसीटपर एकर विवरण दए दियौक। अपन ई-पत्रमे सिगनेचर, माय स्पेस, फेसबुक, ओरकुट, ट्विटर,यू ट्यूब, पिकासा, याहूग्रुप आ गूगलग्रुप केर माध्यमसँ, आर.एस.एस.फीड आ हेडलाइन एनीमेटर जे ई-पत्र सिगनेचरमे सेहो राखल जा सकैत अछि केर माध्यमसँ सेहो एकर प्रचार कए सकैत छी। गूगल एनेलेटिक्स आ वेबमास्टर टूलक सेहो उपयोग करू। एनेलेटिक्सक ट्रैकर कोड सभ पृष्ठपर दिअ जाहिसँ प्रतिदिन कतएसँ के आ कोना अहाँक जालस्थलपर अएलाह तकर जानकारी भेटि सकवे आ वेबमास्टर टूलसँ जालस्थल वेरीफाइ करू आ .xml फाइल सबमिट करू। यदि कोनो पृष्ठपर कोनो फोटो/ लिंककेँ दोसर टैब/ गवेषकमे खोलए चाही तँ टारगेट फ्रेम/ न्यू विन्डो-ब्लैंक चुनू। सी-डैक पुणेक अओजार आ फान्ट सेहो छैक मुदा ओहिसँ विशेष लाभ परिलक्षित नहि भए रहल अछि, उनटे बहुत रास दिक्कत जेना “द् ध” आ “ग् र” क्रमशः द्ध आ ग्र केर बदलामे देखबामे आओत। विदेह ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ पर ऑनलाइन यूनीकोड टाइपराइटर उपलब्ध अछि। पी.डी.एफ.सँ सव एज टेक्स्ट केलापर देवनागरी रूप यूनीकोडमे आ कखनो काल आनोमे नहि सेव होइत छैक। यूनीनगरीमे पी.डी.एफ.सँ कॉपी कए पेस्ट केलासँ देवनागरी रूप आबि जाइत छैक। आस्की कन्वर्टरक सहायतासँ पी.डी.एफसँ यूनीकोडमे बदलैत छैक मुदा प्रारूपण खतम भए जाइत छैक। फन्ट कन्वर्टरमे SIL कन्वर्टर एहन टूल अछि जाहिमे प्रारोपण खतम नहि होइत अछि आ ई अछियो फ्री तन्त्रांश। तिरहुता लिपिक उद्भव आ विकास लिपि? आ लिपि छी की? लिपिक उद्भव। एजिप्टक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपिक आविष्कार टोथ देवता केलनि, मेसोपोटामियाक लोक कहै छथि जे हुनकर लिपि नीबो देलनि, ग्रीसक लोक ग्रीक लिपिक आविष्कारक हर्मीजकेँ मानै छथि आ भारतमे एकर श्रेय ब्रह्माकेँ जाइ छनि। पाषाणकालक लोक मारते रास चित्र लिखलनि आ ओहीसँ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटल। मुदा ई चित्र सभ चित्रलिपि नहि छल, कारण एकचित्रक सम्बन्ध दोसर सँ नहि छल आ सभटा चित्र फराक-फराक छल। मुदा ओहिसँ पाछाँ जा कऽ चित्रलिपिक प्रेरणा भेटले होएत। पहिल-लिपि: चित्रलिपि एखन धरिक खोजबीनसँ पता चलैए जे चित्रलिपिक विकास भेल- टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील नदीक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे। उपरका खोह आ धारक कातक पाथरपर लिखल चित्र आ चित्रलिपिमे अन्तर बिकछेबाक खगता अछि। अहाँ हमरासँ प्रेम करै छी तँ हमर चित्र लिख देलहुँ, कोनो शिकार करै छी तँ से चित्र लिखलहुँ। से अहाँ भेलहुँ लिखिया। से भारतोमे बहुत ठाम छल, मुदा लिखिया लिपिकार चोट्टहि नहि बनि जाएत। लिपिकार जे चित्र बनेलक से कलकारी लेल नहि वरण् खगता लेल। से एतऽ सूर्य बनेबाक लेल वृत्त बना दियौ, पूरा चित्र बनेबाक खगता एतऽ नै अछि, फेर दूटा एहने चित्रक सम्बन्ध स्थापित करू, दूसँ तीन.. आ चित्र लिपि तैयार। से चित्रकार चित्र लिखलक, आ लिपिकार बनेलक। लिपिकारकेँ लिखिया नहि कहि सकैत छिऐ। आ से भेल टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कातक (असीरिया, बेबीलोन आ सुमेरमे), नील नदीक कातक (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे ईजियन आ मिनोअन सभयताक लोक। चित्रलिपि: चित्रात्मक चित्रलिपि आ विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि बाहरसँ दुनू चित्रलिपि अछि मुदा चित्रात्मक चित्रलिपि चित्रक मात्र बोध करबैत अछि जेना वृत्त सूर्यक बोध करेलक। मुदा जखन एकर प्रयोग गुमार लेल होमए लागल तँ ई भऽ गेल विचार आकि भावनाक प्रतीक आ ओहि लिपिक नाम भेल विचार/ भावनात्मक चित्रलिपि। आब कलाकारीसँ बेशी खगता महत्त्वक भेल आ ताहि लेल चेन्हक आकार सेहो छोट भऽ गेल। आइयो चीन आ जापानमे विचार/ भावनात्मक चित्रलिपिक प्रयोग होइत अछि। मुदा पध-आधारित लिपि चीनमे खतम भऽ गेल, मुदा जापानमे ओ आइयो प्रयोगमे अछि। चित्र-ध्वनि लिपि भाषाक उद्भव आ विकास भेल। जेना ओतए ध्वनिसँ सम्बन्धित शब्द प्रवेश केलक तहिना लिपिमे सेहो भेल। आ चित्र-ध्वनि लिपिक विकास भेल। एहिमे विचार-भावनाक संग ध्वनिक प्रवेश सेहो भेल आ पाछाँ जा कऽ ओ ध्वन्यात्मक लिपि बनल। ध्वन्यात्मक लिपि ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि आ वस्तु-व्यक्तिक बीच सम्बन्ध स्थापित करैत चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे ध्वनि वा ध्वनि-समूह लेल चिन्ह बनल। ध्वन्यात्मक लिपिमे पोलीफोन (एक चिन्हक अनेकार्थ वा ध्वनि) आ होमोफोन (अनेक चिन्ह द्वारा एक ध्वनि वा अर्थ) मिला कऽ सेहो अर्थ/ ध्वनि-निर्णय नहि कऽ पबैत छल आ ताहि लेल तेसर ध्वनि-चिन्ह डिटरमिनेटिवक व्यवस्था भेल आ फेर अर्थ वा ध्वनि निर्णय सम्भव भेल। एहि लिपिसँ पद-आधारित आ व्यंजन-प्रधान लिपि बनल। स्थान-लाघव आ प्रयत्न लाघव एतए प्रयत्न-लाघवक चर्च करब आवश्यक अछि। प्रयत्न लाघव लेल कम प्रयाससँ अपेक्षित परिणामक प्राप्ति। माने भाषाक सम्बन्धमे कम शब्दमे सुस्पष्ट विचार व्यक्त करब, पैघ-ध्वनि लेल छोट सर्वमान्य ध्वनिक प्रयोग करब आ ओही हिसाबसँ लिपिक सन्दर्भमे पैघ चेन्ह लेल छोट चेन्हक प्रयोग करब। ओहिना स्थान-लाघव लिपिमे स्थान-कटौती लेल प्रयुक्त होइत अछि। टॊपिक १२ मे शब्द विचारमे लिपि-उच्चारण सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। से प्रयत्न लाघवसँ कखनो काल ध्वनि अनचिन्हार भऽ जाइत अछि, आ ओकर रूपान्तर लिपिमे प्रत्न-लाघव आ कखनो काल स्थान-लाघ्वक संग होइत अछि। पद-आधारित लिपि पद आधारित लिपिमे प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघव नहि रहैत अछि। एकरा एना बुझू जे तमिल लिपि अछि सिलेबल आधारित लिपि, रोमन लिपि अछि अल्फाबेट लिपि आ तिरहुता आ देवनागरी अछि अल्फा-सिलेबिक लिपि। माने जतऽ संयुक्ताक्षर नहि अछि से भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। माने अंग्रेजी, जे रोमन लिपिमे लिखल जाइत अछि, मे संयुक्ताक्षर नहि होइत अछि, मात्र २६ टा अल्फाबेट होइत अछि, से ओ भेल अल्फाबेट आधारित लिपि। तमिलमे सिलेबल आधारित लिपि अछि। से ओ भेल सिलेबल आधारित लिपि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से ओ भेल अल्फा-सिलेबिक लिपि। एहि तीनूक तुलना मोटा-मोटी वार्णिक (अंग्रेजी), मात्रिक (तमिल) आ वार्णिक आ मात्रिक (तिरहुता आ देवनागरी) छन्दसँ कएल जा सकैत अछि। मुदा एतऽ एकटा पेंच अछि, अंग्रेजीमे वर्णक गणनासँ जे मीटर निर्माण करब तँ लय नहि बनत से ओतऽ सिलेबल आधारित गणना करए पड़ैत अछि, आ किएक तँ ध्वनिक सम्बन्ध मात्र सिलेबलसँ छै, शब्दकेँ सिलेबलमे तोड़ल जाइत अछि। जापानी लिपि पद-आधारित अछि से ओतऽ ई झमेल नहि अछि, आ ओतऽ ध्वनिक ईकाई लेल जे शब्द प्रयुक्त होइत अछि तकर अनुवाद मोटामोटी सिलेबलमे कएल जा सकैत अछि आ ओही आधारपर हाइकूमे १७ टा ध्वनि पुरेबा लेल गणना होइत अछि । तिरहुता, देवनागरी आ ब्राह्मीमे जे बाजल जाइए सएह लिखल जाइए, आ एतऽ पाणिनीपूर्व आ पणिनिक परम्परामे ध्वनि आधारित सन्धिक निअम बनल अछि। कर्मधारय समासक विग्रह पदात्मक होइत अछि, महादेव भेला महान् देव, आ जँ दूसँ बेशी पद अछि तँ से भेल बहुव्रीहि- जेना लम्बोदर (नमगर जिनकर उदर से, माने गणेश)। अंग्रेजी (रोमन लिपि) मे बजबा काल सन्धि होइत अछि मुदा लिखबा काल नहि, मुदा ओतहुओ दीर्घ लेल डबल ए, डबल बी आदि प्रयुक्त होइते अछि, पंकचुएशन सेहो ई काज करैत अछि, हँ ओतऽ ट्रिपल ए नहि होइत अछि, मुदा हमहूँ सभ तँ दीर्घक बाद प्लुतकेँ छोड़िये देने छी। आ तही कारणसँ मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखल जाइत अछि। तिरहुता आ देवनागरी लिपिमे दुनू तत्त्व अछि से मात्रिक आ वार्णिक दुनू छन्द एहिमे गणना कएल जा सकैत अछि। टॊपिक १ मे पृष्ठ १८ सँ गणना (मात्रिक आ वार्णिक) सम्बन्धी विशेष जानकारी भेटत। सिलेबल जेना शब्दसँ सम्बन्धित अछि पद तहिना समाससँ पहिलमे ध्वनि प्रमुख अछि आ दोसरमे पद (अर्थ)। से वएह पद आधारित लिपि ध्वन्यात्मक लिपिक विकास छल। जकर प्रमाण ऐतिहासिक रूपसँ उपलब्ध अछि, आ जतऽ सँ लिपिक असली विवेचन सम्भव अछि। आ चित्र-लिपिक रूपमे जाहि तीन गोट लिपिक चर्च भेल माने टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कात (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे), नील धारक कात (एजिप्टमे) आ क्रीट (ग्रीस) मे एहिमेसँ टिग्रिस-यूफ्रेट्सक धारक कातमे सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे जे सभ्यता सभ क्रमसँ आएल ओहिमे पहिने सुमेरमे क्यूनीफॊर्म लिपिक प्रारम्भ भेल ४००० शताब्दी बी.सी.ई. (बिफोर कॊमन एरा)मे। बेबीलोन लोकनि सुमेरसँ ई लिपि सिखलनि आ हुनकासँ असीरिया लोकनि। माटिक सानल आ लोथ बनाएल पट्टीपर सुखेलासँ पहिनहिये नोकबला स्टायलससँ, मोटा-मोटी ३५० टा अक्षरसँ, ई क्यूनीफॉर्म लिपि लिखल जाइ छल जखन आ फेर रौदमे सुखाएल वा चूल्हिमे पकाएल जाइत छल। आधुनिक कालमे एकरा पढ़बाकश्रेय एकटा अंग्रेज हेनरी रॊलिनसनकेँ जाइ छनि। तेसर चरणक बाद धरि ई पद-आधारित बनि गेल छल। एजिप्टमे हायरोग्लाइफिक (हायरोग्लिफिक, हायरेटिक आ डेमोटिक) लिपि क्यूनीफॉर्म लिपिक समकालीन छल। एहिमे २४ टा चिन्ह रहैक जाहिमे सभटा व्यंजन रहैक। स्वर रहबे नहि करैक, से बहुत रास झमेल आ अस्पष्टता आबि जाइ छलैक, से ओकर निवारणलेल ओ लोकनि आर विशेष चेन्ह आ चित्रक प्रयोग करैत छलाह। ओ सभ लाल मोशि-कलमसँ पेपीरस पातपर लिखैत छलाह, ओही पेपीरससँ पेपर बनल अछि। क्यूनीफॉर्म आ हाइरोग्लाइफिक ई दुनू लिपि दहिनसँ वाम दिश लिखल जाइत छल। एहि दुनू लिपिक समकालीन लिपि छल चीनक लिपि से ऊपरसँ नीचाँ लिखल जाइत छल। पहिने एकटा शब्द लेल एकटा चिन्ह छल, मुदा फेर एकटा विचार लेल एकटा शब्दक प्रयोग होमए लागल। चीनक लिपिमे कोनो अल्फाबेट नहि अछि, ४०,००० चिन्ह अछि। एकर अलाबे एलमाइट सभ पहिने देशज रेखात्मक आ चित्र-प्रचुर अक्षरक प्रयोग केलनि मुदा फेर ओ लोकनि सेहो क्यूनीफॉर्म लिपि पकड़ि लेलनि मुदा ओतऽ ११३ चेन्ह जाहिमे ८०सँ बेशी पद-आधारित चेन्ह छल, केर प्रयोग ओ केलनि। से एजिप्टक बदला लिपिक आविष्कारक मेसोपोटामिया (सुमेर, बेबीलोन आ असीरिया) क लोक रहथि, जे लिखबाक कलाक आविष्कर्ता छथि। जेना ऊपर चर्च भेल अछि, ओ लोकनि पहिने चित्र लिखलन्हि, आ किएक तँ चित्र बनेबामे बेसी समयक नोकशानी होइत छलन्हि से ओ लोकनि प्रयत्न-लाघव आ स्थान-लाघवसँ चित्रकेँ चेन्ह बना देलन्हि, चेन्हमे समानता आ समरूपता आनि रेखात्मक पद्धतिक लिपि बनेलन्हि। फेर ई चेन्ह ध्वनिकेँ प्रदर्शित करए लागल, आ एहि तरहक मोटामोटी ३५० टा चेन्ह बनल। सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे जे खाँटी वर्ण आधारित लिपि बनल ताहूमे, फेर मिनोअन सभ्यतामे जे लिपि आविष्कृत भेल ओहिमे पद-आधारित लिपिक प्रभाव पड़ल। पद-आधारित लिपिक दूटा रूप चीनमे छल मुदा तकर प्रयोग चीनमे बन्द भऽ गेल मुदा जापानमे ई प्रयोगमे अछि जकर किछु चर्च ऊपर आएल अछि। व्यंजन प्रधान लिपि एकरा वर्णमाला वा वर्ण आधारित लिपि सेहो कहि सकैत छी। आन लिपि सभमे चेन्ह सभक संख्या ततबा बढ़ि गेल जे शिशु लेल ओकर सीखब असम्भव भऽ गेल। एहि लिपिक विकासक कारण छल प्रयत्न लाघव। एक्के लिपिमे अनेक भाषा लिखब सम्भव भऽ गेल। टिग्रिस-यूफ्रेट्सक कात- मेसोपोटामिया- (सुमेर, फेर बेबीलोन आ तखन असीरियामे)क क्यूनीफॉर्म लिपि वर्णमाला नहि बनि सकल। एहि लिपिक सम्बन्ध सेमेटिक भाषासँ हेबाक प्रमाण अछि। चित्रात्मक फेर विचारात्मक, फेर ध्वन्यात्मक लिपि ई बनि सकल। मुदा ध्वन्यात्मक लिपि सेहो संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आ क्रिया-विशेषणक आवश्यकताकेँ किछु सुधारक संग पूर्ण कऽ सकल। फेर ई पद-आधारित बनल आ एतहि एकर विकास खतम भ‍ऽ गेलैक। बादमे जा कऽ जुरुथ्रुष्टक अनुयायी लोकनि मेसोपोटामियामे अपन लिपिकेँ व्यंजन प्रधान बनेलन्हि जकरा अर्द्ध-वर्णमाला कहि सकैत छी। मुदा ओहिमे कृत्रिम हेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, आ ई प्रवृत्ति ब्राह्मीमे सेहो भाषा-वैज्ञानिक लोकनिकेँ देखा पड़ैत छन्हि। क्रीटमे सेहो चित्र-प्रचुर रेखाकृतिसँ आगाँ बढ़ि १३५ चेन्हबला भावना-प्रधान आ ध्वनि-प्रधान लिपि बनेलन्हि। हिनकर लिखब वामसँ दहिन आ दहिनसँ वाम दुनू छल। उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला सीरिया-साइप्रस आ फिलिस्तीनमे मूल वर्णमालाक आविष्कार दोसर शताब्दी बी.सी.ई. मे भेल जकर नाम उत्तरबरिया सेमेटिक वर्णमाला छल। आ तकर बाद आनो-आन मूल वर्णमाला आविष्कृत भेल जेना आरामाइक, फिनीशिअन, ग्रीक आ ब्राह्मी आ ई लिपि सभ अनचोक्के आविष्कृत नहि भेल होएत वरण ओतहु वएह प्रक्रिया भेल हएत जे मेसोपोटामियाक लिपि संग भेल छल। मुदा एक स्तरक बाद मेसोपोटामियाक क्यूनीफॉर्म लिपि पद-आधारित लिपि बनि अपन खिस्सा खतम केलक ई लिपि सभ पूर्ण वर्णमाला बनि गेल। भारतमे लिपि आ लेखनकला नागार्जुनकोण्डासँ प्राप्त दोसर शताब्दीक एकटा मूर्तिमे राजा शुद्धोधनक दरबारक दृश्य अंकित अछि जाहिमे तीनटा भविष्यवक्ता भगवान बुद्धक माता रानी मायाक स्वप्नक व्याख्या कऽ रहल छथि। हिनका सभक नीचाँ बैसल लिपिकार तकरा लिपिबद्ध कऽ रहल छथि। भारतमे लेखनकलाक ई आइ धरिक सभसँ पुरान चित्र आधारित प्रमाण अछि। एहिसँ अतिरिक्त पुरान प्रमाण हड़प्पा संस्कृति, अशोकक अभिलेख आदि तँ अछिये। अशोकक अभिलेख आ हड़प्पा संस्कृतिक बीचमे सेहो मारते रास अभिलेख भेटलाछि जेना सोहगौराक ताम-पत्र अभिलेख, पिपरहबाक बौद्ध-भीड़ अभिलेख, महास्थान आ बर्लीक पाथर अभिलेख, आ भट्टिप्रोलुक अभिलेख। भारतमे हड़प्पा सभ्यतामे पहिल बेर लिपिक प्रयोग भेल मुदा ओ एखन धरि पढ़ल नहि जा सकल अछि। एकर अभिलेख सभ छोट-छोट छैक सभसँ पैघ अभिलेखमे २६ टा चेन्ह छैक। धोलावीर (गुजरात) मे नग्रक द्वारपर एकटा साइनबोर्ड हेबाक प्रमाण अछि जाहिमे ९ टा चेन्ह छैक। ब्राह्मी आ खरोष्ठी ब्राह्मी वामसँ दहिन आ खरोष्ठी दहिनसँ वाम दिशामे लिखल जाइत अछि। मुदा दुनू भारतक वर्णमाला पद्धतिक आधारपर विकसित भेल अछि। अशोकक अभिलेख ब्राह्मी आ खरोष्ठी (मानसेहरा आ शाहबाजगढ़ी) दुनूमे भेटल अछि आ एकरा एकटा अंग्रेज जेम्स प्रिंसेप १८३७ सी.ई. मे ब्राह्मी पढ़बामे सक्षम भेलाह। खरोष्ठी पढ़बाक श्रेय सम्मिलित रूपसँ कर्नल मसोन आ जेम्स प्रिंसेप केँ देल जाइत अछि। एहि अभिलेख सभमे अशोकक नाम पियदस्सी लिखल छैक आ किछुमे असोक (अशोकक पालि-प्राकृत रूप) सेहो। अशोकक अभिलेखमे लिपिकरक चर्च अछि। ब्राह्मी लिपि बहुत दिन धरि विकसित आ परिष्कृत/ परिवर्द्धित होइत प्रयोगमे रहलाअ एहिसँ भारतक आन लिपि सभक उत्पत्ति भेल मुदा खरोष्ठी लिपि अपने संग खतम भऽ गेल। अशोकक अभिलेखक अतिरिक्त इण्डो-ग्रीक राजा सभ एकर प्रयोग अपन मुद्रापर केलन्हि जाहिमे तर आ ऊपरमे ग्रीक आ ्खरोष्ठी लिपिमे राजाक नाम लिखल रहैत छल। नारद-स्मृतिमे लिपिकेँ उत्तम आँखि कहल गेल अछि आ एकर सृजन ब्रह्मा केलनि तकर चर्च अछि। बृहस्पति स्मृतिमे चर्च अछि जे छह मासक बाद स्मृति धोखा देमऽ लगैत अछि से पातपर लिखल आखरक सृजन ब्रह्मा केलनि। चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनमे सेहो चर्च अछि जे वामसँ दहिन लिखल जाएबला लिपिक सृजनकर्त्ता ब्रह्मा छथि। एहि लिपिक नाम ब्रह्मी लिपि छल आ से पाणिनी पूर्व व्याकरणाचार्य द्वारा स्वीकृत छल, मुदा पाणिनी व्याकरणक अनुरूप ब्रह्मी अशुद्ध अछि। से एहि लिपिक नाम ब्राह्मी पड़ल। पाणिनी अष्टाध्या आ अमसिंह अमरकोषमे लिपि आ लिबिक चर्च करैत छथि। पाणिनी पूर्व आचार्य यास्क अपन निरुक्तमे बहुत रास पूर्व आ समकालीन व्याकरणाचार्यक नाम गणबैत छथि। वर्णक गणना आधारित छन्द आ व्याकरणाचर्य सभक उपस्थिति अपरोक्ष रूपसँ लेखनकलाक उपस्थितिक आभास करबैत अछि। तीन हजार वर्ष पूर्व झेलम आ चेनाबक बीच गांधार (अखन ओतऽ यूसुफजई पठान निवास करैत छथि) इलाकामे दक्षक संघराज्य छल, एहि इलाकामे काबुल धार पच्छिमसँ आबि कऽ सिन्धु धारमे संगम करैत अछि। ओहि संगमसँ चारि माइल उत्तर लहुर गाम, जे पाणिनीक नानी गाम छल, मे पाणिनीक जन्म भेल, ओइ गामक नाम ओइ कालमे शलातुर रहैक। चीनी यात्री ह्वेनसांग (युआन च्वांग), सातम शताब्दीमे. एहि गामक विद्वान ब्राहमण व्याकरणाचार्यक चर्च केने छथि। माने परम्परा आगाँ-पाछाँ काएम छल। जैनक भगवती सूत्र एहि ब्राह्मी लिपिकेँ नमस्कार करैत अछि। लिपिक आधार- अक्षर, वर्ण आ मात्रा आ तकर साक्ष्य ऋगवैदिक ऋचा वर्णवृत्तमे अछि, मात्रिक छन्दमे नहि। वार्णिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि। छान्दोग्य उपनिषदमे अक्षर शब्द उल्लेख अछि दीर्घ स्वरक सेहो। तैत्तरीय उपनिषदमे वर्ण आ मात्रा दुनूक चर्चा अछि। ऐतरेय आरण्यकमे स्वर आ व्यंजन दुनूक चर्चा अछि। पंचविंश ब्राह्मणमे सभसँ छोट दक्षिणा १२ कृष्णल आ सभसँ पैघ दक्षिणा ३,९३,०१६ कृष्णल सुवर्णक चर्चा अछि। कौटिल्यक अर्थशास्त्र चूड़ाकर्म संस्कारक बाद लिपि आ अंकक प्रशिक्षणक निर्देश करैत अछि। राजाकेँ मन्त्रिपरिषदक संग पत्राचार आ गुप्तचरक कूटलिपिमे संदेश पठेबाक चर्च अछि। अर्थशास्त्र कहैत अछि जे लिपिकार तेजीसँ लिखबामे निपुण होथि, साफ-साफ लिखथि आ लेख पढ़बामे सेहो समर्थ होथि। बौद्ध ग्रन्थ सुत्तंतमे अक्खरिका क्रीड़ाक चर्च अछि, जाहिमे अकासी अक्षर बनेबाक स्पर्धा रहैत अछि। बौद्ध भिक्षु लेल एहि क्रीड़ाक निषेध अछि मुदा विनय-पिटक लेखल-कला सिखबाक अनुमति बौद्ध-भिक्षुकेँ दैत अछि। कटाहक जातकमे जाली पत्र देखाकेँ ठकबाक चर्च अछि तँ महासुतसोम जातकमे तक्षशिलाक अध्यापक अपन पुरान शिष्यकेँ पत्र लिखै छथि। कण्ह जातक अक्खर (अक्षरक पालि-प्राकृत रूप) क प्रयोग करैत अछि। महावग्गमे अंक-शब्दक प्रशिक्षण आ कटाहक जातकमे शीतलपाटीक चर्चा अछि जाहिपर लिखब सिखाओल जाइत छल। ललितविस्तर बुद्धक लिपिशाला, हुनकर शिक्षक विश्वामित्र, चाननक शीतलपाटी आ सोनाक लेखनीक चर्चा करैत अछि, एतऽ ६४ टा लिपिक वर्णन अछि जतऽ राजनैतिक सीमाक हिसाबसँ अंगक लिपि, मगधक लिपि वङक लिपिक चर्च अछि मुदा विदेहक लिपिक स्थानपर पूर्व विदेह लिपि लिखल अछि। एकर कारण अछि जे वज्जि विदेहपर अधिकार कऽ लेने छल आ वज्जि आ विदेहक लिपि संयुक्त रूपसँ विदेह लिपि छल। अजातशत्रु तेसर शताब्दीमे वज्जिकेँ जीति मगधमे राजनैतिक रूपसँ मिला लेलन्हि, मुदा सांस्कृतिक रूपसँ ओ अपन अस्तित्व बचेने रहल। ललित विस्तर तेसर शताब्दीक ग्रंथ थिक आ ताहि द्वारे ओ मगध लिपिक संग पूर्व विदेह लिपिक वर्णन करैत अछि। ई प्रवृत्ति बादमे गुप्तकालक तीरभुक्ति (तिरहुत) प्रान्तमे सुदृढ़ रूपसँ सोझाँ आएल आ पूर्वविदेह लिपिक नामकरण भेल तिरहुता। ललितविस्तरमे बाल अवस्थामे बुद्ध-सिद्धार्थक वर्णमाला प्रशिक्षणक चर्च अछि आ ओहिमे वार्णिक अक्षरक काँति आ अलंकरणक योजनाक चर्च अछि जे ब्राह्मी लिपिक अछि। उतरबरिया सेमेटिक वर्णमाला आ ब्राह्मीक बीचमे अलेफ् आ अ, बेथ् आ ब्, गिमेल् आ ग, दालेथ् आ द, हे आ ह, वाव् आ व, जाइन् आ ज, चेथ् आ घ, थेथ् आ थ, योध् आ य, काफ् आ क, लामेध् आ ल, मेम् आ म, नुन आ न, सामेख आ स, आइन् आ ए, फे आ प, साधे आ च, कॉफ् आ ख मे अद्भुत समानता अछि आ मानवक मस्तिष्क कोना दूर रहलोपर एक्के रङ अछि तकर द्योतक अछि। बूलरकेँ ब्रम भेलन्हि जे ब्राह्मी लिपि उतरबरिया सेमेटिक लिपिक अनुकरण केलक। ई ओ काल छल जखन हड़प्पा आ मोहनजोदाड़ोकेँ सेहो मेसोपोटामियाक आउटपोस्ट ताधरि मानल जाइत जाधरि भारतक आन भागमे उत्खनन नहि भऽ गेलै आ हड़प्पा संस्कृतिक देशज रूप प्रकट नहि भऽ गेलैक (हर्मन कुल्के आ दीतमार रोथरमण्ड, अ हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, २००४, पृ. १९, मुदा ओ पृ.५४ पर अखनो भ्रममे छथि जे खरोष्ठी अरामेइक लिपिक आधारपर बनल जे तखन फारसक आधिकारिक लिपि छल। अरामाइकमे मात्र २२ टा अक्षर छैक, स्वरक अपूर्णता अछि, ह्रस्व-दीर्घक भेद नहि अछि, स्वरक मात्राक सेहो अभाव अछि से ओ भारतीय भाषा लेल अयोग्य अछि, खरोष्ठीमे ई सभ गुण अछि, संगे दीर्घ-गुण-वृद्धि ध्वनि लेल भेदक चिन्ह सेहो अछि, प्राकृत अभिलेख लेल ई ब्राह्मी सन सक्षम छल, मात्र दहिन-वाम रहने ई विदेशी नहि भऽ जाएत। खरोष्ठी दहिनसँ वाम लिखल जाइत अछि मुदा एकर वर्णमाला भारतीय अछि, दहिनसँ वाम लिखल जएबाक कारण किछु विद्वान लोकनिकेँ एहिमे फारसक प्रभाव देखाइ पड़ैत छनि, मुदा सत्य तँ यएह अछि जे ब्राह्मी आ खरोष्ठी लिपिमे एक्के वर्णमालाक प्रयोग भेल अछि।)। जेना सङीतमे भारतक सारेगामा क सात टा सुर आ पश्चिमी ऑक्टेव (ओत्तहु साते टा छैक, ऑक्टेव माने आठम सँ पुनः पुनरावृत्तिक मात्र ई प्रतीक अछि) ई सिद्ध करैत अछि जे भाषा कोनो हुअए कान वएह छैक मनुक्खबला। ब्रेल आ इण्टरनेशनल फोनेटिक अल्फाबेट ध्वनिक संग मस्तिष्क (ब्रेल) क सेहो संप्रेषण मोटामोटी एक्के हेबाक प्रमाण दैत अछि (देखू अनुलग्नक) से पहिने तँ किछु विद्वान एकरा बैक्ट्रो-पालि आ आरियानो-पालि विदेशी लिपि बुझि कऽ कहलन्हि, कनिंघम एकरा गांधारी कहलन्हि, मुदा ललितविस्तर आ चीनक विश्वकोष फा-वां-शु-लिनक प्रमाण अकाट्य छल आ ओतऽ वर्णित एकर नाम खरोष्ठी सर्वमान्य भेल। चीनी साक्ष्य ब्राह्मीक उद्भव ब्रह्मा द्वारा आ खरोष्ठीक सर्जन ब्राह्मण आचार्य खरोष्ठ द्वारा भेल मानलक अछि। तेसर शताब्दीक बाद अभिलेख संस्कृतमे लिखल जाए लागल, प्राकृतक प्रयोग बन्द भऽ गेल। प्राकृत लेल ब्राह्मी आ खरोष्ठी दुनू सक्षम छल मुदा संस्कृतक सन्धियुक्त अलंकृत क्लिष्ट शब्द, पद आ समास लेल मात्र ब्राह्मी। से एक बेर जे एकर प्रयोग बन्द भेल तँ प्राकृतसँ निकलल भाषा सभ लेल सेहो ब्राह्मीसँ निकलल लिपिक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल। ब्राह्मीक एरागुडीक अशोकक अभिलेख २६ पाँतीमे अछि। वाम दहिन लेखनक पूर्ण रूपसँ पालन नहि भेल अछि, ओना बेशी पाँती वाम-दहिन अछि। किछु वाम-दहिन पाँतीमे किछु अक्षर वाम-दहिन तँ किछि दहिन वाममे अंकित अछि, किछि ऊपर नीचाँ सेहो अछि। ८ पाँती दहिन-वाम अछि। एक पाँतीमे मात्र एक अक्षर अछि। से दहिन वाम रहने विदेशी प्रभाव सिद्ध नहि होइत अछि। खरोष्ठी सन जापानी सेहो दहिन वाम लिखल जाइत अछि। ललितविस्तरक प्रसंग सेहो इशारा करैत अछि जे व्याकरणक विशेषताकेँ पूर्ण करब ब्राह्मीक उद्देश्य छल, मुदा ई आग्रह ऋगवेदसँ अर्थशास्त्र तक अछि, आ भारतीय परिप्रेक्ष्यमे ब्राह्मी आ ओहिसँ निकलल लिपि ओहि आग्रहकेँ पूर्ण करैत अछि, आ एकर परिष्कृत रूपकेँ कृत्रिम नहि वरण् स्वाभाविक मानल जेबाक चाही। से किछु विद्वान ब्राह्मीक व्याकरण सम्बन्धी आवश्यकताकेँ पूर्ण करए लेल भेल परिष्करणकेँ विदेशी अक्षरकेँ भारतीय प्रारूपमे आनब कहलन्हि अछि (बूलर, ऑन द ओरिजिन ऑफ द इण्डियन ब्राह्मी अल्फाबेट, १८९८), मुदा कनिंघम एकरा भरतीय चेन्ह सभसँ बहार भेल मानलन्हि अछि (कनिंघम, कोरपस इन्सक्रिप्शनम इण्डिकेरम, खण्ड-१)। ब्राह्मी लिपिक अतिरिक्त ६३ टा आर लिपिक चर्च ललित विस्तरमे अछि। सम्पूर्ण यूरोपमे ग्रीस आ रसियन कॉमनवेल्थ छोड़ि कऽ (एहि दुनू ठाम अलग-अलग लिपि छैक) सम्पूर्ण यूरोपमे रोमन लिपिक प्रयोग होइत अछि। से सम्पूर्ण यूरोपमे आइ मात्र तीनेटा लिपि छैक। जँ रूसकेँ यूरोपसँ हटा दी तँ ओ भारतक बराबरे अछि। भारतमे सभ प्रान्तमे मोटामोटी अलग-अलग लिपि अछि, मुदा तमिलक अतिरिक्त सभमे अल्फा-सिलेबिक (अक्षर आ संयुक्ताक्षरक) निर्वहण मोटामोटी एके रङ होइत अछि। एकर कारण छापाखानाक देरीसँ आगमन मात्र अछि। ब्राह्मीक मानक रूप आ ओकर क्षेत्रीय शैली ब्राह्मीक मानक रूप छल आ तकर प्रमाण अछि अशोकक अभिलेख। अशोक १४म प्रस्तर-अभिलेखमे कहै छथि जे अभिलेख-आलेखनक गुण-दोष लिपिकरक जिम्मा अछि, आ सएह कारण छल जे अशोकक अभिलेखमे अक्षर आ ओकर आकारमे समरूपता अछि आ ईहो प्रमाणित होइत अछि जे अशोकक काल धरि ब्राह्मीक मानक रूप आबि गेल छल। जे भेद अछि से क्षेत्र अनुसार, लिपिकरक लेखनक अनुसार आ लेखन उपकरणक विविधताक अनुसार अछि, आजुक हिसाबेँ जँ असमतल पाथर, खोह आदिपर लिपिकार द्वारा पुरातन उपकरणसँ जतेक असमरूपता आएल अछि से मानक ब्राह्मीक स्थिति आर सुदृढ़ करैत अछि। पंकचुएशन संस्कृतमे रहबे नहि करए से प्राकृतमे सएह परम्परा आगाँ बढ़ल। विराम चिन्हक व्याकरणगत आवश्यकता ब्राह्मीक लिपिकारकेँ ओही कारणसँ आवश्यक नहि लगलन्हि। कुटिल लिपि कुटिल लिपि ; उत्तर भारत ६अम शताब्दी सी.ई. ; पच्छिम (शारदा) ; पूब (किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरी। कुटिल लिपिक विशेषतासँ प्रेरित नामकरण- न्यूणकोण वर्णमाला (बूलर, इण्डियन पालियोग्राफी, प्.६८), नह शीर्ष वर्णमाला (टॊड, एनल्स ऒफ राजस्थान, पृ. ७००), भारयीय नाम सिद्ध मातृका,काश्मीर आ वाराणसीमे प्रचलित (अल-बेरुनी, भारत, पृ. १७३, सचाउ), देवल प्रशस्तिमे एकरा लेल कुटिलाक्षरणी प्रयुक्त भेल। आदित्यसेनक अफसड़ पाथर-अभिलेखमे एकर नाम विकटाक्षरणी अछि। विक्रमांकदेव चरितमे कुटिल लिपिमे सिद्धहस्त कायस्थ लोकनिक चर्च अछि। जेम्स प्रिंसेप, जे १८३७ ई. मे अशोकक अभिलेखकेँ पढ़ने छलाह, एकरा लेल कुटिल लिपिक नामकरणक अनुशंसा केलन्हि (जर्नल ऒफ एशियाटिक सोशाइटी ऒफ बेन्गाल, पार्ट-५ पृ. ७७८)। कुटिल लिपिक विकासक की कारण छल? पहिल तँ ई छल जे लिखबाक करची-कलम आ मोशिक प्रयोग संग नव उपकरण आ पुरान उपकरणक नव प्रयोगसँ अलंकरणयुक्त अभिलेख लेखनक इच्छा जागृत भेल, लटपटौआ लिखबाक आग्रह सेहो एहि लेल कारण बनल। एहिसँ उपरका भाग फन सन बनि गेल कारण मोशि ढबकि जाइ, पाछाँ नाङरि आ पद-चिन्ह सेहो सुस्पष्ट भेल। अलंकरणक प्रवृत्तिसँ वर्ण वृत्ताकार आ चिक्कन स्वरूप लेबऽ लागल। अलंकारक कारणसँ एकर नाम पड़ल सिद्धमातृका। कुटिल लिपिक अभिलेख भेटल अछि, कौशाम्बीक माटिक सदण्ड सप्तदीपक (ई मोन पाड़ैए मौर्य कालक बौद्ध सप्ताक्षरी (प्रसिद्ध मंत्र) कूटाक्षरक), मंदसौरक यशोधर्मनक अभिलेख, ईशानवर्माक हरहा पाथर-अभिलेख, सर्ववर्मनक असीरगढ़ मोहर-अभिलेख, अनन्तवर्मनक बराबर आ नागार्जुनी खोह अभिलेख, ईश्वर वर्मनक जौनपुर पाथर-अभिलेख, शाहपुरक प्रतिमापर अभिलेख , मन्दागिरि अभिलेख, जीवितगुप्त द्वितीयक देववार्णार्क स्तम्भ अभिलेख, हर्षवर्धनक मधुबन आ बाँसखेड़ा ताम्रपत्र-अभिलेख, हर्षवर्धनक सोनीपत मोहर-अभिलेख। तिरहुता तिरहुता लिपिक खोजमे आब भारतक पूब भागमे आउ। पूब भागक ब्राह्मीक बाद किराँत, रञ्जना, भुँजिमोल, तिरहुता, नेवारी, तिब्बती, नन्दीनागरी आ देवनागरीक प्रयोग भेटैए। किराँत लिपिमे लिम्बू भाषा आदि लिखल गेल। ई सभ लिपि वामसँ दहिन दिश लिखल जाइए मुदा रञ्जना लिपि कूटाक्षरमे ऊपरसँ दक्षिण लिखल जाइए। नागरीक रूप नन्दीनागरीक प्रयोग मुदा बेशी मध्य दक्कन आ दक्षिण भारतमे भेल आ माध्वाचार्यक द्वैत दर्शनक संस्कृतमे लिखल पाण्डुलिपि नन्दीनागरीमे अछि। विदेह, अंग, वज्जि आ नेपालक तराईमे संस्कृत आ मैथिली दुनू तिरहुतामे लिखल जाइ छल आ एहिमे सभ विषय, जेना साहित्य, गणित, धर्म, दर्शन लिखल जाइ छल आ पाता (सुख-दुख दुनुक) चलै छल आ चिट्ठी-पत्री अहीमे होइ छल। कैथीक प्रयोग हिसाब-किताब, खाता-खतियान लेल होइ छल आ मुख्य रूपसँ कायस्थ एकर प्रयोग करै छला। मुदा मिथिलाक कर्ण-कायस्थक पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल (मैथिल करण कायस्थक पाँजिक सर्वेक्षण- मेजर विनोद बिहारी वर्मा, १९७३)। एकर विपरीत मैथिल ब्राह्मणक पञ्जीक किछु फील्ड-वर्क आ पत्रचार कैथीमे भेल (अनुलग्नक) मुदा एतहु पञ्जी मात्र तिरहुतामे लिखल गेल। ई १४म शताब्दी सी. ई. (कॊमन एरा) सँ शुरू भऽ कऽ २०म शताब्दी सी.ई. धरि रहल जखन देवनागरीमे पञ्जी लिखब प्रारम्भ भऽ गेल। किछु नव आविष्कृत लिपि लिपिक अनुकरणसँ साइन (इशारा) भाषा वधिर लेल १८म शताब्दी सी.ई. (कॊमन एरा) मे वधिर स्कूलमे फ्रांसक चार्ल्स मिशेल देल एप्पे द्वारा आविष्कृत भेल। ई एहेन लिपि अछि जे कागतपर नहि वरण् वायु माने वातावरणमे बनाओल जाइत अछि। अन्ध-दिव्यांग लेल ब्रेल लिपि १९म शताब्दीमे फ्रांसक लुइ ब्रेल आविष्कृत केलनि। २०म शताब्दीमे रघुनाथ मुर्मू संथाली भाषा लेल ओल-चिकी लिपिक आविष्कृत केलनि। ब्राह्मी लिपिक पुबरिया प्रकारक मुख्य अभिलेख सभ अछि- समुद्रगुप्तक हरिषेन लिखित प्रयाग प्रशस्ति जे अशोकक स्तम्भपर लिखल गेल छल, चन्द्र गुप्त-२ क उदयगिरि खोह लेख, स्कन्दगुप्तक कौहम स्तम्भ अभिलेख, चन्द्रगुप्त-२ आ कुमारगुप्त-१ क गढ़वा अभिलेख। तिरहुता लिपिक खोजमे हम सभ उत्तर आ दक्षिणमे सँ उत्तर भारतीय आ फेर उत्तर भारतीयसँ उत्तर-पूब दिस बढ़ब। उत्तर आ दक्षिण भारतक लिपिक जे अन्तर अछि से “म” मे देखाइत अछि। उत्तर भारतक दुनू प्रकार माने पूब आ पच्छिमक प्रकार श, ष, ल आ ह मे देखाइत अछि। गुप्त कालक अभिलेखक पूब प्रकारमे “ल” केर वाम अंग सोझे नीचाँ दिस झुकैत अछि (उदाहरण जौगड़क फराक अभिलेख)। “ष” केर आधार चेन्ह गोल बनाओल गेल आ बिचुलका चेन्हक माला सन बनि गेल। “ह” केर आधार चेन्ह धकिया देल गेल आ एकर सुल्फी उर्ध्वाधरसँ जोड़ि देल गेल। स्कन्दगुप्तक भिताड़ी स्तम्भ अभिलेखे, ओना तँ भारतक पूबमे अछि, मुदा ओहिमे उत्तर भारतक पच्छिम प्रकारक लिपिक प्रयोग भेल। कलाकार पच्छिमसँ आओल हेताह ताहि कारण सँ ई भेल होयत। फेर ईहो भेल जे उत्तर भारतक ब्राह्मीक पूब आ पच्छिम प्रकारक सीमा रेखा परिवर्तित होइत रहल। कन्नौजपर अधिकारक लेल राष्ट्रकूट, गुर्जर-प्रतिहार आ पाल राजवंशक बेच संघर्ष मोटामोटी ७५०-१२०० ई. क मध्य भेल। एहि तरा-उपरी युद्धमे गुर्जर-प्रतिहार जखन बीस पड़लथि तँ पछबरिया कलाकारक कलाकारी पूब दिस बढ़ल। तहिना पाल जखन बीस पड़लाह तखन पुबरिया कलाकार सभकेँ बेसी पच्छिम धरि रोजगार भेटलन्हि। पछबरिया ब्राह्मी नागरी बनल आ पुबरिया ब्राह्मी तिरहुता, असमी, बांग्ला आ ओड़िया। पुबरिया प्रकारक पच्छिम आरि पाल साम्राज्य, मगध आ विदेह+वज्जि निर्धारित भेल। दसम शताब्दी धरि नागरीक पुबरिया आरि बनारस निर्धारित भऽ गेल आ ओ पूर्ण रूपसँ पुबरिया ब्राह्मीसँ फराक भऽ गेल। घियासुद्दीन तुगलकक बाद फिरोजशाह तुगलक आक्रमणसँ तिरहुत साहित्य आ कलाक क्षेत्रमे पछुआ गेल आ ओकर लिपिक बड्ड भारी नोकसान भेलै। तिरहुता लिपिक विकास ओतहि ठमकि गेलै। मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। १२९४ ई. मे जन्म आ १३०७ ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ १३२४-२५ ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन केलन्हि। मुदा एहि हारिसँ पहिने मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक स्थापनाक ओ प्रयास केने रहथि, ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य । आधिकारिक स्थापक नियुक्य भेलाह मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त। हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, मिथिलाक पण्डित लोकनि १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। ओना तँ ओहि समयमे हरसिंहदेव मिथिलासँ पलायन कऽ गेल रहथि तैयो हुनका सांकेतिक रूपमे एकर संस्थापक मानल गेल। क्षत्रियक पञ्जी तँ आब उपलब्ध नहि अछि मुदा ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक जे पञ्जी उपलब्ध अछि तकर लिपि मात्र तिरहुता अछि आ २०म शताब्दीक पञ्जीक तिरहुता जे एहि पञ्जी सभमे अछि से १३२६ ई. (१४म शताब्दीक) क पञ्जीक तिरहुतासँ एक्को मिसिया भिन्न नहि अछि। फॉण्ट बनलाक एकर विकासक सीमा बिना रूप परिवर्त्तित भेने असीम भऽ गेल अछि आ एक्के खाँचामे कलाकार अपन कलाकारी देखा कऽ कएक डिजाइनबला अक्षर निर्मित कय सकैत छथि। से ब्राह्मीक विकास भेल उत्तरी आ दक्खिनी प्रकारमे। उत्तरक प्रकार दू भागमे बँटि गेल, पुबरिया आ पछबड़िया। आ मोटा-मोटी १०म शताब्दीमे पुबरिया लिपि पछबरिया लिपिसँ पूर्ण रूपसँ भिन्न भय गेल। पुबरिया लिपिक सीमा मगध, अंग आ तिरहुत निर्धारित भेलै आ नागरी जे पछबरिया ब्राह्मीक रूपमे गुप्त साम्राज्यक पतन धरि प्रयागोसँ पच्छिम धरि सीमित छल ८म शताब्दीमे ई वाराणसी धरि पहुँचि गेल १२म शताब्दीमे गंगाक दक्षिणमे मगधमे पछबरिया आ पुबरिया दुनू प्रकारक प्रयोग होमय लागल। मुदा गंगाक दक्षिणमे मगधसँ पूब पुबरिया प्रकार मात्र रहलै, आ गंगाक उत्तरमे तिरहुतमे सेहो पुबरिये प्रकार मात्र रहलैक। मुस्लिम आक्रमणक बाद समस्त मगधमे पछबरिया प्रकार पसरि गेलैक मुदा १४म शताब्दी धरि (उदाहरण महाबोधि मन्दिर गया) पुबरिया लिपिक प्रयोग एतऽ पूर्णरूपसँ बन्न भय गेलैक।। १३२६ ई. मे पञ्जी लिखबाक प्रारम्भ भेल आ तहियासँ २०म शताब्दी धरि ई तिरहुतामे बिना परिवर्तित भेने लिखाइत रहल आ ओकर ओही रूपमे फॉण्ट बनि गेलै (देखू गूगल बुक्सपर विदेह आर्काइवक पञ्जीक ११००० तालपत्र/ बसहा कागत अभिलेख, जे प्रारम्भसँ २०म शताब्दी धरिक अछि, २०म शताब्दीक अन्तमे पञ्जी सेहो देवनागरीमे लिखल जाय लागल)। तँ तिरहुताक उद्भव आ विकासक सीमा रेखा १३२६ ई. भेल जखन तिरहुताक अन्तिम रूप निर्धारित भय गेल। पञ्जीकारक नीक-अधलाह हस्तलिपिकेँ तिरहुता फॉण्टक विभिन्न डिजाइन मात्र मानल जा सकैत अछि। एकर ई परिणाम भेलै जे तिरहुतामे जे संस्कृत ग्रंथ लिखल जाइ छल, वा पाता चलै छल सेहो अपरिवर्तित रूपमे २०म शताब्दी धरि चलल। तुगलक आक्रमणसँ अभिलेख लिखनिहारक रोजगार खतम भऽ गेलन्हि आ जे कियो बचलाह से तालपत्र आ बसहा कागतपर लिखल अभिलेखसँ भिन्न लेखबाक क्षमतासँ रहित भय गेलाह। छापाखानाक प्रयोगक बाद आ यूनीकोडक अंकनक बाद आब डिजाइनक आपसमे लिपि परिवर्तन सन प्रयोग सम्भव भय गेल। मैथिलीक अष्टम सूचीमे गेलाक बाद संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षा आ सरकारी कार्यमे मैथिलीक प्रयोग लेल केन्द्र सरकार मात्र देवनागरीक अनुमति देने अछि। पहिने देवनागरी, तिरहुता, बांग्ला, तमिल आदि लिपिमे संस्कृत लिखाइत छलै, मुदा आब सरकार मात्र देवनागरीमे संस्कृत लिखबाक आदेश देलक अछि। ओना बिहार-झारखण्ड आदिमे अखनो सांकेतिक रूपमे स्कूल, कॉलेजक परीक्षामे आ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षामे मैथिली अहाँ देवनागरी वा तिरहुतामे लिखि सकै छी। केन्द्र सरकार संघ लोक सेवा आयोगक परीक्षा आ अन्य कार्य लेल संस्कृत, हिन्दी, मैथिली, मराठी, कोंकणी, डोगरी, बोडो आ नेपाली केँ देवनागरीमे; संथालीकेँ ओल-चिकी वा देवनागरीमे; सिन्धीकेँ अरबी वा देवनागरीमे; उर्दू आ काश्मीरीकेँ फारसी लिपिमे; मणिपुरी आ बांग्लाकेँ बांग्ला लिपिमे लिखबाक आदेश देने अछि। असमी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, तमिल, तेलुगु अपन-अपन अही नमक लिपिमे लिखल जायत आ पंजाबी भाषा गुरुमुखी लिपिमे लिखल जायत। आब फेर तिरहुताक विकास दिस घुमैत छी। गुप्त साम्राज्यक पतन धरि पुबरिया लिपिक आरि-धूरि प्रयागक लग-पासक इलाका रहय जे आठम शताब्दीमे काशी पहुँचि गेलैक। १२म शताब्दीसँ-१४म शताब्दी धरि मगधमे पुबरियो प्रकारक प्रचलन रहलै, जकर बाद ओहि इलाकामे मात्र नागरीक प्रचलन रहल। १४म शताब्दीमे १३२६ मे पञ्जी लिखेनाइ शुरू भेल आ मुस्लिम आक्रमणक बाद तिरहुताक विकास पूर्ण रूपसँ ठमकि गेल आ ओ ओहि कालमे जाहि रूपमे रहय तही रूपमे २०म शताब्दी धरि रहल। तिरहुता लिपिक १३२६ ई. धरि क्रमिक विकास आ अन्तिम स्वरूपक प्राप्ति अशोकक प्रयाग आ रामपुरवा, मठिआ, पहेरिया, निग्लीव, राधिया, सारनाथ स्तम्भ लेख सभमे एकरूपता अछि, एकरा ब्राह्मीक उत्तरवर्ती उत्तर-पूर्वी प्रकार कहल जा सकैत अछि। उत्तर-पूर्वी प्रकारमे किछु विशेषता अछि। “ख” केर नव रूप भेटबामे अबैत अछि। बोधगयाक एकटा अभिलेखमे “ख” केर आधार त्रिभुजक आकारक अछि। नव-मौर्य काल, जे अशोकक परवर्ती कालक अछि, मे “च” मे दू टा घुमघुमौआ आकृति लम्बवत रेखाक दुहू दिस बनैत अछि, मुदा दुनू घुमाव एक आकारक नहि अछि, छोट-पैघ अछि आ ताहि कारणसँ वृत्त नहि बनि पबैत अछि। महाबोधि मन्दिरक रेलिंग- बुद्ध परिक्रमा- मे अभिलेख सभाछि जाहि मे “य” आ “ज” उत्तर भारतीय प्रकारक अछि आ “ल” लटपटौआ अछि। जौगड़क फराक पाथर-अभिलेखमे मुदा बड्ड लटपटाकेँ लेखल गेल अछि जे बादमे पूर्व गुप्त अभिलेख (४म-५म शताब्दी) क पुबरिया प्रकारमे आर पुष्ट भेल। जौगड़मे “ह” केर लटपटौआ प्रकार बादमे पुबरिया प्रकारमे देखल जाइत अछि। उत्तर-मौर्य कालक ब्राह्मीक परवर्ती अक्षर प्रकार दशरथक नागार्जुनी खोह अभिलेख उत्तर-पूर्वी प्रकारक अछि आ तकर बाद महाबोधि मन्दिरक रेलिंग (परिक्रमा)क स्तम्भ सभपर अभिलेखमे ई सेहो देखाइत अछि। नागार्जुनी खोह अभिलेखक लटपटौआ “ल” दर्शनीय अछि। “श” कलसी अभिलेखसँ मेल खाइए आ पुबरिया घुमौआ “श”क ई पूर्व रूप अछि (४म-५म शताब्दी)। “स” सेहो परिवर्तित अछि, उपरक नोकशी नमहर भऽ कनेक झुकि कऽ दोसर पाँति सनबनैत अछि। महाबोधि मन्दिरक रेलिंग दशरथक नागार्जुनी खोहक५० बर्ख बादक अछि। एहिमे “क” कटार सनाछि, “ग” दू प्रकारक अछि- लटपटौआ आ कोणाकार, “प” मे बेस परिवर्तन अछि आ दूटा समकोण स्पष्ट देखाइ दैत अछि। “म” सेहो दू तरहक अछि, पहिल प्रकारमे वृत्त नीचाँ आ अर्धवृत्त ओकर ऊपर अछि, दोसर प्रकारमे त्रिभुज नीचाँ आ समकोण ओकर ऊपर अछि। “र” वक्र पाँतिक रूपमे अछि। “व” मे नीचाँ दिस वृत्तक स्थान त्रिभुज लऽ लेने अछि। “स” दू प्रकारक अछि, पहिल वामदिस कने वक्र, निचुलका नोकशी नीचाँ दिस आ दोसर मौर्यकाल सन जतय निचुलका नोकशी कने नम्हर रहैत छल। “ह” बड्ड लटपटौआ अछि जे उत्तर भारतक पूर्वी भागक ब्राह्मीक स्वरूप छल। सारानाथसँ प्राप्त अभिलेख (०१ ई.पू. सँ ०१ ई. धरि) उत्तर-पच्छिमक (०१ ई.पू.-०२ ई.पू.) प्रकारसँ कोनो अन्तर नहि अछि। लम्ब रेखा कने छोट भेल अछि, वक्र रेखा सभ कलाकारीककारण कोणीय भेल अछि। जँ स्वर शब्दक बीचमे अबैत अछि तँ मौर्यकालक कोणीय प्रकार लटपटौआ स्वरूप लय लैत अछि। कुषाण अभिलेख ब्राह्मी लिपिक उत्तर भारतीय प्रकारक पूर्वी प्रकार बोधगयाक महाबोधि गाछक नीचाँमे राखल पाथरमे प्राप्त होइत अछि। “प” केर उर्ध्वाधर रेखा छोट भेल अछि, “म” मे निचुलका भागक त्रिभुज आकार पूर्व कुषाण स्वरूपसन अछि। “श” कोणीय अछि आ एहिमे क्षैतिज रेखा वाम लम्बवत पाँतिकेँ छू नहि सकल अछि। साहेत-माहेत क बोधिसत्त्वक आकृतिपर लटपटौआ “ह” अछि आ आनठाम कोणीय “ह”। “स” मे पछुलका भाग चाकर अछि। “य” कखनो-काल अधोलिखित अछि आ एहिमे तीन फाँड़ अछि। गुप्त युगक प्रारम्भ (४म- ५म शताब्दी) पूर्व प्रकार “ल”, “ह”, “ष” आ “स” मे स्पष्ट अछि। एहि कालक मुख्य अभिलेख सभ अछि- समुद्रगुप्तक प्रयाग स्तम्भ प्रशस्ति, चन्द्रगुप्त-२ क उदयगिरि खोहाभिलेख, चन्द्रगुप्त-२ आ कुमारगुप्त-१ क गढ़वा भांगल अभिलेख, कुमारगुप्त-१ क धनैदाहा अनुदान-पत्र, कुमारगुप्त-१ क मानकुँवर अभिलेख, स्कन्दगुप्तक बिहार स्तम्भ अभिलेख, भीमवर्मनक कोसम आकृति अभिलेख आ स्कन्दगुप्तक कौहम स्तम्भ अभिलेख। लिपिक प्रकारक अन्तर कोना पकड़ी? उत्तर भारतक प्रकार आ दक्षिण भारतक प्रकार (नागरी सहितमे) अन्तर “म” अक्षरपर ध्यान देलासँ आ उत्तर भारतक पूर्वी आ पश्चिमी प्रकारमे “ष”, “ल” आ “ह” पर ध्यान देलासँ लिपिक कलाकारीमे भिन्नता पकड़ाइत अछि। तिरहुताक स्वरूप एहि तरहेँ पूर्वी प्रकारसँ बहार भेल। “ल”-एकर वाम भाग सोझे-सोझ नीचाँ दिस खसैत अछि। “ष” केर आधार कलाकार गोल बनेने छथि आ कनछियाह बिचुलका रेखासँ घुमाकय मिलेने छथि। “ह” केर आधार थकुचि कऽ छोट कयल गेल अछि आ ओकर नोकशी लम्बवत रेखामे मिला कऽ वाम दिस घुमाओल गेल अछि। “स” मे हरदम एकर वाम लम्बवर रेखाक अन्तमे घुमाव रहैत अछि, जे पहिने वक्र वा नोकशी सन रहैत छल। ई कुषाण कालक मथुरामे सेहो भेटल अछि। समुद्रगुप्तक प्रयाग स्तम्भ प्रशस्ति पूर्वक प्रकारक मानक रूप अछि। तिरहुता भारतीय लिपिक तंत्र सिद्धांत बिन्दु, त्रिकोण, वृत्त आ चतुष्कोणक प्रयोगसँ कलाकार तंत्र-मंत्र कय सकल होथि से सम्भव नहि मुदा तिरहुताक अक्षरकेँ सुन्दर बनेबामे ओ अवश्य सफल भेलाह। ब्राह्मीक उत्तरवर्ती पूर्व प्रकार (५५० ई. सँ ११०० ई.) बुहलर (बूलर) एहि कालक लिपिकेँ सिद्धमातृका कहैत छथि। ५५० ई.-६५० ई. एहि कालक मुख्य अभिलेख सभ अछि- नन्दनक अमौना अनुदान अभिलेख, शिवराजक पटियाकेला अनुदान अभिलेख, अनन्तवर्मनक बराबर खोह अभिलेख, अनन्तवर्मनक नागार्जुनी खोह अभिलेख। मुख्य परिवर्तन जे तिरहुता दिस भेल ओ अछि: -तीन फेँड़ बला “य”; -“घ”, “प”, “फ”, “ष”, “स” केर नीचाँ दिस समकोणीय प्रवृत्ति संगे एहि सभ चेन्हमे दहिन दिस पुच्छी वा लम्ब जे पछबरिया प्रकारमे विकसितभेल तकर अभाव। ६५० ई. सँ ७०० ई. -“अ” केर वाम अंगक उपरका भागक कनेक नमगर भय गेल काँटीक नोक (v अक्षर) जकाँ, निचुलका भाग वक्र बनि गेल आ माथपर बट्टम सन चेन्ह अर्द्धविराम सन “आ”- दोसर वक्रमे अन्तर अर्द्धविराम सन, दहिन अंगक निचुलका भागसँ जुड़ल “इ”- गुप्त कालक लिपिक पश्चिम प्रकार जे बिन्दु वा निचुलका वृत्त सन छलै से पैघ वक्रमे विकसित भय गेल “उ”- निचुलका भागक क्षैतिज रेखा वक्रमे परिवर्तित भय गेल आ नमगर भय गेल आ अही रूपमे १०म शताब्दी धरि रहल आ तखनजा कय अन्तिम रूपसँ विकसित भेल “ओ”- नमगर अर्धविराम पाँछा दिस चौरस भय गेल “क”- पहिल बेर वाम दिस सदैव घुमाव रहय लागल, ई घुमाव ११म शताब्दीमे अर्धवृत्त बनि गेल “ख”- अक्षरक आधारमे त्रिभुज आकृति बनल फेर ई सोझ रेखा बनल आ फेर घुमि गेल, त्रिभुजक एक भुजा अर्धवृत्त बनि गेल आ दोसर नमगर भय गेल आ वृत्तक दुनू चापकेँ छूलक। “ग”- आधार रेखाक वक्रता प्रारम्भिक गुप्त कालहिसँ पुबरिया प्रकारमे देखाइ पड़य लागल छल। ६अम शताब्दीक यशोधर्मन अभिलेखक आधार रेखा वामदिस घुमि गेल आ दहिन दिस टेढ़ भय गेल आ दहिन लम्बसँ न्यून कोण बनेलक। “ङ”- निचुला दहिन दिसुका कोण न्यूनकोण बनि गेल आ लम्बवत सोझ रेखा गोलाइ लय लेलक “च”- गुप्त कालक दुनू गोलाइ त्रिभुज बनि गेल जे “वी” आकार ऊपरमे लेलक, आधार रेखा वा निचुलका रेखा वाम दिस कने नमगर भय गेल। “छ”- कोनो अन्तर नहि। “ज”- पुबरिया प्रकारमे निचुलका प्रारम्भिक गुप्त कालहिसँ क्षैतिज आकार स्पष्ट छल आब लम्बवत रेखामे सेहो स्पष्ट रूपसँ गोलाइ देखाइ पड़य लागल। बिचुलका नव क्षैतिज ओतबी घुमि गेल जतेक निचुलका आधार रेखा छल। उपरका क्षैतिज रेखाक दहिन दिस “वी” आकार जुड़ि गेल। “ञ”- कनेक लटपटौआ “ट”- पछबरिया प्रकारसँ बेस अन्तर आबि गेल। खुजल गोलाइ आ “वी” आकृति ओहि गोलाइक उपरका भाग पर क्षैतिज रूपमे राखि देल गेल। “घ”- आधार रेखाक गोलाइ प्रारम्भिक गुप्त कालक पुबरिया प्रकारमे देखाइ पड़य लागल छल, आब ई तीन फेँड़बला “य” सन बनि गेल। “ठ”- पूर्वकालक मौर्य प्रकार अखनो प्रयुक्त होइत रहल। “ड”- दूटा छोट गोलाइ बनि गेल। “ढ”- कोण गोलाइ लय लेलक। “ण”- आधार रेखा टेढ़ भय गेल आ ओ निचुलका भागक दहिन दिस न्यून कोण बनेलक आ वाम नोकशी नमगर भय गेल। “त”- गुप्त कालहिमे दहिन अंगक निचुलका भाग नमगर भय गेल रहय, ई कने गोलाइ लय लेलक आ एकटा “वी” आकार ऊपरमे बनि गेल। “थ”- उपरका भाग चकराइ लय लेलक। “ध”- छोट चाप अर्द्ध-वृत्त मे बदलि गेल। “न”- प्रारम्भिक गुप कालक गोलाइ बला रूप बदलि कय आधुनिक नागरी रूप लय लेलक। गोलाइ मुख्य भागसँ फराक भय गेल आ मुख्य भागसँ एकटा छोट क्षैतिज रेखासँ मिलि गेल आ कने छोट सेहो भय गेल। “प”- कनेक आर बेशी लटपटौआ आकार लेलक आ न्यून कोण आर स्पष्ट भय गेल। “ब”- “ब” केर स्थान “व” लय लेलक। “भ”- “भ” आ “ह” केर बीच अन्तर खतम भय गेल, पछबरिया प्रकार मे ई पहिनहिये भय गेल छल। “म”- न्यून कोण आर तीक्ष्ण भय गेल आ तकर परिणाम भेल जे दहिना अंग नीचाँ दिस बढ़ि गेल। “य”- “य” दू प्रकारक, पहिल दू फेँड़बला, एकर निचुलका हीसमे न्यूनकोण बनैत अछि आ दोसर प्रकारमे न्यूनकोण ओतेक स्पष्ट नहि अछि मुदा दहिन भागक अंग नीचाँ दिस नमगर भऽ गेल अछि। “र”- निचुलका छोरपर “वी” वा तीरक आकृतिक जे पहिलुक्का अभिलेख सभक पछबरिया प्रकारमे सेहो छल। ई “ड” केर छोट रूपसँ मिलानी खाइत अछि। “ल” दू प्रकारक अछि। पहिल प्रकारमे वाम अंगक वक्र वा नोकशी नीचाँ दिस नमगर भेल अछि आ सभसँ नीचाँ जा कय कनिये बाहर दिस वक्र रूप लैत अछि । दोसर प्रकारमे वाम अंगक वक्रपर नोकशी अछि जे नमगर भऽ कऽ नीचाँ जेबाक बदला आन्तरिक आकार लैत अछि। ई मोटा-मोटी आजुक तिरहुता आ देवनागरी सन भऽ जाइत अछि। “व”- एतय ओही तरहक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि जेना “ख” केर आधारमे त्रिभुज बनैत अछि। त्रिभुजक दुनू भुजा वक्र बनि जाइत अछि, तेसर नमगर भऽ जाइत अछि। अक्षर ऊपर “वी” आकार बनैत अछि। “श”- अक्षरक उपरका भाग पूर्व गुप्त कालमे वक्र छल, आब जा कऽ उपरका भाग वक्रक रूप लैत अछि, निचुलका दहिन अंग ऊपर दिस नमगर भेल अछि। “ष”- ई तीन प्रकारक अछि- पहिल प्रकारमे रूप वक्रित अछि, दोसर प्रकारमे वक्र फोंक “वी” आकृतिक रूप लैत अछि, तेसर प्रकारमे “वी” आकृतिक उपरका भाग फराक भऽ जाइत अछि आ “वी” आकृति नहि रहि जाइत अछि (ई प्रकार भेटैत अछि ६अम सँ ९अम शताब्दीक उत्तर-पूर्वी अभिलेख सभमे)। “ह”- अक्षरक दहिन अंगमे वक्र आ नोकशीक नमगर होयब आ शीर्षपर “वी” आकृति (ढबकल सन) आ अखनि धरिक क्षैतिज आधार रेखा कने टेढ़ भऽ जाइत अछि। आठम शताब्दी एहि कालक मुख्य अभिलेख जाहिमे ब्राह्मीक उत्तरकालक पुबरिया रूप फराक होइत अछि- जीवितगुप्त २ केर देव-बार्नार्क स्तम्भ लेख, धर्मपालक खलीलपुर अनुदान पत्र आ धर्मपालक समयक बोधगया आकृति अभिलेख। मुख्य बिन्दु अछि। स्वर- कोनो परिवर्तन नहि भेल। क, ग, च, ज, ट, ठ, ड, द, ध, न, भ, म, य, ह- कोनो परिवर्तन नहि भेल। ण- दहिन वक्र वा नोकशी नीचाँ दिस नमगर भेल। त- नीचाँ दिस नमगर भऽ गेल, निचुलका छोरपर बड्ड छोट वक्र। “थ”- “वी” आकृतिक छोरक नमगर भेलासँ उपरका भाग चकरगर भेल। “प” दू प्रकारक- पुरनका रूप जाहिमे न्यूनकोण अखनो स्पष्ट अछि। नवका रूपमे न्यूनकोण उपस्थित तँ अछि मुदा स्पष्ट नहि अछि आ एकर स्थान नीचाँ दिसुका दहिन लम्ब रेखा लऽ लेने अछि। “ल”- न्यूनकोण बड्ड छोट भऽ गेल अछिआ दहिन लम्ब रेखा नीचाँ दिस चल गेल अछि। “श”- ई दू प्रकारक अछि। पूर्व रूप वक्र संग अछि। बादक रूप ९अम शताब्दीक दिघवा-दुभौली अनुदान सन अछि। “ष”- वाम अंगक निचुलका भाग लटपटौआ अछि आ वाम भागक लम्ब सँ आगाँ चलि जाइत अछि। अफसड़ अभिलेखमे सभ ठाम दन्त “स” केर प्रयोग भेल अछि। धर्मपालक बोधगया अभिलेख “श” तीन प्रकारक अछि- पहिल प्राचीन रूप जाहिमे उपरका भाग गोलाइ लेने अछि। बादक रूप बिन डण्टाक अछि। एकटा बिचुलका रूप अछि जाहिमे डण्टा सन आकृति छै, मुदा ओ न्यूनकोणकेँ दक्षिण उर्ध्वाधर रेखाक बदलामे नीचाँमे छुबैत अछि। “ज” मे उपरका क्षैतिज रेखा बिला जाइत अछि आ “वी”आकृति ओकर बदलामे आबि जाइत अछि। बिचुलका क्षैतिज रेखा एकटा वक्र अछि। “न” दू प्रकारक- पुरनका प्रकार फानी सन छल। आब ई गुप्त आ तिरहुताक बीचबला आकार लऽ लैत अछि। “ण”- आधार रेखा बिला जाइत अछि। “ह”- निचुलका दिसुका न्यूणकोण बेसी स्पष्ट भऽ जाइत अछि। धर्मपालक बाद देवपालक अन्तर्गत तिरहुत प्रदेश रहल। मुदा तकर बाद गुर्जर-प्रतिहार सम्राट तिरहुत छीनि लेलनि, बिग्रहपाल -१ आ नारायणपाल क शासनकालमे। ब्राह्मीक परवर्ती पुबरिया प्रकार (९अम शताब्दी सी.ई.) एहि सभमे ई सभ मुख्य प्रकार अछि: १.देवपालक मुंगेर अनुदान पत्र २.देवपालक समयक घोसरवा अभिलेख ३.नारायणपालक बादल स्तम्भ अभिलेख ४.नारायणपालक विष्णुपाद मन्दिर अभिलेख ५.नारायणपालक भागलपुर अनुदानपत्र ६.महेन्द्रपालक दिघवा-दुभौली अनुदान-पत्र ७.महेन्द्रपालक रामाज्ञा अभिलेख घोसरवा अभिलेख अ/आ- उपरका भाग अखनो पूर्ण रूपसँ विकसित नहि भेल अछि। इ- दूटा वृत्त वा बिन्दु ऊपरमे आ काटबला वक्र नीचाँमे। ई-समकोण त्रिभुजक रूप लऽ लेने अछि। ख- अखनो वाम अंगक नीचाँ दिस “वी” आकृति लेनहिये अछि। च- चकराइ बढ़ि गेल। ज- पुरातन रूप- बिचुलका क्षैतिज रेखा कने नीचाँ दिस टेढ़ भेल आ निचुलका क्षैतिज रेखा एकटा छोट वक्रमे खतम होइत अछि। ट/ ठ केर दहिन अंग नहि देखाइ पड़ैत अछि। ण- आधार रेखा पूरा-पूरी खतम भऽ गेल। थ- उपरका भाग चाकर भऽ गेल। द/ ध- निचुलका रेखा नीचाँ दिस वक्र भऽ गेल अछि। न- फानी सन पूर गुप्त काल आ तिरहुताक बीचक रूप। फानी अक्षरक मुख्य अंगसँ विलग भऽ गेल। प- पुरातनरूप नीचा दिस कोनो वक्रता नहि। एकटा अधिक कोण आ एकटा नूनकोण बदलामे निचुलका भागमे दूटा समकोण बनि जाइत अछि। भ-नीचाँ दिस टेढ़ म- फानी अखनो नहि बनल अछि। य- न्यूनकोण चपा गेल अछि आ तिरहुता स्वरूप प्राप्त कऽ लेने अछि। ल- आधाररेखा पूरा-पूरी दबि गेल अछि। व- न्यूनकोणक बदलामे दहिन उर्ध्वाधर सोझ रेखाक नमगर रूप आबि गेल। ष- उपरका रेखा टेढ़ भऽ गेल। स- आधार रेखा फेर क्षैतिज भऽ गेल आ उपरका रेखा नीचाँ दिस टेढ़ भऽ गेल। ह- पुरातन रूप, न्यूनकोण अखनो दोसर निचुलका रेखा नहि बनल अछि। विष्णुपद मन्दिर अभिलेख “इ” दू प्रकारक- पहिल प्रकारमे दूटा वृत्त ऊपरमे आ एकटा कटाव नीचाँमे। दोसर प्रकारमे ऊपरमे एकटा छोट क्षैतिज रेखा आ दूटा वृत्त नीचाँमे। “ख” तिरहुताक आकारक रूप लऽ लेने अछि। “घ” अखनो नीचाँमे न्यूनकोण बनेने अछि। “ट”- दहिन दिसुका उर्ध्वाधर सोझ रेखा पूरा-पूरी बिला गेल। “ठ”- अखनो पुरने रूप अछि। “प”- दू प्रकारक। पुरनका रूप जतऽ कोण अखनो अछिये। दोसर रूपमे तिरहुताक लटपटौआ रूप। “म”- आधार रेखा विलुप्त भऽ गेल। “श” आ “ष” क रूप फानीबला आ अखुनका रूपक बीचबला रूप लेने अछि। नारायणपालक भागलपुर अनुदान अ/ आ- पूरापूरी तिरहुता रूप, एतय धरि जे छोटका रेखा जे दहिना लम्ब रेखाक अर्द्धविराम रूपी कटावसँ मिलैत अछि, नीचाँ दिस टेढ़ भेल अछि। “उ”- एहिमे एकटा उपरका रेखा बनैत अछि आ लम्बरूपी रेखावाम दिस वक्र भऽ जाइत अछि। “क” केर त्रिभुज चाकर भऽ गेल अछि। “ख” तिरहुता सन लटपटौआ भऽ गेल अछि। “घ” मे न्यूनकोण खतम भऽ गेल आ तिरहुता केर आकार लऽ लेलक अछि। “च”- उपरका भाग पातर भऽ गेल अछि। “ज”- बिचुलका क्षैतिज भाग दू टा सोझ रेखामे बदलि गेल अछि आ अधिककोण बनबैत अछि। “ट”- उपरका रेखाक दहिन छोरसँ नीचाँ दिस छोटका रेखा जाइत अछि। “ण”- तिरहुता प्राचीन रूप। दूटा छोट रेखा लम्ब सोझ रेखाक वाम दिस जा कऽ मिलैत अछि। “त”- ई बदलि गेल अछि, एहिमे एकटा उपरका रेखा आ एकटा लम्ब रेखा समकोण पर अछि संगहि एकटा वक्र लम्ब रेखाक वाम दिस जुड़ि गेल अछि, जेना नागरीमे अछि। “थ”- तिरहुता सन उपरका वक्र खुजि गेल अछि। “ध”- उपरा भाग खुजि गेल अछि। “न”- पुरातन फानीबला रूप, फानी नीचाँ दिस झुकल। “प”- उपरका दिस पातर भेल। “फ”- उपरका कम चाकर भेल। “म”- सभरूप फाने सन। “ल”- अन्तिम रूपसँ आधार रेखा थकुचा गेल अछि। “श”- सभ प्रकार फानी सन। “ष”- पुरातन रूप, उपरका आ निचुलका भाग बराबर, दोसर मे उपरका भाग कम चाकर। प्रतिहार नरेश महेन्द्रपालक दिघवा-दुभौली अनुदान (गोपालगंज) एहिमे पुबरिया प्रकारक विशेषता भेटैत अछि जेना च पतरा गेल, ज लटपटा गेल, थ- तिरहुताक पूर्व रूप बुझाइत अछि, फानीबला “म” अछि, “श”मे फानी लम्ब रेखासँ मिज्झर होइत अछि, “ष” मे उपरका रेखा नीचाँ दिस टेढ़ होइत अछि। ई अनुदान पूब आ पच्छिमक मिश्रित रूप प्रस्तुत करैत अछि। १०म शताब्दीमे पैघ साम्राज्य सभ खतम होइत गेल आ तेँ अभिलेखो नहियेक बराबर अछि। नालन्दा आकृति अभिलेख एहि कालक अछि जाहिमे “भ” केर पुरान रूप देखबामे अबैत अछि। “श” केर परवर्ती रूप देखाइत अछि। बोधगया केर आकृति पर अभिलेखमे सेहो भ केर पुरान रूप भेटैत अछि आ श केर परवर्ती रूप सेहो। ख केर रूप तिरहुता सन अछि। तिरहुता लिपिक विकासक अन्तिम चरण किछु लिपि जे अखन धरि नहि पढ़ जा सकल अछि (१)- हड़प्पा लिपि (२)- अलंकृत ब्राह्मी, भारतकसभ भागमे छोट-छोट अभिलेख एहि लिपिमे अछि, मोटा-मोटी नाम आ हस्ताक्षर लेल प्रयुक्त होइत छल। (३)- शंख लिपि- एकर अक्षर सभ शंख सन अछि तेँ एकर ई नामकरण भेल। ई सेहो मोटा-मोटी नाम आ हस्ताक्षर लेल प्रयुक्त होइत छल। (कोल्हुआ, मुजफ्फरपुरक अशोक स्तम्भ (बसाढ़ स्तम्भ) मे जे तीनटा अभिलेख भेटल अछि ओहि मे किछु अक्षर शंख लिपिक सेहो अछि।) (४)- ब्राह्मी सन एकटा लिपि जे माटिक मोहर सभपर पूर्व भारतक चन्द्रकेतुगढ़ आ तामलुकसँ भेटल्;अ अछि। (५)- खरोष्ठी सन दहिनसँ वाम लिखल जायवला एकटा लिपि जे अफगानिस्तानसँ भेटल अछि। तिरहुताक विकासक अन्तिम चरण किछु अक्षर पहिने तिरहुताक रूप लऽ लेलक तँ किछु कने बाद। किछु अभिलेखमे किछु अक्षरक प्रयोगे नहि भेल। अनुलग्नक-५ मे तिरहुता रूपक क्रमिक स्थिति देखाओल गेल अछि। कैथी, तिब्बती आ देवनागरी लिपि अही तरहेँ अपन वर्तमान रूपमे आओल जे अनुलग्नकमे देखाओल गेल अछि। किछु विद्वान हर्षवर्द्धनक बादक समयमे ओकर तिरहुतक मंत्री अर्जुन द्वारा कन्नौजक राजा बनब आ तिब्बतक बौद्ध यात्री सभकेँ तंग करबाक चर्चा केने छथि आ प्रत्युत्तरमे तिरहुत पर तिब्बतक कब्जाक चर्चा करैत छथि। आधुनिक विद्वान ओहिपर शंका व्यक्त करैत छथि। तिब्बतक राजनैतिक प्रभुत्वपर तँ शंका अछि मुदा सांस्कृतिक रूपसँ निम्न तथ्य तिब्बतक वज्रयानक मिथिलामे उपस्थिति देखबैत अछि। बौद्ध देवी तारा, वारी, समस्तीपुर, उग्रतारा मन्दिर, महिषी, सहरसा। मुसहरनियां डीह- अंधरा ठाढ़ीसँ ३ किलोमीटर पश्चिम पस्टन गाम लग एकटा ऊंच डीह अछि। बुद्धकालीन एकजनियाँ कोठली, बौद्धकालीन मूर्त्ति, पाइ, बर्त्तनक टुकड़ी आ पजेबाक अवशेष एतए अछि। बुद्धकालीन एकजनियाँ कोठली नाहर भगवतीपुर भुवनेश्वरी मन्दिर (मधुबनी) मे सेहो अछि, प्रायः बौद्ध भिक्षु लोकनिक ई तपस्या स्थली होयत। फेर बौद्ध सिद्ध सरहपाद जे लिखै छथि- सिद्धिरत्थु मइ पढ़मे पढ़िअउ, मण्ड पिबन्तों बिसरउ एमइउ। ओ सिद्धिरस्तु आ एहि विचार कि माँड़ पीने बुद्धि मन्द होइत अछि दुनूक चर्च करैत छथि जाहिसँ हुनकर बौद्ध धर्मक मैथिल होयबाक प्रमाण भेटैत अछि, हुनकर जे फोटो तिब्बतसँ भेटैत अछि ओहिमे हुनकर फोटोक नीचाँमे तिब्बती लिपिमे वर्णन अछि। ७म शताब्दी आ बादक किछु तिरहुता अभिलेख अन्ध्राठाढी अभिलेख (श्रीधरदासक आंध्रा-ठाढ़ी अभिलेख), मधुबनी, बुद्धमूर्ति अभिलेख (कोर्थु), विष्णुमूर्ति अभिलेख (लदहो), १२म शताब्दीक सिमरौनागढ़क तिरहुता पाथर-अभिलेख, १९म शतीक ब्रह्मपुरा शिलालेखमे तिरहुताक आदर्श रूप, मधुबनी जिलाक जमथरि गाम आ हैंठी बाली गामक बीचक गौरीशंकर स्थान, गौरी आ शङ्करक सम्मिलित मूर्त्ति आ एहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल पालवंशीय अभिलेख, बिदेश्वर-मधुबनी जिलामे लोहनारोड स्टेशन लग स्थित शिवधामक स्थापना महाराज माधवसिंह कएलन्हि, ताहि युगक तिरहुताक अभिलेख। मंदार पर्वत-बांका स्थित स्थलमे तिरहुताक गुप्तवंशीय ७म् शताब्दीक अभिलेख अछि। पौराणिक कथामे समुद्र मंथनक हेतु मंदारक प्रयोग भेल छल। निकटमे बौंसीमे जैनक बारहम तीर्थंकर वासुपूज्य नाथक दूटा मूर्त्ति अछि, पैघ मूर्ति लाल पाथरक अछि तँ दोसर काँसाक जकर सोझाँ दूटा पदचिन्ह अछि। जैनक बारहम तीर्थंकर वासुपूज्य नाथक जन्म चम्पानगरमे आ निर्वाण एतहि भेल छलन्हि। बसैटी अभिलेख- पूणियाँमे श्रीनगर (जिला अररिया) लग तिरहुताक ई अभिलेख मिथिलाक पहिल महिला शासक रानी इद्रावतीक राज्यकालक वर्णन करैत अछि। एकर आधार पर मदनेश्वर मिश्र ’एक छलीह महारानी’ उपन्यास सेहो लिखने छथि। बाइसी-बसैटी, अररिया तिरहुता ताम्रपत्र- रानी इन्द्रावती (१७८४-१८०२) जे फूड-फॉर-वर्क आ अन्य कल्याणकारी कार्यक प्रारम्भ कएलन्हि केर मिथिलाक्षर अभिलेख एतए एकटा मन्दिरक ऊपरमे ताम्र-पत्रपर कीलित अछि, जे कारी रंग सँ पेंट कऽ देल गेल अछि आ शिलालेख सन लगैत अछि। जलज कुमार तिवारी आ एस. कृष्णामूर्ति २०१९ ई.मे प्रकाशित अपन आलेखमे निम्न तिरहुता अभिलेख सभक वर्णन दैत छथि जे अखन धरि कोनो पोथीमे नहि आयल छल। चेचर गाम (वैशाली) मे बुद्ध मूर्तिपर अभिलेख भेटल अछि जे तिरहुता लिपि आ संस्कृतमे अछि (९अम शताब्दी)। तारा मूर्ति, जगतपुर बरुआरी (सुपौल) जे सहरसा म्यूजियममे राखल अछि, तिरहुता लिपि आ संस्कृत भाषाक अभिलेख एततसँ भेटल अछि (१० म शताब्दीक)। तारा मूर्ति, दभैछा (वैशाली) मे तिरहुता लिपि आ संस्कृत भाषाक अभिलेख भेटल अछि (१० म शताब्दीक)। पिपरौलिया विष्णु आकृति (मूर्ति), दरभंगा, तिरहुता लिपि. संस्कृत भाषा (१०म शताब्दी)। गाम- भच्छी (बहेरी लगक जिला दरभंगा, मधुबनीक भच्छीसँ भिन्न), तिरहुता लिपि, संस्कृत भाषा (१०म-११म शताब्दी)। कण्दाहा (सहरसा) क पाथर अभिलेख, ओइनवार कालक राजा नरसिम्हदेवक आदेशसँ वंशधर ब्राह्मण द्वारा (तिरहुता १५मशताब्दी, भाषा संस्कृत)। मनसा आकृति (भैरवस्थान, मुजफ्फरपुर)- तिरहुता लिपि आ संस्कृत भाषामे लिखल अभिलेख (१५ म शताब्दी)। बुद्ध मूर्ति, कोर्थु दरभंगा, तिरहुता लिपि, संस्कृत भाषा (१०म शताब्दी)। एकर अतिरिक्त ओ पहिल शताब्दीक एकटा ब्राह्मी अभिलेखक चर्च सेहो करैत छथि [गाम पखौली जिला वैशाली (स्तम्भ अभिलेख) (ब्राह्मी लिपि, पहिल शताब्दी)]। तीनटा अशोक स्तम्भपर, जे कोल्हुआ (मुजफ्फरपुर)मे भेटल अछि, बादमे कियो अभिलेख खचित केने छथि। ओहिमे दूटा अभिलेख ७म शताब्दीक अछि जे नागरी लिपि आ संस्कृत भाषामे अछि आ तेसर ५म शताब्दीक अछि जे संस्कृत भाषामे आ ब्राह्मी लिपिमे अछि। कोल्हुआ, मुजफ्फरपुरक अशोक स्तम्भ (बसाढ़ स्तम्भ) मे जे तीनटा अभिलेख भेटल अछि ओहि मे किछु अक्षर शंख लिपिक सेहो अछि, जे अखन धरि नहि पढ़ल जा सकल अछि। (जलज कुमार तिवारी, एस. कृष्णामूर्ति, मिथिला भारती, भाग-६, अंक १-४, २०१९ ई.) मान्दा अभिलेख, कमौली दानपत्र (विद्यादेव कमौली प्रशस्ति), गदाधर मन्दिर अभिलेख (गदाधर मठ गया), गंजम ताम्रपत्र, लोकनाथक दानपत्र, भागलपुर, मुंगेर आ नालन्दाक दानपत्र, बादल स्तम्भ अभिलेख, विश्वरूप सेनक मदनपाद दानपत्र, अशोकाचलक बोधगया अभिलेख, वल्लालसेनक नैहाटी अभिलेख, ढाका अभिलेख (ढाका मूर्ति अभिलेख), देवपारा प्रशस्ति, अनुलिया आ साहित्य परिषद दानपत्र, भुवनेश्वर, सुन्दरवन, वेलवा आ बोधगया अभिलेख क्रमसँ देवनागरी आ तिरहुताक बीचमे फाँक आनि देलक। उपसंहार तेसर शताब्दी ई.पू. मौर्य, दोसर आ पहिल शताब्दी ई. पू. शुंग, पहिल सँ तेसर शताब्दी शक/ कुषाण, चारिमसँ छअम शताब्दी- गुप्त, सातमसँ ९अम शताब्दी सिद्धमातृका आ तकर बाद तिरहुता, एहि क्रममे तिरहुताक विकास हम देखि सकैत छी। तंत्रक योगदानसँ आ तिब्बती लिपिक प्रभावसँ तिरहुता अलंकृत भेल। मिथिलाक्षरक उद्भव आ विकास मे राजेश्वर झा जी किछु पुरातन तथ्यसँ अपनाकेँ दूर नहि कऽ सकला, जेना ओ नहि फरिछा सकला जे ब्रह्मी पूर्व पाणिनी व्याकरणाचार्य लोकनि द्वारा प्रयुक्त होइत छल आ पाणिनीक व्याकरणमे ओ अशुद्ध भऽ गेल आ तखनसँ एकर नाम ब्राह्मी भऽ गेल। ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा प्रयुक्त हेबाक कारणे ब्रह्मी नाम भेलपर जिदियायल छथि। हुनकर अवधारणा जे वैदेही लिपिसँ ब्राह्मी (जकरा ओ ब्रह्मी लिखै छथि) बहरायल सेहो भ्रामक अछि। मिथिलामे शंख लिपिमे सेहो छोट-छीन अभिलेख भेटल अछि, जकर वर्णन ऊपर कयल गेल अछि, जे हड़प्पा लिपि जेकाँ पढ़ल नहि जा सकल अछि आ ब्राह्मीमे सेहो अभिलेख भेटल अछि, से हुनकर कथन जे सोझे हड़प्पासँ लोक विदेह आयल विदेघ माथवक संग (शतपथ ब्राह्मण) आ एतऽ वैदेही लिपि शुरू कऽ देलक, से मान्य नहि अछि। से सगर भारतमे जे परम्परा छल जे ब्राह्मीमे पैघ अभिलेख लिखल जाइत छल आ नाम आ हस्ताक्षर लेल शंख लिपिक प्रयोग कएल जाइत छल से मिथिलोमे भेटल अछि। राजेश्वर झा तंत्र-सिद्धांत आ एकर तिरहुता लिपिपर प्रभावक सेहो जरूरति सँ बेशी प्रभाव देखेने छथि, जखन कि ओकर प्रभाव किछु सोझे आ किछु तिब्बती लिपिक माध्यमसँ पड़ल मुदा ओ ओहिसँ अलंकृत मात्र भेल। हुनकर ई कथन जे शब्दकल्पद्रुममे देल लिखबाक पद्धतिसँ बांग्ला लिपि नहि वरन् मात्र मिथिलाक्षर (तिरहुता) लिखल जा सकैत अछि, सेहो भ्रामक अछि। बांग्ला वा मिथिलाक्षर वा तिब्बती वा देवनागरी सभ ब्राह्मीपर आधारित अछि आ ई एहि तरहेँ बूझल सा सकैत अछि जे रोमन लिपिमे एकसँ एक फॉण्ट छै जे कखनो अहाँकेँ अरबी सन बुझायत कखनो लटपटौआ, आ सभ एक दोसरामे परिवर्तनीय अछि। शब्दकल्पद्रुममे देल विधि तिरहुते नहि बांग्लो लेल उपयुक्त छल, छापाखाना एलाक बाद जेना रोमन पूर्ण रूपसँ संयुक्ताक्षर खतम कऽ लेलक तहिना बांग्ला बहुत रास संयुक्ताक्षरकेँ खतम कऽ लेलक। आ ओहि नवका रूपकेँ राजेश्वर झा जी शब्दकल्पद्रुमसँ जोड़बाक गलती केलन्हि। राजेश्वर झाकेँ खरोष्ठी लिपिक सम्बन्धमे सेहो भ्रम छन्हि। खरोष्ठी दहिनसँ वाम दिस लिखल जाइत अछि मुदा ई पूर्ण रूपसँ भारतीय लिपि छल, वएह स्वर व्यंजन (कचटतप)। ब्राह्मीसँ किछु चेन्ह कम भेलाक कारण, जखन अभिलेख प्राकृतसँ संस्कृतमे लिखल जाय लागल, खरोष्ठी संस्कृतक समासयुक्त अभिलेखक लेखन लेल अनुपयुक्त भऽ गेल आ खतम भऽ गेल आ कोनो भारतीय लिप एहिसँ बहार नहि भऽ सकल। आधुनिक तिरहुताक रूपक विकास नारायणपालक भागलपुर दानपत्र, श्रीचन्द्र रामपालक दानपत्र, महिपाल प्रथमक वनगढ़ दानपत्र, भोजवर्मनक वेलवा दानपत्र, लक्ष्मणसेनक तर्पण निधि दानपत्र सँ विकसित होइत पक्षधर मिश्र कृत विष्णुपुराण आ १३२६ ई. सँ प्राप्त मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक पञ्जीमे आबि कऽ समाप्त भऽ जाइत अछि। जे किछु छोट-मोट परिवर्तन लेखकक व्यक्तिगत लेखनीक कारण छल से छापाखाना एलाक बाद खतम भेल। रामलोचन शरण (१८८९-१९७१) तिरहुतामे मैथिलीक प्रकाशनक प्रारम्भ केलन्हि।तकरा बाद कम्प्यूटर फॉण्टमे एकरूपता आबि गेल आ से सम्भव भेल देवनागरी यूनीकोड (मंगल), बांग्ला यूनीकोड (वृन्दा) आ तखन तिरहुता यूनीकोडकेँ आधार बनेलासँ। छापाखानामे दिक्कति रहै, जे किछु रूपकेँ ओतय छोड़य पड़ैत छलै, आ घोंघाउज होइत छल जे एहि तिरहुताकेँ सीखि कऽ पाण्डुलिपि नहि पढ़ल जा सकैए। कम्प्यूटरमे एक्के आधारपर विभिन्न फॉण्टक निर्माण भेलासँ विभिन्न फॉण्ट विभिन्न तरहक लेखन रूपकेँ अंकित करैत अछि आ ओ सभ आपसमे परिवर्तनीय होइत अछि। से सभ १३२६ ई. क बादक सभ तरहक परिवर्तन (संयुक्ताक्षर सहित), जे परिवर्तन नहि वरन् लेखनक विभिन्न स्टाइल छल, क समावेश आब सम्भव भऽ गेल अछि। मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली मैथिली आ हिन्दी मैथिली हिन्दी हमरा सभक हमारा हमर मेरा ओकर उसका ई यह ओ वह ई सब ये ओ सब वे अछि है छी हूँ देखनाइ देखना जीनाइ जीना गेनाइ जाना पीनाइ पीना छूनाइ छूना सुतनाइ सोना पढ़नाइ पढ़ना जाउ जाइए जो जा राम गेल राम गया सीता गेलि सीता गई आननाइ लाना बजनाइ बोलना बिसरनाइ भूलना छह हो लिखैत अछि लिखता है लिखि रहल अछि लिख रहा है जायत जाएगा अयताह आएंगे राम जाइत अछि राम जाता है सीता जाइत अछि सीता जाती है सीता जाइत छथि सीता जाती हैं राम खेनाइ खेलक राम ने खाना खाया राम सोहारी खेलक राम ने रोटी खाई तोँ ई काज केने छह तूने यह काम किया है राम फिल्म देखने छल राम ने फिल्म देखी थी राम फिल्म देखने छला राम जी (आदर) ने फिल्म देखी थी राम पाठ समाप्त कऽ लेने होयत राम ने पाठ समाप्त कर लिया होगा राम पाठ समाप्त कऽ लेने हेता राम जी (आदर) ने पाठ  समाप्त कर लिया होगा राम सीताकेँ देखलक राम ने सीता को देखा राम  सीताकेँ देखलनि राम जी (आदर) ने सीता को देखा ऊपर अहाँकेँ स्पष्ट भऽ गेल होयत जे हिन्दीमे कर्त्ता लेल “ने” प्रयुक्त भेल मुदा मैथिलीमे ई रिक्त रहल। कर्म लेल हिन्दीमे “को” आ मैथिलीमे “केँ” प्रयुक्त भेल। हिन्दी सेब एक सेब दू सेब दो सेबों में मैथिली सेब एकटा सेब दूटा सेब दूटा सेबमे हिन्दी सिपाही एक सिपाही दो सिपाही दो सिपाहियों ने मैथिली सिपाही एकटा सिपाही दूटा सिपाही दूटा सिपाही हिन्दी साधु एक साधु दो साधु दो साधुओं को मैथिली साधु एकटा साधु दूटा साधु दुनू साधुकेँ हिन्दी चमगादड़ एक चमगादड़ दो चमगादड़ दोनों चमगादड़ों पर मैथिली बादुर एकटा बादुर दूटा बादुर दुनू बादुर पर हिन्दी चिड़िया एक चिड़िया दो चिड़िया दो चिड़ियाओं मैथिली चिड़ै एकटा चिड़ै दूटा चिड़ै दुनू चिड़ै एतय स्पष्ट भऽ गेल जे बहुवचनमे हिन्दीमे शब्दक रूप परिवर्तित भेल मुदा मैथिलीमे से नहि भेल। एहिसँ पहिने क्रियामे किछु ठाम स्त्रीलिङमे हिन्दी सन परिवर्तन मैथिलीमे सेहो भेल (गेलि) मुदा बेसी ठाम (जाइत अछि, छथि) परिवर्तन नहि भेल। आदरसूचक वाक्यमे हिन्दीमे क्रियामे परिवर्तन नहि भेल मुदा मैथिलीमे भेल (देखलक/ देखलनि)। स्त्रीलिङक बहुवचनमे हिन्दीमे रूप परिवर्तित होइताछि मुदा मैथिलीमे से नहि होइत अछि। कारक/ विभक्ति (मैथिली) कारक/ विभक्ति (हिन्दी) राम राम ने रामकेँ राम को गेन्दसँ, लाठीसँ, लाठी द्वारा गेन्द से, लाठी द्वारा रामकेँ, रामकलेल, राम हेतु राम को, राम के लिये, राम हेतु गाछसँ (विलगाव) पेड़ से रामक घर, रामक पोथी, सीताक राम राम का घर, राम की किताब, सीता के राम घर पर, खोतामे घर पर, घोसला में मैथिली आ बांग्ला मैथिली बांग्ला अपने आपनि नै (नहि) नय छी आछि/ छि काज काज इनार इनार करै (करैत) छी कोरेछि गेल छलौं (छलहुँ) गियेछिलाम बाजू नै बोलबेन ना रान्हल रान्ना की कि संगे शंगे चाह चा दू टा दुटो ई सब एशब सिंघाड़ा शिङाड़ा कोन कोन हाथ हात अखन ऐखोन पाँचटा पाँचटा अच्छा आच्छा छथि आछेन छी आछि हुअय आछो करू कोरून चाही चाइ खोलै छी खुलछि कोनो कोनो बांग्ला “अ” ओड़िया सन “ओ” उच्चरित होइत अछि। मैथिली सन इ/ ई आ उ/ऊ केर ह्रस्व-दीर्घ उच्चारणमे भेद नहि अछि आ ऐ मैथिलीमे अ+इ आ बांग्लामे ओ+ई उच्चरित होइत अछि। औ बांग्लामे ओ+उ उच्चरित होइत अछि। “न” आ “ण” केर उच्चारण बांग्लामे एके रङ होइत अछि। मैथिलीमे “ण” केर उच्चारण कखनो काल “ड़” होइत अछि (गणेश=गड़ेस)। व/ ब एके रङ “ब” (मैथिली जकाँ) सन उच्चरित होइत अछि। आश्विन मैथिलीमे लिखलो आ बाजलो “आसिन” जाइत अछि मुदा बांग्लामे लिखल आश्विन आ बाजल आश्शिन जाइत अछि। तहिना :- बांग्लामे एना लिखल जाइत अछि बांग्लामे एना बाजल जाइत अछि अन्वेषण अन्नेशन श्वास शाश उच्छ्वास उच्छास अक्षर अक्खोर पद्म पद्दो विस्मय बिश्शय उज्जवल उज्जल फेर बांग्लामे एना लिखल आ फराकबाजल सेहो जाइत अछि:- बांग्लामे एना लिखल जाइत अछि बांग्लामे एना बाजल जाइत अछि संस्हा शंस्था स्हान स्थान सुस्ह् शुस्थो असुस्ह् अशुस्थो बांग्लामे कोनो शब्द पर विशेष बल देबाकलेल –-तो जोड़ल जाइत अछि। बांग्लामे पूर्व निर्दिष्ट वस्तु लेल प्रयुक्त वस्तुवाचक संज्ञा/ सर्वनामक एकवचनमे –-टा –-टि आ बहुवचनमे –-गुलो, -गुलि जोड़ल जाइत अछि। बांग्लामे संख्यावाचक शब्दक संग –-टा, -टि, -टे, -टो जोड़ल जाइत अछि मुदा –-गुलो, -गुलि केर प्रयोग नहि होइत अछि। बांग्लामे “संग” आ “लेल” सन अव्यय लेल सम्बन्ध विभक्तिक प्रयोग होइत अछि जेना:- चायेर शंगे- चाहक संग आमार शंगे- हमरा संग आमार जोन्ने- हमरा लेल बांग्लामे सर्वनामक सम्बन्धवाचक रूपबनेबा लेल सर्वनामक तिर्यक रूपमे –-देर जोड़ल जाइत अछि। आमा-आमादेर-हमर आपना-आपनादेर-अहाँक तोमा-तोमादेर- तोहर एना-एनादेर-हिनकर वर्त्तमान काल आज्ञार्थकक बाद –-ना प्रयोग जोर देबा लेल कयल जाइत अछि। देखू ने- देखुन ना कोनो शब्द पर बल देबा लेल मैथिलीमे द्वित्व+एकार केर प्रयोग होइत अछि जेना- कम्मे, एक्के। बांग्लामे ई प्रभाव –-इ युक्त भेलासँ अबैत अछि जेना-कमइ। मैथिलीमे “अछि” केर नकारात्मक “नहि अछि” प्रयुक्त होइत अछि मुदा बांग्लामे “आछे” केर नकारात्मक लेल मात्र “नेइ” प्रयुक्त होइत अछि। अपूर्णकालिक क्रियारूप मे जँ धातु स्वरांत होइत अछि तँ धातुक तिर्यक रूपक संग कालवाची प्रत्यय –-च्छ जोड़ल जाइत अछि। जँ धातु व्यंजनान्त होइत अछि तँ धातुक तिर्यक रूपमे –-छ जोड़ल जाइत अछि। कालवाचक प्रत्यय लगेलाक बाद पुरुषवाचक प्रत्यय जोड़ल जाइत अछि। मैथिली बांग्ला हम अबै छी आमि फिरिछि हम जाइ छी आमि जाच्छि ओ सब आबै छथि उनि फिरछेन अहाँ जाइ छी आपनि जाच्छेन तूँ आबै छेँ तुमि फिरछो तूँ जाइ छेँ तुमि जाच्छो ओ सब अबैत छथि तिनि फिरछेन ओ सब जाइ छथि तिनि जाच्छेन ओ आबै छथि शे फिरछे ओ जाइ छथि शे जाच्छे अहाँ अबैत छी आपनि फिरछेन अहाँ करैत छी आपनि कोरछेन बांग्लामे एक प्रकारक असमापिका क्रिया होइत अछि- क्रियाक तिर्यक रूपक। बादमे –-ते जोड़लासँ ई बनाओल जाइत अछि। करय मे- कोरते (कोर+ते) जाइ मे- जेते (जा+ते) आबय मे- आशते (आश+ते) मैथिली सन बांग्लामे सेहो दू शब्द वा वाक्यकेँ जोड़बा लेल ओ, आर, एबं (मैथिलीमे एवं/ एवम्) केर प्रयोग होइत अछि। बांग्लामे “ओ” केर प्रयोग “संग” केर अर्थमे सेहो होइत अछि। हमहूँ- आमि ओ धातुक पाछाँ पुरुषवाचक प्रत्यय लगा कय क्रियाक सामान्य वर्त्तमान कालक रूप बनि जाइत अछि। कर+इ= कोरि कर+एन= करेन कर+ओ= करो कर+इश= कोरिश कर+ए= करे। मैथिली आ भोजपुरी भोजपुरीमे केर बदला ई वर्ण प्रयुक्त होइत अछि ण न ल र ष ख श स भोजपुरीमे सहचर तीन प्रकारक अछि, विपरीतार्थक, समानार्थक्, आनुप्रासिक आ विशेषार्थ बोधक सहचर। विपरीतार्थक सहचर शब्द विपरीतार्थक सहचर हकासल पियासल लरम गरम रकम पताई साँप गोजर समानार्थक सहचर शब्द समानार्थक सहचर लकड़ी काठी कनिया बहरिया पुरखा पुरनिया किन बेसाह बिआ बाल नेग चार आनुप्रासिक सहचर शब्द आनुप्रासिक सहचर अखोर बखोर हरवा हथियार बोहनी बट्टा पर पाहुन चासा बासा चिरई चुरुंग विशेषार्थ बोधक सहचर शब्द विशेषार्थ बोधक सहचर सेवा खरचा अह जह तगड़ बगड़ अकट बहेर आउँज गाउँज भोजपुरीक किछु उपसर्ग नि-निदरदी कु- कुअन्न अध- अधमरु भोजपुरीक किछु प्रत्यय डाका- अइत- डकइत हार- चूड़ी- चूड़ीहार लकड़ी- लकड़ीहार हर-मुस- मुसहर बाप- बहर मामा- ममहर भोजपुरीमे संज्ञासँ विशेषण कातिक- कतिका आइन- धुँआ- धुआँइन भोजपुरीमे विशेषणसँ संज्ञा पियर- पिअरी अई- थेथर- थेथरई अवती- बूढ़- बुढ़उती भोजपुरीमे संज्ञासँ संज्ञा अई- लरिकाई भोजपुरीमे विशेषणसँ विशेषण लाल- ललछहूँ औठा- पहिल- पहिलौठा स्त्री प्रत्यय आइन- मिसिर- मिसराइन आनी- देवर- देवरानी भोजपुरीमे वचन लइका (एकवचन)- लइकन (बहुवचन) हाथी (एकवचन)- हाथिन/ हाथियन (बहुवचन) मैथिली भोजपुरी छथि तारी खाइत अछि खाता खुजैत अछि खुलता नहि खेलाइत छथि खेलत नइखन नहि अछि नइखे नहि जयताह ना जइहन नहि खयताह ना खइहन जाइ छी जातार पढ़ैत छी पढ़ तानी खाइ छथि खा तारन अहाँ रउआ भोजपुरीक सेहो विभिन्न रूप अछि, जेना क्षेत्रानुसार बा, बाटे, बीया, बड़वेँ, बटे/ बानी बाजल जाइत अछि। मैथिली आ मगही भुव्अनेश्वर शर्माक मगही शब्दकोषमे किछु वर्ण आ संयुक्ताक्षर जेना ण, श, ष, ऋ, लृ, क्ष, त्र, ज्ञ हटा देल गेल अछि। मैथिली सन मगहीमे सेहो “व” केर उच्चारण “ब” आ कतेक ठाम “य” केर उच्चारण “ज” होइत अछि। मगही सेहो अपन उत्पत्ति ८४ सिद्ध आ नाथ सम्प्रदायक नाथ साहित्यसँ मानैत अछि। मगही क्रियामे एकटा आकारक मात्रा कम होइत अछि जेना:- मैथिली मगही एनाइ अनई गेनाइ गनई धोनाइ धोनई मगही लोकोक्ति आ कहावत: अदरा गेल, तीन गेलन, सन, साठी, कपास- स्रदरा नक्षत्रमे वर्षा नहि भेने सन, साठी (धान) आ कपासक खेती बर्बाद भऽ जाइत अछि। ओछा के प्रीत बालू के भीत- ओछ व्यक्तिसँ दोस्तियारी क्षिक होइत अछि। ब्तातदेवल- खोराकी चलायल सिहरी फटल- अकश-तिकश खतम भेल। हहास कयल- दोसरकेँ आगू बढ़ैत देखि कऽ जरल। तुला राशि के भेल- बड्ड तमसायल कन्या राशि के भेल- काजसँ बेकार भेल। ओरहन देवल- शिकाइत कयल। पीढ़ा देवल- आदर देल। खोपसन देवल- उलहन देल। डॉ रामनरेश मिश्र “हंस” मगधक भाषा मागधीक विकसित रूपकेँ मगही कहलनि अछि। मागधी प्राकृतसँ असमिया, बांग्ला, ओड़िया, मैथिली, भोजपुरी आदि भाषा सेहो बहार भेल अछि। मगहीमे “र” लेल “ल” “ड़”, “ल” लेल “र” “ड़” केर प्रयोग होइत अछि। मगहीमे सेहो निर- लगा कऽ निरइठ बनैत अछि (अइठ/ निरइठ)। मगही लोकगाथा आल्हा, सोरठी वृजभार, लोरकाइन, रेसमा-चुहरमल, सारंगा-सदाबृज, छतरी-घुघुलिया, कुँवर विजयी, राजा भरथरी, गोपीचन्द, सोभां नायक, सती बिहुला, नेटुआ दयाल सिंह, राजा ढोलन सिंह, मान गुजरिया, मामा-भगिना, विक्रम, कर्दब-लीला, बनजारा, हिरनी-बिरनी, सहलेस, नूनाचार, राजा हरिचन, बाबा चिन्तामन, बकतौर, बिहुला-विसहरी, बाबा लखन्दर बिहुला-विषधर। मगही लोकनाट्य, नाट्य-गीत आ लोक-नृत्य -कीर्त्तन, जातरा, करमा भइया दूज, जीतिया (नायिका रुसि कऽ नैहर चलि गेल, धनरोपनीक बाद किसान-मजदूर ई नाट्य करैत छथि।) -फागू, चैता, सावनी, बारहमासा, रोपनी। -दूधवंशी (दुसाध), साफी (धोबी), च्हन्द्रवंशी (कहार), कोइरीक नाट्य गीत। -जनी- जातिक- डोमकच, बीछामार, चुलहारिन, सीता-मीता, गेदुरी। -ओझा-डाइन। -सामा-चकेवा, बगुला-बगुली, जाट-जाटिन, सास-पुतोह, -सगबेचनी, मछली बेचनी, जीराबुन, दही बेचनी। -नाच, नेटुआ-कसबिन, कठपुतली। आब किछु मैथिली आ तकर मगही रूपक चर्चा कयल जा रहल अछि। मैथिली मगही खेलेलौं (खेलेलहुँ) खेलली हएत होत अछि हे छथि हथ/ हथुन छी ही जायत जइतो एता अतथुन भेटत मिलतो मगहीक रूप पटनाक आसपास मारलुक (मारबौ) आदिक प्रयोग होइत अछि जे कने दक्षिण गेला पर हथिन/ छथिन आदिमे परिवर्तित भऽ जाइत अछि। मैथिली आ संथाली मैथिली संथाली पिता बा बाबी (बा) नुनुगो (बुडीगो) बाबा गोड़म्बा नमस्ते जोहारगी भेल हुयेना उसरि कऽ (जल्दी) उसारा अछि काना/ गिया छी काना आर आर सँ ते एखन लगाइत एहोबोक् लगीत देखाउ उदुगमे विलम्ब बिलम्ब दिऔ मे/ में करू मा/ कामीयमे नहि आलोम बनू बिनाक्आ बुरबक (बोका) बोका आउ हजुक्मे ध्यान ध्यान दाँत सभ डाटा लगा लिअ लगाव ताम सत्त सरी खबरि खोबोर हमरा इञ खराप बड़ीच् मोन मोने लगा कऽ लगाव काज कातेक केँ दो घास घास आनू अगुकुम अहाँ सँ आमसांव जरूर जरूड़ थोर थोड़ा पंखा पंखा बिजली बिजली लैम्प लैम्प कागत-पेंसिल कागज-पेंसिल मना मना मामिला मामला समय समय धन धन मेहनति मेहनत अहाँ आम कुकुड़ (पु.) सीता कुकुड़ (स्त्री.) सीता इंगा पिल्ला (कुकुड़क बच्चा) सीता होपोन बाछी बछी बेंग रोटे पनही (जुत्ता) पनाही करैल कारला घर (दलान) दुलान मचान मचान कड़छु कड़छु पटिया पटया चालनि चलनी सलाइ-काठी सलाई कठी सूत सुतम थारी-बाटी थरी-बटी लोटा लोटा बोरा बोरा गहूम गुहुम दही दाही थुथुन थुथना गाहकि (गहकी) गहकी अखबार खोबोर कागज हरियर हरयड़ खर्चा खर्चा साफ करब साफा बीछब बाछाव बनायब बिनाव नव करब नावा नेहोरा करब नेहोर जिरायब (विश्राम करब) जिराव थरथरी थारथाराक् आछी करब (छीकब) अछीम साटब साटाव मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) मैथिली आ बांग्ला मैथिली बांग्ला अपने आपनि नै (नहि) नय छी आछि/ छि काज काज इनार इनार करै (करैत) छी कोरेछि गेल छलौं (छलहुँ) गियेछिलाम बाजू नै बोलबेन ना रान्हल रान्ना की कि संगे शंगे चाह चा दू टा दुटो ई सब एशब सिंघाड़ा शिङाड़ा कोन कोन हाथ हात अखन ऐखोन पाँचटा पाँचटा अच्छा आच्छा छथि आछेन छी आछि हुअय आछो करू कोरून चाही चाइ खोलै छी खुलछि कोनो कोनो बांग्ला “अ” ओड़िया सन “ओ” उच्चरित होइत अछि। मैथिली सन इ/ ई आ उ/ऊ केर ह्रस्व-दीर्घ उच्चारणमे भेद नहि अछि आ ऐ मैथिलीमे अ+इ आ बांग्लामे ओ+ई उच्चरित होइत अछि। औ बांग्लामे ओ+उ उच्चरित होइत अछि। “न” आ “ण” केर उच्चारण बांग्लामे एके रङ होइत अछि। मैथिलीमे “ण” केर उच्चारण कखनो काल “ड़” होइत अछि (गणेश=गड़ेस)। व/ ब एके रङ “ब” (मैथिली जकाँ) सन उच्चरित होइत अछि। आश्विन मैथिलीमे लिखलो आ बाजलो “आसिन” जाइत अछि मुदा बांग्लामे लिखल आश्विन आ बाजल आश्शिन जाइत अछि। तहिना :- बांग्लामे एना लिखल जाइत अछि बांग्लामे एना बाजल जाइत अछि अन्वेषण अन्नेशन श्वास शाश उच्छ्वास उच्छास अक्षर अक्खोर पद्म पद्दो विस्मय बिश्शय उज्जवल उज्जल फेर बांग्लामे एना लिखल आ फराकबाजल सेहो जाइत अछि:- बांग्लामे एना लिखल जाइत अछि बांग्लामे एना बाजल जाइत अछि संस्हा शंस्था स्हान स्थान सुस्ह् शुस्थो असुस्ह् अशुस्थो बांग्लामे कोनो शब्द पर विशेष बल देबाकलेल –-तो जोड़ल जाइत अछि। बांग्लामे पूर्व निर्दिष्ट वस्तु लेल प्रयुक्त वस्तुवाचक संज्ञा/ सर्वनामक एकवचनमे –-टा –-टि आ बहुवचनमे –-गुलो, -गुलि जोड़ल जाइत अछि। बांग्लामे संख्यावाचक शब्दक संग –-टा, -टि, -टे, -टो जोड़ल जाइत अछि मुदा –-गुलो, -गुलि केर प्रयोग नहि होइत अछि। बांग्लामे “संग” आ “लेल” सन अव्यय लेल सम्बन्ध विभक्तिक प्रयोग होइत अछि जेना:- चायेर शंगे- चाहक संग आमार शंगे- हमरा संग आमार जोन्ने- हमरा लेल बांग्लामे सर्वनामक सम्बन्धवाचक रूपबनेबा लेल सर्वनामक तिर्यक रूपमे –-देर जोड़ल जाइत अछि। आमा-आमादेर-हमर आपना-आपनादेर-अहाँक तोमा-तोमादेर- तोहर एना-एनादेर-हिनकर वर्त्तमान काल आज्ञार्थकक बाद –-ना प्रयोग जोर देबा लेल कयल जाइत अछि। देखू ने- देखुन ना कोनो शब्द पर बल देबा लेल मैथिलीमे द्वित्व+एकार केर प्रयोग होइत अछि जेना- कम्मे, एक्के। बांग्लामे ई प्रभाव –-इ युक्त भेलासँ अबैत अछि जेना-कमइ। मैथिलीमे “अछि” केर नकारात्मक “नहि अछि” प्रयुक्त होइत अछि मुदा बांग्लामे “आछे” केर नकारात्मक लेल मात्र “नेइ” प्रयुक्त होइत अछि। अपूर्णकालिक क्रियारूप मे जँ धातु स्वरांत होइत अछि तँ धातुक तिर्यक रूपक संग कालवाची प्रत्यय –-च्छ जोड़ल जाइत अछि। जँ धातु व्यंजनान्त होइत अछि तँ धातुक तिर्यक रूपमे –-छ जोड़ल जाइत अछि। कालवाचक प्रत्यय लगेलाक बाद पुरुषवाचक प्रत्यय जोड़ल जाइत अछि। मैथिली बांग्ला हम अबै छी आमि फिरिछि हम जाइ छी आमि जाच्छि ओ सब आबै छथि उनि फिरछेन अहाँ जाइ छी आपनि जाच्छेन तूँ आबै छेँ तुमि फिरछो तूँ जाइ छेँ तुमि जाच्छो ओ सब अबैत छथि तिनि फिरछेन ओ सब जाइ छथि तिनि जाच्छेन ओ आबै छथि शे फिरछे ओ जाइ छथि शे जाच्छे अहाँ अबैत छी आपनि फिरछेन अहाँ करैत छी आपनि कोरछेन बांग्लामे एक प्रकारक असमापिका क्रिया होइत अछि- क्रियाक तिर्यक रूपक। बादमे –-ते जोड़लासँ ई बनाओल जाइत अछि। करय मे- कोरते (कोर+ते) जाइ मे- जेते (जा+ते) आबय मे- आशते (आश+ते) मैथिली सन बांग्लामे सेहो दू शब्द वा वाक्यकेँ जोड़बा लेल ओ, आर, एबं (मैथिलीमे एवं/ एवम्) केर प्रयोग होइत अछि। बांग्लामे “ओ” केर प्रयोग “संग” केर अर्थमे सेहो होइत अछि। हमहूँ- आमि ओ धातुक पाछाँ पुरुषवाचक प्रत्यय लगा कय क्रियाक सामान्य वर्त्तमान कालक रूप बनि जाइत अछि। कर+इ= कोरि कर+एन= करेन कर+ओ= करो कर+इश= कोरिश कर+ए= करे। मैथिली आ असमिया मैथिली जकाँ असमियामे सेहो ह्रस्व इ दीर्घ ई, आ ह्रस्व उ दीर्घ ऊ केर उच्चारणमे कोनो खास अन्तर नहि होइत अछि। मुदा असमिया ऐ केर उच्चारण ओइ आ औ केर उच्चारण ओउ होइत अछि। पहिल तँ मैथिलीसँ भिन्न मुदा दोसर मैथिलीक समान। मैथिलीमे जेना “अ” बाजल जाइत अछि असमियामे तेना “आ” बाजल जाइत अछि। असमियाक “अ” केर उच्चारण मैथिलीमे नहि अछि। असमिया “च” आ “छ” मैथिलीक “स” सन बाजल जाइत अछि। असमियाक “ज” “झ” आ “य” मैथिलीक “ज” सन उच्चरित होइत अछि। मैथिलीमे सेहो बहुत ठाम “य” केर उच्चारण “ज” सन होइत अछि। असमियामे मूर्धन्य आ दन्त दुनू दन्तमूलीय सन उच्चरित होइत अछि। ट. ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न एहि सभमे उच्चारणक दृष्टिसँ कोनो अन्तर नहि होइत अछि, सभटा दन्तमूलीय सन उच्चरित होइत अछि। श, ष, स तीनू “स” सन उच्चरित होइत अछि। मैथिलीमे “ष” कखनो काल “ख” सन उच्चरित होइत अछि। मैथिलीमे सेहो “श” आ “स” “स” सन उच्चरित होइत अछि। “श” “ष” आ “स” “र” केर संग वा दू स्वरक बीचमे रहला पर एकटा तेसरे ढंगसँ उच्चरित होइत अछि, जकर समान मैथिलीमे कोनो उच्चारण नहि अछि। असमियामे “जँ संयुक्ताक्षरसँ शब्दक अंत होइत अछि तँ ओ अकारान्त उच्चरित होइत अछि। माने “ञ” केर उच्चारण “न” सन होइत अछि। मैथिली असमिया ऐ (अइ) एइ चाह साह हमर मोर कनियाँ परिवार परिवार संसार बहीन मनी जलखै/ जलपान जलपान दही दोइ नारिकेलक लड्डू (लड़ू) नारिकलर लारू सुआद (सोआद) सोआद नीक (भल) भाल बेस (बड्ड) बेस खाउ खाओक लिअ लओक जाउ जाओक करू करक अपने आपुनि करबाक/ करू (करक) करक जएबाक (जाउ) जाओक अहाँ आहा धानक धानर दिअ दियक दे दे बाड़ीमे बाड़ीत औषध औसध नेबू (नेबो) नेमु कथा (गप) कथा एक बेर एबार दुइ दुइ चारि सारि मते (अनुसारे) मते लगाति लगत खेनाइ खा तूँ (पुरातन-तोइ) तोइ आइ-काल्हि आजिकालि करह कर्अ कतऽ कोत नहि (नइँ) नाइ चाहक पात साह पात बाँस बाँह नोकसान लोकसान बौस्तु बस्तु आनौं (आनी) आनौं करौं (करी) करौं लिखौं (लिखू) लिखौं एक बेर एबार आबह आह टाका-पाइ (पइसा) टका-पइसा के कोन परिवार परियाल छौरा लोरा रखलौं राखिसों र्ाति राति बजे बजात प्रायः प्राय भाराक घर भाराघर डेढ़ हजार डेर हेजार बेसी बेसि पचास पसास हाथी हाँती हरिण हरिणा पोखरि पुखुरि असमियामे कोनो शब्द पर जोर देबाले –-हे जोड़ि कऽ बाजल जाइत अछि। असमियामे –जनी स्त्रीलिंग वाचक प्रत्यय तँ –-जन पुल्लिंग वाचक प्रत्यय अछि। असमियामे बहुवचन बनबै लेल तीन प्रकारक विभक्ति लगैत अछि। “तुमि”, “तेओँ”, “आपुनि” क संग -लोक, तुच्छार्थबोधक विशेष्य पदक संग -बोर, “तइ”, “सि”, “एइ”, “ताइ” सर्वनाम आ संबंधवाचक विशेष्य पदक संग “हैंत” क प्रयोग होइत अछि। एकवचन बहुवचन तुमि तोमालोक आपुनि आपोनालोक तेओ तेओंलोक तइ तहँत सि सिहँत एइ एइहँत ताइ ताइहँत/ सिहँत लोरा लोराबोर किताप कितापबोर घर घरबोर असमियामे “ई”/“एकरा” लेल “एइ” आ “ओ”/”ओकरा” लेल “सेइ” प्रयुक्त होइत अछि। लागत/ पड़त लेल असमियामे लागिब प्रयुक्त होइत अछि। असमियामे प्रश्नवाचक वाक्यमे जाहि शब्द पर बलदेबाक रहैत छैक ओहिमे –-नो जोड़ल जाइत छैक। धातुक संग –-ओवा जोड़ि कऽ भूतकाल वाचक विशेषणक निर्माण होइत अछि। मूल धातुक संग –-आ जोड़ि कऽ क्रियावाची संज्ञा बनाओल जाइत अछि। असमियामे कर्मवाच्यक ब्रिया बनेबा लेल धातुमे –-आ जोड़ि कऽ आ फेर –-हय वा –-जाय केर प्रयोग कयल जाइत अछि। मैथिली सन असमियामे सेहो क्रिया कालक अनुसार बदलैत अछि। मैथिली आ ओड़िया किछु विशेष टिप्पणी देल जा रहल अछि जाहिसँ मैथिली आ ओड़ियाक बीचमे सम्बन्ध स्पष्ट भऽ जायत। मैथिलीमे “ई” केर बदला ओड़ियामे “इए” प्रयुक्त होइत अछि, मुदा उच्चारण दुनू ठाम एक्के छैक, मात्र वर्त्तनीमे अन्तर छैक। जेना रेघा कऽ हम सब “ई” बाजै छी सएह “इए” छिऐ। “तूँ जाह” हम सब कहै छी आ ओड़ियामे “तू जाऽ“ कहल जाइत अछि। “तूँ जो” हम सब कहै छी आ ओड़ियामे “तुमे जाअ”, हमसब “अहाँ जाऊ” आ ओड़ियामे “आपण जाआन्तु” कहल जाइत अछि। मैथिलीमे “अछि” ओड़ियामे सेहो “अछि” अछि। हमर केर प्राचीन मैथिली रूप “मोर” (पिआ मोर बालक- विद्यापति) अखनो ओड़ियामे गद्यमे “मोर” प्रयुक्त होइत अछि। “नहि” केर बदला “नाहिं” (नाँई) (मैथिलीमे सेहो एहेन उच्चारण होइत अछि आ मैथिली पत्रिका अंतिकामे नइँ लिखलो जाइत अछि), “अपने” आ “अहाँ” केरबदला “आपण” प्रयुक्त होइत अछि जे मैथिलीक “अपने” सन अछि। “छी” केर बदला “छि” प्रयुक्त होइत अछि। “कोन” केर बदला “केउँ”, “काल्हि” केर बदला “कालि” आ “पीलक” केर बदला “पिइला” प्रयुक्त होइत अछि। “नै सुनलनि” केर बदला “शुणिलुनि”, एतय गहिंकी नजरिसँ देखब तँ पता लागि जायत जे नकारात्मक बनेबा लेल ओड़ियामे “नि” शब्दक अन्तमे जोड़ल जाइत अछि। ’केँ’ केर बदला ’कु’ जेना ’रामकेँ’ केर बदला ’रामकु’ प्रयुक्त होइत अछि। “देल” केर बदला “देल” यएह प्रयुक्त होइत अछि। जेना अपने सभ भात “सिझ” गेल कहैत छिऐ, ओड़ियामे बरकल पानिक बदलामे “सिझापाणि” कहल जाइत अछि। “हएत” केर बदला “हेब”, “नै हएत” केर बदला “हेबनि” (नि जोड़ि कऽ नकारात्मक बनल)। अग्रिम/ अगारी केर बदलामे “आगरू”, कराबय केर बदला करिबाकु, पड़त केर बदला पड़िब, “देखने छह” केरबदला “देखिछ”, कतेक/ कत्ते केरबदला केते, जतेक/ जत्ते केर बदला जेते प्रयुक्त होइत अछि। मैथिली केर “ओ” केर बदला ओड़ियामे “से” प्रयुक्त होइत अछि। मैथिलीमे “से” (जेना- से कहलक) कनेक भिन्न अर्थमे मुदा मोटा-मोटी “फराक” केर अर्थमे प्रयुक्त होइत अछि। मैथिली ओड़िया जाइ छै जाउछि एकटा (गोटे) गोटे बुलब/ बुलनाइ बुलिबा दूटा दिटा कोन ठाम(कोन ठाँ) केउँठि जाइ छी जाउछि देखै छी देखिछि आउर के आउ किए आबैले छथिन्ह आसिछन्ति मरि गेल मरिगला जाइ छै जाइछि जेबै जिबे जायब जिबि छलै (छलय) थिला जैठाम (जइठाम, जइठाँ) जेउँठि दरमाहा दरमा गेल गले बैसा कय बसेइदइ करायब करेइबा तोहर तांकर लागैछै लागुछि करबै करिबेनि से काज से काम करि लेता करिनेब किछु किछि दऽ देबै देइदेबि तऽ (तँ) त दिआयल जायत दिआजिब भौजी/ भाउज भाउज जलखै जळखिआ आउर (आओर) आउ चाह चा ओड़ियामे उच्चारण सेहो कनेक भिन्न छैक, जेना “अ” केर उच्चारण “ओ” सन होइत छैक। जेना “समर” केँ हम सभ समर पढ़ब मुदा ओड़ियामे एकरा पढ़ल जायत “सोमोरो”। “अ” लागि कय सभ व्यंजन हलन्त सँ पूर्ण होइत अछि से सभटा व्यंजनमे अ=ओ उच्चारण होयत। मैथिलीमे मनोज केँ बाजल जाइत अछि मनोजऽ, मुदा ओड़ियामे बाजल जायत मोनोजो। इ/ ई, उ/ ऊ- मैथिली आ ओड़ियामे एक्के रङ उच्चारण होइत अछि। ऐ जेना मैथिलीमे अ+इ आ औ जेना अ+ऊ बाजल जाइत अछि तहिना ओड़ियामे सेहो उच्चरित होइत अछि। ऋ मैथिलीमे “री” बाजल जाइत अछि मुदा ओड़ियामे “रु” उच्चरित होइत अछि। कृप मैथिलीमे “क्रीप” पढ़ल जाइत अछि आ ओड़ियामे “क्रुपो” उच्चरित होइत अछि। व ब सन उच्चरित होइत अछि दुनू भाषामे से मैथिलीमे ओ उच्चरित होयत “ब” आ ओड़ियामे “बो”। मुदा विदेशज शब्दक उच्चारण ओड़ियामे सेहो हलन्त सन होइत अछि आ “ओ” सन “अ” केर उच्चारण नहि होइत अछि। मैथिली सन “य” केँ “ज” किछु ठाम पढ़ल जाइत अछि, से “यम” मैथिलीमे “जम” आ ओड़ियामे “जोमो” पढ़ल जाइत अछि। शब्दक प्रारम्भमे जँ “ड” वा “ढ” अबैत अछि तँ नीचाँक बिन्दु दुनु भाषामे विलुप्त रहैत अछि। मैथिली आ ओड़िया दुनूमे कचटतप केर पाँचम अनुनासिक्य अक्षर (क्रमसँ ङ, ञ, ण, न, म) मे सँ मात्र न आ म सँ शब्दक प्रारम्भ सम्भव अछि। “क्ष” मैथिलीमे “क्छ” उच्चरित होइत अछि आ ओड़ियामे “ख” वा “ख्य”। मराठी सन ओड़ियामे संस्कृतक “ळ” अखनो अछि जे मैथिलीमे आब नहि अछि। “ज्ञ” मैथिली आ ओड़िया दुनूमे “ग्य” उच्चरित होइत अछि। “त्स” मैथिलीमे “तस” मुदा ओड़ियामे (स् +च) उच्चरित होइत अछि। इरा मल्लिक, रिलायंस ग्रीन्स टाउनशिप जामनगर गुजरात। बीहनि कथा- असमंजस बाप रे!!!!!! एतेक भोकासी पारिके कथि ल ए कनैत छै ई छौंरी! अजगुत केने छै। नहिं जानि सासुर बसबो करतै कि नहिं।बेचारे बर के गृहस्थी ओ बसय देत कि नहिं। सोनकाकी चिन्ता में पड़ल छली।बड़बड़ाइत छली।हुनकर बेटी शोभा के काल्हि दूरागमन के दिन छैन।सासुर संओ दू टा दियौर आ पाहुन संगे एकटा खबास सेहो आएल अछि। शोभा! पढ़ल लिखल सुशिक्षित एकटा आधुनिक सुख सुविधा आ माहौल में बढ़ल लड़की अछि।ब्याह भेल छैन सुनील संग।सुनील नीक पोस्ट पर कम्प्युटर इंजीनियर छैथ। एखन एक सप्ताह पहिने अमेरिका के कोनो बहुत नीक कंपनी से पोस्ट ओफर भेल छैन।ओ संगे शोभा के ल क जेता।बियाह के पहिने तय भैल छलैन जे शोभा अपन मास्टर्स के पढ़ाई जारी रखती।शोभा अहि निर्णय संओ अति प्रसन्न छलीह।मुदा ई बिच्चे में बिचमाईन भ गेल छल।सुनील कहलखिन्ह जे एखन कनी दिन पढ़ाई स्थगित क दिय फेर समय अनुकूल होयते परीक्षा द देब।शोभा ई सुनि के ते एकदम्मे संओ हकबका गेल छलैथ।एकाएक हुनकर अस्तित्व जेना सिमटि गेल छलैन ।एक ते माए बाप संओ दूर सेहो एतेक दूर कि जे देशक सीमा पार! दोसर पढ़नाइ स्थगित करब ! सबटा परिस्थिति एक्के बेर बजरि गेल शोभा के आगू।बेचारी छुटि -छुटि के अपन विवशता पर कानय मुदा की करौ नै करौ से उपाय नहिं सूझाइन।बहुत असमंजस में छलीह शोभा।हुनका किनको संओ कोनो शिकायत नहिं छलैन। मुदा मोनक कोनो कोन कचोटि रहल छलन्हि अपन अस्तित्व पर। नारीपन के अपेक्षा क बोझ सौं अंततः ओ दबि गेलि ।शायद भारतीय नारी सौं इएह अपेक्षित अछि। ? बीहनि कथा- पाहुन एलखिन गै सोन बहिन! सोन बहिन! कतय छी तूँ! देखी! पाहुन आबि गेलखुन।चिकरते नैना बाहर भेली आ पाहुन के अटैची हाथ में लैत पाहुन के घर अनलखिन।अटैची राखि तखन अपन पाहुन के पएर छूबि प्रणाम केलक।आब ताधरि घर के सब लोग जुटि गेल छलखिन।सब नैना के देखि हंसय लागल जे देखू बहिनदाइ के बतहपन।गै पाहुन के पहिने प्रणाम करिथि कि ने।अटैची कतहु भागल जायत छलै?सब कियो पाहुन संओ हाल चाल पूछय लगलैथ। पाहुनो अपन यात्रा वृतांत सुनबय लगला जे कोना कतेक मोश्किल संओ दू दिन के छुट्टी मिलल।एतबे मेघर संओ ट्रे में पानि आ पांच छ कप चाय बनाक नैना एली।पाहुन आ घर के सबलोग के चाय पानी देलैथ आ चट्ट द अपन सोन बहिन लग दौड़ल गेली।गै सोनबहिन! तोरा बुझायत नहिं छौ जे पाहुन एलखिन अछि।देखय के मोन नहिं करय छौ तोरा। हमरा ते खुशी संओ मोन गदगद भेल अछि आ एकटा तूं छे कि नाम सुनिते पाहुन के घर में नुकायल बैसल छी। सोनबहिन बाजलि; गै नैना! खुशी ते हमरो बहुत भेल ऐ।मुदा सामने कोना जाउ से लाज होइये। पएर उठिते नहिं अछि।बहुत हड़बड़ाहट भ रहल अछि भीतर।की करू! धूर जो! एहनो कहीं कनियां भेलैये।पढ़ल लिखल छें।कनी दिन में आब कालेज में लेक्चर देबें।तहियो ओहिना के ओहिना ! एकदम बुद्धू छैं तों। एतबा बाजिते बाजिते नैना फेर एक ले दू ले फुर्र भ गेली अपन पाहुन सब लग जाक फेर संओ ठाढ़। अरुण लाल दास कर्म प्रधान विश्व करि राखा- राजस्थानी लोक लघु कथा अफवाह धिआन भंग करैत अछि ।आओर लोक एकर चंगुल मे फंसि नीक स बेजाय पर उतरि जाइत छथि । स्थिर भ सोचि तखन जे निष्कर्ष बहराइत अछि ओ ठोस एवं कारगर होइछ ।सबकेँ अपन कर्म एवं दुनू हाथ पर भरोसा हेबाक चाही । एहि संदर्भ मे एक राजस्थानी कथा याद अबैए । मिथिला मे जेना ज्यौतिषी सब बले पाबनि तिहार दू दिना भ' जाइयै आ हम सब एकहि गाम मे एकादशी वा रबि शनि किंवा छठि पाबनि तक दू दिना मनबय लगैत छी तहिना राजस्थान मे सेहो ज्यौतिषी सभक बहुत चलाचलती अछि ।एहि संदर्भ मे एक पिहानी एना अछि जे :- एक गाम मे एकटा ज्यौतिषी भविष्यवाणी केलनि जे आबय बला बारह साल तक गाम मे पानि नहि बरिसत । देखा देखी आओरो ज्यौतिषी सब हुआँ हुआँ करैत पाछू लागि गेलाह।बाबा जैह कहलखिन से सबा सोलह आना सच सब मानि लेलनि ।किछु नीको ज्यौतिषी सब पोथि पतरा देखब उचित नहि बुझलनि ।ओहो सब गलत दिशा मे चलायमान भ गेलाह । चारुभर हाहाकार मचि गेल छल । सब किसान ,वास्तुकार बनियाँ बेकाल सब बेकाबू होइत गाम छोड़बाक निर्णय करैत भागब शुरु केलनि ।देखा देखी गामक गाम खाली होमय लागल ।कोहराम मचि गेल ।पाइन नहि बरिसत तं अन्न केना उपजत ।आ अन्न बिना लोक भूखे मरि जैत ।बिकट परिस्थिति सामने आबि गेल ।सब पराय लागल । एक गरीब किसान मेहनती छल ।किछु समय के लेल ओकरा घर मे अनाज पाइन सेहो छलै ।अपन मेहनति बले खराप दिनक हेतु समान सब बँचा क रखैत छल ।सात दिन तक ओ ठंढा दिमाग स सोचैत रहल , सोचैत रहल ।कखनो कोदारि खुरपी के सरिया क रखैत छल ,कखनो हर फार के दलानक ओरियानी मे सैंत अबैत छल ,तं कखनो बड़द के चुचकारैत ,कानैत ओकरा संगे नोर बहाबय लगैत छल ।कखनो अपन कुक्कुर स लिपटि जाइत असहज भ जाइत छल ।कौखन अपन घर के देखि देखि ओकर आँखि स अश्रुधार बहय लगैत छलैक । ओकर पत्नी ई सब देखि देखि दुखी भ घरक सब मांटिक बर्तन सब जमा करैत पुनः माटि मे विसर्जन हेतु सोचय लगली । एकदिन राति मे पत्नी कहलखिन जे नाहक मे फिरेशान नहि होउ ।जखन ज्यौतिषी जी गाम छोड़ि जाय लगता तखन हमहूँ सब हुनकें पाछू लागि जायब । जाहि विधि रखिहें राम ताहि विधि रहब । बेरि फरहक फूरब एकरे कहैत छैक ।आब किसान के किछु किछु बात समझि मे आबय लगलैक । ओ अपन हर फार सरियौलक ,बड़द जोति कय खेत चल गेल आ हर जोतय लागल ।रौद बहुत तिख आ बसात बंद रहैक ।पाइन कें तं दूर दूर धरि पता नै रहैक ।घामे पसेने किसान के चाँव आबक नौबत भ गेलैक ।ओ थकथका क बैसय लागल छल ।ओकर शरीर आब जबाब देबय लागल छलैक । ताबत मे ओकरा ऊपर सँ मेघराज चलल जा रहल छलथि।ओ पानिक प्रबंध मे जी जान स जुटल रहथि । घाम मे नहायल अशोथकित भेल किसान मेघ स बिलमि जेबाक हेतु मने मन याचना केलक जे किछु समय के लेल ओ छाया प्रदान करथि ।रौद बहुत तिख छलै आ बेचारा किसान पाइन बेतरे लहालोट भ गेल रहय । मेघराज के दया लागि गेलनि ।ओ किछु कालक हेतु रुकि किसान स प्रश्न केलनि ," तों केहन मुरुख छह ,सुनलह नहि जे आब बारह बर्ख तक पृथ्वी पर पानि नहि हेतह आ तों सपरिवार मारल जयबह ।सब किओ एकमुहरी भागि रहल छै आ तों एहि रौद मे फिरेशान होइत डटल छह । किसान बाजल मुदा ओ ज्यौतिषी ? मेघराज के आश्चर्य भेलनि जे किसान तं ठीके कहि रहल ।ओ फेनो किसान के हिदायत दैत कहलनि जे ओ अपन आ परिवारक चिंता करय ।दोसराक बात पर धिआन नै धरय ।किसानक फिरेशानी स द्रवित होइत मेघराज ठहरि गेल छला ओहो बिदा हेबाक मंशा जतौलनि आ फेनो एहि प्रश्नक उत्तर दैक हेतु किसान स कहलनि जे ओ कियैक अपन एवं अपन परिवारक जान जोखिम मे द रहल छल? बेचारा किसान अपन खेत जोतय मे मगन होइत बाजल ," की कहैत छी भाइ मेघराज ! बारहो बरिस पर जँ घूरि आयब तं इएह खेत जोतब ।जँ एखन एकरा हम छोड़ि दैत छी तं हम खेत जोतब बिसरि जायब एवं बड़द सब जंगल परा जैत ।सब अपन अपन काज बिसरि जैत ।हमर पत्नी माटिक घैल बासन बनौनाइ वा रखनाइ बिसरि जेती ।हम सब पाइन कोना पीयब ।घर सब ढहि ढनमना क जंगल भ जैत ।अस्तु हम अपन कामकाज करब नहि छोड़ब ,जे ईश्वर करता से सहर्ष स्वीकार अछि हमरा सबकें ।हमरा अपन मेहनति पर पूरा भरोस अछि आओर हमर पत्नी कें हमरा पर । मेघराज सब बात बहुत धिआन स सुनि रहल छलथि ।ओहो सोचय पर विवश भ गेला ।हुनको भेलन्हि जे कहीं बारह बर्ख मे ओहो ने पृथ्वी पर जल बरिसायब बिसरि जाइथ ।ओ तत्काल अपने आप के नियंत्रित करैत जल बरिसायब प्रारंभ केलनि आओर किसान के आभार प्रगट केलनि जे अफवाह पर धिआन नहि देलक आओर अपन काम पर डटल रहल । अपन कर्म पर एवं अपन दुनू हाथ पर जे भरोसा करैत अछि दरअसल संसार मे वैह सफल होइत अछि ।अस्तु सबकेँ अपन कर्म करबाक चाही। गीताक निचोर यैह अछि । झमाझम बरखा स खेत सब पनिया गेल रहय ।गाम मे खुशी पसरि गेल छल । लोक सब गाम आपस होमय लागल रहय ।ज्यौतिषी सभक मुँह अपना सन भ गेल छल । बीहनि कथा- लहास बारहो मास मधबनी बाली सब दिन भोरे अपन मरद के गरियबिते हाक दैत उठबै छलै । रोगढुकोना अखन तोरी सुतले हय।ई कोनो काम के नइ हय ।बज्जर खसौ ,कहाँ स हमरा माथे सटि गेल।डेरे डेरे खेनाइ बनबैत केहुना क प्रतिपाल करै छी। ढेनमा ढेनमी के खाली जनमाब' अबैत हय । दुमहला पर स अकानैत सब दिन हमर कान पाकि जाइत रहय।कैल की जाय ।कते बेर समझा क थाकि गेलिऐ ।भल लोकक बस्ती मे ई गारि गरौबलि नै करय ।मुदा फजूल ।ओकरा ताहि स कोनो फर्क नहि परैक । आइ किछु ताले मात्रा नै बुझा रहल छल ।पहर रातिए स सब मायधी हाकरोस करैत कानि रहल छलै ।कोरौना बेमारी स परिछना के सांस थमि गेल रहय । मधुबनी बाली निरुत्तर भेलि लहास के बेर बेर निहारि रहल छलै। बीहनि कथा- गाछ बिरिछ सँ प्रेम आइ भोरे भोर ने ओ किछु बाजि रहल छथि ,ने हमहीं किछु पूछि रहलियनि ।आखिर ई चुप्पी भीतरे भीतर करैला सन अक्कत तीत भेल अछि । ई मनहूस घरी मे आखिर हमहीं टोकलयनि ,"ई खुड़पी के काज भोरे भोर परि गेलए । ओ गोंहछैत बजली ," अनेरे के सब काज मे बक ठैंठैं नहि करु।आइ छुट्टी छै ,तं कथी केर धरफरी ।भोजन कनी देर स बनतै ।हम अपनो मन के काज किछु करब तं अहाँ के ओइ मे कोन उजूर अछि ।अहाँ के लिखाइ पढाई मे हम कोनो बाधा नहि पहुँचबैत छी। अहाँकें अपन कविता, पिहानी लिखब जरुरी बुझाइत यै ,तहिना हमरो अपन बागवानी तं करय दिअह । अहाँ जनै छिऐ बागवानी स हमरा कते लगाव अछि । ओ खुरपी स इलाहाबादी लतामक गाछ कोरियबैत बाजय लगली ,ई लतामक गाछ आब फरय बला भेलै ।एकरा पोसैत पोसैत एतेक टा केलहुँ । धूरा मांटि नितः पानि सं धो आँचर सँ पोछैत छी।कतेको बेर खाद पानि सेहो देलिऐ । आब फड़य बला भेल । अहाँ की जाने गेलियै ,गाछ -बिरिछ हमरा कत्ते पसीन अछि । एकर हरिअरी देखि हमर मन खनहन,शीतल आ शांत रहैत अछि । आइ दू बरख सँ अपन धीयापुता जकाँ सेबलहुँ अछि । गाछो बिरिछ पौश मानैत छै, पौश ! कनी एकदिन पाइनो जे पटा दितिऐक । फरतै फुलेतै तं बड नीक लागत ।कैल धैल पर जय जगरनाथ ।" हुँह..... हम मने मन सोचय लगलौं वंशो बढयबा मे तं अहिना सिनेह आओर मेहनति के खाद पाइन देमय पड़ैत छैक । हम हुनकर हाथ स' खुड़पी लैत प्रेम सँ गाछ के जैड़ि कोरियबैत पानि पटाबय लगलौं । बीहनि कथा- दर्शन रे मनटुनमा ! कत' गेल छलैं भोरे भोर ।आइ एको बेर तोहर दर्शन नै भेल । उँह ! अहूँ हद केली मालिक ।दर्शन नै कहू ,हमरा कोनादुन लगैत हय ।कहू ने जे भेट नै भेल ।दर्शन न , अपने आप मे बड गहींर शब्द हय । ...अएँ ...। तोरा एतेक बूझय आबि गेलौ । ... त नै ।आब कहिया बुझबै यौ सर । ...अच्छा ,बता ने दर्शन माने । ...आइ सोमबारी छलै ने। हम भोलाबाबा के जल चढाबे कपलेश्वर गेल रहली य ,बुझली ।खूम प्रेम स' जल चढेली। मंदिर तखनी खाली मिलल । बाबा हमरा मने मन दर्शन देलथिन्ह ।हमरा तं हुनकर प्रेम ,भक्ति आ आस्था मे बिसबास हबे ।आओर इहय तीनों जब एकसाथ मिलैत हय त' बाबा के असली रुप के दर्शन मने मन हो जाइत हय । हम त' आइ नेहाल भ' गेली मालिक । अँय से ...।अगिला सोमबारी मे हमरो संगे ल' चलिहैं तरगरे । आभा झा, प्रवक्ता संस्कृत, गार्गी सर्वोदय कन्या विद्यालय ग्रीनपार्क नई दिल्ली पिघलैत हिमखण्ड हिमानी दुरागमन भ' क' अयलीह शिशिरक संग। स्वाभाविक छलै जे गीतनाद होइतै,अरिछन- परिछन होइतै, मुदा से सभ कत'?दुआरि पर ठाढ़ छलै सात बरखक बेटा आ खबासिनी!उत्सुक दू जोड़ी आंखि दिस देखबा सॅं बचैत हिमानी शिशिरक पाछू शयनकक्ष धरि एलीह। शिशिरक किछु कहबा सॅं पहिनहिं बजलीह- "हम बहुत थाकल छी,सूतब।जयबा काल केबाड़ ओठगंबैत जायब।" "किछु खा लितहुॅं।खेनाइ बनौने होयत सुशीला!भिनसरे बिदा भेलहुॅं,बाटो मे किछु नञि खेलहुॅं अहाॅं!" "नञि,भूख नञि अछि।" हिमानीक सपाट स्वरक आगाॅं किछु कहबाक साहस नञि भेलनि शिशिर केॅं। चुपचाप बहरेलाह,बेटा केॅं दुलार- मलार केलखिन्ह,ओकर उत्सुक प्रश्न सभहक उत्तर दैत रहलखिन्ह आ भोजन कय बेटे संग सूति रहलाह! एम्हर हिमानी-पाथर जकाॅं छत दिस तकैत अपन जीवनक एहि नाटकीय मोड़ पर क्षुब्ध छलीह! नञि चाहितो पाॅंच बर्ख पूर्वक ओ दिन मोन पड़ि गेलनि जाहि मे सजलि- धजलि कतेक उमंगक संग विनोदक प्रतीक्षा क' रहल छलीह! मुदा विनोद-ओ त' कोनो न कोनो बहन्ने हिमानी सॅं दूर रहथि!पूछथि ककरा हिमानी?न समवयस ननदि,न दियादिनी!बूढ़ सासु सॅं की पूछथि,कोना पूछथि? एवंक्रमेण दू मास बीतल,जाहि मे आफिसियल टूर पर दू बेर भ' अयलाह विनोद!आब धीरज टुटि गेलनि हिमानीक,एक दिन ठाढ़ भ' गेलीह सोझां,जखन विनोद आफिस स' आबि चाह- जलखै क' फेर खेलबा लेल बहार भ' रहल छलाह ,ओ स्पष्टत: कारण पुछलखिन। पहिने बहाना,फेर धमकी,मुदा अंततः जे सत्य बहरायल ओ बहुत भयाओन छल! हिमानी आ विनोदक चिकरा- चिकरी सुनि सासुओ सभ गप बुझि गेलखिन आ पश्चात्तापक संग अपन अनभिज्ञता बुझबैत,नैहर पठा देलखिन। साल भरि विवाह- विच्छेदक प्रक्रिया चलल।किछु कादो हिनका पर, किछु विनोद पर पड़ल, मुदा ई मुक्त भेलीह।तकर बाद कोनो तरहें अपना केॅं सम्हारि पढ़ाई पूरा केलनि आ एकटा प्राइवेट स्कूल मे नोकरी कर' लगलीह।जीवन किछु किछु सामान्य होमय लागल छलनि, तखने बड़की काकीक भतीजाक प्रस्ताव पर हिनकर जीवन मे भूकंप आबि गेलनि।हिनक सभ प्रतिरोध मायक नोरक बहाव मे बहि गेल आ ई यन्त्रवत् सभटा सम्पादित करैत,सुखल आंखिए आबि गेलीह समस्तीपुर सॅं पुणे। मुदा उल्लसित मोने नञि,एकटा मातृहीन बच्चाक माय बनि। अगिला दिन सॅं फेर मशीनी जिंदगी शुरू भेल।शिशिर अपनहिं सॅं प्रभात केॅं तैयार क' स्कूल पठौलनि,अपनहुॅं जलखै क' आफिस बहरेलाह। हिमानी कनेक फ्री भ' सुशीलाक सहायता सॅं घरक काजदान बुझलनि आ हफ्ता भरि मे घरक व्यवस्था संभारि लेलनि।मुदा मोन!ओ त' शुष्क पाषाण बनल छल! धीरे- धीरे प्रभातक सभ दायित्व हिमानी संभारि लेलनि, ओहो धीरे-धीरे दोस्ती कर' लागल किन्तु अन्तरंगता कत'? हिमानी केॅं किछु अनुभवे कहाॅं होइन? ओ त' ड्यूटी क' रहल छलीह! शिशिर सभ टा देखैत छलाह, किन्तु ओ मौका देब' चाहै छलखिन! जीवन जॅं खायब, पीयब,सुतब,उठब,काज करब, नोकरी बजायब होइ छै त' नीक जकाॅं चलि रहल छलनि दूनूक! एकदिन प्रभात सीढ़ी पर सॅं खसि अचेत भ' गेल आ हिमानीक हाथ पैर सुन्न भ' गेलनि।कत' ल' जेथिन,हुनका त' किछु बुझले नञि छलनि पुणे के बारे मे।कहुना खबासिनीक सहायता सॅं लगीचक अस्पताल मे ल' गेलखिन। सीटी स्कैन आदि मे जखन किछु विशेष चोट नञि बुझेलै,त' कने होश मे अयलीह आ सुशीला केॅं कहलखिन सर केॅं खबरि देबा लेल। जखने प्रभात आंखि फोललक,तखने ओकरा मुंह सॅं मम्मी बहरेलै आ हिमानी ओकरा कसि क' छाती सॅं लगा कान' लगलीह।हुनक आंखि सॅं बहैत अजस्र अश्रुधार जेना युगयुगक संचित पीड़ा बहा रहल हो।ओम्हर खबासिनीक फोन सुनि हड़बड़ायल एलाह शिशिर माय बेटाक ई अन्तरंग मिलन देखि थकमकायल रहि गेलाह,हुनका बुझा गेलनि हिमखण्ड पिघलि रहल छैक….. कनियें "बौआ हौ!काल्हि भिनसरे उठिए जैअह!" "से की छै काल्हि?" "तिलासंकराति।" "ओह! हम नञि मानै छी ई सब।अनेरे निन्न नञि तोड़िहें।" "बौआ,उठह न,कनियें ओंठगन क' लैह, काल्हि जितिया छै।" "मां,ई सभ अनेरुआ टिटिंभा तोहीं कर।" "बौआ,एना अगरजित नञि बन'।संझुका अर्घक बेर नेपत्ता छलह,भोरका मे त' उठि जा, दीनानाथ सद्बुद्धि देथुन!" "माॅं,तोरा बूझल छौ न जे हम साइंसक विद्यार्थी जी,एहि सभ पर हमरा आस्था नञि!" "आइं हौ!पीबि क' आयल छह!" "माॅं,क्रिसमसक पार्टी छलै,ओइ मे दोस्त सभ जिद केलकै,त' कनियें….. बीहनि कथा- साम्राज्य "एक कप चाह क्यो देत,से नञि।सभ खाइ-पिबै अछि,मौज उड़बै अछि आ एम्हर क्यो बिसरियो क' नञि तकै अछि!हे भगवान,भरि जीवन एतेक अरजि क' रखलहुं आ आइ ई मुंहतक्की!" "कनियें काल पहिंने त' चाह पीने छलथि।आब की चाहक टोंटी लगौने रहिऔन मुंह में?" "एना कियै चिकरै छी?एक कप चाह आरो द' देबै त' किछु बिगड़ि जायत?नोकर-चाकरक सामने तमाशा लगबै छी!" "अच्छा,तमाशा नञि नीक लगैय' अहां कें?परंच जखन अहांक बाप भरल दलान पर हमर भायक अपमान करैत छलखिन,तखन त' अहां कें कोनो समस्या नञि भेल!तखनो नञि भेल,जखन बुढ़ीक चेन हेरा गेल छलनि,त' नोकर सं पहिंने हमर समानक तलाशी भेल छल,कियैकि दरिद्र घरक बेटी हम कतौ नैहर नञि द' अबियै किछु!" "अहां गड़ल मुर्दा उखाड़िते रहब?बिसरब नञि?" "अहांक सम्बल भेटल रहितय,त' बिसरियो गेल रहितौं,मुदा?"एक टा पैघ सांस खींचि पुनः कर्कश स्वर मे- "आब ई साम्राज्य हमर अछि,न अहांक,न एहि बुढ़ीक।चैन भ' जीबू,बेशी टोका- टोकी जुनि करू,से कहि देलहुं।" बीहनि कथा- भरोस नीहारिका आ नीरजक विवाह दू मासक बाद होमय बला छनि।नीरज छुट्टी पर आयल छलाह आ नीहारिकाक मां -बाबू सं अनुमति लय बाहर आयल छथि-"चलू, सिनेमा चलै छी।" "नञि,घ'र पर दू घंटा लेल कहि क' एलियै आ"… "फोन क' देबैन, कोनो दोसरा संग आयल छी"-दर्प भरल स्वर। "नञि,दू घंटा त' दू घंटा।" "अहांक मोन मे कोनो उत्तेजना, कोनो पुलक नञि बुझा रहल अछि।लगैय' जेना विवश भय आयल होइ!" "हमरा एना घुमबा-फिरबाक हिस्सक नञि अछि, तैं ओतेक सहज नञि छी हम।दोसर,दू मासक बाद विवाह हयब निश्चित अछि त' एतेक अधैर्य कथीक?" "अधैर्यक कोन गप? कोनो अशिष्टता केलहुं हम?"-रोषपूर्ण स्वर। नञि,न केलहुं,न क' सकै छी।हम कराटे मे ब्लैक बेल्ट छी।" "ओहहो,अहां भावी पति सं गप क' रहल छी,किं वा कोनो लफंगा सं?" "जहिया पति होयब,हमर भाषा दोसर पायब।" "कोना विश्वास करी?" "करहिं पड़त,जं अपन माता-पिताक चयन पर भरोस अछि,त' निराशा नञि हाथ लागत।" बीहनि कथा- नाटक "सुनू,आइ धरि नञि जतौलहुं अपन अधिकार, नञि टोका-टोकी कैलहुं अहांक व्यवहारक,कियैकि अपन सभहक विवाह नञि, समझौता छल।अपना भरि हमर प्रयास रहल सुकान्त संग कोनो अन्याय नञि होमय,हमरा आ सुनिधि संग संबंधक असहजताक बोध नञि होमय ओकरा। प्रकटत: बुझाइतो अछि ओ हमरा सुनिधि सं कम नञि मानै अछि। मुदा अहां कहियो अपन हृदय पैघ क' सुनिधिक माथ पर पिता जकां हाथ नञि ध' सकलहुं।ओ अहांक आ सुकान्तक दिस सतृष्ण तकैत रहल , मुदा अहां नजरि फेरैत रहलहुं। मुदा आब ओकर विवाहक गप छै, अलग-थलग बैसला सं काज नञि चलत।गप -शप मे सक्रिय भाग लेब' पड़त,से कहि देलहुं।" "एकरा धमकी बूझी?" "पत्नीक अधिकारक बदौलति गप मनबा सकी,ई त' सत्य नहिंए ,तखन जे बूझी।ई नाटक कर' पड़त अहां कें।" "ओना हमर व्यवहार एहन नञि रहल जे अहां विश्वास क' सकी, मुदा पहिल बेर ई मानि लिय' जे हम नाटक नञि करब,सत्ते सुनिधिक बाप बनि निर्णय करब…" बीहनि कथा- भय "कत' जाइ छी नीरू?" "बाहर"" "बाहर माने? "मां,सभटा काज क' देलहुं अछि,दवाइ सिरमा लग राखि देने छी।काज बाली आबि गेल अछि,भरि दिन संग रहबे करत,त' एतेक पूछ गछ कियै?" "हम मां छी,हमरा सत्त गप कहै मे कोनो दिक्कत?" "कहने छलहुं मां सभ सं पहिंने अहीं कें। मुदा अहांकें हमर खुशी सं बेशी अपन इज्जति पसिन छल।आ कि ई भय रहल होयत जे कमाउ बेटी हाथ सं नञि बहरा जाय। तैं आत्मघातक धमकी दय हमरा बन्दी बना रखलहुं।आब त' कोनो भय नञि अछि न?पचास बरखक वयस मे केओ अहांक बेटीक बाट नञि तकैत होयत,से बूझल अछि न?जं,सेहो होयत,त' अहांक बेटा जकां हम नञि छोड़ब अहां कें,एतबा विश्वास राखू।अहां प्राण छूटै धरि देखैत रहू अपन बेटीक बेरंग जीवन, कौमार्य आ वैधव्य दूनू।" बीहनि कथा- विमोचन अजय बाबू जन- कल्याण- पार्टीक सचिव छथि। लगातार दस बरख धरि मेहनति करैत -करैत एकटा सामान्य कार्यकर्ता सं एत' धरि पहुंचलाह। पदक सहचरी होइत छैक प्रतिष्ठा!सभ छोट-पैघ कार्यक्रम मे निमंत्रण स्वाभाविक।कतेको साहित्यकार सम्मेलन मे हुनकहिं हाथे फीता काटल जाइ आ पुस्तकक विमोचन होइ। जाहि तरहें साग -भांटा जकां किताब छपै,ताहि सं हिनका बुझेलनि जे ई कोनो कठिन काज नञि छै! हमहूं कियै नञि एकटा किताब छपबा ली? एक दिन अपन घर पर बजौलखिन हाइस्कूलक अपन हिन्दी- अध्यापक कें। किछु गुपचुप मंत्रणा केलनि आ आदरसहित हुनका अपन गाड़ी सं घर पहुंचबा देलखिन! आइ अजयबाबूक पुस्तकक विमोचन छनि, बहुत गण्य- मान्य लोक सभ उपस्थित छथि,पार्टीक पैघ नेता सभ सेहो। किन्तु अजयबाबूक विनम्रता त' देखू- एतेक पैघ लोकसभक अछैत विमोचन लेल बजौलनि अपन गुरु कें।हुनक चरण-स्पर्श करैत बजलाह - "हमरा हिनकहिं सं साहित्यिक प्रेरणा भेटल,हिनकहिं आशीषक बदौलति अहां सभ हमरा चिन्है छी,मान -दान करैत छी! तैं ई पुस्तक "साहित्य में शुचिता" हम हिनके समर्पित कयने छियनि। जय -जय भेल। स्वार्थक रंग एकटा सफल -व्यक्ति मे जे सब गुण हयबाक चाही, से सब छलनि आनंद बाबू मे। उच्च शिक्षा, खूब नीक नौकरी, इज्जति सं जीबा जोग पाइ- आर की चाही? मुदा भाग्य किछु एहन रंग देखौलकनि, जे जीवनक एहि सान्ध्य- काल मे पूर्णत: एसकर छथि।पत्नी बीच मंझधार मे संग छोड़ि देलखिन आ पुत्रक विदेश- प्रवास हिनका पूर्णतः एकाकी क' देलकनि।संग- समाज कें कहियो मोजर देबे नञि केलखिन,त' वृद्धावस्था मे गाम जैबाक साहस सेहो नञि भेलनि।तखन बहुत सोचि -विचारि कय अपन एकाकी ,अभिशप्त जीवन बितब' लेल शरण लेने छथि नगरक एहि लब्धप्रतिष्ठ वृद्धाश्रम मे। ओना जं देखल जाय त' कोनो कष्ट नहिं छनि एतय- भोजनक समुचित -व्यवस्था, नियमित चिकित्सकीय- परीक्षणक सुविधा, गपशप करबा लेल सेवानिवृत्त मित्रगण।स्वयं कें एतुका वातावरण सं सामंजस्य बैसब' मे प्राय: सफल भ' गेल छलाह आनन्द बाबू,तखनहिं एहि वृद्धाश्रम मे एक टा वृद्धाक आगमन भेलै।ओकर आंखि सं निरंतर बहैत नोर वृद्धाश्रम में रहनिहारक अंत:स्थल के जेना चीरि देने हो। एक बेर साहस कय आनन्द बाबू गेलाह ओहि वृद्धा लग बोल -भरोस दै लेल- " की करबै मैडम ,धिया- पुताक व्यस्त रहने अपना सभ सन वृद्धक रहबा लेल ई कोनो अधलाह जगह नञि छैक‌।सब गोटा परस्पर गपशप कय समय काटि लेब एत'।" तखने खूब जोर सं चिकरि कय बाजि उठलीह ओ महिला- "नञि सर !हम संतानक व्यस्तताक कारण नञि, वंचनाक कारण एहि स्थिति मे छी। हमरा तकर घाव चैन नञि लेब' दैत अछि। बेटा पढ़' लेल विदेश गेल, ओत्तहि नोकरी आ विवाह कय बसि गेल। साल -दू साल मे एक बेर चेहरा देखा जाइत अछि, हं, प्रतिमास मनीऑर्डर कय अपन दायित्व सं मुक्ति पाबि लैत अछि। पतिक मृत्युक बाद एक बेर कहलियै भारत आबि बसै लेल त' कहलक- जाहि सुख -सुविधाक अभ्यस्त हम आ हमर धिया -पुता भ' गेल अछि,ओ सभ छाड़ि एत' बसब संभव नञि, हम बीच-बीच मे अबैत- जाइत रहबौ।एत' सुनीता आ ओझा त' छथुन्हे देख' सुन' लेल,तोरा कोनो दिक्कत नञि हेतौ।ई कहि हमर सभ दायित्वक भार सुनीता पर राखि ओ निश्चिंत भ' गेल। आ सुनीता -हमर बेटी- जकरा पर हम पूर्णत: निर्भर छलियै,ओ ओझा संग मिलि नञि जानि कोन- कोन कागज पर दस्तखत लय पहिने बैंक मे जमा सभ पूंजी अपना अकाउंट मे ट्रांसफर करौलक,फेर गामक जमीन -जथा बेचलक , अन्त मे हमर अंतिम अवलंब दिल्लीक मकान बेचि हमरा एत' पटकि देलक।पतिक मृत्युक सालभरिक भीतर हमर ई दशा भ' गेल!शुरू मे त' हमरा विश्वासे नञि भेल जे अपन कोखिक सन्तान लेल हम भार भ' जेबै!जखन हम उलहन देलियै त' कहलक- "मां,ई जिम्मेदारी भैयाक छनि, हम कतेक दिन तोहर भार उठेबौ, तोहर ओझा तमसाइ छथुन।" ओ बिसरि गेल जे जेना निशांत कें बोर्डिंग मे राखि पढ़ौलियै,तहिना ओकरो। निशांत त' विदेश गेलाक बाद कोनो मदति नञि लेलक मुदा एकर धियापुता सभक पालन- पोषण सं ल' क' परिवारक सभ खर्च- बर्च एखन धरि हमहीं करैत एलियै!हम कतेक दिन जिबितहुं, मुइलाक बाद सभटा ओकरे होइतै, मुदा ओतबो धीरज नञि रहलै! बेटा के फोन केलियै त' कहलक-"चिंता नै कर, तोरा सब सुविधा भेंटि जेतौ,हम वृद्धाश्रमक नामें पाइ पठा देल करबौ।" आब अहीं कहू-की हमर आंखिक प्रतीक्षा समाप्त भ' जायत ओकर पठाओल मनीआर्डर सं? की अहां सभक संग रहला सं पुत्रीक ओ स्वार्थपूर्ण व्यवहार बिसरि जायत? लोक फुसिये कहै छै जे बेटी मायक हिरदयक छाया होइ छैक,नञि यौ, सब एक्के रंग ,स्वार्थक रंग सं रंगल। बौक किछु नञि बजै छथि जया, वाक् हरण भ' गेलनि।ई वैह जया छथि,जनिक उपस्थिति मात्र सॅं वातावरण उल्लसित भ' जाइत छल,सौंसे चहल-पहल भ' जाइत छल। केहनो गंभीर माहौल केॅं ओ अपन विनोदी स्वभाव सॅं हल्लुक बना दैत छलीह। मात्र घरहिं मे नञि,कालेजो मे अपन मेधा आ वाक्चातुर्य  सॅं सभहक प्रिय छलीह।निर्द्वन्द्व बाल्यकाल, निर्बन्ध युवावस्था, आॉंखि मे भविष्यक स्वर्णिम स्वप्न,ओहि स्वप्नकेॅं पूर्ण करबा लेल अनुरूप प्रयत्न! माता-पिताक स्नेह आ विश्वासक छत्रछाया मे जया बढ़ैत गेलीह,अपन व्यक्तित्व गढ़ैत रहलीह आ एही तरहें एकटा मल्टीनेशनल कंपनी में एक्जीक्यूटिव मैनेजरक पद पाबि कने थमलीह। साल दू साल बितला पर माता पिता दिस सॅं विवाहक लेल दबाव पड़' ' लगलनि-"क्यो पसिन्न अछि त' बाजू, नञि त' हम वर ताकै छी"। कने विचारलनि त' अपन मित्रमंडली मे क्यो एहन नञि बुझेलनि जे विवाह लेल गंभीर हो,अपन दिमाग पर विशेष जोर नञि द' ओ माता-पिताक पाला मे गेन फेकि देलखिन।एहि तरहेॅं कैप्टन अशोक हुनका जिनगी मे एलखिन। जीवन जेना आर रमणगर भ' गेलनि।क्षण-क्षण माधुर्यक वर्षा होमैत रहलै आ ज़रा ओहि मे भिजैत रहलीह।दू बरख मे अभिनव कोरा मे आबि गेलनि।आब त' दिन पांखि लगैत उड़' लगलनि।ओ त' रच्छ छलनि जे सासु आबि गेल छलखिन, तैं नोकरी करब पार लगै छलनि। मुदा विधाता केॅं हुनकर सुख नीक नञि लगलनि, जीवन भरि संग देबाक वचन द' हाथ पकड़' बला अशोक मात्र चारिए बरख मे संग छोड़ि देलखिन।अभिनवक मुंह देखि सहि लेलनि ई कठोर आघात जया। मुदा अशोकक जिनगी मे सासुर मे प्रिय रहलि जया अचानक अप्रिय भ' गेलीह!अनेक तरहक बंधन परिवार दिस सॅं थोपल जाइ लगलनि!हुनकर करेजक टुकड़ा अभिनव सेहो उपेक्षित होमय लगलनि! विधाताक कठोर डांग हिम्मत सॅं सहै बाली जया लोकक बदलैत नजरि देखि हतबुद्धि छलीह! कारण छल अशोकक ओ मकान आ सेना दिस सॅं भेटय बला फण्ड!किछु दिन जेना- तेना बर्दाश्त केलनि, मुदा विवश भय पुनः माता- पिताक देहरि पर आबि गेलीह! आर्थिक कष्ट त' नञि भेलनि कहियो,कारण अपन नीक नोकरी त' छलन्हिये,संगे माता -पिताक सभ संपतियोक ई एसकरि उत्तराधिकारिणी छलीह, मुदा संमंधक आधारहीनता हिनका हिला क' राखि देलकनि।बाजब- भूकब आब काजे धरि रहलनि, स्वभावक ओ जीवंतता तिरोहित भ' गेलनि।तैंयो जया जया छलीह,न अपन नोकरीक प्रतिबद्धता अनदेखार केलनि,न माता पिताक सेवा ,न अभिनवक पालन- पोषण मे कोनो तरहक त्रुटि! समय बितैत रहल,अभिनव आइ पूर्ण युवक छथि, शिक्षित, संस्कारी ! एकटा प्रतिष्ठित कंपनी मे कार्यरत छथि।विवाहक लेल ओ अपनहिं सहकर्मिणी पसिन्न केलनि। आब जया कने आश्वस्तिक सांस लेलनि,अपन कर्तव्यपूर्णताक अनुभूति भेलनि,भगवानक धन्यवाद केलनि,।सभ ठीक-ठाक जकाॅं बुझाइत छलनि कि अभिनव आ मधुक समंध खराप होइत होइत एत' धरि पहुंचि गेलनि कि एक दिन मधु दहेजक मांग आ प्रताड़नाक आरोप मे पति आ सासुक विरुद्ध  अभियोग दर्ज करा एलीह।एकर बादक न्यायालयीय कार्रवाई आ सामाजिक प्रताड़ना एतेक पैघ मानसिक आघात देलकनि जया केॅं कि ओ परास्त भ' गेलीह,सभटा जिजीविषा सूखि गेलनि,आब बांचल छथि मात्र एकटा सुखायल गाछ,शब्दहीन,भावहीन प्रेतक छाया! श्याम सुन्दर शशि, दोहा, कतार, जमलिया। कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह कतारक सदरमुकाम दोहासँ लगभग एक सय किलोमीटर दूर जमालिया स्थित मरुभूमिक छातीपर बनाओल गेल भेड़ाक गोहियाक आगू ठाढ़ भऽ एक गोट युवक सिटी बजा रहल छल। महाभारतकालीन कृष्ण जकाँ। जनु अपन गोप आ गोपीकेँ लग बजेबाक उपक्रम कऽ रहल हो। मुदा एहि मरुभूमिमे ने गाई अएबाक कोनो सम्भावना छलै आ ने गोपी। मुदा बकरी आ भेड़ा धरि अवश्य आबि गेल ओकर सिसकारी सुनिकए। दिनभरि ५० डिग्रीक ताप छोड़ि स्वयं थकित सुरुज भगवान संध्या रानीसँ रसकेलि करबाक धुनमे पश्चिमाचलगामी वाट पकड़ि लेने छलाह। पश्चिमसँ आवएवला सेनुताएल प्रकाश मरुभूमिक वालुपर पड़ि मलिछाह आकृति बना रहल छल। मरुभूमि पिलिया ग्रस्त रोगी जकाँ बेजान देखना जाऽ रहल छल। पछिया हवा सांय सांय कऽ रहल छल। हावाक गतिसंग वालुक छोट-छोट कण उड़ि-उड़ि राहगीरकेँ घायल बना रहल छल। बूझि पड़ैत छल जे प्रलयकेर पूर्व संकेत हो। चारुकात वियावान मरुभूमि आ एहिमे उगल एक आध बबूरक पौध। हम बेर-बेर सोचैत रहैत छी जे धन्य बबूर, ऊँट आ सार्कदेशक दुखिया मजुरसभ जे एहि भूमिकेँ धरती होएबाक ओहदा प्रदान करैत छैक। अन्यथा...?? मुदा ओऽ युवक शान्त छल। एक क्षणक बाद सुरुज अस्त भऽ जएतै, सगर सन्सार अन्हार भऽ जएतै आ सयौ विगहामे पसरल मरुभूमिपर कारी रंगक चादर ओछा जाएत। ओऽ अन्हार होएबासँ पहिनहि अपना अधकि भेड़ा आ बकरी गोहियामे घुसियावए चाहैत छल। कर्तव्य परायण मनुपुत्रक रूपमे अपन दायित्व निर्वाह करए चाहैत छल। एहि तरहेँ अपन ईसारापर कृष्ण जकाँ भेड़ा-बकड़ीकेँ नचावएवला युवक के नाम छल महेन्द्र कापर। नेपालक सिरहा जिल्लाक कमलाकात भेड़िया गामक ई मैथिल युवक, विजुली, पिवाक पानि, सड़क आ स्वास्थ्यादि सुविधासँ विहीन एहि मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ एहिना भेड़ा वकरी चड़वैत अछि। महेन्द्र कापर मात्र नहि, एहि मरुभूमिक विभिन्न भागमे बनाओल गेल विभिन्न भेड़ा, बकड़ी आ ऊट बथान तथा लगाओल गेल वगैचामे हजारौं नेपाली, भारतीय, वंगलादेशी, श्रीलंकन आ सुडियन मजुरसभ काज करैत अछि। अपना सभ दिस एक गोट कहबी नहि छैक जे, “जएवह नेपाल, संगहि जएतह कपार”। तहिना ई युवक सभ अपन करम भोगि रहल अछि। ओऽ सभ अबैत काल जे दोहा देखने छल, चकमक विजुलीवत्ती देखने छल आ चिक्कन चुनमुन फोरलेन सड़क देखने छल से घुरैत काल फेर देखत। ओकरा सभक वास्ते दोहा सहर दिल्ली दूर छैक। महेन्द्र जमालियाक एहि अन्कन्टार मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ काज करैत अछि। ओकरा जिम्मामे दू सय भेड़ा आ बकड़ी छैक। हमरा सभकेँ देखिते ओकर आँखिमे विशेष प्रकारक चमक व्याप्त भऽ गेलै, मुखमण्डलपर खुशीक रेखा नाचए लगलैक। साँझ पड़ि रहल छैक ओकरा लालटेम नेसवाक छैक, रातुक खाना बनेवाक छैक आ खुला आकाशक नीचाँ तरेगन गनैत राति बितेवाक छैक। गत एक वर्षसँ महेन्द्रक ई दैनिकी बनि गेल छैक। ईजोरिया रातिक चानकेँ देखि ओऽ अतिशय प्रसन्न होइत अछि, “ई चान हमरो बाऊ आ माय आउर सेहो देखैत होतै नञि”? ओकर निश्चल प्रश्न हमरा भावुक बना देने छल। ओऽ भेड़ा आ बकरीकेँ गोहियामे गोतैत अछि। पठरूसभकेँ दूध पियबैत अछि। चारा रखैत अछि आ चैन भऽ हमरा सभसँ गप्प करवा वास्ते बैसि जाइत अछि। ओऽ एक वर्ष पूर्व कतार आएल छल। मानव तस्करसभ ओकरा कहने रहैक जे वगैचाक काज छैक। ओऽ सोचने रहय जे फलफूलमे पानि पटाएव, रोपव उखारव आ रियाल कमाएव मुदा से भेलै नहि। ओऽ भेड़ा चरवाह बनि कऽ रहि गेल। असलमे महेन्द्र अपने निरक्षर अछि। ओकर कतार आगमनके उद्देश्य छलै गाममे घर बनाएव आ बेटा-बेटीकेँ बोर्डिंग स्कूलमे पढ़ाएव। मुदा ओकर एक वर्षक श्रमसँ ई संभव नहि भऽ पाओल छैक। एक वर्षमे तँ महाजनकेँ ऋणो नहि फरिछाओल छैक। एहि वास्ते ओकरा आओर दू वर्ष एहि मरुभूमिक वालुकेँ फाकय परतैक। अवैत काल दलाल ओकरासँ ७५ हजार रुपैया लेने रहैक। जे ओऽ महाजनसँ ऋण लऽ कऽ चुकता कएने छल। जहन महेन्द्रक गप्पक बखारी खुजलै तँ फेर बन्द होएवाक नामे नहि लैक। ओकरा तँ ओहि गोहियामे राति बितैवाक छलै मुदा हमरा सभकेँ सय किलोमीटर दूर दोहा अएवाक छल। हमरा सभक धरफड़ीकेँ ओऽ अकानि गेल छल। कहलक सर, कहियोकाल अवैत जाइत रहब। भेड़ा बकड़ी संगे रहैत-रहैत ओहने भऽ गेल छी, देखियौ चाहो पानिक लेल नहि पुछलहुँ। आ कपड़ा लपेटल एकगोट पानिक बोतल आगाँ बढ़ा देलक। “हमरा सभक फ्रिज बुझू कि एयर कन्डीशन ईहे अछि”। गर्मीसँ सुखाएल कण्डकेँ पानिसँ भिजाओल आ अपन गन्तव्य दिस आगाँ बढ़ि चललहुँ। लगभग दश किलोमीटर वाट तय कएलाक बाद हमरा लोकनि जमालिया नगरमे पहुँचलहुँ। मुसलमान धर्मावलम्बी सभक रोजा खोलवाक समय भऽ गेल रहै। सड़क कातमे बनाओल गेल चबुतरापर नाना प्रकारक व्यंजन साँठल जाऽ रहल छल। लोक विस्मील्लाह करवालेल तैयार छलाह। हमरा मोन पड़ल महेन्द्रके गोहियामे राखल खवुज (कतार सरकारक सस्ता दरक रोटी) आ प्याउजक धेसर। एसगर महेन्द्र एखन नून, मिरचाई आ तेल प्याउजक संग खवुज दकरि रहल हएत। एतए ओकरेद्वारा पोसल गेल खस्सीक विरयानीक स्वाद लऽ रहल अछि मालिक आउर। उमेश कुमार महतो (पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज स’ रिपोर्ट) बाढक स्थिति बडे खतरनाक रहल, आब कोना के ओ बीत गेल। हमर सभक गाममे कोनो राहत कर्मी नै अएला, नेता सभ चुनाव मे अबै छथ, मुदा रौदी दाही मे नै। गाममे सरकारी स्कूल अछि, सप्ताहमे दू दिन खुजल रहै ये, कशीबारी मे। चारि दिन बन्दे रहै ये। गामक लोक खेती बारी करै ये , धान,गेहूँ परवल खीरा, करैला, कद्दू ,तारबूज ,गोभी, बैगन आ मछली मारै ये। विराटनगर नेपाल मे सेहो लोक सभ सम्बन्धी सभ छथि, 20 किमी दूर बहादुरगंजमे हास्पीटल अछि, गाममे झोलाछाप हास्पीटल अछि जे झोलाछाप डाक्टरक झोरामे रहै ये। पिछला साल एक गोटे के बहादुर गँज हास्पीटल् ले गेलौ, डाक्टर सभ पानी चढा देलकै , तीन दिन तक पानी चढैते रहलै, कियो खेनाइ नै देलकै, ओ पेट फूलि क मरि गेल। घर सभ फूसक आ घासक, धानक पुआरक बनल छै, अगिलग्गेमे से सभ जरैत रहैत छै। एक-एक्अ आदमी के 5-6 टा बच्चा जिबैत रहैत छै, 9-10 बच्चामे। विराटनगर लग गाम मे मौसाक घर गेलौ, ओतए सरकार मैथिली या नेपाली बाजय लेल कहने अछि, सभ गोटे ओत मैथिली बाजै छथि, भारतमे स्थिति खराप। नेपालमे घर फूसोके छै मुदा बेसी लकडी आ टीना के छै। ओत खेती बारी भारते जेका छै। ओतहुओ हास्पीटल दूरे छै। ओते रिक्शा टेम्पू नै चलै छै, खाली बस चलै छै। ओत गाम्मे सेहो बिज्ली छै, गाममे मुदा रोड नै छै, ऊबर खाबर छै, बरसातमे कीचड्क्ष भे जाइ छै। शहरमे रोड ठीक छै। विराटनगर से 20 किलोमीटर दूर नया बजार हटियामे आधा बजार मे बजार आ आधामे दारू बिकाइत छै, जतए छोट से पैघ बच्चा सभी दारू पीबै छै। आर समाचार बाद मे। सुमित आनन्द भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावना भारत-नेपालक मिथिला हस्तशिल्प कलामे असीम सम्भावनापर संगोष्ठी बी.पी.कोइराला नेपाल-भारत प्रतिष्ठान, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्लीक तत्वावधानमे मधुबनी नगर भवनमे भेल। आलेख वाचन सत्र १८.०९.१० केँ आयोजित भेल। उद्घाटन सत्रक प्रारम्भ १८.०९.१० केँ मधुबनीक जिलाधिकारी श्री संजीव हंस (आइ.ए.एस.) द्वारा दीप प्रज्वलितक संग भेल। श्री जयप्रकाश नारायण पाठक, नयन कुमार मांझी, मेधा कुमारी, आरती मिश्रा आ ज्योति द्वारा मंगलाचरण तथा ओडिसी नृत्य प्रस्तुत कयल गेल। अतिथि गण सभक सम्मान एवं स्वागत भाषण अध्यक्ष, विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग डॉ. पुष्पम नारायण द्वारा कयल गेल। अंजली श्वेता आ तुलसी द्वारा स्वागतगान गाओल गेल। मंच संचालक डॉ. अमरनाथ सिंह बीजभाषण लेल विश्वविद्यालय इतिहास विभागक अवकाशप्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. रत्नेश्वर मिश्रकेँ आमंत्रित कयलनि। उद्घाटन भाषण जिलाधिकारी श्री संजीव हंस कयलनि। एहि कार्यक्रममे दुनू देशक कलाकारगण उपस्थित छलाह। मुख्य अतिथिक रूपमे श्री उमाकान्त पाराजुली, सांस्कृतिक परामर्शदाता, नेपाल राजदूतावास, नई दिल्ली छलाह। मुख्य अतिथि अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. संजय कुमार मंजुल छलाह। अध्यक्षीय उद्बोधन विश्वविद्यालय हिन्दी विभागक अवकाश प्राप्त विभागाध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार वर्मा कयलनि। कार्यक्रमक संचालन डॉ. अमरनाथ सिंह, अंग्रेजी विभाग, कुंवर सिंह महाविद्यालय, दरभंगा कयलनि। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शम्भू कुमार साहू, अध्यक्ष, भूगोल विभाग, जे.एम.डी.पी.एल., महिला कॉलेज, मधुबनी कयलनि। प्रथम सत्र आलेख वाचन सत्रक शुभारम्भ अपराह्ण ०४.३० बजे भेल। कार्यक्रमक संयोजिका डॉ. पुष्पम नारायण पाग एवं चादरिसँ विद्वान आलेख वाचक एवं मंचस्थ अतिथि लोकनिक स्वागत कयलनि। एहि सत्रक अध्यक्षता श्री उमाकान्त पाराजुली कयलनि। एहि सत्रक आलेख वाचक लोकनि छलाह- श्री महेन्द्र मलंगिया, श्री कृष्ण कुमार कश्यप, श्रीमति मंजू ठाकुर, श्रीमति रानी झा, डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद साहा एवं डॉ. कमलानन्द झा। हिनका लोकनिक व्याख्यानक विषय क्रमसँ छलनि: -भारत की मिथिला हस्तशिल्प कला की प्राचीनता एवं आज का स्वरूप -मिथिला हस्तशिल्प कला में बाजारीकरण की सम्भावना -मिथिला हस्तशिल्प और महिला रोजगार- नेपाल के सम्बन्ध में -मिथिला हस्तशिल्प कला और महिला रोजगार- भारत के सम्बन्ध में - मिथिला हस्तशिल्प कला की कठिनाइयाँ - मिथिला हस्तशिल्प कला में ह्रास- एक चिन्तन सांस्कृतिक कार्यक्रम सत्र १८.०९.१० सांस्कृतिक कार्यक्रमक अन्तर्गत डोमकछ आ पमरियाक प्रस्तुति कलाकार द्वारा कयल गेल। एहि सत्रक संचालक रंगकर्मी डॉ. सुनील कुमार ठाकुरजी रामचरित मानसक प्रथम श्लोकसँ वाणी आ विनायकक आराधना कयलनि। कार्यक्रमक अन्तमे डॉ. सुनील कुमार ठाकुर सत्रावसान “जय हिन्द, जय नेपाल” कहि कऽ कयलनि। द्वितीय सत्र १९.०९.२०१० केँ १०.३० बजे डॉ. नरेन्द्र नारायण सिंह निराला जीक अध्यक्षता तथा श्री सुनील मंजुल एवं श्रीमति रानी झा क मंच संचालनसँ सत्र प्रारम्भ भेल। एहि सत्रमे मुख्य अतिथिक रूपमे नेपाल राजदूतावासक सांस्कृतिक परामर्शदाता श्री उमाकान्त पाराजुली एवं श्रीमति शशिकला देवी छलथिन। हस्तशिल्प एवं वस्त्र मन्त्रालय, भारत सरकारक प्रतिनिधि विपन कुमार दास, चित्रकार कृष्ण कुमार कश्यप, रमेश झा (भारतीय स्टेट बैंक), प्रो. अरुण कुमार मिश्र, प्रो. ब्रज किशोर भंडारी, स्वैच्छिक संस्थाक सुनील कुमार चौधरी, महेन्द्र लाल कर्ण एवं प्रो. गंगा राम झा प्रश्न, समस्या एवं सुझाव प्राप्त कयलनि।। सुभाष कुमार कामत, घोघरडीहा, मधुबनी बीहनि कथा - तनखाह सरकारी इस्कूल मे मास्टर कक्षा क सब बच्चा सँ बेरा बेरी परिचय के संग संग पूछ रहिल छैथि - पढि लिख अहाँ नमहर भऽ के कि बनै चाही छी। सभ बच्चा अलग जबाब देलिक। केइयों डागदर तऽ केइयों इंजीनियर आदि आदि। अंतिम बेंच पर बैठल छात्र खड़ा भेल आओर कहलक - सर! हमर नाम मुन्ना भेल। आओर हम नेता बनब। पूरा कक्षा खिल खिला केँ हँस परल। - मुन्ना 'तू नेता किया बनै चाही छी'। - सर ! ताकि हम अहाँ सभ ले आवाज उठै सedकी। अहाँ सभकेँ उचित तनखाह समय पर भेटि। हम नै चाही छी तनखाह कऽ अभाव मे कालहि फेरो कोनो द्रोणाचार्य कोनो एकल्वय के अँगूठा नै काटि ली। बीहनि कथा - भूख बीच राति मे मुन्नाक अपन माई सँ। माँ.. माँ.. उठ हमरा बिस्कुट दे। बिस्कुट दे आओर कानइ लगल। - बउआ रौ ! इतेक रातिक लोग बिस्कुट नै खाइयै छै। - नै हमरा चाही, हम खाएब आओर बोम फाड़ि काइनै लगल - राति मे खाए सँ पेट मे दर्द होएत छै। भोर मे खाएब ! अखन सुति रहूँ - माँ.. पेटक कोना पता की 'अखन दिन छै कि राति' बीहनि कथा - बुढवा पेंशन - हे रौ ! मुन्ना तोरा कहलियौ न लाल कऽ उधार नै दयि लऽ - मालिक... - तखनौ नै 'तू हमर बात बूझै छी' - मालिक ओ तऽ सब दिन सँ अपने दुकान सँ बेसाहि गुजर बसर करै लैथि। ए लाकडाउन मे कतह जेताह ? - हे रौ ! से समय किछु आओर छल। अखन समय साल खराब छै , उपर सँ हुनकर अवस्था नै देखै छी - मालिक विपैत मे तऽ लोग ओनाहियो एक दोसर के मदद करैत छै। अहाँ कैंचाक चिंता जुनि करूँ , हुनका बुढवा पेंशन भेटते छै। बीहनि कथा – मैथिली गाम सँ मुन्ना बीए मे नामांकन कराबै लेल दरभंगा आयल। शहर कें नामी गामी कालेज मे नामांकनक लेल , भोर सँ लाइन म भूखे प्यासे ठार छल। जखन नामांकन काॅउण्टर पर पहुँचल तऽ क्लर्क 'साईठ टाका फाजिल' मांगलक। - सर हमरा लऽ फाजिल पैसा नहि य। - नै देबह ! जे बाद म आबियह - सर ! जौं आय हमर एडमिशन नै हेइत तऽ 'गाम जाएत - जाएत राति भ जाएत' । कालि फेरो आबि परत ? - जे बाद म आबियह , 'औरों लोग लाईन म ठार छै' मुन्ना उदास भऽ प्रिंसिपल आफिस आयल - नमस्ते सर ! - नमस्ते - सर ! हम एडमिशनक लेल भोरे सँ लाईन म ठार भेल छी। गाम सँ पढि ख़ातिर , पाँच रुपये सैकड़ा सूद पर कर्जा लऽ केँ आएल छी। एडमिशन काॅउण्टर पर - सर 'एक्सट्रा पैसा मांगै रहल छैथि'। - 'मुझे मैथिली समझ मे नहीं आती'। हिंदी या अंग्रेज़ी में बोलो। - सर ! मैथिली अष्टम अनुसूची मे शामिल अछि आओर ई मिथिलाक राजधानी थिक । "मिथिला मे चाकरी करब त' मैथिली सिखि लियय"। बीहनि कथा - औंठा आधार कार्ड बनबै लेल लोग लाईन मे ठार छल। मुन्ना कका हाथसँ फार्म लैत आधार कार्ड औपरेटर कहल - पहिने अपन दूनू औंठा लागाऊँ आओर फेर अपन दूनू हाथक सबटा अँगूरी मुन्ना कका बाजिल - 'हम पाँचमा पास छी हस्ताक्षर करब , औंठा नै लगेब" बीहनि कथा - मुनाफ़ा एबरि पिछला साल सँ बेसी ठंड अछि। मुन्ना डिल्ली सँ अपन घरवाली लेल दू हाजारमे एकटा सुटर किन गाम पठालौंक । किछु दिनक बाद गाम सँ घरवाली कऽ फोन आएल। - हे यौं ! कहलौं अहाँ जे सुटर पठौने छलिह। से सभक 'बड्ड सुन्नर, बड्ड नीक' लागल। कतैक मे किनै छलिए। - छौड़ू न दाम, आहाँ पहिरू न - नै नै ! कहूं न दाम - पंद्रह सौ मऽ - मधुबनी वाली काकी गुड्डू बउआ के मम्मीक बड्ड पसन्न, हुनका "साढ़े सोलह सह म दऽ दयि छी" । 'चारि - पाँचटा' आओर पठा देब। मनोज झा मुक्ति, काठमांडू नेपाल अस्तित्वक कटघेरामे मिथिला-मैथिलीक संघ संस्थासब संसारक समृद्ध संस्कृति, मिठ्ठ भाषा आ दुराग्रही संस्कारसँ भरल मिथिला धिरेधिरे अपन सबचीज गुमवैत जाऽरहल अछि । सऽभ तरहें मिथिलाक पहिचान संकटमे पडैत जाऽरहल बातके स्वीकार करवामे किनको आपत्ति नई होएवाक चाही । आखिर, ई अवस्था कोना अएलै? एकर दोषी के ? के एकर खोज करत ? विद्वानक बात करव त एकसँ एक विद्वताक व्यक्ति सर्टिफिकेट सहित सहजे उपलब्ध भऽजएता । अभियानक बात करबै त उत्कृष्ट अभियान संचालन कएने प्रमाण सहित प्रस्तुत होवऽबलाके कमी नै भेटत । मिथिला आ मैथिली प्रति अपन जीवन समर्पण कऽदेने कहनिहार व्यक्ति आ संस्थाक गन्ती सेहो संख्यामे कम नई । मुदा, ई सब बात पेपर–पत्रिका, सभा–सेमिनार, गोष्ठी या मंचपरक गप्प अछि । ई आ एहन बात कहऽ÷सुनऽमे जेतवे बड सुहनगर लगैत छैक, निर्वाह करऽमे ओतवे कठीन छै । किया त कहऽ÷सुनऽमे पाई आ परिश्रम नई लगैछै। ‘मंगनीके पाई त नौ मन तौलाई’ से सबठामकलेल बनल कहावत होइतो अपनासबहक माटिपानिकलेल एकदम सटीक बैसैत अछि । मिथिला÷मैथिलीकलेल मात्र नेपाल÷भारतमे बहुतो रास संघ÷संस्था खुजल । बहुत, किछु दिन अस्तित्वमे रहल आ शिथिल होइत बिलागेल । किछु समय–समयपर खुजैत अछि, पुनः बन्द भऽजाइत अछि । आ किछु नामेमात्रलेल बोर्ड टांगिकऽ बैसल अछि । विगतमे मैथिली÷मिथिलाकलेल जमिनीरुपमे काज कएने संस्थासब एखन नाफा–घाटाके दोकानमे परिणत भऽ साइन बोर्ड झमकौने अछि । कहियो अभियान मुख्य उद्देश्य रहल संस्था अपनाके पूर्ण व्यावसायीक बनालेने कहैत अछि आ केहनो काजमे जीविकोपार्जनक प्रश्नके ठाढ कऽदैत अछि । मैथिली÷मिथिलाकलेल काज कएनिहार व्यक्ति या संस्थाके जहन पुरस्कार या सम्मानक बात होइत छैक तहन मैथिली÷मिथिलाक नाम भँजौनिहार व्यक्ति आ संस्थासब बुलबुलाकऽ निकलव कोनो नव बात नहि । हमर शिर्षक अछि जे मिथिला÷मैथिलीसँ जुडल संघसँस्था सबहक अस्तित्व संकटमे अछि । ओना अस्तित्व बिहीन लोकसब रहल संस्थाक अस्तित्व कोना लहलहाओत ? कहवाक तात्पर्य ई जे नैतिक धरातलके बिसरिगेल लोक जहने कोनो संस्थामे रहत त धिरेधिरे अपन चरित्रके प्रभाव ओहि संस्थापर छोडवे करत । मिथिला÷मैथिलीक संरक्षण आ संवद्र्धनलेल कोनो काज नईं होइत अछि या संस्थासब नई करैत अछि सेहो बात नई छै । मुदा, प्रश्न छै जे जाहि तरहक काज मिथिला÷मैथिलीक अस्तित्व निखरारऽलेल÷जोगावऽलेल होएवाक चाही से कि भऽरहल छैक ? जाहि स्तरके काजक आवश्यकता मिथिला÷मैथिलीक छै, से कि कएलजारहल छै ? या जे काज कोनो व्यक्ति अथवा संस्था जे कऽरहल अछि, ताहिसँ मिथिला÷मैथिलीके अभिष्ट पुरा भऽरहलैय ? हमरा जनतवे मिथिला÷मैथिलीकेलेल बहुत रास व्यक्ति आ संस्था काज कऽरहल देखवैत अछि । अन्तरर्राष्ट्रि«य मैथिली सम्मेलन, मैथिली लिटरेचर फेस्टिभल, मैथिली साहित्य सम्मेलन, कवि गोष्ठी, कथा गोष्ठी, विचार गोष्ठी, सम्मान कार्यक्रम, पुरस्कार वितरण समारोह, फग्ुआ फुर्रर् दंग, महामूर्ख सम्मेलन, विद्यापति स्मृति कार्यक्रम, चनमा,सांगितिक कार्यक्रम, नाटक महोत्सव लगायतक बहुत सभा÷सेमिनार महोत्सवक आयोजना प्रायः कतौ ने कतौ होइते रहैत अछि । लोक सहभागियो होइत छथि, खर्चो जुटवैत छथि, खर्चो करैत छथि । मुदा की मिथिला÷मैथिलीके ओहिसँ उपलब्धी छै त ? जँ छै त, केहन ? जहने काज होइत छै या कएल जाइत छै त किछु ने किछु उपलब्धि भेनाई स्वाभाविक छै, होएवो करैत छै । मुदा, जाहिरुपसँ मिथिला÷मैथिलीक अस्तित्वपर चौतर्फी प्रहार कएल जाऽरहल छै, मान मर्दन कएल जाऽरहल छै, ओतऽ जाहिरुपक काज होएवाक चाही से कि भऽरहल छै त ? चाहे मिथिला राज्य नामाकरणक प्रश्न होई या मिथिला क्षेत्रमे मातृभाषामे पढाइयक । सरकारी कार्यालयसबमे मातृभाषाक प्रयोग बढावऽके अभियान होई या मिथिला क्षेत्रमे साइनवोर्ड, पर्चा÷पम्पलेट, वालपेन्टिगं अपन भाषामे लिखएवाक अभियान, कतेक संस्था जमिनीस्तरपर एहि काजमे अपन उर्जा लगौने अछि ? विगतमे कएलगेल काजके कतेकदिनधरि गन्ती कराविकऽ दोकानक बिक्री होइत रहत या बेचैत रहब ? भाषा कोनो जातिक नईं होइत छै, भूगोलक होइतछै से साश्वत सत्यके जनितो मिथिलाक क्षेत्रमे भाषागत जे वितण्डा मचाओल जाऽरहल छैक, ताहिपर मात्र सभा÷सेमिनारमे विचार विमर्श कहियाधरि सिमीत रहतै? मिथिला क्षेत्रक लोककेँ जाहिं तरहें झूठफूस बाजिकऽ मैथिलीक विरोधी मानसिकता तैयार कएल जाऽरहल छै, तकरा के फरिछेतै ? जँ कोनो राजनीतिक दल या कोनो नेताके भरोसे बैसल रहब त सबहक अस्तित्व बँचत कि डूबत से प्रायःलोक बुझिरहल छियै । विवेकहीन विभिन्न पार्टीक कार्यकर्ता आ नेताक कारणे सेहो मिथिला÷मैथिलीकेँ अस्तित्वपर प्रहार कएल जाऽरहल छै से सबके नीकजकाँ बुझल अछि । भोंटक लोभे आ दोपटा ओढवाकलेल कोनो नेता या मन्त्री केहनो एवम् ककरो मंचपर जाऽकऽ आयोजक अनुसारके भाषण करऽमे कनिक्को नईं हिंचकिचाएल करैछ अछि । नेता अपना माइयक बोलीके कखनो कोनो भाषा त कखनो कोनो भाषा कहऽमे कनिक्को विचारधरि नई करैत अछि । एहन अवस्थामे मिथिला÷मैथिलीकलेल लागल प्रत्येक व्यक्ति आ संघ÷संस्थापर ऐतिहासिकरुपसँ कलंकक टीका थारी सजल दरबज्जापर प्रतिक्षा कऽरहल अछि । जौं सबकियो अपन–अपन काजके जमिनी स्तरपर नई करव, मिथिला क्षेत्रक लोकके मानसिकतामे विष रखनिहारकेँ नंगा करैत, फरिछिएवाक काज अविलम्ब शुरु नई भेल त सबहक अस्तित्व घोर संकटमे लगभग लगभग पडैत जाऽरहल अई । अपनाके मिथिला÷मैथिलीक सेवक कहनिहार, मिथिला÷मैथिलीक अभियानी कहनिहार, मिथिला÷मैथिलीक नामपर पेट पालनिहार व्यक्ति आ संघसंस्थासबके अविलम्ब एकटा रणणीति बनाविकऽ मिथिलाक गामगाम आ टोलटोलमे पैसऽके शुरु कऽदेवऽपरत । नेपाल आ भारत संविधानमे मातृभाषामे पठन–पाठन कराओल जएवाक बात रहितो बहुत कम व्यक्ति आ संस्था एहिदिस प्रयास कएलक । किछु व्यक्ति या संस्थाक प्रयाससँ मैथिली विद्यालयधरि पहुँचल त, मुदा सहयोगक आभावमे थकमका रहल अछि । जँ सहयोगी हाथ, संघसंस्थासबके आवाज बुलन्द नई कएलगेल त पाठशालाधरि पहुँचल मैथिली दम तोडिदेत । एहिलेल व्यक्तिगतरुपसँ या संस्थागतरुपसँ मिथिला÷मैथिलीकलेल कएल जाऽरहल खर्चमेसँ मैथिलीक पठनपाठनके सहयोग कऽ जोगौनाई सन ठोस काजक संस्कार कहियासँ शुरु होएतै? सरकार जनगणनाक तैयारीमे अछि, पाईकेलेल अपना मायके बेचिलेने मैथिलीएक किछु बेटा गामगाममे नौटंकी करऽमे लागल अछि । ककरो राजनीतिक अभिष्ट पुरा करवामे अपन भाषाके दोसर ठामक भाषा, जातिक भाषा कहिकऽ विभिन्न गतिविधि कऽरहल अछि । गामगाममे अभियानी या संघसंस्थाके जाऽकऽ अपन अस्तित्व रक्षा सन महत्वपूर्ण काज शुरु करवामे शारिरीक, नैतिक आर्थिक सहयोगक वातावरण निर्माणकलेल गोष्ठी कहिया होएतै ? एकटा बात निश्चित अई जे मिथिला÷मैथिलीक बात कएनिहार, काज कएनिहार, दोकान खोलनिहार, भँजौनिहार सबहकलेल खतराक घण्टी बाजिगेल अछि । एहन समयमे मिथिला÷मैथिलीकलेल खुजल संघसंस्थाक अस्तित्व कटघेरामे अछि । जँ अस्तित्व जोगएवाक अछि, नैतिकता बँचल अछि त संघसंस्थासब एहि दिस ठोसगर सोंच बनाविकऽ आगा बढऽमे विलम्ब नई करी । ओना त किछु विलम्ब भइएगेल अछि, आब जँ आओर विलम्ब भेल त सबहक अस्तित्व मात्र संकटमे नई अछि, सबहक नामके इतिहास कलंकीत करवाक प्रतीक्षामे सेहो अछि । जानकी समय अछैते सबमे चेतना देथुन्ह । निष्कर्षविहीन सम्मेलन ! १९म् अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन वितलाहा चैतमासक २९ आ ३० गते नेपालक राजधानी काठमाण्डूमें सम्पन्न भेल । मूदा जाई तरहक उत्साह मोनमें छल, बहुत कचोट लागल सम्मेलनकेँ उद्घाटन आ समापन देखिकऽ । सम्मेलनक जिम्मा पओने वरिष्ट पत्रकार एवं राजनीतिकर्मी रामरिझन यादवक कार्यक्षेत्र काठमाण्डूसँ बाहर भेलाक कारणे आयोजन कठीन होएब निश्चिते छल । अखनधरि देखल जाएबला मैथिली कार्यत्रmम आयोजनाक खराब पक्ष सबसँ अछुत इ सम्मेलन नहि रहऽ सकल । कोनहुँ समिति बनएबाकालमे, समितिमे रहिकऽ जाइ तरहे बहुतोलोक सुति रहैत छथि सैह विडम्बना अहु सम्मेलनमें देखलगेल । अपन—अपन काज गछियोकऽ नई करबाक प्रवृति अखन अपना समाङ्गसँ नई हटल से प्रमाणित केलक अछि ई सम्मेलन । सम्मेलनमे नेपाल आ भारत दूनु देशक मिथिलाञ्चलसँ ३०० सहभागी होएबाक बात छल । सहभागिसब ऐलथि, मूदा निक जकाँ व्यवस्थापन नहि भऽ सकल । सम्मेलनमें मैथिली आ मिथिलाप्रति अनुरागी कम आ कोनो पार्टीक कार्यकर्ता सभक बेसी जमघट बुझाइत छल । २९ गते ९ बजे बसन्तपुरसँ धोती—कुर्ता आ पाग पहिरिकऽ झाँकी निकालबाक कार्यत्रmम छल, मूदा ११ बजेधरि एक डेढसय लोकक उपस्थिति मात्रे छल । मैथिली आ मिथिलासँ सम्वद्ध सँघ—संस्थासब काठमाण्डू उपत्यकामें ३ लाखसँ बेसी मैथिल रहल ठोकुवा दाबी कयल जाएत अछि । अपनाके मैथिलीक योद्धा कहऽबला किछु गोटे त उपराग देबऽमे सेहो पाछा नई परलथि "जे हमरा खबरि किया नई भेल" ? देखिकऽ अजगुत लागल आ दुःख सेहो जे जौ हम अपना आपके मैथिलीके योद्धा कहैत छी त कि व्यत्तिmगतरुपसँ खवरि केनाई जरुरिए छियै ? कोनो माध्यमसँ जानकारी होएब पर्याप्तता नहि छई ? हँ, कहुनाकऽ विलम्बेसँ सही बसन्तपुरसँ जाउलाखेलधरि धोती—कुर्ता त कमसम, मूदा पागक प्रदर्शन करैत जुलुश पहुँचल । जुलुश प्रदर्शन वास्तविकरुपमे एहि सम्मेलनक सबसँ नीक पक्ष रहल । एकरा नेपालमें मिथिला आ मैथिलक स्थानके प्रमाणित करबामे ठोस कदमके रुपमें अवश्य लेल जा सकैय । सम्मेलनके उद्घाटन कयलथि नेपालक प्रधान मन्त्री प्रचण्ड । ओ अपना भाषणसँ सहभागि सभक मोन जितलथि ताइमें कोनहुँ शंका नई । काठमाण्डू उपत्यकामे कवि कोकिल विद्यापतिक शालिक रखबाक बात सहभागि सबहक दवावपर त कहलथि मूदा राखि देताह ताइके बादेमे पतियाओल जाऽसकैय । तहिना सम्मेलनमे उपस्थित अतिथि फोरमक नेता जय प्रकाश प्रसाद गुप्ता त अन्तराष्ट्रिय विमानस्थलक नाम विद्यापति विमान स्थल होएबाक कहिकऽ प्रचण्डसँ भाषणमें एक कदम आगा रहल प्रमाणित कयलथि । ओ कहलथि जे "जौ काठमाण्डूक विमान स्थलक नाम विद्यापति विमान स्थल नई होएत त निजगढमे विद्यापति अन्तराष्ट्रिय विमान स्थल बेगर हमसब मानऽबला नई छी" । जे हुए बहुत निक गप्प जौं हुनक बात मात्र नेताक भाषण जौं नई होए । सम्मेलनमें नेपालक हिन्दी आन्दोलनके अगुवा आ अन्तराष्ट्रिय मैथिली परिषद् नेपालक अध्यक्ष राजेश्वर नेपाली अपनाके आसन ग्रहण नई कराओलगेल कहिकऽ सम्मेलन बहिष्कार करबाक घोषण त कएलथि मूदा किछुएकालकबाद ओ मञ्चपर आसीन भेल नजरि औलथि । पहिलदिनक कार्यत्रmम साँस्कृतिक कार्यत्रmम करैत सम्पन्न भेल । दोसर दिन अर्थात चैत ३० गते ९ बजेसँ विचार गोष्ठीक कार्यत्रmम छल, मूदा कार्यत्रmमक संयोजक बहुभाषाविद् गंगा प्रसाद अकेला अपने १० बजे एलाह । विचार गोष्ठीमे दूगोट कार्यपत्र प्रस्तुतक कार्यत्रmम छल, ताइमे नेपालदिससँ राम रिझन यादव आ भारतदिससँ डा धनाकर ठाकुरक कार्यपत्र रहनि । कोनो सम्मेलनमे विचार गोष्ठीक सत्रके बहुत पैघ महत्व देल जाइत छैक, मूदा एहि सम्मेलनमे विचार गोष्ठीक सत्र सबसँ महत्वहीन बुझि पडल । विचार गोष्ठीमे गन्थन क कऽ कोनो निष्कर्ष निकालि ताइपर कार्य आगु बढएबाक कोनो सम्मेलनके मुख्य उद्देश्य रहल करैत अछि । मूदा एतऽ अपन अपन कार्यपत्र प्रस्तुत कयलाकबाद प्रस्तोतासब आ अधिकाँश मञ्चपर आसिन व्यक्तिसब मञ्च छोडिकऽ निपत्ता भऽ गेलाह । ओना टिप्पणी करबाकलेल कुल २६ गोटे मञ्चपर गेलाह, मूदा कार्यपत्रपर बहुत कम आ प्रायःलोक अपने राग अलापि कऽ विचार गोष्ठीके अपन व्यक्तिगत विचारक मञ्च बनावऽमे सेहो पाछा नई परलाह । सम्मेलन कोन निष्कर्षपर पहुँचल कोनो सहभागिके मालुम नई भऽसकल । सम्मेलनमे विचार गोष्ठीक सत्रकबाद कवि गोष्ठीक आयोजना भेल छल । ताही बीचमे सम्मेलनक संयोजक रहल राम रिझन यादव अन्तराष्ट्रिय मैथिली परिषद् नेपालक समितिके नव कार्यकारिणीक घोषणा कएलथि । जाहिमे प्रमुख पदक अलावा जे जे मञ्चपर आबि बजने छलथि ओ सबगोटे कार्य समितिक सदस्य भेल घोषणा कएलथि । घोषणा कएल पश्चात किछु युवा एहन गलत प्रत्रिmयाके विरोध करैत हो—हल्ला करबाक शुरु कएलथि । ओना सम्भवतः ई पहिल एहन कार्यसमितिक निर्माण होएत जाहिमें मञ्चपर जे जे जाकऽ बजलाह ओ सबगोटे सदस्य बनाओलगेल होई । तहिना कवि गोष्ठीक सत्रमे सेहो तहिना देखलगेल । कवि गोष्ठीमें सोंचसँ बेसी कवि लोकनिकेँ कविता वाचनकलेल आओल मूदा समयक आभावके कारणे सभ कविके मौका नई देबऽ सकलाक कारणे किछु कविके मोनमे दुःख होएब अतिश्योत्तिm नहिं । काठमाण्डूमे सेहो एतेकरास मैथिली कविता आएब बहुत उत्साहक पक्ष कहल जाऽसकैया मैथिलीक लेल । सम्मेलनमें किछु गोटे सम्मेलनकेँ वास्ते अपन काठमाण्डू यात्राके व्यक्तिगत काजमें सेहो प्रयोग करैत देखलगेल । सम्मेलन छोडिकऽ काठमाण्डू घुमबाक वास्ते आएल जकाँ देखनिहार सहभागि सबहक सेहो कमी नई छल । समग्रमे मैथिलक वर्चश्वताके काठमाण्डूमे स्थापित करबाक पक्षमे सफल रहल १९म् अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन, उद्देश्य आ निष्कर्ष बिहीन बुझाएल । नवेन्दु कुमार झा, समाचार वाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना। विदेह सम्मान- -श्री नवेन्दु कुमार झा केँ पहिल "विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान भेटल छन्हि। अस्तित्वक लेल संघर्ष करैत पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व मिथिलांचलक सांस्कृतिक धरोहर महाकवि विद्यापतिक जयन्तीक प्रतीक्षा मिथिलावासी वर्ष भरि करैत छथि। कार्तिक धवल त्रयोदशीकेँ प्रति वर्ष मनाओल जाएवला एहि वार्षिक उत्सवमे पूरा मनोयोगक संग मिथिलावासी शामिल होइत छथि। एहि क्रममे राजधानी पटनामे आयोजित होमएवाला विद्यापति स्मृति पर्वक प्रतीक्षा सेहो राजधानीक मिथिलावासीकेँ रहैत अछि। मुदा एहि वर्ष एहि आयोजनपर जेना ग्रहण लागि गेल अछि। बढ़ैत संसाधनक बावजूद आयोजक एहि सांस्कृतिक उत्सवक स्वरूप वर्ष-दर-वर्ष छोट कएने जा रहल छथि। ई आयोजन आब इतिहास बनबाक द्वारपर ठाढ़ अछि। पछिला चौबन वर्षसँ प्रति वर्ष आयोजित होमएवाला त्रिदिवसीय कार्यक्रम एहि वर्ष एक दिवसीय होएबाक संवाद अछि। पटनाक हार्डिंग पार्कसँ सचिवालय मैदान आ मिलर हाई स्कूल मैदान होइत ई आयोजन जखन भारत स्काउट मैदान धरि आएल ता धरि ई उम्मीद छल जे ई समारोह अपन पुरान गौरवकेँ फेरसँ प्राप्त करत मुदा जखन एहि समारोहक स्थान परिवर्तित कऽ कापरेटिव फेडरेशन परिसर आबि गेल तऽ स्पष्ट भऽ गेल जे आब आयोजक मात्र खानापूर्ति करबाक लेल एकर आयोजन करैत छथि। आ एहि बेरक सूचनापर गौर करी तऽ स्पष्ट होइत अछि जे आब एहि समारोहक आयोजन मात्र औपचारिकता रहि गेल अछि। कोसी क्षेत्रमे आएल बाढ़ि आयोजक सभकेँ एकटा बहाना बनि गेल अछि आ एहि बहाने एहि समारोहक गौरवपूर्ण इतिहासकेँ समाप्त करबापर लागल छथि। बाढ़ि मिथिलांचलक नियति अछि। शायदे कोनो वर्ष होएत जखन कि एहि प्राकृतिक आपदाक सामना नहि होइत अछि मुदा एहि बेर कोसीमे आएल बाढ़िसँ आयोजक संस्था चेतना समितिक कर्ता धर्ताकेँ अपन गाम-घर दहाएल तँ हुनक दर्द जागि उठल आ कार्यक्रमक समय-सीमा घटा देलनि। दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी आदि मिथिलांचलक कतेको क्षेत्र सभ साल बाढ़िक मारि झेलैत अछि मुदा बिना रुकावट सभ साल तीन दिवसीय विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजन होइत रहल अछि। ओहि क्षेत्र सभक चिन्ता समितिकेँ शायद नहि रहैत छल। ज्यो बाढ़िक समस्याक प्रति एतेक गंभीर छलाह तँ पूर्वमे कतेको बेर आएल बाढ़िक बाद एहि आयोजनकेँ छोट कएल जा सकैत छल से आइ धरि नहि भेल। ज्यो अहू बेर आयोजक एहि समस्याक प्रति गंभीर रहितथि तँ एहि समारोहक माध्यमसँ राजधानीक मिथिलावासीक सहयोग बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल लऽ सकैत छलाह। एहन रचनात्मक डेग संस्था उठाएत से संस्थाक कर्ता-धर्ताक आदति नहि रहलनि अछि। एहिसँ समितिकेँ सामूहिक श्रेय भेटैत से तऽ संस्थाक महानुभाव लोकनिकेँ कतहु मंजूर नहि छलनि। ओ तँ व्यक्तिगत श्रेय लेबापर विश्वास करैत छथि। दरअसल चेतना समितिक जुझारू पदाधिकारी सभमे आब काज करबाक चेतना नहि बचल अछि। नहि तँ ओ एहिपर जरूर चिन्तन करितथि जे एहि समारोहमे प्रतिवर्ष दर्शकक संख्या किए कम भऽ रहल अछि। जखन संस्थाक स्तरसँ दर्शककेँ जोड़बाक कोनो प्रयास नहि भऽ रहल अछि तँ एहिमे दर्शक दिससँ प्रयास होएबाक बात सोचब निरर्थक अछि। ओना आयोजक कतेको वर्षसँ एहि समारोहकेँ विराम देबाक प्रयासमे छथि। कखनो चुनावक बहाना बना तँ कखनो कानून व्यवस्थाक बहाने एहि कार्यक्रमक स्वरूपकेँ छोट क देलनि। एहि वर्ष तँ कोसीक विभीषिका तँ मानू हुनक सभक मनोनुकूल वातावरण दऽ देलक। प्रारम्भमे त्रिदिवसीय आयोजनक तैयारीक बाद एकाएक एकरा एक दिवसीय करब मात्र औपचारिकता लागि रहल अछि जाहिसँ कि जे किछु मैथिली प्रेमी छथि अगिला वर्शसँ अपनहि एहि कार्यक्रमसँ कटि जाथि आ दर्शकक अनुपस्थितिक बहाना बना कार्यक्रमकेँ बंद कऽ देल जाए। ई विडम्बना कहल जा सकैत अछि जे पटनामे शुरू भेल विद्यापति स्मृति पर्वक देखा-देखी प्रदेश आ देशक आन क्षेत्रमे वर्ष दर वर्ष पूरा उत्साहक संग आयोजित भऽ रहल अछि आ एहि ठामक आयोजनक अस्तित्वपर संकट आबि गेल अछि। वास्तवमे चेतना समिति आब किछु फोटोजेनिक चेहरा सभक अखाड़ा बनि गेल अछि जे एकर कार्यालय विद्यापति भवनकेँ अपन दलान बुझि अपनहिमे कुश्ती करैत रहैत छथि। कोसीक विभीषिकाक दर्द मठाधीश लोकनिक संग-संग सभ मिथिलावासीकेँ अछि। कोसीक बाढ़ि पीड़ितक दर्द एहि आयोजन माध्यमसँ सभ मिथिलावासीकेँ जोड़ि सामूहिक रूपेँ बाटल जा सकैत छल। ज्यो से नहि तऽ बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल प्रदेश आ देशक कतेको क्षेत्रमे सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक कएल गेल आयोजन व्यर्थ छल। मिथिलाक कतेको महान विभूति सभक प्रयासँ शुरू भेल राजधानीक ई सांस्कृतिक उत्सव पूरा देशमे एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। एहि आयोजनकेँ इतिहास बनेबाक प्रयास करब चिन्ताक विषय अछि। पहिने कार्यक्रमक स्थान छोट करब आ आब एकर समय सीमा घटएलासँ राजधानीक मिथिलावासी मर्माहत छथि। एकरे परिणाम अछि जे छोटे स्तरपर सही राजधानीसँ सटल दानापुर आ राजीवनगरमे किछु वर्षसँ आयोजित भऽ रहल विद्यापति पर्व आब लोकप्रिय भऽ रहल अछि। आब राजधानीक मिथिलावासी चेतना समितिक बदला एहि दुनू स्थानपर होमएवाला आयोजनक प्रतीक्षा करैत छथि। शायद अहूसँ चेतना समिति सचेत होएत आ विद्यापति स्मृति पर्वक अपन पुरान गौरवकेँ पुनर्स्थापित करबाक प्रयास करत। सुशांत झा ग्राम+पत्रालय-खोजपुर, सम्प्रति सुशांत जी इंडिया न्यूजमे कॉपी राईटर छथि, मिथिला विश्वविद्यालयसँ स्नातक (इतिहास), तकर बाद आईआईएमसी (भारतीय जनसंचार संस्थान) जेएनयू कैम्पससँ टेलिविजन पत्रकारितामे डिप्लोमा (2004-05) ओकरबाद किछु पत्र-पत्रिका आ न्यूज वेबसाईटमे काज, दूरदर्शनमे लगभग साल भरि काज। संप्रति इंडिया न्यूजसँ जुड़ल- सम्‍पादक की बलिराज गढ़ मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि? हमर गाम खोजपुरसँ करीब एक किलोमीटर दक्षिण दिस बलिराजपुर नामक एकटा गाम छैक। ई गाम मुधुबनी जिला मुख्यालयसँ करीब 34 किलोमीटर उत्तर-पूब दिसामे छैक। एतय एक टा प्राचीन किला छैक जे 365 बिगहामे पसरल छैक आ एकर देखभाल भारत सरकारक पुरातत्व विभाग क रहल अछि। किलाक खुदाई भेलापर एहिमे सँ मृदभांड आ विभिन्न तरहक बस्तु निकलल आ सोनाक सिक्का सेहो भेटलैक। किलाक बाहर जे बोर्ड लागल छैक ताहि के मुताबिक ई किला मौर्यकालीन हुअक चाही। किला के कात करोटमे जे गाम छैक ओहिमे भाँति-भाँतिक किंवदन्ति पसरल छैक, किलाक विषयमे। जतेक लोक, ततेक तरहक बात। किछु लोकक कथन छन्हि जे ई किला राक्षस राज बलिक राजधानी छलै -आ किछु गोटा तँ राजा बलिकेँ देखबाक सेहो दावा केलन्हि अछि। साँझ भेलाक बाद लोक सभ किला दिस जाइसँ बचए चाहैत छथि। भऽ सकैत अछि जे ई अफवाह सरकारी कर्मचारी लोकन्हि फैलेने हुएआए-कारण जे ओकरा सभकेँ ड्यूटी करएमे कनी आराम भऽ जाइत छैक। लोक सभ राजा बलिक डरे किछु चोरबऽ नञि चाहए छैक। किला अद्भुत छैक। किलाक देबार भग्नावस्थामे रहितहु अपन यौवनक याद दिआ रहल अछि। किलाक देबार एतेक चाकर छैक जे ओदृपर तँ आसानी सँ एकटा रथ निकलिये जाइत हेतैक। देबारमे लागल ईंटा दू-दू फीट नमहर आ लगभग गोटेक फुट चाकर छैक। चीनक देबारसँ कम मोट नहि हेतैक ई अपन यौवन कालमे। किलामे एकटा पोखरि छैक, ककरो नहि बूझल छैक, जे कहिया खुनाएे ई पोखरि। बूढ़-पुरानक कहब छन्हि जे ई पोखरि राक्षसक कोरल अछि। किछु लोकनिक तँ ई मत छन्हि जे एहिमे एकटा सुरंग सेहो छैक-जकर रस्ता कतओ आर निकलैत छैक। सुनैत छियैक जे घ्राज-परिवारक सदस्यकेँ आपातकालमे बाहर निकालैक लेल एहन सुरंग बनायल जाइत छलैक। किलाक कात-करोटमे जे गाम छैक तकर नाम सेहो ऐतिहासिक। किलाक पूब दिस छैक फुलबरिया नामक गाम आ ओकर बगलमे सटल छैक गढ़ी गाम..जे आब अप्रभ्रंश भऽ कऽ गरही भऽ गेलैए। किलाक पच्छीम दिस छैक रमणी पट्टी नामक गाम आ ओहिसँ सटल छैक भुपट्टी। किलाक दक्षिणमे छैक बिक्रमशेर, जतय प्राचीन सूर्य मंदिरक अवशेष भेटलैए। ई बात ध्यान देबाक जोग जे सूर्य मंदिर देशमे बड्ड कम जगह छैक। बलिराज गढ़क खुदाई पहिल बेर 1976 मे भेलैक, जखन केन्द्रमे साइत डॉ0 कर्ण सिंह एहि बिभागक मंत्री छलाह। गढ़क उद्धारक लेल मधुबनीक पूर्व सांसद भोगेन्द्र झा आ कुदाल सेनाक अध्यक्ष सीताराम झाक बड्ड योगदान छन्हि। किछु इतिहासकार लोकनिक कहब छन्हि, जे ई किला बंगालक पालवंशीय राजा लोकनिक किला भ सकैत अछि वा फेर मौर्य सम्राटक उत्तरी सुरक्षा किला भऽ सकैत अछि। ओना किछु गोटेक कहब छन्हि जे एकर बड्ड संभावना- जे ई किला मिथिलाक प्राचीन राजधानी सेहो भऽ सकैत अछि। एकर पाछू ओ ई तर्क दैत छथिन्ह, जे एखुनका जे जनकपुर अछि, ओ नव जगह अछि आ ओतुक्का मंदिर १८हम शताव्दीमे इंदौरक महाराणी दुर्गावतीक द्वारा बनबाएल गेल अछि। विद्वान लोकनि जनकपुरक ऐतिहासिकताक संदिग्ध मानैत छथि। हमरा एहि संबंधमे एकटा घटना मोन पड़ि रहल अछि। १० साल पहिने पटनामे वैशालीक एकटा सज्जन हमरा भेटलाह आ कहलन्हि जे बलिराज गढ़ वास्तबमे मिथिलाक प्राचीन राजधानी अछि। हुनकर कहब छलन्हि जे ह्वेनसांगक एकटा विवरणक मुताबिक पाटलिपुत्रँस एकटा खास दूरी पर वैशाली अछि, वैशालीसँ एतेक दूरीपर काठमांडू (काष्ठमंडप) अछि आ काठमांडूक दच्छिन आ पूब दिशामे मिथिलाक प्राचीन राजधानी छैक। एखुनका जनकपुर ओहि मापदंडपर सही नञि उतरि रहल अछि। पता नञि एहि बातमे कतेक सत्यता छैक। एकर अलावा, रामायणमे सेहो मिथिलाक प्राचीन राजधानीक संदर्भमे किछु संकेत छैक। रामायणक संकेत सेहो बलिराजपुरकेँ मिथिलाक राजधानी होएबाक संकेत कय रहल अछि। सांसद भोगेन्द्र झाक मुताबिक, राजा बलिक राजधानी महाबलीपुरम भर सकैत अछि, जे दच्छिन भारतमे छैक। सभसँ पैघ बात ई जे पूरा मिथिलामे बलिराजपुरसँ पुरान कोनो किला नहि अछि, जे मिथिलाक प्राचीन राजधानी होएबाक दावा कय सकए। किलाक भीतर उबड़-खाबड़ मैदान छैक, जे राजमहलक जमीनक भीतर धँसि जएबाक प्रमाण अछि। एतय एकाध जगह खुदाई भेलैए आ ओहीमे काफी कीमती धातु आ समान भेटलैक अछि। अगर एकर ढ़ंगसँ खुदाई कएल जाय तँ नञि जानि कतेक रहस्य परसँ आवरण उठि जायत। एखन धरि सरकारक तरफसँ कोनो ठोस प्रयास नहि भऽ पाओल अछि, जञिसँ बलिराज गढ़क प्राचीनताकेँ दुनियाक सोझाँ रखबाक कोसीस कएल जाय। बस एकटा कामचलाऊ सड़कसँ एकरा बगलक गाम खोजपुरसँ जोड़ि देल गेलैक आ इतिश्री कय देल गेलैक। यदि बलिराज गढ़क खुदाई ढ़ंगसँ कएल जाय आ एतय एकटा नीक संग्रहालय बना देल जाय तँ बढ़िया काज होयत। मिथिलांचलक हृदयस्थलीमे रहबाक कारणेँ एतय मिथिला पेंटिंगक कोनो संस्थान वा आर्ट गैलरी सेहो खोलल जा सकैत अछि। एकटा नीक(चाकर आ चिक्कन हाईवे) क संग नीक विज्ञापन बलिराजगढ़क पर्यटक सभकेँ निगाहमे आनि सकैत अछि। एहिसँ इलाकाक गरीबी दूर करबामे सेहो मदद भेटत। यदि एकरा बुद्धा सर्किट वा रामायण सर्किटक अंग बना लेल जाय तँ आर उत्तम। मिथिला मंथन मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबसँ पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय, साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तोप्रँ मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि लेकिन ओहियो सँ पैघ कारण एहि इलाका मे कोनो नीक नेतृत्व के आगू नै एनाई अछि। आजादी लगभग 60 वर्ष बीत गेलाक बाद देश में जहि हिसाब स आर्थिक असमानता बढ़ि गेलैक अछि ओहि में बिहार आ खासकए मिथिला सामने एकटा बड्ड पैघ संकट छैक जे ई आआंर पाछू नै फेका जाय। उदाहरण के लेल ई आंकड़ा आंखि खोलि दै बला अछि जे एकटा गोआ मे रहय बला औसत आदमी के प्रतिव्यक्ति आमदमी एकटा औसत बिहारी सं सात गुना बेसी छैक आ एकटा पंजाबी के आमदनी पांच गुना बेसी छैक। बिहारो मे अगर क्षेत्रबार आंकड़ा निकालल जाय त बिहार के दक्षिणी( एखुनका गंगा पार मगध आ अंग) एवम पश्चिमी ईलाका बेसी सुखी अछि, आ ओकर जीवनशैली सेहो दू पाई नीक छैक। त एहन में सवाल ई जे फेर रस्ता की छैक। की मिथिलांचल के लोक एहिना दर-दर के ठोकर खाईके लेल दुनियां में बौआईत रहता अथवा हुनको एक दिनि विकास के दर्शन हेतन्हि। मिथिलांचलक ई दुर्भाग्य छैक जे एकर एकटा पैघ हमरा हिसाब सँ आधा सँ बेसी इलाका बाढ़ि में डूबल रहैत छैक। बाढ़ि के समस्या निदान सिर्फ राज्य सरकार के मर्जी सँ नहि भ सकैत बल्कि अहि में केंद्रसरकार के सहयोग चाही। पिछला साठि साल मे बिहार क नेतागण अहिपर कोनो गंभीर ध्यान नहि देलन्हि जकर नतीजा अछि जे बाढ़ एखन तक काबू मे नहि आबि रहल अछि। प‍‍छिला कोसी के आपदा एकर पैघ उदाहरण अछि, आब नेतासब के आँखि कनी खुललन्हि अछि, लेकिन एखन सँ मेहनत केल जायत त अहि मे कमस कम 20 साल लागत। बाढ़ि सिर्फ संपत्ति के नाश नहि करैत छैक, बल्कि आधारभूत ढ़ांचा जेना सड़क, रक्षेवे आ पुल के खत्म क दैत छैक। एहन हालत मे कोनो उद्योग के लगनाई सिर्फ दिन मे सपना देखैक बराबर अछि। किछु गोटाके कहब छनि जे बिहार मे उद्योग धंधा कएल जाल बिछाकएकर विकास केल जा सकैछ। लेकिन जखन सड़क आ विजलिये नहि अछि त केना उद्योग आओत। दोसर बात ई जे प‍छिला अविकासक चक्रक फलस्वरुप आबादीक बोझ एतेक बढ़िगेल अछि जे पूरा इलाका मे कोनो खाली जमीन नहि अछि जतय पैघ उद्योग लगायल जा सकय। सिंगूर के उदाहरण सामने अछि। महाशक्तिशाली वाममोर्चा के सरकार के जखन बंगाल मे 1000 एकड़ जमीन नै ताकल भेलैक त एकर कल्पना व्यर्थ जे दरभंगा आ मधुबनी मे सरकार कोनो पैघ उद्योग के जमीन दै। दोसर बात इहो जे पूरा मिथिला के पट्टी मे, मुजफ्फरपुर सँ ल क कटिहार तक कोनो पैघ संस्था-चाहे ओ शैक्षणिक होई या औद्योगिक- नै छै जे एकमुश्त 3-4 हजार लोक के रोजगार द सकै। हमरा इलाका मे शहरीकरण के घनघोर अभाव अछि। जतेक शहर अछि ओ एकटा पैघ चौक या एकटा विकसित गाँव स बेसी नहि।एकटा ढंग के इंजिनियरिंग या मेडिकल कालेज नहि, एकटा यूनिवर्सिटी नहि। कालेज सब केहन जे 4 साल में डिग्री द रहल अछि। एक जमाना मे प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कालेज मे टीचर के अभाव छैक आ कालेज जंग खा रहल अछि। हम सब एहन अकर्मण्य समाज छी जे कोसी पर एकटा पुल बनबैक मांग तक नै केलहुँ,हमर नेता हमरा ठेंगा देखबैत रहला। आब जा क रेलवे आ रोड पुल के बात भ रहल अछि।कुल मिलाकरइलाका मे सिर्फ 8-10 प्रतिशत लोक शहर में रहैत छथि, ई ओ लोक छथि जिनका सरकारी नौकरी छन्हि। ई शहर कोनो उद्योग के बल पर नहि विकसित भेल। बाकी आबादी-लगभग 40 प्रतिशत दिल्ली आ पंजाब मे अपन कीमती श्रम औने-पौने दाम मे बेच रहल अछि। मिथिला के श्रम पंजाब मे फ्लाईओवर आ शापिंग माल बनाब मे खर्च भ रहल अछि, कारण कि हमसब एहेन माहौल नहि बनौलिएकि जे ओ श्रम अपन घर मे नहर या सड़क बनब मे खर्च होअए। तखन सवाल ई जे फेर उपाय की अछि। हमरा ओतय पैघ उद्योग नहि लागि सकैछ, रोड नहि अछि बाढ़ि के समस्या विकराल अछि, त हमसब की करी। लेकिन नहि, मिथिला के विकास एतेक पाछू भ गेलाक बाद एखनों कयल जा सकैछ। आ अहि विषय मे कय टा विचार छैक। किछु गोटा के कहब छन्हि जे एखुनका बिहारक सरकार मगध आ भोजपुर के विकास पर बेसी ध्यान द रहल छैक। एकर वजह जे सत्ता मे पैघ नेता ओही इलाका के छथि, लेकिन दोसर कारण इहो जे ओ इलाका बाढ़िग्रस्त नहि छैक। पैघ प्रोजेक्ट के लेल ओ इलाका उपयुक्त छैक। उदाहरणस्वरुप-एनटीपीसी, नालंदा यूनिवर्सिटी आ आयुध फैक्ट्री-ई तमाम चीज मगध मे अछि। दोसर बात ई जे नीक कनेक्टिविटी भेला के कारणे भविष्य मे जे कोनो निवेश बिहार मे हेतैक ओ सीधे एही इलाका मे जेतैक। कुलमिलाक आबै बला समय मे बिहार मे क्षेत्रीय असमानता बढ़य बला अछि। एहि हालत मे किछु गोटा अलग मिथिला राज्यक मांग क रहल छथि, आ हमरा जनैत संस्कृति स बेसी-अपन आर्थिक विकास के लेल ई मांग उचित अछि। मिथिला विकास माडेल की हुअके चाही।मिथिला के जमीन दुनिया के सबस बेसी उपजाऊ जमीन अछि। हमसब पूरा भारत के सागसब्जी आ अनाज सप्लाई क सकैत छी। लेकिन ओ सब्जी दरभंगा सं दिल्ली कोना जायत। एहिलेल फोरलेन हाईवे आ रेलवे के रेफ्रजेरेटर डिब्बा चाही। दोसर गप्प हमर इलाका के एकटा पैघ रकम दोसर राज्य मे इंजिनियरिंग आ मेडिकल कालेज चल जाईत अछि। हमरा इलाका मे 50 टा इंजिनीयरिंग कालेज आ 10 टा मेडिकल कालेज चाही। ई कालेज भविष्य में विकास के रीढ़ साबित होयत। हमरा इलाका मे छोट-छोट उद्योग जेना स़ाफ्टवेयर डेवलपमेंट या पार्टपुर्जा बनबै बला फैक्ट्री चाही जहि मे 100-200 आदमी के रोजगार भेटि जाय। लेकिन एहिलेल 24 घंटा विजली चाही। ई कतेक दुर्भाग्य के बात जे बगल के झारखंडक कोयला के उपयोग त पंजाब में बिजली बनबैक लेल भ जाय छैक लेकिन हमसब एकर कोनो उपयोग नहि क रहल छी। आई अगर हमरा अपन इलाका मे 24 घंटा बिजली भेटि जाय़ त पंजाब जाय बला मजदूर के संख्या में कम सं कम आधा कमी त पहिले साल भ जायत। भारत के दोसर राज्य सिर्फ आ सिर्फ अही इलाका के सस्ता श्रम के बले तरक्की क रहल अछि। हमसब ई जनितो किछु नहि क रहल छी, ई दुर्भाग्य के गप्प। मिथिला मे पढ़ाई लिखाई के प्राचीन परंपरा रहलैक अछि लेकिन सुविधा के अभाव मे ई धारा हाल मे कमजोर भेल अछि। खासकए महिला शिक्षा के दशा-दिशा त आर खराब अछि। एकटा लड़की कतेको तेज कियेक ने रहेए ओ 10 सं बेसी नहि पढ़ि सकैत अछि कारण घरक क्षेत्र कालेज नहि छैक। हमरा अगर तरक्की करय के अछि त इलाका मे एकटा महिला यूनिवर्सिटी त अवश्ये हुअके चाही, संगहि सरकार के ईहो दायित्व छैक जे हरेक ब्लाक में कमस कम एकटा डिग्री कालेज के स्थापना होअए। देश के विकास मे अहि इलाका के संग कतेक भेदभाव कएल गेलैक आ हमर नेतागण कतेक निकम्मा छथि-एकर पैघ उदाहरण त ई जे इलाका मे एकहुटा केंद्रीय संस्थान नहि छैक। एकटा यूनिवर्सिटी नहि, एकटा कारखाना नहि। आब जा क कटिहार मे अलीगढ यूनिवर्सिटी, दरभंगा में आईआईटी आ बरौनी मे फेर सं खाद कारखाना के पुनर्जीवित करैक बात कयल जा रहल अछि। हमरा याद अछि जे साल 1996 तक दरभंगा तक मे बड़ी लाईन नहि छलैक। हमसब कुलमिलाकर, कोनो तरहक संपत्ति के निर्माण नहि करैत छी। हमसब अपन आमदनी दोसर राज्य भेज दै छियैक-बेटा के बंगलोर मे इंजिनीयरिंग करबै सँ ल क दियासलाई तक खरीदै मे। हमर पूंजी अपन राज्य, अपन इलाका के विकास में नहि लागि रहल अछि। एहि स्थिति के जाबत काल तक नहि बदलल जायत हम किछु नहि क सकैत छी। सुभाष साह लन्दनमे नेपाल मेला २००८ (लन्दनसँ श्री सुभाष शाहक रिपोर्ट) लन्दन शहरमे पिकाडिली सर्कस नामक स्थान पर नेपाल एमबैशीक सहायता सऽ २१ आऽ २२ सितम्बर २००८ कऽ अहि मेलाक आयोजन कैल गेल छल जाहिमे नेपाल के पर्यटन मंत्री आदरणीया सुश्री हिशिला यामी नेपालक राजदूत श्री मुरारी राज शर्मा खैतान ग्रुपके चेयरमैन एवम्‌ मैनेजिंग प्रेसिडेंट श्री राजेन्द्र खैतान आदि सहित अन्य दिग्गज सब उपस्थित छलैथ।अतऽ इहो घोषणा कैल गेल जे साल २०११ के पर्यटन वर्षक रूपमे मनाओल जायत। सुश्री यामी सऽ हम सब अहू बात पर विचारविमर्श केलहुं जे 'लुम्बिनी' के पर्यटक सबलेल बेसी आकर्षक बनाबऽ लेल की कैल जा सकैत अछि।यामीजी अहि बात लेल प्रतिबद्ध भेली जे ओ सीता मैया एवम्‌ बुद्धदेवक इतिहास सऽ सम्बन्धित स्थानके विकासमे यथाशक्ति योगदान देती। श्री नवीन कुमार एवम्‌ सुश्री सुनीता शाह द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक परिधानक फैशन शो अत्यन्त सफल रहल।हमरा सब अन्मुक (ANMUK- Association of Nepali Madheshis in UK) के सदस्य सबलेल अहि आयोजनक सफलता बहुत पैघप्रोत्साहन अछि। हितेन्द्र गुप्ता आब नहि खुलत नवका शराबक दोकान बिहार मे आब शराबक नवका दोकान नहि खुलत. बिहार सरकारक ई फैसला अछि जे आब शराब दोकानक लेल नवका लाइसेंस जारी नहि कएल जाएत. बिहारक आम लोक लेल ई नीक खबर अछि. लोक सभ कमाई केर एकटा बड़का हिस्सा शराब पर खर्च करि दय छथिन्ह. बिहार मे तं कइटा घर शराबक चक्कर मे बर्बाद भ गेल. कतेक लोक सभ दिन भर मजदूरी कs क अएला के बाद सीधे शराबक दोकान पर चलि जाए छथिन्ह. नून-तेल खरीदय के जगह शराबक बोतल खरीद लैत छथिन्ह. परिवार के संग मारि-पीट करय छथिन्ह. सरकार एहि पर रोक लगाबय लेल शराबक दाम बेसि करि देलक मुदा कोनो खास फर्क नहि पड़ल. बिक्री जारी रहल. ओना सरकारक नवका लाइसेंस जारी नहि करय के फैसला सं खास फर्क नहि पड़त...किएक तं पुरना दोकान तं खुलले रहत. पुरना दोकान पर शराब तं मिलते रहत. अगर सरकार सच मे एहिपर रोक लगाबय चाहैत अछि तं ओकरा गुजरात जकां पूर्णरूप सं शराब पर बंदी लगाएबाक चाही. सरकार के कहनाय अछि कि ओ शराब के दुष्परिणाम के बारे मे लोक के जागरूक करत...हर साल 26 नवंबर के मद्य निषेध दिवस मनाएत. मुदा एकर खास असर नहि पड़त. अगर सरकार सच मे गंभीर अछि तं ओकरा सभ धर्मक धर्मगुरु के संग मिलि कs लोक मे एकर खिलाफ अभियान चलएबाक चाही. लोक सभ के ई बतैनाय जरूरी अछि जे एहि सं सेहत आओर पाई दुनू के नुकसान पहुंचैत अछि. ई लोक के खोखला बना दैत अछि. सरकार के एकटा तय समय सीमा दsक एकर दोकान करय वाला के दोसर बिजनेस करय लेल प्रोत्साहित करबाक चाही. एहि पर दस तरहक टैक्स लगा कs एकरा एतेक महंग करि देल जाए जेहिसं लोक एकरा खरीदय मे दस बेर सोचय. (हितेन्द्र गुप्ता साभार- हेल्लो मिथिला http://www.hellomithilaa.com/2011/06/blog-post_2742.html ) गंगेश गुंजन भोज परक आँटी- सत्तरिक नव-खाढ़िक युवा नवतुरिआसँ “भोज परक आँटी” अवश्य सुनल हएत बन्धु! हमरा लोकनि ते आब आयु-अवरोहणक प्रक्रियामे छी। मुदा पराभव अछि अपन एहि मैथिल मानक ओ स्वप्न जे मिथिलांचलक समग्र सामाजिक परिवर्तनक अर्थात्- जनपथक निर्माण (राजपथ नहि) आकांक्षामे सौँसे बातपर उत्कट डेगे चलिते रहबा लेल विवश छी। हमर गाम पिलखबारो ताहि से जुटल अछि, जाहिसँ हितेन्द्रजी अहाँक गाम केओटी। हमरा पीढ़ीकेँ तँ इतिहास “भोज परक आँटी” बना लेबाक बेर-बेर उपाय कएलक, जेना-तेना बँचबामे सफल रहलियैक, मुदा भऽ कहाँ कोनो खास सकलैक। तेकरे टा अफसोच। एक बोझक रूपमे फसिलकेँ खरिहानधरि कहाँ पहुँचा सकलियैक। तेकरे टा दुःख! मुदा टिकल रहलियैक अपन जीवन-मूल्य आ समाज दर्शनक भूमिपर। एक टा कवि-लेखक जे संघर्ष असकरो कऽ सकैत छी। से रस्ता चलबाक यत्न। जे से। पूरा बिहार- आन्दोलनक परिणति एहन आ एतए धरि भऽ जेतैक से क्यो सोचियोसकैत छलैक? अवश्ये बुझल हएत जे ताहि आन्दोलनक उपज- आमद भरि देश कैक टा महापद आसीन सी.एम. समेत कतोक एम.पी., एम.एल.ए. महोदय छथि। अहाँक पीढ़ीमे यदि सत्येक (सन्देह नहि सत्तरिक कारवाँक भव से कहि रहल छी जे) सत्ये मिथिलाक दर्द अछि तँ राजनीतिकेँ चिन्हैत जाइ जाऊ। पोलीटिक्स कऽ एहि नव अवतारकेँ। से भाषाक। ताहूमे मैथिलीक नव-नव ब्रांडक नेता आ एहन राजनीतिकेँ चीन्हि जाऊ। कारण जे राजनीतिक ई एकदम नव अवतार ठीक विश्व-बाजारी अवतार! कोनो औसत सुख लेल ककरो “भोज परक आँटी” नहि बनब। एहि वाष्पीकरणक प्रवाहमे एहन लोक नीक समय अर्थात् कोनो प्रतिगामी व्यवस्था रोकि नहि सकैत अछि। स्वयं राजनीतिक विचारधारा-अवधारणामे सेहो युगक अनुसार सकारात्मक पुनर्विचार चलि रहल छैक। जाति, धर्म, सम्प्रदय, क्षेत्रीयता सभसँ ऊपर सोचैत। समग्रतासँ एक होऊ। अपन मिथिलाँचलो तँ देशेमे ने अछि। अपम माँ मैथिली तँ अवश्ये महान। मुदा अन्य लोकक मातृभाषा सेहो तुच्छ नहि। अपना देशक सभ भाषा श्रेष्ठ अछि। मुदा दुर्भाग्यसँ किछु मूढ़ मैथिल मानसिकताक लोक आर तँ आर हिन्दी तककेँ अपमान जेकाँ कऽ देबाकेँ अपन मैथिल प्रेम बुझि लैत छथि, ई नकारात्मक प्रवृत्ति उचित नहि। हम तँ तेहन समयकेँ सहन कएने छी, जे किछु परम् विद्वान् अत्यन्त आदरणीय लोक लिखैत तँ मैथिली नहि तँ इंग्लिश। हिन्दी नहि। ई बहुत विचित्र लागए। आखिर हिन्दी अपन बहुत गौरवशाली लोकतन्त्र राष्ट्र-भाषा थिक। बन्धु! से मानसिकता बदलि जरूर रहल अछि मुदा अहाँ खाढ़िक (पीढ़ीक) युवा नवतुरिआमे आओर तेजीसँ परिवर्तन चाही। बात नहि रुचए तँ बिसरि जाएब, आग्रह! मैथिलीक उर्वर क्षेत्रमे कॉरपोरेट-जगत धाप एम्हर आब मैथिलीकेँ ई अष्टम सूचीक मान्यता एकटा आओर नव वादक उपहार-दरभंगा-मधुबनी-सहरसा वादक उपहार बनि रहलए। नव बाजारी प्रवृत्तिक ई प्रच्छन्न बीज-वपन आरम्भ भ’ चुकल अछि। सावधान। जे वर्ग एहि नव प्रयोजन-सिद्धिक बाट पर चलि आ’ चला रहलाह अछि, तनिकासँ संवाद होयबाक चाही। एखनहि-एही काल। अन्यथा मैथिलीक जतेक आ’ जेहन हानि आइ धरि नहि भेल छलैक, ताहिसँ बहुत बेशी आ’ खतरनाक नोकसान भ’ जयतैक। देशमे प्रचलित तुच्छतावादी प्रवृत्तिक विरुद्ध रखबारी कर’ पड़त। पूरवाग्रह मुक्त्त मन-प्राणसँ। अपना-अप्नी क’ क’ सुतारबाक, हथिययबाक अवसरवादी प्रवृत्तिसँ बाज अबै जाथि। मैथिलीक विषयकेँ समग्रतामे -देखि-बूझि क’- जाहिमे सम्पूर्ण मिथिला, मैथिल आ’ मैथिली अछि। छुछे दरभंगा-सहरसा-मधुबनी –ए टा नहि। आ’ ने छुच्छे सोति-ब्राह्मण-ब्राह्म्णेतर मैथिली भाषा-संस्कृति। तहिना साहित्य कथा कि कविता कि उपन्यास कि नाटके टा नहि। ई सभटा समस्त मिथिलांचलक एक जातीय सांस्कृतिक समग्रता तथा लोक गरिमाक, मानवीय गुणवत्ता, जीवनमूल्यक दबाबमे करैत रचनाकर-विचारकक संघर्ष आ’ आदर्शोन्मुख अभिव्यक्त्तिमे समस्त युग-यथार्थ बनैत अछि। ओना अपना-अपना पीढ़ीक प्रति आग्रह-आवेश स्वाभाविक, तेँ सभ दिना यथार्थ। मुदा वैह यदि कट्टरताक रूप ल’ लिअय तँ सामाजिक जहर बनि जाइछ। दुःखद आ’ चिन्तक विषय तँ ई जे एहन प्रवृत्ति मैथिली भाषा आ’ साहित्यमे सृजनरत अधिकांश नव्यतम रचनाकारमे पर्यंत देखाइ पड़’ लागलए। जनिकर लेखनसँ मैथिलीकेँ बड़-बड़ आशा छैक। से लोक सेहो।ई दुश्चिन्तेक विषय। एहन विभाजनकारी, विद्वेषोन्मुखी डेगकेँ रोकबाक चेतना जगाउ। आरम्भेमे-एखने। एहन वेगमे संस्थामूल्य सभक क्षय होयबामे समकालीन लोकक नकारात्मक पहल केर मुख्य भूमिका रहैत आयल छैक। आइ तँ आर। संस्था समेत साहित्यक आकलन-मूल्यांकनसँ ल’ साहित्य-सम्मान धरिक मानदण्ड-निकष-कसौटीक निष्पक्षता आ’ ईमानदारी पर प्रश्न उठि रहल अछि। संस्था मूल्य सभक क्षरण आ’ कठघरामे ठाढ़ कएल जयबाक घटना सभकेँ, हल्लुक क’ नहि, बहुत गंभीरता आ’ जिम्मेदारीसँ स्वीकार करबाक एखनहि अछि- बेर छैक। नहि तँ पछताय लेल तँ सौँसे भविष्य धएल अछि। एहि परिस्थिति तथा एकर खतरनाक प्रवृत्ति पर लोकक ध्यान जयबाक चाही, जे कोना एन.आर.आइ. प्रकारक लोक सभ आइ एक-बएक अचानक मैथिलीक भाषा-सांस्कृतिक आँगनकेँ सेहो कब्जा क’ रहल छथि। तेहन देशी एन.आर.आइ प्रकारक लोककेँ अवश्य चिन्हित कयल जयबाक चाही जे मिथिलांचल-मैथिली भाषा आ’ लोकक प्रसँग कहियो किछु नहि कयलनि। कोनो योगदान नहि। परन्तु आइ मैथिलीक ओहू क्षेत्रक अवसर आ’ संस्थाकेँ अपने अधीन क’ लेबाक प्रबंधमे सक्रिय, लगातार सफल भ’ रहल छथि। विडंबना तँ ई जे मैथिली-मिथिलांचलक विरुद्ध एहि गतिविधिमे बहुत रास तथाकथित मैथिलीक उच्चकोटिक लेखक-समालोचक-कवि ( छद्म प्रातिशील रचनाकार समेत) सेहो कोनो आपत्ति वा विरोध दर्ज नहि क’ रहल छथि। बल्कि मैथिलीक एहि नवोदयक-साम्राज्यवादक परोक्ष सहयोगे क’ रहल छथि। सँभव जे भविष्यमे अपना लेल कोनो उत्पादक अवसरक वास्ते निवेश बुद्धिसँ, ई सभ क’ रहल होथि, एकरे व्यावहारिक बाट मानि क’ चुप बनल छथि। युवा पीढ़ीक सेहो। के पड़य एहि सभमे? अद्यावधि प्राप्त इतिहासक जानकारीमे तत्काल यश-धनक अति-उताहुल , व्यग्र नव पीढ़ी! ई पराभव बजार आ’ भूमंडलीकरण (प्रायः!) मिथिलांचलक एहि नव गणित आ’ समाजशास्त्रकेँ की चीन्हओ? जा रहल लोक चीन्हओ कि आबि रहल लोक? ककर दायित्व। हमरा जनैत अवसर आ’ दूरगामी प्रभाव परिणतिकेँ दृष्टिमे राखि क’, छुच्छे बौद्धिकताक, बुद्धिजीविताक संकीर्णताक नहि, सबजन मैथिल अर्थात् जनसाधारणक मंगलकेँ नजरि पर राखि, स्वच्छ हृदय, पारदर्शी व्य्वहारवादक चलन अनै जाउ। यदि सत्ये मैथिली, मिथिलासँ अनुराग हो। पारम्परिक मैथिल कूटिचालि चोड़ै जाइ जाउ। अंततः मैथिली अपना सभक एकहि टा नाओ अछि। सभ गोटय एही नाओमे सवार छी। पार उतरब तँ सभ क्यो। तेँ नाओमे भूर नहि हो। बीचहिमे डूबय ने कतहु। अन्हारोमे अनका टाटक भूर देखबाक आँखि आ’ नेत बदल’ पड़तैक।(अन्हारोमे अनका टाटक भूर देखबाक बिम्ब पूर्णियाक कवि- प्रशान्तजीक मन पड़ि गेलय ‘सद्य मैथिल छी’) जे ओ’ आकश्ववाणी पटनाक मैथिली कार्यक्रम भारतीमे प्रसारित कयने रहथि)। नकारात्मक-ध्वंसात्मक समझ आ’ बुद्धिसँ परहेज करए जाइ जे क्यो से क’ रह्ल होइ। चन्द्रमा पर नव प्रभुवर्गक प्लॉट-रजिस्ट्री जेकाँ सद्याः उपलब्ध मैथिलीक एहन ऐतिहासिक अवसरक उपयोग सोचै जाउ-उपभोग नहि। दरभंगा बनाम सहरसा बना क’ मैथिलीक क्षेत्रीय रजिस्ट्री जुनि करबै जाउ। मनै छी, कहियो छल हेतै ई मनवाद। मुदा से मैथिलीक नितांत दोसर दौर छलैक। से ध्यान रखबाक थिक। ई(वि)काल प्रायः सभ भाषा-साहित्यक इतिहासमे अबैत रहलैए। साहित्यिक सरोकार समाजसँ रहैत छैक, तथा समाज जीवन-यापन समेत जीवन-शैली आ’ जीवन मूल्यक निर्मिति आ’ निर्वहन तत्कालीन सत्ताक उपज होइत अछि। तेँ जन साधारणे लोकटा नहि, बुद्धिजीवी आ’ नेतृवर्ग सेहो ताही दबाबमे अपन प्राथमिकता तय क’ क’ अपन बाट बनबैत अछि आ’ सुभीता चह’ लगैत अछि। कालांतरमे जल्दीये तकर अभ्यस्त भ’ जाइत अछि। मध्यम वर्ग बेशी आ’ जल्दी। ई सुविधावादी जीवन-शैली आ’ जीवनदर्शन जन्मैत छैक- कहियो धर्म-सत्ता, कहियो राज-सत्ता, कहियो विकलांग लोकतंत्र वा कहियो अपरिपक्व लोक सत्ताक विचार-व्यवहारक संवेदनशील व्यवस्था शासनक अधीनतामे। बहुसंख्यक जनताक अशिक्षा दुआरे। तखन ओहि समयक जे बुधियार वर्ग रहैत अछि से सत्ताक अनुगमन करबाक सुभीतगर निष्कंटक बाट चुनैये। सुभीताकेँ अपन जीवन-मूल्य बना लैत अछि। जे बुधियार नहि अर्थात् जनसाधारण लोक, ताहि परिस्थितिकेँ अपन नियति वा प्रारब्ध मानि लैत अछि। एना अगिला कएक पीढ़ी धरि एहिना ओंघड़ाइत चलैत चलि जाइत छैक। गुलामी खाली कोनो बाहरीये देश वा सम्राट-साम्राज्येक टा नहि होइत अछि। गतानुगतिकता आ’ यथास्थितिवादी मानसिकता आ’ युगक प्रगति-गतिकेँ नहि बूझि, मूड़ी निहुँरैने सभ किछु स्वीकार आ’ सहैत चलि जाइक प्रवृत्ति सेहो गुलामियेक थिक। सत्ता तुष्ट लोकक ताबेदारी सेहो नव भाँग-गाँजाक अभ्यास अर्थात् गुलामिये होइत अछि। से ई सभ प्रकारक गुलामी बहुत युग धरि चलैत रहि जाइत छैक- अगिला कोनो सामाजिक परिवर्त्तन- कोनो महाक्रांति अयबा धरि। एखन धरिक इतिहासक शिक्षा तँ यैह कहैत अछि। उर्वर क्षेत्रक आविष्कारक बाद बजार ओकरा हथियबैत छैक। तेहन लोक से क’ नहि गुजरय। निजी सम्पत्ति ने बना लिअय। एकर रजिस्ट्री-केबाला ने करबा ने करबा लिअय। मैथिलीकेँ मसोमातक जमीन जेकाँ अपना-अपना नामे लिखबाक व्योंतमे लागल तेहन लोक से क’ नहि लिअय। एहि प्रक्रियामे माफियो –घुसपैठियो सभक गतिविधि अचानक तेज भ’ जाइत छैक। कहबाक प्र्योजन नहि जे मैथिली एखन सैह उर्वर क्षेत्र बनल अछि। मैथिली माफियाक कॉरपोरेट सेक्टर जोशमे अछि। गतिविधि तेज केने अछि। मैथिलीक विषयकेँ समग्रतामे -देखि-बूझि क’- जाहिमे सम्पूर्ण मिथिला, मैथिल आ’ मैथिली अछि। छुच्छे दरभंगा-सहरसा-मधुबनी-ए टा नहि। आ’ ने छुच्छे सोति-ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर मैथिली भाषा, संस्कृति। तहिना साहित्य कथा कि कविता कि उपन्यास कि नाटके नहि। ई सभटा समस्त मिथिलांचलक एक जातीय सांस्कृतिक समग्रता तथा लोक गरिमा, मानवीय गुणवत्ता, जीवनमूल्यक दबाबमे करैत रचनाकार-विचारकक संघर्ष आ’ तकरे आदर्शोन्मुख अभिव्यक्त्तिमे युग-यथार्थ बनैत अछि। सद्यः उपलब्ध मैथिलीक एहन ऐतिहासिक अवसरक उपयोग सोचै जाइ- उपभोग नहि। दरभंगा बनाम सहरसा बना क’ मैथिलीक रजिस्ट्री-बन्दोबस्त नहि करबै जाइ जाय। किछु एहनो बात विषय यद्यपि एहि बात –‘सगर राति दीप जरय’ पर हम सिद्धांततः प्रभासजीसँ सहमत नहि रहलौँ, परन्तु एम्हर पछिला दशकमे ई तिमाही-कथा गोष्ठी- ‘सगर राति दीप जरय’- आजुक मैथिली कथा-विधामे की योगदान कएलक अछि, से तथ्य आब इतिहासमे दर्ज अछि। ई बात सही छैक जे एहन कोनो कार्य कोनो एक गोटेक नहि होइछ। मुदा सभ वर्त्तमानकेँ ओहि एक संस्थापना-कल्पक व्यक्त्ति-लेखककेँ अवसरोचित रूपेँ कृतज्ञतासँ स्मरण अवश्य कयल जयबाक चाही। से लेखकीय नैतिकता थिक। आ’ हमरा जनतबे, से रहथि- स्व. प्रभास कुमार चौधरी। हमरा तखन दुखद निराशा भेल जखन एहि बेरक मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार पओनिहार प्रदीप बिहारीजी साहित्य अकादेमी-सभागारमे लेखक-सम्मिलन-अवसर पर अपना वक्तव्यमे सगर राति दीप्प जरयक उपलब्धिक चर्चा तँ कएलन्हि, मुदा स्व. प्रभास जीक नामोल्लेखो नहि कयलखिन। एकरा हम साधारण घटना नहि मानि सकैत छी। गंभीर बात बुझैत छी। कारण हमरा लोकनि रचनाकार छी। औसत कोटिक कोनो राजनीतिक नहि। संभव हो नाम अनावधानतामे छूटि गेल होनि। मुदा हमरा सभ लेखक छी तेँ एहन असावधानी करबा लेल स्वाधीन नहि छी। यद्यपि अपन खेद हम हुनका प्रकट कयलियनि। हमरा लगैये जे अपन-अपन सकारात्मक इतिहासक प्रति सभ पीढ़ीक मनमे कृतज्ञताक भाव अंततः लेखकक ऊर्जा आ’ प्रेरणे बनैत रहैत छैक। बतौर कवि हम मैथिलीमे जाहि काल-बिन्दु पर ठाढ छी, तकर जड़ि विद्यापतिसँ ल’ सुमन-किरण-मधुप- आ यात्रीएमे। ई सोचि क’ मन कृतज्ञ होइत अछि! बल्कि गौरांवित। ओना, एकटा लेखक रूपमे हम एहिमे सँ क्यो नहि छी। जेना सभ, सभक कारयित्री प्रस्थान छथि, तहिना हमहुँ नागार्जुन-यात्रीक कारयात्री प्रस्थान छी। आ’ ई भाव हमरा रचनाकर्ममे अग्रसर करबाक उत्तरदायित्व द’ गेलय। तर्पण तिल-कुश –अंजलि बला कर्मकाण्डकेँ तँ हम नहि मानैत छी, मुदा पुरखाक तर्पण हमरा प्रिय अछि। अपना शैलीमे। अपन जीवन-मूल्यक एकटा अभिन्न तत्त्व बुझाइत अछि। तकर बाट की हो? अवसर पर कृतज्ञ स्मृति! अवसर पर- तिथि पर नहि। डॉ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग –डॉ कैलाश कुमार मिश्र -हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि। एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आ वर्णनकेँ पढ़थि आ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि। यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी। अपन संस्था –इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आ विरासत केर रक्षा कएल जा सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल। लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक। असम केर अधिकांश ऑफिस आ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी। स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक। शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जा सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। सदिखान ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि। गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जा सकैत अछि: १.अपर असम २.लोअर असम ३.बराक घाटी ४.नॉर्थ कछार घाटी शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी। शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब। गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह। गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह। समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक। खैर! शर्माजीक प्रयास आ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जा सकैत अछि। हमर कोठरी काफी पैघ आ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”। हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”। हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”। एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ। अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल। किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ। स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। “हाफलाऊ” शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)। हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक। अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक। नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक लोक रहैत छथि: १. दीमासा (Dimasa or Cachari) २. ह्मार (Hmar) ३. जेमि नागा (Zeme Naga) ४. कुकी (Kuki) ५. बंइते (Baite) ६. कार्बी (Karbi) ७. खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar) ८. ह्रांगखल (Hrangkhals) ९. वइफी (Vaiphies) १०. खेलमा (Khelma) ११. रोंगमई (Rongmei) एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि। अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक। रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए। उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक। १८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक। नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक। नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आ मइबांग)मे विभक्त अछि। अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः (क) लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.) (ख) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर) (ग) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर) ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आ गाम सेहो चलब”। गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छकि? आ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ। जटींगा पहाड़ी आ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक। अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक। अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक। आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक। जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कतहु कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए। १९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:. घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह। सभ कियो हमरा माध्यमसँ आ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”। लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक। जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी: A harmonious game of hide and seek Behind the bushes, marshy meadow Under shadow with clouds view, Ever ready for worthwhile, cherish at dawn, The blues make enchanting heart of lovers Midst of covers white Changing scene that lively for romance Beauty and bounty of brooks that flow. Moments of joy, love to cherish Insight the harmony game of hide and seek Behind thick trespasses of white and blue With narrow path of zig-zag. The beauty of hills under cover Orchids, white fall, violet at hills Every moment thrilled with behalf Nature disposal at North Cachar Hills जितेन्द्र झा, पताः जनकपुरधाम, नेपाल रिपोर्ताज स्वरक माला गँथती अंशु हम सभ अपने भाषाकेँ हेय दॄष्टिसँ देखैत छी तें हमर भाषासाहित्य, गीतसंगीत आ संस्कृति पछुआ रहल अछि। ई कहब छन्हि अंशुमालाक। अंशु दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे संगीतमे एम फ़िल कऽ रहल छथि। मैथिली गीत संगीतकेँ गुणस्तरीय बनएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिलकेँ अपन भाषा-संगीत प्रतिक दृष्टिकोण बदलबापर जोड दैत छथि। अंशुमाला संगीतक विद्यार्थी छथि। दिल्ली विश्र्वविद्यालयमे एम. फ़िल.मे अध्ययनरत अंशुक माय हिनक पहिल गुरु छथिन्ह। ई माय शशि किरण झासँ मैथिली लोक संगीतक शिक्षा लेने छथि। तहिना एखन किछु बर्षसं ई रेडियो कलाकार हॄदय नारायण झासँ संगीत शिक्षा ल' रहल छथि। बाल कलाकारक रुपमे सीतायण एलबममे गाबि चुकल अंशु बिभिन्न रेडियो कार्यक्रम आ स्टेज प्रोग्राममे सहभागी भ' क' मैथिली गीत गाबि अपन स्वरसं प्रशंसा बटोरने छथि। एखन दिल्लीमे रहिकऽ संगीत साधनामे जुटल अंशु दिल्लीमे आयोजित विभिन्न कार्यक्रममे मैथिली गीत संगीत परसल करैत छथि। मैथिली भाषीमे अन्य भाषाक गीत संगीतक प्रति बढैत रुचि मैथिली गीतसंगीत लेल हितकर नञि रहल हिनक कहब छन्हि। दिल्लीमे आयोजित एकटा कार्यक्रमकेँ याद करैत ई कहैत छथि जे जाहि कार्यक्रममे लगभग ८ हजार मैथिल रहथि ताहि कार्यक्रममे चाहियोकऽ मैथिली गीत नहि गाबि सकलहुं। ओहि कार्यक्रममे भोजपुरीक डिमाण्ड पुरा करैत अंशुके मैथिली डहकन गेबाक लेल मोन मसोसिक' रह' पडलनि। मुदा अंशु स्वीकारैत छथि जे गायक स्रोताक रुचिक आगु विवश होइत अछि, 'जनता जे सुनऽ' चाहत हमरा सएह गाबऽ पडत अंशु कहलनि। पटनामे मैथिली गीत गाबिक स्रोताक तालिक गडगडाटिसं खुश हएबाक आदति पडि चुकल अंशुकेँ दिल्लीमे आबिकऽ मैथिल भाषीक बदलल सांगीतिक स्वादसं अकच्छ लागि गेल रहनि। मैथिलीमे लोकप्रिय धुनक अभाव रहबाक बात अंशु किन्नहु मान' लेल तैयार नहि छथि। धुन वा लयक अभाव नहि, स्रोता एहिसं अनभिज्ञ रहल हिनक दाबी छन्हि। मैथिली संगीतकर्मी एखनो आर्थिक समस्यासँ लडि रहल छथि, अंशु कहैत छथि। एहिक अभावक कारण प्यारोडी गीतक सहारा लेबालेल संगीतकर्मी बाध्य बनल अछि। मौलिक गीत,संगीतमे लगानीकर्ताक अभाव रहलासँ सेहो प्यारोडी संगीत लोकप्रिय भऽ रहल अछि, हिनक कहब छनि। 'सभसँ पैघ कमजोरी श्रोत छै कलाकार तँ सभ ठाम हारल रहैया' प्यारोडी प्रेमीपर रोष प्रकट करैत अंशु कहैत छथि। मुदा मैथिलीमे स्तरीय गीत संगीत स्रोताकेँ भेटक चाही से अंशुक विचार छन्हि। मैथिली लोकरंग मन्चद्वारा दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे श्रोता भेटल वाहवाहीक उदाहरण दैत अंशु कहैत छथि जे स्रोताक मनोरन्जनक लेल स्तरीय कार्यक्रम सेहो हएबाक चाही। मैथिली रंगकर्ममे लगनिहारकेँ उचित सम्मान तक नञि भेटि सकल, अंशुमालाक अनुभव छन्हि। मैथिली कलाकारकेँ आब' बला दिनमे बहुत मान सम्मान भेटक चाहि, हम इएह चाहैत छी अंशु कहैत छथि। मैथिली संगीतकेँ एकटा ऊँचाई पर पंहुचएबाक लक्ष्य रखनिहारि अंशु मैथिली रंगकर्ममे एखनो लडकी लेल बहुतो कठिनाई रहल बतबैत छथि। अंशु आगु कहलनि-मैथिल समाजसँ जाधरि कलाकारकेँ सम्मान नञि भेटतै ताऽ धरि एहि क्षेत्रमे लडकी अपन प्रतिभा देखाब' लेल आगु नञि आओत। नेपाल वन आ मधेश स्पेशल टेलिभिजनमे जँ मैथिलीक मादे बात करी त नेपाल वन टेलिभिजनके एकटा अलग स्थान बनि चुकल अछि। नेपाल वन टेलिभिजन राति पौने ८ बजे प्रसारित होब' बला मधेश स्पेशलक माध्यमसं मैथिली बहुतो मैथिल धरि पंहुच रहल अछि। नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाए बला दोसर भाषा मैथिली रहितंहु ओत्त ताहि अनुपातमे संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान नई भेट सकल छइ। एहन अवस्थामे पडोसी देश भारतसं सन्चालित नेपाल वन टेलिभिजन मैथिलीमे कार्यक्रम प्रसारण क मैथिलीभाषा भाषी मध्य अपन अलग स्थान बनालेने अछि। नेपालमे सरकारी स्तरपर संचालित नेपाल टेलिभिजन सहित निजी टेलिभिजन च्यानलमे मैथिली एखनो उपेक्षिते अछि। यद्यपि बेर बेरके मधेश आन्दोलन आ संचारमाध्यमपर लाग बला साम्प्रदायिकताक आरोपक कारणे काठमाण्डुकेन्द्रित टेलिभिजनसबमे आब मैथिलीके स्थान भेट लागल छइ। काठमाण्डुसं प्रसारित सगरमाथा टेलिभिजन सेहो सभदिन मैथिलीमे समाचार देल करैत अछि। नेपाल वन टेलिभिजनक मधेश स्पेशल नामक 1 घण्टाक कार्यक्रममे समाचार, नेपालक समसामयिक राजनीति, नेपालक प्रमुख मुद्दापर बातचित आ गीत संगीत समेटल गेल अछि। समसामयिक वस्तुस्थिति पर लोक अपन धारणा द क परिचर्चाके महत्वपूर्ण बना देल करैत अछि। ई कार्यक्रम राति पौने आठ बजेसं पौने नओ बजेधरि प्रसारित होइत अछि। नेपाल केन्द्रित समाचार रहितो नेपाल सं बाहर इ कार्यक्रम देखिनिहार मैथिल कमी नई अछि। नेपालक सीमावर्ती मधुवनी, दरभंगा, सीतामढी, सुपौल, सहरसासहितके जिल्लासभमे सेहो एकर दर्शकके कमी नहि अछि। नेपालक मैथिल जत्त मैथिलीमे समाचार, गीत, आ परिचर्चा सुनि क सुसूचित होइत छैथ ततई भारत आ आन ठामक दर्शक मैथिली गीत आ संचारमाध्यममे मैथिलीक बोली सुनि हर्षित भेल करैत अछि। मधेश स्पेशल नेपालक मधेशीके एकटा अन्तर्राष्ट्रिय संचारमाध्यममे मुंह खोलि क बजबाक अवसर देलकै, सेहो अपने भाषामे। नेपालक संचारमाध्यमसं सेहो कटल कट्ल रहबला मधेशके छोट छिन घटना सेहो प्रमुख समाचार बन लागल। मधेशीक मुद्दापर खुलिक बहस शुरु भ गेल। मधेशक नेता सेहो धोती कुर्ता पहिरिक काठमाण्डुएमे बैसि क कोनो टेलिभिजन पर प्रत्यक्ष रुपेँ जनतासँ बातचित कर लगला। टेलिभिजनमे जत्त मैथिली शुन्यप्राय छल ताहि अबस्थामे एक्कहिबेर एक घण्टा मैथिलीक कार्यक्रमके लोकप्रिय होब मे बेशी समय नइ लगलै। एखन इ कार्यक्रम दू बर्ष पुरा कर लागल अइ। नेपाल 1 टेलिभिजन डिस टिभी आ टाटा स्काइपर उपलब्ध हएबाक कारणे इ देश विदेशमे रह बला मैथिललग सहजहिं पंहुच बनालेने अछि। एहिद्वारे लगभग ७० टा देशमे रहबला मैथिल भाषी मधेश स्पेशलके माध्यमसं मैथिलीमे सुचना आ मनोरन्जन ल रहल छैथ। मधेश स्पेशल मैथिली आ भोजपुरीक मिश्रित कार्यक्रम अछि। एहिमे मैथिली भाषाक गीत नादक अतिरिक्त भोजपुरीक चौकी तोड आ आधुनिक गीत सेहो प्रसारण होइ छै। ई कार्यक्रम तीन भागमे बाटल अछि। पहिलमे नेपाल आ अन्तर्राष्ट्रिय समाचार रहैछै त दोसरमे समसामयिक चर्चा(टक शो) आ तेसरमे मैथिली/भोजपुरी गीत। दृश्य संचारमे मधेश स्पेशल मैथिलीके जगजियार करमे बड पैघ भूमिका निर्वाह क रहल अछि आ क सकैत अछि से कहनाई अतिशयोक्ति नई हएत। डोम कछ आ जट जटिनक नाचसं जं माटिक सुगन्ध लेब चाहैत हुवए त हुनका सभहक लेल मधेश स्पेशल सहायक भ सकैत छै। मेधेश केन्द्रित कार्यक्रम होइतो इ मिथिलान्चलके सर्वाङिण विकासमे कत्तेक सहायक हएत से त आव बला दिने बताओत मुदा एतवा निश्चित जे टेलिभिजनमे मैथिलीक नियमित प्रसारणसं मैथिलके अपन बोली अपन भाषा याद दियबैत रहैतै। नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार भाषा हित कि भोट्क लोभ नयी दिल्लीक मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष एवं दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित मैथिली भोजपुरी एकेडमीकेँ आन एकेडमीसँ आगू बढल देखऽ चाहैत छी, से कहलनि अछि। मैथिली भोजपुरी एकेडमी द्वारा आयोजित भिखारी ठाकुरक विदेशिया नाटक मन्चन कार्यक्रममे दीक्षित ई बात कहलनि। मैथिलीक लेल अलग एकेडमीक माँगक प्रति दीक्षित कहलनि जे हमरा सभकेँ जोड़क बात करक चाही तोडक नञि। एकताक दोहाइ दैत मुख्यमन्त्री भने अलग एकेडमीक् बातसँ कन्नी कटने होथि मुदा मैथिली भाषा साहित्यमे लागल प्रबुद्धबर्ग मानैत छथि जे अलग एकेडमीसँ मात्र मैथिलीक वास्तविक विकास भऽ सकत। ओना एकेडमी भोट बटोरबाक साधन मात्र नञि बनए ताहि दिश सेहो ध्यान देब जरुरी अछि। एकेडमीक आयोजनमे ६ अगस्त मंगलक राति विदेशिया आऽ ७ अगस्त बुधक राति महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक मन्चित कएल गेल छल। मैथिली भोजपुरी एकेडमी आन एकेडमीसँ आगू बढय से दीक्षितके कहब रहनि। सरकारी ढिलासुस्तीकेँ स्वीकारैत ओऽ एक दिन सबहक आवाज सुनल जायत, कहलनि। नव दिल्लीमे एकेडमी द्वारा आयोजित कार्यक्रममे भोजपुरी नाटक विदेशिया देखलाक बाद दीक्षित नाटक खेलनिहार रंगकर्मीकेँ प्रशंसा केने रहथि। नाटयशालामे भोजपुरी आऽ मैथिली भाषीक भीड़ लागल छल। तहिना मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष अनिल मिश्र, एकेडमी, विहारक समॄद्ध संस्कॄतिकेँ बखानैत एहन प्रस्तुति निरन्तर होइत रहत, से जनतब देलनि। "हमर सिंहासन अटल अछि" मलंगिया 'जाधरि हमर कलम चलैत रहत ताधरि मैथिली नाटककारक रुपमे हमर ऊँचाइ धरि कियो नञि पहुँचि सकैत अछिए। ई सिंहनाद छनि मैथिलीक प्रख्यात नाटककार महेन्द्र मलंगियाक। समकालीन मैथिली साहित्यकारकेँ चुनौती दैत, ओ नाटककार अपन सिंहासन किनको बुते डोलाएल पार नञि लगतए से दाबी करैत छथि। मैथिली नाटककार महेन्द्र मलंगिया एखन मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आऽ ख्यातिप्राप्त नाटककारमे चिन्हल जाइत छथि। चुनौतीपुर्ण शैलीमे मलंगिया कहैत छथि, हमर हाथमे जाधरि कलम अछि, हम अपन स्थानपर टिकले रहब, हमर सिंहासन अटल अछि। मैथिली नाटकक भीष्मपितामह कहल जाए तँ केहन लगैए, ताहि जिज्ञासामे मलंगिया मुस्कियाइत कहलनि जे हमर नाटक लोककेँ पसिन छञि हमरा ताहि पर गर्व अछि, हम जाहि स्तरक नाटक लिखैत छी, तेहन रचना एखन नञि भऽ रहल छञि। ओऽ जनकपुरक रंगकर्मीक खुलिकऽ प्रशंसा करैत छथि। मैथिली रंगकर्ममे लागल जनकपुरक कलाकारक मलंगिया प्रसंशा करैत कहलनि, जनकपुरक कलाकारसँ बहुत आशा कएल जाऽ सकैत अछि। मैथिली नाटकमे शेक्सपियर कहल जाएबला मलंगिया ४ दशकसँ बेशी समय नेपालमे बिता देने छथि। ओऽ नेपालमे मैथिली साहित्यक संरक्षण लेल सन्तोषप्रद काज नञि भऽ सकल, बतौलनि। नेपालमे दोसर सभसँ बेशी बाजल जाएबला भाषा मैथिलीमे रंगकर्मक समयसापेक्ष बिकास नञि भऽ सकल मलंगियाक कहब छनि। लोकतन्त्र बहालीक बाद सेहो नेपाल सरकार मैथिलीक लेल किछु नञि कऽ सकल हुनक आरोप छन्हि। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान द्वारा मैथिली भाषा, साहित्यक लेल भेल काजके ओऽ कौराके संज्ञा देलनि। प्रतिष्ठानद्वारा मैथिलीलेल भऽ रहल काज प्रति मलंगिया असन्तुष्टि ब्यक्त कएलनि। मैथिली रंगकर्ममे निरन्तर कार्यरत संस्थाकेँ सरकार दिशसँ कोनो तरहक सहयोग नञि भेट रहल बतबैत, ताहि प्रति खेद ब्यक्त कएलनि। सरकारी उपेक्षाक कारण सेहो मैथिली रंगकर्म ओझराहटिमे पडल, मलंगिया मानैत छैथ। मैथिली साहित्यमे नाटककार आऽ निर्देशकक रुपमे ख्यातिप्राप्त मलंगिया रंगकर्मकेँ रोजीरोटीसेँ जोडल जाए, से कहैत छथि। जाऽ धरि रोजीरोटीसँ रंगकर्म नञि जुटत ताऽ धरि बिकास सम्भव नञि, मलंगिया स्पष्ट कहैत छथि। जनकपुरमे मिथिला नाटय कला परिषदसँ आबद्ध भऽ मैथिली नाटककेँ जन-जन धरि पंहुचएबाक अभियानमे लागल मलंगिया राजतन्त्रमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणक लेल कोनो काज नञि भेलाक कारणे सेहो मैथिली पछुआएल अछि, से कहलनि। मैथिली भाषामे आम दर्शकक मोनमे गडि जाएबला नाटक लिखिकऽ मैथिली साहित्यक श्री बृद्धिमे योगदान देनिहार मलंगिया नाटककार नाटक लिखैत काल दर्शकक मानसिकता, उमेर , शिक्षा आऽ पेशाकेँ ध्यानमे राखए से सलाह दैत छथि। 'हम दर्शककेँ लक्षित कऽ नाटक लिखैत छी, तेँ हमर लिखल नाटक लोककेँ नीक लगैत छञि, मलंगिया अपन सफ़लताक रहस्य बतबैत कहलनि। बिदेशिया नाटक बिदेशिया घुरि जो विदेश जएवाक बाध्यता समाजक एकटा कटु सत्य अछि। अपन गामघर छोडिकऽ कियो विदेश जाय नञि चाहै-ए, मुदा परिस्थितिक आगू ककरो किछु नञि चलए छञि। किछु एहने परिवेशकेँ पर्दापर देखेबाक प्रयास कएल गेल विदेशिया नाटकमे। मैथिली भोजपुरी एकेडमीद्वारा दिल्लीमे आयोजित विदेशिया नाटकमे किछु एहने देखल गेल। वियाह भेलाक किछुए दिनक बाद विदेशिया गाम छोडि दैत छञि, विदेश जाऽ कऽ पैसा कमाय लेल। गाम संगहि विदेशियाकेँ छुटि जाइत छञि, अपन नवकी कनियाँ, गामक संगी-साथी आऽ याद सेहो। ओ पाईक लोभसँ घर छोडने रहैया, मुदा ओऽ पाई तँ नईहे कमासकल शहरमे अपन जीवनके एकटा आओर साथी बनालैयऽ। एम्हर ओकर पहिल कनियां विदेशियाके बाट जोहैत रहैयऽ। विदेशियाक यादमे ओऽ कखनो बटुवाके पुछैयऽ तँ कखनो बारहमासा गबैयऽ। नाटकक निर्देशक संजय उपाध्याय विदेश जएबाक ग्रामीण प्रबॄतिकेँ सुखान्त बनेलहुँ से कहलनि। गामक सोझ आऽ सुशील कनियाकेँ छोडि विदेशिया विदेशमे रइम जाइयऽ। ओकरा आब शहरिया संगी निक लगै छइ, जे दुगोट बच्चाक माय सेहो अइ। विदेशिया अपना आपके बिसरि जाइयऽ। गामक कनिया नइ शहरक छम्मकछल्लो आब ओकर प्राण भऽ गेल छञि। एहिबीच भिखारी विदेशियाकेँ निन्नसँ जगबैत अछि। नाटकमे भिखारी बनल रंगकर्मी अभिषेक शर्मा नाटकक माध्यमसँ लोक अपन गाम घरके याद करलेल विवश भऽ जाइयऽ, से कहलनि। विहारक सुपौल जिलाक रंगकर्मी शारदा सिंह नाटकमे देखाएल गेल विषय बस्तु समाजक सत्य रुप रहल बतौलनि। विदेशिया गाम तँ घुरैयऽ मुदा असगरे नई चारि गोटेक संगे , दूटा बालगोपाल आऽ तकर माय। किछु झोंटाझोंटी आऽ कलहक बाद दु्नू सौतिन आऽ विदेशिया गामेमे रहऽ लगैयऽ। नाटक अन्ततः सुखान्त भऽ कऽ समाप्त होइत अछि। ई कथा गामसँ बाहर रहनिहार एकटा निम्न मध्यमबर्गीय युवककेँ जिनगीक मात्रे नञि अछि। बहुतो युवक गाम देहात छोडिते अपन माटि पानिकेँ बिसरि जाइत अछि। शरीरसँ मात्र नञि मोनसँ सेहो विदेशिया भेनिहारकेँ ई नाटक अपन गाम अपन वास्तविक पहिचानक याद दियबैत रहत। आब चलू नेपाल दिस सशस्त्रक सनसनी मधेश एखन दू दर्जनसँ बेशीक संख्यामे रहल सशस्त्र समूहसँ आक्रान्त अछि। कहियो सशस्त्रक विरोधमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे पत्रकार रैली निकालैत अछि तँ कहियो सिरहाक कर्मचारी कार्यालयमे ताला लगाकऽ सशस्त्रक विरोध प्रदर्शन करैत अछि। तहिना सर्लाहीमे बस चालकक हत्या भेलासँ शुरु भेल यातायात बन्दसँ जनजीवन कष्टकर भऽ रहल अछि। मधेशक माँगकेँ अपन नारा बनाकऽ खुलल दू दर्जनसँ बेशी संगठनकेँ एखन मधेशमे तीब्र बिरोधक सामना करऽ पड़ि रहल छन्हि। चालकक हत्या सर्लाही। राजमार्गमे एखनो शान्ति सुरक्षाक अबस्था बेहाळे अछि। सर्लाही जिलामे हथियारधारी लुटेरा समुह ७ तारिखक रातिमे एकटा बस चालकक गोली मारि हत्या कऽ देलक। राजधानी काठमाण्डू जाऽ रहल बसक चालक कॄष्ण खवासक गोली लागि मॄत्यु भेल छल। पूर्व पश्चिम राजमार्ग अन्तर्गत सर्लाहीक जंगलमे राति ९ बजे ओऽ समूह बसमे लूटपाटक प्रयास कएने रहए। बस नञि रोकि भागऽ लगलाक बाद लुटेरा समूह गोली चलौने छल। गोली लागि घायल भेनिहार चालक खवासकेँ उपचारक बास्ते लालबन्दी अस्पताल लऽ जाइत अबस्थामे बाटेमे मृत्यु भेल, से स्थानीय प्रहरी जनौलक अछि। चालकक गोली लगलाक बाद खलासी बसकेँ नियन्त्रणमे लऽ कए दुर्घटना होबऽ सँ बचौने छल। प्रहरी घटनामे संलग्न होएबाक आशंकामे सात गोटेकेँ पकडलक अछि। दोसर यातायात व्यवसायी आऽ मजदुर चालक हत्याक बिरोधमे चक्काजाम जारी रखने अछि। सरकार समस्या समाधान लेल आगू नञि आएल, कहैत यातायात मजदूर देशव्यापि आन्दोलनक चेतावनी देलक अछि। मजदूर आऽ व्यवसायी पुर्वान्चलक तीन अन्चल आऽ जनकपुर अन्चलमे चक्काजाम कएलाक बाद जनजीवन प्रभावित भेल अछि। बन्दक कारण उपभोग्य वस्तुक अभाव होबऽ लागल अछि। नेपालक (किछु भारतक) मिथिला मैथिल मैथिलीक सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक समाचार "रे नोर एना तोँ नञि टपक" कोशी नेपाल आऽ भारतक जनता लेल एकटा अभिशापसँ कम नञि। १८ अगस्तक कोशी नदी पुर्वी तटबन्धकेँ पश्चिम कुशहा लग तीन सय मीटर भत्थन करैत बाट बदलने छल। तञि के बाद नेपालक लगभग १ लाख जनता विस्थापित भेल। वएह पानि जहन बिहारमे आएल तँ आओर विकराल रुप ल लेलक। बिहारमे पानिसं ३० लाखसं बेशी जनता प्रभावित अछि, जाहिमे २० लाख कोशी इलाकाके अछि। मृतकक संख्या हजारोमे हेबाक आशंका कएल जाऽ रहल अछि। बिहार सरकारक तथ्यक अनुसार कोशी बाढिसँ ७ सय ७५ गामक २२ लाख ७५ हजार जनता प्रभावित अछि। कोशीक कोप चीनक तिब्बत उदगमस्थल रहल कोशी नेपाल होइत बिहार कुर्सेला धरि सात सय २० किलमीटर दुरी पार करैत गंगानदीमे मिलैत अछि। कोशी नदी वार्षिक ५० अरब घन लिटर पानि गंगानदीमे पंहुचाबै-ए। कोशी नदीक वर्तमान जलाधर क्षेत्र ९२ हजार ५ सय ३८ वर्ग फ़िट मिटर अछि, जाहिमेसँ ४१ हजार ३ सय ३३ वर्ग किलोमीटर नेपालक भीतर पड़ैत अछि। कोशी योजना संचालनक ४५ वर्ष होइतो कोशी पीडितक समस्या जहिनाक तहिना अछि। नेपाल आऽ भारत दुनु देशकेँ एहि प्रश्नक उत्तर देव आवश्यक अछि- किए टुटल बान्ह ? बाढिसँ गरीब किसान भूमिहीन भऽ गेल अछि, ने लत्ता कपडा ने पेटमे अन्न आऽ ने पीबालेल पानि। किसान टकटक्की लगौने अछि कोशीक पानि पर, जे कखन घटत? जमिनदार पानिदार भऽ गेल, गाय महिष सबटा दहाऽ गेल छैक, आव बाँकी छञि मात्र जीवाक आश,,,,,। दोष ककर नेपाल आऽ भारत दुनु पक्ष एक दोसराके दोषारोपण कऽ रहल अछि। 'भारतीय प्राविधिक तटबन्ध मरम्मतिक लेल गेल छल मुदा, ओत्त काज करबाक वातावरण नञि बनलाक बाद तटबन्ध निर्माण नञि भऽ सकल, भारतीय पक्ष कहैत अछि। कोशी नदीक समझौता अनुसार नेपाल किछु नञि कऽ सकैत अछि, तेँ हमसभ मुक दर्शक छी, दोष भारतक अछि नेपाली पक्षके दाबी। भारतीय प्रधानमन्त्री डा मनमोहन सिंह बाढ़िक बिभीषिका देखिते राष्ट्रीय विपत्तिक घोषणा कऽ देलनि। बहुत रास पाई आऽ खाद्यान्न सहयोग करबाक आश्र्वासन सेहो। मुदा कोशी तटबन्ध टुटल किए, एकर सरकारी स्तरपर कोनो तरहक जाँच-बुझक आदेश नञि देल गेल अछि। हँ नेपालसँ एहि बिषयमे बातचीत करबालेल एकटा उच्चस्तरीय कमिटीक गठन कएल गेल अछि। ओऽ समिति की बातचीत करत आऽ की निष्कर्ष निकालत भविष्यक गर्भमे अछि। क्षतिपुर्ति कोशी समझौताक अनुसार कोशी तटबन्धक सभ तरहक काज भारतक जिम्मामे अछि। तटबन्धक मरम्मति मात्रे नञि तटबन्ध टूटलासँ होबऽ बला क्षतिपुर्ति सेहो भारते देत, से सन्धिमे उल्लेख अछि। नेपालक परराष्ट्रमन्त्री उपेन्द्र यादव कोशी समझौता अनुसार भारत सरकारकेँ सभ तरहक क्षतिपुर्ति देबऽ पडतै, से कहैत छथि। सन्धिक अनुसार इलाज, पुनर्वास आऽ खाद्यान्न जेहन सहयोग भारत सरकारकेँ करक चाही। भारतीय प्रधानमन्त्री आऽ विदेशमन्त्रीसँ सहयोगक आग्रह कएल गेल आऽ ओऽ सभ एहि प्रति सकारात्मक रहल, मन्त्री यादव कहलनि। आब देखऽ के बाँकी अछि, कोशी पीडित धरि कहिआ पडोसी देशसँ सहयोग पहुँचैत छञि। नञि रुकल कटान कोशी कटान नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल गेल सभ प्रयास असफ़ल भेल अछि। कोशीक सभसँ महत्वपुर्ण मानल जाएबला स्पर बहऽ लागल अछि। नेपाल आऽ भारतीय प्राविधिक टोलीद्वारा कटान नियन्त्रणलेल कएल गेल प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। संयुक्त प्राविधिक टोलीक निगरानीमे बीस हजार बोरा बालु, गिटी राखि कऽ नदिकेँ पश्चिम दिश घुमएबाक प्रयास निरर्थक भऽ गेल अछि। बर्षाक कारण सेहो बाढि नियन्त्रण दुरुह बनल अछि। नेपाल सरकार कोशी कटानसँ बिस्थापित भेनिहारक प्रति परिवार १५ हजार टका सहयोग देत। ई १५ हजार ब्यथित कोशीपीडितके कत्तेक सहयोग भऽ सकत ओऽ सहजहि अनुमान लगाओल जा सकै-ए। किछु मरल बहुतो निपत्ता सप्तकोशी नदी गामेक बाटसँ बह लगलाक बाद विस्थापित भेनिहारसभ एखनो अपन परिजनक खोजिमे अछि। हरिपुर, श्रीपुर आऽ पश्चिम कुशाहासँ विस्थापित सभ अपन घर परिवारक सदस्यके ढुंढि रहल अछि। सुनसरी प्रशासन एखनधरि ५ गोटेक मृत्युक पुष्टि कएलक अछि। मुदा एखनो चारि सय गोट सम्पर्कविहीन अछि। दोसर दिश कोशी बाढ़िसँ विस्थापित आब पेटझरीक चपेटमे आबि गेल अछि। पानि गन्दा भऽ गेलाक बाद विस्थापित शिविरमे पेटझरी आऽ मुँहपेट जाएव विकराल रुप लऽ लेने अछि। विस्थापित एक बालक सहित दु गोटक पेटझरीसँ मृत्यु भेल अछि। मृत्यु भेनिहारमे श्रीपुर-३ के ५६ वर्षीयय तेजन सदा आऽ ६ वर्षिय रम्बा सदा अछि। सुनसरीक विभिन्न २९ शिविरमे एक हजार ५ सय गोट एखन बिमार अछि। अधिकांशमे पेटझरी, निमोनिया, बोखार आऽ छातीमे इन्फ़ेक्सन देखल गेल अछि। रोगीमेसँ १२ गोटक अवस्था चिन्ताजनक रहल, उपचारमे संलग्न चिकित्सक जनौलक अछि। कत्तेक बिपत्ति ! बाढ़िसंगहि सप्तरी जिलामे सर्पदंश बढि गेल अछि। सर्पदंशसँ शुक्रक राति आओर एक गोटेक मृत्यु भेल अछि। भादव महिनामे सांप कटलासँ मरनिहारक संख्या ६ भऽ गेल स्थानीय जनस्वास्थ्य कार्यालय जनौलक। खेतमे काज कऽ रहल स्थानीय रामकृष्ण यादवकेँ सांप कटने रहन्हि। इलाजक लेल सगरमाथा अंचल अस्पताल लऽ जाइत काल हुनक मृत्यु भेल। एहिसँ पहिने फ़किरा ३ क ४५ बर्षीय रामअशिष यादव, पत्थरगाडा ७ क १४ बर्षिय बमभोला यादव आऽ महादेव ८क १२ बर्षीय घनश्याम इसरक मृत्यु भऽ चुकल अछि। बिहारक बाध्यता कोशीक जलस्तर बढ़लाक बाद बिहारक स्थिति आओर असहज भऽ गेल अछि। बिहार सरकार वायु सेनाक ४ हेलिकप्टर, ८ सय ४० नाव आऽ सेनाक मदतिसँ युद्ध स्तरमे राहत कार्य भऽ रहल बतौलक अछि। मुदा बाढिपीडित लाखो जनता एखनो बाढिमे फ़ंसल अछि। सरकारी सहयोग समेत अपर्याप्त रहल, बाढिपीडितक कहब छञि। बिहार सरकार एखन धरि कोशी क्षेत्रमे २८ आऽ समुचा राज्यमे ७६ गोटेक मृत्यु भेल जनौलक अछि। मुदा प्रभावित इलाकामे स्थानीयवासी बहुतो शव दहाइत देखल गेल कहैत अछि। बिहार सरकारक तथ्यांकमे कोशी बाढ़िसँ ७ सय ७५ गामक २३ लाख जनता प्रभावित भेल कहल गेल अछि। बिछियाक आर्तनाद पेटमे अन्न नईं, राहतलेल आकाशमे टकटकी लगौने आंखि, आङमे लत्ताकपडाक अभाव आ भोक्कासी ...। सभ अपन अपन पीडा सुना रहल अछि। पेटके राक्षस शान्त नई भेलाक बाद ओ त सौंसे आदमीएके खा लेलक। नवजात शिशु कत्तेक काल भुक्खे रहैत, ओकरा कोशीक कोरमे छोडिदेल गेल। कोशी सन बेदर्दी जगमे कोइ नइ लघुनाटकमे किछु एहने देखल गेल। मैलोरंगक आयोजनमे दिल्लीमे सेप्टेम्बर १२ क' मन्चित लघुनाटकमे कोशीक बिभीषिका देखएबाक प्रयास कएल गेल। नाटकमे राहतलेल मारामारी कएनिहार जनता भुखसं मृत्युवरण करबाक बाध्यताके जीवन्त रुपमे प्रस्तुत कएल गेल। पीडितके रोदनसं दर्शक भावविह्वल बनल छल। मैलोरंग सेप्टेम्बर १२ सं १४ तारिखधरि मैथिली लोकरंग महोत्सव स्थगित कएलक अछि। कोशी क्षेत्रमे घुरैत मुस्कानकसंग महोत्सव आयोजन हएत मैलोरंग जनौलक अछि। संघर्षक कठिन बाट मैथिली साहित्यकार व्रजकिशोर बर्मा मणिपद्मक स्मृतिमे नयां दिल्लीमे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल। एहि कार्यक्रममे मैथिली नाटक मन्चन हएबाक संगहि मिथिलांगन संस्थाक स्मारिका सेहो विमोचन कएल गेल। मिथिलांगन साहित्यकार मणिपद्मक स्मृतिमे 'उगना हल्ट' नामक मैथिली नाट्क मन्चन कएने छल। ब्रज किशोर बर्मा मणिपद्म मैथिली साहित्यक चर्चित नाम अछि। लोक साहित्यक संरक्षणमे हुनक योगदान उल्लेखनीय मानल जाईत अछि। इएह योगदानक सम्मान करैत हुनका मैथिलीक वाल्टर स्काट सेहो कहल जाईत छन्हि। लोरिक, राजा सल्हेश, नैका बन्जारा जेहन लोकगाथाक संरक्षण करबामे हुनक योगदान सराहनीय रहल कार्यक्रममे कहल गेल। मिथिलांगन एहिसँ पहिने सेहो मणिपद्मक स्मृतिमे विभिन्न कार्यक्रम आयोजन करैत आएल अछि। तहिना त्रैमासिक मिथिलांगन पत्रिका सेहो प्रकाशनके निरन्तरता देल गेल संस्था जनौलक अछि। उगना हॉ/ल्टक लेखक कुमार शैलेन्द्र आ निर्देशक संजय चौधरी छैथ। नाटकमे दिल्लीमे संघर्षरत मैथिली रंगकर्मीक जीवनक कटु सत्य देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि। उगना हल्ट बिहारक मधुवनी जिलाक एक रेल्वे स्टेशनक नाम अछि , यद्यपि नाटकके परिवेश नयां दिल्लीक रंगकर्मीक अडडा मण्डी हाउसपर केन्द्रित अछि। स्थानीय पण्डौल आ सकरी बीचक स्टंशन अछि उगना हॉल्ट। नाटकमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणलेल अपस्यांत नवतुरियाक कथा ब्यथा समेटल गेल अछि। ओएह युवाक संघर्षक इतिबृत मे नाटक घुमैत अछि।। कियो संगीतकार बन' चाहैत अछि त कियो गीतकार, ककरो फ़िल्ममे हिरो बनबाक धुन सबार छइ त ककरो हिरोइन। अन्ततः कठिन संघर्षक बाद सभ अपन लक्ष्य प्राप्त करबामे सफ़ल होइत अछि। नाटकमे संगठने शक्ति अछि आ एहिँस सफ़लता पाबि सकैत छी से पाठ सिखएबाक प्रयास कएने छैथ नाटककार। छिरिआएल आ दिग्भ्रमित जँका बुझाईत पात्रक अभियान अन्तमे सफ़ल होइत अछि। अन्ततः नाटक सुखान्त अछि। उमेश मण्डल लोक-नाट्य-वाद्य मण्डली- संकलन नाच पाटी- मि‍थि‍ला नाट्यकला परि‍षद- पकड़ि‍या कम्‍पनी- श्री राम लखन साहु पे. स्‍व. खुशीलाल साहु पता, गाम- पकड़ि‍या, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) मैनेजर- श्री ठकाई यादव पे. स्‍व. फुसन यादव पता, गाम- मुसहरनि‍याँ, पोस्‍ट- रतनसारा, अनुमंडल- फुलपरास (मधुबनी) नाच- (1) अल्‍हा रूदल (2) लछि‍या रानी (3) शीत वसंत (4) गुगली घटमा (5) राजा कुँवर वृजभान अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- श्री भाेगी लाल दास- स्‍व- भायलाल दास लछमि‍नि‍याँ (मधुबनी) श्री रामचन्‍द्र शर्मा- श्री जंगल शर्मा नेमुआ (मधुबनी) श्री नथुनी शर्मा- श्री वनमाली शर्मा नेमुआ (मधुबनी) श्री सुन्‍दर मुखि‍या- श्री नागेश्वर मुखि‍या हरि‍याही (सुपौल) श्री वासदेव सदाय- स्‍व. कुजाय सदाय सखुआ (ि‍नर्मली) श्री नारायण सदाय- श्री गंगा सदाय बेलही (सुपौल) मो. जाहि‍द उर्फ राजा मो. डोमी नदाफ सुदै द्वारम (मधुबनी) श्री रंजीत राम श्री लखन राम खुटौना (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- आर्गन- श्री छेदी पंडि‍त स्‍व. चन्‍द्र पंडि‍त बरहारा (सुपौल) नाल- श्री परमेश्वर भारती स्‍व. जगरूप भारती मुसहरनि‍याँ (मधुबनी) काँरनेट- श्री चन्‍दर राम श्री जीतन राम लछमि‍नि‍याँ (मधुबनी) नङेरा- श्री लाल राम स्‍व. फुसन राम लछमि‍नि‍याँ (मधुबनी) ढोलक- श्री कलानंद राम स्‍व. खट्टर राम लछमि‍नि‍याँ (मधुबनी) ड्रमसेट- श्री भोलट दास श्री योगेन्‍द्र दास ि‍नर्मली (सुपौल) आन सहयोगी- श्री याेगेन्‍द्र यादव श्री ठकाई यादव मुसहरनि‍याँ घुरन दास श्री भायलाल दास (ताॅति)‍ लछमि‍नि‍याँ दि‍नेश राम श्री सीताराम राम लछमि‍नि‍याँ नाच पाटी- श्री श्री 108 श्री भगवती नाचपार्टी- सि‍मराहा सप्तरी कम्‍पनी- श्री रामचन्‍द्र मण्‍डल पे. श्री वृजलाल मण्‍डल पता, गाम- सि‍मराहा, पोस्‍ट- बरसाइन, जि‍ला- सप्‍तरी (नेपाल) मैनेजर- श्री राम सुन्‍दर राम पे. श्री सुवी राम पता, गाम- दउरी, पोस्‍ट- बरसाइन, जि‍ला- सप्‍तरी (नेपाल) नाच- (1) अल्‍हा रूदल (2) लछि‍या रानी अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- श्री शैनी पासवान श्री दुखी पासवान खड़कपुर (बरसाइन) श्री लक्ष्‍मण राम श्री कैलू राम दउरी (बरसाइन) श्री बेचू राम श्री श्रीप्रसाद राम दउरी (बरसाइन) श्री सत्‍य नारायण राम- श्री नथुनी राम दउरी (बरसाइन) श्री देव नारायण यादव- श्री नथुनी यादव दउरी (बरसाइन) श्री परमेश्वर मण्‍डल- श्री तेजी मण्‍डल सि‍मराहा (बरसाइन) श्री रघु मण्‍डल- स्‍व. थारू मण्‍डल सि‍मराहा (बरसाइन) श्री चरि‍त्तर मण्‍डल- स्‍व. कारी मण्‍डल सि‍मराहा (बरसाइन) श्री जोगी मण्‍डल- श्री बच्‍चाई मण्‍डल सि‍मराहा (बरसाइन) श्री बेचू राम श्री प्रसाद राम दउरी (सप्‍तरी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- काँरनेट- श्री देव नारायण राम स्‍व. नाथो राम दउरी (बरसाइन) काँरनेट- श्री दुखी राम स्‍व. कारी राम खड़कपुर (बरसाइन) ढोलक- श्री नशीवलाल राम श्री कैलू राम दउरी (बरसाइन) नङेरा- श्री राम प्रसाद राम श्री सुवी राम दउरी (बरसाइन) हारमोनि‍यम- श्री चरि‍त्तर मण्‍डल श्री कारी मण्‍डल दउरी (बरसाइन) आन सहयोगी- शि‍व नारायण दास श्री ठकाइ दास दउरी (बरसाइन) कोसी नाट्य कला परि‍षद- सि‍मराहा-सुपौल कम्‍पनी- श्री गया प्रसाद मण्‍डल पे. श्री राम नारायण मण्‍डल पता, गाम- सि‍मराहा, पोस्‍ट- नौआबाखैर, भाया- थरबि‍टि‍या, जि‍ला- सुपौल मैनेजर- श्री दया नन्‍द मण्‍डल पे. श्री राम लखन मण्‍डल पता, गाम- सि‍मराहा, पोस्‍ट- नौआबाखैर, भाया- थरबि‍टि‍या, जि‍ला- सुपौल। नाच- (1) अल्‍हा रूदल (2) सती लछि‍या अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- श्री अरूण कुमार मण्‍डल श्री नथु मण्‍डल सि‍मराहा (सुपौल) श्री रून्‍दी पासवान स्‍व. बहादुर पासवान परसा माधो (सुपौल) श्री राम प्रसाद शर्मा स्‍व. बि‍लट शर्मा परसाहा (सुपौल) श्री देवराज शर्मा स्‍व. तपेश्वर शर्मा सि‍मराहा (सुपौल) श्री चन्‍द्र नारायण मण्‍डल स्‍व. रघुनाथ मण्‍डल सि‍मराहा (सुपौल) श्री दुखी पासवान श्री बेचन पासवान परसा माधो (सुपौल) श्री वि‍जय कुमार राय श्री राम स्‍वरूप राय सि‍मराहा (सुपौल) श्री बेचन शर्मा स्‍व. रामसुन्‍दर शर्मा परसाहा (सुपौल) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- श्री सत्‍य नारायण मण्‍डल स्‍व. खुशीलाल मण्डल सि‍मराहा (सुपौल) ढोलक- श्री गणेश राम श्री वि‍न्‍देश्वर राम एकडारा, थरवि‍टि‍या (सुपौल) काँरनेट- श्री शि‍व नारायण सदा स्‍व. ............. एकडारा, थरवि‍टि‍या (सुपौल) नङेरा-डि‍ग्री- श्री गुनेश्वर राम श्री ............... परसाहा, नाैआ बाखैर (सुपौल) झाइल- श्री हरि‍नारायण पासवान स्‍व. नकछेदी पासवान सि‍मराहा (सुपौल) झाइल- श्री तेज नारायण मण्‍डल स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल सि‍मराहा, नौआबाखैर (सुपौल) भड़ि‍या- श्री लालदेव मण्‍डल श्री बच्‍चा मण्‍डल सि‍मराहा, नौआबाखैर (सुपौल) जोकर- श्री सीताराम राम .................. परसाहा, नाैआ बाखैर (सुपौल) अन्‍य सहयोगी- श्री सुभाष कुमार राय श्री कन्‍हैया लाल राय बौराहा, थरवि‍टि‍या (सुपौल) रामलीला नाट्य कला परि‍षद- रसुआर जि‍ला-सुपौल कम्‍पनी- श्री झोटन मण्‍डल पे. स्‍व. नथुनी मण्‍डल पता, गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, अनुमण्‍डल- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) मैनेजर- श्री त्रि‍लोक नाथ झा पे. स्‍व. रामेश्वर झा पता, गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, अनुमण्‍डल- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) नाच- (1) अल्‍हा रूदल (2) सती लछि‍या (3) राजा सलहेश (4) वि‍द्यापति‍ (5) धुलक फूल (6) सुल्‍ताना डाकू (7) राजा हरि‍षचन्‍द्र (8) कृष्‍ण लीला (9) रामायण अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- श्री रामू मण्‍डल स्‍व. गोपी मण्‍डल रसुआर (सुपौल) स्‍व. राज कुमार ठाकुर श्री रामजी ठाकुर रसुआर (सुपौल) श्री धनि‍क लाल मण्‍डल स्‍व. रामजी मण्‍डल रसुआर (सुपौल) श्री देव नारायण मण्‍डल स्‍व. बलदेव मण्‍डल रसुआर (सुपौल) स्‍व. भोला झा स्‍व. जयदेव झा रसुआर (सुपौल) स्‍व. जि‍लेब मण्‍डल स्‍व. नथुनी मण्‍डल रसुआर (सुपौल) श्री शैनी मण्‍डल स्‍व. लालजी मण्‍डल रसुआर (सुपौल) श्री सीताराम मण्‍डल स्‍व. रूपलाल मण्‍डल रसुआर (सुपौल) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- श्री त्रि‍लोक नाथ झा पे. स्‍व. रामेश्वर झा रसुआर (सुपौल) ढोलक- स्‍व. रामगुलाम मण्‍डल स्‍व. संती मण्‍डल रसुआर (सुपौल) नङेरा-डि‍ग्री- श्री झड़ीलाल राम स्‍व. हि‍या लाल राम रसुआर (सुपौल) झाइल- देवीलाल मण्‍डल स्‍व. खुशीलाल मण्‍डल रसुआर (सुपौल) झालड़ श्री कि‍शोरी मण्‍डल स्‍व. नेवैत मण्‍डल रसुआर (सुपौल) डि‍ग्री सदैबला- स्‍व. रामकि‍शुन मण्‍डल स्‍व. शक्‍ति‍ मण्‍डल रसुआर (सुपौल) भड़ि‍या- श्री नारायण मुखि‍या स्‍व............... रसुआर (सुपौल) जोकर- श्री सीताराम राम .................. परसाहा, नाैआ बाखैर (सुपौल) डान्‍सर- श्री छोटेलाल मण्‍डल श्री बुधु मण्‍डल रसुआर (सुपौल) जोकर- श्री रामअधि‍न मण्‍डल स्‍व. धनि‍क लाल मण्‍डल रसुआर (सुपौल) इटहरी नाच कला परि‍षद- इटहरी जि‍ला-सुपौल कम्‍पनी- श्री जगदीश साहु पे. स्‍व. गंगा प्रसाद साहु पता, गाम- इटहरी, पोस्‍ट- ि‍नर्मली, भाया- ि‍नर्मली, अनुमण्‍डल- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) मैनेजर- श्री रामवि‍लास साहु पे. स्‍व. भोला साहु पता, गाम- इटहरी, पोस्‍ट- ि‍नर्मली, भाया- ि‍नर्मली, अनुमण्‍डल- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) नाच- (1) कुमर वृजभान (2) राजा नल (3) राजा सलहेश (4) गुगली घटमा (5) शीत-वसंत अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- नायक- रामवि‍लास साहु स्‍व. भोला साहु इटहरी (सुपौल) नारी पात्र- बैजू सदाय स्‍व. सोती सदाय इटहरी (सुपौल) नारी पात्र- अशोक सि‍ंह श्री बलराम सि‍ंह इटहरी (सुपौल) मुख्‍य खलनायक- दुखी मण्‍डल स्‍व. श्रीलाल मण्डल इटहरी (सुपौल) जोकर- वि‍जय साहु स्‍व. केसो साहु इटहरी (सुपौल) नारी पात्र- रघुनाथ सदाय स्‍व. मोती सदाय इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- सुकुमार मण्‍डल .................. मुसहरनि‍याँ-रतसारा (मधुबनी) अभि‍नय- रामअधि‍न मण्‍डल स्‍व. धनि‍कलाल मण्‍डल मुंगराहा (सुपौल) अभि‍नय- हरि‍ नारायण मण्‍डल ..... छजना (मधुबनी) अभि‍नय- राम बहादुर मुखि‍या स्‍व. बच्‍चा मुखि‍या ननपट्टी फुलपरास (मधुबनी) अभि‍नय- श्री साधु दास स्‍व. .............. पि‍पराही-वनगामा (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- श्री जगदीश साहु स्‍व. गंगा प्रसाद साहु इटहरी (सुपौल) ढोलक- श्री जुगल साफी स्‍व. दाहुर साफी इटहरी (सुपौल) नङेरा-डि‍ग्री- श्री रामकि‍सुन सदाय स्‍व. सोती सदाय इटहरी (सुपौल) झाइल- श्री सुकदेव साफी ..... इटहरी (सुपौल) झाइल- श्री रामेश्वर साहु स्‍व. मुकुन्‍द साहु इटहरी (सुपौल) डि‍ग्री सदैबला- श्री रामकि‍शुन सदाय ................... इटहरी (सुपौल) भड़ि‍या- झड़ी लाल सदाय श्री सरयुग सदाय इटहरी (सुपौल) ढोलकि‍या-2 रामाशीष यादव .............. ननपट्टी-फुलपरास (मधुबनी) हारमोनि‍यम-2 श्री तनुकलाल मण्‍डल ................ हरि‍याही-ि‍नर्मली (सुपौल) आदर्श वाल-कला नि‍केतन- ि‍नर्मली-पुनर्वास (जि‍ला-सुपौल) कम्‍पनी- श्री राम शरण कामत पे. स्‍व. शि‍वधर कामत पता, गाम- सुरयाही, भाया- मुजि‍यासी, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैनेजर- श्री अशोक सि‍ंह पे. स्‍व. वलराम सि‍ंह पता, गाम- इटहरी-पुरर्वास, पोस्‍ट- ि‍नर्मली, भाया- ि‍नर्मली, अनुमण्‍डल- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल (बि‍हार) मंचन- (1) काँच ताग (2) आन्‍हर कानून (3) लोहा सि‍ंह (4) माइक कलेजा (5) चुड़ी आ सि‍नूर अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- नायक- हेम नारायण साहु स्‍व. लक्ष्‍मी साहु इटहरी (सुपौल) नारी पात्र- राम वि‍लास साफी स्‍व. शोभि‍त लाल साफी इटहरी (सुपौल) नारी पात्र- अशोक सि‍ंह श्री बलराम सि‍ंह इटहरी (सुपौल) नारी पात्र- हरि‍ नारायण साहु श्री मि‍श्री लाल साहु इटहरी (सुपौल) नारी पात्र हरि‍ नारायण साहु श्री लक्ष्‍मी साहु इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- राम सागर साफी श्री शोभि‍त साफी इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- सत्‍य नारायण साहु श्री लक्ष्‍मी साहु इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- जगत नारायण साहु श्री लक्ष्‍मी साहु इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- रोहि‍त साहु श्री राम लखन साहु इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- हीरा लाल साहु स्‍व. सुकदेव साहु इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- जि‍रा लाल साहु स्‍व. सुकदेव साहु इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- रामावतार यादव श्री नुजाइ यादव इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- गंगा पासवान स्‍व. कुसुमलाल पासवान इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- रामचन्‍द्र यादव स्‍व. सुखी यादव इटहरी (सुपौल) अभि‍नय- शत्रुध्‍न साहु स्‍व............. इटहरी (सुपौल) गायक- मदन प्रसाद साहु स्‍व. गंगा प्रसाद साहु इटहरी (सुपौल) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- जगत नारायण साहु श्री लक्ष्‍मी साहु इटहरी (सुपौल) ठेकैता- राम वि‍लास साफी स्‍व. शोभि‍त लाल साफी इटहरी (सुपौल) ठेकैता- श्री शि‍बू साफी ................... इटहरी (सुपौल) झाइल- श्री राम नारायण साहु स्‍व. बच्‍चा लाल साहु लक्ष्‍मीपुर-धबही (मधुबनी) हारमोनि‍यम-2 अशोक सि‍ंह श्री बलराम सि‍ंह इटहरी (सुपौल) कला नि‍केतन नाचपाटी- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (जि‍ला-मधुबनी) (1945-1965) कम्‍पनी- श्री झमेली साहु पे. स्‍व. मंगल साहु पता, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैनेजर- स्‍व. महेश्वरी पाठक पे. स्‍व. कारी पाठक पता, गाम- मझोरा, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाचक मंचन- (1) जंगली वादशाह (2) वंश-उजारन (3) वि‍देशि‍या (4) शीत-वशंत (5) लोड़ि‍क मनि‍यार (6) राजा नल अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- नारी पात्र- स्‍व. अचकी गोसाँइ .................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र- स्‍व. बहुरी मण्‍डल स्‍व. सुनर मण्‍डल लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र- श्री रामदास साफी स्‍व. सुवंश साफी लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र- स्‍व. घौली साफी स्‍व. सुनर साफी लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र स्‍व. वसुदेव ठाकुर(उर्फ बतहु ठाकुर) स्‍व. कैलू ठाकुर लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) जोकर- स्‍व. खट्टर मुखि‍या ..................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) अभि‍नय- स्‍व. दुखाय साहु ..................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र- स्‍व. रतन मण्‍डल ..................... मझौरा (मधुबनी) अभि‍नय- स्‍व. बि‍लम साफी स्‍व. रूपा साफी लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- स्‍व. तुलसी मण्‍डल .................... मझौरा (मधुबनी) ठेकैता- स्‍व. रघुनाथ ठाकुर .................... छजना (मधुबनी) नागार्ची- स्‍व. फुसन राम स्‍व. कंचन राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) झाइल करताल- स्‍व. बच्‍चा मण्‍डल स्‍व. पंची मण्‍डल लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) डि‍गरी सेद्दा- स्‍व. अशर्फी गोसाँइ .................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) भड़ि‍या- स्‍व. अशर्फी गोसाँइ .................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) अन्‍य सहयोगी- स्‍व. नेबाजी साहु स्‍व. भैरव साहु लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) (संकलन सहयोग- रामवि‍लास साहु, लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, मधुबनी) आदर्श नाचपाटी- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (जि‍ला-मधुबनी) (1968-1977) कम्‍पनी- स्‍व. गर्भू गोसाँइ पता, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैनेजर- स्‍व. नेबाजी साहु पे. स्‍व. भैरव साहु पता, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाचक मंचन- (1) बापक हत्‍या (2) दमाद वध (3) नि‍सााद वध (4) वंस-उजारन (5) गोपीचन (6) शंकर शोसि‍ला (7) उति‍म चन। अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- पुरुष पात्र- स्‍व. बहुरी मण्‍डल स्‍व. सुनर मण्‍डल लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र- श्री राम अधि‍न दास स्‍व. जहुरी दास लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र- स्‍व. झोली दास स्‍व. धुत्तर दास लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र- श्री नथुनी दास स्‍व. सोनाइ दास लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र स्‍व. रघुनी दास स्‍व. सुनर दास लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) अभि‍नय- श्री शि‍व नारायण मंडल ..................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) अभि‍नय- स्‍व. डुब्‍बी मुखि‍या ..................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- स्‍व. बहुरी मण्‍डल स्‍व. सुनर मण्‍डल लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) ठेकैता- स्‍व. श्री लाल गोसाँइ स्‍व. बुधु गोसाँइ लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नागार्ची- स्‍व. रामेश्वर राम स्‍व. नेबी राम मझौरा (मधुबनी) झाइल करताल- स्‍व. बच्‍चा मण्‍डल स्‍व. पंची मण्‍डल लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) डि‍गरी सेद्दा- स्‍व. चमकलाल गोसाँइ .................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) भड़ि‍या- स्‍व. सुनर दास .................... लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) (संकलन सहयोग- रामवि‍लास साहु, लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, मधुबनी) लक्ष्‍मि‍नि‍याँ नाचपाटी- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (जि‍ला-मधुबनी) (1970-1982) कम्‍पनी- श्री राजेन्‍द्र प्रसाद साहु पे. स्‍व. सुन्‍दर लाल साहु पता, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैनेजर- स्‍व. बहुरी मण्‍डल पे. स्‍व. सुनर मण्‍डल पता, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाचक मंचन- (1) कुमर वृजभान (2) लछि‍या रानी (3) सुन्‍दर वनक सुन्‍दर फूल (4) अल्‍हा-रूदल (5) वि‍जय सि‍ंह (6) गुगली घटमा। अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- पुरुष पात्र- श्री सीताराम राम स्‍व. जंगल मोची लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र- स्‍व. रसि‍क लाल गोसाँइ स्‍व. बुधु गोसाँइ लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) पुरुष पात्र- श्री गोसाँइ मुखि‍या स्‍व. डुब्‍बी मुखि‍या लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र- श्री मलभोगी दास स्‍व. भायलाल दास लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र श्री कल्‍लर राम स्‍व. खट्टर राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) अभि‍नय- श्री मूसन साहु स्‍व. अशर्फी साहु लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नारी पात्र- श्री राम खेलावन राम स्‍व. फूसन राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- श्री राम शरण साहु स्‍व. हि‍रो साहु लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) ठेकैता- स्‍व. लक्ष्‍मण राम स्‍व. जीतन राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) नागार्ची- स्‍व. फूसन राम स्‍व. कंचन राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) झाइल करताल- श्री शि‍व नारायण मण्‍डल (गामक भगि‍नमान) लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) डि‍गरी सेद्दा- कपि‍लेश्वर राम स्‍व. सगम राम करहरी, फूलपरास (मधुबनी) भड़ि‍या- स्‍व. नि‍रसन राम स्‍व. कंचन राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) काँरनेटि‍या- श्री चन्‍दर राम स्‍व. जीतन राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) (संकलन सहयोग- रामवि‍लास साहु, लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, मधुबनी) कला नाचपाटी- छजना (जि‍ला-मधुबनी) (1945-1980) कम्‍पनी- श्री लालदेव मण्‍डल पे. स्‍व. चतुरी मण्‍डल पता, गाम- छजना, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैनेजर- श्री राम प्रसाद राम पे. स्‍व. गंगाय राम पता, गाम- छजना, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाचक मंचन- (1) बि‍हुला शती (2) लछि‍या रानी (3) सुन्‍दर वनक सुन्‍दर फूल (4) पि‍ता हत्‍या (5) दमाद वध (6) वंश-उजारन (7) कुमर वृजभान (8) वि‍देशि‍या (9) जंगली वादसाह (10) रास लि‍ला। अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- नारी पात्र- श्री कारी मण्‍डल स्‍व. नंदी मण्‍डल छजना (मधुबनी) नारी पात्र- श्री हरि‍ मण्‍डल स्‍व. नंदी मण्‍डल छजना (मधुबनी) पुरुष पात्र- श्री बच्‍ची लाल चौपाल स्‍व. दसाँइ चौपाल छजना (मधुबनी) नारी/पुरुष पात्र- श्री छुतहरू चौपाल स्‍व. सुनर खतबे छजना (मधुबनी) पुरुष पात्र स्‍व. नथुनी मण्‍डल स्‍व. रामफल मण्‍डल छजना (मधुबनी) अभि‍नय- श्री झोली चौपाल स्‍व. ननधर चौपाल छजना (मधुबनी) अभि‍नय- श्री छोटकनि‍ चौपाल स्‍व. बौकू चौपाल छजना (मधुबनी) नारी/पुरुष पात्र- श्री रामजस राम स्‍व. उचि‍त राम छजना (मधुबनी) नारी पात्र- श्री हरि‍हर राम स्‍व. दसाँइ राम छजना (मधुबनी) पुरुष पात्र- श्री रामकि‍सुन मुखि‍या स्‍व. सहदेव मुखि‍या छजना (मधुबनी) पुरुष पात्र श्री दुर्गा नंद ठाकुर स्‍व. नेंगर ठाकुर छजना (मधुबनी) अभि‍नय- श्री मटन चौपाल स्‍व. सेमु चौपाल छजना (मधुबनी) नृत- श्री शि‍व नारायण चौपाल श्री छोटकनि‍ चौपाल छजना (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- श्री राम प्रसाद चौपाल स्‍व. बि‍हारी छजना (मधुबनी) ढोलकि‍या- श्री जनकधारी चाैपाल स्‍व. खुशीलाल चौपाल छजना (मधुबनी) नागार्ची- श्री छोटकनि‍ राम स्‍व. सुनर राम छजना (मधुबनी) झाइल करताल- श्री नथुनी चौपाल स्‍व. मधुकर चौपाल छजना (मधुबनी) डि‍गरी सेद्दा- स्‍व. रोगहा चौपाल स्‍व. तेतर चौपाल छजना (मधुबनी) भड़ि‍या- श्री सुनर चौपाल स्‍व. नथुनी चौपाल छजना (मधुबनी) काँरनेटि‍या- श्री राम प्रसाद राम स्‍व. मंगल राम लक्ष्‍मि‍नि‍याँ (मधुबनी) अन्‍य सहयोगी- श्री बालेश्वर ठाकुर स्‍व. लखन ठाकुर छजना (मधुबनी) श्री रामवि‍लास मुखि‍या स्‍व. बलदेव मुखि‍या छजना (मधुबनी) श्री बि‍सो मण्‍डल स्‍व. अजोधी मण्‍डल छजना (मधुबनी) (संकलन सहयोग- रामवि‍लास साहु, लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, मधुबनी) गि‍रधारी नाचपाटी- छजना (जि‍ला-मधुबनी) (1956-2008) कम्‍पनी- स्‍व. गि‍रधारी साहु वर्त्तमान कम्‍पनी- जलेश्वर दास पे. स्‍व. खटर दास पता, गाम- छजना, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) मैनेजर- जलेश्वर दास पे. स्‍व. खटर दास पता, गाम- छजना, पोस्‍ट- छजना, भाया- नरहि‍या, अनुमण्‍डल- फुलपरास, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) नाचक मंचन- (1) बि‍हुला शती (2) गोपी चन्‍द (3) अल्‍हा-रूदल (4) गुगली घटमा (5) रूणा-झुणा (6) सामा-चकेबा (7) पि‍ता हत्‍या (8) दमाद वध (9) कबि‍र लि‍ला (10) कलयुग प्रेम (9अम एवं 10सम वर्त्तमानमे जारी) अभि‍नय कर्त्ताक नाओं/पता- नारी पात्र- श्री गोसाँइ मण्‍डल ................... धबौली, वनगामा (मधुबनी) नारी पात्र- श्री राजेश्वर यादव स्‍व. तनुक लाल यादव बेरयाही (मधुबनी) पुरुष पात्र- श्री हरि‍हर चौपाल स्‍व. मोहन चौपाल छजना (मधुबनी) नारी/पुरुष पात्र- श्री रघुनाथ चौपाल स्‍व. मुंगालाल चौपाल छजना (मधुबनी) पुरुष पात्र श्री कुसुमलाल चौपाल स्‍व. नथुनी चौपाल छजना (मधुबनी) अभि‍नय- श्री शि‍वजी चौपाल स्‍व. फुसि‍याही चौपाल छजना (मधुबनी) नृत- श्री राजेन्‍द्र चौपाल स्‍व. धीरज चौपाल बि‍क्रम शेर,अंधरामठ (मधुबनी) नारी/पुरुष पात्र- श्री नेहाली चौपाल स्‍व. जहुरी चौपाल छजना (मधुबनी) नारी पात्र- श्री संतलाल साहु स्‍व. दसाँइ साहु छजना (मधुबनी) अभि‍नय- श्री कपि‍लेश्वर राम स्‍व. नेबी राम मझौरा (मधुबनी) अभि‍नय स्‍व. राम प्रसाद चौपाल स्‍व. बि‍हारी चौपाल छजना (मधुबनी) अभि‍नय- श्री धर्मी मण्‍डल स्‍व. ................ रतन सारा (मधुबनी) अभि‍नय- श्री यशोलाल यादव .................... बेरि‍याही (मधुबनी) वाद्य एवं वादक नाओं/पता- हारमोनि‍यम- स्‍व. ठीठर मण्‍डल स्‍व. ...... रतनसारा (मधुबनी) ढोलकि‍या- स्‍व. भुटाइ चाैपाल स्‍व. फेकन चौपाल छजना (मधुबनी) नागार्ची- स्‍व. रामेश्वर राम स्‍व. नेबी छजना (मधुबनी) झाइल करताल- श्री नथुनी चौपाल स्‍व. मधुकर चौपाल छजना (मधुबनी) डि‍गरी सेद्दा- स्‍व. रोगहु चौपाल स्‍व. तेतर चौपाल छजना (मधुबनी) भड़ि‍या- स्‍व. नथुनी चौपाल स्‍व. चुमन चौपाल छजना (मधुबनी) काँरनेटि‍या- श्री जालेश्वर दास स्‍व. खट्टर चौपाल छजना (मधुबनी) अन्‍य सहयोगी- श्री गंगाय साहु स्‍व. दुखाय साहु छजना (मधुबनी) स्‍व. गोवि‍न्‍द लाल साहु स्‍व. झगरू साहु छजना (मधुबनी) श्री लोदाय चौपाल स्‍व. गुणेश्वर चौपाल छजना (मधुबनी) श्री भुगती चौपाल स्‍व. बलदेव चौपाल छजना (मधुबनी) (संकलन सहयोग- रामवि‍लास साहु, लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, मधुबनी) मि‍थि‍लाक लोक संगीत/ लोक कला भगैत गबैया- (धर्मराज, ज्‍योति‍श महराज, अंदू मालि‍, उदय साहु, हरि‍या डोम, बेनी, शती अवला, कारूबाबा इत्‍यादि‍ भगैत नि‍म्नलि‍खि‍त ‘रसुआर-भगैत पार्टी’ 1980 ई.सँ गबै छथि।) श्री शम्‍भु प्रसाद मण्डल सुपुत्र स्‍व. लखन मण्डल भगैत गायन सह खजरी वादन उमेर- 42 साल 1980 ई.सँ भगैत गबै छथि। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल। श्री गंगाराम मण्डल सुपुत्र श्री अशर्फी मण्डल- झालि वादक उमेर- 40 1980 ई.सँ झालि‍ बजबै छथि। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल। श्री जनक मण्डल सुपुत्र स्‍व. उचि‍त मण्डल उमेर- 60 रमझालि‍/ कठझालि‍/ करताल वादक 1975 ई.सँ रमझालि‍ बजबै छथि। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल। श्री रवि‍न्‍द्र मण्डल सुपुत्र श्री खट्टर मण्डल उमेर- 32 नाल वादक पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल। श्री परमेश्वर मण्डल सुपुत्र स्‍व. बि‍हारी मण्डल उमेर- 41 ग्रुमबाजा/ गुमगुि‍मयाँ 1980 ई.सँ गुमगुि‍मयाँ बजबै छथि। पता- गाम- बढि‍याघाट/रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- ि‍नर्मली, जि‍ला- सुपौल। श्री महेन्‍द्र प्रसाद मण्डल सुपुत्र स्‍व. छेदी मण्डल, उमेर- 48, कठझालि‍ वादक बचपनसँ गेबो करै छथि‍ आ रमझालि‍/कठझालि‍ बजेबो करै छथि। पता- गाम- रसुआर, पोस्‍ट- मुंगराहा, भाया- नि‍र्मली, जि‍ला- सुपौल। मैथिलीमे ई-पत्रकारिता ई-पत्रकारि‍ताक प्रारम्‍भ भेने लेखक ओ पाठक वर्गमे काफी वृद्धि‍ देखल जाइत अछि‍। एकर अनेक कारणमे महत्‍वपूर्ण अछि भौगोलि‍क दूरीक अंत। जइसँ वि‍श्वमे पसरल मैथि‍ली भाषी, साहि‍त्‍य प्रेमी सभ सोझा एलाह। ऐठाम अपन वि‍चार व्‍यक्‍त करबाक पूर्ण स्‍वतंत्रा लेखको आ पाठकोकेँ भेटैत छन्‍हि‍। रचनापर त्‍वरि‍त टि‍प्‍पणी-समीक्षा-समालोचनाक सुवि‍धा सेहो इन्‍टरनेटपर अछि‍। इन्टरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थितिक रूपमे विदेहक पूर्व-रूप "भालसरिक गाछ" ५ जुलाइ २००४ सँ http://gajendrathakur.blogspot.com/ लिंकपर उपलब्ध अछि। ओना याहू जियोसिटीजपर २००० ईं.सँ ई साइट रहए, जे याहू द्वारा जियोसिटीज बन्द कऽ देलाक बाद आब उपलब्ध नै अछि। मैथिली ई-पत्रकारिताक आरम्भक श्रेय विदेहकेँ छै आ तँए एकर नाओं अछि‍ ‘वि‍देह प्रथम मैथि‍ली पाक्षि‍क ई-पत्रि‍का’ वर्तमानमे १०३ टा अंक ई-प्रकाशि‍त अछि‍। गूगल एनेलेटिक्स डेटा केर मोताबि‍क ‘विदेह ई पत्रिका’केँ ५ जुलाइ २००४ई.सँ अखन धरि ११६ देशक १,५०२ ठामसँ ७२,०४३ गोटे द्वारा ३५,४५२ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३६,७०७ बेर देखल गेल अछि। विदेह मैथिली पोथी डाउनलोड http://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi पर उपलब्ध अछि। लगभग २०० सँ बेशी मैथिली पोथी देवनागरी, तिरहुता आ ब्रेल तीनू लिपिमे जे पी.डी.एफ. फाइलमे फ्री डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि अनेक रचनाकारक अलाबे जगदीश प्रसाद मंडलक 2टा कथा संग्रह, 2टा एकांकी संग्रह, 3टा नाटक, 2टा कवि‍ता संग्रह, पाँचटा उपन्‍यासक सेहो उपलब्‍ध अछि‍। एकर अतिरिक्त ११००० सँ बेशी, तिरहुतामे लिखल, ५०० बर्ख पुरान तालपत्र, विदेह द्वारा स्कैन कऽ ओकर देवनागरी लिप्यंतरणक संग ऐ साइटपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। सरकारी आ गएर सरकारी संस्था सभ द्वारा अखन धरि कएल समस्त प्रयाससँ ई लगभग १०० गुणा बेसी अछि। ऐ समस्त कार्यमे लगभग १०,००० घण्टाक श्रम लगाओल गेल अछि आ एतए तिरहुता, ब्रेल आ अन्‍तर्राष्‍टीय फोनेटिक अल्‍फाबेट (आइ्. पी. ए) सिखबाक सेहो बेबस्‍था कएल गेल छै आ तइ संबंधी पोथी जे श्री गजेन्‍द्र ठाकुर द्वारा ि‍लखित अछि‍ ओ फ्री डोनलोड लेल सेहो उपलब्‍ध अछि। विदेह मैथिली ऑडियो संकलन http://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio , एतए विविध विधाक ऑडियो जेना कथा, कवि‍ता, गजल, हाइकू, टनका, हैबून, हैगा इत्‍यादि‍, देल गेल अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि ५० घण्टाक ऑडियो संकलन जे मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत जे मैथिलीकेँ जाति आधारित भाषा हेबाक अवधारणापर मारक प्रहार सिद्ध कए रहल अछि। मैथिली वीडियोक संकलन http://sites.google.com/a/videha.com/videha-video , एतए नाटक, सेमीनार, वर्षकृत्य, रसनचौकी, सामा-चकेबा, कवि-सम्मेलन, विदेहक नाट्य आ साहित्य उत्सवक वीडियो, मिथिलाक खोज, गीत-ंसंगीत, मैथिली वीडियो, वोकल आर्काइव, सगर राति दीप जरए, साक्षात्कार, विद्यापति पर्व, मैथिली गजल आदिक वीडियो उपलब्ध अछि। ऐठामक मुख्य आकर्षण अछि, मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीतक वीडियो, आ पहिल बेर विदेहक सौजन्यसँ सतमा कक्षाक दीक्षा भारतीक गाओल ‘गोविन्ददास’क गीत। ऐमे लगभग ५००० घण्टाक मेहनति विदेहक सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मिथिला चित्रकला/आधुनिक चित्रकला आ चित्र- http://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ लिंकपर उपलब्ध अछि ‘मिथिला चित्रकला, आधुनिक चित्रकला, रंगमंच, चौबटिया-सड़क नाटक सहित कएक हजारसँ ऊपर फोटो अछि जइमे २०० सँ ऊपर ि‍मथि‍लाक वनस्पति, १०० सँ ऊपर मि‍थि‍लाक जीव-जन्तु आ १०० सँ ऊपर मिथिलाक जनजीवनक किसानी आ कारीगरी संस्कृतिक फोटो सेहो अछि‍ जइमे ५००० घण्टाक मेहनति वि‍देह सदस्यगण द्वारा लगाओल गेल अछि। विदेह मैथिली जालवृत्त एग्रीगेटर : http://videha-aggregator.blogspot.com/ पर मैथिलीक सभ वेबसाइटक विवरण सहजताक लेल उपलब्ध अछि। विदेह द्वारा मैथिली साहित्य अंग्रेजीमे अनूदित कए http://madhubani-art.blogspot.com/ साइटपर राखल गेल अछि। एतए सत्तरि‍टा पोस्ट अछि जकरा माध्यमसँ मैथिलीक श्रेष्ठ साहित्य विश्वक समक्ष राखल गेल अछि। ऐ अनुवादमे लगभग ७०० घण्टासँ बेसी समैक श्रम खर्च कएल गेल अछि। विदेह:सदेह- पहिल तिरहुता (मिथिला़क्षर) जालवृत्त (ब्लॉग) http://videha-sadeha.blogspot.com/ ई मैथि‍ली भाषाक मि‍थि‍लाक्षरमे सज्‍जि‍त पहि‍ल वेबसाइट अछि‍। विदेह:ब्रेल- मैथिली ब्रेलमे : पहिल बेर विदेह द्वारा http://videha-braille.blogspot.com/ पर मैथिलीक पहिल साइट अछि जे क्रमश: मिथिलाक्षर आ ब्रेलमे अछि जेकारा स्‍पेशल स्‍क्रीन टच माॅनि‍टरसँ संबंधि‍त आदमी पढ़ि‍ सकै छथि‍ तहि‍ना स्‍पेशल प्रि‍ंटरसँ प्रि‍ंट सेहो नि‍कालि‍ सकै छथि‍। जइ दुनूमे लगभग हजार-हजार (१०००-१०००) घण्टाक मेहनति लागल अछि। नेना भुटका साइट मैथिलीमे बच्चा सबहक लेल एक मात्र साइट अछि जे संगीतज्ञ माँगनि खबासक नामपर- http://mangan-khabas.blogspot.com/ राखल गेल अछि। बाल साहि‍त्‍य जेना बाल कथा, प्रेरक कथा, बाल कवि‍ता आदि‍ समस्‍त बाल साहि‍त्‍यकेँ आधुनि‍क-वैज्ञानि‍क दृष्‍टकोणसँ लि‍खल श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक १२५ गोट प्रेरक कथाक अलाबे वि‍भि‍न्न लेखक केर साहि‍त्‍य ऐपर सहजताक संग उपलब्‍ध अछि‍ जेकरा वि‍श्वमे पसरल नेना, बढ़ैत नेना आ कि‍शोरक लेल फ्री डॉनलोड हेतु उपलब्‍ध अछि‍। विदेह रेडियो: मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट- ऐठामसँ मैथि‍लीमे गीत-संगीत, कथा-कवि‍ता, गजल-हाइकू, टनका-हैबूनक संग अनेक परि‍चर्चा प्रसारि‍त कएल जाइत अछि‍। साइटक नाओं अछि‍- http://videha123radio.wordpress.com/ विदेहक फेसबुक चौबटिया-फरबरी २००८सँ अछि जे पुरान फॉर्मेटमे छल https://www.facebook.com/groups/10299304978/ आ http://www.facebook.com/groups/7436498043/ पर, नव फॉर्मेटमे एतए http://www.facebook.com/groups/videha/ उपलब्ध अछि, आ फेसबुकपर मैथिलीक सभसँ पुरान चौबटिया अछि। ऐ चौबटि‍यापर ८४००सँ बेसी मैथिली भाषी सदस्य द्वारा गत साल १०,००० पोस्ट आ ११०० सँ बेसी फोटो पोस्ट कएल गेल अछि। प्रति‍दि‍न १५० टासँ ऊपर कॉमेट पोस्‍ट सभपर अबैए जइमे मि‍थि‍ला-मैथि‍ली वि‍कासपर स्‍वस्‍थ्‍य परि‍चर्चा होइए। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव- मैथिली रंगमंचकेँ वैश्विक स्तर प्रदान केलक अछि जे श्री बेचन ठाकुरजी द्वारा http://maithili-drama.blogspot.com/ पर उपलब्ध अछि। एतए मैथिली आ अंग्रेजीमे मैथिली रंगमंचक चित्र-आ वीडियोक माध्यमसँ विस्तारसँ वर्णन १७५ पोस्टमे देलगेल अछि, ई मैथिलीक अखन धरिक “स्लैपस्टिक ह्यूमर” बला रंगमंचक विरुद्ध विदेह मैथिली समानान्तर रंगमंचक प्रारम्भ केलक अछि। लगभग २००० घण्टाक मेहनति ऐ वेबसाइटपर अखन धरि भऽ चुकल अछि। एतए मिथिलाक गम-गाममे होइत मैथिली रंगमंचक अतिरिक्त, कोलकाता, जनकपुर, राजबिराज, पटना, दिल्ली आदिक रंगमंचक विवरण सेहो उपलब्ध अछि। समदिया- http://esamaad.blogspot.com/ पर पूनम मण्डल आ प्रियंका झा द्वारा २००४ ई.मे शुरू भेल, साहित्यिक पत्रकारिताक लीकसँ हटि कऽ न्यूज पोर्टलक वा ई-पेपरक रूपमे मैथिली पत्रकारिताकेँ एतएसँ प्रारम्भ भेल। अखन धरि ५२५ सँ बेसी पोस्ट ऐठाम भेल अछि। सर्वश्रेष्ठ न्यूजकेँ मासक समदिया पुरस्कार देल जाइत अछि। अगस्‍त २०१२मे सर्वश्रेष्‍ठ मैथि‍ली पत्रकारकेँ ‘विदेह मैथिली पत्रकारिता सम्मान’सँ सम्मानित करबाक घोषणा अछि‍ जे आब साले-साल सेहो देल जाएत। ऐ वेबसाइटपर अखन धरि ५५०० घण्टाक मेहनति पूनम मण्डल आ प्रियंका झा टाइपसँ लऽ कऽ समाचार अपलोड करबाक कार्यमे कऽ चुकल छथि आ ई साइट श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरक सीरियल चोरिक भण्डाफोड़क अतिरिक्त ढेर रास उद्घाटन कऽ साहसिक सोद्देश्य मैथिली पत्रकारिताक परिचए दऽ चुकल अछि। मैथिली फिल्म्स http://maithilifilms.blogspot.com/ श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री बेचन ठाकुर, श्री विनीत उत्पल, श्री सुनील कुमार झा आ श्री आशीष अनचिन्हार द्वारा संचालित साइट अछि, ऐपर मैथिली, अंगिका, वज्जिका आ सुरजापुरीक पूर्ण विवरण उपलब्ध अछि। एतए अखन पचाससँ ऊपर पोस्ट उपलब्ध अछि। अनचिन्हार आखर http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ - एेपर ४८१टा गजल, २२टा कता, बन्द, नात, १२४टा रुबाइ, ७०टा करीब आलेखक अलाबे शेरो-शाइरीसँ संबंधित विडियो सेहो उपलब्‍ध अछि‍। मैथिली हाइकू http://maithili-haiku.blogspot.com/ - ऐ वेबसाइट मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। मैथिली हाइकू (प्राकृत दृश्‍यपर ५/७/५) टनका (प्राकृत दृश्‍यपर ५/७/५/७/७) हैबून (प्राकृत दृश्‍यपर गद्यक एक-दू या तीन अनुच्‍छेदक अंतमे ओतबे हाइकू या टनका) हैगा (तत् संबंधी चि‍त्र), शेनर्यू आदिक थ्योरी आ प्रैक्टिस सभ एतए भेट जाएत। मानक मैथिली http://manak-maithili.blogspot.com/ - ऐ वेबसाइटपर मैथिलीक अन्तर्जालपर मानकीकृत स्वरूप नेपाल आ भारतक मैथिली भाषाशास्त्री लोकनिक मतक अनुसार। मैथिलीक साहित्यिक पत्रकारिताक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। विहनि कथा http://vihanikatha.blogspot.in/ पर, मैथिली कविता http://maithili-kavita.blogspot.in/ पर, मैथिली कथा http://maithili-katha.blogspot.in/ पर आ मैथिली समालोचना http://maithili-samalochna.blogspot.in/ पर उपलब्ध अछि। विदेह गोष्ठी: (परिचर्चा आ प्रैक्टिकल लैबोरेटरीक प्रदर्शन। किछु विचार डाक आ ई-पत्रसँ सेहो आएल।)- http://esamaad.blogspot.in/p/blog-page_05.html मैथिली नाटक रंगमंच फिल्मपर: २८-२९ जनवरी २०१२ स्थान चनौरागंज,झंझारपुर। निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा आधुनिक मैथिली नाटक आ रंगमंचपर: १७-१८ सितम्बर २०११ आ २४-२५ सितम्बर २०११केँ। मैथिली गजल, कता, रुबाइपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा: २६-२७ नवम्बर २०११ आ ०३ आ ०४ दिसम्बर २०११ मैथिली हाइकू, टनका,शेर्न्यू, हैगा, हैबून पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १२-१३ नवम्बर २०११ आ १९-२० नवम्बर २०११ मैथिली बाल साहित्यपर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; १५-१६ अक्टूबर २०११ आ २२-२३ अक्टूबर २०११ मैथिली विहनि, लघु, दीर्घ कथा आ उपन्यास पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २९-३० अक्टूबर २०११ आ ०५-०६ नवम्बर २०११ मैथिली प्रबन्ध, निबन्ध, समालोचना, अनुवाद, मानक मैथिली आ शब्दावली पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०१-०२ अक्टूबर २०११ आ ०८-०९ अक्टूबर २०११ मैथिली महिला आ फेमिनिस्ट लेखन पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०३-०४ सितम्बर २०११ आ १०-११ सितम्बर २०११ मैथिली कला-शिल्प-संगीत पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; २०-२१ अगस्त २०११ आ २७-२८ अगस्त २०११ मैथिली हास्य-व्यंग्य पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ अगस्त २०११ आ १३-१४ अगस्त २०११ मैथिली गूगल ट्रान्सलेटर टूलकिट, गूगल ट्रान्सलेट, गूगल लैंगुएज टूल, मैथिली विकीपीडिया, कैथी आ तिरहुता यूनीकोडक एनकोडिंग पर निर्मली, जिला सुपौलमे अन्तिम परिचर्चा; ०६-०७ दिसम्बर २००८, १३-१४ दिसम्बर २००८, ०५-०६ दिसम्बर २००९, १२-१३ दिसम्बर २००९, ०४-०५ दिसम्बर २०१०, ११-१२ दिसम्बर २०१०, १७-१८ दिसम्बर २०११, २४-२५ दिसम्बर २०११ मैथिली मे प्राथमिक आ मध्य विद्यालयी शिक्षा मैथिली माध्यमसँ मिथिलामे करेबा लेल निर्मली, जिला सुपौलमे परिचर्चा; ०३ फरबरी २०१२-०४-०८ नि‍ष्‍कर्षत: ऐ ई-पत्रकारितामे साहित्यिक आ राजनैतिक दुनू पत्रकारिता शामिल अछि जतए, दृश्य आ श्रव्य माध्यमक प्रचुर प्रयोग कएल गेल अछि। कीर्तिनाथ झा लघुकथा-नपुंसक 1 नीकवा बेजाय, गाममें लोक कें गप्प चाहियैक. मुदा, लोककें रस गप्पमें नहिं अबैत छैक, रस अबैत छैक कुचेष्टामें. कारण, सब सुखी हो ताहिसँ मन शांत जरूर हयत, मुदा, शोणितमें जं हिमोग्लोबिन बढ़ेबाक अछि तं गप्पमें रस लियअ, गप्प में रस दिऔक. अनकरकुचेष्टा जकरा नीक नहिं लगनि से कीर्तन में जा कय बैसथु ! देखैत नहिं छियैक, शहरक देखाउस पर आप गामो सबमें बुढ़ा लोकनि योगासनक बाद अनेरे-अनेरे हँसबाक नाटक करै छथि. कबै झाक कहब छनि, कुचेष्टासँ लोक के हंसबाक अवसर भेटैत छैक, देह में स्फूर्ति अबैत छैक.नहिं तं अपन काज आ बेगरतासँ ककरा फ़ुरसति. तें, फलां ठाकुरक घर में जखन पौत्रक जन्म भेलनि, तं, गाममेंघूड़ लग, ब्रह्मबाबाक स्थानपर, दछिनबारि टोलक मण्डपपर, पोखरिक मोहारपर लोक कें अनेरे मुसुकी छुटय लगलैक.प्रतिष्ठित लोकनि कुच्चड लोकनिकें कात-करोट ल’ जा कय कहथिन, ‘एहन गप्प बजबो जुनि करी’. मुदा कबै झा एहि अनुशासनसँ मुक्त छथि.महिसबारि आ अनुशासन, एक ईर आ दोसर बीर घाट ! कबैकेंजखन ई खबरि भेटलनि, तं, अकस्मात् हुनका मुंहसँ बहरा गेलनि, धन्यभाग! दोहाई हमर गाओं !! जं गौआंकएकबाल रहलैक तं एहि गाओंमें केओ नपुंसक निर्वंश नहिं रहत !महिसबार सब एहि पर पिहकारी मारलक: ‘भाई, एहि गाम में कबै झाक जोड़ा नहिं. गप्पी सबहक ई सरदार जं कर्णपुर छोडि देथि तं एतुका लोक बौक भ’ जायत. कबै झा जे बाहबाही तकैत छलाह से तं भेटि गेलनि, मुदा, तमाकूक अमल जोर मारने रहनि. खौंझाइत कहलखिन, मर बहिं, फुसिएक थोपड़ी पाड़ैत रहबें,कि एक ज़ूम तमाकुओदेबही. सरकार सब किछु पर टैक्स लगा देलक, गप्पहुसँ गेलहुं. आ महिसबार सब एकबेर फेर ठहक्का मारलक. कबै झागदगद भ गेलाह. आ महिसबार सब लोट-पोट भ गेल. 2 रामलखनएहि बेर बहुत दिनक बाद गाम अयलाह-ए.गाम में बहुतो किछु बदलल-बदलललगैत छनि. एहि गाम में ने आब कबै झा छथि आ ने आब रहरहाँ लोक एतय महिस पोसैत अछि.पहिनेगाय-महिसपोसलासँ अर्थ व्यवस्था पर जे असर होइत छल होइक, नेना-भुटका पर एकर दुष्प्रभाव ककरोसँ छिपल नहिं रहैक. दरबज्जा पर माल महिस रहतैक तं गरीब-गुरुबा-किसानक धिया पुता माल-महिस के सम्हारत, कि स्कूल जायत ! आब ताहि में परिवर्तन भेलैये. रामलखन ताहिसँ संतुष्ट छथि. रामलखन अपन जीवनक पहिल सोलह वर्ष एही गाम में बितौनेछथि. हुनका एतुका एक-एक गाछी कलम, बाध-बोन,आरि-धूर,पोखरि-झाँखरि, फील्ड, चौबटिया-चौक आ टोल-मोहल्ला सब किछु हाथक तरहत्थीक रेखा-जकां चिन्हल छलनि. तें, आइ अहल भोरे रामलखन दलान परसँभोरुका टहलान पर निकललाह. एहि टहलानमें ओ गामकें अखियासैत अजुका गाम कें अपन स्मरण गाम सं मनहिं-मन मिलान क रहल छथि; आइ जखन गामक उत्तर,भरल नासीमें उज्जर-उज्जर, भकरार भेंटक फूलक गलीचा देखलनि तं हिनका विश्वास भ’ गेलनि,हं, ई अपने गाम थिक. मोने छनि, मैट्रिक पास कय जहियारामलखनपढ़बाले पटनाचल गेल छलाहतखनेहिनक अनेक बाल-सखा सब स्कूल जायब छोडि गिरहस्ती सम्हारि नेने रहथिन. कतेको गोटे हर-फारआ हरक लागन ध’ नेने छल आ कतेको महाजनीसँ ल’ कय मोटा धरि उघबाले शहरक बाट ध’ नेने छल.आब गाम बदलि चुकल अछि. हर-फार कहिया ने निपत्ता भ’ गेल, भले जिद्दमें नथुनी कामति आ कारी राउत एक-एक टा बड़द राखि गाममेंभजैती शब्दकें जियाकय रखने छथि.यद्यपि,एतय आब बरहीक दरबज्जा पर ने भाथि छनि आ ने ओतय भोरुका पहर हर-फारक मरम्मतिले पसार लगैतछैक. एतुका लोक आब हांसू-खुरपी-पिटबैलेवा चौकठि-केबाड़-खिड़की आ चौकी-तख्तपोश बनबैले, लकड़ी चिरबैले ठाकुरकद्वारि पर आयब बन्न क’ चुकल अछि. ठाकुरक पांच टा बेटा सेहो पांच ठाम पसरि गेल छथिन.टोल परहक इनार भत्थन भ’ चुकल अछि; हं, एहि बेरुका गर्मी में जखन गामक सब चापाकल सुखा गेल रहैक तं लोककें पंथक पाकडि, इनारसब, अवश्य मन पडलैक. गामकछोट-पैघ,गोड़पन्द्रहेक,पोखरिक गन्हाइत पानिमें आबमनुखक कोन कथा,लोक महिसोके नहिं नहबैत अछि. मुदा, खुशीक गप्प ईजे गाम में आब खढ़घरक स्थान पक्का घर ल’ लेने अछि. जतय कतहु खढ़क आफूसक घर बंचल छैहो, खढ़क चार पर कुम्हड़-कदीमाक लत्तीक बीच चकमक करैत टाटा-स्काई आ एयरटेलक टीवी ऐन्टेना रामलखनकेंगामकसमृद्धि आ जीवनमेंग्रामीण लोकनिक बदलैत प्राथमिकताकद्योतक बूझि पड़लनि.अस्तु,गामक सम्पन्नताकें देखि रामलखनकें संतोष सेहोहोइत छनि, आ ओ गामक जिजीविषासँ आश्वस्त सेहोहोइत छथि. एहिना भोरुका झलफलीमें रामलखन गामक प्रगति आ परिवर्तन कें अखियासैत आगू बढ़िते जाइत रहथि,कि हिनका दूरसँअबैत एक टा पुरुषकछवि पर नजरि पड़लनि. करीब छौ फीट नमती, पैघ पेट. बामाहाथकलाठीपर भर दैत नहु-नहु अबैत मध्यवयसाहुक छवि रामलखन कें चिन्हार-सन लगलनि. व्यक्ति जेना-जेना लग अबैत गेलाह, छविस्पष्ट होइत गेलैक आ रामलखनकें अपन चिरपरिचित बालसखाकें देखि सुखद आश्चर्य भेलनि. सोचलनि, एतेक दिनक पछातियो केओ अपन संगी तं भेटल. ओहो व्यक्ति दूरेसँ देखैत: - रामलखन? -के, रघुवीर?लग अबिते दुनू गोटे एक दोसराक हाथकेंअपन-अपन हाथमें लैत, एक दोसराकें भरि पांज कय पकड़लनि. मनहिं-मन रामलखनकें मन पड़य लगलनि कोना ई लोकनि दुर्गाक मन्दिरक आगूक पोखरिक मोहार पर, मंदिरकपाछूक नासी, आ लगक कलमबाग सबमे भरि-भरि दुपहरिया बौआइत रहथि. आमक पातकघिरनीकें तेजसँ घुमबैलेगर्मीमासक धुक्कड़ में निच्छोह दौगैत रहथि. एतेक दिनुक पछाति अनायास भेंट. दुनू गोटेकें प्रकृतिस्थ हेबामें कनेक समय लगलनि. सत्ते, रघुबीरकें देखि तुरते चिन्हबामेंपुरानो परिचित लोककेंकनेक समय अवश्य लगितैक.किन्तु, रामलखन लगभग ओहने छथि. केवलचानि परहक केश उडि गेलनि-ए आ आँखिपर चश्मा चढ़ि गेल छनि. मुदा, रामलखनरघुवीरकें देखि क्षुब्ध छलाह. -एना? -‘आब एहिना.’ तटस्थ भावें अनायास रघुवीरकमुँहसँ बहरयलनि.संगहिं,विवशताकमुसुकीक क्षीण रेखामुँहक एहि कोरसँ दोसर कोर धरि पसरि गेलनि. मुदा, रामलखनकें किछु बुझबामें नहिं अयलनि. असल में स्वस्थ सबल शरीर में जखन अनायास अवघात होइत छैक, तं, अचानक आकस्मिताक मारि पर लोककें अपनहुँ विश्वास नहिं होइत छैक. तकर उपर,पछाति, परिवार आ सर-समाजक निरंतर सहान्नुभूति आ सहाराक आग्रह मनुक्खक मनोबलकें फोकिला करय लगैत छैक. जे मनुक्ख अपन असक्तता भारसँ उबरय जनैत अछि, से देहक चोटकें फुर्तीसँ निजबैत जीवनक गतिकें पुनः पकडि लैत अछि. जकर चोट संघातिक होइत छैक वा जे चोटसँसहजहिं हारि मानि लैछ, बिछाओन ध’ लैत अछि. रघुवीर अपन असक्तताकें हरा चुकल छथि. मुदा, जखन दू टा सुपरिचित व्यक्तिक लम्बा अंतरालक बाद भेंट होइछ, एक दोसराक बदलल मनोवृत्तिकें बूझब सहज नहिं. कारण, शरीर-जकां मनुखक मोन सेहो निरंतर बदलैत रहैत छैक.डाक्टरदीपक चोपड़ा-सन गुरु तं एतेक धरि कहैत छथि, जे प्रति क्षण बहराइत शारीरिक उत्सर्जनक कारण परमाणुक दृष्टिऍ मनुक्खएक रहिते नहिं अछि ! ओ निरंतर बदलैत रहैत अछि. तथापि, रामलखन के रघुवीरकटेढ़, झुलैत दाहिना गट्टा हठात् विचलित क’ देलकनि. पूछि देलखिन, आ ई गट्टा ? परिचित लोक आ अपरिचित. दोस्तवा दुश्मन. नित्तह संगी वा अनेक वर्षक बाद भेंट. जंदुखाइत घाव पर ककरो हाथ पड़उक, मनुक्खक प्रतिक्रिया एके हेतैक: लोक हाथ छिपि लेत, कुहरि उठत वा अनायास रोष प्रकट भ जेतैक. आइओसएह भेलैक. -अहीं लोकनिक देनछी, डाक्टर साहेब ! किन्तु, स्वाभाविके, रामलखन कें बाल-सखाक ई पीड़ा जनित व्यंग -सोझे बुझबामें नहिं अयलनि. -माने? - छोडू. जे भेलैक से भेलैक. तखन पुछै छी तं सुनिए लियअ.आब तं पांच वर्ष भ’ गेलैक. छठिक भोरुका अर्घ्यकदिन.झलफल रहैक, पोखरिक घाटपर दाहिने हाथक भरे खसि पड़लहुँ. गट्टा शुद्ध क’ टूटि गेल. दरभंगागेलहुँ. डाक्टर पलस्तर केलनि. दर्द कम भ’ गेल गाम चल एलहुँ. छौ हप्ताक बाद जखन पलस्तर कटल, तं, हमरा तं बुझू दांती लागि गेल. पहुंचा एक दिस आ गट्टासँ नीचा हाथ दोसर दिस. झुलैत! डाक्टरकें बड्ड गारि पढ़लिऐक. मोन तं भेल कपार फोडि दिऐक. मुदा, लाचार रही. पछाति कतेक गोटे कहलक दिल्ली जाउ. बेटा भोपालसँ आयल तं फज्झति करय लागल. कहलक, अहाँकें की लगैएदरभंगाकहियो बदलतैक ! आब अपनों बूझैत छियैक, हमर पहुंचाक दुनू हड्डी टूटल छल. आइ काल्हि हड्डीक भीतर लोहाक छड़ द’ कय हड्डी जोडि दैत छैक. मुदा, से तं डाक्टर हमरा कहैत, ने. हमरा टाका तं लगबे कयल. पहिने पूछै, गुरुकें कोदो द’ कय पढ़ने छह! हम की बुझय गेलिऐक, आब टाकाखर्चकय सेहो लोक डाक्टरीक डिग्री पबैए आ लोककें ठकि कय हमरे-जकां लहैब करैए. मुदा, हमरा भय भ’ गेल. देरी भ’ गेल रहै. हम दिल्ली नहिं गेलहुं. आब एहिना काज चलबैछी. रामलखन क्षुब्ध भ’ गेलाह.मुदा, ओहि दिन गप्प ओत्तहि ठमकि गेलैक. दोसर दिन रामलखन टहलय ले बहरयलाह तं रघुवीर फेर भेटि गेलखिन. दुनू गोटे टहलैत कमलाक कात धरि गेलाह आ वापसी में दुनू गोटे रघुवीरहिंक दरबज्जा पर बैसि गेलाह. रघुवीर कहय लगलखिन, जखन नौकरीमें रही, देह में एको रत्ती चर्बी नहिं छल. आब बैसल ठाम खाइत छी. वयस से बढ़ले जा रहल अछि. एहिकज्जी डांड ल’ कय ने धफडि क’ चलि सकैत छी आ ने टूटल हाथ ल’ कय योग क’ सकैत छी. तखन भोर-सांझ धीरे-धीरे भरि गाम घूमि अबैत छी. दस गोटेसँ भेंटो-घांट भ गेल आ देह में कनेक हवा-पानि सेहो लागि गेल.यौ, डाक्टर साहेब, गाम पर बैसल-बैसल तं भूखो बिला जाइछ. रामलखन सहमति में मूड़ी डोलौलनि. एतेक वर्षक अवधि आ ओतबे वर्षक बिचुका अपरिचय. लोक गप्पो की करतैक. बहुत दिन धरि जखन लोकक धिया-पुतासेहोदूर रहय लगैत छैक तं ओकरो सबसँ माय-बापक गप्प ‘ठीक छी किने ?’ आ’ हं, सब ठीक’ धरि सीमित भ’जाइत छैक. कारण, दूर-दूर में रहैत लोकक हालत ठीक रहौ, तं, आ बेजाय रहौ, तं, व्यवस्था तं अपनहिं करय पड़तैक.अस्तु, किछु कालक मौन केर बाद रामलखने पुछ्लखिन, ‘ अहाँक दरबज्जा पर आब लोकक अवर्यात नहिं देखैत छियैक ?’ -ककरा देखबैक ? माल-जाल, हर-फार सब उठि गेल. खेती बदलि गेल. बदलि की गेल, समाप्ते भ’ गेल. जकरा जतय द्वारा लगलैक, चल गेल. हमरो धिया-पुता सब बाहरे रहैए. भैयाकजेठका बेटा गामे में ग्रिल बनबैये. हम अपने गाम छोडबासँ पहिने स्कूल जाइत अबैत मैट्रिक तं पास भइए गेल रही. तखनहोम गार्ड केर ट्रेनिंग नेने रही. फल ई भेल जे पढ़ब लिखबतं सीखि लेलहुं, किन्तु,कमरसारि, हर-फार आ खेती-किसानी छूटि गेल छल. की करितहुँ? दू नाओ पर पयर देब ने भ’ सकल, ने तकर इच्छा छल. मुदा, बाबूमैट्रिकसँ आगू पढ़यबासँ पहिनहिहाथ झीकिचुकल छलाह. हुनका तं ओहुना हमरा पर सब दिन भेंडा-महिसिक कानिरहनि. हम तं कहियो किछु नहिं कहलियनि. मुदा, ओ हमरा देखय नहिं चाहथि.किएक से हुनकर धर्म बूझनु. ओईरहस्य तं अपन संगहिं नेने चल गेलाह. हं, तं कहैत जे रही. हम जहिया होम गार्डक ट्रेनिंग ल’ कयगाम आपस भेल रही,ओही बीचे टोल परसँ कतेक गोटे नागपुर जाइत छल. पुबारि टोलक देबू ठीकेदारक संग काज करैत रहथि. कहलनि, चलह. कोनो ने कोनो द्वारा लागिए जेतह. बाबूकें कहलियनि, तंगारिक तर क’ देलनि. कहय लगलाह, ‘बुझही आब. अपने केलहा. कोनो जोकरक नहिं रहलें. हमरा संगे जं किछु सिखने रहितें, तं, अपन दरबज्जा पर बैसल-बैसल काज करितें. लोगतोरेतकैत एत्तहि अबितौ. जो नागपुरमें बौआक ठीकेदारी में माथपर ईटा आ बालु उघिहें.’बाबूकेंअपन कमाई पर बड़ गौरव. चारि टोलक गाम में एकटा पसारी. अपना कमाईसँ पांच बीघा जमीन किनने रहथि. एक बीघामें आमक कलम रोपने रहथि. कहथिन, जे,‘एहि कलमे-गाछीक जं ताकुत करबें तं आम तं सब मिलि कय आम तं खेबे करबें,पांच भाईक बीचो नकदीओ ले’कहियोककरो आगू हाथ नहिं पसारय पड़तौक.’मुदा, हम मन बना नेने रही. हम पैर छुलियनि, ब्रह्म बाबा के गोड़ लगलहुँ आ सबहक संग लागिनागपुरक बाट धेलहुँ. बाबू कोनो बेजाय नहिं कहने छलाह. ओतय जा कयशुरूमें कतेक ने पापड़ बेलल. मुदा, बिनु परिश्रमे कोन काज होइत छैक. देह स्वस्थ छल. कोनोतेहन लुतुक नहिं रहय. ब्रह्म बाबाकएकबाल वर्षक भीतरे कोल इंडिया में सिक्योरिटी विभाग में भरती भ’ गेलहु’ कहैत रघुवीर दुनू हाथ जोड़ि उत्तर दिस तकैत दुनू हाथ माथमेंलगौलनि आएकटा दीर्घ निश्वास छोड़लनि. -वाह! - सबटा मैया आ ब्रह्मबाबाक कृपा. हमरा नोकरी लागि गेल आ सबहक जीवन बदलि गेलैक. रिटायर भ’ क गाम में छी. अहाँ लोकनिक दया सं पांच बीघा जमीन, घर, हाथ पर पेंशनक चारि गो टाका, आ सुरतियाक ई बोलेरो- अपन द्वारिक एक कात टटघरक गराजदिस आंगुर देखबैत- सबटा नोकरिए प्रताप छी. नहिं तं गाममेंपचास घर बाभनगिरहत आ हमरा लोकनि पांच भाई.फीघर जं वर्षमें एक-एक मन धान भेटबे करितैक, तं, आइ ककर गुज़र होइतैक. ताबते एकटा युवक एकटा थारी में दू कप चाह ल’ कय दुनू गोटेक आगू में राखि देलखिन आ रामलखन कें पयर छूबि प्रणाम केलखिन. - ई बालक ? - हमर पौत्र. भोपाल में काज करइए. रघुवीरक पौत्र सूरज, सॉफ्टवेयरइंजिनियर छथि. मुदा, दूनू बाल-सखाकेंगप्पमेंव्यस्त देखि चाह ओतय राखि सूरज आपस चल गेलाह आ दुनू मित्र पुनः गप्पक सूत्र पकडि लेलनि. -अहाँसमय पर सही बाट पकडि लेल. फल तं आँखिक सोझाँ अछिए. - हं. आब तं गाम में एहने केओ हयत जकर धियापुता स्कूल नहिं जाइत हेतैक. मुदा, दोसर इहो देखैत छियैकतहिया जेकेओ शहर धेलकतकरधिया-पुता अन्न-वस्त्र ले बेलल्ला नहिं भेलैक. सबहक देह पर कपड़ा छैक, माथ पर पक्का घर छैक. आब तं सरकारों बहुत काज केलकैए,तखन मनुखक जीवन में खगता आ खाहिसकएत्ता छै, कहैत रघुवीर उगैत सूर्य दिस ताकय लगलाह. कहलखिन, ‘इएह दिनकर दीनानाथ सबहक घर में इजोत करैत छथिन. ब्रह्मे बाबा गामक रक्षा करैत छथिन. हम पूरा नौकरीगढ़चिरौली, मध्य प्रदेश में कयल. पछातिछौंड़ा सब नागपुर में पढ़ैत छल; कनिया तं कहियो गाम नहिं छोड़लनि. धिया-पुता सब कहैत जाइ छल, ‘एत्तहिनागपुरमेंघर बना लितहुँ’. मुदा, कमला माई आ गामक मोह एतय ल’ अनलक. नहिं तं अहूँसँ कहियो भेंट होइत. ओकरा सबकें हम कहलियैक, हमरा जतेक भेल, कय जाइत गेलियह. आब तं सब अपन-अपन डारि धरह, खोंताबान्हह, आ हम गाम आबि गेलहुँ.’ गप्पमें समय कोना बीतल जाइत छल, रामलखनकें अनुमानों नहिं भेलनि. मुदा, हुनकर शंकाक समाधान एखनो बांकीए रहनि. कहलखिन, आइ आब हम चलब रघुवीर. कएक टा काज बांकी अछि. मुदा, एकटाजिज्ञासा रहिए गेल. अहांकहाथ तं टूटि गेल से तं बुझलियैक, मुदा, हाथक छड़ी. नंगराइत चलैत छह! एतय धरि रघुवीर अपनाकें नियंत्रणमें रखने छलाह. मुदा, रामलखनक ई प्रश्न एकाएक रघुवीरक ह्रदयक कपाट खोलि देलकनि. कहलखिन, ‘रामलखन आब पुछलहु, तं एक छन बैसिए जाउ.फेर कहिया भेंट हयत. आ हम ककरा ईगप्प कहबैक. अहाँ नेनपन संगी छी. नारायण पछिला वर्ष गुजरिए गेल, दुखिया बिछाओनधेने अछि’, आ रघुवीर शुरू भ’ गेलाह. -रामलखन अहाँ जखन गाम में रही तहियाककोनोगप्प अहाँसं छिपल नहिं. हं, अहाँ पहिने निकलि गेलहुँ. हमरा गामसँ बहरयबामें समय लागल. कहबे केलहुँ, लटैत-बुडइत हमहूँ मैट्रिक पास भेले रही.तकर बादक गप्प बुझबे केलियैक. जहिनाकोल इंडियाक सिक्योरिटी विभागक नौकरी हमरा ले भगवानक वरदान सं कम नहिं छल, तहिना ओएह नौकरी हमरा पैदार सेहो बना देलक. मुदा, प्रत्येकघटना-दुर्घटनामें सबटा खराबे नहिं होइत छैक. हमरो संगे तहिना भेल. ओही दुर्घटनासँ हमरा मुक्ति सेहो भेटि गेल !’ रघुवीरवाइ में तेना बजैत चल जाइत छलाह जे रामलखनकें हुनका रोकबाक इच्छा नहिं भेलनि. रघुवीर फेर शुरू भ गेलाह. ‘ नौकरीकपन्द्रह वर्ष तं सब किछु खूब नीक जकां चलल. तखन एक राति एकाएक सब किछु बदलि गेलैक.’ कहैत रघुवीरक चेहरा एकाएकमोर्चापर तैनात सैनिक-जकां कठोर आ दृढ़ भ’ एलनि. ‘15 दिसम्बर 2001क राति. बज्र अन्हार. पानि पडैत रहैक, किआतंकी सब खदान तोडबाक गोला-बारूद भंडार पर एकाएक धावा क’ देलकैक. हमड्यूटी पर रही. सब गोटे मीलि कय मोर्चा सम्हारि लेलियैक;हमगार्ड कमांडर रही. हम एक गोटेकें जखने भंडार दिस दौगैत देखलियैक, गोली चला देलियैक.ओ ओत्तहि ढेर भ’ गेलैक.ओम्हरोसँ फयरिंग शुरू भ’ गेलैक. मुदा, हम मोर्चा सम्हारि लेने रही.संयोगसँ आतंकवादी सबहकपहिल गोली हमरे जांघमें लागल. हम खसलहुँ, मुदा, अढ़ में रही. मोर्चा नहिं छोडलियैक. एकटाहमलावर तं पहिनहिढेर भइए गेल रहैक. सबहकप्रयाससँआतंकी हमलाविफल भ’ गेलैक. मुदा,केस-फौजदारीक लम्बा चक्कर चललैक. ओहि दिन ड्यूटी-इन्चार्ज तं हमही रहियैक.’एतय आबि कय एकाएक रघुवीर फेर एक बेर लम्बा निःश्वास छोडलनि आ हुनकर चेहरा पर एकाएक विजेता सैनिकक भाव आबि गेलनि आ चेहरा चेहरा चमकि उठलनि, आ ओअकस्मात बाजि उठलाह, ‘ डाक्टर साहेब,मोने तं हयत, गौआं सब नपुंसक कहि कय हमर केहनमखौल करैत छल ! हम से दाग धो देलियैक !! प्रशासनक सहयोग आ महावीर जीकएकबाल,हम बरी तं भेबे केलहुं, आबगाओं में हमरा सोझाँ ककरो नजरि उठेबाक हिम्मतो नहिं होइत छनि!अवाक्रामलखन, रघुवीरक चेहरापर आयल विजेताक भावकें अनेक क्षण धरि देखिते रहि गेलाह. तावत् सूर्य सेहो ऊपर आबि गेल छलाह. आनन्द कुमार झा, मेंहथ, झंझारपुर - 847404 मैथिलीक वर्तमान रंगमंच, धर्मिता आ स्वतन्त्रता जखन हमर चिन्तन मैथिली रंगमंचक स्वतन्त्रता दिस जाइत अछि तॅ हम पबैत छी - बेसी नाटककार रंगमंचक पक्ष राखए लगैत छथि । जखन की हुनका अपन नाट्य लेखन आ ताहिमे आबि रहल अवरोधक तत्वकेॅ उजागर करबाक चाहिअनि । से ओ जानि - बुझिकेॅ तकरा झाॅपैत रहैत छथि । से मात्र अहि दुआरे जे हुनक नाटक रंगमंच पर प्रदर्शन हुअएह । हुनका एकरती चिन्ता नहि रहलन्हि आकि रहैत छन्हि जे हम एक साहित्यकार छी । हमर सफलता नीक साहित्य लेखनमे अछि । हम पहिनहुॅ कहलहुॅ अछि जे रंगमंच स्वतन्त्र विधा छी । ओकरोमे जहिना साहित्यमे विभिन्न विधा नाटक , कथा , उपन्यास , कविता सभ अछि । तहिना रंगमंचोक अनेक विधा छैक , जेना - नाटक , नृत्य , गायन , बाजन , एकल अभिनय इत्यादि । आब एतए प्रश्न उठैत अछि आ चिन्तन करैक अछि । जे हमरा लोकनि मैथिली भाषामे जखन जखन रंगमंचक चर्चा करैत छी तॅ मात्र नाटकक विमर्श ठार कएल जाइत अछि । से किएक एना जानि बुझिकेॅ कएल जाइत अछि ? से अहि दुआरे जे ओहिमे साहित्य पक्षक लोकक बोलबाला रहैत अछि । रंगमंचीय विभिन्न विधाक विशेषज्ञ लोकनिकेॅ कतियाएल जाइत रहलाह अछि । ओ दहोदिसिआ जे साहित्योमे अपन स्थान सुरक्षित कएने रहए चाहैत छथि आ रंगमंचहुॅ पर सफलताक सिरही चढए चाहैत छथि । मुदा से सम्भव नहि छैक ओ कतहुॅ भएकेॅ नहि रहैत छथि । मुदा अहि खेलमे सभसॅ बेसी नुकसान जॅ ककरो होइत अछि तॅ ओ छी मैथिलीक रंगमंच । जतए नाटककार तॅ ओतबहि रहैत छथि मुदा कलाकार स्थापित नहि भए पबैत छथि । कलाकारक फेर बदल होइत रहैत अछि ओकरा अपनहि मंच पर कतियाएल जएबाक अनुभव अवश्य होइत रहैत हेतैक । अन्ततोगत्वा ओ निरीह कलाकार हारि - थाकिकेॅ रोटिओ जुड़बैक योग्य ओ नहि रहि पबैत छथि तहन विधा छोड़ि परा जाइत छथि । आहाॅ गौड़ कएकेॅ देखिऔक मैथिली रंगमंचक कलाकार ओतबहि गोटए सुरक्षित स्थान कए सकलाह अछि जे कोनो ने कोनो मंचसॅ जुड़ल छथि मैथिलीमे एखनधरि बहुत कमे आदर्श कलाकार बनि सकलाह अछि ( हम तॅ कहब नहि बनि सकलाह अछि ।) जिनका सम्पूर्ण मिथिलाक लोक चिन्हैत हेतनि आकि स्वीकार करैत होएतनि । सम्पूर्ण मंच पर ओ अभिनय करताह से सपना सपनहि रहि जाइत छन्हि । अन्तमे जखन पीढ़ी परिवर्तन होइत अछि तॅ नाटकक कालजयी होएबाक चर्चा तॅ होइत अछि मुदा ओहिमे अपन खून-पसीना सुखेनिहार कलाकारक नामो - पता हरा दैत अछि । ई केहेन रंगमंचक स्वतंत्रता । विद्यापतिक नाटकक चर्चा तॅ गुमानसॅ करैत छी । फेर ओकर मंचन सभमे अभिनय केनिहार कलाकार लोकनिक नाम - गाम किएक बिला गेल । की एकर दायित्व रंगकर्मी, रंगमंचीय सत्ता भोगनाहर लोकनिक नहि बनैत अछि । मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच मैथिली नाटकक बासडीह थिक ग्रामीण रंगमंच । हमरा लोकनिक इतिहास कहैत अछि जे प्राचीन समयमे ज्ञान, यज्ञ , तप करैक भूमि रहल अछि मिथिला । एतए सम्पूर्ण भारतक लोक ज्ञान अर्जित करबाक लेल अबैत छल । से कहबाक तात्पर्य हमर ई थिक जे पूर्वमे अहिठाम एतेक नवीनता छल जे एतुका लोक विरक्त भए आन आकर्षण दिश कहिओ आकर्षित नहि होइत छल । तेॅ पलायन नहि होइत छल । मिथिलाक सभसॅ पैघ खूबी छलैक जे जीविकोपार्जनक विधि-विधान आधुनिक रहितहुॅ , तकरा उपरान्तो ग्राम्य जीवनक स्वरूप कहिओ नहि बदलल । तेॅ हमरा ई कहैत कनिको असोकर्ज नहि भए पाबि रहल अछि जे मैथिली रंगमंचक विशुद्धरुपे ओकर जड़ि ग्रामीण रंगमंच थिक । बुझि सकैत छी जे ग्रामीण रंगमंच कतेक सशक्त छल जे विद्यापति जखन मैथिलीमे गोरख विजय नाटक लिखैत छथि तॅ तकर मंचन एकटा सुदूर ग्राम भैरव स्थानमे (वर्त्तमानमे रैयाम पूर्वी पंचायत ) करैत छथि । जकर मुख्य अतिथि महराज शिव सिंह होइत छथि । आब आहाॅ ग्रामीण रंगमंचक उत्कर्षक अन्दाजा लगा सकैत छी । बादमे ग्रामीण रंगमंच पूर्णरूपेण स्वतंत्र सेहो भेल । स्वतंत्र हम अहि अर्थमे कहैत छी । वर्तमान समयमे जे शहरी रंगमंच अछि ओ पूर्वग्रस्त रहैत छथि जे फल्ले नाटककारकेॅ नाटक हमरा करबाक अछि । चाहे ओ नाटक नीक होएक की बेजय होएक । तहिमे नाटककार सेहो अपन साहित्यक अपघात करैत रंगमंच पर कोना हमर नाटक हएत ताहि लेल साहित्यिक चिन्तनसॅ बेसी ओ रंगमंचक चिन्तन करैत देखाइत रहैत छथि । जखनकि रंगमंचक चिन्तन केनिहार रंगकर्मीक समूह अछि । खैर , से कहै लगलहुॅ - ग्रामीण रंगमंच पर जे नाटकक पोथी चयन करैक प्रक्रिया अछि ओ पूर्ण रुपसॅ पारदर्शी पूर्वक होइत अछि । पहिने नाटक होएबाक सुरसार सुरुह होइत अछि । फेर दू - चारि - पाॅच गोटएकेॅ ई भार देल जाइत छन्हि जे नाटकक पोथी कीनि आनथि । ओ लोकनि बजार जाकेॅ किताबक दोकानसॅ तत्कालमे जतेक पढि सकलाह से पढि पोथी कीनि लैत छथि । ओना कतेको गोटए तॅ भिन्सरसॅ साॅझ कए दैत छथिन पोथी पढैत - पढैत । कतेक बेर तॅ किताब दुकानदारसॅ कहा - सुनी सेहो होमए लगैत अछि । एकटा पोथी बिकएबाक हेतु ओ भरि दिन बरदएल नहिने रहत । जे से पोथी साॅझखनधरि आबि गेलैक । बड़का दलान पर पहिनेसॅ रंगकर्मी लोकनिकेॅ जमघट लागल रहैत अछि पोथीक अएबाक प्रतिक्षामे । आब तॅ हम पहिने पढब तॅ हम पहिने पढब । किछुकाल छिनाछिनी होइत अछि । एहन उत्सुकता नहि देखल जएह । कतेक बेर तॅ अहि छिनाछिनीमे पोथी सेहो फाटिचिट जाइत अछि । आब तॅ राति एक बजौ कि दू , भोरो भए जाउ , जाधरि सम्पूर्ण नाटकक पाठ नहि भए जाइत ता धरि केॅ ससरत । ताधरि तॅ सभक आंगनसॅ कतेको समाद आबि गेलैक भोजन करबाक लेल । कएगोटेक आंगनमे तॅ झगड़ा - झंझट सुरुह भए जाइत छैक । कतेक गोटएकेॅ भोजन झाॅपल राखल रहैत छल । घरमे सभ ठीक नहि रहलैक तॅ उपासलो सुतैत देखलियैक अछि । आब नाटकक सलेक्शन भए गेल । रिहर्सल सुरुह भए गेल । नाटककारकेॅ कोनो सूचना नहि छन्हि । जॅ सम्पूर्ण समाजक अगुआ लोकनिकेॅ रिहर्सलसॅ नाटक मंचनक परिणाम नीक बुझाइत छन्हि तहन बिचार होइत अछि जे अहि लेखककेॅ बजाआओल जएह । नाटककार अबै छथि । गामक लोकक संग नाटक देखैत छथि । मंच हुनका यथाशक्ति सम्मान करैत छथि । आब आहाॅ कहू कतेक स्वतंत्र छल हमर ग्रामीण रंगमंच । कतौ भेदभाव नहि चयन प्रक्रियामे । कि वर्तमान समयमे आकि अवैबला समयमे ई पारदर्शिता सम्भव अछि ? नाटककारकेॅ धर्म छी ओ साहित्यिक दृष्टिकोणसॅ समाजक हितमे नाटक लिखबाक चाही । नहि कि रंगमंच पर कोना नीक हएत । रंगमंच पर कोना नीक हएतैक ताहि लेल हमर रंगकर्मी लोकनि सतत प्रयासरत रहैत छथि । आधुनिक रंगमंच पर कोनो चीज देखएब आब असम्भव नहि रहलैक। कने हंसि लिअ आइ काल्हि कोरोना कालमे डिजिटल बैसारक धर्रोहि लागल अछि । कवि गोष्ठी, कथा गोष्ठी, विचार गोष्ठी , नाना प्रकारक गोष्ठीक आयोजन नित फेसबुक पर अबैत रहैत अछि । जे होइत रहबाक औचित्यो छैक । जीवनकेॅ चलेमान बनोने रहबाक लेल एकर आवश्यकता छैक । मुदा जखन सभटा फेसबुके पर हेबाक छैक तॅ अहि परहक एक्सपर्ट्स लोकनिक मांग बढलैक अछि । तेॅ चलाचलती छन्हि । सभ आयोजक लोकनिकेॅ मन पसीनक विशेषज्ञ भेटब कठिन छन्हि । साहित्यिक जाहि विधा पर कार्यक्रम राखल गेल छैक तकरे विशेषज्ञ हेताह तकर आब आवश्यक नहि रहलैक । आब तॅ बस ओहि कार्यक्रम के सफल बनेबाक छैक इएह उद्देश्य छैक नहिकि ओहि विधा , ओहि विधाक लोक केॅ आगाॅ बढेबाक छनि । उद्देश्य मात्र एतबहि हुनका समीक्षक बना चर्चित बनेबाक अछि । तॅ बेगर्ते कि करताह । नहिसॅ तॅ बढिया । आब लिअ आजुक बैसाड़क विषय - वस्तु अछि - कथा नाटक कविता उपन्यासमे वर्तमान पीढीक योगदान । आब तॅ अतिथि लोकनि आयोजक लोकनिकेॅ आश्वस्ति दए देने छथिन्ह । हमरा लोकनि अहि सेमिनारकेॅ कोनो हालतमे सफल बनएब । आधा समय बितिगेल एखनधरि मूल मुद्दा पर बात नहि आबि सकल । आयोजक लोकनि विचलित । ओ संचालककेॅ कनफुसकी करए लगलाह । कतए भसा रहलियैक अछि विमर्शकेॅ । आब तॅ संचालक आगत अतिथि लोकनिकेॅ अपन बाट दिस आनैक प्रयास कएलनि । मुदा ओ असफल रहलाह । अन्ततोगत्वा संचालक जी स्वयं विमर्शक निष्कर्ष सुनबैत कहलखिन्ह - आजुक विमर्श रास्ता भटकि गेल अछि । कारण ई पहिल विमर्श कार्यक्रम छल । अहिमे ओ सभ बात कतहुॅ नहि अएल जाहिलए ई विमर्श बजाआओल गेल छल । तथापि ई विमर्श हमर संस्थाक लेल फायदेमंद रहल । से अहि दुआरे जे अतिथि लोकनि जे किछु बजलाह ताहि सभ पर अगिला विमर्शक कार्यक्रम कए सकब । एक बाल नाटक- बोलूक बेदना पात्र - परिचय बोलू , प्राची , टुना लाल , बाबूजी , गहिकी ********************************* दृश्य - पहिल °°°°•••••°°° [ स्थान - पक्की सड़क । समय - दस बजे दिन । टुना लाल आ ओकर सॅघतिआ सभ बम्बा पर बैसि बनसी खेला रहल अछि । ओकर संगी लोकनि एकाएक बनसी समटि गामपर जाइ लगैत अछि । सभक हाधमे डाभी खढमे गाॅथल माॅछ अछि । ओ सभ आब चलि जा रहल अछि । जकरा उदास टुना लाल देखए लगैत अछि । ताबतमे स्कूल जाइत बच्चा सभक झुंड जाइत अछि । ओहि झुंडमे प्राची आ बोलू सेहो अछि । टुना लालकेॅ देखि बोलू रुकि जाइत अछि । बच्चा सभक झुंड आॅगा बढि जाइत अछि । ] बोलू : ( पीठ थपथपबैत ) टुना लाल! आइ तोरा एकहुॅ फड़ी माछ नहि भेलौ ? टुना लाल : नहि ! अजुका जतरा बड़ खराब । बोलू : कि हेतौ जॅ एक दिन माछ - भात नहिये खेमह तॅ ? टुना लाल : जो रे! हम तॅ कहियो नहि माछ खाइत छी । बोलू : अच्छा! तू दुध्दा वैष्णव छेॅ? माछ माछ - माउस नहि खाइत छेॅ? टुना लाल : नहि, कहियो नहि । बोलू : ओ तॅ बुझलियौ, माछ तोहर बाबू - मायकेॅ नीक लगैत हेतैन? टुना लाल : नहि! बाबूक तॅ हम मुहो नहि देखलहुॅ । मायक पेटेमे छलहुॅ तखनहि ओ मरि गेलाह । तेॅ हमर माय माछ - माउस नहि खाइत अछि । हमर माय जखन खेबे नहि करतैक तॅ हम किएक खएब? हमहू खएब छोड़ि देलियैक । बोलू : फेर माछ ककरा लेल मारैत छेॅ? टुना लाल : बेचैक लेल । बोलू : बेचैक लेल? टुना लाल : हॅ ! ओहि पाइसॅ चाउर - चिकस कीनिकेॅ लए जाइत छी । बोलू : माछ नहि भेलौ तॅ? टुना लाल : भानस बन्द । बोलू : आइ तॅ माछ नहि फसलौ? टुना लाल : से तॅ खाली हाथ गामपर नहिये जेबैक । मायकेॅ दुख हेतैक । बोलू : जलखै तॅ नहि कएकेॅ अएलाहेॅ? टुना लाल : सभटा एकहि बेर हएत, जखन गाम पर जएब । [ बोलू अपन बैगसॅ टिफिन बाक्स निकालि दैत अछि ।] बोलू : ई ले, तू खा लिहेॅ । टुना लाल : तू स्कूलमे की खेबही? बोलू : हमर चिंता नहि कर । [ पैनक बोतल निकालि दैत ] ई ले पैनक बोतल । भूलहुॅसॅ खत्ता महक पैन नहि पिबिहाॅ टाइफाइट भए जाइत अछि । आब हम चलैत छियौ । घुरती काल भेटिहाॅ । [ टुना लाल आश्चर्य करैत देखैत रहल । बोलू जाइत - जाइत पाॅछा घुमि - घुमि तकैत रहल । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] ---------------------------------- दृश्य - दोसर ••••°°°°°•••• [ स्थान - क्रमश: । समय - बेरुपहर । स्कूलमे छुट्टी भेल अछि । बच्चा सभ घर आपस भए रहल अछि । आकि एकटा गहिकी अएल ।] गहिकी : हेरौ छोड़ा, माछ बेचबीही रौ? टुना लाल : हॅ यौ मालिक! बेचहि लेल तॅ बैसल छी । गहिकी : कतेकमे देबही? टुना लाल : पूरे एक किलो छैक । पचास टाका लागत । गहिकी : सड़ल गन्हाएल माछक दाम पचास टाका । तोरा बेचैक मोन छौक कि नहि? टुना लाल : देखू बेसी हिजो हमरा नहि पसीन अछि । एक दाम चालिस टाका लागत । गहिकी : हेरौ छोड़ा, तोहर चालिस नहि चलतौक । पूरा - पूरी बीस देबौक । [ तखनहि प्राची आ बोलू स्कूलसॅ आबैत अछि । प्राचीक नजरि बम्बा पर राखल टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल पर परैत अछि । ओ आश्चर्य करैत उठबैत बोलूकेॅ इशारा - इशारामे प्रश्न करैत अछि । जकर उत्तर अलग हटि बोलू इशारेसॅ दैत अछि । प्राची उत्तरसॅ संतुष्ट होइत अछि । टुना लाल सेहो गहिकी परसॅ ध्यान हटा बोलू पर लगबैत अछि । ] गहिकी : कि रौ कोम्हर ध्यान अटकेने छेॅ? टुना लाल : एकबेर तॅ कहलहुॅ नहि हएत । गहिकी : तॅ कतेकमे हएत से तूही अन्तिम बेर बाज ! टुना लाल : नहि अहाॅक बीस आ नहि हमर चालिस एकदाम तीस टाका लाउ । बोलू : टुना लाल तू तॅ महामुर्ख छेॅ! माछ तॅ तीन सौ रुपैये किलो अछि । गहिकी : हॅ बौआ तोॅअपन बाट नापहनेॅ । दहीमे सही करैक लेल अएलह हेॅ । बोलू : हम किएक दहीमे सही करब । अहाॅ बच्चा जानि एकरा ठकि रहल छी । जाउ - जाउ ई माछ हम तीन सौ टाकामे कीनि लेलहुॅ । गहिकी : हेरौ नहि विचार भेलहुॅ? टुना लाल : सुनलियैक नहि हमर दोस तीन सौमे लए लेलकैक । [ गहिकी मुह - कान टेढ करैत चलि जाइत अछि । ] टुना लाल : दोस तू सत्ते लेबही माछ? प्राची : बोलू ई कोन तमाशा ठार कए रहला अछि? माछक दाम कतएसॅ देबही? टुना लाल : दीदी अहाॅ केहन बात करैत छी? हम अहाॅ सभसॅ पाइ लेब? बोलू : तहन तोरा घरक भानस? टुना लाल : की हेतै? बोलू : नहि, नहि । तू चल हमरा संगे हमरा गाम पर । हमर बाबूजी माछ कीनि लेथुन । प्राची : बहुत नीक आइडिया! चल ----! [ प्रची आ बोलू ओकरा संग लए जाइ लगैत अछि । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] □□□□□□□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - तेसर ♢♢♢♢♢♢ [ स्थान - पूर्ववत । पक्की सड़क । प्राची आ बोलू आपसमे बतिआएत स्कूल जा रहल अछि । ] प्राची : बोलू तू दू दिनसॅ स्कूलमे लन्च नहि करैत छेॅ जॅ पकड़ेमह तॅ घर पर सिकाइत जेतौक । बाबूजीकेॅ की जबाव देबहुन? बोलू : दीदी तू देखैत नहि छिही! टुना लाल भोरसॅ भुखल रहैत अछि । प्राची : टुना लाल तोहर केओ लगैत छौक? ओकरा तूॅ अपन हिस्साक टिफिन खुआ, अपने भुखल रहैत छेॅ? टुना लाल : ओहो तॅ अपनहि सभ जॅका बच्चा अछि । दीदी जॅ ओकर बाबू मरिये गेलैक तॅ ओ मछमाराक काज कएकेॅ गुजर करत से उचित भेल? प्राची : से तॅ अनुचित छी । एखन ओकर उमेर स्कूल जाइक अछि । खेलाइ - धुपाइक छैक । मुदा हम तू कए की सकैत छी? बोलू : ओकर स्कूल जाइक व्यवस्था । हम तू कए सकैत छी । प्राची : से कोना? बोलू : दुनूगोटए मिल एक स्वरमे बाबूजीकेॅ कहबनि । प्राची : बाबूजीकेॅ? बोलू : हॅ! प्राची : की कहबुहून? बोलू : हमरा दूनू गोटएकेॅ खर्च उठबैते छी । एकटा टुना लालक भार सेहो उठा लियौक । प्राची : तू की बाजि रहलाहेॅ? बोलू: मांग मजबूत अछि प्राची दीदी । प्राची : तोॅ तॅ जे पिटाई खेमह हमरो बात सुनेमह । बोलू : दीदी आब चाहे जे होएक, टुना लालकेॅअपना संगे स्कूल लए जाकेॅ रहब । प्राची : ओ तॅ तोहर स्क्रिप्ट तैयार बुलन्दी पर छौक? बोलू : किएक नहि दीदी । ई हमर बाल अधिकारक मुद्दा अछि । प्राची : हॅ, हॅ! हम तोहर संग छिऔक । ओकर, ओकरा स्कूल जाइक अधिकार भेटबाक चाही । [ बात करिते - करिते उएह बम्बा लग पहुचैत अछि जतए टुना लाल माछ मारैत रहैत अछि ।ओ देखितहि सहटिकेॅ लग अबैत अछि । बोलू ओकरा लन्च बाक्स आ पैनिक बोतल बैगसॅ निकालि थम्हाबैत अछि । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] □□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - चारिम ♢♢♢♢♢ [ स्थान - क्रमवत । टुना लाल बम्बा पर बैसि पाथल बनसी पर टकटकी लगौने अछि । उम्हरसॅ बोलूक बाबूजी अबैत छथि । ओ बम्बा पर टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल देखि आगिबबुल्ला भए जाइत छधि । ] बाबूजी : ई लन्च बाक्स ककर छी? [ टुना लाल लाजसॅ मुह नहि उठबैत अछि । ] मुहमे बकार नहि छौक? बोलूक हिस्साक अन्न गिरैत शर्म नहि अबैत छौक? टुना लाल : ओ तॅ हमरा जबरदस्ती दए जाइत अछि । बाबूजी : खबरदार जॅ झूठ बजमे तॅ! टुना लाल : मायक सप्पथ! हम झूठ नहि बजैत छी । बाबूजी : हम किछु नहि सुनै चाहैत छी । आजुक बाद तू हमर बोलूसॅ बात नहि कए सकैत छेॅ । टुना लाल : से तॅ नहि हएत! हमरा ओकरासॅ दोस्ती भए गेल अछि बाबूजी : कथीक दोस्ती? ओ स्कूल जाइत अछि तू बनसी खेलाइत छेॅ, गोली खेलाइतछेॅ, टाइल - गुल्ली खेलाइ छेॅ । टुना लाल : से तॅ हमर बाप मरि गेल तेॅ ----- बाबूजी : तॅ हम तोहर बपौती सम्पत्ति धारने छियौक? [ तखनहि गहिकीक आगमन होइत अछि ।] गहिकी : की रौ छोड़ा! आइयो हमरा माछ देमए की नहि? बाबूजी : अहाॅ लोकनि तॅ आर एकरा बत्तर बना देलियैक । माछ बजार - हाट जाकेॅ कीनब से नहि! अलोपितभए गेल अहि संसारमे ? एतेक छोट बच्चाक बनसी खेलाएब देखि नीक लगैत अछि? गहिकी : की कहू अहि छोड़ाक हाथमे जादू छैक । तड़ैला एकरती कनखी मारलक माछकेॅ उपर भेनाइ छैक । बाबूजी : तकर बदलामे देखैत छी, हमर अपघात कतेक कए रहल अछि? ई टिफिन बाक्स हमर बेटा बोलूक छी । परोठा, भुजिया आ फिल्टर कएल पैन ओकरा बदला ई भोग कए रहल अछि । टुना लाल : अहिमे हमर कोन कसूर । ओ हमरा बलजोड़ी दए दैत अछि । गहिकी : हे , इहो कोनो बेजय नहि कहैत अछि । अहूॅक बेटा कम नहि अछि । से दिन कीनल माछ पर डाक कए देलक । बाबूजी : अहाॅकेॅ तॅ खाली माछे सुझाइत अछि । हमर बेटा सप्ताह भरिसॅ स्कूलमे लन्च नहि करैत अछि । भुखले रहि जाइत अछि ।ओ तॅ आइ स्कूलसॅ फोन पर सिकाइत अएल अछि । गहिकी : मुह की तकैत छी । पकड़िकेॅ लए जाउ अहि छोड़ाकेॅ एकरा माय लग । एकर माय जखन एकरा कनगोजरिमे झापर लगौतैक तखन एकर बुध्दि ठीक हेतैक । बाबूजी : ठीके कहलहुॅ । आब सएह करै पड़त । आब कोनो दोसर उपए नहि बाॅचि गेल छैक । गहिकी : आइ माफ कए दिऔक ------- बाबूजी : अहाॅ कहैत छी तॅ आइ छोड़ि दैत छी । मुदा सुनिले बौआ अजुका बाद जॅ हमर बेटा दिस तकबो करमए तॅ बुझिराख । गहिकी : रौ छोड़ा माछ ताॅछ फसबो केलकौ अछि? बाबूजी: अहाॅकेॅ तॅ माछे - माउस सुझाइत अछि । एते कतहुॅ माछक सिनेह भेलैक अछि । चलू --- चलू ------ [ दुनू गोटए जए लगैत छथि । बाबूजी टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल लए लैत छथि । टुना लालकआॅखिमे नोर भरि जाइत छैक । मंच परदाकझाॅपनसॅ झपाइत अछि । ] □□□□□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - पाॅचम ♢♢♢♢♢ [ स्थान - यथाक्रम । समय - बेरुपहर । स्कूलमे छुट्टी भेल अछि । छात्र - छात्रा सभ गामपर दिसकेॅ जा रहल अछि । प्राची आ बोलू सेहो बढल आबि रहल अछि । आइ टुना लाल मुह लटकएने मन्हुआएल सन भेल बम्बा पर बैसल अछि ।] बोलू : ( टुना लालक समीप पहुॅचैत ) टुना लाल, तू एतेक उदास किएक छेॅ? प्राची : हॅ, आइ किछु बजितो नहि छेॅ । आखिर की भेलहुॅ अछि तोरा? बोलू : आइ तॅ बम्बा पर हमर टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल सेहो नहि देखाइ दैत अछि । टुना लाल : तोहर बाबूजी अएल छलखुन्ह । टिफिन बाक्स आ पैनिक बोतल उएह उठाकेॅ लए गेलखुन्ह । बोलू आ प्राची : बाबूजी? बोलू : जरुर कोनो बात हएत । प्राची : स्कूलसॅ सिकाइत गेल हेतनि । बोलू : अच्छा बता तॅ टुना लाल, बाबूजी की की कहलखुन्ह? टुना लाल : ओ साफ मना कए गेलाह अछि - तोरा लोकनिसॅ बात करैसॅ । बोलू : ओ तॅ आब बुझलहुॅ तोहर असल बात । तू हमर बाबूजीक आदेशक पालन करै खातिर मुह चुप कएने छेॅ । टुना लाल : ओ तॅ ठीके कहलखिन्ह । कतए तू सभ पढुआ बाबू । हम मछमारा । प्राची : टूना लाल तू हमर बाबूजीक बातक दुख नहि कर । बोलू : हॅ हुनका हम सभ सभटा बुझा देबनि । प्राची : हम सभ तोरा स्कूल दिसका रास्ता देखमए चाहैत छी । टुना लाल : नहि दीदी! ई कोना हएत? हम स्कूल जएब तॅ हमर घर कोना चलत? बोलू : एखन तोरा घर चलबैक बात सोचबाकेॅ नहि छौक । प्राची : से कोना हएत बोलू? स्कूल जएत तॅ बनसी नहि खेलएत, बनसी नहि खेलएत तॅ आमदनी रुकि जएत -------- टुना लाल : नहि, हम स्कूल नहि जएब । बोलू : देखही टुना लाल आइ हम दुनू भाई - बहिन प्रिन्सिपल सरसॅ भेॅट कएने छलहुॅ । ओ तोहर फीस माफ कए देथुन । ई बहुत बड़का बात भेल । प्राची : रहलौ तोहर घरक खर्चा से हम सभ अपन बाबूजीसॅ कहबनि । बोलू : केहन लगलहुॅ हमर सभक प्लान? टुना लाल : हमरा तॅ बड़ डर लगैत आछि । बोलू : स्कूल जाइक बाटमे डरैक कोनो बात नहि छैक । [ बातक बिचहिमे बाबूजी ओतए पहुॅचि जाइत छथि । ओ अबितहिॅ टुना लाल पर आॅखि लाल करैत देखलाह ।] बाबूजी: तू हमर बातकेॅ अभेलना कएलाॅह? बोलूकेॅ फेर रोकलाॅह बोलू : बाबूजी, ओकर कोनो दोख नहि अछि । बाबूजी : तोॅ चुप! प्राची : हॅ बाबूजी टुना लाल बेकसूर अछि । बाबूजी : लन्च बाक्स आ पैनिक बोतल टुना लाल तक कोना पहुॅचल? बोलू : बाबूजी टुना लाल कॅए - कॅए दिन उपासले रहैत अछि । हम तॅ गाम परसॅ खाइये कए स्कूल अबैत छी । प्राची : एकर माय सेहो कएक दिन सहि जाइत अछि । एकरा सभकेॅ केओ देखनाहार नहि छैक । बाबूजी : हम किछु नहि सुनै चाहैत छी । तू सभ पढाई लिखाई छोड़ि - छोड़िकेॅ समाज सुधारक बनै जाइ लगलाहेॅ ? प्राची : टुना लाल बड़ गरीब अछि । ई माछ नहि मारत तॅ दोसर आमदनी कोनो नहि अछि । बाबूजी : बस आब बहुत भेल । चल --- चलै चल एतएसॅ । बोलू : बाबूजी आइ हम सभ एतएसॅ तखनहि जएब जखन टुना लाल संग अहाॅ न्याय करब! बाबूजी : ओ तॅ आब जबर्दस्ती --- चल --- जल्दी चल ---- [ बाबूजी बोलूकेॅ बलजोड़ी घिचिकेॅ लए जाइत छथि । मंच परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] □□□□□□□□□□□□□□□□□□□□ दृश्य - छठम् ♢♢♢♢♢♢ [ स्थान - पूर्ववते । टुना लाल आ बोलू बम्बा पर बैसल अछि । ओ दुनू गोटए अपनामे बात कए रहल अछि । ] टुना लाल : दोस! तू हमरा दुआरे एतेक कष्ट जुनि काट । चलि जो अपना अंगना । बोलू : नहि टुना लाल! जा धरि हमर बाबूजी हमर मांग पूरा नहि करताह , हम अपना आंगन नहि जएब । टुना लाल : अपना आंगन नहि जेमह तॅ हमरे आंगन चल । भुखल कतेक काल रहमए? बोलू : नहि! तोरो आंगन नहि जएब । टुना लाल - रातियोमे एतहि रहमए? बोलू : हमर बाबूजी हमरा बड़ मानैत छथि । ओ रातिकेॅ हमरा एतए नहि रहै देताह । [ तखनहि बाबूजी पहुॅचैत छथि ।] बाबूजी : बोलू तोॅ घरसॅ भागिकेॅ एलएहेॅ ? बोलू : हॅ, आब हम घर कहियो नहि जएब । बाबूजी : किएक? बोलू : बाबूजी अहाॅकेॅ खाली अपनहि बेटा - बेटीसॅ प्रेम अछि । आर ककरोसॅ नहि --------- बाबूजी : बोलू ----? बोलू : हॅ बाबूजी हॅ । टुना लाल टुगर अछि । अनाथ अछि । एकर बाबू मरि गेलै तॅ अहिमे एकर कोन कसूर छैक? बाबूजी : बोलू , अहिमे बाबूजीक कोन कसूर? बोलू : बाबूजी , जॅ हमरा सतहि मानैत छी तॅ हमरे जॅका टुनो लालकेॅ मानियौक । ओकरो हमरे संग - संग स्कूल पठबिऔक । ( कनैत ) बाबूजी आइ जॅ टुना लाल स्कूल नहि जएत तॅ हमहू स्कूल जएब बन्द कए देब । हमहू टुने लाल संग बम्बा पर बैसिकेॅ बनसी खलएब । तखन पतिआएब टुना लालक दुखकेॅ ------ [ बोलू रोदन पसारि दैत अछि ।आ कि प्राची धब दए पहुॅचैत अछि । ओकरा हाथमे स्कूल ड्रेस आ बैग रहैत अछि ।] प्राची : बोलू , अपन सभक बात बाबूजी मानि चुकल छथुन्ह । आब टुना लाल सेहो स्कूल जएत । बोलू : ( प्रसन्न होइत ) दीदी की कहलएह --- बाबूजी प्राची दीदी सत्ते कहलक नेॅ ? बाबूजी : प्राची ---, टुना लालक स्कूल ड्रेस आ स्कूल बैग दए दहीन । [ प्राची दैक लेल आॅगा बढैत अछि आकि बोलू धराक दए छिनि टुना लालकॅ पहिराबै लगैत अछि । ओकरा कन्हा पर बैग टाॅगैत अछि । बाबूजी बम्बा पर राखल बनसीक छीपकेॅ टुकड़ी - टुकड़ी तोड़ि जुमाकेॅ पैनमे बहुत दूर फेकि दैत छथिन्ह । सभगोटए सहटिकेॅ बाबूजीक समीप अबैत अछि । बाबूजीकेॅ सेहो एकटा नीक काज करबाक गुमान होइत छन्हि ।मंच पूर्ण कालिक परदाक झाॅपनसॅ झपाइत अछि ।] नबोनारायण मिश्र नबोनारायण मिश्रजीक रचना- प्रस्तुति आशीष अनचिन्हार (पहिल खेप) एहनो होइत छै कलकत्तामे बहुत रास साहित्यकार भेलाह मुदा कार्यक्रममे बहुतो एहन साहित्यकार अपन प्रस्तुति दै छथि जिनका लोक स्थानीय साहित्यकार बूझै छथि आ अपना-आपकेँ महत्वपूर्ण बूझए बला साहित्यकार सभ हिनका सभकेँ मात्र फिलर बूझै छथि। फिलर मने कोनो कार्यक्रममे महत्वपूर्ण साहित्यकारक मंचपर आबएमे जतेक समय लगतै ताहि समयमे दर्शक-श्रोताकेँ जेबासँ रोकए बला साहित्यकार। साहित्यिक समाज फिलरकेँ महत्व नै दै छै मुदा हमरा जनैत फिलरे टा मात्र सुच्चा साहित्यकार होइत छथि कारण हुनका कोनो संस्था, कोनो मंचक, कोनो स्मारिकाक लाज बचेबाक रहैत छनि आ ताहि बदलामे हुनका ने पुरस्कार चाही आ ने थपड़ी। ओना जँ साहित्यकार समाज एहि फिलर सभहक आलोचना करतथि तँ निश्चित तौरपर ई सभ स्थापित साहित्यकार भऽ सकै छलाह जखन कि हिनकर सभहक रचनामे सभ तत्व अछि। बस खाली साहेब सभहक कृपादृष्टि नै भेटलनि। आइ एहने एकटा साहित्यकार नबोनारायण मिश्रजीक एकटा रचना देखू। भविष्यमे हम कलकत्ताक ओहन सभ रचनाकारक रचना प्रस्तुत करब जे साहित्यमे कतहुँ नै छथि (संकलन-आशीष अनचिन्हार) मोहनजी बड़ सहज आ सोझमतिया लोक। समाजिक कार्यमे सदिखन तैयार मुदा तामस नाकेपर, ताहि कारणे हुनके दोसर नाम दुर्वासा ऋषि सेहो कहल जाइत छल आ लोक घबड़ाइते गप्प करय। लोकक मूँहसँ सुनने छलाह जे सिनेमा मनोरंजनक नीक साधान छै मुदा अवसरे नै भेटनि। एक दिन अपन समवयस्क राघवजीसँ मोनक बात फरिच्छा कऽ कहलनि। राघवजीक कहलखिन जे काल्हिये रवि छै हमरो छुट्टी रहत काल्हि भोजनक पश्चात तैयार रहब मधुबनी चलबाक हेतु। मोहनजीकेँ उत्सुकतासँ रातिमे निन्न नै भेलनि। प्रातःकाल भोजनोपरांत दुनू गोटे मधुबनी पहुँचलाह। सिनेमाक टिकट लऽ शंकर टॅाकीजमे धड़फड़ायले प्रवेश केलन्हि ताधरि तेसर दृश्य चलि रहल छलैक। अन्हारमे अपन-अपन सीट हथोड़ैत पहुँचलाह आ सीट पकड़लाह। दसे मिनट केर बाद मोहनजी बजलाह जे चलू-चलू बुझलियै। धुर... जो एहने होइत छैक? राघवजी बुझेलखिन जे बड़ नीक भऽ रहल छै तखन अगुताइ किए जाइ छी? अहींकेँ मोन लागल छल तखन एना की बात भेल? फेर गप्प ओहिठाम ठमकि गेल। थोड़बे कालक बाद इन्टरभेलमे हॅाल प्रकाशसँ जगमगा उठल। तखन राघवजीकेँ बुझबामे एलनि जे मोहनजी एतेक काल धरि यातना सहलनि। असलमे फोल्डिंगबला कुर्सीक सीट उपर उठा कऽ राखल छलैक। जेना-जेना लोक आएल कुर्सीकेँ नीचा खसा कऽ बैसैत गेल मुदा अन्हार रहबाक अनभिज्ञ मोहनजी कुर्सीक दूनू बाँहिपर शरीरक भार दऽ मुर्गी जकाँ लटकल छलाह। तखन राघवजी कहलखिन जे सिनेमा एहने नै एहनो होइत छै। (मूल प्रकाशन-कर्णामृत जनवरी-जून २०१९) नबोनारायण मिश्रजीक रचना- प्रस्तुति आशीष अनचिन्हार (दोसर खेप) विदेहक पछिला अंकमे हम कोलकाताक नबोनारायण मिश्रजीक एकटा रचना प्रस्तुत केने छलहुँ आ हुनका कलकत्ताक साहित्यमे फिलर कहने छलहुँ। बहुत संभव जे फिलर शब्द नीक नै होइक मुदा करबे की करबै जे सत्य छै से सत्ये रहतै। आन ठामसँ लिखल विवेचना तँ छोड़ू कलकत्तेसँ लिखल साहित्य केर कोनो विवेचनामे हिनकर नाम नै भेटत। हिनके किए आनो लोक जेना गंगा झा, सुरेंद्र ठाकुर आदिक नाम साहित्य बला खंडमे नै भेटत। ई पाँति सभ पढ़िते किछु लोक एक-दू लेखक रेफरेंस देता जाहिमे हिनकर सभहक नाम रंगमंचसँ जुड़ल भेटत मुदा हमर उद्येश्य साहित्य अछि। तँ आइ फेर नबोनारायण मिश्रजीक ई रचना पढ़ू -आशीष अनचिन्हार पृथ्वीक भार भाइ अपन जीवनक व्यथा-कथा लिखबा लेल छी बाध्य कतबो सम्हर कऽ चलैत छी दुर्घटना घटिते छै जेना सत्तापक्षक नियति अछि घोटाला की एकरा नहि रोकल जा सकैछ? भाइ समाजे नहि साहित्य-संस्कृति सेहो सुरक्षित अछि परंच रहि सकत कते दिन तकरे अछि चिन्ता साल दू साल लहलहयलाक पश्चात एना किए भऽ जाइत अछि निष्प्राण मैथिली संस्था? भाइ हमरा लोकनिक संग विडम्बना अछि लोक बिसरि जाइत अछि अपन पूर्वजक योगदान महत्वाकांक्षी लोक कुर्सीक लोभमे केठर अछि बिठुआ लगबैत अछि छिटकी स्वार्थपूर्तिक हेतु छिद्रान्वेषण भऽ गेल अछि मैथिलक चरिताभिधान भाइ कृतघ्नकेँ कथमपि नै करी उपरकार हम छी ठकायल कतेको बेर आ अहाँ तँ हमरहुँसँ बेसी मोने अछि सभ बात तँइ मर्यादाक रक्षा करैत तोड़बाक लेल ओहि कृतघ्न सभहक चक्रव्यूह उताहुल छी हम भस्म करबाक लेल ओहि भस्मासुरक जे दैत रहल अछि लोक माथ हाथ भाइ बेर-बेर ठकेलाक पश्चातो मोनसँ कहाँ हटैत अछि सेवा-भाव सेवामे समर्पित जीवने अछि धन्य अन्यथा जीवनक की अर्थ? पृथ्वीक भार (मूल प्रकाशन- मिथिला दर्शन जनवरी-मार्च २००४। मूल प्रकाशनमे छोट-छोट पाँति देल गेल रहै। हम ओहन पाँति सभकेँ एक ठाम जोड़ि देलहुँ जे कि एक वाक्य बनैत छल) नबोनारायण मिश्रजीक रचना- प्रस्तुति आशीष अनचिन्हार (तेसर खेप) एकटा पाकल आम भाइमे एकसरे, परम दुलारू पाँच बर्षीय बालक ईश्वरजी अपन पिता द्वारा देल गेल मात्र एकटा पाकल आमपर प्रतिक्रियामे खिन्न होइत बाजि उठल-"पापा, एतेक रास आम किनलहँ अछि, एहिमे हमर हिस्सा एकहिटा भेल?" जँ सएह, तैयो शंकर भाइजी (खासे पितियौत) हमरा स बाछि कऽ एकहुटा वस्तु नहि खाइत छथि तँइ हेतु कमसँ कम एकहुटा आर आम हुनका लेल दिअ। एकसरे खेनाइ हमरा नीक नहि लगैए। पिताकें पुत्र द्वारा पूछल गेल एहन प्रश्नक आशा नहि छलन्हि । बारम्बार एकहि बातक आग्रहसँ तंग भऽ पिता पोलहबैत बाजि उठलाह - बेटा, जँ ओकरो सभक भार-चिन्ता हमहीं रखितहुँ तखन भिन्ने किएक होइतहँ? एही लेल ओकरा सभसँ भिन्न भेलहुँ जे अहाँकेँ सभ वस्तुक सुविधा ओकरासँ बेसी भेटय।। अहाँ बकलेल नेना जकाँ हठ पकरने छी। ओतेक जे हम ताकय लागब तखन आर दू किलो आम कीनय परत। पिताक उत्तर सुनि ईश्वरजी निरास होइत बाजि उठल- ठीक छैक, हम अहाँकेँ आब कहियो तंग नहि करब, हमर चिन्ता छोड़ि दिअ। हम दूनू भाइ एकहिटा आममे आधा-आधा बाँटि कऽ खा लेब। ताहिमे नहि ने अहाँ आ माय हमरा रोकब? (नबोनारायण मिश्रजीक ई रचना कर्णामृतक जुलाई-सितम्बर २००४ मे लघुकथा कहि प्रकाशित भेल छल) आशीष अनचिन्हार किछु बीहनि कथा (ई सभ बीहनि कथा विदेहक पुरान अंकमे प्रकाशित भेल अछि। अपवादमे दू टा कथा 'सोति' एवं 'मतलब' अछि। बीहनिकथाक नामपर हम एखन धरि जतेक लीखल अछि से अतबे। एहिठाम एक संगे दऽ रहल छी जाहिसँ पाठककेँ सुविधा होइन।- आशीष अनचिन्हार) बीहनि कथा- पत्नीभक्त भोज खएबाक लेल बैसल छलहुँ। पात पर भात, दालि आ दू प्रकारक तीमन आबि गेल छल। बारिक सभ मनोयोग सँ परसि रहल छलाह। एही क्रम मे एक गोट बारिक बजलाह-- " एखन धरि फेकू बाबू नहि पहुँचलाह आछि"। गप्प सुनतहि रमेश बाबू फरिझौलखिन्ह-- "औताह कोना पत्नी-भक्त छथि ने।घरवालीक पएर जतैत हेताह"। सुधीर फेकू बाबूक समांग छलखिन्ह, तुरछि कए बजलाह--- पत्नी-भक्त भेनाइ खराप छैक की ? जबाब दैत रमेश कहलखिन्ह तखन बैसल छी किएक जाउ अहूँ। एहि बेर सुधीर गप्प के थोड़ेक मोड़ दैत बजलाह- " त की अहाँक सिद्धान्तक मोताबिक पुरुष पत्नी-भक्त नहि भए वेश्या-भक्त बनि जाए" बीहनि कथा- अंतर किछु बर्खक पछाति मैरिज सेरेमनीक शुभ अर्धनिशाभाग रातिमे बर अपन कनियाँसँ पुछलखिन्ह----- कहू तँ हमर सासुर आ अहाँक सासुरमे की अंतर भेटल ? कनियाँ औंघाएल मुदा चोटाएल स्वरे कहलखिन्ह------"इएह जे अहाँ अपन सासुरमे मालिक रहैत छी आ हम अपन सासुरमे बहिकिरनी" बीहनि कथा- लक्ष्मी परिछन-----------भगवती गीत---------हास-परिहासक गीत। बच्चा सभ अनेरो औना रहल छल। दरवज्जा पर धमगज्जर मचल। तुमुल हास-ध्वनि। नाना प्रकारक गप्प-सरक्का। बरक बाप कन्याक बापसँ कहलथिन्ह----" आह बूझि लिअ समधि जे हमरा घरमे लक्ष्मी देलहुँ अहाँ----। कन्याक बाप कहलखिन्ह " हँ से तँ ठीके" आ कहिते आँखि झुकि गेलन्हि आ मोने-मोन बजलथि--" एखन तँ लाखक-लाख टका संगमे अनलीहए ने लक्ष्मी तँ बुझेबे करतीह। जखन खत्म भए जाएत तखन इएह लक्ष्मी कुलच्छनी बनि जाएत।"------ बीहनि कथा- खाए बला पार्टी आइ साँझमे बड्ड दिनक पछाति भोजन बनेबाक अवसर भेटल। पिता श्री आ माँझिल भाएकेँ पुछलिअन्हि जे की खेबै ? अरे भाइ तों जे आगूमे देबही से खा लेबै। हम सभ तँ खाए बला पार्टी छी ... आ ओही रातिमे हम सपना देखलहुँ जे हमर पिता श्री आ माँझिल भाए नेता बनि क' मंचपर छथि आ राजनीतिक पार्टी बनेबाक घोषणा क' रहल छथि। बीहनि कथा- भविष्य वाह... ई बच्चे सभ तँ भविष्य होइत अछि। वाह....................... अच्छा ई कहू जे अहाँके ए.बी.सी अबैए..? हँ.... वाह उत्तम। अपन देशक चौहद्दी अबैए ? हँ...... वाह.. खूब नीक. बाबा-परबाबाके नाम मोन अछि ? हँ... वाह---वाह की संस्कार अछि। अच्छा ई कहू जे अहाँके कि नै अबैए ? जी हमरा बस लाज नै अबैए ---- बीहनि कथा- प्रतिभाशाली "प्रतिभाशाली लोक पोस नै मानै छै" ई बात बहुत बेरसँ एकटा बूढ़ साहित्यकार युवा साहित्यकारक पक्षमे बाजि रहल छलाह. ओ फेर तर्क देलाह जे सुच्चा रचनाकर्मी स्वतंत्र होइत छै ओकरा केकरो गुलामी नै करबाक चाही. सभामे सभ हुनकर तर्कसँ हारि गेल छल. बूढ़ साहित्यकार घर एला तँ किछु सुनसान लगलनि. बूढ़ीकेँ सोर पाड़लनि. बूढ़ीकेँ एबासँ पहिनेहे एकटा बेटा आबि कहलकनि "आब हम भिन्न होबए" चाहैत छी. बूढ़ साहित्यकार बिना किछु बजने अंगनासँ निकलि गेलथि. बीहनि कथा- सोति ओ- 'कहाँदुन सोतिक बियाह केस कटा कʼ होइत छै' हम- 'एकर मतलब जे हमहूँ सोतिए छी' ओ- 'से कोना' हम- 'हमरा केसे नै अछि, तँइ हम दुद्धा सोति भेलहुँ बीहनि कथा- मतलब ओ कहलथि "अभियान कहियो रूकए नै", लोक बुझलक "अभिनय कहियो रूकए नै बीहनि कथा- नर्क " हे रौ, खा ले पूरा। ऐंठ ने छोड़ " " ऊँ...ऊँह......नै आब नै खाएल हेतौ हमरासँ। पेट भरि गेलै " " हे देखही उपरसँ भगवान देखै छथन्हि जे लोक जतेक बेर ऐंठ फेकै छै तकरा नर्कमे जाए पड़ैत छै आ ओहिठाँ ओकरा ओतेक दिन भूखल रहए पड़ैत छै " " नै हमरा भूख नै छौ " आ माए ओही छीपीमे अपनो हिस्सा लए खाए लागैए। बच्चा जवान भेलै, हिस्सक वएह मुदा बहन्ना दोसर------ " छोड़ भगवान-तगवानकेँ। ओ कोनो देखै छै। सभ झुट्ठे छै " आ पिज्जा भरल पेटसँ आधे थारी खा उठि जाइत अछि। कालक्रमे जबान बूढ़ भेल। बेटा-पुतहु बाहरे। खाली अपने आ बुढ़िया घरपर। जहिया बुढ़िया बेमार पड़ै तहिया उपासे सन लागै। ओना कहिओ काल देआद सभ सेवा कए दए मुदा ओहो सभ तेरहे -बाइस। आ उपसे सन एकटा साँझमे बूढ़ाकेँ पड़ोसिया घरसँ सुनाइ पड़लन्हि--- " हे देखही उपरसँ भगवान देखै छथन्हि जे लोक जतेक बेर ऐंठ फेकै छै तकरा नर्कमे जाए पड़ैत छै आ ओहिठाँ ओकरा ओतेक दिन भूखल रहए पड़ैत छै " आ की ई सुनिते बुढ़बाक रोंआ ठाढ़ भए गेलै। मोन पड़ि गेलै ओकरा अपन माएक गप्प। ठीक इएह तँ कहै छलै। आ सिहरैत-सिहरैत बूढ़ा अपन वर्तमानमे आबि गेलाह आ हिसाब लगाबए लगलाह जे ओ कते दिन कतेक बेर ऐंठ छोड़ने छथि। सपना आ भ्रम (ई लघुकथा हमर पहिल प्रकाशित लघुकथा अछि जे कि 2007मे विद्यापति सेवा संस्थानक स्मारिकामे प्रकाशित भेल छल। विदेहक पाठक एवं आन माध्यमक नव पाठक लेल हम एकरा एहिठाम दऽ रहल छी।- आशीष अनचिन्हार) घटनासँ पूर्वक गप्प : सपना देखैत लोक सावधान भऽ जाउ। बड्ड दिन धरि अहाँ सभ सपना देखलहुँ, किछु दिन बिनु स्वपन देखने रहू। "की कहलहुँ ? सपना देखबाक हिस्सक लागि गेल अछि हमरा सभकेँ। हँ से त' सत्ते कहलहुँ - अहाँ, आ से हमहूँ बूझि रहल छी।" "फेर की कहलहुँ। सपना देखब आवश्यक छैक जिनगीक लेल। ई के कहलक अहाँकेँ? बेस मानलहुँ हम जे सपना देखब आवश्यक छैक, मुदा कनेक ई अहाँ फरिछाउ -जे की केवल सपने देखब आवश्यक छैक ओकर क्रियान्व्यन किछु नहि।" "की भेल औ, चुप्प छी किएक किछु बाजू ने।" "ओह बुझाइत अछि जे फेर अहाँ सभ सूति रहलहुँ घोर निन्नमे सपना देखबाक लेल, खाली आ खाली सपना देखबाक लेल।" सूतब एक रंगक गप्प भेल। सपना देखब दोसर रंगक आ सपना देखि ओकरा क्रियान्व्यन करब तेसर रंगक गप्प भेल। मुदा ई तीनू एक दोसरसँ संबंधित अछि प्रजातंत्रक नेता जकाँ। एह कड़ी महँक जँ कोनो कड़ी टूटि गेल तँ सभटा खेल खतम आ पैसा हजम । “आ भ्रम की छैक।" "अच्छा, अच्छा उठि गेलहुँ की ?" "हँ कनेक आँखि लागि गेल छल" "हँ से तँ लगबे करत हिस्सक अछि ने। मुदा हम एहि प्रसंगकेँ छोड़ि अहाँक प्रश्नपर आबी से उत्तम। ओना अहाँक प्रश्नक उत्तर जतेक कठिन ततबे सरल। आब अहाँ ई उदाहरण नहि देब जे संसारे भ्रम थिक। ई गप्प हमरो बूझल अछि। मुदा एहि बाटे जाएब हमरा अभीष्ट नहि।" "हँ तँ अहाँ हमरासँ की पुछने छलहुँ, इएह ने जे भ्रम की थिक। अच्छा एकटा गप्प कहूँ, अहाँ सभ त निश्चित रूपँ मैथिली साहित्यक प्रेमी हएब। हएबे करब। जकरा पाबि कऽ अनेरे पुरस्कार ओ सम्मान भेटैत हो ओकरासँ प्रेम नहि करक तँ करबैक केकरासँ। हँ तँ जखन अहाँ लोकनि साहित्यक प्रेमी छी तँ किछु ने किछु कहबी जनिते हएबैक। आब अहाँ सभ मोने-मोन कहब जे ईहो कोनो पुछबाक गप्प छैक। मुदा हम जनैत छिऐक जे गप्प छैक। आब जखन गप्प कहबीपर एलैक अछि तखन अहाँ सभकेँ तँ एकटा कहबी मोने हएत ने औ? कोन, जनैत छियैक ? वएह जाहिमे कहल गेल छैक जे अपने सूतल छी आ विआह होइत अछि।" आब अहाँ सभ किछु-किछु बुझए लागल हएबैक। "की कहलहुँ, एखनो धरि नहि बुझलिअइ। ठीक छैक तखन हमरा दोसरो कहबी कहए पड़त।" "जेना" "जेना की ओ कहबी छैक-अपने नहाइत छी आ कीदन दहाइत अछि।" आबो बुझलिअइ यौ? की बजलहुँ, एखनो धरि बुझाएल ई गप्प। अरौ बाप रौ बाप। आब हम कोना बुझाएब अहाँ सभकेँ। अच्छा, कोनो गप्प नहि, एहि बेर हम तेरहम विद्याक प्रयोग कए रहल छी।" "अर्थात्।" “अर्थात् जे आब हम सोझे-सोझ गप्पकेँ खोलि कऽ कहब।" "कहू" "हँ, सुनल जाए। मनुख जा धरि सपना देखैत अछि ता धरि तँ ठीक आ आवश्यको छैक, मुदा जहाँसँ मनुख सपनामे क्रियान्वित काज के वास्तविक जीवनमे सत्त बूझि लैत छथिन्ह ओही ठामसँ भ्रम शुरू भए जाइत छैक। एकरे जँ दोसर तरहें एना कही जे-सपना देखब जरूरी छैक मुदा सपनामे भेल काज के वास्तविक जीवनमे बिनु हाथ-पएर डोलेने सत्त मानब भ्रम थिक। आब तँ बुझिए गेल हेएबैक जे सपना कि थिक आ भ्रम की।" "आबो बुझलिअइ औ" "की भेल औ" "ओह फेर सूति रहलिअइ की ? जाउ, सूतू ग।" घटनाक गप्प : पुरबा बहैए मच्छर कटैए निन्न नहि अबैए कनियाँ मोन पड़ैए... टेपसँ मधुर गीत बहार भए रहल छल आ एम्हर बाबू साहेब अपन मित्र दिलीपकेँ रातुक सपनाक संबंधमे सुना रहल छलाह। बाबू साहेब दिलीप के कहलखिन्ह-"बुझलह रातुक सपनामे तों हमरासँ प्रश्नपर प्रश्न करैत चल गेलह आ हम जबाबपर जबाब दैत।" दिलीप अविश्वासक भावसँ साहेब दिस तकलक आ पुछि देलकै-"कहक तँ जे हम तोरासँ की-की पुछलिअह आ तो हमरा की-की जबाब देलह। बाबू साहेब जाँघपर हाथ मारैत बजलाह-"एहीठाम तँ मारि खा गेलहुँ। एखन धरि मोन नहि पड़ल अछि। भोरेसँ मोन पाड़ि रहल छी। दिलीप हँसि देलथि। बाबू साहेब थोड़ेक रुष्ट होइत पुछलखिन्ह-की विश्वास नहि होइत छह ? दिलीप पूर्ववत भावसँ उत्तर देलखिन्ह "सपनों सभ कोनो विश्वास करबाक वस्तु होइत छैक। प्रत्येक दिन-रातिमे प्रत्येक मनुष्य नहि जानि कतेक सपना देखैत हेतैक। के गनती राखता हँ जँ ओ वास्तविक जीवनमे सत्त हुअए तखन ने ओकरा सत्त मानल जाए।" बाबू साहेबक मुँह अप्पन सन भए गेलन्हि, मदा कनेकबे देर धरि। किछु देर घरि ओ किछु बिचारत दिलीपसँ जिज्ञासा केलखिन्ह अच्छा मीत एकटा गप्प कहअ जे वस्तु सच का आकर छाँह? आ दिलीप अकबका गेलाह अनचोकेमे एहन प्रश्न सुनि कऽ। किछु ने फुरेलन्हि उत्तरमे। सोचमे डूबि गेलाह। मुदा कतेक देर धरि, किछु ने किछु त उत्तर देबहे पड़तनि। किछु विचारैत ओ गंभीर स्वरमे बजलाह-"दुनू सत्त।" बाबू साहेब फेर पुछलखिन्ह "कोना" दिलीप फरिछबैत कहलखिन्ह- "ई गप्प तँ निश्चित छैक जे वस्तु सच थिक आ वस्तुएसँ त छाँह होइत छैक, तँइ वस्तुक संगे-संग छाँहो सत्त।" बस आब की छल बाबू साहेब खुश होइत पुछि देलखिन्ह "अच्छा मुदा ई कहह जे वस्तु सत्त छैक तँइ ओकरासँ उत्पन्न छाँह सेहो सत्त भए गेल। मुदा तोरे कथनानुसार सपना फूसि आ ओकर सकार रूप सत्त, एहन दोहरा भाव किएक जखन की मूल प्रश्न एकै छैक। जेना वस्तु ओ ओकर छाँह एक दोसरसँ संबंधित छैक तेनाहिते संपना आ ओकर सकार रूप एक दोसरसँ संबंधित छैक।" दिलीपपर ई दोसर बेर बज्जर खसलैन्ह। ओ बिनु पपनी खसेने बाबू साहेब दिस देखए लगलाह आ बाबू साहेब दिलीपक आँखिमे। घटनाक पछातिक गप्प : एहि कथामे ने किछु सार छैक ने रस से हम मानैत छी। मुदा कनेक काल लेल हम अथवा अहीं जँ दिलीप भऽ जाइ तँ बाबू साहेब के हेताह ? के जोखिम उठा सकैत छथि बाबू साहेब बनबाक लेल ? ई प्रश्न जतबे अनिर्णायक छल ततबे एखनो अछि आ आँगा रहत की नहि रहत से हम नहि कहि सकी, कारण हम कोनो भविष्यवक्ता नहि छी। मुदा प्रश्न तँ सोझामे ठाढ़ अछि। जे व्यक्ति केकरो एक पक्ष के सत्त मानैत छथिन्ह त ओकर दोसर पक्ष के फूसि किएक ? जखन की दूनू पक्ष एक दोसरसँ संबंधित छैक। अविभाज्य छैक। प्रश्न तँ उठबे करतैक, आखिर किनको लेल ब्रह्म किएक सत्त आ माया किएक फूसि ? प्रश्न बहुत रास आबि सकैत अछि। बड़ जोरसँ रोकलाक पछातिओ। आ जे मायाकेँ सत्त मानत छथिन्ह से ब्रम्हकेँ फूसि किएक ? प्रश्नक काज छैक बढ़नाइ बढ़बे करतैक, खाली हम अहाँ एक दोसरक मुँह देखैत रहबैक। अच्छा ई कहू जे - प्रकृतिक उद्दीपन सत्त की आत्माक द्वन्द सत्त की इन्द्रियक दमन सत्त। सत्त की छैक। प्रश्न बढ़ले जा रहल अछि। राम सत्त की रावण ? केओ कहताह राम केओ रावण। मुदा की रामक बिनु रावणक आ रावणक बिनु रामक अस्तित्व संभव छैक। ई प्रश्न सभ भूतकालक थिक से अहाँ कहि सकैत छियै संगहि-संग अहाँ हमरा भूतजीवीक उपमा सेहो दए देब, तँइ आब हम वर्तमान कालमे प्रवेश करब। आब अहीं कहू जे एहि मेंसँ सत्त की छैक अमेरिकाक दादागीरी, पाकिस्तानक आतंकवादी, इरानक स्वाभिमान, चीनक कूटनीति की भारतक शान्ति। सत्त की छैक एहिमेसँ। अहाँ कहबे करब जे अमेरिकाक दादागिरी आ पाकिस्तानक आतंकवादी फूसि आ भारतक शान्ति सत्त। मुदा ई भावना भने अहाँक देश-प्रेमक परिचायक हुअए। मुदा एकरा निरपेक्ष नहि कहल जा सकैए। अंततः शान्ति की छै। आतंक एवं दादागिरीक दमनक पश्चात् जे आनंद बुझाइत छैक ओकरे नाम हम अहाँ शान्ति देने छियै ने। आब अहीं सभ सोचिऔ कनेक जे जँ आतंक नहि हेतैक तँ शान्तिक उत्स हेतैक कतएसँ आ जँ कहींसँ उत्स भइओ गेलैक तँ, हेतैक केकरा लेल। तँइ आतंको सत्त आ शान्तियो सत्त। "अपनेक कहक अभिप्राय ?" "अच्छा उठि गेलहुँ। बड्ड देरक पछाति निन्न टूटल अहाँक ?" "हँ, फेर कनेक आँखि लागि गेल छल!" "अच्छा " "हँ त हम अपनेक अभिप्राय पुछैत छलहुँ" "अभिप्राय ? हँ तँ हमर कहक अभिप्राय जे संसारमे सभ सत्त थिक" "अच्छा मानू जे सभ सत्त थिक तँ फूसि की थिक। की पृथ्वी फूसि विहीन अछि" "नहि-नहि, इहो कहब निरपेक्ष नहि हएत जे पृथ्वीविहीन अछि" "अँए की बजलहुँ, एखने कहैत छलियै जे पृथ्वीपर सभ सत्ते अछि आ एखने कहलिअइ जे पृथ्वी फूसिविहीन नहि छैक। एना दुचित्तापन किएक ?" "सरकार ई दुचित्तापन नहि थिक। हम जे पहिने कहलहुँ सेहो सत्त आ एखन जे कहलहुँ सेहो सत्त" "फेर अहाँ गप्पकेँ घुरछिया देलियै" "नहि सरकार गप्प तँ एकदम सोझ छैक, खाली हमर अहाँक मोन बौआ रहल अछि" "ई अहाँ की सभ बाजि रहल छी से नहि जानि" "जानए के प्रयासो तँ करियौ" "तखन अहीं कहू". "की" "इएह जे अहाँक दूनू गप्प कोना सत्त" "हम कहैत छलहुँ जे शान्तियो सत्त आ आतंको सत्त सएह ने" "हँ" "अच्छा आब एकटा गप्प सूनू मानू जे एकटा आतंकवादी आतंकक प्रसार कएलक आ नुका गेल। तकरा पछाति शासक ओकरा ताकि-हेरि कऽ समुचित दंड देलक। आब एहि गप्पकेँ नीक जकाँ बुझियौ आतंकवादी जे आतंक प्रसार कएलक ई भेल आतंकवादीक सत्त आ शासन ओकरा दंड देलक। ई भेल शासनक सत्त। मुदा की देखैत छिऐक हम-अहाँ सभ। आतंकवादी अपन सत्त देखा चल जाइत अछि आ शासन चुप्प रहैत अछि। इएह चुप्पी तँ फूसि थिक, भ्रम थिक। रावण सीताहरण कए लैत अछि आ आबक राम रामेश्वरक स्थापना कए घूरि अबैत छथि, इएह घूरि जेनाइ तँ फूसि थिक, भ्रम थिक। शासनक सत्त तखने रहतैक जखन की ओ आतंकीकेँ दंड देत। रामक सत्त तखने जखन की ओ रावण के परास्त कए सकथि। मुदा से नहि भए रहल आ ई जे नहि भए रहल सएह तँ फूसि आ भ्रम भेल। आ इएह फूसि इएह भ्रम चारू दिस पसरि रहल अछि। इएह आँगन, दुआरि, चौकठि, बड़ेरी, मोन, आत्मा सन के गछारने अछि। आ हम-अहाँ इएह फूसि इएह भ्रमक दुनियाँमे बौआ रहल छी, एहि छोड़सँ ओहि छोड़, एहि आरसँ ओहि पार धरि हाथमे एकटा टूटल छौकी लेने। घर (कथा विधाक ई हमर दोसर प्रकाशित लघुकथा अछि जे कि पटनासँ प्रकाशित घर-बाहर नामक पत्रिकामे अक्टूबर-दिसम्बर 2008 अंकमे प्रकाशित भेल छल। विदेहक पाठक एवं आन माध्यमक नव पाठक लेल हम एकरा एहिठाम दऽ रहल छी।- आशीष अनचिन्हार) घर तीन प्रकारक होइत छैक। उच्च, मध्यम आ निम्न। एकर आरो भेद उपभेद भए सकैत छैक मुदा ताहिसँ हमरा कोनो बहस नहि। ओहिठाम हम जाहि घरक खेरहा कहब से भेल मध्यम। तँ आगा सुनू खेरहा मध्यम घरक। घरक मतलब मध्यम घर बुझल जाए। प्रत्येक घर ओ जीव होइत छैक जे मनमानी कए सकए। तुच्छ आर्दशक संग। तानाशाहीक बिना कोनो घर, घर नहि होइत छैक, चाहे ओ हमर घर हो वा कि अहाँक। सत्त इएह थिक। घर काठ अथवा ईंटासँ नहि, हुक्मसँ बनैत छैक। घर भूकंप अथवा तोड़लासँ नहि, हुक्म तोड़लापर टुटैत छैक। घर ओ नहि जाहिमे केओ फरमाइश कए सकल। घर ओ छैक जाहिमे हाथ उठा कए दए दिऔक। जकरा भागमे जे होएतैक से भेटतैक। घर अपना मोने किछु नहि होइत छैक। होइत छैक सभक मर्जीसँ मुदा ई घरे थिक जे अपन मर्जी के सभहक मर्जी बुझए लगैत अछि। ओकरा ईहो मोन नहि रहैत छैक जे हमर अस्तित्व कतएसँ अछि। ई घरे थिक जे जानि बुझि कए कोतबालक पदवी लैए प्रचुर योग्यता आ संभावनाक अछैतो प्रत्येक समय ओ कोतवालीक रुतबा देखबैत छैक अनेरो। ई घरे थिक जे कोतवाल बनि सूति रहैत अछि आ निन्नमे गबैत रहैए-'जगले रहिअह हो भाए। आ चोर चुप्पचाप माल निकालि लैत अछि ।घरकेँ दसटा आँखि होइत छैक दसटा दिशाक रूपें जे सदिखन लाल टरेस रहैत छैक। आ ई आँखि देखिते दोसरक आँखि झुकि जाइत छैक अनायास। घरक एकटा गरदनिमे एक लाख हाथीक आवाज रहैत छैक। कनिकतो खखसलापर लोकक पएर थकमका जाइत छैक। कान फाटि जाइत छैक। माथ दुखाए लगैत छैक अपने मने। लगही-नदी बंद भए जाइत छैक। प्रारंभिक वाक्य-: घर हिटलर अछि वा हिटलरे घर अछि एकर खोज करब आवश्यक। घर ओ जगह थिक जाहि ठामक घैलमे नोर भरल रहैत छैक आ चूल्हापर चढ़ाओल रहैत छैक हँसी। पिआस लगलापर लोक नोर पिबैत छैक आ भूख लगलापर हँसी चिबबैत छैक से अहाँ सभ बिनु लिखने बूझि गेल होएबैक। घरक लोक जखन लगही करैत होएतैक तखन नोर निकलेत होएतैक पोखरि दिस जाए कालमे हँसी। आ लोक जतए लगही करैत छैक ओहिठाम फुटि जाइत छैक मोनि। दिसा फिरलाहा जगहपर जनमि जाइत छैक गाछ। कथीक से सोचि लिअ। आ मोनि जतेक गहींर भेल चल जाइत छैक ओहि महक पानि ततबे सुखाएल जाइत छैक। गाछ जतेक नमहर होइत छैक, मनहूसी ओतबे नमहर भए जाइत छैक। गाछक डारि -पात नमरि जाइत छैक, सांसारिक समस्या जकाँ। हँ, एकटा गप्प आरो होइत छैक। पाहुन-परक अएलापर घैलक नोर नहि देल जाइत छैक। रान्हल हँसी जरूर भेटैत छैक। पाहुनक जखन लगही करैत छथि तखन मोनि नहि फुटैत छैक। हँ, दिसा फिरलापर गाछ जरूर जनमि जाइत छैक। आ सहयोग देबए लगैत छैक पहिनेसँ जनमल गाछकें। मोनि फुटैत अछि, गाछ जनमि जाइत अछि घरो-चलैत रहैए। भरत वाक्य - : नोर आ हँसीक माँझ घरक स्थान छैक। घर ओ जगह थिक, जाहि ठामसँ दू टा बाट फुटैत छैक। एकटा आगू दने आ दोसर पाछू दने। बाम दहिनक प्रश्ने नहि। आगू महँक बाट पकड़ब तँ घंटा भरि लागत चौटिआपर पहुँचबामे। आ चौबटिओ तेहने। केन्द्र बिन्दुसँ चारि टा बाट निकलल आ फेर ओहि एक-एक बाटक शुरूआते में चौबटिआ फुटि गेल छैक आ क्रमश: प्रत्येक बाटमे एहनाहिते चौबटिआ फुटल छैक। आ अहाँ चौबटिआपर पहुँचि, थकमका जाएब। अथ-उथमे पड़ि जाएब। किछु नहि काज देत। कखनो सोचब जे ओहि बाटपर चलल जाए तँ कखने ओहिपर। घनचक्कर। किछु ने फुराएत। आ एहन समयमे बात अहाँ थाकि कए ओहि ठाम बैसि जाएब वा कोनो बाटपर चलि बिला जाएब वा पुनः घर घुरि जाए जहाजक चिड़ै जकाँ। आ जँ पाछूक बाट पकड़ब तँ पाँचो मिनटसँ बेसी नहि लागत चौबटिआपर पहुँचएमे। मुदा ओही चारि मिनटमे पाँच जुगक अनुभव भए जाएत। गोठुल्लासँ आगू बढ़ि पाएब जँ ओहि महँक निकलल बत्तीसँ आँखि माथ सही-सलामत बचि गेल तँ। आगू बढ़लापर दूगो घर बीचक एकटा गली भेटैत छैक। देहोसँ कम्म चौड़ा। कहिओ देबालमे लागि छिला जाएत। कहिओ किछु...। अगत्या पार कए जेबैक अहाँ कोनाहुतो ओहि गलीकेँ। आबि जएब चौबटिआपर। मुदा चौबटिआपर पाछूक बाटसँ पहुँचबाक पछातिओ अहाँक आगू में ओएह सनातन प्रश्न आबि ठाढ़ भए जाएत। कोन बाटपर बढ़ल जाए। निर्णय नहि कए सकब से हमरा बुझल अछि। आओर अंत में ओएह तीनटा उपाय-थाकि कए बैसि रहब वा अनचिन्हार बाटपर पएर बढ़ा देब वा घर घुरि आएब। ई घरे थिक जे दू-दूटा बाट राखिओ कए ककरो आँगा नहि बढ़ए दैत छैक। बृहस्पतिओ ग्रहसँ बेसी आकर्षण शक्ति छैक एकरामे। जतेक प्रबल शक्तिसँ अहाँ बाटपर बढ़बाक प्रयास करब एकर शक्ति ओतबे बढ़ल जाइत छैक। रामक समकालीन बालि जकाँ। आ अंतमे नुकाइए लेत ओ अपना पेटमे। घोर अन्हरियामे। पटकैत रहू माथ एहि देबालसँ ओहि देबालपर। टूटत नहि। फूटत नहि। निष्कर्ष वाक्य-: घर दू मूँहा अजगर थिक। घर ओएह थिक जे युग-युगसँ दुर्गा बनबाक देखैत देखैत मरि जाइत अछि। घर कहिओ ने बनि पबैत अछि दुर्गा। दुर्गाक दसटा हाथ आ एकटा मूँह देखि घर सोचैत रहि जाइत अछि जे दुर्गे जकाँ हमरो दसटा हाथसँ अबितै आ एकटा मूँहमे जाइत से कतेक नीक होइतैक। मुदा ई सपना देखिते-देखिते ओ भए जाइत छैक रावण। अबैत छैक दूटा हाथसँ मुदा जाइत छैक दस टा मूँहमे। कखनो कऽ घर ब्रम्हा आ रावणक रक्तसंबंधक प्रसंगमे सोचए लगैत अछि। सत्ते चतुर्मुखीक संतान दसमुखी केना ने हो। कहिओ-कहिओ घर सोचैत अछि जे दुर्गा नहि सही गणेश किएक नहि भए जाइत छी। पेट रहत मनुखक मूँह रहत जानवरक। जानवरक मूँहसँ दूभि-पात चिबाइए सकैत छी। सोहारी ओ भात तँ खएबामे कोनो दिक्कत नहि। मुदा घरक ईहो मनोकामना पूरा नहि भए पबैत छैक। आ रहि जाइत छैक ओ पहिनेहे जकाँ। कहिओ कए अधरतिआमे घर बिसुनाए लगैत अछि आ ओही कालमे ओकर बड़बड़ेनाइ चालू भए जाइत छैक। बड़बडेनाइमे ईहो मिलल रहैत छैक प्रार्थनाक रूपमे-हे भगवान वा तँ हमर मूँहे गाएब कए दिआ वा पेटे। ई दूनू बड़का गुंडा अछि। खास कए ई पेट। आ अंतमे ई प्रलाप सेहो बन्न भऽ जाइत छैक आँखिक संगे-संग। निष्पति वाक्य -: घर बड्ड किछु सोचैत छैक मुदा ओ पूरा नहि भए पबैत छैक। घरे एकटा एहन जीव होइत अछि जे अपना भीतर बाजल गेल हरेक शब्दकेँ रोकबाक लेल छोटोसँ छोट भुरकी बन्द कए दैत अछि। ई जनितो जे शब्दक दूत बसात होइत छैक। आ घरे तँ छैक जे दोसर ठामक गप्प सुनबाक लेल टाट की चारोकेँ हटा दैत छैक चाहे ओहिमे रहए बलापर पाथर खसौक वा पानि पड़ौक वा रौद लगौक। कोनो असरि नहि घरपर। आ एहन सामर्थ्य तँ घरे के हो जे घर में रहएबाला सभ पाथर, पानि रौदसँ भरि जाइत छैक मुदा ओ अपन काज कइएक निचैन होइए। छोट वाक्य -: घर मने ओ व्यापारी भेल जे कनेक लाभ लेल बड़का हानि के मोजर नहि दैछ आ बुझैछ जे हमरा पौ बारह अछि। कहिओ अहाँ सभ सोचलहुँ अछि जे आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे की अंतर होइत छैक। नहि ने। प्रयासो नहि कएने होएबैक। ओना दरबाजापरक घरकेँ घर कहले. नहि जाइत छैक। तइओ...। आङनक घर मने घरबैआ केबाड़ लगा लेताह तँ चारू दिससँ सुरक्षित। दरबज्जाक घरमे अहाँ सुरक्षित भइओ .सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। कतेको गोटाक घर आ दरबज्जामे मात्र एकटा टाटक अस्तित्व रहैत छैक। टाट हटा दिऔक कोन घर रहत कोन दरबज्जा से बुझि नहि पड़त। मुदा तैओ आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे अंतर होइत छैक। आङनक घरमे अहाँ ककरोपर खिसिआ कए हाथ छोड़ि देबैक मुदा दरबज्जाक घरमे चुप रहबाक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि। कारण जे होइक। आङनक घरमे केओ नोर बहा कए टाटकेँ अपन कथा कहि सकैत छथि। मुदा दरबज्जाक घरमे नोर की बेसी हँसिओ नहि सकैत छी। बेसी हँसब तँ लोक बताहे बूझत। आङनक घरक कोनो कोनमे एकटा कापी आ एकटा कलम रहैत छैक जाहिसँ लिखाइत छैक करेजक गप्प। दरबज्जाक घर महँक काँपीपर लिखाइत छैक नून-तरकारीक हिसाब। नमहर वाक्य-: आङनक घरमे सहजता होइत छैक। दरबज्जाक घरमे कृत्रिमता। घर मने एकटा ओहन मंच जाहिपर होइत रहैत छैक हर समय रंग-बिरंगी चौकी तोड़ नाच। एही चौकी-तोड़ नाचकेँ लोक गँड़िघुम्मा नाच कहैत जाइ छथि। आ नाचमे नटुआक जे घूमै घरक मूँह जरूर घूमि जाइत छैक। नाच खत्म भेलापर चौकी टूटल ककरो भेटतै की नहि भेटतै। मुदा टूटल मंच, टूटल घर जरूर भेटैत छैक। नाच शुरू होइत छैक चौकीतोड़क नामे मुदा अंतमे ओकर नाम रखबाक इच्छा भए जाइत छैक घरतोड़। मुदा ईहो एकरा अजगुते गप्प छैक जे एहि नाचक नाम हरेक बेर शुरू में चौकीतोड़ आ अंतमे घरतोड़ रहिते छैक। लोककेँ दूनू नाम पसिन्न छैक। एकैटा नामसँ गुजर नहि चलतै। आ ई घरे अछि जे एहि नाचमे ओ स्वयं भूमिका लैए आ दोसरो घरकेँ भूमिका दैए। आ सभ मीलि कए खेलैए चौकीतोड़ उर्फ घरतोड़ नाच। आप्त वाक्य - : घर एकटा मंच छैक जाहिपर नाच होइत छैक। सभ मीलि नाचैए आ खुश होइए। साँझ होइए, भोर होइए। इजोरिआ जाइए अन्हरिआ अबैए। देबाल ढहैए, चार टुटैए। नेओं पडैए, पीलर गड़ाइए। एस्वेस्टस किनाइए वा छत ठोकाए। सभ किछु होइए। एक घरसँ एकैस घर होइए। होइत जाइए। होइत जएबाक लेल बाध्य होइए। अन्तिम वाक्य - : घर ओ घर नहि अछि जे पहिने छल। घर ओ घर नहि रहत जे एखन अछि। दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै आइसँ 5 बर्ख पहिने गंगेश गुंजन जी दुष्यंत कुमारक एकटा शेर दऽ कऽ कहने रहथिन जे मनोरथ अछि मैथिलीमे एहि 'मिजाज' ओ एहि वज्नक शेर हो। कहिया धरि एहन शेर एतै सेहो पुछने रहथिन। वज्न मने बहर भेल आ से मैथिली गजलमे पहिनेसँ अछि। रहलै दुष्यंत कुमारक शेर सनक मिजाज केर बात तँ हम तथ्यात्मक गिनती केलहुँ जे कहिया धरि एहन शेर लिखेतै मैथिलीमे। गिनती हम करब ताहिसँ पहिने दुष्यंतजीक ओ शेर हम प्रस्तुत करी जे गुंजनजी देने रहथि-- "उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये" निश्चित तौरपर नीक आ उत्तम शेर छै ताहिमे संदेह नै। तँइ गुंजनजी सेहो प्रस्तुत करबा लेल बाध्य भेलाह। तँ आब हम मूल बात दिस चली। हम अपन गिनती लेल दू टा मानक लेलहुँ अछि। पहिल दुष्यंतजीक गजल संग्रह प्रकाशन आ दोसर आधुनिक खड़ी बोली हिंदीमे लिखल शुरूआती गजल आ से हमरा भारतेंदु हरिश्चंद्रजी लगसँ भेटैए (जन्म- 9 सितंबर 1850- मृत्यु 6 जनवरी 1885)। भारतेन्दुजीक गजल सेहो छनि मुदा कोन बर्खमे प्रकाशित भेलनि से हमरा ज्ञात नै ताही लेल हम हुनकर मृत्यु वर्षकेँ अंतिम मानि आगू बढ़ि रहल छी। आब जानी दुष्यंत कुमारजीकेँ। दुष्यंतजीक जन्म- 01 सितम्बर 1933 आ मृत्यु- 30 दिसम्बर 1975 केँ भेलनि। एही बर्ख (1975) मे हिनक गजल संग्रह- 'साये में धूप' केर प्रकाशन भेलनि। एहि ठाम कने रुकि हम भारतेंदु आ हुनकर ठीक बादक किछु चूनल हिंदी गजलकारक किछु शेर देखी— अजब जोबन है गुल पर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है शिताब आ साक़िया गुल-रू कि तेरी यादगारी है एकर बहर अछि 1222-1222-1222-1222 आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया ऐ फ़लक क्या क्या हमारे दिल में अरमाँ रह गया एकर बहर अछि 2122-2122-2122-212 आब सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीक शेर देखू- भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है एकर बहर अछि 2122-2122-2122-212 आब जयशंकर प्रसाद जीक ई शेर देखू-- सरासर भूल करते हैं उन्हें जो प्यार करते हैं बुराई कर रहे हैं और अस्वीकार करते हैं एकर बहर अछि 1222-1222-1222-1222 आ ठीक एही बहरमे शमशेर बहादुर सिंहजीक ई शेर देखू-- जहाँ में अब तो जितने रोज अपना जीना होना है, तुम्हारी चोटें होनी हैं हमारा सीना होना है। पं.कृष्णानंद चौबीजीक ई शेर देखू-- आपका मक़सद पुराना है मगर खंज़र नया मेरी मजबूरी है मैं लाऊँ कहाँ से सर नया एकर बहर अछि 2122-2122-2122-212 आ ठीक एही सभहक बीचमे दुष्यंत कुमारजीक गजल छल। दुष्यंतजीक गजल संग्रहक हरेक गजल बहरमे अछि मुदा एकटा गजलक बहरपर बेर-बेर ओझराहटि हिंदी ओ मैथिलीक गजलकार दिससँ देखल जाइए आ ओहि गजलक मतला छै-- होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिए अही गजलक एकटा शेर गुंजनजी देने रहथिन जकरा हम उपरमे देने छी। जखन कोनो हिंदी-उर्दू गजल देवनागरीमे लिखाइ छनि तखन ओझराहटि आर बेसी बढ़ि जाइत छै। कमसँ कम हिंदीमे तँ बहुत घमर्थन छै जे हिंदी गजल लेल उर्दू शब्दक मूल ध्वनि लेल जाए कि हिंदी ध्वनि। हिंदीक बहुत गजलकार उर्दू ध्वनिक आग्रही छथि तँ बहुत हिंदीक ध्वनिक। दुष्यंतजी अपने सेहो एही ध्वनिक ओझरीमे छलाह तँइ बहुत बेर ओ अपन गजलमे शहर केर मूल ध्वनि शह्र=21 लेने छथि तँ हिंदी ध्वनि श-हर=12 सेहो। अही कारणसँ उर्दू गजलकार सभ दुष्यंत कुमार केर आलोचना केलकनि आ हिंदी बला सभ बुझलकै जे दुष्यंतजीकेँ नीचा देखाबए लेल उर्दू बला सभ एना कऽ रहल छै। एहि गजलक बहर बूझब हुनका लेल आसान हेतनि जे कि मुजाइफ बहर बुझि गेल छथि आ जे नै बुझने छथि से निच्चाक दूटा शेरक तक्ती देखथि- होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए=2212-12-11-22-12-12 इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिए=2212-12-11-22-12-12 उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें=2212-12-11-22-12-12 चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये=2212-12-11-22-12-12 अहाँ सभ चाही तँ पूरा गजल एहि बहरपर बैसा कऽ देखि सकैत छी। कुल मिला कऽ साबित भेल जे दुष्यंतजीक ईहो गजलमे बहर अछि। बिना बहरक गजल भइए ने सकैए। हमरा गुंजनजीक उद्येश्यपर संदेह नै मुदा हमर पापी मोन सोचलक जे कहीं गुंजनजी एहि शेरकेँ अही दुआरे तँ प्रस्तुत नै केलाह जे हुनको बुझाइत छलनि जे एहि गजलमे बहर नै भऽ सकैए। माफी चाहब ई हमर पापी मोनक संदेह छल वा अछि। आब एहि संदेह सभकेँ कात करैत मूल बातपर आबी। जेना कि देखलहुँ जे भारतेंदु आ हुनक बाद काँच-पाकल कथ्यक संग मुदा अनिवार्य रूपे बहरयुक्त हिंदी गजल दुष्यंत सन परिपक्व गजलकार धरि यात्रा केलक आ ताहिमे ओकरा लगभग 90 बर्ख समय लगलै (भारतेंदुजीक मृत्युसँ दुष्यंतजीक गजल संग्रहक प्रकाशन)। एहन नै छलै जे दुष्यंतजीसँ पहिने जे नाम देलहुँ से हिंदीमे अनाम छलाह ओ सभ स्थापित आ युगांतकारी साहित्यकार छलाह , गजलक सभ नियम पालन करैत छलाह, हिंदी गजलकार मानसिक रूपें सचेष्ट छलाह तकर बादो हिंदी गजलकेँ दुष्यंत सन मिजाज पेबामे 90 बर्ख लागि गेलै। एकर विपरीत मैथिलीक शुरूआती गजल बहरयुक्त रहल मुदा बादक अज्ञानी पीढ़ी प्रचारित केलक जे मैथिलीमे गजल भइए ने सकैए, गजलमे बहर होइते नै छै, बहुत बादक पीढ़ी सभ तँ ईहो कहए लागल जे दुष्यंत कुमार बहर तोड़ि देलाह, तँ अदम गोंडवी बहर फोड़ि देलाह आदि। आ एहि चक्करमे लगभग 1950क बाद मैथिलीमे बिना बहरक गजल चलल जे 2008 मे विजयनाथ झाजीक गीत-कविता-गजल संग्रह 'अहींक लेल' संग बंद भेल संगे-संग 2008हि मे गजल लेल समर्पित शोध पत्रिका 'अनचिन्हार आखर' केर स्थापना भेल। आ तकर बाद लगातार मैथिलीमे बहरयुक्त गजल लिखा रहल अछि। एहिठाम ई कहब अनुचित नै जे पछिला पीढ़ीक बिना बहर बला सभ बहुत प्रयास केला जे युवा बहरयुक्त गजल नै लीखए आ ताहि लेल ओ पुरस्कार, लिस्टमे नाम देब, एक पन्नाक समीक्षा लीखि देब प्रलोभन देबाक सन काज सेहो केलाह आ किछु अंशमे सफल सेहो भेलाह मुदा जेना-जेना मैथिलीक युवा लग उर्दू-हिंदी गजलक तक्ती होइत गेलै तेना-तेना ओ सभ मानए लगलाह जे बिना बहरक गजल नै होइत छै आ ओ सभ अपन गजलमे बहर लेबाक लेल आवश्यक मेहनति करए लगलाह। चूँकि शुरूआती गजलक बाद लगभग 50 साल मैथिलीमे बिना बहर बला गजल रहलै तँइ हम 2008केँ मानक बर्ख मानि रहल छी आ एकरे आधार मानि रहल छी। आबि मानि लिअ मैथिलीक गजलकार हिंदिए गजलकार सन बहुपठित, नियमक पालन करए बला. प्रयोगी हेताह तइयो लगभग बर्ख 2090 सँ लऽ कऽ बर्ख 2100 धरिक बीचमे मैथिलीमे दुष्यंत कुमार सनक गजलकार हेबाक संभावना अछि वा कही जे ओहने मिजाजक गजल लिखल जेबाक संभावना अछि। एहिठाम गंगेशजी आपत्ति कऽ सकै छथि जे हम दुष्यंत नै दुष्यंतक गजलक मिजाज कहने छी। मुदा पहिने दुष्यंत तखन ने हुनकर मिजाज। बहुत गोटे प्रश्न उठा सकै छथि जे एतेक समय किए लगतै। मुदा हमरा जनैत ओ सभ कोनो विधाक विकाससँ अपरिचित छथि। विधाक विकास एक-दू सालक खेल नै छै। हम ईहो मानै छी जे वर्तमान समयक सभ मैथिली बहरयुक्त गजलकार प्रतिभाशाली छथि मुदा भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, निराला आदिक दसो प्रतिशत नै छथि। जखन भारतेंदु, जयशंकर प्रसाद, निराला सभकेँ रहैत 90 बर्ख लगलै तँ इम्हर बलाकेँ कतेक लगतै। बहुत संभव जे किछु लोक हमर आकलनकेँ गलत मानथि। हुनका बुझाइत हेतनि जे मैथिलीक गजलकार सभ बहुत प्रतिभाशाली छथि मुदा हमरा मोनमे एहन कोनो खुशफहमी नै अछि। ई 90-100 बर्खक गैप सदिखन रहत। मानू जे जँ एखनो जँ बहरयुक्त गजल बंद भऽ जाए आ फेर बीस बर्ख बाद फेरसँ बहरयुक्त गजल चालू हुअए तँ ओहि समयमे ई 90-100 बर्ख जोड़ल जेतै। तँ जेहन भाव हो काँच-पाकल से सभ बहरमे लीखी आ प्रतीक्षा करी निश्चित तौरपर मैथिलीमे सेहो दुष्यंतक गजलक मिजाज सन गजल लिखेतै। 2030 धरिक कोनो बहरयुक्त गजलकारमे दुष्यंतक मिजाज धारण करबाक क्षमता आएत से बहुत संभव। एखनुक कोनो-कोनो बहरयक्त गजलकार सेहो दुष्यंतक मिजाजमे आबि जाइत छथि मुदा ओ स्थायी नै भऽ पबै छै, भइयो नै सकैए कारण ओहि मिजाज लेल जे भूमि चाही से एखन दूर अछि। खुशीक बात अतबे जे बेसी दूर नै अछि। जँ ई मिजाज स्थायी भऽ जाए तँ बहुत संभव जे एखुनके कोनो बहरयुक्त गजलकार दुष्यंतक मिजाज गजलमे आनि लेताह। जँ हिंदी गजलमे दुष्यंतक गजलक मिजाज केर पृष्ठभूमि ताकल जाए तँ ओ निरालाक गजल हेतै। दुष्यंत कुमार शेर यथा-- सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा आ एहने सन बहुत रास शेर केर पृष्ठभूमि निरालाक ओ शेर अछि जे हम उपर देलहुँ। जँ मैथिलीमे देखल जाए तँ निरालाक समानांतर कविवर सीताराम झाजीक ई शेर अछि-- हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़ तीतल मतलाक बहर अछि 2212+ 122+2212+ 122 मुदा अफसोच जे एहि पृष्ठभूमिक समुचित उपयोग मैथिलीक कथित गजलकार सभ नै कऽ सकलाह। भावक कोन कमी छै एहि शेरमे आ सेहो बहर सहित। जखन हिंदीक शीर्ष रचनाकार सभ बहरक पालन कऽ सकैत छलाह तखन ई मैथिली बला सभ कोन देवताक अवतार छलाह? आ तँइ सीतारामजीक भाव केर आधारपर मैथिलीमे एखन धरि दुष्यंतक गजलक मिजाज नै आबि सकल अछि आ ताहि लेल ओ कथित गजलकार सभ दोषी छथि जे कहलाह मैथिलीमे गजल भइए ने सकैए, गजलमे बहर होइते नै छै, दुष्यंत कुमार बहर तोड़ि देलाह, तँ अदम गोंडवी बहर फोड़ि देलाह आदि। एहन कहए बला सभ मैथिली गजलकेँ कतेक नोकसान केलाह से आकलन करब बहुत कठिन तँ नै मुदा दुखदायी छै। दुख होइत छै ई देखि जे एकटा नीक विधाकेँ मैथिलीमे कोना भुस्साथरि बैसाएल गेलै। गंगेशजी अपन पोस्टमे आशंका जतेने छथि जे दुष्यंतक गजलक मिजाजक शेर पढ़ि सकब आ कि............ हम जँ ॠषि रहितहुँ तँ हम अपन बाँचल उम्र हुनका नामे कऽ दितियिन ई दिन देखबाक लेल मुदा से संभव नै। हम बस शुभकामने टा दऽ सकैत छियनि जे ओ देखि कऽ जाथि। हलाँकि नव गजलकार सभ ई जरूर सोचथि जे जँ हमर पूर्वज लगातार बहरमे लिखने रहितथि तँ निश्चित तौरपर 90 केर दशकमे मैथिलीयोमे दुष्यंतक मिजाज सन गजल आबि गेल रहितै। भावक कमी मैथिलीमे कहियो नै रहलै आ ने भावकेँ पकड़बाक कलामे। मुदा दोष केकर................. हमरा लेल केकरो दोष निरूपति करबासँ बेसी आसान रहैए अपन हिस्साक काज कऽ लेब से एहू ठाम हम केलहुँ। आब पाठक आ सचेष्ट गजलकार जानथि। परिशिष्ट (एहिमे गुंजनजीक मूल पोस्ट दऽ रहल छी)— Gangesh Gunjan 8 July 2015 · " उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये" (दुष्यंत कुमार) हमर बड़ मनोरथ जे एहि मिज़ाज आ वज़नक शे'र अपन मैथिलीओ मे होइत ! कहि सकितय कोय । आस तँ नव तुरिये मे क' सकैत छी। देखी, से दिन पढ़ि क' जाइ छी कि ... मिथिला-मैथिलीक प्रारंभिक Apps App शब्द application केर छोट रूप छै। कंप्यूटर लेल software ओकर application छै आ एहि application मे Web browsers, e-mail programs, word processors, games आदि अबै छै। ई application सभ inbuilt (पहिनेसँ) रहैत छै जखन कि काज ओ सुविधाक हिसाबसँ अहाँ बाहरी application सेहो डाउनलोड कऽ सकैत छी। विकासक संग-संग मोबाइलकेँ सेहो कंप्यूटर जकाँ बनाएल गेलै। ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ IBM Simon दुनियाँक पहिल स्मार्ट फोन छै जे कि August 1994 मे लांच भेल रहै। स्मार्ट फोन ओ भेल जे बहुउद्येशीय हो मने फोन अलावे आर बहुत रास काज (वर्तमानमे ठीक कंप्यूटरे जकाँ)। एकर बाद क्रममे Nokia 9000 Communicator (१९९६) एलै आ 1999 मे Qualcomm नामक कम्पनी pdQ Smartphone" नामसँ निकालक जे कि CDMA आ Palm OS (Palm आपरेटिंग सिस्टम)सँ चलै छल ई टचस्क्रीन बला फोन छल आ वस्तुतः आजुक टचस्क्रीनक माए-बाप। १९९९ मे जपानक NTT DoCoMo नाम कम्पनी i-mode नामक मोबाइल इंटरनेट लांच केलक जे कि ओहि समयमे सभसँ बेसी स्फडसँ चलैत छल। एकर बाद २००० मे Ericsson R380, फरवरी २००१ मे Kyocera 6035, जून २००१ मे Nokia 9210 Communicator, २००२ मे Treo 180 नाम स्मार्ट फोन सभ एलै। पहिल बेसी केपिसटी बला टचस्क्रीन फोन LG Prada छल जे कि दिसम्बर २००६ मे आएल। जनवरी २००७ मे एप्पल पहिल iPhone अनलक। जेना कंप्यूटर लेल कोनो ने कोनो आपरेटिंग सिस्टम (अधिकत विंडोज) तेनाहिते स्मार्टफोन लेल सेहो आपरेटिंग सिस्टम चाही। embedded systems, PenPoint OS, Magic Cap OS आदि बहुत OS समेत वर्तमान समय अधिकांशतः दू OS पर सिमटल अछि पहिल iPhone OS (6, March 2008) आ दोसर Android । एप्पल द्वारा पहिल iPhone OS 6, March 2008 मे लांच भेलै जखन कि Android सेहो सितम्बर २००८ मे लांच भेल, Android गूगल द्वारा संचालित अछि । एहि दू केर अतिरिक्त विंडोज मोबाइल आपरेटिंग सिस्टम सेहो नीक अछि जे कि माइक्रोसाफ्ट द्वारा संचालित अछि। भारतक पहिल Android स्मार्ट फोन HTC Magic छल जे कि July 2009 मे लांच भेल। भरतक पहिल iPhone " iPhone 3G" छल जे कि २००८ मे लांच भेल। आ एहि स्मार्टफोन सभ बहुत रास सुविधा तँ छलैहे संगे-संग ओकरा आर स्मार्ट बनेबाक लेल बाहरी application (App) जोड़ए लागल। आ ई App सभ मोबाइल कम्पनी द्वारा सेहो बनाएल जाइत छै आ आन साफ्टवेयर कम्पनी द्वारा सेहो। नीक App भेलासँ कमाइ सेहो नीक होइत छै आ यूजरकेँ सुविधा भेटैत छैक। प्रायः सभ सेवा देबए बला कम्पनी अपन-अपन App बनबेने छै। App सभ तरहक भेटत। स्मार्टफोनक बढ़त मिथिलामे सेहो भेलै आ सभ अपन-अपन काजक हिसाबसँ किछु मिथिला-मैथिल-मैथिलीसँ संबंधित App सेहो बनेलक। उपल्बध आँकड़ासँ देखल जाए तँ २०१३ मे पहिल App बनल जे कि मिथिला-मैथिल-मैथिलीसँ संबंधित छल। निच्चामे ई लिस्ट देल जा रहल अछि-- 1) Songs for Mithila (apkdotin, apkdotin@gmail.com) Released Date-18 Feb 2013 2) Maithili Talking Dictionary (Khandbahale.com, support@ Khandbahale.com) Released Date- 8 Oct 2013 3) Maithili to English Dictionary ((Khandbahale.com, support@ Khandbahale.com) Released Date- 8 Oct 2013 4) Mithilanchal Fm ( I tech Nepal, account@itechnepal.com) Released Date-24 Nov 2015 ई Mithilanchal Fm द्वारा बनबाएल गेल छै। 5) Maithili Jindabaad (ACApp studio) Released Date- 10 Jan 2016 6) English To Maithili Dictionary (VB Nexcod, vbnexcod@gmail.com) Released Date- 18 May 2016 7) Maithili Patra (JCApp Studio- 1st online Panchang, JCAppStudio.asist@gmail.com) Released Date- 19 August 2016 8) English to Maithili Dictionary (Best 2017 translator App, rudrap775@gmail.com), Released Date- 16 Sep 2016 9) English To Maithili Dictionary (Translate app, dp0591240@gmail.com) Released Date- 19 Oct 2016 10) English to Maithili Dictionary (Live radio Music , manishapandav52@gmail.com) Released Date-20 Oct 2016 11) Maithili Bible (audio) ( LuongOolong, huuluongvip682@gmail.com) Released Date-1 Nov 2016 12) English to Maithili Dictionary (XW infotech, piyushmakwana3666@gmail.com) Released Date- 20 Nov 2016 13) Maithili Dictionary ofline (Daily Apps, dailyapps@yahoo.com) Released Date- 21 Jan 2017 14) Mithilakshar (JC App) Released Date- 15 March 2017 15) Maithili Talk (Bright logical) Released Date- 31 March 2017 16) Maithili Music (Bright logical, florajha@gmail.com) Released Date- 31 May 2017 17) Maithili Video (SparkZeal Technologies pvt ltd, jksah05@gmail.com) Released Date- 11 July 2017 18) Maithili Bible (LCI apps, maithilibible@gmail.com), Released Date-25 sep 2017 19) Maithili Songs-Maithili Videos (Developer- Devaguru Bruhaspati App) Released Date- 10 Dec-2017 20) Maithili Shadi Vivah (Noblers career Map classes pvt ltd, amitjha07@gmail.com) Released Date-26 Dec 2017 21) Maithili video songs: Maithili video Gane (full entertainment video, fenil.sharmaa002@gmail.com) Released Date- 7 Feb 2018 22) Maithili Vivah- Matrimonial App (SKS infotech , contact@mithilavivah.com) Released Date-3 March 2018 23) Maithili Fakra (Megamaind lab , Megamaindlabworks@gmail.com, Chennai) Released Date-23 March 2018 24) Maithili Song Video: Maithili Bhajan ( Mihir Nayak – mihirnayak@gmail.com), Released Date-16 May 2018 25) English to Maithili Dictionary (Best 2018 Apps, best2018apps@gmail.com) Released Date-20 June 2018 26) Maithili Panchang (Roshan choudhary, roshanchoudhry@hotmail.com) Released Date-9 Sep 2018 27) Maithili Sundar Kand (Roshan choudhary ) Released Date- 23 Sep 2018 28) Mithila Jansamvad (WoZoo Technology, editor@mithilajansamvad.com) Released Date-10 Dec 2018 29) Maithili Video status Songs-2019 (Tradevend, contact@ Tradevend.com) Released Date-12 Dec 2018 30) Maithili Panchang (Roshan choudhary ) Released Date-12 Dec 2018 31) Maithili Video Songs HD (Sajeevsapp, sajeevsaapps@Gmail.com) Released Date-23 Jan 2019 32) Being Maithili (ACApp) Released Date- 6 Feb 2019 33) Maithili Sangam:Family matchmaking & Matrimony (People Interactive, care@sangam.com) Released Date- 30 March 2019 34) Maithili Hospitals (MEngage , engage@mengage.in) Released Date-21 May 2019 35) Maithili status Video (Alisha ,alishaadnan05@gmail.com) Released Date-19 June 2019 36) Maithil matrimony for maithil brides and grooms (communitymatrimony.com) Released Date-24 June 2019 37) Maithili Movies (Rameen, rameenraheel918@gmail.com) Released Date-27 June 2019 38) Maithili Geet (Thegauravmishra,officialgauravmishra@gmail.com) Released Date- 7 Sep 2019 एकर अतिरिक्त बहुत रास नवमे बनल हएत वा हमरा नजरिसँ छुटि गेल हएत ताहि लेल अहाँ सभहक सहयोग चाही आ उम्मेद अछि जे सहयोग भेटत हमरा। यूट्यूब आ मैथिली फरवरी 2005मे यूट्यूब केर स्थापना भेल आ नवम्बर 2006 एकरा गूगल कीनि लेलकै। T- series भारतक पहिल यूट्यूब चैनल अछि जे कि 13 March 2006 मे शुरू भेल https://www.youtube.com/user/tseries/about मुदा एहिपर पहिल भीडियो 23 Dec 2010 मे देल गेलै। मैथिली हिसाबसँ हिसाबसँ देखी तँ  https://www.youtube.com/user/vijay7701 नामसँ 3 Feb 2007 केँ एकटा चैनल शुरू भेलै जाहिमे शारदा सिन्हाजीक गाएल एकै गीतक दूटा भीडियो अछि आ पहिल भीडियो 3 Jun 2007 केँ देल गेलै। ई गीत मैथिलीक अछि मुदा ओकरापर लेभल भोजपुरीक लागएल गेल छै आ तकर एकमात्र कारण जे ई गीत सभ मैथिल ब्राह्मणक विधि-बेबहारमे नै अबैत छै मुदा आन मैथिल जातिमे बजैत छै। तेनाहिते gopal yadav केर नामसँ एकटा चैनल छै https://www.youtube.com/channel/UCIr9OhghzI9iG4mby69KB3w  जाहिपर 12 Feb 2007 केँ दू टा मैथिली आ 13 Feb 2007 केँ एकटा भोजपुरी भीडयो देल गेलै। अंशुमान सिन्हा (शारदा सिन्हाजीक पुत्र) 11 Jan 2008 मे अपन चैनल लेलाह https://www.youtube.com/user/mranshumansinha/about जाहिमे पहिल भीडियो 2010 मे देल गेलै सेहो आन-आन भाषाक, किछु मैथिली गीत तीन-चारि सालक बाद देल गेलै। गजेन्द्र ठाकुर अपन चैनल 10 Apr 2008 मे लेलाह https://www.youtube.com/user/ggajendra71/about जाहिपर 27 Apr 2008 केँ पहिल भीडियो एलै। एकर तुरंते बाद Jun 2008 केँ रजनी पल्लवीजीक चैनल आएल https://www.youtube.com/user/rajnipallavi/about जाहिपर पहिल भीडियो 20 Jul 2008 केँ एलै। आ एहि तीनक बाद मैथिली चैनलक संख्यामे बहुत वृद्धि भेल हम अपनो चैनल 22 Aug 2009 केँ लेलहुँ https://www.youtube.com/user/ashishanchinhar/about मुदा एहिपर भीडयो हम सात बर्ख बाद देलहुँ। धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक चैनल https://www.youtube.com/user/premarshi/about 8 Jun 2010 केँ आएल आ पहिल भीडियो 1 Sep 2010 केँ देल गेल। वर्तमान समयमे भीडियोक माध्यमसँ काज करबाक यूट्यूब केर बहुत पैघ सहारा छै। भीडियो शूट कए कऽ यूट्यूबपर अपलोड करू आ अपन बात सभ धरि पहुँचाबू। ई हरेक तरहँक भीडियो लेल छै। चाहे राजनीतिक हो कि समाजिक कि साहित्यिक कि कैरियरक। जीवनक हरेक क्षेत्रसँ संबंधित भीडियो भेटि जाएत एहिठाम। बेसी लोकप्रिय भेलापर ओहि भीडियोसँ अर्थोपार्जन सेहो होइत छै। 2010 केर बाद जँ हम मैथिली यूट्यूब चैनल केर गिनती करए लागी तखन सभ काज छोड़ए पड़त। मुदा जे नीक ओ प्रमुख अछि ताहिमेसँ किछु प्रमुख नाम एना अछि (उपरक नाम छोड़ि ई लिस्ट अछि कारण उपर ओकर चर्चा भेले अछि)— 1) मिथिलांचल गीत 2) मैथिली टी.भी 3) गंगा मैथिली 4) अपन मैथिली 5) नीलम मैथिली लोक गीत 6) मिथिला मिरर 7) मधुर मिथिला एहि केर अतिरिक्त JHM News केर नामसँ एकटा नीक चैनल आएल अछि जे कि मैथिलीक अतिरिक्त हिंदीमे सेहो मैथिल-मिथिला-मैथिलीसँ संबंधित तथ्य सभ लग पहुँचाबै छथि। JHM News एकटा नीक प्रयास अछि। एकर प्रभाव निकट भविष्यमे देखबामे आएत। एकर अतिरिक्त आरो बहुत रास नीक-नीक चैनल सेहो अछि जकर नाम जोड़ल जा सकैए। एहि बीचमे हम फेसबुकपर जानए चाहलहुँ चैनल सभकेँ बारेमे तँ प्रणव झाजी सूचना देलाह जे ओ २००७मे यूट्यूबपर रजनी पल्लवीजीक चैनलसँ गीत सुनने छलाह बादमे रजनीजी सूचना देलीह जे ओ २००६मे चैनल बनेने छलीह मुदा ओकरा हटा कऽ २००८ मे नव बनेलीह। फेसबुक पोस्टक फोटो देल जा रहल अछि। (एहि लेखमे बहुत रास पुरान चैनल प्रणवजीक सहायतासँ भेटल अछि) मैथिली वेब-पत्रकारिताक इतिहास ई कहब उचित नै जे हम इंटरनेटपर एकदम शुरूसँ छी मुदा अतेक तँ जरूर कहब जे जखन इंटरनेटपर मैथिलीक नींव मजगूत करबाक रहै (मने नीँव पड़ि गेल रहै) ताहि समयसँ हम इंटरनेटपर जरूर मैथिलीसँ जुड़ल छी। निश्चित तौरपर ओहि समयक बहुत बात हमरा बूझल अछि एवं आ ओहि समयमे रहल किछुए लोककेँ ई बूझल हेतनि। तँइ नवम्बर 2012 मे हम 'विदेहक वेब पत्रिकारिता विशेषांक' केर घोषणा केने रहियै आ ओकर जे टापिक बनेने रहियै से देशक कोनो विकसित भाषाक समकक्ष रहै। मुदा ओहि समयमे की एखनो एहि टापिकपर लीखए बला नै छथि। बादमे हम अपने एहि लिस्टमेसँ किछु टापिकपर लिखलहुँ आ तकरे नाम "'मैथिली वेब पत्रिकारिताक इतिहास" राखि देलियै। फेर बादमे मोन भेल जे हम अपने लिखलकेँ विदेहक कोनो अंकमे प्रकाशित कऽ दी आ तकरे 'वेब पत्रिकारिता विशेषांक' बूझल जाए। आ संपादक महोदय एहि लेल तैयार भेलाह। हम अपन फेसबुक पोस्टक फोटो सेहो लगा रहल छी एहि लेखक अंतमे। मुदा एहि ठाम देल आलेखक भाषा ओ हमर पोथीक भाषा दूनू मे किछु अंतर छै। तथ्य ओतबे भेटत मुदा एकरा विशेषांक अनुरूपे बनाएल गेल अछि एहिठाम। एहि पोथी केर किछु आलेख विदेह ओ तीरभुक्ति पत्रिकामे प्रकाशित भेल छल। 'मैथिली वेब पत्रिकारिताक इतिहास” इंटरनेटपर मैथिल आ इंटरनेटपर मैथिली ई दूनू बात अलग रहितो एक दोसरक सहायक अछि। इंटरनेटपर पहिने मैथिल एलाह आ संगे-संग मैथिली सेहो एलीह। लेकिन ई घटना अलग-अलग स्थानपर अलग-अलग मैथिल सभ द्वारा भेलै। ई. 2000 मे http://maithili.org/ साइट सक्रिय छल मुदा एकर भाषा अंग्रजी छल। ई साइट प्रवासी अमेरिकन द्वारा संचालित छल (खास कऽ नेपालक मैथिल बेसी) एहि साइटपर किछु मैथिली गीत ओ दूर्वाक्षत मंत्रक आडियो-भीडियो छल। बादमे ई बंद भेल आ संभवतः एकरे दोसर रूप http://maithili.net/ 2002 मे आएल (ओना दूनू साइट केर संचालक अलग सेहो भऽ सकै छथि)। अही क्रममे हम http://maithils.home.att.net/ केँ राखब जे कि 2003 सँ एखन धरि अछि। मुदा एकर सभहक भाषा अंग्रजी मुख्यतः अछि मैथिली नै। मैथिली सेहो ई. 2000 मे इंटरनेटपर आएल 'भालसरिक गाछ' केर रूपमे। गजेन्द्र ठाकुर जी याहूसिटीजपर बहुत रास मैथिलीक साइट बनेने छलाह मुदा ताहिमेसँ "भालसरिक गाछ" केर लिंक (जे सन 2000 सँ याहूसिटीजपर छल) बाँचल अछि। एकर लिंक http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/ अछि। याहूसिटीज पर ई बंद भेलाक बाद 5 जुलाई 2004केँ एही नामसँ ब्लागरपर सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ब्लाग बनाएल गेल आ जनवरी 2009मे एकरा विदेहक संग जोड़ि देल गेलै आ आब ई http://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर आर्काइभ सहित अछि। एहिठाम मोन राखब जरूरी जे याहूसिटीज बला ब्लाग केर आर्काइभ उपल्ब्ध नै अछि। किछु लोक ई मानै छथि जे हम जहियासँ शुरू केलहुँ तहिये पहिल भेलै तँइ आब हम विस्तारसँ विवेचना करब। अंतरजाल (इंटरनेट) केर परिचय अंतरजाल (इंटरनेट), एक दोसरसँ जुड़ल संगणकक एकटा विशाल विश्व-व्यापी नेटवर्क वा जाल छै। एहिमे बहुतों संगठन, विश्वविद्यालय, आदिक सरकारी आ प्राइभेट (निजी) संगणक जुड़ल छै। अंतरजालसँ जुड़ल संगणक एक दोसरासँ इंटरनेट नियमावली (Internet Protocol)क माध्यमें सूचनाक आदान-प्रदान करैत छैक। इंटरनेटक माध्यमें भेटए बाल सुविधामे वेबसाइट, ई-मेल सुविधा प्रमुख अछि। एकर अतिरिक्त सिनेमा, गीत-संगीत, खेल आदि सेवाक सुविधा सेहो इंटरनेटक माध्यमसँ प्राप्त कएल जाइत छै। इंटरनेटक संक्षिप्त इतिहास इंटरनेटक इतिहास 1969- इंटरनेट अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा UCLA आ स्टैनफोर्ड अनुसंधान संस्थानक कंप्यूटर्स केर नेटवर्किंग कए कऽ इंटरनेटक संरचना कएल गेलै। 1979- ब्रिटिश डाकघर पहिल अंतरराष्ट्रीय कंप्यूटर नेटवर्क बना कऽ नव प्रौद्योगिकी केर उपयोग केनाइ शुरू केलक। 1980- बिल गेट्स केर आईबीएम कम्पनीक कंप्यूटर्सपर एकटा माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम लगेबाक लेल बातचीत पक्का भेल। 1984- एप्पल पहिल बेर फ़ाइल आ फ़ोल्डर, ड्रॉप डाउन मेनू, माउस, ग्राफिक्स आदिक प्रयोगसँ युक्त "आधुनिक सफल कम्प्यूटर" लांच केलक। 1989- टिम बेर्नर ली इंटरनेटपर संचार माध्यमकेँ सरल बनेबाक लेल ब्राउज़र, पन्ना आ लिंक केर उपयोग कए कऽ वर्ल्ड वाइड वेब बनेलक। 1996- गूगल स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालयमे एकटा अनुसंधान परियोजना शुरू केलक जे कि दू साल बादसँ काज करए लागल। 2009- डॉ स्टीफन वोल्फरैम "वोल्फरैम अल्फा" लांच केलाह। भारतमे इंटरनेट 80क दशकमे एलै (1986), जखन एर्नेट (Educational & Research Network)केँ सरकार, इलेक्ट्रानिक्स विभाग आ संयुक्त राष्ट्र उन्नति कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रोत्साहन भेटलै। सामान्य उपयोग लेल 15 अगस्त 1995सँ इंटरनेट शुरू भेलै जखन कि विदेश सचांर निगम लिमिटेड (VSNL) द्वारा गेटवे सर्विस शुरू भेलै। वर्तमान भारतमे आब अधिकांश काज जेना बैंकिंग, ट्रेन इंफॉर्मेशन-रिजर्वेशन आदि इंटरनेट द्वारा भऽ रहल छै। इंटरनेट आ मात्र शहरी नै गामोक लोक प्रयोग कऽ रहल छथि जे भविष्यक लेल नीक अछि। इंटरनेटक प्रयोग करबामे एखन भारत विश्वक चारिम आ एशियाक तेसर देश अछि। भारतक 10 सँ 30 सालक उम्र वर्ग बला युवा बेसी इंटरनेट उपयोग कऽ रहल छथि। इंटरनेटक प्रयोगमे आश्चर्यजनक रूपसँ बढ़त देखल गेल अछि। बर्ख 2000सँ 2009 केर मध्य पूरा दुनियाँमे इंटरनेट प्रयोग करए बला लोकक संख्या 394 मिलियनसँ बढ़ि कऽ 1.858 बिलियन भऽ गेल। बर्ख 2010मे दुनियाँक कुल जनसंख्याक 22 फीसदी लोक लग इंटरनेट पहुँचि गेल रहै आ एहि समय धरि 1 बिलियन गूगल सर्च रोज होइत छलै,300 मिलियन प्रयोगकर्ता ब्लाग पढ़ए लागल, आ 2 बिलियन भीडियो रोज यूट्यूबपर देखल जाए लागल। बर्ख 2014मे पूरा दुनियाँमे इंटरनेट प्रयोग करए बलाक संख्या 3 बिलियन (43.6 प्रतिशत) पहुँचि गेल छल मुदा एहिमेसँ लगभग दू-तिहाई हिस्सा धनी ओ विकसित देशक छल। इंटरनेटक बहुत रास फायदा छै ताहिमेसँ किछु प्रमुख फायदा एना अछि-- 1) इंटरनेटक सहायतासँ हम सभ कोनो प्रकारक जानकारी प्राप्त कऽ सकै छी 2) इंटरनेटसँ बिना कोनो लेन देनकेँ चिट्ठी पठा सकै छी (मेल) 3) इंटरनेटक सहयातसँ विभिन्न प्रकारक मनोरंजन जेना फिल्म, संगीत, खेल आदि कऽ सकै छी 4) इंटरनेटक सहायतासँ आब टिकट बुकिंग, बैंकक काज, शिक्षा, दोकानदारी, नौकरी आदि केर सेहो सुविधा लऽ सकै छी 5) आजुक राजनीति सेहो इंटरनेटसँ प्रभावित अछि। मिश्रमे इंटरनेटक सहायतासँ क्रांति सेहो भऽ गेल छै। सोशल नेटवर्किंग केर सहायतासँ समाजक भिन्न भिन्न लोकसँ जुड़ि सकै छी, समाजसेवा कऽ सकै छी। उपरक लाभक अतिरिक्त इंटरनेटक हानियो बहुत छै ताहिमेसँ किछु प्रमुख हानि एना अछि— 1) इंटरनेटक आदति लागि गेलाक बाद एहिसँ समयक नोकसान सेहो होमए लगैत छै। एकर लक्षण इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर केर रूपमे अबैत छै। इंटरनेटक बिना उदास अनुभव करब, पाँचसँ पंद्रह घंटा धरि आनलाइन रहब, घरसँ कम निकलब, कंप्यूटरक समाने वा मोबाइल लऽ कऽ भोजन करब। वास्तविक समाजिक जीवनसँ कटि जाएब, दिन भरिमे सैकड़ो बेर अपन ई-मेल चेक करब आदि इंटरनेट एडिक्शन डिसआर्डर केर लक्षण अछि। वस्तुतः ई आने नशा जकाँ सेहो नशा अछि। 2) जँ अहाँ आनलाइन काज बेसी करैत छी तँ अहाँक गोपनीय सूचना हैक होबाक बेसी संभावना अछि जाहिसँ अहाँकेँ बड़का नोकसान भऽ सकैए जेना कोनो गलत आदमी द्वारा बैंकसँ पाइ निकालि लेब वा दोकानदारी कऽ लेब आदि। एहि तरहँक धोखाधड़ीसँ बचबाक लेल कुछ काज बरोबरि करैत रहू जेना कि- अपन पिन नम्बर आ पासवर्ड किनको नै कहू। पासवर्ड बरोबरि बदलैत रहू। पासवर्ड वा पिन नम्बर कोनो स्थितिमे फोनमे वा ई-मेलमे सेभ कए कऽ नै राखू। स्पैम बला ई-मेलकेँ बिना जबाबा देने खत्म कए दियौ। सार्वजनिक स्थान बला वाइ-फाइ केर उपयोग नहिए करी तँ नीक। 3) पोर्नोग्राफी ई इंटरनेटक सभसँ बड़का खतरा छै आ बच्चा लेल विशेष रूपें। मात्र बच्चे नै युवा आ विवाहित सेहो एहि जालमे फँसल छथि। पोर्नोग्राफमे दवाइ आ तकनीकक सहायतासँ असंभव सन यौन क्रिया देखाएल जाइ छै जकरा युवा आ विवाहित सेहो प्रयोग करए लागै छथि जाहिमे असफल हेबाक कारणे यौन असंतुष्टि, पारिवारिक विघटन आदि घटना घटै छै। 4) सोशल साइटपर बेसी सक्रिय भेलासँ वास्तविक समाजिकता खत्म भेल जा रहल छै। खास कऽ फेसबुक नामक सोशल साइट मानव जातिक धैर्यकेँ समाप्त कऽ रहल छै जाहिसँ असमाजिकतामे अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी भेलैक अछि। फेसबुकक "लाइक" बटन आब आदमीक जीवनक बटखारा बनि चुकल अछि। ई लाइक आब "संपति" जकाँ गिनती होइत अछि। जँ अहाँक पोस्टपर लाइक बेसी अछि तँ अहाँ सेलिब्रेटी भेलहुँ आ जँ लाइक कम अछि तँ साधारण लोक। हमरा मोन पड़ैए 2012- 2013 केर समय जखन हम इंटरनेटपर गजल सिखबैत छलियै। ओहि समयमे एकटा नीक गजल लिखनाहरकेँ जखन हम बहरक गलती दिस धेआन दिआबैत छलिअनि ओ हमरा चट कहैत छलाह जे फेसबुकपर हमर गजलपर एतेक लाइक-कमेंट अबैए जँइ लोककेँ पसीन पड़ै छै तँइ ने। हुनकर बातपर हम चुप भऽ जाइत छलहुँ। फेर एहनो समय एलै जे 2016-2017 मे हमरेसँ सीखि एकटा आरो गजलकार गजल प्रस्तुत करए लगलाह आ नव गजलकारक गजलपर हुनकर गजलसँ दुगुन्ना तिगुन्ना लाइक आबए लागल। आ तकर बादसँ ओ पहिल गजलकार महोदय सदमामे छथि। हुनकर गजल लिखनाइ आब कम भऽ चुकल अछि। ई कोनो एहन खास बात नै भेलै खास बात तँ ओ छै जे "लाइक" बटन केर अविष्कारक Justin Rosenstein किछु दिन पहिने फेसबुक आ अपना द्वारा बनाएल लाइक बटनकेँ समाज लेल घातक मानलथि आ अपनाकेँ एहिसँ दूर कऽ लेलथि। ई पूरा समाद विश्व भरिमे पसरल आ अहाँ सभ एकरा एहि ठाम देखि सकै छी http://www.independent.co.uk/life-style/gadgets-and-tech/facebook-like-inventor-deletes-app-iphone-justin-rosenstein-addiction-fears-a7986566.html 5) इंटरनेट विचार शून्यताकेँ बढ़वा दै छै। साधारण आदमीकेँ इंटरनेटक बड़का मंच देलकै मुदा आब एहि मंचक उपयोग राजनीतिक पार्टी सभ द्वारा खूब भऽ रहल अछि जाहिसँ एहि मंचपर फेक न्यूज, फेक इतिहास, गारि आदिक प्रयोग भऽ रहल अछि आ जनता एहि घटनामे मात्र उपकरण बनि केखनो एहि पार्टीक पक्षमे केखनो ओहि पार्टीक पक्षमे भऽ अपनेमे गारि-मारि कऽ रहल अछि। फेक न्यूज परसबाक लेल आ ओहिपर गारि पढ़बाक लेल अधिकांश राजनीतिक दल द्वारा काल सेंटरसँ पेड सर्भिस लेल जाइत छै आ ई काल सेंटर किछु सही लोकककेँ नौकरी दऽ लाखों फर्जी आ.इ.डी बनबाक कऽ ई काज पसारै छै। फेक न्यूज दंगे टामे नै बिमारी वा आन कोनो घटनासँ सेहो संबंधित रहैत अछि। 6) इंटरनेटसँ दंगा पसरबाक काज सेहो होइत छै। हालमे भरतक यू.पीमे दंगा पसारबाक काजमे इंटरनेटक फेक न्यूजक बड़का योगदान छै। आरो दंगा सभमे एकर भूमिका छै। दंगाक अतिरिक्त साइबर आतंकवाद सेहो होइत छै। साइबर आतंकवादक मतलब भेलै जे कोनो भायरसक माध्यमसँ कोनो देश, राज्य, कोनो कंपनी, कोनो व्यक्ति केर सूचना चोरी कऽ लेब। साइबर आतंकक सबसँ बड़का दिक्कत छै जे एहिमे के आतंकवादी छै मने के भायरस या बग बना कऽ पठा रहल छै तकर पता नै लागै छै। साइबर आतंकवादक संगठित रूप सूचना युद्धमे बदलि जाइ छै आ कोनो एक देश अपन दुश्मन देशपर साइबर हमला करै छै। मोन राखू बम-गोली आदि बलासँ अलग ई साबर आतंकवादी होइ छै आ सभसँ बेसी खतरनाक होइ छै। 7) इंटरनेट ज्ञानीक संग-संग अज्ञानी सेहो बना दै छै। इंटरनेटपर सभ सूचना भेटि जेबाक कारणे लोक आब मोन राखबाक झंझटि नै राखैए। सरल गुणा-भाग धरि सेहो आब मुँहजबानी नै होइ छै। तँइ आजुक युवाक समान्य ज्ञान सेहो कम भेल जा रहल छनि। एकरा दोसर तरहें एना देखू जे इंटरनेटपर सभ सूचना जमा भऽ जाइत छै चाहे अहाँ ई साबित करियौ जे धरती गोल छै वा कियो साबित करै जे धरती वर्गाकार छै। सर्च करए बला जखन सर्च करै छै तखन संबंधित विषय केर दूनू पक्ष सर्च रिजल्टमे आबि जाइत छै। आब सूचना ताकए बला फेरमे पड़ि जाइत छै जे सही कोन छै। आ एहन स्थितिमे अधिकत्तर ओ गलत पक्ष बलाकेँ सही मानि लै छै आ ओकर प्रचार करए लागै छै। एखनुक समाजमे पसरल बेसी अज्ञनता इंटरनेटे बला छै आ से साहित्य, विज्ञान, इतिहास समेत सभ विषयमे छै। इंटरनेटक हानि कम करबाक लेल किछु सुधार प्रस्ताव--- 1) इंटरनेट आ ओहिपर पसरल सामग्रीकेँ नियंत्रित करबाक लेल जिला, राज्य आ केंद्रीय स्तरपर निगरानी टीम बनाएल जाए। पोर्नोग्राफिक सामग्री लेल विशेष टीम गठित कएल जाए। 2) साइबर कानूनकेँ सरल आ फास्ट बनाएल जाए। 3) इंटरनेटपर एकांउट आदि बनएल लेल कानूनी प्रकिया हेबाक चाही मने ओकरा स्कूलक परिचयपत्र, कार्यस्थलक परिचयपत्र वा भोटर आ.डी कार्ड, पैन कार्ड आदिसँ जोड़ि देबाक चाही। 4) एहि सभहँक अतिरिक्त अभिवाभक सेहो अपना स्तरपर रोकथाम कऽ सकै छथि जेना कि बच्चा सभ लेल इंटरनेटक समय नियत कऽ देब, इंटरनेटक खराप पक्षकेँ बच्चाक सामनेमे खुलि कऽ कहब आदि। मैथिलीमे इंटरनेट मैथिलीमे इंटरनेटसँ हमर मतलब अछि जे इंटरनेट मैथिली भाषामे कहिया आ कोना आएल। इंटरनेटसँ मिथिला-मैथिली-मैथिलकेँ कोना प्रभावित केलक आदि-आदि। ओइसँ पहिने एक बेर “मैथिली वेब पत्रिकारिताक प्रारंभिक स्वरूप”केँ हम संक्षिप्त रूपें एहि ठाम राखि रहल छी। आन तथ्य देबासँ पहिने हम याहूसिटीज / ब्लागरसँ संबंधित किछु घोषणा देखा रहल छी जे कि याहूसिटीज / ब्लागर केर आफिसियल पेजसँ लेल गेल अछि आ एकरा कियो गलथोथी वा कुतर्कसँ गलत साबित नै कऽ सकै छथि। तँ देखू निच्चाक तथ्य- 1) 1999मे याहूसिटीज (Yahoo! GeoCities) चालू भेलै आ 2001मे प्रोफिट नै हेबाक कारणे एकरा लगभग बंद कऽ देल गेलै (फ्री एकांउट बला सभकेँ स्टेप बाइ स्टेप बंद कएल गेलै) मैथिलीक पहिल इंटरनेटीय उपस्थिति जे कि भालसरिक गाछ नामसँ सन 2000 सँ याहूसिटीजपर छल तकरो एकांउट बंद भऽ गेलै (जँ कियो चाहता तँ एकर रेकार्ड याहूसँ मँगबा सकै छथि, ओना एकर चांस कम कारण आर्काइभ खत्म भऽ गेल छै)। एकर बादमे 2009सँ याहूसिटीज अमेरिका समेत सभ देशसँ अपन पेड सर्भिस सेहो हटा लेलक आ आब मात्र जापानमे एखन एकर सर्विस बाँचल छै। ई तँ बहुत पहिनेक बात छै हाल-फिलहाल (2014)मे सभ गोटा आरकुटकेँ बंद होइत देखने हेबै। आरकुटपर जिनकर-जिनकर प्रोफाइल रहए से आब नै भेटि सकैए। हँ जे आर्कइभ बना लेने हेता से फाइल रूपमे अपन डाटा रखने हेता। याहूसिटीज केर विकिपीडिया वा आन संदर्भसँ हमर तथ्यकेँ जाँचल जा सकैए। 2) May 01, 2008सँ ब्लागर फ्यूचर पोस्ट केर सुविधा देलकै जकरा एहि लिंकपर देखि सकै छी https://blogger.googleblog.com/2008/05/blogger-now-schedules-future-dated.html एहि सुविधासँ लोक पोस्टकेँ ड्राफ्टमे भविष्यक तारीख संग राखि दै छथिन आ ओ पोस्ट नियत तारीखमे अपने-आप पोस्ट भऽ जाइत छै। एहि फीचरमे जे कैलेंडर देल गेल छै तकरे सहायतासँ आजुक पोस्टकेँ दू साल पाछूक तारीखमे लऽ जा सकै छी तेनाहिते दू साल पहिनुक पोस्टकेँ आजुक तारीखमे आनि सकै छी मुदा ई मात्र पोस्टक तारीख वा सालमे हेड़ा-फेरी कऽ सकै छी कोनो पोस्टक URL केर तारीख,महीना वा सालमे नै। URL बला तारीख,महीना वा साल वएह रहतै जहिया पोस्ट प्रकाशित भेल रहै। 3) December 10, 2008सँ ब्लागर दूटा ब्लाग केर मर्जिंग मने जोड़ि देबाक सुविधा देलकै एकरा एहि लिंकपर देखि सकै छी https://blogger.googleblog.com/2008/12/your-blog-your-data.html एहि सुविधासँ लोक अपन अलग-अलग ब्लागकेँ एकठाम जोड़ि सकै छलाह। 4) February 03, 2010सँ ब्लागर पेज शुरू करबाक सुविधा देलकै एकरा एहि लिंकपर देखि सकै छी https://blogger.googleblog.com/2010/02/create-pages-in-blogger.html एहि सुविधासँ लोक अपन ब्लागक विभिन्न सूचना पाठक लग दै छथि। पेज बनेलापर खाली अक्षर वा अक्षर-अंकक लिंक बनै छै मुदा तारीख,महीना वा सालनै रहै छै। 5) July 17, 2012सँ ब्लागर कस्टम लिंक बनेबाक सुविधा देलकै जकरा एहि लिंकपर देखि सकै छी https://blogger.googleblog.com/2012/07/customize-your-posts-with-permalinks.html कस्टम लिंक मने अहाँ अपना मोनक हिसाबें कोनो पोस्टक URL बना सकै छी मुदा URLमे पोस्टक प्रकाशन दिन बला तारीख,महीना वा साल रहत। पोस्टक ओरिजिनल पोस्ट डेट वा पोस्टक साल नै बदलल जा सकैए जकरा अहाँ सभ एहि लिंकपर देखि सकै छी http://blogger-hints-and-tips.blogspot.in/2009/12/changing-date-for-post.html उपरक तथ्य सभकेँ नीक जकाँ अहाँ सभ मोन राखू आ निच्चा देल गेल मैथिलीक आरंभिक ब्लाग / वेबसाइट सभहँक पहिल पोस्ट आ ओकर तारीख सभकेँ अहाँ अपने जाँचू जाहिसँ ई स्पष्ट हएत जे कोन पत्रिका पहिल अछि आ के दोसर। एहि अंतर्गत हम छह टा ब्लाग / वेबसाइट राखब 1) भालसरिक गाछ (याहू सिटीज आ ब्लागर दूनू बला), 2) पल्लवमिथिला 3) समदिया, 4) अपन मिथिला, 5) प्रकरांतर, 6) कतेक रास बात आगू बढ़बासँ पहिने ई कहि दी जे एहि पाँचो ब्लागमे तीन टा एहन लिंक अछि जकर आर्काइभ उपल्बध नै अछि मुदा चर्चा हम सभ लिंक केर करब चाहे ओकर आर्काइभ हो या नै हो। आर्काइभ नै हेबाक मततलब ई नै छै जे कोनो चीजक अस्तित्वकेँ नकारि देल जाए। भालसरिक गाछ गजेन्द्र ठाकुर जी याहूसिटीजपर बहुत रास मैथिलीक साइट बनेने छलाह मुदा ताहिमेसँ "भालसरिक गाछ" केर लिंक (जे सन 2000 सँ याहूसिटीजपर छल) बाँचल अछि। एकर लिंक http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/ अछि। याहूसिटीज पर ई बंद भेलाक बाद 5 जुलाई 2004केँ एही नामसँ ब्लागरपर सेहो गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ब्लाग बनाएल गेल आ जनवरी 2009मे एकरा विदेहक संग जोड़ि देल गेलै आ आब ई http://www.videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर आर्काइभ सहित अछि। एहिठाम मोन राखब जरूरी जे याहूसिटीज बला ब्लाग केर आर्काइभ उपल्ब्ध नै अछि। पल्लवमिथिला पल्लवमिथिला नामक वेबसाइट जे कि 2059 माघे संक्रान्ति- (2003 जनवरीमे) धीरेन्द्र प्रेमर्षिजी द्वारा बनाएल गेल। एकर लिंक अछि- www.pallavmithila.mainpage.net वर्तमानमे ई वेबसाइट बंद अछि। एहि वेबसाइट केर मूल पेज www.mainpage.net सेहो याहूजियो सिटीज जकाँ बंद भऽ गेलै। संगे-संग एहू वेबसाइट केर आर्काइभ उपल्बध नै अछि। विनय कुमार कसजू केर नेपाली पोथी "सूचना प्रविधिको शक्ति र नेपालमा यसको उपयोग" जे कि सितंबर 2003 मे प्रकाशित भेलै तकर पृष्ठ 155 पर "पल्लवमिथिलाक चर्चा छै। समदिया ईहो ब्लाग गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा 9 अगस्त 2004मे बनाएल गेल छल समादक वास्ते मुदा पहिल पोस्टक बाद लगभग चारि साल ई बंद रहल फेर 2008सँ एकर प्रकाशन शुरू भेल आ फेर-आस्ते-आस्ते 2015 धरि चलैत रहल। एहि ब्लागक पहिल पोस्टक लिंक अछि- http://esamaad.blogspot.in/2004/08/blog-post.html अपन मिथिला मिथिलासँ संबंधित (साहित्य नै) विवरण लेल प्रणव झा "अपन मिथिला" नामसँ 2004 मे साइट बनेने छलाह मुदा बेवसाइट प्रदाता बंद भऽ गेल। एकर लिंक एना अछि 1asphost.com/aapanmithila ई कोन मासमे शुरू भेल तकर विवरण नै अछि कारण एहू बेवसाइटक आर्काइभ नै बाँचल अछि। एकर भाषा अंग्रेजी रहल हएत कारण प्रणवजी सूचित केलथि जे एहिमे देवनागरी लिपिमे किछु नै छल। प्रकरांतर एहि ब्लागक पहिल पोस्ट 12 फरवरी , 2005 केँ अछि जकर लिंक http://prakarantar.blogspot.in/2005/02/blog-post.html अछि। ई ब्लाग किनका द्वारा बनाएल गेल से अज्ञात अछि मुदा कमेंट सभसँ पता चलैए जे कोनो ठाकुरजी छथि (शायद विजय ठाकुर जिनक मैथिली दर्पण, तात्काल आदि ब्लाग सेहो छनि)। जे हो मुदा एकर लिंकसँ एहि ब्लागक तारीख पता चलि रहल अछि। मात्र दू टा पोस्टक बाद ई ब्लाग बंद भऽ गेल मने ओहिपर पोस्ट एनाइ बंद भऽ गेल। एहि ब्लागक अंतिम पोस्ट 19 फरवरी , 2005मे आएल। कतेक रास बात कतेक रास बातक मूल लिंक http://vidyapati.blogspot.com/ अछि (आब एकर पता http://www.vidyapati.org/ अछि मुदा दूनू लिंकसँ खुजैत छै)। एहि ब्लाग 5टा संचालक छथि--आदि यायावर (मूल नाम: पद्मनाभ मिश्र), केशव कर्ण, राजीव रँजन लाल, कुन्दन कुमार मल्लिक आ सुभाष चन्द्र। कतेक रास बात नामक ब्लाग केर सभसँ पहिल पोस्ट जे देखा रहल अछि (देखू चित्र- 1, चित्र सभ निच्चा अछि) ताहिमे झोल-झाल छै। एकर URLमे http://www.vidyapati.org/2013/07/blog-post_28.html देखा रहल छै (देखू चित्र-1 केर उपर घेरामे) मतलब ई पोस्ट 2013 केर जुलाइ मासमे भेल छै। मुदा एकर प्रकाशन केर तारीख July 01,1999 तारीख देखा रहल छै (देखू चित्र-1 केर नीचा घेरामे)। आ एहि पोस्टसँ पहिने आरो कोनो पोस्ट नै छै से न्यूअर पोस्ट देखलासँ पता चलि जाइत छै। एहि पोस्टक बाद जे पोस्ट अछि से सूचनाक रूपमे अछि आ तकर URL http://www.vidyapati.org/2005/08/blog-post.html अछि (देखू चित्र- 2) मने ई पोस्ट 2005 केर अगस्त मासमे भेल अछि (देखू चित्र-2 केर उपर घेरामे) मुदा फेर एहूक प्रकाशन तिथिमे गड़बड़ी कएल गेल अछि आ प्रकाशन तारीखकेँ November 28, 2004 बना देल गेल अछि (देखू चित्र-1 केर नीचा घेरामे)। एहि पोस्टक बाद बला जे पोस्ट अछि तकर URL http://www.vidyapati.org/2005/09/blog-post.html अछि मने ई पोस्ट 2005 केर सितंबर मासमे प्रकाशित भेल आ एकर प्रकाशन तारीख September 02, 2005 अछि मने एखन धरिमे इएह पोस्ट सही अछि (देखू चित्र- 3)। सितंबर 2005 केर बाद जुलाइ 2006मे पोस्ट भेल जकर URL अछि http://www.vidyapati.org/2006/07/blog-post.html आ एकर प्रकाशन तारीख अछि July 12, 2006 एहि आ एकर बाद बला पोस्टक URL आ प्रकाशन तारीख मीलै छै। जे गड़बड़ी छै से पहिलुक दूटा टामे आ से मात्र इतिहासमे गलत तरीकासँ पहिल स्थान बनेबाक लेल। जँ कतेक रास बातक एहि चारि टा पोस्टक तारीखकेँ सजाएल जाए तँ ई निश्चित भऽ जाइ छै जे एहि ब्लागक पहिल पोस्ट 1 अगस्तसँ लए कऽ 31 अगस्त धरिक बीचमे भेल छै (सुविधा लेल अगस्त-2005 नाम हम देलहुँ)। एकटा आर रोचक तथ्य ई जे कतेक रास बात केर परिचय (पेज रूपमे, देखू चित्र-4)मे एहि ब्लागक संचालक लीखै छथि "प्रिय पाठकगण;एहि ब्लोगऽक शुरुआत हम 2004 मे केलहुँ. ताबय धरि हमरा जानकारी मे मैथिली भाषा इन्टरनेट पर नहि छलए"। ई कोन जानकारीक दाबी भेलै। 2003मे प्रिंट पोथीमे पल्लवमिथिला बारेमे लिखाएल छै तखन आर हिनका कोन जानकारी चाही। भऽ सकैए जे संचालक सभ कहथि जे पल्लवमिथिला नेपालक अछि मुदा मैथिली तँ नेपालोमे छै आ ओनाहुतो इंटरनेटक कोन देश हेतै। इंग्लैंडमे चलि रहल मैथिलीक वेबसाइट वा ब्लागकेँ मैथिली भाषाक कहल जेतै या इंग्लैडक भाषाक। भऽ सकैए जे संचालक सभ कहथि जे हम ब्लाग 2004मे बनेलहुँ मुदा ओकर पहिल पोस्ट अगस्त 2005मे भेल मुदा एहन दाबी तँ कियो कऽ सकैए। सभसँ पहिने तँ हमहीं दाबी करब जे हमर ब्लाग "अनचिन्हार आखर" 1999मे बनल मुदा ओकर पहिल पोस्ट 11 अप्रैल 2008केँ भेल। मुदा वास्तविक रूपें हम जानै छियै जे ई तर्क नै मात्र बकथोथी हेतै। कतेक रास बात दिसम्बर 2013 धरि चलैत रहल ओहि केर बाद ओहिपर कोनो सक्रियता नै अछि। एहि ब्लागक संस्थापक कुमार पद्मनाभजीक प्रोफाइलसँ ज्ञात होइए जे ओ इंटरनेटक माहिर छथि आ हुनकर शिक्षा-दीक्षा ओही क्षेत्रमे भेल छनि तँइ ई मानब असंभव जे कुमार पद्मनाभजी एहन काज केने हेता। तखन बँचल हुनक सहयोगीगण। मुदा एकटा संचालक ओ संपादकक तौरपर नैतिक रूपसँ स्वीकार करहे पड़तिन जे हुनकर सहयोगीगण तथ्यकेँ तो़ड़ि मरोड़ि कऽ गलत काज केलथि। गजेन्द्र ठाकुर अपन पोथी "कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक" (संस्करण 2009)मे एकटा आलेख देला जकर शीर्षक छै " भाषा आ प्रौद्यौगिकी (संगगणक, छायाकंन, कुंजीपटल, टंकण तकनीक) अंतर्जालपर मैथिली आ विश्वव्यापी अंतर्जालपर लेखन आ ई प्रकाशन" जे कि बादमे अंतिका पत्रिकाक अंतर्जाल विशेषांकमे "अंतर्जाल आ मैथिली" नामसँ सेहो प्रकाशित भेलै (संयुक्तांक रूपमे अक्टूबर-दिसम्बर 2009, जनवरी-मार्च 2010)। एहि आलेखमे गजेन्द्रजी "भालसरिक गाछ" संबंधमे चर्चा केने छथि जाहि के बाद भ्रम पोसए बला "पहिल" लोक सभहँक भ्रम टूटल आ तकरे फलस्वरूप ओ सभ गलत तथ्य प्रकाशित केलाह जे हम एतेक सालमे शुरू केने रही तँ हम ओतेक सालमे शुरू केने रही। ठाकुरजीक ई आलेख ओहि समयमे पहिल ओहन आलेख रहै जाहिमे अंतर्जालक संबंधमे विस्तारसँ चर्चा रहै एते धरि जे बिना कोनो सर्टिफिकेट लेने अपनासँ कोना वेबसाइट बना सकै छी तकरो विधि ओहि आलेखमे छै। पाठक ई आलेख हुनक पोथी वा अंतिका पत्रिकाक "अंतर्जाल विशेषांक"मे पढ़ि सकै छथि। मैथिलीमे सभ ई मानै छथि जे हम जहियासँ काज शुरू केलहुँ सएह पहिल भेल। इतिहासमे तकनाइ, अध्ययन केनाइ हुनका पसंद नहि छनि (एकटा टटका उदाहरण हमरा भेटल जे एक वेबसाइट जे कि अगस्त 2012सँ चालू भेल हुनक दावा छनि जे हम अपन वेबसाइटपर पहिल बेर साक्षात्कार शृंखला चालू केलहुँ जे कमसँ कम कोनो वेब पत्रिकामे नै छल। आब देखू जे समदिया अक्टूबर 2011सँ "हम पुछैत छी" नामक साक्षात्कार शृंखला चलेलक आ एहिमे कुल सत्तावनसँ बेसी व्यक्तित्वक साक्षात्कार प्रस्तुत कएल गेल अछि। आब कहू पहिनेसँ के चला रहल अछि। एही ठाम अध्ययनक जरूरति पड़ै छै। बिना पढ़ने आ जनने पहिल केर बीमारी पोसने मैथिलीक सेवक सभ बहुत पसरल छथि)। हम पुछैत छी शीर्षक सभ साक्षात्कार एहि लिंकपर पढ़ि सकै छी- http://esamaad.blogspot.in/p/blog-page_22.html एतेक देखेलाक बाद हम "कतेक रास बात" केर संचालक सभसँ पूछए चाहैत छी जे जँ प्रकाशने तारीखकेँ मानक बूझी तखन मैथिली किएक ओ हिंदी आ भारतक पहिल ब्लाग हेबाक दाबी किए नै कऽ रहल छथि। हिंदीक पहिल ब्लाग "9-2-11" अछि जे कि आलोक कुमार जी 21 अप्रैल 2003 के शुरू केने छलाह। कतेक रास बातक तँ प्रकाशन तिथिक हिसाबसँ "9-2-11"सँ चारि साल पुरान अछि तखन "कतेक रास बात" केर संचालक सभ क्लेम करथु भारतक पहिल ब्लाग हेबाक। मुदा "कतेक रास बात" केर संचालक सभ नै कऽ सकताह कारण हुनका बूझल छनि अपन बैमानीक बारेमे। "कतेक रास बात" केर संचालक सभ किछु ओहन नवसिखुआ सभकेँ बड़गला सकै छथि के मात्र एकांउटिंग उद्येश्यक संग कंप्यूटर चलबै छथि मुदा जे कंप्यूटरसँ नीक जकाँ परिचित छथि तिनका ओ कोना बड़गला सकै छथि। हम एहि लेखक माध्यमे "कतेक रास बात" केर संचालक सभकेँ चुनौती दै छियनि जे प्रकाशन तारीखक हिसाबसँ ओ अपन ब्लागकेँ भारतक पहिल ब्लाग घोषित करबाबथि आ से केलासँ ओ मैथिलिओक पहिल ब्लागर बनि जेता। एहि बीच 2018 मे फेसबुकपर हमरा ओ पद्मनाभजी बीच एही बात लऽ कऽ बहस भेल जकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए-- https://www.facebook.com/sanjeev.mithilakinkar/posts/10214777761532420 एहि बहसमे पद्मनाभजीक कहब रहनि जे जहिया हम ब्लाग चालू केने रही तहिया हमरा नै बूझल छल जे आनो कोनो ब्लाग वा साइट छै तँइ हमरे ब्लागकेँ पहिल मानल जाए। ई तर्क कतेक उचित से तँ पाठके कहता मुदा हम एहिठाम परिशिष्ट-1मे ओहि बहसक मुख्य अंश दऽ रहल छी। उपरक तथ्य सभसँ पता चलल हएत जे इंटरनेटपर -- 1) भालसरिक गाछ (याहू सिटीज) 2000सँ अछि जकर लिंक http://www.geocities.com/bhalsarik-gachh/ अछि। 2) पल्लवमिथिला 2003सँ अछि जकर लिंक www.pallavmithila.mainpage.net अछि। 3) समदिया 2004सँ अछि जकर लिंक http://esamaad.blogspot.in/2004/ अछि। 4) अपन मिथिला 2004 सँ अछि जकर लिंक http://1asphost.com/aapanmithila अछि 5) प्रकरांतर 12 फरवरी, 2005 केँ अछि जकर लिंक http://prakarantar.blogspot.in/2005/02/blog-post.html अछि। 6) कतेक रास बात अगस्त-2005सँ अछि जकर लिंक http://www.vidyapati.org/2005/08/blog-post.html अछि। जँ भाषाक हिसाबें "अपन मिथिला"केँ छोड़ियो दी तैयो ई निश्चित रूपेण कहल जा सकैए जे भालसरिक गाछ (याहू सिटीज) बला इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति अछि। तकर बाद पल्लवमिथिलाक स्थान दोसर अछि। समदियाक स्थान तेसर अछि। प्रकरांतर केर स्थान चारिम अछि। आ अंतमे कतेक रास बात केर पाँचम स्थान अछि। बहुत संभव अछि जे इंटरनेटक अथाह दुनियाँ केर किछु तथ्य हमरासँ छुटि गेल हो तँइ जँ अहाँ सभ ओकर सूचना दऽ एहि लेखकेँ परिमार्जन करेबै तँ ई भविष्य आ इतिहास दूनू लेल नीक रहतै। परिशिष्ट-1 चित्र सभ निच्चा अछि- पद्मनाभजीक संग भेल बहसक मुख्य अंश-- संजीव मिथिलाकिङ्कर 1 October 2018 · 🔴 इंटरनेट पर मैथिली... ■ www.videha.co.in ■ maithili-katha.blogspot.com ■ desilbayna.blogspot.com 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Anchinhar कोन सभसँ पहिल साइट अछि Ashish Anchinhar की भेल प्रकाशजी Prakash Jha, जँ तारीखे बदलि लोक अपन साइटकेँ पहिल घोषित कऽ सकै छथि तँ हमहीं किए पाछू रहू। देखियौ मैथिलीक पहिल साइट "अनचिन्हार आखर" जे 1999 सँ शुरू भेल..... Kumar Padmanabh ई त' बहुत नीक गप्प जे 2003 सँ पहिने देवनागरी लिखबाक लेल कोनो टूल बनलो नइँ छल. हिंदीक पहिल ब्लाग 2003क पूर्वार्ध मे आएल छल. नवम्बर 2003 मे हम http://vidyapati.blogspot.com बनेलहुँ. नवम्बर 2003 मे Dhanakar Thakur खड़गपूर आएल छलाह. हुनका लेल दोसर वेबसाइट 2004 मे बनेलहुँ. 2003 सँ 2005 धरि हमर वेबसाइट'क अलावा हमरा कोनो दोसर नइँ देखा पड़ल. भ' सकैत छैक हम ताकि नइँ सकलहुँ. अपने गलती मानैत छी. 2005-2007 धरि एकोटा साहित्यिक वेबसाइट नइँ छल. ओना 10-15 टा आन वेबसाइट सब छल. 2009-2011 धरि बहुत वेबसाइट आएल. ओकर बाद हम अपन हाथ पाएर समेटि लेलहुँ. VIDYAPATI.ORG कतेक रास बात कतेक रास बात Ashish Anchinhar श्रीमान् जी अहाँ ठीके नै ताकि सकलहुँ नै तँ बहुत रास भेटल रहैत लिंक दऽ रहल छी लेख पढ़ि लेब आ तकर बाद हमर तर्क कटबाक प्रयास करब--- https://sites.google.com/.../videha/Home/Videha230.pdf...

लेख केर नाम अछि "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि" उम्मेद अछि पढ़ि कऽ हमर तर्क काटब Kumar Padmanabh 1999 सँ दोसर मैथिलीक वेबसाइट छल, ई त बहुत बढियाँ. मुदा हमर उत्सुकता अछि जे जखन देवनागरीक कोनो टूले नइँ बनल छल तखन देवनागरी मे कोनो पोस्ट होएत छल. ओहि जमाना मे वेबसाइट बनेनाय बहुत कठिन छल. जिनका वेबसाइट बनबए आबैत छलनि लाखोँ मे कमबैत छलाह. गुगल 2003 मे ब्लोगर शुरु केलक. ओहि सँ पहिने नहि छल. Kumar Padmanabh गुगल साइट आ गुगल ब्लाग 2003 सँ पहिने नहि छल. Kumar Padmanabhhttps://en.wikipedia.org/wiki/Blogger_(service) EN.WIKIPEDIA.ORG Blogger (service) - Wikipedia Blogger (service) - Wikipedia Kumar Padmanabh हमरा मानबा मे कोनो आपत्ति नहि जे अहाँक आकि कोनो आन वेबसाइट 2003 सँ पहिने छल. कनि तर्क सँगत जानकारी दैतहुँ त' हमहुँ लोक सबकेँ कहितहुँ. ई त' बहुत नीक गप्प हेतैक जे 1999 सँ मैथिलीक वेबसाइट छल. Ashish Anchinhar श्रीमान् तामसे आन्हर नै होउ। उपर हम लेखक लिंक देने छी से तँ पहिने पढ़ू ने, तकर बाद तर्क करब Ashish Anchinhar Kumar Padmanabh हम पढिए के लिखने छी. मुदा जखन गुगल ब्लाग 2003 मे बनेने अछि आ गुगल . साइट 2008 मे बनेने अछि ओहि सँ पहिने कोना सम्भव अछि. एतबी कहबाक अछि. https://en.wikipedia.org/wiki/Google_Sites EN.WIKIPEDIA.ORG Google Sites - Wikipedia Google Sites - Wikipedia Ashish Anchinhar सिरिमान जी, विदेहक 230म अंकमे जे आलेख हम लिंकमे देने छी से पढ़ू आ तकर बाद अपन तर्क दियौ Kumar Padmanabh 2003-2004 मे हम धनाकर ठाकूर लेल geocities पर बनेने छलहुँ. 1 Ashish Anchinhar बनेने हेबै मुदा ओहिसँ पहिने 2000 कियो आर बना लेने रहै, धीरेन्द्र प्रेमर्षि सेहो 2003 जनवरीमे बनेने रहथि से नेपाली वेब पत्रिकापर लिखाएल पोथीमे सेहो उल्लेख छै, ओ पोथी सेहो 2003 मे प्रकाशित भेलै तखन अहाँक साइट कोना पहिल भेल, पूरा पढ़ू आ तकर बाद तर्क दियौ Kumar Padmanabh वएह त' कहैत छी. भ' सकैत छैक किओ बनौने हेताह. हमर जानकारी मे नइँ होएत. 2003 जनवरी मे तकनीकी रुपेँ सम्भव छलए. यूनिकोड आबि गेल छलए. मुदा 1999 मे तकनीकी रुपेँ सम्भव नहि छल. हँ अग्रेजी मे मैथिलीक बहुत साइट छल. Ashish Anchinhar सरकार लगैए हमर लेख नै पढ़लहुँ आ खाली एहिठामक हमर कमेंट पढ़ि रहल छी। लेख पढ़ू। पूर्ण रूपेन साबित भऽ गेल छै जे अपनेक साइट (कतेक रास बात) मैथिलीक पहिल साइट नै अछि, जँ आगू बात बढ़ेकाक हो तँ ओहि आलेखमे जे हमर आपत्ति अछि तकरा तर्कसँ खारिज करू Kumar Padmanabh अहाँ त' स्क्रीन शाट देने छीयै जे अहाँक ब्लोग 1999 सँ अछि. मुदा गुगल 2003 मे ब्लागर बनेने अछि. गुगल साइट सेहो 2008 मे बनल अछि. कोना मानि ली. हिंदीक पहिल ब्लाग सेहो 2002-2003 मे बनल छल. हमर दिमाग एहि सँ बेसी नहि लागि रहल अछि. मुदा हमरा स्वीकार करबा मे कोनो अशौकर्य नहि अछि. हमरा बड्ड नीक लागत जँ बुझि मे आबए जे 2003 सँ पहिने कोनो वेबसाइट छल. ओना अहाँ पहिल बेर कतेक रास बात केँ 2008 मे डिसकवर केलहुँ. अहाँक टिप्पणी हमर ईमेल मे एखन धरि सुरक्षित अछि. Ashish Anchinhar कतेक बुझाबी अहाँ के..। अहाँ एहि लिंकपर जा कऽ लेख किए ने पढ़ै छी https://sites.google.com/.../videha/Home/Videha230.pdf...

रहलै हमर कमेंटक गप्प तँ भाषा बुझबामे एखन अहाँ अपरिपक्व छी। पहिने देल लिंकपर जा कऽ लेख पढ़ू Kumar Padmanabh जी की करबै, हम ठीके अपरिपक्व छी. नहि बुझि मे आबि रहल अछि. तकनीकी गप्प आओर बेसी नहि बुझि मे आबि रहल अछि. इएह उपसँहार भेल एतेक गप्प आ तर्कक. रहय दियौ. हम पहिने कहि देने छलहुँ जे हमरा स्वीकार करबा मे कोनो आपत्ति नइँ. स्वीकार केलहुँ. Ashish Anchinhar अहाँ लेख पढ़ू तकर बाद तर्क करू आ हमर तर्ककेँ खारिज करू Ashish Anchinhar संजीव सिन्हा संजीव मिथिलाकिङ्कर जी हम अहाँसँ आग्रह करैत छी जे अहाँ एहि लिंकपर जा कऽ लेख पढ़ू आ तकर बाद कुमार साहेबजीकेँ कहियौन https://sites.google.com/.../videha/Home/Videha230.pdf...

कुमार साहेब पता नै लेख पढ़बामे किए संकोच कऽ रहल छथि। Dhanakar Thakur 18.1.2004 Kharagpur W.B. Maithili Padmnabh came at station for making website of AMP Ashish Anchinhar अरे भाइ जे 2000 मे साइट बनलै से पहिल हेतै कि 2004 बला, उपरमे लिंक देल गेल अछि हमर लेखकेँ मात्र तर्कसँ खारिज करू Ashish Anchinhar Dhanakar Thakurhttps://sites.google.com/.../videha/Home/Videha230.pdf... एहि लिंकपर जा कऽ हमर लेख पढ़ू आ ओकर तर्ककेँ काटू Dhanakar Thakur dekhk prayas kayl. sankshep me likak chahee je kee bat. Kono lekh me Introduction aa summary and conclusion hoit chhai- ham kichhu minut me confise bhelanhu. Dhanakar Thakur Padmnabh Maithilipremi chhathi aa mithilavasi b ahut din chalelah . Dhanakar Thakur Maithiliee me hamar 1973 k science artcle(Vishanu: Vish va Nav Jibank nirman) Viruses k oopar BSC(Hons) standard k Ranchi College magzine 1973 m,e chhapal chhal(aab uplabdh nahi) ek prati bhetal achhal se kinko lkag chali gel. Ashish Anchinhar मैथिलीप्रेमी छथि ताहिमे केकरा संदेह छै मुदा तँइ हुनक 2005 मे बनाओल साइट पहिल भऽ जेतै आ 2000 बला नै से कोना मानल जाएत। लेख नीकसँ पढ़बै तँ कोनो दिक्कत नै रहत Dhanakar Thakur Maithileek kaj karait rahu- bi9na sochne je ham pahile. Hamra sab din ee batr uthait achhi_ Mithila rajya sangharsh samiti 8.1.1995 k banaulanhu ham_ aab kiyo claim karit chhathi 1985 me o.. Ashish Anchinhar ई महान उपदेश पद्मनाभ बाबूकेँ दियौन वएह जबरदस्ती आफन तोड़ने छथि Dhanakar Thakur Ham Maithilik kaj me ona 1992 s chee aa CHHOT RAJYA Vikas lel awashyak 20.9.1992 k Ranchee express daily me chhapal achhi. takar baad lagatar chee. Ashish Anchinhar जे क्लेम करै छथि तिनकासँ सबूत माँगू जेना हम पद्मनाभजीसँ माँगि रहल छियनि Dhanakar Thakur Ashish Anchinhar Padmnabh swaym IT expert chhathi. Ashish Anchinhar ई कोन तर्क भेल? मने आइ.टी एक्सपर्ट भेलासँ ई मानि लेल जेतै जे ओ पहिल साइट बनेने छथि। की अहाँ मानै छी जे पद्मनाभजी विश्वक पहिल आ अंतिम आइ.टी एक्सपर्ट छथि उपरक पाँच टा प्रारंभिक ब्लागक अतिरिक्त किछु एहन ब्लागक सेहो अछि जे कि 2006 सँ 2008 क बीचक अछि ताहिमेसँ किछु एना अछि— "हरिमोहन झा के लिखल किछु प्रसिद्ध रचना" एहि नामक ब्लाग राजीव रंजन लाल जी द्वारा जुलाइ 2006 मे बनाएल गेल जाहिपर हरिमोहन झाजीक एकटा कथा देल गेल अछि। एकर लिंक अछि- http://paanch-patra.blogspot.com/ मिथिला मिहिर January 10, 2007 सँ अछि जकर लिंक http://mithila-mihir.blogspot.com/ अछि आ ई अविनाश दास द्वारा संचालित अछि। "गरम छै" एहि नामक ब्लाग इंद्रकांत लालजी द्वारा मार्च 2007 मे बनाएल गेल जाहिपर कुल दस टा पोस्ट अछि। एकर लिंक अछि- http://haasparihaas.blogspot.com/2007/03/ , "मैथिली कविता केर संग्रह" ईहो ब्लाग राजीवे रंजन लाल जी द्वारा मई 2007 मे बनाएल गेल छल जाहिमे कुल तीनटा कविता अछि। एकर लिंक अछि--http://maithilipoetry.blogspot.com/2007/05/ बताह मैथिल नामक ब्लाग September 2007क लगभगसँ अछि। एकर लिंक http://batahmaithil.blogspot.in/ अछि। एकर संचालक पंकज कुमार झा छथि। ई ब्लाग एहि ब्लागपर मिश्रित विषय केर पोस्ट सभ रहैत अछि मने ई ब्लाग कोनो विषयकेँ अनुसरण नै करैत अछि। एहि ब्लागक अंतिम पोस्ट जनवरी दू हजार सोलहमे भेलै। 2009 केर बाद मैथिली वेबपत्रकारितामे रोशन चौधरीजीक आगमन भेल आ ई मैथिली लेल फलदायी भेल। एखन धरि रोशनजी द्वारा मैथिली लेल बहुत रास बेबसाइट बनाओल गेल (साइटक संग ओकर काज सेहो लीखल गेल अछि)। जँ रोशनजी द्वारा कएल गेल काज देखी तँ किछु काज जरूरे महत्वपूर्ण अछि जेना मैथिली लिपि, मैथिली पतरा, mithilahost, मिथिलाफेस आ मिथिला.ओआरजी। एकर सभहँक विवरण आगू सूचीक हिसाबे देल जा रहल अछि। रोशनजीक परिचय हुनकर व्यक्तिगत साइट http://www.roshanchoudhary.in/ पर छनि। मैथिलीक पहिल वेबसंगोष्ठी मैथिलीमे पहिल बेर वेबसंगोष्ठीक रूपमे विदेह द्वारा निर्मलीमे गोष्ठी तीन सालक बीच लगातार करबाएल गेल छल सितम्बर 2008 सँ दिसम्बर 2011 धरिमे जकर समाद एहि लिंकपर देखि सकैत छी http://esamaad.blogspot.in/2012/01/blog-post_08.html ई गोष्ठी मैथिली लेल गूगल ट्रांसलेटर टूलकिट विकीपीडिया मैथिली आदि सभपर छल। एखन बहुत रास लोक कहै छथि जे पहिल वेबसंगोष्ठी दिल्ली कि मुंबइ कि कलकत्तामे भेलै हुनका ई बूझि लेबाक चाही जे पहिल केर घोषणा करबासँ पहिने इतिहास केर जानकारी आवश्यक। बिना जानकारी लेने अपने काजकेँ पहिल मानि लेब अल्पज्ञता थिक। ई भ' सकैए जे बाद बला लोक धूमधामसँ मनौनौ होथि वा हुनक गोष्ठीमे वक्ताक संख्या बहुत बेसी होइन वा हुनकर ओहि गोष्ठीक उद्घाटन प्रधानमंत्री केने होथि मुदा तँइसँ पहिल केर अस्तित्वपर प्रभाव नै पड़तै। हँ ई छूट बाद बला सभ ल' सकै छथि जे ओ अपन गोष्ठीसँ पहिने कोनो विशेषण लगा लेथि जेना "हमर गोष्ठी पहिल एहन गोष्ठी अछि जाहिमे पहिल बेर एक हजार कुर्सी लगाएल गेल छल, हमर गोष्ठी पहिल एहन गोष्ठी अछि जाहिमे पहिल बेर प्रधानमंत्री एलाह, हमर गोष्ठी पहिल एहन गोष्ठी अछि जाहिमे पहिल बेर प्लास्टिक कपमे चाह पिआएल गेलै" आदि आदि। मुदा हुनका बिना अध्य्यन ओ सबूतक ई कहबाक अधिकार नै छनि जे हमर गोष्ठी मैथिलीक पहिल वेबसंगोष्ठी छल। उम्मेद अछि जे प्रारंभिक स्वरूप फड़िछा गेल हएत। तँ आउ आब हम किछु ओहन वेबसाइट, ब्लाग आदिक परिचय करबा रहल छी जे कि अपन-अपन क्षेत्रमे नीक काज केलाह। उपरमे हम जे क्षेत्र देने छी ताही अनुसार हम राखि रहल छी-- भाषा- साहित्य खंड साहित्य खंडमे हम जाहि ब्लाग ओ बेवसाइटकेँ राखि रहल छी ओ अछि-- विदेह, कतेक रास बात, मैथिल आर मिथिला (आब मिथिला दैनिक), अनचिन्हार आखर, ई-मिथिला, बताह मैथिल, मिथिला-विदेह-वज्जि आदि। निच्चा एकर विवरण देल जा रहल अछि--- विदेह (http://www.videha.co.in)-----भालसरिक गाछ- मैथिली जालवृत्तसँ प्रारम्भ इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि, जे कि आब विदेहक नामसँ पाक्षिक रूपमे ई- प्रकाशित होइत अछि। विदेहक रूपमे पहिल अंक 1/1/2008केँ प्रकाशित भेल आ ई हरेक मासक 1 आ 15 तारीखकेँ प्रकाशित होइत अछि। 1/5/2017 धरि विदेहक कुल 225 अंक प्रकाशित भऽ चुकल अछि। भालसरिक गाछक जतेक समाग्री छल से विदेहक प्रारंभिक अंक लेल उपयोग भेल। इंटरनेटक संसारमे विदेहक अलग ओ बेछप स्थान छै। विदेहक किछु काज निच्चा देल जा रहल अछि---- 1) मैथिलीमे एखन अहाँ जाहि विकीपीडियापर लेख सभ पढ़ि रहल छी। तकर श्रेय विदेहेक छै। ओना मैथिली विकीपीडिया केर मंजूरी 2014मे भेटलै मुदा ओहिसँ पहिने एहि लेल जे पेटीशन, जतेक शब्दक अनुवाद आ पृष्ठ जरूरी छलै से विदेहक निर्देशनमे विदेहक उपसंपादक उमेश मंडल द्वारा संपन्न कएल गेल। मैथिली विकीपीडियाक लगभग 70% पृष्ठ Umeshberma (उमेश मंडल) केर नामसँ बनल भेटत। विदेह ई काज 2008सँ लऽ कऽ 2013 धरि केलक तकर बाद ओ मंजूरी लेल आगू बढ़ि सकलै। 2) विदेह बहुत रास साहित्यिक चोरक पर्दाफास केलक। विदेहसँ पहिने सभ कियो साहित्यिक चोरक पक्षमे छलाह या जानि बूझि कऽ अनठा दै छलाह मुदा विदेह एहन-एहन चोर आ ओकर पक्षमे रहए बलाक बहिष्कार केलक। 3) विदेह सम्मान उर्फ समानांतर साहित्य अकादेमी सम्मान केर शुरुआत विदेह केलक। विदेह सम्मान विदेह पत्रिका द्वारा देबए बला वार्षिक सम्मान अछि जकरा समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान सेहो कहल जाइत छै। विदेह सम्मान मात्र साहित्य लेल नै बल्कि हरेक प्रकारक कला जेना नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला लेल सेहो देल जाइत छै 4) विदेह प्रतिभाशाली लेखक सभकेँ आगू अनलक। एहिमे जगदीश प्रसाद मंडल, ललन कुमार कामत, दुर्गानन्द मण्डल, सन्दीप कुमार साफी, कपिलेश्वर राउत, नंद विलास राय, राजदेव मंडल, रामविलास साहु, उमेश पासवान, रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार, बेचन ठाकुर, उमेश मंडल, विन्देश्वर ठाकुर, मुन्नी कामत, जगदानन्द झा मनु, मुन्नाजी, ओम प्रकाश झा, अमित मिश्र, चन्दन कुमार झा आ एहि पाँतिक लेखक समेत आनो आनो नव लेखककेँ मैथिली साहित्यमे स्थापित करबामे प्रत्यक्ष सहयोग केलक। 5) विदेह एकटा "विदेह आर्काइभ" बना कऽ आनलाइन पुस्तकालय केर निर्माण केलक। "विदेह आर्काइभ" विदेह पत्रिका द्वारा संचालित छै जाहिमे मैथिलीक पोथी-पत्रिका, आडियो, भीडियो, मिथिला चित्रकला/ आधुनिक चित्रकला आ चित्र मिथिलाक वनस्पति एवं जीव-जंतु, मिथिलाक जीवन आदिक क्रमशः पी.डी.एफ फाइल आ फोटो सभ देल गेल छै। एहि अर्काइभकेँ चित्र-शब्दकोश कही तँ गलत नै। एहि आर्काइभ केर किछु खंड केर वर्णन निच्चा अछि….. a) मैथिली पोथी डाउनलोड Maithili Books Download लगभग 400 पोथी एवं पत्रिकाक अंकक पी.डी.एफ फाइल एहिठाम राखल गेल अछि जकरा पाठक बिना कोनो कीमतकेँ डाउनलोड कऽ पढ़ि सकै छथि। ई एकटा विशिष्ट आनलाइन पुस्तकालय अछि। एहि पुस्तकालय केर मुख्य आकर्षण पंजी केर मूल पृष्ठ सभहँक स्पष्ट फोटो अछि। Internet Archive 1996 मे अमेरिाकमे तैयार भेलै जे कि फ्रीमे किताब डाउनलोड करबाक सुविधा दै छै। मैथिलीमे 2008 ई सुविधा विदेह द्वारा देल गेलै मने 12 बर्खक बाद। जँ मैथिली हिसाबसँ देखी तँ आन भाषाक अपेक्षा कम्मे समयमे मैथिलीक पाठककेँ विदेह ई सुविधा देलकै एवं आधिकारिक रूपसँ पहिल एहन सेवा देबए बला बनल। b) मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads एहि खंडमे मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत, ममता गाबय गीत (मैथिली फिल्म), मैथिली लोकगीत एवं अन्यान्य आडियो राखल गेल अछि। c) मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos एहि खंडमे मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो, मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो, मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो, श्वेता झा चौधरी, तुनिशा प्रियम, प्रीति ठाकुर, तूलिका, उमेश कुमार महतो आदिम मिथिला चित्रकला, कैलाश कुमार मिश्र - यायावरी फोटो संगे-संग बहुत रास कर्यक्रमक फोटो सभ राखल गेल अछि। 6) "विदेह मिथिला रत्न" केर निर्माण कए कऽ आनलाइन रूपें मिथिला-मैथिली-मैथिलसँ संबंधित लोकक फोटो वृहत रूपें सार्वजनिक केलक। आधुनिक ऐतिहासिक पुरुष आ महापुरुषक चित्र भेटब संभव मुदा पौराणिक आ प्राचीन नायकक असंभव तँइ विदेह मिथिला रत्न नामक पृष्ठक जन्म भेल आ एहिमे ओहन-ओहन नायक काल्पनिक मुदा सत्यक बेसी लगीच बला चित्र सभकेँ देल गेल जकरा आधुनिक कालक आलोचक सभ उपेक्षित छोड़ि देने छलाह। मैथिल आलोचक सिद्ध सरहपादकेँ मैथिलीक आदि कवि तँ मानै छथि मुदा जखन चित्र बनेबाक समय एलै तखन ओ सरहपादक नै बना विद्यापतिक बनेलथि कारण सरहपाद निम्न जातिक छलाह। तेनाहिते मैथिलीक लोककथाक अनेको पात्रक चित्र जानि बूझि कऽ छोड़ि देल गेल छल। विदेह एकरा एकटा चुनौतीक रूपमे देखलक आ सभ उपेक्षित नायकक चित्र बनबेलक। एहि विदेह (पत्रिका) मिथिला रत्न नामक पृष्ठमे सरहपादसँ लऽ कऽ ज्योतिरिश्वर पूर्व विद्यापति धरि, बंठा चमारसँ लऽ कऽ कारिख पजियार, गोनू झासँ लऽ कऽ छेछन महराज धरिक चित्र भेटत। आधुनिक कालक चित्र सभ तँ सहजहिं भेटत। एहि पृष्ठक एकमात्र उपल्बधि अछि जे ओ ओहन नायकक चित्र उपल्बध करबेलक जकरा उपेक्षित छोड़ि देल गेल छल। 7) "विदेह मिथिलाक खोज" नामक सिरीज प्रकाशित कऽ विदेह ऐतिहासिक आ पुरातात्विक चित्र सभकेँ एकट्ठा कऽ सार्वजनिक केलक। एहि पन्नापर विदेह मिथिलाक ऐतिहासिक आ पुरातात्विक चित्र सभ देल गेल अछि 8) विदेह द्वारा मैथिलीक पहिल ब्लाग एग्रीगेटर केर निर्माण कएल गेल जकर नाम "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण" अछि। एहिमे मैथिलीक अधिकांश वेबसाइट, ब्लाग आ इंटरनेटक विभिन्न साइटक पता (URL) भेटत। ब्लाग एग्रीगेटर एहन स्थान थिक जाहिठाम हरेक ब्लाग-साइट केर पता रहै छै मने एकैठाम सभ ब्लाग-साइट उपल्बध भेटत। संगे-संग फीड बर्नरक सहयातासँ हरेक ब्लाग-साइटपर प्रकाशित सामग्री केर सूचना पाठक लग तुरंत पहुँचि जाइत छै। ब्लाग एग्रीगेटर कियो आ कतेको संख्यामे बना सकै छथि मुदा मैथिलीमे एकर पहिल प्रयास विदेह (पत्रिका) द्वारा भेलै। 9) विदेहक हरेक अंककेँ मिथिलाक्षर (तिरहुत्ता)मे प्रकाशन सेहो विदेहक प्रसंशनीय काज अछि। बहुत लोक लिपि लेल कानै छथि मुदा कोनो प्रयास नै करै छथि मुदा विदेह चुप-चाप बिना कोनो कनने-खिजने अधिकांश अंकक प्रकाशन मिथिलाक्षर (तिरहुत्ता)मे केलक। विदेह-सदेह केर अधिकांश अंक सभ सेहो मिथिलाक्षर (तिरहुत्ता)मे प्रकाशित भेल छै। एकर पूरा विवरण "इंटरनेट आ मिथिलाक्षर" बला खंडमे भेटत। 10) विदेहक हरेक अंककेँ ब्रेल लिपिमे प्रकाशन सेहो विदेहक प्रसंशनीय काज अछि। विदेह-सदेह अधिकांश अंक सभ सेहो ब्रेल लिपिमे प्रकाशित भेल छै। श्रुति प्रकाशनक बहुत पोथी सेहो ब्रेल लिपिमे प्रकाशित छै आ एहि पोथी सभकेँ दरभंगा स्थित नेत्रहीन संस्थानक बच्चा सभहँक बीच पढ़बाक लेल सेहो बाँटल गेल छै। 11) विदेह भारत आ नेपालक मानक व्याकरणक मिलान कए कऽ एकटा उभय मानक भाषा बनेलक जाहिसँ कृत्रिम मानक भाषा खत्म भेल आ मैथिली ओहनो लोक धरि पहुँचल जकरा उच्चवर्ग उपेक्षित कऽ देने छलखनि। विदेहक एहि मानक भाषाकेँ "भाषा पाक" द्वारा अभिहित कएल जाइत छैक। 12) मैथिलीमे रचनाकार केंद्रित विशेषांक प्रायः रचनाकारक मृत्युक बाद प्रकाशित करै छथि विभिन्न पत्रिका मुदा विदेह एहि चलनकेँ तोड़ि जीवित रचनाकारक उपर विशेषांक प्रकाशित कएल जाइत छै। विदेहसँ प्रकाशित विशेषांक केर सूची एना अछि-- 1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008 2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008 3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010 4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010 5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर2010 6) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011 7) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012 8) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013 9) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013 10) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015 11) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 189 म अंक 1 नवम्बर 2015 12) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 191 म अंक 1 दिसम्बर 2015 13) दू अंकमे विदेह सम्मान विशेषाक- 200म अक 15 अप्रैल 2016/ 205 म अक 1 जुलाई 2016 14) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017 13) विदेह सदिखन साहित्यिक प्रयोगमे विश्वास राखै छै। एही प्रयोगकक अंतर्गत विदेह लेखकसँ आमंत्रित रचनापर आमंत्रित आलोचकक टिप्पणीक शृंखला प्रकाशित कऽ रहल अछि जकर विवरण एना अछि-- 1.कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी (अंक 209, 1-9-2016) 15) विदेहक विभिन्न अंकक श्रेष्ठ रचना सभकेँ चूनि कऽ एखन धरि दस खंडमे प्रिंट रूप सेहो प्रकाशित कएल गेल अछि जकर विवरण एना अछि-- विदेह:सदेह:1 (विदेह ई-पत्रिकाक बीछल रचनाक संग- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ रचनाक एकटा समानान्तर संकलन) विदेह:सदेह:2 (मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना 2009-10) विदेह:सदेह:3 (मैथिली पद्य 2009-10) विदेह:सदेह:4 (मैथिली कथा 2009-10) विदेह मैथिली विहनि कथा [ विदेह सदेह 5 ] विदेह मैथिली लघुकथा [ विदेह सदेह 6 ] विदेह मैथिली पद्य [ विदेह सदेह 7 ] विदेह मैथिली नाट्य उत्सव [ विदेह सदेह 8 ] विदेह मैथिली शिशु उत्सव [ विदेह सदेह 9 ] विदेह मैथिली प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना [ विदेह सदेह 10 ] मैथिली गजलमे विदेहक (www.videha.co.in) योगदान जखन कोनो विधा विशेष अपन चरमपर पहुँचै छै ताहिसँ पहिने ओकरा पाछाँ कोनो ने कोनो एकटा पत्र-पत्रिकाक सोङर लागल रहै छै। जँ 2008क बाद बला गजलकेँ देखी तँ निश्चित रूपसँ विदेह (पहिल ई पाक्षिक पत्रिका)क खुलल समर्थन देलक आ समय-समयपर गजलसँ सम्बन्धित विशेषांक निकालि गजलकेँ आगू बढ़ेलक। ओना ई कहब कोनो बेजाए नै जे जतेक काज अनचिन्हार आखर द्वारा देखाएल गेल अछि तकर पृष्ठभूमि विदेह छल आ अछि। तँ आउ देखी विदेहक किछु एहन काज जै बिना गजलक उत्थान सम्भव नै छल-- 1) विदेहक 21म अंक (1 नवम्बर 2008) मे राजेन्द्र विमल जीक 2 टा गजल अछि। राम भरोस कापड़ि भ्रमर आ रोशन जनकपुरी जीक 11 टा गजल अछि। संगे-संग धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक 1 टा आलेख मैथिलीमे गजल आ एकर संरचना। अछि संगे-संग ऐ आलेखक संग 1 टा गजल सेहो अछि प्रेमर्षि जीक। विदेहक ऐ अंकमे कतहुँ ई नै फड़िछाएल अछि जे ई गजल विशेषांक थिक मुदा विदेहक ऐसँ पहिनुक अंक सभमे गजलक मादें हम कोनो तेहन विस्तार नै पबै छी तँए हम एही अंककेँ विदेहक गजल विशेषांक मानलहुँ अछि। 2) विदेहक अंक 96 (15 दिसम्बर 2011) मे मुन्नाजी द्वारा गजल पर पहिल परिचर्चा भेल। ऐ परिचर्चाक शीर्षक छल मैथिली गजल: उत्पत्ति आ विकास (स्वरूप आ सम्भावना)। ऐमे भाग लेलथि सियाराम झा सरस, गंगेश गुंजन, प्रेमचंद पंकज, शेफालिका वर्मा, मिहिर झा ओमप्रकाश झा, आशीष अनचिन्हार आ गजेन्द्र ठाकुर भाग लेलथि। ऐकेँ अतिरिक्त राजेन्द्र विमल, मंजर सुलेमान ऐ दूनू गोटाक पूर्वप्रकाशित लेखक भाग, धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक पूर्व प्रकाशित लेख) सेहो अछि। 3) विदेहक अंक 111 (1/8/2012) जे की बाल गजल विशेषांक अछि जाहिमे कुल 16 टा गजलकारक कुल 93 टा बाल गजल आएल। संक्षिप्त विवरण एना अछि-- रूबी झा जीक 13 टा बाल गजल, इरा मल्लिक जीक 2 टा, मुन्ना जीक 3 टा, प्रशांत मैथिल जीक 1 टा, पंकज चौधरी (नवल श्री) जीक 8 टा, जवाहर लाल काश्यप जीक 1 टा, क्रांति कुमार सुदर्शन जीक 1 टा, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक 1 टा, अमित मिश्रा जीक 30टा, ओमप्रकाश जीक 1 टा, शिव कुमार यादव जीक 1 टा, चंदन झा जीक 14 टा, जगदानंद झा मनु जीक 6 टा, राजीव रंजन मिश्रा जीक 4 टा, मिहिर झा जीक 4 टा, गजेन्द्र ठाकुर जीक 1 टा आ ताहि संगे आशीष अनचिन्हारक 2 टा बाल गजल आएल। बाल गजलक आलावे 7 टा बाल गजल पर आलेख आएल। आलेख कारसँ छथि मुन्ना जी, ओमप्रकाश, चंदन झा, जगदानंद झा मनु, अमित मिश्र आ आशीष अनचिन्हार आ मिहिर झा।बाल गजल आ बाल गजल आलेख छोड़ि ऐ अंकमे योगेन्द्र पाठक वियोगी जीक 1 टा लघुकथा, श्री राजक 1 टा आलोचना, मुन्ना जीक 1 टा आलोचना, आशीष अनचिन्हार द्वारा जगदीश प्रसाद मंडल जीक साक्षात्कार, जगदानंद झा मनु आ जवाहर लाल काश्यपक 11 टा विहनि कथा, सुजीत झाक 1 टा रिपोर्ट, जगदीश प्रसाद मंडल जीक 1 टा लघुकथा, मुन्नी कामति जीक 8 टा कविता, जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक 1 टा गीतक अगिला भाग, किशन कारीगरक 1 टा कविता, राजेश झाक 2 टा कविता, पंकज चौधरी नवल श्रीक 1 टा कविता आ संगे संग पुनः जगदीश प्रसाद मंडल जीक 5 टा गीत अछि। 4) विदेहक 15 मार्च 2013 बला 126म अंक भक्ति गजल विशेषांक छै। ऐमे आएल रचना सभहँक विवेचन एना अछि-- अमित मिश्र जीक 6 टा भक्ति गजल अछि। श्रीमती इरा मल्लिक जीक 4 टा भक्ति गजल अछि। जगदानंद झा मनु जीक 5 टा भक्ति गजल अछि। पंकज चौधरी नवल श्री जीक 3 टा भक्ति गजल अछि। जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल, मिहिर झा आ विंदेश्वर ठाकुर जीक 11 टा भक्ति गजल अछि। आशीष अनचिन्हार द्वारा लिखल एक गोट आलेख भक्ति गजल अछि जैमे कविवर सीताराम झा जीक एकटा भक्ति गजल सेहो अछि। 5) 15 नवम्बर 2013केँ विदेहक 142म अंक “गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा” विशेषांक छल। ऐ विशेषांकमे आन विधाक रचना ओ स्थायी स्तंभ छोड़ि गजलक आलोचना एना आएल-- 1) अमित मिश्रा जीक 2 आलेख अछि। 2) आशीष अनचिन्हारक 10 टा आलेख अछि। 3) ओमप्रकाश जीक 6 टा आलेख अछि। 4) गजेन्द्र ठाकुर जीक 4 टा आलेख अछि (संपादकीय सहित) 5) चंदन झा जीक 1 टा आलेख अछि। 6) जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जीक 2 टा आलेख अछि। 7) जगदानंद झा मनु जीक 1 टा आलेख अछि। 8) धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक 1 टा आलेख अछि। 9) मुन्ना जीक 1 टा आलेख अछि। ऐ रचना सभहँक अलावा विदेहक अन्य स्थायी स्तम्भक रचना सभ सेहो अछि। आब किछु गप्प विदेहक फेसबुक वर्सन लेल। मात्र एतबे कहऽ चाहब जे विदेहक फेसबुक वर्सन फैक्ट्री अछि गजलक आ विदेह पत्रिका वेयरहाउस अछि। फैक्ट्रीमे रचना रचल गेलै आ वेयरहाउसमे जा कऽ पाठक लग पहुँचि गेलै। मैथिली गजलक विकासमे विदेहक फेसबुक भर्सन सेहो अतिसहायक भेल अछि। एकर अतिरिक्तो विदेहक बहुत काज छै मुदा एहिठाम संक्षिप्त रूपमे वर्णन कएल गेल अछि। कतेक रास बात (http://www.vidyapati.org)--- एहि ब्लाग केर माध्यमसँ लगभग 200-250 रचना मैथिलीकेँ भेटि चुकल छै। एहि ब्लागपर मुख्यतः आदि यायावर, आदि यायावर (मूल नाम: पद्मनाभ मिश्र), केशव कर्ण (करण समस्तीपुरी) , राजीव रंजन लाल, कुन्दन कुमार मल्लिक, सुभाष चन्द्र, रोशन कुमार झा, अविनाश, अजित कुमार झा, अल्पना, इंद्र कान्त लाल, ज्योति प्रकाश लाल, मीनू राजीव लाल, विजय ठाकुर सहित अनेको नव-पुरान लेखक केर रचना भेटत। एहि ब्लागपर उपन्यास जलकुम्भी (पहिल किस्त आदि यायावर) एकटा नीक प्रयोग अछि। एकर पहिल किस्त लिखलाक बाद आदि यायावरजी आन लेखककेँ आमंत्रित केला आ बादक किस्त सभ विभिन्न नामसँ भेटैत अछि। जँ एहि उपन्यास आन भाग सभ अलग-अलग लोक लिखने हेता तखन ई नीक प्रयोग हएत मुदा जँ ई नाम सभ संपादके बला अछि तखन एकरा मात्र प्रिंट पत्रिका बला मजबूरी मानल जाए (प्रिंट पत्रिकामे रचना नै एलापर संपादके छद्म नामसँ अपन रचना प्रकाशित करए लागै छथि) एहि ब्लागपर मुख्यतः कथा ओ संस्मरण साहित्य केर बेसी सृजन भेल अछि। मैथिल आर मिथिला (http://maithilaurmithila.blogspot.com/, आब मिथिला दैनिक http://www.mithiladainik.in/)-- जनवरी 2008सँ शुरू भेल जकर संचालक जितमोहन झा जीतू छलाह (मिथिला दैनिक लेल वएह संचालक छथि)। एहि ब्लागपर मैथिली भाषाक सभ विधाक पोस्ट देल जाइत छल। वस्तुतः मैथिल आर मिथिला मैथिलीक भाषाक पहिल ब्लाग अछि जे कि अपन स्वरूप लऽ कऽ सर्वलोकप्रिय भेल आ मैथिली ब्लाग केर इतिहासमे लोकप्रियताक एकटा नव बाट मैथिलीकेँ देखेलक। एहि ब्लागक लोकप्रियता एहीसँ अनुमान कएल जा सकैए जे पहिले सालमे एकरा भिजिट करए बलाक संख्या एक लाख टपि गेल। एहि पाँतिकेँ लिखैत काल धरि एकर दोसर स्वरूप (मिथिला दैनिक)पर 38 लाखसँ बेसी भिजिट भेल अछि। मैथिलीक आरंभिक कालक के एहन ब्लागर हेता जे कि मैथिल आर मिथिलापर अपन रचना नै देने हेता, वा भिजिट नै केने हेता। मैथिल आ मिथिला गीतक संगीतक आडियो भिडियो सेहो अपन ब्लागपर पोस्ट केलक (कुल 400सँ बेसी) आ ईहो एकरा लोकप्रिय हेबामे योगदान केलकै।कुल मिला कऽ ई ब्लाग मैथिलीक ब्लागिंग इतिहासमे मीलक पाथर अछि। एकर दोसर स्वरूप (मिथिला दैनिक) समाचार केंद्रित अछि आ तकरो विवरण आगू चलि समाद बला खंडमे हएत। अनचिन्हार आखर (https://anchinharakharkolkata.blogspot.in)----11/4/2008केँ “अनचिन्हार आखर” नामक ब्लाग इंटरनेटपर आएल। अनचिन्हार आखर केर छोटका नाम " अ-आ " राखल गेल अछि। ई ब्लाग आशीष अनचिन्हार द्वारा शुरू कएल गेल छल आ समय-समयपर आन-आन गजलकार सभकेँ जोड़ल गेल। वर्तमानमे ई ब्लाग आशीष अनचिन्हार आ गजेन्द्र ठाकुर द्वारा संपादित भऽ रहल अछि।एहि ब्लागपर खाली गजल, शेरो-शाइरी ओ एहीसँ संबंधित रचना देल जाइत अछि। इंटरनेटक संसारमे मैथिली गजलकेँ स्थापित आ ओहिसँ बाहर लोकप्रिय करबाक श्रेय अनचिन्हारे आखरकेँ छै। इंटरनेटक संसारमे अनचिन्हार आखरक अलग ओ बेछप स्थान छै। अनचिन्हार आखरकक किछु काज निच्चा देल जा रहल अछि---- 1) अ-आ प्रिंट वा इंटरनेटपर पहिल उपस्थिति अछि जे की मात्र आ मात्र मैथिली गजल एवं गजल अधारित विधापर केन्द्रित अछि। 2) अ-आ केर आग्रहपर श्री गजेन्द्र ठाकुर जी गजलशास्त्र लिखला जे की मैथिलीक पहिल गजलशास्त्र भेल। 3) अ-आ द्वारा "गजल कमला-कोसी-बागमती-महानन्दा सम्मान" केर शुरूआत भेल। जे की स्वतन्त्र रूपें गजल विधा लेल पहिल सम्मान अछि। 4) अ-आ केर ई सौभाग्य छै जे ओ मैथिली बाल गजल नामक नव विधाकेँ जन्म देलक आ ओकर पोषण केलक। मैथिली भक्ति गजल सेहो अ-आ केर देन अछि। विदेहक अङ्क 111 पूर्ण रूपेण बाल-गजल विशेषांक अछि आ अङ्क 126 भक्ति गजल विशेषांक। 5) बर्ख 2008 आ 2015 माँझ करीब 30टासँ बेसी गजलकार मैथिली गजलमे एलाह। ई गजलकार सभ पहिनेसँ गजल नै लिखै छलाह। सङ्गे-सङ्ग करीब 5टा समीक्षक-आलोचक सेहो एलाह। 6) पहिल बेर मैथिली गजलक क्षेत्रमे एकै बेर करीब 16-17 टा आलोचना लिखाएल। 7) अ-आ मैथिली गजलकेँ विश्वविद्यालय ओ यू.पी.एस. सी एवं बी.पी.एस. सीमे स्थान दिएबाक अभियान चलौने अछि आ एकटा माडल सिलेबस सेहो बना कऽ प्रस्तुत केने अछि। 8) अ-आ प. जीवन झा जीक मृत्यु केर अंग्रेजी तारीख पता लगा ओकरा गजल दिवस मनेबाक अभियान चलौने अछि। 9) अ-आ 1905सँ लऽ कऽ 2013 धरिक गजल सङ्ग्रहक सूची एकट्ठा ओ प्रकाशित केलक व्याकरणयुक्त एवं व्याकरणहीन दूनू)। 10) अ-आ अधिकांश गजलकारक (व्याकरण युक्त एवं व्याकरणहीन दूनू) संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत केलक। 11) अ-आ 62 खण्डमे गजलक इस्कूल नामक श्रृखंला चलौलक जे की समान्य पाठकसँ लऽ कऽ गजलकार धरि लेल समान रूपसँ उपयोगी अछि। 12) अ-आ मैथिलीमे पहिल बेर आन-लाइन मोशयाराक आरम्भ केलक आ ई बेस लोकप्रिय भेल। 13) मैथिली गजल आ अन्य भारतीय भाषाक गजल बीच संबंध बनेबाक लेल "विश्व गजलकार परिचय शृखंला" शुरू कएल गेल। अनचिन्हार आखरक एही काज सभकेँ देखैत मैथिली गजलक पहिल अरूजी गजेन्द्र ठाकुर 2008क बाद सँ लऽ कऽ वर्तमान कालखंडकेँ "अनचिन्हार युग" केर नाम देलाह। बताह मैथिल बताह मैथिल नामक साइट केर पता http://bataahmaithil.in/ अछि। एहि साइट केर संचालक धनंजय झा छथि। एहि साइटपर कंप्यूटर ओ इंटरनेटक तकनीकी जानकारीक संग हास्य ओ व्यंग्य मूलक पोस्ट सेहो रहैत अछि। मिथिला-विदेह-वज्जि (http://mithilavidehavajjitirhut.blogspot.in)-- डा. शशिधर कुमर द्वारा संचालित ब्लाग अछि। एहि ब्लागक एकमात्र मुदा मैथिली लेल यूनिक विशेषता ई अछि जे एहिठाम मिथिलामे रहए बला सभ जीव-जंतुक उपर कविता बनाए ओकर सचित्र वर्णन अछि। संगे संग आनो मुद्दा ओ विषयपर ई ब्लाग अपन विचार प्रस्तुत करैत अछि। ई-मिथिला (http://www.emithila.in)-- बालमुकुंद पाठक द्वारा संचलित ब्लाग थिक जे कि मैथिलीसँ संबंधित विभिन्न मुद्दाक पोस्टसँ सजल अछि। समान्यतः एहिठाम बालमुकुन्द, विकाश वत्सनाभ आ मुकुन्द मयंक द्वारा पोस्ट देल जाइत अछि। वर्तमान समयमे एहिपर पोस्टक संख्या कम छै मुदा नीक सभ छै। आगू चलि ई आर झमटगर हएत से विश्वास अछि। मैथिली लिपि https://lipi.maithili.org.in/ (वर्तमानमे एहिपर देवनागरी माध्यमे तिरहुत्ता लिपि देल गेल अछि)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। मैथिली सुंदरकांड http://www.sundarkand.maithili.org.in/ (एहिपर चंदा झा विरचित मिथिला भाषा रामायणसँ लेल गेल सुंदरकांड देल गेल अछि, ई साधारणे साइट जकाँ अछि)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। मैथिली फकड़ा http://www.fakra.maithili.org.in/ (एहि साइटपर वर्णानुसार बहुत रास मैथिली फकड़ा देल गेल अछि)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। उपरमे देल गेल ब्लाग-साइटक अतिरिक्त किछु एहनो ब्लाग-साइट अछि जे कि व्यक्तिगत मैथिली रचनासँ भरल अछि आ पाठक लेल आकर्षण बनल अछि जेना धीरेन्द्र प्रेमर्षिजीक http://hellomithila.blogspot.com/, ओमप्रकाशजीक ब्लाग - http://opjha.blogspot.com/, राजीवरंजन मिश्रजीक ब्लाग http://rajeevranjanmishra.blogspot.in/, अमित मिश्रा ब्लाग http://navanshu.blogspot.in/, सुमित मिश्र गुंजन केर ब्लाग http://sumittarang.blogspot.in/, जगदानंद झा मनुजीक ब्लाग http://maithiliputr.blogspot.in/, कुंदन कुमार कर्णजीक ब्लाग http://www.kundanghazal.com/ आदि। अनचिन्हार आखरक अतिरिक्त विदेहक आरो सहयोगी ब्लाग जेना मैथिली बिहनि कथा, मैथिली हाइकू, मैथिली कविता, खेल-कूद आदिक विवरण आगू फेसबुक बला खंडमे भेटत। एहिठाम ई स्पष्ट करी जे ई अंतिम लिस्ट नै अछि। भऽ सकैए जे बहुतो नीक-नीक ब्लाग-साइट हमरा नजरिसँ छूटि गेल हएत। उम्मेद अछि जे अहाँ सभ ओकर नाम सभ हमर मेल ashish.anchinhar@gmail.com पर पठा देब। हम तुरंत ओकर काज समीक्षा करैत एहि ठाम उचित जगहपर ओकर विवरण देबै। समाद खंड समदिया, हेलो मिथिला, इसमाद, नवमिथिला, मैथिली जिंदाबाद, मिथिला मिरर, मिथिला दर्शन, मिथिला प्राइम, मिथिला दैनिक आदि। निच्चा एकर विवरण देल जा रहल अछि-- समदिया (http://esamaad.blogspot.in/)--- ई ब्लाग गजेन्द्र ठाकुर जी द्वारा 9 अगस्त 2004मे बनाएल गेल छल समादक वास्ते मुदा 2008सँ प्रियंका झा ओ पूनम मंडल संपादित कऽ रहल छथि। एहि ब्लागपर अंतिम पोस्ट 2015 केर अछि। एहि ब्लागपपर मिथिला-मैथिलीसँ संबंधित सभ प्रकारक समाद छपै छलै। एकर तीन टा वैचारिक केंद्र छलै "मिथिला आ मैथिलीक विकासपर आलेख", परिचर्चाःविदेह गोष्ठी, आ "हम पुछैत छी"। हम पुछैत छी साक्षात्कार शृखंला अछि। समादक अलावे। समदियाकेँ प्रोत्साहित करबाक लेल ई ब्लाग अगस्त 2011सँ "ऐ मासक सभसँ नीक समदिया सम्मान" शुरू केलक। ई सम्मान अपना तरहँक पहिल प्रयोग अछि जे कि बादमे आन मैथिली पत्रिकारितामे सेहो शुरू कएल गेल। चूँकि ई प्रारंभिक समाद सेवा छल इंटरनेटपर तँइ एकर संसाधन सीमित छल मुदा कुल मिला कऽ समादक क्षेत्रमे ई पहिल प्रयोग छल। हेलो मिथिला (http://www.hellomithila.com/)-- हेलो मिथिला ब्लाग हितेन्द्र गुप्ताजी द्वारा अगस्त 2007मे शुरू कएल गेल छल। एकर पहिल पोस्ट लिंक http://www.hellomithila.com/2007/08/blog-post.html अछि। शुरूआती दौरक किछु पोस्टमे गुप्ताजी कविता सभ दैत रहला मुदा तुरत ई ब्लाग समादक ब्लागमे बदलि जाइत अछि। ओना समादक ब्लाग बनलाक बाबजूदो एहिमे साहित्य केर स्थान बनले रहलै। इसमाद (http://www.esamaad.com/)-- पहिने इसमाद पी.डी.एफ रूपमे इंटरनेट संस्करण छपैत छल। एकर पहिल अंक 15 जनवरी 2008केँ प्रकाशित भेल। एहि अंकक समदिया दरभंगवी, प्रबंध समदिया ममता शंकर, समदिया कुमुद सिंह छलीह। ई सभ समाचार पहिल अंकक अंतिम पृष्ठपर प्रकाशित अछि। आ अइसँ साफ अछि जे ई प्रिंट रूपमे नै छल। समादक इंटरनेट संस्करण 28 फरवरी 2009 धरि चलल (अंक 24) आ तकर बाद ई इंटरनेट पोर्टल इसमाद (http://www.esamaad.com/)मे बदलि गेल आ एहि ठाम आनलाइन खबरि प्रकाशित करए लागल। दरभंगाक मुद्दापर फोकस करब एहि पोर्टलक मुख्य विशेषता अछि तँ हिंदी समादक मैथिली अनुवाद करैत काल मैथिलीकेँ हिंदियाइन बना देब एहि पोर्टलक कमजोरी अछि। मिथिला प्राइम (http://www.mithilaprime.in) जुलाई 2012सँ मिथिला प्राइम मैथिलीमे समाद देनाइ शुरू केलक। एहि पोर्टलपर आदित्य झा द्वारा बेसी समाद प्रकाशित होइत अछि। मिथिला मिरर (http://www.mithilamirror.com)-- एहि समाद सेवाक पहिल संपादकीय 15 December 2013 केँ लिखल गेल छै। ई वेबसाइट एकटा एहन वेबसाइट अछि जे कि मैथिली समादकेँ प्रोफेशनल बनेबा दिस आगू बढ़ल। एकर संचालक छथि ललित नारायण झा। आगू चलि लगभग 2017 मे एही नामसँ प्रिंट पत्रिका सेहो ललितजी प्रकाशित केलाह। एकर यूट्यूब चैनल सेहो अछि जकर ओहि खंडमे वर्णन हएत। नव मिथिला (http://www.navmithila.com/)-- 21 अक्टूबर 2014 धनतेरसक दिन शुरू भेल नव मिथिला कलकत्ता लेल एकटा प्रमाणिक समाद सेवा अछि। एकर शुरूआत प्रकाश झा द्वारा भेल अछि। एहिसँ पहिले 2007मे प्रकाशजी मिथिला लाइव (www.mithilalive.com) चलबैत छलाह जे कि एखन सक्रिय नै अछि। मैथिली जिंदाबाद (http://www.maithilijindabaad.com/)-- 11 अप्रैल 2015सँ मैथिली जिंदाबाद प्रवीण नारायण चौधरीक अगुआइमे बिराटनगरसँ शुरू भेल। अगस्त 2016मे एकर ई-पेपरक पहिल अंक आएल। मिथिला दर्शन न्यूज (http://maithili.mithiladarshan.news/)---दिल्लीसँ संचालित मिथिला दर्शन न्यूज पिछला बरख 07 अप्रैल 2016केँ अस्तित्वमे आएल। तकरा बादसँ लगातार सक्रिय अछि। एहि न्यूज पोर्टल केर शुरू करबाक विचार सर्वप्रथम मैथिली सिनेमा हाफ मर्डर केर निर्देशक-निर्माता रमानाथ झाक मोन आएल छलन्हि। एहि पोर्टलक सदस्य एना छथि- प्रधान सम्पादक: राहुल राय (मिथिला मिरर केर पूर्व संस्थापक सह उप-संपादक छथि), प्रबंध सम्पादक: रमानाथ झा, संवाददाता- प्रभात झा, अंजू भाटी, सलाहकार: कार्तिकेय मैथिल, सागरनाथ झा, नीरज मिश्रा “मुन्नु “, जटाशंकर मिश्र, मनोज पांडे, मनीष झा, अमित पाठक आदि। कोनो बड़का न्यूज कंपनी जकाँ ईहो पोर्टल दू टा भाषाक चुनावपर आधारित अछि। जँ अहाँ मैथिली चूनब तँ सभ समाद मैथिलीमे आएत आ हिंदी चूनब तँ सभ समाद हिंदीमे आएत। एहि पोर्टलकेँ अहाँ कम्पलीट न्यूज पोर्टल कहि सकै छियै जाहिमे बिहार (मिथिलाक अलावे अन्य राज्यपर बटन दबा कऽ ओहि राज्यक संबंधित समाद पाबि सकै छी। एहि पोर्टलपर कारोबार, आध्यत्म सहित आनो विषयपर समाद भेटत। मैथिली भाषाक हिसाबे सेहो शुद्धता रहैत अछि। नाटक, फिल्म एवं संगीत मैथिली लोक गीत- http://maithilivideos.blogspot.com/2007/-- ई ब्लाग राजीव रंजन लाल ई द्वारा संचालित छल जकर पहिल आ अंतिम पोस्ट रवि, 25 मार्च 2007 के भेल। Maithili Song- http://maithilisong.blogspot.com/ ई ब्लाग 2008 सँ अछि मुदा एकर संचालक के छथि से एहि ब्लागसँ स्पष्ट नै भऽ रहल अछि। मैथिली सांगस हब (Maithili Songs Hub)-- एहि ब्लाग केर पहिल पोस्ट June 2009मे भेलै। एकर लिंक अछि http://maithilisongshub.blogspot.in/2009/06/blog-post.html ई पूर्णतः मैथिली गीत-संगीतपर आधारित अछि आ एहिमे आर कोनो विषय केर पोस्ट नै होइत अछि। ई ब्लाग कोनो कैसेट वा सी.डीक पूराक पूरा ब्लागपर दैत अछि जकरा श्रोता फ्रीमे डाउनलोड कऽ सकै छथि। ई हमरा लेल अफसोचक गप्प जे एहि ब्लागक संचालककेँ छथि से हमरा पता नै लागि सकल। सभ पोस्ट Maithil केर नामसँ पोस्ट होइत छै। एहि ब्लागपर अंतिम पोस्ट अगस्त 2015 केर अछि। नहियो किछु तँ एहि ब्लागपर 1000सँ उपर गीतक संकलन हएत जे कि मैथिलीक हिसाबें एकटा नमहर आ धैर्यपूर्वक कएल काज छै। मैथिली फिल्म्स (http://maithilifilms.blogspot.in/)- ई ब्लाग हमरा द्वारा जून 2011मे शुरू भेल छल जाहिपर खाली मैथिली फिल्म, नाटक ओ गीत-संगीत संबंधित पोस्ट देल जाइत अछि। एकर पहिल पोस्ट 14 जून 2011केँ भेल छल जकर लिंक http://maithilifilms.blogspot.in/2011/06/ अछि। विदेह मैथिली नाट्य उत्सव (http://maithili-drama.blogspot.com/)-- ई ब्लाग अगस्त 2011मे शुरू भेल एकर पहिल पोस्टक लिंक http://maithili-drama.blogspot.in/2011/08/ अछि। मैथिली सांग http://www.song.maithili.org.in/ (मैथिली सांग हब केर बाद ईहो एहन साइट अछि जे कि मैथिली गीत-संगीत डाउनलोड करबाक सुविधा दऽ रहल अछि। किछु अंशमे "मैथिल आर मिथिला" सेहो डाउनलोड सुविधा देने छै)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। मैथिली सिनेमा (http://maithilicinema.blogspot.in/)- भाष्कर झा शुरू कएल ब्लाग अछि एकर पहिल पोस्टक लिंक http://maithilicinema.blogspot.in/2011/08/history-of-maithili-films-birds-eye.html अछि। ई ब्लाग अगस्त 2011मे शुरू भेल जकर प्रमाण पहिल पोस्टक लिंक अछि। उपरमे हम सभ देखि चुकल छी जे मैथिली गीत-संगीत अधारित ब्लाग मैथिली गीत-संगीत अधारित ब्लाग "मैथिली लोक गीत" 2007 मे आ "मैथिली सांगस हब" 2009 मे बनि चुकल अछि। प्रस्तुत प्रमाणपर ई मानब उचित जे "मैथिली लोक गीत" मैथिलीक नाटक-फिल्म ओ गीत-संगीतक पहिल पोर्टल अछि। जकर वृहद् विस्तार "मैथिली सांग्स हब" अछि। 2008 मे http://maithili.tv/ नामक साइट छल मुदा ओ आब बंद अछि तँइ एकर सामग्री की छल से अज्ञात अछि। मुदा tv शब्द देखि हम एकरा एही खंडमे राखि रहल छी। ई-कामर्स प्रोफेशनल तरीकाक बात करी तँ सैप्पीमार्ट मैथिलीक एखन धरिक सभसँ नीक ई कार्मसक वेबसाइट अछि। श्रुति प्रकाशन, बिहार लोकमंच, मिथिला हाट आदि मैथिली ई कामर्सक शुरुआती दौरक वेबसाइट अछि। वेबसाइट सभहँक लिंक एना अछि बिहार लोकमंच http://www.biharlokmanch.org/ श्रुति प्रकाशन http://www.shruti-publication.com/ (ई लिंक एखन काज नै क' रहल अछि) मिथिला हाट http://emithilahaat.com/ सैप्पीमार्ट http://www.sappymart.com/ सैप्पीमार्ट केर संचालक मुकुंद मयंक आ बालमुकुंद छथि। बाल संबंधी नेना भुटका नामसँ 2009 मे एकटा ब्लाग बनल जे कि बाल साहित्यपर केंद्रित अछि आ एकर लिंक अछि http://mangan-khabas.blogspot.in/2009/11/111.html ई ब्लाग गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा संचालित अछि। एहिपर बाल साहित्यक लगभग सभ विधा अछि। नेना भुटका नामसँ बहुत बादमे फेसबुकपर देवाशुं वत्स द्वारा फेसबुक ग्रुप बनाएल गेल जकर विवरण आगू देल जाएत। एहि केर अतिरिक्त बाल साहित्य केंद्रित वेबसाइट हमरा नजरिमे नै आएल। फाइन आर्ट एहि खंडमे किछु मिथिला पेटिंग बला वेबसाइट अछि। http://www.mithilaarts.com/ http://mithilaartinstitute.org आदि। धर्म मैथिली पतरा http://www.patra.maithili.org.in/ ("मैथिली पतरा" साइट मैथिलीक एहन पहिल साइट अछि जे कि पतराक आनलाइन केने अछि)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। दुर्गासप्तशती http://durgasaptashati.in/ (वर्तमानमे ई साइट एखन नै अछि मुदा नामसँ बुझाइत अछि जे एहिपर दुर्गासप्तशतीक पाठ रहल हेतै) । ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। अन्य मिथिला होस्ट http://www.mithilahost.in/ (2012 मे डोमेन रीसेल लेल ई mithilahost साइट बनेला। एहिठाम अहाँ अपन मोनक साइट केर नाम चूनि बनबा सकैत छी)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। मिथिला फेस http://www.mithilaface.in/ (2010 मे ई मिथिलाफेस नामक सोशल नेटवर्किंग साइट बनेलाह मुदा किछु कारणवश ई नै चलि सकल)। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। मिथिला http://www.mithila.org.in/ (विकी केर तर्जपर वा ओहिसँ किछुए हटि कऽ मात्र मिथिलापर केंद्रित साइट अछि ई। एकर परिचय साइटपर एना अछि "मिथिला नामक इ वेबसाइट मिथिला लेल अछि ! एतय अपने मिथिला सँ संबंधित सब तरहक विषय वस्तु लेल पेज बना सकैत छी, अपन गावँ-घर, पंचायत, ब्लाक, जिला, समुदाय, धर्म, दार्शनिक/धार्मिक स्थल, वयक्ति विशेष सब विषयके लेल पेज बना सकैत छी ! पहिले सँ लिखल गेल पेज के एडिट सेहो कए सकैत छी" )। ई साइट रोशन चौधरीजी द्वारा बनाएल गेल अछि। मैथिली चुटकुला http://maithilijokes.blogspot.com/, सगर राति दीप जरय http://sagarraatideepjaray.blogspot.com/ , विदेह क्विज http://videhaquiz.blogspot.in/ आदि सेहो नीक ब्लाग अछि। विदेहक आन ब्लाग http://mangan-khabas.blogspot.in/ नेना भुटका, 1.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट http://videha123radio.wordpress.com/ 2.Videha Radio http://videha.listen2myradio.com/ 9. सगर राति दीप जरय http://sagarraatideepjaray.blogspot.in/ 10. सगर राति दीप जरय http://sagarraatideepjaray.wordpress.com इंटरनेट आ मिथिलाक्षर: मैथिली भाषाक फॉण्ट: मिथिलाक्षरमे पोथी आ पत्रिका भाषामे पहिने बजनाइ क्रिया भेलै आ तकर बाद लिखनाइ। लिखबाक लेल बहुत तरीका प्रयोगमे भेलै आ तकर बाद समयानुसार लिखबाक लेल सामग्रीक सेहो बदलैत गेलै। लेख प्रतीक/शब्द शैली सेहो समायानुसार बदलैत गेलै। उदाहरण लेल देवनागरीमे आइसँ सत्तर-अस्सी बर्ख पहिने "अ" जेना लिखल जाइत छलै से आब नै लिखल जाइत छै। बहुत संभव जे सौ बर्ख बाद एखनुक लेख प्रतीक/शब्द शैली सेहो बदलि जाए। एकटा ईहो बात जे लेख प्रतीक/शब्द शैली सभ लेल एकै होइ छै मुदा हरेक लोकक लिखावट केर कारण हरेक लोकक अपन लेख प्रतीक/शब्द शैली बनि जाइ छै। देखैत हेबै जे लोक झटसँ कोनो लिखल देखि कहत जे ई फल्लाँ हाथक लिखल छै। फेर कहब लेख प्रतीक/शब्द शैली सभ लेल एकै होइ छै मुदा ओकर लिखावट अलग लोक होइते अलग भऽ जाइत छै। बहुत बेर अवस्था अथवा अन्य कारणसँ एकै लोकक लिखावट अलग-अलग भऽ जाइत छै। आधुनिक कालमे जखन कंप्यूटर एलै तखन लिखबाक झंझट एलै जे कंप्यूटरपर प्रचलित लेख प्रतीक/शब्द शैलीकेँ कोना आनल जाए। आ तकर समाधान फॉण्ट केर रूपमे भेलै। मने फॉण्ट कंप्यूटरपर लिखबाक एकटा साधन भेल। मुदा जे लोकक लिखबाक तरीका एक नै छै तेनाहिते विभिन्न समयमे फॉण्टमे सेहो विविधता आएल मने एकै लेख प्रतीक/शब्द शैली लेल बहुत फॉण्ट। कुल मिला कऽ फॉण्ट लिखबाक स्टाइल भेल। अंग्रेजी लिखबाक लेल ई फॉण्ट सभ अथवा एही समूहक फॉण्ट सभ लोक रोजे देखैए-- 1. Arial 2. Roboto 3. Times New Roman 4. Times 5. Courier New 6. Courier 7. Verdana 8. Georgia तहिना हरेक भाषा लेल अलग-अलग नाम छै। कोन बात लीखि रहल छी ताहि हिसाबसँ फॉण्ट सेहो बदलि जाइत छै। बियाहक कार्ड जाहि फॉण्टमे लिखल जेतै ताहि फॉण्टमे नौकरीक आवेदन लिखबै तँ ओतेक नीक रिजल्ट नै भेटत। किछु उदाहरण-- Calibri (Body) Font—A Cambria (Headings) font – A गौरसँ देखू दूनू फॉण्टमे एकै लेख प्रतीक/शब्द शैली छै मुदा दूनूक स्टाइल अलग भऽ गेल छै। जेना जतेक लोक ततेक लिखावट तेनाहिते जतेक लोक ततेक फॉण्ट। ई अलग बात जे फॉण्ट बनेबा लेल बेसी मेहनति लागै छै तँइ लोक कम्मे फॉण्टसँ गुजर चला लैत अछि। कुल मिला कऽ ई फॉण्ट कोनो भाषाक graphical प्रदर्शन छै से चाहे ओ कोनो माध्यमसँ किएक ने हो। वर्तमान समयमे कम्पयूटर अछि तँ सएह सही। मैथिलीमे कंप्यूटरसँ पहिने छापाखाना लेल फॉण्ट बनलै आ ताहिमे श्रेय छनि जयकांत मिश्रजीकेँ जे Indian Institute of Advanced Study, शिमला लेल बनेलाह। तकर बाद टाइपराइटर लेल फॉण्ट बनलै मुदा मैथिलीक टाइपराइटर तिरहुत्तामे नै बनलै। अधिकांश भारतीय भाषा केर फॉण्ट छापाखान, टाइपराइटर तखन कंप्यूटर धरि आएल छै मुदा तिरहुत्ताक फॉण्ट छापाखानसँ सीधे कम्प्यूटरपर। फॉण्टक फार्मेट बहुत छै मुदा तीन तरहक प्रमुख - 1) TTF TrueType Font (.ttf), 2) OTF format (OpenType .oft) आ 3) WOFF (Web Open Font Format) अछि (ई फॉण्ट सभ कोना काज करैए से एहि लेखक उद्येश्य नहि अछि एहि लेल हमर अन्य आलेख देखल जा सकैए)। एहन फाण्ट जे बिना कोनो दिक्कतकेँ हरेक कंप्यूटर एक समान रूपे देखाइ पड़ए से भेल यूनीकोड फाण्ट। यूनीकोडसँ पहिने अलग-अलग कंप्यूटरमे अलग-अलग फाण्ट रहै छलै आ तँइ दोसर फान्टक सामग्री तखने देखाइ पड़ै छलै जखन कि ओ टार्गेट फाण्ट ओहिमे देल जाए। मानू जे अहाँक कंप्यूटरमे सुशा फाण्ट अछि आ अहाँ ओहिमे टाइप कऽ हमरा पठेलहुँ मुदा हमर कंप्यूटरमे सुशा फाण्ट नै अछि तँइ ओ हमरा नै देखाएत। देखाए लेल हमरा सुशा फण्ट अपना कंप्यूटरमे इंस्टाल करए पड़त। मुदा यूनीकोड एहि समस्याकेँ खत्म कऽ देलकै। आब अहाँ कोनो फाण्टमे लीखू जँ दोसर कंप्यूटरमे यूनीकोड छै तँ ओ देखाइ पड़तै। यूनीकोडक इएह सभसँ बड़का फाइदा छै आ तँइ हरेक समर्थ भाषाक यूनीकोड फाण्ट बनल छै। आ एक बेर कोनो भाषाक यूनीकोड फाण्ट बनि गेलाक बाद ओही आधारपर एकै भाषाक विभिन्न लेख प्रतीक/शब्द शैली बला फाण्ट बनाएल जा सकैए जे कि समान रूपसँ हरेक कंप्यूटरमे देखाइ पड़तै। माइक्रोसाफ्टमे वएह फॉण्ट डिफाल्ट रूपमे आबि सकैए जकर कि यूनीकोड भर्सन हो जेना देवनागरी लेल मंगल फॉण्ट डिफाल्ट रूपमे छै। तँइ यूनीकोड फॉण्टक महत्व बेसी छै। चूँकि मैथिली भाषा वर्तमानमे देवनागरीमे लिखल जाइत छै तँइ भारतक मैथिली लेल हिंदी बला फॉण्ट काज केलकै तँ नेपालक मैथिली लेल नेपाली बला फॉण्ट। मिथिलाक्षर (तिरहुत्ता)मे फॉण्ट बनाएब बाँकी छल आ से सार्वजनिक रूपे नेपालसँ दू लोक बनेलथि। नेपालसँ पहिल दावेदार सी.के.राउत छथि जे की तिरहुता केर नामसँ फॉण्ट 9 मार्च 2003 मे बनेलाह। एकर लिंक आ फोटो एना अछि (ई फाण्ट रोशनजीक एहि वेबसाइटसँ डाउनलोड कऽ सकैत छी http://www.maithilifonts.in)- https://www.scriptsource.org/cms/scripts/page.php?item_id=entry_detail&uid=ytelv888 नेपालेसँ दोसर दावेदार राजबिराज (नेपाल) केर गंगेश गुंजन झा आ श्रवीण कुमार मिश्रा (Shravin Kumar Mishra) "मैथिली" नामक फॉण्ट बनेलाह जे कि Dec-2004 मे त्रिभुवन विश्वविद्यालय केर सेंट्रल लाइब्रेरीसँ ISBN प्राप्त केलक। आ ताहिमे संतोष कुमार मिश्र, सहित आरो लेखक मिथिलाक्षरमे पोथी प्रकाशित भेल। निच्चामे एहि काजक दूटा फोटो प्रमाण देल जा रहल अछि। ई फाण्ट गुंजनजीक एहि वेबसाइटसँ डाउनलोड कऽ सकैत छी http://gangeshjha.tripod.com/?fbclid=IwAR3zqr0-G6OtObIo5YCx-dlymK_qxpNG94so_s-sv3Mv85jDobCuQmiU0Ds 2019 मे विनय झा दावा केलाह जे ओहो 2003 मे मिथिलाक्षर फॉण्ट 1DevMithila बनेलाह आ तकर समर्थनमे बहुत रास साक्ष्य रखलाह मुदा ओहि साक्ष्य सभमे ओ केखनो 2000 साल कहलाह तँ केखनो 2002, तँ केखेनो 2004 मने एकरूपता नै। निच्चामे हुनक किछु पोस्टक स्क्रीनशाट देल गेल अछि। मुदा हुनके बहुत पोस्टक अधारपर हम ई मानैत छी जे ओ 2004 मे बनेलाह संगे-संग भवनाथ झा जी सेहो ई स्वीकार केलाह (विनयजीक पोस्टपर) जे विनयजी लगभग 2004मे हुनका स्वनिर्मित फॉण्ट देने रहथिन मतलब ई निश्चित भेल जे विनयजी सेहो ओही कालखंडमे फॉण्टक निर्माणमे लागल छलाह। लगभग 2019 मे विनयजीक दावेदारी बला पोस्ट सभपर अनेक कारणसँ आ वर्णक आकार-प्रकार लऽ विनयजी आ भवनाथजीमे घोंघाउज होइत रहल। आ हमरा हिसाबें ई दूनू गोटाक अति छल कारण कोनो भाषाक फॉण्ट मानक लेख प्रतीक/शब्द शैलीक विभिन्न स्टाइल होइत छै। तँइ स्वाभाविक जे गंगेश जी बला फॉण्ट, राउतजी बला फॉण्ट आ विनयजी बला फॉण्ट अलग-अलग हेतै। ओना ई बात निर्विवाद छै जे हरेक चीज आउटडेटेड होइत छै तँइ कोनो फॉण्ट सेहो आउटडेटेड भऽ सकैए। विनयजी एकटा आर बात खटकल हमरा जे जँ हुनका अपना कालखंडमे बनल आन फॉण्टक जानकारी नै छनि तँ एकर ई मतलब नै जे ओ पहिल भऽ जेता। एहन प्रवृति हमरा पद्मनाभोजीमे भेटल अछि जकर वर्णन हम अपन पोथी "मैथिली वेबपत्रकारिताक इतिहास"मे केने छी (ई पोथी समय-समयपर अपडेट होइत रहैए। अतेक तँ निश्चित जे वर्तमानमे (2018सँ लऽ कऽ एखन धरि) विनयजी अपन बनाएल फॉण्टमे बहुत रास परिवर्तन केलथि आ ओकरा बेसी नीक बना कऽ परसलथि। एहि विवाद सभकेँ कात करैत हमरा विचारे 2004 एहन बर्ख अछि जे कि सभ फॉण्ट निर्माताक संधिस्थली बनि सकैए तँइ C.K Raut जीकेँ हम पहिल फॉण्ट निर्माता मानितो (आ जे कि ओ वस्तुतः पहिल छथिहो) हम 2004केँ मिथिलाक्षर फॉण्ट बर्ख कहि संबोधित करब। दोसर बात जे फॉण्टक संधिस्थली बर्ख 2004 लेल हम एकटा सूत्र बनेलहुँ CGSV (चंद्रकांत-गंगेश-श्रवीण-विनय) आ मिथिलाक्षर फॉण्टक पहिल निर्माताक रूपमे हम एहि सूत्र CGSV केँ हम जनताक सामने राखि रहल छी। ओना ई हमरा स्वीकार करबामे कोनो हर्जा नै जे 2019सँ विनयजी लगातार एक्टिभ भेलाह आ मिथिलाक्षर फॉण्ट अलावे कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इण्टेलिजेन्स) मे विनयजीक योगदान सेहो देलाह जे कि सराहनीय छनि आ एहि काजकेँ http://vedicastrology.wikidot.com/mithilakshara-font#toc8 लिंकपर देखि सकैत छी। एकर अतिरिक्त ईहो उल्लेखनीय जे मोबाइलपर मिथिलाक्षरमे लिखबाक लेल पहिल टूल विनये जी 2019 मे बनेलाह। एहिसँ पहिने लिखबाक सुविधा नै छल मोबाइलमे। विनय झाजी लेखपट्ट नामसँ फॉण्ट बना एकर समाधान केलाह जे http://vedicastrology.wikidot.com/mithilakshara-font#toc0 लिंपर भेटत। विनयजीक लेखपट्टसँ पहिने लोक अक्षरमुख केर साइटपर जा कऽ अपन लिखलकेँ मिथिलाक्षरमे बदलि ओकर फोटो बना मोबाइलपर दैत छल। मोबाइलक फॉण्ट लेल आर बहुत रास काज लेल विनयजीक अभिनंदन। निच्चा विनयजीक पोस्टक स्क्रीनशाट सभ दऽ रहल छी- बर्ख 2007 मे दू टा फाण्ट आएल। नेपालसँ जानकी फाण्ट जे कि मदन पुरस्कार पुस्तकालय (https://madanpuraskar.org) लेल गौरव श्रेष्ठ एवं अंजन अले द्वारा बनाएल गेल छल। एहि फाण्टकेँ एहि लिंकसँ डाउनलोड कऽ सकैत छी https://drive.google.com/uc?export=download&id=0B9xwnNKpRLJ1ZTd6MG9ZaEN5LWs&fbclid=IwAR2UsFK475vBpxDYjkn9xO9Ov9CHiWK50plzTOoKXLVp6WW3q99UdIZbYXk एकर बाद 2007मे अनु झाक मिथिला नामसँ फॉण्ट आएल। 2013 मे कौशल कुमार सूर्यलक्ष्मी नामसँ फॉण्ट बनेलाह। अनु झा आ कौशलजी बला फाण्ट रोशनजीक एहि वेबसाइटसँ डाउनलोड कऽ सकैत छी http://www.maithilifonts.in) यूनीकोड लेल सभसँ पहिने भारत सरकारक दिससँ ओम विकासजी 2-7-2005 मे मिथिलाक्षरकेँ Minority Scripts खंडमे नामित केलखिन जकरा एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://www.unicode.org/L2/L2005/05063-vikas.pdf 2006सँ एहि काज लेल अंशुमान पांडेयजी लगलाह 2006 बला प्रस्ताव केर लिंक अछि http://std.dkuug.dk/jtc1/sc2/wg2/docs/n3312.pdf जाहिमे मिथिलाक्षरक संदर्भ लेल ओ पंडित गोविन्द झाजी कल्याणी कोश ओ पं.जीवनाथ रायजीक पोथीक सहारा लेने छथि। 2007क लिंक अछि https://www.unicode.org/L2/L2007/07139-north-indian-acctg-signs.pdf जे कि लगभग उपरे जकाँ अछि। Oct 2009 में अंशुमान पांडेय फेर मिथिलाक्षरक यूनिकोड लेल आवेदन केलाह https://unicode.org/L2/L2009/09329-maithili.pdf जे की बादमे स्वीकार भेलै। स्वीकार भेल यूनीकोड रूप एहि लिंकपर देखि सकैत छी http://www.unicode.org/charts/PDF/U11480.pdf एहिठाम ई मोन राखब बहुत-बहुत जरूरी अछि जे जखन अंशुमान पांडेय 2009 मे फेरसँ यूनीकोड लेल आवेदन केलखिन तखन ओ प्रमुखतासँ गजेन्द्र ठाकुर ओ विदेहक उल्लेख केलथि कारण विदेहक हरेक अंक 2008 सँ मिथिलाक्षरमे प्रकाशित छल आ ओकर अतिरिक्त श्रुति प्रकाशनक बहुत रास पोथी सेहो मिथिलाक्षरमे उपल्बध छल, यूनीकोड लेल विदेह प्रचुर मात्रामे मिथिलाक्षरक नमूना देलक। अंशुमानजी अपन आभारमे एना लिखैत छथि " Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS" । रमानंद झा रमण, पं.गोविन्द झा, एवं नेपालक Dr. Dragomir Dimitrov एहन तीन नाम आर अछि जिनका प्रति पांडेयजी आभार व्यक्त नेने छथिन से उपरमे अंशुमानजी द्वारा देल 2009 केर प्रस्तावना लिंकपर जा कऽ देखि सकैत छी। दिनेश यादवजी (नेपालक मैथिली लेखक ओ सजग पत्रकार) सूचित केलथि जे Dr. Dragomir Dimitrov नेपालक नै बुल्गेरियाक नागरिक छथि मुदा नेपाल किछु अनुसंधानक काजमे हुनक नाम नेपाल दिससँ देल जाइत छनि। एकर बाद C-dac, Pune द्वारा सेहो 2014 मे मिथिलाक्षर फॉण्ट बनाएल गेल यूनीकोडक आधारपर। आ C-dac केर इएह फॉण्ट बेर-बेर अपडेट होइत रहल। अंतिम रूपसँ अपडेट करबाक लेल भवनाथ झाजी लगलाह आ ओकर बदलामे गारि-गंजन भोगलाह। ओना भवनाथजी द्वारा कएल गेल अपडेट अंतरिम एप्रूभल केर बाद C-dac सार्वजनिक करत। ई अपडेट करबाक प्रक्रिया एहन छै जे समयक संग चलैत रहतै। एहि लेल ने भवनाथजी दोषी छथि आ ने C-dac । दोषी तँ ओ ओ सभ छथि जे कि एकटा फॉण्टकेँ अंतिम वस्तु मानि बैसल छथि। ओनाहुतो जखन पूरा समाजे जखन अतीतोन्मुख अछि आ बात-बातपर वेदेसँ अपन परिचय शुरू करैए ताहिठाम जँ भवनाथजी जँ पुरान हस्तलेखक (लगभग 1850 केर आसपासक हस्तलेख) आधारपर कोनो फॉण्टकेँ अपडेट केलाह तँ ओहिमे दिक्कत की? हमरा कोनो दिक्कत नै बुझाइए, जहिया बुझाएत तहिया यूनीकोड बला फॉण्ट छैहे ओही आधारपर हम अपन नव फॉण्ट बना लेब। बहुत संभव जे भाषाक बदलैत स्वरूपमे दस बर्खक बाद C-dac के फेर अपडेटकेँ जरूरति पड़तै तँ ओ ओहि समयक मिथिलाक्षर-प्रवीणकेँ ई काज देत। C-dac केर एकटा अन्य फाण्ट "वैदेही फॉण्ट" लेल भवनाथजी अपन सहयोग सेहो देने छथिन जे कि C-dac लग पड़ल अछि जे कि अंतरिम आदेशक बादे सार्वजिनक हएत। आब विदेहक काज मिथिलाक्षरक प्रति की छै से दऽ रहल छी मुदा एकरा हम दू भागमे बाँटब पहिल 2014 धरि आ दोसर 2015 सँ एखन धरि। एहि बाँट-बखराक ई आधार जे फेसबुक ओ ह्वाट्सएप केर माध्यमसँ सेहो बहुत लोक मिथिलाक्षर सिखा रहल छथि आ ओहिमेसँ सभ प्रायः 2015 केर बादे आएल छथि। फेसबुक ओ ह्वाट्सएप केर माध्यम बला चर्चा हम सोशल मीडिया बला खंडमे करब। चंद्रकांतजी बला फॉण्ट ओ विनयजीक प्रारंभिक फॉण्टमे कोनो पोथी ओ पत्रिका नै अछि। गंगेश-श्रवीण जी बलामे विनीत ठाकुरजीक एकटा पोथी प्रकाशित अछि। तकर बाद गंगेश-श्रवीणजी बला फॉण्टमे संतोष कुमार मिश्रजीक पोथी सेहो छपल आ ई पोथी सभ नेपालसँ मँगा सकैत छी। विदेहक पहिल अंक जनवरी 2008 सँ लऽ कऽ 149म अंक 1 मार्च 14 धरि मिथिलाक्षर, देवनागरी आ ब्रेल तीनूमे आनलाइन प्रकाशित भेल। 150म अंक 15 मार्च 2014 सँ लऽ कऽ एखन धरिक अंक देवनागरीमे प्रकाशित छै। विदेह हरेक पचीस अंकक किछु सेलेक्टेड रचना लऽ कऽ "विदेह-सदेह" नामक प्रिंट रूप निकालने छै जे कि कुल 13 भागमे छै जाहिमेसँ दस भाग मिथिलाक्षर, देवनागरी ओ ब्रेल तीनू लिपिमे छै आ शेष तीन भाग देवनागरीमे। विदेहक हरेक अंक आ लेल फ्री डाउनलोड लेल उपल्बध छै। संगे-संग "विदेह-सदेह" केर सभ अंक केर सभ लिपिमे प्रिंट ओ फ्री डाउनलोड सेहो उपल्बध छै। प्रिंट रूप श्रुति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित छै आ पाठक एकरा कीनि सकै छथि जकर संपर्क सूत्र हम निच्चा देब। एकर अतिरिक्त बहुत रास पोथी सेहो मिथिलाक्षरमे प्रकाशित भेल जकर लिस्ट एना अछि-- गजेन्द्र ठाकुरजीक किछु पोथी-- 1) कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक 2) Learn Mithilakshar Script तिरहुता (मिथिलाक्षर) सीखू 3) Learn Braille through Mithilakshar Script ब्रेल सीखू 4) Learn International Phonetic Script through Mithilakshar Script अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला सीखू गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा आ पञ्जीकार विद्यानन्द झा जीक किछु पोथी-- 1) MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES-Vol.I (एकै पोथीमे अंगरेजी-देवनागरी-मिथिलाक्षर तीनू रूप) 2) MAITHILI-ENGLISH DICTIONARIES-Vol.II (एकै पोथीमे अंगरेजी-देवनागरी-मिथिलाक्षर तीनू रूप) 3) VIDEHA ENGLISH MAITHILI DICTIONARY Vol.I (एकै पोथीमे अंगरेजी-देवनागरी-मिथिलाक्षर तीनू रूप) 4) जीनोम मैपिंग (450 ए.डी.सँ 2009 ए.डी.)--मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध (एकै पोथीमे देवनागरी-मिथिलाक्षर दूनू रूप) एकर अलावे नचिकेताजीक नाटक "नो एण्ट्री : मा प्रविश" केर मिथिलाक्षर भर्सन सेहो अछि। उदयप्रकाशजीक हिंदी उपन्यास "मोहनदास" केर मैथिली अनुवाद विनीत उत्पलजी द्वारा एही नामसँ भेल आ ई मिथिलाक्षर-देवनागरी आ ब्रेल लिपि तीनूमे अछि। ई सभ पोथी-पत्रिका निर्मलीसँ उमेश मंडल द्वारा प्राप्त कऽ सकैत छी। लोक देवनागरीसँ मिथिलाक्षर वा मिथिलाक्षरसँ देवनागरीपर अटकल छथि मुदा गजेन्द्र ठाकुर 2008हि केर आस-पास मिथिलाक्षर द्वारा ब्रेल लिपि ओ International Phonetic Script सिखबाक लेल किताब निकाललाह। विदेह पत्रिका मंगल आ वृंदा फॉण्टपर आधारित रहैत छल। विनीत ठाकुरजीक पोथी "बाँकी अछि हम्मर दूधक कर्ज" जनवरी 2008 मे गंगेश गुंजन झा-श्रवीण मिश्र बला मिथिलाक्षर फॉण्टमे प्रकाशित भेलै। एहि पोथीक एक कात मिथिलाक्षर ओ दोसर कात देवनागरी लिपिमे रचना छै। जँ नेपालक संदर्भमे बात करी तँ विनीत ठाकुर बहुत पहिने लगभग 2003-4 सँ मिथिलाक्षर अभियानमे जुटल छथि से भने पन्ने बला माध्यम किएक ने हो। एखनो हिनकर बहुत रास रचना मिथिलाक्षरमे भेटत। प्रारंभिक कालखंड ओ काजक बाद सोशल मीडियापर अजय नाथ झा शास्त्री मिथिलाक्षर साक्षरता अभियान फेसबुकपर चला रहल छथि। जाहिमे दावा कएल गेल अछि जे लगभग दू लाखसँ बेसी लोक मिथिलाक्षर सीखि लेलक। दूर्वाक्षत संस्था "मिशन मिथिलाक्षर योजना" चला रहल छथि। किछु गोटे एकर मासिक, त्रैमासिक कोर्स सेहो चला रहल छथि। बहुत गोटे तँ ह्वाट्सएपपर सिखबाक-सिखेबाक आह्वान केने छथि। कुल मिला कऽ देखी तँ प्रारंभिक (2003-14) केर बाद ई स्थिति नीक आ उत्साहजनक लगैत छै। नै दू लाख जँ बीसे हजार सिखने हेता तैयो ई एकटा सकारात्मक पक्ष भेलै सोशल मीडियाक। उपरमे जे नाम देल तकर अतिरिक्तो बहुत नाम छथि जे एतए देब संभव नै मुदा ई बात तय जे मिथिलाक्षरक प्रति लोकक रुचि जगलै आ ताहि लेल नेओ केर पाथर सी.के राउत, गंगेश-श्रवीण, विनय झा, गजेन्द्र ठाकुर, अंशुमान पांडेय सहित सोशल मीडियापर एखनुक समयमे सिखा रहल आ अपनाकेँ चमचमाइत शिखर मानि लेने सभ लोक धन्यवादक पात्र छथि। एहिठाम ई कहब उचित जे अधिकांश सिखबए बला ओ सीखए बला या तँ अक्षरमुख साइट केर सहायतासँ फोटो बना दै छथि वा हाथसँ लिखल पन्नाक फोटो। एहि ठाम सोशल मीडियासँ सिखाएल जा रहल मिथिलाक्षरपर किछु एहन गलतीक उल्लेख हम करब जे कि प्रायः सभ सिखबए बला कऽ रहल छथिन आ सीखए बला कऽ रहल छथि। सिखबए आ सीखए बला दूनू वर्तनीक गलती बहुत कऽ रहल छथि। अहाँ भने मिथिलाक्षरेमे किए ने लिखी मुदा जँ वर्तनी गलत रहत तँ ओकर फाइदा की? जाहि लिपिमे लीखू सही लीखू। दोसर गलती बहुत बड़का गलती छै विभक्ति केर संदर्भमे। मैथिलीमे विभक्ति शब्दमे जुड़ि जाइत छै मुदा अधिकांश मिथिलाक्षर बलामे देखि रहल छी विभक्ति हटल, ई तँ मैथिलीक मूल विशेषतापर कुड़हड़ि मारि रहल छियै, जखन मूल विशेषते नै बँचतै भाषाक तखन लिपिए बचा की करब आ एहि प्रकारक गलती लेल सीखए बलासँ बेसी सिखेनहार दोषी छथि। फेसबुकपर एहन गलती बला पोस्ट देखाइ पड़िए जाएत हम जानि बूझि कऽ एहिठाम नै देलहुँ अछि। कहबाक लेल ईहो कहल जा सकैए जे देवनागरीमे जे मैथिली रचनाकार लिखलाह तकरे कियो मिथिलाक्षरमे लिप्यंतरण कऽ देलाह तँइ विभक्ति नै सटल भेटत मुदा ई जानब जरूरी जे मिथिलाक्षरमे विभक्ति सटब अनिवार्य। गीताप्रेस, गोरखपुरक हरेक हिंदी किताबमे विभक्ति सेहो सटल भेटत। जँ ई सिखबए-सिखाबए बला सभ विदेहक मिथिलाक्षर पोथी-पत्रिका, नेपालसँ प्रकाशित मिथिलाक्षर पोथी एवं छापाखाना बला मुद्रित मिथिलाक्षर पोथी पढ़ता ओ तखन लिखता तँ आर बहुत बेसी लाभ हेबाक संभावना रहत। ओना काज भेलै आ काज हेबो करत मुदा एहि लेखक अंत हम ई कहए चाहब जे किछु लोक एहन होइत छथि जे कि हरेक लोक लग प्रश्न करै छथि बिना ई चिंता केने जे उत्तर भेटत कि नै भेटत। कमसँ कम मिथिलाक्षर फॉण्ट एवं कीबोर्ड संबंधमे रौशन चौधरी जी हमरा सभ लग एहने प्रश्नकर्ताक रूपमे छथि जे अपना भरिसक सरकारीसँ लऽ कऽ प्राइभेट साफ्टवेयर कम्पनीक साइटपर 2008 लगातार पुछैत रहलाह जे मैथिली फॉण्ट बनलै की नै बनलै, कहिया बनतै आदि। भऽ सकैए जे फॉण्ट -कीबोर्ड रौशनजी लेल नै बनल हो मुदा सामने वला आदमीकेँ ई बुझाएल जरूर हेतै जे मिथिलाक्षर लेल प्रश्न करए बला कियो छै ओकरो मोन उत्सुक भेल हेतै मिथिलाक्षरक लेल ईहो बड़के काज भेलै। सोशल मीडिया आ मैथिली जियोसिटीजक साइटसँ होइत मैथिली इंटरनेटपर सोशल मीडियाक सहारे बढ़ल। ई सोशल मीडिया की थिक आ कतेक प्रकारक होइत छै से जानी-- ओना तँ सोशल मीडियाक बहुत परिभाषा छै मुदा से तकनीकी छै। हम एकरा गामक चंडालचौकड़ी माध्यमे परिभाषित करब। चंडालचौकड़ीमे की होइ छै किछु लोकक समूह अपन-अपन ठेकनाएल जगहपर जाइत छै आ विभिन्न तरहक क्रियाकलाप करै छै। ई क्रियाकलाप ज्ञान, हँसी-मजाक, मारि-पीट सभ तहहक होइत छै। केखनो काल एक-एक काज लेल अलग-अलग चंडालचौकड़ी होइत छै तँ केखनो काल एकै चंडालचौकड़ीमे सभ क्रिया भऽ जाइत छै। गौरसँ देखियौ चंडालचौकड़ी लेल तीन अनिवार्य तत्व छै, लोक, निश्चित जगह आ लोककेँ अएबाक लेल प्रेरक। आधुनिक समयमे "लोककेँ अएबाक लेल प्रेरक" तत्व इंटरनेटमे बदलि गेलै आ इंटरनेटपर सेहो निश्चित जगह बना देल गेलै लोक लेल। लोकक जेहन प्रवृति तेहने-तेहन जगह। कुल मिला कऽ ओहन चंडालचौकड़ी जे कि इंटरनेटक माध्यमसँ कोनो निश्चित साइटपर होमए लागए तँ ओकरा सोशल मीडिया कहल जाइत छै। ओना मैथिलीमे चंडालचौकड़ी निगेटिभ अर्थमे प्रयोग होइत छै मुदा हम जोर दऽ कऽ कहब जे चंडालचौकरीमे किुछए देर सही ज्ञानक बात सेहो होइत छै, समाजक भलाइ केर बात सेहो होइत छै। सोशल मीडियाक किछु विभिन्न रूप निच्चा देल जा रहल अछि-- 1) Social networks - ई विभिन्न तरीकासँ लोककेँ जोड़बाक लेल बनै छै जेना- Facebook, Twitter, LinkedIn एहूमे LinkedIn मात्र प्रोफेशनल लोक सभ लेल छै से चाहे प्रोफेशन बहुत प्रकारक भऽ सकैए। समान्यतः नौकरीपेशा आ बेपारी LinkedIn पर बेसी रहै छथि। Twitter नेता ओ राजनीतिक ओ समाजिक संगठन लेल बेसी प्रयोग होइए तँ Facebook केँ सभ जनता जनार्दन अपना अनुकूल पाबै छथि तँइ अपना देशमे Facebook हदसँ बेसी लोकप्रिय छै। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 2) Media sharing networks — ई विभिन्न तरीकासँ फोटो, आडियो ओ भडियो सार्वजनिक करबाक सुविधा दै छै जेना- Instagram, Snapchat, YouTube, soundcloud आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 3) Discussion forums — ई विभिन्न तरीकासँ लोकक बीच तर्क करबाक, प्रश्न करबाक, उत्तर देबाक सुविधा दै छै जेना- reddit, Quora, Digg आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 4) Bookmarking and content curation networks — ई विभिन्न तरीकासँ कोनो टेकस्ट वा पी.डी.एफकेँ सुरक्षित करबाक सुविधा दै छै जेना - Pinterest, Flipboard आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 5) Consumer review networks — ई विभिन्न तरीकासँ बेपार ओ ग्राहकक रुचि-अरुचि जनबाक सुविधा दै छै जेना- Yelp, Zomato, TripAdvisor आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 6) Blogging and publishing networks — ई विभिन्न तरीकासँ कोनो टेक्सटकेँ आनलाइन प्रकाशित करबाक सुविधा दै छै जेना- blogger, WordPress, Tumblr, Medium आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 7) Interest-based networks — ई विभिन्न तरीकासँ लोककेँ अपन वयक्तिगत रुचि-अरुचिकेँ सार्वजनिक करबाक सुविधा दै छै जेना - Goodreads, Houzz, Last.fm आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 8) Social shopping networks—Shop online ई विभिन्न तरीकासँ लोककेँ कोनो वस्तु आनलाइन किनबाक-बेचबाक सुविधा दै छै जेना - Polyvore, Etsy, Fancy आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 9) Sharing economy networks—Trade goods and services ई विभिन्न तरीकासँ अर्थव्यवस्था ओ विभिन्न सेवा संबंधी जानकारी देबाक सुविधा दै छै जेना - Airbnb, Uber, Taskrabbit आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। 10) Anonymous social networks— ई विभिन्न तरीकासँ लोककेँ अपन पहिचान नुका कऽ कोनो विषयपर संवाद करबाक सुविधा दै छै जेना- Whisper, Ask.fm, After School आदि। एहि कैटेगरीमे आरो नाम भऽ सकैए। आब किछु एहम सोशल मीडियाक विवेचना देखी जकर महत्व मैथिली लेल बेसी अछि-- फेसबुक आ मैथिली 2004 मे फेसबुक केर शुरूआत भेल आ लगभग 2008सँ फेसबुकपर मैथिली आएल (आएल मने साहित्य ओ भाषाक रूपमे)। कहबाक मतलब जे लगभग 2008सँ मैथिल सभ खुलि कऽ बिना कोनो संकोचकेँ फेसबुकपर मैथिली भाषाक प्रयोग शुरू केलाह। सभ चीजक दुरूपयोग होइ छै आ फेसबुकक सेहो भेलै। तथापि ओइ दुरूपयोगक अलावे मैथिलीक संदर्भमे बहुत रास उपयोगी बात भेलै फेसबुकपर। प्राप्त जानकारीक अनुसारें 9 February 2008 केँ Videha e Journal फेसबुक चौबटिया कहि कऽ ग्रुप एलै जकर लिंक https://www.facebook.com/groups/7436498043 अछि आ एकर पहिल पोस्ट केर लिंक https://www.facebook.com/groups/7436498043/permalink/10150562846913044 अछि तकर बाद फेर अही नामसँ 7 July 2008 केँ विदेहक फेसबुक भर्सन (फेसबुक ग्रुप केर रूपमे) विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका केर नामसँ एलै जकरा एहि लिंकपर देखि सकै छी-https://www.facebook.com/groups/10299304978/ एहि ग्रुपक पहिल पोस्टक लिंक अछि-https://www.facebook.com/groups/10299304978/permalink/428765254978/ बादमे एहि ग्रुपक सभ पोस्टकेँ विदेहक तेसर आ बेसी उन्नत ग्रुपमे परिवर्तित कऽ देल गेलै जकरा एहि लिंकपर देखि सकै छी-- https://www.facebook.com/groups/videha/ ई बदलाव लगभग 2010-11मे भेलै जाहिमे आनो लोककेँ जुड़बाक सुविधा देल गेलै। ओहि समयमे इएह विदेह ग्रुप छल जे जाहिमे मैथिलीक हिसाबें पहिल बेर १०००० लोकसँ बेसी जुड़ल छल। ओना आब तँ अकड़-बकड़ पोस्टक ग्रुप बलापर लाख-लाखक संख्या छनि मुदा परिणाम सुन्ने भेटत। इंटरनेटपर पहिल उपस्थिति कोन अछि तेहने सन तथ्यहीन बहस फेसबुकपर सेहो चलल जे "फेसबुकपर मैथिलीक पहिल ग्रुप कोन?"। मुदा पहिनेहें जकाँ सभ गोटा अपन-अपन ग्रुपक पहिल हेबाक दाबी बिना कोनो लिंककेँ करैत रहलाह। विदेह सदिखन प्रमाण प्रस्तुत करैत रहल अछि। एहि ठाम सेहो लिंक देल गेल अछि। तँइ एखन धरिक प्रमाणक आधारपर ई मानबामे कोनो संकोच नै जे ग्रुप केर रूपमे विदेहक ग्रुप फेसबुपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति अछि। निच्चा किछु एहन तथ्य देल जा रहल अछि जाहिसँ मैथिलीक संदर्भमे फेसबुकक उपयोगिता साबित हएत--- फेसबुक, भाषा आ साहित्य फेसबुक मैथिली भाषा आ साहित्य लेल बहुत योगदान केलक। बिना कोनो स्कूल गेने, बिना कोनो कोंचिंग गेने जतेक लोक एहिठाम मैथिली सिखलाह तकर गिनती नै। जँ सच पूछी तँ मैथिली आंदोलनकारी सभ जे स्कूल वा कालेजमे मैथिली पढ़ाइ लेल अनेरे मारि करै छथि ताहिसँ नीक जे ओ ओतबे समयमे फेसबुकपर मैथिली लिखबा लेल लोककेँ प्रोत्साहत करथि तँ बेसी नीक रिज्लट निकलत। ओना हमरा ई मानबामे संकोच नै जे स्कूल वा कालेजमे कोनो भाषाक पढ़ाइ केर एकटा अलग महत्व होइत छैक।निच्चा किछु एहन तथ्य देल जा रहल अछि जाहिसँ मैथिलीक संदर्भमे फेसबुकक उपयोगिता साबित हएत--- 1) मैथिली भाषाक लिखित प्रयोग--- फेसबुकपर मैथिली लिखनाइ एकटा स्टेटस सिंबल बनि गेल आ शिक्षित-अशिक्षित, नेता-जनता, स्त्री-पुरुष सभ गोटा बिना कोनो वर्तनीकेँ वा कोनो गलतीकेँ चिन्ता केने मैथिली लिखला जाहिसँ मैथिली लिखए बला संख्या बढ़ल आ ई मैथिलीक भविष्य बहुत नीक रहत। फेसबुकपर साहित्य केर संदर्भमे विदेहक फेसबुक भर्सन बहुत रास काज केलक। एहि भर्सन द्वारा नव-नव लेखककेँ प्रोत्साहन भेटल जकर प्रभाव निकट भविष्यमे देखबामे आएत। 2) मैथिलीमे स्त्री लेखिकाक संख्या-- मैथिली लेल ई बहुत नीक जे फेसबुक मैथिली स्त्री लेल ओहन साधन बनि गेल जिनकर बोलकेँ बहुत रास कुच्रकमे फँसा कऽ राखि देने छल ई समाज। आजुक स्त्री कोनो बातक परबाह केने बिना अपन भावनाकेँ फेसबुकपर परसि रहल छथि। आ तइसँ मैथिलीमे नव-नव अध्याय-अनुभव जुड़ि रहल अछि। 3) मैथिली दलित साहित्य केर प्रचारक-- फेसबुकक माध्यमे भारत-नेपाल मिला कऽ जतेक मैथिलीक दलित लेखक, विचारक एलाह ततेक मात्र सिद्ध सरहपादे कालमे छल मने मैथिलीक एकदम शुरूआती समयमे। लगभग हजार सालसँ मैथिलीक समाजिक ताना-बानाकेँ जे तोड़ने छल तकरा फेसबुक तोड़ि देलक आ सही अर्थमे "मैथिल समाज" केर निर्माणमे सहयोग देलक। फेसबुक आ समाज फेसबुक आ फेसबुक ग्रुपसँ किछु लेखक बंधु तमसाएल रहै छथि। हुनक तामसक कारण ई जे लोक हुनकर कथित गंभीर रचनापर धियान नै दऽ फालतूक फोटो, बात आदिपर बेसी सक्रिय रहै छथि। ताहूमे जखन कियो कोनो घास-पात, तर-तरकारी, गाछ-बिरिछक फोटो दऽ पूछै छै-ई की छै आ ताहिपर हजारो लोकक लाइक-कमेंट आ से देखि लेखक सभ तखने जरि कऽ छाउर भऽ जाइत छथि। हुनका बुझाइ छनि जे हमर एतेक गंभीर विचार नष्ट भेल जा रहल अछि आ लोक सभ फालतू काजमे लागल अछि। मुदा एहन लेखक सभकेँ फेसबुकक उद्येश्ये नै बूझल छनि। वस्तुतः फेसबुकक जन्म एही सभ लेल भेल छै जाहिसँ लोक एक-दोसरसँ जुड़ल रहै। बादमे किछु प्रबुद्ध एकर उपयोग साहित्य-संगीत-राजनीति एवं अन्य काज लेल करए लगलै। लेखक सभकेँ धैर्य राखि एहि माध्यमकेँ लेखन लेल सार्थक बनबए पड़तनि आ तखन संभव जे साहित्यो केर दिन घुरतै। ओना घास-पात, तर-तरकारी, गाछ-बिरिछक फोटो लेल हमर विचार अछि जे ई ओहन लोक सभ लेल उपयोगी जे कि गाम-घरसँ कटि गेल छथि। आ फेसबुकपर एहन संख्या लाखोमें अछि तँइ एहन पोस्ट सभपर बेसी सक्रियता रहै छै। कहियो काल किछु वस्तुक संदर्भमे हमरो जानकारी बढ़ि जाइए एहन-एहन पोस्टसँ से हम स्वीकारै छी। हम मात्र हिंट देलहुँ एहि विषयपर कोनो समाजशास्त्री काज करथि तँ नीक विवेचना भऽ सकैए। फेसबुकसँ समाजिक संगठन हेबामे सुविधा भेलैए से चाहे ओ कोनो पाबनि-तिहारक संदर्भमे हो वा कि बाढ़ि-अकाल वा आन कोनो परस्थितिमे। बहुतो एहनो घटनाक सबूत अछि जाहिमे कोनो हेड़ाएल लोक अपन परिवारक लोक फेसबुकक कारण भेटलै। फेसबुकपर एक मिनटमे कोनो समाद हजार ठाम पसरि जाइत छै। फेसबुक आ धर्म फेसबुक मिथिलाक अपन निज ओ खाँटी पाबनि तिहार लेल अमृतक समान काज केलक अछि। बड़का पाबनि जेना दुर्गापूजा, होली, दिवाली, छठि आदिक शुभकामना तँ प्रचलित छल मुदा एहि माध्यमसँ हैप्पी तिलासंक्रांति, हैप्पी जूड़शीतल, हैप्पी जितिया, हैप्पी चौरचन, हैप्पी भरदुतिया आदि बेसी प्रचलित भेल। एकर अतिरिक्त मिथिलामे पसरल उपासक आगू सेहो हैप्पी लागए लागल। मिथिलाक एकटा बहुत बड़का वर्ग (गैर-ब्राह्मण ओ कायस्थ) सेहो अपन-अपन पूजाक लऽ कऽ फेसबुकक प्रयोग कऽ रहल छथि आ ई आरो नीक बात भेलै। निश्चित तौरपर मिथिलाक पछुआएल पाबनि-तिहार फेसबुक ओ अन्य प्लेटफार्म पाबि मजबूत भेल अछि। किछु एहन पाबनि जे कि व्यक्तिगत होइत छै जेना कोजगरा, मधुश्रावणी, भुँइया बाबाक पूजा आदिक कायाकल्प सेहो भऽ रहल अछि एहि माध्यमसँ। धर्मक एहि रूपसँ मैथिलीक गीत विधा बेसी लाभ उठेलक। जाहि पाबनि सभहक गीत प्राचीने कालसँ नै केर बराबरि होइत छल ताहू पाबनि सभहक गीत आब बहुतक संख्यामे भेटत। अप्रैल 2016 मे फेसबुक लाइभ हेबाक सुविधा देलकै मने अहाँ अपन भीडियो रूपमे कोनो बात सेहो कहि सकैत छी। ई सुविधा आन विषय लेल जेहन हो मुदा मैथिली गीत-संगीत लेल अमृतक समान काज केलक। लोक अपन-अपन लाइभ प्रस्तुति दऽ अपन प्रतिभाकेँ समाजक सामने राखि देलखनि। जकर प्रत्यक्ष लाभ एहि विधाकेँ भेटि रहल छै। ओना ई अलग बात जे बर्ख 2020 मे लाकडाउनक कारणे एहि लाइभ केर दुरुपयोग भेलै। एक दिस जनता भायनक दुख भोगि रहल चल तँ दोसर दिस साहित्यकार लेल 'लाइभ काल' चलि रहल छल। फेसबुक आ राजनीति जखने समाज छै तहने राजनीति हेबे करतै से चाहे कोनो स्तरक किए ने हो। आइ स्थिति ई छै जे देशक हरेक नेता ओ पार्टीक सोशल मीडिया प्रभारी छै। आ एहि लेल भारी-भरकम खर्च प्रस्तावित करै जाइए एहि प्रोफेशन केर लोक सभ। भारतमे भारतक चुनाव प्रचार जमीनपर कम आ सोशल मीडियापर बेसी होइत छै। आ एहिसँ कोनो नेताक हारि-जीतक समीकरण सेहो तय होइत छै। 2008 मे अमेरिकामे बराक ओबामा अपन चुनाव केर प्रबंधन सोशल मीडियामे सेहो करबेलाह आ जितलाह ताही तर्जपर 2014 मे भारतक प्रधानमंत्री चुनाव भाजपा सोशल मीडिया द्वारा लड़लक आ ओहि चुनावमे जीतल आ तकर बाद भारतक सभ राजनैतिक दल अपन-अपन पक्ष फेसबुकपर राखए लागल ताहूमे एखन धरि भाजपे आगू अछि। एहिसँ पहिने भारतेमे अन्ना हजारे द्वारा 2011 मे कएल गेल अनशन सेहो फेसबुकक कारणे पसरल आ ओहि आंदोलनसँ किछु नीक नेता जेना अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया आदि निकललाह। फेसबुक राजनीतिकेँ पलटियो दैत छै। 2010 मे मिश्र (इजिप्ट) मात्र फेसबुकक सहारासँ अपन भ्रष्ट ओ निरंकुश शासनकेँ खत्म केलक एकरा Egyptian revolution of 2011 केर नामसँ जानल जाइत छै। विश्वक हरेक कोनामे अपन अवाज उठेबाक लेल फेसबुक आ सुलभ साधन छै। फेसबुक आ बेपार विज्ञापन लेल फेसबुक लेल नीक साधन अछि आ बेपार तँ मुख्यतः विज्ञापनेपर टिकल अछि। जहाँ आन माध्यमसँ विज्ञापन लेल पाइ खर्चा करए पड़ैत छै ततए फेसबुक ओ अन्य सोशल मीडियासँ अपेक्षाकृत नमहर सर्किलमे अहाँ अपन चीजकेँ राखि सकैत छी। प्रायः हरेक कम्पनी केर सोशल मीडिया एकांउट छै जतए ओ अपन नव वस्तु, स्कीम आदिक विवरण दै छै। एकर अतिरिक्त आनो विषयमे फेसबुक सहायक भेल। आ एहने एकटा विषय अछि मजाकिया फोटो, मीम, कार्टून आदि। फेसबुकपर मैथिलीमे लिखल आ मैथिलसँ संबंधित मजाकिया फोटो, मीम, कार्टून बहुत आएल आ आबिए रहल अछि। इंटरनेटपर मैथिली लेखकक उपर पहिल बेर एडिट कएल फोटो (मजाकिया, मीम, कार्टून) एकै संगे तीन टा लेखक गजेन्द्र ठाकुर, आशीष अनचिन्हार ओ उमेश मंडलपर एलै जे विकास ठाकोर नामक एक फेक आइडी 2011 मे बनेने रहै। जे ओहि समयमे फेसबुकपर एक्टिभ रहथि से जनैत हेता जे विकास ठाकोर दू मासमे मिथिला राज्य बना देबाक दावा केने रहै। फोटो दऽ रहल छी। अपनेपर हँसि कऽ अपन नाम इतिहासमे पहिल हेबाक घुसिया रहल छी। ई कार्टून बनबए बला लोक कार्टूने धरि नै रहलाह हरेक पाबनि-तिहारपर ओकर अनुकूल फोटोशाप सेहो करए लगलाह जे कि आकर्षक छल आ पाबनि-तिहारकेँ एकटा नव रंग देलक। ई छल सकारात्मक पक्ष मुदा एकर अतिरिक्त किछु नकारात्मक तत्व सेहो छै आ ई तँ संसारक नियमे छै जे कोनो वस्तुमे गुण-अवगुण दूनू रहैत छै। फेसबुकक दू टा फीचर आ दू टा भ्रम मैथिलीमे बहुत रास भ्रम छै आ ताहूमे लगभग 99% भ्रम व्यक्तिगत भ्रम छै। मुदा मैथिल बहुत चालाक होइत छथि आ ओ अपन व्यक्तिगत भ्रमकेँ सार्वजनिक भ्रम बना देबाक कला जानै छथि। मैथिलीमे सोशल मीडिया तँ एकै मुदा ओकरासँ संबंधित भ्रम सेहो एलै आ लोक ओकरा अपन व्यक्तिगत भ्रम बना पसारहो लगलै। आइ अइ ठाम हम फेसबुकसँ संबंधित दू टा भ्रमपर विचार राखब-- 1) People You May Know--- मैथिल ई भ्रम पोसने रहै छै जे लोक हमर प्रोफाइल नुका कऽ देखैए तँइ हमरा 'People You May Know' मे लोक सभ देखाइए। किछु लोकक ईहो विचार छनि जे जँ हम केकरो प्रोफाइल नुका कऽ देखबै तँ हमरो ई देखाएत। हमरा समझिसँ ई पूर्णतः भ्रम छै। भ्रमसँ बेसी आत्ममुग्धता कहल जेतै। ओना ई भ्रम आनो समाजमे छै आ गूगलपर एकर समर्थनमे सेहो लेख भेटि जाएत मुदा फेसबुकक हिसाबसँ देखल जाए तँ ओहन लोक जे कि अहाँक कोनो मित्रक लिस्टमे छथि तकरा फेसबुक 'People You May Know' मे देखाबै छै तेनाहिते जँ कियो ग्रुपमे छथि तँ ओहि ग्रुपक सभ सदस्यकेँ एक-दोसर 'People You May Know' बला खंडमे समय-समयपर देखाइ पड़तनि। फेसबुक स्थान, शिक्षण संस्थान, रुचि, कार्य आदिक आधारपर सेहो 'People You May Know' मे दै छै। सभसँ बेसी मजा केर बात ई जे 2014 मे फेसबुक ह्वाट्सएपकेँ कीनि लेलकै। आब ह्वाट्सएप कोना काज करै छै से देखियौ। जखन कियो ह्वाट्सएप शुरू करै छै तखन ह्वाट्सएप प्रयोगकर्तासँ पूछै छै जे कि ह्वाट्सएप अहाँक फोटो, कान्टेक्ट, कैमरा आदिक प्रयोग कऽ सकैए आ समान्यतः हम सभ ओकरा एलाउ कऽ दैत छियै। असल खेला एहू ठाम छै। मानू जे अहाँक कान्टेक्ट लिस्टमे एहनो आदमी छथि जे कि अहाँ संग फेसबुकपर नै छथि मुदा फेसबुक ओहि आदमीकेँ 'People You May Know' बला लिस्टमे देखेतै। एहिठाम ई धेआन राखए बला बात ई जे स्थान, शिक्षण संस्थान, रुचि, कार्य आदिक आधारपर फेसबुक लोकक सजेशन दै छै से कियो भऽ सकैए जँ इच्छा अछि तँ जूड़ू अन्यथा ओकरा रीमूभ कऽ दियौ। जुड़बै कोना जखन कि अहाँ ओकर प्रोफाइल चेक करबै आ जँ मनोनुकूल हएत। जँ मनोनुकूल नै भेल तँ अहाँ अपना घर आ लिस्ट बला तँ अपना घरमे अछिए। मुदा ई साक्षात भ्रमे छै जे 'People You May Know' बला लिस्टमे वएह आदमी आएत जे कि अहाँक प्रोफाइल चेक करत। 2) प्रोफाइल रीचमे कमी-- प्रोफाइल रीच केर मतलब भेल जे अहाँक पोस्ट कतेक लोक धरि पहुँचै छै मुदा जँ पोस्टपर कोनो लाइक-कमेंट नै कएल जाए तँ पोस्टकर्ता ई नै बूझि पाबै छथि जे कतेक लोक पोस्ट देखलाह (स्टोरी एवं कोनो प्राइभेट ग्रुपमे के-के देखलाह से आबि जाइत छै, भीडियोमे कतेक लोक देखलाह से आबि जाइत छै) तँइ साधारणतः लोक लाइक-कमेंटमे कमीकेँ "प्रोफाइल रीचमे कमी" मानि लै छथि। समान्यतः फेसबुक शुरूआतमे कोनो आदमीक लिस्टक अधिकाशं लोकक पोस्टकेँ देखाबैत छलै। लोक स्क्रोल करैत छल आ ओकर लिस्टक पोस्ट देखाइत छलै तेनाहिते दोसरो आदमीकेँ हमर वा अहाँक पोस्ट देखाइत छल हेतै। मुदा बादमे फेसबुक लोकक रुचि एंव ओ अपने कतेक दोसर लोकक पोस्टपर जाइत छै ताही अनुरूप रीच दै छै। ई बदलाव लगभग 2015 केर बाद भेलै आ ताहि समयमे वा एखनो भाजपाक सरकार छै। तँइ संभवतः लोककेँ 'प्रोफाइल रीचमे कमी' केर समस्या तकनीकी नै राजनैतिक लागए लगलै। मुदा ई रीच केर समस्या भारतेमे नै आनो देशमे भेलै। ओना सभ सरकार अपना समयमे मीडियाकेँ दबा दै छै तँइ वर्तमान भाजपा सरकार सेहो केने हेतै मुदा जे बदलाव फेसबुक अपने कए रहल छै ताहि लेल राहुल-मोदी-अमित-सोनियाकेँ जिम्मेदार नै ठहराएल जा सकैए। मैथिलीमे ई समस्या ओहने लोक सभ लग छनि जिनका अपन ज्ञानक दाबी छनि आ ओ अपन हरेक पोस्टक अपन लिस्टक हरेक लोकक लाइक-कमेंट चाहै छथि मुदा ओ अपने कहियो गलतियोसँ आन लोकक पोस्टपर नै जाइ छथि। जँ हम लिस्टमे 1000 लोक छथि आ हम सभ लोकक पोस्टपर जइए (भने लाइक-कमेंट करियै कि नै करियै) तँ हमरो पोस्ट ओहि सभ लोक लग पहुँचबे टा करतै। जँ हम हजारमेसँ 200 लोकक पोस्टपर जेबै तँ हमरो पोस्ट ओही 200 लोक लग पहुँचतै आ 800 लग दस-बीस दिनमे एकटा। फेसबुकक ई वर्तमान स्वरूप बेसी व्यावहारिक छै (लोक एकरा राजनैतिक बना देलकै से बात अलग)। तँइ सी फर्स्ट आप्शन रहितो लोक ओहन पोस्टकेँ नै देखि पाबै छै। बहुत लोक अपन लिस्टमे मित्र तँ राखै छथि मुदा ओ मित्र सभ हुनका अनफालो केने रहै छनि। एहनो स्थितिमे पोस्टक रीच कम हेतै। एहिठाम लोक पेड रीच लऽ कऽ सेहो भ्रममे छथि। पेड रीच प्रोडक्ट लेल छै प्रोफाइल लेल नै मुदा बहुत लोक अपनाकेँ प्रोडक्ट बना पेड रीच केर सुविधा लऽ लै छथि। आन लोककेँ बुझाइ छनि जे हुनकर रीच बेसी आ हमर कम अछि। हरेक राजनीतिक दल केर पेज पेड रीच छै ताहूमे जे बेसी दाम देने छै ताहि पेजक रीच बहुत हेतै आ ओकर पोस्ट फेसबुक लेल महत्वपूर्ण हेतै। बहुत संभव जे भाजपा केने हो मुदा सोचियौ जँ कांग्रेसक सरकार बनतै तँ कि ओ ई सुविधा छोड़ि देतै? सोझ बात बुझियौ जे आब प्रोफाइल रीच एहि बातपर निर्भर करैत छै जे अहाँ आन कतेक लोकक पोस्टपर गेलियै एवं आन कतेक लोक अहाँक पोस्टपर आएल। दूनूमेसँ जँ कोनो एकटा शर्त पूरा हेतै तखने रीच बनल रहतै। ओना उपरक दूनू तथ्य सर्वज्ञात छै मुदा तकर बादो भ्रम पसरल छै। फेसबुकपर मैथिलीक किछु प्रसिद्ध ग्रुप आ एकर काज --- 1) विदेहक फेसबुक भर्सन https://www.facebook.com/groups/videha/, एहि ग्रुप मुख्य एडमिन गजेन्द्र ठाकुर छथि। एहिठाम हम विदेहक फेसबुक भर्सन केर किछु काज संक्षिप्त रूपें देखा रहल छी A) विदेह फेसबुक ग्रुपपर सभसँ पहिल काज मैथिली हाइकू केर अछि। गजेन्द्र ठाकुर पहिने हाइकू केर आलेख देलखिन तकर बाद हरेक दिन एकटा गाछक वा कोनो फोटो द' क' हाइकू लिखबाक आग्रह करै छलखिन। एकर प्रभाव तेहन तेहन भेलै जे सभसँ पहिने मैथिलीमे हाइकू केर लेखकमे अभूतपूर्व वृद्धि देखल गेल जाहिमे सुनील कुमार झा, मिहिर झा, ओमप्रकाश झा, इरा मल्लिक, शिव कुमार झा, ज्योति सुनीत चौधरी, अमित मिश्र, चंदन कुमार झा, मुन्नाजी, रामविलास साहु सहित एहि पाँतिक लेखक सेहो सम्मलित छथि। 2008सँ मैथिली हाइकू केर ब्लाग सेहो अछि जाहि ठाम विदेहक फेसबुक भर्सनसँ हाइकू केर संग्रह कएल गेल अछि। ई ब्लाग एहि पतापर देखल जा सकैए http://maithili-haiku.blogspot.in/ B) फेसबुकक माध्यमसँ विदेह मैथिलीक वर्तनी ओ मानकता लेल नीक प्रयास केने अछि आ तही कारणसँ कमसँ कम इंटरनेटपर सुदूर नेपालसँ लए कऽ दरंभगाक मैथिली एकसमान भेल अछि (ईहो धातव्य जे किछु जबरदस्ती बला मानकता बला विद्वान सभ एखनो कृत्रिम मैथिलीकेँ पकड़ने छथि)। विदेहक एहि मानक भाषाक लेखककेँ "विदेह भाषा पाक" नाम देल गेलै जे कि विदेह पोथी डाउनलोडपर सेहो उपल्बध अछि। C) विदेहक फेसबुक भर्सनपर जतेक नाटक संबंधी रचना आएल तकरा विदेह मैथिली नाट्य उत्सव नामक ब्लागपर राखल गेल अछि। विदेह ग्रुपक सहयोगसँ लगातार चनौरागंजमे विदेह नाट्य उत्सवक आयोजन भेल अछि जे कि मैथिलीमे समानांतर नाट्य अवधाणाकेँ मजगूत केलक। D) विदेहक फेसबुक भर्सन मैथिली बीहनि कथाक लगातार सहयोगी बनल रहल। एहि ठाम देल गेल आ प्रोत्साहित भेल बीहनिकथाकारकेँ मैथिली बीहनिकथा ब्लागपर राखल गेल जकरा एहि लिंकपर देखल जा सकैए http://vihanikatha.blogspot.in/ E) विदेह ग्रुपपर आएल प्रमुख कविताकेँ मैथिली कविता नामक ब्लागपर राखल गेल अछि जकरा http://maithili-kavita.blogspot.in/ लिंकपर देखल जा सकैए। लगभग 400सँ उपर कविताक संकलन अछि। F) विदेह ग्रुपपर आएल प्रमुख कथाकेँ मैथिली कथा नामक ब्लागपर राखल गेल अछि जकरा http://maithili-katha.blogspot.in/ लिंकपर जा क' देखि सकै छी। G) विदेह ग्रुपपर आएल प्रमुख आलोचना, समीक्षा आदिकेँ मैथिली कथा नामक ब्लागपर राखल गेल अछि जकरा http://maithili-samalochna.blogspot.in/ लिंकपर जा क' देखि सकै छी। 2) मिनाप MINAP(Mithila Natyakala Parishad) https://www.facebook.com/groups/258380252004/ एडमिन, सुनील कुमार मल्लिक, प्रवेश मल्लिक।, 3) मैथिली गजल भंडार, https://www.facebook.com/groups/mghajal/ एडमिन कुंदन कुमार कर्ण 4) मिथिलांगन ("MITHILANGAN" - A Literary, Social and Cultural Organisation), https://www.facebook.com/groups/mithilangan/, एडमिन आनंद रंजन 5) घटकैती झारखंड मिथिला मंच https://www.facebook.com/groups/226653764434000/, घटकैती झारखण्ड मिथिला मंचक शुरुआत 26 नवम्बर 16 के झारखण्ड मिथिला मंच के स्वयंसेवक भाई सुजीत झा जी केलथि। वर्तमान एडमिन निशा झा एवं सुजीत झा छथि। एहि ग्रुप द्वारा पहिल विवाहक समाचार मई 17 मे प्राप्त भेल जे संपन्न भेल छल बोकारोमे, तकर बादसँ एखन धरि 40 गोटे समाचार देने छथि जे हम्मर पुत्र-पुत्री के विवाह एहि घटकैती ग्रुप द्वारा भेल, विवाह त बहुतो होइ ये ग्रुपक माध्यमे लेकिन ग्रुप मे सुचना बहुतो कम गोटे देइ छैथ, खैर कोनो बात नै हम सब निःस्वार्थ अप्पन कार्य में लागल छी, वर्तमानमे एहि ग्रुपमे 3000 सँ ऊपर बायोडाटा राखल अछि। 6) धूआ धजा https://www.facebook.com/groups/dhuadhaja/ (एडमिन परमेश्वर कापड़ि, कुमार भाष्कर), 7) समदिया https://www.facebook.com/groups/samadiya/ (प्रियंका झा, पूनम मंडल), 8) विदेह नाट्य उत्सव (https://www.facebook.com/groups/136683676426547/?ref=group_browse_new) एडमिन बेचन ठाकुर, 9) मैथिली थियेटर (https://www.facebook.com/groups/MAITHILIRANGMANCH/) एडमिन आशुतोष अभिज्ञ, 10) अछिंजल (https://www.facebook.com/groups/achhinjal/) एडमिन पवन झा, 11) नेना भुटका (https://www.facebook.com/groups/101930576873357/) एडमिन देवाशुं वत्स, एकर अतिरिक्तो बहुत रास ग्रुप अछि जकरा जोड़ल जा सकैए। 2014 केर बादसँ फेसबुक ग्रुपक एकटा ट्रेंड देखबामे आएल जे एडमिन कोनो पोस्ट एप्रूभ करबाक काज अपना हाथमे लऽ लै छथि आ सौंसे हल्ला केने फीरै छथि जे हमर ग्रुपमे साफ-सुथरा पोस्ट अबैए मुदा ई बात निश्चित जे एहन पोस्टमे बेमतलब पोस्ट बेसी अबैत छै। Twitter आ मैथिली Twitter माइक्रोब्लागिंग सोशल साइट छै जे कि अमेरिकन Jack Dorsey, Noah Glass, Biz Stone आ Evan Williams द्वारा मार्च 2006मे बनाएल गेलै आ ओही सालक जुलाइमे सार्वजनिक कएल गेलै। Twitter नेता ओ राजनीतिक ओ समाजिक संगठन लेल बेसी प्रयोग होइए। ओना जे मैथिल फेसबुकपर शुरुआतसँ छथि सएह सभ Twitter पर शुरुआती समयमे (2008-9)मे एलाह आ बादमे आरो बहुत रास लोक सभ जुड़लाह। Twitter पर हैश टैग केर महत्व छै। जँ अहाँ अपन कोनो मुद्दाकेँ सरकार लग जोरगर ढंगसँ राखए चाहैत छी तँ Twitter पर हैशटैग ट्रेंड करबा दियौ, सरकार तुरत एक्टिभ भऽ जाइत छै। विगत किछु समयसँ मिथिला स्टूडेंट यूनियन मिथिला-मैथिलीसँ संबंधित किछु मुद्दाकेँ नीक जकाँ ट्रेंड करबा रहल अछि। आरो संस्था सभ विभिन्न मुद्दापर ट्रेंड करबा रहल अछि जे कि मिथिला-मैथिली लेल बादमे जा कऽ नीक हएत। ह्वाट्सएप आ मैथिली ह्वाट्सएप बातचीत करबाक एकटा नवीनतम आ सुलभ साधन भऽ गेल छै। एकरा माध्यमसँ संदेश आ फोटो पठेनाइ एकदम आसान भऽ गेल छै। वर्तमानमे ह्वाट्सएपसँ फ्री काल केनाइ सेहो संभव छै। जनवरी 2009मे जेन कूम द्वारा जन्मल ह्वाट्सएप आब फेसबुक कीनि लेने छै। ह्वाट्सएप सेहो मैथिली लेल वरदान साबित भेल अछि। ह्वाट्सएप हजारों लोक देवनागरी आ रोमन लिपिक माध्यमें मैथिलीमे लिखित बातचीत कऽ रहल छथि। ह्वाट्सएप ग्रुप बनेबाक सुविधा सेहो देने छै आ मैथिली एकर उपयोग सेहो केलक। ह्वाट्सएपपर मैथिलीक किछु ग्रुप एना अछि-- 1) मैथिली गजल 2) मैथिली बिहनि कथा एकर अलावे हजारो एहन ग्रुप अछि जकर नाम एहिठाम जोड़ल जा सकैए। ह्वाट्सएप सभहँक निजी मोबाइल द्वारा संचालित रहै छै तँइ एहि माध्यममे पहिल के आ दोसर के से तय करब असंभव तँइ एहि चर्चाकेँ कात केलहुँ। एहिठाम जखन ह्वाट्सएप केर चर्चा भइए गेल अछि तखन आन-आन एप्स केर चर्चा सेहो कऽ ली। Apps शब्द application केर छोट रूप छै। कंप्यूटर लेल software ओकर application छै आ एहि application मे Web browsers, e-mail programs, word processors, games आदि अबै छै। ई application सभ inbuilt (पहिनेसँ) रहैत छै जखन कि काज ओ सुविधाक हिसाबसँ अहाँ बाहरी application सेहो डाउनलोड कऽ सकैत छी। विकासक संग-संग मोबाइलकेँ सेहो कंप्यूटर जकाँ बनाएल गेलै। ऐतिहासिक दृष्टिकोणसँ IBM Simon दुनियाँक पहिल स्मार्ट फोन छै जे कि August 1994 मे लांच भेल रहै। स्मार्ट फोन ओ भेल जे बहुउद्येशीय हो मने फोन अलावे आर बहुत रास काज (वर्तमानमे ठीक कंप्यूटरे जकाँ)। एकर बाद क्रममे Nokia 9000 Communicator (1996) एलै आ 1999 मे Qualcomm नामक कम्पनी pdQ Smartphone" नामसँ निकालक जे कि CDMA आ Palm OS (Palm आपरेटिंग सिस्टम)सँ चलै छल ई टचस्क्रीन बला फोन छल आ वस्तुतः आजुक टचस्क्रीनक माए-बाप। 1999 मे जपानक NTT DoCoMo नाम कम्पनी i-mode नामक मोबाइल इंटरनेट लांच केलक जे कि ओहि समयमे सभसँ बेसी स्फडसँ चलैत छल। एकर बाद 2000 मे Ericsson R380, फरवरी 2001 मे Kyocera 6035, जून 2001 मे Nokia 9210 Communicator, 2002 मे Treo 180 नाम स्मार्ट फोन सभ एलै। पहिल बेसी केपिसटी बला टचस्क्रीन फोन LG Prada छल जे कि दिसम्बर 2006 मे आएल। जनवरी 2007 मे एप्पल पहिल iPhone अनलक। जेना कंप्यूटर लेल कोनो ने कोनो आपरेटिंग सिस्टम (अधिकत विंडोज) तेनाहिते स्मार्टफोन लेल सेहो आपरेटिंग सिस्टम चाही। embedded systems, PenPoint OS, Magic Cap OS आदि बहुत OS समेत वर्तमान समय अधिकांशतः दू OS पर सिमटल अछि पहिल iPhone OS (6, March 2008) आ दोसर Android । एप्पल द्वारा पहिल iPhone OS 6, March 2008 मे लांच भेलै जखन कि Android सेहो सितम्बर 2008 मे लांच भेल, Android गूगल द्वारा संचालित अछि । एहि दू केर अतिरिक्त विंडोज मोबाइल आपरेटिंग सिस्टम सेहो नीक अछि जे कि माइक्रोसाफ्ट द्वारा संचालित अछि। भारतक पहिल Android स्मार्ट फोन HTC Magic छल जे कि July 2009 मे लांच भेल। भरतक पहिल iPhone " iPhone 3G" छल जे कि 2008 मे लांच भेल। आ एहि स्मार्टफोन सभ बहुत रास सुविधा तँ छलैहे संगे-संग ओकरा आर स्मार्ट बनेबाक लेल बाहरी application (App) जोड़ए लागल। आ ई App सभ मोबाइल कम्पनी द्वारा सेहो बनाएल जाइत छै आ आन साफ्टवेयर कम्पनी द्वारा सेहो। नीक App भेलासँ कमाइ सेहो नीक होइत छै आ यूजरकेँ सुविधा भेटैत छैक। प्रायः सभ सेवा देबए बला कम्पनी अपन-अपन App बनबेने छै। App सभ तरहक भेटत। स्मार्टफोनक बढ़त मिथिलामे सेहो भेलै आ सभ अपन-अपन काजक हिसाबसँ किछु मिथिला-मैथिल-मैथिलीसँ संबंधित App सेहो बनेलक। उपल्बध आँकड़ासँ देखल जाए तँ 2013 मे पहिल App बनल जे कि मिथिला-मैथिल-मैथिलीसँ संबंधित छल। निच्चामे ई लिस्ट देल जा रहल अछि-- 1) Songs for Mithila (apkdotin, apkdotin@gmail.com) Released Date-18 Feb 2013 2) Maithili Talking Dictionary (Khandbahale.com, support@ Khandbahale.com) Released Date- 8 Oct 2013 3) Maithili to English Dictionary ((Khandbahale.com, support@ Khandbahale.com) Released Date- 8 Oct 2013 4) Mithilanchal Fm ( I tech Nepal, account@itechnepal.com) Released Date-24 Nov 2015 ई Mithilanchal Fm द्वारा बनबाएल गेल छै। 5) Maithili Jindabaad (ACApp studio) Released Date- 10 Jan 2016 6) English To Maithili Dictionary (VB Nexcod, vbnexcod@gmail.com) Released Date- 18 May 2016 7) Maithili Patra (JCApp Studio- 1st online Panchang, JCAppStudio.asist@gmail.com) Released Date- 19 August 2016 8) English to Maithili Dictionary (Best 2017 translator App, rudrap775@gmail.com), Released Date- 16 Sep 2016 9) English To Maithili Dictionary (Translate app, dp0591240@gmail.com) Released Date- 19 Oct 2016 10) English to Maithili Dictionary (Live radio Music , manishapandav52@gmail.com) Released Date-20 Oct 2016 11) Maithili Bible (audio) ( LuongOolong, huuluongvip682@gmail.com) Released Date-1 Nov 2016 12) English to Maithili Dictionary (XW infotech, piyushmakwana3666@gmail.com) Released Date- 20 Nov 2016 13) Maithili Dictionary ofline (Daily Apps, dailyapps@yahoo.com) Released Date- 21 Jan 2017 14) Mithilakshar (JC App) Released Date- 15 March 2017 15) Maithili Talk (Bright logical) Released Date- 31 March 2017 16) Maithili Music (Bright logical, florajha@gmail.com) Released Date- 31 May 2017 17) Maithili Video (SparkZeal Technologies pvt ltd, jksah05@gmail.com) Released Date- 11 July 2017 18) Maithili Bible (LCI apps, maithilibible@gmail.com), Released Date-25 sep 2017 19) Maithili Songs-Maithili Videos (Developer- Devaguru Bruhaspati App) Released Date- 10 Dec-2017 20) Maithili Shadi Vivah (Noblers career Map classes pvt ltd, amitjha07@gmail.com) Released Date-26 Dec 2017 21) Maithili video songs: Maithili video Gane (full entertainment video, fenil.sharmaa002@gmail.com) Released Date- 7 Feb 2018 22) Maithili Vivah- Matrimonial App (SKS infotech , contact@mithilavivah.com) Released Date-3 March 2018 23) Maithili Fakra (Megamaind lab , Megamaindlabworks@gmail.com, Chennai) Released Date-23 March 2018 24) Maithili Song Video: Maithili Bhajan ( Mihir Nayak – mihirnayak@gmail.com), Released Date-16 May 2018 25) English to Maithili Dictionary (Best 2018 Apps, best2018apps@gmail.com) Released Date-20 June 2018 26) Maithili Panchang (Roshan choudhary, roshanchoudhry@hotmail.com) Released Date-9 Sep 2018 27) Maithili Sundar Kand (Roshan choudhary ) Released Date- 23 Sep 2018 28) Mithila Jansamvad (WoZoo Technology, editor@mithilajansamvad.com) Released Date-10 Dec 2018 29) Maithili Video status Songs-2019 (Tradevend, contact@ Tradevend.com) Released Date-12 Dec 2018 30) Maithili Panchang (Roshan choudhary ) Released Date-12 Dec 2018 31) Maithili Video Songs HD (Sajeevsapp, sajeevsaapps@Gmail.com) Released Date-23 Jan 2019 32) Being Maithili (ACApp) Released Date- 6 Feb 2019 33) Maithili Sangam:Family matchmaking & Matrimony (People Interactive, care@sangam.com) Released Date- 30 March 2019 34) Maithili Hospitals (MEngage , engage@mengage.in) Released Date-21 May 2019 35) Maithili status Video (Alisha ,alishaadnan05@gmail.com) Released Date-19 June 2019 36) Maithil matrimony for maithil brides and grooms (communitymatrimony.com) Released Date-24 June 2019 37) Maithili Movies (Rameen, rameenraheel918@gmail.com) Released Date-27 June 2019 38) Maithili Geet (Thegauravmishra,officialgauravmishra@gmail.com) Released Date- 7 Sep 2019 यूट्यूब आ मैथिली फरवरी 2005मे यूट्यूब केर स्थापना भेल आ नवम्बर 2006 एकरा गूगल कीनि लेलकै। T- series भारतक पहिल यूट्यूब चैनल अछि जे कि 13 March 2006 मे शुरू भेल https://www.youtube.com/user/tseries/about मुदा एहिपर पहिल भीडियो 23 Dec 2010 मे देल गेलै। मैथिली हिसाबसँ हिसाबसँ देखी तँ vijay7701 नामसँ 3 Feb 2007 केँ एकटा चैनल शुरू भेलै जाहिमे शारदा सिन्हाजीक गाएल एकै गीतक दूटा भीडियो अछि आ पहिल भीडियो 3 Jun 2007 केँ देल गेलै - https://www.youtube.com/user/vijay7701/about ई गीत मैथिलीक अछि मुदा ओकरापर लेभल भोजपुरीक लागएल गेल छै आ तकर एकमात्र कारण जे ई गीत सभ मैथिल ब्राह्मणक विधि-बेबहारमे नै अबैत छै मुदा आन मैथिल जातिमे बजैत छै। तेनाहिते gopal yadav केर नामसँ एकटा चैनल छै - https://www.youtube.com/user/rustymind1/about जाहिपर 12 Feb 2007 केँ दू टा मैथिली आ 13 Feb 2007 केँ एकटा भोजपुरी भीडयो देल गेलै। अंशुमान सिन्हा (शारदा सिन्हाजीक पुत्र) 11 Jan 2008 मे अपन चैनल लेलाह https://www.youtube.com/user/mranshumansinha/about जाहिमे पहिल भीडियो 2010 मे देल गेलै सेहो आन-आन भाषाक, किछु मैथिली गीत तीन-चारि सालक बाद देल गेलै। गजेन्द्र ठाकुर अपन चैनल 10 Apr 2008 मे लेलाह https://www.youtube.com/user/ggajendra71/about जाहिपर 27 Apr 2008 केँ पहिल भीडियो एलै। एकर तुरंते बाद Jun 2008 केँ रजनी पल्लवीजीक चैनल आएल https://www.youtube.com/user/rajnipallavi/about जाहिपर पहिल भीडियो 20 Jul 2008 केँ एलै। आ एहि तीनक बाद मैथिली चैनलक संख्यामे बहुत वृद्धि भेल हम अपनो चैनल 22 Aug 2009 केँ लेलहुँ https://www.youtube.com/user/ashishanchinhar/about मुदा एहिपर भीडयो हम सात बर्ख बाद देलहुँ। धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक चैनल https://www.youtube.com/user/premarshi/about 8 Jun 2010 केँ आएल आ पहिल भीडियो 1 Sep 2010 केँ देल गेल। वर्तमान समयमे भीडियोक माध्यमसँ काज करबाक यूट्यूब केर बहुत पैघ सहारा छै। भीडियो शूट कए कऽ यूट्यूबपर अपलोड करू आ अपन बात सभ धरि पहुँचाबू। ई हरेक तरहँक भीडियो लेल छै। चाहे राजनीतिक हो कि समाजिक कि साहित्यिक कि कैरियरक। जीवनक हरेक क्षेत्रसँ संबंधित भीडियो भेटि जाएत एहिठाम। बेसी लोकप्रिय भेलापर ओहि भीडियोसँ अर्थोपार्जन सेहो होइत छै। 2010 केर बाद जँ हम मैथिली यूट्यूब चैनल केर गिनती करए लागी तखन सभ काज छोड़ए पड़त। मुदा जे नीक ओ प्रमुख अछि ताहिमेसँ किछु प्रमुख नाम एना अछि (उपरक नाम छोड़ि ई लिस्ट अछि कारण उपर ओकर चर्चा भेले अछि)— 1) मिथिलांचल गीत- https://www.youtube.com/c/Mithilanchal/about 2) मैथिली टी.भी- https://www.youtube.com/c/MaithiliTV/about 3) गंगा मैथिली- https://www.youtube.com/channel/UC41hszq3ex3RFkRD9rAFO-w/about 4) नीलम मैथिली https://www.youtube.com/channel/UClWIHG6uYYnpYprQyGTJfmg/about 5) मिथिला मिरर- https://www.youtube.com/user/MithilaMirror/about 6) मधुर मिथिला- https://www.youtube.com/channel/UCZCpHpF-g9X_pDM_81iJHmA/about 7) मिथिला मचान (Live Baatcheet)- https://www.youtube.com/c/LiveBaatcheetweb/about 8) मिथिला दर्शन- https://www.youtube.com/c/MithilaDarshan/about एहि केर अतिरिक्त JM News केर नामसँ एकटा नीक चैनल आएल अछि- https://www.youtube.com/c/JaiHindMaithiliNews/about जे कि मैथिलीक अतिरिक्त हिंदीमे सेहो मैथिल-मिथिला-मैथिलीसँ संबंधित तथ्य सभ लग पहुँचाबै छथि। JM News एकटा नीक प्रयास अछि। एकर प्रभाव निकट भविष्यमे देखबामे आएत। एकर अतिरिक्त आरो बहुत रास नीक-नीक चैनल सेहो अछि जकर नाम जोड़ल जा सकैए। एहि बीचमे हम फेसबुकपर जानए चाहलहुँ यूट्यूब केर पहिल चैनल सभकेँ बारेमे तँ प्रणव झाजी सूचना देलाह जे ओ 2007मे यूट्यूबपर रजनी पल्लवीजीक चैनलसँ गीत सुनने छलाह बादमे रजनीजी सूचना देलीह जे ओ 2006मे चैनल बनेने छलीह मुदा ओकरा हटा कऽ 2008 मे नव बनेलीह। फेसबुक पोस्टक फोटो देल जा रहल अछि। हमर फेसबुक पोस्ट केर फोटो- दू टा गीतक चर्चा उच्चारण केर आँगनमे दरभंगा घरानाक युवा गायक समित मल्लिक अपन शास्त्रीय रूप संगे जन लोक लेल किछु गीत-संगीत सेहो प्रस्तुत केलाह। हम हुनक गाएल दू गीत सुनलहुँ आ ओहिपर हम अपन विचार दऽ रहल छी। आगू कोनो बात कहबासँ पहिने कहि दी जे हमर टिप्पणीमे कोनो राग-भास, सुर-ताल केर चर्चा नै रहत कारण ओकर ज्ञान हमरा अपने नै अछि। तँइ मात्र किछु साधारण बात सभ हम एहिठाम देब। मैथिलीमे 'आबि' शब्द केर उच्चारण 'आइब' सेहो होइत छै मुदा एहन केखन हेतै से वाक्य आ ओकर उद्येश्यसँ संचालित होइत छै। आ एहने नियम माटि वा पानि लेल सेहो छै। हम पहिल गीत "जनम भूमि अछि मिथिला" सुनलहुँ जाहिमे "कनी आइब अपन नैहर निहारू हे माँ" गाएल गेल छै। मुदा एहि गीतक जे प्रकृति छै ताहिमे 'आबि' केर उच्चारण सही हेतै आ गीतक स्वरूपकेँ बेसी निखारतै। एहने दिक्कत एही गीतमे आएल शब्द 'भरि' संगे भेल छै जाहिमे गाएक एकरा 'भइर' रूपमे गाबि देलथि। गायक जँ कहिो भविष्यमे एकरा गाबथि तँ 'आइब' बदला 'आबि' 'भइर' बदला 'भरि' उच्चारण करथि। एकटा रोचक बात एहि गीतमे 'दुआर' शब्दक प्रयोग भेल छै जकर मूल स्वरूप 'दुआरि' छै। गायक जहिया फेर गाबथि एकरा एक बेर 'दुआइर' बना कऽ गाबथि बहुत बेसी मधुरता एतै एहि गीतमे से हमरा विश्वास अछि। ई नीक बात जे 'अछि' केर उच्चारण सही रूपें कएल गेल अछि। एही गीतक एकटा पाँतिमे 'खवनिहार' मुदा हमरा जनैत एकरा 'खेवनहार' रूपमे गाएल जेबाक चाही जाहिसँ गीत सुनबामे आरो मधुर होइतै। ओना हम आनो गोटासँ आग्रह करबनि जे ओ सूनथि कारण बहुत बेर कान सेहो धोखा दऽ दैत छै। एहि गीतकेँ पारंपरिक कहि कऽ प्रचारित कएल गेल अछि मुदा हमरा जनैत ई गीत पारंपरिक नै अछि आ अही कालखंडमे किनको द्वारा लिखल गेल हएत आ से हमरा 'दीप बुझल' सन प्रयोगसँ बुझाइए। ई 'बुझल' साफे-साफ हिंदी केर नकल अछि। ओना एहि बुझलमे गायक केर बेसी दोष नै कारण जे लिखल भेटलनि से गेलथि। बहुत संभव जे 'आइब' बला प्रसंग गीत लिखए बलासँ जुड़ल हो मुदा गायकसँ सेहो एहन अपेक्षा रहिते छै। समितजीसँ ई अपेक्षा तँ रहबे करत जे ओ गीतकारक नाम खोजि कऽ लीखथि। गीतक गुण-दोषपर चर्चा होइते रहतै मुदा गीतकारक नामक हिस्सा जरूर भेटबाक चाही। एहि गीतक संगीत पक्ष नीक अछि। किछु अलग हटि कऽ अछि आ सुनबामे सेहो नीक लगैत अछि तैयो हमरा समितजीसँ ई अपेक्षा अछि जे ओ एहने संगीत दिस नै रहथि। मैथिली संगीतमे एखन धरि नवाचारी प्रयोग नै भेलैए। किछु गायक गिटार आ ड्रम बला अपन संगीतकेँ नवाचारी कहि दै छथि मुदा ई तेहने बात भेल जेना कियो ई दाबी करए जे हम जींस पहिरने छी तँ हम धोती बलासँ बेसी आधुनिक आ प्रगतिशील छी। मुदा सभ जानै छथि जे आधुनिक ओ प्रगतिशील विचार लेल कपड़ा नै मानक छै तेनाहिते नवाचारी संगीत लेल गिटार एवं ड्रम मानक नै छै। हमर कहबाक मतलब ई नै जे गिटार-ड्रम बला संगीत खराप छै मुदा गिटारे-ड्रमसँ संगीत आधुनिक बनतै से बात नवाचार कम संगीतक संग तिकड़मबाजी बेसी छै। समय एहन तिकड़मी संगीतकेँ अपने-आप खारिज कऽ दैत छै आ संगीते किए समय हरेक कलामे कएल गेल तिकड़मकेँ खारिज कऽ दैत छै। समितजीक गाएल ई पहिल गीत अहाँ सभ एहि लिंकपर जा कऽ सूनि सकै छी- https://youtu.be/eWP-fi0bBSM दोसर गीत विद्यापति रचित 'जय जय भैरवि' अछि जकर संगीत पक्ष नीक अछि। पहिलो गीतसँ बेसी नीक मुदा एहि गीतक उच्चारण नीक नै अछि। एहि गीतमे गायक उच्चारणसँ हम निराश भेलहुँ। एहि गीतसँ ई बुझाइत अछि जे समितजीकेँ एखन मैथिली ध्वनि आ उच्चारणपर नियंत्रण करब बेसी आवश्यक छनि अन्यथा हिनक गीत साधारण लोकसँ कटि जाएत। हमरा जनैत शास्त्रीय आ लोक गीतमे बहुत रास अंतरक संग एकटा महत्वपूर्ण अंतर ईहो छै जे शास्त्रीय संगीतमे ध्वनि बदला राग-तालक शुद्धता ताकल जाइत छै जखन कि लोकगीतमे राग-तालक बदला शब्दक उच्चारण ओ ध्वनिक शुद्धता बेसी ताकल जाइत छै (जँ हम गलत होइ तँ टोकी हमरा)। एहि तत्वपर हमरा ई गीत कमजोर लागल आ भ्रमपूर्ण सेहो। भविष्यमे लोक एहने गलत उच्चारणकेँ मानक मानए लागत कारण ओ कहत जे दरभंगा घरानाकेँ सुनने छी आ ताहिमे एनाहिते गेने छथिन। एहि तरहक गीतमे जे गंभीरताक अपेक्षा छल से पूरा नै भेल। ई गीत एहि लिंकपर सूनि सकैत छी- https://youtu.be/Fx55V5n0l90 समग्र रूपसँ देखी तँ उपरक दूनू गीतक संगीत पक्ष बेसी नीक अछि आ उच्चारण पक्ष कमजोर। पहिल गीतक साउंड नीक अछि तँ दोसर गीतक साउंड ओतेक साफ नै भेल अछि। समितजीक जे अवाज छनि से प्रायः सभ तरहक मूडक गीत लेल उपयुक्त छनि मुदा हमर मानब अछि जे रोमांटिक, भजन ओ गजल लेल हिनक अवाज सर्वाधिक उपयुक्त रहत। व्यक्तिगत रूपसँ हम चाहब जे समितजी मैथिली गजलक गायनमे आबथि। मैथिलीमे गजल गायिकी शून्य अछि तकरा समितजी नीक जकाँ भरि सकै छथि। एकटा "मैथिली गजल" जे बदलि देलकै 'मैथिली गीत-संगीतक' इतिहास समाजमे हरेक एक केर प्रभाव दोसरपर पड़िते छै (नकलकेँ मुदा प्रभाव नै कहल जा सकैए)। से प्रभाव नीको भऽ सकैए आ खरापो। साहित्य सेहो समाजे केर चीज छै आ साहित्य केर विभिन्न विधा सेहो। साहित्य केर एक विधासँ प्रभावित भऽ दोसर विधाक नीक रचना होइत रहलैए। तेनाहिते एक विधाक कायान्तर कऽ दोसर विधामे रचल जाइ छै। आ ई प्रक्रिया नीक छै। मुदा धेआन देबाक बात ई सभ बात पाठक केर सामने रहैत छै। जेना मधुपजीक कविता 'घसल अट्ठन्नी' केर नाट्य रूप सेहो छै मुदा प्रचार-प्रसारमे पहिने कहि सूचित कएल जाइत छै जे ई मधुपजीक कविताक नाट्य रूप थिक। मुदा ई सौभाग्य मैथिली गजल लेल कहियो नै रहल। एकटा मैथिली गजल जे “बदलि देलकै मैथिली गीत-संगीतक इतिहास” मुदा साहित्यकार-संगीतकार एहि गजलक संग न्याय नै केलाह। गजल छै मुदा एकरा गीत कहि प्रचारित कएल जाइत छै। आब एकटा विधा लेल एहिसँ दुखद बात की हेतै? ई बात हम लोक लेल नै कहि रहल छी। ई हमरो बूझल अछि जे जखन कोनो महान रचना रचना लोकमे जाइ छै तखन ओकर शब्द उनट-पुनट होइते छै। ओकर विधापर धेआन नै देल जाइत छै। हमरा लोकसँ नै कथित विद्वान ओ अपनाकेँ महान गायक कहए बला सभसँ शिकाइत अछि जे ओ सभ एहि गजल संग न्याय नै केलथि। लगभग 90 बर्खसँ बेसी धरि पाठक-श्रोताकेँ भ्रमित कएल गेलै जखन कि ओहि रचनाक व्याकरण गजलक छै। रचनाकार ओकरा गजल कहि गेल छथि तकर बादो ई हाल। एहि गजलक प्रभाव ततेक जे जतबे गायक-गायिका एहि गजलकेँ गेलाह वा गेलीह से गलत कऽ वा एकर पैरोडीमे गीत बना गेलाह-गेलीह। अइ हाल लेल तीन टा कारण अछि पहिल जे आधुनिक मैथिलीक गीत विधा बहुत कमजोर अछि। आधुनिक कालमे एकरा अपन कोनो निश्चित आधार नै रहलै मैथिलीमे। आ ताहि लेल ओ गीतकार सभ जिम्मेदार रहलाह जे कोनो तुकांत पाँतिकेँ गीत मानि मंचपर पाग-माला लेल व्याकुल भेलाह। आइ धरि मैथिलीमे गीत विधाक कोनो अपन आलोचक नै भऽ सकलै आ ताहू लेल वएह कथित गीतकार सभ जिम्मेदार छथि। अपवादमे किछु नीक गीतक सृजन भेल मुदा ओ गीतकार सभ गीत विधाक आलोचनामे कहियो नै एलाह आ से चाहे रवीन्द्र नाथ ठाकुर होथि कि मैथिलीपुत्र प्रदीप होथि कि जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' वा चंद्रमणि झा। दोसर कारण जे मैथिलीमे कथित गजलकार सभ पतचटनाक भूमिकामे रहलाह सदिखन। जिम्हर देखला मंच तिम्हर केलाह लंच। आ ताहूपर गजलक व्याकरणक ज्ञान पूरा गोल। तखन कोना बूझितथिन जे ई रचना गजल छै। आ तेसर कारण एहि गजलक प्रभाव। विद्यापतिक गीतक प्रभावक बाद जँ कोनो आन रचनाक प्रभावक बात हएत तँ एहि गजलक नाम सभसँ उपर रहत। खएर हम एतए गीत विधाक चर्चा नै करए आएल छी। हम आएल छी ओहि भ्रमक निस्तार लेल जे कि 90 बर्खसँ 'कमजोर गीत विधा' केर 'कमजोर गीतकार' आ 'कमजोर गायक-गायिका' सभ द्वारा पसारल गेल छै। बहुत गायक कहि सकै छथि जे हम भासपर रचना केलहुँ। मुदा हम कहब जे कोन भासपर रचना केलहुँ? वएह भास ने जे गजलक छै। ओही गजलक किछु शब्दकेँ आगू-पाछू कऽ दऽ ओकरा गलत बना कऽ गाबै छी। कविवर सीताराम झा जी रचित सूक्तिसुधा (प्रथम बिंदु) केर पहिल प्रकाशन 1928 ई. मे भेल छल (संदर्भ- कविवर सीताराम झा-काव्यावली प्रथम भाग, संपादक- विश्वनाथ झा 'विषपायी', प्रकाशक-नमन निकुंज शिक्षा परिषद्, चौगमा, वर्ष-1998)। एहि सूक्तिसुधामे कविवर अपन एकटा रचनाकेँ गजल कहि प्रस्तुत केने छथि जकरा निच्चा दऽ रहल छी (फोटो परिशिष्टमे देखू)- जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी न कैलों धर्म सेवा वा न देवाराधने कौखन कुटेबा में छलौं लागल तकर फल पाबि बैसल छी दया स्वातीक घनमाला जकाँ अपनेक भूतल में लगौने आस हम चातक जकां मुँह बाबि बैसल छी कहू की अम्ब अपने सँ फुरैये बात ने किछुओ अपन अपराध सँ चुपकी लगा जी दाबि बैसल छी करै यदि दोष बालक तँ न हो मन रोख माता कैं अहीं विश्वास कैँ केवल हृदय में लाबि बैसल छी उपरक रचना गजल थिक आ सीतारामजीक अपन वर्तनीमे छनि। गायक सभ अही गजलकेँ गलत कऽ गाबै छथि। एहि गजलक व्याकरणकेँ हम अपन पोथी 'मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास' मे नीक जकाँ देखेने छी। तँइ एहिठाम नै दऽ रहल छी। जिज्ञासु पाठक ओहि पोथीकेँ पढ़ि जानि सकै छथि। बहुत लोक एकरा भगवती गीत कहै छथि जखन कि एकरा 'भगवती गजल' कहल जेबाक चाही। ई अनचिन्हार आखर टीमक सौभाग्य अछि जे ओ मैथिली गजलमे 'भक्ति गजल' सन शब्दक निर्माण केलक (7 अगस्त 2012 केँ अमित मिश्र द्वारा) आ एहि तरहें कविवर सीताराम झा मैथिलीक पहिल 'भक्ति गजल' कहनाहर-लिखनाहर छथि। कविवरजीक ई गजल वस्तुतः भक्ति गजल अछि। ईहो सौभाग्य अनचिन्हारे आखरकेँ छै जे ओ मैथिलीमे 'बाल गजल' सन शब्दक निर्माण केलक (24/3/2012 केँ एहि पाँतिक लेखक द्वारा) आ ईहो सौभाग्येक बात जे मैथिलीक पहिल 'बाल गजल' कहनाहर-लिखनाहर एक बेर फेर कविवर सीताराम झा सिद्ध होइत छथि (विशेष जानकारी हमर गजलक व्याकरण ओ इतिहास बला पोथीमे भेटत)। भासक चर्चा हम उपरे केलहुँ जतेक ई पुरान गजल अछि (8 बर्ख बाद ई गजल 100 बर्खक भऽ जाएत) ताहि हिसाबसँ एकर भास आब कल्ट बनि चुकल अछि। एकर भास आब कियो प्रयोग अपन पैरोडीमे नव रूपें बना सकै छथि आ बलजोरी कहि सकै छथि जे हम नकल नै केलहुँ। हमर अनुमान अछि जे ई गजल बहुतो लोकक नजरिसँ हटि गेल छल जकर पुष्टि रचना नामक पत्रिका केर जून 1984 अंकमे डा. रामदेव झा जीक लेखसँ सेहो होइत अछि जाहिमे ओ सीताराम झाजीक आन गजलक उदाहरण देने छथि मुदा एहि भक्ति गजलकेँ बिसरि गेल छथि। जाहि समयमे ई लेख लीखल गेल हेतै ताहू समयमे एहि गजलक प्रभाव रहल हेतै तँइ हमर अनुमान अछि जे ई गजल डा. रामदेव झाजीक नजरिसँ सेहो छुटल रहलनि। एहिठाम हम एहि गजलकेँ तोड़ि-मरोड़ि आ पैरोडी बनल एक-दू प्रस्तुतिक लिस्ट दऽ रहल छी जाहिसँ स्पष्ट हएत जे कोना एहि गजल संग मजाक भेल छै (एहि लिस्टमे शौकिया आ सिद्ध-प्रसिद्ध दूनूक नाम अछि)- 1) नीलकमल झा रचनाकारक नाम तँ गलत देनहे छथि अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि (ओना अधिकांश पाँति ई शुद्ध गेने छथि)- https://www.youtube.com/watch?v=SnRmai1qtj0 नीलकमल झा एहिमे गीतकार रूपमे -उपेन्द्र ठाकुर मोहनजीक नाम देने छथि से आपत्तिजनक तँ अछिए संगे-संग मैथिली गीत-संगीतक अवस्थाकेँ सेहो देखा रहल अछि। 2) संजय झा एकर भासपर गेलथि जकरा एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://youtu.be/EYctiERxVwo 3) मैथिली ठाकुर अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=0wFT4nPm360 4) आदित्य नाथ पैरोडी बना गेलथि जकर लिंक अछि -https://www.youtube.com/watch?v=yHPSqoSBwN0 5) भाव्या रानी अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=5dbn5X6f5yQ 6) उमा झा अपन गायनमे मूल शब्द सभकेँ उनटा-पुनटा कऽ गायन केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=26vr-J3Wtvc 7) प्रेमसागर अपन गायनमे थर्ड क्लासक पैरोडी केलथि जकर लिंक अछि- https://www.youtube.com/watch?v=JNAen4rZeMg हम पहिने कहने छी जे कविवरक गजलक भास आब कल्ट अछि। एहि भाससँ बहुत नव पैरोडी बनाएल जा सकैए। एकर अतिरिक्त आरो नाम अछि मुदा एहिठाम हम उदाहरण स्वरूप किछुए देलहुँ अछि। अपवादमे हम प्रदीप पुष्पजीक उल्लेख करब ओ गायक नै छथि मुदा फेसबुकपर अपन स्वरमे एहि गजलक शुद्ध पाठ केलथि जकर लिंक एही आलेखक अंतमे एकटा आन संदर्भमे भेटत। स्पष्ट अछि जे सीतारामजीक ई गजल गीत विधामे गहींर धरि गेल। आ एहि लेल बहुत तत्व जिम्मेदार छै पहिल तँ बहर (छंद) ओ काफिया, दोसर मिथिलाक शाक्त परंपरा, आ तेसर सरल शब्द। तीनू विशेषतासँ ई गजल अपन विधामे रहि कऽ गीत विधा धरि गेल इएह एकर सफलता छै। आब हमरा लोकनि लेल ई उचित जे लेखक केर सम्मान करैत, एकटा विधाक सम्मान करैत एहि रचनाक सही वाक्यक संग गायन हो, एहि रचनाक सही विधा देल जाए आ एहि रचनाक रचनाकारक नाम देल जाए। अन्यथा आब गजल विधा कमजोर नै अछि ओ अपन उचित स्थान लेब जनैत अछि। उपरक जे लिंक देखलहुँ तकर अतिरिक्त अन्नु कर्ण जीक गाएल ई भीडियो सेहो देखू- https://www.youtube.com/watch?v=T6XvSPbL9DY एहि लिंकक अलगसँ उल्लेख करबाक मतलब अतबे जे ई भीडियो जिनका द्वारा अपलोड भेल अछि से एहि गजलक संबंधमे बहुत कुतर्क केने रहथि प्रदीप पुष्प जीक वालपर जकरा अहूँ सभ एहि लिंकपर देखि सकैत छी https://www.facebook.com/pradeep.pushpa.7/posts/1414904502006571 हम उपरमे जतेक लिंक देलहुँ आ एकर अतिरिक्त आर जे लिंक हेतै ताहि ठाम जा-जा कऽ हमरा लोकनिकेँ एहि रचनाक सही विधा आ सही रचनाकारक नाम लेल कमेंट देबए पड़त आ ओकरा बदलबाबए पड़त ताहि लेल सभ गजल कार्यकर्तासँ आग्रह जे कविवरजी आ हुनक गजलकेँ उचित स्थान लेल जतेक संघर्षक जरूरति पड़तै से करथि। हम नीलकमल झाजीक लिंक उपर कमेंट दऽ एकर शुरूआत कऽ चुकल छी। परिशिष्ट- प्रणव झा की छै 'डीएनबी' आ की लाभ छै "डीएनबी इन डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल प्रोग्राम" केर एक बेर एकटा मैथिल सज्जन, जे पेशासे पत्रकार छैथ, कोनो वाद-विवादके क्रममे हमरा कहलैथ जे, जे विभागमे अहाँ कार्यरत छी ओत प्रयास किएक नै करैत छी मैथिलीके विकासके लेल। ई सुनि हमरा मोने मोन हँसियो लागल आ ई भान भेल जे जखन पत्रकार भ क हिनका डीएनबीके विषयमे जानकारी नै छईन्ह त बहुतो गोटे हेथिन जिनका एन बी ई आ डी एन बी के विषयमे जनतब नै हेतइन। किएकि ई समय सूचनाके छियइ आ चिकित्सा शिक्षाके संबंधमे सेहो लोक सबमे जागरूकता आ जनतब हेबाक चाहिए अस्तु मोनमे आयल की किएक नै ऐ विषयमे किछु मौलिक जानकारीपर किछ लिखल जाय, दसोटा नवलोकके त ऐ से जनतब हेबे करत ! 1975के सालमे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी देशमे स्वास्थ्य-व्यवस्थामे सुधार आ विशेषज्ञ चिकित्सकके कमी कोना दूर होय ऐ लेल एकटा कमिटीके गठन केने छलीह। कमिटी अध्ययनक के रिपोर्ट देने छलईय जे जै संख्यामे देशमे विशेषज्ञ चिकित्सकके आवश्यकता छैक तकर पूर्ति खाली मेडिकल कॉलेजसे केनाइ मुश्किल। ताहि लेल जौं देशमे स्थित बहुत रास सरकारी आ प्राइवेट अस्पताल आ चिकित्सा संस्थान जैमे पीजी विशेषज्ञ प्रशिक्षण लेल आवश्यक इन्फ्रा आ विशेषज्ञ सलाहकार डॉक्टर मौजूद होय ओहो सब ठाम किएक नै ट्रेनिंग शुरूकके पीजी विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार कैल जाय। मुदा एहेन सक्षम अस्पताल/ चिकित्सा संस्थानके चिन्हइ, ओकरा मान्यता दै, ओतयके ट्रेनिंग व्यवस्थाके लेल मानक तय करई एवं देखरेख करईके आदेश भरिमे एकटा उच्च आसमान स्तरके परीक्षा लेबैके लेल एकटा संस्थानके आवश्यकता छल। एही रिपोर्टके आधारपर तत्कालीन सरकार द्वारा ई सब काजके लेल राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एन बी ई) के गठन कैल गेल छल जे 1982मे स्वतंत्ररूपसे भारत सरकारके स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याणमंत्रालयके अंतर्गत एकटा स्वायत्त संस्थानके रूपमे अस्तित्वमे आयल। एन बी ई सक्षम अस्पताल/ चिकित्स ासंस्थान सबके चिन्हित क के ओकरा विभिन्न विशिष्टतामे पीज ी ट्रेनिंगके लेल मान्यता देबय लागल ई आ 3 वर्षके ट्रेनिंगके उपरांत राष्ट्रीय स्तरपर आयोजित विविध परीक्षा पास करईबला डाक्टर सबके डी एन बी (डिप्लोमैट ऑफ नैशनल बोर्ड) के डिग्री देबई लगलई।डी एन बी डिग्री भारतीय चिकित्सा अधिनियम 1956 (आई एम सी एक्ट 1956) के प्रथम अनुसूचीमे स्थित भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त स्नातकोत्तर/ पोस्ट डॉक्टरल डिग्री छैक, जे चिकित्सा विश्वविद्यालय द्वारा समकक्ष विशिष्टतामे प्रदान एमडी/ एमएस/ डीएम/ एमसीएच डिग्रीके समकक्ष छैक। डी एन बी नाम अमेरिकामे देल जायबला डिप्लोमैट ऑफ अमेरिकन बोर्डके तर्जपर राखल गेल छैक। लेहमेनके भाषामे जौं एकरा बुझईके प्रयत्न करी त एकरा एनाहु बुझल जा सकई अछि जे जेना एम बी ए (फायनेंस) आ सी ए / सी डबल्यू ए लेखा/ वित्तके क्षेत्रमे समकक्ष डिग्री छैक, जेना बी ई/ बी टेक आ ए एम आई ई टी ई इंजीनियरिंगके क्षेत्रमे समकक्ष डिग्री छैक तहिना आधुनिक चिकित्सा विज्ञानके क्षेत्रमे देशमे एम डी/ एम एस आ डी एम/ एम सी एच के समकक्ष डी एन बी (ब्रॉड स्पेशल्टी) आ डी एन बी( सुपर स्पेशल्टी डिग्री) छैक। एम बी ए, बीई/ बी टेक, एमडी/ एमएस/ डीएम/ एम सी एच आदि डिग्री यूनिवर्सिटी सिस्टमके द्वारा देल जाइत छैक त सीए आ डी एन बी डिग्री भारत सरकारके अंतर्गत स्वायत-्तसंस्थान अर्थात क्रमशः आईसीएआई आ एनबीई द्वार ादेल जाइत छैक।अहुमे अहांके समनता देख लेल भेंटत।जेना देखईत हेब ई जे देशमे अलग-अलग यूनिवर्सिटीमे पढ़ाईके स्तर अलग-अलग होइत छैक आ परिणाम स्वरूप कोनो एम बी ए त बहुत तेज होइत छैक आ कोनो कोनो बज्र ढ़ोल, नामके डिग्री बला मुदा सीए जे कियौ केने होइत छै तकरा लग विषयके एकटा स्तरीय ज्ञान रहिते छैक किए त सीए अखिल-भारतीय स्तरपर एकटा उच्च आ समान स्तरके परीक्षा पास केलाके बाद बनैत छैक। तहिना स्नातकोत्तर मेडिकल डिग्रीके क्षेत्रमे अलग-अलग यूनिवर्सिटी/कॉलेजसे पास एमडी/ एमएस डॉक्टरमे कियौ बहुत जानकारो डॉक्टर भेट सकई अछि आ कियौ बाज्र भकलोल सेहो, मुदा डी एन बी बलामे एकटा स्तरीय क्लीनिकल स्किल भेटबे करत किएकि डीएनबी डिग्री अखिल भारतीय स्तरके उच्च मानकबला परीक्षा पास केलाके बाद भेटई छैक आ सीएहे जेकाँ एकरो पास केनाइ एमडी/ एमएस से बेसी कठिन होइत छै। वर्तमानमे एन बी ई 83 टा ब्रॉड आ सुपर-स्पेशल्टी विषयमे डीएनबी आ एफ़एनबी कोर्स चला रहल अछि जे देशभरिके 500 से बेसी अस्पताल आ चिकित्सा-संस्थानमे चलि रहल अछि। की छै “डीएनबी इन डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल” कार्यक्रम देशके बहुते राज्य सबमे स्तानकोत्तर मेडिकल स्पेशलिष्ट आ ओकर पढ़ाईलेल सीटके कमी दूर करय खातिर आ विशेषज्ञ डॉक्टरके क्षेत्रीय स्तरपर एकटा पूल बनाब खातिर केंद्रसरकार राष्ट्रीय परीक्षा बोर्डके संग मिलके ई कार्यक्रम 2013मे शुरूकेलक आ वर्तमान सरकार एकरा आगा बढ़ाबके लेल कृत संकल्प अछि। ऐ कार्यक्रमके तहत राज्य-सरकार, केंद्र-सरकार, लोकल सरकारके अंतर्गत आबयबला 200बेड से बेसी बिस्तरबला टर्सरी केयर अस्पतालमे डीएनबी पाठ्यक्रम शुरू कैल जा रहल छैक। ऐ योजनाके प्रमुख ध्येय छैक: o जिला अस्पतालमे उपलब्ध इन्फ़्रास्ट्रक्चर एवं क्लिनिकल संसाधनोंके उपयोग स्नातकोत्तर विशेषज्ञताके प्रशिक्षणमे करैत विशेषज्ञके नवपूल तैयार केनाइ जे क्षेत्रीय स्वास्थ्य-व्यवस्था के लेल उपयोगी होय, क्षेत्रके परिस्थितिके अनुसार प्रशिक्षित होय, आ क्षेत्र विशेषके मरीज आ बीमारीके बेसी निकसे बूझ िसकई। o ऐ प्रकारके पीजी पाठ्यक्रम चलेलासे ऐ तरहक सरकारी टर्सरी केयर अस्पताल सबमे इन्फ्रास्ट्रक्चर आ क्लीनिकल संसाधनके गुणवत्तामे सुधार हेतई। o ऐ योजनासे राज्य-स्तरपर कम खर्चमे स्नातकोत्तर चिकित्सा विशेषज्ञके प्रशिक्षणके संभावना बनैत छैक आ ऐ प्रकारे चिकित्सकके कार्यकौशलके सेहो विकासके संभावना बढ़इत छै। o अकादमिक प्रशिक्षण व्यवस्थासे ऐ प्रकारके अस्पताल सबमे चिकित्सक सबके भर्ती आ ओकरा सबसे सेवा लेबेके प्रक्रिया सेहो सरल भ जाइत छैक किएक िप्रशिक्षणके लोभे कनिष्ठ चिकित्सक सब अस्पतालमे उपलब्ध रहईत छै। o ऐ प्रयाससे ऐ अस्पताल सबमे चिकित्सक आ हुनकर सेवाके एकीकृत करमे सेहो सुविधा भेटई छै। o नव आ पुरान (इन-सर्विस) एम बी बी एस चिकित्सक सबके सेहो (जिनका आनठाम सीट नै भेंट पाबि रहल छै) पीजी करयके अवसर उपलब्ध होई छैक। o पीजी प्रशिक्षणके लेल माइग्रेट होमयबला चिकित्सक सबके क्षेत्रमे घूरयके संभावना कम रहई छैक मुदा क्षेत्रीय अस्पतालमे प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सकके क्षेत्रमे सेवा दैके संभावना बेसी। अस्तु ऐ प्रकारके कार्यक्रमसे बिहार सन राज्यमे विशेषज्ञ चिकित्सकक कमी दूर करयमे सहायता भेटयके संभावना देखल जा सकई अछि। ऐ क्रायक्रमके सबसे पहिने लाभ उठाबय बल ाराज्य पश्चिम-बंगाल छल, तदुपरान्त कर्नाटक आ तमिलनाडु आ धीरे-धीरे देशके अन्य कई-एक राज्यमे ई कार्यक्रम पसरि रहल अछि। अफसोस कि ऐ योजनाके लाभ लेबेमे सेहो आपण बिहार पछुआयल छल, आ एन बी ई के कते कप्रयास, बिहार-सरकारके संग कतेक वर्कशॉपके बाद बिहार सरकार अपन किछ अस्पताल/ मेडिकल कॉलेजमे ई पाठ्यक्रम शुरू करयके आवेदन केलकय जे एखन मान्यता भेटेके प्रक्रियामे अछि। आशा कैल जा सकई अछि जे जल्दीए ई परियोजना राज्यमे विकसित होय आ क्षेत्रके स्वास्थ्य-व्यवस्थाके सुधारमे सहायक होय। लालदेव कामत, नौआबाखर , घोघरडीहा भूगोलमे मिथिलाराज कहियाधरि जगत जननी जगदंबा जानकी महामाया थीकिह। जातेक रामायण संख्याँमे य रामायणक अवलोकन-मनन करैत धारावाहिक टी० वी० पर श्रीमान् रामानंद सागर जीक आयल। आ अहू कोरोना महामारीक लॉक डाउनमे रामायण सीरियल सर्व सुलभ भेल। ताहि लेल हुनकर धन्यवाद अवश्य करैत छी, परंच एकटा कचोट मनमे सदा सर्वदा रहैत अछि: जौ श्री सागर जी एतुका भाषाक (मैथिली) उपेक्षा नहिंकए तत्कालीन जनकपुर मिथिला क जनभाषाक कनेक चर्चा करितथि तँ मैथिली अनुरागीमे उत्साह बढ़ितैक। आओर हमसब जे जानकी नवमी मनाबैत छी, से आरो परिष्कार होइत। सामाजिक दूरीके नीमाहैत कतौह पैघ जमाबड़ा जुनिकरी, मात्रे नैतिक समर्थन करैत अपन पुरान मांग पर अड़ल रही " मिथिलाराज बनाके रहब " एहि संकल्पके फेरसँ दोहराबैत जनक सुता जानकी आ हुनक मातृभाषा मैथिली पर संक्षिप्त चर्चा करबा सँ अपनाके एहि अवसर पर रोकि नहिँ सकब। महर्षि महामुनि वेदव्यासक अध्यात्म रामायण जे ब्रह्मांड पुराणक उत्तर खंडक आख्यान अछि आ संत बाल्मिकिक प्रतिष्ठा भारतवर्षमे आदि कविक रुपमे छैक जे संस्कृतमे रामायण लवकुश जन्मसँ पूर्वहि रचने रहथि। बहुतो इतिहासकार पौलथि जे सबहक रामायणमे रामेक गुणन बादन बेशी भेल छैक, जखनकि पंडित लाल दासक मैथिली रामायणमे सीताक गुणगान बेसी भेलैक। सीता बिनु रामक मर्यादा पुरुषोत्तम होयब कठिण रहैक। भगवतीरुपे जखन राक्षसके लतियबैत दण्डित करैत छथिन, ताहि प्रसंगके दोसर रचियता सब लालदाससँ फुट विचार केने छैक आ हुनका अपना छाती ( थन) सँ असुरक संहार करबाक कहने छथि: जे कियो पतिया नहिँ सकैत छैक। हमरौ ई तथ्य कनियों नहिँ अरघैत अछि। एहिठाम सीताक प्रति लेखकीय उदणडताक लगाम नहिँ लागने समीक्षक मंथन करथि। हमरा मैट्रिक मे लंका दहन आ आई0ए0 मे वर्षागीत पढ़बाक बाद डाँ0 बच्चेश्वर झाक रेडियो वार्ता सेहो महाकवि लालदास पर सुनवाक सौभाग्य भेटल रहय। हुनकर जन्मभूमि खड़ौआ गाम बहुतोबेर सन् 1980 सँ हालधरि जाकए ओतुका माँटिक चन्दन लगेबाक अवसर भेटल अछि। हुनकर किछु पांति एहि तरहेँ अछि- निज भाषा जननी निज देश! स्वर्गहु सँ जानथि जीवेश!! तेँ हम कथा कहब तेहिरीति! नहि विद्या कविता गुणगीति!! मिथिला भाषा मधु माधुर्य! शेष शारदा कह प्राचुर्र!! देश विदेश क कयल विचार! लक्ष्मी जतय लेल अवतार!! नाम जानकी पड़ल जनीकि! बजली मिथिला भाषा नीकि!! कोमल वाणी अमृत समान! तकर भाव रस क्यो-क्यो जान!! पुण्य देशमे भाषा नीकि! मिथिला सभक शिरोमणि थीकि!! ताहि भाषामे करब सुवन्ध! सीतारामक चरित प्रबंध!! मैथिलीमे राज आश्रित दू महाकविमे चंदा झाक मिथिला भाषा रामायण आ लाल दासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण चर्चित भेल। लाल दास सबसँ बढ़िके सीता पर विस्तार देलनि एकटा पृथक पुष्कर काण्ड रचलनि, जकर पाँति देखू-: मिथिला देश परम अभिराम! सकल तीर्थमय धर्मक धाम!! आबथि ततय मुनीश अनेक! मिथिला वास करथि सुविवेक!! दुष्कर तप कर मुनि समुदाय! जनक सुश्रूषा करथि सदाय!! ऋषि आ घुमन्तु प्राचीन परम्पराक बाद मानव समाज मे जे मैथिली भाषा आ तकर पहिचान दियेबा लेल विश्व प्रसिद्ध हमरा सभक आदर्श सीता दाई लेल आधुनिक उदगार व्यक्त करयमे किछु प्रमुख तथ्य सोझासोझी अछि -: प्रो0 राम प्रमोद चौधरी अपन एकटा आलेख मे कहने छथि- जनक देश बाइस योजन धरि व्याप्त अछि। एतय हजारों गाम अछि। एहि देश मे नीच जातिमे उत्पन्न मनुष्यो प्रायः उदार होइत अछि। जनकरपुरक दक्षिणमे सात योजन दुर हटा कए डीजगल नामक महाग्राम अछि जतय जनक महाराजाक राजप्रसाद अछि, ग्रामक सटले सरिता सभमे श्रेष्ठ यमुना अत्यंत वेग सँ बहैत अछि। डीजगलक दक्षिण भाग मे आध योजन दूरी पर गिरजा नामक ग्राम देशवासी सभ मे विख्यात अछि। एहिठाम दुई नदीक मध्य मे एकटा प्राचीन मंदिर अछि। तत्पश्चात भैरव स्थान अछि जाहिठाम मुनिक... भैरव पूजन कए ओ सीतामण्डप गेलाह, जाहिठाम प्राचीनकालमे ग्रंथि बंधनक रुपे सीताक विवाह भेल छल। पांचम शताब्दीक वृहत पुराणक मिथिला महात्म्य खंड मे जे वर्णित छैक तकर अनुवाद कविवर चंदा झा ई पाँति सृजित केलाह- गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशी पूर्व कौशिकी धारा । पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा।। मैथिली साहित्य मे सिद्धहस्त हस्ताक्षर किछु कविक पाँति देखल जाए, 'वर्तमान मिथिला' कविता मे राजीव कुमार कण्ठ गाबै छथि - माँ मैथिली हटावल गेली, हम चुप रही बीपीएससी सौं धकियावल गेली, हम चुप रही हम मैथिल कियो नै! कास्यथ, ब्राह्मण,यादव बनल चुप्प रही जाति-पाति मे बटल समाज, तखन की हैत?... डाँ0 बुचरू पासवान 'श्री जानकी' कविता शुरू करैत गाबै छथि- मिथिला मे बहु ग्रह नाना जानकी नवमीक बनल संगोर बहु संख्यकमे जनमनके जेना पूजा अर्चना मे जन विभोर... सुभाष कुमार कामत केर पाँति मैथिल मंच सँ प्रकाशित - .... ठाकुरजी, चौधरीजी झाजी मिश्रजीक दलान सँ बहरा दियौक जाय दियौक यादवजी... पासवानजी भंडारीजी आ बारहौं वर्णक दलान पर मिथिला राज्यक नारा कें जाए दियौक घसछिलनी क छिट्टा मे , हरबाहक लागैन पर...... तेरहम शताब्दी मे ज्योतिरीश्वर केर वर्णरत्नाकर मैथिली गद्य पोथी सँ ल के अद्यतन बहुतो रचनाकर् मैथिली साहित्यक कतेको विधामे अपन कलम चलेबामे समर्थ भेलाह/भेलीह। ताहि सद् प्रयास लेल मैथिली पाठक श्रोता अभिभूत रहैत आयल अछि। सन् 1971 मेँ जननायक कर्पूरी ठाकुर सरकार बिहार विधान सभा सँ एक प्रस्ताव पारित कए भारत सरकार केँ पठौनै छलाह। मैथिली विरोध मे श्री धनिक लाल मंडल सन के नाम अबैत रहलैक । मधेपुरक पहिल विधायक स्व0 जानकी नंदन सिंह जी मिथिला राज्य लेल मांग केर बहस के आगू बढैनै रहथि।ओना 1918 सँ कोलकाता विश्वविद्यालयमे मैथिली विषयक एम0 ए0 धरि पढाई होइत रहल। 1939 सँ पटना विश्वविद्यालय मे क्रमशः इण्टर, स्नातक आ स्नातकोत्तर मेँ मैथिलीक पढौनी होइत रहल। मिथिलांचलक बहुतरास राजनेता मैथिलीक प्रति उदार छथि आ मातृभाषामे सदन मेँ शपथ लैत देखेलाह अछि। एखनो हक्कन कनैत मैथिलीक लेल नेतागण प्रयासरत रहौथु। मैथिली भाषा संविधानक अष्टम अनुसूची मे शामिल होअय, ताहि लेल एहि पाँतिक लेखक 1985 मे झंझारपुरक विद्वान सासंद डाँ0 जी एस राजहंस सँ पत्राचार करैत सरकार सँ सब एम0पी0 मिलकए भेंट करथि से आग्रह कैने रहैक। एहि दिशा मे संघर्षशील वैद्यनाथ चौधरी ‘बैजूक’ भाषण एकबेर सरौती (घोघरडीहा) अन्तर स्नातक महाविद्यालयक स्थापना लेल प्रथम बैसक अधिवक्ता सूर्य नारायण कामत केर संग सुनने रही, ताहम अंडर मैट्रिक छात्र सरौती हाई स्कूल सँ रहल होयब। मिथिलाक गौरव गाथाक वर्णन बहुतो पोथीमे मुन्दर्ज छैक। एहि पोथीक नीक कागतक अभावे दीमक केँ शीघ्रे भेंट चढि जाईछ आ ग्रन्थालयमे धुरा गरदा तरमे सैंतायल रहल। किछु दुर्लभ पाण्डुलिपि प्रकाशन एखनो धरि नहिँ भेल छैक। मिथिला मे कोनो पोथीक ग्राहक सदा अभावै रहैत छैक,तैँ बेसी चलैन आब इलैक्ट्रानिक मीडिया आ ई-पत्रिका क भलैक अछि। एहिक लुत्फ नवपीढि उठवयमे लागले अछि। पोथीदिस तैयो उन्मुख समय पर हेबाक चाही। बिनु कोनो नारा आ बिना फ़ैशन केँ मैथिली आगू बैढ़ सकैत छलीह आ मिथिलांचल (भारत - नेपाल) सँ बाहर रहनिहार समस्त प्रवासी मिथिला लोक केँ सिनेमाक माध्यम मातृभाषा दिश आकर्षित करक उद्देश्य सँ मैथिलीक प्रचार-प्रसार चलचित्र माध्यमे हुअय, ताहिलेल धार्मिक बदला सामाजिक समस्या पर एकटा ममता गायब गीत फिल्म बनेबाक धुनकिमे लागल रहथि सर्व श्री केदार नाथ चौधरी (मधुबनी) आ हुनक परम मित्र आर्थिक मददगार स्व0 मदन मोहनदास, उदय भानु सिंह जे राजनगर आ दरभंगा क विराट मठ मे रहल छलाह ओ तिरहुताक (मुजफ्फरपुरक) छलाह। आब तँ बहुत टेलीफिल्म आ सिनेमाक फिल्म चित्रालय सँ देखाईल गेल छैक। नव अभिनेता आ अभिनेत्री जिनक सद् प्रयास सँ मैथिली आरो आगू बढत से आशा जनमानस मेंँ बनल छैक। एहि लेल सरकारी मदद चाहियेक।आ सुविधा बंचित समाजक नायिका गंभीरा देवीक' प्रोत्साहन भेटक चाही। देहाती कोशी क्षेत्रक एकटा गाम सँ मिथिलांचल कोशी विकास समिति हटनी आ एहिक 'कोशी संदेश ' त्रिमासिक मैथिली पत्रिकाक माध्यमे मैथिली लेल कतिपय काज भैलैक अछि। सर्वहारा मंचक रुपे सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी क माध्यमसँ नव लेखकीय समाज तैयार भ रहल छैक। सुच्चा मैथिलक कार्यक्रमक चर्चा चहुँओर पसरल हन। मिथिला मैथिली सँ जुड़ल लोग केँ एक साथ समेटैय म मैथिल मंच क योगदान प्रंशसनीय अछि। मातृभाषा मैथिली मेँ गीत संगीत आ नाटक माध्यम आ मिथिलाक बिरुदावली बखानमे लागल महराय,गायकक दिश सँ मैथिली अगूएलिह अछि। मातृभाषा मे बच्चे सँ पढाई लिखाई केर व्यवस्था राज्य सरकार करय, तकर पाठ्य पुस्तक अकादमी तैयार करय, से काज आजुकौ तारीख म फछुआयल छैक। भुल्ली महिष वाला कथा आ मीरा कलम दिनेश सँ बाल वर्गक विद्यार्थीक मनोविज्ञानिक तरहेँ विकास होइत रहैक से ठमकल छैक तेँ आगू बढवामे पिछैड़ अधिगम स्तरधरि देरी सँ पहूँचैत छैक। जखन कि विदेशोक खानगी स्कूलों म नर्सरी सँ मातृभाषामे धियापुताक पढाई हुअय लागल अछि। मिथिलाक्षर केँ आजादी पूर्व दरभंगा महाराजाधिराज शासन कालेमे पाछु छोड़लक आ कैथी लिपिमे दस्तावेज लेखन कार्य अपन स्थान बनेलक से अद्यतन देवनागरीक ईजोत सँ नेपथ्य चलिगेल सन छैक। नैका पीढी अपन भाषा आ अक्षर पकड़ब केर बनसब्त इंगलिश दिश झूकल छैक। मधुबनी पेंटिंग केर पहिचान विश्व भरि मेँ छैक। एहि सभक संवर्घन होयब परमावश्यक छैक। मिथिला मैथिली लेल बाबा यात्री जी द्वारा स्थापित चेतना समिति पटना आओर छोट पैघ संस्था संगठन लक्षित लाभ लेल काज करैत रहलैक, करितौ अछि जाधरि पूर्ण सफल नहिँ होयत ताधरि ई बैनर "हमरा मिथिला राज्य चाही " जिंदाबाद रहत से विश्वास जमि गेल अछि। एहि छोट सन रिपोतार्य मेँ बहुत रास पैघ विद्वान क आ रचनात्मक कार्यकर्ता गणक चर्चा करब संभव नहिँ भ सकल जे अहर्निश माँ मैथिली जानकी नवमी आ मिथिला राज बनेबा ले अपन सर्वस्व निछावर केने होथि। हम एहि अवदान लेल हुनको सबहक प्रति आभार प्रकट करैत छी। प्रज्ञान रामायणक माध्यम सीताराम मिश्रक कहब- यदि राम छोड़ि दोसर पुरुष नै कएलौं चिंतन तखन सेँ पृथ्वी देवी हमरो दिअ शरण अपन सीता जीक श्रधान्वित एहि पाँति सँ समाप्त करब जे रामायणमे बहुत बेर पढ़ने होयव युग- युग जीवथु बसथु लखकोस हमर अभाग हुनक नहिँ दोष जानकी जीक महात्याग केँ शत् शत् नमन्। ज्ञानवर्द्धन कंठ खेत प्रिंसिपल सेहैब बेलौंचाबला मास्सैबकेँ कहलथिन- "आठमा किलास खाली छैक।कनी अहीं चलि ने जैयौक!" अछता-पछता क' मास्सैब किलास गेलाह।एकटा विद्यार्थी पूछि देलकनि- "मास्सैब,'खेत' त' हमरा सभ बुझैत छियैक,मुदा 'खेत' कहबैक ककरा?कनी बुझा दितहुँ।" मास्सेब भितरे-भीतर बोमछल रहबे करथिन।बमकि क' बाजय लगलथिन-"बूड़ि नहितन!तखन की बुझैत छह, कपार?हौ,खेत खाली वैह भूमि नहि होइ छैक, जाहिमे खाद्य उपजैत छैक!खेतकेँ जोति-कोड़ि आ सिंचित क' कृषक नाना प्रकारक फसिल उपजाबैत छथि,से त' जनिते हेबह।ई खेत समतल भूमिसँ ल' क' ऊँच-ऊँच पहाड़ धरि भेटतह।वैज्ञानिक लोकनि तँ ध्रुवीय हिमक्षेत्रसँ ल' क' अंतरिक्ष धरि उपजा-बारीक विधि-विकासक जोगारमे लागल रहैत छथि।कतेक गोटे अपन घरेक छतकेँ खेत बना किसानी क' रहल छथि।तेँ बूझह तँ जेमहर देखबह,तेमहर खेते- किसान नजरि पड़थुन।नेता लोकनिक लेखे सौंसे देशे खेत थिकनि जाहिमे ओ लोकनि भोटक फसिल उगेबाक घेंटकाट स्पर्द्धामे लागल रहैत छथि।नवका- नवका खेत बनबैक जोगारमे लागल रहैत छथि।बेसी उपज लेल नाना प्रकारक खाद- उर्वरकक प्रयोग करैत रहैत छथि।यथा-जाति-वर्ग-धर्मक भेद, खराँत-अनुदान, विविध वाद-दर्शनादिक सुविधाजनक व्याख्या।हिंसा,आंदोलन, अराजकता आदि हिनका लोकनिक प्रमुख कृषि-विधि आ औजार थिकनि।राष्ट्रवाद,राष्ट्रद्रोह, आतंक,उपद्रव आदि बीयाक विभिन्न उन्नत किसिम थिकनि।गरीबी,बेरोजगारी,दीनता, अशिक्षाक माटिमे हिनक खेती खूब लहलहा उठैत छनि।परिणाम ई भ' रहल छैक जे सौंसे देश उर्वर खेतक रूपमे विकसित भ' उठल अछि।किसान जतहि बैसि जाइत छथि,वैह खेत बनि जाइत अछि।ओत्तहि ट्रेक्टर दौड़य लगैत अछि।दाउन हुअ' लगैत अछि।ओतय विविध भोज्य आ अन्य आवश्यक चीज-वस्तु जुमय लगैत छैक।एहिसँ उल्लसित भ' देशक मूर्धन्य कवि भावुक भ' सुझाव देबय लगैत छथि जे संसद-भवनकेँ खसा खेत बना देल जाय।बुद्धिजीवी लोकनि पक्ष-विपक्षक तार्किक-अतार्किक खेत जोतयमे लागि जाइत छथि।नामी-गिरामी फिलिमकार लोकनि धर्म-संस्कृति पर फूहड़ वितंडा ठाढ़ क' फिलिमक प्रचार क' बेसी-सँ-बेसी अर्थ उगेबाक खेतीमे लागल छथि ।राजनीतिक पक्ष-विपक्ष अपन-अपन खेत तैयार करयमे मनोयोगसँ लागल छथि।जे जतय अछि,ततय खेत कोड़यमे लागल अछि आ ओमहर सीमा पर जवान लोकनि खेत होइत रहैत छथि।एतय अपना इस्कूलमे प्रिंसिपल सेहैबक लेखे हमहूँ एकटा खेते छियह।ओ कखनो खेत परता नहि रखताह।कोनो किलास खाली रहल,बस बेलौंचाबलाकेँ जोति दैत छथि।बस एतबी।घंटी बाजि गेलह।" डॉलीक नामांकन बियाहक चौदह बरीसक बाद जीबछकेँ बेटी भेलनि।घर आनंदसँ भरि गेलनि।नाम रखलनि- डॉली।बड़का भोज केलनि।डॉली बड़का खेलौने भ' गेलनि।सदिखन ओकरेमे ओझरायल रहैत छलाह।सुतलोमे ओकरे मुँह निहारैत रहथि।एक रत्ती कानि उठैन,त' चेहा उठथि।अपना गरमी लागनि त' ओकरा पंखा हुँकय लागथि।डॉली बड्ड सहलोला।बड्ड ठोला।माय कहथिन- "रौ जीबछ! ओना बुच्चीक मुँह किएक निहारैत रहैत छही?मायो-बापक नजरि लागि जाइत छैक!" मुदा जीबछकेँ डॉली परसँ धेयान कखनो जेना हटबे नहि करनि! सुतली राति कोनो बच्चाक कानब सुनि जीबछ ओछान पर हथोड़िया मारि डॉलीक मुँह-कान छूबि आश्वस्त होथि जे ओ निकेँ अछि।बाजार जाथि त' एतबी ताकथि जे कोन चीज डॉलीक लेल लेब त' ठीक रहत।ऑफिसोमे स्टाफ सभक बीच हरदम चर्च करथि- 'हमर डॉली एना केलकैक, त' हमर डॉली ओना केलकैक!' एक दिन सहायजी हुनकर परोक्षमे कहलथिन- " जीबछ बाबूक प्राण डॉलीएमे बसै छनि।संतान की चीज थिकैक, ई संतान भेले पर बुझाइत छैक।नहि यौ?" महतोजी कहलथिन- "मुदा बुढ़ारीक संतान बड्ड पियरगर!आब जावत ओ पढ़ि-लिखि बियाह-जोग हेतनि, तावत जीबछ बाबू झुनकुट बूढ़ नहि भ' हेताह?एखने गाल झुर्रिया गेलनि अछि!" भवनाथजी बजलाह- "यौ, मनुक्खक हाथ किछु छैक?जे जनम दै छथिन, वैह पार-घाट लगबै छथिन।बुच्ची जुग-जुग जीबथु!" समयक पाँखि होइत छैक।चारि साल पूरि डॉलीक पाँचम चहरि गेलैक।जीबछ स्टाफ सभक बीच समस्या रखलनि- "यौ, अहाँ लोकनिकेँ किछु धेयान- बात अछि?हमर डॉलीक पाँचम शुरू भ' गेलैक अछि।ओना तँ हमर माय ओकरा बहुत-रास भजन, श्लोक आ गीत-नाद सिखा देने छनि आ हमहूँ कतेक चीज सभ पढ़ा देने छियैक, मुदा आब कोनो स्कूलमे ओकर नामांकन करा देनाइ आवश्यक बुझा रहल अछि।अहाँ लोकनिक की विचार?" एहि पर रंग-बिरंगक सुझाव आबय लगलनि।सहायजी कहलथिन- "यौ, एहि प्रश्न पर त' एक समय हमहूँ बड्ड असहाय भ' गेल रही।हमर बौअनकेँ सरकारीमे नाम लिखा देलियनि।तहिये सँ अंग्रेजी कमजोर भ' गेलनि।अपना देशमे लोक मातृभाषा-राष्ट्रभाषा अनघोल केने रहत, मुदा अंग्रेजी बिना उत्थान नहि।जँ बौअनकेँ 'इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स' नहि करेबितियनि,तँ आइ गाम पर बैसल झाम गुड़ैत रहितथि। हम तँ कहब जे 'जोसटेफ कॉन्वेंट'मे नाम लिखा दियौक बुच्चीकेँ!" महतोजी कहलथिन- "एह,नाम ऊँच आ कान बूच! हमरो भतीजा पढ़ैत रहय ओतय।एक बेरि दरमाहा नहि भेटल रहय।फीस दैमे विलम्ब भ' गेल।रौ बाप!ओकरा माथा पर हाथ रखबा रौदमे घंटा भरि ठाढ़ करा देलकैक।जखन हमर रौद्र रूप देखलक त' ओकर प्रिंसिपल लागल गोंगियाय।कहलियैक जे एखने थाना-पुलिस करबा देब पत्रकार बजबा क'।दू मासक फीस माफ केलक,तखन हम माफ केलियैक।की बाजत ओ सभ?कथी शिक्षा देत?" गुप्ताजी कहलथिन- "हम तँ कहब जे हमरे बच्चा सभक संग देहरादूनमे होस्टलमे रखबा दियौक आ निश्चिंत भ' जाउ।कोनो फीसो बहुत नहि छैक।तखन विचार क' लिय'।" पाठकजी कहलथिन- "यौ, सभसँ नीक त' हम कहब जे एतय टावर लग एकटा बड्ड नीक स्कूल खोललक अछि- मौर्या प्रिपरेटरी।दू प्राणी अछि।बच्चा सभक खूब ध्यान रखैत अछि।दुइए सालमे छब्बीस टा बच्चाकेँ रामकृष्णबलामे देवघर,पुरुलिया आ सैनिक स्कूल सभमे कंपीट करौलकैक अछि।ऊहो ठीक रहत।" प्रभावतीजी कहलथिन- "यौ, ओहू सभक बच्चा सभ एलेवेंथमे अबैत-अबैत कोटाक बाट ध' लैत छैक। तेँ शुरुहेसँ कोटेमे किएक नहि राखि देबैक?ओतय प्री-नर्चरसँ पढ़त त' 'नीट' वा 'जी'क टॉपर भ' क' बहरायत। ओत्तहि डेरा ल' क' घरनीक संगे राखि दियौक।घरक खान-पान रहतैक,देख-रेख रहतैक।अहूँ छुट्टी- छपाटीमे जाइत-अबैत रहब।एकटा बेटी अछि।नीकसँ व्यवस्था करू।" आदि-आदि। जीबछकेँ माथा काज नहि करनि।डॉलीकेँ अपनासँ दूर पठायब बर्दाश्त नहि रहनि।घरनी कहलथिन- "एतय नीक घरक बच्चा सभ 'जोसटेफ कॉन्वेंट'मे पढ़ैत छैक।अपनो बुच्ची ओहीमे पढ़तैक, चाहे जे हो।पता करू ग'!" जीबछ फॉर्म भरि अयलाह।इंटरव्यू दिन डॉलीकेँ ल' क' दूनू प्राणी स्कूल गेलाह।प्रिंसिपल कहलकथिन- " स्टूडेंट की मदर को होशियार रहना होता है।होम- वर्क करवाना होता है।इसलिये रूम नंबर थ्री के बगल में हॉल में सभी मदर को जाना है।'विंटर सीजन' पर एक पैसेज लिख कर टेबुल पर जमा करना है।एबुल मदर के चाइल्ड को एबुल मानकर एडमिशन ले लिया जाएगा।चलिए,दूसरे को बैठने दीजिये!" जीबछ बाबू सरकारीमे डॉलीक नामांकन करा एकटा ट्युशनियाँ मास्टर राखि दूनू माय-धीकेँ तैयारी करबा रहल छथिन।एहि बेरि नर्सरीमे त' प्राइवेटमे नामांकन नहि भेलनि,अगिला सत्रमे 'एल के जी'मे प्रयास करथिन। गदहाक इलाज ओहिदिन मास्सेब भूटनबाबूक ओतय गेल रही।अँगनेमे पटिया पर उघारे देहे पड़ल छलाह।दूटा चटिया सौंसे देह मलहम लगा रहल छलनि।ओ दरदसँ कुहरि रहल छलाह।कहलियनि-"मास्सेब प्रणाम! की भेल?किएक कुहरि रहल छी?" कुहरि-कुहरि बजलाह- "हौ,सौंसे देह सबसबाइ छल जे ओहि गदहासँ उपचार कराब' गेलहुँ।लगैए,ओकरो कोनो रोगीसँ भेँट नहि भेल रहैक।पहिने-पहिन हमरे पाबि ओ गदहा अपन गदहा जनम लागल छोड़ाब'!देह दुखाइत रहबे करय।पुछलक।कहलियैक जे केहन गदहा छी जे हमरेसँ पुछैत छी जे की होइए?अहाँ पढ़ि-लिखिक' गदहा बनलहुँ अछि,त' अहीं ने कहब जे हमर रोग की थिक?एखनो गदहपचीसी लगले अछि?कहिया सम्मत हैब?अरौ तोरिक-तोरी!तीन गोटेसँ मिलिक' लागल ततार'!पहिने हम बुझलियैक कि जे नीचाँ खसाक' किछु जाँच कर' चाहैत अछि।जखन मुकियाब' लागल तँ शुरूमे स्वास पड़ल।नीको लागल।तकर बाद तीनू गोटे देह पर चढ़ि लागल खून'।मुदा कनिक्के कालमे लागल जे ई रोगक नहि, हमरे इलाज करैए।ओ गदहा हमरा सात गदहाक मारि मारलक।अरौ बाप!छगबा-पिटबा क' देलक।बपलहरि छोड़ा देलक।बोखार झाड़ि देलक।ओ हो हो,इस्स!" कहलियनि-"मास्सेब, अहाँ जेना अपन चटिया सभकेँ बाते-बाते गदहा कहि दैत छियैक,तेना ककरो कहि देबैक,तँ ओ खराप मानबे करत।चिकित्सकक एकटा सम्मानित पेशा होइत छनि।हुनका हुनकर स्टाफ सभक समक्ष गदहा कहनाइ पैघ अशिष्टता भेल।तकर दुष्परिणामसँ अहाँकेँ जे कष्ट भेल देखि रहल छी,से बड्ड कष्ट भ' रहल अछि।" कहलाह- "हौ,गामक लेखे ओझा बताह आ ओझा लेखे गाम बताह!की करू?कपारक दोख!हौ अथाह!पढ़ाइ-लिखाइसँ लोक भागैत अछि,तेँ ने ज्ञानो पड़ायल जा रहल छैक?हौ, हम कोन अनुचित कहलियैक?हौ, 'गद' माने होइत छैक 'रोग' आ 'हा' भेलैक 'हरण केनिहार'।की बुझलह? एतदर्थ 'गदहा'क तात्पर्य भेलैक 'रोगक हरण केनिहार' अर्थात 'चिकित्सक'।तँ केओ पढ़त नहि, शब्दकोश राखत नहि आ सभटा गदहपनी उतारत भूटने मास्सेब पर?कहह?इस्स!" बोंगहा मिठाइ पचहीबाली काकी कार्तिक नहाकय घुरैत रहथि।संगे रहथिन झिरिया माय।कहलथिन- "गै मौगी, भुखले छें।पेटमे मुसरी दंड देने हेतौह।चल, कोनो नीक होटलमे कनी पानि पीबि ले।गाम पहुँचैत-पहुँचैत बेरि डुमि जेतौह।तखन कह' लगबें जे कोन धोंछीक संगे गेलहुँ जे पेटमे अगराही ढुकले रहि गेल।चल, झटकारि क'!" सामने एकटा खूब फैशनेबुल रेस्टोरेंट रहैक।दूनू जनी झोरा-झंटा लेने ओहिमे घुसि गेलीह।एकटा बैरा झटकल लग आबि मेनूबला कागत हिनका सभक टेबुल पर राखि देलकनि।काकी बजलीह- "रौ छौंड़ा!ई कोन कागत घुसका घसकल जाइ छें?ई की छियौक?बंगोर?रौ,हमरा सभ ई कागते चिबायब कि?" ओ घुरलनि आ कहलकनि- "उसमें देखिए  और बोलिये क्या खाना है? जो आर्डर कीजियेगा सो आ जायेगा?" काकी कहलथिन- "जे की कहेंगे?कोनो लहसुन-पियौज कहेंगे?खाली मधुर-मिठाइ कहेंगे।आन किछ थोड़बे बाजेंगे?" ओ कहलकनि- "कौन-सी मिठाई ला दें?" काकी- "मिठाइ आनेगा त' आनो ने रे बोंगहा मिठाइ जल्दी सनी!" ओ बैरा काउंटर पर गेल।ओकरा सभमे बड़ीकाल धरि हुज्जति होइत रहलैक।मनेजर कहलकैक- "वो जो मिठाई माँग रही है, उसका तो नामो नहीं सुने हैं।बोलेंगे नहीं है,तो रेस्टोरेंट के इमेज पर पड़ेगा।जाओ,संभालो कस्टमर को!" ओहि बैराकेँ अबैत देखि पचहीबाली काकी चिचियेलीह- "छुच्छे हाथ डोलबैत अबै छें एत्तीकाल पर?आना रे बोंगहा मिठाइ तों?" ओ कहलकनि- "दादी,वो मिठाई..." काकी कहलथिन- "तखन त' बड़े गप्प छाँट रहा था जे जे बाजेंगे से आन देगा।आब की हुआ?मिठाइ नैं रखता है बना क'?" ओ कहलकनि- "दादी, बड़ा होटल है।यहाँ सब आइटम मिलता है..." काकी- "तखन आना किए ने?" बैरा- "बोंगहा मिठाई था,लेकिन एगो कस्टमर आर्डर देके ले गया है।इसलिए...." काकी- "चल गे झिरिया माय!एकर मधुरे सठि गेलैक अछि। होटल खोलने अछि नानाक सगाई लेल!" ई कहि दूनू जनी विदा भेलीह।काउंटर लग दुनिया भरिक मिठाइ शीशाक भीतर देखाइ देलकनि।देखितहि काकी बुमकार छोड़लनि- "रौ अन्हराक नाति!एतेक मिठाइ राखि बइला रहल छलें? की बुझाया जे मौगी पाइ ले के पड़ा जाएगा?लो,अगौं पाइ धरो आ खुआओ मिठाइ! थमो, झोरा खोलबाइये दिया त' परसादी-बद्धी भी ल'ए लो।" ई कहि काकी सभ स्टाफ आ उपस्थित ग्राहक लोकनिकेँ परसादी-बद्धी बाँटि मिठाइ खा क' बहरेलीह।पूरा होटल रोड तक अरियातक लेल एलनि।मनेजर चरण छूबि कहलकनि- "माताजी,ये पैसा वापस लीजिए और आशीर्वाद दीजिये।" काकी आँचर सँ  नोर पोछि देलथिन।कहलथिन- "पाइ रखो लोक।हमर असिरबादी है।हम फेन आबेंगे त' तोरा सभसे भेँट करेंगे।भगमान हँसी-खुशी राखेंगे!" कुसियारक गाड़ी दृश्य 1: साठि ईस्वी।गामक सड़क पर कटहीगाड़ी कुसियार लदने चलल जा रहल छैक।चें-एं-चें-ओं-चें....।पाछाँ-पाछाँ लुंगी पहिरने एकटा दढ़ियल हाथमे सटका लेने चलि रहल छैक।बच्चा-सभक झुंड ओकरा पिठियौने चलल जा रहल छैक,नेहोरा करैत- "हौ,एकटा दय ने हौ!कुसियार!" कनी-कनी कालक उपरांत दढ़ियल बाजि उठैत छैक- "चोप्प!" अंततोगत्वा हटियागाछी लग गाड़ीसँ घीचि दू-चारि छड़ द' ओ पिंड छोड़बैत अछि।बच्चा सभ कुदैत घुरैत अछि। दृश्य 2: सतहत्तर ईस्वी। कुसियार-बोझल ट्रक सरपट भागल जा रहल छैक।दुखना दोकान लग घुमान पर ट्रक स्लो कर' पड़ैत छैक।चारिटा छौड़ा झटपट ट्रकक पाछाँ छड़पि पिछलका जालीमे सँ झीकि-झाकि हाइं-हाइं आठ-दस छड़-कुसियार खसा कूदि घुरैत अछि।ट्रक स्पीड ध' आगाँ बढ़ि जाइत छैक।खलासी खिड़की सँ नीचाँ ताकि गरिया रहल छैक। दृश्य 3: दु हजार बीस ईस्वी।हटियागाछी लग ट्रैक्टर पर कुसियार लादल छैक।लोक 'बीस टके छड़' कुसियार कीनि रहल अछि।आब कुसियारक गाड़ी छठियेमे गाम अबैत छैक। मोबाइलक रुटीन विवेका बाबूकेँ बड्ड फिकिर लागल रहैत रहनि।घरनी काँटीबालीकेँ कहलथिन- "अइ, अपनेक बालकक चरजा हमरा एकोरत्ती सोहा नहि रहल अछि।जखन-तखन मोबाइल पर लागल रहैत छथि।राति दू बेरि निकास जाइत छी।दूनू बेरि हुनका जगले आ मोबाइल पर लगले देखैत छियनि।जीह लहरि जाइत अछि।कथी इदिर-बिदिर करैत रहैत छथि, नहि जानि!किदन-किदन बाजितो रहैत छथि कनटोपा लगेने।गोली मारो,पकड़ो,..... की-कहाँ अर्र-दर्र बजैत सुनलियनि अछि।कखनहुँ ठठाक' सनकाह जकाँ हँस' लगैत छथि।पता नहि,केहन संगी-संगत छनि! हम तँ हिनक जीवन-भविष्य ल' क' बड्ड चिंतित रहैत छी।सुनै छलियैक-नो नॉलेज,विदाउट कॉलेज।कॉलेज त' कहियो पढ़' जाइत नहि छथि।पता नहि,मोबाइल पर कोन यूनिवर्सिटी खुजल छैक!बुझाक' कहियौन जे अपन मोबाइलक एकटा रुटीन बनाबथु।हरदम मोबाइल जोतने रहैत छथि,से अकरहर क' रहल छथि।एनामे कोनो दिन हमहीं कतहु पड़ा जायब।से कहि दैत छी!" काँटीबाली कहलथिन- "अरे ओ गेम खेलैत रहैत छैक।ओही पर पढ़िया- लिखिया सेहो करैत रहैत छैक।अहाँ अनेरे एहि सभमे नहि पड़ू आ हमरा पेड़ू नहि! जाउ अपन ऑफिस।बेमतलब धिया-पूता पर खिसिएबाक जमाना नहि छैक।की-कहाँ क' लै छैक गे माय गे माय!देहो भुलकि गेल।जाउ, हमर माथ नहि खाउ!" साँझमे ऑफिस सँ आबि विवेका बाबू ओछान पर देह मोड़क लेल पड़ि रहलाह।ओतय सँ हॉलमे बैसल पुत्र पर नजरि गेलनि। ओतय आबि कुरसी पर बैसि गेलाह।कनी कालक बाद बजलाह- "बौआ,एकटा बात कही?खराप लागत त' नहि कहब!" बेटा कहलथिन- "कहू ने पापा! खराप किएक लागत?" प्रसन्न होइत बजलाह- "वाह, इ ने भेल हमर बेटाबला गप!देखू बेटा, हम अपना लेल नहि,अपितु अहींक लेल कहैत छी।एखन अहाँ जलखै क' रहल छी।एखनहुँ एक हाथ मोबाइले पर चलि रहल अछि।एक बेरिमे एक्केटा काज करू।भरि राति जागइ छी,आठ बजेक बादे सूतिक' उठैत छी।इ कोनो नीक बात थीक?गैसक समस्या भ' जायत।स्वास्थ्य गड़बड़ा जायत।तखन कोनो काज नीक सँ नहि क' सकब!मोबाइल सँ हमर कोनो शत्रुता नहि,मुदा अति सर्वत्र वर्जयेत्।तेँ एकटा रुटीन बना लिय'।एक नहि, दू, हे लिय' तीन घंटा मोबाइल चला लिय'।मुदा सदिखन ओही पाछाँ रहब,अहाँ सन बुधियार बेटा सँ हम इ अपेक्षा नहि करैत छी।की,अनुचित कहैत छी?" पुत्र कहलथिन- "पापा, अहाँक कहब सर्वथा उचित अछि।हम मोबाइलक रुटीन बनाक' अहाँकेँ देखबैत छी।" आधा घंटाक उपरांत ओ रुटीन बनाक' अयलाह।कहलथिन-"मात्र दू घंटा अपना लेल मोबाइल चलेबाक समय निर्धारित केलहुँ अछि।"विवेका बाबू प्रसन्न भ' बजलाह- "वाह, मोन खुश क' देलहुँ।" अगिला दिन फेर पुत्रकेँ मोबाइल पर लागल देखि कहलथिन- "बौआ! फेर मोबाइल?आ रुटीन?" पुत्र मुँह पर आँगुर राखि कहलथिन - "वाइवा चलि रहल छैक!" विवेका बाबू चुप लगा गेलाह।साँझमे पुत्रकेँ पुछलथिन- "यौ,अहाँ अपन रुटीन देखाउ त' बौआ!कनी हमहूँ त' देखी जे कोन रुटीन बनेलहुँ अछि!" पुत्र रुटीन आनि देखेलथिन- 'भोर 10बजे सँ साँझ 5 बजे धरि- ऑनलाइन क्लास। साँझ 5बजे सँ राति 10बजे धरि- क्लास-आधारित स्वाध्याय। राति 11 बजे सँ 1 बजे धरि -मात्र दू घंटा अपना लेल मोबाइल पर मनोरंजन/गेम/फेसबुक/व्हाट्सएप्प आदि।' विवेका बाबू कपार पीटि लेलनि।अपन ऑफिसक सहकर्मी लोकनि सँ पुछलथिन।सभक समान व्यथा।बड़ा बाबू कहलथिन - "देखू,तनावमे हमहूँ छलहुँ।अहीं जकाँ हमहूँ बड्ड उद्योग-उपाय केलहुँ।अंतमे केलहुँ की,त' हमहूँ एकटा एंड्रॉइड मोबाइल कीनि लेलहुँ।हम घर जाइते मोबाइल ल' क' बैसि जाइत छी।बस,आब संसारमे अट्ठाबजर ने खसि जाउ, हमरा लेल धनि सन!देखू, संसारक गतिक संग तालमेल मिला लिय'।कोनो तनाव नहि हैत।"विवेका बाबू तहिये अपना लेल एकटा एंड्रॉइड मोबाइल किनलाह।आब दूनू बापूत अपन-अपन संसारमे मगन छथि। काँटीबाली एकदिन कहलथिन- "एकटा एहने फोन हमरो किनबा दितहुँ!हथौड़ीबाली बड्ड चोट मारैत रहैत छथि।आइ मान चढ़ाक' की कहैत रहथि जे बुझलखिन हे बहिन!हमहूँ मोबाइल कीनि लेलियैन।आइकाल्हि ओहि लोककेँ कोनो लोक बुझै छैक लोक,जे एकटा मोबाइलो नहि राखत!की करत पाइ राखिक'? ल' जायत संगे उप्पर?आँय?" कैमरामैन सावित्री -बियाह मे बड़का बखेड़ा भ' गेल रहैक।पुबरिया असोरा पर बिछौना चद्दरि टाँगि गीतगाइन सभ गबैत-गबैत अप्स्याँत भेल रहथि।छौड़ी सभ ओहीठाम सँ हुलकी-बुलकी द' रहल रहैक।मुदा अँगना मे बेदी लग दुइए-चारि टा आइ-माइ सभ कनियाँ-बड़ लग बैसल रहथिन।बारह-बारह बरखक छौड़ी सभ कोना सोझा अबितैक?बड़क चारिटा हिरोलबा संगी जे बिच्चे ठाम कुरसी पर अकड़ि क' बैसल रहैक! कहू त' कोना देखतैक बियाह जवान -जुआन छौड़ी सभ ? ताहू मे एकटा झुल्फीबला कैमरामैन छैक।कहूँ केकरो फोटो झीक लेलकैक तब? लालकाका एहेन अकरहर देखथिन त' लगथिन ललक'? भने ओ भंडार घर दिस बाझल छथिन।सोनकाकी जोर सँ सुना क' कहलथिन- "हइ लोकनि, कहै जाहक ने फोटूबला बरियाती सभ केँ बाहर जेबाक लेल!बियाह भ' जेतैक त' फोटू-फाटू झिकैत रहत।केहन मौगी-मेहर सभक मुँह निंघारने जाइ छैक छौड़ा-मनसा बरियतिया सभ?गै पता करै जाइ जो त' के सभ छियैक इ सभ?एखने नाओं ल' क' गीते मे सातो पुरखा केँ उकटि- पुकटि क' हाथ मे द' दैत छियैक?गै पवितरी धमधुसरी! ओना उतान भ' क' नहि चल बेसी।कैमराबला केँ देखि क' छम-छम नहि कर!" छोटका भैया कहलथिन - "बड़क विचारे सँ ओ सभ आयल छैक।लड़िकी सभक फोटो नहि झिकतैक।गछलकैक अछि,तखन बैसाओल गेलैक अछि।अहाँ सभ हल्ला-गुल्ला नहि करियौक।" सोनकाकी बजलथिन- "धौर, आगि लागय मुँह मे जे फेर बाजी! हमरा कोन काज अछि?नंगटे नाच करै जाइ जाह।जीयब त' की-की ने देखब!हम जाइ छी।हमर हँकार पुरा गेल।" सोनकाकी ओतय सँ विदा भ' गेलथिन, मुदा कनियाँ माय आँचर जोड़ि ठाढ़ भ' गेलथिन,तँ चुपचाप सोनकाकी बैसि गेलथिन।पवित्री ससरि क' बहिन लग जाक' बैसि गेल।कैमराक फ्लैश चमकलैक।बच्चन लप्प द' कैमरामैनक कैमरा छीनि लेलकैक। भारी हंगामा भ' गेलैक।कनी टा बात भेलैक?समर्थ-सकरथ बेटीक फोटो बरियतिया झीक लेलकैक?आइ गामक नाक कटा देल जेतैक? किन्नहुँ नहि!लाककाकाक कान मे बात गेला सँ फोंसरी सँ भोकन्नर भ' गेलैक।बियाह तँ कोनो धरानिये भइये गेलैक,मुदा कोनो नतीजा बाकी नहि रहलैक।रूसा-फुल्ली।बात- बतकहन।आधा बरियात बिनु खयने पड़ा गेलैक।टीशन सँ घुरा-घुरा आनल गेलैक।दूनू दिसक कुटुंब सभ थोर-थाम लगेलनि।तखन जाकय कोनो प्रकारें पार-घाट लगलैक। सभसँ बेसी इज्जत खराप भेलैक ओहि कैमरामैनक।ओ बड़क संगी आ ममियौत दूनू रहैक।तेँ बड़ वरुण बाबू सेहो भीतर सँ दुखी रहथिन। आइ चालीस बरखक बाद आइ फेर एकटा बियाह रहैक।वरुण बाबू दोबरदिसिया रहथिन।बरियाती आ सरियाती दूनू।हुनके पैरवी सँ कथा फरियायल रहैक।।बेस धमगिज्जर बरियात रहैक।आजा-बाजा।मनसे-मौगीक गधकिच्चन डाँस।एगो स्त्री वरुण बाबूक पहुँचा पकड़ि जोर-जोर सँ झीकि डाँस करा रहल रहथिन अपना संगे।तावत वरुण बाबूक नजरि कन्याक बाप पर पड़लनि।ओ हुनका पकड़ि ओहि स्त्रीक सोझा आनि ठाढ़ क' देलथिन।कहलथिन-"यै पवित्री दाइ,बड़क माइ,हमर सारि! एकरा चिन्हलियैक?यैह छी अहाँक समधि!यैह छी वैह कैमरामैन जे हमर बियाह मे अहाँक फोटो झिकने रहय! मोन पड़ल?" बीहनि कथा- हॉर्लिक्स दूनू भाय-बहिन पढ़ै लेल बैसल रहय।दाइ पुछलथिन - "तोरा सभक लेल हॉर्लिक्स बना दियौक?"बहिन कहलकैक- "बौआ केँ द' दहीक।हमरा समय लागत।एखन चारि पन्ना लिखबाक अछि।" दाइ चाहक लेल एक कप दूध राखि शेष मे हॉर्लिक्स घोरि पोता केँ द' एलथिन।ओ पढ़ितो रहय आ पिबितो रहय।कनी कालक बाद बहिन केँ लीखल भ' गेलैक।बाजलि-"दाइ! हमरो हॉर्लिक्स द' दे!" एके कप दूध बाँचल रहैक।दाइ पुछलथिन- "पानि मे बना दियौक आकि दूध मे?" पोती कहलकैक- "दे ने।जथी मे मोन छौ,तथी मे!" हॉर्लिक्स पिबैत बहिनक ध्यान भायक गिलास पर गेलैक।बाजलि- "बौआ, तोरा दाइ बेसी मानैत छथुन।तोरा दूधबला आ हमरा पानिबला हॉर्लिक्स!"दाइ सुनि लेलथिन।आँखि सँ नोर बहय लगलनि।पोता लग मे आबि कहलकनि-"दाइ, हम जनैत छियौक जे दूध कम रहौक,तेँ...।तोरा मोन मे कोनो बात नहि, मुदा आगाँ सँ ध्यान रखिहें।दीदी दोसर घर चलि जेतौक।ओकरा बेसी मान-दान हेबाक चाही।" दाइ हिचुकय लगलीह। बीहनि कथा- मेंटल भूलेकाका निछच्छ बहीर छथि।केकरो किछु सुनै छथिन?अपने धुन मे अर्र-दर्र बजैत रहै छथिन।लोक कहै छैक जे भूलेकाका बड्ड बिसरभोर सेहो भ' गेलाह अछि।लोक केँ नहि चीन्है छथिन।अवस्था गुने प्रतिविशेष भ' गेलनि अछि।साफ 'मेंटल' छथि,'मेंटल'। ठीके।ओहिदिन हुनकर अँगना कोनो काज सँ गेल रही।कोठली सँ भूलेकाकाक स्वर आबि रहल छलनि।अकानैत देखि प्रशांत बाजल-"बाबूजी छथि।एहिना चिकरा-भोकरी करैत रहैत छथि।कोनो चीजक अख्यास नहि रहैत छनि।नूएँ-बस्तर घिना दैत छथिन।" गेलहुँ।गोर लगलियनि।नहि चिन्हलाह।हमर बाबूजीक नाम सँ हमरा संबोधित करैत कहलाह-"के छियह?बच्चन हौ?देखह ने,छौड़ा सभ ओंगरी भोंकि मेंटल फोड़ि-फाड़ि दै जाय छह।तखन राति पेट्रोमैक्स कोना जरतह?कतबो मटिया तेल भरने रहबह आ पोकर सँ खोद-बीद करबह, आगि त' धरेबह मेंटले मे?वैह अपने जरि सौंसे इजोत करतह?आकि नहि?बाजह।मेंटले फोड़ि-फाड़ि देबहक,त' इजोत हेतह?जाबत मेंटल छह, ताबते पेट्रोमैक्स इजोत करतह।तेँ कहै छियह,धीया -पूता केँ बुझाबह।नहि त' सभटा मेंटल फाड़ि क' अन्हार क' देतह।अन्हार घर साँपे-साँप!" भूलेकाका सँ भेँट क' क' अपन आँगन एना बड़ी काल भ' गेल,मुदा 'मेंटल' कतहु मोन मे हड़बिर्रो मचेने अछि। बीहनि कथा- बुढ़िया दाइ बुढ़िया दाइक अपन भाषा छनि।भाव सँ भरल।अपन गढ़ल शब्द छनि।जखनि बजैत छथि, लोकक ठोर पर मुसकी आनि दैत छथिन।जेना; -"रौ चेंगरा सभ! अजगज्जर(अजगर) जकाँ सूतल रहबें कि उठबें आबो?बाबन बजे निन्न खुगतौ?" -"रौ बज्रेश(ब्रजेश)!तोरा बुधि नहि हेतौक कहियो!" -"के छियैक?बेलभद्दरक(बलभद्र) बेटी?" -"यौ किशुनमा!अहूँ बड्ड बेकूफ छी यौ?" -"रौ किरकिट देखै जाइ छें?वैह देतौ खाय लेल?" आदि-आदि। एक दिन भगवान केँ पूजा करैकाल जोर सँ बाजलि बुढ़िया दाइ- "यौ भगमान!हमर पोता केँ एहि बेर 'आइ टी आइ' पास करा दियौक!" पोता लगे मे ठाढ़ रहैक।कहलकैक-"गै बुढ़िया,सभटा नाश करेमे तों?'आइ आइ टी' के 'आइ टी आइ' कहि देलकै बुढ़िया नहितन!" दाइ कहलथिन- "भगमान हमर बात अपने पकड़ि लेथिन।हम हुनकर सभटा गलती- सलती माफ क' देने छियनि!" बीहनि कथा- गहूमक रखबारी फूदे पुछलथिन -"यौ लूटे, तखनि सँ हाक द' रहल छी।अकानैत नहि छियैक?कनियों उनमुनेबो नहि केलहुँ!कोन अनमनामे लागल छलहुँ?एना अनमनायल किएक छी?मुँह किएक भकुआयल अछि?" लूटे कहलथिन- "की कहू भाय?इ गहूमक रखबारी लाहेब केलक। गहूम फटकायल असोरा पर धैल रहैक।काल्हि कनिकाल लेल झिसियाइ लगलैक।आध घंटाभरि फुँहिया गेलैक।केकरो धेयान नहि रहलैक।गहूम रहैक बोरामे। हमर नजरि गेल।हड़बड़ा गेलहुँ।फुरफुराक' उठलहुँ।तलमलाक' खसलहुँ।बासन सभ ढनमना गेलैक ।कछमछा गेलहुँ।तैयो ओरियाक' उठलहुँ।घिसियाक' बोरा भीतर ल' गेलहुँ।तैयो गहूम सिमसिमा गेलैक।की करितहुँ?मोन मारि ओछान पर ओंघरा गेलहुँ।भोरे तरफराक' उठलहुँ।देखलियैक,रौद मरियायल रहैक।अगुतायल रही, मुदा असोथकित भ' सुस्ताय लगलहुँ।फेर मोन भेल जे गहूम पसारि दैत छियैक।पक्के पर छिड़िया देलियैक।एम्हर गहूम पर कौआ सभ लुबुधायल रहैक।चुगै लेल लुसफुसायल रहैक।नंग-चंग क' देलक।बगिलमे सोंटा टेबियाक' धयने रही।जुमाक' चला देलियैक।ओम्हर सँ एकटा नेता लोक सभकेँ डोरिएने भोट माँग' आबि रहल रहैक।ओ सोंटा ओकरे कपार बजरि गेलैक।ओ डिरियाय लगलैक।चिचियाय लगलैक।हम सिटपिटा गेलहुँ।केबाड़ बन्नक' क' गबदी मारि पड़ि रहलहुँ।ओ सभ बड़ीकाल धरि केबाड़ पीटैत रहल।चिकरैत रहल।नेता कहलकैक -'छोड़ि दही, एखन भोटक टाइम छैक।' तखन सँ जीह हड़हड़ करैए।ताहिमे अहाँ खड़खड़ायल आबि गेलहुँ।ओ नेता बड्ड खबखबायल हेतैक,नहि यौ?कहूँ लोक जिता देलकैक, तखन यौ?बाप-रौ-बाप!" पचहीबाली काकीक यात्रा-वृत्तांत (लघुकथा) उत्तिम काका बेसी दुखित भ' गेल रहथि।बेटा-पुतोहु इलाजक लेल ट्रेन सँ दिल्ली ल' गेलथिन।पचहीबाली काकी संगे रहबे करथिन।ओमहर सँ घुरती काल ट्रेनक टिकट नहि भेटि सकलैक।बेटा-पुतोहु केँ लंदन जेबाक रहनि।तेँ हिनका दुनू प्राणी केँ हवाइ जहाजक टिकट कटा एयरपोर्ट तक पहुँचाक' ओ लोकनि समुझा-बुझाक' चलि गेलथिन।सउँसे गाम इ समाचार पसरि गेलैक जे पचहीबाली काकी हवा-जहाज पर चढ़िक' दिल्ली सँ गाम अयलीह अछि।इ सुनि सउँसे गामक आइ-माइ सभ हुनका ओतय जुटय लगलीह।काकीक आँगन मे बड़का मेले लागि गेल। काकी सिरागू घर सँ भगवती केँ प्रणाम क' बहराइत छथि।आँगन मे लोकक जुटान देखि बजलीह - "काका केँ देखबाक लेल जुटै गेल छें गै? एहि लेल एतेक हसेरी बान्हि क' अबै गेलें हन?काका आब निकेँ छथुन! गै, अबै गेलेंहें त' ब्रह्मक घोड़ा जकाँ किएक ठाढ़ छें सभ गोटे?असोरा पर पटिया - शीतलपाटी सभ मोड़ल राखल छौक,से आँखि मे रतौन्ही भेल छौक?सूझै नहि छौक?एक रत्ती ल' क' ओछा लेबें त' रोइयाँ भगन भ' जाइ जेतौह?सभ दिन भसन्नरि के भसन्नरिए रहि जाइ जेबें?हमर बेटा बियाह केने रहय,तँ कतेक घोल- फचक्का केने रहय लोक सभ?आइ ओकरे सभक परसादे हवा-जहाज पर चढ़िक' हमहीं ने एलियैक? आकि आन?बाज!" सभ गोटे बैसि जाइ गेलथिन।तखन दुलारपुरबाली कहलथिन - "बहिन,भैया आब पूरा निकेँ छथिन ने?" काकी बजलीह - "गै, बूढ़ देह भेलनि।दबाइ पर छथिन।तखन तैयो आब ठीके छथिन।एकटा भेल जे बेमारीक बहन्ने हमरो तीर्थ-बर्थ भ' गेल।गे मैया, की कहियौक?ओमहरक मौगी सभ बड्ड रभसल! केकरो माथ पर नूआँ नहि।हमहूँ कहलहुँ जे गाम पर सौतिन सभ हमरे पुतोहु केँ देखि-देखि नाक-मुँह चमकाबै छल।छुछुनरी सभ एत्त' अबितय तखन ने चकबिदोर लगितैक?गै, की कहियौक?ओत्ते-ओत्ते टा घर नहि देखने रहियैक! एकटा होटल मे ल' गेल बौआ हमर।गे मैया सभ! तेहन छलछलौआ रहैक जे चली त' कतेक बेरि पिछड़िक' मुँहे भरे खस' लागी।गै, अपना सभक दिसन लोक चलै छैक आ सीढ़ी रुकल रहै छैक।ओमहर देखलियैक जे सीढ़िये चलै छैक आ लोक सभ ओहि पर सवारी क' क' जाइ अछि,ठाढ़े-ठाढ़े।उतरै काल जँ कनियाँ हमरा पकड़ि नहि लेथि तँ तलमलाक कान- कपार फुटले-घर छल। गे दाइ, की कहियौक?होटल मे खाइ लेल भरि थारी द' गेल।बारीक सभ टोपा लगेने लागय जेना कोनो महराज साहेबक नातिए सभ हुए।एकटा बाटी मे गरम पानि आ नेबो काटि क' देने गेल।हम त' गद्दीबला कुरसी पर पलथी मारने बैसल रही।पानि मे नेबो गाड़ि पहिने पी लेलहुँ।गे मैया, लोक सभ हमरे दिस ताकि क' हँसय लागल।कहलियैक जोर सँ-'की हँसता है?हमरा कोनो घेघ लटकल है?' बेटा-पुतोहु बुझाब' लागल,नहि तँ हम नानीक बियाह मोन पाड़ि देने रहितियनि। चल,हटा।हँ, इ भेल जे महरौली, झंडाबला आ कालका माइ मंदिल दर्शन करा देलक। अबिती काल त' अजगुते खेला भ' गेल।हवा-जहाज पकड़ाब' ल' जाइ गेल।सर-सामान ल' लेलक।ओ एकटा घुमघुमौआ मशीन पर ध' देलकैक।ओ कत'- ने- कहाँ चलि गेलैक।बौआ कहलक जे पटना मे अपने द' देतौक।डिल्ली मे एकटा मजगूत सूप कीनि लेने रही।ओ हाथे मे रहय।ओ छीनि क' लागल मशीन सँ जाँच कर'।हम कहलियैक- 'अइ मे कथी ढूरता है?हुरिया?बड्ड सेहन्ता लगता है त' कोनो रोकता है।कीनि ने आनो आ दौ ने अपन बौह को।अनका समान पर कोन दाबी है केकरो?हल्ला केलहुँ त' आपस केलक। भीतर हवा-जहाज देखै छी त' बूझ ने जे बड़का बसे बूझ।ओहिना लोक सभ सीटे-सीट बैसल।एक गोटा केँ कहलियैक जे यौ हमरा कनी खिड़की लग बैस' दिय'।मोन घूम' लगैए,जी ओकाय लगैए।मुदा ओ मनसा कथी लेल मानत?काका बीच मे बैसि गेलथुन आ हम कात मे।कनी काल मे दू गो लटकी छौड़ी आबि मारितेक बात इशारा सँ कसरत क' क' बताब' लगलैक।हमरा किछु बुझेबे नहि केलक।कहलियैक -' हे गे छौड़ी, इमहर आ!की बजलें,से की हम बुझलियौक?ओ किदन-किदन कहि हमरा एगो फीता सँ सीट मे बान्हि देलक।कहलियैक जे एना मे लोक निकास-बात केना जाएगा?मुदा ओ हमरे सिखाब' लागल।एकरे कहै छैक- नतिनी सिखाबय बुढ़ नानी केँ!' गे मैया! खूब रेस क' क' एक्के बेरि अकास ठेका देलकैक जहाज।नीचाँबला घर सभ सलाइक डिब्बी जकाँ लागइ।मुदा हमरा ड'र नहि भेलहु।हँ, कान बहुत फरफराय लागल।एगो छौड़ी केँ हाक देलहुँ।कहलियैक जे कनी कम रेस मे जहाज हाँक' कहौ, कान बेसी फरफरा रहा है।तखन ओ दूनू कान मे तूर ठूसि देलक।पटना मे उतरै काल दूनू छौड़ी केँ एक-हकटा नमरी देलियैक जे किछु कीनि क' खा-पीबि लीहें।लेबे नहि करय।कहलियैक जे असिरबादी छियौक, राखि ले।कतेक हुज्जति केलियैक,तखन ओ सभ गोर लाग' लागल।बड्ड असिरबाद देलियैक।सभ सँ अजब तमाशा तँ समान लै काल भेल।सभक समान बेरा-बेरी मशीन पर नाचैए आ लोक हथोड़िया मारि ल' रहल अछि।एहि मे तँ केकरो समान केओ उचंगि पड़ा जेतैक।हमरो धोखा भ' गेल।पुतोहु नवका बैग कीनि देने रहथि,ललका।ओ दोसर उठा लेलक।बस, हम गछारलहुँ ओक्कर गट्टा।कहलियैक-' पचहीबाली के बैग आप किए लेते हैं?अपन समान सँ माने- मतलब रखिये।ओ किन्नहुँ मानबे नहि करय।धरा-पकड़ी हुअ' लागल।तखने काका बाजि उठलखुन- 'अपन बैग हइये आब आयल अछि।'तखन ओकरा छोड़लहुँ।बेमतलब सरकार झगड़ करबै छैक। की कहियौक,कनियों चंसगर नहि रहितहुँ त' भारी बिपति मे पड़ि गेल रहितहुँ कैक बेरि।तों सभ एक बेरि हवा-जहाज पर चढ़िक' देखबही तखन ने बुझबही! गै जगदंबा,हइ कनी सभकेँ तेल-सिंदूर क' ने दहीक।" एकर उपरांत पचहीबाली काकी सभकेँ अपन मोटरी सँ निकालि परसादी- बद्धी सभ बाँट' लगलीह।बजलीह- "तों सभ जाइ जइहें त' भरोराबाली, हाबीबाली आ नरुआरबाली केँ सेहो पठा दीहें।सभ केओ हाल- चाल बूझ' आयल आ ओ तीनू बड़का महंथिन बनैए?कहि दिहैक,आबि क' परसादी ल' जाइ जायत,नहि त' सातो पुरखा केँ उकटि-पुकटि क' हाथ मे द' देबैक!" कंचन कंठ मुक्ति मौसीमांकें नोर त जेना लगैत अछि कि सावनसं प्रतिस्पर्धा केने अछि।आई दू दिन भ गेल सुधा - सुधा कहिकय अश्रु छन्हि कि रुक'कें नामे नहि। बेचारी सुधाकें अनाथक नाथ भ' मौसी जिनगी भरि पोसलखिन्ह, विवाह दान सभ भेल। बेचारी जान अरोपिक' सासुरलोक क सेवा केलक।तखन बड्ड मान होइत छल।मुदा जें कि पता चललैन्हि कि ओ जन्मजाते एकटा किडनीकें संग आयल छथि,तकर किनको पता नहि छल,बिना कोनो बातक विचार केने ओकरा मौसीमां लग पहुँचा गेलखिन्ह। मौसी कतबो कहलखिन्ह आन ठाम सलाह लेलहुं,एहि सौं कोनो दायित्वमें अंतर नहि अबैत अछि, के कानबात देनिहार।ओ सभ तऽ धोखासं तलाकोके कागत सैन करा लेलखिन्ह। मौसी हबोढेकार कनैत,ओकर कष्टकें मोन पारैत,सुधाकें मोनेमोन आशीष देलन्हि,"जो आब चैन सौं रहिहें, ई सरसमाज तोरा जोग नहि छलौ।" मुन्ना जी लघुकथा- बीचला लोक हमर साहित्यिक यात्रा कथा लेखन सं प्रारम्भ भेल छल. पहिल कथा-" मनियाडर" झंझारपुर कथा गोष्ठी (1993) मे पाठ पहिल प्रकाशनार्थ कथा " स्वीकार " कर्णामृत (1994) दोसर , प्रदीप बिहारीक संपादन मे सझिया संगोर " भरि राति भोर मे '(1997) तकर अतिरिक्त विदेह, मिथिलांगन....मे. ओइ बीच बीहनि कथा विधा फरिछाब' मे लागल आब ओ पाटि ध लेलक. पुन: कथा दिस....क्रमश: अपन तेरहम आ हिजड़ा जीवन पर लिखल टटका कथा प्रस्तुत ऐछ! सलाह, सुझाव सादर अपेक्षित!-मुन्नाजी वाह!आइ त' जतरा सुफांटि निकलल! तीन दिन सं बौआ-टौआ कें खाली हाथ घर घुरि जाइ! लगैए आइ परोपट्टाक मए सब चिलका जन्म देनाइ बन्न क' देलकैए! अपन अन्न पानि खा कते दिन निमहब? पहिने जाहि गली, मोहल्ला मे पएर दी घोघतनिया बाली सब सेहो कहि दिए-"फल्लां गाम बाली के बेटा भेलैए! "जाउ ने धनगर आ समंगर दुनू छै! खोंइछा, झोरा-झपटा सब भरि देत! धिया पुता सेहो पछोड़ लागि सुना दिए -" ओकरा घर मे बेटा एलैए, चलू ओकरे दुरा पर जमघट जमतै! "यै मइयां आब जनी जाति के चिलका नै होइ छै? धौर हेतै किए नै, ऐ तोर मे सबटा छौंड़ीए भफएल छलै! बेटा सुनिते,हिजड़बा-हिजड़नीक झुण्ड ढोल, हरमुनिया ल' ढ़ूकि जाइ ओही अंगना! रहै त' सबटा हिजड़नीये साया, साड़ी आ ब्लौज पहिरने! कियो कियो सलवार समीज मे आ ओढ़नी ओढ़ने! ओही मे सं कियो कियो जिन्स, टीशर्ट पहिरने, बाबरी छंटेने हिजड़बा भ' जए! आ बांकी सबटा जनी जातिक भेष मे छाती बढ़ेने ऐन मेन मौगीए बुझू! सांच मे त' इ सब ने स्त्री ने पुरूष, बीचला लोक, भगवानक डांग देल! मुदा समाज मे रहै बसै लए कपड़ा लत्ता आ बोल सं पानिगर! देहगर आ दुधगर सेहो! पएरक घुंघरू सं लोकक मोन हरिया दान, धान आ पाइ ल' घर घुरए ! मिथिला मे बेटाक जन्म पर लोकक मोन हर्षित केनाइ पमरियाक काज छल! इ इस्लाम धर्म माननिहार ' पमार' जातिक एकटा वर्ग पेशाक रूप मे अपना लेने छल! इ सब झुण्ड बना गामे गामे पता करैत रहैत छल -' कोन घर बेटा जन्म लेलक! "एकरो रेवाज मे आने पौराणिक रेवाज सन कान्या बारल रहै छलै! कोनो घर कान्या जन्मक खबरि पाबि ओ घर बागि चलए. जखन की एकर पुरूष झुण्ड मोन बहटारै लए किछु सदस्य कें घघरी पहिरा स्त्री वेश मे नचबैए माने राज नर्तकी सं लोक नर्तकी धरि, पेशा मे सेहो स्त्री के नचएब समाज कें बेसी पसिन्न.मिथिला मे लौण्डा नाचक प्रथा नै रहलैए.कबुला पाती मे छठिक घाट पर आंचर पर नटुआ नचएब होइ कि विवाह दान छकरबाजी नाच करतै पुरूष आ स्वांंग स्त्रीक.आ ताहि समाज मे बेटी जन्म पर ओकरा मनहुस बुझत.गर्भहि जांच लग सं ओकर प्रताड़ना सं समाज एकभगाह सन भेल जाइछ.एक दिस बेटी जन्म पर बान्ह आ दोसर दिस जीवनक संपूर्णता आ कि मोन बहटारबाक प्रमुख साधन बेटीये, स्त्री.यांत्रिक विकासें परम्पराक होइत पतन सं सामाजिक सरोकार सेहो भारल सन. आकि लोक विकासक गति नव नव रूचि मे परिवर्तित भ' रहल. हिजड़ा नाच सेहो तहि रूचिक संकेत थिक.आ आब हिजड़ा समाज सेहो तेजी सं विकसित भ' रहल. हय... हय तूं सब आङन मे कत' घूसल अबै छें? बाबा ,तमसाइ किए छी? की भेल अहां कें धीरज धरू ने.हम सब कोनो मुजरा बाली नै जे मोन आ देहक मनोरंजन क' ढ़ेका,जेबी ढ़ील क' घर घुरा देब. हय तों त' बताह जकां गप्प करै छें, हमरा की लालबत्ती बला बस्तीक गांहकि बुझै छें जे एना लोढ़िएने जाइ छें? नै यौ बाबा, हम सब अहांक सनक देखि कें चौल करै छलौं.हम सब कि कोनो कोठा बाली छी जे इमान, देह, धरम सब बेचि क' पेट भरब. हम सब अहीं सब सन माय बापक, इश्वरक डांग सं डेंगएल चिलका थिक. से इश्वरक गलती की हमर सबहक कर्तव्य दोष, नै जानि.एकहि कोखिक कियो सोझ कियो टेढ़ के त' परिवार, समाज राखिए लै छै. मुदा ओही कोखिक बीचला लोक माने नै बेटी ने बेटा के लोक मोन मारि बहटारि दैए.आ तहन हम सब मए बाप, सर समाजक निंहुछल एकटा नव समाजक अंग होइ छी.आ ओही तिरस्कृत समाजक हंसी ठठ्ठा मे समिलात भ' जीवन गुदस्त करैत रहै छी. छी त' हमहुँ सब मनुक्खे, सकलि सुरति , देह गात सं अहीं सन एकरंगाहे. मुदा प्रकृति प्रदत्त जे सृजनधर्मिता तकरा सं वंचित.समाजक लेल अशपृश्य त' नै मुदा कुड़कुट सन. सेहो अयोग्यता त' प्रकृतियेक देल. कोनो बलात् व्यवहृत वस्तु जात त' नै ने हम सब. तहन बाबा एना हिज्जो किए ? ऐ हिजड़ा जातिक एत' कोन खगता ?.हमरा घर त' पोती आयल, पोता नै ने! तहन कथीक हंसी खुशी. जो तों सब आन दुआरि,आन टोल, गाम. ताकुत कर गे नवजात बेटा आ घरन्दार घर. तों किन्नरवा सब हमरा बखसि दे,नेहोरा करै छीयौ. तों सब नाच गान कर तोहर सएह काज ने! जो धन संपति अरज पेट पोस! बाबा, हम सब किन्नर नै, हिजड़ा छी, हिजड़ा. मुदा किन्नर जातिक गुण सेहो अंगेजने छी, पेट पोस' लेल. किन्नर त' सृष्टिक आदिये काल सं छल, वनवासीक रूप मे. जाहि मे नर नारी दुनू फराक छल. जे स्वर्ग लोक मे नर्तक नर्तकी ( नचनिया) रूप मे उपस्थित रहै छल. रामायण- महाभारत सब काल मे नचनिया निमित्त रहल. मुदा हिजड़ा प्रकृतिए सतएल एहेन जीवात्मा ऐछ जे ने नर छल आ ने नारी.कालान्तर मे लेखक सब किन्नर आ हिजड़ा के ओहिना मिझ्झर क' देलक जेना सबटा वनस्पति घी भेल डालडा आ सबटा वाशिंग पाउडर सर्फ कहए लागल.पौराणिक ग्रन्थ ज्योतिष शास्त्र फरिछौने ऐछ जे "- कोनो स्त्री मे चन्द्रमा, मंगल आ सूर्यक लग्ने गर्भधारण होइछ.शारीरिक संबंध मे वीर्यक अधिकाधिक उपस्थिति सं बेटा, रक्तक अधिकाधिक सं बेटी आ दुनूक समान उपस्थिति सं नपुंसक वा हिजड़ा चिलका जन्म लैछ.ओना विज्ञान तकरा नै मानैए.विज्ञानक अनुसार गर्भधारणक विकासक क्रम अवरुद्ध भेला सं मिलावटी जननांग (intersex) के संभावना बनैछ.एकर कारण मे संबंधक अनियमितता, दवाइ सेवनक उनटा प्रभाव, क्रोमोजोम मे एक्स- वाइक जग्गह एकाकी उपस्थिति आदि होइछ. बाबा, एकटा बात गिरह बान्हि लियय जे जन्मक समय सब बच्चा हिजड़ा नै रहैछ.सिरखारी सं सब पुरूषे सन रहैछ, मुदा अविकसीत जननांग रहैछ, टेस्टोरेनक अभाव सं छाती त' विकसीत होइछ मुदा अविकसीत लिंग उपस्थित रहैछ. करीब अस्सी प्रतिशत एहेन चिलका सर्जरीक पछाति कोनो एक रुप पबैछ. किछु सफल ऑपरेशन सं पूर्णत: पुरूष वा पूर्णत; स्त्री काय मे सेहो नवजीवन पौलक. हय ,सुन ! हम कोनो स्कूलक कक्षा मे नै बैसल छी. तों तहन सं इतिहास, भूगोल, विज्ञान पढ़ेने जा रहलें. तोहर सबहक इश्वरक डांग सं समाजिक आ मानसिक स्थिति दारूण छौ से बुझै छी. मुदा आब की अंग्रेजी शासकक सत्ता थोड़े छै जे तोरा सबकें उभयलिंगी दर्जा आ अधिकार छीनि कें नक्सली की अपराधीक श्रेणी मे द' देने छलै. तोहर एतेक भाषण सं जिज्ञासा भेल जे तों नाच गान मे मगन रहै बाली इ विशिष्ट ज्ञानी कोना भेलें? बाबा! हम पूरे हाइ स्कूल पढ़ने छी, आ अपन हंजेड़क मेट छी.अपन आ समूह सदस्यक अधिकार आ ज्ञान प्राप्तिक वास्ते स्कूल, कॉलेज, कचहरी आ मंत्रालयक चक्कर कटैत रहै छी....! समाचार चैनलक पैनल सदस्य छी! बाबाक जिज्ञासा शान्ति पछाति ओकर खून मे नव उर्जा प्रवाहित भेलै,आंशिक चमक बढ़िया गेलै.हलसैत बाजि उठल-" हं बाबा हं, अहूं के जेना हमर सबहक जिनगीक दुख दर्दक खिस्सा बुझले ऐछ! आब कहू जे हम सब सबहक सुख- दुख मे सहयोगीये , मुदा शायद अंग्रेजबा सब रहै उनटा खोपड़ीक . जहन अवसान अबै छै तहन अहंकार बढ़ै छै आ बुद्धि घटै छै. तें ने 1871 मे इ सब एकभगाह कानून पास क' हमरा सब कें अपराधिक जनजाति " जरायम "के श्रेणी मे द' देने छल. बुझू ओ सब हमर सोन चिड़ै सन भारत के कामधेनु गए बुझि दुहि दुहि खए, से भेल मालिक.जहन की हम सब मांगि चांगि खाइ. फेरो हंसाब' खेलाब' जाइ से भेलौं ओकरा नजरि मे अपराधी. धनि कहू सुभाष, खुदीराम आ गांधी बाबा ....सब कें जे ओइ कलमुहां सब सं देश के आजादी दियौलनि.तहन 1951 मे अपन सरकार हमरा सब कें से हो ' जरायम ' सं आजाद करा समाज मे रहि नाच- गान क' पेट भरि जीवाक अवसर देलक. समाजक ओलवा दोलवा सं कहियो हम सब खिन्न नै होइ छी. जे समाज अपन संगतुरिया के नै बखसैए से हमर सबहक कोना हएत? हम सब त' प्रकृतिए बारल सन. बाबा एकटा बात ध्यान राखब, बरू हम सब बारले सही मुदा असमाजिक नै. देहक भूख बरू नै जगौ मुदा पेटक भूख त' लगबे करै छै. ताहि लए त' नाच गाने क' हम सब अहां सबहक नजरि मे रहै छी. अहींक समाज जकां हमरो समाज मे जहन संख्या वृद्धि होइत गेलै तहन कते लोक बधइये मांगितै? सुनने हेबै जे खगता आविष्कारक जननी होइछ.त' हमहूं सब गुरूक आदेशे बस, ट्रेन, रेडलाइट पर थपड़ी पारि अर्थक जुटान मे जुटि जाइ छी. आम समाज सं बरू बारले मुदा हमर कतिएल बेरएल लोकक सेहो एकटा संगठित समाज त' ऐछिए. समाज की? इएह ने जे एक फरीकक,एक जीव वर्गक सामुदायिक जिनगी जीवाक समूह.त' हमहूं सब की एकरवा थोड़े रहै छी. जेना अहांक समाज जाति, धर्म, वर्ग मे बांटल मुखिया, सरपंच, माञिन्जन शासन त'र निमहैए तहिना हमहूं सब अपन देवीक समूह मे बांट बखरा भ' सामूहिक जिनगी जीवै छी यै ने यौ.हमर समूह चारि वर्ग मे संगठित ऐछ! सब वर्गक अपन अपन देवी छथिन. पहिल बुचरा,ऐ वर्ग मे कने पिताह, पुरूषाह आ उग्र सदस्यक प्रवेश रहैछ.इ देवी सेहो काली माय जकां उग्र त' ओ ऐ समूहक शांति भंग नै होम' देथिन, इएह लोक मान्यता छैक. दोसर नीलिमा, इ संयमित, संतुलित जीवन जीयय वाली देवीक समूह ऐछ.!ऐ मे स्त्रैण सदस्य सबहक प्रवेश देल जाइछ. जे राब दुआब नै, अपना कें दाबि राख' वाली सदस्य होइथ.तेसर समूह जाहि देवीक होइछ ओ कहबैछ मनसा, जाहि मे एहेन सदस्य कें राखल जाइछ जे जीवन सं अगुताइथ नै, अपन जीवन मे किछु नव करबाक आतुर होइथ.आ चारिम समूह होइछ हंसा देवीक.ऐ मे हुनकर प्रवेश होइछ जे सदस्य उडांत होइथ. जिनकर पोन, मोन आ जीह एक ठाम टिक कें नै रहि पाबए.एक समूहक सदस्य कें दोसर समूहक सदस्य सं कोनो राग द्वेष नै रहैछ.मुदा जे जाहि समूह वर्गक सदस्य तकर नियमक बन्हन मे बान्धल सन बुझू.अहीं सबहक पंचायतक मुखिया जकां हमरो समूहक प्रमुख नायक कहबैछ.सब समूहक नायक मिलि जुलि एकटा गुरूक चयन करैछ.हमर समाजक कियो सदस्य प्रतिभाशाली, बलशाली, मेधावी कि उजड्ड हो, गुरूक अपमान नै करैछ.हम सब खोपड़ी खपा कि थोपड़ी बजा जे धन अर्जित करै छियै ने बाबा ओ सबटा गुरूक चरण मे अर्पित क' दै छियै. से करियौ किए ने, उएह हमर सबहक पालक आ उएह अभिभावक. ऐ फाल्गुन शुक्लपक्ष मे वार्षिकोत्सव ऐछ, ऐ अवसर पर सब समूहक सदस्य एक निर्धारित जगह पर उपस्थित होइछ.सब अपन लहंगा- चुनरी, जेवर सं सुसज्जित, सजि धजि , दुल्हिन बनि आयल ऐछ. गुरूक आदेशानुसार इ पर्व विवाह अनुष्ठानक पर्व थिक.ऐ दिन सबहक सामुहिक विवाहक स्वांग रचाओल जाइछ.सबहक एकहिटा वर होइत छथि ' अरवण'. गाम, शहर सं बहरी जग्गह, सुनसान सन, अरवण देवताक प्रतिमा लगाओल गेल ऐछ! शमियाना मे लाइट आ डी. जे सं चकमक आ गनगन करैत दृश्य! सब हिजड़ा गण पतियानी बना, धुप दीप जरा ' अरवण' देवताक अराधना मे बैसि गेल. नायक द्वारा पूजन, हवनक संग सबहक सिनूरदानक रेवाज पूर्ण भेल.आब सब नाच गान करैत हर्षोल्लास मे रमि गेल ऐछ! इ त्योहार सांझ सं भोर धरिक होइछ. भोरूकवा मे गुरूक आज्ञा होइते ' अरवण' देवताक मूर्ति तोड़ि फोड़ि नष्ट क' देल जाइछ. तहि संग सब वधुगण अपन अपन चुड़ी फोइर,सेनुर मेटा, मंगल सूत्र तोड़ि वैधव्य धारण क' लैछ.रंग विरंगा साड़ी, ब्लाउजक जग्गह उजरा साड़ीक परिधान मे आबि जाइछ. मुदा विलापक प्रथा नै छै. कींवदन्ति ऐछ जे- महाभारत काल मे हिजड़ा गण वनवासी छल. ओइ ठाम एकरा सब कें राक्षसक उत्पात भेलै.जकरा सं संघर्ष क' अर्जुन पुत्र ' अरवण' आजाद करौलनि. तें इ सब रक्षक बुझि अपन पति स्वीकार क' लेलक.मुदा अरवण,युद्धभूमि मे लड़ैत ओही दिन मृत्यु गति के प्राप्ति क' लेलनि.ओइ दिन सं इ, एकदिना पावनि मनेवाक रेवाज आइ धरि निरन्तरता बनौने ऐछ! आइ सबहक जुटान एकठाम भेल ऐछ, पूरा चुप्पी मुदा मोन अशान्त सन! शान्तिक मृत्यु सं सब मोने मोन खुश भेल ऐछ,जए दहि एकरा त' मोक्ष हेतै.गै बिन्दा,ओना थोड़े पैट हेतौ चप्पल, जुत्ता ला ने.आ सब मिलि लहाश कें चप्पल, जुत्ता सं पीटैत कहैए- जो... जो गै फेर एम्हर नै अबिहें, जनमिहें त' मनुक्ख भ' कें! गै किरणिया तों किए नोर बहबै छें,पोछ! नै त' इ फेरो एम्हरे घुरि औतौ.पुन: शान्ति पसरि गेल ऐछ!अधरतिये मे लहाश कें खेत मे आनल गेल. हिन्दु धर्म मानितो लहास जरएब असगुन बुझल जाइछ. कियो बहरी बला लोकक दर्शन सं एकरा मोक्ष नै भेटतै तें चुपचाप खाधि मे द' झांपि चल. मना जे अगिला जन्म मे मनुक्ख होउ, नर- नारी किछो मुदा बीचला लोक नै. आइ चारू भर खुशीक च'प उनार गप्प पसरल छै.सब हिजड़ाक करेजा सुप सन भेल बुझू.ओना निर्णय समाजक हो कि न्यायालयक सार्थके बुझू.इ निश्तुकि बुझू जे सब निर्णय सब पर लागू नै होइछ.आ कि एना कहू जे सब बात सं सब लाभान्वित नहि होइछ. मुदा तै सं कि आइ 15 अप्रैल 14 हमर सबहक जीवनक इतिहास स्वर्णक्षार सं लिखल सन! किए त' अझुके दिन सर्वोच्च न्यायालय हमरा सब कें पिछड़ी जातिक श्रेणीक बराबर आरक्षणक घोषणा कएलक! आब पढ़ल लिखल कें नोकरी मे जग्गह सुनिश्चित सन. ओना पहिनहियो सं हमर लोक सब शिक्षक, प्रोफेसर, पार्षद आदि त' भेले छै.मुदा आब अधिकार संग हेतै.हं अधिकारक बात पर मोन पड़ैए वर्ष-94. जहिया हम सब टी.एन. शेषण कें नाचि गाबि मोन बहटारने रही.उएह त' पहिल बेर हमरा सब कें विधिवत मताधिकार प्रयोगक अधिकार दियौलनि.ओइ सं पहिने हमरा सब कें मतदानक ने कोनो अधिकार छल आ ने कोनो सरोकार.आब.. आब हमहूं सब सरकार भ' सकै छी आ हमरो सबहक सरकार बनि सकैए जेना एखनहु धरि अहां सबहक ऐछ! बाबा ओंघाइ छीयै की? ढ़ोल, हरमुनिया आ हाथ माइक नेने साड़ी ,समीज बालीक हंजेड़ अनचोके बुचकुन कक्काक आंगन में ढ़ूकि गेल। कनिञां घोघ तनैत,बुच्ची सम्हारैत,नुकबैत कोठरी ध' लेलनि।काकी छाती पिटैत-रौ दैब रौ दैब पोता- पोता रटलौं त' एलीह भगवती। तै पर सं हिजड़ाक झुण्ड।। क्षणहि मे सगरो टोल दलमलित!स्त्री गणक हेंज अंगना सं दुरा धरि सोहरि गेल छल।पमरियाक जग्ग्ह हिजड़ा देखि उत्सुकता दुन्ना।फरमाइस क' के गीत सुनै गेल। नाच-गानक बीच कक्का काकी के एक हजार थम्हबैत लियय किछु कपड़ा लत्ता जोड़ि विदा करू। यै मां इ लौथ एक हजार आओर मिला द' देथुन। गै मए गै मए,जेना बेटा जनमल होइ! मां,बेटा- बेटी नै,मए हेबाक सुख हर्षित केलक! हिजड़बाक मुखिया आओर पांच सए लगा घुरबैतकहलक-"मइयां,हे इ आशीष। " बेटीये से ने बेटा,बेटी सम्हारू त' जग चलतै।" बीहनि कथा- हिक -- नै मारू-पिटू कियो,हाथ जोड़ै छी,आब नै आयब एम्हर।--हाक्रोश करैत पिन्टुआ -- गै मए गै, बचा दही,छोड़ा दही,पड़ा जेतै। -- गै किरणियां,तोरा सनक हिया के टुकड़ी के जे कोन्टा -फड़का हुलुक- बुलुक ,आ बाट-घाट रोका-टोकी केलकौ से बाप-भए कोना बर्दाश्त करतौ,चुप्प! जो अपने कोठरीमे। -- गै मए,जेना हम तोहर हिया के टुकड़ी तहिना ओहो हमर हिया में सन्हिएल बुझ। --चुप्प अलगी,त'तों एना उथर-पाथर तें होइछें जे ओकरा पर तोहर हिक गड़ि गेल छौ। - गै मए , हिक गड़ल टा नै,लुतुक लागि गेल सन बुझ।ओकरा बिनु रहब मोश्किल । -- कते दिनक असरा ? -- "माथा नुआं भ' जेतै तहन थोड़े उंच- नीच " विन्देश्वर ठाकुर-धनुषा-नेपाल, हाल: कतार. बीहनि कथा- न्याय स्कूल जाइत काल एकटा लडकीके ओहे गामक मुखियाके बेटा अपना हबसके सिकार बना लेलक । इ घट्ना सुनलाक बाद स्कुलिया छौडासभ ओकरा बड पिटलक । एहि घटनास हुनकर बाबुजीके अपन पगरी खस्बाक भान भेलै आ अपन बेटाक करतुतपर पर्दा देबाक लेल पञ्चायत नै करबाक घोषणा कयलक । मुखियाके एहन पक्षपात देखि पुरा समाज मिलिक एक निर्णय कयलक जे न्याय आखिर न्याय होइछै । आ सबके साथ उचित न्याय होएब आबश्यक छैक चाहे ओ राजा होए या प्रजा । ते पञ्चायत होएबाक चाही तथा दोसीके कर्म अनुसारके उचित सजाय भेटबाक चाही । समाजक आगु मुखियाक कोनो बस नै चललै । ओ पञ्चायत करबाक लेल विवश भ गेल । दोसर दिन भोरे पञ्चायत बैसल आ उचित न्याय भेल । बीहनि कथा- छुवाछुत --- गामबाली! ये गामबाली! जुलुम भऽ गेलै! --- जा कि भेलै बड़की दिदी? बड़ फिरसान बुझाइछी! --- ओह! कि कहूं बहुरिया? ओ राम्फल,राहुल आ नितेसबा छलै ने आइसोलेसनमे भर्ना भेल?मरिगेलै तिनू।सबकें लास डोजरसँ गारिदेलकै।आसपास ककरो नइँ आब देलकै --- हे भगवान! जुग परिवर्तनसंगे लोक त छुवाछुत उठौने जाइ छल मुदा ई प्रकृतिए केहन महामारी लाबिदेलकै कोरोना।लोक विवशतेमे फेरसँ छुवाछुत करए लगलै। --- सएह देखियौ न कनियां! जित्ता छलै त सदिखन समाज आ देश लेल समर्पित रहै छलै मुदा मरलाक बाद दाहो-ससंकार नसीब नइँ भेलै।अपन-अपन भाग, करम...... प्रभाष अकिंचन बीहनि कथा- रिलीफ मिथिला में बाढ़िक भयावह संकट ओ परिस्थितिक आंकलन व सर्वे करबाक लेल विश्व बैंकक टीम आएल.. घूमैत घूमैत ओ सभ एकमी पुल पर रूकल.. ओतय ओ देखलक जे लोकसभ पन्नी टांगि टांगि रहि रहल छै.. कतहुँ धिया पुता भूक्खे लोहछैत ओंघराइत त' कतहुँ बूढ़बा सभ पेटकूनियां देने पड़ल... सर्वेयर सभ आश्चर्यचकित कि एतेक पाई बाढ़िक हेतु विश्व बैंक स' आएल से की भ' गेलै... एगो अधबैसू सन लोक खैनी चूनबैत बैसल छल.. ओकरा स' सर्वेयर पूछलकै... कक्का हो, तोरा सभके सरकार दिसस' कोनो रिलीफ आ कि मदद भेटबो कयल छ'.. माने सरकार किछ करै छ' तोरा सभ लेल... ... खैनीक नोंईंस झारैत ओ बाजल.. यौ बाऊ, ई बिहार छै, आ ओहू में मिथिला.. एतय सरकार किछ नहिं करै छै... सभटा अपने करय पडै छै.... की बुझलियै....? ओ सभ जेना एकदम सकपका गेलै... बीहनि कथा- जतरा .... माँ गे.... माँ.... आई हमर स्कालरशिप के इम्तिहान अछि... दरभंगा जेबाक अछि... कनी जल्दी खेनाई दिहैं..... राजू बाजल.... रौ बौआ घर में त' किछ छैहे नञ... त' जल्दी कोना हेतौ.... किछ सोंचैत माय कहलखिन.... ठहर देखै छियै... खोंईच बला धान सभके मिलाक' कूटि क' तोरा जोकर भात बना' दै छियौ .... आ काल्हि बथुआक साग तोड़िक' अनने छिये, तकर झोर आ दूटा अल्लू हेबाक चाही, तेकर चोखा.... ..... माने साग भात आ चोखा.... लेकिन तोंहि कहैत रही जे साग आ चोखा खाय सं जतरा भगैंठ जाईत छै.... ..... मायक आंखि डबडबा' गेलई ....आंचरि सं नोर पोछैत बजलीह.... रौ बौआ, मोन पवित्र रहतौ आ लगन रहतौ त' भगवान अपनें जतरा बना देथुन.....दु:ख में भगवानें पर भरोस......... ....... राजू बकर-बकर मायक मुंह ताकय लागल..... पूनम मण्डल टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर मैथिली लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देबाक घोषणा। कार्यक्रम १२ जून २०१२ ई. केँ कोच्चि (केरल) मे। ई पुरस्कार दक्षिण कोरियाक एम्बैसी (स्पॉन्सर सैमसंग इण्डिया लिमिटेड) क आग्रहपर साहित्य अकादेमी द्वारा शुरू कएल गेल अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे शुरू भेल छल। सभ साल ८ टा भाषा आ तीन सालमे साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त सभटा २४ भाषाकेँ ऐमे पुरस्कृत कएल जाइत अछि। मैथिली लेल ई पुरस्कार पहिल बेर देल जा रहल अछि। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुरक १५०म जयन्तीक उपलक्ष्यमे साहित्य अकादेमी आ सैमसंग इडिया (सैमसंग होप प्रोजेक्ट) द्वारा २००९ ई. मे स्थापित कएल गेल छल टैगोर साहित्य पुरस्कार। २४ भाषाक श्रेष्ठ पोथीकेँ तीन सालमे पुरस्कार (सभ साल आठ-आठ भाषाक सर्वश्रेष्ठ पोथीकेँ एक सालमे पुरस्कार) देल जाएत। पुरस्कारमे प्रत्येककेँ ९१ हजार टाका आ प्रशस्ति-पत्र देल जाएत। चारिम साल पहिल सालक आठ भाषाक समूहक फेरसँ बेर आएत। टैगोर जयन्तीक लगाति अवसरपर ई पुरस्कार देल जाइत अछि। टैगोर साहित्य पुरस्कार २००९ बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड, काश्मीरी, पंजाबी, तेलुगु आ बोडो भाषामे २००५ सँ २००७ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -बांग्ला (आलोक सरकार, अपापभूमि, कविता) -गुजराती ( भगवान दास पटेल, मारी लोकयात्रा) -हिन्दी (राजी सेठ, गमे हयात ने मारा, कथा संग्रह) -कन्नड (चन्द्रशेखर कांबर, शिकारा सूर्य, उपन्यास) -काश्मीरी (नसीम सफाइ, ना थसे ना आकास, कविता) -पंजाबी (जसवन्त सिंह कँवल, पुण्य दा चानन, आत्मकथा) -तेलुगु (कोवेला सुप्रसन्नाचार्य, अंतरंगम, निबन्ध) -बोडो (ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, रैथाइ हाला, निबन्ध) टैगोर साहित्य पुरस्कार २०१० असमी, डोगरी, मराठी, ओड़िया, राजस्थानी, संथाली, तमिल आ उर्दू भाषामे २००६ सँ २००८ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। -असमी (देवव्रत दास, निर्वाचित गल्प) -डोगरी (संतोष खजूरिया, बडलोनदियन बहारां) -मराठी (आर. जी. जाधव, निवादक समीक्षा) -ओड़िया (ब्रजनाथ रथ, सामान्य असामान्य) -राजस्थानी (विजय दान देथा, बातां री फुलवारी) -संथाली (सोमाइ किस्कू, नमालिया) -तमिल (एस. रामकृष्णन, यामम) -उर्दू (चन्दर भान खयाल, सुबह-ए-मश्रिक-की अजान) टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ टैगोर साहित्य पुरस्कार २०११ मैथिली, अंग्रेजी, कोंकणी, मलयालम, मणीपुरी, नेपाली आ सिंधी लेल २००७ सँ २००९ मध्य प्रकाशित पोथीपर देल गेल। संस्कृत लेल पुरस्कार नै देल जा सकल। -मैथिली (जगदीश प्रसाद मण्डल, "गामक जिनगी") -अंग्रेजी (अमिताव घोष, "सी ऑफ पॉपीज") -कोंकणी (शीला कोलाम्बकर, "गीरा") -मलयालम (अकितम अचुतम नम्बूदरी, "अंतिमहक्कलम") -मणीपुरी (एन. कुंजामोहन सिंह, "एना केंगे केनबा नट्टे") -नेपाली (इन्द्रमणि दरनाल, "कृष्णा-कृष्णा") -संस्कृत- -सिंधी (अर्जुन हसीद, "ना इएन ना") मीना झा मैथिल समाज ऑफ़ यु. के. केर तेसर वार्षिक समारोहसमाचार: ९.४.२०११ आइ लंदनक स्लौवक ४०० वर्ष पुरान ऐतिहासिक किला बेलिस हाउस ( Baylis House , Slough ) लंदनमे मैथिल समाज ऑफ़ यु. के. केर तेसर वार्षिक समारोह भेल। एहि समारोहमे भारतसँ मुख्य अतिथि मैथिलीक सुप्रतिष्ठित लेखिका एवं मैथिलीक महादेवी वर्मा डॉ. शेफालिका वर्मा आयल छलीह। समारोहक आरम्भ बालिका पारुल क गायत्री मंत्रपर भारत नाट्यम नृत्यसँ भेल. डॉ. विभाष मिश्र संबोधन मे मैथिल समाज केर परिचय देलनि ,डॉ.. अरुण कुमार झा (बर्नली ) अध्यक्ष मैथिल समाज , उद्घाटन भाषण केलनि 'हम सब मैथिल समाजक स्थापना संयुक्त राज्य मे बसल मैथिल सब कोना अपन संस्कृतिक रक्षा क सकी. खास कय हमर ब्रिटिश युवा वर्ग अपन देस कोस के नै बिसरैथ, हम की छी से जानैथ, अपन परंपरा अपन संस्कृति के ज्ञान हुनका रहैक ,अपने सब देखैत छी जे कतेक ब्रिटिश युवा एहि मे आय भाग ल रहल छैथ...' . डॉ. कल्पना झा समारोहक विषय मे विस्तार से सब बात कहलनि. . श्रीमती ज्योति झा चौधरी मिथिलाक टूर पर अपन प्रोजेक्ट देखोलनी ,जाहि मे मिथिलाक संस्कार संस्कृतिक झलक छल. डॉ. रीता झा अपन प्रोजेक्ट स्त्रीक स्वास्थ्य एवं स्तिथि भारत मे कोन दयनीय अवस्था मे छैक से अपन प्रोजेक्ट से जाहिर केलनि, लोग के आह्वान केलनि जे एहि स्तिथिक रोक्वाक उपाय कयल जाय..डॉ अरुण कुमार झा (लन्दन ) अपन प्रोजेक्ट मे कन्या महाविद्यालय ,जनकपुर के देखोलनी ,जाहि मे स्कूल कोना चलि रहल अछ,कोना ओहि स्कूल के कंप्यूटर आदिक सुविधा उपलब्ध करोलनी. सब स आग्रह केलनि जे हम सब जे अपन लैपटॉप सब जे कनिको ख़राब होयत छैक टकरा फेकी दैत छी, से नहि क एकठाम जमा करी ओकरा अपन देस कोस मे भेजवाक प्रबंध करी...ठसाठस भरल हॉल मे सब मन्त्र मुग्ध सन सुनि रहल छलाह..डॉ. अरुण झा क पत्नी श्रीमती मीना झा जे स्वयं मैथिली मे लिखैत छैथ पूर्ण सहयोग द रहल छलीह समारोह मे डॉ. रामभद्र झा , डॉ. कौशलेन्द्र कर्ण, डॉ. मिथिलेश झा आदि सबहक सहयोग छल. ..तकर बाद, डॉ.नूतन मिश्र क आग्रह पर डॉ. कलाधर झा मुख्य अतिथि डॉ. शेफालिका वर्मा क परिचय करोलनी-- कोना हिनकर विषय मे केरला सरकार की सब लिखने छैक,कोना हिनक कविता सब यु.के. क पाठ्य क्रम मे छैक. ...' एहि से पहिने बालिका पारुल आ वत्सला ----- राधा कृष्ण पर बड सुन्दर नृत्य नाटिका प्रस्तुत केलनि . समारोहक दोसर सत्र खुलल आकाशक नीचा बासंती उपवन मे मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्मा के भाषण स शुरू भेल. ओ अपन भाषण मे मिथिलांचलक अतीत केर परिचय दैत,बजलीह.. विदेशक एहि भावभूमि पर अपन मिथिला देश के देखि रहल छी.मैथिल समाजक ई ओ समारोह अछ जाहि ठाम ह्रदय ह्रदय स जुडैत अछ ,बुध्धि बुध्धि स, चिंतन चिंतन स ..सब स पहिने हम अपन हार्दिक आभार प्रकट करैत छी जे अपने सब ई सम्मान हमरा देलों. हम कत्तो मिथिला मैथिली शब्द देखैत छी ते हमर मोन प्राण अद्भुद रूप स झंकृत होम लगैत अछ. अपने सब विदेश मे रही अपन समाज के नै बिसरल छी..एहि लेल अपने सब के बेर बेर नमन... सौँसे पृथ्वी पर यदी हम घूमी आबि ते सब ठाम कत्तो ने कत्तो एक टा छोट मोट मिथिला अवस्य भेटि जायत. मिथिलाक संस्कृति,मिथिलाक संस्कार हमरा बुझने विश्व मे स्एतते कत्तो होई. वास्तव मे मिथिला आधा बिहार मे छपल अछ,लागले पडोसी देश नेपाल ते मैथिली स महामंवित अछ..पहिने दरभंगा ,समस्तीपुर मुझफरपुर ,भागलपुर स लक सहरसा, सुपौल मधेपुरा कटिहार पुरनिया सब मिथिले थीक..कहल जैत छैक जे चारि कोस पर पानि बदले, पांच कोस पर वाणी ...यानि सब ठाम मैथिलीक उच्चआरण अपन अपन क्षेत्र क अनुसार होइत अछ..जेना विश्व भाषा अंग्रेजी के मानल गेल छैक जाहि मे कतेको स्थान के अंग्रेजी उच्चारण समाहित अछ ..हं, ई आन गप थीक जे मुझफरपुर बज्जिका बनि गेल, ते भागलपुर अंगिका के जन्म द देलक,किन्तु, सबहक ह्रदय मे मैथिलीक संस्कार ओहिना अविरल रूप से प्रवाहित होइत रहैत अछ.. , पुनः ओ विद्यापति क गीत स मैथिलीक कव्यधारक उत्पति कहैत लोकप्रिय साहित्य बनेवा मे प. हरिमोहन झा के साहित्य रचना के बड़का योगदान कहलनि....आजुक वैचारिक क्रांति ,वैज्ञानिक क्रांति क उल्लेख करैत ओ कहलनि जे संचार क्रांतिक एहि युग मे सओनसे विश्व एकटा गाम बनि गेल . हम सब देशक नै वरन विश्वक नागरिक बनि गेल छी. आय दुनियाक एक कोन स दोसर कोन धरि सोझे संवाद क लैत छी..एहि से मैथिली साहित्य के बहुत फायदा भेलैक ..नेट पर मैथिली पत्रिका सब अबी लागल ,मिथिलाक खबर अबए लागल.जाहि मे मिथिला मंथन ,मैथिल मिथिला , अनचिन्हारआखर, विदेह .कॉम आदि बहुतो पत्रिका नेट पर अवैत अछिमुदा, असगरे विदेह पत्रिका जे प्रसिद्ध साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर क सम्पादन मे शिव कुमार झा, उमेश मंडल आदिक संयोजन मे बंगला ,उड़िया, तमिल,तेलगु, कन्नड़, ,मलयालम, गुरुमुखी आदि लिपिमे छपैत अछ. एकटा सर्वेक्षण के अनुसार २००४ स आय धरि विदेह १०७ देश के १०७२६, ठाम स ५७,००० लोग ,२००९४९९० बेर एहि पत्रिका के देख्लनी, सब स पैघ गप छैक जे नव लेखनक प्रतिभा के उजागर कयल गेल ,आ सब जाती पातिक प्रतिभा के उजागर कयल गेल . दिल्ली स मिथिलांगन , अंतिका, कोलकाता स कर्नामृत ,मिथिला दर्शन, बम्बई स मिथिला दर्पण, आसाम स पूर्वोत्तर मैथिल, पटना स समय साल, घर बाहर, झारखंड स पक्षधर आदि आदि कतेको पत्रिका बहराय रहल अछ मुदा सब टा नेट स जुडल अछ.. हम हुनका सब के कहलों जे मैथिली पुस्तक एक से एक प्रकाशित भ रहल अछि मुदा बाज़ार नै छैक. सरकार nai ते विश्व विद्यालय के भरोसे छैक. अहाँ सब पुस्तक एहि ठाम मंगाऊ आ हिन्दीक पोथी पुस्तकालय मे एहिठाम अछिमैथिलीक पोथी किएक नै....मिथिला मैथिली बहुत तरहक समस्या स ग्रस्त अछ ओकर समाधान क सेहो सोचु.... दिल्ली सरकार क मैथिली भोजपुरी अकादेमी से बहुत काज मैथिली लेल भ रहल छैक...यानी मैथिलीक चहुमुखी विकास भ रहल अछ. तैयो मिथिलांचल बाढ़ी,रौदी,दाही , बेरोजगारी आदि समस्या स ग्रस्त अछ..सब स पैघ बात ओ कहलनि जे नबका पीढ़ी अपन भाषा बिसरल जा रहल छथि देश विदेश सब ठाम ,.. ई एकटा गंभीर प्रश्न सभक सोझा मे छैक, एहेन नहि होई जे एकदिन अपन मूल गामो बिसरी जित हवाक वेग मे पानि मे हेलैत जडविहीन भाखन जकां हेलैत रही जाय...मिथिलाक नारी लेल सेहो ओ कहलनि कोना अपन अस्तित्व लेल छटपटा रहल छथि, स्त्री के सुरक्षित नै स्वरक्षित हेवाक चाही ,निर्णय लेवाक क्षमता हेवाक चाही. भाषण क अंत अपन कविता स केलनि..हमर घर कते हेरा गेल ; कतेको श्रोता क आंखी नोरा गेल . एकर सब स मनोरंजक कार्यक्रम रहल विदेश मे रहल मैथिल बच्चा मैथिली कोना बाजत जकर बहुत नीक आ सटीक संचालन डॉ. अरुण झा ( लन्दन) केलनि. एकर आकर्षक पक्ष छल एक दिस पुरान पीढ़ी दोसर दिस नव पीढ़ी.. दुनूक समस्या आ समाधान क चेष्टा...डॉ. विभाष मिश्र ,डॉ. नूतन मिश्र आ श्रीमती ज्योति झा चौधरी तिनु हरिमोहन झा क खट्टर ककाक तरंग पर एकटा छोट सनक स्वर- रूपक प्रस्तुत केलनि ,समूचा हॉल ठाहक्का स गूंजी उठल. एहि समारोहक विशेष आकर्षण रहल मैथिली पुस्तक आ मिथिला पेंटिंग क बिक्री .... गीत संगीत मे श्रीमती अनीता चौधरी आ श्रीमती माला मिश्र ,डॉ. वीणा झा आ डॉ. विभाष मिश्र क गान पर समस्त हाल झूमी उठल , पुनः अंग्रेजी कविता डॉ. सीमा झा ,मैथिली कविता श्रीमती ज्योति झा चौधरी आ डॉ. शेफालिका वर्मा क कविता ,माय विलेज ' क पाठ हुनके नतिनी सुश्री अंकिता कर्ण केलनि . डॉ वंदना कर्ण मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्मा के हाथे पुरस्कार वितरण कयल गेल . सबहक समाप्ति डॉ. मिथिलेश झा क धन्यवाद ज्ञापन स भेल ....एहि समारोहक समापन क उपरांत लागले कार्यकारिणी समिति क मीटिंग भेल , जाहि मे समय पूर्ण हेवाक कारन नव कार्यकारिणी क गठन भेल . पुरान कार्यकारिणी अध्यक्ष ..डॉ. अरुण झा ( बर्नली ), सचिव एवं कोषाध्यक्ष - डॉ. मिथिलेश झा , कार्यकारिणी क सदस्य.--डॉ. रामभद्र झा, डॉ. डॉ. वंदना कर्ण , डॉ. पूनम झा , डॉ. कल्पना झा , डॉ. राजीव रंजन दास , वेब साईट रचयिता श्री अखिलेश कुमार नव समिति .. अध्यक्ष --डॉ. अरुण झा ( लन्दन ) सचिव डॉ वन्दना कर्ण , कोषाध्यक्ष--डॉ. मिथिलेश झा . कार्यकारिणी क सदस्य--डॉ. विभाष मिश्र , डॉ. राहुल ठाकुर , डॉ. आलोक झा , श्री राजेन्द्र चौधरी, श्री राज झा , श्रीमती ज्योति झा चौधरी २०१२ मे ३१ मार्च के तारीख अखन राखल गेल ऐछ अन्नुअल जेनेरल मीटिंग के लेल. बेसी जानवा लेले वेबसाइट www.maithili.co.uk देख सकैत छी प्रियंवदा तारा झा परंपरा समाजमे परिवर्तन हमरे सब सऽ हेतै। पुरनका सड़ल , गलल व्यवस्थाके आब काटि कऽ फेकि देबाक समय आबि गेलै। कतेक लोकक आत्मसम्मान छीनि बैसल छै ई रीति-रिवाज। सबके सम्मान सऽ जीबाक एक्के रंग अधिकार छै। हमरा एहि अमानवीय समाजक परंपराक हिस्सा नहि बनबाक अछि। पितामही केर भगवानक पूजा पर बैसबाक अनुरोध पर बजैत, अग्निश्च , वायश्च होइत‌ घऽ र सऽ बहरा गेला मयंक। मेनरोड पर अबिते परम मित्रके फोन अयलैन्ह , जल्दी पेसिफिक माॅलमे पहुंचि जाह , प्रशांतके जन्मदिन छै , माॅलमे सेलेब्रेशनके अप्पन सबहक ट्रैडिशन बिसरि गेलहक की ? मयंक कैब बलाके जल्दी चलबाके निर्देश देबऽ लगलाह। अजगुत देखियौ ,अहांस बनै-बूझै छियै , ई कानून सब कृषि सुधार लेल बड्ड जरूरी छै। ई सरकार किसान सबहक कल्याण लेल कृत संकल्प छै। अहां सबहक फैदा लेल सब टा काज कैल जा रहल छैक आ उनटे अहीं सब विरोध कऽ रहल छी। बुझना जाइत अछि , अपने सब कोनो बड़का साजिश के शिकार भऽ रहल छी, एहि भ्रमके त्यागू आ एहि महत्वाकांक्षी योजनामे सहयोग देल जाउ। नेताजी लागल छलाह , लोक सबके बुझैबामे। ताबते , पूरन जे काज सऽ बाहर जाइत छल , मुदा नेताजीके देखि ठमकि कऽ गप्प सुनबा लेल ठाढ़ भऽ गेल छल , अचकचा कऽ बाजि उठल , ई तऽ बड्ड अजगुत बात भेलै नेताजी। अपने फैदा बला काज करै छियै , लेकिन हिनका फैदा नै चाही। छोड़ि दियौ नऽ फेर, कथी लेल जबरदस्ती उपकार करैपर तुलल छियै ? मोनक गप्प सूर्यदेव शनैःशनैः अस्ताचलगामी भऽ रहल छलाह। वातावरणमे कनी-कनी जाड़क उपस्थिति भऽ गेल छलैक। अरुणा सांझबातीक ओरियाओनमे लागल छलीह। हाथ काजमे व्यस्त छलैन्ह, मुदा मोन छलैन्ह ओझरायल सोचक व्यूहमे , सुगन्धाक सहज प्रश्न जेना स्थिर जलके हिलोड़ि देने होइ। सुगन्धा अरुणाके बड्ड प्रिय छथिन्ह।‌ हुनको प्राण छोटकी काकीमे बसै छैन्ह। स्कूल सऽ आबि जा सबटा गप्प काकीके सुना नै दै छथिन्ह ता चैन नै पड़ै छैन्ह सुगन्धाके। छोट -पैघ, आवश्यक-अनावश्यक सबटा गप्प मनोयोग सऽ सुनैत काकी हुनक फेवरिट छथिन्ह। आइ सुगन्धाके स्कूलमे काउन्सलिंग सेशन छलैन्ह, छात्र –छात्राक भावी जीवनक लक्ष्यक संबंधमे। ओही क्रममे चर्चा करैत अचोकेमे पूछि उठलखिन्ह सुगन्धा, "काकी अहांक की उद्देश्य छल पहिने आ अहांके हाॅबी? किछु क्षण तऽ किछु फुरैबे नहिं कयलैन्ह। ता भैया सुगन्धाके कोनो जरूरी काज लेल आवाज देलखिन्ह आ जेना अरुणाके भेटलैन्ह यक्ष प्रश्न सऽ उग्रास। स्वगते बजलीह, अप्पन मोनक गप्प तऽ हमहीं कहियो बुझबाक पलखति नहिं पयलहुं, अहांके हम की कहू बौआ? बच्चा रही तखनहुं जिद्द करब नहिं बुझलहुं। शिक्षा प्राप्त कयलहुं , मुदा संभावनाके आकाशके सब दिन अपनहिं मोने संसाधनक, परिवारक सुविधा –असुविधाक सिमानमे बंद राखलहुं। हम तऽ अपनहिं अप्पन मोनके नहिं बांचि पयलहुं , हम की कहू मोनक गप्प ? बीहनि कथा- पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाचस्पति बाबू नबका चालि-चलनके प्रबल विरोधी छलाह। खासकऽ कऽ स्त्रीगणक संबंधमे हुनक नियम विशेष छलैन्ह। धाख एहन जे कोनो बेटी पुतहु हुनका सोझा पड़बासऽ बचबाक युक्ति ताकैत रहैत छलीह। सौंसे गाम केर सेंसर बोर्ड छथि श्रीमान। आइयो दलानपर भातिज केर क्लास चलि रहल छलैन्ह ,कनियांके बुझा दियौन ,शील ,संस्कार बुझथि , ई मुगलिया सलवार सूट कोना सासुरमे पहिरबाक साहस भेलैन्ह , कनिक्को लाज धाखक छूति नहिं छैन्ह। गाड़ीक आवाज सऽ गप्पक क्रम बाधित भऽ गेलैन्ह ,पलटि कऽ देखै छथि , बेटा पुतहु छथिन्ह। नीता एकदम माडर्न वेशमे , आबि कऽ चरण स्पर्श कैलखिन्ह __ बाबूजी ठीक छथिन्ह न ? सौभाग्यवती भव __ एहि सऽ बेशी किछु बजबाक साहस नहिं भेलैन्ह। सत्ये , पर उपदेश कुशल बहुतेरे। बीहनि कथा- सम्मान एहन कोन गप्प भऽ गेलै जे अहां एनाउठिकऽआबिगेलहुं।एक्को रत्ती शिष्टाचारक ज्ञान नहिं अछि की अहांके ? की सोचैत हेती मामी ? सुधाके ई आश छलैन्ह जे सलिल आबिकऽ अप्पन परिवारक अनर्गल गप्पक विरोध करताह।मुदा ई की ? ओ तऽ हमरे दोषी मानि रहल छथि।हमर मान-सम्मान ,हमर माता – पिता केर स्वाभिमानक तमाशा बनैत चुपचाप देखैत रहलाह। कोनो संवेदना नहिं , उनटे हमरे संस्कारपर प्रश्नचिह्न ? नहिं ,एकर प्रतिकार तऽ करहे पड़त। अपनाके संयमित करैत बजलीह ,देखू आइ चुपचाप आबि गेलहुं ,आगू अप्पन माता-पिताक संबंधमे किछु अनर्गल नहिं सुनब। यदि सम्मान चाही, तऽ सम्मान देब सेहो सीखू। बीहनि कथा- स्वाभिमान एना सिद्धांतवादी भेला सऽ काज नहिं चलैत छैक दयानाथ बाबू ।हमरा बुझने तऽ अकारणे अहां एतेक नीक कथा छोड़ि रहल छी । एहन कोन अजगुत गप्प कहलैथ विमल बाबू अहां सऽ ___ ई तऽ होइते छैक ।बेटाक बाप छथि __ किछु तऽ मोन मनोरथ हयबे करतैन्ह । भगवतीक कृपा सऽ अहूं एतेक असमर्थ नहिं छी। हम तऽ यैह कहब ,हुनकर सबहक गप्प मानि लियऽ ।बेटी बाप के एतेक ऐंठी उचित नहिं । गप्पक तीव्र स्वर स्वर सुनि दामिनी बहरैलीह । की भेलै ,सब ठीक नऽ? कहां भौजी ,भाई साहेब मना कऽ कऽ आबि गेलाह । अहीं बुझबियौन ,बेटीक भविष्यक संग खेलि रहल छथि । दीर्घ नि:श्वास लैत बजलीह दामिनी __ कोनो बात नहिं ,जे अखनहुं अप्पन बेटा केर विवाहक मूल्य चाहैत छथि ,ओहन परिवार मे संबंध भेले सऽ बेटीक भविष्य खराब होइतैक ।हमरा गर्व अछि जे ओकर पिता कथा अस्वीकार कऽ संपूर्ण नारी जाति केर स्वाभिमानक रक्षा कैलन्हि । बीहनि कथा- की बुझबै तामसे लहालोट भेल अनिल के पानि केर गिलास पकड़बैत , बुझबैत बजलीह अनीता __ कियैक एतेक परेशान होइत छी?सब लोक सब रंग होइत छैक । अरे अहां लेल बड्ड आसान अछि ,ई बजनाइ ।अहां की बुझबै कतेक तनाव होइत छैक आफिस मे । मैनेजमेंट किछु सुनऽ बूझऽ लेल तैयार नहिं होइत छैक आ इम्हरका लोक के काज सऽ बचबाक सै टा बहाना । बीच में पिसा कऽ रहि गेल छी हम। अस्तु कहुना रतुका खेनाइ सम्पन्न भेल ।सब समेटि कऽ अनीता बिछाओन पर अयलीह तऽ अनिल फोंफ काटि रहल छलाह ।आइ बड्ड तनावपूर्ण दिन छलैन्ह स्कूल में अनीता के ,सोचने रहथि जे कनी अनिल सऽ शेयर करब ।मुदा? बीहनि कथा- दूरक ढोल सोहाओन जहिया सऽ लाल काकी बड़का बेटा-पुतहु लग सऽ रहि कऽ आयल छथि , किछु बदलल जकां छथि। ओ पहिलुक्का रुआब जेना कत्तहु हेरा गेल होइन्ह। छोटकी पुतहु सुधाके छगुनता लागि गेलैन्ह, सासुके एतेक शान्त देखि कऽ। सुधा जाहि दिन सऽ सासुरमे पैर देलैन्ह , अपना लेल प्रशंसाके कोनो बोल नहिं पौलन्हि। कतबो प्रयास कयला उत्तर सासुके संतुष्ट नहिं कऽ सकलीह। लाल काकी हरदम बड़की पुतहुके गुणगानमे लागल रहैत छलीह। एहन दीब , एहन संस्कारी, साक्षात् अन्नपूर्णा छथि बड़की कनियां। हुनकर तऽ कोनो जोड़े नहिं। हमरा मुंह सऽ बजबा सऽ पहिने मोनक गप्प बूझि जाइत छथि। असकरे सबटा काज करैत सुधाके मोनमे अबैन्ह , सालमे दू-चारि दिन आबि कऽ एतेक मोनमे बसल छथिन्ह, आ जे चौबीसो घंटा लागल रहैत छैक , तकर खाली कुचेष्टा। अखन पिछले मास भैया एलखिन्ह तऽ लालकाकीके अपना संगे लऽ गेलखिन्ह। काकी गेली तऽ बड्ड हुलसि कऽ , मुदा पंद्रहे दिनमे छोटका बेटाके बजा कऽ संगे वापसो आबि गेलीह। आब बड़की कनियांके गुणगानो नहि। बुझाइत अछि लाल काकीके , 'दूरक ढोल सोहाओन ' के अर्थ बुझबामे आब भांगठ नहि रहलैन्ह। बीहनि कथा- विकल्प भोरे सऽ गुनधुनमे लागल छथि मीता , निश्चय करैत छथि, फेर डेग पाछू भऽ जाइत छैन्ह। मोनके बुझबै छथि , हम कोनो अधलाह गप्प नहिं सोचि रहल छी , तखन एतेक द्वन्द्व कियैक ? अही साल मीता दिल्लीमे एकटा छोट-छीन घऽर कीनने छथि, तकर किस्त चुकबैत , बच्चा सबहक शिक्षा केर मोट खर्च आर्थिक तनावक कारण बनि गेल छैन्ह। दुन्नू गोटे जे कमाइत छथि, से जेना पहिले सप्ताहमे ओरा जाइत छैन्ह। एकटा सुगम उपाय बेर-बेर दिमागमे अबैन , कियैक ने नैहरमे खाली पड़ल कोनो जमीनके हटा कऽ कनी हल्लुक भऽ जाइ। हमहू तऽ ओही ठामक अंश छी , किछु तऽ हमरो अधिकार अछि ओतय। भाइजीके तऽ बाबू अपने मोने मदति केने रहथिन्ह। यैह विचारि भाइ सऽ गप्प करबा लेल विदा भेलीह , मुदा बकार नहिं फुटलैन्ह। समान अधिकारपर धाराप्रवाह भाषण देबऽ वाली चुपचाप अधिकारके सौहार्दपर वारि घुरि गेलीह। अधिकार वा स्नेह ई विकल्प अखनहुं समानताक सत्य छैक , नारी जातिक लेल। वापसी मानसी भोरेसऽ तैयारीमे लागल छथि। भानस भातसऽ फरागति पाबि घऽर दिस ताकि स्वगते बजलीह, सब ठीके छैक ,आब कनी बिलमिकऽ तैयार भऽ जाइत छी। बहुत समयसऽ अही दिनक प्रतीक्षा छलैन्ह, आइ मानस अप्पन परिवारक संग आबि रहल छथि। मानस हुनक अंश , जिनका शिक्षा-दीक्षाक लेल मानसी अप्पन ज़िनगी होमकऽ देने छलीह। ओ ख्याति प्राप्त सफल डाक्टर आइ विदेशक सुख-सुविधा छाड़ि अप्पन धरतीपर घुरि रहल छथि। भावावेश सऽ भरि उठलीह मानसी। भरोस नै छलैन्ह जे बेटाके अहि गप्प लऽ तैयार कऽ सकब। ओतऽ पुतहुक समझदारी जे ई संभव भेल। सत्ते , मुक्ता बड्ड बुझनुक छथि। कतऽ हमरा ई चिन्ता छल‌ जे ओ बेटाके हमरा सऽ दूर करतीह , मुदा ओ‌ तऽ हमर निधिके हमरा लग आनि देलथि। भगवती , एहन पुतहु सबके देथुन्ह। मोन पड़ै छैन्ह मानसीके अप्पन आशंका , पैघ घऽरक बेटी हमरा सन सामान्य परिवारमे कोना एडजस्ट करतीहॽ आब घऽरोमे अपमान सहऽ पड़तैक ? भीतर सऽ बड्ड डेराइत-डेराइत बेटाके इच्छा देखैत तैयार भेल रहथि ओ विवाह लेल। आ जखन मानसके अमेरिका जयबाक मौका भेटलैन्हि तऽ हहरि गेल छलीह ओ। कतेक कहलखिन्ह , एत्तहु तऽ सब किछु छै , अही ठाम काज करू नऽ। बेर-बेर कहला सऽ खौंझा उठल छलाह मानव , तों कियैक नै बूझै छही , हमर कैरियरके सवाल छै। तकर बाद चुप भऽ गेल छलीह मानसी। अमेरिका जयबासऽ किछु दिन पहिने मुक्ता रातिमे सासुके कहलखिन्ह , मां हम अहांक मनोस्थिति बूझि रहल छी। अहां चिन्ता नहिं करु , हम मानस के लऽ कऽ निश्चय वापस आयब , अहां बस अप्पन ध्यान राखब। आ भारी मोनसऽ विदा कऽ देने रहथिन्ह मानसी बेटा ,पुतहुके। कोना कऽ ई पांच वर्ष कटलैन्हि मानसी वैह जनैत छथि। अप्पन आशंका , ताहिपर सऽ लोक सबहक गप्प , भरि ज़िन्दगी बेटा छोड़िकऽ क्यो सुझलैन्हिनै , आब लियऽ ,असकरि छोड़िकऽ पड़ैलैन्ह विदेश। मानसी सब सुनियो कऽ अनठा दैत छलीह , की करितथि आर ? मानस , मुक्तासऽ गप्प होइन्ह तऽ बेटासऽ बेशी आश्वस्ति भेटैन्ह , पुतहु बुझाबैन- अहां बस किछु दिन आर धैर्य राखू। मानसी अतीतके पन्ना सबमे ओझरायले छलीह कि मुकुल बाबू बाहरसऽ बजैत ऐलखिन्ह , धुर अहां आइयो अहिना बैसल रहब की ? जल्दी उठू , परिछू पुतहुके , अहांके बेटा संग अहांक पोतियोके वापस आनने छथि। हंहं , नेने अबैत छी , आइ हमर तपस्या पूर्ण भेल , बजैत हड़बड़ाइत बहरैली। एतेक दिनक बाद सबके देखि, आंखिसऽ गंगा जमुना बहऽ लगलैन्ह , मुदा आइ ई नोर छलैन्ह खुशीके। गदगद स्वरमे बजलीह , मुक्ता अहां मानसो सऽ बेशी प्रिय छी हमरा। संतोष कुमार राय ’बटोही’ गाम गामक बीचि टोल मे किछु लोकनि हरदम खेलथि छथि ताश। उ दलान ताश खेलेवाक गृह बनि गेल छै। जखन परदेशी सभ गाम वापिस अबैत छथि तँ ओइ दलान केँ दिनभरि ओगरने रहति छथि। सुनबा मे आयल जे इ दलान बड़ि पुरान छै। गामक आदि दलान। हम नान्हिटा सँ देखि रहल छियैए अइ दलान पर ताश खेलनिहार भरल रहैत छथि। जलखै खेलाक बाद एकटा टीम ताशक अजमाइस करs लागैत छथि। फेर ओइ टीम मे सँ किछु लोकनि खेल-खेल कs बाहरि भs जाएत छथि आओर किछु दोसर लोकनि टीम मे जुड़ैत जाएत छथि। जेनानी सभ जलखै बना कs माल जाल केँ काज मे भीर जाएत छथि। इ मरद लोकनि ताश खेलैत-खेलैत निशीभाग राति मे घर जाएत छथि। इ दलान कतेक इतिहास लिखलकै। गाम केँ दुभाग मे बाँटि कs किछु लोकनि अपन उल्लू सीधा कएलाथि। अइ दलान पर ओइ सँ किछु फर्क नहि पड़लै । गामक इतिहास बड़ि नीक नहि रहलै। लक्ष्मी बाबा के मर्डर सँ लकs राजेश्वर मास्टर साहब के मर्डर धरि कतेक छोट सँ छोट आओर नम्हर सँ नम्हर कुकर्म भेलै। सभ इ गाम पचा लेलकै। इ गामक एकता कहल जाए वा गामक कमजोरी। गाम सँ सामंती सोच गायब नहि भेलै अखन धरि। बुझना नहि जायत जे भारत एकटा लोकतांत्रिक देश छियैए। गरीबक हाल ओहिना छै। मुखिया आओर वार्ड मेम्बर बदैल गेलै, परञ्च गामक हाल ओहिना छै। सरकारी योजना मे लूट-खसोट बरकरारे छै। राजद केँ जंगल राजक बाद सुशासन बाबू केँ पन्द्रह साल सेहो बीत रहल छै, परञ्च गाम ओहिना केँ ओहिना छै। जन वितरण प्रणाली केँँ दुकान पर धांधली जारी छै। रजिस्टर मे डीलर गेहूँ, चावल आदि केँ वजन किछु आओर लिखैत छथि आओर राशन कार्ड धारक केँ अनाज किछु आओर दैत छथिन्ह। अर्थात् डीलर राशन कम दैत छथिन्ह आओर कार्ड धारक सँ साइन बेसी पर कराबैत छथिन्ह। गरीब केँ अनाज पर डीलरक डाका पूरा बिहार मे छै मने। मनरेगा मे लूटिस भ रहल छै। मुखिया आओर हुनकर चमचा लूटि कs खा रहल छथि। इ खेल ऊपर सँ नीचा धरि पदाधिकारी सभ मिलि कs क रहल छथि। सरकारक सभटा योजना अइ प्रकारेण सफलिभूत भs रहल छै। ताश केँ पत्ता जँका रंग बदलि रहल अछि गाम। जिनका पक्का घर छन्हि हुनका प्रधानमंत्री आवासक लाभ भेट रहल छन्हि। इ बिहारक सच्चाई छियैए। आवासीय सहायक मिलि कs सरकारी खजाना केँ लूटि रहल छै। गरीब ओहिना गरीब छथि। भरि गामक लोकनि बौक भs गेल छथिन्ह। मुखिया केँ विरूद्ध चुँइ नहि बाजि सकैत छथि। मुखिया गुंडा पालने छथि। पाँच-छह टा बेरोजगार छौड़ा पालने छथि। तकर डर देखा कs सभहक मुख चुप कs दैत छथिन्ह। यद्यपि इ खेल कतेक दिन धरि चलतै। अगिला बरख चुनाव छियैए आओर जनता आब फेर हिनका भोट नहि देतिन्ह। इ भरि पंचायत मे जनता बाजि रहल छै। " हिनका की भेलन्हि ?", बमबम वीरू सँ पुछल्थिन्ह। " सुनबा मे आयल जे तोहर माय केँ कैंसर भs गेल छन्हि ।" , बासु बजलाह। "हँ, ठीके सुनलियैए काका ।" ,वीरू प्रत्युत्तर देलथिन्ह। "इलाज करौहलक, कि नहि ?" "काका, हाथ मे फुटी कौड़ी नहि अछि तँ कतs सँ इलाज करौबै ।" "लॉकडाउन मे सभ किछु बरबाद भs गेल।" सभ जगह लॉकडाउन मे लूटिस भs रहल छै। बिहार मे विकास केँ नाम पर नेता-चमचा मिलि कs लूटि रहल छै।" हँ, तूँ ठीके कहैत छिही ।", बासु बजलाह। बाबा नीलकंठ चौक पर चारिटा दोकान खुलि गेलैए। लॉकडाउन मे जिनगी केँ पटरी पर लाबै केँ इ जतन भs रहल छै। मखनपुरा पर सेहो स्नैक्स केँ दोकान खुलि गेलैए। नीक गप इ अछि जे सभ लोकनि स्वरोजगार केँ ऊपर ध्यान द रहल छथिन्ह। प्रमीला देवी आइ गुजैर गेलीह। मंगरौना संकल्प सेवा संस्थान आओर ग्रामीण केँ सहयोग सँ वीरू माय केँ पटना में इलाज करौलथि ,परञ्च कैंसर प्रमीला देवी केँ जान लकs छोड़लकै। आइ पस्टन वाला पुरोहित गरूड़ पुरान के वाचन कs रहल छथिन्ह। रामदाय देवी अपन सास-ससुर के उधेसने छै।दलान पर किछु मेहमान बैसल छथिन्ह ,परञ्च ओ लोकनि तकर परवाह नहि करैत गुहाँ-गिज्जरि करवा मे लागल छथि। "निपुत्तरे रहमे।" "तोरा पुरखा के कर मे हगबौ।" "देखै नहि छी सौतिन, नांगर भेल छैं।" " जेना हम दुख कटै छियैए ओहिना तोहर माय कटतौ।" "सौतिन बेसी बजलैं तs आब एकटा अलंग तोड़ि देबौ।" इएह दुनिया छियैए गामक। गामक लोकनि सभ बौरा गेल छथि। लॉकडाउन तबाह कs देलकै।इस्कुलिया सभ भरि दिन तेलिया कलम मे खेलैत रहैत छथि। पढ़ाई-लिखाई सभ चौपट भ गेलै। कोरोन सभ केँ जिनगी मे खलबली लैब देने छै। तै परसँ बाढ़ि आबि गेल छै। मालथस के थ्योरी काज कs रहल छै। डॉ. अर्पणा, सम्पर्क- बालूघाट, बॉंध रोड, मुजफ्फरपुर नारी शब्दक लेल किछु प्रमुख शब्दक विवेचना नारी- नारी शब्द नृ अथवा नरसँ बनल अछि। (नृ+अस+दीप= नारी। यास्क नारीकेँ ‘नृतू’सँ मानलनि अछि। एहि विशेषणक आधारपर स्त्रीकेँ नारी कहल गेल अछि, मुदा ऋग्वेदमे ‘नृ’क प्रयोग वीरताक काज करब दान देब तथा नेतृत्व करबाक अर्थमे भेल अछि आ नर शब्दक प्रयोग सेहो वीर दाता तथा नेताक अर्थमे प्रयुक्त भेल अछि। स्त्रीक नारी नाम सेहो एहि विशेषताक कारण पड़ल होएत। ब्राह्मण ग्रन्थमे कतहु कतहु ‘नारी:’पाठ भेटैत अछि मुदा सायणृक मतसँ नारिक भाव नरक उपकारकसँ अछि। वामा- स्त्री सौन्दर्यताक कारणेँ वाम कहबैत अछि। ‘वयति सौन्दर्यम’। प्रतिकूल बात कहलासँ सेहो ‘वामा’कहबैत अछि। जेना- हक बदल। नहीं, वामाक दुर्गनाम सेहो अछि। अवला-‘अवला शब्द नारीक शारीरिक संरचनाक ध्यानमे राखि प्रयोग कएल गेल अछि। कारण पुरुष जकॉं स्त्रीमे बल नहि होइत अछि। यद्यपति नारीक मानसिक उड़ानकेँ लोहा वैदिक ऋषि सेहो मानैत छलाह आ ओकरा वशमे करब असाध्य मानैत छलाह। सुन्दरी- सु+उन्द= गिल्लकरब+डीप= सौन्दर्यवती नारी एहि हेतु कहल जाइत अछि जे जकरा देखलासँ मात्र पुरुषक हृदय गिल्ल भऽजाइत अछि। चित्त द्रवित भऽ उठैत अछि अथवा ‘सुष्ठानुन्दयति इति नैरुक्ता:। वस्तुत: ‘सुन्दरी’शब्द ऋग्वेदक ‘सुनरी’शब्दक विकसित रूप प्रतीत होइत अछि। ऋग्वेदमे उमाक लेल ‘सूनरी’शब्दक प्रयोग भेल अछि। ‘सुनरी’क तात्पर्य-शोभाशाली सुन्दी। प्रमदा- प्रमदक भाव होइत अछि हर्षा ‘प्रमद समदौ हर्ष च।’अतवएब हर्षित, पुलकित स्वभाव होवाक कारणे सेहो स्त्रीकेँ ‘प्रमदा’कहल गेल अछि। अपन हाव-भावसँ पुरुषकेँ उत्तेजित कऽ देब नैसिर्गक विशेषता होएवाक कारणेँ ओ प्रमदा कहवैत अछि। ललना- ई शब्द सेहो स्त्रीक एक मनोवैज्ञानिक पक्षकेँ प्रकट करैत अछि। ओ मान करबाक प्रिय होइत छथि- रूसैत छथि। अतएव मानिनी छथि। मानिनीक एकगोट आरो पक्ष होइत अछि- ओ अछि स्वाभिमान आत्म-सम्मानक भावना। ओकर सौन्दर्य गुण, कार्य आदि कोनोक प्रतिकूल आलोचना ओकरा वाण जकॉं बेध दैत अछि तेँ ओ मानिनी भेल। महिला- पूज्या होएवाक कारणेँ स्त्रीक नाम महिला पड़ल। मह्+इलत+आ= महिला।मह्क अर्थ होइत अछि पूजा। उपर्युक्त शब्दक व्युत्पत्ति नारीक सामान्य स्वरूपक अभिव्यंजना करैत अछि। नारी सम्बन्ध विशेषक द्योतक शब्दक परिचय अधोलिखित अछि- दूहिता- यास्कक अनुसार दुहिता शब्दक व्युत्पत्ति- ‘दुहिता दुर्हिती, दूरेहिता’। दुर्गाचार्य एकरा स्पष्ट करैत लिखैत छथि दुहिता कारण ओ जतय कतहु देल जाइत छथि ओकर स्वागत नहि होइत अछि, ओ सर्वत्र दुत्कारल जाइत छथि। अथवा बेटीकेँ दूर चलि गेलापर पिताकेँ चैन भेटैत अछि। यास्क दुहिता शब्दकेँ ‘दूह’धातुसँ सेहो बनौलनि अछि आ पिताकेँ प्रसन्न कए सदिखन किछु ने किछु धन लैत रहैत छथि तेँ दुहिता भेला। वस्तुत: दुहितृ शब्द दुह्-दुहना धातुसँ बनल अछि, सम्भवत: प्राचीनकालमे कन्या अपन पिताक घर गाय दुहल करैत छलीह। फलत: हुनक नाम दुहिता पड़ल। जाया- स्त्री ‘पत्नी’रूपक लेल जाया शब्दक प्रयोग कएल गेल। ऐतरेय ब्रह्मणमे जायाक व्युत्पति एहि प्रकारेँ कयल गेल अछि ‘तंज्जया जाया भवति यदस्यां जायते पुन:’। जाया एहि हेतु अछि जे पुरुष स्वयं ओहिमे पुत्रक रूपमे जन्म लैत अछि। ऋग्वेदमे जायाक प्रति अत्यन्त मधुर उद्गार व्यक्त कयल गेल अछि। माता- वैयाकरण मातृ शब्दकेँ मान+तृणसँ बनवैत छथि। आ मातृ शब्दक अर्थ ‘आदरणीय’अछि। यास्कक मतसँ मातृक भाव ‘निर्मातृ’निर्माण करयवाला जननी सेहो अछि। मुदा ‘आदि युगसँ लय आइ धरि मानव जकरा असीम श्रद्धा प्रकट करैत अछि आ जाहिसँ अजस्त्र अक्षय स्नेह पबैत रहैत अछि, ओ मात्र जन्मदात्री नहि, ओ एहिसँ बहुत पैघ अछि। ओकर स्थान स्वर्गसँ सेहो उच्च आ गुरुसँ अधिक पूज्य होइत अछि। माय सदैव माय होइत अछि। वेदमे सेहो नारीक लेल कुलयानी, सम्राज्ञी कल्याणी पुरन्धि, कुलपा आदि शब्दक प्रचुर प्रयोग भेटैत अछि। इन्द्राणी, उषा, अदिति, इला, श्रद्धासिनी, वाली, भारती, पृश्नि, वरूणानि, आख्यानि वाक, दयावा पृथ्वी, राका आदि रूपमे वैदिक संहिताक नारीक दृष्टि पथमे अवतरित होइत छथि। स्त्रीक हेतु एक स्थानपर कहल गेल अछि। ‘शुद्धा:’पूसा योषितो यज्ञिया इमा:’तथा हुनका पुरुषक हेतु अश्व, गायक हेतु शिव होयवाक बात कहल गेल अछि। सहोत्तरंस्म पुरानारी, समनं चावगच्छति’अर्थात् पहिले स्त्री यज्ञ आयुद्धमे जाइत छलीह। हुनक पुत्र शत्रुहण छथि। एक गोट स्थानपर स्त्री कहैत छथि हमरासँ अधिक केओ सौभाग्यशालिनी नहि छथि वैदिक अक्ष सूक्तमे एकगोट जुआरीकेँ ओकर सासु डटैत अछि आ पत्नी रोकैत अछि। वेद कहैत अछि ‘अनवया पतिजुष्टेवनारी’अर्थात् सच्चरित्रस्त्री पतिकेँ प्रिय होइत छथि। अर्थवेद कहैत छथि ‘जायापत्नेमधुमतीवाचंवदति’। वेदमे स्त्रीकेँ ब्रह्म सेहो कहल गेल अछि। तेँ वरदा वेदमाताकेँ वेदमे स्तुति कयल गेल अछि। आचार्य प्रियव्रत तँ सरस्वतीकेँ शिक्षाविभागक मंत्री कहलनि अछि। संहितामे वर्णित नारीक एहि उत्कृष्ट रूपक छाया हमरा सहितेतर वैदिक साहित्य (ब्राह्मण एवं उपनिषद्) मे प्रचुरतासँ उपलब्ध अछि। ब्राह्मण साहित्यमे पत्नी तथा स्त्री विषयक अनेक सन्दर्भ प्राप्त होइत अछि जाहिसँ नारीलोकनिक गरिमा परिलक्षित होइत अछि। नारीकेँ सावित्रीक संज्ञासँ समलिंगीकृत कयल गेल अछि। स्त्री सावित्री (जैठव्रा., 4/27/17)। गृहपरिवारमे ओकर प्रधानताकेँ स्वीकार कयल गेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मण जायाकेँ गाईपत्य अग्निकरुपमे स्वीकार करैत अछि- ‘जाया गार्हपत्योग्नि:’। (ए.ब्रा, 8/24) पत्नी पतिक अर्द्धांगिनी मानल गेल अछि। संहिता एवं ब्राह्मण साहित्यक विपरीत उपनिषदकालीन नारीलोकनिक समुन्नत अवस्थाक परिचय भेटैत अछि। केनोपनिषद् मे हेमवती उमाक आध्यात्मिक ज्ञान, ब्राह्मवादिनी, वाचकनवी गंर्गी आ मैत्रेयीक वर्णण ओकर आघ्यात्मिक ज्ञानक पराकाष्ठाकेँ सन्दर्भशित करैत अछि। मैत्रेयीक ई कथन जे ‘येनाहंनामृतास्याम किंकुर्याम्’हुनक ज्ञान पराकाष्ठाक दिग्दर्शन करैत अछि। एहि काल पिता सेहो पंडितापुत्रीक इच्छा करैत छलाह। उपनिषद् साहित्यमे स्त्रीलोकनिक मातृत्व पक्षकेँ सेहो चित्रित कयल गेल अछि। ऐतरेय उपनिषद् मे गर्भ धारण करयवाली स्त्री व्यावयित्री एवं भावियितव्या कहल गेल अछि। एहिकालमे स्त्रीकेँ यद्यपि छायाधिकारक स्पष्ट रूपसँ वर्णन नहि कयल गेल अछि, मुदा वृहदारण्यक उपनिषद् मे सन्यास गमन करैत याज्ञवल्कय द्वारा अपन भार्याकेँ वित्त विवरण करब हुनक पतिक सम्पतिमे अधिकार होयवाक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। स्वैनिणी नारीक उदाहरण हमरा छन्दोग्यमे (4/42/2) देखल जाइत अछि। सूत्र साहित्यकेँ अवलोकन कयला पर एहि युगमे स्त्री लोकनिक स्थान प्रत्येक दृष्टिसँ समुन्नत अवस्थाकेँ प्राप्त दृष्टिगत होइत अछि। आ विद्या सम्पन्न होइत छलीह तथा विद्यालयमे उपाध्याय। आ आचार्यहुपर प्रतिष्ठित होइत छलीह। मैत्रेयी, बहवा, प्राचितेयी, गार्गी, वाचकनवी, सुलभा आदि ऋषिकाकेँ रूपमे उल्लिखित छथि। गोभिल गृहसूत्रमे स्त्रीलोकनिक उपनयन संस्कारक सेहो निर्देश अछि (2/1/19) एतएव सूत्रकालमे स्त्री शिक्षा सुव्यवस्थित रूपमे छल। ________________________________________ [1]आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ कविनवतिका, मैथिली मन्दिर, राजकुमारगंज, दरंभंगा, 1984 [2]कर्णामृत (जुलाई-सितम्बर, स्मृति विशेषांक), 2000, कोलकाता [3]सम्पादक विजयनाथ ठाकुर, जयन्ती, पृ- 131, चेतना समिति, पटना, नवम्बर- 2004 [4]तत्रैव [5]लालदास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण (बालकाण्ड), पृ- 4, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, दरभंगा, सम्वत 2011 [6]लालदास, रमेश्वर चरित मिथिला रामायण (पुष्करकाण्ड), पृ- 437, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1999 [7]डॉ. मुरलीधर झा- चन्दा झा ओ लालदास रामायण तुलनात्मक अध्ययन, पृ- 174, मिथिला रिसर्च सोसाइटी, लहेरियासराय, दरभंगा, 2006 रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे ‘कौशल्या’ कौशल्या एक आदर्श राजमहिषी तथा जननीक रूपमे चित्रित भेल छथि। कौशल्या हेतु राम, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्नमे कोनोटा अन्तर नहि बुझल जाइछ। राम हुनके पुत्र थिक। ओ सौतिनि लोकनिकेँ छोट बहिनिक दृष्टियेँ देखैत छथि। हिनक सर्वप्रथम उल्लेख वाल्मीकि रामायणमे पुत्र-प्रेमक आकांक्षिणीक रूपमे भेटैत अछि। वाल्मीकिक परम्परामे रचित काव्य एवं नाटक सभमे कौशल्या सर्वत्र अग्र महिषीक रूपमे चित्रित छथि, मात्र आनन्द रामायणमे दशरथ एवं कौशल्याक विवाहक वर्णन विस्तारसँ भेल अछि। गुण भद्रकृत उत्तर-पुराणमे कौशल्याक मायक नाम सुवाला तथा पुष्पदत्त ‘पड़मचरित’ मे कौशल्याक दोसर नाम अपराजिता देल गेल अछि। राम कथामे अवतारक प्रभावक फलस्वरूप पुराणमे कश्यप आ अदितिकेँ दशरथ आ कौशल्याक रूपमे अवतारक वर्णन भेल अछि।[i] लालदास रामक वन गमनक समयमे कौशल्याक मातृ हृदयक सफल चित्रण कयलनि अछि- हम नहि विपिन जाय सतदेव। अहा अपयश जग मे बरुलेव।। नृपतिक हाथ देव वरु प्राण। त्यागव नहि अहँ सन सन्तान।। मुदा रामक वन गमनक उपरान्त भरतकेँ अयोध्या पहुँचलापर कौशल्याक मतृत्व ओ पत्नीत्वमे अत्यधिक संघर्षक स्थिति देखि पड़ैत अछि। रामक वन गमनक काल कौशल्याक मातृत्व उमड़ि पड़ैछ। कौशल्या मूर्छित खसलीह। शोकाकुल कानय लगलीह।। व्याकुल पीटथि हृदय कपार। कहथि कतय छथि प्राणाधार।। एक बेरि सुतमुख देथु देखाय। तखन प्राण तन रहिओ कि जाय।।[ii] राम वनसँ आपस नहि अयलाह से समाचार सुनि कौशल्या शोकाकुल भऽ उठैछ। कौशल्या सुनलनि परिणाम। फिरि नहि अयला वन सौं राम।। लगली पीटय हृदय कपार। हाय वत्स की कयल विचार। हमरा त्यागल ककर भरोस। मरब आइ करितहि आक्रोश।। हायबध दैलहु बड़ धन्ध। कयल देल हमर दुहू दृग अन्ध। अह बिनु हमर रहत नहि प्राण। लगयिछ ऑंगन भवन भयान।। स्त्रीधर्मक रक्षा करैत कौशल्या राजा दशरथसँ कहि उठैत छथि जे रामक वन गमनमे विधिक विधान अछि अपनेक कोन दोष नहि। कविक शब्दमे- अछि चिन्ता सौं चित्त अचयन। तैं कहलहु हम अनुचित वचन।। चलयित कहलनि राम बुझाय। किछु जनि कही पिता का माय।। हमर सिनेहो अनुचित बात। कहब तँ बड़ दु:ख पओता तात।। एहि प्रकारक कहि बारम्बार। वनगेला रघुनाथ उदार।। से सुत ममते गेलहुँ भुलाय। कहलहुँ पति रूषि वचन बजाय।। कयो नहि हमर सनि अछि अधलाहि। पतिकॉ कटु कहयित नहि आहि।। सुन प्रणेश अहूँक नहि दोष। कयल विधाता ई सभ रोष। एहि प्रकारेँ देखैत छी जे लालदास कौशल्याक पत्नीत्वक मर्यादाकेँ संरक्षित कयलनि अदि मुदा हुनक विविध उत्कट वचन नारीत्वक मर्यादायक अनुकूल बुझना जाइछ। राजा दशरथक मृत्युक पश्चात कौशल्याक कारूणिक दशा द्रवित भऽ उठैछ- ‘पति संग हमहु अनल समाय। रहब सुखी भल सुरपुर जाय।। सुनिसुनि कौशल्याक विलाप। सभजनकेँ बाढ़ल बड़ताप।। मनमे सभकेँ भेल सन्देह। हिना प्राण रहत नहि देह।। अर्ते कौशल्या कॉ दुखित ओहि देखल सकल समाज। अन्त:पुर लय जाय पुनि बोधल कति ऋषि राज।।[iii] नारी जीवनक पैघ उद्देश्य कुशलकरय वाली आ कुशल मानावय वाली जाधरि नारी सभक कुशल करब, कुशलक कामनाभावना नहि नहि राखत ताधरि ओ पूर्ण नहि कहा सकैत अछि। कौशल्या सातो गुण प्रधान नारी छलीह। मातृत्वक गम्भीरता, विश्वासक अडिगता, ममता तथा कुशल भावनापर कोना बाधा नहि आवय देलनि। जखन कैकई रामकेँ वन पठेवाक आदेश कौशल्या सुनलनि तँ मातृत्व आ कल्याणक भावनाक संघर्षमे हुनक अवस्थाक वर्णन गौस्वामीजी मात्र एक पांतिमे सुन्दर ढंगसँ कयलनि अछि- ‘सुनि प्रसंग रहि मूक जिमि वरनि नही जाई।’ कौशल्याक अवस्था गीताक साम्ययोगकेँ स्मरण करबैत अछि। कौशल्याक व्यापक रूपक दर्शनक प्रसंग मानसकार लिखैत छथि- “व्यापक ब्रह्मा निरंजन निर्गुन विगत विनोद। सो अज प्रेम भगति वस, कौशल्या को गोद।।”[iv] प्रभुक व्यापक रूपक दर्शन होइत अछि साधककेँ- “देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड। रोमरोम प्रतिलागे कोटि कोटि ब्रह्मांड।।”[v] एहि व्यापक रूपक दर्शन रामायणमे मात्र कौशल्याजीकेँ भेलनि। ________________________________________ [i]रामचरित मानस (अयोध्याकाण्ड) [ii]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (बालकाण्ड) [iii]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (सा.अ.) पृ.- 166 [iv]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (अयोध्याकाण्ड) [v]रमेश्वरचरित मिथिला रामायण (अरण्यकाण्ड) पृ.- 133 रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे पुष्कर काण्डक विशेषता कविवर लालदासक प्रशस्तिमे आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’कवि-नवतिकामे कहने छलाह- “रमा रहित रामक अयन नहि अशक्ति पुरुषत्व। लालदास रचि ‘रमेश्वरचरित’, बुझऔल तत्त्व।। ” आ दामोदर लाल ‘विशारद’लिखैत छथि- “लाल मधुप लखि लाल भव, किंशुक पर जनु मूल। वैदेही पद कमल मधु, सेव सकल सुख मूल।।”[1] रामायण रचनाक परम्परामे केओ एहन नहि होएत जे लालदासक नाम नहि जनैत हो वा रामायणक पद नहि सुनने हो। देवी कामाख्याक प्रेरणासँ महाशक्ति जाग्रत भूमिमे एकर लेखन ग्रन्थरत्नकेँ विशिष्ट अर्थवत्ता दैत अछि। फलत: रामेश्वर चरित मिथिला रामायणक रचनाक उद्देश्य अछि सीता-चरित्रक सर्वोत्तर्ष महालक्ष्मी, महासरस्वती आ महाकालीक समवेत रूपमे आदिशक्ति ध्वजोत्तोलन। महाकाली आ रणचण्डी दुर्गाक सीताक चरितक प्रतिष्ठापन ओज आ गर्वक प्रतीक नारी शक्तिक आह्वान। शक्ति-शक्तिमानक समरसेतुमे जीवनक चरितार्थ निहित अछि। बिनु शक्तिक योग ब्रह्मा, विष्णु महेश शव छथि, बुढ़ियाक फुसि थिकाह। एकर प्रतिपादन-सम्पादन रामायणक अन्तिम काण्ड पुष्पकरकाण्डसँ भए जाइत अछि। लालदासक सर्वश्रेष्ठ अवदान थिक जे नारीक अस्मिता-मनस्विता उद्वोधक अछि।[2] वीरांगनाक रूपमे सीताक अवतरण पुष्करकाण्डक भेँट थिक। सीताक चरित्रक सर्वातिशयता पुष्करकाण्डक अग्रणी भूमिका अछि। रामक रामत्व सीताक बिना शून्य अछि। सीता-परित्यागक मार्मिक अंशकेँ छोड़ब लालदासक बुद्धिमता थिक। रमेश्वर चरित मिथिला रामायण रामक लोक नायत्वमे सीताक असीम सामर्थ्य आकलित करैत अछि। वैष्वमतपर शाक्त मतक उत्कर्ष प्रदर्शित करैत अछि। एतय सभ किछु शक्तिक दृष्टिए देखल गेल अछि। सीता साक्षात योगमाया थिकीह जनिक भू-भागपर सृष्टिक जय ओ क्षय नचैत अछि।[3] मूल प्रकृति लक्ष्मी जनिक, सीता रूप प्रधान। तनिक नाम जपि पाबि नर, दुहु लोकक कल्याण।। पुष्करकाण्डमे देखाओल गेल अछि जे रामक पराक्रम ओ विजयक सभटा श्रेय सीताकेँ छलनि, राम तँ निमित्त मात्र छलाह। जहीिना महाभारतमे देखाओल गेल अछि जे अर्जुनक विजयक श्रेय कृष्णकेँ छलनि, कृष्ण विहीन होइते अर्जुनक सभटा शौर्य निष्प्रभ भए जाइत अछि। तहिना लालदास देखओलनि अछि जे सीताक सहाय्यसँ विहीन रहने सहस्त्रमुख रावणक सम्मुख प्रभावहीन भए गेल छलाह। हुनक समस्त सैन्य ओकर वयव्यस्त्रसँ उधिया गेल छल। मुदा सीताक हेतु ओकर बध करब कठिन नहि छल। पुष्करकाण्डक आरम्भमे रामक सिंहासनारोहणक पश्चात् एक दिन जखन ऋषि महर्षि लोकनि रामक अभिनन्दन करबाक क्रममे रामवण वधक प्रशंसा करैत छथि तँ सीताकेँ हँसी लागि जाइत छनि। ई देखि राम जखन जिज्ञासा करैत छथि तँ हुनका सीतासँ ज्ञात होइत छनि जे श्वेत द्वीपपर एखनहुँ सहस्त्रमुख रावण वर्त्तमान अछि। सीताक मुखसँ ई सन्दर्भ सुनि रामकेँ बड़ क्षोभ होइत छनि। तत्क्षण चारू भाई मिलि श्वेत द्वीप दिस प्रस्थान करैत छथि। मार्गमे वायुक तेहन प्रचण्ड प्रवाह बसि रहल छल जे ओकर झोंकमे चारू भाई उधियाइत-उधिआइत पुन: अवध फेका जाइत छथि। तदुपरान्त सीता हुनका लोकनिक संग पुष्पक विमानपर चढ़ि सैन्य सहित प्रस्थान करैत छथि। सीताक प्रभावसँ सभ केओ श्वेत द्वीप पहुँचैत छथि। युद्धमे राम सहित सभ सैन्य संज्ञाहीन भए जाइत छथि। वशिष्ठ मुनिक कहलाक पश्चात् सीताकेँ बड़ रोष होइत छनि तथा ओ अपन सामान्य स्वरूप त्यागि कालीक रूप धारण कए शत्रुक संहार करय लगैत छथि। थोड़बे कालमे सहस्त्रमुख रामवणकेँ वध कऽ दैत छथि मुदा हुनक उग्ररूप रामकथामे ‘सहस्त्र स्कन्ध रावणक वध-कथा उपलब्ध अछि। लालदास वैष्णव मतक प्रतिपादनक संगहि शाक्त सम्प्रदायक भावनाक अनुकूल वस्तु-विन्यास कयलनि अछि। भारतीय संस्कृतिक अनुरूप आदर्श पारिवारिक जीवन तथा भक्तिपक्षक अनुरूप आत्मनिवेदन ओ समर्पझा भावक रामयण वस्तु-विधान दृष्टिगोचर होइछ। ________________________________________ [1]आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ कविनवतिका, मैथिली मन्दिर, राजकुमारगंज, दरभंगा, 1984 [2]कर्णामृत (जुलाई-सितम्बर, स्मृति विशेषांक) 2000, कोलकाता [3]सम्पादक विजयनाथ ठाकुर ‘जयन्ती’, पृ.- 131, चेतना समिति, पटना, नवम्बर- 2004 लालदासक रामायणमे विधि-व्यवहारक वर्णन भावपक्षीकेँ कल्पनाक पॉंखि भेटलासँ साहित्यमे उड़वाक सामर्थ्य आबि जाइत छैक। कल्पनाक कमनीयता भावक सौन्दर्यकेँ अभिवृद्धि कए दैत अछि। इएह कारण अछि जे अभिव्यक्तिकेँ प्राणवान वोधगम्य चमत्कारी एवं अर्थसमृद्ध बनएवाक हेतु अन्य अनेक ‘साधन’क आवश्यकता पड़ैत छैक। भाव तत्व एवं विचार तत्वकेँ आकर प्रदान करएवला कल्पना तत्त्व होइत अछि। कल्पना सएह कोनो भाव एवं विचारकेँ अभिव्यजना दैत अछि।[1] रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे मिथिलाक विधिव्यवहारक वर्णनसँ तात्पर्य ई अछि जे एहि रामायणक रचनाक्रममे मिथिलाक जीवनक केहन वर्णन कएने छथि। वालकाण्डमे लक्ष्मी अवतारक वर्णनक क्रममे पावन देश मिथिलाक वर्णन करैत कविवर कहैत छथि- “सुरसरिधार उत्तरकूल सुरमुनिसेक्ति भूमि अतूल।। देवभूमि पर्वत हिमवान तेाहिसौं दक्षिण धर्म निधान।। मिथिला नामक पावन देश जहॉं राजर्षि क्ज्ञथि मिथिलेश।। जन्मभूमि नैहर सीताक जतय स्वयं शिव रूप पिनाक। शक्ति पीठ उत्तम असथान उग्रभूमि सभ भॉंति महान।। प्रियनिवास महि हरि लक्ष्मीक तपथि जनक ऋषि तह वाल्मीकि याज्ञवल्क्य गौतम हिमदाव सिद्ध भेला मिथिलाक प्रभाव शुक्राचार्य जनकक सतसंग सिखलनि ज्ञान जतय भलरंग।। मुनि मण्डलीक सुसिद्ध स्थान यज्ञभूमि दायक कल्याण।। सुरगन्धव यज्ञ समुदाय नरतन मिथिला वसथि सदाय।”[2] अभिप्राय जे वर्णाश्रम धर्मक प्रधानता छल सभ वर्ग धर्मावलम्बी छल। पुरुष वर्ग कर्त्तव्यनिष्ठ ओ महिला वर्ग सुशीला, सुलक्षणा ओ सुदृदय रहथि। सुख-सम्पदा ओ शान्ति सर्वत्र विद्यमान छल।[3] विधि-व्यवहार वर्णनक दृष्टिसँ लालदासक रामायण अन्य रामायणक अपेक्षा कृर्त विशद कहल जा सकैत अछि। रामक जन्म ओ विविध संस्कार एहन अवसर सभ अछि जकर नीक जकॉं वर्ण लालदास कएने छथि। रामक जन्मक अवसरपर सोहर, सीताक गिरिजा पूजन तथा वाम अंग फड़कला सँ शुभ सूचनाक रूढ़िक वर्णन मिथिलाक व्यवहार पक्षक अन्यनिर्दशन अछि। मिथिलाक लोकाचारक विषयक विविध पक्षक नियोजित ओ उत्कृष्ट वर्ण भेल अछि। खास कए कविवर सीता रामक विवाह क्रममे मिथिलाक लोक व्यवहार केँ अत्यन्त स्फुट कएलनि अछि। वरियाती-सरियाती, जनवास- परिछन, कुशलाचार (पएर धोएवाक) विधि, गोत्रादया अग्नि स्थापन पाणिग्रहण, गीत-नृत्यादिक वर्णन भेल अछि। कविवरक रामायणमे मैथिल विपटाक कला प्रदर्शनक वर्णन अत्यन्त मनोहर भेल अछि- “मैथिल विपटा लगवय ताल कहय कृपण वड़ अवध भुआल।। चारि वेरिरवैतहु जें भोज पवितहुहान होइत नरि ओज।। खर्चक डरे अवध महराज कयल एकहि वेरि चारू काज।। अपने लेताह चारि दहेज याचक नर्तक पुरलक भोज।।”[4] डहकन महुअक कोवर घरक उतरा-चौरी दहेज आदिक वर्णन सेहो हिनक लोक व्यवहार पक्षक ज्ञान तथा मैथिल रीति नीतिक प्रति गौरवमय आसक्तिक परिचय केलनि अछि। देखू एक गोट वर्णन- “कौतुक भवन गेला श्री राम। अभिलिह नगरक नागरि वाम।। कुच उत्तंग, अंगअभिराम वयस किशोर विवशकृत काम।।” परिधन भूषन-वसन लालाम। वुझि पड़ सभजनि अमरक वाम।। चन्द्रवदनि गजराज प्रचार सभ मातलि यौवन मदभार।। हास्य कला मय निपुण सुधीर वैसलिह सभ जनि रामक तीर।। लगलिह कहय कथापूत व्यंग्य रस वश पुलकि उठय सभ अंग।। विधिकरि लयलिह महुअक खीर देल परसि लेलनि रघुवीर।। जौं जौं भोजन रघुवर करथि सखि मिलि हँसि करथि कतुकहथि।। अहँक वंश केर अद्भुत कर्म सुनल पुरुष कै प्रेसवक धर्म।। पुनि सुनलहुँ पायसकेँ खाय लै अछि नारि पुत्र जनमाय।। राम अहॉं जनु पायस रवार वैदेहीक उपहास वचाउ।[5] एहि प्रकारेँ रमेश्वर चरित मिथिला रामायणमे विधि-वयवहारक वर्णन अप्रतीम भेल अछि। कविवर लाल दासकेँ जेना वर्णन करबमे मोननहि अधाइत छलनि। वर्णनक विन्यासमे लाल दास समस्त अवसरकेँ पूर्णतया उपयोग करबाक प्रयत्न कयलनि अछि।[6]एहिठाम हम सलीपुलक न्यायसँ किछु विवेचना कएल अछि। ________________________________________ [1]जयनाथ नलिन विद्यापति एक तुलनात्मक समीक्षा पृ.- 233, रघुवीर शरण वंशल, 24 दरियागंज दिल्ली- 6, 1961 ई. [2]लालदास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण, वालकाण्ड, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, सम्वत 2011 [3]चेतना समिति पटना- जयन्ती पृ- 124, संसकरण 2004 [4]लाल दास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण, पृ.- 95 साहित्य अकादेमी नई दिल्ली, 1999 [5]लाल दास- रमेश्वर चरित मिथिला रामायण, वालकाण्ड, पंचायत प्रेस, लहेरियासराय, सम्वत 1911 [6]डॉ. मुरलीधर झा- चन्दा झा ओ लाल दास रामायण तुलनात्मक अध्ययन पृ.- 200, मिथिला रिसर्च सोसाइटी- लहेरियासराय, 2007 डॉ. चित्रलेखा, एसोसिएट प्रोफेसर, मैथिली विभाग, यू.भी.के. कॉलेज, कड़ामा- आलमनगर, बी.एन.मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा मिथिलामे गीत नादक महत्व मनुष्यक जन्मक पूर्वसँ मृत्यु पर्यन्त अनेकानेक अवसरपर पावनि ओ उत्सव मनाओल जाइत अछि आ से सभ गीतमय भेल रहैत अछि, जाहिमे व्यवहारजन्य भाव भेटैछ। गीतक संगहि संग अवसर विशेषपर व्यवहारजन्य, अराधना एवं वंशक अभिवृद्धिजन्य पौराणिक कथा ओ व्रतादिक विषय वर्णित अछि, जकर रक्षा मैथिलानी लोकनि करैत आबि रहल छथि। अवसर परक व्यवहारिक गीतक रसामाधुर्य, ताहि संगे जातीय गीतक रागात्क धार्मिक औद्रार्यक अतिरिक्त गीतक अनुपमेयतामे पौराणिक देवचरित्र स्पष्टत: दृष्टिगोचर होइछ। गीतक द्वारा पितरक स्मरण, देवी-देवताक अराधना, लौकिक आचार-विचार ओ वैदिक परम्पराक विधि-व्यवहारक लिक्षणता, तन्त्र-मन्त्रक महत्ता, विधि सामग्री सभक वस्तुजन्य ओ अवसरजन्य गुणक विशेषता भेटैछ, जाहिमे व्यक्तिकेँ परिवारसँ, परिवारकेँ कुटुम्ब ओ आस-पड़ोसक समाजसँ वर्त्तमान आनन्दमे सौहार्द्र भाव परिलक्षित होइछ, ओ तेँ तदनुरूपेँ सांस्कृतिक रक्षा सतत स्वत: सिद्धे थिक। ‘धर्मपराणता, आनन्दकारिता, लौकिकता, हृदयग्राहिता, सामयिकता, अवसरोपयोगिता व्यवहारपटुता कलानिपुणता आदि अनेकानेक जीवनोपयोगी ओ लोकोपयोगी मनोरम भावसामग्री मिथिलाक निर्मल पावन क्षेत्रक हरीतिमा मध्य ओ सामयिक गीत सभमे पाबि अनतत: ई बुझना जाइछ जेना संगीतक माध्यमे भाव साधनक संयोगसँ चित्रित कऽ वर्त्तमानक स्वरूपमे परम्परया अतीतकेँ समक्ष आनि भविष्यक संस्कारकेँ चमत्कृत ओ उज्जीवित करैछ, जे स्वभावत: श्लाधनीय, पठनीय, स्मरणीय ओ स्तुत्य अछि। शास्त्रक हेतु तँ प्रत्यक्ष मंत्र प्रमाण होइछ अछि, किन्तु विधि तँ परम्परासँ चलैत आबि रहल अछि। ‘गीत आ कथा’जीवनक संग उपर्युपरि अभिमिश्रित आ स्वरूपित अछि। जतए मिथिला क्षेत्रक विभिन्न स्थानीय विशेषताक अन्त: स्वरूपसँ परिचित होएबाक अवसर भेटत, ओतए विभिन्न विधि व्यवहारसँ समानता ओ भिन्नताक बोध सेहो होएत। अनेक जातिक सम्पर्कमे अएबाक अवसर भेटल। कोनो गॉंवमे कोनो जातिक प्रधानता ओ कोनोमे कोनो आन जातिक। मुदा सर्वत्र एक बात दर्शनीय अछि आओर ओ अछि एकर परस्पर सहय्य भाव। एहि विभिन्न जातिक फराक साहित्य, संस्कार, विचार, आदर्श आदिक अध्ययनमे सुविधा पाओल। कथावाचक ओ गायक रूपमे यद्यपि स्त्री पुरुष दुहू भेटल ओ सेहो सभ अवस्थाक लोक, मुदा बालगीत, चकचन्दा गीत आदिक गायक प्राय: बालक अछि, गाथा गीतक गायक प्राय: पौढ़, पुरुष, होली, चैती, कजरी आदि उल्लासक गीत युवक वर्गक बीच बेसी लोकप्रिय अछि। महिलामे अवस्थाक नियन्त्रणपर कककरो ध्यान नहि अछि। सभ अवस्थाक महिला सोल्लास लोकगीत गबैछ, कथा कहैछ ओ सुनैत अछि। तखन सामयिक लोकगीतमे विशेषत: नव वयसक महिला बेसी अभिरूचि रखैत अछि। गीतगाइनि दू प्रकारक भेटलीह- (1) सभक संग स्व मिला कऽ गओनिहारि आ (2) स्वतंत्र रूपसँ गओनिहारि। कोनो पावनिक अवसरपर सभक संग मिलिकऽ गएबाक व्यवहार अछि। किदु व्यावसायिक गायिका सेहो होइछ जे विविध मांगलिक अवसरपर गीत गाबि पारिश्रमिक लैत अछि- यथा, वक्खौ- बरवौनी, नट-नटी आ पमरिया आदि। एहि ग्रामीण स्त्री-पुरुषमे अनेकानेक लोकक लग अपार साहित्य वैभव अछि। अधिकांश निरक्षर वा मात्र साधारण साक्षर रहितहुँ श्रुति परम्परासँ सम्पूर्ण साहित्यकेँ कंठाग्र कएलन्हि अछि। साहित्य कोशकेँ समृद्ध करबाक हेतु कोनो कार्य व्यापार छोड़ैत नहि छथि तथापि अपन कार्यक बीच क्रमश: ई साहित्य-भंडारी बनि जाइत छथि। मिथिलामे परम्परासँ प्रचलित व्यवहारसँ सम्पृक्त बालक आ बालिका लोकनिक जन्मसँ द्विरागमन पर्यन्त सभ पावनिक पुनीत अवसर परक गीत पुरातन संस्कृतिक स्वरूपकेँ उत्जीवित रखैत भविष्यक संस्कृति रक्षामे सहाय्य बनैछ। अवसर परक व्यवहारिक गीतक जीनोपयोगी स्वरूप, सौन्दर्य, समय विशेषक सामयिक गीतक रसमाधुर्य, ताहि संगे जातीय गीतक रागात्मक धर्मिक औदार्यक अतिरिक्त गीतक अनुपमेयतामे पौराणिक देव चरित्र स्पष्टत: दृष्टिगोचर होइछ। गीतहि द्वारा पितरक स्मरण, देवी-देवताक आराधना, लौकिक आचार-विचार ओ वैदिक परम्पराक विधि-व्यवहारक विलक्षणता, तन्त्र-मन्त्रक महत्ता, विधि सामग्री सभक वस्तुजन्य ओ अवसरजन्य गुणक विशेषता भेटैछ, जाहिमे व्यक्तिकेँ परिवारसँ, परिवारकेँ कुटुम्ब ओ आस-पड़ोसक समाजसँ वर्त्तमानक आनन्दमे सौहार्द्र भाव परिलक्षित होइछ, स्वत: सिद्धे थिक। सन्तानक हेतु स्त्री-पुरुषक आन्तरिक लालसा, साधना ओ दव-स्पप्न, गर्भवती जननीक आकुलपीड़ा पुत्रोत्पत्तिजन्य उल्लास, सम्बन्धी ओ परिजनक परस्पर बधाई आ शुभकामना संग आनन्द विभोर भए कतहु- सोहर गबैछ, तँ अक्षरम्भ काल भविष्यक आशामे रत, कखनहुँ मुण्डन कराए नव संस्कार ओ विशुद्धि करबएमे मग्न, तँ पुन: उपनयनक सविधि संस्कारसँ ब्रह्मतत्व ज्ञानक प्राप्ति प्रक्रियामे लागल ओ तहिना सृष्टिक रक्षार्थ स्त्री पुरुषक सामाजिक गेठबन्धक वैवाहिक कृतिकर्म द्वारा कराबए मे डेग-‘डेगपर, घड़ी-घड़ीमे भावकेँ स्वर दए अभिव्यंजित करैत अछि। एहि प्रकारेँ जन्मक पूर्वसँ लए मरण पर्यन्त अनेकानेक अवसरपर पावनि ओ उत्सव मनाओल जाइछ आ से सभ गीतमय भेल रहैछ, जाहिमे व्यवहारजन्य-भाव भेटैछ। गीतक संगहि संग अवसर विशेषपर व्यवहारजन्य, आराधनाजन्य, उपदेशजन्य, विस्मयजन्य सामाजिक स्वरूप रक्षा एवं वंशक अभिवृद्धिजन्य पौराणिक कथा ओ व्रतादिक विषय वर्णित अछि, जकर रक्षा महिला लोकनि करैत आबि रहल छथि। मिथिलामे पावनि-तिहार मिथिलाक सभ पावनि-तिहारक अपन-अपन विशिष्ट महत्त्व छैक। एकरा पाछू कोनो ने कोनो संस्कारक सृजन अथवा ओकर विकासक हेतु सांस्कृतिक आधार सेहो रहिते अछि। खास कऽ मिथिला तँ पावनि-तिहारक नैहरे अछि। वर्षक बारहो मास पावनि-तिहारक धम्मक लोकक दुआरिपर होइतहिं रहैत छैक। हँ, एकबा धरि सत्य अछि जे समयक क्रमानुसारेँ प्रत्येक पावनिक अपन-अपन विशेष महत्त्व छैक। एहिठामक मौसम, भौगोलिक परिस्थिति, सामाजिक संरचना ओ अवस्था अवश्य धार्मिक संस्कारक परिवेशक संग जुटि कऽ एकर महत्ताकेँ आओर बढ़ा दैत अछि। बानगीक रूपमे तीला-संक्रान्तियेकेँ लेल जा सकैत अछि। स्वाभाविक बात छैक जे जाहि समयमे ई पावनि होइछ ताहि समय धरि बाध-बोन आ खेत-खरिहानसॅम्ं सभटा धान कटा कऽ प्राय: घरमे आबि गेल रहैत अछि। एहि समयमे की धन्निक, की गरीब, सभक घरमे धान-चाउर प्राय: रहिते छैक। तेँ सभक घरमे हरियरका नवका चूरा, नवका गूड़क भेली ओ लाइ-मुरहीक प्रचलन तँ नवान्नक रूपमे होइतहिं अछि; संगहि लाइ, चुल्लौर ओ तिलबामे नवान्ने जकॉं नवका गुड़क व्यवहार सेहो होइत अछथ्। इएह कारण थ्ज्ञिक जे तीला-संक्रान्ति सनक पावनिक महत्ता लोक-जीवनक एकटा महत्त्वपूर्ण संस्कार-कार्यक अंग बनि कऽ रहि गेल अछि। तहिना जुड़शीतलक संस्कारकेँ सेहो मिथिलाक लोक जीवनक संग कम कऽ कऽ नहिं ऑंकल जा सकैत अछि। गाछमे नव पल्लव अएलापर ई पावनि होइछ। पोखरि-इनार जकर उपयोग पूर्व कालहिंसँ मिथिलामे होइत रहल अछि आ इनार पोखरि पतझड़क समयक झड़ल पातसँ अन्हर-बिहाड़ि वा दाहिक संयोगे भरि गेल रहैत अछि। पानिमे ओ सड़ि जाएत तँ लोक भोजन ओ पीबाक निमित्त व्यवहार कोनो करत?लोक जुड़शीतलक माध्यमेँ ओकर सफाई, गामक गन्दगीसँ भरल गली-कुच्ची आ सड़कक सफाई, एक चुड़ुक पानिक निमित्त टुक्कुर-टुक्कुर तकैत गाछ वृक्षकेँ जुड़बैक निमित्त ओकर जड़िमे पानि दैत अछि। एहि दिन नव रब्बीसँ आएल जौ आ बदलामक सातु खएबाक परिपाटी अछि जाहिसँ धातु पुष्ट होइछ आ वर्ष भरिक लेल पेटक हेतु कल्याणकारी। तेँ जुड़शीतलक महत्ता मिथिलाक लोकजीवनमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। मरूभूमि ओ पहाड़मे रहनिहार लोक जतए धान आ बदामक ने तँ दाउन होइछ आ ने पीटल जाइछ से जुड़शीतल आ तीला-संक्रान्तिक महत्ता की बूझत? मिथिलाक लोककेँ छोड़ि दोसर ठामक लोक कोजागराक महत्ता की जानि सकत जतए मखाने नहिं होइछ। मखान मात्र मिथिलाक सम्पदा थिक। कोजागराक महत्त्वकेँ जतेक मिथिलावासी जानि सकैत अछि ततेक दोसर नहिं। कोजागरामे आएल मखान, केरा, दही आ मिठाईक भार ओ ओहि पूर्णिमा रातिक पचीसीक महत्त्व मिथिलेक धरतीक लोक जनैत अछि आन ठामक लोककेँ ई नसीबेमे नहि छैक। अपन सासुरमे बहिन नीक जकॉं छथि वा नहिं, हुनका कोनो कष्ट तँ नहिं छन्हि तकर लेखा-जोखा करबाक हेतु भरदुतिया मिथिलेमे अछि। तेँ मिथिलाक परम्परानुसार भाइक ई कर्त्तव्य अछि जे कमसँ कम वर्षमे एको बेर ओ अपन बहीनक खोज-खबरि लेथि जे ओ कोन स्थितिमे छथि आ बहीनोक ई कर्त्तव्य अछि जे अपन हाल-चाल बुझबाक हेतु आएल भाइक स्वागत सत्कार करथि तकर जीवन्त रूप थिक- भरदुतिया पावनि। भरदुतियाक महत्ता आ तकर पाछूक अर्थ मिथिले जनैत अछि आन नहिं। तेँ मिथिलाक लोक जीवनमे भरदुतिया पावनिक अत्यधिक महत्तव अछि। तेँ एकरा धार्मिक महत्त्व दए लोक-जीवनसँ जोड़ि देल गेल जे समयानुक्रमे मिथिलाक लोक-जीवनक एकटा महत्त्वपूर्ण अंग बनि कए रहि गेल अछि। मिथिलाक प्रसिद्ध पावनि मधुश्रावणीक महत्ता एहिठामक लोककेँ छोड़ि आनठामक लोक की बूझत। नव कनियॉं-वर प्रकृतिक महत्ताकेँ जानथि फूल लोढ़ि पूजन करथि आ टेमी दागि एहि बातकेँ स्वीकार करथि जे सभ दु:ख-सुखमे दुनू गोटे (पति-पत्नी) संगहि सहभागी रहब आ छोट-मोट कष्ट दुनू गोटेक सुखमय दाम्पत्य जीवनक बीच कोनो तरहक व्यवधान उपस्थित नहिं कऽ सकए। मधुश्रावणी सनक एहन पसिद्ध पावनि आन कोनो समाजमे प्रचलिते नहि अछि तखन ओकर महत्त्व ओ की जानत? तीज कहि कऽ मिथिलेत्तर समाज मिथिलाक चौठचन्द्रक अनुकरण भलेँ ही कऽ लिअए किन्तु चौठचन्द्र (चौरचन) क जे महत्ता से मिथिले जनैत अछथ्। बिनु फल देखौने खाली हाथेँ चन्द्रमाक दर्शन वर्ष भरिक हेतु रंग-बिरंगक कलंक अपना माथपर लेबाक द्योतक अछि। दलिपूरी, पिड़ुकिया ओ मड़ड़ भङबाक महत्त्व आन समाज की बूझत? मिथिलाक लोक-जीवन कतबहु आर्थिक तंगीमे रहओ किन्तु चौठ-चन्द्रक पावनिक अवसरपर तँ नीक भोजन कर्जो लऽ कऽ करबे करत। तेँ चौठ-चन्द्रक धार्मिक महत्ता मिथिलाक संग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। मिथिलामे पावनि-तिहारक संख्या अधिक अछि। एहि ठामक जनमानस बाढ़ि आ रौदी सँ डूबल आ सुखाएल रहैत अछि किन्तु मुँह जीहक बड़ पातर होइछ तेँ ओकरा चहटगर चाही। तेँ पावनि-तिहारक नामपर कर्जे सही, कर्ज लेबए पड़त तँ कि पावनि-तिहार नहिं मनाओल जाएत- से कोनो हएत। ‘हौ बौआ! कतहुँसँ पैंचो उधारक व्यवस्था करह छठि आ चौड़चन पावनि छैक। अर्थात् कर्ज लिअ आ पावनि करू, नीक नीकुत खएबाक हेतु। एखन पछिला कर्ज सधबो नहि कएल कि दोसर पावनि उपस्थित भऽ गेल। अर्थात् कर्जमे सालो भरिक कहॉं जन्म भरिक आ कतेको ठाम पुस्त-दर-पुस्त डूबल रहू। तेँ प्राय: मिथिलावासीक कहब अछि जे- “स्नान कृत्वा हरि जपेत भोजन कृत्वा जलं पिबेत त्रणं कृत्वा घृतं पिबेत यावत् जीबेत सुखं जीबेत्।।” अर्थात् कर्जेमे जन्मूआ कर्जेमे मरि जाउ किन्तु पावनि ने तँ कमजोर हएत आ ने छुटबे करत। मिथिलाक आर्थिक दुर्दशाक किछु अंश धरि कारण एहि ठामक पावनि-तिहारक सेहो रहल होएत मुदा आब से बात नहिं। विकसित संस्कारक संगहि आर्थिक विकास सेहो पर्याप्त भऽ रहल अछि। लोक समाजमे पहिनेसँ ‘बढ़ि-चढ़ि’ कऽ पावनि-तिहार मनएबामे रूचि लऽ रहल अछि। हम ई नहिं कहैत छी जे मिथिलाक परम्परागत संस्कार आ पावनि-तिहारक परम्परा बहुत सुन्दर अछि, मुदा समयक संग चलैत ओहि सभ परम्परा सभमे परिवर्तन होएबाक चाही से भइये रहल अछि। आब ने ओ वातावरण आ ने परिस्थिति अछि। ज्ञान-विज्ञान बहुत बढ़ि गेल अछि। विश्व दौड़ि रहल अछि आगू दिसि कऽ तँ कमसँ कम हम डेगो-डेगो तँ ओकर पादू विकास करब। सन्दर्भ सूची- 1. मिथिलाक पावनि-तिहार- मोहिनी झा 2. मिथिलाक वार्षिक पावनि-तिहार- श्रीमती अंशु मिश्र 3. मिथिलाक पावनि-तिहार- बाबू गंगापति सिंह मिथिलाक परिचय वेद-वेदान्त, पुराण, उपनिषद, धर्मशास्त्र आ तंत्र-मंत्र विद्या एवं संसारक मानव चिन्तनक इतिहासमे ई अपन महत्त्वपूर्ण भूमिकाक लेल सुविख्यात अछि। एतबे नहि एक दिस जँ सामवेदक प्रथम मंत्रद्रष्टा आ ऋगवेदक मरूत्सूक्तक प्रणेता- ऋषि गौतम, शुक्लवेदक प्रणेता- महर्षि याज्ञवल्क्य, भीजल धोती आकाशमे सुखबएवला साधक-मदन उपाध्याय, षड्दर्शन टीकाकार वृद्ध वाचस्पति मिश्र, भगवान जनदिनोकेँ चुनौती तक दऽ देबएवला उदयनाचार्य, आयाची- भवनाथ मिश्र, परमाचार्यवर्य मण्डन मिश्र आदि लोकनिक अविच्छिन्न परम्परा सभसँ मिथिला सदा अलंकृत रहल अछि तँ दोसर दिस मित्रऋषिक आत्मजा मैत्रेयी, ऋषिगर्ग तनया गार्गी, भारद्वाजसुता कात्यायिनी, ऋषि अत्री- कलत्र सती-अनुसूया, जनकनन्दिनी जानकी, भारती, भामती, लखिमा आदि मनस्विनी-विदुषी लोकनिसँ महनीय तथा वन्दनीय रहल अछि। ई भूमिजा जगज्जननी जगदम्बा लक्ष्मीस्वरूपा विदेह नन्दिनी वैदेहीक वसुधा रहल अछि। 12वीं शदीक बंगाली महाकवि कर्णपुर परिजातहरणमे श्री कृष्ण- सत्यभामाक विमानकेँ मिथिलामे प्रवेशक वर्णनक क्रममे लिखैत छथि जे- “जानकी- जनन- भूमिरीक्ष्यातामम्बुजाक्षि मिथिलेयमग्रत।। यत्र विज्ञवदनेष्ज्ञु दर्पिता नृत्यति प्रतिगृहं सरस्वती।” जाहिठाम प्रत्येक घरमे सरस्वती सोल्लास नृत्य करैत होथि, ओहिठामक विद्वत परम्परा अनिवार्य रूपसँ अद्भुत हएत, संगहि जाहि क्षेत्रक राजाकेँ ऐश्वर्य आओर राज वैभवसँ असम्पृक्त रहि कऽ वीतरागी विदेहक योगस्थ कर्णमीमांसकक दृष्टान्त रूपमे आनन्दकन्द भगवान श्री कृष्ण द्वारा अभिहित कएल गेल हो। श्रीमद्भागवतमे 57 मैथिल जनकक नामक उल्लेखक पश्चात् कहल गेल अछि जे एतेक जनक कर्मयोग विद्याक विशारद भेलाह आओर योगीश्वर- महर्षि- गौतमक प्रभाव सँ घरमे रहितहुँ ओ सुख आ दु:ख आदि द्वन्द्व सभसँ विमुख छलाह। अर्थात् घरेमे जीवनमुक्त भऽ कऽ अन्तमे पब्रह्ममे लीन भऽ गेलाह। वेद, पुराण, उपनिषद्, स्मृति आदि ग्रन्थमे मिथिलाकेँ मोक्षक नगरी कहल गेल अछि। एहि सम्बन्धमे शास्त्र-पुराणक निम्नलिखित वचन द्रष्टव्य अछि- “अयोध्या, मुथुरा, माथ, काशी, काञ्ची, अवन्तिका। पुरी द्वारवती चैव सप्तैता मोक्ष दायिका।” शास्त्रक उपर्युक्त वचनमे कहल गेल अछि जे अयोध्या, मथुरा, माया (मिथिला), काशी, काञ्ची, अवन्तिका आ द्वारिकापुरी ई सातटा मोक्षक धाम अछि। अनादिकालहिसँ जगज्जननी मॉं जानकी जन्मभूमि आओर राजा जनकक राज्य मिथिला तपोमय एवं तपोवन रूपमे सुविख्यात अछि। जतए वेदान्तक मूल ज्ञानकाण्ड एवं कर्मकाण्ड समन्वित रूपसँ प्रचलित अछि। मिथिला महात्म्यक गूढ़ रहस्यक ज्ञान प्राप्त करबामे महाभारतक निर्माता भगवान वेदव्यासोकेँ तेना ने बुझि पड़लन्हि जे हुनको लिखऽ पड़लन्हि जे- यदि दूरहुँ सँ मिथिलाकेँ नमन कऽ लेल जाए तँ मुक्ति भेटत सुनिश्चिते बूझू- एहिमे कोनो प्रकारक संशय नहि- “मिथिला ये नमस्यन्ति देशान्तरगता अपि। तेषां भुक्तिश्च मुक्तिश्च जायते, नात्र संशय:।।” खास कऽ जगज्जननी जगदम्बा जानकीक एहि मिथिलाक, पावन भूमि पर अवतरित भेलसँ एकर महत्त्व आओरो बढ़ि गेल। वेद-वेदाङ्ग, धर्मशास्त्र उपनिषद्, स्मृति, पुराण, काव्य आदि समस्त वाङ्मयमे भिन्न-भिन्न ढंगे एहि मिथिलाक महत्ताक प्रतिपादन उपलब्ध होइत अछि। संगहि प्राचीनता, संस्कृति, धर्मानुकूल आचरण, अध्यात्म ज्ञानक प्रमुखता आदिक दृष्टिऍं एकर महत्ता स्वत: स्पष्ट भऽ जाइत अछि। मिथिलाक भूमि एक दिस अपन स्वर्णिम संस्कृति, इतिहास, आलिंपनकला, विद्वता पुरातत्व, मनस्विनी, नारी, युद्धवीर पुरुष लोकनि तथा मिथिलाक लोकदेवीसँ भरल पड़ल अछि तँ दोसर दिस सारस्वत पुत्र लोकनि गौतम, याज्ञवल्क्य, मदन उपाध्याय, धीरेन्द्र उपाध्याय, कालिदास, भवभूति, वृद्ध वाचस्पति मिश्र, आयाची- भवनाथ मिश्र मिथिला विभूति मण्डन मिश्र, उदयनाचार्य महाकवि विद्यापति, कवीश्वर चन्दा झा प्रभृति नरपुंगवर रत्नक सुरभिसँ मँह-मँह करैत अछि तँ तेसर दिस क्रांतिकारी शहीदक त्याग बलिदानमे अग्रगण्य गणेशी, अकलू सूरजनारायणक जीवटतासँ चतुर्दिक मिथिलाक भूमि त्रिवेणीक सदृश पूजनीय, वन्दनीय, अभिनन्दनीय ओ महनीय बनल अछि। एहिठाम सनातन कालहिसँ एकहि संग शाक्त, शैव ओ वैष्णव आदि सभ पन्थक उपासक निवास करैत आबि रहल छथि। सभ गाममे ग्रामदेवता आ ग्रामदेवी प्रतिष्ठित छथि। लोकक आस्था अविकल-अविचल ओहि देवतासँ जुड़ल अछि। फलत: गाममे धार्मिक तनावक अभाव देखल जाइत अछि। एतबे नहि एतए बहएवला धार आ पोखरि सभ सदानीरा रहल अछि, जकरा पानिसँ गृहस्थ पटौनीक अतिरिक्त पान, मखान, माछ, आम आदिक उत्पादन कऽ अपन जीविका ‘सादा जीवन उच्च विचार’क आदर्शक अन्तर्गत जीबैत आबि रहल छथि। एतुक्का लोकक लेल मॉंछ-भात तँ प्रसिद्ध अछिए संगहि कतेको शाकाहारी छथि। एहिठामक पारम्परिक वेष-भूषामे सॉंचीवला धोती-कुरता, पाग-डोपटा, चानन-ठोप आ मुँहमे गुलाबी खिल्ली पानक संगहि खान-पानमे मुख्य रूपसँ दही-चूड़ा-चीनी, अमोट, माढ़, मखान, तरूआ, तिलकोड़, खम्हारू, साग, अरिकोंच, ओल, अदौड़ी, वर-बड़ी, कुम्हरौड़ी, अँचार, खट्मिट्ठी, ठकुआ, भुसबा, लाइ-चुड़लाइ, तिलबा, केहुनियॉं खाजा आ मुङबा आदि पर्याप्त मात्रामे खएबाक तथा अतिथि लोकनिकेँ खुअएबाक प्रथा रहल अछि। मिथिलाक बेसी लोक शक्तिक उपासक छथि तेँ कबुला-पाती आ परिस्थिति विशेष पर छागरक बलिप्रदानक प्रथा सेहो प्रचलित अछि। एहिठामक पावनि-तिहारमे दुर्गापूजा, दियाबाती, छठि, तिलासंक्रान्ति, भ्राद्वितिया, जूड़शीतल आदि बेसी प्रसिद्ध अछि। संगहि एकर अतिरिक्त अनेक पर्व मिथिलावासी लोकनिक जीवनक आस्थ्ज्ञा-विश्वासकेँ सनातन धर्मक प्रति दृढ़ता प्रदान करैत अछि। मिथिलामे जे धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान अछि से आनठाम देखबामे नहि अबैछ। एत एक समुदायक लोक दोसर समुदायक पावनि-तिहारमे सम्मिलित होइत रहल अछि। मिथिलामे अनेक सिद्धपीठ- तीर्थ ओ देवालय तथा ऋषि-मुनिक आश्रम वद्यमान अछि, जाहिमे जनकपुर, सीतामढ़ी, शिलानाथ, श्रीजलेश्वर, श्रीकामदानाथ तथा श्री दुर्गा उच्चैठ, श्री भैरव, श्री यामुण्डास्थान, राजेश्वरी, श्रीकपिलेश्वर, अहल्यास्थान, भद्रकालिका, भुवनेश्वर, भुवनेश्वरी, कुशेश्वरस्थान, जयमंगला, उग्रतारास्थान, सिंहेश्वरस्थान, मुक्तेश्वर स्थान, छिन्नमस्तिका, विदेश्वरस्थान, एवं वाल्मीकीआश्रम, डोकहर, गौतमाश्रम आदि प्रसिद्ध अछि। एहिठाम अनेक वंशक शासन रहल अछि। जाहिमे जनक वंश, पाल वंश, सेन वंश, कर्णाट वंश, ओइनबार वंश एवं खण्डवाला वंश प्रमुख अछि। गीतमे लोककथा गीत, लोकगीत, सोहर, समदाउनि, फागु भगैत झिझिया, नचारी महेशवाणी, पराती आदि वद्याक स्वर लहरी सनातन कालहिसँ मिथिलामे अनेक पावनि-तिहार पर निनादित होइत आबि रहल अछि। उपर्युक्त पृष्ठभूमिसँ चमकैत-दमकैत हमर मिथिला सम्पूर्ण संसारक संस्कारक मुख्य स्रोतास्वनी रहल अछि। सन्दर्भ सूची- 1. वेदभूमि- मिथिला- संस्कृति दर्शन- श्री हरिदेव झा 2. मिथिला की धरोहर- पं. श्री सहदेव झा 3. मिथिला माहात्म्य, दरभंगा 4. मिथिला के वेद वेदान्त- पं. श्री सहदेव झा मिथिलाक भाषा एवं साहित्य मिथिलाक प्रत्येक क्षेत्रक मैथिलीमे स्वरक दृष्टिऍं रंच मात्रक अन्तर स्पष्ट देखबामे अबैत अछि। जखन अन्तर्राष्ट्रीय भाषामे एकरूपता नहि, राष्ट्रीय स्तरक भाषामे भिन्नता तँ अन्य भाषामे रंचमात्रक भिन्नताकेँ भिन्नता नहियेँ कहल जा सकैत अछि। शब्दक उच्चारण ओ क्रियाक अनतमे जोर दऽ देलासँ जे स्वरक उहापोह परिलक्षित होइत अछि तकरा अन्तर नहियेँ कहल जा सकैत अछि। ओहुना कहावत अछि जे- “तीन कोसपर पानि बदलय पॉंच कोसपर भाषा दिल्ली हो बा ल्हासा।” स्वाभाविक बात थिक जे तीन कोसपर पानिक स्वादमे किछु अन्तर होइछ तेँ किन्तु अछि तँ ओ आखिर पानियेँ। तहिना शब्दक उच्चारण-प्रयोग जे अगल-बगलसँ कनेक-मनेक प्रवाहित रहैत अछि ताहि आधारपर आएल अन्तरपर विचार करैत डॉ. ग्रियर्सन श्री गोविन्द झा, डॉ. सुभद्र झा, डॉ. दिनेश कुमार झा आदि ठाम-ठामपर अपन अन्तर-विचारक चर्च कएने छथि। श्री गोविन्द झाजी पूर्णियॉं, भागलपुर ओ पूर्वी संथाल परगन्नाक बोलीकेँ पूर्वी मैथिली, मुंगेरक बोलीकेँ दक्षिणी मैथिली, मुजफ्फरपुर आ पूर्वी चम्पारणक बोलीकेँ पश्चिमी मैथिली, नेपालक तराईक समस्त मैथिली क्षेत्रक बोलीकेँ उत्तरी मैथिली तँ मध्य मिथिलाक ओ सभ क्षेत्र जाहिठाम मैथिलीक अलावा ककरो विशेष प्रभाव नहियेँ जकॉं छैक तकरा केन्द्रीय मैथिली कहि कऽ चर्चा कएलन्हि अछि। तहिना डॉ. दिनेश कुमार झा अपन प्रसिद्ध ग्रन्थ “मैथिली साहित्यक आलोचनात्क इतिहास”मध्य सेहो बोली ओ स्वरक उहापोहकेँ आधार बनबैत ओहि मैथिलीकेँ जे मिथिलाक हृदयस्थलीकेँ स्पर्श करैत अछि अर्थात् मिथिलाक केन्द्रमे बाजल जाइत अछि तकरो केन्द्रीय मैथिली कहलन्हि अछि, ओ केन्द्र थिक उत्तरी दरभंगा ओ मधुबनीक क्षेत्र। केन्द्रीय स्थान होएबाक कारणेँ एहि केन्द्रीय मैथिलीकेँ ओ आदर्श मैथिली सेहो कहि कऽ सम्बोधन कएलन्हि अछि। दक्षिणी दरभंगा, दरभंगा शहरी क्षेत्रक पूर्वी मुजफ्फरपुर, पश्चिमी पूर्णियॉं धरिक क्षेत्रमे बाजल जाइबला मैथिलीकेँ दक्षिणी मैथिली कहने छथि तहिना पूर्णियॉंक पूर्वी क्षेत्र एवं सम्पूर्ण बंगालक दिनाजपुर ओ कि मालदह क्षेत्रमे प्रचलित मैथिलीकेँ पूर्वी मैथिली कहि सम्बोधन कएलन्हि अछि। उत्तरी संथाल परगन्ना, दक्षिणी मुंगेर ओ भागलपुर दक्षिणी भागक मैथिलीकेँ छिका-छिकी मैथिली नाम देलन्हि अछि। ताही प्रकारेँ पूर्वी चम्पारण ओ पश्चिमी मुजफ्फरपुरक प्रचलित मैथिलीकेँ पश्चिमी मैथिलीक नामे चर्चा एकलन्हि अछि। उत्तरी दरभंगा तथा मधुबनी क्षेत्रमे बसल मुसलमान सम्प्रदायक बीच बाजल जाइबला मैथिलीकेँ जे रंच-मात्र परिवर्तन परिलक्षित करैत अछि। तकरा जोलही मैथिली तथा जातिगत हिसाबेँ अन्तर भेल भाषाक आधारपर पूर्वी सोतिपुराक क्षेत्रक बोलीकेँ केन्द्रीय जनसाधारणक मैथिली कहि- एकर क्षेत्र मधुबनी सबडिविजन मानलन्हि अछि। स्पष्ट अछि जे बोलीक उच्चरणक आधारपर मैथिलीक रूप निर्धारित कएल गेल अछि। सूक्ष्मतासँ विचारोपरान्त डॉ्. दिनेश कुमार झाक मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहासमे चर्चित रूप ग्रियर्सनक द्वारा देल गेल विचारसँ बहुत दूर धरि मेल खाइत अछि। ग्रियर्सन मैथिली भाषाक विभाषाक रूपमे तँ कतहु चर्च नहि कएलन्हि अछि किन्तु बोलीमे स्वरक उहा-पोहक आधारपर आदर्श मैथिली, दक्षिणी मैथिली, पूर्वी मैथिली, छिका-छिकी मैथिली, पश्चिमी मैथिली आ केन्द्रीय जनभाषाक मैथिली कहि कऽ चर्च अवश्यक कएलन्हि अछि। स्वरक उच्चारणमे कनेक-मनेक क्षेत्रियताक दृष्टिए अन्तर स्पष्ट अवश्य अछि तेकर ई अर्थ नहि जे मैथिली भाषा ओ साहित्यमे कतहु अन्तर अछि। नेपालक सप्तरी, बारा, जनकपुर, सरलाही, विराटनगर, सुनसरी, धरानअथवा धनकुट्टा क्षेत्रक मैथिली, एहि क्षेत्र सभक प्रयुक्त होइत मैथिलीसँ भिन्न नहि। हँ, एतबा अवश्य जते राजनीतिज्ञ भलेँ ही ओकरा अन्य देशमे बॉंटि कऽ धऽ देने हो। मैथिली दुनू क्षेत्रकेँ अपन एकरंगक स्नेह दए एके संग एक दोसराक हृदयकेँ महने अछि। हँ, एखन किछु राजनीतिज्ञ अपन पेट ओ राजनीति चलएबाक हेतु संगहि राजनीतिक रोटी सेकबाक निमित्त एकर अपनहि अंगकेँ अंगिका आ बज्जिका नाम दए एकर अंकेँ विकलांग बनएबाक कुत्सित प्रयासमे अवश्य लागल छथि। यद्यपि हमरा जनैत ओ सुफल होमयबला नहि छथि, ओ भाषणे आ पोस्टर धरि समटा कऽ रहि जएताह। तथापि, ओ सभ अस्थिरताक जहर फैलएबासँ बाज नहि आबि रहल छथि तथा मैथिलीक खुट्टा एखन धरि डोलल नहि अछि तथापि एकर सुरक्षा हेतु एकरो राजनैतिक संरक्षणक नितान्त आवश्यकता अछि जाहिसँ मैथिली अपन कतेको हजार वर्षक अपन किलाकेँ डोलय नहि देअए। सन्दर्भ सूची :- 1. मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास- डॉ. दिनेश कुमार झा 2. मिथिला- डॉ. लक्ष्मण झा 3. मिथिला भाषामय इतिहास- मुकुन्द झा वक्शी मिथिलाक नामकरण एवं प्रादूर्भाव एहि ‘मिथिला’ नामकरणक पाछॉं सेहो एकटा इतिहास रहल अछि जकर आधार पूर्णरूपेँण धार्मिक यज्ञ- अनुष्ठानक अछि जे एहि प्रकारेँ अछि- “भारतमे ‘सूर्य’ नामक एकटा सूर्यवंशीय क्षत्रीय राजाक राज्य छल। ई वंश सम्पूर्ण आर्यावर्तमे विख्यात छल। एही वंशमे राम, कृष्ण आ बुद्ध सदृश्य महान लोकक जन्म भेल। सूर्यवंशीय ज्ञान पुरुष सूर्यक पुत्र ‘मनु’ भेलाह। ‘मनु’ महा मेधावी पुरुष छलाह। प्रत्येक मन्वन्तरमे अलग-अलग मनु भेल छथि। ओ ‘मनुस्मृति’ सन महान ग्रन्थक निर्माण कएलनि। ‘मनु’क पुत्र ‘इक्ष्वाकु’ अयोध्याक राजा भेलाह। ‘इक्ष्वाकु’क ज्येष्ठ पुत्र ‘विकुक्षि’ अपन पिताक उत्तराधिकारी भऽ कऽ अयोध्याक राजा भेलाह। ‘निमि’क वंशमे एक सएसँ अधिक व्यक्ति मिथिलाक राजा भेलाह आ हुनका लोकनिक उपाधि ‘जनक’ छल। ‘इक्ष्वाकु’क ज्येष्ठ पुत्र ‘विकुक्षि’ राजा छलाह आ छोट भाए ‘निमि’ अत्यन्त कुशाग्रबुद्धिक एवं दूरदर्शी पुरुष छलाह। ओ मने मन सोचलन्हि जे जीवन तँ क्षणभंगुर आ मृत्यु सनातन सत्य अछि, जे व्यक्ति राजा-रंक-फकीर एहि संसारमे आओत ओकर जाएब निश्चित छैक तथा ‘कीत्तिर्यस्य स: जीवति’क सिद्धान्तकेँ मनमे स्थिर कए दृढ़ संकल्प लेलन्हि जे हम एहन कीर्त्ति करब जाहिसँ हम सार्वभौम बनि जाएब। मनमे दृढ़ निश्चयक ओ अपन कुलगुरु ऋषि वशिष्ठसँ निवेदन कएलन्हि जे- ‘हमरा एहने यज्ञ करा दिअ जाहिसँ हमहूँ ‘ईश्वरक सदृश्य सर्वत्र विराजमान रही’। कुलगुरुक वशिष्ठ निमिसँ कहलन्हि जे- हम पूर्वहिमे देवराज इन्द्रकेँ यज्ञ कराएब स्वीकार कऽ लेने छी। इन्द्रक यज्ञ समाप्तिक उपरान्त हम अहॉंकेँ यज्ञ करा देब। एहिपर ‘निमि’ मौन धारण कऽ लेलन्हि। कुलगुरु वशिष्ठ ‘निमि’क मौन स्वीकृति लक्षणम्’ बुझि कऽ इन्द्रक यज्ञानुष्ठानक हेतु प्रस्थान कऽ देलन्हि। ‘निमि’ सोचलन्हि जे जीवन क्षणभंगुर आ मृत्यु तँ सनातन सत्य अछि, पता नहि कखन की भऽ जाए। ‘निमि’केँ यज्ञानुष्ठानक तीव्र लालसा हुनका व्याकुल कऽ देलकन्हि ओ ‘शुभस्थ शीघ्रम् ‘अर्थात् शुभकार्यमे विलम्ब नहि करबाक चाही कारण- “आदानस्य प्रदानस्य कर्त्तव्यस्य चकर्मण। क्षिणमक्रियमानस्य काल: पिबति तद् रसम्।।” एहि उत्कट इच्छाकेँ शीघ्र पूर्ण करबाक हेतु व्याकुल ‘निमि’अयोध्यासँ पूर्व दिशामे चलि पड़लाह आ चलैत-चलैत ओ मिथिला आबि गेलाह। मिथिलामे महर्षि गौतमक आश्रम छल। प्राचीन कालमे मिथिलाक भू-भागकेँ गौतमक ‘तवोबन’कहल जाइत छल। बादमे एकर ‘मिथिला’नामकरण एक अनुश्ठानक कारण पड़ल। ‘निमि’महर्षि गौतमक तप आओर तेजसँ अत्यधिक प्रभावित ओ आकर्षित भए गौतमक आश्रमपर यज्ञानुष्ठानक अपन लालसा प्रकट कऽ महर्षि गौतमसँ यज्ञ करा देबाक प्रार्थना कएलन्हि ताकि ओहि यज्ञक फलसँ ओ (निमि) सर्वत्र व्याप्त भऽ जाथि। महर्षि गौतम ‘निमि’क उत्कट इच्छाकेँ शान्त कए यज्ञ करा देबाक आश्वासन देलन्हि। महर्षि गौतम यज्ञार्थ- याज्ञवल्क्य, भृगु, वामदेव, उशित, कण्व, अगस्त्य्, भारद्वाज, वाल्मिकि आदि जितेन्द्रिय ऋषि लोकनिकेँ आहूत कऽ निश्चित समयपर यज्ञ प्रारम्भ कऽ देलन्हि। ‘वृहद विष्णु पुराण’क मिथिला महात्म्यमे एकर वर्णन उपलब्ध होइछ। एहि जितेन्द्रिय ऋषि लोकनिक द्वारा ‘निमि’क दीर्घकालीन यज्ञानुष्ठान संकल्पित भए ओहि यज्ञक श्री गणेश भऽ गेल। यज्ञक पूर्णाहुति होएबासँ पूर्वहि इन्द्रक यज्ञ समाप्त कऽ कऽ कुलगुरु जगद्रवंद्य ऋषि वशिष्ठ अयोध्या लौटलाह। ऋषि वशिष्ठकेँ जखन एहि बातक जानकारी भेलन्हि जे ‘निमि’ हुनक (कुलगुरुक) बिना प्रतीक्षा कएलनहि दोसर ऋषि लोकनिक सहयोगसँ यज्ञानुष्ठान प्रारम्भ कऽ देलन्हि। एहि अवज्ञाक कारण ओ क्रोधित भऽ निमिक यज्ञस्थ्ज्ञलपर अएलाह तथा कुलगुरुपर विश्वास नहि करबाक हेतु ओ (कुलगुरु) ‘निमि’केँ दण्डस्वरूप विदेह भऽ जएबाक शाप दऽ देलन्हि। एमहर संकल्पित यज्ञ समाप्तो नहि भेल छल कि ‘निमि’ प्राणहीन भऽ गेलाह। आब उपर्युक्त सभ ऋषि लोकनिक हेतु एकटा विचित्र समस्या ठाढ़ भऽ गेल। किन्तु ‘अध्वर्यु’ (ऋत्विक) बनल ऋषि गौतम सभ ऋषि लोकनिसँ आग्रह कएलन्हि जे हम सभ अपन-अपन तपबलसँ एहि प्राणहीन ‘निमि’क शरीरक मंथन करी। मंत्रोच्चार एवं ऋषि तपबलक कारण मंथनसँ एक भव्य राजकुमार बालकक आविर्भाव भेल। मंथनसँ उत्पन्न होएबाक कारणें ओहि राजकुमारक नाम ‘मिथि’ पड़ल। तथा ऋषि लोकनि ओही ‘मिथि’सँ शेष यज्ञक कार्य पूर्ण कएलन्हि। मंथनसँ आविर्भूत ‘मिथि’क द्वारा बसाओल गेल नगर ‘मिथिला’ नामे प्रसिद्ध भेल। सम्पूर्ण संसारमे अनादिकालहिसँ मिथिले एकटा एहन पावन प्रदेश अछि, जाहिठामक सांस्कृतिक महत्ता एवं विद्वता अतुलनीय अछि। वेद-वेदान्त, पुराण, उपनिषद्, धर्मशास्त्र आ तंत्र-मंत्र विद्या एवं संसारक मानव चिन्तनक इतिहासमे ई अपन महत्वपूर्ण भूमिकाक लेल सुविख्यात अछि। मिथिलाक भूमि जनक, याज्ञवल्क्य, न्यायसूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद, मीमांसाक प्रस्तोता जैमिनि तथा सांख्यदर्शनक संस्थापक कपिल आदिक जन्मभूमिसँ उर्वर रहल अछि। एतबे नहि छठम शताब्दी ओ तकर परवर्ती कालमे ई महान साहित्यिक एवं दार्शनिक क्रियाकलापक केन्द्र बनल रहल अछि। उद्योतकर मण्डन,वाचस्पति, उदयन, गंगेश, पक्षधर मिश्र प्रभृति विद्वान अपन प्रखर प्रतिभासँ मिथिलाकेँ विभिन्न युगमे परिभाषित कएलन्हि अछि जाहि कारणेँ ई भारतीय संस्कृतिक केन्द्र बनल रहल। मिथिलाक हेतु प्रयुक्त ‘विदेह’एवं ‘मिथिला’नामक उत्पत्तिकेँ विशुद्ध रूपेँ पौराणिक कहल जा सकैत अछि। राजा विदेध माधवक आगमनक पश्चाते एकर ‘मिथिला’नाम पड़ल। ई लोकनि सरस्वतीक तटपर निवास करैत छलाह। ‘शतपथ ब्राह्मण’क अनुसारेँ सदानीरा (गण्डकी) क तटपर आबि ई लोकनि अग्नि प्रज्वलित कए एहि भूमिक शोधन कएलन्हि। संगहि हिनका लोकनिक संग अनेक ब्राह्मण सभ आबि कऽ खेती-बारी प्रारम्भ कएलन्हि तथा यज्ञक माध्यमसँ अग्निकेँ संतृप्त कएल गेल। ओना तँ ई अन्वेषणक विषय थिक जे मिथिलाक उत्पत्ति कहिया भेल, मुदा प्राचीन ग्रन्थ सभक अध्ययन ओ अवलोकनोपरान्त एतबा तँ अवश्ये कहल जा सकैत अदि जे हिमालयक शृंखला एवं गंगाक बीचक स्थान (मध्य भू-भाग) मिथिलाक अन्तर्गत आबि जाइछ जे गंगा, ब्रह्मपुत्र आदि नदी-पहाड़क माटिकेँ आनि हिमालय आ गंगाक बीच जे एकटा समतल भू-भाग बनओलक सएह ‘मिथिला’थिक। पौराणिक वंशावलीक आधारपर कहल जा सकैत अछि जे ‘मनु’क पौत्र ‘निमि’एहि यज्ञ भूमिमे पदार्पण कएलन्हि आ मन्थनोपरान्त ‘मिथि’नामक कारणेँ ओ अपनहि नामपर ‘मिथिला’राज्यक स्थापना कएलन्हि। जखन नगरक निर्माण भेल तँ ओ ‘जनक’नामसँ प्रसिद्धि पओलन्हि। हिनक उत्पत्ति मन्थनक पश्चात् भेल छल तेँ हिनक नाम ‘मिथि’उपयुक्त मानल गेल। मिथिलाक उत्पत्तिक सम्बन्धमे पाणिनि कहने छथि- “मथ्यन्तेऽत्र रिपवो मिथिला नगरी :”अर्थात् जाहिठाम शत्रुक मर्दन कएल जाइछ से ‘मिथिला’थिक। ओना प्राचीन समयमे राजाक नामपर नगर बसएबाक परम्परा रहल अछि तेँ ई कहल जा सकैत अछि जे मिथिलाक सम्बन्ध राजा ‘मिथि’सँ अछि। भागवत् स्कन्ध अध्याय 133मे कहल गेल अछि- “जन्मना जनक सोऽभूद्र: वैदेहस्यतु विदेहज:। मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता।।” अर्थात् राजा ‘मिथि’क द्वारा जाहि नगरक निर्माण कराओल गेल सएह ‘मिथिला’नामसँ प्रसिद्ध भेल। मत्स्य पुराणक अनुसार ‘मिथिला’नामक एकटा तेजस्वी ऋषिक नामपर एहि नगरक ‘मिथिला’नाम पड़ल। डॉ. दिनेश कुमार झा अपन मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहासमे डॉ. मोती चन्द्रक कथनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि। हुनक कथन छन्हि जे- “जखन भारतमे एकटा मिश्रित संस्कृतिक विकास भऽ रहल छल तखने ‘तिरभुक्ति’ नाम लोक व्यवहारमे तिरोहित भऽ कऽ ‘तिरहुत (मिथिला) शब्दक निर्माण भेल।” एतबे नहि किछु भू-वैज्ञानिक लोकनिक ईहो मान्यता अछि जे तिरहुतक भू-भाग सभसँ पाछॉं आबि कऽ बनल अछि। कहल जाइछ जे एक लाख वर्ष पूर्व एहिठाम समुद्र छल जकर विस्तार हिमालय एवं विन्ध्यपर्वत मालाक मध्य अरबक खाड़ीसँ बंगालक खाड़ी धरि छल। हिमालयसँ नि:सृत नदी सभक संग प्रवाहित माटिक संचयसँ एहि मध्य भू-भाग तैयार भेल तेँ एतए पहाड़क कोनो नामो-निशान नहि अछि। एहिठाम नदी सभक अधिकता अछि आ एकरा तीरपर ‘मिथिला’ अवस्थित अछि तेँ एकर नाम ‘तिरभुक्ति’ वा ‘तिरहुत’ भऽ गेल। मिथिलाक प्रसिद्ध लोक पर्व सामा-चकेबा मिथिलाक स्त्रीसमाजक अनुपम आ आदर्शक एकटा अद्भुत आ अत्यन्त मनोरंजक पावनि थिक सामा-चकेबा। स्कन्दपुराणक निम्नलिखित श्लोकक आधार मैथिल ललना लोकनि आदिकालहिंसँ परम्परानुसार सामा-चकेबाक पावनि करैत आबि रहल छथि- “द्वारकायाञ्चकृष्णस्य पुत्री सामाऽतिसुन्दरी। साम्बस्य भगिनी ‘सामा’माता जाम्बवती शुभा।। इतिकृष्णेन संशप्ता सामाऽभूतक्षितिपक्षिणी। चक्रबाक इति ख्यात: प्रियया सहितो वने।।”[1] मिथिलाक स्त्रीसमाज ई पावनि अखण्ड भातृ सुख, सर्वभौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादिक अर्थात् सन्तानक कल्याणार्थक अतिरिक्त खास कऽ अपन पति आ भाइकेँ दीर्घायु, यशस्वी आ समृद्ध होएबाक कामनासँ करैत छथि। सम्पूर्ण मिथिलामे स्त्रीगण लोकनिक पावनिमे इएह एकटा एहन पावनि अछि जे लगातार पन्द्रह दिन तक चलैत अछि। ई पावनि प्रतिवर्ष कार्तिक मासक द्वितीया शुक्लसँ प्रारम्भ भए पूर्णिमा धरि चलैत अछि। प्राय: एकर कारण ई अछि जे शास्त्रानुसार कार्तिक मास सभ पापक नाश करएबला आ भगवान विष्णुक सभसँ प्रिय मास थिक। एहि पावनिमे मैथिलानी लोकनि खास कऽ अपन भाईक कल्याणार्थ चुगिलाक मुँह जरबैत छथि। शायंकाल गीत गाबि नवका धानक शीशसँ हिनक पूजा कएल जाइत अछि। भातृद्वितीया दिनसँ ई पूजा प्रारम्भ होइत अछि आ कार्तिक पूर्णिमा दिन नवका चूड़ा-दही, गुड़ भोग लगा कऽ परिचारिका एवं धियापूता सभमे प्रसाद बॉंटल जाइत अछि। वाटो बहिनोकेँ चौबटियापर अवस्थित कएल जाइत छन्हि। पन्द्रह दिन धरि मुन्हारि सॉंझ कऽ समा-चकेबाक डालाक अदला-बदली मैथिलीएमे मन्त्र पढ़ि-पढ़ि कएल जाइत अछि। डाला फेरलाक बाद कार्तिक पूर्णिमा दिन नानाप्रकारक पकमान बना कऽ बहीन, भाईकेँ भोजन करओलाक बाद भाईक द्वारा ठेहुन लगा कऽ मूर्ति सभ तोड़लाक बाद भाईक फाँड़ भरल जाइत अछि आ सामा-चकेबाकेँ अगिला वर्ष पुन: अएलाक नोत देलाक बाद विसर्जन कऽ देल जाइत अछि। ध्यातव्य जे ई पावनि अबितहिं मैथिल ललना लोकनिमे हर्षोल्लासक संग आनन्दक लहरि हिलकोर मारऽ लगैत छन्हि। कारण हुनका लोकनिकेँ अपन-अपन गीतक प्रदर्शन करबाक पूर्ण अवसर भेटि जाइत छन्हि। ई गीत गएबाक क्रम सायंकालसँ प्रारम्भ भए चारि-पाँच घन्टा तक चलैत रहैत अछि। मिथिलाक सामा-चकेबाक पूजा बड़ प्रख्यात अछि। ई पावनि मिथिलाक प्राय: प्रत्येक घरमे होइत अछि आ मात्र स्त्रीगणे लोकनि द्वारा ई सम्पादित कएल जाइत अछि। एकर मूल कारण अछि सामाक कथा, जे कथाक अवलोकनसँ स्वत: स्पष्ट भऽ जाएत। शोध-अन्वेषणसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर सामाक कथा तीन प्रकारक उपलब्ध होइत अछि- पहिल कथा :- सामा साम्बक बहिनि छलीह। ई अत्यन्त भव्य रूपलावण्यवतीक संग-संग बुधियारि (गुणवती) सेहो छलीह। ई अधिकांश समय मुनि लोकनिक आश्रम जाहि वनमे छलन्हि ततहि भ्रमणशील रहैत छलीह। वन-भ्रमण विचरणक आदति हिनका नैनेसँ छलन्हि। हिनका बलिप्रदान, होम, यज्ञ, वेद-पुराण पाठ आदि देखबा-सुनबामे खूब मोन लगैत छलन्हि। ओहिठामक होमाग्नि आ स्वच्छ शीतल हवा सेहो अत्यन्त स्वास्थ्यकर छल। श्यामा जखन नमहर भऽ गेलीह तखनहुँ ई ज्ञान यौवना बालकौतुहलवशात् नेने जकॉं पूर्ववते निश्छलतासँ विचरण करैत रहलीह। एहन अपूर्वसुन्दरि वालाकेँ देखि मुनि लोकनिकेँ पूर्ण आशंका ओ स्नदेह भेलन्हि जे कहीं मुनिकुमार लोकनिक चंचल मोन जे वायुवेगहुँसँ अत्यधिक तीव्र होएबाक कारणेँ डोलि ने जान्हि, तेँ सामाकेँ मना कएलन्हि जे ओ आश्रमणक निकट भोरे-भोर नहिं आबथि। किन्तु निश्छल पवित्र मोन वाली सामा बारम्बार मुनि लोकनिक द्वारा मना कएलहुँ पर ओ नहिं मानलन्हि। तखन क्रोधक आवेश मे आबि ओ मुनि लोकनि शाप दऽ देल जे ‘अहॉं पक्षी भऽ जाउ’। मुनि लोकनिक शापक कारणेँ सामा पक्षी बनि एमहर-ओमहर फुर-फुर करैत उड़ए पड़ए लगलीह। अशान्त मोनसँ मुनि आश्रमक निकट केवल चैं-चैं, टैं-टैं करैत ऐ डारिसँ ओइ डारि उड़थि फिरथि। कहाबत छैक जे ‘वृथा न होंहि देव ऋृषि वाणी’। कृष्णक पुत्र साम्बकेँ ऋृषि-शापक ई अशुभ समाचार भेटलन्हि। ओ दायार्द्रचित्त भए ठेहुनियॉं दए दस हजार वर्ष धरि विष्णुसहस्रनामक पाठादि तप कए भगवान विष्णुकेँ प्रसन्न कएलन्हि। तत्पश्चात् सामाक पक्षीत्व विमोचन भेलन्हि।[2] दोसर कथा :- एक समय कोनो सरोवरमे कृष्ण भगवान अपन आठो पटरानी सभक संग नग्न-नग्ना जल-क्रीड़ामे लीन छलाह। चारूकातसँ ओहार आ परदाक पूर्ण प्रबन्ध छल। साम्बकेँ कौतुहलवशात् परदाक इरोतमे भऽ जल-क्रीड़ा नुका कए देखबाक इच्छा भेलन्हि। ओ नुका कऽ परदामे छेद कए जल-क्रीड़ा देखए गेलाह। क्यो चुगिलाह जा कऽ भगवान कृष्णकेँ चुगली लाड़ि देलक। साम्ब अपन माए लोकनिकेँ वस्त्रहीना देखबाक महापाप कएलन्हि तेँ चुगिलाक चुगिलपनक कारणेँ क्रोधित भए कृष्ण हुनका शाप दऽ देलथिन्ह जे- ‘अहॉं कोढ़ि भऽ जाउ’। कृष्णक शापक बाद साम्ब तुरत्ते गलित कुष्टसँ अत्यन्त पीड़ित भऽ गेलाह। गलित कुष्ट रोगक कष्ट देखि सूर्य भगवानकेँ दया लागि गेलन्हि। साम्बकेँ स्वप्नमे ओ अपन 21 टा उग्र नाम कहलन्हि। जाम्बवतीक पुत्र साम्ब, ओही 21 नामक (साम्बपुराणान्तर्गत सूर्यस्तवराजक) पाठ करए लगलाह। पापक फल भोगलाक पश्चात् किछु दिनक बाद ओ रोगमुक्त भऽ गेलाह। हिनक पाठक अवधिमे हिनक बहिनि सामा अग्नि प्रज्वलित कए अपन भाइक जघन्य महापापक चुगली कएनिहार चुगिलाक नूआक मूर्ति बना कऽ जराएल करथि। तेँ मिथिलामे ई कहबी प्रचलित छैक जे- ‘चुगिला करए चुगली बिलाइ करए म्याउँ’। सामाक द्वारा अपन भाइक प्रति अगाध प्रेम ओ सहानुभूतियेक कारण कुलाङ्गना लोकनि सामाक पूजा-अर्चना करैत आबि रहल छथि।[3] तेसर प्रचलित कथा :- इएह कथा मिथिलामे प्राचीन कालहिंसँ परम्परासँ प्रचलित अछि आ एही कथाक अनुरूप ई ‘सामा-चकेबा’खेलाएल जाइत अछि। ई कथा एहि प्रकारेँ अछि :- एक समय ऋषि लोकनि सूत महाराजसँ कहलथिन्ह जे- हे सूत महाराज! हम सब अपनेक मुँह सँ अनेक इतिहास पुराणक कथाक श्रवण करैत आबि रहल छी। आई हमरा लोकनिक मोनमे सामाक सम्बन्धमे जिज्ञासा भेल अछि जे- एहि पृथ्वीपर सामाक पूजा किएक होइत छन्हि? ई सामा के थिकीह? ई किनकर पुत्री आ किनकर बहिन आ किनकर पत्नी छथि? पृथ्वीपर हिनकर पूजाक की विधान अछि? कृपया एहि वृतान्तकेँ सविस्तर सुनएबाक कृपा कएल जाए। ऋषिगणक आग्रहपर सूत महराज एहि ‘सामा-चकेबा’क कथा सविस्तार सुनएबासँ पूर्व कहलन्हि जे आइ जे हम सामाक कथा एखन विस्तार सँ सुनबाऽ जा रहल छी ताहि सम्बन्ध ई कहि दी जे एहि कथाक श्रवणसँ स्त्री सौभाग्वती होइत छथि आ सामाक पूजासँ स्त्रीगण कृतकृत्य भऽ जाइत छथि। हे मुनिश्रेष्ठ लोकनि! आब विस्तारसँ ई कथा सुनू- “सामा श्री कृष्णक पुत्री छलीह। हिनक भाइक नाम साम्ब आ माएक नाम जाम्बवती छलन्हि। सामा अपूर्व सुन्दरीक संग-संग उदारता आदि गुणसँ सम्पन्न छलीह। सामा अपन सखी लोकनिक द्वारा सदैव प्रशंसित रहलीह। ओ नित्य ऋषि-मुनिक आश्रम जाए खेलाइत छलीह। एही प्रकारेँ हिनकर समय व्यतीत होइत छल। सामाक विवाह चारूवक्य (चक्रबाक) नामक एकटा समृद्ध युवकसँ भेल छलन्हि। हुनका एकटा डिहुली नामक नोकरनी छलन्हि। एकदिन सामा मुनिक आश्रमसँ घुरल अबैत छलीह कि बाटहिमे ओ डिहुली नामक नोकरनी हिनका देखि लेलकन्हि आ कृष्णक लग जा कऽ सामापर मिथ्या मनगढ़ंत आरोप लगा कऽ चुगली कऽ देलकन्हि जे- ‘ई वृन्दावनमे टहलऽ जाइत छथि तेँ ऋषि सभक संग रमण करैत छथि।’ श्री कृष्ण सामाक चारित्रिक दोषारोपण सुनि अत्यन्त क्रोधित भए गेलाह आ ओही क्रोधमे सामाकेँ शाप दऽ देलन्हि जे- ‘हे समा! जखन एहन स्वर्गतुलय घर केँ छोड़ि अहॉं मुनिक निकट गेलहुँ, तँ जाउ! हम अहॉंकेँ शाप दैत छी जे पृथ्वीपर जा कऽ वृन्दावनक जंगलेमे चकबी पक्षी बनि निवास करू।’ श्री कृष्णक शापक कारण सामा चकबी पक्षी भऽ गेलीह। आ ओहो क्रोधमे आबि कऽ चुगिलपनक कारणेँ डिहुलीकेँ शाप दऽ देलन्हि जे जाहि मुँह सँ अहॉं हमरा पर मिथ्या मगनगढ़ंत आरोप लगौलहुँ ओ मुँह अहॉंकेँ आगिसँ झरकाओल जाएत।” शापित सामा चकबी पक्षी बनि वृन्दावनमे रहऽ लगलीह। ओमहर हिनक पति चारूवक्य (चक्रबाक) एहि शापक घटना सुनि अत्यन्त दु:खी भऽ गेलाह आ विरहमे तुरत देवाधिदेव महादेवक अराधनामे लीन भऽ गेलाह। एक दिन महादेव सामाक पति चारूवक्यक तपस्यासँ प्रसन्न भए कहलन्हि जे- ‘माँगू! अहॉं जे वरदान माँगब से हम देब।’ तखन सामाक पति महादेवसँ कहलथिन्ह जे- हे महादेव! हमर पत्नी सामा अपन पिता श्री कृष्णक शापसँ पक्षी बनि गेलीह। हम आब हुनका वियोगमे नहिं जीवि सकैत छी। तेँ हम जाहि कोनो प्रकारेँ हुनका संग रहि पति-पत्नीक सुख प्राप्त कऽ सकी से वरदान दिअ। तखन महादेव एवमस्तु कहि देलथिन्ह। महादेवक एहि वरदानक पश्चात् सामाक पति चारुवक्य (चक्रबाक) पत्नी सुख प्राप्त करबाक हेतु चकबा पक्षी बनि गेलाह। तत्पश्चात् सामा आ चारुवक्य (चक्रबाक) दुनू गोटे (पति-पत्नी) पक्षी रूपमे वृन्दावनमे यत्र-तत्र-सर्वत्र संगे घुमि-फिरि दाम्पत्य जीवनबिताबए लगलाह। सामाक भाई साम्बकेँ जखन अपन बहिन-बहिनोइकेँ शापित भऽ पक्षी बनि जएबाक घटनाक जानकारी भेटलन्हि तखन ओ बहुत दु:खी भऽ गेलाह आ अपन बहिन-बहिनोइक उद्धारक हेतु तत्क्षण एकाग्रचित्त भऽ कऽ भगवान विष्णुक पूजा प्रारम्भ कऽ देलन्हि। विष्णु सहस्त्र नामक विष्णुक स्तुतिसँ शंख-चक्र-गदाधारी भगवान विष्णु साम्बक समक्ष प्रकट भेलाह आ साम्बसँ कहलन्हि जे- हे पुत्र! हम अहॉंक अराधनासँ अति प्रसनन छी। तेँ ‘अहॉं माँगू! जे वर माँगब से हम देब।’ साम्ब कहलन्हि जे- हे नारायण! यदि अहॉं हमर अराधनासँ प्रसन्न छी तँ हमर एकमात्र शापित बहिन-बहिनोईकेँ जे पक्षीक रूपमे आइ दर-दर जंगले-जंगल भटकि रहल छथि तनिका पुन: वास्तविक मनुष्य रूपमे सुखी दाम्पत्य जीवन व्यतीत करथि से वरदान दिअ। तखन भगवान विष्णु कहलन्हि जे- हे वत्स! अहॉंक बहिन-बहिनोइ जाहि तरहेँ शाप-मुक्त भऽ मनुष्य योनि प्राप्त करताह से उपाय हम कहैत छी। अहॉं ध्यानसँ सुनू- कार्तिक मास हमर सभसँ प्रिय मास अछि। ई मास सभ पाक नाश करऽबला होइछ। कार्तिक मासक शुक्ल पक्षक पंचमी तिथिमे घर-घरक स्त्री लोकनिक द्वारा नवीन वस्त्र पहिरि सामा, चुगिला, स्प्तर्षि आ वृन्दावन आ साम्ब आदिक मूर्ति बनाओल जाए। आ रंगल-ढेउरल ओहि सभ मूर्तिकेँ एकटा चँगेरामे राखि विधिवत् पूजा कएल जाए। रातिमे दीप जरा कऽ ओकरा घुमाओल जाए आ चारूकात सँ चुगिलाक मुँह झरकाओल जाए। एहिना करैत जखन पूर्णिमाक तिथि आबए तँ बहिनिक द्वारा विभिन्न पकमान बना कऽ भाइ केँ भोज कराओल जाए तत्पश्चात् भाईक द्वारा ठेहुनसँ ओहि मूर्ति सभकेँ फोड़लाक बाद, हुनका सभकेँ अगिला साल पुन: अएबाक नोत दऽ कऽ श्रद्धापूर्वक विसर्जन कऽ दिअए। एहि तरहेँ जखन ई पूजा कएल जाएत तखन अहॉंक बहिन-बहिनोइ स्वत/ मनुष्यक शरीर प्राप्त कऽ लेताह, आओर जे स्त्री सामाक पूजा करतीह ओ सौभाग्यवती होएतीह। ई बात कहि शंख-चक्र-गदाधारी भवान विष्णु अन्तर्धान भऽ गेलाह। साम्ब अपन राज्यमे सूचना प्रसारित करौलन्हि जे हमर सम्पूर्ण राज्यक स्त्री लोकनि उपरोक्त विधि-विधानसँ सामा-चकेबा बनाए चुगिलाकेँ जरौतीह आ जे एहि आदेशक पालन नहिं करतीह तनिका एहि राज्यसँ निष्कासित कऽ देल जाएत। साम्बक आदेशनुसार राज्यक महिला लेाकनि तदनुरूप कार्तिक शुक्ल पक्षक प्रथमे दिनसँ एहि कार्यमे लागि जाइत छलीह। साम्बक आज्ञानुसार गाम-गाममे स्त्री लोकनिक द्वारा उपरोक्त विधि-विधानसँ सामाक पूजा भेल आ ओहि पुण्यसँ सामा पुन: अपन मनुष्यक शरीर प्राप्त कएलन्हि। सामा पुन: अपन मूल रूप देखि विस्मित होइत अपन सखीसँ पुछलन्हि जे हमर ई रूप कोना भेल? आ ई काज के कएलक? से कहू। जे हमरा पक्षी रूपसँ मानव रूपमे परिवर्तित कएलन्हि हुनका हम जीवन दान देबन्हि। सखी उत्तर देलथिन्ह जे ई सभटा अहॉंक भाई साम्बक प्रयाससँ सम्भव भेल। सखीक ई बात सुनितहिं सामाक आँखिसँ अश्रधारा प्रवाहित भऽ गेलन्हि आ गद्-गद् वाणीसँ बजलीह जे- संसारमे सहोदर भाइक समान दोसर नहिं होइत अछि। धन्य थिक ओ स्त्री जकरा सहोदर भाई छैक। सामा अपन भाईक द्वारा एहि तरहक कार्य करबाक हेतु अनका अपन आन्तरिक हृदयसँ दीर्घायु होएबाक आशीर्वादक संगहि संसारक सभ बहिनकेँ हमरे सन भाई हो तकर कामना कएलन्हि। ओकर बाद सामा अपन भाईसँ भेँट कए पुन: अपन माए-बापसँ भेँट कएलन्हि। सूतजी कहलथिन्ह जे- हे ऋषिगण! जाहि दिन सामा अभिशापसँ मुक्त भेलीह ताही दिनसँ सामाक पूजा पृथ्वीपर होमए लागल। सामाक पूजा अखण्ड भ्रातृ सुख सर्वसौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादि प्रदान करऽवला कहल गेल अछि। जे नारी एहि व्रतकेँ प्रति वर्ष करैत छथि जे भ्रातृविहीना नहिं होइत छथि आ पुत्र-पौत्रादिसँ युक्त होइत छथि। सम्पूर्ण मिथिलामे भ्रातृद्वितीये दिनसँ सामा बनाएब प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। स्त्रीगण सभ ओहि दिन जाहि माटिसँ सामा बनौतीह तकरा स्पर्श अवश्य कऽ लैत छथि। तत्पश्चात् अधपहरा देखि कऽ छठिक खरना वा रपना दिन सामा बनबैत छथि। सभसँ पहिने सिरी सामा, दोसर दिन चकेबा, तखन एके पाँतीमे बैसल सातटा सतभैंयॉं चिड़ै, खररूचि भैया, बाटो बहिनो दू पक्षीक मुँह दू दिस भाग्य-चक्रसँ भाइ-बहिनक विमुख भेल भाइ-बहिन। नवका खढ़सँ बनल वृन्दावन, भम्हरा तथा सन (पटुआ) सँ मोंछबला अनाओल चुगिला आ चुगिलखोड़ चूड़कक प्रतीक अछि। सामा बनएबामे दिन-नक्षत्रादिक सेहो विचार कएल जाइछ। ई अधपहरा मे नहिं बनाओल जाइछ। सर्वप्रथम स्त्रीलोकनि सामा बनबैत छथि तत्पश्चात् क्रमसँ सामा-चकेबा, सतभइयॉं (सप्तर्षि), वृन्दावन आ साम्ब भैया, पक्षी आ ओकरा हेतु घर आओर चुगिला आदिक मूर्ति बनाओल जाइछ। चुगिला केँ जड़बाक काल स्त्रीगण बड़ गारि पढ़ैत छथिन्ह। एकर मुख्य कारण ई अछि जे सामाक चरित्रपर दोषारोपण लगबएवला चुगिले छल आ चुगिलेक चुगिलपनक कारणेँ सामा शापित भेल छलीह तेँ ओकरा गारि पढ़बाक परम्परा प्रारम्भ भेल। सम्पूर्ण मिथिलांचलक महिला वर्ग (की बूढ़, की बच्चा, की जवान) सभ मिलि कऽ समा-चकेबा खेलाइत छथि। सॉंझ होइते देरी धियापूतासँ लऽ कऽ बूढ़-पुरैनियॉं तक सभक मनमे एकटा नव उमंग, नव जोश हुंकार भरऽ लगैत अछि। कारण धियापूतासँ लऽ कऽ बूढ़ धरिक सभकेँ स्वतन्त्र रूपसँ अपन-अपन गीतक प्रदर्शन करबाक नीक अवसर भेटैत छन्हि। धिया-पूताकेँ बूढ़-पुरैनियॉं सभसँ गीत आ गीत गाबक कला सीखबाक सेहो नीक अवसर भेटैत छन्हि। अँगना-अँगनासँ स्त्रीगण सभ चँगेरामे सामा-चकेबा साजि कऽ धियापूताकेँ माथपर रखने गीत गबैत टोले-टोल एक ठाम जका भऽ कऽ टहाटही इजोरियामे नव-अनव धुनमे गीतक प्रतिस्पर्धा चारि-पाँच घन्टा धरि चलैत रहैत अछि आ नव-पुरान सभ गीतगाइन सभ गीत गाबि-गाबि प्रतिदिन थोड़ेक-थोड़ेक चुगिला के जरा कऽ डाला समेटि अपन-अपन घर चलि जाइत छथि। ई क्रम लगातार कार्तिक शुक्ल पक्षक प्रथम दिनसँ पन्द्रह दिन धरि चलैत अछि आ अन्तिम पन्द्रहम दिन अर्थात् पूर्णिमाक रातिमे आने दिन जकॉं सभसँ पहिने गोसाउनिक गीत गाबि समाकेँ नवका चूड़ा-दही, गुड़, मिष्टान आदिक भोजनोपरान्त सुपारी देल जाइत अछि। आँगनमे स्त्रीगण द्वारा सभ भाईक नामसँ ओकर कल्याणार्थ गीत गाओल जाइछ। तत्पश्चात् समा-चकेबा आ प्रज्वलित दीपसँ साजल चँगेरा माँथपर राखि स्त्रीगण सभ निम्नलिखित गीत गबैत आँगनसँ बहराइत छथि- “डाला लऽ बहार भेली, बहिनो से फल्लाँ बहिनो, फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनू! राम सजनी। समुआ बैसल तोहेँ बाबा बड़ैता, तोर बेटा लेल डाला छीनि, सुनू! राम सजनी।। कथी केर डलबा गे बेटी! कथी बान्हल चारू खूट, कोनो रंग डाला लेलकौ छीनि, सुन! राम सजनी। सोने केर डलबा हौ बाबा, चम्पा, चमेली चारू खूट, लाले रंग डाला लेल छीनि, सुन! राम सजनी।। जौं तोरा आहे बहिनी हम डलबा दिया देबऽ हमरा के की देबऽ दान, सुनू! राम सजनी। चढ़बाक घोड़ा देब पढ़बाक पोथी देब, छोटकी ननदिया देब दान, सुनू! राम सजनी।।” उपर्युक्त गीत गबैत गामक सभ घरक महिला लोकनि जोतलाहा खेतमे क्रमश: जमा होमए लगैत छथि। ओतऽ सामा सब के पसारि देल जाइत अछि। तत्पश्चात् सीरी सामाकेँ हाथमे लऽ कऽ लगाएल पान, गोटा सुपारी आओर एक मुट्ठी अरबा चाउर महिला लोकनि अपना-अपना आँचरपर राखि सखी सभक संगे अदला-बदली करैत छथि। अदला-बदली करैत काल स्त्रीगण निम्नलिखित फकड़ा मन्त्र रूपमे पढ़ैत छथि- “जीब’ जीब’ हो की मोर पिया जीब’ की मोर भैया जीव’ जेहन धैबिया के पाट तेहन भैया के पीठ जेहन करड़िक थम्ह तेहन भैया के जॉंघ जेहन पोखरिक सेमार तेहन भैया के टीक।” एहि विधिक बाद भईक फाँड़ भरल जाइछ आ सामा फोड़बाक लेल देल जाइत अछि, जकरा ओ लोकनि अपन ठेहुनसँ फोड़ैत छथि। सामा फोड़लाक बाद भाई लोकनिकेँ नवका चूड़ा-दही-गुड़ खुआओल जाइत अछि। तत्पश्चात् सामाक खेल प्रारम्भ होइछ। तकरा बाद चुगिलाक मोँद-दाढ़ी जराओल जाइछ आ सभसँ अन्तमे वृन्दावन जराओल जाइछ। एहि सभ विधिक पश्चात् पुन: गीत गाओल जाइछ- “गाम के अधिकारी भैया हाथ दसं पोखरि। खुना दिअ’, चम्पा फूल लगा दिअ’हे। फलबा लोढ़ैते बहिनो आयल हे। घमि गेल सिर के सिन्दुर नयन भरू काजर हे। छत्ता लेने आबथि भैया से फल्लाँ भैया हे। बैसह बहिनो एहि छॉंह आसीष दहू हे। पानियो लेने दौड़ल आबथि अइहब भौजो हे। ननदो पीबि लिअ निरमल पानि से हमरो आसीष देहु हे। युगे-युगे जीबथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ओ हे।” मिथिलाक स्त्रीगण सामा-चकेबाक गीत सभमे अपन-अपन भाइक नाम जोड़ि गीत गबैत छथि। मिथिलाक अनुपम आ आदर्शक एहि अद्भुत पावनि ‘सामा-चकेबा’सँ सम्बन्धित अनेकानेक गीत सभ अछि जे समयानुकूल सामाजिक परिवर्तनक कारणेँ धीरे-धीरे क्रमश: लुप्त भेल जा रहल अछि। हम ‘सामा-चकेबा’सँ सम्बन्धित किछु गीत सभक संकलन उद्धृत कऽ रहल छी जाहिसँ अध्येता आ शोधार्थी लोकनिकेँ सहयोगक संग-संग ई गीत सभ जीवन्त रहि जाए तँ खास कऽ हमरा काफी आत्मसंतुष्टि होएत। मिथिलामे परम्परासँ प्रचलित ‘सामा-चकेबा’क क्रमश: लुप्त होइत जा रहल किछु गीत सभ यत्र-तत्रसँ संग्रह कए प्रस्तुत कएल जा रहल अछि- गीत- 1 “साम चाको साम चाको अइह हे, अइह हे, जोतल खेतमे बइसिह हे, बइसिह हे- सब रंग पटिया ओछइह हे, ओछइह हे- ओहि पटिया पर कए कए जना, कए कए जना छोटे बड़े नबो जना, नबो जना। हमरा भैया के सोनाक छुरी, सोनाक छुरी।”[4] गीत- 2 “सामा खेल खेलू हे भौजो। चिर जीवन मोर भाए। चूड़क मुँह उक फेरब भौजो! चुगली करत न जाए। बापक शाप बशें वन ऐलौं चारु बदन पति पाए। पति सुत भाए जिअत सब भौजो! भैया होएत सहाए।।”[5] गीत- 3 “अयलइ काति मास हो भैया, सामा लेल अवतार। चिट्ठी ल’क’जैहें हजमा, नैहर हमरार। बाबा आगू बजिहें हजमा, गोचर हमार। भैया आगू बजिहें हजमा मिलन हमार। सेहो सुनि भेला भैया, घोड़ा पीठि असवार। सिन्दुर बेसाहताह भैया, बेतिया सन हे बजार। टिकुली बेसाहिह’भैया, पटना सन हे बजार। सामा बेसाहिह’भैया, मनसुर चक हे बजार। टिकुली झलकि गेल फल्लाँ बहिनि के कपार। सिन्दुर झलकि गेल भैया अइहब भौजी के कपार।”[6] सन्दर्भ सूची- ________________________________________ [1]मिथिला की सांस्कृतिक लोक चित्रकला- पं. लक्ष्मीनाथ झा [2]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र- पृ. 164 [3]मिथिलाक पावनि तिहार- बाबू गङ्गापति सिंह [4]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र [5]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र [6]मैथिली संस्कार गीत, उर्वशी प्रकाशन, पटना। विष्णु कान्त मिश्र महादेवक कूटनीति शंकर बाबूक सिरमामे यमदूत ठाढ़ छल ।ओ हिनका कहनि -- 'चल हमरा संग'। --------- 'हम तोरासंगे किएक जाएब?हम एखन जयबाक मूडमे नहि छी ।तावत दोसरसभके देखहक ।के पठौलकह तोरा'? ------ 'देवाधिदेव महादेव।तोहर समय भ' रहल छह ।हमरा ल'ग आना -कानी नहि चलतहु।हमरा त' तोरा महादेवधरि पहुचयबाक अछि ।तत्पश्चात तोरा जे कोनो गलती बूझि पड़ौ त' हुनकेसॅ गप क' लीह' ।'यमदूत बाजल। शंकर बाबू प्रश्न कयलनि ----'फेर हमरा हुनका ल'गसॅ घुमा क' पृथ्वी लोक तोॅपहुचाए देबह ने '? ----- हमरा मात्र पहुचयबाक भार अछि ।फेर के संग आबि क' मृत्युलोक पहुचेतहु से महादेवसॅ पूछि लियहुन ।विदा होएबामे आब एक मिनट मात्र बाॅकी छहु ।' किछु क्षणक पश्चात यमदूत शंकर बाबूके नेने जाय महादेवल'ग सुपुर्द क' देलक ।आब ई महादेवक दायित्व छलनि जे चित्रगुप्तसॅ शंकर बाबूक जीवन भरिक क्रिया - कलापक गोपनीय रिपोर्ट मॅगबाबथु । शंकर बाबू महादेवसॅ कहलथिन ---'अहाॅ एहन बेकहल सयदियाके हमरा ओतय किएक पठौलहुॅ ?एकरा जोरगरीक दाबी छैक ।हम कहलियैक जे बादमे भेंट क' लेबनि , जबर्दस्ती अनलक अछि ।' महादेव चित्रगुप्तके बजाय पुछलनि-----'अहाॅ शंकरक क्रिया-कलापक एकाउन्ट दिअ ।' ---------'सरकार, ई जीवनमे पचहत्तरि परसेन्ट झूठेटा बजलाह ।क्रोध ,गारि,स्वार्थ,इर्ष्या,पराया स्त्रीक शील हरण,मोह आदिमे समय व्यतीत कयलनि ।अपनेक सोंझा सभटा लिखल रिपोर्ट राखि रहल छी ।'ई कहि चित्रगुप्त शंकर बाबूक रिपोर्ट कार्ड महादेवक समक्ष राखि देलनि । महादेव शंकर बाबूके कहलथिन ---- 'अएॅ औ, अहाॅक त' पूरा रेकर्डे खराब अछि।' ई सुनितहि शंकर बाबूक देहमे आगि लेसि देलकनि ।ओ महादेवपर बमकि उठलाह ----' अहाॅ कहियाके न्यायकर्ता भेलहु ।नशामे सदिखन बुत्त रहैत छी ।बेकहल तेहने छी जे वस्त्रक बदला बाघक छाल ठेहुनधरि पहिरैत छी ।मुंडमाल देखि हमरासभके घृणा होइत अछि ,तकरा अहाॅ गरदनिमे लटकौने रहैत छी ।इन्द्रक आंखिमे मरछाउर छीटल रहनि जखन ओ अहाॅक नाम देवाधिदेव महादेव रखलनि ।अहाॅसन बूड़ि न भूतो न भविष्यति।एहन लोक हमर न्याय की क' सकैत अछि ?चलूं पालनकर्ता विष्णु ल'ग ।' महादेव आ शंकर बाबू दूनू विष्णुक ओतय गेलाह ।महादेव शंकरक सभटा किरदानी विष्णुके सुनाय देलथिन।शंकर बाबू सेहो विष्णुक समक्ष महादेवक पूरा बखिया उधेड़ देलनि।कहलथिन ---'नशाबाज आ बताह कतहु पंचैतिया होअए !' विष्णु शंकरक गपसॅ सहमत भेलाह।मुदा हुनका क्रिया- कलाप के सही ठहरौलनि । -------' यौ विष्णु,हम अहाॅ ल' ग अयलहु जे महादेवक निर्णयके अहाॅ कैंसिल क' देबैक , मुदा अहाॅ त' युग जितलहु।एकटा घरवालीक खर्चा जोड़बामे त' पुनः: प्रात लोकके होइत छै।अहाॅ दू- दूटा विआह कयने छी ।छलसॅ कतेको हत्या केने छी ।एहन पापी हमर पंचैती की करताह ?अहाॅ दूनूगोटे हमरासंग ब्रह्मा ल' ग चलू ।सृष्टिकर्ता त' वैह छथि ने ।' शंकर बाबूक आग्रहपर विष्णु आ महादेव ब्रह्माक समक्ष उपस्थित भेलाह ।अपन- अपन पक्ष तीनूगोटेके रखबाक अवसर प्रदान कयलनि। महादेव आ विष्णुके जखन अपन पक्ष राखल भ' गेलनि त ' शंकर बाबू सॅ ब्रह्मा आग्रह कयलनि ---- ' अहाॅके अपना प्रसंग की कहबाक अछि से कहू '। शंकर बाबू ---' औ ब्रह्मा जी ,हम अपनेक ओहिठाम एहि दूनूके इएह सोचि अनलहु जे अपनेल'ग हमरा न्याय भेटत ।विष्णु आ महादेव दूनूगोटे एक पेट क' नेने छथि ।महादेव चित्रगुप्तके कनखी मारि क' हमर पृथ्वीलोकपरक की हिसाब - किताब अछि से मॅगलथिन ।हम ई दाॅव नहि चलय देबनि ।चित्रगुप्त हमरा प्रसंग सभटा झूठक पुलिन्दा आनि क' राखि देलकनि ।महादेवसन कंगाल आ बताह कतहु चौरासी लाख योनिक जीवक मालिक होथि ।नाक उॅच आ कान बुच ।ई त' सतत उनटे - फेरीमे लागल रहैत छथि ।' ' अहाॅक सभ गप बुझलहु ।अहाॅ की कहय चाहैत छी?अहाॅक अभिप्राय हम नहि बूझि सकलहु ।' ब्रह्मा शंकर बाबूसॅ कहलथिन । ------' नहि, नहि, अहाॅ हमर सभ बात बूझियो क' अनठा क ' पूछि रहल छी । अहूॅ विष्णु आ महादेवक पक्ष लेमय चाहैत छियनि । छिलका छोड़ा क' हम सभ किछु अहाॅके कहलहु अछि । तखन त ' चोर - चोर मसियौत भायबला गप अछि ।गलती हमर अछि जे अहाॅ ल'ग पंचैती कराबय अएलहु ।अहाॅक नाम पाॅच मुंह वला'पंचानन' सेहो अछि ।सरिपहु तें अहाॅक ई दशा अछि। पृथ्वी लोकमे त ' एकटा मुहके भरल पार लगिते नहि छैक आ स्वर्गलोकमे अहाॅक पाॅचटा मुंह के के भरत ?एतय अहाॅके सभ नीच बुझैत अछि ।ताहि दुआरे सहरजमीनहिपर लोक अहाॅक पूजा करैत अति ।ओहो विध - विधानसॅ नहि ।एकहिबेरि जल ,फूल, चानन, अक्षत आदि अर्घामे ल' समर्पित क' दैत अति।अहाॅ तीनूगोटे मिलि क' हमरा बापक विआह आ पितियाक सगाइ देखाबय चाहैत छी ।हम अहाॅ तीनूगोटेक कहियो कोनो अधलाह नहि कयलहु तैयो भेंड़ा - महिसिक कानि हमरापर रखने छी।' शंकर बाबू अग्निश्च- वायुश्च होइत बमकि उठलाह। ब्रह्माबजलाह----'यौ शंकर बाबू, चित्रगुप्तक गोपनीय रिपोर्ट झूठ नहि भ ' सकैत अछि।पृथ्वीलोकपर अहाॅक समय पूरा भ' जयबाक कारणे अहाॅके एतय यमदूतक माध्यमसॅ बजाय लेल गेल अति।एहिमे अधलाह की ?' ' यमदूत घर छोड़ि घुरमुरिया खेलबाय रहल छथि ।झूठक जालमे फॅसाय धोबिया पाट मारय चाहैत छथि।ई सोचिए शंकर बाबू गम्भीर होइत कहलनि --- 'हम अहाॅ तीनूमेसॅ ककरो फैसला नहि मानैत छी।अहाॅ लोकनि मुंह देखि मुंडवा परसैत छी ।सूनू, इन्द्र त' सभहक राजा छथि ।तीनूगोटे हुनकहि ल'ग चलूं।ओ त' सुप्रिम कोर्ट छियैक कि ने ।औ दूध आ पानि दूनूके बराक क ' देता ।' अन्ततोगत्वा ब्रह्मा, विष्णुआ महादेव तीनूगोटे शंकर बाबूकसंग देवराज इन्द्र के सभामे पहुचलाह।इन्द्र एहि चारु गोटेकै अएबाक कारण पुछलनि।शंकर बाबू विनतीपूर्वक अपन पक्ष रखैत बाजि उठलाह ---' हुजूर!महादेवा आदेशपर यमदूत हमरा जबर्दस्ती पकड़िके ल' अनलक।हम कतबो कहैत रहि गेलियैक जे एखन हमरा अमाशय उखड़ि गेल अछि, निराल पानि पेटसॅ जाय रहल अछि ।कने मोन ठीक होमय दैह त' हम अबैत छी ,मुदा के मानैत अछि ।चण्ठ हमरा पकड़ने ल' गेल।फल भेल जे भरि बाट धोतिअहिमे ततेक पानि चुरुकि गेलहु जे यत्र- तत्र धोती पीयर भ' गेल अछि।कने पानिक बन्दोबस्त कतहुसॅ करय कहलियै सेहो नहि कयलक।यमदूत त ' साक्षात चंडाल थिक।' इन्द्र समस्याक गंभीरता देखि कहलनि ----' सूनू,यमदूत अपराध अवश्य कयलक अछि ।ओकरा बाटमे पानिक जोगाड़ क' देबाक चाहैत छलैक ।अहाॅके जाहि समयमे अनबाक आदेश भैटल छलैक ओहि समय पर अहाॅके लाएब आवश्यक छलैक तें अनलक ।शौचकलेल जलक इन्तजाम यमदूत नहि कयलक तें सात बेरयमदूत कान पकड़ि क' उठा-बैसी करथु ।' शंकर बाबू एहि पंचैतीसं खुश नहि भेलाह।ओ हाथ जोड़ि इन्द्रके कहलनि--' अपने राजा छी जॅ हमर जी- जान बकसि दी त' किछु बाजी ।' इन्द्र हुनका निर्भीक भ' बाजय कहलनि। ----' हजूर, अपनेक न्यायसं हम संतुष्ट नहि भेलहु ।अरे थे हरि भजन को औटन लगे कपास ।हमरा त' अपने मुहे भरे खसाय देलहु।अहाॅ त 'तेहने डाही छी जे सत्यवादी हरिश्चन्द्रके विश्वामित्रक माध्यमसॅ तेहन ने पेंचमे फॅसा देलियनि जे हुनका जीवनभरि रन-बोनक पात तोड़य पड़लनि ।वृन्दावन आ मथुराक इलाकामे तेहन वर्षा क' देलियैक जे बाढ़िक प्रलयसॅ लोकके भगबाक बाट नहि भेटैक।' शंकर बाबू उकटि क' हाथ क' देलनि --' सभ केओ दक्षिणेश्वर काली ल'ग चलूं।ओ जे कहतीह से हम यानि लेब ।' शंकर बाबू सबके नेने दक्षिणेश्वर कालीकट समक्ष उपस्थित भेलाह ।सभटा वृत्तान्त हुनका सुनाया देलनि।दक्षिणेश्वर काली ब्रह्माके एकान्तमे बजाय कहलथिन ---' अहाॅ घर छोड़िए एतेक घुड़मुड़िया किएक खेलाय रहल छी ।कने दिमागसॅ काज लिंक ।अहाॅ के छी कने सोचूं ।जे किछु पृथ्वीलोकमे हिनकर कृत्य कैल छनि ताहि आधार पर शंकर बाबूक देहपर कुशसॅ जल छींटि हिनका छोटकी चुट्टीमे पृथ्वीलोक पठाय दिअनु ।' ब्रह्माके अपन प्रभुत्वक भान भेलनि। शंकर बाबू के झट कुशसॅ जल छींटि पृथ्वीलोक विदा क' देलनि । 'ने ओ नगरी, ने ओ ठाॅउ ।' चारि पत्र पहिल पत्र --------- उजियारपुर, २१.८.१९६० मन मोहिनी, शरदक चानजकाॅ चमकैत रहू । आइ पन्द्रह दिनसॅ अहाॅक कुशल नहि बूझि पानिसॅ बाहर माछजकाॅ छटपटाए रहल छी। बी० एड०कोर्सक अध्ययनमे मोन नहि लागि रहल अछि। रहि_रहि क' ध्यान अहींक पूर्णिमाक चान सदृश मुॅहपर जा 'क ' अटकि जाइत अछि। अहाॅक डोकासनक आॅखि ,तीसीवला नाक,धनुष सदृशभौंह, डरकसके स्पर्श करैत भादवक मेघसन केशपाश ,मालपूआसदृश गाल,पीपरक पातके पतनुकान करयवला ओष्ठ हमरा मानसपटल पर तेना ने अपन साम्राज्य स्थापित क ' लैत अछि जे रात्रि क ' औंघियो हेराए जाइत अछि। हे प्रयाण प्रिये! मधुश्रावणीमे हम अहाॅक गाम आएल रही।अहाॅ एकटा पायलट फरमाइश करने रही।हम उजियारपुर पहुचितहि बाबू के पोस्टकार्ड लीखि ट्रेनिंग कालेजक फूसि बजट देखाय पायलकलेल रुपैया मॅगाय लेलहुॅ। कोजागरा क अब किछुए दिन बाॅकी रहि गेल छैक । दस दिन पूर्वहि हम क्लास छोड़ि अहाॅक खातिर गाम आबि जाएब । हे मृग नयनी! अहाॅक बाबू बढ़ कसाई छथि ।ओ हमरा अहाॅक बीच बदला छथि। दस तारीख क' हम गाम आएब ।हम बुझैत छी जे ओ हमरा बजयबाकलेल ककरो नहि पठौताह। एकटा युक्तिबुझाय दैत छी। अहाॅ अपन बहिनपा पानजोड़ीके सिखाय अपना मायक माध्यमसॅ बाबूपर दबाब बनाएब । जखनहि केओ हमरा बजयबाकलेल अओताह कि धुरिआएले पैर हम हुनकहिसंग पहुंचिए जाएब । हे प्राणाधार!अहाॅ त' बुझिते छी जेअहांक बाबू पुरान विचारक लोक छथि।कहां सिनेमा देखबाक प्रसंग अपना अन्तर्देशीयपत्रमे लिखने रही।हम ओकरा लेल तैयार छी ।हॅ, बाबूसॅ चोराय क' जाय पड़ता।जयबाक कार्यक्रम हम अहांके बुझाया दैत छी।भिनसरवे रात्रि दूनूगोटे उठि क 'विदा भ' जाएब।घंटे कोस चलब तैयो दूं घंटामे राजनगर पहुचि जाएब।साढ़े पांच बजे ट्रेनसं पौने छह बजे मधुबनी उतरि रिक्शासॅ जाय कपिलेश्वर महादेवा दर्शन करब। पुनः मधुबनी आबि टेबुल-कुर्सीवला होटलमेभोजन क ' मैटिनी शो सिनेमा देखि लेब।सबा छ:बजे ट्रेनसॅ।विदा भ ' साढ़े आठ-पोने नौ बजे धरि गामपर छवि आएब।बाबू ल'ग मायपेटक दर्दके डाक्टरसॅ देखयबाक बहाना बनाया लेथिन्ह। हे चन्द्र मुखी! हमर माय-बाबूजीमाघमे सोझे बरखे द्विरागमन करयबाक निर्णय ल' रहल छथि।अगहनमे हमरो परीक्षा सम्पन्न भ' जाएत।भगवती के किछु कबुला क' दिओन्ह जे कोनो हाई स्कूलमे झट द' हमरानोकरी भ' जाय ।फेरि दूनूगोटे बाहरे रहब।अहाॅक बाबू महींंस रखने छथि, मुदा ओ एहन ने कंजूस छथि जे एको चूरुक दूध अहाॅलेल नहि राखि सभटा बेचि लैत छथि ।अहाॅक सगर देहमे हड्डियेटा बाॅचल अछि । मायके कहबनि जे थैरिसॅजखनहि बाबू महींस दूहि क ' लाबथि त' ओ एक गिलास दूध अहाॅकलेल चोरा क' राखि लेतीह।एखन जॅ देह नहि फौदाएत त ' कहिया?हॅ, एकटा गप बिसरि गेल छलहु , नढ़िया टोलक खखरू बाबू वैद्य ल' ग पानजोरीके संग ल' छवि जाएब आ च्यवनप्राश कीनि आनब।पानजोड़ीसॅ कैंचा पैंच ल' लेब ।हम अबैत छी त ' सधाय देबनि ।एक गिलास दूधमे एक चम्मच च्यवनप्राश घोरि क ' प्रतिदिन पीबिलेल करब। रातिके बारह बाजि रहल छै।नींद त' हमरा नहिए हैत । एहि करोटसॅ ओहि करोट ओंघराइत रहब। तखन त ' --- ' एहि आशा अटक्यो रहत, अलि गुलाब के फ़ूल। अइहैंफेर बसन्त ऋतु, इन डारन ओ फूल ।। ।। इति ।। अहाॅक पिआसल अहींक भ्रमर --- देवनाथ दोसर पत्र ------------ हाई स्कूल, सहरसा 3/12/1970 प्रिये, शुभाशीर्वाद। हम एतय सकुशल छी। अहाँ क लिखल अंतर्देशीय पत्र एखनहि डाकपिउन हस्तगत करौलक अछि। पत्र पढ़ि सभ समाचार सॅ अवगत भेलहुँ। काशीनाथ के सर्दी भ' गेल छैक। ओकरा वैद्य जीसँ सितोपलादि चूर्णआनि देल करियौक। जड़कालाक समयछैक। अपनहु ठंडा सॅबचल रहब। दुन् माय-बेटा अठकपारिसॅ गायक दूध उठौना ल' पीब। हॅ, खाली पेटमे अधिक लाभ करत। कतेक दिन सँ सोचैत छी जे फेमिलीक संग रहब। प्राण अहुरिया काटि रहल अछि। मुदा अपने जाएब नेपाल, कपार संगहि जाएत । पछिला कर्जसभ कने झाड़ि लैत छी त' निश्चिन्त भ' सभ केओ एत्तहि सहरसेमे रहब। अहाॅजे घूटर कप्रसंग लिखलहुँ अछि जे ओ सपरिवार संगहि रहैत छथि से ओ त' मातवर घरक छथि। अनकर देखाउस करब त' छओ मास व्यथे मरब। गर्मीक छुट्टीमे हम गाँव आएब त' सभकें एतहि नेने आएव। काशीनाथ के सेहो एही ठाम स्कूलमे एडमिशन कराय देबैक- उसराहा परक तेफसिला दसकठवा खेत कहियो मरहन्ना नहि जाएवला, ताहिमे तीन मन धान बॉँटिके देलक अछि। खेतक आरिपर जखनहि जायवला केओ नहि छैक त' एहिना हेतैक। बटाइदार सभसँ नार-पोआर जमा करबा लेब आ ओकरे सभकें कहबैक जे बेचाय देत। खेतक मालगुजारीकलेल अहाँ लिखलहुँ जे कर्मचरी तंग क' रहल अछि से की करबैक। फरवरी धरिक मोहलति ल' लिअ । फरवरी कदरमाहा भेटितहि हम मनीआर्डर क' देब। एखन हमरा एक सय चालीस रुपैया दरमाहा अछि। अपना बुतात जोगर राखि हम चारि महि दिन एक सय दस मनीआर्डर क' देलहुँ अछि । जाड़ काला आबि गेल छैक। फलानेनवला . एकटा ओढ़नी अपना लेल आ बौआक लेल एकटा भरिबहुआँ स्वेटर-टोपी अवश्य कीनि लेब। अकलुआ माय मुँहक जोर छैक। ओ सदिखन झगड़ाक बीह तकिते रहैत छैक। ओ 'एकटा राहरि, सभसैँ बाहरि' छैक । एकरा सॅ मुॅह नहि लगाएब । हम एतय ट्यूशन सेहो पछिला दू मासससॅप्रारम्भ क' लेने छी। ई रुपैया हम अहाँके नहि पठाय अपनहि एतय जमा क' रहल छी जाहिसॅ झगड़ू बाबूक मोट कर्जसॅ उद्धार भ ' सकी । अहाॅके बुझले अछि जे दू बरख पहिने काशी नाथक निमोनिया बीमारी मे हुनकासॅ सत्तरि टाका दू पाइ सूदिपर लेने छलियनि ।सूदि-मूरि जोड़ि क' बहुत रास भ' गेलैक ।माय -बाबूक श्राद्धक कर्ज सभ सधि गेल अछि ।दुनू माय-बेटा अपना स्वास्थ्य पर ध्यान राखि ठंडासॅ बचि क' रहब ।कलम आब बन्द करैत छी ।पत्रक जवाब घुरती डाकसॅ अवश्य देब। अहींक , ---देवनाथ तेसर पत्र -------- हाई स्कूल,सहरसा ३/ १२/ १९९० प्रिय काशीनाथक माय, शुभाशीष। अहाॅक पत्र काल्हि जखन एकटा पानक दोकानपर ठाढ़ रही त' डाकपिउन हस्तगत करौलक । हम मोटा-मोटी कुशल छी ।पत्र पढ़िसभ समाचारसॅ अवगत भेलहु ।बेटा-पुतोहुक प्रसंगक सभ गप पढ़लहु ।की करबैक ?देह लगाए क' अंगेज' पड़ता।'अपन हारल आ बहुक मारल 'लोक बजितो नहि अछि ।बेंगाइक बेटा _पुतोहुक परतर जे अहाॅ तकैत छी से कोना होएत ।हम-अहाॅ ओहि जन्ममे दैवक घरमे आगि लगोने रहियैक ।सीता कुम्मरि एक पहर दिन उठलाक पश्चात सूति क' उठैत छथि। घर-आंगनक झाड़ू -बहारू , मनसा घर नीपब ,जारनि-काठी ओरिआएब,भानस-भात करब सभटा अहांके अपनहि करय पड़ैत अछि ।काशीयोनाथ बौकजकाॅ सभटा देखैत रहैत छथि ।की करबैक ?देह लगा क' मारू।बहिरा करैत बनि जाउ ।सगर पोखरिमे एकटा पोठी। हॅ, अहाँ लिखलहुँ जे काशी नाथ नी कुमरि के ल' जाय चाहैतछथि डेरा पर पटना। एहि लेल अहाँ कोना फसाद नहि करब। कनियाँके पटना सॅडेढ़ मास अएना भ' गेलनि। ओ मुर्गी जकाँ छटपटाइत होएतीह। जकरा जाहि बस्तुकएक बेरि चस्का लागि जाइत छैक, ओकरा छोड़ब पाथरपर दूध उगाएब जकाँ होइत छै। कतहु दुनू व्यक्तिबेकति रहथु, माँ भगवती सानन्दरखथुन। अहाँ कहते छी जे रात क' सपनो रूपेपएरो मे तेल नहि लगा देलनि। इहो नीके भेल। कमसँ कम एकर आदति त' नहि लागल। अहाँ कहैत छीजेसात दिनक छुट्टी ल' काशी नाथ गाम आयल छथि, मुदा खेत-पथार, कलम-गाछीदेखय नहि गएलाह। एतुका धन-सम्पतिसॅ हुनका कोनो मतलब नहि।की करबैक । हमरा-अहाँक परोक्ष भेला सन्ता एकर-सुख-दुःख ओ अपनहि बुझता । हम जनैत छी जे उदर विकार सँ अहाँ अस्वस्थ रहैत छी। लवण भास्कर चूर्ण आ त्रिफला चूर्णकसेवन नियमित रूप सॅ कएल करब । हम स हरसे ल' अनितहुँ, मुदा घरमे ताला बन्द क 'कोना आएब। चोरक हल्ला यदाकदाह होइत रहै छैक ।सुन्न घर-आंगन पाबिअन्न-पानि, सीता कुम्मरिक गहना-गुड़िया, पेटी-बाकस सभटा चोरबा सभ उठाके ल' जाएत। आब त' कोतवाल लोसभ रातिके पहरा देब छोड़ि देने छैक । रातिके जॅ कोनो जन-बोनिहारकें सुतबाको लेल कहबैक त' ' मारि करैत अछि ओकर दरमाहा । बौआ एतेक दिनसँ कमाइतो छथि, तथापि खगले रहैत छथि। जीवन भरि जे किछु कमाइ भेल ताहिसँ त' नाना प्रकारक भूरे सभकें मुनैतअएलहु।माय-बापक श्राद्ध ककर्ज, काशीनाथक मुंडन, उपनयन हुनक बी.ए. धरिक पढ़ाइक खर्च, पावनि-तिहार, दवाइ-वीरो आदिमे सभटा कमाइ चलि गेल। नोकरी कयलाकपश्चातो काशी नाथ कइएक बेरि हमरहिसँ टाका लेलनि अछि। हम-अहाँ एकटा ट्रान्जिस्टर किनबाक लेल सोचिते रहि गेल हुँ। नहि कीनि सकलहुँ। बौआ फूसि बाजि हमरासँ टाका मँगाय नोकरीक चारिए मासक पश्चात ट्रान्जिस्टर कीनि लेलनि। द्विरागमनक दुइएक मासक अभ्यन्तर कनियोके पटना ल' गेलाह। एहि बात सभहक चिन्ता नहि करब। चिन्ता चिता समान होइत छैक । स्वास्थ्य पर एहिसँ कुप्रभाव पड़त। दू वर्ष पश्चात हम रिटायर्ड भ' जाएब । अहाँके बुझले अछि जे हमरा सबके पेंशन नहि भेटैत छैक। अस्तु 'अनेर गायक राम रखवार' । पत्रक जवाब शीघ्र देव। क्रमश: काल्हि अहाॅक, -काशी नाथक बाबू चारिम पत्र ----------- मैनापट्टी, १७/४/२००१ चिरंजीवी काशी नाथ, शुभाशीर्वाद। एतय हमरा लोकनि नेपलिया रेल गाडी जकाॅ कुशल छी । डेढ़ माससॅ अहाँक समाचार नहि बूझि चिन्तित छी। पन्द्रह दिनसे अहाँक माय बीमार छयि ।ओ भनसा घर नी पीके निकलय लगलीह कि पएर पिछड़बाक कारणें चौकठि पर घड़ामसॅखसिपड़लीह। बेहोशी कारणे दाँती लागि गेलनि। लोक सभमुँह पर पानि छीटय लगलनि। केओ सरौता सॅदांत छोड़ाबय लगलनि त' गोटेक घंटाक प श्चातहोश मे अलीह। बादमे ढोढ़नबाबासँ दू सय रुपैया कर्ज ल' सरकारी अस्पताल ल' गेलियनि। डॉक्टर कहलक जे चोटक संग-संग ठेहुनक हड्डी टूटि गेल छनि। ढौआ-कौड़ीक अभाव में पुनः ढ़ोढ़न बाबाके सिमराहावाला पॅँचकठवा तेफसिला खेत भरना द 'चारि हजार टाका लेलहुँ। ठेहुन आ छाती दुनू ठाम बड़का पलस्तर क देने छनि। चौकीके थोड़ेक गोलमोल कटबाय आ ओकरा नीचाएकटा पैघ बर्तन राखिदेने छियैक।ओही मे सुतले-सुतले दीर्घशंका-लघुशंका करैतछथि। बाड़ीमे डबल खाधि कोड़ि देने छियैक। ओहीमे जाएके ओकरा खसायथोड़ेक माटिसँ झाँपि दैत छियैक। काँच-पाकल भोजन स्वयं बनाय लैत छी। हमरो स्वास्थ्य स्थिति नीक नहि अछि। डॉक्टर टी.बी. कायम कएलक अछि। अंग्रेजी दवाइ बड़ महग होएबाक कारणे वैद्य सँ दवाइ भ' रहल अति। भोजन मे दू पटल करय पड़ैत अछि। अहाँ क मायकलेल भात आ अपना लेल रोटी। अहाँ हमरा लोकनिक कोनो चिन्ता नहि करब। हमसभ काँच घैल छी। काँच घैलके मुंगरक आस। सीता कुम्मरि आ हरिनाथ के शुभ आशीर्वाद । शुभकांक्षी, देवनाथ पुनश्च : बंगट कोनो काजसँ पटना गेल छलाह। काल्हि हमरा हुन कासॅ मेंट भेल । ओ कहलनि जे अहाँ लोकनिक सभ परिस्थितिसँ हम अहाँक बालक के अवगत कराय देलियनि । अहाँ लोकनिक कुशलक्षेम कहलनि।अहाँ ताजमहल देखबाक लेल सपरिवार आठम दिन आगरा जाय रहल छी ई खबरि सुनि मन प्रसन्न भेल। हमरा लोकनिके त' आब 'औषधं जाह्नवी तोयं, वैद्यो नारायणः हरिः। डा. सुभाष चन्द्र झा, एम .ए. पी. एच. डी (मानविकी मैथिली) बी. आर. ए. बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क साहित्य यात्रा बौक बधिर वाचाल मनुज गंभीर ज्ञान गुण स्नातक मूक पशु धरि भाव प्रेक्ष निश्नात होइछ सरीसृप जातक।। वैधनाथ मिश्र "यात्री "क जन्म ओहि काल खण्ड जून 1911ई.में भेल जखन देश परतंत्रताक पीड़ा सं आजिज मुक्त हेवाक लेल छटपटा रहल छल। अनाचार अत्याचार सं दग्ध जनमानस निर्णायक संघर्ष पर उतारू छल, अंग्रेजी सत्ता के उखाडवाक प्रण लय गाम गाम शहर शहर आंदोलन तीव्रता सं पसरि रहल छल, ओहि प्रभाव सं हिमालयक तराई में बसल भारतक गौरवशाली सभ्यताक प्रतीक रहल मिथिला सेहो अछूत नहिं रहल, बाढ़ि अकालक जांत में पिसाइत पिसाइत मिथिलाक गौरवशाली समृद्ध अतीत मैलछौन भ गेल छल। सामंतवादी परिपाटी गरीबक जीवन दोजख कय राखि देने छल। अन्न अन्न लै रकटल प्राण शरीर के जीर्णशिर्ण कमजोर अशक्त कय राखि देलक। अभावक कारणें अनेको कुप्रथा जन्म ल चुकल छल, बालविवाह बहुविवाह छुआछूत नारी उत्पीड़न आदि ओहि समयक सामाजिक विवशता सं अंकुरित भय समाजक लेल कोढ़ बनि समाज के निम्नतर स्तर पर आनि पटकि देलक। भेदभाव जातिवाद में मिथिला दिन पर दिन अपन सम्भ्रान्त अतीत सं विलग होइत गेल। जाहि मिथिला मध्य सम्पूर्ण भारतवर्षक चटिया लोकनि विद्याध्ययनक लेल सुदूर प्रांत सं चलि ज्ञानार्जन कय पुनः स्वपरान्त गमन करैत छलाह आ मिथिलाक विद्वान सं प्राप्त ज्ञान के प्रकाश सर्वत्र प्रकाशित करैत छलाह। ओ मिथिला अशिक्षा गरीबीक दलदल मे धंसल चल गेल। एहन विकट संक्रमण काल खण्ड में वैद्यनाथ मिश्र "यात्री "क जन्म प्रतिकूलताक अनुकुल स्वाभाविक प्राकृतिक घटना क्रम लगैछ, कारण जेहन कठिन सं कठिन आबोहवा हो प्रकृति ओहि वातावरण मे सार्थक पादप वा लताक लेल माकुल वातावरण तैयार क दैछ। शीत रौद छांह नमी शुष्क ठरल जबकल मृदा उर्वर सभ तरहक भूमि स्थल में जैव तत्व सक्रियता देखल जाइछ, गरीबी में जन्म लै, मैटुअर भय पिता सं उपेक्षित समाज सं उपेक्षित भय वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" जीवन यात्राक प्रारम्भ कठिन दौर सं शुरू भय गेल। ज्येष्ठ मासक पूर्णिमा मेघ मे बादलक प्रताड़ना सहि अपन सौम्य प्रकाश के धरती तक पहुँचा क रहैछ तहिना मातृक सतलखा में जन्म लै यात्री तरौनी मधुबनी आवि पिता गोकुल मिश्रक संरक्षण में कहुना पालल पोषल जाय लगलाह ।शिक्षा दीक्षाक संग संस्कृत पंडित पिताक अध्यवसाय पंडिताई में सेहो डैन पूरैत अग्रसर होइत रहलाह। येनकेन प्रकारेण यायावार यात्री शिक्षा यात्रा क्रम में कलकत्ता बनारस आदि शहर में अपन अध्ययन पुर्ण कयल। बहुभाषाविद् यात्री संस्कृत पाली बंगला हिंदी मैथिली आदि में अनेको रचना कयल। पत्रकारिता कय घुमक्कड़ी जीवन के अपना बौद्ध भिक्षु बनि श्रीलंका आदि देशक यात्रा कय सामाजिक मनोविज्ञान के अपन लेखनीक आधार बनाओल । कवि यात्री दवल कुचलल अस्पृश्यक आवाज बनि ललकार लगौलनि समतावादी विचार के जगौलनि, ऊंच नीचक भेद के मेटौलन्हि, समाज में पसरल कुरीति के ऐना देखा मानवीय संवेदना के जगौलन्हि, विधवा विलाप, कविक स्वप्न, मुखर आवाज़ बनल अवला लाचार ओ गरीबक लेल। प्रगतिवादी विचारधाराक पोषक अन्वेषक कुपोषण ओ भुख के अद्भुत रूपें चित्रित कयने छथि, यथा- मकड़ाक जाल सं बेधल ओय चुल्हाक मुँह, थारी गिलास सब बेच खा गेलय ऊंह।। कवि यात्री क रचना बहुआयामी समसामयिक परिस्थितिक दर्पण थीक। मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ मिथिलाक नग्न गरीबीक दस्तावेज थीक। और वर्तमान परिपेक्ष में ओहि सं सबक लेबाक नीक उपक्रम। साहित्य अकादमी सं पुरस्कृत उपरोक्त संग्रह समीचीन विवेचनात्मक तथ्य के सामने स्पष्ट करैछ। चित्रा सामाजिक परिस्थितिक भयावहता के सामने रखैछ। आरो अन्य रचना बलचनमा पारो सामाजिक विषमताक गवाही दै यात्रीक प्रगतिवादी सोच ओ अन्याय पूर्ण मानवीय दोष पर प्रहार करैत दृष्टिगोचर होइछ। ।।इति।। अनुपम रैना, शोधार्थी, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर यात्रीक व्यक्तित्व ओ कृतित्व यात्रीक सामान्य परिचय :- कविशेखर ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापति युगसँ अविच्छिन्न रूपेँ प्रवाहित मैथिली काव्यधारामे मोड़ देनिहारमे मनबोध, चन्दा झा, सीताराम झा प्रभृति अनेक महाकविलोकनिक नाम लेल जाइछ, मुदा ओकर गतिकेँ तीव्रतम कऽ ओकरा आधुनिक युगक कोनो अन्य समृद्ध भाषाक काव्य प्रवाहक समानान्तर लऽ अनबाक श्रेय जाहि एक मात्र कविकेँ देल जाइछ, ओ थिकाह ‘यात्री’क उपनामसँ सुविध्यात श्री वैद्यनाथ मिश्र। हिनक लेखनीसँ नि:स(त मैथिली कविता अपन ओहेन सुच्चा सुवाससँ सम्पूर्ण वातावरणकेँ महमहा देलक जकर सुगन्ध लेबाक लेल दूर-दूरक लोक स्वत: आकृष्ट भऽ गेल। वस्तुत: आकृष्ट करऽवला हिनक व्यक्तित्वो अछि। अपन गाम-घरक भारसँ अपनाकेँ सतत फराक रखबाक चेष्टामे रत रहऽवला फक्कड़ व्यक्तित्व; सतत भ्रमणशील, समाज-संसारक रग-रगकेँ परखऽवला पारखी व्यक्तित्व; रूढ़िभंजक, श्रम-शक्तिक पूजक, व्यवस्थाक विद्रोही, नवीन पीढ़ीक प्रति आवेशी व्यक्तित्वक लोक छथि यात्रीजी। अपन जीवने जकॉं मैथिली कविताकेँ ई संकीर्ण छन्दक बन्धनसँ मुक्त कऽ सर्वहाराक प्रशस्त बाटपर उन्मुक्त विचरण करबाक हेतु छोड़ि देलनि। यात्रीजी आधुनिक मैथिली साहित्य मध्य एकटा एहन देदिव्यमान नक्षक रूपमे अवतीर्ण भेलाह जे सम्पूर्ण मैथिली साहित्येक धाराकेँ मोड़ि देलनि। मैथिली साहित्यक आधुनिक जनक कवीश्वर चन्दा झा जँ नव प्रयोग कऽ पूर्वक रूढ़िक परम्पराकेँ तोड़लनि तँ भुवनेश्वर सिंह भुवन ओहिमे प्रगतिवादक वीजारोपण कएलन्हि। मुदा यात्रीजी ने केवल भुवनजी द्वारा स्थापित प्रगतिवादकेँ एकटा वटवृक्ष सदृश विशालकाय वनस्पति ठाए़ कएलन्हि अपितु ओहिमे पानिढारि-ढारि ओकरा यथार्थवादक सघन सुन्दर, आकर्षक आ मनोरम वाटिका बना देलनि। आधुनिक मैथिली साहित्यमे वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक विशिष्ट स्थान छनि। ई मैथिली काव्यगगनमे अपन असाधारण प्रतिभा तथा काव्यक सर्वांगपूर्ण प्रसाद-माधुर्ययुक्त कवितासँ अक्षुण्ण आभाक आभास नहि दैत छथि, अपितु साहित्य-मर्मज्ञकेँ रसास्वादन करयबामे सुक्ष्मगतिक प्रदर्शक छथि। जाहि भावक वर्णन आन-आन कविगण पैघ-पैघ छन्दमे कएने छथि आ ओकर अभिव्यक्तिक लेल ध्वनि तथा अलंकारक बोझसँ दबि गेल छथि, तकरा यात्रीजी ग्रामीण भाषाक माध्यमसँ छोटसँ छोट छन्दमे अभिव्यक्त करबामे पूर्ण सफल भेल छथि। यात्रीजी अपन रचनासभमे मैथिली बोलीक ठेंठक ढाठ बन्हैत छथि। मैथिलीक ठेंठ शब्द सभपर हिनक पूर्ण अधिकार छनि। हिनका प्रसंग डॉ. शैलेन्द्र मोहन झाक कहब छनि :- “यात्रीजीक कवितामे एक विचित्र विविधताक दर्शन होयत। रूढ़ि-जर्जर एवं आत्मविश्वाससँ ग्रसित जीवन, शोषण उत्पीड़नक दारूण ज्वालामे दग्ध होइत जनताक दुख-दर्द, समाजमे अन्तर्निहित वर्गसंघर्षक भावना, जीवनक सरल सात्विक वर्णन, प्रकृतिक एकसँ एक रमनगर रूपक अतिरिक्त ‘प्राचीन’, मध्यकालीन आ आधुनिक मिथिलाक माटि-पानिकेँ-हर-जनकेँ- कोसी लखिमाकेँ नहि विसरि सकलाह अछि।”[1] बहुमुखी प्रतिभासँ सम्पन्न, सामाजिक परिवेशक निपुण तथा अपन भाषा व्यवस्थाक कारणेँ वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’आधुनिक मैथिली साहित्यमे अपन उपलब्धिमे बहुचर्चित रचनाकार थिकाह। कवीश्वर चन्दा झाक लोकवादी भावना ओ भाषा व्यवस्था, महाकवि सीताराम झाक व्यंग शैली ओ ठेंठ भाषाक ठाठ तथा भुवनजीक प्रगतिशीलताक नवोन्मेष यात्रीजीक काव्य व्यक्तित्वमे एकाकार भऽ गेल अछि। हिनक रचना सभमे विशेष कए कवितामे देश प्रेमसँ उत्पन्न आत्मवेदना, साम्राज्यवादक भयंकर स्वरूपक विरूद्ध कान्ति, जनवादी परम्पराकेँ संगठित रूपसँ प्रकट करब समाजमे प्रचलित कला रूपकेँ अपनायब आ जनभाषाक सरस, सरल स्वरूप दिस झुकान देखैत छी। एतबे नहि हिनक रचनामे मार्क्सवादी प्रभाव देखबामे अबैत अछि, जाहिमे आर्थिक विषमता, समिष्टिक भावना, भावक गहराइ, पलायनवादी प्रवृत्तिक अभाव, समिष्टिक चेतनापर बल आ निम्न स्तरक जीवनपर प्रकाश भेटैत अछि। मिथिला मध्य यात्रीक परिचय एकटा फक्कर, घुमक्कर बाबाक रूपमे छनि मुदा इतिहासकारलोकनि मैथिली साहित्यक हिनक रचना आ ओकर भाषाकेँ परेखि करैत छथि। आधुनिक मैथिली साहित्य मध्य दूटा महामानव एहन छथि जनिक भाषा हुनक परिचय दऽ दैत अछि। ओहिमे एकटा छथि प्रो. हरिमोहन झा जनिका आँगुरपर भाषा नचैत छल तँ दोसर महामानव छथि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जनिक प्रत्येक साहित्यक रचनाक भाषा हुनक परिचय स्वत: करा दैत अछि। एहि प्रसंग दुर्गानाथ झा श्रीशक अभिमत छनि :- “अभिव्यक्ति शैलीमे तँ ई कान्ति उपस्थित कऽ देल। मैथिली साहित्यमे हिनकहिटा भाषा यथार्थ रूपमे लोकभाषा थिक। मुदा अपन प्रतिभावक स्पर्शसँ ओ ग्राम्य भाषाकेँ साहित्यकता प्रदान कएल। हिनक रचनाकेँ जे सर्वाधिक मार्मिकता प्रदान करैत अछि से थिक यैह स्वाभाविक भाषाक प्रयोग ओ वक्रतापूर्ण कहबाक रीति जाहिमे व्यंगार्थ बेस चमकऽकारक होइत अछि।”[2] मैथिली साहित्यक प्रत्येक विद्वान यात्रीजीकेँ अपना-अपना ढंगसँ परिचय करबैत छथि। कियो हुनक भाषा-शैलीसँ तँ कियो सुच्चा ठेंठ बोलीक ठाठसँ। किछु विद्वान हुनका प्रगतिवादसँ चिन्हैत छथि तँ किछु यथार्थवादसँ। कियो घुम्कर-फक्कर झोड़ा ढंगने साहित्यकार बुझैत छथि तँ कियो मार्क्सवादी विचारधारक समर्थक। कतहुँ ई वौद्ध धर्मावलम्वीक रूपमे प्रख्यात छथि तँ कतहु सर्वहाराक हिमायती। एक ‘वैद्यनाथ मिश्र’कतोक उपनामसँ चर्चित परिचित छथि। कियो ‘यात्री’कहैत छनि तँ कियो ‘नागार्जुन’कियो ‘विद्याथ्र्ज्ञी’कहैत छनि तँ कियो ‘वैदेह’, जखन कि मैथिली साहित्यक ख्यातिनामा विद्वान डॉ. जयकान्त मिश्र हिनक भाषा-शैलीकेँ पकड़ि हिनकासँ परिचित करबैत छथि :- “Trhe change in the cdoms of these poems is remarkable. The poet does not use Sanskriticed words and rise a colloquial style to the poetec level. Ingenions thought, epigrammatic and terse slyle, colloquial diction, utiparalleled speed and tempo and obserration Characterise these poems.”[3] यात्रीजीक जन्म स्थान :- यात्रीजीक जन्म तिथि संदेहास्पद अछि। ओ स्वयं अपन जन्म तिथि 1911 ई.क ज्येष्ठ पुर्णिमाकेँ मानैत छथि तथा हुनक पुत्र सेहो हुनक जन्मक विष्ज्ञयमे उपर्युक्त तिथिएकेँ स्वीकार्य करैत छथि, मुदा किछु अन्य श्रोतसँ विद्वान लोकनि हिनक जन्म 30 जून 1911 ई. शुक्रदिन मानैत छथि। दुनू तिथि भिन्न-भिन्न भऽ जाइत अछि कारण जँ जज्येष्ठ पुर्णिमा 1911 ई.केँ हुनक जन्म तिथि मानी तँ ई 11 जून रविदिन पड़ैत अछि। मुदा दुनू तर्कमे मात्र दिनक अन्तर होइत अछि वर्ष 1911 ई. तँ निश्चित अछि। सन 1998 ई.मे राजकमल प्रकाशन नयी दिल्लीसँ प्रकाशित यात्री समग्रक अनुसार हिनक जन्म सन् 1911 ई.मे जेष्ठ पूणिमाक दिन दरभंगा जिलाक तरौनी गाममे भेलनि। मुदा अन्य श्रोतक अनुसार उक्त तिथिकेँ यात्रीजीक जन्म हुनक मातृक मधुबनी जिलाक सतलखा गाममे भेल छलनि तथा तरौनी हुनक पैतृक गाम छलनि। हिनक पिताक नाम गोकुल मिश्र तथा माताक नाम उमा देवी छलनि। यात्रीजीक वचपनक नाम ‘ठक्कनमिसर’ छलनि।[4] गोकुल मिश्र आ उमा देवीकेँ चारि गोट सन्तान भेलन्हि आ चारू लगातार असमय कालकवलित भऽ गेलनि। एहिसँ गोकुल मिश्र अति निराशापूर्ण जीवन जीबैत छलाह। अशिक्षित व्राह्मण गोकुल मिश्र ईश्वरक प्रति आस्थावान तँ छलाहे तथापि दुखक एहि समयमे अपन आराध्य देव भगवान शंकरक पूजा किछु बेसीए करय लागल छलाह। ओ पुत्र लालसाक हेतु वैद्यनाथ धाम (देवघर) जा कए बाबा वैद्यनाथक ओ यथाशक्ति उपासना कएलन्हि आ बादमे अपन गाममे आबि सेहो पूजा पाठमे समय बितबय लगलाह। बाबा वैद्यनाथक आशीर्वादसँ पाँचम सन्तान भेलन्हि। व्यक्तित्वक परिचय :- व्यक्तित्वकेँ अंग्रेजीमे ‘Personality’कहल जाइत अछि जे लैटिन भाषक ‘Persona’शब्दसँ बनैत अछि। ‘Persona’शब्दक अर्थ लैटिन भाषामे होइत अछि ‘मुखौटा’। ग्रीक कलाकार लोकनि रंगमंचपर अपन पहचान छुपेबाक हेतु ‘मुखौटा’केर प्रयोग करैत छलाह। बादमे Persona शब्दक अर्थ बदलि गेल। मनुष्य दोसरकेँ केहन देखाइत अछि, एहि अर्थमे बादमे‘Persona’शब्दक रूपान्तर ‘Personality’ अर्थात् व्यक्तित्वक रूपमे कएल जाए लागल।[5]व्यक्तित्व शब्द भाववाचक संज्ञा थिक। व्यक्तिक क्षेत्रमे जाहि गुण अथवा विशेषताक समावेश होइत अछि, ओ सभ व्यक्तित्वक अन्तर्गत अबैत अछि। कहबाक तात्पर्य जे कोनो व्यक्तिक महत्वपूर्ण विशेषता ओहि व्यक्तिक व्यक्तित्व कहबैत अछि। व्यक्तिक एहि प्रकारक विशेषता ओकरा सामान्यसँ पृथक करैत अछि। अर्थात् कोनो व्यक्तिक विशेषताक समुदाय ओकर व्यक्तित्व कहबैत अछि।[6] मानक हिन्दी शब्दकोशक अनुसार व्यक्तित्व शब्द शब्दक युग्मसँ बनैत अछि, जकर अर्थ होइत अछि- व्यक्त हेबाक अवस्था वा भाव।[7] कोनो लोकक निज विशिष्ट क्षमता, गुण, प्रवृत्ति आदि जे ओकर उद्देश्य, कार्य, व्यवहार, आदिमे प्रकट होइत अछि आओर ओहिसँ ओहि लोकक सामाजिक रूवरूप स्थिर होइत अछि। लोकक मनोभाव एवं विचार ओकर कार्य तथा वाचिक, आंगिक क्रियासभमे, हाव-भावमे प्रकट होइत अछि, लोकक मन सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेशसँ संस्कारित होइत अछि। ई संस्कार सेहो ओकर क्रियकलाप, हाव-भावमे अनायास व्यक्त होइत अछि। व्यक्तित्व लोकक अन्तर्निहित गुणमे प्रकाशित होइत अछि तथा ओकरा अभिव्यक्त करबाक क्षमतेकेँ व्यक्तित्व कहल जाइत अछि। हिन्दी विश्वकोशमे व्रूक्तित्वक अवधारणा एहि प्रकारे देल गेल अछि- “व्यक्तित्व शब्द कोनो व्यक्तिक उद्दीपक मूल्यक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि।”[8]एकर तात्पर्य ओहि सम्पूर्ण प्रभावसँ अछि जे एक व्यक्तिक दोसरपर पड़ैत अछि उद्दीपकक रूपमे क्रियाक प्रभाव सेहो सतत् पड़ैत अछि, जकर ओ अन्य व्यक्तिक बीच उपक्रम करैत अछि। ई परिणामात्मक शक्ति एकटा एहन परिवर्तन उत्पन्न करैत अछि जे ओकर अपन दोसर लोक आ परिस्थितिकेँ प्रभावित करैत अछि। दोसर अर्थमे ई कहल जा सकैछ जे लोक आत्म परीक्षण करैत अछि तथा वाह)य जीवन, संगठन, एकता आओर स्थिरता उत्पन्न कए कऽ अपन अन्तर्वैयक्तिक स्वभावमे अपन आत्म धारणाक विकास करैत अछि। प्रत्येक रचनात्क व्यक्तिमे प्रतिभा महत्वपूर्ण होइत अछि। साहित्यिक कृतिसभमे साहित्यकार लोकनिक व्यक्तित्व प्रसंगत: किछु अंशमे अनायास प्रतिविम्बित होइत अछि। रचनाकारक अहमक संस्कार ओकर आत्माभिव्यक्तिक रूपमे व्यक्त होइत अछि। रचनाकारक ‘अहम्’समाजक सामूहिक अहमक संग तादात्म्य बना ओकर आनन्दक कारण कारण बनैत अछि। रचनाकारक व्यक्तित्व युग परिवेशसँ प्रभावित होइत अछि। उपर्युक्त सभ विवरणपर विमर्श कएलाक बाद ई कहल जा सकैछ जे दिव्य प्रतिभासँ उभरि कए कोनो साहित्यकारक व्यक्तित्व विकसित होइत अछि। कोनो लोकक किछु वाह्य एवं आन्तरिक तत्वसँ व्यक्तित्वक निर्माण होइत अछि। एहि तत्व सभक विवेचन व्यक्तित्व निरूपणमे अन्तर्भूत होइछ। साहित्यकारक परिवार, परिवेश, स्वभाव प्रवत्तियुगीन वातारण जीवनमे भेटयबला अवसर, किछु लगती, किछु कमजोरी, चुकल अवसर किछु क्षमता, किछु सबलता, जीवनक मूल्य दृष्टि, आदर्शक प्रभाव आदि अनुभवसँ बनल दृष्टिकोणसँ साहित्यकारक मानवीय व्यक्तित्वक निर्माण होइत अछि। ई व्यक्तित्व समाज आओर साहित्यकारक दायित्वमे, प्रतिवद्ध ओ सजग भऽ एकटा साहित्यकारकेँ सर्जक व्यक्तित्वक निर्माण सेहो करैत अछि। संक्षे9मे साहित्यकारक निजी व्यक्तित्व हुनक व्यक्तित्वक सामंजस्यसँ बनल एकटा विलक्षण व्यक्तित्व होइत अछि। यात्रीक साहित्यपर विवेचन करबासँ पूर्व हुनक जीवन परिवचय करब आवश्यक अछि। मनमे ई आशंका रहनि जे पूर्वक चारि सन्तानक भाँति इहो ने ठकि कए चलि जाए तेँ पाँचम संतानकेँ सभ ‘ठक्कन’नामसँ पुकारय लागल। कतोक दिनक बाद एहि ठक्कन नामक बालकक नामकरण भेल आओर बाबा वैद्यनाथक कृपा प्रसाद मानि एहि बालकक नाम ‘बैद्यनाथ मिश्र’राखल गेल। यात्रीक नामे प्रसिद्ध भेलाह। आगू चलि कए इएह बालक मैथिली साहित्य जगतमे यात्री, हिन्दीमे ‘नागार्जुन’, लेखकगण, मित्रमण्डली एवं राजनीतिमे ‘नागाबाबा’, संस्कृतमे ‘चाण्क्य’नामसँ प्रख्यात भेलाह। संगहि हिन्दी साहित्य जगतमे ‘आधुनिक कबीर’क नामे विभूषित कएल गेलाह। यात्रीक जन्म प्रसंग अद्यावधि निश्चित निर्धारण नहि भऽ सकल अछि। डॉ. जयकान्त मिश्र अपन पोथी The History of Maithili literature मे हिनक जन्म सन् 1908 ई. मानैत छथि। हिन्दी साहिय कोषमे हिनक जन्मक विषयमे 1910 ई. निर्धारित कएल गेल अछि। डॉ. प्रकाशचन्द्र भट्ट हिनक जन्म 1911 ई. मानैत छथि। डॉ. ज्ञानेश्वरदत्त हरित अपन शोध प्रबंध ‘नागार्जुन व्यक्तित्व और कृतित्वमे सन् 1911 ई. जेठ (जून) मासक कोनो तिथि मानैत छथि।[9] डॉ. प्रभाकर माचवें जेठ पूर्णिमा सन् 1911 ई.[10]बाबू राम गुप्त नागार्जुनक नानीक अनुसार जेठ मासक कोनो दिन 1911 ई. हिनक जन्म मानैत छथि।[11] मिथिलाक विद्वान लोकनिमे बहुसंख्यक सेहो जेठ (जून) पूर्णिमा सन् 1911 ई. सहए हिनक जन्म तिथि निर्धारित कएलन्हि अछि। यात्रीक जन्म निम्न मैथिल व्राह्मण परिवारमे भेल छलनि। हिनक जन्म स्थान मातृक ‘सतलखा’हेबापर कतोक विद्वान मत भिन्नता रखैत छथि मुदा अधिकांश विद्वान व्राह्मण मधुबनी जिलाक ‘सतलखा’केँ स्थापित करैत छथि जे मिथिलाक एकटा भू खण्डक अंग अछि। हिनक पैतृक गाम तरौनी दरभंगा नगरसँ लगभग 13 कि.मी. दूरीपर स्थित अछि। यात्रीक माता-पिता एवं वंश :- वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’क जन्म एकटा गरीब निर्धन परिवारमे भेल छलनि। हिनक पिताक नाम गोकुल मिश्र एवं माताक नाम उमा देवी छलनि। जखन यात्रीजी मात्र छह वर्षक छलाह तखनहि हिनक माताक देहान्त भऽ गेल छलनि। हिनक माता एकटा सुशील महिला आ अपन नैहरसँ सभ्रान्त परिवारसँ छलीह। कूल-मूलक दृष्टिऍं यात्रीक पैतृक पक्ष उच्च छल। मातृ विहीन छोट सन बालकक सम्पूर्ण पालन-पोषण एकटा एहन पिताक द्वारा भेल जे घुमक्कर, भंगेरी, लापरवाह, रूढ़िवादी गरीब अशिक्षित तथा कठोर स्वभावक व्यक्ति छलाह। हिनक पिताक मृत्यु सितम्बर 1943 मे काशीक मणि कर्णिका घाटपर भेल छलनि। माता-पिताक वात्सल्यसँ वचित बालक वैद्यनाथक शिशु मनपर पहिल छाप भरि जन्म अपन पिताकसँ अपमानित माए आ विधवा पतिअनिक दु:खक जीवनसँ पड़ल। जकर प्रभाव हिनक हिन्दीमे रचित उपन्यास- ‘रति नाथ की चाची’ तथा मैथिलीक दीर्घ कविता ‘विधवा विलाव’ मे देखल जाइत अछि। यात्रीक माताक देहावसानक बाद पिता गोकुल नाथ यात्रीकेँ अपन कान्हपर बैसा कए गामे-गामे घुमबथिन। कारण हुनक वृत्त ‘पुरहित-पाटी’ (पुरोहित कर्म) छलनि। गोकुल मिश्र एकटा कठोर आ घुमक्कर स्वभावक व्यक्ति छलाह। एहि प्रकारेँ यात्रीजीकेँ वाल्यकालहिसँ विरासतमे ‘यायावर’प्रवृति भेटल छलनि। उपर्युक्त वातावरण आ परिस्थितिसँ निकलल एकटा अबोध बालक माँ सरस्वतीक एहन बड़दपुत्र हैता से कियो नहि जनैत छल। मुदा यथार्थ इएह थिक। ईहो बात सत्य जे यात्रीक बाल मन पर जे उचाट बैसल तकर दंश ओ भरि जीवन झेलैत रहलाह, तकर प्रतिबिम्ब हुनक प्राय: सभ रचनामे देखल जा सकैत अछि। यात्रीजी अपन वचपनकेँ कहियो नहि जी सकलाह। एकटा मातृहीन बालकक सहारा पिता होइत अछि आ जखन ओ पिता आशिक्षित, अज्ञानी, मूर्ख, नशेरी हो तँ ओ कोमल नश्चछल बाल मनमकेँ कोना पढ़ि सकैछ। तेँ यात्रीजीक व्यवहार बादोमे सामान्य लोकसँ भिन्न होयब स्वाभाविक छल। किम्वदन्ती आ जनश्रुतिक अनुसार ‘गोकुल मिश्र’क विधवा भाभी आ कुलानन्द मिश्रक पत्नीसँ वैद्यनाथ मिश्रक अबैध संबंध छलनि।[12] मुदा उपर्युक्त तथ्य जे ‘नागार्जुन मेरे बाबूजी’मे वर्णित अछि एकर अतिरिक्त हमरा अन्यत्र कतहु नहि भेटल अछि तेँ एहि तथ्यकेँ हम पूर्णत: निराधार मानैत छी। यात्रीकेँ वाल्यकालहिमे अपन भाए द्वारा ईमान्दारी, परिश्रम, साहस, समृद्धि दृढ़ चरित्र हेबाक शिक्षा सहजहि भेटि गेल छल। हुनक माएक व्यक्तित्वक ई गुण हुनक कतोक रचनाक नारी पात्र सभमे परिलक्षित होइत अछि। यथार्थमे यात्री एकटा कर्मशील चरित्रवान व्यक्तित्वक लोक छलाह ई कहबामे हमरा कनियोँ संकोच नहि होइत अछि। यात्रीजीक वंश परिचय :- यात्रीजीक पूर्वजलोकनि बिहारक दरभंगा जिलाक तरौनी गाम स्थित वत्स गोत्रीय मैथिली व्राह्मण छलाह। हिनक कुलक पलिवाड़ मसौल शाखासँ ई परिलक्षित होइत अछि जे करीब दू सौ वर्ष पूर्व हिनक पितामह छत्रमणि मिश्र ‘मसौल’गामक निवासी छलाह। हिनक पिता गोकुल मिश्र तथा एहिसँ पूर्व तीन चारि पीढ़ीक पूर्वज लोकनि कम पढ़ल-लिखल छलाह। ओ लोकनि खेती-बारी करैत छला आ व्रितान पदाधिकारी लोकनिक देखभाल करैत छलाह। ओना हिनक पुर्वजमे वाचस्पति (अभिनव) आ रूचिपति आदि कतोक महामहोपाध्याय लोकनिक विवरण सेहो उपलब्ध अछि मुदा से साक्षात नहि भऽ गोत्रक शाखाक आधारपर अनुमानित अछि। “महामहोपाध्याय परमेश्वर झा मिथिलांचलक रत्न छथि। गामक मध्यमे हुनक मकानक भग्नावेश अद्यावधि अवस्थित अछि। एहि गाममे करीब 250 घर आ आबादी लगभग 3500 अछि। उपजाऊ भूमिक रकबा गाममे बेसी नहि अछि। गामक आवादीमे उच्च वर्गक आवादीमे मात्र व्राह्मण लोकनि निवास करैत छथि। गैर व्राह्मणमे यदुवंशी यादव लोकनि रहैत छथि। तरौनी गाम विद्या द्वारा अर्जित बाहरी कमाइ पर अपन अस्तित्व बचा कए रखने अछि। तरौनीक गैर व्राह्मण सेहो आब महानगर दिस आकर्षित भेलाह अछि। व्रह्मण आ गैर व्राह्मण मिलाकए मात्र पाँच-सात गोट परिवार अन्वेषणक क्रममे हमरा दृष्टिगत भेल जे गरीब छथि। शेष लोक अपन गुजर-वसर नीक जकॉं करैत छथि। गामक निम्न वर्गक लोक तँ अपन श्रमशक्तिक बदौलत स्त्री-पुरुष ठीक-ठाक कमा लैत छथि मुदा उच्चवर्गक लोक उच्च ख्शिक्षा पएबाक कारणेँ श्रम कार्य करबासँ परहेज करैत छथि। एकरा अपन प्रतिष्ठासँ जोड़ैत छथि। मैथिलीक एकटा कहाबत तरौनी गामक लेल सटीक वैसैत अछि- “छूछ गौरव छूटाइन ढेकार”अर्थात् प्रतिष्ठाक कारण अपन विपन्नताकेँ नहि उजागर करबाक मजबूरी।[13] यात्रीजीक पुत्र श्री शोभाकान्त अपन पोथी ‘नागार्जुन मेरे बाबूजी’मे लिखैत छथि- “हमर बाबा अर्थात् बाबूजी केर पिताजीकेँ अपन पूर्वजसँ पैतृत सम्पत्ति बेसी तँ नहि मुदा कामचलाऊ जरूर प्राप्त भेल छलनि।” गोकुल मिश्रक पिताक नाम छत्रमणि मिश्र छलनि। छत्रमणि मिश्रकेँ तीन गोट पुत्र- परमानन्द मिश्र, कुलानन्द मिश्र आओर गोकुलानन्द मिश्र। हिनकालोकनिक मातृक सहरसा जिलाक महिसी गाममे छल। मातृकक संपति सेहो हिनका तीनू गोटाकेँ प्राप्त भेल छलनि। आँगनमे तीन भाग एक-एकटा घर एक-एक माईक हिस्सामे पड़ल छलनि। पूवरिया घर कुलानन्द मिश्रक हिस्सामे, उत्तरवला परमानन्द मिश्रक हिस्सामे आ दक्षिणवला गोकुलानन्दक जिम्मामे छलनि। घरक बनावट भीतक देवाल, वाँस-काठक ठाठ तथा खढ़ (फूस)सँ छारल छल। पछवरिया वासडीह खाली पड़ल छल। आँगनसँ पूब पोखरि पड़ैत छल जे अद्यावधि अवस्थित अछि। आँगनसँ दक्षिण एकटा बसविट्टी छल जकर क्षीण अवशेष अखनहुँ स्थित अछि। गोकुल मिश्रक समयेमे परमानन्द बाबूक परिवार मातृक ‘महिसी’जा कए स्थायी रूपसँ बसि गेलाह आ हुनक उत्तराधिकारी लोकनि तरौनीक अपन हिस्सा बेचि कए एहि गामसँ सदाक लेल नाता तोड़ि गेलाह। शेष दुनू भाई मातृकक सम्पत्तिकेँ सेहो नहि राखि सकलाह।[14] चौदहवी शताब्दी अर्थात् 1310 ई.मे मिथिलाक महाराज हरसिंह देव द्वारा जे पंजी प्रथा चलाओल गेल छल ओकर मूल पंजीक वंश वृक्षक आधारपर यात्रीजी ‘वत्सगोत्रीय’पलिवार समौल मूलक निर्विवादित मैथिल व्रह्मण छलाह। यात्रीजीक पुत्र शोभाकान्तक अनुसार यात्रीक प्रपितामहक नाम पारसमणि मिश्र छलनि तथा उक्त पोथीक आधारपर यात्रीजीकेँ छओ गोट संतान छलनि जाहिमे चारि गोट पुत्र- शोभाकान्त, सुकान्त, श्रीकान्त तथा श्यामाकान्त तथा दू पुत्री छलीह- उर्मिल आओर मंजू, मुदा उमेक्षा वृत्ति एवं निर्धनताक कारणेँ कोनो पुत्र अथवा पुत्री उच्च विद्याभूषित नहि भऽ सकलाह। ओना हिनक दोसर पुत्र सुकान्त ‘सोम’ मैथिली साहित्यक स्थापित कवि, कथाकार एवं पत्रकार छथि। हिनक एकटा प्रसिद्ध कविता संग्रह निज सम्वादाता द्वारा प्रकाशित अछि। वर्तमानमे सुकान्त सोम हिन्दीक प्रसिद्ध दैनिक अखबार हिन्दुस्तानमे स्थानीय सम्पादकक रूपमे कार्यरत छथि। उपलब्ध श्रोतक आधारपर यात्रीजीक वंशावली निम्न सारिणीमे द्रष्टव्य अछि- पारसमणि मिश्र (प्रपितामह) छत्रमणि मिश्र (पितामह) परमानन्द मिश्र कुलानन्द मिश्र गोकुलानन्द मिश्र (चाचा) (चाचा) (पिता) शोभाकान्त सुकान्त श्रीकान्त श्यामाकान्त उर्मिल मंजू (पुत्र) (पुत्र) (पुत्र) (पुत्र) (पुत्री) (पुत्री) यात्रीक शिक्षा-दीक्षा :- बालक बैद्यनाथक पिता श्री गोकुलानन्द मिश्र रूढ़िगत अनपढ़ व्राह्मण छलाह। ओ वैद्यनाथकेँ अंग्रेजी शिक्षासँ अलग राखय चाहैत छलाह। कारण ओ बुझैत छलाह जे अंग्रेजी पढ़निहार लोक ‘क्रिश्चयन’बनि जाइत अछि। वैद्यनाथ मिश्रक प्रारंभिक शिक्षा अपन मातृक सतलखासँ प्रारंभ होइत अछि। एकरा किछु दिन बाद हुनका तरौनी गामक पाठशालामे नामांकन कराओल गेल। एहिठाम हिनक संस्कृत शिक्षा भेटलनि। गनौलीसँ ई ‘काव्यतीर्थ’क उपाधि ग्रहण कएने छथि। आगूक शिक्षाक लेल ई काशी तथा कलकत्ता गेलाह। हिनका समयमे संस्कृत शिक्षाक प्रचलन व्राह्मण परिवारमे छल। एकर प्रभाव यात्रीजीपर सेहो पड़लनि। अपठित दीन-हीन रहलाक बादो यात्रीजी अपन प्रतिभा दृढ़ विश्वास आ संघर्षक उच्च शिक्षा अर्जित कएलनि। यात्रीजी घुमक्कर लोक छलाह तेँ मिथिलाक बाहर अन्य प्रान्त सभमे सेहो जाइत छलाह। जिज्ञासु प्रवृतिक स्वभाव रहबाक कारणेँ यात्रीजी जाहि-जाहि प्रान्तमे अपन भ्रमणक क्रममे जाइत छलाह ओहि प्रान्त सभक भाषापर अपन अधिकार जमा लैत छलाह। यात्रीजी वहुभाषाविद् छलाह। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी, बंगला, पाली, मराठी, तिब्बती, सिन्धी, गुजराती, पंजाबी, तमिल, रूसी, चानी आदि भाषाक ज्ञाता छलाह। यात्रीजीकेँ प्रारम्भमे तँ अंग्रेजी भाषाक ज्ञान नहि छलनि मुदा भ्रमणक क्रममे ओ काम चलाऊ अंग्रेजी सीखि लेलनि। यात्रीजी काशीमे रहि संस्कृत भाषाक गहन अध्यययन कएलनि। एहि प्रकारेँ यात्रीजी किछु दिन गाम किछु दिन मातृक सतलखा,किछु दिन कलकत्ता तथा किछु दिन काशीमे संस्कृत साहित्यक अध्ययन कएलनि। एकर बाद बौद्ध भिक्षु भऽगेलाह आ श्रीलंका चलि गेलाह। यात्रीजी अपन 14 वर्षक उमेरमे संस्कृतसँ प्रथमा पास कएलनि। ओहि वरख तरौनीक प्रतिष्ठित विद्वान पण्डित अनिरूद्ध मिश्रक ध्यान हिनकापर पड़लनि। अनिरूद्ध बावू चारि-पाँच दिन धरि हिनक शिक्षा, बुद्धि आ प्रखरतापर ध्यान दैत रहलाह आ तकरा बाद हिनक पिंगल शिक्षाक गुढ़ता बुझवय लगलाह। किदु छन्दक प्रारम्भिक ज्ञान, पुन: वाल्मीकि आ कालीदासक किछु-किछु प्रसिद्ध पोथी सभकेँ लऽ कए छन्दक सामान्य ज्ञान देलनि। पहिल ‘समस्या’ जे वैद्यनाथ मिश्र पूर्ति कएने छलाह से छल- बलानां दरोदनम् बलम्...। संस्कृतसँ प्रथमाक बाद आगू पढ़बाक लेल बैद्यनाथ मिश्र जे अपन गाम-घर छोड़लनि आ आगू मुहेँ चलैत रहलाह तकर परिणति ‘यात्री’नामे देखार भेल। बैद्यनाथ मिश्रकेँ विद्यार्थी- वैदेह- यात्री वा नागार्जुन धरिक विशेषण लगबैमे 1925 ई.सँ 1937 ई. धरि पूरा एक युग यानी बारह वर्ष लागल रहन्हि। प्रथमाक बाद गणौली- पंचगछिया रहि तीन वर्षमे ‘मध्यमा’फेर पढ़ाइ अथवा आन किछु करी तकर इतह-तितहमे किछु मास आ अन्तत: पढ़बाक लेल काशी गेलाह। काशीमे प्रख्यात मैथिलीक कवि पण्डित सीताराम झा संस्कृत काव्य दिस झुकैत बैद्यनाथकेँ मैथिली आ हिन्छी कवि कर्म दिस घुमा देलथिन। कविवर सीताराम झा अपन प्रेरणा आ प्रशिक्षण दऽ संस्कृत आ हिन्दी-मैथिली काव्य शास्त्रक अन्तर आ अन्तरसंबंध नीक जकॉं परिछा देने रहथिन। जाहि समय भाषा-शिल्प-बिम्ब आदिक प्रयोगसँ वाक्य विन्यासमे चमत्कार अनबाक रहस्य सीखैत रहथि ओहि कालमे पण्डित बलदेब मिश्र बैद्यनाथकेँ सांस्कृतिक परम्पराक संग वर्तमानकेँ बुझबाक हेतु प्रेरित कैलथिन। दैनिक अखबार आ जनजीवनकेँ निकट जा कए देखबाक जिज्ञास ओहि समयसँ हिनका अन्दर जागृत होमय लागल। पण्डित अनिरूद्ध मिर, कविवर सीताराम झा आ पण्डित बलदेव मिश्र वैद्यनाथक जीवन निर्माणमे तीनटा सबल ईंटा जकॉं छथि जाहिपर पं. बैद्यनाथ मिश्र सन बहुभाषी विद्वान आ काव्य शास्त्र मर्मज्ञ, जनकवि नागार्जुन एवं युग पुरुष यात्रीक विशाल, विलक्षण तथा अविस्मरणीय व्यक्तित्व ठाए़ भेल आगू आबि कए।[15] यात्रीजी संस्कृत भाषामे रूचि रहबाक कारणेँ प्रथमा, मध्यमा ओ ‘काव्यतीर्थ’क उपाधि प्राप्त कएने रहथि। काशीमे हिनका ज्योतिषाचार्य बलदेव मिश्र, त्रिलोचन झा, रायबहादुर श्रीनाथ मिर सन कतिपय विद्वानकसानिध्यमे रहि कऽ संस्कृत भाषाक गहन अध्ययन कएलनि। एहि प्रकारेँ मनक अन्त: संघर्ष कतेको तनाव, पारिवारिक बोझ, आर्थिक तंगी आदिकेँ रहैत वैद्यनाथ मिश्र जे शिक्षा ग्रहण कएने छथि ओ अति दु:साहसु कार्य छल। यात्रीक जीवन वृत एवं आजीविका :- आधुनिक कालमे विशेष रूपेँ स्वातंप्योत्तर कालमे हिन्दी एवं मैथिली कथा-साहित्यमे यात्रीजीक विशिष्ट स्थान छनि। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्दक बाद हिन्दी साहित्य मध्य समाजक पीड़ित, शोषित, किसान, मजदूर वर्गक जीवनक चित्रण करयबला कथाकारमे नागार्जुन (यात्री)क नाम उल्लेखनीय अछि। हिनक कथा साहित्यमे सामाजिक अत्याचार आ प्रखर शोषणक चित्र प्रस्तुत कएल गेल अछि। प्रेमचन्दक समान यात्री सेहो उमेक्षितक पक्षधर छलाह। ई हिन्दी एवं मैथिलीक प्रखर कथाकार एवं जनवादी चेतनाक कार्यवाहक छथि। हिनका कथाक केन्द्र-बिन्दुमे किसान-मजदूर, दबल-कुचलल गाम घरक लोक रहैत अछि तेँ ई अपन जनवादी चेतनाक अभिव्यक्तिमे मुख्य रूपेँ ‘किसान, मजदूरद्व नारी समाज, दलित एवं निम्न वर्गक लोकक लेल आस्था रखैत छथि। यात्रीजीक समस्त साहित्य हिनक जीवनसँ अभिनन रूपेँ जुड़ल अछि। हिनक जीवनक कथा स्वयं केर अनुभव, विचार, समस्त मानवतासँ जुड़ि हुनक मने हुनक साहित्य थिक। यात्रीजी अपन युग आ समस्त भारतीय समाज राजनीति, धर्म, लोकतंत्र आ जनवाद आदिसँ सतत् जुड़ल रहलाह। ओना तँ यात्रीजी कथाकारक रूपमे ख्याति पाओने छथि मुदा देखल जाए तँ ई मूलत: कवि छथि। हिनकामे कथाकार, उपन्यासकार, आलोचनक तथा एकटा सुधि चिन्तकक जकॉं अनेक विशेषता विद्यमान छलनि। अपन विशिष्ट शैली, जनवादी विचार, शोषित एवं पीड़ितक दु:ख-दर्दकेँ बुझयबला तथा शोषकक षडयंत्रकेँ उघारयबला निडर, निर्भीक साहित्यकार छथि। पीड़ित लोकसँ आत्मीयतारखबाक कारणेँ हिन्दी एवं मैथिली साहित्य मध्य हिनक एकटा विशिष्ट स्थान छनि। आधुनिक साहित्यकारलोकनि अपन युगीन विशेषता- घात-प्रतिघात, विकृति, विरोधाभाष, समस्या, जिज्ञासा विषमता आदिकेँ विभिन्न विधा सभमे अभिव्यक्त कएलन्हि अछि। यात्रीजी सेहो उपर्युक्त तथ्यसभकेँ अपन साहित्यमे उठेलन्हि अछि। यात्रीजी बाल्यकालहिसँ एक स्थानसँ दोसर स्थानक यात्रा करैत छलाह। एहन लोकक जीवन यापन कोना होइत छैक ईहो एकटा बिडम्बने अछि। गुजर करबाक लेल कठिन परिश्रमक आवश्यकता होइत छैक, मुदा जे व्यक्ति उपनयन संस्कारक बाद अपन गाम-घर त्यागि पड़ा जाए, साधु बनि जाए, बौद्ध भिक्षु बनि जीवन-यापन करैत हो ओहेन व्यक्ति अपन जीवन-यापनक हेतु रोजगार कतए खोजत? जखन जीवनक बहुमूल्य समय नव-यौवनमे धन कमयबाक छल ताहि समय ओ कोलम्बो, तिब्बत आ वर्मामे घुमि-घुमि बितौलनि तखन रोजगार कतए भेटत। हिनक जन्म मिथिलाक एकटा साधारण परिवारमे भेल छल। खेत-पथार ओहेन नहि रहनि जाहिसँ जीविका चलि सकए। पिता कोनो तरहेँ पोसि कए युवक बनौलकनि। मुदा हिनक तँ जन्म भेल छल साहित्य साधना करबाक लेल। तेँ ई अपन जीविकोपार्जनक साधन एकमात्र साहित्य साधना बुझलनि। आ एहि क्षेत्रमे एकसँ एक नवीन अध्याय जोड़ैत गेलाह। ई बात सत्य जे भाग्यहीन होयबाक बादो जँ मनुष्य प्रतिभा सम्पन्न होइछ तँ ओकर विकास होयब निश्चित अछि। कोनो प्रकारक संकट किएक नहि हो, जँ लक्ष्य प्राप्त करबाक मनोभाव रहैछ तँ बेरा पार अवश्य लागि जाइत अछि। सन 1932 ई.मे यात्रीजीक विवाह मिथिलांचलक सुदूर देहात मधुबनी जिलाक हरिपुर ढंगा गाममे अपराजिता देवीक संग भेलनि। दुई वर्षक बाद दुरागमन सेहो भऽ गेलनि मुदा एहन सन्यासीकेँ एहि समयमे एकर आवश्कता नहि छल आ ओ पुन: अपन गाम घरकेँ छोड़ि पड़ा गेलाह। यात्रीकेँ कहियो धनक लालसा नहि छल। एकटा प्रश्न सभक मनमे उठैत अछि जे ओतेक प्रतिभा सम्पन्न यात्री छलाह तखन नोकरी किएक नहि भेलन्हि? मुदा एक सटीक उत्तर हुनक धर्म पत्नी अपराजिता देवी अपन एकटा साक्षात्कारमे एहि प्रकारेँ देने छथि- “हुनकर अपन खुशी जे नौकरी नहि कएल अंग्रेजक विरोध करैत छलाह। गाँधीक संग रहैत छलाह। चारि बेर जेल गेल छथि। सन्यासी भऽ गेलाह। सन्याससँ लौटलाक बादो गृहस्थी बसेबाक लेल ओ तैरूार नहि भेलाह। हमरा अन्न-पानि नैहरसँ आबि जाइत छल। किछु पाइ हुनक लिखल अखबारक रचनासँ आ किछु जेलक भत्तासँ अबैत छल। जाहिसँ हमर पारिवारिक गुजर-बसर कोनो तरहेँ चलैत छल।”[16] एहिसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे यात्रीजी अपन आजीविकाक कोनो स्थायी नहि कऽ सकल छलाह। समय-समयपर अपन रचनाकेँ प्रकाशित भेलाक उपरान्त जे कठोर परिश्रमक कमाई होइत छल ओहिसँ पारिवारिक भरण-पोषण होइत छलनि। मूलत: आजन्म यात्रीजीक जीविकाक एक मात्र साधन इएह रहलनि ओना शोभाकान्त एवं सुकान्त दुनू बेटा स्वयं कमासुत भऽ गेलाक बाद ओते कष्ट नहि रहलन्हि। बादमे बिहार सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, बंगाल सरकार ओ अनेक संगठन पुरस्कार स्वरूप यात्रीजीकेँ अनेको बेर सहायता भेटलनि। जाहिसँ हिनक गुजर-वसर चलैत रहलन्हि। परिवारक बोझ हिनकापर नहि रहलन्हि संगहि कोनो तरहक लालसा सेहो नहि रहलनि। मुदा एकटा महान कथाकारक आर्थिक व्यथाक कथा हृदय अवश्यक विदीर्ण कऽ दैत अछि। यात्रीक विभिन्न नाम एवं भिक्षु जीवन- यात्रीजी तीन नामसँ साहित्य जगतमे सुविख्यात छथि। हिनक जन्म समय नाम पड़ल ‘ठक्कन’। एकरा बाद हिनक नामकरण कएल गेल वैद्यनाथ जे कौलिक उपनामक कारणेँ ‘वैद्यनाथ मिश्र’नामसँ प्रसिद्ध भेलाह। हिन्दी साहित्यमे नागार्जुन तथा मैथिली आ संस्कृत साहित्यमे ‘यात्री’क नामे परिचित छथि। अपन प्रतिभा एवं पढ़ाकू प्रवृत्तिक कारणेँ गामक लोक हिनका ‘विद्यार्थी’कहि सेहो सम्बोधित करैत छलाह। यात्रीक एकटा उपनाम ‘वैदेह’सेहो छनि। पिता गोकुल मिश्र आ माता उमा देवीकेँ ‘यात्री’क जन्मसँ पूर्व चारिगोट संतान जन्म लैतहि काल कवलित भऽ गेल छलनि। दुनू मिश्र दम्पत्ति पुत्रक लेल अति चिन्तित रहैत छलाह। पुत्रक इच्छासँ दुनू प्राणी ‘बाबा वैद्यनाथ’ (देवघर) मे जा हुनक पूजा-अर्चना अति भक्ति-भावसँ कएलनि। वैद्यनाथ बाबाक कृपासँ पुत्र जन्म लेलकनि। मुदा मनमे आशंका छनि जे अन्ये पुत्र जकॉं ईहो ने ठकि कए चलि जाए। तेँ बालक यात्रीक जन्म होइतहि सभकियो हिनका ‘ठक्कन’कहए लगलनि। चूमि वैद्यनाथ बाबाक आशीर्वाद स्वरूप हिनक जन्म भेल छलनि तेँ हुनकहि नामपर बादमे हिनक नाम ‘वैद्यनाथ मिश्र’राखल गेल। वैद्यनाथ मिश्र जखन मैथिली आ संस्कृतिमे साहित्य लेखन करैत छलाह तखन ओ ‘यात्री’नामसँ लिखैत छलाह। चूमि हिनक जन्महिसँ हिनक कुल-परिवारक लोक प्रयाण कऽ जएबाक आशंकासँ चिन्तित छल, तेँ बादमे ‘यात्री’क नामसँ कविता आ उपन्यास लिखय लगलाह। यात्रीजी एहि नामक प्रसंग स्वयं लिखैत छथि :- “ओना पहिल साहित्यिक नाम यात्री छल। संस्कृत आ मैथिलीमे ‘यात्री’क नामसँ लिखि रहल छी। बहुत लोककेँ तेँ पतो नहि छनि जे यात्री आ नागार्जुन एके व्यक्ति अछि।”[17]यात्रीजी विभिन्न पत्र-पत्रिका सभमे लिखैत छलाह आ यात्री नामसँ लेखन करबासँ पूर्व वैद्यनाथ मिश्र ‘वैदेह’नामे लिखैत छलाह। हिनक नाम नागार्जुन कोना पड़ल ताहि प्रसंगयात्रीजी स्वयं लिखैत छथि :- “मैं राहुल जी के साथ यात्रा पर निकल गया... फिर हम लंका गये। वहाँ मैं बौद्ध भिक्षु हो गया। उसी स्थान पर मुझे नागार्जुन नाम दिया गया, जो चल रहा है।”[18]एहि प्रसंग बाबूराम गुप्तक कहब छनि जे- भारतक विभिन्न खेत्रक भ्रमण करैत नागार्जुन सन् 1936 ई.क अन्तमे सिंहल द्विप (श्रीलंका) चल गेल। ओतहि ओ गृहस्थ रूप छोड़ि ‘चीवर’ धारण कएलनि। ओहिठा ओ बौद्ध जगतक प्रख्यात, लंकाक प्रचीन विद्यापीठ- विद्यालंकार- परिवेणमे पहुँचि कए बौद्ध धर्ममे दीक्षा प्राप्त कए बौद्ध भिक्षु बनि गेलाह। ओ प्रख्यात बौद्ध तत्ववेताक दर्शनिक ग्रन्थ सभक अनुवाद करय चाहैत छलाह आ ओ वैद्यनाथ मिश्रक स्थानपर अपन नाम ‘भिक्षुनागार्जुन’ कऽ लेलनि।[19] यात्रीजी जखन लंकासँ भारत अएलाह तँ रामवृक्ष बेनीपुरीजीसँ मिललनि। बेनीपुरीजी हुनका ‘नागार्जुन’नामसँ लिखबाक सलाह देलखिन। यात्रीजी हुनक सलाह मानि हिन्दी साहित्यक लेखन नागार्जुनक नामसँ करय लगलाह। एही नामसँ हिन्दी जगत मे अपन पृथक स्थ्ज्ञान बना लेलनि। जखन वैद्यनाथ मिश्र संस्कृतमे लिखैत छलाह तँ ओहि समय ‘चाणक्य’आ मैथिलीमे ‘यात्री’नामसँ सुविध्यात भेलाह। एहि प्रकारेँ यात्रीक पृथक-पृथक नाम आ पृथक-पृथक नामसँ कएल गेल लेखन अद्यावधि उपलब्ध अछि। विवाह एवं पारिवारिक जीवन :- 19 सम वर्षक आयुमे सन 1930 ई.मे यात्रीजीक विवाह अठारह वर्षीय अपराजिता देवीसँ भेलनि। यात्रीजीक मनमे सदैव अपन पत्नीक प्रति सहानुभूतिक भावना रहलनि, मुदा ययावरी जीवनक कारणेँ उचित स्नेह नहि दऽ सकलाह। सन् 1938 ई.सँ 1941 ई. धरि घर छोड़ि भ्रमण करैत रहलाह। एकरा बाद पुन: गृहस्थीमे निमग्न रहलाह मुदा हिनक संबंधी एवं मित्रलोकनिक कहब छनि जे एहन गृहस्थीसँ संयासीए रहब उचित छल। यात्रीजी घुमक्कर प्रवृत्तिक लोक छलाह। अपन पिताक प्रति तिरस्कारक भावना जे हिनका पिताक दुर्व्यवहार सन प्रवृतिक कारण उत्पन्न भेल छल, ज्ञान प्राप्तिक जिज्ञासा एवं पिताकेँ दण्डित करबाक उद्देश्येँ ई घर त्यागि देने छलाह। मुदा पत्नीक प्रति हिनका सदैव स्नेह आ सहानुभूति रहैत छलनि। यात्रीजीक सम्पूर्ण जीवन आर्थिक संघर्षक रहल ई हिनका विषयमे उपलब्ध जे कोनो ग्रन्थ अछि ओहिसँ स्पष्टत: प्रमाणित भऽ जाइत अछि। प्रारम्भमे जीवन निर्वाहक लेल ‘बुढ़वर’ ‘विलाप’ नामसँ आठ-आठ पेजक दू गोट पोथी छपबा कऽ स्वयं रेलगाड़ीक डिब्बामे घुमि-घुमि बेचैत छलाह आ एहिसँ उत्पन्न आयसँ अपन गृहस्थी चलबैत छलाह। यात्रीजी पिताक आग्रहपर किछु दिन लुघियानामे जैनमुनि उपाध्याय आत्मारामजीक साहित्य निर्मित काज हेतु नौकरी सेहो कएलनि मुदा वेतनभोगी बनब हिनका स्वीकार्य नहि छलनि तेँ नौकरी छोड़ि देलनि। ई भरि जीवन अपन साहित्य सृजनक प्रकाशनसँ प्राप्त रायल्टी एवं मिथिलाक देहातमे अल्पमात्रामे खेती-बारीक आयपर निर्भर रहलाह। पिताक मृत्युक बाद यात्रीजी अनाथ भऽ गेलाह। पैतृक गामक घर-गृहस्थीक सभ भार पत्नी अपराजिताक ऊपर आबि गेलनि। अपराजिता देवी भू-स्वामी किसानक बेटी छलीह। भूमिक महत्व ओ बुझैत छलीह। हुनका शहरक वातावरण कथमपि रास नहि अबैत छलनि ओना यात्रीजीकेँ सेहो शहरक ताम-झाम पसिन्न नहि छलनि मुदा साहित्यिक कार्यक हेतु हुनका शहरसँ संबंध राखब आवश्यक बुझाइत छलनि। तेँ अपराजिता देवी ई निर्णय लेलनि जे ओ गामे धी कए रहतीह आ पतिकेँ (यात्रीकेँ) जतए जेबाक होनि ओ जाथु। यात्रीजी अपन परिवारक भरण-पोषणक चिन्ता कहियो नहि केलनि। ओ सतत् भ्रमणशील रहलाह। एहि अभ्यंतर पत्नी अपराजिता देवी थोड़-बहुत खेत-पथार आ नैहरक बलेँ अपन बाल-बच्चाक उदर पोषण करैत रहलीह। मुदा एहि बातकेँ कथमपि नहि नकारल जा सकैछ जे हुनका घरक चिन्ता नहि रहैत छलनि। ओ अपन पत्नी आ धिया-पुताक उदरपोषणक हेतु सेहो सदिखन चिन्तित रहैत छलाह। एहि कारणेँ ओ अपन भ्रमणक क्रममे- पंजाब, हिमाचल, राजस्थान, कठियावाड़ सिंहल द्विप, जतए-जतए गेलाह ओहिठामक प्राकृतिक रूप, लोकजीवन साहित्य, भाषा, संस्कृति, धर्म आदि संबंधी ज्ञान प्राप्त कएलनि। सन् 1951 ई.मे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धामे ओ नौकरी कएलनि मुदा सेहो उपजिविका चलेबाक हेतु। कखनहुँ कविता गाबि कऽ बेचैत छलाह, कखनहुँ अनुवादकक रूपमे चाकरी कए कऽ साहित्य लेखन करैत छलाह। कखनहुँ अध्यापकक रूपमे। एहि विविध अस्थायी कार्य सभसँ जे किछु उपार्जन होइत छलनि ताहिसँ अपन खर्चक अतिरिक्त जे बँचैत छलनि ओ पत्नीकेँ पठा दैत छलथिन। यात्रीजीकेँ अपन पत्नी आ घरक चिन्ता सतत रहैत छलनि, मुख्य रूपसँ आर्थिक संकटक। जकर प्रमाण 7 अगस्त 1976 ई.क लिखल हुनक निम्न पत्रमे दृष्टिगत होइछ जे ओ अपन पत्नीक नामे लिखने छथि- c/o राजकमल प्रकाशन 8 फैज बजार दिल्ली- 6 7-8-76 सोस्ति सिरी अपराजिताजी, निकेँ रहू। हम आइ भोरखन दिल्ली पहुँचल छी। एक मासक प्रोग्राम अछि। कृष्णाष्टमीसँ पूवेँ टाका अहाँकेँ पहुँचि जायत। बउआ झाकेँ कहबइक- पाँच टाका जमा कऽ कऽ नेहरावला बंक मे अपन खाता खुजबा लेत। हम ओकरे नामे ड्राफ पठा देबइक। -ना. बी- 3/113 जनकपुरी नई दिल्ली- 58 स्वस्ति! आइ टुनाइक चिट्ठी आयल अछि। ओ एहिठाम आबि रहल अछि। अही ठाम रहत- काज ओकरा भेटिए जेतइ। बउआ झा कत’अछि? दयानाथ एको बेर आयल छथि की नहि? मंजुलियाक ननकिरबी निकेँ रहइ छइ की नहि? बेसी की लिखू? हमरा दम्मा परेशान कऽ देने छल। आब निकेँ भेल छी। -ना. उपर्युक्त दुनू पत्र हमरा बुझने प्रयाप्त अछि यात्रीजीक पारिवारिक पृष्ठभूमिक चित्रांकन करबाक हेतु। यथार्थमेमैथिली साहित्यक महामानव नागार्जुन आ मैथिली साहित्यक काव्य मनीषी यात्रीक एहि पत्रक कथामे जे व्यथाकेँ उकेड़ैत अछि ओ हृदयकेँ द्रवित कऽ दैत अछि। एतेक आर्थिक संकटसँ विपन्न लोक साहित्य सृजय कऽ सकैछ ई वर्त्तमान समयमे कोनो कल्पनासँ कम नहि। मुदा सत्य तँ इएह थिक। यात्री जे ने आर्थिक रूपेँ भरि जन्म संघर्ष करैत रहलाह वल्कि दर्दसँ सेहो जुझैत रहलाह जे दर्द हुनक उपर्युक्त पत्रमे दृष्टिगत होइत अछि। यात्रीजी पंजाबमे ‘दीपक’ नामक मासिक पत्रिकाक सम्पादनक कार्य सेहो कएलनि। अपन पोथीक प्रकाशनक हेतु ‘यात्री’ नामक प्रकाशन सेहो खोललनि मुदा से अर्थाभावक कारणेँ बन्द भऽ गेल। गुजरातमे जैन मुनि ‘रामचन्द्र’ सँ हिनका भेँट भेलनि जे आगू पढ़बाक आदेश देलकनि। हुनक आज्ञा मानि यात्रीजी ‘प्राचीन भारतीय भाषा प्राकृत, पाली, अपभ्रंशआदि भाषाक अध्ययन कएलनि। ओ पाली भाषाक अध्ययन कएलन्हि जाहि क्रममे हुनका बुद्धक क्रान्तिकारी विचार अति प्रभावित कएलकनि। यात्रीजी श्रीलंकामे बौद्ध दर्शनक अध्ययन कएलनि आओर ओतहि 1936 ई.मे बौद्ध धर्मकेँ स्वीकार कएलन्हि। यात्रीजी अपन जीवन निर्वाह करबाक लेल किछु दिन अध्यापन कार्य सेहो कएलनि। सिंघल प्रान्तमे प्राचीन भाषाक अध्ययन सेहो कएलनि। श्री लंकामे हिनका वामपंथी पार्टी दिस झुकान भेलनि। यात्रीजीकेँ कुल छ: गोट संतान छनि जाहिमे चारि गोट पुत्र- शोभाकन्त, सुकान्त, श्रीकान्त, श्यामाकान्त तथा दू गोट पुत्री जनिक नाम छनि- उर्मिल आ मंजू। वर्त्तमानमे पुत्र ‘सुकान्त’‘सुकान्त सोम’क माने मैथिली साहित्यमे प्रसिद्ध कथाकारक रूपमे ख्याति छथि मुदा अन्य सन्तान आर्थिक विपन्नताक कारणेँ ओतेक पढ़ि-लिखि नहि सकलाह। यात्री प्रतिभा ओ व्यक्ति:- जखन कोनो व्यक्तिक मरण भऽ जाइत छैक तखन ओकर व्यक्तित्वकेँ संस्करणात्मक रूपमे संजोगि कऽ रखबाक प्रयोजन पड़ैत अछि। तेँ लोक अपन आत्मीय जनक संस्करण लिपिबद्ध कऽ लैत अछि। मैथिली साहित्य मध्य यात्रीजी अपन अप्रतिम प्रतिभा लऽ अवतीर्ण भेल छलाह। हुनक ई प्रतिभा अर्जित नहि नैसर्गिक छलनि। एकर उपयोग ओ अपन जीवनक विषम परिस्थितिमे करबामे पूर्णत: सफल रहलाह। एहि तथ्यक परिज्ञान समाजकेँ हुनक मृत्युक पश्चात भेलैक। ई बात एहिसँ स्पष्ट होइछ जखन यात्रीजी गीताक- “स्वधर्मे निधनं श्रंय: परधर्मो भयावह:”क वचनक उल्लंघन कए- “अहिवातक पालितल फोड़ि-फोड़ि हम जाय रहल छी आन ठाम।” लिखि नव विवाहिता पत्नीकेँ त्रूागि बौद्ध भिक्षु भए गेल रहथि। ओहि समय कर्मकाण्डक प्रतिष्ठा रखनिहार तरौनी गामक ब्राह्मण समाज हिनका मात्र कुल नहि, समाजोक हेतु कलंकित पुत्र मानने छलनि। मुदा अठासीम वर्ष पूर्ण कएलाक बाद हुनक मृत शरीरकेँ पूर्ण तामझामक संग, पुष्पमाल्यसँ आच्छादित कएने बिहार सरकारक प्रशासन विभाग अन्त्येष्ठि हेतु तरौनी गाम पहुँचल तँ सम्पूर्ण मिथिलावासी अश्रुजलसँ तिलांजलि दैत श्मशान भूमिकेँ दलमलित कए देलक, तखन ई कुल-कमल तरौनी गामक गौरव ओ मिथिलाक विभूतिक रूपमे वन्दित-अभिनन्दित भेलाह। एहन सम्मान साहित्यकारक कोन कथा, राजपुरुषो लोकनिकेँ भेटब दुर्लभ अछि। ई सभ हुनक प्रकृति प्रदत्त प्रतिभेक प्रतिफल थिक। यात्रीजी कोनो शास्त्रीय गम्भीर अध्ययन नहि कएलनि। कतहु अपन पांडित्यक प्रखर चमत्कार नहि देखौलनि। कोनो सिद्धान्त ग्रन्थ नहि लिखलनि। शोध कार्य कऽ कोनो नव तथ्यक उद्घाटन सेहो नहि कएलनि। मुदा जाहि नव-नव बाटपर अपन डेग उठौलनि तकर अन्तिम छोड़ धरि पहुँचि गेलाह। ई हुनक असीम प्रतिभाकेँ प्रदर्शित करैत अछि, कारण कोनो व्यक्तिक प्रतिभा व्यक्तिमे निहित रहितो व्यक्तित्वसँ पृथक अपन अस्तित्व रखैत अछि। यात्रीजी विचारसँ यद्यपति घोर नास्तिक रहथि। जनउ-तनउकेँ ओ पाखण्ड मानैत छलाह। तथापि बौद्ध धर्मसँ पुन: सनातन धर्ममे अएबाक हेतु पुन: अपन उपनयन कएने रहथि। स्वाभावोक्ति हिनक रचनाक अलंकार थिक आ दैनन्दिन जीवनक प्रयोगमे अबैत ठेंठ शब्दावली शृंगार। पण्डिताम भाषासँ ई अपनाकेँ दूरे राखब श्रेयस्कर मानैत छलाह जाहि कारणेँ सामान्यो लोककेँ हिनक रचनाक आस्वादनसँ आनन्द भेटैत छलैक। हिनक जनउ-तनउ प्रसंगकेँ पाखण्ड कहब उक्ति जे ऊपर वर्णित अछि तकर मूल प्रमाण पं. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क निम्नलिखित संस्मरणसँ भेटि जाइत अछि। एहि संस्मरणमे अमरजी लिखैत छथि- “श्री सुमनजीक बालक श्री व्रजेन्द्रजीक उपनयन छलनि। पं. सहदेव झा, कविवर सीताराम झा, मधुपजी, काशीनाथ ठाकुर ‘कलेश’क संग हम पहिने वल्लीपुर पहुँचि गेल रही। स्नान जलपानादिसँ निवृत होइत करीब एक बाजल, देखैत छी घामे-पसीने तरबतर यात्रीजी धुरिअयले पैरेँ धम्म दए आबि बैसि गेलाह। कियो पंखा हौंकय लगलनि, क्यो पैर धोयबाले पानि अनलक। श्री सुमनजीक अनुज भूपेन्द्र बाबू कककरो शर्बत आनय कहि, हिनका पैर धोयबाक आग्रह करय लगलथिन। मुदा ने कुर्ता बाहर कएलनि ने पैर धोलनि। कहलथिन- हम राति समस्तीपुर मुसाफिर खानामे सूतल छलहुँ, भोरे उठि कए विदा भेलहुँ से एखन पहुँचलहु अछि, बड्ड भूख लागल अछि। भूपेन्द्र बाबू कहलथिन- पैर धो लेब तँ ठंढ़ा जायब। जलखै चूड़ा-दही, सोहारी-तरकारी, दुनूमक व्यवस्था छैक, जे इच्छा हो।यात्रीजी कहि उठलथिन- ने दही-चूड़ा, ने सोहारी-तरकारी, हम गूड़क संग चूड़ा फाँकब। घरबैया असमंजसमे, पाहुन पड़क चकित, ग्रामीण विस्मित, मुदा यात्रीजी जिद्दपर अड़ल रहलाह। जे बाजल छलाह सैह कएलनि। चूड़ा फाँकि शर्बत पीबि दीर्घ निसास लए हमरा कानमे कहलनि- मामाजी, हम उपनयमे अयलहुँ अछि, मुदा जनउ नहि अछि, तकर जोगार धराउ। तेँ कुर्ता नहि बाहर करैत छी, एहि घटनामे एक नाटकीयता सेहो छल।”[20] यात्रीजी कविता, कथा, उपन्यास, रिपोर्ताज आदि सभ किछु लिखलनि, मुदा नाटक दिस दृष्टि नहि उठौलनि, परन्तु अपन क्रिया-कलापसँ सर्वग नाटकीयता बनौने रहैत छलाह। अलबटाह बगय-बानी, बाणी सेहो पूर्णत: स्फुट नहिए छलनि तथापि भाव-भंगिमा ओ कलममे तेहन चुम्बकत्व छलनि जे व्यक्तिकेँ आकृष्ट कए लेबाक अद्भुत क्षमता रखैत छलनि। यात्रीजी गम्भीर व्यक्तित्वक लोक कखनहुँ नहि बुझाइत छलाह। जेहने भेष-भूषा तेहने स्वभाव। हँसी-चौल हिनक व्यक्तित्वक पर्याय बनल छल। तेँ लोक हिनका हल्लुक व्यक्ति मानैत छलाह। जकर प्रमाण अमरजीक एहि संस्मरणमे देखबामे अबैछ- सुमनजीक बालकक उपनयमे जखन यात्रीजी बल्लीपुर गेल रहथि तँ ओहिठाम एकसँ एक महारथी लोकनि पहुँचल रहथि। बल्लीपुर ओहनहुँ जमीन्दारी ठाठ-बाठक लेल प्रसिद्ध छल। ओहि उपनयनमे कतोक प्रसिद्ध गायक सभ अपन गायन कऽ रहल छल। ओहिठाम राजदरभंगाक अनेक अधिकारी लोकनि जेना- पं. गिरीन्द्र मोहन मिश्र, दुर्गानन्द झा, प्रो. रमानाथ झा, आदिक काफिलसँ महफिल सजल छल। समावर्त्तन संस्कार चलि रहल छलैक। सम्पूर्ण आँगन गदमद भरल छल। एकटा गवैया शास्त्रीय, कोनो रागमे मूर्च्छानाक संग आलाप लेलनि। ओहि गम्भीर वातावरणक गम्भीरताकेँ भंग करैत यात्रीजी चिचिआइत उठि कए ठाढ़ भए गेलाह। सुमनजीक अनन्य सखा श्री नूनू बाबू दौड़ल लग जा पुछलथिन- ‘की भेल?’ यात्रीजी जोरसँ बाजि उठलाह- ‘हमरा गाममे एकटा बकरी एहिना मेमिआइत-मेमिआइत मरि गेलैक।’ से कहैत दलान दिस चल गेलाह।[21] उपस्थित जन समुदायमे व्याप्त विस्मय हास्यमे परिवर्तित भए गेल, किछु गोटेमे क्रोध तँ किछु गोटेमे खोभ सेहो परिलक्षित भेल। गायक लोकनि सेहो क्षुब्ध भऽ गेलाह। यात्रीजीक व्यक्तित्व एहने सदावहार छलनि। यात्रीजीक नाम पिता रखलथिन ‘ठक्कन’तँ हुनको हेतु अपन नामकेँ सार्थक कएलनि। अपने उपनाम रखलनि यात्री तँ तकरो सार्थक कएलनि। मात्र जे कियो नाम रखलथिन ‘नागार्जुन’से नाम भने सभसँ बेसी प्रसिद्ध पौने होनि, मुदा ओकरा सार्थक नहि राखि सकलाह। तकर श्रेय हिनक धर्मपत्नी अपराजिता देवीकेँ छनि जे तरौनीक घराड़ीकेँ आजीवन सेवि कए धयने रहलीह। जाहि प्रसादेँ जाहि मिथिलाकेँ अन्तिम प्रणाम कए चल गेलाह, ताही मिथिलाक माटिमे हिनक शरीर पंचत्वमे विलीन भए सकलनि। यात्रीक जीवनक संक्षिप्त यात्रा- हिनक मूलनाम बैद्यनाथ मिश्र यात्री छलनि। जन्मक बाद पीसी द्वारा हिनक नाम ‘ठक्कन’राखल गेल। साहित्यिक नामक रूपमे ई वैदेही, यात्री, नागार्जुन नामे ख्याति पाओलनि। पिताक नाम गोकुल मिश्र तथा माताक नाम उमा देवी छलनि। हिनक जेष्ट पूर्णिया 11 जून 1911 ई.केँ तरौनी, जिला दरभंगामे भेल छलनि तथा मातृक मधुबनी जिलाक सतलखा गाममे भेल छलनि। यात्रीजीक विवाह अषाढ़ 1931 ई.मे श्री कृष्णकान्त झा उर्फ कंटीर बाबूक कन्या अपराजिता देवीक संग भेल छलनि तथा तकरा तीन वर्षक बाद सन 1934 ई.मे दुरागमन भेल छलनि। यात्रीजी जखन तिब्बतक यात्रापर छलाह तखन सन 1943 ई.मे हिनक पिताक देहान्त भेल छलनि। पत्नी अपराजिता देवीक अवसान 19 फरवरी 1997 ई.केँ तथा हिनक देहावसान 5 नवम्बर, 1998 ई.केँ भेलन्हि। मातृहीन ठक्कन पाटी आ गबिसक संग गामक लोअर प्राइमरी स्कूलमे प्रवेश कएलनि। पिताक द्वारा अंग्रेजी माध्यमक विद्यालयमे प्रवेशसँ वर्जित राखल गेल। हिनका पुरोहित कर्म हेतु जीविकोपार्जनक योग्यता प्राप्त करबा लेल गामक टोल पाठशालामे प्रवेश कराओल गेल, जाहि ठामसँ ई प्रथमाक परीक्षा उत्तीर्ण कएलन्हि। संस्कृत विद्यालय गोनोलीसँ मध्यमा प्रथम वर्ष, पंचगछिया संस्कृत विद्यालयसँ शास्त्री प्रथ्ज्ञम खण्ड (1931), कलकत्ता गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज कलकत्तासँ शास्त्री (द्वितीय खण्ड, 1922) आ काव्य तीर्थक शिक्षा ग्रहण कएलन्हि। यात्रीजीकेँ छओसँ बेसी भाषाक ज्ञान छलनि जाहिमे मैथिली, संस्कृत, हिन्दी, बंगला, प्राकृत, सिंहली आदि-आदि। यात्रीजी श्री लंकाक विद्यालंकार परिवेण मठसँ सन् 1937 ई.मे नायकपद आनन्दसँ दीक्षा लए ‘नागार्जुन’बनलाह। स्वामी के शवानन्दक अनुरोधपर साहित्य सदन, अवोहरक पत्रिका ‘दीपक’क दू वर्ष सम्पादन कएलनि तथा लुधियानाक जैन मन्दिर (1941-42) धरि एवं हैदराबाद वर्त्तमानक पाकिस्तानक सिन्ध प्रान्तक सारस्वत ब्राह्मण पाठशालामे अध्यायन कएलनि। सिंध राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हैदराबादक मुखपत्र ‘कौमी बोली’क संपादन सेहो किछु दिन कएलन्हि। भारतीय ज्ञानपीठ काशीमे 1945 ई.मे नौकरी सेहो पकड़लनि। एकर अतिरिक्त राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धामे किछु मास सन 1951 ई.मे नौकरी कएलनि। यात्रीजी निरंतर पाठावस्थामे एक विद्यालयसँ दोसर विद्यालयमे यात्रा, एक स्थ्ज्ञानसँ दोसर स्थानक यात्रा, एक श्खहरसँ दोसर शहरक यात्रा करैत रहलाह। सन 1037 ई्मे केलेनिया (श्रीलंका) विद्यालंकार परिवेण मठ, श्री लंकाक यात्रा, राहुल सांस्कृत्यायनक संग जून 1938 ई.मे अस्वस्थताक कारणेँ तिब्बतक अपूर्ण यात्रा, 1942-43 मे एकसरे थोलिंग महाविहार तिब्बतक यात्रा कएलनि। महाकवि यात्री मैथिली कविक रूपमे रूसक यात्रा अर्थात् जा धरि काया संग देलकनि ता धरि भरि जन्म निरंतर भ्रमणशील रहलाह। सहजानन्द सरस्वतीक किसान आन्दोलनमे सक्रिय भेलाक कारणेँ 20 फरवरी 1930 ई.मे छपराक अमवारी जेलमे बन्दी बनाओल गेलाह। एहि क्रममे हजारीबाग आ भागलपुर जेलक यात्रा स्थानान्तरणक कारणेँ सेहो भेलनि। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक हत्याक उपरान्त प्रकाशित कविता ‘शोषिण तर्पण’क कारणेँ सन 1948 ई.मे सेहो जहल कटलनि। जे.पी. आन्दोलनमे 26 मार्च 1976 ई. के पटना हाइ कोर्टक आदेशपर आराक जेलसँ मुक्त भेलाह। तरौनीक पण्डित अनिरूद्ध मिश्रक प्रेरणासँ वाल्यावस्थामे संस्कृतमे समस्या पूर्तिसँ काव्य यात्राक श्री गणेश कएलनि। काशी अएलापर कविवर सीताराम झाक सम्पर्क आ प्रेरणासँ मैथिलीमे रचना प्रारंभ कएलनि। हिनक पहिल रचना मैथिलीक पत्रिका ‘मिथिला’मे सन् 1929 ई.मे प्रकाशित भेल। संस्कृत, मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी, बंगला आदि भाषामे काव्यारंभ कएलनि। दरभंगाक महारानी लक्ष्मीवती द्वारा उदियमान बालकक हेतु स्थापित संस्था बालवर्धनी सभ तथा काशी द्वारा काव्य रचना हेतु यात्रीजी पुरस्कृत कएल गेलाह। एहि सभाक कर्त्ताधरता पण्डित बलदेव मिश्र छलाह। सन 1968 ई.मे पत्रहीन नग्न गाछ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारती उत्तर प्रदेश, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान मध्यप्रदेश, राजेन्दशिखर सम्मान बिहार, राहुल सांकृत्यायन सम्मान, पश्चिम बंगाल, साहित्य अकादमीक महत्तर सदस्य 1994 ई.मे तथा चेतना समिति पटना द्वारा सन् 1977 ई.मे सम्मानित कएल गेलाह। चेतना समितिक स्थापना, 18 जुलाई 1954 ई. केँ महाकवि यात्रीजीक प्रेरणा आ मार्गदर्शनक कारणेँ संभव भऽ सकल। यात्रीक रचना संसार (कृतित्व) कविशेखर ज्योतिरीश्वर- विद्यापतिसँ अविच्छिन्न रूपेँ प्रवाहित मैथिली काव्यधारामे महत्वपूर्ण मोड़ अननिहार कविलोकनिमे मनबोध, चन्दा झा, कविवर सीताराम झा प्रभृत कतोक महाकविलोकनिक नाम लेल जा सकैछ। मुदा ओकर गतिकेँ तीव्रतम कऽ ओकरा आधुनिक युगक कोनो अन्य समृद्ध भाषाक काव्य-प्रवाहक समानान्तर लऽ अनबाक श्रेय जाहि एक मात्र कविकेँ देल जाइछ, ओ छथि ‘यात्री’क उपनासँ सुविध्यात ‘श्री बैद्यनाथ मिश्र। यात्रीक प्रसंग डॉ. भीमनाथ झाक कथन छनि- “हिन लेखनीसँ नि:सृत मैथिली कविता अपन ओहेन सुच्चा सुवाससँ वातावरणकेँ महमहा देलक जकर सुगन्ध लेबाक लेल दूर-दूरक लोक स्वत: आकृष्ट भऽ गेल। वस्तुत: आकृष्ट करऽवला हिनक विलक्षण व्यक्तित्वो अछि- अपन गाम-घरक भारसँ अपनाकेँ कात रखबाक चेष्टामे रत रहऽ बला फक्कड़ व्यक्तित्व; सतत भ्रमनशील, समाज संसरक रग-रंगकेँ परखऽबला पारखी व्यक्तित्व; रूढ़ि भंजक, श्रम-शक्तिक पूजक, व्यवस्थाक विद्रोही, नवीन पीढ़ीक प्रति आवेशी व्यक्तित्व। अपन जीवने जकॉं मैथिली कविताकेँ संकीर्ण छन्दक बन्धनसँ मुक्त कऽ सर्वहाराक प्रस्त बाटपर उन्मुक्त विचरण करबाक हेतु छोड़ि देलनि।”[22] आधुनिक मैथिली साहित्यमे यात्रीजीक नाम अविस्मरणीय बनि गेल अछि। गद्य (उपन्यास) एवं पद्य (काव्य) दुनू क्षेत्रमे अपन रचनाक गुण-धर्म, ओजस्विता, जनगणमनक भावनाक सहज साधारणीकरण, भाषाक भूगंध एवं जनसंदेदनाक मनोगंधक बलेँ मैथिली ओ हिन्दी दुनू साहित्य जगतमे यात्री ओ नागार्जुनक रूपमे चिरस्मरणीय बनल रहलाह। बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’आ नागार्जुनक रूपमे अनेक विधामे रचना कएने छथि, मुदा उपन्यास ओ कविता हुनक प्रमुख ओ विशिष्ट क्षेत्र रहल अछि। बङला ओ संस्कृतमे तँ मात्र काव्ये रचना कएने छथि। एहू दुनूमे कविक रूपमे हिनक देखब विशेष रूपेँ उपयुक्त लगैत अछि। उपन्यास हो अथवा कविता दुनूमे ई जन सामान्यक पक्षधरताकेँ उजागर कएने छथि, विशेष शैलीमे विशेष प्रभावी ओ लोक प्रचलित भाषमे। यात्रीक रचना :- यात्रीजीक रचनाकाल करीब सत्तरि वर्ष रहल। एहि अवधिमे हिन्दीमे तँ हिनक कतोक पोथी प्रकाशित भेल मुदा मैथिलीमे गानि-गुथिकऽ मात्र पाँच गोट पोथी भेटैत अछि जाहिमे दू गोट कविता संग्रह आ तीन गोट उपन्यास छनि। मुदा मैथिली पत्र पत्रिकामे घनेरो आलेखादि हिनक छपल अछि। यात्रीक अधिकांश रचना पूर्वेक लिखल छनि। जखन यात्रीजी हिन्दीमे लिखय लगलाह तँ मैथिलीक रचना कमि गेलनि। बादमे तँ प्राय: मैथिलीक रचना बन्दे भऽ गेलनि। तेँ हिनक रचना पहिलुके पत्र-पत्रिकामे संचित अछि। पुरान पत्र-पत्रिका हमरा एहि शोध-क्रममे उपलब्ध नहि भऽ सकल तथापि जतबा धरि उपलब्ध भेल ताहिमेसँ बिछि-बिनि एहिठाम प्रस्तुत कऽ रहल छी। इहो सम्भव जे जाहि पत्र-पत्रिका सभक नाम एहिठाम हम उल्लेख कएल अछि ताहूमे सँ कतोक छुटि गेल हो। तेँ एहि सूचीमे परिष्कार करबाक संभावना आ अपेक्षा मैथिलीक गम्भीर विद्वान लोकनिसँ सतत रहत। यात्रीक मैथिली रचना :- क्र.सं. – पोथीक नाम – विधा – प्रकाशन वर्ष – लेखकक नाम – प्रकाशक 1. पारो उपन्यास 1946/1965 यात्री - ग्रन्थालय प्र. दरभंगा 2. नवतुरिया – उपन्यास- 1954/1965 यात्री- विद्यापति प्रकाशन दरभंगा 3. बलचनमा- उपन्यास 1966/1965 – यात्री – मिथिला सांस्कृतिक परिषद कलकत्ता 4. चित्रा- कविता- 1949 – यात्री – तीरभुक्ति पब्लिकेशन प्रयाग 5. पत्रहीन नग्न गाछ- कविता 1967 – यात्री – मैथिली एकेडमी, इलाहाबाद मैथिली पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचना- 1. कविता मिथिले! – 1936 यात्री- मिथिला मिहिर, दरभंगा, मिथिलांक 2. एते दिनुका बाद- 25.09.1960- यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना 3. आधुनिक राधिका- 27.11.1960-यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना 4. देखल समपनामे- 11.08.1963-यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना 5. अन्तिम दर्शन (अमरनाथ झाक प्रति कविता)- 16.02.1964-यात्री- मिथिला मिहिर साप्ताहिक, पटना 6. दू टा रचना (नेहरुक महाप्रयाणक पश्चात)-28.06.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) पटना ठाम-ठाम, कनैत अछि गुलाब-28.06.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) पटना 7. दू टा कविता- विहुँसै छी, सभागाछी-28.06.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) पटना 8. ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति: -08.11.1964, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 9.दोहाइ हे लिबर्टी मैया- 19.12.1965, मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 10.आउ हे ऋतुराज- 13.03.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 11.अहँ, अहँ- 03.04.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 12.भेटल छल वरदान- 22.05.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 13.युगक चमत्कार- 22.05.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 14.कालिदास कविकुल गुरु- 17.12.1966,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 15.राज्य मंत्री भेला उत्तर- 01.04.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 16.एम्हर जुनि अबै- 06.05.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 17.हऽ आब भेल वर्षा- 15.07.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 18.सुनल शब्द विमान परिचारिकाक- 12.08.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 19.मामा आँखि मुनि लेलथि- 23.09.1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 20.वाह रे हमर नाति!- 28,10,1973,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 21.एहि घर पर बैसल रहय गिद्ध- 20.10.1974,मिथिला मिहिर (सप्ताहिक) 22.गाँधी- जनवरी, 1950, वैदेही (मासिक) दरभंगा 23.कोरिया- फरवरी 1951,वैदेही (मासिक) दरभंगा 24.गोठिबिछनी- विशेषांक साल 1358, वैदेही (मासिक) दरभंगा 25.मुक्तक- नवम्बर 1952, वैदेही (मासिक) दरभंगा 26.गाँधी- जनवरी 1852,वैदेही (मासिक) दरभंगा 27.अरूणोदय- फरवरी 1953, वैदेही (मासिक) दरभंगा 28.अन्हार जिनगी- मई 1953, वैदेही (मासिक) दरभंगा 29.या निशा सर्वभूतानाम्- जुलाई 1953,वैदेही (मासिक) दरभंगा 30.हम क्षुब्ध छी- मार्च 1954,वैदेही (मासिक) दरभंगा 31.दूटा गीत- (I)जय जय भारत! जय हिन्द भूमि- जनवरी 1955, वैदेही (मासिक) दरभंगा (II) निखिल विश्व प्रिय निखिल भूमि प्रिय- जनवरी 1955,वैदेही (मासिक) दरभंगा 32.ओ तँ थिका दधीचिक हार- सितम्बर 1962,वैदेही (मासिक) दरभंगा 33.कोचिंग इन्स्टीच्यूट- सितम्बर 1958,वैदेही (मासिक) दरभंगा 34.जन्म भूमि- अंक 10, 1973,विभूति (मासिक) मुजफ्फरपुर 35. मिथिला-15.12.1952, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 36. युद्धगीत- 12.01.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 37. नेहरु- 09.02.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 38. नचारी (पुरान आ नवीन)-02.03.1952, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 39. चीन- 09.03.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 40. हे अभागल देश- 16.03.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 41. किसान- 30.03.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 42. कोरिया- 13.04.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 43. कांग्रेसी कनवासर- 18.05.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 44. नेहरुक लंदन यात्रा- 01.06.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 45.सिनुरिया आम- 18.06.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 46.छठू बाबू- 15.06.1953, मिथिला (साप्ताहिक) दरभंगा 47.बाबाक विभूति-उदय- 1, किरण- 3, 1930, मिथिला मित्र 48.भगवान! हमर ई मिथिला सुख शान्ति केर घर हो- 1932 – मिथिला संदेश 49.वन्दना- वर्ष- 1, अंक- 2, 1948- स्वदेश (मासिक) दरभंगा 50.गाँधी- वर्ष- 1, अंक- 2, 1948- स्वदेश (मासिक) दरभंगा 51.दीन बालिका- वर्ष- 1, अंक- 2, 1948- स्वदेश (मासिक) दरभंगा 52.सुग्गा मैना इन्स्टीच्यूट- 1954- चौपाड़ि 53.तीव्र विषाक्त विलक्षण गन्धी- 1954- चौपाड़ि 54.पुनि-पुनि पसरओ- जून 1956- पल्लव (मासिक) नेहरा 55.उपहार- जून 1956- पल्लव (मासिक) नेहरा 56.आहि रे कर्म!-अप्रैल 1968- मैथिली कविता (त्रैमासिक), कलकत्ता 57. स्वागत हे विलम्बित- वर्ष- 1, अंक- 6, 1969- सोना माटि (मासिक) पटना 58.हमहूँ संध्या तर्पण करितहुँ भोरमे- वर्ष- 7, अंक- 1, 1979- मिथिला भारती (द्विमासिक) पटना- अंक- 4, अप्रैल-मई 1981- मैथिली अकादमी पत्रिका (द्विमासिक) पटना 59.चारि कविता 1. तोहर तानी हमर भरनी- 2. हुनका लकबा मारलकइनि- 3. खूब चटइ जो... 4. मिनि मिथिला- 60.कविता तीन- 1. शनि महराज- अगस्त 1983- माटि-पानि (मासिक) पटना 2. बप्प रे बप्प- 3. हुजूर, हँ हजूर- 61.लिप्सा- दिसम्बर 1983, माटि-पानि (मासिक) पटना 62.जन्म भूमि- अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयंती अंक) द्विमासिक, दरभंगा 63.बाबाक विभूति-अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक) 64.मुक्तक- अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक) 65.सुग्गा मैना इन्स्टीच्युट- अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक) 66.हुनका लकबा मारलकइन-अगस्त-सितम्बर 1986, चिनगी (यात्री जयन्ती अंक) 67.बाजलि सुखमा- अंक- 1, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना 68.यात्रीक किछु कविता- 1. अबितहिं, अही हमर स्वागत- अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना 2. नहि, नहि नहि किन्नहु नहि- अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना 3. मणिजी हमर झोरा नुका राखत-अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना 4. अन्तत: ओ अपनहि मूहेँ अरुणोदय-अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना 69.सिनुरिआ आम- अंक- 4, 1986- सन्निपात (अनियमितकालिक), पटना 70.कारी-कारी- जनवरी-अप्रैल 1987, कोसी कुसुम (द्विमासिक) सहरसा 71.रचू-रचू मधुरगीतम्- जनवरी-अप्रैल 1987- कोसी कुसुम (द्विमासिक) सहरसा 72.मैथिल के? – वर्ष- 2, अंक- 1, 1987, अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषदपत्रिका, दरभंगा 73.दूटा कविता- शारदीय 1994, कर्णामृत (त्रैमासिक), कलकत्ता 1. पूर्वाभ्यास- 2. कुसियारक छाहरिमे- 74.हे हमर आद्य- नवम्बर 1982, आरंभ, पटना 75.चारिटा एम्हरुका कविता- जून, 1997, 1982, आरंभ, पटना 1. मोशहरिक भीतर/पौने नओ बजे राति- 2. शुरू वैशाखमे गामसँ 3. भकड़ार मोछवला पैंतालिस बर्खक- 4. तुलसी बाबा साथ रहइ तों- 76.अहाँ बड्ड फूसि बजइ छी- अंक- 4, अप्रैल 1994, संकल्प, सुपौल 77.जरदगब- 15.09.1953, मिथिला मिहिर 78.गप्पक फोड़न- दिसम्बर 1954, वैदेही, दरभंगा रिपोजार्ज एवं शब्दचित्र : 79.बूढ़ बोको- जून 1950, वैदेही दरभंगा 80.चारि अहोरात्रि आ एक दिन- जुलाई 1954, वैदेही दरभंगा 81.वैदेहीक नव रूप- जून 1871, वैदेही दरभंगा निबंध- 82.मैथिल महासभा मैथिलत्वक- वर्ष- 1, अंक- 12, 1937, विभूति, मुजफ्फरपुर 83.पृथ्वे ते पात्रम्- सितम्बर 1954, वैदेही दरभंगा 84.प्रवासक संस्मरण- अप्रैल 1957, वैदेही दरभंगा 85.लेनिन आ भारतीय साहित्य- अंक- 2, 1986, सन्निपात (मूल हिन्दी) स्तम्भ- 86.यत्र-तत्र सर्वत्र- मई, 1957, वैदेही, दरभंगा 87.यत्र-तत्र सर्वत्र- जुलाई, 1957, वैदेही, दरभंगा 88.यत्र-तत्र सर्वत्र- अगस्त, 1957, वैदेही, दरभंगा 89.यत्र-तत्र सर्वत्र- अक्टूबर, 1957, वैदेही, दरभंगा 90.यत्र किंचित- जून, 1959, मिथिला दर्शन 91.चिन्तन अनुचिन्तन- जन.-फरवरी 1959, मिथिला दर्शन 92.ओना मासी धँ- 15 जनवरी, 1961, मिथिला मिहिर 93.ओना मासी धँ- 05 फरवरी, 1961, मिथिला मिहिर साक्षात्कार- 94.अनौपचारिक साहित्य-वार्त्ता- 06 जुलाई 1975, मिथिला मिहिर 95.टेमी के दाग?-अप्रैल 1987,1987, (दोसर पक्ष)मिथिला मिहिर 96. मिथिला मैथिल विभूति : बाबा श्री बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’- शारदीय अंक 1987, कर्णामृत, कलकत्ता 97.गप्प किछु हमर जबाब हुनकर- वर्ष- 1, अंक-2, नवम्बर 1993, अनुवाता 98.खिसिअयल व्यक्ति नहि लिखत- जून 1994, देस-कोस अन्य- 99.शोक-श्रर्द्धांजलि (म.म. पं. मुरलीधर झाक प्रति)-वर्ष-1, अंक-9, साल- 1337, मिथिला 100.विभागीय सभापतिक भाषण : कविता विभाग- 1956, प्रथम अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन, दरभंगा 101.सम्पादकीय- जनवरी 1973, मिथिला दर्शन 102.यात्रीजीक पत्र ललितक नाम- 29 मई 1983, मिथिला मिहिर 103.विश्व सम्मानिक महाकवि विद्यापति- दिसम्बर 1985, हालचाल 104.संवेदना (मणिपद्म श्रद्धांजलि अंक) जुलाई-सितम्बर, 1986, कर्णामृत 105.यात्रीजीक एगारह पत्र किसुनजीक नाम- सितम्बर 1986, चिनगी पोथीमे संग्रहीत रचना- 106.विद्यापति के देश मे- (सं. जगन्नाथ प्रसाद, सुमन, अमर) मुक्तक- 1955, संकलन 107.मैथिली पद्य संग्रह- (स. डॉ. उमेश मिश्र) 1. मिथिले, गोठबिछनी- 1962, संकलन 108.गलप सुधा- 1964, संकलन (स. डॉ. अशर्फी झा, अमरेश आ श्री रमानन्द), 109.मैथिली साहित्य संग्रह- वंदना, कौसिकीक धार- 1964, संकलन (पद्यांश- सं. रमानाथ झा)- इजोत- 110.कविता कुसुम- सम्पादक रमानाथ झा- 1964, संकलन 1. हम छी छुब्ध- 2. परमसत्यसँ- 3. हिमगिरक उत्तुंगमे- 111.मैथिली नवीन गीत- सं. रमानाथ झा- 1965, संकलन 1. भावना- 2. सिनुरिआ आम 3. अन्हार जिनगी- 4. आधुनिक राधिका- 5. देखल सपनामे- 112.मैथिली गद्य संग्रह, (तृतीय भाग)-1964, संकलन (सं. रमानाथ झा, सुमन, ईशनाथ झा) 1. पृथ्वी ते पात्रम- 113.कविता कलाप- 1970, संकलन 1. केहन दिव्य- (सं. शंकर कुमार झा)- 114.कविता संग्रह- 1977, मैथिली अकादमी, पटना (सं. प्रो. आनन्द मिश्र, आर.सी. प्रसाद सिंह, अमरजी) 1. कविक स्वप्न, 2. पितापुत्र संवाद 3. परम सत्य, 4. एहि घर पर बैसल रहय गिद्ध- 115.काव्य माधुरी- सं. प्रो. आनन्द मिश्र-1980, मैथिली अकादमी, पटना 1. माँ मिथिले, 2. अंतिम प्रणाम, 3. नव नचारी, 4. गोठिबिछनी- 116.मैथिली गद्य प्रसून- सं. बालगोविन्द झा व्यथित- 1980, मैथिली अकादमी, पटना 1. पितापुत्र संवाद 117.कथा कुंज- सं. प्रो. परमानन्द शास्त्री- 1986, मैथिली अकादमी, पटना 1. चारि अहोरात्रि एक दिन 118.पद्य तालिका- (सं. माहेश्वरी सिंह महेश- 1987, मैथिली अकादमी, पटना तथा डॉ. प्रेमशंकर सिंह) 1. भावना, 2. आधुनिक राधिका, 3. नवतुरिआ आबओ आगाँ- 119.मैथिली कथा- काव्य संग्रह- 1991, मैथिली अकादमी, पटना (सं. शिवशंकर झा कान्त, नवोनाथ झा) 1. विलाप- 120.कमलदह- सं. नवीन चन्द्र मिश्र, अमरनाथ झा- 1991, मैथिली अकादमी, पटना 1. भावना, 2. युगधर्म, 3. तारक गाछ, 4. अन्हार जिनगी 121.मैथिली कविता संग्रह नेपाल- 1990, मैथिली अकादमी, पटना (सं. राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, धीरेन्द्र प्रेमर्षि) 1. जगतारनि, 2. तीसीक तेल मध्य- अभिनन्दन ग्रन्थ- 122.सारस्वत सरमे हे मराल- (श्री रमानाथ झा, अभिनन्दन ग्रन्थ) 123.गोविन्दाय नमो नम:-पं. गोविन्द झा अर्चा ओ चर्चा (संस्कृत श्लोक) पुस्तकक भूमिका इत्यादि- 124.कला (उपन्यास)-प्र. वर्ष- 1948, सम्प्रति ले. चतुरारानन मिश्र 125.नक्षत्र (कविता संग्रह)- प्र. वर्ष- 1956, दुटप्पी ले. श्री राम चरित पाण्डेय अनु. 126.अनेरे (कविता संग्रह)- प्र. वर्ष- 1993, भूमिका ले. श्री हंसराज 127.सभसँ पैघ विजय (कथा संग्रह)- 1966, प्रस्तावना ले. आशा मिश्र- 128. मोहन लड्डू (गीत संग्रह)-1947, दू आखर हमरो ले. रूप नारायण मिश्र नागार्जुनक नामसँ एकर अतिरिक्त यात्रीजी हिन्दीमे सेहो कतोक रचना कएलन्हि अछि जकर विवरण विधाक हिसाबें निम्नलिखित अछि- उपन्यास : (हिन्दी) 1. रतिनाथ की चाची- नागार्जुन- द्वि. स. 1953, किताब महल, इलाहाबाद 2.वलचनमा (हिन्दी संस्करण)- नागार्जुन- द्वि. स. 1967, किताब महल, इलाहाबाद 3.दुखमोचन- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1966, किताब महल, इलाहाबाद 4.वरूण के वेटे- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1957, किताब महल, इलाहाबाद 5.बाबाबटेसर नाथ- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1954, राजकमल प्रकाशन 6.कुम्भीपाक- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1954, राजकमल प्रकाशन 7.चम्पा- (कुम्भी पाकक संक्षिप्त संस्करण)- नागार्जुन- चतुर्थ संस्करण, 1954, जी.टी. रोड, शहादरा 8.उग्रतारा-नागार्जुन- तृ. संस्करण, 1970, राजपाल एण्ड सन्स 9.हीरक जयन्ती- यात्री, 1962, आत्माराम एण्ड सन्स 10.इमरतिया- यात्री, 1968, आत्माराम एण्ड सन्स 11.नई पौध- यात्री, 1953, आत्माराम एण्ड सन्स काव्य रचना- (हिन्दी) 12.युगधारा- नागार्जुन, 1953, जनसेवा प्रकाशन 13.सतरंगे पंखोंवाली- नागार्जुन, 1959, यात्री प्रकाशन, कलकत्ता 14.प्यासी पथराई- नागार्जुन, 1962, यात्री प्रकाशन, कलकत्ता 15.खून और सोले- नागार्जुन, 1962, यात्री प्रकाशन, कलकत्ता 16.प्रेत का बयान- नागार्जुन, 1962, यतीन प्रेम, पटना 17.चना जोर गरम- नागार्जुन, 1952, हंस- कार्यालय, इलाहाबाद 18.शपथ- नागार्जुन, 1952, हंस- कार्यालय, इलाहाबाद 19.अब तो बन्द करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन- नागार्जुन, 1952, ब्रजदुलार स्ट्रीट, कलकत्ता 20.भस्माकर- नागार्जुन, 1972, राजकमल प्रकाशन 21.तालाब की मछलियाँ- नागार्जुन, 1974, अनामिका प्रकाशन (एहि संग्रहमे- युगधारा, सतरंगे पंखोंवाली, प्यासी पथराई आँखें काव्य संग्रहक बीछल चुनल कथा सभ संग्रहीत अछि) बाल साहित्य- (हिन्दी) 22.वीर विक्रम- नागार्जुन, पुस्तक भंडार, पटना 23.तुकों का खेल- नागार्जुन, बाल सखा, पटना 24.नदी बोल उठी- नागार्जुन, ऐजन 25.वानर कुमारी- नागार्जुन, ऐजन 26.प्रेमचन्द्र की जीवनी- नागार्जुन, ऐजन निबंध- हिन्दी- 27. एक व्यक्ति एक युग- नागार्जुन, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद उपयुक्त तालिकामे सहजहि देखल जा सकैछ जे मैथिली साहित्यमे ‘यात्री’जीक तीन गोट उपन्यास, दू गोट कविता पाँच गोट साक्षात्कार, एक सौसँ बेसी विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित रचना, (कविता, आलेखादि) आदि अछि। एकर अतिरिक्त मैथिलीक विभिन्न पोथी सभमे जेना- मैथिली पद्य संग्रह, गल्प सुधा, कविता कुसुम मैथिली गद्य संग्रह, मैथिली नवीन गीत, कविता संग्रह, कविता कलाप, काव्य माधुरी, मैथिली गद्य प्रसून कथा कुंज, पद्य तालिका, मैथिली कथा कमलदह आदिमे हिनक रचना संग्रहीत अछि। यात्रीजीक रचना सभ अभिनन्दन ग्रन्थ, विभिन्न पोथी सभक भूमिका, पत्र-पत्रिका सभमे स्तम्भ लेखनक रूपमे सेहो भेटैत अछि। अहिना हिन्दी साहित्यमे सेहो उपन्यास, काव्य, वाल साहित्य, निवंध एवं अन्यान्य विधापर हिनक लेखनी चलल अछि। हिनक विविध प्रकारक रचना देखलासँ ई स्वयं परिभाषित भऽ जाइत अछि जे यात्रीजी वहुमुखी प्रतिभाक धनी छलाह। यात्रीक रचनाक विश्लेषण :- ‘यात्री’आ ‘नागार्जुन’ओना तँ दू रूपमे रचना कएने छथि, मुदा उपन्यास ओ कविता हुनक प्रमुख ओ विशिष्ट क्षेत्र रहल अछि। बाङला आ संस्कृतमे तँ मात्र काव्ये रचना कएने छथि मुदा एहू दुनूमे कविक रूपमे हिनक देखब विशेष रूपेँ उपयुक्त लगैत अछि। उपन्यास हो अथवा कविता दुनूमे ई जन सामान्यक पक्षधरताकेँ उजागर कएने छथि। हिनक रचना विशेष शैलीमे विशेष प्रभावी ओ लोक प्रचलित भाषामे देखल जा सकैछ। मैथिलीमे हिनक तीन गोट उपन्यास आ दू गोट कविता संग्रह प्रकाशित अछि जे क्रमश: एहि प्रकारेँ- पारो (1946), चित्रा (1949), नवतुरिया (1954), बलचनमा (1966)आ पत्रहीन नग्न गाछ (1967)। एकर अतिरिक्त यात्री समग्रमे करीब 80 गोट कविता संकलित अछि। हिनक आधा दर्जन कथा, तीन गोट स्तम्भ लेखन सेहो संकलित अछि। एहिसँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे हिनक रचना विधा कतेक व्यापक छल। यात्रीक प्रथम उपन्यास 1946मे प्रकाशित भेल। ता धरि भारत वर्ष स्वतंत्र नहि भेल छल। अवस्था आकर्षक छलनि। ओ समय राजनीतिक ओ सामाजिक रूपसँ संघर्षक समय छल। ओहिसँ पहिलुक शताब्दीमे विश्वक क्षितिजपर पव राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक चेतनाक उदय भए चुकल छल। पूँजीवादी अवधरणाकेँ ध्वस्त करबाक उद्देश्यसँ मार्क्सवादी दर्शनक प्रभाव सम्पूर्ण विश्वमे परिव्याप्त भऽ रहल छल। एकरा अन्तर्गत शासक ओ शासित, पूँजीपति ओ सर्वहारा आदिक अवधरणा ओ शब्दावली प्रचलित-व्यवहृत भऽ गेल छल। भारतवर्षमे राजा राम मोहन राय, दयानन्द सरस्वती आदि नवीन विचारक ध्वजवाहक बनि उभरि चुकल छलाह तथा सामाजिक चिन्तन संबंधी हुनकलोकनिक अवधारणा प्रभाव देखायब प्रारंभ कऽ देने छल। सम्पूर्ण देशमे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद अथवा सामाजिक यथार्थवादक अवधारणा पसरि गेल छल। भारतीय स्वतंत्रता संग्राममे राष्ट्रीय अवधारणाक संगहि समाजवादी विचारधारा संग-संग चलि रहल छल। भारत वर्षमे किसान आन्दोलन सेहो सक्रियता देखा रहल छल। एहि वैश्विक एवं भारतीय चिन्तन ओ क्रियाशीलताक प्रवाहपूर्ण युगमे यात्रीजी साहित्य जगतमे नव चिन्तन-नव विचारधाराक संग पदार्पण कएलनि। हिनक उपन्यास पर दृष्टिपात कएलासँ स्पष्ट होइत अछि जे तीनू उपन्यासमे तीन विषय अछि। ‘पारो’उपन्सासमे वयसमे अनमेल विवाह जन्य सामाजिक समस्याक मनोवैज्ञानिक पक्षक उद्घाटनक दिशामे सांकेतिक डेग मात्र उठाओल गेल अछि, मुदा मैथिली जगतमे इएह डेग आधुनिक ओ प्रगतिशीलताक दृष्टिसँ साहसिक डेग छल, कारण अद्यावधि वर्जित क्षेत्र यौन-आकर्षणक वर्णन-चित्रण करबाक साहस कएल गेल जकर दूरगामी प्रभाव समकालीन आ परवर्ती साहित्यपर पड़ल। हिनक ‘नवतुरिया’ (1954) उपन्यासक कथानक सेहो वैवाहिक समस्यापर आधारित अछि मुदा ई ‘पारो (1946) सँ दू डेग आगाँ बढ़ि कए अछि। एहि उपन्यासमे तत्कालीन समाजक गतिविधि सेहो स्थान पाओलक अछि। नवीन विचार, क्रियाशीलता, प्राचीन-नवीनक संघर्षकेँ सेहो एहिमे समेटबाक प्रयास भेल अछि। एहिमे समाधानक दिशा संकेत, नारी जागरणक संग नारी शक्तिक आवाहन ओ सहभागिताक संदेश देल गेल अछि। नवयुवक वर्गक आगाँ अएबाक कथावस्तु एहिमे लेल गेल अछि। वैवाहिक समस्यासँ संबंधित रहितहु एहि उपन्यासमे नवोन्मेषकेँ प्रश्रय देल गेल अछि। यात्रीजीक मैथिलीक तेसर उपन्यास थिक ‘बलचनमा’ (1966)। एहि उपन्यासक हिन्दी संस्करण पहिने प्रकाशित भेल छल आ एकर हिन्दी मूल सन 1966 ई.मे प्रकाशित भेल। एहिमे हिनक ‘पारो’आ ‘नवतुरिया’सँ भिन्न कथावस्तु राखल गेल अछि। एहिमे हिनक ‘पारो’आ ‘नवतुरिया’सँ भिन्न कथावस्तु राखल गेल अछि। एहिमे किसान आन्दोलन, फलीभूत भावना, जागरूकता, धनवानक उत्पीड़न आ निर्धन पीड़ित अवस्था-भावनाकेँ प्रश्रय देल गेल अछि। अर्थात् धनवान-निर्धनक संघर्ष, भूमिक प्रति धरती पुत्रक मोह ममत्व आदि समाविष्ट कएल गेल अछि। स्वातंत्रयोत्तर कालक परिवर्तित होइत समाजमे दलित जागरणक संदेश सेहो एहिमे नीक जकॉं कएल गेल अछि। प्रगतिशील, यथार्थवादी अथवा नवीनताक मूलमे नवीन अवधारणा सामाजिक भावात्मक स्तरपर फ्राइडक धारणा-वासना अथवा यौन भावना ई दुनू अवधारणा मुख्य रूपेँ सक्रिय रहल अछि। एकरा रचनाकारलोकनि अपन कौशल ओ क्षमतासँ विभिन्न रूप दैत रहलाह अछि। यात्री सेहो ओहि कोटिमे राखल जा सकैत छथि किन्तु कथावस्तु एवं अभिव्यक्ति शिल्पक क्षेत्रमे ई ओहि दुनूसँ आगाँ बढ़ि जाइत छथि। स्थानीय वैशिष्टकेँ समाहित करैत नवीनताक वरण हिनक साहित्यिक गरिमाक श्रीवृद्धिमे आधारभूमिक काज करैत अछि। ‘पारो’मे जतए फ्रायडीय अवधारणाक अनुसार समवयस्क ‘नारी-पुरुष’क परस्पर आकर्षण भावनाकेँ स्थान भेटल अछि तँ ‘नवतुरिया’मे नवजागरणक समाज सुधारक विषमता विनासक युवाशक्तिक अवतरण ओ सक्रिय नेतृत्व क्षमताक संकेत दैत मार्ग प्रशस्त करैत अछि। वास्तवमे तीनू उपन्यास स्वतंत्रता कालक पूर्ववर्ती ओ निकटवर्ती कालक परिस्थिति भाव ओ सेघर्षक क्रियाशीलताकेँ कथावस्तुक आधार बनौलक अछि। पारो ओ नवतुरिया दुनूमे नारीकेँ प्रधानता दए तानी-भरनी बुनल गेल अछि जाहिमे यथार्थक विद्रुप स्वाभाविकताक संग स्थान पाबि सकल अछि। ओना बलचमामे सेहो बलचनमाक बहिनकेँ सेहो एही अवधारणासँ देखल जा सकैछ। तीनू उपन्यासमे चरित्रकेँ नीक जकॉं ठाए़ कएल गेल अछि। शैलीक दृष्टिएँ पारोमे प्रथम पुरुषमे कथा कहल गेल अछि- विरजू द्वारा। एहिमे चरित्र चिन्तनरत अछि। पारो एवं विरजू दुनूक मनोगत भाव देखाओल गेल अछि। कुण्ठा किंवा क्रानि दुनू पात्रक मनोगते रहैत अछि वाह्य वा प्रकट रूपमे नहि। नवतुरियामे उपन्यासकार घटित घटनाक चित्रण करैत छथि। पात्रक संख्या आ घटनाक क्रियाशीलताक मात्र ओहिमे रहैछ। बलचनमामे तँ आओरो अधिक गतिविधि गामसँ शहर धरि पहुँचैत अछि। धनिक निर्धनक चित्र अछि उत्पीड़न, संघर्ष, भूमि सम्बन्धी अथवा ग्राम्य जीवन, राजनीतिक चेतना आदिक समावेश ‘बलचनमा’क कथा वस्तुकेँ विस्तार दैत अछि। शिल्पक दृष्टिऍं पारोमे वर्तालाप पद्धति अपनाओल गेल अछि। मुदा नवतुरिया ओ ‘बलचनमा’मे वर्णनात्मक घटनाक चित्रण पद्धति अपनाओल गेल अछि। ‘नवतुरिया’मे नवीन समाजिक चेतनाक अनुकूल ‘गरम दल’क चर्चा अछि जाहिमे अनेक नवयुवक माहे, बुलो, गोनउरा, टुनाई आदिकेँ स्थान दऽ साहसी परिवर्तनक आकांक्षी युवा वर्गकेँ ठाढ़ कए नव संदेश देल गेल अछि। तहिना परम्परापोषंक ओ रूढ़िवादीलोकनिक रूपमे खोखाइ झा, मुखिया, चौधरी, मुटकी मिश्र फतूरी काका आदि नारी नवतुरिआक चरित्र सेहो ठाढ़ कए सकत। संघर्ष ओ परिवर्तनक भावकेँ विश्वसनीयता प्रदान कएल गेल अछि। केन्द्रीय समस्याक समाधान हेतु अपनहि बीचसँ उपयुक्त बरक रूपमे वाचस्पतिकेँ ठाढ़ कएल गेल अछि। एहि प्रकारेँ कोकनल रूढ़िभंजन ओ सामाजिक पुनर्निमाणक दृष्टान्त बनल नवतुरिया। सहज, सरल फड़कैत भाषाक प्रयोग यात्रीजीक सभ उपन्यासमे बेछप अछि। वातावरणक अनुकूल ठेँठ शब्दावली, तत्सम, तद्भव देशी-विदेशी, विदेशीक ग्राम्य प्रयोग पात्र ओ परिस्थिति अनुसारेँ सटीक रूपेँ करब यात्रीक उपन्यासक वैशिष्ट्य थिक। उपन्यासे जकॉं यात्रीक कविता सभमे सेहो समाजिक यथार्थवादकेँ प्रमुखतासँ स्थान देल गेल अछि। हिनक प्रथम काव्य संग्रह ‘चित्रा’मे 1931 सँ 1949 धरिक चुनल कविताकेँ राखल गेल अछि। प्रत्येक कविता अपन पृथक वैशिष्टसँ युक्त अछि। जेना विलापमे सामाजिक कुप्रथा ओ नारी नैराश्यकेँ उजागर कएल गेल अछि। ‘कविक स्वप्न’मे प्रगतिवादी उद्देश्यक घोषणा कएल गेल अछि। ‘अन्तरात्माक भाव’हिमगिरिक उत्संगमे सिनुरिया आम आदिमे संस्कार संस्कृति, मिथिला मातृभूमि सभ भावक कविता एहिमे स्थान पओलक अछि। तहिना 1967 ई.मे प्रकाशित आ 1968 ई.मे साहित्य अकादमी दिल्लीसँ पुरस्कृत कविता संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’मे पारंपरिक सामाजिक यथार्थतासँ परिपूर्ण, प्रतीक पूर्ण, प्रयोगपूर्ण ओ वक्रोक्तिपूर्ण आधुनिक वातावरण नव्यतम स्वरूपमे विद्यमान अछि। एहिमे नव नचारी, अन्हार जिनगी, नवतुरिए आबओ आगाँ, आधुनिक राधिका आदिक संगहि प्रकृति वर्णनसँ युक्त माघ, फागुन, चैत, वैशाख, अषाढ़, साओन, मेघवर्णन आदि कविता अछि। हिनक काव्यमे मानवीयताक रचनात्मक प्रीतिरोध सर्वस्पर्शीय संदेवदना, एकरे परिधिमे, सामाजिक कुरीति, एहि जालमिे फँसल, पछुआएल अपेक्षित नारी ओ दलित समाज तथा नव युगक संदेशवाहक, नवयुवकक पक्षधरता नीक जकॉं उजागर भेल अछि। यात्रीक काव्यक प्रसंग डॉ. वासुकी नाथ झा लिखैत छथि- “कथ्य, सत्य ओ यथार्थक खर-खर धरातलपर आक्रोश ओ संवेदनाक मार्मिकता यात्रीक काव्यमे बेछप अछि। ‘अगराही लगौ बरू वज्र खसौ’ भावक उद्दीपन मिथिलाक नारी वर्गक आजुक संदर्भमे निष्पत्ति दिस अग्रसर होइत स्पष्ट दृष्टिगोचार होइत अछि। कविक युगद्रष्टा ओ युगस्रष्टा होएबाक विशेष सन्दर्भमे एकरा देखल जा सकैत अछि।”[23] यात्रीजीक कविता सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक स्थिति-परिस्थिति ओ विद्रुपताक प्रति सचेत तँ करितँहि अछि, संगहि जागरूकता आ सुधारक प्रेरणा सेहो दैत अछि। हिनक काव्यमे विद्यमान वस्तु स्थितिक समाजशास्त्रीय दृष्टिसँ विवेचन अपेक्षित अछि। यात्रीजीक काव्यक भाषा बेछप अछि। सर्वत्र व्यावहारिक लोक भाषाक सटीक प्रयोग सरलता-सहजतासँ परिपूर्ण ओ प्रवाहपूर्ण, ओजस्वितापूर्ण, स्वत: सम्प्रेषण सक्षम शब्दावली ओ शिल्प शैलीक परिपूर्णता विद्यमान अछि। आधुनिक मैथिली कवितामे मुक्त वृत्तिकेँ व्यापक ओ गरिमापूर्ण बनेबाक श्रेय हिनका देल जाइत छनि। हिनक योगदानकेँ एहि प्रकारेँ रेखांकित कएल जा सकैछ- मार्क्सवादी ओ फ्रायडीय सिद्धान्तक प्रभावपूर्ण प्रयोग, सामाजिक यथार्थकेँ कविता आ उपन्यासमे सटीक रूपेँ प्रयोग, मुक्त वृत्तिकेँ कलात्मक बनाय सर्वस्वीकृत बनाएब, सामाजिक यथार्थकेँ व्यंगक माध्यमे काव्यमे प्रभावी बनाय ग्राम्यचित्रक शब्दावलीक प्रयोगसँ भाषामे सरलता, सहजता, स्वाभाविक भाव बोध सहज प्रभाव सामान्य पाठक धरिकेँ अभिभूत करबामे सक्षम होयब। वर्त्तमानक साहित्यकार जतए आई स्त्री विमर्शक नारा दऽ रहल छथि ओतए यात्रीजीक 20म शताब्दीक चारिम दशकक कविता विलाप, बूढ़वर, जगतारनि स्त्रीक स्वरकेँ, आर्तनादकेँ तथा आर्त्तनादक अभ्यन्तर उद्भूत संश्लिष्ट अन्तर्द्वन्द्वकेँ ओकर गाम्भीर्यकेँ जगजियार कऽ चुकल छथि। ई कविता सभ वास्तमे स्त्री-विमर्श सामाजिक दृष्टिसँ वस्तुत: भविष्यद्रष्टा सिद्ध करैत अछि जे आइ चरितार्थ भए रहल अछि। ________________________________________ [1]परिचायिका- डॉ. भीमनाथ झा, 107 [2]मैथिली साहित्यक इतिहास- पृ.- 206, डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश [3]History of Maithili literature- page- 160, Dr. Jaikant Mishra. [4]यात्री : मेमे बाबूजी, शोभाकनत, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1990, पृ.- 13 [5]दिनकर का व्यक्तित्व- पृ.- 8ए डॉ. प्रमिला [6]दिनकर का व्यक्तित्व- पृ.- 8ए डॉ. प्रमिला [7]मानक हिन्दी कोश- पृ.- 124ए पॉंचवा खण्डए रामचन्द्र वर्मा [8]हिन्दी विश्वकोश- पृ.- 150ए प्रथम संस्करण खण्ड [9]उपन्यासकार नागार्जुन- पृ.- 1, श्याम प्रकाशन जयपुर, 3 1985, बाबू राम गुप्त [10]आज के लोक प्रिय हिन्दी कवि नागार्जुन- पृ.- 3 प्र. राजपाल एण्ड सन्स- 3, डॉ. प्रभाकर माचवें [11]उपन्यासकार नागार्जुन- पृ्.- 2, रामबाबू गुप्त [12]नागार्जुन मेरे बाबूजी : पृ. सं. 58, शोभाकान्त [13]नागार्जुन मेरे बाबूजी : पृ. सं. 46, शोभाकान्त [14]नागार्जुन मेरे बाबूजी- पृ.- 53, शोभाकान्त [15]यात्री समग्र : ‘यात्री समग्र’क सन्दर्भमे- 2003, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। [16]नव भारत टाइम्स : साक्षात्कार, अपराजिता देवी, 29 जुलाई 1991, अंक- पटनासँ प्रकाशित [17]बाबा नागार्जुन- पृ.- 14, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, सं.- नरेन्द्र कोहली [18]बाबा नागार्जुन- पृ.- 14 वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, सं.- नरेन्द्र कोहली [19]उपन्यासकार नागार्जुन- पृ.- 6, श्याम प्रकाशन जयपुर, बाबूराम गुप्त [20]यात्री- (2000) पृ.- 20, चेतना समिति पटना, सम्पादक डॉ. श्री हरिनारायण मिश्र [21]यात्री- (2000), पृ.- 20, चेतना समिति पटना, सम्पादक डॉ. श्री हरिनारायण मिश्र। [22]परिचायिका- पृ.- 107, डॉ. भीमनाथ झा [23]यात्री साहित्यावलोकन- पृ.- 5, 2011, चेतना समिति पटना, स. वासुकी नाथ झा यात्रीक गद्य-साहित्यमे मिथिला समाज सामान्यत: मनुष्यक लिखबा-पढ़बाक अथबा बजबाक छन्दरहित साधारण व्यवहारक भाषा गद्य (Prose) कहबैत अछि एहिमे मात्र आंशिक सत्यता अछि, कारण एहिमे गद्यकारक रचनात्मक बोधक अवहेलना होइछ। साधारण व्यवहारक भाषा गद्य तखनहि भऽ सकैछ जखन ओ व्यवस्थित आ स्पष्ट रूपेँ व्यक्त कएल गेल हो। तेँ रचनात्मक प्रक्रियाकेँ ध्यानमे रखैत गद्यकेँ मनुष्यक साधारण किन्तु व्यवस्थित भाषा वा ओकर विशिष्ट अभिव्यक्ति कहब सएह उचित होयत। साहित्य रचनाक दू गोट विधा होइछ- ‘गद्य- ओ ‘पद्य’। गद्य विधाक अन्तर्गत कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, निबन्ध, संस्मरण, व्यंग, आत्मकथा, रिपोर्ताज, आलोचना पत्र-पत्रिका इत्यादि लिखल जाइत अछि। गद्यमे अलंकारक प्रयोग प्राय: नहिए होइत अछि मुदा पद्यमे एकर प्रयोग खूब होइत अछि। गद्य विधाक रचना सोझ-डारिएँ पढ़ल जाइत अछि, कारण एहिमे लयात्मकता नहि होइत अछि, जखन कि पद्य विधाक रचनामे लयात्मकता होइत अछि। यथार्थमे गद्यक सम्बन्ध हमरालोकनिक अभिव्यक्ति आ विचारसँ रहैत अछि जखन कि पद्यक सम्बन्ध मनोभावसँ रहैत अछि। दोसर शब्दमे पद्यक सम्बन्ध मनसँ होइछ आ गद्यक सम्बन्ध मस्तिष्कसँ। ई बात सत्य जे पद्य लेखन प्रारम्भ गद्यसँ पहिने भेल छल, जकर प्रमाण महाभारतसँ लऽ ऋग्वेदकालीन प्राचीन रचनासभकेँ देखलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ मुदा आधुनिक काल गद्यक स्वर्णयुग थिक कारण तुलनात्मक रूपेँ एहि कालखण्डमे गद्यक विकास बेसी भेल अछि। आधुनिक गद्यक प्रारम्भ :- मैथिली गद्यक प्रारम्भ कहिआ भेल से निश्चित रूपेँ नहि कहल जा सकैछ मुदा आरम्भमे एकर साहित्य मौखिके छल तथा एकर विकासो तहिना होइत रहल। चौदहम शताब्दीक प्रथम चरणमे ‘वर्णरत्नाकर’क रचना भेल छल। तेँ ई अनुमान लगाए असंगत नहि होयत जे ताबत काल धरि मैथिली गद्यमे साहित्याभिव्यक्तिक क्षमता आबि गेल रहए। मैथिली पद्य-साहित्ये जकाँ गद्य साहित्य सेहो सरस्वतीक अन्त: सलिला धारा जकाँ जनसमाजमे प्रवाहित भए रहल छल। वर्णरत्नाकरक पूर्वक गद्य साहित्यक स्वरूपक हमरालोकनि अनुमाने अथवा पीढ़ीगत हस्तान्तरणक आधारपर बुझि सकैछ। कारण ओ आलेखित आ मौखिक होइत छल। तात्कालीन समयक लोककथा जेहन प्रो. तंत्रनाथ झाक ‘जोगक संगी’ ओ ‘जिवितहिँ स्वर्ग’ अछि तथा विभिन्न प्रकारक लोक कथाकाव्य जाहिमे म.म. परमेश्वर झाक ‘सीभान्तिनी आख्यायिका’क अनुसार रूक्मिणी स्वयंवरसँ लऽ विरहा चाँचरि धरि अबैत अछि। एतबे नहि एहिमे सलहेस प्रभृति ‘लोकवीरगाथा’ सेहो अबैत अछि। लोककथा काव्यकेँ गद्य-साहित्यमे परिगणित करबाक कारण ई जे एहिमे पद्यक अतिरिक्त गद्यक प्रयोग होइत छल, मुदा ओ पढ़ल जाइत छल लयात्मक रीतिएँ, गीत जकाँ। एहि पढ़बाक रीतिकेँ म.म. परमेश्वर झा ‘गमैया भास’ कहने छथि। डॉ. ग्रियरसन अपन ‘मैथिली क्रिस्टोमैथी’ (1981) मे सलहेसकेँ संकलित कए प्रकाशित करबौने छथि। ओकर भाषा केहन छल से द्रष्टव्य अछि- “नान्हिटासँ पोसलहु, एतेक वस्तु आनि कै घरमे रखलहुँ, तैयो नहि स्वामी सलहेस ऐलाह। हुनका कारण फुलबारी रोपलि, रंग-रंगक फूल आनि जगाओलि। बेली फूल, चमेली ओ बुलकुंज, नेबार, तेखरिक फूल, फुलवारी लगाओल हुनि सलहेस... आदि।” उपर्युक्त पाँतीकेँ पढ़लासँ एतबा तँ स्पष्ट अछि जे ई नि: सन्देह ओहि समयक भाषा नहि थिक, मुदा ओहि समयमे भाषाक जेहन रूप रहल हो, गद्य धरि अवश्य लयात्मक प्रवाहमे गाओल जाइत छल आ ओ आइओ गाओल जाइत अछि। परन्तु वर्णरत्नाकरक पूर्वक गद्य लिखित रूपमे उपलब्ध नहि अछि। एकर कारण प्राय: छल पण्डितलोकनिक लोकभाषाक प्रति उपेक्षा भाव अथवा लिखबाक असौकर्य। इएह कारण अछि जे वर्णरत्नाकरक पूर्वकेँ के कहए, पश्चातहुक कोनो साहित्यक गद्य चन्दा झाक पूर्वक प्राप्त नहि होइत अछि। चन्दा झासँ छओ सए वर्ष पूर्व ‘वर्णरत्नाकर’क भाषाक गद्यमे रचना कए ज्योतिरीश्वर केहन साहसक परिचय देने होएताह, तकर आइ हमरालोकनि अनुमाने टा लगा सकैछ। विद्यापति सेहो लोकभाषामे पद्य रचना कए बड़ साहिसक परिचय देल एवं मैथिली लोकभाषाकेँ साहित्यिक गरिमा प्रदान कएल मुदा मैथिलीमे गद्यक रचना ओहो नहि कए सकलाह। विद्यापति गद्य लिखलनि तँ अवश्य मुदा अवहट्ठमे- ‘कीर्तिलता’ ओ ‘कीर्तिपताका’ तथा संस्कृतमे ‘पुरुषपरीक्षा’ प्रभृति ग्रन्थक माध्यमे एतेक दूर धरि जे लिखनावलीक रचना ओ संस्कृतमे कएल, जकर उद्देश्य छलैक पत्र प्रभृति लोकोपयोगी प्रणालीक व्यवस्था प्रस्तुत करब आओर जे आइ-काल्हि मिथिलाक धार्मिक सांस्कृतिक समारोहक अवसर आओर जे आइ-काल्हि मिथिलाक धार्मिक सांस्कृतिक समारोहक अवसरपर आमंत्रण प्रभृति लिखबामे आदर्श बनले अछि। एहिसँ पण्डित लोकनिक जाहिमे विद्यापति सेहो अन्तर्भुक्त कएल जा सकैत छथि, लोक भाषाक प्रति केहन प्रवृत्ति छल, तकर परिज्ञान होइत अछि। तथापि हुनक अवहट्ठु भाषामे मैथिली गद्यक विकासशील स्वरूपक परिचय भेटि जाइत अछि, यद्यपि ओहिमे संस्कृतनिष्ठता सएह अधिक अछि। आधुनिक कालमे मैथिली जकर अतीत आ मध्यकाल उज्जवल रहलैक अछि, अपन सवल-श्रेष्ठ आधुनिक साहित्यपर यक्तिञ्चतो गर्व करबाक स्थितिमे अछि। मिथिलाक नवजागरण “नवीन पश्चात्य शिक्षा-पद्धति ओ एहिसँ उद्भूत नाना प्रकारक आन्दोलन, मुद्रण-यंत्र तथा समुन्नत ब्रिटिश प्रशासन”क सत्परिणाम थिक। ओना एकटा बात एतए कहब आवश्यक जे जखन पटनामे हिन्दीसँ अभिभूत विश्वविद्यालय स्थापित भेल तँ मैथिली शिक्षा-संस्थानसँ हटाए देल गेल आओर “तिरहुत महाराज”क कचहरीसँ सेहो निष्कासित भए गेल, तथापि एकर साहित्यिक स्तर एवं परंपरामे महान् परिवर्तन आएल। एहि नवोन्मेषक एकदम प्रत्यक्ष ओ महत्वपूर्ण परिणाम गद्यक क्षेत्रमे परिलक्षित भेल अछि। प्राचीन आ मध्यकालीन गद्य नवीन युगक अपेक्षाक पूर्ति करबामे समर्थ नहि छल। पूर्वक गद्य अत्यधिक कवित्वमय आ अत्यधिक रीतिवादी छल; मध्यकालीन गद्यमे विभिन्न प्रयोजनक अनुरूप अपनाकेँ गढ़ि लेबाक खमता नहि छलैक। आधुनिक जीवनमे एहन गद्यक आवश्यकता छलैक जे दीर्घ काल धरि सुविधापूर्वक पढ़ल आ स्वादल जाए सकए, जे अखबार, पत्रिका, फिल्म, उपन्यास, विज्ञापन, कथा, आलोचना तथा एहिसभक संग शास्त्रीय निबन्ध एवं ग्रन्थक उपयुक्त माध्यम भए सकए। आधुनिक गद्यक आदिकालीन आ अन्तकालीन स्वरूपक बीच ततेक प्रखर अन्तर अछि जे आन्हरहुकेँ ओ देखि पड़तैक। एहि नवीन स्वरूपपर अएबासँ पूर्व मैथिली गद्यकेँ अपन अनेक सोपान पार करए पड़लैक अछि। एकर विकासमे जकर मत्वपूर्ण योगदान रहल अछि से थिक आधुनिक कालमे श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक उदय। हिनकहि प्रसादेँ मैथिली गद्य अपन नवीन स्वरूपक वरदान पाओलक अछि। मैथिली गद्यमे यात्रीक अवदान :- मैथिलीक कतोक शीर्षस्थ साहित्यकार लोकनि मातृभाषा ओ राष्ट्रभाषा दुनूमे उत्कृष्ट कोटिक रचना कएलनि। मातृभाषा आ राष्ट्रभाषामे अन्यतम सम्बन्ध छैक। अतएव साहित्यकार जे विवेकशील, सम्वेदनशील ओ व्यापक अन्तर्दृष्टिसँ सम्पन्न होइत छथि, हुनका लेल दुनूमे पार्थक्य भाव राखब असम्भव। मातृभाषा परिचितक माध्यम थिकै। मातृभाषा अपन देश-कोस, माटि-पानिक महत्वकेँ सार्वजनिक रूपसँ स्वीकृति मान्यता देबाक, आदर्श स्थापित करबाक माध्यम थिक। यात्रीजी एहि दृष्टिकोणसँ अन्यतम साहित्यकार छथि। ओ मातृभाषा आ राष्ट्रभाषा दुनूमे समान रूपेँ रचना कएलनि तथा अपन रचनाक माध्यमसँ समाजकेँ नव दिशा-दशा, आयाम आ दृष्टि देलनि। इहो तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण ओ गूढ़ रूपसँ विचारणीय जे मातृभाषेक माध्यमसँ द्विभाषी साहित्यकार लोकनि शीर्षस्थ साहित्यिक पुरस्कार अर्थात् साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ पुरस्कृत भेलाह- ताहिमेसँ एक छथि ‘श्री वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’। मातृभाषाक ओ ‘यात्री’ छथि तँ राष्ट्रभाषाक- ‘नागार्जुन’। ‘यात्री’ सन साहित्यकार कोनो एक भाषा, देश-काल, माटि-पानि, व्यक्ति- वर्ग, समाज-लिंग, जातिक सीमामे बन्हाएल नहि रहैछ। ओ सार्वदेशिक, सार्वकालिक ओ सार्वभौमक होइछ। मानवीय धरातलपर उतरि जखन सम्वेदनाकेँ अनुभव कएल जाइछ एवं जन-जनमे तकरा देखल जाइछ, तखन सृजन होइत छैक, कालजयी- विश्व व्यापी रचनाक, जे युगधर्मसँ सम्पृक्त रहैछ। जन-जनकेँ अपनामे आत्मसात कएनिहार ‘यात्री’ आ जन-जनमे समाहित ‘यात्री’ वंचित, पीड़ित, शोषकक दु:ख दर्दक मूक वेदनाकेँ करूण किन्तु बुलन्द स्वर देलनि। स्वरमे अनुनय-याचना नहि, संघर्ष विद्रोह ओ ललकाराक तख्ती प्रदान कएलनि। भूतसँ स्वीकृति-अस्वीकृति, वर्त्तमानक समकालिकता एवं भविष्यक लेल स्वस्थ्य आस्थापूर्ण सूक्ष्म-तीक्ष्ण अन्तर्दृष्टिक दिग्दर्शन यात्रीक गद्य वा पद्यक अन्तर्गत होइत अछि। ‘यात्री’ मिथिलेक नहि वैश्विक छथि। एतएव हुनक गद्यमे प्राचीनताकेँ स्वीकार अथवा नकार भावसँ ग्रहण नहि कएल गेल अछि आ, ने तँ नवीनताकेँ सद्य: सकारि लेल गेल अछि। दुनूक ग्राह्य-अगाह्य पक्ष-तत्त्व सतत हुनक अन्तर्दृष्टिमे रहलनि अछि। यात्रीजीक मैथिली गद्य :- मैथिलीक गद्य विधापर जँ विचार करी तँ श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक रचना संसार अति विस्तृत अछि। अपन एहि गद्य रचनाक माध्यमे यात्रीजी मिथिलाक सुदूर गाम-घर, कोठा-अटारी, झुग्गी-झोपड़ी, नगर-नगर आदिक विस्तृत चित्रण प्रस्तुत कएलन्हि अछि। हिनक सभ रचनामे मिथिला समाजक माटिक सुगन्ध भेटत, मिथिलाक प्रतिभा प्रतिष्ठा भेटत, समाजक सोझ-टेंढ़, विद्रुप्ता भेटत जकरा साहित्यकार श्री वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ यथार्थताक संग प्रस्तुत करैत छथि। मैथिली गद्यक क्षेत्रमे यात्रीजीक निम्नलिखित कार्य अति प्रसंसनीय अछि यात्रीजी मैथिली साहित्यक प्रत्येक विधापर अपन हाथ चलौलन्हि आ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर थिक। हिनक दू गोट उपन्यास मैथिली भाषामे प्रकाशित अछि जे औपन्यासिक साहित्यक लेल एक विशिष्ट अवदान अछि- (1) पारो (1946) (2) नवतुरिया यात्रीजीक फुटकर गद्यक रूपमे जे प्रमुख साहित्यक हम अपन एहि शोध प्रबन्धमे चर्च करए चाहब ओहिमे निम्नलिखित कथाक नाम लेने बिना हिनक गद्यक प्रसंग चर्च अपूर्ण रहत। ओ थिक- (1) बउकन ठाकुर (2) बूढ़ बोको (3) गप्पक फोड़न (4) रूपान्तर (5) जरद्गव (6) चितकबरी इजोरिया यात्रीजीक तेसर विधा जे गद्यक रूपमे हमरालोकनिकेँ भेटैत अछि, ओ थिक हिनक संस्मरण, जाहिमे निम्नलिखित शीर्षकक संस्मरण कएने बिना यात्रीजीक गद्य-संसार अधूरा रहि जाएत। संस्मरण विधामे हिनक तीन गोट संस्मरणक विमर्श करब एतए उचित एवं आवश्यक अछि- (1) चारि अहोरात्रि एक दिन (2) पृथ्वी ते पात्रं (3) प्रवासक संस्मरण हिनक लेख व्याख्यान, रिपोर्ताज तथा स्फुट आदिक रूपमे जे प्रमुख गद्य यात्रीजीक अछि ओहिमे निम्नलिखित शीर्षकक उल्लेख करब अपेक्षित अछि- (क) मैथिल महासभा : मैथिलित्वक मानदंड (ख) रिक्तता ओ पूर्णता (ग) कविता युगक गीता (घ) प्रस्तुत प्रसंग (ङ) स्वगत- अनुचिन्तन (च) एकटा संदेश एकर अतिरिक्त स्तम्भ लेखन एवं पत्र सेहो यात्रीजीक छनि। ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’ नामसँ चारि गोट स्तम्भ, ‘यत्-किंचित’ शीर्षकसँ आठ गोट स्तम्भ तथा ‘ओ-ना-मा-सी-धङ’सँ दू गोट स्तम्भ छनि। यात्रीक पद्यमे मिथिला-समाज साहित्यक रचनाक दू गोट विधा होइछ- गद्य ओ पद्य। गद्य विधाक अन्तर्गत कथा, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, स्मरण, व्यंग्य, आत्मकथा, पत्र लेखन, आदि अबैत अछि; ओतहि ‘पद्य’क अन्तर्गत कवि, गीत, गजल, मुक्तक, महाकाव्य, खण्डकाव्य आदि अबैत अछि। पद्यमे अलंकारक प्रयोग तुलनात्मक रूपेँ अत्यधिक होइत अछि। अलंकारकेँ पद्यक गहना कहल गेल अछि। पद्य विधाक रचनामे लयात्मकता होइत अछि। एहि प्रकारक रचना गेय होइछ। हमरालोकनि एकरा सुरमे गाबि सकैछ। पद्य रचनाक प्रारम्भ गद्यसँ पहिनहि भेल छल। महाभारतसँ लऽ ऋग्वेद काल धरिक पुरातन रचनासभ पद्य विधेमे अछि। यात्रीक मूल्यांकन कविक रूपमे :- कवि शब्दक अर्थ मात्र कविता लिखनिहार नहि थिक। प्राचीन भारत वा प्राचीन ग्रीक देशमे सभ दिन शब्दक प्रयोग द्रष्टा, क्रान्ति द्रष्टा, सर्वज्ञ, नियन्ताक अर्थमे होइत रहल। अंग्रेजीमे तकरे भावार्थ gifted, insight, seev, prophet आदि शब्देँ व्यक्त कएल गेल अछि। एही अर्थमे सोना कविकेँ आदिअहिसँ ओ जे कोनो भाव सभ व्यक्त कएलनि, जे किछु तथ्य विचारलनि तकरे, महत्व देल जाइत अछि। यात्रीजी की कएलनि, की लिखलनि, की कहलनि तकर महत्व एही दृष्टिसँ बुझबाक थिक। आइ हुनक मृत्युक बाद हमरा इएह खटकैत अछि जे हम सब ई नहि बुझि, हुनक महत्व मात्र हुनक कवित्वक चमत्कारकेँ दैत छिअनि। ओ कविता लिखनि, नीक कविता लिखलनि, नव ढंगक कविता लिखलनि से से सर्वथा सत्य थिक, मुदा ओतबे सत्य नहि थिक। ओ बरोबरि जाहि कवि कर्मकेँ धेने रहलाह, से हुनक नैसर्गिक ओ स्वाभाविक कलमक गति छलनि। विशिष्ट जे हुनकामे वस्तु छल, से ओतबे धरि नहि रहल। लोक कहैत छनि जे यात्रीजी बहुत संख्यामे कविता लिखलनि, ओ अपनहुँ बजलाह जे हम कतेक कएलहुँ, से लोक नहि जनैत अछि, हमर बहुत प्रकारक कविता भेल, हिन्दीमे भेल आ से मिथिलाक लोक नहि जनैत बुझैत अछि; हम बहुत प्रकारक विताकेँ नव आयाम देलियैक, से लोक नहि बुझैत अछि। हिन्दीमे कहल जाइत अछि जे ओ आञ्चलिकता, शब्दक ठेठपन, तद्भावना, व्यंगपूर्ण भावुकता आ प्रवल जीवन शक्तिक कविता लिखलनि, प्रगतिशील कविता लिखलनि, ओ नव छन्द, मुक्त वृत छन्द गढ़लनि, अतुकान्त कविता लिखलनि, गद्य लिखलनि।’ सभसँ बेसी कहल जाइत छनि जे जनताक पक्षधर ओ व्यंग, ओ बहुत संख्यामे आ बहुत दिन धरि दू हजार पाँती पचास वर्ष धरि- बरोबरि लिखैत रहलाह। आ इएह हुनक महानता छलनि। एहि प्रसंग बहुतो बात ठीक छैक आ बहुत बातक दृष्टिकोण हुनक कवि कर्मक सम्बन्धमे उनटा-पुनटा बूझल जाइत अछि। मोटा-मोटी हुनक सम्पूर्ण रचनामेसँ आजुक लोककेँ हुनक गद्य रचना विशिष्ट लगैत छनि। ई बात नहि जे हम हुनक गद्य शक्तिक महत्व कम दैत छिअनि, से भा्रमक होएत। प्रत्युत हम मानैत छी जे गद्यमे पाखण्डक ओ सामाजिक स्वार्थक महान चित्रण यात्रीजी कएलनि। एहिमे वर्ग संघर्षक विद्रोह एवं असन्तोष उजागर कएलनि अछि। ओ नव कविता आ मुक्तक छन्दक प्रचार-प्रसार सेहो कएलन्हि, मुदा हम ई नहि मानैत छी जे हुनक महत्व आञ्चलिकताक कारणेँ भेलनि। हिन्दीमे यात्रीजी अपन पेट पोसबाक लेल एवं विशाल क्षेत्रमे प्रसिद्धि पएबाक लेल जे प्रयास कएलनि, ताहि हेतु हुनक सभसँ विशेष महत्व देबय बला वस्तु छलनि। मुदा ओ तँ भीतरसँ- अन्तससँ मिथिलाक साहित्यकार छलाह, मिथिलाक माटि-पानि केर ओ मूलत: जीवन्त कवि छलाह, जकर सीमा महान छल, हिमालयक शिखर सन उच्च छल। ओ कोनो आञ्चलिक शक्ति नहि छलाह जे हिन्दीमे प्रकट भेलनि, किछु सन्हिआ गेलनि, किछु देखि पड़लनि। मैथिली साहित्यक एकटा विस्तार छल। मूलत: ओ हिन्दीक लेखक नहि छलाह। एहि विषयपर विचार करबाक हेतु एकटा बृहत् शोध-प्रबन्ध लिखबाक आवश्यकता अछि। हुनक मैथिली कविता कम रहनु, मुदा हिन्दी बला जकरा आञ्चलिकता कहैत छथि से बहुत बेसी, बहुत उत्तम, खाँटी मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक तात्विक छिटका सभ थिक। ओ सभ तँ मैथिलीमे लिखबाक वस्तु छलैक, मैथिलीएमे लिखल जइतैक, मुदा ताहि हेतु प्रचुर प्रकाशक नहि भेटलनि। ‘बाबा बटेसर नाथ’नामक जे ओ पोथी लिखलनि से विशुद्ध एहने कथा थिक। ओकर मर्म हिन्दीक पाठक नहि बूझि सकताह। ओकर गहींड़ सामाजिक अभिप्राय नहि पाबि सकताह, मुदा से यात्रीजी मैथिलीमे नहि लिखनि, तकर कारण छल मैथिलीक प्रकाशक नहि भेटब। मैथिलीमे लिखि ओतेक पैसा, मेहनति, विस्तृत क्षेत्रमे पाठक एवं यश भेटबाक आशा छलनि तेँ ओ पोथी मैथिलीमे नहि लिखल गेल। बलचनमा, दुखमोचन आदि एही प्रकारक आञ्चलिकताक द्योतक थिक। व्यंगपूर्ण सामाजिक चित्रण मिथिला मात्रक टिप्पणी नहि थिक, ओहिमे मिथिलासँ बाहरो अनुभव सभक प्रयोग भेल छैक। मुदा, कवित्व शक्ति जकरा कहैत छैक, जाहि कवित्व शक्तिक कारणेँ यात्रीक कविकर्मकेँ हमरालोकनि उत्युच्च कोटिक लेखन मानैत छिअनि, तकर बराबरी करय बला हिन्दीमे हुनक काव्य नहि भेटैत अछि। जेना- कल्पनाक पाँखिक उड़ान, द्वन्द्व, कृतिका नक्षत्रमे, हिमगिक उत्संगमे, ताड़क गाछ, भए गेल प्रात, ऋतु सन्धि आदि केर जोड़ी हुनक हिन्दी काव्यमे हम तककैत-तकैत हरान भए गेलहुँ, नहि भेटल। ‘आन्हर जिनगी’जाहि कविक शक्तिक परिचय दैत अछि से प्राय: विश्वक सभसँ श्रेष्ठ कवित्वमे कतहु भेटय तँ भेटय अन्यथा ओ बेजोड़ अछि। यात्रीजीक एकटा पैघ उपलब्धि ई छनि जे हुनका भाषामे ठेठ शब्दक प्रयोग होइत अछि आ हुनक भाषा एही कारणेँ क्रान्ति अनलक। ओ देहातीपनक गमैया टाँसमे ठेंठ बोलीक रचनामे माधुर्य उत्पन्न करैत छथि। एहि प्रकारेँ खाँटी शब्दक पाथर हिनक रचनामे अनायासे भेटि जाइत अछि। यात्रीजी एकटा विशेष शैलीमे लोक जीवनक ठाठ बुनि अपनत्व बोधक प्रगाढ़तामे जीवन यथार्थक खाला खिचलनि। श्री चन्देशक उक्ति छनि- ‘युग सत्रूक प्रमाणिक दस्तावेज’ यात्रीक प्रसंग।[i] उपर्युक्त चन्द्रेशक उक्तिमे हमरा अतिशयोक्ति देखि पड़ैत अछि। प्रत्युत हिन्दीक लेखनकेर बीचमे मैथिली शब्दावलीक प्रयोगकेँ हिन्दीक बोलीक रूपमे देखब छैक। हम मैथिलीक साधारण शब्दक साधारण प्रयोगकेँ गमैया आ ठेंठ अपमानजनक बुझैत छी। मैथिली शब्द मात्रकेँ गमैया प्रयोग कथमपि नहि मानल जा सकैछ। मैथिली शब्दक प्रयोग स्वस्थ आ शिष्ट मैथिली भाषाक शब्दावलीक प्रयोग थिक, जाहिमे सरल जीवन्त भाषा ओहिना रहैछ, जहिना मिथिलाक शिष्ट समाजमे मैथिली बाजल जाइत अछि। ओहिमे शब्द जे सरल अछि, ताहिमे कोनो गमैया प्रयोग नहि झलकैत अछि। ध्यान देबाक थिक जे ओहि शैलीमे संस्कृतिक प्रयोग सेहो पूर्ण साहित्यिक रूपमे यत्र-तत्र भरल अछि। जेना बंगला भाषाक कोनो साहित्यमे सरल बंगला सहित संस्कृतनिष्ठ शब्दावलीक प्रयोग करब स्वाभाविक होइत छैक। ओकरा गमैया ठेंठ कहब अपमानजनक थिक। ओ तँ शिष्ट भाषाक साहित्यिक रूप थिक। यात्रीजीक मैथिली काव्यमे जे प्रयोग सब अछि तकरा कोनो रूपेँ संस्कृतनिष्ठ शब्दावलीसँ ओत-प्रोत कएल छैक, तकरा देखलापर हुनक मैथिलीकेँ कोनो गमैया ठेंठ कहल जा सकैछ, से आश्चर्य लगैत अछि। एकर एकटा बानगीक रूपमे ‘परम सत्य’नामक कवितामे देखल जा सकैछ :- “हम, अहाँ ओ ई मने क्यो होथु- व्यक्ति मात्र थिकाह अगबे फूसि सत्य की तँ शून्य सत्य की तँ ब्रह्म सत्य की तँ घनानन्द, अखण्ड चित् कूटस्थ सैधव लवण सम नीरंध्र..।”[ii] की, एहि पाँती सभकेँ गमैया कहबैक? अगबे शब्द गमैया नहि थिक शुद्ध मैथिलीक शिष्ट भाषा थिक। आ ‘सौंधव लवण सम नीरंध्र मैथिलीक चमत्कृत संस्कृतनिष्ठ प्रयोग थिक। ई कोनो कृत्रिमताक भाषा नहि थिक। ई सहज शिष्ट मैथिलीक साहित्यक रूप थिक। जेना- “धनिकहा सबहक हाथमे छनहि राम-कृष्णक टीक जे बजइ अछि फूसितकरा डरेँ घर-घर कपइ छथि हलुमान, घूस रोटक पाबि दुष्टक पीठ ठोकथि काल भैरव सन विकट बलवान।”[iii] एहिठाम ध्यान देबा योग्य बात ई अछि जे हलुमान आ काल भैरव’क बिम्ब-गमैया ठेंठ आ संस्कृत पर आधारित छैक, से गमैया नहि थिक। ओ सभ मिल-जुलल मिझड़ाएल शुद्ध शिष्ट मैथिली भाषाक साहित्यिक रूप थिक। यात्रीजीक आओर कोनो कविता लेब; तँ ओहिमे सरल ओ सस्कृतनिष्ठ मिझड़ल भाषा भेटत, जहिना शिष्ट साहित्यिक भाषामे भेटत। ओकरा गमैया कहब धृष्टता होएत :- कुम्हीक लैत अओढ़, चारक पुरान खओढ़ कोड़ो धरैत खाम्ह, बरेड़ीक संग-संग छल जा रहल बहैत, अपसग अलझन दैत देखि भेलहुँ ढंग- क्षीर सागरमे सुतल भावनाकेँ करबाक लेल तंग।[iv] उपर्युक्त पद्यांशमे क्षीरसागर आ खाम्ह, कोड़ो, दुइ भाषा छैक? नहि। दुनू एके भाषा- शिष्ट, साहित्यक मैथिली भाषाक शब्दावली थिक। जाहिठाम जेहन कल्पना, जेहन साहित्यिक योजनामे जेहन भाषाक, जेहन शब्दावलीक माङ छैक, तेहन शब्दावली आनल गेल अछि। ई देहातीपनक बोलीमे रचना माधुर्य उत्पन्न करब थिक। ई शुद्ध मैथिली भाषा, मैथिली साहित्यक चमत्कार कवि कर्म थिक। ई सभ तँ सामान्य रूपेँ शीर्षस्थ कवि कर्मक गुण भेल। मुदा एतबे लए केँ हम यात्रीजीकेँ महाकविक रूपमे नहि देखैत छिअन्हि। ओ दूर द्रष्टा, युग स्रष्टा जे भेलाह से एहिसँ बेसी अपना देश अपन जन्मभूमि मिथिलाकेँ महान आधुनिक देश बनेबाक दृष्टि रखबाक कारणेँ भेलाह, जे आरम्भसँ हृदयमे आगि जकाँ पजरैत छल, मुदा पूर्ण रूप जीवनक अन्त अबैत-अबैत देखलनि। पहिल दृष्टिमे यात्रीजीकेँ सन 1931 ईसँ 1941 ई. धरि एतबे ध्यान गेलनि जे अपन प्राचीन इतिहास बहुत महान छल। मुदा ओहिमे बहुत रास सामाजिक ओ आर्थिक समस्या सभ आबि कऽ देशकेँ जटिल ओ दुर्भाग्यपूर्ण बना देने अछि, तकरा ओ बालविवाह ओ बृद्धविवाह केर कारूणिक एवं घिनाओन वैवाहिक दुखस्थाकेँ हटेबाक विकलता रूपमे देखलि। बूढ़ वर ओ बाल विधवाक विलाप नामक कवितामे लिखलनि- “बनौने जा रहल अछि नोरक धार ओहीमे लोक वेद भसिया बरू जाय अगराही लगौ बरू बज्र खसौ एहन जाति पर बरू धसना खसौ भूकम्प हौक बरू फटौक धरती मा मिथिले रहिये केँ की करती।”[v] एहिठाम ध्यान देबाक अछि जे मिथिलाकेँ बड़ उच्च स्वरमे ओ गौरव गाथा लय अपन काव्य दृष्टि आरम्भ कएने छलाह आर से गौरवमयी प्राचीन मिथिला केर गीत गाबि कऽ की हैत? जँ ई समस्या सभ नहि सुधरत। समस्याकेँ ओझराएबाक हेतु ओ नवतुरियाक आह्वान कएलनि। हुनक कहब छलनि- पछाति नवतुरिए आबओ आगाँ ई ओ पहिल दृष्टि थिकनि जाहिसँ ओ मिथिलाकेँ आगाँ बढ़ाबय चाहैत छलाह। यात्रीजी एतबेसँ सन्तुष्ट नहि होइत छथि। ओ ताकए लगलाह जे आर की करबाक छैक। कविक स्वप्न कामक कवितामे तकर आभास पूर्ण रूपसँ देखलनि- “अन्न नै छै, कैंचा नहि छै, कौड़ी ने छै गरीबक नेना कोना पढ़तैक रे? उठह कवि तोँ दहक ललकारा कने गिरि शिखर पर पथिक- दल चढ़तैक रे!”[vi] वास्तविकता की थिकइ से बुझितहक आँखि खोलि ओ चारू दिस तकलनि तँ मिथिलादेश हुनका देखि पड़लनि। बाढ़िक विकट समस्या, गरीबीक मारि, बेरोजगारीक झमारल देश आँखिक सामने नाचय लगलनि आ हुनका रहि नहि भेलनि। 1947 ई. अबैत-अबैत यात्रीजी बुझलनि जे मिथिलाक विकास तखने होएत, जखन समाजमे छोट-छोट, छोट-पैघ जे भिन्न-भिन्न अपनाकेँ बुझैत अछि- मिथिलावासी यावत् अपनाकेँ एकदेसी भए भेद-भावकेँ बिसरि, स्वयं जागि समस्या सभकेँ अपने नहि सोझराओत। ओ लिखैत छथि- “जय जय जय हे मिथिला भात जय लाख लाख मिथिलाक पुत्र अपनहि हाथेँ हम सोझराएब अपना देशक शासनक सूत्र।”[vii] तेसर दृष्टिकोण अबैत छनि मिथिलाक हेतु विद्यापति पर्व गाम-गाम मनयबाक-प्रचलित करबाक यात्रीजीक आह्वान आ चेतना समितिकेँ पटनामे स्थापित करब। ई कथा विशेष जोर दए कहबाक थिक ओ बुझबाक थिक। महाकवि विद्यापतिक नामेसँ जे मंच बनल से आइ एकर प्रतीक अछि जे मिथिला वासीक चेतना जगबाक इएह मंच, इएह संस्था मार्ग थिक, जाहिसँ नव मिथिलाक निर्माण भए सकत। कवि देखलनि आ हमरा सभकेँ मार्ग धरा देलनि। इएह विचारसँ घुमि-घमि ‘परम सत्य’नामक कवितामे कहैत रहलाह। ओ लिखलनि- धन्य हे श्रमशील मानव विश्वभरिमे व्याप्त तोहर जाति। अन्तिम सोपान अपन एकान्तमे लिखल पत्र सभ श्री जीवकान्तक नामे जे भारती-मंडन नामक पत्रमे छपओलन्हि तइमे ओ स्पष्ट ओ गूढ़ विचार रूपेँ ओ बाजि उठलाह- “संयुक्त मिथिला पीपुल्स पार्टी अथवा ताहिसँ पहिने रन्टेले कचुअल फोरम फार युनाइटेड मिथिला कोटिक कोनो ग्रुपकेँ अंकुर रूपेँ देखय लागल छी। समस्त पत्रावलीमे ओ सभटा विस्तारसँ देने छथि हुनक कवि दृष्टि विकसित भए गेलनि आर ओ की करय चाहैत छलाह। मिथिलाक निर्माण एत्ते एही मार्ग होएब सम्भव छैक। दु:ख एतबे जे एहि दृष्टिकेँ देखि-देखि ओ मात्र कविक स्पप्न बना सकलाह। मरबाक समय मात्र ओ एतबे बाजि सकलाह- हमरा लए चलह अपन गाम, सभसँ पहने मोन पड़इ अछि अपने भूमिक लोक। _______________________________________ [i]यात्री- चेतना समिति पटना, 2000 ई, पृ.- 44 [ii]चित्रा- यात्री, (परम सत्य कविता) [iii]चित्रा- यात्रीजीसन्दर्भ- यात्री- यशोदानाथ झा पृ.- 44 [iv]चित्रा- यात्रीजी सन्दर्भ- यात्री- यशोदानाथ झा पृ.- 44 [v]चित्रा- परम सत्य कविता- वैद्यनाथ मिश्र यात्री [vi]चित्रा- बूढ़वर [vii]चित्रा- मॉं मिथिले कविता- यात्रीजी यात्रीजीक मैथिली रचनामे समसामयिक जीवनक अभिव्यक्ति बहुभाषा विज्ञ वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ मैथिलीक मुख्यतः दू उपन्यास आर कविता संग्रह लिखि समस्त मिथिलाक तात्कालिन आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक परिदृश्यक चित्रण क्रमशः विश्लेषित प्रारूपक सँग कएलन्हि अछि । यात्रीजीक प्रार्दुभाव राजनीतिक रूप सँ भारतीय उपनिवेशक परिवर्तनक काल छल । अंग्रेजी हुकुमतक बर्बर तानाशही एवं ब्रिटिश सरकार द्वारा मान्य जमींदरी प्रथा समाज के ँ शोषक वर्गक हाथ में कठपुतली बना राखि देने छल । सम्भ्रान्त समाजक मुट्ठी भरि लोक बहुसंख्यक गरीब प्रजाक ऊपर पाशविक अत्याचार, दमन, शोषण कए समाजक दुर्गति करबा में लीन छल । भारतीय अर्थव्यवस्थाक रीढ़ खेती छल जे जमींदारक हस्तगत छल । जमींदारक अत्याचार किसानक मनोबल के तोरि देने छल । अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार सँ सम्पूर्ण देश मे अर्द्धशिक्षित वर्गक संख्या बढ़ि गेल । बल्कि विभीषिका सँ महामारी दुभिक्ष आदि सँ जान-मालक हानि चेचक, प्लेग, हैजा अदि बिमारी महामारीक रूप अखित्यार कएने छल । एहना परिस्थिति में सामाजिक विषमता, अंधविश्वास वर्ग-भेद, वर्ग-उपवर्ग, छूत-अछूत, धार्मिक पाखण्ड आदि समाजक मध्य रोग जकाँ पसरि गेल छल जे कवि यात्री जी अपन रचना मध्य व्यक्त करबा सँ नहि चुकलाह अछिः- मकडाक जाल सँ बेढल हुइ चुलहाक मुँह थरी-गिलास सब बेचि बिकिन खा गेलइ ऊँह समाजक दुरावस्थाक दृष्य केँ एहि प्रकारे देख वैत कवि यात्रीक उक्त पंक्ति के देखल जायः- कैंचा जकरा से, खाए भात क रहल मौज से, जकरा छइ कोनी गतात दरिद्रताक अभिशाप समस्त मिथिलांचल भोगिरहल छल । अन्न पानि दवा दारूक कोनो युक्ति नहि छल । समाधानक उक्ति ढूढ़वाक प्रयास मे कवि यात्री कहैत छथि । नहि रहलइ ककरो किच्छु मात्र तोहर भरोस । माँटिक महत्व केँ चीन्हि लेलक ई देश-कोश । वस्तुतः भगवानक भरोसे जीवऽ बला व्यक्ति केँ साफ शब्द में कहऽ चाहैत छथि जे अपन धरतीक भरोस करू, देह मे मांइट लगाउ, कर्म करू, मेहनत करू एही बदौलत समस्याक समाधान भए सकत। नहि कि मात्र देवताक भरोसे सब किछु छोरि जीवन के बेकार बना देव । मिथिलाक परिस्थिति सँ खिन्न यात्री कोनो विकल्प नहि देखि रहल छथि । एहन परिस्थितिमे कवि अपन भाव के शब्द दैत कहैत छथिः- अन्न नेछै कैंचानै छै कौड़ी ने है गरीबक नेना कोना पढ़तैक रे? उठह कवि, तो दहक ललकाय कने गिरि शिखा पर पथिक हल चातैक रे! कवि अपनहि अपन आत्मबल केँ मजबूत करैत कहैत दथि अर्थहीन संसाधन बिहिन समाजक उत्थान करबा लड हमरे अथैकेँ आगु आबऽ पड़त । निश्चित रूपेँ यदि संकल्पक सँग जनहित हेतु संघर्ष कएल जायत तँ असम्भव नहिं जागृतिक शंखनाद भटका रहल मात्र कने प्रयासक आवश्यकता छैक, साहस क आवश्यकता छैक। कोनो पैद्य बात नहि जयनाद जैहैत तऽ अवस्से उँच से ऊँच पहाड़ केँ पथिक सहज रूपें रास्ता बना लैत अछि। जिन्दगी भरि जे अमृत मंथन करल जिन्दगी भरि जे सुधा संचित करए ओ पिआसैं मरि रहल अछि, ओकरे अमृत पीवा सँ जगत वंचित करए ओकर मूल भूत अधिकारक हनन होइत छैक। ओकर उचित हिस्सा नहिं भेटैत छैक। एहन बर्बर समाजक सामन्ती सोच बलाक प्रति अभिजात्य वर्गक प्रति घोर घृणाभाव आक्रोश सँ भड़ल कवि अपन मनोभाव के पुनः शब्द दैत कहैत छथि हमर वीणा ध्वनि कने पहुँचैत जँ सटल पौजर बोनिहारक कान में सफल होइत तखन ई स्वर साधना चिर उपेक्षित जनक भौटव गान में। अन्न बिना सटल पाँजर कुपोषणक बोनिहार अवश्य परिवर्तन आनत यदि शिक्षक अलख ओकर घर घरि पहुंच जेतैक । भारत सर्वशक्तिमान सम्पन्न ‘चन्द्रगुप्त’ क राज्यक अभ्युदय भेल तहिना प्रेरणाश्रोत माध्यमक आवश्यकता छैक । परम मेघावी कतेबालक जत मूर्ख रहि हा गाय चरवैत छथि कते वाचस्पति कते उदयन जत हाय! बनगोइठा विछैत फिरैत छथि तानसेन कतेक रविवार्म कते घास छिलथि वाग्मतीक कछेड़ में कालिदास कतेजक विद्यापति कते छयि हेड़ाएल महिसवारक हेड़मे कवि यात्री एही सँ चिंतीत छथि । के एकर मार्गदर्शन करत के सोचत गरीब निरिहक हेतु ताहि सँ मेधावी गरीब बच्चा अपन स्थान अपन अधिकार निरूपित कऽ सकत । ओहने स्थिति मिथिलांचलक सुसंस्कृतिक अपसंस्कृति में बदलि देलक । स्वार्थां भए परम्पराक नाम पर कुव्यवस्था केँ परिपाटी बनालेलक कवि एहि भयानक मनोवृत्तिक चित्रण कए वास्तविक जीवनक स्थिति सँ परिचय करौलनि अछि । समस्त भावनाकेँ दरकिनार करइत समाज में पसरल दर्भिक्ष जकाँ स्त्रीक प्रति अन्यायपूर्ण मानसिकता समाजक स्वीतत्व पर प्रश्नचिन्ह लगवैत अछि। धन एक मात्र उदेश्य बनि मनुष्यक जीवन के नर्क बना दैत छैक। एहन स्थिति क बेटीक बाप शुभछन कहि, बेटीक बापक उत्तरदायित्व केँ नकारबक चेष्टा करैत अछि। जहिना माछ मखानक खेती अर्थोपार्जनक साधन अछि तहिना बेटीक जन्म एकरा व्यवस्था सँ कम नहि एहि सँ बेसी सोचबाक ककरो उद्देश्य नहि समय नहिं। अहुरिया कटलक मललक हाथ बाबू भाभी माय झुकौलनि माथ हुनक अन टोटल बात एकदिश झरकल सन हमर अहिबात एकदिस करब की सब पी गेलऊँ घोरि कऽ चम्पाक कली-फेकल गेलऊँ खोंटिकऽ समाज में पसरल कुव्यवस्थाक झांकी एखनहुँ अनवरत देखवा में अवइयै। पारो:- मैथिली में पहिल उपन्यास ‘‘पारो’’ 1946 ई0 में प्रकाशित भेलाक बाद उपन्यास जगत मे श्री बैधनाथ मिश्र ‘‘यात्री’’क नाम विख्यात भए गेल। अपन पहिल कृति ‘‘पारो’’ सन सामाजिक ओ मनोवैानिक उपन्यास लिखि ‘‘यात्री’’ मैथिली उपन्यास मे एक नवीन प्रयोग कए देलैन्हि। गद्य-शैलक विलक्षणता सेहो यात्री सन कविमे अछि एहि सँ पहिल बेर लोक परिचित भेल आ अपन एहि पहिल परिचय मे यात्री तेहन ने सामाजिक रूढ़ परम्पराक चचार्प कएलैन्हि जे ओ विवादक विषय बनि गेल। आश्चर्य एहि बातक जे यात्री कोनएहन अपराध कए देलनि जकर किछु विद्वान लोकनि घोर निन्दा कए देलैन्हि। परन्तु एतबा कहि देब जे यात्रीक ई पहिल प्रयोग जे ओ गद्य रूप मे बएतैन्हि पूर्ण सफल भेल अछि। हुनक गद्य शैलीक विलक्षण प्रतिभा सँ हमरा सभकेँ ‘‘पारो’’ द्वारा परिचय भेल अछि। तेँ ई निर्विवाद सत्य धिक जे यात्रीक ई ‘‘पारो’’ सामान्य पारो नहि अपितु मिथिलक आइ धरिक जीवनक ई पहिल ओ अंतिम पारो थिक। पारोक परिचय ई अछि- ‘‘पारो नामि रहय। चेहरो नामे रहैक। हाथ सीक सन-सन। देह लक-लक पातर। टाङ सन्ठी सन-सन। कटगर ओकर आंखि जेहेन छलै तेहेन आन कोनो अंग कथी ले रहते।’’ यात्रीक एहि पारोक पूरा नाम छल पार्वती । पारो एहि उपन्यासक मुख्य नायिका अछि ।आ एकर मुख्य नायक ब्रजकान्त झा उर्फ बिरजू तेसर जे चरित्र एहि मे अछि ओ छथि वैधव्य सँ देदीप्यमान ललाट वाली पीसी जनिक नाम प्रतिभा मा अछि । एहि उपन्यास मे चारिम सभ सँ महत्वपूर्ण व्यक्ति छथि चैधरी जी । यात्रीक चैधरी जी सँ परिचय कए लेल जाए- ‘‘वेश गोर नार । चेहरा नाम; मुहठान कटगर । नाल भरल। भौंहे सघन। कपार ने पैथ ने छोट । दहिना कान मे कनौसी। वाम कानक जड़ि मे, ऊपर दिस छोट छीन मसुविर्धि।’’ मैथिल समाज मे आएल रूढ़िवादी परम्पराक उद्घोष। मिथिलाक सभ्यता संस्कृति दर्शन सेहो एहि मे यात्री यत्र-तत्र करौने छथि। ‘‘पारो’’क कथानक प्रसंग डाॅ0 अमरेश पाठक अपन ग्रन्थ मे केने छथि मुदा जंएह कहने छथि ओ बड़ महत्वक बात- ‘‘कथावस्तुक विकास दृष्टिएँ यात्रीक पारो महत्वपूर्ण रचना अछि। इहो उपन्यास वैवाहिक समस्याकेद्द लए लिखल गेल अछि। निर्धनताक कारणें पारोक विवाह एक अधवयसू चैधरी जीक संग होइत अछि। पारोक हृदयक विषाद केँ पारोक विभिन्न उक्ति द्वारा व्यक्त करबाक चेष्टा कएल गेल अछि। एकर कथानक निर्माण मे औचित्यक त्याग भेल अछि। ई वर्णन सामाजिक वातावरणक, साहित्यिक आदर्शक प्रतिकूल अछि । उपन्यासक कथानक केँ मानव जीवनक यथार्थ सँ घनिष्ठ रूपें सम्बद्ध होएब आवश्यक छैक ई सत्य किन्तु ओहि सत्यक कुत्सिक रूपक चित्रण साहित्यक मयार्दाक प्रतिकूल अछि। यात्री जी नवतुरिया मे मैथिल समाजक पर्व-त्योहर सभक सेहो चर्चा केने छथि जेना-जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, पौचन्द्र, दीपावली, आदिक सांकेतिक चर्चा देने छथि, पितृपक्ष सन मैथिल समाजक अपन संस्कृतिक चर्चा कए ओ एकर महत्व के देखाएबाक प्रयास कैने छथि। पितृपक्ष मिथिला साज मे खूब प्रचलित अछि। एहि मे लोक अपन अपन मृत माए, मातामही, पितामही, सासु, प्रपितामही आदि जलक अर्ध दैछ आ एक-एक टा ब्राह्मण के भोज करवैछ तकर चर्चा एहि मे भेल, अछि, जाहि सँ मिथिला समाजक संस्कारक प्रतीति होइछ। एहिना मैथिल समाज मे प्रचलित विवाहक अनेकानेक सामग्री सभक नाम सेहो एहि मे अंकित भल अछि संगीह समाजक प्रचलित विवाहक विधि सभक सेहो चर्चा भेल अछि, जाहि सँ मैथिल समाजक संस्कृतिक चित्र भेटैत अछि। मैथिला समाज मे विवाह मैथिल-विवह पद्धतिक अनुसारे होइछ आ दुर्वाक्षतसन कार्यक्रम होइ तकरो चर्चा कए यात्री जी मिथिलाक गरिमा के बढ़ौने छथि। यात्री सँ एहि सामाजिक उपन्यासक माध्यम सँ मिथिलाक रूढ़िवादी परम्परा पर वोट कैने छथि, तँ अन्धविश्वास सँ आक्रान्त नौगछिआ गामक नवतुरिआक द्वारा वीनी चेतना सेहो जागृत कैने छथि। एहि तरहे जनसाधारणक भाषा मे अपन भावना व्यक्त करैत यात्रीजी मानव जीवनक सभसँ महत्वपूर्ण बिन्दु दिश दृष्टिपात कैने छथि आ साहित्य समाजक दर्पण अहि एहि बात केँ नवतुरिआ लिखि कए साकार कए देने छथि आ नवीन पीढ़ीक हेतु मार्ग प्रशस्त कए देने छथि जे आबधु नवतुरिआ, करथु मैथिल समाजक उद्धार । जे कहलैन्हि से यात्री पूरा सेहो कएलैन्हि तरखने सँ हिनक उपन्यास नवतुरिआ एतेक महत्व पाबि रहल अछि आएकरा पाबि कए यात्री सन बौद्ध भिक्षु आह्वाला दित भए रहल छथि आ नवीन मिथिला केँ उजागर होइत देखबाक लेल जीवन सँ संग्राम कए रहल छथि । बलचनमा - ‘‘बलचनमा’’ केँ जँ यात्रीक प्रतिनिधि उपन्यास कही तँ कोनेा अर्नगल प्रलाप नहि होएत कारण यात्री एहि उपन्यास माध्यम सँ समाज केँ ई देखएबाक प्रयास कएलैन्हि जे शोषित वर्ग केँ बलचनमा सदृश मजबूत बनि कए स्वयं अपन अधिकारके रक्षा करबाक होएत आ जें अपन अधिकार ओ शक्ति के नहि चिन्हूत, नहि बुझत, आ निरीह बनल रहल तखन ओकर शोषण होएबा सँ कोनो नहि बचा सकैछ आ नहि कोनो बचबाक विकल्प रहि जाइछ । मोन पड़ैछ हरिमोहन बाबूक ओ पांती जाहि मे ओ यात्री के कहने छथि- ‘छे टका लाखे जहां मैथिलीक कोषागार। तैत खेदित होइछ मन इ देखि कै व्यवहार जाय ‘‘बलचनमा’’ एते तँ पाबि के दुत्कार आर स्वागत होइ ओकर जाके प्रयागक हार।’’ बलचनमाक प्रसंग यात्री जी अपन ‘‘आईने के सामने’’ नामक, लेख मे लिखने छथि- ‘‘बलचनमा से डरता हूँ। मै अपने इस खेतिहर हीरो से इन दिनों बहुत घबराता हूँ। वह चालीस से उपर का हो चुका है। एक बार गांव का सरपंच भी चुना गया था। सात-सात बेटों का बाप है अब हमारा बलचनमा। अरे, बड़ा गुस्सैल है बलचनमा.......पीछे पड़ जाता है, तो फिर तबाह कर देता है........ यह मेरा मानस पुत्र ठहरा न? बलचनमाक प्रसंग डा0 श्री ब्रजकिशोर वर्मा ‘‘मणिपद्म’’ अपन एकटा लेख ‘‘श्री नागार्जुनक चिन्तन धारा’’ मे लिखने छथि- ‘‘बलचनमा विद्रोही थीक । ओ सक्रिय आ सामाजिक रूप थीक आ ओ कपार पर अनवरत हथौड़ा पीटेवाला लोक थीक । डा0 दिनेश कुमार झा ‘‘बलचनमा’’क प्रसंग अपन मत व्यक्त करैत कहत छथि- ‘‘बलचनमा’’ यात्रीक उपन्यास कलाक कीत्र्तिस्तम्भ अछि । डाॅ0 जयकान्त मिश्र ‘‘बलचनमा’’क प्रसंग अपन मन्तव्य ‘‘मैथिली उपन्यास ओ सामाजिक चेतना’’ नामक आलेख मे दैत कहैत छथि- ‘‘अपने उपन्यास बलचनमा के माध्यम से नागार्जुन ने सर्वप्रथम ग्रामीण जीवन और भूमि व्यवस्था के साथ बनते-बिगड़ते सम्बन्धों को उद्घाटित किया है। यात्री अपन मातृभूमि मिथिला धाम केँ गामक कृषक गरीबी, ओकर दुर्दशा, जमीन्दार लोकनिक द्वारा होइत ओकर शोषण, ओकरा पर कएल जाइत अत्याचार सन सामाजिक समस्रूा केँ उजागर करबाक उद्देश्य से एहि ‘‘बलचनमा’’ न सन उपन्यासक रचना कएलीन । ई पहिने अपन मातृभाषा मे सएह एकर रचना कएलैन्हि पश्चात हिन्दी मे एकरा अनुवाद कैलन्हि । यात्रीक बलचनाम मे सम्पूर्ण मिथिलांचल समाजक चित्र अंकित भेल ओ चित्र अछि सर्वहारा वर्धक संघर्षक, शोषण, अत्याचार, अमानवीयता, ओ समाज मे पसरल बिसंगतिक चित्र देखल जा सकैछ । समाजक मालिक कहाबए वला लोकक कुकुत्यकेँ। कोन तरहे एकटा जीव ओहो मे मनुष्य तकरा पशहुओं सँ बदत्तर स्थिति में बांधि कए मारि रहल अछि । एहि तरहे गरीब लोकनिक आर्थिक शोषण एहि समाज मे होइत छल आ समाज मौनव्रत धारण कैने छल । परिश्रमी श्रमिकक जीवन समाज मे केहन छल देखल जा सकैछ । ‘‘नीक सँ भगवान करबे करैत छथि? धारि परानीक परिवार छोड़ि कए हमर बाप मरि गेल, इहो भगवान ठीके एकलक। भूख में मारे दाई ओ माए आमक गुठरीक गुद्दा चूरि-चूरि कए सकैत छल, इहो भगवान ठीके करैत छलाह आ मालिक लोकनि कनकजीर आ तुलसी फूलक गमकइत भात, राहरिक दाहि, परोरक सीमन, घी, दही, चटनी खइत छल, सएह अहो भगवानेक लीला छत। यौकोर दलम बागक तेल हुनका हमर दू कट्ठा खेत पहित छल आ हमरा अपन पौकोर पेटक लेल मुट्ठी भरि दाना ।’’ डॉ ललन कुमार झा, स्थायी पता- ग्राम-पो-रहुआ, भाया-सिमरी बख्तियारपुर, जिला- सहरसा 852127. - अध्यक्ष, मैथिली विभाग, यू.भी.के.कॉलेज करामा आलमनगर, पो- भागीपुर, जिला- मधेपुरा। पं. तेजनाथ झा ओ संस्कार : एक समीक्षा वास्तवमे विधिपूर्वक संस्कार साधनसँ दिव्य ज्ञान उत्पन्न कऽआत्माकेँ परमात्माक रूपमे प्रतिष्ठिते करब मुख्य संस्कार अछि आओर मानव जीवनक सार्थकता सेहो एहिमे सन्निहित अछि। संस्कार शब्द शब्दत: वैदिक साहित्यमे नहि भेटैत अछि। मुदा सम्क संग कृ धातु तथा संस्कृत शब्द बहुधा मिलि जाइत अछि। ऋग्वेद (5/76/2) मे संस्कृत शब्द धर्म (बरतन)क लेल प्रयुक्त भेल अछि। जेना दुनू अश्विन पवित्र मेल बरतनकेँ हानि नहि पहुँचबैत अछि। शतपथ ब्राह्मण (1/1/4/10)मे आयल अछि जे- ‘स इदं देवेम्यो हवि: संस्कुरु साधु संस्कृत संस्कुर्वित्येवैत दाह।’ पुन: अछि (3/2/1/22) मे आएल अछि जे- तस्मादु स्त्री पुमांसं संस्कृते तिण्डन्तभ्येति अर्थात् स्त्री कोनो संस्कृत (सुगठित) घरमे ठाढ़ पुरुषक लग पहुँचैत अछि। जैमिनिक (3/1/35) मे संस्कार शब्द ‘उपनयन’क लेल प्रयुक्त भेल अछि। संस्कारसँ आत्मा-अन्त:करण शुद्ध होइत अछि। संस्कार मनुष्यकेँ पाप आओर अज्ञानसँ दूर राखि कऽ आचार-विचार आओर ज्ञान-विज्ञानसँ संयुक्त करैत अछि आओर व्यक्ति कार्य विशेषक लेल अहर्ता प्राप्त करैत अछि। एही लेल मीमांसाकार शबर संस्कार शब्दक अर्थ बतबैत कहलन्हि अछि जे- ‘संस्कारो नाम स भवति यस्मिन जाते पदार्था भवति योग्य: कस्य चिदर्थस्यं- अर्थात संस्कार ओएह अछि जाहिसँ कोनो पदार्थ वा व्यक्ति कोनो कार्यक लेल योग्य भऽ जाइत अछि। तन्त्रवार्तिकक अनुसारेँ ‘योग्यतां चादधाना: क्रिया संस्कारा इत्युच्यन्ते’ अर्थात् संस्कार एहन क्रिया तथा रीति अछि जे योग्यता प्रदान करैत अछि। ई संस्कार मुख्यत: दुइ प्रकारक होइत अछि- (1) मलापनयन आओर (2) अतिशयाधाना। कोनो दर्पणपर पड़ल गरदा आदि सामान्य मलकेँ वस्त्रादिसँ पोछब, हटाएब वा स्वच्छ करब मलापनयन अछि आओर फेर जँ कोनो रंग वा तेजमय पदार्थ द्वारा ओहि दर्पणकेँ विशेष चमत्कृत वा प्रकाशमय बनाएव ‘अतिशयाधान’ कहबैत अछि। दोसर शब्दमे ओकरा हीनभावना, प्रतिचरण वा गुणाधान संस्कार कहल जाइत अछि। एहि तरहेँ संस्कार मानव जीवनक एक आवश्यक अंग अछि जकरा बिनु ओ अपूर्ण रहि जाइत अछि। जेना जन्मसँ केओ शुद्रे रहैत अछि, मुदा जखन ओकर कर्ण वेधोपनयन संस्कार भऽ जाइत अछि तखन ओ द्विज भऽ जाइत अछि। ‘जन्मना जायते शुद्र: संस्काराद्द्विज उच्यते। मातुर्यदग्रे जायन्ते द्वितीय मौञ्जिबन्धनात्। ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेते द्विजा: स्मृता:।। ‘द्विर्जायत इति द्विज: निर्वचनमे इएह भाव गौण अछि। एही भावनासँ प्रेरित भऽ कऽ वीर मित्रोदय संस्कारक परिभाषा एहि प्रकारेँ देल गेल अछि- ई एक विलक्षण दुइ प्रकारक अछि- (1) जकरा द्वारा व्यक्ति आन कर्म (जेना उपनयन संस्कार, वेदाध्ययन आरम्भ होइत अछि) क अहर्ता प्राप्त करैत अछि तथा (2) दोष (जेना जातकर्म संस्कारसँ वीर्य एवं गर्भाशयक दोष मोचन होइत अछि) सँ मुक्त भऽ जाइत अछि। इएह कारण अछि जे हिन्दू धर्मशास्त्र संस्कारकेँ मानव जीवनक वांछनीय नहि अपितु अपरिहार्य अंग मानल अछि। ई ध्यातव्य अछि जे संस्कार सेहो पुरुषक जीवनमे अनिवार्य कहल गेल अछि जतए मन्त्रपूर्वक ओकर निष्पादन होइत अछि। स्त्री लोकनिक विवाह संस्कार मात्रक ओतेक महत्त्व जे मन्त्रपूर्वक होइत अछि। आन क्रिया तँ बिनु मन्त्रक सेहो भऽ सकैत अछि। ‘तूष्णीमेता: क्रिया स्त्रीणां विवाहस्तु समन्त्रक:। एता जातकर्मादिका: क्रिया: स्त्रीणां तूष्णी विनैव मन्त्रैर्यथाकालं कार्या:। विवाह: पुन: समन्त्रक: कार्य:।।- मिताक्षरा नवैता: कर्णवेधान्तामन्यवर्ज क्रिया: स्त्रिया: विवाहोमन्त्रतस्तस्या: शूद्रस्यामन्त्रतोदयश।। -व्यास स्मृति- 1/15-16 स्मृतिकार हारीतक अनुसारेँ संस्कार दू कोटिमे विभाजित अछि- ब्राह्म आओर दैव। गर्भाधानादि संस्कार जे मात्र धर्मशास्त्रमे वर्णित अछि, ब्राह्म कहल जाइत अछि। पाक यज्ञ (पकाओल भोजनक आहुति) एवं सोमयज्ञ आदि जकरा संस्कार कहल जाइत अछि। एहि तरहेँ हिन्दू लोकनिक बीच संस्कार घूलि-मिलि गेल अछि। एकरा बिनु पूर्णता वा जीवनक सार्थकता नहि अछि। संस्कारक संख्याक विषयमे स्मृतिकार लोकनिमे मतभेद रहल अछि। गौतम (8/14-24) चालीस संस्कारक वर्णन कएलन्हि अछि। वैरवानस अठारह शरीरक संस्कार गनाओल अछि। व्यासक अनुसारेँ सोलह संस्कार अछि ओ आइ एकरे मान्यता अछि। मनु संख्याक परिगणना तँ नहि कएलन्हि अछि, मुदा कहलन्हि अछि जे निषेक (गर्भाधान)सँ श्मशान धरि संस्कारक तरफ संकेत कएलन्हि अछि- निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधि:। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्।। -मनुस्मृति- 2/16 एहि संस्कारक उल्लेख कऽ मनु इहो संकेत देलन्हि अछि जे द्विजेटा एहि धर्मशास्त्रक अधिकारी अछि। एहि तरहेँ जीवनक प्रधान तत्त्व संस्कारक संख्याक विषयमे मतभेद अछि। मुदा स्मृतिकार व्यासक संख्या परक विचार सर्वथा मान्य अछि। हिनका द्वारा परिगणित सोलह संस्कार ई अछि- (क) गर्भाधान, (2) पुंसवन, (3) सीमन्तोन्नयन, (4) जातकरण, (5) नामकरण, (6)निष्क्रमण, (7) अन्नप्राशन, (8) वपन क्रिया, (9) कर्णवेध, (10) प्रतोदेश (उपनयन), (11) वेदारम्भ, (12) केशान्त (गोदान), (13) समावर्तन (वेद स्नान), (14) विवाह, (15) विवाहाग्नि परिग्रह आओर (16) त्रेताग्नि संग्रह। “गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तनो जातकर्म च। नामक्रियानिष्क्रमणेऽन्नाशनं वपन क्रिया। कर्णविधो व्रतादेशो वेदारम्भ क्रियाविधि:। केशान्त: स्नानन्मुद्वाहो विवाहग्नि परिग्रह:। त्रेताग्नि संग्रहश्चेति संस्कारा: षोडशस्मृता:।।” व्यास स्मृति- 1/13-15 मानव जीवनमे एहि संस्कारक बड़ महत्त्व अछि। एहि लेल स्मृतिशास्त्रक बाद निबन्ध ग्रन्थमे सेहो एकर उपादेयताक वर्णन कएल गेल अछि। पं. तेजनाथ झा प्रणीत वाजसनेयिनां विवाहादि संस्कार पद्धतिमे सेहो एहि संस्कारक वर्णन कएल गेल अछि। पं. तेजनाथ जनकल्याणक भावनासँ उक्त निबंध ग्रन्थक प्रणयन कएलन्हि। वाजसनेयी शाखावला ब्राह्मण केवल मिथिले टा मे नहि छथि, एहि बुद्धिसँ ओ एहि ग्रन्थक टीका सेहो हिन्दीमे लिखलन्हि जाहिसँ ई अत्यन्त व्यापक भऽ गेल अछि। संस्कारक प्रकारक सम्बन्धमे जे मतवैभिन्न होअए, मुदा ग्रन्थकार मात्र तेरह संस्कारक आलोच्य ग्रन्थमे वर्णन कएलन्हि अछि। ई परम्परा विरुद्ध सर्वप्रथम विवाहक वर्णन कएलन्हि अछि। उक्त ग्रन्थमे वर्णित संस्कारावली एहि तरहेँ अछि- (1) विवाह (2) गर्भाधान (3) पुंसवन (4) सीमन्त्रोन्नयन (5) जातकर्म (6) नामकरण (7) निष्क्रमण (8) अन्नप्राशन (9) चूड़ाकरण (10) कर्णवेध (11) उपनयन (12) वेदारम्भ आओर (13) समावर्तन। एहि ग्रन्थमे कुल उन्नैस विभाग कएल गेल अछि। सर्वप्रथम विवाहक पूर्व दिन रातिमे सीमन्त (सोंथ) आमन्त्रण आओर फेर विवाह दिन कन्यादानसँ पूर्व वरक आंगन अएलापर आदरभावसँ पूंगादि दानक वर्णन कएल गेल अछि। तदुत्तर अष्टमंगला विधिक वर्णन अछि, जे वर सहित आठ ब्राह्मण लोकनिक द्वारा सम्पादित होइत अछि। तेसर क्रममे मातृका पूजा- विधि आओर अनन्तर आभ्युदयिक श्राद्ध विधि वर्णित अछि। धर्मशास्त्रमे वर्णित आन संस्कार सभक क्रमबद्ध वर्णन किएक नहि कएल गेल अछि, एहि विषयमे ग्रन्थकार किछु नहि लिखलन्हि अछि। धर्मशास्त्रानुमोदित संस्कार क्रमक विचार कऽ प्रतिपादन कएल जाइत। एहि दृष्टिएँ सर्वप्रथम गर्भाधान संस्कारपर विमर्श प्रस्तुत कएल जाइत अछि। गर्भाधान :- गर्भाधान पहिल संस्कार कहल गेल अछि। विधिपूर्वक संस्कार युक्त गर्भाधानसँ उत्तम एवं योग्य सन्तान उत्पन्न होइत अछि। एहि संस्कारसँ वीर्य तथा गर्भ सम्बन्धी दोष, पाप दूर होइत अछि- “निषेकादि बैजिकं चैनो गर्भिकं चापमृज्यते। क्षेत्र संस्कार सिद्धिश्च गर्भाधान फलं स्मृतम्।।” -स्मृति संग्रह पुंसवन :- पुत्रक प्राप्तिक लेल धर्मशास्त्रमे पुंसवन संस्कारक विधान कएल गेल अछि। ‘गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्व रूप प्रतिपादनम्’ (स्मृति संग्रह) एहि वाक्यक अनुसारेँ पुत्रोत्पत्तिक लेल पुंसवन संस्कारक कर्त्तव्यता स्वत: ज्ञात होइत अछि। जखन गर्भ तीन मासक भऽ जाइत अछि तखन पुंसवन संस्कारक विधान कहल गेल अछि। पं. तेजनाथ झा कहलन्हि अछि जे पुंसवन संस्कार गर्भधारण माससँ दोसर अथवा तेसर मासमे करबाक चाही। सीमन्तोन्नयन :- गर्भक छठम वा आठम मासमे ई संस्कार कएल जाइत अछि। गर्भक शुद्धिए एहि संस्कारक आधार अछि। एहि संस्कारक वर्णन आश्वलायन, शांखायन, हिरण्यकेशीय, गोभिल, पारस्करादि विभिन्न गृह्य सूत्रमे कएल गेल अछि। पं. तेजनाथ झा पारस्करक मतक अनुसारेँ प्रथम गर्भमे एकर प्रासंगिकता कहलन्हि अछि। कर्कोपाध्याय दोसर गर्भमे सेहो एकर आवश्यकता पर जोर देलन्हि अछि, मुदा पं. झाक कहब छन्हि जे पारस्करक विचार सर्वथा मान्य अछि आओर स्मृतिकार हारीतक वचनक उल्लेख कऽ पारस्करक मतक पुष्टि सेहो कएलन्हि अछि- “सकृच्च कृतसंस्कारा सीमन्तेन द्विजस्त्रिय:। यं यं गर्भ प्रसूयन्ते स सर्व: संस्कृतो भवेत्।।” -वाजसनेयिनाम्- पृ. 47 जातकर्म :- जातकर्म संस्कार अति प्राचीन अछि। तैत्तिरीय संहिता (21215/3-4) मे आएल अछि जे जखन ककरो पुत्र उत्पन्न होइत अछि तँ ओकरा बारह विभिन्न पात्रमे पाकल रोटी (पुरोडारा)क बलि वैश्वानरकेँ देबाक चाही। बालकक जन्महोइतहि ई संस्कार कर्त्तव्य अछि। नालच्छेदनसँ पूर्व बालककेँ सोनाक शलाकासँ अथवा अनामिका आंगुरसँ मधु तथा घृत चटाओल जाइत अछि। बालकक पिता अथवा आचार्यकेँ बालकक कान लग ओकर दीर्घायुक लेल मन्त्रक पाठ करबाक चाही। पं. झा एकर क्रम सेहो स्थिर कएलन्हि अछि- “ऊँ सजतु दशयास्यो गर्भोजरायुणास यथाथं वायु रेजति तथा समुद्र रजति एवायन्दशमास्योऽस्रजरायुणा सह।” नामकरण :- एहि संस्कारक फल आयु तथा तेजक बृद्धि एवं लौकिक व्यवहारक सिद्धि कहल गेल अछि- “आयुर्वचोऽभिवृद्धिश्च सिद्धिव्यवह्तेस्तथा। नाम कर्म फलंत्वेत त समुछिष्टं मनीषिभि:।।” (स्मृति संग्रह) आचार्य मनुक अनुसारेँ जन्मसँ दशम वा बारहम दिन ज्योतिष शास्त्रमे कहल गेल शुभ तिथि, मुहूर्त्त आओर गुणयुक्त नक्षत्रमे बालकक नामकरण संस्कार होइत अछि। पं. झाक मन छन्हिजे दशम दिन (अशौचान्त) सूतिकाकेँ उठा कऽ ग्यारहम अथवा आन विहित दिनमे पिता द्वारा शिशुक नामकरण कएल जाए। ओ कहलन्हि अछि जे सर्वप्रथम मातृका पूजा आओर आभ्युदयिक कऽ ब्राह्मण भोजन कराए कऽ बच्चाकेँ स्नान कराए नवीन वस्त्र पहिराए स्वस्त्ययन कऽ पूर्वाभिमुख शिशुक दहिना कानमे ‘ऊँअमुक शर्मासि’ एहन तीन बेरि कहथि। निष्क्रमण :- मनुक अनुसारेँ नवजात शिशुकेँ सूर्यक दर्शनक लेल चारिम मासमे घरसँ निकालबाक चाही- “चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं शिशोर्निष्क्रमणं गृहात्’ (2/34) पं. झा मनुक अनुरूपे चारिम मासमे चन्द्र तरानुकूल दिनमे बच्चा आनि कऽ सूर्यक दर्शन “ऊँ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छक्रमुच्चरत्। पश्येम शरद: शतं, जीवेम शरद: शतं, शृणुयाम शरद: शतं, प्रव्रवाम शरद: शतामदीना: श्याम शरद: शतभ्यूयश्च शरद: शतात्” मन्त्रसँ करए। अन्नप्राशन :- एहि संस्कार द्वारा माताक गर्भमे मलिन भक्षण जन्य दोष बालकमे आबि जाइत अछि, ओकर नाश भऽ जाइत अछि। जखन बालक छ: सात मासक होइत अछि आओर दॉंत निकलए लगैत अछि, पाचन शक्ति प्रवल होवए लगैत अछि तखन ई संस्कार कयल जाइत अछि। पं. झाक अनुसारेँ बच्चाक बाजव स्पष्ट करवाक कामनासँ माछ, वायुक कामनासँ कृकलासक व्रह्मवर्चसक नाटिकाक, मांस एवं सभ फलक कामनासँ उपर्युक्त सभ मांस खोएबाक चाही। चूड़ाकरण :- आचार्य मनुक अनुसारेँ सभ द्विजाति बालकक चूड़ाकरण संस्कार वेदक अनुसार पहिल वा तेसर वर्षमे करबाक चाही। पं. झा स्पष्ट रूपसँ एहि कर्मक समय निर्धारित कएलन्हि अछि जकरा अनुसारेँ वर्षाभ्यन्तर वा तेसर, पॉंचम वा उपनयनक संगे शुद्ध समयमे सूर्यक उत्तरायण रहलापर शुक्ल पक्षमे गुरु शुक्रास्तादि दोष नहि रहलापर रिक्ता तिथि (चौंठ, नवमी, चतुर्दशी) छोड़ि कऽ सोम, बुध, गुरु, शुक्र मे सँ कोनो दिन विहित नक्षत्र युक्त विहित तिथिमे आचार्य द्वारा करवाक चाही। कर्णवेध :- पं. तेजनाथ झा धर्मशास्त्रानुमोदित जन्मसँ तेसर अथवा पॉंचम वर्षमे विहित नक्षत्र तथा विहित तिथिमे पूर्वाह्न समयमे पिता अथवा आन श्रेष्ठ व्यक्ति पूर्वाभिमुख बैसि कऽ कुमारक दहिना कानमे यजुर्वेद (25/21) क मन्त्र पढ़ए। तहिना दोसर मन्त्रसँ वामा कानक अभिमन्त्रण करबाक चाही। तदनन्तर कानक मध्य भागकेँ देखि कऽ कानमे छेद कराबए। उपनयन :- पं. झा गृह्य सूत्रक वचनकेँ आधार बना कऽ लिखलन्हि अछि जे आठम वर्षमे अथवा गर्भाष्टम वर्षमे ब्राह्मणक उपनयन करबाक चाही। उचित अवधि धरि उपनयन नहि भेलापर द्विज व्रात्य भऽ जाइत अछि, जकर निराकरणक लेल विशेष यज्ञक व्यवस्था अछि। वेदारम्भ :- सूत्र ग्रन्थक चर्चा करैत ग्रन्थकार कहलन्हि अछि जे ओना तँ सूत्र ग्रन्थकार लोकनि वेदारम्भक समय विशेषक सम्बन्धमे किछु नहि लिखलन्हि अछि, मुदा याज्ञवल्क्यक कहब छनि जे गुरु शिष्यक उपनयन संस्कार कऽ ओकरा महाण्याहृतिक संग वेद पढ़ावए आओर शौचक नियमक शिक्षा देअए- ‘उपनीय गुरु: शिष्यं महाव्याहृति पूर्वकम्। वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत्।। -याज्ञ. 2/15 समावर्तन :- वेदारम्भक पश्चात् समावर्तन कर्म कएल जाइत अछि। नियमानुसार विद्याध्यययनक उपरान्त स्नान कर्म तथा गुरु गृहसँ अबैत समयक संस्कार स्नान वा समावर्तन कहल जाइत अछि। याज्ञवल्क्य सेहो समावर्तनक एहि अर्थमे प्रयोग कएलन्हि अछि। ओ कहलन्हि अछि वेदाध्ययन वा व्रतकेँ समाप्त कऽ अथवा दुनू समाप्त कऽ गुरुकेँ यथाशक्ति दक्षिणा दऽ कऽ हुनक आज्ञासँ समावर्तन करए- “गुरुवे तुवरंदरवा स्नायाद्धा तदनुज्ञया। वेदं व्रतानि वा पारं नीत्वा हयुममेव वा।।” -याज्ञ. 1/51 म. म. राजनाथ मिश्र ओ तिथि निर्णय : एक अध्ययन म.म. राजनाथ मिश्र प्रणीत ‘तिथि निर्णय:’ धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्रक समीक्षात्मक उत्कृष्ट कृति अछि। एहिमे विद्वान ग्रन्थकार प्रतिपदासँ लऽ कऽ अमावस्या धरिक कृत्यक सप्रमाण प्रतिपादन कएलन्हि अछि। विशेष रूपसँ स्वरूप निरूपण, सामान्य परिभाषा कथन, काल विभाग प्रतिपादन कृष्णाष्टमी व्रत निरूपण, नवरात्र निर्णय, रामनवमी विश्लेषण, दीपावली, महाशिवरात्री, होलिकादहनादिक जे विवेचन कएल गेल अछि से निश्चित रूपेण सुधी पाठकक मानसकेँ प्रमुदित कएनिहार अछि। आब प्रश्न उठैत अछि जे ‘तिथि की थीक?’ अत् (गमने) इथिन् विधानसँ पृषोदरादि सूत्रसँ वैकल्पिक ङीप् प्रत्यय लगलासँ दीर्घ भऽ कऽ तिथि शब्द बनैत अछि, जकर सामान्य अर्थ होइछ चन्द्रदिवस। अथवा तन् (विस्तारे) धातुसँ सेहो एकर निष्पत्ति मानल जाइत अछि। तदनुसारेँबढ़एवला अथवा क्षय होमएवला चन्द्रकलाकेँ जे विस्तारित करएवला काल विशेष ‘तिथि’ कहबैत अछि- “तंत्र तिथि शब्ददस्तनोतेद्यतोर्निष्पन्न:। तनोति विस्तार यति वर्धमानां क्षीयमाणं वा,चन्द्रकला मेकां च कालविशेष: सा तिथि। यद्वायथोक्त कलयातन्यत इति तिथि:। तदुक्तं सिद्धांत शिरोमणै तन्यते कलया यस्मान्तस्मात्तास्तिथय स्मृता:।” -कालमाधव पृ.- 92 एहि धारणाकेँ लक्ष्य कऽ स्कन्द पुराणमे कहल गेल अछि जे हे देवि! सोलह भागसँ विभक्त भऽ कऽ अमाक नासँ परिचित जे महाकला अछि, ओएह माया आओर परमा शरीर धारीक लेल शरीर धारण करैत अछि। हे सुन्दर मुखवाली! अमावस्यासँ लऽ कऽ पूर्णिमा धरि चन्द्रमाक जे कला अछि ओकरा तिथिकनामसँ अभिहित कएल जाइत अछि- “अमाषोऽशभागेन देविप्रोक्ता महकला संस्थितापरमा माया देहिनां देह धारिणी। अमादि पौर्णमास्यन्त या एव शशिन: कला: तिथियस्ता समाख्याता: षोडशैव वरानने।।” - कालमाधव पृ.- 92 तिथि निर्णयकार पं. मिश्र ग्रन्थारम्भमे सर्वप्रथम गणेश, भगवती, सरस्वती, विष्णु, महादेव आओर गुरुकेँ प्रणाम कएलन्हि अछि- “नव्वा ढुष्ढिं गिरं विष्णु निबन्धृन् गिरिशं गुरुन। क्रियते राजनाथेन तिथिर्णय संग्रह:।।” ग्रन्थकार तिथिकेँ अखण्ड विशेषकाल कहलन्हि अछि। विष्णुधर्मोत्तरक वचनकेँ उल्लेख कऽ कालक विशेषताक सेहो वर्णन कएलन्हि अछि। तदनुसार काल अनादि निधन अछि, रुद्र ओकर संकर्षण अछि, सभ प्राणीक कलना ‘नाश’ कऽ ओ काल नामसँ अभिहित अछि- “अनादिनिधन: कालो रुद्र: संकर्षण: स्मृत:। कलानात् सर्वभूतानां स काल: परिकीर्त्तित:।।” सभ भूतक कर्षणसँ ई संकर्षण आओर शमन कएलासँ रुद्रनाम कीर्त्तित अछि। अनादि निधनक कारण ओ परमेश्वर अछि- “कर्पणात् सर्वभूतानां स तु संकर्षण स्मृत। सर्वभूतशमित्वाच्च सरुद्र परिकीर्त्तित:।। अनादिनि धनत्वेन समहान् परमेश्वर:।।” -कालमाधव पृ.- 16 पं. मिश्र सामान्य परिभाषात्मक तथा काल विभाग प्रकरणमे सभ तिथिक विशेषता तथा ओहि तिथिक कर्तव्यताक विषयमे सेहो वर्णन कएलन्हि अछि। तिथिक लक्षण सेहो कहल गेल अछि। तदनुसार ओकर तीन लक्षण खर्व, दर्प ओ हिंसा अछि- “खर्बो दर्पस्तथा हिंसा त्रिविधन्तिथि लक्षणम्। धर्मा धर्म व शादेव तिथिस्त्रेधा विवक्षिता।।” -तिथि निर्णय पृ. 03 अर्थात् खर्ब-साम्य (सम तिथि) वर्धित होमएवला आओर हिंसा क्षय युक्त तथि कहबैत अछि। तिथिक संदर्भमे ई बुझब आवश्यक अछि जे प्रतिपदासँ लऽ कऽ पूर्णिमा अथवा अमावस्या पर्यन्त पन्द्रह तिथि होइत अछि। नाड़ीसँ उत्तर तिथिकेँ बाधित करैत अछि। सभ प्रकारक ई वेध व्रतोपवासक दूषक अछि तथा अरुणोदय कालिक वेध वैष्णवक लेल मानल गेल अछि। एहि तथि निर्णय ग्रन्थक अध्ययनसँ ज्योतिषशास्त्रक तिथिक आन सांकेतिक नामक सेहो पता लगैत अछि। ई संभवत: शब्दलाधवक लेल प्रयोगमे मनीषी लोकनि द्वारा आनल गेल छल होएत। एकरा अनुसारेँ भिन्न-भिन्न तिथिक ज्येातिष शास्त्रीय नाम एहि प्रकारेँ अछि- पंचमी-वाण आओर नाग, दशमी- दिग् चतुर्दशी भूत, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी आओर पंचमी- भुग्मातिनग्न,भुत-षष्ठी, सप्तमी-पण्मुनि,अष्टमी-नवमी-वसुरन्ध्र, एकादशी युक्त द्वादशी-रुद्रेण युक्ता द्वादशी, पंचमी युक्त षष्ठी नागविदा एकादशी विद्ध द्वादशी-रुद्रविद्ध दिवाकर, तृतीया चतुर्थी युता- गौरी विनायकोपेत, नवमी सहिता दशमी-सँ दुर्गा दशमी। पंचमी दशमी पूर्णिमा (अमावस्या) पूर्णा। एहि तरहेँ तिथि निर्णय ग्रन्थोपयोगी विषय ध्यान देबाक योग्य अछि। सर्वप्रथम नन्दा भ्रद्रोद शब्द ककर व्यापक अछि, ई सभ ग्रन्थ विषयवगमक लेल आवश्यक अछि। एहि शब्दकेँ एहि प्रकारेँ जानल जा सकैत अछि- प्रतिपदा षष्ठी एकादशी- नन्दा द्वितीया सप्तमी द्वादशी- भद्रा तृतीया अष्टमी त्रयोदशी- जया चतुर्थी नवमी चुर्दशी- रिक्ता पंचमी दशमी पूर्णिमा (अमावस्या)- पूर्णा सामान्य तिथि विषयक परिभाषाक बाद ‘काल विभाग’क विवेचन प्रस्तु कएल गेल अछि। एहि क्रममे ओ ब्रह्मवैवर्त पुराणगत वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि। तदनुसारेँ प्रात: चारि दण्ड पर्यन्तक समय अरुणोदयक अछि। ई सन्यासीलोकनिक स्नानक समय अछि, जखन सरोवरक जल गंगाजलक समान पवित्र रहैत अछि- “चतस्रो घटिका प्रातररुणोदय उच्चयते। यतीनां स्नानकालोऽयं गंगाम्भ: सदृश: स्मृता।।” -तिथि निर्णय पृ.- 06 प्रात: कालक बाद तीन दंड धरि संगव कहबैत अछि, तीन मुहूर्त्त आगू धरि मध्याह्न आओर ओकर बाद उपराह्न होइत अछि। ओकर बाद तीन मुहूर्त्त पर्यन्त सायंकाल होइत अछि जाहिमे श्राद्ध वर्जित अछि। ई राक्षसी वेला कहबैत अछि जे सभ कर्मक लेल गर्हित समय मानल गेल अछि। एकरा मिथिलामे व्यवहारिक भाषामे ‘गदहबेर’सेहो कहल जाइत अछि। दिनक पन्द्रह मुहूर्त्त मानल जाइत अछि जाहिमे आठम् भाग कुतपकाल तथा नवम् रोहिणी कहबैत अछि। ई दुनू काल पितरक लेल अक्षय पुण्यप्रद मानल जाइत अछि- “प्रात: कालो मुहूर्त्तांस्त्रीन् संगवस्तावदेव हि। माध्याह्ननस्त्रिमुहूर्त्त: स्यादपराह्लस्तत: पर:। सायाह्नस्त्रिमुहूर्त्त: स्याच्छाद्धं तत्र न कारयेत्। राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु।। अठ्लोमुहूर्त्ता विख्याता दशपंच च सर्वदा। तत्राष्टमो मुहूर्त्तो य: स काल: कुतुप: स्मृत:।। रौहिणो नवम: प्रोक्त: पितृणामुभयं हितम्।।” -तिथि निर्णय पृ.- 07 पितरक एकोदिष्ट हेतु धर्मशास्त्रमे कुतपक अत्यधिक महत्व अछि जे दिनक आठम मुहूर्त्त होइत अछि, जाहि समय सूर्य अपन छायामे प्रवेश कऽ खड्गक तरह दृश्य होइत अछि। दिनमे पन्द्रह मुहूर्त्त होइत अछि आओर आठम मुहूर्त्त कुतप अछि। पं. राजनाथ मिश्र सेहो कुतप कालक उपस्थापन एहि रूपेँ कएलन्हि अछि- “द्वौ यामौ घटिकान्यूनौ द्वौ यामो घटिकाधिकौ। स काल: कुतुपो ज्ञेय: पितृणां दत्तमक्षयम्।।” एहिठाम यामक अर्थ तीन घन्टा अछि आओर घटिकाक अर्थ चौबीस मिनट अछि। ओहिना पं. मिश्र सेहो ‘पूर्वाहणों वै देवानां मध्यन्दिनं मनुष्यानामपराहण: पितृणाम्’वचनक पदस्थापन कऽ दिनकेँ तीन भागमे बॉंटि देने छथि। निबन्धकार एहि तरहेँ नक्षत्र (तारा) ‘दर्शनात् नक्तं (राति) प्रदोषोऽस्तमनादूर्ध्व घटिकाद्वमिष्यते’ कहि कऽ प्रदोषक परिभाषा सेहो कएलन्हि अछि। प्रदोश तथा रातिक सम्बन्धमे ग्रन्थकार मिथिलेश शुभंकर ठाकुर तथा वर्धमान उपाध्यायक वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि। तदनुसार उदयसँ दू घड़ी पूर्व प्रात: संध्या तथा सूर्यास्तक बाद तीन घड़ी तक सायंकाल कहबैत अछि। एहि तरहेँ सूर्यास्तक तीन मुहूर्त्त धरि प्रदोष आओर तदनन्तर रातिक उल्लेख कएलन्हि अछि- “उदयात्प्राक्तनी सन्ध्या घटकाद्वय मिष्यते। सायं संध्या त्रिघटिका अस्तादुपरि भास्वत:।। त्रिमुहूर्त्त: प्रदोष: स्याद् भानावस्तंगते सति। तत्परा रजनी प्रोक्ता तत्र कर्म परिव्यजेत्।।” -तिथि निर्णय पृ.- 08 ‘प्रदोषो रजनीमुख:’वचन सेहो प्रचलित अछि। रातिक बाद ग्रन्थकार निशाभागक उल्लेख सेहो कएलन्हि अछि। तदनुसार सूर्यास्तक तीन घन्टा बीत गेलापर निशा भाग आओर अड़तालीस मिनट आओर बीति गेलाक बाद राति निशा भाग अछि। एहि तरहेँ प्रात: संगव अधान अपराह्न प्रदोष राति निशा भाग, अति निशा भागक वर्णन कऽ पं. मिश्र पक्षीक पन्द्रह तिथिक वर्णन सेहो कएलन्हि अछि। प्रतिपदा द्वितीय, तृतीया, चौठ, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी आओर पूर्णिमा ई पन्द्रह तिथि अछि मुदा कृष्णपक्षमे पन्द्रहम् तिथि अमावस्या कहबैत अछि। प्रथम तिथिक रूपमे प्रतिपत् वा प्रतिपदाक नाम अबैत अछि जकरा सम्बन्धमे पूर्व तिथिसँ युक्तक ग्राह्यताक अनुशंसा कएल गेल अछि। ‘सा पूर्वयुताग्राह्य’एहिठाम ग्रन्थकार पैठीनसिक वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि- “पंचमी सप्तमी चैव दशमी च त्रयोदशी। प्रतिपन्नमी चैव कर्त्तव्या सम्मुखी तिथि:।।” -तिथि निर्णय पृ.- 19 सम्मुखीक अर्थ सायाह्न व्यापिनी मानल गेल अछि। मुदा आश्विन शुक्ल प्रतिपदाकेँ पख्यापिनी किंवा द्वितीयासँ युक्त रहबाक अनुशंसा कएल गेल अछि। मुदा जँ अमावस्या युक्त प्रतिपदाकेँ नवरात्रमे केओ कलश स्थापना करैत अछि तँ ओहिमे देवी दुर्गा शाप दऽ कऽ भष्मशेष कऽ दैत अछि- “यो मां पूजयते भक्तया द्वितीया यां गुणान्विताम्। प्रतिपच्छारदीं ज्ञात्वा सोऽश्नुते सुखमक्षयम्।। यदि कुर्भाद्मायुक्त- प्रतिपप्स्थापनं मम। तस्मै शापायुतं दत्वा भस्मशेषं मम।।” -तिथि निर्णय- पृ. 09 प्रथमा तिथिक बाद द्वितीया तिथिक निर्णय करैत म.म. रज्जे मिश्र स्मृतिकार पैठीनसि स्मृतिक वचनोल्लेख कएलन्हि अछि जे तृतीयायुक्त द्वितीयाक ग्रहणानुशंसा कएलन्हि अछि। पैठीनसि युग्म नियमक अवलम्बन कऽ परतिथियुत तिथिक अनुमोदन कएलन्हि अछि- “एकादश्यष्टमी पष्ठी द्वितीया च चतुर्दशी। त्रयोदश्यप्यमावास्या उपोष्या: स्यु: परान्विता।।” -तिथि निर्णय पृ. 11 तृतीया निर्णयक प्रसंगमे पं. मिश्र सर्वप्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया विवेचन कएलन्हि अछि। ई तृतीया उदयव्यापिनी अनुशंसित कएल गेल अछि। एहि प्रसंगमे देवी पुराणक वचनोल्लेख कएल गेल अछि। एहि वचनक अनुसार पार्वती प्रिया (तृतीया) सूर्योदयक अपेक्षा रखैत अछि, तिथि युग्मताक कोनो बात नहि- ‘युगाद्यावर्षवृद्धिश्च सप्तमी पार्वतीप्रिया। सूर्योदयमपेक्षन्ते न तत्र तिथियुग्मता।।’ चौठ (चतुर्थी) गणेश चौठ मातृ विद्धा अर्थात् तृतीय वृद्धा प्रशस्त अछि जँ मध्याह्न व्यापिनी होअए तँ दोसर दिन (पंचमी युक्त) मे कर्त्तव्य अछि- “चतुर्थी गणनाथस्य मातृविद्धा प्रशस्यते। मध्याह्नव्यापिनी चेत्स्यात्परतश्च परेऽहनि।।” पंचमी तिथि पूर्वयुता ग्राह्य अछि। तेँ पं. रज्जे मिश्र ब्रह्म पुराणक- ‘पंचमी च प्रकर्तव्या चतुर्थी संहिता प्रभो’तथा हारीतक- ‘चतुर्थी संयुता कार्या पंचमी परया न तु’वचनकेँ उद्धृत कऽ अपन मन्तव्य व्यक्त कएलन्हि अछि। मुदा नागपंचमी षष्ठी युता अनुशंसित कएल गेल अछि- ‘नागपंचमी तु परैव’ ब्रह्मवैवर्त्त पुराण सेहो षष्ठी युता पंचमीक अनुशंसा कएलक अछि- “पूर्वाहणे कृष्णपक्षे तु नागतोषकरी तिथि:। पंचमी तु प्रकर्त्तव्या षष्ठ्या युक्ता तु नारद।।” -तिथि निर्णय- 17 अन्यत्र चतुर्थीयुता कर्त्तव्य होइत अछि। पं. रज्जे मिश्र स्कन्द षष्ठी व्रतकेँ पूर्व युक्त तिथिसँ विहित मानलन्हि अछि। एहि लेल स्मृतिकार वशिष्ठक वचनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि- “कृष्णाष्टमी स्कन्दषष्ठी शिवरात्रि चतुर्दशी। एता: पूर्वयुता ग्राह्यास्तिथ्यन्ते पारणंचरेत्।।” एकर अतिरिक्त सप्तमी युता ग्राह्य अछि। तेँ स्मृति समुच्चयमे एहि सम्बन्धमे कहल गेल अछि- ‘षष्ठ्यष्टमी अमावास्या कृष्णपक्षे चतुर्दशी। एता: परयुता ग्राह्या: परा: पूर्वेण संयुता:।। ‘ष. न्योरितियुग्मात्’इत्यादि वचनसँ सप्तमी षष्ठी युता ग्रहण करबाक योग्य अछि। सप्तमी नहि अष्टमी युक्त नहि सप्तमीसँ युक्त अष्टमी ग्राह्य अछि। षष्ठयष्टमी नागविद्धा इत्यादि पूर्वोक्त स्मृतिसँ एहन मन्तव्य देल गेल अछि। भविष्य पुराणक सेहो इएह वचन अछि जे सप्तमी षष्ठी युता सएह ग्राह्य अछि नहि कि अष्टमी युता। अष्टमी नहि सप्तमी युता होएबाक चाही नहि सप्तमी सएह अष्टमी युता होअए। अष्टमी सर्वदा नवमी युता ग्राह्य अछि- “तत्र नाष्टमी सप्तमीयुक्ता सप्तमी नाष्टमीयुता। नवम्या सह् कार्या स्याद्ष्टमी सर्वदा बुधै:।।” -तिथि निर्णय पृ.- 20 ब्रह्मवैवर्त्त पुराणक अनुसारेँ नवमी अष्टमी विद्वा करणीय अछि। जँ व्रती फलक कामना करैत होअए, दशमी विद्धा कदापि नहि करए- ‘अष्टम्या नवमीविद्धा कर्त्तव्या फलकाङि क्षभि:। न कुर्यान्नवमी तात दशम्या तु कदाचन।।’ -तिथि निर्णय, पृ.- 26 दशमी पूर्व वा बाद दुनू दिनमे विहित काल व्यापिनी ग्राह्य अछि। एहि सम्बन्धमे ग्रन्थ्ज्ञकार पक्षधर मिश्रक वचनक उल्लेख कएलन्हि अछि, जाहिमे कहल गेल अछि जे फलक कामना करएवला व्यक्ति एकादशी विद्ध दशमी करए- “दशम्येकादशीविद्धा कर्त्तवया फलकाङि क्षभि:। दशमी चैव कर्त्तव्या सदुर्गा द्विजसत्तम।।” -तिथि निर्णय पृ.- 28 एकादशी उपवासदिमे द्वादशी युताक ग्राह्यता अछि। दशमी युता एकादशी कहियो नहि कएल जाए। एहि लेल पं. रज्जे मिश्र प्राचीन शास्त्रीय वचनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि जे- “एकादशी दशविद्धा गान्धार्या समुपोषिता। तस्या: पुत्रशतं नष्ट तस्मातां परिवर्जयेत्।।” -तिथि निर्णय पृ.- 29 द्वादशी उपवासादिकेँ संभव भेलापर एकादशी युता ग्राह्य अछि। ‘रूद्रेण द्वाद्वशी’एहि युग्म वाक्यक अनरोधसँ तथा ‘कामविद्धो भवद्विविष्णु’एहि त्रयोदशी वृद्धत्वक निषेधक वचनसँ सेाहे त्रयोदशी विद्धा द्वादशी त्याज्य अछि। शुक्लपक्षीय त्रयोदशी द्वादशी युता ग्राह्य अछि। एहि प्रसेंग पं. मिश्र एक शास्त्रीय वचनक उद्धरण देलन्हि अछि- “पंचमी सप्तमी चैव दशमी च त्रयोदशी। प्रतिपन्नवमी चैव कर्त्तव्या सम्मुखी तिथि:।।” तथा- “कृष्णाष्टमी वृहत्तल्पा सावित्री वटपैत्रकी। कामत्रयोदशी रम्भा उपोष्या: पूर्वसंयुता:।।” तथा- “शुक्ला त्रयोदशी रम्भा नोपोष्या परसंयुता:।।” शुक्ल पक्षक चतुर्दशी पूर्णिमा युता ग्राह्य अछि। एहि सम्बन्धमे चतुर्दश्याथ पूर्णिमा, एकादश्यष्टमी इत्यादि वचन समर्थक अछि। एहि तरहेँ उदयक बाद तीन मुहूर्त्त धरि सेहो चतुर्दशी रहलाक बाद पूर्णिमा रहए तँ ओ ग्राह्य अछि। ई मुख्य रूपसँ अनन्त पूजाक लेल प्रासंगिक अछि। भविष्य पुराणक वचनकेँ उद्धृत करैत पं. मिश्र प्रकारान्तरसँ अपन विचार प्रस्तुत कएलन्हि अछि। स्कन्द पुराण सेहो एहि उक्तिक पुष्टि करैत अछि- “कृष्णपक्षेऽष्टमी चैव कृष्णपक्षे चतुर्दशी। पूर्वविद्धा तु कर्त्तव्या परविद्धा न कहिंचित्।।” -काल माधव पृ.- 360 अमावस्या प्रतिपदा युक्त ग्राह्य अछि। पैठीनसि प्रभृति स्मृतिकार लोकनि ‘एकादश्यष्टमी षष्ठी अमावस्या चतुर्थिक। उपोष्या: पर संयुक्ता: परापूर्वेण संयुता:’ एहि वचनसँ पुष्ट कएलन्हि अछि। मुदा कार्त्तिक अमावस्याक अवसरपर लक्ष्मीपूजा प्रदोष व्यापिनी ग्राह्य अछि। पं. रज्जे मिश्र एहि प्रसंगमे भविष्योत्तर पुराणक वचनकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि- “प्रदोषे पूजयेद्देवी पद्महस्तां- हरिप्रियाम्। तथा च प्रदोषसमये लक्ष्मी पूजयित्वा यथाविधि। ब्राह्णान् भोजयित्वा तु भोजयेच्च बुभुक्षितान्।।” -तिथि निर्णय पृ.- 37 स्नान दानादिक क्रिया ‘उदयव्यापिनी पूर्णिमामे होइत अछि, आन काज चतुर्दशी युता ग्राह्य अछि- “चतुर्दश्याथ पूर्णिमा’। फाल्गुनी पूर्णिमा” होलिका दाहक प्रसंग प्रदोषव्यपिनी ग्राह्य अछि- “सायाह्ने होलिकां कुर्यात् पूर्वाहणे क्रीडनङ्गवाम्। दीपं दद्यात्प्रदोषे तु एष धर्म: सनातन:।।” श्रावणी पूर्णिमा उपाकर्मादिक प्रसंग उदय कालिकी ग्रहण योग्य अछि। भाद्री पूर्णिमा ऋषि तर्पण आदि कर्ममे उदयव्यापिनी ग्राह्य होइत अछि। ईहो कहल गेल अछि जे षष्ठी, एकादशी, अमावस्या, सप्तमी विद्धा अष्टमी तथा परविद्धा पूर्णिमा ग्राह्य नहि अछि- “षष्ठयेकादश्यामावास्या पूर्वविद्धा तथाष्टमी। पूर्णिमा परविद्धा तु नोपोष्य तिथि पंचकम्।” -तिथि निर्णय – 44 एवं प्रकारेँ म. म. राजनाथ मिश्र शुक्लपक्ष एवं कृष्णपक्ष दुनू तिथिक प्रतिपदासँ पूर्णिमा एवं अमावास्या तिथि धरिक समीचीन, संक्षिप्त एवं वांछनीय वर्णन कएलन्हि अछि। पं. कुशेश्वर कुमर ओ पर्व निर्णय: एक समीक्षण धर्मशास्त्रीय निबन्ध ‘पर्व निर्णय’पं. कुशेश्वर कुमर द्वारा प्रणीत अछि। हिनक नाम मैथिल निबन्धकार लोकनिक बीच समादृत अछि। ई ज्योतिष शास्त्रमे तीर्थ एवं आचार्य छलाह संगहि काव्य (तीर्थ), धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण एवं मीमांसा (कर्मकाण्ड)क सेहो उद्भट्ट विद्वान छलाह। ज्योतिष आओर धर्मशास्त्र दुनूमे वैदुष्य रहबाक कारणेँ ई दुनू शास्त्रमे ग्रन्थक प्रणयन कएलन्हि अछि। मिथिला देशीय पंचागम् (1328-1338 साल पर्यन्त), वित्रिभ लग्न भ्रमणम्, गोल प्रवेशिनी, पंचागदीपिका, ज्योतिषरत्नावली, ज्योतिष शिशुबोध, शुद्धि बोधिनी हिनक ज्योतिष ग्रन्थ अछि। ई धर्मशास्त्रक व्यवहार मंजूषा कृत्य मंजरी, व्यवहार दीपिका, सदाचार चन्द्रिका आओर पर्व निर्णय ग्रन्थक प्रणेता सेहो छथि। पर्व शब्दक व्यापक अर्थ अछि। ओना व्रत पर्व समानार्थक अछि, मुदा तत्वत: पर्वक अन्तर्गत व्रत अबैत अछि नहि कि व्रतक अनतर्गत पर्व। एहि पर्वक तिथि स्थिर करबाक लेल ज्योतिष शास्त्रक सहारा लेबए पड़ैत अछि। मिथिलामे पर्व निर्णयमे अनेक प्रकारक मतभिन्नता रहैत आएल अछि। एहि विषयकेँ ध्यानमे राखि कऽ महान् धर्मशास्त्री पं. कुशेश्वर शर्मा एहि सामाजिक मतभेदकेँ दूर कऽ एक निर्णयात्मक ग्रन्थक प्रणयनक विचार कएलन्हि। पं. शर्मा भिन्न-भिन्न पर्वक सम्बन्धमे निबन्ध ग्रन्थक अवलोकन कऽ समकालिक विद्वान लोकनिक विचार लऽ कऽ कोनो एक निर्णयपर पहुँचबाक विचार कएलन्हि। एहि हेतु ओ मिथिलाक विद्वान लोकनिसँ गामे-गाम घूमि कऽ सम्पर्क कएलन्हि। सभ विद्वान लोकनिक मतक संग्रह कऽ विभिन्न पर्वक हेतु ओ जे ग्रन्थक प्रणयन कएलन्हि ओएह आइ ‘पर्व निर्णय’क रूपमे अछि जाहिमे विभिन्न पर्वक निर्णय हेतु सम्पादक पं. कुशेश्वर शर्मा तेरासी विद्वान् लोकनिक निबन्धक संकलन कएलन्हि आओर सभ विद्वान लोकनिक निबन्धक तत्तपर्व निर्णय हेतु प्रस्तुत कएलन्हि। एहि तरहेँ श्रावण माससँ आरम्भ कऽ चैत्र कृष्ण प्रतिपदा धरिक विमर्श कएल गेल अछि। ग्रन्थारम्भक पूर्ण विषयानुक्रमणिका देल गेल अछि, जाहिमे भिन्न-भिन्न पर्वक निर्णय हेतु ओहि-ओहि विद्वान लोकनिक नाम सेहो देल गेल अछि। मुख्य पर्व आइयो मिथिलामे पूर्ण श्रद्धा भक्तिसँ मनाओल जाइत अछि आओर किछु समाप्त प्राय। अछि जेना मिथिलाक प्राचीन पंचांग कहैत अछि जे अशून्यशयनव्रत जे भगवान विष्णुकेँ लक्ष्य कऽ मनाओल जाइत छल से समाप्तिक तरफ बढ़ल जाइत छल आओर आइ ओ अस्तित्वमे नहि अछि। स्त्री आओर पुरुष दुनू अपन शाश्वत संगक लेल एकरा मनबैत छल। सॉंपसँ रक्षाक लेल मौना पंचमी आओर नागपंचमी पर्व आइयो क्रमश: श्रावण कृष्ण आओर शुक्लपक्षमे मनाओल जाइत अछि। मिथिलाक सुप्रसिद्ध पर्व मधुश्रावणी श्रावण शुक्ल तृतीयाकेँ नवविवाहित कन्या आओर वरक द्वारा मनाओल जाइत अछि। विवाहक प्रथमे वर्ष एकरा उत्साहक संग मनाओल जाइत अछि। एहि पर्वकेँ मनएवाक मुख्य उद्देश्य अछि सर्प जातिसँ कोनो प्रकारक क्षति नहि होमए। श्रावण शुक्ल पूर्णिमाकेँ रक्षा बन्धन पर्व केवल मिथिले टामे नहि लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारतमे मनाओल जाइत अछि। मैथिल आचारानुसार भद्रा रहित उदय गामिनी पूर्णिमाकेँ रक्षा बन्धन पर्व मनाओल जाइत अछि। भाद्र कृष्ण चतुर्थीकेँ बिहुला पूजा आइयो प्रचलित अछि। मिथिलामे कृष्ण अष्टमीकेँ कृष्णाष्टमी मनाओल जाइत अछि, अन्यत्र विशेषत: वैष्णव सम्प्रदायवला जयन्ती व्रत करैत अछि। भाद्र मासीय अमावस्याकेँ कुशोत्पाटनक मिथिलामे परम्परा अछि। पितृविहीन लोक सभ जातिक, विशेष रूपसँ पितृकर्मक लेल कुश अवश्य उखारैत अछि, किएक तँ बिनु कुशक कोनहुँ क्रिया नहि होइत अछि- “बिना दर्भेण या सन्धया पिंतृदेव क्रियाश्च या:। सफला विफला यस्मात् तस्मात् कुशयुतो भवेत्।।” - पर्व निर्णय- 64 हरिताली-हरितालिका :- भाद्र शुक्ल तृतीया हरिताली या हरितालिका व्रतक नामसँ प्रसिद्ध अछि जे स्त्री लोकनिक लेल यावज्जीवन सुन्दर पति आओर सौभाग्यक लेल अनुष्ठेय अछि। माली (सखी)क द्वारा ह्त भऽ जएबाक कारणेँ हरिताली नामसँ प्रसिद्ध अछि। स्त्रीक लेल तृतीया व्रतक बड़ पैघ महत्व अछि। जेना श्रावण शुक्ल तृतीया मधुश्रावणी, भाद्र कृष्णक कञ्जली आओर शुक्ल पक्षीय हरितालिका व्रत बड़ श्रद्धाभावसँ स्त्रीलोकनि अनुष्ठान करैत छथि। बेशी काल ई चतुर्थी संयुक्ता ग्राह्य अछि- “सा च तृतीया परयुतैव ग्राह्या- रम्भाख्या वर्जयित्वा तु तृतीया द्विजसत्तम। अन्येषु सर्वकार्येषु गुणयुक्ता प्रशस्यते।।” -पर्व निर्णय- पृ.- 68 चतुर्थीचन्द्र (चौठचन्द्र) :- मिथिलामे एहि पर्वक बेशी प्रचलन अछि। चतुर्थी चन्द्रक दर्शन पं. जीवनाथ राय निषिद्ध मानलन्हि अछि, मुदा धात्रेयिका वाक्यक पाठ कऽ दर्शन कएल जा सकैत अछि। ब्रह्म पुराणक अनुसारेँ- “नारायणोऽभिशप्तस्तु निशाकरमरीचिषु। स्थितश्चतुर्थ्यामद्यापि मनुष्यानापतेच्च स:।। अतश्चतुर्थ्याचन्द्रन्तु प्रमादाद् वीक्ष्य मानव:। पठेद् धात्रेयिकावाक्यं प्राङमुखो वाऽप्युदङमुख:।।” -पर्व निर्णय- पृ.- 70 धात्रेयिका वाक्य स्यमन्त कोपारधानमे एहि प्रकारेँ अछि- “सिह: प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हत:। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक:।।” अनन्त पूजा :- भाद्र शुक्ल चतुर्दशीकेँ भगवान विष्णुक अनन्त रूपक पूजा कएल जाइत अछि, जे पूर्णिमायुता ग्राह्य अछि- “तृतीयैकादशी षष्ठी शुक्ल पक्षे चतुर्दशी। पूर्वविद्धा न कर्त्तव्या कर्त्तव्या परसंयुता।।” -पूर्व निर्णय- पृ.- 78 भाद्र पूर्णिमा ऋषि अगस्त्यक तर्पणक लेल प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे काश पुष्प हाथमे लऽ कऽ तर्पण करबाक विधान अछि। आश्विन कृष्णपक्षमे क्षयतिथिकेँ पार्वण करबाक विधान अछि। कमसँ कम कर्म पर्व (अमावस्या)केँ तँ अवश्ये पार्वण करबाक चाही। ओना पं. कुमर प्रतिदिन पितृपक्षमे श्राद्ध करबाक समर्थन कएलन्हि अछि। ब्रह्मपुराणक अनुसारेँ जँ पितृपक्षमे एको दिन श्राद्ध (पार्वण) कऽ लेल जाए तँ वर्ष पर्यन्त पितर तृप्त रहैत अछि- “यो वै श्राद्धं नर: कुर्यादेकस्मिन्नपि वासरे। तस्य संवत्त्रय यावत् संतृप्ता: पितरो ध्रुवम्।।” -पर्व निर्णय, पृ.- 84 जीवित पुत्रिका :- महिलालोकनिक सभसँ प्रिय व्रत जीवित पुत्रिका आश्विन कृष्ण अष्टमीकेँ मनाओल जाइत अछि। महिलालोकनि अपन सन्तान विशेषत: पुत्रक कल्याणार्थ एकर अनुष्ठान श्रद्धाभक्तिसँ करैत छथि। भविष्य पुराणक अनुसारेँ आश्विन कृष्णक जीमूतवाहन व्रत सौभाग्य प्रदान कएनिहार अछि। प्रदोष एकर मुख्य पूजाकाल अछि। जाहि प्रदोष कालमे अष्टमी पड़ैत अछि ओएह समय अनुष्ठेय अछि। सप्तमी विद्धा अष्टमी व्यात्र्य मानल गेल अछि। अष्टमी तिथि पर्यन्त निराहार तथा बिनु जलक उपवास कऽ नवमीमे पारण कएल जाइत अछि, भनहि अष्टमी दोसर दिन कतेको विलम्ब तक किएक नहि रहए। ‘पारणान्तं व्रतं ज्ञेयम्’क अनुसारेँ नवमी तिथिकेँ पारण करबाक विधान अछि। कोनहुँ स्थितिमे अन्न जलादिक सेवन हितकारी नहि होइत अछि- “आश्विनस्यासिताऽष्टम्यां या: स्त्रियोऽन्नं च भुज्जते। मृतवत्सा भवेयुस्ता विधवा दुर्भगा ध्रुवम्।।” -पर्व निर्णय, पृ.- 93 नवरात्र :- आश्विन शुक्ल प्रतिपदासँ नवमी पर्यन्त शारदीय नवरात्र उत्तर भारतक हिन्दूलोकनिक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पर्व अछि। द्वितीया युता प्रतिपदा मान्य अछि- “यो मां पूजयते भक्त्या द्वितीया दिगुणान्विताम् प्रतिच्छारदीं ज्ञात्वा सोऽश्नुते सुखमक्षयम्।।” -पर्व निर्णय, पृ.- 99 अमावस्या युता प्रतिपदा निन्दनीय मानल गेल अछि- “यदि कुर्यादमायुक्ता प्रतिपत् स्थापने मम। तस्मैशापायुतं दत्त्वा भस्मशेषं करोम्यहम्।।” -पर्व निर्णय, पृ.- 99 कोजगरा :- आश्विन शुक्ल पूर्णिमाकेँ कोजगरा पर्व ब्राह्मणक लेल विशिष्ट महत्त्व रखैत अछि। देश भेदसँ ई चन्द्रोदय व्यापिनी वा निशीय व्यापिनी दुनू ग्राह्य अछि। ‘को जागर्ति महीतले’ एहि जज्ञासासँ लक्ष्मी रातिमे घुमैत अछि। प्रदोष कालमे लक्ष्मीक पूजाक विधान अछि। दियावाती (सुखरात्रि, दीपावली) :- कार्तिक कृष्ण अमावस्याकेँ श्यामापूजाक निशीथ कालमे पूजाक विधान अछि। प्रदोषकालमे उल्का भ्रमणानन्तर लक्ष्मीक पूजा आ गोसाउनिक घरक पूजाक विशेष रूपसँ विधान अछि। पितृपक्षक अन्तिम दिन रहलासँ महालयाक अन्तिम दिन मानल जाइत अछि। सायंकाल उल्काभ्रमणसँ मर्त्यलोकमे आएल पितरकेँ हुनक पुत्रादि उल्का दीपसँ स्वर्गलोक पठा दैत छथि। दिनमे चतुर्दशी होअए तथा रातिमे अमावस्या होअए ओहि दिन लक्ष्मीक पूजा करबाक चाही इएह सुखरात्रि कहबैत अछि। कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भातृ द्वितीया) :- पं. कुशेश्वर शर्मा एहि द्वितीयाक प्रसंगमे पं. बदरीनाथ झाक निबन्धक आश्रय लेलन्हि अछि। एहिमे अशून्यशयन व्रत, यम यमुनाक पूजन, चित्रगुप्तक पूजा, भगिनी द्वारा भाएकेँ आदरपूर्वक भोजन प्रदान तथा भाए द्वारा सेहो बहिनकेँ वस्त्र-भूषणादिसँ संतोष प्रदान करब ई चारिटा कृत्य कहल गेल अछि। ई द्वितीया पूर्व विद्धा आओर परविद्धादुनू समयानुसार प्रचलित अछि। षष्ठी निर्णय :- व्रतानुष्ठानमे षष्ठीक बड्ड महत्त्व अछि। ई बारह प्रकारक मानल गेल अछि। सप्तमी विद्वा षष्ठीए मान्य अछि। पंचमी विद्धा गर्हित अछि आओर एकरा कएनिहारक धन ओ सनतानक हरण होइत अछि। अक्षय नवमी :- ई युगारम्भ तिथिक रूपमे मान्य अछि। ई नवमी युगादि कृत्यक लेल दशमी विद्वा ग्राह्य अछि। वाचस्पति मिश्र कार्तिक शुक्ल नवमीकेँ अत्यन्त पुण्यप्रद मानलन्हि अछि- ‘कार्तिके शुक्लपक्षे तु त्रेताऽथनवमेऽहनि।’ रविव्रत निर्णय :- पं. कुशेश्वर शर्मा रविव्रत निर्णयक प्रसंगमे पं. वासुदेव झाक निबन्धकेँ उद्धृत कएलन्हि अछि। तदनुसार अग्रहण, माघ,वैशाख आओर आषाढ़ शुक्ल पक्षीय रविकेँ भगवानसूर्यक व्रत करबाक लेल कहल गेल अछि। निर्णयानुसार मेष शशिगत सूर्यक रहलेपर रविव्रत करए, जँ वैशाखमे मलमास होअए तइयो। श्री जानकी महोत्सव :- प्राचीन मैथिल परम्परामे अग्रहण शुक्ल पंचमीकेँ श्रीसीताक जन्मोत्सव मनाओल जाइत अछि। श्री पंचमी (सिर पंचमी) :- माघ शुक्ल पंचमी श्री पंचमी वा सिर पंचमी कहबैत अछि। ई चतुर्थी युता ग्राह्य अछि। उपवासादिक अतिरिक्त सभ पंचमी पूर्व विद्धा ग्राह्य अछि। एहि दिन शिष्टजन हल प्रवहण ओ ओकर पूजा करैत अछि। माघ शुक्ल सप्तमी :- ई सप्तमी स्नान माघ शुक्लक करबाक प्रसंग उदय व्यापिनी ग्राह्य अछि, जे सूर्यग्रहणक तुल्य अछि। सातटा आक, बैर आओर जौवक पातकेँ माथपर राखि स्नान करबाक चाही। पर विद्धा सप्तमी कदापि अनुष्ठेय नहि अछि। होलिकादहन :- होलिका दाह सायाम व्यापिनी भद्रा शुन्य फाल्गुन पूर्णिमाकेँ करबाक चाही। एकर मुख्य काल प्रदोष अछि- “प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या फाल्गुनी पूर्णिमा सदा।” प्रतिपदानमे होलिकार्पण दोषावह होइत अछि। होलिका दाहक पश्चात् दिनमे फाल्गुनी पूर्णिमाकेँ सिन्दूर क्रीड़ाक विधान अछि। रामनवमी व्रत :- काल माधवमे पुनर्वसु नक्षत्र युक्त चैत्र शुक्ल नवमी मध्याह्न योग भेलासँ महापुण्य प्रदान कएनिहार होइछ। नवमीमे उपवास कऽ दशमीमे पारण कहल गेल अछि। बैशाख शुक्ल तृतीया :- बैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीयाक नामसँ प्रसिद्ध अछि। ई चतुर्थी युता ग्राह्य अछि। वटसावित्री व्रतम् :- ज्येष्ठ कृष्ण अमास्याक दिन मिथिलामे महिलालोकनि वटसावित्री व्रत करैत छथि। चतुर्दशी विद्धाअमावस्याक अनुशंसा कएल गेल अछि। ई अवैध्यक कामनासँ कएल जाइत अछि। प्रतिपदा युक्त अमावस्या ‘गर्हित’ मानल गेल अछि। पञचाग्नि व्रत :- ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रम्भा तृतीया कहबैत अछि। एहिमे महिलालोकनि पञ्चाग्नि व्रत करथि एहन शास्त्रीय विधान अछि। ई तृतीया द्वितीया युते करबाक चाही। गंगा दशहरा :- ज्योष्ठ शुक्ल दशमी गंगा दशहराक नामसँ जानल जाइत अछि। एहि दिन गंगा स्नानसँ दशविध पापक नाश होइत अछि। एकादशी व्रत :- शुद्धा एवं दशमी विद्धा नामसँ दुइ प्रकारक एकादशीक वर्णन कएल गेल अछि। अरुणोदय कालमे जँ दशमी रहए तँ ओहि दिनक एकादशी पाप मूलक उपवास युक्त विद्धा एकादशी कहबैत अछि। ई व्रत दुनू पक्षक एकादशी करए अथवा शुक्ल पक्षक एकादशी व्रतकेँ करए। चतुर्दशी व्रत :- चतुर्दशी शुद्धा आओर विद्धा नामसँ दुइ प्रकारक होइत अछि। चतुर्दशीमे उपवास कऽ चतुर्दशीयएमे पारणा उत्तम कहल गेल अछि। मिथिलामे कृष्ण चतुर्दशीएक ख्याति अछि। पूर्णिमा कृत्य :- ई पूर्णिमा चतुर्दशी विद्धा ग्राह्य नहि अछि, पर विद्धे ग्राह्य अछि। एहि तिथिमे अमावस्याक तरहेँ पितृ श्राद्ध आवश्यक अछि, अन्यथा नरकभाक होबए पड़ैत अछि। सोमवारी व्रत :- स्त्री लोकनिक हेतु मिथिलामे सोमवारी व्रत खूब प्रचलित अछि। अतिचार :- दैवज्ञ बान्धव ग्रन्थमे कहल गेल अछि जे वर्षकेँ पूर्ण नहि भेलापर जँ वृहस्पति पूर्व शशिकेँ छोड़ि पर राशिगत भऽ जाइत अछि तँ अतिचारक प्राप्ति होइत अछि। एहि अवधिमे विवाहादि कार्य नहि होइत अछि। कुम्भ पर्व निर्णय :- प्राचीने कालसँ हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन आओर नासिकमे कुम्भ पर्वक प्रचलन अछि। जँ सूर्य मेष राशि तथा वृहस्पति कुम्भ राशिमे होअए तँ हरिद्वारमे, सूर्य जखन मकर राशिमे होअए तथा वृहस्पति अजग (मेष राशि) मे होअए तखन प्रयागमे जखन वृहस्पति सिंह राशिगत होअए तखन उज्जयिनीमे आओर गुरु कर्क राशिमे होअए तथा सूर्य चन्द्रमा सेहो कर्क राशिमे होअए तखन नासिकमे कुम्भ योग होइत अछि। दीक्षा ग्रहण :- मिथिलामे मंत्र ग्रहणक अत्यधिक महत्त्व बताओल गेल अछि। यावत् पर्यन्त दीक्षा नहि ग्रहण कएल जाइत अछि तावत धरि बीज मन्त्रक उच्चारण नहि कएल जाइत अछि। मन्त्र ग्रहणकसम्बन्धमे कहल गेल अछि जे पिता, मातामह, कनिष्ठ भ्राता तथा शत्रु पक्षाश्रित व्यक्तिसँ मन्त्र नहि ग्रहण करबाक चाही। पारम्परिक मैथिल शिष्टाचारसँ दीक्षा देबाक लेल माता सर्वश्रेष्ठ मानल गेल अछि। एहि तरहेँ पर्व निर्णयक सम्बन्धमे पं. कुशेश्वर शर्मा विभिन्न निबन्धक संकलन पर्व निर्णय सम्बन्धी जिज्ञासाक शान्तिक लेल सार्थक प्रयास कएलन्हि अछि। म.म. उमापति ओ शुद्धि निर्णय म. म. उमापति विरचित‘शुद्धि निर्णय’ मैथिल धर्मशास्त्र निवन्ध ग्रन्थमे महत्वपूर्ण स्थान रहैत अछि। विद्वान् लोकनिक द्वारा आदृत एहि ग्रन्थमे वर्णाश्रम धर्मानुसार जनन, मरणाशौच आओर ओकर शुद्धि सार रूपमे निरुपित कएल गेल अछि। शास्त्रमे व्यापक दृष्टिसँ सकल देशाचारक अनुसारेँ व्यवस्था देल जाइत अछि जाहिमे अपन देशक व्यवस्थाक अनुसारेँ आचरण करए इएह मर्यादा अछि। आन देशीय व्यवस्था शास्त्रानुकूल भेलोपर त्याज्य अछि। एहि ग्रन्थमे शास्त्रानुकूल सेहो कनेको व्यवस्था मिथिलाक व्यवहारक विरुद्ध अछि जकर टिप्पणी करणक चर्चा सेहो कएलन्हि अछि आओर समाधान सेहो निकालल गेल अछि। एहिसँ प्रकृत ग्रन्थक उपयोगिता बढ़ि गेल अछि। कतए अशौच होइत अछि कतए नहि होइत अछि, कतेक समयमे आओर कोन विधिसँ ओकर शुद्धि होअए, एहि सम्बन्धमे ई पुस्तक निश्चयत: प्रामाणिक अछि। एहिठाम अनेक धर्मशास्त्रक बचनक जालकेँ छोड़ि कऽ सार रूपसँ एक निर्णयक उपस्थापना कएल गेल अछि आओर ओकरा विषयमे अनेक विषय सेहो संक्षेपमे कहल गेल अछि। प्रकृत ग्रन्थमे निम्नलिखित विषयक प्रतिपादन भेल अछि- चातुर्वर्ण्याशौचम्, सपिण्डादिलक्षणम्, अशौचसंस्कार, विदेशस्याशौचम्, बालापशौचम्, स्त्र्यशौचम्, गर्भस्रावाशौचम्, मृत्युविशेषाशौचम्, सपिण्डाद्यशौचम्, निर्हाणाद्यशौचम्, अथाधिकारिण:, अनधिकारिण:, उदाकानर्हा/, सन्यासिनाम् एकोदिष्ट विचार:। चातुर्वर्ण्याशौचम् :- सपिण्ड ब्रह्मणक मृत्यु भेलापर ब्राह्मण दशशन्तिमे शुद्धि प्राप्त करैत अछि। एहि तरहेँ क्षत्रिय बारह, वैश्य पन्द्रह तथा शुद्र एक मासमे शुद्ध होइत अछि। चारू वर्णमे सकुल्यक मरलापर तीन राति, कुलजक मरलापर पक्षिणी तथा गोत्रजक मरलापर स्नान मात्रसँ शुद्धि होइत अछि। सपिण्डादिलक्षणम् :- ‘सपिण्डा: सप्तपुरुषावध्य: - एकर भाव स्पष्ट करैत टिप्पणीकार श्री कृष्ण ठाकुर कहैत छथि जे बीजी पुरुषसँ आरम्भ कऽ सप्तम पुरुष पर्यन्त सभ संततिवला तथा सन्ततिक सपिण्ड्य होइत अछि। अपन वंशक सप्तम पीढ़ीसँ बादवला दश पुरुष धरि सकुल्य कहबैत अछि। ओकर पश्चात् जन्म आओर नामक ज्ञान भेला धरि कुलज कहबैत अछि। दश- पुरुषान्तर गोत्रज मात्र कहबैत अछि। कुमारि कन्याक सापिण्ड्य पिताक संग तथा विवाहिताक पतिक संग होइत अछि। अशौचसंस्कार :- दस दिन पर्यन्त अशौचक अवधिमे पॉंचम दिन पर्यन्त सजातीय दस दिवसीय अशौच आबि जाए तँ पूर्व अशौचक संग ओकर शुद्धि होइत अछि। ओकर पश्चात् नवम दिन धरि जँ इएह स्थिति आबए तँ द्वितीय अशौचान्तक संग ओ युक्त भऽ जाइत अछि। दसम दिन जँ पुन: सजातीय अशौच भऽ जाए तँ ओहि दिनक बाद दुइये दिनमे शुद्धि भऽ जाइत अछि। दशम दिन राति शेष रहलापर अरुणोदय बेला धरि जँ अशौच प्राप्त होअए तँ सूर्योदयक पश्चात् तीन रातिक शुद्धि होइत अछि। एहि तरहेँ क्षत्रियादिक अशौचापगमन होइत अछि। जननाशौचक अन्तसँ जननाशौच समाप्त होइत अछि, भनहि अल्पेदिनमे मरणाशौचान्त किएक नहि होअए। विदेशस्याशौचम् :- बिनु बीतल अशौच कालावधिमे विदेशस्थ व्यक्तिक मृत्युक सूचना प्राप्त भऽ जाए तँ जतेक दिन बँचल अछि ओहिमे अशौचान्त भऽ जाएत। सम्पूर्णाशौच कालक व्यतीत भऽ गेलापर छ: मासक भीतर सपिण्डण मरणक सूचना भेटए तँ तीन रातिमे शुद्धि होअए। नवम मास पर्यन्त एक राति, ओकर बाद एक वर्ष यावत् एक दिन-राति तथा वर्षानन्तर स्नानोदक दान मात्रसँ अशौच समाप्त भऽ जाइत अछि। एक दिनमे जाहि स्थानक समाचार प्राप्त नहि होअए ओ विदेश कहबैत अछि। साठि योजन (240 कोस)क दूरीवला देशान्तर कहबैत अछि। साठि योजनक अभ्यन्तर: सेहो भाषा, भेद-पहाड़, महानदी प्रभृति व्यवधान भेलापर देशान्तर कहाबए लगैत अछि। ओहिठाम मृत्यु भेलापर सद्य: शौच होइत अछि। बालाद्यशौचम् :- छ: मासक भीतर बालकक मृत्यु भेलापर सद्य: शौच होइत अछि। सप्तम मासक आरम्भ भऽ गेलापर तथा दुइ वर्ष धरि ब्राह्मणमे अहोरात्र अशौच लगैत अछि। उपनयनसँ पूर्व मृत्यु भेलापर तीन राति अशौचक लेल मानल जाइत अछि। क्षत्रियमे सात माससँ दुइ वर्ष धरि मृत्यु भेलापर तीन दिन, तीनसँ छ: वर्ष धरि छ: दिन आओर एकर बाद बारह दिन पर्यन्त अशौच होइत अछि। वैश्यमे सात माससँ दुइ वर्ष पर्यन्त मरलापर तीन दिन ओकर वाद पॉंच वर्ष धरि मृत्यु भेलापर नौ दिन आओर ओकर वाद पन्द्रह दिन अशौच रहैत अछि। शुद्रमे सात माससँ दुइ वर्ष धरि पॉंच दिन ओकर बाद सोलह वर्ष धरि अविवाहितक मृत्यु भेलापर बारह दिन, विवाह भऽ गेलापर आठमे वर्षसँ मासावधि अशौच मान्य अछि। एहि तरहेँ कन्याशौचक व्यवस्था देल गेल अछि। स्त्र्यशौचम् :- सम वर्णमे दुइ वर्षक कन्याक मृत्यु भेलापर सद्य: शौच होइत अछि। ओकर बाद विवाह पर्यन्त एक अहोरात्र तथा पतिक कुलमे सम्पूर्ण अशौच लगैत अछि। वागदत्ता कन्याक मृत्यु भऽ गेलापर पति आओर पिता दुनू कुलमे त्रिरात्र अशौच होइत अछि। म. म. उमापति विवाहिताक पितृ कुलमे मरब अथवा प्रसव कएलापर माता-पिताक लेल त्रिरात्र अशौच मानलन्हि अछि जँ साम्प्रतिक मैथिल व्यवहारानुसार मातामह पितामह कुलमे पड़एवला सभक लेल त्रिरात्राशौच मान्य अछि। एक परिवारमे रहएवला सहोदर, वैमात्रेय अथवा चाचाक पुत्रक लेल एक रात्राशौचक नाम अछि। पिताक आश्रमसँ भिन्न रहएवला पुत्रक लेल अशौच नहि मानलन्हि अछि :- ‘पितृर्भिन्ना श्रमवासिनां पुत्रादीनाम् अशौचं न भवति।’ कन्याक गोत्र पाणिग्रहक गोत्रे होइत अछि। मुदा पाणिग्रहण भऽ गेलापर जँ सप्तपदी, अश्मारोहण समाप्त भेलासँ पूर्वे कन्या वलात् दोसर द्वारा उपहरण कऽ लेल जाइत अछि तँ स्वामीक गोत्र पाणिग्रहणक गोत्र मानल जाएत। पाणिग्रहण आदि वैवाहिक कर्म समाप्त भेलासँ पूर्वे बलात्कारक द्वारा अपृत जाधरि ओकर प्रसव नहि भऽ जाइत अछि ताधरि पितृ गोत्रे मान्य रहैत अछि। प्रसबक पश्चात् पूर्व कृत स्वामीक प्रसव मरणजन्य त्रिरात्राशौच होइत अछि। गर्भस्रावाशौचम् :- गर्भ स्त्राव भऽ गेलापर सेहो ब्राह्मणादि वर्णक लेल अशौच कहल गेल अछि। मुदा प्रतिकूल साम्प्रतिक समयमे परम्पराक क्रमश: लोप भेल जा रहल अछि। मृत्युविशेषाशौचम् :- साम्प्रतिक समयमे असमय मृत्युक घटना घटि रहल अछि, जकर अशौचान्त दशमे दिन होइत अछि। मुदा उमापति एकरा विषयमे विशेष व्यवस्था देलन्हि अछि जकरा अनुसारेँ शौच आचमनादि काजमेवृद्ध जे असाध्य रोगसँ ग्रस्त अछि; मरणक इच्छासँ अग्नि-जलादिमे प्रवेश कऽ मृत्यु प्राप्त कऽ जाइत अछि, एहन सपिण्डक मृत्यु भेलापर त्रिरात्र अशौच कहलन्हि अछि। तत्काल अग्नि आदिमे प्रवेश कएलोपर मृत्यु नहि भऽ कऽ बादमे मृत्यु भऽ जाइत अछि तँ त्रिरात्र मात्रक अशौच कहल गेल अछि। रोगादिक कारणेँ अथवा पुत्रादि शोकामिभूत भऽ जँ केओ जलमे प्रवेश कऽ मरि जाए तँ ओकर अग्निदाह तथा तन्जन्य अशौच सेहो निषिद्ध कहलनि अछि। मुदा असावधानी अग्नि, व्रजादिसँ मृत्यु भऽ जाए तँ सम्पूर्ण अशौच मानल जाएत। मुक्का-मुक्की, शस्त्र शून्य झगड़ामे मृत्यु भऽ गेलापर सद्य: शौच कहलन्हि अछि। एहि तरहेँ निवन्धकार अनेक प्रकारक मृत्युमे अशौच नहि मानलन्हि अछि। मुदा आजुक समयमे दशदिनमा शौचक व्यवस्था देखाए पड़ैत अछि। सपिण्डाअशौचम् :- शुद्धि निर्णयमे ‘सपिण्डमरणे दशाहमशौचं’ ई धर्मशास्त्रीय तत्त्व सर्वत्र आदृत अछि, मुदा सिद्धान्त मात्रसँ।सकुल्यमरणे त्रिरात्रम्। ज्ञातिमरणे पक्षिणी। गोत्रजे मृते स्नानमात्रम्- तँ वृद्ध मुखसँ सुनल दन्तकथा जेना लगैत अछि। उमापति आचार्य मरणे तत्संस्कारकर्त्तु: शिष्यस्य दशरात्रम्। यदि संस्कारं न करोति तदा त्रिरात्रम्। आचार्य पत्नीमरणे तत्पुत्रमरणे गुरुकुलस्यितस्य शिष्यस्य त्रिरात्रम्- सेहो धर्मशास्त्र ग्रन्थोक्त मात्र लगैत अछि। वस्तुत: आइ आचार्य होएब आओर केश वपन कठिन विषय अछि। एहि लेल एहन स्थितिमे विचार करब प्रासंगिक नहि रहि गेल अछि। मुदा उमापति आन जाहि बिन्दुपर विचार कएलन्हि अछि ओहिपर ध्यान देब सामाजिक रूपसँ आवश्यक अछि। उदाहरणक लेल ग्रन्थकार मातामहक मृत्यु भेलापर दौहित्रक लेल त्रिरात्र मातामहीक मरलापर पक्षिणी, मामा, मौसी, ममियौत, दौहित्र, भागिन इत्यादिक मृत्यु भेलापर पक्षिणी अशौचक विधान कएलन्हि अछि। मुदा मातामहकेँ छोड़ि आनक विषयमे जे पक्ष राखल गेल अछि से आइ प्रचलित नहि अछि। निर्हाणाद्यशौचम् :- धर्मवृद्धिसँ अनाथ मृत ब्राह्मणक शवकेँ उघब आ अन्त्येष्टिमे भाग लेलापर स्नान मात्रसँ शुद्धि कहल गेल अछि, मुदा सम्प्रति ईहो व्यावहारिक नहि अछि। एतए ब्राह्मणादि कोनो वर्णकेँ त्रिरात्र अशौच लगैत अछि। ओना राजनीतिक व्यक्तिक मरलापर, शव उघव एवं संस्कारमे भाग लेलापर केश कर्तनक व्यवस्था शिथिल देखाए पड़ैत अछि। दहादिक पश्चात् मृत सम्बन्धीक घरपर रहब तथा सिद्धान्न खएला पर त्रिरात्र अथवा दश दिनमे शुद्ध होइत अछि। अथाधिकारिण :- मृत व्यक्तिक तीन क्रिया होइत अछि- पूर्वा, मध्या आओर उत्तर। दाह संस्कारसँ आरम्भ कऽअशौचान्त धरि पिण्डदानादि क्रिया पूर्वा अछि। अशौचान्तक पश्चात् सपिण्डीकरणक पर्यन्त मध्यमा क्रिया अछि तथा ओकर पश्चात् एक्रोदिष्टादि क्रिया उत्तरा कहबैत अछि। एहिठाम प्राचीन व्यवहारानुसार तेरहो पुत्रक अधिकार कहल गेल अछि। मुदा टीकाकार श्री कृष्ण ठाकुर कहलन्हि अछि एहि कलियुगमे औरस, पुत्रिकापुत्र, देत्तक आओर कृत्रिमे पुत्रकेँ श्राद्ध करबाक अधिकार अछि। एहि चारूक अतिरिक्त पुत्रक श्राद्धाधिकार सम्मत नहि अछि। शूद्रमे पौनर्भव (अन्यसँ विवाहिताक पुत्र) पुत्रक सेहो अधिकार देखाओल गेल अछि- “कलौ औरस- पुत्रिकापुत्र- दत्तक- कृत्रिमाणामेव- श्राद्धेऽधिकार:।” एतच्चतुष्टयभिन्ना: पुत्रा ब्राह्मणैर्न कर्त्तव्या: निषेधात्। अत्र शूद्रस्य पौनर्भवपुत्रोऽव्यधिकारीति विशेष:।। -शुद्धि निर्णय पृ.- 45 जे स्त्री परित्यक्त अछि अथवा जकर पतिक मृत्यु भऽ गेल अछि अथवा स्वेच्छासँ जे पति छोड़ि दोसर पुरुषक भार्या बनि कऽ पुत्रोत्पन्न कएलक अछि से पौनर्भव नामक पुत्र अछि। अनधिकारिण :- पतित, वेदक प्रामाणिकताकेँ स्वीकार नहि करएवला, अपन जातिसँ भिन्न, सम्पत्ति चोरी करएवला, समयातीत उपनयन करएवला, आलस्य वा अश्रद्धासँ स्वकर्मच्युत, मद्य पीबएवला, अपन गर्भ तथा स्वामीसँ द्रोह कएनिहारि स्त्री श्राद्धधिकारी नहि होइछ। उदाकानर्हा :- अकृत संस्कार, वेद निषिद्ध सन्यासी, मद्यपायी सन्यासी पुत्रादि मृतक क्रियाक हेतु अयोग्य होइत अछि। संन्यासिनाम् एकोछिष्ट विचार :- सन्यासीक पुत्रक द्वारा सांवत्सरिक एकोदिष्ट पार्वण आभ्युदयिक तीर्थ श्राद्ध कर्त्तव्य अछि। एहि मतक अनेक विरोधी वचन प्राप्त होइत अछि। जेना- “एकोछिष्टं न कुवींतं संन्यासिनां चैव सर्वदा। अहन्येकादशे प्राप्ते पार्वणंतु विधीयते।। एकोछिष्टं यतेर्नास्ति त्रिदण्ड ग्रहणादिति। सपिण्डीकरणाभावत् पार्वणश्राद्धमिण्यते।। संसास ग्रहणादेव प्रेतत्वं नैव जायते।।” - शुद्धि निर्णय पृ.- 49 एहि वचनसँ सन्यासी लोकनिक श्राद्ध सेहो होइत अछि। स्मृतिकार शातातप सन्यासी श्राद्ध सेहो निषिद्ध मानलन्हि अछि। अत: हिनक एकोदिष्ट सेहो समीचीन नहि अछि। दत्तात्रेयक सेहो इएह मत अछि। एहिठाम किछु गोटे एकोदिष्ट करैत छथि आ किछु गोटे नहियोँ करैत अछि। शास्त्रकार लोकनि ओकर एकोदिष्ट सेहो सामान्य रूपमे करवाक लेल कहलन्हि अछि। मैथिल निबन्धकार सपिण्डीकरणादि कर्त्तव्यक दिस संकेत कएलन्हि अछि, मुदाआन पार्वणक निशेध तँ करितहि छथि। एहि तरहेँ करमहावंशीय म. म. उमापति धर्मशास्त्रानुमोदित सामयिक व्यवहारक वर्णन कऽ मिथिलाक संस्कृतिक उच्चता ओ प्रवणताक तरफ ध्यानाकृष्ट कएलन्हि अछि। पुत्र ओ पितृकर्म पिता पुत्रक सम्बन्ध अनुकूल नहि रहलासँ सामाजिक व्यवस्थामे गतिरोध उत्पन्न होएब स्वाभाविके अछि। पुत्रक प्रति पिताक कर्तव्यकेँ नकारल नहि जा सकैछ तँ पुत्रक कर्त्तव्यमे सेहो गुरुतर भारमे वृद्धि भऽ जाइत अछि जे पिताक प्रति अनुकूल व्यवहार करए, किएक तँ पिता तँ गुरुओक गुरु होइत अछि। तेँ जीवितावस्थामे पुत्रक कर्त्तव्य विशेष महत्त्व रखैत अछिकारण हुनक ऋणसँ पुत्र मृत्युपरान्त मुक्त नहि होइत अछि। जीवितावस्थामे पुत्र पिताक कहब मानए ओ मृत्युपरान्त हुनका निमित्त पिण्डदान करए एहिमे ओकर पुत्रता अछि, ई शास्त्रीय वचन अछि। ‘जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्। गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता।। ‘पुत्’ नामक नरकसँ मुक्ति दिएवाक कारणेँ पुत्र कहबैत अछि। एकरा सम्बन्धमे स्मृतिकार बौधायन कहने छथि जे ‘पुत्’ शब्द नरकक पर्याय अछि आओर दुख तँ नरक अछिए। एहि नरकसँ त्राण दिआबएवला पुत्र होइत अछि। तेँ पिता इहलोक ओ परलोक दुनूक लेल पुत्रक कामना करैत अछि। ‘पुदिति नरकस्यारण्या दु:खंच नरकं विदु:। पुत्रस्त्राणात्तत: पुत्रमिच्छन्ति परत्र च।।’ एहि सम्बन्धमे मनु सेहो कहलन्हि अछि जे पिताकेँ पुत् नामक नरकसँ त्राण दिअएबाक कारणहि सुत पुत्र सेहो कहबैत अछि, एकरा साक्षात ब्रह्मा कहलन्हि अछि। “पुंनाम्नो नरकाह्यस्मात्त्रायते पितरं सुत:। तस्मात्पुत्र इति प्रोक्त: स्वयमेव स्वयंभुवा।।” मनुस्मृति- 9/138 पुत्त्र शुद्ध रूप अछि पुत्रक जकर प्रयोग पुत्र मात्र भऽ गेल अछि। पुत्रहीन व्यक्तिक लेल पुत् नामक नरक सुरक्षित कएल गेल अछि। ‘आत्मा वै जायते पुत्र’ एहि शास्त्र वचनानुसार पति स्वयं अपन पत्नीक गर्भसँ पुनर्जन्म लैत अछि जाहिमे हुनका असीम आनन्द होइत छन्हि। पिता सभ दुखकेँ बिसरि जाइत अछि जखन हुनका पुत्ररत्न प्राप्त होइत छन्हि संगहि पुत्र पिताक सभ क्लेशकेँ दूर कयनिहार होयबाक चाही। जहिना नाव अथाह सागरकेँ पार कराए दैत अछि ओहिना पुत्र इहलोक ओ पारलौकिक दुनू लोकसँ मुक्ति दिआए दैत अछि। इएह कारण अछि जे आनादिकालहिसँ एहिठाम पुत्र जन्मक कामना करैत देखल जाइत अछि। कहल गेल अछि जे- ‘अपुत्रस्य गतिर्नस्ति। भारतीय सनातन धर्मानुसार पितरक लेल प्रतिदिन तर्पण करबाक चाही। एहि तर्पणसँ पितर मृत्युक उपरान्त कोनो योनिमे किएक नहि होथि हुनका सर्वविध तृप्ति भेटैत छन्हि। नित्य जल तर्पणक कामना पितर अपन सन्तानसँ करैत छथि एवं बड़ प्रसन्नतासँ ओकरा ग्रहण करैत छथि। पुत्रहीन पितरकेँ जलक बड़ दुख होइत अछि ओ अश्रुक रूपमे पिबैत छथि। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’मे महाकवि कालिदास राजा दुष्यन्तक पुत्रहीनताक व्यथा व्यक्त कएलन्हि अछि। राजा दुष्यन्त शापवशात् गर्भवती पत्नी शकुन्तलाक त्याग कऽ देने छलाह आ पुत्रहीनताक शंकासँ परम खिन्न छलाह। हमर पितर सन्तानहीन प्राणीक द्वारा देल गेल तर्पणक जलकेँ नोरक रूपमे पिउताह। ‘अस्मात्परं वत यथाश्रुतिसंभृतानि को न: कुले निवपनानि नियच्छतीति। नूनं प्रसूतिविकलेन मया प्रसिक्तं धौताश्रुशेषमुदकं पितर: पिबन्ति।। अभिज्ञान शाकुनतलम्- 6/25 एहने सन भाव महाकवि कालिदास रघुवंश महाकाव्यमे व्यक्त कएलन्हि अछि। राजा दिलीप वशिष्ठसँ इएह प्रार्थना करैत छथि जे पुत्रहीन हमरा बाद पितृ तर्पण जलकेँ दुर्लभ बूझि हमरासँ देल गेल तर्पण जलकेँ हमर पितृ, पितामहादि पितरगण अपन-अपन श्वांस-प्रश्वाससँ ईषत् गरमकेँ पिबैत छथि- ई सत्य अछि किएक तँ दुखी व्यक्तिक नोर तथा श्वांस दुनू गरम-गरम निकलैत अछि। “मत्परं दुर्लभं मत्वा नूनमावर्जित मया। पय: पूर्वे: स्व नि:श्वासै: कवोष्ठमुप भुज्यते।।” रघुवंश- 1/67 राजा दिलीप निवेदन कएलन्हि जे पुत्रहीन हमरा बाद श्राद्ध पिण्डक भावी लोप देखएवला हमर पूर्वज पितृगण दुखी भेलासँ हमरा द्वारा प्रदत्त स्वधा-स्वधान्त पितृमन्योत्सर्ग पितृभोज्य पदार्थक संग्रहमे तत्पर भेलापर सेहो पर्याप्त रूपसँ भोजन करएवला नहि होइत छथि। “नूनं मत्त: परंवश्या: पिण्डविच्छेददर्शिन:। न प्रकामभुज: श्राद्धे स्वधा संग्रहतत्परा:।।” रघुवंश- 1/66 पुत्रक एहि महत्तापर विचार करैत नारद इक्ष्वाकुवंशीय पुत्र राजा हरिश्चन्द्रसँ गर्हस्थ्य मोंछ, दाढ़ी एवं तपस्यादिसँ वारण करैत केवल पुत्रक इच्छा करबाक कहलन्हि- ‘पुत्रं ब्रह्मण मिच्छत्वं सर्वलोकोऽवदादद।’ -हरिश्चन्द्रोपाख्यान- अध्याय, 33/गाथा- 04 ऐतरेय ब्राह्मणक एहि अध्यायमे नारद पुत्रक प्राप्तिकेँ अनिवार्य मानलन्हि- “नापुत्रस्य लोकोऽस्तीति।”– गाथा, 09 एवं प्रकारेँ एहि जगतमे पुत्रक विशिष्टता अछि जे पिताकेँ इहलोक तथा परलोक दुनूसँ पार कराए दैत अछि। तेँ पिता-पुत्रक प्राप्तिक लेल व्याकुल रहैत छथि। कोनो पिता प्राथमिक रूपसँ पुत्रेक कामना करैत छथि। पुत्री कतेको गुणवती किएक नहि होअए पिताकेँ पुत्र चाही। जतए अपुत्र व्यक्तिक मृत्युसँ पूर्व कर्ता पुत्र बनबैत अछि आओर मृत्युक पश्चात् ओ कर्ता निमंत्रण पत्रमे ‘मत्पुत्रत्वकर’ वा स्त्रीपक्षमे ‘मत्पुत्रत्वकरी’क प्रयोग करैत अछि। एहन विशिष्ट पुत्रकेँ धर्मशास्त्री लोकनि अधिकारक संग कतिपय कर्त्तव्य निर्धारित कएलन्हि अछि। नन्द विलास राय सरस्वती पूजाक परसाद माघक इजोरिया पखक पंचमी तिथि। आइये वसन्त पंचमी छी। वसन्त पंचमीकेँ श्री पंचमी सेहो कहल जाइत अछि। मिथिलांचलक किसानक श्री पंचमी एकटा प्रमुख पाबैन छी। जे किसान हर-बरद रखै छैथ ओ श्री पंचमीक भोरमे हर ठाढ़ करै छैथ। हर ठाढ़ करैसँ पहिने हरक फारकेँ बरही ओइठाम लऽ जा कऽ पिटा अनै छैथ। जे किसान जइ बरहीसँ फार पिटौलक ओ किसान ओइ बरहीक गिरहत भेल। किसान भरि साल अपना बरहीसँ हर सम्बन्धी काज करौत तइ एबजमे किसान बरहीकेँ ऐगला अगहनमे एक मन आकि एक बोरा माने अस्सी किलो धान देत। किसान बरही ओइठामसँ फार पिटा कऽ आनि काठक जे हर बनल रहैत अछि जे हरीस आ लागैनमे ठोकल रहैत अछि ओइ काठक हरमे फार फिट करैत अछि। फेर हर लाधि जोड़ा बरदक संग जा कऽ कोनो खेत आकि परतीमे अढ़ाइ मोड़ हर जोतैत अछि, फेर बरदकेँ खोलि दैत छथिन आ आ लधलाहा हर नेने आँगनमे जे पीठारसँ हरक आकृति बनल रहैत अछि तैपर हरक नास राखि लागैन पकैड़ ठज्ञढ़ रहैत छथिन। घरक मलिकाइनओइ हरक नासकेँ धानसँ झँपै छथिन। जेकरा जेते मन भेल, दू पसेरी (१० किलो), वा आध मन (२०किलो) धानसँ हरक नासकेँ झाँपल जाइत अछि। ओ धान हर ठाढ़ केनिहारक होइत अछि। जँ हर हरबाह ठाढ़ केने रहल तँ ओ धान उठा कऽ अपना घर लऽ गेल। आइसँ पनरह-बीस बर्ख पहिने मिथिलांचलक किसानक श्री पंचमी प्रमुख पाबैन छल। मुदा कृषि यंत्रक विकास भेने लोक बरद पोसनाइ छोड़ि देलक आ खेती ट्रेक्टरसँ होमए लगल। दोसर कारण दिल्ली पंजाबमे रोजगार खुजलासँ मिथिलांचलक बेसी लोक दिल्ली पंजाब जाए लगल जेकर फल भेल जे किसानकेँ हरबाह भेटबे मोशकिल भऽ गेल। अहू कारणसँ किसान बरद पोसनाइ छोड़ि देलक। दोसर कारण लोकक आर्थिक हालतमे सुधार भेलाक कारण, लोक हरबाहि केनाइकेँ गुलामीबला काज बुझि हर जोतब छोड़ि देलक। जे हरबाह जइ गिरहतक हर ठाढ़ केलक ओइ हरबाहकेँ भरि साल ओइ गिरहतक हर जोतए पड़ै छल। हरबाहिक एबजमे गिरहत हरबाहकेँ पाँच वा दस कट्ठा खेत कलियौती दइ छल। जे खेत हरबाहकेँ कलियौती भेटै छल। ओ खेत उपजा कऽ हरबाह दुनू कूर उपज अपना घर लऽ जाइ छल। जे गिरहत हरबाहकेँ कलियौती खेत नै दइ छल ओ दस कट्ठा वा पनरह कट्ठा खेत हरवाहकेँ बँटाइपर दइ छल। अेना, आब तँ खेती केनाइ घाटाक सौदा भऽ गेल आ खेत सहजे भारी भऽ गेल हेन। तँए बेसी गिरहत अपन खेत बटाइ अथबा मनकूतपर लगबैत अछि। खाएर जे से...। आइ सरस्वती पूजा सेहो छी। केतेको पब्लिक स्कूलसँ सरस्वती पूजाक नौत-हकारक कार्ड आएल अछि। हमरो पोती नन्दनी डी.पी.एस. पब्लिक स्कूलमे यू.के.जी क्लासमे पढ़ैत अछि। तीन साए टका सरस्वती पूजाक चन्दा नन्दनीक लागल। डी.पी.एस. पब्लिक स्कूलसँ सेहो निमंत्रण कार्ड आएल अछि। श्री पंचमी दिन आब हर तँ ठाढ़ नै होइए किए तँ ने बरद रखने छी आ ने हरबाहे अछि आ ने अपना हर जोतैक लूरि अछि। तखन बरद रखबे किए करब। मुदा श्री पंचमी दिन घरक गोसाँइकेँ जे गुड़-चाउर आ दुधक खिचड़ी चढ़ै छल से आइयो चढ़िते अछि। आइयो दस बजे दिनसँ पहिने पाबैन भेल जइमे घरक गोसाँइकेँ गुड़खिचड़ी, लड़ू, पान, सुपारी आ केरा चढ़ल। अपनो सबहक खेनाइमे गुड़खिचड़ी आ अल्लू-कोबीक तरकारी बनल। पत्नी हमरासँ पुछली- “सरस्वती पूजाक नोतो-हकार पूरए जेबइ?” हम कहलयैन- “एहनो कहीं नै जाइऐ। केतेको ठामसँ हकारक कार्ड आएल अछि।” तैपर पत्नी बजली- “तँ खेनाइ खा लिअ आ चल जाउ, सरस्वती माताक दर्शनो करब आ परसादो खाएब। भऽ सकए तँ किछु परसाद हमरो-ले नेने आएब। आन स्कूलमे जेहेन परसाद दिअए मुदा जइ स्कूलमे नन्दनी पढ़ैत अछि ओइमे तँ बढ़ियाँ परसाद देबे करत। किए तँ तीन साए टाका नन्दनी पूजाक चन्दा वास्ते लऽ गेल हेन।” हम कहलयैन- “के कहलक, केहेन परसाद देत?” हम खेनाइ खा कपड़ा पहिर साइकिल लऽ सरस्वती पूजाक हकार पूरए विदा भऽ गेलौं। सभसँ पहिने मिथिला पब्लिक स्कूल पड़ैत अछि। ओइ स्कूलमे प्रवेश केलौं। पूजाक आरती भऽ रहल छेलइ। एक मन कहलक जे आगाँ बढ़ि जाइ आ घुरती कालमे एतए परसाद ग्रहण करी। दोसर मन कहलक सरस्वती माताक आरती होइ छै, बिना आरती नेने चल गेलाइ नीक नहि हएत। हमरा सत्य नारायण भगवानक पूजाक कथा मोन पड़ि गेल। हम ओत्तै अँटैक गेलौं। आरतीक बाद सरस्वती बन्दना भेल। हमहूँ सरस्वती बन्दना गउलौं। फेर आरती आएल। जेबी टटोललौं तँ एकटा दूटाबला सिक्का भेटल। ओ सिका आरतीबला प्लेटमे रखि आरती लेलौं। तत्पश्चात एकटा कुर्सीपर बैस गेलौं। पूजा समाप्त भेलाक अदहा घन्टा बाद स्कूलक विद्यार्थी सभमे परसाद बाँटल गेल। जखन विद्यार्थी सभ परसाद लऽ-लऽ गेटसँ निकैल गेल तखन आगन्तुक अतिथि लोकैनकेँ परसाद बाँटल गेल। कागतक छोटका प्लेटमे लगभग पच्चीस ग्राम बुनियाँ आ गहुमक चिक्कसक परसाद मिललहा, दू-तीटा टुकड़ी गार, दूटा टुकड़ी केशौर, एक खण्डी बैरक आ एकटा फाँड़ा समतोलाक रहए। परसाद खा डी.पी.एस. पब्लिक स्कूल, जेतए हमर नातिन पढ़ैत अछि, विदा भेलौं। गेटेपर हमर नातिन नन्दनी भेट गेल। हमरा देखते नन्दनी बाजल- “नाना, पाँचटा टका दिअ।” हम पुछलिऐ- “पाँचटा टका की करबीही?” तैपर नन्दनी बाजल- “ड्रिम लाइट बिस्कुट कीनब। भूख लागल अछि।” हम फेर पुछलिऐ- “आ स्कूलमे जलखै खाइले नै देलकौ?” नन्दनी बाजल- “देलक। कनी मुरही आ कनी बदामक घुघनी। भूख लगले अछि।” हम पुछलिऐ- “आ परसादमे की देलकौ?” नन्दनी कहलक- “एकटा प्लास्टिक कपमे कनीके बुनियाँ, दूटा टुकड़ी केशौर, दूटा टुकड़ी गाजर, एकटा फाँड़ा समतोला आ एकटा बैरक खण्डी।” तामसे हमर टीक ठाढ़ भऽ गेल। हम एकटा दसटकही जेबीसँ निकालि नन्दनीकेँ देलिऐ आ गेटक भीतर गेलौं। पूजाक भव्य पण्डाल बनल छल। माँ सरस्वतीक प्रतिमो भव्य छल। दस-बारहटा हौरन सेहो स्कूलक छतपर फिट केने रहए आ निच्चाँमे चारिटा साउण्ड बॉक्स। हम जा कऽ प्रतिमोकेँ प्रणाम केलौं। प्रतिमाक दर्शन कऽ अबिते रही कि स्कूलक निदेशक हमरा देखलैथ आ बड़ आदरसँ एकटा कोठरीमे लऽ जा कऽ बैसौलैथ। ओइ कोठरीमे पहिनेसँ किछु लोक सभ बैस कऽ परसाद खा रहल छला। हम बैसबे केलौं कि एकटा लड़ा एकटा ट्रेमे परसादक प्लेट लऽ कऽ आएल। स्कूलक दिनेशक एकटा प्लेट लऽ हमरा दिस बढ़ौलक। हम निदेशकक हाथसँ प्लेट लऽ परसाद खाए लगलौं। प्लेटमे करीब पच्चीस ग्राम बुनियाँ आ वएह सभ छल जेना नन्दनी कहलक। परसाद खा हम दोसर स्कूलक लेल विदा भऽ गेलौं। ज्ञानगंगा कोचिंग सेन्टरमे गेलौं। ओतए ध्वनि विस्ताकर यंत्रमे ई छौड़ी, ई छौड़ीबला गीत बजैत रहए। हम सोचए लगलौं आइ सरस्वती पूजा छी। विद्याक देवीक पूजा। आ ऐ पूजामे एहेन गीत बजबैए। जखन कि कोनो धार्मिक गीत बजैबतए। माँ शारदेक प्रतिमाकेँ प्रणाम कऽ एकटा ब्रेचपर बैसलौं। एक विद्यार्थी परसाद नेने आएल। हम ओइ विद्यार्थीकेँ कहलिऐ- “ऐ कोचिंग संस्थाक निदेशक के छैथ, कनेक हुनकासँ भेँट कराउ।” दूइए मिनटक बाद एक आदमी जे शूट-बूटपर टाइ लगौने रहए, हमरा लग एला। हम पुछलयैन- “अपने ऐ संस्थाक निदेशक छी?” ओ बजला- “जी सर, हमहीं ऐ कोचिंग संस्थाक डारेक्टर छी।” तैपर हम कहलयैन- “विद्याक देवी माँ सरस्वतीक पूजाक अवसरपर अपने कोन गीत बजा रहल छिऐतहूपर धियान देलिऐ हेन।” आब निदेशकक धियान गीतपर गेलैन। ओ तुरन्ते जा कऽ गीत बन्द करौलैथ आ हमरा लग आबि अपन गलती कबूल करैत हमरासँ माफी मंगलैथ। ओ परसादक एकटा प्लेट अनलैथ आ हमरा हाथमे देलैथ। परसाद खा हम गाँधी विद्यापीठक लेल विदा भेलौं। गाँधी विद्यापीठ क गेटपर साइकिल खड़ा कऽ साइकिलमे ताला लगबैत रही तखने दूटा सज्जन गप-सप्प करैत निकलला। एक गोरे पैन्ट-कोर्ट आ दोसर बेकती पायजामा कुरतापर बन्डी पहिरने छला। हम हुनका सबहक गप सुनए लगलौं। पायजामा कुरताबला बजला- “कहू तँ चन्दा लेत पँच-पँच साए टाका आ परसादीमे केशौर, गाजर आ बैरक टुकड़ी। मिठाइक नाओंपर पच्चीस-तीस ग्राम बुनियाँ।” तैपर कोट-पैन्टबला बजला- “यौ नेताजी, एकरा सबहक ई धन्धा भऽ गेल हेन। सरस्वती पूजाक नाओंपर, स्वतंत्रता दिवस आ गणतंत्र दिवसक नओंपर विद्यार्थी सभसँ चन्दा उगाही करत आ चन्दाक पाइ अपना सभमे बन्दरबाँट करत।” पायजामा-कुरताबला बजला- “यौ स्कूलो फीस जइ हिसाबे लइ छै तइ हिसाबे पाढ़ाइ कहाँ छै। जँ विद्यार्थीकेँ ट्यूशन नै पढ़ेबै तँ विद्यार्थीक विकासे नै हएत।” कोट-पैन्टबला बजला- “लोके की करत, सरकारी विद्यालय सभमे पढ़ाइ होइते ने छै तँए लोक प्राइवेट स्कूलमे अपन धिया-पुताकेँ पढ़बैत अछि। मुदा एतुक्को सएह हालत छै।” पायजामा-कुरताबला बजला- “सरकारी विद्यालयमे जे पढ़ाइ हएत, से की कोनो शिक्षककेँ किछु अबै छै जे विद्याथ्र्ज्ञीकेँ बतौत।” कोट-पैन्टबला बजला- “नहि से बात नइ छै। सरकारियो विद्यालयमे जे शिक्षक लालूजीक समयमे कम्पीटीशन दऽ कऽ बहाल भेल रहैथ ओ सभ योग्य शिक्षक छैथ। मुदा छैथ सीमित संख्यामे। एम्हर जे परीक्षाक अंकक आधारपर बहाली भेल, चाहे शिक्षा मित्रबला शिक्षक होथि वा पंचायत शिक्षक, तइमे पच्चास प्रतिशत अयोग्य छैथ। हँ, टी.ई.टी. पास केलहा शिक्षक सभ योग्य जरूर छैथ।” पायजामा कुरताबला बजला- “ई जे अंकक आधारपर शिक्षक सबहक नियुक्ति भेल तइमे फर्जी प्रमाण-पत्र कहियौ आकि कीनुआ प्रमाण-पत्र कहियौ तइ प्रमाण-पत्रपर जे बहाली भेल से सभ एकदम बोगस शिक्षक सभ छैथ। हुनका सभकेँ जखन नियुक्ति पत्र प्राप्त करौलक तँ केतेक गोरे लिखलक एक पति पाया।” कोट-पैन्टबला बजला- “हँ से तँ ठीक्के। यौ, एकटा बात आर छै। जइ शिक्षककेँ मैरिटो छै, ओकरो मानसिकता विद्यालयमे बच्चा सभकेँ पढ़ाबी, से नहि छैन।” पायजामा-कुरताबला बजला- “की करबै। जेकरा सरकारी नौकरी भऽ जाइ छै ने ओकर नैतिकतामे ह्रास हुअ लगै छै। अच्छाछोड़ू ऐ गप-सप्पकेँ। गाड़ी स्टार्ट करू। चलू आर.एस. पब्लिक स्कूल नवटोली। ओइ स्कूलक डायरेक्टर अपनेसँ हकारक कार्ड दऽ गेल छला।” दुनू गोरे फटफटियापर चढ़ि विदा भऽ गेला। हमरो आर.एस. पब्लिक स्कूल नवटोलीसँ हकार भेटल छल, हम बिसैर गेल छेलौं, हमरो मोन पड़ि गेल। हम गाँधी विद्यापीठ स्कूलक भीतर जा प्रतिमाक दर्शन करि परसाद लेलौं आ नवटोलीक लेल विदा भऽ गेलौं। पच्चासे लग्गा आएल हएब कि एकटा गीतक अवाज कानमे गुँजल। गीत रहए- डी.जे.बला छौड़ा अनहरियामे पीच देतौ।’ देखलौं तँ ई गीत ज्ञान गंगा शिक्षा निकेतनक पूजामे लगौल ध्वनि विस्तारक यंत्रमे बजि रहल छल। मनमे भेल साइकिल रोकि ज्ञान गंगा शिक्षा निकेतनक निदेशककेँ डाँटी मुदा फेर सोचलौं सभटा ठीकेदारी की हमहीं नेने छी। जँ ज्ञानगंगा शिक्ष निकेतनक निदेशक हमरा कहए- जे हम अपना भैंसकेँ कुरहैरेसँ नाथब तइसँ अहाँकेँ की, तब तँ भऽ गेल झगड़ा। दोसर गप जे ओइ निकेतनक निदेशक हमर मित्रे छैथ मुदा हकार नै देने छैथ तँए जाएब उचित नहि। हम आगाँ बढ़ि गेलौं। नरहियासँ पूब बहुल नदी बहैत अछि। बहुल नदीक पुल टपलौं। पुलसँ साए मीटरक दूरीपर एन.एच.- ५७ सँ बाइ पासे सड़क निकलल अछि जे धनजैया टोल होइत आगाँ फयूल सेन्टर लग जा कऽ एन.एच. ५७ मे मिलैए। जेतएसँ बाइ पास सड़क शुरू होइत अछि, तहीठाम बाइ पास सड़कसँ उत्तर एकटा भव्य पण्डाल छल। वोर्डपर लिखल रहए- शान्ति निकेतन कोचिंग संस्थान। ओइ संस्थानक निदेशक हमर कौलेजक संगी। ओहो हकारक कार्ड भेजने छला। निदेशक महोदय सड़केपर ठाढ़ छला। हम चाहलौं जे आगाँ बढ़ि जाइ, किए तँ अबेर भऽ गेल छल आ नवटोली पहुँचब जरूरी छल। एतए सँ आर.एस. पब्लिक स्कूल नवटोली लगधक दू-अढ़ाइ किलोमीटरसँ कम नै हएत। मुदा से नहि भेल। शान्ति निकेतन कोचिंग संस्थानक निदेशक हमरा देख गेला आ बजला- “आउ, नन्द भाय। केतए पड़ाएल जाइ छी।” हम साइकिलकेँएन.एच. ५७ सँ बाइ पास सड़कपर उतारलौं। एतए प्रतिमाक दर्शन कऽ परसाद ग्रहण केलौं आ बाइ पासे सड़कसँ आर.एस. पब्लिक स्कूल नवटोली विदा भऽ गेलौं। धनजैया टोलपर बाइ पास सड़कक कातेमे एकठाम पूजाक आयोजन छल। कोनो ताम-झाम नहि। एकटा प्लास्टिकबला तिरपाल टाँगि, तही निच्चॉंमे स्नानी चौकीपर मण्डप बला माँ शादेक प्रतिमा बैसा पूजा भेल छल। सड़के कातमे दूटा ब्रेंच आ पान-सातटा प्लास्टिकबला कुर्सी राखल छल। जखन हम ओतए पहुँचलौं तँ साइकिलसँ उतैर माँ शादाकेँ प्रणाम केलौं। सोचलौं एहेन पैघ-पैघ संस्था सभमे तँ केशोर, गाजर आ बैर मिश्रित परसाद भेटल, अतए तँ साधारण ढगे पूजाक आयोजन अछि। बड़ हएत तँ गहुमक चिक्कसक परसाद हएत। प्रतिमाक दर्शनक बाद जखन साइकिलपर चढ़ए लगलौं कि एकटा युवक बजला- “सर, परसाद लऽ लेल जाउ।” हम साइकिल खड़ा करि ब्रेंचपर बैस गेलौं। ओ युवक एकटा प्लास्टिकक कापमे भरि कप बुनियाँ देलैथ। एखन धरि जेतेक ठाम परसाद भेटल छल तइ सभसँ नीक। परसाद देख मन प्रसन्न भऽ गेल। हम बजलौं- “अहाँक परसाद सभसँ नीक अछि। ऐ लेल अहाँकेँ धन्यवाद।” ओ युवक हाथ जोड़ैत बजला- “सर ई अपने सबहक आसिरवाद छिऐ।” युवक विनीत भावे बाजल रहैथ, मन गदगद भऽ गेल। हम युवकसँ पुछलयैन- “अपने..?” ओ युवक बिच्चेमे बजला- “जी हम पहलासँ पाँचमा तक चटिया सभकेँ ट्यूशन पढ़बै छी।” हम बजलौं- “बड़ नीक काज करै छी।” ई कहैत एकबेर पुन: हुनका हृदयसँ धन्यवाद दैत आर.एस. पब्लिक स्कूल नवटोलीक लेल विदा भऽ गेलौं। बुढ़क दुख दोसर साँझ, करीब सात बजैत। रघु काका मालऽ घरक मचानपर पड़ल छला। हुनकर मन खराप छेलैन। पेटमे मीठ-मीठ दरद करैत रहैन। तखने हुनकर बेटा जीवन आ पुतोहु बेलहीवाली भैंस दुअैले एली। जीवन भैंसक पर्ड़ूकेँ खोललक। पर्ड़ू भैंसक थन तर गेल मुदा भैंस पर्ड़ूकेँ पिअ नै देलकै। भैंस खटपटाए गेलइ। जीवन बाजल- “मर्र!भैंसकेँ की भऽ गेलै। खटपटाए किए गेल। भोरमे तँ केहेन बढ़ियाँ लागल रहए। भरिसक भरि पोख खेनाइ नइ भेलै तँए नहि तँ खटपटाए गेल।” तैपर पत्नी बेलहीवाली बजली- “सएह बात छिऐ। आन दिन बुढ़बा भोरो आ बेरूओ पहर डगर-बाटपर भैंस चरा आनै छेलइ। आइ बुढ़बा भरि दिन ओछाइने धेने छइ। किछ खेबो-पीबो नै केलक हेन। जलखै खाइले कहलिऐ तँ कहलक जे पेट फुलौने अछि, नइ खाएब।” जीवन बाजल- “खाइ-पीबैक कोनो ठेकाने ने रहै छैन तँ पेट फुलौतैन ने। रातिमे खीर-पुरी बेसी खा नेने हेथिन। चाह भोर-साँझ हेबाके चाही। जलखैमे रोटीक संग दूध सेहो चाहबे करी आ भैंस चरबै बेरमे मन खराप भऽ जाइ छैन।” बेटाक बात रघुकाका सुनलैथ। हुनका असीम कष्ट भेलैन मुदा बजला किछु ने। रघु कक्काक उमेर लगधक बहत्तैर-तिहत्तैर बर्ख छैन। गठिया-वातक शिकाइत रहै छैन। मुदा बेटा-पुतोहुक डरे भोर आ बेरूपहर डगर-बाटपर भैंस चरा अनै छैथ। रातिमे घड़ी पबैन छेलइ। पुतोहु- बेलहीवालीसँ रघु काका कहलखिन- “कनियाँ, हमरा-ले दूटा गहुमक सोहारिये बना दइतौं तँ नीक होइतए। पुरी खेलासँ गैस बनि जाएत। भऽ सकैए पेटो खराप भऽ जाए।” तैपर पुतोहु कहने छेलैन- “हम असगरे की-की करब। पाबैनक ओरियानमेखीर, पुरी, हलुआ बनाएब आकि हिनका-ले गहुमक सोहारी बनाएब..! यएह कहौथ हमरा एत्ते पलखैत भेटत? पाबैनक दिन छिऐ, दूटा पुरिये आ कनी खीरे खा लिहैथ।” रघु काका की करितैथ। पुतोहुक आग्रहपर दूटा दलिपुरी आ कनी खीर खा लेलैथ। कनेक हलुआ सेहो खा लेलखिन। अदहे रातिसँ रघु कक्कक पेटमे मीठ-मीठ दरद करए लगलैन। भोर हैत-हैत (हइत-हइत) मन बेकार भऽ गेलैन। पेटमे गैस भरि गेलैन। तँए भरि दिन किछु नहि खेलैथ। रघु काका सोचए लगला। केतेक फिरीशानीसँ जीवनकेँ बी.एस-सी. पास करेलौं। मालिक बाबाक हरवाही कऽ आ भैंसक दूध बेच-बेच ओकर पढ़ाइक खर्च जुमेलौं। जखन किसान सलाहकारक नौकरीक लेल पच्चास हजार टका मांगलक तँ दूटा जमक गाछ आ एकटा आमक गाछ बेच कऽ ढौआ देलिऐ। तखन जा कऽ ओकर बहाली किसान सलाहकारक पदपर भेलइ। सप्ताहमे दू नै तँ तीन दिन काजपर जाइए, नइ तँ भरि-भरि दिन चौकपर संगी-तुरयाक संग ताश खेलाइत रहैए। आइ नौकरी कऽ दूटा पाइ कमबैए तँ कहाँसँ बापकेँ बैसा कऽ खुअबिताए तँ उन्टे अन्ट-सन्ट बजैए। हमहीं की कोनो बैसले खाइ छिऐ। गठिया-वातक शिकाइत अछि। नेंगराए-नेगराए चलै छी तहू दशापर भैंस चरा कऽ आनि दइ छिऐ। आइ कनी मन खराप भऽ गेल आ भैंस चरबए नै गेलौं तँ बेटाक बात केहेन भेल। कहैत अछि ‘भोर-साँझ चाह पीबैत अछि..!’ कोनो कि हमरे लेल चाह बनैत अछि। अपना सभ लेल बनाबैत अछि तँ एक घोंट हमरो दऽ जाइत अछि। जलखैमे मन भेल तँ कहियो एक करौछ दूध दइए आ नहि मन भेलै तँ नहियेँ दइए। राति-के कहियो दूध देबे नइ करैए। विरधा पिलसिन जे उठा कऽ अनै छी तइमे सँ कहियो एक्को साए टका हमरा लग नहि रहए दइए। तमाकुल जे खाइ छी तहूपर आफत। लोक सभसँ मांगि कऽ खाइ छी। कएक गोरे तँ कहियो दइए जे ‘बुढ़बा विरधा पिलसिन जे भेटै छह तइमे सँ किए ने तमाकुल कीनै छहक।’ कोनो बेजाए तँ नहियेँ कहैए। रघु काकाकेँ नअ-दस बर्ख पहिलुका गप मोन पड़ि गेलैन। रघु काका गुड़की हाट बनगामा जाइत रहैथ1 नवटोली गामक पच्छिम सड़कक कातमे जुगुत मररकेँ बकरी चरबैत देखलखिन। जुगुत मररक घर नवटोलीए गाममे। हुनकासँ रघु काकाकेँ नीक चिन्ह-पहचीन। जवानीमे जुगुत मररक नीक चला-चलती रहैन। महींसक पैकारी करै छला। महींस कीनि-कीनि कहियो धरान तँ कहियो सुपौल लऽ जा कऽ बेचै छला। अपनो खुट्टापर एकटा लगहैर भैंस रहै छेलैन। आइ बकरी चरबै छैथ। जुगुत लालकेँ बकरी चलबैत देखिते रघु काकाकेँ छगुन्ता भेलैन। रघु काका जुगुत मररसँ पुछलखिन- “मर्र!मरर अपनेसँ बकरी चरबै छी। अहाँ तँ पहिने महींसक पैकारी करै छेलौं आ अपनो महींस पोसै छेलौं। आब बकरी चरबै छी। लोक की कहत?” तैपर जुगुत मरर बाजल छला- “हौ बौआ, बकरी जे नै चरा कऽ लऽ जेबैन तँ खेनाइयोपर आफत भऽ जाएत।” रघु काका पुछलखिन- “से किए कहै छिऐ मरर। भगवान अहाँकेँ कोन चीजक कमी देने छैथ।” जुगुत मरर बजला- “हौ बौआ, से तँ ठीके कहलह। कोनो चीजक कमी नै अछि। छोटका बेटा संजीत परिवार लऽ कऽ दिल्लीए मे रहैत अछि। सुनै छिऐ नीक घरो बनौने अछि। केतेको बेर हमरा अबैले कहैत अछि मुदा हमरा शहर-बजार पसिन नै अछि। तँए नै जाइ छी। जेठका बेटा रंगीत मासटर छी। तहूमे आजी-गुजी मास्टर नहि।” रघु काका बजला- “मरर, की कहलिऐ।आजी-गुजी मास्टर नहि’, हम बुझबे ने केलौं।” जुगुत मरर बजला- “हौ एकटा मासटर भेल शिक्षा मितर, दोसर भेल पंचायत शिक्षक आ तेसर भेल पूरा दरमाहाबला मासटर।हमर रंजीत पूरा दरमाहा बला माटर छी। किदैन तँ कहै छै पै-स्केलबला मासटर। सुनै छिऐ शिक्षा मितर आ पंचायत शिक्षकबला जे मासटर सभ अछि ओकरा सभकेँ दरमहो कम भेटै छै। आर एकटा बात सुनै छिऐ। ई जे शिक्षा मितर आ पंचायत शिक्षकबला मासटर सभ अछि ओकरा सभकेँ तँ दू कानसँ बीस कान धरि खाँतो ने अबै छइ।” रघु काका बजला- “छोड़ू ओइ मास्टर सभकेँ, अहाँ कहू जखन बेटा नीक दरमाहाबला मास्टर यऽ तखन ई बकरी किए चरबाबैए?” जुगुत मरर बजला- “हौ बौआ, ओइ मसटरबाकेँ कोन धरानी पढ़ेलौं से की कहबह। भैंसक पैकारी आ दूध बेच कऽ जे दूटा पाइ आमदनी हुअए से ओकरा पढ़ाइमे खर्च करी। कहुना कऽ सकण्ड डिवीजनसँ मैट्रिक पास केलक। निर्मली कौलेजमे नाओं लिखौलक। आइ.ए. सेहो पास केलक।” रघु काका बजला- “बड़ बढ़ियाँ, कहुना पाइक बेरबादी तँ नै केलक। पढ़ाइ कऽ खर्चा देलिऐ तँ आइ.ए. तँ पास कऽ गेल।” जुगुत मरर बजला- “हँ से तँ केलक। आगाँ सुनहक ने।” रघु काका बजला- “अच्छा, बजियौ।” जुगुत मरर बजला- “ओकर बिआहो कऽ देलिऐ। धनीकलालक बेटा मासटरी ट्रेनिंग बास्ते राँची जाइ छेलै। जखन रंजीतकेँ पता चललै तँ ओ हमरा कहलक, बाबू, धनीक लाल कक्काक बेटा अजीत मासटरी ट्रेनिंग करए राँची जा रहल अछि, हमहूँ जाएब। तैपर हम पुछिलऐ- केना की खरच-बरच हेतह।” रंजीत कहलक- “पच्चीस हजार टका डूनेशन आ तैपरसँ महिने-महिने दू हजार टका दू साल धरि।” हम सभटा खर्च जोड़लौं तँ लगधक एक लाख टका बुझाएल। टोटका बेटा अठमामे पढ़ैत रहए। रंजीतक कनियाँकेँ किछु जेबर रहए। हम रंजीतसँ कहलिऐ- कनियाँक जेबर बेच कऽ पच्चीस हजारक इंजाम कऽ लएह। मुदा कनियाँ अपन जेबर नै देलकै। एम्हर रंजीत जिद्द कऽ देलक। खेनाइ तियागि देलक। की करितौं हारि कऽ रंजीतक माइक छक आ हौंसुली बेच ओकरा देलिऐ तखन जा कऽ ओ राँची ट्रेनिंग कौलेजमे नाओं लिखौलक। दूध बेच आ भैंसक पैकारीक आमदसँ जखन ओकर खर्चा नै पुगल तँ दू कट्ठा जमीन बेच कऽ ढौआ देलिऐ। भैस सेहो बिका गेल। रंजीत कहने रहए- बाबूजी, पाइ कमाएबए लगब तँ जेहेन महिींस कहबै तेहेन कीन देब। मुदा आइ लगधक बीस बर्खसँ नौकरी करैए, कताक बेर कहलिऐ- हौ एकटा भैंस कीन दएह,दूध-दही खाइले जी ऐंठैत रहैए। मुदा तइ गपपर कहियो धियान नै देलक। अपने दुनू परानी आ धिया-पुता उठौना लऽ कऽ दूध खाइए मुदा हमरा एक कप चाहोपर आफत अछि।” ई कहैत जुगुत मररकेँ आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलैन। रघु काका सोचए लगला- सभ बुढ़क तँ यएह हाल छै..! हुनको आँखि डबडबाए गेलैन। प्रायश्चित बससँ दरभंगा जाइ छेलौं।हम नरहिया बजारमे बसपर चढ़ल छेलौं। बस फारबिसगंजसँ अबैत रहएतँए बसमे बेसी भीड़ छेलइ। फुलपरास तक ठाढ़े गेलौं। फुलपरासमे किदु पैसेन्जर सभ उतरला तँ हमरा एकटा सीट भेटल आ हम बैस गेलौं। बस खोपा चौकपर रूकल तँ एकटा लगधक उनहत्तैर-सत्तैर बर्खक महिला यात्री बसमे चढ़ली। हुनका संगमे एकटा दस-बारह बर्खक लड़की सेहो छेली। महिलाक कपड़ा-लत्तासँ बुझाएल जे ओ गरीब घरक छैथ। संगमे जे बुच्ची छेली ओहो साधारणे कपड़ा पहिरने छेली। महिला दुबर-पातर बड़ कमजोर छेली। पएरमे चप्पल नै रहैन। ओ महिला बस जगह खोजए लगली। मुदा बसमे केतौ एक्कोटा सीट खाली नै छेलइ। सत पुछू तँ ठाढ़ो होइमे महिलाकेँ दिक्कते छेलैन। ओ हमरा सीटक बगलमे आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेली। हुनक उमेर आ कमजोर शरीर देख हमरा दया आबि गेल। हम ठाढ़ भऽ गेलौं आ ओइ महिला आ हुनका संगमे जे बुच्ची छेली; बैसा देलिऐन। कनीकालमे बस कंडक्टर आएल आ ओइ बुढ़ीसँ पुछलक- “केतए जेमे बुढ़िया?” हमरा कंडक्टरक बोली बिसाइन जकाँ लागल, मुदा हम बजलौं किछु ने। बुढ़ी बजली- “झंझारपुर जाएब बाबू।” “ला भाड़ा ला।” –कंडक्टर बाजल। बुढ़ी एकटा बीस रूपैआबला नोट कंडक्टर दिस बढ़ौलक। कंडक्टर रूपैआ लैत बाजल- “दस टका और ला।” तैपर बुढ़ी बजली- “आब पाइ नै अछि बाबू।” कंडक्टर तमसाइत बाजल- “पाइ नै छौ तँ बसमे चढ़लीही किए। बस रूकतै तँ उतैर जइहेँ। ई ले अपन बीस रूपैआ।” तैपर हम कंडक्टरसँ कहलिऐ- “बुढ़ महिला छथिन। देह-दशा देखते छिऐ, गरीब बुझाइ छथिन। की हेतै दस टका नै देती तँ। कथी-ले दस टका खातिर उतारबै।” तैपर ओ कंडक्टर हमरा दिस तकैत बाजल- “की खराँतमे पैसेन्जरकेँ लऽ जाइऐ। अहाँक बड़ ममत लगैए तँ अहीं दऽ ने दियौ भाड़ा।” हम जेबीसँ एकटा पचसटकही नोट निकालि कंडक्टर दिस बढ़ा देलिऐ। ओ निच्चाँ-सँ-ऊपर हमरा दिस देखलक आ आगाँ बढ़ि गेल। हमरा पैछला एकटा घटना मोन पड़ि गेल। जखन हम बाइस-तैइस बर्खक रहीतही समैयक बात छी। हम पत्नीक संग राजविराजसँ अबैत रही। बस जखन बेलही स्टेण्डपर आबि कऽ रूकल तँ हम सभ नेपाली बससँ उतैर कऽ बोर्डर पार कऽ कुनौली बजार पहुँचलौं। कुनौली बजारक बस ठहरावपर निर्मलीक बस लगल रहए। अदहासँ बेसी सीट खालीए रहै, तँए हम दुनू पत्नी-पत्नी बीचला सीटपर एक्केठाम बैसलौं। बस खुजैमे एक घन्टा समय बाँकी रहइ। अदहा घन्टाक बाद विराटनगरसँ राजविराज जाइबला बस बोर्डरक ओइ पार बेलही (नेपाल) बस ठहरावपर आबि कऽ रूकल। ओइ बससँ तीस-पैंतीसटा पैसेन्जर उतैर कऽ बोर्डर पार कऽ कुनौली बस ठरावपर पहुँचल। ठहरावपर स्टैन्ड किरानीसँ टिकट लऽ-लऽ बसमे चढ़ए लगल। देखते-देखते पूरा बस पैसेन्जरसँ भरि गेल। बस खुजैसँ पाँच-सात मिनट पहिने एकटा महिला अपन मोटा-झोराक संग बसपर चए़ली। हुनकर उमेर लगधक चौंसैठ-पौंसैठ बर्ख रहल हेतैन। ओ साधारणे कपड़ा पहिरने छेली। ओ हमरा सीटक बगलमे आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेली आ बसमे जगह हियाबए लगली। मुदा बसमे आब एक्कोटा सीट खाली नै रहए। महिलो सीटपर महिले सीट बैसल छेली। केतौ जगह नै देख ओ हमरा दिस तकैत कहली- “बौआ कनेक हमरो बैसऽ दिअ।” ई कहि ओ हरा लग बैसऽ लगली। हम ओइ महिलाकेँ डपैट देलिऐ। महिला कातर भावसँ चारू दिस देखैत ठाढ़ भऽ गेली। हमरा बगलमे एकटा सज्जन बैसल रहैथ ओ ठाढ़ भऽ गेला आ ओइ महिलाकेँ बैसा देलखिन। जखन ओ महिला बैस गेली तखन हम हुनका चेहरा दिस तकलिऐ तँ हुनकर चेहरा हमरा जान-पहचानल लगल। हम अपना दिमागपर जोर देलिऐ तँ हमरा स्मरण भऽ गेल। ओ महिला नरहिया बजारक बैजनाथ भगतक माएछेली। हम आ बैजनाथ भगत संगे नरहिया हाइस्कूलमे अठमासँ मैट्रिक धरि पढ़लौं। बैजनाथक घर सड़कक कातेमे अछि तँए हुनका माएकेँ सेहो चिन्है छेलिऐ। पाँच-सात बर्ख बैजनाथक माएकेँ देखना भऽ गेल रहए तँए जल्दी नइ चिन्ह सकलौं। हमरा अफसोस भेल जे बैसऽ नै देलिऐ तँ नै देलिऐ मुदा डँटलिऐ किए। हम महिलासँ पुछलिऐ- “अहाँ घर नरहिया बजा भेल?” ओ महिला बजली- “हँ।” हम फेर पुछलिऐ- “अहाँ बैजनाथक माए छिऐ?” ओ महिला बजली- “हँ, बैजनाथ हमर जेठका बेटा छी। मुदा अहाँ बैजनाथकेँ केना चिन्है छिऐ?अहाँक घर कोन गाम भेल?” हम कहलयैन- “हमर घर भपटियाही अछि। हम बा बैजनाथ संगे-संग पढ़ने छी।” बगलमे बैसल एकटा बुर्जुग बजला- “चिन्है छेलिऐन तखनो बैसए नै देलिऐन।” हम सोल्हन्नी चुप रहि गेलौं। पत्नीक फरमाइस निर्मली बजारसँ घर पहुँचले रही कि पत्नी प्रश्न दागली- “पनीर अनलिऐ की नहि?” हम कहलिऐ- “एहनो कहीं नै अनिऐ, हमरा कि कोनो भूखले सुतबाक अछि जे अहाँक आदेशक पालन नै करब।” पत्नी फेरो पुछली- “आ ब्रेड पकौड़ा?” हम कहलयैन- “जी मेम साहैब, ओहो अनलौं हेन। हमरा कि दलानक अखरे चौकीपर सुतबाक अछि आ भरि राति तौनीसँ मच्छर हौंकैत परात करबाक अछि जे अहाँक फरमाइस पूरा नै करब।” बरबैरेपर छी हम आ अनिल दुनू गोरे बनगामा हाइस्कूलसँ निर्मली कौलेजमे बी.ए. धरि संगे पढ़लौं। हमर घर भपटियाही सखुआ जखन कि अनिलक घर सखुआ महदेवा। जहिना हम बी.ए. पास केला पछाइत घोड़ा घास छीलै छी तेनाहिये अनिलो भैंसवार बनल अछि। एक दिन भूतहा हाटपर अनिल भेँट भेला तँ हम कहलयैन- “मीत गामेमे रहै छी मुदा कहियो भेँटो करए कहाँ अबै छी?” तैपर अनिल बजला- “आ अहाँ तँ हमरा ओइठाम सभ दिन जाइ छी किने।” हम सोचए लगलौं, अनिल ठीक्के कहलैथ। हमहूँ तँ गामेमे रहै छी मुदा हमहीं कहाँ कहियो अनिलसँ भेँट करए हुनका ओइठाम गेलौं..! सोचैत गुनधुनमे पड़ि गेलौं, बजैले जेना किछु रहिए ने गेल। मुदा ऐठाम चुपो रहबसँ सम्बन्ध प्रभाविते होइत। बजलौं- “चलू मीत बरबैरेपर छी।” अदरश विआह काल्हि मरर कक्काक पोतीक कथकिया आएल छेलखिन। कथकिया सबहक स्वागतमे हमरो रहबाक छल मुदा काल्हि हमरा मधुबनी कोर्टमे एकटा कुटुमक जमानतमे जाए पड़ल, तँए हम मरर काका ओइठाम नै जाए पेलौं। कथकियाकेँ लड़की पसिन भेलैन कि नै भेलैन आ जँ पसिन भेलैन तँ आगाँ की बात-विचार भेलै ऐ बातक भाँज अखन धरि नै लागल छल तँए मरर काका ओइठाम जेबाक लेल मन कछमछ करैत रहए। चारिये बजे भोरहरबामे नीन टुटि गेल मुदा ओछाइन छोड़लौं साढ़े चारि बजे। भैंसकेँ मालऽ घरसँ निकालि बाहरक नादिपर बान्हि खाइले दऽ पोखैर दिस विदा भऽ गेलौं। दतमैन करैत गाममपर एलौं। कलपर कुर्रा-आचमन कऽ सोचलौं जे अखने मरर काका ओतए विदा भऽ जाइ। फेर सोचलौं पत्नीकेँ तँ जनतब दऽ दिऐ। जनतब की दिऐन हुनकासँ आदेश लऽ ली। छह मास पहिनुका गप मोन पड़ि गेल। निर्मलीमे विमला थियेटर आएल रहए। संगी-तुरियाक संगे हो-हामे बिना पत्नीकेँ कहने थियेटर देखऽ चलि गेलौं। दू बजे रातिमे थियेटर देखकऽ आपस गामपर एलौं। भूखो लगल रहए। आँगन गेलौं। पत्नीकेँ केतबो हाक देलिऐन आ केबाड़ो पीटलिऐ मुदा पत्नीक कुम्भकरणी नीन नै टुटलैन। आकि जाइने कऽ नै उठली ओ तँ पत्नीए जानती। हारि कऽ दलानक चौकीपर ओछाएल अखरे गोनैरपर सुतलौं। सुतब की कपार भरि राति तौनीसँ मच्छर हौंकैत परात केलौं। बिहान भने जखन मुँह-हाथ धोइ कऽ आँगन गेलौं तँ पत्नी वर्तन-बासन माजि कऽ आएल छेली। हम पत्नीक मूड ऑफ देख खुशामद करैत अपना बोलीमे पाँच किलो चीनी घोरैत कहलयैन- “की यै मेम साहब, चाहो-ताहोक जोगार अछि?रातिमे तँ भुखले रखलौं, अखनो कम-सँ-कम एक कप चाहो तँ पियाउ।” तैपर हमरा दिस देखैत पत्नी बजली- “आ छौरी सबहक जे नाच देखलिऐ तइसँ पेट नै भरल?” हम बजलौं- “नाचो देखलासँ कहीं भेट भरलै हेन।” पत्नी बजली- “नाचो की कोनो आजी-गुजी रहए, विमला थियेटरक छौरी सबहक नाच रहए। सुनै छिऐ जे थियेटरमे तँ छौड़ी सभ किदैन-किदैन देखबै छै जइसँ छौड़ा सबहक भूख-पियास सभ जेरा जाइ छै। आ अहाँ कहै छी हम भुखले रहलौं। की सभ देखौलक छौड़ी सभ। भरि मन भेल कि नहि। जँ भरि मन नै भेल हुअए तँ आइयो चलि जाएब।” यौ बाबू हम की बजितौं। चुप्पे रहैमे अपन भलाइ बुझि आँगनसँ निकैल गेलौं। तइ दिनसँ बिना पत्नीक आदेशे केतौ ने जाइ छी। आँगन गेलौं तँ पत्नीकेँ चुल्हा नीपैत देखलयैन। हमरा देखते बजली- “मर! मरर काका ओतए नै गेलिऐ। जा कऽ पता करियौ ग ने जे कथकियाकेँ लड़की पसिन भेलैन आकि नहि। जँ पसिन भेलै तँ आगाँ की बात-विचार भेलइ।” हम कहलयैन- “ओतइ विदा भेलौं हेन। सएह कहैले आएल छेलौं।” तैपर पत्नी पुछली- “चाह बना दिअ की?” हम मने-मन सोचलौं- की आइ दिनकर भगवान पच्छिममे तँ नै उगलखिन हेन। आगाँ सोचलौं जे पत्नी चाहो पियौती तँ पोडरक आकि नेबोबला पियौती मुदा मरर काका ओतए तँ भैंसिक दुधक गढ़गर चाह पीब...। कहलयैन- “छोड़ू चाह-ताह। कथीले फिरिशान हएब। हमरो मनमे छटपटी लगल अछि जे कखनी मरर काका ओतए पहुँची। जाए दिअ।” पत्नी बजली- “बड़बढ़ियाँ..!” हम मरर काका ओतए विदा भऽ गेलौं। हमर बाबूजी आ मरर काका लंगोटिया संगी। दुनूक घर दू टोलमे मुदा जवानीमे दुनू गोरे भरि-भरि दिन संगे महींस चरबै छला। पैछला साल फागुनमे हमर बाबूजी दिवंगत भऽ गेला आ मरर काका अखनो जीविते छैथ। मरर काका छोट खुट्टीक, कुहेलगर शरीर। उमेर लगधक 82-83 बर्ख छैन्हे। कहाबत अछि- लोहामे टाटा, जूतामे बाटा आ मनुखमे नाटा,बेसी दिन टिकैत अछि। मररो काका नाटा जवान तँए अखनो खूब थेहगर छैथ। जवानीमे पहलमानी करै छला। महींसिक थने-तरसँ तीन-चारि सेर दूध पीब जाइ छला। आठ-नअटा महींसो पोसै छला आ भरि-भरि दिन महींसे चरबैत रहै छला। अखनो खुट्टापर दूटा महींस रखने छैथ जइमे एकटा लगहैर छैन। ओना, मरर काका पढ़ल-लिखलक नाओंपर सोलह दूना आठ छैथ। बेटा-पोता नोकरी करै छैन। दूटा बेटा परिवार लऽ कऽ दिल्लीएमे रहै छैन। एकटा बेटा विमलजी संस्कृत विद्यालयमे शिक्षक आ दूटा पोता पंचायत शिक्षक छथिन। मरर काका दलानक चौकीपर बैस चाह पीबै छला। हम सड़केपरसँ कहलयैन- “काका, गोड़ लगै छी।” मरर काका बजला- “नीके रहह। के नन्दु?आबह-आबह। कहह कुटुम सबहक जमानत भऽ गेलैन किने?” हम कहलयैन- “हँ कका, अहाँ सबहक आर्शीवादसँ कहुना जमानत भऽ गेलैन कुटुम सबहक। ओना, मोकदमा बड़ उकड़ू छेलइ।” मरर काका बजला- “बैसह पहिने चाह पीबह। पछाइत गप-सप्प हेतइ।” कहैत मरर काका अपन पोतीकेँ हाक देलखिन- “विभा!विभा!! नन्दु काका-ले चाह नेने अबहुन।” तैबीच हम मरर काकासँ पुछलयैन- “काका, काल्हि जे कथकिया आएल रहैथ तिनका सभकेँ विभा पसिन भेलैन किने?” मरर काका बजला- “हँ हौ लड़की तँ पसिन भेलै मुदा..।” ताबेमे विभा एकटा ट्रेमे एक कप चाह, एकटा प्लेटमे चारिटा नमकीन विस्कुट आ एक गिलास ठंढाएल पानि नेने एली आ ट्रे चौकीपर रखि हमरा गोड़ लागि ठाढ़ भेली। हम आर्शीवाद दैत कहलिऐ- “नीक्के रहह। परीक्षाक डेट निकललऽ?” विभा बाजल- “हँ काका, पाँच जुलाईसँ परीक्षा छी।” मरर काका बजला- “हुअ, पहिने चाह पीबह। सराए जेतए।” बिस्कुट खा पानि पीब हम चाह पीबए लगलौं। तखने विभा पान नेने आएल। पान खा मरर काकासँ पुछलयैन- “हँ काका, जखन लड़की पसिन भऽ गेलै तखन आगाँ की बात-विचार भेल?” मरर काका हमरा पुछला- “बौआ, एकटा बात कहअ, अदरश विआह केकरा कहै छै?” अदरशविआह! हम किछ बुझबे ने केलौं। केतबो दिमागपर जोर दिऐ मुदा समझमे नै आबए। हमरा असमंजसमे देख विभा बजली- “काका, अदरश बिआह नइ बुझलिऐ। बाबा आदर्श बिआहकेँ अदरश विआह बजलखिन हेन।” हम मरर काकासँ कहलयैन- “काका जइ विआहमे दहेजक लेन-देन नै होइत अछि ओइ बिआहकेँ आदर्श बिआह कहल जाइत अछि।” मरर काका बजला- “कथकियामे जे लड़काक माम रहैथ ओ बजला- लड़की हमरा सभकेँ सोलहअनासँ बत्तीसअना पसिन अछि। लड़की सुन्नैर आ सुशील छैथ।” बिच्चेमे हमरा मुहसँ निकैल गेल- “से तँ विभा अछिए” मरर काका बजला- “आगाँ सुनहक ने।” कहलयैन- “कहियौ।” काका बजला- “हमर बेटा विमल पुछलकैन तखन आगाँ?” तैपर लड़काक बाप बजला- “बिआह अदरशे हएत मुदा हमरा जे लड़काकेँ इंजीनियर बनबए-मे 15 लाख टका खर्च भेल से आ कनियाँक जेबरमे एगारह भरि गोलड दऽ दियौ। लड़का अहाँक भेल। अतिरिक्त हमरा किछ नै चाही। हौ हमरा तँ विभा कहलक जे गोलड माने सोना होइ छै।” तैपर हम कहलयैन- “तखन ई कोन आदर्श बिआह भेल। बेटा जे पाइ कमेतैन से कि कोनो हमरा सभकेँ देता आकि बापेकेँ देथिन।” मरर काका बजला- “सएह तँ..! कहह ई कोन अदरश बिआह भेल।” बीहनि कथा- हमरे पार्टीक लोक एक दिन डॉ. दिलीप बाबूकेँ डेरापर बैसल रही।बालाकोट ऑपरेशनपर गप-सप्प करैत रही। तखने उदयजीक छोट भाए- विनीत जे एम.ए. पास छैथ एला। डॉ. दिपीप बाबू विनीतसँ पुछलकैन- “की विनीत केमहर-केमहर। कोनो खास बात छै की?” तैपर विनीत कहलकैन- “खासे बुझू। हमरा कनियाँकेँ खेनाइ नीक नै लगै छइ। खाइक क्षुधे ने जगै छइ।” तैपर डॉक्टर दिपीप बाबू एकटा कागजपर किछु दवाइ लिख देलखिन आ कागज विनीतकेँ दैत कहलखिन- “हम दवाइ लिख देलौं हेन। ई दवाइ सभ आनि कऽ दियौन। सभ ठीक भऽ जेतइ।” विनीत दवाइबला पुरजी लऽ चल गेला। हम डॉक्टर साहैबसँ पुछलयैन- “विनीत तँ मैथिलीसँ एम.ए. केने छैथ। की करै छथिन अखन ओ?” तैपर डॉक्टर साहैबक पत्नी बजली- “की करता..! कनियाँक नुआँ-विस्तर खीचै छैथ।” तैपर हम कहलयैन- “तब तँ विनीत हमरे पार्टीक लोक भेला।” हमर बात सुनि डॉक्टर साहैब आ हुनकर पत्नी ठाहाका मारि हँसए लगला। बीहनि कथा- एमेली साहैब बेरुका उखड़ाहा। समय लगधक दू-अढ़ाइ बजैत। थोलबा काकाकेँ दुखनी काकी कहलकैन- “अँइहै!बिरधापिलसीन केतेक दिनसँ नै भेटल गऽ। रानीगढ़ी परतीपर जे हाकिम सभ आएल छल गऽ आ ओकरा जे कागत-पत्तर देने रहिऐ तेकरो तीन माससँ ऊपरे भेल गऽ। जा कऽ मुखियाजी सँ पूछौ गऽ ने जे कहिया भेटतै बिरधा पिलसीन।” तैपर थोलबा काका बजला- “अच्छा! हम अखने जाइ छी मुखियाजी लग, पुछै छिऐन कहिया भेटत। मुखियोजी कि कोनो दूरमे छैथ, गामेक तँ छथिन मुखियाजी।” थोलबा कक्काक उमेर लगधक 75-76 बर्ख। तनाहिये दुखनी काकीक उमेर 70-71 बर्ख हएत। दुनू गोरेकेँ वृद्धावस्था पेंशन भेटैत छैन। छ: माससँ वृद्धावस्था पेंशनक भुगतान नै भेल हेन। सरकारी स्तरपर कागज-पत्तरक जाँचक लेल रानीगढ़ी परती- मझौराक पंचायत भवनपर शिविर लागल छल जइमे लाभुक सभसँ आधर कार्ड आ पासबुकक छाया प्रति मांगल गेल रहए। थोलबा काका आ दुखनी काकी दुनू परानी अपन-अपन आधार कार्ड आ बैंक-पासबुकक छायाप्रति शिविरमे पंचायत सचिवकेँ देने रहथिन। कागज-पत्तर देला चारि माससँ बेसी भऽ गेल मुदा अखन धरि पेंशनक भुगतान नै भेलैन। थोलबा काका पढ़ल-लिखलक नाओंपर सोलह दूना आठ। एकदम भोला-भला। छह-पाँच किछ ने बुझैत सुधंग लोक। हुनका घरसँ दसे घरक बाद मुखियाजीक घर। थोलबा काका मुखियाजीक दरबज्जा लग पहुँचला तँ दरबज्जाक आगाँ एकटा चरिचकिया गाड़ी लागल देखलखिन। दलानक भीतर किछु गोरेक बाजब सेहो सुनलखिन। ओ थकमका गेला। तखने मुखियाजीक बेटा अमित एकटा ट्रेमे पान-सुपारी, इलायची, जर्दा-पत्ती लऽ कऽ आँगनसँ निकलल। थोलबा काकाकेँ ठाढ़ देख बाजल- “मर्र!काका ठाढ़ किए छी। दलानपर चलू ने।” तैपर थोलबा काका बजला- “हौ बौआ, एहेन अगए-बगए लऽ कऽ दलानपर केना जाएब। चरिचकिया गाड़ी देखै छिऐ। केतए-कऽ पाहुनसभ छथुन?” अमित बाजल- “काका पहुन नै छैथ। विधायकजी छथिन।” थोलबा काका बजला- “विधायकजी?नै बुझलियह।” अमित कहलकैन- “विधायकजी नै बुझलिऐ,यौ एम.एल.ए. साहैब।” थोलबा काका- “अच्छा, एमेली साहैब!एमेली साहैब छथुन। हौ बौआ कहअ तँ भोँटक समय आबि गेल, कहिया छी भोँट?” अमित बाजल- “नै काका!अखन भोँटक समय नै आएल हेन।” थोलबा काका मने-मन सेाचए लगला। जखन भोँटक समय नै आएल अछि तखन एमेली साहैब केतए एला हेन? बजला- “अच्छा बौआ, अखन जाइ छिअ, पछाइत आएब।” ई कहैत थोलबा काका घरमुहाँभेला आ अमित पानक ट्रे लऽ दलानक भीतर गेल। बीहनि कथा- स्वाभिमान डॉ. पंकजक बेटाक बिआहक काल्हि बहुभोज छल। आइ भोरेसँ सर-कुटुम आ धी-स्वासीन सभ अपन-अपन गामक बाट पकड़लैन। कनियाँक संगे जे लोकनियाँ सभ आएल रहैथ ओहो सभ अपन-अपन फटफटियापर चढ़ि गाम जाइ गेला। दिनक चारि बजे-बेरुका पहर। डॉ. पंकज अपन पत्नी- अलकासँ कहलखिन- “कनी नीक कॉफी पिआउ। बड़ थकान बुझाइत अछि।” कनियेँ कालक बाद अलका दू कप कॉफी नेने पति लग एली। एकटा कप पतिक हाथमे देली आ दोसर कप अपने हाथमे लेली। दुनू पति-पत्नी बैस कऽ कॉफी पीबए लगली। कॉफी पीबैत डॉ. पंकज बजला- “सभ सर-कुटुम तँ एला मुदा वीणा दैया आ ओकर दुल्हा नै एला। कहू तँ हमरा बेटाक बिआह फेरसँ हएत..!” तैपर पत्नी अलका कहलकैन- “वीणा दैयाक बेटीक बिआहमे अहाँ आकि हमहीं गेल रहिऐ जे ओ सभ अबितए।” डॉ. पंकज बजला- “हमरा समय नै भेटल तँए नै गेलौं मुदा नौत पुराइ एगारह साए टका तँ पठाइये देने रहिऐ।” तैपर पत्नी अलका कहलकैन- “ओहो सभ अहाँक बेटाक बिआहमे बाइस साए टका पठा देलखुन हेन। की बुझै छिऐ ओ सभ गरीब अछि तँ दौड़ले औत। यौ सभकेँ अपन स्वाभिमान छइ।” तैपर डॉ. पंकज किछु ने बजला, मुदा हुनका मनमे भेलैन जे भगिनीक बिआहमे नै गेलौं से हमरा सन नीक नै भेल। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ नरक विजय एहि नाटकक एक संस्करण हमर पोथी ‘त्रिनाटकम्’ मे छपि गेल अछि। ओहि मे दृश्यक संख्या बहुत बेसी रहला सँ किछु निर्देशक लोकनि एकर मंचन पर प्रश्न चिन्ह लगौलनि। ओहि आलोचना कें ध्यान मे रखैत एकरा परिवर्धित कएल गेल। एकर बंगला अनुवाद श्री नवीन चौधरी केलनि अछि। - योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ पात्र परिचय मानव पात्र — रमेश, सुरेश, अनुपम अमित (वैज्ञानिक) पौराणिक पात्र — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद, यमराज, चित्रगुप्त, दू यमदूत अंक 1 दृश्य 1 पर्दा उठबा सँ पहिने नेपथ्य मे घोषणा होइत अछि -- आजुक टटका खबरि सुनू। दुर्दान्त बाहुबली रमेश आ सुरेश अपन शीर्ष राजनीतिक संरक्षक लोकनि कें जलसा मे बजाए बड़ी राति तक नाच गान भेलाक बाद बेहोसीक अवस्था मे पाँच गोटेक दनादन हत्या कऽ देलनि। तकर बाद कृत्रिम बुद्धि आ साइबोर्गक क्षेत्र मे अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक अनुपम अमितक अपहरण सेहो केलनि। पर्दा उठैत अछि। बीच मे उपर टाँगल अछि एकटा डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड, जे एखन स्विच-ऑफ अछि। मंच पर एक कोन मे टेबुल पर कम्प्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक यंत्र, किछु Do-It-Yourself (DIY) किट, किछु तार, सोल्जरिंग आयरन, अन्य उपकरण आदि अस्त व्यस्त दशा मे राखल। दोसर कोन मे टेबुल पर अनेको शास्त्र पुराणक मोट मोट पोथी सब सजाओल। मंचक बीच मे कने आगू दिश तीनटा कुर्सी राखल। कुर्सीक सामने छोट टेबुल पर जलक बोतल आ गिलास। बीच बीच मे नेपथ्य मे जंगली जानवर सबके शब्द सुनाइ पड़ैत अछि। वैज्ञानिक अनुपम स्लीपिंग सूट पहिरने छथि। वयस साठिक धक। चेहरा पर ओंघाएल आ थाकल हेबाक भाव। हुनका बन्हने रमेश आ सुरेशक प्रवेश। रमेश आ सुरेश दूनू प्रायः पचास-पचपनक वयस, बेस गठल शरीर, खाकी ड्रेस, मुह गमछा सँ झाँपल, दूनूक हाथ मे पिस्तौल छनि। प्रकाश वैज्ञानिकक चेहरा पर फोकस रहैत अछि आ जेना जेना ओ मंच पर आगू अबैत छथि, तेना तेना हुनका संग चलैत अछि। मंचक बीच पहुँचला पर पूरा मंच प्रकाशित होइत अछि। रमेश हुनकर बन्हन खोलैत छथि। सुरेश हुनका एक गिलास जल पीबै लेल दैत छनि। दूनू अपन मुहक गमछा खोलैत छथि) वैज्ञानिक (जल पीबि, घबराएल) हमरा किएक अपहरण केलहुँ ? सुरेश (कुर्सी दिस इसारा करैत) पहिने आसन ग्रहण कएल जाओ सर। (एक एक कए तीनू गोटे बैसैत छथि, दूनू बाहुबली अपन पिस्तौल टेबुल पर रखैत छथि।) रमेश घबरेबाक कोनो बात नहि सर, अपने आराम सँ बैसियौ। अहाँ सँ ने कोनो फिरौती लेब आ ने कोनो तरहक कष्ट देब। अहाँ तऽ हमरा सबहक पूज्य छी आ देशक गौरव। अहाँक सुरक्षा हमरो सब लेल बहुत जरूरी अछि। किछु गप सप केलाक बाद अहाँ कें एखनहि आपस पहुँचा देब। नेपथ्य मे जंगली जानवर सबके शब्द सुनाइ पड़ैत अछि। वैज्ञानिक अकानैत छथि। वैज्ञानिक हम सब जंगल मे छी की ? सुरेश जी सर, एतए एकान्त मे अहाँ कें लऽ अनलहुँ मात्र अपन प्रोजेक्ट बुझबै लेल। हमरा सबहक प्रसिद्धिए तेहन भऽ गेल अछि जे अहाँक ऑफिस मे जाकए विजिटिंग कार्ड देखा कए गप नहि ने कऽ सकैत छलहुँ। तें अपहरणक नाटक करए पड़ल। वैज्ञानिक (चेहरा पर शांत भाव अनैत) एतए अहाँ सब कें पुलिसक डर नहि अछि ? एतेक पैघ कांड भेला पर पुलिस अहाँ सब कें चारू कात तकिते होएत ने। रमेश चिन्ता नहि सर। पुलिसकें रस्ते देखल नहि छैक आ यदि रस्ता भेटियो जेतैक तऽ आएल नहिए पार लगतै। सुरेश रस्ता पर पैघ गड्ढा बनाओल छैक जे हरदम पानि सँ भरल रहैत छैक। हम सब जखन आबऽ लगैत छी तऽ मोबाइल के रिमोट कन्ट्रोल द्वारा पानि उपछै लेल पम्प चला दैत छिऐक। आबि गेला पर फेर ओहि मे पानि भरि जाइत छैक। बहुत सुरक्षित छैक ई जगह सर। रमेश एकटा बात आर छैक सर जे अपने कें हमरा सबहिक विषय मे आश्वस्त करत। सुरेश पुलिस हमरा सब कें जीवित अवस्था मे कहियो नहि पकड़ि सकत। यदि कोनो असावधानी सँ कहियो घेराइयो जाएब तऽ पुलिस कें मृत शरीरे भेटतैक। वैज्ञानिक ठीक छैक, जल्दी अपन योजना कहल जाओ। रमेश देखियौ सर, एतेक दिनक अपराध यात्रा मे हम सब बहुत पाप केलहुँ। एतेक तरहक पाप जकर वर्णन शास्त्र पुराण मे भेटबो नहि करत। सुरेश हम सब एहि बीच शास्त्र पुराण सबके अध्ययन सेहो केलहुँ, मृत्यु उपरान्त स्वर्ग नरक भोगक जानकारी सेहो लेलहुँ। देखियौ ओ पोथी सब (कोन दिस इंगित करैत छथि) वैज्ञानिक (कने मुस्किआइत) अच्छा ! रमेश आइ हमरा दूनूक आत्मा कें अपूर्व शान्ति भेटि रहल अछि जे ओहि पाँचो पपियाहा दुष्टात्मा सब कें यमलोक पहुँचा देलियैक। एही दुष्ट राजनेता लोकनिक कारण हम सब अपराधक संसार मे घुसिया गेलहुँ। हमरा सबके आपराधिक जीवन एतहि शेष होइत अछि। वैज्ञानिक किन्तु अहाँक अपन कएल पापक दंड तऽ अहीं सब भोगबै। राजनेता सबके हत्या सेहो एहि पापक कड़ी मे जोड़ा गेल ने। सुरेश पापक प्रायश्चित्त करबाक लेल हम दूनू किछु अभिनव तरीका सोचने छी। एहि शरीरें तऽ अपराध छोड़ियो देला पर समाज हमरा दूनू कें स्वीकार नहिए करत। आ फेर कानूनी प्रक्रिया सेहो छैक। रमेश ओही प्रोजेक्टक लेल अपने सँ विमर्श करबाक अछि। सुरेश आब हम सब एक विशेष अभियान पर जाए चाहैत छी। एहि लेल हम सब अपना संग किछु चीज लऽ जाए चाहैत छी जे एतुका वैज्ञानिक आविष्कारक अभिनव नमूना होइक। ओही लेल अहाँक मदति चाही। हमर ई लिस्ट देखि लेल जाओ सर। (एकटा कागतक टुकड़ी हुनका दैत छथि) वैज्ञानिक (लिस्टक अध्ययन करैत) समय आ खर्च दूनू बेस लागत। रमेश ओकर चिन्ता नहि। एकटा आर अनुरोध अछि, एकरा देखियौ सर (दोसर कागत बढ़बैत छथि।) वैज्ञानिक मुदा अहाँ सब बुतें कोना पार लागत ? सुरेश हम फीजिक्स मे एम.एस-सी. छी आ हमर सहयोगी इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर छथि। ई तऽ नियतिक दुश्चक्र जे हम दूनू अपराध जगत मे आबि गेलहुँ। नहि तऽ कोन ठेकान आइ अहींक प्रयोगशाला मे सहायक भेल काज करैत रहितहुँ। रमेश समय निकालि हम सब अहाँक टीम द्वारा कएल जा रहल वैज्ञानिक अनुसंधान आ आविष्कारक जानकारी सेहो लैत रहलहुँ। इलेक्ट्रॉनिक्स आ कम्प्यूटर सम्बन्धी लूरि बिसरी नहि ताहि लेल किछु किछु करैत रहलियैक (टेबुल दिस इंगित करैत छथि) वैज्ञानिक ठीक छैक, हम अहाँ सबहक अभियान मे मदति करबाक सक्क भरि कोशिश करब। आर किछु ? सुरेश नहि, खाली अहाँ सँ फेर कोना सम्पर्क करी से बता दिअऽ। वैज्ञानिक बेस, ई लिअऽ हमर विशेष कोड। (एकटा कागत पर किछु लीखि कए दैत छथि) एहि द्वारा ब्रह्मांडक कोनो जगह सँ स्मार्टफोन सँ एकरा डायल कऽ सकैत छिऐक मुदा ध्यान राखब ई अनका हाथ नहि पड़ैक कारण ई गुप्त कोड छिऐक, एहि पर फोन टैपिंग लागू नहि छैक। अहाँ दूनू हमरा फोटो लेबऽ दिअऽ, जे हम परिचय लेल अपना सिस्टम मे देबैक। परिचय नहि भेटला पर सिस्टम कॉल स्वीकारे नहि करत। रमेश एहि वेशभूषा मे फोटो जुनि लेल जाओ सर। हम दूनू अपन परिचय आ फोटो कालि अपनेक प्रयोगशाला मे पठबा देब। वैज्ञानिक ठीक छैक। फोटो एलाक बादे हम किछु काज आगू बढ़ा सकब। एतेक ध्यान राखू जे हमरा प्रयोगशाला मे एके बेर प्रवेश कऽ सकब आ तकर बाद बाहरी संसार सँ कोनो सम्पर्क नहि रहत। मोबाइल आदि हम रखबा लेब। काज शेष भेलाक बादे बहरा सकब। मंजूर अछि ? दूनू समवेत एकदम मंजूर। वैज्ञानिक दू सप्ताहक समय दिअऽ। सुरेश बेस, आब चलू, अहाँ कें आपस पहुँचा दैत छी। (जाइत काल दूनू गोटे वैज्ञानिक कें पएर छूबि प्रणाम करैत अछि)। (वैज्ञानिक आगू आगू आ रमेश, सुरेश हुनकर पाछू पाछू मंच सँ प्रस्थान, प्रकाश बंद। नेपथ्य मे दू गोटेक स्वर मे घोषणा) एक एखने खबरि आएल अछि जे वैज्ञानिक अनुपम आपस आबि गेलाह। ओ प्रेस वार्ता मे घोषित केलनि जे हुनकर अपहरणक घटना पुलिसक कल्पना छलैक। नेता सबहक हत्या सँ घबराएल पुलिस बिना किछु बुझने एहि तरहक प्रचार केलक। राति मे हुनका किछु अभिनव आइडिया आएल छलनि तकरे मंथन करबाक लेल ओ कने सबेरे टहलए चल गेल छलाह। दू वैज्ञानिक अनुपमक अभिनव आइडिया पर कार्य करबा लेल दू सप्ताह बाद दूटा अंतरिक्ष वैज्ञानिक औथिन। ओ तीनू प्रायः दू तीन मास प्रयोगशालाक एकान्त मे रहि काज करताह। एहि अवधि मे हुनका संग कोनो तरहक सम्पर्क संभव नहि होएत। एक प्रयोगशालाक सुरक्षा बढ़ा देल गेलैक आ प्रशासनक सर्वोच्च स्तर पर एकर सूचना सेहो पठा देल गेलैक। दू उड़ती खबरि इहो अछि जे दूनू बाहुबली आपराधिक जीवन छोड़ि देलनि। आब शहर मे शांति रहत, से आशा करू। दृश्य 2 मंच सज्जा पछिले दृश्य सन, खाली शास्त्र-पुराणक पोथीक बदला मोटका विज्ञान पोथी, जर्नल आदि राखल। कुर्सी चारिटा। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लीखल छैक “'AI Laboratory (highly confidential)'। ई वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला थिक। प्रकाश वैज्ञानिक पर फोकस होइत अछि। अपना प्रयोगशाला मे बैसल ओ लैपटॉप पर कोनो लेख देखि रहल छथि आ लेगो ब्लॉक सँ खेला रहल छथि। सामनेक टेबुल पर एकटा छोट आकारक डिजिटल घड़ी, किछु सीडी/डीभीडी, किछु कोटक बटन, लेजर टॉर्च, आर किछु यंत्रादि पसरल छैक। इलेक्ट्रोनिक्स बला टेबुल कने परिवर्तित आ सजाओल। एहि टेबुल पर छद्म वेश मे रमेश आ सुरेश खेलौना बला छोटका ड्रोन सँ किछु काज कऽ रहल छथि। मंचक उपर पर्दा सँ एकटा एलईडी बल्ब लटकि रहल छैक जाहि सँ किछु अन्तराल पर लाल रंगक प्रकाश मंच कें आलोकित करैत छैक। वैज्ञानिक लैपटॉप देखि चौंकैत छथि। वैज्ञानिक ई की ? (फेर लैपटॉप कें देखऽ लगैत छथि) रमेश की भेल सर ? वैज्ञानिक एखनहि बूझि जेबैक, काज करैत रहू। जींस-कुर्ता पहिरने एकटा अपरिचित व्यक्तिक प्रवेश। हाथ मे गिटार सन बाजाक गिगबैग लटकल। एकदम वैज्ञानिकक सामने ठाढ़ भऽ जाइत छथि। प्रकाश पहिने आगन्तुक पर पड़ैत अछि तखन पूरा मंच आलोकित होइत अछि। वैज्ञानिक तरे तर मुसकिआइत छथि मुदा अकचकेबाक अभिनय करैत छथि। वैज्ञानिक अहाँ के छी, एतए भीतर कोना घुसि गेलहुँ ? सुरक्षा अधिकारी अहाँ कें रोकलनि नहि ? आगन्तुक (ठाढ़ भेल, कने दूर हटि कए स्वतः) हम तीनू लोक मे स्वच्छन्द विचरण करैत रहैत छी। हमरा के रोकत ? (प्रकट, वैज्ञानिक लग जा कए) हम एतए आकाश मार्ग सँ एलहुँ। मुदा अहाँ घबराउ नहि, अहाँक सुरक्षा कें हमरा सँ कोनो खतरा नहि अछि। वैज्ञानिक (आश्चर्यचकित हेबाक अभिनय करैत, कुर्सी आगू बढ़बैत) अच्छा, बैसू। बाजू अहाँ की चाहैत छी ? चाह, काफी किछु मँगाबी ? आगन्तुक (कुर्सी पर बैसैत) चाह, काफी छोड़ू, काज सूनल जाओ। ओना तऽ हम संगीत सँ सम्बन्ध रखैत छी मुदा एखन अहाँ लग वैज्ञानिक आविष्कार सबहक जानकारी लेबा लेल आएल छी। वैज्ञानिक सब आविष्कारक वर्णन इंटरनेट पर उपलब्ध छैक। आब इंटरनेट अपना ब्रह्मांड मे सबतरि उपलब्ध छैक आ कोनो ग्रहक बासी कतहु बैसल एकरा पढ़ि सकैत अछि। आगन्तुक हम अहाँक मुहें सूनए चाहैत छी। वैज्ञानिक (रमेश, सुरेश दिस इंगित करैत) हमर ओ दूनू सहकर्मी एतए काज करथि तऽ कोनो असुविधा नहि ने ? आगन्तुक कोनो असुविधा नहि। अपने सुनाउ। वैज्ञानिक बेस, हम किछु पुरान आविष्कारक जानकारी दऽ सकैत छी। जाहि विषय पर शोध चलिए रहल छैक तकरा बारे मे हम किछु नहि कहब। आगन्तुक कोनो बात नहि, जतेक अहाँ बता सकैत छी से बताउ। (कागत पर लिखब शुरू करैत छथि।) वैज्ञानिक (किछु सोचि आ घड़ीक आकारक अपन स्मार्टफोन बहार करैत) एकरा देखियौ, आब ई बड़ पुरान आविष्कार भऽ गेलैक, एकर अनेक नव रूप सेहो आबि गेलैक अछि मुदा हम एखनहुँ कखनो कए एकर व्यवहार कऽ लैत छी। एकरा स्मार्टफोन कहल जाइत छैक। आगन्तुक (किछु लिखैत) ई की काज करैत छैक ? वैज्ञानिक एना कहियौ — ई की नहि करैत छैक। साधारण दूरभाष सँ लऽ कए सिनेमा देखब, चित्रक आदान प्रदान करब आ रोबोट कें कोनो काजक लेल आदेश देब तऽ पुरान बात भऽ गेलैक, आब हम एतए बैसले बैसल विश्वक कोनो भाग मे बरखा सेहो करबा सकैत छी, कोनो अन्य भाग मे रातिओ मे कृत्रिम सूर्य उगा सकैत छी, कोनो अन्य ग्रह पर आक्रमण करबा सकैत छी, आरो बहुत किछु। आगन्तुक (चिन्तित होइत) कृत्रिम सूर्यक निर्माण भऽ गेल। आश्चर्य ! अहाँ कोनो अन्य ग्रह पर आक्रमण करबा सकैत छी, ई तऽ विशेष चिन्ताक बात। (लाल प्रकाश हुनका मुह पर पड़ैत अछि, ओ विचलित होइत छथि) ई प्रकाश किएक ? वैज्ञानिक एतुका सब गतिविधिक जानकारी केन्द्र कें पठाओल जा रहल छैक। असुविधाक लेल क्षमा चाही। (रमेश आ सुरेश अपना मोबाइल पर कोनो ट्यून लगबैत छथि आ नेपथ्य मे जोर सँ वर्षा आ बिहाड़ि एबाक आवाज होइत छैक। आगन्तुक ध्यान सँ सुनैत छथि) आगन्तुक ई की भऽ रहल छैक ? वैज्ञानिक कृत्रिम वर्षा लेल एकटा नव प्रयोगक तैयारी मे किछु जाँच कएल जा रहल छैक। चिन्ताक कोनो बात नहि। आगन्तुक कृत्रिम वर्षा ! आश्चर्य। (लेगो ब्लॉक दिस देखबैत) ई की छिऐक ? वैज्ञानिक ब्रह्माण्डक अन्य ग्रह पर बनऽ बला महल आदिक नमूना। सौरमंडलक सब ग्रह पर एहन भवन सब बनि गेल छैक। वायुमंडलक संरचनाक हिसाबें भवनक डिजाइन तैयार कएल जाइत छैक। आगन्तुक किछु बुझबा मे नहि आएल, आगू कहियौ। वैज्ञानिक (हाथ मे एकटा प्लास्टिक जकाँ कोनो पारदर्शी चीज उठबैत) एकरा देखियौ, ई अद्भुत वस्तु थिक। आगन्तुक (किछु नहि देखैत) अहाँ हमरा बड़ बुड़िबक बुझैत छी की ? खाली हाथ देखा कए कहैत छी एकरा देखियौ। एना ठकू नहि। वैज्ञानिक इएह तऽ एकर विशेषता छैक, हमरा हाथ मे अछि मुदा अहाँ देखि नहि सकैत छिऐक। ई अदृश्य पदार्थ छिऐक। एकर गुण सब सुनबैक तऽ ततेक आश्चर्य लागत जे अहाँ फेर कहब ठकैत छी। आगन्तुक बेस, कहियौ। वैज्ञानिक संक्षेप मे बूझि लिअऽ जे धरती पर जे कोनो प्राकृतिक धातु (metal) पदार्थ अछि तकर नीक सँ नीक गुण एकरा गुणक तुलना मे करोड़ो गुणा न्यून लागत। आ सबसँ महत्वपूर्ण बात जे एकरा पर तापक कोनो असरि होइते नहि छैक, कतेको सूर्यक सम्मिलित ताप कें ई सहि सकैत अछि। एकर वस्त्र जे कोनो वस्तु कें ओढ़ा देबैक ओ अदृश्य भऽ जाएत। ओकरा आगिक कोनो डरे नहि रहतै। आगन्तुक (बेस आश्चर्यचकित होइत) सत्ते कहैत छी ? वैज्ञानिक हम तऽ पहिनहि कहलहुँ जे अहाँ कें लागत हम झूठ बजैत छी। हमर काज छल सुना देब, विश्वास करी बा नहि से तऽ अहाँ जानी। आगन्तुक (बेस चिन्तित होइत) ठीक छैक, किछु आर सुनाउ। वैज्ञानिक एकर दोसर गुण छैक जे विशेष तरीका सँ एहि मे बिजलीक धारा बहाओल गेला सँ ई पारदर्शी नहि रहि जाइत छैक, एकरा सँ लेजर प्रकाश बहराइत छैक। आगन्तुक (लिखबाक उपक्रम करैत) ई लेजर प्रकाश की होइत छैक ? वैज्ञानिक कृत्रिम सूर्ये जकाँ पूर्णतः मानव निर्मित अजूबा। (एकटा लेजर टॉर्च उठा कए वैज्ञानिक ओकर प्रकाश चारू कात देखबऽ लगैत छथि, प्रकाश अनेक पुंज मे बँटैत छैक, एक दू बेर आगन्तुकक आँखि पर सेहो पड़ैत छनि, ओ हाथ सँ आँखि झँपैत छथि आ विस्मित होइत छथि) आगन्तुक एहि सँ तऽ आँखि आन्हर भऽ जेतैक। वैज्ञानिक ओ क्षणिक प्रभाव छैक, चिन्ताक बात नहि। आगन्तुक बेस, मानि लैत छी। एकर आर की की गुण छैक ? वैज्ञानिक सबटा विस्तार सँ कहऽ लागब तऽ एक दिन मे खतमो नहि होएत। संक्षेप मे बूझि लिअऽ जे लेजर प्रकाश धरती पर प्रायः सब क्षेत्र मे उपयोग भऽ रहलैक अछि आ सब लोक एकर गुण सँ परिचित अछि। एही प्रकाश द्वारा हम एतए बैसले बैसल कोनो ग्रह पर शत्रु कें नष्ट कऽ सकैत छी। आगन्तुक एकर एकटा नमूना हमरा भेटि सकत की ? वैज्ञानिक (एकटा पुरान छोट लेजर पेन हुनका दैत) ई राखि लेल जाओ। (सुरेश खेलौना बला ड्रोन कें उड़बैत छथि। नेपथ्य मे हवाइ जहाज उड़बाक आवाज होइत। आगन्तुक एहि खेला कें आश्चर्यचकित भावें देखैत छथि आ आबाज कें अकानैत छथि। ड्रोन मंच पर एम्हर ओम्हर उड़ैत रहैत छैक आ फेर एक क्षणक लेल आगन्तुक के माथ पर बैसि जाइत छैक। ओ अकचकाएल भावें छड़पि कए कुर्सी सँ उठि जाइत छथि। तखने ड्रोन हुनका माथ सँ उड़ि जाइत छैक। ओ असौकर्यक भाव देखबैत माथ हँसोथैत छथि। तकर बाद ओ ड्रोन वैज्ञानिक के सामने रुकि जाइत छैक।) रमेश हमरा सबहिक प्रयोग सफल रहल सर। ई यान आब तैयार अछि। आब हमरा सबकें अनुमति भेटए। वैज्ञानिक बहुत नीक। आब अहाँ दूनू गोटे अपन अभियान पर जा सकैत छी। हमर शुभकामना। (वैज्ञानिकक पैर छुबैत रमेश आ सुरेशक प्रस्थान) आगन्तुक ई कोन चिड़ै छियैक जे एतेक जोर के आवाज करैत उड़ैत छैक ? वैज्ञानिक चिड़ै नहि ई अन्तरिक्ष यान छिऐक जे अपना ब्रह्मांड मे कतहु जा सकैत अछि। एकर ओजन मात्र सौ ग्राम छैक मुदा ई एक हजार किलोग्रामक ओजन उठा कए उड़ि सकैत अछि। आगन्तुक ई तऽ पुष्पक विमानक कान कटलक यौ। वैज्ञानिक आब ककर कान कटलक आ ककर नाक कटलक तकर अन्दाज हमरा तऽ नहि अछि। अहाँ कोन काल्पनिक पुष्पक विमानक चर्चा करैत छी से तऽ अहीं जानी मुदा हमर टीम एकटा एहन यान पर शोध कऽ रहल अछि जे अन्य ब्रह्मांडक यात्रा सेहो कऽ सकत। एकर बारे मे हम एखन किछु नहि कहि सकब। आगन्तुक मुदा अन्य ब्रह्मांड पर जेबा लेल अहाँ सब कें देवता सबहक संग युद्ध करऽ पड़त। वैज्ञानिक (कने खिसिएबाक मुद्रा मे) ई तऽ अनर्गल बात भेल, देवता लोकनि अपने सबतरि बौआइत रहथि से नीक आ मानव अपन आविष्कारक बल पर कतहु जाए तऽ हुनका सँ युद्ध करऽ पड़त। ओना कोनो युद्ध लेल हम सब रोबोट सेना आ विभिन्न प्रकारक परमाणु बम तैयार कइए लेने छी। आगन्तुक रोबोट सेना की भेलैक ? वैज्ञानिक रोबोट माने भेल यंत्र मानव जे पूर्णतया मानव निर्मित अछि। छिऐक तऽ ई एक प्रकारक यंत्र मुदा प्रजनन छोड़ि बाँकी सब काज मनुक्खे जकाँ करैत अछि। सीमित मात्रा मे प्रजनन सेहो कऽ सकैत अछि, माने दोसर रोबोट कें बना सकैत अछि यदि अनुमति दऽ दियैक। आगन्तुक (आश्चर्य सँ आँखि पसारैत) अद्भुत, एहि रोबोट सेनाक संहारक कोनो विधि ? वैज्ञानिक ओ हम नहि कहि सकैत छी। एतेक बूझि लिअऽ जे अस्त्र शस्त्रक कोनो असरि नहि होइत छैक एकरा पर। आगन्तुक आ परमाणु बम की भेलैक ? वैज्ञानिक कने घुसकि आउ। (लैपटॉप पर एकटा छोट भिडियो हुनका देखेबाक उपक्रम) अपने जे देखलियैक ताहि सँ दस लाखक जनसंख्या बला शहर नष्ट भऽ गेल छलैक। एखन एहन शक्तिशाली बम सब छैक जे एकेटा सँ आर्यावर्त सदृश देश स्वाहा भऽ जाएत। आगन्तुक (बहुत बेसी चिन्तित होइत) एतेक शक्तिशाली ! एहन अस्त्र तऽ महाभारत युद्ध मे सेहो नहि छलैक। बेस, आगू कहियौ। वैज्ञानिक एकरा देखियौक (हाथ मे एकटा बटन सदृश वस्तु लैत) ई भेल हमर प्रतिरूप। हमर मस्तिष्कक सब ज्ञान एहि मे भरल छैक। एकरा साइबोर्ग (cyborg) अवस्था कहल जाइत छैक। हम आब एहि अवस्था मे अमर भऽ गेल छी। एकर एक प्रति राष्ट्रीय संग्रहालय मे सेहो राखल छैक। आब हमरा मृत्युक कोनो डर नहि अछि। आगन्तुक (लिखब बन्द करैत आ कागत कें पॉकेट मे रखैत) बर बेस, एहि सँ बेसी हमरा दिमाग मे एखन नहि अँटत। की हमरा अपन अंतरिक्ष यानक एकटा नमूना दऽ सकैत छी ? वैज्ञानिक (अस्वीकारक मुद्रा बनबैत) माफ करब मुदा एहि लेल उच्च स्तरीय अनुमतिक आवश्यकता छैक। संगहि अपनेक पूर्ण परिचय सेहो जरूरी होएत। आगन्तुक (परिचयक नाम पर कने घबराइत) कोनो बात नहि। रहए दियौक। एतेक जानकारीक लेल बहुत धन्यवाद। चलैत छी। (प्रस्थान) वैज्ञानिक (दर्शक कें सम्बोधित करैत) अहाँ सब चिन्हलिएनि ई के छलाह ? नहि ने ? अरे ओएह नारद बाबा, वेष बदलि कए आएल छलाह देवता सबहक दिस सँ धरती पर जासूसी करए लेल। हमरा खुफिया रिपोर्ट भेटि गेल छल तें विज्ञानक प्रगतिक बारे मे चुनि चुनि कए बात कहलिएनि। हमर बात सूनि कए केहन चिन्तित भऽ रहल छलाह से तऽ अपने सब देखिये लेलियैक। हमरा तऽ लागल जे बेसी खिस्सा कहबनि तऽ कतहु हॉर्ट अटैक ने भऽ जाइन। मुदा भागि गेलाह। देखियौ आगू की करैत छथि। वैज्ञानिक द्वारा लैपटॉप बन्द करबाक उपक्रम, प्रकाश शनैः शनैः बंद होइत अछि, नेपथ्य मे धड़-पकड़ के हल्ला, किछु लोक एम्हर ओम्हर दौड़ैत देखाइत अछि। दू बेर पिस्तौल चलबाक शब्द सूनऽ मे अबैत अछि। तखने घोषणा – घबराउ नहि, एहि गोली सँ दूनू बाहुबली रमेश आ सुरेशक अन्त भेल। पुलिस द्वारा घेरल जेबाक बाद पकड़ेबाक डर सँ दूनू बाहुबली रमेश आ सुरेश अपने गोली सँ आत्महत्या कऽ लेलक। करीब बीस बरखक बाद राज्य मे शान्ति बहाल होएत। चलू महावीर मंदिर मे लड्डू चढ़बै लेल। सब जा रहल अछि। दृश्य 3 मंच सज्जा मे मामूली परिवर्तन, टेबुल सब हटा देल गेल अछि, मात्र किछु कुर्सी राखल। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड स्विच ऑफ छैक। ई स्थान बाहुबली रमेश आ बाहुबली सुरेशक मृत्युस्थल अछि। खाकी ड्रेस पहिरने दूनू नीचा मे सूतल पड़ल अछि, दूनूक हाथ लग पिस्तौल छैक। मंचक दूनू कात सँ दूटा यमदूतक प्रवेश। प्रकाश हुनका दूनूक मुह पर पड़ैत अछि। दूनू मरल लोक लग आबि कए ठाढ़ भऽ जाइत अछि। तखन प्रकाश यमदूतक मुह सँ नीचा दिस मृतक पर पड़ैत छैक। यमदूत ओकरा दूनू कें उठेबाक चेष्टा करैत अछि तखने ओ दूनू मृतक ठाढ़ भऽ जाइत अछि। रमेश (हाथक इशारा सँ स्वागत भाव देखबैत) यमदूत लोकनिक मर्त्यलोक मे स्वागत अछि। दूत-एक हमरा सब कें स्वागत कथी लेल करैत छी ? हमरा सबहक काज अछि मात्र अहाँ दूनू कें लऽ कए यमराजक दरबार मे हाजिर करब, फेर कोनो दोसर ड्यूटी मे लागि जाएब। सुरेश अरे जेबे करब, कने सुस्ता लिअऽ, एक जूम तमाकुओ तऽ खा लिअऽ, भरि दिन यमलोक आ मर्त्यलोकक बीच दौड़ैत दौड़ैत थाकि जाइत होएब ने। दूत-दू थाकि तऽ जाइते छी मुदा काजे ततेक ने भऽ गेल अछि जे की कहू ? साँसो लेबाक फुरसति कहाँ भेटैत छैक ? रमेश तें ने कहैत छी, कने विलमि जाउ। (दूनू यमदूत एक दोसराक मुह ताकए लगैत छथि) दूत-एक (दूत-दू सँ) की विचार छौ ? दूत-दू ठीक छै, एक बेर कने नियम भंग कइए ली। सुरेश बहुत नीक। (तमाकू चुना कए दैत) लिअऽ, खाउ। दूनू दूत ई की छिऐ ? रमेश आहि रे बा ? तमाकूओ नहि खेने छिऐक कहियो ? दूत-दू ई सब यमलोक मे थोड़बे भेटै छै जे देखने रहबै ? सुरेश अच्छा छोड़ू एकरा, आब ई कहू, हमरा सब कें यमलोक मे की की करऽ पड़तै ? दूत-एक से कोना कहू ? यमराज जखन फैसला सुनेताह तखन ने बुझबै। रमेश फैसला तऽ हमरा सब कें बुझले अछि, नरके मे जेबाक अछि। ताहि हिसाबें कहू ने की सब हेतैक। दूत-दू सबटा तऽ हमरा सब कें नहि बूझल अछि, किछु देखने छिऐक से कहैत छी, जेना गरम तेलक कुण्ड मे फेकि देनाइ। सुरेश अच्छा ! तेल कतेक गरम रहैत छैक ? माने ओकर तापमान कतेक रहैत छैक ? दूत-एक ई की जानए गेलियै ? गरम तेल गरम तेल होइत छैक, बस एतबे। हम सब की ओहि मे पैसलियै जे बुझबै कतेक गरम छैक। रमेश ऐं यौ एतबो नहि बुझैत छिऐ जे 50 डिग्री पर गरम कएल गेल तेल आ 200 डिग्री पर गरम कएल गेल तेल मे अन्तर होइत छैक ? अच्छा ई कहू जे तेल कोन वस्तुक रहैत छैक ? सरिसो, तीसी, नारिकेल, सोयाबीन आ कि कोनो फेंट फाँट बला ? (दूनू यमदूत एक दोसराक मुह तकैत छथि, किछु नहि बूझि रहल छथि जे की उत्तर देथि।) दूत-एक देखू, ई हमरा सब कें नहि बूझल अछि आ ने एहि सँ कोनो सरोकारे अछि। अहाँ यमलोक पहुँचि कए यमराज सँ बूझि लेब। चलू देरी जुनि करू। सुरेश कने सूनू तऽ। ओ तेल कोना गरम कएल जाइछै ? माने बिजलीक हीटर लागल छैक कि सौर ऊर्जा सँ आ कि जारनि सँ? दूत दू हमरा सब कें किछु नहि बूझल अछि। चलू देरी भऽ रहल अछि। (दूनू दूत दूनू मृतक कें पकड़बाक चेष्टा करैत अछि, सुरेश, रमेश जोड़ सँ ओकर हाथ झटकि दैत छैक जाहि सँ ओ सब खसि पड़ैत अछि, फेर अपना कें सम्हारैत ठाढ़ होइत अछि) दूत एक अहाँ सब यमलोक नहि जेबै ? सुरेश जेबै तऽ जरूरे, मुदा बिना सब बात फरिछेने विदा नहि होएब। अहाँ सब जाउ आ यमराज कें एतहि बजौने अबियनु, ताबत हम सब एतहि रहब। (दूनू गोटे अपन कमीज कें समेटि बाँहि उघार करैत अछि आ फूलल मांशपेशी कें निहारैत अछि। दूनू यमदूत ओहि दूनूक शारीरिक सौष्टव कें देखैत कने भयभीत होइत छथि।) दूत-दू अहाँ सब नहिए जेबैक ? रमेश कहलहुँ ने, यमराज सँ सब बात फरिछा लेलाक बादे जेबैक। (दूनू मंचक पाछू भाग मे नीचा मे पड़ि रहैत अछि, खिसियाएल मुद्रा मे यमराजक प्रवेश, वेश भूषा पौराणिक वर्णनक हिसाबें। प्रकाश हुनका पर फोकस होइत अछि।) यमराज (तामसक मुद्रा मे दूत कें सम्बोधित करैत) एतेक देरी किएक लागि गेल ? हम सब चिन्ता मे पड़ल छलहुँ। चित्रगुप्त महराजक कहला पर हमरा अपनहि आबए पड़ल। दूत एक हमरा दूनू कें माफ कएल जाओ आ अपन समस्या कहबाक अनुमति देल जाओ धर्मराज। हम सब तऽ घुरि कए जाए बला छलहुँ अहाँ कें बजबै लेल। यमराज (कने सामान्य होइत) बिना मृतात्मा कें लेने घुरि जइतहुँ ? से किएक ? दूत-दू की कहू धर्मराज, एहन मृतात्मा सँ कहियो पाला नहि पड़ल छल जे प्रश्न पूछत। यमराज (आश्चर्यचकित होइत) मृतात्मा प्रश्न पुछलक ? आश्चर्य, एना तऽ कहियो नहि भेल छलैक। दूत-एक सएह ने कहैत छी। दूटा लोक अछि जे अपना कें बाहुबली कहैत अछि, नाम छैक सुरेश आ रमेश। ओ पूछऽ लागल नरक मे कोन तरहक यंत्रणा देल जाइत छैक। दूत-दू हम सब गलती सँ कहि देलियै जे गरम तेलक कुण्ड मे फेकल जाइत छैक। बस, तकर बाद ओ सब प्रश्न पर प्रश्न करऽ लागल, तेल कतेक गर्म रहैत छैक, तेलक तापमान कतेक होइत छैक ? कोना कए गरम कएल जाइत छैक ? कोन पदार्थक तेल रहैत छैक – नारिकेल तेल कि सरिसो तेल कि फेंट फाँट बला। दूत-एक हमरा सब कें एकर उत्तर बूझल नहि छल। ओ दूनू कहलक जे जाबत एहि प्रश्नक उत्तर नहि भेटि जाएत ताबत यमलोकक यात्रा नहि करब। जाउ यमराज कें अपनहि आबए कहियनु। यमराज (खिसिआइत) मृतात्माक एतेक साहस कोना भेलैक जे अहाँ सब सँ प्रश्न पुछलक ? हमरा बजबैक आदेश देलक ? (तामसें जोर सँ बजैत) कतए अछि ओ दुष्टात्मा सब? देखाउ हमरा। एखनहि हम ओकरा सबहक नंगटपनी घोसारि दैत छिऐक। (एखन प्रकाश रमेश आ सुरेश पर फोकस होइत अछि) दूत दू (हाथक इशारा सँ देखबैत) ओएह दूनू छी ओ बाहुबली मृतात्मा। (दूनू मृतात्मा हड़बड़ा कए उठि जाइत छथि आ एकहि संग धर्मराजक पैर पर खसैत छथि) रमेश, सुरेश जय हो, जय हो, धर्मराजक जय हो। महाराज वैवस्वतक जय हो। मर्त्यलोक मे महाराज सूर्यपुत्रक स्वागत। यमराज (तामस कें घोंटैत, कने हटि कए, स्वतः) आश्चर्यक बात, पहिल बेर एहि मर्त्यलोक मे कियो यमराजक जयजयकार करैत स्वागत कऽ रहल अछि, जरूर ई दूनू कोनो विशिष्ट व्यक्ति अछि। (लग आबि, प्रकट) अहाँ सब यमदूतक संग नहि जा कए बहुत पैघ नियम भंग केलियै, जे आइ तक नहि भेल छलैक। एहि अपराध लेल अहाँ सब कें सजाए बढ़ाओल जा सकैत अछि। रमेश पहिने आसन ग्रहण कएल जाओ सूर्यपुत्र (हुनका हाथ पकड़ि कुर्सी पर बैसबैत छथि, अपने दूनू गोटे टेबुलक दूनू कात ठाढ़ होइत छथि, यमदूत लोकनि काते मे ठाढ़ रहैत छथि) यमलोक जेबा लेल तैयारे छी धर्मराज, आ जे कोनो सजाए भेटत ताहि लेल सेहो तैयार छी। सुरेश मुर्दा पर जेहने दश मोनक बोझ तेहने पचास मोनक बोझ। जखन नरके मे बास करबाक अछि आ यातना सहबाके अछि तखन हजार बरखक बदला दू हजार बरख सएह ने। कोनो फर्क नहि पड़ैत छैक। यमराज (आश्चर्यचकित होइत) अहाँ सब अपने मोने कोना बूझि गेलिऐ जे नरके मे बास करबाक अछि ? रमेश धर्मराजक जय हो। बुझले अछि जे हम सब कोनो अबोध बच्चा नहि छलहुँ ने। ब्रह्महत्या, नारीहत्या, भ्रूणहत्या, गोहत्या आदि सँ लऽ कए छागरहत्या, शूकरहत्या, कुक्कुटहत्या, मत्स्यहत्या, छुटले की छल ? यमराज (आश्चर्य प्रदर्शित करैत) अच्छा ! सुरेश ओतबे नहि देव, डकैती तऽ साधारण बात भेल, अपहरण, व्यभिचार आ साइवर क्राइम मे सेहो हमरा दूनूक जोड़ नहिए रहल हेतैक। रमेश बीस बरख तक एतेक जे पाप कएल तऽ ई सोचिए कए ने जे नरक मे दीर्घ प्रवास करब। सुरेश नरक मे देल जाए बला यातना आदिक वृहत जानकारी सेहो लऽ लेने छी धर्मराज। सबटा शास्त्र पुराण आर अन्यान्य ग्रन्थ सब सेहो चाटि गेल छी। रमेश जतेक प्रकारक अपराध हम सब कएल अछि ओहि सब लेल एतुका ग्रन्थ सब मे तऽ सजाएक प्रावधानो नहि छैक। लगैत अछि ग्रन्थकार कें ओहि अपराधक कल्पनो नहि छलनि। तकरा बारे मे अपने कोना निर्णय लेब से सोचि राखू धर्मराज। यमराज ओ तऽ बादक बात भेल, एखन एहि मृत्युलोक मे रुकल किएक छी जखन कि अहाँ सबहक भोगक अवधि शेष भऽ गेल अछि ? अंट शंट प्रश्न पूछि कए यमदूत लोकनि कें रोकने रहलियैनि से किएक ? सुरेश महाराज औदुम्बर, हमरा सब कें बूझल छल जे देरी भेला सँ अपने स्वयं मर्त्यलोक एबे करबैक। रमेश हमरा सबहक प्रश्न ओ नहि अछि जे दूत लोकनि सँ पूछल। ओ तऽ बहन्ना छल। सुरेश महाराज वैवस्वत, अपने कें कष्ट देल एतए बजाए से मात्र एकटा छोट अनुरोध करबाक हेतु। रमेश हमर आग्रह जे दूनू यमदूत कात भऽ जाथि। (यमराज इशारा करैत छथिन, दूनू दूतक प्रस्थान) सुरेश हमरा सबहक आग्रह एतबे जे अपना संग पाँच किलो ओजनक एकटा ब्रीफकेस लऽ जेबाक अनुमति भेटए। यमराज (आश्चर्यचकित होइत) ई की बाजि रहल छी ? रमेश महाराज औदुम्बरक जय हो। बुझले होएत जे आब फोकटियो हवाइ जहाज कम्पनी सब लोक कें सात किलो ओजन तक के ब्रीफकेस अथवा हैंडबैगक अतिरिक्त पन्द्रह किलो चेकइन लगेज लऽ जेबाक सुविधा दैत छैक। हम सब तऽ मात्र पाँच किलोक अनुमति माँगि रहल छी। सेहो ब्रीफकेस टा, कोनो चेकइन लगेजक झंझट नहि। यमराज मुदा ई कोना सम्भव छैक ? आइ तक कहियो एना नहि भेलैक। सुरेश अपने तऽ धर्मराज छी, हम सब मर्त्यलोकक अदना प्राणी अपने कें की बुझाएब ? तैयो पुछैत छी जे जखन इन्द्र गौतम ऋषिक पत्नी अहिल्याक शीलभंग करबा लेल गेलखिन तऽ ओहि सँ पहिने ओहन घटना भेल छलैक की ? यमराज अहाँ सब की कहऽ चाहैत छी ? रमेश एतबे जे कोनो नव काज शुरू करबा लेल पहिने की भऽ गेल छैक तकरा देखब जरूरी नहि। एना जँ लोक करऽ लागए तऽ कहियो कोनो नव काज शुरुए नहि हेतैक। यमराज मुदा यमलोक मे मृत्युलोकक चीज वस्तु कोना रहि सकैत छैक ? सुरेश एखनहु तऽ रखने छिऐक धर्मराज। नरकक विभिन्न कुण्ड मे जे मानव मल, मूत्र, रक्त, मज्जा, वीर्य, अश्रु आदि भरल छैक से यमलोक मे तऽ नहिए भेटैत हेतैक। मानव तऽ मर्त्यलोकेटा मे छैक देव। ओ सामान सब तऽ एतहि सँ उठा कए लऽ गेलियैक। यमराज सम्भवतः अहाँक बात ठीक अछि, मुदा ई काज बहुत दिन पहिने भेल छलैक जखन हमर पूर्वक पूर्वक पूर्वक यमराज यमलोकक काज देखैत छलखिन। रमेश कहुना भेल होइक, भेलैक तऽ। बस, तखन हमरा सबहक निवेदन स्वीकार कऽ लेल जाओ सूर्यपुत्र। सुरेश यदि अपनेक यान मे जगहक समस्या हो तऽ हम सब विशेष यानक व्यवस्था कऽ सकैत छी। ओ यान एतुका वैज्ञानिक लोकनि कठिन शोध सँ तैयार केलनि अछि जे ब्रह्मांड मे सबतरि जा सकैत छैक। यमराज नहि नहि, तकर काज नहि पड़तैक मुदा हम अपने मोने ई अनुमति नहि दऽ सकैत छी। एहि लेल हमरा देवता सबहक संग विशेष मीटिंग करए पड़त। रमेश कइये लेल जाओ धर्मराज, ताबत हमरा दूनू कें एतहि छोड़ि देल जाओ। ओतए चल गेलाक बाद घूरि कए तऽ आएल पार नहि लागत। यमराज ठीक छैक, हम दूनू यमदूत कें अहाँ दूनूक पहरा मे लगा दैत छिएनि। (संकेत करैत छथि, दूनू यमदूतक प्रवेश), हम कने देवलोक मे एकटा इमर्जेन्सी मीटिंग करबा लेल जाइत छी, ताबत हिनका दूनू कें एतहि रखियनु। (यमराजक प्रस्थान) सुरेश अपने सब आराम सँ भीतर मे बैसू ने। कतेक काल ठाढ़ रहब। भीतर मे अपनेक लेल सब इन्तजाम कएल अछि। (इशारा करैत छथि) दूत-एक भगबै नहि ने यौ ? रमेश भागि कए कतए जेबै ? मरल लोक समाजक बीच कोना जेतैक ? सब भूते बूझि लेत आ ढेपियौनाइ शुरू करत। अपने सब निश्चिन्त रहू। दूत-दू बेस (दूनूक प्रस्थान) सुरेश (दर्शक दिस मुह घुमा) देवलोक मे इमर्जेन्सी मीटिंग चलि रहल छैक, परमीसन तऽ भेटबे करतैक। किएक ने जल्दी जल्दी ब्रीफकेस तैयार कऽ ली। रमेश आ विशेष यान कें सेहो तैयार करबा कए राखिए ली। किन साइत ? (दूनूक प्रस्थान, मंच अन्हार) दृश्य 4 मंच सज्जा पहिने जकाँ। एकटा टेबुल आ छओटा कुर्सी टेबुलक तीन कात अर्धवृत्ताकार रूप मे सजाओल, आब डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लीखल छैक ‘देवलोक’। विष्णु बीचक कुर्सी पर, ब्रह्मा हुनका बामा कात आ महेश दहिना कातक कुर्सी पर बैसल छथि। हिनका सबहिक मेकअप पौराणिक वर्णन हिसाबें कएल गेल अछि। महेश हाथ मे डमरू रखने छथि आ जटा सेहो बेस पैघ बनल छनि। प्रकाश शनैः शनैः तीनू पर पड़ैत अछि। तकर बाद प्रवेश पथ पर पड़ैत अछि जतए नारद बाबा अपन पौराणिक वेष मे वीणा लेने आबि रहल छथि। नारद जखन लग पहुँचैत छथि तखन पूरा मंच आलोकित होइत अछि। नारद नारायण, नारायण ! त्रिमूर्ति कें साष्टांग दंडवत। विष्णु स्वागत मुनिश्रेष्ठ। आसन ग्रहण कएल जाओ (एकटा कुर्सी दिस इशारा करैत) बहुत दिनक बाद दर्शन भेल। नारद (ब्रह्माक बगल बला कुर्सी पर बैसैत) हॅं, कने चल गेल छलहुँ पृथ्वी भ्रमण हेतु। ओम्हरहु बहुत दिन सँ नहि गेल रही से सोचल जे देखि लियैक खुरापाती मानव जंतु की कऽ रहल अछि। ब्रह्मा मानव कें खुरापाती किएक कहलियैक देवर्षि ? ओ तऽ हमर अप्रतिम सृजन थीक। नारद अपनेक वचन सत्य चतुरानन, मुदा सोचियौ ओकर मस्तिष्क केहन तेज बना देलियैक। कहियो इहो सोचलियै जे एहन स्थिति आबि जेतैक जे ओ मानव देवलोक पर विजय अभियान लेल तैयार भऽ जाएत। राक्षस सँ अपने सब बहुत बेर युद्ध कएल, छल बल सँ जीतल मुदा मानव अहाँ सँ छलो बल मे बीसे रहत। ओकर कपटबुद्धिक आगू देवलोकक कोनो बुधियार नहि टिकता। महेश (जटा पर हाथ फेड़ैत आ मुसकिआइत) नीके ने, एतए हम सब फोकट मे मजा लूटि रहल छी। ओ सब तऽ कहुना दिन राति खटि कए किछु उपार्जन करैत अछि, आविष्कार करैत अछि, आब जमाना आबि गेलैक अछि जे समस्त ब्रह्माण्ड मे ओकरे सबहक राज होइक। विष्णु औघड़दानी कें तऽ एहिना चौल फुराइत रहैत छनि। महेश चौल नहि, सत्य बात। मानव हमरा सब कें पूजा करैत, प्रशंसा करैत, टिटकारी दैत अकास ठेका देलक, अकर्मण्य बना देलक आ अपने कतेक आगू बढ़ि गेल। विष्णु अच्छा, सुनियौ देवर्षि कें की कहबाक छनि। अपने मुनिश्रेष्ठ कने फरिछा कए कहियौ की की देखलियै, बुझलियै। नारद देखलियै बहुत किछु, बुझलियै ओलक टोंटी। तैयो किछु बता दैत छी। पहिने हम रस्ता पेड़ा पर छद्म रूपें घुमैत रहलहुँ आ लोकक बीच वार्तालाप सुनैत रहलियै, धिया पूताक खेलेनाइ देखैत रहलियैक। अद्भुत नव नव वस्तुक आविष्कार भऽ गेलैक अछि। सबतरि सुनियै रोबोट सँ ई काज करा ले, रोबोट सँ ओ काज करा ले, एक ठाम देखलियै बच्चा सब फतिंगा जकाँ मसीन सब मे पचास साठि टा पजेबा बान्हि कए उड़ा रहल छल। पुछलियै ई की छिएक तऽ सब हँसऽ लागल। ब्रह्मा फेर किछु बुझलियै की नहि ? नारद हॅं, एकटा बच्चा कें दया एलै, कहलक “बाबा ई ड्रोन छिऐक, अहाँ कोन शहर मे रहैत छी ? आब ड्रोन तऽ सबतरि भेटैत छैक, दोकान सँ चीज वस्तु आब सबहक घरे घर एकरे द्वारा पठाओल जाइत छैक”। विष्णु मुनिश्रेष्ठ, ठीक सँ सुनलियै की नहि ? ओ ड्रोन बाजल की द्रोण ? महेश अहूँ की मजाक करैत छिऐक जनार्दन। द्वापर युगक गुरु द्रोण की आब कलियुग मे लोकक घरे घरे दोकान सँ सामान पहुँचबैत हेथिन ? नारद हमरहु पहिने भेल जे बच्चा कें बजबा मे किछु गलती भेलैक, ड्रोन नहि द्रोण कहबाक छलैक। हम ओकरा फेर टोकलियै तऽ फेर सब बच्चा हँसए लागल, कहलक ई ड्रोन छिऐक, अंग्रेजी भाषाक शब्द छिऐक। हम तऽ गुम्मे रहि गेलहुँ। ब्रह्मा (कने चिन्ता आ आश्चर्यक भाव लेने) बेस, आर की सब देखलियै, बुझलियै ? नारद जखन एहि तरहें जिज्ञासा शान्त नहि भेल तऽ पता लगा कए एकटा वैज्ञानिकक कार्यालय मे घुसि गेलहुँ। विष्णु वैज्ञानिक ? ई कोन जीव होइत छैक ? पंडित सब तऽ सुनने छलियै, ऋषि मुनि तपस्वी आदि सँ भेंट भेले अछि मुदा वैज्ञानिक शब्द तऽ पहिले पहिल सूनि रहल छी। महेश (डमरू कें दू बेर बजबैत) तें ने हम कहलहुँ, हम सब घमण्ड मे चूर रहलहुँ, बुझैत रहलियै जे एहि ब्रह्मांड पर अनन्त काल तक हमर राज रहत, इनारक बेंग जकाँ देवलोकक चारि टा पहाड़, नदी, झील आ अप्सरा सबहक बीच दिन बितबैत रहलहुँ आ आन ठाम की की विकास भेलैक से बुझबाक कहियो चेष्टे नहि केलहुँ। ओ तऽ धन्य कही नारद मुनि कें जे किछु नव बातक जानकारी अनलनि। (एतए नारद पाकिट सँ लेजर टॉर्च निकालि ओकर प्रकाश चारू दिश फेकैत मंच पर नाचए लगैत छथि। लेजर प्रकाश तीनू देवताक आँखि मे सेहो पड़ैत छनि, हुनका सब कें चकचोन्ही लगैत छनि, सब आँखि मिलमिलबैत छथि आ आश्चर्यचकित भेल नारद दिस तकैत छथि) ब्रह्मा ई कोन खेला देखा रहल छिऐक देवर्षि ? नारद लेजर प्रकाशक नमूना चतुरानन। ई तऽ अति सूक्ष्म यंत्र अछि जे हम ओहि वैज्ञानिक सँ माँगि लेल। ओकर कहब छलैक जे बहुत शक्तिशाली लेजर सँ ओ सब कोनो ग्रह पर शत्रु कें नष्ट कऽ सकैत अछि। ओतए जे हम देखल से वर्णनातीत अछि। की कहू, एकेटा यंत्र सँ विभिन्न रंगक प्रकाश अनेक दिशा मे अनेक दूर तक जाइत जे देखल तऽ ठकमूड़ी लागि गेल। महेश (दूबेर डमरू बजबैत) अति उत्तम आविष्कार। मानव जाति कें हार्दिक बधाइ। विष्णु बधाइ बाद मे देबैक उमापति, एखन अपना पर आबऽ बला खतराक चिन्ता तऽ करू। अच्छा, आर की की देखलियैक-सुनलियैक देवर्षि ? नारद ड्रोन, लेजरक अतिरिक्त रोबोट, साइबोर्ग, कृत्रिम सूर्य-चन्द्र, ग्रह-उपग्रह, कतेक कहू ? आब इन्द्रक पूजाक कोन काज ? मानव कृत्रिम रूपें सब किछु करबा लैत अछि। जखन चाही, जतए चाही, जतबे चाही, वर्षा भऽ गेल। शत्रु कें तंग करबा लेल बिहारियो उठा देत। ब्रह्मा सब किछु हमरा सब लेल बहुत चिन्ताक विषय अछि। आर किछु कहू। नारद ओहि वैज्ञानिक सँ बहुत रास जानकारी भेटल, मुदा जेना कहलहुँ ने, बात सब ठीक सँ बुझबा मे नहि आएल। हम ओहि वार्तालापक अंश कें जे किछु लीख सकलहुँ से देखा दैत छी। (विष्णुक हाथ मे एकटा कागत दैत छथिन, ओ स्वयं पढ़ि कए ब्रह्मा आ महेश कें बेराबेरी पढ़ऽ दैत छथिन, कियो ठीक सँ बात नहि बूझैत छथि, तीनू देव कें आश्चर्य सँ आँखि पसरले रहि जाइत छनि) विष्णु बहुत बात तऽ हमहू नहि बुझलहुँ मुदा चिन्ताक बात एकेटा जे आब मानव दोसर ब्रह्माण्ड पर जेबाक तैयारी मे लागल अछि। अपना ब्रह्माण्डक विभिन्न भाग मे ग्रह नक्षत्र पर यान आ दूत पठा देलक अछि। ब्रह्मा एहि अभियान कें रोकबा लेल किछु तऽ सोचहि पड़त। (एतबा मे हकासल पियासल अपसियाँत भेल यमराजक प्रवेश) यमराज त्रिदेव कें हमर साष्टांग दंडवत स्वीकार हो। विष्णु धर्मराजक स्वागत, मुदा एना अपसियाँत किएक भेल छी ? यमलोक मे सब कुशल तऽ अछि ने। यमराज कुशल क्षेम बाद मे कहब, हम दौड़ल आएल छी एकटा अति आवश्यक मंत्रणा लेल। ब्रह्मा मुदा चित्रगुप्त कें कतए छोड़ि देलिएनि ? हुनका बिना कोनो मंत्रणा कोना होएत ? यमराज से ठीके, हड़बड़ी मे ध्याने नै रहल। एखनहि हम दूत पठा हुनका बजा लैत छी। (नेपथ्य दिस देखि) कने चित्रगुप्त कें जल्दी दरबार मे अबै लेल कहि देबनि। (प्रत्यक्ष भऽ कए) ताबत हमर समस्या तऽ सूनल जाओ। महेश ठीक छैक, कहल जाओ धर्मराज। यमराज किछु समय पूर्व मर्त्यलोक मे दू गोटेक टिकट कटि गेलनि। हमर दूत हुनका आनऽ गेल। ओ दूनू अपना कें बाहुबली कहैत छलखिन। दूत लोकनि जखन बहुत देरी भेलाक बादो मृतात्मा कें लेने नहि अएलाह तखन चित्रगुप्त महराज सँ मंत्रणा केलाक बाद हमरा स्वयं ओतए जाए पड़ल। (एही बीच मोट मोट खाता पजियौने अपन पारम्परिक वेश मे चित्रगुप्तक प्रवेश, हुनका सम्बोधित करैत) आउ, आउ, एकदम ठीक समय पर अपने पहुँचि गेलहुँ। हम जे मर्त्यलोक गेल छलहुँ तकरे खिस्सा कहि रहल छी। ब्रह्मा ई तऽ बड़ विचित्र बात लगैत अछि जे यमदूत मृतात्मा नहि अनलक आ अहाँ अपनहि गेलहुँ। आबहु ओ सब आएल की नहि ? यमराज नहि ने। सएह तऽ खिस्सा कहैत छी आ आवश्यक मंत्रणा करबाक अछि। ओहि दूनू बाहुबलीक अनुरोध छैक जे अपना संग किछु सामान यमलोक लऽ जेबाक अनुमति भेटए। हम स्वयं एकर निर्णय नहि लऽ सकलहुँ तें दौड़ल एलहुँ अपने सबहक दरबार मे। ओहि दूनू कें हम अपन दूतक पहरा मे मर्त्यलोके मे छोड़ि आएल छी। विष्णु सामान आ मर्त्यलोक सँ यमलोक आनल जाएत ? ई तऽ सत्ते अभूतपूर्व घटना होएत। एकर दूरगामी प्रभावक अध्ययन केने बिना हम सब कोना निर्णय लेब जे अनुमति देल जाए की नहि। महेश पहिने चित्रगुप्त महराज सँ सूनि लेल जाए हुनकर विचार। चित्रगुप्त (बड़ी काल तक खाता कें उनटबैत पुनटबैत) हमरा खाता मे जतेक नियम कानून लिखल छैक से मात्र जीव लेल छैक। निर्जीव सामान लेल कोनो नियम कानून कहियो बनाओले नहि गेलैक। ब्रह्मा हमरा त ऽ एहि मे बेस खतरा बुझा रहल अछि। जेना मुनि नारद सुनौलनि, यदि किछु एहन सामान आबि गेल तऽ फेर देवलोक कें सेहो डर छैक ने। यमराज ओकरा दूनूक कहब छैक जे मर्त्यलोक सँ सामान पहिनहुँ यमलोक पठाओल गेलैक अछि। विभिन्न कुण्ड सब मे मानव मल मूत्र रक्त मज्जा आदि भरल गेलैक से तऽ ओतहि सँ आनल गेलैक। यमलोक आकि देवलोक मे मानव तऽ छलैक नहि। विष्णु बात तऽ ठीके कहैत अछि ओ सब। कने नारद मुनिक विचार सेहो सूनि लेल जाओ। नारद हम जे किछु देखलियै तकरा आधार पर एतबे कहब जे ओकरा सबहक सामान हम सब चीन्हि नहि सकबैक। लाभदायक होएत की हानिकारक से बुझबाक कोनो उपाय देवलोक मे नहि छैक। बूझू अन्हार घर सापे साप। चित्रगुप्त हमरा सब तऽ “एम्हर इनार आ ओम्हर खाधि”बला स्थिति मे आबि गेल छी। अनुमति नहि देला सँ ओ दूनू बाहुबली मर्त्यलोक सँ टसकत नहि आ अनुमति देला सँ संगें की आनत सेहो अज्ञात अछि। यमराज किछु निर्णय शीघ्रे लेबऽ पड़त। महेश हमरा विचारें अनुमति देबा मे कोनो हर्ज नहि। देवलोक नष्ट हेतैक तऽ नीके हेतैक, फेर सँ निर्माण करब। पुरान घर खसए, नव घर उठए (डमरू बजबऽ लगैत छथि) ब्रह्मा संहारक रुद्र कें तऽ विनाशलीला देखबा मे मजा अबैत छनि। सब गोटे कने सीरियस होउ आ प्रस्ताव पर विचार करू। विष्णु छोड़ू सब त्वञ्चाहंत आ बतकही। आनऽ दियौ जे आनत से। यदि कोनो विघ्न आओत तऽ अन्त मे भगवती तऽ छथिए सब दुष्टक संहार करबा लेल। चित्रगुप्त नीक विचार। यदि सब गोटेक सहमति हो तऽ हम खाता मे लीख ली। आगू फेर एहन प्रस्ताव पर बहस करैक काज नहि रहत। ब्रह्मा लीखू सर्वसम्मति सँ प्रस्ताव पास भेल। यमराज बहुत नीक, आब हम चलैत छी (चित्रगुप्तक संग प्रस्थान) महेश चलै चलू, बहुत समय बर्बाद भेल, कनियाँ सब बाट तकैत हेतीह (हुनका संग विष्णुक प्रस्थान, ब्रह्मा रुकि जाइत छथि।) ब्रह्मा (नारद कें सम्बोधित करैत) मुनिश्रेष्ठ, कने एम्हर आउ। (नारद हुनका लग अबैत छथि, ब्रह्मा हुनका कान मे किछु कहैत छथिन) नारद नारायण, नारायण ! देखियौ की कऽ सकैत छी। (दूनूक प्रस्थान, प्रकाश बन्द) दृश्य 5 स्थान मर्त्यलोक मे बाहुबली रमेश आ सुरेशक मृत्युस्थल। मंच सज्जा ओहिना, कुर्सी टेबुल अछिए, डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड स्विच-ऑफ अछि। दूनू यमदूत कुर्सी पर बैसि टेबुल पर पएर पसारि मोबाइल मे कोनो सिनेमा देखबा मे तल्लीन छथि जे हुनका रमेश आ सुरेश देलकनि। दूनू बाहुबली मृतात्मा मंच सँ गाएब छथि। हड़बड़ाएल यमराजक प्रवेश। यमदूत लोकनि यमराज कें नहि देखैत छथि। यमराज (डँटबाक मुद्रा मे जोर सँ बजैत) की देखबा मे तल्लीन छी यौ दूत लोकनि ? (दूनू दूत चौंकि जाइत छथि, जल्दी जल्दी मोबाइल कें नुकेबाक चेष्टा करैत छथि मुदा यमराज मोबाइल छीन लैत छथिन आ स्वयं देखऽ लगैत छथि। कने हटि कए, स्वतः) अद्भुत वस्तु अछि ई। एतबेटा डिब्बा मे कोना एतेकटा मनुक्ख घुसिया गेल छैक आ बन्दे रहैत कोना नाचियो गाबि लैत छैक ? आश्चर्य। (लग आबि प्रकट) ई की देखि रहल छलहुँ अहाँ सब ? छिः छिः, कतऽ भेटल ई ? (दूनू यमदूत मूड़ी झुकेने चुपे ठाढ़ रहैत छथि) यमराज (आर जोर सँ बाजि खिसिआइत) चुप किएक छी ? बजै किएक नहि छी ? मर्त्यलोकक एहन अधलाह वस्तु अहाँ सब कें छुबाक साहस कोना भेल ? बूझल नहि छल जे एतए मृतात्मा कें छोड़ि आर कोनो वस्तु छूनाइ वर्जित छैक ? दूत एक (मूड़ी नीचा झुकौने, कान पकड़ैत) गलती भऽ गेल धर्मराज। दूत दू (कान पकड़ैत) पहिल बेर ई दूनू मृतात्मा कें लऽ जेबा मे देरी भेल आ एकरे दूनूक कारण ईहो गलती भेल सूर्यपुत्र। क्षमा कएल जाओ। दूत एक अपनेकें देरी भऽ रहल छल तऽ समय बितबैक लेल ई यंत्र ओ दूनू मृतात्मा हमरा दूनू कें देलनि। एहन गलती फेर कहियो नहि होएत से वचन दैत छी। अपने कें काज भऽ गेल ? यमराज काज भऽ गेल, मुदा अहाँ सब ओहि दूनू मृतात्मा कें कतऽ भगा देलियै ? दूत दू एतहि अछि ओ दूनू (मृतात्मा कें मंच पर चारू कात तकैत छथि, नहि देखि दूनू दूत चिन्तित होइत छथि, एक दोसराक मुह तकैत छथि) यमराज मुह की तकैत छी, भागि गेल ओ सब। भेल बखेरा, आब समूचा धरती पर ओकरा सब कें तकैत फिरू। (तखने ब्रीफकेस लेने रमेश आ सुरेशक प्रवेश) रमेश (ब्रीफकेस रखैत) एतहि छी धर्मराज। सुरेश (ब्रीफकेस रखैत) हम सब अपनेक संग यमलोक यात्राक लेल तैयार छी। यमराज (निःश्वास छोड़ैत, स्वतः) हऽ, पैघ झंझट सँ बचलहुँ। (प्रकट) आब विलम्ब की? चलैत चलू। रमेश बस, अन्तिम बेर कने आहे माहे सुना दी, यमलोक मे फेर अवसर नहिए भेटत। सुरेश अपने हमरा दूनू पर बहुत कृपा केलिऐ धर्मराज, स्वयं आबि गेलियै आ ब्रीफकेस संगें लऽ जेबाक अनुमति सेहो दऽ देलियै, एहि लेल हम सब कोटि जिनगी पर्यन्त अपनेक अनुगृहीत रहब। रमेश हमरा सबकें ई जानि बहुत दुख होइत अछि सूर्यपुत्र जे धरती पर कतहु कियो भक्तिभाव सँ अपनेक पूजा नहि करैत अछि। अपने सन धर्मात्माक पूजा हेबाके चाही। आन देवताक मन्दिर सब गामे गाम टोले टोल आ अपनेक मन्दिर तकबा लेल गूगल सर्च करए पड़ैत छैक। यमराज हमरा अपन काज सँ मतलब अछि, पूजा अर्चनाक चिन्ता हमरा नहि अछि। रमेश ई अपनेक महानता भेल धर्मराज मुदा सोचियौ ई भेदभाव किएक ? अपने यमलोकक एतेक पैघ साम्राज्यक देखभाल करैत छिऐक, अपनेक संग जे चित्रगुप्त रहैत छथि हुनको पूजा लेल वर्ष मे एक दिन निश्चित कएल छनि, तखन मात्र अपने किएक छूटल रहैत छी ? अपनेक पूजा तs सब देवताक संग हेबाक चाही सूर्यपुत्र। सुरेश जरूर एहि मे देवलोकक कोनो चक्रचालि छैक। हम तऽ कहब जे अपने देवता सब कें एक बेर हड़तालक नोटिस पठा दियनु जे यमलोकक सब काज अनिश्चित काल लेल बन्द भऽ जाएत। अपनहि सब लाइन पर आबि जेताह। यमराज यमलोकक काज बन्द कऽ देबैक ? ई की बाजि रहल छी अहाँ ? रमेश काज बन्द नहि करबैक, बन्द करबाक धमकीएटा देबाक अछि देव, हमरा विश्वास अछि जे हड़तालक नोटिस भेटला पर देवलोक मे हड़कम्प मचि जेतैक आ सब अपनेक बात मानबा लेल बाध्य भऽ जेताह। सुरेश हमरा सब कें जे कहबाक छल से कहि देलहुँ देव, यदि किछु अनुचित बजा गेल हो तऽ माफ कऽ देबैक। आब अपने रस्ता देखबियौ, हम सब यात्रा लेल तैयार छी। रमेश (दूनू यमदूत कें सम्बोधित करैत) ब्रीफकेस उठा ने लएह, तकैत की छह ? दर्शक दिस घूमि कए दूनू कोरस मे एकटा समदाओन गबैत छथि जाहि मे अपन कएल समस्त अपराधक लेल जनता सँ माफी मँगैत छथि। बर रे कुदिन मे जनम हम लेलियै, पढ़ि लीखि भेलियै जवान चाकरी के फेरा मे नेता के संग धेलियै, बनि गेलियै राकस हेवान माए बापक सपना समाजक मनोरथ, माटि मे देलियै मिलाए पापक जड़ि ओहि नेता सबकें मारि कए, लेलियै यम कें बजाए चलै छी हम यमदेश सब कें कना कए, कएल बहुत संहार एहन अधम हम माफी कोना मँगबै, करबै अहीं सब विचार, करबै …. (गबैत गबैत दूनू कानए लगैत छथि, पर्दा खसैत अछि, तखने नेपथ्य मे आगि लागि जेबाक हल्ला होइत अछि। लोक सबहक भाग-दौड़ आ अग्निशमन गाड़ीक हूटर के आवाज सुनाइ पड़ैत अछि। आगिक बारे मे दू व्यक्ति द्वारा घोषणा होइत अछि – एक बहुत दुखद खबरि अछि जे वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला आ राष्ट्रीय संग्रहालय मे आगि लागि गेल। ई आगि एहन समय मे लागल जखन वैज्ञानिक अनुपम अन्य ब्रह्माण्ड जेबाक तैयारी मे लागल छलाह। तीनटा वैज्ञानिकक प्रायः तीन मासक प्रयास सँ अन्य ब्रह्माण्ड जाए बला विशेष विमान तैयार कएल गेल छल। दू वैज्ञानिक अनुपम प्रेस वार्ता मे बतौलनि जे आगि सँ भेल क्षतिक आकलन करबा मे समय लागत। आगि कोनो शत्रु द्वारा लगाओल गेल छल। राडारक आँकड़ा कें नीक जकाँ छानबीन केला सँ शत्रुक पता लागि जेबाक सम्भावना अछि मुदा राष्ट्रीय सुरक्षा नीति कें देखैत शत्रुक परिचय गुप्ते राखल जाएत। प्रथम अंक समाप्त अंक 2 दृश्य 1 मंच सज्जा मे कोनो विशेष अन्तर नहि। एकटा टेबुल आ किछु कुर्सी मंच पर राखल। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लिखल अछि ‘यमलोक’। यमराज आसन पर बैसल छथि। बगल मे चित्रगुप्त अपन खाता बही पसारने ओहि मे डूबल छथि। प्रकाश पहिने यमराज पर पड़ैत अछि तखन चित्रगुप्त पर। फेर प्रवेश पथ पर, जतए दूनू यमदूत बाहुबली मृतात्मा रमेश आ सुरेश कें लेने आबि रहल छथि। हुनका दूनूक मंचक बीच पहुँचला पर पूरा मंच आलोकित होइत अछि। दूनूक हाथ मे ब्रीफकेस छनि, से मंच पर रखैत छथि। यमराज चित्रगुप्त महराज, इएह दूनू ओ विशिष्ट बाहुबली मृतात्मा छथि रमेश आ सुरेश। हिनकर कर्मक लेखा जोखा देखि लेल जाओ। रमेश (नम्र स्वरें) धृष्टता माफ हो महाराज तऽ निवेदन करी। यदि ब्रीफकेस खोलबाक अनुमति भेटैत तऽ अपने सबहक काज आसान भऽ जाइत। यमराज अहाँ दूनू लेल जखन सब नियम कानून बदलले गेल तखन इहो कइये लिअऽ। (दूनू नीचा झुकि कए अपन ब्रीफकेस खोलि स्मार्टफोन बहार करैत छथि, ओहि मे लीखल विवरणक फाइल निकालि ओकरा चित्रगुप्त कें दैत) सुरेश एहि मे अपने कें हमरा दूनूक सबटा पापक रेकॉर्ड भेटि जाएत। हमरा दूनू द्वारा कएल गेल हत्या, अपहरण, बलात्कार, व्यभिचार आदिक विस्तृत विवरण तारीख, साल आ समय सहित लिखल अछि। रमेश ई विवरण हमरा कम्प्यूटर मे सेहो भेटि जाएत। इंटरनेट आब पूरा ब्रह्माण्ड मे उपलब्ध छैक। यदि एतए कम्प्यूटर उपलब्ध हो तs क्षणे मे सब सूचना हाजिर भs जाएत। चित्रगुप्त इंटरनेट आ कम्प्यूटर की होइत छैक ? छोड़ू ई मुरखाहा गपसप। (स्मार्टफोनक विवरण कें देखैत आ अपना खाता सँ मिलबैत) धर्मराज, विवरण तऽ ठीके नीक सँ लीखल अछि। यमराज ठीक छैक, एखन तऽ हिनका दूनू कें जल्दी अपन स्थान पठेबाक अछि तकर इन्तजाम होअए। चित्रगुप्त हिनकर कर्मक फल देखि तऽ लगैत अछि जे छियासियो नरक कुण्ड कम पड़ि जाएत। हिनका दूनू कें सब नरक कुण्डक बास भोगनाइ छनि तें कतहु सँ शुरू कऽ सकैत छी। यमराज तऽ पहिने अग्निकुण्डे मे जाथु। रमेश अनुमति हो तऽ एकटा तुच्छ निवेदन करी धर्मराज। यमराज आब की ? डराइत छी की ? सुरेश नहि धर्मराज, उखरि मे मुह देलाक बाद मुसराक कोन डर ? यमलोक मे आबि पापी कें यातनाक कोन डर ? डर होइतै तऽ लोक पाप करबे नहि करैत। हमर निवेदन दोसर अछि। रमेश हमरा दूनू कें स्नान करबाक अनुमति देल जाओ महाराज वैवस्वत। यमराज (तमसाइत) पापी नरकभोगी मृतात्मा कें स्नानक कोन काज ? ई कोन नव टाटक ठाढ़ केलहुँ अहाँ सब ? सुरेश धर्मराज, अपनेक न्याय तीनू लोक मे ख्यात अछि। बुझले होएत जे फाँसिओक सजा भेटल कैदी कें अन्तिम इच्छा पूछल जाइत छैक आ पूरा कएल जाइत छैक। रमेश ओतबे नहि, ध्यान दियौक देव जे छागड़ो कें बलि देबा सँ पहिने स्नान करा देल जाइत छैक। हमहूँ सब जखन विभिन्न नरक कुण्ड मे हजारो सालक सजा भोगए जा रहल छी तऽ ओहि सँ पहिने एक बेर नीक जकाँ स्नान कऽ लेब उचिते ने हेतैक न्यायराज। चित्रगुप्त धर्मराज, बहस मे हिनका दूनू सँ जीतब कठिन अछि। अपन चमत्कार तऽ ई सब मर्त्यलोके सँ देखा रहल छथि। तें हमर विचार जे हिनका लेल स्नानक व्यवस्था कइये देल जाए। सुरेश (चित्रगुप्तक पैर पकड़ैत) धन्य छी प्रभो। बस एकटा आर विनय जे स्नान खुला मे नहि बन्द कक्ष मे करबाक व्यवस्था हो आ ब्रीफकेस लऽ जेबाक अनुमति सेहो भेटए। यमराज बन्द कक्षक स्नानघर तऽ मात्र हमरेटा अछि, ताहि मे मृतात्माक प्रवेश सम्भव नहि। (दूनू यमदूत कें सम्बोधित करैत) जाउ कोनटा बला इनार कें घेरेबाक व्यवस्था करू। रमेश धर्मराज, नियम मे मामूली ढिलाइ सँ समयक अमूल्य बचत होइत। जतेक काल मे इनार घेरल जाएत ओतेक काल मे तऽ स्नान कऽ कए हम सब किछु घण्टा अग्निकुण्ड मे बासो कऽ लेब। एहि दृष्टिकोण सँ देखल जाओ सूर्यपुत्र। चित्रगुप्त हमरा लगैत अछि नियम मे ढील देबहि पड़त। जतेक जल्दी हिनका दूनू कें एतए सँ हटाएब ओतेक जल्दी दोसर काज शुरू कऽ सकब। ई सब जतेक काल एतए रहताह, किछु ने किछु टाटक ठाढ़ करितहिं रहताह। यमराज (दूनू यमदूत कें सम्बोधित करैत) बेस, चित्रगुप्त महराजक इच्छानुसार हिनका दूनू कें हमरा स्नानघर मे लेने जइयनु। कड़ा पहरा राखब। चिन्हिते छिएनि केहन मायावी छथि। कतहु एम्हर ओम्हर बहरा जेताह तऽ पूरा यमलोक मे हड़कम्प मचि जाएत। दूनू दूत जे आज्ञा देव। (दूनूक ब्रीफकेसक संग दूनू कें स्नानघर दिस लऽ जाइत छथि।) चित्रगुप्त हमरा लक्षण किछु नीक नहि लागि रहल अछि। ई सब धरती पर पापो केलक अछि, जतेक जे काज केलक से अनायासे नहि, खूब सोचि विचारि कए केलक, ओकर क्रमबद्ध रेकॉर्ड सेहो तैयार केने अछि जे सत्ते मे हमरा खाता सँ नीके छैक, हरदम विचित्र माँग रखैत अछि जकरा एकदम अनुचितो नहि कहि सकैत छिऐक। यमराज अपने तऽ ई खेला एखन देखलियैक अछि, हम तऽ कतेक काल सँ देखि रहल छी। एही खेलाक कारण ने हमरा मर्त्यलोक जाए पड़ल आ फेर दौड़ि कए देवलोक आबए पड़ल मंत्रणा लेल। (किछु खियाल करैत) स्नान मे बहुत देरी लगौलक ई दूनू। (एतबे मे एक यमदूत दौड़ल अबैत अछि एकदम परेशान भेल) दूत-एक जुलुम भऽ गेल धर्मराज, ओ दूनू एकहि संग स्नानघर मे प्रवेश कऽ गेल दूनू ब्रीफकेसक संग। एतेक देरी लागि गेलैक मुदा बहराइते नहि अछि। तें अपन संगी कें पहरा पर राखि हम दौड़ल एलहुँ अपने कें सूचित करै लेल। यमराज चित्रगुप्त महराज, आब की होएत ? एहि मायावी मृतात्माक कोनो ठेकान नहि। चित्रगुप्त कने देखि लेल जाओ, यमलोक सँ भागत कतए ? (ताबत पाछू मे दोसर दूतक संग रमेश आ सुरेश आबि कए ठाढ़ भऽ जाइत छथि, दूनूक हाथ मे एकटा पैकेट छनि।) रमेश अपने सबहक समय बचबै लेल एके बेर स्नानघर मे प्रवेश कएल धर्मराज। कोनो कुण्ड मे पठेबा सँ पूर्व एकटा तुच्छ अनुरोध मानल जाओ देव। यमराज आबहु अहाँ सभक बखेराक अन्त नहि भेल अछि ? सुरेश नहि देव, बखेरा कोनो नहि, मात्र एतबे जे मर्त्यलोकक ई छोटछीन उपहार स्वीकार कएल जाओ जे हम सब अपना ब्रीफकेस मे लेने आएल छलहुँ। (रमेश अपन पैकेट यमराज कें आ सुरेश अपन पैकेट चित्रगुप्त के दैत छनि) यमराज (पैकेट कें निहारैत) एकर की प्रयोजन ? रमेश उपयोग केलाक बाद एकर गुण अपनहि बूझि जेबैक महाराज वैवस्वत। चित्रगुप्त (पैकेट कें चारू कात घुमा कए देखैत) एकरा की करबाक छैक ? सुरेश एकर उपयोग अपने शयनकक्ष मे करबैक देव। पैकेट मे देखियौ एकटा टोंटी छैक। राति मे शयन कक्ष मे विश्राम करबा काल पैकेट सँ वस्तु कें बहार कए ओहि टोंटी कें सेहो खोलि देबैक। किछु काल बाद ओ पसरि जेतैक आ किछु बाजऽ लागत। ध्यान सँ सुनबैक आ जेना कहल जाए तहिना करबैक। यदि कोनो तरहक गड़बड़ी लागए तऽ टोंटी कें मुह बन्द कऽ देबैक। ओ वस्तु फेर अपन पुरान अवस्था मे आबि जाएत। यमराज आर किछु ? रमेश नहि देव, हम सब तैयार छी, पठाउ जाहि कुण्ड मे आदेश हो। सुरेश (रमेशक हाथ धरैत) अग्निकुण्डक आदेश तऽ भइये गेल छैक, चलऽ ने अपनहि पुछैत पुछैत चलि जाएब। बुझले छहु ओतए सौ हाथ उपर धधरा उठैत हेतैक। (विदा हेबाक उपक्रम करए लगैत अछि) चित्रगुप्त आब अहाँ सब किछु बेसिए हड़बड़ाएल लगैत छी। थम्हू, हमरा खाता मे नाम पता लिखऽ दिअऽ, एतए औंठा छाप दियौक। ई आदेशपत्र लऽ कए दूत लोकनि जेता अहाँक संग, ओतुका अधिकारी कें देथिन, ओ फेर औंठा छाप लेताह मिलबै लेल जे कतहु कोनो मृतात्माक अदलाबदली तऽ ने भऽ गेल। तकर बादे कुण्ड मे खसाओल जाएत। रमेश दूटा निवेदन स्वीकार करियौ देव — पहिल जे औंठा छाप नहि लऽ कए दस्तखत लेल जाओ, हम सब तऽ उच्च शिक्षाप्राप्त छी। आब मर्त्यलोक मे सब साक्षर भऽ गेल छैक। दोसर जे हमरा दूनू कें कुण्ड मे खसबैक कोनो काज नहि, हम सब अपनहि खुसी खुसी कूदि जेबै ओहि मे। यमराज दस्तखत तऽ आइ तक कियो करबे नहि केलक, हमरा इहो नहि बूझल अछि जे ओतुका अधिकारी लोकनि कें दस्तखत मिलान करबए अबैत छनि की नहि। सुरेश अपने सब फोटो लेबाक व्यवस्था किएक ने रखैत छी ? कोनो तरहक झंझट नहि, फोटो देखू, मिलाउ। कोनो अदलाबदलीक सम्भावना नहि। चित्रगुप्त (खिसिया कए) ई यमलोक छिऐक, मर्त्यलोक नहि। एतए वैज्ञानिक आविष्कार नहि भऽ रहल छैक, मात्र पापी मृतात्मा कें सजा देल जाइत छैक। रमेश हम सब नीके लेल कहलहुँ देव, कोनो बात नहि, सुरेश, छोड़ह अपन जिद, दऽ दहक औंठा छाप आ आगू बढ़ऽ। (औंठा छाप देबा लेल हाथ बढ़बैत छथि, चित्रगुप्त हुनकर औंठा छाप लैत छथि, तकर बाद दोसर कागत पर सुरेशक औंठा छाप सेहो लैत छथि, दूनू कागत दूतद्वय कें दैत) चित्रगुप्त हिनका दूनू कें सम्हारि कए अग्निकुण्ड तक लेने जइयनु, ओतुका अधिकारी कें सब बात नीक जकाँ बुझाए देबनि नहि तऽ ई दूनू ओतहु कोनो टाटक ठाढ़ करताह। (दूनू यमदूतक संग रमेश आ सुरेशक प्रस्थान) यमराज एक उखराहा मे मात्र दूटा मृतात्मा कें निपटाओल। एना जॅं स्थिति आगुओ भेल तऽ यमलोकक कार्यालय बन्दे भऽ जाएत। चित्रगुप्त आब आइ कोनो काज करबाक मोन नहि अछि। जाइ विश्राम करी, अहूँ विश्राम करू धर्मराज। यमराज आजुक संध्या तऽ ओहुना एहि मायावी पैकेट कें बुझबा मे बीत जाएत। चित्रगुप्त से ठीके। हमरा तऽ डर लगैत अछि जे ई सब कोनो षडयंत्र ने रचने होअए अपना सब कें बुड़िबक बनबै लेल। यमराज की कहू ? ओतए जखन देवलोक सँ मीटिंग के बाद पहुँचलहुँ तऽ देखल जे दूनू दूत ओएह डायरी बला डिब्बा मे किछु देखि रहल अछि। ततेक तल्लीन छल जे हमरा पहुँचबाक कोनो सुधि नहि भेलैक ओकरा दूनू कें। हम ओ डिब्बा छीन कए जे देखल तऽ आश्चर्यचकित रहि गेलहुँ। एतेक छोट डिब्बा मे एकटा अर्धनग्न युवती बन्द आ कूदफान करैत। चित्रगुप्त (किछु नहि बुझबाक भाव चेहरा पर) किछु बुझबा मे नहि आबि रहल अछि एकरा सबहिक खेला। देखियौ राति मे ई डिब्बा कोन करतूत देखबैत अछि। यमराज बेस, आब चलल जाए। (अपन अपन उपहारक डिब्बा सम्हारने दूनू गोटेक प्रस्थान, मंच अन्हार) दृश्य 2 मंच सज्जा मे कोनो परिवर्तन नहि। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर ओहिना लीखल छैक ‘यमलोक’। यमराज मंच पर एम्हर ओम्हर टहलि रहल छथि। प्रकाश हुनका चेहरा कें आलोकित करैत अछि जाहि सँ हुनकर अति प्रसन्न मुद्रा देखाइत अछि। यमराज (स्वतः) अद्भुत अछि ई मानव जाति। की की आविष्कार केलक अछि आ केहन गुण बला सब जे देवलोकक सब देवी, देवता, अप्सरा, गन्धर्व ओकरा सबहक नोकर नोकरनीओ बनबा जोगर नहि छथिन। (किछु रुकि कए, एम्हर ओम्हर टहलैत आ देखैत, मूड़ी नीचा झुकौने, प्रकाश हुनका मात्र आलोकित करैत) एकटा छोट डिब्बा मे बन्द वस्तु, की नाम दियैक सेहो नहि बूझल अछि मुदा कतेक लुरिगर ! उर्वशी मेनका रम्भा तऽ कात जाथु, कामदेव प्रिया रतियो कें एतेक लूरि आ अनुभव हेतनि से कहब कठिन। स्वर कतेक मधुर ! अंग संचालन मे केहन चतुर ! लगैत अछि ऋषि वात्स्यायन सबटा ज्ञान एहि पुतरा मे भरि देलखिन। को विहातुं समर्थः ? ककरा ने हेतैक जे हरदम ओकरे सानिद्ध्य मे बैसल रही अथवा छाती सँ लगौने रहियै। (रमेश आ सुरेशक अदृश्य भेल प्रवेश। जेना पर्दाक पाछू सँ बजैत हो। दूनू कातक प्रवेश पथ पर अदृश्य भेल ठाढ़।) रमेश बुझाइत अछि धर्मराज मर्त्यलोकक उपहार अपने कें पसिन्न पड़ल। यमराज (चारू कात तकैत आ अकानैत) अहाँ के बजैत छी ? सुरेश उचित समय पर सबटा बूझि जेबैक धर्मराज, एखन एकरा रहस्ये रहए दियौक। (पारम्परिक वेश मे वीणाक संग नारदक प्रवेश, मंच पूरा आलोकित होइत अछि।) नारद नारायण, नारायण ! यमराज स्वागत देवर्षि। आउ, आसन ग्रहण कएल जाओ। (कुर्सी दिस इशारा करैत, दूनू गोटे बैसैत छथि) कोना एमहर आबि गेलियै ? नारद ओहिना यमलोकक हालचाल बुझबा लेल। ककरा सँ गप कऽ रहल छलहुँ धर्मराज ? यमराज कियो देखा नहि पड़ि रहल अछि मुनिश्रेष्ठ। हमहूँ नहि बूझि रहल छिऐक। एहन आवाज प्रथमे सुना रहल अछि। यमलोक मे ओहि दूटा विचित्र मृतात्माक एला सँ एहन आभास भऽ रहल अछि जे किछु उलटफेर होमए जा रहल अछि। रमेश (नारद कें सम्बोधित करैत) बाबा, फेर गेल छलियै मर्त्यलोक दिस? नारद अहाँ के बजैत छी ? प्रकट किऐक नहि होइत छी? सुरेश हम सब प्रकट भऽ जाएब तँ अहाँ कें दाँती लागि जाएत यौ बाबा। तें एखन एहिना रहए दियौ। उचित समय पर सब बात बूझि जेबै। एखन हमरा प्रश्नक उत्तर दियऽ। (नारद चुप्पे रहैत छथि) रमेश अहाँ की बुझलियै जे चुपचाप आकाश मार्ग सँ जा कए वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला मे आ राष्ट्रीय संग्रहालय मे आगि लगा देबै तऽ ओहि वैज्ञानिकक सबटा कएल धएल नष्ट भऽ जेतैक ? हाय रे बकलेल बाबा ! सुरेश एकटा बात ध्यान राखब बाबा। मानव सभ्यता बहुत विकसित भऽ गेलैक अछि, रामायण महाभारतक जमाना नहि रहलैक। पूरा ब्रह्माण्ड मे बीसो तह मे नुकाएल एकटा बगरो यदि पाँखि हिलेतै तकरो संकेत मर्त्यलोक मे राडार पर देखाइये जेतैक। रमेश अगिला बेर यदि फेर धरती पर पएर रखबै बाबा तऽ पाछू मे लोक लगा देत डाबा आ जहिना सामा चकेबाक चुगला कें लोक आगि लगबैत छैक तहिना दाढ़ी मे किरासन तेल चोपकारि कए आगि लगा समूचा घुमाओत। नारद (बहुत घबराएल, यमराज कें सम्बोधित करैत) वैवस्वत, किछु बूझिए नहि रहल छी जे मर्त्यलोकक घटनाक खबरि यमलोक मे कोना पहुँचि गेलै ? (हुनका कान मे किछु कहैत छथि) सुरेश बाबा, उत्तर धर्मराज कोना देताह, हमहीं सब देब। मोन पारियौ बाबा जखन वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला मे गेल छलियै तखन ओ की सब कहने छलाह आ की सब देखेने छलाह। रमेश बाबा, अनठबैत छिऐक तऽ हमहीं सब मोन पाड़ि दैत छी। ओ कहने रहथि जे एकटा स्मार्टफोन होइत छैक जाहि सँ ब्रह्माण्ड मे कतहु बातचीत कएल जा सकैत छैक, समाद आ फोटो आदि पठाओल जा सकैत छैक। सुरेश हमरा सब कें ओएह वैज्ञानिक खबरि पठौने छलाह बाबा। खैर, एहि बात कें एखन कात जाए दियौक। एखन हम सब जे कहैत छी से दूनू गोटे ध्यान सँ सुनैत जइयौ। रमेश हम सब समस्त नरक कुण्डक भ्रमण कएल अछि धर्मराज। जेना कि हमरा अन्दाज छल, सब कुण्ड पर लगाओल पहरेदार अपना मे मस्त कतहु चौपड़ि, कतहु लूडो, कतहु ताश आदि खेलाइत। ककरो ध्यान कुण्ड दिस नहि छलैक। लगैत छल जेना मर्त्यलोक मे अपना देशक अकर्मण्य पुलिस सब कें देखि रहल छी। सुरेश कुण्ड सबहक हालत की कहू ? लगैए युग युग सँ एकर निरीक्षण नहि भेलैक। सब अधिकारीगण अपना अपना मे मस्त, घमण्ड मे चूर। कहैए लेल ओ सब पापात्मा कें कुण्ड मे पीटैत रहैत छथिन। हम सब ककरो किछु करैत नहि देखलियै। खानापूरी करैक लेल दिन मे एक बेर आ राति मे एक बेर डंडा चला देलनि, कोनो अभागल कें चोट लगलैक, बाँकी सब बाँचि गेल। रमेश अग्निकुण्ड मे जारनि उसकैनिहार सेहो ओंघाइत छल, फल ई जे ओहि कुण्ड मे शुरू शुरू मे जे धधरा एक सौ हाथ उपर उठैत छलैक से एखन कहुना मात्र जड़ि रहल छैक। धधरा उपर किएक उठतैक ? सुरेश तहिना दोसरो कुण्ड सबके हाल बेहाल। मूत्र कुण्ड आधा सँ बेसी सुखाएल, बिटकुण्ड मे सबटा बिष्टा सुखा गेल, अश्रुकुण्ड, शुक्रकुण्ड, मज्जाकुण्ड सब तहिना मात्र नाम लेल अश्रु, वीर्य आ मज्जा सँ भरल। तैलकुण्ड मात्र सुसुम गरम। धर्मराज, अपने स्वयं सम्भवतः बहुत दिन सँ कुण्ड सबके निरीक्षण नहि केलियैक अछि। यंत्रणा योग्य पदार्थक आब मर्त्यलोक सँ आपूर्ति सेहो सम्भव नहिए बूझू। यमराज (अकचकाइत) से किएक ? रमेश आब पृथ्वी पर राजतन्त्र तऽ रहलैक नहि जे राजाक आज्ञा सँ सब काज हेतैक। ओतए आब जन प्रतिनिधि होइत छथि से अहाँक आज्ञा मानताह कि अपन वोटरक बात सुनथिन। वैज्ञानिक लोकनिक अनुसंधानक फलस्वरूप सब तरहक मल मूत्र, रक्त, मज्जा आदि सँ अति उपयोगी पदार्थ सब बनि रहल छैक। तें जनता ओकरा बाहर पठबए नहि देतैक। नारद बात तऽ ठीके कहैत छथि। रमेश आर सुनू। कुण्ड सब जहिया बनाओल गेल, कोनो तरहें बुद्धिक उपयोग नहि कएल गेल। सोचियौक जे अग्निकुण्ड मे अनेरे एक सौ हाथ ऊँच धधरा उठैत छैक तकर की प्रयोजन ? सुरेश कुण्ड मे जे मृतात्मा फेकल जाइत अछि से तऽ चल गेल नीचा। ओतए ओकरा जतेक धधरा आ ताप लगबाक छैक से तऽ लगबे करैत छैक ओहि सँ बेसी यंत्रणा तऽ हेतैक नहि। जे धधरा उपर उठैत छैक ओकर ताप अनेरे नष्ट होइत छैक। प्रदूषण बढ़ैत छैक। ओहि लेल जतेक जारनि खर्चा होइत छैक से निरर्थक। रमेश जारनि लेल अपने जंगल कटबैत छिऐक जाहि सँ पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत छैक। जारनि जड़ैत रहला सँ ब्रह्माण्ड मे ताप बढ़ैत रहतैक जाहि सँ यमलोको प्रभावित हेबे करत। यमराज एहि दृष्टिकोणे तऽ हम सब कहियो सोचबे नहि केलियैक। सुरेश सब कुण्डक दशा तहिना अछि। एकटा अछि कुम्भीपाक कुण्ड, तकरा एक लाख मर्द गहींर बना देने छिऐक, भस्मकुण्ड, दग्धकुण्ड डेढ़ हजार मर्द गहींर अछि, बूझू कथी लेल ? सस्ता पैसा आ बेगारक मजदूर छल, खुनबैत गेलियै, खुनबैत गेलियै, कहियो ई नहि सोचलियै जे एकर प्रयोजन की ? रमेश सब चीजक एकटा उचित आ विशिष्ट डिजाइन होइछै। ओहि अनुसारें बनेला सँ यातना सेहो अधिकतम होइतै आ खर्च सेहो कम। आ रखरखाबक खर्चा आर न्यून रहैत। की यौ नारद बाबा, चुप किएक छी, हम सब अनर्गल गप बजैत छी की ? नारद (बहुत मद्धिम स्वरें) बात तऽ ठीके कहैत छी अहाँ। सुरेश एकटा आर महत्वपूर्ण गप अछि काल सम्बन्धित। अपने सँ बेसी ई बात के बुझतैक धर्मराज जे यमलोकक नियम कानून सतयुग मे लिखल गेल छलैक जखन कियो कियो पातकी होइत छल। यमराज से तऽ ठीके। जखन विभिन्न लोकक निर्माण भेलैक तखने यमलोक आ देवलोक अस्तित्व मे एलैक। आ सब नियम कानूनो ओही समय लिखल गेल रहैक। रमेश हमरा सबहक विचारें आब कलियुग मे एहि नियम सब मे आमूलचूल परिवर्तनक आवश्यकता छैक। मर्त्यलोक मे समाज मे बहुत परिवर्तन आबि गेलैक अछि। जकरा सौ साल पहिने समाज गलत काज मानितैक तकरा आइ खुशी खुशी अंगीकार कऽ रहलैक अछि। सुरेश जखन समाज अपनहि नियम बदलि रहलैक अछि आ देशक संविधान सेहो निरन्तर संशोधित भऽ रहलैक अछि तखन हजारो साल पुरान नियम यमलोक मे किएक चलाओल जाए ? यमराज बात तऽ अहाँ तर्कसंगत कऽ रहल छी। हम सब जड़ताक शिकार भऽ गेलहुँ तें परिवर्तनक कोनो बात कहियो सोचबे नहि केलियैक। रमेश महाराज ओदुम्बर, यदि अपने यमलोकक साम्राज्य कें एखनहुँ प्रभावी आ प्रासंगिक बनौने राखए चाहैत छी तऽ ई गुह मूत गिजबाक व्यवसाय छोड़ू। धरती पर आब लोक कें एहि खिस्सा सब सँ भय नहि होइत छैक तें पापीक संख्या मे एतेक वृद्धि भऽ रहलैक अछि। सुरेश सबटा कुण्ड कें नष्ट कऽ कए एकदम अत्याधुनिक यातना शिविर सब बनाउ जाहि मे वायरलेस शॉक, लेजर ब्लाइन्डिंग, ग्रैविटी टॉर्चर, सोलर फ्राइ आदिक व्यवस्था रहतै। रमेश एहि काज कें मूर्त रूप देबा लेल अति महत्वपूर्ण अछि जे तत्काल प्रभाव सँ वर्तमान नियम स्थगित कऽ देल जाए। नव संविधान निर्माण लेल कमेटी बनाओल जाए। सुरेश दोसर जे कलियुगक उत्तरार्ध मे एखन पापीक संख्या मे गुणोत्तर वृद्धि हेतैक से यमलोकक विस्तार हेबाक चाही। यमलोकक विस्तार लेल देवलोक सँ अतिरिक्त जमीन आबंटन कराउ। नव निर्माण मे मर्त्यलोकक आर्किचेक्ट, इंजीनियर सब सँ मदति लेबाक व्यवस्था कराउ। बेस, आब हम सब चलै छी। (आवाज बन्द) नारद की सोचलियैक वैवस्वत ? हमरा तऽ लगैत अछि ई आवाज झूठ फूसिक धमकी छल। यमराज किछु फुराइये नहि रहल अछि। हम एकरा धमकी मानै लेल तैयार नहि छी, बात तऽ सटीक कहलक। हम सब विचित्र दशा मे आबि गेल छी देवर्षि। नारद से की ? यमराज पापक दंड लेल ओहि दूनू मृतात्मा कें पहिने अग्निकुण्ड पठेबाक विचार भेल। मुदा कुण्ड मे जेबा सँ पहिने ओ दूनू बन्द घर मे स्नान केलक। आ बाहर एलाक बाद हमरा आ चित्रगुप्त महाराज कें एक एक टा पैकेट उपहार देलक। नारद अजगुत बात जे मृतात्मा स्नान केलक, पैकेट उपहार देलक। की छलैक ओहि मे ? यमराज कोना कहू ? ओहि पैकेट मे मर्त्यलोकक नैवेद्य मिष्टान्न किछु नहि छलैक, छलैक एकटा पुतरा जे अपन रूप बदलि सकैत छल। ओ पुतरा अति मधुर नारी स्वर मे बजैत छल। आगू कहैत लाजो लगैत अछि। नारद से की ? यमराज संकेते सँ बूझि लेल जाओ मुनिश्रेष्ठ। नारद (स्मित हास्य दैत) उपभोग करू धर्मराज, आब चलैत छी। यमराज कालि दुपहरिया मे चित्रगुप्तक संग देवलोक आएब मंत्रणा करबा लेल। (दूनूक प्रस्थान, प्रकाश बन्द) दृश्य 3 मंच सज्जा ओहिना, टेबुलक पाछू छओटा कुर्सी अर्धवृत्ताकार रूप मे लागल। डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर लिखल अछि ‘देवलोक’, तीनू देव बीच मे बैसल छथि। अत्यधिक चिन्तित मुद्रा मे नारदक प्रवेश। प्रकाश क्रम सँ चारू कें आलोकित करैत अछि। तखन धीरे धीरे पूरा मंच आलोकित होइत अछि। नारद नारायण, नारायण, सब सत्यानास भेल जा रहल अछि। विष्णु पहिने आसन ग्रहण कएल जाओ मुनिश्रेष्ठ। (नारद ब्रह्माक बगल मे कुर्सी पर बैसैत छथि) बहुत चिन्तित देखैत छी। किछु विशेष बात ? नारद देव लोकनि, मोन हेबे करत किछु दिन पूर्व यमराज दूटा मृतात्माक सम्बन्ध मे एकटा विचित्र प्रस्ताव अनने छलाह। हम सब ओहि मृतात्मा कें मर्त्यलोक सँ किछु सामान अनबाक स्वीकृति दऽ देने छलियै। महेश हँ, ओ प्रस्ताव तऽ सर्वसम्मति सँ पास भेल छलैक। नारद ठीक, मुदा जेना हम कहने छलहुँ, ओहि सामान कें हम सब चीन्हि नहि सकबैक। ओहि मे की छलैक आ ओकर देवलोक पर की प्रभाव हेतैक से एखनहुँ हम नहि बुझैत छी मुदा किछु अप्रत्याशित घटना घटि रहल अछि जरूर। विष्णु कने फरिछा कए कहू। नारद ओहि मृतात्माक एलाक बाद ओकरा सब कें अग्निकुण्ड पठा देल गेलैक। मुदा ताहि सँ पहिने ओ सब बन्द घर मे स्नान केलक। ब्रह्मा यमलोक मे आबि मृतात्मा बन्द घर मे स्नान केलक ! आश्चर्य घटना जे कहियो नहि भेल छल। नारद ओतबे नहि, तकर बाद आबि कए यमराज आ चित्रगुप्त कें एकटा पैकेट उपहार देलकनि। ओ उपहार केहन छलैक से तऽ हुनके सब सँ सूनब। महेश ओ दूनू गोटे उपहार राखि लेलनि ? कने बएन एम्हरो पठा दितथि तऽ हमहूँ सब स्वाद चिखितहुँ। नारद कने दम धरू उमापति, ओ दूनू आबिए रहल छथि। ओतबे नहि, ओ सब अग्निकुण्ड मे जेबा काल सेहो किछु नाटक केलक। विष्णु अच्छा ? नारद एकरो विस्तृत वर्णन हुनके सब सँ सूनब। मुदा हम कालि यमलोक मे बड़ अजगुत देखल। महेश खिस्सा बहुत रोचक बनि रहल अछि, कने फरिछा कए कहियौ देवर्षि। नारद कालि ओहिना उत्सुकतावश यमलोक गेल छलहुँ जे यमराज सँ ओहि दूनू मृतात्माक हालचाल पूछी। ओतए जे देखल से अविश्वसनीय छल। ब्रह्मा एहन की देखलियै मुनिश्रेष्ठ ? नारद जखन हम प्रवेश कएल तऽ देखल जे यमराज सँ कोनो दूटा अदृश्य आत्मा गप कऽ रहल अछि। ओ सब प्रकट नहि होमए चाहैत छल। ओ हमरो चिन्हैत छल। विष्णु अपने कें तीनू लोक मे के नहि चिन्हत देवर्षि ? नारद से बात नहि चक्रपाणि, हम जखन मर्त्यलोक गेल रही तखन छद्मवेश मे। तकर बाद हाल मे एक बेर फेर गेल छलहुँ मुदा किछु विशेष कार्य सँ जाहि मे ककरो सँ भेंट करबाके नहि छल। महेश चुपेचुपे एतेक मर्त्यलोक भ्रमण किएक देवर्षि ? नारद ओ खिस्सा बाद मे कहब। एखन तऽ बूझि लेल जाओ जे ओ दूनू मृतात्मा मर्त्यलोक सँ लगातार सम्पर्क बनौने रहैत अछि। ब्रह्मा यमलोक मे अग्निकुण्ड मे पड़ल आत्मा कोना मर्त्यलोक सँ सम्पर्क बना सकैत अछि ? ई तऽ अबूझ पहेली भेल मुनिश्रेष्ठ। नारद वैज्ञानिक प्रगति जे हम देखल ताहि सँ ई सम्भव छैक चतुरानन। मुदा ओ बात एखन कात रहए दियौक। सूनू यमलोकक खिस्सा। महेश सुनबा लेल व्यग्र भेल छी देवर्षि। नारद ओ दूनू अदृश्य आत्मा हमरा दूनू कें बहुत डरा धमका देलक। यमलोकक वर्तमान स्थितिक ओ सब पूर्ण जानकारी रखने छल जेना पूरा इलाका मे ओ सब घुमैत रहल होअए। ब्रह्मा कुण्ड मे पड़ल आत्मा कोना बाहर आबि गेल, कोना समूचा इलाका घूमि लेलक ? कुण्ड मे पहरा नहि छलैक ? नारद से तऽ यमराज सँ पूछि लेब प्रजापति। एतेक जरूर जे ओ सब जाहि तर्कें बाजि रहल छल से सब ओहिना नकारल नहि जा सकैत छलैक। ओकरा तर्क मे औचित्य छलैक आ सब बात मर्त्यलोकक आधुनिक वैज्ञानिक विकासक अनुभव सँ प्रेरित छलैक। विष्णु की मानव सत्ते देवलोकक विजय अभियानक तैयारी कऽ रहल अछि ? (महेश दू बेर डमरू बजा दैत छथि, जेना कोनो युद्धक बिगुल होए) नारद तेहन सन तऽ नहि लगैत अछि। देवलोक ओकरा सब लेल कोनो चैलेंज नहि छैक। ओ सब तऽ ब्रह्माण्डक अन्यान्य ग्रह नक्षत्र पर पहुँचिए गेल अछि। आ अन्य ब्रह्माण्ड पर जेबाक तैयारी मे लागल अछि। (चित्रगुप्तक संग यमराजक प्रवेश) यमराज त्रिमूर्ति कें हमर दंडवत प्रणाम स्वीकार हो। विष्णु अबैत जाउ, आसन ग्रहण करैत जाउ (कुर्सी दिस इशारा करैत, यमराज, चित्रगुप्त दूनू कातक कुर्सी पर बैसैत छथि, चित्रगुप्त अपन खाताबही टेबुल पर रखैत छथि) कहल जाए धर्मराज, कोन विशेष प्रयोजन सँ एखन उपस्थित भेलहुँ ? यमराज विशेष प्रयोजन भेल यमलोक मे घटैत किछु विचित्र घटना सँ देवलोकनि कें अवगत कराएब आ शिथिल होइत प्रशासन पर किछु चर्चा। महेश आ मर्त्यलोकक उपहारक चर्चा नहि करबै ? यमराज पहिने चित्रगुप्त महाराज सँ हुनकर अनुभव सूनि लेल जाओ देवलोकनि। विष्णु सुनबा लेल तैयारे छी। चित्रगुप्त खिस्सा ओहि दू विचित्र मृतात्मा सँ सम्बन्धित अछि। ओ दूनू अपना पेटी मे डायरी जकाँ एकटा यंत्र अनने छल जाहि मे अपन सब कुकृत्यक विस्तृत विवरण लिखने छल। आ से एहन नीक ढंग सँ जे ओकरा देखिते हमरा अपना लूरि पर लाज होमए लागल। ब्रह्मा (आश्चर्य प्रकट करैत) से की ? अपने सन लेखाकार तीनू लोक मे नहि अछि तखन ओहि मर्त्यलोकक अदना जीव एतेक कोना सीखि लेलक ? चित्रगुप्त हमरहु एकर उत्तर नहि भेटल अछि प्रजापति। एकेटा सम्भावना अछि — युग युग सँ हम सब शिथिलताक शिकार भेल छी। कहलनि ओहि दिन महादेव ठीके जे हम सब मानि बैसल छलियै सब लूरि मे सर्वोत्तम छी आ नव किछु कतहु भैए नहि सकैत छैक। ओही प्राचीन पद्धति कें कनहा पर टॅंगने हम सब एतए बैसि अपना अभिमान मे डूबल रहलहुँ आ धरती पर ई तेज बुद्धि बला मानव जाति की की ने विकसित कऽ लेलक। विष्णु वैज्ञानिक आविष्कारक किछु झाँकी तऽ नारदमुनि देखि आएल छथि मुदा लेखाकृति मे सेहो एतेक प्रगति भऽ गेलैक ई नव सूचना भेल। एहि सँ अपने कें चिन्तित हेबाक कोन काज ? ओ हमरा सब कें चैलेंज तऽ नहिए करत। चित्रगुप्त से बात नहि, मुदा विकसित सभ्यता सँ डर तऽ हेबाके चाही ने चक्रपाणि। नित्यप्रति ओहि मृतात्माद्वय लऽ कए कतेको अजगुत बात भऽ रहल अछि जे पहिने कहियो नहि देखने छलियैक। ब्रह्मा से तऽ ठीके, किछु नारदमुनि एखनहि सुना देलनि। मुदा हम धर्मराज सँ पुछैत छिएनि जे कुण्ड मे पड़ल आत्मा बाहर कोना आबि गेल आ समूचा इलाका मे टहलि लेलक। ओतए पहरा देनिहार की करैत छल ? यमराज कुण्ड मे दूनू मृतात्मा पड़ले अछि प्रजापति। हमरा सबहिक प्रशासन मे कतहु कोनो ढिलाइ नहि भेल अछि। हम सब किछुओ नहि बूझि रहल छी जे ओहि सँ अलग दूटा अदृश्य मृतात्मा कोना आबि गेल। विष्णु किछु मथदुक्खी जरूरे अनलक अछि ई घटना सब। एकर जाँच पर विचार हेतैक। अपने किछु प्रशासनिक चर्चा करए चाहैत छलहुँ धर्मराज। यमराज यमलोकक प्रशासन मे शिथिलता आबि रहल अछि देव। ब्रह्मा धर्मराज सन न्यायप्रिय शासक आ चित्रगुप्त सन लेखाकारक अछैत ई शिथिलताक चर्चा किएक ? यमराज प्रशासन मे शिथिलता आबि रहल अछि चतुरानन कारण युग परिवर्तनक संग हमरा लोकनिक न्याय व्यवस्था परिवर्तित नहि भेल। हम सब कलियुगक उत्तरार्द्ध मे आबि गेल छी आ व्यवस्था सतयुगे बला रखने छी। महेश (डमरू बजबैत) एकदम ठीक, हम तऽ कहब जे व्यवस्था शीघ्र बदलब परम आवश्यक। यमराज दूटा बात पर ध्यान देल जाओ प्रभो – एक तऽ भेल यमलोकक आकार। यमलोक कें जे जमीन आबंटन भेल से सतयुग मे। ओहि समय पातकीक संख्या न्यून छल। तें यमलोक कें कम हिस्सा भेटलैक। ब्रह्मा ई तऽ ठीक मुदा आब एहि मे कोना संशोधन सम्भव छैक ? यमराज आजुक तारीख मे यमलोक मे आबऽ बलाक संख्या हजारो गुणा बढ़ि गेल अछि, संगहिं पापक जे परिभाषा हम सब रखने छी ताहि अनुसार ओकरा सबकें यमलोक मे बहुत दिन तक रहए पड़ैत छैक। फल ई भेलैक जे यमलोक मे सब कुण्ड मे मृतात्मा सब ठूसल रहैत अछि। बहराइत अछि एकटा आ आबि जाइत अछि दशटा। चित्रगुप्त धर्मराज ठीके कहैत छथि। हमरहु एहि स्थिति लऽ कए बेस चिन्ता रहैत अछि। विष्णु अपनेक की सुझाव ? महेश हमर तऽ विचार जे देव लोकनिक लेल एक एक बीघा जमीन राखि देवलोकक बाँकी सबटा जमीन यमलोक कें दऽ देल जाए। यमराज भोलेनाथ तऽ सब दिन क्रान्तिकारी प्रस्ताव दैत रहलखिन। मुदा हमरा ओतेक नहि चाही। अपने सब कष्ट मे रहब से हमरा कोना नीक लागत ? हम कोना कैलास पर्वत आ क्षीर सागर पर कब्जा जमाउ ? तहिना सब देव अपन फैल आवास राखथु। सुविधानुसार जे बचए से यमलोकक नाम आबंटन कऽ दियौक। ब्रह्मा मुदा एहि मे एकटा पैघ समस्या छैक – देवलोकक जमीन यमलोक कें दइयो देल जेतैक तऽ कोनो मृतात्मा ओहि भूभाग पर पैर कोना देत ? ई तऽ नियमक विरुद्ध हेतैक। महेश तें ने हम कहैत छी पहिने नियम कें बदलू। विष्णु ओहि भूखंड कें यमलोकक भाग घोषित कऽ देला पर मृतात्मा सब रहि सकताह मुदा कतेक जमीन चाही ? यमराज जतेक बिन काजक जमीन हो यथा बंजर, बलुआह, चट्टान, चऽर चांचर, सघन जंगल आदि जकर देवलोक मे कोनो उपयोग नहि छैक। महेश हमरा तऽ ई प्रस्ताव अति उत्तम लागल। जखन ओ सब अनुपयोगी जमीन लेबा लेल तैयार छथि तखन हर्जे की ? विष्णु हमरा ई प्रस्ताव मंजूर अछि। ब्रह्मा अनुपयोगी जमीन लेल हमरो स्वीकृतिए बूझल जाओ। यमराज बहुत कृपा केलिऐ देव लोकनि। ई समस्या एतेक सुगमता सँ निपटि जाएत से हमरा अन्दाज नहि छल। आब हमर दोसर प्रस्ताव सुनू। विष्णु कहियौ, हम सब तऽ बैसले छी ओही लेल। यमराज जहिना जमीन आबंटन सतयुग मे भेला सन्ताँ कलियुग अबैत अबैत असंतुलन भऽ गेलैक तहिना पाप आ धर्मक परिभाषा सेहो प्राचीन भऽ गेलैक। पृथ्वी पर मानव समाज मे बहुत परिवर्तन एलैक। राजा, जकरा लोक इन्द्रक अवतार बुझैत छल, से सबतरि हटि गेलाह। लोक अपन शासन चलेबा लेल प्रतिनिधि सब चुनलक। ब्रह्मा मुदा कर्म तऽ ओएह करैत रहल, हत्या, बलात्कार सब समय पाप रहबे करतैक। नारद सतयुग आ कलियुगक युगधर्म अलग अलग छैक देवगण। यमराज पुरान व्यवस्था मे यमलोक मे जे विभिन्न कुण्डक विधान छल ताहि हिसाबें नवका कुण्ड सब जे बनाओल जाएत ताहि लेल सामान सब कतए सँ आओत ? सूनल अछि जे मर्त्यलोक मे वैज्ञानिक लोकनि नव नव अनुसंधान द्वारा मल मूत्र आदि सँ बहुत उपयोगी पदार्थ बना रहलाह अछि तें यमलोक कें ओकर बिक्री आब नहि होएत। नारद धर्मराज ठीके कहैत छथि। ओतबे नहि मनुष्य एहन आविष्कार केलक अछि जे अपन प्रतिरूप एतए पठा देत जकरा पर शीत, ताप, गंदगी आदिक कोनो असरे नहि हेतैक। महेश देखू, हम पहिनहुँ कहने छलहुँ, आइयो कहैत छी जे देवलोक मे जड़ता आबि गेल छैक। परिवर्तन सृष्टिक नियम छिऐक। जहिना ठाढ़ जल शनैः शनैः दूषित भऽ जाइत छैक तहिना नियम कानून सेहो बेसी पुरान भेला पर बेकार भऽ जाइत छैक। नारद मर्त्यलोक मे तऽ संविधान संशोधन चलिते रहैत छैक। विष्णु बात बुझलहुँ, एहू दिशा मे कार्य हेबाक चाही। महेश हम तऽ कहब जे वर्तमान विधान कें तत्काल प्रभाव सँ स्थगित कऽ देल जाओ, नव विधान बनेबा लेल गणेश अथवा कार्तिकक अध्यक्षता आ चित्रगुप्त महराजक सचिवत्व मे एकटा कमेटी बनए जे नव नियमक संग संविधान प्रस्तुत करथि। धर्मराज अपने विशेष सलाहकार रहता। ब्रह्मा नव संविधान बनेबाक लेल समय सीमा निश्चित हेबाक चाही ने उमापति। महेश देखियौ, एतेक युगक बाद पहिल बेर नव संविधान बनाओल जा रहल छैक। पृथ्वी पर जतेक वैज्ञानिक विकास भेलैकए ताहि हिसाबें अपराधो के नव नव रूप आएल हेतैक। संगहि ओहि मे ब्रह्माण्डक अन्य ग्रह आदि पर कएल गेल अपराध सेहो जोड़ए पड़तैक कारण मनुष्य आब सबतरि पहुँचि गेल अछि। एतेक पैघ काज लेल समय सीमा कोना निर्धारित करबै प्रजापति ? नारद नव विधान लेल की स्वर्ग मे विराजमान पुरान विधि विशेषज्ञ सबहक सेवा नहि लेल जा सकैत अछि ? ब्रह्मा जेना कि ? नारद गाँधी, राजेन्द्र प्रसाद, अंबेदकर सन विधिवेत्ता सब जे छथि। महेश जरूर जरूर, ओहने व्यक्ति सब सँ नव विधान वास्तव मे नव होएत। मात्र नव कलेवर नहि, नव आत्मा सेहो। हम तऽ कहब जे एकाध वैज्ञानिक कें सेहो राखि लेल जाए जे मर्त्यलोक मे भेल वैज्ञानिक विकास सँ परिचित होथि। विष्णु ठीके कहलहुँ। वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु महोदय बैसले रहैत छथि। चित्रगुप्त पुरना नियम स्थगित रहबाक अवधि मे यमलोकक प्रशासन कोना चलए ? महेश हमरा विचारें धर्मराज कें विशेषाधिकार देल जाए, ओ स्वयं निर्णय लेथि जे कोन हिसाबें मृतात्मा सब कें रखताह आ कि छुट्टी दऽ देथिन। विष्णु बेस, इहो प्रस्ताव पासे बूझल जाओ। दू तीन दिन मे सब सदस्य लोकनि सँ सहमति लऽ कए नव कमेटीक घोषणा कऽ देल जाएत। धर्मराज अपन विशेषाधिकार एखनहि सँ प्रयोग करथु। आर किछु ? यमराज नहि देव, हमर सब समस्याक समाधान भऽ गेल। महेश आहि रे बा ! उपहारक चर्चा तऽ करबे नहि केलियै कियो ? यमराज ओ उपहार कोनो नैवेद्य मिष्टान्न नहि छल भोलेनाथ जे बएन पठबा दितहुँ। कालि ओकरा बारे मे नारदमुनि कें बताइये देने छलिएनि। हुनके सँ बूझि लेब। नारद स्पष्टे कहियौ ने सूर्यपुत्र जे मर्त्यलोक सँ एकटा मसीनी पुतरा आएल अछि जे स्वर्गलोकक सब अप्सरा कें नोरी बना कए रखबाक गुण रखैत अछि। अपन एक मधुर सम्भाषण सँ कोनो तपस्वीक तपस्या भंग करबा मे समर्थ अछि। ठीक छैक ने चित्रगुप्त महाराज ? चित्रगुप्त अपने बुझिए गेलियैक तऽ आब बेसी की कहल जाए ? महेश बर बेस, सुख भोग करू दूनू गोटे। (दर्शक दीर्घाक अढ़ सँ रंगबिरंगी लेजर प्रकाश हॉल मे फेकल जाइत अछि, ओकर रूप सेहो क्षणे क्षणे बदलैत रहैत छैक, ई लेजर ओहने छैक जेहन नारद वैज्ञानिक अनुपमक प्रयोगशाला मे देखने छलखिन। तखने ओहिना अढ़ सँ एकटा छोट ड्रोन उड़ाओल जाइत छैक जे किछु काल तक दर्शकक बीच उड़ैत रहै अछि। नेपथ्य मे विमान उड़बाक जोर सँ ध्वनि होइत छैक। महेश उठि कए डमरू बजबैत खुसी सँ नाचए लगैत छथि।) विष्णु सुदूर मे ई कोन विचित्र प्रकाश देखल हम सब ? आ एतेक जोर आवाज बला चिड़ै सेहो पहिले बेर देखि रहल छी। नारद इएह दूनू खेला हम ओहि वैज्ञानिक के प्रयोगशाला मे देखने रही। मुदा ई देवलोक मे कोना पहुँचि गेल से नहि बुझा रहल अछि। जरूर ओहि वैज्ञानिक के बदमासी छी हमरा सब कें बुझबै लेल जे ओ सब वास्तव मे ब्रह्माण्डक कोनो भाग मे जा सकैत अछि। महेश (ठाढ़े ठाढ़) जिन्दाबाद, जिन्दाबाद, मर्त्यलोकक मानव आविष्कार जिन्दावाद। (बैसि जाइत छथि) ब्रह्मा हँसी ठट्ठा नहि बुझियौ महेश्वर, कने सीरियस होउ। देवलोक पर बहुत पैघ खतरा आबि गेल अछि। हमर तऽ विचार होइत अछि जे भगवती दुर्गा कें आह्वान कएल जाए आ मानव जातिक नाश कएल जाए। ई विचार हम बहुत कष्टें देल अछि कारण बुझले अछि मानव हमर अप्रतिम सृजन अछि आ हमरा सबसँ बेसी प्रिय। महेश चतुरानन, सत्ते अहाँ सठिया गेलहुँ अछि। मानव सँ अराड़ि लेब तऽ पूजा के करत? हम अहाँक पूजा करब आ अहाँ हमर तै सँ चुलहा कोना पजरत ? छप्पन प्रकारक भोगक आदति जे लागि गेल अछि से कतऽ सँ आओत ? देवलोकक छहरमहर दुइये दिन मे खतम भऽ जाएत आ तकर बाद ठनठनगोपाल। नारद हमर कहब दोसर अछि। कोनो अभियान सँ पूर्व शत्रुक सबटा सैन्यशक्तिक पता लगा लेबाक चाही। विष्णु से तऽ ठीके। दोसर बात जे देवी महिषमर्दिनी कतोक युग सँ युद्ध मे नहि गेलीह अछि। हुनको अस्त्र शस्त्र आब बिझा गेल हेतनि। महेश मानव सँ युद्धक विचार त्यागिए देल जाए सएह होएत बुधियारी। आब कतेक दिन हम सब ओकरा ठकबै ? विष्णु देखल जेतैक, एखन मीटिंग समाप्त भेल, सब गोटे अपन अपन घर चली। (सबहक प्रस्थान, प्रकाश बन्द) दृश्य 4 मंच सज्जा मे कोनो परिवर्तन नहि, डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर आब ‘यमलोक’ लीखल छैक। यमराज आ चित्रगुप्त कुर्सी पर बैसल छथि। मंच आलोकित होइत अछि। यमराज कालि दरबार मे भेल निर्णय यमलोक आ देवलोकक इतिहास मे अभूतपूर्व रहल महालेखाकार। हमर विचार अछि जे अपन विशेषाधिकारक प्रयोग करैत सबटा मृतात्माक नरक भोग शेष कऽ दी आ हुनका लोकनि कें आगूक योनि मे पठेबाक आदेश दऽ दी। आब एक साल तक कोनो नव मृतात्मा कें यमलोक अबैक काजे नहि, सोझे अगिला जन्म मे चलि जेताह। यमलोक खाली भऽ जाएत। चित्रगुप्त अति सुन्दर विचार, हमरो काज किछु हल्लुक होएत धर्मराज। ओना हमरा फेर नव विधान बनेबा लेल व्यस्त रहहिं पड़त मुदा ओ नव अनुभव होएत तें ओहि कार्यक प्रति हम बहुत उत्सुक छी। यमराज हम अपनेक सफलताक कामना करैत छी देव। (रमेश आ सुरेशक प्रत्यक्ष रूप मे प्रवेश, दूनू यमराज आ चित्रगुप्त कें प्रणाम करैत छथि) चित्रगुप्त (दूनू कें देखि आश्चर्यचकित होइत) हिनका दूनू कें तऽ अग्निकुण्ड पठा देल गेल छल, फेर एतए कोना ? की हिनका सब कें छुट्टी भेटि गेलनि धर्मराज ? यमराज छुट्टी हम तऽ नहि देलिएनि, एखन घोषणा भेलैक कहाँ ? ई तऽ कोनो माया लगैत अछि। सुरेश माया तऽ राक्षस करैत अछि देव। मर्त्यलोकक मानव मात्र वैज्ञानिक अनुसंधान करैत अछि। समय आबि गेलैक जे सबटा रहस्योद्घाटन कऽ दी। रमेश नव आविष्कारक लूरि सँ हम दूनू अपन साइबोर्ग प्रतिरूप तैयार कएल। स्नानघर मे गेलाक बहन्ने हम सब ओहि प्रतिरूप कें बहार कऽ देल जे एखनहुँ अग्निकुण्ड मे पड़ल अछि देव। तकरा बाद एकटा अदृश्य पोशाक पहिरि हम दूनू बहरेलहुँ आ सबतरि घुमैत रहलहुँ। सुरेश बेर कुबेर जे अपने अदृश्य आवाज सुनलियै देव से हमरे दूनूक छल। अदृश्य पोशाक सेहो मर्त्यलोकक वैज्ञानिक आविष्कारे छैक देव। यमराज अच्छा तऽ एही लेल ओ पेटी संग लेने एलियै अहाँ सब ? रमेश ठीके बुझलियै धर्मराज। आब सब बात स्पष्ट भऽ गेल ने देव ? यमराज हँ, बहुत नीक। खुशीक बात जे अन्त मे एहि नाटक सँ यमलोक मे सुधार करबाक काज शुरू भऽ सकल। चित्रगुप्त उचित समय पर रहस्यक सब बात फरिछा गेल से बहुत नीक बात। रमेश महाराज वैवस्वत, हमर निवेदन जे अपन विशेषाधिकारक प्रयोग करैत हमरा दूनू कें मर्त्यलोक आपस पठा देल जाए आ हमर जे प्रतिरूप अछि तकरा एतहि अपना सेवा मे लगा देल जाओ। हमरा सब कें यमलोकक नवनिर्माण करबाक अछि धर्मराज। सुरेश एकदम मॉडर्न क्न्सट्रक्सन महाराज औदुम्बर, जाहि लेल मर्त्यलोक सँ नवका मसीन सब आनए पड़त, विशेष वस्तु सब आनऽ पड़त, रोबोट मजदूर पठबए पड़त। एतए हमर प्रतिरूप सबटा कार्यसंचालन देखत आ मर्त्यलोक सँ सामान सप्लाइक व्यवस्था हम दूनू देखबैक। यमराज एवमस्तु। रमेश एकटा आर सुझावक धृष्टता करैत छी देव, यदि अनुमति हो तऽ कही। यमराज जरूर कहू। सुरेश नव संविधान बनेबा सँ पहिने चित्रगुप्त महराज कम्प्यूटर सीखि लेथि तऽ उत्तम होइत। कम्प्युटर हम पठा देब, हमर प्रतिरूप हुनका एतहि सब किछु सिखा देतनि। आधुनिक युग मे बिना कम्प्यूटर के लेखाकृतिक कल्पनो नहि कएह जा सकैत छैक देव। रमेश हमरा सबहिक अभिलाषा अछि जे नवका यमलोक अत्याधुनिक तकनीकक प्रदर्शनी स्थल बनए। चित्रगुप्त अभिलाषा जरूर पूर होएत। यमराज कतए सँ कतए हम सब पहुँचि गेलहुँ। धन्य कही मानव जातिक वैज्ञानिक विकास कें। चित्रगुप्त चली हम सब देवलोक मे सब बातक रहस्योद्घाटन कऽ दिएनि। यमराज संगहि ईहो बुझा दिएनि जे एहि सब घटना मे मानव जातिक कोनो द्वेषभाव नहि छलैक। ओ तऽ यमलोक मे सुधार करबा लेल ई व्यूह रचल गेल छल। रमेश आ सुरेश दूनू देव कें प्रणाम करैत छथि, दूनू देवक प्रस्थान। रमेश आ सुरेश विजय मुद्रा मे, अति प्रसन्न भेल हाथ सँ V चिन्हक प्रदर्शन करैत दर्शक दिस मंच पर आगू आबि जाइत छथि। रमेश (दर्शक दिस घुरि) अपने सब बुझिए गेलियै जे हमरा दूनूक एहि विशेष अभियानक उद्येश्य छल नरक विजय। अभियान सफल भेल। आब नरक मे कोनो मृतात्मा नहि रहताह आ ने एखन कियो ओतए जेताह। हम दूनू गोटे धरती पर घुरि रहल छी। ई विज्ञानक चमत्कारे छल जाहि सँ हम सब यमलोक मे सुधार करबा सकलहुँ। सुरेश वैज्ञानिक अनुपम अमितक सहयोग सँ हम दूनू साइबोर्ग प्रतिरूप बनौनाइ आ रोबोट एसेम्ब्ली सीखल। हुनके प्रयासें अदृश्य होइबला कपड़ा लेल। यमराज आ चित्रगुप्त कें जे उपहार देलिएनि से रोबोट अप्सरा छल। बाँकी बात तऽ अपने सब सुनिये लेलियै। (तखनहि वैज्ञानिक अनुपम अमितक प्रवेश) वैज्ञानिक (दर्शक दिस देखि) चमत्कार देखू जे आब हम अपन विशेष यान सँ दूनू शिष्य रमेश आ सुरेश कें अभियानक सफलता पर बधाइ देबा लेल सशरीर यमलोक पहुँचि गेलहुँ। (रमेश, सुरेश हुनका पएर छूबि प्रणाम करैत छनि, ओ दूनू कें छाती सँ लगा पीठ थपथपबैत छथि) हमरा आशा नहि छल जे अहाँ दूनू गोटे एतेक नीक तरहें अभियान कें सफल बनाएब। रमेश सब अपनेक सहयोग सँ सम्भव भेलैक सर। सुरेश अभियानक सफलताक पूरा श्रेय अहीं के अछि सर। रमेश अपने हमरा सब कें बीस सालक पापक प्रायश्चित्तक गप कहने रहियैक से स्मरण होएत सर। सुरेश आब ओ अभिनव योजना बताइये दी। रमेश देवलोक सँ काटि छाँटि कए यमलोक कें बहुत रास नवका जमीन भेटलैक अछि। सबटा पुरना यातनाकुण्ड सब नष्ट कऽ कए रोबोट मजदूर द्वारा पूरा यमलोकक नवनिर्माण हेतैक। सुरेश बुझले अछि प्राकृतिक सौन्दर्यक हिसाबें यमलोक आ स्वर्गलोक समाने छैक। यमलोकक कलंक छैक इएह नरक कुण्ड सब। एकरा नष्ट कऽ कए मानव द्वारा डिजाइन कएल तरीका सँ पुनर्निर्माण केला पर यमलोक स्वर्गलोक सँ बेसी सुन्दर भऽ जेतैक। रमेश एहि निर्माण लेल मर्त्यलोक सँ मसीन आ सामान सप्लाइ कएल जेतैक। ओकरे निर्यात कम्पनी हम सब खोलबैक। सुरेश संगहि यमलोक आब अपना ब्रह्माण्डक नवका टूरिस्ट स्थल बनतैक, ताहि लेल हम सब एकटा ट्रैवेल कम्पनी सेहो खोलबैक। ई दूनू कम्पनी पृथ्वी पर चलैत एखनुक कम्पनी सँ अलग हेतैक। आब एहि मे कोनो बेइमानीक काज नहि हेतैक ने कोनो राजनेता कें हिस्सा देल जेतनि। हम सब आब कोनो नवका पापक भागी नहि बनब। हमरा दूनूक पुनर्जन्म भेल अछि। रमेश बेस पैघ व्यवसाय छैक, बहुत लोक कें नोकरी भेटतैक। एहि मे प्राथमिकता भेटतनि ओहि व्यक्ति कें जिनकर परिवार कें हमरा दूनूक हाथें कोनो तरहक क्षति भेल छलनि। इएह होएत हमरा सबहिक प्रायश्चित्त। वैज्ञानिक नीक विचार। सरकारो एहि सँ बेसी नहिए करितैक। सुरेश आर एकटा नव बात सर। पाप पुण्यक नव व्याख्या हेतु एकटा संविधान सभा बनाओल गेलैक अछि जाहि मे चित्रगुप्त सचिव रहताह आ स्वर्गलोक मे बैसल एतुका भूतपूर्व विधिवेत्ता आ वैज्ञानिक सबके सेवा सेहो लेल जाएत। नवका विधान बनबाक अवधि मे यमलोक मे ताला लगा देल गेलैक अछि। कोनो समय सीमा नहि। रमेश देवता लोकनिक आदेश सँ पृथ्वी पर सेहो वर्तमान शास्त्र–पुराणक चर्चा बन्द करबा देल जाएत। नवका विधान बनलाक बाद मर्त्यलोक मे पंडितगण सबटा शास्त्र पुराण फेर सँ लिखताह। एहि मध्य एखनुक पोथा सब कें कोन-कान दोग-दाग सँ ताकि कए जमा करथु आ जरबैक व्यवस्था करैत जाथु। वैज्ञानिक ई तऽ सबसँ नीक काज होएत। (तखने नारदजीक संग ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यमराज, चित्रगुप्त आ दूनू यमदूतक प्रवेश। सुरेश, रमेश देव लोकनि कें प्रणाम करैत छथि।) वैज्ञानिक देखियौ, हम एखनहि देवलोक जेबा लेल तैयार छलहुँ आ एतए देवलोके पहुँचि गेल। नारद (वैज्ञानिक कें सम्बोधित करैत) वैज्ञानिक अनुपम, जरूर अहाँ ब्रह्माण्ड मे कतहु जा सकैत छी। हमरा आब पूर्ण विश्वास अछि। मर्त्यलोकक वैज्ञानिक चमत्कारक कतबो प्रशंसा कएल जाए, कम होएत। हम जरूर पहिल बेर अपनेक कक्ष मे किछु जासूसी करए गेल छलहुँ मुदा धन्य अछि अहाँक तन्त्र जे हमर सब चेष्टाक काट ताकि लेलक। (रमेश, सुरेश दिश घुरि, पीठ थपथपबैत) अहाँ दूनू बहुत साहसिक काज केलहुँ। अगिला चरण लेल हमर आशीर्वाद। विष्णु (वैज्ञानिक सँ हाथ मिलबैत) हम पहिल बेर एहन गुणी सँ भेंट कs रहल छी। समस्त देवलोक अपने सबहिक कार्य पर गौरवान्वित अछि। ब्रह्मा आइ हम अपन अप्रतिम कृति मानव पर गौरवान्वित छी। हमर कामना जे स्वर्ग नरकक भ्रमजाल सँ मुक्त मानव एहिना वैज्ञानिक विकास करैत रहए आ समस्त ब्रह्माण्ड पर राज करए। महेश मर्त्यलोकक विज्ञान विकसित होइत रहए आ हमहूँ सब ओहि सँ लाभान्वित होइत रही सएह हमरा सबहक कामना। जय विज्ञान। महेश जोर सँ डमरू बजबैत छथि। सब देवगण वैज्ञानिक सँ हाथ मिलबैत छथि। वैज्ञानिक बीच मे, हुनक दूनू कात सुरेश आ रमेश, बामा कात नारद, यमराज आ चित्रगुप्त, दहिना कात ब्रह्मा विष्णु महेश ठाढ़ होइत छथि। आगू मे दूनू यमदूत नचैत छथि आ गबैत छथि- यमलोकक काज सँ छुट्टी भेटल दिन राति दौड़ए नहि पड़त मर्त्य लोक आब बिसर रहल छी, बिसरि रहल छी। प्रकाश धीरे धीरे कम होइत अछि, पटाक्षेप डॉ विनीत उत्पल- सी-३२, मंडावली ऊँचे पर, आई. पी. एक्सटेंशन, नई दिल्ली-११००९२. लघु कथा- नागा फकीर (डिस्क्लेमर: एहि खिस्साक सभटा पात्र आ तथ्य मनगढ़ंत अछि, समानता मात्र संयोग अछि-कथाकार) पता नहि जे कि फुरायल जे आइ ओकर पुरना फेसबुक पोस्ट पढ़य लगलौं- १४ नवम्बर: अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थाक युवा पुरस्कारक जूरी कोनो पोथीक मूल्यांकन नहि कऽ कय प्रतिभागीक उमरि देखैत अछि, जे अमुक लेखक केँ अगिला बरख पुरस्कार देल जा सकैत अछि वा नहि। ०२ अक्तूबर: ‘सगर राति दीप जरय’ जाहि दिन सँ सोलकन लग गेल, बभना आ रारी कायस्थ सभ गुरमौटी देने अछि, जे ई की भेल? ताहि देखादेखी ‘सगर दिन अन्हार रहय’ शुरू कयल गेल। ३१ अक्तूबर: मैथिलीक सम्मानित सबसँ युवा कथाकार आब ‘इस्स’ आ ‘भक्क’ नामसँ खिस्साक पोथी लिखने छथि आ दुनू पोथी केँ दुनियाक ‘बेस्ट सेलर’क खिताब भेटल अछि आ दुनियाक चालीस भाषामे तकर अनुवाद भेल अछि। २६ जनवरी: बिहारमे मद्यपान निषेधक कारण ओतयसँ सबसऽ बेसी साहित्यकार हर दू दिन पर कोनो ने कोनो कार्यक्रमक बहन्ने दिल्ली आबैत छथि आ सोमरसक पान राजधानीक बीयर बारमे करैत छथि। ३० जनवरी: मैथिली-अंगिका-वज्जिका-मगही-भोजपुरी अकादमीक उपाध्यक्षक आगू सभ भाषाक कतेक रास कवि अप्पन नाम लेल निहोरा करैत छथि, जे पिछला दू बरख सँ हमरा कविता पाठ लेल नै बजेलहुँ। १५ अगस्त: घोर कलयुग, कतेक रास आपराधिक प्रवृत्तिक लोक आब साहित्यकार बनि गेल अछि आ राज्य आ केन्द्र सरकारक संग अंतरराष्ट्रीय संस्थाक बहुत रास समितिक सम्मानित सदस्य भऽ गेल अछि। बेसी पोस्ट तऽ ओकर फेसबुक वाल पर नहि छल, मुदा जे छल ओ साहित्यिक समाजक लेल बिख सँ कम नहि छल। हमरा सँ ओकर भेंट कहियो नहि छलै। ओकरा लऽ कऽ फेकुआ भाइ कहियो-कहियो हमरा लग चर्च करैत छला। ओ कहैत छला जे सत्ता आ साहित्यकेँ जँ बुझबाक अछि तँ ओकरासँ गप करू। ओकर फेसबुक पोस्ट पढ़ू। ओ अजुका ‘राजकमल चौधरी’ छिऐ, अजुका। सोशल मीडियाक ‘नागार्जुन’। की कही, एक बेर ओकर फेसबुक वाल पर गेलो रही, मुदा ओकर पोस्ट हमरा पसीन नहि आयल, तें हम फेर दोबारा नहिये तँ ओकर फेसबुक वाल पर गेलहुँ आ नहिये ओकरा फेसबुकक मित्रताक निमंत्रण देलहुँ। हमरा लागैत छल जे फेकुआ भाइक गप जँ सत्य अछि, तँ ओ बड़ तार्किक हएत। सत्ताक समीकरण बुझैत हएत। साहित्यक समझ जँ ओकर नीक छै तँ फेर कोनो साहित्यकार ओकरा मोजर किए नहि देलाह। ओकरा मोजर तँ ओना हमहूँ नहि देलहुँ। एहि दिल्लीमे के केकरा पुछैत छै। रोज बिहार-यूपी सँ अल्लू-प्याजक बोड़ा जेना लोक-बेद ट्रेन, बस आ फ्लाइटसँ आबैत छथि। किछु लोक दिल्लीमे संघर्ष करैत छथि तऽ कियो नोएडा आ गुरुग्रामक कोनो फैक्ट्रीमे काज करैत-करैत अपन जिनगी गुजारि दैत छथि। ‘हाय पैसा-हाय पैसा’क चक्करमे साहित्य के पढ़त आ राजनीतिक गप के करत? ‘धौ महराज, अहाँकेँ कहबाक तँ नहि चाही, मुदा खिस्सा सुना रहल छी आकि फालतू गप? कथाक बाटसँ नहि भटकू’। ‘चलू भाइ, जे गलती-सलती भेल से माफ़ करब। आगू सँ हम एकर ख्याल राखब। एखन धरि जे गप कहलहुँ ओकरा बिसरि जाउ, माफ़ कऽ दिअ। एकरा सँ बेसी हम की कऽ सकैत छी’। ‘भाइ, तऽ हम सब कतय रही’? हँ, ख्याल आयल। किछु दिन पहिने फेकुआ भाइ मधुबनीक मानकी पोथी भंडारक दोकान पर भेटल छल। हुनकर मन कनी सुस्त देखलियनि तँ पुछने रहियनि- ‘की भेल भाइ’? पहिने तऽ कनि अनमनैलक, फेर बजलाह- ‘ख्याल अछि अहाँकेँ? एकबेर हम दिल्लीमे एगो लोकक चर्च केने रही, सत्ता आ साहित्य पर जिनकर बड़ रुचि छनि आ ओ नीक जानकार छथि।’ ‘जी, जी’, हम बजलहुँ। ‘ओ पछिला कतेक माससँ नपत्ता अछि। नहिये ओकर दिल्लीमे कत्तौ पता लागल आ नहिये गामेमे। पुलिस लग रिपोर्ट लिखेलहुँ मुदा हाथमे किछु नहि आयल।’ ‘सार’, जेहन नाम, तेहने करम।’ ‘फकीर रहय, फकीर। एकदम नागा’ ‘नहिये घरक चिंता, नहिये नौकरीक, बस चिंता तँ साहित्यक आ राजनीतिक। एना लागैत छल जे ओ नहिये तऽ ओ कोनो साहित्यकार अछि नहिये कोनो समीक्षक। बस महाभारतक अर्जुन जेना साहित्यक राजनीति पर ध्यान लगौने रहैत छल। ने कनियो टा इम्हर, ने उम्हर। ‘कहू तँें भाइ, एना कत्तो लोक होइत छै।’ सत्य कही तऽ आइ हमरा बड़ अफ़सोस भेल जे ओकरा सँ भेंट कऽ लैेतिऐे तऽ की भऽ जैतिऐ। आब जतेक लोक, ओकर ओतेक खिस्सा। कियो कहय जे ओकरा दिल्लीमे रहय बला कोनो मौगीसँ प्रेम भऽ गेल छलै आ ओ मौगी ओकरा छोड़ि देलकै तऽ ओ बताह भऽ गेल। कियो कहय जे दिल्लीक कियो गोटे अप्पन संस्था चलाबैक लेल मधुबनीक ‘अरेर’ मे दू बीघा जमीन ओकरा रजिस्ट्री कऽ देने छल। ओ दिल्लीकेँ छोडिकऽ ‘अरेर’ मे रहय लागल छल आ अंतिम बेर कोनो ‘राष्ट्रीय दल’क लोकल नेताक संग देर राति ‘नागिन डांस पार्टी’मे ’देखल गेल छल। लोक तऽ ईहो कहैत छल जे कियो गोटे सहरसाक चैनपुरमे पुस्तकालय चलाबैक जिम्मेवारी ओकरा देने छल आ ओहि दिन भोरे-भोर दरवाजाक आगकू पोखरिमे जे ओ डुमकी लगौैलक, आइ धरि ओकर लाश नपत्ता अछि। कियो कहलक जे ओ तऽ वयोवृद्ध हिन्दी कथाकार कृष्ण ठाकुरक संग पांडवनगरमे रहैत छल, कोनो कैसेट कंपनीमे काज करैत छल आ ‘लाल पाइन’ पीबैक लेल इंडिया हैबिटेट सेंटर जाइत छल। ताहिसँ ओकर लीवर ख़राब भऽ गेल आ ओ सुरपुर धाम कहिया नहि चल गेल। ताज्जुब तऽ तखन भेल जखन कियो कहलक जे ओ जनउ तोड़िकऽ इस्लामी प्रसिद्ध विद्वान अकबरूदीन खानक संग रोजा राखैत छल आ पँाचो टाइम नमाज पढ़ैत छल। ‘सुब्हान्ल्लाहि वलहम्दु लिल्लाहि व ला इल्ललाहु वल्लाहु अकबर’’ केर जाप सेहो करैत छल। कियो तऽ बाजल जे ओ हिन्दू सँ बौद्ध बनि गेल। हल्ला ईहो छल जे ओ नक्सली बनिकऽ छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश बॉर्डर पर स्थानीय पुलिसक हाथ लागल आ ढेर भऽ गेल। हल्ला तऽ छल जे ओ कश्मीर सेहो गेल आ ‘तैस-ए-मोहम्मद’ मे शामिल भऽ गेल छल आ सेनाक हाथ मारल गेल। पूरा खिस्सा तऽ मधेपुरा जिलाक बराही गामक प्रकांड संस्कृत पंडितजी अस्सी बरखक अरुणाभ बाबूसँ पता लागल। जँ विश्वास करी तँें पंडितजी अरुणाभ सत्य गप कहने छलाह। ओहि दिन तऽ गाम आयल छल ओ। घड़ी-पावैन मे। गामक भगवती थान पर दू दिनक बड़का मेला लागल छल। एहि पावैनमे साँपक विषकेँ उतारैक लेल लोक सिद्धि प्राप्त करैत छल आ ओहि बेर ओ सेहो मंतरिया बनि गेल छल। नागा तऽ घुमिते छल। माथमे केस छलै, मुदा सबटा पाकल। आँंखि लग झुर्री सेहो लखाह दैत छल। ओहि समयमे ओ सदिखन महिषी बला राजकमल चौधरीक एकटा पाँति दोहराबैत छल, ‘समय एकटा आन्हर साँप/ समय एकटा आन्हर रस्ता/ आ व्यक्ति अजगरक पेटमे छटपटाइत पक्षी।’ मुदा लोककेँ बुझयमे नहि आबैत छल जे ओकर मनमे की डाकै छै। घड़ी मेलाक दू दिन बादक गप छिऐ। ओ उदाकिशुनगंज कोर्टसँ घुरल छल। लोक कहैत छल जे जखन कहियो ओ गाम आबैत छल तऽ कोर्टमे मुक्तारीक काज सेहो करैत छल। साँझ खन दीप-बातीक काल ओ साइकिल पर चढ़ि कऽ घुरि रहल छल जे उदा पुल पर गामक रोहिता यादव भेट गेलै। ओ माल-जाल संग बाधसँ घुरि रहल छल। एकटा महीसक पीठ पर बैसल तमाकू चुना रहल छल। ओ रोहिताकेँ टोकलक- ‘की रे रोहिता, की हाल?।’ ‘रे बभना, ठीक सँ बोल। चिन्हय नै छेँ हमरा? ’ ‘हे रे सार, हम की कहलियौ तोरा, जे एत्ते बमकै छेँ।’ एतबी कालमे नम्हर सींग बला महीसकेँ रोहिता यादव ओकरा दिस हुलकाय देलक। ओ सौंसे देह साइकिलक संग नहर दिस गिरल। नहरमे राति पाइन छोड़ल गेल छल। एक मरदसँ उपर पाइन छल। साइकिल तऽ एक दिस अटकि गेल मुदा ओ डूमय लागल। नहरक दुनु दिस लोक जमा भऽ गेल आ हो-हल्ला हुअए लागल। रोहिता भीड़ देखि अपन माल-जाल संग ठामसँ भागल। नहरमे पाइनक धार एतेक तेज छल जे ओकरा सम्हरहि कऽ मौका नहि भेटलै। सौ हाथ पाइनमे बहैक बाद ओकर देह एकटा बाँसमे अटकि गेलै। गामक लोक बेहोशी हालतमे ओकरा नहरसँ खींचि केँ बाहर निकाललक। कहुनो कऽ कय साइकिलकेँ सेहो निकालल गेल। ताधरि बभना टोल आ देवहैर टोलमे एहि लऽ कऽ हल्ला भऽ गेल छल जे रोहिता यादव कोनो बाभनकेँ नहरमे ठेल देने छै। बराही गाममे दू टोल छल। एकटा ‘ब्राहमण टोल’, जेकरा आन टोलक लोक ‘बभन टोली’ कहैत छल आ दोसर ‘देवहैर टोली’, जे असलमे ‘देवहर टोल’ छल। देवहैर टोलमे पुरना लोक अप्पन नामक पाछू ‘देवहर’ लिखैत छल। बादमे सभ अप्पन टाइटिल ‘देवहर’केँ बदलिकऽ ‘यादव’ राखि लेलक आ नाम कहैत काल अप्पन नामसँ बेसी ‘यादव’ पर जोर दैत छल। तखन बाभन सभ ओहि टोलकेँ ‘ग्वरटोली’ कहिकऽ बजाबय लागल छल। (ई खिस्सा ओहि कालक अछि जखन पूरा देश मंडल आ कमंडलमे जरि रहल छल। चूँकि बराही आ पास-पड़ोसमे कोनो मुस्लिम बस्ती नहि छल, तें सांप्रदायिक सौहार्द्र ओतुक्का समाजक लेल कोनो गप नहि छल। मुदा बिहारमे लालू यादवक मुख्यमंत्री बनलाक बाद समाजक मुख्य धारासँ फराक रहय बला लोक सजग भेल छल। फेर जाहि मंडल कमीशनक रिपोर्टकेँ विश्वनाथ प्रसाद सिंह लागू केने छल, ओहि मंडल कमीशनक अध्यक्ष बी. पी. मंडल मधेपुरा जिलाक छल।) ओहि साँझक बाद तऽ दुनू टोलक लोक एक-दोसरा केँ देखहि नहि चाहैत छल। ब्राहमण टोलक चिड़ियो-चुनमुन, कुकुरो-बिलाय ओम्हर नहि जाइत छल। मनुखसँ बेसी वफादारी तऽ माल-जालमे पाओल जाइत अछि। तीन-चारि मास बीतल छल। ठार आबि गेल छल। एक राति दू-टा कुकुर मांगन भैयाक बँसबिट्टीमे आपसमे फरिआबय लागल। ओ दुनुटा जतेक जोरसँ एक-दोसरा पर भुकलक जे द्वार पर चचरी पर सुतल बड़का बाबा केँ भलै जे अजुका राति आर-पारक राति होयत। अप्पन चचरीसँ बौकू कक्का केँ शोर पारलखिन। अन्हरिया राति, हाथकेँ हाथ नहि सुझैत छल। मेघ चारू कातसँ घेरने छल। शीतलहरी सेहो अलगे। मुदा कक्काक आवाज सुनि बौकू कक्का निन्दौसँ उठल आ तीर-फट्टा सीधे हाथमे लेने मांगन भैयाक बँंसबिट्टी दिस दौड़ल। बौकू कक्का एतेक जोरसँ चिकरलक जे सौंसे बभनटोलीक लोक जागि गेल। मारि तिरपित जेकरा जे भेटल, हाथमे लेने ओहि दिस दौगल। बँसबिट्टीसँ आठे-दस कदम बौकू भाय पाछू छलाह, तखने लोकक शोर सुनि, एक कऽ पाछाँ एक दुनु कुकुड़ हुनका बगलसँ एना दौगल जे एकटा कुकुर बौकू कक्काक धोतीमे ओझरा गेल। कक्का धरफरीमे बुझि नहि सकल जे ई कोनो कुकुड़ छै आकि मनुख। बौकू कक्का सौंसे चिंतांग धरती पर गिर पड़लाह। गिरल देहसँ दोसरो कुकुर भिर गेल। हुनकर मुँहसँ एतेक जोरसँ ‘बाप रौ बाप’ निकलल, लागल जे आइ ग्वरटोलीक यादव हुनको निशाना बना देलक। वातावरण किछु काल धरि स्तब्ध रहल। लोककेँ बुझयमे नहि आयल जे की भेल। ताधरि मांगन भैया सेहो बड़का टॉर्च लऽ कऽ आबि गेल। टॉर्चक इजोतमे पता लागल जे सबटा किरदानी कुकुरक छल। गाममे दुनू जातिक बीच मनमुटाव बरक़रार छल। आन लोक सेहो एकर फायदा उठा रहल छल। गामक लोक कहैत अछि जे ओ एहन विकराल समय छल जे कल्लू यादवक नामसँ मधेपुराक धरती कांपैत छल। एक बेर एहन आयल जखन एक हफ्ता भरि कल्लू यादव गैंग मधेपुरामे लोकक देहकेँ उघारि-उघारि जनउ ताकैत छल आ जनउ पहिरय बला लोक केँ ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ दऽ कऽ जुत्ता-चप्पल-लाठी सँ धुनैत करुण यादव मुखियाकेँ बजौने छल। ओ पुछने छल जे बराही गामक बाभन केँ की करल जाय? अरुण मुखिया सीधे मुँह कहि देने छलाह कल्लू यादव केँ- ‘भाय, बराही पंचायतक मुखिया हम छी। हम सभ जाति सौ बरखसँ बेसीसँ संगे रहि रहल छी। दू भैयारीमे एहिना झगडा-झंझटि होइत रहैत छै। बाभन आ देवहैर एक्के छिऐ। ताहि सँ हुनका सबकेँ तंग करैक आवश्यकता नहि’। भीड़सँ कियो कहनो छल- ‘एक बेर कहो ने मुखियाजी, एखने राति भरि मंे सबटा बभनाकेँ घर जरा देते हैं।’ लोक अखनो कहैत अछि जे ओहि अन्हरिया ठार रातिमे मुखियाजी गांधीजी जेना खुट्टा गाड़िकेँ ठाढ़ रहल आ केकरो हिम्मत नहि भेल जे गामक बाभन टोल दिस एक्को डेग आगू दैतिऐ। एकरे फल छल जे करुण मुखिया चालीस बरख धरि बराही पंचायतक निर्विरोध मुखिया चुनल गेल आ राज केलक। मुखियाजी कल्लू यादवकेँ ओहि राति बुझा तऽ देलक आ गामक सीमान सँ भगा तऽ देलक मुदा दुनू जातिमे विश्वास नहि आनि सकल। कतेक बेर भगवती थान पर पंचायत बजाओल गेल, मुदा वएह ढाकक तीन पात। एक साँझ कहानीक पात्र ‘ओकरा’ आ रोहिता यादवमे सीधा लड़ाइ भऽ गेल। रवि दिन छल। उदामे साप्ताहिक हटिया लागैत छल। ओकरा माछ खाइक मन छलै। एक तऽ ओ माछ खाइ नहि छल मुदा खाइ छल तँ सवा किलो सँ एक कनमा कम माछ कीनैत नहि छल। संजोगसँ रेहू माछ एक्के गोटेक लग छलै, सेहो एक किलो पचास ग्राम। पचहत्तर ग्राम माछक कमी सँ ओकरा तामस आबि गेलै। संजोग जे तखने रोहिता सेहो माछ लेल पहु्ँचल। ‘हे रे। एक किलो माछ तौल दही।’ ‘मालिक, आब तऽ ई माछ बिक गेल।’ ‘ओ की छियौ’। ‘नहि मालिक। सवा किलो मे पचहत्तर ग्राम कम अछि, तँे बहस भऽ रहल अछि। ई साहब कीन लेलक।’ ‘हे रे धीचोदा। हमारा देभी की नै। देखभँय तू। चिन्है छी की नै?’ ‘जी मालिक, चिन्हैत छी।।।’ ओकर गप ख़तमो नाहि भेल छल ताधरि रोहिता ओकरा दू थाप खींच देलक आ माछक टोकरी उठाकऽ चलि देलक। कहानीक पात्र ‘ओकरा’ ई बर्दास्त नहि भेल। ओ सेहो पाँजर कसलक आ रोहिताकेँ उठायकेँ पटकि देलक। उदा नहर बला घटना दिनसँ रोहिताक खून खौलले छल। रोहिता माथे भरे जमीन पर खसल। संयोगे या दुर्योगे कही, जाहि ठाम रोहिता खसल, ओहि ठाम एकटा नोकी बला पाथर छल। शोणित ओकर माथसँ बोकरय लागल। रोहिताक भीषणकाय देह जमीन पर गिरल, से गिरले रहि गेल। रोहिता यादवक प्राण जाइत देखि "ओ" भक्क भऽ गेल। ओकरा मुँहसँ ‘इस्स’ टा निकलल। दू सेकेँडक लेल ओकरो देह स्टेच्यू बनि गेल छल। सम्पूर्ण हटियामे हो-हल्ला हुअए लागल। भीड़ ‘मारो मादरचो... बभना केँ।’ ‘हे रे बहिनचो... बभना, ग्वारक राजमे ग्वारकेँ मारि देभी।’ ‘के छिऐे रे... ’। जाधरि ओतय लोक जुटिकऽ ओकरा मारतिऐे, ताधरि ओ अचानकसँ भीड़मे भीड़क हिस्सा बनि गेल। केकरो पता नहि चलल जे ओ कतय गेल। मुदा ओ माछ नहि छोड़लक। सभटा माछ लऽ कऽ भागि गेल। जखन पुलिस इन्क्वायरी लेल पहुँचल तऽ किशुनगंज थानाक इंस्पेक्टर रामबाबू सिंह एक-एक गोटासँ पूछताछ केलक। दूटा बाभन टोलक छौड़ा समरनत्था आ मुनितबाकेँ ओहि हटियामे पुलिस लाठी सँ जतेक मारि मारलक, से कहि नहि सकैत छी। दुनू दू दिन पहिने दिल्लीसँ गाम आयल छल। दुनू अपराधी तऽ नहि छल, मुदा गाम आबैत छल तऽ पंचायतमे छिटपुट मारि-पीट कऽ लैत छल। मुदा, ‘ओकरा’ नहिये तँ पुलिस पकड़ि सकलै आ नहिये ओकर कोनो थाह ककरो लागलै। ओहि साँझ एकटा आओर गप भेल। पुलिस इन्क्वायरीक बाद नहरक काते-कात माछबला जखन घर जा रहल छल तऽ कियो साइकिलबला छौड़ा अन्हारमे ओकरा एक-एक सौ टाकाक दूटा नोट देलक आ कहलक- ‘हे हौ। जे तोहर माछ लऽ कऽ भागले छल ने, वएह ई टाका देने छौ।’ एतबे कहि कऽ ओ साइकिल बला छौड़ा फिरंट भऽ गेल। गामक चार-चौहद्दीमे ‘ओकरा’ खोजल गेल। पुलिस आ सी.आइ.डी. लगातार ओकर घर पर ‘रेड’ केलक, मुदा ‘ओकर’ पता नहि लागल। बराही गामक ब्राहमण टोलक लोक बड चिंतित भेल, मुदा हाथमे शून्य। ओना अहि घटनाक बाद आ बाभन टोलक दुनू छौड़ाक पुलिसक लाठी लगलाक बाद एतबे टा भेल जे दुनू टोलक लोक मामिलाकेँ शांत करयमे लागि गेल। रोहिताक स्त्री सेहो कोनो मोकदमा दर्ज करहिसँ मना कऽ देलक। लोक कहैत अछि जे रोहिताक स्त्री सेहो ओकरासँ तंग आबि गेल छल। रोहिता सभ दिन कत्तोसँ मारि-पीट कऽ आबैत छल। बिहारमे जहियासँ मद्य प्रतिबंधित भेल, तहियासँ ओ देशी ठर्रा या ताड़ी पीबिकेँ रातिमे घर घुरैत छल आ स्त्रीसँ मारि-पीट करैत छल। दुनूक ब्याहक बरख भेल छलै आ अखैन धरि कोनो संतान नहि भेल छलै। पुलिस जखन रोहिताकेँ पकड़ि कऽ लऽ जाइत छल तऽ ओकर स्त्रीकेँ सेहो लऽ गेल। भरि राति रोहिता हाजतमे आ ओकर स्त्री प्राणक डरसँ ओइ पुलिसक सिपाहीक बाँहिमे बंद रहल। रोहिताक स्त्रीक नाक-नक्श, ओठ, मांसल देह आ सुडौल उन्नत वक्ष कोनो विश्वामित्रक तपस्या भंग करहि लेल काफी छल। भोर धरि ओकर देह टूटि गेलै आ तकर बाद थानाक सिपाही दुनू प्राणीकेँ छोड़ि देलक। ‘गोंद’ सँ चिप-चिप करैत भरि नुआ पहिनने ओ रोहिताक संग गाम आयल। एहन तरहक गप कतेक दिन नुकाओल रहतिऐ। एक कानसँ दोसर कान जाइत-जाइत भरि गाममे गप हुअए लागल जे हर दू दिन बाद पुलिस रोहिता केँ बिन कारणो किए पकड़ि कऽ लऽ जाइत छै। नशा रोहिताकँे एहन बना देने छल जे काज तऽ ओ सभटा करैत छल, मुदा स्त्रीक संग की भऽ रहल छलै, ओकरा एकर परवाहि नहि छलै। लोक कहैत अछि जे किछु दिनक गहमा-गहमीक बाद बराहीक दुनू टोलक वैमनस्यता ख़तम भऽ गेल। नहिये रोहिता यादव रहल आ नहिये कहानीक पात्र ‘ओकरा’। लोक कहैत अछि जे एहि घटनाक बादो पुलिसक सिपाही रोहिताक स्त्री केँ पूछताछक लेल बजाबैत छल आ भोर भेने पहुँचा दैत छल। रोहिताकँे मरलाक छह मास बाद ओकरा गर्भ सेहो रहि गेलै, जाहिसँ तंग आबिकऽ एक राति थानामे ओ अपन इहलीला समाप्त कऽ लेलक। पुलिस बला सेहो ओकर लाशकेँ केकरो हाथ नहि लागय देलक आ हरैली धारमे एहन नपत्ता कऽ देलक जे आइ धरि ओकर लाशक कोनो थाह नहि लागल अछि। पिछला बेर जेखन अप्पन गाम गेलहुँ तखन गामक लोक सँ मालूम भेल जे कहानीक पात्र ‘ओकरा’ बारे मे बीस बरख बादो पता नहि चलल। कियो कहैत अछि जे ओ कोलकाता गेल छल अप्पन केस सुलझाबय लेल। जज शत्रुघ्न झा लग। कियो कहैत अछि जे ओ दिल्ली गेल छल इलाजक लेल एम्सक डॉक्टर ईश्वरशंकर लग। किछु दिन ओतय कोनो ड्रामा कंपनीमे काज केलक आ थियेटर कंपनी स्थापित केलक। कियो कहैत अछि जे ओ मुंबइ सेहो गेल छल। एक बेर कियो कहलक जे ओ बेंगलुरुमे एकटा कंपनीमे मैनेजर बनि गेल छल आ कतेक कर्मचारीकेँ मैथिलीमे कविता लिखय लेल सिखा देलक। ओहिमे एकटा ऑफिसर आ ओकर कनियाक कविताक धूम सभ दिस मचल अछि। कियो कहैत अछि जे ओ पोथी प्रकाशनसँ सेहो जुडल आ ‘पुरनांत प्रकाशन’ खोलि कऽ प्रकाशन जगतमे धूम मचा देलक। एकर कतेक रास लेखककेँ साहित्यक नोबेल पुरस्कार कतेक बरख भेटल। जेना मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार जीवकांत नव लेखनक प्रसंगमे लिखने छलाह जे मैथिली नवलेखन बेकार युवक सभक ‘स्टेपिंग स्टोन’ थिक, ओ कोनो व्यक्तिक सम्पूर्ण जीवनक मिशन नहि थीक, ताहिना एहि कहानीक पात्र ‘ओकरा’ कँे सेहो गाममे रहबाक कोनो प्रयोजन नहि छलै। लोक कहैत अछि जे ओ घुमक्कड़ छल। पहिलुक बेर गाममे एहि तरहे समाजक रंगमे फँसल छल। ओहि दिन दिल्लीक मंडी हॉउस मे मैथिली नाटक ‘ओरिजनल कामशास्त्र’ देखिकऽ निकलले रही जे प्रकाश भाइसँ भेंट भऽ गेल। वएह प्रकाश भाइ जे कहियो गाममे गीत गाबैत छल आ दिल्लीमे बड़का वकील भऽ गेल छल। कहानीक पात्र ‘ओकरा’ बारेमे चर्चा भेल तऽ ओ फेकुआ भाइक चर्च केलखिन। ‘भक्क’ सँ हमर नीन टूटल। फेकुआ भाइ ई की कहैत छलथि जे जहिना नाम, तहिना करम, फकीर रहय, एकदम नागा। आब हमर दिमाग जागल। चूँकि हमरा ओकरामे कोनो दिलचस्पी नहि छल, तें हम फेकुआ भाइक गपकेँ सुनिकऽ कानमे तूर-तेल दऽ कऽ सुति जाइत छलहुँ। अहाँकेँ नै लागैत अछि जे कहानीक जे मुख्य पात्र अछि ओ देश-दुनियामे यात्री जेना भटकैत अछि, ओहिना जहिना मिथिलाक लोक देशक कोना-कोनामे भटकैत अछि। कखनो महाराष्ट्रसँ, कखनो गुजरातसँ, कखनो दिल्लीसँ भगाओल जाइत अछि। अहाँकेँ नहि लागैत अछि जे ओ नवयुवक आन कियो नहि, हम आ अहाँ छी, जे झट्ठोकेँ आन-शानमे केकरोसँ लड़ैत छी आ ‘माछ’क भोज लेल छुछुआयल जेना केकरोसँ मांगि लैेत छी आ कियो खुआबैत अछि तऽ खा लैत छी, की? कुसुम ठाकुर अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक? ओना तs हमर स्वभाव अछि हम नहि लोक के उपदेश दैत छियैक आ नहि अपन मोनक भावना लोकक सोझां मे प्रकट होमय दैत छियैक । हम सुनय सबकेर छियैक मुदा हमरा मोन मे जे ठीक बुझाइत अछि ओतबा धरि करैत छियैक। एकर परिणाम इ होइत अछि जे हमरा सलाह देबय वाला केर कमी नहि छैक। सब के होइत छैन्ह जे ओ जे कहताह कहतिह से हम अवश्य मानि लेबैन्ह।अपन अपन भावना केर हमरा पर थोपय के कोशिश बहुत लोक करय छथि। परोपदेश देनाइयो आसान होइत छैक । मुदा हमर भलाई केर विषय मे के सोचि रहल छथि इ ज्ञान तs हमरा अछि । मुदा दोसराक विचार सुनालाक किछु फायदा सेहो छैक। लोकक विचार सुनि अपन विचार व्यक्त करय मे आसानी होइत छैक आ आत्म विशवास सेहो बढैत छैक। एकटा कहबी छैक "कोठा चढ़ी चढ़ी देखा सब घर एकहि लेखा " सब ठाम कमो बेसी एके स्थिति छैक, मुदा दोसरा केर विषय मे कम बुझय मे, आ देरी सs बुझय मे आबैत छैक, अपन तs लोक के सबटा बुझल रहैत छैक। पारिवारिक हो सामाजिक हो वा देशक, सब ठाम आपस मे विचार मे मतान्तर होइत रहैत छैक जे कि मनुष्य मात्र के लेल स्वाभाविक छैक आ हेबाक सेहो चाहि । जखैन्ह दस लोकक विचार होइत छैक तs ओहि मे किछु नीक किछु अधलाह सेहो विचार सोंझा मे आबैत छैक। मुदा आजु काल्हि सब ठाम स्वार्थ सर्वोपरि भs जाइत छैक । लोक के लेल देश समाज सs ऊपर अपन स्वार्थ भs गेल छैक। संस्था व न्यास केर स्थापना होइत छैक समाज आ संस्कृति केर उत्थानक लेल । मुदा संस्थाक स्थापना भेलैक नहि कि ओहि संस्थाक मुखिया पद आ कार्यकारणी मे सम्मिलित होयबाक लेल राजनीति शुरू भs जाइत छैक । एकटा संस्था मे कैयैक टा गुट बनि जाइत छैक । आ ओहि मे सदस्य ततेक नहि व्यस्त भs जाइत छथि कि हुनका लोकनि के सामाजिक कार्य आ संस्कृति के विषय मे सोचबाक फुर्सते कहाँ रहैत छैन्ह । आ ताहू सs जौं बेसी भेलैक आ बुझि जाय छथि जे आब हुनक ओहि ठाम चलय वाला नहि छैन्ह तs एक टा नव संस्था केर स्थापना कs लैत छथि। सामाजिक कार्य केर नाम पर साल मे एकटा वा दू टा सांस्कृतिक कार्यक्रम कs लैत छथि आ बुझैत छथि समाज केर उद्धार कs रहल छथि । ओहि कार्यक्रम मे पैघ पैघ हस्ती , नेता के बजा अपन डंका बजा लैत छथि।बाकि साल भरि गुट बाजी आ साबित करय मे बिता दैत छथि जे हुनक कार्यकाल मे कार्यक्रम बेसी नीक भेलैक। हम मानय छियैक जे कार्यक्रम अपन संस्कृति केर आइना होइत छैक, मुदा ओ तs स्थानीय कलाकार के मौक़ा दs कs सेहो करवायल जा सकैत छैक। इ कोन समाजक उत्थान भेलैक जे लोक सs मांगि कs कोष जमा कैल जाय आ मात्र कार्यक्रम मे खर्च कs देल जाय। बहुतो एहेन बच्चा शहर वा गाम मे छथि जे मेधावी रहितो पाई के अभाव मे आगू नहि पढि पाबय छथि। दवाई केर अभाव मे कतेक लोकक जान नहि बचा पाबय वाला परिवारक मददि केनाई समाजक उद्धार नहि भेलैक? आय काल्हि तs लाखक लाख खर्च करि कs एकटा कार्यक्रम कैल जाइत छैक। कहय लेल हम ओहि महान हस्ती केर पर्व मना रहल छी। कार्यक्रम करू मुदा कि अपन गाम शहर के भूखल के खाना खुआ तृप्त कs ओहि महान हस्ती के श्रद्धाँजलि नहि देल जा सकैत छैक। इ तs मात्र एक दू टा समाज के सहायतार्थ काज भेलैक ओहेन कैयैक टा सामाजिक काज छैक जे कैल जा सकय छैक । यदि सच मे लोक के अपन समाज आ संस्कृति सs लगाव छैन्ह तs जतेक कम संस्था रहतैक ततेक नीक काज आ समाजक उत्थान होयतैक। ओहि लेल मोन मे भावनाक काज छैक नहि कि दस टा संस्थाक । देश मे नित्य नव नव राज्यक माँग भs रहल अछि। ओहि मे मिथिलांचलक माँग सेहो छैक। हमरा सँ सेहो बहुत लोक पूछय छथि "अहाँ मिथिला राज्य अलग हेबाक के पक्ष मे छी कि नहि "? हम एकहि टा सवाल हुनका लोकनि सँ पूछय छियैंह "कि राज्य अलग भेला सँ मिथिलाक उत्थान भs जेतैक "? इ सुनतहि सब के होइत छैन्ह हम मैथिल आ मिथिलाक शुभ चिन्तक नहीं छी। बुझाई छैन्ह जे अलग राज्य बनि गेला सँ मिथिलांचलक काया पलट भs जेतैक । एक गोटे जे अपना के मिथिला के लेल समर्पित कहय छथि, साफ़ कहलाह "मैथिल के मोन मे मिथिला के लेल जे प्रेम हेतैक से दोसरा के नहि" । हमर हुनका सँ एकटा प्रश्न छल "कि पहिने बिहार मे मैथिल मुख्य मंत्री, मंत्री नहि भेल छथि "? जवाब भेंटल " ओ सब मैथिल छलथि मिथिलाक नहि"। अलग राज्य भेलाक बाद जे कीयो मुख्य मंत्री होयताह ओ मिथिलाक होयताह आ मात्र मिथिला के लेल सोचताह । हमरा इ बुझय मे नहि आबैत अछि जे लोकक मानसिकता के कोना बदलल जा सकैत छैक ? एखैंह ओ दरभंगा के छथि , ओ सहरसा के .....ओ मुंगेर के छथि ....कि अलग राज्य भेला सँ आदमी केर मानसिकता बदलि जेतैक .....कि दरभंगा , सहरसा आ कि मुंगेर वाला भेद भाव मोन मे नहि औतेक ? आ जौं इ भेद भावना रहतैक तs सम्पूर्ण राज्यक विकास कोनाक भs सकैत छैक ? कि मिथिलाक होइतो ओ सम्पूर्ण मिथिला केर विषय मे सोचताह ? छोट छोट राज्य नीक होइत छैक , ओकर पक्ष मे हमहू छी मुदा बिना राज्यक बंटवारा केने सेहो बहुत काज कैयल जा सकैत छैक, जौं करय चाहि तs । ओना सब अपन स्वार्थ सिद्धि मे लागल रहय छथि इ अलग गप्प छैक। कि नीक स्कूल कॉलेज कारखाना के लेल बिना राज्य अलग बनने प्रयास नहि कैयल जा सकैत छैक? कि मात्र मिथिला राज्य बनि गेला सँ मिथिलाक उद्धार भs जयतैक ? मिथिला राज्यक अलग हो ताहि आन्दोलन मे अनेको लोक सक्रीय छथि , मुदा हुनका लोकनि सs एकटा प्रश्न .......ओ सब आत्मा सs पुछथि कि ओ सब मात्र राज्य आ समाज के लेल सोचय छथि कि हुनका लोकनि के मोन मे लेस मात्र स्वार्थक भावना नहि छैन्ह ? कैयैक टा राज्य अलग भेलैक अछि मुदा बेसी केर स्थिति पहिने सs बेसी खराब भs गेल छैक, झारखण्ड ओकर उदाहरण अछि । खनिज संपदा सँ संपन्न राज्यक स्थिति बिहार सs अलग भेलाक बाद आओर खराब भs गेल छैक। एहि राज्य मे नौ साल के भीतर सात टा मुख्यमंत्री बनि चुकल छथि । लोक के उम्मीद छलैक जे १० साल के भीतर एहि राज्य केर उन्नति भs जयतैक। उन्नति भेलैक अछि, मुदा राज्य केर नहि नेता सब केर । चोर उचक्का खूनि सब नेता भs गेल छथि आ पैघ सs पैघ गाड़ी मे घुमि रहल छथि , देश आ जनता केर संपत्ति केर उपभोग कs रहल छथि इ कि उन्नति नहि छैक ? अमरेश कुमार लाभ, हरनीचक, अनीसाबाद , पटना –८००००२ बीहनि कथा- लेबलीटिये बड्ड छन्हि ― केओ लड़िका नीक सन नै अछि नजरि मे, यौ ? ― से की ? आइ काल्हि लड़िका केँ के पुछै अइ, यौ ? लड़िका तँ ढ़ंगरिआएल अइ ? जे घर देखू , दू – चारि टा लड़िका अबस्से भेट जाएत l ― से तँ ठीके, मुदा ढ़ंग के भेटए तखन ने l ― लड़िका तँ एक सँ एक नजरि मे अछि l मुदा केहन लड़िका चाही, किनका लेल चाही, बाजबै किछ तखन ने, यौ l ― किनका लेल की, हमर अपने बच्चिया अछि l रूप – रंग मे केओ काटै बला नै lM.A. पास केने अछि l काज – धाज मे सेहो निपुण l जोग्य लड़िका जदि भेट जाइ त’ पाइ सेहो गिनबै l ― एगो तँ बड्ड बेजोड़ लड़िका नजरि पड़ि रहल अछि, अहाँक बच्चिया जोग्य l एहि पोरकां साल नोकरी धरलक हेन, केंद्र सरकारक प्रथम वर्ग अधिकारी मे l पढ़ल – लिखल सेहो ओतबे l कोइ अवगुण नै l आउर तँ आउर माय – बाप केँ बड्ड आज्ञाकारी l ― से त ठीक अइ l घर – परिवार केहन छन्हि ? के – के संगे रहै छन्हि ? किछ जानकारी अछि की ? ― हँ, यौ l किएक नै रहत ! बड्ड भरल – पुरल परिवार छन्हि l माय – बाप तँ छथिन्हें l लड़िका भाई – बहिन मे दोसर नमबर पर l बड़का भाई नै किछु क’ पबिलै बियाह भ’ गेल छैक, दोसर नमबर पर लड़िका अपने भेल, तेसर बहिन भेलैक जे अखनि कुमारे छै, आ चौथा भाई अखनि नौकरी के तैयारी मे लागल अछि l हर दृष्टि सँ हमरा उपयुक्त लागि रहल अइ ई परिवार अहाँक कनियाँक बास्ते l कहियौ तँ बात चलबियै l ― की कहू ? लड़िका तँ हमरो बड्ड पसीन अछि l मुदा,लेबलीटिये (liabilities) बड्ड छन्हि ! बीहनि कथा- बेटी बचाबू ―कनिको नीक नैं हेतै ओ सरधुआ केँ l डाक्टर अइ ओ, जरलाहा ? पाईयो ठगि लेलक आ सब उनटा l ― की भेलौक माय ? किएक एतेक तमसायल छें ? ― आँय रौ, तों एना पूछि रहल छें, जेना किछु जानिते नैं छें l ― कोनाक बुझबौ, किछु कहबें तखन ने ? ― बूझ त’, ओ कनियाँ केँ जीवने सँ ने खेलवार करलक ? ई तोहर तेसर संतान भेलौक l लोग बाग कहै जाय छैक कि बड़का आपरेसन सँ तीन सँ बेसी बच्चा नैं होइत छैक l अहि लेल ने कहने छलियौ जे पहिनहिंयें वो जाँच .... की कहै छै ......? जहिं मे बेटा हेतैक की बेटी पहिनहिंयें पता चलि जाय छैक करबा लेबा लेल l त’ आब तोहिं बाज ? की फायदा भेल ? पाईये ने ठगलक ओ ? कहलक होएत बेटा आ भ’ गेल बेटी l ― एहि में की नोकसान भ’गेलैक ? आइ काल्हि बेटा-बेटी में किछ फरक नैं l ― हमरा ज्यों पहिने पता चलि जतिएक जे बेटी हेतैक तखनि ............. ― एहि लेल त’ हम तोरा, बिनु जाँच करौने ओहिना कहि देने छलियौक l ममता कर्ण, जमशेदपुर उपराग मरैई वाली चाची खुब झटकारने नमहर नमहर डेग बढ़ेने रस्ता मे दिखाई देलैथ । पुछलियन्हि लाल काकी कत जाई छी , फरियाक किछ नै बजलैथ लेकिन चेहरा पर खुशी साफ झलकैत रहैन्ह । (टोला मे सब हुनका लाल काकी कहैत छैन्ह ) दुआरे पर स हल्ला करैत बड़की दाई के अँगना पहुंच ल खिन्ह ,दाई ऐ बड़कि दाई कत छी बाहर निकलु । बड़कि दाई भानस घर में आँटा सनैथ रहथिन्ह लाल काकी के अवाज सुनि क अँटे हाथ सं बाहर एली लाल काकी आऊ बैसु कि बात छै । बैसब त हम बाद में पहिले हमर उपराग सुनि लिय ,सुनलौंह संतोष बौवा हवाई जहाज के पायलट बैन गेलैथह , मर मिठाई भोज भात त दुर अपना मुहँ स ई खबर भी नै सुनेलौंह । दोसर के मुहँ स सुनिक आबि रहलौंहँ । मालती पिसीया बड्ड शांत भाव स बजली हँ काकी बौवा फोन त केने छल पर सही बात त बौवा के एला के बादे बुझब । मालती पिसीया गामक बेटी छैथ ,घर के बड़ बेटी सब हुनका बड़कि दाई हहैत छैन्ह । संतोष जखन डेढ़ साल के रहथिन्ह तखन पापा कोनो हादसा मे खतम भ गेलखिन ,तहिया स मालती पिसीया नैहरे में रहिक बड़ दुख स अपन बेटा संतोष के पालन पोषण केने छैथ । दुख के झेलैत झेलैत सुख के अनुभुति जेना हुनका स कोषो दुर भ गेल छैन । ताहि स बेटा के नौकरी वला बात भी हुनका बिषेष प्रभावित नै क सकलैन ।पर लाल काकी के उपराग हुनका निक लग लैन । बजली काकी अखन चाय स मुहँ मिठा करु बाद मे सब हेतै । सुचिता कुमारी पोतीक बियाह राम दुलारी काकी के बड़की पोतीक विवाह ठीक भेलनि अछि। बड़का बेटाक फोन आएल रहैन जे छोटका संगे विवाह में आबि जाएब । काकी के दूटा बेटा रहैैन, बेटी नहि देने रहथिन भगवान तैं पोतीक विवाह देखबाक बड़ मोन रहैन हुनका। अपन बियौहती हार ओकरा देबाक वास्ते काकी रखने रहथिन। विवाहक खबरि सुनिते ओ जेबाक ओरिआओन में लागि गेली। काकीक बड़का बेटा कलकत्ता में बड़ पैघ वकील छलैन, मुदा छोटका के नहि कोनो नोकरी भेलै, आ ओ खेतीबारी सअ अपन परिवारक भरणपोषण करैत छल। बाबूक मरलाक बाद माएक देखभालक दायित्व सेहो एकरे छलैक। विवाह में जेबाक तैयारी पूरा भेलाक बाद काकी छोटका सअ पुछलथिन "कहिया जेबहक कलकत्ता? " "से कियैक" "पूजीया के बियाह छैक से बीसरि गेलहक? " "मुदा माए हम बियाह में त नहि जा सकब। " "से कियैक? " "अहा त बुझिते छी जे हमर आर्थिक हाल नीक नहि अछि, आ एहि बेर फसिल बढिया नहि भेल। आ फेर कलकत्ता जाए में त टाका लगतै से कहाँ सअ लाएब। भैया तअ सीधे एबाक लेल कहि देलाह, एको बेर पुछबो नहि केलाह जे टिकटक पाइ छह कि नहि? " "बेटीक बियाह में अपने कतेक खर्च होइत छैक त तोरा ओ पाइ लेल की पुछतह। " "हमरा छोरु मुदा अहां तअ माए छिऐन अहां के त आबि कए लअ जएता, आ नहि त कम स कम टिकटो कटा कअ पठबिताह। हमर हाल तअ बुझले छैन हुनका। " "छोड़ह ई सब गप्प, तु नहि जेबह तअ नहि जा मुदा हम त जाएब, हमरा लग किछु टाका अछि, जाहि से आबए-जाए के टिकट भ जाएत। " "मुदा अहां जाएब ककरा संगे। " "हम एसगरे चलि जाएब, तु गाड़ी पर बैसा दिहअ, आ बडका के फोन कअ दिहक, ओ हमरा कलकत्ता स्टेशन पर आबि क लअ जाएत। " "ठीक छै त अहां काल्हि गाड़ी पकड़ि लिय परसु बियाह छैक ,ओहि दिन भिनसरे पहुंच जाएब। आ फेर जहिया एबाक होएत हमरा फोन कअ देब हम दरभंगा स्टेशन पर स अहां के लअ आएब। " "ठीक छैक। " एम्हर कलकत्ता में बियाह दिन सभ गोटे तैयारी में लागल छलाह। बरियातीक एबाक समय भअ गेल छलै। कन्याक पिता अपस्यात भेल काज में लागल छला कि तखने देखैत छैथ जे माए आगु में ठाढ छैथ। "माए अहां, एखन एलहुं, सबेरे किएक नहि एलहुं, आ एसगरे एलहुं, छोटका नहि आएल संगे ? " "छोटका नहि आबि सकल, हमरा गाड़ी में बैसा कअ ओ कहने छल जे तोरा फोन कअ देतह , आ तु स्टेशन आबि जैतह। गाड़ी त भिनसरे पहुँच गेल , कतेक काल तोहर बाट तकलहुं तु नहि एलह दुपहरिया भअ गेल तखन एकटा टैक्सी पकड़ि ओतअ स बिदा भेलहुं, कतेक बौआ क एखन घर पहुँचलहुं। "मुदा हमरा फोन नहि आएल, ऐ यैइ काल्हि छोटकाक फोन आएल छल? " "हं फोन त आएल रहै, मुदा अहां काज में व्यस्त छलहुं, तैं हम नहि कहलहुं। " पत्नीक उत्तर स वकील साहब खीसीया जाइ छैथ, "अहांक कारण माए के कतेक परेशानी भेलैन, आ अहां बादो में नहि कहलहुं जे छोटका फोन केनेे छल। " "जै दहक की भेलै बियाह स पहिने हम आबि त गेलहुं, आ कनिया पूजा कतअ अछि कने देखतियैक "। " ओ अपन रुम में तैयार भ रहल अछि। " "हम ओतहि जा कअ भेंट क अबै छी। " काकी जा कअ पोती के भरि पांज धअ लैत छथिन, आ गर में अपन बला हार पहिरा दैत छथिन, ताबेत पाछु-पाछु पुुतोहु सेहो आबि जाइ छैन। "मम्मी दादी के एतअ कियैक लअ एलियन, ओ हमर सभटा मेकअप खराब क देली, आ ई ओल्ड फैशन हार हमरा पहीरा देली अछि। " "कोनो बात नहि बेटा अहां अपन मेकअप ठीक कअ लिय,आ ई हार लाउ हम राखि लैत छी। आ माए ई चलते किछु जलपान क लेथ। " किछु काल बाद काकी जखन जलपान करैत जलील त हुनक कान में बेटाक स्वर सुनाई देलक, । "हे यै, सुनै छी,माए लेल कोनो घर में ओछैन कअ दियौ बड थाकि गेल हेती, किछु काल अराम क लेती। " "आब हुनका लेल बिछौना कोन घर में करियनि,सभ में त पहिने स गेस्ट सब भरल अछि, पहिने अहां कहलहुं जे माए नहि एती। आब ओ एलीह अछि त आब एखन कतअ व्यवस्था करियनि। " "ई अहां की कहैत छी, कतहुँ व्यवस्था कअ दियौन , माए थाकल छैथ। " ई सुनिते काकी ओतअ आबि जाइ छैथ। "की भेलह बौआ हमरा लेल किएक परेशान होइत छी, हम त बियाह देखबाक लेल एलहुं अछि, राति भरि बियाह देखब आ भोरे चलि जाएब गाम। हमरा लेल बिछौन नहि करु। " "से किएक भोरे चलि जाएब माए, आब एलहुं अछि त किछु दिन रहब ने। " "नहि बौआ हमरा एतअ मोन नहि लगैत अछि,हम त बियाहे देखबाक लेल आएल छलहुं। ओहि के बाद रहि क की करब एतअ। " "ठीक छैक जे अहांक इच्छा। " दीपा झा दादी परी (नेन्ना -भुटका लेल) " गे बुचिया ,कक्खन से बजबै छियाऊ , एमहर आ ने। ", बरखा के दाई ओकरा सोर केलखिन। बरखा जल्दी जल्दी अपन कोठली स, अपन झोरा समेटैत बहरेलै । " हैया भा गेल दाई। सब टा चीज ओरिया ब मे समय लागई छै ने। अहा बड हड़बड़ा दई छी।" दाई बरखा संगे बिदा होइत बाजलि ," तोरे दुआरे कहैछियौ। जौं बाबू आइब जैथुन ता फेर सवाल के झड़ी लगा देता। तू ता बुइझते छिहीन की तोहार बाबू के तोहर कन्या सब के मेहँदी लगेनाइ एकदम पसीन नै छ। ओकरा आबा स पहिने बिदा भ जाएब ता पाछाँ हम सम्हाईर सकै छी। " बरखा महेंदी लगाब मे बड कुशल छल्ले। बच्चे स जेना ओक्कर आँगुर मेहँदी के घोल के अपन मन मुताबिक़ घुमा दाई छल्ल। जे डिज़ाइन , जे आकार आर जे कल्पना बरखा कैरथहै , स्याः हाथ पर उभर जाए छल्ल। ओना ता बाबू बड प्रसंसा कराई छेलाह , मुदा दोसर घर जा के ,सादी -बियाह म बरखा ई काज करे , से हुनका नै पसीन छल्ले। एही समय म बरखा के दाई आगू एलखिन। ऊ अपन बेटा के बात स सहमत नै छलाह , मुदा बेहेस करनाइ उचित नई बुझै छेलखिन। कहीं बात के बतंगड़ न बैन जाए -एहि दुआरे। मुदा दाई ता छलखिन दाई ! हुनकर दृढ बिचार छल्ले की बेटा- बेटी एक सामान होइ छै , आर कोनो काज ऊछ नई होइ छई। जाबैत तक बरखा के हाथ मेहँदी लगा ब मे बैइस नई जाए छै , दाई ई जिम्मा अपने पर लेलखिन की बरखा के प्रयास मे कोनो कमी न रहे, सुआइत ऊ कोनो न कोनो बहाने अपन पोती क कला मे बाधा नई उत्पन्न होबा देलखिन। ऊ अपन प्रगतिशील बिचार स आर स्नेहपूर्ण आचार स बरखा क उत्साहित राख्लखिन। बरखा के परी छली ओ ! विद्या रश्मि गलतीक बोध (संस्मरण) बात ओहि समय के छियै जखैन हम आठवां में छलौ आ गरमी छुट्टी में हास्टल स गाम आयल रहौ।सांझ क खेला क आयले रही कि ब्राह्मण टोला स दामोदर कका ऐलखिन आ लालपीसी के कहलखिन जे लालबहिन आई राइत में आयब हमरा अंगना आई हमर बड़की बेटी लालदाई के बियाह छियै राइत में।लालदाई हमरे उमर के रहै आ छोट में जखैन गाम में पढ़ै छलौ त एके क्लास में रहौ। लालपीसी आश्चर्य स पुछलकै जे अखन दूपहरिये में त लालदाई के आम क गाछी में देखने रहियै आ अहुं के त खेत दिस जाईत देखने रहौं त कत चारि घंटा में वर भेट गेल? कहलखिन जे नै राजे कथा लगेने रहियै लड़का बर सम्पन्न छलै घर दुआर सेहो नीक छलै लेकिन बर के माय बहुत पाई मंगै छैलै तै छोड़िए देने छलियै ई कथा लेकिन ओहि लड़का के आई राति में हमर छोटका भाय रामबाबू पकैड़ के आनतै आ चोरौका बियाह हेतै । लालपीसी आश्चर्य भ कहलकै अखने किया करै छियै बियाह अखैन त अठमें में अछि आ चोरौका बियाह किया करै छियै। दामोदर कका ज़बाब देलखिन जे चोरौका बियाह नै करबै त पाई कत स गिनेबै दहेज के आ अखैन नीक लड़का फंसेने छै रमबबूआ ई कहि हरबरैलै चलि गेलखिन ओत स।हम आश्चर्य स लालपीसी के पुछलियै जे चोरौका बियाह की होई छै त लालपीसी दुखी भ कहलकै जे राति में चलिहें बियाह देखै लै त देखिहै।बांकि के चारि घंटा तक हमरा लै बहुत मुश्किल भ गेल बितेनाई कियकि लालदाई संगी जकां छलै हमर आ एक्का अगले तरह के बियाह। लेकिन जखैन राति में मां आ लालपीसी संगे दामोदर कका के अंगना गेलौ बियाह देखै लै त ओत के दृश्य देख क अचंभित रैह गेलौ। बियाह बला के वर जबरदस्ती एते शराब पिया देने रहथिन ई सब जे उ नीचा भूईंया में उंघरायल आ धोती खाली डांर में लपटायल रहैन्ह और नशा के हालत में भरि अंगना के लोक के गारि पढ़ै छलैथ।आ लालदाइ बियौहतलि सारि पहिरने कोबर घर के कोना में डरे डबडबायल आंखि ठार।आ भरि अंगना के लोक जल्दी जल्दी बियाह के ओरियान करै में लागल रहै किया कि अगर बर के होश आइब जैतै त भाइग जेतै।हम ओते पैघ त रहौं नै लेकिन तैयो बहुत डर भ गेल पता नै ई केहन बियाह होई छै।हम लालपीसी के अक्कछ कर लगलीयै जे अंगना चल हमरा नै नीक लागैया तखन कनीये काल बाद हम सब अंगना चलि एलौं।भरि रात्रि ठीक स नींद नहि भेल जहां आंखि लागय कि सपना में बियाह बला अंगना के दृश्य देखाय लागै आ हड़बड़ा कर उठि जाई छलौ।भोरे कमनिहरि कहलक जे राति में जे बियाह भेलै ओहि में त बाद में वर के कनि होश एलै त भाग लगलै तखैन सब डरा धमका क कहुना बियाह करेलकै।भोर में दामोदर कका ऐलखिन तो बड खुश भ क कहै छथिन जे लालबहीन लालदाई के बियाह सम्पन्न भ गेल।आब हमर आधा मन हल्का भ गेल तीन चारि बरख के बाद अपन छोटकी बेटी फूलदाई के सेहो अहिना क क लेबै बियाह।हमरा बहुत आश्चर्य लागल जे हिनका अपने बेटी के ओ तकलीफ भरल‌ चेहरा पर नजैरि नै गेलैन जे ई अखनो एते खुश छथिन। लेकिन बाद में कका बुझलखिन जे हुनका स केहन बड़का गलती भ गेलैन जेकरा सुधारनाई बहुत मुश्किल छै।जखैन चतुर्थी तक तो कहुंना पकरि धकरि के रहलैन बर लेकिन ओकर पराते चुपे चापे भागि गेलैन्ह आधा रात्रि में। बर अपन गाम स कतौ और जा के नुका गेलैन। आ लालदाई त गुम्मी लाईद लेलकै। नै किछ बाजै ने भूकै कतौ चुपचाप बैसल रहय। पढ़ाई सेहो छोड़िए देलकै। एकदम मुरझा गेलै।आब त दामोदर कका के बेटी के हालत देखल नै जानि।कतेको बेर बर के माय स भेंट करथिन्ह जे कहुना बर के खबर पता चलनि लेकिन किच्छ नै पता चलैनि। बहुतों बेर भेंट केला पर बर के माय हुनकर हैसियत से बहुत बेसी दहेज ल क ई बियाह के मानलखिन आ अपन बेटा के सासुर जाय देलखिन्ह आ फेर दुरागमन भेलै। ई सब खबरि जखैन गाम अबियै छुट्टी में त लोक सब दैत रहै छलै। पांच छःसाल बीत गेलै अहि बात के । फेर एक बेर गाम गेल छलौ छुट्टीये में त एक दिन भोरे दामोदर कका हरबरायले एलैथ आ लालपीसी के कहलखिन जे उतरबायर गाम जाई छी फूलदाई के कथा ठीक करै लै।हम त आश्चर्य स तकलियैन‌ कका दिश किया की आब हमहु पैग भ गेल रहौ आ लालदाई के चोरौका बियाह के मतलब बुद्धि गेल रहौं। लेकिन ओहि दिन कका के चेहरा में तकलीफ देखाई दैत छलैन कह लगला नै बुच्ची ऐ बेर फेर स उ गलती नै करबै ए बेर देख सुनि क करबै। ई लड़का बला कहलकै या जे सोनदाई के पढ़ देतै आगू। गरीब परिवार छै लेकिन की करियै तिलक नै द सकै छियै किया की लालदाई के सासु के पाई दै लै सबटा बेच देलियै आ बिना टाका के संभव नै छै सर्वगुणसंपन्न लड़का आ ई लड़का बला बिना तिलके(टाका) के बियाह करै लेल तैयार छै। कका त चलि गेलैथ लेकिन हम बहुत किछ सोचै पर मजबूर भ गेलौ। जेना दामोदर कका बड़की बेटी के धनवान आ सम्पन्न लेकिन लालची, संवेदनहीन लोक के घर में बियाह क क खुश छैथ वा छोटकी बेटी के गरीब आ बुझनुक लोक बला घर में बियाह क क। कि सबटा गलती दामोदर कका के छैन्ह या ई गलती करै पर मजबूर कर बला त बेटा के बाप के , जे ई नै बुझै छै जे आदमी बेचै के वस्तु नै होई छै? दामोदर कका सन लोक त मानि गेलैथ अपन गलती आ सुधारै के कोशिश केलखिन,लेकिन पाई लै बला बेटा के बाप अपन गलती कहिया मानता नहि जानि। डॉ मालती मधु स्तन कैंसरक शुरूआती लक्षण आ रोकथाम ब्रेस्ट कैन्सर या स्तन कैन्सर आब बहुत कॉमन भ रहल अछि. पहिले विदेश टा मे बेसी देखल जाई छले लेकिन पिछला किछ साल मे अपनादेश मे एकर केस बढल जा DX रहल अछि. धीरे धीरे स्तन कैन्सर महिला मे होई वला सबस कामन कैन्सर भेल जा रहल छै.अगर शुरु के स्टेज मे बीमारी के पता लगा लेल जाय त बहुत हद तक इलाज सम्भव अएछ. पुरा दुनिया मे स्तन कैन्सर के रोके के लेल उपाय चैल रहल छै और ऑक्टोबर महिना के जागरुकता महिना के रूप मे जानल ज़ाई छै. अहि लेख मे स्तन कैन्सर के शुरुआती लक्षण के बारे मे जानकारी देल जायत. स्तन कैन्सर के शुरुआती लक्षण स्तन के कोनो ऐहेन गाँठ जई मे दर्द नहि हुए ओई पर ध्यान दई के चाहि. निपल स कोनो तरह के डिस्चार्ज विशेष रूप स लाल रंग के डिस्चार्ज आबे त डॉक्टर लग जा क जाँच करबी. स्तन के स्किन मे कोनो फ़रक (संतरा के छिलका जेका छेद भेला पर) भेला पर सहो ध्यान देबाक चाही.बगल मे या गर्दन मे भेल गिल्टी शुरुआती लक्षण भ सकेत अछि. निपल के आस पास बहुत जाड़ा खुजली या स्तन मे स्वेलिंग सहो महत्वपूर्ण लक्षण भ सकेत अछि. स्तन कैन्सर स केना बचल जाइय स्तन कैन्सर के लेल बहुत रिस्क फ़ैक्टर होइत अछि जेना वजन बेसी भेनाए ( विशेष रूप स रजोनिवृति के बाद), डेली दिनचर्या मे व्यायाम के कमी या बिवाहक बाद लेट स बाल बच्चा भेंनाई. संतुलित खानपान आ प्रतिदिन व्ययाम स बहुत बीमारी स बचाव सम्भव अछि. खान पान मे बेसी सब्ज़ी और फल के शामिल करवाके चाहि. वसायुक्त भोजन, धूम्रपान वग़ैरह स परहेज़ कर चाहि. स्तन कैन्सर के केस मे अपना आप स ब्रेस्ट के सेल्फ इग्ज़ैमिनेशन (अपना आप स जाँच) काफ़ी कारगर साबित भेल अछि. दुनिया भरि मे अलग अलग देश मे स्त्री सब अपना आप स अपन जाँच करे छैथ और कोनो समस्या भेला पर डाक्टर स सम्पर्क करे छैथ. सेल्फ इग्ज़ैमिनेशन मे मासिक के बाद के कोनो दिन फ़िक्स क क हाथेली स हल्का दबा क देखल जाये छै जे कोनो गाँठ या निपल स कोनो मवाद आबी रहल अछि. अगर कोनो दिक़्क़त महसूस हुए त डॉक्टर स भेंट करि. मैमोग्रफ़ी एकटा खास तरह के एक्सरे जाँच होइत अछि जई स बहुत शुरुआती स्टेज मे स्तन कैन्सर के पकरल जा सके छै. मैमॉग्रफ़ी चालीस स पचास वर्ष के बीच हर दु साल मे एक बेर कराएबाक ज़रूरत छै या कम स कम चालीस स पचास साल के बीच एक बेर त ज़रूर कराएबाक चाही.चालीस साल स पहिले स्तन के अल्ट्रसाउंड बेसी बढ़िया रहै छै. अगर कोनो गाँठ हुए त डॉक्टर स परामर्श ली. उपचार स्तन कैन्सर मे जत्ते शुरुआत मे पता चलई छै, मरीज़ लेल ओतबै बढ़िया रहे छै.शुरु के स्टेज मे सर्जरी मे पूरा ब्रेस्ट नहि हटा क खाली गाँठ के हटाब स काज चलि जायत अछि. कखनो कखनो कीमोथेरपी के सहो जरुरत होइत अछि. ई बीमारी के भयावह रूप स डराई के बदला मे अपन जाँच क सही समय पर डॉक्टर स परामर्श ल क एकर उपचार सम्भव अछि.महिला सब अपना आस पास दोस्त, सखी या रिश्तेदार मे सेल्फ़ इग्ज़ैमिनेशन के बारे मे जागरुकता फैला क एक दोसर के मदत क सकैत छथिन. (Dr. Malti Madhu- Gyanaecologist obstraction and IVF specialist, Apollo fertility,Noida). पल्लवी सिन्हा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार तीसी गुणक खान अछि मनुष्यक प्रवृति त यैह अइछ जे ,कोनो वस्तु आसानी सँ उपलब्ध होइए तकर महत्व कम भ जाइत अइछ। हम सब ई त जानवे करइ छी जे तीसी गाँव घर मे बहुतायत में उपलब्ध होइत अइछ आ ओकरा साधारण बुझि कै हमसब,या कही सकइ छि जे जानकारी के अभाव में लोग एकर सेवन पर्याप्त मात्रा में नई क पाबय छथिन। त आउ आई हम एकर गुण स अहाँ सबके अवगत करबै छी। तीसी के अलसी सेहो कहल जाइत अइछ। तीसी के तासीर गरम होइत छइ।अई में मौजूद तत्व महिला सब मे मेनोपॉज के समस्या में मन आ व्यवहार में जे बदलाव अबैत अइछ ओई में बहुत लाभ मिलई छइ। पोषक तत्व-तीसी में एंटीऑक्सीडेंट गुण होइत अइछ। एई में प्रोटीन,ओमेगा-3 ,फैटी एसिड,फाइबर,विटामिन बी ,पोटैशियम आ मैग्नीशियम सेहो मिलैत अइछ। लाभ -- तीसी के प्रयोग स वजन नियंत्रित, पाचन तंदरुस्त,कैंसर, मधुमेह ,कब्ज़ आदि समस्या में लाभ होइत अइछ। तीसी के सउँसे खाय स देह के विषाक्त तत्व निकइल जाइत अइछ। प्रयोग -- रोज एक चम्मच भूजल तीसी खाय सँ सुखल केश,बेजान त्वचा,एलर्जी आ मुँहासा स बचल जा सकई यै। गर्भवती महिला आ स्तनपान करबै वाली महिला चिकित्सक के परामर्श स एकर सेवन कै सकइ छथिन। त आउ तीसी खाक अपन इम्युनिटी मजबूत करई जाई जाऊ।तीसी प्रतिदिन के भोजन में शामिल करू आ स्वस्थ रहू। जवाहर लाल कश्यप स्ट्रेश बस्टर "रागिनी जल्दी चलु 6.13 के ट्रेन भेट जायत तखन समय पर घर पहुँचब आ घरक काज जल्दी भ जायत" सुशीला ऑफिश स निकलैत रागिनी के हाथ ध क बजलीह / "नहि आई हम संगे नहि जायब /" "ओकर फोन आयल छल कि ?"w "हॉ ओकरे फोनेआयल छल कहलक जुहु मे भेट करु" रागिनी के मुँह पर लज्जा मिश्रित मुस्कान आबि गेल / ओकर बाद दुनु अलग अलग दिशा मे मुम्बई के भीड के हिस्सा भ गेलीह /मुम्बई के भीड, भागैत भीड, एक दोसर स आगा बढबा के होर लैत भीड, धकियाबैत मुकियाबैत भीड, पता नहि ई होर कहिया खतम होयत / ओहि भीड के अंग बनि सुशीला अन्धेरी स्टेशन पर आबि गेलीह / ट्रेन पहिले आबि गेल छल आ लगभग भरि गेल छल /ओ ओहि मे चढि गेलीह / बैसबाक नहि मुदा सोझ स ठाढ होबाक जगह भेट गेल छल / समय बीति रहल छल आओर् लोक ट्रेन मे चढल जा रहल छल / तिल रखबाक जगह नहि छल मुदा आदमी तैयो सन्हियायल जा रहल छल / मुम्बई के ट्रेन मे भारतक छवि देखल जा सकैत अछि / कोना नाना धर्म, नाना जाति , भिन्न-भिन्न प्रकार के वेश धेने सब एक संग समाहित भेल अछि आ अपस्यॉत भेल जिन्दगी जीबय लेल आ देश चलनिहार के गारि पढबाके लेल विवश भेल छथि / ट्रेन चालु भेल आ सब कियौ भगवानक जयकारा लगेलक / सुशीला रागिनी के लेल सोचय लगलीह हमरा त अप्पन काज स फुरसति नहि होईत अछि, आखिर कोना ओ सब काज करैत हेती /अप्पन आफिसक काज , घर मे दुनू बच्चा के काज , पति के काज तखन बॉयफ्रेंडक नखरा से अलग / पता नहि भारतक पतन आ पाश्चात्यक नकल कतय जा रुकत / * * * "आई पहिले आबि गेलहुँ" सुशीला घर मे घुसैत आँफिस स आयल अप्पन पति के देखि बजलीह / खुशी बड्ड भेलन्हि मुदा भरि दिनक झमारल मुँह पर ओ खुशी नहि आबि सकल आ मोनक ओहि खुशी के राहुल (पति) नहि देख सकलाह / राहुल व्यंग केलथि ,"चलु आई गलती भेल आब हम जल्दी नहि आयब /" "हाँ जल्दी आबि क हम्मर उपकार केलहुँ . . ." सुशीला खिसिया गेलीह "तखन स टी व्ही देख रहल छी / एक कप चाह नहि पिने होयब ? रवि (बेटा) के स्कुल स आनि लाबितहुँ, सेहो नहि केने छी…." राहुल बीच मे खिसिया क बजलाह "एक दिन हम सबेरे आबि जाउ तकर मतलब जे सब काज हमहीं करु /" "नहिं , आबि क टीव्ही देखैत रहु " सुशीला बैग राखैत, जबाब डेल्खिन्ह् / हन हन करैत , घरक दरबज्जा जोर स बन्द करैत, रवि के लावय लेल स्कूल विदा भ गेलीह /भरि रस्ता अप्पन क्रोध के शांत करबाक प्रयास करैत रहली मुदा क्रोध छल जे शांत हेबाक नाम नहि ल रहल छल / पता नहिं पुरुख जाति कहिया स्त्री के अपन सम्तुलय मानत / जतेक काज ऑफ़िश मे ओ करैत अछि ततेक त हमहुँ करैत छी, तखन कथीक घमंड / रवि के स्कूल मे छुट्टी होमय बला छल गार्जियनक लाईन लागल छलै, सुशीला मोने-मोन खिसियाईत पता नहिं ई लाईन स कहिया छुट्टी होयत जतय जाउ ओतय लाईन, बस मे लाईन, ट्रेनक टिकट मे लाईन, रोड पर गाडी के लाईन/तखने छुट्टी के घंटी बाजल / बच्चा सब अप्पन-अप्पन गार्जियन सब लग आबय लागल/ रवि के कुम्हलायल फुल सन सुखायल मुँह के देखिते सुशीलाक क्रोध ममत्व मे बदलि गेल / अप्पन जमाना याद आबय लागल / एकटा स्लेट ल क स्कूल गेनाई ,जतय पढाई कम,मौज-मस्ती ज्यादा /पढाबय के जगह पर कुर्सी पर बैस क सुतय बला मास्टर साहेब पासवान जी /खिस्सा सुना क पढाबय बला चन्द्रकांत बाबु /आब अपना स ज्यादा भाडी बैग /डिसिप्लिन के नाम पर बच्चा के टार्चर करैत सर / अहि चक्कर मे हरा गेल बचपना / सुशीला अहि बात के सोचैत अप्पन घर आबि गेल आ आबिते क्रोध अप्पन चरम पर पहुँच गेल / राहुल घर मे नहि छल, घर मे ताला लागल छलै आ घर के दोसर चाभी सुशील के बैग मे रहै / राहुल के मोबाईल स्विच आँफ छलै आब एकटा उपाय छल जे पडोसी के घर मे बैस इंतजार कैल जाय आ सुशीला वैह करय लगलीह /ज्यों-ज्यों समय बितैत छल हुनकर क्रोध चरम पर जा रहल छल / ओ आ रवि दोसर के घर मे बैसल परेसान भ गेल मुदा राहुल के कोनो पता नहिं / रातिके 9.35 मे राहुल घर आयल आ अप्पन गलती पर सफाई देनाई सुरु केलक, सुशीला ओकरा बिना सुनने अंदर आबि गेलीह / राहुल -" साँरी हमरा ई अंदाज न......... सुशीला- "चुप भ जाउ हमरा कोनो बात नहि सुनय के अछि /" सुशीला के क्रोध देखि रवि त सहमि गेल मुदा राहुल और खिसिया गेलाह / ओहि राति दुनु प्राणी मे खुब झगरा भेल / राहुल सुशीला पर पहिल दिन हाथ छोडि अप्पन पुरुषत्व सेहो प्रदर्शित केलाह /तीनु प्राणी भुखले सुतलाह / रातिक घटनाक प्रभाव भोर मे सेहो देखल गेल / राहुल बिना खाना खेने चलि गेलाह /सुशीला रवि के खाना खुआ स्कूल भेजि अपने बिना खेने चलि गेलीह / फ़ेर सुरु भेल ट्रेनक वैह भीड / अंधेरी मे ट्रेन स उतरि ऑफिस के लेल बिदा भेलीह तखने रागिनी के फोन आयल कहाँ छी हमहुँ अंधेरी आबि गेल छी / सुशीला ओकर इंतजार करय लगलीह /किछु देर मे खुशी मोन रागिनी आयल आ दुनु आँफिस के लेल बिदा भेल /सुशीला -" कि बात छै आई बहुत खुश छी /" "हम त अहिना खुश रहैत छी" रागिनी के जवाव छल "जिंदगी के एकटा मकसद अछि जे खुश ऱहु /" सुशीला -"एकटा बात पुछु खराप नहि ने मानब ?" पुछु.... "अहाँ जे दोसर लडका स भेंट करय जाईत छी से के अछि ?अहाँक बियाह भ गेल अछि, दू टा बच्चा अछि तखन ओकर की महत्व ? ओ अहाँक के अछि ?" रागिनी के मुँह पर मुस्कान आबि गेल -"ओ हम्मर कियौ नहि अछि आँफिस मे सर स परेशान आ घर मे पति के पुरुषत्व स / बस ओ स्ट्रेश बस्टर छै ,स्ट्रेश बस्टर ............. पद्य खण्ड जयंती कुमारी गजल बिनु पीड़ा नै प्रेम असल छै सोना छै आगि सँ निकसल छै बौसि रहल छी अन्हरोखेसँ मीत हम्मर आइ रूसल छै केओ त' जा क' कहि दे हुनका मोनमे हुनक रूप बसल छै कहब कोना नै कहब कोना कंठेमे ई बात फँसल छै चलत कोना क' हम्मर जीवन कर्मक सिक्का बहुत घँसल छै हाथ धरत के अइ ठाँ ककरो सभक सभ एत' स्वयं खसल छै (बहरे मीर-22222222 सब पांतिमे।) कल्पना झा- बोकारो, झारखंड अम्मा झूड़ीये में लेपटायल ओ मुंह, सांस सं देह के लेने झैंप, अतृप्त मनोकामना सं हहाइत फुफुआइत आंखि, आशा लगेने मोन बेचैन, दिवस भ गेल नहि आयल कोनो खुशी, बेचैन राइतक अर्थहीन भेल कलंकित मोन, बितैत दिन के लोढि पर पिसैत उलझन, अते सुंदर नाम मुद्दा व्यर्थ, इ झुड़ी उम्रक पड़ाव नहि थिक, बितल समयक नय कोनो प्रमाण, चुपेचाप इ सचाई पर नय करु कोनो भ्रम, इ विपदा के नहि उगैल पाबिक गम, अपना स्वार्थ द्वारे मनुक्ख कते करैत प्रपंच, हे गे अम्मा तोरा छव नमन, हे गे अम्मा तोरा छव नमन। साओन बाड़ी झाड़ी खीलल फुलवारी, साओन आयल सोहावन मास, चलली धीया सब माया संग, बोला मनाबयेक सुनकर धाम, कृपा दृष्टि से करु महादेव, अन्न धन लक्ष्मी हमर धाम, सीथक सिन्दुर बनल रहै, पूर्ण करु हे कृपा निधान, मंडार पुष्प सं श्रृंगार करब हम, पंच गव्य स करब स्नान, बेलपत्र अर्पित हम करब, स्वीकार करु हे कृपा निधान, बडु दुख दिन आ दुर्दिन देखलवं, कते सहू से कृपा निधान, जगत के स्वामी कहबैका छी, दीन दुखी के करु कल्याण, करु निवास कहां कतौ जा, पर्वत आ या पाथर में, सदि खन हमर हृदय बिराजैथ, हे बाघम्बर कृपा निधान। हम कतय छी? ने एतय छी , ने ओतय छी, हम कतय छी? हम असोराक ओ रउद छी, जे छजाक लाइंघ खसैय छी, हम पाइनक ओ धार छी, ज्यों रुकैत छी त मांटी में लपटायल थाल छी, हम मरबाक ओ दाबा छी, जे नेहू नहू ढहय छी, हम देवालक ओ इंटेबा छी, जे नूनी लाइग खसैत छी, हम कोन सूरत में गढल छी, जेकर नहिं कोनो स्वरुप छी, हम ओ राहगीर छी, ज्यों रुकैत छी त थकैत छी, हम चौखैट के भीतर घुटैत छी, मगर डेग बढाबैथ डरैय छी, संस्कार क छवि सं ओझरायल, हम कुहिर रहल छी, ने एतय छी, ने ओतय छी, हम कतय छी ? आशीष नीरज- चार्टर्ड एकाउंटेंट कोरोना सामाजिक दूरी बनाउ हे मित्रगण, नभ,जल, पहाड़, तथा तराई में। "संक्रमण स बचाव" अछि हथियार, "कोरोना "स वैश्विक लड़ाई में ।। सबके डस रहल अछि ई दानव, अमीर-गरीब ओ राजा-दीन हो। बड़को बड़का देश नय बच पायल, अमेरिका, ईरान या चीन हो।। मानव जीवन स अमूल्य किछ नय, बेर बेर अपन हाथ के शुद्ध करु। मन के वश में राखिकर घर में रहु, दृढ़संकल्पित भ क स्वयं स युद्ध करु।। पैघ पैघ संकट झेललकय अछि मानव, इ कोरोना के सेहो हम हरायब। आई अगर हम-सब संभल गेलहु, त काल्हि हमर बच्चा मुस्कुरायत।। आभा झा जोड़- घटाव असन्तोष, अलगाव भरल ई वर्ष न किछु उम्मीद बचल व्याल कराल व्याधि-विष व्यापित, विकल विश्व अछि कानि रहल। वृत्ति छिनायल ,क्षुधा - पिपासा केर तम अति घनघोर बनल भेल अधोमुख अर्थ- नीति, हिय चिन्ता केर अछि शूल गड़ल।। एहनो विषम परिस्थिति देखू, शासन- कर्दम -दाॅंव पक्ष वा कि प्रतिपक्ष सभक अछि कुटिल कुमार्गे ठाॅंव सत्ता हित रचइत प्रपंच केर, नञि भारत टा ग्रास "हमहीं ","केवल हमहीं ",स्वार्थक घोष बनल विकराल ।। कोनो मांग बनैछ जिद जॅं, तुमुल विचारक रण अछि भाव्य बाग राजसी वा किसान केर अविश्वास- विप्लव अछि प्राप्य । भूख,गरीबी,व्याधि हटौ वा केन्द्र बनौ समरसता ,हाय! जनहित गौण,प्रेम परिणय पर बन्धन अछि सत्ते सम्भाव्य।। वर्ष ,मास,दिन, ऋतु परिवर्तन ई सभ सहज प्रकृति केर हाथ बीस बीस केर साल जगत पर ,कुलिशोपम क' देलक घात।। करुण गुहार सुनू हे भगवन्! आब न सह्य ई विषम प्रहार करू कृपा छॅंटि जाय कुहेसो,आशा- रवि निज खोलय द्वार।। पुनः उगय नव वर्ष नवल उम्मीदक दिनकर नभ मे वृत्तिहीनता, क्षुधा, विपर्यय न हो विवशता एहि भू मे । सम पर जीवन आबि सकय, हम जुटी समर मे नेने आस जे किछु छूटल, पुनः समेटब ,जागय मन मे ई विश्वास । चेतना के अछि जड़ वा के चेतन अछि,स्थूल भेद वा सूक्ष्म चिन्तना केलहुॅं नञि साक्षात् तथ्य जॅं, नञि ओ,कहि जुनि करू वञ्चना। संभव अछि,जे हमर दृष्टि सॅं वञ्चित,ओ साकार सत्य हो हो अगम्य ,दुर्लभ ,परंच, ओ ईशक हो रमणीय सर्जना।। ज्ञानक अछि आकाश अनन्ते,स्वल्प समय,क्षमता से न्यूने किंतु करू चिंतन गभीर भय,की असली,की कविक कल्पना? पानिक लहरि चंचला,पाछां ओकर व्यर्थ श्रम ,मिथ्या लौल विद्यमान विद्युत् जे ओहि मे,प्राप्ति ओकर महनीय साधना।। तत्त्वक द्रष्टा ऋषिक कथन सुनि जे अदृश्य,ओहि जलधि डूम दिय' पैसि अतल,मुक्ता मणि अभिनव सॅं समृद्ध करू अपन चेतना।। अपन घेर जनता अछि बेहाल बाढ़ि मे, दंभ विकासक सभहक मुंह आइ बिमारी घर-घर पैसल किंतु चुनावक रचलहुं व्यूह। प्रकृतिक रोष सिमान -उपद्रव ,मृत्युक अछि पदचाप सगर एखनो नञि क्यो चेतल देखल, जतै जे भेटल,से हड़पल ।। सब तरहक व्यभिचार, कदाचारक अछि निष्ठुरता व्यापल प्रगतिक कथा हन्त! सपना, ओक्कर त' जड़िये कोकनल। एहनो विकट समय नेतागण आत्म प्रशंसा मे लागल किंतु जकर मत सं ताकतवर,सैह विवश निरूपाय बनल।। बुर्जुआ पक्षक प्रतिपक्षक खेलि रहल अछि निर्घृण खेल नञि ओक्कर प्रभुताक ह्रास हो, दुन्नू मे अछि अद्भुत मेल। चमकी मे शैशव मरैत छल,आइ वयस्को कालक ग्रास नञि ककरो क्यो देखबैया अछि,आइ प्रशासन केर नञि आश। दुर्बल आश्रयहीन श्रमिक संग शिक्षित सेहो राज्य तेजल यक्षप्रश्न वृत्तिक सुरसा सम अप्पन बड़का मुंह मुंह फोलल । अस्पताल जर्जर ,विद्या केर आलय अछि गुरुजन- विहीन किंतु न ककरो कोनो चिंता अपन घेर मे प्रभु बाझल। व्यथा गौर वर्ण पर मुग्धमना कवि लिखथि अपूर्व रूप गाथा रचि- रचि अवयव, गसि- गसि उपमा रचथि रतिक मनहर काया। सौ गुण सुंदरताक फराके, दुग्ध- धवल छवि एक्के दिश तुला मध्य नापब जं दूहू, पायब गोरे कें अहां बीस।। कृष्ण- वर्ण तैंयों न उपेक्षित, गेलनि कवि केर ओत्तहु ध्यान लावण्यो बेशी कृष्णे मे, मादक नयन सेहो अभिराम। प्रेमक सघन तीव्रता मारुक, नायिकाक पद देलनि ललाम अंग-यष्टि सुषमा सुमनोहर,भ्रू- कटाक्ष छनि मार समान ।। कहू अहीं की रही उपेक्षित ,हम गोधूम -वर्ण बाला ? नव-रस केर बुन्नो सं वंचित, शुष्क हमर नयनक हाला! कतबो रुचिर गढ़नि देहक हो, प्रभा आननक हो विमला आंखि आम केर फांक, नासिका शुक सम, दंतपंक्ति धवला। कोन अपराध कयल हम कवि प्रति,रहलाह सदा कियै ओ रुष्ट कविक न्याय बस शब्दे टा मे,घोर उपेक्षा हमर अदृष्ट।। गुरुदेवक आह्वान सुनैते ,तीन काव्य रचलनि कवि गुप्त युगक उपेक्षित व्यथा हमर की पाओत शब्द, रहत वा सुप्त? कृष्ण केर माहात्म्य थमल जग केर काम- कौतुक स्तब्ध भेल कारी निशा घनघोर वृष्टिक संग चहुं दिशि घेरने कारी घटा जखन अनयक ,कृष्ण कर्मक भ' चुकल अतिचार छल संत्रास सं जग मुक्ति पाबय, केशव एला ल' नव दिशा ।। रूप- गुण- कर्मक त्रिवेणी बहि चलल ब्रज देश मे प्रेम- भक्तिक विमल सरिता बहल अनुपम वेश में। उद्देश्य नञि विस्मृत कथंचित् ललित- लीला- भेस मे आसक्त सन छवि, वस्तुतः ओ नञि बन्हायल घेर में।। राज्य केर नञि लालसा, आशा न बहुमानक कतौ कर्म निष्कामक प्रवर्तन सगर जग,बस लक्ष्य छल राधिका वा गोपिदल केर ध्रुव समर्पण दीर्घतम साधना संपूर्ण जखनहिं, कृष्ण तत्क्षण प्राप्य छल।। स्पर्श करइछ कृष्ण केर माहात्म्य मीरा -गीत मे मुग्ध करइछ भाव चैतन्यक समर्पित नृत्य मे बाल लीला अति मनोरम आह! सूरक छंद मे ललित ललाम पदक छटा जयदेव केर संगीत मे। आइयो हे कृष्ण! दारुण दशा भारत देश केर आधि-व्याधि,द्विधा,संशय,जाल पसरल विकृति केर विनय,कातर सुता द्रुपदक सुनि, प्रभो!पुनि अबियौ! काटि अन्यायीक मस्तक धर्मध्वजा फहराबियौ ! श्रमिक हम श्रमिक अहां केर सेवा मे, खटिते रहैत छी आठ याम भरि पेट भेटौ भोजन हमरो, नञि रहौ अस्थि पर मात्र चाम नञि भरल पेट,तन नञि झंपैल,तजलहुं हम बेबस तखन गाम नञि आलस सं संबंध हमर ,सन्मार्ग तेजल नञि कोनो ठाम। ई सगर देश हम्मर बुझकय, बहरयलहुं वृत्तिक हेतु मुदा श्रम कौशल सं टाका अर्जल, अपमानक भाग भेटल हमरा । नञि किंतु गाम छूटल कौखन, जड़ि हमर रहल गृह राज्य सदा सुख- दुख पावनि आ तिहार स्मृति में संरक्षित रहल सदा । हम आइ किंतु सब राज्यक हित, बनि गेल समस्या भारी छी अर्जनक बाट छूटल सबहक, की करी, सदाशय - कामी छी दायित्व ककर, जाहि नगरक हित नींवक पाथर हम रखने छी वा ओकर जतए हम जन्म लेल, रक्तक संबंध निभौने छी। अछि भेल घमर्थन एतेक देखि मन अतिशय व्याकुल भेल प्रभो ! हम मानव नञि समता भोगी सब मानल प्रगतिक बाट विभो! हम मात्र एक संख्या ,भावक,संवेदन मरु मे झुलसै छी साधन हीन छलहुं सब दिन ,आइ रोन-बोन मे भटकै छी। मतिविशेख अहल भोर सॅं सुनिते चिक- चिक, भेल मोन मम अतिशय घोर सगर घोंघाओज पकड़ि छीपि केॅं ,मूलक नञि अछि कतहु छोर। जड़ि जॅं पकड़ब संभव अछि जे, अपनो वसनक दाग देखाइ कात करोटे चलथि विज्ञ तैं, झॅंपने अप्पन चरण -बेमाइ। लाभ लोभ केर लिलसा उर मे, मुंह पर नि:स्पृहता केर खोल निज- पर हेतु तराजू भिन्ने, सुनू सत्य केर अगबे ढोल। भारति- सेवक से त्रिपुंड धय, भावथि सदति वैभवक मोल भद्रजनक भूषा धय मंचे, चिकरि शब्द केॅ करथि अमोल। बहुत माछ छै एहि तड़ाग मे ,काल्हि देबै भिनसरबे बोर महाजाल रातिए दय बड़का घरक भोज मे माछक झोर। हन्त, मलाहक परिजन भूखल, अनयक तम पसरल घनघोर एहि घावक मरहम नञि कवि लग, हिय मे पीड़ा केर हिलकोर। ई चकमक संसार भ्रमित कय रहल अज्ञ केॅं ओरे सॅं अबल अनाश्रित सीदित सबतरि, सबलक परिचिति जोरे सॅं। जॅं क्यो बिसरल -भटकल सरिपहुॅं सत्यक पथ संधान करथि लोक कहै जनि बूड़ि,छलाह ई मतिविशेष त' कोरे सॅं। बाबा बैद्यनाथ ॐ "कुण्डलिया छंद" करतै जे नित साधना, आर कठिन अभ्यास। धन वैभव विद्या सहित, होयत सकल विकास।। होयत सकल विकास, चतुर्दिक मान बढ़ायत। सदिखन लोकक झुंड, संगमे पुनि मड़रायत।। कह "बाबा" कविराय, देखि दुष्टोसभ जरतै। तीव्र प्रखरता देखि, अहित ओकर नहि करतै।। ॐ गजल आब नहि ई काज कर किछु सुधरि जो लाज कर लूरि किछुओ सीख ले नहि सदति अंदाज कर बाप के अरजल जमा खूब खो आ राज कर भास सीखै गीत के सुर मिला ले साज कर नाम बढ़तौ देसमे फेर तहिपर नाज कर सभ पाँतिमे 2122-212 मात्राक्रम अछि। गजल बहुत पैघ छथि ओ कखन बात होयत गरीबक बुझू नहि अबरजात होयत कते लोक हेतनि मठाधीश बैसल जखन चाटुकारो गनब सात होयत सरंजाम मस्तीक जोगार लागल हँसी आ ठहक्काक बरसात होयत प्रयासो करब,नहि सफल भय सकब यौ समस्या सुनायब तँ अपघात होयत इलाकाक लोको कहै छनि विधाता मुदा राति दिन बस करामात होयत 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि। गजल 1 2 2 1 2 2 1 2 2 1 2 2 जखन भेष देखत तखन दान भेटत करब काज उत्तम सदति मान भेटत हृदय शुद्ध राखब बनत विश्व अप्पन रहत द्वेष जखनहि अपन आन भेटत जतऽ नम्रता अछि ततऽ काज ससरय जखन बुद्धि सीखब सकल ज्ञान भेटत करी बात कखनहुँ बचन मीठ राखी गलत बात बाजब तँ अपमान भेटत रहत रौब हरदम डरत लोक सज्जन मुदा टेढ़ लोकक सदति शान भेटत जखन माय बापक करब खूब सेवा घरेमे अहाँकेँ तँ भगवान भेटत (ध्यातव्य--एक्कोटा मात्रापतन नहि) गजल 1 2 2 1 2 2 1 2 2 1 2 2 सदति छन्द सुन्दर गढ़ल जा रहल छै गजल रोज नीके कहल जा रहल छै कनै घोघ तरमे घरक जे बहुरिया कियै धार नोरक बहल जा रहल छै पढ़लि खूब नारी मुदा लाज भारी कते दर्द निशिदिन सहल जा रहल छै अखन नीक लोकक गुजर अछि असम्भव अपन लोकसँ ओ ठकल जा रहल छै करै छल कुचेष्टा सदति आन के जे बढ़ल पाप तँ ओ जहल जा रहल छै महल गीत गजलक बनल पैघ *बाबा* उपेक्षित पड़ल ओ ढहल जा रहल छै गजल पहिल गुरु मायकेँ बूझी हुनक सभ बातकेँ मानी प्रथम पूजन करी हुनके तखन जे काज से ठानी रखै छलि ध्यान पेटोमे जनम देलनि पुनः सेवा कते ओ कष्ट छलि सहने कहै सभ बात छथि नानी लगै अछि लाज हमरा बड़ पड़ै अछि मोन बदमासी करी हम तंग माताकेँ तखन छल खूब मनमानी कते ओ कष्ट सहि पालन करै छलि दुःखकें सहितो पढ़ाकेँ उच्च शिक्षा धरि बनौलनि पुत्रकेँ ज्ञानी मुदा ओ रोगमे जकड़ल कनै छथि खाटपर सूतलि इलाजो खूब करबै छी लगै अछि बैसिकऽ कानी जखन अवहेलना मायक करय जे पुत्र अछि पापी तखन उद्धार नहि ओकर कतेको पैघ हो दानी आनन्द दास- "बाबाअंगना", नवानी चिठ्ठी अहां स्कूल पहुंचते, तेसर लाइनमे बैसि जायब। मास्सेबके नज़रि अछि, हमरे-अहां पर, अंत्याक्षरीमे, अहां गीत गाएब, हम बस्ता बजायब। अहां हमरा काजर आ हम अहांके नजरि लिखब। लिखै छी हम चिठ्ठी, अहूं जवाब लिखब। स्कूलक चारके तेसर बत्तीमे, खोइन्स जायब। नजरि झुका मुस्का देब, इशारा जानि, अहांक चिठ्ठी हम दौड़ि ल' आयब। अहां हमरा जामुन आ हम अहांके गुलाब लिखब। लिखै छी हम चिठ्ठी, अहूं जवाब लिखब। टीसन पढ़ै लेल आयब, त' सीधे अंगना आबि जायब। बाहर, सखी सब अहांके किरिया खुवायत, कहत भौजी छथिन, मुदा अहां नै ल जायब। अहां हमरा सत्तु आ हम अहांके सतुआईन लिखब। लिखै छी हम चिठ्ठी, अहूं जवाब लिखब। (एकटा बात; अहां जखन प्रेममे होइ छी, दोसरे लोकमे रहै छी, दुनियाके सब भेद-भाव, ऊंच-नीच, जाति-पातिसँ ऊपर बुझैत छीयै, प्रेमक अलावा सब चीज़, गैर-जरूरी होइत अछि।) जुनि डरु लोक सब स'..., प्रेमक पवित्रताके ज्ञान नै केकरो, लोक त' अगियाबताह भ' अनेरो नाचत। प्रेम त' होइत अछि, जाति-पाति स' ऊपर, अपन प्रेम पवित्र हेतै, पायल जकां छन-छन बाजत। अहां हमरा प्राण प्रिये आ हम अहांके प्राणेश्वरी लिखब। लिखै छी हम चिठ्ठी, अहूं जवाब लिखब। हे…, हम अहांक मोनक सबटा बात बुझै छी, ज्यादा नै बौआऊ, धरातलेपर रहु ; प्रेमक आनंद लिय, प्रेममे जिबु, उन्मुक्त गगनमे घुमू। प्रेमक ई त' उमरे अछि, प्रेम अनंत अछि, प्रेमक अंत नहि करु, सावनक फुहारमे मोर बनि झुमु। अहां हमरा राधा आ हम अहांके कृष्ण लिखब। लिखै छी हम मोनमे चिठ्ठी, अहूं मोनेमे जवाब बुझब। लिय… लिख देलौं हम चिठ्ठी, आब… अहूं जवाब लिखब। नींद आबि जाइत अछि आइ भोरमे, ख़ूब तमसा-पित्ता क', गाम फोन केने छल, सपना छल आ सपनेमे, बहुतेक बात-कथा कहने छल। सबके जे बनौलक, आब सबसँ भीख मांगि रहल छै, आब त' गामों-घरके, गाममे, मोन नहि लागि रहल छै। कहै छल…, अहांके सपरिवार गाम एला, दसेक साल भ' गेल, निपैत अंगनाके खुरैवला बौआ, एतेक सियनगर भ' गेल। तुलसी चौड़ामेदीप आ असोरामे बिनु शीशा लालटेन टांगल छै, मड़वाखुट्टा, चारक रंगल मुठ्ठी, साबेडोरीसँ, अखनों बान्हल छै। राखल लार-पुआर दलानपर आ अंगनामे धान मिरल छै, नेबो, अनार, धातरीम, अररनेबा, सबटा सरि-सरि गिरल छै। आम-मौह आ ख़िरीयपुरिया गाछ, सबटा गामेमे राखल छै, किछु काज गामोंसँ करु, मड़वा-दलानके आस लागल छै। असोराके जत्ता आ ढेकी, सबदिन एकदोसर स', लड़ाई ठानै छै, लोरहि-सिलौटके देखियौ, उखरि-समाटक, एक्कोटा बात नहि मानै छै। अंगनामे कौवा कुचरययए आ दलानपर तितली आब'अ लागयछै, जखन अहां, सपरिवार गाम आबै छी, धियापुताके ख़ूब मोन लागय छै। अगर, अखनों अप्पन गाममे, अस्पतालक चिंता नै करबै, फेर, सेवानिवृत्त भेला बाद, गाममे सुखक दिन कोना कटबै। की करब, हम अहां भोज गाममे, आब परदेशेमे पार्टी भ' जाइत अछि, फुर्सत त' हमरो अछि गामक लेल..., मुदा..., जखन पेट भरि जाइत अछि, त' नींद आबि जाइत अछि...। प्रियंवदा तारा झा उम्मीदक आश्रय शब्द नीरव , युक्ति हारल ,थाकल मन प्राण विकास बाधित ,संचार स्थावर ,भ्रमित ज्ञान विज्ञान भीरुमन , शिथिल तन , विकल विश्व अनुखन व्योमचारी बनल बन्दी, भय ग्रसित सदिखन। प्रगतिक मार्ग सब धूमिल भऽ रहल मायक कोरमे , शिशु भूखसऽ बिलखि रहल मनुष्य सऽ मनुष्य भयभीत भऽ रहल संवेदनापर व्याधि भय हावी भऽ रहल।। निश्चय विकट समयई ,अछि परीक्षाक घड़ी विश्वव्यापी व्याधि जनित आतंकक कड़ी दैन्य ,नैराश्यभाव अछि भेल प्रबल अदृश्य शत्रुक भीति सबपर भारी पड़ल।। विवश भेल मानव, बुद्धि हेरायल, ओझरायल तर्क क्षुब्ध भेल सोचि रहल, हम छी मानव अति विशिष्ट विश्व जीतल , प्रकृति बान्हल ,अर्जित नूतन आयाम पुरुषार्थक नित नवीन परिभाषा ,जीतल धरा व्योम।। नहिं स्वीकार करब पराजय , नहिं छोड़ब उम्मीदक आश्रय हम आयब , हम आयब, लय समाधान संसार बचायब।। हम गाम छी हम गाम छी ,सभ्यताक पहिल वास अति गौरवमय अछि हमर इतिहास हम शास्त्रार्थक चर्चित भूमि मंडन ,वाचस्पतिकेर ई धराधाम।। शस्य-श्यामल क्षेत्र हमर सरिता सिंचित भूमि हमर विकासक असीम संभावना सऽ ओत-प्रोत मानव संसाधन केर हम अमल स्त्रोत।। कला , साहित्यक हम छलहुं धनी हास-परिहास सऽ सदति गुंजित अवनि मधुर-भाखा ,संस्कारक मधुरावलि स्नेह,सौजन्यक रमनगर संगम-स्थली।। मुदा नहि जानि ई की भेल ? ककर नजरि लागि गेल सुन्न भेल जाइत अछि दलान कतय हेरायल सौहार्दक अनुदान ? धिया-पुता सब होइत छथि हरान शिक्षा, रोजगार हेतु भटकैत छथि देश-विदेश नहिं पबै छथि समयानुकूल समावेश लखियो मायक नोर पड़ाइ छथि परदेश‌।। हम विकासक डेगमे छी पाछू पड़ल बाढि ,रौदी,उद्योगक कमी सऽ पस्त स्वास्थ्य सुविधा केर घोर अभाव की की कहू ,भेल छी लाचार।। रहि गेलहुं गौरवमय अतीत क अवशेष मात्र अछि सिहन्ता पबितहुं विकासक आयाम रोकि रखितहुं अप्पन संततिकेँ निजकोर पुनि पबितहुं गत-गौरव ,स्वावलंबन ओ सम्मान।। हम गाम छी ,आशमे बैसल दुर्दशा‌ सऽ विकल उपेक्षा सऽ व्यथित हम गाम छी ,आशमे बैसल।। व्यूह बहुत दिन सऽ ओझरायल छी मोनक व्यूहमे चेतनाक जलधिमे , भावक जंजालमे नहि कोनो एकपरिया अछि भेटैत सोझ कौखन सगरो बाटे बुझाइछ अबूझ। सत्य लगैत अछि फुसियाही गप्प आदर्श जेना विक्षिप्तक प्रलाप नैतिकता अछि बनल विषहीन सर्पक पर्याय कतऽ भुतलायल मनुष्यक सहज औदार्य ? अनन्त लालसा संग्रह केर ,पदलिप्साके नहि कोनो छोर विषय वासना भेल प्रबल , अहंकारके नहि कोनो ओर नेतागण छथि अनुपम अभिनेता,जनदुख सऽ नहि कोनो नाता अति प्रिय बाजब ,निज-गुण गायब , नहि लोकक कोनो चिन्ता। धर्म , अध्यात्मके नवीन परिभाषा अछि लिखा रहल मूल-तत्व उपेक्षित , कलेवर अछि चमकि रहल जनमानस जेना अन्धानुकरणक कामी भऽ रहल कृष्णपक्षक अन्हार सबतरि भेल प्रचंड प्रबल।। मोन होइछ मोन होइछ,विचरितहु नभ में ,पबितहुं अनंत सीमा निरखितहुं प्रक्रृतिक सौंदर्य अबाध सुनितहुं मधुर कलरव ,सरिताक अव्यक्त छन्द पढितहुं मोनक पोथी निर्द्वन्द । मोन होइछ, स्वत्व ,स्नेहक करी निवेश सहज भेटय निज प्राप्य नहि सदिखन कर्तव्यक भार हमर कौखन भेटय अधिकारो के आनन्द। मोन होइछ निर्द्वन्द्व रहितहुं साजितहुं कल्पनाक मोहक डाला सुखद स्वप्नक दूभि धान रखितहुं आत्मविश्वास ,सफलताक पान मखान । मोन होइछ धरित्रीक सौन्दर्य देखितहुं सुनितहुं विहगक मधुर कलरव सागरक उद्दाम वीचि नर्तन सरिताक शान्त गतिमय छन्द । मोन होइछ नहिं रहैत कोनो तनाव कोनो ओझराव सहज समतल चलय ई जीवन रहय मुदित सदिखन मन उपवन मोन होइछ लिखितहुं संघर्षक हम उपसंहार करितहुं उल्लासक कानन में हमहूं विहार स्वप्न जीबितहुं,बांचितहुं सुखक उदगार करितहुं नयन उन्मीलित पथ विस्तार ।। मोन होइछ,नहि रहय कत्तहु विभेद स्नेहक सरिता बहय अमन्द नहि शिशु कोनो सूतय भूखल भेटय सहज शिक्षा केर अधिकार। मोन होइछ,होमय शासन रामराज्य किन्तु , मैथिली नहिं भोगथि ओ भाग्य नहिं, अग्निपरीक्षा केर अपमान सहज सुरक्षित होमय स्त्री केर सम्मान ।। सविता 'सुमन', सहरसा स्त्री हम स्त्री छी हम जननी छी हम माँ छी हम बेटी छी हम पत्नी छी हम बहु छी कतेक हिस्सा में हम बंटल छी सब लेल जिए छी मुदा खुद के पहचान भूलि जाइत छी मिटा देइत छी अपन अरमान चुल्हा के आगि में भूला दैत छी अपन पहचान घरक काज में भोर सौं सांझ धरि चक्की जेना पिसाइत छी सभक चेहरा पढि सभक जरुरत पूरा करैत छी सभक ठोर पर मुस्कान आनैत छी मुदा अपन आंखिक नोर आंचर सौं छुपा कऽ पोछैत छी हम स्त्री छी कतबौ पढ़ल लिखल संस्कारी छी घरे में हराएल हम नारी छी आगु तऽ बढे दिअ हमरो कंधा सौं कांधा मिला के चलऽ तऽ दिअ हमरो कोमल हृदय हम स्नेह के अभिलाषी छी रचे छी श्रृष्टि मुदा प्रेमक प्यासी छी........ कंचन कंठ हमर नानीगाम हमर नानीगाम प्रसिद्ध अछि जतय छलाह महाकवि पंडित लाल दास जे छलथि हमर परनाना अद्भुत विद्वान् माँ सीताके दियौलनि मान सहस्र रावण के पराजयक वर्णन सुनि सुधीजन भय गेलाह मगन स्त्री धर्म शिक्षा पर पोथी लिखि जन जनमे भ' गेलाह अमर छलाह पंचभाषाऔ तंत्र क ज्ञाता ओ लिखल अठारह पोथी गाम खड़ौआ के स्कूल आ मंदिर ओ पोखरि झाँखरि सभसँ अमिट भेल नाम हुनकर । तनिकर बहुआसिन हम्मर नानी ओकर ममता कतेक बखानी हमर नानी छलीह बड्ड सोझ माथ पर धयने काजक बोझ मुदा तखनहुँ छुटय ने ईश भजन हाथ में काज मुँह में राम सबहक कयलीह सभटा निमेरा कखनहुँ नहि होइ मुँह मलिन गाबथि सिखबथि भजन सभ दिन कतेक सुआदु ओ तरकारी तीमन सोहारी बनाबथि ने परथन खसय सभ दिन हमर सभके हृदय बसय चलि भेलीह रामनवमी दिन राम जपथि रामहि मे लीन। अजगुत बुचिया दुलरी मुनिया पहिरने पैजनिया डोलैयाआंगन में मचबै रुनझुनिया जानि नहि कोना भ गेली सियान पढ़ब - गुनबमे लागल धियान पढ़य लगलीह ओ गणित ओ विज्ञान चतुराईसं काटल सभके कान मोन में छल देशभक्ति क उफान भेल चयन ओ उड़ाबय विमान डरि जो रे अभगला अक्खज शैतान नहि तऽ मिटा जेतौ सभटा निसान बुझिहैं नहि तों विपन्न ओ करुण माँ भारती क छथि ई दुलरी सियान धन्य ओ माता पिता छथि भागमान जनिका घर एली सिया सुकुमारी मिटाबय कुल ओ देशक अपमान रहलीह ओ लय नव अवतार कतेक दिन राखब अहाँ झमारि दियौ कनि सिनेह दुलारक संग विश्वास छूबि लेतीह आसमान औ फंद काटिकय लौतीह नवका विहान। प्रभाष अकिंचन पंच राम दीप राम-अर्थक प्रतीक पंचदीप अटल आर्यावर्त आत्मदीप्त रामराजक आदर्श-संकल्पना चतुर्दिक सुख-शांति स्थापना प्रजा-जन हो भयमुक्त प्रसन्न ऐहन शासनक मंगलकामना पहिल दीपक मंगल पुनीत राम-अर्थक प्रतीक पंचदीप दोसर-दीप राम-सम मर्यादा पुरूषोत्तम बनला सुखदाता सत्य-कर्म धर्मनिष्ठ-आचरण आत्मशुद्धि आ जीवन-सादा सकल जगत जे गाबै गीत राम-अर्थक प्रतीक पंचदीप तेसर-दीप नेतृत्व-अद्वितीय वंचित-शोषित के सर्वप्रिये सकल समाजक आदर-पात्र विश्वास-सहयोग-शक्ति त्रिये आत्मविश्वासक हो दीप्त-रीत राम-अर्थक प्रतीक पंचदीप चारिम-दीप राम-शौर्य-बल आमजनक साहसी पगदल जलधि लांघि लंकेश-वधक परम पराक्रमक पुष्टि-प्रबल स्थापित जन-मानसक जीत राम-अर्थक प्रतीक पंचदीप पंचम-दीप लोकतांत्रिक-राम उचित-राय के दैत सम्मान जनमत लोकमत सर्वोत्तम जन-अनुमतिस' सिद्धकाम प्रजा प्रजापति हो राजहित राम-अर्थक प्रतीक पंचदीप पावस मिलन रिमझिम पावस मदिराएल सांझमें मनमोहक छवि अभरि रहल भीजल वसन तन प्रियवर जेना कामदेव नभ उतरि रहल नहूं-नहूं चुप्पे-चुप्पे ससरैत अएला दलान पर पसरल-मुस्की मधुर-मुख जेना इन्द्रधनु चमकय गाम पर पट खोलिते भेल दरस-परस वृष्टि मोती-सम झहरि रहल सत्कारक उमंग चरम हिय खा' रहल हिचकोल छल सुधि-बुधि तन-वसनक नहिं कनिको अंग-अंग करैत किलोल छल नूपुर रूनझून खन-खन कंचिका रति-मदन मत्त बरसि रहल कतेक दिवस पर प्रियतम-दर्शन सोलहो-श्रृंगारक आस पूर्ण सकल मनोरथ प्रेम-प्रवाह संग तृप्ति जेना मरूपात्रक बूंद आजु अनाथ सनाथ बनल ई जेना वृंदावन गमकि रहल संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम-मंगरौना, पोस्ट-गोनौली, थाना- अंधराठाढ़ी, जिला-मधुबनी आउट इनकम बड़ि नीक गप थिक इ घूस लेल जाउ सभ कियो दिन देखारे डाका छियैक बेलॉक पर नवका रोजगार। ऊपर सँ नीचा धरि सभ मिलि बाँटि कs खाएत छथि गरीबक हिस्सा लाभार्थी केँ खाता मे छेद भेलन्हि। मनरेगा सँ मुखिया मालामाल वृद्धा पेंशन मे सेंध लागल जीविका कर्मी लागल छथि जोर-शोर सँ आउट इनकम केर बाजार भेलै गरम। बीडीओ,सीओ सभ हिस्सेदार छथि फलि-फूलि रहल छै गोरखधंधा कान मे रूई आओर तेल डालि कs कुंभकर्ण निद्रा मे सुतल छथि देशक प्रधान। आशीष अनचिन्हार गजल चास नै छै बास नै छै गाम नै छै वस्तु नै छै वास्तु नै छै दाम नै छै आबि बैसल मोनमे अपने हिसाबें नेह नै छै सोह नै छै काम नै छै बस खुशीमे अंग बूझू संग बूझू आ दुखीमे काज नै छै नाम नै छै देशमे रावण कुम्भकर्णो मेघनादो केसरी नै लाल लक्ष्मण राम नै छै सर्द इच्छा भाव सर्दे सर्द भेटल चाह नै छै धाह नै छै घाम नै छै सभ पाँतिमे 2122-2122-2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोसद्दस सालिम)। गजल हमरो भेटल सुन्ने सुन्ना हुनको देलक तकरे दुन्ना बेरोजगारीक तीन यार धर्म शर्म भाषण झुनझुन्ना छिड़िआ गेल छलहुँ हम बहुते हमरा बान्हल भूखक जुन्ना संसदमे के सभ पहुँचल छथि सीसी बोतल ठेपी मुन्ना ओ सभ मरलै जिनका कारण से गाबै छथि ता ता तुन्ना सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल अपना सन नै लागल अनचिन्हार अनका लग ई बाजल अनचिन्हार रचनामे कनियों नै रहलै धाह सुविधा रसमे डूबल अनचिन्हार बहुते बाजल लेकिन काजक बेर नाँगरि सुटका भागल अनचिन्हार बदलत सभ कहियो बाजल ई बात अलमीरामे राखल अनचिन्हार पक्का हेतै ई चिन्हारक काज सोझा सोझी बाजल अनचिन्हार सभ पाँतिमे 222-222-222-1 मात्राक्रम अछि। गजल हुनका आगू कोनो मुद्दा नै बँचलै कुर्सी टेबुल चप्पल जुत्ता नै बँचलै जिनका आगू राखल छै खाली आँठी तिनका आगू रसगर गुद्दा नै बँचलै सभ भऽ गेलै अपना मोने साधू संत अइ संसारमे कियो लुच्चा नै बँचलै हेहर कहियौ थेत्थर कहियौ या किच्छो ई सच सभ दिन बँचलै सत्ता नै बँचलै भूखसँ जो़ड़ल समान एलै बजारमे महँगा नै बँचलै आ सस्ता नै बँचलै सभ पाँतिमे मात्राक्रम 222-222-222-22 अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल रूसल रहलै खाली पेट नहिये भेलै राजी पेट

भरले पेटक पूछम पूछ नै नै करतै हाँ जी पेट

कत्ते करतै पूजा पाठ साधुक सेहो पापी पेट

पूरा जीवन दुन्नू साँझ खाली रहलै खाली पेट

कखनो अफरल कखनो धोधि लुच्चा छै सरकारी पेट

सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। ई बहरे विदेह अछि। गजल इम्हर एने तगमा भेटत उम्हर गेने घटना भेटत

मूड़ी झुकने बाबू सभहँक दिल्ली भेटत पटना भेटत

कत्ते देखब हुनकर भीतर जे सभ भेटत ठकना भेटत

पाखंडी सभहँक चाँगुरमे राधा भेटत सलमा भेटत

अनचिन्हारक संगे रहने इच्छा भेटत सपना भेटत

सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल चानन टिक्का आर मसुआइ अजगुत खेला भाइ रे भाइ दुनियाँ माने अतबे बूझू झूर झमेला लाइ लपटाइ ई सभ भेलै लेकिन फेरो की सभ हेतै दाइ गे दाइ सुख के माने तिलबा हेतै दुख के माने लाइ चुड़लाइ हुनके जकाँ हम हाथ जोड़ल हुनके जकाँ हमहूँ नितराइ सभ पाँतिमे 22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल ईहो निकलत ओहो निकलत जहरो निकलत अमृतो निकलत अइ रंग बिरंगक दुनियाँमे करियो निकलत उजरो निकलत आँगनमे एहने फरमान बुढ़ियो निकलत बुढ़बो निकलत कहियो आधुनिकताक लिस्टसँ गामो निकलत शहरो निकलत कहियो ने कहियो पिंजड़ासँ सुग्गो निकलत मैनो निकलत सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल घड़ी दू घड़ी जे बिता गेल भमरा बहुत बात हमरा सिखा गेल भमरा गमक लीखि देबै मधुर रस परागो जदी गाछ फूलक पटा गेल भमरा निमाहब कठिन छै हलाहल समाने अपन आन खातिर बिका गेल भमरा हमर टीस लेलक अपन टीस देलक तकर बाद किम्हर नुका गेल भमरा रहै दाग पुरना मुदा दर्द नवके हवन कुंड लग सकपका गेल भमरा सभ पाँतिमे 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि (बहरे मुतकारिब मोसम्मन (चारि सालिम वा बहरे मुतकारिब सालिम अठरुक्नी)। यदि=जदि केर उच्चारण रूप जदी लेल गेल अछि। वर्तनी रूपमे ‘यदि’ सही छै। गजल बाहर बाहर जोड़ल भतार भितरे भीतर टूटल भतार छै मृगतृष्णा सन के विकास इम्हर उम्हर दौड़ल भतार इच्छा माने पूरा समान किम्हर जेतै परिकल भतार लेने हेतै सभटा हिसाब चुप्पे रहि रहि कानल भतार हमरा आने देलक समाद अपने लोकक दागल भतार सभ पाँतिमे 22-22-22-121 मात्राक्रम अछि। गजल छै अमीरक दिक्कत हीरा सोन दिक्कत आ गरीबक दिक्कत माँड़े नोन दिक्कत कोना पुरतै सिंदूर सभ इच्छा लेल रहतै किछु इच्छा कुमारि तँ कोन दिक्कत हमहूँ मानि लेलहुँ ओहो मानि लेलक अइ दुनियाँमे देह दिक्कत मोन दिक्कत किनको खातिर ई कर्जो भेलै तगमा किनको खातिर सबूत बला लोन दिक्कत बिना जनने बिना बुझने उल्टा प्रभाव छै तांत्रिक सभ लग जोग दिक्कत टोन दिक्कत सभ पाँतिमे 222-222-222-22 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल गहुमन बली अजगर गली धामन बली साँखर गली नेहक धनी जाइत रहल आँचर गली काजर गली बगुला भगत भेटल बहुत बाहर गली भीतर गली कोना चलब अतबे कहू हिनकर गली हुनकर गली आएल रहथिन देवतो पापक महल पामर गली सभ पाँतिमे मात्राक्रम 2212-2212 अछि (बहरे रजज मोरब्बा (दू) सालिम वा बहरे रजज सालिम चारिरुक्नी)। भक्ति गजल नमो मेधा महामाया नमो देवी नमो भाषा नमो जटिला नमो ब्राह्मी नमो सीता नमो राधा नमो धन्या नमो वसुधा नमो अनघा नमो लक्ष्मी नमो दुर्गा नमो सत्या नमो आद्या नमो काली नमो चंडी महाकाली नमो तारा नमो माँजरि नमो कुसुमा नमो लोना नमो लखिमा नमो थेरी नमो गंडक महानंदा नमो गंगा नमो कमला नमो जीबछ नमो कोशी सभ पाँतिमे 1222-1222-1222 केर मात्राक्रम अछि। परंपरासँ प्राप्त शब्दकेँ बहरमे सजा देल गेल अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। भक्ति गजल डोकहर वासिनी ग्रामिणी भगवती दुखहरी सुखकरी राज राजेश्वरी मातृदेवी युगल उर्वरी कामिनी सुंदरी माधुरी काम कामेश्वरी शालिनी मालिनी शेखरी रागिनी रुचिकरी शुचिकरी नाद नादेश्वरी धर्मदा अर्थदा कामदा मोक्षदा जयकरी शुभकरी योग योगेश्वरी कंकिनी काकिनी कोटरी साधिके शंकरी सहचरी सर्व सर्वेश्वरी सभ पाँतिमे 212-212-212-212 मात्राक्रम अछि। विजय इस्सर "वत्स" अपराधी छी हम केकरा कहबै,के सुनतै किए मानत क्यो हमर बात सभक अपन अलगे ज्ञान बुद्धि आ संस्कार सभकेर भिन्नहि अछि चालि-चलन-व्यवहार कहाँ सुनलियै हमहूँ कहाँ बूझि सकलियै कहाँ मानल हमर मोन हमरा सँ एकहु बेर कतय गेल छलैक हमर ज्ञान बुद्धि आ विवेक जहन हमर आत्मा कहै छल हमरा सँ हमरे लेल,हमर बात डेगे डेग,बेरम बेर। केकरा पर उठायब आँगुर कोना कहब केकरो दोषी की गुणब अपराध आनक जखन हमहीं हतने छी हमर अपन आत्मा के मारने छी अपन मोन के कल्पेने छी अपन काया के केने छी कतेको अपराध अनुचित व्यवहार सँ केने छी बहुत खेलबार अपन संस्कृति-संस्कार सँ हमहीं सभसँ बेसी दोषी अपन आंतरिक अदालतक सभसँ पैघ अपराधी छी हम। बचबिहऽ हो कक्का हँसलक भभाकय, सभ मारलक ठहक्का भागलहुंँ चिकड़ि हम बचबिहऽ हो कक्का सुंदरि सभक बीच हम जाकय फसलहुंँ सीता स्वयंवर कें नारद जी बनलहुंँ अपन हाल देखि भेलहुँ हक्का बक्का भागलहुंँ चिकड़ि कय बचबिहऽ हो कक्का पता नैं जे हमरा मति मे कि आयल जेना कोनों मजनूं के आत्मा समायल थापर खा परेलहुंँ जेना चोर उचक्का भागलहुंँ चिकड़ि कय बचबिहऽ हो कक्का कियो नैं बुझै छै हमर दुर्दशा की जें हम छी कुमारे तें नें दशा ई भेलहुँ अधबयसू फिरी खाइत धक्का भागलहुंँ चिकड़ि कय बचबिहऽ हो कक्का आजाद गजल माँगि रहल छी सौंसे दुनिया, गामे टोल सुधारि दियौ ने बूझल जगमग करबै जग केंँ, डीही दीया बारि दियौ ने देशक-राज्यक बात बहुत छै, कत्ते कहबै कत्ते सुनबै अपनहि घर केँ स्वर्ग बनाके, भगवा झंडा गाड़ि दियौ ने भाषण काल फुराइ बहुत छै, कथनी करनी में बड अंतर मंचक नीचाँ आबि कने निज जीवन में उतारि दियौ ने हम्मर बाजब तिख्खे लागत,सत्यक धाह सहब की संभव अप्पन तामस शांत करब तेंँ, हमरे घर उजारि दियौ ने देश हमर छल मिथिला शोभित,राज्यक लेल किए बेलल्ला सुनगय दीयौ सभके हृद मे एक्कहि संग पजारि दियौ ने नबोनारायण मिश्र ई कीर्तिमान बनल जे छल खास अपन आइ सैह अछि आन बनल। अभिशप्त जीनगी हमर, अवगुणक खान बनल।। जकरे हित-साधन मे, रहलहुँ सभदिन लागल। तकरा नजरि मे आइ, हम छी अकान बनल।। एहि आर्थिक-युग मे, टाका अछि सर्वोपरि। टाका बिनु जिनगी, जे ना सुन्न-मसान बनल ।। फुसि-फटक बाजिकड, सभके ठकैत रहल। बिडम्बना एहन जे, आइ वैह अछि महान बनल।। पुण्य भूमि मिथिलाक, कण-कण जुड़ा गेल। मैथिलीक संबर्द्धनार्थ, शंशोधित संविधान बनल ।। श्रेयले बाक लुझि मे, हमहीटा पछु आयल । अपन पीठ ठोकि-ठोकि, सभ पहलमान बनल।। जयकारक उद्घोष करैत, बेमत्त मैथिलीभाषी। अभिनन्दन समस्त मनीषी के जनिक प्रयासे ई कीर्तिमान बनल।। (मूल पाठ कर्णामृत अक्टूबर-दिसम्बर २००७सँ साभार) नवगीत सभ ठाम चोरे-चोर, ई मानि कऽ चलू नेता अफसर घुसखोर, ई मानि कऽ चलू जिनगीक बाट मे कतेको काँट जे गड़ल सड़ल-गलल-निंघेस हमर फाँट मे पड़ल व्यर्थे बहैब नोर, ई मानि कऽ चलू नेता अफसर घुसखोर, ई मानि कऽ चलू हम छी अपन समाज आ परिवार सँ हारल लटकल जेना बबूर पर केओ बेल के मारल बितैछ कलयुग घोर ई मानि कऽ चलू नेता अफसर घुसखोर, ई मानि कऽ चलू महगी अकाश लोक उपासे मरैत छै गोदान मे गहूम उदामे सड़ैत छै हेतैक निश्चित भोर, ई मानि कऽ चलू नेता अफसर घुसखोर, ई मानि कऽ चलू (ई रचना मिथिला दर्शनक अंक Nov-Dec-2010 मे गजल कहि कऽ छपल अछि मुदा वस्तुतः ई गीत-नवगीतक श्रेणीमे अबैए।) बिडम्बना धोबीक कुकूर सन घर के नै घाट के। थाहि-थाहि चलबाक अछि अनचिन्हार बाटके। जकरा लेल कनलहुँ तकरे आँखि नोर नहि जीवन संघर्षमय हमर दुखक ओर नहि चोर बाजए जोरसँ अभरैत डेग-डेगपर। प्रबुद्ध लोकक चुप्पी, प्रश्नचिह्न अछि दरेगापर। जरलपर नून छिटब, धर्मनिरपेक्षताक नामपर। दोषारोपण उचित नै, सेनाक सम्मानपर। घर के भेदिया लंका डाह, देखू आइ सीमानपर। पाथर फेकैत देशद्रोही, सेनाक जवानपर। सेनाक मनोबल अछि, उच्च अकासपर। राजनीति गर्म भेल, शहीदक लहासपर। नबोनारायण के विनती, देशद्रोही हो दंडित। सद्भावक बलपर हो वापसी कश्मीरी पंडित। ज्ञानवर्द्धन कण्ठ मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै! घुरि इम्हर कनी ताकू यै! बाजी अहाँ, से माखन-मिसरी ताकी अहाँ त' छिटुकय बिजुरी नैन मृगा-सन, बोल सुगा-सन जुनि मुसकी सँ मारू यै! गोर बरन मुख-चंदा शोभय श्याम केश-घन उपर डोलय रूपक बरखा रिमझिम-रिमझिम हमरो कनी नहाउ यै! धन्य विधाता गढ़ि-गढ़ि रचलक धन्य नयन दर्शन-सुख पओलक ही केर भीतर हूक उठैए एकरा कोना सम्हारू यै! मधुर-मधुर अहाँ बाजू यै! घुरि इम्हर कनी ताकू यै! के छथि? जनमैते उठि नाचथि, के छथि? रहि-रहि ताल लगाबथि, के छथि? बदलि-बदलि क' गाबथि, के छथि? अरे, पमरिया? नञ-नञ, कवि छथि! चिकरि-चिकरि क' बाजथि, के छथि? नव-नव ताल लगाबथि, के छथि? बेरि-बेरि गरियाबथि, के छथि? अरे, सनकहबा? पत्रकार छथि! डारिए-डारिए छड़पथि, के छथि? नव-नव नाच देखाबथि, के छथि? नोचथि,नोछरथि,भोम्हरथि, के छथि? अरे,बनरबा? नहि, नेता छथि! नरक पीक' टुन्नी टुन्न भेला, खसला ओ गंदा नाला। किछु सुधि नहि रहलनि,पड़लनि जे दारु सँ बड़का पाला। फुटल माथसँ शोणित छर-छर, भीजल-तीतल झोंटा । मुँहसँ लसलस लेर चुअल छनि, बहल नाकसँ पोटा। लगमे बहुत बोकरने, लेभरल सगरो मारे गन्हकै छनि। आधा देह पड़ल नालामे, पिलुआ सह-सह सहकै छनि। भरल मुँह बैसल छनि माछी, पैरमे माखल गुँह। आबिक' केम्हरो सँ एक कुक्कुर लगलनि चाटय मुँह। जीबै लेल पिबै छथि वा ओ पीबै लेल जिबै छथि! इ जिनगी जँ छनि जिनगी तँ नरक कथीकेँ कहै छथि? हमर मुनियाँ सुतैये टुनमुनियाँ हमर मुनियाँ सुतैये टुनमुनियाँ कि निनियाँ आबह ने! मेघ पर सवार भ' क' अबिहह हे निनियाँ मुनियाँ लय अनिहह तों नवकी झुनझुनियाँ कोरमे ल' क' मुनियाँकेँ निनियाँ तों झूला झुलाबह ने! मुनियें सँ शोभा आ मुनियें सँ शान छै मुनियें हमर जान-प्राण, राग-तान छै हमर मुनियाँकेँ कानेमे निनियाँ मधुर गीत गाबह ने! आसक जहाज सँ अकास उड़इ मुनियाँ तोरे संगे घूमइ सगर देश-दुनियाँ चान-तारा सँ साजल-सँवारल तों सपना सजाबह ने! भगवान अहाँ सँ की बाजी भगवान अहाँ सँ की बाजी, कोन बात अहाँ जे नहि जानी! सभ जैव-अजैव अहींक रचना, एहि सृष्टिक एक अहीं स्वामी! कण-कणमे व्याप अहीं केर छै, क्षण-क्षण हम जाप अहींक करी! धड़कनमे नाम अहींक प्रभु, प्रति श्वासमे वास अहींक मानी! जे किछु छी,जे किछु संग हमर, से सभटा देल अहीं केर छी! नहि हम्मर किछु,नहि हम किछु छी, एकमात्र अहीं अंतर्यामी! सभ भावमे अहींक प्रभाव प्रभु, नहि अहाँक अछैत अभाव कोनो! जिनगी देनिहार अहीं भगवन, जिनगी केर बादो अहीं जानी! सम्हरिक' रस्ता चलिहह हौ! बटोही पग-पग भेटतह काँट सम्हरिक' रस्ता चलिहह हौ! रौदे घामेघाम त' कखनो जाड़े कँपतह गात हौ। अन्हड़ बरखा-बुन्नी कहियो पाथर खसतह माथ हौ। सभटा सहि-सहि चल' पड़तह छोड़िहह नहि तों आस, सम्हरिक' रस्ता चलिहह हौ! नहि केओ तोहर अपन एतय छह नहि केओ तोहर आन हौ। सभ केओ तोरे सनक मोसाफिर नहि केकरो इ गाम हौ। नहि किछु अरजल संगे जयतह जयबह खाली हाथ, सम्हरिक' रस्ता चलिहह हौ! लोभ क्रोध मत्सर माया सँ छाड़ल आँखिक पर्दा हौ। देखह कोना काया तोहर भेलह गर्दा-गर्दा हौ। कानह नहि, अपने तों अकानह कण-कण प्रभु केर वास, सम्हरिक' रस्ता चलिहह हौ! रहमत आजु उपासल, बिरजू पियासल हे....... रहमत आजु उपासल, बिरजू पियासल हे, धनी हे, दिय' चारि रोटी निकालि, खोआकय खायब हे। गाम थिक एक परिवार,केकर मुँह ताकब हे, धनी हे,हिलि-मिलि रहि देब संग,सभक दुख बाँटब हे। चलतइ चाक चकाचक,बासन बनायब हे, धनी हे,बेचि धनिक घर आयब,नीक-नीक खायब हे। कण-कण जोड़ि जुटायब,महल बनायब हे, धनी हे, रानी बनाकय राखब,नथिया गढ़ायब हे। लछमी अपन सुलच्छिन, नीक घर बियाहब हे, धनी हे, शुभ दिन शुभ शुभ आओत,मंगल गायब हे। आशुतोष कोना कहू? भारत एक कृषि प्रधान देश अछि। राजू क गाल पर तीन थप्पड़ लगवैत गुरू जी बजलाह उल्लू पाजी गदहा डूवि मर लाज नञि होइत छौक छोट छिन बात भारत एक कृषि प्रधान देश अछि याद नञि रहैत छौक हिचकैत राजू बाजल लाजे त होइत अछि अहि बात क क्लेश अछि तीन सॉझ क भूखल छी कोना कहू? भारत एक कृषि प्रधान देश अछि। जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल' बाल गजल राति सकाले सुतबै हम भोरे-भोरे उठबै हम नमस्कार करबै सभकें सबहक आदर करबै हम आसन-प्राणायाम करब तन-मन निरोग रखबै हम नहि ककरो हम दुख देबै मधुर सत्य टा बजबै हम हम छी सबहक सभ हमर अहिना सभ दिन बुझबै हम मेल-जोल राखब सभसं नहि ककरहुसं लड़बै हम जहिना रहला राम-लखन तहिना सभदिन रहबै हम ( मात्रा-क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 ) दू टा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | छठम शेरमे एक-एक टा लघुकें दीर्घ मानल गेल अछि | बाल गजल आखर अकानिक’ चलू लक्ष्य संधानिक’ चलू एलहुँ कतयसं कोना पहिने इ जानिक’ चलू खेल थीक जीवन ई आबो त मानिक’ चलू अहूँ छी हनुमानजी सागर इ फानिक’ चलू काज देत बरखामे छत्ता इ तानिक’ चलू ( मात्रा-क्रम : 2 2 2 2 2 2 ) दू टा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | गजल अही गाँमे हमरो रहबाक अछि और हमरा नै किछु कहबाक अछि अपन मूर्खतापर हंसबाक अछि दुनियाक दुरगतिपर कनबाक अछि किछु लोक दिनकें राति कहैत छथि बस एहेन लोकसं बचबाक अछि किछु लोक नाथथि कुडहरिसं महींस देखी, मुदा किछु नै बजबाक अछि किछु लोक ठोकथि अपने अपन पीठ कान आँखि मूनि सभ सुनबाक अछि करैब अपन आँखिक ऑपरेशन टेटर दोसरक नहि गनबाक अछि किछु जन बाटेपर रोपथि बबूर अही बाटपर हमरो चलबाक अछि सभ क्यो कहैए अहाँ नै बुझै छियै माटिक मुरुत जकाँ बनबाक अछि ढोलक आ झालि जकाँ बाजब हम अहिना अपन दिन आब गनबाक अछि घरेमे छथि सभ देव आ देवी शरण आब त हुनके गह्बाक अछि सभ क्यो करैत अछि सबहक खिधांस सभ जनैए एकदिन मरबाक अछि किछु लोक मरियोक’ नहि मरैत छथि हमरो किछु तेहने करबाक अछि मास्क बिनु लगौने छोडू नै घर कोरोनासं सभकें लड़बाक अछि (मात्रा-क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | गजल ई दुनिया थिक भोजक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का रसगुल्ला आ भांगक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का खाजा मुंगबा और जिलेबी सत्य थीक ऐ जीवनमे बांकी सभटा झूठक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का योग करी सकरौडीसं आ ध्यान खीर-मलपूआ केर तड़ुआ आ तिलकोरक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का परमानन्दक अनुभव होइछ चूड़ा-दही-चिन्नीमे अदभुत आम-अँचारक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का प्रेम प्रवल सजमनि-कोबीसं कुम्हरौडी-खटमिट्ठीसं गजब ओल आ सागक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का जे अछि स्वर्गहुमे दुरलभ से सभ सहज अछि मिथिलामे माँछ-मखानक पानक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का सालो भरि मौसम अछि भोजक ब्याह श्राद्ध आ बरखीमे मूडन आ उपनयनक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का भोजेसं कंगाल भेल छथि मिसर चौधरी ठाकुर झा उजड़ल अछि जयबारक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का धन्य हमर सीता जे रामक आदर छन्हि संसारमे अदभुत शील-स्वभावक दुनिया से कहलनि खट्टर कक्का (मात्रा-क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दू टा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | गजल धोती, जनउ, खराम बहुत अछि पुरस्कार बदलाम बहुत अछि खुट्टापर त बरद एकहिटा जाबी और कराम बहुत अछि रस्ता बदलि-बदलि क' देखल सभ रस्तापर जाम बहुत अछि पूतना अछि बनल कोरोना भय चिन्ता सभ ठाम बहुत अछि ईश्वर छथि संगहिमे सदिखन घुमबा खातिर धाम बहुत अछि एखनो सोर करैए हमरा जामुन आम लताम बहुत अछि ( मात्रा क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि । गजल अनके टेटर बैसल लोक गनैत रहल चालनि सभ दिन सूपक मू़ंह दुसैत रहलफ़् आमक गाछीमे कोइली कुहुकैत रहल बगरा-बगरी आंगन आबि नचैत रहल चारेपर कौआ सभ दिन कुचरैत रहल सूगा सदिखन सीताराम रटैत रहल सीढी लोकक खातिर लोक बनैत रहल अहिना सभ दिन सभकें लोक ठकैत रहल बांचल गाछक खातिर नेह-सिनेह कहां आमक खातिर बानर गाछ चढैत रहल हल्ला भेलै लेकिन चोर धरैल कहां चौकीदारेकें सभ चोर कहैत रहल कूकुर अहिना छाहो देखि भुकैत रहल हाथी अपने धुनिमे बाट चलैत रहल सुरुज उगैत-डुबैत रहल सभ दिन अहिना कते अहिल्या रामक बाट तकैत रहल (मात्रा क्रम : 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 2 ) दूटा लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि । मुन्ना जी पथराइत डीह रन्हबैया त' भेटि जाइछ पाइक बलें गाम गाम मे बाँटल पर्चा पर देने अपन फोन नम्बर सँ मोन पड़ैए भोज तिहार मे दसगर्दा तीमन डालना नै जानि कतेको बारी झारी सँ उपरा लेल जाइत छल कदीमा आ केरा आलूक संग मिज्झर करबा लेल खेबैया भ' गेल पहाड़ सन डालना बला भोज मे बीझो करिते जुमि जाइत छल सगरो टोलबैया आब हाक पर हाक नै सुनैए कियो कतेको बेर कनेक्ट होइत छी स्काइप आ मैसेन्जर पर वैश्वीकरण आ उदारीकरण सँ डालनाक जग्गह लेलक मिक्स भेज चिकन,मटन पुछि तय करै छथि नोतहारी खएबा लेल जएब की नै ! भोज भात मे आवश्यक साग भेटि जाइत छल बुढीमाइक डीह पर पछुआरक ओलती मे कोरल जाइत छल ओल आ खम्हाउर चटनी,तरुआक जग्गह लेलक पकौड़ा आब बुढीमाइ सब सेहो नन्हकिरबाक शरण मे छहरियेबाक ब्योंत तकैत गेलीह शहरिया डीहक हरियरी भेल गेल निपत्ता बाटक संग डीह सेहो पक्का भेल गेल वा रहि गेल परती पराँत कन्वेंट मे पढ़ि पढि सरवेन्ट हेबाक लिलसा मे धीया पुता, खएब त' दूर कहाँ सुनि पौलक गेन्हारी,ओल,खम्हाउर फलाहारक अल्हुआ,सुथनी नवतुरिया सब सुतितो उठितो तकैए- बर्गर,चाऊमिन आ फ्रेंचफ्राइ चारू पहर , एक फोन कॉल पर जुमि जाइए पिज्जा गामक थान तरहक अखाड़ा भ' गेल बज्जर जिम केर चलन रहरहाम भेने अखाड़ा सँ घुमि पीब' बला भैंसीक थ'न तरहक दूधक जग्गह लेलक गेटोरेड आ एन्डुरामास आबक मैञा,लोरी आ घुघुआ मेना कतिया लगा दै छथि पोगो आ डिस्कवरी किड्स चैनल माटि के त'र क' आँकड़ पाथर आ बालु सिमेन्टक अकारे डीह,बारी-झारी भेल जा रहल बज्जर बाबा,मइयाँक सेहो पथरएल गेलनि आँखि आ करेजा नन्हकिरबाक संग वैश्विक सुख सुविधा तकैत क' लैत छथि तुम्मा फेरी विद्युत शवदाह गृह सुनि जीविते भान होइ छनि देह मे पसाही लागल सन सेहन्ता जतबै छथि गमैये माटि पानिक नन्हकिरबा सेहो समयाभावक फेर मे परम्परा के उघवा सँ तकैए मुक्ति गामक बाट सँ घूरि मूनल अछिया सँ बीछल अस्थिक गंगा लाभकक करैए ब्योंत डीह रहि जाइए धराउख रेस्टुरेन्टक बुक कएल मेनू मे जतेक नोतहारी ततेक गाम गीनि ठाढे ठाढ पेट भरि पुरबै छथि भाँज नवका पीढीक धीया पुता बाबा सँ डैडीक व्यवहारक हस्तान्तरण के माटि छोडि निमाहि लेत यांत्रिक कम्पोजिशन आ डिस्काउन्ट ऑफर पर होम डिलेवरीक बलें गेन्हारी, कदीमा, केरा,ओल आ खम्हारुक खगता जएत विला तहन प्रकृतिक विऱूद्ध छोट छोट गमला मे भेटत गामो मे रंग विरंगा कैक्टस जे जीवन के भोगव त' दूर जे जीवन के छूबो सँ करत वंचित अमरेश कुमार लाभ, हरनीचक, अनीसाबाद, पटना –800002 कविता- संतान दाम्पत्य जीवन केँ मुस्कान होइछ संतान बियाहक बाद पहिल ख़ाब, पहिल अरमान होइछ संतान मायक कोख वा पिताक दोख के अड़चने जे रहि जाए छथि संतान सुख सँ वंचित नहि देखबन्हि हुनक मुँह पर मुस्कान किंचित संतान प्राप्ति लेल डाक्टर-बैद, कबुला-पाती तीरथ-धाम सब जुगत करए छथि आपन बूते पाबि संतान जुड़ाइ छन्हि छाती कोई कसर नहिछोडै जाए छथि पालै-पोसै मे संतानक जिनगी संवारै मे बिसरि जाए छथि आपन जिनगी नहिसूझै छन्हि किछु ता धरि जा धरि नहिस्थापित भ’ जाइछ संतान बढ़ियाँ सँ, खूब बढ़ियाँ सँ कविता- राग अलापने किछु नहि भेटत राग अलापने किछु नहि भेटत पाछाँ भागने किछु नहि भेटत जे मुठ्ठी ओ देखा रहल छथि ज्यों खूजत तँ किछु नहि भेटत l मिसरी सन मिठगर बाजै छथि जहर पसारै मे लागल छथि डाइगर बाँटि देने छथि सगरो रक्त-पिपासु बना रहल छथि l बड़ा चतुर छथि, मुठ्ठी बान्हने भ्रमित करथि, ज्यों बपौती राखने नहि सम्हरब तँ मुँह भरि खसब जहि दिस लेने जाए छथि हाँकने l कविता- लागल छथि गीता कुरान त’ नै पढ़िलथि धरम’क उद्धार मे लागल छथि जे गाम दिस तकितो नै छथि मिथिला के राज्य बनाबै छथि l ज्यों द्वार जाऊ त’ नै चिन्हता बड़का मानिजन कहलाबै छथि जे मर्म दीन केँ नै समझैथि गरीबी मेटबै मे लागाल छथि l जे लिख लोढ़ा लिख पाथर छथि शिक्षा केँ अलख जराबै छथि सब बड़का-बड़का अपराधी संसद केँ मान बढ़ाबै छथि l बड़का-बड़का डिगरी जिनका अफसर बड़का कहलाबै छथि मूरख चपाट नेता पाछाँ नेंगरी डोलबै मे लागल छथि l सब के बापु दलित वंचित हरिजन सँ भरपूर प्यार छलैन्ह समरस समाज होमय जिनकर विचार छलैन्ह l ओहिना नैं कहलेलथि ओ सबके बापु सभके कल्याण होमय हुनका धियान छलैन्ह l जिनगी गुजारि देलैन्ह बनिकें फकीर सादा सरल जिनगी उच्चतम् विचार छलैन्ह l काज कोई नीच नैं सभकें महत्व जहिने संदेश देलैन्ह ओहिने व्यवहार छलैन्ह l दासताक बेड़ी में जकड़ल छलैक देश तोड़ै में हुनकरे प्रबलतम प्रहार छलैन्ह l ऋणी हुनक हम सभ जाधरि ई जिनगी मनुख रहितों जिनकर देवतुल्य संस्कार छलैन्ह l मिझल आगिकेँ खोड़ने की मिझल आगिकेँ खोड़ने की तितल सीरक ओढ़ने की प्रेम-दया केँ भाव ने जिनका हुनका केँ कर जोड़ने की अन्हराकेँ आँखि खुजने की बहिरा सोझा ढोल पिटने की अनठाकेँ गबदी लधने जे हुनका केँ झकझोरने की बीतल के यादि करने की खींझल के पाइर धरने की जीबैत में किछ मोजरे नहि त गरल मुर्दा उखड़ने की भुक्खे पेटे सजने की अखरा बासन मजने की एक कनमा सिदहा नहि घ’र में चुल्हा फेन पजारने की लक्ष्यहीन के जिबने की नोरक घोंट के पिबने की अपने बल ज्यों नहि हासिल भेल बाप-पित्ती पर कुदने की गजल बड पिच्छड़ छै पिछड़ बनैंयौ ठामहि खसिकेँ छितर बनैंयौ उतरा-चौरी बड होइतअछि आनक सूनल पिनक बनैंयौ लागल छथि किछ उसगाबै में जारनि बनिकेँ पजर बनैंयौ उघिलिअ’ जा धरि छी अहिठां गेला पर जे उगह बनैंयौ डगरा केँ बैगन सन रहलौं लुढ़िकति-लुढ़िकति ससर बनैंयौ जहि घर सोहर सुनलौं कहियो समदाउन सुनिकेँ सिहर बनैंयौ जे वाजिब अछि कहि दिअ’सोंझा पाछाँ जा केँ उकट बनैंयौ गजल केहन केहन जँ नहिटिकल की टिकब अहाँ कतबो चाहे नाक रगड़ि ली नहिजितब अहाँ मतदाता अछि कते अहाँ केर जाति के गनि गुथि केँ बड्ड ओतबे ने घिचब अहाँ अपराधी सब छँटल छँटल ठार भेल छथि हिनका सब सं अड़ारि मे की पड़ब अहाँ अरजल धन अछि कतेक आपन से थाहि ली डीहो डाबर बेचि टिकस कीनि सकब अहाँ जे छथि युवराज कुर्सी पर वैह बैसता झोरा ढोबति रहल सदा आ रहब अहाँ l गजल थामिलहुँ ज्यों हाथ तँ विसबास राखू एक दोसर लेल छी आभास राखू नहिरहै कोनो तरहक शक आ संदेह नहि पड़ए गाँठि भरिसक प्रयास राखू संग रहने टोनामेनी भइये जाइ छै नहिफनफनाउ आ नै खटास राखू खुलि के मोनक बात बतियाइ जाउ अनेरे नहिमोन मे किछु भरास राखू ओझराएल रहै छी काजे मे सदिखन खैर-खबर लेल तँ किछु अवकास राखू l इरा मल्लिक, रिलायंस ग्रीन्स टाउनशिप जामनगर गुजरात। ३३ टा कविता १ लक्ष्य कठिन नहिं जीत हमर हेतय जनैत छलहुँ हम हारि नहिं बैसब मोन में ठनने छलहुं हम। एकाएक जे बिर्रो उठल जिनगी में हमर। गत्र गत्र व्यथित छल किनका सं कहितौं। परिस्थिति एहन किछ बाट नहि भेटय अहि बाट जाउ आ कि ओहि बाट जाउ इत: तत: में मन छल भगवान के भरोस छल श्रेष्ठ जन के आशीर्वाद संग छलै परिस्थिति बुझु सरल ते नहिये छल; ओहि कांट कूश भरल बाट संओ निकलनाय। मोन में अपन हम ठानि चुकल छलौं नहिं हारब थाकब सतत आगू ताकब अछि कठिन बाट एक मोन में उचाट विजयक प्रचंड वेग बढ़बैत डेग मोन में अथाह भरल आत्मविश्वास क तेज सफलताक ताज मेहनत के राज दिन राति में नहिं ताकल विभेद सुदृढ विचार संयमित व्यवहार। ओहि कंटकीर्ण बाट पर चलैत रहलहु एक एक डेग बढ़ैत रहलहुं मंजिल दूर छल लक्ष्य पेनाय सुगम नहिं छल मुदा; एकटा दृढ़ आस छल अपन कर्म पर विश्वास छल जीत हमरे हेएत आइ नहिं ते काल्हि विजेता हमही छी पहाड़ तोड़ि हम बाट बना लेब सुन्दर सन ओहि सुमार्ग पर चलि उन्नति के शिखर छुअब ओ विस्तृत अनन्त नीलाभ सम्पूर्ण आकाश हेएत हमर । कामयाबी के बाट बहुत आसान नहिं किन्तु ओतेक सेहो कठिन नहिं मोन में जौं एक बेर ठानि लिय ते किछ दुर्गम नहिं। ओहि विजयीभाव संओ सफलताक शिखर निश्चय भेटत। ई हमर विश्वास अछि। जीवन के मूलमंत्र अछि पहिने स्वंय के जय करू हौसला राखू! धैर्यपूर्वक, भए एकाग्रचित्त अनासक्त भाव सँओ कर्म करैत रहू। कर्म करैत रहू। २ महानगरक माया ई महानगर छै यौ भाइ! बड्ड भव्य! विशाल! मनोरम! मायावी नगर! एतय लोग बहुत व्यस्त भेटत नगर व्यस्त! सड़क व्यस्त! दिन-रातिक कोनो भेद नहिं। व्यस्त लोग, अपने में मस्त लोग! नहिं छैन्ह किनको आन किनको संओ लेनाइ-देनाइ! अपार्टमेंटी व्यवस्था छै भरपूर सुख सुविधा छै। नम्हर गाड़ी! चकाचक फ्लैट! फ्लैटक भीतर सजल -धजल एक सुन्नर दुनियाँ। सुंदर घरवाली सभ्य बच्च! मुदा! नेनपन संओ दूर! बाल सुलभ कौतुक नहिं भेटत एतय। पड़ोसी एक- दोसर संओ अनचिन्हार। जिनगी में भागम -भाग मचल छनि बड़का-बड़का मॉल , रेस्टोरेंट , थिएटर जिनगी संओ खुश हेबाक सब साधन तहियो किनको मुँह पर उत्फुल्ल आत्मीय खुशी कहाँ देखै छियै! सब सँओ अपस्यांत ई शहरी लोग अपन डफली ,अपने राग अपने सुर, अपने तान अलापि रहल छै! कैंचाक(पैसा के) रौद छै ओकर प्रचंड चकाचौंध छै पाइ के उपार्जन मात्र इयैह एकटा लक्ष्य छै। सौंसे नगर भागि रहल अछि ओहि गन्तव्यक दिस! जीवन में आगू बढ़बाक तीव्र लालसा में मनुक्खक मानवता कतहु नष्ट भs गेल छै एक -दोसर कँ धकेलि कs छिटकि मारि ,अपन हित साधि लेबा में कनिको नहिं हिचकै छै। भौतिकवादी लोग! हृदयविहिन लोग! गरीबक एकटा विशाल वर्ग सेहो छै एतय शहरक बाहरी ताम-झाम आ चकमक दिन-राति देखि महानगरक महामाया सँओ दिक् -भ्रमित लोग! गाम -घरक खेती-पथारी बाड़ी-झाड़ी, ‌डीह -डाबर आमक गाछी, पोखरि ,मांछ उज्जर मखान! खिलखिलाइत हँसी-खुशी सब किछु त्यागि मायावी शहरक मोह-पाश संओ बन्हा गेल छैक-------बड्ड मजगूती सँओ! शहर में बढ़ैत मजदछर वर्ग दुनु सांझक बुतात (रोटी) के ब्योंत में ओझरायल जा रहल छै करेजा-तोड़ मेहनति करैत दिन -राति तहियो ओकर बच्चा भूखे बिलबिलाइत भेटत! मंदिर में, मूर्तिक दुग्धाभिषेक हेतै घैलक घैल दूध दुग्धाभिषेक के नाओं पर बहाओल जाइत छै। मन्दिरक बाहर गरीबक बच्चा भूखे - पिआसे चिचियाबैत तापित पिपासित ओहि शिशुक कंठ तर एको बुन्न दूध नसीब नहिं भूखे तड़पैत शिशुक लेल मानवताक! करूणाके एको बुन्न नहिं भेटत शहर में। बड्ड अजगुत देखल अहि संसार में किनको जिनगी में सब दिन होली छै आ सब राति दिवाली छै दोसर दिस, किनको भाग्य में अन्हारे-अन्हार पसरल छै मनुक्खक ई सीमा-रेखा कहिया धरि! आखिर कखन धरि जीबैत रहतैक। जिनगीक ई दुनु रंग समय के चक्की में कि अहिना पिसाइत रहतैक? गरीब आ धनिक, समृद्ध आ विपन्न कारी उज्जर बनल महानगरक ई सीमा - रेखाक भेद मरैत मानवता टुटैत सामाजिक सरोकार किनको ते मिटबैये पड़तैन्हि शहर वा गाम हमाज तँ समाजे छैक समाजक जन-जन में सुखमय भोरक सेहन्ता जगाबs पड़तैक कृष्ण बनि शंखनाद करs पड़तैक सुखी समाज!! खुशी समाज!! सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया!!!!! ३ स्वर्णिम भोर क आस (जीवन एक आस थिक! ई जिंदगी के हम आशावान बना जीबय के प्रयास करी! इयैह अहि कविताके मूलमंत्र अछि! कविताके इयैह प्राणतत्व छैक। पढ़ब अहां सब।) घुरि आओत ओ दिन! हाँ यौ! ओ शुभ दिन एक दिन, घुरि औतै जरूर हमरा विश्वास अछि मोन में। सुख -दुख ते बुझू जीवनक अंग थिक। घबड़ाएब कियैक! जहिना अमावस्या आ पूर्णिमा दिन संग राति सबके अस्तित्व छै एखन दुख सँओ ग्रसित, दुखित संसार अछि। मुदा ओकरो अंत निश्चित छैक। केहनो घुप्प अन्हार राति होउक कि ओ रोकि सकै छै स्वर्णिम भोरक आगमन के। हम जनैत छी फेर आओत ओ दिन। खुशी सँओ उछाह सौँ भरल! बिसरत सब दुख जे एखन तक लोग भोगि चुकल छैथ।! चूल्हा में आगि हेतइ खुशी के बसात हेतैक नीपल चिनबार पर बासन में दालि आ बटलोही में भात हेतैक ठरिया गेन्हारी के सुअदगर साग चार (छत) पर सँओ तोड़ल तिलकोरक पात । आइ तरूआ लेल तिलकोरक पात चाउरक पिठारे संग सजता। ओह! तीमन तरकारी भात दालि गरम गरम! अग्नि देवता की जय। जारैन गोइठा चूल्हा ढेकी जाँत में दररतै अगबे राहरि काकी मैंया जंतसार गेतैक आनन्द पसरतै गीतक धुन संओ स्वर्ग उतरतै धरती पर नाचि उठतै अंगना। बासन पानि तीमन तेल। डिबिया जरैत हरैत तिमिरक अस्तित्व पसरैत इजोत !चहुँओर। सुखक दिन औतय। मनुक्खक दिन बदलतै। कोठी भरल अन्न खुशी भरल मन्न दलानक आतिथ्य देवता घर सं उठैत गोसाउनिक गीतक । गूंजायमान हेतैक धूप लोबान के सुगंधि संओ पवित्र भ जेतै घर , झूमि उठतै खेत -खलिहान। आओत अगहन मास। जीवन में तखन ओअतैक हास उल्लास चहुंदिस पसरैत हँसी के स्वर लहरी चतरैत रहतै सबटा खुशी लतरैत रहतैक जीवन बेल। जी नहिं हारू! मोन नहिं मारू जिनगी मिलल अछि कर्मठता संओ संवारू! धैर्य संओ सम्हारू! ४ मनुक्ख कोना चलि दैत छै लोग ओहि बाट पर जे टिकल रहैत अछि निछच्छ झूठ,छल,प्रपंच फरेब के बुनियाद पर। जिंदगी के दौड़ में भनहि पाछू रही मुदा एहन शार्ट कट के बाट हमरा मंजूर नहिं। हमर संस्कार के स्वीकार नहिं। ककरो नोर पर हम खुशी के महल ठाढ़ नहिं क सकै छी! दुनिया एहने भ गेल अछि काजक बेर लोग दोसरा के बापो कें बाप बना लेत काज निकलि गेल ते निकालि देत कात। हम देखैत रहैत छी लोगक स्वार्थपरक संबंध प्रपंच रचैत पांखि लगा उड़ैत लिप्सा लोलुपताक उडान दिस। आओर कतेक नीचा खसत नैतिकता पैर तर कतेक धंगाइत रहत इमानदारी! भलमनसाहत! सोचि के मोन बहुत उदास अछि। हाँ! हम बहुत उदास छी! ५ इयैह कामना हमर (हमर ई कविता पढ़ैत छी कतेको बेर हम! मुदा मोन हमर, अहि रचना कें फेर फेर पढ़य लेल उत्सुक रहैत अछि सदिखन!अहूँ सब पढ़ू हमर ई रचना!) पसरल अछि भीड़ चारों दिस अथाह,दूर तक। हम ताकि रहल छी ओहि भीड़ भाड़ में अपन हित मित कुटुम्बीजन कें। मुदा कियौ नहि दूर दूर तक दृष्टिगत होयत छैथ। हम हारि थाकि के बैस चाहैत छी किन्तु, इ की? हम ते ओहि भीड़ में स्वंय हेरा चुकल छी! हम के छी? हमर कि पहचान अछि! अपन ठेकान कोन अछि, सोचय लगलहुँ। मोनेमोन ओझरा गेल छलहुं। अपन कहि के हमरा लग ते किछु नहिं अछि। ई तन के चोला, ओ मन सब हमर कहां अछि। चलैत प्रवाहित सांस सं पूछलियै ओहो कोनो निश्तुक्की नहिं दैत अछि जवाब। शरीर सँ सेहो पूछलियै हम कतेको बेर बहुत टोहकारलियै ओकरा ते एक्के बेर खौंझा के बाजि उठल हम शरीर छी! हम कोनो एक तत्व संओ बनल छी? पांचो पांच तत्व के मेल संओ हमर अस्तित्व अछि। हम कोना के तोहर सवालक जवाब दियउ। क्षिति,जल,पावक,गगन,समीर सबसंओ तोरा पूछहि पड़तौ अपन मोनक सवाल। हम छघुनता में पड़ि गेलहुँ! शरीर अपन वश में नहिं कखन रहत नहिं रहत साथ छोड़ि देत के कहलक अइ। आ हम ओहि में अपन अस्तित्व ताकि रहल छी! सदिखन मोनक अनुरूप परिस्थिति नहिं होयत अछि। अछि चारि दिन के ई जिन्दगी अहि जिन्दगी सं कामना अछि जावत जीवैत रही लोकहित काज आबि सकी हमर एक एक सांस किनको खुशी के कारण बनय। अहि जग में , आओर राखल की छैक, मोह,माया,तृष्णा! अपूर्व मृगतृष्णा!!!! ६ भोर विभोर भोर ! ओह!!! भोर हमरा विभोर कs दैत अछि! हमरा बड्ड नीक लगैत अछि। अह्लादभरल आतुर हमर मोन निशदिन, भोर के बाट जोहैत अछि। नैसर्गिक सौन्दर्य संओ पूरित, हे उषाकाल! उगैत सूर्य के रक्तिम लाली! मुग्ध भ जायत छी हम अहाँक अनुपम बाल अरूणोदय रूप निहारि। नव उर्जा संओ ओत प्रोत लगैत अछि भोरूकवा पहर ! आकाशक कपाटपट खोलि हँसैत मुस्कैत ओ ललकी किरण! नवकुसुमित मुंह खोलि खिलखिलाइत पुष्पबृन्द! हरित पात पर चमकैत हीरक ओसकण! संगीत लहरी भरैत चतुर्दिक मधुर राग छेड़ैत मंद मंद सिहकैत पवन। पसरल चहुंदिस प्रकृतिक हिलकोर झुमैत मदमस्त बयार। सोन सन झलकैत गहुँमक बालि। स्वर्णिम उषाकाल के नभांगनमें किरिण फुटैत भोर लुटबैत चहुँओर निर्द्वन्द्व खुशहाली मनोरम प्रकृतिक सुंदरता। खग विहग के कलरव प्राण - ‌ओज संओ भरल तन्मयता स्फूर्ति , जखन भरैत अछि जन जन में प्रकृतिक सामीप्य भेटि जायत अछि मेटा जायत अछि सब शोक संताप। जी उठैत छी हम पलभरि में उत्फुल्लताक संग एक नवशक्ति सं प्रेरित आत्मशक्ति सं सिंचित जीवन। जगैत संसार, अलसाएल नीन्द तोड़ैत, शीतल बयार। कठिन मातृत्व के सुंदरता, अलख जगबैत बिहसैत शैशव के निश्छलता, स्वच्छ नदी के कलकल छलछल पानि भरैत पनिहारिन। भोर होइ संओ पहिनहि कान्ह पर हल धेने, दुनु बैल के आगू केने परातीक सुर दैत गीत गबैत, अपन कर्मभूमि दिस जाएत कृषक, बाट में कतेको बेर बारंबार जोर जोर संओ बैल के टोहकारैत जेना सबटा मोनक बात ओकर बैल बुझैत हो आकि बैलद्वय के बात बुझैत होय ओ किसान। जगत के निश्छलताक अपूर्व दर्शन जीवात्माक मौन संवाद स्वरूप किसान आ बरद; ओहि दुनु जीव के मध्य विलुप्त होयत अन्तर्भेद आत्मा संग परमात्माक एकाकार सहजहि ओहि भाव के अध्यात्म रूप पाबि आत्मज्ञान भ जायत अछि। तपोभूमि में श्रमाहूति दइ लेल तत्पर माथ में पगड़ी बन्हने किसान एकटा गमछा मात्र देह पर। ओ साधारण शरीर नहिं अछि सख्त कठोर भुजदंड निरन्तर श्रमतप संओ तपल फौलादी मजगूत चाकर छाती। तपोभूमि में अपन खून पसीना में भीजल एक एक श्रम बिन्दु सँगे श्रमाहूति देताह। संग में छैन्ह हुनकर सहगामिनी सहधर्मिणी सहचरी! भोर! अपना संग अनैत छैक जीवन के कतैको सुन्दरता विविध रूप रंग छटा पवित्रता ! दृष्टिगत होयत अछि जे संसार के परिवर्तन! आरंभ आ अन्त, प्रकृतिक नियम थिक। दिन आ राति, समय के मर्यादा थिक। सुख क साथ दुखक आहट आ दुखक गर्भ में सुखक आस हमेशा अंर्तनिहित होइत अछि। इयैह जीवन - चक्र थिक अटल! शाश्वत आ परम सत्य। ७ घुंघट के बदलैत स्वरूप ललना! आब नहिं ओ घुंघट में रहती जमाना के संग कदम मिला कए आगू पथ प्रशस्त ओ करती। तानल घुंघट के भीतर दबल सिकुड़ल छल हुनकर दुनिया घुप्प अन्हरिया चहुँ दिस पसरल। कलुसित कुंठित जीवन छल, छल मौन शापित बिखरैत प्रतिपल। दुनु नयन के संपूर्ण गगन ते बस ओहि घुंघट में सिमटल छल। मोन में उठैत विचार बवंडर रूढ़िवादी समाजक स्वनिर्मित कतेको तरहक वर्जना आ बेरी ऊँच -नीच के प्रश्न आ उत्तर। आब ओ अपन अस्तित्व पहिचानि चुकल छैथ नेत्र अपन ओ खोलि चुकल छैथ जानि चुकल छैथ घुंघट के तर्क ओ शर्म हया नयन के गप्प थिक। पैघक लिहाज ,स्त्री के लालित्य ओकर कुलिन व्यवहार में निहित थिक। जानि रहल छैथ ललना , आब! घुंघट नहिं अछि स्त्री के गहना। घुंघट के व्यापक अर्थ अछि गहरा घुंघट नहिं आब लाजक पहरा। अपन प्रखर प्रतिभा के दम पर अपन शक्ति स्वरूप सार्थक करती व्यापक जग असार पसरल छै उन्नति पथ पर अग्रसर होयती। मौका सबके दुनिया दैत छैक, फेर अस्तित्वहीन बनि कियै ओ जीती। अपन आत्मविश्वास जगेलैन ललना, पाछू मुड़ि नहिं एकबेर तकलैन सफलता क हरेक क्षेत्र में कामयाबी के झंडा फहरौलैन! साबित केलैन्ह अपन अस्तित्व ओ, दुनियाँ भरि सन्देश पठौलैन! सफलता के बाट कठिन होय केतबो, संघर्षमय हो! कंटकीर्ण हो! ललना कहियो विचलित नहिं हेती! समाजक एहेन सड़ल गलल मानसिकता, कहियो ओ स्वीकार नहिं करती। आब नहिं ओ घुंघट में रहती! आब नहिं ओ घुंघट में रहती! ८ सच छै अहाँ के देह सँओ बन्हि कs अहीं के नेह में सनि क s हमर जिनगी बदलल हम!हम नहिं रहलौं अपन पहचान सब बदलल! अपन वजूद व्यक्तित्व सब किछु बिसरि चुकल छी हम। नहिं हमरा में हमर स्वत्व बाँचल आओर नहिं अपन स्वातंत्र्य सब किछ मेटाकs अप्पन दुनिया अनुपम बसा नेने छी ओकर सुन्दर रंग छटा में आकंठ हम डूबल छी। अर्पण ! समर्पण ! पूजा! ,अराधना! सब प्यार में समाहित अछि अहाँके। स्वयं समर्पित केला संओ मिलल जीवन के एक नवीन अर्थ! अपूर्व अछि ! सबसँ अलग; पसरल आब --- !समबन्धक विस्तृत क्षितिज! सुन्दर !सम्पूर्ण! समग्रता सँओ भरल। ई दू आत्मा दू शरीरक गप्प नहि थिक ई थिक द्वैतक योग सौँ बनल अद्वैत क निर्मल अविरल प्रवाह जखन नहिं द्वैत बाँचय एकाकार भsजायत अछि जेना कि , बून्न ! सागर में विलीन भ एकत्व स्वरूप प्राप्त भ जायत अछि। किछ एहने सन दशा अछि हमर आ अहाँक अस्तित्वक । एक दोसर के पूरक! हमर मोन कहि उठैत अछि कि अहाँ कि हम दुनू में अन्तर कतय! एक आत्मा छी एक प्राण बसल शरीरक कोन गप्प थिक ई ते नश्वर छैक रहत आ कि नहिं रहत सत्य इएह अछि! हमरा अपन अहि रूप में दर्शन होयत अछि सत्य शिव सुन्दर स्वरूप के। हमशरीर मात्र अलग छी! मुदाअहाँ ; हमर आत्मा छी!!! हम अहाँक अन्तर्तम में बसल अहींक स्वरूप धारण क लेने छी! दू तन एक प्राण छी! हमरा अहाँ में ई विभेद कतय! पवन संओ सुरभि विलग कतय! पवन संओ सुरभि विलग कतय!!! ९ जीवन-चक्र डाँढ झुकल अछि नैन थाकल अछि तहियो हम्मर माँ कत्तेक सुन्दर अछि। चाम लटकि गेल केश उज्जर छैन्ह शुभ्र इजोरिया सन हँसी निर्मल छैन्ह! उमिरक बान्ह सँओ के बान्हत ममता जननी जग के सृजनहार छैथ। जीवनक किछु एहने सन सत्य उमिरक चारिम प्रहर बड़ निर्मम कठोर भेल भाव प्रचंड इहो शब्द बुढापा जर्जर! ई थकित नैन किछ कहैत बैन सिकुड़ल अछि चाम विस्तृत अछि ज्ञान। अनुभव के गप्प सब मुश्किल हमर होयत अछि अंत ओकर कहल हर एक शब्द हमरा लेल अछि वेदजन्य उपमान नि:शब्द कथन! किछु सिखबैत अछि हमरा! हुनक, बड गहन सघन केशक शुभ्र स्वच्छ इहो धवल रंग ई उमिरक सत्य अछि संख्या के ढलन दुनियाँक चलन कि वयस ढरल उतरल उमंग! परिपक्व चिंतन सुखद मनन प्रज्ञा प्रणीत मौन चिंतन इहो छल एक -एक गुजरैत प्रहर प्रकृतिक आगमन अनुभव अगाध विस्तृत नीलाभ नवसृजनक लेल छैथ ओजपूर्ण ! नबका पीढ़ी के ओ कल्पतरू। जीवनक अजस्त्र सब आत्मिक प्रमुदित, अह्लाद भरल! ई समयक चक्र चलैत रहत निर्बाध !अनवरत्। इयैह थिक इहलौकिक परम सत्य! १० सम्हारू निज अस्तित्व क जीवन- यात्रा सहज होयतो अनायास कखनो -कखनो असहज भsउठैत अछि! बहुत बेर ! कतेको बेर, ई देखना गेल छैक जे बेकसूर होयतो कसूरबार ठहरा देल जायत छैथ लोग। ओहो अपन स्वजन द्वारा! विश्वास के धज्जी उड़ैत देखि आत्मा कलपि उठैत अछि। ओ चोट के गहराई व्यक्तित्व के अतल तल तक हताहत करैत आत्मा तक उतरि जाएत अछि। बड़ी आसानी आ सहजता संओ स्वभावक कोमलता , सहजता आ मृदुलता के बड़ी निष्ठुरता संओ मसलि के आत्मा के; विदिर्ण क दैत छैथ किछ लोग। अहि परिस्थिति संग अपना के सम्हारब बहुत कठिन होयत छैक। अहि अवस्था में अहि परिस्थिति में अपन मोन के एकदम शान्तचित्त,स्थिर राखब होयत छैक परम जरूरी । स्वयं में अपन आत्मशक्ति कें जाग्रत करब जरूरी। लोगक पक्ष के सुनबाक साहस राखब जरूरी। लोगक आरोप प्रत्यारोप में कतेक सच्चाई छै या ओ आरोपक परिधि के ओ कुटिल मानसिकता के लोग अपना हित में कतेक व्यापक बनौने अछि सब बात के अर्थ बुझब जरूरी। जरूरी नहिं छैक जे हम देखि रहल छी ओ नितान्त सत्य हो भ सकैत अछि देखल ओहि परिदृश्य के कोनो आओर अर्थ हो ओहि परिदृश्य में ओकर सच दबि रहल हो जे भी कारण हो यदि अहांके जबर्दस्ती कसूरबार बनबय के प्रयास होय तखन ओहि लोग संओ, ओहन विषम परिवेश संओ डटि के सामना करी सौम्य शान्त व्यक्तित्व में मुखर प्रखर रूप धारण करू शान्त शीतल चन्दन स्वभाव के रगड़ि अग्नि प्रज्वलित करू। देखा दियऊ साँच हर अवस्था में सांच होयत छैक सांच के प्रमाणक आवश्यकता नहिं सांच शक्तिवान अछि सांच के आंच नहिं। आ बिना विलम्ब केने शीघ्र स्वंय के ओहि निषेधात्मक विचारधारा संओ अपना के सर्वथा पृथक करी । एकरा पलायनवाद नहिं बुझू। अपन बहुमूल्य समय कें अपन उर्जा कें शक्तिवान बनाउ। सक्षम बनाउ। व्यक्तित्व में विस्तार दियौ। अपन अस्तित्व के सम्मान करू अपन व्यक्तित्व के आदरणीय रहय दियौ अपना के सहेज क राखू। अहांक अपन समय,उर्जा,मर्यादाक सम्मान स्वंय करब उचित! लोग के कि लगैत छैक! हुनका ते बस आगि लेसि हवा दैत धू धू जरैत ओहि आगिक पसाहि में हाथ सेकैत बड्ड आनन्द अबैत छै । मुदा! ई अटल सत्य छै कि जे कियो अबुझ लोग अकाश के पाथर मारत ते ओ पाथर वापस ओकरे चोट पहुंचाएत निश्चित। हरेक ध्वनि के प्रतिध्वनि होएत अछि। तैं जे हमर मूल स्वभाव अछि एकटा नित्य आत्मा अछि ओहि में आकाश सदृश व्यापकता के यथावत रहय दी! शुभ्र! पवित्र! जाज्ज्व्ल्यमान्! ११ एहन कियैक होयत छैक (अपन माँ के इयादिमे) माँ हमर! माँ ! अहाँ चलि गेलौं। कियैक! क्षितिज के ओहि पार! सब किछ लगैत अछि रिक्त- तिक्त अधूरा अधूरा। अहाँ बिन किछ नहिं लगैत अछि अप्पन। सब किछ लगैत अछि वीरान सन अहां हमरा सदिखन जे बजबैत रहैत छलौं ! टोकैत छलौ !! कोनो बात पर हमरे नाम अहाँक इयादि रहैत छल कतेक जोर सँ हमरा टोहकारैत छलहुँ। हम खौंजाएत अहाँ पर सबटा तामस अपन झारैत छलौं आब कियैक ओहि आवाज के सुनबाक लेल मोन हमर हरिदम व्यग्र होयत अछि। ओ शब्द !अहाँक ! ओहिना एखन धरि हृदय में बसेने छी माँ। बजबैत शब्द जे छल एखनो कान में ओहिना गुंजैत अछि चेहाय तकैत छी चारो दिस कतौ नहिं पबैत छी अहाँके। सदिखन हमर मोन पूछ चाहैत अछि अहाँ सँओ कतेको सवाल। हमर मोन में घुमरैत कतेको प्रश्न !उत्कंठा !उलझन ! अहाँ सुनिते सुलझा दैत छलौं जे चुटकी में। आबो हम अहिं सँ माँगय चाहैत छी ओ सब समाधान व्याकुल मोन त्राण नहिं पबैत अछि। आंखि अपन बन्द कsलैत छी अहींक स्वरूप हम अपन पलक तर समेट लैत छी पबैत छी हमरा दिस तकैत निहारैत अहींक दुनु सुन्दर नयन ठोर सँओ मधुर हंसी निर्झर झहरैत पबैछी पबैत छी ठोर सँओ निर्झर झहरैत मधुर हँसी अहाँ दिस निहारिते , बिसरि जायत छी ओ सब सवाल जे पूछबाक छल अहीं सँ अहाँ बुझि जायत छी हमर परेशानी सम्हारैत छी हमरा ;जेना लगैत अछि अहाँ कहैत छी ! बेर बेर चेतवैत छी! हमरा जगबैत कहि रहल छी; उठू! देखू! जतन करू।बचपना छोरू पैघ बनू। शक्तिमंत बनू। बुझबैत कहैत छलौं अहि अगम अथाह संसार में अहाँ सँओ बढि अहाँक शुभचिंतक क्यो नहिं! किन्नहु नहिं! अपना पर विश्वास राखू। सहिष्णुता आ धैर्य जरूरी दुख के गहराई के समझू सुख के उँचाई जानू सब किछु अहि दुनिया में संभव छैक। सृष्टि सत्य ते ; विनाश सेहो सत्य। कोनो भी कार्य के दुनू पहलू पर गौर करू सब किछु छितरायल छैक अहि चराचर जगत मे। मुदा! दू टा पहलू जे अछि प्रकृतिक एकटा आदि अछि तँ दोसर अंत। दुनू पहलू के ध्यान में राखू जतय आदि छैक ओतय अन्त निश्चय! अन्हरिया राति अछि ते निश्चित फेर होयत स्वर्णिम भोर के उदय! स्वर्णिम भोर के उदय!! १२ बाँचय दियउ अस्तित हँसैत नारी! बिहुँसैत नारी। जीवनगीत गबैत नारी। जीवनक रँग मेँ रंगैत नारी! चूल्हा चिन्बार नीपैत नारी! भानस भात करैत नारी। गोलेगोल सोहारी पकाबैत नारी। तिमन तरकारी रन्हैत नारी। थारी मेँ खुशी परसैत नारी। भरि घरक चिँता करैत नारी। भोरे अँगना सँ दुख केँ बहारैत नारी। चिक्कन चुनमुन अँगना नीपैत नारी। घोघतर लाजे लजाइत नारी। मातृरुप सुन्नर सजैत नारी। पतिप्रेम मेँ भीजल शील निमग्न नारी। रूपगर्विता स्वँयमुग्धा मधुर नारी। सृष्टि सृजन के आधार नारी। अपन दुख अपने सहैत नारी। धरणीरूप धरैत नारी। जीवन के सार्थक करैत नारी। करेज मेँ एक प्रश्न उठैत अछि, जौँ नारी एतेक विशेष छथि. अस्तित्व हुनके कियैक आइ शेष छन्हि? कियैक साँस लेबs सँ पहिने, हुनक साँसक डोर तोरि देल जायत छैन्ह? दुनियाँ मेँ प्रवेश सँ पहिने, कन्या कियैक नष्ट क देल जाय छैथ। कन्या भ्रूण हत्या एक गहन विषय थिक। हे नारी! उठु! जागू! अपन शक्तिरूप जाग्रत करू! अहाँ सृष्टि के रचयिता छी! सँपूर्ण सृष्टि के विनाशक गर्त सँ बचाऊ। या देवी सर्वभूतेशू शक्तिरूपेण संस्थिता। १३ इयैह सच छै ज़िन्दगी हमरा कतेको सुख! खुशी! मान -सम्मान संओ अनुगृहित केलक अछि। कतेको अनुकूल परिस्थिति हमरा अपन बहुपाश में अंजोरय लेल आतुर मिलल। मुदा; अपना-परायाक अपमान-घृणा! उपेक्षा-अवहेलनाक दंश सहबाक विवशता संओ ग्रसित सेहो भेल छलौं। सुरक्षा ,भय, यश,अपयश, लोगक उलहन उपराग! सेहो जिंदगी में आएल आ गेल! निर्बाध चलैत हम बाट मिलल अपार स्नेहसिक्त ममता दुलार। लोगक स्नेह प्यार के सौंदर्य सँओ हम जीवित छी। प्यार ममता बिलहैत एलहुँ अछि ! ओकरे शक्ति संओ हमर जीवनीशक्ति मजबूत बनैत अछि। सबसँओ अनसम्हार हम प्यार ममता पबैत छी। जीवन इयैह थिकैक सबके संग जीब क देखियौ किनको घृणा ,अवहेलना के प्यार में बदलि देखियौ। सोहनगर स्वर्णिम बनि जाएत अछि ई चारि दिन के जीवन यात्रा। नहिं कतहु राग अछि अहि में नहिं कतहु पूर्वाग्रह। सबसँओ अलग , एक अलख जगबैत अछि जिंदगी। हमर जिंदगी के सब दुख सुख हमर अपन थिक। जहिना हम सुख के स्वागत करैत छी सहर्ष ओहिना जिनगी में आओल दुख, कठिनाई,उपेक्षा सबके ओहि तन्मयता सँओ आलिंगन करैके प्रयास करैत एलहुँ अछि। हमरा लेल हमर जिन्दगी के अर्थ बहुत व्यापक अछि। जखन लोगक देल तिरस्कार, अपमान के प्रतिउत्तर हम पूर्वाग्रहजनित प्रतिकार सँ नहिं, अपितु, सम्मान देबा उचित बुझैत छी। बहुत सुन्दर अछि ई दुनियाँ बहुत सुंदर अछि मानव संग मानव के ई मौसम। मनुक्खक अहि रिश्ता मनुक्ख संग, कखनो! ठिठुरैत पर्णहीन अछि ते कि, ओतहि बिहुँसैत बसन्त सेहो अछि। नजरि खोलि देखिय उ किछु नहिं छै ई दुनिया में सब माया अछि कि ल क एलहु आछि कि ल क जायब शाश्वत रहि जायत सिर्फ आ सिर्फ हमर अपन व्यवहार नम्रता उपकारिता सदाशयता दयालुता!!!!!! १४ मांँ माँ माँ के कोर मेँ, बैसल शिशु, मातृत्व धन्य करैत छैक। जननी अपन आँचर मेँ, दुनियाँ समेट लैत छैथ। करेज सँओ सटल , शिशुक स्पर्श, आलोड़ित करैत अछि, जननी के मर्मस्थल, शिशु मुख निहारैत माँ, डूबि जायत छैथि , एक असीम सुख मेँ, निःशब्द, शान्त। भरि लैत छैथ अपन आँचर मेँ, फूल, अमृत, गँध! बिसरि जायत छैथ ओ , अपन पीड़ा, व्यथा, अन्तर्द्वँन्द्व। मुँह पर छलकि जायत छैन्ह, एकटा निश्चिन्त हँसी के स्मित रेह! स्थिर खुशी के ठेह! भोरका स्वर्ण किरण सँ दीप्त, दुख तिमिर हरैत प्रकाश पुँज!! दुख,पीड़.व्यथा , सबके पाछू छोड़ि. जननी बढ़ि जायत छैथ, उज्ज्वल भविष्य दिस। माँ-शिशु क अन्तर्भेद के ओकर मर्म के , नहिं बुझि सकल कियो! माँ के कोरा मेँ शिशु, वर्त्तमान के कोरा मेँ समाहित, भविष्य! अहि अभेद्य रिश्ता के मर्म के, बुझनाय आसान नहिँ , अँतहीन! अहि स्नेह तँतु के नहिँ कतहु आदि छै ! नहिं कतहु अंत!! ई एकटा अटूट बंधन छैक अंतहीन! पावन!! विलक्षण!! १५ हम्मर भौजी (ई कविता हमर मोनक बहुत करीब अछि! ) लाल साड़ी पहिरने भौजी, मिथिला आँचर छथि ओढ़ने, चिक्कन चुनमुन गोर माथ पर, लाल टिकुली छथि सटने । छनछन पएरक नेपुर बाजे, हाथक चूड़ी खनकए , भौजी शोभा छथि ! हमर घर के। बाजब हुनकर मधुर मधुर छन्हि, अधर रहै सदिखन मुसकैत , घर मे सबहक ध्यान रखै छथि, थकैत नहि छथि ओ कौखन, घरक साज सँभार करैत, गृहिणी बनि मान बढ़ाबथि, भौजी शोभा छथि! हमर घर के! बाबीक छथि चित्र सुन्नरि माँजीक शोभारानी, भोर भिनसर उठि के भौजी पहिने, बाबी के चरण छुबै छथि मांजी के नेह स्नेह लsभौजी दिन के शुरुआत करय छथि हम छोट भाइ बहिन ले भौजी, जननी रूप धरै छथि, भौजी शोभा छथि !हमर घर के! स्वजन बन्धु औ सर कुटुंब मे ओ ते मैथिल संस्कार बेबहार निभाबथि, पाविन तिहारमे हमर भौजी, नीक नीक पकवान पकाबथि, भार्या रूप धए भौजी हमर , भैयाक मान बढ़ाबिथ, घरमे प्राण संचार करै छथि भौजी ! शोभा छथि हमर घरक! १६ गीत ............ दर्द दर्द में फर्क बहुत अछि हँसी हँसी केर अर्थ अलग अछि | पीर गहनतम शान्त दर्द अछि टीस पीर के मर्म बुझल अछि | पीर सत्य थिक सुख क्षणिक अछि नुका सकब दृग नोर भरल अछि | घोंटि सकब नीलकंठ बनि विष शिवरूप धरब कहु कहाँ सरल अछि | १७ लालसा एक मुट्ठी सुख क कामना! एक आंजुर प्रकाशमय भोर क लालसा ! जीवन सँँओ जुड़ल कतेको! असंख्य प्रश्न ? उत्तर ! हम तकैत छी तिमिर अंधकारक बीच। नहिं भेटैत अछि कोनो बाट ! अंतहीन सवाल उगैत रहैत अछि, प्रश्नक कांट बेधि रहल अछि। तन- मन दुनू के , एक के बाद एक! निरंतर! लगातार ! अज्ञानक ओहि गहन अंधकार में नहिं सुझैत अछि एकोमिसिया! क्षीणोमात्र! प्रकाश क रेह! नहिं पबैत छी कोनो जवाब! टटोलैत छी हम अपना के चिन्है चाहैत छी अप्पन अस्तित्व के! एक इच्छा पूर्ण नहिं भेल आकि पनपि जाइत अछि दोसर इच्छा , बालहठ नेने, आ ठाढ़ भ जाइत अछि सोझ में । किनको जीवन! कि र्निद्वंद छैक? ई यक्षप्रश्न ! हम्मर सम्मुख, सीना तानि ठाढ़ भ जाइत अछि। नै त सुख शाश्वत छै, आ नै दु:ख निरंतर! सब क्षणिक ! प्रवंचना! छलनामयि !क्षणभंगुर छैक! चिरस्थाई किछु नहिं !! मनुक्खक इच्छा! कहियो पूर्ण नहिं होइत छैक। हरेक इच्छा ,दोसर संभावित इच्छा के, निमंत्रण दैत! सब एक दोसर सँओ जुड़ल! जीवन पर्यंत ओझरायल! अंतहीन छै ई लिप्सा! सुख के नित्य,सुंदर , शाश्वत बनैबाक पिपासा में, आकंठ डुबल रहबाक ब्योंत में, खुशी के ओहि मृग मरीचिका क पाछू अपस्याँत मनुक्ख ! आत्मचेतन सौं दूर, निरंतर ! समय नष्ट करैत जाइत अछि। किंतु एक बुन्न आत्मचेतन सँओ जागृत विवेक, मनुक्खक जीवन के संपूर्ण बनेबाक सामर्थ्य रखैत अछि। आत्मज्ञान में सुख छै, आत्मज्ञान में संतोषक भाव निहित छै। आत्मज्ञानक समग्र प्रकाश पुंज के नपबाक कोनो कसौटी नहिं छै। दानी दान करबा सँओ, ज्ञानी ज्ञान बांटै सँओ, मजदूर मेहनैति करै सँओ, जननि वात्सल्य प्रेम सँओ, नदी मीठ जल देबा सँओ, तरुवर छाया प्रदान करबा सँओ, जे सुख पबैत छैक ओहि अंतर्मनक सुख में, ओहि क्षणक सुख में अपार आनंद छै! ओहि असीम आनन्द क कोनो पराकाष्ठा नहिं छै। वएह सुख अनादि, अनंत अलौकिक छैक! ओहि शाश्वत सत्य में ईश्वर परमानंद छै!! अप्प दीपो भव!!! १८ नारी ...........,.,,. हँसैत नारी! बिहुँसैत नारी। जीवनगीत गबैत नारी। जीवनक रँग मेँ रंगैत नारी! चूल्हा चिन्बार नीपैत नारी! भानस भात करैत नारी। गोलेगोल सोहारी पकाबैत नारी। तिमन तरकारी रन्हैत नारी। थारी मेँ खुशी परसैत नारी। भरि घरक चिँता करैत नारी। भोरे अँगना सँ दुख केँ बहारैत नारी। चिक्कन चुनमुन अँगना नीपैत नारी। घोघतर लाजे लजाइत नारी। मातृरुप सुन्नर सजैत नारी। पतिप्रेम मेँ भीजल शील निमग्न नारी। रूपगर्विता स्वँयमुग्धा मधुर नारी। सृष्टि सृजन के आधार नारी। अपन दुख अपने सहैत नारी। धरणीरूप धरैत नारी। जीवन के सार्थक करैत नारी। करेज मेँ एक प्रश्न उठैत अछि, जौँ नारी एतेक विशेष छथि. अस्तित्व हुनके कियैक आइ शेष छन्हि? कियैक साँस लेबs सँ पहिने, हुनक साँसक डोर तोरि देल जायत छैन्ह? दुनियाँ मेँ प्रवेश सँ पहिने, कन्या कियैक निवेश होयत छैथ। कन्या भ्रूण हत्या एक गहन विषय थिक। हे नारी! उठु! जागू! अपन शक्तिरूप जाग्रत करू! अहाँ सृष्टि के रचयिता छी! सँपूर्ण सृष्टि के विनाशक गर्त सँ बचाऊ। या देवी सर्वभूतेशू शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। १९ कविता माँ के कोर मेँ, बैसल शिशु, मातृत्व धन्य करैत छैक। जननी अपन आँचर मेँ, दुनियाँ समेट लैत छैथ। करेज सँओ सटल , शिशुक स्पर्श, आलोड़ित करैत अछि, जननी के मर्मस्थल, शिशु मुख निहारैत माँ, डूबि जायत छैथि , एक असीम सुख मेँ, निःशब्द, शान्त। भरि लैत छैथ अपन आँचर मेँ, फूल, अमृत, गँध! बिसरि जायत छैथ ओ , अपन पीड़ा, व्यथा, अन्तर्द्वँन्द्व। मुँह पर छलकि जायत छैन्ह, निश्चिन्त हँसी के स्मित रेह! भोरका स्वर्ण किरण सँ दीप्त, दुख तिमिर हरैत प्रकाश पुँज! दुख,पीड़.व्यथा पाछू छोड़ि. जननी बढ़ि जायत छैथ, उज्ज्वल भविष्य दिस। माँ के कोरा मेँ शिशु, वर्त्तमान के कोरा मेँ समाहित, भविष्य! अहि अभेद्य रिश्ता के मर्म के, बुझनाय आसान नहिँ , एक अटूट बँधन छैक , अँतहीन! अहि स्नेह तँतु के नहिँ कतहु आदि छै नहिं कतहु अँत! २० होली के एक दूटा पाँति रँगक हुड़दँग मचल पिया बसँती होरी मेँ, सबहक मोन मेँ उमँग भरल पिया बसँती होरी मेँ। छै भँगक तरँग मचल पिया बसँती होरी मेँ, बुढ़बो दियर लागै पिया बसँती होरी मेँ! राधा छैथ जीवन आ मेहनैति छथि श्याम यौ, सब हाथ के काज दियौ हेत जीवन आसान यौ। हिँसा आ द्वेष दँभक होलिका जरा दियौ, कटुताकेँ छोड़ि रँग दोस्ती मेँ रँगाउ यौ। नारी नारायणी थिकि , हुनका मान सम्मान दियौ, जिनका सँ ई सृष्टि छैक, हुनक शक्ति जगाउ यौ। २१ बेरोजगार केहन घर केहन दलान, हम बेरोजगारक नहिँ पहचान कतओ। शहर शहर हम भटैक रहल छी, नहिँ डिग्री के मान सम्मान कतओ। पैरवी भरल अहि दुनियाँ मेँ, कोनो जनता राखौ ईजोतक आस कतओ। सब उमँग भ जाएत छै पस्त, बिग्रल शिच्छा तँत्र के नै उपचार कतओ। एक सँ एक घाघ बैसल छै अड्डा जमाके, के कम बेसी से बुझेतै कतओ। २२ कविता हमर अहि छोट छोट आँखि के, बड्ड पैघ पैघ सपना अछि। अपन नान्हि नान्हिटा पाँखि सँ, बड्ड ऊँच उड़ान भरै के कामना अछि। सदिखन सजबैत रहैत छी, अपन इ कपोलकल्पित स्वप्न के, अछि इ जागल आँखि के सपना, बैसल हम एकान्त शाँत, खिड़की सँ देखल, दूर पसरल विस्तृत आकाश के, निलाभ अनन्त गगन छल! अपनहि मेँ पूर्ण सँपूर्ण! नहिँ कतहु ओर एकर, नहिँ छल कतहु छोर। लोगक अहि बस्ति मेँ, भीड़ भाड़ आ, रेलम ठेलम मेँ, अपस्याँत भS जायत छी, पस्त भS जायत छी हम। लेकिन, हमहुँ तै हिस्सा छी अहि भीड़ के! ककरा सँ भागु? लोगक अहि भीड़ सँ, आकि, रोजमर्रा के समस्या सँ! नहिँ नहिं, कोनो बाधा , हमर सजायल नयनक सपनाके, डगमगा नहि सकैत अछि। अहि भीढ़ मेँ हमरो, व्यस्त रहS के अछि, भाग्यवादी नहि बनि, अपन कर्मठता सँ, सदाशयता आ विश्वास लगन सँ, जनमानस मेँ नवचेतना जगाबS के अछि, जाति पाति के भेद मेटा कय, घर घर मेँ नारी शिच्छा के अलख जगाबS के अछि, हमरा ते एक नवीन शिच्छित, मैथिल समाजक , नवनिर्माण करय के अछि ! २३ बाट जाम होय कि, मगज विकास रुकबे करत. बेइमान हो नेता ते, देश के नैया डूबबे करत। पूँजीपति हो लालची, चोर धनबटोर सूदखोर, विकराल मँहगाइ ते, आसमान छुबबे करत। भूख सँ बिलबिलाइत अछि, बाल बच्चा वृध्दजन, देशक सरकार के थूका फजीहत हेबे करत। बढ़ैत जनसँख्या सँ त्रस्त अछि, सौँसे सँसार आइ, बेरोजगारीक मारि सँ, दू चारि आब होए पड़त। जहि देश मेँ होय एकता, अखँडताक दिव्यमँत्र, ओते सुख शाँति समृध्दि के. त्रिवेणी बहबे करत!!!! २४ जाड़क राति अछि, थर थर तन काँपय, कँपकँपायत देह पर, गरम नरम, स्वेटर शाल ओढ़ि कय, गीत जाड़ के गाबी, चलु चलु हम जाड़ भगाबी। गरमा गरम पकौरी के सँग , गरमागरम चाय बनाबी, मोनगर सोहनगर बात मगन भै सखावृन्द सँग खूब बतियाबी, चलु चलु आइ जाड़ भगाबी। लकड़ी काठी जोड़ि जोड़ि कय, धधरा के धधकाबी, घूरक तर के गप्प सरक्का, एकरो आनँद उठाबी, चलु चलु आइ जाड़ भगाबी। आबि गेल अछि जाड़क दिन, स्वेटर रजाइ कोट के दिन, अमीरक ठाठ बाट के दिन, गरीबक गुदरी सुजनी के दिन, जतन करी, दुनू वर्गक अहि सीमा रेखा के, सब मिलकय दूर हँटाबी, चलु चलु आइ जाड़ भगाबी!!!!! २५ गीत हम हारि जाइ छी जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। जीतै छी हम बाजी जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। बिरह लै करोट जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। व्यथित हो जौँ मोन जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। प्रीत छेड़य राग जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। मोन मयूर नाचै जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। फाग मचाबै धूम जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। साओन के कजरी जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। बरखा के पड़य फुहार, तखन इयाद करै छी तोरा। भिजय पोरे पोर जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। जाड़ मेँ काँपै गात जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। शीतल बहै ब्यार जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। कोयली कुहकै चहुँ ओर, तखन इयाद करै छी तोरा। बेला महकय चहुँ ओर, तखन इयाद करै छी तोरा। बैरिन हो बतिया जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। चाँदनी हो रतिया जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। बसि पिया दुर्देश जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। पतियाँ नै सन्देश जखन, तखन इयाद करै छी तोरा। २६ जीवन जीवन अछि, आह, कराहक सिलसिला , पीड़ा आ दर्द के रंगीन, मनमोहक कथा! सब किछ, भ्रम, स्वप्न, मिथ्या, प्रवँचना! दुनियाँक सब रिश्ता अछि, ममताक मृगतृष्णा! जीवन के , सिर्फ अपना लेल जिनाय. अपन लेल सोचनाय, हमर जीवन, बस हमरे लए? नहिँ नहिँ, एना सोचब तै. होयत स्वार्थ हमर, नितांत स्वार्थ ! जीवन के किछ अर्थ भेनाइ, ते जरुरी छैक, जीवन के एक लछ्य भेनाइ, ते बेहद जरुरी छैक। ओ लछ्य, भए सकैत अछि, भिन्न भिन्न । ककरा हम कहबै, सत्य. ककरा हम, असत्य ठहरा सकैत छी। किन्तु एक सत्य , मानव जीवन मेँ, आनि सकैत अछि, अथाह शान्ति. असीम आनन्द! ओहि सत्य के बुझबाक , हम प्रयास करैत छी निरंतर! हमरा लए हमर जीवन मेँ, सबसे पैघ वैभव, ओ स्वर्गिक सुख अछि, जे दैत अछि अपूर्व सँतोष, मानव सेवा मेँ छिपल अछि, हमर अँतर्मन के ओ , अलौकिक सत्य! मानव सेवा आ परोपकार सँग, जी उठैत अछि , हमर आत्मा, तृप्त भs जायत अछि मोन, ओहि आत्मिक सुख के आगू, दुनियाँ के सब सुख . बुझायत अछि छोट , छोट, बहुत छोट!!! मानव सेवा आ परोपकार, यैह अनँत निधि अछि , यैह निताँत सत्य अछि, यैह एक लछ्य अछि, हमर जीवन के!! २७ जिनगी के राह मेँ, धूप छाँह बहुत छैक। सँग अहाँके, नेह अहाँके पाबि, मन मेँ हमर एहसास जागल, धूप हो या हो छाँह, अहाँक स्नेहक तपीस के सम्मुख. धूप की? छाँह की? ककरो कि बिसात छैक! रौद ते रौदे छै, भकभक तेज, लाले लाल, आगि उगलैत गरम गरम! कतहु त्राण नहिँ, किँतु, अहाँक स्नेह पाबि, इ तेज रौद, गँधपुष्प मेँ बदलि जायत अछि, हमर जीवन के राह मेँ, फूल बनि बिछ जायत अछि, चानन शीतल छाँह बनि, गम -गम करैत, सुरभित बाट, गन्ध सुवासक , नगर बनि जायत अछि। अहाँक स्नेहक डोर पकड़ि हम, सुगँधित सुवासित , ओहि नगर मेँ, घुमैत रहैत छी, बावरी, मतवारि बनि, अहि गली, ओहि गली! धूप छाँह के इ खेल , हमरा नीक लगैत अछि, एहि मेँ, अहाँक आओर सामीप्य पाबि, सिमटि जायत छी, ओहि गेह मेँ, जतय अहाँक मजबूत, दुनु बाँहि के घेरा अछि, ओहि बहुपाश के घेर मेँ, हमर एक बड्ड सुँदर, घर बसल अछि, जे हमर सुख चैन के, बसेरा अछि!!!!! २८ भोर भेलै, घरनी के तँ हाल बड़ा बेहाल छै, तहियो ओ नेहाल छै। घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के। आँखि मिरैत उठि पुठि भोरे, भनसाघर ओ दौड़ै छैथ, चाय बनाब के छैन्ह हुनका, केतली चूल्हा पर चढ़बै छैथ, नास्ता संग तैयार करै छैथ, दिनभरि के दिनचर्या, घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के। घर भरि कान मेँ तूर तेल लेने, एखनो निसभरि सूतल छैथ, पतिदेव आ नेना के, जगेनाय एखैन तँ बाँकि छै, ऑफिस आ स्कूल भेजवाक, सरंजाम केनाइ तँ बाँकिये छै, तहियो भोरतरँगक खुशियाँ, समेटि आँचर मेँ बान्है छथि, घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के। जीवनक अइ आपाधापी मेँ, खुशी के फूल लोढ़य छैथ, ओहि फूलक सुरभित माला सँ, परिवारक बगिया सजबै छथि, जीवन के सृँगार बसल, सुँदर हिनक गृहस्थी मेँ, सँगीतक सुर तान बसल अछि, मनभावन हिनक गृहस्थी मेँ, घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के! २९ आँखि सुतल नहिँ रातिभरि, मोन भटकैत रहल जिनगी के, बितल पल पर ,कखनो आइ पर! मोनक गति विचित्र छैक, छन मेँ अहिठाम, पल मेँ ओइठाम, यादि अबैत अछि ,अपन बचपन के, मधुर, सुँदर, सोहनगर बात, माँ के लोरी,बाबी के प्यार, दुलार भैया के,बहिनक नेह, कनियाँ पुतरा के ब्याह, देर तक, दूर तक, बस खेलहि खेल, निर्बाध स्वच्छँद!!!!! किताबक बस्ता, स्कूलक रस्ता, सब यादि अछि। बरसा के पानि, कागज के नाव, गरमीक रौद, आमक टिकोल, जाड़ के मास, थरथराइत गात, सबकिछ पाछू छुटि गेल। छुटि गेल ओ मेला ठेला, पावैन तिहारक अपनत्व रंग, बाग बगीचा, अँगना झूला, सब किछ अछि ओहिना अंकित, हमर मोन के कोना मेँ, किँतु एकहि पल मेँ जी उठैछ, अंतर्मनक शिशु आइ, मचलि उठल, आँखि मेँ भरि लैत छी, कतेको सुँदर रँग, आ समेट लैत छी, अपन आँखि मेँ, पलक मेँ बँद क दै छी, अपन बचपन! अपन नेनपन!! ३० बड़ी अजीब मँहगाई छै! आटा चाउर तेल शक्कर, मँहगी के छूलक आसमान, गृहिणी भनसाघर मेँ देखु, कतेक भए गेलि परेशान, बड़ी अजीब मँहगाई छै! एतेक मोट तनखा के गड्डी, मासांत पति घर अनै छथि, दस दिन मेँ हालत गड्डी के देखु, कतेक पातर दुब्बर भs जाय छै, बाँकि महिना के बीस दिन, कोना चलत, की करैथ उपाय, बड़ी अजीब मँहगाई छै! पनपियाइ बेरहट के व्यँजन, सुनु! सब फीका फीका भ गेल, भोर साँझ के चाय सँग बिसकुट, सेहो गिनती मेँ कम भेल, एतेक कतर व्योँत मेँ घरनी, अतिथि के कोना करती सत्कार, बड़ी अजीब मँहगाई छै! पावैन तिहारक बात नै पूछू, घरनी कोना करती ओरिआन, कपड़ा सियेती या उपहारमँगेती, कोना पकेती पुआ पकवान, बड़ी अजीब मँहगाई छै!!! ३१ लाल साड़ी पहिरने भौजी, मिथिला आँचर ओढ़ने, चिक्कन चुनमुन गोर माथ पर, लाल टिकुली छैथ सटने। छनछन पएर के नेपुर बाजे, हाथ के चूड़ी खनकए , भौजी शोभा छैथ , हमर घर के। बाजब हुनकर मधुर मधुर छैन्ह, अधर मुस्कैत सदिखन, घर मेँ सबके ध्यान रखै छैथ, थकैत नहिँ छैथ कौखन, घर के साज सँभार करैत, गृहिणी बनि मान बढ़ावैथ, भौजी शोभा छैथ, हमर घर के। बाबी के छैथ चित्रसुन्नैर, माँजीक भव्यारानी, भोर भिनसर उठि , भौजी पहिने, बाबी आ माँ के, चरण छुबै छथि. हमसब भाय बहिन ले भौजी, जननीरुप धरै छथि, भौजी शोभा छैथ हमर घर के। स्वजन बन्धु सर कुटुँब मेँ भौजी, मैथिल बेबहार खूब निभाबैथ, पावैन तिहार मेँ हम्मर भौजी, नीक नीक पकवान पकावैथ, भार्यारुप मेँ ओत , भैया के मान बढ़ावैथ, घर मेँ प्राण सँचार करै छैथ, भौजी शोभा छैथ हमर घर के। ३२ माँ! बैसल दूर गाम मेँ हम्मर माँ जोहि रहल छैथ बाट अपन बेटी के। दिन बितल बीतल हफ्ता मास बितल बिति गेल साल कनिको दिन लेल अबिये जैतैथ सोचथि बेटी लय निशदिन माँ भाग्य सराहथि विधिना मनावैथ अपन सुता लय हम्मर माँ सोचि रहल छैथ अपन मोन मेँ धी जीवनक यथार्थ सच माँ लछ्मी रूप, रूप सरस्वती अन्नपूर्णा अछि हमर वनिता सौँसे परिवार के एक स्नेह डोर मेँ बाँन्हि रखने छथि हमर सुता! सौंसे परिवार के एक स्नेह डोर में, बाँन्हि रखने छथि हमर सुता!! ३३ हम स्त्री छी हम!!!! जखन थाकि जाएत छी घर गृहस्थीक दैनिक जिम्मेवारी मे आ ओझराएल रहय छी ओकर जाल कराल सँओ छोट पैघ जिम्मेदारीक ओहह!!!! ई अनवरत यात्रा! एकर आवश्यकता पूरा करैत करैत पलखैत नहिं भेटैत अछि प्राण सांस उखैर जायत अछि थसथसा जायत अछि देह थकमका जायत अछि डेग सूर्य किरण उगै सँओ सूर्य अस्त तक के हमर अनवरत चलैत गृहस्थी क यात्रा कोना पूरा भsजायत अछि किछु नहि बुझना जायत अछि। एको घड़ी अपन सुधि लै के पलखैत नहिं भेटैत अछि। बसंत के खनक वसुन्धरा के श्रृंगार प्रकृतिक मनोरम दृश्य प्रचंड रौद तामसे घोर अकाश धरती मे फाटैत दरारि सूखल चास बास चैत बैसाखक कहर साओन के झूला बरखाक बून्न उमरैत नदी प्रवाह उमगैत देहक धाह। पूस माघक जाड़ थरथराइत गात होलीके रंग परिवार के संग सब मौसम जीबैत छी अपन काज राज के बीच सब संग जीब लैत छी सुख दुख के रंग अपन खुशहाल गृहस्थी मे बाँटि लैत छी ओहि ब्यस्त दिनचर्याक बीच सुख आ खुशी। हम गृहिणी के गार्हस्थ्य धर्म एक साधना अछि एक-एक दिन के तपस्या सँओ सजैत अछि! बसैत अछि ई खुशहाल गृहस्थी । ज़िन्दगी मे आओर कोनो कामना शेष नहिं बचैत अछि! हम स्त्री के दुनिया के इएह सत्य थिक । प्रेम सँओ परिपूर्ण हृदयक उद्गार ममता मानवता सदाशयता परोपकार श्रद्धा संस्कार आत्मगौरव अर्पण! समर्पण! पूजा! पवित्री! सब अहि मे समाहित रहैत छैक आ ओहि मे समाहित होयत अछि हमर गौरवमयी नारित्व! एक संपूर्ण सृष्टि के आधार!!!! ७ टा श्रृन्गार गीत १ लs चलु नदी के पार सखि, ओहि पार हमर प्रियतम छैथ। हम केश सजेलौँ गजरा सँ, नयन लगेलौँ कजरा तँ, लै अधरकली के लाली सँ, भेल लाज सँ गाल गुलाबी तँ, अहाँ धरू एखन पतवार सखी, लs चलु प्रियतम के गाम सखी। सजि धजि के नयन बिछैने छलहुँ, नयनन मेँ सपन सजैने छलहुँ, तड़पैत अछि आकुल व्याकुल मन, इहो पीर नै सहत हमर तन मन, अहाँ करु किछ जतन उपाय सखि, लs चलु प्रियतम के ठाँम सखी। प्रियतम जोहै छैथ बाट हमर, बैरिन भेल रैन, नदी के लहर, तरिणी तट नौका बन्हल पड़ल, नाविक सुतल निसभेर बनल. अहाँ करु नहिँ एको छन देर सखी, नाविक के तुरत जगाउ सखी। लs चलु नदी के पार सखी, ओहि पार हमर प्रियतम छैथ। २ ओहि राति! ओहि राति ! सपन में अयला सजना ! बिहुँसैत अधर भीजल नयना! ओहि राति! सपन में अयला सजना! नहुँ नहुँ दीप जरय ओहि प्रीतमहल, हम बाती मधुर बनल सजना! ओहि राति ! सपन में अयला सजना! पिपासित छल मन! तन थिरकि रहल ! तकय चानक दिस चकोर नयना ! ओहि राति! सपन में अयला सजना ! वन कानन मन विरहिन पपीहा ! पीउ पुकारि रहल काँपय गगना ! ओहि राति! सपन में अयला सजना ! प्रीतकुँज जखन कुहकल कोयली! आधे राति बिखरि गेल भोर जेना ! साँस उसाँस सुरभित सुरभित ! महुआ मादक बौरायल मना ! ओहि राति ! सपन में अयला सजना ! ओह!! ओहि राति सपन में अयला सजना !! ३ अहाँ कहै छी , बैसू लग मेँ, नीक लगैये। नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैये। हाथ केँ हाथ सँओ साथ मिलल, जखन पयलौँ नेह अहाँके, जीवन डोर मेँ बान्हि पिया, सोहागिन बनलौँ अहाँके, अहाँ हँसै छी सौँसे घर आब , झिलमिल चाँद लगैये, नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैये। सुध बुधि नहिँ अछि अपन आब तेँ, मुखड़ा देखि अहाँके, सिँगार अहीँ छी, साज अहीँ, पिया! प्यार बसल अँगना मेँ, अकछ करै छी पिया हमरा , तहियो बड नीक लगै छी, घर मेँ होली, दशमी, दिवाली, निशदिन आब लगैये। अहाँ कहै छी, बैसु लग मेँ, बड नीक लगैये। नेह नयन निहारब सजना, बड नीक लगैये। ४ साँच हमर मीत अछि! साँच हमर मीत अछि! विपति कष्ट हानि लाभ, सबके कसौटी मेँ, कसल हमर मीत अछि, साँच हमर मीत अछि! जीवन के दू बाट मेँ, एक गली हार तँ, दोसर गली जीत अछि, अहि दू गली मेँ देखु, जीत हमर मीत अछि, साँच हमर मीत अछि! नहिँ स्वार्थ नहिँ लोभ, नहिँ दंभ नहिँ छोभ, अहि सबसे ओ बहुत दूर, प्रीतक रीत मेँ हुनक, नहिँ ओर कोनो छोर छै साँच हमर मीत अछि! सूर्य के किरण सन, केसर के फूल सन, सुँदरता आ उष्मा सौँ, परिपूरित हमर मीत अछि, साँच हमर मीत अछि! जीवन के अहि तपोवन मेँ, शान्त स्वच्छ पर्णकुटीर, क्लान्त थकित मन जतय, पावय सुख अनँत अछि, साँच हमर मीत अछि! मैत्री अछि अमूल्य चीज, नैसर्गिक जगत के, विहुँसैत ठोर के, मधुर रसधार बनल, गान हमर मीत अछि, साँचे कहैत छी , प्राण हमर मीत अछि, सुनु! साँच हमर मीत अछि! साँच हमर मीत अछि!!!!! ५ पिया के घर! सुँदर चौखट, फूलक बेल , सुँदर आँगन, मन के आँगन, हमर अति चँचल! सिँदूर भरल सिउथ, मेँहदी रचल हाथ, सिहकैत तन, लाज भरल, बड्ड मीठ मुस्कान! मिठास भरल घरभरि के प्यार, अरमान नया, प्रीत नया, मीठ मनुहार! कजरारे नयन, सपन सुँदर, करोट लैत, रिश्ता के बैन! मिलन के रुत, सपना के सेज, मनभावन रैन, चूड़ी के खनखन, मदमस्त पाजेब, गीत गबै रुनझुन रुनझुन! गजरा के गप्प, कजरा के गप्प, नेह भरल , शरारत प्यारक गप्प, तनमन के गप्प, गुमशुम गुमशुम, भोर नया, शबनम शबनम! ६ गजब तोहर रूप गजब तोहर सिँगार गे छौँरी, तैपर तिरछी नजरिया मारै सौ सौ कटार गे छौँरी। एहन बालि छौ उमिरिया कोना लचकै छौ कमरिया, एना चलभि बीच बजरिया मरतै सँसार गै छौँरी। छौ ठोर गुलाबी बसँती तोहर गाल गुलाबी बसँती, सुँदर बदन तोहर छौ गुलाब के भँडार गै छौँरी। गोरिया रँग तोहर बेजोड़ केहन मारै छौ इजोर, चकाचक चढ़ल जुआनी पर मिटौ सँसार गै छौँरी। ७ नभ के आँगन मेँ एखन, चाँद के अबइया छै। नभ के------! विस्तृत नभ नील वर्णी, शाँत नि:शब्द भेल, झिलमिल तरेगण मिल, एकसँग बिहुँसि गेल, स्वागत मेँ चाँद के, चाँद के अबइया छै, नभ के आँगन मेँ देखु, चाँद के अबइया छै, नभ ------! दिवस बितल , भेल साँझ, साँझ के कपाट खोलि, रत्नजड़ित साड़ी मेँ, सलज्ज चाँद प्रगट भेल, सोलह कलासँ पूर्णचँद्र, अमृत बरसाबय छै, चाँदनी धवल छटाँ सँ, दिगन्त हरसाबय छै, चाँद के अबइया छै, नभ के आँगन मेँ एखन, चाँद के अबइया छै, नभ -------! ६ टा बाल गीत/ कविता १ बाल कविता चल चल्ल रौ मिता! घूमि अबि कने सौँसे गाम। साल भरि जे बाट तकलियै, तखन एलै गर्मी छुट्टी, हम किताब बस्ता सँ करबै, देखहि केहन नम्हर कुट्टी, चल चल्ल रौ मिता। पोखरि झाँखरि गाछी बिरछी, एको बाँकि नहिँ छोड़बै हम, जँगल मेँ खूब मँगल करबै, इहो छुट्टी पड़तै बड़ कम, चल चल्ल रौ मिता। भोरे उठि पुठि हुड़दँग मचेबै, पोखरि मेँ छपाक सँ कुदबै, दुपहरिया धरि, चुभकैत डुबकैत रहबै पोठी इचना माछ पकड़बै, लहकैत मटकैत अँगना एबै, करिया झुम्मैर खेलैत दीदिया के, छिटकि मारि चारो चित्त खसेबै , एतै फेर ते बड्ड मजा, चल चल्ल रौ मिता! हक्का बक्का छथि माँ बाबुजी, देख बदमस्ती अपन छौँड़ा के, मने मने सोचि रहल छथि, छौँड़ा रहल नहिँ कोरा के! चल चल्ल रौ मिता, आब बौआबी सौँसे गाम!! दुपहरिया धरि २ मेघ बरसलै, धरती बिहूँसलै, भीजय गहे गह, धरती बनल छै रानी, राजा बनलै मेघ, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! बिजली चमकलै, ह्रदय हहरलै. सखी बसै दूर देश, नाचि रहल छै , छमछम छमछम, वन मेँ मोरनी मोर, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! घिर घिर आओल, कारी बदरिया, बरसै रस मेघ फुहार, देखि रहल छै इन्दर राजा, धरती अछि रसे विभोर, ढमढम बाजै ढोल नगाड़ा! ३ माँ हमरो किनि दिअ खिलौना! खेलब मोन भरि, नहि उत्पात मचायब, नहि पसारब आब, हम कोनो घेउना, माँ हमरो किनि दिअ खिलौना। ना ना नहि करू, जिद अहाँ छोरू, आनि दिअ कनि सुँदर सुँदर, भालू, बन्दर, खग, मृग छौना, माँ हमरो किनि दिअ खिलौना। जाउ बजार अहाँ जल्दी सँ, करु नहि देर , हमरो सँग लS लिय, रिमोटवाSल्ला ओ मोटर गाड़ी, हवाइ जहाज किनू, होय मँहग या भारी, बैटरीवाला मोटर-बोट हो, हाथी .घोड़ा,या गुड़िया छोट हो, ढोल, मजीरा,ड्रम, कैसियो, जे पसँद होय अहाँके मैया, किनि दिअ नहि ताकु रुपैया, माँ हमरो किनि दिअ खिलौना। लेकिन माँSS! नहि चाहि हमरा, बंदूक ,रायफल, तीर, कमान, खेल खेल मेँ हम नहि सीखी, हिँसा सनके पाप , हम छी भारतमाँ के सपूत, हमरा भरS के अछि , बड्ड ऊँच उडान , जन जन के रच्छा कS सकी, देश के कय सकी कल्यान, देश मेँ आनी खुशहाली, बालपन के, खेल खेल मेँ. पूर्वाभ्यास एकर कS ली, माँ! हमरो किनि दिय खिलौना। ४ छम छम बरसा, छम छम पानि, चम चम बिजली, चमकै आइ, चम चम बिजली चमकै छै, जियरा मेँ आगि लगावै छै। कारी कारी घटा घिर आओल, मन के मोर शोर मचाओल, बिजली चमकै जियरा हहरै, कारि अन्हरिया राति भयाओन, पिया के सन्देश सुना दिअ आइ, चम चम बिजली चमकै छै। सँग सहेली घर चलि गेलि, सून भवन मेँ छी हम अकेली, सनननन बड़ी जोर पवन अछि, घन घमँड देखावै आइ, चम चम बिजली चमकै छै। मन के मोर सुनु इक बैन, पाओत मोन कोना कहु चैन, किछ ते जतन करु अहाँ इहो रैन, छोड़ू मचेनाय शोर किलोल, पहुँ के सन्देश सुना दिय मोर, चम चम बिजली चमकै छै। ५ मानवताक गीत। एक स्वर मेँ बाजि उठल, मानवता के गीत। मानव छी , मानव सँग भेद! कदापि नहिँ। ऊँच नीच के जातिभेद! कदापि नहिँ। धनीक आ गरीबक वर्गभेद! उचित नहिँ। नारी कए दुर्बल , पुरुष के सबल, जतेबाक जरूरति नहिँ। समाज के, अहि कुत्सित विचार के दूर करबाक जरूरति अछि, एहेन भेदभाव केँ, स्वाहा केनाय जरुरी अछि। सब छी एक-एक-एक। मानव सँग मानव के नेह, आब जोरनाय जरुरी छैक। नारी कय शक्ति! पुरुषक शिवरूप जाग्रत केनाइ, नितांत जरूरी छय। नारी जगाबथु अपन, सम्मानिय, शिष्ट आ वीराँगना रूप, पुरुष अपन कर्मठता आ पुरुषार्थ सँओ, निर्माण करु नवसमाज के। आउ हमसब मिलकय, सम्मान करी, ईश्वर के अहि सुँदर रचना के, उत्थान करी अपन समाज के! ६ बाबी(दादी माँ) शिशु हसन, जखन बाबी के, मुँह पर पसरि जाय, बाबी हमरा बड़ नीक लागय। कतेक कहानी गीत सुनाबय, फकरा ,कहबी के अँबार लगादय, चुपेचाप नचारी,कोबर ,सोहरके, बड़का बड़का बारहमासा के, मल्हार, फागुन , चैता के, गीतक पाँति सिखाबय, अरिपन रँग बिरँग बनाके, हमरो सँ बनबावय। बाबी हमरा बड़ नीक लागय। पैघक आदर मान करेनाय, छोट पर प्यार दुलार बरसेनाय, धीरे हँसनाय,धीरे बजनाय, शील गुन के बात सिखेनाय, बाबी ओहिछन दुनियाँ मेँ, सबसे सुँदर लागय, बाबी हमरा बड़ नीक लागय। ५ टा गजल आ तीन टा शेर १ जमाना देलकै दरद बहुत किनका कहबै करेजक भेल कत्तेक टुकड़ी किनका कहबै | किछ बात एहेन जहि सँ हम अनजान छलौं बड़ी भेद भरल बेदर्द लोग किनका कहबै | उप्कार में अप्कार तकै जग के रीत पुरान छै हवन करैत जौं हाथ जरल किनका कहबै | मुँह आगू जैह मीठ बनै पीठ पाछू उपहासी मुखौटा लगेने लोक छै फरेबी किनका कहबै | जे जेतबे नम्हर चोर बात हुनके लम्बा चौड़ा साधु बनल मुँहचोर रक्षक किनका कहबै | सज्जन के नै ठौर कतौ दुनियाँ चोर ठकैत के झूट्ठा बनै पवित्र एतै धर्मात्मा किनका कहबै | सरल वार्णिक( वर्ण- १८) २ जिनगी जहिना तहिना कटैत रहलौं सुख दुख के जउँर ( रस्सी ) सँग बटैत रहलौं | कान्ह पर छलै घर जिम्मेदारी क बोझ हँसि हँसिके ओ बोझ सब उघैत ( ढोऐत )रहलौं | दुख एलै हम कहियो निराश नहिं भेलौं सुख के मोती हम पानि सँ छटैत रहलौं | रैन अन्हरिया छलैक तहियो की भेलय सवर्णिम भोर के आस लए खटैत रहलौं | बड़ अजगुत दुनियाँ के चलन की कहू तकै नीको में बेजाय सब सहैत रहलौं | पिघलैत रहल रसेरस दुख के घड़ी मेहनैतिये के मोजर छै जनैत रहलौं | दुनु हाथक भरोस छै मेहनैति के जोर जीवन में सुख के संगीत गबैत रहलौं | सरल वार्णिक- ( वर्ण -१६ ) ३ प्रीतके मीठे होय छै बोल सेहो हम जानि गेलौं प्रीतके बोल बड़ा अन्मोल सेहो हम मानि गेलौं | इन्द्रधनुष के सातों रंग सँ प्रीत सजल अछि मनमा करै मोर किलोल सेहो हम जानि गेलौं| प्रीतक नहिं छै भाषा कोनो एकर कोनो नै बोली अनहद बाजै प्रीतक ढोल सेहो हम जानि गेलौं| पोथी पढि बनलौं हम ज्ञानी बहुत अभिमानी प्रीतके ढाई आखर बोल सेहो नहिं जानि पेलौं| प्रीतक रीत विरह के पीड़ा दारुण दुखदायी करेजा सालै छै अनघोल चुप्पे हम कानि लेलौं| तरसि गेल दरस बिन नैना प्रीत निरमोही मौन छै व्याकुल नैना बोल सेहो हम मानि गेलौं| सरल वार्णिक(वर्ण-१८) ४ हुनक नैन झरैत नोर हम देखने छी भरल आँखिक लाल कोर हम देखने छी | नैन चुपचाप रहय बोल किछ नै फुटै हुनकर बिजुकैत ठोर हम देखने छी | उठैत करेजक दरद कहु के बुझतै सालैत अो टीस पोरे पोर हम देखने छी | नेहमहल ओ सजेने छलैथ जतन सँ बिखरै महल खंड थोर हम देखने छी | हुनका के बुझाबै इयैह जिनगी थिकैक कानबै कनैत चहुँ ओर हम देखने छी | (वर्ण - 16) ५ जेतबेटा चादरि हो ओतबे पैर पसारल करु, दुनियाँ के इएह सत थिकैक नै बिसारल करू। आमद होय कम्म खर्च नम्हर कोना गुजर जेतै, नापि तौलि अपन दुनियाँ नीक सँ सम्हारल करु। बूँदे बूँद सँ घट्ट भरै छै इहो ते सब जनिते छी, गागर मेँ सागर भरि दियौ मन नै हारल करु। मितव्ययी बनब अहाँ जीवन अहीँक शिष्ट हैत, जग मेँ झुठक चकाचौँध बहुत छै तारल करु। झूठक जिनगी चहटगर होय छै से जानि लिय, ऋणियाँ बनि क अपन जिनगी नै गुजारल करु। वर्ण-( 19) ३ टा शेर १ अहाँके बाट हियासल कतेक दिन सौँ। अछि राति इ पियासल कतेक दिन सौँ। मात्रा क्रमः 1222 1221 1121 212 २ प्रीतक मीठे होय छै बोल सेहो हम जानि गेलौँ। बिन बाजन बाजै इहो ढोल सेहो हम मानि गेलौँ। मात्रा क्रमः 2222 2122 1222 2122 ३ पढ़ि लिखि बनल छलौँ हम कतेक ग्यानी बनल अभिमानी। प्रीतक ढाई आखरक मोल सेहो नहिँ जानि पेलौँ। मात्रा क्रमः 2222 2122 1222 2122 २ टा बाल गजल १ अछि बड्ड जिद्दी बरसात कहल नै मानै एको बात। कहल----- घटाटोप बादल आवारा ठुमकि के नाचै चारु कात। कहल----- कखनोटिप-टिप कखनोझम-झम भिजलै धरती गाछे पात। कहल ----- भैया के भिजलै कापी बस्ता जे नै कराबै मेघ बसात। कहल----- सब मौसम छै आनी जानी बरसातक फरके बात। कहल------ सँग कजरी झूला साजल इन्द्रधनुष के रँगे सात। कहल------ वर्ण-10 २ भरि रस्ता कादो कीचड़ पसरल बाहर कोन्ना जेबै हम कन्हा चढ़ि इसकूल जायलेल बाबू के कोना मनेबै हम। मुसलाधार बरसै छै बदरा एक्कोपल लेल थमतै नै इसकुल पहुँचै मेँ देरी हेतै निश्तुक्की छै मारि खेबै हम। गल्ली कुच्ची अँगना डबरापोखैर भरि गेलै खेतक आरि पानिये चानी पीटल छै सबतरि नाव कोना चलेबै हम। लकड़ी काठी जारैन चुल्हा सब तीतलै बड्ड मोशकिल छै सेहोदेखि माथठोकि कहैछै माँजी भातो कोना पकेबै हम। सँगी साथी सबघर मेँ घुसरल कियो नहिँ बहराबै छै इन्दरराजा ढोल बजाबै ढम्म सँ के नचतै जे गेबै हम। वर्ण- 22 ५ टा शृंगार गजल मैथिलीक पहिल शृंगार गजल- भक्ति गजल, बाल गजल आ सोझे गजल, तकरा बाद प्रस्तुत अछि मैथिलीक किछु “पहिल शृंगार गजल” सभ, सरल वार्णिक बहरमे- पहिल बेर विदेहमे- सम्पादक। श्रृंगार गजल १ अछि राति बितै सँ रहब बाँकि किछु बात अहाँ सँ कहब बाँकिl कहै के अहाँ सँओ दू -चारि शबद कोना कहबै ओ बात गढ़ब बाँकिl अहाँ संगे दूरी बाँचल जे किछु अछि बालू के भीत ढहब बाँकिl जी भरिके बात अहाँ सँ करब छै नेह के तपन सहब बाँकिl कहू प्रीतक डोर ई बान्हू कोना अछि लाज सँ आब मरब बाँकिl मिलन सुर्ख लाल गुलाब कली रसधार सुधा में बहब बाँकिl छोट डेग प्रेम पथ में अपन जीवन भरि संग चलब बाँकि। सरल वार्णिक (वर्ण-१२) २ गमाउ नै गोरी छन मधुराग भरैये हमर हृदय सँ फूल पराग झरैये। देखु लाज सँ गालक गुलाब खिल गेल लोगक नैनाक काँट बेहिसाब गरैये। नैना चितवन अल्हड़पन देखैत छी कोना मुस्की मिसरिया पर जान जरैये। अधर कोमलकली छै रस सँ भरल मन भँवरा बौरायल से जानि परैये। मोन फागुनी बयार बनि मस्त मगन सिनुर लाज सँ मुखरा गुलाल भरैये। रूप चर्चा पसैरि गेल गामहि गाम मेँ कोना चलतै लोग दिने मेँ बाट हेरैये। सरल वार्णिक (आखर-१५) ३ जी के जंजाल बनल हमर हेयै कंगना खनक खन बाजि उठै जागि गेलै अंगना । दौड़ि बहियाँ पकड़ि पिया करै बरजोरी अरज न मानै केहन मचबै उधंगना । सासु पढ़ैथ गारि ननदी करै ठिठोली तीख नैना गोतनीयाँक लगै हड़कंपना । बैरिन भेल ननदी बैरि छोट देउरबा बैरि सजनजी कतेक करै तंगचंगना । आँचर सम्हारि तँ बाजि उठल कंगनी मोरा बारि बयस भेल बड़ा यै बेढ़ंगना । कतेक सासु मनाबी ननदिया पैँया लागी ककरा की कहबै जौँ पड़ल कूपै भंगना । प्रीत मीठ साजन के नीक हुनक संगना देखि मुस्की इजोरियाँ सिहकै अंग अंगना । वर्ण - 16 ४ गजल ( श्रृँगार.मल्हार ) बरखा बरसै छै दिन राति अहाँके इयाद सताबै ओहिपर कारि अन्हरिया राति अहाँ बिन चैन न आबै। अहाँ---- घिरलै कारी घटा घनघोर वन मेँ नाचै मोरनी मोर एसगर सून्न भवन छै मोर बिजुरिया देखि डराबै। अहाँ---- बरसैत कजरा के धार हमरा इहो दैत उपराग प्रीतम द्वारजोहै छी बाट अहाँके मोरा हिय हहराबै। अहाँ ----- पिया अहाँ बसु दूरदेश मेघ सँ भेजू अपन सँदेश करोट फेरैत कटै छै मोरा रतिया नैना नीर बहाबै। अहाँ----- बून्ने मोती सजल सब पात देखि सिहरै छै मोरा गात भिजै कजरा गजरा बिंदिया कोयलियो के बोली सताबै। अहाँ---- विलमनै करियौमहाराज अबियौ छोड़ि काम आ काज हमर कँगना पायल के झँकार रहि-रहि अहीँके बजाबै। अहाँ--- वर्ण -21 ५ गमाउ नै गोरी ई छन बाते बेबात मेँ हमर हृदय सँ फृल पराग झरैये। देखु लाज सँ गालक गुलाब खिल गेल लोगक नैनाक काँट बेहिसाब गरैये। नैना चितवन अल्हड़पन देखैत छी कोना मुस्की मिसरिया पर जान जरैये। अधर कोमलकली छै रस सँ भरल मन भँवरा बौरायल से जानि परैये। मोन फागुनी बयार बनि मस्त मगन सिनुर लाज सँ मुखरा गुलाल भरैये। रूप चर्चा पसैरि गेल गामहि गाम मेँ कोना चलतै लोग दिने मेँ बाट हेरैये। आखर-15 अशोक जे. दुलार बाल-कविता- प्रिया रानी प्रिया रानी गै! एते तोँ ने हल्ला मचा; बुढ़िया जइसन बात बजै छैँ, छैँ तों एखन बच्चा। प्रिया रानी गै एते तोँ......॥ सूति-ऊठि नित लेट्रिन जाही दतमनि करही अपने, मुँह-कान के धो-पोछि कऽ नहा-सोना ले तखने; थोड़-थोड़ कऽ खाही ओतबे सकही जतबे पचा। प्रिया रानी गै एते तोँ.....॥ अँगने मे घोसियैल रहै छैँ बात नीक नहि भेलै, संगी-साथी बाट जोहै छौ जाही आबो खेलै; खाली कानय बात ने मानय राखि देलैँ तोँ नचनी नाच नचा। प्रिया रानी गै एते तोँ.....॥ मुस्की तोहर हुलकी मारौ झहरौ नयना नोर, संगी संगे गीत गाबै छाड़ि दे आबो कोर; सुनि ले एखनो दकर ने कखनो, आम लताम कच्चा । प्रिया रानी गै, एते तों....॥ सा ते भवतू सीख लेलैँ तू गिनती सिखही आब, पहिने पढ़ही तखन लिखिहेँ पूरा करिहैँ ख्वाब; सजि-धजि कऽ इस्कुल जेबैँ बुधमनि हेबैँ सच्चा। प्रिया रानी गै एते तोँ....॥ गरहलि-गाँथलि प्रिया रानी बाजय बोल अनमोल, दुध्दा दाँत झलकि उठय क्षण आँखि घुमाबय गोल; खिलखिलाइत-खन बाँहि पसारय कहैते चचा-चचा। प्रिया रानी गै एते तोँ......॥ ८ टा कविता १ मन काबू रख बाबू **************** मन काबू मे रख बाबू आगू पाछू लख बाबू। बोली मे गोली भरने ओल सनक नहि भख बाबू। बेसी बुधियारी कयने तीन ठिया नहि मख बाबू। दुनियादारी घोर बितै आँखि फुजल तूँ रख बाबू। गाल बजा नहि काज करै बेसी नहि चख चख बाबू। संबंध जुड़ल नहि हिय मे केश कटा की नख बाबू। चालि चलन देखल बिगड़ल फूरै नहि अक-बक बाबू। बिन बातक अनघोल मचै छाती कर धक धक बाबू। भाव अभावे शान कहाँ नहि रस्ता भरिसक बाबू। २ योग करू ने मीता ------------ सब शमित रोग करू ने मीता भोग कम, योग करू ने मीता कर्मरत अहि दुनिया मे रहितहुँ अल्प उपभोग करू ने मीता दुखहि डूबल नहि रहि कय झामर नित नियम योग करू ने मीता अछि बनल काल करोना जग भरि योग उपयोग करू ने मीता मानलक आब तऽ दुनिया सगरो योग मनयोग करू ने मीता जोड़ि सबके ल'क' संगहि चलि ली एहने ब्यौंत करू ने मीता आब संयोग सुखद सुंदर हो देश हित ध्यान धरू ने मीता अलहदे चीन भजै'ए गोटी तोड़ि मुह हाथ धरू ने मीता ३ जाड़ कतेक पड़ै छै यौ ***************** बंकू बाबू डुग्गू बाबू औ जाड़ कतेक पड़ै छै यौ। सुटकल दुबकल रहियौ घर धरि बड़ शीतलहरि लहरै छै यौ। स्वेटर पहिरू टोपी पहिरू से एहि सँ जाड़ टरै छै यौ। धोन्हीं चादरि सुरुज नुकेला उफ़!पछबा हाड़ गड़ै छै यौ। हाँ,हाँ,टोपी नहि ने फेकू एना मे कान ठरै छै यौ। खोंता धेने चुनमुनियाँ सब नहि बकरी घास चरै छै यौ। कुकुर बिलैया कूँ कूँ म्याऊँ कंबल सीरक हेरै छै यौ। गामो घर मे बूढ़-पुरनियाँ घूरे लग जाय अरै छै यौ। जाड़क अमरित आगि कहाबय दुखिया संताप हरै छै यौ। जाड़ कसैया बड़ निर्दैया ओ ककरो ने छोड़ै छै यौ। ठहरू ठहरू थोड़हि दिन बस जाड़ोक उमेर ढरै छै यौ। नेना भुटका घर मे बैसल ई कविता याद करै छै यौ। ४ हमरा सबहक नेताजी ************ रगड़ा झगड़ा ठनने फीरथि से हमरा सबहक नेताजी। पूज्य बनल रहता ओ कोना बेबात फसाद करेता जी। बतकुट्टनि के खेती सनगर आ सौंसे आगि लगेता जी। प्राण बसय हुनकर सत्ता मे कुर्सी लय ग़दर मचेता जी। चारि बरस धरि निमुआने सन पचमे आबि फुसियेता जी। जाइत-पाइत धर्मास्त्र बल मरछाउर छीटि सुतेता जी। आगाँ पाछाँ मोटर पों पों औ अगबे धूलि फकेता जी। चलती हुनकर की देखै छी चलती देखबथि चहेता जी। केहन अनबुझ बूझथि सबके पढ़ने बिनु खूब पढ़ेता जी। ५ बेसी हमरा सँ के बुधियार! <><>¤¤¤¤<><>***<> बेसी हमरा सँ के बुधियार! फूट डारि कऽ राज करै छी, अपन तिजोरी खूब भरै छी, टीकमटीक ओझरायल रहौ बस, तेहने तेहन काज करै छी, केहेन-केहेन पानि भरै छथि मानथि हारि बड़-बड़ सुतिहार। बेसी हमरा सँ के बुधियार!! बुद्धिजीबी जे वर्ग कहाबथि, उछलथि कूदथि गाल बजावथि, रस्ता हम्मर वैह सोझराबथि। अपन बिरादर आखिर अपने शान हुनक तऽ हमरे झपने, हुनकर सिदहा हमरे नपने, बालि बनि हम कियैक ने गरजी, बढ़ले जाय हमर अधिकार! बेसी हमरा......!! जतय जे गऽर ऊँट बैसै बस गोटी तैखन सैह भजै छी, बहुरुपिया अछि रूप हमर हरेक रूप मे बेश छजै छी, धर्म-अफीम नशा केर पुड़िया तकरो बाना खूब जनै छी, पर उपदेश कुशल हम अपने प्रवचनो दऽ खूब गजै छी , चोरी टा सँ मोन भरय नहि {पेट तऽ बिना चोइरोक भरैए} ताँय डकैती पर उतरल छी तैँ की डकैत कहत संसार! बेसी हमरा सँ के बुधियार!! ६ हम मजदूर बिहारी ¤*******¤****¤ हम मजदूर बिहारी भैया,हम मजदूर बिहारी घर छोड़ी लाचारी भैया,हम मजदूर बिहारी। हमरे बल पर नहर-छहर आ बनय महल अटारी, हमरा स्वेदे लहलहाइत फसिल, पंजाबक खेती-पथारी। भैया,हम मजदूर बिहारी।। आसेतु हिमालय पसरल सगरो, हमरा काज ने कोनो भारी; सोझमतिया हम मारल जाइ छी, नफ्फा लूटय बणिक-व्यापारी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ अखरा नोन आ मिर्च हरियरका संग प्याजु सोहारी, रुक्खा-सुक्खा खा जीबै छी के कीनत महग तरकारी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ घर बनबितो बेघर रही भेटय सगरो टिटकारी; कतहु 'भैया' 'बंदा'कतहु चलय करेजा आरी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ उपजाओल हमरे भोग ने हमरा, कखनो कऽ बिचारी; बैठल ठाँव जे बात बनाबय आगाँ ओकरे भरि थारी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ माया-जाल प्रपंच बनल ई योजना सब सरकारी; कोनो दल सरकार बनै छै लागै एक्के बेमारी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ बौआ-बुच्ची किताब ने काँपी, कनियाँ के ने निम्मन साड़ी; मेहनतकश के मोल ने एतबो समय केहेन ई भारी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ खन असोम तऽ खन मुंबई मे हमरे पर गोला-बारी; मनिआडर के आस मे परिजन सुनि दै औनी-पथारी। भैया,हम मजदूर बिहारी॥ ७ स्वप्न-परी ********** ऐ स्वप्न परी घड़ी दू घड़ी, बिलमि कनेको जाउ ने। तृषित नयन निहारि रहल, झलक देखा तरसाउ ने॥ काल कराल केर चक्र चलय अछि, रस क्षण केर पीबि लियऽ। जानि ने की अछि अगिला पल मे, एहि पल के जीबि लियऽ॥ प्रबल प्रतीक्षे पीड़ित छी, कय मन उन्मन भरमाउ ने! ऐ स्वप्न परी.......॥ जन जीवन मे उत्ताप बढ़ल, सब किछु बनल व्यापार अछि। सब संबंध शिथिल पड़ल, ससरि रहल संसार अछि॥ तप्त बनल जीवन-मरुथल, स्नेहामृत बरिसाउ ने! ऐ स्वप्न परी....॥ खिलल कमल-दल अछि मुख-मण्डल, मधुरिम हास सुशोभित। मन भमरा भमि-भमि आबय, अधर सुधा-रस लोभित॥ दय ग्रिव-हार लवंग-लता भुज, कुंतल घटा घहराउ ने! ऐ स्वप्न परी....॥ ई मदिर नयन छलकाबय हाला, भरय दियऽ थोड़ जीवन-प्याला। यौवन रस केर धार ने बान्हू, डूबि मरय दियऽ आइ ने थाम्हू। दु:ख दर्द केर शव पर नेहक सिँगरहार झहराउ ने! ऐ स्वप्न परी......॥ ई चंचळ चितवन चोरी चोरी, उन्मादक ज्वारि उठाबय अछि। रुन-झुन खन-खन खिळ-खिळ हासे, मनक सितार बजाबय अछि॥ कदलि थंभ पर केहरि कटि ई, ता पर सुमेरु उठाउ ने! ऐ स्वप्न परी......॥ सुंदर तन आ सुंदर मन अछि, मंदिर हमर अहीँ छी। प्राण अहाँ मे ध्यान अहाँ मे अहीँ आकाश मही छी॥ अटकी भटकी जीवन पथ पर, गेंठ कने सोझराउ ने! ऐ स्वप्न परी......॥ ८ परतारब फेर बुझले अछि परतारब फेर, काज ससारब टारब फेर। पहिलुक बेर'क नहि थिक बात मुइले के पुनि मारब फेर। जे घर चूबै तकरे छाड़ि छाड़ल चारे छाड़ब फेर। पौती पेटार उसारल त' बँचलो कैंचा झाड़ब फेर। मिहिया मिहिया कुरहड़ि भाँजि फारल जाड़नि फारब फेर। मुहछी मारय भोजक बेर हमरे मोहल्ला बाड़ब फेर। मेल मिलाप सहन नहिं होय कठिया लाड़नि लाड़ब फेर। गादी चढ़िते बदलै मोन कुनबा अपनहि तारब फेर। सुनगै कनियों धुंआँ-धुकुर घीउ अँहीं ने ढारब फेर। जीते जीत सदा परतीत पुनि पुनि हमहीं हारब फेर। विष्णु कान्त मिश्र चीर हरण कहयवला समय नहि रहलै, माइक खोंछि आब नहिभरलै। बाॅचल आब की रहल अछि, कूपहिमे भाॅग नीक घोरल अछि। जड़िएहिमे जहर देर जाइतछै, गाछक चीरहरण भेल जाइत छै। गननाएब हमरासॅ पार नहि लागत, बहिरा करैत कखनहु नहि जागत। भाषा,शिक्षा, धर्मक चीरहरण, दक्षिण-वामपंथी छथि पीर हरण। चरक निकलुआ उपर बैसल अछि, जन मानस चुपचाप सैंथल अछि। उपर-नीचा एजेन्ट रखने अछि, युवा-वुद्धिजीवीके नीक पेकने अछि। संस्कार,संस्कृति,प्रेमादिक चीरहरण, परिवार, गाम,नगरादिक चीरहरण। विआहक नीति के तोड़ि-ताड़ि, जाति-संप्रदायकेफोड़ि-फाड़ि। सभहक ठीक एक दोसराॅ ओझराबय, हत्यारा सभ एहिना राज चलाबय। जिनगीक कोन क्षेत्र अछि बाॅचल, जे अछूत हो नहि हो आंचल। भनहि'विष्णु' सत्यानाशमे नहि भांगठ, युवा वर्ग बचाबथु होएबासॅ नांगट। बालबोध शिशुक नाल कटला सन्ता, माइक गर्भसॅ कोर अबै अछि। अनुश्रवण तखनहि माइक क', नित - नित आगाॅ भगैत रहै अछि।। वस्तु चिन्हाएब संकेतसॅ ल'क', बोली फोड़ब हुनकर काज। उमेरमे किछु आगाॅ बढ़ि, नकल करय ओ माइक बात।। बोली- आचरण जेहन हो सुनकर, ओकर पड़ै छै अमिट छाप। बाजि- बाजि क' जे सिखबै छथि, भ' जाइत अति मोहर छाप।। वातावरणमे जेहन रखै छथि ओकरा , तदनुकूले जड़ि बनै छै। बाल्यावस्था थिक नींव जिनगीक, आगाॅ बढ़ि तेहने गाछ अबै छै।। सुन्दर फूल,मीठफलक डारिसॅ, स्वयं अपन ओ ध्वज फहराबय। भनहि 'विसुन' कुम्भकारिन बनि ओ अपन कलाके जंग दरशाबय।। बालबोधक सरस्वती बनि, रहैत छथि सतत ओ ठाढ़ि। कुबुद्धि - सुबुद्धि दायिनी छथि ओ, ओहने ज्ञानक आबय बाढ़ि।। सामा – चकेबा नारी जातिक मुख्य पावनि अछि, माय -बहिनक प्रेमक गान। छठिक खरनासॅ प्रारम्भ होइत अछि, पूर्णिमा राति होइछ भसान।। बहिनलोकनि बड़ जतनसॅ बनबथि, माटिक सामा, चकेबा,चुगला।। माय -बहिन बीच फूट करबैमे , चालि चलय ओ सभटा दोगला।। बृन्दावन , लड़ुबेचनी, भरिआ , संगहि झाॅझी कुकुर बनाबथि । सभ राति क ' सखी-बहिनपासंग , मुदित मन भायक गीतों गाबथि ।। पूर्णिमा रात्रि सभ अॅगने-अॅगने, गोसाउनिलग भायसॅ सामा फोड़बाबथि। साॅची खूटपर नवका चूड़ा द ', गूड़क संग सिया जुड़ाबथि।। चॅगेरामे मूरुत सहित जरबैत दीप, भगवती ल 'गसॅ गीत गबैत। नहु -नहु डेग चलि क' आॅगनसॅ बाटपर सखीसॅ मिलन करैत।। जोतल खेत में जा' एक - दोसरासंग, सामा - चकेबाक आदान - प्रदानकरैछ। चुगिलाके डाहि -पजारि ठामहि, समदाओन गबैत आॅगन अबैछ।। कतयगेली ओ मिथिलानी सभ , एकरा बना देलनि इतिहास। सीता स्वर्गसॅ नोर खसाबथि, देखि एंकर एहन उपहास।। 'विष्णु' कर जोड़ि निवेदन करैछ, नीक परम्पराके नहि त्यागू। चिक्का -दरबड़क एहि दौड़ते, अहूॅएना निछोहे नहि भागू।। अनुत्तरित प्रश्न मिथिलाक नारी कतहु रहथि, संस्कार अपन सर्वत्र चमकाबथि। आदि शक्ति वा प्रकृति कहीं , ब्रह्मक कल्पना छथि दरशाबथि ।। की अपन माटिक गौरवके , मिटि मिलाया मटिआए देती ? वा एकरा सीताक चानन बूझि , अपार अपन सटोने रहती ? पुरुषसॅ उच्च स्थान नारी के की हुनकासॅ नहि खानदान बनैछ ? मिथिला, मैथिल, मैथिलीक प्रति, की मनमे नहि श्रद्धा रहैछ ? की मैथिलीक कुहरवपर कान नहि , वा तूर - तेल ल ' बहिर बनती ? संतान में मिथिलाक संस्कार आनि वा पाश्चात्य संस्कारॅ धराके पटती ? हुनकहि हाथ मिथिलाक पाग छै, की ओकरा ओ खसय देती? वा फाॅड़ बान्हि रण चण्डी बनि, खसैत पागमाथपर रखती? ज्ञान - संस्कृतिक अमर कोश के, की पच्छिमक हिटलर लुटिते रहतै,? वा नारी समूह मिथिलाक दुर्गा बनि, समुद्र जाय हिटलर के भसेतै? करथि प्रश्न 'विसुन 'नारीसॅ, की मिथिलाक अधोगति होइते रहतै ? वा शपत लेब संस्कारक खातिर, जंतर छलै ओतहि जयतै ।। पथिक ये बटोही चलैत रह पथपर , बिनु कोनो दूरी सोचने । एक मुट्ठी माटिक मोल नहि, भगैत नजरि मंजिल रखने।। आगमन -प्रस्थानसॅ अनजान छैं, साॅस जाधरि इस ताधरि। बाम -दहिन बिनु तकनहि, अन्तिम साॅसधरि इस मरि -मरि।। बाटमे हिम -आतप समशीतोष्ण भेटतहु, उच्च, मध्यम, दलित, भिखारि । सज्जन -दुर्जनक संपर्क होएतहु, करिहैं विज्ञ बनि तौल सम्हारि।। पग -पग पर पाथर आ फूल पुंज, संतुलित साॅससॅ सम्हरैत चल। शील संग सहयोग स्वभावमे, शान्ति, संतोष, नानक बल।। मंजिलधरि पहुचहिसॅ पूर्वहि, दिशाहीन भेलहु नहि भान होउ। भनहि 'विष्णु 'बन एहन बटोही, तोहर अनुकरणीय भ ' मान होउ ।। कुरसी चोरा-नुक्की खेल खेलाइते , निर्लज्ज बनि आब टाल ठोकै छै। क्रिमिनल गैंगक सरदारबनै लेल, आन पार्टीक मेम्बर फोड़ै छै ।। जन प्रतिनिधि बनब सर्वोत्तम बिजिनेस थिक, अहिसॅ जुनि केओ मुह मोड़ू । जखनहि कतहु पाइ -पोस्ट भेटय , पहिलुका पार्टीक जड़िके कोड़ू ।। संविधानक मूल भावना संग, सतत खेल खेलाइत रहू । प्रजातंत्रके कनगुरिया आॅगुरपर , टिकलीजकाॅ नचैल करू।। जतिआरे -धार्मिक उन्माद लोकमे, सतत सूइ भोंकि जगैल करी । भेंड़ा -महिसिक कानि समाजमे, जालजकाॅ पसारि चली ।। कुरसीक खातिर मन्दिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्चक दोहाइ दिअ । दिग भ्रमित करू अहिना सबके, मुट्ठीमे सभहक टीक लिअ ।। गाॅधीक नाम सभ बेचि-बेचि क' , स्वर्गहुमे हुनका अशान्त करू। करैत रहू उनटा काज सभ अहिना , गगनचुंबी मूर्तिक निर्माण करू।। नाकसॅ उपर पानि गेल छै , धक्का आब मारैटा पड़तै । प्रजातंत्रक चीरहरण कहियाधरि हेतै, कौरवक अन्त होएबे टा करतै ।। अपनहि घरक किछु दुर्योधन सभ , भारतके गुलाम बनाय रहल छथि। आजादीक गुलामीक विरोधाभासमे, 'विष्णु 'नग्न सत्य उगलि रहल छथि।। कुकुरके कारासॅ मतलब , नांगरि डोलाय कारा खयलक । दोसर ठाम देखितहि खाद्य वस्तु, ओतुका बाट पुन:फेर धयलक ।। डा जियाउर रहमान जाफरी, हाई स्कूल माफ़ी +2, वाया -अस्थावां, जिला -नालंदा 803107, बिहार आजाद गजल जीवन मे अछि प्यार जरूरी ई ते अछि हर बार जरूरी घर हमर खतिहान मे हुनकर अब ते अछि दीवार जरूरी मिथिला के ई पहिचान अछि हर गप्प मे व्यवहार जरूरी हर नारीक रक्षा के खातिर रावण के संहार जरूरी सत्य के रक्षा करवाक खातिर झूठक छै इंकार जरूरी सत्ता भोगक वस्तु नहि अछि सब जन के उपकार जरूरी हर पल मे ई बदलैत दुनिया भिनसरि मे अखबार जरूरी जिनगी सहज सरल नहि थिक ते नहि ऐसन सरकार जरूरी आजाद ग़ज़ल आँखि मे हमर नोर रहल देश मे लम्पट चोर रहल नोन, तेल आ कपड़ा लत्ता जिनगी भर ई जोर रहल समय किछु नहि आबि सकल बिजुरी संग इंजोर रहल सोचैत रहेत छी अबहू हम आँखि मे किएक भोर रहल कतइ विकासक बात चलत दिल्ली दोसर छोर रहल अहाँ त किछु नहि कहलहूँ मुदा ई कोना शोर रहल हम ते ग़ज़ल सुनैत रहलहुँ अहाँ क की गठजोर रहल प्रदीप पुष्प दीयाबातीपर रुबाइ आह होइ हियमे आनक करुण पुकार लेल जीवन बितै अहाँक सदति पर-उपकार लेल घर-आँगनक इजोत किछु कम्मो चलतै मुदा एकटा प्रदीप हो मनकेर अन्हार लेल रुबाइ कर्म -घटल लोक निज हाथक लकीर दूसैए छैक युगक दोष तें प्यादा वजीर दूसैए जे क' सकल ओरियानो नै कनेक अदहनके' खिच्चड़ि सन लोक से ओ आइ खीर दूसैए ( २११२ २१२२ २१२१ २२२) रुबाइ जिनगी मोटका चाउर भेल जा रहल बिन ब्याहेक चिलकाउर भेल जा रहल ओ नै संग छोड़त कहियो भरोस छल सपना सोन सन ई छाउर भेल जा रहल ( 22212 2221212) रुबाइ ई पेंच आ प्रपंच-व्यापारसँ कोन मतलब हमरा नै स्नेह,नै दुलार, उपहारसँ कोन मतलब हमरा जै ठाम आइयो ख'गल लोक कनैत हो सिदहा ले तै देशमे फिजूल जयबारसँ कोन मतलब हमरा (2212 1212 2112 12222) रुबाइ तिला-संक्रांतिक शुभकामना सहित..... "जा बोली छै, तोरा माँ कहबे करबौ हम, तोरा ले' सदिखन नेन्ना रहबे करबौ हम, बरु छी परदेशे, मारल हम सत्ते पेटक, तैयो तिल- चाउर तोहर बहबे करबौ हम," गजल उघरल खाट छी उसरल हाट छी क्यो ने जाय छै बिसरल बाट छी खुट्टा ठाढ छै भसकल टाट छी भुखले भोजमे अंतिम लाट छी सगरो मैल हम पोखरि घाट छी (२२२१२ सब पाँतिमे।) गजल नव सूर्य नव बिहान धरि चल मीत छौ दम त' आसमान धरि चल मीत पी नोर ई घटोसि ले तूँ दुःख हिम्मत बढ़ा निदान धरि चल मीत जिनगी बसै कतेक कष्टक बीच कसि डाँढ़ तूँ बलान धरि चल मीत जै ठाम भोज होइ टिकुलाकेर गाछीक तै मचान धरि चल मीत लिलसा जँ छौ विकास मिथिलाकेर पिछड़ल ख'गल दलान धरि चल मीत (2212 1212 221 सब पांतिमे) गजल स्वप्नक सिंदूरी आकाशमे हम छियौ कि नै कोनो बिसरल गीतक भासमे हम छियौ कि नै हम छी बरु बनिजारा डीह नै छै हमर मुदा तोहर अतमाके रनिबासमे हम छियौ कि नै जीवन कतबो रौदीमे बितै आ कि शीतमे ओ मुस्की सानल मधुमासमे हम छियौ कि नै छै सच नै छी तोहर आब हम वर्तमानमे बस ई कहि दे इतिहासमे हम छियौ कि नै बूझल अछि बिसरल छें नाम 'पुष्प'के मुदा तोहर असगरुआ अखियासमे हम छियौ कि नै (22 222 221 22 12 12 सब पांतिमे) बिनय भूषण कोरोना-अवकाश ई एक्कैस दिनक घरबन्दी ओकरा लेल घरबन्दी नञि छियैक ई एक्कैस दिनक घरबन्दी ओकरा लेल अवकाश छियैक, अवकाश जखन ओ सुनैत अछि जे एक्कैस दिन अपने घरमे रहबाक आबि गेल अछि आदेश जखन ओ सुनैत अछि जे एक्कैस दिनक लेल ओकर मालिक दऽ देतैक ओकरा छुट्टी जखन ओ सुनैत अछि जे एक्कैस दिनक लेल ओकरा करबाक अछि आराम तखन ओकर हृदयक आकाशमे उमरि अबैत अछि प्रसन्नताक बादरि ओकर मोनक जमीनपर सोहनगर पाँखि पसारि नाचय लगैत अछि मनमोहक मयूर । ओकर काया सदिखन लगौने रहैत छल अवकाशक आस ओकरा कहाँ कहियो भेटैत छलैक छुट्टी ओ कहाँ कहियो सुति पबैत छल भरि निन्न ओ तँ ओंघाइते उठैत छल भोरमे ओंघाइते चलि जाइत छल काजपर ओंघाइते करैत छल काज काजमे भऽ जाइत छल मग्न लगैत छलैक जेना दस - दस हाथीक बल छलैक ओकरा बिसरि जाइत छल भूख - पियास । बड्ड जतनसँ ओ लाल टुह-टुह भारी आ गरम लौहक सिल्ली ओकर देह नहायल रहैत छलैक घामक टघारसँ ओकर नाकसँ टकराइत रहैत छलैक सदिखन लोहाइन गंध एहि गंध मध्य ओ लैत छल गँहीर साँस हफसि जाइत छल ओ इएह हफसी आ साँस ओकरा लेल छलैक अनुलोम - विलोम इएह हफसी आ साँस ओकरा लेल छलैक ऊर्जाक अजस्र - स्रोत साँझकेँ मालिक दैत छलैक किछु कैंचा इएह कैंचा ओकरा लेल छलैक अकुत धन - सम्पत्ति साँझकेँ एहि कैंचाकेँ बदलि लै छल रोटीमे मिझाए लैत छल पेटक आगि थकानक नशामे मदमस्त सुति रहैत छल निसभेर । आइ भोरे - भोर जागि गेल अछि अपन बिछाओनपर ओकर आँखिक आगू देखाए रहल छैक प्रसन्नताक महासमुद्र ओ सोचैत अछि आइये साँझ ट्रेन पकड़ि चलि जायत गाम ओ सोचैत अछि एतेक नमहर छुट्टी ओकरा कहाँ भेटैत छलैक कहियो ओकर हृदयमे घुमरय लगैत छैक सोनहौला सपनाक बादरि । ओ सोचय लगैत अछि एहि छुट्टीमे बहुत बेशी दिन ओ रहत अपन पत्नी आ बाल - बच्चाक संग ओ सोचय लगैत अछि एहि छुट्टीमे अपन माँ - पिताक करत सेवा - सुश्रुसा खूब फैलसँ ओ सोचय लगैत अछि घरक बनल अमृत सन भोजनसँ तृप्त होयत हमर मोन अपन बाड़ीक रामतोरइ आ झिंगुली ओ सोचय लगैत अछि तुलसीचौड़ाक बगलमे रोपल मिरचाइक गाछसँ तोड़ि आनत हरियर कुच - कुच मिरचाइ ओ सोचय लगैत अछि टाटपर लतरल खीड़ाक लत्तीसँ खयबाक लेल तोड़ि आनत खिज्जा खीड़ा ओ सोचय लगैत अछि काटि आनत हँसुआसँ चार पर लतरल लत्ती मे लागल कदीमा आ सजमनि ओ सोचय लगैत अछि ओहि ठाम रहतैक घरे के चाउर , घरे के दालि कतेक मजा लगतैक गाममे । एहि घरबन्दीकेँ ओ बूझैत छैक अवकाश अवकाश - गाम जयबाक अवकाश अवकाश - अपन माटिक दर्शनक अवकाश अवकाश - भगवानसँ भेंट करबाक अवकाश हँ ! हँ ! भगवानक दर्शनक अवकाश सत्ते ओकर माँ - पिता ओकरा लेल भगवान छियैक - भगवान अवकाश - प्रेमक इजहार करबाक अवकाश अवकाश - पत्नीक मूँह देखबाक अवकाश अवकाश - अपन बाल - बच्चाक गाल चुमबाक अवकाश अवकाश - गाममे शान्तिसँ रहबाक अवकाश अवकाश - मित्रगणक बीच गप लड़ेबाक अवकाश चौक - चौवटियापर सुख - दुख बतियेबाक अवकाश अवकाश - अपन गाछीमे बैसि आम ओगरबाक अवकाश अवकाश - मशीनी जीवनसँ मुक्तिक अवकाश अवकाश - प्रेम आ आपकताकेँ महसूस करबाक अवकाश अवकाश - प्रकृतिक साक्षात्कारक अवकाश अवकाश - बाल - बच्चाकेँ वात्सल्यक दर्शन करेबाक अवकाश अवकाश - बूढ़ - बुजुर्गसँ स्नेह पयबाक अवकाश ओ अत्यंत उत्साहित भए गाममे अवकाश बितेबाक बनबए लगैत अछि योजना । ओ सोचए लगैत अछि एहि अवकाशमे ओकर कोदारि चीरतैक पिरथीक वक्ष अपन पिरथीक माटिसँ बहराइत जीवन- गंधसँ ओकर मोनमे होयतैक आह्लादक संचार माय धरतीक आशीर्वचनसँ अलोपित भए जेतैक ओकर आत्माक पियास ओ निहारत अपन खेतकेँ अन्नमन्न ओहिना जेना कोनो मंदिर व मंदिर - परिसरकेँ निहारैत अछि तीर्थयात्री । खेतमे ओलरल खेसारी आ मौसरीक लत्ती देखि ओकर आँखिमे आबि जेतैक हरियरी ओकर आँखिक आगू चमकैत रहतैक सोनाक छड़ीक चमकैत पीयर रंग ओकर शीर्षपर नन्हकी सोनक झूनझूना सन झूलैत चमकैत गँहुमक शीश ओ निहारत मोनभरि मक्कैक गाछ तरुआरि सन पातकेँ देखैत ओकर देहमे हजार - हजार हाथीक ताकत ओकर पाँजरमे खोंसल हरियर बालि एहि बालिक भीतर नुकायल जीवन - रस बालिक शीर्षपर हिलैत उज्जर आ बादामी रंगक मोछु मोछुसँ बहराइत जीवन - गंध । ओ सोचए लगैत अछि भोरे - भोर जायत अपन गाछी गाछीमे गमकैत रहतैक मज्जरक सुगंध महुआक गाछसँ तुवैत रहतैक गमगमौवा उज्जर फूल ओकर कानसँ टकरेतैक कोयलीक कूक सत्ते ओ प्रसन्न अछि अवकाशक संवादसँ अवकाश - एक्कैस दिनक अवकाश मोटरी - चोटरी बान्हि ओ करए लगैत अछि साँझक इन्तिज़ार असंख्य सपनाक पोटरीकेँ अपन हृदयमे नुकौने टीसन दिस बढ़ाए लैत अछि अपन डेग । ठौरक जोगारमे घरमूँहा मजूर ओकरा नीक जँका बूझल अछि परदेसी होयबाक पीड़ा ओ जानैत अछि नीक जँका जरैत पेटक दर्द ओकरा नीक जँका पता अछि जरैत पेट कोना कऽ लोककेँ ठेलिया दैत अछि गामसँ दूर दूर - बहुत दूर बहुत - बहुत - बहुत दूर करजा चुकेबाक लेल वा परिवारक सौख पुरेबाक लेल ओ बहरा जाइत अछि दोसर ठाम । अपन प्रियगर गामकेँ छोड़ि ओहिना नञि पराइत अछि ओ परदेस परदेसमे ओ देखऽ लगैत अछि अपन विकास परदेसमे गुनऽ लगैत अछि ओ अपन खून आ पसेनाक दाम परदेसमे ओकर हृदयमे जन्मऽ लगैत अछि बड़का लोक बनबाक स्वप्न ओ सुतैत अछि फूटपाथपर ओ काटैत अछि राति वायुबिहीन बन्न गोदाममे फैक्ट्रीक फर्शपर सुतैत अछि गाढ़ निन्नमे निन्न जरूरी अछि रोटिये जँका अगिला दिन जतनसँ खटबाक लेल मालिककेँ प्रसन्न करबाक लेल । आइ घरेमे रहबाक भऽ गेल अछि घोषणा ओकरा रहबाक लेल कहाँ अछि अपन घर ओ कतय सुतत साँझकेँ हाथक आंगुरक गफामे दिनुका श्रमक अरजल टाकासँ अबैत छलैक दुइ - चारि क' र नून - रोटी ओ राति - दिन देखैत छल सपना जे ओकरो थारीमे अयतैक भात - दालि - तरकारी घी लगाओल रोटी कि पूड़ी - मिठाई ओ अपन कायामे शक्ति जोगेबाक लेल अगिला दिन काज करबाक लेल अपन देह आ दिमागकेँ दुरुस्त रखबाक लेल ओ पिबैत छल सतुआक शर्बत अमृत जँका ओ सपनाइत छल असंख्य सपना भोटक समय ओकर आँखिक आगू सपनाक हरियर खेत ओ अपन माँ - पिताकेँ लिखैत छल पत्र जे देशमे आबि गेल अछि नीमन दिन । ओ फोनपर कहैत छल अपन पत्नीकेँ बदलि रहल अछि देशक दिन बदलि जेतैक ओकरो दिन ओ पठाओत टाका ढ़ेरीक ढ़ेरी बड़के लोक जँका ओ अपन माँ - पिताकेँ पाँकेट - खर्चक लेल पठाओत टाका अलगसँ बाबूकेँ खैनीक लेल नञि करऽ पड़तैक मुंहतक्की माँक बीड़ीक लेल ओ अलगसँ पठाओत टाका पत्नीक लेल ओ जरूरे कीनत निकहा सुंदर साड़ी साड़ी - लाज झँपबाक लेल साड़ी साड़ी - अन्नमन्न ओहने साड़ी जेहन पहिरैत छैक बड़की गिरहतनी ओ जरूरे कीनत अपन बेटा - बेटीक लेल सुंदर - सुंदर अंगा - पेंट आ सलवार - सुट बड़के लोकक धिया - पुता जँका ओकरो बेटा - बेटी लगतैक सुंदर अति सुंदर आब ओकर बेटा - बेटी नञि पढ़तैक खिचड़ी - स्कूलमे आब ओकरो बेटा - बेटी पढ़तैक काँन्वेंटमे आब ओकरो बेटा - बेटीक देह पर साजल रहतैक टायवला ड्रेस ओकरो बेटा - बेटीक पएरमे पहिड़ल रहतैक चमचमाइत जूत्ता - मौजा ओ सपनाइत छल सपना सपना - समय बदलबाक सपना सपना - दिन घूरि अयबाक सपना सत्ते आबि रहल अछि नीमन दिन देशमे सत्ते ओकरो आबि जयतैक नीमन दिन । अचक्के आइ ओकर समस्त सपनाक अट्टालिका भऽ रहल अछि शीशाक महल जँका चूर - चूर - चकनाचूर आइ आबि गेल अछि सरकारक फरमान घरबन्दीक भऽ गेल अछि घोषणा मृत्यु- दूत कोरोना ओकर कायाक चारू कात भिनभिनाइत मँडरा रहल अछि मधुमाछी जँका काज - धाज भऽ गेल अछि थप्प ओकर जेबीमे नञि अछि एक्को टाका फूटपाथपर बरसैत छैक पुलिसक डंटा फैक्टरी आ गोदामक गेटपर लागि गेल अछि ताला ओ कोनो ठौरक जोगारमे औनाइत अछि महानगरक बाटपर महानगरक बाटपर पसरल अछि पुलिसक रौब आ तामस पुलिसक बेंतसँ लोहछि जाइत छैक ओकर काया नील - डाउन आ उठा - बैसक के अपमानजनक दंड फाटऽ लगैत अछि ओकर छाती । ठौरक जोगारमे ओ दाँत निपोरि निहोरा करैत अछि अपन मालिककेँ मालिक कहैत छथि साफ - साफ आब बन्न भऽ गेल अछि काज - धंधा तोहर जरुरत कहाँ अछि हमरा की तोरा इ नञि बूझल छौ घरबन्दीमे बन्न भऽ जाइत छैक काज सम्पूर्ण दुनियामे घूमि रहल छथि यमराज शायद हवामे सेहो मिझरायल अछि कोरोना - दानव की तोरा नञि बूझल छौ घरमे बन्न रहबाक आबि गेल अछि फरमान । कोनो आश्वासनक खोजमे ओ ताकैत रहैत अछि मालिकक मुंह मालिक भऽ जाइत अछि निश्तब्ध अपन दिमागक तार पर दैत अछि दबाव मालिक ताकैत अछि गंहीर नजरिसँ ओकर देहपर लटकल मैल - कूटकूट फाटल अंगा दिस मालिकक नाकसँ टकराइत अछि ओकर देहसँ बहराइत पसेनाक गंध मालिकक आँखि टिकि जाइत अछि ओकर कारी - खूटखूट क्षीण - हीन काया पर मालिक देखैत अछि ओकर ठोरक भीतरक निपोरल दाँत ई समस्त दृश्य मालिकक हृदयमे भरि दैत अछि घृणाक जहर ओ ताकैत रहैत अछि मालिकक मुंह मालिकक नजरि चलि जाइत अछि अचक्के मजुरक बिदकल मुंह दिस आँखिसँ बहैत नोरक धार दिस किछु नहि बाजैत अछि मालिक घूमाऽ लैत अछि अपन नजरि लगाऽ लैत अछि अपन ग्रिलक ताला । मजूरक आँखिक आगू देखाइत अछि अन्हारे - अन्हार अन्हार - डेराओन अन्हार अन्हार - कोरोनाक अन्हार अन्हार - भूख - प्यासक अन्हार अन्हार - मृत्युक अन्हार ओ जानैत अछि नीक जँका अवश्यंभावी अछि ओकर मृत्यु कोरोनासँ मृत्यु - भूखसँ मृत्यु मृत्युक लेल सहर्ष तैयार अछि ओ ओकर आँखिक आगू पसरि जाइत अछि घरबन्दीक अदंकक घनगर कुहेस बाटपर ठाढ़ पुलिसकेँ देखिद पानि - पानि भऽ जाइत अछि ओकर काया निराशाक घोर अन्हरियामे औनाइत अपन माटिपर प्राण त्याग करबाक सेहन्तामे राजधानीक राजपथकेँ करैत अछि प्रणाम अपन जनपदमे पहुँचि जयबाक अदम्य आकांक्षाक संग जनपथपर बढ़ाऽ दैत अछि अपन डेग । ओ प्रसन्न अछि अपन यात्रासँ ओकरा लेल इ गृहयात्रा सामान्य यात्रा नहि छियैक ओकरा लेल इ गृहयात्रा जीवनक महायात्रा छियैक ओ प्रसन्न अछि एहि लेल जे मृत्युसँ पूर्व ओ पहुँचि जायत अप्पन गाम मृत्युसँ पूर्व अपन आँखिसँ भरि पोख देखि लेत अपन माँ - पिताक काया मृत्युसँ पूर्व ओ पावि लेत परिजन - पुरजनसँ स्नेह आ आशीर्वाद मृत्युसँ पूर्व ओ अपन पत्नी - बेटा - बेटी आ भाइ - बहिनकेँ दऽ सकत बोल - भरोस अचक्के ओकर माथ घूमऽ लगैत अछि घिरनी जँका ओ अपन तरबाकेँ अजमाबैत अछि जनपथ पर अपन देहक ताकतकेँ तौलैत अछि जनपथक महायात्राक लेल । थाकि गेल अछि ओकर पएर दुखाए रहल अछि ओकर गत्रक पोर - पोर प्रत्येक पग - पगपर ओकर आँखिक आगू देखाइत अछि अन्हारे - अन्हार ओकर मुंहमे आबैत अछि हाफीक हवा ओ ढ़ेकरैत अछि सूखल ढ़कार मुंहमे आबैत पितौंट पानिकेँ चाटैत अछि ओकर जीह अक्कत तीत स्वाद पावि घोंकचि जाइत अछि ओकर चेहराक झमान भेल चाम लड़खड़ाइत अछि - लटपटाइत अछि नाकमे रूमाल बान्हने घरमुंहा सहयात्री सम्हारैत अछि - उठाबैत अछि बढ़ौनय जा रहल अछि अपन डेग कोरोनाक अदंक पैसल रहैत अछि हृदयमे ठौरक लेल - घरबन्दी पालन लेल अपने - आप बढ़ल जा रहल अछि ओकर डेग महाप्रलयमे मृत्युसँ साक्षात्कार कोरोना महामारीक डेराओन तांडवक मध्य वैश्वीकरणक एक - एक परमाणु छिड़िया रहल अछि ग्लोबक कण - कणमे वसुधैव कुटुंबकम सन सुंदर आ शक्तिशाली मंत्रक महाशक्तिक भऽ रहल अछि क्षरण क्षण - क्षण । हमर आँखिक आगू सदिखन नाचैत रहैत अछि महाप्रलयक महातांडवक दृश्य प्रदीप्त तेजक संग दमकैत सुरूजक मध्य हमर आँखिक आगू सदिखन देखाइत रहैत अछि मृत्युक घोर अमावस्याक डेराओन चित्र । अपन घरक सीमामे बान्हल हमर कल्पनाक श्वेत कपोतक कंठ गुँटरूं - गुंक मधुर स्वरक लेल कछमछाऽ रहल अछि कसायक परिकठ पर चमचमाइत धरगर छूरीसँ रेतल मुर्गीक कंठ जँका । हमर कल्पनाक श्वेत कपोतक स्वच्छंद उज्जर धपयधप पाँखि फरफराऽ रहल अछि मुर्गीक फरफराइत ललिछौह पाँखि जँका । हमर कल्पनाक श्वेत कपोत अपन आँखिक दूनू कोरमे अपन पीड़ाक समस्त नोरकेँ रक्त बनौनय जिजीविषाक अस्तित्व रक्षाक लेल मृत्युक प्रतीक्षा करैत लड़ैत रहैत अछि कोरोनाक क्रुरतम प्रहारसँ । भोरे - भोर नहि सुनाइत अछि कौआक काँव - काँवक सगुन - स्वर नहिये सुनाइत अछि फुद्दी आ मैनाक कलरव आब कहाँ टकराइत अछि हमर कानसँ कोयलीक कूकक मधुर स्वर भोरे - भोर । आब कहाँ भोरे - भोर पपीहाक पि - कहाँ पि - कहाँ आब कहाँ देखाइत अछि खिड़कीसँ कोनो बाबूक पोटरीमे चाउर - गहुम - चना कहाँ छिड़िआबैत छथि कोनो बाबू दाना - ताना मैदानमे कहाँ आबैत अछि परवाक हेंज लुबलुब दाना लपकऽ लेल । उदास बैसल अछि परवा बहुमंजिला छत पर फुदकैत नञि अछि फुद्दी मैदानमे मैदानक कातमे अनमनायल बैसल अछि मैना निराश बैसल अछि कौआ उदास गाछ पर नुकायल पपीहा आ कोयली डेरायल आँखियें देखि रहल अछि महामारीक महाप्रलयक दृश्य । कुकुरक लेल कहाँ किओ आनि रहल छथि बासि सोहारी पावरोटी - बिस्कुट कठघरा लग कुकुर करैत अछि लोकक इन्तिज़ार डोलबैत अछि नांगरि मुदा निराश अनमनायल भूखल - सिहायल कुकुर लुद दऽ बैसि जाइत अछि बाटक कातमे । कचराक ढ़ेर पर कहाँ होइत अछि सुग्गर आ कुकुरक हुलदौर कहाँ देखाइत अछि सुग्गर शावक के मोहक रुप कहाँ कत्तौ कोनो कुतिया आकि मादा सुग्गरक थनमे लटकल देखाइत अछि सुग्गर - शावक आकि पिल्ला - पिल्ली । गायक लेल कहाँ कोनो बाबू आनि रहल छथि रोटी - तरकारी कि पुड़ी - बुनिया माछक लेल पोखरिमे कहाँ केओ फेंकि रहल छथि चिक्कस - रोटी - गुड़ । सुन्न भऽ गेल अछि वाट - चौवाट आ चौखरी कानि रहल अछि माछ - पानि - पोखरि - महार उदास ठाढ़ अछि गाछ समयक विकराल दृश्य देखि अदंकसँ सिहायल चिड़ै अपन खोंतामे बैसि तकैत अछि अकास दिस । ग्लोबल दुनियाक भाड़ाक ग्लोबल निवासमे हमर आँखिक आगू देखाइत अछि ठाढ़ हमर मृत्यु - दूत हमर हृदयक खोंतामे बैसल कल्पनाक श्वेत - कपोत अचक्के देखऽ लगैत अछि नोरसँ डबडबायल हमर आँखि पीबऽ लगैत अछि कपोत हमर आँखिसँ बहैत समस्त नोर नागफेनीक काँट सन ठाढ़ हमर रोइयांकेँ सहलावऽ लगैत अछि अपन चांगुरसँ हमर फाटल करेजकेँ सीवऽ लगैत अछि अपन लोलसँ कल्पनाक श्वेत - कपोत हमर ठोरकेँ भींजा दैत अछि प्रसन्नताक मधु - अमृतसँ हमर गाल पर खिंचा जाइत अछि मुस्कानक गंहीर डिडीर । हमर नजरि चलि जाइत अछि पत्नी दिस हमर कानसँ टकराइत अछि पत्नीक मुंहसँ बहराइत ठहक्का बेटा - बेटीक संग प्रसन्न मुद्रामे बतिआइत हमर पत्नी संचार माध्यमक प्रशंसाक पुल बान्हैत अतीतक महामारीक चर्च करैत हमर बेटा - बेटी टी ० वी ० पर देखाइत कोरोना अपडेटसँ अवगत होइत हमर परिवार बच्चा आ बुढ़केँ सभसँ बेशी सावधान करैत टी० वी० चैनल । अचक्के हमर आँखिक आगू नाचऽ लगैत अछि गाममे एसगर रहैत वृद्ध माँ - पिताक काया हम गाममे लगबऽ लगै छी फोन फोन अबैत अछि पहुँचक सीमासँ बाहर कछमछाबऽ लगैत अछि मोन मेटाऽ जाइत अछि हमर गाल पर खिंचायल मुस्कानक डिडीर । आँखिक आगू नाचऽ लगैत अछि दरिभंगामे रहैत एसगर बहिन हरिद्वारमे रहैत एसगर नूनू दाइ समस्तीपुरमे बड़की नूनू कलकत्तेमे हमरासँ दूर रहैत हमर छोट भाय - भतीजा सिहरऽ लगैत अछि हमर देह । हमर धिया - पुता आ पत्नी टी ० वी ० पर देखैत अछि कोरोना - अपडेट हमरा मिसियो भरि नहि सोहाइत अछि कोरोना - अपडेट हम अपन मित्र आ परिजन - पुरजनसँ फोन पर गप करबाक करैत रहैत छी असफल प्रयास अचक्के हमर कानसँ टकराइत अछि समवेत स्वर समुचा दुनिया मुट्ठीमे । हम डेरायल - सिहायल ताकऽ लगै छी अपन हृदयक खोंतामे नुकायल श्वेत कपोतकेँ निपत्ता भऽ गेल अछि श्वेत - कपोत अपन दरबज्जाक सीमाक भीतर कछमछाइत हमर मोन औनाबऽ लगैत अछि गाम जयबाक लेल । माँ - पिताक खोज - खबरि लेबाक लेल भाइ - बहिनसँ भेंट करबाक लेल मित्र आ परिजन - पुरजनकेँ देखबाक लेल बैचैन होमऽ लगैत अछि मोन पुन: हमर आँखिक आगू देखाइत अछि ठाढ़ असंख्य मृत्यु - दूत निपत्ता अछि हमर हृदयक खोंतामे बैसल हमर कल्प - कपोत । हमर आँखिक आगू देखाइत अछि वैश्वीकरणक क्षत - विक्षत काया ग्लोबक कण - कणमे छिड़िआयल कनैत वैश्वीकरणक परमाणु झनझनाबऽ लगैत अछि हमर मस्तिष्कक तार लोककेँ लोकसँ विच्छिन्न करैत कोरोनाक कहर हमर कानमे बेरि - बेरि गुंजैत रहैत अछि समुचा दुनिया मुट्ठीमे । आनन्द कुमार झा, मेंहथ, झंझारपुर – 847404 प्रतिमुख अहाॅकेॅ हम नहि नीक लगैत हएब तेॅ हमर गीत नहि नीक लगैत हएत तेॅ हमर कविता नहि नीक लगैत हएत तेॅ हमर कथा सेहो नहि नीक लागल हएत तेॅ हमर नाटक सेहो नहि नीक लागल रहएह तेॅ हमर चिन्तन कहिओ नहि सोहाएल आहाकेॅ नहि नीक लागल ताहिसॅ कि हम लिखिते चलि जएब आहाॅ बाॅचल रहब जखन हम नहि रहब प्रतिमुख भेल ठार हमही नीक लागब हमरे नीक लागत कएल सभटा काज किएक तॅ हम लिखैत छी अपन समाजक लेल अपन देशक लेल अपन विश्वक लेल अपना लेल किछु नहि अपना लेल कहिओ नहि एकटा नव कहानी गढबाक अछि एकटा नव कहानी गढबाक अछि सुरूज दिस डेग बढेबाक अछि नित्य निरन्तर नव खोजसॅ अपन प्रतिभा अपन सोचसॅ जगकेॅ अचम्भित करबाक अछि एकटा नव कहानी गढबाक अछि सुरूज दिस डेग बढेबाक अछि विघ्न - बाधासॅ भयमुक्त भएकेॅ ओस - धोन्हिक सूक्ष्म जलकणसॅ ओसाओन सन पवित्र भएकेॅ आॅगा सत्यभुवन दिस निकलबाक अछि एकटा नव कहानी गढबाक अछि सुरूज दिस डेग बढेबाक अछि सप्तॠषिक चरणकेॅ छूकेॅ नौओ ग्रहक नौ धुरि - रंगधूसर लएकेॅ नव रंगोली सजेबाक अछि एकटा नव कहानी गढबाक अछि सुरूज दिस डेग बढेबाक अछि सी•वी• रमणक काजक आॅगा अब्दुल कलामक खोजक आॅगा कल्पनाक उड़ानक आॅगा हमरा लोकनिकेॅ उड़बाक अछि एकटा नव कहानी गढबाक अछि सुरूज दिस डेग बढेबाक अछि दुर्दशावस्था चित्रसॅ मिलबैत आसमानी आसमानकेॅ जखन देखैत देखै छी वर्तमान पीढीकेॅ तॅ चिन्तित हएब स्वभाविक प्रक्रिया थिक आसमानी आकाशक बढि रहलै अछि दिनानुदिन दुर्दिन दुर्दशा चहुॅओरसॅ घेरने जा रहलै अछि ओकरा प्रलयकारी निहारिका जे धुल धुआॅक साम्राज्य थिक सम्पूर्ण आकाशकेॅ छेकने जा रहल अछि ओकर प्रकाशपुंजकेॅ प्रकोपित केने जा रहल भूमण्डलीय आभा-मण्डल छहोछित भेल ओकर बिलएल जा रहल अछि विकार रहित हवा प्रकाश पानि परिवर्तित भेल जा रहल अछि आकाशीय नीलिमा ठीक ओहिना जेना नीलिका मुद्रणकेॅ करिआ मुद्रणक पट्टीसॅ झाॅपल जा रहल हो कि आब नहि देखि सकब निर्मल नील आकाश जे प्रेमक प्रतीक रंग थिक ! मात्सर्य जहिया पहिल बेर ओ पकड़ने रहै हरक लागनि करै लागल रहै हरबाहि जोतए लागल रहै खेत नहि फाड़ल भेल रहै सोझ सरदर सिराउर दू दालि जॅका फोड़ि देने रहै बड़दक पीठ आबै काल लगा देने रहै बड़दकेॅ फाड़ बाबा देखिते छिनि उसाहि देने रहथिन पेना आ कहि देने रहथिन सीखगे कोनो आन इलिम नहि बनै जोग छेॅ हड़बाह मुक्तिक तरास मुक्तिक तरास ओकरा बना रहलै अछि सक्कत देखाए रहलै अछि बाट करा रहलै अछि यात्रा ओकरा के रोकत ओकरा के टोकत ओकरा के बौसत आब ओ भए गेलै अछि सर्वतंत्र स्वतंत्र सब किछुक अधिकारणी किएक तॅ ओ नहि बनलि रहल कठपुतली आनहि सभ जॅका कठजीव ओ नहि करैत रहल असहाय होएक अलाप आकि बिलाप || रमन कुमार झा नेनपन ममता केऽ आंचर हमर बिछौना ओरहय छी मेऽ तोहर सिनेह, हमरा नेऽ चाही मेऽ तोसक तकिया लेरहेबउ मइटे में देह, कतबो तमसेबही मइया सुइन-सुइन कऽ अगरेबउ माय, जाइन-बुइझ ओंघरेबउ मइया कोरा कांख लही लगाय, इमहर उमहर भगबउ मईया तोरा देख परेबउ माय, कोने-कोन नुकेबउ मइया रहि-रहि हुलकी मारबउ माय, झात-झात खेलेबउ मइया किलकारी मारबउ माय, खिखिया कऽ हँसबउ मइया पेंर हाथ पटकबउ माय, थाल खिच लेरहेबउ मइया सगरो देह लेबउ भिजाय, छपछप-छपछप करबउ मइया आँचर में जेबउ लेपटाय, ठेहुनिया हम देबउ मइया घुसकुनिया कटबउ माय, छोइर जऽ तू गेलेऽ मेऽ गय, जोड़-जोड़ डिरियेबउ माय, आंगुर पकैड़ कऽ चलबउ मैय्या दियमाने फटबउ माय, रुइक-रुइक डेग उठेबउ माइया खसबौ परबौ गुरकबउ माय, दु डेग चललियौ नय कि असगर छोइड़ गेलेऽ पराय, भवसागर मे छोइड़ कऽ हमरा माया मोह देलेऽ ओझराय, उलझन सब सुलझबिहेऽ मईया आसरित हम छियउ माय, असमंजस में आईब कऽ मईया रमन केऽ राह दिहेऽ दिखाय , करम कुटय छी ढेंकी मे नऽ नेना कोनाऽ रहैयेऽ माय अपने अईब कऽ देखियौ आय, कतउ निक नेऽ लागेऽ अहाँ विन अय नगरी में , करम कुटय छी ढेंकी में नऽ।। ठारहे पएर चलाबी माय बाट गेलउ हराय , अहुँ बिसैर बैसल छी जीवन केऽ अय करकी मे, करम कुटय छी ढेंकी में नऽ। खाली पएर उठाबी माय एक डेग चललो ने जाय, एकई ठाम कुदय छी सब दिन अय भुरकी में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। भेटेंऽ किछ नय हमरा माय खाईध देलियई और धसाय, मईट उखरल जाईये चारू कात ठेकरी में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। संग्गी साथी सब उसकाय अप्पन हाथ बचाबे दाय, बेगतरे हाथ चलाबेऽ डईर डईर कऽ उख्खैर में, करम कुटय छी ढेंकी में नऽ। ढक-ढक करय छी हम माय अही करियौ कोनोऽ उपाय, कत्ता दिन कुदेबय कनियेऽ टा केऽ जिगगी मे, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ।। करमेऽ खुब कुटऽलियई माय सब दिन मुसरा के पिजाय, तईयो पेएर कऽ रखलउ उत्थर भेल उख्खैर में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। जंघहा उखरल जाईये माय हम्मर जांघो कनकनाय, कतेक करम कुटेमें किस्मत केऽ अय खेती में, करम कुटय छी ढेंकी में नाऽ। रमन कोनाऽ रहैयेऽ माय अपने अईब कऽ देखियौ आय, कतउ निक नेऽ लागेऽ अहाँ विन अय नगरी में , करम कुटय छी ढेंकी में नऽ। केबार (पराती) मइया उठियौ यइ जग जननी खुजलैइन भैरव के केबार, खुजलैइन भैरव के केबार हम सब सोझा में छी ठार, मइया उठियौ यइ जग जननी खुजलैइन भैरव के केबार।। ककरो हाथ कमंडल मइया ककरो हाथ में हार, हिलमिल सब करय छी मइया आही केऽ जयकार, मइया उठियौ यइ जग जननी खुजलैइन भैरव के केबार।। भोरहरवे सऽ बैसल छी मेऽ अही केऽ दरबार, दरशन दियउ काली मइया सुनियौ हमर पुकार, मइया उठियौ यइ जग जननी खुजलैइन भैरव के केबार।। दीनानाथ उगलखिन मइया मिटलय जग अनहार, अहुँ अपन पट खोलियौ मइया अहुँ अपन पट खोलियौ मइया विनती करू स्वीकार, मइया उठियौ यइ जग जननी खुजलैइन भैरव के केबार।। मनोकामना पुरा करियौ बैसल छी बैसार, रमन पराती गबैयेऽ मेऽ सब पराती गबैयेऽ मेऽ खोलियौ अपन केबार, मइया उठियौ यइ जग जननी खुजलैइन भैरव के केबार।। कहिया एबय हमरा आंगन कहितउ तऽ रहितउ यइ, नय तऽ हम जाय छी मइया अही के तकय लेल यइ, ताईक हाइर हम थकलउ मइया कहाँ कतउ भेटलउ यइ, तइयो मोऽन नय माने माइ हिया नय हारलउ यइ, दर्शन दुर्लभ भेल भवानी दौड़ धूप बड्ड केलउ यइ, जइयो नय सकय छी माइया तइयो जोड़ लगाबी यइ, जा धैर नय भेटब मइया ता धैर बौएबय यइ, मान अपमान सब सऽहबय मइया अही लग रहबय यइ, अहाँ बिन किछ निक नेऽ लागे टुग्गर भेल घुमय छी यइ, सब पुछैयेऽ मेऽ कतऽ छउ ककरा कि कहियइ यइ, हइया एलउ हौउऐऽ एलउ कहि -कहि खूब ठकय छी यइ, सपना मे अबय छी माइ सोझा नय खटकय छी यइ, कि कहुँ अहां के मइया सबटा अहाँ बुजहय छी यइ, बेटा कुहरैये माइ अहाँ टहलय छी यइ, टुटल जइये आस हमर मेऽ उम्मीद नय छोड़य छी यइ, मेऽ नय तऽ कियो जग में एतबेऽ टा बुजहय छी यइ, अय सऽ बेसी ज्ञान नय देलउ ते अही सऽ कहय छी यइ, कहल सबटा करब माइ कहु कि कहय छी यइ, रमना रमल अय माइ सेऽ कियेऽ नय बुजहय छी यइ, जइन बुइझ कऽ हमरा माइ नटनी नाच नचबय छी यइ टपटप नोर चुबैये टपटप नोर चुबैये यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइये, कहलो नेऽ जाइयेऽ हमरा रहलो नेऽ जाइयेऽ टपटप नोर चुबैयेऽ, यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ मोन केनाऽ दइन करैयेऽ यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, काली काली रटैयेऽ यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, टपटप नोर चुबैये यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, कोन कसूर केलउ यइ मइया हमरा बजलो नेऽ होइयेऽ, चिंते माथ फटैये यइ मइया हमरा सहलो नेऽ जाइये, सहलो नेऽ जाइये हमरा बजलो नेऽ होइयेऽ टपटप नोर चुबैयेऽ यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, जीनगी पहाड़ लगैये यइ मइया हमरा उघलोऽ नेऽ होइयेऽ , उघलो नेऽ होइये हमरा छोड़लो नेऽ जाइये टपटप नोर चुबैयेऽ यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, काली काली रटैयेऽ यइ मइया हमरा उठलो नेऽ होइयेऽ, उठलो नेऽ होइयेऽ हमरा बैसलो नेऽ होइये टपटप नोर चुबैयेऽ यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, अही लेल अतमा कनैयेऽ यइ मइया हमरा दनशन नेऽ होइयेऽ , दरशन नेऽ होइयेऽ हमरा मुक्ति नेऽ भेटैयेऽ टपटप नोर चुबैयेऽ यइ मइया किछ कहलो नेऽ जाइयेऽ, मनभावन मइया मोरी मनभावन मइया मोरी मानु हमर बात यइ, हमरे आंगन रहियौ मइया हरदम हमरे संग यइ, पुजा करब आरती करब करब नय मेऽ तंग यइ, अही केऽ कहल मेऽ करब रहब सैदखन संग यइ, छोइर कतउ नय जेब मइया जी हजुरी करब यइ, जे जुरबय सेह खेबय मेऽ कहियो किछ नय मांगब यइ, मनभावन मइया मोरी मानु हमर बात यइ, हमरे आंगन रहियौ मइया हरदम हमरे संग यइ, बड्ड सोहनगर लगतय मइया घर आंगन उमंग यइ, अहाँ के देख देख मइया नचतय अंग अंग यइ, दिन राइत ओगरब मइया सुख दुख सबटा कहब यइ, ससरब नय हम कतउ मइया अही लग रहब यइ, मनभावन मइया मोरी मानुँ हमर बात यइ, हमरे आंगन रहियौ मइया हरदम हमरे संग यइ सबहक सुइध लियउ हमरे घर रहिकऽ यइ, राज काज समहारू मइया अंतरयामी बइनकऽ यइ, रमन केऽ अरहबियौ मइया जे कहब सेऽ करब यइ, रानी बइन कऽ रहियौ मइया रमन नोकर चाकर यइ, मनभावन मइया मोरी मानुँ हमर बात यइ, हमरे आंगन रहियौ मइया हरदम हमरे संग यइ रूसा-फुली (भगवती वंदना) मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। हम खसलउ बिचेऽ ठाम अहाँ करय छी आराम, जीवन रुकल बिचे ठाम बिगैर कऽ हम बैसल छी उजैर कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। केलियौ ऐहन कोन अपराध भटकय छीयउ बाधे बाध, छाहैर ताइक रहल छी सउसे छिछिया कऽ थाइक गेलउ डिरियाऽ कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। छोरले मेऽ गय हमर संग हम्मर मोन लगय छउ तंग, टुकटुक तकय छियौउ नामे सुमैर कऽ भेटय नय छेऽ जइन कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। धकधक करय छउ करेज साँस फुलय छउ बड्ड तेज, क्षण क्षण बितय छउ पहाड़ ई सोइच कऽ जीवन बितलौ नइच कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। घिरनी बनल छियउ माय आर कतेऽ नचेमेऽ दाय, घुरमा लइग रहल छउ गोल गोल घुइम कऽ माया मोह डुईब कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा -फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। सुजझय नय छउ कोनो बाट लगलउ दरशन केऽ उचाट, हमरा बिसैर गेलेऽ तू मामत अपन समेट कऽ संग सिनेहिया छोइर कऽ ना , मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ। हम नय रहबउ बेसी दिन हमरा नय छउ किछ पसीन, रहबउ तोरो संग हरदम मील कऽ संग सिनेहिया जोईड़ कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। अबही जल्दी हमरा लऽग रमन के नय आब ठग, नेना शोर पराय छउ सबहक आस छोइर कऽ देखही कने पलऽइट कऽ नाऽ, मेऽ गय किये रूसल छेऽ रूसा-फुली खेल कऽ बेटा के धकेल कऽ नाऽ।। शशि महेंद्र (शशि प्रभा) स्त्री एक स्त्री जे नहिं सिर्फ स्त्री होयत अछि जेकरा में होयत अछि प्रकृति के सब गुण एक स्त्री, पहाड़ जेना अटल जेकर दृढ़निश्चय नहिं डगमगायत एक स्त्री, फूल जेना कोमल प्यार सं सम्हारू,नहिं तऽ मुरझायत एक स्त्री में, चिड़िया जेना हौसला तिनका तिनका जोड़ि नया घर बसायत एक स्त्री, नदी जेना चंचल समय के धार संग बहैत जायत एक स्त्री, गाछ जेना सृजनशील सृष्टि सृजित करैत जायत एक स्त्री, चान जेना शीतल चाँदनी राति जेना शीतलता बरसायत एक स्त्री जे नहिं सिर्फ स्त्री होयत अछि जे होयत अछि प्रकृति के हर गुण सं भरल जे होयत अछि प्रकृति के हर गुण सं भरल| तनुजा दत्ता नारीक अंनत रूप नारी अहाँ जीवनदात्री , वंश वृक्ष के रोपण छी ! सृष्टि के आधार अहाँ ,मातृ शक्ति के पोषण छी ! संयम,करुणा,दया भाव, वृहत गुण के खान छी ! कोमल हदय,सरल जीवन, ईहै अहाँ के शान छी ! विपदा होय समक्ष त बनलौं माँ दुर्गा अवतार! सहनशीलता,मान मर्यादा,शक्ति के भरमार ! बनि स्वरूप लक्ष्मी बाई करैत छी शत्रु संहार ! त्याग भावना राखि, बनबय छी सुंदर घर संसार ! आँखि में दर्द क सागर, मुख पर रहल मुस्कान! दु:ख नुका लेलौं आँचर में,अहाँ के अछि पहचान! प्रगति होयत समाज देश के,रहथि वृहत योगदान ! सभ क्षेत्र में भेट रहल, पुरूष संग नारी के सम्मान ! साहस अरु प्रेम के मूरत,केने छथि हर मुकाम हासिल ! माँ,बहन,बेटी नारी में हर रंग अछि शामिल ! चंदना दत्त ,रांटी फागु आय खेलब हम फागु सखी हे आय खेलब हम फागु. भरि मिथिलामे अनघौल मचल अछि रंग अबीर गुलाल घोरल अछि एकदिस खेलथि रामजी पहुनमा संग सखीके सिया लली छथि घोरल इनारमे भंग सखी हे आय खेलब हम फागु मातु सुनयना रानी पुआ पकाबथि जीमय छथि राम चारु भैया जुडा़ बथि मिथिलानि नयनमा उड़े चहुंओर केसरगुलाल सखी. हे आय खेलब हम फागु. गमगम गमके आमक मज्जरि महमह महके अड़हुल बेली चहुंदिस पसरल मादक सुरभि रमि गेला पहुनमा मिथिला क गली सखि हे आय खेलब हम फागु माँ माँ अहांँ हमर अथाह प्रेमक सागर मां अहांँ बिनु नहि हमर कोनो अस्तित्व बनल रहलहुं ढाल सदिखन गर्भ सं भूमि धरि जीवन बनल धरोहरि पाबि अहांँक स्नेह आ प्रीति बनलहुं अहीं हमर ज्योति जखन छल घटाटोप अन्हार माँ अहीं हमर अथाह प्रेमक सागर. जीवन अछि अहींक देल अहाँक कर्मठता आ सीपसन नेह नुका कए रखलक सब अन्हर बिहाडि़ मे नहि पडय देलक रौद बसात हमरा पर रखलहुं अहां सदिखन लगाय ह्दय सं खुऐलहुं हमरा खोआ स्वयं रहि उपास मां सीखेलहुं केनाय नीक कर्म नहि बाजि कटु सत्य राखि सबहक मोन मुदित मां अहां हमर मान हम अहां क गुमान दीपा झा मुढ़ी -कच्छ बंसबट्टी स सरसराईत, हबा बहैछै साईँ -साईँ, केस सबटा ओझरा जाए छै, हम आइख झाँपैत , धुक्कर स बचाबैत , बसेसर कक्का क मचान पर, बइस ठाट स मुढ़ी-कच्छ छी खाइत । अम्बिका मल्लिक, गीतांजलि कॉलोनी, मोबाइल टॉवर के नजदीक, बरहेत्ता रोड, लहेरियासराय, दरभंगा -८४६००१. हंसी समय हमर हंसी नै छिन सकैत अछि, हमर मुस्कान गुलाम नै भ सकैत अछि । समय ओकर राह बदैल‌ सकैत अछि, लेकिन ओकर मंजिल नै बदैल सकैत अछि। हमहीं त सब के हंसी सिखेलौं , स्वामी में, बृद्ध और बाल में । घर के बगिया और गुलाब में, हमरे हंसी त बिराजमान अछि । अपन हंसी के हमहीं सृजन कर्ता छी, हमर हंसी में सम्पुर्ण कायनात अति । छिन नै सकैत अछि कोई हमर हंसी, कियाकी हंसी हमर पहचान अछि । हम छी काली हम छी दुर्गा मां!!!! अहि धरा पर सुत ,सुता सब अहिं के संतान अछि फेर किया मां लाल आंहां के क्यो - क्यो एहन चांडाल अछि चीत्कार करैत रही जखन हम बधिर किया संसार छल आब जखन निष्प्राण भऽ गेलौं तखन किया ई शोर अछि नारी के अस्तीत्व के लेल लंका दहन और महाभारत भेल आई किया कानून हमर मुक बधिर और नि:सहाय अछि नै बनब हम बेटा सन मां हमर अलग पहचान अछि हम छी काली हम छी दुर्गा हमही अपन रक्षपाल बनब बेटी बचाऊ बेटी पढ़ाऊ सञ पहिले नारा एक और बनाऊ जखन बेटी मजबूत और सशक्त बनत तखन फलत बेटी बचाऊ और बेटी पढ़ाऊ विरांगना अर्द्धांगिनी छी हम विरांगना छी आधा अंग के संग संग हम सब आधा आबादी पर राज अपन बनेने छी देशक डोर होय या गृहस्थी के सब पर अपन‌ कमान बनेने छी कर्म भूमि होय या रण भूमि पहचान अपन बनेने छी व्योम होय या शिखर आरोही में ध्वज अपन फहरेने छी फायटर होय या पायलट होय हौसला अपन बुलंद बनेने छी अभिनेत्री होय या कवियत्री लोहा अपन मनवेने छी आईएस अफसर होय या क्रिक्रेटर होय रुतबा अपन बनेने छी गायकी होय या तैराकी होय सबहक मन हम मोहने छी साध्वी होय या अभयंत्री होय सब पर अपन पकड़ बनेने छी गणतंत्र दिवस के जय घोष में पहचान विरांगना के बनेने छी निर्मला कर्ण ममताक सम्मान करु माय के वन्दन के करथि, माय के अभिनन्दन के करथि | सब स्वार्थ में छथि भेल दृष्टिहीन, माय के अवलंबन के बनथि | माय के रुधिर सँ सिञ्चित भेलथि, आ रूप मनोहर पाबि लेलथि | मातृ-स्नेह सँ सज्जित भs क, प्रज्ञा जखनि निखारि लेलथि | पाबि जगत सँ सम्मान तखनि, बिसरा गेल मायक अँचरा छनि | लक्ष्य अपन पौलथि जखने, आब कोनो जोकरक नहि ममता छनि | भूलल बिसरल स्मृति में माय, एक कोन में आब परल रहली | अपने सन्तानक सम्मुख माय, हिरणी सँ भीत बनल रहली | माय के सुधि लेमय वाला, नहि आई छथि कोनो सपूत | मायक दुःख करता की, देख पराई छथि ओ कपूत | मायक स्नेह बिसारि अहाँ, पायब अपन पहचान कहाँ | किछु श्रेष्ठ जगत के दs पाबी, आब ततेक रहब ऊर्जावान कहाँ | जड़-मूल नष्ट तs कय लेलहुँ, शाख कहाँ रहि पाओत आब | सब पात तना फल सूखि जायत, झरि माटि में मिलि जायत आब | आबहु चेतू आबहु सम्हरु, ममता के नहि अपमान करु | माय छथि गँगा जमुना ओ सरस्वती, एहि सलिल-सँगम में स्नान करु | ममता छूटत तs जग रुसत, ओ स्नेह कहाँ फेर पायब मनु | ईश्वर छथि मायक ममता में, से कहियो धरि बिसरायब जनु | माता आओर धरती माता, दूनू छथि जग के जीवन-दायिनि | हिनकर रक्षा में तत्पर रहि कs, रोकब अपना सबहक जीवन-हानि | नारीक सम्मान पापी संसार ई सदिखन सँ, नारी के छथि अपमान केने | सब छलने छथि हुनका हरदम , आ हुनके छथि बदनाम केने | मानव-दानव के बात छोड़ू, देवो तs छथि यैह काज केने | छलना नारी के संग केलनि , आ रक्षा सृष्टि के नाम देलनि | नारी नहीं केलनि भूल मगर , सब हक दोषी ओ भs गेली | पाप केलनि कोई आन मगर , नारी पापिन बुझना गेली | वृंदा के पातिव्रत्य जखनि, स्वर्गक गर्वत्व हरण केलनि | पतिव्रत्य हरण के हेतु तखन, वृन्दा संग गुरुतर छल भेलनि | क्षण भर के लेल हरि के मन में , नहिं वृंदा लेल सन्ताप कोनो | अपने भक्तक संग छलना में , हरि के बुझना नहिं पाप कोनो | वृंदा के संग छल कs क, हुनकर पति के संहार केलनि | जलंधर के रण में वध करवा , मानवता के उपकार केलनि | प्रभु के वरदान पाबि वृंदा , प्रातः स्मरणीया देवि भेली | प्रभु के पटरानी होईतो धरि, वृन्दा जग में पथभ्रष्टा नाम पेली | रणनीति बनाक छल केलनि , तखनो प्रभु के किछु दोष नहिं | पावन, सती,अबला वृन्दा के , ई जग कहलक निर्दोष नहिं | हे अखिल विश्व के रचयिता , स्वीकार करू करबद्ध नमन | विनती सुनियौ हे जगतपिता , हमर सम्मान राखु हे कमलनयन | हम सब नारी छी सृष्टि कर्ता , निर्देश अहाँ सs पाबि प्रभु | ई गुरुतर हम भार लेलहुँ, आदेश अहिं के मानि प्रभु | बस एक प्रार्थना अछि प्रभुवर , निर्दोषे दण्ड ने पाबी हम | अनकर पापकर्म कलुषित , के बोझ ने आब उठाबी हम | हे जगत नियंता सुनु विनय , जग में वितरित करु दिव्यज्ञान | अहिं सन जग में न्याय होए , धरती के नर होय नारायण | सशक्त नारी सशक्त समाज सशक्त नारी, सशक्त समाज | ई मात्र एकटा स्लोगन अछि, अथवा समाजक चाहत | यदि स्लोगन अछि त, बहुत नीक, बड्ड सोहनगर | चलु किछु आर अहिना , सुन्दर सुन्दर स्लोगन रचु | एहि के झुनझुना बना, जोर स बजायल जाऊ | कतेक नीक कर्ण-सुखद, स्वर गूंजि उठल | सुनु मनोरम ध्वनि, सँगहि दर्शन करू | एहि सशक्त नारी के, की ओ सशक्त भेली | सुनु एहि सशक्त नारीक क्रन्दन, ई गृहलक्ष्मी छथि लक्ष्मी विहीन | नहि हिनक अपन पसन्दक भोजन, नहि परिधान | हिनका पर थोपल जाइछ, परिवार-समाजक विधान | हिनक कलेवर आधुनिक, छनि विचार वैह पुरान | ई सरस्वती छथि, वाणी विहीन | नहि अपन अलग सोच, नहि अपन पृथक विचार | ई पार्वती दुर्गा काली छथि, पूर्णतः शक्ति विहीन | पराधीन, पराश्रित, रुग्ण-कलेवर, शस्त्र-विहीन,| जागू स्त्रीगण जागु, अहाँ रचू नव-विधान | महामाया, अन्नपूर्णा, लक्ष्मी अहिं, अहाँ थिकहुँ माँ सरस्वती | नहि कोनो संशय राखू मन में, अहिं थिकहुँ माँ पार्वती | अहाँ प्रेम के करु स्वीकार, सँगहि शोषण के करु प्रतिकार | तखनि होयब अहाँ सशक्त नारी, अहिं स बनत सशक्त समाज | अपन कलेवर मात्र नहि, परिवर्तित करू अपन विचार | आधुनिक सभ्यता सँग, आधुनिक सोच के करु अङ्गीकार | शोषित होउ नहि, शोषण करु बन्द | सृजन करू नव समाजक, रचू जीवनक नव छन्द | अहिं छी सशक्त नारी, अहिं स बनत सशक्त समाज l प्रीति प्रभा, जमशेदपूर। पंखुड़ी के छी हम,आ कि छी हम, अंगनाक रौनक,सांझक दीया रूनझून पैंजनी चंचलाअबैत करैत बिन शोर, मायक छाया पिता के काया बनी अएलहूं अहांक द्वार कअ लिय हमरा सहज स्वीकार। धानक बाली सन खनकब हर क्षण चहकब सदा घर आ आंगन सजल रहत मड़बा अहांक चढ़ी बैसत दुलरी धीया अहाँक राखत पागक मान-सम्मान देहरी पर नहीं आबत आँच। हम छी जूही, हम छी चम्पा गुलाबक सुवासित पंखुड़ी हम। दमकैत रहै माय के आँचर एहन रूप विभूति सचार छी हम। अंगनाक रौनक विसहथ गामक धीया छी हम। अप्पन मिथिलाधाम पवित्र पावन अछि हम्मर धाम जे नही देखलहूं देख लिय चलू मिथिलाधाम। शगुण के सब किछ ओतय भेटत।लाल पाग संग माछ, पान आ सौम्य मखान अई स घिरल अछि अप्पन धाम जे नहि देखलहूं देख लिय चलूं मिथिलाधाम। माँ वैदेही के परल चरण अतए श्रीराम नरेश भेलैथ कुटुम्ब एतय मीठगर वाणी सअ भेटत सम्मान खोईछा भरी पाबि लिय मान सम्मान। उगना महादेवक साक्षात दर्शन लिय अंगना दलान पर उदित भास्कर के संग लिय चाहक मजा चाँनी सन माछ के दर्शन महान जे नही देखलहूं देख लिय चलू मिथिलाधाम। मधुबनीक पेंटिग के मास्कक भेल गुणगान आब नई कोई दिक्कत राह भ गेल आसान उड़ी उड़ी पहुँचु हम्मर धाम प्रीति के कलम स देख लिय चलू मिथिलाधाम। बबली मीरा, जमशेदपुर (झाड़खण्ड), नैहर-हनुमान नगर, सासुर-ईजोत हम मिथिला के नारी छी हम मिथिला के नारी छी रूकब नै झुकब नै चलिते रहब बढ़ीते रहब हम मिथिला के नारी छी... मां के प्राण छी बाबूजी के अभिमान छी भाई के भरदुतिया छी बहिन के संगी छी हम मिथिला के नारी छी... नारी छी,जननी छी पति के अध्दागिंनी छी बच्चा के अध्यापिका छी पुतोहू के धरोहर छी हम मिथिला के नारी छी... मिथिला के संस्कार छी तीज और त्योहार छी वटसावित्री और मधूश्रावणी छी गीत और नाद छी हम मिथिला के नारी छी... भनसा घर और कोबर घर छी चूल्हा और चिनवार छी कोठी और ढ़ेकी छी पुरहर और पातिल छी हम मिथिला के नारी छी... माछ और दही बला भोजन छी पान और मखान छी भाई के ओठगन छी हम मिथिला के नारी छी... कमला और बलान छी जीबछ धार छी गाम के पोखैर और गाछी छी किचर नैकमल छी हम मिथिला के नारी छी... जानकी और श्यामा छी उच्चैठ के भगवती छी डोकहर के गौड़ी छी दूर्गा और सरस्वती छी राधा और मीरा छी हम मिथिला के नारी छी... दुर्बल नै शक्ति छी सभ नारी के आवाज छी पुरे समूह के के नाज छी कविता में देखाई छी कहानी और गीत लिखय छी हं हम बबली मीरा छी हं हम बबली मीरा छी रागिनी प्रीत, जयपुर गीत सखी बरखा के रिमझिम फुहार के सनू, जखैन पुरवा बहैया बयार के सुनू। गीत गावैया कण-कण मगन भs कोना, प्रीत के गीत सभ टा ध्यान सँ सुनू। सन् सनन सन चलैया हवा बावरी, खूब कुहकैया कोयल महके मंजरी। तान झरना के कल-कल मोहित मन करै, राग अद्भुत अछि जीवन के गान के सुनू। भोरे सूरज के कर्म गीत प्रेरित करै, तान मेहनत के साधि दिन सफल हम करी। सांझ शीतल आ राति चैन बंसी बजे, पहर के रागिनी सब सम्मान सँ सुनू। सूनु कंगन के खन-खन में गीत अनुराग, सुनि पायल के छन-छन में अनुपम बहार। गीत गावैया अंचरा मगन मोहिनी, साँस के लय में मोहन के तान सुनू। 1266 || विदेह सदेह:२३ विदेह सदेह:२३|| 1265

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€ Ashish Anchinhar Q € Ashish Anchinhar Q 3) मैथिली भाषाक विकाससँ जुड़ल तकनीक आ संभावना Ashish Anchinhar cee 44) प्रौद्योगिकी सापेक्ष विकास यात्रा: मैथिली आ नेट 50407 202 + a 5) ब्लागिंग आ व्यगतिगत पत्रकारिता 6) इंटरनेट ( ब्लाग आ साइट) che माध्यमसँ होइत शोध कार्य fade aga feng ata एला, बहुत किछु करत AI AEA 47) मैथिलीक बेब पत्रकारिता जाहि विषयपर विदेहसैँ आसा लगेने छी ओ थिक विद्हेक 78) मैथिलीक ब्लाग आ ई पत्रिका कोनो एकटा अंक ( २०१३ केर मार्च-अप्रिलमे, वा ताहिसँ 79) मैथिलीक अध्ययन आ अध्ययापनमे इंटरनेटक भूमिका पहिने of मैटर आबि जाइ a) बेब पत्रिकारिता विशेषांक केर 20) मैथिली arene जुड़ल साफ्टवेयर रूपमे रहए। एखन हम विषय दए रहल छी जिनका जाहिपर 97) मैथिली टाइपिंगसँ जुड़ल साफ्टवेयर आ ओकर संभावना रूचि चढ़ए ताहिपर लीखू आ संपादक जीकें पठा दिऔन्‍्ह। 22) बेब मीडिया समाजिक सरोकार आ व्यवसायक रुपमे ओना किछुए आलेख मैथिली बेब पत्रिकारितापर अछि oF 23) सोशल नेटवर्किंग ax इतिहास wet सभ सहयोग करबै J विदेह ऐमे आगू आएत-----।ई 24) बेब मीडिया आ अभिव्यक्ति केर दुरुपयोग विषय एना ife-—------ 25) बेबमीडिया सरकारी नियंत्रणमे 26) बेब मीडिया स्वतंत्रता बनाम स्वच्छंदता 7) मीडिया - भेद आ प्रभेद 27) बेब मीडियाक माध्यमे उपल्बध मैथिली पोथी 2) विभिन्न मीडियाक माँझ बेब पत्रकारिता 28) बेब मीडिया on कापीराइट 3) बदलैत समयमे बेब मीडिया 29) मैथिली बेब मीडिया आ रोजगार 4) बेब मीडिया आ मैथिली 30) मैथिलीकें विश्व भाषा बनेबामे बेबमीडियाक योगदान 5) मैथिलीकें विकासमे बेब मीडियाक योगदान 37) भारतक बदलैत शिक्षा पद्धति आ इंटरनेट 6) भारतमे इंटरनेटक विकास 32) समाजिक न्याय on बेबमीडिया 7) बेब मीडिया आ सोशल नेटवर्किंग साइट 33) युवा आ बेबमीडिया 8) लोकतंत्र आ बेबमीडिया कि 34) बेब मीडियाक सिद्धांत आ बेबहार 9) सर्वहारा बनाम ब्राम्हणवाद: बेबमीडियाक संदर्भमे 70) बेबमीडिया आ प्रवासी मैथिल ई विषय सभहँक लेल हम अविनाश वाचास्पति जीक अभारी 7) मैथिली ब्लागिंग, साइट स्थिति आ संभावना छी। सभ प्रबुद्ध मैथिली पाठक आ लेखक आग्रह जे ओ 72) इंटरनेरटमे मैथिलीक वर्तमान स्थिति ऐसेसैं अपन एसंटीटा तिषयर आलेख एठालशि। Write a comment. GA) © Write a comment. GA) ©

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(0. @ निप्हघ00८८०ा/ बहती, ०9/7पनग%20]02%20नवनाथह203-588२0#_80 x ७ @: HE Apps BE Mail है BSNL| Broadband... HE Apps पद \ @ mnewshuntcomii & Vinay Jha on यह लेख मैथिली भाषा की लिपि से सम्बन्धित है, अतः मैथिली में लिखनी चाहिए थी, 2004 ईस्वी में मैंने देवनागरी और मिथिलाक्षर के फॉण्ट बनाये और वितरित किये मुझे मिले, सबमें यही दोष था, वे सारे sive अखबारी भाषा को ध्यान में रखकर बनाए गए उसे ge झाषा में केवल अपनी संस्था के PDF फाइल हेतु प्रयुक्त किया, फॉण्ट का वितरण फॉण्ट में समाविष्ट करके मैंने {Devwithila.ttt फॉण्ट बनाया, जिसके प्रत्येक चिहन पर मम Ley EEE 35:23

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= Information janaki Regular Version .000 2007 initial release True Type Font Creator: Gaurav Shrestha & Anjan Ale (Madan Puraskar Pustakalaya) Copyright © 2007 by Madan Puraskar Pustakalaya. All rights reserved. 82586 hati I / if A AANA

० कब खा | बाघ... | | एन Ae. © इन = ‘ vourcaues पक 24 बढ़ाया और अब अन्य बहुल सा लिपियाँ सहित ats गई घौसेरर तैयार हैं । देवनागरी में. कूल . afin care | Bae pee आती हैं उन्मठ भी देवनागरी की ene बटन दबाने से शुद स्वचालित संयुक्ताकषरी सहित हूँढे न . Jha 2.2. | लेखपढ में प्राचीन मिसी लिपि का कलात्मक वई ऊार्ट - ‘ey Oneppnta . Egyptian Hieroglyphs Word-Art in Lekhpatta = @ eso vase . ? EIQ) Sone

EE Vinay Jha - मिथिला के पाप कं (ole) 3 J € > C — @ dharmdhara.com/articles/vinay%20jha/fAFeeT% 20896 20FTUS FertA-FATTE% 208% 20AL% 20FSTA% 20TH TOTAN...t mI * e i Vinay Jha @ 25 sentemver English (UK) Tet” English (US) 3 मिथिला के पाण्डुलिपि-गिरोह ने मेरे जिस मिथिलाक्षर give को सोलह ast से दबाये रखा और हाल मैं हल्ला मचने पर उसे आउटडेटिड घोषित किया, उसी फॉण्ट के यूनिकोड वर्शन Privacy - Terms - Advertising - AdChoices में इन्टरनेट पर टाइपिंग का नमूना प्रस्तुत है जिसे किसी भी कम्प्यूटर या स्मार्टफोन में Cookies - More देख सकते हैं, और यदि HTML जानते हैं तो स्मार्टफ़ोन care भी इन्टरनेट पर मिथिलाक्षर Facebook © 208 टाइपिंग कर सकते हैं :-- hitp:/ivedicastrology.wikidot.com/mithilakshara-font#toc2 इन्टरनेट पर टाइपिंग के लिए यूनिकोड फॉण्ट अनिवार्य नहीं है, पुराने फॉण्ट a att ae सम्भव है किन्तु यूनिकोड का लाभ यह है कि बहुत अधिक संयुक्ताक्षर आदि हों तो एक ही यूनिकोड sive में सबका समावेश हो जाता है | मिथिलाक्षर को ब्राहमी, मिश्र की चित्रलरिपि, आदि वाले प्रागैतिहासिक वर्ग मे यूनिकोड मान्यता मिली | अतः मेरा प्रस्तुत उदहारण सिद्ध करता है कि संसार की समस्त प्रागैतिहासिक लिपियाँ मे इन्टरनेट पर लिखना संभव है, इन्टरनेट अंगरेजी की बपौती नहीं | VEDICASTROLOGY.WWIKIDOT.COM Mithilakshara Font - Vedic Astrology (किन्तु इसके लिए उस वेबसाइट पर HIML कोड की अनुमति रहनी चाहिए | जिस किसी. नौरज सक्सेना, Abhay Trivedl and 335 others 40 Comments 24 shares Like ‘Comment Share Most relevant ‘Write a comment. «Or ns 05 (07) ol (a _— 70:3 PM eS eT लाए

TRIBHUVAN UNIVERSITY a \Se/ CENTRAL LIBRARY er ta [EXIT 58५ National Agency cert APPLICATION FORM पड हब ote, जि ISBN National Agency 7540 Tawney Cena सडक ००.5 [९७१ overs, as ISBN Nunta or yb eo ptt Pee ek) he bx Tee [om [0 Se" [oeex] om [ome | com bles | Coo | ए न" चित | Corners [ Coo | font (Manilawer Keon cb Gurya by andin Ke Mish La) कि का Matti Navaysha Sahitya Piggies ८ उस -ठा- Tet 4ueang9 Fax Exmal! $frcKxm @ bats con [sen | oa a या — Pres 499.60 Oe EXE ie “Jo BE COMPLETED BY THE NATIONAL AGENCY तप Gygntey Group kdensier Number: 8904 G Spboudah _ A (, fs $ i zi ‘Sara oft SEN OF pcre s owe Dec. 2, 2004, eee ar

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मैथिल नवयुवा साहित्य परिषद ion काठमाण्डू ,रथा.-र0६60 १52 Bate aict_Uusee राजविराज-५, सप्त \ व । AAG /गंगरेश Tord का जी, अपने द्वारा RTA \( ity if Wy क्षर”, जे पहिल बेर F (8 ‘aa शंकर रात | poke G tt et HUSc f a2 ce रामदर्याल राकेश : ; paren f "Gade nt. Ay or rete hs नि Jip | i ee ; ey eee 0 |

y Fi Facebook x b! © 8०9७५ अनचिन्हार आखर x x MM Drafts (224) ashishans x ¥ @) MarTHau cinema size x YG) httpi//maithiicinemable x € > S [O maithiticinema.blogspot.in/20/08/history-of-maithili-flms-birds-eye.html tr) i First Portal of Maithili Films, Artists, Songs, Music, Theater and Entertainment मैथिली फ़िल्म, कलाकार, गीत- संगीत, रंगमंच आ मनोरंजनक पहिल मैथिली पोर्टल Home | MAITHILIFILMHISTORY | FILMSPOSTERS-TRAILER | MAITHILISONGS | MAITHILINEWS | MAITHIL ARTISTS MAITHILI FILMS LIST Sunday, July 24, 2074 हे... अली Ls a story Of Maithili Films: A Bird’s Eye View Seah per 2) Maithili Cineworld ies ry Of Maithili Films: A Bird's Eye View fallin tnguages ofa Maiti is conse to bo the svestest and most cuted. tisneodessto pont | [____] ut that Maithl is spoken by about 6 -7 crores of the people of not only India but abroad also. The most atta significant characteristic feature of this sweet language is that it has its own grammar literature, culture | romwers Reaaeqaatagarr customs, almanac and geographical area Maithili language is known all over the world for its sweetness, जाब अन्यथा कानूनी कार्रवाई classical epics, melodious songs of Poet Vidyapati and what not. In the light of all this riches possessed by Followers (205) Next करन जाएत Maithili that it has been accorded a place in the Constitution of India. Fy ‘Al ii BR e rrorecreo कं cure guesses rem toed eee sommes || Ea a FR Bl COPYSCAPE Popularity y y ia LU | a DO NOT COPY i As far as Maithili cinema is considered, it has remained till date at back foot which is a matter of utter shame B ©: Zz ‘S| he and serious concem for all the Maithils. However, some people have tried their best to heip Maithili cinema get its due. Let us delve deep into the history and milestones whatever of Maithili Cinema. TE [cy Be = नि न 7a aiid ही —_ @ 6 ना false fale sHOeeawK De DEM

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436 || विदेह सदेह:२३ Font Information |, (Ni vNv\ janaki Regular LAA Version ह.000 2007 initialrelease, = True Type Font LN Creator: Gaurav Shrestha & Anjan Ale (Madan Puraskar Pustakalaya) Copyright © 2007 by Madan Puraskar Pustakalaya. All rights yeserved. Basic Latin i ANA \\ yA Hl i il lt | एकर बाद 20078 अनु झाक मिथिला AR फॉण्ट आएल | Bint “ «+ @ Font Information Yerton 80 Ocober 3,207, na ease notype Fort conyeat Minavron 9. ‘Thieme sofware ere by ANA you can trite ener my WARRANTY; without vont imped werany ef MERCHANTABILITY er THES Fon 8 PeRTCILaR PURPOSE Ian © as =

474 || विदेह सदेह:२३ हमर फेसबुक पोस्ट केर फोटो- € Ashish Anchinhar Q € Ashish Anchinhar Q 73) मैथिली भाषाक विकाससँ जुड़ल तकनीक आ संभावना Ashish Anchinhar see .4) प्रौद्योगिकी सापेक्ष विकास यात्रा: मैथिली आ नेट oy 5Nov 2072+ a 5) ब्लागिंग आ व्यगतिगत पत्रकारिता 76) इंटरनेट ( ब्लाग आ साइट) केर माध्यमसँ होइत शोध कार्य विदेह बहुत fing करैत एला, बहुत किछु करत मुदा एखन हम. 77) मैथिलीक बेब पत्रकारिता जाहि विषयपर विदेहसँँ आसा लगेने छी ओ थिक विदहेक 78) मैथिलीक ब्लाग आ ई पत्रिका कोनो एकटा अंक ( २०१३ केर मार्च-अप्रिलमे, वा ताहिसँ 9) मैथिलीक अध्ययन आ अध्ययापनमे इंटरनेटक भूमिका पहिने जैं मैटर आबि ong a) बेब पत्रिकारिता विशेषांक केर 20) मैथिली भाषासें जुड़ल साफ्टवेयर रूपमे रहए। एखन हम विषय दए रहल छी जिनका STEER 7) मैथिली टाइपिंगसँ जुड़ल साफटवेयर आ ओकर संभावना रूचि चढ़ए ताहिपर लीखू on संपादक जीकें पठा दिऔन्ह। 99) बेब मीडिया समाजिक सरोकार आ व्यवसायक रुपमे ओना किछुए आलेख मैथिली बेब पत्रिकारितापर अछि जैँ 23) सोशल नेटवर्किंग केर इतिहास हाँ सभ सहयोग करबै तैँ विदेह ऐमे आगू आएत----।ई 24) बेब मीडिया आ अभिव्यक्ति केर दुरुपयोग विषय एना अछि---- 25) बेबमीडिया सरकारी नियंत्रणमे 26) बेब मीडिया स्वतंत्रता बनाम स्वच्छंदता 2) मीडिया - भेद आ प्रभेद 27) बेब मीडियाक माध्यमे उपल्बध मैथिली पोथी 2) विभिन्न मीडियाक माँझ बेब पत्रकारिता 28) बेब मीडिया आ कापीराइट 3) बदलैत समयमे बेब मीडिया 29) मैथिली बेब मीडिया आ रोजगार 4) बेब मीडिया आ मैथिली 30) मैथिलीकें विश्व भाषा बनेबामे बेबमीडियाक योगदान 5) मैथिलीकें विकासमे बेब मीडियाक योगदान 37) भारतक बदलैत शिक्षा पद्धति आ इंटरनेट 6) भारतमे इंटरनेटक विकास 32) समाजिक न्याय आ बेबमीडिया 7) बेब मीडिया आ सोशल नेटवर्किंग साइट 33) युवा on बेबमीडिया 8) लोकतंत्र आ बेबमीडिया 34) बेब मीडियाक सिद्धांत आ बेबहार 9) सर्वहारा बनाम ब्राम्हणवादः बेबमीडियाक संदर्भमे ues seen ES 70) बेबमीडिया आ प्रवासी मैथिल ई विषय auger लेल हम अविनाश वाचास्पति जीक अभारी 7) मैथिली ब्लागिंग, साइट स्थिति आ संभावना छी। सभ प्रबुद्ध मैथिली पाठक आ लेखक आग्रह जे ओ 72) इंटरनेरटमे मैथिलीक वर्तमान स्थिति ऐसेसं अपन एसंटीटा farmers arabes carat (6) Write a comment. © (© WMriteacomment (Sy

विदेह सदेह:२३|| 485

486 || विदेह सदेह:२३ परदास्पिकोरी,