ISSN 2229-547X विदेह सदेह २४ विदेह-सदेह २४, विदेह www.videha.co.in/ पेटार (अंक ३१७-३३२) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ३०००/- संस्करण: २०२२ Videha Sadeha 24: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 317-332 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-७४९) डा. किशन कारीगर- विलुप्त होइत मिथिला के लोक संस्कृति घोड़ा (कठघोड़वा) नाच, कोन बिरड़ो मे उधिया गेल?कतअ हरा गेल मिथिला के नटुआ नाच?, भोजकाजी मनेजर, पोसलाहा छागर सब आई गेले घर छह? (पृ. २-१३) सोनी कर्ण- स्त्री विमर्श के परिभाषा आर अवधारणा (पृ. १४-१७) रमा नाथ मिश्र- लघुकथा- पुनर्जन्म (पृ. १८-२७) कंचन कण्ठ- स्त्री- सज्जा-परंपरा-फैशन, टूटल रिकार्ड (पृ. २८-३७) नन्द विलास राय- गंगा नहेलौं, करौना, जान-मे-जान आएल, संस्कारी कन्या, फोचाइ कक्काक बेमारी (पृ. ३८-९४) बिटू मिश्र वत्स- दू गोट बटोहीक गप (पृ. ९५-९५) उमेश मण्डल- १०५ म् ‘सगर राति दीप जरय’ कथा चेतना रैली (पृ. ९६-१००) लालदेब कामत- पानक बरैब (पृ. १०१-१०५) रामलोचन ठाकुर जीक संक्षिप्त परिचय- (पृ. १०६-११५) रामलोचन ठाकुर विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे- (पृ. ११६-११८) रामलोचन ठाकुर संग साक्षात्कार- प्राश्निक- डा. वन्दना कुमारी (आब डा. वन्दना किशोर)- एहन जड़िआयल समाजमे महिला कोना उतरतीह मैथिली रंगमंचपर (पृ. ११९-१२९) अमरकान्त लाल- रामलोचन ठाकुर जीक अनुवाद (पृ. १३०-१३२) प्रदीप पुष्प- गीतकार रामलोचन ठाकुर (पृ. १३३-१३६) शैलेन्द्र मिश्र- एकटा खाँटी मैथिल : रामलोचन ठाकुर आ हुनकर काव्य संसार (पृ. १३७-१४८) भीमनाथ झा- बचा दिअ भाइकेँ (पृ. १४९-१५४) महाकान्त ठाकुर- माटि परहक लोक (पृ. १५५-१५८) अरविन्द ठाकुर- अपूर्णता जखनि नियति हुअए [सन्दर्भ:रामलोचन ठाकुरक काव्य-रचनाक मूल्यांकनक अपूर्ण प्रयास], पचपनियाँ बनाम बभनियाँ मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर, कौशिकी जनपदक लोक-संस्कृति- इतिहासक शिकारी, भीमनाथ झा “कुसुम”! (पृ. १५९-२७६) आमोद झा- सत्यक एकपेरिया पर काव्य वितान (पृ. २७७-२८४) चन्द्रेश- प्रतिरोधी साहित्यकार रामलोचन ठाकुर (पृ. २८५-२९३) शिवशंकर श्रीनिवास- .रामलोचन ठाकुरक 'बेतालकथा' (पृ. २९४-३०२) दिलीप कुमार झा- एखनो माँगि रहलए उत्तर-' लाख प्रश्न अनुत्तरित' (पृ. ३०३-३१५) नचिकेता- रामलोचन - हमर नजरिमे (पृ. ३१६-३२१) नबोनारायण मिश्र- हमरा नजरिमे: श्री रामलोचन ठाकुर (पृ. ३२२-३२६) अशोक- राम लोचन ठाकुरक कविता पढ़ैत (पृ. ३२७-३४१) नारायणजी- विरोध आ अनुरोधक कविता (पृ. ३४२-३४६) भ्रमर- देसिल बयनाक बहन्ने रामलोचन ठाकुर प्रसंग (पृ. ३४७-३५७) संतोषी कुमार- भाषा-संस्कृतिक आस्था आ नव-निर्माणक संकल्प (पृ. ३५८-३६४) केदार कानन- एक सुच्चा कविः रामलोचन ठाकुर (पृ. ३६५-३७२) सुरेन्द्र ठाकुर- मैथिली सेवी कवि श्री रामलोचन ठाकुर जी (पृ. ३७३-३८०) वियोगी- रामलोचन ठाकुरक व्यक्तित्व : एक दृष्टिकोण, पिरामिडक देश मे (पृ. ३८१-४५४) बिहारी- मशाल लेने चलैत अग्रदूत (प्. ४५५-४६०) कामेश्वर झा "कमल"- श्री रामलोचन ठाकुर आ हुनक व्यापक काव्य संसार (पृ. ४६१-४६९) डॉ कैलाश कुमार मिश्र- रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना (पृ. ४७०-४८०) रमण कुमार सिंह- मैथिली कविताक विद्रोही स्वर रामलोचन ठाकुर (पृ. ४८१-४८८) डॉ अनमोल झा- कोलकाता परिसरक मैथिलीक मणि श्री रामलोचन ठाकुर (पृ. ४८९-४९५) रमेश- रामलोचन ठाकुरक काव्य-युद्ध (पृ. ४९६-५०२) आभा झा- बीहनि कथाक आजुक परिप्रेक्ष्यमे उपादेयता, सोगारथ, फुरसति, बीछक डंक, मर्यादा (पृ. ५०३-५१६) अरुण लाल दास- दू टा बीहनि कथा (पृ. ५१७-५१९) कल्पना झा- बीहनि कथा (पृ. ५२०-५२०) सुभाष कुमार कामत- अस्पताल, रंग, चॉकलेट, नून, ऑनलाईन (पृ. ५२१- पूनम झा- २ टा बीहनि कथा (पृ. ५२६-५२७) पूजा झा- औरत, उलाहना (पृ. ५२८-५३१) प्रियंवदा तारा झा- ४ टा बीहनि कथा (पृ. ५३२-५३६) रवि भूषण पाठक- घर (पृ. ५३७-५३८) अमरेश कुमार चौधरी- २ टा बीहनि कथा (पृ. ५३९-५४२) सांत्वना मिश्रा- बीहनि कथा-बड़दक घंटी (पृ. ५४३-५४४) रूचि स्मृति- २ टा बीहनि कथा (पृ. ५४५-५४७) देवेन्द्र मिश्र- एकता (पृ. ५४८-५४९) मिन्नी मिश्र- के समाहरत इ गृहस्थीक भार! (पृ. ५५०-५५१) गौरी शंकर साह- भाव (पृ. ५५२-५५३) सत्यनारायण झा- लखन बाबू। (पृ. ५५४-५५४) घनश्याम घनेरो- बीहनिकथा आ 'घनेरो'क अवधारणा, लैह-लैहे गुलबिया (पृ. ५५५-५५७) अभिलाष ठाकुर- टकध्यान (पृ. ५५८-५५८) अखिला नन्द झा 'रमण'- चश्मा (पृ. ५५९-५५९) सबिता झा 'सोनी'- सेहेन्ता / बेगरता (पृ. ५६०-५६०) पूनम झा "सुधा"- सेल्फी (पृ. ५६१-५६२) मनोज मंडल- मां (पृ. ५६३-५६३) चंदना दत्त- प्रेम दिवस, वरदान, मोह, रौद (पृ. ५६४-५६७) विन्देश्वर ठाकुर- घुस्सा-घुस्सी (पृ. ५६८-५६८) कुन्दन कर्ण- आओर छिछियाउ (पृ. ५६९-५६९) सोनी नीलू झा- अदनाबालीक आंगन (पृ. ५७०-५७०) विनीता ठाकुर- किसान (पृ. ५७१-५७१) डॉ प्रमोद कुमार- ढ़हलेल छी (पृ. ५७२-५७२) इरा मल्लिक- बेटीक महिमा (पृ. ५७३-५७३) सत्येन्द्र कर्ण- बनिया बाबा (पृ. ५७४-५७४) जवाहर लाल कश्यप- पहिल प्रेम (पृ. ५७५-५७५) जयंती कुमारी- दू टा बीहनि कथा (पृ. ५७६-५७७) डा. शिव कुमार प्रसाद- ४ टा बीहनि कथा (पृ. ५७८-५८१) विद्या चन्द्र झा "बमबम"- साहित्य मंथन आ बीहनि कथा, अधलाह बस्तु (पृ. ५८२-५८५) भावना मिश्रा- गरीब लोक (पृ. ५८६-५८७) अमर कान्त लाल- उघार (पृ. ५८८-५८८) अमल कुमार झा- हिरो (पृ. ५८९-५८९) प्रभात कुमार कर्ण- प्रकृतिक तांडव (पृ. ५९०-५९१) डाॅ.प्रमोद झा "गोकुल"- २ टा बीहनि कथा (पृ. ५९२-५९३) निवेदिता झा- दू टा बीहनि कथा (पृ. ५९४-५९५) ओम चौधरी- सुरज माटि-कादो गिजैत छल (पृ. ५९६-५९६) कल्पना झा- २ टा बीहनि कथा (५९७-५९८) भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश'- संजय केर अॅंइख (पृ. ५९९-५९९) जगतरंजन झा- बीहनि कथा (पृ. ६००-६००) शेफालिका वर्मा- हँ एहनो होयत छैक (पृ. ६०१-६०२) प्रभाष अकिंचन- भरोस (पृ. ६०३-६०३) मुन्नी कामत- दू टा बीहनि कथा (पृ. ६०४-६०५) मिसिदा- ट्राय एगेन लैटर (पृ. ६०६-६०६) मृणाल आशुतोष- आंदोलन (पृ. ६०७-६०७) ज्ञानवर्द्धन कंठ- फैदाबला बिजनेस, लालदाइ, औकवर्ड ट्रेडिशन, भोल्टेज, 'नीक' आ 'बड़ा नीक', उषा मैडमक विदागरी, दाबा, पराश्रित (प्. ६०८-६२३) राजीव कर्ण- झुठक महत्व (पृ. ६२४-६२४) जगदानन्द झा 'मनु'- ४ टा बीहनि कथा (पृ.६२५-६२९) विरेन्द्र कुमार झा- कोना बुझब (पृ. ६३०-६३०) मुन्ना जी- संवेदनाक सीढ़ीपर ठाढ़-“ताल बेताल”, बीहनि कथाक आधार स्तम्भ छलाह- श्री राज, आधुनिक विश्वकथाक बाट पर जाइत बीहनि कथा, बीहनि कथाक दशा- दिशा, बीहनि कथाक विकास मे अवरोधक तत्व (पृ. ६३१-६५२) अनीता मिश्र- २टा बीहनि कथा (पृ. ६५३-६५४) नीरज कर्ण- छुच्छे (पृ. ६५५-६५५) सुचिता कुमारी- बीहनि कथा (अनेरुआ), लघुकथा (पोतीक बियाह, ऑनलाइन क्लास, ईनर) (पृ. ६५६-६६९) अंजू खरबंदा- मुखिया (पृ. ६७०-६७१) रवि प्रभाकर- अदकल जीह (पृ. ६७२-६७२) सतीश खनगवाल- घुरपेंच (पृ. ६७३-६७३) विजय 'विभोर'- अन्नदाता (पृ. ६७४-६७४) योगराज प्रभाकर- थाल आ कमल (पृ. ६७५-६७५) सदानन्द कविश्वर- नाङरि हिलेबाक फयदा (पृ. ६७६-६७६) डा पुष्करराज भट्ट- बहिष्करण (प्. ६७७-६७९) प्रा. डा. कपिल लामिछाने- सौन्दर्य आ समानता (पृ. ६८०-६८१) हरिप्रसाद भण्डारी- दू टा बीहनि कथा (पृ. ६८२-६८३) तारा केसी- अपन परिचय (पृ. ६८४-६८५) रचना शर्मा- चरित्र (पृ. ६८६-६८७) डॉ. प्रदीप कौड़ा- क्रांति (पृ. ६८८-६८९) निरंजन बोहा- करूगर सत्य (पृ. ६९०-६९०) जगदीश अरमानी- कथानक (पृ. ६९१-६९१) जंगबहादुर सिंह घुम्मण- आचरण (पृ. ६९२-६९२) दीपक बुदकी- जन्नत (पृ. ६९३-६९४) मुबश्शिर अली ज़ैदी- ईनाम (पृ. ६९५-६९५) इब्न आसी- फेर मनुक्खक की भेलै? (पृ. ६९६-६९७) रतन सिंह- बिना शीर्षकक (पृ. ६९८-६९९) सच्चिदानन्द कर- तितली आ प्रेम (पृ. ७००-७०१) प्रज्ञा महान्ति- मेमोरीचिप्स (पृ. ७०२-७०३) विनय कुमार दास- कर्मफल (पृ. ७०४-७०५) गायत्री दास- बुझौअलि (पृ. ७०६-७०७) मिनती प्रधान- संगी (पृ. ७०८-७०९) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- अपूर्वा, राम लोचन ठाकुर प्रसंग (पृ. ७१०-७२५) आशीष अनचिन्हार- पारंपरिक-प्रगतिशील (रामलोचन ठाकुर), अनचिन्हार लेल रामलोचन ठाकुर, ४ टा बीहनि कथा, बीहनिकथा की छै?, लॅाकडाउन केर कथा, पाठक हमर पोथी किए पढ़थि (पृ. ७२६-७४९) पद्य-खण्ड (पृ. ७५०-९१८) जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- किछु गजल (पृ. ७५१-७५३) ज्ञानवर्द्धन कंठ- किछु गजल (पृ. ७५४-७६२) सुभाष कुमार कामत- फाटल जिंस, जनगणना मे, हरायल गाम (पृ. ७६३-७६८) मुन्ना जी- बाल कविता- सुसंस्कार (पृ. ७६९-७६९) आशीष अनचिन्हार- किछु गजल (पृ. ७७०-७८८) आभा झा- अस्मिता, महामानव (पृ. ७८९-७९२) आकांक्षा कर्ण- बेटी हमर अभिमान (पृ. ७९३-७९४) सोनी कर्ण- बेटी (पृ. ७९५-७९७) रागिनी प्रीत- सखी (पृ. ७९८-८०२) रागिनी मनोरथ- शिक्षा (पृ. ८०३-८०४) प्रीति प्रभा- मनोरथ (पृ. ८०५-८०६) संतोष कुमार राय 'बटोही'- गड़बड़झाला (पृ. ८०७-८०८) अमर ठाकुर- आवाहन, मोमबत्ती (पृ. ८०९-८११) विभा रानी- स्तन, योनि आ गर्भाशय (पृ. ८१२-८१४) कल्पना झा- किछु छुटि गेल (पृ. ८१५-८१६) ममता कर्ण- बरसात, निर्भर, किताब, थाकल मजदूर (पृ. ८१७-८२८) आरती- प्रकृति (पृ. ८२९-८३०) सविता 'सुमन'- उमंग, उम्मीद, माँ (पृ. ८३१-८३६) आनन्द दास “गौतम”- नेतागिरी जारी अछि…, फागु (पृ. ८३७-८४२) सोनी दास- मौन (पृ. ८४३-८४४) कंचन कंठ- आराधना, जय माँ अंबे, शिक्षा (पृ. ८४५-८४९) महेन्द्र हजारी- से छथि रामलोचन (पृ. ८५०-८५२) नारायणजी- श्रद्धेय रामलोचन ठाकुरकें स्मरण करैत (पृ. ८५३-८५४) विनोद कुमार झा- राम लोचन हमर प्रेरणा (पृ. ८५५-८५७) बिनय भूषण- रामलोचन ठाकुरक झिझिरकोना आ... (१-५), आइ पिरथी दिवस अछि, आखिर एना कियैक लागि रहल अछि, माँक आँचरक स्नेहिल बसात..., कोरोना- काल मे माँ, मृत्युगीतक डेराओन राग, कुर्सीक चिन्ता आ कोरोनाक कहर, अप्पन-अप्पन ताल, यात्री (१-३) (पृ. ८५८-९१७) 2
गद्य खण्ड चित्र: प्रीति ठाकुर किशन कारीगर विलुप्त होइत मिथिला के लोक संस्कृति घोड़ा (कठघोड़वा) नाच आरौ तोरी के देखही रौ घोड़ा लथारो मारै छै? अच्छा चल त घोड़ावला के छू क देखबै? नै रौ अखनी खूब जोर स लथार फेकै हेलै बलू चोट लगतौ तब. इह कोनो देह टुटि जेतै की? कनि मनि चोट लगतै त कि हेतै रौ बाद मे देह झारि लेब कीने? छै़डा मारेड़, धिया पूता, बुढ़ पुराण सब कोइ गाम घर दिस बेस मोन स घोड़ा नाच देखै जाइ छलै. आब नै ओहेन घोड़े वला, नै ओहेन डफली बौंसली वला, आ नै ओहेन छमकी नटुए सब रहल आ नै आब तेहेन घोड़ीनाच रहलै? आ नै कतौ आब होइ छै. विलुप्त भेल जा रहलै घोड़ा नाच? पहिने गाम घर, छोट छिन बजार सब दिस घोड़ा (कठघोड़वा) नाच बेस लोकप्रिय रहै आ लोक मनोरंजन के सहज सोहनगर साधन रहै. डफली वला डफ डफ करै, बौंसली वला बौंसरी बजबै, कैसियो वला धुन बजबै आ नटुआ मेकप केने डांर लचका के नचै आ बीच मे घोरा वला अपना कांख मे रस्सी काठ बत्ति स बनल सजल घोड़ा के टंगने नटुआ संगे रमैक रमैक के नचै. घोड़ा वला नचैत नचैत बीच बीच धिया पूता दिसी हुड़ैक जाई, आस्ते स लथार फेकै आ छौंड़ा मारेर सब धरफरा के एक दोसर के देह पर खसै? कोइ धांई भटका खसै त कखनो के छौंडा सब घोड़ा वला के लथारो छू के देखै त घोड़ा वला आरो हुमैक हुमैक के अपना ताले बैंड के धुन पर नचै आ धिया पूता सब घोड़ा के मुँह नांगैर छू के अपनो एक दोसरा के धकैल दै छेलै एना जेना घोड़े वला लथार फेकने होई.आ धिया पूता बुढ़ पुरान, जनिजाति सब भभा हँसै आ घोड़ा वला नचैत नचैत हुड़कैत हुड़कैत सब दिस घूमि घूमि नाच करै आ ओकरा संगे नटुआ सेहो खूब नचै आ लोक मनोरंजन होइ. घोड़ा नाच काल लोक सब नटुआ आ घोड़ा वला के रूपैया पैसा दै, कतेक छौंड़ा सब त नटुआ के चोली मे आलपिन लगा दस पंच टकही खोंसि दै ताबे एम्हर घोड़ा वला हुड़ैक जाइ आ लोक धड़फरा के भगै आ उ ओकरा देह पर त कोइ ककरो देह पर धरफरा के खसै. नाच देखनिहार लोक सबहक किरमान लागल रहै आ लोक सब भभा भभा हंसै आ लोक सबहक नीक मनोरंजन होइत रहै. बुढ़ पुरान, जनिजाति, आ गामक गनमान्य लोक सब घोड़ा वला, नटुआ, डफली वला सबके हाथे मे रूपैया, खुदरा पाई द अशीरवादी बक्शीस दै जाइ छलै. पहिने मिथिला मे गाम घर दिसी बियाह शादी, मूरन, मांगलिक काज सब मे घोड़ा नाच अब्बसे होइत रहै. गरीब, गिरहस्थ, लोक सब घोड़े नाच वला के बजबै आ घोड़ा नाच सब जाति वर्गक लोक देखै छलै आ लोक मनोरंजन के नीक साधन रहै घोड़ा नाच. लेकिन आब ई घोड़ा नाच बिलुप्त भेल जा रहलै? बड्ड चिंता के गप जे लोक मनोरंजक घोड़ा नाच आब कतौ देखबामे नै अबै हइ. एकरा सरंक्षित करै लै सरकार आ मिथिला समाज के आगू आबए पड़तै. आब त गामे गामे डी जे बजैए, बाई जी नचैए, अरकेसरा होइए? त के चिंता करतै केकरा बेगरता परतै आ के देखतै घोड़ा (कठघोड़वा) नाच? कोन बिरड़ो मे उधिया गेल?कतअ हरा गेल मिथिला के नटुआ नाच? हौ कतए के नटुआ एलैइए? फलां ठाम के. इ कहू जे थेहगरीये टा की लटकियो नटुआ सब अएल छै? एह जेबै देखै ले तब ने? थेहगरही, लटकी, छमकी सबटा नटुआ एलैइए, ततेक नीक नचै जाइ हइ से छौंड़ा मारेर सब मारते रूपैया लूटबै जाइ छै आ नटुआ सब नाचै के त थैह थैह केने रहै छै. हं तब त हमहूँ जेबै नाच देखै लै एमकी मने नीक नटुआ सब एलैइए? मिथिला के लोक संस्कृति मे रचल बसल रहै नटुआ नाच जे लोक मनोरंजक रूपे बेस प्रचलित रहै. मूरन, उपनेन, बिआह दान, नाटक, नाच, छकरबाजी, अल्ला रूदल, दिवाली, छैठ जे कोनो उत्सव होउ ओइ मे नटुआ नाच अब्बसे होइ. आ लोक नटुआ के साज सिंगार, लटक झटक, अदाकारी देख के ओकर नाचब देखै, नटुआ संगे नाइच के आनंदित होइत रहै आ लोक मनोरंजन के नीक साधन रहै. हमरा मोन परैए जे हमर गाम मंगरौना के दुर्गा पूजा मे भटचौरा के नाटक पार्टी, विरदाबोन के नाच पार्टी सब अबै. दुनू के नटुआ सब तेहेन लटक झटक वला, रोल खेलै वला नटुआ सब रहै जे अपन अदाकारी स देखनिहार के मोन मोहि लै. आ लोक खुशी स झूमि के नटुआ के इनाम दैत रहै. अनदिना त मूरन, बिआह, सब मे बाबूबरही के फूल हसन बैंड पार्टी अबै . उ बैंड वला बेस नामी आ तेकर नटुआ उसमान हुसेन खूब नीक नटुआ रहै ओकर नाचब देखै ले त लोक सौंसे गामक लोक सब अबै. नटुआ नाच के प्रचलित प्रकार.. 1. रोल खेलिनहार नटुआ- एकरे सब के बोल चाल मे लोक सब थेहगरी नटुआ कहै जाइ छै. इ सब अनुभवी आ उमेरगर कलाकार सब होइ जे अपना नाचब अभिनय आ बेहतर संवाद स लोक के बेस प्रभावित करै जाइ. नाटक देखनिहार लोक सब एकरा मे अपना समाजिक संबध माए, बहिन, भौजाइ, आदि के छवि देखै जाइत रहै. पाठ (रोल) खेलाएब शुरू करै स पहिने इ नटुआ सब मेकअप, सैज धैज के स्टेज पर अबै आ कहै जाइ हे बाबू भैया सब, हे माता बहिन, अहाँ सब अशीरवाद करै जेबै. लोक इ संवाद सुनि के जोड़दार थौपड़ि तालि बजबै जाइ आ मोने मोन नटुआ के अशीरवाद दै लोक सब जे आइ नीक रोल खेलेतै. नीक नाटक, नाच देखब सुनै जाएब. रोल खेलाइत खेलाइत उ थेहगरही नटुआ सब दर्शक बीच मे अशीरवादी मंगै ले अबै आ लोक सब के दस, बीस, पचास जे जुड़ै से नटुआ के चाबस्सी रूपे दै. 2. लटकी नटुआ- नामक अनरूपे इ सब तेहेन सजल धजल रहै आ नचैत काल तेहेन लटक झटक करै जे छौंड़ा मारेर सब त एकरा पर फिदा भऽ जाइत रहै. एतेक फिदा जे नटुआ के कोरा मे उठा लेब, ओकर गाल छूअब, नटुआ के चोली मे आलपिन लगा रूपैया खोंसि देब आ लटकी नटुआ संगे छौंड़ा मारेर के खूब नाचब बेस रमनगर लगै. बूढ़ पुरान सब सेहो तरे आंखि नटुआ सब पर मोहित होइत रहै आ छौंड़ा मारेर सब पर झूठो खिसियाइ जाइ जे हे तूं सब नटुआ के बेसी नंगो चंगो नै करै जाहि की ताबे छौंड़ा सब नटुआ के बुढ़ पुरान दिस हुलका दै आ खूब पिहकारी होइ. बुढ़ो पुरान सब नटुआ के नीसा मे डूबल देह हाथ डोला के थोड़ बहुत नाचै आ नटुआ के बक्शीस दै. अइ लटकी नटुआ सबहक साज सिंगार, इनाम भेटला पर शुक्रिया अदा करब के आगू त फिल्मी कलाकार सब फिका बूझना जइतै. जिन बलमा ने दिया रूपैया मैं रखूंगी चोली मे सम्हाइर के, अठ्ठनी हमरा गाल पर आ रूपैया हमरा माल पर.आ तेहेन ने लटक झटक स लोक के मोन मोहि लै जे नवयुबक सब फिदा भऽ जैत रहै. छौंड़ा मारेर सब त अइ लटकी नटुआ सब मे अप्पन प्रेमिका, बहुरिया, भौजाइ आदि के छवि देखै आ बेस लोक मनोरंजन मे डूबल रहै. इ नटुआ सब नाटक, नाच, बैंड पार्टी मे रहैत रहै जे सब गेबो करै आ खूब नचबो करै जाइ. 3. छमकी नटुआ- इ छमकी सब त रेकार्डिंग डांस कला फिल्मी गीत पर तेना छमा छम नचै जे लोक सब सुइध बुइध बिसरा जाइ. एना एकटिंग करै जे लोक के होइ फिलिम देखै छि. कोठे उपर कोठरी उस पर रेल चला दूंगी, बस एक को कुंवारा रखना, मैने जो घूंघरू बांध लिए सब पर तेहेन रिकार्डिंग डांस होइ से छौंड़ा सब सेहो नचै लगै, खूब पिहकारी सिटी बजै आ लोक रूपैया इनाम दै.शेरो शायरी. रेकोडिंग डांस के जमाना एला पर छमकी नटुआ सब बेस लोकप्रिय भेल रहै. इ सब सब तरहक गीत पर मनमोहक डांस करै जाइ छलै. 4. नटुआ- इ नटुआ सब बैंड पार्टी, छकरबाजी, नाच पार्टी, ढोल पिपही पार्टी, अल्ला रूदल सबमे रहैत रहै जे पारंपरिक वेश भूसा, पारंपरिक नाच लेल बेस प्रचलित रहै. सजल धजल मेकअप केने चोली पर रूपैया टंगने समाजिक लोक मर्यादा के मान रखने इ नटुआ सब नचै आ लोक के मनोरंजन करै जाइ. हमरा मोन परैए स्कूलि जीवन मे गाम घर दिस प्रसिद्ध नटुआ सब जेना रामउदगार, रामदुलार पासवान (दुनू सहोदर रहै), सीरिदेब पंडित, उसमान हुसैन, बनैया राम, बबलू मंडल आदि लोक कलाकार सब जेकर नटुआ नाच देखै लेल लोक दूर दूर स अबै. कतेक कलाार सब त अाब अइ दुनिया मे नै रहलै तइयो जे कलाकार सब बांचल छै हुनका प्रति आदर दिर्घायु हेबाक कामना करैत छि. गाम घर मे नटुआ त सब के मन मोहि लै जेना? नटुआ सबके मेकअप करैत काल धिया पूता के हुलुक बुलुक करब, छौंड़ा मारेर सब के नटुआ मेकअप रूम के पहरेदारी करब, बुढ पुरान सब तकतान करै मे जे नटुआ सबके बेसी नंगों चंगो नै करै जाही, फेर पिहकारी हंसि ठहक्का जे लोकरंग रहै से नटुआ नाच के आरो जीवंत बना दै. मिथिला समाज लोक कलाकार प्रति सब दिन उदास रहल. बात बात मे दुत्कारि देब जे पढबें लिखमै की नचनीया बजनिया बनमैं? त एना मे के अइ कला सबके जियाअ कए के राखत? भोजपूर वला सब नटुआ नाच (लौंडा डांस) के जियाअ के रखलक त देखियौ जे रामचंद्र मांझी के पद्मश्री अवार्ड भेटलै. आ अपना मिथिला वला सब नटुआ के हेय दृष्टिये देखलक ओहेन प्रोत्साहन नै देलक त आब नटुआ नाच कलाकार नैंहे भेटत? बड्ड भेल त नेपाल,बंगाल,यू पी स बाई जी मंगा के लोक नचा लैइए सैह टा? नटुआ नाच के पारंपरिक रूप आ उत्सव बला सुआद डीजे, बाई जी मे किन्नौ ने भेटत? असली आनंद त नटुआ नाच मे देखाएत यदि तकियौ त? मिथिला समाजक लोक चिंता कए के देखियौ जे नटुआ नाच के जिआ के राखै परत. नटुआ कलाकार के प्रोत्साहन देबाक अभाव मे, बड्ड दुखक आ चिंता के गप जे एहेन लोकरंग वला नटुआ नाच आब कतौ हेरा गेल जेना? डी जे, अरकेसरा बाइ जी के बिरड़ो मे कतौ उधिया गेल नटुआ नाच? भोजकाजी मनेजर (हास्य कटाक्ष) बसहा बड़द पर बैसल बाबा बज़बड़ाइत रहै जे एहने कहूं मनेजर भेलैइए? एतेक दाबी त पैंजाब आ स्टेट बैंक वला के नै देखलियै रूपैया छोड़बै काल? एकरा सब के त बैंको वला मनेजर स बेसी दाबी भऽ गेलै. इ सब गाम घर मे रहैए तेकर माने की भोज काज मे मनमाना करै जाएत? से नहि चलअ देबै आब? बाबा तामसे अघोर भेल बजैत दमसल चलि जाइत रहै. रस्ता मे बाबा भेंट भेलैथ त हम हाल चाल पूछली की समाचार यौ बाबा? बाबा बजलै अंगोरा धधकल्हा. हौ कारीगर तंहू की हमर मन अघोर करै पर उतारू भेल छह? तोरा मीडिया वला सब के त एहने ख़बैर मे मोन रमकल रहै छह की आ लगले ब्रेकिंग न्यूज बना दै छहक. पहिने एक जूम तमाकुल खुआबह त कहै छिअह? बाबा कतबो तामस मे रहौ की मोन अघोर रहै त तइयो कारीगर भेंट होइ त मोन हलूक आ तामस कम जरूर भऽ जाइ की. आब ब्रेकिंग न्यूज़ बनेबा लोभ मे बाबा के तमाकुल बना के खुएलहुँ? फेर बाबा के पुछली जे कि सब होल कैले खिसियाएले रहली ग. तमाकुल खाइत मातर बाबा पूरा घटनाक्रम एकसूरे कहअ लगलै. हौ कारीगर की कहियअ काल्हि एकटा सराधि भोज खाई लै गेल रही. छौंड़ा मारेर सब बारिक रहै त रमकल फिरै? कोनो पता मे देलकै किछो कोनो छूटियो गेल. फुँसियाहिक हो हो बेसी होइत रहै. भोजकाजी मनैजर झूठो के बारिक छौंड़ा सब पर दमसै जे सब पता दिसी सब किछो परस, बेरा बेरी घूम. असल मे त ओइ मनेजरे के सिखाउल विद्या रहै जे मूँहे कान देख पता मे परसै जंहियै आ दौगल फिरिहें. आ ठीक सैह होइत रहलै. हम बाबा के पुछलौंह जे अंहा पांत दिस अहगर के रसगुल्ला अएल रहै की ने? बाबा फेर तमतमाइत बजलाह जे एक आध बेर लालमोहन एक बेर रसगुल्ला एलै. आ दोहरबै लै कहलियै त छौंड़ा सब कहलक जे बाबा आब त दही चिन्नी उठि गेलै? तोंही कहअ त केना तामस ने उठत? एना कहूं करब भेलैए भोजकाजी मनेजर सबके जे अपना चिन्हा परिचे वला गिरोह दिसी सब किछो दोहरा तेहरा दै छै. कतेक खेबो करै छै आ चोरा के लोटो मे भरि लअ जाइए? आ जेकरा चिन्हा परिचे ने तेकरा पता दिसी बेर निबदी धअ लेतह की? ओहिना जेना बैंक मे रूपैया छोड़ेबा काल बैंक वला कहतअ जे लिंक फेल तहिना इ भोजकाजी मनेजर सब भांज पूरबै मे रहतह की? सराध होउ एहेन भोजकाजी मनेजर सबहक? पोसलाहा छागर सब आई गेले घर छह? (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत चल जाइत रहै जे हे पोसलाहा खस्सी सब? आई त गेले घर छह? पूजा होइ टा के देरी छै? तकरा बाद खरांस स गर्दैन उड़ा देल जेतह? ताबे भागेसर पंडा बमैक गेल जे अहां किए एना खस्सी सबके मोन भांगठ करै पर लागल छियै? भगवति स्थान मे ज खस्सी मूड़ि नै डोलबै त बैइल कोना चढ़तै? बाबा सेहो तामसे तमतमा क तामसे फाइर भेल बजलै अईं हौ भागेसर इ कहअ त भगवति ई कहै छथुन जे बैइल चढाबह? की अपनामने तूं सब तितमहा करै जाइ छह जे भगवति नाम पर पोसलाहा खस्सी के चढ़ा सांझे स माउस गबर गबर भोकसब की ने? आ बहन्ना जे भगवति के बैइल चढाएब. कहअ त भगवति कहूं कहथिदिन जे हमरा बैइल चढाबह? एतेक कहूँ बैइल चढाएब भेलैए जे दुर्गा स्थान मे लाइन लागल रहै छै? बाबा आ भागेसर मे कहा कहि होइत रहै. भागेसर कहै बाबा अहाँ के एको रति धर्म कर्म दिया नै बुझै छियै? बाबा बजलै हौ ताबे तोंही कोन बड्ड नेहाल कए देलहक आ समाज स अंधविश्वास के हटा देलहक? भागेसर बाजल यौ बाबा सब दिन स जे होइत एलैए से लोक केना छोइड़ देतै? बाबा कहलकै हौ भागेसर जा जा कि बेमतलबक हमरा संगे डिस्कस करै मे लागल छहअ? जल्दी दुर्गा स्थान जा नै त छागरक सीरा कमीटी वला ध रखतअ त तोरा कीछो फैबो ने लगतह? जा तंहू छागर पोसनहे छह त लगले दुर्गा स्थान भऽ आबह? भागेसर बाजल हम जाएब सै अपना मने की अंहा मने? एम्हर कहा कही होइते रहै बाबा के मोन रंज भेल रहै की ताबे हमहूँ बाबा लक पहुँचलौ आ एक लोटा जल चढा देलियैन? की बाबा आरो अघोर भेल बजलै कोन उलुआ सब छी जे बेरो कुबेरो जल चढा दैइए? अखैन लोक बैइल चढबै लै जाइए आ एकरा जल ढारबाक तार छै? के छियअ हौ? हम बजलहुँ यौ बाबा हम छि कारीगर. ई सुनि बाबा के कनी तामस कम भेलै कहलकै जे अच्छा तूं छियअह तोरो अखुनके बड्ड तार लागल छेलह? एकटा काज करह कनी एक बाल्टी पाइन आनि के बसहा बरद के पिया दहक आ कनि एक जूम तमाकुल खुआबह. भागेसर पंडा त अपने एक बाकुट तमाकुल खा गेल आ हम मंगलियै त कहलक जे आब चुनैटी मे तमाकुले नै अछि? ई सुनि भागेसर फेर बमैक गेल जे बाबा अहाँ खाली हमरा बेज्जैत करै पर लागल रहै छी की? बाबा बजलै एह हमरा कहबाक भावार्थ बुझलहक नैहें? कहबाक ई जे जहिना एक बाकुट तमाकुल एक्के बेर नै खेबाक चाही तहिना ओतेक छागर के बैइल नै देबाक चाही? भागेसर तैइओ बाजल बैइल हेबाके चाही की आ डिस्कस करअ लागल. हम भागेसर के समझा बुझहा के शांत करौलहुँ आ फेर तमाकुल चुना एक एक जूम बाबा आ भागेसर पंडा के देलियै. बाबा स पुछलहुँ जे की भेल जे अहाँ भागेसर संगे डिस्कस मे लागल छी बेमतलबो. बाबा बजलौ हौ कारीगर हम त सुप्पत गप कहै छियैअ त भागेसर बेमतलबो डिस्कस मे लागल यै? हम बजलहुँ यौ बाबा सोझ साझ फरिछा के कहू जे भेल की? बाबा हां हां क हँसैत बजलै हौ कारीगर तहूं पत्रकार भऽ एते खाने बुझहै छहक? आईं हौ आई सतमी मेला छियै त गाम घर दिस दरबज्जे दरबज्जे पोसुआ छागर देखलहक की ने? हम कहलियै जे हँ देखलियै त कएटा दरबज्जा पर दू दू चारि टा के? बाबा बजलै देखिहक जे अष्टमी नौमी दिन त आरो ततेक बैइल चढबै जेतै से दुर्गा स्थान खूने खूनाम अनपट लागल रहतै? बाबा कहैअ लागल एह अखैन देखबहक जे सब खस्सी के खूब मान दान करतह की, कटहर पत्ता, घास, जिमरक पत्ता, की की ने खुएतह? एतेक दिन लोक डाइलोक माइरतह जे बकरी खस्सी छोटका जाइत सब पोसै जाइए आ अखनी त बड़को जाइत सब बैल चढबै दुआरे छागर पोसअ लागल. अइ गप के फेर जातिवादी नै बना दिहक, तूं सब यथार्थ बुझने बिना अकानह नै लगिहअ? हे देखहक त भागेसरो पंडा दू टा छागर पोसने अछि आ दुनू भगवति के चढौतै. एकटा अपना आ दोसर बेटा साति. कहअ त भगवति कहूं कहथिहिन जे हमरा बैल चढाबह? दरबज्जा पर खस्सी देख हम एतबा त बाजल रही जे हे छागर आई तों सब गेल घर छह? पूजा होइतै मातर खरांस स गर्दैन उड़ा देल जेतह? यैह गप सुनि देखै छहक भागेसर के बेटा सरवेसर हूर उठा देलकै आ भागेसरो हमरा स लड़ै लै एलैह जे अहां छागर के भरकबै मे लागल छियै? सोनी कर्ण- विराटनगर स्त्री विमर्श के परिभाषा आर अवधारणा स्त्री शब्द के विश्लेषण एहि प्रकार कय सकैत छी, जेना कि स्त्री शब्द एक महिला व नारी के प्राकृतिक रूप में जनेवाक वैज्ञानिकता क रूप अछि। ओना मानव रुपे स्त्री पुरुष के संयुक्त बोध अछि परञ्च लिंग रुपे दुहु अलग अलग अछि। सृष्टिक बड पैघ महत्त्व स्त्री के छनिह। तहिना विमर्श शब्द हिन्दी एबं मैथिली मे एके अछि त अंग्रेजी शब्द एकर डिस्कोर्स के पर्याय अछि ।लेटिन discursus शब्द स् discours शब्द लेल गेल अछि जकर अर्थ संवाद,वार्तालाप, एबं विचारक आदान प्रदान हएत अछि। एही विमर्श के discurasive नहि मानबाक चाहिँ। आब स्त्री विमर्श के अवधारणा सतत् इएह अछि जे अक्सर मध्यम वर्गीय स्त्री पर केन्द्रित हएत अछि।प्राचीन काल स् पुरुष क दासता के अधीन मे रहैत आधुनिक युग काल मे पुरुष क दासता मे स्त्री के दबल अधिकार के विरोध स्वरूप उठल आवाज स्त्री विमर्श के रूप में लेल जा सकैछ।समाज मे पुरुष के भेटल अधिकार , सहुलियत समान रूप में नारी वर्ग के सेहो भेटक चाहिँ आ एहि प्रकरण में स्त्री सभ अपन आवाज बुलन्द करैत अपन अधिकार क सुनिश्चिता हेतु मांग हर क्षेत्र स् उठि रहल अछि आ एहि के आब नजरअन्दाज केनाई समाजक विकास में अवरोध केनाई अछ।लैंगिक समानता एहि आधुनिक एबं वैज्ञानिक काल के हेतु अपरिहार्य अछि।पुरुष जका समान काम मे समान पारिश्रमिक वेतन भेट्व,यौन उत्पीडन,घरेलु हिंसा , समाजिक एबं पारिवारिक भेदभाव बन्द आदिक विरोध क मुद्दा प्रमुख अछि।समाज मे स्त्री मात्र एक संख्यात्मक नहि अपितु पुरुष समान केन्द्रित होमय चाहैत छ्िथ आर एहि के अपन अस्तित्व क आधार स्तम्भ के रूप में शशक्त लड़ाई क रहलीह अछि करैत छ्िथ, जे स्त्री विमर्श के मुखर भ रहल अछि। पाश्चात्य सन्दर्भ, पुरुष क समकक्षी स्त्री सभ के राजनीतिक,सामाजिक,शैक्षिक समानता के आन्दोलन किछु वर्ष स् नारीवाद स् जानल जाइत अछि जकर आंगल शब्द अंग्रेजी मे feminism प्रचलन में अछि।नारीवाद बहुत सार्थक एबं उपयुक्त अछि। उपरोक्त आन्दोलन ग्रेट ब्रिटेन आर संयुक्त राज्य अमेरिका स् सुरु भेल जे 18वी शदी मे मानवतावाद आर औद्योगिक क्रान्ति के रूप में देखल जाईत अछि।नारी सभ पुरुष क अपेक्षा शारीरिक एबं बौद्धिक रुपे कमजोर बुझवा में छल आ स्त्री जे हीनतर रूप में बुझैत छल जे एकटा बहुत पैघ अवमानना छल।कानुन एबं धर्मशास्त्र मे नारीक पराधीनता के पुरुष वर्ग अपन श्रेष्ठता कायम रखबाक हेतु गलत व्याख्या करैत नारी के पराधीनता के जंजीर मे जकरने छल।नारी सभ अपन नाम स् रुपन्ति नहि राखि कोनो तरहक व्यवहार कय सकै छलिह। अपन संतान एबं स्वयं पर कोनो अधिकार व नाम नहि सकैत छलिह। यद्दपि स्त्री क व्यापक अवसर प्रदान करबाक पहिल आवाज उठल जाहि में महतवपूर्ण दस्तावेज महिला के अधिकार क बहाली बास्ते सन् 1729ई में बनल छल।फ्रांसीसी क्रांति के समय मे महिला सिलिकन क्लाबो के मांग छल कि आजादी,समानता आ भातृत्त्व के व्यवहार विना कोनो लिंग भेद लागू होमक चाहिं मुदा एहि आन्दोलन के ओहि समय मे नेपोलियन क संहिता अयला स् कमजोर पडि गेल। उत्तरी अमेरिका में अबिजेक एडम्स आ मेरी औस्टिस वारेन, जार्ज वाशंिगटन आ रामस जैफरसन पर दवाव पडल जे नारी मुक्ति क बात संविधान मे शामिल कएल जाय।नारीवाद आन्दोलन वास्तविक रूप में सन् 1848ई में प्रारम्भ भेल, आही समय मे एलिजाबेथ कैंडी स्टेण्डन, लुक्रेसिया कफिन मोर आ किछु अन्य सव न्यूयार्क में एक महिला सम्मेलन कय क नारी स्वन्त्रता क घोषणा पत्र जारी कयलनहि जाहि में पूर्ण कानुनी समानता,शैक्षिक एबं व्यावसायिक अवसर समान मुआबजा आ मजदूरी क अधिकार तथा वोट क अधिकार के मांग भेल छल। एहि के पूर्व मे स्त्री विमर्श बात मध्यम वर्गक नारी के विषय मे जिक्र भेल अछि। पैघ तथा नम्हर कारण जे साहित्यकार आर विमर्शकार व्यक्तित्व स्वयं मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि स् अधिकांश जुडल छ्िथ आ एहि स् एकर वर्णन व व्याख्या नहि भ सकैत अछि। एहि मे गढल मानसिकता महिला क छवि एबं प्रतिनिधित्तव उपनिवेशी दौर के मानसिकता अछि। स्त्री मुक्ति क अवधारणा मध्यम वर्गीय केन्द्रित बहस क विषय अछि।स्त्री स्वतन्त्रता क संघर्ष दैहिक आ आर्थिक स्वतन्त्रता मे सीमित अाबि रहल अछि।परम्परा रुपे आत्मनिर्भर नहि छ्िथ। यौनिकता एबं स्त्रीत्व सम्बन्धी भ्रम में जीबैत आवैत छथि।महिला के मानसिकता शारीरिक एबं यौन रूप में महिमामन्डित मध्यम वर्गीय स्त्री मे खास क भेल अछि। एहि के चर्चा वैचारीक बहस नहि हएत अछि आ एहि के विमर्श क बात नदारद अछि, हासिए पर अछि। दलित वर्ग क स्त्री स् स्त्री विमर्श क बात आशापल्वित अछि कारण ई महिला सभ अपन अधिकार बास्ते संघर्ष के महत्त्व दैत संघर्षरत रहैत छथी। किछु पढल लिखल कीछु महिला विमर्श पर मुख्य रूप स जुडल रहै त छथि, परञ्च मध्यम वर्गीय महिला सभ आत्मनिर्भरता एबं यौन सूचिता स् जुइझ रहल छथि। आव प्रश्न मात्र एहि तरहक स्त्री के नहि अपितु विमर्श के चरित्र स् अछि। जौँखन राष्ट्र के सामाजिक संरचना वहुस्तरीय अछि तहिना हालत में केअो कोनो विमर्श क स्तर एकटा अथवा एक स्तरीय कोना भ सकैछ ।विमर्श के सभटा स्तर के प्रतिनिधित्वक विचार करक चाहिं। विचार क सुलेमिथ फयरस्टोन क अनुसार टेस्टट्युब द्वारा सन्तान उत्पादन स् स्त्री मुक्ति क अवधारणा विकसित करय में बल दायी अछि,सक्षम एबं सक्रिय वास्ते बलप्रदान करैत अछि।स्त्री क मातृत्तव के स्त्री क पराधीनता नहि मानि जीवन के स्वाभाविक बात अछि जे कीछु हद तक स्वीकार्य एबं अनिवार्य बात थीक। रमा नाथ मिश्र लघुकथा- पुनर्जन्म (ई कहानी आ ऐ कहानी के सबटा पात्र एवं घटना पूर्णत: कल्पित अछि।) पटना कौलेज मे गरमी छुट्टी से ठीक एक दिन पहिने टीचर्स रूम मे प्रोफेसर सब गप- सप मे लागल छलाह। एक मासक छुट्टीक खुशी सभक चेहरा पर स्पष्ट देखा पड़ै छलनि। गप्पे-गप्पे मे मनोविज्ञान के प्रोफेसर बिन्देश्वरी बाबू बजलाह, " अहाँ सब के बूझल अछि , मनुक्खक पुनर्जन्म होई छै?" केशव राय ,इतिहास के प्रोफेसर बजलाह, " एहेन भ नै सकैये।" बिन्देश्वरी बाबू कहलखिन्ह ," हम एहि विषय पर रिसर्च क रहल छी।" अँग्रेजी के प्रोफेसर दिनेश सिंह कहलखिन," ओना सुनै मे ठीके पुनर्जन्म के बात कपोल कल्पना लगै छै। लेकिन हमरा एकटा सत्य घटना बूझल अछि। सब आश्चर्य से दिनेश सिंह दिश तकैत पुछलखिन, "केहेन सत्य घटना?" दिनेश बाबू कहलखिन," पैंतालीस बर्ष पूर्व अही कौलेज के छात्र - रमेश त्रिपाठी आ छात्रा - कुसुमा फुकन के कहानी। सभक आग्रह पर दिनेश बाबू कहल खिन ठीक छै, सुनू । ******** ***** ******* सब नि:शब्द आ एकाग्र भ के कहानी सुन लगला। आई से पैंतीस बर्ष पहिने कौलेज सब मे एडमिशन के भीड़ लागल रहै। ओई दिन पटना कौलेज मे एडमिशन ले काउन्टर पड़ हम रमेश त्रिपाठी चारिम नम्बर पर रही, लाईन मे हमरा से आगू कल्पित फुकन, ओकर आगू दीपेन्द्र झा आ काउन्टर के मुँह पर देवनाथ सिंह छले। हमर विषय छले अर्थशास्त्र आनर्स । लगभग एक घंटा मे हमर एड मिशन भ गेल। एक सप्ताह के बाद कौलेज के होस्टल सेहो भेट गेल। एहेन संयोग जे हमरा , रमेश त्रिपाठी, दीपेन्द्र झा आ देवनाथ सिंह , चारू गोटा के एके होस्टल के एके रूम मे जगह भेट गेल। कल्पित फुकन हिस्ट्री आनर्स, दीपेन्द्र झा अँग्रेजी आनर्स आ देवनाथ शर्मा हिन्दी आनर्स के छात्र छला। कौलेज सब गरमी छुट्टी के बाद खुजि गेल छलै। अगिला दिन कौलेज जाई काल कल्पित फुकन से परिचय भेल। कल्पित फुकन असम के कोकराझार जिला के छोट- सन शहर गोसाईं गाँव के निवासी छले। ओकर पिता रेलवे मे गार्ड छलखिन्ह आ रेलवे कालोनी मे हुनका रेलवे के क्वार्टर छलैन। तैं कल्पित के होस्टल के आवश्यकता नै रहै|हम सब अपन-अपन पढ़ाई मे लागि गेल रही। रविदिन कल्पित फुकन होस्टल मे हमरा सबसे भेंट करै ले आएल रहे। हमर रूम- मेट सहित सब से खूब गप-सप आ परिचय के आदान-प्रदान भेल। कखैन आ केना ककरो से प्रगाढ़ मित्रता भ जाई छै से बुझनाई कठिन छै। कल्पित हमर बहुत नीक मित्र बनि गेल छल। ऐ बीच कुसुमा के सेहो पटना कालेज मे अँग्रेजी, पोलिटिकल साईन्स और अर्थशास्त्र विषय सब सहित इन्टर मे नाम लिखा गेलै। कल्पित फुकन बहुत सज्जन व्यक्ति छले।हम सब अधिक काल कौलेज संगहिं जाय लगलहुँ। लगभग एक मासक बाद, रविदिन , संध्या काल कल्पित फुकन हमर होस्टल आएल आ आग्रह पूर्बक अपन आवास पर ल गेल। अपन माय आ बहिन से परिचय करौलक। कुसुमा के भगवान बहुत फुर्सैत से गढ़ने छलखिन। ओकर मुँह पर से आँखि हटौनाई मुश्किल छल। ओकर पिता ट्रेन ल के मुगलसराय दिश गेल छलखिन्ह तैं भेंट नै भेला। करीब एक घंटा के बाद हम कहलियै, कल्पित! आब हम जाई छी । लेकिन कल्पित के माय कहलनि," नै बिना भोजन केने नै जाएब।" हम भोजन केलाक बाद होस्टल वापस आबि गेलौं। भरि राति कुसुमा के चेहरा हमर मस्तिष्क मे घूमैत रहल। ओकरबाद गार्ड साहेब के डेरा पर हमर एनाई- गेनाई बढ़ि गेल। दुर्गा पूजा के अवकाश मे हम छ: दिन ले अपन घर मुंगेर गेल रही। ओत माय के कल्पित , कुसुमा सभक चर्चा केलियै । हम कुसुमा से विवाह करै के अपन इच्छा कहलियै। हमर माय कहलक जे हमरो ओकरा देखै के इच्छा होईए। हम कहलियै," हम अखैन त पटना जाई छी , कोनो शनि रवि के एबौ आ तोरा सब के ल जेबौ। पटना एलाक बाद पढ़ाई के प्राथमिकता के देखैत हम अपन माय के पटना नै अनलियै। दू साल देखैत - देखैत बिति गेल छलै ।हमर सभक परीक्षा के बाद रिजल्ट आबि गेल छले। हमरा बि.ए आनर्स मे फर्स्ट क्लास भेल। कल्पित गार्ड के नौकरी करैत सेकेंड क्लास से बी.ए केलक । कुसुमा फर्स्ट डिबीजन से आई. ए. पास क गेल छले। कुसुमा के आगाँ अँग्रेजी पढ़ी आ बैंक मे नौकरी करी से इच्छा रहै। तैं ओ अँग्रेजी आनर्स के संगे बी. ए मे नाम लिखा लेलक। आ हम अर्थशास्त्र मे एम.ए. मे नाम लिखा लेलौं ।सोम दिन हम भिनसर अपन घर मुंगेर से आएले रही आ झट- पट कौलेज जाईले तैयार भेलौहें कि कुसुमा हमर रूम के आगाँ ठाढ़ छले। कहलक , संगे कौलेज जाएब। दुनू गोटा विदा भेलौं, रस्ता मे कहलक ," हमरा सबके बिहू पावनि मे कोकड़ाझार - गोसाईं गाँव जेबाक अछि। दस दिन के बादे वापस आएब। ओत हमर कका सब हमर माँ के दबाब द के हमर वियाह करा देत से कोनो ठीक ने। कौलेज से वापस एलाके बाद हम कुसुमा के संग ओकर घर गेलौं।ओकर माँ के कहलियै, हम कुसुमा के ल के काल्हि मुंगेर जाई छी अपन माँ- बाबूजी के देखा के साँझ तक वापस आबि जाएब। कल्पित कहलक , चल हम और माँ सेहो संगे चलै छी। सब फाईनल कईए के आएब। अगिला दिन भिनसरे हम सब मुंगेर गेलौं। हमर बाबू मिडिल स्कूल के हेडमास्टर छलाह। ओ स्कूल चल गेल छलाह। हमर माँ कुसुमा आ ओकर माय के संगे गप- सप मे लागि गेल। हमर माँ- बाबू के कुसुमा सब तरहे पसिन्न पड़लनि। दोसर दिन हम सब पटना वापस आबि गेलौं। कल्पित के कोकड़ाझार के गोसाईं गाँव स्थित पैतृक घर से बिहू पावनि के बीच मे शुभ दिन मे हमर आ कुसुमा के विवाह संपन्न भ गेल। हमर माँ बाबू जी, हमर आठ साल के बहिन आ हमर दूटा कका के परिवार के ओहिठाम के आदर सत्कार आ लोक सभक स्वभाव बहुत नीक लगलै। विवाहक पाँचम दिन सब पटना आबि गेलौं। हमर आ कुसुमाक विवाह के तीन बरख बीत चुकल छल। हम दु बरख से भागलपुर विश्वविद्यालय मे अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के पद पर कार्यरत रही। कुसुमा बी. ए केलाके बाद दोसर प्रयास मे स्टेट बैंक के प्रोबेशनरी आफीसर भ गेल छली आ पटना मे बैंक के मुख्यालय मे नियुक्त छली। कल्पित फुकन के बदली खड़गपुर भ गेल छलै। हम आ कुसुमा पटना मे किराया के डेरा ल के रहैत रही।। छ मासक बाद कुसमा के बदली भागलपुर मेन ब्रान्च मे भ गेलै त हम सब भागलपुर मे डेरा ल लेलौं। लगभग दू बरखक बाद, जून मास रहै। कल्पित फुकन के टेलीग्राम आएल जे ओकर विवाह नौगांव, असम मे फाईनल भ गेलैये। हमरा सबके दू दिन के बाद ट्रेन से संगहिं ल जाएत से तैयार रहै ले। कुसुमा आ हम दुनू गोटा एक सप्ताह के छुट्टी ल लेलौं । कल्पित के संगे हम आ कुसुमा नौगांव चल गेलौं।कल्पित के विवाह धूम- धाम से सम्पन्न भ गेलै ।ओकर दोसरा दिन कुसुमा कहलक, " वापसी मे अपना सब कामाख्या मे दू दिन रहि के माता के दर्शन आ ब्रह्मपुत्र मे स्नान करब , गौहाटी घूमि लेब तेकर बाद भागलपुर जाएब। तेसर दिन हम सब गौहाटी आबि गेलौं। कुसुमा के कहल अनुसार हम सब पहिने गौहाटी घूमि लेलौं । कुसुमा कहलक, " जे कोनो पति- पत्नी संगे- संग माता कामाख्या के दर्शन आ ब्रह्म पुत्र मे स्नान करैये ओ सात जनम तक संगे रहैये। एकदिन गौहाटी मे रुकि के अगिला दिन भिनसरे हम सब कामाख्या आबि गेलौं। स्नान करै से पूर्ब गर्भ- गृह के बाहर से हम दुनू गोटा माता कामाख्या के प्रणाम केलौं।ओकर बाद ब्रह्मपुत्र मे स्नान करै ले उतरलौं। कुसुमा हमर हाथ खूब कसि के पकड़ने रहेठेहुन भरि पानि मे नीचा उतरलहुँ कि नदी मे बहुत जोड़ के लहरि एलै । तत्तेक वेग रहै जे कुसुमा के हाथ हमर हाथ से छूटि गेलै। हम बताह जकाँ ओकरा पकड़ै के कोशिश करैत रहलियै लेकिन नै पकड़ाएल। ओतै के पण्डा सब मे से एकटा नदी मे कूदि के कुसुमा के बचबै के बहुत कोशिश केलक लेकिन सब व्यर्थ । ब्रह्मपुत्र के वेग मे कुसुमा विलीन भ गेली। हम किंकर्तव्यविमूढ़, बिना खेने- पीने मन्दिर के पहाड़ी पर बेहोश भ गेल रही। दू दिनक बाद एकटा देवदासी हमरा कोनो तरहे होश मे अनलक। हमर दुनियाँ उजड़ि गेल छल। पण्डा सब कहलक जे एत अहि तरहे बैस के अहाँक पत्नी वापस नै औती । धैर्य राखू आ अहाँ जत से आएल छी ,वापस जाऊ। देवदासी ,जे हमरा होश मे अनने रहे, कहलक जे एत्त ब्रह्मपुत्र मे डूबि के जेकर मृत्यु होई छै ओकर पुनर्जन्म होई छै। अहाँ अही तिथि के प्रत्येक बर्ष माँ कामाख्या के दरबार मे अबैत रहब त अहाँ के अपन पत्नी जरूर भेट जेती। दुखक पहाड़ लेने हम भागलपुर वापस चल एलौं।देवदासी के कथन के अनुरूप कुसुमा के मृत्यु के तिथि पर हम प्रत्येक बर्ष माँ कामाख्या के दर्शन करै ले जाए लगलौं। हमर मित्र सब हमरा बुझबैत छलाह जे पुनर्जन्म एना नै होई छै। लेकिन हम कामाख्या जाईत रहलहुँ। कुसुमा के मृत्यु के पन्द्रह बर्ष भ गेल छलनि। शारीरिक रूप से हम कमजोर भ गेल रही आ मानसिक रूप से निराश सेहो भ गेल रही। विश्वास भ गेल छल जे आब ऐ जनम मे कुसुमा के नै देखबैन। ओही बर्ष उत्तर- पूर्व राज्य के आर्थिक स्थिति के उत्थान और संभावना पर नौगाँव मे दू दिनक राष्ट्रीय सेमिनार के अध्यक्षता करबाक लेल हमरा आमन्त्रण भेटल।। हम बहुत दुखी मोन से नौगाँव गेलहुँ। दोसर दिन सेमिनार संपन्न भेलाक बाद एकटा लड़की हमरा लग आएल आ पैर छूबि के हमरा प्रणाम केलक। ओकरा देखि के हम एकदम अचम्भित रहि गेलहुँ। एन- मेन कुसुमा के प्रतिरूप। हम पुछलियै," तों के छिएँ?" कहलक, " हम अहाँक बेटी मानसी।"हमरा आश्चर्य के सीमा नै रहल। हम कहलियै," ई केना भ सकैये, कुसुमा के आई से पन्द्रह बर्ष पूर्व कामाख्या मे ब्रह्मपुत्र मे डूबि गेला से मृत्यु भ गेल छलन्हि। हम कत्तेक बर्ष कामाख्या एलौं, कहियो नै देखलियनि"।हम पुछलियै," तों हमरा केना चिन्हलें?" कहलक,माँ के संगे अहाँक वियाहक फोटो हमर घर मे टाँगल अछि। और कहलक ," माँ जखैन कामाख्या मे ब्रह्मपुत्र मे डूबि गेल रहे त हम तीन मासक ओकर पेट मे छलियै। ब्रह्मपुत्र के तेज प्रवाह मे ओकर लाश 180 कि.मी दूर तेजपुर लग ब्रह्म पुत्र के किनार मे लागि गेल रहै। लाश देखि के लोक सभ बाहर निकाललकै आ तुरत ओतै अस्पताल मे ल गेलै। माँ के मृत्यु भ गेल रहै। डाक्टर सब के ताज्जुब लगै छलै जे हम तीन न दिन तक मृत माय के पेट मे केना जीबित रहि गेलियै। कोकड़ाझार पुलिस माँ के लाश के पहचान करबै लेओकर फोटो अखबार मे देलकै। माँ के काका ओकर फोटो देख के चिन्हलकै अस्पताल से लाश ल जा के अन्तिम संस्कार केलकै। डाक्टर सब माँ के पेट के आपरेशन क के हमरा निकाललक आ जार मेसात महीना तक अस्पताल मे रखलक। बाद मे माँ के काकी( हमर नानी) हमरा पोषलक।। मानसी के हम बड़ी काल तक अपन छाती से लगौने कनैत रहलहुँ। मानसी के देखि के हमरा जीबैक आधार भेटि गेल छल।। बेटी के संग भागलपुर आबि गेलहुँ। हमरा देवदासी के बचन पर विश्वास भ गेल जे कोनो रूप मे मनुष्य के पुनर्जन्म भ सकै छै। कंचन कण्ठ स्त्री- सज्जा-परंपरा-फैशन कहल जाइत छैक कि स्त्री के अनाज दियौ ओ छप्पन भोग व्यंजन बना देत, मकान दियौ,स्वर्ग सँ सुंदर घर बना देत! माने कि सुघड़ता, सुंदरताक पर्याय स्त्री! ताहूमे मैथिल ललना के त बाते अद्भुत! ओ त गोबरमाटिसँ बनल घरों के सुंदर सुंदर चित्रकारी कय नवल रुप प्रदान करयमे सक्षम छलीह तँ स्वयं के त जानिए क सुंदर बनबितथि! त ओहि क्रम में ओ अपनहुँ गात के रंग-बिरंगक प्रसाधन सँ सजायब शुरु कयल। दीप सँ करिखा लऽकऽ काजरि, त चानन सँ सुगंधि, फूलसँ रंग आ कि रंग-बिरंगक आभूषण बनेलीह। आ सेनूर बिना त कोनोहु शुभकाज नहि भ सकैत अछि! तऽ ताहि क्रममे ओ पटवासि/पटमासि/धासा बनाएब शुरु केने हएतीह! पटवासि शुभ अवसर पर कपाल पर सीथके केन्द्र बनाकए ओहि के चारुभर सुंदर सुंदर आकृति वा फूल बनाकए ओकरा सुशोभित करैछ। कपाल पर सेनूर ओ विभिन्न घोरुआ रंगक मदति सँ आ केशमे तीसी के पानिक मदति सँ रंरगबिरंगक कागतक फूल बनाकए ताहि पर भूसना सेनूर सँ सजाओल जाइत अछि; नवकनियाँ के विभिन्न पाबनि तिहारमे! ओनाहू मिथिलामे विवाहिता सभ अखरे (मात्र) सेनूर नहि लगबैत छथि, सदिखन तेल आ सेनूर संगहि लगाओल जाइत अछि कि ओ झखरय नहि। ताहिसँ मुखक शोभा बढ़ि जाइत छन्हि। एकटा अलगे तेज ओ सौंदर्य परिलक्षित होमय लगैत अछि। एखने जेना *बेरसाति/वटसावित्री,*मधुश्रावणी/मोसरामनी* पाबनि आओत त नवकनिया संगहि सभ बियाहलि स्त्रीगण माथ पर पटवासि बनबैत छथि आ अपन सौभाग्य पर भगवानक कृपा बनल रहैक आशीष मांगे छथि। पटवासि/पटमासि/धासा मुख्यतः ब्राह्मण ओ कायस्थ महिला सभमे प्रचलित अछि। ब्राह्मण में सीथ सँ सेनूर लगाकए गोल टीका जेकाँ लगाएल जाइछै तँ कायस्थमे सीथसँ लगाकए मेंहीं चित्रकारी जेकाँ कएल जाइत छैक।जाहिसँ मुखमुद्रा देदीप्यमान भऽ उठैत छैक। नवतुरिया महिला सभ फैशनक बयारमे सेनूर लगायब पुरातनपंथी बुझि तियागि रहल छथि। मुदा जे एखनहुँ एकरा महत्वपूर्ण मानय छथि से पूरा सीथ नहितए छोटछीने सेनूर अवश्य लगबय छथि। विदेशमे रहनिहारि महिला सभ घर अयला पर अपन दादी, माँ-पितियाइन सभसँ घोरुआ सेनूर बनबाकए ल जाइत छथि। आब तए लिक्विड सेनूर लिपस्टिक सनके डिबियामे सेहो भेटैत अछि! त ओकरा कतहु पर्समे राखिकए ल जाऊ! कोनो दिकदारीक गप नहि! बहुत महिला सभ आब एम एनसी आ कारपोरेट आफिस सभमे काज करैत छथि त हुनका सभके ड्रेसकोड मेन्टेन करैत सदिखन लगायब संभव नहि होइत छन्हि आउटफिटक हिसाबे! मुदा ओहो सभ पाबनि तिहार आ महत्वपूर्ण दिन सभपर बढ़िया सँ तैयार भ क जाइत छथि। महाराष्ट्र में गणपति उत्सव आ दशहरामे त रंग-बिरंगक कलरकोडके संग मैचिंग मिलाकए हँसैत-खिलखिलाइत बैग उठाकए आत्मविश्वास सँ ओ सौंदर्य सँ भरल ऑफिस जाइत महिला सभक रुप देखिते बनैत छैक। संपूर्ण वातावरणके अपन प्रभासँ ज्योतित क दै छथि जेना! आइक महिलाक आत्मविश्वास ओ सक्षमता देखि लोक छगुंतामे परि जाइत छथि कि जहिना एक हाथे ओ आफिसमे,फील्डमे, हास्पिटलमे, वायुयानमे काज करैत छथि तहिना घरमे अरिपन देब, पकमान बनाएब, पूजा-पाठ करब,अपन घरकेँ सभ सदस्यक साज सम्हारि तहिना कुशलतापूर्वक क रहलीह। कोरोनाकालमे त अपन समझदारी सँ घरक लोक केँ होमकोरेंटाइन करैत घरेसँ घर ओ आफिसक काज सम्हारैत सभकेँ एहि विकराल बीमारी सँ निकालि लएलीह अछि। जरुरति बस एतबे कि हम सभ हुनका पर विश्वास करी, यथासंभव सहयोग दी आ हुनकामे विश्वास राखि। टूटल रिकार्ड घूरन बाबू एकटा लटखेनाक ेदोकान चलबैत छलाह। हुनका ओहिसौं नीक आमदनी भs जाइ छलैन्ह। किंतु आमदनीकेँ हिसाबसौं खर्चो छलैन्ह, परिवारमे चारिटा कन्याके बाद एक गोट पुत्र भेलैन्ह। कतेक कोबला, उपास -तिरास केलैथ, बैजनाथ धाम, सिमरिया सभ सेवलाकेँ बाद ओ पुत्र भेल छलैन्ह तs बड्ड आससौं ओकर नाम "आदित्य" रखलाह। जहिना नाम छलैन्ह तहिना ओ बालक बड्ड कुशाग्र छल। तुरत-फुरत किछु सीख जाइ। आन लोक सोचिते रहय आ आदित्यकेँ जवाब फटसौं हाजिर! माय तs दिनमे कतेको बेरि निहुंछथि छलीह , पिता सेहो गर्वित छलाह। लेकिन जेना - जेना ओ बढ़ैत गेलाह, खुराफातो बढ़ैत गेलैन। ते जतs ओ छल तैं स्कूलमे पढाईमे कोनो खास मेहनत लगबेनै करै तs जी भरि उत्पात करैत छलाह। जगह-जगहसौं रोज उलहन-उपराग आबयसौं आजिज भs गेलाह माता - पिता। किछु फुरेबे नै करै कि-की कयल जाय की नहि। एक दिन समर गामअयलाह ओ सहरमे पढ़ैत छलाह अपने दियादक बेटा छलाह। ओ काक-ाकाकीकेँ भेंट करय ऐलखिन तs हुनका सभकेँ चिंतित देखि सभ बात पुछलाह। समस्या बुझलापर ओ कहलैन्ह "पढ़sमे त होशियार अछि नै।" ई सभ तकर प्रशंसा कयलन्हि तs ओ सुझाव देलखिन्हि जे तखन एकरा पढ़ाबय लेल ओ किया नै सहर भेजि दैत छथि। ओतय पढाई तs नीक हेबै करतै आ एते जे बदमाशी करैत अछि ताहूपर नियंत्रण रहतै किछु। ई विचारसौं माय तs कन्नारोहटि उठा देलखिन्ह। दुख तs अपनो बड्ड छलैन्ह लेकिन बच्चाके नीक भविष्य लेल कखनो कs तs कठोर निर्णय लेबयै परैत छैक। आखिर दुलार तs ओहो करिते छलाह; किंतु ओहि दुआरे ओकर भविष्य तs बिगड़य नै दs सकैत छलाह। छौंड़ा चंसगर छले, दिमाग तs खूब चलते छलै ओ एक्केबेरमे "रामकृष्ण मिशन स्कूल " के ऐंट्रेंस निकालि लेलक। जहिना बाबासौं बच्चा मंगने छलाह तहिना बाबाशरणमे शिक्षा - दीक्षा लेल चल गेल। भरिपरोपट्टामे घूरन बाबू ओ हुनक खानदान के जय - जय भs गेलैन्ह। सबके छगुंता होइन क िऐहेन निरक्षर परिवारमे ऐहेन होशियार बच्चा भेलैन्ह केना! कियो कहैन पुर्वजन्मकेँ पुण्य छैन्ह, तs कियो भोलाबाबाके परसाद!समरकेँ सेहो बड्ड आशीष आ धन्यवाद देथिन्ह कि एकटा बहसल बच्चाकेँ ओ रस्ता देखेलखिन्ह। किछु लोक तs जैsरकेँ खाक भs गेलाह "घूरनाके कोनो पाइके कम्मी छैक मास्टरके तरेतर घूस खुऔने हैत, छौंड़ाकेँ तs कखनो एक अच्छर पढ़ैत तs कियो देखबे नै करै आ छौंड़ा पासो कs गेल परीच्छा। ओहि इसकूल सबमे पढ़ेनाय कोनो ठट्ठा छैक कि।" मायके तs होनि कि केना बच्चा रहत ओतय, के ओकर धियान राखत। आह! गोदीके बालकके केना आँखिसs ओझल करब। कखनो दुलार करथिन कखनो सीख देथिन " ओतs जाकs पढ़ै- लिखैपर मोन देब तखनने बड़का हाकिम बनब। हे ओतय बदमाशी नै करब नै तs मास्साब बड़ खिसियेता।" आई कल्पना कs अपने बुकोरि लागि जानि। खैर जे से , ओहो दिन आयल कि घूरन बाबू बेटाक सँगे विदा भेलाह। मायके तs सम्हार बमोश्किल। बहिनियो सबके भाईसौं फराक रहैके कल्पनासौं नोर थमबे नहि करैन्ह। दुनु-बाप - पूत जखन इसकूल पहुंचलाह तs शोभा सुन्दर देखी तs चकचौन्हि लागि गेलैन्ह। आदित्यके तs मास्साब हाॅस्टल , नवसंगी - साथी सभ खूब नीक लगलैन्ह। बापके बड़ संकोच भs रहल छलैन्ह। प्रिंसिपल सर हुनकर मनोभाव बुझि, हुनका बोल -भरोस देलखिन्ह। आश्वस्त केलैन्हि कि बच्चा सबके पूरा भार स्कूलके अछि आ एतय जे अबै छैथ हुनकर उज्जवल भविष्यके बारेमे तs कोनो संदेह हेबाके नै चाही। स्कूलमे ऐहेन वातावरण होइत छैक कि बच्चा सभ अपने नीक काज करैय लेल संकल्पित भs जाइत छैक। ओ आदित्य के नीकसौं रहय, सबके बात मानबाके सीख दs भारी मोने घsर घूमि गेलाह। आदित्य बाबूके मोन रम गेलैन ओतय।बीच - बीचमे छुट्टीमे अबैत रहलाह। एक दिन अचानक डाकिया आयल आर घूरन बाबूकेँ एकटा चिट्ठी देलक। चिट्ठी पबिते कन्नारोहटि उठि गेल। ई बातसौं आइ हँसी आबि सकैत अछि , किंतु ताहि जमानामे अशिक्षा आर अंधविश्वासके ततेक बोलबाला छलै घर-घरमे कि चिट्ठी अबिते लोक आशंकित भs जाइत छल आर टेलीग्राम तs किनको देहावसानेके खबरि अनलक- लोक सैह बुझैत छलै। जखन डाकिया चिट्ठी दs कs गेल तs आब ओ पढ़ल केना जाए। ग्राम प्रधानसौं लs के सरपंच तक के लिखा - पढिकेँ मामलामे हाथ कनी तंग छलैन। कहुना कs पता लागल जे अमीन बाब ूलग लs जायल जाs ओ तs खाता- खेसराके काजे करैत छथि। तs की दौड़ल गेला आ निहोरा मिनती कs चिट्ठी पढ़बाक अनुरोध केलैन्ह। बेसी पढ़ल- लिखल तs ओहो नै छलाह, किंतु एतेक लोकके अपन खोज करैत देखि मोन प्रसन्न भs गेलैन्ह। ओ चिट्ठी पढs लेल तैयार भs गेलाह। ओ पढय लगलाह " आदित्यके अभिभावकको सूचित किया जाता है कि आपके पुत्र ने पिछले सभी सालों का रिकार्ड तोड़ दिया है। अतः स्कूलके वार्षिकोत्सव पर उसके माता -पिता को आमंत्रित किया जाता है। आपसे अनुरोध है कि इस अवसर पर अवश्य पधारें।" एतबा देरमे तs ओ तामसे- पित्ते घौर भs गेलाह "एकरा कहलकै जे जाएब नेपाल कपार जैत संगे, एते सिखा पढ़ा कय एलहुं रे बौआ! मोन लगा कय सब काज करिहैं किनको सिकैतके मौका नै देबै। लेकिन कुकुरके नांगड़ि! कतहु सोझ भेल जे ई हैत। रौ बौआ नां आदित रखने की हैत रहबे तs रारक रारे। कहू तs ई हड़ाशंख पढ़s गेल कि ई किदैन 'रेकाट' तोड़ िदेलक।" बुझल-गमल तs किनको किछु छल नै ताहूपर कतेक लोक पहिनेसं खार-खैनेहे रहय हिनकासँ, त दहीमे सही मिलबय लागल "सांचो घूरन बाबू, कहू तs अपने तs अहां बापक फरजमे कोनो किछु उठा नै रखलहुं। कत्ते खरचा-बरचा कs ओहन पैघ इसकूल पठेलिए जकर नावों ने भरि परोपट्टामे कियो सुनने छल तखन एहन काज रिकाडे तोड़ि देलक।" मोने मोन तs बड्ड प्रसन्न छलाह घूरन बाबूके अवस्थापर किंतु उपरसौं सांत्वना दैत बजलाह "बुझू तs किछु त बरकै बदमाशी केने हैत , तखने नै माइयोके बजाहटि छैन्ह।" बेचारे घूरन बाबू भरिमुहें ककरोसौं लाजे बजनाइयो छोड़ि देलैन्ह। दुनु प्राणी जाइ लेल उद्धत भेला तs कनिया डेराइत - डेराइत बजलीह "किच्छो अछि तs , अछि तs अपने बालक।की करबै आब जौं गलती कैये लेलक तs पैघ जकां , जखन माय-बाप छियै तs सुधार तs हमरे सभके करय परत नै। तs अपना संगे मुन्नालाल ओ जे कमरबा छैक तकरो संगे लs लिय ओ जे किदैन तोड़ि देलकै बौआ, तकरा ओ बना देत।" कनियाके तs तामसे ओ मारि-मारि कs छुटलाह। फेर चित्त शांत भेलैन्ह तs लगलैन्ह जे सलाह उचिते देलकै छौड़ा कs माय। तs तीनू गोटे इसकूल पहुंचलाह। लाजे तs होइन जे फाटह हे धरती मैया! अपना शरणमे लs लिय कोन मुहें मास्साबके सामनामे जाएब ओ कि कहताह, कि नै। भयभीत स्वरमे धखाइते दरबानकेँ कहलखिन "मास्साबके कहिये जे आदितके मां-बाप आया है।" प्रिंसिपल सर जखनहि बुझल कि दौड़ल एलाह "ओ माइ गाॅड, कमाल है आइये - आइये , आप ही का इंतजार कर रहे थे हमलोग।" हुनका सभके बड्ड आदर सौं एकटा सुसज्जित कक्षमे लs एलाह। ओ आदित्यके चर्च केलखिन्ह तs मास्साब सुनबै नहि करथिन्ह। ओतs हिनका सभके एतेक सजल - धजल घरमे जतय लोक सभ खचाखच भरल रहय लs एलाह। बेचारे सोचलाह आई तs एतेक लोक कs आगू सातो पुरखाके उखाहि करताह ई मास्साब! आदितबोके नै देखै छियै कि ओकरो किछु समझैबतियै। हुनका दुनु गोटेके बुकोरि लागय लगलैन। ओ मास्साबके पकड़ि कs कात लs गेलाह आ बड्ड कातर स्वरमे बजलाह "कि करेंगे मास्साब ! कोड़िपछ्छू है ने ताहि सs कनि बेसिये बदमास हो गया है। दू थापर मारेंगे तs तुरत्ते ठीक भs जाएगा। आपका उ कौन चीज है 'रेकाट,' तोड़ि दिया है तs हम कमार के भी संगे लाया हूं ; देखिए ई बहुते होसियार है तुरत्ते ठीक करि देगा।" ई सुनि कs प्रिंसीपल सर हँसैत -हँसैत बताह भs गेलाह! हुनका फंक्शनबला रूममे लs गेलाह आ ओतय जतेक मेडल, ट्राॅफी, प्रशस्ति-पत्र सभ राखल छलै तकरा देखा कs बजलाह "इसमें से ज्यादातर आपके आदित्य ने एक साल में जीत कर एक रिकॉर्ड तोड़ा है, एक कीर्तिमान स्थापित किया है। आज का यह समारोह आप सब के सम्मान में रखा गया है और विद्यालय समिती की ओर से आदित्य की सारी फीस माफ की जाती है। यहां पर रिकार्ड तोड़ना मतलब बहुत बढ़िया काम किया है। इसके लिए आपको डरने की जरूरत नही है!" आब ओ सोचय लगलाह "आरौ तोरीके ई रिकार्ड तोड़यपर एते मानदान होई छै आ हम झुट्ठे एतेक परेशान भेलहुं। हमरो जे माय-बाप कनियो पढ़ोने रहितै तs ऐते जे बच्चाके गारि बात कहलियै , एतेक हंसीके पात्र बनलहुं से तs नै बनितहुं। अपन कनियोपर तामस उठलैन्ह जे ई तs आर निप्पट कमरबाके संगे लगा देलक! फेर भेलैन्ह जे जखन हम नै पढ़लहुं - गुनलहुं तs ई तs जानिये कs जनी-जाति एकरा के पढ़ौते! ई सोचिते अपन कनकिरबी सभपर धियान चलि गेलैन जे अपना संग जे अन्याय भेल सैह तs हमहुं अपन बुच्ची सभके नs पढ़ाकs कs रहल छी। आब अपन कोनो बच्चा संगे हम अन्याय नै होमय देब। जहिना चान सुरूजक जोत सभ ठाम पहुंचै छै तहिना शिच्छा सेहो सब ठाम पहुंचायब।" आ अनायासे आदित्यपर ममता उमड़ि परलैनि आ बच्चाके भरि पांजि कय पकड़ि लेलैथ दुनु गोटे! नन्द विलास राय गंगा नहेलौं साँझुपहर बाध दिससँ अबै छेलौं। जखन नन्दा भाइक दरबज्जाक सामने एलौं तँ सुनलयैन, नन्दा भाय सोझमतिया भौजीकेँ कहै छला, ‘चलू गंगा नहेलौं।’ हमरा नन्दा भाइक बातक कोनो अर्थे ने लागल। नन्दा भाय कहै छैथ, गंगा नहेलौं! जखन कि हिनका सभ दिन गामेमे देखै छिऐन। तखन सिमरिया कहिया गेला आ गंगा कखन नहेला? सिमरियो कोनो अपना गामसँ दू-कोस-चारि कोसपर थोड़े अछि जे लोक भोरमे जाएत आ स्नान करि जलखै बेरमे आकि कलौ बेरमे घुमि कऽ आबि जाएत। अपनो सवारी, अपन सवारी भेल कोनो टेम्पू आकि चरिचकिया गाड़ी, जेना- जीप, बोलेरो आकि स्कारपिओ। तइसँ गंगा नहाइले सिमरिया जाएत तैयो भरि दिन समय लगिये जाएत। ट्रेनसँ सहजे अठारह-बीस घन्टा जाइ-अबैमे लगत। तखन गंगा कखन नहेला। मन भेल जा कऽ पुछै छिऐन जे भाय सभ दिन गामेमे देखै छी तखन सिमरिया कहिया गेलौं आ गंगा कखन नहेलौं। फेर सोचलौं अखन पति-पत्नीक बीच गप-सप्प भऽ रहल अछि तँए अखन जा कऽ कोनो बात पुछब उचित नइ हएत। अनेरे नन्दा भाय सोचता दालि-भातमे मूसलचन्द बनिकऽ एला हेन। तँए रस्ते-रस्ते अपन घर दिस बढ़ि गेलौं। सोचलौं जखन नन्दा भाय बाध-बोनमे केतौ भेटता तँ पुछि लेबैन। दोसर दिन भनसा घरक ओसारापर बैस कऽ चाह पीबैत रही तँ पत्नी कहलैन- “जलखै आकि कलौ लेल कोनो तरकारी नइ अछि।” अपना सोचलौं जलखैमे गहुमक सोहारी तँ पियौजोक चटनी आकि अचारो सने खा लेब मुदा कलौ बिना तरकारीक केना खाएब। भाइ, चाउर आ दालिक कमी नइ अछि। किएक तँ पैछला साल पैछला साल भेल जे साल बीत रहल अछि, किएक तँ गोटि पंगरा खेत सभमे आब धान फुटि रहल छै, तँए पैछला साल कहलौं। हँ, तँ कहै छेलौं पैछला साल धानक उपजा नीक हाथ लागल छल। तेकर बाद रहल दालिक बात, तँ गोटेक मन मटर, पच्चीस-तीस किलो मौसरी आ पनरह-बीस किलो खेरही सेहो भेल छल। दू क्विन्टल अल्हू सेहो उपजौने रही मुदा अखाढ़ अबैत-अबैत सभ अल्लू सड़ि गेल। हँ, पियौज बाँचल अछि। अखनो घरमे पनरह-बीस किलो पियौज हएत। अपना टाट-फरकपर लत्ती-फत्ती नइ अछि। रोपैले झुमनी, घेरा आ सजमैनो रोपने रही मुदा केतए-सँ ने केतए-सँ हराशंख आकि सभ लत्तीकेँ खा गेल। पत्नीकेँ कहलयैन- “भूतहा हटिया तँ बेरियॉंमे लगत। बेरमे भूतहा हाट जा तरकारी कीनि आनब। मुदा कलौ लेल तँ तरकारी चाही।” मोन पड़ल नन्दा भाय तँ पान-छह कट्ठा खेतमे रामझुमनी आ दू-अढ़ाइ कट्ठा खेतमे घेराक खेती केने छैथ। किए ने हुनकेसँ एक किलो घेरा आ एक किलो रामझुमनी लऽ आनी। कहुना देता तँ हाट-बजारसँ सस्ते देता। फेर मोन पड़ल काल्हि जे नन्दा भाय सोझमतिया भैजीसँ कहै छलाजे गंगा नहेलौं, सेहो पुछि लेबैनजे भाय सभ दिन गामेमे देखै छी तखन गंगा कहिया नहेलौं। चाह पीब पत्नीकेँ कहलयैन- “एकटा झोरा आ पच्चासटा टका दिअ। हम नन्दा भायसँ तरकारी नेने अबै छी।” आब अहाँ कहबै जे टको पत्नीए-सँ मंगलिऐ। यौ भाय, अहाँसँ छाम की घरक सोलहन्नी गारजनी पत्नीए-केँ दऽ देने छिऐ। धान आकि गहुम बेच कऽ जे आमदनी भेल सभ पत्नीकेँ सुमझा देलिऐन। बर-बेगरतामे हुनकेसँ मांगि कऽ खर्च करै छी। पत्नीक मनमे जे होइतैन जे मरदबा पाइकेँ की करै छैथ की नइ, से तँ नइ ने मनमे हेतैन। ओना, पत्नियो पाइ ओरिया कऽ रखै छैथ आ अपना नइ रहलापर दोकानो-दौरीसँ जरूरते भरि समान अनै छैथ। बेलट्ट खर्चा एक्को पाइ नइ करै छथिन। पत्नी झोरा आ पचसटकही दैत बजली- “रामझुमनी जुएलका नहि लेब आ ने बुढ़ाएल घेरे लेब। लौजा रामझुमनीक तरकारी नीक होइए।” “ठीक छै।” कहैत हम झोरा लऽ विदा भऽ गेलौं। जखन नन्दा भाइक बारी लग पहुँचलौं तँ देखलयैन जे नन्दा भाय आ सोझमतिया भौजी रामझुमनी तोड़ि-तोड़ि जमा कऽ रहली हेन। लगधक पनरह-बीस किलो घेरा तोड़िकऽ रखने छला। हम फरिक्केसँ कहलयैन- “भाय साहैब, हमरो हाजरी।” तैपर नन्दा भाय बजला- “आबह! आबहअनिल!! कहहनिक्के ना छह किने?” हम कहलयैन- “हँभाय, अपने सबहक आसिरवादसँ सभ ठीक छी।” नन्दा भाय बजला- “रोप तँ बेसी नइ ने गललह?” हम कहलयैन- “हँ, भाय, दस कट्ठा गहींरका खेतमे चननचूर धान रोपने छी। पैछला साल नीक मंजा आएल रहए। उ धान किछु बेसीए गलि गेल। खोभितौं जे से बीये ने रहए। की करितौं, दू किलो कट्ठा हरितक्रान्ति, एक किलो कट्ठा पोटाँस आ दू किलो कट्ठा यूरिया मिला कऽ ओइ गललाहा धानमे छीटि देलिऐ। आब जे आड़िपर जाइ छी तँ बुझाइते ने अछि जे रोप गलल छेलए।” नन्दा भाय बजला- “नीक केलह। अच्छा केम्हर-केम्हर एलह हेन। तरकारी लेबह आकि ओहिना भेँट-घाँट करए एलह हेन।” हम कहलयैन- “भाय तरकारियो लेब आ अहाँसँ किछु गपो-सप्प करब। से तँ देखै छी जे अहाँ रामझुमनी तोड़ैमे लागल अछि।” नन्दा भाय बजला- “रामझुमनी तोड़ल भऽ गेल हेन आ घेरा पहिनहियेँ तोड़ि नेने छी।” हम कहलयैन- “पच्चीस-तीस किलो रामझुमनी आ पनरह-बीस किलो घेरा हएत।” नन्दा भाय बजला- “ठीक्के ठीकलह हेन।” तैबीच एकटा छिट्टामे पाँच-सात किलो घेरा आ पाँच-सात किलो रामझुमनी लऽ कऽ सोझमतिया भौजी गाम दिस माने घरपर विदा भऽ गेली। हम कहलयैन- “अतेक तरकारी भौजी की करती?” नन्दा भाय बजला- “गामोपर किछु लोक तरकारी कीनए अबै छैथ। तिनका सभ लेल ओ तरकारी लऽ गेली हेन। बाँकी जे बाँचत से तरकारी बेचुआ लऽ जाएत। बेचुआ हाटे-हाटे तरकारी बेचैत अछि। तरकारीए बेचि कऽ पाँच गोरेक परिवर चलबैत अछि। बेचाराकेँ घराड़ीक अलाबे एक धुर खेत नै छै। तखन तँ वएह अछि जे हटिये-हटिये तरकारी बेचि अपन गुजर करैए।” हम कहलयैन- “यौ भाय, भगवान सबहक बेरा पार लगबै छथिन। अच्छा भाय गप-सप्प होइत रहतै, पहिने हमरा एक किलो रामझुमनी आ एक किलो घेरा जोखि कऽ दऽ दिअ।” नन्दा भाय बजला- “बड़बढ़ियाँ।” ‘बड़बढ़ियाँ’कहि नन्दा भाय खोपड़ीसँ तरजू-किलो निकालि रामझुमनी तौलए लगला। हम कहलयैन- “भाय, लौजा रामझुमनी देब आ घेरो अजोहे देब।” तैपर नन्दा भाय बजला- “तोरा जे जुआएल लगै छह से छाँटि दहक।” अपना जनैत हम जुआएल रामझुमनी आ बुढ़ाएल घेरा छाँटि देलिऐ। नन्दा भाय, अदहा किलो रामझुमनी आ अदहा किलो घेरा दैत बजला- “ई हमरा तरफसँ भेलह। खेतपर एलह हेन।” पचासक नेाट दैत नन्दा भायकेँ कहलयैन- “लिअभाय, पाइ काटि लिअ।” नन्दा भाय बटुआ खोलि ओइमे सँ एकटा दसक सिक्का निकालि हमरा देलैथ आ पचसटकही बटुआमे रखैत बजला- “हम गामक लोककेँ पैकारे भाव तरकारी दइ छिऐ।” हम नन्दा भायसँ कहलयैन- “भाय, एकटा उपराग दइ छी।” नन्दा अकचकाइत बजला- “से की अनिल। कथीक उपराग। हमरासँ आकि हमरा धिया-पुतासँ कोन अपराध भऽ गेलह हेन जे तों भोरे-भोर उपराग दइ छह।” तैपर हम कहलयैन- “भाय अहाँ अथबा अहाँक परिवारसँ कोनो अपराध नइ भेल हेन।” नन्दा भाय बजला- “तखन उपराग किए बजलह।” हम कहलयैन- “भाय चुप्पेचाप गंगा नहा एलौं आ हमरा कहबो ने केलौं। हमरा कहितौं तँ संगे हमहूँ जइतौं। सएह उपराग दइ छी।” नन्दा भाय बजला- “हौअनिल, पैछला साल जे कार्तिक पूर्णिमा दिन गंगा नहाइले सिमरिया गेल रही तेकर बाद कहाँ सिमरिया गेलौं हेन।” हम कहलयैन- “तइ बैचमे तँ हमहूँ रही।” नन्दा भाय बजला- “हँ, से तँ तों रहबे करह। जँ नीक्के ना रहब तँ फेर कार्तिक पूर्णिमा दिन गंगा नहाइले सिमरिया जाएब। तहूँ चलिहह।” हम सोचमे पड़ि गेलौं। सोचए लगलौं, काल्हिए साँझमे नन्दा भाय सोझमतिया भौजीसँ कहै छला, चलू गंगा नहेलौं। आ अखन कहै छैथ जे कार्तिक पूर्णमाक बाद सिमरिया गेबे ने केलौं हेन। आखिर नन्दा भाय झूठ किए बजता। गंगे नहाइले गेल हेता तँ कहि दितैथजे गंगा नहाइले गेल छेलौं, ऐमे झूठ बजैक कोन बेगरता छै। हमरा सोचमे पड़ल देख नन्दा भाय बजला- “की सोचए लगलह।” हम कहलयैन- “भाय, जखन काल्हि साँझमे हम बाध दिससँ जाइ छेलौं आ जखन अहाँ दलान सामनमे एलौं तँ सुनलौं, अहाँ भौजीसँ कहै छेलिऐन, चलू गंगा नहेलौं।” नन्दा भाय कहलैन- “अच्छा..! तखुनका बात सुनि तों सोचलह जे नन्दा भाय गंगा नहा एला आ हमरा कहबो ने केलैन।” हम कहलैन- “हँ भाय, हम सएह सोचलौं आ तँए उपरागो देलौं।” नन्दा भाय कनेक काल गुम्म भऽ गेला। अपनो चुप्पे रही। जेबीसँ तमाकुलक डिब्बी निकालि तमाकुल चुना तरहत्थी नन्दा भाय दिस बढ़ेलौं। नन्दा भाय एक जूम तमाकुल ठोरमे लेला। तमाकुलक रस पबिते नन्दा भाय बजला- “बौआ, तों जे गंगा नहाइक बात सुनलह से ठीके सुनलह। हम ठीके तोरा भौजीकेँ कहै छेलिऐ जे चलू गंगा नहेलौं। मुदा तों एकर सोझका अर्थ बूझलह।” हम कहलयैन- “की सोझका अर्थ भाय?कनी फरिछा कऽ कहियौ।” नन्दा भाय बजला- “बौआ अनिल, ई बात तूँ बुझिते छहक जे लोक अपन पाप कटबैले गंगा स्नान करैए।” हमरा मुहसँ निकलल- “हँ भाय, बेसी लोक अपन पापे धोइले गंगा स्नान करैए।” नन्दा भाय कहलैन- “हौ बौआ, कर्जा जे छी सेहो पापे छी किने। जाबे धरि केकरो माथपर कर्जा रहैत अछि ताबे धरि ओ बेकती पाप तरे दबल रहैए। जखने कर्जा उतैर जाइ छै माने कर्जा सधि जाइ छै तखने लोक मुक्त भऽ जाइ छै। ई बुझहक जे, पाप तर जे दबल रहैए से पाप उतैर जाइ छै। तँए लोक बजैए, गंगा नहेलों।” आब हमरा नन्दा भाइक गपक अर्थ बुझा गेल। हम बजलौं- “हँभाय, कर्जा ठीके पाप छी आ कर्जा उतरब माने सधब गंगे नहाइ सदृश भेल मुदा अहाँकेँ कर्जा किए भेल आ केकरासँ कर्जा लेलौं। गाममे तँ केकरोसँ कर्जा नइ नेने छेलौं।” नन्दा भाय बजला- “तोरा अगुताइ नइ ने छह।” हम कहलयैन- “नइ अखन तेहेन कोनो काज नइ अछि जे अगुताइ रहत।” नन्दा भाय बजला- “बौआ, तोरा तँ बुझले छह जे हम एक भाय आ एक बहीन छी।” हम कहलयैन- “से कहीं नइ बुझल रहत। अहाँक परिवारसँ हमरा परिवारक बाबूएक अमलदारीसँ दोस्तियारे अछि। की हम अहाँक बहिनक बिआहक मरजादक भोज नइ खेने छी। खेने छी। मरजादक भोजक सकरौड़ीमे जे नारियर, छोहाड़ा, किसमिस सभ देल रहए सेहो मोन अछिए।” नन्दा भाय बजला- “बौआ अनिल, हमर चन्दा बहिनक बिआह कमलपुर गाममे एकटा नीक परिवारमे भेल अछि। सेहो बुझले हेतह?” हम कहलयैन- “हँ भाय, सेहो बुझल अछि। कैक बेर कमलपुरबला पाहुन आ चन्दा दैयासँ सेहो भेँट अछि।” नन्दा भाय बजला- “जइ समयमे चन्दा बहिनक बिआह कमलपुर गौरीकान्त बाबूक बेटासँ भेल ओइ समयमे गौरीकान्त बाबूकेँ बारह बिगहा खेत छेलैन। गौरीकान्त बाबूकेँ तीनटा बेटा छैन जइमे सभसँ छोट बेटा चन्द्रमोहन हमर बहनोइ भेला। बीस-बाइस बर्ख पहिने गौरीकान्त बाबू स्वर्गवास भऽ गेला। बाप मरलाक साले भरिक भीतर तीनू भाँइमे भिनौज भऽ गेलैन। चरि-चरि बिगहा खेत तीनू भाँइकेँ हिस्सा भेलैन जइमे धराड़ी, बाँस, कलम आ पोखैर छल। हमर बहनोइ चन्द्रमोहन बाबू बी.ए. पास छैथ। सरकारी नौकरीक पाछू बहुत हाथ-पैर मारलैथ मुदा नौकरी नहि भेलैन। हारि कऽ दिल्ली चलि गेला। दिल्लीमे किछु दिन काजो केलैथ मुदा डेंगू बोखारक डरसँ दिल्लीसँ पड़ाए कऽ गाम आबि गेला। तही बीच हुनकर पिताजी मरि गेलखिन। पिताजीक मरलाक छबे मासक भीतर भैयारीमे भिनौज भऽ गेलैन आ हमर बहनोइ दिल्ली छोड़ि गामेमे रहए लगला।” हम पुछलयैन- “गाममे कोनेा रोजगार करै छैथ आकि पूर्णरूपेण खेतीएपर निर्भर छैथ?” नन्दा भाय कहलैन- “पहिने अनाजक खरीद-बिक्री करै छला। नीक आमदनी होइ छेलैन। मुदा एक बेर तीसीमे बड़ पैघ घाटा लगलैन जइसँ पूजी टुटि गेलैन। तहियेसँ खरीद-बिक्री छोड़ि देलखिन आ खेतीपर पूर्णतया आश्रित भऽ गेला।” हम पुछलयैन- “चन्दा बहिनकेँ कैकटा सखा-सन्तान छै?” नन्दा भाय कहलैन- “तीनटा बेटी आ एक्केटा बेटा छै।” हम पुछलयैन- “बेटी सभक बिआह भऽ गेल छै किने?” नन्दा भाय बजला- “हँ, भगवानक कृपासँ तीनू बेटीक बिआह भऽ गेल छैन आ हमर तीनू भगिनी सुखी अछि। एकटा भगिन-जमाए सरकारी नौकरीमे छैथ आ दूटाकेँ नीक बिजनेस छैन।” हम कहलयैन- “चलू, ई तँ खुशीक बात भेल।” नन्दा भाय कहलैन- “खुशीक तँ बात छीहे मुदा हमरा बहिन-बहिनोइक बेटीक बिआहमे डेढ़ बिगहा खेत बिका गेलैन।” हम पुछलयैन- “आ भागिन की करैए?” नन्दा भाय बतौलैन- “हमरा बहिनकेँ तीनटा बेटीपर सँ बेटा भेल रहैन। बड़ दुलारू। देखैयोमे बड़ सुन्नर। पढ़ैयोमे बड़ चन्सगर। फर्स्ट डिविजनसँ मैट्रिक आ फर्स्ट डिविजनमे नीक मार्क्ससँ इन्टर केलक। दू बेर आई.आई.टी. आ जे.ई.ई. प्रतियोगिता परीक्षामे बैसल मुदा सफल नइ भेल। बापसँ कहलक जे हम भोपालमे इंजीनियरिंग पढ़ब। बहिनो सभ भाइक बातकेँ समर्थन केलकै। बेटाक बात मानि हमर बहनोइ एक बिगहा खेत बेच भोपालमे इंजीनियरिंग पढ़ा बेटाकेँ इंजीनियर बनौलैथ।” तैपर हम पुछलयैन- “भागिन इंजीनियरिंग पास कऽ कोनो जॉव करैए आकि बेरोजगारे अछि?” नन्दा भाय कहलैन- “हौ हमर भागिन कहलक जे हम प्राइवेट नौकरी नइ करब, सरकारी नौकरीक लेल प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी करब। पाँच कट्ठा खेत बेच हमर बहनोइ फेरो पाइ देलकै। हमर भागिन दिल्लीमे रहि कऽ प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी करै छेलए मुदा तही बीचमे चन्दाकेँ लकबा मारि देलकै आ ब्रेन हेमरेज भऽ गेलइ।” हम कहलयैन- “ई लकबाबला बात तँ हमरो बुझल अछि। लगधक दू साल पहिनुका घटना छी।” नन्दा भाय बजला- “हँ, ठीक्के कहलह। 2018क नवम्बर मासक घटना छी।” हम पुछलयैन- “अखन चन्दा बहिनक की हाल छै?” नन्दा भाय बजला- “सुनहक ने। जखन ब्रेन हेमरेज भऽ गेलै तँ हमर बहनोइ चन्दाकेँ लऽ कऽ पटना गेला आ बी.एन. नरसिंग होममे भरती करौलखिन। भागिनकेँ फोन भेलै ओहो दिल्लीसँ पटना पहुँचल। डॉक्टर हमरा बहनोइसँ कहलकैन, ब्रेन हेमरेज का केश है इसका ब्रेन खोलना पड़ेगा। पाँच लाख रूपये ऑपरेशनमे लगेंगे। दबा में भी दो लाख से ऊपरे खर्च पड़ जाएगा। तत्काल ऑपरेशन के लिए चार लाख यप्ये जमा कीजिए। मेहमान (पाहुन) पटनासँ फोनपर हमरो कहलैनजे कमसँ कम दू लाख रूपया बेवस्था कऽ कए पटना आऊ। हौ बाबू, मेहमानक बात सुनि हमबड़का सोचमे पड़ि गेलौं। अपना लग मात्र पाँच हजार टका रहए जे मेहमानक खातामे जमा कऽ देलिऐ। एक्केटा बहिन, सोचलौं दू-तीन कट्ठा जमीनो बेच कऽ बहिनक इलाजमे ढौआ देब। अपना गाममे तीन गोरे जमीन खरीदैए। सभसँ पहिने अशोक लग गेलौं। सभ बात कहलिऐ। पुछलक, कोन जमीन बेचब। तैपर हम कहलिऐ, नाढ़ी-चौरीक खेत बेचब। तैपर अशोक पुछलक, की रेटमे जमीन देब। हम कहलिऐ, हौ बौआ, हमरे आरिमे तिलेसर पैछला साल नब्बे हजार रूपैए कट्ठा बेचने छेलए। अशोक बाजल, हम पच्चास हजार रूपैए कट्ठा लेब। जँ बेचबाक अछि तँ काल्हिये रजष्ट्री ऑफिस चलू। हम छगुन्तामे पड़ि गेलौं। केतए नब्बे हजार आ केतए पचास हजार।” नन्दा भाय आगाँ बजला- “हौ बौआ, अशोक लगसँ मुँह चूरू भऽ गामपर एलौं। खेनाइयो ने सोहाएल। बहिनक चिन्ता छल। सोचलौं आब केतए जाएब। मोन पड़ल जे विनय सेहो पाइबला हसामी अछि। हुनको बेटा इनकम टेक्सक इंस्पेक्टर छी। ओहो जमीन कीनैए। हम विनय लग गेलौं। कहलयैन यौ विनय बाबू हमरा किछ पाइक बेगरता अछि तँए तीन कट्ठा जमीन बेचब।” तैपर विनय पुछलैन- “कोन खेत बेचब?” हम खेतक ठाम बता देलिऐ। तैपर विनय पुछलैन- “की रेट रखने छिऐ?” हम कहलयैन- “एक लाख रूपैए कट्ठा।” तैपर विनय बजला- “हमरा लग तँ अखन पाइयो नइ अछि। तैयो जँ अहाँ साठि हजार रूपैए कट्ठा बेचब तँ हम पैंचो-पालट करि कऽ लऽ लेब।” सोचलौं सभ मजबूरीसँ फायदा उठा रहल अछि। आब की करब। पत्नी कहलैन जे रफीको भाय जमीन खरीदै छैथ। रफीकसँ भेँट कऽ सभ बात कहलयैन। तँ ओ बजला, ई जमीन हम नइ लेब। चौकपर जे अहाँक खेत अछि से जँ बेचब तँ हम लऽ लेब। चौकपर खेतक रेट पाँच लाख रूपैए कट्ठा अछि। रफीक भाय बजला, तीन लाख रूपैए कट्ठा हम चौकपरबला जमीन लऽ लेब। आबि कऽ पत्नीकेँ कहलयैन। पत्नी बजली, अहाँ अनीताक दुल्हाकेँ फोन कऽ सभ बात कहियौ। हुनको लग पाइ रहै छैन। भगवानक कृपा हिनकापर बनल छैन। माटि छुबै छथिन तँ सोना भऽ जाइ छै। अनीता हमर सारिक नाओं छी। हम तुरन्ते सारहुकेँ (अनीताक दुल्हाकेँ) फोन लगेलौं। पूरा बात सुनलाक बाद ओ कहलैन- “ओत्तेक पाइ तँ अखन नहि अछि तखन एक लाख पच्चीस हजार टका अछि, काल्हिये लऽ जाऊ।” हम भोरे सारहु लगसँ पाइ लऽ अनलौं आ ओही दिन पटना जा कऽ पाहुनकेँ पाइयो दऽ एलिऐन आ बहिनक जिज्ञासा सेहो कऽ लेलौं। नन्दा भाइक सभ बात सुनि बजलौ- “पाइयो खर्चाक बाद चन्दा बहिन ठीक भऽ गेली ने?” नन्दा भाय बजला- “हौ बौआ, सभ मिला कऽ दस लाख टकासँ ऊपर खर्च भऽ गेलैन। मुदा संतोख यएह अछि जे चन्दाकेँ नित्यक्रिया आदि करैमे दिक्कत नइ होइ छै। चलबो-फिरबो करैए। आब बोलियो नइ लटपटाइ छै। भागिन अखनो माइक पाछू अछि।” हम कहलयैन- “आब चलै छी भाय।” तैपर नन्दा भाय बजला- “असल गप तँ रहिए गेल।” हम पुछलयैन- “की असल गप भाय?” नन्दा भाय कहलैन- “सारहु लगसँ पाइक मांग होमए लगल। सारहु तँ कम मुदा हमर सारि अनीता बरबैर फोन करए। केकरोसँ जमीनक बात करिऐ तँ लाख टकाक बदला पच्चास-साठि हजार कट्ठा लगाबए। तहूँमे किछ लोकक मनमे रहै जे चौकपरहक जमीन कहुना लिखा ली। पैछला साल बैसक्खा तरकारीक खेती केलौं। साठि हजार टकाक आमदनी भेल, सारहुकेँ दऽ एलिऐन। ऐ साल फेर भिन्डी, खीरा, घेरा, सजमैन आ करैलाक खेती केलौं। सुतरल, तीन दिन पहिने तक पचहत्तर हजार टकाक आमदनी भेल। काल्हि भोरे पचहत्तरो हजार टका लऽ कऽ सारहु ऐठाम गेलौं। पचहत्तर हजार टका सारहुकेँ दैत कहलयैन, पनरह हजर टका आरो दऽ जाएब। तैपर सारहु दस हजार टका हमरा आपस करैत बजला, हम तँ एक लाख पच्चीसे हजार टका देने छेलौं जइमे अहाँ साठि हजार टका पहिने दऽ गेल छेलौं तँ पैंसैठे हजार टा ने बाँकी रहल छल। ई दस हजार किए दऽ रहल छी। आ कहै छी पनरह हजार आरो दऽ जाएब?” हम कहलयैन- “ई दस हजार सुइद दऽ रहल छी आ आगाँ जे पनरह हजार देब ओहो सुइदे देब।” तैपर हमर सारहु बजला- “अँइ यौ सारहु, चन्दा बहिन अहींटाक बहिन छथिन ओ हमर बहिन नइ भेल की?राखू ई सुइदबला टका आ आब टका नै लएब।” हम की बजितौं। हमर तँ बोलीए बन्न भऽ गेल। हमरा आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगल। नन्दा भाय बजला- “बौआ आब बुझलह ने जे गंगा केना नहेलौं।” हम कहलयैन- “हँ भाय, सभ बुझि गेलौं।” तखने बेचुआ दुनू परानी तरकारी जोखबए आएल। हम नन्दा भायसँ कहलयैन- “भाय, आब अहाँबेचूकेँ तरकारी जोखि कऽ दियौ। हम जाइ छी।” नन्दा भाय बजला-“तरकारीक बेगरता हुअ तँ लऽ जइहह। पाइ-कौरीक चिन्ता जुनि करिहह। पाइ आगाँ-पाछाँ अबैत रहतै।” हम कहलयैन- “ठीक छै भाय।” करौना रामू कक्काकजमाए विनीतजी दिल्लीक एकटा प्राइवेट कम्पनीमे नौकरी करै छथिन। नीक पाइयक आमदनी छैन। विनीतजी तेज-तर्रार लोक। पाँच-सात बर्खसँ दिल्लीमे रहै छैथ। दू बर्ख पहिने रामू कक्काक बेटी रीतासँ बिआह भेलैन। बिआहक बाद छह मास धरि रीता सासु-ससुरक संग सासुरेमे रहली मुदा छह मासक बाद जखन विनीतजीक नौकरीमे तरक्की भेलैन तँ दरमाहा सेहो बढ़लैन। कम्पनी तरफसँ क्वाटर सेहो भेटलैन तँ ओ अपन पत्नी रीताकेँ दिल्ली लऽ गेला। भगवानक कृपासँ रीताक पएर भारी भेलइ। पहिल बच्चा तँए सावधानी बरतब जरूरी, तँए जखने रीताक पएर भारी भेलै विनीत जी महिला डॉक्टरसँ रीतकोँ देखा सलाह लेलैथ। महिला डॉक्टर मासे-मासे रीताकेँ सम्पर्क करए लेल कहलखिन। जखन पाँचम मास चढ़लै तँ रामू काका आ सीतीया काकी सेहो बेटी-जमाए ओतए दिल्ली गेलैथ। रामू काका आ सीतीया काकीकेँ लऽ कऽ एकेटा सन्तान आ ओ रीता। तँए जखने बेटीक पएर भारी हएब सीतीया काकी सुनली तखनेसँ बेटी ओतए दिल्ली जेबा लेल आफन तोड़ए लगली। मुदा जेती केना, माने दुआरिपर एकटा बाछी छैन, तेकरा छोड़ि कऽ केना जेती?पाँच दिन पहिने ओ बाछीकेँ एक गोरेकेँ पोसिंया दऽ देली आ छठम दिन रामू काका सीतीया काकी दिल्लीक लेल बस पकैड़ लेली। दिल्ली पहुँचलापर बेटी रीता आ जमाए विनीतजी बड़ खुश भेला। रामू कक्काक विचार रहैन जे बेटीक हाल-चाल बुझि एक सप्ताहक भीतर गाम वापस भऽ जाएब। मुदा से भेलैन नहि। एक्के ठीन जमाए कहलकैन- “अखन जाएब केना नीक?भगवानक कृपासँ हमरा कोनो चिजीक अभाव नै अछि डेरो फइल-ऐल अछिए। सुतै-बैसैमे कोनो दिक्कत नहियेँ अछि। क्वाटरमे तीनटा बेड रूम, एकटा किचेन, एकटा ड्रांइगरूप आ लेटरीन-बाथरूम सभरूममेएटाएच अछिए।” माने जाबे धरि रीताकेँ सुहिरदे पूर्वक बच्चा नै जनैम जाइ छै ताबे धरि दुनू गोरे यानी रामू काका आ सीतीया काकीकेँ दिल्लीएमे रहए पड़तैन।की करितैथरामू काका आ सीतीया काकी बेटी-जमाइक बात मानए पड़लैन। गामोपर कोनो काज नहियेँ छेलैन। खेतीयो-पथारी नहियेँ जकाँ छैन। बालो-बच्चाक नाओंपर एक्केटा सन्तान रीतेटा। रामू काका कहलखिन- “पाहुन, हम सभ अहाँक बात मानि एतए रहब मुदा हमरा डेरामे बैसल नीक नहि लागत तँए कोनो छोट-छीन नौकरी लगा दिअ।” जमाए बाबू कहलकैन- “ठीक छै, जँ अपनेक सएह मन अछि तँ तेकरो जोगार भऽ जेतै, ओना हम कहब जे अपने डेरेपर रहू। कवि छीहे, डेरेपर बैस कऽ कविताक रचना करैत रहू। दिल्लीयोमे कवि गोष्ठी होइत रहै छै ओइमे भाग लिअ।” तैप्र रामू काका कहलखिन- “डेरामे बैसल-बैसल मन उबिया जाइत अछि। तँए कोनो नोकरी करब तँ मनो लगल रहत आ दूटा पाइ सेहो हएत।” विनीतजी एकटा कम्पनीमे रामू काकाकेँ दरवानक काज धरा देलकैन। सीतीया काकी बेटीक भानस-भात आ कपड़ा-लत्ता धोइमे मदैत करए लगलखिन। जखन रीताक पएर भारी भेना सात मास भऽ गेलै तखन करोना बेमारीक कारण पूरा देशमे लॉक-डॉन लागू भेल। सभ कल-कारखाना, दोकान-दौरी, कारवार सभ बन्न भऽ गेल। खाली दवाइ देाकान, फल, किराना आ सब्जीक देाकान सभ खुजैत रहए। तहूमे दबाइ दोकानक अलावे किरानी, फल आ सब्जीक दोकान समयसँ खुलए आ समयसँ बन्न भऽ जाए। रामू कक्काक नौकरी सेहो छुटि गेलैन किए तँ कम्पनीए बन्न भऽ गेलइ। विनीतजी मासे-मास रीताकेँ महिला डॉक्टरसँ देखबिते छला। दिल्लीमे करोना वायरसक प्रकोप बेसी बढ़ि गेल। डॉक्टरो सभ करोना,ख वायरससँ संक्रमित होमए लगला। केतेक डॉक्टर तँ अपन प्राइवेट क्लिनिक बन्न कऽ देलैन। हँ, करोना वायरसक संक्रमण बढ़लासँ खानगी नरसिंग होमक मालिक चानी काटैए। पाँच लाखसँ लऽ कऽ दस लाख टका लऽ कऽ करोना वायरससँ संक्रमित बेकतीकेँ इलाज करैए। बुझू जे करोना वायरसक नाओंपर लूटम-लूट होइए। रीताक नवम् मास चलि रहल छेलइ। विनीतजी रीताकेँ लऽ कऽ डॉक्टर (जइ डॉक्टरसँ देखबैत छला) ओतए पहुँचला। संगमे रामू काका आ सीतीया काकी सेहो छेली। डॉक्टर कहलकैन- “रीताकेँ करोनाक जाँच करबए पड़त।” विनीतजी पुछलखिन- “जाँच केतए हएत?” तैपर डॉक्टर प्राइवेट जाँचघरक पता आ स्लिप देलखिन। विनीतजी रीताकेँ लऽ कऽ डॉक्टर साहैबक बतौल जाँचघर गेला। ओतए रीताक कण्ठ लगसँ पाइपसँ सेम्पल लेल गेल। जाँच घरक डॉटर विनीतजीकेँ फोन नम्बर सेहो लेलखिन। विनीतजी पुछलखिन जाँच रिपोर्ट कखन भेटत। तैप्र जाँच घरक डॉक्टर कहलकैन- “रिपोर्ट तैयार भऽ जाएत तँ फोनसँ अहाँकेँ खबैर कऽ देब।” विनीतजी सेम्पल दऽ सभतूर डेरा आबि गेला। डेरामे मोबाइल चार्जमे लगा कऽ बजार दिस गेला।रामू काका एकटा कविता लिख रहल छला तखने विनीतजीक मोबाइलमे घन्टी बजल। रामू काका चार्जमे सँ मोबाइल निकालि कऽ हरियरका बटन टिपैत बजला- “हेलो, के बजै छिऐ?” ओम्हरसँ अवाज आएल- “हम खन्ना जाँच घर का डॉक्टर बोल रहे हैं। आपकी पत्नी का जाँच रिपोर्ट पोजेटीव आया है।” तैपर रामू काका कहलखिन- “रीताहमारी बेटी है।” तैपर मोबाइलमे सँ अवाज आएल- “देखिए, आपकी बेटी को अविलम्ब मलहोत्रा नरसिंह होममे भर्ती करना पड़ेगा। लगभग पाँच लाख रूपये का प्रबन्ध कीजिए। देखिये आपकी बेटी को बच्चा होनेवाला है। मामला सीरियस है। जल्दी कीजिये। अगर और बेहतर इलाज चाहते हैं तो सात-आठ लाख रूपैआ का बेवस्था कीजिये, दिल्ली का ए-वन नरसिंग होममे भर्ती करबा देंगे। गारंटी के साथ इलाज होगा।” रामू काका कहलखिन- “अच्छा गारजियन आते हैं तो कहते हैं।” रामू कक्काक आँखिसँ दहो-बहो नोर जाए लगलैन। कनेक कालक बाद सीतीया काकी चाह नेने रामू काका लग एली तँ पतिकेँ कनैत देख पुछलखिन- “मर्र!ई की भऽ गेल।कनइ किए छिऐ?” मुदा रामू काका किछु ने बजला। ओ सोचए लगला जे जखन रीताक माएकेँ कहबैन तँ ओ आर दुखी हेती आ जोर-जोरसँ कानए लगती। रीताकेँ मालूम हएत तँ ऊहो दुखी हेती। तँए रामू काका सीतीया काकीकेँ किछु ने बतौलखिन। तखने विनीतजी बजारसँ सब्जी आ किरानी समान लऽ कऽ डेरा पहुँचला। ससुरकेँ आँखिमे नोर देख पुछलखिन- “की बात छिऐबाबूजी, अपनेक आँखिमे नोर देखै छी..!” रामू काका विनीतजी केँ मोबाइलपर भेल सभ बात बता देलकैन। विनीतजी सोचए लगला रीतामे तँ करोना बेमारीक कोनो लक्षण नै छल। फेर रिपोर्ट पॉजिटीव केना आएल? विनीतजी सोचमे पड़ि गेला। तखने मोबाइलक घन्टी बाजल। विनीतजी फोन रिसिव करैत बजला- “आप रीता का पति बोल रहे हैं?” विनीतजी कहलखिन- “हँ, हम रीता का हसबेन्ड बोल रहे हैं। आप..?” बिच्चेमे अबाज आएल- “हम खन्ना जाँच घरसँ बोल रहे हैं। आपकी पत्नी का रिपोर्ट पॉजेटीव है। कम-सँ-कम पाँच लाख का प्रबन्ध कीजिए। मलहोत्रा नरसिंग होममे भर्ती करा देते हैं। अगर उससे भी बेहतर इलाज चाहते हैं तो सात-आठ लाख का बेवस्था कीजिए। समझे, देखिये मामला सीरियस है जल्दी कीजिये।” विनीतजी कहलखिन- “ठीक है। हम रिपोर्ट लेने आ रहे हैं वहीं बात होगी।” ई कहि विनीतजी फोन काटि देलखिन। विनीतजी अपने दिल्लीक फेरल लेाक। एम.ए. पास केला बाद दिल्लीए आबि गेल छला। किछु दिन सरकारी नौकरीक लेल प्रयास केलैथ मुदा सरकारी नौकरी नइ भेटलैन तँ प्राइवेट कम्पनीमे काज करए लगला। प्राइवेट नरसिंग होम सभमे केना मुल्लाकेँ फँसौल जाइ छै आ नीक इलाजक नाओंपर केना लूटल जाइ छै, सभ बात विनीतजीकेँ बुझल। तँए ओ जाँच रिपोर्ट पॉजिटीव सुनला पछाइतो घबड़ेला नहि। टेम्पू केलैथ आ रिपोर्ट आनए विदा भऽ गेला। रामू काका कहलखिन- “हमहूँ संग चलै छी।” तैपर विनीतजी कहलखिन- “नइ, अपने नइ जाउ। हम रिपोर्ट नेने अबै छी। ताबे अपने सभ तैयार रहब आ रीताकेँ सेहो तैयार राखब। हम ओम्हरेसँ गाड़ी नेने आएब। रीताकेँ जय प्रकाश नारायण अस्पतालमे भर्ती कराएब।” ई कहैत विनीतजीचलि गेला। खन्ना जाँच घरक डॉक्टर विनीतजीकेँ बड़ उन्टा-सीधा समझौलकैन। डॉक्टर कहलकैन- “देखिये आपकी पत्नी को दस-पनरह दिन के भीतर बच्चा होनेवाला है। इसलिऐ किसी अच्छा नरसिंग होममे भर्ती कराना जरूरी है ताकि करोना का अच्छा इलाज हो सके। अभी मलहोत्रा नरसिंग होम में अच्छा इलाज हो रहा है। बेवथा भी ठीक है। पाँच लाख रूपये लगेंगे।” तैपर विनीतजी कहलखिन- “मैं साधाराण आदमी हूँ। मेरी हैसियत किसी प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराने का नहीं है। मैं किसी सरकारी अस्पताल में इलाज कराऊँगा।” डॉक्टर कहलकैन- “आप कम से कम कितना खर्च कर सकते हैं। मैं कुछ छूट भी करबा दूँगा।” विनीतजी कहलखिन- “मेरे लिए अभी करौना वायरस के चलते लॉक-डॉनमे परिवार चलाना भी मुश्किल है। लाइये रिपोर्ट दे दीजिए।” डॉक्टर रिपोर्ट दैत कहलकैन- “मेरा काम अपको अच्छा रास्ता दिखलाना था। आगे आप जाने और आपका काम।” तैपर विनीतजी कहलकैन- “सलाह के लिए धन्यवाद।” रिपोर्ट लऽ विनीतजी विदा भऽ गेला। डॉक्टर विनीतजीकेँ जाइत देखैत रहि गेला। ओ सोचए लगला, मुल्ला फँसा नहीं। विनीतजी एकटा बोलेरो गाड़ीबलाकेँ फोन कऽ बजौलैथ आ डेरापर एला। डेरापर सभ गोरे तैयार रहबे करैथ। गाछ़ीमे रीताकेँ बैसा रामू काका अ सीतीय काकीक संगे विनीतजी जय प्रकाश नारायण अस्पताल पहुँचला। ओतए रीताकेँ भर्ती कऽ देलखिन। अस्पतालक डॉक्टर विनीतजीकेँ कहलकैन- “करोना से घवड़ाने की आवश्यकता नहीं है। वैसे आपकी पत्नी को दस-पन्द्रह दिनों के भीतर डिलेभरी होनेबला है। खून चढ़ाना पड़ेगा।” विनीतजी डॉक्टरकेँ कहलकैन- “सर मेरा खून ले लीजिये। मेरे खून का ग्रूप और मेरी पत्नी का खून का ग्रूप सेम है।” तैपर डॉक्टर कहलकैन- “आप तो अपने दुबले-पतले है। आपके शरीर से खून नहीं निकाला जा सकता है।” रामू काका कहलखिन- “सर हमर खून लऽ लिअ।रीताक हम पिता छिऐ।” डॉक्टर शायद मैथिले छला। ओ बजला- “नहि, अपनेक उमेर बेसी भऽ गेल अछि। तँए अपनेक खून काज नइ करत। कोनो जवान बेकतीक खून चाही। दू तीन दिनक भीतर खूनक प्रबन्ध करू।” रीताकेँ भर्ती कऽ सभ गोरे डेरा आबि गेला। विनीतजी अपना मित्र-मण्डली आ सगा-सम्बन्धी जे दिल्लीमे छला सभकेँ खून देबा लेल आग्रह केलखिन, मुदा कियो तैयार नइ भेलैन। विपीतजी खूनक लेल चिन्तित भऽ गेला। ओ रामू काकाकेँ कहलखिन- “बाबूजी खूनक बेवस्था तँ भइये ने रहल अछि। केना हएत। अपनेकेँ कियो चिन्ह-पहचीनक लोक दिल्लीमे छैथ तँ प्रयास करियौ।” तैपर रामू काका कहलखिन- “अछि तँ केतेको सर-कुटुम, मुदा रक्तदान करता कि नहिसे नइ जानि।” विनीतजी कहलखिन- “प्रयास कएल जाउ ने।” रामू काका अपन सर-कुटुम, गौंआँ-घरूआ आ अड़ोसी-पड़ोसीकेँ फोनोसँ आ भेँटो करि कऽ कहलखिन। मुदा कियो तैयार भेलैन। दिल्लीमे एकटा संगठन अछि, नाओं छिऐ- सुच्चा मैथिल। मुख्य रूपसँ ओ संगठभ्न मैथिली भाषाक साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी लोकनिक संगठन छी। रामू काकाकेँ कवि सम्मेलनमे ओइ संगठनक अध्यक्ष अस सचिवसँ परिचय भेलैन। रामू कक्काक कविता सुनि संगठनक अध्यक्ष, सचिव प्रभावित भेल छला। रामूओ काकाकेँ ओइ सुच्चा मैथिल संगठनक सदस्य बनौल गेलैन। बरबरि संगठनक अध्यक्ष, सचिवसँ रामू काकाकेँ सम्पर्क मोबाइल द्वारा होइ छेलैन। रीताकेँ अस्पतालमे भर्ती केलाक पाँचम दिनक गप छिऐ। रामू काका आ विनीतजी रीताक लेल खूनक बेवस्थापर गप करै छला कि रामू कक्काक मोबाइलक घन्टी बाजल। रामू काका मोबाइलक रिसिभ करैत बजला- “हेल्लो, हम रामू बजै छी।” ओम्हरसँ अवाज आएल- “हम सुच्चा मैथिली संगठनक अध्यक्ष बजै छी। की हाल-चाल अछि कविजी?” तैपर रामू काका बजला- “प्रणामअध्यक्षजी, हमर हाल-चाल ठीक नइ अछि। बेटीकेँ बच्चा होमए बला अछि। खूनक बेगरता अछि। अखैन धरि खूनक बेवस्था नइ भऽ सकल अछि।” अध्यक्षजी बजला- “केतेक खून चाही। जेतेक खूनक बेगरता हएत भऽ जेतै, अहाँ चिन्ता जुनि करू। रातिमे दस बजे हमरा फोन करब।” दस बजे रातिमे रामू काका अध्यक्षजीकेँ फोन केलकैन। अध्यक्षजी कहलकैन- “काल्हि ती गोरे अहाँक डेरापर जएत। अहाँ तीनू गोरेकेँ अस्पताल लऽ जाएब आ जेतेक खूनक बेगरता हएत ओ सभ देता।” सएह भेल। जेतेक खूनक अवश्यकता छल ओतेक खून एके गोरे दऽ देलकैन। रीताकेँ खून चढ़ौल गेल। दसम दिन रीता एकटा लड़ाक जन्म देलक। जान-मे-जान आएल जन्माष्टमीक दिन। हमरा ओहिठाम बेस चहल-पहल छल। किएक तँ अपनो दरबज्जापर भगवान श्री कृष्णक जन्म-उत्सव मनौल जाइत अछि। से आइयेसँ नहि, बाबूएक अमलदारीसँ। दस बजे रातिमे भगवान श्री कृष्णक मुरुतकेँ नयन पड़ल। तेकर पछाइत विधि-पूर्वक पूजा-पाठ भेल। कीर्तनियाँ मण्डली कीर्तन गौलैथ आ दाइ-माइ लोकैन भगवान श्री कृष्णक गीतक संग भगवती आ महादेवक गीत सेहो गौलैन। भगवानकेँ भोग लगलाक बाद परसाद बाँटल गेल। तेकर बाद परिवारक लोक भोजन केलैन। ओना, बाल-बोध सभ खेनाइ खा नेने रहए। साढ़े बारह बजे रातिमे हम जा कऽ ओछाइनपर सुति रहलौं। लगभग दू-अढ़ाइ बजे रातिमे नीन टुटल। सेहो नीन ओहिना नहि टुटल, अँगनाक गल-गुल सुनि कऽ नीन टुटल छल। ओछाइनेपर सँ सुनलौं, भैया कहैत रहैथ- “बिलम्ब करब नीक नहि हएत। जतेक जल्दी अस्पताल पहुँचब तेते नीक रहत।” तैपर हमर जेठका भातीज मनोज बाजल- “गाड़ीबलाकेँ फोन केलिऐ हेन, जइ घड़ी ने पहुँचल।” ओछाइनपर सँ उठि कऽ ओसारपर एलौं तँ हम अपन पत्नीकेँ हम अपन भौजाइसँ गप करैत देखलयैन। हम पत्नीकेँ लगमे बजा पुछलयैन- “की बात छिऐ, कथीक फजगज होइ छै?” तैपर पत्नी कहलैन- “छोटकी कनियाँकेँ बच्चा होनिहार छै। दरद शुरू भऽ गेलै हेन। मासो पुरले छै।” हम कहलयैन- “तखन तँ अस्पताल लऽ जाए पड़तै किने?” पत्नी बजली- “रातिमे एम्बुलेन्सबला औत कि नहि तँए स्कारपिओ गाड़ीबलाकेँ फोन केलकै हेन। ओ गाड़ी लऽ कऽ आबि रहल छै। रेफरल अस्पताल फुलपरास लऽ जेतइ। रीनाक माए हमरो संगे जाइले कहलक हेन।” रीना हमर जेठकी भतीजीक नाओं छी आ छोटकी कनियाँ हमरा भैयाक छोटकी पुतोहु भेली। हम पत्नीसँ कहलयैन- “जखन संगे जाइलऽ कहलक हेन तखन नइ जेबै से हएत। जाउ तैयार भऽ जाउ आ जाइयौ। पाइयो-कौरी लेबइ?” पत्नी बजली- “साए-पचास टका संगमे रहत तँ नीक्के रहत किने। कखनो चाहे-ताहे पीबैक मन हएत तँ केकरासँ मंगबै ग।” हम पत्नीक विचारकेँ समर्थन करैत कहलयैन- “से तँ ठीके।” एकटा पचसटकही आ पाँचटा दसटकही नोट पत्नीकेँ दैत कहलयैन- “लिअ, एक साए टाका रखि लिअ। खुदरा अछि। खर्चो करैमे असान हएत।” दसे मिनट बाद गाड़ी आबि कऽ डेढ़ियाक सामने खड़ा भऽ गेल। स्कारपिओ गाड़ी रहए। बीचला सीटपर छोटकी कनियाँकेँ आरामसँ लेटाएल गेल। बगलमे हमर पत्नी बैसली। भैया आ एकटा गामक डॉक्टर ऐगला सीटपर (ड्राइवरक बगलमे) बैसला। भौजी आ भातीज पैछला सीटपर बैसल। सभकेँ बैसते ड्राइवर गाड़ीकेँ स्टार्ट केलक आ विदा भऽ गेल। हमहूँ जा कऽ ओछाइनपर सुति रहलौं। अबेर-कऽ सुतल रही तँए अबेर-कऽ नीन टुटल। गोहाली घरसँ महींसकेँ निकालि बाहरक नादिपर बान्हि सानी लगा पोखैर दिस विदा भऽ गेलौं। नित्यक्रियासँ निवृत भऽ गामपर एलौं तँ छेाटका भातीज अजयसँ पुछलिऐ- “हउ, रौतुका समाचार नइ बुझलौं।” तैपर अजय बाजल- “रेफरल अस्पताल फुलपरासमे बच्चा नहि जनमलै तँ रीता नायकक नरसिंग होम लहेरियासराय लऽ गेलै। ओतए पेट खोलि कऽ बच्चा भेलइ।” हम पुछलिऐ- “कोन बच्चा छिऐ?” अजय बाजल- “लड़का छिऐ।” लड़काक नाओं सुनि थोड़ेक संतोष भेल। संतोष ऐ लेल भेल जे पेट खोलि कऽ बच्चा भेल रहए। अखन बेटीक बिआहमे दहेजक जे समस्या खड़ा भऽ गेल अछि ओ बेस जटिल भऽ गेल अछि। जइ परिवारमे बाहरी आमदनी नइ छै, ओइ परिवारमे जँ बेटीक बिआह हएत तँ बिना जमीन बेचने दोसर कोनो उपाय नइ। खाएर दहेजक जे समस्या छै, जेतए छै तेतए रहह। हम अजयसँ पुछलिऐ- “बच्चा आ जच्चा ठीक छै किने?” अजय हमर मुँह तकैत बाजल- “की जच्चा?” हम अजयकेँ समझाबैत कहलिऐ- “बच्चा भेल नवजात शिशु जे जनमल हेन आ जच्चा भेल बच्चाक माए, जेकरा प्रसूती सेहो कहल जाइ छै।” ई गप-सप्प होइते रहए कि हमर भतीजी मोबाइल नेने आएल आ हमरा कहलक- “काका, मनोज भाइजी अहाँसँ बात करता। ओ लाइनेपर छथिन।” हम मोबाइल लऽ मुँह लग मोबाइल सटा बजलौं- “हेल्लौ, की कहै छीही?” ओम्हरसँ अबाज आएल- “लहेरियासराय आबहक ने। हम तँ पूजापर बैसब। तँए गाम आबए पड़त आ भगवानकेँ पूजा-पाठ, धुप-आरती कए भोग लगबए पड़त। जाबे मुरुत नइ भँसत ताबे हमरा गामेमे रहि कऽ भोर-साँझ धूप-आरती करए पड़त।” हम पुछलिऐ- “बच्चा आ जच्चा ठीक छै किने।” ओम्हरसँ अबाज आएल- “हँ, सभ ठीक छै। तूँ एबहक तखने हम गामक लेल विदा हएब।” हम कहलिऐ- “बस पाँच मिनटमे हम विदा भऽ जाइ छी।” सएह केलौं। एकटा लूंगी, एकटा गमछा आ अन्दरपैन्ट झोरामे लऽ कऽ विदा भऽ गेलौं। संयोग नीक रहल। एन.एच.पर एलौं कि बस भेट गेल। साढ़े आठे बजे रीता नायकक नरसिंग होम पहुँच गेलौं। भातीज मनोज कहलक- “बच्चाक डॉक्टर बिपिन मुखर्जीसँ बौआकेँ देखौलिऐ हेन। डॉक्टर साहैबक कम्पाउन्डर बौआक खूनो जाँच करए लऽ गेला हेन। पाँच बजे साँझमे डॉक्टर बिपिन मुखर्जीसँ भेँट कऽ ओ की कहै छैथ बुझि लिहह। जँ बच्चाक डॉक्टर दबाइ लिखथिन तँ दबाइ कीनि कऽ आनि लिहह। ढौआ माएकेँ दऽ देलिऐ हेन।” ई कहैत भैया आ भातीज विदा भऽ गेला। पहिने जा कऽ बच्चाकेँ देखलौं। बड़ सुन्दर, गोर-नार, नमहर-नमहर आँखि, मुदा दुबरे-पातर बच्चा रहए। पत्नी सेहो बच्चेक पाँजरमे बैसल छेली। पत्नी हमरा पुछली- “महींसकेँ केकरो जिम्मा लगा कऽ एलिऐ हेन किने।” हम कहलयैन- “हँ, माएकेँ कहि कऽ एलिऐ हेन।” पत्नी पुछली- “चाह पीने छिऐ?” हम कहलयैन- “नहि, चाह नइ पीने छिऐ। समैये नइ भेटल। आब जाइ छी, बिस्कुटो खाएब आ चाहो पीब।” पत्नी आढ़ैत दैत बजली- “एक कप चाह हमरो लेल नेने आएब।” हम पुछलयैन- “गिलास अछि?” पत्नी स्टीलक गिलास दैत बजली- “लिअ, अहीमे चाह नेने आएब।” हम फेर पुछलयैन- “आ रीनाक माए चाह नइ पीयत।” तैपर पत्नी बजली- “नइ रीनाक माए चाह कहाँ पीबैत अछि।चाह पीलासँ ओकरा गैस बनि जाइ छै।” हम गिलास लऽविदा भऽ गेलौं। चाहक दोकान नर्सिंग होमक बगलेमे। एक कप चाह आ पाँच टकाबला एक डिब्बा ड्रीमलाइट बिस्कुट हम पत्नीकेँ दऽ एलिऐन। पछाइत अपनो बिस्कुट खा पानि पीब चाह पीलौं। पाँच बजे साँझमे बच्चाक डॉक्टर बिपिन मुखर्जीक क्लिनिकपर गेलौं। कम्पाउन्डरकेँ कहलयैन- “हम रीता नायकक नर्सिंग होमसँ एलौं हेन। भोरमे एकटा नवजात शिशुकेँ डॉक्टर साहैब देखने रहथिन।” तैपर कम्पाउन्डर कहलैन- “हँ, बच्चाक खूनक जाँच रिपोर्ट आबि गेल हेन भीतरक आदमी निकलै छैथ तँ अहाँकेँ डॉक्टर साहैबसँ मिला दइ छी।” पाँचे मिनट बाद एकटा बेकती एकटा पाँच-छह बर्खक बच्चाक संगे क्लिनिकसँ बाहर निकलला तँ कम्पाउन्डर भीतर गेला। दुइये-तीन मिनटक बाद डॉ. बिपिन मुखर्जी हमरा भीतर बजौलैथ आ बजला- “देखिये, आपके बच्चा को के.बी. मेमोरियलमे आइ.सी.यू.मे भरती करना पड़ेगा।” तैपर हम पुछलयैन- “क्या आइ.सी.यू.मे रखना जरूरी है?” तैपर डॉ. मुखर्जी बजला- “तो क्या मैं वैसे कह रहा हूँ। सुरक्षा के ख्याल से बच्चा को आइ.सी.यू.मे रखना जरूरी है।” ई कहैत डॉक्टर बच्चाक प्रिसकेप्सन दैत पुन: बजला- “जाइये जल्दी कीजिए।” यौ बाबू हमर तँ पएर तरक जमीने घुसैक गेल। बूझू हमर पाद-उकासी दुनू बन्न भऽ गेल। भैया-भातीज बच्चाक सभ जवाबदेही हमरा दऽ कृष्ण भगवानक पूजा-पाठ करए गाम चल गेला। हमरा माथपर बड़का भार छल। हम रीता नायकक नर्सिंग होम आबि अपना पत्नी आ भौजाइकेँ सभ बात कहलयैन। पत्नी, भौजाइ आ पुतोहुजनी सभ चिन्तित भऽ गेली। पत्नी कहलैन- “गामपर फोन कऽ मनोजकेँ पुछियौ जे की कहैए।” सएह केलौं। मोबाइल निकालि मनोजकेँ फोन लगेलौं। ओमहरसँ हल्लोक अबाज आएल तँ बच्चाक डॉक्टरसँ जेतेक गप भेल छल सभ गप कहलिऐ। तैपर मनोज कहलक- “नइ, के.बी. मेमोरियलमे बच्चाकेँ भरती नइ करबै आ ने आइ.सी.यू.मे बच्चाकेँ राखबै। बड़ खर्च पड़त।” ई कहि ओ फोन काटि देलक। अपना किछु फुरेबे ने करए। सच पुछी तँ आई.सी.यू. की होइ छै से बुझबे ने करिऐ। भैया-भातीज गाममे छल। टोटल जवाबदेही अपना ऊपरमे छल, किछो राजा-दैब हएत तँ दोखी अपने बनब। पता चलल जे के.बी. मेमोरियलमे बच्चाकेँ भर्ती करैसँ पहिने दस हजार टका अग्रिम देमए पड़ै छै। अपना लग मात्र पाँच साए टका रहए। भौजी लग सेहो दुइये हजार टका छेलइ। सोचलौं जे डॉक्टर ऑपरेशन कऽ बच्चा निकाललक, तेकरासँ पुछै छिऐ जे ओ की कहै छैथ। सएह केलौं। डॉ. रीता नायकसँ भेँट कऽ बच्चाक डॉक्टर बिपिन मुखर्जीसँ जे बात भेल रहए आ ओ (बच्चाक डॉक्टर) जे कहने रहैथ, सभ बात डॉ. रीता नायककेँ कहलयैन। तैपर ओ बजली- “बच्चेलेल ने हमरा ऐठाम आएल छिऐ।” हम कहलयैन- “हँ, से तँ बच्चेलेल आएल छिऐ।” डॉ. रीता नायक कहलैन- “तखन, बच्चाक डॉक्टर जे कहलैथ से करियौ। यानी बच्चाकेँ आइ.सी.यू.मे भर्ती करियौ।” ले बलैया, आब तँ भेल आर पहपैट। सोचलौं जे डॉ. रीता नायक किछु दोसर बात कहती मुदा ओहो तँ डॉ. बिपिने मुखर्जीक बातकेँ समर्थन कऽ देली। हम बच्चाक लग गेलौं आ बच्चाकेँ गौरसँ देखलौं। बच्चा हमरा पूर्ण स्वस्थ लागल। हमरा मनमे भेल जे ई बच्चाक डॉक्टर आ डॉ. रीता नायक दलाली तँ नइ कऽ रहली हेन। हमरा पैछला बात मोन पड़ि गेल। हमर जेठकी बेटी विभाकेँ बच्चा होइले छेलइ। भोरे आठ बजे दर्द शुरू भेलै तँ रेफरल अस्पताल फुलपरास अनलिऐ। बारह बजे तक बच्चा नइ भेलै। अस्पतालक कर्मचारी, जइमे महिला आ पुरुख दुनू छेलै, कहए लगलै केश बिगैड़ रहल अछि। तँए प्राइवेट नर्सिंग होममे लऽ जा कऽ भरती कऽ दियौ। हमर पत्नी सेहो घबड़ाए गेली। हम अस्पतालक एकटा महिला कर्मचारीसँ पुछलयैन- “केतए अछि प्राइवेट नर्सिंग होम आ ओतए केतेक खर्च पड़त?” तैपर ओ महिला कर्मचारी बतेली- “रोडसँ उत्तर रेफरल अस्पताल अछि आ रोडसँ दक्षिण सड़के कातमे गायत्री नरसिंग होम छै। जँ नॉरमल डिलेवरी भऽ जाएत तँ पन्द्रह-बीस हजार टकामे फरिछा जाएत आ जँ सीजर करए पड़ल तँ तीस-पैंतीस हजारक लपेट लागि जाएत।” हम पुछलयैन- “सीजर केकरा कहै छै?” ओ महिला कर्मचारी बजली- “पेट खोलि कऽ जे बच्चा होइ छै ओकरा सीजर कहल जा छै।” ई गप होइते रहए कि एकटा नर्स आएल आ कहलक- “विभाक पिताजी अहीं छिऐ।” हम कहलिऐ- “हँ, हमहीं विभाक पिता छिऐ। की बात?” तैपर ओ बाजल- “मामला सीरियस अछि, जल्दी गायत्री नरसिंग होम लऽ जाइयौ।” ओइ नर्सक बात सुनि चिन्तित भऽ गेलौं। पाइयो-कौरीक अभावे रहए। मात्र चारिये हजार टका छेलए। दिमाग काजे ने करए। सोचलौं दस मिनट देख लइ छिऐ। पछाइत देखल जेतइ। मन भेल एक कप चाह पीब ली। सएह केलौं। चाह पीबए चाहक दोकानपर गेलौं तँ ओतए विवेकजी भेँट भऽ गेला। ओ हमर राजनीतिक मित्र। दुनू गोरे एक्के दलमे छी। विवेकजीसँ कुशल समाचार भेल। हुनका सभ बात बतौलिऐन। तैपर ओ कहलैन- “केतौ ने जेबाक अछि। ऐ अस्पतालक कर्मचारी सभ पाइवेट नरसिंग होमक दलाली करैत अछि। अहाँ धैर्य आ साहस राखू। नॉरमल डिलेवरी हेतइ।” सएह भेलै। एक घन्टाक बाद नॉरमल डिलेवरी भेलइ। विभा एकटा सुन्दर बालककेँ जन्म देलकै। मनमे पूरा विश्वास जमि गेल जे डॉ. रीता नायक आ डॉ. मुखर्जी के.बी. मेमोरियलक दलाल छी। हम रिक्सा केलौं आ बच्चाकेँ पत्नीक कोरामे दऽ सभ कियो सरकारी अस्पताल पहुँचलौं। ऐठाम कम्प्यूटरमे पुरजा बनाए डॉक्टर लग गेलौं। डॉक्टर नवजात शिशुकेँ देखलैथ। आला लगा कऽ सेहो जाँचलखिन। डॉक्टर बजला- “आपका बच्चा पूर्ण स्वस्थ है। क्या दिक्कत है, जो यहाँ लाये हैं?” हम डॉ. विपिन मुखर्जी आ रीता नायकसँ भेल सभ बात कहलयैन। तैपर बच्चा अस्पतालक डॉक्टर कहलैथ- “कहीं भरती नहीं कराना है। बच्चा को ले जाइये। किसी भी समय कोई दिक्कत हो तो इस अस्पतालमे ले आइयेगा। यह चौबीसो घन्टा खुला रहता है।” बच्चा अस्पतालक डॉक्टरक बात सुनि जान-मे-जान आएल। संस्कारी कन्या साँझुपहर बाध दिससँ गामपर एलौं। बाध दिससँ की आएब, गहुम खेतक ओगरवाही कए कऽ एलौं। यौ किसान छी। दू बिगहा खेतमे गहुमक खेती केने छी। सभ गहुम निछार भऽ कऽ फुटि गेल अछि। मुदा गहुम खेत सभमे अड़कच-बथुआ तेतेक अछि जे घसवाहनी सभकेँ रहले ने जाइ छै। जँ गिरहत नहि रहल तँ घासक लाटमे गहुमो उखारि कऽ बोरामे कसि लेत। नहियोँ गहुम उखारत तैयो घास उखारैतकाल गहुमक गाछकेँ थौआ कइये देत। तँए सभकेँ घास उखारैसँ मनाही कऽ देने छिऐ। मुदा गिरहत नइ रहत तँ घसवाहनी सभ मानबे ने करत। तँए गहुम खेतक ओगरवाही करए पड़ैए। अहाँ कहबै गहुम फसलमे खढ़ मारैबला दबाइ किए ने दऽ देलिऐ। की कहू सभ गहुममे पच्चीस ग्राम कट्ठा तोरक नीमनका बीआ छीटने छिऐ। तोरो बड़ नीक अछि। जँ खढ़ मारैबला दबाइ दइतिऐ तँ खढ़े संगे तोरोक गाछ मरि जाइतए। तँए गहुमक खेतमे खढ़ मारैक दबाइ नइ देलिऐ। बाध दिससँ आबि कलपर जा पएर-हाथ धो कऽ कुर्रा-आचमन केलौं। चाहक तलक रहए। आँगन गेलौं तँ माएकेँ गोसाँइ-पीतरकेँ दीप लऽ साँझ देखबैत देखलिऐ। हमर पत्नी अपना कोठरीमे टी.वी. देखैमे मगन रहैथ। हम अँगनेसँ पत्नीकेँ हाक दैत कहलिऐ- “यै सुनै छिऐ?” मुदा पत्नी किछु उतारा नहि देली। हम फेरो हाक देलिऐ- “यै रूपौलीवाली सुनै छिऐ ने, अहींकेँ कहै छी।” मुदा तैयो ने किछु बजलीआ ने कोठरीसँ बाहरे एली। तैबीच हमर माए कहली- “हौ टी.वी. चलै छै, ओसारापर जा कऽ हाक देबहक तखन सुनतह।” हम ओसारापर जा कऽ कहलिऐ- “यै मेम साहिबा, हम किछु कहबो करै छी?” तैपर पत्नी कोठरीसँ बाहर निकलैत बजली- “की कहै छिऐ। घरवाली बाहरवाली फिलिम चलि रहल छै। बड़ चहटगर फिलिम छइ।” हम कहलिऐ- “अच्छा फिलिम देखैत रहब। पहिने एक कप चाह बना कऽ पियाउ।” तैपर हमर पत्नी बजली- “माँसँ कहियौ ने बना देती।” हमर मन तँ बुझू घोर-घोर भऽ गेल मुदा पहिनुक साँझमे पत्नीसँ बहस करनाइ नीक नहि बुझलूँ। हम कहलिऐ- “नइ हम माएसँ नै कहबै।” पत्नी बजली- “अच्छा हमहीं माँसँ कहै छिऐन।” ओ माए लग गेली आ माएसँ कहली- “माँ एक कप चाह बना देथुन ने। टी.वी. मे बड़ चहटगर सिनेमा चलि रहल छै। अदहा सिनेमा देख नेने छी।” ई कहैत ओ कोठरीमे जा टी.भी. देखए लगली। माए चाह बनबए विदा भेली। तामसे हमर टीक ठाढ़ भेल गेल। माए चाह बना कऽ कप हमरा हाथमे दैत बजली- “लएह चाह पीबह।” माए पुन: आगू बजली- “जे ने करए ई टी.वी., साँझो-बाती हमरे देखबए पड़ैए।” हम कहलिऐ- “माए तों पुतोहुकेँ माथपर चढ़ा रहल छीही।” माए बजली- “छोड़ह चाह पीबह।” हम बजलौं- “की चाह पीब, मूड ऑफ भऽ गेल।” हमरा मोन पड़ि गेल। जखन हमर ससुर महराज बिआहक बात करए हमरा ऐठाम आएल रहैथ तँ हमरा पिताजीसँ कहने रहैथ जे यौ गोपी बाबू हम अपनेकेँ एकटा संस्कारी कन्या देब जेकरामे मिथिलाक सभ संस्कार भरल अछि। ओ बात मोन पड़िते हमरा मनमे उठल- यएह छी मिथिलाक संस्कारी कन्या? जे कन्यागोसाँइ-पीतरकेँ साँझो-बाती ने देखौत। अपना भरि-भरि दिन टी.वी. देखत आ 70 बर्खक बुढ़ सासुसँ चाह, जलखै, खेनाइ बनबाऊत। ई सभ सोचैत हम चाह पीबैत रही, तखने हमर छोटकी काकी एकटा अनार माएकेँ दऽ गेली। माए हमरा अनार दैत बजली- “लएह ई अनार तों खा लएह।” तैपर हम माएसँ कहलयैन- “गै माए, तों बुढ़ भेलेँ तँए ई अनार तोहीं खा ले।” माए बजली- “नै तों खा लएह। अखन नइ खेबह तँ रखि लएह भोरमे खा लीहह।” हम कहलयैन- “हमरा की अछि, शहर-बजार जाइ छी तँ रंग-बिरंग चिज सभ खाइत रहै छी। तों तँ घरेमे रहै छेँ। तोहर उमेरो सत्तर टपि गेलौ। तँए ई अनार तोहीं खा ले।” माए बजली- “हम तँ आब चल-चलाउ भेलिऐ। हमरा खा कऽ की हएत। तों तँ जबान-जुआन छह। तोरा अखन बहुत दिन जीवाक छह। तँए ई अनार तोहीं खा लएह।” माएसँ ई गप्प-सप्प होइते रहए तखने बिजलीक लाइन कटि गेल आ टी.वी. बन्न भऽ गेल। पत्नी बाहर निकलली। आ पुछली- “कथीक घंघौज भऽ रहल अछि?” हम कहलिऐ- “छोटकी काकी एकटा अनार दऽ गेली हेन। माए हमरा कहैत अछि ई अनार तों खा लएह आ हम कहै छिऐ जे माए तों बुढ़ भेलेँ तँए ई अनार तों खा ले।” तैपर हमर पत्नी पुछली- “कहाँ अछि अनार।” माए हमरा पत्नीक हाथमे अनार दैत बजली- “यएह अछि अनार। बड़ नीक अनार अछि।” हमर पत्नी अनार देखैत बजली- “ठीके बड़ नीक अनार अछि। एकरे बेदाना कहल जाइ अछि। ठीक छै अहाँ दुनू गोरे नै खाए चाहै छी तँ कोनो बात नहि, रहए दियौ हम खा लेब।” ई कहैत पत्नी अनार नेने कोठरीक भीतर चलि गेली। तखने बिजलीक लाइन आबि गेल आ टी.वी. चलए लगल। हमरा मुहसँ निकलल- “हाय रे मिथिलाक संस्कारी कन्या..!” फोचाइ कक्काक बेमारी तेहेन ने करोना वायरस पसैर रहल अछि जे काज-उदेमकेतौ जाएब-आएब सभ बन्न भऽ गेल। प्रधानमंत्रीक एक्कीस दिनक लॉक-डाउन। जे जेतए छैथ ओ ओत्तै फँसल छैथ। अपनो केतौ नहि जाइ-अबै छी। चारिमे दिन ब्लड-प्रेशरक दबाइ सठि गेल। तँए परसू दबाइ कीनए वास्ते निर्मली जाए पड़ल। साइकिलसँ जाइत रही। यौ भाय, अपना ने मोटर साइकिले अछि आ ने चलाएले होइत अछि। आब तँ सहजे साठि बर्खसँ बेसी उमेर भऽ गेल तँए ड्राइवरी लाइशेन्स बनबे ने करत। तँए आब ऐ जनममे अपन मोटर साइकिल नहियेँ हएत। ई तँ भेल नियम-कानूनक बात मुदाअहाँसँ छाम की, अपना ओकाइतो नहियेँ अछि जे मोटर साइकिल कीनब। जँ सेहन्तासँ एक-डेढ़ कट्ठा जमीनों बेच गाड़ी कीन लेब मुदा गाड़ीमे पेट्रोल केतएसँ आउत। खाएर जे से...। हँ तँ कहैत रही परसू दवाइ कीनए साइकिलसँ निर्मली जाइत रही। बेरियर चौकपर गेलौं तँ तीन-चारिटा पुलिसकेँ बैसल देखलिऐ। बाँसक ढढी सेहो लागल रहइ। साइकिलसँ उतैर गेलौं। पुलिसकेँ कहलिऐ- “दबाइ कीनए बजार जाएब।” एकटा पुलिस हाथक इशारासँ जाइ ले कहलक। थोड़ेक दूर साइकिल गुरकौने गेलौं। बेरियर चौकसँ दस लग्गा दच्छिन जा साइकिलपर चढ़लौं। बजार गेलौं। पूरा बजार भकोभन। इक्का-दुक्का लोक बजारमे। दबाइ दोकान आ किराना दोकान खुजल। आपका दवाखानामे जा दवाइ कीनलौं। पत्नी चाह पत्ती आ चीनीक आढ़ैत देने छेली। एकटा किराना दोकानपर गेलौं तँ दोकानदारकेँ दोकान समटैत देखलिऐ। हमरा देखते दोकानदार पुछलक- “की लेब जल्दी बाजू। पोने छह बाजि गेल। छह बजे दोकान बन्न करए पड़त।” हम कहलिऐ- “अदहा किलो चीनी, साए ग्राम निधि चाह पत्नी आ आधा किलो बदामक दालि।” दोकानदार जल्दी-जल्दी समान तौलकऽ दऽ देलक। हम पुछलिऐ- “पाइ केते भेल?” दोकानदार कहलक- “बीस रूपैआ चीनी, छत्तीस रूपैआ चाह पत्नी आ तैंतीस रूपैआ बदामक दालिक, सभ मिला कऽ नब्बासी रूपैआ भेल।” हम एकटा नमरी दैत कहलिऐ- “चाहपत्ती आ बदामक दालिक बेसी पाइ लइ छिऐ।” तैपर दोकानदार बाजल- “खैर मनाऊ जे भेट रहल अछि।” हम समान झोरामे रखि वापसी पाइ लऽ साइकिलपर चढ़ि विदा भेलौं। मन भेल एक राउन्ड पूरा बजार घुमि ली। साएह केलौं। ताबेत छह बाजि गेल। बजारमे दवाइ दोकानक अलावे सभ दोकान बन्न। गमछासँ मुँह-नाक झपने रही। पुलिस डन्टा लऽ कऽ घुमैत रहए। मुदा एकोटा चाहक वा पानक दोकान खुजल नै रहए। साइकिलपर चढ़ि घरमुहाँ भेलौं। बेरियल चौपर साइकिलपर चढ़ले अबैत रही कि पुलिस बजौलक। पुलिस डाँटैत कहलक- “साइकिल से उतरा क्यों नहीं..!” हमअकबकाए गेलौं। मनमे भेल जे कहिऐ ‘साइकिलसँ नहीं उतरने से करोना वायरस लग जाता है क्या?’ मुदा बजलौं किछ ने। सोचलौं के कहलक एक डंटा मारिये दिअए। हम बकर-बकर ओकरा सबहक माने पुलिस सबहक मुँह तकैत रही। एकटा पुलिस बाजल- “जाइये।” हम साइकिल गुड़कौने विदा भेलौं। बीस-पच्चीस लग्गा गुड़कौने आगू बढ़लौं पछाइत साइकिलपर चढ़लौं। गाम पहुँच कऽ समानक झोरा पत्नीकेँ सुमझा चाह बनबैक आढ़ैत देलिऐ। पत्नी पुछली- “बजारमे चाह नहि पीलौं की?” बजलौं- “बजारमे दवाइ दोकान आ किराना दोकानक अलाबे सभ दोकान बन्न छैलै। तहूमे किराना दोकान छह बजे साँझमे बन्न भऽ जाइत अछि।” पत्नी बजली- “ठीक छै, अहाँ हाथ-पएर धोऊ ताबे हम चाह बनबै छी।” जाबे हम कलपर सँ हाथ-पएर धो कऽ एलौं ताबे पत्नियोँ चाह बना नेने छेली। हमरा बैसते पत्नी दू कम चाह नेने एली। दहिना हाथक कप हमरा देली आ बम्मा हाथक कप अपने रखली। दुनू गोरे चाह पीबए लगलौं। हम कहलयैन- “पूरा बजार भको-भन्न छल। इक्का-दुक्का आदमी बजारमे छल। पुलिस सभ मोटरो साइकिलसँ आ पएरो हाथमे डन्टा लऽ कऽ घुमैत रहै।” पत्नी बजली- “बाध दिस गेल रही। मीता काकी भेटल छेली। कहै छेली मीता काका ओछाइन पकड़ने छैथ।” ‘मीता काका ओछाइन पकड़ने छैथ’सुनि चिन्तित भऽ गेलौं। कहीं करोना वायरससँ तँ ने संक्रमित भऽ गेला। हम पत्नीसँ पुछलयैन- “मीता काका किएक ओछाइन पकड़ने छैथ?” तैपर पत्नी बजली- “मीता काकी कहली जे बेमार-तेमार नै छैथ। कोनो बातक आकि कोनो काजक चिन्ता भऽ गेल छैन तँए ओछाइन पकैड़ नेने छैथ।” पत्नीक बात सुनि मनमे सबुर भेल। किए तँ मोबाइलपर जे मैसेज अबैत अछि ओइमे खाँसी, बुखार आ साँस लइमे दिक्कतकेँ करोना वायरससँ संक्रमणक लक्षण बतौल गेल अछि। से सभ तँ मीता काकाकेँ नै छैन। सोचलौं भोरमे जिज्ञासा करए जेबैन। पहिने अगले-बगलसँ भाँज-भूँज लगा लेब तखन लगमे जाएब। मुँहमे गमछा लपेट लेब। रातिमे खेनाइयो नै सोहाएल। जेतए पाँचटा-छहटा गहुमक सोहारी खाइ छेलौं तेतए मात्र तीनटा सोहारी खेलौं। सुतैले ओछाइनपर गेलौं। मुदा नीने ने आबए। सोची मीता काकाकेँ की भऽ गेलैन। किए ओछाइन पकैड़ लेला। रहि-रहि कऽ करोना वायरसक डर हुअए। फेर सोची मीता काका तँ चौको-चौराहापर नै जाइ छैथ। गामपर सँ खेत आ खेतसँ गामपर। खेतेमे परमानेन्ट खोपड़ी आ मचान बनौने छैथ। केतेक दिन तँ बाधेमे जलखैयो आ कल्लौओ खाइ छैथ। खोपड़ीमे चाहक सरमजान रखने रहै छैथ। जखन मन भेलैन अपनहिसँ तुलसी पात दऽ कऽ लाले चह बनौलैथ आ पीलैथ। तखन करोना वायरस केतए लगतैन। फेर शंका भेल जे बेपारी सभ अबैत रहै छै, तरकारी कीनए लेल। भिनसरबामे नीन भेल। तँए अबेर धरि सुतल रहलौं। पत्नी आबि कऽ जगेली। पत्नियेँ भैंसकेँ बाहर निकालि नादिपर बान्हि सानी लगा देने छेली। हम उठि कऽ विदा होइत पत्नीसँ कहलयैन- “हम मीता काकासँ भेँट केने अबै छी।” पत्नी पुछली- “चाह नै पीब?” हम कहलयैन- “चाह-ताह ओम्हरे पीब लेब।” हमर पिताजी दू भैयारी। जेठ हमर पिताजी आ छोट काका, जिनकर नाओ रामवरण राय। मीता कक्काक नाओं सेहो रामवरण मण्डल। मीता काका हमर काकासँ एक मासक छोट। हमर घर पछबरिया टोलमे जखन कि मीता कक्काक घर पुबरिया टोलमे। पुबरिया टोल आ पछबरिया टोलक दूरी लगधक एक-डेढ़ किलोमीटर। दुनू टोलक बीचमे एकटा कनेटा चौक। जेतए दूटा चाहक दोकान, एकटा नास्ताक दोकान, दूटा पानक दोकान, एकटा मोबाइल रिपेयरिंगक दोकान सेहो अछि। हमर काका आ मीता काका बेदरेसँ संगी। दुनूक एक्के नाओं तँए बाले-बोधसँ एक-दोसरकेँ मीत कहैत। संगे-संग नरहिया हाइ स्कूलसँ दुनू गोरे मैट्रिक पास केलैथ। मैट्रिक केला-पछाइत दुनू मीता निर्मली कौलेजमे आई.ए. मे नाओं लिखेलैथ। हमर काका आइ.ए. पासो केलैथ मुदा मीता काका बिच्चेमे पढ़ाइ छोड़ि देलखिन। तेकर कारण भेलै जे मीता कक्काक पिताजीक असमय मृत्यु। हमर काका आई.ए. पास कऽ दिल्ली चल गेला। दिल्लीमे दालि मीलमे मुंशीक काज भेटलैन। दिल्लीएमे बसि गेलाह। साल-उेढ़ सालपर गाम अबै छैथ। काकाकेँ दिल्ली गेलाक बादो मीता काकासँ सम्बन्ध ओहिना रहल जहिना काकाकेँ गाममे रहने छल। सत पुछी तँ मीता काकासँ दोस्तियारे आर प्रगाढ़ भऽ गेलै। पैछला साल हमर पिताजी दिवंगत भऽ गेला, मीता काका कहलैथ- “बौआनन्दु, एक्को पाइ चिन्ता नइ करह। जाबे धरि हम जीबै छी ताबे धरि कोनो बर-बेगरतामे कोनो चिजक बिथुत नै होमए देबह।” मीता काका ई बात बजबेटा नै केलैथ बल्कि निमाहियो रहला हेन। पैछला साल बाढ़िमे अपने खेतक धानक सभ बीरार रांग जकाँ गलि गेल रहए, तखन मीता काका एक कट्ठा बीरार दऽ खेत रोपबा देलैन जखनकि पैछला साल एक कट्ठा धानक बीरार बारह हजार रूपैआमे बिकाइत छेलइ। मीता काका जीवनी किसान छैथ। तहूमे तरकारी खेतीक जीवनी किसान। ई बुझू जे भरि दिनक बारह घन्टामे छह घन्टा हाथमे खुरपी रहबे करै छैन। मीता काकाकेँ दुइेय बिगहा खेत छैन मुदा अपन किसानी जिनगी तेना कऽ ठाढ़ केने छैथ जे जेठका बेटाकेँ बी.एड. करा रहला हेन आ छोटका बेटा इन्टर पास कऽ डी.एल.एड. कऽ रहल छैन। हम चौकसँ पहिने एकटा पोखैरपर नित्यक्रियासँ निवृत्त भऽ गेलौं। चौकपर जा कलपर मुँह-कान धोलौं आ भरि छाँक पानियोँ पीलौं। चौकेपर मीता कक्काक जेठका बेटा दिनेशसँ भेँट भऽ गेल। हमरा देखते दिनेश बाजल- “भाय, समाचार सभ नीक छह किने?” हम बजलौं- “हमरा दिसक समाचार तँ ठीके अछि। तों कहह की हाल-चाल छह, मीता कक्काक की हाल-चाल छैन?सुनलौं जे मीता काका ओछाइन पकैउ़ नेने छैथ?” दिनेश बाजल- “बाबूकेँ कोनो बातक चिन्ता भऽ गेलैन हेन तँए ओछाइन पकड़ने छैथ।” तैपर हम बजलौं- “हौ भाय, हमरा तँ डर भऽ गेल जे मीता काकाकेँ कोनो बेमारी नै तँ भऽ गेलैन।” दिनेश बाजल- “तइ सभक चिन्ता नै करह। तोरा होइ छह जे बाबू करोना वायरससँ संक्रमित भऽ गेला हेन।” हम कहलिऐ- “हौ भाय, हवा तँ अखन सहए छै। जखनसँ पत्नी कहलैन तखनेसँ चिन्तित छी। भरि राति नीन नै भेल। सुति उठि कऽ एम्हरे विदा भेलौं हेन।” दिनेश बाजल- “तइ सभकेँ मिसियो भरि चिन्ता नै करह।” फेर दिनेश बाजल- “चाहो जे दुनू भाँइ पीतौं से तँ दोकाने सभ बन्न छै, जे ने करए करोना बेमारी। चलह गामेपर चाहो पीब। आ गपो-सप्प करब।” गप-सप्प करैत मीता कक्काक घर लग पहुँचलौं। मीता काका चौकीपर बैस कऽ चाह पीबैत रहैथ। हम सड़के परसँ कहलयैन- “काका गोड़ लगै छी..!” मीता काका बजला- “नन्दु, आबह! आबह!! भने गमछासँ मुँह-नाक झँपने छह।” हम कहलयैन- “हँ, काका, की करबै, तेहेन ने करोना वायरस बला बेमारी चलल हेन जे सभ आतंकित भऽ गेल अछि।” मीता काका बजला- “से तँ ठीके। हम तँ बुझह बेरबाद भऽ गेलौं। तीन-चारि मासक मेहनत पानिमे चलि गेल।” मीता काका की कहलैन से तँ बुझबे ने केलौं। बजलौं- “से की काका?” ताबेत दिनेश एकटा प्लेटमे चारिटा ड्रीमलाइट बिस्कुट, एक गिलास पानि आ चाह नेने आएल। तैबीच मीता काका बजला- “हुअ पहिने चाह पीबह नै तँ सेरा जेतह। पछाइत गप-सप्प हेतइ।” हम बिस्कुट खा पानि पीब चाह पीबैत रही कि दिनेश पान नेने आएल। पान खा मीता काका दिस तकलौं। मीता काका पुछलैन- “कोनो औगुताइ नइ ने छह?” हम कहलयैन- “नहि, कोनो खास तेहेन काज नै अछि।” मीता काका बजला- “तखन हमरा संगे चलह।” ई कहैत मीता काका विदा भेला। हमहूँ मीता कक्काक पाछाँ-पाछाँ विदा भेलौं। दुनू गोरे तरकारी खेत पहुँचलौं। कट्ठा पाँचेमे पत्ताकोबीक खेती देखलिऐ। एक किलोसँ दू किलो धरिक गाँठ बन्हने। काका बजला- “ई पात कोबी देखै छहक, जी-तोड़ मेहनत केलौं हेन। पनरह हजार टका खर्च अछि। कपारो बुड़ि जाइत तैयो एक लाख टाकासँ बेसी होइतए। एक दिन सात साए रूपैये क्विटल दू क्विंटल बेपारी लऽ गेल। तेकर बाद बेपारी एबे ने कएल। अपना ऐठाम तँ अखबार नै अबै छै आ ने अपना नेटबला मोबाइले अछि। सुनलौं हेन जे करोना वायरस बन्धा कोबीमे अड़तालीस घन्टा जीवित रहै छै। तँए बजारमे बन्धा कोबी बेचनाइ बन्न कऽ देलक अछि। अन्न-पानि किछु ने सेाहाइए। भरि-भरि राति नीन नहि होइए, जगले रहै छी।” हमरा मीता कक्काक बेमारीक थाह चलि गेल। हम बजलौं- “काका की करबै, एहेन घाटा की कोनो अहींकेँ भेल हेन। बड़का-बड़का कारखाना सभ बन्न अछि। सुनै छिऐ बिना काजे केने लेबर सभकेँ कम्पनीकेँ दरमाहा देमए पड़तैक।” मीता काका बजला- “हँ, सेहो सुनलौं हेन।” हम बजलौं- “काका, सबुर करू। जे होइ-के छेलै से भेल, आब की करबै।” मीता काका किछु ने बजला। खाली हमरा दिस तकैत रहला। बुझि पड़ल जेना किछु बाजए चाहै छैथ मुदा मुहक बोली गुम्म भऽ गेल छैन। बिटू मिश्र वत्स दू गोट बटोहीक गप (बाट पर दू गोट बटोहीक गप, जबान छौंरा मोटरसाइकिल पर आ बृद्ध बाबा साइकिल पर l) छौंरा: अहि यौ बाबा, इ गोनरबा गाम कत्ते दूर छै यौ ? बृद्ध बाबा : रौ, तूं मोटरसाइकिल पर छि तोरालखे कोन दूर रौ ? दूर त हमरा लखे छै l छौंरा: नै... नै... हमरा कहेके भावार्थ इ छल जे, गोनरबा कत्ते छै ? बृद्ध बाबा : अहिंरो बा... हेरौ, गाम के कउनु चले आबई छै जे कतहु आनठाम चलिजेतई ? जत्तइ छई ओत्तई हेतई ने l (छौंरा चुप्पे बढ़ीगेल आगाँ ......) -बिटू मिश्र वत्स, तिलाठी नेपाल (घटना; महोत्तरी जिला स्थित हमरे संगे घटल छैठिके प्रातःl) उमेश मण्डल १०५ म् ‘सगर राति दीप जरय’ कथा चेतना रैली उद्धघाटनकर्त्ता : प्रो. डॉ. शशिनाथ झा (कुलपति, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय-दरभंगा) उद्धघाटन समय : संध्या 6 : 30 बजे तिथि : 13 फरवरी 2021 कार्यक्रमक अन्तराल- संध्या 6 : 30 बजे से सॉंझसँ 6 : 00 बजे भिनसर धरि स्थान : सीतायन सभागार, 3 जी.एम. रोड, दरभंगा संयोजक : श्री कमलेश झा अध्यक्ष- डॉ. भीमनाथ झा (उद्घाटन एवं पोथी लोकार्पण सत्र), डॉ. शिव कुमार प्रसाद एवं श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (कथा सत्र) मंच संचालन- श्री कमलेश झा (उद्घाटन सत्र), श्री उमेश मण्डल (पोथी लोकार्पण सत्र), श्री नन्द विलास राय एवं श्री राधाकान्त मण्डल (कथा सत्र) स्वागत भाषण- प्रो. डॉ. विद्यानाथ झा दू शब्द- डॉ. योगानन्द झा, श्री शैलैन्द्र आनन्द, डॉ. शिव कुमार प्रसाद मिडिया प्रभारी : श्री गौतम झा ऐ कथा गोष्ठीमे लगभग देढ़ दर्जन नूतन कथा (कहानी)क पाठ (वाचन) एवम् समालोचक द्वारा समालोचना कथा पाठ- 1. अनाथ : श्रीमती लक्ष्मी सिंह ठाकुर (दरभंगा) 2. दरभंगासँ दिल्लीक यात्रा : श्रीमती स्वर्णिम किरण (दरभंगा) 3. धनेसरी : श्री श्याम भास्कर (दरभंगा) 4. भोंटक बधिया : प्रो. प्रीतम निषाद (मुरहद्दी, बाबूबरही) 5. जन आन्दोलन : श्री कपिलेश्वर राउत (बेरमा, झंझारपुर) 6. फकड़ावाली बुढ़िया : श्री अमित मिश्र (करियन, समस्तीपुर) 7. सभ केलहा फुसि : श्री राम विलास साहु (लक्ष्मीनिया, मधुबनी) 8. अट्ठाबज्जर : श्री राम विलास साहु (लक्ष्मीनिया, मधुबनी) 9. सम्प्रदायिक सद्भाव : श्री नारायण यादव (जयनगर) 10. बेचन काकाकेँ चिन्हब : श्री उमेश मण्डल- (निर्मली, सुपौल) 11. कलहक जड़ि : श्री शारदानन्द सिंह (बलथरी, दरभंगा) 12. दूटा भॉंटा गाछ : श्री शारदानन्द सिंह (बलथरी, दरभंगा) 13. दशार्णवक अंश : श्री उमेश नारायण कर्ण ‘कल्पकवि’- (इसहपुर, सरिसवपाही) 14. अनजान दोस : श्री राधाकान्त मण्डल- (धबौली, लौकही) 15. प्रायश्चित : श्री नन्द विलास राय- भपटियाही (घोघरडीहा, मधुबनी) 16. सभसँ पैघ सॉंच : श्री नन्द विलास राय- भपटियाही (घोघरडीहा, मधुबनी) 17. संकल्प : श्री जगदीश प्रसाद मण्डल- (बेरमा, झंझारपुर) समीक्षा- डॉ. शिवकुमार प्रसाद श्री अरविन्द प्रसाद श्री लालदेव कामत श्री प्रदीप पुष्प राधाकान्त मण्डल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल श्री कमलेश झा प्रो. प्रीतम निषाद श्री राम विलास साहु श्री कपिलेश्वर राउत श्री चन्द आचार्य पं. बाल गोविन्द आर्य श्री नारायण यादव पुस्तक_लोकार्पण_एवम्_वितरण 1. कृषियोग (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. श्री शैलैन्द्र आनन्द (निविष्ट कथाकार, नाटककार एवं कवि) 2. हारल चेहरा जीतल रूप (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. प्रो. उषा चौधरी (एम.एल.एस.एम. कौलेज, दरभंगा) 3. रहै जोकर परिवार (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. प्रो. शशिनाथ झा (कुलपति, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा) 4. कर्ताक रंग कर्मक संग (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. डॉ. योगानन्द झा (मैथिली लोक साहित्यक अध्येता) 5. गामक सूरत बदैल गेल (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. श्री अरविन्द प्रसाद (प्रधान सचिव, मधुबनी ज़िला प्रगतिशील लेखक संघ) 6. अन्तिम परीक्षा (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. डॉ. शिव कुमार प्रसाद (हिन्दी साहित्यक वरेण्य विद्वान एवं मैथिली साहित्यक वहुआयामी रचनाकार) 7. घरक खर्च (कथा संग्रह) ले. जगदीश प्रसाद मण्डल, लो. प्रो. डॉ. विद्यानाथ झा (प्राचार्य, एम.एल.एस.एम. कौलेज, दरभंगा) 8. सरस्वती पूजाक परसाद (कथा संग्रह) ले. नन्द विलास राय, लो. डॉ. भीमनाथ झा (आधुनिक मैथिली साहित्यक मर्मज्ञ विद्वान) 9. वर्ण प्रकरण भाष्य भूमिका (व्याकरण, भाग- 1) ले. बाल गोविन्द आर्य उर्फ बाल गोविन्द यादव, लो. प्रो. शशिनाथ झा (कुलपति, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा) 10. भाव पुष्पांजलि (काव्य संग्रह) ले. सीताराम मिश्र, लो. प्रो. डॉ. विद्यानाथ झा (प्राचार्य एम.एल.एस.एम. कौलेज, दरभंगा) 11. मोनक देहरिपर (गजल संग्रह) ले. प्रदीप पुष्प, लो. डॉ. उदयचन्द झा ‘विनोद’ (लब्धप्रतिष्ठ कवि) 12. देवाश्रम- 5 (पाम्फलेट संकलन) सं. उमेश मण्डल, लो. डॉ. भीमनाथ झा (आधुनिक मैथिली साहित्यक मर्मज्ञ विद्वान) 13. देवाश्रम- 6 (पाम्फलेट संकलन) सं. उमेश मण्डल, लो. श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (आधुनिक मैथिली साहित्यक अनन्य स्तम्भ) धन्यवाद ज्ञापन- श्री कमलेश झा १०६म आयोजन : ग्राम- हटनी, नौआबाखर (मधुबनी), मई 2021 मे होएत भावी संयोजक : श्री लालदेव कामत लालदेब कामत, नौआबाखर, घोघरडीहा पानक बरैब एकटा गीतकार केँ" खाकय मगहिया पान यौ पाहुन हम्मर,जान किए लै छी। जान किये लै छी, प्राण किए लै छी...... संगीत सुनि मिथिला मेँ पानक चलनसारि आ महौत तकर नियमित उपयोगक मोन सहजे पड़ै य। से ललिचगर पान सर्वत्र चौक - चौड़ाहाक पसल पर सब तरहक भेटि जाइछ।परंच एहनो सौखगर पानखेनिहारक कमि नहिँ जे पानक भरल दोकानमे अपना हिस्सक केर 'मिठगर पत्ता' पान नहिँ भेंटने औनाईत पराइत छैक।पानक महिमा अति प्राचीनकालसँ शास्त्र- पुराणमे सेहो भेटैत अछि। एहि लेल एकर उद्भव आ उत्पादन पर विचार करब परम आवश्यक बुझाय परल। तेँ मुहँक लाली 'पान' आओर तकर जैविक खेती कोना भ' रहल छैक से संतनगर, तमुरिया आ मटरस आदि मधुबनी जिलाक गाममे बेख देखय परिभ्रमण कयलहुँ। वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ पान एकटा वनस्पति थीक। ई आठ वर्षीय सदाबहार लत्तीदार एकलिंग श्रेणिक बेल (लती) छी। पान भारतीय इतिहास आ परम्परा सँ बड लगीच जुटल छै। एहिक उदभव स्थल मलाया द्विप थीक। पानकेँ संस्कृतमे ताम्बूल, तेलगूमे पक्कू, तमील आ मलयालम मेँ वेटिलाई एवं गुजरातीमे नागुरवेल कहल जाईछ। हरियर पानक पत्ताके सेवाद्वारा उजर बनायल जाइछ, तकरा बहुत पाकल वा सफेदपान कहल जाइत छैक। बनारसमे पानक सेवा बढ़ श्रमसँ कयल जाईछ। मगह केर एकटा पानक नश्लके कतेको मासधरि बढ़ जतनसँ ओरियाके पकाउल जाइछ, जकरा मगही पान कहल जाईछ। ओ अत्यंत मूल्यवान आ सुस्वादु कहल गेल हन। एहिक पाँच प्रमुख प्रजातिक नाम थीक बंगला, मगही, साँची, देशावरी, कपुरी आ मिठापता। डांटकी लागल छुट्टापान पूजामे देव-पितर केँ चढावल जाइछ। गृह गोसाईं केँ विशेष अनुष्ठानमे डबल आ ट्रिपल मुड़ीबाला पानक काज पड़ैत छैक से ५गुणा बेसीदाममे बढ़ कठिनाई सँ भेटैत छैक। खैर (कथ) चुन सुपारीक योग सँ बिरा लगातार, पानखिल्ली मुंहक सुन्दरता-सुगन्धि आ शुद्धिक संगे श्रृंगार बढबैत छैक। पान चिबाकऽ कायल जाइछ, जाहिमे सोहनगर जर्दा (तमाकूल) अनेक तरहक मशाला, लौंग-इलाईची, भुजल नारिकेल आ मीठाक लेल रसना-हीरामोती सौंप अवश्य देल जाइछ। चेन्नई दिन बिनु कतेक पान खेबाक प्रचलन बढल छैक। ओना मिथिलामे से हो पाना थोड़ा खिली कल्लामे दबेलाक बाद उपर सँ मिझाईलचून डांटते लगाकय चटैत देखते अबैछ। भोजनोपरान्त पानक बीड़ा वा खिल्ली तथा गछपानक छोट खिलि शोभाकारी मानव गेल ऐ। तम्बाकू (जर्दा) केर संग नियमित पान खाईत-खाईत लोक प्राय:एहिक व्यसनि भ'जाइछ, जे अभ्यास बिनु दांत खराब केयने आ रोग एवं दुर्गन्धक कारणेँ छोड़त नहिँ। ओना पानमे औषधियगुण से हो प्रचुर मात्रामे रहैत छैक। कड़गर मोलाइम छोट पैघ रुखगर आ सागपातसन पानक सुआद कटु कषाय तिक्त आओर मधुर होईछ। पानमे रसायनिक गुण पावर जाईछ। एहिमे वाष्पशील तेलक अतिरिक्त अमीनो अम्ल, कार्बोहाइड्रेट आ किछु विटामिन प्रचुर मात्रामे रहैत छैक। पान औषधिय गुणक बखान तँ चरक संहिता मेँ खुब भेल अछि। देहाती क्षेत्रमे पानक पात्रता सँ घाघौस फोंका केर उपचारमे पुल्टिसक रुपेँ साटल जाइछ। हितोपदेश'क अनुसारे बलगम कफ हटेबाक लेल, मुखसुध्दि, अपच,सांश रोगक निदान हेतु पानमे औषधियगुण देकर गेल छैक। एहिमे विटामिन ए खूब छैक। भोरमे जलखै कयलासन्ता मरीचक संग पानक सेवन सँभुख निकसँ जगैत छैक। ओना यूजिनाॅल अवयबके कारणेँ होईत छैक। रात्रि मेँ सुतै सँ पूर्व पानके नून आ अजवाईनक संग मुँहमे रखला पर नींन नीक जेकाँ होइत छैक। क्योंकि आ दम्मा रोगीकेँ पान सँ लाभ होईछ। भारतमे पानक प्रचलन एकटा प्रथाक रुप समाज मेँकहिया आयल से प्राचीन ग्रंथरघुवंश आ वात्स्यायन कामसूत्र मेँ भेटैत छैक; ताहि सँ अनुमान लगा सकैत छी। ठंडामे उकासी रोकय लेल गर्म हरैदके पानमे द'के चिबाऊ,रातिके उकासी तेज करै तँ हरैदक जगह अजवाइन द'के चिबाऊ। किडनीक रोगी पानमे बिनु किछ फेंटने खाई। पानमे १०ग्राम कर्पुर द केँदिनमे ३-४बेर पान चिबाऊ, सेव नहिं घोटाले; एहि सँ दाँत 'क पैरिया शिकायत दुर होइत छैक। पाकला पर आ छलाउदार पर पानके रस शुसुम कयके लगौनाई हितकर होईछ। पीलिया ज्वर आ कब्जमे पानक व्यवहार लाभकारी होइछ। जुखाममे पानमे लौंग द'के खाऊ, जुकाम झटदय पँकि जायत। मगही, बनारसी, गंगातिरी आ देशीपान दवाईक रुपे वेशीकाल व्यवहारिक होईछ। सुश्रुत संहिता सदृश्य आयुर्वेदिक प्राचिन ग्रंथ मेँ सेहो पानके औषधीये द्रव्यगुणक महिमा वर्णित भेल छैक। सब पुराण, संस्कृत साहित्यक ग्रंथ, स्त्रोत आदिमे तांबूल केर , वादमे ५वीं शताव्दीक अनेकों अभि उत्तरी बिहारमे मुख्यतः बंगला आ दछिण बिहार दिश मगही प्रभेदक पान केर खेती कयल जाइछ। पान उत्पादन उष्ण जलवायुमे छाहदार नमस्थान मेँ कयल जाइछ। गर्मी आ ठंडी सँ बचेबाक लेल कृत्रिम मंडप (छाही) केर भीतर पान उगायल जाइछ, जकरा वरेजा आ वरेठ (बरैब) सेहो कहल जाइछ। ऊंचगर ढरकाह जलनिकास जोकरक बलुई दोमट वा बलूआही मटियारि, कार्वनिक आ पूर्ण जीवांशबाली मांटि पर जाकर pHमान५.७सँ८.२होय,से पानक खेती लेल उपयुक्त होइछ। पोखरिक मुहार पर खत्ताक हत्ता पर एहिक खेती सुगम होइछ। अप्रील मासक अंतिम हफ्तामे कल्टीहर सँ जोताई करैत जून मासक रौंद लगाकय खरपतवार उन्मूलन कयल जाइत छैक। जूनक तेसर सप्ताहमे चौकियाके फेरों सँ महिन जोताय आ चौकी दैत मांटि भुरभुरी जेकाँबनावल जायत। थोकरा कचरा आदि ओलि लेबाक आ चून सँ डाईर बनाबैत ३०सेमी०धरि ऊँच आ ५०सेमी०धरि चौरगर आड़ाक निर्माण कमल जाइछ। बीच सँ जल निकासी लेल ५०/३०सेमी चौड़गर नालाक निर्माण कयल जाइछ। लाईनमे दूहाथक दुरीपर ३-४ मीटरके बांसक खुटा गारल जाइछ, ताहि पर दू दिस आधाआधी पर सँ करची जोड़िकय नमगर चौड़गर बढाकय उपर छप्पर बनाबैत ओहिपर पुआर खर आदि सँ छारल जाइछ। हवा बिहारिमे उड़य नहिं, ताहि लेल उपर सँ बांसबल्ला आ बत्ती दैत बन्हन कतौह कतौह टांकल जाइछ। तीन सलिया पानक लत्ती सँ दूं गीरह बाला डंटल एक कठामे तीन हजार अलूआ जेकाँ दंगपर रोपल जाइछ। पतियानी सँ पतियानी क'दुरौस ३०सेमी०आ पौध सँ पौधक दुरी १५ सेमी०राखल जाइछ। लत्तीक कटिंग केँ उपचारित करय लेल १०ग्राम ट्राईकोडरमा विरिडि , मालिकों राईजा (वैम) आ स्यूडोमीनस फ्लोरोसेंस केर मिश्रण सँनिरोग लतीकेँ डुमाकय राखल जाईछ। खेती-किसानी तैयारी मेँ ५०किलोधरि प्रतिकठा नीम-सरिसौ बा अण्डीक खैर देल जाईछ। वर्मी कम्पोस्ट सँ सेहो काज चलावल जा सकैछ।जैविक आ सूक्ष्म पोषक तत्व केर अतिरिक्त शालमे एकबेर १००किग्रा० नेत्रजन, १००किलो पोटाश मई -जूनमे माँटि चढबैत काल प्रवन्धन कयल जा सकैत अछि। नवरोपमे एकदिनमे दूबेर हलुक सिंचाई आ फरबरी सँ अप्रैल धरि खूब अधिक पटौनी कयल जाइछ। माटमे पानि भड़िकय संग्रहित करैत घैल सँ छिच्चा दैत पटाओल जाईछ। ठंडिमे 10-15दिन पर सिंचाई कयल जाईछ। करचीआ खरही -सरपत सँ सहारा दैत लत्तीकेँ उपर चढाओल जाइछ। पान रोग पदगलन , सिमांत झूलसा, अंगमारी , पर्णदाग सँ अक्रान्त पौध पर औषधिक प्रयोग करैत सुरक्षित पानक पात तैयार कय बजारमे बेचल जाइत छैक । बरैवमे ललका मोकरा , उज्जर मांछी, मिलीवग आ महुआ कीट सँ सुरक्षा केनाई लाभकारी रहैत छैक। पान हानिकारक जड़गांठ सूत्रकृमि आ रैनीफार्म सुत्रकृमि सेहो पैघ अवघात करैत छैक। पान 200पातक एक ढोली बनाकय वा फीसैकड़ा हिसाब सँ ढोली बनाकय सांस्कृतिक जालीदार छिट्टामे राखि पठावल जाईछ बजार।भीजलपुआर तहेतह द'केँ सैंतल जाइछ। पानक बरैबमे कतौह-कतौह गोबरमे सराईल सांस्कृतिक नोकगर खुँटि जे तैयार कयल जाईछ तकरा एहि तरहें गाड़ल जाईछ जे चोरी सँ पान तोरय बालाकेँ पैरमे गँथि जाईछ जे घातक टेटनश रोगक त्वरित गतिये शिकार भ'जाइछ बरैबमे । चित्र: श्वेता झा चौधरी रामलोचन ठाकुरजीक संक्षिप्त परिचय सितम्बर 2020केँ विदेह 'रामलोचन ठाकुर विशेषांक’ प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक। एहि घोषणाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा एहिठाम प्रस्तुत अछि ठाकुरजीक संक्षिप्त परिचय। निच्चा हिनकर नामपर क्लिक करबै तँ हिनकर विकीपीडिया पृष्ठ खुजि जाएत। नाम : रामलोचन ठाकुर अन्य साहित्यिक नाम : अग्रदूत, कुमारेश काश्यप, मुजतबा अली माता-स्व. शारदा देवी पिता-स्व. सुरति ठाकुर (सुरति ठाकुर नाम रेकार्डमे अछि। इएह नाम नबोरायाण मिश्रजीकेँ रामलोचनजीक बालक पुष्टि केलखिन ।तँइ ई प्रमाणिक अछि।) जन्म 18 मार्च 1949, जन्म भूमि : ग्रा.+पत्रा. - बाबूपाली (पाली मोहन), खजौली, मधुबनी, मिथिला, हुनक प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत टोल पाठशालामे भेलनि। 1963 मे कलुआही हाइस्कूलसँ मौट्रिक पास केलाक बाद ओ नोकरीक खोजमे कलकत्ता चलि एलाह। तखन ओ पंद्रहे बर्खक छलाह। कतहुँ-कतहुँ हिनक जन्म बर्ख 1948 लिखल जाइत अछि। मुदा नबोरायाण मिश्रजीकेँ रामलोचनजीक बालक बर्ख 1949 पुष्टि केलखिन ।तँइ ई प्रमाणिक अछि। साहित्यसँ पहिने रामलोचनजीक रंगमंच आ रंगमंचसँ पहिने मैथिली आंदोलनसँ जुड़ल छलाह। आ एकर विस्तृत चर्च सभ प्रकाशित अछि। अन्य पारिवारिक सदस्य- पत्नी-श्रीमती सीता देवी संतान-तीन पुत्र ओ दू पुत्री (पुत्र-स्व. उगन ठाकुर, श्री अरुण ठाकुर एवं श्री ललन ठाकुर), (पुत्री-स्व. कविता ठाकुर एवं श्रीमती सविता ठाकुर) वर्तमान पता- 2M, चिराग अपार्टमेंटस्, 4, इटालगाछा रोड, कोलकाता-700028 लेखन /प्रकाशन (एहिमेसँ बहुत रास पोथी विदेह पोथी डाउनलोडपर राखल गेल अछि आ तकर लिंक जे पोथी छै ताहीमे छै ओकरा क्लिक करबै तँ पोथी खुजि जाएत) 1) इतिहासहंता (मौलिक, कविता ,1977) 2) बेताल कथा (मौलिक, व्यंग्य, 1981) 3) प्रतिध्वनि (अनुवाद, काव्य, 1982) 4) जादूगर (अनुवाद, नाटक, 1982) 5) मैथिली लोककथा (संकलन-संपादन ,1983) पुणर्मुद्रण-2006 6) आजुक कविता (संपादित, कविता,1984) 7) माटि-पानिक गीत (मौलिक, कविता ,1985) 8) देशक नाम छलै सोन चिड़ैया (मौलिक, कविता ,1986) 9) अपूर्वा (मौलिक, कविता ,1996) 10) फाँस (अनुवाद , नाटक, 1997) 11) जा सकै छी किन्तु कियै जाउ (अनुवाद , कविता, 1999, भाषा-भारती सम्मानसँ सम्मानित) 12) कविपति विद्यापति मतिमान (संग-संपादन , आलेख , 2000) 13) लाख प्रश्न अनुत्तरित (मौलिक, कविता , 2003) 14) स्मृतिक धोखरल रंग (मौलिक, आलेख, 2004) 15) रिहर्सल (अनुवाद , नाटक, 2004) 16) आँखि मुनने आँखि खोलने (मौलिक, आलेख, 2005) 17) युगप्रवर्तक कवीश्वर चन्दा झा (संपादित, आलेख, 2007) 18) पद्मा नदीक माँझी (अनुवाद , उपन्यास , 2009) 19) नन्दितनरके (अनुवाद , उपन्यास, अंतिकामे 2009, पोथी-2011,मैथिलीमे) नन्दितनरके (बया-2009,पोथी 2010-हिंदीमे), 20) जयकांत मिश्र समज्ञा (संग-संपादन , आलेख , 2016) 21) कठपुतरी नाचक इतिकथा (अनुवाद, उपन्यास , 2016) 22) सागर लहरि समाना (आत्मकथा-आत्मसंस्मरण, 2017) 23) अयाची संधान (अनुवाद , उपन्यास, मूल विभूति भूषण मुखोपाध्याय, प्रकाशक किसुन संकल्प लोक, 2018), 24) रानी गाइदिन्ल्यू (अनुवाद , उपन्यास , मूल जगदम्बा मल्ल, प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट- 2020) 25) चारि पहर (अनुवाद ,नाटक, मंचित, अप्रकाशित) 26) किशुन जी विशुन जी (अनुवाद, नाटक, मंचित, अप्रकाशित) 27) बाह रे बच्चा राम (अनुवाद, नाटक, मंचित, अप्रकाशित) एकर अतिरिक्त बहुत रास रचना ओ विभिन्न पत्रिकाक संपादकीय छनि जकरा पोथी रूपमे आनब बाँकी छै। संपादन- 1) अग्निपत्र (1973, डा. वीरेन्द्र मल्लिक आ सुकान्त सोम संग) 2) मैथिली रंगमंचक मुखपत्र "रंगमंच" (1974) 3) "सुल्फा" नामसँ हस्तलिखित पत्रिका (1975) 4) "मैथिली दर्शन" (पुनः प्रकाशन जनवरी 2005सँ मार्च 2006 धरि) 5) मिथिला दर्शन (मई-जून 2009 सँ लऽ कऽ जनवरी 2020 धरि) एकर अतिरिक्त "देसकोस" (1981) जकर संपादकमे नाम छल विनोद कुमार झाक मुदा संपादन केर अधिकांश काज रामलोचन ठकुरजी द्वारा संपादित होइत छल। एहने एकटा आर पत्रिका छलै "देसिल बयना" (Oct-1981) जकर संपादकमे नाम छलन्हि जनार्दन झाक मुदा काज रामलोचने जी करैत छलखिन। सम्मान- 1) CIIL द्वारा अनुवाद लेल “भाषा-भारती सम्मान” (2003-4) 2) विदेह पत्रिका द्वारा संचालित 2011-2012 केर “विदेह सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार)”क अनुवाद पुरस्कार 3) प्रबोध साहित्य सम्मान (2012,चंद्रभानु सिंहजीक युग्म रूपे), 4) किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान, उजान द्वारा “किरण साहित्य सम्मान” 2015 5) चेतना समिति, पटना द्वारा “यात्री-चेतना पुरस्कार”-2017 आदिसँ सम्मानित। 6) विशेष सम्मान- सितम्बर 2020मे हिनक नामक उपर मैथिली गजलमे आएल एकटा नव बहरक नाम "बहरे लोचन" रखबाक घोषणा भेल। ई घोषणा देखबाक लेल क्लिक करू 'बहरे लोचन' ई बहरे लोचन की छै एकर पूरा जानकारी लेल क्लिक करू "बहरे लोचन" एकर अतिरिक्त कलकत्ताक किछु संस्था द्वारा अभिनंदन सेहो भेल छनि जेना मिथिला सांस्कृतिक परिषद् ओ अन्य। लगभग 2019 सँ रामलोचन ठाकुर अल्जाइमर बिमारीक चपेटमे छथि, एहिमे लोक बिसरए लागैत छै आ से सभ चीज जेना अपन परिचय, पता-ठेकाना सभ। 12 फरवरी 2021, शुक्र दिन भिनसर 9.30 बजे रामलोचन ठाकुरजी अपन घरसँ कतहुँ निकलि गेलाह आ तकर बाद एहन धरि हुनकर कोनो पता नै चलि रहल अछि। ठीक एहने दुर्दिनमे हमरा लोकनि ई विशेषांक प्रकाशित कऽ रहल छी। बहुत आलेख एहि घटनासँ पहिने आबि गेल छल तँ किछु आलेख एहि घटनाक बाद आएल अछि। रामलोचनजीक फोटो (पारिवारिक सहित) आ बहुत रास जानकारी नबोनारायण मिश्रजीसँ प्राप्त भेल अछि)। पुनःश्च- ई अंक अपन समय 1 अप्रैल 2021 केँ प्रकाशित भेल मुदा 6 अप्रैल 2021 केँ कलकत्ता पुलिस द्वारा रामलोचनजीक परिवारकेँ सूचना देल गेलै जे नीलरतन सरकार अस्पतालमे एकटा शव छै। परिवारक लोक ओहिठाम पहुँचलाह आ ओहि शवकेँ रामलोचन ठाकुरजीक रूपमे चीन्हल गेल। अस्पतालक रेकार्ड मोताबिक हिनक मृत्यु 25 मार्च, 2021 केँ भेलनि आ मृत्यु प्रमाणपत्रमे इएह 25 मार्च लिखल छनि। 6 अप्रैल 2021 केर रातिमे हिनक संस्कार कलकत्ताक निमतल्ला घाट (भूतनाथ मंदिर)मे भेलनि। उपरोक्त सूचना विदेह द्वारा 14 अप्रैल 2021केँ जोड़ल गेल अछि। रामलोचनजीक किछु पारिवारिक चित्र अंक प्रकाशन केर घोषणा चित्र: प्रीति ठाकुर रामलोचन ठाकुर विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे एहि विशेषांक केर शुरूआत एहन साक्षात्कारसँ कऽ रहल छी जे कि लेल गेलै बहुत पहिने मुदा एखन धरि अप्रकाशित छल, तकर बाद तीन एहन नव समीक्षकसँ आलेख खंड केर शुरुआत कऽ रहल छी जे कि मूलतः मैथिली समीक्षा-आलोचना क्षेत्रमे नै छथि। ताहूमे अमरकांत लाल तँ एहन रचनाकार छथि जे मैथिलीक कोनो पहिल पोथी पढ़लथि सेहो रामचलोनजीक पोथी आ रामलोचनजीक अनुवाद अमरकांतजीकेँ केहन लगलनि ताहिपर हुनक विचार छनि। दोसर लेख प्रदीप पुष्पजीक छनि आ ई मूलतः गीतकार-गजलकार छथि। तेसर शैलैन्द्र मिश्र छथि। उम्मेद जे भविष्यमे ई तीनू समीक्षा क्षेत्रमे सक्रिय रहताह। तकर बाद नव-पुरानक फेंटि कऽ क्रम बनाएल गेल अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिकाक होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा समाग्रिए नीक नै रहत वा बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। जेना कि उपर परिचय बला पन्नापर सूचित केलहुँ जे फरवरीमे रामलोचनजी अपन घरसँ जे निकललाह से फेर घूमि कऽ एखन धरि नै एलाह अछि। एहि विशेषांक केर किछु लेखपर एकर असरि भेटि सकैए। रामलोचन ठाकुर संग साक्षात्कार- प्राश्निक- डा. वन्दना कुमारी (आब डा. वन्दना किशोर)- एहन जड़िआयल समाजमे महिला कोना उतरतीह मैथिली रंगमंचपर प्राश्निक- डा. वन्दना कुमारी आब डा. वंदना किशोर, विभागाध्यक्ष, मैथिली विभाग, ए.एन. कॉलेज, पटना एहन जड़िआयल समाजमे महिला कोना उतरतीह मैथिली रंगमंचपर: रामलोचन ठाकुर मिथिलांचलसँ बाहर कलकत्ता (कोलकाता) ओ पहिल स्थान अछि, जतए आधुनिक भाव-बोधक समसामयिक मैथिली नाटकक मंचन प्रारंभ भेल। स्वतंत्र नाट्य संस्था सब अस्तित्वमे आयल। निरन्तर नाट्य-गतिविधि चलल, जे आइयो चलि रहल अछि। मूलतः प्रवासी मैथिल लोकनिकेँ एकजुट करब तथा मैथिली आन्दोलनकेँ आगू बढ़ायब तहिया एकर लक्ष्य छल। कलकत्ताक मैथिली नाट्य आन्दोलनक आब सुदीर्घ इतिहास अछि। कतोक स्वर्णिम उपलब्धिक गवाह अछि कलकत्ता। बादक समयमे एकरे देखा-देखी देशक आन शहर आ गाम सबमे सेहो मैथिली नाटकक संस्था सब बनल तथा रंगमंचीय गतिविधि सक्रिय भेल। कलकत्तामे मैथिली रंगमंचक न्यों रखनिहार तथा निरन्तर सक्रिय रखनिहारमे जाहि किछु नामक उल्लेख अनिवार्य भऽ जाइछ, ताहिमे एकटा प्रमुख नाम अछि-रामलोचन ठाकुरक, जे बादमे नाटक छोड़ि कथा-कविता आ साहित्यमे रमि गेलाह। परंच परोक्ष रूप ओ एखनो कलकत्ताक मैथिली रंगमंचसँ सम्पृक्त छथि। रामलोचन ठाकुर अभिनय तँ करबे करथि, कतोक नाटकक अनुवाद आ निर्देशन सेहो कयलनि। मुदा हुनक योगदान के एतबे धरि सीमित नहि कयल जाय सकैत अछि। ओ एकटा महत्वपूर्ण संगठनकर्ता आ समन्वयक सेहो रहथि जकर योगदान गतिविधिक सक्रियता आ तकर निरंतरता बनौने रखबाक लेल जरूरी अछि। ८ मार्च २००५ केँ रामलोचन ठाकुर पटनामे रहथि। ओ प्रबोध साहित्य सम्मान २००४क निर्णायक मंडलक बैसारमे आएल रहथि। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस आ महाशिवरात्रि पाबनिक हूलि-मालिक बीच संध्या ८ बजे फ्रेजर रोड स्थित प्रेसीडेंट होटलक कमरा न. ४०५मे हुनकासँ ध्वन्यांकित साक्षात्कार कएल गेल। ई साक्षात्कार वस्तुतः "नाटक आ नारी" विषयक वृहद शोधक क्रममे कएल गेल छल। शोध कार्य पूरा भऽ अपन निष्पत्ति प्राप्त कऽ चुकल अछि। मुदा ई साक्षात्कार आद्यावधि अप्रकाशित छल। आब पंद्रह वर्ष बाद एहि विशेषांक लेल ई उपलब्ध कराओल गेल अछि। कृप्या पाठक गण एहि साक्षात्कारमे आएल तथ्य आ विचार आदिकेँ साक्षात्कारक समय-तिथि दर्पणमे देखबाक प्रयास करथि। प्रस्तुत अछि ४० मिनटक एहि ध्वन्यांकित साक्षात्कारक प्रमुख अंश— अपने कलकत्ताक मैथिली रंगमंचमे खूब सक्रिय रहलहुँ अछि। लगसँ एकर गतिविधि देखैत रहलहुँ अछि। कहू जे कलकत्ताक मैथिली रंगमंचमे महिला कलाकारक केहन भूमिका रहल अछि? सुनल अछि जे बंगला भाषी स्त्रीगण लोकनि मैथिली नाटकमे अभिनय करैत रहल छथि ? कलकत्ताक मैथिली रंगमंचकेँ दू भागमे बांटू-1953सँ 1976 धरि आ फेर 1983सँ अद्यावधि। 1976मे हम सब नाटक करब छोड़ि देलौं। तहिया धरि हमरा सबकेँ जतेक महिला कलाकार भेटलीह, सब बंगला रंगमंचक कलाकार छलीह, एहिमे कोनो शक नै। मैथिलानी मंचपर नै उतरै छलीह, आइयो नै उतरै छथि। एकरा एना बुझियौ जे सय वर्ष पहिने जखन गिरीश घोष बंगालमे नाटक शुरू केने रहथि, तखन पुरूषे महिलाक रोल करैत छल। बादमे एकटा वेश्या के प्रथम बेर ओ मंचपर उतारलनि, नाम रहैक नटी विनोदिनी। यह स्थिति कम की बेसी मैथिली नाटकक आइयो अछि। 1976क बाद बंगालमे मैथिली नाटकमे ब्रेक लागि गेलै। 1983सँ फेर दोसर चरण शुरू भेलै। एहि खेप किछु मैथिलानी मंचपर अयलीह। दू-एक टाक नाम कहब, नीक अभिनेत्री छथि (नाम मोन पाडैत, परंच मोन नहि पडै छनि), महेश झाक ननकिरबी रहै। विवाह भेलै तँ नाटक छूटि गेलै। सामाजिक बंधन छलै। पतिदेव नाटकमे नै उतरय देलथिन। दोसर श्रीमती वन्दना झा, बड़ नीक अभिनेत्री, एखनो करैत छथि। मुदा हुनका रंगमंचसँ कम प्रेम छनि-ग्रुप (संस्था)सँ बेसी। जाहि ग्रुपसँ ओ जुड़ल छथि-तकरे टाक संग नाटक करैत छथि- दोसर ठाम नै करैत छथि। एकटा आर घटना कहब। भरिसक 1983क बात थीक। हम सब मुंशी रघुनन्दन दासक नाटक 'मिथिला नाटक' कलकत्तामे खेलायल रही। एहिमे सात टा महिला रहै, प्रस्तुतकर्ता रहै-कर्ण गोष्ठी-कायस्थक संस्था छियै, बुझिते छियै। सात टा महिला आयल रहथि, नाटक कयलनि। तकरा बाद दोसर नाटक लेल उपलब्ध नै भेलीह। ई तँ विडम्बने ने भेल। बंगला भाषी अभिनेत्री रहलासँ मंचनमे दिक्कत नै होइत रहए ?, प्रस्तुतिक गुणवत्ता नै प्रभावित होइ ? खूब बाधा होइ। हालमे 6 मार्च के कलकत्तामे एकटा नाटक भेल-'भफाइत चाहक जिनगी'(लेखक-सुधांशु 'शेखर' चौधरी)। एहिमे बंगला भाषी अभिनेत्री छलीह। ठीकसँ उच्चारण तक नै कऽ सकलीह। आब अहाँ नाटकमे ठीकसँ बजबे नै करबै तँ......? अपन व्यवहारिक अनुभव कहू ? अहाँ लोकनि कोना तैयार करियै बंगला भाषी अभिनेत्री के? ओना तँ सब गोटे मुदा विशेष रूपसँ- हमरा सबहक बीच लक्ष्मीनारायण मिश्र नामक एक व्यक्ति रहथि, जे आफिससँ छुट्टी लऽ लऽ भरि दिन अभिनेत्रीक डेरा जा हुनका मैथिली बाजब सिखाबथि, पार्ट घोखबथिन। मैथिली संवाद के बंगला लिपिमे लीखि कऽ देथिन। तखन हुनकामे कोनो बातक पता नै चलै। हमरा सबहक संग जे-जे बंगला भाषी अभिनेत्री काज कयलनि से एहिना। दू टाक नाम लेब- श्रीमती वीणा राय आ चन्द्रकला किरण। ओकरा हम सब चिन्है छलियै जे ओ मैथिली भाषी नहि अछि, अहाँ नै चिन्हितियै। सिखबाक क्रममे दुनू के मैथिलीपर ततेक कमांड भऽ गेल रहै। ओ दुनू हमरा सबसँ मैथिलीयेमे गप्प-सप्प करैत छलीह। आब एखन ओतेक मेहनति होइते नै छै। हमरा सबमे प्रतिबद्धता छल। सिखबाक प्रयास करै छलिये। साँझ कऽ अड्डा दियै। एक टकाक टिकट कीनि-कीनि बंगला नाटक जा-जा कऽ देखियै, बंगलामे की नब भऽ रहलैए। महेन्द्र मलंगिया के पुछबनि, ओ कहताह। कलकत्तामे हुनका पकड़ि-पकड़ि हम सब नाटक देखाबी-चलू फल्लां नाटक देखा। एखनुका कलाकारमे ओ प्रतिबद्धता नै छनि। करऽ के अछि, कऽ लियऽ एकटा नाटक। नै किछु अछि तँ एकटा नाटके कऽ लिअ। मैथिलानी नाटक करए मंचपर नै अबैत छथि तकर की कारण अहाँ के लगैए? सामाजिक विडम्बना छै। हमर सबहक जे संस्कार अछि, गीतनाद-नृत्य-नाटककेँ हम सब हेयदृष्टिसँ देखैत रहलियै। आब यद्यपि नृत्यमे मैथिलानी आबि रहल छथि। हम नाम नै कहब, कलकत्ताक एकटा बड़ पैघ श्रेष्ठ आन्दोलनी-साहित्यकार छथि, तिनकर ननकिरबी के एक बेर इच्छा भेल छलै नाटक करबाक-मुदा ओ अपन बचिया के नाटक नै करय देलथिन। अपने ओ भाषण दैत छथिन मंचपर महिला के अयबाक लेल। आइयो हम-अहाँ भाषण दैत छियै, लेकिन अपन बेटी-स्त्रीकेँ मंचपर उतारब से साहस हम सब नै करै छी। हमरा लोकनिक समाज एखनो पुरुष शासित अछि। जँ पुरुष Alow नै करथिन तँ महिला कोना मंचपर अओतीह? एहि स्थितिमे एखनो परिवर्तन नै अयलैए- हम सब भाषण जतेक झाड़ी। अहाँ स्वयं नाटक करैत रही, प्रगतिशील विचारधाराक लोक रही, अहाँ अपन पत्नीकेँ किएक नै मंचपर अनलहुँ ? हम एहि प्रश्नक अपेक्षा करैत रही अहाँसँ। देखियौ, हमरा पत्नी के पढ़हो नै अबैत रहनि। बाजहो-भुकहो नै अबैत रहनि। किए तँ पढ़ल-लिखन नै रहथि। बियाह भेल तँ कहलियनि-चिट्ठी-पुर्जी लीखू। तँ मात्रा छोड़ि अक्षर लीखब सीखि लेलनि। ओ जे एकटा कहबी छ जे एकटा पत्नी अपन स्वामी के चिट्ठी लिखलथिन-ट क प ठ ब त प ठ ब न त स ब म र ब (टाका पठायब तँ पठाउ नै तँ सब मरब)। तेहने लिखब सिखलनि हमर पत्नी-मात्रा ज्ञान नै भेलनि, हुनकर स्थिति आ स्तरक अनुमान कऽ लियौ। दोसर अपने कमजोरी किए ने कहि दी। अपने हम मैट्रिक पास कऽ कऽ गामसँ कलकत्ता गेल रही। नोकरी लागल। मुदा कॉलेजोमे नाम लिखौलौ। हमरा माय के बड़ इच्छा पढ़ऽ-लिखऽ के। पत्नी जे सुनलनि कॉलेज जाय वला बात तँ कहलनि-'एह आब धियापुता पढ़तै, तँ अपने कॉलेजमे नाम लिखौताह।' तँ ओहि पत्नी के हम कतेक दूर धरि आनि सकैत छलहुँ ? नै आनि सकलहुँ, हमरो कमजोरी अछि। एकटा बात आर कहब। कोनो प्रोग्राम होइ छै, नाटक होइ छै तँ ओहिमे कैक टा दर्शक स्त्रीगण रहैत छैक ? हम सब,सब, गोटे परिवारक संगे रहै छी, मुदा परिवार लऽ कऽ प्रोग्राममे किए नै जाइ छी ? कलकत्ताक मैथिली रंगमंचक इतिहास लगभग पचास वर्षक भऽ गेल। तथापि स्थिति नै बदलल? जड़िआयल सामाजिक संस्कार जाधरि नै बदलत, ताधरि....। आब देखियौ जे हमरा घरमे कोनो महिला आई.ए.एस. छथि तैयो भानसक दायित्व हुनके रहतनि। नोकरी ओहो करैत छथि- स्वामियो करैत छथिन, मुदा भानस स्त्रीये करतीह, पतिकेँ चाह बना कऽ वैह देथिन। स्वामी किएक ने करथिन ? एकटा स्त्री मृदुला गर्गक 'रुकोगी नहीं राधिका' सन उपन्यास पढ़तीह, मुदा मंचपर नै उतरतीह। हम सब (पुरूष वर्ग) Allow नै करै छियनि। पटनामे हम कहब जे हमरा लोकनिक सौभाग्य अछि जे प्रेमलताजी (प्रेमलता मिश्र 'प्रेम') सन वरेण्य आ सम्मानित अभिनेत्री एखनो सक्रिय छथि। ओ साहस कऽ कऽ मंचपर अयलीह। मैथिलीक नाटक सबमे संख्याक दृष्टिसँ स्त्री चरित्र कम रहैए। एकर की कारण ? की महिला कलाकारक अभाव मात्र एहि लेल जवाबदेह अछि ? तँ आर की ? महिला कलाकार छैके नै तँ नाटककार लिखिये कऽ की करताह? मंचने नै होयतनि। हम कहि सकैत छी जे कमसँ कम कलकत्ताक नाटककार जे नाटक लिखलनि से ओही हिसाबे। हम एकटा नाटक खेलायल रही- जादूगर आ रिहर्सल। अनुवाद नाटक छल। तँ हम तकैत-तकैत ओहन नाटक तकलहुँ आ अनुवाद कयलहुँ, जाहिमे महिला कलाकार छलैके नहि। नचिकेताक नाटक 'एक छल राजा'मे तीन टा महिला रहै। मुदा हमरा सब लग रहथि दू टा महिला कलाकार। एक गोटेकेँ डबल रोल देलियै। तँ लोक चेहरा नै देखि सकै त एकटा रोलमे ओकरा चेहरा घुमा पाछू मुंह बैसा देलियै-अपन गीत गाउ आ चलि जाउ। ई तँ स्थिति अछि। कोना नीक नाटक लिखायत आ कोना तकर नीक मंचन होयत ? हमर स्पष्ट मत अछि जे महिला कलाकारक अभाव अछि तें नाटककार कम महिला चरित्र रखलनि, नै रखलनि। बिनु महिला पात्रक नाटक हो तँ उत्तम। आइयो जे नाटक लिखाइए-ताहूमे दू-तीनटासँ फाजिल नारी चरित्र कहाँ रहैए ? ई संकट सब ठामक छैक। आब गोटपगरे सही, मैथिलानियो घरसँ बहरा रहल छथि। नोकरी, व्यापार, फैशन, खेल-पुलिस सब क्षेत्रमे। गबै छथि-नृत्य करैत छथि। तखन नाटक नहि करबाक पाछू की कारण लगैए रंगमंचक स्वयं केर स्थिति एहि लेल कतेक दोषी लगैए? हम फेर कहब सामाजिक अवस्था दोषी अछि। ताहूमे पुरूष वर्ग दोषी अछि। स्त्रीक इच्छा रहितो छैक तँ पुरूष ओकरा Allow नै करै छ। तँ ओ नै अगुआइ छथि। ओहुना बंगालमे कि दक्षिण भारतीय भाषा सबमे कलाक प्रति जतेक आकर्षण छै ततेक हमरा सबमे नै अछि। एकदम्मे नै अछि। मिथिला पेंटिंग बंगाली सब बना-बना बेचि रहल अछि हम सब नै। मैथिलानी घर-घरमे पेंटिंग बनौतीह-मुदा प्रदर्शनीमे नै जेतीह, किए तँ परिवार Allow नै करै छनि। नाटको लेल सैह बात अछि। एखनो हमरा सबहक मानसिकतामे कहाँ परिवर्तन भेलए जे नाटक एकटा कला छियै। साहित्यक सबसँ सशक्त विधा छै नाटक, नाटक मात्र पोथी नै। एकटा समन्वित कला छै। एकर जे प्रभाव दर्शक-श्रोतापर पडै छै- से कथा-कविताक कहियो भइये नै सकै छै। मुदा हमरा सबमे तकर इमानदारी आ विचारक अभाव अछि। आब मल्ल कालक स्थिति तँ हम नै कहब। मुदा ओहू कालक नाटक सबमे नटी-सूत्रधारक परिकल्पना छै, तँ महिला कलाकार रहल हेतै-से हमरा लगैए। ई बीचमे आबि कऽ मुसलमानी आक्रामणक बाद पर्दा प्रथा आयल। हमरा लोकनिपरम्परावादी सोचक लोक, ओकर रूढ़ि बना देलियै। जतेक नाटक अहाँ पढ़लहुँ, कयलहुँ अथवा देखलहुँ-ताहि आधारपर कहू जे मैथिल नारीक केहन छवि नाटक सबमे आयलह अछि ? पुरुष आश्रित नारीक छवि। नियमसँ बाहल, भनसाघरमे घोंसियायल, घरक काज करैत, पुरुषक सेवा करैत नारीक छवि। बहुत-बहुत पछुआयल नारीक छवि। पुरुषक समकक्षोक छवि नै बनल अछि। स्त्रीक स्वतंत्र अस्तित्व कहाँ कोनो नाटकमे आयलए ? अगुआयल चरित्र कहाँ आयलए? स्वावलंबनक भावना वला नारी कहाँ अनलनिहें नाटककार लोकनि नाटकमे ? हँ, गुणनाथ जी 'पाथेय' नाटकमे नारीक कनेक नीक छवि देखौलथिन। की यह अछि मैथिल नारीक सम्पूर्ण छवि? सम्पूर्ण छवि माने की ? मिथिलाक नारीक दू वर्ग अछि ग्रामीण स्त्री आ शहरी स्त्री। विडम्बना अछि जे मिथिलामे कलकत्ता कि पटना सन शहर नै छै। शिक्षित-बुद्धिजीवी गाम छोड़ि शहर आबि गेल। मुदा गामक स्त्री एखनो गोबर पथैए। शहरमे से तँ नै करैए, मुदा ग्रामीण संस्कारसँ एखनो मुक्त नै भेलैए। आब देखू, हमरा लोकनिक अधिकांश नाटककार शहरी छथि। ग्रामीण पृष्ठभूमिपर मलंगियाजी टा नाटक लिखै छथि। आब शहरमे रहि कऽ गामक नाटक लिखबै तँ से केहन हेतै ? शहरियाक मात्र स्मृतिमे गाम छैक। कैक दिन गाम जाइ छी हमरा लोकनि ? तें गामक बारेमे चिंतन सतही होयत-तँ से स्वाभाविके। तें नारीक जे यथार्थ छवि अयबाक चाही नाटकमे - से नै अबैए। मलंगियाक नाटक 'ओकरा आंगनक बारहमासा, नसबंदी, जुआयल कनकनी'मे यद्यपि अयलैए। स्त्रीक दुर्दशा लेल स्वयं स्त्री कतेक दोषी छथि ? स्वयं स्त्री के सर्वांशतः दोषी नै मानल जा सकैए। हमरा लोकनिक समाज पुरुष शासित रहलए। हमरपरम्परा बहुत जड़िआयलपरम्परा अछि। एतय बुझबाक अछि जेपरम्परा नीक वस्तु अछि,परम्परा बनै छै मनुक्खे लेल-समाजक उन्नति लेल। लेकिन हमरा सबहक साहित्यमेपरम्पराक गलत व्याख्या कयल गेलए। जे रूढ़ि छै तकरा हम सबपरम्परा मानि लेलियैए। एहि रूढ़िसँ जाबे हमरा सब के मुक्ति नै भेटत-ताबे नारीक स्थिति , नै सुधरतनि। नारियो समाजमे जाबे बटसावित्रीक पूजा होइत रहतै आ मधुश्रावणीमे ठेहुन दगाइत रहतै-ताबे तक भरिसक नारी आगू नै आबि सकतीह। नाटकोमे यह स्थिति अछि। आखिर लेखको तँ ओही वर्ग आ समाजसँ अबैत छथि- प्रायः ओहो नारी के सामने नै आनय चाहैत छथिन। हमरा जनैत मलंगियाजी विशिष्ट वर्गक नाटके लिखैत रहलाह। ओहि विशिष्ट पिछड़ा वर्गमे नारी के विशेष स्वाधीनता छै। जकरा फारवर्ड कहैत छियै, ताहि वर्गक नारीमे बड़ कम स्वाधीनता छै। जखन कि फारवर्डमे नारी कम कि बेसी पढ़बो-लिखबो कयलनि। परंच संस्कार समकालीन नै भेलनि। सोच आधुनिक नै भेलनि। आधुनिकताक प्रभावसँ पाछू रहलीह। की अहाँ के लगैए जे महिला नाटककारक अभाव रहलासँ नाटकमे महिलाक उचित प्रतिबिम्ब.... (बिच्चेमे बात लोकैत) नै-नै, ई कारण नै छै, बल्कि ई गलत धारणा छै। कोनो भाषामे एना नै छै जे महिला लेखिके महिलाक विषयमे बढ़िया लीखि सकैत छथि। नाटककार तँ सब भाषामे पुरुषे बेसी छथि। महिला लिखतीह तँ महिला कलाकार भेटत अथवा महिलाक सम्पूर्ण समस्या आओत ई हम नै मानै छी। जेना, साहित्यमे आएल दलित साहित्य एकदम बकबास छै। साहित्य कतौ दलित होइ आ साहित्यकार कतौ दलित हुअय। साहित्यकार मात्र स्रष्टा होइ छै बस। देखू, दरअसल हमर नाट्य विधे कमजोर अछि। नाटक लिखायत मंचन लेल से कते मंच (नाट्य संस्था) अछि अपना सब लग? नाटक खेलाइ वला लोक नै अछि। मंचक (नाट्य संस्था) अभावक चलते नाटक कमजोर। कम लेखन। सय वर्षक आधुनिक मैथिली नाटकक इतिहास अछि-संख्यामे कतेक नाटक अछि ? 1953मे कलकत्तामे हम सब मैथिली नाटक करब शुरू कयलहुँ। तँ 51-52 सालमे कलकत्तामे एखन तक मात्र 51 टा मौलिक मैथिली नाटक आबि सकल-बाकी अनुवाद अछि। जखन कि कलकत्तासँ हम सब एखन धरि 250सँ 300 पोथी छपलहुँ, ताहिमे मात्र 51 टा मौलिक नाटक। हमरा सब लग नाटककारोक अभाव रहल अछि। नाटक लीखब परिश्रमक काज अछि। ओकरा मंचक ज्ञान होइ। नाटक एक बेर लिखायल, पाठ होयत, फेर काँट-छाँट। फेर लीखू। तखन रिहर्सल। रिहर्सलमे फेर चेंज होयत। तखन मंचन। फेर काटपीट, तखन प्रकाशन। एतेक परिश्रम करबाक लेल लोक तैयारे नै छथि। डैराइ छथि। उपन्यासोमेहनत मंगैत छै तें मैथिलीमे उपन्यासो कम छै। सबसँ बेसी कविता लिखा रहलए सेहो हम कहब छंदक बंधन टूटि गेलै तें। हमरा सब लग प्रतिबद्ध आ परिश्रमी लेखकक अभाव अछि। फेर लेखनसँ पाइ तँ भेटै नै छै। तें ई 'पार्ट टाइम' जॉब जकाँ लोक करैए? थोड़े नाटक नचिकेता लिखलनि। आब एखन तँ मलंगिया छोड़ि कियो नै। बाबू साहेब चौधरीक एके टा नाटक अछि-'कुहेस'। हमरा बुझने दहेज प्रथापर मैथिलीमे सबसँ नीक नाटक अछि। किएक तँ ओ 15-20 टा नाटकमे स्वयं अभिनयो कयने रहथि आ नियमित बंगला नाटक देखितो छलाह। अमरकांत लाल रामलोचन ठाकुर जीक अनुवाद रामलोचन ठाकुर जीक पोथी प्रतिध्वनि पढ़बाक प्रयास कऽ रहल छी , पढि नहि पाबि रहल छी कारण ,पढबा काल मोन सदति पूर्वाग्रहसँ भरल रहैछ, रामलोचन ठाकुर जीकेँ पढबा लेल लगैछ जे हमरो निर्द्वन्द ,निर्लेप होयबाक चाही। अनुवाद पहिनहु पढ़ने छी मुदा एहन अनुवाद कम्मे भेटल जाहिमे ईशा अपन आत्मा जनक आ जानकीमे समाहित कऽ देने होथि , ठाकुर जी के पढबा माने सर्वहारा मैथिलक संस्कारमे डूबकी लगैब ,जत्त दुख तकलीफ सेहो आध्यात्म आ दर्शनक समुद्रमे समाहित अछि। धनकुटनी पढबाकाल "ढेकीमे धान कतेक कष्ट पबैछ" .......... विपत्तिक कारखानासँ रत्न भऽ बाहर अबैछ । एहि पाँतिमे उपदेश प्रेरणा, सत्य सभटा एक्कहि संग अगल,बगल ठाढ़ भेल अछि, ठाकुरजीक विषयमे हल्ला छैक ओ हरा गेलाह, हमरा जनतबे ओ मैथिली छोड़ि कत्तहु ने हरा सकै छथि। श्रीमानक रचना सदति खेत खरिहान ,वंचितक आँगन घर सौंसे ठाढ़ भेटत ओ अनुवादे किएक नहि हुए मुदा निर्विवाद रुपमे अनुवाद कत्तहुसँ अनुवाद नहि मैथिलीक सुच्चा माटि-पानि संग ओही स्वादमे ठाढ़ "वसुधैव कुटुंबकम" सन वसुधैव कष्ट एकदृष्टमक सूचना दैत जागृत अछि। बेसी काल रचना विन्दु आ रचनाकार एकाकार नहि भऽ पवैछ ,परंच रामलोचन ठाकुरजीक रचना कखनहुँ हुनकासँ फराक दृष्टिगोचर नहि होइछ। हुनक रचना बहुत संगठित लोकशक्तिक उदय आ‘ विस्तारक ओहि सम्भावनासँ परिचय करेबाक प्रयास करैत अछि जाहिठाम प्रतिफल विकासक बाटक प्रशस्त करत। विकाससँ सुख समृद्धि आ क्लान्त मुखमण्डल पर सुख उझलबाक काज रचना मादे कैल जा सकै छै एकर विश्वास हिनक रचना कैएक बेर दिएबामे सफल रहल।तखन ईहो कहब जे ओ इतिहास बिसरि गेल छलाह से नहि तँइ हुनका रचनामे क्रान्तिक ओ घवाह स्वर छैक जे अन्यत्र भेटब कम संभव वा ईहो कहि सकैत छियैक जे रचनाकार बेसी काल जाहिसँ परहेज करैए छथि। "आर जुनि उठा माथ बर्फ अम्बार नहि तऽ अइखन पकड़ब हम तरुआरि" जाहिमे सम्पूर्ण व्यवस्थाक प्रकृतिके विरुद्ध ठाढ़ होयबाक प्रयास जाहिमे वर्ग विशिष्ट नहि सभक लेल वर्तमानसँ संघर्षक घोष छैक , मैथिलीए नहि हिन्दीयोमे झट दऽ भेटब असंभवे बुझियौ। समृद्धिक फूहिआएब देखबामे अबैछ मुदा भाषा लेल भाषा समृद्धिक बरखा कम्महि भेटैछ। फूहीसँ सन्तोषक हरितिमाक विस्तारक आश मुदा स्थायी विस्तार लेल बरषा चाही ।जागरण, संगठन, सामाजिक दायित्वबोध आ’ समन्वित राष्ट्रीय दृष्टिक विकासक विविध बाट आ ओहि बाटपर प्रमुख अछि, स्वर्णिम अतीतक अवदानक परिचय द्वारा लोककेँ उत्प्रेरित करब। मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहास पराक्रमक गौरव गाथासँ परिपूर्ण अछि। मुदा ठाकुर जी ओहि गौरवगाथासँ फराक भऽ एकटा नव दृष्टिकोण ठाढ़ करबामे लागल छथि जे नहि तऽ राजनीति प्रेरित अछि आ नहि कूनू विशेष धारा वा विचारसँ हुनक स्वतः स्फूर्त भाव जे किनको कम्युनिस्ट वा वामपंथी लगौन्ह परंच ओ सदति मिथिला आ मैथिलीपंथी थिकाह जाहि विषयमे जनबाक अनेक स्रोत अछि। ओ स्रोत सभ लिखित आ’ अलिखित दूनू अछि। जे लिखित अछि पढ़ल-लिखल लोक तकरा पढ़ि पढ़ि सामाजिक बोधसँ अभिभूत होइत रहलाह अछि आ जे लिखल नहि जा सकल, से लोक कंठहिक माध्यमे आइ धरि सुरक्षित रहि प्रेरणाक अजस्र स्रोत प्रवाहित करैत आबि रहल अछि। कूनू बेक्ति जखन कर्म आ दायित्व के चरम विन्दु तक पहुँचबाक प्रयास करै छथि तँ देखार होइ छथि। तहिना ठाकुरजीक रचना सेहो समाजक सभ वर्गक बोध पसारैत सभक लेल चेतौनीक काज सेहो करैए छथि आ अपना दिससँ संघर्षघोष सेहो। प्रदीप पुष्प गीतकार रामलोचन ठाकुर मैथिलीक आने विधाक अनुरूप मैथिलीक गीतक उपर आलोचक लोकनि कम्म ध्यान देलनि अछि। कविताकें विशेष महत्व द' मैथिली गीतक उपेक्षा कयल गेल अछि। यद्यपि मैथिली गीतक परम्परामे महाकवि विद्यापति जकाँ गीति-काव्यक पुरोधा नीक जकाँ मुखर छथि आ हुनका बाद सेहो बहुत नीक गीतकारक श्रृंखला रहल अछि, तथापि ई कहबामे कोनो अशौकर्य नहिं जे मैथिली गीत-विधाकें ओतेक मूल्य नहि भेटि सकल जे ओकरा भेटबाक चाही। यद्यपि भिन्न- भिन्न कालमे गीतकार- कवि द्वारा रचल सुमधुर गीत मैथिल जनमानसक कंठमे अपन माधुर्य संग लोकप्रिय होइत रहल मुदा गीतक आलोचना पक्ष आ अइ वास्ते अकादमीक सहयोगक दृष्टिकोणसँ गीत विधा कविता जकाँ जगह नै बना सकल। मैथिलीक प्रसिद्ध कवि, रंगकर्मी, आंदोलनी, पत्र-पत्रिकाक माध्यमे मैथिलीक जन- जागरण कएनिहार श्री रामलोचन ठाकुर जीक साहित्यिक अवदान बेस व्यापक अछि। एकटा समर्थ कवि, मातृभाषा अनुरागी, आन्दोलन कर्मी, पत्रकार इत्यादि विभिन्न भूमिकाक नीक जकाँ निर्वहन करितो ठाकुर जी मूलतः मैथिलीक सुंदर भविष्य लेल, मिथिलाक उत्थान लेल चिंतित स्वप्नद्रष्टा छथि। रामलोचन जीक गीत मूलतः मिथिलाक छायाचित्र अछि। व्यापक उद्देश्य सँ रचल गेल गीतक कैनवास नमहर अछि आ आने गीतकार जकाँ वस्तुनिष्ठ आ सूक्ष्म नै भ' पबैत अछि। गीतकार ठाकुरजी निश्चित रूपेण प्रगतिशीलता प्रतिनिधि छथि। हिनक गीत यथार्थक भूमि पर ठाढ भेल मजगूत घर जकाँ अछि। अपना समयक समाज आ देशक समुचित चित्र उपस्थित करबाक सफल प्रयास ठाकुर जी कयने छथि। हिनक गीत समाजक वर्ग- संघर्ष केँ, असमानताकेँ प्रतिध्वनि थिक। ई अपन गीतमे क्रान्तिक आह्वान करैत छथि। हिनकामे समतामूलक समाजक प्रबल भावना देखाइत अछि। हिनक गीत कोनो नवयुवतीक प्रति रचल गेल उपमा- उपमेय आ श्रृंगारक वर्णमाला नै, अपितु हिनक गीत भूख, ब्याधि, बेकारी, शोषण आ अपन भाषा- संस्कृतिक प्रति हिनक अगाध अनुरागक गान थिक। श्रमिक- मजदूर वर्गक आक्रोश, पलायन, भूखमरी, कृषकको अधोगति हिनक मूल- विषय रहलनि अछि। अपूर्वाक भूमिकामे श्री नवीन चौधरी लिखैत छथि-"रामलोचन ठाकुर जीकेँ यशस्वी गीतकारक पतियानीमे देखब कोनो आलोचककेँ नै अघरतनि। एहि पोथीक गोटेक दर्जन गीतमे ओ सामर्थ्य छै।" हम आदरणीय चौधरी जीक एहि कथनसँ सहमति नै रखैत छी। यथार्थक तेहेन स्वर ठाकुर जीक गीतमे प्रमुखता सँ उपस्थित छन्हि जे निश्चित रूपेण हिनका अग्रणी गीतकारक रूपमे स्थापित करैत अछि। ठाकुर जीक गीत परम्परागत गीतसँ पृथक अछि। हिनक गीतक कथ्य आ शिल्प दुनू परम्परा सँ अलग अछि। उदाहरण लेल- हिनक गीत " उठ - उठ रओ बौआ"मे ठाकुर जी कहैत छथि-" काल्हि जनगणना थिक गामे पर रहब, ठीक - ठीक लिखाएब कने जेना - जेना कहब, माइक जे भाषा से मैथिली लिखाएब, देखब हिन्दी ने लिखए मुझौसा-" एकटा दोसर गीतमे लोक गीतक शैली लिखल पर ई बेस चोटगर अछि_ " करिया झुम्मरि खेलै छी, ढील पटापट मारै छी, लीख पटापट मारै छी, शोणित पीबै जे मनुखकेँ, तकरे मारै - जारै छी," हिनक एकटा प्रसिद्ध गीत अछि-'बिढनी कटलकौ,तुम्मा फुलेलकौ, फेर कन्हुआइ छौ तोरे पर'। ई गीत पाँच बरख पर नेतालोकनि द्वारा चुनाओ जीत क' जन- समुदायक शोषण पर बेस धरगर प्रहार अछि। संगहि, गीतकार अइ गीतमे मतदान करय बला समुदायकेँ चेतौनी द' रहल छथि। शिल्पक दृष्टिसँ गीत लेल आवश्यक छैक ओकर गेयता।ताहि लेल आवश्यक छैक जे ओकर अंतराक मीटरमे तारतम्य होइ जाहिसँ ओ प्रभावी रूपे गाओल जा सकय।मुदा ताहि दृष्टिकोणसँ हिनक गीत बेसी ठाम उपयुक्त नै लगैए।उदाहरण लेल- "सखि हे हम की गायब गीत" शीर्षक मे कोनो अंतरा तीन पाँतीक अछि त' कोनोमे चारि -पाँच पाँतीक। तहिना -" इतिहास युग नवीन के" आ " क्रांतिक आह्वान " मे सेहो साम्यताक अभाव। हिनक बेसी गीतक शिल्प नजरिए ओतेक प्रभावी नै। पोथी 'अपूर्वा'क प्रारंभमे आदरणीय सुनील चौधरी ललन जीक ई कथन -" रामलोचन ठाकुर लग कतोक वस्तुक अभाव छनि। आलोचनाक निष्पक्ष कसौटी पर राखि क' देखल जाए त' किछु दोष अवश्य भेटत। ठाम - ठाम हुनकर मान्यतासँ सहमति होएब कठिनाह बुझि पड़त......। "सँ हमहुँ सहमति रखैत छी। प्रगतिशीलता आ यथार्थवाद केँ समेटैत,परम्परागत गीत-शैली केँ अनठबैत जँ अहाँ हिनक गीतक उद्देश्य आ विषय-वस्तुक प्रासंगिकता मात्र धरि ध्यान राखी त' हिनक गीतकारी नीक छनि आ मिथिला- मैथिल लेल प्रभावोत्पादक छनि। मुदा, ओइमे आन आवश्यक गुणक अभाव। रामलोचन जी बहुतो विधा पर अपन कलम चलौलनि।एकटा गीतकारक संभावनाक रूपमे जँ विचार करी त' ओ विषय - चयन आ तत्कालीन परिवेश ( अखनहुँ प्राय: ओहिना) केँ चित्र उपस्थित करबामे सफल छथि मुदा गीतक आन तत्वक अभाव कारणे ओ बेसी काल धरि गीतकारक रूपमे आकर्षक नै लगै छथि। शैलेंद्र मिश्र एकटा खाँटी मैथिल:रामलोचन ठाकुर आ हुनकर काव्यसंसार आदरणीय रामलोचन ठाकुर मिथिला मैथिली मध्य एकटा ध्रुवतारा बनि चमकि रहल छथि ई कहबामे हमरा असोकर्ज नै भऽ रहल अछि किएक तँ भाषाक प्रति समर्पणता ओ त्याग बिरले व्यक्तिमे भेटत। ई कलकत्तामे मिथिला-मैथिलीक पर्याय बनि एकटा खाम्हक रूपमे विद्यमान छथि आ अपनासँ कनिष्ठ पीढ़ीक कतेको साहित्यकारकेँ साहित्य-साँचामे गढ़लथि। अपन बात–विचार स्पष्ट रूपसँ रखैत रहलाह अछि। एकटा विरल मैथिली आंदोलनकर्ता, कवि, गद्य लेखक, समालोचक, कुशल संपादक, नाटककार, निर्देशक ,रंगकर्मी ओ सफल अनुवादकक रूपमे प्रख्यात छथि। हुनकर रचना संसार ततेक विशाल छनि जे सम्पूर्ण कृतित्वकेँ एकटा लेखमे समेटनाइ कठिन अछि। अइ लेखमे हम हुनकर मात्र काव्य यात्रापर केंद्रित करब। हिनकर राजनीतिक विचार मार्क्सवादी –बामपंथी रहलनि आ हिनकर कविता सभमे सेहो मार्क्सवादक सौन्दर्य-शास्त्रक उदाहरण भेटैत अछि। लेकिन सिर्फ ककरो राजनीतिक विचारधाराकेँ केंद्रभूमिमे राखि कऽ मूल्यांकन केनाइ निश्चित रूपसँ त्रुटिपूर्ण साबित हएत किएक तँ अइ बातपर सबमे सहमति छै जे कोनो रचनाकार तखने पैघ बनैत छथि जखन ओ अपन विचारधाराकेँ अतिक्रमण करैत अछि।हिंदी साहित्यमे भक्तिकालक एकर उदाहरण अछि जायसी तँ आधुनिक कालमे मुक्तिबोध। सूफी मतवादक अतिक्रमण कइए कऽ जायसी पद्मावत सन श्रेष्ठ रचना लिख सकलाह तँ मुक्तिबोध मार्क्सवादी विचारधाराक अतिक्रमण कऽ सफल भेलाह। आलोचनामे एकटा प्रवृत्ति हावी रहलैए जे रचनाकारकेँ व्यक्तिगत राजनैतिक विचारधाराक आधारपर मूल्यांकन केनाइ लेकिन हमर कोशिश अछि जे रामलोचन जीके रचनाकेँ केंद्रमे राखि अपन विचार प्रस्तुत कऽ सकी। तखन ईहो बात सत्य अछि जे हुनकर कविता-संग्रहक अध्ययन केलाक बाद एकटा गीत स्वतः मोन पड़ि गेल –‘दुखहि जनम भेल, दुखहि गमाओल’ निराशा ,कष्ट ओ संघर्ष आदरणीय रामलोचन ठाकुर के कविताक केन्द्रीय भाव छै। जेना भगवान बुद्ध कहने छथिन –‘संसारमे दुःख छै’ लेकिन ओ दुःखक समाधान सेहो देने छथिन। ठाकुरजीक कवितामे दुःख तँ छै लेकिन समाधान नै छै। ई चिकित्सक जकाँ समाजक रोगकेँ उजागर करैत छथिन,ईहो गप्प सत्य जे कवि समाधान देबे करथि से आवश्यक नै। रामलोचन ठाकुर जीक रचना संसारमे सब तत्व विद्यमान अछि काव्यक सब रस भेटैत अछि , सर्वगुण सम्पन्न हुनकर विद्वता ओ गहराइ के साधारण चश्मासँ किन्नहु नै देखल जा सकैत छै। हुनकर काव्य-यात्रा एकटा मानव जीवन सन उभर –खाभर ओ वैविधतापूर्ण छनि। अपन कविता सबमे सब बात फरीछ कऽ कऽ रखने छथि। आदरणीय ठाकुरजीक व्यक्तित्व ओ कृतित्वमे बेसी अंतर नै छै। जएह हुनकर जीवन सएह हुनकर रचना संसार। हुनकर तेवर अप्पन पहिलुके कवितासँग्रह ‘इतिहासहंता’मे देखल जा सकैत अछि जतऽ ओ मिथिला मैथिली के अस्मिताक नामपर चलि रहल खेल के अस्वीकार कऽ दैत छथि बहुत रास बिम्बक माध्यमसँ अप्पन गप रखने छथि। जखन ओ अपन पहिलुके कविता ‘मैथिली’मे कहैत छथि “मैथिली कें बनसँ नै /नैहरेसँ /बलजोरी घिसियबैत /ल गेल छला राक्षस-राज /आ औखन रखने छनि /अशोक बाटिका मे/शोकाकुल मैथिली जतय /कुहरि –कुहरि /अपन जीवनक अंतिम क्षणक /प्रतीक्षा क रहल छथि /की करती बेचारी /विदेह बाप पहीनहिं देह त्यागि चुकल छथिन /राम छथिन नपुंशक /आ /हुनकेसँ जनमल /लव आ कुश की वीर पुरुष हेथिन”।ई पढलाक बाद कविक प्रति आक्रोश स्वाभाविक छै किएक तँ राम भारतीय सांस्कृतिक एकटा उत्कर्ष पुरुख भेल छलथि आ हुनका ‘नपुंसक’ कहनाइ बहुत खेदक गप्प भेल। लेकिन उपरोक्त कविताकेँ कएक टा तह छै सतही स्तरपर जतय एकटा साधारण मैथिलक पीड़ा ओ आक्रोश नजरि परिलक्षित होइ छै किएक तँ सीता संग भेल दुर्व्यवहारक कारणे रामकेँ लोक कथा कहनाइ ,गारि पढ़नाइ एकटा स्वाभाविक प्रतिक्रिया छै। मैथिल संस्कृतिमे जमाए ओ ओकर सासुरक लोककेँ हास्य-परिहास केनाइ कोनो नब गप्प नै। तँइ कहल जा सकैए जे ओ आवेशमे आबि एकटा सीमाकेँ तोड़ि आगू बढ़ि गेल छथि ,परंच ओ नैहर पक्ष ओ मिथिलाक लोक के सेहो नै छोड़लखिन। लेकिन यदि दोसर तहकेँ देखल जाए तँ ओ मैथिली भाषाक मादे सेहो बहुत किछु कहि देने छथि जे एखनो प्रासंगिक अछि लगभग 40 वर्ष पूर्व जे मैथिली भाषाक दुर्दशा छल वएह एखनो अछि अष्टम सूचीमे शामिल भेलाक बादो कतेको विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे शामिल भेलाक बादो खाली मंच ,पाग दोपटा ओ विद्यापति पर्व-समारोहक भाषा बनि कऽ रहि गेल अछि। कतेक विश्वविद्यालयमे विद्यार्थीक अभावमे मैथिली विभाग बंद भऽ गेल तँ कतेको ठाम बंद होमए के कगारपर अछि। ‘नैहर’ के मतलब एतय राज्य राखि देल जे तैयो बहुत किछ फरीछ भऽ जाइ छै ,राज्यमे मैथिली के कोनो सम्मान नै ,ओइसँ बेसी त दोसर राज्य जेना झारखंड /दिल्लीमे बेसी छै। हुनका सन मातृभाषा प्रेमी ओ युगपुरुष मैथिली भाषा साहित्यमे कम्मे भेटत किएक तँ ओ मिथिलाके भूगोल,सांस्कृतिक परिदृश्य, आर्थिक-सामाजिक परिदृश्यसँ पूर्ण रुपें परिचित छथि। ओ गन्हाइत व्यवस्थाक प्रतिवाद करैत छथि। ‘नाटक ,निर्देशक आ एक गोट कविता’ शीर्षक कवितामे माध्यमसँ कटु सत के जगजियार करैत छथि –‘जखन मंच से उतरैए /कुनु एक कलाकार /दर्शक दीर्घा से ल जाइए /एगो युवती कें /प्रतिवादी भाईक हत्याक पश्चात /मंचपर कएल जाइए ओकरासँग /सामूहिक बलात्कार /अभिनय के नामपर /तैयो शांत –एकदम चुप्पी आ /आन्दोलनमत्त भेल अभिनेता सब /क रहलए गरंथिया नाच’। अइ कविताक माध्यमसँ रामलोचन ठाकुर बहुत किछु बात कहि दैत छथि ,ई कोनो मैथिले समाज नै अपितु अभिनयक नामपर व्याप्त स्त्रीक शोषण, फूहड़ता ओ लोकक असंवेदनशीलताकेँ प्रकट केने छथि। आइयो दृश्य-परिदृश्य वएह छै अइमे कोनो बदलाबक कल्पना केनाइ संभव नै छै। अग्रजक नाम शीर्षक कविता –केहन लागत अहाँके /जे भनसाघर कुनू /कसाइ खाना-कम किचेन –कम रेस्टोरेंट /बनि गेल हो ,आ /अहाँक अनुजक ससड़ी काटल खलड़ी ओदारल /देह झुलैत हो पछुअतिमे /ओकर टटका मांसक कबाब, आ /टटका रक्तक शराब बेचल जाइत हो। ओ एकटा जनवादी-प्रगतिवादी कवि के रूपमे आमजनक व्यथा–कथाकेँ निष्पक्ष आ बिना कोनो लाइ–लपटाइ के राखि दैत छथि। ओ मार्क्सवादक प्रभावमे छलथि आ ‘इतिहासहंता’मे सबटा एहने –एहने क्रांतिकारी कविता सब के संकलन छै। लेकिन हिनकर मात्र एक गोट कविता-संग्रहकेँ पढ़ि कोनो टैग नै लगायल जा सकैए, लगभग 45 बरखक काव्य साधनामे बहुत रस ओ रंगक रचना केलथि। ओ सब तरहक रचना चाहे तुकांत हो वा अतुकांत ,सब तरहक रचना केलथि। हुनकर बादक कविता सभक विषय वस्तु सेहो भिन्न रहलनि। परंच ई बात सेहो सत्य जे हुनकर मूल विषय मिथिला ,मैथिली ओ मैथिले रहलनि। अपन दोसर कविता –संग्रह ‘देशक नाम छलै सोन चिड़ैया’ (अरुणोदय प्रकाशन,कलकत्ता 1986 ई)मे ‘सुच्चा मैथिल’ शीर्षक नामक कवितामे मैथिलक दुर्दशाक वर्णन केने छथि – आइ भारती /गुदड़ीसँ झपने अंग /दाबापर चिपड़ी पथैत छथि /हीरामनि सुग्गा /पहिलहि मरि चुकल अइ /आ /तीन दिनसँ अन्हार /तौनीसँ बन्हने अपन पेट /बैसल छथि /एकजनियाँ एकचारीमे /महापंडित मंडन मिश्र /स्वतः प्रणाम /परतः प्रणामम रटैत /जानि ने /कोन शंकराचार्यक /प्रतीक्षा छैन’। वस्तुतः मिथिला /मैथिल भूतकालमे जीबए बला छी ,अतीत कतबो सोहनगर किएक नै रहल हो, वर्तमानसँ बेसी सुन्नर नै भऽ सकैए। पुरातन संस्कार तखने बचि सकत जखन हम सब साकांछ भऽ अपना के आर्थिक ,सामाजिक ओ राजनीतिक दृष्टिसँ मजगुत रहब। उपरका कवितामे बहुत रास बिम्बक माध्यमसँ ओ सूतल लोककेँ फेरसँ जगेबाक प्रयास कऽ रहल छथि। रामलोचन ठाकुर मैथिली –मिथिलामे एकटा पुनर्जागरण चाहैत छथि। मैथिलीक उपेक्षा ओ राजनीतिक –आर्थिक रूपे जानि बूझि कऽ पाछा रखनाइ के खेल सदतिसँ चलि आबि रहल अछि जकर कारण मैथिल स्वयं छथि। मिथिला राज्य आन्दोलनक नामपर सेहो बहुत किछ भेल बादमे जा कऽ भारतक संविधानक अष्टम सूचीमे शामिल तँ भेल लेकिन ओ वस्तुतः बहुत दिनक संघर्षक परिणाम छल। रामलोचन ठाकुर अपन कविताक मादे चेतौनी सेहो देने छलखिन जे मैथिली के जदि अपन हिस्साक उचित सम्मान नै देल जायत तँ ई आंदोलन भीषण रूप लऽ सकैए। भाषाक अस्मिता आंदोलन केहन –केहन देशकेँ तोड़ि देलकै आ रामलोचन ठाकुर अइ बातक उल्लेख कऽ मैथिली /मिथिलाक नामपर दोकान चलेनहार नेता ओ दलाल सबकेँ सतर्क करैत छथि। आबहुँ तों चेत/ रे पटना के पंडा /रे डिल्लीक दलाल /हिंदीके पोसा कुकूर –शैतान /जुनि करबा /इतिहासक पुनरावृत्ति /सम्मुख ज्वालामुखी /बढ़ा जुनि डेग /सावधान /नहि तई मिथिला देश /बनत विश्व कें /दोसर बांग्लादेश /दोसर वियतनाम। अग्नि पीढ़ीक कवि होमए कारणे जोशमे ओ कनि दूर चलि जाइ छथि बांग्लादेश ओ वियतनामकेँ मात्र एकटा संकेतक रूपमे लेबाक चाही किएक तँ हुनकर देशभक्ति ओ मिथिला भक्ति दूनु एक दोसर के पूरक छै हुनकर हुंकार तँ मात्र माँ मिथिलाक हेरायल स्वर्णकालक स्मृति दिअबैत छै। हुनका ई कनिको स्वीकार नै छनि जे ककरो फूसिक आश्वासनपर निर्भर रही ओ अपन अधिकार के माँगबामे नै बल्कि जरूरत पड़लापर छिनबामे सेहो विश्वास रखैत छथि। रामलोचन ठाकुर सब तरहक प्रयोग सेहो केलथि अपन कवितामे कतेको तरहक ज्यामितीय आकृतिमे कविता सब लिखने छथि। एकटा और बात हिनकर रचना सबमे हमरा लागल जकरा व्यक्त करै के लेल एकटा अंग्रेजी शब्दक सहारा लेब ‘bravity’ अर्थात संक्षिप्तता। ओ शब्दक खर्चक प्रति बड्ड साकांक्ष रहलथि जतबी शब्दक खगता ओतबी शब्द खर्च केलथि। हिनकर कविता–संग्रह सभ सबटा पातर –पातर भेटत, कविता सब छोट ओ माँझिल आकारक लेकिन मारुख लौंगिया मिरचाइ सन। कोनो कवितामेसँ जँ एकटा शब्द निकालि देल जाए तँ ओ सर्वथा अपूर्ण लागत तहिना हिनकर कविता–संग्रह सब कोनो कविता के यदि छाँटल तँ संग्रह झुझुआन बुझि पड़त। यदि हिनकर बात किछु शब्दमे संप्रेषित भऽ जाइ छै तँइ अनेरो ओकरा दीर्घ नै बनबै छथि। किछु बात ई हाइकूमे सेहो कहने छथि जकर मारक –क्षमता किन्नहु कम नै छै। उदाहरण :- ईहो बर्ख /ओहिना बीति गेल/ बुढ़ अथबल सूर्य /बस गैरेजक /पछुआरमे डुबि गेल एवं लाहौर बस /कारगिलमे ध'स /बिजेपी बस (बर्खान्त, लाख प्रश्न अनुत्तरित, 2003) अपूर्वा जे 1996 ईस्वीमे छपल कविता –संग्रह अछि ओइमे सबटा कविता सबमे रामलोचन ठाकुर जीक अलग रूप देखबामे अबैए। हमरा बुझने प्रत्येक मैथिली–मिथिलासँ प्रयोजन रखै व्यक्ति सबकेँ ई संग्रह पढ़बाक चाही यदि नै पढ़ि सकी तँ कमसँ कम शुरुआती पाँच टा कविता अवश्य पढैत। अहि कविता सभक पहिल विशेषता ई छै जे कविता सब तुकांत छै आ रामलोचन ठाकुरकेँ वामपंथी चश्मासँ देखनाहर लोक सब के लेल निराश करतनि। रामलोचन ठाकुरक विराट व्यक्तित्वक दर्शन होइत छै। ओ मैथिली–मिथिलाक निधि एवं हुनकर कृतित्व सबकेँ प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करैत भावुक करैत छथि संगे समकालीन ओ कनिष्ठ पीढ़ीक लेल प्रशंसाक शब्द रखैत छथि। किछु पंक्ति सभ नीचा देल गेल अछि :- धीरेश्वर धीरेन्द्र बनि धयल जनकपुर धाम। ठुमकि बहथु कमला भने ओ नहि घुरता गाम।। माया मायानंद के पाथर बनले मोम। गीजि गीत गीतल बनल भांगक लोटा होम।। पाथर जे पसिझैत अछि देखु कबिलपुर जाय। रामदेव कविएल छथि अजगुत कहल न जाए।। गुंजन नहिं गंगेश ओ आइ भोर के आश। नाम उचितवक्ता हिनक लोक सुनु नवभास।। बुद्धिनाथ मिश्रक सकल रचना अर्थ प्रधान। हिंदीमे तें गवै छथि सोहर आ समदाउन।। रामलोचन ठाकुर वर्तमान राजनीति –व्यवस्था ,राजनेताक स्वार्थसँ नीक जेना परिचित छथि,ओ अइ बातसँ एकदम व्यथित भऽ जाइत छथि जे राजनीति जे एक समयमे देशक गरीब –गुरबा, दलित-शोषितक उत्थानक लेल एकटा पुनीत कर्तव्य छल आब ओ महज लूट-खसोट ओ पूंजीपति –वर्गक संरक्षणक एकटा साधन बनि गेल अछि। व्यवस्था सड़ि गेल अछि :- दिल्ली आकुल अछि अगबे निर्यात लए गामक चिंता दुनु साँझ बुतात लए नेता लोकनिक नजरि विदेशी नोटपर सत्य देश चिंता सीमित अइ मंच धरि वास्तवमे सभ मरैछ अपन गतात ले (नेता ओ जनता, अपूर्वा, 1996) एतेक बर्ख बितलाक बादो राजनीतिक रंग-रूप नै बदलल अछि। स्थिति दिनो दिन खरापे भेल जा रहल छै, तँइ रामलोचन जीक बात एखनो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल। हमरो एकटा गाम छल ‘बरखामे बिलंब देखि /गमैया पुजाक सँगोर /जाट-जटिन खेलबामे व्यस्त/महिला समाज /तजियाकसँग /झरणीपर झूमैत किशोर ,तरुण दल /फगुआक अबीर / आ जुड़-शीतलक कादो-माटिकसँग /हमर गाम जीबैत छल .. हम ताकि रहल छी सएह गाम /अपन गाम ‘ उपरका कविताक विश्लेषणसँ लगैत अछि जे रामलोचन ठाकुर एक तरफ मिथिलाके समृद्ध देख’ चाहैत छथिन तखन जखन लोक बदलल गाम देख क ओ किएक ने हरखित छथि? जखन वैश्वीकरण/भूमंडलीकरण सब व्यवस्थामे परिवर्तन अनलकै तखन गाम कोना अपरिवर्तित रहि जेतै। मिथिलाक दुर्भाग्य जे लोक रोजी-रोटी ओ शिक्षा के लेल पलायन कऽ गेल। गाममे बूढ़ कि लाचार लोक भेटत गामक–गाम सुन्न। महल सब भम्म पड़ि रहल छै। गाम तँ ठीके हेरा गेल छै ,परंच बदलल गामकेँ सेहो स्वीकार करऽ पड़त। गाममे एखनो बड़ किछु बाँचल छै, गामकेँ मात्र पिकनिक स्पॉट के रूपमे नै देखबाक चाही, ओतुक्को लोकक जीवन स्तर बदललैए, सबके जीवन स्तर बढ़लैए नीक कपड़ा ओ नीक घर सबके छै। रामलोचन ठाकुर एकटा क्रांति-धर्मी कवि रहितो एकटा खास दृष्टिकोणसँ आगू नै बढि सकला। संघर्ष के बाद आयल सुख के वर्णन नै करैत छथि। ई बात सत्य जे हिनकर कविता सब ओइ समयक वर्णन करैत अछि जाहि समयमे ज्ञान-विज्ञान, धन ओ शक्ति किछु खास लोक तक सीमित रहै आब समय बदललैए आब ओ बात नै छै सब पढै-लिखै छै। जाति-संघर्ष नै रहि वर्ग-संघर्ष छै –‘बीसम शताब्दीक शेषक / सभ्य सुशिक्षित मनुक्ख /शब्द के बना लेने छी अस्त्र /अस्त्र विभाजनक /अस्त्र शोषणक /अस्त्र संहारक/ आइ शब्द स्नेह नहि /घृणाक करैत अछि सृष्टि-संसार------ शब्द आइयो अछि/ मुक्तिक हेतु कछमछाइत /आकुल-व्याकुल पेबाक लेल/ अपन हेरायल अर्थ/ तकैत अछि बाट/ कोनो वाल्मीकि,विद्यापति, कृतिवासक/ शब्द आइयो थिक ब्रह्म’ (शब्द –लाख प्रश्न अनुत्तरित 2003) अइ कवितामे दू तरहक परस्पर विरोधी बात छै, अपनहि कहल गप्पकेँ अपनहिसँ कटैत कवि रामलोचन ठाकुर बात के विराम दै छथिन एक ठाम शब्दकेँ शोषणक पर्याय बनेने छथि त दोसर ठाम शब्दकेँ ब्रह्म। वास्तवमे ओ अपन मोनक भावकेँ खोलि कऽ राखि दै छथिन ,’पॉलिटिकली करेक्ट’ हेबाक चेष्टा कखनहु नै करैत छथि किएक तँ हुनका पुरस्कार, मंच मालाक कोनो मनोरथ नै रखलथि। ओ कतियायल रहलाह कि राखल गेला से तँ नै बुझल अछि किएक तँ मैथिली साहित्यक हम बड नव विद्यार्थी ओ पाठक छी मुदा एतेक बात तँ कहि सकैत छी जे रामलोचन ठाकुर अपन विचार ओ क्रांतिधर्मिताक गुण किन्नहु नै छोड़ि सकलाह। उदासी, अनुचितक प्रतिवाद हुनकर स्थायी भाव बनि रहि गेलनि। रामलोचन ठाकुर वैश्विक राजनीतिक घटनाक प्रति सेहो साकांक्ष रहल छथि। ‘नेल्सन मंडेला’ नामक शीर्षक कवितामे ओइ विराट महामानव के लेल लिखने छथि जाहि समयमे ओ जहलमे छलथि –कोनो /रक्तबीजी बाजक /चांगुरसँ चोंचधरि किकियाइत /विगत छब्बीस बर्खसँ छटपटाइत /एकटा श्वेत कपोत - नेल्सन मंडेला। एतबे टा नहि ओ भारतक पड़ोसी देश अफगानिस्तानक बिगड़ैत परिस्थिति हुनकर कवि मोन के झकझोड़ि देने रहैन्ह जकर उल्लेख ओ ‘ओइ दिन उगल नै छल सूर्य’मे केने छथि –‘ ओ देखलक / चौबटियाक बिजुलीक खम्हा से झुलैत/ एगो लाश /क्षत- विक्षत, सोणिते- सोणितान /अपन पोती के कोरामे उठबैत /फिसफिसायल रहमत -/”नाजीब !संयुक्त राष्ट्रसँघक सुरक्षामे तोहर ई परिणति !/ मौलवाद, युद्धवाद तालीबान/ जे गति हिनकर भेलनि/ सैह गति तोरो लोकनिक हो।“ अंतमे एतनी कहि सकैत छी जे रामलोचन ठाकुरक मैथिली, मिथिला ओ मैथिलक प्रति स्नेह, समर्पण ओ कर्तव्ययबोध अविस्मरणीय छनि। आदरणीय ठाकुरजी एकटा क्रांतिधर्मी, आन्दोलनी ओ मिथिलाक सांस्कृतिक धरोहर के रक्षा केनिहार एवं निडर व्यक्ति रहलाह। जएह हुनकर जीवन सएह हुनकर रचना। जरूरी छै जे हिनकर साहित्यिक अवदानक और वृहत रूपमे चर्चा होय। हिनकर छपल कविता सभक संग्रहकेँ एकटा समग्र पोथी के आकार देल जाए किएक तँ हुनकर बहुत रास रचना सब यत्र-कुत्र पसरल छै। हुनकहि रचनासँ हम अइ आलेख के सम्पन्न कर’ चाहब जे हुनका जीवनपर एकदम सटीक छै :- कतौ रहब हम करब कुशलेक कामना खगता हो शोर करी तेजी भूल भावना हम ने बेर बीतल जे घूरि ने फेर ताकत (बाट अहाँक ताकत – अपूर्वा 1996) ------------- संदर्भ : 1.इतिहासहंता,रामलोचन ठाकुर, शिखा प्रकाशन, कलकत्ता, 1978 2. देशक नाम छलै सोन चिड़ैया,रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता , 1986 3. आजुक कविता,संपादक –रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता,1984 4. अपूर्वा,रामलोचन ठाकुर,मिथिला समाद, कलकत्ता,1996 5. लाख प्रश्न अनुत्तरित,रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता/ बाबुपाली ,2003 6. आँखि मुनने: आँखि खोलने, रामलोचन ठाकुर, अरुणोदय प्रकाशन, कलकत्ता/ बाबुपाली ,2005 7. Contemporary Marxist Literary Criticism, Fancis Mulhem, Routledge, London, 1992 8. http://videha.co.in/ भीमनाथ झा बचा दिअ भाइकेँ जड़ि तँ रामलोचनजी आ हमर एकै नर्सरीक गाछक अछि। मुदा हुनक थल्ला रोपा गेलनि कलकत्ता आ हमर रहि गेल गामेक कोनो छोट हत्तामे। माटि-पानिक भेद फलक स्वादमे जतबा अंतर आनि दैत छै से तँ छैके, ताहिसँ बेसी ई भेलै जे ओकर ताकुत केनिहार नीक भेटलै आ एम्हर ई एक हिसाबें अनेरुआ भऽ गेलै। रामलचोनजीकेँ साहित्यिक प्रशिक्षण नीक भेटलनि आ हमर सोच विशृखंल भऽ गेल। ओ ओतए गोड़ी रोपि लेलनि आ हम बौआइत रहलहुँ बेगूसराय, बखरी, कुशेश्वरस्थान, राँची, पटना, दरभंगामे। ने हम कलकत्ता बेसी गेल छी आ ने वएह इम्हर अधिक अबैत रहथि। कवि सम्मेलनोक मंचपर दूनू संग-संग कदाचिते अभरी। कारण वएह दूरी। कलकत्ताक साहित्यिक समारोहमे हम चारि-पाँच खेप गेल हएब। ओहो इम्हर तहिना आएल हेताह जतए हमहूँ पहुँचल होइ। तँइ भेंट-घाँट सेहो हिसाबेंसँ होइत रहए। पत्राचार एहिसँ कने बेसी। पत्रलिकक्खड़ हम छी नहि।, ईहो नै छथि। हँ पत्र उत्तर अवश्य देबाक इच्छा रखैत छी। से इच्छा हिनको रहैत छलनि। पछाति फोन एलापर ओ तँ बंदे जकाँ ई कने ताहिसँ बेसी चालू भऽ गेल छल- कनियें बेसी ई जखन 'मिथिला दर्शन'क संपादक (कार्यकारी) भऽ गेला आ हम हिनक लेखक, तखन बेसी काल फोनक घंटी हमरे बाजए। दर्शनोक अवसर, हिनक गाम अबरजातिक क्रममे, कने बेसी पाबए लगलहुँ।जतेक सुविधासँ ई अपन विचारक प्रतिकूलो व्यक्तिसँ आत्मीयता स्थापित कऽ लै छथि, से हिनक व्यक्तित्वकेँ उदाहर आ भास्वर बनबै छनि। साहित्यक प्रति हिनक की विचार छनि ई सर्वविदित अछि। जकरा परंपरावादी सोच कहल जाइछ, तकर विरुद्ध युद्ध केनिहार दलक एक टुकड़ीक नायक ईहो मानल जाइत छथि। स्वयं 'इतिहासहंता'क रूपमे अपनाकेँ ठाढ़ करै छथि। अपन रचना लक्ष्यक उद्घोष करै छथि ई- "सरिपहुँ उगिलत आगि कलम/ हो चिनगीये/ रखने अपना अन्तरक मध्य/ क्षमता अजस्र/करबाक सृष्टि दावानलकेँ/ जे जरा करत सुड्डाह/ मात्र कूड़े-कर्कट नै/ घास-पात/ बँसबिट्टी-बेल-बबूर-बर-पीपरक गाछ" आ सरिपहुँ हिनक लेखनी आगि उगिलललकनि, चिनगी उड़ि कऽ अग्रजक आंगपर पड़लै आ सट दऽ दागि देलकै- "मुदा / अहां नञि / अहां सन नञि / अहां /हमरा सोझा सं फराक भ जाउ/ हम नञि देख' 'चाहै छी/ अहांक मुंह/ नञि सुन' चाहै छी/ अहांक मुंहे कुनू इतिहास/ ई एक-एक घटना/ एक-एक नाम/ की ताइ सं कम महत्वपूर्ण अइ/ कत्ते नीक होइत/ जे आइ/ अहूं बनि गेल रहितौं/ कुनू एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास/ आ हमर छाती/ सूप सन भ गेल रहैत/ किन्तु अहां से नञि भेलौं/अहां से भइयो ने सकैत छी/ आ हम/ एखन नञि लिखि सकब/ करिया मोसि सं/ उजरा कागत पर/ कुनू कविता/ कथा/ इतिहास /अप्रयोजनीय/ अस्थायी / देखैत नञि छी / हमरा हाथमे / चमकैत पंचकमनियां भाला/ चलि पदल छी हम/ लाल टुह-टुह रक्त सं / पिरथीक विशाल वक्ष पर / लिखबा लेल एगो कविता / एगो कथा / एगो इतिहास" हिनक मनोनुकूल हिनक अपन समाज, अपन लोक, अपन संस्कृति, अपन साहित्य "एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास" नै बनि सकलनि तकर बड़ आक्रोश छनि हिनका, आ तें उताहुल छथि " स्वयं बनि जेबाक लेल एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास" आ तें हिनक हाथमे जे कलम देखै छियनि से असलमे थिकनि "चमकैत पंचकमनियां भाला"। हिनका के उत्तेजित करै छनि, आदर्श की छनि, तकरो खुलासा कऽ देने छथि- "फ्रांस रूस चीनक/ क्रान्तिक कथा/ वियतनाम लाओस कम्बोदिया/ चीली आ क्यूबाक/ संग्रामक कथा/ रूसो मार्क्स एन्जिल्स/ लेनिन स्टालिन माओ/ चू-ते होचिमिन्ह मारकुस/ नेरुदा सार्त्र चे-गुएवाराक नाम/ राजकमल सुकान्त गोर्की/ लू-सुन लुमुम्बाक मृत्यु सम्बाद/ हेमिंग्वेक आत्महत्या/ आर कते रास की...." मानल बात थिक, जकरा ई सभ उत्तेजित करतै ओ क्यो रहय, ओकरा धर्म-कर्म, नियम-निष्ठा, अपन परंपरा, अपन संस्कार-व्यवहार-लोकाचार बलाय लागऽ लगतै, ताहिसँ ओ मुक्त होबऽ चाहतै, अपन सहगामी-अनुगामीसँ एहने अपेक्षा रखतै, ओकरा सभकेँ ताहि लेल प्रेरितो करतै। अदौसँ चल अबैत सिलसिलाक खिधांस करतै, ओकर दोष गनौतै। तँ की से रामलोचन ठाकुर कयलनि? कहबा लेल जे कहि लेथु, मुदा हिनक पुष्कल रचना, एकाधिक पोथी एकर साक्षी अछि जे ई मिथिलाक लोकसंस्कृतिकेँ निकृष्ट नहि मानैत छथि अपितु अपन परंपरा हिनका उत्कृष्ट लगै छनि, आकृष्ट करै छनि। मैथिली काव्यक छंद, यति, लय, तुकपर ई हँसैत तँ नहिएँ छथि उनटे ओकरा स्वायत्त कयने छथि। जाहि कोटिक रचनाकेँ हिनक दलीय मित्र लोकनि परंपरावादी कहि तिरस्कार कहै छथिन, ताहू तूरक हिनक रचना थोड़ नहि छनि। हिनक एक पोथी अछि 'माटि-पानिक गीत'। ओहि महक किछु पाँति देखल जा सकैछ- "तीर पर अवस्थित पुनि यज्ञ तीर-तीर पावन एहि धरतीक तीर्थ गाम-गाम स्रष्ट जन पूजक आ पूजित हो सृष्टि माटिक शिव बना पुनि प्रतिष्ठाक प्राण महिमा गबैछ जकर उपनिषद् पुराण मिथिले मम मातृभूमि तिरहुत ललाम एक अन्य गीतक ई अंश सेहो द्रष्टव्य-- कुटिया पीसिया करैक माय नाम दुर्गादत्त बेटाक कहू कथा ई न के जनैत छी? एक चुरू पानि बरू डूबि मरू नीक थिक मिथिलाक नामपर कलंक की मढ़ैत छी एक अंश ईहो- जाहि माटिसं जन्मलि सीता सएह हमर ई धरती यज्ञवल्क्य गौतम कपिल के भूमि रहत नञि परती सुग्गा शास्त्रक गप्प करै छल तकरे गीत सुनाबै छी एतबे नहि, ताहिसँ आर आगाँ छथि ई। मिथिलामे प्रचलित जे रंग बिरंगक लोककथा अछि-सुच्चा मैथिलीक लोककथा, तकर ई विलक्षण संग्रह कयने छथि। ई सभ कथा जे लुप्त भेल जा रहल छल, शहरी संस्कृतिमे पालित नेना-भुटका लेल जे अनचिन्हार भऽ गेल छल, मुदा जहिमे मिथिला बजैत अछि, जाहिमे अपन पूर्वज बजैत छथि, जाहिमे अपना लोकनिक समाजिक सांसकृतिक आर्थिक आ मानवतावादी आस्था संचित अछि, तकर वर्तमान आ भविष्य लेल जोगा कऽ राखि देलनि अछि रामलोचन ठाकुर। वएह रामरोचन ठाकुर जे कहै छथि हुनक हाथमे कलम नहि "पंचकमनियां भाला" छनि। मुदा हमरा तँ बुझि पड़ै अछि, हुनक हाथमे कलम नहि, चंपा-चमेली, बेली-गेना, सिंगरहारक पंचसुगंधित माला छनि। ततबे नहि, वर्तमानन कालक लगभग समस्त प्रसिद्ध साहित्तिक व्यक्तित्वक परम्परित कुंडलिया छंदमे तथा सिद्ध-असिद्ध शतावधि लेखकक परम्परित दोहामे जे ई परिचय प्रस्तुत कयने छथि, सेहो हिनका मिथिलाक माटि-पानि आ परंपरासँ जोड़ै छनि। एकरा तँ हम कहब, हिनक हाथमे मैथिली कवि-पूजन लेल प्रस्तुत दही-धान-पान-मखान-मिठाइ पूरित चुमानक डाला छनि। रामलोचनजीक सोझाँ जखन हुनक एहि अंतर्विरोधकेँ रखै छलियनि, तखन ओ तेना मुस्किया उठथि जेना कहि रहल होथि- एत्ते सोझ नै छै बूझब। डूबऽ पड़ैत छै। हमहूँ मुस्किया दियनि-डूमू अहाँ। डूमल तँ छीहे। जनिके रूचय तनिके गीत गाउ।............................................. मुदा नहि भाइ, अहाँ डूमू नहि। फेरसँ उगि आउ। अहाँ भने नहि मानियनु, हमरापर तमसाउ भने, मुदा हम तँ भगवानकेँ गोड़ लागि कऽ कहिते रहबनि- बचा दिअ भाइकेँ। महाकांत ठाकुर माटि परहक लोक हमर पाली मोहन गाम, एहि अर्थमे उछितगर अछि जे पचीस टा जाति हीलि-मीलि कऽ रहि रहल छथि। गामक अपन इतिहास होइ छै। मुदा किछु सुकर्मी की किछु कुकर्मी ऐतिहासिक भऽ जाइत छथि। अइ गपकेँ कते सुंदर लोकोक्तिमे कहल गेल अछि- सुकर्महि नाम कि कुर्महि नाम। हमर पात्र काल्पनिक नहि छथि। कवि शेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुरक गाम हुनका नहि जनैछ। ज्योतिरीश्वर चौक पाली, नहि जनैछ लोक । पाली मोहन, सेहो नहि। लोक जनैए: मरनी चौक, बाबू पाली। जे डाक घर कि कोनो सरकारी कागतमे नहि अछि। अही चौकसँ पूब, चारिम-पा़ँचम घराड़ीपर सूरति ठाकुर रहथि। निसंतान। ई घरारी नहि रहै, एकटा खत्ताक कातमे किछु धूर खाली जमीन रहै। सझिया आँगनमे भरत ठाकुर, घरक ठाकुर, सरक ठाकुर आदि पहलवान, बहलमाध ठाकुर सभ संतानहीन सूरति ठाकुरकेँ आँगनसँ बैला देलकनि। ई कहि जे कोन ठीक पिता बनि जेबें,जगह बदलने। मिथिलामे बड़ सुंदर चलन रहै। हगना नाम रखबहि कि कोनो तेहने सन, पपिआहा नाम तँ नेना जल्दी नञि मरतौ। बेसी दिन जीतौ । सूरति ठाकुर जेना तेना रहक ब्योंत केलनि एतय। रमलोचनाक जनम एतहि भेल रहै, महा दीदी कहलक। बेचन के बेचना, फेकन के फे़कना दुलारक नाम मानल जाइ। सूरतिकेँ सुरता, जीबछकेँ जिबछा, युगेश्वरकेँ जुगबा आदि भेटैत अछि। हरि गाममे पाँचे-दस गोटे साक्षर, सभ टोलमे एक टा कऽ अखाड़ा जरूर रहय। बारह-बरना गाम। बाहर, माने गामसँ निकलक बाट बड़ विकट, थाल-पानि हेलू तँ निकलू। ओना कटही गाड़ी आबय जाय जोगर एकलिखा सड़क चारुदिश। थाना खजौली, जिला दरभंगा........। जमींदारक ड्योढीक गाम। मतलब बाभनक गाममे राड़-पँजियार । तें पाली मोहन आ ज्योतिश्वरकेँ हटा बाबू पाली बनाबक खेड़हा बराक....एतय राम लोचन ठाकुरकेँ लालन-पालन हेतनि/भेलनि। सूरति ठाकुर बिना कोनो हील-हुज्जतिकेँ सपत्नी रहय लगला एहि तिनकोनमा घरारीपर। न्याय प्रिय समाजमे। संतानहीनकेँ कते सम्मान। मुदा नहि, किछुए बरखक पछाति ओ पिताक गौरवशाली पदपर प्रतिष्ठित भेला। पूरा समाज हर्षित। पत्नी कोकण बालीक खुशीक ठेकान नै। कोकण वाली (नाम मने शारदा देवी रहनि) केर सुखक हृदय नीकसँ भरलो ने रहनि कि पति परमेश्वर माने सूरति ठाकुर स्वर्गवासी भऽ गेला। चारुकात कनफुसकी शुरू भेल। शिशु माने चिलका बपखौका भेलै। बपटुग्गर नेन्नाक प्रति लोकक भाव बूझल जा सकैछ। कोकण वाली कि दिआद-बाद अपनहि लल्ल। धन बीत आ विवेकसँ सेहो। तें जेना-तेना माय अपने आ नेनाक पेट भरि जीबि लेबाक दुस्साहस करैत रहली। बपटुग्गर बालक बटुक भेला। बगलक दिआद सुखदेव ठाकुरक पिता हल्ली ठाकुर ड्योढीक गुमास्ता रहथिन। ऊंचगर दलान आ परोपट्टाक मानल सम्मान संग किछु गोटेमे खिस्सा पिहानी बाँटथि। हुनका दलानपर दस-बीस गोटेक बैसार सदति रहिते छलनि। ओ कहिओ काल टोलक नेना सभकेँ भट्ठा पकड़ब सिखाबथि। कहय लय गाममे विद्यालय रहै पाँचवा धरि। मुदा मारिक डरे कम्मे बच्चा नाम लिखबैत छल। पढब-लिखब स्वान्त: सुखाय कर्म मानल जाइत रहै। माय-बाबू की समाजक कोनो आग्रह नञि पढ़य लेल। कारण पढ़क उपयोगिता बुझले ने ककरो। खनदानी कारबारमे संग पूरब नेन्नहिसँ शुरू होइ। कुम्हारक बेटा बासन गढ़यमे निपुण होबक प्रयास करैत छल तँ बनियाक नेन्ना व्यापारमे। ई दुनु पड़ोसी एहि बालकक। हल्ली ठाकुरक दलान टापर रंग-बिरंगक गपास्टक होइत छल । एहन परिवेशमे पढ़य-लिखक प्रेरणा भेटक कारण कारण अज्ञाते। तथापि हमर बटुक शिक्षा आरंभ केलनि आ मारि नहि लागय, ताहि डरे, मोन खराब की बिकालो समयमे छुट्टी नहि करथि । लोक जीवित कोना रहता, पेट भरक कोन उपाय करय पड़त, तकर चिंता बेसी। उपजाबारी कम होइ । तीन-तीन बरख रौदी, महामारी, चेचक, हैजा, टीबी सन महामारीक प्रकोप। तँ ई मसोमातक बेटा पढतै। कथी करतै पढ़ि कऽ । इह........ मलखान की बबुआनक ढेकरबसँ भुक्तभोगिए टा नहि पूरा समाज डेराइत छल। बौना। भोजनमे की सभ छलैए? बात दाइल अल्लुक सन्ना। ऐ नारायणपुर बाली। कनी सुनू। ई मसोमातक बालक भात दाइलपर अल्लुक सन्ना भोजन केलक अछि। भगवान सबहक ने छथीन। अहीं टा नहि ने छी.....माटि परहक लोक लेल खाय-पीबय लय रहै भरुआ, अल्हुआ, खेसारी, इशारा, पोखरीक पाइन । तखन एक टा अनमोल वस्तु रहै, सभक हृदयमे प्रेम ठोरपर मुस्की, चून-तमाकूक स्नेह। माटिक मनुख सभ लग। तदपि कनैत नहि छल एना लोक। सागोभात अनूप ।मसोमात अपना बेटाकेँ महीसक चरवाह की घसबाह बनएसँ बचा कऽ रखलनि । खिस्सा-पिहानी, लिखना आ काज उदेममे निपुण कोकण वालीक पुत्र मैट्रिक पास केलकनि । (मैट्रिक धरिक खिस्सा एहि संस्मरणमे अछि आ तकर बाद संभवतः रामलोचन ठाकुर कलकत्ता चलि एलाह आ ओकर बादक क्रमबद्ध लेखन तँ नै भेल अछि मुदा अतेक तँ जरूर छै जाहिसँ रामलोचनजीक कलकत्ताक कालखंडकेँ नीक जकाँ देखल जा सकैए। एहिमे आएल नाम सभ ओहिना राखल गेल अछि-संपादक) अरविन्द ठाकुर अपूर्णता जखनि नियति हुअए [सन्दर्भ:रामलोचन ठाकुरक काव्य-रचनाक मूल्यांकनक अपूर्ण प्रयास] अहा कलकत्ता! कलकत्ता! कोलकाता! पश्चिम बंगालक राजधानी! तिरहुत जनपदक बेरोजगार सभक लेल मोरंगक बाद आ दिल्ली-पंजाब सं पहिनेक दालि-रोटीक ठिकाना। जेकर नाम सं बहुत दिन तक कोनो रेलवे स्टेशन नहि रहए आ जेकर काम हाबडा आ सियालदह सं चलैत रहए। जेतय हाल-हाल तक हाथ रिक्शा चलैत रहए,प्रतिबंधित भेलाक बादहु चलए छै आ जेकरा चलाबैक लेल पशुक नहि,मनुष्यक उपयोग(?) होइत रहए,होइ छै । जेकर भुइयां दिआ कहल जाइ छै जे ई भीतर सं फोंक छै। एहन अमानवीय नगर,जेतय लोकक भीड़क बीच सड़कक पटरी पर कोय मरि जाइ,तखनिअहु रफ़्तारक बबन्डर मे उड़िआइत लोकसभ पर कोनो असर नहि,ओकरा भीतर कोनो उत्सुकता,कोनो संवेदना,कोनोटा भावना नहि जागए। जेकर स्थापना 1690 मे मुट्ठी-भरि फिरंगी तिजारतीसभ कएने रहए,जे1772 मे अंग्रेजसभ द्वारा ‘भारत दैट इज इंडिया’क राजधानी बनाएल गेल रहए आ 15 अगस्त,1947 कें अंतिम अंग्रेज गवर्नर जनरलक विदा भए जएबा तक जे नगर/शहर भूमंडल पर राज करैक अंग्रेजी सपनाक प्रतीक रहए। जे नगर हिंसा आ अराजकताक घर छै आ जेतहुका नागरिकगण आइयो एहि मिथकक भरोस करैत अछि जे साम्यवाद ओकर संरक्षण करत आ सभटा विघ्न-बाधा सं पार लगाए देत। जाहि नगर पर डोमिनीक लापिएर ‘द सिटी आफ जोय’ नाम सं उपन्यास लिखि एकर घिनाएल बस्तीसभ कें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कलंकित कए साहित्यिक व्यावसायक कीर्तिमान बनएलनि आ ईसाइ धर्मक कृपालुता कें महिमामंडित कएलनि। से,एहि कलकत्ता मे मधुबनीक बाबूपाली गाम सं आबि अपन जीवनक चारि दशक सं बेसीक अवधि बितैनिहार कवि छथि – रामलोचन ठाकुर। आ से सामान्य कवि नहि,घोषित रुप सं दुर्घर्ष (किताब पर ‘दुर्घर्ष’ लिखल देखाइत अछि,शुद्ध प्राय: ‘दुर्द्धर्ष’ हेतए) अग्निहस्ताक्षर छथि आ कविता नहि करए छथि,अग्निलेखन करए छथि।इतिहास कें पछाड़ैत,मिथिहास कें धकियाबैत मिथकक घटाटोप मे धावा मारए छथि आ शाब्दिक ताप एहन जे अपन पहिल काव्य-संग्रहक नामकरण “इतिहासहंता” करए छथि। इतिहासहंता बनाम मिथकजीवी रामलोचन ठाकुर स्वयं कें ‘तामसक कवि’क रूप मे प्रस्तुत करबाक आग्रही छथि आ एहि विशेषण कें प्रमाणित करबाक क्रम मे अपन कविता मे आगि भरैक पुरजोर प्रयास त करितहि छथि,एहि बातक पैरोकारी करबाक लेल अपन अधिवक्ता सेहो नियुक्त कएने छथि।एहि प्रयासक क्रम मे हुनक बहुर रास कवितासभ कृत्रिम,सूत्रबद्ध किंवा ‘लाउड’ भए गेल अछि। किन्तु हुनक कवितासभक रचनाकाल कें देखैत एहि बातक प्रशंसा आ स्वागत कएल जएबाक चाही।मैथिलीक मसुआएल,मिझाएल परम्परावादी कविता-साहित्यक जे पथार ओहि काल-विशेष तक प्रकाश मे आएल छल,तेकर परिपेक्ष्य मे ई तेवर एकदम अभिनव आ क्रांतिकारी बुझाइत अछि। ‘इतिहासहंता’ काव्य-संग्रहक प्राकट्य-काल अछि उन्नैसम इस्वीक सातम दशक आ एहि मे 1972 सं 1977क बीच लिखल ‘मैथिली’ सं ‘जेठुआ मेघ’ तक एक सोरय(16 टा) कविता कुल 37 पृष्ठ मे समेटल अछि।प्रथम कविता ‘मैथिलि’ मे कविक शब्दसभ फुफकार छोड़ैत अछि।तामस उर्ध्वगामी भेल अछि – ‘मैथिली कें वन सं नहि/नैहरे सं बलजोरी घिसिअबैत ल गेल छल राक्षसराज’ वा ‘विदेह बाप पहिनहि देह त्यागि चुकल छथिन’ वा ‘राम छथिन नपुंसक’ वा ‘हुनके जनमल लव-कुश की वीर पुरुष हेथिन’ वा ‘दशरथक बरखी मे मैथिलीक आपसीक सिपारिसक भीख मांगैत तीनू बापते’ – पराकाष्ठा दिस जाइत।किन्तु तामसक ई पराकाष्ठा,ई उर्ध्वगामिता अपन वेध-आकांक्षा लेल की कोनो लक्ष्य सेहो निर्धारित कएने अछि?से निर्धारित अछि त देखाइ किऐ नहि पड़ैत अछि?आक्रोश कवि-कविताक आन्तरिक शक्ति होइ छै,किन्तु तखनि,जखनि ई सही मिकरात मे हुअए,संतुलित हुअए।संतुलन आ मिकरातक(मात्राक) एक रत्ती फ़र्क एहि आक्रोषक अभिव्यक्ति कें गारि मे बदलि दैत अछि,अभिजात्यक भाषा मे जेकरा शाब्दिक हिंसा कहल जाइ छै।तामसक स्वर ‘विध्वंस मात्र’ मे सेहो छै,किन्तु हाहाकारी शीर्षकक बादहु एहि कविता मे ‘नवनिर्माणक मार्ग प्रशस्त’ हेबाक कामना सेहो छै।बढियां! संग्रहक प्राय: प्रत्येक कविता कोनो ने कोनो सन्दर्भ सं जुड़ल बुझाइ छै,किन्तु जेंकि ई सन्दर्भसभ व्यष्टि-अंश अछि,समष्टि-अंश नहि,तें पाठक लेल सन्दर्भक अज्ञान कविता कें बुझबा मे बाधक होइत अछि।प्राय: इएह कारण सं ‘नाटक,निर्देशक आ एक गोट कविता’ किए ने किए हमरा जीवकांतक ‘धार नहि होइछ मुक्त’ संग्रहक स्मृति दिआए देलक,जे छपल त रहए सामान्य रुप मे,किन्तु पुरस्कारक प्रत्याशा मे ओकरा हार्ड बाउन्ड आ नवका कभर सं सुसज्जित कएल गेल रहए।‘सर्वहारा टी स्टाल’ मे पहिल बेर किछु कलकतिया दृश्यसभ आएल छै,किन्तु ओ कविताक भाव-मूल मे नहि छै।एहि कविताक अंत कविक स्वगत प्रश्न सं होइत अछि – ‘त कि/हमरो लेल कविता लिखब/कुनू फैशन थिक वा आदति’।कविक अग्निलेखन एहन अतस्तितह मे किए पड़ि जाइत अछि?सर्वहाराक कविता बनैत-बनैत एकर परिणति आत्मरोदन मे किए होइ छै?एहने अतस्तितहक पुनरावृति ‘अन्तरक ज्वाला हमर’ मे देखाइ पड़ैत अछि जखनि कविताक प्रारम्भ मे कवि कहए छथि – ‘जनै छी हम/शब्द मे नहि छैक ओ सामर्थ्य/क सकै जे सही व्याख्या भावना कें आइ/तद्यपि बन्धु!’।ई कविता बाद मे जाए कए सम्हरए छै,किन्तु हारल मन सं की कोनो जीतक आशा कएल जाए सकैछ?प्रथमे ग्रासे मक्षिका पात:।जखनि शुरुए मे शब्द कें सामर्थ्यहीन सकारि लेल गेल,तखनि बिगुल फूकए सं पहिने ‘तद्यपि’ त लगाबहि पड़त आ ई ‘तद्यपि’ तमाम हरबै-हथियार कें भोथ कएअहि देत,ताहि मे कोनो संशय नहि। ‘अग्रजक नाम/प्रजातंत्र’ वंशवादी राजनीतिक विरुद्ध अछि।एहि मे वंशवादक विरुद्ध कविक प्रतिवाद बहुत मुखर अछि।किन्तु जेंकि कवि मात्र अपन कविता मे नहि,अपन अस्तित्वक आन-आन उपस्थिति सेहो राखैत अछि – अपन वाचिकता मे,अपन गतिविधि मे;तें कवि सं ई अपेक्षा स्वाभाविक जे ओकर लिखित रचना आ ओकर दैनन्दिनी अभ्यास मे एकरुपता रहए,विरोधाभास नहि हुअए।भारतीय साहित्यक लेखकसभक हमरा सभ लग जे मूल्यवान विरासत अछि,ओहि मे शब्द आ कर्म एकहि सिक्काक दू पहलू मानल गेल अछि।साहित्यक लोक(पाठक समाज) अधिकांशत: भारतीय लोकमतक प्रतिनिधित्व करैत अछि आ ओ लेखक आ ओकर रचना मे फर्क कए कए नहि देखैत अछि।एहन स्थिति मे ई बात बहुत अनसोहांत बुझाइ छै जे वंशवाद पर एहन तीव्र प्रहार करनिहार कवि कें वंशवादी मिथिला राजक पुनरावृतिक लिलसा किए छनि?एहि राजपरम्परा मे मात्र सीताक बाप जनक नहि,कराल जनक सन अत्याचारी-व्यभिचारी राजा सेहो भेल अछि।एहि कविता मे एक ठाम कवि कहए छथि—‘ओना/यज्ञ आइयो होइ छै/छोट सं ल अश्वमेध पर्यन्त/मुदा पुरोहितक बदला/होइत छै प्राइवेट सेक्रेटरी’।उपरका प्रश्नक उत्तर की एहि पंक्तिसभ मे उपस्थित छै?ई क्षोभ पुरोहितसभक भाग(हिस्सा) छिनैबाक आधुनिक युगक उपक्रम सं उपजल त नहि छै?एहि कविता कें ‘कवि सोमदेवक लेल’ समर्पित करबाक प्रत्यक्षत: कोनो तारतम्य नहि बुझाइत अछि।सोमदेवक संग मैथिलीक प्रजातंत्रकालीन वंशवादी तत्व द्वारा कएल गेल अनदेखी वा तिरस्कार वा अन्यायक आकलनक समय आइ छै,तहिया नहि रहए जहिया ई कविता लिखल गेल रहए।‘अग्रजक नाम/केहन लागत अहां कें’ मे जेहन वीभत्स चित्रण अछि,से केकरहु रोइयां भुलकाए दए सकैत अछि। अवसरवादी-पराश्रयी लोकनिक एकटा विशेष सुविधालोलूप वर्ग होइत अछि,जे अवसर ताड़ैत रहैत अछि,अवसर पाबितहि अमरबेलक लत्ती जकां कोनो शक्तिशाली अस्तित्व पर पसरि/लतरि ओहि अस्तित्वक रक्त सं अपन पोषण-संवर्द्धन करए लागैत अछि।एहन वर्ग पहिनहु रहए,आइयो छै आ भविष्यहु मे रहतए।एहन सर्वज्ञात यथार्थ कें नव कलेवर मे चित्रित कए किछु प्रश्न ठाढ कए देब—कविक की एतबे टा काज छै?एहन परजीवी तत्वक ठोस आ स्पष्ट पहचान करए मे कविता किए चुकि रहल छै?एतय लेखनक अग्नि मसुआएल किए छै? उनटे ई एहि कथन कें प्रमाणित कए रहल छै जे ‘कविता मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया अइ’।‘अग्रजक नाम’ शीर्षकबला तेसर कविता ‘हम बिसरि गेल छी’ उपशीर्षक सं ‘कवि जीवकांतक लेल’ अछि।(अकस्मात मन पड़ल जे फेसबुक,ट्विटर आदि सोशल साइटसभ पर जेकरा कम मित्र व फालोवर रहए छै,ओ बेसी मित्र वा फालोवरबला कोनो व्यक्ति कें टैग करैत अछि,जाहि सं ओकर बात बेसी लोग तक पहुंचए) साहित्यक विभिन्न विधाक अतिरिक्त जीवकांतक धुरझारिता पत्र-लेखन मे सेहो रहल अछि।तें पत्र-लेखन सं सन्दर्भित कविता कें हुनक नाम सं जोड़ब प्रथमदृष्टया उचितहि बुझाइत अछि।ई अलग बात जे जीवकांतक लेखन(पत्र सहित) के केन्द्र मे और जे किछु हुअए,सिंगरहार,हीना,रजनीगंधा,कमल आ ओढूलक फ़ूल वा खजन चिड़ैया सं महमह-चहचह करैत वातावरणबला नास्टेल्जिया नहि रहनि।एहिसभ प्रतीकक माध्यम सं कवि जं कोनो आन बात(आपकता,रसगर गपबाजी,ग्रामीण सौन्दर्य आदि-इत्यादि) कहए चाहए छथि त बात अलग।‘एहि जम्बूद्वीपक भारत खण्ड मे’ प्राचीन प्रतीकसभक माध्यम सं स्वतंत्रता आन्दोलन, स्वतंत्रता प्राप्ति,केन्द्रीय सत्ता-प्रतिष्ठानक निरन्तर सबल आ आमलोकक निबल होइत जाएब,लोकतंत्री संसद आ चुनावी प्रक्रिया पर प्रहार कएल गेल अछि।कविताक नकार-भाव त पचैत अछि,किन्तु एकर नैराश्य-भाव व्यथित-चिन्तित करैत अछि।स्वतंत्रता भेटब अपना-आप मे अनमोल वस्तु छै।स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद सभ बेजायहि-बेजाय भेलए की?आ जं छुच्छे बेजायहि-बेजाय भेलए त की भविष्यक बेहतरीक कोनो छोट-क्षीण किरणहु बांचल नहि छै? जं ‘अहिना बितल जाइछ/दिन पर दिन/मास पर मास/बर्ख पर बर्ख’,त की ई मनि ली जे ई जम्बूद्वीप भारत खण्डक भुइयां वीर-विहीन भए गेलए? जं एना छै त दुर्द्धर्ष अग्निहस्ताक्षर लोकनि,हुनक सखा-समुदाय कोन बील मे नुकाएल छथि?जे शंखनाद ‘समानधर्माक नाम’ मे कएल गेल अछि;कर्ण,एकलव्य, शंबूक,शिव आदि मिथकीय पात्रक माध्यम सं इतिहास-पुराणक होलिका-दाह करबाक,रामराज्य पर थुकबाक, पांडुक नपुंसकताक संग-संग ओकर जन्मक कथा,परीक्षितक दुराचारिता,रामक स्वेच्छाचारिता, आचार्यक कुकर्मक पर्दाफाश करबाक आह्वान कएल गेल अछि,वर्ग-संघर्ष आ संगठित शक्तिक चर्चा कएल गेल अछि,से ‘एहि जम्बूद्वीप….’ मे नदारद किए अछि?ई कविक द्वैध,कविक वैचारिक द्वैध त नहि अछि?अपन समकालीन परिदृश्यक अत्याचार-अनाचार पर नैराश्य-भाव सं गबदी मारि थस लए लेब आ बितलाहा कोनो मिथकीय युग पर फांड़ा बान्हि कए चढि दौड़ब दुर्द्धर्षक श्रेणीक विशेषता भए सकैत अछि की?आ की ई सम्मुख-संघर्ष सं सुविधाजनक दूरी बनाए कए स्वयं कें सुरक्षित राखबाक मनोवृतिक परिचायक अछि?द्वैध एतबे नहि छै।काव्य जीवन मे ‘मिथिलाक पाहुन’क रामराज्य पर थुकबाक आह्वान आ व्यक्तिगत जीवन मे पाहुनक ससुरारिबला राजक मांग करब—द्वैधक पराकाष्ठा छै आ एहन भयंकर विरोधाभास कविक व्यक्तित्वद्वयक खण्डित छवि बनबैत अछि।‘ओना होइत त इएह आएल अछि’ वाक्य-खण्ड कें बेर-बेर दोहराएब आ अन्त मे बिगुल बजाए देब—ताहि सं अमृत-पानक समय आबि जेतए,ई आन त आन,कविक कोनो समानधर्मा-समानकर्मा कें सेहो एहन विश्वास हेतए—ताहि मे सन्देह।किन्तु कवि सेहो जिदियाह छथि आ एहि दुनू कविताक सभटा कोर-कसर ‘अग्रजक नाम/इतिहासहंता’ मे निकालबाक प्रयास करए छथि।‘इतिहासहंता’ कविता मे लाल भोर सं जुड़ल प्राय: प्रत्येक वाम शब्दावलीक प्रयोग भेल अछि।एहि मे फ्रांस-रूस-चीनक क्रान्तिक कथा,वियतनाम-लाओस- कम्बोडिया-चीली-क्यूबाक संग्राम कथा,रूसो-मार्क्स-एन्जिल्स-लेनिन-स्टालिन-माओ-चू ते-होचिमिन्ह-मारकुस-नेरुदा-सार्त्र-कैस्त्रो-चेगुएवारा आदिक नाम,राजकमल-सुकान्त-गोर्की-लू सून-लुमुम्बाक मृत्यु सम्वाद आदि-आदिक चर्चा भेल अछि।कविताक अंत ‘देखैत नहि छी/हमरा हाथ मे/चमकैत पंचकमियां भाला/चलि पड़ल छी हम/लाल टुहटुह रक्त सं/पिरथीक विशाल वक्ष पर/लिखबा लेल एगो कविता/एगो कथा/एगो इतिहास/आ स्वयं बनि जेबा लेल/एगो घटना/एगो नाम/एगो इतिहास।‘ सं होइत अछि।विलक्षण विरोधाभास! लाख मगजमारीक बादहु एहि अंत कें ‘वक्रोक्ति’ किंवा ‘व्याज स्तुति’क रूप मानए मे भीषण सं भीषण साहित्याचार्य-संहिताचार्य कें संकोच हेतनि।‘इतिहासहंता’ द्वारा ‘इतिहासजीवी’ होएबाक कामना कल्पनातीत अछि,अविश्वसनीय अछि। ‘अनुजक नाम/काज अहींक थिक’, ’व्यवस्थाक नाम/चेतौनी’ आ ‘जेठुआ मेघ’ छोट-छोट आ नीक कविता अछि। ‘कंकावतीक कैबरे’ मे ने कविता अछि,ने व्यंग्य,स्तरहीन टिप्पणी अछि। ‘सांझ हमरा आंगन मे’ कविता कोनो भांज सं अग्निलेखनक चौहद्दी मे नहि अंटैत अछि,किन्तु हम अधिकारपूर्वक एहि कविता कें संग्रहक सर्वश्रेष्ट रचना मानए छी,घोषित करए छी। अग्निक पोस्टर आ मार्क्सवादक प्रहसन समालोचनाक लेल कुछ सर्वस्वीकृत मान्यतासभ अछि। समालोचना दुराग्रह सं रहित,भावुकता सं बचल आ दलबन्दी सं उपर उठल हएबाक चाही।आचार्यलोकनि एक स्वर सं एहि काज लेल ‘सहृदय हृदय’ कें प्रामाण्य मानलनि।ई ‘सहृदय हृदय’ की छिए?अभिनवगुप्तक मत सं जिनकर मन-रूपी मुकुर—मनोमुकुर,जे काव्यशीलनक अभ्यास सं स्वच्छ भए गेल अछि—मे वर्णनीय विषय मे तन्मय भए जएबाक योग्यता अछि,वएह हृदय-संवादक भाजन रसिकजन सहृदय कहाए सकए छथि। ई संग्रह (इतिहासहंता) अपन अवलोकन-मनन लेल पाठक कें ई छूट नहि दैत अछि जे ओ अपन हिसाबें एहि मे डुबकी मारए,काव्य-सागर मे हेलबाक आनन्द लिअए,मन हुअए त एकाध घोंट पीबिअहु लिअए आ एकर पानिक तासीरक अपन ढंग सं आकलन करए।पाठकक एहि लोकतंत्री अधिकारक स्वतंत्र उपयोग मे एहि पोथीक ब्लर्ब पर अंकित टिप्पणी कोनो रिंगमास्टर जकां बाधकहि टा नहि होइ छै,ओ कोड़ा फटकारैत ई निर्देश(आदेश) सेहो दए छै जे एकरा कोड़ाक लहरानक अनुपातहि मे पढल आ अर्थग्रहण कएल जाय।ठीक ओहिना,जेना वैदिक मंत्र कें बुझबाक,अर्थ-ग्रहण करबाक लेल उदात्त,अनुदात्त आ त्वरितक संकेत अंगुरीक माध्यम सं कएल जाइत छै।एना मे पाठकक संकट अपारताक पार चलि जाइ छै।पहिने त ओकरा खुलल आंखि सं देखबा पर प्रतिबन्ध लागलए,फेर ओकरा एकटा विशिष्ट उपकरणक माध्यम सं,विशिष्ट कोण सं,विशिष्ट स्थिति मे देखबा लेल बाध्य कएल गेलए। परिणाम ई जे पाठक मूल-वस्तुक मौलिकता सं छत्तीस लग्गा दूर भए गेलए आ ओकर दृष्टि(विजन) कें केलिडोस्कोपिक भ्रम गछारि लेलकए।(बहुत संभव जे हमहुं एहि पर लिखैत काल एकर मौलिक तत्व सं कतेको लग्गा हटि भ्रमित भए गेल होइ आ हमर ‘सहृदय हृदय’ कतहु लंक लए लेने होइ।) ब्लर्बक टिप्पणी मे एक ठाम लिखल अछि – “हिनक(कविक) चिन्तन धाराक आधार अइ मार्क्सवाद,फलत: ‘वर्ग-संघर्ष’ आ तइ पर आधारित क्रान्ति,हिनकर रचनाक मूल होइए।“ टिप्पणीकार जाहि विचार/चिन्तन धाराजनित रचनाक गप टीपए छथि,ओकर एकटा सुदीर्घ इतिहास रहल अछि,जेकरा मार्क्सवादी चिन्तक ‘विश्व कविता’ कहए छथि।एहि सं इतर कविता मार्क्सवादी दृष्टि मे ‘बूर्ज्वा कविता’ अछि।मार्क्सवाद आ मार्क्सवादी कविता दुनूक उद्घाटक स्वयं मार्क्स कें मानि सकए छी। मार्क्स,एंजेल्स आ लेनिन कें प्राय: राजनीतिक चिन्तन आ सक्रियताक लेल जानल जाइ छनि,किन्तु ओसभ अपन सामाजिक-राजनीतिक चिन्ता कें यदा-कदा कविताक माध्यम सं सेहो व्यक्त कएने छथि। मार्क्स लेल कवि-कर्म साभिप्राय रहनि।एक दिस ओ अपन पत्नी जेनी कें सम्बोधित प्रेम कविता आ दोसर दिस चिकित्सा,आचार संहिता आ गणित सन शुष्क विषयसभ कें लए कए कविता लिखलनि। मार्क्स एकटा कविता मे कहए छथि –‘नष्ट कए देब ई संसार सदैवक लेल/किए त रचि नहि सकए छी नव संसार हम’। एंजेल्स लिखए छथि-‘प्राय: तिरोहित भए चुकल अछि दीप्ति पश्चिमक/धीरज राखह?/आबैत अछि नव श्रम-मुक्ति-दिवस/आरोहित हएत सूर्य फेर सदालोकित सिंहासन पर/और ई चिन्तासभ रातिक/अस्त भए जाएत’।लेनिन अपन एकमात्र कविता ‘संघर्ष’,जे ओ बाल्टीक नदीक कछेर पर स्थित एकटा गाम मे गुप्तवासक अवधि मे लिखने छला,मे लिखए छथि- ‘बढल चलह भूखल लोकनि/बढल चलह/बढल चलह सताएल लोकसभ/आगू बढह अपमानित जन/मुक्ति-जीवन दिस/गरदनि पर राखने जुआ उच्चवर्गसभक/चलह लड़ाई मे सर्वहारा’। माउत्सेतुंग चीनी क्रान्तिक पहिने सं कविता लिखब शुरू कएने रहथि। हुनकर अनेक कविता नमहर अभियानसभक बीचक अछि।हुनक काव्य यात्रा 1925 सं 1965 तक जारी रहल।दुनियांक मजदूर-समुदाय कें एकजुट करबाक लेल जाहि अन्तर्राष्ट्रीय गीतक रचना विश्व सर्वहाराक इतिहास मे एकटा क्रांतिकारी भुमिका निभएलक,ओकर श्रेय पेरिस मे जनमल एजेन पोतिए कें जाइत अछि।‘इन्टरनेशनल’ शीर्षक सं प्रसिद्ध ई गीत 1871क मई मासक खूनी पराजयक बाद रचल गेल छल।वियतनामक होचीमिन्ह क्रांतिकारी योद्धाक संग-संग एक संवेदनशील कवि सेहो छला।हुनक कवितासभ हुनक पोथी ‘जेल डायरी’ मे संग्रहित अछि। ओ अपन ‘हजार कविक कविता संग्रह कें पढला पर’ शीर्षक कविता मे जनताक पक्षधर कविलोकनिक रचना-दायित्वक निर्धारण एहि पंक्ति मे कएने छथि – ‘रचबाक चाही गीत हमरासभ कें फौलाद ढालल/आ जानबाक चाही कविसभ कें हमला करबाक पैंतरासभ’। चीनक लू शून आ रूसक मायकोवस्की कें सेहो एहि क्रांतिकारी परम्पराक मानल जाइत अछि। तुर्कीक नाजिम हिकमत,चिलीक पाब्लो नेरुदा,जर्मनीक बर्तोल्द ब्रेख्त आदिक अतिरिक्त क्युबाक रेजिन आ निकोलस गिल्यिन,ग्वाटेमालाक ओतोरेने कास्तील्यो,स्पेनिश कवि डेविड फ़ेर्नादेस,बल्गेरियाइ कवि निकोला वाप्सारोव,इंग्लैंडक लुई मैकनीस आ चिलीक विन्सेन्त युरोवारो आ पैब्लोद रोस्य आदि अनेक नाम एहि परम्परा मे गिनाएल जाए सकैत अछि। अर्जेन्टिना मे जनमल चे ग्वेवेराक नाम आइयो क्रांतिक पर्याय मानल जाइत अछि।चिकित्सा विज्ञानक शिक्षा पूर्ण कए चे दक्षिणी अमेरिकाक यात्रा कएलनि। ग्वाटेमालाक सरकारक तख्तापलटक बाद ओ सीधा मैक्सिको पहुंचला,ओतय कैस्त्रो सं भेंट भेलाक बाद क्यूबा पहुंचि ओतहुका संघर्ष मे सम्मिलित भेला आ क्यूबाक नागरिक बनि गेला।बहुत गोटे कें ई अविश्वसनीय लागतनि जे चे ग्वेवेरा कवि-कर्म सेहो करैत छला। ‘कैस्त्रोक लेल’ शीर्षक कविता मे हुनक कुछ पंक्ति छनि—‘पहिल गोली दगितहि/संपुर्ण वन जागतए विस्मय सं आ/ओतय ओहि क्षण एकटा शांत टुकड़ी/प्रकट हेतए, अहांक बाहु सं’ आ ‘आ जखनि बर्बर पशु चाटि रहल हएत/अपन घायल भुजा/चोट कएलक अछि जाहि पर क्यूबाई बर्छा/हएब हमसभ अहांक बाहु सं सटल/गर्वोन्नत छाती तानने’। दक्षिण अफ्रीकाक श्वेत(बोथा) सरकार सं मुक्ति-युद्ध मे शहीद भेल सोलोमन महलांगू आ बेंजामिन मोलाइस सन देशभक्त आ क्रांतिकारी कवि इएह परम्पराक रहथि। विदेशक एहि तीव्र परिक्रमाक बाद अपन देश घुरिकए देखी त एतहु मार्क्सवादी-वामपंथी कविता आ कविक उपस्थिति भेटत। एहन कविसभ मे तेलुगुक सुब्बाराव पाणिग्रही आ चेराबंड राजूक संग-संग एम टी खान , निखिलेश्वर आ वरवरा राव; पंजाबक अवतार सिंह पाश,अमरजीत चन्दन,सुरजीत मोहनजीत,लाल सिंह दिल आदिक नाम लेल जाइत अछि। एहि आलेखक आलोच्य कवि जाहि बंगालक राजधानी मे चारि-पांच दशक गुजारलनि,ओहि बंगाल मे सेहो एहि क्रांतिकारी कविताक नमहर परम्परा रहल अछि। विद्वद्जन एकरा नजरुल इस्लाम सं शुरू मानए छथि आ एहि कड़ी मे नवारुण भट्टाचार्य,सुकान्त भट्टाचार्य (जे ‘पारपत्र’ मे संकलित अपन रचनाक माध्यम सं जन-जागरणक शंखनाद कएने छथि आ जिनकर नामक चर्चा आलोच्य संग्रहक कविता ‘इतिहासहंता’ मे भेल अछि।),सरोजदत्त,द्रोणाचार्य आदिक नाम सम्मिलित करए छथि। एतय मार्क्स सं लए कए द्रोणाचार्य तक के चर्चा एहि उद्देश्य सं कएल गेल अछि जे हिनका सभक क्रांतिकारी लेखनक योगदानक परिपेक्ष्य मे अग्निलेखनक,जेकर चिन्तनधाराक मूल मार्क्सवाद घोषित कएल गेल अछि,सही-सही वजन कएल जाए सकए; दुर्द्धर्ष अग्निहस्ताक्षर,अग्निलेखन आ ओकर पहिल दस्तावेजक उदात्त ,अनुदात्त, त्वरित कें सार्थकताक कसबट्टी पर परखल जाए सकए। ई आकलन कएल जाए सकए जे ई कवितासभ मार्क्सवादी परम्पराक बीच अपन उपस्थितिक संज्ञान कराबैत अछि की नहि? किन्तु एहि पर आगू बढए सं पहिने “देशक नाम छलै सोनचिड़ैया”क हवाई सर्वेक्षण आ “लाख प्रश्न अनुत्तरित” पर विहंगम दृष्टि फेरल जाय। देशक नाम छलै सोनचिड़ैया वर्ष 1986 मे प्रकाशित एहि संग्रह मे कुल 64 पृष्ट मे समेटल ‘मैथिली सं’ सं ‘किछु क्षणिका’ तक 21 टा कविता संग्रहित अछि।‘इतिहासहंता’ जकां एहि संग्रह मे कवितासभक रचनाकाल अंकित नहि अछि। पहिल कविता ‘मैथिली सं’ मे कवि चारि कोटि लव-कुशक कुम्भकर्णी निद्रा मे सूतल रहबाक,चारि कोटि संतानक नपुंसक हेबाक घोषणा करैत मैथिली सं काली-कराली-खप्परवाली बनि एक बेर,मात्र एक बेर प्रलय मचाए देबाक आह्वान करए छथि,किन्तु हुनक संशयग्रस्त मन मैथिली कें वैकल्पिक प्रस्ताव दैत कहैत अछि—‘जं से नहि क पाबी/त हमर अनुरोध/खा लिअ बिख/किन्तु/विदेहक नाम कें/बदनाम जुनि करी’।एहि कविता मे कवि भाषाक शक्तिक प्रति एहन भयंकर रूप सं द्विधाग्रस्त किए छथि? हुनका धर्म कें अफीम मानबाक मार्क्सवादी मान्यता बिसारि काली-कराली-खप्परबालीक शरणागत हेबाक मानसिकता मे किए घुरियाबए पड़ल छनि? हुनका मैथिलीक बिख खाएब मंजूर छनि,किन्तु विदेहक नाम बदनाम हएब मंजूर नहि। किए? एकर की अर्थ? ओ मैथिलीक मूल्य पर मिथिला-राजक प्राप्ति वा पुनर्जन्मक महत्ता कें सन्दर्भित/प्रतिपादित कए रहल छथि की? ‘सुच्चा मैथिल’ कविताक प्रारंभिक पंक्तिसभ मे अर्थालंकारक ‘व्याज स्तुति’ भेद उपस्थित अछि,जाहि मे उपर सं देखला पर त ओ निन्दा बुझाइ छै,किन्तु ओ होइत अछि वस्तुत: प्रशंसा! कविताक द्वितीयार्द्ध मे उपमेय,उपमान, साधर्म्य,वाचक आदिक तेहन विचित्र धालमेल छै जे अर्थ मे अनर्थ आ अनर्थ मे अर्थक अनेकानेक विस्फोट होइ छै। ‘गुदड़ी सं अपन अंग झपने दाबा पर चिपड़ी पथैत भारती,मरि चुकल हीरामनि सुग्गा आ तीन दिन(मात्र) सं अपन पेट कें तौनी सं बन्हने एकजनिया एकचारी मे स्वत: प्रमाणम परत: प्रमाणम रटैत महापंडित(?) मंडन मिश्र’ तक त ई बुझाइ छै जे कवि पतनक दृश्य चित्रित कए रहल छथि,किन्तु कवितान्त मे ‘जानि ने/कोन शंकराचार्यक/प्रतीक्षा छनि’क वक्रोक्ति माथ सं उपर बहि जाइत अछि।(ई पाठक/आलोचकक अपन बुद्धिक सीमा सेहो भए सकैत अछि)मैथिललोकनि केतबो गाल बजाबथि,शंकराचार्यक आएब कोनो शुभ आ स्वागतयोग्य बात त नहि भेल रहनि मंडन-भारती लेल! मंडन स्वयं पराजित भेल छला शंकराचार्य सं आ भारती द्वारा शंकराचार्य कें पराजित करबाक जे गौरव-गाथा बुनल गेल अछि,तेकर अन्तर्कथा त और ग्लानिदायक अछि।शंकराचार्य सन ब्रह्मचारी,उद्भट्ट विद्वान आ शास्त्र-मर्मज्ञ कें ‘कोकशास्त्र’ सन विषय कें माध्यम बनाए पराजित करब बहुत गौरवपूर्ण आ सम्मानजनक गप नहि अछि। कवि एहि कविताक माध्यम सं मैथिलक ‘कोंढ मे खाज’ बला मुहावरा चरितार्थ होइत देखबए चाहए छथि की? अपन शब्द-प्रयोगसभ मे कवि जाहि तामसक प्रदर्शन करए छथि,तेकर आधार पर त इएह मानल जएबाक चाही,जं कविताक पुर्वार्द्ध कें व्याज-स्तुतिक श्रेणी मे नहि राखी त। ‘चेतौनी’ पोस्टर कविता अछि आ प्राय: तें अर्धवयस्क अंधोत्साह आ विवेकहीन धमकी-चमकी कें एकर अन्तर्वस्तु बनाएल गेल अछि—‘रक्तधार बहाएब/राष्ट्र की धो-धो चाटब?/बरू आगि लागौ एइ राष्ट्र/बिलटि जाओ भारत/अन्हरा धृतराष्ट्र/हिन्दी के पोसा कुकुर—शैतान/नहि त ई मिथिला देश बनत विश्व के दोसर बंगला देश,दोसर वियतनाम’। एहन शब्द,एहन भाव,एहन कथ्य,एहन भौंकी जं कविताक तत्व अछि त गाम-देहातक गमार स्त्रीगणक बीच होइबला राड़ी-बेटखौकी की भेलए? महाकाव्य? ई ठीक छै जे कथ्यक दबाव कवि कें उपयुक्त भाषा आ रूपक निरन्तर खोजक लेल बाध्य करैत अछि।प्रभावशाली भाषा आ रूपक ई खोज रचनाकार कें विभिन्न प्रयोग दिस प्रवृत करैत अछि।किन्तु ई खोज कविक असावधानीक स्थिति मे ओकरा भटकाबितहु अछि आ ई भटकाव ओकरा भाषाक अपव्यय दिस लए जाइत अछि।ई स्थिति खतरनाक होइ छै। भाषाक अपव्यय बड़बोलापन कें जन्म दैत अछि,जाहि सं कविताक स्वाभाविकता कें त क्षति पहुंचतहि अछि,कविक विचार मे सतही आस्था कें देखार सेहो करैत अछि। एहि पोस्टर कविताक अलगाववादी, क्षेत्रीयतावादी आ मिथकजीविताक उपनिवेशवादी मानसिकताक सन्दर्भ मे मन पाड़ैत चली जे पंजाबी कवि पाश अपन क्रांतिकारी सोच आ समझक तहत विश्वक व्यापक जनता आ सर्वहारा वर्गक पक्षधर हेबाक चलते संप्रदायवाद, अलगाववाद,क्षेत्रीयतावाद,जातिवाद आदिक खिलाफ अपन पत्रिका आ रचनाक माध्यम सं एकटा व्यापक मुहिम चलएने रहथि। ओ खलिस्तानक खिलाफ रहथि,तें हुनकर लड़ाई एकरहु विरुद्ध छल। इएह कारण रहए जे 23 मार्च,1988 कें खालिस्तानक पक्षधर लोकनि हुनका मारि देलक आ एहि तरहें पाश अपन क्रांतिकारी भुमिकाक कारण शहीदक मौत मरला। ’कहैत छला बाबा’ मे धर्म आ धर्मस्थलक यथार्थ पर बहुत कुछ कहबाक गुंजाइश रहए,किन्तु कवि एहि विषय पर समग्रता मे समधानल प्रहार करबा मे हिचकिचाए गेल छथि आ बीध पुराबैक लेल एकरा मात्र छुबिकए छोड़ि देने छथि। धर्म आ धर्मस्थलक सभ सं बेसी विकृति एकर पंडा-पुरोहित व्यवस्था मे अन्तर्भूत छै,जेकर विरोध कए ओकरा निर्मूल करब कोनो प्रगतिशील व्यक्तिक/कविक काम्य हेबाक चाही। से कामना एतय अलोपित छै। एहि हिचकिचाहटिक पाछू कविक व्यक्तिगत पृष्टभूमिगत कोनो अवरोधक तत्व वा मानसिकता अछि की? ‘भूख’ कविता मे पेट आ सेक्सक भूखहिक सभकुछ हएबाक घोषणा आपत्तिजनक आ अस्वीकार्य अछि। जं इएह दुनू भूख सभकुछ छै,तखनि कवि कें कविता लिखबाक भूख किए जागलनि? मैथिली मे लेखन सेक्सक भूख त किन्नहु नहि अछि। ई त ‘घर फूंक,तमाशा देख’बला काज अछि। हृदयक शोणित जराए रचना करू,अपन जोड़ल पाइ लगाए ओकरा प्रकाशित करू आ घर-घर जाए कए पढबाक आग्रह संग पोथी बांटि आउ।तें एकरा पेटक भूख सेहो नहि मानल जाए सकैछ। साहित्यकार जीवन कें देखैत अछि त जीवनक पार सेहो देखैत अछि,तें ओकरा सं एहन वक्तव्य एकदम अवांछित अछि। हिप्पी-संस्कृतिक उद्घोषक वा पैरोकार हएब कवि-कर्म नहि अछि। ‘हमरा कने बिलम्ब हएत’, ’भाइ!अहां घुरि जाउ’, ’आगामी काल्हि हमरे सभक हएत’, ’दोहाइ ओइ पारक छी’, ’ओहू दिन एहिना भेल रहए’, ’बिहाड़िक बाद आमक गाछी’, ’कैफियत’, ’ओ हमरे भाइ छल’, ’आर कहिया धरि’ आ ‘मृत्यु अभिमन्युक’ आदि कविता मे साम्यवादक मनोहर पोथीक शब्दावली सं लेल शब्दसभक खूब प्रयोग भेल अछि,पर्चा-पोस्टरबला उत्तेजना सेहो अछि,वर्त्तमानक प्रति असन्तोष आ भविष्यक लाल-बिहानक प्रति अंध-आशावादक फार्मूला सेहो अछि,किन्तु एहि सभ सामग्री कें काव्य-तत्त्व सेहो मानल जाएत,ताहि मे सन्देह अछि। आन-आन कलासभ जकां कविताक प्रकृति सेहो अधि भौतिक(मेटाफिजिकल) छै आ ओ मात्र तर्कक वा आक्रोशक स्तर पर प्रभावित नहि करैत अछि। बिना काव्य-तत्त्वक मात्र सपाटबयानी कोनो सोझ प्रहार कए सकैत हुअए,ई सेहो सम्भव नहि अछि। त्वरित लोकप्रियता अर्जित करबाक लेल एना कएल जाए सकैत अछि,कएलहु जाइत अछि,किन्तु ई लोकप्रियता स्थायी नहि भए सकैछ। मार्क्सवाद एकटा क्रांतिकारी विचारधारा अछि। ई रचनाकार कें संघर्षधर्मी चेतना सं लैस करैत अछि। एकर माध्यम सं कोनो कवि अपन कविता मे विचार आ वक्तव्यक नीक समायोजन आ प्रभावशाली संयोजन कए सकैत अछि।किन्तु जीवन-जगतक यथार्थक गहन अवलोकन, जनजीवनक प्रति अनुभूतिगत संवेदना आ कल्पनाशक्तिक अभाव मे ओकर कविता दोहरौनीक शिकार भए जाएत। ई सेहो ध्यातव्य जे जं कोनो विचार नीक जकां अभ्यंतर मे घुलि-मिलि नहि गेल हुअए त ओ असन्तुलित आक्रोश अश्लील आ कुरुचिक रुप मे प्रगट होइत अछि आ ई सबलताक नहि,दुर्बलताक प्रतीक अछि। ‘हमरा कने बिलम्ब हएत’ मे ‘तानसेन’ आ ‘बाइजी’ कें अपन प्रयोजनक तरजू पर एक बराबर तौलब सामान्य पाठक कें की, कोनो परम-प्रयोगशील कविअहु कें अनसोहांत लागि सकैत अछि। ‘चारण हम ओकरहि छी’ मे कविता सं पूर्व कवि ‘धूमिल’क वक्तव्य उद्धरित देखि कविताक प्रति उत्सुकताक संग-संग अतिरिक्त अपेक्षा जागैत अछि।कवि एहि मे स्वयं कें श्रमजीवी समुदायक चारण घोषित करए छथि। स्वागत! कविता बेजाय नहि छै,किन्तु एहिमे ने अन्तर्वस्तुक नवीनता छै आ ने प्रस्तुतिकरण मे कोनो विशेषता। ‘एक टा सही कविता पहिने एक सार्थक वक्तव्य होइत अछि।‘ – धूमिलक ई प्रगतिशील-प्रिय कथन बेर-बेर दोहराएल गेल अछि आ हमरा सन-सन अनेक लोग एकर अन्तर्भाव सं सहमत सेहो छथि।किन्तु एकरा दोहरैनिहार द्वारा एकर आन्तरिक भाव कें की ठीक-ठीक आत्मसातहु कएल गेल अछि? धूमिलक ‘सही’,’पहिने’,’सार्थक’ आदि शब्दप्रयोगक निहितार्थ बुझने बिना हुनकर एहि कथनक आत्मा मे प्रवेश नहि कएल जए सकैत अछि। प्रगतिशील कविताक नाम पर छूछ नकल,नारा,फ़कराबाजी खूब भेल अछि,भए रहल अछि आ आगुअहु हएत,किन्तु एकर नियति मात्र अल्पजीविता अछि। मार्क्सवादी सौन्दर्य शास्त्र सृजन प्रक्रिया कें अद्भुत आ अनायास या दैवी-कृपा नहि मानैत अछि,किन्तु एकर ई अर्थ नहि लगाएल जेबाक चाही जे ई ओकरा सायास आ यान्त्रिक मानैत अछि।ई सही छै जे रचना प्रक्रियाक कोनो निर्धारित विधि वा अवधि नहि छै आ ई रचाकारक आवेगक मुखापेक्षी होइत अछि,किन्तु एकरा पाछू विचार आ प्रेरणाक तत्व रहैत अछि,जे कवि कें मूर्त जीवन-जगत सं प्राप्त होइत अछि।रचनाकारक दृष्टि जं सोझराएल आ वैज्ञानिक चेतना सं लैस नहि हुअए त ओ वस्तु कें ओझराएल आ विकृत रूप मे देखैत अछि आ ओकरा तहिना व्यक्त करैत अछि।ई सभ बात धूमिलक संज्ञान मे रहनि आ तें ओ वक्तव्यक सार्थकता पर,विचारक प्राथमिकता पर जोर त दए छथि,किन्तु अन्तत: एहि मे काव्य-तत्त्वक अनिवार्यता कें सेहो रेखांकित करए छथि,जेकर उपस्थिति सं कोनो कविता ‘सही’ कविता बनैत अछि। संग्रहक अगिला कविता ‘अजगुत देश’ अजगुत छै—निस्सन्देह! ई कविता पढैत अनायास एकटा विदेशी लोक-कथाक नायक ‘नारसिसस’ मन पड़ि जाइत अछि,जे एकटा झील मे अपन अप्रतिम रूप देखि स्वयं पर एहि पराकाष्ठा तक मोहित भए गेल जे अपन सुध-बुध बिसारि ओहि झीलहि मे खसिकए डूबि गेल रहए। स्वमुग्धताक एहि चरम कें ‘नारसिसस सिन्ड्रोम’ कहल जाइ छै।जेना बताह सं बतहपनी बनए छै,तहिना एकरा मैथिली मे ‘नारसिससपनी’ कहि सकए छी। ‘अजगुत देश’ कविता आ एकर कवि एहि नारसिससपनीक प्रभावक उत्कृष्ट उदाहरण बुझाइत अछि।कविता मे युटोपिया,नास्टेल्जिया आ मिथिज्म (मिथकजीविता वा मिथकवाद) चरम पर छै।एहन चरम जे प्रगतिशीलताक आग्रही पाठक कें वितृष्णा सं भरि दए छै आ ई विश्वास करबाक यथेष्ट आधार प्रदान करए छै जे कवि अपन अन्तस मे मूलत: नारसिसक प्रतिरूप छथि। हुनक काव्य-जगत मे जेतय-जेतय मिथकक झील आबैत अछि,ओ अपन अपरूप रूप निहारि आत्मरतिक चरम पएबा लेल ओहि मे खसि पड़ए छथि।विचित्र बात ई जे झील मे देखाइत ई अपरूप रूप वर्त्तमानक नहि, कोनो आन रचनाकारक रचित काल्पनिक अतीतक खिस्सा मे वर्णित रूप अछि। एतय रबीन्द्रनाथ ठाकुर मन पड़ि जाइ छथि जे एकठाम लिखने छला – ‘धुइयां आकाश सं शेखी बघारैत अछि आ छाउर पृथ्वी सं जे ओ अग्निवंशक अछि।‘ धुइयां आ छाउरक ई शेखी खूब शिद्दत सं एहि कविता मे उपस्थित आछि। ‘एहि संएतीस बर्ख मे’ एकटा लघुकथा कें कविता बनएबाक निष्फल प्रयास अछि। एहिमे रिक्शाबलाक पीड़ा अपेक्षित प्रभाव नहि उत्पन्न कए पाबैत अछि। आजादीक सैंतीस बर्ष बादहु देश मे सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल आ गरीबक दुख-पीड़ा आ ओकरापर अत्याचारक यथास्थिति कायमहि अछि,इएह एहि कविताक मूल कथ्य अछि।कविता मे बेर-बेर ‘एहि संएतीस बर्ख मे’ वाक्य-खण्डक दोहरौनी एकर गंभीरता कें खण्डित करैत अछि।यथार्थ आ वस्तुस्थितिक चित्रण कवि सं अपेक्षित होइत अछि आ ओ यथार्थ आ वस्तुस्थिति बेजाय आ निराशजनक सेहो भए सकैत अछि। छूछ निराशावाद राजनीति मे जनाक्रोश जगाबए लेल त उपयोगी भए सकैत अछि,किन्तु कवि सं महत्तमक अपेक्षा होइत अछि जे ओ जनाक्रोशक सत्ती जन-चेतनापर अपन चेतना कें केन्द्रित राखथि। अगिला कविता ‘अनेकता मे एकता’ बहुत प्रयासक बादहु हमर समझदारीक सीमा मे नहि अंटि सकल,बाहरहि बाहर रहि गेल। अनेकता मे एकताक मखौल उड़ैबाक लेल नरभक्षी,पिशाच,कपिला गाय सन कंपैत माउग आदि-आदि प्रतीकक काव्यार्थ वा भावार्थ स्वयं कें बूझल जएबाक लेल कोनो गंभीर आ नामवर काव्य-अध्येताक मांग करैत अछि। संग्रहक शीर्षक-कविता ‘देशक नाम छलै सोनचिड़ैया’ कें वस्तुत: कुमारेश काश्यपक ‘बेताल कथा’ मे संग्रहित कएल जएबाक चाही छल। ई व्यंग्य-रचना प्राय: भूलवश कविताक रूप मे एहि संग्रह मे चलि आएल अछि।संग्रहक अन्तिम छहटा क्षणिका नीक अछि। लाख प्रश्न अनुत्तरित मैथिली दिवस(ई दिवस के बनएलक से नहि जानल),1410 तद्नुसार 11 मई,2003 कें प्रकाशित एहि संग्रहक एक सय पृष्ट मे ‘विख्याता भुवनत्रयम’ सं ‘बर्खान्त’ तक कुल 48 टा कविता संग्रहित अछि। ‘विख्याता भुवनत्रयम’,’बहिनदाइक नाम एगो चिट्ठी’,’हमरो एकटा गाम छल’ आदि कविताक विषय मैथिली मे बेर-बेर दोहराएल गेल अछि आ एकर प्रस्तुतिकरण मे सेहो कोनो नवीनता नहि छै। ‘विख्याता भुवनत्रयम’ मे जखनि कवि कोशी-प्रांगणक व्यथा लिखने चलि जाइ छथि,तखनि ओ निश्चित रूपसं वर्त्तमान मे उपस्थित छथि, किन्तु ‘जतए ने जाथि रवि,ओतय जाथि कवि’ कें चरितार्थ करैत ओ अकस्मात युग-शताब्दी कें हनुमत-वेग सं टपैत कंकालक देश अपन मातृभूमि तथाकथित विख्याता भुवनत्रयम मिथिला मे प्रगट भए जाइ छथि।ई काल-विसंगति कनेक नहि,बहुत विचित्र छै। जं मिथकहि कें आधार मानी त कोशी नदी मिथिलाक सीमांत मानल गेल अछि। ई नदी अपन प्रचण्ड हाहाकारी मुद्रा मे अपन पथ बदलैत रहल अछि। ई नदी आइयो अपन भौगोलिक-अस्तित्व मे उपस्थित अछि आ मिथिलाक मैथिल-मन छोड़ि और कतहु कोनो अस्तित्व नहि अछि।यथार्थ आ मिथक कें एना मिज्झर करब भूगोलहु कें टेढ-घोंच कए देत।कवि कें अपन कल्पनाक पसारक स्वतंत्रता छै,किन्तु इहो कविए कें देखए पड़तनि जे ई स्वतंत्रता आन भौतिकता कें क्षतिग्रस्त करबाक संग-संग स्वयं हुनकर अपनहि रचल कविता कें वायवीयतामय नहि कए दनि।कोशी-प्रांगणक व्यथा लिखैत काल एहि क्षेत्रक दुर्दमनीय जीजिविषा,अथक पुरुषार्थ आ श्रम-संस्कृतिक महत्ताक ठामपर जं कवि कें परजीविताक प्रतीक कोनो मिथकीय मकड़जाल मे मुक्ति वा त्राण देखाइ पड़ए लागए त ओकर सम्पूर्ण प्रगतिशीलता आ वामवादिता पर प्रश्नचिंह त लागितहि अछि, ओकर व्यक्तित्व पर छद्मक छटाक आभास सेहो दैत आछि। ‘एक फांक अन्हार:एक फांक इजोत’ मे गाम-शहरक तुलना इजोत-मात्र तक सीमित,सरलीकृत अछि आ तें अपूर्ण कविता अछि। ‘अपन समाचार’ कविक व्यंग्य रचना ‘बेताल कथा’क लाट सं भटकिकए एम्हर चलि आएल अछि। ‘शब्द’ सचेत अवस्था मे लिखल कविता नहि अछि। ई अवचेत आ अचेतहु सं पारक कोनो चेतावचेताचेत अवस्थाक बियान अछि। शब्दक प्रति एहन भ्रम,एहन शंका,एहन अविश्वास कोनो कविक भाव अछि,से केकरहु भ्रम,शंका आ अविश्वास सं भरि दए सकैत अछि—एकदम अनसोहांत जकां। ई सम्भव छै जे कोनो क्षण-विशेष मे,क्षण-विशेषक उत्तेजना मे कविक शब्दास्थाक नींव डगमगाए जाइ,लेखन-कर्मक व्यर्थता-बोध सं भरि कवि स्वयंक प्रति ग्लानि सं भरि जाइ।एकरा कविक व्यक्तिगत आ मानवीय कमजोरी मानि तत्काल स्वीकार कएल जाइ सकए अछि।किन्तु जखनि ओ अपन समकालीन कविसभ कें निस्पृह,निर्विकार होएबाक आरोप सं लांछित करैत शब्द कें अपन हेराएल अर्थ पएबाक लेल भविष्यक नहि, अतीतक बाट दिस जएबाक प्रतिगामी गप करए त इ कवि-कर्मक प्रति अपराध-सदृश्य अछि।ठीक छै जे कविता कें जीवनक आन-आन भौतिक वस्तु जकां व्यवहृत नहि कएल जाए सकैत अछि। ई मनुष्यक लेल हवा,पानि आ भोजन जकां अनिवार्य नहि अछि। आस्कर वाइल्ड एकठाम कहने रहथि जे,’अन्तत: समस्त कलासभ सारहीन अछि’। तें कला-कविता कें महज उपयोगितावादी नजरिया सं देखब त ताहि सं कुछ हासिल होबएबला नहि अछि। अहां अपन व्यक्तिगत जीवन मे एहि बात लेल स्वतंत्र छी जे अहां अपन सुविधानुसार मार्क्सनामी चद्दरि ओढी/उतारी वा रामनामी चद्दरी ओढी/उतारी वा एकटा मूल्यहीन समाजक हिस्सेदारक रूप मे एकटा मरणधर्मा संस्कृति कें उघैत रही।किन्तु जेना राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता कोनो व्यक्ति कें सार्वजनिक बनबए छै,तहिना साहित्यिक सक्रियता सेहो व्यक्ति कें सार्वजनिकता प्रदान करए छै।एना मे अहां रचनाक नाम पर एकालाप वा प्रलाप नहि कए सकए छी।एक बेर सार्वजनिक होइतहि अहां संलापक परिधि मे आबि जाइ छी आ तेकर पालन करब अहांक बाध्यता अछि। ‘मैथिली मन्दिर मे दीप लेसैत’, ’हम श्रद्धांजलि नहि द पाएब’, ’नेल्सन मंडेला’, ’नीक नहि कएल अहां’ आदि विभिन्न व्यक्तित्व कें समर्पित कवितासभ अछि। समर्पणक सभक अपन-अपन तरीका होइ छै,तें ओहिपर कोनो टिप्पणी नहि कएल जएबाक चाही।किन्तु सत्य कें ‘संदिग्ध’ आ गांधी कें ‘विखण्डित राष्ट्रक विकलांग पिता’ कहब; नेल्सन मंडेला कें ‘श्वेत कपोत’क उपमा देब कतेक गोटे कें ठोंठ सं गीरब पार लगतनि,से कहब कठिन। कविता कें जं विज्ञान सं परहेज होइ वा अविज्ञानी हएब कविक लेल अनिवार्य हुअए,तखनि त ‘धरती प्रतिकार करैछ’ कविताक विरोधक कोनो बात नहि; किन्तु इतर स्थिति मे ई प्रश्न उठब स्वाभाविक जे ज्वालामुखी भड़कए,अन्हर-बिहाड़ि उठए आ भूकंप होइ मे धरतीक कोन भुमिका,कोन अपराध?कोनो स्कूलक सामान्य छात्रहु कें ई तथ्य बूझल रहए छै जे धरती एहिसभ उत्पात कें सहैत-भोगैत अछि,एहि उत्पातसभक उत्पादक नहि अछि। ‘शहर शामियाना’, ’पन्द्रह अगस्त’, ’एक गोट राष्ट्रद्रोहीक वक्तव्य’ राष्ट्रीय विषय-घटनासभ सं जुड़ल कविता अछि। एहि कवितासभक रचाव मे अपेक्षित गंभीरता आ संवेदनाक अभाव एकरासभ कें अधसिज्झू व्यंजन जकां नीरस बनाए दैत अछि। ‘हम चाहै छी’ मे कविक काव्याकांक्षा प्रशंसनीय अछि। अजुका कविता ओहने हएबाक चाही, जेहन कविताक आकांक्षा एहि कविता मे कएल गेल अछि।नीक कविता। आब लाख रुपैयाक जिज्ञासा ई जे कविक ई आकांक्षा भूमिका-मात्र तक किए रहि गेल,एकरा हुनक तीन-तीन टा संग्रहक अन्तर्वस्तु बनाबए सं,एकरा क्रियान्वित करए सं के रोकलकनि? लेखन सं लए कए प्रकाशन तक सभ सरंजामक अछैतहु हुनक ई कामना फलीभूत किए नहि भेल? ई कविता अपनहि रचनाकार कवि सं एहि प्रश्नसभक उत्तर आ स्पष्टीकरणक मांग करैत अछि। ‘भगवान तथागत’, ’मनुक्ख आ ईश्वर’, ’दिनचर्या’, ’संवाद’, ’बसात’, ’कौआ’, ’मैना’, ’नव रचनाक मादे’, ’सोना आब नम्हर भ गेलए’ आदि कविताक अन्तर्वस्तु ओ नहि अछि,जेकर आकांक्षा कवि द्वारा ‘हम चाहै छी’ कविता मे कएल गेल अछि,किन्तु एहि कवितासभ मे काव्य-तत्त्वक पुष्टता अछि आ कवि एतय सहज कवि-रूप मे उपस्थित छथि। एत्ते तक जे पत्रिका आ पोथीक चर्चा होइतहु ‘संवाद’ कविताक लय नहि टूटैत अछि,बरु ई चर्चा कविताक प्रभाव कें विस्तारित करैत अछि। ई बात एहि दिस इंगित करैत अछि जे रामलोचन ठाकुरक काव्य-विषयक प्राय: इएह स्वाभाविक क्षेत्र छनि,जेकरा ई कवितासभ छुबैत अछि। भ्रमण कवितासभ मे स्थलसभ कें देखबाक कवि-दृष्टि रुमानी अछि आ ई रुमानी-दृष्टि नीक लागैत अछि। चारि गोट मिनी कविता बहुत रास मैक्सी कविताक तुलना मे बहुत उत्तम अछि। क्षणिका भात मे आएल कंकड़ जकां अछि। अन्तिम आ संग्रहक शीर्षक-कविता ‘लाख प्रश्न अनुत्तरित’ राह भटकि कए ‘बेताल कथा’ सं बिछुड़ि एम्हर चलि आएल अछि। रहबर जखनि डगर भटकाबए साहित्यक वाचिक/श्रव्य परम्परा आ आधुनिक लिखित/पठ्य परम्परा मे बहुत रास ढब-ढांचा आमूलचूल बदलि गेल अछि। अनेक सुविधा बढल अछि,त अनेक सुविधा विलुप्त भए गेल अछि।वाचिक परम्पराक कवि अपन श्रोता लग सदेह उपस्थित रहैत रहथि आ हुनका ई सुविधा रहनि जे ओ अपन हाव-भाव,अपन आंगिक प्रदर्शनक संग-संग मौखिकहु स्तर पर अपन काव्यक मूलार्थ वा गूढार्थ अपन श्रोता तक पहुंचाए सकथि।लिखित परम्परा मे कवि कें ई सुविधा नहि रहलए।पोथीक प्रकाशनक बाद ओकर रचनाकार विदेह ( बिना देहक,अनुपस्थित वा अदृश्यक अर्थ मे,मिथकीय राजाक अर्थ मे नहि) भए जाइत अछि।कविक हाव-भाव,ओकर आंगिक प्रदर्शन आ मौखिक व्याख्या वा स्पष्टीकरणक क्षतिपूर्तिक सभटा दारोमदार पोथीअहि पर चलि आबैत आछि।तें संग्रहक (प्रकाशित पोथीक) अन्त्तर्वस्तु सं लए कए ओकर प्रस्तुतिकरण ( कवर-डिजाइन,प्रकाशन-विवरण,ब्लर्ब पर देल रचनाकारक परिचय,फोटो वा टिप्पणी,समर्पण,भूमिका आ पोथीक पृष्ट आ मूल्य तक) तक प्रत्येक वस्तुक अपन अर्थ होइ छै।ई सभटा वस्तु अपन-अपन दिस सं किछु ने किछु कहए छै,संकेतित करए छै,निरर्थक नहि होइ छै।उदाहरण लेल ‘इतिहासहंता’ पोथीक मुद्रित मूल्य (साधारण-दू टाका:विशेष-चारि टाका) कें ललका रोशनाई सं काटि पन्द्रह टाका लिखि ओकर नीचां कविक हस्ताक्षर करब सेहो बहुत बात कहि जाइत अछि।ध्यातव्य अछि जे सामान्य परम्पराक अनुसार पोथीक मूल्य निर्धारित करबाक अधिकार प्रकाशकक होइत अछि आ एहि पोथीक प्रकाशक कवि रामलोचन ठाकुर नहि,शिखा प्रकाशनक कुणाल-अग्निपुष्प छथि।किन्तु मैथिली त कोनो सामान्य भाषा नहि अछि।तें एतय प्रकाशनक नियमसभ सेहो असामान्य अछि।ललका रोशनाई सं कवि द्वारा संशोधित मूल्य मैथिली मे पोथी प्रकाशनक व्यवस्थाक पोल खोलैत अछि (ई पोथी विदेहपर डाउनलोड लेल कवि द्वारा देल गेल छै)।एहि पोथीक ब्लर्ब पर कुणालक टिप्पणि दर्ज अछि,जाहि मे ओ रामलोचन ठाकुर कें ‘दुर्घर्ष अग्निहस्ताक्षर’ आ एहि संग्रह कें ‘अग्निलेखनक पहिल दस्तावेज’ घोषित करैत दाबी ठोकए छथि जे ई दस्तावेज साबित करैए जे कविता मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया नै अइ। आगू ओ ‘अग्निलेखन’क परिभाषा दैत लिखे छथि जे अग्निलेखन यथास्थितिक प्रति अतिशय असहिष्णु,आक्रोशक तीक्ष्ण भावाभिव्यक्ति,मार्क्सवादी चिन्तन सं संपृक्त संघर्ष चेतनाक निर्माता,स्व-निर्माणक प्रति घोर आस्थावान,तें विध्वंस कें आवश्यक मानैत कोनो तरहक सुधार कंह पूर्णत: अस्वीकार करैए; मानैए जे मनुखक जीवनक सुन्दरतम क्षण ओ हेतै जखन ओ क्रांतिक साक्षी बनत—सहभागी बनत आ तावत साहित्यक काज छै संघर्षक वैचारिक धरातल तैयार करैत रहनाइ जाइ मे मात्र स्थिति निरुपण नै,दिशाबोध भयंकर(!) रूप सं आवश्यक छै। आगू ओ कविक परिचय दैत लिखए छथि—“कवि,निबंधकार रामलोचन ठाकुर मैथिली साहित्यक सुपरिचित नाम अइ,अपन प्रखरता आ वैचरिक सुदृढता स एकटा फराक स्तित्वक मालिक सेहो। हिनक चिन्तनधाराक आधार अइ मार्क्सवाद,फलत: ‘वर्ग-संघर्ष’ आ तइ पर आधारित क्रांति हिनकर रचनाक मूल होइए। हिनका अग्निलेखन के प्रपंच आ विकृति सं बचेबाक प्रमुख श्रेय छनि।…… स्वभाव सं उग्र,विचार सं परिपक्व आ व्यवहार स सर्वहारा…..” दुर्द्धर्ष अग्निलेखकक अग्निलेखनक पहिल दस्तावेज ‘कविता मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया नै अइ’ कें साबित करैत अछि की नहि,ताहिपर किछु चर्चा एहि आलेखक पूर्व मे भेल अछि,किछु आगू हएत।किन्तु ब्लर्ब पर कुणालक ई टिप्पणी,जे मौलवी-मुल्लासभक फतवाक हद पार करैत अछि,शब्दस: ‘मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक यूटोपिया’ अछि,से कहबा मे हमरा कनियहु संकोच वा संशय नहि। ई सम्पूर्ण मैथिली-जगत कें बूड़ि बुझबाक,अनकर माल पर फुटानी करबाक,मैथिली रचनाकार-समुदाय कें मानसिक,वैचारिक आ रचनात्मक स्तर पर परम पिछड़ल आ अपढ बुझबाक आ आत्मरतिक पराकाष्ठा सं उपजल अहंकार सं ऐंठल टिप्पणी अछि। ‘अग्निलेखन’ आ ‘अग्निहस्ताक्षर’क शिगूफा एहि एहि मानसिक व्यभिचारी यूटोपियाक प्रथम पौदान अछि।एकर बादक हुनक सम्पूर्ण टिप्पणी,जेकरा ओ स्वघोषित विश्वकर्मा जकां अपन आचार्यबोधत्वक प्रभाव मे अग्निदुर्गक निर्माणक संरचना बुझि लेने छथि,वस्तुत: यूटोपियाक पसरल मकड़जाल अछि,जाहि मे अपढ कीट-फतिंगा त ओझराए कए मरितहि अछि,स्वयं अतिविद्वान मकड़ा सेहो अधमरू होइत दिवंगतावस्था मे चलि जाइत अछि।शास्वत यथार्थ छै जे भारी-भरकम,महाकाय,विराटकाय पहाड़नुमा शब्दसभक ढेरी लगएला सं कोय वेदव्यास नहि भए जाइ छै। ’पहाड़ तोड़ि देबए’, ’भुइयां हिलाए देबए’ सन-सन हुंकारा देला सं कोय क्रांतिकारी वा पहलवान नहि भए जाइ छै,ठीक ओहिना जेना ‘आगि-आगि’ चिकरला सं मूंह नहि जरए छै।गांधी-नेहरूक नाम जपला सं जेना कोय कांग्रेसी नही भए जाइ छै,तहिना मार्क्स,एन्जेल्स आ लेनिनक नाम-जाप आ ‘वर्ग-संघर्ष’, ’बूर्ज्वा’, ’सरमायेदार’, ’भौतिक द्वन्द्ववाद’, ’सर्वहारा’, ’पूंजीवाद’, ’सामन्तवाद’, ’लाल सलाम’, ’कामरेड’ आदि शब्दक आडंबरपूर्ण व्यवहार सं कोय मार्क्सवादी नहि भए जाइ छै; आ ने ‘पेरेस्त्रोइका’ आ ‘ग्लास्नोस्त’क रट्टा मारला सं सोवियत संघ विघटित भए जाइ छै।कोनो वैचारिकता कें ग्रहण करबाक लेल एकटा समझदारी सं ओतप्रोत निष्ठा चाही,वैचारिकताक सांचा मे स्वयं कें आपादमस्तक ढालि लेबाक अटूट जिद चाही।विचार चद्दरि जकां देह पार ओढल नहि,अस्थि मे मज्जा जकां आ नस-नस मे शोणित जकां प्रवहमान हएबाक चाही।संयोग कही वा कुसंयोग,सौभाग्य कही वा कुभाग्य,कुणालक फतवारूपी परिचय-प्रस्तावना आ रामलोचन ठाकुरक काव्य-जगत दुनू मे वैचारिकताक उपस्थिति देह पर ओढल चद्दरि जकां अछि,जेकरा निज सुविधा किंवा अवसरक अनुसार ‘ज्यों की त्यों धरि दिन्ही चदरिया’ कएल जाए सकैत अछि आ फेर दोसर क्षेत्र मे जाइतहि ‘पुनर्मूषको भव:’ भेल जाए सकैत अछि।एतय जे मार्क्सवाद अछि,से एकटा सजीव दर्शनक निर्जीव अ बचकाना समझ सं उपजल फसिलक रूप मे उपस्थित अछि।मार्क्सवाद अपन राजनीतिक इस्तेमाल मे विवाद,निन्दा आदिक विषय रहल अछि।एकर आधार पर बनल राजनीतिक संरचनासभ पर हिंसात्मक रवैया अख्तियार करबाक आरोप लागैत रहल अछि।किन्तु एहि विचारक वैज्ञानिकता पर प्रश्न ठाढ करबा सं एकर विरोधीअहुसभ परहेज कएलनि अछि।सोवियत रूसक विखण्डनक आलोक मे जे ई कहल गेलए जे ई मार्क्सवादक पराजय नहि,मार्क्सवादक नाम पर बनल राजनीतिक संरचनाक पराजय अछि,से उचित। चीनक वर्त्तमान पूंजीवादी वामपंथ सेहो विचारक नहि,संरचनाक दोष अछि। भारतीय वामपंथ त शत-प्रतिशत विदेशी नकल पर आधारित अछि।एतय एकरा लागू करबा मे एहि देशक सामाजिक संरचना,एकर सांस्कृतिक परम्परा, एकर भाव-भूमिक अनुरुप कोनो परिवर्तन/परिवर्द्धनक लेल भारतीय बौद्धिकताक प्रयोग कएलहि नहि गेल। भारतीय कम्युनिष्ट परिदृश्य पर नजरि राखनिहार विचारकसभ कें देखल छनि जे एतय जोर वैचारिक दीक्षा देबा पर नहि,कैडरक नाम पर बंधुआ मजूर बनएबा पर देल गेल अछि।एतहुका विभिन्न कम्युनिष्ट पार्टी अपन-अपन बौद्धिक कुटीर उद्योगक लेल श्रमिक तैयार करबा लेल जे अक्षरबोध पाठशाला चलबैत अछि,ताहि मे चटियासभ कें मेधावी बनएबा पर नहि,रट्टू सुग्गा बनबए पर बेसी ध्यान रहैत अछि। एहन रट्टू सुग्गा,जेकरा राजनीतिक बोलचाल मे ‘छोटभईया’ कहल जाइत अछि। छोटभईया वा छुटभैया,जे अपन बुद्धि-विवेक कें ताल्लुक सं बाहर राखए आ ओतबे बाजए/लिखए जे ओकरा सिखाएल/रटाएल गेल अछि,ओतबे करए/चलए जे पोलित ब्यूरो लेल वांछित अछि।ओकर अवचेतनहु मे एहि प्रश्नक कल्पना तक नहि आबए जे मार्क्स त सर्वहाराक अधिनायकत्व पर बल देने छला,किन्तु लेनिन ओहि सिद्धांत कें साम्यवादी पार्टीक अधिनायकत्व मे बदलि देलनि,जे अन्तत: महासचिवक अधिनायकत्व मे बदलि गेल आ जेकर साक्षात रूप बचल-खुचल रूस,अगियाबैताल भेल चीन,लचरल बेनेजुएला आ मिझाइत क्यूबा आदि देश मे दृश्यमान अछि।भारतीय वामपंथ एहि सभक नकलची हएबाक फिराक मे आपादमस्तक भ्रमित भए ने घरक रहल अछि ने घाटक।एकरा पर स्वतंत्रता संग्रामक दौरान अंग्रेजक लेल स्वतंत्रता सेनानीसभक मुखबिरी करबाक आ गांधी-नेताजी आदिक प्रति अपशब्द आ अपमानजनक संज्ञासभ सं कलंकित करबाक आरोप रहल अछि।1940क दशक मे वामपंथीसभ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका ‘अनमास्क्ड पार्टिज एण्ड पोलिटिक्स’ मे गांधीक संग-संग नेताजी कें ‘आन्हर मसीहा’ कहल गेलए(आलोच्य कविक गांधीक प्रति कएल एहनहि सन टिप्पणीक चर्चा पूर्व मे कएल गेल अछि)। सुभाषचन्द्र बोसक प्रति त वाम शब्दावली भयावह रूप सं अपमानजनक आ अश्लील भए गेल रहए। हुनका ‘काला गिरोह’, ‘गद्दार बोस’ आ ‘हिटलरक अगुआ दस्ता’ तक कहल गेलए।वामपंथी लोकनि द्वारा नेताजीक आजाद हिन्द फौज कें भारतीय भूमि पर लूट,डाका,विध्वंस मचैनिहार घोषित कएल गेल रहए।1947 मे द्विराष्ट्र सिद्धान्तक समर्थन करब,1948 मे हैदराबाद मे भारतीय सेनाक विरुद्ध रजाकारसभक समर्थन करब,1962क युद्ध मे चीनक भाषा बाजि ओकर समर्थन करब,1967 मे हिंसक माओवाद कें जन्म देब,आपातकाल मे इन्दिरा गांधीक समर्थन आ जेपी आन्दोलन कें फासिज्म घोषित करब,कांग्रेसक संग मिलि फासिस्ट विरोधी सम्मेलनक सहभागी बनब आदि-आदि घटना भारतीय इतिहास मे दर्ज अछि आ भारतीय वामपंथक भ्रमित राजनीतिक चेहराक प्रमाण अछि।भारतीय वामपंथक ई हाल मात्र राजनीतिक स्तर पर नहि छै। प्रगतिशील लेखक संघक स्थापना जाहि परिस्थितिमे,जाहि लेखक लोकनि द्वारा भेल हुअए,कालान्तर मे ई कम्युनिष्ट पार्टीक एकटा विंग भए गेल। शोभा लेल भरतीक कुछ पद भनहि व्यक्तित्वक आधारपर भेटि जाइ,किन्तु एकर केन्द्रीय पदधारी बनबाक लेल पार्टीक कार्डहोल्डर हएब अनिवार्य अछि। प्रसिद्ध विचारक चौथीराम यादवक वामपंथी वैचारिकता पर हुनक दुश्मनहु कें कोनो शंका नहि भए सकैत अछि।किन्तु वएह चौथीराम जी कें प्रगतिशील लेखक संघक विलासपुर अधिवेशन मे खुलल मंच सं दुखी स्वर मे एहि बातक उपराग दिअए पड़लनि।हम स्वयं एहि संगठन सं जुड़ल रहल छी,बिहार राज्यक उपाध्यक्ष रहि चुकल छी आ एहि अप्रिय यथार्थक गवाह छी।एतेक चर्चा मात्र ई कहबाक लेल जे वैचारिक मार्क्सवादी हएब अलग बात छै,मार्क्सवादी कार्डहोल्डर हएब अलग बात।पहिल स्थिति मानसिक आ वैचारिक छै,उत्तम छै।दोसर स्थिति शारीरिक आ भौतिक छै आ वामपंथी राजनीति कें देखैत एकरा अधम कही,नहि कही,मध्यम कही,नहि कही,उत्तमक श्रेणी मे किन्नहु नहि अछि।एहि परिपेक्ष्य मे ई मानए मे कोनो संशय नहि जे कुणालक लिखल परिचय-प्रस्तावना मार्क्सवादी विचारक प्रतिफलन नहि,मार्क्सवादक प्रहसन अछि। हुनक लिखल टिप्पणीक एकहु टा अंशक पुष्टि ने एहि संग्रहक रचनासभ करैत अछि,ने रचनाकार।ई विचित्र स्थिति अछि आ एकर व्याख्या दू तरह सं कएल जाए सकैत अछि।पहिल ई जे परिचय-प्रस्तावनाक रूप मे कुणाल जे गाइडलाइन देलनि,तेकर अनुपालन रामलोचन जी अपन रचना मे नहि कएलनि।दोसर ई जे रामलोचन जी जे कुछ लिखलनि,तेकरा कुणाल जी ठीक-ठीक बुझिकए व्याख्यायित नहि कए सकला।ओना एकटा तेसरहु स्थिति भए सकैत अछि जे ने कुणाल जी रामलोचन जी कें पढलनि आ ने रामलोचन जी कुणाल जी कें पढलनि।ई तेसर स्थिति कनी हास्यास्पद छै,किन्तु मैथिलीक परिदृश्य,जेतय कोय केकरो नहि पढैत अछि बल्कि कुछ गोटे त पढितहि नहि छथि, कें देखैत एहि तेसर स्थितिक स्थिति बेसी सटीक लागैत अछि।एतेक धरि अवश्य जे ई परिचय-प्रस्तावना अपन गब्बरीय अस्तित्व सं कोनो विमर्श ठाढ करबाक कुल दायित्व समीक्षक-समालोचक पर बलात आरोपित कए दैत अछि आ तेकरहु विचित्र पक्ष ई जे एहि विमर्श लेल समालोचक कें कविताक अन्तर्वस्तु, ओकर शैली-शिल्प दिस कम,कविता मे जे नहि छै वा जे हएबाक चाही छल,तेम्हर उन्मुख करैत अछि।ई कनी अनेरुआ सन चुनौती अछि,किन्तु मैथिली आलोचना-साहित्यक दरिद्रता कें देखैत एहि चुनौती कें स्वीकार करब मैथिली आलोचनाक हित मे अछि।ओना स्व-निर्माणक प्रति घोर आस्थावान(आत्ममुग्ध) व्यक्ति संघर्ष-चेतनाक निर्माता भए सकैत अछि;विध्वंस कें आवश्यक माननिहार,सुधारवाद कें पूर्णत: अस्वीकार करनिहार संघर्षक वैचारिक धरातल तैयार कए सकैत अछि – ई सभ ततेक हाई-लेवलक गप छै जे एकरा मैथिलीक पोलित-ब्यूरोक जन्मजात व्यास-महासचिवलोकनि बुझथु त बुझथु,सर्वहारा-समुदायक माथक केशक उपर सं उड़ियाइत चलि जाइत अछि।किन्तु जेंकि अग्निलेखन आ अग्निहस्ताक्षर नामकरण मार्क्सवादी कविताक पैटर्न पर कएल गेल अछि त ई देखब उचित जे एहि पैटर्न मे कोनो तथ्यगत,वस्तुगत संगत छै की नहि। ‘मार्क्सवादी चिन्तन सं संपृक्त’ कविता मार्क्सक अपनहि लेखन सं शुरु भेल आ विश्वक विभिन्न भागक क्रांतिकारी व्यक्तित्वसभ सं समृद्धि पओलक।एहि पर पूर्व मे विस्तृत चर्चा कएल गेल अछि।मार्क्स,एन्जेल्स,लेनिन आदि मूलत: कवि नहि रहथि,राजनीतिक चिन्तक रहथि,अपन राजनीतिक उद्देश्यक पूर्तिक क्रम मे यदा-कदा किछु लिखैत रहथि।तें हुनकरसभक कविता मे काव्यक दृष्टिकोण सं नाराबाजी आ जोश रहए।माओत्सेतुंग आ होची मिन्ह सेहो एहनहि सन कवि रहथि,किन्तु हिनकादुनू मे कलात्मकताक संग-संग प्राकृतिक संवेदनाक सन्दर्भ बेसी रहए,जे हिनकासभक कविता कें तुलनात्मक रूप सं उल्लेखनीय बनबैत अछि।एतय बेसी विस्तार मे नहि जाए कए एतबे कहबाक अछि जे कम्युनिष्ट क्रांति सं जुड़ल बहुत रास लोग फुरसत मे कविता लिखलनि किन्तु ओसभ मूलत: कवि नहि छला। आगू जए कए एहि परम्परा मे एहन बहुत रास लोग अएला जे क्रांतिकारी गतिविधि सं जुड़ल त नहि रहथि,किन्तु एहि विचारधारा कें मानैत रहथि आ मूलत: कवि रहथि।एतय मात्र नाजिम हिकमतक चर्चा करैत चली,जे अपन देश तुर्कीए टा मे नहि वैश्विक स्तर पर चिन्हल गेला,प्रसिद्ध भेला। से हिकमत अपन ओहेन अनेकानेक प्रारम्भिक कवितासभ कें बाद मे खारिज कए देलनि,जे मात्र प्रोपगण्डा लेल लिखल गेल छल।किन्तु ई खारिजबला कार्रवाई ओ तखनि कएलनि,जखनि हुनक कविता उत्तरोत्तर विकास करैत गेल आ ओकरा ‘मार्क्सवाद’ सं बाहरहु स्वीकृति भेटलए।एतय कहबाक एतबे जे मार्क्सवादी कविताक दू धारा रहलए—एकटा प्रोपगण्डा कविताक आ दोसर शुद्ध (प्रोपगण्डामुक्त) कविताक। आब प्रश्न ई ठाढ होइत अछि जे आलोच्य कविक कवितासभ एहि दू धाराक कोन धाराक कविता अछि,कोनो धाराक अछिअहु वा नहि?वामपंथी धाराक आइ तक लिखल कवितासभ मे आलोच्य कवि कें एहन कोन तत्त्वक कमी बुझएलनि,जेकर पूर्तिक लेल हुनका स्वयं कविता लिखब आवश्यक बुझएलनि?हुनक अपन कविता एहि क्रांतिकारी विरासत मे किछु जोड़ैत अछि वा नहि?मार्क्सवादी चिन्तन मे सर्वहाराक शत्रु-समुदाय आ क्रांति-पथ मे बाधक तत्व कें सेहो चिन्हित कएल गेल अछि।ई देखब आवश्यक जे अग्निहस्ताक्षर सेहो ओहि शत्रु-दल कें चिन्हलनि अछि की नहि, अग्निलेखनक लक्ष्य-वेधक वृत्त मे ओ शत्रु-दल आएल अछि वा नहि आ ओकरा पर समधानल प्रहार भेल अछि वा नहि? अर्जुनक आंखि,माछक आंखि आ निशाना भारतीय परिपेक्ष्य मे सर्वहाराक सर्वाधिक प्रबल शत्रु अछि—उपनिवेशवाद। एहन शत्रु जे मायावी अछि,मायाक बलें अपन रूप बदलि लैत अछि,माया पसारि लोक-डीठ कें भ्रमित कए सकैत अछि,मायाजाल सं अपन बहुरूप कें मनोवांछित विस्तार दए सकैत अछि आ निरन्तर शोषण करितहु पीड़ित कें शोषणक कनिकहु टा आभास नहि हुअए दैत अछि।उनटे पीड़ित कें अपन शोषण एकटा प्रभु-कृपाक आनन्ददायी रूप बुझाइत रहैत अछि। अपन वर्तमान राजनीतिक,आर्थिक आ सांस्कृतिक निर्मिति पर सर्वहारा-प्रतिबद्धताक संग दृष्टिपात करी त एहिपर औपनिवेशिकताक घातक प्रहारक स्पष्ट निशानसभ देखाइ पड़त।दृष्टिक स्पष्टता हुअए त एकर बाह्य आ आन्तरिक घावसभ ठाम-ठाम उपस्थित देखाइत अछि आ हमरासभक मूंह दूसि रहल अछि।इएह ‘घवाह निर्मिति’ आइ अपनसभक राष्ट्र-समाजक निर्णायक आ भाग्यविधाता बनल अछि।प्रकट रूप मे ई ब्रिटिश उपनिवेशक करतूत बुझाइत अछि आ बहुलांश मे ई सत्य सेहो अछि।मानल जाइत अछि जे ई देश जन्म-जन्मान्तर तक ब्रिटिश उपनिवेश बनल रहए,ताहि लेल अंग्रेजसभ एहि देश पर तीन चीज आरोपित कएलक—ब्रिटिश पार्लियामेन्टक नकलबला भारतीय लोकतंत्र,ब्रिटिश नौकरशाहीक प्रतिरूप घटिया शासनतंत्र आ तेसर फोंकाएल औद्योगिक सभ्यता। चाही त चारिम तत्त्वक रूप मे मैकालेक शिक्षा-पद्धति कें सेहो राखि सकए छी। अंग्रेजसभक ई प्रयत्न एतेक अप्रत्यक्ष आ सूक्ष्म रहल अछि जे एकरा पकड़ब कठिन।एकरा चिन्हबा मे संकट ई छै जे औपनिवेशिक मंशा कें आधुनिक सभ्यताक अर्थक अढ मे झांपि देल गेल अछि। एकर व्यवहार उपर सं अतिशय सुधारवादी, लोकतंत्रात्मक आ प्रगतिशील रहल अछि।एकर सम्पूर्ण दमन-लूट-शोषणक तंत्र खूब महीन आ अप्रत्यक्ष रहल अछि। भारतीय बुद्धिवादक संकट ई छै जे एकरा थोड़-बहुत बुझितहु,एकर कम-बेसी विरोध करितहु ओ एकरा प्रति आकर्षित सेहो छै।स्वाभाविक छै जे चाहे हमरासभक लेखन हुअए,चाहे हमरासभक राजनीतिक दल हुअए,चाहे हमरासभक विभिन्न शासन-सत्ता हुअए,सभ एहि ब्रिटिश औपनिवेशिकताक अधीन विकसित भेल अछि आ हमसभ एकरहि प्रभाव मे यांत्रिक रूप सं प्रत्येक क्षेत्र मे क्रांतिकारी भेल छी।किन्तु ई सभ त एम्हर दू-चारि सौ वर्षक खेरहा अछि। हजार-हजार वर्ष सं भारतीय राष्ट्र-समाज एहि ब्रिटिश औपनिवेशिकता सं बेसी भयंकर,बेसी घातक,बेसी जहरी औपनिवेशिकताक दंश सं पीड़ित रहल अछि।समकालीन भारतहु मे पुरातन भारतक औपनिवेशिकताक रक्तजीवी तत्त्व आइअहु कतेको धूल-धुसरित परत,गली-कोनटा,दीमकक भोज्य-अधभोज्य बनल पोथीसभ,बीहड़ जंगल-पहाड़ आ भुतिआएल-अनचिन्हार भेल खण्डहरसभ मे त अचेत-अवचेत अवस्था मे उपस्थित त अछिए, विरासतक स्वघोषित ठीकेदार बनल पण्डा,महन्थ,सन्तादिक पौरोहित्य-प्रवचन आदि मे खूब सचेत भेल हुंकार भरि रहल अछि।ई पुरोहिति उपनिवेश हजारक हजार वर्ष तक अपन घातकता सं जे कएलक से कएलक, ब्रिटिश उपनिवेशवादक संग नत्थी भए कए ई औरहु ज्ञानघातक भए गेल अछि।स्वतंत्रता आ संविधान-प्रदत्त अवसरक प्रभाव सं अधिकार-चेतनाक जे सुगबुगी-छटपटी-कछमछी अजुका सर्वहारा-समुदायक बीच जागल अछि,ताहि सं चौकन्ना भए उपनिवेशवादी तत्त्वक ई मिश्रित अभिजात्य-मानस नव-नव खटराग लए कए मंचस्थ भए रहल अछि।‘तिरहुता’क ‘मैथिली’ नामकरण मे सफलता पाबि आब एकरा संग ‘मिथिला-मैथिल’क प्रपंचत्रयी रचि साहित्य-संस्कृतिक मंचसभ पर मैथिल ब्राह्मणक जातीय आ अणुष्ठानिक परिधान ‘पाग’ कें मिथकीय मिथिलाक संस्कृतिक प्रतीक कहि जे तमाशा ठाढ कएल जाए रहल अछि,से यजमानी उपनिवेशक डोरी ढील भेलाक बाद एहि क्षेत्र-विशेष (कोलकाता मे बसए सं पहिने आलोच्य कवि सेहो एहि क्षेत्रक रहवासी रहथि) कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश बनएबाक नवका उपक्रम अछि।ई पौरोहित्य-परम्परा जाति-वर्ण-धर्मक नाम पर मनुष्य-मनुष्य मे विभेद करबाक ,स्वयं कें उच्च आ आन कें नीच मानबाक मानसिकता कें पसारबाक अपराधी रहल अछि आ एकरा अपन भरण-पोषणक माध्यम बनएने रहल अछि।इएह पुरोहिती-उपनिवेशवादक परिणाम अछि जे ई राष्ट्र-समाज,एतहुका लोक-वेद कहियो एकजुट भए कए आततायी राजवंशसभक,विदेशी आक्रांतासभक विरुद्ध लामबन्द नहि भेल आ जं कहियो एकजुटताक प्रारम्भिक चरण अएबहु कएल त अगिला चरण मे एहि विभेदकारी तत्त्वक कुप्रभाव मे छिन्न-भिन्न भए गेल। मार्क्सवाद वैश्विकताक पैरोकार अछि,किन्तु अपन मौलिक सोच मे क्षेत्रवादक घोर विरोधी अछि।एकर मानब छै जे क्षेत्रीयताक आग्रह सं सर्वहाराक एकजुटता खण्डित होइत अछि आ ई साम्यवादी राष्ट्रक निर्माण मे बाधक होइत अछि। क्षेत्रीयतावाद साम्राज्यवादक ओ हथियार अछि जे सामन्तवाद,राजतंत्रवाद आदिक रूप मे परिवर्तन, आधुनिकता,वैश्विक भाइचाराक धुर विरोधी होइत अछि,यथास्थितिक पोषक होइत अछि, अतीतोन्मुख होइत अछि,भविष्य-दृष्टि कें बाधित करैत अछि,चरित्र मे बूर्ज्वा होइत अछि आ सर्वहाराक गुलामीक मूल कारक होइत अछि।कोनो देशक कम्युनिष्ट क्रांति राष्ट्रनिर्माणहि लेल भेल अछि आ एहि मे राष्ट्रक प्रति घृणा,ओकर विखण्डनक कामना आ क्षेत्रीय राज बनैबाक लिलसा कतहु नहि देखाएल अछि।भारतक प्रगतिशील-जनवादी कविताक कविलोकनि लेल, पेरेस्त्रोइका आ ग्लास्नोस्तक परिणामस्वरूप विघटनक नियति कें प्राप्त होइ सं पहिने तक,प्रिय यूटोपिया रहल सोवियत संघ एकर ठोस प्रमाण अछि। ओना संज्ञा जे रहओ,उपनिवेशवाद,पुरोहितवाद,पुंजीवाद,सामन्तवाद सभ एकहि सिक्काक विभिन्न पहलू अछि, अपन मूल मे सर्वहाराक शत्रु अछि आ जातिवाद,सम्प्रदायवाद आ क्षेत्रीयतावाद आदि एकरहि बाइ-प्रोडक्ट अछि। ओह,कलकत्ता ! [एतय आबि अकस्मात रामलोचन जीक 12 फरवरी,2021क भोर मे बिना केकरहु किछु कहनहि अपन घर सं बहराए जएबाक आ व्यक्तिगत,सामुहिक आ प्रशासनिक स्तर पर समग्र प्रयासक बादहु हुनक कोनो सूचना नहि भेटबाक स्तब्धकारी सूचना भेटैत अछि। कलम आ लिखबाक आवेग दुनू ठमकि जाइत अछि,आगू बढए सं नठि जाइत अछि। आ ई आलेख रामलोचन जीक जीवनहि जकां …….] कलकत्ता ! जेकरा समक्ष बम्बई कें पिछड़ल शहर मानल जाइत रहए। जे औषधि आ कपड़ाक अखिल भारतीय केन्द्र रहए। जेतय आजादीक बाद भारतक शीर्ष कम्पनीसभक,मल्टीनेशनल कम्पनीसभक मुख्यालय रहए। जेकर एयरपोर्ट सं भारतक समस्त एयरपोर्टक सम्मिलित उड़ान सं बेसी उड़ान होइत रहए। जे एकटा अति-समृद्ध सांस्कृतिक विरासतक केन्द्र रहए आ विभिन्न संस्कृतिक समावेशी सेहो। जेतय वामपंथी शासन अएलाक बाद सभटा उद्योग खण्ड-विखण्ड भए गेलए आ विभिन्न उद्योग कें ओतए सं अपन कारबार समेटए पड़ि गेलए। जेतय हड़ताल सामान्य बात रहए आ अक्सरहां ई हिंसक रूप लए लैत रहए आ ताहि मे कतेकहु प्राण गेलए। जेतय सं धीरे-धीरे राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनीसभ भागल,बौद्धिक आ कलाकार भागला आ साम्यवादी राजनीतिक क्रियात्मक रूप कतेक भयावह होइ छै,तेकर ओ प्रदर्श भेल। जे वर्ष 2001 मे कलकत्ता सं कोलकाता भेल। ताहि कलकत्ता कें कलकत्ता मे प्राय: पांच दशक बितैनिहार कवि रामलोचन ठाकुर एकाध ठाम बीध छोड़ि अपन रचनासभ मे कोनो मोजर नहि देलनि। की हुनका ई बूझल रहनि जे ई कलकत्ता हुनक अज्ञात-यात्राक प्रस्थान-बिन्दू हएत? (अपूर्ण) पचपनियाँ बनाम बभनियाँ मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर मैथिली साहित्यक संवादगत परिदृश्य प्राय: निद्रावस्थहि मे रहैत अछि। मौसमी घटना जकाँ किछु विद्यापति-समारोह,त्रैमासिक कथा गोष्ठी ‘सगर राति दीप जरए’ आ सहित्य आकादेमी द्वारा यदा-कदा आयोजित कवि-सम्मेलन/विचार-गोष्ठी सन किछु ढेला बीच-बीच मे एहि चहबच्चा मे ‘धप’ जकाँ गिरैत अछि,कादो-सनाएल पानि मे किछु क्षण लेल किछु लहरि उठैत अछि आ थोड़बे कालक बाद चहबच्चाक पानि मोफ़तिया यजमानी चुड़ा-दही भकोसि कए फोंफ काटैत थुलथुलहा पुरहित जकाँ स्थिर आ निद्रावश भए जाइत अछि।इहो मौसमी घटनासभ अपन सीमितता मे समेटल रहि जाइत अछि आ एकरसभक प्रकृति सेहो एकांगी अछि।एकर सहभागी लोकनि कविता,कथा वा आलेखक माध्यम सं अपन बात कहि अपन-अपन ठाम धए लए छथि,श्रोता वा अन्य सहभागी दिस सँ ताली-वाहवाहीक अतिरिक्त कोनो ठोस प्रतिदान नहि आबैत अछि,आन कोनो प्रतिदान अपेक्षितहु नहि रहैत अछि। नतीजा जे ई सभटा उपक्रम एकालाप,प्रलाप,विलाप तक सीमित रहि जाइत अछि,संलापक स्थिति नहि बनाए पाबैत अछि।वाद,प्रतिवाद आ संवादक अभाव मे मैथिलीक द्वन्द्ववाद पुनकिअहि नहि सकल अछि आ तें एकर अधिकांश स्वरुप एकरस आ बासी अछि। एमहर आबि पोथी प्रकाशनक गति त जोर पकड़लक अछि,किन्तु ओकर वितरण-व्यवस्था अखनिअहु व्यक्तिगत प्रयासहि तक सीमित अछि।पत्र-पत्रिकाक दलिदरा त जेना मैथिलीक भाग्य-रेखहि मे लिखल अछि।जे किछु बहराबितहु अछि,से कोनो ठोस वैचारिकता आ दृष्टिक अभाव मे बीधहि पुड़ैत रहैत अछि—कोनो योजना नहि,कोनो नवीन परिकल्पना नहि,कोनो दूरगामी सँकल्पना नहि—जे रचना भेटि गेल,छापि देलहु। परिणामस्वरुप मैथिली साहित्यक परिदृश्य संवादहीनताक नियति भोगबाक लेल अभिशप्त अपन स्थैर्यक ठाम पर कोनो पाथर जकाँ अचल पड़ल रहैत अछि आ अपन एहि दयनीय दशा पर कानिअहु नहि पाबैत अछि।ई संवादहीनता,ई विमर्षहीनता कोनो भाषा-साहित्य लेल बहुत खतरनाक आ मारूक होइत अछि।भाषा-साहित्यक जीवंतता, विकास आ आधुनिकीकरण लेल ई आवश्यक छै जे ओकर वैचारिकता,ओकर रचनात्मकता सतत प्रवहमान रहए। लेखन व्यक्तिगत कर्म होइतहु सामुहिकताक मुखापेक्षी अछि। तें लेखक कें बुझल रहबाक चाही जे ओकर चारुकातक लेखनक परिदृश्य की छै,के सभ लिखि रहल छथि,की लिखल जाए रहल छै,केना लिखल जाए रहल छै आ तहि मे ओकर अपन स्थिति आ स्थान की छै,ओकर अपन दिशा ठीक छै वा ओकरा मे कोनो परिवर्तन वांछित छै।लेखक जहि भाषा मे लिखि रहल छै,ओहि भाषा सँ सम्बन्धित आन्तरिक आ वाह्य गतिविधि की छै, तहि गतिविधि सँ भाषाक लाभ भए रहल छै वा हानि,तहु पर नजर राखब आ अद्यतन रहब सेहो लेखक लेल आवश्यक छै।लेखकक अपडेट रहब ओकर लेखन आ भाषा—दुनू कें परिमार्जित करए छै,आधुनिकता आ प्रगतिशीलता सँ लबरेज करए छै।किन्तु,जँ सुचना-संवाद सँ अपडेट रहल त से मैथिली की भेल! सूचना-संवादक अभाव मे मैथिलीक अधिकांश लेखन एकभगाह आ असंतुलित भेल अछि।भावयित्री आ कारयित्री दुनू क्षेत्र मे अराजकता व्याप्त अछि।इतिहास-लेखन आ वैचारिक क्षेत्र त झूठ,प्रपंच आ क्षुद्रताक जीवन्त दस्तावेजहि बनल छै।प्रतिरोधी आ यथार्थवादी लेखक-शक्तिक अभाव मे भाषा आ क्षेत्रक ‘सत्य’ ठोह पाड़िकए कानि रहल छै।कोय ओकर नोर पोछनिहार नहि।इतिहास-लेखनक कुरुक्षेत्र मे प्रतिद्वन्द्वीविहीन भेल धृतराष्ट्र अपन सार आ सखा-संतानक सँग उन्मत्त भेल अपन पैशाचिक-विजयक घोष कए देने छै।मनमानीक इ स्थिति छै जे एकटा सबाल्टर्न-शकुनी-इतिहासकार भुइयांगत यथार्थ कें आम आदमीक नजरि सँ देखबाक दाबी ठोकैत एकर पुनर्लेखनक गप करए छथि आ एहि क्रम मे हुनक सम्पूर्ण शक्ति अपन जातिक श्रेष्टताक वर्णन सँ होइत हुनक अपन व्यक्तिगत/पारिवारिक कुलीनताक स्थापना आ ओकर दस्तावेजीकरण मे खर्च भए जाइ छै।इतिहासक सामाजिकताक नाम पर एहन विकट निर्लज्जताक लिखित प्रदर्शन होइ छै आ एहि समाजविरोधी विध्वंसक लेखन पर कतहु सँ कोनो प्रतिरोधक स्वर नहि अभरए छै। प्रतिपक्षक अक्षमता आ एकरा प्रति रूचिहीनता कें दोष सेहो देल जाए सकए छै,किन्तु एकर एकटा प्रमुख कारक संवादहीनता सेहो छै,जे साहसिक आलोचना कें पुनकए नहि दए रहल छै। नतीजा छै जे निहित स्वार्थी तत्वसभ निधोख भए कए मैथिली साहित्य न्यायालय सँ एक्स-पार्टी डिक्री लेने चलि जाए रहल छै। शैलीक एकटा उक्ति छनि जे,”जेना एकटा निराश चोर चोरसभ कें पकड़निहार बनि जाइत अछि,तहिना निराश भए कए लेखक आलोचक बनि जाइत अछि”। शैलीक एहि उक्तिक अर्थ लोक अपन-अपन आग्रहक आधार पर निकालि सकए छथि।एहि ‘निराशा’क व्याख्या सेहो भिन्न-भिन्न प्रकार सँ कएल जाए सकए छै।कहल जाए सकए छै जे ई ‘निराशा’ लेखकक अपन लेखनक नि:शक्तता,अपंगता वा असफलताक परिणाम छिअए।किन्तु एकर एकटा दोसरहु पक्ष छै आ खासकए मैथिलीक प्रसंग मे ओ बेसी प्रासंगिक आ उपयुक्त बुझाइ छै।एतय जाति-बिरादरी, गोधिया-दियादवादक किल्लत सँ ग्रस्त कतेकहु सशक्त लेखक आ ओकर लेखन कें यत्नपूर्वक अनठिआएल गेल छै आ षड्यन्त्रपूर्वक ओकरा चिन्हार नहि हुअए देल गेल छै।तें ई ‘निराशा’ सशक्त,सार्थक आ प्रगतिशील लेखनक अछैतहु ‘पहचान’ आ ‘मोजर’ नहि भेटबाक परिणाम बेसी बुझाइ छै।गैर-मैथिल लेखकसभक सँग त ई अनदेखी परिपाटी जकाँ भेलहि छै,गुट-गिरोह सँ अलग रहनिहार मैथिलहु लेखक कें ई दण्ड भोगए पड़ल छनि।आवश्यकता एहि बातक रहए जे शैलीक एहि उक्ति कें चरितार्थ करैत एहि दुनू प्रकारक ‘निराशा’क परिणामस्वरूप ‘चोर पकड़निहार’ आलोचकसभक उत्पत्ति होइतए आ यथास्थिति कें खुल्ला चुनौती नहि त चुनौतीक आगमनक आशंकाजनित भय होइतए।अखनि तक एहन अपेक्षित स्थिति नहि आएल अछि।कामना करी जे ई उत्पत्ति जँ अखनि तक नहि भेलए त आगु हुअए,निकट भविष्यहि मे हुअए। फ़ारसीक एकटा कहावत छै—“अदावत के आंखि मे हुनर बहुत बड़का ऐब छै”। मैथिलिक पुरस्कार-सम्मान-लुटेरा समुदायक विभिन्न गुट-गिरोहक सँचालक आ ओकरा बलें वर्चस्वशाली बनल लोकक फोंक-भयभीत मानस कें हुनरमंद लोकक अस्तित्व खतरा जकाँ बुझाइत आएल छै आ ओ एहन तत्त्व सँ एन-केन-प्रकारेण छुट्टी छोड़ाए लिअए चाहए छै।एहि लेल ओसभ हुनर कें हतोत्साहित,भ्रमित करबाक लेल कोनहुटा छल-प्रपंच बांकी नहि छोड़य छथि। एहन सन संवादहीन,संवेदनहीन आ मौन-प्रपंचमय परिदृश्य मे सुभाष चन्द्र यादवक ‘गूलो’क प्रकाशन आ एहि मे प्रयुक्त भाषा कें ‘पचपनियाँ’ नामकरण करैत एहि पर आलेखक माध्यम सँ अपन पक्ष राखब एकटा एहन घटना छै,जेकर मैथिलि-थाना द्वारा सँज्ञान लेब,डायरी मे दर्ज करब,ओकर तहकीकात करब आ निष्कर्ष पर पहुंचब बहुत आवश्यक छै।एहि घटनापर सकारात्मक विमर्षक मार्ग प्रशस्त करब मैथिली भाषा आ एकर लेखन कें आत्मावलोकन,आत्मपरीक्षण आ आत्मशोधन/आत्मपरिष्करणक अवसर प्रदान करत।एहि अवसरक लाभ लेबाक चाही। सुभाष जीक आलेख एहि बात कें उजागर करए छै जे साहित्यक दुनियां मे सभकिछु पवित्र आ पूजनीय नहि छै,आनहि क्षेत्रसभ जकाँ एतहु अपवित्र,अशोभन आ निन्दनीय तत्त्वक उपस्थिति रहए छै।मैथिलीक परिपेक्ष्य मे त ई उपस्थिति प्राणघातक मात्रा मे,जानमारू बहुमत मे छै। सुभाष जीक आलेख विमर्ष कें जगैबाक लेल यथेष्ट खोराक दैत अछि,यद्यपि कि हुनकर कथनसभ मे बहुत रास झोलसभ सेहो अछि।जहि आलेखक माध्यम सँ ओ अनेक रास प्रश्न उठबए छथि,तहि आलेख पर सेहो अनेकानेक प्रश्न उठैत अछि।पहिल झोल त नामकरणहि मे अछि।ओ कहए छथि जे कोनो सोल्हकन सँ पुछला पर ओ अपन मातृभाषा ‘ठेठी’ बतबैत अछि आ शिक्षित सोल्हकन कहैत अछि जे,’मैथिली त बाभनक भाषा छिऐक’। सोल्हकन एकरा ‘ठेठी’ कहैत अछि।ठीक!शिक्षित सोल्हकन एकरा की कहैत अछि,से ओ नहि लिखलनि। हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि जे सोल्हकनहि नहि,पढल-लिखल सम्पूर्ण मैथिलेतर जातिक लोक एकरा सभदिन ‘तिरहुता’ कहैत आएल अछि,आइअहु कहैत अछि। हं,पुछला पर ई प्रतिक्रिया अवश्य भेटैत अछि जे मैथिल ब्राह्मणक आग्रही प्रभाव मे ‘तिरहुता’ कें ‘मैथिली’ सँज्ञा दए देल गेल अछि।ई प्रतिक्रिया एकदम वाजिब आ तार्किक छै आ एकर प्रमाण छै जे आइयो एकर लिपि कें ‘तिरहुता लिपि’ कहल जाइ छै—किछु एजेन्डाजीवी कें छोड़िकए।तखनि सुभाष चन्द्र यादव जी एकर नामकरण ‘पचपनियाँ’ कोन आधार पर कएलनि?हुनक आलेख मे एहि प्रश्नक उत्तर नहि अछि। ओ लिखए छथि जे सुपौल,सहरसा,मधेपुरा,अररिया तथा पुर्णियाक सवर्ण, पिछड़ा, दलित एवं सर्वहारा अर्थात सभ जाति आ वर्गक लोक एहि मैथिली(पचपनियाँ) मे बाजैत अछि।ई बाइ मे देल वक्तव्य जकाँ अछि – कोनो मौलवीक फ़तवा जकाँ।ध्यातव्य जे जेकरा सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली मे पचपनियाँ कहल जाइ छै,तहि मे सवर्ण आ दलित त नहिए टा आबैत अछि,यादव सेहो एहि गोल मे सम्मिलित नहि अछि। ‘सर्वहारा’ शब्द सेहो एहि सम्पूर्ण समुदाय कें नहि समेटैत अछि।एहि परिपेक्ष्य मे एकर नव-नामकरण ‘सबजनियां’ बेसी उपयुक्त होइतए।जँ क्षेत्रीयताक विभाजन कें आधार बनाबी,तखनिअहु एकर नामकरण ‘कौशिकी’ किंवा ‘कौशिकी मैथिली’ हएबाक चाही छल।ओना एहि नामकरणोत्सव मे ‘मैथिली’ सँज्ञाक प्रयोगहि किऐ हुअए? एतबे नहि,एहि नामकरणोत्सवक स्वघोषित पौरोहित्य ग्रहण करबाक धड़फड़ी मे सुभाष चन्द्र यादव जी एहि क्षेत्र-विशेष कें मिथिला कहि अनजानहि मे वएह एजेन्डा कें विस्तार दए दैत छथि,जेकरा लेल किछु मुर्दा-संस्कृतिक उघवाह अतीतजीवी लोकनि ढेका खोलिकए झालि बजा रहल छथि। डा मेघन प्रसादक सँग एकटा साहित्यिक कार्यक्रम मे कएल गेल अपमानजनक व्यवहार निकृष्टता आ अधमताक श्रेणी मे आबैत अछि आ एहन कुकृत्य करनिहार कें विद्वान की,मनुष्यहु नहि मानल जाए सकैत अछि। नीक आ प्रशंसनीय बात जे सुभाष जी एहि कुकाण्ड सँ विचलित भेला आ तत्क्षण ओकर प्रतिकार कएलनि।किन्तु सुभाष चन्द्र यादव कोनो छोटभैया-नेता किंवा सियासी-भोलंटियर नहि छथि।ओ लेखक छथि आ लेखक अपन प्रतिकार वाणी-मात्र सँ नहि,लेखनक माध्यम सँ करए,से अपेक्षित रहैत अछि।मेघन-काण्ड भेला कतेकहु वर्ष बीत गेल,एहि अवधि मे सुभाष जी बहुत किछु लिखलनि,किन्तु एहि घटना पर लिखल हुनकर कोनो सँस्मरण,कोनो रिपोर्ताज, कोनो निबन्ध व्यक्तिगत रूप सँ हमरा त देखल-पढल नहि भेल।ओ कहि सकए छथि जे सभटा पत्र-पत्रिका पर बाभनहिसभक आधिपत्य रहए,तें हुनकर एतद्सम्बन्धी रचना नहि छपल।प्रश्न तखनिअहु अपन ठाम पर छै जे की ओ एहि सोल्हकन-अपमान-काण्ड पर किछु लिखने रहथि,लिखलनि त कतय छपलनि,नहि छपलनि त के नहि छापलकनि आ कोय जँ नहि छापलकनि त ओ स्वयं एकरा प्रकाशित किऐ नहि कएलनि? सुभाष जीक मामला मे त आर्थिक सँकटहु कोनो बहाना नहि अछि।‘साफ दिखते भी नहीं,सामने आते भी नहीं’ सन गप!मेघन जी सँग भेल कुकृत्यक वाजिब आ असली प्रतिकार त इ रहए जे एहि घटना कें लिखिकए दस्तावेजी रूप देल जएतए आ एकर प्रस्तोता अपन कलम कें नोर आ लहू मे बोरि-बोरि लेखन-शक्तिक एहन सदुपयोग करितथि जे पढनिहार-सुननिहार एहि करतूत पर सिहरि उठितए,अपरिमित आक्रोष सँ भरि जएतए आ करतूतक दोषी कुकर्मीसभ पर असीम घृणा सँ थू-थू करितए।से नहि कए,बाभनहि राजकमल चौधरीक अभिनन्दन-लेखन करब हुनक प्राथमिकता मे किऐ अएलनि? देश मे लोकतंत्र छै,एकरा द्वारा प्रदत्त अधिकार छै,तें जवाबतलबी हएबाक चाही।किन्तु अधिकारक सँग कर्तव्य सेहो जुड़ल छै आ तें उत्तर मांगनिहार कें उत्तर देबाक उत्तरदायी सेहो हुअए पड़ए छै। लेखनक प्रारंभिक दौर मे कोनो लेखक अपन लेखन-भाषाक राजनीति वा आन गतिविधिसभ सँ अनभिज्ञ आ निर्लिप्त रहैत अछि। ओकर लेखकीय चेतना मूलत: अपन लेखन पर केन्द्रित रहैत अछि।तें अपन आरंभिक लेखन मे आनहि लेखकसभ जकाँ सुभाष जी जँ बभनियाँ मैथिलीक प्रयोग कएलनि आ साहित्यिक गोष्ठी,सेमिनार आदिक सँग-संग अपन दैनिक बैठकासभ मे बाभनहिक सँगति धएने रहला,त ई स्वाभाविक मानल जए सकैत अछि।किन्तु तिरहुता किंवा ठेठी (जेकरा ओ आग्रहपूर्वक पचपनियाँ कहए छथि) मे लिखबाक बेगरताक भान त हुनका मेघन प्रसादक सँग भेल बेहुदगीक बादहि भए जएबाक चाही छल।दुर्भाग्य जे तहिया हुनका ई इलहाम नहि भेलनि।तेकर बादहु हुनक लेखनक माध्यम बभनिअहि मैथिली रहल आ हद त ई जे पचपनियाँ मैथिलीक एजेण्डा उठाएब आ ओकर तरफ़दारी-पैरोकारी करबाक लेल सेहो ओ बभनिअहि मैथिली कें अपन माध्यम किंवा औजार बनएलनि।की हुनका सन अति-प्रबुद्ध लेखक कें ई सामान्य सन बात नहि बुझल भेलनि जे कोनो भाषिक-परम्परा (लेखन, शैली,वर्तनी) मात्र मुद्दा उठएला,तहि पर नाराबाजी वा हू-ले-ले कएला वा कोनो अज्ञात अस्तित्व सँ ओकर मान्यता,स्वीकृति वा प्रमाणपत्रक याचना कएला सँ नहि,ओहि मे लेखनक निरन्तरता सँ बनैत अछि? एहि प्रसंग मे दू टा लेखक त विषयगत रोल माडलक रूप मे मैथिली मे अपन उपस्थिति दर्ज कएनहि छथि आ सुभाष जीक दृष्टि-परिधिअहु मे हएबहि करता।तारानन्द वियोगी अपन लेखन मे बहुत कुशलताक सँग अपन गाम-घर-परिवारक अनेक शब्द आ वाक्यांशक प्रयोग करए छथि आ बभनियाँ मैथिली कें एकटा अलग तरहक ग्राम्य-सौन्दर्य सँ सज्जित कएलनि अछि,त जगदीश मंडल अपन विशेष वर्तनी आ शैलीक माध्यम सँ विपुल लेखन कएलनि अछि आ एकटा बेछप उदाहरणक रूप मे स्वयं कें प्रस्तुत कएलनि अछि।जगदीश मंडल एतबहि पर नहि रुकला अछि।ओ अपन विशिष्ट शैलीक निर्माणक सँग-संग ओकर विकासक लेल एकटा वृहत बौद्धिक-समुदाय कें अपन सँग लए कए चलए छथि आ साहित्यिक-सहकारिताक अनुपम प्रयोग मे सफल भेल छथि। हिनकासभ सँ प्रेरणा लए मे सुभाष जी कें के रोकलकनि?दोसर बात ई जे कोय केकरो बात अहिना नहि मानि लए छै।तें प्रेरणा देबए सँ पहिने स्वयं मे प्रेरणाक स्रोत उत्पन्न करए पडए छै।प्रेरणाक सत्त्व ई छै जे एकर महत्व दए सँ बेसी ग्रहण करए मे छै। अहांक वैचारिक व्यक्तित्व प्रेरक अछि तखनहि कोय अहां सँ प्रेरणा ग्रहण करत।प्रेरणादायी व्यक्तित्व बनबाक लेल भीमराव अम्बेडकर महाड़ मे जल-सत्याग्रह चलैलनि, नासिक मे कालाराम मन्दिर मे दलित-प्रवेश लेल आन्दोलन कएलनि।भारतक सँविधानक निर्माणक सँग-संग दलित-अस्मिता आ आन-आन विषय पर प्रचूर लेखन कएलनि।ठीक छै जे सभक तुलना अम्बेडकर वा गांधी सँ सँ नहि कएल जएबाक चाही,किन्तु जे स्वयं के एहि परम्परा-पुरुषक रूप मे प्रस्तुत करए चाहए छथि,हुनका सँ त ई पुछलहि जाए सकैत अछि जे अहां लग अपन पूंजी की अछि?इतिहास कें बिसरब,त ऐतिहासिक भूल करब।जहि सर्वहाराक गप एहि प्रसंग मे आएल अछि,ओकर नायक के रहए,के छै? ओ केकरा सँ प्रेरणा ग्रहण करत?एक समय रहए जे कोय एहि समाज कें अपन नायक उधार देबाक लेल तैयार नहि रहए।किऐ? एकमात्र कारण ई जे ई सर्वहारा अपन नायक के चुनब,मानब छोड़ि अपन बुद्धि-विवेक कें ओकरहि सभक चौखटि पर राखि आएल,जेकरा सँ ओकरा लड़बाक रहए।दुर्भाग्य रहलए जे ई वर्ग कहियो बुद्ध कें पकड़लक,कहियो कबीर,कहियो रैदास कें,कहियो ज्योतिबा फुले कें,त कहियो बिजली पासी,बिरसा मुण्डा,झलकारी बाई,सुहेलदेव कें आ अन्तत: फेर पुरोहिती-चौखटि पर घुरि आएल। कौशिकी-कक्षक भीम केवट आ लौरिक मनियार सोल्हकन-लोकसमाज स्मृति मे यथावत छथि,किन्तु सोल्हकन-अभिजात्य लेल त्याज्य किऐ छथि?प्रारम्भिक दिन जेहन हुअए,किन्तु सुभाष जी सबदिन एलिट बनल रहबाक लेल प्रयासरत रहलाह अछि।एहि क्रम में ओ पचपनियाँक पौध लगबए सँ पहिने जमीन तैयार करबाक अनिवार्यता कें बिसरि गेल बुझाइ छथि।से नहि त पहिने उगरी महाराज,सोनाय महाराज,चिल्का महाराज,लाला महाराज,लालमैन महाराज,छेछना डोम,दीना भदरी,अमर बाबा आ सलहेस इत्यादि हुनक लेखनक परिधि मे किऐ नहि अएला।ई सभ नायक आन-आन जातिक छथि,किन्तु यादवहु मे त लौरिकक अलाबे कारू खिरहरि,बीशू राउत,महिनाथ आदि लोकनायक भेला।जखनि अपन प्रतिरोधक अभिव्यक्ति लेल अहां जाति कें आधार बनबए छिअए त अपन जातीय आधार कें त पहिने सुदृढ करू। देश स्वतंत्र अछि,लोकतंत्र कें अंगीकृत कएने अछि आ देशक आधुनिक भूगोल प्रशासनिक दृष्टिकोण सँ राज्य, प्रमण्डल,जिला,अनुमण्डल,प्रखण्ड आदि मे विभक्त अछि। एहन स्थिति मे आधुनिक व्यवस्था कें तिलांजलि दएत कोनो कपोल-कल्पित पुरातनकालक मिथकीय ‘मिथिला’ नामक यूटोपियाक कामना करैत ओकरा पुनर्स्थापित करबाक चौल करब अंगुरी पर गिनल जाएबला किछु अतीतजीविताक कारोबारीसभक काज अछि आ ई बात मैथिलेतर समुदाय त बुझितहि अछि,मैथिलक बुझनुक बहुमत सेहो एहि यथार्थ सँ अनभिज्ञ नहि अछि।एहन स्थिति मे ‘पचपनियाँ’क पैरोकारी करैत-करैत सुभाष चन्द्र यादव जी कें एहि यूटोपियाक गह्वर-पूजन मे भक्तिपूर्वक साष्टांग दण्डवत भए झालि बजाएब केना सोहएलनि?जखनि अनेक जिलाक गजेटियर लिखनिहार महान अण्वेषी इतिहासकार पी सी रायचौधुरी सहरसाक गजट लिखैत काल एहि क्षेत्र-विशेष कें कोनो मिथकीय-राजक हिस्सा मानए मे सशंकित भए गेला,एकरा सर्वकालीन स्वतंत्र क्षेत्र कहलनि,तखनि इतिहासक ककहरा सँ अनभिज्ञ कोनो व्यक्ति एहि तरहक भ्रम पसारए मे सहायक केना भए सकैत अछि? एतबहि नहि,ओ प्रकारान्तर सँ ईहो प्रस्ताव दएत बुझाइ छथि जे जँ हुनक ‘पचपनियाँ’क एजेण्डा स्वीकार कए लेल जाए त ओ एहि सँ जुड़ल राजनीतिक वा भाषाई आन्दोलनक सहभागी भए जएता।विचित्र द्वैध,अपच अतिरेक आ ब्लैकमेलिंग सँ भरल अछि ई गप,जाहि मे धमकीक अढ सँ परस्पर लाभ बांटि गठबन्धन करबाक प्रस्ताव अन्तर्निहित अछि। आ की ई सुभाष जीक कोनो पराजय-बोध-विशेष अछि जे अन्तत: मनुष्य कें याचनाक मुद्रा मे लए आबैत अछि?कनी काल लेल मानि लेल जाए जे दातालोकनि(?) दिस सँ हुनक पचपनियाँ कें सम्मान देब गछि लेल गेल,हुनका साहित्य अकादेमीक वांछित सम्मान सेहो दए देल गेलनि।आब ओ की करता? अपन घरक ताखा पर राखल मिथिला-राज उतारि सम्मानदाता-लोकनि कें हस्तगत कए देता? कतहु नुकाए कए राखल अलादीनक चिरागक जिन्न कें प्रकट कए अतीतक पुनर्स्थापनक एहि तमाशा कें महा-आन्दोलन मे तब्दील कए घमासान मचाए देता? एहि काजक लेल अपन लेखकीय वा सामान्य जीवन मे कतेक लेखक वा समर्थक तैयार कएने छथि ओ? तिरहुता (जेकरा पचपनियाँ कहल गेल अछि) कें आदरविहीन (non-honorific) कहब सेहो अज्ञानतावश ओकर अनादर करब थिक। ठेठी आदरक अपन तरीका छै आ से तरीका देखबाक लेल कोनो अणुवीक्षण यंत्र (microscope)क बेगरता नहि छै।एकतुरिया वा छोट लेल जँ ‘तूं जेबही’ कहल जाइ छै,त जेठक लेल सम्मान देबाक स्थिति मे ‘तूं जेबहक’ कहल जाइ छै।एहन अनेक उदाहरण देल जाए सकैत अछि,जाहि पर सुभाष जीक ध्यान नहि गेल हुएनि,से सम्भव नहि ; अपन स्थापना कें सुदृढ करबाक लेल ओ एकरा जानि-बुझिकए अनठिअएने छथि,से बात अलग।अपन ‘गूलो’ मे ओ स्वयं ठेठीक आदरसूचक ठाठ पसारने छथि।‘घुरि कए आबै छियह’,’हौ!तू बड़ कंजूस छहक!’,’भैया,अपने टा खाइ छहक’,’बबा,कहिया कीन देबहक’,’पांच सौ लाइब कए देलियह।सबटा चाटि गेलहक आ पांच टका निकालै मे दांती लागै छह।‘ आदि सम्मानसूचक(honorific) नहि छिऐ,त की छिऐ?ई बात सही छै जे एहि सर्वहारा तिरहुता मे विकारीक उच्चारणबला कोनो शब्दक स्थान नहि छै आ तें ‘भ गेलै’,‘क देलकै’ आदिक स्थान एतय नहि छै ; किन्तु एकरा ‘भाए गेलै’, ‘काए देलकै’ लिखब त जानि-बुझिकए एकरा विकृत करबाक कुचेष्टा छिऐ। अजीब बात जे अपन आलेख मे सुभाष जी गर्वपूर्वक एहि प्रयोगक चर्चा करए छथि,जखनि कि ‘गूलो’ मे कएकठाम ‘कए-भए-लए’क प्रयोग करए छथि।ई त ‘गतानुगतिकता’क विरोधक नाम पर ‘नव-गतानुगतिकता’क प्रतिपादन करबाक,नींव राखबाक उपक्रम बुझाइत अछि।उपरोक्तक जे उच्चारण कौशिकी जनपद मे होइ छै,तहि अनुरूप ओकरा ‘भए गेलै’, ‘कए देलकै’ लिखब बेसी उपयुक्त छै।ई अलग बात जे ‘गूलो’ मे इएह टा प्रयोग नहि छै।‘गूलो’क प्रयोगसभ मिनजुमला खाता छिऐ,जहि मे भाषा,बचल-खुचल विभिन्न प्रकारक तर-तरकारी सँ बनल ‘डलना’(mixed vegetable) भए गेल छै।एहि मे ‘काए’ के सँग-संग ‘कए’ के प्रयोग सेहो भेल छै आ ठाम-ठाम भेल छै।जँ ‘काए’ आ ‘भाए’ लिखल गेलए तखनि ‘लए’ किऐ?एकरहु ‘लाए’ हएबाक चाही छलए।लेखक एहन अनेक दोष टंकक वा प्रकाशकक माथ पर थोपि सकए छथि,किन्तु पाठक कें कोनो आन ठाम देल स्पष्टीकरण पढबाक फुरसत कहां छै।प्रयोग हएबाक चाही,एकर स्वागत! प्राय: प्रत्येक लेखक प्रयोग करैत अछि।किन्तु प्रयोग करैत ई सजगता त हएबाकहि चाही जे प्रयोग युक्तिसंगत हुअए, पाठकक मगज मे आसानी सँ घुसि जाइ,अराजकता नहि पसारए। ‘गूलोक पुनर्पाठ कयला पर केदार कानन कें कोनो असुविधा नहि भेलनि’ सन-सन तर्क बेतुक छै।केदार कानन एहि पोथीक प्रकाशक छथि आ एकर भुमिका सेहो वएह लिखलनि अछि।स्वाभाविक आ अपेक्षित छै जे ओ एकरा बेर-बेर पढथि।किन्तु पुनर्पाठक ई अपेक्षा सामान्य पाठकहु सँ किऐ राखल जाए? ईहो आवश्यक नहि जे सभक बौद्धिक-स्तर केदार काननहि जकाँ उच्चस्तरीय हुअए। अनुभव कहैत अछि जे मैथिली “खिधांसीक ओस्ताद” लोकनिक खान अछि। डेग-डेग पर भेटता।केकरो खिधांस करए लागता त एहि पुण्य-प्रयास मे आकाश-पाताल एक कए देता।खिधांसक वेध-लक्ष्य जँ कोनो विचार वा स्थापना छै त ओकरा अपन उद्गम-माताक कोखि मे घुरि जएबाक लेल बाध्य कए देता आ जँ लक्ष्य(Target) पर कोनो व्यक्ति छै त ओकरा रौरव नर्क गेनहि कल्याण।किन्तु खिधांसीक एहि ओस्तादलोकनि कें हुनकर अपनहि कहल बात कें लिखिकए व्यक्त करबाक आग्रह करिअनु त अहांक आग्रह अनन्त-अनन्त जन्म तक अपन पालनक प्रतीक्षा करैत रहि जाएत। कोनो व्यक्ति ताल ठोकिकए जे बात मौखिक तौर पर कहि रहल छै,तेकरा लिखित रूप मे व्यक्त करए मे ओकरा की दिक्कत? दिक्कत छै। दिक्कतहि टा नहि छै,खतरा सेहो छै।मौखिक अभिव्यक्ति मे अपनहि कहल बात सँ नठि जएबाक सुविधा छै।एहि सुविधाक लाभ लैत मूंहक अतिसार सँ ग्रसित मानुस बेर-बेर बोकरि सकैत अछि आ अपन वमन सँग अनर्गल प्रलापक मल-मुत्र विसर्जन कए सकैत अछि।लिखिकए अपन बात कहए मे मारिते रास खतरा छै।पहिल खतरा छै—मारि खएबाक।ई खिधांसीक ओस्ताद लोकनि प्रकटत: ‘बुधिक बखारी’ भनहि होथु,हुनका अपनहु बुझल छनि जे ओ वस्तुत: ‘फोंकहा सँठी’ सँ बेसीक औकात नहि राखए छथि।ई सभ ओस्तादलोकनि पछुआरक वाणी-वीर छथि।सम्मुख होइतहि चरण गहि ‘नाथ-प्रभु-बापा’ कहि लम्बवत भए जेता,उठिकए देह झाड़ि लेता आ पछुआर जाइतहि फेर वएह गारि-कीर्तन।जे से!कोनो कथन एक बेर लिखित भेलाक बाद दस्तावेज भए जाइ छै,प्रकाश मे आबितहि अपरिवर्तनीय भए जाइ छै। लिखनिहार लेल अपन बात सँ नठबाक,पलटबाक कोनो गुंजाइश नहि रहि जाइ छै।जँ एहि मे कोनो आरोप छै त ओकरा प्रमाणित करबाक जिम्मेदारी आरोपकर्त्ता लेखक पर स्वत: चलि आबए छै। तथ्यहीन बात लिखला पर ओ सार्वजनिक निन्दा आ हास्यक पात्र बनि जाइ छै।ओकर समकालीन ओकर वयस,वरिष्टताक लिहाज कए भनहि दम साधि लिअए,चुप रहि जाइ,किन्तु अगिला पीढी ओकरा पर कोनो मुरब्बत नहि करत,ओकरा छील देत।कखनियो काल एहनहु होइ छै जे शब्दक मधुमय आवरण मे गरल परसबाक ओस्तादी कएल जाइ छै।किन्तु एहि सँ खतरा टरैत नहि छै,कनी विलम्बित भनहि भए जाओ। अपन बात कहबाक लेल लेखकक एक-एक शब्द-चयन,वाक्य-विन्यास आदि लेखकक मूल मंशा,ओकर वैचारिक-मानसिक स्थिति कें प्रकट कएअहि दए छै।बुझनुक पाठक लग अभिधा-व्यंजना-लक्षणा वा व्याज-स्तुति-वक्रोक्ति आदिक मायाजाल कोनो काजक नहि रहि जाइ छै। अपन शिल्प-शैली वा कलात्मकताक बल पर अहां अपन लेखन कें केतबहु आवरण दिअओ,ओकर वस्तुगत अर्थ-यथार्थ सुधि-पाठक तक पहुंच जाइत अछि। अहां द्वारा प्रयुक्त एकटा शब्द,एकटा वाक्य,एकटा अनुच्छेद अहांक लेखकीय टा नहि, अहांक व्यक्तिगत व्यक्तित्वक वास्तविकता कें नीक जकाँ प्रकट कए दएत अछि।जँ रामलोचन ठाकुर अपन पोथी ‘बेताल कथा” हरिमोहन झा कें समर्पित करैत आनहि परम्परावादी पण्डा-पुरहित साहित्यकार जकाँ हुनका ‘हास्य सम्राट’ कहए छथि त एहि एक शब्द मात्र सँ हुनकर मार्क्सवादी चोला आ व्यंग्य-हास्यक भेद सम्बन्धी हुनकर साहित्यिक समझ दुनू धराशायी भए जाइत अछि।जखनि महापण्डित गोविन्द झा लिखए छथि जे, ‘अधिकतर ग्राहक भेला समृद्ध वृद्ध भूमिहार ब्राह्मण,एकर प्रेरक भेलनि अपन जाति मे कन्याक कमी आ दोसर मैथिल ब्राह्मण वर्ग मे समएबाक कामना’,त भूमिहार ब्राह्मणक प्रति हुनकर घृणा,एहि जातिक विराट पुरुषार्थ कें लघुकाय करबाक हुनक क्षुद्र-प्रयास आ मैथिल ब्राह्मण(हुनक अपन जाति) द्वारा बेटी बेचबाक अधम आ घृणित कर्मक बादहु ओकर श्रेष्टता(?) कें अवांछित सुरक्षावरण देबाक प्रपंच नुकाइत नहि अछि,जगजियार भएअहि जाइत अछि।जँ डा वीरेन्द्र मल्लिक अपन कविता ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’ मे कविता कें मारिजुआना आ किदन-कहांदन घोषित करए छथि त ई बात नुकाइत नहि अछि जे ओ अपन काव्य-रचना सँ पूर्व कथीक सेवन करए छथि।जँ अग्निपुष्प अपन टिप्पणी मे जीवकांत कें एलेन गिन्सवर्गक परम्पराक कवि घोषित करए छथि त हुनक अध्ययन-मननक अल्पता स्पष्टतया देखार होइत अछि।एहन अनेक उदाहरण मैथिली मे अछि,किन्तु तेकर विस्तारण आन कोनो ठाम लेल छोड़ल जाए।एतय आशय एतबे जे अभिव्यक्तिक लेखन-प्रणाली दुधारी तलवार छै,जाहि पर चलब सभाक बुत्ताक बात नहि छै। आन-आन भारतीय भाषाक साहित्य मे जे स्वतंत्रता,प्राय: किछुअहु कहि देबाक जे छूट आइ उपल्बध अछि, ओ सभ टा वर्त्तमान लेखकलोकनिक अपन अरजल नहि छनि।ई हुनकर पुरखासभ छला जे सभ अपन समय मे एकरा लेल कठिन सँघर्ष कएने रहथि।मैथिली साहित्य मे दुर्भाग्यवश एहन सँघर्षशील पुरखासभ वा त छथिअहि नहि, वा नगण्य छथि।मैथिलीक लगभग शत-प्रतिशत पुरखा लेखकसभ आजादी सँ पूर्व राजा,राजभवन, सामन्त, जमीन्दार आ आजादीक बाद सत्तासीन शक्तिशाली वर्गक आ सम्पूर्ण काल मे धार्मिक-प्रतिष्ठानसभक लेल स्तवन लिखबाक काज मे बाझल रहला आ एहि मे विद्यापति सन नमहर नाम सेहो सम्मिलित अछि।एकरहि परिणाम अछि जे मैथिली साहित्य सँ आक्रोश आ प्रतिरोध अलोपित अछि आ हमरासभ कें आत्मालोचनक परम्परा आ ओकर उप्लब्धिसभ सँ पूर्णतया वंचित रहि जाए पड़ल अछि आ वर्त्तमान वा दू-एक पीढी पूर्वक किछु गिनल-गुथल प्रगतिशील लेखकलोकनि कें प्राय: शून्य सँ अपन शुरुआत करए पड़लनि अछि। आधुनिकता आ ओकर सँघर्ष त वस्तुत: आब विचारणक केन्द्र मे आबि रहल अछि आ सेहो अधिकांशत: मैथिल ब्राह्मणेतर लेखकलोकनिक मारफत। ई स्थिति जातिक नाम पर स्थापित लेखकीय-प्रतिबद्धताहीन समुदाय कें भयभीत आ असहज कए रहल अछि। हुनकासभ कें बुझल छनि जे नबका पीढी कें देबाक लेल हुनकासभ लग ने अपन व्यक्तिगत पूंजी छनि,ने पुरखासभक देल कोनो समृद्ध क्रान्तिकारी विरासत आ जे किछु बटुआ-झोड़ा मे छनि,जँ तेकर नीक सँ जांच-पड़ताल भेलए त ओहिसभक फोंक आ जीर्ण-शीर्ण अस्तित्व देखार भए जेतए,बेनंगन भए जेतए।तें कोनो नबका विचार आबितहि ओकरा पर अभद्र आक्रमणक कुत्सित प्रयास शुरू भए जाइत अछि।ई काज अखनि लेखनक माध्यम सँ कम,मौखिक रूप मे बेसी आ सोशल साइट्सक अभद्र टिप्पणीसभक माध्यम सँ बेसी भए रहल अछि।प्रसंगवश एकटा कहावत मन पड़ैत अछि—‘प्रेमी लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ चुम्मा-चाटी करए लागए छै आ वक्ता लग जखनि शब्द सठए छै त ओ खोंखी करए लागए छै’। वर्त्तमान स्थिति कें देखैत एहि कहावत मे एकटा टुकड़ी और जोड़ल जाए सकए छै—‘मैथिल लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ गारि पढए लागए छै’।कहावत मजाकिया छै,किन्तु चेतबए छै।मैथिलीक राड़ी-बेटखौकी बहुत चिन्ताजनक छै। केकरो दोष बताएब ओकर खिधांस करब नहि होइ छै।ई लक्ष्य-तत्वक परिमार्जनक लेल एकटा शुभेच्छा सेहो होइ छै।एकर सँज्ञान लेब त अहां अपन परिमार्जनक दिशा मे बढब,नहि लेब त बूड़ू,लोकक की जाइ छै! ‘निन्दक नीयरे राखिए आंगन कुटी छबाय’ तें कहल गेल रहए। आब ई अहांक इच्छा जे अपन कुतर्कक परम्परा मे नव कुतर्क गढि ली जे ई बात मैथिली मे नहि कहल गेल छै,तें एकरा नहि मानब। एहिसभ परिपेक्ष्य मे जँ सुभाष चन्द्र यादव लिखित रूप मे कोनो विषय (एहन,जहिपर विवाद हएब सुनिश्चित-सन छै) पर अपन मन्तव्य प्रकट कएलनि अछि त हुनक लेखकीय साहसक (मैथिलीक परिपेक्ष्य मे दुस्साहस) प्रशंसा कएल जएबाक चाही। अनेक रास झोल,अन्तर्विरोध आ लचर प्रस्तुतिकरण (जहिपर पुर्व मे चर्चा कएल गेल अछि) आदिक उपस्थितिक बादहु सुभाष जीक आलेख मे जे बिन्दुसभ उठाएल गेल छै,तेकर अनदेखी करब कठिन त छैहे,एकरा अनठिआएब सेहो मैथिलीक हित मे नहि छै। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयक वार्षिक वाद-विवाद सभा मे पूर्व केन्द्रीय मंत्री आ सुप्रसिद्ध लेखक शशि थरूरक महत्त्वपूर्ण भाषण आ पुर्वोत्तर मैथिल पत्रिका मे सुभाष चन्द्र यादवक पचपनियाँ मैथिली पर केन्द्रित आलेख सँयोगवश एकहि समयावधि मे आएल आ दुनूक विषयगत केन्द्रीय तत्त्व ‘उपनिवेशवाद’ सँ जुड़ल अछि। शशि थरूर आक्सफोर्ड मे अपन बात कहैत बेर ई नीक जकाँ जानैत रहथि जे ब्रिटेन भारत आ भारतीय जन-समुदाय सँग कएल अपन अपराधक मुआवजा भारत कें कहियो आ किन्नहु नहि देत।किन्तु ई जानितहु ओ एहि बात कें रेखांकित कएलनि जे ब्रिटेन द्वारा गलतीक माफीअहि कें यथेष्ट मानल जाएत।शशि थरूरक कहब रहनि जे, ‘जँ दू सौ बरस तक भारत पर निर्दयता सँ राज करबाक एवज मे ब्रिटेन प्रतिवर्षक लेल मात्र एकहु टका देत त हमसभ सन्तुष्ट हएब’।सुभाष चन्द्र यादवक आलेख मे शशि थरूर बला स्पष्टता आ आक्रामकता नहि छनि,किन्तु ओ प्रकारान्तर सँ अनगिनत वर्षक पुरोहिती वर्चस्वक अधीन भेल शोषणक लेल माफी आ प्रतीकात्मक (Token) क्षतिपुर्तिअहिक गप कहि रहल छथि।तेवर जे हुअए,सुभाष चन्द्र यादवक आभार मानल जएबाक चाही जे ओ एहि आलेखक बहन्ने पुरोहिती उपनिवेशक तटस्थ हिसाब-किताब तैयार करबाक लेल मैथिली-समाज कें उद्वेलित कएलनि अछि,भाषा सहित्य पर पड़ल एकर दुष्प्रभावक निष्पक्ष आकलन हेतु खोराक देलनि अछि,एकटा परिणामदायी बहसक परम्परा शुरु करबाक डगर देखएलनि अछि,विषमता सँ पीड़ित वर्त्तमानक वास्तविकता आ प्रायोजित बौद्धिक प्रपंचक अभियानक क्षुद्रता कें उघार कएलनि अछि।ई आलेख एक दिस मैथिलीक औपनिवेशिक सत्ता कें देल गेल चुनौती अछि त दोसर दिस सर्वहाराक हेराएल अस्मिता कें खोजबाक,खोजिकए पुनर्स्थापित-पुनर्प्रतिष्ठित करबाक प्रयास सेहो अछि। एकर स्वागत लेल अभिजात्यक साहित्यिक-दुर्गक द्वारपट खोलल जएबाक चाही। समय निरन्तर करवट फेरैत रहए छै आ एकर प्रत्येक करवटक सँग जीवन-जगतक कण-कण मे कोनो ने कोनो परिवर्तन होइ छै।एहि परिवर्तन कें रोकब कोनो ताकतक वश मे नहि छै।विवेकवान व्यक्ति वा समाज एहि परिवर्तनक हुलसि कए स्वागत करए छै आ एकर एकटा हिस्सा बनि गतिशीलताक प्रवाहक सहयोगी होइ छै।जे एहि परिवर्तनक अवश्यम्भाविता सँ आंखि मुनने रहए छै,अपन पुर्वाग्रही मन कें अतीतक भूलभुलैया मे अटकएने वर्त्तमान सँ स्वयं कें काटने रहए छै,ओ व्यक्ति वा समाज वा त ठस भेल मृत वा अप्रासंगिक भए जाइ छै वा परिवर्तनक अंधड़ ओकरा उड़िआकए अजायबघरक वस्तु बनाए दए छै।ई परिवर्तन जीवनक प्रत्येक क्षेत्र मे अपन प्रभाव छोड़ए छै आ तें साहित्य सेहो एकर प्रभाव सँ मुक्त नहि रहए छै। नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनि कें लागलनि जे हजारक हजार वर्ष सँ हुनकसभक अस्मिता शासन-सत्ताक दुष्चक्रीय आवरण मे विलुप्त-सन भए गेल अछि आ ओकर पुनर्स्थापन हएबाक चाही।एकरा लेल एकटा विराट समूह आन्दोलित भए उठल।प्रत्येक आन्दोलन जकाँ एकरहु अपना लेल एकटा विशिष्ट सँज्ञाक बेगरता बुझएलए। नव-अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनिक ई विराट समूह अपन अस्मिताक आक्रोश-भरल खोज कें गर्वपूर्वक ‘श्यामत्व’ (मूल शब्द—नेग्रिट्यूड/Negritude) नाम देने छला। अपनहु देश मे दलित साहित्य अपन भिन्न पहचान बनएलक, जेकर अधिकांश श्रेय महाराष्ट्र कें जाइ छै।मराठी मे एहन साहित्यक विपुल आ प्रभावी भण्डार छै।जँ तिरहुत मे एहन साहित्यिक उभार कें स्वतंत्र व्यक्तित्व देबए लेल एकरा ‘सोल्हकनत्व’ कहि एकटा बहुजन समाज अपन अस्मिता,अपन भाषीय-संस्कृतिक आक्रोश-भरल खोज करैत अछि,ओकरा सर्वस्वीकृति दिएबाक सँघर्ष करैत अछि आ एकर अनेक उपकरण मे सँ एक ‘पचपनियाँ मैथिली’क पैरोकारी मे आवाज उठाबैत अछि त प्रगतिशील शक्तिसभ सँ ई सहज अपेक्षा होइत अछि जे ओ आगू बढि एकरा अपन अंकवार मे भरथि, एकर स्वागत-अभिनन्दन मे तोरण-द्वारहि टा नहि बनाबथि, हुलसिकए एहि प्रवृति कें सशक्त करबाक आयोजन मे सम्मिलित सेहो होथि।मैथिलीअहिक नहि,तिरहुत क्षेत्रीय समाजहु लेल ओ गर्वक स्थिति हेतए,जखनि ब्राह्मणत्वक तुलना मे सोल्हकनत्व कें हेय नहि मानल जएतए,बल्कि ओकरा श्रेष्टत्व प्राप्ति हेतए।ई स्थिति अपन आगमन लेल अभिजात्यक ‘कृपणता’क नहि,उदारताक मुखापेक्षी अछि। प्रगतिकामी चेतना आ उदार सावधानीक सँग विचार कएला पर ई बुझाएत जे नानाप्रकारक एतिहासिक परम्परासभक आन्तरिक मार्गक अनवरत यात्राक चलते भिन्न-भिन्न जनसमूहक लेल भिन्न-भिन्न प्रकारक भाषाक आवश्यकता होइ छै आ एहि आवश्यकताक आन्तरिक प्रस्फुटन सँ भिन्न-भिन्न भाषा-उपभाषाक प्रकटीकरण होइ छै।ई बात सत्य छै जे एहि क्षेत्र-विशेषक बोली(जेकरा परम्परा सँ तिरहुता वा ठेठी आ सुभाषीय आग्रह सँ पचपनियाँ कहल गेल छै) कें भाषाक स्वरूप दए मे मैथिल ब्राह्मणलोकनिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहल अछि। भनहि एहि सभक पाछू बबुआनी करबाक लिलसा हुअए,यजमानीक नव-क्षेत्रनिर्माणक परिकल्पना हुअए वा अपन जातीय सँस्कृतिक उपनिवेश बनएबाक योजना हुअए,किन्तु ई मैथिल ब्राह्मणलोकनिअहि छथि जे नेपालक जनकपुर,विराटनगर,राजबिराज सँ लए कए बिहारक विभिन्न शहर-नगर-गाम आ झाड़खण्डक रांची,जमशेदपुर सँ लए कए बंगालक कोलकाता कि तेलांगनाक हैदराबाद तक खुब ताम-झाम सँ मैथिली सँ जुड़ल आयोजनसभ करए छथि।मैथिलीक विभिन्न अल्पायु-दीर्घायु पत्रिकासभ हुनकहिलोकनिक प्रयास सँ बहराएल अछि।मैथिली पोथीक प्रकाशनक जे काज भए रहल अछि,ताहि काजक सभटा अगुआ/प्रकाशक मैथिल ब्राह्मणहि छथि।आइयो एहि भाषा मे लिखनिहारलोकनि मे एहि जातिक लोकक बहुमत छै।स्वाभाविक छै जे एहि भाषा पर हुनकर सभक लेखनक शैलीक वर्चस्व छै आ तेकर प्रभाव आनहु जातिक लेखकलोकनिक लेखन पर पड़ल छै। हं,तखनि एकर माने ई नहि जे ओसभ स्वयं कें एहि भाषाक निर्माता आ भाग्य-विधाता मानि एकरा अपन उपनिवेश किंवा खबोतर बनाए लेथि।बहुमतक अपन अलग महत्व छै,किन्तु ई ध्यान राखब आवश्यक जे ‘लोकलाज’ आ ‘नैतिकता’ सेहो कोनो चीज होइ छै आ एकर अपेक्षा सभसं बेसी साहित्यकारहि सँ होइ छै। एहि ऐतिहासिक तथ्य कें सेहो नहि नकारल जाए सकए छै जे क्षेत्र-विशेष (तिरहुत कहू,कौशिकी कक्ष कहू वा मिथिला नामक मिथकीय खबोतर मे हड़पि लिअ) आ भाषा-विशेष (तिरहुता कहू,ठेठी कहू वा मैथिली नाम सँ जातीय खतियान मे दाखिल कए लिअ) दुनूक दृष्टिकोण सँ मूल डीही त सर्वहारा समुदायहि अछि। अभिजन समाज वा अग्रजन्मालोकनिक पाही हएबाक तथ्य अपन ठाम पर अचल अछि,भनहि महापण्डित गोविन्द झा सन-सन ‘काव्य-नाटकाख्यानकाख्यायिका-लेख्य-व्याख्यानादि-क्रिया-सर्वविद्या-निपुणै:’ व्यक्तित्व कागज पर डीही-पाहीक भ्रमोत्पादक-मिथ्या-लेखनातिसार करैत रहथि।जखनि हमसभ ई सुनि उत्तेजित भए हाकरोस करए लागए छी जे फल्लां व्यक्ति आन-आन भाषा-बोली कें सुनब किंवा बोलब पसन्द करैत अछि वा हमरासभ सँ अलग वर्तनीक प्रयोग करैत अछि,त वस्तुत: हमरासभक रोष ओहि भाषा,ओहि बोली वा ओहि वर्तनीक उपर नहि,ओकर बजनिहार, ओकर सुननिहार,ओकर प्रयोगकर्ताक प्रति होइत अछि।ई बात प्रमाणित करैत अछि जे हम ओहि व्यक्ति सँ प्रेम नहि करए छी।जँ हमरासभक मन मे प्रेम उपस्थित रहितए त हमसभ ओकर वा ओकरसभक रूचि आ सँस्कारादि कें बुझबाक प्रयत्न सेहो करितहुं।ई जे चिढ हमरासभक मन मे प्रकट होइत अछि,से स्वयं कें विशिष्ट मानबाक,श्रेष्ट मानबाक क्षुद्रभाव सँ उपजैत अछि आ हमरासभक ‘प्रेम-दारिद्र्य’क सूचक अछि।एहि प्रेम-दारिद्र्य कें तजने बिना ने हमरासभक अपन कल्याण अछि,ने अगिलाक आ ने भाषा आ लोक-समाजक। हमरासभक पाण्डित्य-बोध कें ईहो बोध रहबाक चाही जे ई भाषाक भदेसपन छै जे ‘रेणु’ कें ‘रेणु’ आ ‘काशीनाथ सिंह’ कें ‘काशीनाथ सिंह’ बनबैत अछि।भाषाक अभिजात्य कें पवित्र मूर्ति जकाँ पूजनीय-वंदनीय मानबाक मानसिकता सँ बाहर आबिअहि कए ‘मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसम’ आ ‘काशी का अस्सी’ सन कालजयी रचनाक जन्म भए सकैत अछि। बभनियाँ मैथिली सँ पिण्ड छोड़ाइअहि कए ‘गूलो’ सन अभिनव कृति रचल जाए सकैत अछि। एतय एक बेर और ‘शैली’ कें उपस्थित करी। हुनकर कथन मे प्रयुक्त ‘निराशा’क किछु पक्ष पर पुर्व मे चर्चा भेल अछि।एहि ‘निराशा’ सँ जे ‘आलोचना’ उत्पन्न होइत अछि,से केहेन हएबाक चाही?एहि पर विचारण सँ पहिने कन्नड़ दलित साहित्यकार डा मोगल्ली गणेशक दलित लेखन पर कएल किछु रोषपूर्ण टिप्पणी पर दृष्टिपात करैत चली।ओ कहए छथि जे, ‘दलित लेखक सौन्दर्य-पक्षक उपेक्षा करैत आइ तक जे लिखैत रहला अछि,ओ एकटा लमगर शिकायती-पत्र बनि गेल अछि’ आ ‘अनेक दलित लेखकलोकनि अपन समुदायक अनुभवसभक पुंजी सँ अपन कैरियर चमकएलनि अछि’।ई टिप्पणी खासतौर सँ आलोचना पर नहि,सम्पूर्ण दलित-लेखन लेल कहल गेल अछि।किन्तु एहि टिप्पणी मे जे ‘लमगर शिकायती-पत्र’ आ ‘कैरियर चमकाएब’ अछि,से ध्यातव्य अछि। रचनात्मक लेखन हुअए किंवा आलोचनात्मक,ओहि मे उपरोक्त दुनू चीज कथमपि स्वीकार नहि भए सकैत अछि।सदति मन राखए पड़त जे कलपला सँ,याचना सँ,समझौतावादी नजरिया सँ कृष्ण-सन पक्षधर होइतहु धर्म पर स्थिर पाण्डवलोकनि कें किछु नहि भेटलनि।कहियो बुद्ध कहने रहथि जे सँसार मे दुखक मात्रा बहुत अछि आ एहि सँ मुक्तिक लेल ओ करुणा आ अहिंसा सन मानवीय गुणक पैरवी कएने रहथि,जे कालान्तर मे असफल सिद्ध भए गेल।बुद्धक अहिंसक अनुयायी लोकनि कें लुटेरासभ सँ आत्मरक्षार्थ जूडो-कैराटे सन रणकौशल विकसित करए पड़लनि।ई बात सही छै जे युद्ध कोनो विकल्प नहि होइ छै,किन्तु ईहो बात सही छै जे जखनि कोनो विकल्प नहि होइ छै,तखनिअहि युद्ध होइ छै।मैथिलीक साहित्यिक सत्ताखोर,मखमलिया बुद्धिजीवी,अचूक अवसरपरस्त आ यथार्थ-विरहित यथार्थ-स्रष्टालोकनि एहन विकल्पहीनताक स्थिति नहि आबए देथि आ एहि स्थिति कें स्वीकार करथि जे भाषा कें अपन खबोत्तर वा उपनिवेश बनाए कए राखबाक उपक्रम ओहिना धराशायी भए जाएत,जेना पुरोहिती उपनिवेश भेलए,जेना ब्रिटिश उपनिवेश भेलए,जेना राजा-महराजा लोकनिक प्रासाद-दुर्ग आदि भेलए। व्यक्तिगत,परिवारगत लाभ आ अय्यासीक लेल एकटा विशाल समुदाय कें अपन शत्रु बनाएब पहिनुकहु युग मे उचित नहि रहए,अजुकहु युग मे बुधियारीक गप नहि छै।पुरुख बली नहि होत है,समय होत बलबान;भिल्लन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान।समय आबि गेल छै जे प्रत्येक पक्ष ई स्वीकार करए जे हमसब वैदिक सिन्धु-सरस्वती सँस्कृति आ सनातन धर्मक मार्ग सँ आएल छी। ने कोय जन्म सँ शुद्र छै,ने कोय जन्म सँ ब्राह्मण। ई सभ कर्मणा दायित्व छै ,जे दूषित भए जन्म-आधारित भए गेल छै।अनेकानेक शताब्दी पूर्व जे जातिगत विभेदीकरण भेल रहए,ओकर आधार समाज मे श्रमक समुचित आ यथोचित विभाजन करब रहए,ने कि उत्कृष्टता वा निकृष्टता,श्रेष्टता वा अधमताक निर्धारण करब।एकरा आधार बनाए कोनो वस्तु पर कोय अपन एकाधिकार घोषित कए दिअए,ई अजगुत गप एकदम सँ अवांछित आ अस्वीकार्य छै। दोसर दिस, “पाग-दोपटावला मैथिली चल जायत,लेकिन गोलगलावला मैथिली जीबैत रहत” सन-सन हवाबाजी, ज्योतिषाचार्यी भविष्यवाणी,नाराबाजी आ खामखयाली सँ सेहो काज चलएबला नहि छै।पाग-दोपटाबला कें ई बुझि लिअए पड़तनि जे मुर्दा-संस्कृतिक गौरव-गानक पाछु खबोत्तर-रक्षा आ जीवित-संस्कृतिक उपेक्षाक उपक्रम आब लोक खूब नीक जकाँ बुझि रहल अछि,तें एहिपर पूर्णविराम लागब जरुरी।गोलगलाबला कें सेहो ई बुझि लिअए पड़तनि जे जीवित-संस्कृति कें मुर्दा-संस्कृति पर श्रेष्टता/वरिष्टता दिअएबाक लेल सामाजिक क्षेत्र जकाँ सामाजिक-न्याय मात्रक भरोसहि यथेष्ट नहि अछि आ एहि सँ प्रदत्त आरक्षण सँ साहित्य-संस्कृतिक क्षेत्र मे काज चलएबला नहि अछि।एहि क्षेत्र-विशेष मे मात्र नाराबाजी नहि,फांकीबाजी नहि,ठोस काज चाही। ठोस काज माने लेखन। आ से मात्र रचनात्मक साहित्यहि टा मे नहि,इतिहास आ आलोचनाक क्षेत्रमे सेहो प्रचूर यथार्थवादी लेखनक मांग करैत अछि। अकबर इलाहाबादीक ‘मेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी,शिया के साथ शिया,सुन्नी के साथ सुन्नी’ शेरबला दुपनियां-मानसिकता सँ पचपनियाबला एकजनियां एजेण्डाक फेकौअल खेलल जाए सकए छै,किन्तु एहि सँ ने निष्कलुष सत्यक सँधान कएल जाए सकए छै,ने निर्णायक शक्तिक सँचय। पक्षपात नहि करू,किन्तु अपन पक्ष त चुनैए पड़त,राखैए पड़त,स्थापित करैए पड़त।महान अफ्रीकी लेखक चेनुआ अचेबेक कहब कें सदति मंत्र जकाँ कण्ठस्थ राखए पड़त आ ओकरा क्रियान्वित करबा लेल प्रयत्नशील रहए पड़त—“जा तक हिरणसभ अपन इतिहास स्वयं नहि लिखत,ता तक हिरणसभक इतिहास मे शिकारीसभक शौर्य-गाथा गाबल जाइत रहत”। मैथिली मे एहि सँ आगूअहुक काजसभ छै। हिरण कें अपन इतिहास लिखबाक सँग-संग ओकर पाठकक निर्माण सेहो करबाक अछि। करू।मैथिलीक खबोत्तर-पीठक कबन्ध-अस्तित्वक रहितहु कोनो प्रतिभाक लेल निराश हएबाक आवश्यकता नहि छै।संघर्ष आ ओकर निरन्तरता अवश्य चाही।कोनहु युग मे कोनो सत्ता-प्रतिष्ठान,कोनो मठ-सम्प्रदाय कोनो प्रतिभाक डगर नहि छेक सकल छै।मैथिलीअहु मे एहन मैथिलेतर लेखक,जिनका मे प्रतिभा छनि,लिखबाक जिद छनि,ध्येय मे निरन्तरता छनि,से अपन परिचिति बनएलनि अछि आ अपन लेखकीय प्रतिभाक धमक कें स्वीकृत करबएलनि अछि।ई परिचिति,ई स्वीकृति कोनो सम्मान,कोनो पुरस्कारक, कोनो प्रमाणपत्रक सोंगरक बेगरता नहि बुझैत अछि।ई स्वीकृति-परिचिति ईच्छा सँ हुअए वा अनिच्छा सँ, घोषित रूप मे हुअए वा मनहि-मन,से महत्त्व नहि राखैत अछि।ओना,जँ लिखब-रचब अहांक धर्म अछि त कोनो स्वीकृति, कोनो परिचिति,कोनो सम्मान-पुरस्कारक अपेक्षहि किऐ?अपन रचनाक मुल्यांकन भविष्य आ भावी पीढी पर छोड़ू।जँ अहां कें बुझाइ ए जे एहि भाषा-साहित्य कें जन्मना वेद-व्यास-समुदाय कब्जएने अछि त अहां कें तुलसीदास बनए सँ के रोकलक?जँ व्यवस्था पर वशिष्ठक आधिपत्य छै आ से अहां कें स्वीकार नहि अछि त विश्वामित्र बनए सँ अहां कें के रोकलक?जँ गुरू द्रोणाचार्य पक्षपाती बनि अर्जुन कें प्राथमिकता/वरीयता दएत अहांक तिरस्कार कए रहल छथि त अहां कें एकलव्य बनए सँ के रोकैत अछि?अहूं धनुर्धर बनू आ जँ गुरू अहां कें एकर अधिकारी नहि मानए छथि त हुनका अपन अऊंठा दए सँ नठबहि टा नहि करू,हुनकरहि अऊंठा छोपि लिअ।जँ अहांक प्रतिभा कोनो मठाधीश-प्रदत्त प्रमाणपत्र वा पुरस्कारादिक असीम लिलसा सँ सुखिकए टटाए नहि रहल अछि,जँ अहांक अतमा पुरहितक पंजी-प्रबन्धक सुरक्षा-कवच मे घुसिअएबाक लेल कलपि नहि रहल अछि,जँ अहांक बौद्धिकता खबासी-कर्मक लेल उताहुल-व्याकुल नहि अछि आ जँ अहांक मेरुदण्ड सोझ रहबाक सत्ती करची वा सांप जकाँ लहरदार हएबाक विषानि प्रवृति दिस लहरिया नहि मारि रहल अछि त फजुलक अरण्य-रोदनक की अर्थ? ई त जेकरहि सँ घीन अछि,तेकरहि देह मे देह रगड़ि ओकर दुर्गंध सँ जनम सोगारथ करबाक कृत्य भेल। ई तहिना हास्यास्पद अछि,जेना कार्ल मार्क्स कोनो धीरूभाई अम्बानी सँ अपन विचारक पुष्टिक कामना करथि,जेना हिरण कोनो शिकारी सँ अपन अमरताक वरदान चाहए,जेना विश्वामित्र कोनो वशिष्ठ सँ ‘ब्रह्मर्षि’ पदक याचना करथि,जेना कोनो भिखारी भिखारिअहि सँ भीखक अपेक्षा करए। जँ एना छै त अहां सम्मानक नहि,दया आ दुत्कारक पात्र छी। जँ विचार मे वैज्ञानिकता आ मानस मे पौरुष अछि, अपन लेखनक सार्थकता पर आस्था अछि त आत्मदया, आत्मग्लानि, आत्मरतिक आत्महन्ता मानसिकताक बेढ सँ बाहर आऊ। बनबाक अछि त अपन श्रम,अपन पौरुष,अपन शक्ति पर विश्वास राखनिहार स्पार्टाकस बनू। सम्मान-पुरस्कार आदिक वांछना कोनो पाप,कोनो अपराध नहि छै। यशेषणा साहित्यकारक लेल स्वाभाविक छै। किन्तु एकरा लेल याचनाक हद तक जाएब,सम्भव छै जे अहां कें लहलहाइत लत्ती बनाए दिअए,किन्तु अहां फलदार-छायादार-छतनार वृक्ष नहि भए पाएब। हारल मन सँ भीख मांगल जाइ छै,जे देनिहारक इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर छै। प्रश्न अछि जे अहां कें भीख चाही वा अपन अधिकार— चुनब अहींक हाथ मे अछि। हारि मानि चुकल व्यक्ति जीवनक कुरुक्षेत्रक एहन योद्धा(?) होइत अछि जे रणक्षेत्र मे उतरए सँ पहिनहि अपन अस्त्र-शस्त्रादि बाहरहि छोड़ि दएत अछि। प्रश्न अछि जे अहां लग कोनो अस्त्र-शस्त्र अछिअहु की? जँ अहां सही माने मे साहित्यक हस्तिनापुर पर कौरव-दलक बलात आधिपत्य सँ आहत छी,आक्रोषित छी आ ईमानदारी सँ एकर प्रतिरोध करए चाहए छी,त एहि लेल एकाध बेर गारि देबाक बीध पुरि भागिकए कोनटा धए लेब कायरी-विकल्प अछि,कोय कए सकैत अछि,करैत रहैत अछि। जँ अहां मे आत्मसम्मान आ ओकर रक्षाक प्रति सजगता अछि,जँ अहां मे वीरता,पुरुषार्थ आ सँघर्षक सँकल्प अछि त अहां कें अन्यायक विरुद्ध लामबन्द हुअएअहि पड़त,अपन प्रतिरोध कें योजनाबद्ध प्रक्रियाक अन्तर्गत आनएअहि पड़त।कहबी छै जे असगर वृहस्पतिअहु झूठ। तें पहिने पांच टा पाण्डव कें एकत्रित करबाक लेल प्रेरक त बनू। कथा-कविताक पुष्पास्त्रक अपन महत्त्व छै,ओकरहु उपयोग हुअए।किन्तु निर्णायक युद्धक लेल इतिहास,आलोचना आ वैचारिक लेखनक रुद्रास्त्र सँ सुसज्जित भेने बिना विजयक गप त बाद,बराबरी (Draw)बला स्थितिअहुक कल्पना नहि कएल जाए सकैत अछि। ओशो (आचार्य रजनीश) अपन ‘साहस सँ खुलैत अछि ईश्वरक मार्ग’ शीर्षक लेख/प्रवचन मे कहए छथि – ‘सत्यक बहुत रास लोक कें खोज छनि।परमात्माक बहुत चर्चा छै।किन्तु ई सभ साहस सँ कमजोर लोक कए रहल छथि। ओ,जे सँग छोड़बाक लेल राजी नहि छथि आ जे दीया बुतैबाक लेल राजी नहि छथि। अन्हार मे जे असगर चलबाक साहस करैत अछि बिना प्रकाशक,ओकरहि भीतर साहसक प्रकाश जन्म लेब शुरू भए जाइत अछि। आ,जे अबलम्ब खोजैत अछि,ओ निरन्तर अबल होइत चलि जाइत अछि। हम जखनि कमजोर किंवा शक्तिहीन कहि रहल छी,त एतय तात्पर्य एहन लोकसभ सँ अछि,जे एकटा अबलम्ब पएबाक खोज मे छथि।भगवान कें अहां सहारा/अबलम्ब नहि बुझिअनु।जे लोकनि भगवान कें अबलम्ब बुझैत हएता,से सभ भ्रम मे छथि। हुनका भगवानक अबलम्ब नहि उपल्बध भए सकतनि। साहस सँ रिक्त एहन लोकक लेल एहि जगत मे किछुअहु उपल्बध नहि होइ छै। कौशिकी जनपदक लोक-संस्कृति- इतिहासक शिकारी महान अफ्रीकी लेखक चेनुआ अचेबेक एकटा कथन सं विषय-प्रवेश करैत चली। अचेबे कहने रहथि जे “जा तक हरिणसभ अपन इतिहास स्वयं नहि लिखता,ता तक हरिणसभक इतिहास मे शिकारीसभक शौर्य-गाथासभ गाबल जाइत रहत”। भारतीयसभ पर ई आरोप छनि जे ई सभ इतिहासक उपेक्षा कएलनि।देशक घटनासभ कें क्रमबद्ध लिखलनि नहि। पुरनका भारतीय साहित्य पर विहंगम दृष्टि फेरला पर मात्र पुराणहिसभ एहन ग्रंथ देखाइत अछि,जहि मे किछु पुरान घटना आ व्यक्तिसभक उल्लेख भेटैत अछि।फेर एकटा दीर्घ अन्तरालक बाद ई जिम्मेदारी विदेशी इतिहासकार लोकनि द्वारा निभाएल गेल अछि।कौशिकी जनपदक त दुर्भाग्यहिसभ सं वास्ता पड़ैत रहल अछि आ एकर आन-आन दुर्भाग्यसभक संग एकटा नमहर दुर्भाग्य इएह रहल अछि जे कहियो कोय व्यवस्थित रूप सं एहि क्षेत्र-विशेष कें केन्द्र मे राखि एकर इतिहास लिखबाक जिम्मेदारी नहि लेलक। एकर परिणाम वएह भेलए,जेकर चेतावनी चेनुआ अचेबे देने रहथि। इतिहासक कतिपय मध्ययुगीन-मानसिकताधारी पुरोहितसभ इतिहास आ मिथिहासक खिचड़ी कें अपन दुराग्रहक नून दए कए पकएलक आ इतिहासक नाम पर प्रपंच-गाथासभ लिखि कए ढेरिआए देलक। धर्म-ग्रंथसभ मे संस्कृतक पण्डितलोकनि सैंकड़ाक सैंकड़ा वर्ष सं समय-समय पर यथास्थान क्षेपकसभक प्रविष्टि कए एहि प्रपंच-गाथासभक पृष्टभूमि पहिनही सं तैयार कए कए राखनहि छला।पराश्रयी-बुद्धिजीविताक प्रतीक लकीरक फकीर विद्वानसभ आ महापण्डित पत्रकारसभ ओहि प्रपंच-गाथासभ कें जांचल-परखल उद्धरण मानि कए बेर-बेर ओकर हवाला देलनि,बेर-बेर ओकरा दोहरएलनि।स्थिति वएह भेल जे हिटलरक कुख्यात प्रचार-सहायक गोएबेल्स पैदा कएने छल।बेर-बेर दोहराएल जाए कए झूठ परम-सत्यक एहन रूप लए लेलक,जाहि मे सं सत्यक लेशहु निकालब घूराक नमहर सन बुताएल ढेरी सं कोनो नान्हि सन चिनगी वा सुइया कें खोजबाक सदृश्य कठिन भए गेलए। कौशिकी जनपदक मूल-समाजक आमजन एहि वैचारिक साम्राज्यवादक प्रति सजग नहि छथि आ बुद्धिजीविता पर आइअहु अभिजात्यक कब्जा छै।एकटा जाति-विशेषक कतिपय सियासी-मिजाज धूर-धुरन्धर-गिरोह सुनियोजित तरीका सं इतिहासक एहि छ्द्म कें आधार बनाए कए ने मात्र अपन जातीय विधि-विधान कें एहि क्षेत्रक संस्कृति पर लाधबाक कुप्रयास कए रहल अछि,बल्कि विभिन्न जनपदसभ कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश मे हड़पि कए दाखिल करबाक आपराधिक कृत्य सेहो कए रहल अछि।जे काज धर्मग्रंथक मिथकीय चरित्र ‘जनक’ अपन सौंसे जीता-जिनगी मे नहि कए सकला,ओ काज वर्त्तमान युग मे हुनक बन्धुआ मानस-पुत्रलोकनि कए धरबाक ठानि लेने छथि।रामकथा पढनिहारसभ कें ओहि कथाक अनेक राजा-महाराजालोकनिक ओहि बात सं वाकिफ हएबाक अपेक्षा कएल जाएब वाजिब अछि जहि मे अयोध्या सन विशाल राज्यक राजकुमारक एतेक छोट-छीन राज्यक राजकुमारि सं विवाह हएबा पर अचरज व्यक्त कएल गेल छल।अजुका अचरज ई अछि जे त्रेतायुग मे जनकक राज भनहि अजुका कोनो ग्राम-पंचायतक क्षेत्रफलहु सं छोट रहल हुअए,कलियुग मे अपार क्षैतिक विस्तार लए कए महाविशाल भए गेल अछि आ एहि मे कौशिकी जनपदक गप के कहए,अंग-गंग-बंग आ अंगुत्तराप-पौण्ड्रवर्द्धण सहित छोटानागपुर आ मगध तक सम्मिलित भए गेल अछि।एहि नबका भूगोलक संग-संग एकर सांस्कृतिक उपनिवेशक विस्तार सेहो जारी अछि आ जं एकर राकेटीय-गति मे ब्रेक नहि लागलए त ई भारतक सुदूर दक्षिण तक टपि जाएत।इतिहास-भूगोलक जे दुर्दशा कएल जाए रहल अछि आ तहि सं बनल भ्रमक जे महाजाल पसरल अछि,तेकर परिणामक दू टा उदाहरण त कोसी-प्रतिष्ठानक एहि अयोजनक स्मारिका सं लेल जाए सकैत अछि।एहिमे एक ठाम ‘मधुबनी पेन्टिंग’क चर्चा करैत कहल गेल अछि जे ई वस्तुत: ‘मिथिला पेन्टिंग’ अछि आ दोसर ठाम कोशी-क्षेत्र कें मिथिलाक भाग कहल गेल अछि।जखनि स्वयं कें प्रगतिशील आ वैज्ञानिक चेतना सं लैस कहनिहार बुद्धिजीवी समाजक शीर्ष-दस्ता सेहो एहि प्रपंच-गाथासभक दबाव मे आबि भ्रमित भए सकैत अछि त ‘लिख लोढा,पढ पत्थर’बला आम लोक-वेदक कोन मोजर?सच्चाई ई छै जे ई पेन्टिंग निर्विवाद रूप सं मधुबनी पेन्टिंग छिऐ आ एकर नाम कें विवादग्रस्त करब,एकर नाम बदलब मधुबनी-क्षेत्रक अस्मिताक संग खेलौर करब,एकरा ठोकर मारब सदृश्य अछि।मधुबनीक अतिरिक्त आन कोनो एहन इलाका नहि अछि,जेतय ई कला घर-घरक संस्कृति बनल हुअए।ई अलग बात जे ललित नारायण मिश्र द्वारा रेल-मंत्रीक रूप मे देल गेल संरक्षण आ प्रोत्साहनक बाद एहि कलाक प्रसिद्धि दूर-दूर तक पहुंचल अछि आ एहि मे कमाईक संभावना देखि बिहारहि नहि,देशक आन-आन क्षेत्र मे सेहो एहि कलाक विकास भेल अछि,किन्तु छिऐ ई मधुबनीअहि पेन्टिंग।एहि तरहें ईहो निर्विवाद अछि जे पौराणिक मिथिलाक पूर्वी सीमा कोशी नदी अछि।एहन शास्त्रसम्मत सेहो अछि आ अकबरक एकटा पट्टा मे सेहो ‘अज कोसी ता बोसी’ लिखल जएबाक प्रमाण अछि। 1704 मे कोशी नदी पुर्णियां शहरक निकट रहए आ 1952 मे त्रियुगा (तिलयुगा) कें पार करैत तत्कालीन दरभंगा जिला मे घुसि गेल रहए।मने जे एहि 250 वर्ष मे कोशी 70 मील सीधे पच्छिम चलि आएल।मिथिला राज्य नामक कोनो वस्तुअ रहए,तेकर कोनो ऐतिहासिक प्रमाण वा साक्ष्य उप्लब्ध नहि अछि,किन्तु हजार वर्ष पहिनहुं निर्विवाद रूप सं कोशी नदीक अस्तित्व रहए। एतेक वर्ष पहिने जं कोनो मिथिला नामक राज्यक अस्तित्व रहबहु कएल हएतए त ओहि काल-विशेष मे ई नदी दरभंगहु सं बहुत-बहुत पच्छिम दिस बहैत हुअए त कोनो अचरजक गप नहि।तें कौशिकी जनपद कें कोनो मिथिलाक हिस्सा बताएब कोनो जातीय जिदक हिस्सा त भए सकैत अछि,तथ्य आ बुधियारीक हिस्सा त कथमपि नहि।ई आवश्यक नहि जे साहित्य आ पत्रकारिता सं जुड़ल लोक इतिहासहुक जानकार होथि,किन्तु ई लोकनि इतिहासक छद्म कें चिन्हथि आ एहि छद्मनिर्मित असत्य कें त्रुटिवशहु नहि दोहराबथि,एहि विवेकक अपेक्षा त हुनकासभ सं कएलहि जाए सकैत अछि।ई सभ बात विषय सं असम्बद्ध भनहि लागए,असम्बद्ध अछि नहि।एकर चर्चा एहु कारण सं आवश्यक अछि जे एकर आलोक मे कौशिकी जनपदक सन्दर्भ मे चेनुआ अचेबेक कथनक उपयोगिता/ प्रासंगिकता/ सत्यता देखल जाए सकए।देखल जाए सकए जे नागर,शिष्ट आ अभिजात साहित्य मे शिकारीसभक गाथा केहन निधोख आ निर्लज्ज भए कए गाबल जाए रहल अछि। हरिणसभक शौर्य-गाथा कौशिकी जनपद दिआ ई सत्य छै जे एकर भौगोलिक स्थिति विकट रहए।जंगल,नदी आ अनगिनत छाड़न नदी-धार आदिक कारण एहि क्षेत्र मे आवागमन एकटा विकट समस्या रहए।इएह कारण रहए जे पुरना समय मे वा त अधिकांश केन्द्रीय सत्तासभ एहिपर अपन आधिपत्यक प्रति रुचि नहि राखलक,चाहना नहि कएलक,आ जं कएबहु कएलक त एहि क्षेत्रक मूल-निवासी समुदायक जातीय मनिजन,सरदार वा सामन्त लोकनि केन्द्रीय सत्ताक एहि कामना कें फलीभूत नहि हुअए देलक।बादक कालावधि मे एकटा एहनहु व्यवस्थाक झलक देखाइत अछि,जाहि मे केन्द्रीय सत्ता कूटनीतिक-समझौताक तहत स्थानीय सरदारलोकनिकें अपन माध्यम बनाए कए एहि क्षेत्र पर अपन शासन कायम कएलक।एहि सम्बन्ध मे इतिहासक झिर्रीसभ सं आबैत किरिणसभ एतेक मद्धम अछि जे ओकर रोशनी मे वस्तुस्थिति कें ओकर वास्तविक आ सही रूप मे देख पाएब कठिन अछि।बुकानन हेमिल्टनक विभिन्न वृतांत आ पी सी रायचौधुरीक जिला गजेटियर मे यत्र-तत्र विभिन्न काल मे एहि क्षेत्रक स्वायत्त हएबाक सूत्र-संकेत भेटैत अछि,किन्तु ओसभ यथेष्ट नहि अछि। एतहि जाए कए हमरासभ कें अभिजात्य साहित्यक आंचर छोड़ि कए लोकक शरण मे जएबाक बाध्यता बनैत अछि आ हमसभ देखए छी जे अभिजात्य साहित्य/इतिहास मे भनहि शिकारीसभक शौर्य-गाथासभ लिखित रूप मे गाबल जाइत रहल हुअए,हरिणसभ लोक-साहित्य मे अपन गाथासभ मौखिक परम्परा मे गाबि-गाबि कए एतहुका भुंइयां पर एहि तरहें टंकित कए देने छथि जे ओकरा मेटा पाएब सम्भव नहि। स्मरण करैत चली जे सामान्यत: साहित्यक दू प्रकार मानल गेल अछि – शिष्ट साहित्य आ लोक साहित्य।शिष्ट वा नागर वा अभिजात साहित्य हमरासभक विवेच्य विषयक हिस्सा फिलहाल नहि अछि।लोक आ ओकर साहित्यक विचारणक दिशा मे आगू बढैत किछु विद्वानलोकनिक टिप्पणीसभ कें एतय उद्धृत करब प्रासंगिक हएत। ‘लोक’ कें परिभाषित करैत डा सत्येन्द्र कहए छथि – ‘लोक मनुष्य समाजक ओ वर्ग अछि जे आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाण्डित्य चेतना आ पाण्डित्यक अहंकार सं शून्य अछि आ जे एकटा परम्पराक प्रवाह मे जीवित रहैत अछि’ तथा ‘लोक एकटा एहन समुदाय अछि,जे आधुनिक सभ्यता एवं शिक्षा सं वंचित होइतहु प्राचीन विश्वास आ अनुष्ठानादि कें सुरक्षित राखने अछि’। डा हजारी प्रसाद द्विवेदी लोक-साहित्य कें परिभाषित करैत कहए छथि – ‘एना मानि लेल जाए सकैत अछि जे जे वस्तुसभ लोकचित्त सं सीधे उत्पन्न भए सर्वसाधारण कें आन्दोलित ,चालित आ प्रभावित करैत अछि,वएह लोक-साहित्य, लोक-शिल्प,लोक-नाट्य,लोक-कथानक आदि नाम सं बजाएल जाए सकैत अछि’। ‘लोकचित्त’क अभिप्राय कें स्पष्ट करैत द्विवेदी जी आगू कहए छथि – ‘लोकचित्त सं तात्पर्य ओहि जनताक चित्त सं अछि,जे परम्परा-प्रथित आ बौद्धिक विवेचनापरक शास्त्रसभ आ ओहि पर कएल गेल टीका-टिप्पणीक साहित्य सं अपरिचित होइत अछि’। कौशिकी जनपदक ओ काल,जे इतिहासक दृष्टि मे आएल,आ ओ काल जे ‘अन्धकार-युग’क कारण इतिहासक दृष्टि सं ओझल रहल,ओहि सभटा कालावधि मे अभिजात साहित्य जे कएने हो,किन्तु लोक-साहित्यक अजस्र धारा एहि सभ काल मे निर्बाध गति सं प्रस्फुटित आ नि:स्सरित होइत रहल अछि आ लोक-कंठक माध्यम सं जन-मन कें सिंचित करैत रहल अछि। एहन एकटा लोक-गाथा आ ओकर नायक भीम केवट कें जानी-सुनी त ने मात्र गौरवपूर्ण आनन्दक अनुभूति सं मन भरि उठैत अछि,बल्कि एहि जनपदक समस्त संरचनात्मक वैविध्य अपन सम्पूर्ण ओजक संग आंखिक आगू जगमगाए उठैत अछि।वैशाली जनपद कें जं ‘जनतंत्रक जननी’ हएबाक सौभाग्य प्राप्त अछि त कौशिकी जनपद कें ‘जनतंत्रक सखा-सहायक’ आ ‘जनविद्रोहक सूत्रधार’ दुनू हएबाक गौरव प्राप्त अछि। गुप्तवंशक अन्तिम राजा जीवितगुप्त द्वितीयक सन 725 मे पतनक बाद जे अराजकता आ मत्स्यन्यायक दुख:द दौर चलल,तहि सं तंग आ आजिज भए जनता-जनार्दन जखनि पालवंशक संस्थापक ‘गोपाल’क चयन कएलक त ओहि मे कौशिकी जनपदक सेहो नमहर आ महत्वपूर्ण भुमिका रहए।एहि जनपदक जातीय सरदारलोकनि ओकरा चुनबाक आ ओकर शासन-व्यवस्था मे सहयोग देबाक महत्वपूर्ण आ निर्णायक जिम्मेदारी निभएने छला।एहन एकटा वीरपुंगव ‘दिब्बोक’ छला,जे पाल शासकक प्रभावशाली सामन्त रहथि। अपन क्षेत्र कें व्यवस्थित आ विकसित करबा मे पाल शासक लोकनिक अवदान उल्लेखनीय अछि।किन्तु जखनि इएह पालवंशक शासक महिपाल सत्ताक मद मे बौराएल त इएह कौशिकी जनपद ओकरा चुनौती दए बैसल।एहि विद्रोह वा जनान्दोलनक नेतृत्व ‘भीम केवट’ कएने रहथि। कथा बतबैत अछि जे दिब्बोक आ हुनकर भातिज भीम केवट ने मात्र निषादलोकनिक बाइस उपजातिसभ कें एकजुट कए लामबन्द कएलनि,बल्कि एहि विद्रोह मे पौण्डरीक,कोंच,नागर आ दुसाध आदि जातिक लोक सेहो हुनकासभक संग मिलिकए लड़ल आ जीत सेहो हासिल कएलक।भीम केवटक शासन भनहि मात्र चारिअहि वर्ष तक चलल,किन्तु ई एहि बातक प्रमाण अछि जे एहि जनपदक मूल निवासीसभ मे निषाद बहुसंख्यक रहथि,बलशाली रहथि आ हुनकासभ कें अपन अस्मिताक पहचान सेहो रहनि।कथा मे किरातसभक संग भीम केवटक मुठभेड़क जिक्र सेहो आबैत अछि,जे महाभारत-कालीन किरात राजा विराटक जातिक एहि क्षेत्र मे सशक्त उपस्थिति कें दर्शाबैत अछि।ज्ञातव्य अछि जे एकलव्य एहि जातिक छला आ कोशी-गीत मे बहुचर्चित रन्नू सरदार सेहो। एहि क्षेत्र मे किरातक बहुलांशता आ हुनकासभक द्वारा लगभग दू सौ वर्ष तक एहि क्षेत्र पर शासन कएल जएबाक प्रमाण उप्लब्ध अछि।एहि जाति कें कालान्तर मे व्यवस्थाकारलोकनि शेष समाजक लेल त्याज्य आ कुपथ्य (बांतर) घोषित कए देलनि। अजुका समय मे ई जाति ‘बांतर’ नाम सं प्रसिद्ध अछि। कौशिकी जनपदक लोक-गीत,लोक-भजन वा भगैत मे जननायक भीम केवट आइअहु जीवित छथि आ ठसकाक संग उपस्थित छथि। निषादसभक बाइसहु उपजाति मे हिनकर एकहि सनक लोक-गीत प्रचलित अछि।कोशी जनपद पर अपन महीन आ तीक्ष्ण दृष्टि राखनिहार विद्वान हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’क शब्द मे कही त –‘लोक-भाषा मे काव्यादिक संचय-संकलन त बहुलांश मे भेल अछि,किन्तु भीम कैवर्तक लोक-गाथा जातीय काव्य हएबाक चलते आइ तक उपयुक्त स्थान नहि पाबि सकल अछि।बाइस उपजातिक कंठ मे समाहित वीरपुंगव भीम कैवर्तक लोक-भजन मे अक्षय जीवनी-शक्ति अछि।बुद्धिजीवीलोकनि भनहि एहि गाथाक उपेक्षा कएलनि,किन्तु अति-पिछड़ल वर्गक एहि विशाल समुदाय मे,जे युग-युग सं पीड़ित,दलित,पराजित आ अपमानित रहल छथि, हुनकासभक अन्तस्तल मे भीम कैवर्तक गाथा बज्राक्षर मे अंकित अछि,भनहि ओकरा कागजक सादा पन्ना नहि भेटि सकल हुअए’। लोक-गीत कोनो संस्कृतिक मुंह-बाजैत चित्र होइत अछि।भनहि हमसभ एकर रचनाक तिथि नहि तय कए पाबी, ई सभ अपन समयक दस्तावेज अछि।भीम केवटक गीत-गाथा जकां लौरिक मनियारक गीत सेहो तत्कालीन समाजिक संरचनाक चित्रमय रूप अछि।लौरिकक गाथा ओहि समय कें शब्द दैत अछि,जखनि 12म शताब्दीक आसपास पच्छिम भारतक नदीसभक सुखि जएबाक कारण भारी संख्यां मे पशुचारक समाजक लोक गंगाक कात-कात होइत कौशिकी जनपद मे आबि एतय अपन वास-स्थल बनबए छथि। लौरिकक कथा बतबैत अछि जे कौशिकी जनपद भीम केवटक काल सं आगू निकलि चुकल अछि।मत्स्यक्षेत्र आ वनक्षेत्र बहुत हद तक कृषि क्षेत्र मे परिवर्तित भए चुकल अछि।आवागमनक सुविधा पहिने सं बेहतर भेल अछि। किरात,निषाद आदिक क्षेत्र मे यादव आ परमारलोकनि अपन उपस्थिति बनाए लेने छथि।बेसी सम्भावना एहि बातक लागैत अछि जे पशुचारकलोकनिक नमहर समूहक आगमन सं एकाध सदी पहिने लौरिकक कथाकाल हुअए।एहि कथा मे प्राय: सभटा पात्र निम्न जातिक छथि। एकटा उघरा पमार नामक पात्र परमार वंशक कोनो चरित्रहीन आ उपद्रवी व्यक्ति प्रतीत होइत अछि,जे हरबा-बरबा दू भाइक कुटुम सेहो अछि आ ई हरबा नौहट्टाक( वर्त्तमान मे सहरसा जिलान्तर्गत एकटा प्रखण्ड) राजा छल।एकर अतिरिक्त एहि कथा मे दुहबी-सुहबी नामक दूटा ब्राह्माण कुमारीक चर्चा आबैत अछि।एहि सं अनुमान कएल जाए सकैत अछि जे ब्राह्मणलोकनिक छिटपुट उपस्थिति सेहो एहि क्षेत्र मे भए गेल रहए।कौशिकी जनपद मे प्रचलित लौरिक-गाथा मे विशेष बात ई अछि जे एहिमे वर्णित अनेक गाम वा त एहि जनपदक अछि वा पड़ोसी मधुबनी जिलाक।पात्रसभ मे निम्न(सोल्हकन) आ अतिनिम्न(दलित) जातिक लोक छथि जे एहि क्षेत्रक रहाइशक स्थिति कें पुष्ट करैत अछि जे ई इलाका हुनकहिसभक छल,आइअहु अछि,बस ओहिमे सवर्ण जातिक हल्लुक-सन दखल शुरू भए गेल अछि।कौशिकी जनपदक सुपौल आ सिंहेश्वर स्थानक बीच एकटा प्रसिद्ध गाम अछि – हरदी।एतय लोकदेव लौरिकक गढ रहल अछि आ तें गर्व सं एकरा हरदी गढ कहल जाइत अछि।एतहुक प्रसिद्ध वनदेवी लौरिकक अराध्या रहल छथि।लौरिकक स्मृति मे एतय प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसर पर विशाल मेला लागैत अछि आ ई स्मृति मेला एहि बातक साक्ष्य अछि जे लोक-समाज मे लौरिकक आइअहु कतेक सम्मान छै।लौरिक पर विभिन्न भाषा मे गीत-कथासभ पसरल अछि।भोजपुरी लौरिकायन मे लौरिक भनहि आतंक आ अपहरणक पर्याय रहल होथि,किन्तु कौशिकी जनपदक लौरिक-गाथा मे लौरिक दुष्ट-संहारक,सज्जन-उद्धारक आ अबला नारीक रक्षक छथि।लौरिकक ई लोकगाथा मात्र एक व्यक्तिक उत्थान-पतनक मार्मिक गाथा-मात्र नहि अछि,एहि क्षेत्र-विशेषक मूल-समाजक अस्मिताक गौरव-गान अछि। राजल धोबी,बारू दुसाध,बंठा चमार,गांगे क्षत्री सन-सन मित्र-पात्र हुअए वा करना कुम्हार,गज भीमल, कौल्हमकड़ा सन-सन शत्रु-पात्र,कथा मे एहिसभक बल आ पराक्रमक चर्चा अद्भुत छै।वर्णनक अतिरेकहु एतेक मोहक छै जे सुननिहार एकदम सं मन्त्रमुग्ध भए जाए।लौरिकक बियाह मे ओकर पिता कुब्बे सत्ताइस मन दूध पीबि जाइत अछि,सात सौ तौला दही चाटि जाइत अछि,सत्तर माठ सकरौरी सुड़कि लएत अछि आ आग्रह कएला पर एक सौ हांड़ी मलाइ कंठक नीचां उतारि लएत अछि।लौरिकक नव-ब्याहता मांजरि उठैत अछि त अकस्मात जेना बिजली छिटकैत अछि,आकासतारा पटोर लहराबैत अछि,माणिक-कंचुकी झलझलाए उठैत अछि,रतन-नथिया हिलैत अछि,मणिमय-कुंडल झुलैत अछि आ बज्र-चूड़ी झनझनाए उठैत अछि।एहि लोक-गाथाक एहेन अनेक प्रसंग सुनि कए एकर अज्ञात रचनाकारक प्रति अनायासहि अनन्त श्रद्धा सं माथ झुकि जाइत अछि। लोक देव-देवीसभक अवतरण कौशिकी जनपदक मानस-भूमि लोक-नायकलोकनिक संग-संग लोक-देव-देवीसभक अनेक गाथा-गीतसभ सं आप्लावित अछि।एहि देव-देवीसभ मे एहि जनपदक त्रस्त-मानस ने मात्र आसरा लेलक अछि,बल्कि हुनकासभ सं संघर्ष आ पुरुषार्थक सीख आ प्रेरणा सेहो ग्रहण कएलक अछि।एहि मे धार्मिकता कें सेहो एक कारकक रूप मे देखल जाए सकैत अछि,किन्तु एकटा स्पष्ट रेखा एहि धार्मिकता कें अभिजात्य आ लोक मे विभाजित सेहो करैत अछि।एहि मे संशय नहि जे धर्मक उत्पत्तिक जड़ि मे भय रहए। आकाश मे बिजली तड़कल,वर्षा हुअए लागलए, ओला खसलए,अन्धर उमड़ि पड़ल,जल-प्लावन भए गेलए आ आदिकालक मनुष्य भयभीत भए गेल। ई बुझि पाएब कठिन रहए जे एहि प्राकृतिक प्रकोपी खेलक पाछू कारण की छै।भयाक्रान्त भए कए ओसभ कोनो अज्ञात शक्ति कें एकर कारण मानि लेलक आ ओकरा सुविधानुसार देव वा दानवक नाम दए देलक। निवारणार्थ ओसभ किछु टोटका गढलक आ पूजादिक पद्धति बनएलक।प्राकृतिक क्रीड़ासभक अतिरिक्त भौगोलिक परिस्थिति, हिंसक जीव-जन्तु,दैहिक बीमारीसभक बीच अपन अस्तित्वक रक्षाक लेल सेहो मनुष्य एहि दैवी-शक्तिसभक शरण गहलक।मानव-जीवनक आदिम चरण आ बादहु मे स्त्री आ भूमि कें लए कए संघर्षक स्थिति बनैत रहल।संघर्ष मे विजय-प्राप्ति आ भविष्यहु मे विजयी हएबाक कामना,पराजित पक्ष द्वारा बदला लेबाक आ विजयी हएबाक अभिलाषा सेहो अज्ञात-शक्तिसभक कल्पना कें सुदृढ कएलक।कालान्तर मे एकर दू धारा बनि गेल। अभिजात्य पुराणादिक माध्यम सं अपन देवी-देवता रचलक त लोक भिन्न देवक कल्पना रचलक। अभिजात्य त अपन अनदेखल आ काल्पनिक देव-देवीसभ मे ओझराएल रहि गेल,किन्तु लोक ओहि सं आगू बढि प्रत्यक्ष आ साक्षात नायकलोकनि मे अपन देवसभक स्थापना कए लेलक।एहि ‘लोक’ मे सेहो पहिने कबीला आ फेर जातिसभक आधार पर भिन्न-भिन्न देव-देवीसभक विभाजन होइत रहल आ संग-संग हुनकसभक गाथासभ प्रवहमान होइत रहल।कौशिकी जनपदक लोक चिल्का महाराज,लाला महाराज,लालमैन महाराज, छेछना डोम,दीना भदरी,सलहेस,अमर बाबा,उगरी महाराज,कारू खिरहर,खेदन महाराज,सोनाय महाराज, स्वरूप महाराज,बीशू राउत सन अनेक देवलोकनिक आराधना-गाथासभ मे विभोर भए गेल। डा विश्वनाथ झा एहि लोकदेवसभक सम्बन्ध मे किछु स्थापनासभ देने छथि,जे एहि प्रकार अछि – (1) लोकदेवी-देवतासभक उदय ब्राह्मणवादक विरोध मे भेल अछि। हिनकरसभक पूजोपासना मे कर्मकाण्डीय आडम्बरसभक अभाव अछि। हिनकर निजी पहचान सहजोपासना अछि। (2)सांस्कृतिक पृष्टभूमि मे एकर आधार जातीय अछि। (3) हिनकर प्रतिष्ठा अनुसूचित जाति,जनजाति तथा पिछड़ल जातिसभ मे अपेक्षाकृत बेसी अछि। (4)हिनकरसभक पूजोपासना राग-ताल एवं लय-छन्द मे निबद्ध अछि।एहि सं सम्बद्ध गीत-गाथा,नृत्य-संगीत, चित्र-मूर्ति,लोकोत्सव आदि एकर प्रमाण अछि। (5) ई जातीय-सोच,कलात्मक-संचेतना,सामाजिक-आचार आदि कें बढावा देलक अछि। जं पुर्वाग्रह वा दुराग्रह नहि हुअए त डा विश्वनाथ झाक एहि स्थापनासभ सं असहमत हएबाक कोनोटा कारण नहि देखाइत अछि।एतबहि नहि, जं दृष्टि मे ईमान हुअए,ओहि पर अभिजात्यक मोतियाबिन्द नहि चढल हुअए त कौशिकी जनपदक परिपेक्ष्य मे ई बात साफ-साफ देखाइत अछि जे ई जनपद लग-पासक जनपदहि सं नहि, दूर-दराजक जनपदहुसभ सं एकदम अलहदा,अनन्य आ विशिष्ट अछि।ई बहुत स्पष्ट अछि जे कौशिकी जनपद मे लोक-नायक,देव-देवीसभक विभिन्न गाथासभक धारा ने मात्र अभिजात्यक धाराक समानान्तर अछि,बल्कि एहिमे अभिजात्य-धाराक प्रति नकार आ प्रबल प्रतिद्वन्द्विताक भाव उपस्थित अछि।एक दिस अभिजात्य सुन्दरीसभक अनूप-रूप,ओकर कदली-जंघा आ ओकर कूचद्वयक दृढ-उतुंगतादिक वर्णन कए अपन प्रतिपालक सामन्तलोकनिक महफिल कें रौनक दए रहल छल त दोसर दिस लोक अपन क्षत-विक्षत जीवन कें गीतसभ मे ढालि ओहि सं अपार जीजिविषा ग्रहण कए रहल छल। अभिजात्य लग अभिसारिका छल त लोक लग कोशी छल। अभिजात्य लग गिनल-गूथल सत्तासीन नायक रहए त लोक लग ओकर समानान्तर अनगिनत संघर्षशील नायकसभक फौज रहए। अभिजात्यक भीम जं चालीस हाथीक बल राखैत छल आ पवनतनय हनुमानक बल पवन-समाना रहए त लौरिक मनियारक खण्डा सेहो अस्सी मनक आ रन्नू सरदारक कोदारि अस्सी मनक त रहबे करए,ओहि कोदारि मे बेरासी मनक बेंट सेहो लागल रहए। ई रन्नू सरदार भैंसा सन मरद छै,जेकर देह बज्र सन छै आ ओकर मोंछ बांसक बत्ती सं बनल बहिंगा सन। अद्भुत! कोशी-गीतसभक भाव-वैविध्य लोक-नायक आ विविध लोकदेवी-देवसभक गीत-गाथासभक अतिरिक्त जे चीज कौशिकी जनपद कें खास आ अनन्य बनबैत अछि,से अछि कोशी नदी आ एहि क्षेत्रक जन-मन मे अदौं-अदौं सं बसल ओकरा सं सम्बन्धित कोशी-गीत। “कोसी-जनित विषम परिस्थितिसभक चपेट मे पड़ल कोसी निवासीसभक आकुल-व्याकुल प्राण सं आह रूप मे नि:सृत उच्छवास-गीतसभ मे ओकरसभक आक्रान्त जीवन अपन सर्वांगीन रूप मे सजीव भए उठल अछि।एतय जीवन दुखहु मे गतिपूर्ण अछि।ई दुखक पहाड़ सं टकराबैत अछि,खसैत अछि,खसि-खसि कए उठैत अछि आ फेर ओहि पहाड़क चोटी पर चढि कए मुस्काबैत अछि।विपत्तिसभक अनेक झंझावातक बीच पड़ल एकर जीवन-नैया लड़खड़ाइत अछि,लहरिसभक प्रचण्डता एकर साहसिकता कें डेग-डेग पर धोखा देबए चाहैत अछि,कष्टसभक दलदल मे पड़ि कए नैया रहरहां फंसि जाइत अछि,तखनिअहु अलमस्त नाविक मस्त तरानासभक संग बढितहि जाइत अछि,एकटा वीर योद्धा जकां दुख आ विपत्तिसभ सं मोर्चा लएत रहैत।कठिन जीवनक एहि दुर्गम घाटीसभ सं बहैत एहि कोसी-गीतसभ मे कोसी निवासीसभक जीवनक प्रचूर अभिव्यक्ति भेल अछि।प्रलयंकर बाढि,उफनाइत लहरसभ,घहराइत तूफान सं लादल पूजा-गीतसभ मे हमसभ पाबए छी कोसी निवासीसभक ईश्वर पर दृढ विश्वास,जे दुखक अनवरत झंझावातहु मे अटल रहैत अछि। निरुपाय,असहाय,निरबलम्ब कोसी निवासीसभक स्वानुभूत सुख-दुखसभ सं परिप्लावित,मधुत भावनापन्न कोसी-गीतसभ कें हृदयंगम कए सहसा एहन बोध होइत अछि जे एतहुका बच्चा-बच्चा प्रकृतिक विकरालता सं संत्रस्त होइतहु ओकरा चुनौती दएत, दुखसभ सं पराजित होइतहु पराजय कें चिढबैत,अनन्त विपत्ति मे पड़ितहु ओकरा ललकारा दएत गौरवपूर्ण भाव सं कवीन्द्र रवीन्द्रक शब्द मे अन्तर्मनक भावात्मक अभिव्यक्ति करैत घोषणा कए रहल अछि – ‘हे दिव्यधामी देवतालोकनि! तोरे जकां हमहुसभ अमृतक पुत्र छी,हमहुसभ अमृतक पुत्र छी’।“ कोशी-गीतसभ दिआ किछु कहबाक लेल एहि सं नीक कोनो शब्द आ अभिव्यक्ति नहि भए सकैत अछि,जे उपरोक्त पंक्तिसभ मे कोसी-गीतक संकलनकर्त्ता ब्रजेश्वर मल्लिक जी अनेक दशक पुर्व कहलनि।ई कोशी-गीतसभ जेना एहि जनपदक मानसक गाबैत-बतिआबैत दस्तावेज अछि।विभिन्न जाति-वर्ग अपन-अपन तरीका सं कोशी-गीतसभ मे अपन मन-हृदय-आत्मा कें डुबाए कए अपन अभिव्यक्ति कें अंकित कएने अछि।एहि गीतसभ मे दुख, आक्रोष,प्रार्थना,विद्रोह सन सन परस्पर विरोधी किन्तु परस्पर पूरक भाव अछि त वैयक्तिक आनन्दक संग-संग जातीय अस्मिताक प्रदर्शन सेहो अछि। किछु गीत मे सामाजिक समरसताक अद्भुत चित्र अभरि कए आएल अछि।कोशी कें अनेकठाम चिरकुमारीक रूप मे देखाएल गेल अछि आ एहि नदीक उद्याम निरंकुशता कें ओकर कुमारी रहि जाएबहि सं जोड़ल जाइत अछि।किन्तु लोक-कल्पना की कोनो सीमा,कोनो बन्हन मानए छै?ओ अपन ठेठ लौकिकताक विस्तार मे कोशीक विवाहक कल्पना सेहो करैत अछि। कोशी (कन्यारूप मे) क विवाहक प्रसंग मे एकटा गीत अछि जहि मे समाजक प्रत्येक जाति-वर्गक लोकक सहयोगी भूमिका कें रेखांकित कएल गेल अछि।कोशीक विवाह भादो मास मे भए रहल अछि।एकर तैयारी चलि रहल छै।एहि मे माली मोर उठएतए आ नगरक समस्त लोक बराती सजएतए।दुलहिन कोशीक लेल डोम डाला ओढएतए,कपड़िया साड़ी ओढएतए, चुड़िहारा चूड़ी पिन्हएतए,दर्जी चोली सीतए,सोनार हंसुली गढतए,तेली तेल लगएतए,बहिन कमला उबटन लगएतए आ रन्नू सरदार टीका आ टिकुली पिन्हएतए।बेटी त सम्पूर्ण समाजक जिम्मेएदारी छै,त एहि मे सभक सहयोग सेहो चाही आ एहि प्रकार अलग-अलग जातिक होइतहु सभगोटा एकहि समाजक पूरक आ अभिन्न अंग अछि,जेकरा एहि गीत मे नीक जकां देखल जाए सकैत अछि। गीतसभ सं हुलकैत संस्कृति विद्वानलोकनि द्वारा लोक-गीतसभ कें सेहो विभिन्न श्रेणीसभ मे विभक्त कएल गेल अछि आ संस्कार गीत कें सेहो एकर एक श्रेणी मे राखल गेल अछि।गर्भाधान सं अन्तर्धान धरिक सोलह संस्कार मानल गेल अछि आ प्राय: प्रत्येक संस्कार-कर्म पुरोहिती-व्यवस्था आ कर्मकाण्डक उत्पत्ति अछि,तें एकरा लोक-संस्कृतिक हिस्सा मानब कतेकहु लोकक लेल कनी कठिन अछि।एकर अधिकांश गीतसभ मे अभिजात्यक छाप सेहो अछि।किन्तु जन्म, मरण, विवाह आदि त सम्पूर्ण मानव-जातिक जीवनक अभिन्न कारोबार अछि।एहि अवसरसभक लेल सेहो लोक एहन आचार-व्यवहारक समृद्ध परम्परा बनाए लेने अछि,जेकर पुरोहिती कर्मकाण्ड सं कोनो लेब-देब नहि अछि।उच्च जातिक विभिन्न संस्कारसभ मे सेहो स्त्री-वर्ग एहन अनेक रस्म-रिवाज/बीध-विधान बनाए राखलनि अछि,जे पुरोहिती मंत्र-विधि-पद्धतिक दायरा सं एकदम बाहर अछि।कखनहु-कखनहु त ई लागैत अछि जे विवाहादिक कर्म शुद्धत: स्त्रीगणक अधिकार-क्षेत्रक काज रहए,जहि मे बहुत बाद मे जाए कए पुरोहिती हस्तक्षेप भेलए।जे-से! गौर सं देखी त एहि संस्कार-गीतसभ मे सेहो ठाम-ठाम लोक आ अभिजात्यक फर्क देखाइ पड़त।ओना पीड़ा आ खुशी एहन चीज अछि जेकर कारण आ प्रकार भनहि अलग-अलग हुअए,लोक आ अभिजात्यक अन्तर कें समाप्त भनहि नहि करए,न्यून अवश्य कए दैत अछि। कौशिकी जनपदक संस्कार-गीतक विविधता आ प्रचूरता अचरज मे डालि देबएबला अछि।उदाहरणक लेल विवाह-संस्कार कें ली त एहि मे विभिन्न विधानक अनुरूप विभिन्न गीतसभक भण्डार भरल पड़ल अछि।एहि मे लगन,तिलक,उबटन,कासा भुजाय,दल-धोय,मटकोर,बिलौकी,बटगमनी,ओमौर,लहछू,द्वार-छेकाय सं लए कए विवाह,सुहाग,मड़बा,मिलन,कन्या-निरीक्षण,परिछन,अठोंगर,भांवर,कन्यादान,जोगपिसाय,लाबाभुज्जी,कंगन बंधाय,सिन्दूरदान,कोहबर,घुंघट,चतुर्थी,पनबिछी,दुरागमन,बेटी बिदाय,समधी मिलन,खीर खबाय आदिक संग-संग भतखय मे समधी आ बराती कें पढल जाएबला गारि-गीतसभक बहार अछि।एहि गीतसभक भाव विधान-विशेषक विधि मात्र तक सीमित नहि अछि।एकर माध्यम सं स्त्रीगण ने मात्र अपन पीड़ासभ कें अभिव्यक्ति देलनि अछि,बल्कि सामाजिक कुरीतिसभ पर प्रहार सेहो कएलनि अछि। कोनो एकटा गीत मे बेटी अपन अल्पवयस हएबाक दोहाइ दए कए पिता सं अखनि विवाह नहि करबाक विनती करैत अछि,त कोनो गीत मे बेटी कें बापक लेल ग्रहण जकां बताएल गेल अछि।एकटा गीतक भाव अछि जे जहि तरहे आम बिना आमक घौदा आ कोयल बिना गाछक डारि सून लागैत अछि ,तहिना बेटीक ससुरारि चलि गेलाक बाद पिताक घर सून भए जाइत अछि।एहिना कोनो गीत मे विवाहक बाद बेटीक आजादी छिनाए जएबाक दुख व्यक्त भेल अछि।एकटा गीत मे बेटीक माय धमकीक स्वर मे कहैत अछि जे जं बूढ जमाय भेल त ओ अपन अंगना मे नहि रहत,मने अंगना त्यागि देत।आगू ओ कहैत अछि जे जं एना भेल त ओ सभटा पोथी-पतरा जराए देत आ जं नारद बाभन बीच मे किछु बाजबाक हिमाकति करता त ओ हुनकर दाढी पकड़ि कए घिसिअएती।भगवान शंकरक कथा सं जुड़ल एहि गीतक पृष्टभूमि अभिजात्यक अछि जाहि मे कोशी-कमला परिक्षेत्रक एकटा जाति-विशेष मे बेटीसभ कें जातीय श्रेष्टताक नाम पर बूढ भलमानुसलोकनि सं बियाहि देबाक रुग्ण परिपाटी नमहर कालावधि तक चलल।किन्तु गीत मे व्यक्त आक्रोश आ विद्रोहक स्वर खांटी रूप सं लौकिक (अनभिजात्य) अछि। पुराणादिअहु मे कतिपय स्थल पर और कुछ कोशी-गीतसभ मे सेहो कोशी कें बाभनक बेटी आ कुमारि सेहो कहल गेल अछि।अचरज नहि जे लोक-मन एहि गीतक माध्यम सं कोशी कें अदृश्य प्रतीक मानि कए एहि विद्रोहक मानसिक समर्थन कएने हुअए जे कोनो बूढ आ कुपात्र सं बियाहल जएबाक सत्ती ओ कुमारि रहब बेसी नीक बुझैत अछि।एतय ई ध्यातव्य अछि जे लोक-मान्यता मे कोशी आ कमला सहोदर बहिन अछि।सहोदरा होइतहु कमला परम्परा कें आंखि मुनिकए स्वीकार करैत अपन नियति सं समझौता कएनिहारि छथि,जखनिकि कोशीक रग-रग मे विद्रोहक विस्फोटक भरल अछि।इएह अन्तर कोशी आ कमला जनपदक मानसिकता मे सेहो देखाइ पड़ैत अछि।एतय इहो ध्यातव्य अछि जे अनेक लोकगीतकारलोकनि गीत रचिकए ओहिमे ‘विद्यापति’ भनिताक प्रयोग कए ओकरा उदारतापूर्वक लोक-समाज मे वितरित कए देलनि अछि।तें ई आवश्यक नहि जे जहि गीतसभ मे विद्यापति भनिता लागल हुअए,ओ राज्याश्रय मे रहिकए अपन पालन-पोषणकर्ता सामन्तक लेल ‘कीर्तिलता’ सन दरबारी रचना करनिहार विद्यापतिअहिक रचल हुअए।एहि जनपद मे ‘विदापत नाच’ प्रसिद्ध अछि,एहि मे विद्यापतिक लोक-उच्चरित विदापत नाम जुड़ल अछि;किन्तु ई नाच हुनकर रचल नहि छनि। ओहुना एहि आ एहन अन्य गीतसभक अभिव्यक्तिक तेवर विद्यापतिक समझौतावादी कवि-मानस सं मेल नहि खाइत अछि। संस्कार गीतसभक अतिरिक्त एहि जनपद मे बिरहा,बरहमासा,झूमर,कजरी,चैता,निर्गुण,जंतसार,लोरी,नारदीय, मर्सिया आ खेतीक विविध काजक बेर मे गाएल जाएबला गीतसभक अपार भण्डार अछि। इहो कहि सकए छी जे लोक-जीवन-जगतक कोनो एहन क्षण नहि अछि,जेकरा लेल लोक-कविगण गीत नहि रचलनि आ एकर माध्यम सं अपन विविध भावना कें अभिव्यक्ति नहि देलनि। एहि जनपद मे निम्नवर्गक संख्यां अधिक अछि आ हुनकरसभक अतीत गरीबीक अछैतहु गौरवमय रहल अछि। खुदमुख्तियारी हिनकासभक शोणित मे रहल अछि।एना मे स्वाभाविक अछि जे हिनकरसभक मानस मे उच्चवर्गक प्रति एकटा खास किस्मक अवहेलना-भाव बैसल अछि। आधुनिक लोकतांत्रिक पद्धति मे ओसभ एकरा समय-समय पर वोटक माध्यम सं व्यक्तहु कएने छथि।कांग्रेसक चला-चलतीक जमाना रहितहु एहि क्षेत्र मे समाजवादी विचारधाराबला पार्टीक मजबूत उपस्थिति रहल अछि।लोक-गीतसभ मे सेहो एहि अवहेलना-भावक अभिव्यक्ति होइत रहल अछि।एकटा लोकगीतकार त कबीरक बेलौस भाव मे व्यंग्य करैत कहैत अछि – “अरे हो,बुड़बक बभना,चुम्मा लए मे जाति नहि रे जाए?जोलहा,धुनियां,तेलिया-तेलिनियां के पीबए ने छुअल पनियां,नटिनी के जोबनमा के गंगा-जमुनमा मे डुबकी लगाए कए नहनियां”।एहि लोकगीतसभ मे एहन तीर जकां भोंकाएबला अनेकरास टीपक भरमार छै। अनेक लोक-गीत मे कोशी स्वयं कें श्रेष्ट-कुल-जाया कहैत अछि। तेकर बावजूद ओ वीर कोहला वा रन्नू सरदार सन निम्नजातिक लोकक संग सम्बन्ध जोड़ैत अछि त ई लोक-मनक वएह भावनाक अभिव्यक्ति प्रतीत होइत अछि। होलीक जोगीरा-गीतसभ मे त ई भावना अपन चरम उत्कर्ष पर होइत अछि,जखनि जोगीराक टोली दरबज्जा पर चढिकए ठमकक संग अभिजात्य कें रस लए-लए कए गरियाबैत अछि,ओकरा निर्मम हास्यक संग बेपर्द करैत अछि। एहि लोकगीतसभ मे एहि जनपदक मानस मानू जेना अपन सभटा दुखक समाधान,सुखक सन्धान आ श्रमक उत्सवधर्मिता कें खोजि लेलक अछि आ खोजि कए ओकरा सहेज लेलक अछि। नाचसभक कौशिकीकरण भावसभक प्रबलता जं गीतसभ कें जन्म दएत अछि त आनन्द आ पुलकक अतिरेक नाचबाक लेल बाध्य कए दएत अछि।ई एकटा अनबुझ बुझौवलहि जकां अछि जे कौशिकी जनपदक जनजीवन जखनि असुविधा,कष्ट,विपत्ति आ संघर्षक मारि झेल रहल छल,तखनि एतय गीत,नाच आदिक एतेक नमहर समृद्ध परम्परा बनल;आ आइ जखनि जन-सुविधासभक विस्तार भेल अछि,अनेक भौतिक वस्तु आ संरचनात्माक ढांचाक निर्माण आ उप्लब्धता भए गेल अछि त ई सभ परम्परा प्राय: समाप्तिक कगार पर ठाढ अछि।एहि जनपद मे छोट-छोट मेला आ विभिन्न नाच-तमाशाक सुदीर्घ परम्परा रहल अछि।एहि नाचसभ मे पुरुषहि स्त्री-वेश मे नाचैत रहला अछि। आन-आन क्षेत्र मे एहन नाच कें “लौंडा नाच”क संज्ञा देल गेल अछि।किन्तु कौशिकी जनपदक लोक-मानसक भलमनसाही देखिऔ जे एतय ई हीनताबोधक,ग्लानिदायक शब्द कबूल नहि अछि। एमहर एहन नर्तकसभ कें “नटुआ” कहल जाइत रहल अछि।एमहरका नाचसभ मे बिदापत नाच,राजा सलहेस,नैका-बनजारा,दुलरा दयाल,कुमर बृजभान, आल्हा-ऊदल,जालिम सिंह,कमला मैया,कोशी मैया, रमखेलिया आदि खेलल जाइत रहल अछि।एहि नाचसभ कें जं एहि जनपदक मौलिक निर्मिति नहिअहु मानी,तखनहु एहि बात मे कोनो संशय नहि जे एतहुका लोक-कलाकारलोकनि एहि नाचसभक पुर्ण नहिअहु त बहुत हद तक एकर कौशिकीकरण अवश्य कए देने छथि। विशेषतया नाचक “बिकटा”सभ एहि काज मे खास आ विपुल योगदान देने छथि।नाचक दौरान एहि बिकटासभक मारूक टिप्पणीसभ मे एहि जनपद-विशेषक विभिन्न आ विशिष्ट परिचितिसभक उल्लेख बेर-बेर होइत अछि। एहि नाचसभ आ एहि बिकटासभक ‘विकट’ टिप्पणीसभ मे अभिजात्य कें फूहड़ता आ अश्लीलताक दर्शन भए सकैत अछि,होइतहु अछि,किन्तु ईसभ वस्तुत: सरल लोक-मानसक निर्मल अभिव्यक्ति अछि।बिकटा सं ओकर शिक्षा दिआ पुछला पर ओकर उत्तर होइत अछि – “गाय-माल चराबए आ छौड़ी पटिआबए के चक्कर मे कोशी-बान्ह तक त नहि,बस गजना धार तक कोनो-कोनो तरहे पढि सकलिऐ”! एहिना एकटा बिकटा अपन बापक भूमिका करैत व्यक्ति सं पुछैत अछि जे की ओ ओकर (बिकटाक) माय सं बियाह केने रहए?उत्तर मे ‘हं’ सुनितहि बिकटा तपाक सं कहैत अछि – ‘तब त हम्हूं तोहर माय सं बियाह करबह’। एहि बिकटासभक जांघ मे बोखार होइत अछि आ इलाजक लेल ओ ईंटाक टैबलेट खाइत अछि। अभिजात्यक लेल एक त पुरुष द्वारा स्त्रीक स्वांग भरिकए नाचबहि आपत्तिजनक अछि,तहि पर सं एहन भदेस टिप्पणीसभ त एकदम सं नाकाबिले-बर्दाश्त सन बात भए जाए त कोन अचरज!किन्तु लोक-मानस कें एहि मे ‘रस’ आबैत अछि आ एहनहि मजाकसभ ओकर ठोर पर मुस्की आनैत अछि,ओकरा ठहाका लगाबैक लेल बाध्य कए दएत अछि। एहि नटुआ-नाचसभक अतिरिक्त ‘सामा-चकेबा’ आ ‘जट-जटिन’ नाच अछि,किन्तु एहि पर शुद्ध रूप सं स्त्री-समाजक आधिपत्य आ एकाधिकार अछि।किन्तु कमाल अछि जे अहू नाचसभ मे ‘कोशी’क उपस्थिति रहैत अछि। हमर घर सं प्राय: पचास डेगक दूरी पर धानुक-टोली अछि।धानुक अर्थात कौशिकी-कक्ष वा जनपदक सर्वाधिक पुरान डीही आ मूल-निवासी निषादलोकनिक एक उपजाति। कृषि-कार्यक कारण एहि टोल सं हमर परिवारक घनगर सम्बन्ध रहल अछि – परिवार जकां।एहि टोलक प्राय: प्रत्येक परिवारक जन-जनी हमर खेतीक काज सम्हारय मे योगदान दएत रहल अछि। अपन समाजवादी प्रतिबद्धता आ सामासिक विचार-व्यवहारक चलते हमर पिता एहि टोलक अधिकांश लोकक लेल ‘मालिक’ नहि,’दादा’ वा ‘बाबा’ बनल रहला,कहाइत रहला। सम्बन्धक ई सिलसिला हमरा एहि टोलक अनेक महिलाक ‘देवर’ बनबैत रहए त अनेक महिला ‘कका’ कहितहुं हमरा अपन हंसी-मजाकक घेर मे लए लएत छली।सम्बन्धक इएह आंच हमरा दू-एक बेर ‘जट-जटिन’ नाच देखबाक अवसर देने रहए,जेकरा ओसभ नाच नहि,’खेला’ कहैत छली,जे मात्र महिलासभक बीच खेलल जाइत अछि आ जेतय कोनो पुरूषक उपस्थिति कठोर रूप सं वर्जित रहैत अछि।एक त हमर किशोरवय,दोसर देवरबला रसमय सम्बन्ध,हमर उपस्थिति ने मात्र ओकरासभ कें आह्लादित करैत छल,बल्कि कएक बेर हमरा ओहि नाचक बीच खींचकए ओ रसविभोर महिला सभ हमरहु ओहि ‘खेला’क प्रतिभागी मानि/बनाए हमरा संग छेड़खानीक आनन्द सेहो लएत छली। हमर स्मृति मे ओहि नाचक किछुअहि हिस्सा सुरक्षित अछि,जहि मे सं एक अछि ‘जट’क भूमिका करैत महिला द्वारा मोरंग जएबाक अनुमति मांगला पर ‘जटिन’ बनल महिलाक “कोशीक एहन नाह खेबबाक मजा मोरंग मे कतए भेटतौ रे जटा” गाबैत अपन एक अंग-विशेष दिस इशारा करब आ ओहि अंग कें बेर-बेर उचकाएब। ‘जट-जटिन’क ‘खेला’ त खेलनिहार महिलालोकनिक लेल जेना मदनोत्सवक नाच अछि।एकर विपरीत ‘सामा-चकेबा’क प्रस्तुति मे अपेक्षाकृत शालीनता अछि।यद्यपि कि इहो महिलासभक दूटा समूह द्वारा एक-दोसराक डांढ मे हाथ फंसाए कए खेलल जाइत अछि,किन्तु महिलालोकनिक आपसी चुहल इहो नाच मे चलैत रहैत अछि। प्रसिद्ध नाटककार अनिल पतंगक अनुसार सामा मोरंग नरेश राजा रतिनाहक पुत्री तथा चक्रवाक अथवा चकेबा मद्र-देशक राजा लक्ष्मण सेनक पुत्र छला आ वृन्दावन नामक जंगल सहरसा जिला मे सिमरी-बख्तियारपुरक उत्तर अवस्थित अछि।एहि स्थापना कें अनिल पतंग इतिहाससम्मत कहए छथि।एहि सूचना आ तथ्यक आलोक मे ‘सामा-चकेबा’क खेल कें कौशिकी जनपदक मौलिक उत्पत्ति मानल जाए सकैत अछि। ईसभ नाच एहि बातक प्रतीक अछि जे आनन्दक क्षणसभ कें कोनो पूर्व तैयारी वा तामझामक बेगरता नहि अछि। पुरुषलोकनिक नाच मे लगपासक घरसभक सुतबा मे उपयोग होइबला काठक बनल आठ-दस टा चौकी जुटाए कए आपस मे जोड़ि देल गेल,प्रकाशक लेल कोनो छोट-मोट प्रबन्ध कए लेल गेल आ नाच शुरू। पुरुषलोकनिक मेक-अप लेल जं भुषणा पौडर भेटि गेल त वाह-वाह,नहि भेटल त वाह-वाह।किन्तु स्त्रीलोकनिक नाच मे त ने मंचक झमेल,ने मेक-अपक,अंगनाक भुइयां हुअए वा खेतक,नाचक स्थल बनल-बनाएल उप्लब्ध। क्षरणोन्मुख लोक आ बदलैत परिदृश्य घर-परिवारक बेहतरीक लेल मजदूर आ मिस्त्रीक काज करनिहार पीतांबर कहियो नटुआ भेल करैत रहए। नाचैत काल ओकर पैरक धमक सं चौकीसभक टुटबाक रेकार्ड बनल रहए।बहुत रास लोक तहिया पीतांबर नटुआक नाम सुनि अपन कमजोरहा चौकी देबए सं नठि जाइत छला।नाचक डिमाण्ड कम भए गेलए,पीतांबर सीजनल मजदूर भए गेल,कखनहु देबाल जोड़बाक काज आ कखनहु खेतक काज करए लागल। आइ पीतांबर लकवाग्रस्त भेल घर मे पड़ल अछि आ ओकर परिजनसभ मे सं दूर-दूरतक केकरहु कोनो नाच सं कोनो सम्बन्ध, कोनो सरोकार नहि अछि।पीतांबर स्वस्थ रहए त कहैत छल जे आब त उत्सवसभ मे डीजेक कानफाड़ू ध्वनि पर ‘टिंकू जिया’ , ‘दिल करे चूं-चांय चूं-चांय-चांय’ वा ‘तनिक जींस ढीला करा’ सन-सन गीतसभपर लोक बेहुदा ढंग सं उछलि-कुदिकए नाचए मे अपन शान बुझैत अछि,आब हमरसभक नाच के देखए? नथुनी मण्डल पर गोसांइक ‘भाओ’ आबैत रहनि। ढ़ोल,हरमुनियां,झालि आ गायनक बीच नथुनी भगतक माध्यम सं गोसांइ लोकसभक उपचार आ विभिन्न समस्याक समाधान हेतु सलाह दएत छला। आब लोकसभ कें अस्पताल उप्लब्ध छै,डाक्टर उप्लब्ध छै आ रोगसभक उपचारक आधुनिक तंत्र उप्लब्ध भेल छै त नथुनी भगत पर ‘भाओ’ आएब ठमकि गेल अछि आ ओहि सं सम्बन्धित सभटा वाद्य-यंत्र आ गायन-कला कोनटा धए लेलक अछि।जं भक्तहि नहि,त ‘भाओ’ कतय! आब धनुकटोलीक स्त्रीगण ‘जट-जटिन’ नहि खेलए छथि।पुछिऔ त लजाए जाएत अछि।मरौनाबाली कहैत अछि जे डिल्ली-पनिजाब कमाबएबला बेटासभ मना कए देने छनि। आब ओसभ खेतहुक काज लेल उप्लब्ध नहि छथि, बेगरतहि नहि छनि।लए-दए कए सामा-चकेबाक खेल रहि गेल अछि,जेकरा ओसभ गीत गाबैत कोनो टटका जोतल खेत मे खेलि आबए छथि,एकर नाच त खतमहि बुझू। खेतीक विभिन्न अवसर पर गाएल जाएबला गीतसभक सूनब आब सपना भए गेल अछि।खेती आब उत्सव नहि रहल। मिक्सीक युग आबि गेल अछि आ पिसाएल पैक्ड सामग्री उप्लब्ध अछि त आब जांता,ढेकी आ उखरि-समाठ कें के पुछैत अछि जे एकर गीतसभ गाएल जाएत। सुकरातीक दिन सजल-धजल बड़द आ महिष द्वारा सुगरक शिकारक खेल “हुरिआहा” आब अपन दिवंगत हएबाक स्वर्ण-जयन्ती मनाए रहल अछि।लार-पुआर आ संठीक बोझक पाछू नुकाए कए ‘आस-पास’ खेलाइत बेदरासभ आब नहि देखाइत अछि।एक पैर पर कुदैत माटिक खपटा सं ‘ति ति’ वा ‘तिक-तिक’ आ गुड़ी कबड्डी खेलाइत नन्हकिरबा-नन्हकिरबी नहि देखाइत अछि।कबड्डी सेहो पुरान जमानाक गप भए गेलए। आब गली-बाट पर क्रिकेटक राज चलि रहल छै। ढोल,हारमोनियम,झालि,करताल,मृदंग आदि वाद्य-यंत्र कें डीजे पुरातत्वक वस्तु बनाए देने अछि। ‘रेणु’क ‘पंचकौड़ी मिरदंगिया’क अंगुरीसभ टेढ भए गेल अछि आ ओकर ‘रसप्रिया’ जानि कोन कबाड़खाना मे पड़ल कानि रहल अछि।प्रेमचन्दक ‘होरी’ ‘गोबर’क डगर धए पनिजाब-डिल्ली कमाबैत अछि,त ‘हरखू’ बिछौना परक कम्बल के कहए,तोशक पर रजाइ ओढिकए सुतैत अछि आ बाहर घुमबाक लेल बेटाक देल ‘जैकेट’ पहिरैत अछि। हरबाहासभ आब गिरहतनी सं ‘बसिया भात’क लेल रुसैत-झगड़ैत नहि छथि। हुनकासभ कें मनपसन्द भोजनक लेल नगद पैसा चाही।ओनाहितहु आब हर-बड़द सं खेती के करैत अछि?रोटीक पौष्टिकता आब अभिजात्यक व्यंजन-सूची मे सम्मिलित भए गेल अछि आ भात खाएब आब लोकक अभिजात्य भए गेल अछि। आब किल्लत नामक कोनो चीज नहि रहल।की छोट,की नमहर,सभ गोटा मे घर कें ईंटा-सीमेन्ट सं बनएबाक प्रतियोगिता चलि रहल अछि।खढ-फूसक छौनी आ टाट कें माटि सं लेबकए सुन्दर देबाल बनाए देबाक कलासभ आउट आफ डेट भए गेल अछि। फूसक बेगरता नहि रहल त खढहोरि सेहो विलीन हुअए लागल अछि। छप्परक स्थान छत लए लेलक त बंसबिट्टीसभक बेगरता नहि रहल।बांस रहल नहि आ बांसक उत्पादक कोय खरीदनिहारहि नहि त एहि सं जुड़ल कलासभ कें कालक गाल मे जएबाकहि अछि। स्वामी सहजानन्द 1947 मे कोशी-मुक्त अंचलक भीमनगर,प्रतापगंज आ छातापुर थाना क्षेत्रक भ्रमण पर अएला त ओ एतहुका रस्तासभ कें नरकक रस्ता सं बदतर कहने छला। आइ एतहुका 95% सड़क चकाचक अछि आ एहिपर तेज सं तेज भागबाक लेल वाहनसभ मे होड़ मचल अछि।एना मे बड़दगाड़ी कें के पुछए? से ‘हीरामन’ सेहो अपन गाड़ी आ बड़द दुनू बेचि आएल। कोशीक बाढि आबैत रहए त माटि आ बालुक भरान सं झौआ,कास आ पटेरक नमहर आ घनगर जंगल बनि जाइत रहए। कोशीक लोक एहि क्षुद्र सन देखाइत उप्लब्धता कें अपन इलिम आ श्रमक सम्मिलित प्रयास सं आर्थिक उप्लब्धि मे परिणत कए देने रहए। प्रत्यक्षत: अनेरुआ आ फिजूल सन देखाइत एहि वस्तु कें कच्चा-माल मानिकए एतहुका लोक एकरा अपन कलात्मकता सं उपयोगी वस्तुसभ मे ढालि लेबाक परिपाटी बनाए देलक। चटाइ,पटिया,दौरी,मौनी,चंगेरी-चंगेरा,खर्रा आदि वस्तुक निर्माण एहि सं हुअए लागल।जल-जमाव पटुआक खेती लेल अनुकूल रहए,त एकर खेती खूब लोकप्रिय भेल। नमहर स्तर पर पटुआक खेती भेल आ एकर कलकत्ता तक निर्यात भेल। लोकक हाथ मे नगद रकम अएलए आ स्थानीय स्तर पर एकर डोरी-रस्सा-सुतरी आदि बनैबाक कला सेहो विकसित भेल। बांसक उत्पाद आ उपयोगक विविधता त औरहु अद्भुत अछि। घरक टाट-छप्पर सं लए कए घेराबन्दी आदि मे एकर उपयोग त होइतहि रहल अछि,एहि सं छिट्टा,सूप,हाथक पंखा आ बेदरासभक घिरनी,गाड़ी आदि खिलौना आदिक अतिरिक्त विभिन्न सजावटी समान सेहो बनैत रहल अछि। प्लास्टिकक आगमन आ पक्का मकान बनैबाक बढैत प्रवृति एकहि संग एहिसभ उत्पाद,उत्पादक आ एहि कला पर हमला बोलि देलक अछि आ एकर परम्परागत कलाकारसभक रोजी-रोटी पर संकट ठाढ कए देलक अछि। आधुनिकताक आरा पर लोक-संस्कृतिक काठ अजुका समय क्षेत्रीय पहचान आ अस्मिता पर घहराबैत संकटक समय अछि।एक दिस सूचना-प्रौद्योगिकी तथा कम्प्यूटर-तकनीकसभक पीठ पर सवार पूंजीवाद ‘विश्वग्राम’ आ ‘उन्मुक्त-अर्थव्यवस्था’क नाम पर सामाजिक ताना-बाना कें छिन्न-भिन्न करएबला अराजकता कें जन्म देलक अछि,त दोसर दिस मध्ययुगीन विचारधाराक आधुनिक महारथी लोकनि सेहो सक्रिय छथि,जे धर्मक पुरोहिती-संस्कृतिक पुनरावृति कें प्रोत्साहित,पुनर्स्थापित करबाक जी-तोड़ प्रयास मे लागल-भिड़ल छथि। अभिजात्यहि जकां पूंजीवादहु मानैत अछि जे लोक-संस्कृति प्राक-आधुनिक समाजक संस्कृति अछि आ एहि समाजक विघटनक बाद ‘लोक’ कें सेहो अन्तत: विघटित भए जएबाक अछि।पूंजीक अभिजात्य-साम्राज्यवाद अपन संचार-क्रांति,भूमण्डलीकरण,उदारीकरण,बाजारीकरण आदि-इत्यादिक वैचारिक अस्त्रसभक माध्यम सं एहि विघटनक प्रक्रिया कें तेज करबाक हर संभव प्रयास मे लागल अछि।मध्ययुगीन विचारधाराक अभिजात्य त सदा-सर्वदा सं ‘लोक’ कें अपन शत्रु मानैत आएल अछि। सर्वविदित अछि जे मध्ययुगीन विचारधारा मिथ्याचेतना पर आधारित अछि,जे लोकक विवेक कें कुन्द करबाक कोशिश मे लागल रहैत अछि।एहि तरहें लोक आ ओकर संस्कृति वर्त्तमान मे दुतरफा आक्रमणक बीच घेराएल अछि।सम्पूर्ण विश्वक लोक पर एहि संकटक यम-छाया पसरल अछि,त कौशिकी जनपदहि एकरा सं अनछुअल केना रहत? पूंजीक साम्राज्यवादक छत्रच्छाया मे,संरक्षण मे बाजार व्यापक भए कए गली-मोहल्ला सं होइत घरसभ मे घुसपैठ कए चुकल अछि।बाजारक सौदागरसभ फटाफटक संस्कृति कें फैशन बनाए देलक अछि आ ई फैशन वायरल भेल जाए रहल अछि।इन्सटैन्ट कौफी,टू मिनट नुडल्स आ पैक्ड फूड आब लोकक दिनचर्याक अनिवार्य हिस्सा बनैत जाए रहल अछि। भावानासभ पर चालाकीक कला हावी भए रहल अछि। लोक-कलासभ धैर्य आ इत्मीनानक कला-साधना अछि आ ई नमहर समय,अभ्यास आ जीवनक नमहर हिस्सा मांगैत अछि।फास्ट लाइफ आ फास्ट फूडक एहि दौर मे लोकसभ लग धैर्य आ इत्मीनान कतय?गीत-नाद,नाच आदि भावना सं जुड़ल अभिव्यक्ति अछि,एकरासभ कें चालाकी लग जएबाक इलिम कतय? त यक्ष-प्रश्न अछि जे एना मे लोक-संस्कृतिक पंच-प्रकारसभ (लोक-गीत,लोक-गाथा,लोक-कथा,लोक-नाट्य आ सुभाषित वा लोकोक्ति) आ लौकिक-तत्वसभ (मानव-जीवनक विभिन्न संस्कार,सामाजिक उत्सव,पर्व-त्योहार, मनोरंजनक साधन,रहन-सहन,वेश-भूषा,अलंकरण-प्रसाधान,भोजन व पेय-पदार्थ,सामाजिक रुढि, लोक-विश्वास,मान्यतादि,कला,शिल्प,परम्परादि,प्रथा)क रक्षा आखिर केना हुअए,के करए? नव-संकल्प आ प्रतिबद्धताक बेगरता एहन प्रश्नसभ आ आसन्न भयक चलते लोक-संस्कृतिक भविष्य कें लए कए तीन तरहक विचार-दृष्टि सोझां आबैत अछि – नियतिवादी,संरक्षणवादी आ बहु-भाषिकतावादी।एहि तीनू मे नियतिवादी मास-कल्चरक मुकाबिला कए सकबा मे लोक-संस्कृति कें असमर्थ पाबए छथि आ मानए छथि जे ओकरा आगू समर्पण कए देबाक अतिरिक्त आन कोनो रस्ता नहि। एतय जखनि मृत्यु कें नियति मानि लेल गेल अछि,तखनि त रक्षाक चर्चहि व्यर्थ अछि। संरक्षणवादीसभक विश्वास छनि जे राज्य अपन प्रयत्न सं लोक-संस्कृति कें जीवित राखबाक लेल संकल्पित हुअए त ओकरा बचाएल जाए सकैत अछि।एतय ई प्रश्न उठि कए ठाढ भए जाइत अछि जे लोकक संरक्षणक गोहार ओहि राजसत्ता सं केना कएल जाए जे सदा-सर्वदा सं अभिजात्यक पक्षपाती रहल अछि आ जे लोकतांत्रिक युगहु मे तथाकथित विकासक नाम पर प्रारम्भहि सं लोक-परम्परासभक अनदेखी कएलक अछि,यद्यपिकि ओकर भंगिमासभ मे संस्कृति आ परम्परासभ कें सम्मान देनिहार उदारता परिलक्षित होइत रहल अछि।तेसर दृष्टि बहु-भाषिकतावादक अछि जे ई मानैत अछि जे देशक जहि-जहि क्षेत्र मे ओतहुका स्थानीय भाषा मे शिक्षणक काज भेल अछि,ओहि-ओहि क्षेत्रसभ मे साक्षरताक बयार सं ओतहुका लोक-संस्कृति समृद्ध भेल अछि।एतय संकट ई अछि जे कौशिकी जनपदक भाषा कें सेहो अभिजात्य अपन उपनिवेश बनाए लेने अछि। वर्ष 1986 मे बिहार राष्ट्रभाषा परिषद राधावल्लभ शर्मा द्वारा संग्रहित 320 संस्कार-गीतक संग्रह प्रकाशित कएलक। खेदक विषय अछि जे एकर शत-प्रतिशत गीत अभिजात्य सं जुड़ल अछि।एडविन प्रीडो आ ब्रजेश्वर मल्लिक एहि सम्बन्ध मे समर्पण आ रुचिपूर्वक काज कएलनि,किन्तु हुनकरसभक संग्रहक काज मात्र कोशी-गीतहि तक सीमित रहल अछि।बादक समय मे कतिपय विद्वानलोकनि एहि पर काज कएलनि,किन्तु वा त ओसभ अधिकतर पुनरावृति अछि वा यथेष्ट नहि अछि आ इहो काज कोशी-गीतहि तक सीमित अछि। आवश्यकता अछि जे कौशिकी जनपदक लोक-गीत,लोक-गाथा,लोकोक्तिसभ आ संस्कृति सं जुड़ल आन-आन सामग्रीसभक संग्रह कागजक पन्ना पर उतरए आ ओकरा नव-जीवन भेटए।एकरा लेल संरक्षणवाद आ बहु-भाषिकतावादक उत्तम समन्वयहि सं रस्ता बहराए सकैत अछि।ईसभ चीज स्थानीय भाषा मे अछि आ एकरा इएह भाषा मे अएबाक अछि।लोक-कलाकारलोकनि रचयिताक रूप मे अपन-अपन काज कए गेला,अपन भूमिका निबाहि देलनि। आब हुनकासभ कें आगू अएबाक छनि जिनकर एहि साहित्य-संस्कृतिक प्रति निष्ठा हुअए,जे एहि काजक प्रति सुच्चा वैचारिक-प्रतिबद्धताक संग समर्पित होथि आ एकर दस्तावेजीकरणक काज मे दक्ष आ समर्थ सेहो होथि। ई निराशाजनक पक्ष रहल अछि जे एहि तरहक काजक नाम पर जे किछु खानापुरी भेल अछि,तहिमे लोक-पक्षक लेखकलोकनि अभिजात्यक बाहबाही लेबाक लोभ मे अर्थक अनर्थ कएने छथि आ हुनकरसभक लेखन पर अभिजात्यक दिशा-निर्देशक छाप साफ-साफ-देखाइत अछि।ई खतरा अखनिअहु अछि, तखनिअहु दस्तावेजीकरणक काज लेल कोनो व्यक्ति जं लोक-पक्षहि सं आबथि त से तुलनात्मक रूप सं नीक आ बेहतर रहत। कौशिकी जनपदक लोक-साहित्य पर प्रत्येक पीढीक समान अधिकार बनैत अछि। आमजन कें ई बात जानबाकहि चाही जे कौशिकी जनपदक लोक-अन्तस सदा-सर्वदा सं सक्रिय आ गतिमान रहल अछि,अपन संघर्ष आ पुरुषार्थ पर अतीव विश्वास राखैत रहल अछि आ प्रत्येक कठिनाह आ विपत्तिक कालहु मे जीन जैक्स रूसोक एहि शब्द मे अपन स्वायत्त-अभिमानक समवेत घोषणा करैत रहल अछि – “हम कोनहु टा ना-इन्साफी कें बर्दाश्त नहि करब। हमसभ शिकारी-समुदाय कें बताए देबनि जे दुनियाँ हुनकरसभक बपौती नहि अछि”। भीमनाथ झा “कुसुम” ! 2016 क कोनो दिन। अपन ‘भानुमती’ सिरीजक एकटा कविता कें अंतिम रूप देबाक क्रम मे एकटा शब्द पर अटकि गेलहुं।ई संशय केना दूर हुअए? किनका सं सलाह ली? मानसपटल पर तुरत भीम भाय अभरला। फोन कएलियनि।प्रणाम-पाती आ कुशल-क्षेम भेल। पुछलियनि, “ई ‘उत्स’ शब्द ‘स्रोत’ वा ‘उद्गम’ आदिक समानार्थीए छिअए ने?” “से की?” हम कहलियनि, “हम अपन एकटा कविता मे ‘स्रोत’ वा ‘उद्गम’क ठाम पर ‘उत्स’क प्रयोग करए चाहए छी।कविताक शब्द-संरचना मे ‘उत्स’ शब्दक ध्वनि बेसी नीक जकां खपए छै।किन्तु शब्दकोश मे ‘उत्स’ शब्द छैहे नहि।“ “एह! एहनहु कतहु होइ जे शब्दकोष मे ‘उत्स’ शब्द नहि होइ!ओना अहां निधोख भए कए ओकर प्रयोग करू।तीनू शब्द प्राय: एकहि अर्थ दए छै।“ “ठीक छै।“,कहि कए फोन बन्द कएलहुं आ कविता कें अन्तिम रूप दए मे लागि गेलहुं।काज करितहि रही कि प्राय: दस-पन्द्रह मिनट बाद सेलफोन घनघनाएल। स्क्रीन पर देखलिअए---भीम भाय। “जी!”,काल रिसीव करैत हम कहलियनि। “हे यौ अरविन्द बाबू,ठीके कहैत रही अहां।शब्दकोष मे हमरहु ‘उत्स’ शब्द नहि भेटल।अहांक कोन शब्दकोष अछि?”,भीम भायक स्वर मे बेचैनीक ध्वनि बुझाएल। “नालन्दा शब्दकोष। हिन्दीक सभ सं समृद्ध कोष मानल जाइ छै।“,हम कहलियनि। “हम त दोसर मे देखल। नहि भेटल। अचरजक गप!”,भीम भाय एना बाजलथि,जेना शब्दकोष मे ‘उत्स’ शब्दक उपस्थिति नहि रहब हुनके दोष हुअए। त से की करबए! एहनहि छथि भीम भाय---दायित्वबोध सं आप्लावित एकटा साधुपुरुष!सामान्य-सन जिज्ञासाक समाधान करब हुनका अपन परम व्यक्तिगत दायित्व बुझाइ छनि। आन कोनो व्यक्ति रहितए त पहिलहि बेरक वार्ता यथेष्ठ होइतए।किन्तु नहि।ई त भीम भाय छथि!ओ फोन राखि अपन शब्दकोष खोलता, ओहि मे ‘उत्स’ शब्दक खोजबीन करता आ नहि भेटला पर दोषी-भाव सं दुबारा फोन करता, अचरज आ अफसोस व्यक्त करता। ***** 2017क कोनो दिन। मनक की छै?एहिना बौआइत रहए छै। बहुत दिन सं मन मे ई बात कुलबुलाइत रहए जे हमर कोनो विशिष्ट साहित्यिक नाम हएबाक चाही छल—सामाजिक रूप मे प्रचलित नाम सं अलग कोनो अदभुत,कोनो एहन संज्ञा जे हमर लेखकीय व्यक्तित्व कें प्रतिबिम्बित करए। भीम भाय कें फोन लगएलियनि। अपन जिज्ञासा हुनका लग राखलियनि। ओ क्षण भरि चुप रहला आ फेर कहलनि, “मने जेना हम अपन नाम राखी—भीमनाथ झा ‘कुसुम’? सएह ने?” आ फेर हुनकर एकटा घनघोर ठहक्का। हमरहु हंसी लागल। ‘भीमनाथ’ सन महाकाय शब्दक संग ‘कुसुम’ सन कोमल शब्दक गठबन्हनक अद्भुत कल्पना सं हमर रोम-रोम रोमांचित भए उठल।हमहुं हंसैत अपन सहमति व्यक्त कएलियनि, “हं! जेना हम अपन साहित्यिक नाम अरविन्द ‘अजातमित्र’ राखी।“ भीम भायक विचार अएलनि जे एहि तरहक नाम वा उपनाम कोनो साहित्यकार अपन प्रारंभिक दौर मे राखैत अछि।कोनो नाम सं प्रसिद्ध वा सुपरिचित भेलाक बाद उपनाम जोड़बाक प्रचलन नहि रहल अछि। चर्चा चलल त एहि क्रम मे विविध गप भेल।प्रसंगवश हम अज्ञेयक चर्चा करैत कहलियनि जे हुनक किछु पुस्तक (आत्मनेपद,अपने-अपने अजनबी) मे लेखकक नाम मात्र “अज्ञेय” अछि,किछु (एक बूंद सहसा उछली) मे मात्र “सच्चिदानन्द वात्स्यायन” आ किछु (कलास्वाद का मर्म) मे “स0 ही0 वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ “ लिखल गेल अछि। आकि,भीम भाय हड़बड़ाए कए गड़बड़ाए गेला, ‘हे यौ,एहि बात दिस हमर ध्यान कहियो नहि गेल।‘ हम गपक क्रम आगू बढबैत बैद्यनाथ मिश्र सं विद्यार्थी,वैदेह, यात्री आ फेर यात्री सं नागार्जुन हएबाक चर्चा कएलियनि।एतय भीम भाय कें अपन चिन्हल-जानल सुपरिचित क्षेत्र भेटलनि। ओ खूब विस्तार सं एहि पर चर्चा कएलनि।खिस्सा पर खिस्सा। किन्तु भाव एहन जेना ओ बैद्यनाथ मिश्रक डिफेन्सक वकील होथि आ बैद्यनाथ मिश्रक धर्म बदलनाइ, मैथिली सं हिन्दी दिस गेनाइ,यात्री सं नागार्जुन भेनाइ,परिवारक जिम्मेदारी तजि औलिया जीवन जीनाइ आदि-आदिक स्पष्टीकरण देब भीम भायक व्यक्तिगत आ परम पुनीत कर्तव्य होनि।एहि क्रम मे भीम भायक स्मरणशक्तिक दीप्ति अद्भुत,गपक रस खूब रसगर,सब किछु प्रेम सं सुनबा जोगर आ प्रशंसनीय। एहि वार्ताक समापन सं पूर्व ओ फेर सं जेना स्वयं कें सम्बोधित करैत हुंकारा देलनि, “भीमनाथ झा कुसुम” आ अपन एहि स्वनामकरणक मौलिक आ अनायास अभरल कल्पना पर मुग्धभाव सं प्रमुदित होइत फेर एकटा घनघोर ठहक्का देलनि। आ अन्त मे,जे हुनक व्यक्तित्वक विशिष्टता बनल छनि,तहि सहज,सरल,हास्यबोध सं भरल-पूरल विनम्रताक संग, “नीक विषय पर गप भेल,अरबिन्द बाबू! अहांक आभार!” ओहि दिनुका गप खतम भेलाक बाद बहुत दिन तक हुनक ई स्वनामकरण हमर विचारणक क्षेत्र मे बेर-बेर घुरियाबएत रहल। आइयहु घुरियाबएत अछि।भीम भायक जे भौतिक वाह्य व्यक्तित्व छनि,तेकरा हुनक नाम ‘भीमनाथ’ खूब नीक जकां प्रतिबिम्बित करए छनि।किन्तु अपन साहित्यिक-सामाजिक आभ्यंतर संचेतनाक स्तर पर ओ कोनो कुसुमहि जकां सुकोमल,सुगंधित आ सुन्दरमक प्रतिरूप छथि। एहि दृष्टिकोण सं “भीमनाथ झा कुसुम” नाम हुनक सम्पुर्णताक द्योतक होइतए। अफसोस जे भीम भाय कें ई ध्यान पहिने नहि अएलनि। त से की कएल जाए,तहिया हुनका हमरा सन अलबटाह सं परिचयहु नहि रहनि! ******* 2012क मई मासक कोनो तिथि। उदयचन्द्र झा विनोद फोन कएलनि।रहिका गाम मे ओ प्रतिवर्ष एकटा साहित्यिक आयोजन करए छथि—मिथिला विभुति स्मृति पर्व समारोह।एहि बेर केना ने केना हुनका हमहुं मन पड़लियनि। हुनक आग्रह भेलनि जे हम ओहि कार्यक्रम मे आबी आ अपना संग किछु और कविलोकनि कें सेहो लेने आबी। हम युवा कवि विजय हरीश आ एकटा अन्य कविक संग चललहुं। अजित आजाद पटना सं चलि सकरी आबि प्रतीक्षारत रहथि। हुनका संग कएल आ मधुबनी मे चन्द्रमोहन झा जी सं भेंट करैत रहिका पहुंचलहुं। ओतय भीम भाय जेना हमरहि प्रतीक्षा मे रहथि। हम गाड़ी सं उतरबहि कएल रही कि भीम भाय अपन विशाल कायाक संग सम्मुख मे उपस्थित—“आऊ,अरबिन्द बाबू।“ प्रणाम कएलियनि।ओ कुशल-छेम लएत हमर बांहि धएने हमरा पहिने सं उपस्थित कविलोकनिक गोल लग लए गेला।कोनो विद्यालयक परिसर रहए प्राय:। टेन्ट हाउसक टेबुल सब एक सोझ मे लागल रहए आ ओकर दुनू कात कुर्सी—कोनो भोज भातक आयोजन जकां।ओतय बहुत रास लोक रहथि।सब गोटय सं नमस्कार-पाती भेल। चाय आएल,पीलहुं। ओतहि मनमोहन झा रहथि।पूर्व सं चलैत कोनो गप कें कन्टीन्युटी दएत भीम भाय मनमोहन जी सं कहलथिन, “हं,त कहैत रही जे पोथी त अहांक जे अछि,से त अछिए,किन्तु अहां आइ अरबिन्द बाबू पर भारी पड़ि गेलियनि। अहांक गाड़ी हुनकर गाड़ी सं मंहग अछि।“ आ फेर हुनक गगनभेदी ठहक्का।तत्काल हुनक गपक पहिल अंशक सन्दर्भ हमर माथ मे नहि घुसल। चुपहि रहलहुं। कार्यक्रम शुरू होइ मे बिलम्ब रहए।विनोद जी आबि प्रस्ताव देलनि जे एहि बीचक अवधि मे हम सब कमरा मे आराम कए सकए छी।सब गोटय कमरा मे अएलहुं। कमरा मे दरी-जाजिम बिछाएल रहए। अभ्यागतलोकनि अपन-अपन रूचि,अपन-अपन वयसक लोकसबक संग अलग-अलग गोल बनाए अपन-अपन स्थान धएलनि। हम,भीम भाय,रामलोचन ठाकुर,मनमोहन झा आ दू-चारि गोटय और एक ठाम बैसलहुं।रामलोचन भाय अपन झोड़ा सं स्वयं द्वारा अनुदित पोथी ‘नन्दित नरके’ निकालि हमरा भेंट कएलनि।भीम भाय मनमोहन जी कें सम्बोधित करैत कहलथिन, “अहूं अपन पोथी बहार करू आ अरबिन्द बाबू कें दियनु”।मनमोहन जी संकुचित होइत अपन पोथी ‘खिस्सा’क एक प्रति हमरा दिस बढएलनि।भीम भाय टीपलथि, “पोथी त अहांक जे अछि,से त अछिएएएए,किन्तु आइ जं अहां चरिपहिया पर नहि आएल रहितहुं त विनोद जी अहांक लेल घोषित भेल आइ देल जाइ बला पुरस्कार अहां कें दए सं नठि जएतथि।“ भीम भाय फेर अपन भीमियन ठहक्का मारलनि।बात आब हमर संज्ञान मे आएल।मनमोहन जीक पोथी ‘खिस्सा’ पर रहिका समाज द्वारा आइ हुनका पुरस्कृत करए जाए रहल छल आ एकरहि पर भीम भाय बीच-बीच मे आनन्दी चुटकी लएत रहथि।बात बुझए मे आएल त हमरहुं हंसी छूटल।भीम भाय ओहि दिन परम-आनंदी मूड मे रहथि। हुनक एहि मूडक पकड़ मे बेराबेरी प्राय: सबगोटे आबएत गेला।कार्यक्रम प्रारम्भ होइ सं पहिने तक हमसब एहिना विभिन्न विषयसब पर गप-सरक्का करैत रहलहुं।एहि गपक बीच-बीच मे भीम भाय मनमोहन जी दिस ताकथि, कनेक आंखि नचाबथि आ अपन विशिष्ट टोन मे बाजथि, “पोथी त अहांक जे अछि,से त अछिएएएएए….!” मंच पर सम्मान-पुरस्कार आदिक क्रम चलल आ तेकर बाद कवि सम्मेलन प्रारम्भ भेल। ओहि दिन हम अपन कविता ‘हम हत्या करए चाहए छी’क पाठ कएने रही। कविता-पाठक बाद जखनि हम आबि कए बैसलहुं त भीम भाय बिहुंसैत बजला, “बड़ बिखाह कविता रहए। आब आगां सं विनोद जी अहां कें रहिका नहि बजएताह”। आ फेर मंचक अनुशासन कें देखैत यत्नपूर्वक दबाएल हुनक मद्धिम ठहक्का।(अद्भुत बात जे तेकर बाद ठीके विनोद जी फेर कहियो हमरा रहिका नहि बजएलनि।) कार्यक्रम समाप्त भेलए।भोजन-भात भेलए।सब गोटय चलबाक तैयारी मे लागि गेलहुं।दुनू ड्राइवर गाड़ी लए कए आबि गेल—हमरहु आ मनमोहनहु जीक।जे सब अपन गाड़ी सं नहि आएल छला,तिनकर सभक रात्रि विश्रामक व्यवस्था रहिके मे रहनि।भीम भाय मनमोहन जीक गाड़ी सं आएल छला आ ओहि सं घुरबाकहु रहनि। ओ हमरा संग ठाढ रहथि। हम कहलियनि, “चलू,हम अहां कें गाड़ी मे बैसाए कए बिदा करए छी”। भीम भाय हंसला।कहलनि, “से नहि हएत।पहिने अहां बैसिकए निकलू।की यौ,मनमोहन जी”?मनमोहन जी सहमति मे मूड़ी डोलएलनि। आकि, अकस्मात हुनका दिस ताकैत भीम भाय बजला, “पोथी त अहांक जे अछि,से त अछिए,गाड़ीअहु अहांक तेहने अछि,मनमोहन जी“। एहि बेर भीम भायक ठहक्का मे सब गोटेक ठहक्का सम्मिलित छल। भीम भायक आदेश पर हम अपन गाड़ी मे बैसलहुं।प्रणाम कएलियनि,उत्तर देलनि। जा तक हमर गाड़ी आगू नहि बढि गेल,भीम भाय अपन स्थान सं टस सं मस नहि भेला। एहनहि छथि भीम भाय! ***** 2013क सितम्बर मासक कोनो तिथि(प्राय: 10 वा11)। मायानन्द मिश्र जीक निधन भए गेल रहनि। हुनकर द्वादशाक दिन सहरसा मे हुनक निवास पर उपस्थित रही।सोचने रही जे सांझ तक ओतय उपस्थित रहब आ तेकर बाद सुपौल दिस जाएबला अन्तिम ट्रेन पकड़ि घुरि जाएब।किन्तु से नहि भेल। केदार (कानन)क ज्येष्ठ भ्राता-द्वय ओतय उपस्थित रहथि।बैद्यनाथ छात्र जीवनक संगी रहए आ विश्वनाथ हमर राजनीतिक जीवनक सहकर्मी-सहयोगी छला।एहि दुनू भायक जिद भेलनि जे हम भोजन कैए कए जाइ। भीम भाय सेहो दरभंगा सं दू-तीन गोटेक संग सड़क-मार्ग सं आएल छला। हुनकहि संग लगातार बैठकी जमल रहल।श्राद्धकर्म बिलम्ब सं सम्पन्न भेलए आ भोजन होइत-होइत हमर ट्रेनक समय निकलि गेल रहए।भोजन समाप्त भेलाक बाद भीम भाय जिज्ञासा कएलनि।स्थिति जानि कहलनि, “एतय रुकबा मे त अहां कें कष्ट भए जाएत।राज-काजक घर मे ढग सं सुतबाक जोगार-भांज कहां भए पाबए छै”? हम कहलियनि जे हम एतय नहि, कोनो होटल मे ठहरि जाएब आ भोरका गाड़ी सं सुपौल घुरि जाएब।भीम भाय असहज भेल कने काल मौन रहला। हुनका दरभंगा घुरबाक रहनि आ हुनक संग आएल लोकसभ निकलबाक लेल हड़बड़ाएल रहथि। भीम भाय कनिएं काल मे असमंजस सं बहरएला आ कहलनि, “अहां हमरासभक संग चलू। हमरहुंसभ कें त सुपौलहि दके जएबाक अछि”। ओसभ ड्राइवर छोड़ि चारि गोटे रहथि;मने जे सिटिंग व्यवस्थाक हिसाब सं फुल्ल। हम ई कहैत हुनक प्रस्ताव नकारि देलियनि जे हमर शामिल भेला सं हुनकासभ कें अनावश्यक दिक्कत हेतनि। किन्तु भीम भाय अपन निर्णय पर अडिग।कहलनि, “चालीस किलोमीटर जएबा मे कोन दिक्कत?आ जं दिक्कत हेबहु करत त ई अहांक राति भरि जे दिक्कत हएत,तेकर तुलना मे त किछु नहि। चलू,दिक्कते-सिक्कत मे निकलि जाएब आ अहां कें घरक आराम भेटि जाएत”। अन्तत: वैगन आरक पछिला सीट पर चारि गोटेक अंटान कए हमसभ ओतय सं चललहुं। हम भरि रस्ता अपराधबोध सं ग्रस्त,जे हमरा चलते तीन-तीन गोटे कष्ट मे छथि,सिकुड़ल जाइ,सिकुड़ल जाइ। ओमहर भीम भाय सेहो जेना प्रयासपूर्वक अपन देह कें सिकोड़थि जे हमरा बैसए मे अधिक सं अधिक सुभीता हुअए। खैर,एक घंटा मे सुपौल पहुंच गेलहुं। हम आग्रह कएलियनि जे “जं अहां सभ कें बेसी हड़बड़ी हुअए त हमरा बस-स्टैंड लग छोड़ैत निकलि जाउ,ओतय सं हम पएरे घर निकलि जाएब। आ जं तेहन हड़बड़ी नहि त पांच मिनट लेल हमर घर पर चलू,पानि-तानि पी लेब आ फेर निकलि जाएब। अहांसभक पएर पड़ला सं हमर घरहु धन्य हएत”। आनसभक कहब रहनि जे निकलि चलू,किन्तु भीम भाय बजला, “एह!एहनहु कहूं होइ।बीच रस्ता मे हिनका कोना छोड़ि देबनि? हमरा अरबिन्द बाबूक घरहु देखबाक अछि। रूकब नहि,से ठीक,किन्तु हिनका हिनक घर पर छोड़िए कए हमरासभ आगां बढब”। गाड़ी हमर घर तक आएल। हम पुन: आग्रह कएलियनि जे “घर तक आबिए गेल छी त कनी काल बैसिकए बिलमि लिअ,पानि-तानि पी लिअ,फेर निकलि जाएब”। भीम भाय गाड़ी सं बहरएला।पाछू-पाछू हुनक तीनहु संगी सेहो बहरएलथि।‘विप्लव भवन’क बहरुका लाइट जरैत रहए आ तेकर प्रकाश मे सम्पूर्ण परिसर विजिबुल रहए।भीम भाय मेन गेट पर ठाढ भेल मुग्धभाव सं हमर घर कें निहारैत कहलनि, “राजमहल थिक!” हम बिहुंसैत हुनकासभ कें अपन स्टडी सह ड्राइंगरूम मे बैसलियनि। भीम भाय किताबसभ सं भरल हमर अलमारीसभ कें मन्त्रमुग्ध भए निहारैत रहला।सभक लेल गिलास मे पानि आएल।सभ गोटे पीलनि। हम शोधित पानिक दू-तीन टा भरल बोतल गाड़ी मे रखबाए देलियनि—बटखर्चाक लेल।बिदा दएत काल हम कहलियनि, “कनिएं काल लेल सही,अहांसभक अएला सं आइ विप्लव भवन धन्य भेल”।भीम भाय बिहुंसैत,गाड़ी मे बैसैत बजला, “ एतय आबि बहुत पावन आ आनन्ददायक अनुभूति सं भरि गेलहुं। अहांक पिताक प्रबल पुरुषार्थ गमकैत अछि एहि डीह पर।धन्य त हमसभ भेलहुं”। भीम भाय मूड़ी घुमाए कए एक बेर फेर विप्लव भवन दिस निहारलनि। ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट कएलक आ हम विनीतभाव सं गाड़ी कें जाइत देखैत रहलहुं। ***** 2012-13,दरभंगा। दरभंगा सं मैथिलीक पहिल रंगीन दैनिक समाचारपत्र “मिथिला आवाज”क प्रकाशनक तैयारी शुरू रहए।एकर परिकल्पनाक बीजारोपन त बहुत पहिने भए गेल रहए आ बारह मई,2012 मे एहि सं सम्बन्धित पहिल औपचारिक बैसार एहि अखबारक वित्तपोषक चन्द्रमोहन झाक उपस्थिति आ सभापतित्व मे सम्पन्न सेहो भए चुकल रहए।1जुलाई,2012 कें हम विधिवत एहि अखबारक प्रभारी सम्पादकक पदभार ग्रहण कएने रही।एकर बाद काजक गति तेजी पकड़लक। कटहलबाड़ी मे एकर कार्यालय लेल एकटा दूमंजिला भवन सहित जमीनक खरीद आ तेकर भौतिक हस्तान्तरण सेहो भए चुकल रहए।कार्यालयक उपस्कर-उपादान आदिक खरीद,ओकर आमद आ ओकरासभ कें स्थापित-सुसज्जित करबाक काज निरन्तर जारी रहए।कोनो दिन विशाल आकारक जेनरेटर आबि रहल ए त कोनो दिन प्रिन्टिंग मशीन।प्राथमिक स्तर पर किछु टंककलोकनिक नियुक्ति सेहो भए गेल रहए।टेबुल कुर्सी आ कम्प्युटरादिक व्यवस्थित भेलाक बाद ओहिपर प्रैक्टिसक काज शुरू भए गेल रहए।सम्पादकक चैम्बर बनि गेल रहए।एहिसभ प्रारंभिक काज सं लए कए अखबारक प्रकाशनक अवधि मे भीम भाय नियमित रूप सं आबथि,दैनन्दिन होइत प्रगति कें देखथि आ प्रसन्न होथि। एहिसभ व्यस्तताक बीच मे हमरा एकटा आयोजन करए पड़ि गेल। ‘सगर राति दीप जरए’ कथा गोष्ठीक चेन्नई मे भेल आयोजनक बाद हमर टिलिफोनिक सहमति लए रमानन्द झा रमण ओहि आयोजनक दीप आ ओकर पंजी हमरा नामे लेने आएल छला आ एक दिन ‘मिथिला आवाज’ कार्यालय आबि ओसभ वस्तु हमरा सुपुर्द कए गेल रहथि। एकर अर्थ जे अगिला 78म आयोजन हमरहि करबाक रहए। हम अतस्तितह मे रही जे ई आयोजन सुपौल मे करी वा दरभंगा मे।एहि गोष्ठीक तीन टा आयोजन ‘कथा विप्लव’ नाम सं हम सुपौल मे कए चुकल रही आ स्थायी निवासी हएबाक चलते सुपौलक प्रति अतिरिक्त मोह सेहो रहए,तें हमर इच्छा सुपौलहि मे आयोजन करबाक प्रति जोर मारए।एम्हर अजित आजाद,कुमार शैलेन्द्र,अमलेन्दु पाठक आ चन्द्रमोहन झा पड़बा आदिक जोर रहनि जे आयोजन दरभंगा मे हुअए। ओसभ आश्वस्त कएलनि जे दरभंगा मे आयोजन करए मे कोनो दिक्कत नहि हेतए आ अन्तत: आयोजन दरभंगहि मे हएब तय भेलए। हमरा मात्र अर्थक भार लेबाक रहए आ हुनकासभ कें व्यवस्थाक।1 दिसम्बर कें ई आयोजन एमएमटीएम कालेज, दरभंगाक हाल मे भेल।एहि मे राकेश झा,डीआईजी आ बैजनाथ चौधरी बैजू प्रभृति किछु गैरसाहित्यिक व्यक्तिक उपस्थिति सेहो भेलए। एकर आर्थिक भार अधिक भए जएबाक चलते हमरा सुपौल सं पाइ मंगाबए पड़ल,किन्तु आकार,भव्यता आ भोजनादिक आधार पर एकरा धमगज्जर आयोजन मानल गेलए।किछु सहयोगी एहि गोष्ठीक अध्यक्षताक लेल जे नामसभक सुझाव हमरा दएत छला से हमरा अरघएत नहि रहए। हमर हार्दिक इच्छा रहए जे भीम भाय एकर अध्यक्षता करथि। हम अपन एहि इच्छा सं अजित आजाद कें अवगत करएलियनि त ओ कहलनि जे भीम भाय राति भरि रहब नहि गछता। हम अजित कें कहलियनि जे ओ भीम भाय सं राति भरि उपस्थित रहबाक शर्त पर सहमति लए लेथि।भीम भाय सहमत भेला आ अपन व्यक्तिगत नियम कें भंग करैत राति भरि जागल रहि खूब प्रसन्नतापूर्वक अध्यक्षक दायित्वक निर्वहन कएलनि। हम एकरा हमरा प्रति हुनक अतिरिक्त अनुराग मानए छी। भीम भाय ‘मिथिला आवाज’क प्रकाशनक प्रति अति-उत्साहित रहथि। हुनक मनोरथ रहनि जे ई अखबार स्तरीय हुअए,प्रगति करए,दीर्घायु होइ आ पत्रकारिताक इतिहास मे ‘मीलक पाथर’ बनए। हुनक ई सदिच्छा मात्र भावनात्मक स्तर तक सीमित नहि रहए,ओ लेखकीय स्तर पर सहयोग देबाक लेल सेहो सदैव प्रस्तुत रहथि।तें ‘मिथिला आवाज’क प्रकाशन शुरू भेलाक बाद ओ कोनो ने कोनो आर्टिकल लए कए आबथि।ओना ई सभ फीचर पृष्ट सं जुड़ल वस्तु रहए,जेकर प्रभारी नरेन्द्र जी छला।किन्तु भीम भाय आबथि त शिष्टाचारवश दूओ मिनट लेल हमर चैम्बर मे आबि अवश्य बैसथि। हमर मनोमस्तिष्क मे अखबार सं जुड़ल अनेकरास बिन्दुसभ नाचैत रहैत छल आ अपन एहि सम्पादकीय व्यक्तित्वक अस्तित्व मे हम अनायास बहुत औपचारिक भए जाइत रही।गपक्कर हम पहिनहुं नहि रही,किन्तु ई जिम्मेदारी आ एकर निर्वहनक भार हमरा और बेसी शब्द-संकोची बनाए देने रहए। भीम भाय आबथि त हम अभिवादन करियनि, तुरत हुनका लेल चाय मंगाबियनि, कुशल-छेम पुछियनि,किन्तु चैम्बरक शीशा सं हमर दृष्टि सौंसे कार्यालय दिस बौआइत रहैत रहए।भीम भाय एकरा अनुभव करथि।ओ औपचारिकताक बेढ मे बेसी काल रहएबला लोक नहि छथि,तें कनिएं काल मे ओ असहज भए जाथि। हम एहि बात कें अनुभव करी,किन्तु हमरा लग अपन एहि अवांछित औपचारिकताक कोनो उपचार नहि रहए।तें प्राय: चाय समाप्त होइतहि भीम भाय नरेन्द्र सं भेंट करबाक बात कहि पांच-दस मिनटहि मे उठि नरेन्द्रक चैम्बर दिस चलि जाथि। हम एहन स्थिति पर कनी देर अफसोस करी आ फेर अपन काज मे रमि जाइ। दरभंगा मे हमर संसार दूए ठाम सिमटल—चूनाभट्ठीक अपन किरायाबला डेरा आ कटहलबाड़ी स्थित ‘मिथिला आवाज’क कार्यालय,बस।ई हमर जिद रहए।‘मिथिला आवाज’क सम्पादक हएब हमरा लेल कोनो सम्मान,कोनो गौरव सं बेसी एकटा मिशन,एकटा पवित्र उद्देश्य जकां रहए।तें हम कोनो प्रकारक गोलैसी सं दूर रहि अपन जिम्मेदारीक निर्वहनक प्रति समर्पित रही,कोनो प्रकारक डेविएशन हमरा कबूल नहि रहए आ एहि लेल स्वयं कें क्रुरतापूर्वक अनुशासित कएने रही। हमरा बूझल रहए जे एतय तथाकथित मैथिली-हितैषी मैथिललोकनिक एकटा बड़का गोल एहन छै जे अपन संकीर्ण परिधि मे जूठहु लेल कुकरौझ करैत अछि आ तहि मे सं अधिकांश लेल हम हुनक कुमंशाक डगर मे बाधक छियनि आ जातिक आधार पर सेहो हुनकासभक लेल एकटा अवांछित आ माथ पर बथाएल तत्व जकां छी।ई किनकहु साहस वा भप नहि रहनि जे हमर सोझांसोझी हमर एकबाल कें चुनौती दितथि,किन्तु हमर पीठ पाछू ओसभ अपन धंधा मे लागल छथि,तेकर सुचना हमरा भेटैत रहैत रहए।भीम भाय त एतहुका रहबासीए रहथि,तें हुनका दरभंगाक रग-रग चिन्हल हेतनि।जे बात हम अन्य माध्यम सं अनुभव मात्र करैत रही,तेकरा ओ प्रत्यक्ष आ क्रियात्मक रूप मे देखैत हएता।तें कहियो काल व्यंजना-लक्षणा मे कोनो छोट-सन टिप्पणी करथि।जेना एक दिन बजला, ‘अहां निधोख भ क अपन काज करैत रहू’। ने हम पुछलियनि जे ओ कोन सन्दर्भ मे ई बात कहि रहल छथि आ ने ओ एहि सुक्त-वाक्य कें फरिछाएब आवश्यक बुझलनि।ई आपसी समझदारीक पराकाष्ठा रहए। हम त निधोख भए कए अपन काज करितहि रही,हुनक सुक्ति कें अपन गेंठ मे सेहो बान्हि लेलहुं। एक दिन भीम भाय हमर चैम्बर मे बैसल रहथि।दुनू गोटेक आगू मे चायक कप रहए आ ओकर चुस्की लैत कोनो चर्चा चलि पड़ल रहए। अकस्मात किछु कोलाहल-सन भेलए।सम्पूर्ण कार्यालय हमर त आंखिक सोझहि मे रहए,भीम भाय कें ओमहर देखबाक लेल मूड़ी घुमबए पड़लनि।देखए छी,अजित आजाद एकदम नव आ चकाचक सूट-बूट मे लकदक,माथ पर हैट आ आंखि पर गोगल्स पहिरने कार्यालय मे प्रवेश कएने रहथि। चारि-पांच गोटे हुनक आगू-पाछू डोलैत रहनि। हुनक अभिवादन आ परिधानक प्रशंसाक क्रम मे ई हलचल भेल रहए।भीम भाय कने काल नि:शब्द भेल ओमहर ताकैत रहला आ फेर हमरा दिस पलटि बिहुंसैत बजला, ‘लक्षण गड़बड़ बुझाइत अछि। अजित त एकदम्मे बदलि गेला हे’। आ से कहैत भीम भाय अनचोक्के उठलथि आ नरेन्द्र लग जाएब बिसरि चुपचाप कार्यालय सं बहराए गेला। एकर प्राय: किछुए दिन बाद ई दुखद सूचना आएल जे अजित ‘मिथिला आवाज’ सं मुक्त कए देल गेला आ हुनक मुख्य कार्यकारीबला सभटा अधिकार ललन झा कें दए देल गेलनि।लागल जेना भीम भाय ओहि दिन भविष्य देख लेने रहथि। 18 अप्रैल,2013 कें ‘मिथिला आवाज’क पदभार सं त्यागपत्र देलाक बाद अपन चूनाभट्ठीबला डेरा मे खूब निश्चिन्तता, सहजता आ आराम सं रही।डेराक प्रत्येक मासक किराया अग्रिम भुगतान कएल करैत रही।तें मासक अन्त तक एहि मे रहबाक अधिकार रहए। ने कोनो हड़बड़ी आ ने कोनो बाधा वा व्यस्तता।पुत्रलोकनि कें सूचना भेट गेल रहनि।आब प्रतीक्षा रहए जे ओतए सं गाड़ी कोन दिन आएत आ हमसभ अपन डेरा-डंटा उठाए एहि तपस्या-अवधिक अंत करब। फुरसतिक एहि अवसरक लाभ लैत दुनू प्राणी खूब घूमी।बीणा जी (हमर धर्मपत्नी) एहि बीच प्राय: पच्चीस-तीस हजार रुपैयाक खरीदारी कएलनि।ओ प्रसन्न छली जे आब घर घुरब आ बेटा-पुतहु,पोता-पोतीक सानिध्य-सुख लेब। हमर मन किन्तु किछु संकेत करए।एक दिन बैसल-बैसल ई संकेत स्पष्ट भेल।एह!घर घुरए सं पहिने जं एक बेर भीम भाय सं भेंट नहि कए लेब त ई केहनदन गप हेतए। छुछाओन-छुछाओन त लागबहि करत,एकटा अपराध सेहो हएत। हुनक घर किन्तु देखल नहि रहए।‘मिथिला आवाज’ मे सहयोगी रहल युवा आ तेज-तर्रार भैरव जी कें फोन कएलियनि।ओ हमरा भीम भायक छपकी परड़ी स्थित आवास तक पहुंचएलनि। भीम भाय प्रतीक्षा मे रहथि। हम अपन तावत धरि प्रकाशित पोथीसभ हुनका देलियनि।घरक बनल किछु मीठ-नमकीन आएल।फेर चाय आएल।गपक क्रम मे भीम भाय हमर त्यागपत्र देबाक प्रति जिज्ञासा कएलनि। हम मुस्काइत कहलियनि जे अखनि एहि विषय पर कोनो टिप्पणी उप्लब्ध नही अछि,समय आएत त हम एकरा लिखिकए व्यक्त करब आ तहि लेल प्रतीक्षा करए पड़त।भीम भाय सेहो मुस्कएला आ गप दोसर बिन्दु दिस घुरि गेल। चलैत बेर ओ अपन बहुत रास पोथी हमरा देलनि,जेकरा कोनो अमोल वस्तु जकां अपन पांज मे भरने हम अपन डेरा घुरल रही। ***** 1993क फ्लैशबैक। ई ओ वर्ष रहए जहिया हम पहिल बेर भीम भायक नाम सुनने रही।ई ओ वर्ष छल जहि मे हमर संग सं उत्साहित केदार (कानन) तेरहम कथा गोष्ठीक आयोजनक भार लए ओकरा सम्पन्न कएलनि आ ओही वर्ष अनियतकालीन पत्रिका ‘संकल्प’क समकालीन कथा पर केन्द्रित अंक बहराएल।सुपौलक मैथिली साहित्यक परिदृश्य लेल ओ वर्ष बहुत उर्वर रहए।ओही वर्ष हमर पहिल कविता संग्रह ‘परती टुटि रहल अछि’क संग-संग नारायण जीक ‘हम घर घुरि रहल छी’ आ केदार काननक ‘आकार लैत शब्द’ एकहि संग प्रकाशित भेल।ई ओ समय रहए,जहिया हम मैथिली साहित्य आ साहित्यकार कें केदार काननहिक आंखि सं देखी,हुनकहि कान सं सूनी,हुनकहि नाक सं सूंघी।एकदिन केदार एकटा आवेदननुमा कागज लए कए अएला आ कहलनि, ‘भैया,एहि पर दस्तखत कए दहक’। हमर जिज्ञासा कएला पर ओ बतएलनि जे दरभंगाक एगो भीमनाथ झा नामक कोनो लेखक छथि,जे ‘विविधा’ नामक एकटा व्यर्थ-सन पोथी लिखलनि अछि आ जोगारक प्रभाव सं एहि पोथी पर हुनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार दए देल गेल छनि।तहिकाल हम मैथिलीक साहित्यिक राजनीति सं एकदम अभिज्ञ रही।केदार हमर जिज्ञासाक उत्तर देलनि,से नीक,किन्तु जं ओ नहियो दितथि तखनहु हुनका पर जे हमर अगाध विश्वास रहए, तहि मे हुनका सं कोनो असहमतिक कोनो टा गुंजाइश नहि रहए।तें ओहि विरोध-पत्र पर हमरहु दस्तखत भेल आ ओ पत्र प्राय: साहित्य अकादेमी कें पठाएल गेल रहए।बाद मे भीम भाय एकटा कविता हमरासभक तीनू पोथी पर केन्द्रित लिखलनि, जे हुनक 1997 मे प्रकाशित संग्रह ‘नाम तं थिक वैह’ मे आएल।भीम भाय केदारेक माध्यम सं अपन ओ संग्रह पठएलनि। हमर प्रति पर ओ लिखलनि, ‘बन्धुवर श्री अरविन्द ठाकुर जी कें सस्नेह—भीमनाथ झा,16-11-97’।भीम भायक कहब छनि जे एहि कविता मे रोष नहि छै।किन्तु एतय हम साहसपूर्वक हुनक बातक खण्डन करए छी।कोनो बात कें अनठिआए देब,ओहि दिस पीठ कए लेब सेहो रोषक अभिव्यक्तिक एकटा प्रकार छै।ओहि कविताक अंतिम पंक्ति ‘अपने टहलि जाइ ताबे’ एहि प्रकारक अभिव्यक्तिक एकटा काव्यात्मक उदाहरण अछि।ई शुद्ध ‘भीमीय पद्धति’ अछि आ एहि पद्धतिक उपयोग करबाक हुनका अधिकारहु छनि। एहि ‘भीमीय पद्धति’क दोसर रूप आ हुनक भौतिक स्वरूपक साक्षात दर्शनक पहिल अवसर भेटल वर्ष 1995 मे।रांटी,मधुबनी मे साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित ‘अखिल भारतीय कवि सम्मेलन’क जहि सत्र मे हमरा काव्य-पाठ करबाक छल,तेकर संचालनक भार भीम भाय पर रहनि।भीम भाय कें मंच पर देखब एकटा अद्भुत अनुभव अछि।ओ बैसलहु रहए छथि त सभ सं उंच देखाइ छथि।ठाढ होइ छथि त पर्वताकार देखाइ छथि।बाजय छथि त घन-गर्जनक निनादक अनुभव होइत अछि। से,ओहि सत्र मे जखनि हमर काव्य-पाठक बेर आएल त हमरा आमंत्रित करबाक लेल अपन विशिष्ट उच्चारण मे भीम भायक घोषणा रहनि, ‘अपन लेखकीय प्रताप सं जे मैथिली कविताक परती कें तोड़लनि,से तपस्वी श्रमसाधक अरविन्द ठाकुर आबथु आ अपन कविताक पाठ करथु’। अपन ठाम पर सं उठैत-उठैत हमरा क्षणांश लेल भीम भायक विरोध मे लिखल शिकायत-पत्र मन पड़ल, ओहि पर कएल अपन दस्तखत मन पड़ल,मैथिली साहित्य मे अपन अकिंचन-पात्रता मन पड़ल आ हम किंचित लज्जित भावक संग काव्य-पाठ लेल प्रस्तुत भेल रही।इएह छिऐ ‘भीमीय पद्धति’, जेकर माध्यम सं व्यक्ति अपन कद ततेक उंच कए लएत अछि जे आन सभ व्यक्तित्व ओकरा आगू छोट पड़ि जाइत अछि। हमरा नहि बूझल अछि जे भीम भाय माछ-मासु खाइ छथि वा नहि?किन्तु ओ अपन सामाजिक-साहित्यिक दुनू व्यक्तित्व मे एकदम दुद्धा वैष्णव छथि। हुनक आक्रोषहु अपन अभिव्यक्ति लेल शाक्तक नहि,वैष्णवक शरण मे जाइ छनि। ***** ई-पत्रिका ‘विदेह’ जीवित साहित्यकार सभ पर विशेषांक निकालबाक योजना बनएलक त वर्ष 2016 मे ओकर श्रीगणेश हमरहि सं कएलक।एहि विशेषांक लेल भीम भाय सेहो एकटा आलेख लिखलनि।बाद मे 2020 मे एकर मुद्रित रूप ‘स्वतंत्रचेता’ नाम सं प्रकाशित भेल। ई पोथी हमरा लग पहुंचल त हम फेसबुक पर एकर सहभागी लेखकलोकनि कें टैग करैत तेकर सूचना 20 दिसम्बर,2020 कें पोस्ट कएल।भीम भाय तावत फेसबुक पर अपन उपस्थिति दर्ज कए चुकल छला। एहि पोस्ट पर ओ टिप्पणी कएलनि, “अरविन्द फुला गेल।भ्रमर सभ मकरन्द पान ले’ टुटि पड़त। हमरा त एतहि सं सुंघ’ पड़त……..”।प्रत्युत्तर मे हम लिखलियनि, “फुलाएल अरविन्द अहांक हस्तारविन्द तक दौगल पहुंचत”।भीम भाय टिपलनि, “तखन तं हमरो मनारविन्द खिलखिला उठत”। किन्तु दौगल पहुंचबाक क्रिया बिलम्बित होइत गेल।कोरोनाक संक्रमण चहुंदिस पसरल रहए आ तेकरा चलते हमर बाहरी आवाजाही दीर्घकाल सं बन्द रहए। अजित जी (अजित आजाद) जखनि सूचित कएलनि जे हमर दोसर गजल संग्रह ‘मीन तुलसीपात पर’ छपि कए आबि गेल अछि त लागल जे इएह समय अछि जे भीम भायक मनारविन्द कें खिलखिलएबाक भांज कए लेल जाइ।9 फरवरी,2021 कें अपन गाड़ी सं पहिने मधुबनी अएलहुं।संयोगवश ‘स्वतंत्रचेता’क सम्पादक आशीष अनचिन्हार सेहो अपन गाम आएल रहथि आ ओ सेहो नवारम्भ कार्यालय पहुंच गेल रहथि—नवोनाथ झा जीक संग।ओतहि बैठका जमि गेल।फेर भेलए जे दिलीप कुमार झा अपन टांग मे चोट लगाए बैसला अछि त हुनकहु सं भेंट कैए लेल जाए।ई भेंटघांट सम्पन्न करैत बेस बिलम्ब भए गेल। मधुबनी सं रहिका दके निकललहुं जे आशीष अनचिन्हार कें हुनक गाम छोड़ैत दरभंगा निकलि जाएब। हुनका छोड़ैत आगू बढलहुं त भूखक तीव्रता सं छटपटाए गेलहुं।एकटा लाईन होटल पर रुकि भोजन कएल।तहि बीच मे भीम भाय कें फोन कएलियनि जे हम आधा घंटा मे पहुंच रहल छी।ओ कहलनि जे ओ घर सं बाहर छथि आ जं हुनका कनेक विलम्ब होनि त हम हुनक घर पर हुनक प्रतीक्षा करी।दरभंगाक ट्रैफिकक सघनता आ छपकी परड़ी जएबाक रस्ताक संकीर्णताक चलते हमरहि विलम्ब भेल।पहुंचलहुं त भीम भाय पहिनहि सं उपस्थित आ प्रतीक्षारत रहथि। हुलसि कए बहरएला। हम गाड़ी सं किताब निकालए लागलहुं त हमर मना करितहु-करितहु ओ हाथ बढाए कए किताब धए लेलनि।दुनू किताब देखि बहुत प्रफुल्लित भेला।बधाइ देलनि।ताबत विभुति आनन्द सेहो आबि गेल रहथि आ तेकर कनिकहि बाद दमन कुमार झा सेहो। चाय आएल।गप-सरक्का भेल।ता हमर ध्यान घड़ी दिस गेल। छह सं उपर होइत रहए।बहुत दिनक बाद भेंट भेल रहए आ तें और गप करबाक मन रहए।किन्तु एकर बाद हमरा समस्तीपुर सेहो जएबाक रहए आ ओतय सं रोसड़ा आ बिरौल होइत सुपौल घुरबाक रहए।तें हम हड़बड़ाए कए अनुमति मांगलियनि।भीम भाय सन्तुष्ट नहि रहथि, किन्तु यात्रा-पथक दूरी देखैत ओ सहमति देलनि। छुछाउन सन एहि भेंट सं मन सेहो छुछाउन-छुछाउन लागैत रहए।गाड़ी पर चढि विदा होइत एतबे टा संतोष रहए जे पोथी भीम भायक हाथ मे पहुंचि गेलनि।लहेरियासराय टपलाक बाद अकस्मात ध्यान मे आएल—“जा!पोथी पाबि भीम भायक मनारविन्द खिलखिलएलनि कि नहि,से त हुनका सं पुछबे नहि कएलियनि।“ फेर मन मे आएल जे सभटा बात पुछिअहि कए थोड़बे बुझल जाइ छै।इन्ट्युशनहु कोनो चीज होइ छै कि नहि! आमोद झा सत्यक एकपेरिया पर काव्य वितान मैथिली भाषा साहित्य ओ संस्कृतिक दृष्टिसँ सामाजिक भाव विकास कयनिहार, निरंतर मानव- जीवन मूल्यक आदर्श पर अग्रसर सामान्यतया यात्रीक समान धर्मा रचनाकार, ठेंठ शब्दक ठाठ कोमल उपयोग कयनिहार, काव्य बानाक अक्षर शिल्पी, श्रृजनात्मक साहित्यकेँ अभिव्यक्ति देनिहार, मनुष्य जीवनक कुत्सित मनोवेग के चिंतन आ व्यवहारमे वैयक्तिक चरित्रक निर्माणकेँ उजागर कयनिहारक नाम छनि बाबूपाली जिला मधुबनीक कोलकाता बासी श्री रामलोचन ठाकुर । आदरणीय ठाकुर जीक प्रसंगे आदरणीय विद्वान नवीन बाबू लिखैत छथि जे “ रामलोचन बाबूक काव्यमे निराशाक बिरड़ोमे आशाक नव आलोकक संधान कठिन, से मुदा हिनक काव्यमे भटैत अछि ”। एतद् कविक रचनामे कारुणिक मन:स्थितिमे नव कवितामे जे विद्रोह तकर बानगी पोथी नामे लिखल रचना शीर्षक “ लाख प्रश्न अनुतरित “मे अनुभव करी हम चाहै छी हमर कविताक भाव कोटि कोटि शोषित पीड़ित मनुपुत्रक परितोष नहि, आक्रोशक उपादान हो मुक्ति संघर्षक प्रेरणा, शक्ति सरंजाम हो हम चाहैत छी - - -! एतद् निराशाक बिरोड़ोमे आशाक नव आलोक संधान केनिहार मुक्ति संघर्षक कवि श्री रामलोचन बाबूक| पोथी “ लाख प्रश्न अनुतरित ’’ अपन पाठकीयताक भाव-विचार ओ समीक्षात्मक अभिव्यक्ति लिखि रहल छी। ताहि प्रसंगे कही प्रस्तुत पोथीमे छोट पैघ कुल 48 गोट रचनाक दूरी कुल एक सय पेजक मध्य असीम शक्तिक संग नव निर्माणक ओ जागरूकताक संग प्रतिष्ठापन भेल अछि। सुधि पाठक कवि रामलोचन ठाकुर जीक हृदयमे वर्तमान परिवेशमे धन-पद-लोलुप प्रवंचक चाटुकार,ब्यवस्थाक प्रति अनास्था असंतोषक मोनमे हिलकोर मारैत छनि आ बनि जाइत छथि ब्यवस्थाक प्रति विद्रोही कवि । से देखू अपन बहीन तक के व्यवस्थाक प्रति अपन दायित्वक निर्वहण करैत “बहीनदाइक नाम एगो चिठ्टी”मे : “कथमपि उचित नै कानब/ वरन चिन्हब अपन शक्ति आ बाहरोक शब्द के अकानब - - - आ एगो प्रण ठानब तs कालि - - - आगामी कालि हमरो एगो परिचय रहत बिरदानक हम हमर विरदावन” कवि कुत्सित मनोवेग आ निराशाकमेघ जे आच्छादित तकरा आशान्वित करबाक धारणा छनि । आम जनकेँ अपन शक्तिसँ परिचय करायब आ अपन उदात भावमे अपन अतीत ओ सामाजिक व्यवस्थाक जे अतीत गौरव के निर्मित करब कवि अपन अभीष्ट सेहो रखैत छथि। अध्ययन कहैत अछि जे समालोचना शास्त्रक अंतर्गत समीक्षामे यथासाध्य सर्वांगीन परिचय प्रस्तुत करब आवश्यक मुदा से भs जाइत अछि व्यक्तिगत दकियानूसी विचार, इएह जे मैथिली साहित्यक समालोचना ओ समीक्षाक स्तर शनै:-शनै: समाप्तक कागारपर छैक परिणाम सृजनशील साहित्यक बेस कमी भेल जा रहल अछि । पाठकक कमी साहित्यक मनीषी लोकनि विमर्श कs रहला अछि, “ लाख प्रश्न अनुतरित” मध्य प्रत्येक रचना प्राय: स्व के चिन्हबाक प्रेरणा आ मिथिलाक संस्कृतिक चेतना आ समाज उत्थानक दर्शन करबैत अछि। मातृभूमिक स्वरूपक स्नेह जगबैत अछि ।कवि भोगल यथार्थ आ युग परिस्थितिक ढकफेरीसँ उत्पन्न अविश्वास - अनास्था-अकुलाहटिसँ अपन अग्रज कवि जीवकांतक समीप जा आशाक संचार होइत शीर्षक “ वसंत गीतक मादे”मे: "आउ ने हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी -----आइ ने काल्हि एहिमे होएतैक नव पल्लव रंग बिरंगक फूल" एतद काव्यकार सदैव साकांक्ष अपन शास्त्रीय काव्यक आंतरिकमे बसल सूक्ष्म भाव जे मुद्रित होइछ से पाठकक हृदय के गद-गद कs जाइत अछि। सहजातावादक प्रणेता सोमदेवसँ प्रभावित काव्य बानाक रूप लैत “ अपन समाचार “ शीर्षकमे मानवीय दुर्बलता ओ दृढताक समन्वित भाव भेंट-घाँट क्रमें अपन निजत्वक झलकैत स्नेह "हमरो एकटा गाम छल" गामक प्रति अगाध स्नेह, गामक सरलता भरल जीवनमे सोहर आ समदाउनक अतिरेक कविक मोन अपन गामेमे बसल रहैत छनि, ओना विद्वान नवीन बाबू के मैथिली कविता पर नॉस्टेलजियाक गंध अबैत रहै छनि, मुदा वर्तमानमे मैथिली कविताक स्वरूप बदलि रहल छैक। स्वतंत्रताक मानवीय शोषण आ गरीबीक पराभव आ गुनधुनियोमे गामक लोक श्रद्धा-स्नेहक बीच मस्त रहैत अछि। चरित्र निर्माणक भावमे कवि “ एक फॉक अन्हार : एक फॉक इजोत"मे गाम आ शहरक बीच अंतर के स्पष्ट करैत, समालोचनाक मादे जयधारी बाबू लिखैत छथि जे मनोवैज्ञानिक अपनत्व जखन रहि जाइत छैक तखन मानसिक शक्ति पर कलमक जोर मारैत छैक, तकरे फल कविक “ मैथिली – मंदिरमे दीप लेसैत” रचनामे आरसी प्रसाद सिंह जीक, “फूल जी पूजाक आनल पॉतीमे अपन भाव दीप जराय स्वगत स्नेह दर्शा रहलाह अछि । “शब्द” शीर्षकमे शब्द ब्रम्ह साधनामे लीन मानू कवि निज चिंतक भावमे सामान्य जन जीवनक कल्याणक कामना, ओना सब ठीके रहैक शीर्षकमे कवि भाव यतिक समरूपतामे ठाकुर जीक मुखर वाक्यांश जे हिनक विशिष्टता अछि। कविक रचना मानू कवियेक पाँती मादे कविक “कीर्ति चमकैत चान-पुनिमक” अमर कीर्ति भावोद्रेक भेल अछि । कही तँ समालोचना शास्त्रमे साहित्यमे एकरा कलात्मक अभिव्यक्ति मानल जाइछ। कविक रचनामे नित नवीन प्रयोगसँ कवि रामलोचन बाबू अर्थानुसंधाता मात्र नहि अपितु काव्य जगतक संस्पर्श अनुभूति संड़्गाता बनि जाइत छथि। मैथिली काव्य जगतक बहुआयामी कवि “ओना सब किछु ठीक रहैक”।मे थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली'क बौद्धिकता ओ चिंतनपूर्ण सत्यता पर आधारित कीर्ति छनि। कविक प्रत्येक सृजन क्षेत्रीय संस्कारसँ उपर उठल संवेदनाक गहनता पर आधारित अछि। श्रद्धांजलि नहि दs पाएबमे लिखै छथि: "अल्ला ईश्वर तेरो नाम सस्वर गाओल जा रहल आ बढले जा रहल दिनानुदिन अल्ला ईश्वरक बीच व्यवधान " एतद् पोथीक नेल्सन- मंडेला आदिक भाव कमोवेश एक्कहि सजगता संग आत्म निर्वासन भावसँ तँ “ नीक नहि कयल अहॉ” शीर्षकमे बंगला साहित्यक मर्मज्ञ कवि शक्ति चट्टोपाध्यायक अवसानक व्यथामे अपन विशाल हृदयक आशय Oh dissection calendar भावक परिचय, 15 अगस्तमे रजनीतिक गिरावट संज्ञाहीन नेताक परिचय तँ एना नहि बुझाइए देशराग आ धरती प्रतिकार करैछ शीर्षकमे यथार्थवादी कवि यदुनाथ झा “यदुवरक” समीप अनैत छनि । कविक अपन भाषा साहित्यक प्रति असीम स्नेह आ अनुराग देखैत यदुवर जीक भावमे भाव “मातृभाषा आ मातृभूमि एके सम सेवथि। विवुद्ध त्यागथि अधम मलीन ।आशय ठाकुर जीक रचना परिधि अत्यंत विस्तृत इएह जे हिनक काव्य इन्फ्लूएन्स वर्तमान हिनक समकालीन कविक भीड़सँ फराक आनि ठाढ करैत छनि। वर्तमानमे अद्य पतन पर कतेक व्यथानुभूति भरल रचनाक बानगी:- "महामान्य अदालत । ओना कहबा लय बहुत किछु अछि हमरा लग मानवताक आदिसँ अद्यपर्यन्त किन्तु सीताराम कह - - - आत्माराम रटाओल पिजड़ामे बंद पाखीक- - -!" उपर्युक्त रचना आदिमे कवि गुणीभूति ब्यंगकार कविक रूपे “ ओहि दिन उगल नाञिं छल सूर्य” मे आंतरिक अंतर्विरोध अतीतक गुलामीक मानसिकतासँ मुक्ति संघर्षक संदर्भ,विकट द्वन्दसँ साक्षात्कार करबैत कवि के मनन करू:- नञिं कथमपि नञिं - - - - -वर्तमान स्वरमे बाजि उठल अतीत विप्लव की होइ छै बाबा ? कविक काव्यधारा एकटा प्रवाह अछि । अत्याधुनिक अकविताक प्रवाहमे कतेक यथार्थवादी मर्मस्पर्शी शहर शामियानामे अनुभव करी: कियो न्यायिक जाँच कऽ कियो स्मारक निर्माणक आ बात एतेक दूर तक गेलैक -- - - -गोली धरि चलि गेलैक ।परिस्थितिक भयंकरतासँ क्षुब्द कवि, देश आ समाजक उलझल समस्या के निदान तकैत दिशा लक्षित करैत “भगवान तथागत” शीर्षकमे बुद्धक मार्ग के आवलंम्बन करैत छथि । साहित्यमे कविक शील्प शैली जीवन्तताक प्रतीक मनुख आ ईश्वर शीर्षकमे समाजसँ आलोपित होइत मनुख माने मनुखता जाहिसँ चिंतित लिखैत छथि : "मनुक्ख नहि रहल रहि गेल किछु हिन्दू - - - मुसलमान - - - सिख - - - क्रिस्तान" कवि सदैव समाजक बीच कटु सत्य के उजागर करैत शासन आ व्यवस्था पर कड़गर चोट करैत छथि । काव्यमे व्यंग्यक एकटा सुदीर्घ परंपरा रहलैक अछि गाम कोतवाल शीर्षकमे व्यंग्य वक्रोक्ति उक्ति जतहि कोतवाल चोरक ततहि उपद्रव, तहिना महाश्मशानमे कवि सबहक अछैत जीवाक लिलसामे श्मशानमे बसल अछि: जीवाक लिलसामे पल-पल मरैत पल - घड़ी – दिन – गनैत लोकमानवीय संवेदनाक अपूर्व मिसरी घोरल काव्य सृजन,’क भावमे भीड़सँ बाहर करैत छनि एतद् रचनाक मादे सिद्ध होइछ कवि अपन समकालीन कविसँ अत्यंत संवेदित छथि। अपन उदात् भाव ओ समभावमे “ अहाँ आ हम “ शीर्षकमे अपूर्व शब्द संधान करैत कवि हमरा मोन पड़ैत छथि सर्वमान्य आधुनिक कवि राम कृष्ण संग राजकमल जे कहलनि “ समय एकटा साँप “ कहलनि “सद्य: अनुभव करी: क्रोनिएक घूस खा मैच हारब थोरेक पाइपर बिका जाइछ समाचारसे नहि बनैछ समाचार चिंता जुनि करी - - -! अस्तु कवि अपन अग्रज कवि सबहिक सदैव अनुज भावमे पाठक पबैत छनि जकर प्रभाव पाठक हुनक रचनामे स्पष्ट छाप देखैत अछि ख्यातिनामा कवि जीवकांत “ नाचू हे पृथ्वी “ वेद पुराण पर समसायिक विषमताक प्रभाव तहिना ठाकुर जीक रचनामे भेटैत अछि ।“ संवाद “ शीर्षकमे “ अग्निपुष्पक “ पत्र पाबि कतेक आह्लादित छथि से देखू : "सहस्त्रबाहुक अभियानक शंखनाद थिक “संवाद” भाइ !मैथिली काव्यक नवताक पक्षधर कवि अपन रचना बसात, कौआ,मैना शीर्षकमे पारंपरिक दलान खसैत आ केबिन के गेट खुजैत, भाव बोधमे आधुनिक परिवेशक भयंकरतासँ सेहो चिंतित छथि । यथा टीड़ी शीर्षकमे नेता रूपी टीड़ी समाजिक भाव व्यवहार के चाटि जाइत अछि , नव रचना मादे भाइ कुलानन्द मिश्र केँ संबोधित करैत लिखै छथि जे युगक धुआँमे लोक औनायल जकाँ, बुझू कवि नव तूरके एवाक आह्वान करैत , सोना आब नम्हर भs गेलैए शीर्षकमे जीवनक मार्गदर्शन कs रहला अछि। दिन एखनो बहुत बाँकी छै मे कवि कोनो धीरोदात वा धीरप्रशांत दैव गुण संम्पन्न नायक'क व्यंजना नहि अपितु ओ मनुक्ख जे अपन जन्म लग्नहिसँ संघर्षरत अन्हारक विरूद्ध कवि सदैव आगू बढ़बाक लेल प्रेरित करैत छथि । उनटा बसात शीर्षकमे व्यंग्य वक्रोक्ति शैलीमे कतेको समस्याक समाधान ओ जगजियार कयलनि करैत छथि । छोट-छोट सृजनमे तिस्ता नदीक समस्या, सिक्किम ओ गेंगटोक आदि-आदि स्थानक वर्णन आदिक संग किछु पाश्चत्य शैलीक हाइकू जे भारतीय काव्य परंपरामे प्रचलित किछु सृजनमे अपन भाव अभिव्यक्ति खूब सुतरलनि अछि ।यथा: इहो बर्ख ओहिना बीति गेल बूढ अथबल सूर्य बस गैरेजक पछुआरमे डूबि गेल । एतद् “लाख प्रश्न अनुतरित” पोथीक अध्ययन - मनन – विश्लेशणसँ स्पष्ट अछि जे ठाकुर जीक काव्य परिधि विस्तारमे युग जीवनक गौरवगाथा संग प्राकृतिक सांस्कृतिक ऐतिहासिक समसायिकताक उत्कर्ष - अपकर्ष संग साहित्य समाज महापुरूष संग व सामाजिक ब्यवस्था पर सौंदर्य चेतनामे लक्षणा व्यंजना अप्रस्तुत विधान सांकेतिक भाव करूण विवशता सामाजिक अंतर्विरोध द्वंदात्मक उन्मेष,वर्ग चेतनाक स्वरूप अशिक्षा-अविश्वास भुखमरी भ्रष्टाचार, चाटुकारिता,सँ टुटैत सामाजिक व्यवस्था पर कविक पाँति मोन पड़ैत अछि: आ एगो दीर्घ निसास छोड़ैत बाजल रामलाल बौआ ! एहि अस्सी बर्खक बयसमे हम तs खाली बेरबादिए देखैत आयल छी बौआ !उपर्यक्त पाँतीक संग कविक लाख प्रश्न अनुतरित रहैत छनि जे पोथीक नामके सार्थक ओ समीचीन सिद्ध करैत छनि। चंद्रेश प्रतिरोधी साहित्यकार रामलोचन ठाकुर
रामलोचन ठाकुरक पहिचान प्रतिरोधी साहित्यकारक रूपमे। ओ सदैव संघर्ष चेतनासँ संपृक्त भऽ व्यवस्थामूलक विरोधमे अपन कलमकेँ हथियार बनौलनि। हुनका केखनो समझौतावादी गंध पसिन्न नहि छलनि। ओना किछु समझौता अबस्से जीवन संघर्षमे करए पड़लनि अछि जकरा मनुक्खक दुर्बलता ओ विवशता बूझि अवहेलित कएल जा सकैत अछि। ओ यथास्थितिवादकेँ तोड़बाक प्रयास अपन कथनी ओ करनीक माध्यमे अबस्से केलनि अछि। ओ लिखलनि से जमि कऽ लिखलनि। हिनक दर्जन भरि मौलिक आ अनूदित पोथी आएल अछि। बहुत रास रचना पत्रिकाक पातपर अछि। एहि रचना सभमे हिनक मानसिक परिवेश आ अन्तर्निहित मनोवैज्ञानिक सत्य खूजि कऽ उभरल अछि से वैविध्य परिवेशमे विभिन्न छवि-छटा नेने विविध अर्थमयी भऽ आएल अछि। ओ बौद्धिक रचनाकार छथि। हिनक भाषामे सहज सौंदर्यक दृष्टि अछि। ओ विभिन्न वयक लोकक लेल विविधतामे रचना केलनि। एहिमे व्यवहारिकता सार्थकता आ स्वाभाविकता अछि तँ किछु रचना अबस्से गुरू गंभीरतामे आएल अछि। जखन जीवनक वर्तमान आ भविष्य डवाँडोल बुझाइत छैक आ अतीतक फरफराइत पन्ना मूँह दूसए लगैत छैक तँ स्वाभाविक थिक जे आँखिक आगा अन्हार या छापि कऽ इजोतकेँ मटियामेट करबापर तूलि जाइत छैक। एहने दुःस्थितिमे हिनक अनुभव,सोच आ दृष्टिसँ ओहि अन्हरियाकेँ फाड़बाक ब्योंत अपन रचनाक माध्यमे प्रस्फुटि भऽ करबैत अछि। ओ केखनो काल जँ गुम-सुम भऽ चुप्पी लाधितो छथि तँ ओ तैयो संकेतक भाषामे बहुत किछु कहि दैत छथि जे कहबे केलनि। हिनक सभ हीत-मीत अछि आ केओ नहियो अछि। कारण आपकतामे रहितो ओ ओहि व्यक्तिकेँ चुट्टी काटबासँ परहेज नहि करैत छथि जनिक काज अनसोहाँत बुझाइत छनि। तें शत्रु बनाएब आ राखब हिनका पसिन्न छनि। कारण, दूमूँहा चरित्रकेँ उघार करबासँ ओ केखनो परहेज नहि करैत छथि। उदाहरणस्वरूप एकटा नहि बहुतो घटना घटित भेल अछि जे हिनक कलमक नोकपर चढ़ि कऽ कागतपर उभरल अछि। ओ विविधाकेँ दुविधा कहि प्रचारित-प्रसारित केलनि। हिनका जखन जे आवश्यकता बुझेलनि से लिखलनि। गद्य ओ पद्य दूनू लिखलनि। ओ बात-बातमे बातकेँ रखलनि। कही तँ छिलका छोड़ा कऽ प्रस्तुत कऽ देलनि। अपने 'बेताल कथा' (१९८१) हास्य-व्यंग्य पोथीमे सात गोट आलेखक माध्यमे विभिन्न विषयादिकेँ उठा कऽ जीवंततामे चरित पुराणकेँ राखि देलनि। जेना 'कुर्सी महात्म्य'मे स्पष्ट रूपे लिखलनि अछि "विभिन्न जाति आ धर्मक बीच झगड़ा बझेबाक प्रयास हो। आ एहि सभ काजक लेल प्रचुर मात्रामे चमचा प्रोडक्सन हो। आर कतेक रास बात छैक जे तोरा ओ कुर्सी स्वंय सिखा देतह (२१)"। आजुक राजनैतिक परक स्थिति-पातकेँ उठा कऽ जे ओ व्यवस्थापरक छिद्रान्वेषणकेँ देखार केलनि अछि से वस्तुतः कोनो निर्भीक साहित्यकारे इमानदारीपूर्वक दृढ़तामे कऽ सकैत अछि जे ओ केलनि अछि। आजुक भ्रष्ट सत्ता-व्यवस्था अपन तिकड़मी चालिमे बझबैत दूमूँहा चरित्रकेँ देखार करैत अछि। ई ओ विभिन्न अवसरपरक बहुत किछु खूजि कऽ वा मौन भाषामे कऽ देलनि अछि। हिनक भीतर जे जन-समाजक अपसंस्कृतिक गादि अछि तकरा ओ ताकि कऽ जमा केलनि अछि आ ओहि कूड़ा-कर्कटकेँ मानसिकतासँ बहरिया कऽ फेकि देलनि अछि। समाजक मूँहपर ओ समाधानपूर्वक थापड़क चोट देलनि अछि। ई सत्य अछि जे हिनक रचना जन-मानसक बातकेँ उठबैत जन-जीवनकेँ झकझोड़ैत अछि। ओ जन-जनक पीड़ाकेँ अपन पीड़ा बना सार्वजनिक कऽ देलनि अछि। ओ आत्मकथ्यकेँ जगतकथ्य संग सामंजस्य स्थापित कऽ सर्वजीन बनबैत छथि। किछु बात ओ व्यंग्यक माध्यमे सेहो चुप्पी सधैत संकेतक भाषामे कहि दैत छथि। तें ओ 'विद्यापतिक बर्खी'मे कहि उठैत छथि-"आजुक मैथिल जाति भूतजीवी आ भूत प्रेमी थिक, ओकरा वर्तमान आ भविष्यक कुनू संबंध-सरोकार नहि छैक। एहि प्रकारे ओ जे मैथिल जातिपर चोट केलनि अछि से कसगर चमेटा कसैत ओकर स्वाभाविक गुणकेँ निखारलनि अछि। रामलोचन ठाकुर मूलतः आ प्रसिद्धतः कवि छथि। हुनक कैकटा मैथिलीक पोथी से कविता संग्रह अछि जेना इतिहासहंता, माटि-पानिक गीत, देशक नाम छलै सोनचिड़ैया, प्रतिध्वनि, अपूर्वा, लाख प्रश्न अनुत्तरित अछि। आजुक कविताकेँ ओ संपादित केने छथि। ओ कैकटा पत्रिका यथा रंगमंच विषयक पत्रिका रंगमंच, अग्निपत्र, सुल्फा, मैथिली दर्शन ओ मिथिला दर्शन आदिकेँ सफलतापूर्वक संपादित केने छथि। ओ रंगमंचक कलाकार रहथि। एहि क्रममे ओ किछु नाटकक अनुवाद सेहो केने छथि जे पत्रिकाक पातपर आएल अछि यथा जादूगर, फाँस, रिहर्सल अछि। ओ संस्मरण सेहो लिखलनि। स्मृतिक धोखरल रंग हिनक प्रमाण अछि। तहिना आँखि मुनने आँखि फोलने सेहो अछि। आँखि मुनने आँखि फोलने पोथीमे २४ गोट आलेख अछि। बुद्ध एवं अन्यान्य पादगणसँ लऽ कऽ दोषीक दोष धरि। एहिमे किछु नव-नव तथ्यक खोज सेहो केलनि अछि। जेना पाद लोकनिमे २६ गोट पादक उल्लेख नाम सहित भेल अछि। मुदा एहि पाद लोकनिक जन्मस्थानक संबंधमे आ मैथिल हेबाक संबंधमे अर्थात प्रमाणिक विश्वसनीयताक उल्लेख नहि करब अबस्से कमी बोध देखबैत अछि। कहब जे कोनो एकटा निबंधमे सभटा बातक उल्लेख होइतो नहि अछि। जे स्वाभाविक थिक मुदा चौरासी गोट सिद्धमे कतेक मिथिलाक छथि ताहि प्रसंग सिद्ध नहि करब से आलेखकेँ हलुकाबैत अछि। तें की? ओ जतेक काज केलनि से तँ आधार भूमि देबे केलनि। ओ तँ स्वयं मिथिला विभूति महाकवि डाकक आलेखमे स्पष्टतः उल्लेख केलनि अछि जे हिनक (डाकक) जन्मस्थान तथा समयक संबंध एखनो धरि निस्तुकी नहि भऽ पाओल अछि। जे किछु, रचनाकारक इमानदारी स्पष्टतः लौकि जाइत अछि। २४ गोट आलेख जे एहि पोथीमे अछि से मुख्यतः मिथिला विभूतिक कहल जाएत। ओना एहिमे बेसी गुजरि गेल छथि मुदा सोमदेव छथिए। किछु आनो आलेख जेना समकालीन कथाक सौंदर्यबोध, मैथिली लोक साहित्यः उत्पति, उपयोगिता, अनुसंधान, नाट्यमंचक विकासमे पत्रिकाक योगदान, भतरस लेल भाषा आएल अछि। ओ लिखैत छथि, जतए विशेष छनि से प्रकट करैत छथि। मुदा हिनक आलेख सभमे ओ व्यापकता आ विशदता नहि भऽ पबैत अछि जे हेबाक थिक। कारण थिक संक्षिप्तता। ओ जनैत छथि जे एखन पैघ आलेख पाठक पढ़ए नहि चाहैत छथि। कारण, धैर्य ओ समयक अभाव कहि सकैत छी। मुदा नीक आलेखक पाठकक अभाव कहियो नहि रहल अछि। तैयो ओ जतबे जे किछु आलेख लिखलनि आ जाहि समयमे लिखलनि तकर मोल अछिए। समृतिक धोखरल रंगमे तँ कोलकाताक प्राचीन नाम कलकत्ताक विभिन्न विषयक योगदानपरक दस गोट आलेख अछि। कलकत्ताक साहित्यिक, सांस्कृतिक विषयक बात-विचारकेँ बुझबाक लेल ई पोथी लाभप्रद अछि। कहब जे कविवर आरसी प्रसाद सिंहपर स्वतंत्र आलेख अछि आ ओ कलकत्ताकेँ अपन कर्मक्षेत्र नहि बनौलनि। स्पष्ट अछि जे कोनो रचनाकार कोनो समय-क्षेत्र विशेषक होइतो हुनक रचनाक गमगमी दग्-दिगंतमे पसरैत अपन सार्थक अनुभूति करा जाइत अछि। ईहो सत्य अछि जे रामलोचन ठाकुर देखल-भोगल अनुभूतिक चित्रण करैत छथि। तें रचना सभमे अपन सार्थकताक बोध करबैत छथि। कहब जे कोनो रचनाकारकेँ अपन आत्मकथाक बोध नहि करेबाक चाही जे ओ करौने छथि। ई ओ एहि कारणे केने छथि जे हिनक व्यक्तित्व अपन कृतित्वक संगहि अछि जकरा ओ देखार केने छथि। ओ काज केने छथि से साहित्यधर्मिता ओ आन्दोलनधर्मिता निर्वाह करैत केने छथि। ई हुनक मिथिला-मैथिलीक प्रति पूर्णतः समर्पण भाव थिक। ओ विशुद्ध कवि छथि। हमरा जनैत नीक कविता लिखब बड्ड कठिन काज होइत अछि। कारण,नीक कविता ओ होइत अछि जकर अर्थ मात्र कवितेमे सीमित भऽ कऽ नहि रहि जाइत अछि। प्रत्युत ओकर मर्म पाठकीय अन्तर्मन धरि पैसि कऽ ओहि पाठकीय मानसिकताकेँ सदैव हौंड़ैत रहैत अछि। जतेक खेप पढ़ब ततेक नीक आस्वाद ग्रहण करैत जाएब। ईहो कहि देब अनर्गल नहि हएत जे कोनो कविक सभटा कविता नीके नहि होइत अछि। तखन अनुपातमे सम्मान देबेए पड़ैए। ईहो सत्य अछि जे कालजयी कृति अबस्से जटिल स्तरपर आधृत होइत अछि जे बेर-बेर पढ़लापर नव आस्वाद करबैत अछि। रामलोचन ठाकुर सभ तरहक आ सभ वयसक लेल कविता लिखलनि। तें बालसँ लऽ कऽ बूढ़ धरिक कविता आएल अछि। एहिमे किछु नीक कविता अबस्से अछि। किछुमे आक्रोशमूलक स्वर विशेषे भऽ आएल अछि। खौंझाहटिमे लिखल गेल कविता कनेक विशेषे उग्र भऽ आएल अछि। किछु कवितामे बौद्धिकताक ताप अछि। जे गंभीरता लेने आएल अछि। मिथिलाक आचार-विचार ओ सभ्यता-संस्कृति सेहो कतिपय कवितामे अभिव्यक्त भेल अछि। सृष्टि विस्तारक क्रममे हिनक कविता सभ उत्थानपरक अछि। कैकटा कविताक सरलता ओ सहजता जे अभिधात्मकतामे अछि तँ सेहो ताहि ढंगे जाहि शिल्पमे रचित अछि से विशेषे बनैत अछि। ओ स्वयं स्वीकारने छथि जे – -- हमरा सभकेँ अपने लिखबाक अइ अपन इतिहास जे सरिपहुँ थिक संघर्षक वर्ग संघर्षक (इतिहासहंता-समानधर्माक नाम) हिनक छोट-छिन कविता सभ सेहो संघर्षक चुनौती दैत अछि। कविता छोट हो वा कि पैघ से ततेक महत्व नहि खैत अछि। महत्व अछि जे जन-संवेदनाकेँ झकझोड़बामे कोना की जीवन सत्यसँ साक्षात् करबैत अछि। समाजक विडंबना, विसंगति, विद्रूपता आदिकेँ को तरहें आ कोना कऽ प्रस्तुति कएल गेल अछि जे जन-जनक हियमे पैसिक कऽ अपन समार्थ्यबोध देखबैत अछि। समयबोध अबस्से निरखरि उठए एहि सभ बातकेँ रामलोचनक कवि हृद्य नीक जकाँ जनैत-बुझैत छथि। ओ नीक जकाँ जनैत छथि जे बिनु विचारें रचना भैए नहि सकैत अछि। हिनक रचनामे विचार आएल अछि से रचि-पढ़ि कऽ। कतहुँ जँ अलगलो अछि तँ तेना भऽ कऽ नहि। तें रचना विशेषे मूर्त अछि, अमूर्त नहि। ओ उदारीकरणपर चोट करेत लिखैत छथि- "ई गिद्ध सभ नहि खाइछ माँस माँसक दू टूक ल उड़ि जाइछ दूर देश बिना कोनो रोक-टोक निर्यात उदारीकरण (एहि महाश्मसानमे- लाख प्रश्न अनुत्तरित) ओ स्वयं नाटककार छथि। नाटकीय कला-कौशल छनि। एहि नाट्य तत्वकेँ सेहो अपना रचनाक माध्यम बनौलनि अछि। नाटकीय गुण हेबाक फलस्वरूप हिनक कतिपय रचना उतार-चढ़ाओक क्रममे अछि। ओ अपन झिवनक खूजल पन्ना पढ़बाक लेल 'सागर लहरि समाना'(२०१७) लिखलनि अछि जे जीवनक पृष्ठ दर पृष्ठ अंकित भऽ आएल अछि। ई पोथी संस्मरणात्मक होइतो आत्मकथाक बहुतो अंशकेँ समेटने-बटोरने अछि। तें ओ आत्मकथात्मक पोथी कहल जा सकैत अछि। एहिमे मिथिला-मैथिलीक गतिविधिक बहुतो बात आएल अछि। सांस्कृतिक कार्यक्रम, आन्दोलनपरक बात सभ आएल अछि। लोकक चरित्रकेँ नाँगट-उघार करैत ओ स्वयं लिखलनि अछि- किछु लोक कूपक बेंग सन संसारकेँ जनैत अछि इतिहासकेँ आरंभ अपने जन्मसँ मानैत अछि ओ समय आ समाजपर कटाक्ष करैत बहुतो बात सभक जीवंत चरित्र चित्रण केलनि अछि। आपकताकेँ बचा कऽ रखबाक चिन्ता सदैव रहलनि अछि। ओ जखन कोनो दरंगी नीतिकेँ देखलनि आ से साहित्यकारगणमे महंथी साहित्यकारक कुत्सित क्रियाकलापकेँ देखलनि तकरा ओ खुजि कऽ उघार करबे केलनि। एकटा बात ईहो कहि देब आवश्यक बुझैत ची जे मेथिलीक बहुतो उर्जस्व रचनाकार लोकनि मैथिलीक महंथ लोकनिक खडयंत्रकारी नीतिसँ उबिया कऽ मैथिली लिखनाइ छोड़ि देलनि। फल भेल जे ओहन रचनकारक अमूल्य लेखन रत्न-मंजूषासँ सजग पाठक वर्ग वंचित रहल आ भ्रष्ट गोलौसीवाद महंथ लोकनिक अपन सड़ल-गलल रचना लऽ पुजबैत रहलाह, सम्मानित होइत रहलाह आ स्वार्थवादी नीतिमे पाठककेँ अपन रचना पढ़बाक लेल बाध्य करैत रहलाह। यैह सभ रामलोचन ठाकुरक रचनाकारकेँ ारो धधकबैत रहल। ओ स्वयं पजरैत रहलाह आ बहुत किछु लिखबाक लेल बाध्य होइत रहलाह। ओ सफल अनुवादक छथि। जा सकै छी किन्तु किए जाउ, पद्मा नदीक माँझी, नंदितनरके आदिक सफल अनुवाद केलनि। हिनका जनसम्मान अबस्से बेटलनि। एहिमे भाषा-भारती सम्मान, प्रबोध साहित्य सम्मान किरण साहित्य सम्मान आ आनो संस्था सभक सम्मानसँ ओ समलंकृत भेलाह अछि। अतेक तँ अवश्य कहल जाएत जे ओ लिक्खाड़ छथि। ओ जे किचु लिखलनि से अबस्से अपन जीवनमे भोगल यथार्थकेँ उभारलनि। संबंधक बदलैत दवाबमे समाजिक मुद्दा सभकेँ उठा कऽ रखलनि। हिनक दूरदृष्टि अबस्से रहल अछि जे सभ समाजिक दवाबमे लिखल गेल कही तँ प्रखर चेतनाक स्वर लऽ आएल अछि। एकटा बात ईहो कहब अनर्गल नहि हएत जे हीत-मीतसँ बेसिए ओ शत्रु बनौलनि। तैयो जे ओ हपन नव जमीन लेखनक उर्वराशक्तिसँ बनौलनि से अबस्से कहल जा सकैत अछि आ यैह बात हमरा नीक लगैत अछि। शिवशंकर श्रीनिवास रामलोचन ठाकुरक 'बेतालकथा' 'बेतालकथा' रामलोचन ठाकुरक व्यंग्य रचना थिक, जकरा ओ "हास्य-व्यंग्य" विधाक रूपमे लिखलनि अछि। रामलोचन ठाकुरक अन्य नाम अछि- अग्रदूत, कुमारेश काश्यप ओ मजतबा अली। उक्त नाम सभ ओ अपन पोथी 'लाख प्रश्न अनुत्तरित (कविता संग्रह)' मे देने छथि। बेताल कथा कुमारेश काश्यपक नामसँ लिखने छथि किंतु किएक से एहि प्रसंग हुनक कोनो मंतव्य प्राप्त नहि अछि। एहि पोथीक प्रकाशन 'विदेह पबलिकेशन्स' कलकत्तासँ 1981 मे भेल अछि। व्यंग्य साहित्यिकविक विधा थिक, जकर अर्थ होइछ कटाक्ष करब जे शब्दक व्यंजना शक्तिसँ प्राप्त होइत अछि। हास्यक अर्थ उपहास होइत अछि जे कतौ ने कतौ व्यंग्यबोधक अछि। ओना हास्य हँसबाक लेल, मनोरंजन लेल सेहो प्रयुक्त होइत अछि। मिथिलामे संबंधनक अनुसार हास्यक परिपाटी रहल अछि जाहिमे उपहास कम संबंधबोधक मधुरता बेसी रहैत अछि। एहन हास्यमे मनोरंजनक उद्येश्य रहैत अछि।मैथिली साहित्यमे प्रो. हरिमोहन झाक विभिन्न विधामे लिखल हास्य-व्यंग्य भेटैए। हिनक साहित्यमे हमरा सभ दिन ओहि विधाक शिल्पमे हास्य बोड़ल भेटल मुख्य व्यंग्य अछि जाहि माध्यमे ओ (हरिमोहन झा) समाजमे सुधारक आकांक्षी रहलाह आ लोकप्रिय भेलाह। मिथलामे केकरोपर व्यंग्य करबाक हेतु मान चढ़ा कऽ बजबाक सेहो स्वभाव रहल अछि। जेना कि कहि रहल छी केकरो विषयमे आ ओकर अर्थ खुजि रहल छै केकरोपर। हमरा जनैत एहि पोथीक रचनामे कुमारेश काश्यप अर्थाप रामलोचन ठाकुर एहि स्वभावक अनुसार कथाक रचना करैत अपन रचनाक उद्येश्यक पूर्ति कयलनि अछि। आ ई बात हिनका हरिमोहन झासँ फूट करैत छनि। एहि पोथीक नाम अछि "बेताल कथा'। संस्कृत साहित्यमे बेताल भट्ट द्वारा लिखित 'बेतालपञ्चविंशतिका' कथा संग्रह प्राप्त होइत अछि। एहि पोथीक पचीसो कथामे विक्रमादित्यक न्याय प्रति हुनक दृढ़ता देखाओल गेल अछि। हिंदी साहित्यमे सेहो अनेक अपना-अपना ढंगक बेताल कथा विभिन्न नामसँ अछि। रामलोचन ठाकुरक 'बेतालकथा' पोथीमे पाँच टा बेताल कथा, एकटा तोता-मैना संवाद अथ कथा चमचा पुरणा प्रसंग ओ एकटा लालबुझक्कर विद्यापतिक बर्खी' कुल सात टा कथा अछि। 'तोता-मैना संवाद अथ कथा चमचा पुरणा प्रसंग ' उक्त संग्रहक पहिल कथा थिक। एहिमे रचनाकार अपन भाषाक चिन्ता करैत छथि, हिनक कहब अछि जे जावत मैथिली कार्यलयक भाषा पढ़ौनीक भाषा नहि हएत ताबत विभिन्न संस्थामे मात्र स्वीकृति भेलासँ मैथिलीक उचित विकास संभव नहि अछि। आ ई काज तखने हएत जखन जनता जागत किन्तु से कोना हएत? एहि भूमिक नेता एहि भूमिक रहितो दिल्ली दरबारक पूजामे रहैत अछि आ समाजक लोक बनि गेल अछि दरबारी जकरा ओ चमचा कहलनि अछि। वर्तमान स्थिति (रचनाकाल आ एखनो जे ओहिना विद्यमान अछि)केँ देखा कथाकार अपन कथाक इति करैत छथि। उक्त बात निश्चित रूपें समाज ओ एकर राजनीतिक पृष्ठिभूमिपर व्यंग्य अछि। अपन भाषाक प्रति अतेक आस्था रखनिहार रामलोचन ठाकुर एहि कथाक नाममे सूगा बदला तोता लिखलनि। ओना सूगा आनो भाषामे प्रयोग होइत अछि किन्तु मैथिलीमे "सूगा", "सुग्गा" शब्द सएह प्रयोगमे रहल अछि। हँ, इम्हर आबि कऽ विभिन्न प्रभावे 'तोता' सेहो कहल जाइत अछि। किन्तु रामलोचन जी 'सूगा' नहि लीखि 'तोता' लिखलनि , ई नीक नहि लगैत अछि। भऽ सकैए जे हिन्दी भाषामे "तोता-मैना"क कथा जे गद्य ओ पद्यमे प्रसिद्ध अछि से हिनका सेहो नाम देबामे प्रभावित केने होइन। 'विद्यापतिक बर्खी' मे लेखक वर्तमान समयमे शिक्षा जगतमे होइत शोध-कार्यादिपर व्यंग्य केलनि, जे बहुत मार्मिक अछि। विद्यापति पदावलीमे जे मूल बात अछि, जाहि कारणे ओ जन-जनक कवि छथि ओहि सभसँ फफूट हुनका युग-चेतनाक रूपमे नहि अन्य विभिन्न रूपमे हुनक छविकेँ आधार मानि शोध प्रस्तुत करैत पी.एच.डी प्रदान कएल जा रहल अछि। लेखक अपन रचनाक बलपर नहि अन्य कारणे महान घोषित कएल जा रहलाहे। एहि सभपर हिनक व्यंग्य निश्चित रूपसँ सचेतक अछि। एहिठाम एकटा बात आरो हम कही जर व्यंग्य रचना जहिना साधारण पाठक लेल बहुत रुचिप्रद ओ प्रेरक होइत अछि ओहिना विसंगतिकारी लेल असह्य ओ त्याज्य। प्रो. हरिमोहन झापर सेहो परंपरावादी लोकनि विभिन्न तरहेँ अपन क्रोध प्रगट केने छथि।रामलोचन ठाकुरक रचना व्यंग्य रूपमे एतेक तीक्ष्णता संग आपकता रखने किंतु हिनका व्यंग्यकार रूपमे नहि चीन्हल गेल से आश्चर्य, जखन कि हिनक रचनामे समयक अद्भुत पकड़ अछि आ व्यंग्यक सटीक चमत्कार। उक्त दूनू कथाक बाद हिनक शुरू होइत अछि- बेताल कथा। पहिल कथा अछि कुर्सीक महात्म्य। हिनक बेताल कथा पारंपरिक बेताल कथासँ फूट अछि। एहि कथामे विक्रमादित्य छथि, बेताल छथि किंतु दूनू चरित्र पूर्णतः आजुक समयानुसार नव परिधान ओ नव चिंतनमे अछि। 'कुर्सीक महात्म्य'मे विक्रम अपन कुर्सीक सुरक्षा चाहैत छथि। एहि कथामे रचनाकार वर्तमान समयमे जे सत्तासीन नेताक चरित्र अछि ओ विक्रमादित्यमे आरोपित केलनि अछि। एहन विक्रमादित्य अपन परमप्रिय सलाहकार बेतालसँ मंत्रणा करैत छथि जे हुनक सिंहासन कोना बाँचल रहत। आ बेताल हुनका युक्ति बुझा रहलाह अछि। सत्तासिन व्यक्ति स्वाभाविक रूपसँ सामंती मनोस्थितिक होइत छथि। एहन लोक समाजमे पिछड़ल लोकक उत्थानसँ डेराइत छथि। उक्त कथामे दुसाधक बेटा न्याय-प्रक्रिया ओ समाजक ओहि दिस जाइत रुखिसँ विक्रम डेराइत छथि। आ, ओहिसँ चिंतित भऽ अपन सिंहासनक सुरक्षाक उपाय बैतालसँ पुछैत छथि। उक्त कथा कहैत अछि जे वर्तमान समय एहन भऽ गेल अछि जे राजनेता सत्ता पबैक लेल संपूर्ण देशक लोकमे महान बनबाक नाटक करैत अपन सुख-भोगमे लिप्त रहैत अछि आ सदिखन अपन कुर्सीक सुरक्षा हेतु अपन चमचा द्वारा अपन महिमाक गान करबैत रहैत अछि। उक्त कथा अतीतसँ वर्तमान अबैत अछि आ कहैत अछि जे एकटा समय आओत जे ई कुर्सी दिल्ली (भारतक राजधानी)मे रहत आ एहिपर बैसनिहार प्रधानमंत्री कहाओत। एहि तरहे लोकतंत्र शासनमे व्यक्ति-पूजाक खेलपर भयानक व्यंग्य अछि जे पाठककेँ समयसँ साक्षात्कार करेबामे समर्थ होइत सचेत करैत अछि। कथा अछि 'विप्लव'। 'विप्लव' केर अर्थ होइत अछि-क्रांति, विद्रोह। राजसत्ता केखनो अपन समाजिक विद्रोह नहि चाहैत अछि। ओ एकरा दबेबाक लेल समाजक बीच एहन चुप-चुप कांड करैत अछि जाहिसँ समाजक ध्यान ओहि दिस बँटि जाइत छैक आ राजसत्ता स्वयं कांड कऽ कऽ ओहि घटित कांडकेँ निंदा करैत समाजक सहानुभूति लैत अपना प्रति होइत विद्रोहक धाराकेँ बदलि दैत अछि। एहि बातकेँ बेताल विक्रमादित्यसँ वनराज सिंहक कथा कहैत छथि जे कोना सिंहक ' प्राइवेट सेक्रेटरी चमचा प्रधान श्रीमान शृंगाल शर्मा मंत्रणासँ बकरीक अपहरण कऽ ओकरा मारि खाएल गेल पुनः हरिणक अपहरण कऽ मारल गेल आ स्वयं शेर सिंह एहिपर दुख प्रगट करैत, भाषण दैत जानवर सभक सहानुभूति पौलनि। राजसत्ताक एहि भयंकर खेलकेँ उघार करैत उक्त कथा सत्तापर व्यंग्य तँ करिते अछि समाजकेँ सेहो सतर्क करैत अछि, जे ध्यान योग्य अछि। रामलोचन ठाकुर जाहि रूपेँ जन-मानसिकतासँ अपन व्यंग्यमे राजसत्ताक चरित्रपर चोट करैत छथि ओ अत्यंत महत्वक अछि। हिनक खूबी अछि जे ओ बहुत सहजे प्राचीन युगक पात्रकेँ वर्तमान समयक राजनेताक चरित्रमे आरोपित कऽ अपन व्यंग्यात्मक विद्रोहक स्वर स्पष्ट करैत छथि जे अत्यंत महत्वपूर्ण ओ तथ्यपरक अछि। हिनक रचनाक आर खूबी अछि जे ई अपन व्यंग्यमे ने तँ लावधिक नाम लैत छथि आ ने नेताक किंतु हिनक कथाकालक ओ खास राजनेताकेँ सेहो इंगित करैत अछि। भारतीय प्रजातंत्रक इतिहासमे इमरजेंसी (आपातकाल) २५ जून १९७५ सँ २१ मार्च १९७७ धरि २१ मासक अवधिक बीच छल। एहि बीच भारतीय नागरिक स्वतंत्रता छिना गेल छलैक। विद्रही नेता, पत्रकार ओ जनपक्षक लोककेँ जेल भऽ गेल छलनि। सत्ताक विरोधमे बाजबकेँ दंडनीय अपराध बूझल जाइत छल। देशद्रोह बुझल जाइत छल। ई बात वर्तमान समयमे सेहो कतेक प्रासंगिक अछि सहजहि बूझल जा सकैत अछि। एहन समय हेबाक कारणमे जाहि रूपेँ 'ब्रह्माक श्राप' मे इंद्रक ताना-शाही, ॠषि-मुनिक कारागार ओ अन्य बात देखाओल गेल ओ अद्भुत रूपेँ देशमे भेल 'आपातकाल'केँ मोन पाड़ि दैत अछि। ओ समय आपातकाले थिक से आइ स्पष्ट होइत अछि जखन ब्रह्मा हुनका आगूक जन्म नारी हेबाक श्राप दैत छथि। उक्त कथामे आपातकालक जन-दुर्दशाकेँ जाहि रूपेँ बेताल-विक्रमादित्यकेँ कथा सुना रहलैए ओ इंद्रक प्रशासनमे चलैत अछि। किंतु इंद्रकेँ नारीक श्राप जाहि कुशलतासँ ओकरा भेटैत छैक ओ सद्यः आपातकालक स्थितिक भऽ जाइत छैक। कोनो व्यंग्य अपन व्यंजना शक्तिक ई विशेषता थिक जकरा कहबी संग कहि सकैत छी जे 'घाओ' कत्तौ आ पह कत्तौ' आ से रामलोचनजीक रचनामे बहुत सहजता संग 'घाओ आ पह' दूनू चिन्हार होइत अछि। एहि रूपेँ, अद्भुत रूपेँ आपातकालक विषम स्थितिपर टिप्पणी करैत उक्त कथा जन-चेतनाकेँ झकझोड़ि कऽ जगेबाक काज करैत अछि जे हुनक व्यंग्यकेँ सार्थक ऊँचाइ प्रदान करैत अछि। कोना लोक नायककेँ खलनायक, सद्गुणीकेँ दुर्गुणी लोक कहि अपना अनुसार समयकेँ देखि कऽ करैए तकर उत्तम उदाहरण अछि हिनक व्यंग्य 'उत्तर महाभारत'। जाहिमे बेताल पांडवकेँ अन्यायी, कृष्णकेँ कुटिचाली संबोधन कऽ कथा कहलनि अछि। ओना राजनीतिमे सभ किछुकेँ अपना हितमे सिद्ध करबाक बातकेँ सफल राजनीति कहल जाइत अछि, हमरा जनैत प्रकरान्तरसँ बेताल सएह कहै छथि। 'अमरावती उपकथा' अद्भुत कथा अछि। एहि देशमे आपातकालक बाद छठम आमचुनाव भेल। जाहिमे जनता पार्टी जीतल। कहल गेलै जे भारतीय जनताकेँ आब असल स्वतंत्रता भेटलैक किंतु की भेल? तकरे व्यंग्य कथा अछि उक्त कथा। उक्त कथा कहैत अछि जे पुनः जनता ठकल गेल। चुनावसँ पहिने नेता लोकनि बहुतो आश्वासन देने छलखनि किंतु सभ बिसरि जाइ गेलाह। बेतालक शब्दमे "कारण तखन ई लोकनि कुर्सी बिहीन छलाह। कुर्सी भेटिते बिसरि गेनाइ स्वाभाविक । आब कैसी तेरी रंगा ! दोसर बात जे इहो लोकनि त कुनू ने कुनू रूप मे पुरने दल सं सम्बद्ध छलाह। रक्त सम्पर्के ओही वंशक छथि ! आ तेसर बात जे बिलाड़ि जं माछक रखबार हो त परिणामक कल्पना सहजहि कएल जा सकैए।" एतावता ईहो लोकनि जनताकेँ भ्रमित करैत अपन स्वर्ग भोगमे लागि गेलाह। कथा स्पष्ट रूपसँ कहैत अछि जे एहि देशक जनता जावत स्वयं नहि जागत, तावत ओकर कल्याण संभव नहि छैक। एहि बातकेँ कहबाक लेल कथा जाहि तरहेँ व्यंग्यात्मक रूपें अपन बात कहैत भारतीय राजनीतिक दुर्दशाकेँ समक्ष करैत अछि, ओकर प्रस्तुतिक विलक्षणता बहुत प्रभावी अछि। कथामे नेताक वेश-भूषा ओ ओकर प्रवृतिकेँ समक्ष रखबामे रचनाकार अत्यंत सफल भेलाह अछि ततबे नहि ओ जनताक सहिष्णु स्वभावकेँ सेहो आलोचना केलनि अछि। हिनक कहब अछि जे जनताकेँ अपन सहबाक सीमाकेँ सेहो बूझक चाही। अन्याय ओ शोषणक विरोधमे ठाढ़ हेबाक चाही। ओतबे नहि कथा अपन प्रसंगसँ स्पष्ट कहैत अछि जे जनता स्वयं अपन शोषणकेँ रोकि सकैत अछि, अपन स्वतंत्रताक द्वारि खोलि सकैत अछि। एहिठाम एकटा बात हमरा कहब आवश्यक बुझाइए ओ ई जे मैथिली साहित्यमे व्यंग्यपरक रचनामे कतेको रचनाकारक रचना छनि जाहिमे प्रो. हरिमोहन झा, अमरजी, छात्रानंद आदि लोकनि प्रमुख छथि किंतु ई लोकनि कोनो खास विधामे व्यंग्यक समावेश केलनि अछि। हँ, एहिमे हरिमोहन झाक 'खट्टर खकाक तरंग' केँ छोड़ि कऽ। 'खट्टर ककाक तरंग' विभिन्न विषयपर लिखल संवादात्मक हास्य (मनोरंजन हेतु, हास्य उत्पन्न करबाक हेतु)-व्यंग्य रचना थिक जे कोनो खास विधाक अंतर्गत नहि रहितो अत्यंत मार्मिक अछि। एहिठाम हम ईहो कहि सकैत छी जे हरिमोहन झा उक्त रचना व्यंग्यकेँ स्वतंत्र विधाक रूप देलनि अछि। किंतु रामलोचन ठाकुर 'बेताल कथा' मुख्य रूपसँ राजनीतिपर अपन रचनाकेँ केंद्रित कऽ हास्यकेँ उपहाेसक रूपमे व्यंग्यमे समाहित करैत अपन रचनाकेँ व्यंग्य विधामे कायम केलनि अछि तें हम पहिनहुँ कहलहुँ अछि जे ई हरिमोहन झाक रचनासँ फूट अपन रचनाकेँ स्वरूप प्रदान केलनि। हिनक पोथीक नाम थिक 'बेताल कथा'। हम सेहो हिनक रचनाक व्याख्या करैत कएक ठाम कथा शब्दक प्रयोग केलहुँ अछि किंतु हिनक रचना कथा नहि थिक। ओ सभ थिक व्यंग्यात्मक गद्य जकरा 'व्यंग्य रचना' कहल जाएत। तकर कारण अपन विधामे जाहि रूपें अपन घटनाक समापन संग कथ्यकेँ देखार करैत अछि से हिनक रचनामे नहि अछि। कथामे जँ कतौ मूल घटनासँ फराक लगैत विषय देखाइत अछि तँ ओ अंततः मूले घटनाकेँ स्पष्ट करैत ओहि संग समाहित भऽ जाइत अछि। किंतु रामलोचन ठाकुरक उक्त रचनामे घटैत घटना ने कथा जकाँ क्रमशः सम्यक रूपें चलैत अछि ने कथ्य धरि जाइत अछि , अस्तु हिनक रचना प्रारंभेसँ अपन कथ्य कहैत पुनः चलैत आगू बढ़ैत अछि जे हिनक रचनाकेँ कथा नहि बनए दैत अछि, कतहुँ संवाद कतहुँ कोनो घटनाक वर्णन, कतहुँ कोनो सूचनात्मक वृतांत हिनक रचनाकेँ मात्र व्यंग्य रूपमे आगू बढ़बैत अछि। आ व्यंग्यक खास विधाकेँ जनपक्षधरताक दृष्टिएँ आगू बढ़बैत अछि जे हिनका महत्वपूर्ण व्यंग्यकारक रूपमे महत्वपूर्ण बनबैत अछि। दिलीप कुमार झा एखनो माँगि रहलए उत्तर -' लाख प्रश्न अनुत्तरित' मैथिली कविताक जे प्रगतिवादी धारा भुवनजीसँ प्रारंभ भेल से यात्रीजी लग अबैत-अबैत बेस भकरार भ' गेल।रामलोचन ठाकुर जाहि प्रगतिवादी धाराक प्रतिनिधित्व करैत छथि से विश्वमे नित- नूतन होइत परिवर्तनसँ प्रभावित तँ अछिये,मिथिलाक जे आर्थिक ,सामाजिक दुर्दशा अछि से हिनक कविताक केन्द्र बिन्दुमे रहल अछि।एहि मामिलामे यात्रीजीक मैथिली कविता सेहो मिथिलाक सामाजिक ,आर्थिक परस्थितिकक गहन विश्लेषण करैत देखाइत अछि।राम लोचन ठाकुरक कविताक अभिष्ट एकटा सुन्नर दुनियाँ देखबाक अभिलाषी अछि,जाहिमे मानव मूल्यक कीमतपर कोनो समझौता नहि। हुनक कविताक केन्द्रमे एकटा विकसित,शिक्षित मिथिलाक परिकल्पना सेहो रहलनि अछि।कविक रुपमे कविता लिखलनि, ताहुसँ आगाँ मिथिलाक भाषा - संस्कृतिक रक्षाक लेल, मिथिलाक अस्तित्वक फराक परिचिति बनल रहय ताहि लेल दरभंगा,पटना सँ कोलकाता धरि अनेको आन्दोलनमे भाग लेलनि। एकटा आन्दोलनी व्यक्तित्व छथि कवि रामलोचन ठाकुर।कविता लिखि क' सुति नहि रहलाह।अपन कविताकें क्रियाशीलनक अवस्थामे अनबाक जे कोनो प्रयास संभव छलनि से ओ करैत रहलाह खाहे ओ रंगमंचक माध्यमसँ हो वा पत्र -पत्रिकाक संपादनक माध्यमसँ।सम्प्रति किछु दिन पूर्वतक मिथिला दर्शन पत्रिकाक संपादन करैत रहलाह अछि।अपन प्रश्न सभक उत्तर हेरैत रहलाह अछि।एकटा तेज छात्र अवसर भेटितहि शिक्षकसँ अनेको प्रश्न करय लगैत अछि से रामलोचन ठाकुर अपन कविताक माध्यमसँ लाखों प्रश्न करैत छथि।हम बात क' रहलहुँ अछि हुनक कविताक संग्रह 'लाख प्रश्न अनुत्तरित' के प्रसंग।एहि आलेखमे, संग्रहमे संग्रहित हुनक कवितापर किछु बात तँ करबे करब।हम एहु बातक पड़ताल करय चाहब जे एखन धरि हुनक प्रश्न सभक किछुओ उतारा भेटलनि की नहि! कवि लिखबा लए बैसैत छथि गंगा अवतरणक कथा,लिखने चलि जाइत छथि कोसी- प्रांगणक व्यथा। कविकें मिथिलाक लोकक पीड़ा कखनो दोसर वस्तु सोचबा लेल पलखति नहि दैत छनि।ओ विश्वक चिंतन करैत छथि।दुनियाँमे अनेक रंगक संकट उपस्थित छैक ताहिपर कवि अपन चिंता व्यक्त करैत छथि मुदा फेर अनचोके बाजि उठैत छथि- रक्तहीन,मांसहीन/कंकालक देश/हमर मातृभूमि /मिथिला ई विख्याता भुवनत्रयम् बिसरल कि जाइत अछि। कवि अपना देशमे प्रसन्नता तकै छथि।आजादीक बाद भारत कतेक तरक्की केलक? भारतक विकासमे मिथिलाक की हालति छैक तकर सेहो संगे -संग पड़ताल करैत छथि।कवि कहि उठैत छथि- लिखबा ले बैसै छी कथा आजादी के/ब्यथा बेरबादी के लिखायल चलि जाइत अछि। सरिपहुँ कवि की लिखथि? कियेक लिखथि? तकर निर्णय नहि क' पबैत छथि कारण स्पष्ट छै।देश समाज दिन- दिन ओझारइते जा रहल अछि।अपने गाममे हमसभ अनठिया अनचिन्हार भ' गेल छी।जकर कोनो पता ठेकाना नहि बाँचल अछि।सरिपहुँ कतेक असहनीय पीड़ा होइछ कोनो संवेदनशील व्यक्तिक लेल जखन ओकर परिचिति समाप्त होब' लगैत छैक।मुदा ताहि लेल कवि कहैत छथि एकर समाधान बैसि क' कनलासँ नहि हैत।एकरा लेल करय पड़त उद्यम।चिन्हय पड़त अपन शक्तिकें।जाहिसँ एकटा समृद्ध ओ सुसंस्कृत भारत ओ मिथिलाक निर्माण क' सकी। राम लोचन ठाकुरक जन्म गाममे भेलनि। नेनपनसँ किशोरावस्था धरि गामेमे रहलाह मुदा दरिद्रता मिथलाक लेल सभदिन अभिशाप रहलैक से युवा रामलोचन ठाकुर चलि गेलाह कलकत्ता ओतय जेना- तेना किछु उपार्जनक संग अपन आगाँक अध्ययन सेहो करैत रहलाह।मिथिलाक सोन्हगर माटिक सुगन्धिसँ शिक्त एहि कविक मोन- प्राण नहि रमलनि कोनो आन बाटपर ओ सदिखन ठाढ़ भेटलाह अपने माटिपर।ओ कलकत्तामे सेहो मैथिली बिषय पढ़लनि।ताहि दिन कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली पढ़ाइ होइत छलै।संगे संग मैथिलीमे लेखन दिस सेहो उन्मूख भेलाह।भारत गामक देश अछि आओर मिथिला गामक प्रदेश ,से गाम रामलोचन ठाकुरकें सभदिन आकर्षित करैत रहलनि।कविक मोनमे जे अनेक प्रश्न उमरैत - घुमरैत रहलनि अछि ताहिमे ईहो एकटा प्रश्न रहलनि जे भारत गामक देश अछि तँ भारतक विकासक मानचित्रपर गाम कतहुँ कियेक नहि देखाइत अछि? सभठां नगरेक चर्चा - वर्चा अछि।नगरेक विकास लेल संसद आ विधानसभामे योजनाक निर्माण होइत अछि ।तखन खाली जबानी जमाखर्च सँ गामक विकास कोना हैत?गाम लगातार विकासक दौड़मे पिछड़ि रहल अछि।गामक लोक परा क' शहरमे शरणागत भ' रहल अछि।ताहि स्थितिमे कविक मोनमे ई प्रश्न घुरिआयब स्वभाविके छनि। जखन कवि अपन कवितामे बाजि उठैत छथि- ' किंतु श्रीमान् अपने त' कहने रहिअइ भारत गामक देश थिक आ एहिठाम त' अगबे शहरे- शहर छै गाम कहाँ छै,अपना सभक गाम...' कविक मोनसँ एको पलक लेल गाम बाहर नै भ' पबैत छनि।रहैत छथि नगरमे, गाम बर्षमे एक दू बेर आबि जाइत हेताह सएह बहुत।चाही तँ अहाँ हुनका नास्टेल्जिक बुझि सकैत छी,मुदा से अपने जे बुझि कविक मोनमे गाम रचल - बसल छनि।कविक मानस पटलपर अपना गामक अनेक रंगक चित्र उभरैत छैक।हुनका मोन पड़ैत छनि अपना गामक शिव मंदिर,डीहबारक स्थान,मसजिद। माने सभ जाति धर्मक सदभावसँ बनल ,बसल गाम।हुनका मोन पड़ैत छनि-' पसरमे जाइत चरबाहक पराती आ साँझ मे दूर नदी कातसँ बाध -बोनसँ भासल अबैत बारहमासाक स्वर आङनसँ ढेकी जाँतक संगीतक संग लगनीक स्वर कहियो सोहर, कहियो समदाओन कहियो तिरहुत जे कहियो मिथिलाक गामक परिचिति छल' एतबे नहि हुनका मानस पटलपर गामक संस्कृतिक सभटा रंग देखाइत छनि।गमैया पूजाक सड़ोर, जट-जटिनक खेल,तजियाक संग झरनी गीत,फगुआ ,जुड़शीतल सहित सभटा पाबनि तिहारक पुरना स्वरुप आ गामक लोकक मेल मिलापक संग जीवन बितायब ।।गामक सामाजिकता ,एक दोसराक संग पुरब।सुख- दुखमे संग रहब सभटा मोन पड़ैत छनि। कवि ताकि रहलाह अछि अपन ओहेन गाम। एहि भूमंडलीकरणक दौड़मे आब ओ गाम भेटब मोशकिल छनि। एहि संग्रहक अधिकांश कविता भारतमे भूमंडलीकरणक आरंभिक समयमे लिखल गेल अछि।आइ तीस बर्खक बाद कविताक अभिष्ट निजगुत बुझा रहल अछि।जं -जं दिन बितैत जाएत समय आर फरीछ होइत जाएत ।एहि भुमंडलीकरणमे सांस्कृतिक विविधताक लोप भ' रहल अछि।ओना तँ सगरे संसार एहि सांस्कृतिक ओ आर्थिक आक्रमणक शिकार भेल अछि मुदा मिथिला एकटा तन्नुक मनोस्थितिवला प्रदेश अछि, जे बहुत तीव्रतासँ दोसराक देखाँउस करैत अछि।कवि एहि प्रवृतिसँ दुखी छथि,चिंतित सेहो।आनक छिछा उतारबामे मस्त रहैत अछि। 'अए हओ बुढ़बा तों आजादी देखने छहक? सत्त-सत्त कहिह' ओ बकर- बकर ताकय लागल हमर मुह 'आजादी हओ आजादी देखने छहक? हम ओकरा बुझबैत बाजल रही आ एगो दीर्घ निसास छोड़ैत बाजल छल रामलाल-- 'बौआ ,एहि अस्सी बरखक वयस मे हम त'खाली बेरबादीए देखैत आयल छी कहियो रौदी ,कहियो दाही कहियो हैजा,कहियो मैया पपियाही कहियो जमिंदारक जुलूम आ आब त' ओकर संग पुरैत छै थानाक सिपाही' से आजादी के पचहत्तरि बरखक बादो की हालति छैक देशक? आइ भीतरिया आ बहरिया दुनू कातसँ देशपर आक्रमण छैक।देशक संसाधनपर सीमित लोकक अधिकार छैक।राजनीतिज्ञ, अपराधी ओ व्यवसायिक तीन तरफा गठजोड़ सँ आम लोक त्रस्त अछि।पचहत्तरि बरखक आजादीक बादोआइ भारतक बच्चा सभकें गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षाक अधिकार नै भेटि सकलै।भारतक शिक्षा केटेगरीमे बटल छैक।अमीरक लेल अलग शिक्षा आ गरीबक लेल अलग।एखन धरि सभक लेल स्वास्थ्य सुविधा सपने अछि।तखन एकटा आजादी तँ अवश्य भेटलैक अछि से बजबाक आजादी।जकरा जे फुरा रहल छैक से बाजि रहल अछि ।से लोकतंत्र आ देशक मार्यादाक उल्लंघन करब सेहो कोनो संवेदनात्मक बात नहि रहलैक। देश प्रेमक अतिवाद सेहो छैक तँ देशक विरोधमे , विरोधमे नारा लगेबासँ सेहो कोनो बन्हेज नहि,कोनो परहेज नहि।देशद्रोही आ देशभक्तक पहिचान करब एखनुका समयमे बड़ कठिनाह अछि।तें रामलाल बुढ़बाक बात एखनो प्रासांगिके अछि। जाति आ धर्म शक माध्यमसँ सत्ता प्राप्त करब एखन देशमे बड़का खेल भ' गेल अछि।आम लोकक मौलिक आवश्यकताक कोनो मोल नहि।आब मनुक्खसँ बेसी जरुरी अछि जातिक विकास,धर्मक विकास।लोक सेहो आब अपना -अपना जातिक हिसाबें मतदान करैत आछि। साँच बजबाक आ साँच सुनबाक साहस प्राय: समाप्ते जकां भ'गेल अछि,तें जे हाल -चाल अछि एखन आजादीक नामपर से लगभग एहिना चलैत रहत।सार्थक विरोध करबाक साहस नै रहलै।आब यात्री,रामलोचन ठाकुर सन ठाँहि-पठाँहि कहैवला,कविता रचैवला तँ सेहो विरले छथि।अन्ध विरोध आ अन्ध समर्थकक बीच प्रतियोगितात्मक दौड़ चलि रहल अछि।तेहने परिस्थितिमे रामलोचन ठाकुरक लाख बेर मोन पड़त लाख प्रश्न अनुरत्तरित! रामलोचन ठाकुर अपादमस्तक मैथिल छथि।मैथिली भाषापर आसन्न संकटक निवारण लेल ओ सदति संघर्ष करैत रहलाह। एकटा विपन्न परिवारमे जन्म भेल छलनि।अभाव कें ल'ग सँ भोगने ओ देखने छलाह। मिथिलाक जनगणक पीड़ाकें अकानैत सदति मिथिलाक उन्नति,प्रगतिक कामनाक लेल चिंतित कवि ,नाटककार रामलोचन ठाकुर कवितामे एहने रंग भरैत छलाह जाहिमे सीदित पीडि़त मिथिलाक लोकक स्वर देबाक सदति चेष्टाक संग ओहि विपन्न समाजकलेल सशक्त स्वर छथि ,जे हजारो बर्षसँ सीदित अछि,पीड़ित अछि।भाषाक लेल सेहो एकटा मुखर स्वर छलाह। एकटा कविता छनि एहि संग्रहमे' अपन समाचार'।कियो परिचित मैथिल व्यक्ति हुनक समाचार पुछैत छथिन।उतारामे कहैत छथि-" समाचार तँ तत्काल एक्केटा मैथिलीकें लोकसेवा आयोगक परीक्षासँ क' देलकयै बाहर लल्लू सरकार..... बेस सहजताक संग बाजल ओ-- "हँ,अखबार मे देखलए आर अपन समाचार? केना अछि डांड़? एहि कविताक माध्यमसँ मैथिल समाजक असंवेदनशीलता नीकसँ देखार चिन्हार भेल अछि।एहि कवितामे कवि रामोलचन ठाकुरक भीतर मातृभाषाक अपमानक कतेक आगि छनि तकरो नीकसँ उभार भेल अछि? कवि रामलोचन ठाकुरक मादे हुनक अग्रज पीढ़ीक साहित्यकार जीवकान्त लिखैत छथि," पच्चीस बर्ष पहिने रामलोचन ठाकुर भाषाक स्वयंसेवक छलाह।हुनक संगतुरिया मैथिलीक अनेक लोक महंथ भेल छथि। ओहो महंथ भेल रहितथि तँ हुनक प्रतिष्ठा घटल रहितनि।" से राम लोचन ठाकुर अद्यावधि मैथिली भाषा आओर भाषाक लेल काज केनिहार मनीषी लोकनिक सम्मान करैत रहलाह।कवि आरसी प्रसाद सिंहक लेल एकटा कविता अछि एहि संग्रहमे 'मैथिली -मंदिरमे दीप लेसैत' " मैथिली मंदिरमे दीप लेसैत दीप,फूलडालीमे सजबैत। फूल पूजाक मैथिली केर प्रतीक्षा बाल रविक बिहुँसैत बहाना मात्र सूर्यमुखि केर बिसरि की सकत मैथिली पूत रत्न मिथिलाक अनमोल अनूप महाकवि आरसीक छबि,कृति सौम्य सुन्दर आकर्षक रुप करत सब बेर-बेर आवृति रहत जा धरा-धाम मिथिलाक पानि गंगा-कोशी-कमलाक रहत ता नाम अमर कवि तोर कृति चमकैत चान-पुनिमाक मात्र आशीष तोर, प्रण मोर। राम लोचन ठाकुर श्रमजीवी लोकनिक संघर्ष ओ पीड़ाकें उजागर करैवला महत्वपूर्ण कवि छथि मुदा कविक काज खाली आगिए उगलब तँ नहि थिक।प्रकृतिमे परसल नीक - नीक वस्तुकें देखब।पर्यावरणमे उपस्थित सौन्दर्य छटाकें निहारब ओहिमे श्रृंगार ओ सौन्दर्य बोधकें ताकब- हेरब सेहो कविताक काज थिक,से कवि रामलोचन ठाकुर सेहो कवितामे सौन्दर्यबोध अनबाक चेष्टा केलनि अछि ओ एहिमे कतेक सफल भेलाह अछि से पाठकक दृष्टिपर निर्भर करैत छैक।ओ वसंत गीत लिखय चाहैत छथि मुदा कखन? 'हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी गाछ सब एखनो अइ प्राणवंत आ हमरा विश्वास अइ आइ ने कालि होएतैक नब पल्लव रंग बिरंगक फूल जकर मादक गंधसँ महमह करत परिवेश पीबि मधु मातल मधुप गुंजन करत तखन हमहूँ लिखब वसन्त गीत जे आकाशक नहि परिवेशक उपजा थिक। कवि सौन्दर्य बोधक संवेदनाक लेल आर्थिक रुपसँ लोक सामर्थ्यवान हेबे करय से नहि मानैत छथि।ओ श्रमिक वर्गक सौंदर्यबोधक अलगे परिभाषा गढ़ैत छथि।जकर स्थिति नितह कमेनाय आ नितह खेनाय छैक से कतयसँ ताजमलक सैर करबा लेल जायत।खजुराहो वा कोणार्कक सूर्यमंदिर देखबाक लेल जायत मुदा सौन्दर्य बोध गरीबक लेल सेहो होइत छैक,जकर प्रकृतिसँ बहुत सन्निकटतासँ सम्बद्ध रहैछ। कवि लिखैत छथि- 'ओना, हम देखने छी साँझक मेघाच्छन्न आकाश घर घुरल जाइत कोनो सारस- दम्पत्ति हम देखने छी। -------------- हम देखने छी डबरी-चबच्चा मे जलविहार करैत डुबैत -उगैत हंस-दम्पत्ति हम देखने छी। कवि भादवक अन्हरिया रातिमे ,पछुआरक बसबिट्टी आ करजानमे अनगिनत भोगजनीकें चमकैत देखने छथि। कविक आँखि एहने- एहन दृश्य सब देखबाक लेल औनाइत छनि।एहन सौन्दर्य छटा जे जन साधारण बिनु कोनो खर्चकें देखि सकैत अछि। ओ अपन कविताक अलग सौन्दर्यशास्त्र गढ़लनि अछि।हुनक कविताकें पढलाक पछाति पाठककें एकटा खास तरहक सौन्दर्य बोधक आभास होइत छैक।जखन हुनक कवितामे ढेकि जाँतक आबाज,कनसारनिक लाड़नि,हट्ठामे आ पौरपर चलैत बड़दक गरदामीक बजैत घंटी -ध्वनि लोहाड़क हथौड़ा आ मशीनक आबाजमे ध्वनिक सौंदर्य बोध भेटैत अछि तँ निश्चिते एकटा फराक सौन्दर्यक परिभाषा गढ़ैत अछि। एतावता हम देखैत छी जे कवि रामलोचन ठाकुरक कविताक सौंदर्यबोध सेहो एकदम फराक अछि।निस्सन अछि आ शाश्वत सेहो। एहि तरहें कविता संग्रह पढ़लाक पछाति ई नहिकहि सकैत छी जे कविता अप्रासांगिक भेल अछि।बीस बरखक बादो कविता सभ समकालीन स्वरसँ ओत -प्रोत अछि।कविताक माध्यमसँ उठाओल गेल अनेक प्रश्न एखनो उत्तर हेरि रहल अछि। कविक आज थिक आम जनक हितक लेल संवाद करब।प्रश्न उठायब।से एहि कविता संग्रहमे कवि सफलतापूर्वक उठौलनि अछि।जाहिमेसँ कतेक प्रश्न उत्तर भेटल? कतेक एखनो अनुत्तरित अछि? कतेक नव प्रश्न सभ ठाढ़ भेल अछि? से सभक पड़ताल करब निश्चितरुपसँ वर्तमान समाजक अछि से साहित्यिक समाज लेल सेहो ।हँ,जे शासन सत्ताक हर लगातार जोति रहलाह अछि।जिनका लग सत्ताक सभटा कुंजी छनि हुनकासँ त' स्वाभाविके। उदयनारायण सिंह 'नचिकेता' रामलोचन - हमर नजरिमे भारतीय नवजागरणक पृष्ठभूमिमे अप्पन देस-कोसक भाषा और साहित्यकें प्राथमिकता देल गेल छल। ई त' हम सब जनिते छी जे मैथिली आ’ बांगला – दुनू केर साहित्यक मध्य युगेमे वैष्णव और शाक्त सम्प्रदाय – दुनू सम्प्रदाय केर रचनाक प्रभावसँ सामान्य जनसँ ल’ कय कवि-विद्वान रचनाकार सब क्यो प्रभावित भेल छला। जाति प्रथा और भेद भावकें मेटा देबाक वाणी बजैत तकर पहिनहि चैतन्यदेव आर हुनक धार्मिक आन्दोलनक प्रभाव समग्र पूर्वी साहित्यपर पड़ल छल। विद्यापतिसँ एहन समन्वय केर चिन्ता शुरू भेल छलनि। उन्नैसम शतकमे आबैत-आबैत तकर सुदूर-प्रसारी प्रभाव हमर सोच-विचारपर पड़त आ' हमरा नव तरहसँ सोचै ले' वाध्य करत - से कोनो अनापेक्षित घटना त' नहिये छल। देखल जाइत अछि जे प्रारंभिके समयमे राष्ट्रीय चेतनाक जेना ज्वार नजरि आयल छल – जकर प्रभाव समग्र भारतीय जन-जीवनपर पड़ल – ई त' हम सब जनिते छी। उन्नैसम शतकमे, जखन बंगाल जागि रहल छल आ’ जखन हमर पड़ोसेमे साहित्यक इतिहासमे एकटा नवीन चेतना आबि रहल छल, तकर प्रभाव मिथिलापर पड़त ताहिमे आश्चर्य की? मिथिलाक सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक जीवनपर तकर बड्ड प्रभाव पड़ल। ओना त' मिथिलामे एहि विषयपर तत्तेक शोध आ’ चर्चा भेल नहि अछि – मुदा रामलोचनजीक संगे हमर निकटता अथवा उर्दूमे कही त 'नज़दीकी' जे कैकटा कारणें भेल छल तकरामे प्रमुख ई छल जे हम दुनू बंगालमे रहि कय मैथिलीक चर्चा करैत काल इतिहासक एहि समझ अथवा 'पाठ'पर सहमत छलहुँ। सदा प्रयास ई रहैत छल जे कोना हमरा लोकनिकें इतिहासक गभीरता धरि ल' जायब संभव होयत। तैं आश्चर्य नहि जे हुनकर हाथसँ 'इतिहासहन्ता' सनक महापाठक निर्माण हेतनि। ओना त' रामलोचन ठाकुर मार्क्सवादी विश्वदृष्टिसँ सम्पन्न रचनाकार छथि, जनिक काव्य-शिल्प लोकधर्मी छनि । अग्निजीवी काव्यधाराक प्रवर्तक कवि, अभिनेता-निर्देशक एवं कर्मठ भाषा आंदोलनी रहल छथि। हुनक लेखनी कत्तेक शक्तिशाली छनि तकर एकटा अंदाजा किछु पंक्तिसँ भेटि सकैत अछि - “बन्धु ! एना होइत छैक एना होइत छैक कहियो काल भदवारिक सतहिया माघक शीतलहरी कोनो नव बात नहि जखन दिनपर दिन सूर्यक अस्तित्व रहैछ अगोचर तें मानि लेब सूर्यक अवलुप्तिकरण आलोकपर अन्धसकारक वर्चस्व कत' क' बुद्धिमानी थिक सामयिक सत्यस होइतहुं शाश्वत नहि होइछ अन्धकार” ओ हमरा सबकें सचेतक' दैत छथि - विश्व-बाजार केर चलि रहल खेल केर विषयमे, एहि तरहेँ - “जखन पूंजीवादी विस्तानर लिप्साक' जारज संतान वैश्वीकरण वृहत विश्ववकें बाजार बना देबाक लेल अछि उद्धत अपस्यांत आवश्य्के नहि अनिवार्य भ' जाइछ प्रतिकार शब्द-साधक लेल…” मिथिला, मौथिली आ मौथिल संस्कृतिक प्रति अगाध प्रेम हुनका मिथिलाक पीड़ा आ आकांक्षाकें कवितामे करबा लेल प्रेरित कयने छनि। व्यंग्य, करुणा, विरोध आ ललकार हुनक प्रमुख काव्य-स्वर थिकनि। हुनक काव्य-शिल्प लोकधर्मी अछि। पनरहे बर्खक उमरमे जखन ओ नोकरीक खोजमे कलकत्ता चलि आयल छलाह, जखन हुनकरआँखिमे कतेको सपना छलनि, तखनहि हुनका संग परिचय आ' मित्रता भेल छल – जे अटूट रहल। शिक्षाक प्रति जे अनुराग हुनकामे छलनि से चैन नहि लेबऽ देलकनि। स्थायी नौकरी शुरू करिते ओ सांध्यकालीन छात्रक रूपमे चारुचन्द्र कॉलेजमे प्रवेश लेलथि। ओ कलकत्ता विश्वविद्यालयक एहन स्नातक छात्र भेलाह, जिनका मौथिली पढ़बा लेल संघर्ष करए पड़लनि। ओ आयकर विभागसँ 2009 मे सेवानिवृत्त भेला। तखनहि हमहुँ सब 'मिथिला दर्शन'क पुनरुज्जीवनक योजना बना रहल छलहुँ, जकर ओ कार्यकारी सम्पादनक दायित्व ग्रहण कयने छला। रामलोचन ठाकुर जखन छठमेमे पढ़ैत छलाह तखने गीत लिखब शुरू कयलनि। नौ टा मौलिक पोथीक अतिरिक्त दूटा संपादित तथा अनुवादक सात टा पोथी प्रकाशित आ कैकटा अप्रकाशित सेहो छनि। पाँच टा प्रकाशित काव्य संग्रह भेलनि : ‘इतिहासहंता’ (1977), ‘माटि-पानिक गीत’ (1985), ‘देशक नाम छल सोन चिड़ैया’ (1986), ‘अपूर्वा’ (1996) एवं‘लाख प्रश्न अनुत्तरित’ (2003)।`बेताल कथा` नामक एकटा हास्य-व्यंग्य कथा-संग्रह सेहो कुमारेश काश्यपक छद्म नामसँ 1981 मे छपल छलनि। एम्हर रामलोचनक दूटा संस्मरणात्मक पोथीअयलनि - `स्मृतिक धोखरलरंग` (2004)मे आ `आँखि मुनने : आँखि खोलने` (2005)। 1983 आ पुन: 2006 मे ओ `मौथिली लोककथा` छपौलनि जे लोकसाहित्यक पुनर्रचना अछि। अनुवाद लेल हुनका प्रतिष्ठित `भाषाभारती सम्मान`सँ अलंकृत कयल गेल छलनि तथा विदेह सम्मान सेहो प्राप्त भेल छनि। वर्ष 2012क लेल वरिष्ठ कवि एवं गीतकार चंद्रभानु सिंहक संग युग्म रूपमे रामलोचन ठाकुर कविताकें सेहो मैथिली साहित्यक क्षेत्रमे सर्जनात्मक आ' अनुवादक काज लेल प्रबोध साहित्य सन्मान भेटल छलनि। ‘अग्रदूत’क छद्म नामसँ रामलोचन अनेक कथा एवं निबंध लिखलनि जे अद्यावधि पत्र-पत्रिकामे छिडि़आयल अछि- ओकरा एकत्रित क' कय क्यो प्रकाशित करय त' आर कैकटा पुस्तक बनि सकैत अछि; ओ अनेक पोथी आ पत्रिका कसंपादन सेहो कऽ चुकल छथि। `अग्निपत्र`, `रंगमंच`, `मौथिली दर्शन` आ `सुल्फा` सन स्तरीय पत्रिकाक ओ यशस्वी संपादक रहल छथि।जे क्यो अनुवाद-प्रेमी छथि, तिनका लोकनिकें हिनक अनुवाद-पुस्तक सब अवश्य मोन हेतनि - ‘प्रतिध्वनि’ (अनुदित कविता), ‘जा सकै छी, किन्तु किए जाउ’ (अनुदित कविता), ‘जादूगर’ (अनुवाद), आदि। जापानी पद्धतिमे ओ हाइकू कविता - 'किछु क्षणिका' केर रचना कयने छला - जे 'विदेह' मे प्रकाशित भेल छलनि –जेना कि - "भोजक पान/ सासुरक सम्मान/ पुनिमाक चान", वा "हाथीक कान/ नटुआक बतान/ एक समान", अथवा "दूरक चास/ गामक कात बास/ कोन विश्वास" – जतय पद्धति विदेशी अवश्य छलैक, मुदा स्वर सम्पूर्ण रूपेण 'मैथिली'येक। १९५७ मे हरिमोहन झा, मणिपद्म-जी आ' लक्ष्मण झाजीक प्रेरणासँ अखिल भारतीय मैथिली संघ आ' मैथिली लोकसंघक विलय क' कय जे अखिल भारतीय मिथिला संघ बनल छल – जकर पुरोधा स्वरुप बाबूसाहेब चौधरी, प्रबोधनारायण सिंह आदिक संग रामलोचनक पितृव्य शुकदेव ठाकुरजी सेहो अत्यंत सक्रिय छला – आओर तरुण रामलोचन सेहो आगाँ चलि कय भाषा आंदोलनमे काफी सक्रिय भ' गेल छला। बादमे ओ बेसी इन्वोल्वड भ' गेल छला मैथिली नाट्य-आन्दोलनक संग। तकरहि संगे लेखन आ' सम्पादन त छलैये। स्वस्थ रहथि आ' सृजनशील रहथि, सैह कामना करब। नबोनारायण मिश्र हमरा नजरिमे: श्री रामलोचन ठाकुर मिथिला-मैथिलीक उत्थान हेतु कलकत्ता सभ दिन अग्रगण्य रहल अछि। एकर अतीत वस्तुतः गौरवपूर्ण रहल अछि। हमर अग्रज लोकनि भाषा-संस्कृतिक हेतु सजग रहलाह आ एखनहुँ नव पीढ़ी अपन दायित्वक पालन करैत छथि। ताहि मध्य श्री रामलोचन ठाकुर जीक नाम विशेष लोकप्रिय रहल अछि। श्री रामलोचन ठाकुरजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक समग्र मूल्यांकन करब हमर सामर्थ्य नहि तथापि जे हम देखल अछि से वर्णनातीत। मिथिला-मैथिलीक प्रति हृदयमे वेदनाकेँ ओ साकार करैत रहलाह अछि। मूल समस्याकेँ विभिन्न स्तरपर रेखांकित करैत रहलाह अछि। तकरे निमित्त मैथिली आंदोलन, मैथिली रंगमंच, काव्य आदिक सर्जनाकेँ माध्यम बनौलनि। मैथिली आंदोलन हुनक मूल अभिव्यक्ति छलनि। मैथिलीक अधिकार हेतु आंदलोन पक्ष रखैत 'देसिल बयना'मे हुनक संकल्प द्रष्टव्य अछि- संविधान बिनु मैथिलीक ओ मानचित्र बिनु मिथिला धाम डाहि-जारि सुड्डाह करब हम विद्रोही मिथिलाक जुआन यद्यपि श्री ठाकुरजीसँ पूर्व परिचित छलहुँ मुदा हुनकर स्नेह-सान्निध्य १९९० ई.मे मैथिली नाट्य संस्था 'कोकिल मंच' के स्थापनाक पश्चात हमर सक्रियतासँ प्रगाढ़ भेल। हम हिनक मैथिलीक प्रति समर्पणसँ बहुधा प्रेरित होइत रहलहुँ। ताहि दिन कोनो एहन कार्यक्रम नै छल जाहिमे वक्ता ओ नै होथि। ताहि मध्य शिष्टाचारवश भेंट होइत रहल आ हम अपनाकेँ पारिवारिक सदस्य सन पाबि धन्य होइत रहलहुँ। कोकिल मंचक कोनो एहन कार्यक्रम नै जाहिमे ओ सम्मिलित नै भेल होथि। प्रत्येक वर्ष स्मारिकामे आलेख हेतु जखन कहलियनि से निरंतर महत्वपूर्ण आलेख दैत रहलाह। हुनक परामर्शसँ संस्थाकेँ सुयश प्राप्त होइत रहल। एकटा उल्लेखनीय काजक चर्चा करब जरूरी बुझना जाइत अछि। श्री सूर्यनारायण झा 'सरस' रचित "मैथिली श्री सीताराम चरित मानस"केँ जखन कोकिल मंच दिससँ प्रकाशनक योजना बनेलहुँ आ तकर संपादनकेँ गुरूतर भार हुनका देल तँ ओ सहर्ष स्वीकार केलनि जे वस्तुतः बहुत श्रमसाध्य काज छल। ताहि अवधिमे प्रेससँ प्रूफ देखेबाक हेतु मित्रवर कुमरकांत झाजी (राघोपुर-बलाट)क संगे अनेको बेर हुनका घर जेबाक अवसर भेटल। महाजाति सदन प्रेक्षागृहमे मैथिली नाटकक मंचनकेँ अवसरपर एहि पोथीक लोकार्पण भेल जाहिमे मंचासीन प्रो. विद्यानंद झा आ रामचलोचन ठाकुरजीक सारगर्भित वक्तव्य आइयो प्रासंगिक अछि। एक दिन प्रसंगवश आग्रह केलियनि जे 'मैथिली रंगमंच आ कलकत्ता' विषयपर आलेख लिखू जे कोकिल मंचक स्मारिकामे देबाक अछि। ओ कहलनि जे जतेक बुझल अछि तकर अतिरिक्त कलकत्ताक आ उपनगरीय क्षेत्रक मैथिली रंगमंचक जानकारी अहाँ देब तखनहि संभव अछि। हम सहयोग केलियनि जे स्मारिकामे छपलै आ पश्चात जखन 'स्मृतिक धोखरल रंग' हुनकर पोथी छपलनि ताहिमे सेहो संकलति केलनि। दोसर महत्वपूर्ण पक्ष जे मातृभूमि आ मातृभाषाक प्रति स्नेहक वशीभूत विभिन्न पत्र-पत्रिकासँ संलग्न रहितो एकटा ठोस साहित्यिक मंच "संपर्क" केर ओ प्रणेता रहलाह अछि। ध्यातव्य जे उक्त संस्थामे एकटा पदाधिकारी "संयोजक" प्रारंभहिसँ ओ रहलाह अछि। एहि संस्थाक नियमानुसार साहित्यिक रुचि रखनिहार आ मैथिली सेवी भाग लैत छथि। एकर कोनो सदस्य नै बनाओल जाइत अछि। अपन रुचिकेँ अनुसार सम्मिलित व्यक्ति ओकर सदस्य भेलाह। मासक प्रत्येक दोसर रवि दिन साँझुक ४ बजेसँ कार्यक्रम प्रारंभ होइत अछि। सहभागी लोकनि अपन नव रचनाक संग उपस्थित होइत छथि जाहिपर उपस्थित लोक पठित रचनापर मंतव्य दैत छथि। आवाश्यकतानुसार आलेखमे संशोधन करबाक खगतापर सुझाव दै छथि। एहि प्रक्रियासँ साहित्यिक रुचि ओ गुणवत्तामे वृद्धि हएव स्वाभाविके। प्रत्येक संपर्कक प्रारंभमे उपस्थित लोक अपनेमेसँ एकटा अध्यक्ष चुनैत अछि जकर संचालनमे ई कार्यक्रम शुरू ओ अंत होइत अछि। मने हरेक संपर्कक अध्यक्ष अस्थायी होइत छलाह। ध्यातव्य जे अन्यान्य संस्था सभमे पदाधिकारी बनबाक लेल प्रतिस्पर्धा होइत अछि मुदा ताहिसँ अलग संपर्क अपन गतिविधि नियमित रूपें करैत अछि। मुदा आब ई कने अस्थिर भेल अछि। संपर्कक तत्वावधानमे जखन साहित्य अकादेमी पुरस्कार श्री कीर्तिनारायण मिश्र आ अनुवाद पुरस्कार श्री नवीन चौधरीकेँ भेटलनि ताहि उपलक्ष्यमे एकटा उल्लेखनीय सम्मान समारोह आयोजित भेल छल। नवीन जीक चर्च भेल तँ ई कहब उचित जे नवीनजी अपन पोथी "वर्ण वितान' केर भूमिकामे लिखै छथि जे "....श्री रामलोचन ठाकुरक सत्संग सँ साहित्य बुझबा आ लिखबाक अवगति भेल। आ संपर्क (सभ मासक दोसर रवि)मे निरंतर उपस्थिति सँ सूतल रहबाक मनःस्थिति एखन धरि नहि आएल...."। ध्यातव्य जे तीनू साहित्यकारक कर्मक्षेत्र कलकत्ता रहल अछि। अतबे नहि रामलोचन ठाकुरजी संपर्कक माध्यमसँ बहुतो नवयुवाकेँ प्रेरित केलाह ताहिमे एकटा आशीष अनचिन्हार सेहो छथि आ अनचिन्हारो अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" एहि बातक चर्चा केने छथि। संपर्कक समयक आस-पास बाहरसँ आएल कोनो साहित्यकारकेँ संपर्कक बैसारमे उपस्थित हेबाक आग्रह कएल जाइत रहल अछि। जाहिसँ बाहरी ओ स्थानीय साहित्यकार एक-दोसरसँ परिचित होइत रहलाह अछि। संपर्क एखनो धरि चलैत आबि रहल अछि जकर पाछू रामलोचने जीक बल छनि संगे-संग आनो लोकक। कलकत्तामे किछुए एहन मैथिल भेलथि जिनकर नाम लेलासँ कलकत्ताक बोध होइत हो। रामलोचनजी ओहि किछुमेसँ एकटा आइकन आ इनसाइक्लोपीडिया छथि से हम निश्चित रूपसँ कहि सकैत छी। एहन महान सर्जक, संपादक आ क्रांतिकारीकेँ पाबि हमरा सभकेँ सतत गौरव बोध होइत रहल अछि। संपादकीय नोट- नबोनारायणजी द्वारा विदेहपर रामलोचन ठाकुरजीसँ संबंधित अन्य सामग्री। 2011 मे विदेह द्वारा संचालित “विदेह सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार)” 2011-2012 केर अनुवाद सम्मान रामलोचन ठकुरजीक अनुवाद पोथी पद्मा नदीक माँझी देबाक घोषणा भेलै। https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/147780938633376 आ एहि अवसरपर हमरा लोकनि नबोनारायण मिश्रजीसँ आग्रह केलहुँ हुनकर साक्षात्कार लेल। हमरा लग साक्षात्कार आएल आ ई विदेहक 15 जनवरी 2012 केर अंक संख्या 98 प्रकाशित भेलै। एहि समय धरि रामलोचनजी पूरा स्वस्थ छलाह। ई आलेख लेल विदेह अंक 98 डाउनलोड करू एहि लिंकसँ http://videha.co.in/new_page_15.htm एकरा एहू लिंकपर पढ़ि सकैत छी http://esamaad.blogspot.com/2012/01/blog-post_09.html एहि साक्षात्कार केर अतिरिक्त महत्व ई जे जाहि समयमे ई साक्षात्कार लेल गेलै ठीक ताही समयमे प्रबोध साहित्य सम्मान केर घोषणा सेहो भेल रहै। अशोक राम लोचन ठाकुरक कविता पढ़ैत रामलोचन ठाकुर मैथिलीक प्रसिद्ध कवि छथि। ओ एही संग आंदोलनकर्ता, रंगकर्मी ओ अनुवादक सेहो छथि। पोथी सभक संपादन केने छथि। व्यंग्य ओ लोकधर्मी कथा लिखने छथि। ओ एहन कवि छथि जिनक चेतना लोकोन्मुख आ अभिलाषा जनवादी अछि। ओ खाँटी मैथिलीक कवि छथि। हिंदीमे कहियो नहि लिखलनि। राम लोचन ठाकुर मैथिली साहित्कारक ओहि परंपराक लोक छथि जे परंपरा काञ्चीनाथ झा 'किरण'क अछि। मातृभाषाक विकास जिनकर लक्ष्य रहलनि। मातृभाषाक विकास एहि कारणे जे 'मातृभाषाक विकाससँ जन-जागरण होइत छैक ओ जागरण धन-कुल-जातिमूलक गरिमाकेँ चूरि दैत अछि'। रामलोचन ठाकुरक जन्म मिथिलामे भेलनि आ जीवन बंगालमे बितलनि। फलस्वरूप हुनक जे रचनाकार-व्यकतित्व निर्मित भेल से दूनू ठामक सांस्कृतिक चेतनाक समन्वयसँ निर्मित भेल। ई चेतना परिश्रमी ओ उत्पादक वर्गक संघर्षशीलतासँ उपजल छल। रामलोचन ठाकुर अपन कविता आठम दशकसँ शुरू करैत छथि। मोटामोटी १९७० ई.क बादसँ लिखल हुनक कविता सभ चारि संग्रहमे संग्रीहत अछि। 'इतिहासहंता' (१९७७), 'देशक नाम छलैक सोन चिड़ैया' (१९८६), 'अपूर्वा' (१९९६) आ 'लाख प्रश्न अनुत्तरित' (२००३)। ओ विभिन्न शिल्प-शैलीमे कविता लिखलनि अछि। छंदोबद्ध ओ मुक्तक दूनू रूपमे हुनक कविता उपल्बध अछि। दोहा, कुंडलिया, मुक्तक कविता, मिनी कविता, क्षणिका (हाइकू) सभ तरहक कविता। हुनक कविता सभहक क विशेषता ईहो अछि जे पूर्वजसँ लऽ कऽ समकालीन ओ अनुज धरिकेँ मोन पाड़ैत ओ संबोधित करैत हुनक बहुते रास कविता अछि। एहिसँ हुनक जुड़ाओ ओ प्रतिबद्धता प्रकट होइत अछि। समानधर्माक प्रति लगाओ हुनक एक फराकसँ रेखांकित करए बला प्रवृति अछि। रामलोचन ठाकुरक कवितामे समयक ताप ओ धाकेँ संग आर्थिक-समाजिक ओ राजनीतिक-सांसकृतिक परिदृश्य ओ प्रवृतिपर टिप्पणी, व्यंग्य, आक्रोश भेटैत छैक। हुनक कविता-यात्रामे पाठककेँ ओहि समयक स्थिति-परिस्थिति मूर्तिमान होइत छैक जखन ओ कविता लिखल गेल छल। ई देश स्वतंत्रता बादसँ बहुतो झंझावात, आलोड़न-विलोड़न देखि चुकल अछि। स्वाधीनता प्राप्तिक जे उल्लास रहैक से क्रमशः थोड़ेक वर्षक बाद बिलाए लगलै लोककेँ लगलै जे ओकर दुख-तकलीफ कम नै भऽ रहल छै। सत्तामे गोर अंग्रेजक स्थानपर कारी अंग्रेज बैसि गेल अछि। मोह-भंगक संग साहित्यमे सेहो ओकर अनुगुंज सुनाइ दिअ लागल। शासन-सत्तासँ निराश आ हताश विपन्न लोक सभ आ एक जुट हुअ लागल। सत्ता परिवर्तनकेँ अनुपयोगी बूझि व्यवस्था परिवर्तन लेल ओ कृषक-मजदूर सभहक शोषणसँ मुक्ति लेल सशस्त्र संघर्ष बंगालक नक्सलबाड़ीमे शुरू भऽ गेल। रामलोचन ठाकुर अपन कविता यात्रा ओही उथल-पुथलसँ भरल समयक संग शुरू केलनि। मैथिलीमे अग्निजीवी कविक रूपमे तमाम भेद-भाव, शोषणकेँ देखि वर्ग-संघर्षक लेल पुरातन मान्यताकेँ अप्रयोजनीय, अस्थायी, उज्जर-कारी रचना, इतिहासकेँ तात्तकाल निरस्त कऽ शोषितक पक्षमे नव इतिहास बनेबाक लेल सशस्त्र क्रांतिक लेल डेग बढ़ा दैत छथि। आ हम/ एखन नञि लिखि सकब/ करिया मोसि सं/ उजरा कागत पर/ कुनू कविता/ कथा/ इतिहास /अप्रयोजनीय/ अस्थायी / देखैत नञि छी / हमरा हाथमे / चमकैत पंचकमनियां भाला/ चलि पदल छी हम/ लाल टुह-टुह रक्त सं / पिरथीक विशाल वक्ष पर / लिखबा लेल एगो कविता / एगो कथा / एगो इतिहास / आ स्वयं बनि जेबाक लेल एगो घटना/ एगो नाम/ एगो इतिहास" (अग्रजक नाम-इतिहासहंता) व्यवस्था परिवर्तन लेल आरंभ भेल एहि प्रकारक संघर्षकेँ तँ तात्कालीन सत्ता द्वारा बलपूर्वक दबा देल गेल मुदा ई संघर्ष-चेतना जनतामे पसरि गेल। ई चेतना सामूहिक संघर्षक छल। मैथिली साहित्यमे सेहो चाहे कविता हो कि कथा कि उपन्यास एहि चेतनाक अभिव्यक्तिकेँ आठम-नवम दशकमे देखल जा सकैत अछि। ओहिसँ पूर्व मैथिली कविताक जे प्रवृति छल से आधुनिक दृष्टिसँ सम्पन्न रोमांटिक , प्रगतिवादी आ नव कविताक रूपमे अभिव्यक्त भऽ रहल छल। डा. हरिमोहन मिश्र अपन पोथी 'आधुनिक मैथिली कविता'मे लिखलनि अछि जे "रोमांटिक कवितामे प्रमुख रूपें सौंदर्यक वर्णन होइत छल। प्रगतिवादी कवितामे समाजिक वास्तव अर्थात समाजिक विषमता, समाजिक कुरीति, गरीबी, शोषण, अत्याचार आदिक वर्णन होबए लागल"। मैथिलीमे रोमांटिक कविता भुवनजीसँ, प्रगतिवादी कविता यात्रीजीसँ आ नव कविताक आरंभ राजकमल चौधरीसँ मानल जाइत अछि। नव कविताक प्रवक्ताक रूपमे रामकृष्ण झा 'किसुन'क योगादन महत्वपूर्ण रहल अछि। डा. हरिमोहन मिश्र ओहि पोथीमे ईहो कहै छथि जे "प्रगतिवादी कवि अतीतक विरोध करैत छलाह किन्तु भविष्यक प्रति पूर्ण आस्थावान छलाह कारण हुनका लोककनिक समक्ष भविष्यक कोनो एहन स्पष्ट चित्र छल। नव कविक समक्ष भविष्यक एहन कोनो स्पष्ट चित्र नहि अछि। तथापि ओ नवक स्वागत करैत छथि कारण जे ओ वर्तमानसँ अत्याधिक आशंकित ओ संत्रस्त छथि"। पाश्चात्य साहित्यिक विभिन्न काव्य आंदोलनक प्रतिध्वनि भारतीय आ कि मैथिली कवितापर ओहि काल विशेषमे पड़ैत रहल। मोटामोटी कवितामे बहिरंग आ कि बाहरी यथार्थ आ अंतरंग आ कि आन्रिक यथार्थ, चेतन आ अवचेतनक अभिव्यक्तिक द्वंद प्रगतिवादी आ नव कविताक मूलमे रहल अछि। रामलोचन ठाकुरक कवितामे अवचेतन आ कि अंतरंगक विभिन्न मोनोग्राफिक चित्रण साधारणतया नै भेटैत अछि। हुनक कविता स्वाभाविक रूपसँ सहज भाषा ओ शिल्पमे लिखल गेल अछि। हुनक कविता प्रयोजनमूलक अछि, कलात्मकमूलक नै। "अइ रातिक गुज्ज अन्हारमे हमरा सभकेँ तय क लेबाक अइ बहुत रास बाट पहुँचि जेबाक अइ ओइ दिबड़ा भीड़ पर जतय स काल्हिक बाल सुरुजक संग देबाक अइ नारा बड़बाक अइ डेग आजुक बुढ़बा सुर्य मरि चुकल अइ ई अन्हार रहौक अनके लेल किन्तु आगामी काल्हि हमरा सभक हएत हमरे सभक हएत" (आगामी काल्हि हमरे सभक हएत-- देशक नाम छलै सोनचिड़ैया) ई जे आस्था आ विश्वास अछि जे आगामी काल्हि हमरे सभक हएत अर्थात शोषित-दलित-परिश्रमी लोकक हएत से बिना भविष्यक चित्र स्पष्ट रहने नै भऽ सकैत अछि। ई कारपोरेटी व्यवस्था समाप्त कऽ उपेक्षित, हाशियापर ठेलल गेल लोकक नव, उर्वर ओ समानतापर आधारित व्यवस्था कायम करबाक लेल सामूहिक संघर्ष ओ एकजुटतापर संभव होयत। रामलोचन ठाकुरक कविकेँ ई सोच-विचार एकदम स्पष्ट छनि। हुनक कवितामे एहि भावक अभिव्यक्ति बेर-बेर होइत अछि। रामलोचन ठाकुरक कवितामे एहि विचारधारक संग मिथिला ओ मैथिली लेल संघर्ष-चेतनाक अभिव्यक्ति सेहो भेटैत अछि। अपन धरोहरि अपन सांस्कृतिक-साहित्यिक थातीपर गौरव-बोध अछि तँ वर्तमान स्थिति प्रति असंतोष ओ आलोचनात्मक स्वर सेहो अछि। एही संग भाषिक चेतनाक लेल संघर्षक आह्वान अछि। "स्त्री-पुरुष-जवान-बूढ़-बच्चा सभ चल लाठी गड़ाँस भालामे शक्ति छै प्रबल चूड़ी बजैत झन-झन नव चेतनाक स्वर जय मैथिलीक नारा दए बज्र सन प्रबल पटना दे पाटि दिल्ली धरि डगमगा पड़ै" (इतिहास युग नवीनकेँ, अपूर्वा) देशमे 1990 ई. बाद वैश्वीकरण आ कि भूमंडलीकरणक प्रभाव पड़ए लागल। शासन सत्ता सेहो मिश्रित अर्थव्यवस्था आ कि कल्याणकारी राज्यक नीतिसँ पृथक भऽ मुक्त बजार व्यवस्था जे उदारीकरणक नामसँ जानल जाइत अछि, केर रस्तापर चलए लागल। रंगीन टी.भी आएल आ ओही संग आएल रंगीन सपना देखबए बला जेबी कटू बजारक प्रचार-तंत्र। रूढ़वादिताक प्रचार-प्रसार बढ़ल। आम लोकक कष्ट आर बढ़ैत गेल। धनिक आर धनिक आ गरीब आर गरीब होइत गेल। जाति धर्म जे पहिनहिसँ जड़िआएल छल से आब खूब चतरि कऽ लोकक संकटकेँ बढ़ाबए लागल। सत्ता परिवर्तन होइत रहल मुदा लोकक स्वाधीनता आ सत्तामे बैसल लोकक पूँजीवादी मानसिकतामे दूरी आ चौड़गर होइत गेल। जनताक मतसँ चुनल प्रतिनिधि ओ सरकार जनताक हितमे निर्णय नहि कऽ पूँजीपतिक हितमे निर्णय लिअ लागल। ई सभ वस्तुतः विदेशसँ आयातित अर्थव्यवस्थाकेँ आदर्श मानि लागू कएल जाइत रहल। विश्व बैंक एवं आइ.एम.एफ केर कर्जक बोझ जनतापर तेजीसँ बढ़ए लागल। तथापि लोकक आस्था आ विश्वास नहि डगमगाएल। नीक दिन आओत से विश्वास बनल रहलैक। एहि महान देशक नब्बे कोटि जनताक कमसँ कम कम नवम अंश लोक सत्ता परिवर्तन आ स्वाधीनताक मौलिक पार्थक्य पर विचारब कऽ देने अछि प्रारंभ विदेशसँ आयातित स्मृति नाशक औषधि जे कीटनाशक नामे कैल जाइत रहल-ए प्रयोग खेत-खरिहानसँ चूल्हि-चिनवार धरि प्रभावहीन प्रमाणित भऽ रहल अछि आ नेता लोकनिक माथमे लीख आ कुरसी मे उड़ीसक संख्याक दिन-प्रतिदिन वृद्धि भऽ रहल अछि। तात्काल संतोषक बात इएह टा अछि। (१५ अगस्त, लाख प्रश्न अनुत्तरित) एही समयमे कंडल ओ कलंडलक आंदोलनसँ जातीयता आ साम्प्रदायिताक भावनाकेँ राजनीतिक सत्ता द्वारा मजगूत कएल जाए लागल। स्वाधीनता संघर्ज़क जे मूल्य सभ छल से तिरोहित हुअ लागल। देशक बँटवारा समय हिंदू-मुसलमानक जे दंगा भेल, ओकरा महात्मा गाँधीक संग स्वाधीनताक नव विहानमे शासन सत्ता बुद्धिमत्तापूर्ण ढ़ंगसँ बिना कोनो साम्प्रदायिक भेद-भावकेँ शान्त करबामे सफल रहल छल। सामप्रदायिक ओ भावना मुदा समाप्त नहि भेल, फलस्वरूप महात्मा गाँधीक हत्या भेल। भितरे-भीतर सुनगैत ओ साम्प्रदायिक भावना भूमंडलीकरणक एहि अवधिमे छूटि कऽ खेलाए लागल। एहनमे कवि रामलोचन ठाकुर महात्मा गाँधीकेँ मोन पाड़ि बहुत दुखक संग ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यमे वर्तमानक सत्ता-संपोषित साम्प्रदायिक दंगाकेँ देखबैत छथि। अल्ला ओ ईश्वरक बीच बढल जाइत फाँकसँ ओ कराहि उठैत छथि। अहाँक प्रियगान 'अल्ला ईश्वर तेरो नाम' सस्वर गाओल जा रहल आ बढ़ले जा रहल दिनानुदीन अल्ला - ईश्वरक बीच व्यवधान नोआखाली भनहि हो इतिहास बम्बई अहमदाबाद थिक वर्तमान हे राम! अहिंसाक उपासक (हम श्रद्धाञ्जलि नहि द' पाएब, लाख प्रश्न अनुत्तरित) रामलोचन ठाकुर अपन कवितामे ईश्वरक सत्ताकेँ नकारै नहि छथि मुदा ईश्वरक सत्ताक कारण विभिन्न धर्म संप्रदायकेँ बीच होइत बँटवाराकेँ मनुखताक विरुद्ध मानैत छथि। ओ एहि बँटवारा ओ एहि कारणे होइत वैमनस्य, कटुता, हिंसाकेँ एक मनुक्खक रूपमे न्यायोचित नहि मानैत छथि। एहिमे मनुख्ताक क्षरण देखैत छथि। वस्तुतः आब ओ मनुक्ख ओहेन नै रहल जे एहि विराट आ सुन्दर पृथ्वीपर आएल रहए। आब एहि कुरूप नृशंस भावनासँ विभिन्न कोलामे बँटि मनुक्ख पृथ्वीकेँ छोट कऽ लेलक अछि। पिरथी पर एहि विराट सुन्नर पिरथी पर ईश्वर नञि छला मनुक्ख स पहिने छल जंगल पहाड़ झरना नदी पशु पाखी .... प्रयोजन नजि छलै ओकरा सभ के ईश्वरक मनुक्ख के भेलै आविर्भूत होमय लगला ईश्वर एकक पश्चात् एक राम कृष्ण ईशा मुहम्मद बुद्ध मनुक्खक कल्याण हेतु ईश्वर अविनश्वर आबय लगला रहय लगला आलोपित होइत चल गेल मनुक्ख एकक पश्चात् एक मनुक्ख नजि रहल रहि गेल किछु हिन्दू मुसलमान सिख क्रिस्तान... एहि पिरथी पर एहि छोट-छीन पिरथी पर । (मनुक्ख आ ईश्वर,लाख प्रश्न अनुत्तरित) ई पृथ्वी जे मनुक्खक लेल जीवन जीबाक आ प्रकृति समग प्रगति करबाक जगह रहए से क्रमशः कारी-गोर, नस्लीय घृणा, जातिसम्प्रदायक पारस्परिक हिंसक व्यवहार, राष्ट्र-उपराष्ट्रमे बाँटए लागल। मानवता पाछू छुटेत गेल आ राष्टवाद-अंधराष्ट्रवाद बढ़ैत गेल। मनुक्ख हिंसक होइत गेल, ओकरामे निर्ममता, वीभत्सा एहन बढ़ल जे लोकसँ लोक आतंकित हुअ लागल। विचार जे मनुक्खकेँ सुंदर, सहज बनेबाक लेल उत्पन्न भेल छल से विचारधारक रूपमे घृणा आ हिंसाकेँ संपोषित करए लागल। देशप्रेमकेँ स्थानपर राष्ट्र आ राष्ट्रवादक ज्वारि राष्ट्र सुरक्षाक नामपर युद्ध आ युद्धक आकांक्षाकेँ बढ़बैत गेल। अस्त्र-शस्त्रक होड़ बढ़ैत गेल। एहनमे जीवन सौंदर्यक उपासक, मानव-विकासक आकांक्षी कवि छटपटा उठल। मानवताक पक्षमे ठाढ़ लोकेँ सत्ता आब देशद्रोही मानए लागल। सत्ता-पुरुष आ सर्वोपरि होइत गेल। सत्ता द्वारा राष्ट्रद्रोहीक आरोप झेलैत एहन एक कविक आदलातमे देल बयानकेँ एहि कवितामे देखल जा सकैत अछि। हे महामान्य अदालत ! जेना कि कहल गेलए हम एगो कवि छी सौंदर्यक उपासक जीवनक कविता लिखैत छी हम मृत्युक नहि ओकर निर्ममता बीभत्सता आतंकित करैछ हमरा तें हत्यारा सँ घृणा करैत छी घृणित कर्म मानैत छी हत्या के मानवताक विरूद्ध एगो एहन अपराध जकर क्षमा नहि से हत्या --- भनहि विचारक नामपर हो एनकाउन्टरक नाम पर वा राष्ट्रक सुरक्षाक नाम पर ..... (एक गोट राष्ट्रद्रोहीक वक्तव्य, लाख प्रश्न अनुत्तरित) एहन कवि स्वाभाविक रूपसँ चाहैत अछि जे ओकर कविता उत्पादक ओ परिश्रमी लोकक श्रमसँ अर्जित चेतना-विचार ओ सौंदर्यबोधसँ जन्मय। पुष्पित-पल्लवित हो। ओ कवि ईहो नहि चाहत जे ओकर एहन कोनो कविता-गीत कोनो शीत-ताप नियंत्रित सभागारमे भद्र सुसज्जित सज्जन समुदायमे पड़ल जाए किएक तँ ओ लोकनि एकर निहितार्थ नहि बूझि सकता। वस्तुतः जे लोक परिश्रमी लोकक पक्षमे नहि अछि से निश्चित रूपसँ अन्ततः हत्यारा प्रजातिक संग धऽ लेत। कविता हमर कोनो मंदिर मसजिद वा कोठा सँ नहि, मजूरक झोपड़ी सँ कारखानाक जरैत चिमनी सँ खेत जोतैत हरक फार सँ धीपल लोहा पर पड़ैत लोहारक हथौड़ा सँ कुम्हारक चाक सँ चमारक टाकु सँ जनमओ हम चाहै छी XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX हम चाहै छी हमर कविता महानगरक कोनो शीत-ताप-नियंत्रित सभागारमे भद्र सुसज्जित, सज्जन समुदाय मध्य नहि पढ़ल जाय कोनो कारखानाक गेट पर मजूरक बीच, खेतक आरिपर झहरैत मेधक बीच सारिबद्ध धनरोपनी करैत श्रमिकक समक्ष हम चाहै छी हम इएहटा चाहै छी अपन कविताक लेल । (हम चाहै छी, लाख प्रश्न अनुत्तरित) देश-दुनियाँमे चलैत आ बढ़ैत भूमंडलीकरण वा बजारवादक एहन समयमे जतए गलाकाट प्रतियोगिता आतंकक सृष्टि, उधारीक नीति, बाबा नाम आ दादा नाम केवलम् चलि रहल अछि ओतए शोषित-दलित-परिश्रमी लोक जीवन-यापन लेल एम्हर-ओम्हर बौआइत, जीविका तकैत छिछिया रहल अछि। एहि स्थितिक बावजूद स्नेह करए बला गामकेँ, जीवनसँ लबालब गामकेँ बिसरि नहि पाबि रहल अछि। भले गाम बदलि रहल हो, शहरे भऽ रहल हो, भले गामसँ विस्थापित लोक लेल गाम अनचिन्हार भेल जाइत हो वा ओ स्वयं अनठीया भऽ रहल हो, ओ अनुभव करैत अछि जे ओकर परिचय जेना छिना रहल छैक। मैथिली साहित्यक ई खास विशेषता रहल अछि जे एहिठामक साहित्यकार अपन रचनामे मिथिला भूमिक लोक हित-चिंतासँ विलग नहि भेल अछि। ओ चाहैत अछि जे मिथिलाक समाजिक-आर्थिक विकास हो जाहिसँ लोक पलायन लेल मजबूर नहि रहए। रामलोचन ठाकुरक कवितामे सेहो ई चिंता-बेगरता गामक स्मृतिक संग विभिन्न रूपे अभिव्यक्ति भेल अछि। बहिन दाइ ! हम मानैत छी / आ अहूं मानब जे आइ / अपने गाम मे हम सभ छी अनठिया-अनचिन्हार जकर नजि छइ कुनू पता-ठेकाना - सरिपहुं कतेक असह्य थिक ई पीड़ा मुदा / ताइ लेल कथमपि उचित नजि कानब / वरन् चीन्हब अपन शक्ति आ बाहरोक शब्द के अकानब- आ एगो प्रण ठानब त कालि-आगामी कालि हमरो एगो परिचय रहत बिरदावनक हम हमर बिरदावन। (बहीन दाइक नाम एगो चिट्ठी, लाख प्रश्न अनुत्तरित) वस्तुतः ई परिचय वैयक्तिक परिचयनहि थिक। सामूहिक परिचय थिक। मिथिलाक अपन धरती अपन देश अपन गामसँ जुडऽल रहि ओहि माटि-पानिसँ उर्जा पायब थिक जाहिसँ दुनियाँकेँ बदलि सकी। अपनाकेँ चिन्हबाक लेल आ अपन शक्तिकेँ बूझि समाज व्यवस्थामे परिवर्तन लेल सामूहिक रूपे सन्नद्ध होयब वस्तुतः अपन परिचय पायब थिक। एहि लेल शोषित-दलित लोकक प्रति संवेदनात्मक स्तरपर जुड़ल रहल जरूरी अछि। तैं कवि कहि उठैत छथि। लिखबा लेल बैसै छी गंगा अवतरण कथा लिखने चल जाइत छी कोशी प्रांगणक व्यथा विख्यात भुवनत्रयम्, लाख प्रश्न अनुत्तरित) रामलोचन ठाकुरक आठम दशकसँ पछिला शताब्दीक अंत धरि आ एहि शताब्दीक आरंभ धरिक कविता सभकेँ पढ़ि लगैत अछि जे एहि देश-दुनियाँक विद्रूपता, वैषम्य, असमानता, शोषणपर आधारित समाज आ सत्ताक परत दर परत उघरैत चल जा रहल अछि। एक आस्था विश्वासक संग व्यवस्था परिवर्तन लेल सोच-विचार ओ सामूहिक संघर्षक मानसिकता परिश्रमी लोकक हित-चिंता, पक्षधरताक संग संवेदनात्मक स्तरपर अपन छाप छोड़ि रहल अछि। हइए जे कविक संग कहि उठी- आउ ने हमरा लोकनि संग मिलि पटाबी गाछ सभ एखनो अइ प्राणवंत आ हमरा विश्वास अइ आइ ने कालि एहि मे होएतैक नव पल्लव रंग-बिरंगक फूल जकर मादक गंध सं महमह करत परिवेश पीबि मधु मातल मधुप गुंजन करत तखन हमहूं लिखब आ निश्चिते लिखब वसन्त-गीत जे आकाशक नहि परिवेशेक उपज थिक । ((वसन्त गीतक मादे, लाख प्रश्न अनुत्तरित) नारायणजी विरोध आ अनुरोधक कविता कवि रामलोचन ठाकुर हमरा सभ दिनसँ आकृष्ट करैत रहलाह अछि। तकर आधार हुनकर ओ सुस्पष्ट वैचारिक लेखन थिक जे एक संग भाषा आ साहित्यक प्रति समान भावे एकल निष्ठा आ समर्पणकेँ दर्शाबैत अछि। साहित्य साधनाक माँग करैत अछि। साधना लेल चाही एकांत। एकांत वैचारिक सुदृढ़ीकरण लेल अत्यंत आवश्यक मानल गेल। संगहि एकांत भाव आ शब्दक उपासनाक लेल सेहो अवकाश उपलब्ध करेबामे साहयक होइत अछि। मुदा भाषा लेल चाही आंदोलन। आंदोलन लेल एकांतसँ बहरा व्यक्ति आ व्यक्तिसँ जुटि एकटा सार्थक संगठनक खाहे तँ निर्माण करब होइत अछि अथवा निर्मित संगठनक संग भऽ अपन गति आ त्वरासँ संगठनकेँ दिशा देब थिक। रामलोचन ठाकुरक जेँ कि मैथिली भाषा आ साहित्य लेल सदा समर्पित रहलनि अछि, पौराणिककेँ वर्तमानमे साकार करबाक लेल समर्पित रहलनि अछि तेँ हुनका द्वारा रचित मौलिक साहित्यकेँ भाषा आंदोलन आ ताहि लेल उत्खनित-अविष्कृत विचार संग जोड़ि देखल जाएब आवश्यक अछि। हमरा एखन अपन कहियोक पढ़ल मोन पड़ि आएल अछि जे पानिक अभावमे जखन सिंधुघाटी सभ्यता नष्ट भेल जा रहल रहै तखन सिंधु देवी एकटा प्रतिभाशाली तथा पराक्रमी युवकक सपनामे अवतरित भऽ जलक अविरल प्रवाह बनौने रहबाक लेल युक्तिक ज्ञान करबौने रहथिन। हमरा ईहो स्मरण भऽ आएल अछि जे मगध सम्राट अशोकसँ पराजित भऽ कलिंग कोना तीन सए बरखक उपरांत खाड़बेल (तात्कालीन कलिंग राजा) केर सपनामे देवी बनि प्रकट भए मुक्ति लेल प्रार्थना केने रहथि। आ ई स्मरण तँ भऽ रहल अछि जे लामा किछु मंत्र बिदबिदाइत छथि तकर आर जतेक आ जे किछु होइत हुअए मुदा एकटा आर अर्थ 'तिब्बत' होइतहिं टा अछि। तहिना रामलोचनजीक जतेक पत्र हमरा अबैत छल ताहिमे हमर नाम-गाम-जिलाक निच्चामे लिखल रहैत छल 'मिथिला'। मिथिलासँ बाहर रहैत रामलोचनजीक सपनामे 'मिथिला' साकार होएबाक अपन संपूर्ण कमनीय इच्छाक संग रहलनि। रामलोचन ठाकुर मिथिलासँ बाहर रहैत अहर्निश मिथिला लेल चिंतिंत मिथिलाकेँ विकसित रूपमे देखबाक लेल जें कि आंदोलनक समग रहलाह, जन समुदायक संगे रहलाह तें अपन रचनाक भाषाकेँ अभिजात्य वर्गक भाषासँ यथासंभव दूर जनभाषक निकट रखलनि जे नहि सर्वजन-बोधगम्य छल अपितु भाषा द्वारा विचारकेँ सर्वग्राह्य बनएबाक लेल तथा जन समुदाय लेल, जनसमुदाय द्वारा अपेक्षित उत्तेजानक लहरि सेहो उत्पन्न करएमे सफल भेल अछि। संगहि मिथिलाक उद्धार लेल मिथिलाक निजी भाषा मैथिलीक उद्धार करबाक लेल भाषिक चिन्ता तँ हुनकर सर्वोपरि रहबे केलनि सभ दिन। उपर्युक्त चिंतासँ चिंतित अनेक मौलिक तथा अनूदित पुस्तकक रचयिता रामलोचन जीक १९९६ ई. मे प्रकाशित ४८ शीर्षकमे विभक्त कविता सभक संग्रह थिक "अपूर्वा" जकरा क्रांति-गीत कहब बेसी उपयुक्त हएत, एहि लेल जे एहि संग्रहक कविता सभमे विलक्षण गेयधर्मी गुण अछि जे कविक विशिष्ट छंद-तानकेँ उजागर करैत अछि, तथा जाहि कविता सभक पाँति सभकेँ नाराक रूपमे आंदोलन लेल मंचसँ कहल जा सकैत अछि एवं देबालपर लिखल-साटल जा सकैत अछि। रामलोचन ठाकुर मिथिलाक गरिमाक कवि रहलाह अछि। हुनकर कविता सभमे प्राचीन मिथिलाक ज्ञान-वैभव अनेक ठाम अनेक आवृति बनि आएल अछि, जाहि वैशिष्ट्यसँ परिचय करएब आजुक लोककेँ अनिवार्य बुझैत रहलाह अछि। ओ बुझैत रहलाह अछि जे गरिमामयी अतीत जे रहल अछि, अपन तकरा स्मरण दिअओलासँ वर्तमानमे एहिठामक निवासीमे ओहि मूल्यक प्रति जागरुक बनाओल जाए सकैत अछि जे कहियो छल से बूझब आवश्यक अछि- "लक्ष्मी के बास जतए खेत-खरिहान घर-घरमे सरस्वती गबै छथि साम। स्रष्टा जत पूजक आ पूजित हो सृष्टि माटिक शिव बना पुनि प्रतिष्ठाक प्राण।" रामलोचन टाकुर मिथिलाक गरिमा आ ज्ञान-वैभव तथा स्वर्णिम अतीतक करैत आजुक समयमे मिथिलाकवासीक ओहि विवशताक अथवा ओहि निर्धनताक चर्च सेहो करैत छथि अपन कविता द्वारा जे हम सभ साग-पात खाए जिबैत छी की आ केहन अयाची छी? रामलोचन ठाकुर मिथिलाक समुचित विकास लेल मैथिली भाषाक विकास बड़ आवश्यक मानैत छथि। एहि लेल जे भाषाक अभिव्यक्तिक एहन माध्यम थिक जाहि द्वारा जनसमान्यक नहि मात्र सुख-दुख टा बूझल जाए सकैत अछि अपितु जनसमान्यक सापेक्ष जीवन विकासमे ओकर इच्छा-आकांक्षाकेँ सेहो सरि भए बूझल जाए सकैत अछि। मुदा मिथिलामे पसरल तँ अछि हिंदी जे हमर शत्रु नहयो रहैत मित्र कखनहुँ नहि थिक। तें कवि आह्वान करैत छथि जे जनगणनामे मैथिली लिखबाक- "काल्हि जनगणना थिक गामे पर रहब ठीक-ठीक लिखाएब कने जेना-जेना कहब माइक जे भाषा से मैथिली लिखाएब देखब हिंदी ने लिखए मुद्दैया" उपर्युक्त काव्य-पंक्ति मिथिलामे भाषाक प्रति भेल अपसांस्कृतिक दृष्टांत उजागर करैत हिंदीक विरोधमे कविक व्यक्त विचार थिक। रामलोचन ठाकुर अपसांस्कृतिकरणक बिहाड़िसँ मिथिलाकेँ बचएबाक लेल ने केवल निज भाषाकेँ बचएबाक लेल आह्वान करैत छथि अपन कविता द्वारा अपितु अपन परंपरासँ गाढ़ अनुराग देखबैत तकरा बचएबाक अनुरोध करैत छथि। मुदा एहि विलक्षण दृष्टिकेँ जतबेक प्रशंसा कएल जाए से थोड़ हएत। ओ परंपराकेँ बचएबाक जे अनुरोध कएलनि अछि से पाबनि-तिहार आ भक्ति-पूजा सन बुजुर्आ सौंदर्यबोधक पारंपरिक संस्कारक बचएबाक अनुरोध नहि, से थिक लोक-संस्कृतिकेँ बचएबाक लेल विकल अनुरोध। आ ताहि लेल मिथिलामे कहियो प्रचलित ओ खेल आ फकड़ा सभ थिक जे कहियो छल जकर आइ लोप भए रहल अछि। मुदा ताहि लोक-संस्कृतिक फर्मामे ओ समयकेँ जे देखओलनि अछि तकर मूलमे लोकधाराक लोकरसमे पागि अपन संदेश बिलहब थिक आ तकर बानगी देखल जाए सकैत अछि--'उट्ठी गोटी मोर पचास' शीर्षक कविता, 'आम छू अमरोरा छू' कविता, तथा 'फेर कन्हुआइ छौ तोरे पर' कविता सभ थिक , जे सभ कविक अपन वैचारिक अनुरोधकेँ अपन राग-भासमे व्यक्त करबाक एक प्रकारक अनुरोध थिक। रामलोचन टाकुर जाहि सकारात्मक निर्माणक योजनाक झलक संग मिथिलाक ओ रोग जे अपसांस्कृतिकरणक अछि तकर अपन कविता द्वारा विरोध कएलनि अछि ओतहि ओ अपन गौरवशाली परंपराकेँ बचएबाक लेल अनुरोध सेहो कएलनि अछि। आ हुनकर से सदिच्छा सर्वत्र हुनकर कविता सभमे मुखरित भेल अछि। आ अपन ताहि विचारकेँ पुनर्जीवित रखबाक लेल अपन एहि करुण विनय संग मार्मिक अभिव्यक्ति देलनि अछि- हम रही वा नर रही याद हमर बाँचत मओन सुन्न बाट जकाँ बाट अहाँक ताकत हमर विश्वास अछि जे रामलोचन ठाकुर सभ दिन रहताह, हुनकर कविता सभ दिन बाँचत। आ कवितामे अनुस्यूत हुनकर विचार मिथिलावासीकेँ सभ दिन दिशा प्रदान करैत रहत। रामभरोस कापडि भ्रमर देसिल बयनाक बहन्ने रामलोचन ठाकुर प्रसंग ह्मरा मोन नहि अछि–रामलोचन ठाकुरसँ हमरा कहिया भेट भेल छल । तखन सभा समारोहमे निरन्तर कतेको ठाम भेटैत रहलहूँ अछि । आ से मात्र औपचारिक भेटमात्र । हुनका अनेरे बजैत रहबाक प्रायः आदतो ने छन्हि । नहि देखलियनि तेहन । हँ, तखन पत्र–पत्रिकाक माध्यमे काफी पहिनेसँ भेट रहल । हुनक लेखनमे व्यवस्था प्रतिक आक्रोशक हुनक लेखकीय स्वरुपकें जतेक प्रखर बनबैत छलन्हि, ततबे प्रभावकारी । आ हम से रुचिसँ पढी । एहि दुआरे नहि जे हमरा कोनो वाम–दहिन विचारधाराक प्रभाव गछडने रहे । एहि दुआरे जे खूलि कऽ अव्यवस्था आ शोषणके रखबाक हुनक साहस हमरा लग अनने छल । ई सम्वन्ध आर प्रगाढ भऽ गेल–कलकत्तासँ बहराइन त पत्र–पत्रिकाक माध्यमे । हम निरन्तर छपैत छलहुँ । दोसकोस भाई विनोद कुृमार झाक, देसिल वयना जनार्दनझाक सम्पादनमे छपैत आ एम्हर भाइ रामलोचन ठाकुरक सम्पादनमे छपैत ‘मिथिला दर्शन’क साँग । ‘मिथिला दर्शन’मे रचना सभ छपिते छल, हमर एकटा स्तम्भ सेहो छपैत छल जे काफी समय प्रकाशित होइत रहल । कोनो खास रचनाक हेतु आग्रह, अथवा विशेष रुपें लिखल रचनाक प्रकाशनक विच सम्पादक वअस्था दुनूके निरन्तर जोडैत रहल छल । तकर अतिरिक्त भाइ रामलोचन ठाकुरक सँग हमर चेन्नईक भेटघाट संक्षिप्त मुदा सुखद अछि । हम, डा. रामावतार यादवक सँग ठाकुरजीक सँग विस्तृत गपसप आ फेर समुद्क किन्हेरमे सैर सपाटाक आनन्द, । ताहू क्रममे कतेको प्रसंगमे पोस्टमार्टम होइत रहल, हमरा सभक टोली आगा बढैत रहल । कम बाजब आ सटीक बाजब । लोक एकरा भले कडा, कठोर आ रसहीनताक आरोप लगाबे–लोक भाषामे एकरा ठाय–पटाका कहब कहल करैत अछि से ठाकुर जी कहैत अएलाह अछि । आब आबी बात करी देखिलवयनाक जे कलकत्तासँ १९८१ ई.मे बहार भेल छल । ई मासिक पत्र छल जे अखबारी साइजमे आठ पृष्ठक बहराइत छल । जँ कि ई मैथिली मुक्ति मोर्चाक मुखपत्र छल, तएँ एहिमे एकर संयोजक राम लोचन ठाकुर पृष्ट पृष्ट आ कही त पंक्ति पंक्तिमे बजैत छलाह । सम्पादक यद्यपि जनार्दन झा रहथि । मुदा देसिल बयनाक पृष्ट पर उभरैत विभिन्न नामी आ बेनामी रचना सभक चयन राम लोचन ठाकुरजीक सोचके अधीक सँ अधीक प्रतिनिधित्व करैत बुझाइक । तहिया हम जनकपुरधामसँ अर्चना द्वैमासिक रुपें निकालैत रही । जे तहिया डाक सुलभताक कारणे काफी ठाममे जाइक, कलकत्ता सेहो । दोसिल वयनामे तकर विज्ञापनो छपल करैक । हम प्रारंभेसँ देखिल वयनासँ जूडलहुँ । खूब लिखलहुँ आ खूब पढलहुँ । बरु कही त रामलागेचन ठाकुर जीक विचारसँ ताही पत्रिका माध्यमे अवगत भेल रही । ठायँ पटक्का बज बला मर्द मैथिल... । देसिलबयना हमरा निरन्तर अबैत छल । संग्रह अछियो । एखन जखन हुनकापर केन्द्रित लिखबाक हेतु विदेहसँ आग्रह आएल तं खोजल । एक–दूटा भेटल । आर खोजबाक हिम्मत नहि भेल । आधादर्जन अनबारीमे तहिआएल पुस्तकके कतौ पातर काया अदृश्य भऽ गेल छल । तखन विदेहक सहयोेगे आर किछु प्रति प्राप्त कएल । जकरा माध्यमे किछु लिखबाक आधार तैयार भेल अछि । से हम देसिल वयनाक वर्ष २, अंक ८ सँ किछु प्रसंग राख चाहब । ओ बाल गीत बरोबरि लिखैत छलाह । हम सेहो कहियो काल बालगित लिखैत छलहुँ । से हुनक बालगीत नीक लगैत छल । बच्चाके हुनके धुन आ शैलीमे अपन भाषा–साहित्यपर ध्यान केन्द्रित करबालेल कयल गेल आग्रह एत्त देखल जाए– “झिझिर कोना झिझिर कोना, कोन कोना जाउ मिथिलाके आंगनमे सभतरि खेलाउ उत्तर हिमालय आ दक्षिणमे गंगा छइ कोशी आ गंडकमे हेलु नहाउ ! उत्तर आ दक्षिणके भेद बिसराउ मिथिलाके सन्तति छी मैथिल कहाउ कन्हासँ कान्ह जोडि जाति–पाति अडि तोडि मिथिलाके माटि उठा माथसँ लगाउ ।।” ताही अंकमे एकटा कविता मीताक नाम छपल छन्हि । देखू– “मानै छी मीत सत्य सरिपहुँ आरोप तोहर बीति गेल हमर समय लिखि नहि सकैछी आब व्यर्थ करैछी प्रलाप संकुचित विचार बोध गहने चलि जाइत अछि किन्तु हम बाध्य छी जरबय त चाहैछी आशक आलोक नव निराशाक बिडरो मिझओने चलि जाइत अछि लिखबाले बैसैछी कथा आजादीके व्यथा बेरबादीके लिखाएल चलि जाइत अछि... ।” आजादीक सुखानुभूतिक पृष्टभूमिमे उगि आएल अव्यवस्था, अराजकताक प्रकोपेव्यथित कबि अपन लेखनीके अनायास अपन चिंतनक संवाहक बनएबा पर विवश भऽ जाइत छथि । आ हमरा जनिते जनवादी कवि रामलोचन ठाकुरक इएह सत्य थिकै, इएह अभिष्ट भऽ गेलै । ‘कहलोचन कविराय’ स्तम्भमे रामलोचन ठाकुरक छव पतिया निरन्तर छपल करैन । आ ताहुमे ओ मैथिल, मिथिला आ मैथिली पर विचार, उद्वोधन रखबासँ पाछा नहि रहथि । आइयो हुनक एहि विचारमे कोनो परिवर्तन भेल छन्हि से बात नहि । तखन समय आ अवस्था ज्ञाने गति तेज आ मद्धिम होएब दोसर बात । तेहने एक ठाम ओ लिखैत छथि– “बारिक पटुआ तीत आ, हो बाजारक मीठ कुहरि रहल छै मैथिली, डनिया टेरय गीत डेनिया रेरय गीत, नचैए पश्चिम गामक चमक–दमकसँ मोहि, पुत सभ मिथिलाधामक क्ह लोचन कविराय, कलंकक लेपल कारिख मैथिल युवजन मानि, मैथिली पटुआ बारिक ।।” (देसिल बयना, वर्ष २, अंक ५ फरबरी, १९८२) बस्तवमे देसिल बयना पत्रिकाक लेखनक छांट देखलापर ई स्पष्ट भऽ जाइछ जे ओहिमहक बहुतो आलेख÷टिप्पणी विभिन्न नामसँ ठाकुरजी स्वयं लिखैत छलाह । वाणीमे ओज, जखन नुकायल नामोक आवरणमे पत्रिकाके पन्ना पर उतरैत छै तं बेछप बेसी काल नहि रहि पबैत अछि । ओएह प्रखरता, सुपत–कुपत कहबाक हिम्मत आ लोक व्यवहारसँ लोहछल मनःस्थिति । से ओ प्रकारान्तरसँ स्वयं स्वीकार कयनहुँ छथि, तखन जखन देसिल बयना पंयिजकरणक कारणे देसकोस नामसँ बहरायल त तकर पहिल अंकमे सम्पादकीय लिखैत ठाकुरजी व्यथा व्यक्त करैत देसिलबयनाके साहित्य विशेषांक (अक्टुबर १९८२) क बाद बन्न हयबाक मूल कारण लेखकीय असहयोग कहने छथि । ‘देसिल बयना’ एक वर्ष चलल । एहि एक वर्षक प्रत्येक अंकमे रामलोचन ठाकुरक उपस्थिति विभिन्न रुपमे देखबामे अबैत अछि । कतेको स्तम्भ सभ देखि पडैछ– सभक भाषा–बोलीमे ठाकुरजीक कलमक चमत्कार देखि पडैछ । मैथिली भाषाक उत्थानक हेतु गठित भेल मैथिली मुक्ति मोर्चाक क्रान्तिकारी उद्बोधन एहि पत्रिकाक स्वर सन्धान रहलैक आ तकर संरक्षक प्रेरक रहलाह रामलोचन ठाकुरजी । हमहँु एहि पत्रिकासँ जूडल रहलहुँ । मुदा कथा, कविता धरि मात्र नहि रहि पौलहुँ । देसिल वयनाक वर्ष १, अकंक २ नवम्वर १९८२ ई. क अंकमे तेसर पृष्टपर हमर एकटा लेख छपल–‘मैथिली आन्दोलन–मैथिलक आन्दोलन बनब पडत ’ । आइ जखन उनचालिस वर्ष पूर्वक अपन एहि लेखके पढैत छी त लगैए इहो ठाकुरेजीक रँगमे रंगल लेख छल, जे तहिया माने चारि दशक पूर्व आनायास लिखबापर बाध्य भेल रही । आ ताहि लेखक जे भाव अछि ओ आइयो मैथिली भाषा, साहित्यक्षेत्रमे ओहिना देखल जाइछ, कोनो परिवर्तन नहि, बरु संकुचन बेसी । आजुक भाषा आन्दोलनक ओ पृष्टभूमि जकाँ लगैत अछि । भाषा आन्दोलनक चर्च जखन देसिल वयनाक पृष्ट पर देखैत छी त एखनो ओकर औचित्य बूझि पडैत अछि – आव ई स्पष्ट भऽ गेल अछि जे मैथिलक दूटा वर्ग अछि–समर्पित सेवीक आ सौदागरक । दुनूक अलग अलग उदेश्य छैक । मैथिलीके अपने बपौती बुझबला सौदागर वर्ग सदिखन मधुर झडबाक ताकमे बकध्यान लगौने रहैत अछि त दोसर दिस समर्पित लोक दिन राति रचनात्मक काजमे व्यस्त । ... सौदागर वर्ग समस्त सुख–सुविधा हथिया अपना स्वार्थ सिद्ध कऽ रहल अछि ।” (बैद्यनाथ विमल, दैखिल वयना, वर्ष १, अंक ३, दिसम्वर १९८१) ‘देसिल बयना’क पृष्टपर अपन वास्तविक नामसँ उभरैत रामलोचन ठाकुर कखनो काल अत्यन्त कठोर भऽ उठैत छथि । अपन गामसँ, अपन सपनाक वृन्दाबनसँ जखन अर्थ आर्जन व्यथे शहर पकडबापर बाध्य होइत छथि त सामाचकेवा खेलाइत बहिनक भाइक अनुपस्थिति बोधसँ होइत पीडाक अनुभूतिके महशूस करितो ग्राम्य राजनीति प्रति अपना मोनमे बैसल अवसादके एना कऽ व्यक्त करैत छथि– “बहिन दाई ! हम जानैत छी जे अहाँ एहु बेर बनओने हएब शामा–चकेवा तकने हएब हमर बाट लगलापर आगि विरदाबनमे आ नहि पाबि हमरा भेल हएब उदास बहल हएत आँखिसँ दहो–बहो नोर । किन्तु बहिन दाई ! अहाँ मानी कि नहि मानी थिक धरि ई सत्य जे कुनो दावानलके नहि मिझाओल जा सकैछ सोबर्ना लोटासँ आ, जेना अहाँ लिखने छी– ठीके हम बड बदलि गेलौहें हम बुझैछी÷जे विरदाबन÷ओ बिरदावन नहि रहि गेल–ए आइ, एकटा नहि हजारक हजाार चुगिला जनमि गेलए । आ इएह बिरदाबन थिक ओकरा सभक आवास... ।” एकर पुरान गाछ सभक धोधरिमे एकसँ एक अबोध विषधर करैए निवास आइ अइठामक बसातो अइ विषयुक्त सांसो लेबाक अनुपयुक्त तै हमरा विचारे । एकरा जरिए गेनाइ थिक नीक मिझेबाक प्रयास सर्वथा अनुचित...।” (देसिलवयना वर्ष १ अकं २, नवम्वर १९८१) ‘देसिल वयना’सँ देसकोस धरिक यात्रापर फूटसँ कहियो लिखब । एखन एहि पत्रिकामे रामलोचन ठाकुरक व्यक्तित्वके खोजबाक प्रयास कएल अछि । एहिमे सावधानी इएह जे अनेको कठोर आ प्रतिरोधी विचारक प्रस्तुति सभ आएल अछि, जाहिमे हिनक नाम नहि छन्हि, तएँ हम उल्लेख नहि कएल अछि । ओहुना ओ व्यवस्था प्रति कठोर, अंवाछनीय गतिविधि प्रति अनुदार रह बला लोक छथि, आ ई कोनो दुर्गुण नहि, विरले भेटबला गुण होइछ । जे हिनकामे छन्हि । से एहि तरहे अपन सत्य तथ्यसँ लोकके तरंगित कैनिहार कवि व्यक्तित्व कखन सरस बनि प्रकृतिके सौन्दर्यमे अपनाके समर्पित कऽ दैत छथि देखी एकटा बानगी, हिनक चारिगोट मिनी कवितामे – ” १. सूर्योदय – माइक आंचर तरसं बहार क क मुह अपन बिहुसि देलक शिशु अबोध ! २ राति –दुरगमनिया कनियां बनि बन्न साँझ महफामे बेटी प्रत्येक दिन चलि जाइछ देने विछोह, व्यथा पसारि मन पिरथी पर कारी धन अन्धकार ! ३ चन्द्रमा –परदेशी पाहुन केर जोहैत होथि बाट जेना खिडकी लग ठाढि कुनू राधिका ! ४ बखान्त इहो वर्ष ओहिना बीति गेल बुढ अथबल सूर्य बस गैरेजक पछुआरमे डुबि गेल ! (देसिल वयना, वर्ष २, अकं ४ जनवरी १९८२) एहि तरहे देसिल वयना आ देसकोस पत्रिकाक माध्यमसँ अपन युवा आ उर्जावान व्यक्तित्वक छाप विभिन्न रचनामे छोडने छथि–रामलोचन ठाकुर । दोसर तरहें कही त एहि दुनू पत्रिकाक पृष्टपर राम लोचन ठाकुरक प्रतिबिम्ब झलकैत अछि । संतोषी कुमार भाषा-संस्कृतिक आस्था आ नव-निर्माणक संकल्प ‘‘ईर्षा-द्वेष हटाबै छी घृणा विभेद मेटाबै छी बुद्धि विवेकक दीप लेसि हम प्रेमक ज्योति पसारै छी करिया झुम्मरि खेलै छी।’’ मिथिला संस्कृति मे आस्था आ नव-निर्माणक संकल्पक समन्वय करैत कवि रामलोचन ठाकुरक पाँती मैथिल जन-मन लेल प्रेरणादायक अछि। मैथिली साहित्य जगतक कवि-निबंधकार (रामलोचन ठाकुर), कथाकार (अग्रदूत) आ व्यंग्यकार (कुमारेश काश्यप) मैथिल सामान्य लोक लेल ‘‘माटि पानिक गीत’’ आ गेय-काव्य ‘‘अपूर्वा’’ सन कविता-संग्रह लिखैत छथि। दोसर दिस ‘अग्निलेखन’ धर्मी बनि ‘‘इतिहासहंता’’, ‘‘देशक नाम छलै सोन चिड़ैया’’ आ ‘‘लाख प्रश्न अनुत्तरित” कविता-संग्रहक रचना करैत छथि, जाहि मे यथास्थितिक प्रति असहिष्णु, आक्रोशक तीक्ष्ण भावक अभिव्यक्ति, मार्क्सवादी चिंतन सँ सम्पृक्त, संघर्ष चेतनाक निर्माता आ स्व-निर्माणक प्रति घोर आस्थावान, तैँ विध्वंस केँ निर्माणक आवश्यकता मानैत छथि। हुनक मंतव्य अछि जे मैथिली आन्दोलन आ अफ्रीका वा फिलिस्तीनक मुक्ति आन्दोलन मे कोनो पार्थक्य नहि छैक। सभ ठामक जनता अपन भाषा-संस्कृति आ जातीय मुक्ति लेल एकरंग आकुल-व्याकुल आ संघर्षरत अछि। आ तैँ अफ्रीका हो वा फिलिस्तीन, पाकिस्तान वा मिथिला सभक कविताक कथ्य आ स्वर एक्के छैक। एहि पृष्ठभूमि मे अन्यान्य देशक/भाषाक कविक कविताक मैथिली अनुवाद ओ ‘‘प्रतिध्वनि’’ मे कएने छथि। सर्वहारा ओ शोषितक पक्ष मे अपन लेखनी केँ प्रतिबद्ध रखैत छथि। सर्वहारा ओ शोषितक लेल तऽ विश्व-बंधुत्वक अवधारणा रखैत छथि, मुदा व्यवसायीक वैश्वीकरण अनुबंधक प्रतिरोध स्वरूप अपन कविता-संग्रह ‘‘लाख प्रश्न अनुत्तरितकेँ समर्पित करैत छथि। ठाकुरजी मिथिला-मैथिली प्रेम लेल प्रतिबद्ध छथि, जे हुनक कविता मे स्मृति, परिचय, वर्णन वा कटाक्ष रूप मे प्रतिचित्रित भेल अछि। नव-निर्माण लेल ध्वंस केँ आवश्यक माननिहार कवि, मिथिला मे पसरि गेल असंख्य कुत्सित प्रवृतिक लोक सँ अपवित्र भेल बिरदाबनक जड़नाइ उचित बुझैत छथि। एकरा सम्हारब व्यर्थ मानैत छथि। संगहि अपन श्रम सँ नव बिरदाबन (नव मिथिलाक) कल्पना करैत छथि, जाहि मे सभक आश पूर करबाक क्षमता हो – ‘‘हजारक हजार चुगिला जनमि गेल-ए आ इएह बिरदाबन थिक ओकरा सभक स्थायी आवास एकर पुरान गाछ सभक धोधरि मे एक सँ एक विषधर करैयै निवास ...... एकरा जरिए गेनाइ थिक नीक मिझेबाक प्रयास सर्वथा अनुचित शक्तिक अपव्यय जे करबाक थिक संचय आगामी कालिक निमित्त जखन कि हमरा लोकनि लगाएब निश्चिते लगाएब/एगो नव बिरदाबन पटाएब/कुनू डबरीक पानि सँ नइं अपन घाम सँ/ आ फुलाएब रंग-बिरंगक फूल/अपन आशाक अनुकूल अपन कल्पना कें देब वास्तव रूप।’’ अपन आशा-आकांक्षाक प्रतिपुर्ति करबा योग्य मिथिलाक कल्पना मे ओ युवकक भूमिका महती मानैत छथि। मैथिली युवा लेखनक संकलन सँ प्रकाशित पत्रिका ‘‘अग्निपत्र’’क सम्पादन कएने छलाह। मैथिली भाषा केँ संविधानक अष्टम अनुसूची मे संलग्न करबाक आन्दोलनक समय लिखल गेल हुनक पाँती कोना बिसरा सकैत अछि - ‘‘संविधान बिनु मैथिलीक आ मानचित्र बिनु मिथिला धाम डाहि-जारि सुड्डाह करब हम मिथिलाक जुआन।’’ हम श्री ठाकुरजी केँ ‘‘मिथिला दर्शन’’ पत्रिकाक सम्पादक रूप मे सम्पादकीय आलेख पढ़ैत चिन्हबाक-जनबाक प्रयास कएने छी। ‘मिथिला दर्शन’क जिज्ञासु पाठकक रूप मे हुनक आलेख गंभीर चिंतनक हेतु अग्रसर करैत रहल। कोलकाता प्रवासक समय हुनका सँ पहिल व्यक्तिगत भेंट ‘‘सम्पर्क’’ मे भेल छल। ओतहि ओ अपन ‘भिजिटिंग-कार्ड’ देने छलाह जाहि पर हुनक परिचय मे कवि (poet) अंकित छल। पश्चात् हुनक कविता सभ पढ़बाक सुयोग भेल। सत्ते ओ नैसर्गिक कवि छथि जिनक शब्द आ काव्य अपना मे सर्वहाराक दुःख प्रतिचित्रित करैत व्यवस्था सँ संघर्ष करैत अछि। काव्य ‘‘सर्वहारा टी स्टॉल’’क नाम सँ लिखाइत अछि। हुनका लेल साहित्यक सौंदर्य-बोध, असहाय-नचारक स्थितिक वर्णन-विश्लेषण मे अछि। अपन नाट्य साहित्यक अध्ययन-अनुशीलनक क्रम मे कोलकाता मे मैथिली नाटक आ रंगमंच लेल कएल गेल कार्यक पर्यालोचन करैत छी, तऽ ओहि मे श्री ठाकुरजीक नाम श्रेष्ठ स्थान मे देखाइत अछि। कलकत्ता(आधुनिक कोलकाता) आरंभहि सँ मिथिला-मैथिली आन्दोलन लेल अग्रसर रहल अछि। आन्दोलनाकार लोकनि सामान्य मैथिल जन केँ एकत्रित आ संगठित कऽ प्रारूप पर कार्य करैत छलाह। लोकक आमंत्रण आ संगठन लेल साहित्यक सशक्त विधा नाटक रहल अछि। नाट्य-मंच केँ लोकरंजनक प्रमुख आ सहज-सुबोध साधन बूझि मैथिली आन्दोलन आहूत कएनिहार सभ मैथिली नाटकक प्रणयन कलकत्तामे प्रारंभ कएलनि, जाहि मे किछु प्रहसन आ अल्पावधिक नाटक मंचित भेल। पछाति हुनका सभक चिंतन-चेतना मे आभासित भेल, जे मैथिली आन्दोलन भाषा आन्दोलन थिक आ एकर सफलताक आधार प्राचीन साहित्यक भंडारे टा नहि, ओकर अविरल-अविच्छि परंपरा ओ समृद्ध समकालीन साहित्यक आगारो प्रयोजनीय अछि आ ई समृद्धि नाट्य विधाक लेल सेहो वांछित अछि। एही क्रम मे कलकत्तामे विभिन्न नाट्य संस्था सभक स्थापना भेल। एहि संस्था सभक प्रथमिकता छल मंचोपयोगी नाटक लिखाएब आ ओकर प्रदर्शन लेल मैथिलीभाषी कलाकारक जुटान करब। ठाकुरजी एहि दुनू कार्यक भार संवहन मे पछुएलाह नहि। अपन लेखकीय धर्मक निर्वहन करैत बहुभाषी प्रतिभाक धनीक ठाकुरजी बांगला सँ मैथिली मे नाटकक अनुवाद कएलनि। हुनक अनूदित नाटक मे बांगला रंगमंचक प्रसिद्ध लेखक-निर्देशक शैलेश गुह नियोगीक ‘‘फाँस’’ आ ‘‘रिहर्सल’’ आओर श्यामल तनु दासगुप्ताक ‘‘जादूगर’’ (बांगला - जादूकर) अछि, जे नाटक सभ प्रदर्शित-प्रकाशित भेल अछि। किरण मैत्रक ‘‘चारि-पहर’’ आ मनोज मित्रक ‘‘किशुनजी-विशुनजी’’ (बांगला - ‘केनाराम-बेचाराम’) हिनक अनूदित नाटक अछि, जे प्रदर्शित भेल अछि, मुदा अप्रकाशित रहल अछि। पुस्तकाकार रूप मे प्रकाशित हो वा अप्रकाशित, हिनक अनूदित नाटक सभ मैथिली साहित्यक आगार मे निधि रूप मे संचित भेल अछि। कलकत्तामे मैथिली नाट्य मंचक आरंभिक काल मे कलाकारक आवश्यकता आ हिनक नाट्य अभिरुचि, एहि सुयोग सँ कतेको नाटकक प्रथम रात्रिक मंचन मे पात्रक अभिनय करैत रहलाह। उदय नारायण सिंह ‘‘नचिकेता’’ जीक नाटकक पात्र ‘शुभंकर’ (एक छल राजा), ‘अनिरुद्ध’ (नाटकक लेल) आ ‘नवल’ (नायकक नाम जीवन)क भूमिका मे ठाकुरजीक अभिनय अविस्मरणीय रहल अछि। बिना प्रशिक्षण प्रप्त रंगकर्मी रहितहुँ, हिनका द्वारा कएल गेल अभिनय आ निर्देशन लेल मैथिली रंगमंचक प्रसिद्ध लेखक-निर्देशक कुणाल हिनका मैथिली रंगमंचक उत्तम अभिनेता-निर्देशक मानैत छथि। हिनका निर्देशन मे मैथिली नाटक प्रदर्शित होएबाक सूचना तऽ अछि, मुदा तकर मान्य आ लिखित साक्ष्य नहि रहबाक कारणे ओकर चर्च नहि कऽ रहल छी। नाटक केँ दृश्य-काव्य मानल गेल अछि, मुदा नाटक केँ विषय-वस्तु बना काव्य लिखब फराक अछि। ओ नाटक केँ काव्यक विषय बना ‘‘नाटक, निर्देशक आ एकटा कविता’’ शीर्षक सँ कविता लिखलनि, जाहि मे नाटकक नाम पर प्रस्तुत भऽ रहल उत्क्षृंखलता आ अश्लीलताक प्रतिवाद करैत छथि। नाटकक सफलताक आधार दर्शकक उपस्थिति वा ओकर थोपड़ीये टा नहि, अपितु कथ्य-कथानकक गांभीर्यक प्रमुखता मानैत छथि। मैथिली नाट्य मंच केँ समर्पित पत्रिका ‘‘रंगमंच’’ जे कलकत्तासँ प्रकाशित भेल छल, ओकर सम्पादक सेहो श्री रामलोचन ठाकुर छलाह। कतिपय कारण सँ एहि पत्रिकाक एक्कहि टा अंक प्रकाशित भेल। नाट्य संबंधी हिनक आलेख कलकत्ताक मैथिली नाट्यकार’’, ‘‘कलकत्तामैथिली रंगमंच आ श्रीकांत मंडल’’, ‘‘कलकत्तामैथिली रंगमंचक महिला कलाकार’’, ‘‘नाट्य-मंचक विकास मे पत्रिकाक योगदान’’, ‘‘मिथिला नाटक आ मुंशी रघुनन्दन दास’’, ‘‘समकालीन मैथिली रंगमंचक विकास मे कलकत्ताक योगदान’’ आदि पठनीय अछि, जे विभि पत्रिका मे प्रकाशित भेल छल। एहि समस्त आलेखक संकलित रूप मे प्रकाशन संस्मरण ‘‘आँखि मुनने, आँखि खोलने’’ आ ‘‘स्मृतिक धोखरल रंग’’ मे प्रकाशित अछि। मैथिली आन्दोलनक ‘अग्निलेखन’ धर्मी कवि रामलोचन ठाकुरजी अपन लेखन आ रचनाक माध्यम सँ युवा वर्ग केँ सम्बोधित करैत रहलाह, मुदा आधुनिक युवाक इच्छा-आकांक्षा आ विमुख होइत मिथिला-मैथिली सँ विचार केँ देखि, आहत होइत लिखैत छथि – ‘‘दूरक ढ़ोल सोहावन, कहबी छैक पुरान किन्तु मात्र कहबीए नहि, सुनियो रहलहुँ कान सुनियो रहलहुँ कान, आँखि सँ देखि रहल छी मैथिलीक दुर्दशा हाल मिथिलाक कहब की कह लोचन कविराय, विवेक एहन नवतूरक निश्चित पतनक मूल, प्रगति बात त दूरक।।’’ कियो कवि रूप मे जानए वा कथाकार ‘अग्रदूत’ रूप मे। कियो ‘‘बेताल-कथा’’ पढ़ि ‘कुमारेश काश्यप’ केँ जानए वा ‘‘पद्मा नदीक माझी’’ पढ़ि अनुवादक केँ। कियो सम्पादक बूझए वा रंगमंचक कलाकार। रामलोचनजी सभ ठाम सशक्त हस्ताक्षर बनि उपस्थित छथि। हुनक अस्वस्थताक सूचना अछि। हुनक शीघ्र स्वस्थ्यक कामना करैत छी। मैथिली आन्दोलनी रूप मे ओ संदेश दैत छथि, जे आत्मसात् करबा योग्य अछि – ‘‘निज भू-भाषा हित मरय मरय ने, अमर बनैत अछि तकरे गाथा विश्व ई गाओत, सदा गबैत अछि।’’ संदर्भ-संकेत 1 करिया झुम्मरि, अपूर्वा, पृ॰41 2 आजुक कविता (भूमिका), प्रतिध्वनि, पृ॰10 3 बहिन दाइक नाम एगो चिट्ठी, लाख प्रश्न अन ुारित, पृ॰9 4 प्रतिध्वनि 5 समकालीन कथाक सौंदर्य बोध, आँखि मुनने, आँखि खोलने 6 इतिहासहंता 7 नाटक, निर्देशक आ एकटा कविता, इतिहासहंता, पृ॰13 8 देसिल बयना 9 आखर आलेख, स्मृतिक धोखरल रंग केदार कानन एक सुच्चा कविः रामलोचन ठाकुर रामलोचन ठाकुर संघर्षशील कवि छथि। ओ बहुत श्रम आ साधनासँ कविताक समीप पहुँचल छथि। हुनक जीवन ततेक कंटकाकीर्ण आ क्षत-विक्षत रहलनि जे ओ कविता नै लिखतथि तँ कलकत्ता सन महानगरमे अनेक समान्य मैथिल जकाँ, अन्हारमे बिलायल रहितथि। ओ कविताक मर्म बुझलनि आ ओहि मर्मकेँ अपन वैचारिकताक संग काव्यात्मक अभिव्यक्ति देलनि। कवि लग मिथिलाक महान परंपराक पूरम्पूर अभिज्ञान छनि। ओहि महान परंपराक सूत्र ओ सदैव धयने रहैत छथि। ओ अपन कवितामे कतहुँ हुसैत नहि छथि। हुनका अखनुक क्रूरतम समयक सार्थक बोध सेहो छनि। एहि दूनूक मिश्रणसँ ओ बेस बेधक आ बेछप कविताक सृजन कऽ सकलाह अछि। आइ कविताकेँ ततेक गंजन सहय पड़ रहल अछि तकर लेखा नहि। कविताकेँ खेलौर बुझनिहार कवि लोकनि लग रामलोचन ठाकुरक कविता अयनाक काज करैत अछि। हुनका सभकेँ निश्चित रूपसँ रामलोचन जीक कविता पढ़बाक चाही आ तकर मर्मकेँ स्पर्श करबाक चाही। रामलोचनजी प्रचार-प्रसारसँ दूर रहि अपन कवि-कर्ममे लागल रहलाह आ सैह कारण थिक जे ओ कविताकेँ एक उद्येश्य धरि लऽ जा सकलाह। हुनक जीवन सुच्चा रहलनि। अत्यंत सावधानी आ इमानदारीसँ ओ अपन जीवनक निर्वाह कयलनि। ठीक तहिना ओ कवितोमे बहुत सावधान आ इमानदार छथि। ओ जखन जे अनुभव कयलनि, अपन संवेदनाक धरातलपर आबि तकर अभिव्यक्ति कयलनि। यैह कारण थिक जे हुनक कविताने टटका स्पन्दन छनि, सुवास छनि। हुनक कविता मैथिलीक विशिष्ट काव्य-परंपरामे एक सार्थक हस्तक्षेप थिक। हुनक कविता एक दिस मिथिलाक गाम आ ओहिठामक जीवन अछि तँ दोसर दिस महानगरीय जीवनक यथार्थ आ सक्कत-पथराह भूमि सेहो अचि। ओ कवितामे अपन बात बिना कोनो छल-छद्मक, बिना कोनो लाग-लपेटक कहि सकलाह अछि। तें ओ कविताकेँ एक निश्चित उद्येश्य धरि लऽ जा सकलाह अछि। हुनका लेल सभसँ महत्वपूर्ण रहलनि अछि। अंतिम विपन्न आदमी। जकरा लग अपन कहबाक किछु नहि छैक। जकरा भारतक स्वतंत्रताक बाद एखन धरि लुलुआयले गेल छैक, तें अस्वाभाविक नहि जे ओ मनुक्खक जय चाहैत छथि, जीवनक जय केर आकांक्षा रखैत छथि आ मुक्ति संघर्षसँ प्रेरित जीवनक दोहाइ दैत छथि। मैथिलीमे रामलोचन ठाकुर एक विशिष्ट आ तथाकथित सड़ल-गन्हाएल परंपराक भंजक कवि छथि। हुनक कविता पढ़ैत काल कतहु-कतहु ई बोध होइत छैक जे हुनक कविता वक्तव्य भऽ जाइत अछि अथवा नारा सन लगैत अछि। मुदा ओहू कविता सभमे कविक सुच्चापन आ इमानदारी झलकैत अछि। जे मिथिला सौंसे भुवनमे विख्यात रहल अछि से आब रक्तहीन, मांसहीन कंकालक भूमि बनल अछि। मुदा कविक विवशता छनि जे ओ मातृभूमि मिथिलाकेँ बिसरि नहि पबैत छथि। ओ अपन कवितामे घनघोर निराशा आ उदासीकेँ फटकय नहि दैत छथि। ओ सदैव आशा-उल्लास आ जीवनक बात करैत छथि। जीवनमे सफलताक बात करैत छथि। ओ एक सुखद भविष्यक बात करैत छथि। अपन कविता "बहीनिदाइक नाम एगो चिट्ठी"मे कहैत छथि- आगामी कालिक निमित्त जखन कि हमरा लोकनि लगाएब निश्चिते लगाएब / एगो नव बिरदाबन पटाएब / कुनू डबरीक पानि सं नहि अपन घाम सं / आ फुलाएब रंग-बिरंगक फूल/ अपन आशाक अनुकूल अपन कल्पना कें देब वास्तव रूप हुनक अधिकांश जीवन मैथिली आंदोलन लेल समर्पित रहलनि। मातृभाषापर होइत कोनो प्रहारकेँ ओ बरदास्त नहि कयलनि आ मैथिलीक हित लेल जे हुनकासँ संभव भेलनि से ओ निरंतर करैत रहलाह। आवश्यक भेलापर ओ मैथिली लेल नारा सेहो लिखलनि जे बहुत अर्थगर्भा आ व्यंजक छनि। मिथिलाक गामक ओहि समृद्ध परंपरा आ प्रीति, सौजन्य-सौमनस्यकेँ ओ तकैत रहैत छथि। जतय कोनो भेदभाव नहि छल। जातिपात नहि छल। सभ एक-दोसराक पर्व-त्योहारमे खुजल आ उन्मुक्त मोनसँ सम्मिलित होइत छल। मुदा से गाम आइ निपत्ता भेल अछि। जीवन बदलि रहल छैक, सभ्यता-संस्कृति बदलि रहल छैक। आयातित विचारक प्रदूषणसँ, अपना-अपनीसँ, स्वार्थक महाजालसँ संपूर्ण परिवेश अनठिया बनि गेल छैक। ओ अपन गामक अन्वेषणमे लागल कहैत छथि— पसरमे जाइत चरवाहक पराती आ साँझमे दूर नदी कातसँ बाध-बोनासं भासल अबैत चौमासा-बारहमासाक स्वर आँगनसँ ढेकी जांतक संगीतक संग लगनीक स्वर कहियो सोहर, कहियो समदाओन कहियो तिरहुत, कहियो मलार हमर गामक परिचिति छल बरखामे विलम्ब देखि गमैया पूजाक सँगोर जट जटिन खेलेबामे व्यवस्त महिला समाज तजियाक संग झड़नी पर झुमैत किशोर/तरूण दल फगुआक अबीर आ जूड़शीतलक कादो-मटिक संग हमर गाम जीबैत छल ................. हम ताकि रहल छी सएह गाम अपन गाम कवि मानैत छथि जे शब्द जे कहियो पूर्वजक अनुसारे ब्रह्म छल से आइ अपन मुक्ति लेल छटपटाइत वाल्मीकि, विद्यापति, कृतिवासक बाट ताकि रहल अछि। कियैक तँ बीसम शताब्दीमे मनुक्ख ओहि शब्दकेँ अस्त्र बना लेलक अछि, ओकर अर्थ बदलि गेल छैक, अपन संपूर्ण अर्थवत्तामे ओ भयाओन भऽ गेल छै आ ओकरासँ साधारण लोककेँ डर होइत छै। कविता कतेक अर्थपूर्ण अछि से देखी-- हमरा लोकनि अर्थात् एकैसम शताब्दीक सभ्य सुशिक्षित मनुक्ख शब्दकें बना लेने छी अस्त्र अस्त्र विभाजनक अस्त्र शोषणक अस्त्र संहारक आइ शब्द स्नहे-संवेदना नहि घृणा-द्वेषक करैत् अछि सृष्टि-संचार शब्द आइयो अछि संसद-संविधानमें बणिकक तिजोरीमे स्तावक लोकनिक ठोर पर कलमक नोक पर शब्द आइयो अछि मात्र बदलि गेल छैक ओकर अर्थ तें लगैत अथ्छ अनचिन्हर-अनभोआर लगैछ भयाओन लोक, साधारण लोक आइ शब्दसं डेराइत अछि भारतक आजादीक पछाति गणतंत्र दिवस आ स्वतंत्रता दिवसक अवसरपर संपूर्ण देहक रोमांचित होयब, एकटा अखंड विश्वासक लहरिक दौगब आ मोन प्राणक उत्फुल्ल होयब, समय-साल बदललाक कारण , देश-दशाक स्थितिक विरूपताक कारण आ समान्य जनताक इच्छा-आकांक्षा आ ओकर समस्त भविष्यपर लगाओल गेल पैघ प्रश्नचिह्नक कारण, अंततः स्थिति कतेक बदलि गेल अछि तकरा कविक १५ अगस्त कवितामे देखल जा सकैत अछि- १५ अगस्त आब रोमांचित नहि करैछ फहराओल जाएब तिरंगाक शहीदक शोणित, ओकर बलिदानक कथाक स्मरण नहि करबैछ तिरंगाक केसरिया रंग लालक बदला -- एक पैध सुचिन्तित षडयंत्रक प्रतिफलन बुझि पड़ैछ आ श्वेत खंडक बीचो बीच चक्र एक पैघ कलंकक टीकाक प्रतीक जाइ मे बोफर सं शेयर धरि हवाला सं गवाला धरि कतेको अपकर्म, कुकर्मक कथा गाथा सत्तासीन भारत भाग्य विधाताक समाहित हो कवि रामलोचन ठाकुर अपन 'हम चाहै छी' कवितामे कहैत छथि- कविता हमर कोनो मंदिर मसजिद वा कोठा सँ नहि, मजूरक झोपड़ी सँ कारखानाक जरैत चिमनी सँ खेत जोतैत हरक फार सँ धीपल लोहा पर पड़ैत लोहारक हथौड़ा सँ कुम्हारक चाक सँ चमारक टाकु सँ जनमओ हम चाहै छी रामलोचन ठाकुर विराट फलकक कवि छथि। मैथिलीमे, अपन धाराक एकसर कवि जकाँ, अपन संर्घष-पथपर अविराम चलैत, अनथक यात्राक सभटा मोल चुकबैत ई कवि अपन कविता सभमे एक विशिष्ट अर्थ भरैत रहलाह। आइ हिनक कविता सभ मैथिली कवितामे एक धड़कैत आ विचारोत्तेजक आयाम दैत अछि। एतेक सहज आ संप्रेषित जे कविताक अर्थ ताकबा लेल कतहुँ दूरक यात्रा नहि करय पड़त अपितु तकर अर्थ एतेक सरल आ खुजल रहैत अछि जे ओ अहाँ के समान्य मैथिल आ हिंदुस्तानी जीवनमे अनायासहि भेटि जाइत अछि। कोनो दीहन-हीम, कोनो मजूर, कोनो रिक्सा आ ठेला बलाक जीवनक संघर्षमे हुनक कविताक पाँति फड़कैत, अपन बात कहैत भेटि जाएत। ई हुनक कविताक एक महत्वपूर्ण आयाम थिक। रामलोचन ठाकुर एक श्रेष्ठ कविक अतिरिक्त श्रेष्ठ अनुवादक ओ विचारक सेहो छथि। अपन अनुवाद कर्म आ तकर गुणवत्तासँ ओ मैथिलीक मान बढ़ौलनि अछि। ओ मैथिल मनक विशिष्ट रचनाकार छथि आ हुनक कवितामे आ अन्यो रचनामे संपूर्ण मिथिलाक जीवन स्पंदित करैत अछि। धर्म, समाजिक जीवन प्रणाली, राजनीति, सभ्यता आ संस्कृतिपर हुनक एतेक संतुलित आ समधानल व्यंग्य छनि जे हुनक रचनाक कलात्मक संयम आ तकर उत्कर्ष मनकेँ मोहि लैत अछि। मिथिलाक संग-संग बंगालक जीवन एक संग हुनक रचनामे अबैत अछि। एक दोसरासँ जुड़ल आ अन्तरंग रूपमे। निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे कवि रामलोचन ठाकुर प्रथमतः आ अंततः जनताक रचनाकार छथि। आखरी विपन्न आदमीक सुख-सेहंतामे भीजल, ओकरे दुखसँ दुखी होयब, ओकरे सुखसँ सुखी होयबाक व्यापक परिधिमे हुनक रचना बौआइत रहैत छनि। हुनक रचनाकार लक्ष्य जनता थिक, समान्य जनता। आ हुनक एहि महत्वपूर्ण आ अर्थव्यापी लक्ष्य लग अंततः प्रत्येक रचनाकारकेँ जयबाक चाही। सुरेन्द्र ठाकुर मैथिली सेवी कवि श्री रामलोचन ठाकुर जी ओह! हम की कहू नहि कहू। हम तखन बहुत मोश्किलमे पड़ि जाइत छी जखन हम अपनासँ कनिष्ठ बा ज्येष्ठ कोनो मैथिली सेवीक व्यक्तित्व,कृतित्व आ कीर्तित्वक विषयमे किछु लिखबाक लेल हाथमे कलम पकड़ैत छी।तखन मोनमे होइत रहैत अछि जे ओहि मैथिली सेवीक संबंधमे कतहुँ कोनो मौलिक तथ्य छुटि ने जाए बा एहेन कोनो बात नहि लिखा जाए जाहिसँ हम उपहासक पात्र बनि जाइ! आखिर हम की करबैक? एखन तँ हमरा लिखहे पड़ि रहल अछि। प्रसंगवश्, उलेख्य महानुभाव छथि मैथिलीक कवि-लेखक साहित्यकार आदरणीय श्रीमान् रामलोचन ठाकुर जी। ओना हम ई०सन्--१९७५ क २६ जनवरी क' कलकत्ताक धरती पर पैर रखलहुँ। हमर अजिया ससुर श्री उदित नारायण झा आ ससुर श्री बुद्धदेव झा जीक कलकतास्थ रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालयक जोड़ासाँको प्रांगण स्थित निवास स्थानपर यदा-कदा बा छुट्टी दिन क' सामान्य मैथिलक अतिरिक्त किछु मैथिली सेवी यथा श्री महेन्द्र झा(बेलौंजा),श्री राजन्दन लाल दास(कर्णामृतक सम्पादक)आ नाट्यकार द्वय श्री दयानन्द झा(नागदह) आ श्री गंगा झा(परजुआरि,डीह) आदि प्रमुख मैथिलीसेवी सभ उपस्थित भ' जाथि। मिथिला-मैथिली विषयक वार्तालापमे हुनका सभकें संग देथिन्ह नाट्यकार श्री कृष्णचन्द्र झा'रसिक'(परजुआरि,डीह)।ओही समयसँ हुनका सभक मुँहें सुनियन्हि आदरणीय श्री रामलोचन ठाकुर जीक नाम। ओना तखन तक हम कलकत्ताक मिथिला-मैथिलीक गतिविधिसँ संलग्ने नहि छलहुँ। मुदा,बादमे हम विशेष रुचि लेबय लगलहुँ। ज्ञातव्य हो कि एहिसँ पूर्व पटना शहरमे रहैत ओतुका मैथिलक गतिविधिसँ रुचि रखैत रही। ई०सन् १९८६क एकटा घटना! हम मैथिली-सेनानी श्री बाबू साहेब चौधरी जीक विशेष आग्रहपर अखिल भारतीय मिथिला संघ कलकत्त्ताक सदस्य बनलहुँ। आ सक्रिय रुपेण संघक लेल काज करय लगलहुँ। तखन हम रिषड़ा(हुगली)मे रहैतरही। उपरोक्त 'संघ' आ श्रद्धेय चौधरी जीक सानिध्यमे रहैत चर्चाक्रममे हमरा ज्ञातव्य भेल जे आदरणीय श्री रामलोचन ठाकुरजी 'संघ'क सक्रिय सदस्य छलाह। प्राय:नब्बे दशकक प्रथम उतरार्धमे एक दिन 'अस्वस्थ्य' चौधरी जी हमरा आग्रह कयने रहथि:---"सुरेन्द्र जी! विशेष सूत्रसँ हमरा ज्ञात भेल अछि जे श्री रामलोचन ठाकुर जी बहुत अस्वस्थ्य छथि। अपनहि लोक छथि। अपन 'संघ'क शुभ चिंतक छथि।जौ आहाँसँ सम्भव हो तँ 'संघ'क दिशिसँ, हमरा दिशिसँ आ अपनहुँ दिशिसँ कृपया भेट क' अबितियन्हि तँ बहुत बढ़ियाँ होइत।।" हम हुनक प्रस्ताव के सहर्ष स्वीकारल आ कहने रहियन्हि---"चौधरी जी,कृपया, अपने हुनक पूरा पता-ठिकाना दी। हम एखनहि हुनकासँ भेट करबाक लेल जाएब।" की कहू! हम चौधरी जीसँ प्राप्त पता-ठिकाना ल' क' श्री राम लोचन ठाकुर जीक लेक गार्डेन्स स्थित निवास स्थानपर चारि बजे बेरु पहर पहुँचि गेल रही। हुनक कोठली तक पहुँचैत हम अजीबो गरीब स्थितिमे पड़ि गेल रही। देखने रही जे एकटा व्यक्ति अपन विस्तरपर पड़ल छथि आ हुनक एकटा पैरसँ डोरीसँ लागल -बान्हल किछु ईंटा विस्तरक फ्रेमसँ नीचा लटकि रहल छैक। हम पूर्वानुमाने पूर्ण आश्वश्त भेल रही जे इएह छथि ----'श्री मान् राम लोचन ठाकुर जी। हम हुनक पैर छुबि गोर लागल आ अपन पूर्ण परिचय दैत कहने रहियन्हि----"हमरा अपनेक ओतय अपनेक जिज्ञासार्थ एखन पठौलन्हि अछि श्रद्धेय श्री बाबू साहेब चौधरी जी। आ, आग्रह कयलन्हि अछि जे हुनक सेवा उपलब्ध करैबाक जौं बात होई से ठाकूर जी अबस्से कहथि। हम पूर्ण रुपेण तैयार छी| संगहि ,पूर्ण स्वस्थ्य भेला पर हम अबस्से भेट करबन्हि|" हमर बात सुनि ठाकुर जी बाज़ल रहथि:-" ठीक छैक ।आहाँ चौधरी जीकें कहबन्हि जे हम उतरोत्तर ठीक भ' रहल छी।आ,जौं हमरा हुनक कोनो सेवा लेबाक जरुरति पड़त तँ हम हुनका अबस्से सूचना देबन्हि।पहिने ओ स्वयं स्वस्थ्य होथि,से हमर कामना अछि। जे किछु,ठाकुर जीक घरमे किनको नञि देखि हम पूछने रहियन्हि:-"ठाकुर जी! अपनेक घरमे हम किनको नञि देखैत छियन्हि। एखन एहिठाम किओ छथि की नञि।"ओ आगा कहने रहथि:-"एखन किओ नहि छथि। सभ किओ गामेपर छथि।।"हम पुनि आगा पूछने लहियन्हि:-"की आहाँ अपना संबंधमे अपन पारिवारिक लोककें गाम पर सूचना देने छियन्हि।" ओ आगा बाजल रहथि:-"नहि, हुनका सभकें हम कोनो तरहक सूचना नहि देने छियन्हि ।आ,ने देबन्हि।हमर आग्रह अछि ,जे आहाँ बा चौधरी जी 'क अलाबे जेकियो होथि ,हमरा सम्बन्धमे,हमर गाम पर, हमर पारिवारिक कोनो सदस्यकें ,अपने लोकनि कोनो तरहक सूचना नहि पठबियन्हि।कारण,ओ लोकनि सुनितहिं घबड़ा जयताह आ दौड़ले कलकत्ता चलि औताह। तखन हमर सभ योजना बिगड़ि जाएत।" ठाकुर जीक उपरोक्त बात सुनि हम हुनका कहने रहियन्हि:-ठाकुर जी,एवमस्तु! हम सभ अपनेक निर्देशके अबस्से पूर्ण पालन करब। चिन्ता जुनि करी।" हम ठाकुर जीसँ पुन: पूछने रहियन्हि:-"ठाकुर जी! अपनेक संग ई दुर्घटना केना भ'गेल।ओ बाजल रहथि:-"सुरेन्द्रजी! हड़बड़ीमे हमर पैर 'स्लीप' क' गेल। ओकर बाद घरहिंपर डाक्टरी सलाह लेल। एक्स-रे कराओल गेल। पैरक हड्डी टुटि गेल। संबंधित डाक्टर प्लास्टर कयलन्हि। सूई-दबाई सभ देलन्हि। आ,कहलन्हि -'घरे पर आबि क' हम पुन: देखैत-सुनैत रहब। से आहाँ देखिते छी,हम ' ट्रैकिंग' पर छी।" हम पुन: आगा पूछने रहियन्हि:- ठाकुर जी !अपनेक क्रिया-कर्म आ घरेलू काज केना चलि रहल अछि? ओ बाजल रहथि:--"डाक्टरक अलाबे सभ दिन क' एकटा नर्स अबैत अछि।एकर अलाबे सभ दिन क' अही ठामक एकटा महिला(आया) भानस-भात क' दैत अछि। कपड़ा-लत्ता,बर्तन-बासन आ घर'क सफाई आदि क' दैत अछि। हम स्वयं 'स्टीक'क सहारे नित्य क्रिया-कर्म कहुना क' खूब सावधानीक संग क' लैत छी। आर की कहू,कष्ट तँ थोड़ेक अछिए। 'हम तखने अनुभव कयने रही जे ठाकुर जी एकटा बहुत जीवटगर आ संघर्षशील लोक छथि। हम पुन: आगा पूछने रहियन्हि-"ठाकुर जी!अपनेक ई प्लास्टर कहिया धरि कटत?" बाजल रहथि ठाकुर जी:-"हॅ, डाक्टर कहैत छथि जे पन्द्रह दिनक बादे प्लास्टर कटि सकैत अछि। आ,एखन धरि हमर स्थिति तँ ईएह अछि।मुदा,दुख अछि जे हम एखन आहाँ के चाहो नञि पीआ सकैत छी।कारण, चाह लाबय बला किओ नहि अछि। जे चाह थरमसमे छल से हम आहाँ आबयसँ पहिनहि पीबि चुकल छी।'"हम कहने रहियन्हि:-अपने एहि लेल बेशी चिन्ता नञि करी।" उपरोक्त बातचीतक बाद हम प्रस्थान करबाक लेल उद्यत भेल रही कि ठाकुर जी बाज़ार रहथि:-सुरेन्द्र जी!कनेक आर ठहरू।"ई कहैत ओ हमरा अपन लिखल एकटा मैथिली पोथी उपहार स्वरुप देने रहथि।हम कहने रहियन्हि:-ठाकुर जी!हम एखन उपहार स्वरुप ई पोथी नञि लेब।हम कोनो मैथिली पुस्तक प्राय:उपहार स्वरुपमे नञि लैत छी।कीन लैत छी। अपने लोकनि अपन निजी टाकासँ पोथी छपबैत छी।जौ उपहारे स्वरुप सभकें पोथी देबैकतँ दोसर-तेसर पोथी कोनो छपाएब?आहाँ सन मैथिली लेखक सभ प्राय: गरीबे होइत छथि।तैं हम एखन टाका देबे करब।अन्यथा नञि बुझी। जौं,सम्भब हैत तँ हमरा बादेमे उपयुक्त समयपर उपहार द'देब।" तत्काल हम टाका देल आ पोथी ल'लेल। मुदा,ठाकुर जी हमर तथाकथित उपकारकें नहि बिसरलाह। आ,पूर्ण स्वस्थ्य भेला पर कोनो उपयुक्त समय पर ओ अपन लिखल एकटा दोसर पोथी हमरा दए देलन्हि। ओकर बादो दोसर लेखकक लिखल 'फ्री'मे बाँटय बला पोथी सेहो समय-समय पर दैत रहलाह।धन्य छथि हमर सभक ठाकुर जी अर्थात्---श्री राम लोचन ठाकुर जी !! ओकर बाद श्री ठाकुर जीसँ अनुमति ल' हम पुन: हुनक पैर छुबि प्रणाम करैत प्रस्थान कयने रही!! ओही दिनक प्राय: आठ बजे साँझक समय हम श्री चौधरी जीकें श्री ठाकुर जीक स्वास्थ्य सुधारक संबंधमे सभ बात आबि कहने रहियन्हि।ओ बहुत खुशी भेल रहथिआ कहने रहथि:-"ठीक छैक । हम सभ हुनक स्वास्थ्यक संबंधमे कोनो सूचना हुनक गाम पर एकदम्में नहि पठयबन्हि। ओकर बाद चौधरी जी रुकलाह नहि। अबाध गतिएं ओ कहब शुरु कयने रहथि:-सुरेन्द्र जी! श्री शुकदेव ठाकुर जी आ श्री राम लोचन ठाकुर जी दुनू निज पितियौत भाई छथि। श्री शुकदेव जी कलकत्ता ट्राम (वेज)कंपनीमे काज करैत छथि। आ श्री राम लोचन जी एत्तहिं इनकम टैक्स विभागमे काज करैत छथि। दुनू भाई कर्मठ लोक छथि। दुनू भाई 'मिथिला संघ'क लोक छथि।शुकदेव जी 'संघ'अध्यक्ष रहथि।आ राम लोचन जी से हो 'संघ'क सचिव रहि चुकल छथि।बादमे ओ 'संघ'क नाटक विभागक प्रभारी बनाओल गेल रहथि।दुनू भांई नाटकक मांजल कलाकार छथि।राम लोचन जी तँ हमरा संग हमर लिखित नाटक 'चाणक्य'मे चन्द्र गुप्तक भूमिकामे रहथि। आ,हम चाणक्यक भूमिकामे रही। लोक सभ एखनो धरि कहैत छथि उक्त दुनूक भूमिकामे ऊक्त नाटक बेश मंचित भेल छल।जकर पुनरावृति भविष्यमे पुन: हैत कि नहि,से नञि जानि।एखन समयाभावमे दुनू भांई समय नञि द'रहल छथि।" ताहि पर हम आगा कहने रहियन्हि-"चौधरी जी! अपने ठीके कहैत छी। हम सेहो कलकत्ताक कतेको लोकक मुँहे ई बात सुनने छी। विशेष क' हमरा श्रीवैद्यनाथ झा जी(डुमराबला)सेहो एहि संबंधमे कहने छथि।" श्रद्धेय श्री बाबू साहेब चौधरी जी हमरा आगा कहने रहथि :-सुरेन्द्र जी! राम लोचन ठाकुर जी एकटा नीक जुझारू मैथिली क्रान्तिकारी छथि। ओ 'मैथिली मुक्ति मोर्चा बना क' पटनामे सफल आन्दोलन सेहो कयने छथि। ओ मैथिली जगतमे जानल-मानल लोक छथि। हमरा ओ ईहो कहने रहथि जे ओ मैथिलीक एकटा नीक कवि-लेखक आ साहित्यकार छथि। लेखन हेतु जे किओ हुनका प्रोत्साहित कयने हेथिन्ह ताहिमे हम सेहो एकटा लोक छी। ओ किछु मैथिली पोथीक प्रकाशन सेहो कयने छथि। आ,उतरोत्तर करैत रहताह। ओ मैथिली पत्र-पत्रिकाक सम्पादन सेहो करैत छथि" महामना श्रद्धेय चौधरी जी हमरा ईहो कहने रहथि:-सुरेन्द्र जी! श्री शुकदेव ठाकुर जी आ श्री राम लोचन ठाकुर जी हमर समधि सेहो छथि। हमर कनिष्ठ भ्राता राम प्रसाद(चौधरी)क जयेष्ठ बालककें शुकदेव ठाकुरजीक अपन एकटा कन्यासँ विवाह हमहीं करबौने छी। तैं हमरा सभक बीचमे एतेक आपकता अछि आ रहत।" आब श्रद्धेय श्री बाबू साहेब चौधरी जी नहि छथि। मुदा,ओ हमरा श्री रामलोचन ठाकुर जीक संबंधमे जे बात सभ कहि गेल छथि से एखनो धरि अक्षरशः मिलैत अछि। आ,हम पूर्ण अनुभव कयल अछि जे श्री राम लोचनजी अद्यावधि मिथिला-मैथिलीक नि: स्वार्थ सेवा क' रहल छथि। ओ हाल तक बहुतो मैथिली पुस्तकक प्रकाशन क' चुकल छथि। ओ विभिन्न पत्र- पत्रिकामे आलेख लिखैत रहलाह। कखनो छद्म नामसँ त' कखनो अपनहिं नामसँ। ओ हमरा सभ के कहला पर अ०भा०मिथिला संघ'क लेल श्रद्धेय (स्व०)श्री बाबू साहेब चौधरी जी द्वारा स्थापित-प्रकाशित पत्रिका' मैथिली दर्शन'क पुन: सम्पादन -प्रकाशनक भार उठौलन्हि। उक्त पत्रिका जनवरी २००४सॅ शुरु भेल । आ, दिसम्बर२००५तक प्रकाशित होइत रहल। मुदा,सन-२००६क जनवरी माहसँ 'संघ'क भूतपूर्व मुख पत्र आ मासिक पत्रिका'मिथिला दर्शन'क पुन: प्रकाशन शुरु भेल श्री मान् उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'जीक प्रधान सम्पादकत्वमे। आ ,श्री ठाकुर जी उक्त पत्रिकाक कार्यकारी सम्पादककें रुपमे काज करय लगलाह। फलस्वरुप 'मैथिली दर्शन'क प्रकाशन बन्द भ'गेल। तथापि श्री ठाकुर जीक सर्वस्तरीय सहयोग प्रसंशनीय रहल छल। एहि सभ उपरोक्त तथ्यक अतिरिक्त श्री राम लोचन ठाकुर जी समय -समय कोलकाता आ एकर उपनगरक मिथिला-मैथिलीक विभिन्न कार्यक्रममे सक्रिय रुपसँ भाग लैत रहलाह। ओ अपन सम्पादकीय लेखन आ भाषण सभमे प्राय: मौलिक तथ्य के सदा उल्लेख करैत रहलाह। जाहिसँ नवागत पीढ़ीक लोक सभ मिथिला -मैथिलीक अतीत आ वर्तमानक समस्या सभसँ अवगत होइत रहथि। हमरा दृष्टिएं श्री राम लोचन ठाकुर जी राजनैतिक रुपसँ एकटा सुच्चा कम्यूनिष्ट छथि। ओ अपना स्तरक उचितवक्ता आ सफल मैथिलीवादी लोक छथि। नोकरी करब हुनकर एकटा मजबूरी छलन्हि। लेखन हुनक एकटा व्यसन छन्हि। मिथिला-मैथिलीक निरन्तर सेवा करब हुनक परम धेय छन्हि। एहि अंतर्गत सम्पूर्ण मिथिलामे प्राथमिक स्तर पर शिक्षाक माध्यम मैथिलीए हेबाक सिद्धान्तक पक्षधर छथि। संगहि, 'मिथिला राज' निर्माणक प्रबल समर्थक छथि। एखन 'मिथिला दर्शन' पत्रिका पुन: चालू भेल अछि। परन्तु किछु मास पहिने एहि मासिक पत्रिका'क प्रकाशन हठात् बन्द भ' गेल छलैक। ओही समयमे ज्ञातव्य भेल छल जे श्री राम लोचन ठाकुर जी अपन शारीरिक अस्वस्थ्यताक कारणें एकर सम्पादन सहयोग बन्द क' देलन्हि अछि। आ,ओ चिकित्सा करबा रहल छथि।एक दिनक बात।प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक श्रीगंगा झा जी फोनक कयलन्हि जे हम श्री ठाकुर जीसँ भेटकरबाक हेतु हुनक निवास स्थान पर जाएब।कृपया अपने अबस्से आउ। एकहिं संगे दुनू आदमी जाएब। सैह भेल।दुनू आदमी हुनका भेंट केलियन्हि। देखल जे उत्तरोत्तर हुनक स्वास्थ्यमे सुधार भ' रहल छन्हि।हुनका संग प्राय:एक घंटा बातचीत कयल। ओ चाह पीऔलन्हि। अंतमे हम दुनू व्यक्ति हुनक सुखद स्वास्थ्यक कामना करैत प्रस्थान कयल। योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ रामलोचन ठाकुरक व्यक्तित्व : एक दृष्टिकोण रामलोचन ठाकुर कें हम पछिला सोलह-सत्रह साल सँ जनैत छिऐनि। हुनकर किछु साहित्यिक कृति पढ़ल अछि। साहित्यक मूल्यांकन करबाक अवगति हमरा नहि अछि, मात्र हम हुनक व्यक्तित्वक किछु खास अंश पर अपन अवलोकन एतए प्रस्तुत करैत छी। 2004 के अन्त अथवा 2005 के शुरु के समय, हम कलकतिया साहित्यिक समाज मे घोंसियेबाक चेष्टा करैत रही आ सम्पर्कक मासिक बैसार मे जाएब शुरु कएने रही। ओहि समय ई बैसार कॉलेज स्ट्रीट बला राजेन्द्र छात्र निवास मे कोनो कोठरी मे भेल करै। एहने एक बैसार मे अकस्मात रामलोचन जी अपन एकटा पुस्तक ‘स्मृतिक धोखरल रंग’ लेने अएलाह आ एतबा कहि जे ‘एकर विमोचन वैज्ञानिकजी करताह’ हमरा हाथें ओकर विमोचन करबौलनि। ओ किताब हमरा पहिने सँ देखल नहि छल। हम ओहि विषय पर किछु बजबा मे असमर्थ छलहुँ, मुदा विमोचनक प्रक्रिया सम्पन्न भेल। किताब मे हमरा पहिल बेर किछु अटपट लागल — मुखपृष्ट पर किताबक नाम आ लेखकक नाम मात्र मिथिलाक्षर (जकरा हम सब बच्चा मे तिरहुता लिपि नामे सिखने छलहुँ) मे लीखल। देवनागरी निपत्ता। बगल के फ्लैप पर जरूर देवनागरी मे ओएह बात लीखल छलैक, किन्तु एहन व्यवहार हम पहिल बेर देखि रहल छलहुँ। पुरान मैथिली लेखक लोकनिक कतेको पुस्तक एहन देखने छी जाहि मे मिथिलाक्षरक व्यवहार भेल छलैक मुदा संगहि देवनागरी सेहो रहितहिं छलैक, से बरू छोटे अक्षर मे किएक ने होइक।तकर बाद हुनकर आनो पुस्तक सब देखबाक आ पढ़बाक अवसर भेटल। हुनकर पुरना किताब सब, जेना ‘मैथिली लोककथा’ (1983), ‘अपूर्वा’ (1996), ‘लाख प्रश्न अनुत्तरित’ (2003) आदि सब मे ओएह ढाठी। ‘आँखि मुनने आँखि खोलने’ (2005) मे देखैत छी मुखपृष्ट पर दूनू लिपिक व्यवहार। तकर बाद अनुवाद बला किताब सब मे मिथिलाक्षर निपत्ता। बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे एहि प्रयोगक की औचित्य छलैक ? किछु गोटे एकरा रामलोचनजीक हठधर्मिता कहि सकैत छथि मुदा हमरा विचारें एकर गूढ़ अर्थ छलैक। मैथिली सेनानी रामलोचन ठाकुरक लेल मैथिली भाषाक संगहिं लिपिक महत्ता समतुल्ये छलनि। ओ मैथिल समाज कें इएह सन्देश देबऽ चाहैत छलखिन जे अपन लिपि कें बिसरब उचित नहि। मिथिलाक्षरक हटा देब मैथिली लेल कतेक लाभदायक आ कि हानिकारक भेलैक ताहि बहस मे हम एतए नहि जाए चाहैत छी मुदा एतबा बता देब जरूरी बुझैत छी जे मिथिलाक बाहर जे विद्वान मैथिली भाषा आ संस्कृति सँ सिनेह रखैत छथि आ भाषाक संग लिपिक महत्व बुझैत छथिन, हुनका नजरि मे लिपि कें हटा देब मैथिली लेल महान गलती भेल। ओना तऽ अनेको एहन उद्धरण देल जा सकैत अछि, मुदा एहि प्रसंग हम अपन अनुभव बतबैत छी। 2014 मे केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तेजपुर (असाम) मे भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) के वार्षिक मीटिंग भेल छलैक। ओहि मे असमियाक प्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर नगेन साइकिया अतिथि वक्ताक रूप मे अपन व्याख्यान प्रस्तुत कएने रहथि। व्याख्यानक अन्त मे हमरा हुनका संग किछु गप-सप भेल छल। ओही क्रम मे ओ ई विचार व्यक्त केलनि जे लिपि कें हटाएब मैथिलीक लेल बहुत हानिकारक भेलैक। समयक संग रामलोचनजीक एहि विचार मे किछु परिवर्तन भेल। एकटा आर अवलोकन — मिथिलाक्षर बला किताब सन हिनकर स्वयं प्रकाशित छलनि। एकर विपरीत अनुवाद पुस्तक सब अन्य प्रकाशन सँ — जेना ‘पद्मा नदीक माझी’ (2009) मिथिला सांस्कृतिक परिषद कलकत्ता सँ, ‘कठपुतरी नाचक इतिकथा’ (2016) साहित्य अकादमी सँ आ ‘अयाची संधान’ (2018) किसुन संकल्प लोक, सुपौल सँ। की मिथिलाक्षरक अनुपस्थिति कें प्रकाशक सँ जोड़ि सकैत छिऐक ? आ कि लेखक स्वयं एहि निष्कर्ष पर आबि गेलाह जे ई व्यवहार अनुपयोगी भऽ गेलैक ? कहब कठिन कारण एहि विषय पर हमरा हुनका संग चर्चा नहि भेल। ‘स्मृतिक धोखरल रंग’ नामहि सँ बुझना जाइछ जे पुस्तक संस्मरणात्मक लेख सबहिक संकलन अछि। एहि मे मुख्यतः चर्चा अछि मैथिली आन्दोलन मे कलकत्ताक योगदान, जाहि मे रामलोचनजी कोनो ने कोनो रूप मे अपने सहभागी छलाह। पुस्तक पढ़ला सँ हम मैथिली आन्दोलन मे कलकतिया मैथिल समाजक योगदान बूझि पौलहुँ। ‘मैथिली लोककथा’ पहिल बेर छपल 1983 मे। ई कोनो मौलिक कृति नहि कहल जेतैक मुदा समाजक धरोहरि कें सम्हारि कए एकत्रित करबाक काज भेलैक। खिस्सा पिहानी बच्चा मे सब गोटे सुनने छी माए-बाबू, काका-काकी, दादा-दादी, नाना-नानी अथवा परिवारक आ समाजक अन्य लोक सबसँ। विश्वक सब समाज मे अनेक रूप मे ई खिस्सा-पिहानी प्रचलित छैक जाहि सँ बच्चाक लेल मनोरंजनक अतिरिक्त बहुमूल्य शिक्षा सेहो भेटैत छैक। सब भाषा मे एहन खिस्सा सब के छोट-पैघ संकलन सेहो कएल गेल छैक। सत्य बजबाक नीक फल, झूठ बजबाक खराप फल, इमानदारीक महत्व, परिश्रमक फल, अतिथि सत्कारक महत्व, कर्तव्याकर्तव्यक बोध आदि अनेको विषयक परिचय आदि काल सँ बच्चा कें एहि खिस्सा सब सँ भेटैत रहलैक अछि। लोककथाक स्वरूप देश-कोस बदलि गेला सँ बदलि जाएब स्वाभाविके। एके गाम मे दूटा कथा वाचक एके कथा कें कलेवर कने बदलैत सुनबैत भेटि जाएब असम्भव नहि। कतहु कने पात्र बदलि गेल तऽ कतहु कने दृश्य। ई खिस्सा सब छिड़िआएल छैक आ समयक संग बहुतो खिस्सा लोक बिसरि जाइत रहल अछि। खास कऽ कए बदलैत सामाजिक परिवेश मे, जतए नानी, दादी बला संयुक्त परिवार उठि गेलैकए आ युवा पति-पत्नीक न्यूक्लियर परिवार रहि गेलैकए, खिस्सा कहबाक लेल पुस्तक बहुते आवश्यक बुझाइत छैक। रामलोचनजी एहि आवश्यकता कें बुझलनि बहुत पहिनहि आ तें संकलित केलनि लोककथा कें। लोककथाक संकलित साहित्य सब विकसित भाषा मे बहुत समृद्ध छैक। ए. के. रामानुजन लिखित अंग्रेजी किताब Folktales from India, जाहि मे भारतक बाइस भाषाक चूनल 110 टा लोककथा छैक, एतेक उपयोगी भेलैक जे ओकरा बंगला अनुवाद केलनि महान विदुषी लेखिका महाश्वेता देवी। एकर मैथिली अनुवाद सम्भवतः नहिए भेल छैक। बंगला भाषा मे अनेको पुस्तक छैक लोककथा विषय पर। तथापि महाश्वेता देवी सन महान साहित्यकार ए. के. रामानुजन लिखित अंग्रेजी किताब के बंगला अनुवाद केलनि। बाइस भाषा मे ई नहि मानि बैसबैक जे मैथिलीओ छैक। एहि अंग्रेजी किताब मे मैथिलीक कोनो कथा नहि छैक। छिड़िआएल लोककथा सब कें एक ठाम लीखि कए पाठक कें परोसि देब महत्वपूर्ण योगदान बूझल जेबाक चाही। रामलोचनजी अपन एहि पुस्तक कें समर्पित केलनि मैथिली लोकसाहित्यक अनन्य उपासक डा० ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’, राजेश्वर झा आ अणिमा सिंह कें। एहि मे कुल 36 गोट कथा छैक, सब रुचिगर। विध-विधाताक खिस्सा सँ लऽ कए समाजक प्रायः सब वर्गक प्रतिनिधित्व छैक एहि संग्रह मे। ठक, आलसी, चतुर, सेठ-साहूकार, लोभी, दानी, विद्वान आ महामूर्ख सब के खिस्सा भेटत अपने कें एहि संकलन मे। मैथिली लोककथाक छोटमोट संकलन पहिनहु प्रकाशित भेल छलैक किन्तु एतेक पैघ नहि। पाठकवर्ग सेहो एकर महत्व कें बुझलक आ पुस्तक के पहिल संस्करण जल्दीए शेष भऽ गेल। तखन 2006 मे आएल दोसर संस्करण। बहुत दिन बाद 2017 मे किछु आर बेसी खिस्साक संग आएल योगानद झा संकलित आ साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘मिथिलाक लोककथा संचय’। रामलोचनजीक ई प्रयास एकटा अमूल्य निधि भेलैक मैथिली साहित्य लेल। अस्वस्थताक कारण वर्तमान मे ओ निष्क्रिय भऽ गेल छथि। ईश्वर सँ प्रार्थना जे हुनका शीध्रे स्वस्थ कराबथि जाहि सँ मैथिली साहित्यक भंडार मे किछु आर योगदान होइक। पिरामिडक देश मे १ हमरा सबहिक सनातन धर्म दर्शनक अनुसार मनुष्य योनि मे जन्म लेनिहारक सबसँ पैघ इच्छा रहैत छैक पुनर्जन्मक चक्र सँ छुट्टी भेटब आ मोक्षक प्राप्ति जाहि मे मनुष्य वैकुण्ठलोक पहुँचि जाइत अछि। विभिन्न शास्त्र पुराणक अनुसार मोक्ष प्राप्त भेला सँ पहिने लोक निरन्तर जन्म लैत रहैत अछि। अगिला जन्म मे कोन योनि मे जन्म लेत से ओकर कर्मक फल पर निर्भर करैत छैक। ओना तऽ ई कहब कठिन छैक जे कोन तरहक कर्म केला सँ लोक मोक्ष प्राप्त करैत अछि आ यदि ककरो मोक्ष भेटियो जाइत छैक तऽ ओकर की परिचय अथवा चिन्ह होइत छैक मुदा मानि लेल जाइत छैक जे कोनो बहुत धर्मात्मा व्यक्ति कें एहि तरहक गति भेटैत हेतनि। जे किछु होइ, मुदा मृत्युक बाद एहि पार्थिव शरीर कें सनातन धर्म मे कोनो महत्व नहि छैक तें एकरा आगि मे जरा देल जाइत छैक। आब सोचियौक यदि मोक्षक बदला अपने कें कहल जाए जे बहुत नीक कर्मक फल सँ अपने फेर अगिला जन्म मे कहियो ओही शरीर मे आबि जाएब, तखन कोन तरहक तैयारी करबैक ? शरीर कें बचा कए राखब तखन जरूरी भऽ जेतैक ने। एहि पार्थिव शरीर कें बचा कए राखब कतेक कठिनाह हेतैक ? ठंढा प्रदेश मे किछु बेसी दिन तक तऽ सुरक्षित राखलो जा सकैत छैक मुदा गर्म जलवायुक प्रदेश मे तऽ मुश्किले। देखिते छिऐक जे किछुए घंटा मे मृतक के शरीर अकड़ि जाइत छैक आ एकाध दिनक बाद ओकर क्षय शुरु भऽ जाइत छैक, ओहि सँ दुर्गन्ध बहराए लगैत छैक। प्राचीन मिस्र मे एहि तरहक मान्यता छलैक जे नीक काज केला सँ राजा मृत्युक बाद फेर कहियो ओही शरीर मे प्रवेश करैत जन्म लेताह। तें खास कऽ कए राजपरिवारक बीच एहि लेल प्रयास कएले गेलैक आ ओहि समाज मे शरीर कें सुरक्षित रखबाक फर्मूला ताकि लेल गेल। सुरक्षित शव कें, जकरा ‘ममी’ कहल गेलैक, कएक तह के ताबूत मे बन्द कऽ कए विशेष कक्ष मे राखल जाइत छलैक जकरा उपर पैघ पाथर राखि देल जाइत छलैक जे कोनो तरहें यदि कनियो दुर्गंध निकलबो करतै तऽ सियार कुकुर आदि कें ओहि शव तक गेल नहि होइक। एहि पाथर कें मस्तबा कहल जाइत छलैक। अफ्रिका मे जीवनदायिनी नील नदीक कछेर मे विकसित मिस्र देशक सभ्यता प्राचीन तऽ छैके, कतेको हिसाबें प्राचीनतम सभ्यता सब मे अद्वितीय सेहो। ओतुका पिरामिड संसारक सात आश्चर्य मे एक मानल जाइत रहलैक अछि। मिस्रक सभ्यताक बारे मे बच्चा मे इतिहास मे जे पढ़ने छलहुँ ताहि सँ ओतए जाकए देखबाक इच्छा तऽ छलेहे, हाल मे इंटरनेट पर अनेको सामग्री उपलब्ध भेला सँ मिस्र भ्रमणक उत्सुकता बढ़िते गेल। भ्रमण लेल हम पहिने अपन विश्वासी ट्रैवल एजेंट बंगलोरक वियोन्डर सँ सम्पर्क कएल। वियोन्डरक टीम मे श्रीनिवास सेनॉय मिस्रक विशेषज्ञ छथि आ मिस्र टूर पर कतेको ब्लॉग लिखने छथि। मुदा छोट संस्था रहलाक कारणें ओ कम्पनी हमरा लेल कोनो एहन टूर ग्रुपक जोगार नहि कऽ सकल जे सुविधाजनक होअए। अन्त मे श्रीनिवास अपनहि सुझाव देलनि जे हम थोमस कूक टूर कम्पनीक मिस्र पैकेज मे यात्रा करी। टूर पर जेबा सँ पहिने श्रीनिवास हमरा मिस्रक दर्शनीय स्थल, इतिहास, आदिक बहुत जानकारी देलनि। ओएह बतौलनि जे एकटा प्रख्यात अमेरिकन ईजिप्टोलॉजिस्ट श्रीमान बॉब ब्रॉयर अठतालीस लेक्चर के एकटा ऑडियो बुक बनौने छथि, ओहि ऑडियोबुक कें फोकटे मे कोना डाउनलोड कएल जा सकैत छैक। हम सेहो कएल। बॉब ब्रायर लिखित ओही ऑडियोबुक के संक्षिप्त रूपरेखा के एकटा पीडीएफ सेहो इंटरनेट पर भेटि गेल। एहि स्रोत सबसँ मिस्रक प्राचीन सभ्यताक आधुनिक ज्ञान सँ परिचित भेलहुँ। श्रीनिवास थोमस कूक के पैकेज मे दूटा परिवर्तन सेहो करौलनि — दोसर दिनक एलेक्जेन्ड्रिया टूरक बदला गीजाक आसपास के सकारा आ दहसुर नामक जगह, जतए प्राचीनतम पिरामिड छैक। सकारा मे तऽ बहुते किछु छैक जे हम आगू लिखब। दोसर परिवर्तन छल टूर कें एक दिन बढ़ा कए लक्जर के आसपास डेन्डारा आ आबीदोस मे प्राचीन मंदिर सब देखब। यद्यपि एहि लेल हमरा अतिरिक्त खर्चा लागल मुदा एहि लेख कें अन्त तक पढ़लाक बाद अपने कें विश्वास भैये जाएत जे ओ अतिरिक्त खर्चा बहुत उपयोगी छल आ हम कहि सकैत छी जे ओकरा बिना टूर किछु हिसाबें अपूर्णे रहि जइतए। थोमस कूक के सात-राति-आठ-दिनक पैकेज मे तीन दिन राजधानी काहिराक उपनगर गीजा मे पाँच सितारा होटल मे रहबाक, तकर बाद तीन राति नील नदी पर ओहने बहुत नीक जहाज पर रहबाक आ अन्तिम राति लक्जर शहर मे फेर पाँच सितारा होटल मे रहबाक व्यवस्था छलैक। खर्चाक चर्चा हम एतए नहि करैत छी कारण एहि मे करीब आधा भाग विदेशी मुद्रा के छैक आ ओकर विनिमय दर बदलैत रहैत छैक। कहबा लेल मिस्रक टूर बारहो मास चलैत छैक मुदा नीक समय नवम्बर सँ फरवरिए तक रहैत छैक। तकर बाद गर्मी। हमर टूर 17 सँ 24 सितम्बर 2019 तक छल। माने भेल 17 सितम्बर कें पहुँचनाइ आ 24 कें भोरे बिदा भऽ गेनाइ। एकरे कहल जाइत छैक सात-राति-आठ-दिनक (7N8D) पैकेज। बिदा हेबाक तिथि सँ मात्र चारि दिन पहिने टिकट आ मेडिकल इन्स्योरेन्स पेपरक संग सातो राति लेल होटल के नाम, यात्राक एडवाइजरी आदि सब किछु थोमस कूक ईमेल सँ पठा देलक - सबटा सॉफ्ट कॉपी। प्रिंट अहाँक काज छी लेबाक होअए तऽ लीअए नहि तऽ सॉफ्ट कॉपी सँ काज चलाउ। ओना एडवाइजरी मे कहल गेल छल जे प्रिंट जरूरे लऽ लेब। उचिते, कारण यदि कतहु मोबाइल हरा गेल अथवा भंगठा गेल तखन सॉफ्ट कॉपी कतए सँ आओत ? जे किछु, एक प्रति सब चीजक प्रिंट लऽ कए रखलहुँ। हमरा 16 सितम्बर कें साँझ मे कलकत्ता सँ मुम्बइ जेबाक छल, ओतए छओ घंटाक प्रतीक्षाक बाद 17 सितम्बर कें तीन बजे भोर मे ईजिप्ट एयर सँ काहिराक यात्रा। कहल गेल जे काहिरा एयरपोर्ट पर टूर मैनेजर प्रतीक्षा करैत रहताह। ओतहि ग्रुपक अन्य सदस्य सब सँ भेंट होएत। सबेरे स्थानीय समय ठीक साढ़े पाँच बजे हम सब काहिरा एयरपोर्ट पर उतरि गेलहुँ। आश्चर्य लगैत छल जे एतेक सबेरे पहुँचलाक अछैतो थोमस कूक आजुक भरि दिनक कोनो कार्यक्रम नहि रखने छल। अस्तु, हवाइ जहाज सँ बहराइते थोमस कुक के एकटा स्थानीय प्रतिनिधि अपन बैनर लेने भेटला, कहलनि, चलू चेकइन लगेज लेबाक बेल्ट लग सब गोटे प्रतीक्षा करू। एतए गोटागोटी ग्रुपक किछु सदस्य सँ भेंट होइत गेल। सबकें एकत्रित करबा मे कने समय तऽ लागिए गेलैक। अन्त मे करीब साढ़े सात बजे हम सब बाहर निकलि बस मे सबार भेलहुँ। एखन मात्र अठारह गोटे ग्रुप मे छलहुँ। एतए बस मे थोमस कूकक भारतीय टूर मैनेजर पहिल बेर उपस्थित भेलाह, ओ अपन परिचय देलनि इन्द्रजित देशमुख नाम सँ। बर बेस, आगू बिदा भेलहुँ। हमरा सबहिक होटल काहिरा शहरक उपनगर गीजा मे छल आ प्रसिद्ध पिरामिड सँ मात्र एकाध किलोमीटर के दूरी पर। मुदा एयरपोर्ट सँ बेस दूर। रस्ता मे एकठाम बस ठाढ़ कऽ कए यात्री लेल जलपान लेल गेल। एहि मे सैंडविच सदृश एक प्रकारक स्थानीय स्टफ्ड ब्रेड, जकरा फलाफेल कहल जाइत छलैक, के दू पीस आ किछु फल, लतामक जूसक डिब्बा आदि छलैक। एकर अतिरिक्त पीबाक लेल डेढ़ लीटरक जलक बोतल सेहो देल गेल। हमरा सबकें बुझा देल गेल जे आजुक दिन भरिक लेल जलपान आ लंच सब किछु इएह भेल। करीब डेढ़ घंटाक बाद होटल पहुँचलहुँ। होटल नाम गुण पाँच सितारा बला छलैक। बेस पैघ लॉबी। हमरा सब एतेक पैघ लॉबी मे जेना हरा गेलहुँ। एतए रूम भेटबा मे मुदा बेस देरी लागल। तकर कारण जे साधारणतः एतेक सबेरे रूम सब तैयार नहि रहैत छैक। मिस्र मे होटलक चेकइन समय दुपहरिया मे दू बजे छैक। इन्द्रजित हमरा सबहिक पासपोर्ट आ रिटर्न टिकटक छापल प्रति जमा केलनि आ एकटा होटल स्टाफक संग लगला रूम दिएबाक तैयारी मे। लोक कें फ्री वाइफाइ होटल मे प्रवेश करिते भेटि गेल छलैक तें सोचिये सकैत छिऐक सब अपन अपन मोबाइल फोन पर व्यस्त भऽ गेल। रूम भेटबाक ओतेक हड़बड़ी आब नहि छलैक। आइ बीस साल पहिने लोक कें प्रतीक्षा अखरितैक, लॉबी मे लोक टहलैत रहैत, मात्र किछु स्थानीय अखबार अथवा कोनो मैगजीनक पन्ना उनटबैत रहैत मुदा आब ई मोबाइल आ वाइफाइ सब व्यवहार कें बदलि देलक। कोनो शिकाएत नहि। स्थानीय मुद्रा लेल होटलक लॉबीए मे एटीएम मसीन छलैक। लोक सब अपना आवश्यकताक हिसाबें डॉलर भजा कए मिस्रक ईजिप्सियन पौंड लैत गेल। हमहूँ एक सौ डॉलर के ईजिप्सियन पौंड लेल। इन्द्रजित बुझा देने छलाह जे विनिमय दर सबतरि एके छैक। अस्तु, करीब दस बजे हमरा चाभी देल गेल। बुझा देल गेल जे एखन भरि दिन अपनहि पर छी, जे मोन होअए से करू। साँझ मे साढ़े छओ बजे ग्रुप जाएत ‘साउन्ड एन्ड लाइट’ शो देखबा लेल। तकर बाद एही होटल मे आबि हम सब अलग सँ भारतीय भोजन करब। माने साढ़े छओ बजे सँ थोमस कूकक जिम्मा मे सब यात्री आबि जेताह। रूम गेलहुँ, स्नानादि सँ निवृत्त भेलहुँ। तकर बाद पैकेट मे बचल सामान सधा देलियैक। भारतीय समयक अनुसार एखन करीब अढ़ाइ बाजि रहल छलैक तें लंचक बेर तऽ भैए गेल छलैक। आब आगूक दिन खाली छल। होटलक रूम मे बैसि दिन बिताएब अखरि रहल छल। थोमस कूकक प्रोग्रामक हिसाबें पिरामिडक दर्शन तेसर दिन कराओल जाइत। ताहू मे समस्या छल जे पैघ ग्रुप मे रहैत कतेक फैल सँ सब किछु देखि सकब। अपन कम्बोदिया यात्रा मे एकसर टूर करबाक लाभ देखिये लेने छलिऐक। मोन मानैत नहि छल। नीचा उतरि होटलक ट्रैवेल डेस्क पर पुछारी कएल। कहल गेल जे दू घंटाक लेल कार सँ घुमला पर करीब 600 पौंड लागत। बेसी समय भेला पर प्रति घंटा 200 पौंड अतिरिक्त। बर बेस। हम एकटा गाड़ी कऽ लेलहुँ। ड्राइवर अंग्रेजी बजैत छलाह। ईहो नीके। एखन ओएह हमर गाइड भऽ गेलथि। ओना तऽ ई ड्राइवर महोदय ईजिप्टोलॉजी पढ़निहार कोनो प्रशिक्षित गाइड नहि छलाह मुदा जखन मंडन मिश्रक गामक परिचारिका सब शास्त्र चर्चा कऽ सकैत छलीह तखन ई मिस्रवासी ड्राइवर, जे टूरिस्टे सबकें घुमबैत रहल छथि, किएक ने जरूरी ज्ञान रखताह ? से ओ हमरा बहुत किछु बुझबैत गेलाह। पिरामिड परिसर कें बुझबा लेल मिस्रक किछु इतिहास बूझब जरूरी। तखने ईहो बुझबा मे आओत जे टूरिस्ट पिरामिडक भीतर जेबा लेल किएक उत्सुक रहैत छथि आ ओकर की महत्व छैक ? मिस्रक इतिहास पर कतेको हजार पोथा सब लिखल गेल छैक आ ईजिप्टोलॉजी एखनहु महत्वपूर्ण शोध विधा छैक जकर अध्ययन चलिते छैक आ पोथा सब लिखाइते छैक। तथापि एहि भ्रमण लेख कें बुझेबा लेल जे लघुरूपक इतिहासक जानकारी चाही से हम लिखैत छी। विद्वान लोकनि प्राचीन मिस्रक इतिहास कें तीन भाग मे बँटैत छथि — प्राचीन साम्राज्य (old kingdom), मध्य साम्राज्य (middle kingdom) आ नवीन साम्राज्य (new kingdom) जे प्रायः ईसा पूर्व 3500 वर्ष सँ शुरू होइत ईसा पूर्व 300 वर्ष तक चलल। एहू तीन साम्राज्यक भीतर अनेक वंश (dynasty) के शासन रहलैक। तकर बाद तऽ यूनानी शासन आबि गेलैक, सिकन्दर (Alexander) आ हुनक वंशज राज्य करए लगलाह, एलेक्जैन्ड्रिया शहर अस्तित्व मे आएल आ कतेको शताब्दी तक देशक राजधानी सेहो रहल। तकर बाद अबैत गेलाह रोमन साम्राज्यक राजा लोकनि। मिस्रक इतिहास कें बुझबा लेल कने ओकर भूगोल पर सेहो ध्यान देबए पड़त। दक्षिण सँ उत्तर जमीन नीचा ढाल पर छैक, तें नील नदी दक्षिण सँ उत्तर दिस बहैत भूमध्यसागर मे मिलैत छैक। नील नदीक पूब पच्छिम दूनू कात किछु दूर तक, जतेक मे नदीक जल बाढ़िक कारण पसरि जाइत छलैक आ लोक कें जलक सुविधा उपलब्ध रहैत छलैक, एकटा पातर पट्टी जकाँ क्षेत्र मे सभ्यताक उदय भेलैक। सागर मे समाहित हेबा सँ पूर्व नदी कें अनेक भाग मे बँटि गेला सँ ओहि क्षेत्र मे डेल्टा जकाँ बनैत छैक, बस बूझि लिअऽ जहिना गंगा कें समुद्र मे मिलबा काल सुन्दरवनक डेल्टा बनल अछि। ई डेल्टा क्षेत्र तऽ उन्नत कृषिक उपजाउ क्षेत्र रहबे केलै। मिस्रक वर्तमान राजधानी काहिरा (Cairo), गीजा प्लेटो, सकारा आदि एही इलाका मे अवस्थित छैक। नील नदीक कछेरक उपजाउ इलाका कें छोड़ि पूब आ पश्चिम दूनू कात विशाल मरुभूमि — अफ्रिकाक नामी सहारा मरुभूमिक अंग। मिस्रक दछिनबरिया भाग कें Upper Egypt आ उतरबरिया भाग कें Lower Egypt सेहो कहल जाइत छैक। कबीलाइ साम्राज्यक समय ई दूनू भाग अलग शासन के कब्जा मे छल आ दूनू भाग मे परस्पर युद्ध चलिते रहैत छलैक। कबीलाइ लोक सब कें एक सूत्र मे बान्हि देश कें सुगठित शासन देब शुरू भेल प्राचीन साम्राज्य सँ जाहि मे राज्यक मुखिया कें फैरो (pharaoh) कहल जाइत छल। शुरुएहि सँ ई बात प्रचारित कएल गेल आ जनता मानि लेलक जे फैरो ईश्वरक अवतार होइत छथि, हुनका मे विशेष दैवी गुण होइत छनि। ई आस्था ओहिना छल जेना आर्यावर्त मे राजा कें इन्द्रक अवतार मानल जाइत छल। फैरो सब कें महिमा मन्डित करबा लेल पन्डित चाहबे करी से ओतहु भेल। विभिन्न प्राकृतिक घटना सँ सम्बन्धित देवता गढ़ल गेलाह आ हुनका लोकनिक अर्चना आरम्भ भेल। एहि मे मुख्य छल सूर्यक तीन रूप मे देवता — भिनसर के बालरविक रूप, मध्यान्हक तेज रवि आ अस्त होइत समयक निश्तेज रवि। एकर अतिरिक्त जाहि जीवजन्तु सँ लोक कें भय भेलैक ओकरो देवताक मान्यता भेटलैक, तहिना जकरा बहुत उपयोगी बूझल गेल तकरो दैवीय पद भेटलैक। एहि सबहक चर्चा हम बाद मे करब। सब साम्राज्य मे नील नदीक पुबरिया भाग आ पछबरिया भागक महत्व अलग रहलैक। पूब मे जेना कि सूर्योदय होइत छैक, एहि भाग कें उगैत जिनगीक रूप बूझल गेल। एकर विपरीत पच्छिम मे सूर्य अस्त होइत रहलाह तें एहि भागक जमीन कें सेहो जिनगीक अस्तक रूप बूझल गेल। तें सब वंश मे जतेक समाधि, पिरामिड आदि बनल से सब नदीक पछबरिया भाग मे। गीजा प्लेटो सेहो नील नदीक पछबरिया भाग मे अवस्थित अछि। तहिना सबटा पिरामिड। गीजाक तीनटा मुख्य पिरामिड प्राचीन साम्राज्यक चारिम वंश (Fourth Dynasty), जकर समय ईसापूर्व 2575 सँ 2465 तक मानल जाइत छैक, के दोसर फैरो (सम्राट) खुफु, हुनक पुत्र आ चारिम फैरो खाफ्रे आ हुनक पौत्र आ पाँचम फैरो मेनकौरे द्वारा बनाओल गेल छलैक। प्रथा छलैक जे फैरो सब अपनहि शासन काल मे अपन मृत्युस्थलक चुनाव कऽ कए पिरामिड आ मोर्च्यूअरी टेम्पल बना लैत छलाह जाहि सँ हुनका मरलाक बाद शरीर कें ममी बना कए ओहि मे राखल जा सकए। एतुका तीनटा पिरामिड मे खुफुक पिरामिड सबसँ पैघ अछि। एकर आधार करीब 230 मीटर आ मूल ऊँचाइ 146 मीटर अछि। तहिना खाफ्रेक पिरामिडक आधार 216 मीटर आ उँचाइ 143 मीटर छलैक। मेनकौरेक पिरामिडक आधार 109 मीटर आ उँचाइ 66 मीटर छलैक। खुफुक पिरामिड कें ग्रेट पिरामिड कहल जाइत छैक। मिस्रक इतिहास मे एकटा आर महत्वपूर्ण घटना छलैक करीब दू हजार साल पहिने भेल विध्वंसकारी भूकम्प। एहि दुर्घटना मे बहुत रास स्मारक नष्ट भऽ गेलैक आ पिरामिड सब सेहो धँसि गेलैक। तें वर्तमान मे ग्रेट पिरामिडक ऊँचाइ मात्र 139 मीटर रहि गेलैक अछि। भूकम्पक प्रभावक वर्णन एहि यात्रा कथा मे आगू बहुत ठाम भेटत। प्राचीन मिस्र मे देवाल पर चित्र बनाएब आ पापीरस पर चित्र आ अक्षर लीखब ईशापूर्व करीब 3500 वर्ष पहिनहि शुरू भऽ गेल छलैक। एहि लिखावट कें हाइरोग्लिफ कहल गेलैक। प्रायः एही समय आर्यावर्त मे सेहो सिन्धु घाटी सभ्यताक उदय भेल आ हरप्पा आदि जगह मे लिखावट शुरू भेल होएत। भाग्यशाली रहल मिस्रक समाज जे एहि प्राचीन लिखावट कें पढ़बाक कुंजी उनैसम शताब्दी मे भेटि गेलैक आ प्राचीन मिस्रक सम्पूर्ण इतिहास आधुनिक विश्व मे जगमगा गेलैक। एकर विपरीत हमरा लोकनि हरप्पाक लिपि एखनहु पर्यन्त पढ़ि नहि सकलहुँ, ओ कुंजी हरा गेल अछि अथवा बनाओले नहि गेलैक। कतेक विरोधाभास जे खजूर खेबाक लूरि लोक मोन पाड़ने रहल आ आम खेबाक लूरि बिसरि गेल ! ओना तऽ एयरपोर्ट सँ गीजा अबैत आ होटल पहुँचैते विशाल पिरामिडक दर्शन लोक कें होमए लगैत छैक मुदा परिसरक भीतर नजदीक गेला पर विश्वक एहि प्राचीन आश्चर्यक सामने ठाढ़ भेल लोक कें एक बेर विस्मय सँ जरूरे आहि बहरेतैक। ओतेक पुरान जमाना मे, जखन कोनो मसीन नहि बनल छलैक, कोनो ट्रक ट्रेलर नहि, कोनो क्रेन नहि, कोनो विशाल मालवाही जहाज नहि, मात्र छेनी हथौरी टा मजदूर आ कि कलाकारक हाथ मे रहैत छलैक, तखन कोना कए एतेक पैघ पाथरक खंड सब सुदूर दक्षिण के आसवान क्षेत्रक पाथरक खदान सँ काटि नदी मे बहा कए आनल गेल आ फेर नदी सँ निकालि समाधि स्थल तक पहुँचाओल गेल आ एक एक कए नीचा सँ उपर तक उठा कए जोड़ल गेल, से एखनहु बहुत तीव्रबुद्धि इंजीनियर लोकनि कें आश्चर्यचकित करितहिं छनि। किछु विद्वानक मत छनि जे मिस्रक इतिहास अथवा उचित कही तऽ मानव सभ्यताक इतिहास मे किछु महत्वपूर्ण अंश हेराएल अछि। पिरामिड मात्र एकटा प्राचीन स्मारके टा नहि, अपितु सब तरहें आश्चर्यक खजाना अछि। सबटा प्रवेश द्वार सटीक उत्तर दिशा मे कोना बनलैक ? कतेक सटीक ? उत्तर दिशा सँ एकर दिशाक अन्तर मात्र एक डिग्री, आधा डिग्री ? नहि, यौ ई अन्तर छैक मात्र 0।003 डिग्री। ग्राहम हैनकॉक के अनुसार एखनहु कोनो इंजीनियर एतेक सटीक दिशा निर्धारण कइए नहि सकैत छथि आ ओकरा कोनो भवन आ कि स्मारक मे उतारब तऽ असम्भवे बूझू। जतबे एकर विस्तार मे जेबैक ततबे ई आश्चर्य बढ़िते जाएत। आ एही आश्चर्य कें निहारैक लेल तऽ सब साल लाखो टूरिस्ट मिस्र दौड़ैत अछि। अस्तु, ड्राइवरक संग पहुँचलहुँ पिरामिड परिसरक गेट पर। पिरामिड परिसर मे एक कात सँ दोसर कात जेबा मे किछु किलोमीटर के दूरी भऽ जाइत छैक। तें भीतर मे टूरिस्ट लोकनि बस, कार अथवा अन्य सवारी लैते छथि। परिसरक भीतर मात्र जेबा लेल 160 पौंड के टिकट, जाहि मे लोक परिसर मे टहलि सकैत छल, पिरामिड देखि सकैत छल मुदा ओकर भीतर नहि जा सकैत छल। पिरामिडक भीतर जेबा लेल अलग सँ 360 पौंडक टिकट, मुदा सेहो एखनहि गेटे पर लऽ लेबाक छल। तहिना अन्य किछु जगह लेल अतिरिक्त टिकट। एकर विपरीत 500 पौंडक एकटा टिकट छलैक जाहि मे लोक पिरामिडक भीतर जा सकैत छल आ एकाध अन्य दर्शनीय स्थल सेहो। हमर ड्राइवर कहलनि जे यदि पिरामिडक भीतर जाएब तखन नीक होएत जे सम्मिलित टिकट लऽ लिअऽ। हुनके सुझाव पर हम 500 पौंडक टिकट लेल। सुरक्षा जाँच करबैत परिसरक भीतर प्रवेश केलहुँ। ड्राइवर दोसर रस्तें हमरा ओहि कात भेटि गेलाह। फेर गाड़ी मे बैसि ग्रेट पिरामिड लग बनल पार्किंग एरिया पहुँचलहुँ। अन्दर मे स्थानीय लोक टूरिस्ट लेल घोड़ाबला टमटम सेहो चलबैत अछि, किछु इलाका मे ऊँटक सवारी सेहो चलैत छैक मुदा ई सब भेल ओकरा लेल, जेना अमेरिकन आ कि यूरोपियन टूरिस्ट, जे टमटम सदृश सवारी पर नहि चढ़ल होए अथवा ओकर विशेष मजा लूटऽ चाहैत होअए। हम सब तऽ मधेपुर सँ दरभंगा तक एक्का टमटम के बीचे पैघ भेल छी तखन ओकर कोन विशेष आकर्षण ? परिसर पहुँचि ड्राइवर पहिने विभिन्न मुद्रा मे पिरामिडक पृष्टभूमि मे हमर फोटो लेलनि। एकटा फोटो संलग्न अछि उदाहरण लेल। फोटो देखि अपनहुँ कें अन्दाज भैए जाएत जे ओ ड्राइवर ट्रेंड गाइड आ फोटोग्राफर सेहो छलाह। अन्यत्र सेहो हमर फोटो ओएह लैत रहलाह। कोनो सेल्फी सँ ई फोटो सब जरूरे नीक छैक। बाहर सँ पहिने ग्रेट पिरामिड देखल। जेना कि पिरामिडक ज्यामितीय बनाबट सँ बुझिए गेल हेबैक, आधार वर्गाकार होइत छैक आ ऊँचाइ समान भाव सँ घटैत घटैत अन्त मे एक विन्दु रहि जाइत छैक। चारू कातक फलक त्रिभुजाकार होइत छैक। आधार आ त्रिभुजक बीच के कोण पिरामिडक उन्नत कोण (angle of inclination) कहल जाइत छैक। जतेक पैघ कोण ओतेक उँचगर ओ पिरामिड बनतैक, तखने ने चारू त्रिभुजक फलक एक विन्दु पर मिलतैक। छोट कोण रहला सँ उँचाइ कम हेतैक। ग्रेट पिरामिडक ई कोण करीब 52 डिग्री छैक। एहि मे करीब 23 लाख प्रस्तर खंडक उपयोग भेलैक, प्रत्येक घनाकार खंड करीब एक मीटर सँ कने बेसी अछि आ ओकर ओजन करीब अढ़ाइ टन छैक। पिरामिड बनबै मे पीयर चूना पत्थर (lime stone) के व्यवहार भेलैक। बाहरी सतह कें चिक्कन बनबै लेल नीक जकाँ पालिस कएल उज्जर चूनापत्थर लगाओल गेलैक। भीतर मे कमरा सब आ ब्युरियल चैम्बर ग्रेनाइट सँ बनाओल गेलैक। बाहरक उजरा पाथर तऽ प्रायः सबटा लोक छोड़ा छोड़ा कए लऽ गेल अथवा नष्ट भऽ गेलैक। मात्र खाफ्रेक पिरामिड मे उपरका टोपी बचल छैक। अपना गाम-घर मे यदि कोनो बहुत पैघ पोखरि रहैत छैक तऽ ओकरा लेल जनश्रुति प्रचलित भऽ जाइत छैक जे ई दैत्य अथवा राक्षस द्वारा खुनाओल गेल हेतैक। तखन सोचियौक जे पाँच हजार वर्ष पहिने बनल ई पिरामिड कोन दैत्य बनौने हेतैक ? प्राचीन यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार ग्रेट पिरामिड कें बनेबा मे बीस साल लगलैक आ करीब एक लाख मजदूर काज करैत रहलै। मुदा वर्तमान ईजिप्टोलोजिस्ट सबके अनुमान छनि जे एतेक मजदूर अस्थायी रूपें खाली ओहि समय मे रहैत हेतैक जखन नील नदीक सालाना बाढ़िक समय रहैत छलैक जाहि समय मजदूर सब कें खेतीबारीक काज नहि रहैत छलैक। स्थायी रूपें सब मिला कए बीस हजार के करीब लोक पिरामिडक निर्माण लेल काज करैत छलैक जाहि मे रसोइया, डाक्टर सँ लऽ कए पंडित तक सामिल छलैक। एहि सब कें अनुमाने बूझल जेबाक चाही। पिरामिड कोना बनलै तकर समुचित इंजीनियरिंग जानकारी एखनहु नहि बूझल भेलैक अछि आ रिसर्च चलिये रहल छैक। पिरामिड परिसरक खुदाइ मे कतेको मजदूरक बस्ती, ओकरा सबहिक कब्र, कतेको हाइरोग्लाइफिक लेख आदि भेटलैक। आब संक्षेप मे बूझि लिअऽ जे पिरामिडक भीतरे रहैत छलैक राजा अथवा रानीक ममी आ ओकरा संग आर बहुत किछु, जाहि मे छलैक ओकरा द्वारा प्रयुक्त गहना-गुड़िया, अस्त्र, शस्त्र आर अनेको वस्तु। एतेक दिन मे किछु बचल तऽ नहि छैक, सबटा चोरि भऽ गेलैक, जे किछु चोरि नहि भेलैक से ब्रिटिश शासक लोकनि द्वारा ब्रिटेन लऽ जाएल गेल। तथापि ओकर बनाबट, भीतर मे अवस्थित कब्रक विभिन्न कोठरी आदि एखनहु टूरिस्ट कें आकर्षित करिते छैक। सबसँ महत्वपूर्ण छैक भीतर जेबाक अनुभव। नहि गेलहुँ तऽ जरूरे लागत जे टूर मे किछु छूटि गेल। ड्राइवर चेता देलनि जे एतए बहुत गाइड सब तंग करत तें अपन टिकट अनका नहि देखाएब। ठीके देखल जे जेना जेना पिरामिडक लग पहुँचैत गेलहुँ अनेको गाइड टिकट देखेबाक आग्रह करए लागल, किछु तऽ बलजोरी टिकट छीन लेबा पर उद्यत भऽ गेल। अपना कें बचबैत पिरामिडक किछु सीढ़ी चढ़ि ओहि द्वार लग पहुँचलहुँ जतए सँ भीतर जेबाक रस्ता छलैक। एतए एकटा गार्ड टिकट चेक केलक आ अन्दर जेबाक इशारा कऽ देलक। भीतर जाएब कठिनाह छैक, यद्यपि पूरा रस्ता इजोत रहैत छैक तथापि रस्ता एकटा संकीर्ण सुरंग जकाँ छैक जाहि मे लोक कें उतरए आ चढ़ए पड़ैत छैक। सुरंगक उँचाइ एतेक कम जे बहुत लिघुरि कए, कतहु कतहु बूझू घुसकि कए, जाएब जरूरी। एतेक जे पीठ पर राखल बैग सेहो उपर के देबाल मे सटि जाइत छलैक आ आगू बढ़ब कठिन भऽ जाइत छलैक। बैग राखब जरूरी मात्र एही कारण जे जलक बोतल अति आवश्यक। अन्दर गर्मी बहुत छैक, मोन औलबालि तऽ हेबे करत, घाम छुटबे करत। जिनका ठेहुनक दर्दक शिकाएति रहए अथवा संकीर्ण जगह मे जेबा मे डरक अनुभूति होनि ओ नहिए जाथि से नीक। किछु दूरक रस्ता तऽ सामान्य उँचाइ बला छलैक, तकर बाद आबि गेल सुरंग। सीढ़ी बनल, प्रकाशित मुदा उँचाइ बड़ कम। अस्तु, लिघुरैत घुसकैत चढ़ए उतरए लगलहुँ। बेस लम्बा रस्ता। लोक सेहो बहुते कम। कियो कियो भीतर अबैत आ कि बाहर जाइत। अस्तु करीब दस-बारह मिनट के बाद भितरका कक्ष मे प्रवेश केलहुँ आ ठीक सँ ठाढ़ भेलहुँ। एतए कक्ष तऽ सामान्ये मुदा एक कात मे एकटा पैघ हौज जकाँ बनल। इएह जगह छलैक ममी-युक्त ताबूत कें रखबा लेल, एकरा ब्यूरियल चैम्बर कहल जाइत छैक। एतए किछु सेल्फी लेल, एकटा टूरिस्ट कें अनुरोध कएल जे हमर फोटो लऽ लेथि, एवम् प्रकारें फोटो लैत फेर बहार होएब शुरू कएल। करीब आधा घंटा लागल। पार्किंग तक अबैत अबैत अनेको फेरीबाला सब घेरैत रहल अपन सामान सब बेचबा लेल। सब सामान ओएह चीन सँ आयातित नकली अनुकृति आदि। एतुका लोक भारतीय सिनेमा स्टार सबसँ खूब परिचित छथि। भारतीय मुह-कान सदृश यात्री कें आकर्षित करै लेल ओ लोकनि सलमान खान, अमिताभ बच्चन, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा आदि हीरो हीरोइनक नाम लैत आ किछु तऽ कोनो गीतक एकाध पाँती सेहो गबैत। हम अपना कें बचबैत गाड़ी तक पहुँचलहुँ। तकर बाद ड्राइवर संग गाड़ी मे बैसि बाकी दूटा पिरामिड देखैत एकटा उँचगर जगह पर गेलहुँ जतए सँ तीनू पिरामिड एक रेखा मे दृष्टिगोचर होइत छलैक। एहि जगह कें ‘पैनोरैमिक भ्यू’ बला जगह कहल जाइत छैक। एतए सँ किछु भग्न पिरामिड सेहो देखबा मे अबैत छैक। एतहु किछु फोटो लेल। पिरामिड परिसर मे एहि मुद्रा मे ठाढ़ करा कए ड्राइवर फोटो लेलनि।पिरामिड परिसर मे एहि मुद्रा मे ठाढ़ करा कए ड्राइवर फोटो लेलनि। पिरामिड परिसर मे एहि मुद्रा मे ठाढ़ करा कए ड्राइवर फोटो लेलनि। पिरामिड परिसर मे एहि मुद्रा मे ठाढ़ करा कए ड्राइवर फोटो लेलनि। हमर 500 पौंडक टिकट मे परिसर मे अवस्थित सोलर बोट म्यूजियमक दर्शन सम्मिलित छल। एतहु गेलहुँ। एतए फैरो खुफ्रुक सोलर बोट राखल छैक। पिरामिड परिसर के खुदाइ के समय 1954 इo मे जखन साफ-सफाइ चलि रहल छलैक तखन अकस्मात एकटा पाथरक देबालक भीतर करीब 1200 टुकड़ी मे ई नाओ भेटलैक। एकरा निकालि कए फेर सँ जोड़ल गेल आ एकटा आधुनिक म्यूजियम बनाए ओहि मे प्रदर्शित कएल गेल। बोट म्यूजियम मे मोट पातर विभिन्न साइजक पापीरसक रस्सी आ काठक तखता सब कें कोना कए ओहि डोरी सब सँ जोड़ि कए नाओ बनाओल जाइत छलैक तकर विधि सेहो प्रदर्शित अछि। बोट म्यूजियम के बाद ड्राइवर हमरा लेने गेलाह प्रसिद्ध स्फिंक्स लग। गीजाक ई स्फिंक्स सेहो अद्भुत छैक। बैसल सिंहक विशाल मूर्ति मुदा मानव मुखाकृति बला चूनापत्थर के एकहि शिलाखंड सँ बनल ई 73 मीटर लम्बा आ 20 मीटर ऊँच स्मारक विश्व मे अद्वितीय अछि। विद्वान लोकनिक कहब छनि जे मुखाकृति फैरो खाफ्रे सँ मिलैत छैक। एहि मे राजकीय सिरस्त्राण सँ युक्त फैरो कें देखाओल गेल अछि। एतहु किछु फोटोग्राफी भेल। पिरामिड परिसरक भ्रमण एतहि शेष भेल। तकर बाद घुरती रस्ता मे ड्राइवर हमरा लेने गेलाह एकटा पापिरस (papyrus) गैलरी मे। पापीरस अपना इलाकाक मोथी जकाँ पानि मे उपजैबला वनस्पति छिऐक। एकर पौधा डेढ़ मीटर के उँचाइ तक होइत छैक, उपर मुह पर फुलाएल, एकर डाँट गोल नहि, त्रिभुजाकार होइत छैक। एही पापीरस सँ पुरान जमाना मे मिस्र मे लिखबा लेल कागत बनाओल जाइत छलैक। गेटे पर एकटा नवयुवती पापीरस के गाछ, एकटा ट्रे मे जल मे डुबाओल ओकर किछु ओदारल टुकड़ी आदि रखने पर्यटक कें कागत बनेबाक विधिक प्रदर्शन हेतु। लिखबाक नीक सतह बनेबा लेल बूझू सीकी सदृश पातर पातर किन्तु आठ-दस मिलीमीटर चाकर एक फुट लम्बा टुकड़ी सब कें तानी भरनी के क्रॉस स्टाइल मे बना कए एकटा समतल काठक पटरी पर राखि खूब जोड़ सँ बेलन चलाओल जाइत छैक जाहि सँ ओ पूरा समतल भऽ जाइ। एहि गैलरी मे एहने कागत पर चित्रकारी कएल अनेक कलाकृति प्रदर्शित छल। ओ महिला एहि कलाकृति कें देखबए लगलीह आ संगहिं मिस्रक प्राचीन इतिहास सेहो बुझबए लगलीह। कलाकृति सब तऽ ओही इतिहासक विविध प्रसंग कें चित्रित करैत छलैक तें ई बुझाएब जरूरी। हमरो लेल ई नीके रहल। एतहि बूझल जे अगिला जीवन मे लोकक नीक बेजाए काजक लेखाजोखा करबा लेल ओकर हृदय कें एकटा काल्पनिक पाँखि, जकरा “फेदर ऑफ जस्टिस” कहल जाइत छलैक, के ओजन सँ तुलना कएल जाइत छलैक। पाँखिक तुलना मे जाहि फैरोक हृदय हल्लुक पाओल गेलनि ओ नीक काज केने छलाह तें हुनका देवत्व भेटैत छलनि। एही चित्र सब सँ बूझल जे फैरो लोकनि अपन नाम चित्र पर अथवा देवाल पर बेलनाकार घरक भीतर लिखैत छलाह, जकरा प्राचीन मिस्रक भाषा मे शेन (shen) कहल जाइत छलैक। एहि बेलनक एक कात मे रेखा खीचल रहैत छलैक जाहि सँ पता चलै जे कोन दिशा मे पढ़बाक चाही। नेपोलियनक सिपाही लोकनि एकर नाम कारतूस देलखिन कारण ओहि बेलनक आकार बन्दूकक गोली भरै बला कारतूस सदृश छलैक आ सएह नाम आब प्रचलित भऽ गेलैक। गैलरी मे टाँगल चित्र सबके दामो लीखल मुदा आश्चर्य लागल जे सरकारी नाम रहितहुँ दाम मे मोलाइ सम्भव छलैक। एहू वस्तु मे चीन सँ बनल नकल बहुत घुसिया गेल छैक आ कहब कठिन जे कोन मूल अछि आ कोन चीनी नकल। तैयो एकटा कलाकृति मोला कए 200 पौंड मे कीनल। ओहि मे कारतूस बनल छलैक जाहि मे पर्यटक अपन अथवा कोनो आत्मीय के नाम लिखबा सकैत छल। हाइरोग्लिफ्स अक्षर मे हमर नाम Y P VIYOGI लीखि देलनि ओएह नवयुवती। करीब तीन घंटा समय नीक जकाँ बिताए हम होटल घुरि एलहुँ। साँझ मे फेर थोमस कूक के बस मे पूरा दल गेलहुँ “लाइट एण्ड साउन्ड” शो देखबा लेल। ई जगह स्फिंक्सक ठीक सामने उँच चबूतरा पर बनल छैक। सैकड़ो कुर्सी लागल। कतेको टूरिस्ट ग्रुप संगहि ई प्रोग्राम देखैत अछि। करीब पचास मिनटक अंग्रेजी भाषा बला ई प्रोग्राम साढ़े सात बजे शुरू भेलैक। विभिन्न कालखंडक मिस्रक इतिहास बतबैत ई प्रोग्राम पूरा पिरामिड परिसर कें चित्रित आलोकित करैत रहल। एखन स्फिंक्स बहुते जीवंत भऽ गेल छलैक। एतेक सुन्दर स्फिंक्स दिनक रौद मे कोना देखि सकत लोक? घुरती बस मे चेन्नै सँ आएल बीस बाइसटा पर्यटक हमरा सबहिक ग्रुप मे जुड़ि गेलाह। ई लोकनि साँझ मे काहिरा उतरल छलाह आ एयरपोर्ट सँ सीधे लाइट एण्ड साउन्ड प्रोग्राम देखबा लेल अबैत गेलाह। आब बस पूरा भरती भऽ गेल। होटल पहुँचि ओकर विस्तृत डाइनिंग हॉल मे कन्टिनेन्टल बुफे भोजन सँ अलग एक ठाम हमरा सब लेल भारतीय भोजनक बुफे व्यवस्था छल। थोमस कुक एकटा भारतीय रसोइया अपना टीम मे राखब शुरू केलक अछि। सूप सँ लऽ कए मिठाइ तक, नीक व्यंजन सब। लोक किछुओ खा सकैत छल — कन्टिनेन्टल आ कि भारतीय। लोक अपना अपना रुचिएँ डिनर लेलक आ रात्रि विश्राम लेल जाइत गेल। एहि प्रकारें हमर मिस्र यात्राक पहिल दिन शेष भेल। २ पिरामिडक देश मे (पछिला अंक मे हमर मिस्र यात्राक पहिल दिनक अनुभव पढ़लियैक जाहि मे हम टूर ऑपरेटर थोमस कूक के प्रोग्राम सँ अलग अपने खर्चा सँ गीजाक पिरामिड परिसरक दर्शन कएल आ पापीरस गैलरी देखल।) 18 सितम्बर 2019, आइ मिस्र मे दोसर दिन छी। थोमस कूक बला ग्रुप एलेक्जेन्ड्रिया जा रहल छैक मुदा हमरा आइ विश्वक पहिल पिरामिड देखबाक अछि। एहि लेल हम वियोन्डरक माध्यम सँ अलग सँ व्यवस्था केने छी मेम्फिस टूर नामक कम्पनीक संग। मेम्फिस टूरक टूर मैनेजर हमरा सँ भेंट करबा लेल सबेरे आबि गेलाह, हम तैयारे छलहुँ। हुनक गाइड, ‘हेन्ड’ नामक महिला आठ बजे एलीह आ हम सब विदा भेलहुँ टूर पर। आजुक टूर बिल्कुल प्राइवेट छल, गाड़ी मे ड्राइवर, गाइड आ हम, बस एतबे, जहिना कम्बोदिया यात्रा मे छलहुँ। समयक कोनो पाबंदी नहि, एतबे जे कुल आठ घंटा सँ बेसी नहि लगबाक चाही। गाड़ी मे बैसलाक बाद गाइड अपन परिचय दैत बतौलनि जे हेन्ड माने भेल इन्डिया, फ्रेन्च Inde (ऐन्द) सँ सम्भवतः बनल, तें हुनका हम ‘भारती’ कहि देलिएनि आ ओकर अर्थो बुझा देलिएनि। ओ खुसी भेलीह। अस्तु, ओ हमरा आजुक दर्शनीय स्थल सबहक इतिहास बतौनाइ शुरू केलनि। हम संगहि सड़कक दूनू कात आसपासक दृश्य सेहो देखब शुरू कएल। गीजा शहर सँ बहरेलाक बाद पहिल बेर जखन देहाती इलाका मे एलहुँ तखन देखल नील नदीक नहर सब जे पटौनी लेल सबतरि पसरल छैक। गाइड बतौलनि जे नहरक पानि खाली खेती लेल उपयोग कएल जाइत छैक, पीबाक लेल नहि। नहरक दूनू कात चाकर सड़क तकर कात मे घर, दोकान सब आ घरक कात खेत सब मे खजूरक गाछ। गाम देहात मे सब ठाम पक्का घर, सब तरहक, जहिना आब अपनहु सबके गाम मे भेटैत छैक। एखन सीजन छलैक आ पीयर पीयर खजूरक बड़का घोदा गाछ सब मे लटकल। ओना तऽ एहन दृश्य अपनहु गाम घर मे जून जुलाइ मास मे भेटि जाएत मुदा ने ओतेक पैघ गाछ आ ने ओहन पैघ गुदगर फल। एकटा आर विशेषता देखल, एतए खजूरक गाछ सँ रस निकालबाक कोनो प्रचलन नहि। कम्बोदिया मे तारक गाछक रस सँ गुड़, चीनी बनौनाइ राष्ट्रीय उद्योग छिऐक से बात हम गाइड कें कहलिएनि। हुनका ई नहि बूझल छलनि। हम अपना देहातक खजूरक फल आ एतुका फलक तुलना कए सोचल जे सम्भवतः रस निकलि गेला सँ गाछ कमजोर भऽ जाइत छैक आ फल रसगर गुदगर नहि भऽ पबैत छैक। एतए सम्भवतः एही कारण रस नहि निकालल जाइत हेतैक। एतए फल मुख्य छैक, रस नहि। अपना देहात मे खजूरक फल कोनो महत्वक चीज नहि होइत छैक आ लोक ताड़ीक व्यवसाय लेल रस निकालब बेसी उपयोगी काज बुझैत अछि। एक ठाम ठाढ़ भऽ कए खजूरबोनीक पृष्टभूमि मे फोटो सेहो लेल। बुझाएल जे जहिना अपना सब आमक गाछी लगबैत छी तहिना एतए लोक खजूरक गाछी लगबैत अछि। किछु दूर गेला पर आमक गाछ सेहो भेटल जाहि मे फरल आम लटकल छलैक। गाइड बुझौलनि जे मिस्र मे आम सेहो लोक उपजबैत अछि। गाड़ी मे चलैत चलैत गाइड हमरा दहसुरक टेढ़ (Bent) पिरामिड आ लाल (Red) पिरामिडक खिस्सा बतबैत रहलीह। एहि इलाकाक पिरामिड सब चारिम वंशक पहिल फैरो (सम्राट) स्नेफेरू द्वारा बनाओल गेल छैक। स्नेफेरू गीजाक ग्रेट पिरामिड बनौनिहार फैरो खुफुक पिता छलखिन। स्नेफेरूक बनबाओल पहिल पिरामिड सकाराक सीढ़ीनुमा पिरामिडक नकल करैत बनाओल गेलैक मुदा असफल रहलैक आ नष्ट भऽ गेलैक। स्नेफेरू हारि मानै बला नहि छलाह। हुनक एक पुत्र हेमि उनी पिरामिडक वास्तुकार छलखिन। प्रयास चलैत रहलैक। दोसर जे बनलैक तकर उन्नत कोण शुरू मे 54 डिग्री राखल गेलैक। एकरा भीतर सेहो ब्यूरियल चैम्बर आदि बनाओल गेल छलैक। एहि समय पिरामिडक इंजीनियरिंग विकसिते भऽ रहल छलैक। एहि पिरामिडक आधार बहुत नीचा सँ नहि उठाओल गेलैक आ पिरामिडक बाहरी भागक जगह सेहो ओतेक मजगूत नहि छलैक। करीब 47 मीटर उँचाइ तक बनेलाक बाद वास्तुकार हेमी उनी कें डर भेलनि जे यदि एहिना आगू ऊँच करैत रहताह तऽ पिरामिडक आधार ओकर समस्त ओजन कें सम्हारि नहि सकतैक। तें कोण घटा कए 43 डिग्री कऽ देलखिन। पिरामिड बनि तऽ गेलैक मुदा देखबा मे ई टेढ़ लगैत छैक। टेढ़ो भेला पर पिरामिड बनेबाक बहुत बुद्धि तऽ वास्तुकार कें भैए गेलनि आ मजदूर सब सेहो अनुभवी भैए गेल छल। तखन बनाओल गेल तेसर पिरामिड जकरा रेड पिरामिड कहल जाइत छैक। इतिहासक हिसाबें उचित कही तऽ इएह विश्वक पहिल पूर्ण पिरामिड छिऐक आ फैरो स्नेफेरूक कब्र सेहो। “रेड” विशेषण लगलैक कारण लाल पाथर सँ बनलाक कारण एकर रंग ललौन छैक। आब रंग बहुत मलिन भऽ गेल छैक तथापि दूर सँ एखनहु अपन विशेषण कें सार्थक करितहिं छैक। 220 मीटर आधार आ 105 मीटर उँचाइ बला ई पिरामिड गीजाक खुफु आ खाफ्रे पिरामिडक बाद विशालता मे तेसर स्थान पर अछि। मुदा एहि पिरामिड कें 43 डिग्री उन्नत कोण पर बनाओल गेल छैक। मजबूती देबा लेल एकर ठोस घनाभ आधार 9 मीटर गहींर जगह सँ उठाओल गेलैक। हमरा जिज्ञासा पर गाइड मिस्रक प्रसिद्ध ममी बनेबाक विधि सेहो बतबैत गेलीह। ममी बनाएब कहिया शुरू भेलैक से तऽ अज्ञात अछि मुदा एतेक तऽ जरूर जे राजा लोकनि अपन अगिला जीवन (afterlife) लेल अपन शरीर कें सुरक्षित करबाक प्रयास करैत रहलाह। मिस्र मे जे सबसँ पुरान ममी भेटलैक से अनुमानतः 3000 BC अवधि के छैक। ममी बनेबाक बारे मे जे किछु बात बूझल छैक तकरा अनुसार पहिने डाँड़ लग नीचा भाग मे भूर कऽ कए शव सँ द्रव बला अंग आँत, लीवर आ किडनी कें निकालि कए अलग राखल जाइत छलैक। तहिना मस्तिष्कक द्रव पदार्थ सेहो नाक बाटे निकालि कए राखि लेल जाइत छलैक। हृदय शरीर मे छोड़ि देल जाइत छलैक। शव कें लेटा कए काटल भाग मे सूती कपड़ा ठूसि देल जाइत छलैक। तखन दूनू हाथ कें छातीक उपर क्रॉस जकाँ मोड़ि कए रखलाक बाद पूरा शव कें नूनक ढेरी मे राखि देल जाइत छलैक जाहि सँ ओकर सब द्रव पदार्थ शोषित भऽ जेतैक। एहि प्रक्रिया मे चालीस सँ सत्तरि दिन तक लगैत छलैक। तकर बाद बचल सुखाएल शरीर कें सूती कपड़ाक कतेको तह मे खूब सक्कत कए लपेटि देल जाइत छलैक। चेहरा उघारे रहैत छलैक जाहि सँ ओ व्यक्ति भगवानक घर मे चीन्हल जा सकैछ। हृदय भीतरे मे छोड़ि देबाक एकटा खिस्सा ओ सेहो कहलनि। अगिला जीवन मे जखन व्यक्तिक कर्मक लेखा जोखा हेतैक तखन ओकर हृदयक ओजन कें न्यायक एकटा काल्पनिक पाँखि (feather of Justice) सँ तुलना कएल जेतैक। यदि लोक नीक काज कएने रहत तऽ ओकर हृदय ओहि पाँखि सँ हल्लुक रहतैक। खराप काज केनिहारक हृदय भारी भऽ जेतैक। एहि खिस्सा सँ सम्बन्धित कतेको चित्र हम पापीरस गैलरी मे कालि देखने छलहुँ आ ओतहु एहन खिस्सा सुनने छलहुँ। पहिने तऽ ममी मात्र राजा लेल बनैत छलैक मुदा बाद मे ई व्यवसाय भऽ गेलैक। राजाक लगुआ भगुआ धनीक सेठ आ कुलीन व्यक्ति सेहो अपन ममी बनबए लगलाह। ममी बनौनिहार कें ते टाका चाही। तखन ममी लेल किछु नियम बनाओल गेल। राजा-रानीक लेल ममीक संग गहना-गुड़िया, मुकुट, अस्त्र शस्त्र आदि अलंकरणक संग दामी रेशमी वस्त्र आदि सँ लपेटि रखबाक विधान बनलैक, मध्यम वर्गक लेल अलंकरण-रहित, खाली सूती कपड़ा सँ लपेटल आ जनसाधारण लेल ममी कें बैसल स्थिति मे राखल जेबाक प्रावधान भेलैक। करीब चालीस मिनटक यात्राक बाद दहसुर इलाका मे प्रवेश करितहिं फैरो स्नेफेरू नामक साइनबोर्ड भेटऽ लागल। स्नेफ़ेरू नामक दोकान आदि सेहो देखल। एहि इलाका मे टूरिस्टक कोनो भीड़ नहि, बल्कि एक्का-दुक्का टुरिस्ट, सएह बूझू। हमरे जकाँ जिद्दी आ कि अन्वेषी टूरिस्ट एमहर अबैत हेताह। पिरामिड पहुँचबा सँ करीब दू किलोमीटर पहिने आबि गेल ‘टूरिस्ट पुलिस’ के चेक पोस्ट। ओतए पुलिस गाड़ीक नम्बर, गाइड आ ड्राइवरक नाम आ लाइसेंसक वर्णनक अतिरिक्त हमर राष्ट्रीयता सेहो लिखलनि। ई तऽ बूझल नहि भेल जे हमर भारतीय राष्ट्रीयताक कारण आन विवरण नहि लीखल गेल आ कि कोनो अन्य देशक नागरिक लेल दोसर तरहक व्यवहार छलैक। अस्तु, तकर बाद गाड़ी आगू बढ़ल। एतहि कने दूर गेला पर गाइड उतरि कए टिकट कीन लेलनि। आगू विस्तृत मरुभूमि छल। मात्र एकटा पैघ घेरल इलाका जे मिलिट्री लेल बनाओल गेल छलैक। ओतहु हलचल बहुत कम। मुदा एतुका दर्शनीय स्मारक रेड आ बेन्ट पिरामिडक महत्वे ततेक छैक जे एहि मरुभूमिक बीच सेहो बहुत नीक सड़क बनल। रस्ता तेना बनल छलैक जे पहिल पड़ाव आबि गेल रेड पिरामिड। एखन सबेरक नओ बाजल छलैक आ पार्किंग एरिया मे हम सब पहिल यात्री छलहुँ। गाइड हमरा टिकट दऽ देलनि आ पिरामिड लग छोड़ि देलनि कारण पिरामिडक भीतर गाइड नहि जाइत छथि। ई बात तऽ हम कालिए देखि लेने छलहुँ। अस्तु, बाहर सँ कने मने देखि लेलाक बाद हम चढ़ि गेलहुँ सुरंगक गेट तक। एतए एकटा अरब सुरक्षा कर्मचारी हमर टिकट चेक केलनि। तकर बाद उतरए लगलहुँ भीतर। सीढ़ी तऽ बनल छैक मुदा सुरंग एतहु मात्र 3 फुट ऊँच, तें खूब लिघुरि कए जाए पड़ैत छल। पूरे 200 फुट (करीब 61 मीटर) नीचा उतरलाक बाद देह सोझ केलहुँ आ सामने आबि गेल अति सुन्दर शंकुनुमा चैम्बर जाहि मे दू कातक देवालक बीच के दूरी उपर उठला पर घटैत जाइत छलैक। उपर दिस देखला पर लगैत जे देबालक दूरी घटेबा लेल ओकरो उन्टा सीढ़ीनुमा आकार देल गेलैक। करीब 40 फुट उपर गेला पर दूनू देबाल मिल जाइत छलैक। एहने दोसर चैम्बर फेर बगले मे भेटल। एहि चैम्बरक सामने सेल्फी लेल। उपर अबै काल ओएह अरब सुरक्षा कर्मचारी हमर फोटो लेबाक अनुरोध केलनि। एतए हम कने हूसि गेलहुँ आ अपन मोबाइल हुनका पकड़ा देल। ओ किछु फोटो तऽ लेलनि मुदा अन्त मे बख्सीस माँगए लगलाह। ई गप हमरा बूझल छल जे मिस्र मे बख्सीस बहुत प्रचलित छैक आ यदि ककरो सँ कनियो सहायता लेबैक तऽ बख्सीस देबऽ पड़बे करत। मुदा एखन हमरा जेबी मे खाली दू सौ पौंडक नोट छल, दस बीस के किछु नहि आ एतेक बेसी बख्सीस तऽ नहिए देल जा सकैत छलैक। हम कने झूठ बजैत जे हमरा लग खुचरा नहि अछि, नीचा उतरि गेलहुँ। ओहुना आब लगैत अछि जे ई सब अनुभव मिलाइए कए यात्रा चिरस्मरणीय होइत छैक। बाहर सँ पिरामिड सब एके रंग लगैत छैक आ विशालतम पिरामिड तऽ हम कालि देखिये लेने छलहुँ। मुदा भीतर मे दूनू पिरामिडक कक्ष सब मे बहुत अन्तर छलैक, से बिना अन्दर गेने कोना बुझितिऐक ? एकर बाद हम सब आबि गेलहुँ एक किलोमीटर दूर पर टेढ़ (bent) पिरामिड लग। पार्किंग एरिया मे एतए एकटा गाड़ी पहिनहि सँ लागल आ किछु टूरिस्ट ओहि पिरामिड कें बाहरे सँ देखि रहल छलाह। पार्किंग एरियाक बगल मे छाहरि बला एकटा बस स्टैण्ड सदृश जगह बनल, किछु टूरिस्ट पुलिस एतहु आराम करैत। गाइड आ ड्राइवर कें एतहि छोड़ि हम गेलहुँ पिरामिडक परिक्रमा करबा लेल। पथराह जमीन। एहि पिरामिड मे हालहि मे करीब पचास वर्ष बाद भीतर जेबाक बाट खोलल गेलैक अछि। सुरंग तऽ बनि गेलैक मुदा ओहि मे प्रकाश एखनहु नहि छैक। गेट पर जे सुरक्षा कर्मचारी छलाह ओ एकटा टॉर्च रखने। यदि कियो अन्दर जाए तऽ ओ संग संग इजोत देखबैत जेताह। एतए भीतर मे चैम्बर करीब 80 मीटर गहींर छैक, माने रेड पिरामिड सँ करीब बीस मीटर बेसिए। एकरा पाछू मे छोटका 18 मीटर उँचाइ बला पिरामिड छैक जाहि मे स्नेफेरूक रानी हेतेफेरसक कब्र छलनि। एहू मे आब उतरबाक व्यवस्था भऽ गेलैक अछि मुदा एकर दरबज्जा बन्द रहैत छैक आ आग्रह केले पर सुरक्षाकर्मी अपनेक लेल ताला खोलताह, अपने जतेक काल भीतर रहबै, ओतेक काल ठाढ़ रहताह आ फेर ताला लगाइये कए जेताह। जतेक एहि अरब लोकनिक सेवा लिअऽ ओतेक बख्सीस देबा लेल तैयार रहू। हम ओहुना रेड पिरामिड मे चढ़ि उतरि कए थाकि गेले छलहुँ आ दिन सेहो चढ़ल जा रहल छलैक आ ओही अनुसारें एहि मरुभूमि इलाका मे भगवान भास्कर अपन तीक्ष्णता बढ़ा रहल छलाह। तें हम एहि दूनू पिरामिडक प्रदक्षिणा कऽ कए घुरि गेलहुँ। फेर एकटा नीक जगह चुनि कए गाइड कें कहलिएनि फोटो लेबा लेल। एतहि हमर दहसुर दर्शन समाप्त भेल। अगिला स्थल छल मेम्फिसक म्यूजियम। मेम्फिस एखन तऽ अति छोट गाम जकाँ छैक मुदा प्राचीन समय मे मिस्रक राजधानी सेहो छलैक। एतए म्यूजियमक भीतर गाइड संगहि रहलीह आ विभिन्न दर्शनीय स्मारक कें बुझबैत रहलीह। एतए मिस्रक प्रायः सबसँ प्रतापी फैरो रैमसेस-द्वितीयक विशाल किन्तु अंशतः खंडित प्रस्तर प्रतिमा सुताएल राखल छैक। रैमसेस-2 उनैसम वंशक तृतीय फैरो छलाह आ प्रायः 66 वर्ष तक (1279-1213 BC) राज केलनि जे विश्व मे एखनहु कीर्तिमान छैक। लम्बा अवधिक शासन लेल सम्भवतः ब्रिटेनक वर्तमान महारानी एलिजाबेथ-2 एहि कीर्तिमान कें तोड़ि देलनि अछि, मुदा कतए रैमसेस-2 सन सक्रिय प्रतापी सम्राट आ कतए ब्रिटेनक सांकेतिक राष्ट्राध्यक्ष महारानी एलिजाबेथ ? दूनू मे कोनो तुलने नहि। हिनका जहिना अनेकानेक पत्नी छलखिन तहिना सैकड़ो पुत्र छलखिन। रैमसेस-2 के स्मारक मे सब ठाम दूटा मुकुट देखल, दूटा मुकुट मिस्रक दूनू भाग – निचला आ उपरका – कें संकेत करैत जे सम्राट समान भाव सँ दूनू भाग कें देखैत छथिन। हिनकर खिस्सा मिस्र भ्रमण मे आगू अनेक बेर आओत। म्यूजियम परिसर मे खुला जगह पर हिनक कने छोट प्रस्तर प्रतिमा ठाढ़ अवस्था मे सेहो लागल छैक। मुदा एहि सबसँ विशिष्ट अछि एतुका स्फिंक्स। ई स्फिंक्स आकार मे तऽ गीजाक स्फिंक्स सँ बहुत छोट छैक मुदा एकर मुखरा छैक मिस्रक रानी हातसेप्सुत केर। रानी हातसेप्सुत मिस्र मे एकमात्र महिला शासक भेलीह जे अपन नावालिग बेटाक समय करीब 12 वर्ष तक पुरुषक वेष मे राज केलनि। हिनकर खिस्सा आगू अनेक बेर आओत। मेम्फिस म्यूजियम मे देबाल पर अनेको चित्रकला आदि तऽ छलैके, परिसर मे खुला आकाश मे कतेको खंडित प्रस्तर स्मारक सब राखल। गाइड कहलनि जे पुरातात्विक खुदाइ मे जखन जे किछु भेटलैक आ जकरा आन ठाम जगह नहि भेटलैक से एतए आनि कए राखि देल गेलैक। लोक बाद मे अध्ययन करैत रहत। एतए परिसर मे, जेना कि टूरिस्ट जगह पर सर्वत्र होइत छैक, बहुतो दोकान उपयोगी अनुपयोगी आ कहबाक लेल बहुमूल्य वस्तु सब बेचैत। हमरा आकर्षित करबा लेल ओहिना एकटा दोकानदार लगला भारतीय फिल्मस्टार सबहक नाम गनाबए। ओतेक सँ हम नहि रीझलहुँ तऽ एकटा नील रंगक पाथरक टुकड़ी, जकरा ओ सब सौभाग्यक प्रतीक बुझैत छथिन, से पकड़ा देलनि। गाइड हमरा कहलनि लऽ लेबाक लेल, हम लऽ लेलहुँ। मुदा घुरती मे जखन हम ओहि दोकान सँ किछु नहि कीनल तखन दोकानदार जरूरे मोने मोन हमरा सरापने होएत। छोड़ू, एना तऽ होइते रहैत छैक। एतए सँ हमसब विदा भेलहुँ सकारा कें। फेर रस्ता मे आबि गेल नील नदीक नहर सब। करीब आधा घंटाक बाद टूरिस्ट पुलिसक चेकपोस्ट पार करैत मरुभूमिक एकटा उँचगर जगह पर छलहुँ जतए छल विस्तृत खंडहर सब के भंडार आ सबसँ महत्वपूर्ण स्मारक – विश्वक पहिल विशाल प्रस्तर स्मारक जकरा लोक स्टेप पिरामिड कहैत छैक। तृतीय वंशक पहिल फैरो जोसर (Djoser) एवं हुनक वास्तुकार इम्होटेप कल्पना केलनि जे कब्र मे ममी कें झँपबा लेल मात्र एक मस्तबा (शिलाखंड) के बदला यदि शिलाखंडक उपर शिलाखंड रखैत खूब उँचगर उठा देल जाए तऽ नीक रहतैक। एही कल्पना सँ सकारा मे जोसरक कब्र लेल बनाओल गेल सीढ़ीनुमा (stepped) पिरामिड। स्टेप पिरामिडक परिसर मे हम सब प्रवेश केलहुँ एकटा गैलरी होइत जाहि मे खूब ऊँच स्तम्भ दूनू कात बनल आ ऊपर सेहो पाथरेक छत। गाइड बतौलनि जे ई छत पुनरुद्धार (restoration) के प्रयास मे हालहि मे बनाओल गेलैक। भीतर परिसर बेस पैघ, एतए वार्षिक उत्सव होइत छलैक। सामने ठाढ़ छल ओएह सीढ़ीनुमा पिरापिड जे विश्वक पहिल एतेक पैघ प्रस्तर स्मारक बनल। वर्तमान मे ओ स्मारक ढहि रहल छैक तें ओकर भीतर के कहए, लगो जाएब प्रतिबन्धित छैक। सब किछु घेरल। प्रायः पाँच हजार साल पुरान एहन स्मारक एखनहु देखबा लेल कहुना ठाढ़े छैक सएह की कम आश्चर्य ? आर्यावर्त मे तऽ एहन किछु नहिए छैक। अस्तु, हम सब एही कात सँ किछु फोटो आदि लेल। तकर बाद बाहर निकलि कए एकटा उँचगर जगह सँ सकारा स्थित विभिन्न स्मारक के दर्शन कएल। सामने मे दूर अवस्थित दहसुरक टेढ़ आ लाल पिरामिड सेहो देखाइ पड़ि रहल छल। एकर अतिरिक्त भग्नावस्थाक विभिन्न चरण मे करीब एगारहटा पिरामिड एक लाइन सँ देखाइ पड़ल। गाइड बतौलनि जे सकारा मे बहुत रास स्मारक एखनहु माटिक भीतर पड़ल छैक, हम अपनहु देखलियै एक ठाम खुदाइ चलिये रहल छलैक। सकाराक विस्तृत क्षेत्र देखबा लेल एक दिन बहुते कम, तखन टूरिस्ट कें किछु मुख्य स्मारक सब देखि कए संतोष करए पड़ैत छैक। हम एकर बाद फैरो उनासक पिरामिड देखबा लेल गेलहुँ। ओना ई पिरामिड भग्ने छैक मुदा एकर भीतर कक्ष सब अद्वितीय छैक। पहिल बेर देखल पूरा ब्यूरियल चैम्बर मे देबाल आ छत सब हाइरोग्लिफ (hieroglyph) लेखन सँ भरल। एकर एकटा छोट चित्र संलग्न कऽ रहल छी। इएह हाइरोग्लिफ लेखन आधुनिक युग मे लोक कें मिस्रक प्राचीन सभ्यता सँ परिचय करौलकै। विद्वान लोकनिक अनुसार हाइरोग्लाइफिक लेखनक आविष्कार प्रायः 3300 BC ( अर्थात करीब 5300 वर्ष पूर्व) मे भेल छलैक। मिस्रक सब प्राचीन स्मारक मे एकर प्रचुर व्यवहार भेलैक। मध्य युग मे एहि लिपिक ज्ञान नष्ट भऽ गेल छलैक मुदा आधुनिक युग मे मिस्रक रोजेटा जगह पर एकटा प्राचीन शिलालेख, जकरा रोजेटा स्टोन नाम देल गेलैक, कें पढ़ि कए फ्रासीसी विद्वान जाँ-फोंस्वा शाँपोलिओं एकर कुंजी ताकि लेलनि आ तखनहि मिस्रक सभ्यताक पूरा इतिहास जगजगार भऽ गेलैक। रोजेटा स्टोन वर्तमान मे ब्रिटिश म्यूजियम मे राखल छैक। स्टेप पिरामिडक परिसर मे खुदाइ भेला पर बहुत रास पाथरक हाइरोग्लाइफिक लेख सब भेटलैक जाहि मे पहिल आ दोसर वंसक राजा सबहिक नाम छलैक। उनासक पिरामिडक लगे मे एकटा छोट कब्र छल राजकुमारी इदुत के, जे उनासक पुत्री छलीह। एतहु देबाल सब पर बहुत रास चित्रकारी आ लिखाइ। चित्रक रंग एखनहु बहुत जीवंत छैक। देबाल मे चित्रित हाइरोग्लिफ अक्षरदेबाल मे चित्रित हाइरोग्लिफ अक्षर देबाल मे चित्रित हाइरोग्लिफ अक्षर देबाल मे चित्रित हाइरोग्लिफ अक्षर देखबाक तऽ बहुत किछु छल मुदा रौद बढ़ल चल जा रहल छलैक आ मरुभूमि मे बालु आ पाथरक टुकड़ी बला जमीन पर चलबो आनन्ददायक नहि रहि गेल छलैक। भूखो लागि गेल छल। तें किछु खंडहर सब कें देखैत फोटो लैत सकारा सँ विदा लेल। हमरा टूरक खर्चा मे लंच जोड़ल छल। गाइड पुछलनि की खाएब ? हम शाकाहारी विकल्प चूनल। ओ अपनहि मोने बैगनक तरकारी बनेबाक आदेश रेस्तराँ कें दऽ देलखिन। हम सब घुरि कए करीब सबा दू बजे गीजा एलहुँ। जाहि रेस्तराँ मे हमर लंचक व्यवस्था छल से एकदम स्फिंक्सक सामने। एतए दुतल्ला पर बैसि पूरा पिरामिड परिसरक दृश्य देखबा मे अबैत छल। उत्तम जगह, तहिना भोजनो उत्तम। भात, स्थानीय रोटी, तीन प्रकारक चटनीक संग बैगनक तरकारी जे बूझू तरुआ आ रसदारक बीच मे छल, बेस स्वादिष्ट लागल। अन्त मे खीर सेहो। आर की चाही ? गाइड बुझा देलनि जे टिप (बख्सीस) हमरा देबाक चाही। हुनके सँ पूछि दस पौंड टिप हम बेयरा कें दऽ देल। होटल अबैत अबैत साढ़े तीन बाजिए गेलैक, माने टूर साढ़े सात घंटाक भैये गेल। हम गाइड आ ड्राइवर कें सेहो यथोचित बख्सीस दऽ कए विदा कएल आ रूम मे आराम करए गेलहुँ। साँझ मे थोमस कूकक ग्रुप जखन एलेक्जेन्ड्रिया सँ घुरलैक तखन सब गोटे संगहिं भारतीय भोजनक रसास्वादन कएल। एतहि इन्द्रजित ग्रुपक ड्राइवर, गाइड, रसोइया आ अन्य स्थानीय सहयोगी सबके बख्सीस लेल सब सदस्य सँ करारक अनुसार पाँच डॉलर प्रतिदिनक हिसाबें चालीस डॉलर रखबा लेलनि। अस्तु आब अगिला पाँच दिन हमरो एही ग्रुपक संग रहबाक छल। अगिला दिन 19 सितम्बर काहिरा प्रवासक अन्तिम दिन छल। आजुक कार्यक्रम मे बहुत किछु शामिल छल। सबेरे जलपानक बाद साढ़े सात बजे सब गोटे बस मे सवार भेलहुँ पिरामिड परिसर जेबा लेल। गाइड एतहु एकटा महिला छलीह। ओ सब कें बुझा देलनि जे जिनका ग्रेट पिरामिडक भीतर जेबाक होअए से अलग सँ गेटे पर टिकट कीन लेथि कारण थोमस कूकक पैकेज मे भीतर जाएब सम्मिलित नहि छलैक। हमरा ग्रुप मे तऽ एहनो तमिल महिला छलीह जे हवाइ जहाज मे ह्वील चेयर सँ चढ़ैत उतरैत गेलीह। तहिना किछु अन्य लोक अपन असुविधा कें खियाल करैत पिरामिड कें बाहरे सँ दर्शन करब यथेष्ट बुझलनि। मुदा किछु गोटे कें तऽ टिकट किनबाक छलनि। एतेक सबेरे विदा भेलाक अछैतो पिरामिड परिसरक प्रवेश मार्ग पर टूरिस्ट बसक ततेक ने लाइन लागि गेल छलैक जे हमरा सब कें सब प्रक्रिया करैत सुरक्षा जाँच करबैत अन्दर जेबा मे नओ बाजि गेल। आइ हमरा एतए बहुत किछु करबाक नहि छल कारण सब किछु तऽ देखले छल। जतेक समय मे ग्रुपक अन्य सदस्य लोकनि ग्रेट पिरामिडक भीतर जाइत गेलाह ओतेक समय मे हम तीनू पिरामिड कें नजदीक सँ प्रदक्षिणा कएल जाहि सँ ओहि मे भेल क्षयक अनुमान भऽ सकए। बसे सँ सब गोटे भ्यू प्वाइन्ट जाइत गेलहुँ। पैघ ग्रुप मे समस्या अबितहिं छैक जे विभिन्न लोक कें फोटोग्राफीक विभिन्न आवश्यकता। सब कें सम्हारि कए राखब आ समय के पाबन्दी सेहो बना कए राखब कठिन काज छैक मुदा टूर मैनेजर इन्द्रजित तऽ इएह काजे करैत रहल छथि। बेस दक्ष अपना उत्तरदायित्व मे। एतहि करीब 200 मीटर चलि कए सब लेल ऊँटक सवारी करबाक व्यवस्था कएल छलैक। लोक ऊँट पर चढ़ि दस मिनट तक एहि मरुभूमिक हिआओ लेलक, ततबे। करीब आधा घंटा लागल एहि काज मे। फेर सब गोटे बस मे सवार भए आबि गेलहुँ परिसरक बाहर पार्किंग एरिया लग जतए सँ स्फिंक्सक दर्शन करबाक छल। स्फिंक्स लग तऽ हम पहिनहु गेल छलहुँ मुदा आइ दोसर बाटें प्रवेश भेला पर एतहु एकटा कब्र देखल। भीड़ ततेक जे ककरहु सेल्फी ठीक सँ नहिए लेल होइत छलैक। मुदा लोक की मानैत छल ? अस्तु, तय समय पर सब गोटे बस मे सवार भेलहुँ। अगिला स्थल छल मिस्रक नामी इत्र देखबाक आ कीनबाक। हम सब एकटा बेस पैघ घर मे प्रवेश कएलहुँ जतए सब कें बैसबा लेल सोफा, कुर्सी आदि देल गेल, संगहिं मुफ्त शौचालयक सुविधा सेहो। अन्यत्र तऽ पाँच पौंड देबऽ पड़ैत छैक लघुशंको लेल। तें एतए लोक अपना अपना हिसाबें शंका निवारण केलक। गृहस्वामी अथवा उचित कही जे इत्रक दोकानदार हमरा सब कें एक एक गिलास शीतल पेय देलनि। गर्मी तऽ छलैके से एहि पेय सँ सबहक मोन प्रसन्न भेलैक। तकर बाद सबकें एकटा कए कागत पकड़ा देल गेल जाहि मे विभिन्न इत्रक नाम आ दाम सेहो लीखल छलैक। फेर चलल इत्र आदिक वर्णन आ सब कें हाथ मे लगा लगा कए ओकरा सुँघबाक आ जँचबाक क्रम। हमरा एहि सब मे बेसी रुचि नहि छल मुदा महिला वर्ग तऽ तल्लीन छलीह – ई देखाउ, ओ देखाउ आदिक फरमाइस चलि रहल छलैक। अन्त मे दोकानदार अपन विभिन्न पैकिंग के ‘ऑफर’ दाम आदि बतबैत गेलाह, कोन कम्बिनेसन मे कतेक लेला सँ कतेक लाभ होएत आदि। अस्तु किछुए लोक छोट छोट शीशी किनलनि। तकर बाद हम सब बस मे सवार भेलहुँ काहिरा जेबाक लेल जतए भोजन करबाक छल, फेर विश्व प्रसिद्ध काहिरा म्यूजियम देखबाक छल आ तखन फेर एकटा बजारक दर्शन आ शॉपिंग आदि। दू बाजि गेल छलैक, लोक कें भूखो लागि गेल छलैक मुदा बस शहरक ट्रैफिक मे घुसकिए रहल छल सएह बूझू। सब शहरक हाल एहिना छैक। मुदा किछु होउ, ट्रैफिक नियम भंगक बात सोचिओ नहि सकैत छी। अस्तु, हमसब पहुँचलहुँ नील नदीक कछेर मे नाओ पर बैसाओल एकटा होटल जकर रेस्तराँ मे हमरा सबहिक भारतीय भोजनक उत्तम व्यवस्था छल। थोमस कूक भोजनक व्यवस्था मे कखनहु कोनो शिकाएतिक अवसर ककरो नहि दैत छैक। लोक भरि पोख भोजन केलक। भोजनक बाद पहुँचलहुँ म्यूजियम। एतए पहिल बेर इन्द्रजित लोक कें बुझौलखिन जे कैमरा सँ फोटोग्राफी लेल अलग सँ टिकट लगैत छैक। मुदा मोबाइल सँ बिना फ्लैस के फोटो लेबा पर कोनो रोक नहि छैक। बर बेस, किछु शौकिया फोटोग्राफर लोकनि टिकट कीनैत गेलाह। हमरा सब कें म्यूजियमक प्रवेश टिकट हाथ मे देल गेल। संगहिं गाइड सबकें एकटा इयरफोन सेहो पकड़ा देलनि, ओहि मे चैनल सेट करबाक व्यवस्था। एहि तरहक व्यवस्था आब पैघ आ भीड़भाड़ बला जगह मे सबतरि भऽ गेलैक अछि से हम छओ वर्ष पूर्व ऑसविच भ्रमण मे देखने रही। अस्तु, सब गोटे गाइडक पाछू म्यूजियम मे प्रवेश केलहुँ। इयरफोन भेला सँ सुविधा छैक जे लोक कें गाइड सँ सटल रहब जरूरी नहि आ गाइड अपनहु साधारण आवाज मे बिना आन ग्रुप कें डिस्टर्ब केने बाजि सकैत छथि। तैयो ग्रुपक सदस्यक संग रहब आ संग चलब जरूरी नहि तऽ फेर भोतला जाएब। एतेक विशाल म्यूजियम मे मात्र डेढ़ घंटा मे सब किछु देखब तऽ सम्भव नहि छलैक। गाइड लोकनि एकटा रूट बना लैत छथि जाहि मे प्रमुख प्रदर्शन स्थल होइत लोक चलैत अछि। पहिल महत्वपूर्ण स्थल छल रोजेटा स्टोन। पहिनहि कहि देने छी असली रोजेटा स्टोन, जे रोजेटा नामक जगह पर भेटल छलैक आ जाहि सँ मिस्रक प्राचीन हाइरोग्लाइफिक लेखन कें पढ़बा मे मदति भेटलैक, ब्रिटिस म्यूजियम मे राखल छैक। एतुका म्यूजियम मे ओकर अनुकृति छैक। गाइड एकर इतिहास बतबैत दुख सेहो प्रकट केलनि जे असली पाथर मिस्र मे नहि अछि। तकर बाद किछु राजा रानीक मूर्ति, चित्र आदि देखल जाहि मे मुख्य छल खुफु, खाफ्रे आ मेन्कौरेक पाथर प्रतिमा, जिनकर पिरामिड हम सब गीजा मे देखि लेने छी। म्यूजियम मे कतेक ने वस्तु छैक देखबाक जे लोक महीनो एकर अध्ययन करैत रहत तैयो शेष नहि हेतैक। तखन एहि डेढ़ घंटाक टूर मे सब किछु मोन राखब सेहो सम्भव नहि। एहि म्यूजियम मे दूटा प्रसिद्ध वस्तु छैक – तूतनखामन के सोनाक ताबूत आ ममी आदि। गाइड सेहो बुझैत छथिन जे लोक एतबे मोन राखत। अस्तु, घुमैत घुमैत हम सब पहुँचलहुँ ओहि स्थल पर जतए प्रसिद्ध फैरो तूतनखामनक ताबूत राखल छैक। तूतनखामन नवीन साम्राज्यक अठारहम वंशक तेरहम फैरो छलाह जिनक शासनक समय 1355-1346 BC आँकल जाइत अछि। मिस्रक पुरातात्विक खुदाइ के इतिहास मे एकटा इएह ताबूत एतेक सही सलामत भेटलैक जाहि मे असली सोनाक ताबूतक संग ममी सेहो छलैक। ममी किछु नष्ट भऽ गेल छलैक आ एखन प्रदर्शनी सँ हटा देल गेल छलैक। आश्चर्ये जे प्रायः 3300 वर्ष मे एतए चोर नहि पहुँचि सकल। ताबूत तीन तह मे छलैक – सब सँ भीतर बला ताबूत 110 किलो ओजन बला ठोस सोनाक बनल छलैक, ओकर उपर दूटा आर काठक ताबूत बनल छलैक, बूझू जहिना रसियन डॉल रहैत छैक तहिना। ताबूत सब मात्र काठक बक्सा नहि होइत छलैक, अपितु ओहि मे उपर नीचा दूनू भाग मे बहुर रास चित्र, कलाकारी आदि बनल रहैत छलैक। एकदम मनुष्यक आकार मे बनाओल जाइत छलैक ई ताबूत सब, जाहि मे सिर, धर आ पएर के अंश ओहिना बुझाइत छैक जेना लोक शवासन मुद्रा मे पड़ल होए। ताबूत दू टुकड़ी मे बनैत छलैक, नीचा बला भाग मे ममी बनल शव राखि उपर बला भाग सँ झाँपि देल जाइत छलैक। एकर अतिरिक्त तूतनखामन के ताबूत पर 10 किलो शुद्ध सोनाक मुखौटा सेहो छलैक। मुखौटा मिस्रक उन्नत कलाक अद्वितीय नमूना अछि। एकर फोटो लेब वर्जित छैक मुदा इएह फोटो इंटरनेट पर सबतरि भेटि जाएत। तीन तह बला ई ताबूत चारि तह के सोनाक मुलम्मा चढ़ाओल काठक बहुत पैघ बक्सा मे सुरक्षित राखल छलैक। ओहि बक्सा मे ताबूतक बगल मे चारिटा छोट बक्सा सेहो छलैक जाहि मे अलाबास्टर पाथरक विशेष पात्र मे शरीरक द्रव बला अंग - आँत, लीवर, किडनी आ मस्तिष्क, निकालि कए राखल गेल छलैक। ई सब गाड़ल छलैक राजाक घाटी (valley of kings) मे जे कि नील नदीक पश्चिम मरुभूमि मे एकटा पहाड़ी इलाका मे गुप्त स्थान छलैक। नवीन साम्राज्य तक राजा सबकें बुझबा मे आबि गेल छलनि जे कब्रक चोरि होइते रहैत छैक तें एकटा गुप्त जगह चुनि कए अपन कब्र बनबैत गेलाह। हमरा सबहिक टूर के अन्तिम दिन एहि घाटीक भ्रमण होएत। अस्तु, तूतनखामनक कब्रक अवशेष देखि लेलाक बाद हम सब ममी देखबा लेल पहुँचलहुँ। दूटा ममी म्यूजियमक जेनरल भाग मे राखल छैक। राजा-रानीक ममी सब विशेष “रोयाल कक्ष” मे राखल, जकरा लेल अलग सँ 180 पौंडक टिकट लगैत छलैक। हम टिकट लऽ कए एहि कक्ष मे सेहो ममी सब देखलहुँ। सब ममी काँचक पारदर्शी घेरा मे बन्द आ सब घेराक भीतर एक एकटा हाइग्रोमीटर राखल ओकरा भीतर नमी कें जँचबा लेल। टिकट बला ममी सब के दूटा हॉल छलैक आ दूनू मिला कए करीब पचीस टा ममी राखल, सब नीक सुरक्षित अवस्था मे। एहि प्रकारें आजुक म्यूजियम दर्शन शेष भेल। तकर बाद बस सँ जाइत गेलहुँ अल-खलीली बजार। थोमस कूक इएह बजार हमरा सब लेल किएक चुनलनि से तऽ ठीक सँ बुझबा मे नहि आएल मुदा रस्ता मे राजधानी काहिराक किछु दर्शनीय स्थलक दर्शन जरूर भेल। बसे सँ देखैत आँखि जुरबैत गेलहुँ जे ई काहिराक किला छिऐक तऽ ई स्टेडियम। काँच ईंटाक बनल किछु प्राचीन घर बला इलाका सेहो देखल। आब तऽ सबतरि पक्का ईंटा आ सीमेंट-कंक्रीटक घर बनैत छैक। अल-खलीली बजार हमरा सबकें आनल गेल छल जे लोक अपन बेगरताक अनुसार सनेसक चीज वस्तु कीन लेत। एतए मिस्रक स्थानीय निर्मित वस्तुक अपेक्षा चीन सँ आयातित वस्तुक भरमार देखल। पूरा विश्व मे एहिना चीनी सामान भरि गेल छैक। अस्तु, हमरा बहुत किछु किनबाक तऽ नहि छल, बच्चा सब कें मिस्र भ्रमणक सनेस देबा लेल किछु पिरामिडक अनुकृति कीनल। ग्रुपक महिला लोकनि तऽ एतहु अनेक सस्ता ड्रेस आदि किनलनि, बर बेस। ग्रुपक किछु सदस्य कें आइ रातिए आसवान (Aswan) जेबाक फ्लाइट छलनि। ओ लोकनि अपन सामान लइए कए भोर मे चलल छलाह। एतए हुनका सबकें एकटा अलग बस मे बैसा कए एयरपोर्ट पठा देल गेल। ओ सब राति मे आसवान मे होटल मे विश्राम करताह आ भोर मे फेर एयरपोर्ट आबि जेताह सबहक संग आगूक भ्रमण लेल। हमर स्थानीय मुद्रा आब शेष भऽ रहल छल आ होटल छोड़बा सँ पहिने एकर इन्तजाम कैए लेबाक छल कारण आगूक यात्रा मे एहन सुविधा कतए भेटत से निश्चित नहि। एहि आशयक चर्चा हम जखन घुरती मे बस मे चलाओल तऽ एकटा तमिल यात्री बजलाह जे हुनका लग किछु विशेष ईजिप्सियन मुद्रा छनि। ई अतिरिक्त मुद्रा हुनका एकटा मित्र देने छलखिन जे कहुना डॉलर मे विनिमय करा कए भारत लऽ आबथि। बेस, हमरा एहि मे कोनो आपत्ति नहि छल, हुनके सँ एक सौ डॉलर भजा लेल। करीब साढ़े आठ बजे हम सब होटल घुरलहुँ आ फ्रेस भेलाक बाद जुमि गेलहुँ भोजनालयक भारतीय खंड मे। टूरक अगिला भाग मे सबेरे सब कें हवाइ जहाज सँ मिस्रक दछिनबरिया शहर आसवान जेबाक छल, सेहो पूरा ग्रुपक सदस्य एकहि फ्लाइट सँ नहि जा रहल छलाह, किछु कें फ्लाइट पाँच बजे आ किछु कें साढ़े पाँच बजे। आ हम सब छलहुँ एयरपोर्ट सँ दूर गीजा मे। इन्द्रजित सबकें बुझा देलखिन वेकअप कॉल एक बजे रातिए मे बजि जाएत, डेढ़ बजे तक सब गोटे अपन सुटकेस सब गेटक आगू राखि देबैक जाहि सँ होटलक कर्मचारी ओकरा उठा कए नीचा उतारि बस लग राखि देत। आ दू बजे तक सब गोटे होटल सँ चेकआउटक क्रियाकर्म पूरा करा कए अपन सुटकेस चीन्हि कए बस मे रखबा लेब आ बस मे सवार भऽ जाएब। बस कोनो दशा मे सवा दू बजे विदा भैए जाएत जाहि सँ तीन बजे तक एयरपोर्ट पहुँचल जा सकए। काउन्टर पर सब यात्रीक लेल होटल सँ जलपान पैक करबा कए राखल रहत। ३ पिरामिडक देश मे (पछिला दू अंक मे अपने पढ़लियैक मिस्रक राजधानी काहिरा के आसपासक इलाका मे हमर तीन दिनक यात्राक अनुभव, जाहि मे मुख्य छल गीजाक पिरामिड परिसर आ स्फिंक्स, पापीरस गैलरी, सकाराक स्टेप पिरामिड आ दहसुरक टेढ़ आ लाल पिरामिडक दर्शन, मेम्फिसक म्यूजियम मे रानी हातसेप्सुतक स्फिंक्स आ फैरो रैमसेस-2 के अनेक मूर्तिक दर्शन, काहिरा शहर मे ईजिप्सियन म्यूजियम मे तूतनखामन के सोनाक ताबूत आ अनेक ममी देखनाइ आ बजार घुमनाइ।) चारिम दिन 20 सितम्बर 2019। अधरतिए मे होटल छोड़बाक छल आसवानक यात्रा लेल। आसवान मिस्रक दक्षिण भाग मे अवस्थित प्रसिद्ध शहर छैक जे प्राचीन समय सँ बनिज व्यापारक प्रमुख केन्द्र रहलैक अछि। थोमस कूकक प्रोग्रामक अनुसार हम सब आब एही दछिनबरिया इलाका मे बस, जहाज आदि सँ घुमैत रहब आ अन्तिम दिन लक्जर शहर सँ फेर हवाइ जहाज द्वारा काहिरा पहुँचि देश आपस जाएब। पछिला राति मे मात्र तीन घंटा लेल हमरा निन्नक आवाहन नहिए कएल भेल, वेकअप कॉलक भरोसे हम नहिए रहैत छी कारण सुतबा काल आँखिक चश्माक संग कानक चश्मा सेहो खोलि कए राखि दैत छिऐक। तें जगले आ सतर्क रहलहुँ। दू बजे होटल सँ चेकआउट करैत जलपानक पैकेट संग मे लैत गीजाक होटल छोड़ि देल आ बस मे सवार भए काहिरा एयरपोर्ट विदा होइत गेलहुँ। एयरपोर्ट पहुँचि हमरा आसवान लेल तुरत्ते एकटा पहिलुके फ्लाइट मे जगह भेटि गेल कारण हमर एहि खंडक टिकट बिजनेस क्लासक छल। सम्भवतः थोमस कूक कें सब पसिंजर लेल इकोनॉमी क्लास मे टिकट नहि भेटल हेतैक तें हमर प्रोमोसन भऽ गेल छल। अस्तु, एहि सँ कोनो विशेष लाभ नहि, एतबे जे बिजनेस क्लास मे एक कप नीक गर्म कॉफी भेटि गेल आ काहिरा एयरपोर्ट पर प्रतीक्षा करबाक बदला आसवान पहुँचि एयरपोर्ट पर प्रतीक्षा करए पड़ल। जलपानक पैकेट देखल, किछु बेसिये सामान बुझाएल। अस्तु, हिसाबें निकालि कए खा लेल आ बाकी राखि देल। आजुक प्रोग्राम मे लंच सेहो पैकेटे भेटबाक छलैक कारण बहुत दूरक बस यात्रा छल आ साँझे भेला पर जहाज पर भोजन भेटैत। ग्रुपक सदस्य लोकनि बादक फ्लाइट सँ बेराबेरी अबैत गेलाह। सब कें एकत्रित करैत सभक सामान बस मे उठबैत प्रायः साढ़े आठ बाजि गेलैक। बस मे चढ़िते थोमस कूकक स्थानीय पार्टनर कम्पनीक लोक लंच पैकेट आ जल सब कें बाँटि देलनि। एतए मोहम्मद अब्दुल्ला नामक गाइड बस मे संग भेलाह। कारी अफ्रिकन मूलक बेस पैघ कायाक व्यक्ति मुदा बहुत हँसमुख, ईजिप्टोलोजीक नीक ज्ञान, अपना काज मे दक्ष आ बहुत परिस्कृत अंग्रेजी बजैत। सब यात्री कें आदर अथवा मजाक मे ‘फैरो’ सँ सम्बोधन हुनक, माने हुनका लेल तऽ हम सब टूरिस्टे सम्राट छलिएनि। टूरिस्टेक आय सँ हुनको पेट चलैत छलनि आ देशक अर्थ व्यवस्था सेहो। अगिला चारि दिन हिनके संग हमरा सब कें भ्रमण करबाक छल। गाइडक बुद्धि आ व्यवहार सँ सब गोटे प्रसन्न छलाह आ थोमस कुक कें एहू लेल बधाइ भेटलनि। गाइड अब्दुल्ला बूझू प्राइमरी स्कूलक मास्टर जकाँ हमरा सब कें इतिहास बुझा रहल छथि, बीच बीच मे प्रश्न सेहो पूछि बैसैत छथि। भाषणक बीच ककरो गप करब हुनका पसिन्न नहि। यात्री सब सेहो मिस्रक इतिहास बहुत किछु बूझि पढ़ि कए आएल छथि आ गाइडक बात ध्यान सँ सुनलाक बाद हाथ उठा हुनकर प्रश्नक उत्तर दैत छथि अथवा किछु प्रतिप्रश्न सेहो करैत छथि। आइ हमरा सब कें जेबाक छल अबू सिम्बेल नामक जगह। ताहि सँ पहिने सकाले ओ सब कें आसवानक हाइ डैम देखबा लेल लऽ गेलखिन। आसवानक ई हाइ डैम आधुनिक आ स्वतंत्र मिस्रक कायाकल्प केनिहार प्रोजेक्ट छलैक जहिना स्वतंत्र भारत लेल भाखड़ा-नाँगल सदृश योजना। मिस्र मे नील नदीक प्रवेश करितहिं पैघ बान्ह बना कए विस्तृत जलाशय आ जल-विद्युत उत्पादन केन्द्र बनाओल गेल। नेहरूक परम मित्र मिस्रक राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासर एकर सूत्रधार छलाह। तें बान्ह सँ बनल जलाशय कें ‘लेक नासर’ कहल जाइत छैक। हाइ डैम पर ठाढ़ भऽ कए लेक नासरक विशालताक मात्र कल्पना कएल जा सकैत छैक। नील नदी पर आसवान इलाका मे अंग्रेज शासन मे सेहो एकटा बान्ह बनल छलैक, ओ छैके, मुदा छोट आ पुरान, एकरा आब ‘लो डैम’ कहल जाइत छैक। नव स्वतंत्र मिस्र कें औद्योगिक राष्ट्र बनेबाक दिशा मे बिजली उत्पादन बहुत जरूरी छलैक। ताही दिशा मे काज करैत राष्ट्रपति नासर पहिने स्वेज नहरक राष्ट्रीयकरण केलनि, अंग्रेजक हाथ सँ ओकर स्वामित्व अबिते राष्ट्रक आय सेहो बढ़ि गेलैक। तखन रूसक सहायता सँ नव पैघ डैम बनाओल गेल। गाइड अब्दुल्ला डैम आ लेक सम्बन्धित बहुत रास बात बतबैत छथि जाहि मे मुख्य अछि एखन लेक मे सहसह करैत गोहिक जनसंख्या। गोहि प्राचीन कालहिं सँ नील नदी मे भेटैत रहलैक आ नाविक सब कें सतबैत रहलैक। तें एकरो देवताक खाढ़ी मे राखल गेल। बान्ह बनला पर लेक मे गोहि सब फँसि गेल, दोसर कात जाएत कोना ? प्रजनन चलैत रहलैक आ जनसंख्या बढ़ैत रहलैक। एकर शिकार पर प्रतिबन्ध लागि गेला सँ ई जानवर आओरो छुट्टा भऽ गेल। एखन स्थिति ई छैक जे यदि पति पत्नी मे झगड़ो होइत छैक तऽ धमकी इएह देल जाइत छैक — “लेक नासर मे फेकि देबौ, गोहिक शिकार बनमे”। लेक नासरक विशालताक अन्दाज करबा लेल बुझियौ जे एकर जल धारण क्षमता 132 घन किलोमीटर छैक, एकरा तुलना मे भारतक सबसँ पैघ नर्मदा बान्हक जलाशय ‘इन्दिरा सागर डैम’क क्षमता मात्र 12.2 घन किलोमीटर छैक। लेक नासर के सतहक घेरा करीब साढ़े पाँच हजार वर्गकिलोमीटर मे पसरल छैक, बूझू एकर तुलना मे भाखड़ाक गोविन्द सागर मात्र 168 वर्गकिलोमीटर छेकने छैक। एहि जलाशयक बनला सँ मिस्रक एहि इलाका मे अवस्थित कएकटा प्राचीन स्मारक ओकरा पेट मे चल गेलैक। एहि मे सँ किछु अति महत्वपूर्ण स्मारक कें ओ लोकनि पूर्ण रूपें एक एकटा पाथर काटि कए उठा कए प्रतिस्थापित कऽ देलनि। ई काज कएल गेल यूनेस्को के तत्वावधान मे अनेको देशक वास्तुकार, इंजीनियर आ तकनीकी विशेषज्ञ लोकनिक देखरेख मे। एहने प्रतिस्थापित स्मारक अछि अबू सिम्बेल मे उनैसम वंशक प्रतापी सम्राट रैम्सेस-2 के मंदिर। अबू सिम्बेल आसवान शहर सँ 300 किलोमीटर दूर अवस्थित अछि, हिसाबें लेक नासरक दोसर छोड़ पर, रस्ता सपाट मरुभूमि बाटे। करीब चारि घंटा जेबा मे आ ओतबे फेर घुरबा मे लगैत। एहि यात्रा मे बसक एयरकन्डिसनिंग मसीनक देखभाल लेल अलग सँ मिस्त्री सेहो बस मे चढ़ल गेलाह कारण आइ गर्मी सेहो खूब छलैक आ रस्ता मे मरुभूमिक बीच कोनो तरहक सहायता भेटब असम्भवे। मरुभूमि मे एतए सड़क एकदम सपाट आ सीधा, बूझू पचीसो किलोमीटर मे कोनो घुमाव नहि। दूनू कात जतेक दूर तक नजरि जाइत छल कतहु कोनो आबादीक चिन्ह नहि। रस्ता मे कतहु कोनो गाड़ी नहि, कखनहु कए एकाधटा मिलिटरी ट्रक मात्र जाइत अबैत। अब्दुल्ला बतौलनि जे रस्ता मे एहि गर्मी मे मरुभूमिक प्रसिद्ध घटना ‘मृग मरीचिका’ (mirage) देखब सम्भव होएत। ठीके करीब एगारह बजे तक रौद एतेक तेज भऽ गेल छलैक जे मरीचिका देखबा मे आबऽ लागल। किताबे मे एहि घटनाक बारे मे पढ़ने रही मुदा प्रत्यक्षतः आइए देखल। एहि यात्रा मे बूझू ई बोनस भेल। पूरा रस्ताक बीच मात्र एक ठाम ‘मिडवे’ जकाँ एकटा दोकान जतए किछु ड्रिंक आदि भेटैत आ पाँच पौंड बला पेड शौचालयक सुविधा छलैक। करीब दू घंटाक यात्राक बाद आएल ओ मिडवे। सब गोटे उतरैत गेलहुँ। भारत मे एहन कोनो मिडवे पर अनेको गाड़ी बस लागल रहैत मुदा एतए किछु नहि। एकमात्र हमरा सबहिक बस। कने लेट भऽ गेला सँ दोसर टूरिस्ट बस पहिनहि चल गेल छलैक। एहि मिडवे मे एकटा घर आ तकरा आगू किछु काठक खुट्टा पर चढ़ाओल पातर छाही। मुदा वाह रे मरुभूमिक घरक छाही ! मकइक डाँट उपर मे छिड़िआएल, एतेक हटल हटल जे कहुना छाहरिक बोध होइत। एहि सँ घनगर तऽ बाती आ खरही देल बिन छाड़ल ठाठ हमरा सब बन्हैत छी गाम मे। बरखा तऽ एतए होइते नहि छैक तखन रौद सँ बँचबा लेल एतबो बहुत। अस्तु, एतए लोक शंका निवारण केलक, किछु गोटे कोल्ड ड्रिंक लेलनि। दस मिनट बाद बस विदा भेल। जेना जेना हम सब अबू सिम्बेलक लग अबैत गेलहुँ, गाम घरक दर्शन होमए लागल। मरुभूमि मे गाम घर तऽ जलक स्रोत ओएह लेक नासर। करीब डेढ़ बजे हम सब अबू सिम्बेल गाम पहुँचलहुँ। पार्किंग मे बस लगा देल गेल। ओतए सँ हमरा सब कें पएरे करीब आधा किलोमीटर चलि कए ओहि स्थल पर पहुँचबाक छल जतए प्रतिस्थापित मंदिर छलैक। रस्ता मे थोड़ेक दूर तक तऽ दूनू कातक मीनाबजारक छाहरि छलैक। तकर बाद जतए टिकट चेक कएल गेल ओतए एकटा घर ‘विजिटर सेन्टर’ बनाओल। एहि मे प्रतिस्थापन कालक पूरा भीडियो चलैत। तकर बाद रस्ता फेर खुला आ प्रचंड रौद मे। ई मंदिर अजन्ताक गुफा जकाँ पाथर कें काटि कए बनाओल गेल छलैक ईसा पूर्व तेरहम शताब्दी मे सम्राट रैमसेस-2 द्वारा। एकटा पैघ मंदिर अपना लेल आ बगल मे दोसर छोट मंदिर अपन सर्वप्रिय रानी नेफरतारी लेल। असल मे मंदिर मे ओहि समयक प्रचलित देवता ‘आमुन’ (Amun), ‘रा-होराख्ती’ (Ra-Horakhty) आ ‘ता’ (Ptah) कें समर्पित छल। ‘रा’ सूर्य कें कहल गेल छनि। प्रतिस्थापित करबा लेल पहिने उपरका पाथर कें हल्लुक ब्लास्ट सँ हटाओल गेल। तखन 20-30 टन ओजन के टुकड़ी मे मूर्ति सब कें काटल गेल। एक हजार सँ बेसी एहन टुकड़ी सब कें विशाल किरान द्वारा उठा कए नव जगह आनि फेर एक एकटा टुकड़ी कें बैसाओल गेल। एहि लेल पहिने कृत्रिम पहाड़ी बनाओल गेल आ ओकरा खोह मे पाथरक टुकड़ी सब कें एहि तरहें बैसाओल गेल जे एकदम असली मंदिर बनि गेल। विश्वक धरोहर कें सुरक्षित रखबाक एतेक पैघ स्तर पर एहन भगीरथ प्रयास अन्यत्र कतहु नहि भेल छलैक। सबसँ मुख्य बात छलैक मंदिरक द्वारक दिशा सही राखब जाहि सँ 22 अक्टूबर आ 22 फरवरी कें भोर मे सूर्योदयक समय सूर्यक किरण एकदम भीतरक गर्भगृह पर पड़ैक, जेना कि मूल मंदिर मे होइत छलैक। एहि तारीख कें विद्वान लोकनि रैमसेस-2 के जन्मदिन आ राज्यारोहण दिन सँ सम्बन्धित मानैत छथि। मुख्य मंदिरक सामने भाग मे रैमसेस-2 के 20 मीटर ऊँच चारिटा विशाल मूर्ति छलैक, प्रवेश द्वारक दूनू कात दू दूटा मूर्ति। एकटा मूर्ति मिस्रक प्राचीन भूकम्प मे पहिनहि क्षतिग्रस्त भऽ गेलैक। एकरा एखनहु ओहिना छोड़ि देल गेल छैक। मूर्ति मे सम्राट सिंहासन पर बैसल छथि आ मिस्रक दूनू भाग — अपर इजिप्ट आ लोअर इजिप्ट — कें निरूपित करैत जौआँ मुकुट पहिरने छथि। एहने जौआँ मुकुट पहिरने रैमसेस-2 के मूर्ति अन्यत्र सेहो पहिनहिं देखने छलहुँ। भीतर मे विशाल स्तम्भ सब पर मूर्ति, सम्राट द्वारा कएल गेल विभिन्न लड़ाइ के चित्रकारी आदि एखनहु जीवंत छैक। भीतर मे अनेक कक्ष छैक जे सामने सँ अन्दर जाइत छोट होइत जाइत छैक। सबसँ भीतर मे मात्र एकटा कक्ष जे गर्भगृह भेलैक। तहिना करीब 100 मीटर दूरी पर ओही कृत्रिम पहाड़ीक दोसर भाग मे रानीक मंदिर बैसाओल गेल। ई मंदिर देवता हाथोर आ रानी नेफरतारी कें समर्पित अछि। एकर सामनेक भाग मे प्रवेशद्वारक दूनू कात करीब 10 मीटर ऊँच तीन तीन टा मूर्ति, जाहि मे बीच मे सम्राट आ दूनू कात रानी। एहू मंदिर मे भीतर मे विशाल स्तम्भ सब मे चित्रकारी मुदा ओतेक कक्ष नहि। मंदिर घुमबा मे लोक कें प्रायः आधा घंटा लगलैक मुदा फेर बस तक आपस जेबा मे समय लगलैक। पाछू सँ देखला पर ई कृत्रिम पहाड़ी एको रत्ती बनाबटी नहि लगैत छैक। अस्तु करीब अढ़ाइ बजे हम सब अबू सिम्बेल सँ विदा लेल। एक घंटाक मंदिर दर्शन आ आठ-नौ घंटाक बस यात्रा। ओना तऽ साँझ मे आसवान शहर घुमबाक किछु कार्यक्रम छल मुदा यात्री सब कें थाकल रहला सँ एकरा त्यागि देल गेल। हम सब सोझे पहुँचलहुँ अपन जहाज ‘क्राउन प्रिंसेस’ पर। आब तीन दिन तक एतहि रात्रि विश्राम करबाक छल। ‘क्राउन प्रिंसेस’ पाँच सितारा होटलक समकक्ष मानल जाइत छैक। पाँच तल्लाक बेस पैघ जहाज, करीब अढ़ाइ सौ पसिंजरक रहबाक व्यवस्था। तकरा सेवा लेल सब प्रकारक कर्मचारी। सबसँ नीचा मे डाइनिंग हॉल छलैक, तकरो नीचा मे इंजन रूम आदि। तखन चारि तल्ला मे रहबाक कमरा, लॉबी, दोकान, बार, आदि सब किछु। उपरका डेक पर स्विमिंग पूल, आ खुला जगह मे अनेको कुर्सी लागल। एतहु चाह, कॉफी, ड्रिंक आदि उपलब्ध मुदा अलग सँ पैसा देला पर। दुपहरिया मे एक बेर चाह/कॉफी फ्री, माने जहिना होटलक आन भोजन फ्री (दाम तऽ टूरक पैकेज मे देले छलैक)। एहि समय अपन भारतीय यात्री लेल इन्द्रजित अपन रसोइया सँ पकोड़ा, सिंघाड़ा आदि सेहो बनबा लैत छलाह। एतए रूम सब करीब करीब होटले जकाँ, मात्र कने छोट कारण जगह बचेबाक लेल। रूमक सफाइ सेहो नित्य ओहिना कएल जाइत छैक। खाली इंटरनेट बहुत महग आ पीबाक जल जेना हमरा गीजाक होटल मे भेटैत छल से नहि। तें बाहर सँ जल कीनऽ पड़ल। एतहु डाइनिंग हॉल मे अलग सँ भारतीय व्यंजनक इन्तजाम थोमस कूक केनहि छल, ओकर अपन रसोइया तऽ संगहिं छलैक। हमरा सब लेल किछु टेबुल सेहो रिजर्व रहैत छल आ कहलो गेल छल जे अन्यत्र नहि बैसी। ओना भोजन लेल लोक किछुओ चुनि सकैत छल, कन्टिनेटल, जे अन्य यात्री लेल बनाओल जाइत छलैक, अथवा भारतीय, ई अपना इच्छा पर निर्भर छलैक। जहाजक सवारी के हमर अनुभव बहुत कमे रहल अछि - किछु घंटाक सवारी अंडमान यात्रा मे केलहुँ, एक टापू सँ दोसर टापू पर जेबा लेल, तहिना इंगलिस चैनल पार करबा काल आ डेनमार्क सँ स्वीडन जेबा काल, ततबे। जहाज पर रात्रि विश्रामक अनुभव पहिले बेर भेल अछि। एतए देखलियैक जे एक बेर भीतर गेला पर आ चेकइन केला पर बाहर जेबा लेल लोक कें एकटा पास देल जाइत छलैक। घुरला पर गेटे पर ओ पास रखबा लेल जाइत छलैक। साधारणतः ई प्रक्रिया तखन बेसी जरूरी रहैत छैक जखन जहाज किछुए समय मे तट छोड़ि देबा लेल तैयार रहैत अछि आ कोनो व्यक्ति कें बाहर जाएब जरूरी भऽ गेलनि। जहाज खुजबा सँ पूर्व सबटा पासक गिनती कएल जाइत छैक जाहि सँ पता चलैक जे कोनो व्यक्ति बाहर तऽ ने छूटि गेल। आइ राति जहाज कें एतहि रहबाक छलैक। अगिला दिन 21 सितम्बर 2019, सबेरे हम सब जलपानक बाद बस मे सवार भऽ कए गेलहुँ आसवान शहरक एक इलाका जतए फेर छोटका नाओ सँ एकटा टापू पर जाकए फिले (Philae) मंदिर देखबा छल। फिले मंदिर नील नदीक एकटा टापू पर छैक जे पुरना लो डैमक जलक्षेत्र मे पड़ैत छलैक। एहि इलाका मे अनेक छोट पैघ टापू। फिले मंदिरक मूल टापू मुदा जखन डूबऽ लगलैक तखन एकर समस्त मंदिर परिसर कें उठा कए लगेक दोसर उँचगर टापू पर प्रतिस्थापित कएल गेल। नाओ पर सँ गाइड अब्दुल्ला हमरा सब कें मूल फिले टापू देखा देलनि। फिले मे मंदिर सब मिस्रक मूल फैरो (सम्राट) नेक्टानेबो-1 द्वारा ईशापूर्व 370 इस्वी मे देवी इसिस लेल बनाओल गेल। जखन मिस्र पर ग्रीक लोकनि शासन करए लगला तखन स्थानीय जनताक विश्वास जितबाक लेल आ ओकरा सब कें अपना दिस मिला कए रखबा लेल ओ लोकनि मिस्रक पुरान देवी देवताक नाम पर फेर सँ मंदिर सब बनौनाइ शुरू केलनि। तहिना बाद मे रोमन शासक लोकनि सेहो मंदिर सब बनौलनि। फिलेक मंदिर मुख्यतः टोलेमी-2, टोलेमी-5 आ टोलेमी-6 के शासन काल मे बनाओल गेल। काहिराक ईजिप्सियन म्यूजियम देखबा काल अनेक टूरिस्ट ग्रुपक बीच हमरा सब कें ईयरफोन देल गेल छल जाहि सँ अपन गाइड कें सुनि सकी। एतए ओ सुविधा नहि आ अनेको ग्रुपक लोक आ गाइड बौआइत। हमर गाइड अब्दुल्ला सबकें एकठाम जमा कऽ कए फिलेक वर्णन सुनबए लगलाह मुदा लोक सब तऽ फोटो लेबा मे व्यस्त भऽ जाइत छल। भीड़ मे चालीस सदस्य कें एक संग सम्हारि कए राखब कठिन काज छलैक। तथापि ओ हमरा सब कें मंदिरक पहिल प्रवेश द्वार, जाहि मे विशाल गोपुर (pylon) बनल छलैक, फेर भीतर के विशाल आङन, तखन दोसर गोपुर होइत अन्त मे छोट गर्भगृह देखौलनि। गर्भगृह मे एखन मात्र ग्रेनाईटक चबूतरा टा छैक। कोनो समय मे एहि चबूतरा पर देवी इसिसक मूर्ति रहल हेतनि। आङन मे एक कात अनेको छोट छोट कमरा सब छैक जे कहियो पंडित लोकनिक निवास रहल हेतनि। संगहि कात मे सेहो विशाल स्तम्भ सब छैक। गाइड अपन काज समाप्त कऽ कए फोटो लेबा लेल अलग सँ बीस मिनट समय देलखिन। अस्तु हम सब ओतए सँ फेर नाओ पर चढ़ि कए बस पार्किंग बला जगह अबैत गेलहुँ। अगिला भ्रमण स्थल छल एतुका प्रसिद्ध ईजिप्सियन कॉटन के दोकान। मिस्रक सूती वस्त्र विश्व प्रसिद्ध छैक से सबकें बूझल छल। मुदा गाइड कहलनि जे साधारणतः दोकान सब मे एखन खाली चीनी सामान (जकरा ओ मजाक मे आर-ओ-सी, माने रिपब्लिक ऑफ चाइना कहैत छलथिन) भरल छैक आ सुच्चा ईजिप्सियन कॉटन सब ठाम नहि भेटैत छैक। एहि मे हमरा सब कें कोनो अतिशयोक्ति नहि बुझाएल कारण चीनी सामानक बाढ़ि तऽ विश्वक हरेक गली कूची मे देखबा मे अबिते छैक। अस्तु, हम सब एकटा एहन सुच्चा कपड़ाक दोकान मे प्रवेश केलहुँ। सत्ते एतुका वस्त्र देखि सन्देह मेटा गेल। मुदा वस्त्र सबहक दामो तहिना ऊँच। कोनो हाफ शर्ट 900 पौंड (माने करीब 4000 रुपैया) सँ कम नहि। थोड़ेक काल तक तऽ प्रायः सब गोटे घुरिआइते रहलाह मुदा किछु गोटे कीनब शुरू केलनि तऽ हमरहु धाख छूटल। नाति नातिन लेल टीशर्ट कीनल, क्रेडिट कार्ड सँ पेमेंट कएल। समय कम छल, लंच तऽ जहाजे पर करबाक छल मुदा बेसी महत्वपूर्ण छलैक जहाज कें डेढ़ बजे छुटबाक समय। तें अब्दुल्ला सब कें समेटि बस मे ढुका लऽ अनलनि जहाज पर। आसवान शहर छोड़ि देल। आब जहाजे पर सब किछु। एहने समय लेल पैघ समुद्री यात्रा मे लोक जहाजक लाइब्रेरीक उपयोग करैत रहल होएत। हमर लाइब्रेरी किन्डल मे छल। रौद बेसी रहला सँ उपरका डेक पर जाएब सम्भव नहि। रूम एयरकन्डिसन्ड छले। बस, खिड़कीक पर्दा हटा देल आ बैसि कए नील नदीक किनाराक बदलैत दृश्यक आनन्द लेबऽ लगलहुँ। सूर्यास्त सँ किछु पहिने हम सब पहुँचलहुँ “कोम ओम्बो” मंदिर लग। आब हम सब उत्तर दिशा मे चलैत आसवानक बान्ह सब के जलक्षेत्र सँ बहुत दूर चलि आएल छलहुँ आ मंदिर सब मूले स्थल पर अवस्थित छैक। एहि मंदिर कें “स्वास्थ्य लाभक मंदिर” सेहो कहल जाइत छैक। प्राचीन काल मे दूर दूर सँ बीमार लोक एतए अबैत छल, चढ़ौआ चढ़बैत छल आ अपन नीरोग हेबाक कामना करैत छल। कोम ओम्बो मन्दिर कें जोड़ा मन्दिर सेहो कहल जाइत छैक कारण एतए दूटा देवता लेल एक समान सटले-सटल दूटा मन्दिर बनलैक। एकटा मन्दिर मे गोहि देवता ‘सोबेक’ लेल, जिनका प्रजननक देवता सेहो बूझल जाइत छल। दोसर मन्दिर अछि बाज देवता ‘हारोरिस’ लेल। एतए घुमैत साँझ परि गेलैक आ बहुत रास मन्दिर परिसर हम सब बिजलीक प्रकाशे मे देखल, ई नव अनुभूति भेल। ई मन्दिर सब ग्रीक शासनक समय बनाओल गेल छलैक। कतेको चित्र आ मूर्ति कें देखा कए गाइड हमरा सब कें बुझौलनि जे ग्रीक लोकनिक बनाओल चित्र मे नारीक शरीरक विभिन्न अंगक अनुपात पुरान जमानाक मिस्र मे बनाओल चित्र सँ बहुत भिन्न छैक। ग्रीक लोकनि महिलाक वक्ष कें बेस पैघ बनाकए वक्षाग्र पर्यन्त कें देखनुक बना अनावृते छोड़ि दैत छलखिन। मुस्लिम संस्कृति मे जनमल भीजल अब्दुल्ला कें ई ढंग नीक नहि लागि रहल छलनि। एहि मन्दिर मे ओहि जमाना मे व्यवहृत शल्य चिकित्साक औजारक चित्र सब बनाओल छैक। एतए ओहि प्राचीन समय मे प्रसव काल महिला लोकनि कें कोन तरीका सँ बैसाओल जाइत छल तकर एकटा चित्र देखल। गाइड अब्दुल्ला हमरा सब कें बुझा देलनि जे ई तरीका आब फेर लोकप्रिय भऽ रहल छैक। हमरा ग्रुप मे एकटा तमिल महिला गाइनेकोलोजिस्ट छलीह। ओ एकर समर्थन केलखिन। मन्दिर परिसर मे पहिल बेर देखल नाइलोमीटर (Nilometer) जे एकटा इनार जकाँ होइत छलैक। प्राचीन काल मे एहि इनारक जल स्तर सँ प्रशासन कें ई बुझबा मे अबैत छलैक जे नील नदी मे एहि बेर कतेक पानि एलैक, ओहि हिसाबें जनता कें खेतीक उपजा केहन भेल हेतैक। ताही हिसाबें कर ओसूल कएल जाइत छलैक। यदि पानि कम रहलैक तऽ नीक उपजा नहि भेला सँ लोक कें कमे कर देबऽ पड़ैत छलैक। एतेक संतुलित आ वैज्ञानिक कर व्यवस्था विश्वक प्राचीन इतिहास मे अन्यत्र भेटब कठिन। एतहि क्रोकोडाइल म्यूजियम देखल जतए एकटा हॉल मे बहुत रास गोहिक ममी बना कए राखल छलैक। मनुष्यक ममी तऽ काहिराक म्यूजियम मे देखने छलहुँ, गोहिक ममी एतहि देखल, ई विश्व मे अद्भुते अछि। हमरा सब एखन जहाजक पंछी बनि गेल छी — जैसे उड़ि जहाज की पंछी पुनि जहाज पे आबै। सएह गति। अस्तु, मन्दिर भ्रमणक बाद घुरि अबैत गेलहुँ जहाज पर। जहाज राति मे एतए सँ विदा भऽ जेतैक से बता देल गेल। संगहि ईहो जे बहुत सकाले एडफू मंदिरक दर्शन करबा लेल तैयार होमए पड़त। साढ़े चारि बजे भोरे बार मे चाहक व्यवस्था भेल रहतैक। कोनो दशा मे पाँच बजे जहाज छोड़ि सड़क पर आबि जेबाक छल। बर बेस, भोजनक बाद रात्रि विश्रामक तैयारी मे लागि गेलहुँ। जहाज पर अन्तिम दिन, 22 सितम्बर। जहाज राति मे कखन चललैक आ कखन एडफू पहुँचि गेलैक से नहिए बुझलियै मुदा सकाल मे तैयार भऽ साढ़े चारि बजे चाह पीबा लेल सब गोटे जमा भए गेलहुँ। ठीक समय पर सड़क पर अबैत गेलहुँ। थोमस कूकक व्यवस्था मे कतहु कोनो कोताही नहिए रहैत छलैक। सड़क पर चारि सीट बला बहुत रास टमटम सब ठाढ़। एडफू मन्दिर जहाज सँ करीब डेढ़ किलोमीटर दूर छलैक तें सबके टमटम सँ ओतए जेबाक छल। लोक अपना हिसाबें चारि गोटेक ग्रुप बना लेलक। आ टमटम सब दौड़ए लागल। किछुए दूर गेला पर मंदिर परिसरक दर्शन होमए लागल। परिसर बहुत पैघ। एतेक सबेरे तैयार होइतहु मंदिर परिसर पहुँचैत हम सब अन्य ग्रुपक यात्री सबसँ कने पछुआइये गेलहुँ। गेट तऽ छओ बजे खुजबाक छलैक मुदा लोक लाइन मे पहिनहि सँ लागल। हमहूँ सब लाइन मे लगैत गेलहुँ। अस्तु, गेट खुजलाक बाद सब ग्रुप मे अपन अपन गाइड सब जगह बना कए लोक कें मदिरक इतिहास आदि बतबए लगलखिन। हमरो लोकनिक गाइड अब्दुल्ला कमान सम्हारलनि, सब गोटे कें घेरा मे ठाढ़ कऽ कए मंदिरक सब जानकारी विस्तार सँ दऽ देलनि। तकर बाद लोक स्वतंत्र छल अपना हिसाबें घुमबा लेल आ जतेक इच्छा होइ से फोटो घिचबा लेल। एडफू मंदिर ग्रीक शासनक समय मे बनल छलैक जे टोलेमी-3 के समय शुरू भेल आ टोलेमी-12 के समय मे बनि कए तैयार भेल। एकर पहिल गोपुर 37 मीटर ऊँच आ 70 मीटर चौड़ा छैक जकरा बीच मे प्रवेश द्वार बनल छैक। सामने मे दूटा बाजक मूर्ति। एकटा कने खंडित भऽ गेल। गेटक आगू भीतर मे विशाल आङन। ताहि मे तीन कात बरामदा जकाँ अनेको स्तम्भ बनल। भीतर मे एकटा बाजक मूर्तिक नीचा सम्राट टोलेमी-12 ठाढ़ छथि। ई मन्दिर देवता ‘होरस’ कें समर्पित अछि जे एतए बाज के रूप मे प्रतिष्ठित छथि। मंदिरक सबसँ भितरका भाग, गर्भगृह, मे एकटा ग्रेनाइटक चबूतरा पर हिनक पवित्र नाओ राखल रहैत छलैक। वर्ष मे दू बेर एतए सँ नाओ पर नील नदी मे जुलूसक संग होरस कें बाहर निकालल जाइत छल आ डेन्डारा सँ हिनक पत्नी देवी ‘हाथोर’ ओहिना नाओ पर जुलूसक संग अबैत छलखिन। एहि समय समूचा मिस्र मे खूब उत्सव मनाओल जाइत छलैक। पत्नी सँ मिलनक बाद एक सप्ताह तक दूनू गोटे एडफू मे रहैत छलाह। तकर बाद फेर हाथोर कें डेन्डारा पठा देल जाइत छलनि। एडफूक मन्दिर बहुत दिन तक नील नदीक गादि आ मरुभूमिक बालु सँ झाँपल रहलैक। एतेक तक जे एकरा उपर लोक सब घर सेहो बना लेलक। कतोक पाथरक टुकड़ी लोक सब अपन घर बनेबा मे उपयोग कऽ लेलक। उनैसम शताब्दी मे जखन मिस्र मे फ्रेंच लोकनि अएलाह आ प्राचीन स्मारक सबहक खोज शुरू भेल तखन एकरो पता चललैक। फेर एहि जगह कें अवैध कब्जा सँ मुक्त कराओल गेल आ पूरा परिसर के सफाइ भेल। वर्तमान मे ई मन्दिर मिस्रक सब स्मारक सँ बेसी नीक सुरक्षित अछि। मंदिरक किछु भाग मे एखनहु गादि मे डुबलाहा भागक चिन्ह भेटैत छैक। रोमन साम्राज्यक प्रारम्भिक समय मे जखन ईसाइ धर्मक अतिरिक्त आन धर्म कें ‘पागान’ घोषित कऽ देल गेल आ दूनू मे धर्मयुद्ध शुरू भेल तखन कतेको ईसाइ मिसनरी एहि मन्दिर मे नुका कए रहैत छलाह। मंदिर देखि हम सब करीब आठ बजे तक जहाज पर घुरि अएलहुँ। जलपान केलाक बाद एखन बेसी लोक डेक पर चल गेल। भरि दिन आब जहाजे पर रहबाक छलैक। किछु लोक स्विमिंग पूलक मजा लेलनि। किछु अन्य अपन चाह कॉफी आदि पीबैत नदीक दूनू कातक गाम घरक दृश्य देखैत रहलाह। असल मे थोमस कूकक बनाओल प्रोग्राम मे तीन दिनक ‘नील क्रूज’ के असली मजा लोक एखने लऽ रहल छल। एहि बीच एकटा खेला शुरू भेल। एकटा छोटका नाओ (डोंगी) हमरा सबहिक जहाज मे बन्हा गेल। ओहि मे दूटा स्थानीय युवक हमरा सब कें आकर्षित करैत चिचिया रहल छलाह जे हुनका सँ किछु कीनी। ओ सब बेडशीट, टेबुलक्लॉथ आदि बेचि रहल छलाह। सामान सब तऽ ओएह चीनी माल (अब्दुल्लाक भाषा मे आरओसी, republic of china, बला) मुदा आब लोक बचि कए कतए जाएत ? सब तरि तऽ ओएह सामान कीनैत छी, दीपावलीक गणेश आ लक्ष्मीजीक मूर्ति सँ लऽ कए सालो भरिक सजावटक बिजलीक सामान तक। संकेतक भाषा मे मोल मोलाइ चलए लागल। हमरा ग्रुपक किछु गोटे एहन सामान किनबो केलनि। सामान ओ सब प्लास्टिकक बैग मे बान्हि एहन साधल लक्ष्य सँ उपर फेकैत छलथि जे ओ सीधे डेक पर पहुँचि जाइत छल। यदि डेक सँ कियो हुनका सामान घुरा देलखिन तऽ ओहो ओहिना डोंगी पर फेकि दैत छलखिन आ ओ स्थानीय व्यक्ति आराम सँ ओकरा लौकि लैत छलाह। तहिना ओकर दाम सेहो एकटा चद्दरि मे बान्हि डेक पर सँ नीचा फेकि देलक लोक आ बेचनिहार लोकि लेलनि ओकरा। बाट मे करीब बारह बजे ‘एसना’ शहर लग एकटा लॉकगेट आएल जतए नदी पर बान्ह बनल छलैक। एतए जहाज कें ओहि लॉकगेट बाटे जेबाक दृश्य सेहो मनोरंजक छल। लॉकगेट सँ पास हेबा मे जहाज सबहक लाइन लागल छलैक। बेराबेरी सब निकलि रहल छल। एतए एक घंटा सँ बेसी समय लागि गेल। लुकझुक साँझ मे जहाज लक्जर शहरक बाहरी इलाका मे एक ठाम किनार लागल। एतए बहुत नीक बाग बगीचा लागल। आब हमरा सबहिक नदी यात्रा शेष भेल मुदा राति आइयो जहाजे पर बितेबाक छल। आब जहाज सँ बाहर जेबा मे कोनो पासक आवश्यकता नहि। ने जहाज कें कतहु जेबाक छलैक आ ने यात्री कतहु बेसी दूर भागि सकैत छल। अगिला दिन बहुत भोरे कोनो प्रोग्राम सेहो नहि छलैक। भोजनोपरान्त यात्री लोकनि एहि नदी यात्राक खुसी मे बहुत नाच गान करैत गेलाह। तकर बादे रात्रि विश्राम भेल। ४ पिरामिडक देश मे (पछिला तीन अंक मे अपने पढ़लियैक मिस्र यात्राक हमर छओ दिनक अनुभव जाहि मे काहिरा-गीजा इलाकाक पिरामिड, ईजिप्सियन म्यूजियम देखलाक बाद हम सब देशक दछिनबरिया भाग मे आसवान शहर आबि गेलहुँ। एहि इलाका मे नील नदी पर जहाज सँ यात्रा करैत अबू सिम्बेल, फिले, कोम ओम्बो, एडफू आदि जगहक मन्दिर सब देखल। आब समापन किस्त।) सातम दिन 23 सितम्बर 2019, थोमस कूक के टूरक अन्तिम दिन। सबेरे जलपानक बाद सब गोटे ‘क्राउन प्रिंसेस’ जहाज सँ चेकआउट करा कए सामान बस मे रखबाओल। आइ दिन भरि बसे मे यात्रा करबाक छल आ साँझ मे होटल निवास। नील नदीक पश्चिमी कात पहाड़ीक अढ़ मे बसल छैक ‘वैली ऑफ किंग्स’। पिरामिडक रूप मे कब्र बनाएब प्रायः छठम वंशक बाद बन्द भऽ गेलैक, राजाक प्रताप घटए लगलनि आ सम्पत्तिओ ओतेक नहि रहलनि जे बहुत पैघ स्मारक सब बनबितथि। बारहम वंशक बाद जखन फेर कब्र सब मे चोरिक घटना बहुत बढ़ि गेलैक तखन फैरो लोकनि सोचलनि जे कतहु एहन ठाम गुप्त जगह मे कब्र बनाओल जाए जे चोर कें पता नहि चलैक। एही क्रम मे खोज कएल गेल वर्तमान लक्जर शहर के पास नील नदीक पश्चिम भाग मे चट्टानक मध्य किछु पहाड़ी इलाका जतए जाएब दुर्गम छलैक आ सभ्यता सँ दूर रहला सँ हिसाबें सुरक्षित सेहो छलैक। बस सँ हम सब विदा भेलहुँ एहि घाटीक दर्शन करबा लेल। रस्ता मे शहर छोड़लाक बाद आबऽ लागल गाम-घर आ ओकर खेती-बारी। ओना तऽ जहाज पर सँ नदीक किनारक किछु गाम देखल छल मुदा एतेक नजदीक सँ नहि आ खेत मे लागल जजात तऽ चिन्हल नहिए गेल छल। बान्ह बनला सँ पहिने नील नदी मे बाढ़ि अबैत छलैक आ इएह बाढ़ि एतुका सभ्यताक खेतीक आधार छलैक। तें कृषि सभ्यता ओतबे दूर तक पसरलैक जतेक दूर तक बाढ़िक पानि सँ पटौनी सम्भव होइत छलैक। बान्ह बनलाक बाद परिदृश्य बदलि गेलैक। आब दूर दूर तक नहरि खुना कए पानि पहुँचाओल जाए लागल। खेतीक क्षेत्रफल मे बहुत वृद्धि भेलैक। मरुभूमिक भाग सेहो हरियर होमए लागल। देखल जे एहि इलाका मे माटि कारी, जहिना अपना देशक महाराष्ट्र आदि मे भेटैत छैक। एहन माटि मे कुसियार आ बाङ (कपास) खूब उपजिते छैक। मिस्र मे सेहो एहि दूनूक खेती नामी छैक। बाङक गुणवत्ता सँ एतुका सूती वस्त्र विश्व प्रसिद्ध भैए गेल छैक। खेत मे एहि दूनू जजातक फसल एखनहु देखबा मे आएल। एकर अतिरिक्त धान, मकई, तिल, गहूम, आलू, प्याज, अल्हुआ, टमाटर आदि सेहो खूब उपजैत। बंधाकोबीक खेत देखलहुँ जाहि मे छोट छोट फर लागल। अब्दुल्ला बतौलनि जे बंधाकोबी एक फुट व्यासक गोला जकाँ आ चारि पाँच किलो ओजन तक के होइत छैक। फल मे अंगूर, लताम, संतोला आदि उपजैत छैक। आम आ खजूर तऽ पहिनहि देखि लेने छलियैक। गाम घरक रस्ता छलैक। स्कूल जाइत बच्चा सब। एतहु स्कूल दू तरहक — सरकारी आ निजी। वित्तक हिसाबें लोक अपना बच्चा कें जे कोनो स्कूल मे पठेलक। टूरिस्ट अर्थव्यवस्थाक कारण सड़क सब ठाम नीक। अस्तु, देहातक एहि दृश्य सब कें देखैत हम सब पहुँचलहुँ छोट पैघ पहाड़ीक शृंखलाक बीच बहुत घुमावदार रस्ता सँ एकटा पैघ पार्किंग इलाका मे। पहिनहि सँ चट्टान सब मे खोह सब काटल देखा रहल छल। अब्दुल्ला बतौने जा रहल छलाह जे ईहो सब ओही वैलीक अंग छिऐक, सब खोह कोनो ने कोनो व्यक्तिक कब्रे छिऐक आ एखनहुँ खुदाइ चलिये रहल छैक। ईसा पूर्व सोलहम शताब्दी सँ लऽ कए एगारहम शताब्दी तक प्रायः पाँच सौ वर्षक अवधि मे नवीन साम्राज्यक अठारहम सँ बीसम वंशक अनेको फैरोक कब्र एहि घाटी मे बनल। एकर अतिरिक्त हुनका लोकनिक लगुआ भगुआ तथाकथित ‘कुलीन’ परिवारक लोक सब सेहो एतए कब्र लेल जगह पौलनि। से फैरो आमनहोतेप-1 सँ लऽ कए रैमसेस-11 तक के करीब 60 सँ उपर कब्र भेटि गेल छैक मुदा कतेक छैक से सबटा एखनहुँ बूझल नहिए भेलैक अछि। बस सँ उतरि इन्द्रजित हमरा सब कें तीनटा कब्र देखबाक टिकट पकड़ा देलनि। किछु विशेष कब्र, जाहि मे मुख्य छल तूतनखामन के कब्र, देखबा लेल यात्री कें अलग सँ अपनहि टिकट किनबाक छलैक। किछु गोटे एहन टिकट कीनैत गेलाह। टिकट हाथ मे लेने हम सब दू डिब्बा बला बैटरी चालित खुला ट्राम सदृश गाड़ी पर सवार भेलहुँ। ई हमरा सब कें करीब 400 मीटर दूर कब्र समूहक परिसर के गेट तक पहुँचा देलक। रौद मे एतबो सहायता बहुत भेलैक। अब्दुल्ला पहिनहि सब बात बुझा देने छलाह। ओ गेटक भीतर नहि गेलाह। लोक अपनहि जाइत गेल। कब्र सब मे आब छैक तऽ किछुओ नहि मुदा पहाड़ी मे काटल विभिन्न सुरंग, किछु सपाट, किछु बहुत नीचा दिस जाइत, ओकर देवाल पर कएल चित्रकारी, जे ओहि फैरोक विजय गाथा सब छलनि, आ अन्त मे कब्रक स्थल आदि लोक देखैत छल आ आश्चर्यचकित होइत छल। रौद बहुत तेज छलैक आ वृक्ष विहीन चट्टानी पहाड़ी इलाका मे खुला मे बहुत काल ठाढ़ रहब सम्भव नहिए। तें लोक जेना जेना कब्र देखैत गेल, तेना तेना घुरि कए गेट लग बनल बस अड्डा सदृश छाहड़ि बला जगह मे सुस्तेबा लेल आबि गेल। सब गोटेक जमा भेलाक बाद एतए सँ हम सब गेलहुँ रानी हेत्सेप्सुतक मंदिर। ई मंदिर तऽ बूझू पूर्णतः नष्ट भऽ गेल छलैक। एकरा पोलैंडक एकटा वास्तुकार द्वारा 1961 सँ 2008 धरि पुनरुद्धार कएल गेल। ओ वास्तुकार महोदय एहन निर्जन स्थल मे, बुझियौ भुतहा कि मरचरही घाटी मे, जतए चारू कात कब्रे कब्र छलैक, घर बना कए एतेक दिन रहि गेलाह। धन्य कही हुनक कर्तव्यबोध आ मिस्रक प्राचीन स्मारक सँ प्रेम कें। कोनो ऐतिहासिक स्मारक कें पुनरुद्धार करबाक ईहो एकटा रेकॉर्डे हेतैक प्रायः। अस्तु, एतेक दिनक परिश्रमक बाद एहि तीन तल्ला मंदिर मे बहुत किछु सुधरि गेलैक अछि, दोसर तल्लाक सात टा स्तम्भ मे रानीक ठाढ़ भेल मूर्ति सब लगाओल जा चुकल छैक। तैयो काज बाकिए छैक। एतहि वैली ऑफ किंग्स के दर्शन शेष भेल। तकर बाद लगैक एकटा गाम मे पाथरक स्थानीय कलाकारक कारखाना देखबा लेल जाइ गेलहुँ। ई कलाकार सब एखनहुँ प्राचीन पद्धतिक औजार, छेनी, हथौड़ी आदि सँ तरासि कए दर्शनीय वस्तु सब तैयार करैत छथि। एहि मे अलाबास्टर नामक पाथर, जे देखबा मे संगमरमर सदृश होइत छैक आ जकर पातर टुकड़ी कने पारदर्शक होइत छैक, सँ बहुत नीक कलाकृति बनैत छैक। काज देखलाक बाद बगल मे दोकान जाइत गेलहुँ। एतए बड़का हॉल मे ताख सब पर अनेक छोटपैघ कलाकृति सजाओल। जाहि आकारक पिरामिडक अनुकृति हम काहिराक बजार मे 60 ईजिप्सियन पौंड मे छओटा किनने रही, एतए एक-एकटाक दाम 200 पौंड। अन्तर एतबे जे ई स्थानीय कलाकार द्वारा पाथर कें तरासि कए बनाओल छल आ हमर वस्तु बहुत सम्भव चीन देश सँ आयातित छल। अलाबास्टरक छोट लैम्पशेड 800-1000 पौंडक दाम बला। हमरा किछु किनबाक नहि छल। ठंढा जगह पर सोफा पर बैसल रहलहुँ जाबत ग्रुपक अन्य सदस्य लोकनि अपन अपन बेगरताक हिसाबें वस्तु किनलनि। दोकान नीक छलैक, विश्वासी, लोक कार्ड सँ पेमेंट कऽ सकैत छल आ वस्तु कें नीक पैकिंग करा कए देल जाइत छलैक। एखन तक, बूझू आब अन्त तक, थोमस कूकक स्थानीय एजेंट लोकनि हमरा सब कें तीनटा जगह बजार करबा लेल लऽ गेलाह – गीजा मे इत्रक दोकान, आसवान मे सूती वस्त्रक दोकान आ एतए असली पाथरक कलाकृतिक दोकान। इत्रक दोकान मे गुणवत्ता हमरा बुझबा मे नहि आएल मुदा आन दू ठाम अवश्ये विश्वासी आ असली चीजक दोकान छलैक, दाम जे लगौक। थोमस कूकक एहि व्यवहार सँ ग्रुपक सब सदस्य प्रसन्न छलाह। इलाका छोड़लाक बाद रस्ता मे एक ठाम खंडहर लग पहुँचलहुँ जे असल मे फैरो आमेनहोतेप-3 के विशाल मूर्तिक जगह छलैक। एतए बैसल मुद्रा मे 18 मीटर ऊँच हुनक दू गोट मूर्ति छैक जे उपर मे बहुत किछु नष्ट भऽ गेल छैक। तैयो जगह रस्ते पर छलैक आ टूरिस्ट सब कें एहन वस्तु आकर्षित करबे करैत छैक। बस रुकलै, लोक उतरि किछु फोटोग्राफी करैत गेल। तखन करीब आधा घंटाक बाद हम सब लक्जर शहर मे भोजन लेल एकटा पाँच सितारा होटल पहुँचलहुँ। ई होटल हमरा सबहिक रात्रि विश्राम लेल नहि छल मुदा एतए विशेष भारतीय भोजनक व्यवस्था कएल गेल छल। सब गोटे तृप्त भावें भोजन करैत गेलहुँ। पर्याप्त मात्रा मे नीक दही एतए सबकें भेटलैक। दही तऽ छलैक आनो ठाम मुदा ग्रुप मे तमिल लोक बहुत बेसी रहला सँ अनका मौका कमे लगैत छलैक। दही पर तमिल सब ओहिना टूटि पड़ैत छल जेना चीनी पर चुट्टी। एतए मुदा ककरो दहीक अभाव नहि भेलैक। थोमस कूकक बिजनेस मॉडल मे ई व्यवस्था कोना फिट केलक से तऽ ओएह सब जानथि मुदा यात्री भूरि भूरि प्रशंसा केलकनि। भोजनोपरान्त टूरक अन्तिम भाग मे आब हमरा सब कें शहरक बगले मे कर्नाक (Karnak) मन्दिर आ तखन शहरक भीतरे लक्जर मन्दिर देखबाक छल। लक्जर मन्दिर लग बाटे हम सब दू बेर गुजरि गेल छलहुँ आ बस मे अब्दुल्ला ओकर खिस्सा सेहो सुनाइये देने छलाह। कर्नाक मन्दिर जाइत काल लोक थाकल बुझा रहल छल, सुअदगर भारतीय भोजन जरूरति सँ बेसिए पेट मे ढुका देने छलैक। किछु यात्री तऽ नखरा करए लगलाह “नो मोर टेम्पुल्स”। मुदा सबकें बूझल छलैक जे टूरक अन्तिम भाग मे इएह दूनू मन्दिरक भ्रमण करबाक छलैक। दू तीन गोटे तऽ बसे मे बैसल निन्न पूरा केलनि, कर्नाक मन्दिर नहिए देखलनि। अस्तु, हम सब कर्नाक मन्दिर परिसर गेलहुँ। जेना कि अब्दुल्ला बतौने छलाह, एतए सँ एकटा गैलरी जकाँ रस्ता शहरक भीतर अवस्थित लक्जर मन्दिर तक बनल छलैक। साल मे एक बेर राजाक जुलूस एतए सँ लक्जर मन्दिर जाइत छलैक। आब तऽ शहर मे कतेक ठाम ओहि रस्ता पर मकान बनि गेल छैक। कर्नाक मे मुख्य मन्दिर छैक देवता आमुन के, जे फैरो तुथमोसिस-1 द्वारा बनबाओल गेल छलैक। एतए विभिन्न देवी देवता जेना कि ता (Ptah), मुत (Mut), मोन्तू (Montu), ओसाइरिस (Osiris), खोन्सू (Khonsu) आदि के मन्दिरक अतिरिक्त रैमसेस-2 के मन्दिर सेहो छैक। एतुका मन्दिर सब मध्य साम्राज्य सँ लऽ कए यूनानी वंशक टोलेमी साम्राज्य तक प्रायः डेढ़ हजार वर्ष सँ बेसी अवधि मे बनैत बिगड़ैत रहलैक। बिगड़ैत एहि दुआरे जे किछु मन्दिर जे एक फैरो बना गेलाह ओकरा अगिला फैरो तोड़बा दैत छलखिन। सब मिला कए करीब 30 फैरो एहि मन्दिर समूहक निर्माण मे योगदान देलखिन। एहि मन्दिर मे पहिल बेर देखल पवित्र सरोवर, जे एखन तक अन्यत्र कतहु नहि भेटल छल। एकर अतिरिक्त अनेक स्तम्भ (मीनार, Obelisk) जाहि मे आब बाँचल तीनेटा छैक। एकटा टूटि कए खसि पड़लैक से ओतहि राखल छैक। ई स्तम्भ चौकोर होइत छैक आ उपर गेला पर चौड़ाइ कने घटैत जाइत छैक। चोटी पर पिरामिडक आकारक नुकीला टोपी रहैत छैक। पूरा स्तम्भ एके पाथरक टुकड़ी सँ बनाओल जाइत छलैक। एहि पर हाइरोग्लाइफिक लिखावट मे फैरो लोकनिक विजया गाथाक खिस्सा सेहो लीखल रहैत छलैक। समयक मारि सहैत बहुत स्तम्भ नष्ट भऽ गेलैक। जे बचलैक से विश्व मे सब ठाम छिड़िया गेल। किछु तऽ विजयी देशक राजा लोकनि उठा कए अपना देश लऽ गेलाह, किछु मिस्रक शासक लोकनि स्वयं दान मे अथवा राजनयिक सम्बन्धक अन्तर्गत दोसर देश पठबा देलखिन। एहन एकटा स्तम्भ हम सब फ्राँस मे पेरिसक कन्कॉर्ड प्लेस मे देखने छलहुँ। ओहि समय एतेक ठीक सँ बूझि नहि पौलियैक। आब पता लागल जे नेपोलियन ओ स्तम्भ लक्जर मन्दिर सँ उठा कए लऽ गेल छलाह। जखन रोमन साम्राज्यक अधिकार भेलैक तखन ई स्तम्भ हुनका सब कें ततेक नीक लगलनि जे कर्नाक मंदिरक देवाल तोड़ि कए उठा लेलनि। इटली मे तेरह टा स्तम्भ छैक जाहि मे वैटिकन सिटीक स्तम्भ सेहो सामिल अछि। इटलीक अतिरिक्त वर्तमान मे एहन स्तम्भ तुर्की, इंगलैंड, अमेरिका, पोलैंड, इसराइल आदि अनेक जगह सब पर छैक। जे बाँचल छैक तकर कलाकृति एखनहुँ लोक कें अचम्भित करैत छैक। कर्नाक सँ घुमैत हमसब पाँच बजे लक्जर मन्दिर पहुँचलहुँ। आब समय बहुत कम छलैक आ प्रायः सब किछु एके तरहक। एतए किछु लोक मंदिर देखबाक बदला चल गेलाह बजार करए, कारण मिस्र मे ई अन्तिम दिनक अन्तिम भाग बचल छलनि। बजार बगले मे। एक घंटा मात्र समय। छओ बजे बस होटल लेल विदा हेबे करितैक। होटल मे चेकइनक सब इन्तजाम पहिनहि सँ थोमस कूकक स्थानीय एजेंट कऽ लेने छलाह। एतए ने पासपोर्ट जमा करए पड़ल ने आन कोनो झंझट। साँझ मे रूम सब तऽ तैयारे छलैक। बस, एकाएकी चाभी लैत गेलहुँ। सबहक लेल अगिला दिनक जलपानक इन्तजाम सेहो करा देल गेल। जिनका अहलभोरे फ्लाइट छलनि तिनका लेल पैक डिब्बा तैयार भेटतनि। हमर टूर एखन एक दिन आर छल मुदा हम ई पाँच सितारा होटल छोड़ि रहल छलहुँ। अन्तिम रातिक लेल एकटा ‘बजट’ (सस्ता) होटल लेने छलहुँ। अगिला दिन हमरा बहुत दूरक टूर पर जेबाक छल। प्रोग्रामक अनुसार हमरा मेम्फिस टूरक गाड़ी मे छओ बजे भोरे निकलबाक छल आ ओतेक सबेरे होटल मे जलपान सम्भव नहिए होइत तें डिब्बा बन्द विकल्प चूनल। हमहूँ अपन नाम ओही लिस्ट मे लिखाओल। राति मे भोजन फेर दिने बला होटल मे करबाक छल। ई अन्तिम भोजन छल थोमस कूक दिस सँ। दूनू होटलक दूरी प्रायः दू किलोमीटर। बस सँ जाइत गेलहुँ। भोजनक बाद इन्द्रजित ग्रुपक किछु सदस्यक जन्मदिनक लेल एकटा पैघ केक कटबौलनि, किछु धन्यवाद ज्ञापन यात्री लोकनि आ थोमस कूक दूनू दिस सँ भेलैक। सब कें अभिवादन करैत लोक सब विदा लेलक। टूरक आठम दिन 24 सितम्बर। आइ ग्रुपक सदस्य मे सँ किछु लोक थोमस कूक के संग जोर्डनक यात्रा पर जाइत गेलाह, किछु अन्य अपन देश घुरबा लेल। सब कें मुदा लक्जर सँ काहिरा जेबाके छलनि। हमर मेम्फिस टूरक गाइड श्रीमान मेधात नासर गाड़ी लऽ कए पौने छओ बजे उपस्थित छलाह। हम नीचा आबि चेकआउट करा रिसेप्सन पर सँ अपन जलपानक पैकेट लऽ कए तैयारे छलहुँ। तुरत्ते विदा भेलहुँ डेन्डारा आ आबीदोस देखबा लेल। एडफू मन्दिरक वर्णन मे अपने पढ़लियैक जे डेन्डारा मे होरसक पत्नी हाथोरक मन्दिर छलनि। साल मे दू बेर मिलन हेतु नाओ के जुलूस मे सवार भऽ कए दूनू नील नदी मे अबैत छलाह आ तखन देवी हाथोर पतिक संग एडफू आबि एक सप्ताहक लेल निवास करैत छलखिन। ओही डेन्डारा मन्दिर कें देखबा लेल हम चललहुँ। करीब साढ़े सात बजे डेन्डारा पहुँचि गेलहुँ। गाइडक संग मन्दिर परिसर देखब शुरू कएल। एतए सबसँ बेसी आकर्षित करए बला अछि विशाल गोलाकार स्तम्भ, ओहि मे कएल चित्रकारी आ छत मे कएल गेल अद्भुत चित्रकारी। हजारो वर्षक अवधि मे छत मे कारी (काजर) के मोट परत लागि गेल छलैक जकरा बहुत किछु साफ कराओल गेलैक तखन ओकर सुन्दर चित्रकारी निखरि एलैक। छतक किछु छोट भाग एखनहु कारी छैक, एहि भाग मे सफाइ नहि कराओल गेलैक यात्री कें ई बुझेबा लेल जे साफ कएल आ बिना साफ कएल सतह मे कतेक अन्तर छैक। प्रायः बाइस सौ वर्ष पुरान एहि चित्र सब मे रंग तऽ बूझू मात्र उज्जर आ नील छैक मुदा ओ रंग कनियो मलिन नहि भेल छैक। एकर नयनाभिराम सुन्दरता बिना देखने कोना बुझबैक ? ई मन्दिर परिसर बनब शुरू भेलैक तऽ बहुत प्राचीन काल मे, अंदाज अठारहम वंशक शासनक समय मुदा तैयार भेलैक ग्रीक आ रोमन शासनक समय मे। एतए देवी हाथोर कें चारि टा मुख छनि आ हुनक कान गायक कान जकाँ बनाओल गेल छैक। एतए छत मे बनल एकटा राशिचक्र, जकरा डेन्डारा राशिचक्र (Dendara Zodiac) कहल गेलैक, फ्रेंच लोकनि ओदारि कए लूब्र म्यूजियम लऽ गेलाह आ एकटा नकली चित्र लटका देलखिन। डेन्डारा सँ जखन हम सब आबीदोस लेल विदा भेलहुँ तखन गाइड कहलनि जे हमरा सबहक संग पुलिसक गाड़ी रहत कारण जे रस्ताक करीब तीन चौथाइ भाग निर्जन मरुभूमि बाटें छलैक आ एहि रस्ता पर एकसर कोनो गाड़ी कें जाएब वर्जित छलैक। एतेक तऽ बूझल छ्ल जे टूर कम्पनी कें अपन प्रोग्राम पुलिस कें पहिनहि सँ बता देबऽ पड़ैत छैक आ मेम्फिस टूर सेहो तहिना केलक मुदा मरुभूमि लेल पुलिस वैन संग रहत से नव अनुभव छल। सड़क एतेक नीक जे सौ किलोमीटरक वेग सँ गाड़ी आराम सँ चलि सकैत छल। मुदा आब हमरो गाड़ी ओहि पुलिस वैनक गाड़ीक वेग सँ चलबा लेल बाध्य भऽ गेल। यदि ओ सब कतहु गपो करबा लेल रुकि जाथि तऽ हमरो सब कें रुकए पड़ैत छल। हमरा सबहिक यात्रा पैघ छल, रौद तिक्ख भेल जा रहल छलैक मुदा ताहि सँ ओहि पुलिस कें कोन मतलब ? मरुभूमिक रस्ता शेष भेला पर पुलिसक गाड़ी हमरा सबहक संग छोड़ि देलक। आब फेर नील नदीक नहर आ नहरक दूनू कात बसल गाम घर, खेत खरिहान, शहर, बजार, स्कूल पोस्टऑफिस सब देखबा मे आबि रहल छल। हम सब करीब एगारह बजे आबीदोस पहुँचलहुँ। हमरा एखनहुँ मन्दिरक खंडहर देखबा सँ कोनो विरक्ति नहि भेल छल। सब मन्दिरक अपन अलग इतिहास छैक। एहने खंडहर मे टूरिस्ट बौआइत छथि से मिस्र रहओ कि कम्बोदियाक अंगकोर वाट समूह। गाइडक संग परिसरक भ्रमण शुरू कएल। आबीदोस मे देवता ओसाइरिसक मुख्य मंदिर छलैक। ओसाइरिस बहुत प्रभावी देवता छलखिन। एकर प्रसिद्धि एतेक छलैक जे सब मिस्रवासीक मनोरथ रहैत छलनि जिनगी मे कम सँ कम एक बेर आबीदोस जरूर घूमि आबी, बूझू वर्तमान मे इस्लाम धर्माबलम्बी लेल मक्का आ कि हमरा सबहिक लेल बाबा बैदनाथ आ गंगा स्नान। ई मंदिर तऽ वर्तमान मे ओतुका गामक नीचा गड़ल छैक। उपर मे जे बचल छैक से थिक फैरो सेती-1 के मंदिर। सेती-1 प्रतापी सम्राट रैमसेस-2 के पिता छलखिन। एतए देवालक भित्तिचित्र कतेक सुन्दर छैक से हमरा लिखला सँ नहि देखले सँ बुझबैक। कएकटा चित्र मे सेती-1 अपन पुत्र रैमसेस-2 कें कोरा मे लेने छथिन। एहन एक चित्र मे बच्चा रैमसेस-2 के केसक गाँथल जुट्टीक कलाकारी बहुते महीन छैक। तहिना अनेक चित्रक रंग हजारो सालक बाद एको रत्ती मलिन नहि भेलैक अछि। एक कमरा मे देवाल पर प्राचीन वंशक पूरे छिहत्तरि टा फैरोक वंशावलीक लिस्ट छैक कारतूस मे मूल हीलियोग्लिफ अक्षर मे लीखल। असल मे एहि मे तीन कतार मे अठतीस टा कए कारतूस बनल छैक। लिस्ट प्रथम वंशक पहिल फैरो नारमेर सँ शुरू होइत सेती-1 के पिता रैमसेस-1 तक चलैत छैक। नीचा बला कतार मे खाली सेती-1 के विभिन्न नामक चर्चा छैक। सातम आ आठम वंशक कतोक फैरोक नाम लेल इएह एकमात्र स्रोत छैक। मिस्रक पुरातात्विक इतिहास मे एहि लिस्टक महत्व रोजेटा स्टोनक समकक्षे बूझल जाइत छैक। मुदा एहि लिस्ट सँ रानी हेत्सेप्सुतक नाम गाएब अछि कारण ओहि समय कोनो महिला फैरो कें मान्यता नहि भेटलनि। आबीदोस मे परिसर दू भाग मे बाँटल, दूनूक बीच प्रायः तीन-साढ़े तीन सौ मीटर दूरी। ई असली बलुआह मरुभूमिक रस्ता। परिसरक कात सघन बस्ती जतए गाड़ल अछि ओसाइरिसक मन्दिर। घेरा रहितहुँ ओहि भीतर मे गामक लोक कें प्रवेशक अधिकार छैक। देखल बच्चा सब स्कूल सँ घूरल अबैत भीतरे बाटे अपन घर जाइत। दोसर भाग मे सम्राट रैमसेस-2 के विजय गाथा वर्णित अछि। जगहक नाम सब जतए ओ युद्ध जितलनि, देशक नाम सब जकरा ओ अपना देश मे मिलौलनि आदि सब अनेको कारतूस मे लीखल छैक। टूर शेष भेलाक बाद बाहर आबि बगले मे एकटा रेस्तराँ मे गेलहुँ। मेम्फिस टूर एतहु हमरा लेल लंचक नीक इन्तजाम केने छल। ई रेस्तराँ एकटा पाँच सितारा होटलक भाग छलैक। आश्चर्य लागल जे एतेक दूर मे मात्र आबीदोस देखबा लेल कियो एतुका होटल मे रहत। गाइड बतौलनि जे कतेक विदेशी एतुका शान्त वातावरण मे रहि स्मारक सबहक अध्ययन करए चाहैत छथि जे कि लक्जर सँ आबि कए नहि हेतैक। बात तऽ ठीके, लक्जर सँ अबैए मे तीन घंटा लागि जेतैक सेहो यदि पुलिसक गाड़ी बदमासी नहि करैक। सकारा टूर पर लंच मे भेटल सुच्चा स्थानीय भोजनक बाद आइ फेर तहिना सुच्चा स्थानीय भोजन खा रहल छलहुँ। शाकाहारी रहितहुँ भोजन स्वादिष्ट छलैक आ हमरा भरि इच्छा खेबा मे कोनो दिक्कत नहि भेल। घुरती मे संयोग नीक छल जे टूरिस्ट पुलिसक चेकपोस्ट पर लक्जर जाइबला एकटा मिनिट्रक भेटि गेल। पुलिस आश्वस्त भेल, हमरा गाड़ी कें ओहि ट्रकक पाछू लगा देल गेल, माने ई दूटा गाड़ी आब संग रहला सँ मरुभूमिक रस्ता मे सफर कएल जा सकैत छल। बलिहारी कही एतेक सुन्दर सुरक्षा व्यवस्था आ सरकारी तंत्रक सजगता कें। आश्चर्य ईहो लागल जे एतेक पैघ यात्रा मे ड्राइवर कि हमर टूर गाइड कतहु रस्ता मे चाह पीबा लेल नहि रुकलाह। सम्भवतः ई हिनका सबहिक व्यवहार मे नहि छनि। रस्ता मे कतेको गाम आ कि छोट शहर एबे केलैक मुदा रस्ता कात हम कोनो तेहन चाहक दोकानो कतहु नहि देखलियैक। भोर सँ कुल एगारह घंटाक यात्रा कए हम पाँच बजे लक्जर घुमलहुँ। गाइड हमरा अपन होटल नेफरतीती पहुँचा देलनि। हम गाड़ी सँ अपन सामान निकालि हुनका दूनू कें यथोचित बक्सीस देल आ हुनका धन्यवाद दैत विदा लेलहुँ। होटल नेफरतीती मे चेकइन केलहुँ। रूम रेन्ट तखनहि चुकता कएल। ओतहि चर्चा कएल जे हमरा सबेरे टैक्सी चाही एयरपोर्ट लेल। एक गोटे ठाढ़े छलाह बूझू एही काज लेल। चट दए ओ पूरा टाका एडभान्स लेलनि, रसीद देलनि आ आश्वस्त केलनि जे पाँच बजे टैक्सी ठाढ़ रहत। हम रिसेप्सनक व्यक्ति कें अनुरोध कएल जे हमरा जलपान पैक करबा देथि। ओ सब बात तऽ सुनिए रहल छलाह। होटल व्यवसाय मे एहि तरहक अनुरोध कोनो नव नहि, ओ सहर्ष स्वीकार केलनि। मिस्रक एहि टूर मे हमरा चारिटा गाइड सँ काज पड़ल। मुदा मोहम्मद अब्दुल्लाक तुलना मे सब बहुत झूस। ईजिप्टोलॉजीक ज्ञानक चर्चा हम नहि करैत छी, ओ तऽ काज जोगर सब कें रहितहिं छैक मुदा भाषा आ संवादक लूरि जे अब्दुल्ला कें छलनि से नहि। ओहिना नहि ने ओ मिस्र अबै बला राजनयिक भीआइपी सब के गाइड बनैत छथि? अन्तिम रातिक हमर होटल दामगुण ठीके। 150 डॉलर सँ 25 डॉलर के तुलना कोना करबैक ? रूम छोट मुदा सब सुविधा, खाली पढ़बा लिखबाक टेबुल जे पाँच सितारा होटल मे एखन तक देखैत एलियैक से नहि छलैक। कोनो बात नहि, हमरा तऽ अन्तिम दिन मात्र रैनबसेरा चाही। रूम मे वाटर हीटरक संग चाहक पुड़िया, कॉफीक पाउच आ चीनी छल, दूधक पुड़िया नहि। रिसेप्सन पर फोन केला पर एक गोटे भरि कप गरम दूध लेने आबि गेलाह। आब एहि सँ नीक की हेतैक ? हम ततेक ने थाकि गेल रही जे फेर रातुक भोजन लेल बाहर जेबाक इच्छा नहिए भेल। भोरका जलपानक डिब्बाक बचल सँडविच खा कए एक कप नीक चाह पीबि आराम करए लगलहुँ कारण भोरे पाँचे बजे टैक्सी बजौने छलियैक एयरपोर्ट जेबाक लेल। मिस्र मे अन्तिम दिन 25 सितम्बर 2019। भोरे पाँच बजबा सँ किछु पहिनहि वेकअप कॉल आबि गेल। हम तऽ चाह पीबि कए तैयारे छलहुँ। नीचा गेलहुँ, टैक्सी ठाढ़ छल। जलपानक डिब्बा लेलहुँ आ टैक्सी मे सवार भेल मात्र दसे मिनट मे एयरपोर्ट पहुँचि गेलहुँ। काहिराक फ्लाइट एतए कने लेट भऽ गेलैक मुदा हमरा तकर कोनो चिन्ता नहि छल कारण काहिरा मे सात घंटा प्रतीक्षा करबाक छल। किंडलक संग प्रतीक्षाक समय कटि रहल छल। काहिरा एयरपोर्ट पर भोजन आदि केलाक बाद हमरा लग नब्बे ईजिप्सियन पौंड बचि गेल छल। ओतहि पापीरस के पेंटिंग बला दोकान पर पाँच डॉलर दाम बला एकटा पेंटिंग चूनल आ दोकनदार कें नब्बे पौंड धरा देलियनि। ओ कहलनि जे विनिमय दरक हिसाबें पंचानबे पौंड हेबाक चाही मुदा फेर नब्बे राखि लेलनि। चलू ने रहल ईजिप्सियन मुद्रा ने फेर एकर विनिमयक झंझट। एहि प्रकारें मिस्र सँ विदा लेल, ईजिप्ट एयरक उड़ान सँ मुम्बइ आ फेर अगिला दिन 26 सितम्बर 2019 कें सकाले विस्तार एयरलाइन्सक उड़ान सँ कलकत्ता घुरि अएलहुँ। प्रदीप बिहारी मशाल लेने चलैत अग्रदूत राम लोचन ठाकुर माटिपानिक एकटा एहन कवि, कथाकार, अनुवादक, सम्पादक आ रंगकर्मी छथि, जिनक रचनाक कण-कणसं मातृभूमि आ मातृभाषाक प्रति अनुराग छिटकैत अछि। जें मिथिला आ मैथिलीक सर्वांगीण विकास हेतु आग्रह छनि, तें मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक प्रति सरकारी उपेक्षाक विरोध सेहो हिनक रचनामे पाओल जाइत अछि। सन् 1987 ई. मे अपन उपन्यास "विसूवियस" क विमोचन समारोहमे कोलकाता (ताहि समयक कलकत्ता) गेल रही। ताधरि भाइ श्री रामलोचन ठाकुर हमरा लेल फड़िछायल परिचित भ' चुकल छलाह। हिनक पोथी सभ, यथा- माटिपानिक गीत, देशक नाम छलै सोनचिड़ैया आ आजुक कविता (सम्पादित) पढ़ि चुकल रही। एतबे नहि, विभिन्न पत्र-पत्रिका सभमे 'कह लोचन कविराय' सेहो पढ़ने रही। 'अग्रदूत' आ 'कुमारेश काश्यप' नामसं कथा आ हास्य-व्यंग्य सेहो पढ़ने रही आ फरिछौट भ' गेल रहय जे अग्रदूत आ कुमारेश काश्यप केओ आर नहि, दुर्घर्ष अग्नि हस्ताक्षर राम लोचन ठाकुर छथि। एतबे नहि, मुर्तजा हुसैन सेहो यैह छथि। हिनक सम्पादनमे बहरायल नाट्य पत्रिका 'रंगमंच' देखि चुकल रही आ प्रभावित भेल रही। एहन अग्रदूत सं भेंट आ भरिपोख गप करबाक सेहन्ता लेने सेहो कलकत्ता गेल रही। मुदा, दुखित होयबाक कारणें ओ उल्लेखित विमोचन समारोहमे नहि आबि सकलाह। हमहीं हुनका भेंट कर' गेल रहियनि। मिथिला आ मैथिलीक विभिन्न समस्या पर गप भेल छल। रंगमंचक अधुनातन शिल्प पर गप कयलनि।हमरा प्रसन्नता भेल रहय जे हमर ताधरिक अधिकांश कथाक कथावस्तु आ पात्रक नाम धरि मोन छलनि। जे नीक लागल रहनि, तकर बड़ आवेशसं प्रशंसा कयलनि । आ, जे नीक नहि लगलनि, जत' त्रुटि बुझायल रहनि वा कोनो वैचारिक मतभेद बुझायल रहनि, तकर स्पष्ट रूपें आलोचना कयने रहथि। हिनक ई गुण हमरा तहियो नीक लागल रहय आ आइयो नीक लगैत अछि। नीककें नीक आ बेजायकें बेजाय कहबाक हिम्मति रामलोचन भाइमे एखनहुं छनि। ओ मुंह देखि मुंगबा कहियो ने परसलनि। हुनक ई गुण हुनका बहुतोसं बेरबैत छनि। अपन एहि गुणक कारणें बरोबरि कतिआयल जाइत रहलाह अछि। मुदा तकर परबाहि ओ कहियो ने कयलनि अछि। हुनका लेल अपन सोचक मानदंड बेसी महत्वपूर्ण छनि। हुनका स्वयं पर भरोस छनि। आ तें ओ अपन रचनामे आ व्यवहारमे परम्पराक रूढ़िकें तोड़ैत रहलाह अछि। राम लोचन ठाकुर एकटा एहन गीतकार छथि, जे अपन गीतसं मिथिलाक बिसरल जाइत उत्सवकें मोन पाड़ैत छथि। बिसरल जाइत खेलकें अपन गीतक विषय बना ओकरा जिअ'बैत छथि। 'माटि पानिक गीत' नामक संग्रहमे देखल जा सकैत अछि जे हिनक प्रत्येक गीतक आखर-आखरसं मिथिला आ मैथिली अनुगुंजित होइत अछि। एहि संग्रहक खेल शीर्षकसं लिखल गीत हो वा कोनो आने, ऊपरसं तं सोझ-सोझ बुझाइत छनि, मुदा भीतरसं मरखाह आ आक्रमक होइत छनि। हिनक काव्य रचना पढ़ने बुझाइछ जे ई सोझे-सोझी बात कहबाक आग्रही छथि। तथापि विषय वस्तुक अनुसार छन्द गढ़बाक हिनक लूरि सहजहिं देखबामे अबैत अछि। कुण्डलिया छन्दमे हिनक रचना 'कह लोचन कविराय' खूबे चर्चित भेल छल। राम लोचन ठाकुर अपन कविता सभमे मातृभूमि आ मातृभाषाक विकास आ समृद्धि हेतु अपन व्याकुलताक संग देखाइत रहैत छथि। संगहि, वैमनस्य आ वैमनस्यकें प्रश्रय देल जाइत व्यवस्थाक विरोध करैत छथि। अपन रचना सभमे नव निर्माण लेल व्याकुल देखाइत छथि। नव निर्माण लेल रचैत छथि आ विद्रोह सेहो करैत छथि। ओ आंखि खोलने सभठाम आ सदिखन ठाढ़ देखाइत छथि। सामाजिक व्यवस्था आ सांस्कृतिक मूल्यक क्षरण होअय वा शोषित-प्रतारितक दुख, राम लोचन ठाकुर सभक भंगठी लेल कलम उठौने देखाइत छथि। हमरा जनैत हिनका मोनमे अभाव घुरमुरिया दैत रहैत छनि। जत' अभाव देखैत छथि, तकर निवारण लेल तैयार भ' जाइत छथि, उठा लैत छथि कलम। ई गुण हिनक रंगकर्मी होयबाक कारणें सेहो छनि प्राय:। प्रस्तुतिक उत्कृष्टताक लेल जेना रंगकर्मी नाटक आ रंगमंचक कोनहु काज लेल तत्पर रहैत अछि, तहिना राम लोचन ठाकुर अपन कलम उठौने तत्पर रहैत छथि। आ तें बहुत विधामे रचना कयलनि अछि। राम लोचन ठाकुर बहुत विधामे लिखलनि। अग्रदूतक नामसं कथा, कुमारेश कश्यपक नामसं व्यंग्य। आदि, आदि। मैथिलीमे जत'-जत' रिक्तता बुझयलनि, अपन कलमसं भरबाक प्रयास कयलनि अछि आ सफल भेलाह अछि। बिसरल जाइत लोक साहित्यकें 'मैथिलीक लोक कथा' नामक पोथीमे परसलनि अछि। राम लोचन ठाकुर कुशल अनुवादक छथि। अनुवादक प्राय: दस गोट पोथी प्रकाशित छनि। हिनक मूल लेखक आ अनुवादक, दुनू एक पर एक। हिनका द्वारा अनूदित कृति सेहो मौलिके सन लगैत छैक। एकर प्राय: इहो कारण छैक जे स्रोत भाषासं सोझे लक्ष्य भाषामे अनुवाद करैत छथि। एखनि मैथिली मे बड़ कम अनुवादक छथि, जनिका अनुवादमे संपर्क भाषाक खगता नहि होइत छनि। बांग्लासं अनूदित पोथी सभ छनि। जे महत्वपूर्ण वस्तु अपना भाषामे आनबाक खगता बुझयलनि, जे पूरे इमानदारीसं आनलनि। कहल गेलैए जे नीक अनुवाद वैह, जे पढ़ैत काल अनूदित सन नहि लागय। से, हिनका द्वारा अनूदित नाटक होअय, काव्य संग्रह होअय वा उपन्यास, उत्तम कोटिक अनुवाद मानल जा सकैत अछि। लक्ष्य भाषामे स्रोत भाषाक लोकोक्ति आ मुहावराक सटीक अनुवाद ताकबामे हिनक कारीगरी महत्वपूर्ण छनि। एहन देखल गेलैक अछि जे स्रोत भाषाक समाजक चलन-प्रचलनक अर्थ लक्ष्य भाषाक समाजमे उनटि जाइत छैक। ओहिठामक नीक एहिठाम अधलाह भ' जाइत छैक। ई अनुवादकक लेल चैलेंजक स्थिति भ' जाइत छैक। किछु अनुवादक एकर शार्टकट विकल्प ताकि ससरि जाइत छथि। एहना स्थिति मे अनुवादककें बेसी सतर्क होयबाक खगता होइत छनि। ई कहैत हर्ख होइत अछि जे राम लोचन ठाकुर अपन अनुवादमे एहन कोनो शार्टकट ताकि ससरलाह नहि अछि, जकर बानगी हिनका द्वारा अनूदित उपन्यास नन्दित नरके, पद्मानदीक माझी, कठपुतरी नाचक इतिकथा, अयाचीक संधान आ काव्य-संग्रह 'जा सकै छी, किन्तु किए जाउ' मे देखल जा सकैत अछि। राम लोचन ठाकुर एकटा कुशल संपादक छथि। जखन बुझयलनि जे कवितामे रजनी-सजनी लिखल जाइत छैक, तं 1984 ई. मे 'आजुक कविता' नामक कविताक पोथीक संपादन क' कविताक चित्र स्पष्ट करबाक प्रयास कयलनि अछि। एहि पोथीमे सोमदेवसं विभूति आनन्द धरिक तेरह गोट कविक कविताक संकलन-संपादन क' कविताकें वर्तमान परिवेश प्रसूत मानसिकताक प्रतिफलनक रूपमे प्रस्तुत कयलनि अछि। बहुत रास पत्र-पत्रिकाक संपादनक बाद हेबनि धरि 'मिथिला दर्शन'क कुशल संपादन कयलनि अछि। अपन बेसी पोथीक प्रकाशक ओ स्वयं छथि। ओना मैथिलीमे ई बात मानल जाइत अछि जे लेखक स्वयं प्रकाशक होइत छथि। ई बात सांच सेहो अछि। मुदा, पूरा-पूरी सांच नहि। जाहि समय हिनक पोथी सभ अबैत छल, ताहि समय कलकत्तामे बहुत रास संस्था सभ छल। ई संस्था सभ बहुत रास पोथी छापलक। मुदा...अपन स्पष्टवादी स्वभाव आ ठाहिं-पठाहिं उचित-अनुचित कहैत रहबाक कारणें राम लोचन ठाकुर बहुत गोटेकें नहि पचलाह, बहुत संस्थो कें नहि। मुदा, एहि सभक परबाहि ओ कहियो ने कयलनि। लेखककें असल मान पाठके दैत छनि। से, पाठक हिनको मान-सम्मान देलकनि अछि। खूब पढ़ल गेलाह अछि। अपन धुनमे मस्त अपन उद्देश्यक लेल बढ़ैत रहलाह अछि। साहित्य आ समाजक गोलैसीसं फराक रहैत अखण्ड मिथिला आ मैथिली लेल सोचैत रहलाह अछि। मुदा, एहन-एहन गोलैसीकें इंगित करबामे चुकलाह नहि अछि। काव्य-संग्रह 'अपूर्वा'क स्मृति-चित्र शीर्षक कविताक ई पद देखल जा सकैछ- सुनह वियोगी कान दय भलमानुष के बात। मैथिलीक साहित्य मे सब सं पैघ गतात। राम लोचन ठाकुर ईमानदारीपूर्वक मिथिलाकें मिथिला लिखैत छथि। जिनका सभकें हिनकासं पत्राचार भेल छनि, सभ एहि बातसं सहमति होयताह । पत्र पर लिखल ठेकान पर जिलाक बाद मिथिला लिखैत छथि। जेना, जिला-बेगूसराय (मिथिला)। सभ ठाम एहि तरहक ठेकान लिखल देखैत रहबाक सपनाक संग राम लोचन ठाकुर एखनो जीबि रहल छथि। अपन क्रान्ति-यात्रामे मशाल बला हाथकें नोतैत जीबि रहल छथि। कामेश्वर झा "कमल" श्री रामलोचन ठाकुर आ हुनक व्यापक काव्य संसार डॉ कैलाश कुमार मिश्र रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना कोलकाता मिथिलासँ बाहर बहुत झमटगर सृजन भूमि रहल अछि मैथिली डायस्पोरा लेल। एकर स्पष्ट कारण शायद ई रहल अछि जे लोक कोलकाता तँ जरूर जाइत छलाह काजक तलाशमे मुदा आत्मासँ गामे रहैत छलाह। ऊपरसँ ओहि भूमिमे भेंट जाइत छलथिन गामक लोक, दोसर गामक सम्बंधी, हित-मित्र, जानकार आ कियोक नहि तँ मैथिली भाषा बजनिहार। बस भऽ जाइत छलनि आप्त प्रेम, सरोकार,परदेसमे अपन देसक लोक आ बात विचार। फेर बनि जाइत छल अड्डा नौकरीकेँ बादक नौकरी तकबाक भऽ जाइत छल ओ स्थान रोजगार कार्यालय। सब पुरान लोक लागि जाइत छलाह अपन-अपन तरीकासँ नौकरीकेँ जोगारमे। आ शुरू भऽ जाइत छल कविता साहित्य, नाटक, आदिक निर्माण । ई सब एहि लेल होइत छल जे लोक अपन गामक कमीक अनुभव नहि करथि। ओहुनासँस्कृति स्वभावसँ नॉस्टैल्जिक होइत अछि। नोस्टाल्जिया तखन अपन प्रभाव देखेतैक जखन लोक अपन जड़िसँ फुनगी दिस बढ़तैक। कोलकातामे सएह भेलैक। रामलोचन ठाकुर ओहिपरदेसमे देसक खोज करैत छलाह। मैथिली जेना हुनका भंगिया देने होनि! लगातार रचना आ बादमे पत्रिका केरसँपादन आ देखरेखमे व्यस्त रहला। की-की कएलनि से किनकोसँ छुपल नहि अछि। आब अबैत छी रामलोचन ठाकुरक एक पोथीपर। पोथीक नाम छैक "मैथिली लोककथा"। नामे ज्ञाने ई कथा नेनपनसँ लेखककेँ सुनल कथा केर स्मरण करैत लिपिबद्ध करबाक यत्न कएल गेल छैक। निश्चित रूपसँ ई उत्तम प्रयोग आ पोथी छैक। कथा लोकक छैक। लोककंठसँ सुनल छैक तँ स्वाभाविक छैक जे कथापर लोकक अधिकार छैक। अहि पोथीमे कुल जमा 36 कथाकसँचयन छैक: 1. हिरामनि सुग्गा 2. अबकी बेर फतंग 3. महाराज बिक्रमादित्य4. गदहा खेने कोनो ने दोष 5. एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया 6. काजरि7. सदबा-बदबा 8. एकटा बुढ़िया रहय 9. एकटा गरीब बाभन रहथि 10. नारदमुनि आ सांप 11. लाल बुझक्कर 12. जामुन अन्त न पाबेउ 13. राभणो नतु रावण 14. मीतारे 15. ठठपाल 16. एकटा रहथि राजा 17. एकटा गरीब बाभन रहथि18. महाकाली19. पतिबरता 20. एगो रहथि राजा 21. चिन्ता रोग 22. हम देवी चंडिके23. एगो रहए जोलहा 24. चतुर भागिन 25. चिल्हो सियारो 26. शीत-बसंत 27. हंसराज-वंशराज28. झोड़ाकपरताप 29. मोहन बरही 30. पड़ोसियाक दुनू 31. चारबाह राजा 32. अहदी 33. कुल्टा34. दिलजान साहु35. गल हस्तेन धोधरः 36. लिखलाहालोक बहुत सहज आ बहुत जटिल शब्द छैक। एकरा सब कियोक बुझैत छी आ सब कियोक भ्रममे रहैत छी। एहेने भ्रमक स्थिति रामलोचन ठाकुरकेँ छनि। ओ पहिने शास्त्रीय, प्रमाण, हिंदी साहित्यक प्रमाण आ वैश्विक प्रमाणसँ लोक शब्दक व्याख्या सन्दर्भ-कथामे (अथवा भूमिका) करैत छथि। वृहद्विष्णुपुराणसँ शुरू करैत, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति होइत हज़ारीप्रसाद द्विवेदीसँग मैक्सिम गोर्की तक केर भाव स्पष्ट करैत हुनकर लोकक भावसँ पाठककेँ अवगत करेबाक लघु किन्तु गंभीर प्रयास करैत छथि. मुदा एक बात, हमरा बेर-बेर एना बुझना गेल जेना ओ लोकक अर्थ ओहेन जन सामान्यसँ बूइझ रहल होथि जे बहुत शिक्षित आ विकसित नहि होथि। ई लोकसँग साहित्य आ तथाकथित एडवांस विषय अथवा शास्त्रीय विचारधारा केर विद्वानक वायरस जकाँ अछि। लोक, लोककथा, लोकविद्या अलग-अलग बात भेल। लोकविद्या ओ विधा भेल जाहिमे लोक ज्ञान, लोक ज्योतिष, लोक चिकित्सा, लोककृषि, लोकगीत, लोकसँगीत, लोककथा, जेंडर स्टडीज, नूतन प्रयोग, श्रृंगार, समाज आदिक बातपर विचार होइत अछि। जकरा ई लोक कहैत छथि तकरा पश्चिमक लोक पोपुलर कहैत अछि। तखन लोक की भेल? लोक भेल एक निश्चित भूभागमे रहय बला मानव समुदाय जे अपन भाषा,सँस्कृति, प्रकृति, स्थानीय ज्ञान, परंपरासँग रहैत अछि जाहिमे स्त्री, पुरुख, बच्चा, बुढ़, सब कियोक अबैत छथि। जाहिमे माटिक लोक आ माटिसँ बाहर रहनिहार प्रवासी सेहो अबैत छथि। आजुक युगमे लोक एक प्रजातान्त्रिक समूह छैक। आजुक युगमे एक व्यक्ति लोक छथि आ वैह मॉडर्न अथवा शास्त्रीय सेहो छथि। तखन लोक भेल की? लोकक मादे ई प्रश्न एखनो ठाढ़े अछि। लोक कहीं ओ तँ नहि जे लिखल नहि हो? आ शास्त्र ओ जे लिखल हो? नहि, ईहो बात नहि अछि। उपलब्ध ज्ञान आ डाटाबेस कहैत अछि जे मौखिकपरम्परा आ लोक अलग-अलग बात अछि। कतेक मौखिकपरम्परा एहेन अछि जे लोक नहि अछि, आ कतेक लिखितपरम्परा एहेन अछि जे लोक अछि। उदहारण स्वरुप वेद, उपनिषद तँ श्रुतिपरम्परा अछि मुदा लोक नहि अछि। सुकरात कहियो अपन बात नहि लिखलनि। ओ बजैत रहला आ हुनक शिष्य सब सुनैत रहल। ओ कहैत छलाह जे लिखलासँ ओहि बातक उपयोगिता खत्म भले नहि होइक लघु अवश्य भऽ जाइत छैक। ओ लिखित ज्ञानकेँसँग्रहालयमे राखल मृत वस्तुसँ तुलना करैत छथि। आर-त-आर रामलोचन ठाकुर जीक अहि पोथीक अंतिम कथाक नाम छनि "लिखलाहा"। लिखब केर अर्थ भेल ठोस प्रमाण; अंतिम सत्य; शब्द ब्रम्ह; अथवा तुलसीदासक रामचरितमानसक प्रसंगसँ बात करी तँ सत्यम शिवम् सुन्दरम। मुदा लिखब सेहो लोक भेल। विद्यापति अपन गीत अवश्य लिखने हेताह। बादमे ओकर महत्ता देखैत लोक ओकरा अपन कंठक चिपमे सदा सर्वदा हेतु सेव कऽ लेने हयत। ई भ्रम ओना तँ बहुत ठाम अछि मुदा भारत आ विशेष रूपसँ मिथिलामे अधिक अछि कारण जे लोकपर फोकलोर, एथनोग्राफी, मानवविज्ञान आदिक विद्वान सब काज नहि कऽ रहल छथि। अतेक स्पष्टीकरण देने बिना हम अपन बात कें आगा नहि कहि सकैत छी। ताहि कनि चर्च कएल। आब पुनः पोथी दिस बढैत छी। कथा लिखित हो अथवा श्रौत जखन लोकमे अबैत छैक तँ लोक ओहि कथाक मूलकेँ रखैत अछि आ अपन ज्ञान, शब्दावली, भाव, भंगिमासँ ओकरा अपन अंदाजमे प्रस्तुत करैत अछि लोकक मादे मौखिक कथा सब दिन सब ठाम, नव शब्द सबसँ नित नूतन स्वरुप ग्रहण करैत छैक यद्यपि कथाक मूल भाव शास्वत रहैत छैक। लोककथा (वाचन कथा या कथा वाचन) मूलतः तीन ढंगसँ लिपिबद्ध होइत अछि:पहिल, ओहि समाजसँ कोनो बाहर केर व्यक्ति द्वारे। ई काज मानवविज्ञान, फोकलोर अथवा एथनोग्राफी केर लोक करैत छथि। हुनका एहेन ट्रेनिंग रहैत छनि जे जाहि तरहे कथा वाचक हुनका सुना रहल छथिन तहिना ओ लिखथि। ओहिमे कोनो तरहक सुधार अथवा अपना दिससँ किछु नहि जोड़ैथ।सँभव हो तँ एक कथा अलग-अलग व्यक्तिसँ सुनिक लिखथि। दोसर, कतेक स्थिति एहेन होइत छैक जखन लोक अपन समाजमे काज करैत छथि। मुदा हुनकासँ आशा ई रहैत अछि जे ओ ई बिसरि जाथि जे ओ ओहि समाजक हिस्सा थिकाह। आ गंभीरतासँ ओतबे लिखथि जे कथा वाचक अथवा वाचिका कहि रहल होथि। ई कनि सहज काज नहि छैक। लोक नहियो चाहैत पूर्वाग्रही भऽ सकैत छथि। एहि तरहक काज करेबला लोककेँ ऑटो- अन्थ्रोपोलोजिस्ट कहल जाईत छनि। चंदा झा आदि विद्यापति गीत लोकसँ सुनबाक क्रममे अहि धरमक पालन नहि कऽ सकल छलाह। मुदा तकर प्रयोजन अते नहि अछि. अहिपर विस्तारसँ कहियो लिखब. तेसर, एहेन जे जखन लोक अपन समाजमे प्रचलित सुनल कथाकेँ बहुत दिनक बाद अपन स्मरणसँ लिखैत अछि। रामलोचन ठाकुर तेसर श्रेणीक लोक छथि। हिनको कथावाचक कहल जा सकैत अछि। कहल की जा सकैत अछि, ई छथिए। जेना कोनो कथा वाचक कथाकेँ अपन भाव, भंगिमा, आ शब्दावलीसँ मनोरंजक आ प्रभावी बना सुनबैत अछि तहिना ई कथा सबकें अपन श्बवालीसँ सजेने छथि। ओहिमे व्याकरण, आ श्ब्द्संयोजनासँ आकर्षण उत्पन्न केने छथि। ताहिं हिनक कथा मूल कथा बुझल जाए। उपरसँ अपन दाई पितियाइनसँ सुनने छथि से ई स्पष्ट करैत अछि जे कथापरम्परासँ एक पुस्तसँ दोसर पुस्त दने चलैत हिनका लग आबि गेल छनि। आब ई कथाकेँ कहि कऽ नहि लिख कऽ अपना पीढ़ी आ आबय बला पीढ़ीकेँ शास्वत प्रमाण केर रूपमे हस्तांतरित कऽ रहल छथि - चरैवेति- चरैवेतिक निनादसँ कथा बढ़ि रहल अछि।कहैत चली जे रामलोचन ठाकुर बहुत साकांक्ष भेल कथा लिख रहल छथि। कोनो कथा एहेन नहि भेटत जाहिमे ठोस आ ठेस मैथिली केर शब्दावली नहि भेटत। नीक तँ ई हएत जे आलेख केर अंत मे हिनका द्वारे व्यवहृत ठेठ शब्दक एक ग्लोसरी बना दी। मुदा ताहि अवस्थामे अएबाक हेतु अहि पोथीपर कमसँ कम तीन खेप लिखनाई जरुरी अछि। प्रमाणक रुपमे किछु शब्द कें देखल जा सकैत अछि:“पातर, ओजीर, भोजन-साजन, हेट, दिवड़ा भीड़, पएर दाबि, पहरुआ, दू टूक, करमान, कौआ टाहि, ईतस्ततः, फुरफुरा क उठल, यार कें बाझ,हरलनि ने फुरलनि, टहाटही, मन मेछंत, चौर-चाचर, लहालोट, अहर बीतल, पहर बीतल,ठकमुरी,घेंट,चिड़ै मड़ा कें,डिगडिगिया,हरबिड़रो,सीधा सम्मर,नग्र,बिसनाइत,पहरू सभ,फूलें-फलें माति उठल,गाजु,पोखरिक भीड़,ले बलैया,खा लौक,कन-साग,गदहा बौरि गेल,मिस पड़ै छल,गदहा डोभ चरन्त, झी-चाकर,बोरसी,धुरखुर,बरबरना,लगे दाढ़ी पड़ोसे छूरा,कपारपर टिटही मरडाइ छइ,उफांट,पतिया-पराछुत,किछु मुनियां,चीन,फूजल ऊक,खलोदर,दरेग,अगहरी पात,मन मेछंत,तरबाक लहरि टिकासन,ठेसी,मकुनीहाथी,डांरथि,चुट्टीक धारी, सितुआ चोख”एखन अतबे अहि पोथीपर लिखब सहज बात नहि अछि। एकर अनेक बिंदु, कहबाक शैली, बातक प्रमाणिकता, आ लेखक महोदय केर निष्ठा किछु एहेन बात अछि जाहिपर गंभीर भेने नहि लिखल जा सकैत अछि। आब कथा दिस फेरो बढ़ी। जेना-जेना हिनकरसँकलित आ हिनक मस्तिष्क केर मेमोरीसँ निकसल कथा सभ पढ़ने जायब, एक पाठकक रूपमे लोक सङ्ग लोक भेल जायब। जेना लोकमे होइत छैक तहिना हिनको कथा सभमे प्रकृति अर्थात चिड़ै चुनमुन, जानवर सब बजैत छैक। बाजब प्रमाण छैक। अतेक ठोस प्रमाण जे प्रकृति केर मानवीकरण कखनो अहाँकेँ बनाबटी अथवा अनसोहात सन नहि लागत। लोककथामे नदीक प्रवाह, बटोहीक चलब, फुलवारी, सब किछु अबैत छैक। धोबिया घाट, ब्राह्मणक दरिद्रता, जोलहाक चतुराई, सब किछु अबैत छैक। लोककथा लोककेँ कथा सङ्ग जोड़ैत छैक। रसद सङ्ग चलैत बैलगाड़ी बनिया आदि सेहो अपन भूमिका सङ्ग रहैत छैक। लोककथा यथार्थक कल्पनाशीलता छैक। अहु बातक भान कथा सङ्ग एक गंभीर पाठक केर रूपमे अहाँ अवश्ये देख सकैत छी। लोककथा अपन भावकसँवेदना अनेक भाषा आ भाषाक प्रसंग जेना की फकड़ा , गीत, दोहा आदिक मादे प्रयुक्त होइत छैक। लोककथा अहि तरहें मोनोलॉग नहि मल्टी डायमेंशनल डायलाग होइत छैक। लोककथा एकरंगी विधवा परिधान नहि अपितु बहुरंगी चुनरी होइत छैक। अतय कनि कम साकांक्ष छथि रामलोचन ठाकुर जी। ओ गद्य जखन लिखैत छथि ताहि काल ओ अपन भाषासँ अलग लोकक आत्मामे नहि जा पबैत छथि। एकरा एना बुझु: कहियो कखनो मधुश्रावणी कथा सुनने हएब, अथवा गाम घरमे ककरो कथा सुनने हएब। ताहिमे अगर बनिया छैक तँ दोसर भाषा बजतैक। अगर पात्र दोसर भूमिकेँ छैक तँ कथा वाचक (अथवा वाचिका) ओकरा लेल अलग भषा केर प्रयोग करतैक। कथा वाचिक बात कहतैक, भंगिमा प्रदर्शित करतैक। ओ नाटकीयता कनि खटकि रहल छैक। मुदा रामलोचन ठाकुर एकरा लोकक एक ओहेन श्रेणी जे वाचिककेँ लिखितपरम्परामे बदलैत छथि, मूल कें यथावत रखने ओकर विन्यास आ सौंदर्यमे परिवर्तन करैत छथि तँ ईहो स्वीकार होबाक चाही। मुदा जखने प्रसंग पद्यक अबैत छैक तँ लोकक निश्छल स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होमय लगैत छैक। उदाहरण स्वरूप "अबकी बेर फतंग" कथाकेँ देखू। ई कथा अपन शब्द शैलीमे स्मरणक पिटारासँ लिख रहल छथि लेखक । जहाँ की पद्य अबैत छैक लोक जेना जागि जाइत छैक:"थप्पा गनि-गनि रोटी पकओलनि गदहा ढोभ चरन्तघोड़ा बांस फसन्त निनिआ कहैत जे नेनिआ आएलिघर-पछुआर मे भुस्सा तइ मे ल गेल मुस्सा अबकी बेर फतंग" (पृ. 25 ) एहने सन भाव "गदहा खेने कोनो ने दोष" मे भेटैत छैक। ई एकर किछु मात्रक शब्दक दू आखर पूरा कथाक सीख बनि जाइत छैक। अंतिममे जखन ई कहैत छैक:"तीन राड़ एकसँतोष गदहा खेने कोनो ने दोष" एकर आशय भेल जे तीन बुरीलेल (मुरखक बाहुल्य) अपन बेबकूफीसँ गलत काज करैत अछि तँ ओहिमे केहेन आश्चर्य! एकरसँदर्भसँ बुझक दरकार होइत छैक। लोककथा गतिमान होइत छैक। कथा कहनहार आ सूनयबला दुनू गतिशील होइत छैक। गति सङ्ग जेना ट्रेन अथवा बसक सवारीमे खिड़की लगसँ नदी, पहाड़, झरना, धरतीक वैविध्य अबैत जाइत रहैत छैक आ यात्री गतिशील भेल रहैत अछि तहिना लोककथा केर कथानक पाठककेँ गतिशील बनने रहैत छैक। ई गतिशीलता कनि आरो डायनामिक भऽ जाई ताहि लेल गद्यमे पद्यक प्रवेश होइत छैक। रामलोचन जी बहुत गंभीरतासँ ई बात बुईझ पबैत छथि आ ओ पद्य सब हेरि अनैत छथि। एक उदाहरण "एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया"सँ देखल जाओ: "बरदबला भाइ !परबत पहाड़पर खोंता रे खोंताभूखे मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइयातइलए पकड़ने जाइए "। उपरोक्त पद पूरा कथाक आत्मा छैक आ पारिस्थिकीसँतुलन केर वेद मंत्र जेना काज क रहल छैक। कथाक पात्र मुनिया ई पद्य घोड़हिया, हाथीबला, आ खुद्दीबला सबसँ कहैत छैक आ ओकर समस्या केर समाधान भऽ जाइत छैक। एक स्पष्ट उदाहरण देखू जाहिमे भावकसँवेदना आ कथ्यक गंभीरताकेँ डायनामिक बना भाषा केर देबार कोना तोड़ैत छैक श्रुतिकथा। ई पद्य "लालबुझक्कर" कथामे भेटत:"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पएर मे उखड़ि बान्हि कें हरिन चरक्का होइ।।" कथा आगा बढ़ैत छैक। फेरो उपरोक्त पदक प्रथम पंक्ति केर बेस बनबैत दोसर पंक्ति केर मादे बात स्पष्ट होइत छैक :"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पहुँचे लगसँ काइट दो कि अपने बाहिर होइ।।" आ अंततः कथा अपन यात्राक अंतिम पड़ाव दिस अबैत छैक:"लालबुझक्कर देखितहि बूझकि हो हाथी की अमरूद।" बात बायोडायवर्सिटी केर लोककथा के मादेसँरक्षण केर बात करैत रही। एकर प्रमाण भेटैत अछि "जामुन अन्त न पाबेउ" नामक कथा मे। ई कथा अपन नामकरणसँ शुरू होइतसँस्कार धरि समस्त स्वरूपमे बायोडायवर्सिटीकेँ हारमनी प्रदर्शित करैत छैक। कोना लोक शास्त्रपर कखनोकाल बीस पड़ैत छैक आ कोना अपन पारिस्थितिकी ज्ञानसँ अब्बल होइत छैक तकर प्रमाण छैक ई कथा। जखन चारि दोस्त सामान्य वेश भूषामे राजा लग अबैत छैक त शास्त्रीय विद्वान लोकनि ओकरापर हँसैत छथिन। मुदा जखन ओ चारु लोकज्ञानी एक चारि पंक्ति केर पद्य मिल कऽ सुनबैत छैक त सभक होश उड़ि जाइत छैक। पद्य छैक:"जामुन अन्त न पाबेउ पीपर आनेउ नार उमर कटंती जानि क वर तर ठानेउ राड़।" आब कोना एकरा चारि मित्र कहैत छैक से देखल जाओ:"चारु दोस्त उठि क ठाढ़ भेल।पहिल कहलकै --- जामुन अन्त न पाबेउ दोसर कहलकै -- पीपर आनेउ नार तेसर कहलकै -- उमर कटंती जानि कचारिम कहलकै -- वर तर ठानेउ राड़।“ हमरा लगैत अछि ई कथा कनि विस्तृत विवरण आ विवेचना मँगैत छैक। से केना? एना जे किछु लोक जे अनेड़े लोकपर शास्त्र थोपने रहैत छथि आ अपना कें सर्वक्षेष्ठ स्थापित करैत छथि, एहेन लोकपर ई कथा निर्मम प्रहार छैक। ई कथा बतबैत छैक "सावधान भऽ जाऊ! लोक अहाँकेँ विद्याक सम्मान करैत अछि मुदा लोकक ज्ञान अगाध छैक। एकर विशालताकेँ अहूँ सम्मान करू। से नहि करब त लोक कखनो अहूँकेँ धोबिया पाट दऽ देत!"ई पोथी अनेक तरहें उपयोगी छैक। मैथिली साहित्य अनुरागी सब एकरा अधिकसँ अधिक पढ़थि। एकर अनेक पक्षपर बहुत गंभीरतासँ फैलसँ लिखबाक दरकार छैक। एहि पोथीपर एक अखिल भारतीय स्तरक सेमिनार आयोजित कएल जा सकैत अछि। एकर अनुवाद अनेक भाषामे होबाक चाही। हिंदी आ अंग्रेजीमे तुरत होबाक चाही। अहिपर बात होइत रहक चाही। एकर पट दरपरत खुजिते रहक चाही। एक एहेन मैथिली केर साधक रामलोचन ठाकुर जे एकरा अपनसँस्मरणसँ शब्द देलनि तिनका प्रतिसँवेदनशील भेनाइ हमर सभक सम्मिलित जवाबदेही अछि। एहि पोथीपर हम तँ लिखते रहब आरो लोक सब लिखथि। रमण कुमार सिंह मैथिली कविताक विद्रोही स्वर रामलोचन ठाकुर मैथिलीक सुप्रसिद्ध आ निस्सन कवि रामलोचन ठाकुर संघर्षशील आ प्रतिरोधी चेतनाक प्रतिनिधि कवि छथि। ओ मैथिलीक अग्निजीवी पीढ़ीक संभवतः सबसं प्रखर कवि छथि। शिखा प्रकाशन, कोलकाता सं अग्निलेखन सं संबंधित जे साहित्य प्रकाशनक क्रम शुरू भेल छल, ओहि शृंखलाक पहिल पुष्प रामलोचन ठाकुर कें पोथी इतिहासहंता छल। एहि पोथीक प्रकाशनक पछाति मैथिली साहित्य-सरोवरक ठमकल पानि मे भारी हिलकोर उठल। कियैक त अग्निलेखन साहित्य यथास्थितिक प्रति अतिशय असहिष्णु छल। मार्क्सवादी चिंतन सं लैस संघर्ष-चेतनाक निर्माण लेल प्रतिबद्ध अग्निलेखन साहित्य में आक्रोशक तीक्ष्ण अभिव्यक्ति भेल छल। नक्सलवादी आंदोलन सं प्रभावित एहि पीढ़ी केर मानब छल जे नवनिर्माण लेल विध्वंस बहुत जरूरी अछि, कियैक तं सामाजिक-आर्थिक असमानता तखने खत्म भ सकैत अछि। तें कवि रामलोचन ठाकुर अपन कविता मे कहैत छथि- विध्वंस मात्र विध्वंस करत जे पथ प्रशस्त नव निर्माणक नइ हैत जतय पुनि अनाहार वा रंग-भेद केओ ऊंच-नीच वा छोट-पैघ । (1) नाटक, निर्देशक आ एक गोट कविता शीर्षक कविता मे कवि जाहि मंच आ नाटकक मंचन के आख्यान कहैत छथि, ओ कोनो मिथकीय देशकाल केर नाटक नहि थिक, बरू अपने देशक तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक जीवनक वीभत्स यथार्थक आख्यान अछि, जतय दर्शक दीर्घा सं कोनो युवती कें उठा कें मंच पर ल गेल जाइत अछि आ ओखरा संगे लोकतंत्रक अभिनयक नाम पर कयल जाइत अछि सामूहिक बलात्कार। ई कविता पूर्णतः राजनीतिक कविता थिक जे नक्सलवादी आंदोलन केर दमन केर नग्न आ वीभत्स यथार्थ कें संवेदनशीलताक संग प्रस्तुत कयने छथि। एहि कविता कें पढ़ि हमरा महाश्वेता देवीक 1084 की मां उपन्यास मोन पड़ि जाइत अछि। एहि कविता मे ओपन्यासिक अथवा महाकाव्यात्मक विस्तारक संभावना अछि। किछु काव्य पंक्ति द्रष्टव्य अछि- जखन मंच सं उतरैए कुनू एक कलाकार दर्शक दीर्घा सं उठा कें ल जाइए एगो युवती कें प्रतिवादी भाइक हत्याक पश्चात मंच पर कएल जाइए ओकरा संग सामूहिक बलात्कार अभिनयक नाम पर तैयो शांत-एकदम चुप्पी आ आनन्दोन्मत अभिनेता सभ क रहल ए गंरिथैया नाच (2) देश कें आजादी जखन भेटल छल तं आम लोकक मोन मे उम्मेदक नव किरिण फूटल छल, मुदा थोड़बे काल पछाति देशक राजनीतिक व्यवस्था सं लोकक मोहभंग भ गेल आ ई प्रश्न उठय लागल जे एहन तरहक प्रजातांत्रिक व्यवस्था राजतांत्रिक व्यवस्था सं कोन तरहें भिन्न अछि। असल मे जखन सत्ता अधिनायकवादी चरित्र कें अपना भीतर अंगेजि लैत अछि, त ऊ सत्ता मात्र प्रदर्शन पर निर्भर रहि जाइत अछि, जाहि मे ढोल तं प्रजातंत्रक बजाओल जाइत अछि, मुदा ओहि मे जनजीवनक सरोकार कतहु नहि देखार दैत अछि। निहित स्वार्थ पर केंद्रित ई सत्ता नहि मात्र आत्म-मुग्धताक शिकार होइत अछि, अपितु निरीह जनताक शोषण आ दमन सेहो बर्बरता सं करैत अछि। अपन अग्रज कवि आ मैथिली मे अग्निजीवी आंदोलन के दिशा-निर्देशन करय बला कवि सोमदेव जी लेल लिखल अपन कविता अग्रजक नाम/प्रजातंत्र मे कवि लिखैत छथि- आ आइ हुनक (प्रधानमंत्रीक) सुपुत्रक जन्मदिनक अवसर पर अमरावतीक सबसं पैघ शीत-ताप नियंत्रित होटल मे विराट पार्टीक आयोजन भेल अछि कोरमा, पोलाव... पानि जकां बहि रहल विदेशी शराब (कहियो एहि देश मे दूधक नदी बहैत छल) समाजवादक लेल गरीबी हटेबाक लेल प्रत्येक दिन बान्हल जाइछ नव-नव प्रत्यक्ष आ अप्रत्यक्ष कर आ शांति रक्षार्थ रोजे होइए पुलिसक तांडव नृत्य (3) रामलोचन ठाकुरक काव्य-भाषा एतेक विलक्षण आ बेधक अछि, जे सीधे मर्म धरि पहुंचैत अछि आ पाठक कें बेचैन क दैत अछि। हुनक एहि संग्रहक कविता सभक चरित्र भारतीय राजनीतिक व्यवस्था केर जन-विरोधी क्रियाकलाप सं उपजल अछि। सत्ता नहि खाली अपन विरोधी सभ कें दुश्मन मानैत अछि, बल्कि ओ सामासिक संस्कृति कें नष्ट करैत हिंसक रुख अख्तियार क लेने अछि। कवि रामलोचन ठाकुर एकटा सजग आ जिम्मेदार नागरिक जकां सत्ता के एहि जन-विरोधी क्रियाकलापक प्रति असहमति आ प्रतिरोध रचैत छथि आ बेहतर भविष्यक नव निर्माण लेल विध्वंस कें जरूरी बुझैत छथि। केहन लागत अहां कें शीर्षक कविता मे ओ सत्ताक हिंसक, बर्बर आ कुत्सित क्रियाकलाप कें बहुत संवेदनशीलता सं रेखांकित कयने छथि- केहन लागत अहां कें जं भनसाघर कुनू कसाइखाना-कम-किचेन-कम रेस्टोरेंट बनि गेल हो आ अहांक अनुजक ससड़ी काटल खलड़ी ओदारल देह झुलत हो पछुअति मे ओकर टटका मांसक कबाब आ टटका रक्तक शराब बेचल जाइत हो त केहन लागत (4) एहन राजनीतिक-सामाजिक वातावरण मे स्वाभाविक अछि जे लोक अपन भाषिक संवेदना आ ओकर आत्मीय संस्पर्श बिसरि जाय। अपन अग्रज कवि जीवकांतक लेल लिखल कविता मे कवि रामलोचन ठाकुर एहने दुखद आ दयनीय स्थिति कें रेखांकित करैत लिखैत छथि- सरिपहुं हम नइ लिखि सकब भरिसक ओ भाषा जाइ मे लिखल जाइत छैक पत्र अपन आत्मीयक नाम हम बिसरि गेल छी। (5) रामलोचन जीक काव्य स्वर एतेक तीक्ष्ण छनि जे बहुत रास यथास्थिवादी पाठक कें हुनक कविता नहि अघरतनि, मुदा सत्य के ठांय-पठांय कहबाक निर्भीकता आ यथास्थितिवादक प्रति असहमति दर्ज करायब हुनक काव्य-नायकक खास पहिचान थिक। जाहि देश मे कर्ण सन शूर-वीरक पराक्रम सं डेरायल व्यवस्था ओकरा अवैध संतान घोषित क दैत छैक, जतय कोनो आचार्य द्वारा एकलव्यक ओंठा काटि देल जाइत छैक, जतय तपस्या करै के अपराध मे कुनू शुद्रक हत्या मर्यादा पुरुषोत्तम द्वारा कयल जाइत छैक, आ अनेक तरहक अन्याय -अत्याचार होइत छैक, ओकर इतिहास पुराण के होलिकादाह करबाक आ ओहन रामराज्य पर थूकि देबाक आह्वान करैत कवि कहैत छथि जे- समय आबि गेल अछि हमरा सभ कें अपनहिं लिखबाक अइ अपन इतिहास जे सरिपहुं थिक संघर्षक वर्ग संघर्षक घुरा देबाक अइ ओकर अस्त्र ओकरे दिस। (6) रामलोचन ठाकुरक पहिल काव्य संग्रह इतिहासहंता मैथिलीक विद्रोही कविताक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। एहि संग्रह मे हुनक कथ्य, कहबाक नव ढंग आ काव्य-शिल्प बेछप अछि। हुनक रचनात्मक प्रौढ़ता, राजनीतिक यथार्थ केर नग्नता कें उद्घाटित करैत काव्य-विवेक आ सर्वहारा जीवनक छवि कें संवेदनशीलता सं चित्रित करैत कविता मैथिलीक काव्य-साहित्यक धरोहर थिक। हुनक आरो कविता पोथी सभ प्रकाशित छनि आ सब संग्रह में हुनक एहने काव्य विशेषता परिलक्षित होइत अछि। माटि-पानिक गीत (1985), देशक नाम छलै सोन चिरैया (1986) , अपूर्वा (1996) आ लाख प्रश्न अनुत्तरित (2003), आदि हुनक आन काव्य-पोथी सभ प्रकाशित अछि। आंदोलन, रंगमंच, पत्रकारिता करैत अपन साहित्यिक सफर मे रामलोचन ठाकुर बहुत रास उकृष्ट साहित्य मैथिल समाज कें देलनि, मुदा मैथिल समाज हुनका ओकर प्रतिदाय नहि द सकल। अपन संपूर्ण जीवन ओ संत जकां एकनिष्ठ भाव सं मैथिली साहित्यक सेवा कयलनि। हुनक निष्ठा पर कहियो केओ संदेह नहि क सकैत अछि। आलोचकीय दृष्टि सं विचार करी, तं हुनक काव्य-रचनाक दू धारा परिलक्षित होइत अछि, जाहि मे सं एक धारा मे इतिहासहंता आ देशक नाम छलै सोन चिरैया, आ लाख प्रश्न अनुत्तरित केर कविता कें राखल जा सकैत अछि, त दोसर धारा मे माटि-पानिक गीत, अपूर्वा कें राखल जा सकैत अछि। ओ छंदबद्ध काव्य आ आधुनिक नव कविता दुनू लिखलनि। छंदबद्धता पद्यक मूल लक्षण होइत छैक, मुदा काव्यक नहि। एकरा एहि तरहें बूझल जा सकैत अछि जे जं पद्य आ काव्य एक्के होइतियै, तखन पूर्वआधुनिक वैद्यक, ज्योतिष आदि संबंधी ग्रंथ छंदोबद्ध हेबाक कारणें काव्य मे परिगणित होइतियै, मुदा ओकरा काव्य नहि मानल जाइत छैक। काव्य लेल काव्यात्मकता सबसं जरूरी छैक आ से गुण रामलोचन जीक आधुनिक काव्य मे भरपूर भेटैत अछि। रामलोचन जी कविता आ छंदोबद्ध पद्यक अलावे धरगर व्यंग्य सेहो लिखने छथि। हुनक व्यंग्य रचना बेताल कथा (1981) कुमारेश काश्यप के नाम सं विदेह पब्लिकेशंस, कलकत्ता सं प्रकाशित अछि। एकर अलावे लेख आ संस्मरण विधा सं संबंधित हुनक रचना स्मृतिक धोखरल रंग (2004) , आंखि मुनने, आंखि खोलने (2005) सेहो प्रकाशित छनि। धिया-पुताक लेल मैथिली लोककथा (1983) लिखलनि आ बहुत रास अनुवाद एवं संपादननक काज सेहो करैत रहलाह। हुनक रचनादिक फेर सं परायण एवं अनुपलब्ध रचनाक प्रकाशन मैथिल समाजक जिम्मेदारी अछि। कियैक तं हुनकहि शब्द मे-'ओना इहो निर्विवाद अछि जे जे कोनो जाति अपन विभूति कें बिसरि जाइत अछि, ओकर अधःपतन अनिवार्य छैक। ' (7) संदर्भ- 1-कविता-विध्वंस मात्र, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -11, शिखा प्रकाशन, कोलकाता 2-कविता-नाटक, निर्देशक आ एक गोट कविता, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -13, शिखा प्रकाशन, कोलकाता 3-कविता-अग्रजक नाम/प्रजातंत्र, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -17, शिखा प्रकाशन, कोलकाता 4-कविता-केहन लागत अहां कें, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -19, शिखा प्रकाशन, कोलकाता 5-कविता-हम बिसरि गेल छी, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -21, शिखा प्रकाशन, कोलकाता 6-कविता-समानधर्माक लेल/ओना होइत त इएह आयल अछि, रामलोचन ठाकुर, इतिहासहंता, पृष्ठ -25, शिखा प्रकाशन, कोलकाता 7-मिथिलाक विभूति महाकवि डाक, रामलोचन ठाकुर, आंखि मुनने, आंखि खोलने, पृष्ठ -19, अरुणोदय प्रकाशन, बाबूपाली/कोलकाता ------------------ डॉ अनमोल झा कोलकाता परिसरक मैथिलीक मणि श्री रामलोचन ठाकुर रमेश रामलोचन ठाकुरक काव्य-युद्ध रामलोचन ठाकुरक रचना-संसार बहु-आयामी अछि। हिनक अनूदित नाटक (जादूगर) हास्य-व्यंग (बैताल-कथा) आ मैथिली लोक-कथाक संकलन दिस हिनक विशेष अभिरुचि चौंकबैत अछि। मैथिली आन्दोलनक प्रति कटिबद्धता, हिन्दीक साम्राज्यवादी कूटनीतिक विरोध, लोकभाषा-लोकसंस्कृति आ अग्निलेखनक प्रति क्रियाशीलता एकटा नीक पृष्ठभूमिक निर्माण करैछ, जकरा आधार पर हिनक व्यक्तित्व, कृतित्व, जीवन आ साहित्यक मूल्यांकन निकें-नाँ कयल जा सकैछ। मैथिलीमे अग्नि-लेखनक परम्पराकेँ अपन अशेष ऊर्जस्वितासँ सम्पोषित कयनिहार मैथिली आ साहित्यक ई सिपाही, गंभीरतापूर्वक मूल्यांकित नहि कयल जा सकलाह एखन-पर्यन्त, से मैथिली-आलोचना-क्षेत्रमे व्याप्त जड़ताक अलावे आर किछु नहि थिक। हिनक एखन धरिक जीवनक आन तरहक आ साहित्यक क्रियाकलापमे तादात्म्य परिलक्षित अछि। आ हिनक साहित्यकारक वैचारिक विकास-यात्रा तार्किक, वैज्ञानिक आ सुस्पष्ट अछि। माओ-त्से-तुंग, हो-चि-मिन्ह, ब्रेख्त, पैट्रिक लुमुम्बा, लू शुन आ पाब्लो नेरुदाक कविताक मैथिलीमे आइसँ चौदह वर्ष पूर्व अनुवाद प्रस्तुत करबाक उद्देश्य, - दृष्टि सम्पन्नता आ प्रतिबद्धताक मादे बहुत किछु कहैत अछि। अपन अनूदित काव्य-पोथी ‘प्रतिध्वनि’मे ‘आजुक कविता’ आ कविताक मादे व्यक्त विचार हिनक जीवन-संघर्ष, जीवन-दर्शन आ लेखनक अनुकूलहिं अछि। पिरथीक विभिन्न भागक मनुक्खक संघर्षक एकरुपताक बात कयनिहारकेँ जँ अफ्रीका आ मिथिलाक संघर्षमे साम्य नजरि अबैत हो तँ से समीचीने थिक। ‘प्रतिध्वनि’क आमुखक शीर्षक ‘आजुक कविता’ राखब आ ताही शीर्षककेँ अपन सम्पादित काव्य-संग्रह (आजुक कविता)क शीर्षक पुनः बनायब, कवि-सम्पादकक एकटा विशेष आग्रह दिस इंगित करैत अछि। ओ अपन ‘मिथिला’केँ आजुक कविताक मादे जे वक्तव्य देलनि ‘प्रतिध्वनि’मे तकर नमूना वा झाँकी ‘आजुक कविता’(काव्य-संग्रह -सं॰)मे प्रस्तुत कयलनि अछि। ई एकटा योजना आ रणनीति थिक, जे कोनों योद्धासँ अपेक्षित रहैत अछि। विदेशी-कविताक मैथिली-रूपान्तर ‘प्रतिध्वनि’ ‘मैथिलीक दधीचि बाबू भोलालाल दास आ वीर-रसक ऐतिहासिक कवि पं॰ राघवाचार्य’केँ समर्पित कयलनि अछि ठाकुरजी। अपन ‘मैथिली लोककथा’ नामक संकलन ‘अपना गामक डिहबार’केँ समर्पित कयलनि अछि। अपन काव्यपोथी ‘देसक नाम छलै सोनचिड़ैया’’ ठाकुर जी, ‘मुक्ति-युद्धक विगत, आगत ओ वर्तमान अनाम योद्धा-लोकनिकेँ अपन असीम श्रद्धा, सम्पूर्ण आस्था ओ विश्वासक संग’ - समर्पित कयलनि अछि। ई तीनू समर्पण अपना- आपमे बहुत किछु कहैत अछि आ हिनकर संघर्षशील छवि आ जनवादी तेवरकेँ सुस्थापित करैत अछि। हिनक विदेशी काव्यानुवाद आ लोक-कथाक चयन-दृष्टिकोण आ भाखाक स्वरूपो, हिनका ताहि रूपमे परिचित करैत अछि। मैथिली कवितामे अग्नि-लेखन-युगक कटिबद्ध हस्ताक्षर ठाकुरजी रहल छथि। अभिनेता, निर्देशक, कथाकार रूपमे ‘अग्रदूत’, व्यंग्यकारक रूपमे ‘कुमारेश काश्यप’, मार्क्सवाद, वर्ग-संघर्ष क्रांति आ विध्वंसक अवश्यंभाविताक चेता, ‘अग्निपत्र’क संपादक आ अग्नि लेखनक स्तंभ, स्वभाव आ विचारमे अद्भुत तादात्म्य, व्यवहारमे सुच्चा सर्वहारा - हिनक से परिचय स्थापित करैत ‘कुणाल’ अविश्वसनीय नहि लगैत छथि, तकर कारण ई जे, ठाकुरजीक वैचारिकता, व्यक्तित्व, जीवन-संघर्ष, क्रियाकलाप आ साहित्य आदि-आदिमे सुखद एकात्मकता अछि। ‘माटि-पानिक गीत’सँ सभ प्रेम नहि कऽ सकैछ। आजुक कविताक अनुसंधान, परिचय स्थापन, संकलन, संपादन, आयात-निर्यात कोनो दृष्टिसम्पन्ने हस्ताक्षर क’ सकैत अछि। मैथिली-मुक्ति मोर्चाक संयोजन-संचालन आ ‘सुल्फा’ उसाहब, सबहक बसक बात नहि थिक। कोनो क्रांति-चेतनाकेँ जिआयब, ओकरा हवा देब, ओकरा लेल जीयब-मरब आ ओकरा भूमि, संस्कृति, साहित्यमे स्थापित करबा लेल खून-पसेना एक करबाक नाँ जँ रामलोचन ठाकुर थिक, तँ ई नाँ हमरा पीढ़ीकेँ आश्वस्ति देबाक योग्यता रखैत अछि। परिचयक एहेन निस्सन पृष्ठभूमिक आधार पर जखन हमरा लोकनि रामलोचन ठाकुरक कविताक पड़ताल करय बैसैत छी, तँ काव्य-सम्बन्धी हुनक मान्यता बूझब अनिवार्य भ’ जाइत अछि। ‘‘इतिहासहंता’’ कविक पहिल काव्यपोथी थिक, जकरा कुणाल ‘अग्निलेखनक पहिल दस्तावेज’ मानलनि अछि आ हुनके माध्यमे हम सब मानि सकैत छी जे ठाकुरजी कविताकेँ मानसिक व्यभिचारक लेल शब्दक ‘यूटोपिया’ नहि मानैत छथि। क्रांति-विध्वंस आ नवनिर्माणक जमीन तैयार करबाक लेल, दिसाबोधक निर्देश करबाक लेल कविताकेँ ओ हथियार मानैत छथि। ‘इतिहासहंता’, हिनक पहिल काव्यपोथी (1972-77)क मध्य लीखल गेल कविताक संकलन थिक आ दोसर काव्य-पोथी ‘देशक नाम छलै सोनचिड़ैया’ (1971सँ 1985)धरिक कविताक संकलन थिक। स्पष्ट अछि जे दोसरो कृतिमे प्रारम्भिक कविताक समावेश भेल अछि आ पहिलमेसँ तँ अछिए। दोसरमे एहेन समावेशक पाछू विशेष आग्रह आ प्रतिबद्धता विचारणीय अछि, जे पहिल काव्य-पोथीमे स्थान किऐक नहि पाबि सकल? ठाकुरजीक पहिल काव्यपोथीक कालखण्ड अत्यंत उथल-पुथलवला थिक, राजनीतिक रूपसँ। 1972सँ 1977ई॰ धरिक कालखण्ड पोखरण परमाणु-विस्फोट, जयप्रकाश आन्दोलन, आपातकाल आ जनता पार्टीक समारोहणक काल थिक। तें समय-सापेक्ष साहित्यमे तकर झलक भेटब स्वाभाविक थिक। ठाकुरजी शास्त्र-पुराणक भ्रष्टाचार आ कर्मकाण्डी जटिलताक उचिते विरोध करैत छथि। तेहेन मिथकीय उदाहरण सभसँ हिनक दुनू पोथी भरल-पुरल अछि। मिथक सबहक शोषण ई साहित्य आ जनसामान्यक पक्षमे करैत छथि। हुनक सहानुभूति गरीब-गुरबा, भिखमंगा आ रिक्शाबलाक पक्षमे रहब अपेक्षित अछि। जनभाषा आ जनसंस्कृतिक प्रवक्ता ओ तेहने कट्टर छथि, जेहने किसुनजी नवकविताक छलाह। यथास्थितिक सभ व्यवस्थाक ध्वंस हुनका काम्य छनि। कोनो तरहक सुधारवाद वा संशोधनवादक ओ विपक्षी छथि। मुदा प्रलयोपरान्त नव सृष्टिक सिद्धान्तमे आस्था रखनिहार, भावनाक व्याख्यामे शब्दकेँ, मुदा, सक्षम नहि मानय, से आश्चर्यित करैत अछि। हिनक अनेकानेक संबोधनात्मक आ उद्बोधनात्मक कविता अग्रज, अनुज आ समानधर्मा लोकनिक नाम लीखल गेल अछि। मिथिला-मैथिलीपरक कविता सभ वीर-रसक उद्रेक करैत अछि आ समर्पित सम्बोधनबला कविता सभ विकृतिक चित्रण करैत अपन वक्तव्य सेहो पाठक धरि सम्प्रेषित करैत अछि। मुदा कथ्य, शिल्प, भाव आ कलापक्ष, हिनक एहेन कविता सभमे, चरम उत्कर्ष प्राप्त नहि करैत अछि। अपन ‘इतिहासहंता’ नामक कवितामे कवि, क्रान्तिकारीगण आ क्रांति-भूमिक नाम गांथि क’ कविताक आरम्भ के कमजोर कयलनि अछि। अग्निलेखनक ओहि युगमे ‘भाला’, ‘लाल टुहटुह रक्त’ - आदि कवितामे आयब अस्वाभाविक नहि छल। व्यवस्थाक नाम चेतौनी फेकबाक आवश्यकता, ठाकरजी अपन दुनू पोथीकालमे बुझलनि अछि। पहिल पोथीक अधिकांश कविता जतय जीवनक सरलीकृत व्याख्या आ सपाटबयानीक शिकार भेल अछि, कविताकेँ अति-सहज बनयबाक अतिरिक्त उत्साहमे ततहि, ‘जेठुआमेघ’ आ ‘सांझ हमरा आङनमे’ आदि कवितामे काव्य-रसक उचित परिपाक भेल अछि। नामपट, अग्रज-अनुज, भाइ, सम्बोधन-उद्बोधन, चेतौनी, पोस्टर, आह्वान, आशावादिता आदि अनेकानेक बेर दोहराओल गेल अछि, जे काव्यक सौंदर्य-बोधकेँ छिटकी मारैत अछि। हिनक दोसर काव्यपोथीक कालखण्ड जनता-पार्टीक बिखराव, इन्दिरा गाँधीक सत्ता-वापसी, हत्या आदि घटनाक्रमक बीचक अछि। सन् 1977 बादक मोहभंगक व्याख्या ‘मंत्र’ नामक कविता करैत अछि त’ समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीतिमे व्याप्त रङ-विरङकष् षडयंत्र आ छद्मशीलताक लेल जादूक छड़ी देखबैत अछि। ‘चारण हम ओकरहि छी’ - ठाकुरजीकेँ किरणजीक नजदीक ठाढ़ करैत अछि। कए ठाम, कए टा कविता, उत्साहक अतिरेक थिक। जखन कविता पर भावना वा वैचारिकता-कोनो एक पक्ष हावी भ’ जाइत छैक, संतुलन डगमगा जाइत छैक आ वर्णनक शब्दजालमे कविता फँसय लगैत छै, त’ कथ्य आ काव्यरूप विकृत भ’ जाइत छै। धूमिलेक कथनकेँ लेल जाय त’ - ‘हरेक सही कविता ‘पहले’ एक सार्थक वक्तव्य होती है’ -सँ स्पष्ट अछि, जे कविताक बादमे ‘आर किछु’ आवश्यक रूपसँ होइत छै। मात्र वक्तव्य कविता नहि थिक आ धूमिलक एहि विचारमे ‘पहले’ शब्द महत्वपूर्ण अछि। कविता समाजमे व्याप्त विकृतिक समीक्षा करैत अछि। साहित्य समाजक आलोचना थिक। मुदा कविताक स्वरूपमे ओकर मौलिक सौंदर्यबोध शाश्वत थिक आ रहत। एतहि काव्यक तेसर पक्ष, जे वस्तुतः पहिल पक्ष थिक, सोद्येश्यता आ प्रतिबद्धताक प्रासंगिकता महत्वपूर्ण भ’ जाइछ। तकरा संग काव्यक आन तत्वक तालमेल बैसायब आ तकर क्षमता, काव्योत्कर्षक चरम-बिन्दु अथवा स्खलन अथवा ‘सपाटबयानी’ तय करैत अछि। स्वतंत्रताक बादक सैंतीस बरखक लेखा-जोखा आ चौक पर कोनो माउगिकेँ नाङट करबाक विरोध काव्यक विषय अवश्य बनत, मुदा तकरा लेल काव्यभाषा आ साहित्यक सौंदर्य शास्त्रक उपयोग वा प्रयोग, आवश्यक अछि। कोनो राजनीतिक खलनायिकाक जीवनक वर्णनमे एगारह पृष्ठ अनेरो खर्चलासँ कविताक कोनो नव प्रतिमानक स्थापना नहि भ’ पबैछ। ओना तानाशाह वा खलनायिकाक विकृत जीवन पर लीखब, अग्निलेखनक परम्पराक अनुकूलहिं अछि। रामलोचन ठाकुरक अपन भाषा-संस्कार छनि। तेहेन शब्द-सामर्थ्यक अछैतहुँ, अङरेजी शब्दक भरखरि उपयोग अनावश्यक रूपे भेल अछि। एहेन जनभाषा आ माटिपानिक सुगंधि-प्रेमी कविसँ, से अपेक्षा राखब कठिन अछि। किछु क्षणिका सूक्ष्म अर्थगर्भित आ किछु स्थूलकाय चलि सकैछ। मुदा एहेन क्रांतिधर्मी आ अग्निजीवी कविक ‘विधिक विधान’, ‘भाग्यफल’ वा ‘लिखलाहाक आगू चलिते छैक ककर वश’ आदि-आदि, कोनो तानाशाहक लेल व्यंगार्थ रखितो, शेष कविताक निहितार्थक संग तादात्म्य नहि स्थापित क’ पबैछ। मुदा, किछु अपन नैसर्गिक सीमा आ किछु अग्निलेखनक सीमाक अछैतहुँ, कवि अपन जीवन-संघर्ष, साहित्य आ जीवन-दर्शनमे जाहि जीवट, इमानदारी, संघर्षशीलता आ प्रगतिवादक परिचय देलनि अछि, से अपन काल-सापेक्षतामे बहुत प्रासंगिक अछि। अपन समयक जड़ताकेँ तोड़बामे आ नवीन व्यवस्थाक स्थापनाक लेल जाहि कछमछीक ओ प्रदर्शन करैत छथि, से मिथिला, मैथिली, मानवता, समाज आ साहित्यकेँ बहुत-बहुत आश्वस्त करैत अछि। ठाकुरजी अपन आन्दोलनी जीवन, क्रांतिधर्मी व्यक्तित्व आ प्रगतिवादी छविक अनुकूल कार्यलीन छथि आ तकर निर्वाह साहित्योमे इमानदारीक संग करब, कोनो न्यून बात नहि। जीवन आ साहित्यमे एहेन सामंजस्य किछुए साहित्यकार क’ पबैत छथि। आ ठाकुरजी एखनहुँ कएटा ‘अग्निकवि’ जकाँ ‘चुकलाह’ नहि अछि। अपन सम्पूर्ण सामर्थ्यक संग ओ गतिमान छथि। ठाकुरजीक अशेष ऊर्जस्विता, परवर्ती पीढ़ीक लेल प्रेरणास्पद भ’ सकैछ। चित्र: श्वेता झा चौधरी आभा झा बीहनि कथाक आजुक परिप्रेक्ष्यमे उपादेयता परिवर्तन संसारक नियम छैक। बदलैत समयक संग लोकक आवश्यकताक स्वरूप बदलैत छैक आ तदनुसार ओकर प्राप्तिक साधन सेहो। ई आवश्यकता मात्र भौतिकेटा नञि, मानसिक, बौद्धिक आ भावनात्मक सेहो होइत छैक आ ओकर पूर्तिक साधन मनुष्य पोथी सभहक मध्य तकैत अछि। विज्ञानक जिज्ञासा वैज्ञानिक ग्रन्थ आ प्रयोग आदिसॅं शमित होइत छैक, राजनीतिक विचारक परिपुष्टि राजनीतिक पुस्तकादिसॅं। अर्थात् कोनो तरहक रुचि आ जिज्ञासाक शमन ओहि विषयक पुस्तकादिक अध्ययन-मननसॅं होइत छैक। मुदा ज्ञानक धाहसॅं तप्त विकल मनक, भौतिक –समृद्धिक प्राप्ति लेल अविराम पड़ाइत लोकक थकित-तृषित हृदयक, संसारक ताप- शापसॅं आहत- व्यथित अन्तर्मनक लेल शान्तिक शीतल- स्निग्ध लेप साहित्ये द' सकैत अछि। साहित्य शब्द आ अभिप्रेत अर्थक समभाव मानल जाइ छैक। ई साहित्य मूलतः गद्य , पद्य आ नाटक तीन रूपमे पाओल जाइत अछि। साहित्यकारक सूक्ष्म दृष्टि, गहन अनुभूति आ विचारक आलोड़न जखन कल्पनाक संग झंकृत होइत छैक, कोनो बंधनक बिना सहज रूपें अभिव्यक्त होइत छैक, तखन गद्य- साहित्यक सृजन होइत छैक। छंद, गति- यति- लयादिक आग्रहसॅं मुक्त हयबाक कारण गद्य- साहित्यक अभिव्यक्ति अधिक स्फुट आ अधिक ग्राह्य होइत छैक। गद्य साहित्यक अनेक भेदमे कथाक विशिष्ट स्थान छैक। बदलैत समयक संग साहित्यक रूपमे परिवर्तन सेहो होइत रहलै अछि, हयबाको चाही। बहैत पानि सदैव निर्मल होइत छैक, यदि ओकरा बान्हि देल जाइ त' ओ गंदा भ' जाइत छैक। पाठकक साहित्यसॅं की अपेक्षा छै, ओ साहित्यकारक प्रस्तोव्य विषय बनैत छैक। आजुक समयमे उपदेशात्मकताक अपेक्षा यथार्थपर आधारित कथा बेशी पसिन्न कयल जाइत छैक। विविध सामाजिक- परिस्थिति , समस्याक समाधान तथा जीवन मूल्यक उद्घाटन कथाक उद्देश्य मानल जाइत छैक। अपन आकारक आधारपर कथा, लघुकथा आ बीहनि कथा आदि एकर भेद मानल जाइ छै। आइ हमर विवेच्य विषय अछि- "बीहनि कथाक आजुक परिप्रेक्ष्यमे उपादेयता"। साहित्यक सभ रससॅं भरल वृहत्कलेवर उपन्यासक जॅं खगता नञि हो, यथार्थ, कल्पना आ रोचकतासॅं संश्लिष्ट कथाक चॅंखिगर उपस्थिति हो, तखन ई छोट सनक कथाक आवश्यकता कियैक? खेतमे लहलहाइत धानक फसलि छाड़ि ओकर बीहनिक अन्वेषण कियैक कयल जाय? भरल बखारी छाड़ि छोट सनक स्टीलक डिब्बा चुनब कोनो बुद्धिमानी त' नञि? एहि सभ तरहक प्रश्नक उत्तरमे हम एतबहि कह' चाहब कि सभ विधाक, साहित्यक सभ उपादानक अपन- अपन महत्त्व छैक। कोनो विधा दोसर विधाक विकल्प नञि भ' सकैछ। हॅं, आवश्यकतानुसार आ रुचिक अनुरूप ओकर चयन कयल जा सकैत छैक। कोनो समयमे महाकाव्य रचबाक परंपरा छलै, आइ छोट-छोट मुक्तक, क्षणिका आदि अनवरोध लीखल आ पढ़ल जा रहल छैक। तैॅंकी महाकाव्य अर्थहीन भ' गेलै? जॅं लोकक समक्ष साहित्य पढ़बाक अवसर नञि हो, पेटक आ गिमिझयबा लेल कोल्हुक बड़दबला स्थिति हो, अथवा उच्च महत्वाकांक्षाक प्राप्ति लेल यन्त्रवत जीबाक स्थिति हो, गहूमक उपजाक लिलसामे गुलाबक कलीक बिनु फुटने मुरझयबाक स्थिति हो, एहन स्थितिमे जिम्मेदार लोकक कर्त्तव्य –क्षेत्र बढ़ि जाइत छैक। कियै नञि व्यस्तसॅं व्यस्त लोकक सोझॉं ओकर साहित्यिक पिपासा शान्त करबा लेल एक घोंट ठंढा पानि राखि देल जाइ? ओकर तृषित-बुभुक्षित मन पूर्णतः आश्वस्त हो वा नञि, किन्तु किछु सीमा तक प्रफुल्लित अवश्य हेतै। एहन स्थितिमे बीहनि- कथा अपन अत्यल्प संक्षिप्त कलेवरक कारण युवा वर्गक लेल उपयोगी आ ग्राह्य अछि। युग –परिवर्तनक संग पाठकक मनोदशामे परिवर्तन भेलै अछि। आब कथाक फैंटैसीसॅं बेशी यथार्थाधारित कथा पसिन्न कयल जाइत छैक। बीहनि- कथा अहू मानदंडपर अपनाकेॅ स्थापित करबाक कारण लोकक मोन छुबै छै, किछु चिंतन करबा लेल प्रेरित करैत छैक, चिंतनक संग किछु प्रतिकारक लेल सन्नद्ध करैत छैक। हॅं, ई गप अवश्य जे कथा- लेखक कथावस्तुक चयन, अपन अभिव्यक्तिक बेधकता आ विषयोपस्थापनक अभिनव शैलीसॅं पाठक वर्गक अपेक्षा पूरा करबाक सामर्थ्य निरन्तर विकसित करैत रहथु। कारण, मात्र छोट हयबाक कारण कोनो चीज ग्राह्य वा मात्र पैघ हयबाक कारण कोनो विधा त्याज्य नञि होइत छैक। अखनहुॅं साहित्यानुरागी पैघ-पैघ उपन्यासकेॅं खूब रुचिसॅं पढ़ैत छथि। हॅं, हुनका छोटसॅं कोनो विरोध नञि, मुदा शर्त एतबहि जे ओ पाठकक साहित्यिक- क्षुधा शान्त करबाक क्षमतासॅं सम्पन्न हो। साहित्यमे संक्षेपणक अपन चमत्कारिक महत्त्व छैक। कमसॅं कम शब्दमे बहुत किछु कहि सकबाक क्षमताक पाठक समुदायमे अत्यधिक आदर होइत छैक। प्राचीन कालकक विगण एक मात्राक लाघवमे पुत्र जन्मक आनन्दोल्लाससॅं भरि उठैत छलाह। एहि विशिष्टगुणसॅं युक्त बीहनि कथा आइ अवश्य उपादेय अछि। बीहनि कथा लेखक पाठकवर्गकेॅं एकटा प्लाट उपलब्ध करयबाक उद्देश्यसॅं सेहो उपादेय। अहाॅंक सोझाॅं विविध भावभूमिपर आधारित प्लाट अछि , रुच्यनुसार चयन करू आ ओहिपर बनाउ दीर्घकथा वा उपन्यासक भवन! बीहनि-कथाक सर्व- स्वीकार्यता औखन प्रश्नांकित अछि। हमर कहब एतबहि जे कोनो विधामे साहित्यक रस प्रवाहित होमय, सहृदय पाठककेॅं मानस- तोषदैमे सफल हो, त' ओकरा उदार भय स्वीकार करबाक चाही। अन्हार भगबैमे कखनो –काल भगजोगनीक इजोत सेहो कारण बनै छै। बरगदक अत्यन्त लघु बीआ शाखा- प्रशाखासॅं युक्त बटवृक्षक कारण होइत छैक। माॅं मैथिलीक उपासककेॅं सभ अहंभावतजिहुनक सभ सन्तानकेॅं समुचित समादर देबाक चाही। प्राचीन ऋषि-मनीषी अहम्सॅं मुक्त मन: स्थितिमे एहि तथ्यक साक्षात्कार केलनि अछि- "नाल्पेसुखमस्ति, भूमावैसुखम्"। सोगारथ "मैंयॉं,सुनलियनि सोनदाइक बियाह भेलैनअ'। "हॅं,ई कुलकलंकिनी एहने दिन देखाओत।" "से कियै बोलै छथिन मैंयाॅं?सोनदाइ पढ़ल- लिखल छथिन, नोकरी करैत छथिन,तखन कियै लात- बात सुनितथिन ओइ ठढ़मनसा के?भने केलखिन जे ओकरा छोड़ि न'ब जिनगी शुरू केलखिन। ई अर कामधाम नञि करै रहथिन,तैं पित मारि सभ सहै रहथिन। हमरा अर मे मौगी- मनसा सब काम करै छै,त' अपना मोन स' जीबै छै।मोन मिलल त' घर बसल, नञि त' सगाइ कैलक।चलथु मैंयॅॉं,आब हिनको अर के जिनगी सोगारथ होलनि।" फुरसति "कक्का!ई लिस्ट देखि लियौ,सब ठीक छै न?" "कथीक लिस्ट हौ?" -"भोजक।" "हौ,केओ नञि औत' खाय लेल।कहुना पांच टा विप्र हाथ धो लेत' त' भाग बुझिह'।" " कक्का,दही ढल्ल,मालदह आम आ पचमेर करबै,जकरे कहबै सभ औतै।" " कोन भरम मे छ'। हम त' बुझबे केलियै जखन भगवतीकेॅं नौत पड़ि गेलनि, नञि त' साफे बरजि दितिअह।आब जखन जग अराधि लेलह,तखन कहुना निमहबा दिय', तैं अबै छियह।" कक्का… "हौ सभ बुझै छियै,पड़ुकाॅं कहलियह त' फुरसति नञि छलह,एहि बेर लाकडाउन मे छुट्टी नञि लागतह, तैं सभक प्राण अवग्रह मे देने छहक। तोरा सभ जकाॅं हमरा लेल देवता- पितर खेल नञि छथि, तैं उपनेन धरि संगे छियह। तों सौजनियां आ जयबारी लिस्ट बनबैत छह!" बीछक डंक "विकास, कनियां कें सोर पाड़हुन त', सुनैना माय कुम्हरौड़ी पाड़य छै,कने ओकरा संग देथिन।" "मां,... "की भेल', कनियां की करैत छथुन?" "कविता लिखै छथिन,बीच मे टोकारा देबनि त' प्रवाह टूटि जैतनि।" कविता...चारि सौ चालीस वाटक करेंट लगलनि सासु कें आ तुरछि क' बजलीह-" जं ई बूझल रहितय त' संमंधे नञि करितहुं।" राति मे-"हे यौ, कनियां पढ़लि लिखलि छथि, नोकरी करै छथि,से त' बूझल छल,मुदा कविता लिखै छथि,से समधि कहने छलाह अहांकें?" ऐं….जेनाबीछक डंकलागलनि ससुर कें।- "हमरा त' ई कथा पसिन्ने नञि छल,कनी- मनी पढ़नाइ- लिखनाइ त' ठीक,परंच पी एच डी,कओलेजक नोकरी,ताहि पर सं कविता! मुदा विकासक जिद! बसि गेलनि विकासक घर!" माथ पर हाथ देलनि गृहपति! मर्यादा ई आने दिन जकाॅं एकटा मन्हुआयल भोर छलै।एहि बीच मे सूर्य आशाक लालिमा नेने नञि, निराशा आ आशंकाक करिऔन मेघक संग उगैत छल। शुभ्रा यन्त्रवत् चाह पीबि आफिसक काज प्रारंभ करबा लेल लैपटाप खोलनहिं छलीह कि मोबाइल स्क्रीन पर शिशिरक नाम स' काल देखब' लागल।एक बेर इग्नोर कय काजक दिश ध्यान केंद्रित केलनि कि फेर मैसेज टोन- "काल पिक करू" "आफिसक काज क' रहल छी,पांच बजेक बादे गप होयत।" "दू मिनट गप नञि क' सकैत छी?ई टुटपुंजिया नोकरी हमरा स' पैघ भ' गेल?" "हॅं, सएह बूझू,सांझ मे काल करू"।-शुभ्रा मैसेज टाइप कय अनमनायल सन काज करैत रहलीह।हुनक प्रोजेक्ट- हेड के किछु आभास भेलै त' कहलखिन- "शुभ्रा,अहाॅं ठीक नञि बुझा रहल छी,आइ विश्राम करू,काल्हि क' लेब काज।" "नञि सर! काज करैत छी त' समय कटि जाइत अछि, नञि त' दिन पहाड़ बुझाइ अछि।" "बुझै छी अहाॅंक दु:ख, तैं छुट्टी एक्सटेंड कर' नञि कहलहुॅं, किन्तु आइ अहाॅं एतेक गंभीर प्रोजेक्ट पर ध्यान देबाक मन:स्थिति मे नञि बुझाइ छी, तैं कहलहुॅं, कोनो अगुताइ नञि छै,टाइम बाउंड प्रोजेक्ट नञि छैक,कखनो क' लेब।"- धियापुता जकाॅं बुझबैत कहलखिन महेश सर।एहि दु:खद समय मे आफिसक अधिकांश स्टाफ शुभ्राक संग ठाढ़ छलनि,सभहक इएह प्रयास छलै जे कोनहुना ई सामान्य भ' सकथि। आ शुभ्रा सत्ते लैपटाप बन्न क' देलनि। बहुत मुश्किल स' दिमाग के संयत केने छलीह,सत्य स्वीकार करबाक स्थिति मे आयल छलीह, प्रायः मास दिन स' आफिसक काज सेहो शुरू क' देने छलीह, नञि त' भांइ -भांइ करैत खाली घर काट' दौड़य छलनि।होइन जे बढ़ैत अवसाद स' दिमाग खराप भ' जेतनि।आघातो त' बड़ पैघ लागल छलनि!दू दिनक भीतर मां आ पापा दूनू संग छोड़ि देलखिन।ओ कारी दिन आ राति आ ओ भयावह सन्नाटा! मुइलो मुंह कत' देख' देलकनि कियो? अंतिम यात्रा की एहने होइ छैक?पन्नी मे बन्न देह आ इलेक्ट्रिक शवदाह गृह,ओतय ठाढ़ टुग्गड़- टापर शुभ्रा आ निखिल सर। बस आफिसक किछु संगी-साथी फोन कय बोल भरोस दैत छलनि। हॅं, मकान नं.54 के मेहरा आंटी आ निखिल सर कखनो संग नञि छोड़लखिन, नञि त' हिनका की होश छलनि जे किछु कण्ठ तर दितथि! आ आइ दू मासक बाद पहिल बेर शिशिरक फोन आयल छलनि।जखन बाबू आ मां दु:खित छलखिन,ओ कतेक अधीरता स' शिशिरक फोनक प्रतीक्षा करैत छलीह! मुदा जहिना ओ नेपत्ता छलाह तहिना हुनकर फोनो।बाबूक स्थिति जखन खराप होमय लगलनि आ कोनो अस्पताल मे बेड नञि भेटलनि,तखन निर्लज्ज भ' शुभ्रा स्वयं फोन केलखिन- "निखिल,अहाॅंक बाबूक त' बहुत जान-पहचान अछि,एकटा बेड कहुना दिया दिय'।" "हॅं,देखैत छियै, कोनो व्यवस्था भेने फोन करैत छी।"-कहि जे फोन कटलनि शिशिर,तकर बाद कतेक वज्रपात सहलनि एसकरि शुभ्रा, किन्तु शिशिर किंवा हुनक पिताक दिस स' संवेदनाक कोनो फोन नञि!ओ जिबैत छथि वा मरलीह एकर कोनो जिज्ञासा नञि!आ आइ! आइ ओ चाहैत छथि जे हम सभ काज छोड़ि हुनकर फोन के प्राथमिकता दियनि! अहीसभ चिन्ताजाल मे ओझरायल शुभ्रा केॅं समयक कोनो होश नञि रहलनि आ सांझ मे फोनक बदला शिशिर सद्य: उपस्थित छलाह। "फुरसति भेट गेल?"-स्वर नञि चाहियो तिक्त भ' गेलनि। "नञि ,एखन फुरसति कत'?अहाॅंकेॅं बुझले अछि एहि महामारी मे काज कतेक बढ़ि गेल छैक।कखनो भोजन- वितरणक व्यवस्था देखू,कखनो दवाइक व्यवस्था,कखनो कोनो शिकायत भ' जाइ त' मीडियाक प्रेशर सहू! नेतागिरी कोनो आसान काज छैक।" "तखन?"- " सुनू शुभ्रा,अहाॅं हमर भावी पत्नी छी, अहाॅंकेॅं हमर पद- प्रतिष्ठाक ध्यान रखबाक चाही। हमरा पता लागल जे अहाॅं सांझ-राति अपन पड़ोसी संग घुमैत रहैत छी,लोक अनर्गल गप बजैत अछि।जे भेलै से भेलै,आब अहाॅं अपन व्यवहार संयमित क' लिय' ।" "अच्छा!अहाॅंके हमर किंवा हमर व्यवहारक पता रहैत अछि?तखनो संवेदना देब जरूरी नञि बुझायल? हमरा त' भेल जे देरिये स' सही,हमर दु:ख बांट' एलहुॅं अछि।"- आर्त स्वर मे पीड़ा देखार भ' गेलनि। "देखू शुभ्रा,ओ सभ एतबहि ओरदा लिखा क' आयल छलाह,की करबै?हम ओहि दिन नञि छलहुॅं एत',दोसर कोविड प्रोटोकॉल त' पालन करबाक चाही न!" "ओकर बादो भेल होयत जे शुभ्रा सेहो नहिंए जीती त' औपचारिकता मे समय नष्ट कियैक कयल जाइ, नञि?" "शुभ्रा!एहन भाषा बाजि क' अहाॅं अपन गलती नञि नुका सकैत छी।अहाॅंक उच्छृंखल आचरण हमर घरक मर्यादाक अनुरूप नञि अछि।समेटू अपना के।मोन राखू जे ई संबंध अहाॅंक दिवंगत माता- पिता स्थिर क' गेल छथि।" "कोन आचरण?केहन उच्छृंखलता?"तैश मे बजिते छलीह शुभ्रा,तखने निखिल निधोख पैसलाह आ -"चलू न,आइ टहल' नञि चलब की"-बजिते छलाह कि दृष्टि शिशिर पर पड़लनि आ प्रश्नवाचक दृष्टि स' शुभ्रा दिस तकलनि। "ई शिशिर छथि,एमएलए सुहास बाबूक पुत्र।आइ फुरसति भेटलनि त' जिज्ञासा कर' एलाह अछि।आइ हम नञि जा सकब,अहाॅं घुमि आउ।" "आबो पुछबै केहन उच्छृंखलता?"-कटगर स्वरें बजलाह शिशिर। "हॅं, अवश्य।ककरो संग टहल' जायब उच्छृंखल आचरण छैक?" "हॅं,रोज जायब, समय- कुसमय एकटा जवान लड़कीक घर एकटा पुरुखक आयब,रातुक दस-दस बजे धरि रहब की मर्यादित कहल जा सकैत छैक? मां-बाबू नञि रहलाह त' अहाॅं एतेक उद्धत भ' जायब? किछु उम्मीदो देने छियै की?हमर परिचय भावी पतिक रूप मे नञि करायब की इशारा क' रहल अछि?" -क्रोध मे बेसम्हार होइत बजलाह शिशिर। "शिशिर!आब अहाॅं पर हमरा क्रोध नञि,दया आबि रहल अछि।अहाॅंक ओ संस्कारे नञि भेटल जे अहाॅं उचित- अनुचित बूझि सकी,अपन गलती मानि सकी किंवा सुधारि सकी!अहाॅंके सफाई देब हमरा जरूरी नञि बुझाइ अछि,तैंयों कहब कियैकि अहाॅं अपन चरित्र ऐना मे देखि सकी- सुनू,जखन हमरा सभ स' बेशी अहाॅंक खगता छल,तखन अहाॅं नेपत्ता छलहुॅं,एकटा फोनो स' सांत्वना देब जरूरी नञि बुझायल अहाॅंके। गाजियाबाद आ दिलशाद गार्डन के दूरी अहाॅं लेल पहाड़ भ' गेल!हम कोना बिपत्तिक समय कटलहुॅं,हम जनैत छी! जॅं निखिल सर आ हुनक माइ नञि रहितथि त' हमरो नञि देखितहुॅं अहाॅं।ओएह दूनू गोटे एखन धरि हमर संग छथि,हम कोना खाइ-पीबी, कोना एहि अवसाद स' निकली,एहि लेल ओ दूनू गोटे तत्पर छथि।भरि दिन एसकर मसान सनक घर मे रहि हम पागल भ' गेल रहितहुॅं ? तैं बिनु नागा ओ अबैत छथि,हमरा खुलल हवा मे ल' जाइत छथि।आ अहाॅं- अहाॅं जासूस लगौने छी हमरा पर!छि:!घिन अबैत अछि अहाॅंक सोच पर। आ उम्मीद त' हम नञि देने छियनि कोनो हुनका,आगू की करब,ई हमरो पता नञि, किन्तु अहाॅंसन संवेदनहीन व्यक्ति संग हम आगूक जिनगी नञि बितायब ई निश्चित अछि।" "अहाॅंक ई साहस! अहाॅं चिन्है नञि छी हमरा।"-तमतमाइत ठाढ़ भेलाह शिशिर। "आबे त' चिन्हलहुॅं!अहाॅं जा सकैत छी।"-कहैत दरबज्जा बन्न कयलन्हि आ भोकारि पाड़ि क' कान' लगलीह। अरुण लाल दास दू टा बीहनि कथा १.बीप्रेक ...धुर जाउ ,केहन हती । ...केहन । ...रसफट्टू आम जाँकित । ...से की । ...सैह कहली य ।टिकुले से अहाँ नजरि खिरबैत रहली । देख देख जाइत रहली य । हम आसा मे धिआन से रहली । अब तं आम पाकि के सिनुरिया गेल हय । अहाँ तं खेले बिगाड़ देली । मौसमी पैर के नह खोटैत मूरी झुकौने नहू नहू सोहन स बतिआइत अपन मनक भड़ास निकालि रहल छलै । दरअसल ओकर प्रेम मे दरक्का लागि गेल रहैक । ...से त ठीके । हमरा सँ ओतेक रोकल नै गेलै ,मतलब प्रतीक्षा कैल नै भेलै ।आबे की भेलैए ।हम अखनो तैयार छिकियै ।ई पसिन छै हमरा एखिन्तो। ...हमर हिरदय काठ के हांरी जैसन हय ,जे आगि पर दू बेर नै चढि सकय हय ,बुझली । ई दोसर ताकि सकै हय ...त हम नै । सूरुज भगमान डुमि गेल छलाह।साँझ शिता गेल रहैक आ मौसमी अपन डेग झटकि देने छलै । २.परबतिया परबतिया के हाक दैत झुंझुआइत ओकर माय बजलै ,"आइ तोहर बपहिया घरसूरक मइल छोड़ा देतौ ।भरि दिन ई ससुरी मोबाइलक खेल मे घरक एक टा काज नै करैए ,जाने कोन माहटर सँ बतियाइत रहैए ।की पढैए भगमाने जानय । हम केमहर केमहर की की करु , थारी बाटी ,गाय गोरु ,गोबर करसी ,कलउ बेरहट आकि दुधपीबा बच्चा के सम्हारु । सामने फांइट पर परल परबतिया के देखिते ओ धुमधुमा देलकै । इस्कुल के टैम भ गेल रहैक । कनैत ,आँखि पोछैत तामसे पित्ते घोर परबतिया साइकिल उठा बिन खेने इस्कुल चलि देने रहैक । वार्षिक समारोह मे आइ सब अभिभावक केँ बजाओल गेल छलैक । डी.एम सैहेब द्वारा 400 मीटर ,100 मीटर एवं 90%उपस्थिति पर पार्वती कुमारी के नाम प्रथम पुरस्कार उद्घोषित होइत देखि क' परबतिया माय केर आँखि नोरा गेल रहैक । कल्पना झा, बोकारो बीहनि कथा -----यदु कका के कते वर्ष क बाद तीन टा पुत्र भेलैन।समय स सब सयान भेला।समय रहिते सबके अपन जजात बखरा कैनाय उचित बुझी,गाछी गेला।हाथ में कागज देख रखबार पुछलकैन! ---कि भेल मालिक?बिना बाजयत आंखिक इशारा सं ओकरा बजौलैन।इ बरका क, ओ मांझिल के आ ओ छोटका के! ---रखबार बाजल मालिक अते तरद्दुत सं एकरा बचोलौं आ एखने कोन खगता परी गेल बखरा के! ---रे तों नय बुझबिही हमर बखरा लागय सं पहिले इ हम काज क दी। लग में ठाढ़ पोता बाजि उठल! ---बाबा ओ बड़का आमक गाछ हमर बाबू के नाम कय देब। बाऊ रे ओहि में फल नहि होय छय। ---चट ओ बाजि उठल त ।हमर बाबू सं कोनो फलक उम्मीद नय करु ! सुभाष कुमार कामत अस्पताल - आयं हौ ! मुन्ना सूनबै एल "जे अस्पताल मे एकोटा बेड नै बाचल छै" - ठीके सुनलो कक्का - हौ ! तखन लोक बिना इलाज केँ कोना बचत - कक्का अहिं कहूं तँ हम अहाँ अस्पतालक लेल लड़लिय कहिया । हम अहाँ तँ लड़लिय बस मंदिर - मस्जिदक लेल आओर आई ओ बंद अछि रंग मुर्गा - भाई ! आइ कालि अहाँ चितिंत बुझाईत छी बकरा - हँ भाई ! अहूँ आई कालि भोरे-भोर बांग नै दैय छीयै "से कि बात" मुर्गा - हँ यौ भाई ! आब लोक बेसी "शरीफ आओर निर्बलकेँ सतबैत छै' बकरा - बात अहाँ ठिके कहलौ, "जे समाजक लेल जतैक नीक सोचताह आओर करताह , उनटे समाज उकर उतबैह बड़का दुश्मन" मुर्गा - आबि मनुख रंग सँ कम 'हमरा अहाँक सोनित सँ बेसी होरी पसंद करैत अछि'। चॉकलेट - आई दू कप मीठगर चाह बनाऊ - अहाँके तऽ डागदर मीठ से परहेज़ करै लेल कहनै छथि - तें न आई टा कहि छी - किया आई किछ विशेष अछि की? - रेडियो पर नै सुनलिए जे "आई चॉकलेट डे छियै" ।आब दाँत त अछि नै ।कम सँ कम संग बैठ मीठगर चाहो तऽ पीबी। नून - हे यै ! काल्हि सँ तिमन मे नून कनि कमे डालब - किया "तिमन बेसी नूनगर भऽ गेल की' - तिमन तँ निमन्न अछि - तखन 'डागदर कहलैथ कि नून कम खाई लऽ' - नै यै - तखन किया कहै छिए "नून" कम - हम अहाँ तऽ किसान छी। अपना सभकेँ दर्दक केय बूझत। "अखन बाजार मे हमर अहाँक फसल सँ बेसी महंग नून बिक रहल छै" । ऑनलाईन - हे ये! कनिया - हँ माँ, कि कहै छथिन - हमर पोती 'नव कनिया बैनि दोसर घर जा रहल अछि' ओतह केना रहत, कखैन खैति कखैन न? - से तऽ माँ ठीके कहै छथिन - एकटा काज करूँ न, मकई के लावा, मुरही, सतूआ बुच्चीक अलग सँ द दियो - मैया अहूँ न। आब ओ समय नै रहल जे आहाँ सोचे छिए। जे मोन करि से खाऊ, आब सब किछु बनल - बनैल आॅनलाईन भेटैंत अछि। पूनम झा, कोटा,राजस्थान २ टा बीहनि कथा १."काकी बजलीह" -- "काकी गोर लगै छी ।" अंगना अबैत विष्णु ( दियोर क बेटा ) बाजल । "नीके रह बौआ । कहिया एलां ?"भनसा घर सं काकी बजलीह । "काल्हि एलौं काकी । कक्का कत छथीन ?" "अहिठाम छथीन। अहिठाम आबै आ बैस ।" "काकी ! कक्का सं आब भानस करबै छियैन्ह ?" "बौआ! जखन बाल-बच्चा अपना में व्यस्त रहतै त माय-बाप सेहो एक दोसर के नै देखतै ?" २.'परवाह' "आई अहां सेब काटि क हमरा नै देलौं न ?" घरवाली दूध क बरतन चुल्हा पर चढाबैत बजलीह। "हैया लिय पहिने सेब खा लिय ।" घरबला सेब काटि क दैत बजलाह । "हूंउउ.. हैया खाय छी ।" "पूरा द दिय की ?" "नै नै आधा सं बेसी हम नहि खा पबै छियै, से अहां के बूझल अछि न ?" "हमरा सेब नीक नै लगै अछि मुदा अहां के दुआरे ई आधा सेब हमरा खाय पड़ैत अछि ।" घरबला सेब क टुकड़ा चबाबैत बजलाह। घरबाली मोनेमोन बुदबुदेली 'हमरे कोन नीक लगैत अछि, मुदा अहांके सेब खुएबाक कोनो दोसर तरीका हमरा नै अबैत अछि।' पूजा झा. कोटा औरत औरत के जे पहचानलक, समझू विश्व ब्रह्याण्ड के जनलक | माँ जननी के मर्यादा के त ब्रह्या , विष्णु महेशो तक मानलैथ | औरत के महानता है कहाँ कहाँ नै तौलल गेल , कखनो गंदी कखनो बुरी कि सब नही बाजल गेल | जे जन्म देलक हमरा आहाँ सब के जेकर करूणा कथा हिला दैत अछि भगवान के | "ईव " अगर फल नही खैतैथ त आई ई सृष्टि नही होईता , कुन्ती अगर अपन राज नही छुपैब तैथ त जगत में गीता के वृष्टि नही होईता | केकैयी राम के वनवास नही दियैवतैथ त राक्षस के राज होईता | राधा रास लीला नै करितैथ त संसार में प्नेम नै होईता |औरत हर जगह नीके केलैथ , पर ओकरा बदला में हुनका कि भेटल | क्यो प्नतारित करैत छथिन त क्यों अपमानित, क्यो व्यंग्य में कहेत छथिन जे औरत त अवला छथि | अते महानता रखितो दहेज के लेल जरायल जाईत छैथ औरत | मनोरंजन के लेल बेचल जाईत छैथ औरत | कि कैह सकैत छी चंद रूपैया के लेल सतायल जाईत छैथ औरत | न जाने कतेको डाँक्टर ,इंजीनियर , वकील पैदा केने हेती | दुर्भाग्यवश वक्त पर क्यो नै दैत छैन दलिल | हर वक्त ओ काज आबैत छैथ ओ दोसर के, कखनो माँ कखनो बहिन कखनो वाला बैनक |ई सुनि लिअ देश वासी औरत तखने तक जलायल जैती , जाबत तक ओ करूणा के देवी छैथ | जाहि दिन रण चंडिका बैन जयती , ओहि दिन अपन अधिकार मान सम्मान सब पाईब जयती | आहाँ ओकर अधिकार कि देबै, जे आहाँ के अधिकारी बनेलैथ | आई जई स्तर पर औरत ठाढ छैथ ,ओ स्थान ओ अपने बनेने छैथ | और आगा प्नगति कर चाहती त खूद स करती | एकर चिन्ता नै करू जे आहाँ सब पर भरोसा करती | आदिकाल स कलिकाल तक अगर औरत रण चंडिका बनल रैह तैथ , त आई विश्व भरि में ममता ,दया करुणा के परिभाषा नै होईता | आबो समय अछि पाप के प्नायश्चित करू और अपन उन्नति के सुरक्षित करू | 'वरना ओ दिन दूर नै ' जहिना दहेज के आरोप मे जरायल जाईत छैथ औरत , तहिना जला क राख क देती सबटा एक औरत | औरत के शालीनता के उपहास नै उङाऊ ,ई धरती सेहो एक औरत छैथ अई देवी के गुण गाऊ | उलाहना अरे नहि होयत आँहा स | छोइर दियौ लाऊ हम क दैत छी | निरंजन जी सरला जी स व्यंग्यात्मक लहजे मे कहलखिन | सरला जी फीकी हँसी बिखेरैत फेर जुटि गेलैथ साईकिल के बोल्ट कस में | 50 वर्ष के सरला जी अपन बच्चा सब के काबिल बनाक ओ अपन सपना के थाह लेब शुरू केने छलैथ | और साईकिल चलेनाई ओहि सपना के एक टा छोर छलैन जेकरा ओ कसि क पकङ के कोशिश क रहल छलैथ | मगर निरंजन जी हमेशा हुनका कहैथि रहैत छलखिन जे आँहा स ई नहि भ सकैत अछि | आँहा के बस के बात नहि अछि, मूर्ख भ गेल छी कि एतबा समझ में नहि आबैत अछि जे आँहा स ई सब नहि होब बला अछि | काफी देर तक जखन सरला जी स कोनो उत्तर नहि भेटलैन त निरंजन जी पुछलखिन , ' कि त आब नाराज भ गेलौ | सरला जी मिठी मुस्कान लैत कहलखिन अरे नहि नहि .......आँहा के ई उलहन , ताना , व्यंग्यात्मक शब्द , ई ठहाका ईया सब तहमरा आगा बढ के उर्जा दैत अछि | हमरा और मेहनत कर के लेल प्नेरित करैत अछि | और मने मन ठाईन लैत छी जे ई व्यक्ति के गलत साबित कर के अछि | अतेक कहैत ओ पैडल मारैत , साईकिल पर सवार भ क निकलि पङलैथ | प्रियंवदा तारा झा ४ टा बीहनि कथा १.अन्नदाता महेश अप्पन खेतमे तन्मयता सऽ खुरपी चलबैत चलबैत विचारक गहन समुद्रमे सेहो डुबकी लगौने छल। कोबी , टमाटर, सेम, भाटा, कीनै छलै ओइ छोट छीन खेतमे। खूब नीक तरकारी सब भेल छैक , मोन कनी प्रसन्न भऽ गेलै। मुदा मोन जोग पाइ कहां भेटि पबै छै ? साहूकारके पाइ लेने छियै , ओतऽ सब टा तरकारी पानिके भाव लेत आ अपने खूब फैदा कमैत। एहि बेर अगहनी फसलि सेहो बड़बढ़ियां भेलै , मुदा सूद चुकबैत, चुकबैत किछु खास बचि नहिं सकलै।कतेक दिनसऽ बुचियाके फोन गछने छियै , मुदा अहू फसलिपर नहियै भऽ सकलै। महेश अही सब गुनधुनमे लागल छल कि भातिज दौड़ल एलै, कक्का , सुनै छहक , आब अपना सबके दिन बदलि जेतै। से की ? कोनो लाटरी निकलल छौ कीॽ धुर, तों नै बुझै छहक, सरकार हमरा सब लेल नबका कानून बनौने छै , आब छोटका, बड़का सब किसानके बाजिब दाम भेटतै , आब अन्नदाताके धियापुताके सब मनोरथ पुरबे करतै। सरकार अप्पन सबहक जिनगी बदलि देतै। ई कोन नऽब मायाजाल रचने अछि सरकार? अन्नदाताके संबोधनमे भरमि कऽ रहि जाह। ई सब नेता सबहक गप्प छै बौआ। मोन मारि कऽ जिनगी बितैबा लेल एकटा शब्दक छलावा। एतबा बजैत अन्नदाता लागि गेलाह पुनः अप्पन कर्मक्षेत्रमे। २.उपराग वसुधा भगवतीके सांझ देबाक ओरियानमे लागल रहथि। मोने-मोन रतुका काजक फेहरिस्त सेहो बनि रहल छलैन्ह, जल्दी-जल्दी भानसक सरंजाम कऽ बच्चा सबके पढेबाक अछि। एम्हर सासुके मोन खराब रहबाक कारणे ओकरा सबपर समय नहि दऽ पाबि रहल छियैक, परीक्षा लगिचायल छैक, पिछड़ि नहि जाइ दुन्नू। ओतऽ भगवती सहाय भेलखिन्ह, मोन ठीक छैन्ह आब कनी। सबटा काज समेटि घऽरमे अयलीह तऽ ओछाओनपर पैकेट पड़ल देखि मोन घोर भऽ गेलैन्ह, एक्कहुटा चीज जगहपर कियो नहिं राखि सकैत अछि। खोलि कऽ देखै छथि, तऽ गमकैत गुलाबक बुके, संगहि सुन्दर कार्ड। ई कथी लेल आब, अहिना अनेरे पाइ नाश करैत रहू, उपराग दैत बजलीह वसुधा। मोनेमोन मुसकाइत बजलाह वरुण, हम खूब बुझैत छी अहांक उपरागक भाषा। ३. गणतंत्र दलानपर छब्बीस जनवरीक चर्चा बेश उत्साहसऽ भऽ रहल छल। बिरजू बाबू संविधानक मूलभूत तत्वके व्याख्यामे लागल छलाह। प्रबुद्ध श्रोता लोकनिक खनहुं सहमत होथि, कौखन विरोधोक स्वर आइब जाइत छल। बुधना जे दलान बहारैत छल, ई सब गप्प सुनैत अकबकैल ठाढ़ भेल छल। ओकर ई मुद्रा देखि बिरजू बाबू टोकैत कहलखिन्ह, जल्दी-जल्दी हाथ चलाबह, मुंह खोलने की ठाढ़ छह? तों की बुझबहक गणतंत्र? जी सरकार, सैह तऽ। जखन सब एक्के रंग छै, समानताक अधिकार छैक, तखन फेर ? ४. तिलबाक मर्म कनी एम्हर सुनू। हं अबै छी। फेर कनिये कालमे, सुनै नै छी की? एतेक काल सऽ आवाज दऽ रहल छी , आबि कऽ कुरता, बंडी निकालि कऽ देब ,से नहिं। ओत्तहि अलमारीमे टांगल अछि , अपने सऽ बाहर कऽ लियऽ नऽ कनी , ओरिया कऽ बजलीह लाल काकी। एहन कोन बड़का काजमे लागल छी अहां , तुरछैत पुछलखिन्ह लाल कक्का। कनी तिलबा बनबै छियै , हाथ लागल अछि , बुझिते नहिं छियै दोसरा के काज अहां सब। ई कोन बड़का काज छै। मौगी सबहक आदति होइछै , राइके पहाड़ बनबैके , एतनी टा काज लऽ कऽ भरि दिन बैसल रहब आ झुट्ठे हल्ला , एत्ते काज , एत्ते काज। देखू , हम केहन झटपट बना दै छी। ई कहि , लाल कक्का तिलबा बनैबाक उपक्रम शुरू कऽ दैलन्हि , लाल काकी मना करिते रहलीह, मुदा ओ कि सुननिहार। जहिना पहिल लड्डू बान्है लेल मिश्रण हाथमे लेलन्हि , हाथ पाकि गेलैन्ह, जल्दीसऽ हाथसऽ फेकबाक कोशिश कैलन्हि , मुदा गुड़क पाक , की हाथ सऽ जल्दीसऽ छूटै भला ? लाल काकी तिलबा बान्हब छोड़ि , लालक्काके दवाई लगा रहल छथिन्ह आ जेना बिन बाजने पुछै छथिन्ह , बुझलियै तिलबाक मर्म। रवि भूषण पाठक घर (एक) डेली शुरू होय 'हमर बाबू एहन ,हमर भैया एहन ' । दुपहर तक बात पहुंच जाय ' हमर गाम मे एना ' । मुदा उपसंहार होय सांझ तक ' छोटका चौधरी एहन आ मैंझला चौधरी एहन ' । घर (दू) जे थारी आइंठकूठि रहै ,से कतौ गेंटल ,कतौ ओहिना राखल । खाए काल मे एगो दुगो मंजा जाए । बजार सं आनल तरकारी ओहिना झोरा मे नूरियैल । भनसाघर मे कतौ पियाज कऽ छिलका ,कतौ उसनल आलू कऽ छिलका । रौतुका मच्छरदानी केओ खोलनाहर नै । साफ़ आ पहिरल कपड़ालत्ता एके संग अराम करैत । दलान या अगिला रुमक कुनो कंसेप्ट नै ।एना मे जे केओ गेट ठकठकबै , तऽ पहिले ई विचारल जाय कि शायत दोसरक गेट बाजै छै ! दोसर तेसर बेर गेट बाजै ,तखन बाले बच्चे मिलि के अगिला घर कऽ सफाई शुरू भऽ जाइ । सफाई मने अगिला रुमक समान कें जेनातेना पाछू लऽ आननै रहै । ई काज बच्चोऽ सब आटोमेटिक शुरू कऽ दै । कहबासुनबा के जरुरी नै । मुदा सबसं आनंददायक चीज़ रहै कि केओ नै आबै ऐ ठाम ! ने कतौ जेनए ने ककरो एनए । थिर पृथ्वी ! अतिथि हीन ब्रह्माण्ड ! घर (तीन) आनंद जी लिस्ट बनेने छथिन । कनिया कहिया कहिया भानस बनबै छथिन , कहिया कहिया आनंद जी । कहिया कहिया होटल सं आबै छै आ कहिया कहिया मंत्रे सं काज चलै छै । स्थिति जेहन होय , मां के कहल यादि आबै छैन ।नेनपन मे मां कहैत रहथिन 'खा ले वौआ , एको टा दाना नै छोड़ ।जत्ते दाना धोनिधानि बनतौ ,ओत्ते दिन भुक्खे रहबहीं ' । अमरेश कुमार चौधरी २ टा बीहनि कथा १.व्यथा - कत गेलहुं - आबैत छी - सभटा समान ,राखि देलियै - हं दस जोड़ी मौजा , पांचटा दस्ताना , दु दर्जन रूमाल आ बीसटा छोटकी गमछी बड़का झोड़ामे राखि देलहुं- कने सबेरे एबै ने , बौआके जन्म दिन छै - हमरा पता अछि। - कहैत छल पप्पाके कहिए केक आनिद लेल.पड़ोसमे छसातटा दोस्तके भोरेभोरे कहि एलैया .कपड़ा लऽ लेबै - हं हं। सभटा लऽ लेबै। ------- ---- -- - लेट भऽ गेल -.हां - एना मोन किया मसुआएल अछि . - बौआ कतऽ गेल - बाहरि बच्चा सभ संगे खेलैत अछि - किछु पाई अहां लग अछि कि - नहि , किछो नहि बिकल. -- एक सप्ताहसं लोककतेहन आन्दोलन चलि रहल छै जे पुलिस चारियो घनटा निक सं बैसए नहि दैत छै . ३०० टकाके बिकलै. के के २५० टकाके भेलै ५०टकाके जिलेबी लऽ लेलियै. - पैरे एलिए एतेक दुरसं - हां. तै देर भऽ गेलै. - कपड़ा नै हेतै एहि बेर बौआके-- आंखि पोछति साड़ीसं बाजए लगली – लोकके कि फरक पड़ैत छै- करैत रहौ आन्दोलन पाईबला सभ –हमरे सभ लेल एहने दिन भगवान देने छथिन। २.अबोध - सुखेसर - जी मालिक -एम्हर आबह। बौआके अंगनामे मोनेने लगैत छै, कने दलान दिश लऽ जाह। दलानपर बच्चा सबके देखि मोन लगतै। -हं मालिक -कने रूकु। बड ठंड छै, स्वेटर पहिरा दैत छियै।---- -- ल जइयौ -- सोगरथा ,रे सोगरथा - कि बाबू - ट्युसन गेल रही - हं हौ - एकरा सने खेलीहने। -बडहावा उठि गेलै, पहिने अंगना जो मलकाइनसं एकर टोपी नेने आबिह ------------------------ - लऽ। - कने हम पहिर कऽ देखियै - मारबौ कि सार। दुटा बुसट पहिरने छी ने रे। - हमरा तऽ ने टोपी दैत छह आ ने स्वेटर। खाली बड़के लोकके जार लागैत छै कि – कहैत आंखि के नीच्चा कऽ लेलकै। सांत्वना मिश्रा बीहनि कथा- बड़दक घंटी भोगिया पुआरक बोझ पर हाथमे एकटा सटका लेने चैनसँ सुतल छल। अोम्हर बड़द धान दाउन कऽ रहल छल . ताबत गोपाल जी जे पेशासँ वकील छला ,जा रहल छला। पुआरक बोझ पर भोगिया के बेसुधि पड़ल अा बड़द के अपने मोंने दाउन करैत देखि ठमकि गेला । फेर किछ भांज नए लगलैन तऽ भोगियाकेँ उठेला आ कहला आहिरो बा... ई की छै?? तूँ तऽ सुतल छह आ इ बड़द अपने मोंने दाउन करएमे लागल छै से कोना?? भोगिया कहलक -हे यौ गिरहत बड़द के गरामे बड़का घंटी लागल छैक,जखने घंटीक स्वर नहि सुनाइत अछि तऽ उठिक एक सटका दए छी ,फेर चलए लगए छैक, बुझलौं! गोपाल जी सहमत नहि भेला,आ मुँह बना कऽ बजला...। नए हौ.... जौं एक्के ठाम ठाढ़ भ गर्दनि हिलाबए लगए तऽ??भोगिया बाजल... हे यौ गिरहत अहांँ वकील छी,बड़द नहि!!अहाँ केँ तऽ पेशा अछि संका केनाइ । गोपाल जी भोगियाकेँ देखिते रहला।भोगिया फेरसँ पुआरक़ बोझ पर सुतल! रूचि स्मृति २ टा बीहनि कथा १.खोज उहापोह मे रहथिन ओ.. की अछि जिनगी? इ प्रश्न अनेकानेक बेर हुनक मोन मे ऐलै। वयस भ गेला के बाद केवल विवाह करब? सेहो समय भ गेलै त ककरो सँ भ' जएत! आकि जे जल्दी भेट जाए बला छए! तकर बाद की? मन माएर के आपन जिनगी मे लोगक भीड़ मे आपन लोग खोजब, शेष लोक त'अपन स्वार्थ पूर्ति धरि तक मात्र संबंधी अछि। २.आत्मनिर्भर हुनकर नाम रहै बबिता। बबिता खेत-पथार मे काज करथिन । खेतक काज हुनका बड्ड सोहाबैत रहै। "बियाक जोगार भ' गेलै यै माय, बिहाने हम खेत मे बाउग करबै" "बबितिया तौँ घर अंगना के काज देख ,खेती-पथार बाउ देख लेथुन.रौद मे काज करैत कतेक कारी भेलही यै मुंह देखैत छी.कखनो.. कियो बिआहो नै करतो" माय तामसे कहलकै। बबीता आपन उजरल केस के हाथ से समेटैत कहलकै"हमरा बिआह करबाको नै छए! खूब नीक खेती करै लागल रहै बबीता। एक दिन गामक मुखिया ओकर देहरि पर एलै"बबीता गै बबीता... सुनै..." किसान सम्मान के लेल सरकार तोहर नामक घोषणा केलक। आब बबीता खेती संगे, सामाजिक कार्य सेहो करैत रहै, पति द्वारा त्यागल औरत सबके ओ अपन खेत दैत रहै खेती करबाक लेल, छोट लड़की सबके पढ़ाई के संगे खेती करैक गुण सेहो सिखाबै। दुआर पर सांझ दै के बाद बबीता के माय बबीता के बाप सँ कहलकै - "जं विवाह क' लैत त ऐतेक काज क' आइ सम्मानक हकदार बनि पबैत? देवेन्द्र मिश्र, राजविराज,नेपाल एकता नहर कातक एकटा चभच्चामे तीनटा सिंहेसरा पाड़ा, तीनूक नाङड़ि तीन दिस, मुह एक्के दिस । एकटाक सिंघ बड़का-बड़का, दाेसरके मझेलबा आ तेसर बिनु सिंघेके । -अपनासभक जीवन बेकार भ' गेल । लाेकसभ अपना स्वार्थे सिंहेसरा बना दैए आ अपनासभकेँ अपना-अपना भागपर छाेड़ि दैए । - हँ, देख ने ! लाेकके खेतमे जाइते देरी हल्ला जे करए लागैए ! स्वार्थीसभ ! -ओतबे कहाँ ! बड़का बरछी ल' दाैगैए आ कचबाबध क' दैए । सर्वसम्मत निर्णय हाेइत अछि आपसी एकताक आ अपनासबकेँ खेहारनिहारपर आक्रमण करबाक । तखनहिं दछिनबरिया टाेल दिससँ आवाज सुनाइत अछि - एहैऽऽऽत, एहैऽऽऽऽऽऽत .............!! तीनूक कान ठाढ़ हाेइत अछि । बिनु सिंघबला ठाढ़ हाेइत आवाजकेँ अकानैत अछि । मझिलबा सिंघबला ठाढ़ हाेइत ओकरा धकिअाबैत अछि आ दरबर मारैत अछि । एहैत, एहैऽऽऽत ...... जाेरक आवाज । बड़का सिंघबला दाैड़िक' मझिलबा सिंघबलाकेँ मारैत अछि जाेरसँ पाँजरेमे । थुस्स द' बैसि गेल ओ । बिनु सिंहबला त' पहिनहि हारि मानि लेने अछि । बैसलाहा सेहाे अपन एकताक असफल याेजनापर नाेर चुबा रहल अछि । मिन्नी मिश्र, पटना के समाहरत इ गृहस्थीक भार! अपन नव विवाहिता, मास्टरनी कनिया संग,नवका मकान में घुसिते विद्वान प्रोफेसर पति, गर्व सं बजलथि, " सुनु , प्रिय, एहि महल में अहांक सुख भोगक सबटा समान --कपड़ा, गहना , फ्रीज़, एसी .. आदि -आदि, हम कीनि क भरि देने छी । आब अहां अपन इ गृहस्थी के सम्हारि क राखू । मुदा, एहि गृहस्थीक भार सं हमरा फ्री क देब ... बहुत रास रिसर्च वर्कक काज अधुरे पड़ल अछि । सभके प्रकाशन हेतु , हमरा... यथाशीघ्र प्रेस पठेबाक अछि ।" नवकी कनिया, मुस्कुराइत बजलिह, " बुझलौं, हमरो वहए मोन होइए जे अहांके होइत अछि ।" कोयल सन मीठी आवाज के सुनि प्रोफेसर साहब , लजाइत, सकुचाइत बजलाह," कने बता ने दिय, जे कि मोन होइत अछि?" " त, सुनिए लिय, इहे होइए जे भरिदिन हम अहीं जेना खाली पढिते टा रही ।" कनिया के मनसा सुनिते देरी , पति देव कपार ठोकैत बुदबुदेला, " सब कोई सुनै जाउ, प्रोफेसर फेल भऽ गेल आ मास्टरनी पास।" गौरी शंकर साह, ग्राम+पो०-तुलापत गंज, थाना-झंझारपुर, जिला-मधुबनी, बिहार 847109 भाव परीक्षा दियाबय लेल सप्ता आयल छलथि मास्टर साहेब। संगमे ड्राइवर सेहो छलनि। जखन दोसर सिटिंग एक बजे शुरू भेलनि तऽ किछु समय पछाति खेबाक लेल आरके काॅलेज दिस बिदा भेलाह। गाड़ीकेर अपन स्थान धरा एकटा घरदोकनिया पर पहुँचलथि। सात -आठ आदमी एकसंगे खा सकैत ततेक जगह छलनि। एक आदमी पहिने सँ पाबि रहल छलाह। मास्टर साहेब दू जगह खेनाइक आॅर्डर दऽ सीट धऽ लेलनि। खेनाइमे भात -दालि, अल्लू-कोभीक तरकारी,अल्लूक भुजिया आ पापड़ रहनि। दोकानदार प्रेमपूर्वक सभगोटेकेर खिया रहल छलाह। हुनक उमैर पैसठसँ कम नहि हेतनि। तखनहि पहिने सँ खायबला आदमी हुनका आवाज देलकनि कि कनेक भुजिया देब यो। मास्टर साहेब बाजि उठलाह-अतेक उमरि भेलाक बावजूद अहां लोक सब के खिया रहल छी, एक तरहे तऽ देश सेबा कऽ रहल छी। तखनहि ओ दोकानदार मास्टर साहेबक पलेटमे पापड़ द' देलकनि।पहिनुक खेनिहार बाजल आंय यो मांगने रही हम आओर देलयनि हुनका। मास्टर साहेब सोचि रहल छलाह नीक भाव रहने फल सेहो ओहने कीने ? सत्यनारायण झा लखन बाबू लखन बाबू आइ जॅ जिबैत रहितथि त कतेक प्रसन्न रहितथि।लखन बाबू जखन पन्द्रह बर्खक रहथि त पिताक स्वर्गवास भए गेलनि।जे किछु जमीन जाल रहनि ,दियादवाद हरपि लेलकनि आ भाई बहिन संग अनाथ भए गेलाह,कोनो उपाय नहि बचलनि ,भूखे परिवार विलटि गेलनि आ तखन लखन बाबू एक ग्रामीण संग कलकत्ता गेलाह मुदा हावड़ा ब्रिज पर ओ हिनका छोड़ि भागि गेलनि ,पंद्रह बर्खक लखन बाबू खूब कनला जे आब की करब ,मुदा अपना में धैर्य आ साहश राखि सघर्ष करय लगलाह जे कालांतर में भाग्य पलटि गेलनि आ अपन लग्न , सत्यनिष्ठा के बदौलत एकटा खुशहाल परिवार ठाढ़ केलनि।घरक सभ बाल बच्चा ,बेटा भातिज सभ के पढ़ेबे नहि केलनि वल्कि उच्च शिक्षा तक देलखीन जाहि बदौलत हुनकर परिवार देश विदेश में झंडा गारि देलकै।ओकर एकेटा कारण छै ओ सत्यनिष्ठ छलाह,झुठ नहि ,बैइमानी ,घुसखोरी नहि केलनि।ओ सभ बाल बच्चा के कहने गेलखीन जे सत्यनिष्ठा पर रहै जायब।आइ ओ रहितथि त कतेक प्रसन्न रहितथि मुदा स्वर्गो सॅ अपन सफलता पर मुस्कराइत जरुर हेता। घनश्याम घनेरो बीहनिकथा आ 'घनेरो'क अवधारणा बीहनिकथा की छैक? एकर संबंध ककरा सँ छैक? एकर प्रारूप केहन होइछ? बस्स! एतबा जानि जाइ, एकटा नव विधाक जानकारी पूर्ण भ' जाइछ। 'बीहनि' शब्द सँ 51% लोक अनभिज्ञ छथि आ 'बीहैन' शब्द सँ 11%। अर्थात शब्द उच्चारणक असरि मष्तिष्क कोना करैत छैक तकर आकलन कयल जा सकैछ। मैथिलीमे शब्दक लिपिबद्ध आ उच्चारण सामान्यतः आम लोक केँ दुविधामे रखै छैक। जखन आम लोक एकरा पढबा लेल उत्सुकता देखबैछ, अपने मातृभाषा अपनहि क्लिष्टक अवधारणा सँ प्रताड़ित भ' जाइत छैक। तकर कारण अल्प पढ़ब आ मातृभाषा अछि तँ बाजि लैत छी वा मुंह सँ खसि पड़ैत अछि वा भुलचुकमे मैथिली शब्दक उच्चारण भ' जाइए, छैक। 'बीया वा बीज (seed)' केँ अधय्यन एकटा गूढ़ विषय थीक। एकर संबंध मातृत्व सँ सेहो छैक। खाहे मानव हो वा जीव-जंतु आ गाछ बिरिछ। जखन बीया केँ अनुकूल स्थान भेटै छैक तँ किछु सृजन करबा लेल अग्रसर होइत अछि। तखन होइत छैक स्फुटन। पेंपी... दू पतिया.. तखन एकरा कहैछ -'बीहनि'। आब बीहनिकथा पर अवलोकन करी तँ एकर स्वरूप अनमन एहने होबाक चाही। आमक आंठीमे लतामक पेंपी नहि हेतै तहिना जाहि कथामे एक्के कथ्यक बानगी जे स्वर मुखरित हो वैह बीहनिकथा कहौत। तैं आकार छोट हेतैक।बानगी मे100 सं 125क लगीच.निष्कर्षत: पौराणिक स्त्रोत्र जनरल कथाक परिष्कृत रूप वा कथाक लेटेस्ट वर्जन! एहि विधाकेँ जे भाषा अपनाओत तकर भविष्य दीर्घजीवी हेतैक। कारण सभमे ई गुण तुरत नहि होइछ जे अपन उत्कंठा केँ कागजपर उतारि सकय। हँ, तखन अपन उत्कंठाक मूल सिद्धांत केँ लिपिबद्ध क' साहित्यक भंडारण क' सकैत अछि। तकर फलाफली देखल जा सकैछ जे मैथिलीमे नव साहित्य सृजनकर्ताक उजाहि आएल छैक। लैह-लैहे गुलबिया -हे यै माँ! हम कोन साड़ी पहिरि उपनायनक हँकार पूर' जेबै? -इंजीनियरक बौह आ साड़ीए लेल बेलल्ल! पहिरु ने, जे अनुरधियाक बियाह राति छमकौने रही। ललहोन, छिछलौआ। केहन तँ ललितगर लगैत छल। -हूँ, कहकलकै जे! ओइ दिन तँ लोक सभ यैह साड़ीमे देखने छल, फेर वैह पहिरु? लोक लेल तँ ई पुरान भ' गेलै। जाथु ई अपने हँकार पूरि आबौथ। -अच्छे! आब' दियौ लाल बच्चा केँ, नहि एक गांठ साड़ी कीना क' रखबा देलहुँ तँ फेर... -ठिक्के यै माँ? -ठिक्के नहि तँ की? अहींक संस्कार सन ओकरो विचार होइक तखन ने? -से की यै माँ? -हमरा तँ हाथ-पैर हेरायल अछि जे लाल बच्चा ई नहि कहि दीए जे पुतौह तोहर पुरान भ' गेलौ, आब संगे रखबै तँ लोक की कहत! अभिलाष ठाकुर, लोहना पठशाला, झंझारपुर टकध्यान -- माँ आइ हमरा स्कुल जाइ के इक्च्छा नहिं अछि। -- बाबू तमसौता! जल्दी नहा सोना लिअ आ आइ दस टा टको देब स्कुल जाउ नेना! -- मास्टर सहैब जे पढ़बै छथि से हम बुझबे नै करइ छियै त' जाकऽ की लाभ॥ --- अप्पन पोखरि म'न अछि ? --- हाँ त से की ? --- बगुला टकध्यान लगेने रहैत छैक तखने ओकर पेटक अभिलाषा पूर होइ छै। तहिना अहूँ मास्टर सहैबक बात पर टकध्यान लगेबै त हमर अभिलाषा पूर हएत॥ अखिला नन्द झा 'रमण' चश्मा अन्हरोन साँझेमे जे सुलोचना लोटा लय बारी गेली,से घुरि आङन पायर नञि देली। रातिसँ प्रेम कान्त बाबू एहि खढ़होरिमे बेटी लेल किलहोरि काटि रहलाहै।यै सुलोचना छी यै......, बेटी......, यै सुल्लो.....। फलेरियासं असक पतिकेँ सत्यसँ सोझाँ होमय लेल पत्नी शनैः शनैः तैयार कय रहल छलीह। -- "आब एहिमे हमर बेटीक कोन दोष।एहि बोन झाँकुरमे दू चारि अधमलोक बलजोरी कय दौक तऽ असगर अबला अपनाकेँ कतेक बचाओत।" -- "एहन अर्रदर्र जुनि बाजू।क्यो नै किछु कयने हेतैक हमर बेटीसँ।" बाजय लेल प्रेमकान्त बाबू किछु बाजि दौथ,किन्तु हुनको अन्देसा ओहने अनिष्ट टा पर छैन्ह।कुन मुँह लय लोकक सोझाँ हेता।होइन्ह पृथ्वी फाटि जाय आ ओ ओहिमे समाधि लऽ लैथ।कोनो बिषधर पायरकेँ हबैकि लैन्ह।एक्को क्षण एहन अपजस जीवन जीअब मृत्युसं भारी छलैन्ह।ताबैत खढ़ोरि लग किछु बात सुगबुगेलै।लोक लपकल।जे देखलक सैह सन्न।प्रेम कान्तो बाबू दुहु बेकती ओतय एला। कोनो हिंसक जन्तु हुनक बेटीक लहासकें चिथड़ी कय देने छलैन्ह।से देखि हुनका जानमे जान एलैन्ह।ओत्तै कने हल्लुक भय, बेटीक वियोगमे कानय लगला। सबिता झा 'सोनी' सेहेन्ता / बेगरता फुलेसरि के दुतिव'र सँ विवाह भेलैक छल। जोगेसरा के पहिलुक कनियाँ विवाहक किछुए साल भेलैक बीमारी सँ स्वर्गसिधारि गेलैक..! फुलेसरीक टोलक नवविवाहित ननैद "मुनीतिया" बेसी काल भेंटघांट करय अबैत छलैक..हँसी ठहक्का..चौल दुनु मे होईतरहैत छलैक।एकदिन बेरूपहर मुनीतिया फुलेसरी लग एलैक ओकरा उदास देखि पुछलकै.. ~~भौजी भैया खूब मानै छथि ने'.. इन्द्रपुजा मेला खूब घुमौलनि फिरौलनि..ने' हँ ओ नबका सिनेमा सेहो देखौलनि ने..की' सभ खुऔलनि कने कहू ने...! ~~ बौआ छोड़ू ने ... ~~"यै भौजी' भैया त खूब शौखीनदार छथिन..पहिलुक भौजी के ल' क' बड्ड... ~~ फुलेसरी आँखिक कोर सँ टघरैत नोर पोछैत बाजलि.... "यै बौआ अहाँक पहिलुक भौजी छल "सेहेन्ता" आ हम..छी "बेगरता"...! पूनम झा "सुधा", फरीदाबाद सेल्फी ओमहर सँ.. हेलो - हेलो ...... एमहर सँ .. हेलो के ? हेलो ! मामी हम खुशी, हँ बौआ कहु? नानी आब अपना सबहक बिच नै रहलि। मामी यै मामी , नानी कोना हमरा सभकेँ छोड़ि कs चैलि गेलैय यै ।आब हम ककरा नानी कहबैक यैय, मामी । हमरा बड्ड कनाय यै मामी...... बौआ नै कानू आहाँ, नानी बीमार तs छलैथ ने। आ बुढापा सेहो आबि गेल छलन्हि।चुप रहू ........। ओमहर सँ खुशी ...कहलौं हं मामी हमरा एकटा नानी कें फोटो पठा दितौउ। तs हम कनी फेसबुक पर दैतियई। लेकिन बौआ यै नानी हमरा कहलैथ यै कनियाँ.. खुशी जे आयल छल से अपन मोबाइल सँ धाँयं-धाँयं अपन फोटो खिचै छल आ हम ओकरा लग ठाढ़ भs गेलियै त'कहलक, कनि कातs भs जाऊ ने हम सेल्फी लै छी । हमरा बड्ड दुख भेल ! बौआ नानी कहि गेलि हं जे हम मरब तs ओकरा ने एकोटा फोटो पठायब आ ने हमर काज में बजायब .। बौआ आहाँ नानी कें भोजभात में जरूर आयब । तखने सभगोटे सेल्फी लेब । मनोज मंडल मां नारी जीवन मातृत्व प्राप्त केला पछाति पूर्ण भ' जाएत अछि और कोनो नारीक लेल माँ बनव कोनो वरदानसँ कम नहि । अपार वेदनाक सहलावादो मातृत्व प्राप्त केला पछाति जे हर्ष नारी जाति अनुभव करैत छथि ई लीखब संभव नहि। ममता बहिनके ई सौभाग्य विआहक पंद्रहम बरख बितला पछाओ नहि भेटल रहैन जे प्रसवक वेदनासँ बेसी कष्टदायक रहै। ओना मन हिया हारि रहल रहैन मुदा आँखिक कोनो कोणमे मातृत्व ममत्व अखनो दुबकल रहबे करै । विद्यालय जेबा क्रममे अपन स्कूटि रोकने छली तखने एकटा बच्चा मैल झोल कपड़ा पहिरने ममता बहिन लग आबि माँ कहने रहै। ममता बहिन पहिल बेर अबोध बच्चाक मूँहे माँ शब्द सुनि सिहैर उठल छली । ममता बहिन ओहि बच्चाके हृदयसँ लगा लेने रही और आँखिसँ एना नोर गिरैत रहैन जे जन्म-जन्मान्तरसँ ई सुनबा लेल व्याकुल रहैथ। अखन ममता बहिनक ओ बेटा दीपक अपन कमायक अधिकांश हिस्सा गरीब बच्चाक पढाई लिखाई पर खर्च करैत अछि। ममता बहिन तृप्त लगै छथि। चंदना दत्त, रांटी मधुबनी प्रेम दिवस आयं यै प्रेमसुन्नरि, आय कथीके हुलिमालि छैक, धियापुता संग हमर पुतोहुओ बेहाल छथि घरवलासंगै फोटो परफोटो मबाईल पर लगबय लै? से नहि बुझलखिन्ह बहीन, ओ आब त नवका नवका जुगजम्मनाके नवका गप्प, ओ कीदुन कहय छै आई प्रेमदिवस छै, से जे जतेक प्रेम करय ककरो संगै तकर फोटो लगबय छै, नीक नीक समान दै छै, यै बहीन हमहुँ त हिनके जम्मनाके छी, तखन कनि धियापुता संगै टीवी मबाईल सं सीखि लैत छी, रामनगर वाली बजलीह. धौर जाऊ, ई फोटो खिचौने आ डार घुमा मोटरसाइकिल पर बैसि घुमने बेसी प्रेम भ जैत, बड्ड परेम तें एकटा सं दूटा बाल बच्चा होई छैन्ह परेम त हमरा सभके करैत छलाह भरि घर धियापुतासं भरल. वरदान हे सुनय छियै , आब अहां घरसं बाहर किन्नहुं नहि जायब , इ बजर खसौना सभकें लीलने जाय छै" " फुलपरासवाली हाकरोस करैत बजलीह। हम कहां कत्तहु निकसय छी बड़ जी हौरय अछि त अहाँसं एक दूबाजी लडि़ लैत छी ' जहियासं इ रोग बढल सबटा कारोबार भगवाने भरोसे , ताहि पर नित्तहु कतौने कत्तौसं खराप समाचार सुनायै जाइये। तखने हुनकर सभ दिना खबास बौका बाड़ी सं चारि टा भांटा आनि राखि देलक आ बैसिक' खैनी चुनबय लागल। ओह एतेक दिन बुझैत रहि बौकाकें कतेक कष्ट अछि ,ने किछु सुनय अछि ने बाजि पबैत अछि आइ बुझि पड़यैइ ओकरा वरदाने भेटल छैक. हां ,ठीके कहलहुं नेजाए ओ टोला ने सुनिइबोला. मोह “आइयो नहिं आयल दुनू भाय, कि विचार केलक नहिं जानि.” सोचैत पवित्री देवी जांतमे अरवा चाउर पीसय लगलीह. आंय यै काकी अहां अपने दुखित छी, आ इ कि करय बैसलौंह यै? बुझि पड़यै प्राण त्याग य लेल तैयार छी| रहिका वाली जे आय तीस वर्खसं काज धेने छन्हि से लौहछैत बाजि उठल, ओ रातिखन ज्वरसं तपैत काकीकें कहुना एकटा सोहारी संगे गोटी खुआ कय गेल छल , से भोरखन हुनका जांत पीसैत देखि छगुनता संगे तामस लहलहा गेलय ओकर. “नहि हमरा कि हैत गय रहिकावाली, तों जे रातिखन जांतिपीचि क गोटी खुआ देलैं से मोन हल्लुक लगैत छल दुनू भायक अबैया छैक ने तें कनि पीसय लगलहुं चिक्कस, बड्ड नीक लगय छैक दुनूकें , शहरमे कतय खाइत हैत कनि अललू कुम्हरौरीके तीम्मन क दिहय आ आमकके चटनी.” ठीके कहय छै, मायक जी गायसन आ पुतक कसायसन, जहियासं नौकरी आ बियाहदान भेलनि दुनू भायके खाली धानपान आ आमे लेबय आबय छथिन्ह अखन ऐहन दुखित छथिन्ह ई पढुआ कका दसदिनसं फोन पर फोन करय छथिन्ह से अखनधरि पलखति नहि भेलनि अछि. गय कि करबहि परान छुटि जायत त पुरखाक देहरि नहिने छुटत, ल जायत त महिना दु महिना लेल बांटि लेत तहिसं त नीके ने. कहैत आंखिक नोर आंचरक कोरसं पोछय लगलीह पवित्री देवी. रौद (बीहनि कथा) भोरूका इस्कुल सं झटकल घ'र घुरैत रहि। तखन मोन पडल माताजी कहने रहथि एकजोड लहठी नेने अबय लेल, भोरे नैहर जेबाक छलनि से मामी लेल हम सविता चुडी केन्द्र पर ठमकलहु। सविता माय नजरि नहि आयल ,तहियो घमायल रही से पंखा के हवा लगबय लगलहु। ता ओ हो हपसैत आयल। कतय छलौ यय, एकजोड लहठी दिय कनि दामी, बड कडगर रौद अछि आय। दीदी, आय गाडी ल'क नहि एल खिन्ह,भैया जी, कि कहियन्ह तगादा मे गेल छली। सौदा ले जाएत आ पाय दय घड़ी दाँत निपोरै लागत सब। आब हम कोनो धन्ना सेठ जी, जे तगादा नहि करू? हम ओकर दुख बुझलहु, गामघरमे दोकानदारी कोनो हंसी खेल नहि, मुदा छलय सबितियामाए बड उएहगर, छोटछिन दोकान आ सिलाई फराय से हो क लैत छल ,बचिया सबके सिलाई सीखेबो करैत छल। ओ चुडी देखबय लागल तातक एकेटा जनानी आबि गेल दोकान पर, 'हे अहां बलु सिलाई हमरा नहिये सीखा देलि जे किने से।' मोन त रौदायल छलै ओकर, लोहैछक' बाजल, हम ऐहेन काज करय छी, आय यय ,सबजे सीखिये लेत त हमर कसटम्मर के हैत? विन्देश्वर ठाकुर, धनुषा: नेपाल, प्रवास:दोहा/कतार घुस्सा-घुस्सी -जा! जा ई कि भेलै? कार्यक्रम बन्द भऽ गेलै! -हां भाइ! देखलहोग नइँं छौडासब दारु पी क' केना रंगदारी करै छलै? त बन्द नइँ भऽ जाउक...? - सएह त! ईसब केना करैछै सरस्वतीयो पूजा दिन क? -धु! नामके लेल करैछै विद्याक देवी शारदेके पूजा आ खाइछै सब दारु-तारी..लगबैछै अश्लील ड्रेस आ सुनैछै अश्लील गीत... -सच बात भाइ! ई बात एकोरत्ति नीक नइँ भेलै - नइँ त केना नीक भेलै! अच्छा! त दारुए पी' क लडाइ भेलैए हौ? - नइ हौ भाइ! दारु त एकटा बहन्ना छलै।असली झगडाक जरि छलै फुलेसरी.. मोहना कहै छलै हमरासंगे नाँच आ सोहना कहैछलै हमर छे.. हमरासंगे नाँच... तहीमे भऽ गेलैए खूबक' घुस्टा-घुस्टी... कुन्दन कर्ण, दिल्ली ( तारालाही) "आओर छिछियाउ" आइ लॉक डाउन के अठारहम दिन छै। सोहन बाबू के घरक लोक बड़ बुझबैत छलैन्ह जे सरकार जखन मना कय रहल अछि त' घरे में कियएक नइ रहैत छी.. मुदा सोहन बाबू सभदिन सँ अपने जुइते चलैत छलाह.. हुनका होइत छलैन्ह जे ककरो बात मानि लेबाक मतलब ओकरा सँ हारि गेलहुँ!! तेहन अहंकारी। कियो टोकैत छलैन्ह त' जवाब दैत छलखिन तोरा सबके अहिना रहैत छौ डरपोकहा सब!! घर पर बैस टीवी पर रामायण आ महाभारत सिरियल देखय में हुनका बुझाइत छलैन्ह जे ओ बिमारी सँ डरा गेलाह तैं भरि दिन बाहर छिछियाइत रहैत छलाह। अपने त' रामायण महाभारत नइ देखलाह मुदा आइ हुनका आंगन में "गरुड़ पुराण" के पाठ भय रहल छन्हि! सोनी नीलू झा अदनाबालीक आंगन झलफलाइत साँझ छलैक। डिबिया मे बेसी तेल नहि होबाक कारणे डिबिया सेहो लुकझुक करैत छलैक। अदनाबाली दिने सोहारी पका लैत अछि। बीजली बिल जमा नहि करबाक कारणे काटि देने छैक बिजली, कंपनि बला। चूल्हि लग कात मे सीलौट सेहो राखल छैक। अदनाबाली बेसी क' नोन मरचाइ आ अहगर क' आमक आचार ध' क' चटनी पीस रहल छैक। बौका बेटा घेंट पकरि झूलि रहल छैक अदनाबालीक पीठ पर। मुन्निया दौड़ल एलैक दलान दिस सँ आ मायकेँ कहलकै, गै बुढ़िया तोँ तँ हमरा सभकेँ कहैत छेँ जे खेड़हीक दालि,भात आ तीमन-तरुआ पाबनि दिन क' बनैत छैक, तँ लाल कक्का आंगन रोज्जे रोज्जे पबनी रहए छैक..? आ अपना आंगन....? विनीता ठाकुर, सोनीपत हरियाणा किसान रौ फेकुआ आई ई बुशर्ट पैंट आ बाबरी सिट केय फेर कतय के जतरा छै रौ ? बाबू बजलै। फेकुआ-हौ बाबू कते दिन रहबै गाम मे हमरा आउर के गुजर हेतै अहि खेती बाड़ी पर बाबू- एं रौ बिसैर गेलिह ओ दिन जखैन बँबई डिल्ली मे कि दन कहै छै कोरोना एलै त भूखले पेटे सभके ओहे हाकिम सभ भगेलकौ आउर लत्ते पत्ते पैरे भगलैं । तखन त शपथ खेलही आब घुरि कअ नहि एबै परदेश अपने गाम मे खेती करबै किसान कहेबई । एतबे दिन मे सभ बिसरा गेलौ एकरे कहै छै हेहर। फेकुआ - हौ बाबू तुहीं कहअ एते दिन सँ खेती करै छहअ तुं बदला मे कि भेटै छअ सभटा निमन धान चाउर बाहर जाईत छैक बिचौलिया सभटा नफा लैत छ आ तोरा सभके लागतो नहि भेटैत छ । रौ बौआ से त तों ठीके कहैत छैं सरकार त हमरा आउर के सुधिइयो नहि लैत छैक । जाय दही तहियो ओहि परदेश सं नीक छी । जेह नुन सोहारी भेटैये इज्जत के सँग खाई छी आ रहैत छी । विपत्ति मे त फेन अपने गाम काज देलकौ नहि जानि तोरा आउर के ई कोन परदेशक हवा लागि गेलऊ । डॉ प्रमोद कुमार, पांडिचेरी ढ़हलेल छी केहन ढ़हलेल छी ! स्नो पाउडर त’ जाय दियौ, साड़ी तक ने ढंग स पहिरय अबैत अछि अहां के ! कहां सऽ हमर कपार मे बथा गेलहुं अहां। निछ्छ छी ! जाउ बाबू केर सेवा टहल करियौन । बाबू के पाइये चहियनि ने ! ठीक छै । हम हुनका रुपैयाक ढ़ेर पर बैसा देबनि ! एतवा कहि मुनी जी घर सऽ निकलि गेलखिन। दरबज्जे पर सुतै छथिन आब। फूलमती के चौदहम चढ़ले रहनि कि सासुर बसऽ लगली। कचहा उमेर! पति-पत्निक ब्यवहार सं अनभिज्ञ! चौबिसो घंटा सब सं पुछि पुछि साड़ी पहिरवाक अभ्यास करय लगली। मास दर मास, बरख दर बरख बितलै। गाछी, बिरछी, खेत खरिहान सबठाम ओ साड़ी पहिरैत रहै छथिन आ पुछै छथिन, “ कहू त’! निक भेलै ने?” लाजो धाखक लेख नहिं छनि। जकरा नहिं बुझल छै ओ हंसि दैत छैक आ जकरा बुझल छै ओ मूरी गोंइत लैत छैक। पगला गेलखिन फूल सन फूलमती! इरा मल्लिक, रिलायंस ग्रीन्स टाउनशिप जामनगर,गुजरात बेटीक महिमा गै चनचनही! आब चुपो रहबें आ कि बजिते रहबें। बजिते बजिते एकरा बकासी नहिं लगै छै हे भगवान! बाजैत थाकबे नहिं करत।कियो एक रती किछ चिढका दैत छैक कि बस!!! भ जायत छै ई बिढ़नी।कहिया बुइध देथिन भगवान एकरा!बजैत,बड़बड़ाइत सोचैत नीरा परेशान छलैथ।हुनकर दूटा संतान में से बड़की इयैह बेटी नीतू छलीह।नीतू संओ एकटा छोट भाई छलखिन जे नीतू के खौंझा दैत छलखिन।नीरा अपने माथ झंटैत ,कोसैत घर में जा क बैसल एखनो भुनभुनाइत छली।सबटा तमाशा नीतू के दाय(दादी) देख रहल छलीह।दाय के अपन पुतहु नीरा के परेशानी बुझाइत छलैन।मुदा पोता- पोती के बाललीला सेहो बड्ड आनंदित करैन।आइ जखन नीरा के बेसी परेशान होएत देखलखिन तखन हुनकर सासु नीरा के कोठली में गेली।पुतहु के बड़ दुलार संओ माथ सहलाबैत कहलखीन ; नीरा एतेक परेशान नहिं होई।ई बच्चा सबके सहज प्रक्रिया छै।हम सब देखू आ ओहि में नीक बेजाए के ज्ञान करबियनु।बेटी के इयैह चनचनाहट,कलरव संओ घर में हर्ष,उल्लास ,उमंग के वातावरण रहैत छैक।ई बेटिये के महिमा अछि।जे एक संग दू -दू टा गृह में खुशी बरसाबैत अछि। आँखि संओ टप टप नोरक धार बहय लगलैन सासु पुतहु दुनु के! सत्येन्द्र कर्ण बनिया बाबा गोर- नार , पतरे- छितरे, लम्बा आ छुड़ी सन नाक देखय में बड्ड सुन्नर बनिया बाबा छलाह . एकटा पैघ जमींदार सुखदेव बाबूक कामति छलाह.सलाना तनख्वाह बारह मन धान भेटैत छलनि. एहि एबज में हुनक सब जमीन- जाल, बांस- काठ आ कलम- गाछी देखैत छलाह. टोल में जिनका ओहिठाम सत्यनारायण भगवान पूजा वा अष्टयाम होइत छल, ओतय आरती, चरणामृत आ चौरठ केयो देखा आ परैस लैत छलाह मुदा परसादी परसैक भार बनिया बाबा कें भेटैत छलनि. कारण एकटा पैघ छल जे बनिया बाबा परसादी चुटकी सं परसैत छलाह.परसादी सवा सेर हो वा अढ़ाइ सेर ओहिमे सभ कें बाटैत,उगारी तक दैत छलाह.इ विशिष्टता छल. बाबा कुमारे छलाह परञ्च सम्पूर्ण परिवारिक विकास हेतु सतत् प्रयत्नशील रहलाह.जवानी में कहियो किराना दोकान केने छलाह तैं बनिया नाम सं प्रसिद्ध भेलाह. जवाहर लाल कश्यप पहिल प्रेम : हम अहा सं प्रेम करै छी | : काहिया स ....? : जहिया रामलीला में रामक अभिनय करैत देखलहू ... : अहा हमरा स नहि राम स' प्रेम करै छी....आ राम त ककरो मन मोहि लेथिन्ह..... : हम अहा स ' प्रेम करै छी । : अगर प्रेम हमरा स होइत त ओहि दिन भ जाईत जहीया पाहिल बेर मंडली के खाना लेल समान मांगय गेल रही । बहुत अंतर अछी हमरा आ अहाके बीच , कियो राजकुमार होयत अहा लेल...... आई बीस बरख बादो हम निश्चय नहि क सकलहू हम्मर पहिल प्रेम ओ कलाकार छल आ की राम ...... जयंती कुमारी दू टा बीहनि कथा १.हीरा एं यौ नुनू बाबू.. बहिन त' फोटो सनक नै देखा परली..! देखासुनी के बाद राम बाबू कहला। बाबुजी...फोटो और सोझा मे किछु त' अन्तर हेबे करै छै। ओना ...बहिन हमर हीरा अछि..हीरा.. बुझलऊँ..पर हम त'आब सोच में ने परि गेलौ! बेटा के नान्हिये टा स गछने छी जे कनियाँ उज्जर गोर क देब !कोना क' हुनका मनेबनि ? ओह ! बाबूजी एना नै कहियौ! आब त ' कार्डो बँटा गेल छै , हलुआइया सभ केँ, बैना द' देने छिये! हमर बहिन बहुत गुनी अछि! नुनु बाबू परेशान भ' कह' लगला! अरे बाऊ.. परेशान जुनि होइ ! हम त' बस ई कह' चाहैत रही जे बहिन लय दुपहिया नै चारिपहियाक इंतजाम क' लेब! बस्स..... बात ई जे रौद बसात नै लागत त' हीराक रङ मंद नै परत। २.नीक लड़की चलू ! कतौ एकांत मे बैसी। राघव नेहा केँ कहलक ..। दूनू एक्कहिं ऑफिस में कार्य करैत रहय, पारिवारिक सहमति सँ बियाह सेहो तय रहै ,अगिला लगन मे भ जेतै। चलू.... हमहू.देखै छी, अहाँ कत्त ल' जाय चाहै छी... कहलक नेहा .... ई हमर मित्रक डेरा अछि.. अपने सब लय खाली अछि। नेहा.... आइ हम अहाँक सम्पूर्ण प्रेम कर चाहै छी, अहाँक आपत्ति त नै? नेहा.. ....मुदा आइ हमरा घर जल्दी जेबाक अछि और हे.. कनि दिनक बाद अहाँ करैत रहब सम्पूर्ण प्यार। के रोकत ... हा हा ... राघव .. ओ हो..नेहा! अहाँ साँचहूँ " नीक लड़की "छी... हम त' अहाँ क जाँच' लय ई सब कहलौ ! नेहा एक मिनट सोचि क' कहलक......अगर हम अहाँक प्रस्ताव मानि लितौं त' खराब ? हम त अहाँ केँ अपन मोने द' देने छी.. तनक समर्पण त' हमरा लय प्यारक प्रतिदान मात्र छै। .. राघव...हम नीक रही कि नै..अहाँ कथमपि नीक नै छी! आगा सँ सम्पर्क करै केर कोशिश नै करब! गुड बाय!! डा. शिव कुमार प्रसाद, सिमरा, झंझारपुर, मधुबनी ४ टा बीहनि कथा १.छौंक हे रौ हरिया, बड़ देखै छियौ दौड़ा- दौड़ी करैत! की बात छै रौ? यौ सरकार,बिन बाते तऽ आब कुकूरो ने भुकै छै,हम तऽ मनुखे छी। कोइ सखे दौड़ैत छैक,छौंक लगे छै तखने दौड़ैत छै! २.जनम रौ कोढिया जीबऽ देमे कि नहि? आब जी तैयो आ कि मर तैयो, हमरा कोनो फेरसँ जनमबाक अहि! ३.फर्मलिटी कनिया काकी की भेलैन? कनिया दिनक दोष! कनेक चोट लागि गेल। बड़ दिक्कत भऽ गेलैन। अच्छा की करथिन,ठीक भऽ जेतैन। बेटो देखऽ अबितैन,मुदा भिनसरो गेट बन्दे रहैत छनि आ रातिओकें जखैन अबैत छैन ताबत ई सभ सुति रहैत छथिन। हँ यै कनिया, से तऽ ठीके कहैत छी।एहि जाड़-ठाढ़मे भोरे भोर एहि हालैतमे हमरा सँ एतेक सिरही चैढ़-उतैर कोना गेट खोलल हएत। बौआ सभकें पलखैत नहि छैन तऽ की करबै!काम मे बाँझल रहैत छथि। कतहु रहैथ,आनन्द रहैथ। अच्छा काकी आब जाय छियैन। जाउ,चाहो पियैतौं कि पिबतौं सेहो के बनौत?अबैत रहब। आब बड़ अबेर भऽ गेलै।अखन जाय छियैन। गोर लगै छियैन। सोहागवती रहू! ४.बहीर बाबा,बाबा यौ? की यौ,कहू ने! हमर नानी साफ बहीर छै! कैल्ह अहाँ फौन करियै,फेर करियै,नानी लग फौन राखल आ ओ उठेबे ने करथिन तऽ अन्त मे हम उठेलयै तऽ अहीं फौन करैत रहियै। पुछलयै नानी,तों फोन किएकने उठबै छलही? बहीर छही? कहलकै हँ रौ जेहने तोहर बाबा बतपदौन तेहने तों! हम तऽ साफ बहीर छी। नानी बहीर छै ने? विद्या चन्द्र झा "बमबम", शोधार्थी (पटना विश्वविद्यालय ) साहित्य मंथन आ बीहनि कथा बीहनि कथा'क मादे जखन कखनहु हम सोचैत रही तखन एकटा भिन्ने प्रकारक सूगबुगाहट जकाँ हमरा मोन मे होइत रहैत छल । भिन्न -भिन्न कथाकार लोकनिक बीहनि कथा पहिने पत्र-पत्रिका सभ मे पछाति सोशल मीडिया पर सहो अभर' लागल जकरा हम ओहि समय मेँ एकटा पाठकक रुपे पढ़ैत रही । से हमरा बीहनि कथा खूब रूचैत छल परंच पचैत नै छल । अपना सभ ओतए कहबी छै "जूरब,रूचब आ पचब इ तीनू बड्ड भागे बला'क होए छै" । से जूरै आ रूचै त' छल परंच पचैत नै छल , तेँ इ कहब जे ओकर कथानक खराब रहैत छलै तांय आकि विधिपूर्वक तैयार नै कएल गेल छलै अथवा अधखिच्चू रहैत छलै तांय नै पचैत छल सेहो बात नै छलै । एहिमे बात इ छलै जे जखन कखनहु हम बीहनि कथा पढ़ैत रही तखन हमर मोन - मस्तिष्क मे एकटा प्रश्न ठाड़ भ' जाइत छल जे इ कथा साहित्य मे इ बीहनि कत' सँ आबि गेलै ? बीहनि त' किसानक घर आ माटिक तर रहैत छलै परंच इ साहित्यक नगर केँ कोना धकिया लेलकै ? फेर कहिएक जे छोर ने हमरा कोन मतलब अछि, कोनो कथा रहै त' हमरा एकर रसास्वादन सँ मतलब अछि । परंच बीहनि केँ जनबाक उत्कंठा आ जिज्ञासा हिए बीच औँड़ मारए लगए । हम अपन जिज्ञासाक शांति हेतु बीहनिक अन्वेषण प्रारंभ केलहुं, काल क्रमे जखन विभिन्न प्रकारक बीहनि केँ अबलोकन कएलौ आ तकर उत्तर पौलौं जे इ साहित्यकारक घरक आ पोथी परक बीहनि थिक । जहिना साहित्य मे आन-आन विधा सभक उतपत्ति समयक प्रभाव मे आवि केँ भेल ठीक ओहिना मैथिली मे बीहनि कथा केँ सेहो भेल । हँ एहि मे तत्कालीन बीहनि कथाकार लोकनि कनेक सतर्कता अवस्य देखौलनि समयक परिदृश्य बदलै सँ पहिने यानी अन्हार होइ सँ पहिने सूर्यक रूख देखि पहिल साँझक पूर्व समूचित प्रकाशक बेबस्था क' लेलनि, पाठक मूड बदलै सँ पहिनहि बीहनि कथा केँ स्थापित कए देलनि । ओ सभ युगद्रष्टा युगपुरुष छलाहल जे समयक मूव'क भान केलाह , जे अबै बला समय भाग-दौड़ सँ भरल होइ बला छैक जाहि मे लोक लग समयक घोर अभाव रहतैक परंच एहनो स्थिति मे ओकरा साहित्यक बुस्टर भेटैत रहौक ताहि हेतु बीहनि बनौलनि । लोक सभ ( साहित्य पाठक वर्ग ) अपन मनोरंजक/ज्ञान/आत्मतृप्ताक हेतु भविष्य मे महाकाव्य ओ उपन्यासे सदृश्य कथा केँ सेहो अपेक्षाकृत कम पसिन करत । कविता दिस पुनि पाठक केँ मोरब आर कठिनाह अछि , किआक त' कविता सँ ओही दिन लोकक मोह भंग भ' गेलै जाहि दिन काव्य सँ रस ,अलंकार आ छंदक अंतिम संस्कार भए गेलैक । मात्र एकोदिष्ट साले-साले होइत छै सेहो बेसी दिन धरि नहिए हेतैक जे - - - -। तखन त' एहन स्थिति मे मात्र एकहि टा ठोस विक्लप सोंझा एलै बीहनि कथा जे अमृतस्यपुत्र साबित भेल । जहिना सागरक मंथनक उपरांत अमृत-कलश बहराएल तहिना साहित्य मंथनक पश्चात बीहनि कथा बहराएल । अमृतकलश देवता लोकनि केँ राक्षस सँ रक्षार्थ हेतु आ बीहनि कथा साहित्यक भस्मासुर सँ साहित्यक रक्षार्थ हेतु साहित्यकार के हस्त गत भेल । बीहनि कथा आखिरकार बीहनि कथा किआक ? एकर पाछू विभिन्न साहित्यिक लोकक भिन्न विचार भए सकैत अछि । परंच हमरा अन्वेषण मेँ जे भेटल ओ एना अछि :- मैथिलीक लोक भाषा परम्परा मे 'बीहनि' शब्दक प्रयोग 'बीया' हिन्दीक 'बीज' आ अंग्रेजीक 'सीड'क लेल होइत रहल अछि । जहिना एकटा बीया सँ परिपूर्ण फलदार वृक्षक निर्माण समय काल परिस्थितिक अनुसार संभव होइत अछि, ठीक ओहिना साहित्य मे 'बीहनि कथा' भेल जाहि सँ पाठकक हृदय मे पाठकक भावानुकूल भावोत्तेजनाक उत्पत्ति होइत अछि आ पाठक केँ हृदय मे बीहनि अंकुरित भए कला'क स्वनिर्मित विधानक अनुसार निर्मित होइत अछि, परंच इ निर्माण परम्परा द्वारा स्वीकृत विधान आ अभिप्रायक अनुसारे होइत अछि । जे अविश्वसनीय रहितो विश्वसनीय होइत अछि । पाठक क्षण भरि मे सम्पूर्ण घटना केँ जीव लैत अछि। जाहि मे ने समय केँ वर्बादी होइत छैक आ ने विचार-विनमयक । अधलाह बस्तु ~ हल्लो ! के ओझहा ? ~ हं हं कहौथ । ~ की कहबनि ? डागदर - - - । ~ की कहलकै डाॅक्टर - - ? प्रिया ठीक त' छनि ने ? ~ हं ओ ठीके छै मुदा , अहु बेर अधलाहे बौस्त छै अल्टासन मेँ, से हम त कहबनि जे सफइया - - - - ~ जे बजलथि से बजलथि फेर एहन गप बजबो नहि करियथि , इ हमर साउस छथि ततबी टा लेल नै त' - - - - ~ हले गै पिरीया बुझबहुन तूं अपने कने ( बेटी केँ हाथ मे फोन दैत ) । माँ ठीके त' कहैत अछि । इ अंतिमे बेर अछि - - - ~ एकर मने की हम अपने सँ अपन संतान केँ - - - नै नै किन्नहु नै । की हम सभ जानवरो सँ खतम छी ? ओहो अपन बच्चा केँ - - - ~ लेकिन हम अबाॅर्शन करबै के सोचि लेने छी । ~ तखन अहूं हमरा लेल अधलाहे बस्तु बुझू अपनाकें । भावना मिश्रा, नई दिल्ली। गरीब लोक डेकची 1 घंटा सं चुल्ही पर चढल अछि,मुदा एखन धरि भात नहि बनल अछि। बौआ बजलाह -- " माँ ,माँ खाएक दे ना, 1 बजैत अछि बड़ भूख लागल अछि।कतेक देर से भात बनि रहल अछि,आबि बनि गेल हेतो।" रीतिया बजलीह -- "कनि देर थम ... कनि आर समय लागतै भात बनै मे।" एतबा मे बौआ भूख सँ हाक मारि के कानय लागल,माँ के आँखि सं नोर झड़य लागल। सोचय लगलीह -- ई बेरि कोराना के कारण सब किछ बंद छल आ समय पर खेत बाउग नहि भेल। बाढ़ि के कारण जेँ भी फसल भेल,सब तहस- नहस भए गेल।कोरोना के द्वारा रीतिया के बाप के घर बैठे पड़ल आ मजदूरी भी नहि मिलल । कुनू विधि से 10% ब्याज पर उधार लौ के खेत बाउग करलक रीतिया के बाप,आब करजा कैना चुकाएत? दोकान बला से हो बेहाल बन्न क' देलक.एतबा मे बौआ तामस सं चुल्ही पर चढल डेकची के लात लगा देलक.... डेकची निचा खसि पड़ल.. आ ई कि ? भात तेँ अछि नहि ई मे तेँ छुछे पानि अछि .... पेटकुनियां द' देलक! अमर कान्त लाल, रघुनन्दनपुर/ खड़ौआ, मधुबनी, बिहार 7091529 उघार (बीहनि कथा) -अजय , कनियाँ के कहुन माथ पर नुआ ल लेथुन, -कतेक गर्मी छै माँ रहs दही ने। - गर्मी छै तऽ की भऽ गेले ? लोक नङ्गटे रहते ! - नङ्गटे कहां छै माँ,कपड़ा तऽ पहिरनहि छै ! - माँ,की भेलेन्हि? कनियाँ माथ पर नुआ ल' घोघ काढैत बजलीह - की कहू कनियाँ ? अहाँ तऽ बहुत बात बुझियो जाय छिएक, ई अजैया किछु बूझैये नै चाहै छै , लोको लाज किछु छै की नहि? देखियौ तऽ रामदीरी वाली पुतौहु के ! कखनहुँ, "मुँह उघार भेटत"? तावत केओ घौल केलक जे रामदीरी वाली के पुतौहु "चौकीदरवा" संगे फ़रार भऽ गेले । उघार माथ उघार चरित्र पर मुस्की मारलक| अमल कुमार झा, पाही, सरिसब – पाही, मधुबनी, बिहार, पिन - ८४७४२४ हिरो बाबू ई देखू। अरे वाह! ई तऽ बड सुन्दर चित्र अंकित कएलहु अछि! केकर चित्र बनेलहु अछि? अपन हिरो के!! अहाँ के हिरो के अछि? अहाँ हद्द करैत छी!! बेटी के हिरो ओकर पिता होइत अछि से अहाँ के नहि बुझल अछि? नहि।हमरा नहि बुझल अछि ।हम तऽ बड साधारण लोक छी। से अहाँ बुझैत छी। अहाँ के बेटी अहाँ के हिरो बुझैत अछि। ओ अहाँ सन बनए चाहैत अछि । ढुनढून! की ई हमर चित्र छी? हँ! बाबू! अहाँ हमर हिरो छी! हमरा अहाँ जकाँ सभक आशीर्वाद चाही।हमरा अहाँ जकाँ खूब पढबाक अछि। अरे वाह!ढुनढून अहाँ मोन गद गद कऽ देलहु। गुरुजन के आशीर्वाद से अहाँ अवश्य विदुषी बनब। प्रभात कुमार कर्ण प्रकृतिक तांडव हैलो ---! हैलो -----!! आस्था छैं---हेलो ---!आस्था फोन उठवैत कहैय छथीह ---"गोर लागैय छियौ श्रृष्टि दीदी" ---! श्रृष्टि -खुश रह --! देख तोहर पाहून प्रकृति आई फेर धर मे तांडव कय रहल छथुन ---! आस्था--गे --तोरो धिया पुता सब तs उडण्डे छोउक , मंदिर कहियो-कदाल आवैय छौक मुदा अप्पन सेल्फी लs भागि जेतौ तय एको बेर उपरको मन सँ प्रणाम नहि करैय छोक । श्रृष्टि--सांचे कहि रहल छै--मुदा , अखन ई सब ग़प्प छोड़ , पहिने अप्पन पाहून प्रकृति केँ तांडव शांत करs ! आस्था---हुनका फोन दिहिन -- ,हेलो --! हेलो-- ! पाहूना गोर लागैय छी ! प्रकृति --खुश रहूँ , कहु सब नीके ! आस्था- हअ ---, एकटा ग़प्प पुछैय छी--,अहाँ अपने घर मे अपने धियापुता संग किआक तांडव कय रहल छी ? प्रकृति -इयै , साँस,इजोत, अन्न,पानि सब के सब हमर खून जेना चूसि रहल अछि आ हमरे ढाहैय अछि ,तोड़ैय अछि , अंग -अंग कटैय अछि । अहाँ स्वयं कहूँ जे हमर जड़ल आत्माक कुहेश किआक नइ आफैद बनि झहरतै ! डाॅ.प्रमोद झा "गोकुल", ग्राम पोस्ट दीप (पश्चिम), भाया-झंझारपुर (R.S), जिला-मधुनी विहार(मिथिला) २ टा बीहनि कथा १.सुपक गोपी कागत केर खेतक आड़ि पर कलमक लागैन पकरने ठाढ़ रही ।समय अपन वेग सं ससरल जा रहल छल ,आ हम बीहैन तथा गाछक बीच मे बेवस भेल जा रहल छलहुं । एकाएक विपुल फलक भार सं अवनत आमक गाछ दिस दृष्टि गेल, ते जेना ओत्तै ठमकि के रहि गेल । चकमक गोटगर बोनैल आम ऊपर ,आ आवरण पात भीतर ।प्रकृतिक सुंदर परिहास मोन के गुद गुदा के राखि देलक । तखने धब्ब केर शब्द सं मोन चौंकि उठल ।देखै छी ठनक जमीनक चोट सं सुपक गोपी आम छहोछित भेल बिहुंसि रहल अछि । जेना ओ कहि रहल हो -आउ !हमर छाती सं बलबलैत माधुर्य रस चूसि के हमरा सनाथ कय दिय, आ अपनो सुखद अनुभूतिक संग तृप्त भय जाउ !! मोन हुलसि उठल आ नयन हिलसि गेल ,परोपकारी फलक निस्वार्थ प्रेम देखि । २.अनुराग अधरतिया मे मेघ घटाटोप क' के एलै आ झमाझम वर्ष' लगलै ।रहि रहि के बिजलोकाक चमक पर जोर जोर से तड़कन एसगरि सूतलि सुखेत वालीक हृदय मे कपकपी भैर देलकै ।ओ जोर से घिघियैत बाजलि --- कत' गेलै ?अबौ ने ! हमरा एसगर आइ बड्ड डर होइये !! ओसरा पर मशहरी तर मे सूतल पंचम करोट बदलैत बाजल - बलौ के डर करै छै !हौलमानजी के नाम ल' बम्मा करोटे सूति रहौ !!! - नै••• ई घरे अबौ ! एकरा बिना निन्न आइ नै हेतै !! - एते औनराग आइ कत' से चैल एलैये ? -से ई जे कैह लौ ! हैया हम बिलैया खोइल देलियै !!! केवार खुजैक चरमराहट भरल आवाज सुनि पंचम मुस्कियैत घर गेल आ पुन: बिलैया लगबैक खट सन आवाजक संग नि:शब्द भय गेल आ बाहर ओहिना वर्षाक संग मेघ तड़ैकते रहलै । निवेदिता झा, दिल्ली दू टा बीहनि कथा १.मुंहबजना विवाह चारि दिन पहिनें भेल छलैन ,गीता मोन में सोचैत रहथि मिला जुलाके नीके स्वभाव छनि हिनक ,बेकारे डरायत रहि कि केहेन भेटता ,सोचैत लाल भ गेलैन गीताक मुखारविंद , काल्हि चतुर्थी में किछ उपहार सेहो भेटत ,सखी सब हँसैत रहथि मिली जुलीके कतऽ छी गीता धडफडा गेली ,आँचर माथ पर रखैत ई कि छैक अहाँ हमर एको टा कपड़ा नहि धोलहुँ ,अटैची उल्टा देलखिन नवका ओझा ,ई सब नहि चलत हमरा घर में अहाँ चारि दिनसँ एके कपडा पहिरने छी ,फेर हम अटैची के कोना खोलितौं ....ई शब्द कतौ कँपैत रहि गेल.... चतुर्थी के मुँह बजना भेट गेल छलैन २.स्टेण्डर्ड विवाहक साँठ खुलल ,बहुत रास साड़ी , देखय वला सब बहुत प्रसन्न भेलखिन मुदा घरक लोकक मोन झामरि पडि गेलैन किया त ओ सब साडी वर प़क्ष लौटा देने रहथि जे सब कन्यापक्ष खानपीन में पठौने रहथि एतेक पाई कोडी लेलाक अहेन कृत्य माँ अहाँ मोन छोट नहि करू निर्मला बजलीह पिताक माथक कर्ज हुनका ज्ञात छलैन चारिम दिने द्विरागमन भ गेलैन सांठके दुसैत सब ननदि मुँह बनब लगलि भोरे भोर ननदि ऐली ,भौजी चिकन नुआ पहिरब बहुत लोग देखैय लेल आओत नवकी कनिया के दाय अहि कहू हम कि पहिरि ? ई ‘ नुआ ‘ जा दाय अहि नुआ के त अहाँ सब लौटेने रहिए कि अहाँ सभक स्टैंडर के नहि अछि ओम चौधरी, दिल्ली सुरज माटि-कादो गिजैत छल माँ सोर पारलखिन बउआ बरखा मे कि कादो गिजै छि। आबी जाउ नए त मोन खराब भ जैत। सुरज - माँ बरखा स माटि गिल भ कादो बनि गेल हम आमक गाछ रोपि रहल छि जे पैघ भेला पर माटिकें सब दिन रखबारी करैत रहै । हाँ स्त्रिगणो त माँ होइत छथि मुदा सब पुत कहाँ गाछ बनि ठाढ़ रहैत अछि जीवनकें सम्मानित रखबा हेतु. कल्पना झा, पटना २ टा बीहनि कथा १.नबका धोती आइ ओंकारनाथ ठाकुर ततेक उत्साहितछलथि जे पहर रातिये निन्न टूटि गेलन्हि,बेटा आलोक सूति कऽ उठितथिन ताहि सँ पहिनहि स्नान ध्यान कऽ कुर्ता धोती पहिरि तैयार भऽ गेल छलथि।जाहि दिन सँ पद्म श्रीक लेल नामक घोषणा भेलैक तहिये सँ एहि दिनक प्रतीक्षा छलन्हि।परसूए पटना सँ दिल्ली आबि गेल छलथि बेटा ल'ग । -------हौ आलोक जल्दी करऽ हम तैयार छी , राष्ट्रपति भवन पहुँचहु मे तऽ दू घंटा लागि जेतऽ ? --------कतेक हड़बड़ाइत छी बाबूजी ,दू घंटा नहि लागत एक डेढ़ घंटा मे पहुँच जाएब ,अहाँ तैयार छियै ? एहिना जेबै ? धोती तऽ बड़ पुरान लागैत अछि ,थम्हू हम अपन बला नबका धोती आनैत छी। --------धुर्र रहऽ ने दहक ,कोनो हमरा धोती पर पुरस्कार भेटि रहल अछि,धोतीए पर भेटितइ तखन तऽ तोरे ने भेटितऽ ..........आलोक के एहि बातक कोनो जवाब नहि फुरएलन्हि । २.हेराइत बोली "हैलो.... हँ..काकी गोड़ लागैत छी...... कोना मोन पड़लहुँ आइ हम ? " "नहि,बस ओहिना मोन पड़ल जे अहाँ छठि करैत छी , त' सोचल हाल चाल पूछि लैत छी, कोना की ओरिआओन भ' रहल अछि, आइ त' " नहाय खाय " होएत ने ? " "की काकी.....अहाँ सभ दिन पटनामे रहैत रहैत ई कोन बोली बाजए लगलहुँ ,अपना मिथिला मे "नहाय खाय" कहियासँ होमए लागल "नहाय खाय" नहि अरबा अरबाइन कहियौ , हँ....आइ अरबा अरबाइन अछि । अपना मिथिलाक लोक त' बारहो मास छत्तीसो दिन नहाइए क' खाइत छथि ।" भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश' संजय केर अॅंइख -धृतराष्ट्र बियाकुल छथि युद्ध भूमि केर हाल जानैक लेल। -तखन संजय पान बिड़ि केर लेल पानक गुमटी पर चलि गेल। -अएल त' धृतराष्ट्र खिसियाइत कनअ चैल जाय छी अहां पता नै आय कोन बेटाक नम्बर अछि। - कनि लगाबू तऽ दिव्य दृष्टि आ सुनाबू अहां युद्ध भूमि केर हाल! -संजय एखन महाबली भीम केर रथ दुशासन केर ओर बढि रहल अछि। -उत्सुकता मे आर किछ नया ताजा आय कत्ते सैनिक मरल। - संजय महाराज आय तऽ युद्ध भूमि मे उड़ि रहल धूल मे किछ नै दिखाय य' आ भनभनायल चौसर खेलैत घड़ी आ द्रोपदी केर इज्जत दाव पर छल तऽ कंठ नै फूटल तै ऊपर से भीष्म पितामह सेहो अॅंइख मुनले छल। - धृतराष्ट्र संजय जी किछ नै बूझलौं कनि ठीक सं देख केर बाजू। -संजय महाराज हमरा एखन संख केर ध्वनि सुनाय देलक सुर्य आस्त भ' गेल मुंह बला पान थुइक देलक। - अन्हरा तहिनअ निरवंश भ' जैबैं। जगतरंजन झा बीहनि कथा ~मालिक यौ एगो बात बुझलिऐ अमेरिका में जो बाइडेन नवका राष्ट्रपति बनलै ! ~ ऐं रौउ ढेनमा तोरा कहियो गांव सँ दरिभङ्गो जाय केँ जरूरी नय परलौ तँ अमेरिका के राष्ट्रपति कियो बनले से बुझि कऽ तौं की करबही ? ~ यौ मालिक आखिर छी तँ हमहूँ मैथिल नैं? आ सबदिन ब्राह्मणे लग रहलहुं, भरि दिन टीवी देखू समाचार बुझू आ चौक पर चोपैत कऽ गप्प दियौ, लोक बुझत बड्ड काविल छय! ~ ढेनमा चौक पर गप्प देनहार सबहक बपौती कोठी खाली होय दहि तहन पमौजी घोसरतै तौं एही सभमें नय पर अपन हाल रोजगार में लागल रह ! ~ हां हां मालिक से हम बुझय छी तहन ने जीवन भरि अहाँके चाकरी केलहुँ !! शेफालिका वर्मा, A 103, सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट्स, डॉ मुखर्जी नगर, दिल्ली 110009. हँ एहनो होयत छैक सासु पुतहुक ताना तानी सं परेश हरदम तनाव में रहैत छल। . घर मे कोनो काज मे गड़बड़ तँ मायक माथे , नीक काजक श्रेय रीना अपना पर। माय दुखी त' रहिते छलीह परञ्च मौन मूक बेसी रह लगलीह। रीना अपन नैहर में अपन माय के जे देखने छलीह से हुनको बाल मन में सासुरक रूप एहने बसल छल। एकटा बात सुनैत छी ?----पतिक प्रेमपूर्ण स्वर सुनि --बाजू ने की कहैत छी! चाह बना रहल छी! माय मंदिर गेल छलीह --चाहक दुनू कप ल' रीना डाइनिंग टेबुल पर बैसैत कहू की कहै छी! अपना सभ ब्याह मे अग्निक सोझा किरिया खेने छलौं -- अपना सब एक दोसराक सुख दुःख में संग रहब , एक दोसराक सहगामिनी रहब ! ---हं हं हमरा मन अछि --से अचक्के अहाँक किएक मन पड़ल ? हम सोचैत छी जे हम कतेको ठाम चुकि जायत छी --अहाँ जाहि ढंग सं हमर माय सं गप्प करैत छी , ओहिना त' हमरो अहाँक माय सं गप्प करवाक चाही -- --की एहनो होयत छैक --परेश ओकर कान्ह दबवैत बाजल ---हं रीना एहनो होयत छैक ,,,,, प्रभाष अकिंचन भरोस एकटा झुनकूट वृद्ध बाप धड़फराएल हुलसि क' एटीएम में घुसलाह. एटीएम कार्ड बेर-बेर मशीन में घुसबैत आ निकालैत बड़बड़ाईत बजलाह.... ऐहन भइये नहिं सकैत छै.... ... कहीं एटीएम कार्ड त' नहिं खराप भ' गेलै... फेर कार्ड के बेर-बेर पोछैत आ मशीन में लगाबैत..... वृद्ध पसीने पसीने त'र-बतर आ परेशान होइत फुसफुसाइत... ऐहन त' भइये नहिं सकैत छै.... बगल में बैसल गार्ड पुछि उठल... की भेल बाबा... वृद्ध बजलाह... हो बेटा कहने रहय दवाई लेल पैसा पठा देब...एक हफ्ता स' रोज एटीएम में अबै छी... आई पूछलियै त' कहलक आई निश्चित पठा देब... हमर बेटा ऐहन नहिं अछि.. कहलक त' जरूर पठौने होयत... गार्ड बाजल... पाई नहिं पठौने होयत... मशीन ठीक छै... खाता में पाई रहत तखने न निकलत ... जाऊ बाबा घर जाऊ... वृद्ध कल्पैत बाहर निकललाह... पता नहिं की भेलै... आब की हेतई... एक हफ्ता स' दवाई छुटल अछि... बजैत बजैत दम्म फुलय लगलन्हि.... मुन्नी कामत दू टा बीहनि कथा १.सिया -माय गे एक दिन तोरा हम चान पँ ल' जेबौ... - हँ.. हँ... आय बड़ स्नेह झड़ै छै बाज की चाही.....? - माय गे हम सेना मे भर्ती लेल एनडीए के फार्म भरए चाहिए चियैय तू बाबू के कहीं न..... ( सिया के बात बिंदेसर सुनैत गदगद मन सँ बाजल) - सिया तू अपन पढ़ाई सँ समाज में हमर प्रतिष्ठा ऊँच केलअं .... हम अहाँक अहिं सपना के पैंख देव... २.दरेग - कक्का ई ककरा बियैह आनलहक.... न पैर सँ चट्टी उतरैं छै आ न कोड़ा स' बेटी.... हूं.... अकरो पोसअ आ अकर बेटियों क'... ( सिलिया दोती बियाहल जोड़ी के देख तनतनैत बाजल) - गे सिलिया ऐना किया जहर बोकरै छ', बेचारी के घाव अखन ताजा छै किया खोरचै छ'....? तोहर चाची के मुईला कि हम बउआ के छोइर दोसर बियाह करी.... नै न...! त' फेर ई कोना अपन बेटी के छोड़थिन.... अपन मनक भाप ठंडा कर आ हिन्द चाचीये जेका आदर- सम्मान कर। शंकर के बात सुईन फुलिया के दुनू आँईख सँ लोड़ टघैर गेल.... मिसिदा ट्राय एगेन लैटर गयाराम भाईजी हेडमास्टर छलैथ. पौरकां सोनगढ़ इस्कूल सँ रिटायर भेल छलाह. कहवी छै बूढ़ बरद आओर बूढ़ मनुख केर कोन सम्मान ? ओ भौजी लेल,एगो नवका एंड्रॉयड मोबाइल कीन देलैन. एकबेर गयाराम भाईजी केँ मेरठ जाय पड़लैन्ह. इएह बीच कोरोना कारण लाकडाऊन भ' गेलै, हुनका मेरठ मे रह' पड़ि गेलैन्ह. भौजी, भाईजी केँ फोन केलखिन. गयाराम भाईजी, मोबाइल पर बात करैत बजलाह, "....बांकी सब त' ठीक अछि, लाकडाऊन छै, घ'रे मे रहब....हाँ, मोबाइल नीक जकाँ राखब...." "ऐंह, वैह त' हमर सहारा अछि, फेसबुक पर हमर साढ़े चारि सै सँ उपर दोस बनि गेलै.... जनै छियै, यू-ट्यूब पर नीक-नीक चीज बनौनाय सीख रहल छी....?" भौजी जबाव देलखिन्ह. "सैह कहैत छी, खसि पड़त तखन.... फेसबुक पर जँ केओ आनलाईन नहि देखत त' बूझि जेतै जे एहि कोरोना मे अहाँ....." तखनहि झनाक सँ किछु पटक' केर आवाज एलैन्ह मोबाइल बाज' लागल, "मोबाइल सब्सक्राइबर इज आउट आफ कवरेज एरिया ट्राय एगेन लैटर....." मृणाल आशुतोष आंदोलन 'यौ कक्का, खा लिअ न!" आवाज सुनि के खेतमे हर चलबैत गनेशी हड़बड़ा गेल। ई त मनीषबा के आवाज़ लगैत छै। मुदा ओ एत कथि लेल एतय। मुड़ी के देखलक त सच मे मनिषे छल। "रौ, तौं एत कथि लेल आबि गेलें। पेट काटिके इहे लेल टोन भेजने छलखुन बड़का भइया।" "नय यौ कक्का। मन भेल कि इहे बहाने अपन खेत देख लेब।" "आबि ई अप्पन खेत रखल कहाँ?" "ई कौन बात कहलिये यौ?" "पिछला साल रानीके बियाह मे एकरा बेचअ पड़ल। मालिक नीक आदमी छतिन्ह। बटैया करबाक लेल हमरे द देलाह।" "ओह्ह।सरकार अहाँ सभक कीछ मदद नय करैत छी की?" "हाँ, कीछ मदद त अवैत छै। ओत सँ एक टका अवैत छै तो हाथ मे चारिओ आना नय मिलल।" "अहाँ किसान सब मिलिके आंदोलन किया न करैत अछी?" "आन्दोलन करबाक लेल पेट भरल भेनाय जरूरी छै न। अहिं बताऊ। आब हम आंदोलन करी कि घर-परिवार के पेट भरि। ज्ञानवर्द्धन कंठ बीहनि कथा- फैदाबला बिजनेस -"बाबा!हमर सेठजी केँ कनी बुझबियौन्ह ने।ओतेक बेमार छथिन आ कंजूसीसँ इलाजे नहि करबै छथिन।" -"बेटा सभ किएक नहि बुझबै छनि?" -"एह,बुझबै कोना नहि छनि?मुदा ई ओकरे सभकेँ बुझाब' लगैत छथिन।की कहलखिन से बुझलियैक?" -"की?" -"पहिने पुछलखिन जे जँ हम मरि जेबौह त' कतेक खरचा हेतौह? किरिया-करम शार्टकटमे क' लीह'।डोम-लकड़ी-अगरम-बगरम जोड़ि क' पाँच ने दस हजार।की?हुंडा सराध क' लीह'।पाँच हजार।एगारह जन ल' क' निमहि जाइ जैह'।हे पाँच हजार आर राखह।जोड़ह।कतेक भेलौह?बीस हजार।बस बमभोला! आ किंसाइत इलाज कराब' चलि गेलहुँ,तखन हिसाब लगाबह।डाक्टरक फीस पाँच सय अगाउ धरा लेतौह।खून-पेशाब-पैखाना-एक्स रे,अल्ट्रासाउंड,हेन-टेन करबैत-करबैते पनरह टपि जेतौह।साढ़े पनरह।पथ-पानि, आनी-जानी-रहनी-रुकनी दससँ कममे नहि फरियेतौह।साढ़े पचीस एखने भ' गेलौह।तखन जावत जीयब तावत दवाइ-दीगर नहि बेसी त' दुइये हजार महीना राखह।पुछारी-पैगाममे अबैत-जाइत लोकक आगत-भागतपर खरचा लागल रहतौह,से फराके जोड़ह।आब कहह,की भा' पड़तौह?लौसबला बिजनेस करबह आकि फैदाबला? बेटोसभ की करितैक?गुम भ' जाइ गेलैक।" लालदाइ 'कलिंग लिटरेचर फेस्टिवल'क ऑनलाइन कार्यक्रम देखि रहल छलहुँ।कोनो फोन-कॉल बेरि-बेरि आबि व्यवधान क' दिए।काटि दियैक।तेसर बेरि जखन फेर फोन बाजल त' उठा लेलियैक।ओमहरसँ एकटा स्त्री-स्वर आयल - "नीरज बजै छही?हम लालदाइ।" -"हम कनीकालमे फोन करैत छियौक"। ई कहि हम फेर फोन काटि देलियैक,मुदा आब कार्यक्रम देखैत मोनमे बेरि-बेरि प्रश्न आबय- 'लालदाइ, वैह लालदाइ की?' कार्यक्रम समाप्त भेलाक बाद इमहरसँ हम फोन लगेलियैक- "हलो!हम नीरज।एकटा कार्यक्रममे..." -"हँ, से त' हमरा भेल।रौ,हम सीतामढ़ी आयल छियौक,एकटा श्राद्धमे।आइ द्वादशा छियैक।काल्हि चलि जयबौक।तोहर डेरा कतय छौक?" जँ केओ तेसर व्यक्ति ई संवाद सुनने रहितथि त' लगितनि जे लालदाइ हमर निकट संबंधी होयत एवं हमरा लोकनिक संवाद नियमित रूपसँ होइत होयत।एतेक सामान्य बात नहि रहैक।तेँ संवाद सम्पन्न भेलाक बाद एकटा फिलिम आँखिमे चलय लागल आ हम 1977-78 ईoक स्मृति- चलचित्र देखय लगलहुँ। हमर गामक टोलक मध्य एक घर 'मल्लिक' छथि।स्कूल जाइकाल सड़क पश्चिमसँ समकोणपर जतय दक्षिण मुड़ि जाइत छैक, ओहीठाम अछि 'मल्लिक-अँगना'।ओहि आँगनमे हमरा लोकनिक बाबा श्री(आब स्वo) धनुषधारी मल्लिकक परिवार रहैत रहनि।बाबा हमर गामक सभसँ सुन्नर व्यक्तिमे सँ एक रहथि।सुन्दरताक धनुषपर सज्जनताक वाण धारण केनिहार बाबा सभक हृदय-भूमि विजित करबाक सामर्थ्यसँ युक्त रहथि।हुनक सभ संतति तेहने सुन्नर आ सज्जन।तहिया गाम-घरमे गरीबीक साम्राज्य रहैक,मुदा शील-संस्कार-सौहार्दक शीतल मंद सुगंधित मलय सर्वत्र प्रवाहित भ' जीवनी-शक्तिक संचार कयने रहैक। स्कूलमे हम दू भाय पहिला किलासमे रही।हमरा लोकनि नित्य अपनासँ एक किलास ऊपर अपन गुलाब बहिनक संग स्कूल विदा होइ, झोरामे सिलेट-पेंसिल आ बोरा नेने।अपन अँगनासँ निकलि हमरा लोकनि मल्लिक- अँगना आबी।ओतय बाबाक बेटी लालदाइकेँ संग करी।गुलाब बहिन कहैक- "गै फूल!चल ने इस्कूल, अबेर होइ छौक।" एहिना किछु बरख चलल हेतैक।तकर बाद लालदाइ कतेक पढ़लक, की पढ़लक,कतय गेल, किछु पता नहि।हमहूँ सीतामढ़ी आबि गेलहुँ।एत्तहि पढ़लहुँ- लिखलहुँ, एत्तहि नोकरी कर' लगलहुँ।तहियासँ आइधरि कमला-लक्ष्मणामे बहुतेक पानि बहि गेलैक।साझी आश्रमक युग भसियाइत-भसियाइत आब एहन स्थितिमे आबि गेलैक अछि जे एक परिवारक सदस्य लोकनिक संपर्क-संवाद जतय भ' रहल छैक, ततय बड़का भाग्य-सौभाग्य मानक चाही।एहन परिस्थितिमे ओ लालदाइ आइ एना फोन कयलक,से अपन कानपर विश्वासे नहि हुअय,मुदा घंटाभरिक भीतर ओ दू जनीकेँ संग कयने डेरापर आबि गेल।नैहरक लोकसँ भेँट भेलापर जे अपूर्व आनंद ओकर मुखमंडलपर व्याप्त रहैक,से देखि हमरा लोकनि प्रफुल्लित भ' उठलहुँ।ओ हमर मायकेँ प्रणाम क' देह गछारि लेलकैक।हम ओकरा प्रणाम क' एक कात ठाढ़ भ' गेलहुँ।हमर बियाह भेना चौबीस बरख भ' गेल आ ओ हमर कनियाँकेँ सेहो पहिले बेरि देखि रहल रहैक।ओ हुनका देहमे साटि लेलकनि।हमर कोनो पीसी आब जीवित नहि रहलीह,मुदा ई तथ्य असत्य सिद्ध भ' गेल।लागल जेना अपन पीसी नैहर आयल अछि।बहुत आनंद भेल।पुछलियैक- "पीसाकेँ नहि अनलिही?" कहलक-"ओ भोज-भातमे अरसिया-परसियामे लागल छथुन।एतय अयलहुँ त' हिनकासँ तोहर फोन नंबर लेलहुँ।बड्ड मोन लागल छल तोरा सभकेँ देखबाक लेल।कैकटा धीया-पुता छौक?फेसबुकपर तोहर हम फ्रेंड छियौक।देखही ने,जया दास।तोहर रचना पढ़ैत रहैत छियौक।बड्ड गौरव होइत अछि...." लालदाइ बजैत गेल आ हमरा लोकनि ओकरा संगे भाव-तरंगमे उग-डूब करैत रहलहुँ।हम पुछलियैक- "तोरा कैकटा धीया-पुता छौक आ की करै जाइ छौक?" सहजतासँ कहि गेल- "एकटा बेटीक बियाह क' देने छियैक।दूनू परानी फ्राँसमे छौक।बेटा जर्मनीमे इंजीनियर छौक।छोटकी लॉ-फायनलमे छौक।" हम विस्फारित नेत्रसँ देखिते रहि गेलियैक ओकरा।कोनो दम्भ वा उपलब्धिक दर्प नहि छू सकल छैक एखनहुँ ओकरा।पीसा बैंकमे छथिन।पटनामे घर लेने अछि,मुदा गामपर सेहो सभ किछु व्यवस्थित रखने अछि।एखन किछु दिनसँ गामे अछि।एखनहुँ गाम ओकरासँ बाहर नहि भेल छैक।तेँ एहन प्रीति,तेँ एतेक भाव।जाइकाल हमर कनियाँकेँ 'देखना' देनाइ नहि बिसरल।तीनू जनीक तेल-सिनूर भेलैक।हम अपन पोथी देलियैक तीनूकेँ।लालदाइ ओकरा नैहरक सनेस जकाँ जुबुताक' राखि लेलक।जे लोकनि मिथिलाक दिन-दिन घटैत संस्कारक दोहाइ दैत छथि,हम आब हुनक किंचित प्रतिवाद क' सकैत छी।'लालदाइ' हमर प्रमाण थिक। औकवर्ड ट्रेडिशन लिजा आ ग्रेसी दूनू बहिन मातृक पहुँचैत अछि।माय कानय लगैत छथिन।संगे-संग मामी सभ सेहो। ममियौत भायक नवकी कनियाँ मरौत काढ़ने घरसँ बहराइत छथिन।दूनू बहिन एयर बैग असोरापर राखि तमाशा देख' लगैत अछि।नवकी भौजी मलसीसँ तेल निकालि एकरा सभक मायक एकटा घुट्ठीमे लगा नहुँ-नहुँ ससार' लगैत छथिन।माय कहैत छथिन-"आब छोड़ि दिय' कनियाँ, भ' गेलैक।" ई कहि ओ अपन दोसर पैर हुनकर आगाँ बढ़ा दैत छथिन।तावत दोसर आँगनसँ आइ-माइ सभ सेहो प्रत्यागत भ' जाइत छथिन।कनियाँ सभक पैर ओंगार' लगैत छथिन।एकटा बूढ़ी कनियाँक घोघ उठा कहैत छथिन-"यै! ई सभ जे कहथुन,कनियाँ त' बड्ड सुन्नरि छथिन,मुदा मोहन सन नाक नहि छनि।रंगो मद्ध छनि कनी।" दोसर टिपलथिन-" बहिने जकाँ नकार- सिकार छैक यै कनियाँक।एकर बहिन हमरे बहिनौतसँ ने बियाहल छैक! ओकरो काट एहने छैक।"एहने सन रूप-लक्षण- विश्लेषणक क्रममे कनियाँ बेरा-बेरी बुलनिहारि सोआसिन सभकेँ तेल-कूर आ सिंदूर लगा आ सभक चरण माथ लगा अपन कोठली दिस अबैत छथिन।दूनू बहिन भौजी लग आबि घोघ हटा दैत छनि।लिजा कहैत छैक -"भौजी!अहूँ बड्ड बैकवर्ड छी।एहन-एहन औकवर्ड ट्रेडिशन फॉलो करैत छी,से बड्ड टीजिंग नहि लगैए?" ग्रेसी कहलकनि - "वर्ल्ड कत'सँ कत' चलि गेलैक, गर्ल सभ आब अप-टु-डेट आ एडुकेटेड भेल आ अहाँ बुढ़िया सभक लेग पॉलिस करैमे लागल छी?धुर जाउ!पढ़ल-लीखल नहि छियैक कनियो?" तावत कनियाँ एकटा प्लेटमे मेवा-मधुर आ दूटा रुमाल राखि दुनूक आगाँ राखि बजलीह -"लिय, ई सभ अपना सभक ट्रेडिशन छैक।" लिजा पुछलकनि - "हमर भैया लेक्चरर छथि आ अहाँ कोना एहन गमार भ' गेलियैक भौजी?कतेक तक पढ़ल छियैक?" भौजी धीरेसँ बजलीह - "एखन त' पढ़िते छियैक।'एम डी'मे नामे लिखेलैक अछि।एखन त' तीन साल लगतैक।" भोल्टेज आइ हेड मास्सैब लग बिजली बाबू खेखनियाँ काटि रहल छथि-ओ मास्सैब ओ मास्सैब!हमरा बौआकेँ एगो साटीफीटी बना देल जाउ हाली सनी।हम त' बर्बाद हो गेली ओ मास्सैब! मास्सैब पुछलथिन- की भे गेल?काहे ला कछमछा रहल हती?की करम सर्टिफिकेट ले के?कहिया नाउँ लिखेले रही बौआके?कहिया पास केले रहय?कोन साल?कोन किलास? बिजली बाबू कहलथिन-से की जाने गेली ओ मास्सैब!हम कोनो पढ़ल-लिखल हती?पान-सात साल पहिले के रजिस्टरमे खोजू न! मास्सैब-की नाम हय बचबा के?कहिया के जनम हय?कुछ त' बोलू! बिजली बाबू- नाउँ त' हइ भोल्टेज!भिनुसरबामे भुइकम्प न भेल रहे,ओही रात ओकर जनम भेल रहे।हमनी सभ्भे दूरा पर रही।बिजली-लाइट एकदम्मे डीम रहे।पोल परके बौल टिमटिमा रहल रहे।तभिये जोर से भोल्टेज अलै आ मंगुराहाबाली आ के बोल गेलै-बिजली बौआके बेटा भेलै ह'! रामानंदी बाबा हँसे लगलथिन।कहलथिन-बिजली के बेटा भेलै ह' आ अबते भोल्टेज आ गेलै।एकर नाउँ हम 'भोल्टेज' राख देलियै।कथी कहू मास्सैब?सगरे गाउँ ओकरा भोल्टेज-भोल्टेज लगलै कहे।उहे नाउँ इस्कूलोमे लिखा देलियै।तहिया परमेसर बाबू मास्सैब रहथिन।कहलथिन-नाउँ बदल दै हतियौ, मगर हमहीं न बदले देलियै।की जाने गेलियै जे ई भोल्टेजबा हमरे फ्यूज उड़ा देत?देखू न मास्सैब!बेल कराबे के हय।मधेपुरा-जेहलमे बन्न केले हय ओकरा। मास्सैब रजिस्टर उनटाब' लगलाह आ संगे-संग पूछ-ताछ सेहो कर' लगलाह- कोन अपराधमे जेहलमे बन्न क' देलै ह'? बिजली बाबू- अपराध कथी कहबइ ओ मास्सैब?इहाँ त' घर-घर ऊहे रोजगार हय।एक के दारू तीनमे बिलैक हो जाइ हय।उपरका परसेंट आ थाना-पुलिस काट-कूटके दोबरी नफा हो जाइ हइ।बूझ लू जे पूरा पेलवारे मूड़ी पर उठेले हय हमर भोल्टेज।ओकरे से रौनक पसरल हय हमनीके। मास्सैब रजिस्टर बंद क' गुम भ' गेलथिन। बिजली बाबू- कैला गुम्मी लाध लेली मास्सैब?अठारह से जादे उमेर हो गेलै ह' की?काम बनेबला न हइ कादो?अरे बाप!तब त' बेल न देतै ओकरा।की होतै हो भगमान?मास्सैब बाजि उठलाह-बिजली बाबू!अहाँ लेखा बिजली जाले समाजमे अइसन भोल्टेजसे रौशनी करैत रहत,ताले समाजके फ्यूज आ फेज उड़ते रहतै।हम सरकार रहती त' पहिले अइसन बिजलीएके तार काट देती। 'नीक' आ 'बड़ा नीक' एकटा रहय 'नीक' आ एकटा रहय 'बड़ा नीक'।'नीक' एक पन्ना पढ़य,त' 'बड़ा नीक' दू पन्ना।'नीक' दू करीन पानि पटाबय, तँ 'बड़ा नीक' चारि करीन।'नीक' सोझे कॉलेज पास केलक,त' 'बड़ा नीक' फर्स्ट डिवीजनसँ।पैघ भ' क' दूनू बनि गेल नेता। ठाढ़ होइ गेल चुनावमे। 'नीक' रहय 'ईर पार्टी'मे, त' 'बड़ा नीक' रहय 'बीर पार्टी'मे।'नीक' बाजल- हम नीक, त' 'बड़ा नीक' बाजल- हम बड़ा नीक।एक कहलक- एकमहला देबौ,त' दोसर गछलक- दुमहला देबौ।'नीक'केँ भोट एलै चौबन हजार,त' 'बड़ा नीक'केँ एलै पचपन हजार।मुदा 'ईर पार्टी' जीति गेल,'बीर पार्टी' हारि गेल।'नीक' बनि गेल मंत्री,त' 'बड़ा नीक' बनल ने मंत्री, ने संतरी।केओ कहलक 'नीक' नहि भेल,त' केओ कहलक- बड़ा नीक भेल।जनता जोहै अछि दुमहला।नहि बनलै एकमहला।'नीक' कहलकै- हरलाहाकेँ कोन लाज?'बड़ा नीक' कहलकैक- जितलाहाकेँ भेटलैक कि कोनो राज?सभ अपन-अपन करू ग' काज!खिस्सा खतम, पैसा हजम! उषा मैडमक विदागरी उषा मैडम स्कूलक लेल विदा भेलीह।बाहर पतिदेव रौनकजी जोर-जोरसँ मोटरसाइकिलक एक्सीलेटर हुरहुरा रहल रहथिन।कनियाँकेँ देखितहि बड़बड़ेलाह-एतेक कहूँ सीट-साट करय लोक?रोजीना लेट क' दैत छी अहाँ।आइ फेर हाजिरी कटले अछि अहाँक।बैसू जल्दी।उषाजी मुस्किया देलथिन -अरे चलू ने,बैसि गेलहुँ।गाड़ी चलि देलकैक।मीटर भाग' लगलैक।एन एच पर तँ सत्तर टपि गेलैक।मुदा टोला पर एगारहटा स्पीड ब्रेकर पार करैत कोन ठाम उचकि क' उषा मैडम खसि पड़लीह,से रौनकजीकेँ सोहे नहि रहलनि।तीन किलोमीटर आगाँ गेला पर कनियाँकेँ पुछलखिन- यै,पानिक बोतल अनने छी?मुदा कनियाँ कोनो सीट पर रहथिन जे जवाब भेटितनि?रौनकजी एक हाथ पाछाँ ल' जा क' टोइयेलाह।गाड़ी रोकलनि।कनियाँक कतहु अता-पता नहि।कंठ सुखायल रहबे करनि, प्राण कंठगत भ' गेलनि।कतय खसि पड़लीह?पता नहि, की भेल हेतनि?अज्ञात आशंकासँ सिहरि उठलाह रौनकजी।मुँहक रौनक कतहु बिला गेलनि।कोंढ़ थरथर कर' लगलनि।गाड़ी घुमेलनि।रस्ते-पएरा सूर-पता लैत आगाँ बढ़ैत गेलाह।एक ठाम चारिटा स्त्रीकेँ झटकारल जाइत देखि पुछलथिन- यै, एतय कोनो स्त्री गाड़ीसँ खसल...? एकटा जवाब देलथिन- हँ यौ,एकटा मौगी गाड़ीसँ फेका गेलैक।घरबला आन्हर-बहीर भेल गाड़ी बढ़बैत चलि गेलैक।अहींक कनियाँ त' नहि छी?यौ केहन बरंबताह छी?अपना बुझायल नहि?यौ मेला लागल अछि,मेला!पचहीबाली काकीक अँगनामे, मड़बा पर। काकीक अँगनामे बड़का जुटान रहैक।स्त्री-पुरखे थाहाथही करैत।एकटा पटिया पर पाया-भरे उषा मैडम ओंगठल बैसल रहथि।काकी माथमे तेल पचा रहल रहथिन।आइ-माइ सभ सेवा-टहलमे लागल रहथिन।काकी बाजि रहल रहथिन- बुच्ची, किछु नहि भेलौक अछि।भगवत्ती सहाय रहथुन जे खाली बामा केहुनी आ बामा घुट्ठी लग चाँछ छौक।कत्त' जाइत रही?ककरा संगे?फोन नहि छौक संगे?उषा मैडम सभ बात कहैत कहलथिन- फोन धरफरीमे घरे पर बिसरा गेलैक।पता नहि, ओ कत्त औनाइत हेथिन!जा,आबिये गेलथिन।रौनकजीकेँ जान मे जान एलनि।एकटा बौआसिन घोघ कढ़ने हुनका हूथ' लगलथिन- केहन भसन्नर छैक?कनियाँ खसलै से किछु बुझबो नहि केलकैक।निसाँमे गाड़ी चलबै छैक की?आइ मास्टरनीकेँ किछु भ'-त' जयतैक त' हाथ मलिते नहि रहि जयतैक?पचहीबाली काकीक पारा गरम भ' गेलैक -गै रामखेतारीबाली! बेसी लुबुर-लुबुर नहि कर'!एक त' बेचारा हको-पियासल अयलाह अछि आ दोसर ई लगलीह अछि बियाम छाँट!ई नहि होइ छौक जे एकटा पीढ़िया दैत छियैक बैस'!जो उठ आ एक लोटा पानि दहीक कल चला क'!बैसू बाबू,चला-फिरा क' देख लेलहुँ,बुच्चीकेँ टूटल-फुटल नहि बुझाइत अछि।से रहितैक त' हम केहन-केहनकेँ अपने हड्डी बैसा दैत छियैक,ससारि क'!मुदा आबक डागदर कोनो ससार- फसार कर' दैत छैक?गै जगदंबा!गै मोकनी-माधव जकाँ ठाढ़ रहबें आकि कनी देहो उसकेबें?जो,भनसा घरसँ चाउरक रन्हुआ सोहारी,नोन-तेल-मरचाइ परसि क' दहीक ने?गै चानदाइ!तोंहू जाही ने संगे। लौ-सग बनेने छियैक।बासनसँ काढ़ि क' नेने ने आ झटपट!एकर बाद काकी सभकेँ यथायोग्य निर्देश करैत भगवती-घर गेलीह।एकटा थारीमे दूबि-धान आ एगारहटा टाका नेने बहरेलीह।उषा मैडमकेँ तेल-सिनुर क' खोंइछ बान्हि देलथिन।रौनकजीकेँ माथमे विभूत लगबैत कहलथिन-बेटा बड़का ग्रह कटि गेलह,से बुझह।मोन मलिन नहि करी।भगवत्ती सहाय रहथुन।अक्खे अमर क' देथुन जुगुल-जोड़ीकेँ।हमर भाग जे हमरे दुरुखा पर खसल बुच्ची हमर।एहीदने रोज जाइत-अबैत छह।कहियो क' काकीक हाल-चाल ल' लेल करिहह।हमरो बेटा-पुतोहु तोरे सभक बतारी हेतह।काकी आँचरसँ आँखि पोछि लेलनि।सभक आँखि नोरा गेलैक।उषा मैडम त' हिचुकय लगलीह।लगलनि मायक घरसँ फेर विदागरी भ' रहल होइन। दाबा लखनकाका बड्ड खिसियायल रहथिन।कहलथिन- "आँय यौ बुचकुन?हमर दाबा पर अहाँक कोन दाबा?कोदारिक छौ सँ हमर दाबा ढाहिक' अहाँ अपन डाबा टाँगि देलियैक,तँ अहींक दाबी भ' गेल? एक्के दाबि अपन दबिया ल' क' अहाँ अनकर हक कपचि लेबैक,से नहि हैत!कथी पर एतेक दाबा अछि यौ?जोरगर छी,तँ कमजोरकेँ दाबि देबैक?चलू,पंचायतमे! दबाड़ पड़त, त' सभटा दाबी घोसरि जायत।चलू,अहाँक दबाइ करबै छी हम!"पंचायतमे दबदबाबला दबंग सभ अयलाह।हिनके पर दबाव पड़ि गेलनि,दाबी छोड़बाक लेल।दाब सँ दबि ओतय सँ विदा भेलाह।साँझमे देखलनि- पंच लोकनि बुचकुनक दोकान पर मधुर दबाक' दाबि रहल छलाह। पराश्रित -"आँय यै, आइ अपन बुच्ची कंपनीमे काजो करय लागलि।कोना दिन बीति गेलैक, से पते नहि चलल।आब तँ नीक बर-घर ताकि....." -"से त' छैके!" -"अपन घर चलि जायत बुच्ची।नञ यै?अपना सभक लेल त' ओ पाहुने भ' जायत!आब अहीं अपने सँ मिलान क' क' देखू।अहाँ कतेक दिन अपन माय-बाप लग रहि सेवा करैत छियनि?हुनका लोकनिकेँ कतेक आर्थिक मदति क' पबैत छियनि?तहिना त' अपनो बुच्ची किने?" -"किएक?ओ कोनो हमरे जकाँ पराश्रित छैक?" राजीव कर्ण झुठक महत्व ...माँ हम जाय छी इंटरव्यू दै ले। ... जाऊ, भगवती अहाँ के सफल करैथ। ... हम अंदर आबि सकै छी सर? ....हाँ, आऊ। .... कते पढल छी अहाँ ....सर बी. कॉम. केने छी। ....कतौ काज केने छी। ....जी, किछु दिन अकाउंटक काज केने छी एकटा कंपनी में। (आधा घंटा बातचीत के बाद) .....अहाँ जाऊ, पहिले झूठ बजनाइ सीखू। कियेक त बाजार में झूठ फरेब चलै छै। सच के कोनो भाव नै छै। अहाँ निश्छल आदमी छी तैँ बता देलौं। जाबैत तक झूठ फरेब नै सीखब बौआइते रहब। (निश्छल आदमी के झूठ फरेब सँ कोन मतलब, उमर बीत गेलैन्ह अखन धरि बौआइते छैथ कहुना गुजर चलै छैन्ह।) जगदानन्द झा 'मनु' ४ टा बीहनि कथा १.उचितवक्ता रस्ता कात एकटा सिलाई मसीन लअ क बैसल दर्जी। छोट कपड़ाके पैघ आ पैघ कपड़ाके छोट करैक काजमे लागल। औकर लऽगमे पहिनेसँ एकटा करीब पच्चपन वर्षिय नीक लोक ठार भय किछु काज कराबैत। दीनानाथ भाई एकटा झोरामे किछु कपड़ा लेने, ओहि दर्जीक दोसर कातमे चुपचाप ठार भ गेला। दर्जी - (मसीन पर हाथ चलबिते दीनानाथ भाई के दिस देखैत) "हँ भाई।" दीनानाथ भाई हाँके इसारा मे मात्र अप्पन माथ हिला देलकिन्ह, जेना कि ओ कहैत चाहैत हेथिन, पहिने ओई ग्राहक के जेए दियौन। हुनक मोनक ई गप्प बुझि पहिनेसँ ठार दोसर ग्राहक बजला - "कोनो ने अहाँ कहियौन, ई नम्हर काज छै चलिते रहतै।" दीनानाथ भाई एक डेग आगू आबि, अप्पन झोरासँ दूटा फुल पेंट निकलि, सिलाई मसीनक टेबल पर रखैत - "ई एकटा के निच्चासँ तीन ईंच छोट क देबै आ ई दोसर के निच्चासँ तीन ईंच छोट करब संगे डाँड़मे सेहो दू ईंच कम क देबै।" दर्जी- "ठीक छै दू घंटा बाद लय जाएब।" "ठीक" - कहैत दीनानाथ जी ओई ठामसँ बिदा होबाक हेतु जहाँ ने अप्पन डेग, पाछु घूमेलनि कि ठार दोसर नीक लोक बाजि परला- "एहिमे संकोचक कोन गप्प, जखन धिया पुता बापसँ पैघ भ जाई छैक तँ छोट कपड़ा ठीक कय क बापे के ने पहिरअ परै छै।" दीनानाथ जी सुनैत चुपचाप ओहि ठामसँ चलि देला। २.मनुक्खक जीवन “बौआ पैघ भए कऽ अहाँ की बनब ?” “मनुक्ख।” नेनाक एहि उत्तरपर चारूकात ठहाका पसरि गेल। मनुक्ख ! मनुक्ख तँ हम सभ छीहे, मनुक्ख बनक बेगरता की ? मुदा नेनाक आखर ‘मनुक्ख’ हमर हृदयमे तऽर धरि धसि गेल। की आइ काल्हि हम मनुक्ख, मनुक्ख रहि गेलहुँ ? हमर सभक भीतर मनुखताक कोनो अवशेष एखनो बचल अछि ? मनुक्ख की ? खाली मनुक्खक कोखिसँ जन्म लेने भऽ गेलहुँ ? जन्म लेलहुँ, नम्हर भेलहुँ, ब्याहदान भेल, दू चारिटा बच्चा जनमेलहुँ, ओकर लालन-पालन केलहुँ, बुढ़ भेलहुँ, मरि गेलहुँ, इहो जीवन कोनो मनुक्खक जीवन भेलै। आइ मरलहुँ काल्हि दुनियाँ तँ दुनियाँ १३ दिन बाद अप्पनो बिसरि गेल। मनुक्ख जीवन तँ ओ भेल जेकर मृत्यु नहि हुए। मृत्यु देहक होइ छैक, कमसँ कम नामक मृत्यु तँ नहि होइ, नाम जीबैत रहै, ओ भेल मनुक्खक जीवन। ३.अरबाचाउर “गे बौआ कनी काकीसँ अरबाचाउर माँगि कए नेने आ।” “नहि, हम नहि जेबौ, हमरा माँगैमे लाज लगैए।” “दैया ने, की करबै देखी कतेक दिनपर मामा एलैए, की कहतै एकरा घरमे अरबोचाउर नहि रहै जे उसनाचाउरक भात खुएलक।” “मामक ई सोचनाइ बढ़ियाँ, की काकीक ई सुननाइ–आइब गेलहुँ ढकनी लए कऽ माँगै लेल।” ४.छबी ब्याहक पन्द्रह बर्ख बाद सा० हमर पर्स केर तलाशी लैत, “सभ कियो अप्पन अप्पन पर्समे अपन कनियाँक फोटो रखने रहैए मुदा अहाँ.....!” “पर्समे फोटो रखैक बेगरता ओकरा परै छैक जकरा अपन कनियाँक छबी इआद नहि भेल होए, हमरा तँ अहाँक छबी हमर आँखिक रस्ता होइत हमर करेजामे जा बसल अछि। एहनठाम ई कागजक फोटो राखैक की बेगरता।” विरेन्द्र कुमार झा कोना बुझब मयंक के पापा महानगर मे नौकरी करैत छथि । सपरिवार संग रहैत छथि । मयंक एकटा नीक स्कूल में पढ़ैत अछि । ओहि स्कूल में एकटा मैथिल शिक्षक सेहो शिक्षण कार्य करैत छथि । एक दिन स्कूल मे कोनो काज सं मैथिल शिक्षक लग गेलाह आ बजलथि ," सर हमहुं मिथिलांचल के रहय वला छी , हमरा पोथी लेबाक अछि से कतेक टाका लागत ? शिक्षक तमसाय गेलाह आ कने जोर सं बजलाह," अरे तुम यहाँ क्यो हो, जावो मैडम के पास , वही बतायेंगे ? मयंक सोचय लगलाह ," हमर पापा त कहने रहैत जे ओ मैथिल शिक्षक से मातृभाषा मे गप करैक लेल , मुदा ई हिन्दी मे हमरा सं गप केलथि । मयंक मैडम लग पहुँचलाह , " मैडम बजलीह," सबटा गप हम एहिठाम सं सुनल , ओना हमर घर केरल छी मुदा हम मिथिलांचल मे दुई साल रहल छी , मैथिली हमरा बाजय अबैत अछि, बाजू कोन काज अछि । मयंक हिनका से मैथिली मे बात केलथि , बद्द खुशी भेलैन । मुन्ना जी संवेदनाक सीढ़ीपर ठाढ़-“ताल बेताल” जीवनक आपाधापीमे च'प-उनार हएब जिनगीक संतुलनक स्रोत बूझू। छोट पैघ डेग उठिते तँ मोकाम धरि पहुँचैए लोक। जहिना डेग छोट-पैघ, तहिना कर्मो छोट-पैघ आ ओहने फल सेहो होइछ! ओइ छोट-पैघपर जहन डेग लड़खराए लगैए तहन दोसराक मूँहे उपहासक पात्र बनब देरी नै।ओ उपहास, डेगे नै मोन सेहो तिलमिला देबाक लेल पूर्ण होइछ। ओ कखनो नजरि सँ तँ कखनो शब्दवाण भऽ बेधैछ। शब्दवाण जे तिलमिला दिए, बेधि दिए उएह साहित्यिक परिधिमे व्यंग्यक संज्ञा पबैछ! व्यंग्य, माने प्रस्तुतकर्ताक सिरखारीपर मुस्की आ लक्ष्यपरक चोट आ कि तिलमिलाहटि। व्यंग्य हास्यमे सेहो प्रस्तुत होइछ आ हास्यास्पद रूपमे सेहो। व्यंग्येक एक रूप तँ आलोचना थिक। साहित्यमे व्यंग्यक कएटा रूप वा संबोधन अछि। यथा पैरोडी, प्रहसन आदि। सात दशकक मैथिली आन्दोलनी, दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व- श्री रामलोचन ठाकुर जी मिथिला भूमिमे हास्य-व्यंग्यक कोना धेलनि से नै जानि मुदा असल नाम नुका अपन छद्मनाम 'कुमारेश कश्यप'सँ व्यंग्य लिखबाक प्रयास हुनका अनुरूप हमरा नै लागल। ताल- बेताल व्यंग्य संग्रहमे कुल सात गोट व्यंग्यक धार बहेलाह। जकर पहिल शीर्षक अछि-"अथ कथा चमचा पुराण। प्रस्तुत प्रसंगमे मैथिली आन्दोलनमे भोगल अनुभवक बीच देखल चाटुकारिता, गोधियाँ-गोधौअलसँ आहत भऽ तोता - मैनाक संवादे चित्रणसँ संतुष्ट भेलाह। "ऐं यौ, ऐ बेर जहियासँ मिथिलाक सर्वेक्षण क' एलौं तहियासँ गुमसुम बैसल छी। की कहू-मिथिला, मैथिलीक क्षति त' हेबे करतै जे हमरो सबहक खोंता बिनु उजारने नै रहत। ओ! अच्छा ई कहू ई चमचा शब्द कत' भेटल, आ कि अहींक उत्पति? " देखू- चमचा शब्द प्रयोग भेल अछि महर्षि वेदव्यास द्वारा। ओ अपन सत्रह पुरानमे एकर कथांत नै क' पौलाह।तहन अठारहम पुराणक रचना कर' पड़लनि-" चमचा पुराण " ओइमे लिखै छथिन- -" अष्टादस पुराणे व्यासाज वचनम ध्रुवमसर्व काले सभी क्षेत्रे चमचा सर्वत्र विद्यते "ओना अतबेसँ सन्तुष्ट नै भेलाह। तँ चमचाक प्रमुख प्रकार सेहो चारि भागमे बाँटि लिखलाह। 1- अज्ञान वाक् -जकरा ज्ञानक छुति नै, महन्थक वाक्यकें ब्रम्हवाक्य मानब। 2- सुटकुन -जकरा ज्ञानक छुति रहैछ मुदा महन्थक धरिया धेने पार उतरैछ। 3- स्वविवेकी -स्वार्थवश चमचागिरी , फेर अलोपित। 4- फँचारि-सभा , सोसाइटी दलमलित केलक। महन्थक टोकारापर घसकन्त। विद्यापतिक बर्खी-विद्यापतिक सम्मानसँ बेशी जेबी भरबा लए हुनक अवसानपर चोट करैत! वक्तामे सेहो गोधियाँ-गोधौअलक प्रस्तुति! सुनू ऐ मंचपर बेशी बला सब बाजि गेलाह। हम तँ कम्मे जे पढ़ने सतमा धरि माने वामन बुझू। पैघ ओ जे सबमे पैघ होथि। जेना बेशी विवाह, बेशी धिया पुता, बेशी धन संपत्ति, बेशी लटारहम (टंटबंट), बेशी गप्प हांकय,बेशी खाय, बेशी पचाबय। आब अध्यक्षीय भाषण- अहाँ सबहक सौभाग्य जे आइ मंचपर तीन गोट विद्यापति विशेषज्ञ बैसल छथि डॉ. झांखुर झा- जिनका विद्यापतिक नायिका चूड़ी पर शोधक पी.एच.डी भेटलनि।डॉ.गोबर गणेश जे विद्यापतिक नायिकाक नूआ पर शोध क' सम्मानित भेलाह। तेसर-डॉ. खेसारी खबास जे विद्यापतिक अन्तर्वस्त्रक रिसर्च स्कॉलर छथि। अहिना जुत्ता, छड़ी, पाग, दोपटा महात्म्यक परिचर्यामे विद्यापतिक बर्खी सब बेर अपन किछु नव कीर्तिमान स्थापित करैए। कुर्सी महात्म्य- डॉ. नास एम.ए। त्रिपाठी.एच.डी, डीलिट्। अठारह पुराणक रचना केलनि। ताहिमे एक अछि कुर्सी पुराण।ओइपर कहियो राम बैसल कहियो कृष्ण आ तकर पछाति नै जानि कते नरसंहारी। मुदा आब ओ कुर्सी कोनो साधारण जनता प्राप्त कऽ सकैए जे फकीर रहए। कोटि कोटि आ कुटि कुटि के व्यंग्यक निष्पादन करैत कथा।सत्तामे बैसल वा पावरफुल व्यक्ति कखनो ककरो कटबाक आदेश दऽ सकैए।कखन कोन विपत्ति ककरा पर आइब जाए से कहब अनिश्चित! मुदा घेंट जोड़बामे सब व्यस्त आ खुश।- विप्लव! ब्रम्हाक श्राप- अइ कथामे सत्ताक शताब्दीक व्याख्या कएल गेल अछि! दुनिया एडवांस भऽ रहलै। ब्रम्हा जीक संग अंग्रेज़ी वार्तालाप तकरे प्रतीक थिक। अमरावती उपकथा--कमीशनखोर सब कोना नेताकें फँसा कऽ रखैछ। आ काज बेर कोना अपने फँसि व्यस्त भऽ मालो माल होइ छथि। सबटा कथा कतेको दशक पहिनेक मुदा आइयो स्थिति परिवर्तन नै। तें आइयो पूर्ण प्रासंगिक। बीहनि कथाक आधार स्तम्भ छलाह- श्री राज (प्रथम पुण्यतिथि १ अगस्त २०२१पर मोन पाड़ैत) अपन आखर ,अपन बाट। साहित्य संवर्द्धन लेल ककरो बाट जोहब हुनकर आदति सं बहरीक चीज छल।पठन- पाठन आ लेखन में मस्त! जमीन परहक लोकक पीड़ा देखार करबाक जेना भारवाहक होइथ।सदिखन आम रचनाकारक भीड़ सं विलग अपन बात राखब एकमात्र उद्देश्य में लीन देखल जाइथ।ओ साहित्य सृजन स्वान्त सुखाय लेल नै,पर पीड़ा हरनाय लेल करैत रहला।हुनकर गमैया सोच, शब्द पाठककें बन्हने रहैत छल। ओहने सोचक परिणाम छल मैथिली साहित्यक एकमात्र अपन विधा-" बीहनि कथा "। जकरा कतेको बरख धरि मगजक शिरा के खिरबैत साहित्यक जमीन पर बैसा छोड़लनि।1991सं चलि अबैत विमर्श मे सर्वसम्मति सं 1995मे विधाक मूर्त रूप में सोझां आबि सकल।ओना त' शोधक क्रम में एहेन कथाक प्रादुर्भाव मिथिला मिहिरक 1937क अंक-2सं भेल भेटैछ।मुदा ओ एखन ओहने अइछ जेना मानवीय उत्पत्तिक समय 25-30लाख वर्ष पूर्वक मानल जाइछ मुदा ओ पूर्णत: मनुक्खे छी तकर निश्तुकी 5लाख वर्ष पूर्व मात्रक। एकान्त वास हुनक आदति मे समएल छल।मुदा विचारें दसगरदा हेबा मे रूचि रखै छलाह! हम दिल्ली सं जखन गाम जाइ त' अपन घरक बाट में पहिने हिनके घर पड़ैए,ओत' विलमैत जाइ।मारिते रास गप कोनो नव बिन्दु पर पहुंचाबए। गपक क्रम में पूछि दियैन - भाई, जिनका सं अपनेकें गप होइए तिनका लग ऐ विधाक चर्च/ पसार नै करै छियै ? छुटिते कहथि- आगन्तुक मे सं बेसी लोक सोझां अबिते साष्टांग करै छथि आ दलान सं बहराइते अदखोइ- बदखोइ,कुचिष्टा।मुन्नाजी, इ विधा,विषय गहींर आ गम्भीर लोक लेल छै।एकरा ओहोन उठल्लू लोकक बीच सझिया करै के सोचिए करेजा कांपि उठए तें मौन रहब उचित बुझी। 1995 सं विधिवत समवेत प्रयासें यात्रारत इ विधा आइ राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर अपन आसन जमा लेलक।अफसोस जे बीहनिक झमटगर होइत रूप देखबा लेल नै रहला। साहित्य ककरो वैयक्तिक वा पैतृक संपत्ति नै होइछ।तें कोनो विधाक कियो प्रतिपादक/आविष्कारक नै कहा सकाइछ।कोनो विधा समवेत सहयोगे भेल विकासक फल थिक ,तें बीहनि कथा कें सेहो ओही नजरिये देखल जा सकैए।ऐ विधाक स्थापना आ विकास मे श्रीराजक कृत्य सं विद्यापतिक पछाति उएह टा चिरकालिक भ' सकलाह। जेना अन्य रचना सं विलग विद्यापति, मैथिली गीत लए अमर भेलाह,तहिना बीहनि कथाक संग' श्रीराजक नाम अक्षुण्ण रहतनि।शेष कथाकार हुनक नीचला पांति मे बुझू। सादर नमन! आधुनिक विश्वकथाक बाट पर जाइत बीहनि कथा मैथिली बीहनि कथा ( Maithili seed story) भारतीय साहित्यक नव विधा थिक. एहेन नव जे कियो कखनो एकर हाथ- पएर तोड़बा लेल, कियो झांटि बाढ़नि क' बैलेबा लेल त' कियो कंठ मोकि प्राण लेबा लेल आतुर, सक्रिय आ उग्र देखल जाइ छथि.समाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक आ सबहक सार रूपें साहित्यिक रचनाधर्मिता मे नवताक प्रवेश आगू बढ़बामे सहायक होइ छै. पीढ़ी दर पीढ़ी जेना कोनो परम्परा स्वहस्तान्तरित होइ छै, तहिना सब पीढ़ीमे नव परम्पराक सूत्रपात से हो होइछ.से पुरान परम्पराक संवर्द्धित/ परिष्कृत रूप होइ आकि पूर्णत: नव सृजन.इ नवताक सोझां अबिते दू पीढ़ीक बीच द्वन्द्वता आ तहन अराड़ि,मानवीय स्वभाव सन बुझू.इ बदलाव पहिने नहुंए- नहुंए पएर पसारै जहन संचार तंत्रक अभाव वा शिथिलता छल. मुदा आब.... यांत्रिक पसार भेने लोकक जीवन सेहो यंत्रवत भ' गेल. तें सामाजिक बदलावमे सेहो शीघ्रता देखएत.साहित्य सेहो समाजेक हिस्सा ने! वर्तमान मे जे भारतीय साहित्यक सिरखारी ( रूप रेखा) देखाइछ ओकर व्याकरणिक आधार संस्कृत आ विधा निरूपणक आधार मूलत: अंग्रेजी साहित्य रहल ऐछ! अंग्रेजी, संस्कृत वा अन्यान्यो भाषामे साहित्य लेखनक शुरुआत काव्य विधा सं प्रारम्भ भेल जे अंग्रेजी मे पोएट्री कहबैछ. मुदा ओकर प्रारूप विभिन्न स्वरूपें/ नामे लिखाइत स्वतंत्र अस्तित्व मे स्थापित भ' चुकल ऐछ. यथा- कविता, गीत, गजल, हाइकु, क्षणिका..... आदि. प्रारम्भ मे कथा लेखन सेहो पद्ये विधा अंग छल. यथा- कथा काव्य! पद्य( Poetry)के पछाति गद्य( Prose) विधाक जन्म भेल. पद्ये जकां गद्यो विधान्तर्गत रचनाक कतेको प्रकार ऐछ, जे स्वतंत्र नामे स्वतंत्र अस्तित्व मे सर्वविदित ऐछ! यथा - नाटक, उपन्यास- उपन्यासिका,लघुकथा, बीहनि कथा... आदि! बीहनि कथाक परिभाषा आ खगता? पौराणिक स्त्रोतें बहरएल कथाक परिष्कृत, आधुनिक स्वतंत्र विधा थिक बीहनि कथा. जकरा न्यूनतम 20 आ अधिकतम 100 शब्दमे लिखबाक विधान ऐछ! इ ककरो नामान्तरण,कायान्तरण वा विधान्तरण नै, स्वतंत्र रूपमे विद्यमान ऐछ. जे स्पष्ट कथ्य आ गसल शिल्पें लिखल पुष्ट कथा थिक. जाहि मे निष्कर्ष पाठक पर छोइर देल जाइछ. खगता! सृजनक आधार होइछ.आ खगल लोक ओकर पूर्ति बेर अपन अनुकूल बस्तुकें अंगिकार क' अंगेजैए.कालान्तरें लोक व्यवहार- ओढ़न-पहिरन, पढ़ब- लिखब सबमे स्वाभाविक परिवर्तन होइछ. लोक सदिखन परिवर्तित वा नव स्वरूपकें अंगेजबा लेल उदार होइछ.यांत्रिक युगमे इ इच्छा आओर प्रबल सन! कथाकार आ पाठकक ताहि इच्छापूर्तिक नव साहित्यिक साधन थिक -" बीहनि कथा " पहिने समादकें कतौ पठेबाक लेल चिट्ठीक प्रयोग होइत छल. ओइ चिट्ठीक प्रारूप मे से हो भिन्नता. क्रममे सर्वप्रथम पोस्टकार्ड तहन अन्तर्देशी आ अन्तिम मे लिफाफे चलन सोझां आयल. आब गौर करू जे चिट्ठी लिखै/ लिखबै बला पर निर्भर छल जे कियो अपन सबटा बात पोस्टकार्ड मे लिखि पठबै छल, ककरो बात पूर करै लेल अन्तर्देशीक खगता त' कियो लिफाफ मे पन्नाक पन्ना भरि बात पूर करै छल. मुदा कालान्तरे लोककें असोकर्ज होम' लगलै ओकर पहुंचबाक नमहर समयान्तराल सं.तहन लोककें कम समयमे समाद पहुंचेबाक खगता पूर' लेल एलै- तार ( टेलिग्राम). जे द्रुत गतियें कम सं कम शब्दमे पास बलाक मगजमे समा क्रियाशील क' दै.त' चिट्ठीक प्रारूप मे 'तार' भेल बीहनि कथा.जे सीमित शब्द( अधिकतम 100) मे अपन बात सं पूर्ण रूपें पाठककें झकझोरवा मे सक्षम हुअए.आब वास्तविकता देखू जे तार बन्न भ' गेल, यांत्रिक विस्तार मे ओ इमेल धरि पहुंचि गेल. मुदा कथामे जहन हम सब तार धरि नै पहुंचि पाबि रहलौं तहन इमेलक कल्पने व्यर्थ! आब दोसर रूपें बुझू भारतक सबसं लोकप्रिय खेल ऐछ -' क्रिकेट ' जकर प्रारम्भ टेस्ट मैच सं शुरू भेल छल. आगू आबि जहन लोककें समयाभाव भेने शीघ्र फलक आश जगलै तहन टेस्टक संग एक दिना( वनडे) खेलक प्रारुप एलै.जकरा झटसं लोक अपन हियामे बसा लेलक.जखन जिनगी आओर व्यस्त , समय शिथिल भेलै तहन आयल -'ट्वेन्टी- ट्वेन्टी! ऐ खेलक प्रारूप मे ट्वेन्टी- ट्वेन्टी बुझू बीहनि कथा ! चलू फेर घुरि चली साहित्यमे.गद्य लेखनक प्रारम्भ उपन्यास सं भेल छल. कालान्तरे पाठकक आ लेखकक व्यस्ततावश जनमल विधा लघुकथा( शॉर्ट स्टोरी) जाहि अन्तर्गत मैथिली मे कथा गल्पक लेखन होइछ.कालक्रमे लोककें अति व्यस्तता सं पलखतिक अभाव आ साहित्यिक नव रूचिएं कथाक परिष्कृत रूप वा लेटेस्ट दर्जन रूपमे सोझां आयल बीहनि कथा(शीड स्टोरी) . आब गप्प करी विधान वा बन्हनक!पहिने बीहनि कथाकें अंग्रेजीक फ्लैशफिक्सनक टेलब्राक अन्तर्गत राखि अधिकतम 150 शब्दमे लिखबाक प्रावधान सोझां आयल. इ सुनिये मैथिली मनीषी सब छटपटा उठला! कहलनि- ऐं गद्यकें कोना कोनो बन्हनमे बान्ध जा सकैए? बान्ह आ नियम त' पद्य लेल होइछ.तहन हुनकर सबहक इ विचार आ कि हाहाकार! हास्यास्पद लागल.इ प्रत्यक्ष उदाहरण सोझां ऐछ जे उपन्यास सं लघुकथा होइत बीहनि कथा धरि अवरोही क्रममे पहुंचब शब्देक सिकुड़न थिक.कथ्यक सिकुड़न नै होइछ. अहां एकहि कथ्य सं शब्द विस्तार दैत बीहनि कथा सं लघुकथा होइत उपन्यास धरिक सृजन क' सकै छी.आ तें बीहनि कथामे अन्त खुजल रहैछ, बन्न नै.माने निष्कर्ष नै रहैछ.ओ पाठक तय करए. बीहनि कथा स्थापनाक प्रारम्भिक क्रममे विस्तृत अध्ययनक निष्कर्षत: मैथिली कथा साहित्य संकट ग्रस्त देखएल.भाय- भैय्या री, गोंधिया गोधव्वल आ नकल लात तर दबल.लतखुर्दन सन! जे सब लिखथि हुनके किछु गोटेक समूहमे ढ़ाठल.कियो एकरा ओइ ढ़ाठसं बहराकय राष्ट्रीय पटल पर ल' जेबाक मनोरथ तक नै पोसने. बस! अपन परार मे बान्हि -" हम सुनरी हमर पिया सुनरा,गामक लोक बनरी-बनरा " के चरितार्थ करैत. हमरा जन्म इएह मूल कारण हेतै जे मैथिली साहित्य अन्यान्य भारतीय साहित्यक क्रममे सबसं पाछु नै वरन् क्रम सं कतिएल सन! कतौ हेरएल- बेरएल बुझू.ऐ दुर्दशासं आहत हम, इ मनोरथ वा लौ़ल जे कही, करैत मैथिली कथा साहित्यकें बीहनि कथा माध्यमे राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय, वैश्विक बनेबाक संकल्प लेलौं.जहन विश्व भरिक विधाकें अंगीकार क' हम सब अंगेजने छी, तहन माय मैथिलीक एकमात्र चिलका/ विधा बीहनि कथाकें विश्व भरिमे पसार कि एक नै करी? अंग्रेजी साहित्यक विधाक क्रममे-- नोवेल, शॉर्ट स्टोरी होइत सीड स्टोरी पर पहुंचबाक क्रममे हिन्दी लघुकथाक नकल मैथिली मे देखएल. जे भातमे आंकड़ सन लागल.ओइ नकल केर एकटा कारण छल हमर सबहक हिन्दीयाइन भेनाइ.हिन्दी साहित्य जेना अंग्रेजी साहित्य सं प्रभावित तहिना मैथिली साहित्य हिन्दी साहित्य सं आच्छादित! तकर मूल कारण रहल हमरा सबकें हिन्दी पट्टीक अंग रहनाइ.अफन सबहक शिक्षाको माध्यम हिन्दी, जाहि सं पत्र- पत्रिका, पोथी पढ़बामे हिन्दीये ग्राह्य ! फिल्म, समाचार, आ साहित्य देखब, पढ़ब- सूनब सब हिन्दीमे तें ओइसं प्रभावित भ' ओकर कोर्ट चिलका ' लघुकथाकें पोसपुत मानि लेब स्वभाविक सन! निसंतान दंपति द्वारा पोसपुत कोर लेब बेजए नै, मुदा जहन अपना लग मए मैथिलीक चिलका बीहनि ऐछ तहन दोसराक मुंह ताकब कते उचित? कोनो नीकक अनुकरण बेजए नै, मुदा अंधानुकरण अनुचित! किएक त' नकल लेल अकल चाही से देखएल शुन्य उदाहरणार्थ- अंग्रेजीक शॉर्ट स्टोरी क अन्तर्गत मैथिलीक रचना सृजन होइछ- कथा/ गल्प. तें सब कथा संग्रह पर अंग्रेजी मे लिखल भेटत- Collection of Short stories. एत' एकटा हास्यास्पद स्थिति जे हिन्दी बलाक देखांउसे शुरू भेल लघुकथा ताहु संग्रह पर अंग्रेजी मे लिखल ऐछ- Collection of short stories. जहन कि दुनूक प्रकृति/ स्वरूप देखू जे दुनूमे पिता- पुत्र बला स्थिति.तहन त' पहिचानक संकट. एतै नकल लेल अकल केर खगता देखार होइछ.खैर! गौर करबा योगय महत्वपूर्ण बात जे मैथिली मे जे विधा ऐछ- सब कोनो ने कोनो भाषा सं आयातित ऐछ. जहन कि बीहनि कथा मैथिलीक अपन माटि- पानि पर अपन शब्दें जनमल एक मात्र पूर्णत: मैथिली साहित्यक विधा थिक. ककरो कायान्तरण, नामान्तरण, आ कि कोनो आन विधान विधान्तरण नै थिक. बीहनि कथा विधाकें मैथिली मे स्थापित भेलोपरान्त एकरा विश्व कथाक बाट पर आगू बढ़ेबाक क्रममे टेलब्राक अधिन अधिकतम 150 शब्द धरि लिखबाक सीमान राख गेल छल. आगू बढ़ैत विश्व कथा विधायक संशोधने ओ निरस्त भ' गेल.तहन ओकरा अंग्रेजीक माइक्रो स्टोरीज वर्ग में आनि स्थापित आ मान्य भेल. जाहि अन्तर्गत अधिकतम 100 शब्दमे स्पष्ट कथ्य आ गसल शिल्पें लिखल संपुष्ट कथा ' बीहनि कथा ' नामे स्थापित भेल.इ कोनो कथाक छेंट वा फिलर नै थिक. आब विश्व कथा साहित्यक अध्ययन आ निरुपण करैत आधुनिक कथा साहित्यक भिन्न वर्गीकरण सोझां आयल. जकर विवरण ऐ प्र कारें ऐछ- अंग्रेजी साहित्यमे गद्य लेखनक शुरूआत नोवेल सं भ' शार्ट स्टोरी होइत सीड स्टोरी धरि आबि क्रियशील ऐछ! नोवेलक पछाति 1896 में नव खगता आ पूर्तिक लेल जनमल शार्ट स्टोरी 1930 धरि पुरातन सन भ' गेल.1930 मेछोट कथाक नव खगता- पूर्ति वा खांहिश मे जनमल वेरी शार्ट स्टोरीज केर अवधारणा. मोन पाड़ू 1930 माने मैथिली शार्ट स्टोरीज ( कथा/ गल्प) क शैशव काल! ओइ " वेरी शार्ट स्टोरीज के कथा वर्गीकरण मे फ्लैश फिक्शन श्रेणी में राखल गेल जाहि मे अधिकतम 1000 शब्दकोश कथा रचना निहित छल. से क्रम 1990 धरि चलल. एकर पछाति फेरो एकर संशोधन परिमार्जनक खगता भेल.आ से परिमार्जन वा संशोधन भ' नव विधान आगमन -1990-1995क बीच भेल .महत्वपूर्ण बात जे ओही 90-95क बीच मैथिलीक तत्कालीन नव पीढ़ीकें मैथिलीमे " बीहनि कथा "(सीड स्टोरी)के खगता आ पूर्तिक संभावना देखएल. पहिने कथा लेखनक शुरुआत संस्कृत, बांग्लाक प्रभावे भेल छल. तें बड्डे पछुएल.इ सुनि गौरव बोध हएत जे " बीहनि कथा विधा" प्रत्यक्षत: अंग्रेजीक आधुनिक कथा विधाक समक्ष अपनाकें ठाढ़ केलक. ककरो आन भाषा/ विधाक बैशाखीक सहारे नै. से किछु मैथिलकें आंखि आ देह दुनूमे गड़ब शुरू भेलनि.मुदा बीहनि कथा ओइ संघर्ष सं पार पाबि बहुत आगां निकलि गेल. मैथिलीक किछु साहित्यकार बीहनि कथाकें शब्द संख्या द्वारा निरूपण आधारकें विरूद्ध नकारात्मक स्वरें सुगबुगेला.एत' अंग्रेजीक आधुनिक कथा विधाकें फरिछबैत वर्गीकरणक बानगी प्रस्तुत ऐछ! गद्य लेखन नोबेल सं शुरू भ' शार्ट स्टोरी होइत सीड स्टोरी पर आबि ठमकल.1896 सं गति पकड़ल शार्ट स्टोरी 1929 धरि बढ़ैत कछमछए लागल.1930 मे अंग्रेजी साहित्यकारकें शार्ट स्टोरीजक विकल्पक खगता - पूर्ति स्वरूप 1931 मे जनमल नव विधा जे फ्लैश फिक्शन कहएल.ओकरे पर्याय के रूपमे" वेरी शार्ट स्टोरीजकें परिभाषित कएल जाइत रहल. महत्वपूर्ण बात जे कथा विधाक स्वरूपमे जे कालान्तरे परिवर्तन होइत रहल ओकर मूलाधार शब्दे मात्र छल. यथा- 1000 सं1500 शब्द धरिक कथा शार्ट स्टोरीजक अन्तर्गत राखल गेल( अपवाद स्वरूप शार्ट स्टोरी 3500 शब्द धरि लिखएल ऐछ!) 1000 वा ओइ सं कम शब्द धरिक कथा फ्लैश फिक्शन वा वेरी शार्ट स्टोरी कहएल. इ कथा विकासक क्रमे आगां बढ़ैत 750 शब्द धरिक कथा सृजन होम' लगलै जकरा सडेन फिक्शन संज्ञा देल गेल. कालान्तरे आगू जा 280 शब्द धरिक कथा लिखल जए लागल जे ट्वीटरेचर नामे जानल गेल.आओर संशोधन होइत माइक्रो फिक्शन वा क्षीणकाय बला कथा विधा सोझां आयल. जाहिमे आधिकतम 100 शब्दक पूर्ण कथा लिखबाक प्रावधान छै. एकरे अन्तर्गत मैथिलीक बीहनि कथा विधा ( सीड स्टोरी) विद्यमान ऐछ! आ कही मानक ताकें पालन करैत आधुनिक कथाक विश्व पटल पर बैसबाक प्रयास मे लागल ऐछ. 1993-95 मे ब्रायन एल्डिस " मिनी सागा "नामे कथा लेखन- प्रकाशन सोझां अनलनि . जाहिमे पूर्ण 50 शब्दमे लिखबाक बन्धन छलै.49 शब्द आ कि 51 शब्द स्वीकार नै छल. ओही कठोर नियमक चलते लोकप्रिय नै भेलै. अही संग फिफ्टी फाइवर आ सिक्सटी नाइनर कथा विधा सेहो उपकलै.ब्रूस हॉलैण्ड राजर्सक 365 सिक्सटी नाइनर कथाक संग्रह चर्चित रहल. एखन धरिक अद्यतन कथा विधा सिक्स वर्ड स्टोरीज छै.जकर जन्मदाता अर्नेस्ट हेमिंग्वेकें मानल जाइछ. हुनक छ: आखरक पहिल कथा 1992 मे प्रायोगिक तौर पर छपिकें सोझां आयल. ओकर मैथिली भाषान्तर नीचा पढ़ू--- " बिकाऊ ऐछ बेबी शूज, बिनु पहिरल." आब चली बीहनि कथा ( Seed Story) पर. बीसम सदीक अन्तिम दशक! मैथिली कथा साहित्यमे एकटा नव कथा विधाक धमक भेल.ओ विधा छल- " बीहनि कथा "(Seed Story) . ओ एहेन समय छल जहन विश्व कथा समुदायमे सेहो एहेन कथा विधाक खगता आ पूर्ति लेल सीड स्टोरीक प्रादुर्भाव भेल.इ काज सर्वप्रथम 1993 मे अमेरिका मे भेल.एकर शुरुआत " Stories Bite" नामक पत्रिका द्वारा भेल.इ पत्रिका ऐ कथा विधाकें परिभाषित करैत " Seed Stories नामे बानगी वा प्रयोग स्वरूप किछु रचना प्रकाशित आ परिभाषित केलक. एकरा परिभाषित करैत ओहि मे लिखलक- " Seed stories are stone of knowledge, Idea and action. It's Called of small Moment stories. " अर्थात- एकर प्रारम्भिक अवस्थामे लोककें परिचित/ प्रेरित करबा लेल संपूर्ण U. S. A मे रेडियो पर प्रसारण आ टी. वी रिले अनिवार्य क' देल गेल छल. इ महज एकटा सुखद संयोग छल जे कथा विकासक क्रममे विश्व साहित्य पटल पर जाहि आधुनिक कथाक खगता बुझल गेल ओही समकाल भारतीय साहित्यक मैथिली कथा साहित्य मध्य सेहो एहेन कथा विधाक बीजारोपणक खगता आ पूर्तिकें अकानलनि. जे संपूर्ण भारतीय कथा साहित्यक एकटा परिवर्तनकामी आ क्रान्तिकारी डेग छल. ध्यातव्य जे पहिने जे मैथिली कथा साहित्य भारतीय कथा साहित्यक क्रममे पांतिसं बाहर छल, उएह बीसम सदीक अन्तिम दशक मध्य विश्व कथा परिदृश्यक समकक्ष भ' कान्ह उठेलक.आ वर्ष 1995 सं उठैत- बैसैत,ठोकाइत- पिटाइत पूर्ण परिष्कृत रूपमे आविष्कार स्थापित भ' गेल.आब टघरल- सरल नै वरन् दौगैत मोकाम दिस बढ़ि रहल. .....! बीहनि कथाक दशा- दिशा पौराणिक उत्सें( स्रोतें) बहरएल कथाक ,संशोधित ,संबर्द्धित ओ परिष्कृत आधुनिक संस्करण थिक " बीहनि कथा"! जकरा स्पष्ट कथ्य आ गसल शिल्पें न्यूनतम बीस आ अधिकतम डेढ़ सए शब्द धरि लिखबाक प्रावधान ऐछ! इ आन कोनो विधाक विधान्तरण, नामान्तरण वा कायान्तरण नै, संपुष्ट कथाक एकटा स्वतंत्र विधा थिक! वर्तमान स्थिति:- गद्य लेखन उपन्यास( नोवेल) सं शुरू भ' लघुकथा (शॉर्ट स्टोरी) होइत बीहनि कथा ( सीड स्टोरी) धरि पहुंचल. वर्तमान मैथिली कथा साहित्य मध्य पूर्ण प्रासंगिक , सर्व परिचित आ लोकप्रिय विधा भ' स्थापित भेल. लघुकथा छल त' बीहनि कथाक खगता ? :- समयान्तरे ,विकासक क्रमे खगताक जन्म होइछ. से समयावधिक अनुसारे प्रासंगिक होइछ आ तखने ओकर पूर्ति सेहो आवश्यक. जेना जहन चलनसारि मे समाद लेल चिट्ठी छल त' तार ( टेलिग्राम)किए आयल? चिट्ठी मे लोक अपन मोनक बात खुलि के लिखै छल, कोनो बन्हन आ नियम/ प्रावधान सं मुक्त! मुदा तार? तार( टेलिग्राम) मे अपन बातक निचोड़ किछु सिमित शब्दें कहि पाठक/ पावककें पूर्णत: क्रियाशील बना दै छल. त' ' लघुकथा' चिट्ठी भेल जकरा लिखबाक कोनो सिमाना/ विधान नै, आ बीहनि कथाकें तार बुझू जे अल्प शब्दक स्पष्ट कथ्य आ गसल शिल्पें संपुष्ट कथाक खगतापूर्तिक निश्शन माध्यम भेल. अन्य पक्ष देखू :- भाषण- कोनो बात बजैत चलू... कोनो लगाम नै! मुदा कोनो निश्चित विषय- बस्तु पर विद्वतापूर्ण विचार कहाइछ- बीज भाषण! एहिना संस्कृत मे शुद्धिकरण वा सशक्तिकरण लेल रचल गेल मन्त्र( श्लोक नै) आ तकरो सक्षम वा प्रभावी बनेबाक खगतापूर्तिक लेल आयल बीज मन्त्र! जेना बीहनि कथाक कथ्यकें ( शब्द नै) विस्तार दैत शाॉर्ट स्टोरी सं नॉवेल धरि रचि सकै छी तहिना एकटा बीजमंत्र ( ऊं.. हीं.. क्लीं...) सं अनेको मंत्र जन्म लेने ऐछ! ओहिना बहुत रास कथा रहितो ओकर सशक्त वा परिष्कृत रूपमें उपस्थित ऐछ बीहनि कथा! वैश्विक स्थिति :- जहन हम सब विश्व विधाकें अंगिकार क' अंगेजने छी तहन अपन एकमात्र विधा " बीहनि कथा "कें विश्व भरिमें किए नै पसारि सकै छी? मुदा ताहि लेल पहिने बराबरी त' क' ली! विश्व कथा साहित्य उपन्यास सं चलि- वॉन्डर स्टोरीज, हण्ड्रेड वर्ड स्टोरीज, फिफ्टी फाइव वर्ड स्टोरीज, वन लाइनर होइत सिक्स वर्ड स्टोरीज पर अंटकि प्रकाशन आ विमर्श मे लागल ऐछ आ हम सब एकैसम सदीमे आइयो छी बीहनि कथाकें बढ़बाक- रोकबाक घोंघाउज मे फंसल! बीहनि कथा मैथिली कथा साहित्यक चर्चित, परिचित आ लोकप्रिय विधाक रूपें भलहिं ख्यात भेल हुअए मुदा वैश्विक परतर मे पांति सं बाहर.से अदौ काल सं! विश्व साहित्यक मुकाबले भारतीय साहित्य बड्ड पछुएल, आ भारतीय साहित्य मध्य मैथिली साहित्य मात्र पछुएलटा नै वरन् विकासक क्रम में क्रम सं बाहर हेरएल- भुतिएल!हं मौखिक आ फेसबुक पर वैश्विक सं उपर. बीहनि कथा भलहिं मैथिली कथा साहित्यक संशोधित, परिमार्जित आ परिष्कृत आधुनिक संस्करण भ' उभरल मुदा आन भाषाक समकक्ष विधा सं बड्ड पछुएल सन! जेना बीस सं एकसए पचास शब्दमे अनबाक कारण लेखककें लघुकथाक मानसिकता सं उबारि मानस पटल पर बीहनि कथाकें समाहित करबाक उद्देश्य छल. एकरामे एखनहु कतेको दोष ऐछ जकरा आओर परिष्करणक खगता ऐछ विश्व साहित्यक धारा मे अनबाक लेल. समवेत प्रयास चलि रहल... सबहक सहयोग सादर अपेक्षितअपेक्षित! (5 मार्च " बीहनि कथा " दिवसक शुभकामना क संग -मुन्नाजी) बीहनि कथाक विकास मे अवरोधक तत्व मैथिली " बीहनि कथा विधा " आब लिखित अवधारणा/शास्त्रीय पक्ष आ निर्धारित मापदण्ड पर ठाढ़ भ' व्यवस्थित रूपें मोकाम दिस बढ़ि रहल. ताहि स्थिति मे लघुकथा नामक अस्तित्व हीन, मौखिक आ तथाकथित विधाक आढ़ मे एकरा धकिएबाक षडयंत्र चलि रहल. केकरो नीक चीज कें अनुकरण करब बेजए बात नै ( मैथिली मे बीहनि कथाक अतिरिक्त सब विधा उधार, पैंचे ऐछ) 1995 मे बीहनि कथा मैथिलीक एकटा स्वतंत्र विधाक रूप मे गोरा पर बैसल.1997 मे नामक नकल मात्र कएल तथाकथित विधा लघुकथाक पहिल संग्रह आयल. मोन पाड़ैत चली जे मैथिलीक अग्रणी विद्वान द्वारा लघुकथा ( Short Story) अदौ काल सं कथा/ गल्प रूपें एकटा व्यवस्थित विधाक रूप मे मैथिली मे विद्यमान ऐछ! नकल कएल तथाकथित लघुकथाक 1997 सं आइ 21 म सदी धरि कोनो लिखित मापदण्ड नै ऐछ, मौखिक घोंघाउज मात्र. यानी - लघु त' केकरा सं लघु, कतेक लघु , केहन लघु? कोनो प्रकृति, स्वरूप निर्धारित नै.एकर सवालक जवाब मे विद्वान सब कहै छथि- मानि लियय जे छोट भेल त' लघुकथा, ओइ सं पैघ त'कथा, ताहि सं पैघ दीर्घकथा आओर पैघ त' उपन्यास.....! एकर सत्यता कें लिखित रूपें सोझा रखलनि कथाकार, आलोचक, प्रो. डा. अशोक अविचल.ओ ज्ञानवर्धन कंठ जीक लघुकथा संग्रह " लुखिया"क भूमिका मे लिखै छथि-" इ स्पष्ट क' दी जे कतिपय प्रयासक पश्चातो एकर कोनो शास्त्रीय आधार की नियत मापदण्ड हमरा उपलब्ध नै भ' सकल, जाहि मे लघुकथा परिभाषित हो आकि एकर समीक्षा हेतु विन्दुवार कोनो मापदण्ड निर्धारित भेल हो."-- अशोक अविचल ध्यातव्य इ जे एकैसम सदी मे जकर आधार, अस्तित्व मौखिक आकि फेसबुकिया मात्र रहै तकर तुलना मैथिलीक अपन एकमात्र व्यवस्थित विधा( बीहनि कथा) सं करब मैथिलीक लेल निन्दनीय आ कि घोर अपमान नै थिक? बीहनि कथाक विकास मे लागल समस्त रचनाकार हुनका सं साकांक्ष रही जे दुर्भाग्यपूर्ण दुष्प्रचार करै छथि- बीहनि कथा, लघुकथाक बदलल नाम थिक, लघुकथा छै त' बीहनि कथा किएक....? त' बीहनि कथा अंधानुकरण, नामान्तरण आकि विधान्तरण नै, एकटा निर्धारित मापदण्ड पर ठाढ़ स्वतंत्र विधा थिक. तुलना होइछ बरोबर मे. बीहनि कथा सन मौलिक विधाक तुलना अस्तित्व हीन, मौखिक विधा सं करब पूर्णत: अनुचित. निष्कर्षत: - लघुकथाक बहन्ने बीहनि कथाक बाट अवरोध करबाक षडयंत्रक अलावे और किछु नै ऐछ! एहन षडययंत्रकारी सबके चिन्हित क' कतिया/ बेरा मोकाम दिस बढ़ल चली....! अनीता मिश्र २टा बीहनि कथा १.तलाक जज साहब:-निर्मला देवी! हमरा बहुत आश्चर्य लगि रहल अछि कि साठि वर्षक उम्र में आहाॅं अपन पति सऽ तलाक लेवऽ चाहैत छी।जखन कि अखने आहाॅंक परिवारक विशेष आवश्यकता अछि। निर्मला देवी:-जज साहब! हम अपन फायदा लेल, हमरा पर कोनो पति अत्याचार केलनि अछि, ताही लेल तलाक नहि लेबऽ चाहैत छी। अई विकसित युग में अखनो बहुत पुरुष के दिमाग में ई विचार जड़ सऽ जकड़ल छनि कि घऽरक काजक जिम्मेबारी केवल महिला के छनि चाहे वो बाहरक काज कऽलेथि,हम चाहैत छी कि जीवन के अंत समय में हमर पति सोचथि कि हुनकर ई धारणा गलत छलनि।आगाक पीढ़ी से हो अही बात के बुझि सकय! २.एहसास सुधा चाहक कब टेबुल पर राखि कऽ पिबक लेल फैसले रहथि कि फोनक घंटी टुन-टुनाय लगलनि। दौड़कऽ भन्शा घर सऽ फोन लेलीह। सुधा के माय:-"देख सुधा! बुढ़िया कतबों चिकनी चुपड़ी बनि कऽ देखबौक ओकरा झांसा में नहि अवियांह।जे करबौ से हमही,साऊस कखनौ अपन नहि हेतौक" चुपचाप फोन राखि सुधा चाह पिबऽ लगलीह तखनहि कान में साऊसक शब्द सुनाई पड़लन्हि। मृणाली (सुधाक ननदि) सऽ फोन पर बात करैत छलीह,"कोनो बात नहि बेटा साउस पैघ आ आदरणीया छथि।हुनकर ताना और डाॅंटो में आशीर्वादें भेटत।आहाॅं जवाब नहि देबनि"। सुधा के एहसास भेलनि जे मृणाली सर्वगुण संपन्ना के संग रूपवती आ उच्च शिक्षित छथि। ताही पर सऽ हमर साऊस एतेक दहेज देलखीन तखन मृणाली के साऊसक लेल सुनकर मन में एतेक आदर!!हमर मायके एकौटा रुपैया ने दहेज देवऽ पड़लनि,तखन हमर साऊसक लेल हरदम जड़ल -भुजल शब्द! नीरज कर्ण बीहनि कथा- "छुच्छे" "बाप रे बाप भीड़ रहए नेताजी के भासन में, नै पूछू।" लखना उमकैत बाजैत घर में घुसल। "हँ किये नै। और अहाँ के काजे की। मुदा भासन स' पेट नै भ'रत।" घरवाली गुम्हरैत बजली। "अरे एते स्कीम सब आइब रहल छै हमरा सब के काज दै के लेल कि.. छोड़ू अहाँ की बुझबै। बड भूख लागल अइछ। भोजन में की सब बनेलौं।" हाथ-मुँह धोऐत लखना पुछलकै। "की सब ने कहू..। चाउरक रोटी और अहाँकेँ नेताजी के भासनक तरकारी।" भनसाघरसँ आवाज अएल। "आईं.. भासनक तरकारी के की माने!" घरवाली आगू में जखने थारी रखलखिन लखना अपने आप माने बुइझ गेल। आ रोटी चिबबैत सोच' लागल 'नेतासब के भासन ठीके में "छुच्छे" होइछै की।' सुचिता कुमारी बीहनि कथा- अनेरुआ आइ भोरे सअ एतेक जोर बरखा भ रहल छल जे घर स निकलब दुरलभ छल। सुनैना चिंतित छलीह जे कखन ई पानि छूटत से नहि जानी। धिया-पुता के स्कूलक देरी भ गेल आ ओ अपनो आइ ऑफिस नहि गेला। ओ ई सब सोचिते छलीह कि तखनहि हुनक दस बरखक बेटा आबि क कहअ लगलनि , "मम्मी मम्मी आब स्कूल कखन जाएब, देखु ने कतेक देरी भ गेल। " "आब आइ कोना स्कूल जाएब एतेक पानि में। " "की हेतै हम छत्ता लगा कअ चलि जाएब।" "एहन पानि में जे निकलत ओकर दिने बूरल हेतै ने। " "देखियौ, गली में कए गोट अनेरुआ गै घूमैत अछि ,त कि ओकर सबहक दिन बूरल छै।" पोतीक बियाह राम दुलारी काकी के बड़की पोतीक विवाह ठीक भेलनि अछि। बड़का बेटाक फोन आएल रहैन जे छोटका संगे विवाह में आबि जाएब । काकी के दूटा बेटा रहैैन, बेटी नहि देने रहथिन भगवान तैं पोतीक विवाह देखबाक बड़ मोन रहैन हुनका। अपन बियौहती हार ओकरा देबाक वास्ते काकी रखने रहथिन। विवाहक खबरि सुनिते ओ जेबाक ओरिआओन में लागि गेली। काकीक बड़का बेटा कलकत्ता में बड़ पैघ वकील छलैन, मुदा छोटका के नहि कोनो नोकरी भेलै, आ ओ खेतीबारी सअ अपन परिवारक भरणपोषण करैत छल। बाबूक मरलाक बाद माएक देखभालक दायित्व सेहो एकरे छलैक। विवाह में जेबाक तैयारी पूरा भेलाक बाद काकी छोटका सअ पुछलथिन "कहिया जेबहक कलकत्ता? " "से कियैक" "पूजीया के बियाह छैक से बीसरि गेलहक? " "मुदा माए हम बियाह में त नहि जा सकब। " "से कियैक? " "अहा त बुझिते छी जे हमर आर्थिक हाल नीक नहि अछि, आ एहि बेर फसिल बढिया नहि भेल। आ फेर कलकत्ता जाए में त टाका लगतै से कहाँ सअ लाएब। भैया तअ सीधे एबाक लेल कहि देलाह, एको बेर पुछबो नहि केलाह जे टिकटक पाइ छह कि नहि? " "बेटीक बियाह में अपने कतेक खर्च होइत छैक त तोरा ओ पाइ लेल की पुछतह। " "हमरा छोरु मुदा अहां तअ माए छिऐन अहां के त आबि कए लअ जएता, आ नहि त कम स कम टिकटो कटा कअ पठबिताह। हमर हाल तअ बुझले छैन हुनका। " "छोड़ह ई सब गप्प, तु नहि जेबह तअ नहि जा मुदा हम त जाएब, हमरा लग किछु टाका अछि, जाहि से आबए-जाए के टिकट भ जाएत। " "मुदा अहां जाएब ककरा संगे। " "हम एसगरे चलि जाएब, तु गाड़ी पर बैसा दिहअ, आ बडका के फोन कअ दिहक, ओ हमरा कलकत्ता स्टेशन पर आबि क लअ जाएत। " "ठीक छै त अहां काल्हि गाड़ी पकड़ि लिय परसु बियाह छैक ,ओहि दिन भिनसरे पहुंच जाएब। आ फेर जहिया एबाक होएत हमरा फोन कअ देब हम दरभंगा स्टेशन पर स अहां के लअ आएब। " "ठीक छैक। " एम्हर कलकत्ता में बियाह दिन सभ गोटे तैयारी में लागल छलाह। बरियातीक एबाक समय भअ गेल छलै। कन्याक पिता अपस्यात भेल काज में लागल छला कि तखने देखैत छैथ जे माए आगु में ठाढ छैथ। "माए अहां, एखन एलहुं, सबेरे किएक नहि एलहुं, आ एसगरे एलहुं, छोटका नहि आएल संगे ? " "छोटका नहि आबि सकल, हमरा गाड़ी में बैसा कअ ओ कहने छल जे तोरा फोन कअ देतह , आ तु स्टेशन आबि जैतह। गाड़ी त भिनसरे पहुँच गेल , कतेक काल तोहर बाट तकलहुं तु नहि एलह दुपहरिया भअ गेल तखन एकटा टैक्सी पकड़ि ओतअ स बिदा भेलहुं, कतेक बौआ क एखन घर पहुँचलहुं। "मुदा हमरा फोन नहि आएल, ऐ यैइ काल्हि छोटकाक फोन आएल छल? " "हं फोन त आएल रहै, मुदा अहां काज में व्यस्त छलहुं, तैं हम नहि कहलहुं। " पत्नीक उत्तर स वकील साहब खीसीया जाइ छैथ, "अहांक कारण माए के कतेक परेशानी भेलैन, आ अहां बादो में नहि कहलहुं जे छोटका फोन केनेे छल। " "जै दहक की भेलै बियाह स पहिने हम आबि त गेलहुं, आ कनिया पूजा कतअ अछि कने देखतियैक "। " ओ अपन रुम में तैयार भ रहल अछि। " "हम ओतहि जा कअ भेंट क अबै छी। " काकी जा कअ पोती के भरि पांज धअ लैत छथिन, आ गर में अपन बला हार पहिरा दैत छथिन, ताबेत पाछु-पाछु पुुतोहु सेहो आबि जाइ छैन। "मम्मी दादी के एतअ कियैक लअ एलियन, ओ हमर सभटा मेकअप खराब क देली, आ ई ओल्ड फैशन हार हमरा पहीरा देली अछि। " "कोनो बात नहि बेटा अहां अपन मेकअप ठीक कअ लिय,आ ई हार लाउ हम राखि लैत छी। आ माए ई चलते किछु जलपान क लेथ। " किछु काल बाद काकी जखन जलपान करैत जलील त हुनक कान में बेटाक स्वर सुनाई देलक, । "हे यै, सुनै छी,माए लेल कोनो घर में ओछैन कअ दियौ बड थाकि गेल हेती, किछु काल अराम क लेती। " "आब हुनका लेल बिछौना कोन घर में करियनि,सभ में त पहिने स गेस्ट सब भरल अछि, पहिने अहां कहलहुं जे माए नहि एती। आब ओ एलीह अछि त आब एखन कतअ व्यवस्था करियनि। " "ई अहां की कहैत छी, कतहुँ व्यवस्था कअ दियौन , माए थाकल छैथ। " ई सुनिते काकी ओतअ आबि जाइ छैथ। "की भेलह बौआ हमरा लेल किएक परेशान होइत छी, हम त बियाह देखबाक लेल एलहुं अछि, राति भरि बियाह देखब आ भोरे चलि जाएब गाम। हमरा लेल बिछौन नहि करु। " "से किएक भोरे चलि जाएब माए, आब एलहुं अछि त किछु दिन रहब ने। " "नहि बौआ हमरा एतअ मोन नहि लगैत अछि,हम त बियाहे देखबाक लेल आएल छलहुं। ओहि के बाद रहि क की करब एतअ। " "ठीक छैक जे अहांक इच्छा। " ऑनलाइन क्लास "ऐं रौ भरि दिन अहिना सुतले रहबैं, कि पढबो-लिखबो करबैं। " गणेशी अपन बेटा राजू के देह डोला कअ उठबैत बाजल। " ओह पप्पा सुतअ दिय ने, उठि क करब की स्कूलो बंद छै। " "स्कूल बंद छै त की भेलै, घर में लोक पढै नहि छै। गप्प सुनु एकर स्कूलो बंद छै। " "घर में पढ़बै ककरा स किछु पुछबाक हेतै त के बतेतै?" "आ मालिक के बेटा कोना पढै छै, जखन जाइ छी तखन ओ कहै छैथ जे रवि पढ़ि रहल अछि , अगिला साल मैट्रिक क परीक्षा हेतै ने तैं बड मोन लगा क आइ-काल्हि पढैत अछि ओ। त फेर ओकरा किछु पुछबाक रहैत हेतै त ककरा स पुछैत हेतै। मालिक अपने हिन्दी मीडियम स मैट्रिक पास छैथ, हमरा नहि बुझाइत अछि जे एखुनका अंग्रेजी मीडियम के किताब हुनका पढाएल होइत हेतैन। घर में आओर दोसर किओ त पढल छनि ने। " गणेशी एकटा चूड़ा मील में काज करैत छल आ ओकर मालिक के बेटा एकरे बेटा क तुरिया छलैक, दुनु परुका साल मैट्रिक क परीक्षा में बैसत।एगो सीबीएसई बोर्ड स त दोसर बिहार बोर्ड सअ। "रवि के बाते दोसर छै ओकर नाम शहरक सबसअ पैघ स्कूल में छैक। " "पैघ स्कूल में नामे रहला स की हेतै स्कूल त ओकरो बंदे छै ने। " "अहां नहि बुझबै पप्पा ,बड़का पराइवेट स्कूल सभ में धिया-पुता सभ बड़की टा मोबाइल जे होइ छै जकरा स्मार्ट फोन कहै छियैक ओहि स घरे बैसल पढै छैक माने ऑनलाइन क्लास करै छै। " "मोबाइल स कोना ऑनलाइन क्लास कराएल जाइ छै, फरिछा कअ कह ने। " "स्कूल के सर, मैडम सभ मोबाइले पर पढबै छथिन, सवाल सभक उत्तर सेहो मोबाइलेपर दैत छथिन। " "त पराइवेट स्कूलक विद्यार्थी स्कूल बंदो में पढि सकै छैथ। आ सरकारी स्कूलक विद्यार्थी लेल कोनो व्यवस्था नहि। " "व्यवस्था त सरकारी स्कूल क विद्यार्थी लेल सेहो छैक मुदा ओहु सअ अपना सभ के कोनो लाभ नहि। " "एहन की व्यवस्था छैक जे। " "सरकारी स्कूल क विद्यार्थी सभ के टीवी पर पढाएल जाइ छैक। जेना स्कूल में अलग-अलग विषय के अलग-अलग सर मैडम पढबै छथि , अहिना टीवी के एकटा चैनल पर सभ क्लासक सभ विषयक पढाई लेल अलग-अलग समय आ टीचर निर्धारित छैक। मुदा अपना सभ लग ने टीवी अछि ने बड़का मोबाइल त ऑनलाइन क्लास हम करब कोना। तैं भरि दिन सुति कअ हम अपन समय बितबै छी।" "माने जकरा घर में टीवी नहि छै, बड़का मोबाइल नहि छै ओकर बाल-बच्चा आब पढतै नहि। " "पढतै त ओहो मुदा भगवान भरोसे। " ईनर रमेश बाबू आइ जखन घर पहुँचला तअ जाड़ सअ हाड़ हीलि गेल रहैन। अगहन मास, छौए बजे एहन अन्हार भअ जाइत छैक जेना कतेक राति भअ गेल हो। दिन में तअ करगर रौउद रहै छैक मुदा साँझ पड़िते, जाड़-बसात बढ़ि जाइत छैक। रमेश बाबूक अॉफिस कने दूर रहैन, तैं घर पहुंचैत -पहुंचैत अन्हार भअ जाइत रहैन। भोरु पहर जाय काल में अो रौद देखि सुइटर नहि पहिरला,तैं अबैत काल जाड़ खेहाडि मरलकनि। घर पहुँचते श्रीमती सअ कहलथिन , "आइ हमर सुइटर सब नीकालि दिय।बड जाड़ भेल आइ बाट में अबैत काल। " "हम त कहिए सअ कहैत छी जे आब जाड़ आबि गेलै, बिना साल-सुइटर के अॉफिस नहि जाउ, त अहीं नहि सुनैत छलहुं। " श्रीमती शिकायतक स्वर में बजलीह। "हँ त आब कहैत छी त आब निकालि दिय। " रमेश बाबू अपन गलती के नुकबैत बजलाह आ सोचअ लगला जे जाड़ तअ सही में अॉफिस सअ अबैत काल एकटा सुइटर के बराबर आठ दिन पहिने सअ होइत छल । मुदा अॉफिसक कोनो बाबू के नहि देखैत छियैन जे सुइटर या साल लअ कअ अबैथ। आ सभ सअ पहिने हमही जे सुइटर पहिरअ लागू त सब की कहत। यैह कारण सअ एतेक दिन कहुना काटि लेलहुं।मुदा आजुक जाड़ के देखि लगैत अछि जे आब नहि एना चलत,आब तअ सुइटर पहिरहे पड़त। श्रीमती सुइटर आ साल दुनु निकालि देलनि।रमेश बाबू अपन बैगक तरका खाना में नुका कअ सुइटर राखि लेलाह आ सोचला केओ देखि नहि लै जे हम सुइटर लैल छी आ जाबेत धरि दोसर ककरो नहि देखबनि सुइटर पहिरने ताबेत धरि तअ नहिए पहिरब । बाट में अॉफिसक बाबूक संग जाहि ठाम छुटि जाएत ओहिठाम सअ हम सुइटर पहिर लेब। रमेश बाबू अबैत काल एक नजरि सभ स्टाफ पर देलनि मुदा किनको सुइटर पहिरने नहि देखलखिन। आब रमेश बाबू एहि फिराक में लागि गेला जे सुइटर कोनठाम पहिरता जे केओ देखैन नहि। हुनका संगे चारिटा स्टाफ एकहिटा टैम्पू सअ विदा भेलखिन। ओना ओ सब आन दिन स्टेशन धरि संगे रहैत छलखिन मुदा आइ महावीर बाबू के हुनके घर लग एक गोटे ओतअ जेबाक छलैन तैं ओ रमेश बाबू के संगे हुनक घर धरि रहला। आ एहि के परिणाम ई भेलै जे रमेश बाबू के सुइटर पहिरबाक अवसर नहि भेटलनि। आ घर अबैत-अबैत जाड़ सअ थरथरा गेला। पत्नीक बात सेहो सुन पड़लनि जे जखन सुइटर लअ गेल रहुं तअ फेर पहिरलहुं किएक नहि? दोसर दिन भोरु पहर रमेश बाबूक कान में पत्नीक स्वर पड़लनि, "यऊ उठु ने कतेक सुतब ,आइ अॉफिस नहि जेबाक अछि की। " रमेश बाबू धड़फडा कअ ऊठि बैसला, देवाल पर टांगल घड़ी पर नजरि देलनि तअ पूरे आठ बाजि रहल छल। पत्नी दिस देखि बजला, "एखन धरि हम सुतले छलहुं, आ अहुं आब उठबअ एलहुं "? " हम त कखने सअ उठा रहल छी, अहीं घोड़ा बेचि कअ सुतल छलहुं। " पत्नी उत्तर देलथिन। "आइ मोन कने भारी लागि रहल अछि, बुझि पड़तै अछि बोखार लागि गेल। रमेश बाबू बजलाह। ई बात सुनिते पत्नी के मौका भेटि गेलनि अपन मोनक भरास निकालबाक।सुनबअ लगलीह, "बोखार होएत नहि, आओर दोसरक देखसी करु, जाड़ हेतै तअ लोक ई देखतै जे आओर लोक सुइटर पहिरने अछि कि नहि दोसर पहिरता तखने हमहूं पहिरब। एतेक दिन साल सुइटर निकलल नहि रहै त कहैत छलहुं जे नीकालि नहि दैत छी। आ आब जखन नीकालि देलहु तअ सुइटर पहिरलहुं नहि।ऑफिस सअ घुरा कअ लेने एलहुं। तखन आब बोखार भेनाइ तअ स्वाभाविक छल, आब भोगु। "हं तअ भोगिए रहल छी ,आ आब अहां बेसी भाषण नहि दीय, जल्दी स हमर मोटका सुइटर नीकालि दीय आ मोफलर सेहो ।" रमेश बाबू खौइझाइत बजलाह। ताहि पर पत्नी कहलखिन, "त आब एखने सअ मोटका सुइटर पहिरब? "हं आइ बड जाड़ भअ रहल अछि आ जल्दी नीकालि दिय अॉफिसक देर भअ जाएत। "रमेश बाबू बजलाह। रमेश बाबू आइ मोटका सुइटर आ मोफलर पहीरि अॉफिस पहुंचलाह आ पहुंचते महावीर बाबू पूछि बैसलखिन, "की बात रमेश बाबू आइ लेट भअ गेलहुं, आ मोन ठीक अछि ने इ सुइटर मोफलर पहीरि कअ एलहुं, की बात? " "मोन नीक नहि अछि, जाड़ बोखार भअ गेल। " रमेश बाबू उत्तर देलखिन आ पुनः जिज्ञासा भरल स्वर में महावीर बाबू सअ पुछलखिन, "ऐ यऊ एकटा गप्प पुछु"। " की पुछु ने" महावीर बाबू बजलाह। तखन रमेश बाबू पुछलखिन "अहां ई पतरका शर्ट पहीरि कअ अबै छी से जाड़ नहि होइत अछि अहां के। हमरा तअ काल्हि घुरैत काल से जाड़ भेल जे बोखार धअ लेलक आ अहां कतेक बढिया छी। महावीर बाबू हंसैत जवाब देला, " से की यऊ जाड़ कियै होएत हमरा, ई पतरका शर्टक भीतर कहिए से हम एकटा पतरका सुइटर पहीरि कअ अबैत छी। जकरा आइ काल्हि लोक सभ ईनर कहै छैथ। रमेश बाबू महावीर बाबूक बात सुनि मुंह बौने ठारे रहि गेला। एहि पर महावीर बाबू टोकलखिन, " की बात की भेल। " "नहि किछु, रमेश बाबू बजला, अच्छा त महावीर बाबू ई बताऊ जे जखन बेसी जाड़ होएत तखन मोटका सुइटर आ कोट अहां पहिरब शर्टक ऊपर स आ ०तखन ई पतरका सुइटर माने कि ईनर के शर्टक भीतर पहिरबाक की अभिप्राय भेल? " एहि पर महावीर बाबू कहअ लगलाह, "देखु रमेश बाबू एखन ई पहिलुक जाड़ में जाड़ त सबके होइ छनि, मुदा केओ ई देखबअ नहि चाहै छैथ जे हुनका जाड़ होइत छैन तैं ओ शर्टक तर में ईनर पहीरि लैत छैथ। मुदा जखन जाड़ बेसी बढि जाइ छैक माने पूस माघ में, तखन जे हम शर्टक तर में मोटका सुइटर पहीरि लेब तखन जाड़ त हमरा नहि होएत मुदा अहां की बुझब जे महावीर बाबू लग एगो सुइटर नहि छैन एतेक जाड़ में अहिना आबि जाइ छैथ। महावीर बाबूक बात सुनि रमेश बाबू हक्क-बक्क ठारे रहला आ सोचअ लगला जे, एहि के मतलब ऑफिस में सब गोटे के जाड़ होइ छैन आ सब गोटे ईनर पहीरि कअ अबैत छैथ। आ हम हिनका सबके फेरी में पडि जाड़े थरथरेलहुं आ मोनो खराब केलहुं। ओ ठीके कहैत छैथ जे हमरा सन बुड़बक केओ नहि होएत। चित्र: श्वेता झा चौधरी अंजू खरबंदा (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) मुखिया रीता चौखटिए पर सँ दगलक प्रश्न - "ओ" टूर सँ आपिस आबि गेलथुन्ह? नहुँए सँ सुलभा उतारा देलकै - "नै गे! अखन धरि तँ नहि।" रीता कुर्सी घीचैत सशंकित भ' पुछलकै - "लाथी नहितन! तँ बाहर गैलरीमे किनकर पुरखाहा कपड़ा सभ सुखाइ छौ?" -आन लोकक नजरि सँ सुरक्षित रही तैं हुनक कपड़ा केँ गैलरीमे टांगि दैत छियै। -से किए? -एहि सँ दोसरा केँ लगै जे पुरुख घरे पर छथि। -तकर माने की? -नहि तँ ओ सभ सोचत जे असगरुआ जनिजाति... नेना-भूटका संग हमर बिगाड़िए की लेत!" रवि प्रभाकर (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) अदकल जीह ओ बिधव अनुनय-विनय करैत अछि अपन पड़ोसिन सँ - "दीदी, जतय हम काज करै छियै ने ततय सँ जे घुरबै तँ मुंहारि सांझ बीति गेल रहतै। तैं अपन मुन्नी केँ हिनका लग छोड़ने जाइ छियन्हि। रखथिन्ह ने?" - हमरा परीक्षा लैत छी अहाँ?आब तँ अहाँक गाम सँ दियोर आबि रहैत छथि तखन...? - यैह तँ बात छै, तैं हिनका लग छोड़ने जाइ छियन्हि। सतीश खनगवाल (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) घुरपेंच मंत्रीजी हारल नटुआ जकाँ बड़बड़ाइत छलाह - "आब कोन घुरपेंच बाँचल? सबटा तँ लगाओल- राष्ट्रवाद, राष्ट्रद्रोह, आतंकवाद आ साम्प्रदायिकताक उधबा उठा क' सेहो देखि लेलहुँ। इहो पर्यन्त कयल जे आंदोलन केँ हिंसाक फुलपैंट पहिरा देलियै मुदा वैह स्थिति यथावत।" एतबा सुनतहि सैक्रेटरी टुसलक - तँ एहि बेरि सरकार पाछु घुसकि जेतै की? सरकारक पिट्ठू केँ जेना लेसि देने हो, तरंगति कहलकै - "केहन बात करैत छी यौ! अहाँ एकटा काज करु। पुलिस, सीबीआई, ईडी केँ कहियौ जे आंदोलनी नेता सभक तार विदेश सँ जोड़ि, जाँच करय। शेष काज तँ हमर मीडिया कैए देत।" ई सुनि सैक्रेटरी हिचकिचायल - "जँ अहू सँ बात नहि सुढिएल तखन? "तखन?तखन तँ आंदोलन केँ जतेक नमरा सकै, नमराब' दियौ। आम जनता आ लोकल लोक जतेक फिरसान हेतैक ओतेक सरकारक लेल नीक हेतै। एकदिन यैह जनता आंदोलनक खिलाफ उठि ठाढ़ हेतैक।" विजय 'विभोर' (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) अन्नदाता पीपरक गाछ तर खटियापर बैसल मालिक पुछलथिन - "रौ रमुआ! एहि बेर किनका भोट देबहुन?" रमुआ पटौनीकढेकुल थिर करैत उतारा देलकै - "मालिक! हमर भोट तँ हुनके पड़तै जे हमर अन्नदाता छथि।" मालिक पीत सँ अन्हराइत, ठाढ़ होइत कहलथिन्ह - "आयं रौ स्सार, हरामी! एकर माने तों हमरा भोट नहि देबें।" योगराज प्रभाकर (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) थाल आ कमल -एह! एहि बेर इंद्र महाराज थहि-थहि क' देलथिन यौ मालिक, कैक साल बाद एहन थाल-कीच देखबामे एलैए। खेत सभ जल -मगन! -हँ, से तँ ठीक्के छैक मुदा एकरे कारण हमर पोखरि भथाएल जा रहल अछि। गंगेजल किए नहि बरखो ताहि सँ की, सभक माटिक कटान तँ पोखरिएक पेटमे समाइ छैक ने। थाल तँ थाले ने कहौतै। -बरखामे जे होइत छैक से तँ ऊपरवाला करबै छथिन, एहिमे आम जनताक कोन दोख? -पोखरिक स्थिति देखि लोक नाक बन्न करैत जाइत अछि। नीक-बेजाय के सुनाए? अच्छा! एकरा भरबाए दैत छिऐक। -नै यौ मालिक, लोकक बात केँ माइन नहि राखु। -तँ की कहैत छह जे हम क' सकी? -थोड़ धैरज राखू। हम सभ एहि पोखरि केँ नीक सँ देख-रेख करबै, मेहनति करबै। अहाँ एक दिन देखबै मालिक जे यैह थालमे कमल फूलेतैक आ सभक मुँहपर सपटी लागि जेतैक। सदानन्द कविश्वर, 39- बी, पॉकेट ए-11, कालकाजी एक्सटेंशन, नई दिल्ली- 110019 (हिन्दी सं मैथिली भाषान्तर- मुन्ना जी) नाङरि हिलेबाक फयदा हाउसिंग सोसाइटीक पार्क मे पोसुआ आ अनेरूआ कुकुर संगे खेलाइत आ बतियाइत छल. वर्मा जीक पोसुआ भूरा कुकुर सं अनेरूआ कुकुर पूछलक- भूरा, तोरा हरदम नाङरि हिलबैत आ मालिकक तरबा चटैत देखै छियौ.से किए? हा... हा... हा! " भाटिया जीक प्रोमोशन अहू बेर नै भेल आ गुप्ता जीक चारि बरखमें दोसर प्रोमोशन भ' गेल."- मालिक, मालकिन कें सुनबै छलखिन. आंइ एना किए, ओ जातात' काजो नै नीक सं करै छथि? मालिक कहलनि- काज अबै कि नै, ओकरा नाङरि हिलाब' आ तरबा चटबाक लूरि नीक छै. " हम सुनि गद् गद् भ' गेलौं!आ तहिये सं हमहूं....! वर्मा जीक बेटाक स्वर बहरएल- भूरा? " भूरा, कालू दोस के छोड़ि नाङरि हिलबैत दौगल....! चित्र: श्वेता झा चौधरी डा पुष्करराज भट्ट (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) बहिष्करण पछिला चौध, पन्ध्र दिन चिन्तेमे बितल । नइँ बितैत सेहो कोना ? कोरोना महामारीक कारण मोन ओहिना बिचलित होइत रहल। “ई रोग लगलहबा बहुतोगोटे ठीक भऽ गेलैक।हमसभ ठीक कोना नइँ हेबै!" चित्त बुझेबाक एकटा इहो नीक उपाय रहैक। बेस सावधानीसंग ई दिन कटलहुँ।एकरबादक दिनसभ केहन हेतै की पता<लोक कोन रुपमे एकरा लेतैक<इएह बिचारसभ मोनभरि अनवरत अबैत रहल। “ओना त अहाँक रिपोर्ट हिसाबे अहाँक बिमारी ठीक भऽ गेल।तथापी किछु दिन आओर घर-परिवारसँ दूरे रहु।” अस्पतालसँ घर पुहुँचलाक किछुए देरमे भाइजी कहल्खिन। घरमे बैसल-बैसल मोन पीडागेल।चौकदिससँ घुरि अएबाक सोचलहुँ कि बाटमे आशिष भेटि गेल। “तोरा कोरोना लागल बात सुनने रहियौ।एखन केना की छौ?" ओ पुछलक। “एखन ठीक छी।समान्य अवस्था छैक।" हम कहलियै।" किछु दिन तोरासंग हमरालोकनिके नजिक नइँ हेबाक चाही।भौतिक दुरी राख' पडतै।" आशिष हमरासँ दूर होइत बाजल। हम किछु कहब उचित नइँ बुझलियै। सोचलहुँ, “यी बिमारी हमरा मात्र लागिक' दोसरकियो स्वस्थ-तन्द्रुस्त रहतै से जरुरी त नइँ छै<" हम किछुदेर चौकमे अलमलाक' घरदिस घुरि देखैत रहौं,पडोसिया काका कहलनि," तो त मज्जासँ घुमिरहल छे।कोरोना लागल बात सुनने छलियौ।एना नइँ घुम बाबू रे!हमरालोकनिके बचबाक अछि।" “हमरा नीक भऽ गेल अछि।हम स्वस्थ छी।कोरोना कोनहु कारणे सरि सकैत छै।हम कोरोना बोकिक' थोडे चलैत छी।" एतबे बात जोडसँ कहलियै कि ओतुका सब लोक हमरे टक्क लगा' देख' लागल। रोग लागल व्यक्ती किछु दिनक बाद अवस्से स्वस्थ होइत छैक।स्वस्थ व्यक्तीकें बहिष्करण करबाक चेष्टा केनिहारसभकसंग लडबाक लेल आब हमरालग आवाजटा मात्र बाँकी अछि। (पुष्करराज भट्ट नेपाली साहित्य लेखन तथा अनुसन्धानक क्षेत्रमेँ सक्रिय छथि। नेपाली लघुकथामेँ पहिल एमफिल एवम् विद्यावारिधि करबाक सौभाग्य हिनका प्राप्त छनि। तीन एकल तथा एक संयुक्त लघुकथा कृतिक लेखक छथि । पाँच साझा संकलनके सम्पादक छथि । नेपाली लघुकथामेँ पुरस्कारक संस्थापक सेहो छथि। लघुकथा समाजसँ आबद्ध छथि। एकर अतिरिक्त गोरखापत्र संस्थानमेँ डोटेली भाषा पृष्ठ संयोजक, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक आख्यानमूलक पत्रिका समकालीन साहित्यके सम्पादक सेहो छथि।अइ तरहे लेखन, सम्पादन, साहित्यिक संगठन परिचालन, फेसबुक समूह सञ्चालन आदिक माध्यमसँ साहित्य क्षेत्रमेँ क्रियाशील । पत्रकार ओ साहित्यकर्मी छथि।) प्रा. डा. कपिल लामिछाने (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) सौन्दर्य आ समानता मूलुकमे समानताक गप्प-सप्प खूब चलैत रहे।जइमे लैङ्गिक समानता सेहो एक रहैक।हरेक गप्पमे समानताक बात उठे।एहन प्रश्न उठब समाज-विकासक दृष्टिसँ स्वागतयोग्य बात छैक। चिकित्सकलोकनि एकर परीक्षण करबाक निर्णय कएलनि। ओ सभ छोट बालबच्चासभकें स्वतन्त्र रुपमे खेल' लेल छोडि देलक। लडकी कनियां बनल,लडका वर बनल।लडका समान जुटौलक,लडकी खाना पकेलक।पहिने लडका खेलक,बादमे लडकि खा'क भाडावर्तन धोएलक।खेल चलैत रहल। तकराबाद ओसभ समान उमेर आ तौलक छौडा-छौडीसबकें छनलक।ओकरासभकें समान तौलक भारी बोकिक' निश्चित स्थानपर पहुँचाब लेल कहलक।दुनू एक्के समयमे भारी बोकिक पहुँचल। – गुड चिकित्सकसभ प्रसन्न भेलनि। आ ओसभ समान उमेर आ तौल रहल युवा-युवतीके समान दुरीधरि खाली हाथ दौगबाक लेल कहलनि।दुनू दौग लागल।युवतीकें हिल चप्पल अल्झेलक।ओ जुत्ता लगेलनि।फेर दौग लागल।सारी अल्झेलक।ओ कुर्ता-सुरवाल लगेलक।आ फेर दौग लागल।चुन्नी अल्झेलक।ओ युवकेजकाँ पैन्ट आ टिसर्ट लगेलक।आब त तोरा अल्झाब' बला किछु नइँ छौ ने?<- युवक पुछलक। आब नइँ अछि।- युवती बाजल। तहन आब दौगबै त हेतै? - हेतै। ओसभ दुनू सिट्टीक संकेत अनुसार पुन: एक्कसंग दौग' लागल। कनिए देरबाद लडकी थाक लगली।पाछू होब लगली।लडका रुकल। ओ बाजल– आब की ओझरेलक लडकी बजली– हिलबला चप्पलले ओझरेलक,ओकरा फेकली।आङी ओझरेलक ओकरो फेकली।कुर्ता–सुरुवालले ओझरेलक।ओकरा सेहो हटेली मुदा... की मुदा –लडका बीच्चेमे पुछलक लडकी कने लजाइत बजली– सबकिछु त फेकब नइँ मिलैछै ने!... चिकित्सकलोकनि खुल्ला कारमे बसिक' फ्लो करैत रहए। ओसभ कहलनि– अच्छा त आब निष्कर्ष इएह निक दृष्टिकोण हरिप्रसाद भण्डारी क दू टा बीहनि कथा (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) १ सौझका झोलफल चारुदिस रमणगर रहए।टोलक बौवा-बुच्चीसब खुल्ला मैदानमे जम्मा भऽ कऽ खेलैत रहए।चराचुरुङ्गीसब बास बसबाक तरखरमे रहए।एहिबीच प्रहरीक भ्यान आएल,घनश्यामक घर आगु रोकलक आ घरमे बैसल घनश्यामकें गाडीमे राखिक' लऽ गेल। यी सब देखिक' छिमेकीसब प्रतिकृया देलनि- - नेता छी कहैत छलथि, कोनो नइँ नीक काज केलकै कि - तस्करी करैत छी कहैत छलथि, कोनो केशमे फसिगेलै कि - सरकारी ओ सार्वजनिक सम्पति हड्पने छै कहैत छलै, अख्तियार पकैर लेलकै कि - एकर सान देखलाक बाद चालि-चलन ठीक नइँ छै से लागल रहे हमरा....छिमेकीसब मनेमन घृणा व्यक्त कएलनि। साँझुक पहर सञ्चार माध्यमसँ मन्त्रिमण्डल पुनर्गठन भेल आ घनश्याम मन्त्री भेल खबर प्रशारण भेल। तकराबाद बधाई देबाक लेल ओएह पडोसीसब घनश्यामकें घरमे छोर लागि गेल।ललै कि सबकिछुमे समानता खोजब प्रकृतिसम्मत नइँ छैक।ओकर एकटा सीमा होइत छै। सबगोटे स्वीकृतिमे गर्दन हिलेलक। २ दृष्टिकोण सौझका झोलफल चारुदिस रमणगर रहए।टोलक बौवा-बुच्चीसब खुल्ला मैदानमे जम्मा भऽ कऽ खेलैत रहए।चराचुरुङ्गीसब बास बसबाक तरखरमे रहए।एहिबीच प्रहरीक भ्यान आएल,घनश्यामक घर आगु रोकलक आ घरमे बैसल घनश्यामकें गाडीमे राखिक' लऽ गेल। यी सब देखिक' छिमेकीसब प्रतिकृया देलनि- - नेता छी कहैत छलथि, कोनो नइँ नीक काज केलकै कि< - तस्करी करैत छी कहैत छलथि, कोनो केशमे फसिगेलै कि< - सरकारी ओ सार्वजनिक सम्पति हड्पने छै कहैत छलै, अख्तियार पकैर लेलकै कि - एकर सान देखलाक बाद चालि-चलन ठीक नइँ छै से लागल रहे हमरा.... छिमेकीसब मनेमन घृणा व्यक्त कएलनि। साँझुक पहर सञ्चार माध्यमसँ मन्त्रिमण्डल पुनर्गठन भेल आ घनश्याम मन्त्री भेल खबर प्रशारण भेल। तकराबाद बधाई देबाक लेल ओएह पडोसीसब घनश्यामकें घरमे छोर लागि गेल। तारा केसी (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) अपन परिचय भोरे उठिते मातर भन्सा घरमे पडोसनी काकी बाबू-माएके कहैत बात सुनि लेलहुँ।काकी कहैत रहथिन्,"हमर दीपशीखाक लेल नीक घरसँ बात आएल छैक।खन्दानी परिवार।काठमाण्डौमे तीनटा घर छै।दू टा भाडामे लागल छै।भाडा मात्रे तीन लाख अबैत छै।बात चलैतियै त होइतै ने श्याम भैया?? काकीक बातमे समर्थन दैत बाबुजी कहल्खिन्-" नीक घर,वर छै त बात चलाएब उचिते कि! आखिर दीपशिखाक उमेर सेहो विवाह करबाक योग्य भऽ गेलनि।" प्रात भेने भोरे माए हमर घरक टेबुलपर चाह रखैत बजली-" बेटी उठिक' तयार भऽ जाउ कि! आजु अहाँक देखबाक लेल लडका अबैए।की करु बाउ सबदिन अपनेसंगे रखबाक मोन छल मुदा दोसरकें घर जाइ बला जाति राखब असम्भव अछि।" नैनमे नोर भरने माए कहली। माएक बात सुनि हमर मोन द्रवित भऽ गेल।तीनटा कार हमरे घर लग आबिक' रुकलै।पडोसनी काकी हमर गेटदिसँ पैसबाक इसारा केलनि। "ओएह लील रङ्गबला शूट लगेने हेबाक चाही लडका,देखएमे त सुन्दरे छै नइँ दिपशिखा।" दिदी कहलनि। हम किछु नइँ बजलहुँ।लडका पक्षसँ बातचितक शुरुवात भेला उपरान्त दिदी हमरा आओर सुन्दर बनाक' ओकरासभक आगु लएलनि।हम लगाम लगाएल घोडाजकाँ ओ सब जे जे कहलनि से से करैत गेलहुँ।हमर शिरसँ पाउ तक एक नजरि देखलाक उपरान्त 'ओके' कहल्खिन लडका पक्ष। "लडकाक पढाइ,लिखाइ,इलम की छै?" बाबुजी पुछल्खिन। बाबुजीक प्रश्नक उत्तर दैत लडका पक्षबला उत्तर देलनि,"नोकरी करब,पैसा कमाएब, ओहि लेल पढब,लिखब.. ओ सबकिछु छैक बाबू लगमे।पैसा ओ धनसम्पतिक कोनो कमी नइँ छैक।अपनेक बेटीकें रानी बनाक राखत।ओइसँ बेसी की चाही अपनेके? ओकरासबके बात सुनलाक बाद हमर अन्तरात्मामे दबाक' राखल बोलीसब विस्फोट भऽ गेल।हम पैसामे बिकाइ बला लडकि नइँ छी।पुर्ख्यौली सम्पति आइ छै,काल्हि नहियो भऽ सकैत छै।अपने कमाइ रहल, पढल-लिखल ओ समाजमे अपन अलग पहिचान बनाब मे सफल जीवनसाथी चाही हमरा।उनकामे कहाँ छै अपन परिचय, तें हमरा माफ कएल जाओ बाबुजी।हम विवाह नइँ कऽ सकैत छी। रचना शर्मा (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) चरित्र ‘चरित्रबहादुर अष्टबक्र’नामक बेस चरित्रवान् शिक्षक । हमरहि घर लगिचकें क्षेत्रकुमारी मा.वि. कें प्रध्यापक।भारतक प्रसिद्ध उच्च महाविद्यालयसँ विज्ञान आ गणित विषयमे डिग्री हासिल केनिहार।हमर बौवाबुची सेहो ओएह विद्यालयमे अध्यनरत। एकदिन हम विद्यालयकें अतिरिक्त मिटिङ्गमे पुछलियै-“अष्टबक्र सर हमर बेटा विज्ञानमे बहुत बेसी कमजोर छै।कोना पास हेतै? अपने जऽ ट्युसन पढबैत छियै त काल्हिसँ बौवोकें पठादेबै, नइँ हेतै?”हमर बात सुनिक' ओ सम्झबैत हमरा कहलनि- “तेहन बात नइँ छै मैडम, बौवाकें पढाइ ततेक नइँ निमन कहाँ अछि से <नेनामे सबकियो एहने होइत छै,पैघ होइते सबकियो अपने लाइनपर आबि जाइत छै।हम्हूं कक्षा ७ मे फेल भेल विद्यार्थी छी। एखन हमरे उदाहरण लैत कतेको विद्यार्थी आगु बढि रहल छैक।ट्युसन नइँ पढाउ बौवाकें।बरु अपनेसँ पढबाक व्यवहारके विकास कराउ। आवश्यकता बुझाएत त मेसेन्जरपर सोधपुछ कएल करब।" वाह! सर जीक एतेक नीक सुझाब पाबि त हम प्रसन्न भऽ भेलहुँ।घरमे अबिते फेसबूक खोलिक' ‘चरित्रबहादुर अष्टबक्र’नाम सर्च केलहुँ। फ्रेन्ड रिक्वेस्ट पठेलहुँ। ४ घन्टा बाद नोटिफिकेशनमे ‘चरित्रबहादुर अष्टबक्र’ एसेप्ट योर फ्रेन्ड रिक्वेस्ट कहिक' सुचना आएल। सरकें प्रोफाईल पिक्चर देखलहुँ। बेस सुन्दर रहैक।मिलल दाँत देखबैत मनमोहक मुस्की! पिक्चर सँगसँग स्टाटस् सेहो। वाउ! Û शिक्षाक अन्तिम लक्ष्य चरित्र निर्माण होइत छैक। जतबे नीक व्यक्ति, ओतबे नीक स्टाटस । फोटो आ स्टाटस देखिक' मोन थाम्हि नइँ सकलहुँ आ ठोकि देलहुँ लभ रियाक्ट।साथमे कमेन्ट सेहो १०० प्रतिशत राईट सर,कहिक'। काल्हिखन बौवा स्कूलसँ बिधुवाएल मुंह ल' घर आएल। “मम्मी < एकटा स्याड न्युज छै । कहू?” ‘क'ह न बेटा की भेलह? ” हम पुछलियै। “दूर की कहूं, आब हमरासबके साईन्स सब्जेक्ट चरित्र सर नइँ पढबै छथिन्।आइसँ विचित्रप्रसाद अधिकारी सर पढाएब शुरु केल्खिन् ग । “ओहो की भेलै चरित्र सरकें से? नीक लोक आ चरित्रवान व्यक्तित्व त टिकबे नइँ करैछै। कतौ सरुवा भऽ गेलै हुनकर की?” “नइँ मम्मी ओ सर अपने स्कूलमे नौ कलासमे पढिरहल दिदीकें होम ट्युसन पढबैत छलै पता नै काल्हिखन की केलकै ओइ दिदीकें।बहुते प्यारेन्टस् आबिक' स्कुलमे मिटिङ्ग केलकै ।आ तकराबाद हेडसर माईकमे,आइसँ चरित्र सर अपन स्कूलसँ रेस्टिगेट भेल सुचना देल्खिन् ।” चित्र: श्वेता झा चौधरी डॉ. प्रदीप कौड़ा (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) क्रांति पहिल: अहाँ एना उदास कियाक बैसल छी? दोसर: हम उदास नहि छी, किछु सोचि रहल छी। पहिल: की सोचि रहल छी? दोसर: यैह कि अपन देशमे क्रांति कोना आबि सकैत अछि। पहिल: एहैंन अपने कहियासँ सोचए लगलहूँ? दोसर: पिछ्ला एक दशकसँ। पहिल:एक दशकसँ? दोसर: शायद अहियोसँ बेसी दिनसँ भ सकैत छैक। पहिल:अपने कृपा कऽ सोचनाइ बन्न क देल जाइ। दोसर: कियाक? पहिल : कियाक की अपने आब अहि देशमे क्रांति नहि ल पाएब! निरंजन बोहा (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) करूगर सत्य दुर्घटनासँ भेल हुंनकर मृत्युक आइ पाँच दिन बित चूकल छल। शोकसभामे जुड़ल लोक सभ हिनक इच्छाक संग हिनक नेना अा विधवा पत्नी लेल संवेदना व्यक्त क रहल छल। नीक लोकक खगता अहि लोक अा ओहियो लोकमे अछि। शोक सभा मे एकहि संग कतेको स्वर चहु दिस पसरल। अो सभ त ठीक छैक, परंच ए हैं न असमय मृत्यु केँ दुःख सहनाइ बहुत मुश्किल छैक। बात आगां बढ़ल। एहि अबोध नैनाक की होएत? तेसर स्वरमे सभक धियान नैना दिस पड़ल। राधेश्याम जखन आतंकवादिक हाथसँ मारल गेल छल त सरकार हुंनक पत्नीकेँ पाँच लाख टाका देने रहैंन,अा पुत्र केँ नौकरी। चारिम स्वरमे स्त्रीगण सभक बीच बैसल मृतककेँ पत्नी क स्वर सोचए पर विवश केलक, जाँ हम्मर भाग्य मे यैह लिखल छल त हमरो पतिक मृत्यु आतंकवादिक हाथें होइत!! जगदीश अरमानी (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) कथानक भोरका समय छल,वर्षाक पश्चात ठरल- ठरल बयार बहि रहल छल। अपन कल्पनामे मग्न लेखक बस्तीसँ बहुतों दूर निकलल छल। अपन नव कथा लेल कथानककेँ तकै मे डुमल होइथि तहिना प्रतित भ रहल छल। एकाएक लेखककेँ चेहरा पर मुस्कि दौड़ गेल। आवेशमे आबि अपन औंठासँ चुटकी बजाबैत बजला, आहहा.... भेंट गेल कथानक किच्छे दूर पर अस्थिरे - अस्थिरे चलि रहल छला की गाड़िक पहिया कादोमे धसि गेल, दुनू स्त्री - पुरुष गाड़ीसँ उतरि कऽ प्रयास करै लागल , पहिया निकालैकेँ, अपना भुत्ते नहि भेल त गाड़ी बला कोनो मदतगारकेँ ताकै लागल। थोड़ बे दूर पर बाउलक टीहुल्बा पर लेखक देखाइ पड़ल। गाड़ी बला चैनकेँ स्वास लेलक,लेखक सँ जखने आंखि मिलल की लेखक उत्साहित करैत बजला । शाबाश! नवयुवक! शाबाश! आर जोड़ लगाऊ ,हम अहाँ पर कथा लिखब! जंगबहादुर सिंह घुम्मण (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) आचरण थानाकेँ मुंशीसँ आतंकवादी मारल गेल। शिंगारा सिंहक मृत्युक प्रमाणपत्र हुंनकर अबोध पुत्र अा बुढ़ पिताक हाथ थमहाबैत अपना अा संग बैसल दु गोट सिपाही न्यायोचित अधिकार जमाबैत उपेक्षणिय स्वरमे कहल, बाबा आइ बड्ड ठंढि छै। नैना प्रश्नात्मक दृष्टिसँ अपन बाबाकेँ देखल,अो अपन चिप्पी लागल कुर्ताक जेबीमे मुद्दतसँ सम्महारि क राखल टाका,मुंशीकेँ द देल। थानासँ बाहर निकललाकेँ उपरांत नैना उत्सुकता व आश्चर्यसँ अपन बाबाक डबडबायल आँखिमे तकैत, व्याकुल स्वरमे पूछलक... बाबा यौ ई एक साय टाका हिंनका सभकेँ कियाक देलौं? बाबा बजला.... ई सभ हमर अनाथ भेलाकेँ उत्सव मनाबै चाहैत छथि! चित्र: श्वेता झा चौधरी दीपक बुदकी (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) जन्नत(स्वर्ग) स्वर्गक (जन्नतक ) दरबज्जा पर ओतुक्का दारोग़ा ओकरा रोकि लेलकै आ पुछलकै- “तों अपन जिनगी मे कोन एहन काज केने छें जे तोरा स्वर्गक भीतर प्रवेश भेटौ?” ”हुज़ूर, हम जन्नत पैबा लेल की नञि केलहुॅं?.तीस टा विधर्मीक(काफ़िरक) गर्दन उड़ाओल, ओकर कनियाॅं सभकेॅं विधवा आ धिया पुता केॅं अनाथ बनाओल। एहि तरहेॅं बाक़ी लोक सभ केॅं पता चलि गेल हेतै कि भगवानक आक्रोश (ख़ुदाक क़हर) केकरा कहल जाइ छैक। “सत्ते, तोॅं त' बड़ पैघ काज केलें । हम तोरा सभ सन लोकक लेल फराक सॅं एक टा ख़ास जगहक इंतज़ाम केने छियौ। तों सामने बला नदी पार कय सीधा ओम्हर चलि जो जत' स' धुआॉंक बादल उठि रहलैक अछि। ओत' तोरा एहने एकटा दरबज्जा भेटतौ। ओत' तोहर स्वागत लेल सिकंदर, हलाकू ,चंगेज़ ख़ान, तैमूर, हिटलर और मुसोलिनी सन सन पैघ सूरमा सभ बेचैनी स' बाट तकैत हेतौ (इंतज़ार क' रहल हेतौ)।. मुबश्शिर अली ज़ैदी (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) ईनाम हम जाहि सरकारी कार्यालय मे काज करै छी ओत' सपना कीनल जाइत छैक। किछु लोक अपन सपना कौड़ीक भाव बेचि दैत छथि, किछु केॅं सपनाक बदला अशर्फी देल जाइत छनि। पिछला सप्ताह एकटा युवक एकटा सपना सुनौलक,- “हम सपना मे देखलहुॅं जे ज़मींदार सभहक ज़मीन छीनिकय ग़रीब हलवाहा सभ मे बाँटि देल गेल।” एहि सपना केॅं सर्वश्रेष्ठ घोषित कयल गेल। काल्हि हम अपना अफ़सर सॅं पूछलियनि- “ओहि युवक केॅं की इनाम भेटलै?” अफ़सर बाजल- “पैघ-पैघ सपना देखनिहार केॅं इनाम मे नीक वेतन पर सरकारी नौकरी देल जाइत छैक। फेर ओ कहियो एहन सपना देखबा जोग रहिये नञि जाइ छैक । इब्न आसी (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) फेर मनुक्खक की भेलै? जखन समुद्र पूरा दुनिया केॅं अपना चपेट मे ल'-लेलकै तखन चारू दिस भगदड़ मचि गेलै।सभ जीव-जन्तु अपन-अपन जान बचब' लेल कोनो ऊँच आ सुरक्षित जगह ताकि रहल छलाह कि तखनहिॅं अचानक घोषणा भेलै कि प्रत्येक जीवक एक-एक गोट जोड़ा अमुक पहाड़ पर स्थित नाव पर पहुँचि जाय।सभ ओम्हरे पड़ायल आ नाव देखितहिॅं जल्दी स' ओहि पर सवार भ' जाइ गेल। जखन नाव चलबा लेल उद्यत भेल तखन एकटा पुरुष आ एकटा महिला ओतय पहुँचलाह। दूनू नाव पर चढ़ैये बला छलाह कि नाव- चालक(नाविक) ई कहि हुनका बरजि देलक कि नाव मे कोनो मनुक्ख नञि बैसि सकै अछि। पुरुष आश्चर्यचकित होइत पुछलक- “कियैक?हज़रत नूहक नाव मे त' मनुक्खो सवारी केने छल। ” बरज' बला उत्तर देलक- “एत' न कियो नूह अछि आ न ई हुनक नाव छनि, तैं तों दूनू गोटे एहि मे बैसि नञि सकै छह।” “जॅं हम सभ एहि पर सवार नञि भेलियै तखन मनुक्खक वंश (नसल) कोना आगाॅं बढ़तै?एना' त' मनुक्ख दुनिया सॅं समाप्ते भ' जेतै।” बरज' बला कने हॅंसैत उत्तर देलक-, “अही द्वारे त' तोरा सभ केॅं नाव मे नञि बैसाओल जा रहल छह।” रतन सिंह (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) बिना शीर्षकक एकर शीर्षक उल्लू आ मनुक्ख भ' सकै छै। एक दिन पक्षी सभहक सभा मे उल्लू एक टा सुझाव देलक जे चिड़ियो सभ कें चाही कि ओ थोड़-बहुत भोजन भंडार क' क' राखथि, जाहि सॅं ख़राब मौसम मे हुनका कोनो तरहक दिक्कत नञि होनि। तोता जे पक्षी सभ मे सब स' बुद्धिमान मानल जाइत अछि, उल्लूक गप सुनिक' बाजल- “भाइ लोकनि! एहन मूर्खता कहियो नञि करिह'I” “एहि गप मे मूर्खता की छैक?” उल्लू पुछलकI “मूर्खता ई कि जहिया सॅं मनुक्ख अन्न, वस्त्र, जारनि- काठी, रुपया-पैसा आदिक भंडार करब शुरू केलनि, तहिया सॅं ज़रूरतिक चीज बौस्त किछु लोक ल'ग त' एतेक जमा भ' गेलै जे हुनका सूझि नञि पड़ै छनि ओ ओकर की करथि, दोसर दिस आन लोक सभ ग़रीबी, भुखमरी आ बिमारीक ग्रास बनि रहल छथि वा एहि कारण रोज़ मरि रहल छथि I” ई सुनिते उल्लू उल्लू होइतो अपन सुझाव तुरत वापस ल' लेलक I (रत्न सिंह अपन बीहनि कथाक क्रमांक लिखैत छलाह, शीर्षक नहि।) चित्र: श्वेता झा चौधरी सच्चिदानन्द कर (ओड़िआ मिनी गल्प: मैथिली अनुवाद- सोनालिका महान्ति) नाम—सच्चिदानन्द कर , जन्म—26-06-1962, शिक्षा—एम.ए., पीएच.डी, वृत्ति—अध्यापन, प्रकाशित पुस्तक—16, विभिन्न सारस्वत संसथा द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित तितली आ प्रेम तितलीक पाछाँ दौड़ैत-दौड़ैत थाकि गेल छलि ओ छौंड़ी। “केओ पकड़ि दितए !”—सोचैत रहए ओ। “हे लिअ’।” एकटा छौंड़ा ओकर लग आबिक’ कहलकै। छौंड़ी हुलसि उठलि—बरिसकालक धार जकाँ। बाजलि—“कतेक ने दौड़लहुँ हम।” “हमरा दौड़’ नहि पड़ल।” छौंड़ा कहलकै। “बदमास तितली नहितन !” बाजलि छौंड़ी। बिदा भ’ गेल रहए छौंड़ा। छौंड़ी ओकरा पाछाँसँ सोर केलकै—“अहाँ कोना बुझलिऐ जे...?” “किछु गप नहिओ कहलासँ बुझा जाइ छै।” छौड़ा कहलकै। “एकर माने हम अहाँकेँ निश्चय नीक लगै छी?” छौड़ी बाजलि। मुस्किया उठल छौंड़ा। “लगैए जे अहाँ संग रहलासँ हमर मोनक गप बूझि की की ने धरा देब हमरा हाथमे अहाँ।” छौड़ी बाजलि। सम्बन्धक हाथ बढौलक छौंड़ी। मुस्किया उठलि छौंड़ी। प्रेम भेलै। फेर छौड़ीक हीआ हुलसि उठलै—बरिसकालक धार जकाँ। प्रज्ञा महान्ति (ओड़िआ मिनी गल्प: मैथिली अनुवाद- सोनालिका महान्ति) नाम—प्रज्ञा महान्ति, शिक्षा—स्नातक, वृत्ति—गृहिणी, अनेक कथा आ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित मेमोरीचिप्स ई तँ क्लिअर एक्सीडेंटल केस छिऐ। तखन डाक्टर साहेब परीक्षाक उत्तरपुस्तिका जकाँ एतेक गओरसँ जाँच रिपोर्चमे की देखैत छथिन से जानि नहि ! पोस्टमार्टम हाउसमे ठाढ़ भेल भेल अगुता गेल हरि। “साँझ पड़ि गेलै...बॉडी लॉक क दिऔ।” कहलकनि हरि। “नहि...किछु काल आर ठहरह...। एतबा कहि ओ फेर लाश पर झुकि गेलाह। किछु काल धरि किछु देखलाक बाद हरिक हाथसँ तौलिआ ल’ हतास स्वरमे बजलाह, “एतेक बॉडीक पोस्टमार्टम क’ लेलहुँ, मुदा जे तकै छी से भेटि नहि पाबि रहल अछि। आश्चर्य !!” हरि किछु बूझि नहि पओने रहए एहि गपक अर्थ। खाली प्रश्न भरल आँखिएँ डाक्टरक मुह तकैत रहल। “तखन एहि मेद, मांस, रक्त, मज्जाक समष्टि मनुक्खक शरीरक भीतर कत’ नुकाए रहैत छै भाव, भावना, भय, प्रेमकेँ जोगाक’ राखैबाला ओ मेमोरी चिप। गहे-गहे एतेक तकलोपर भेटल ने किएक ? तँ की ठीके मृत्यु ओहि मेमोरी चिपकेँ अपन संग ल क चलि जाइत छै ?” चिन्ताग्रस्त डाक्टर साबेबक ई बेकल अवस्था देखि एकटा अज्ञात आशंकासँ काँपि गेल छल हरि। विनय कुमार दास (ओड़िआ मिनी गल्प: मैथिली अनुवाद- सोनालिका महान्ति) नाम—विनय कुमार दास, जन्म—06-11-1949, विविध विधावदी, बाल साहित्य रचनाकार, कवि, कथाकार, नाटककार, गीतकार ओ अनुवादक, विभिन्न संस्था द्वारा पुरस्कृत ओ सम्मानित, पता—अनामिका नीड़, अंगारगडिआ, बालेश्वर—756001, ओडिशा कर्मफल --बाबू --किएक बाम्बार तोँ हमर सपनामे आबि रहल छेँ ? --अहाँक हाल बुझबाक लेल। कहू कोना छी ? अच्छा नहि कहू, हमरा बूझल अछि...भ्रूणावस्थामे हमरा मारिक’ तीनटा बेटाकेँ पढ़ा-लिखाक’ योग्य बनौलहुँ। अहाँ सोचैत छलहुँ जे अन्तिम अवस्थामे ओ सब अहाँक सेवा करत। मुदा एखन ओ सब अपन-अपन परिवार ल’ विदेशमे अछि। माए सेहो अहाँकेँ छोड़िक’ परलोक चलि गेल। एखन अहाँ बड़ कष्टमे रहै छी। जँ हम बाँचल रहितहुँ तँ अहाँक देखरेख करितहुँ। --बेटासब चलि गेल तकर दुख नहि अछि। एखन तँ इएह नियम भ’ गेलैए। तोहर माए जे हमरा छोड़ि गेलीह हमरा लेल ततबे दुख...हम हुनका कहिओ दुख नहि देलिअनि...मुदा... --फूसि नहि बाजू बाबू। गर्भपात नहि करेबा लेल माए कतेक बेकल भ’ क’ अहाँकेँ मना क’ रहल छलि...अहाँ माइक दरेगकेँ नहि बूझलिऐ...ओहि पापक फल केओ आन थोड़े भोगतै ? गायत्री दास (ओड़िआ मिनी गल्प- मैथिली अनुवाद—तन्मया तपस्विनी मुर्मू) नाम—गायत्री दास, जन्म—19-08-1978, सतत साहित्य चिन्तन। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे रचना प्रकाशित होएबाक कारणेँ पाठकीय स्वीकृति आ आदर पबैत रहलीह अछि।एकटा कविता-संग्रह यन्त्रस्थ। पता—पोपुलर स्टाल्स, दुर्गा विहार, अनुगुल, ओडिशा बुझौअलि युवककेँ भर्ती कएलाक बाद डाक्टर लगमे ठाढ़ भद्र व्यक्तिकेँ बजाक’पुछलथिन, “अहाँ एहि युवककअभिभावक छिअनि की ?” “जी, हम एकर पिता छिऐ।” भद्र व्यक्ति मूड़ी झुकौने हाथ जोड़ि कृतार्थ होएबाक भंगिमामे ठाढ़ छलाह। “अहाँक बेटा की करैत छथि?” पुछलथिन डाक्टर साहेब। “हमर बेटा नीक जकाँ पढ़ाइ क’ रहल अछि सर। पूरा पंचायतमे फस्ट आएल छल। तेँ धान, खेरही, उड़ीद बेचिक’ एकरा शहरमे पैघ कओलेजमे पढ़बैत छिऐ। आब एक सालक बाद इंजीनियर भ’ निकलत। एतेक संयमी बच्चाक देह किएक खराप भ’ गेलै सर?” “अहाँ बूझि लिअ...अहाँक बेटा ड्रग एडिक्ट अछि आ एहि लेल ई सिमेन बिक्री करैए... भद्र व्यक्ति ओड़िआमे बुझा देबाक लेल डाक्टरक नेहोरा कर’ लगलथिन। मिनती प्रधान (ओड़िआ मिनी गल्प- मैथिली अनुवाद—तन्मया तपस्विनी मुर्मू) नाम—मिनती प्रधान, जन्म—30 अक्टूबर, शिक्षा—स्नातकोत्तर, कृति—समय (ओड़िआ कविता-संग्रह), A new dawn (English poems), Transformative Harmony (English features) पुरस्कार—इन्दुदेवी स्मृति सम्मान 2013, ओडिशा कथा सम्मान 2014, पता— A.301, Surabhi Apartments, Ranka colony road, Bangalore--76 संगी “मामुनि, सुनलिऐ जे रेणु पछिला सप्ताह गाम एलैए।” माए अबाज देलकै। “हँ, कोरोनाक कारणेँ सबटा कओलेज तँ बन्द छै, ककर क्लास लेतै ओ ?” मामुनि विरक्त भ’ बाजलि। “तोँ ओकरासँ भेट करबाक लेल नहि गेलहीँ आ ने ओएह अपना ओहिठाम एलौए। तोँ आएल छेँ से बूझल छै ने ओकरा ?” “दू दिन पहिने अजूक संग भेट भेल छल। कहलक—मामुनि, ओ दिल्लीक एमएनसीमे काज करै छै। ओकर उठब-बैसब पैघ-पैघ लोकसभक संग छै। हम की ओकरासँ भेट करबै ?” ई सुनिक’ माए छगुन्तामे पड़ि गेल। सोच लागल—ई दुनू अन्तरंग संगी नेनहिसँ सब काज संगे-संग करैत रहए। मुदानोकरी पकड़लाक बाद एखन दुनू संगीकेँ ईर्ष्या आ इगो पूरा-पूरी गछाड़ि लेने छै। चित्र: श्वेता झा चौधरी जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ अपूर्वा मैथिलीक पद्य साहित्यमे प्रकाशित पोथी सबहक सूचीमे एकटा पवित्र नाम अछि ‘अपूर्वा’ जे चर्चित साहित्यकार-सम्पादक श्री राम लोचन ठाकुर जीक 1970सँ 1995 धरिक रचनाक एक संकलन अछि | ‘अपूर्वा’क प्रकाशन ‘मिथिला समाद’,कलकत्ता द्वारा 23 नवम्बर 1996 क’ भेल अछि | ‘अपूर्वा’ एकटा वहुमुखी प्रतिभाक कवि-गीतकार-चिन्तककेँ पुनः लोकक सोझां अनलक | अइसँ पहिने हिनक सात टा पोथी आबि चुकल छलनि | उनासी पृष्ठक एहि पोथीमे उन्हत्तरि पृष्ठमे पद्य-रचना अछि जकरा निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछि : (1)दोहा (2)छओ पाँतिक छन्दमय कविता (3)आठ पाँतिक छन्दमय कविता (4)गीत रचनाक विषयकें निम्निखित वर्गमे राखल जा सकैत अछि : (1) मिथिला,मैथिली,मैथिल, मैथिलीक साहित्यकार, मैथिलीक समस्या | (2) देश, देशक समस्या,देशक व्यवस्था,देशक जनप्रतिनिधि | दोहाकसँख्या 110 अछि | 25 टा दोहामे गामसँ दिल्ली धरिक बात, राजनीति आ सामाजिक सरोकारक बात अछि | किछु दोहा / किछु पाँति देखल जाए : ‘चालनि दूसय सूपके जकरा भूर हजार पोथी के नहि मान अछि थोथी चलय बजार’ ‘कान छैक पर सोन नहि सोन छैक नहि कान वाणिक पूत झखैत छथि उल्लू लक्ष्मीवान’ ‘भाइ-भाइमे शत्रुता पुजा रहल आइ सार’ ‘विद्यापति केर पर्वमे विद्यापति टा बाद सभ अपैत पति मंचपर व्यर्थक वाद विवाद’ ‘राजनीतिसँ नीतिकें कहियो भेल न मेल विजयश्री तें पार्थ लए कर्ण पराजित भेल’ कोनो साहित्यकारकें एकटा दोहामे व्यक्त करब कठिन काज अछि, तथापि ओहि समय तक चर्चित 85 टा साहित्यकारकें एक-एक दोहामे व्यक्त करबाक प्रयास कएल गेल अछि जाहिमे कतहु-कतहु हास्य-विनोद आ कतहु व्यंग्य सेहो अछि | साहित्यकार लोकनिक एहि सूचीमे महामहोपाध्याय मुरलीधर मिश्र,भाषाविद ग्रियर्सन, नगेन्द्रनाथ गुप्त, जीवन झासँ ल’ क’ प्रदीप, वियोगी, रमेश, चन्द्रेश, विभूति आनंद,अरविन्द ठाकुर,नारायणजी, केदार कानन, सुस्मिता पाठक धरि छथि | दोहामे साहित्यकारक कोनो पोथी अथवा हुनका सम्बन्धमे कोनो घटनाक संकेत मात्र अछि | बानगीक रूपमे किछु दोहा प्रस्तुत अछि : ‘नाचू हे पृथ्वी अहाँ जीवकान्त केर वस्तु धार मुक्त नहि होइत अछि नहि कतहु नहि अस्तु |’ एहि दोहामे ‘नाचू हे पृथ्वी’ आ ‘धार नहि होइछ मुक्त’ जीवकान्तजीक कविता संग्रह, ‘वस्तु’ कथा संग्रह आ ‘नहि कतहु नहि’ उपन्यासक नाम अछि | ‘हमरा लग रहबै अहाँ पुछने फिरथि प्रभास कथा प्रभासक की कही भेला हतो-प्रत्याश |’ प्रभास कुमार चौधरी पर एहि दोहामे हुनक चर्चित उपन्यास ‘हमरा लग रहब’क चर्च अछि | ‘राजमोहनक मोहमे आरंभक अछि अन्त गलतीनामा जपै छथि कथा जगत के सन्त |’ एहि दोहामे ‘आरम्भ’ राजमोहनजी द्वारासँपादित पत्रिकाक नाम अछि आ हुनक आलोचनात्मक निबन्धक एक पोथीक नाम अछि ‘गल्तीनामा’ | ‘छोडल जे आनन्दकेँ जोड़ल भारद्वाज तोड़-जोड़मे अनवरत मोहन भारद्वाज |’ मोहन भारद्वाजक मूल नाम छनि आनन्द मोहन झा, यैह एहि दोहामे कहल गेल अछि | ‘बुद्धिनाथ मिश्रक सकल रचना अर्थ प्रधान हिन्दीमे तें गबै छथि सोहर आ समदाउन |’ सभकें बुझल अछि जे मिश्रजी हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे गीत रचना करैत छथि | साहित्यकार रमेश आ महेन्द्र मलंगियाक लेल लिखल दोहा देखू : ‘सँच मंच भ’ मंच तजि लेखन करथि रमेश गीत-गजल-कविता-कथा नित नूतन सन्देश’ ‘नसबन्दी के डरसँ तेजि मलंगिया गाम बारहमासा गबै छथि बैसल धनुषा धाम’ ‘ओकरा आंगनक बारहमासा’ नाटककार महेन्द्र मलंगिया जीक चर्चित कृति अछि | कतहु-कतहु बहुत कंजूसी कएल गेल अछि, एकर उदाहरण अछि ई दोहा : ‘लिली रे उषा किरण शान्ति सुमन नहि थोड़ नीता पुनि शेफालिका पसरल नवल इजोर |’ एतय चारिटा साहित्यकारकें एक दोहामे व्यक्त कएल गेल अछि | निम्नलिखित साहित्यकारकें छओ-छओ पाँतिक छन्दमे व्यक्त कएल गेल अछि :ज्योतिरीश्वर, महाकवि डाक,विद्यापति,चन्दा झा, लाल दास, कवि शेखर, सीताराम झा,भोला लाल दास,सुमन जी,मधुप जी, किरण जी, यात्री जी,मणिपद्म जी, हरि मोहन बाबू, आरसी प्रसाद सिंह,राघवाचार्य,ललित,किसुन आ राजकमल | दोहाक तुलनामे छओ पाँतिक कविता सभ द्वारा सम्बन्धित साहित्यकारकें बेशी नीक जकाँ प्रस्तुत कएल जा सकल अछि | बानगीक रूपमे प्रस्तुत अछि हरिमोहन बाबू पर ई कविता : ‘हरिमोहन हरि लेल मन हास्य-व्यंग केसँग कन्यादान द्विरागमन खट्टर कका तरंग खट्टर कका तरंग रंगशालाक रंग मे पढुआ अपढ़ जुआन बूढ़ सभ सम दर्पण मे कह लोचन कविराय युग पुरुष युग मनमोहन हास्य-व्यंग्य सम्राट अमर स्रष्टा हरिमोहन’ विशिष्ट छन्दमे लीखल एहि तरहक रचना सबहक पांचम पाँतिमे ‘कह लोचन कविराय’ नीक लगैत अछि | कवि मिथिलाकसँस्कृतिक अनमोल धनक स्मरण करैत वर्तमान स्थितिपर दुख प्रकट करैत कहैत छथि : ‘जइसँ छल विख्यात किछु नै मिथिलामे वसुधा एव कुटुम्ब घोषणा भेल जतय भाइ-भाइ दिन-राति लड़ैए मिथिलामे सुग्गो शास्त्रक गप्प करै छल के मानत लाठी-बम-बन्दूक चलैए मिथिलामे कुल देवी बनि पुजा रहल अछि सुपनेखा मैथिलीक कौचर्य होइत अछि मिथिलामे’ मिथिलाक महिमाक वर्णन करैत एकठाम कवि कहैत छथि : ‘एकर सिया धिया के बल पर राम काल भगवान |’ दोसर ठाम देश-दशामे मिथिलाक वर्तमान स्थिति पर दुखी होइत कहैत छथि : ‘नढ़िया–कुकुर तीन कोटि छइ सिंहक नाम बिला गेलै ठोहि पारि कै कनइ मैथिली की छलै आ की भेलै’ मिथिला-मैथिलीक लेल कर्तव्यक बोध करबैत कहैत छथि : ‘हम नव मिथिला निर्माण करब’ एहि लेल वैचारिक क्रान्तिक बात करैत कहैत छथि : ‘क्रान्तिक आह्वान थिक शान्तिक सम्मान हेतु’ ई संकलन ओहि समयक थिक जखन मैथिलीकें संविधानमे स्थान नहि भेटल छलै आ मिथिला-क्षेत्रमे एहि बात लेल अपन नेता-स्थानीय नेता सभपर आंगुर उठाओल जाइत छल | लोकक खीझकें स्वर देल गेल अछि ‘किछु लोक’ शीर्षक रचनामे : ‘किछु लोक मैथिलीकें धन्धा बना लेने अछि चन्दा उगाहि पालि रहल पेट किछु लोक बजारमे निलाम करै माइक जे लाज तकरे विभूति मानि रहल पूजि रहल लोक वर्खोसँ ठकि रहल जे सांसद, हमर विधायक तकरेपर फूल माला बरिसा रहल-ए लोक’ कविकें ओहेन पढ़ल-लिखल मैथिल लोक सबसँ दुःख होइत छनि जे मैथिलीक शब्द सभकें बिसरल जा रहल छथि | देखल जा रहल अछि जे ‘जलखै’ शब्दक स्थानपर लोक ‘नाश्ता’ शब्दक उपयोग क’ रहल छथि | अहिना और शब्द सभ अछि जकर उपयोग कम भ’ रहल अछि | एहिपर ‘छुबुध लगैए’ रचनामे कहल गेल अछि : ‘पढुआ लिखुआक एहेन अवस्था की पुछै छी सोचि भविष्य मैथिलक सरिपहुं छुबुध लगैए’ ई काव्य-संकलन देशमे ओहि समयक जे सामाजिक, आर्थिक,राजनीतिक स्थिति रहै, तकर गवाह अछि | देशमे गरीबी, महगी,बेरोजगारी छल,मंडल आयोगक क्रियान्वयनसँ समाजमे उथल -पुथल छल |‘चित्र-विचित्र’ शीर्षकसँ एहि सभ विषयपर छओ-छओ पाँतिक चौदहटा रचना अछि | महगीपर एहि छन्दमे लिखल एकटा रचना देखू : ‘जनताले’ ई देल अछि नव बर्खक उपहार कोयला चाउर गहूमके दाम बढ़ा सरकार दाम बढ़ा सरकार बन्द केलक कत गाड़ी विदा नीति के तहत बन्द उद्यम सरकारी कह लोचन कविराय देश के भाग्य विधाता की की खेल देखौत जीत जौं देखत जनता’ अही छन्दमे देशमे लोकतन्त्रक स्थितिपर कहल गेल एक कविताक दू पांती देखू : ‘कह लोचन कविराय राज ई लाठी तन्त्रक लल्लू पप्पू चला रहल गाड़ी गणतंत्रक’ स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद जतेक प्रगतिकेर आशा लोक करैत छल,से नहि भ’ सकल छल| ‘चरैवेति’ शीर्षक रचना कहैत अछि : ‘फूसि सभ प्रगति कथा, फुसियाही ई विकास अन्न-वस्त्र जुटा पाएब, एखनो त बांकी अछि’ सामान्य जनक कष्टक लेल देशक नेतासभकें दोखी मानैत ‘नेता आ जनता’ शीर्षकसँ कहल गेल अछि : ‘नेता लोकनिक नजरि विदेशी नोटपर जनताक आँखि नचैए रोटी-भात लए’ विकासक स्थितिपर ‘के हिसाब देत’ शीर्षक रचनामे कहल गेल अछि : ‘दसमहला-बिसमहला बनय रोज सत्य बात खोपड़ि कतेक रोज खसय के हिसाब देत’ ‘नेता कहैछ देश उन्नति के शिखर चढ़ल अवनति ककर कतेक भेल के हिसाब देत’ लोक नेता चुनैए, आशा करैए जे हमर आवाजसँसदमे उठौताह,मुदा जौं नेतासँसदमे लोकक व्यथाकें व्यक्त नहि करताह, तं कविक शब्द बाजत,से कहल गेल अछि : ‘नांगरि दबा रहै छथि दुबकल जेसँसदमे सएह चुनावक बेर गाममे गरजि रहल अछि’ ‘उदार नीति’ शीर्षकसँ व्यवस्थापर जे कहल गेल अछि, से देखू : ‘अरथी अर्थक आजादीकेर कान्ह उठौने कीर्तनियां दल राम नामक’ सत्य चलल अछि थपरी झलिबज्जा ढोलबज्जा पोन पिटैए चिकड़ि गबैए भांट सूर्य दिस देश बढ़ल अछि’ जाहि समयक गवाह अछि ई संकलन ओहि समयमे देशमे राजनीतिमे जे दू टा धारा जोर पकड़ने छल, तकरा एना व्यक्त कएल गेल अछि : ‘मण्डल आर कमण्डल केर एहि राजनीतिमे जनता भेल तबाह आ नेता मौज करैए भाइ-भाइ केर जानी दुश्मन घात लगौने घृणा द्वेष ज्वालामे गामक गाम जरैए’ बिहारक जे स्थिति ओहि समय छल तकर साक्ष्य अछि रचना ‘फेर पाटलिपुत्र’ | कविता कहैत अछि : ‘वसुधा एव कुटुम्ब सगर्व जतए घोषित छल वर्गवाद के अगराहीमे आइ जरैत’छि अत्याचारी शासकसँ मुक्तिक निमित्त तें फेर पाटलिपुत्र कोनो चाणक्य तकैत’छि’ जाहि समयक ई संकलन अछि ,ओहिमे एहनो एकटा काल-खण्ड आएल छल, जे लोककें बौक बना देने छल आ तकर अभ्यास बहुत दिन लागल रह्लै | ’अद्भुत देश’ शीर्षकक अन्तर्गत ई पाँति देखू : ‘शब्द ब्रह्म थिक किन्तु अर्थपर अटकि जाइत अछि आइ सत्यके सत्य कहब अपराध भेल अछि’ पोथीमे व्यवस्थापर आंगुर उठबैत पीड़ित वर्गक टीसकें ‘धनकटनीक गीत’ शीर्षक रचनामे व्यक्त कएल गेल अछि: ‘हम सभ कमाएब आ खाएत कियो आन लगैए छगुन्ता ई छै केहेन विधान’ आ अधिकार लेलसँघर्षकसँकल्पक ध्वनि सेहो व्यक्त भेल अछि : ‘रोपने छी कटबै आ घर अपन भरबै अन्नक अभावे ने आब हम मरबै’ ‘चैत कबड्डी’,’हुक्का लोली,दीप जराउ’,’अटकन-मटकन’,’उठ रौ बौआ’, ’झिझिर कोना’,’करिया झुम्मरि’,’फेर कनुआइ छौ तोरे पर’,’आम छू अमरोरा छू’,’छै तकरे इतिहास’, ‘ताक धिना धिन’,’उट्ठी गोटी मोर पचास’,’मिथिलाक महिमा’,’मिथिलाक वसँत’,’देश महान छै’,’इतिहास युग नवीन के’,’हम मिथिलावासी’ आदि गीत मे मिथिलाक महानता, सम्पूर्ण देशक महानता,सँस्कृतिक विशेषता, आपसी स्नेह आ मेल-जोलक आवश्यकता,जन -जनक सुख आ समृद्धिक कामना आदि बातक उल्लेख बहुत सुन्दर आ सरल शब्द सबहक माध्यमसँ भेल अछि | ‘लेनिन’केँ बहुत सम्मानपूर्वक अभिनन्दन कएल गेल अछि | एहि संकलनमे कयटा रचना एहेन अछि जे गजल जकाँ लगैत अछि, किन्तु गजल बनि नहि सकल अछि |किछु रचनामे पहिलुक शेरमे गजलक गुण अछियो त बादक पाँति सभमे तकर अभाव अछि | बानगीक लेल देखल जाए ई रचना : ‘किछु गीत एहन होइ छइ गाओल ने जाइ छइ किछु चीज एहन होइ छइ पाओल ने जाइ छइ टहकैत रहै छैक कोंढ़मे करेजमे किछु घाव एहन होइ छइ देखल ने जाइ छइ’ काव्य-दृष्टिक विविधताक कारणे एहि संग्रहकें कोनो एक ‘वाद’मे नहि राखल जा सकैछ | ई संकलन मैथिली साहित्यमे उपलब्ध पद्य संकलन सबहक मध्य एकटा विशिष्ट स्थान पर रहबाक पर्याप्त योग्यता रखैत अछि | हिनक रचना संसारमे गीत अछि, कविता अछि, कथा अछि, हास्य-व्यंग्य अछि, अनुवाद अछि, संकलन-संपादन अछि । चिन्तन लेल मिथिला अछि, मैथिली-आन्दोलन अछि, देश अछि, देशक राजनीतिमे नैतिक आन्दोलन अछि । 'माटि-पानिक गीत'क बाद हिनक एहि संग्रहमे हिनक गीत रचना सभ अछि। गीत सभमे हिनक चिन्तन, सुन्दर सरल, लोकप्रिय शब्द सभ,स्वच्छ आ स्वस्थ दृष्टि देखि कहल जा सकैछ जे 'लोचन'जी जौं गीते टा लिखितथि तँ मैथिली भाषाक गीत कारक प्रथम पांतिमे हिनक स्थान सुरक्षित रहितनि । राम लोचन ठाकुर प्रसंग एखन विदेहमे भाइ राम लोचन ठाकुर जी पर जे विशेषांक आएल अछि, ताहिमे वंदना किशोरजी द्वारा जे साक्षात्कार प्रस्तुत कएल गेल अछि ताहिमे एक प्रश्नक जबाब दैत भाइ कहैत छथि जे हमरा पत्नीकें अक्षरक ज्ञान छलनि, मात्राक नहि | हमरा लगैत अछि जे इहो प्रश्न पूछल जेबाक चाही जे ओहि स्थितिमे परिवर्तनक हेतु अहाँ द्वारा की प्रयास कएल गेलै | मुदा, बड्ड देरी भ’ गेल अछि, आब ई प्रश्न ककरासं पूछब ? ...................................... ‘विदेह’मे प्रकाशित विशेषांकमे अग्रज राम लोचन ठाकुर जीक मैथिली साहित्य मे योगदानक विषयमे बहुत किछु जनलाक बाद आश्चर्य होइत अछि जे एतेक कर्मठ लोक एतेक जल्दी कोना अदृश्य भ’ गेलाह ? कोन एहेन गलती कोन स्तरसं भेलै जे स्थिति ककरो नियंत्रणमे नहि रहि सकलै ? 12 मार्चक’ घरसं निकलला आ एके बेर 6 अप्रैलक’ मृत अवस्थामे पाओल गेलाह | बीचक स्थितिक कल्पनासं मोन बेकल भ’ जाइत अछि | भाइ कत’ खसल-पडल हेताह—कोना दीन-हीन अवस्थामे की भेल हेतनि, एहि जिज्ञासाक समाधान कठिन अछि | आदरणीय राम लोचन जी एहेन साहित्यकारकें एहि तरहें जाएब सभकें व्यथित केलकनि | कते गोटे हुनका खोजमे डेढ़ माससं लागल छलाह | मुदा अहू प्रश्नक उत्तर लेल शास्त्रक सुनय पडत : विवाह आ जन्म-मरण ..........| ओना भाइ बहुत किछु मैथिली साहित्य जगतकें द’ गेल छथि जाहिसं ओ युग-युग धरि चर्चामे सभ ठाम उपस्थित रहताह | अपन अनुभव यैह कहैत अछि जे बहुत स्थितिक स्पष्टीकरण लोक अपनहु नै द’ सकैत अछि | गत पन्द्रह मार्च क’ हम अपने बाथरूममे कोना खसि पडलहुँ से नै बुझि सकलिऐ | ने पिच्छर छलै, ने चप्पल स्लिप करबाक कोनो आन कारण बूझ’ मे आएल आ ने बी पीक दबाइ छोड़ने रही | देबालसं टकरयबाक कारण माथक अगिला भागमे चोट बेशी बुझाएल |...................................... (आँखिमे चित्र हो मैथिलीकेर- आत्म-कथासँ) आशीष अनचिन्हार पारंपरिक-प्रगतिशील (रामलोचन ठाकुर) 1 भगवान शंकर विरोधाभासक देवता छथि। गलामे साँप मुदा बेटा मयूर पोसने। संगमे बाघ मुदा बड़दक सवारी। योगशास्त्रक जन्मदाता मुदा पत्नी लेल पागल। एहन-एहन बहुत रास विरोधाभास छनि हुनका ओ हुनका परिवारमे। एहि विरोधाभासक बहुत ढ़ंगसँ परिभाषित कएल गेलै। कियो एहि विरोधाभासकेँ कोनो परिवारक मुखियाक रूपमे देखै छथि तँ कियो एकरा शंकरक जीवनमे अभवाक रूपमे चित्रित करै छथि। 2 विश्वास ओ अंधविश्वासमे की अंतर छै? अंतर अतबे जे कोनो एहन प्रथा वा एहन नियम जाहिसँ समाजकेँ वा केकरो हानि नै हो से भेल विश्वास आ एहन प्रथा वा नियम जाहिसँ समाज वा केकरो हानि होइ से भेल अंधविश्वास। तँ मानवक विरोधाभास जँ अपनामे रहै तँ ओ ओतेक खतरनाक नै छै जेना कियो नास्तिक छै मुदा ओकर घरक लोक पूजा करै छै वा केकरो कहलापर पूजामे प्रणाम कऽ लैत छै। मुदा जखन कियो अपन फायदा लेल बलि दै छै वा तेहने सन काज करैत छै तखन ई अंधविश्वास भेल। साहित्यमे ई विश्वास-अंधविश्वास परिभाषित भऽ जाइत छै आचरणसँ। कोनो लेखक अपन आचरणमे जे रहैत छै (चाहे खराप किए ने हो) आ ओकर लेखनमे ओहने बात आबै छै तँ ओहि लेखककेँ नीक मानल जाइत छै आ एहिसँ समाजमे लेखनक प्रति सकारात्मक प्रभाव पड़ैत छै। रैदास-कबीरसँ लऽ कऽ तुलसीदास (उदाहरण स्वरूप) आदिक प्रभाव देखि सकै छी। मुदा जँ कोनो लेखक लिखित वा वाचिक तौरपर शोषित केर पक्षमे रहैत छै आ मनसा-कर्मणा शोषक केर पक्षमे तँ ई विरोधाभास पाखंडकेँ जन्म दैत छै आ समाज लेल हानिकारक होइत छै। अधिकांश आधुनिक लेखक लिखित तौरपर शोषित केर पक्षमे छथि तँ कर्ममे शोषक वा शोषक केर पक्षमे। तँइ वर्तमान समयमे समाज लेखन ओ लेखकपर संदेहक नजरिसँ देखै छै। 3 देवता सेहो एक तरहँक मानव छथि तँइ हुनके जकाँ मानव सेहो विरोधाभाषी होइत अछि। रामलोचन ठाकुर आन किछु हेबाकसँ पहिने मानव छथि तँइ हुनकोमे विरोधाभास हएब स्वाभाविक। केकरामे विरोधाभास नै छै? हमरा जनैत रामलोचनजीक सभ विरोधाभास मात्र समाजिक दायरामे रहल हेतनि तँइ ओ पाखंडकेँ जन्म नै दऽ सकल। समाजिक दायरासँ हमर मतलब जे दैनिक काज चलेबाक लेल जतेक समौझता एक सामान्य आदमी द्वारा कएल जाइत छै जेना कोनो पहिचान बलाक काज जल्दी कऽ देब, अपन पहिचानसँ कोनो सरकारी इस्कूलमे भर्ती करा देब आ एहने सन आन काज। रामलोचन ठाकुर सेहो अपन जीवनमे समाजिकता वश एहन समझौता केने हेता। मुदा ई समझौता पाखंडक जन्म नै दै छै। पाखंड तखन जन्मै छै जखन कि अपन सौख पूरा करबाक लेल वा कोनो भविष्यक लाभ लेल एहन समझौता कएल जाए। तँइ हुनक सभ विरोधाभास समाजक लेल हानिकारक एखन धरि नै भेलै। एखन धरि नै भेलै तँ निश्चिते ई मानल जा सकैए जे आगुओ नै हेतै। लगभग एहने सन विरोधाभास हुनकर लेखनमे सेहो छनि। ओ केखन कोन रूप धऽ लेताह से नै जानि। केखनो अग्निलेखक बनि इतिहास हनन करए निकलि जाइत छथि तँ केखनो मिथिला इतिहासक वंदना करए लागै छथि। आन लेखक, आलोचक आदिकेँ हुनकर ई विरोधाभास बहुत अखरै छनि। 4 रामलोचन ठाकुर मूलतः साहित्यकार नै छलाह। ओ मूलतः मिथिला-मैथिलीक एक्टीभिस्ट छलाह। एक्टीभिस्टकेँ साहित्यकार हेबाक चाही वा कि नै, अथवा साहित्यकारकेँ एक्टीभिस्ट हेबाक चाही कि नै ताहिपर कियो एकमत नहि छथि। पहिने तँ इएह प्रश्न छै जे एक्टीभिस्टकेँ परिभाषा की छै तँ ओ परिभाषा जनसेवक केर नजदीक पहुँचै छै। आ ई जनसेवक पारंपरिक अर्थमे नेता धरि सेहो पहुँचै छै। मुदा ई एक्टीभिस्ट के भऽ सकैए? वर्तमानमे बहुत मैथिली साहित्यकार जे नौकरीक स्तरपर सेटल छथि (सरकारी नौकरी) ओ सभ कोनो मंचपर जा कऽ भाषण झाड़ि अबै छथि आ अपन नामक आगू एक्टीभिस्ट लगा लै छथि। एहन लोककेँ कतेक दूर धरि एक्टीभिस्ट छथि से समाज ओ समय तय करत मुदा एतेक निश्चित जे सरकारी नौकरीमे रहैत ओ सभ मात्र थ्योरी रूपमे एक्टीभिस्ट छथि प्रैक्टिकल नै। प्रैक्टीकल एक्टीभिस्ट बनबाक प्रयास उत्तर प्रदेशक आइ.पी.एस अमिताभ ठाकुर केने छलाह हुनका योगी सरकार नौकरी खत्म कऽ जबरदस्ती घर बैसा देलकनि। रहलै बात प्राइभेट नौकरी बलाक तँ ओ रविदिन कोनो संस्थाक कार्यक्रममे चलि जाइत छथि, कोनो सचिव-अध्यक्षसँ जान-पहिचान भऽ जाइत छनि आ ओ अपनाकेँ एक्टीभिस्ट मानि लै छथि। जेना कि उपरे कहलहुँ जे रामलोचन जी मूलतः एक्टीभिस्ट छलाह साहित्यकार नै। शुरूआती दौरक एक्टीभिज्म लेल हुनका जे-जे आन चीजक जरूरति पड़लनि से-से ओ केलाह। मुदा जीवनक्रममे ओ सरकारी नौकरी केलाह आ क्रमशः ओ अपन एक्टीभिज्मकेँ रचनामे बदलि देलाह। जहिया हुनका बुझेलनि जे नाटक केलासँ मिथिला-मैथिलीक मुद्दा बेसी लोक लग जाएत तँ ओ नाटकमे एलाह। जखन हुनका बुझेलनि जे मिथिला-मैथिलीक मुद्दा कविताक माध्यमसँ बुद्धिजीवी लग जेतै तँ ओ कविता लिखलाह। जहिया बुझेलनि जे इतिहासक हनन केलासँ मिथिलाक भला हेतै तँ ओ इतिहासक हनन केलाह। जहिया हुनका बुझेलनि जे मिथिलाक वंदन केलासँ नीक हेतै तँ ओहो केलाह। कुल मिला कऽ ओ साहित्य लेल साहित्य केर रचना नै केलाह ओ अपन एक्टीभिज्म लेल अपन रचना केलाह। आ इएह कारण छै जे हुनकर रचनात्मक विचारधारामे घोर विरोधाभाषा देखाइत छै मुदा विरोधाभास नै छै कारण ओ सभ रचना ओ अपन एक्टीभिज्म लेल केने छथिन। हम एखन धरि जे लिखलहुँ ताहि आधारपर आन कोनो लेखक सेहो कहि सकैए जे हमर रचना हमर एक्टीभिज्मक अछि। मुदा धेआन देबए बला बात जे रामलोचन ठाकुर पहिने एक्टीभीस्ट छलाह। जँ पहिने ओ एक्टीभिस्ट नै रहितथि तखन निश्चिते हुनकर विरोधाभास केर आलोचना हम करितहुँ। आन लेखक केर रचनाक एक्टीभिज्म जँचबाक लेल हम इएह पैमाना रखने छी। एकटा बात तँ निश्चिते जे रामलोचनजीकेँ एक्टीभिज्मक परिभाषा ओ सरकारी नौकरीक मर्यादा दूनू बुझल छलनि तँइ ओ नौकरी समयमे अपन एक्टीभिज्मकेँ बिसरि गेलाह। जँ ओ चाहितथि तँ नकली एक्टीभिस्ट जकाँ निर्वाह कऽ सकै छलाह मुदा से हुनका काम्य नै रहल हेतनि। 5 कुल मिला कऽ रामलोचनजीक साहित्य हुनकर एक्टीभिज्म लेल एकटा साधन छै साध्य नै। तँइ बहुत विरोधाभास छै। जँ कोनो आलोचककेँ हुनकर विचारधारामे ओझराहटि बुझाइत छनि तँ अही कारणसँ बुझाइत छनि। जँ आलोचक हुनकर एक्टीभिज्मक रस्तासँ हुनकर साहित्य धरि पहुँचए तखन फेर कोनो ओझराहटि नै हेतनि। साहित्यक तौरपर रामलोचनजीक सभ विचारधाराकेँ देखैत हुनका हम "पारंपरिक-प्रगतिशील" मानैत छी। ई "पारंपरिक-प्रगतिशील" शब्द युग्म मैथिलीमे नै अछि मुदा एकर प्रयोग हम रामलोचनजी लेल कऽ रहल छी। ई शब्दयुग्म हुनकर रचनाक सभ विचारधाराकेँ सामने राखि दैत अछि। संपादकीय नोट-आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह ओ अनचिन्हार आखरपर रामलोचन ठाकुरजीसँ संबंधित अन्य सामग्री- 1) https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/313661235378678/ 2) https://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2012/05/blog-post_16.html 3) https://www.facebook.com/groups/videha/permalink/316679568410178 4) https://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2012/05/blog-post_22.html 5)https://sites.google.com/a/videha.com/videha/Home/Videha200.pdf?attredirects=0&d=1 , लिंक 1 ओ 2 एवं 3 ओ 4 केर सामग्री एकै अछि मुदा लिंक अलग-अलग। उपरका लिंक सभ पढ़लाक बाद गजेन्द्र ठाकुरजी द्वारा रामलोचनजीक उपर एकटा तथ्य पढ़बाक लेल निच्चाक एहि लिंकपर जाउ- https://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_6385.html अनचिन्हार लेल रामलोचन ठाकुर बर्ख 2000 केर मइ-जूनमे हम पहिल बेर कलकत्ता आएल रही आगूक शिक्षा लेल आ दिसम्बर 2008 मे हम कलकत्ता छोड़ि देने रही नौकरी लेल आ चलि गेल रही दिल्ली। बर्ख 2003 मे हम पहिल बेर अपन कविता पाठ सार्वजनिक मंचपर केने रही। कोन मंचपर केने रही, ओहिमे किनकर-किनकर भूमिका रहै तकर नमहर चर्चा हम अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास" मे केने छी। आ अही पाठ केर बाद हमरा कलकत्ताक बहुत लेखक, पाठक ओ संगठनकर्ता सभसँ परिचय भेल जाहिमे एकटा रामलोचन ठाकुर छलाह। ओहि दिनक परिचयक बाद ईहो पता लागल जे कलकत्तामे अन्य कवि सम्मेलन केर अतिरिक्त हरेक मासक दोसर रवि दिन कऽ एकटा "संपर्क" नामक गोष्ठी सेहो होइत छै जाहिमे साहित्यकार लोकनि जुटैत अछि। संपर्क गेल रही। पहिल संपर्क। जहाँ धरि हमरा मोन अछि हमर आ प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार योगेन्द्र पाठक वियोगीजीक पहिल संपर्क बैसार एकै छल मने ओहो हमरे जकाँ पहिल दिन आएल रहथि। आ तकरा बादसँ प्रायः कलकत्ताक हरेक साहित्यकारक संगत रहल। आ तकरे बाद बुझने रही जे कोन लेखक कोन बाट ओ कोन लक्ष्यक छथि। जाहिमे हमरा रामलोचनजीक बाट ओ लक्ष्य नीक लगैत रहए। हमरा रामलोचनेजीक बाट ओ लक्ष्य किएक नीक लगैत छल से जानब कठिन नै। जे हमरा नीक जकाँ जनैत छथि से हमर स्थिति सेहो जनैत छथि। जे नै जनैत छथि से हमर ओ संस्मरण पढ़थि जे हम फरवरी 2020 मे अपन पिताजीक मृत्युक बाद लिखने रही। कुल मिला सारांश अतबे जे हम अपना गामक महागरीब। किछु अंशमे एखनो छी मुदा स्थिति सम्हरल अछि। आब अहूँ सभ बुझि सकैत छियै जे हमरा रामलोचनेजीक बाट ओ लक्ष्य किएक नीक लगैत छल। दोसर बात ईहो जे हुनका जे कहबाक रहैत छलनि से कहि दैत छलखनि आब लोक जे करए। हुनकर भूमिका हम शिक्षक नै प्रोफेसर जकाँ मानैत छी। शिक्षक हाथ धरा सिखाएत। मुदा प्रोफेसर बाजैत चलि जाएत। आब अहाँपर निर्भर जे ओ नीक चीज पकड़ि सकैत छी की नै। अचानक तँ नै मुदा रामलोचनजीक हरेक बेरक भेंट हमरा किछु एहन सूत्र दऽ जाइत छल जाहिसँ हमरा जीवनमे सहायता भेटैत छल। साहित्यमे सेहो भेटैत छल मुदा बेसी सूत्र हम जीवन बला पकड़लहुँ आ तकर बाद साहित्य बला। एकटा संक्षिप्त नोट दऽ रहल छी-- 1) आर्थिक सूत्र- आर्थिक जीवन मुख्यतः शिक्षापर टिकल छै तँइ ओ युवा कविसँ शिक्षा कालमे मात्र शिक्षे लेल समय देबए कहथिन। ओ जीवनमे अर्थक महत्व सेहो कहथि। एक बेर संपर्कसँ निकलि (किशोरीकांत मिश्रजीक प्रेससँ) जाइत रही हुनके संगे। बाटमे किछुए देरक संग रहैत छल कारण हमर घर मात्र पैदल दस मिनटक दूरीपर आ हुनका बस पकड़बाक रहैत छलनि। चलैत-चलैत अर्थेसँ जुड़ल बात-चीतमे ओ हमरा कवि सभहक सीमा एना कहलाह जे मानू अहाँ नीक कविता लिखैत छी आ हम ओकर प्रसंशक छी मुदा अहाँ लग नौकरी नै अछि वा अछियो तँ ओतेक नीक नै अछि। मुदा अहाँक कविताक प्रसंशक रहितो जँ हमरा अपन बेटी लेल वर ताकए पड़त तँ ओहि काल अहाँक नाम हमर लिस्टमे दूर-दूर धरि नै रहत। बात ओ मात्र उदाहरण लेल कहने छलाह मुदा हम एकरा अपना जीवनमे लेलहुँ आ जहने हो तेहने स्थितिमे अर्थ दिस बेसी फोकस केलहुँ। साहित्य नै छोड़लहुँ। मंचक प्रति रामलोचन जी उदासीन नै छलाह मुदा हम अपना जीवनसँ मंचोकेँ हटा देलहुँ, कारण लगभग ओही भाषामे अर्थक महत्व हमर माँझिल भाए सेहो बजैत छलाह, एखनो बजैत छथि। एकै बात विभिन्न कोण, संदर्भमे सुनलासँ हमरा मंचक प्रति उदासीने नै कठोरो बना देलक। आब हम एकर फायदा बुझि रहल छी। 2) साहित्य सूत्र- हम हुनकर बातसँ दू टा चीज सिखलहुँ पहिल जे हरेक लेखक अपना लेल एकटा केंद्रीय विधा चुनए। ओ बहुविधावादी लेखनकेँ प्रायः संदेहसँ देखैत छलाह। बादमे हम अपना लेल गजल चुनलहुँ। दोसर जे ओ पुरस्कार-सम्मानकेँ लेखनक बाइ-प्रोडक्ट मानै छलखिन। ओ एक बेर कहलाह जे पैखाना घृणित वस्तु छै मुदा जीवन लेल आवश्यक तेनाहिते पुरस्कार लेखन लेल छै। हम पुरस्कार लेल हुनके बात मानै छी। रचनारत लेखककेँ जखन उपेक्षा होइत छै तखन किछु ने किछु दुख अवश्य होइत छै। रामलचोनजीकेँ सेहो कोनो क्षण विशेषमे दुख भेल हेतनि मुदा ओ दुख हुनका लेल अवरोध नै बनलनि से अंतो धरि हुनक सक्रियतासँ बूझि सकैत छी। ओना एहि तरहक दुख हरेक लेखकक जीवनमे अबैत छै। एहन दुख एबाको चाही तखने कोनो लेखक सार्थक रचि सकैए ताहूमे मैथिली भाषामे जाहिमे पुरस्कार भेटिते लेखन बंद भऽ जाइत छै। 3) भाषा सूत्र- आइ हम मात्र मैथिलीमे लीखै छी तँ से गुण हमरा रामलोचन ठाकुरसँ भेटल अछि। एक बेर (प्रायः संपर्केमे) बाजल रहथि जे बंगला छोड़ि आन कोनो उत्तर भारतीय भाषा (मैथिली, हिंदी, उर्दू, नेपाली आदिमे) मे लेखन कऽ अर्थोपार्जन नै कएल जा सकैए। तखन जँ हिंदियोमे पाइ नै भेटत आ मैथिलियोमे पाइ नै भेटत तखन मैथिलिएमे रचना किएक ने लिखी। कुल मिला हम आब भाषा लेल इएह नीति रखने छी। बहुत संभव जे आर बात हम हुनकासँ सिखने होइ मुदा जे मुख्य छल से उपरक तीन अछि। कहबाक लेल तँ हम हुनका साहित्यिक गुरू कहैत छियनि मुदा वस्तुतः ओ हमर जीवनक बहुत रास गुरूमेसँ एकटा सेहो छथि। आब जखन कि रामलोचनजी एहि संसारमे नहि छथि, हम ई बात सभ नहियो लीखि सकैत छलहुँ मुदा से कृतघ्नता होइत आ हम बदमाश, असभ्य, अबंड सभ किछु भऽ सकैत छी मुदा कृतघ्न आ बैमान नहि। ४ टा बीहनि कथा १.बूझब "बीते-बीत धूर होइ छै आ धूरे-धूर कट्ठा फेर कट्ठे-कट्ठा बिग्घा..." "बुझलियै कि नै........." "की यौ बुझलियै कि नै..." "नै बुझलियै....." "जाह सीधे छै बुझनाइ" "मुदा हमरा जेबीमे पाइ नै अछि।" २.मजबूरी "ई फेसबुकपर बूढ़ लोक सभ अपन बेटा-पुतहुअक जन्मदिनक बधाइ किए दैत छै" "किए देबाक नै चाही से। एहिमे कोन खरापी छै?" "खरापी होइक वा कि नै होइक मुदा....." "मुदा की?....." "लागै छै जेना ओ सभ सार्वजनिक बधाइ नै देथिन तँ बेटा-पुतहु घरमे रहहो नै देतनि"........ ३.स्थिति "सासुरमे नौकरानी छियै" "तखन नैहरमे तँ मलिकीनी रहल हेबै" "नै ओत्तौ नौकरानिए छलियै" "से कोना" "नैहरमे किछु सुविधा-स्वतंत्रता संग नौकरानी छलियै तँ सासुरमे किछु बंधनक संग" ४.भूत अल्हुआ झा आ सुथनी मिश्र एकै संगे बैसल छलाह कि उम्हरसँ कटहर ठाकुर सेहो पहुँचि गेलाह। अल्हुआ कटहरकेँ देखिते पुछलखनि "बहुत दिन गाएब छलह से कि बात" कटहर झा उत्तर देलखिन "श्मसान साधनामे छलहुँ भूत देखबाक लेल" सुथनी मिश्र पुछलखनि-- "देखलहक" जबाब भेटलनि "नै देखबे नै कएल" अल्हुआ झा कहलखिन-"एहि लेल साधना-फाधनाक कोन जरूरति बस सरकारी विकासक नाम सुनि लएह ओहो एक तरहक भूते छै। खाली सुहबहक मुदा देखेतह नै" बीहनिकथा की छै? बीहनि कथापर किछु लिखबासँ पहिने ई स्पष्ट कऽ दी जे जहियासँ हम बीहनिकथा नामक विधाक प्रति काज देखलहुँ तहियेसँ लागए लागल जे ई मात्र नामक घोंघाउज अछि आ से संभवतः ओहि दुआरे भेल जे एखन धरि बीहनि कथा उपर कोनो तेहन सैद्धांतिक बहस वा आलोचना नै भेल अछि। ओना ईहो मानबामे कोनो दिक्कत नै जे किछु बीहनि कथाकार मात्र नामे बदलबाक लेल लीखै छथि। एहन कथाकार के-के सभ छथि से गनाएब एखन अभीष्ट नै। हमर अभीष्ट अछि एहन तथ्य जाहिसँ बीहनि कथापर किछु प्रकाश पड़ै। बीहनि कथापर आन बात कहबासँ पहिने हम कहि दी जे व्यक्तिगत तौरपर हम मैथिलीमे ओहने लघुकथाक अस्तित्व मानै छियै जकरा हिंदीसँ आनल गेलै। मुदा संगे ईहो जोड़ब जे बीहनिकथा लघुकथाक एडभांस रूप छै। जेना शाइरीमे गजलोसँ बेसी कठिन रुबाइकेँ मानल जाइत छै तेनाहिते हम बीहनिकथाकेँ लघुकथासँ बेसी कठिन मानै छियै। जे हजारक-हजार लघुकथा लीखि अभ्यास करता से कदाचित् कहियो बीहनिकथा लीखि सकै छथि। एकर माने ई भेल जे हरेक बीहनिकथाकार लघुकथा लीखि सकैए मुदा हरेक लघुकथाकार बीहनिकथा नै लीखि सकत आ तकर कारण अभ्यास छै। बीहनिकथा केकरा कही आ कोना लिखल जाए ताहि लेल बहुत चर्चा भेल आ बहुत मंथन भेल। मुदा हमरा जनैत वर्तमानमे जे कियो बीहनिकथा लीखि रहल छथि से बीहनिकथा नै लघुएकथा लीखि रहल छथि भने ओकर शीर्षक बीहनिकथा किए ने हो। आब एहिठाम ई प्रश्न उठै छै जे आखिर बीहनिकथाक कोन एहन मापदंड छै जाहि आधारपर हम बीहनिकथाकेँ लघुकथासँ अलग कऽ रहल छियै तँ हमर उत्तर हएत जे "जँ कोनो कथानक अहाँ संपूर्ण रूपसँ मात्र 60-70 (बेसीसँ बेसी 80-90)मे कहि सकी तँ ओ बीहनिकथा हएत। शब्दक संख्या जतेक कम होइत चलत मुदा कथानक संपूर्ण रहत ओ बीहनिकथा ओतबे उत्कृष्ट हएत। वर्तमानमे दू छोड़ अछि एकटा अनमोल झा जे कि लघुकथापर अनघोल केने छथि तँ दोसर छोड़ मुन्नाजी जे बीहनिकथाक डोर रखने छथि। मुदा अफसोच जे ई दूनू गोटे विधाक मर्म बुझबामे असफल रहि गेलाह। अतेक हम निश्चित रूपसँ कहि सकैत छी जे अनमोल झाक किछु रचना जे कि लघुकथा शीर्षकसँ अछि से वस्तुतः बीहनिकथा अछि उदाहरण लेल हिनक पोथी "समयसाक्षी थिक" केर 'नेत (एक)', 'नेत (तीन)' तेनाहिते मुन्नाजीक बहुत रास रचना जे कि बीहनिकथाक शीर्षकसँ अछि से वस्तुतः लघुकथा अछि उदाहरण लेल हिनक पोथीकि "प्रतीक" केर रचना सभ देखल जा सकैए। हमर कथन- वर्तमान मैथिलीमे बीहनिकथा बहुत कम्म अछि आ ई अभ्यासक चीज छै। जतेक अभ्यास करब ततबे कमांड हएत जे कम शब्दमे पूरा कथानक रचि दी। अनमोल झा लघुकथा लिखैत-लिखैत एक-दू बीहनिकथा लीखि लेने छथि मुदा मुन्नाजीक लघुकथा बीहनिकथा होइत-होइत रहि गेल अछि। उम्मेद अछि जे आबए बला कालखंडमे ई दूनू गोटे आ हिनका संग अनेको नव लेखक नीक बीहनिकथाकार कहेता। एक बात जे भ्रम तँ नै छै मुदा मैथिल सभ एकरा भ्रम बना कऽ प्रस्तुत केलथि-- Seed story आ बीहनिकथा। Seed story अंग्रेजीमे होइक वा कि नै होइक मुदा ई निश्चित तौरपर बीहनिकथा केर अंग्रेजीकरण थिक। मैथिल सभ जँ बीहनिकथाकेँ Seed story कहै छथि ताहिसँ ई साबित नै होइ छै जे ई Seed story अंग्रेजियोमे हेतै। तँइ हम अंग्रजीक विद्वान सभसँ आग्रह करबनि जे ओ अपन उर्जा एहि बातमे नै लगाबथि जे अंग्रेजीमे Seed story नै होइ छै तखन ई गजेन्द्र ठाकुर वा कि मुन्नाजी Seed story किए प्रचलित करै छथिन। ओना देखल जाए तँ अंग्रजीमे Watermelon story नामक शब्दयुग्म छै तँ बहुत संभव जे Seed story नामधारी सेहो होइक। हरेक भाषामे किछु लोक एहन होइते छै जे ओ अपन स्कूल-कालेजक सिलेबसमे जे पढ़ने रहै छै ताहिसँ आगू जाए नै चाहै छै। एखनो ई कहए बला बहुत लोक भेटताह जे मैथिलीमे हरिमोहन झासँ आगू किछु नै भेलै, हिंदीमे प्रेमचंदसँ आगू किछु नै भेलै......तेनाहिते अंग्रजियोमे हेतै। खएर जे किछु......... मैथिल जखन केकरो पसंद नै करै छै तँ ओकरा हरेबाक लेल पहिल काज नाम बिगाड़ब कऽ दैत छै। जँ कतहुँ अहाँकेँ 'बिहनीकथा', बिढ़नीकथा', मधुमाछीकथा' आदि देखएमे आबए तँ तुरंत बूझि लेब जे ई सभ बीहनिकथासँ डेराएल लोक छथि। आ ई सभ जीवन भरि मात्र नामे बिगाड़ि अपन अहम् संतुष्ट करैत रहता। संगे-संग हम ईहो जोड़ए चाहब जे एहन लोक सभ साहित्यिक रूपसँ अयोग्य होइत छथि। लॅाकडाउन केर कथा (व्यंग्य) एकटा गाममे A नामक आदमी छलाह। सभ्य ओ विद्वान। हुनकर बियाह B नामक लड़कीसँ भेलनि आ एहि दूनूक चारि टा बेटा भे;लनि C, D, E आ F। चारू बेटा साहित्य केर मर्मज्ञ। रक्ष अतबे रहल जे विधाक मर्मज्ञ नै भेल बस साहित्ये केर भेल। कालक्रमे ई चारू अपन विद्वतासँ पूरा परिसरमे चमकि उठलाह। चारू दिस अही चारुक चर्च। चारू भाए केर काज बाँटल। पहिल केर काज छलनि साहित्यमे कोना अवनति आबि रहल छै ताहिपर चर्च करब। लोक सभ हिनकर बातपर लहालोट भऽ जाइथि। एकदम तैशमे आबि जाथि जे आउ C बाबू हम अहाँक संग छी। फेकि देबै एहि साहित्यिक गंदगी सभकेँ। दोसर केर काज छलनि अवनति भेल साहित्य केर मीठ समीक्षा करब। बहुत साहित्यकार हिनकर पाछू-पाछू घूमल करनि। जे कनी क्रांतिकारी तिनको मोनमे हिनका प्रति सहानुभूति। ई D बाबू सदिखन गोष्ठीमे उक्ति फेकथि जे साहित्यमे सही आलोचना नै भऽ रहल छै। खाली प्रशंसे-प्रसंशाक भंडार अछि। तेसर केर काज छलनि अनुवाद केर नामपर छल करब। जाहि भाषाकेँ जनितो नै छलाह ताहि भाषाक पोथी अनुवाद भऽ जाइत छलै। E बाबू अपन भाषाक रचनाकेँ आनो भाषामे लऽ जेबाक लेल कमीशन खाइत छलाह। बहुत लोक ललायित रहैत छल। वरिष्ठ बेसिए। चारिम केर काज छलनि पुरस्कारक जूरी बनब आ पुरस्कार लेब-देब। चारू भाएमे सभसँ बेसी इएह F बाबू केर चलती छल समाजमे। हिनकापर जथा-टका सभ किछु निछाउर होइत छल। जिनकर जेहन विभव। संसारमे सभ किछु होइत छै। ई चारू भाए अपन-अपन काज कऽ रहल छलाह आ समाजमे कहै छलखनि जे हमरा दोसरसँ मतलब नै अछि। दिनमे चारू भाए अलग मुदा रातिमे ई चारू एक संगे खा कऽ आ पीबियो कऽ अगिला दिनक प्लान करैत छलाह जे अगिला बेर केकरा बेकूफ बनेबाक छै। मैथिली साहित्यमे C, D, E आ F केर काज नीकसँ चलि रहल छल। पाइसँ सम्मान धरि। मुदा दुर्योग कोरोना कारण C, D आ E केर मृत्यु भऽ गेलनि आ F कहुना बाँचि गेलाह (नोट- F लग पुरस्कार बेचलासँ जे पाइ आएल छलनि ताही सभसँ आक्सीजन कीनल गेलनि)। F बहुत हतोत्साहित छलाह। तीनू भाइ केर सहायतासँ हुनकर काज असान भऽ जाइत छलनि। पुरस्कार बेचियो दै छलखिन आ हुनकापर कोनो आँच नै अबैत छलनि मुदा आब असगरे रहि गेलाह। अंतमे बहुत सोचलाक बाद हिम्मति केलनि आ असगरे सभ काज करबाक भार उठेलनि। आ प्रयास करए लगलाह। आब ओ दिनमे समय नियत कऽ लेने छथि। आठ बजेसँ दस बजे धरि साहित्यिक अवनतिपर भाषण दै छथि। दस बजेसँ बारह बजे धरि मीठ समीक्षा करै छथि आ तकर बाद दू घंटाक ब्रेक लै छथि। दू बजेसँ चारि बजे धरि अनुवाद कर्म (कुकर्म) लेल तैयार रहै छथि आ चारि बजेसँ चह बजे धरि जूरी एवं पुरस्कार वितरणमे रहै छथि। फेर साँझमे तीनू भाए केर फोटो लग जा प्रणाम कए रसरंजन (तरल साहित्य) करै छथि आ अगिला बेर केकर काटल जाए से सोचै छथि। "पाठक हमर पोथी किए पढ़थि" एहि शीर्षककेँ एनाहुतो लीखि सकैत छी जे "पाठक हमर पोथी किए किनताह"। एहि तरहक विषयपर विवाद होइत रहत मुदा हमरा लाभ बुझाइए जे हम पाठक लग अपन self-appraisal प्रस्तुत कऽ रहल छी। बहुत लोक एकरा नैतिक रूपे खराप मानताह तँइ मैथिलीमे एहन विषयपर नै लीखल गेल (मौखिक तँ सभ लेखक करिते छथि) मुदा हम नहि मानैत छी। कहबाक लेल तँ ई self-appraisal प्राइभेट नौकरी लेल छै जाहिमे कर्मचारी अपन गुणक विवरण दैत छै आ ओकर बॅास ओकरा देखि कऽ मिलान करै छै जे लिखल चीज वास्तवमे सही छै कि नै आ तकर बाद ओहि कर्मचारीक वेतन वृद्धि वा प्रमोशन होइत छै। हमरा लगैए जे ई साहित्यो लेल नीक काज करत। एहि विषय अंतर्गत लेखक अपन पोथीक ओहन किछु विशेषता अवश्य लीखथि जकरा बादमे समीक्षक-आलोचक देखि कऽ तय कऽ सकथि जे देल गेल विशेषता केर निर्वाह पोथीमे भेल छैक वा कि नै। आ एहि क्रममे हम अपन पोथी "अनचिन्हार आखर" जे कि 2011 मे श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल छल पाठक लग तकरा दऽ रहल छी। श्रुति प्रकाशन केर परिचय लेल ओकर विकीपीडियापर जा सकैत छी जकर लिंक https://mai.wikipedia.org/s/iu7 अछि। जहिया इंटरनेटपर ब्लागपर धूम रहै तहिया लेखक सभ अपन पोथीक नामपर ब्लाग बनेलाह मुदा "अनचिन्हार आखर" नामक ब्लाग 2008 मे बनल आ 2011 मे अही नामसँ हमर पहिल पोथी प्रकाशित भेल। पोथीक नाम ब्लागक नामपर हो से आइडिया गजेन्द्र ठाकुरजीक छलनि आ प्रकाशनक श्रेय हुनके। वर्तामनमे एहि पोथीक प्रिंट रूप उमेश मंडल, निर्मलीसँ प्राप्त भऽ सकैए। आब आबी किछु एहन बातपर जाहिसँ ई पाठककेँ ई सहूलियत हेतनि जे उपरमे लिखल पोथी किए पढ़बाक चाही वा कि किए किनबाक चाही--- 1) कोनो विषय वा विधापर पहिल बेर लिखबासँ पहिने कतेक तैयारी हेबाक चाही तकरा जनबाक लेल पाठक एवं लेखककेँ अनिवार्य रूपसँ पढ़बाक चाही ई पोथी। 2) रचनामे प्रचलित शब्द हेबाक चाही वा कि पुरान एवं अप्रचलित से बहस मैथिलीमे अनवरत चलि रहल अछि आ ताही संदर्भमे पाठक एवं लेखक-आलोचक सभकेँ आमंत्रित करैत छियनि ई पोथी पढ़बाक लेल। हमर एहि पोथीमे नव आ पुरान दूनू तरहक शब्दक जाहि तरहे प्रयोग कएल गेल अछि से ताहिसँ दूनू पक्षक लोक संतुष्ट हेताह से हमरा विश्वास अछि। 3) ई पोथी वैदिक छन्द जनबाक लेल सहायक अछि। लोक वेदक नाम तँ जपैत छथि मुदा वैदिक छन्दक गिनती कोना होइत छै से नै जानि पाबै छथि। पाठक ई पोथी एहि लेल ई पोथी अवश्य पढ़थि। 4) साहित्यमे खास कऽ गजलमे प्रेमपरक विषय अनिवार्य रूपसँ अबैत छै मुदा अधिकांशतः प्रेमपरक रचना एक सीमाक बाद बाधक भऽ जाइत छै। मुदा प्रस्तुत पोथीमे प्रेमक प्रयोग एना भेल छै जे बाप-बेटी वा कि भाए-बहीनि एकै संगे एहि पोथीक रचना सभकेँ पढ़ि सकैत छथि। 5) जे पाठक मैथिली गजलक विकासक्रम बूझए चाहै छथि तिनका ई पोथी अवश्य पढ़बाक चाही। ई पोथी अही विधा केर अछि। एहि पाँच टाक अतिरिक्त आरो बात सभ अछि जाहि लेल पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक चाही मुदा एहि ठाम ओ बात सभहक खोज करबाक लेल हम पाठक एवं आलोचक दूनूकेँ आग्रह करबनि। पद्य खण्ड चित्र: प्रीति ठाकुर जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ गजल ककरो पलखति नै छै पोथी पढ़तै के पढियो जँ लै त मुश्किल छै जे गुनतै के भरि घरमे छिडियायल पोथी जहाँ-तहाँ अही लेल त झगड़ा होइए बुझतै के कान मूनि बैसल छी अपन सुनयबालय यैह हाल सबहक छै अनकर सुनतै के नाथू अपन महींस अहाँ कुड़हरिएसँ किछुओ मतलब नै छै ककरो बजतै के अस्पताल ब’न’ चाहय सभ मन्दिर-मस्जिद काज ‘अनिल’ छै कठिन कहू ई ठनतै के ( मात्रा क्रम : 2222 2222 222 ) दू टा अलग-अलग लघुकें एक दीर्घ मानल गेल अछि | चारिम शेरक पहिल पाँतिमे अंतिम लघुक गिनती दीर्घमे भेल अछि | गजल प्यास मेटेबालय पोखरि खुनबैत देखलिऐ भोज काल ओकरा कुमहर रोपैत देखलिऐ कतहु मूँह बओने धरती रहलइ ओहिना और मूसलाधार कतहु बरसैत देखलिऐ सरबन-सन जे पिताक सेवा छल करइत तकरा आक्सीजनक लेल तडपैत देखलिऐ मन्दिर मसजिद गिरिजाघर गुरुद्वारा सभ सभकें बेबस आ बौक भेल देखैत देखलिऐ घरमे दुबकल त्राहि कृष्ण करय नर-नारी सबहक छातीमे धधरा धधकैत देखलिऐ ( सरल वार्णिक बहर / वर्ण-18 ) गजल माछ-दही जतरालय की ई दुनियाँ ककरालय की दै बाला देबे करतै नै सोचत हमरालय की किछु बाजत किछु नठि जायत लुच्चा आ लबरालय की कतहु बैसि कय खा लेतै ठाँ-पीढ़ी बगरालय की दुनियाँलय फगुआ-बकरीद मुरगा आ बकरालय की पांचम शेरमे पहिल पाँतिमे अंतिम लघुक मात्राक गिनती नै कएल गेल अछि | ज्ञानवर्द्धन कंठ गजल एक बेरि सभ संगे कहियौ जय जय सीताराम बेरि बेरि सभ संगे बजियौ जय जय सीताराम पाँच बर्ख जे सूतल रहला तकला नहि घुरि गाम फेर आइ ओ जितला नचियौ जय जय सीताराम एक बेरि नहि सूतल खटिया जिनगी मे ओ प्रेत दान आइ खटिया नव करियौ जय जय सीताराम मूर्ति माइ दुर्गा केँ पुजिकय कन्या पूजी सात मारि पेट मे कन्या कहियौ जय जय सीताराम भाव भेस भाषा केँ बिसरी कहबाबी स्मार्ट आन नीक अपना केँ दुसियौ जय जय सीताराम (21 21 222 22 22 2221) गजल काज भेलै ओकर ओ दफा भ' गेलै लाज एलै नै तनिको बिदा भ' गेलै मेघ कारी ओमड़लै गरजि क' खूबे नै बरिसलै ओ कनियो हवा भ' गेलै जे गछलकै ओ तहिया तकर गपे की बेरि बितलै एलेक्शन नफा भ' गेलै ठामठामे दोकाने बहुत लगे मे ज्ञान कीनब से कैंचा सफा भ' गेलै भेल झौहरि दोकानेदलान खूबे भाव नेहक ओ चिंता हवा भ' गेलै गजल हमरा सन केओ नीक नै छै यौ हुनका सन बड़ बेठीक नै छै यौ हम्मर कनियाँ सैंतल बड़ी चिक्कनि हमरा सन उँचगर टीक नै छै यौ भैया छथि खूबेखूब बैमनमा हुनकर ई रंगत ठीक नै छै यौ सभदिन रहलौं दुब्बर मुदा दाबल तैयो नै खोंखी छीक नै छै यौ छी हम बड़गुन्ना की कहू अपने दुनियाँमे सुल्टा लीक नै छै यौ (22 222 21 222) गजल सवाल जय सियाराम जवाब जय सियाराम दबाइ छै बिकै लेल इलाज जय सियाराम खरैच कय पचा गेल हिसाब जय सियाराम पढ़ैत ओ बढ़ै लेल पढ़ाइ जय सियाराम विचार छै बड़ा नीक हियाव जय सियाराम सवाल बड़ लगै तीत जवाब जय सियाराम गजल बात बिगड़तै नहि कहबै यौ लोक बमकतै नहि कहबै यौ आगि लगा ससरैछै से की देखि ससरबै नहि कहबै यौ दाबि नरेठी कमजोरक ओ खेत हड़पतै नहि कहबै यौ छोट बड़क की निर्धारणमे जाति पकड़बै नहि कहबै यौ दूध अलग की पानिक फेंटल निर्णय करबै नहि कहबै यौ गजल मीत गीत हम गाबी कोना प्रीत रीत समुझाबी कोना बोन-बोन बौआयल मनकेँ ताकि-हेरि हम पाबी कोना पोर-पोर पीड़ायल हम्मर जोर-जोर दुख दाबी कोना नोर-झोर औनायल नेना ताकि माय हम लाबी कोना जोर-जोर गरजल सिंहासन घेंट दाबि उनटाबी कोना गजल मोन नहि लगैए यौ जीह बड़ डरैए यौ मीत नहि निकेँ हम्मर चित्त नहि लगैए यौ राति दिन बहैए से नोर नहि रुकैए यौ एक घर कनैए आ एक घर गबैए यौ भाल पर फटाफट ई काल बड़ नचैए यौ गीत कम गबैए जे ढोल बड़ पिटैए यौ कत्त' छथि शिवा दानी बाट नहि सुझैए यौ सुभाष कुमार कामत, नौआबाखर, घोघरडीहा सुभाष फाटल जिंस दोसर पर एक आँगुर उठाबै सँ पहिने अपन चारि आँगुर दिस सेहौ देखियौ कोनो महिलाक पहिरल पहनावा आओर फाटल जिंस देखि अहाँक लाज आओर शर्म होएत अछि मुदा हम पुरूख वर्ग पहिरी फाटल जींस आ नांगट रही तँऽ समाजक कोनो हर्ज नै कियाक तँऽ अखनो पृत सतात्मक समाज अछि सैह नऽ आबि नै पहिरत कोनो लड़की फाटल जिंस हम आश्वासन दै छी मुदा ओं सँ पहिने हमरा अहाँ ई आश्वासन दियै जे हमर अहाँक बुद्धि विवेक ओ फाटल जिंस सँ बेसी चिथरा चिथरा भ गेलि अछि ओ कहिया धरि बदलब। जनगणना मे रहूँ देशक कोनो कोण मे बस मैथिली याद राखब मोन मे मैथिली छी हमर मातृभाषा सदखिन धियापुताक संग बाजू गर्व सँ कैरि चाकर सीना कनियो नै एंठेबै वरना बड़का जूलूम भऽ जाएत जनगणना मे एकटा प्रश्न पूछत की थीक अहाँक मातृभाषा ? झट सँ अहाँ कहब मैथिली हमर मातृभाषा शान सँ बाजू मैथिली जुनि बिसरब मातृभाषा । हरायल गाम पोखरमे नै अछि जाइठ बूढ़ा पीपर मे रहल नै कोनो ठायर कासक छारल भीतक घर खरही के लागल टाट खरौआ डोरीके बनहन मोथी पटेरक पटिया आंगन चिनवार सभ हारा गेलि भानस घर मे नै अछि चिपरी गोइठा आंगन मे नै अछि उखैर- समाठ, ढेंकी जत्ता सभ भ गेलि निपत्ता असगरे सिलवटा गवाह अछि मंदिर-मस्जिदके भेल खूब तरक्की गामक सरकार जमीन पर दबंग केने अछि अवैध कब्जा भोथे गेलि सबटा इनार भोर सांझ दोपहिया तीनो पहर देश दुनिया क खबर देनहार रेडियो गिन रहल अछि अपन बचल खुचल दिन हिनकर डागदर समय सँ करलक नै अपनेक नवीनीकरण आबि खुद अछि बीमार लाजार आबि कहियौ एक संग भेट नै होएत अछि बचपन क सबटा संगी तुरिया जिंदगी भ गेलि अछि छुटछुटा पेंच लागल भोथहा टेंगारी सँन बढ़ हरास भेलि जखन देखलो टेलीविज़न स्कीन पर गुमशुदा क सूचिमे हरायल अपन गाम। मुन्ना जी बाल कविता- सुसंस्कार शुन्य भेल सपन नुका क' राखू अपन संस्कार जगा के राखू अछि शुट-बुट शिक्षो मे लागू मोन के मैथिल बना के राखू कम्प्युटर गेम अछि सुन्नर मगज टटका बना के राखू नेना लक्ष्यहीन नहि हुअए तकर जोगार धरा के राखू ककरो बानि चाहे रहय केहनो हृदय सँ अप्पन बना के राखू आशीष अनचिन्हार गजल बाहर बाहर जोड़ल भतार भितरे भीतर टूटल भतार छै मृगतृष्णा सन के विकास इम्हर उम्हर दौड़ल भतार इच्छा माने पूरा समान किम्हर जेतै परिकल भतार लेने हेतै सभटा हिसाब चुप्पे रहि रहि कानल भतार हमरा आने देलक समाद अपने लोकक दागल भतार सभ पाँतिमे 22-22-22-121 मात्राक्रम अछि। गजल निशानापर बूढ़ संगे बच्चा छै देशमे आब युवा केर सत्ता छै दर्दक अनुभव होइतो नोर रोकब ईहो एक तरहँक गर्भहत्या छै सत्य हुनकर ठोरक चुप्पी जगतमे बाद बाँकी बात मिथ्ये मिथ्या छै केकरो हाथमे भरलाहा भारी केकरो हाथमे खाली डिब्बा छै लोहा के हो प्लास्टिक के या काठक कोनो कुर्सी अपनामे सत्ता छै सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल पानि कादो थाल की छै बोनि उपजा टाल की छै प्रश्न ईहो पूछि देलक आर कहियौ हाल की छै साधि लेलक दर्द सभटा राग सुर आ ताल की छै घीचि लेतै प्राण सभहक जीह की छै खाल की छै गेल सौतिन फेर पोखरि माछ पुछतै जाल की छै सभ पाँतिमे 2122-2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी)। गजल बात हुनकर सम्मोहन हो राम हँसी हुनकर दुखमोचन हो राम नमरी बड़ हल्लुक छै से कहलक फाइल सभ केर ओजन हो राम ने बँचलै नौकरी ने बेपार भेटतै कोना भोजन हो राम छै हुनके माला हुनके माइक हुनके मंच संयोजन हो राम छै तीत अकत बेबहार लेकिन भेलै मीठ संबोधन हो राम सभ पाँतिमे 222-222-222 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल एक आँगन बहुते विचार सात चुल्हा सत्तर भतार माथ हुनकर हुनके लिलार हाथ हुनकर हुनके कटार देशमे छै अतबे फसाद मूँह हुनकर अनकर सचार मोनमे छै अतबे सवाल कोन कोना जेतै लचार नग्र नग्रक बाते कमाल गाम गामक दुक्खे अपार सभ पाँतिमे 2122-22-121 मात्राक्रम अछि। गजल सभटा सुविधा सरकारी राम हरे खाली हुनके सरदारी राम हरे जीवन भेलै अखबारी राम हरे रिपोर्टिंग रहलै जारी राम हरे अपनेमे मारा मारी राम हरे उजड़ल पूरा फुलवारी राम हरे अपने थारी घिउढ़ारी राम हरे खाली अपने परचारी राम हरे बच्चा भेलै संस्कारी राम हरे माए रहलै बेचारी राम हरे सभ पाँतिमे 22-22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। राम हरे पदक प्रयोग भजन सभसँ लेल गेल अछि। गजल आइ जे इतिहास हेतै काल्हि से उग्रास हेतै पाइ बिन अतिचार मानू पाइ बिन मलमास हेतै की जरूरी हारि मानी आस रखने रास हेतै बूझि गेलहुँ बात हुनकर दोसरे सभ खास हेतै छल अभयमुद्रा बहुत दिन आब ओ संत्रास हेतै सभ पाँतिमे 2122-2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी)। गजल गरीबक नाम मजबूरी मिश्रा अमीरक नाम अंगूरी मिश्रा प्रस्ताव लटकल रहलै अधरमे नहिए भेलै मंजूरी मिश्रा भेल छै हुनकर ठोरक लालीसँ पूरा जीवन सिंदूरी मिश्रा छै अपने लेखक अपने पोथी संस्था छै अपने जूरी मिश्रा केकरो दोस्ती नै टूटै मुदा ईहो छलै बड़ जरूरी मिश्रा सभ पाँतिमे मात्राक्रम 222-222-222 अछि। दू टा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल
मोन बनलै शांतिवादी पेट बनबै क्रांतिकारी एक राजा एक रानी बाद बाँकी दास दासी ई जमा हमरे जमा अछि आँखि भारी पीठ भारी की कऽ सकतै से तँ कहियौ दोस्त बनलै काठ आरी भाग ओकर एहने छै एकभुक्ते एकचारी सभ पाँतिमे 2122-2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी)। गजल
मोनक उप्पर बात बहुत मोनक भित्तर घात बहुत
बिहाड़ि या कोनो कारण गाछक निच्चा पात बहुत
छौंड़ी सन तरसाबैए हमरा सभकेँ भात बहुत
सरकारक मेहरबानी तँइ भेलै उत्पात बहुत
अनचिन्हारक कपारमे नोरक छै खैरात बहुत
सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल मोन मीलै बात मीलै प्रेम आ उत्पात मीलै बात अतबे भेल बड़का मूँह संगे भात मीलै छै समयकेँ माँग अतबे बीच संगे कात मीलै बेबहारक मोल केहन विश्वमे औकात मीलै छै मिलन दू शराबक घातमे प्रतिघात मीलै सभ पाँतिमे 2122-2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी)। गजल जेहन जेहन भेलै मति तेहन तेहन भेलै गति खाली सम्बन्धे टुटलै जीवनमे छै अतबे क्षति नै छै कियो जनता लेल प्रधानमंत्री राष्ट्रोपति कनियें रस आ बहुते बिख रखने रहला हमरा प्रति हम्मर हिनकर जिनकर हो छै ईहो अति ओहो अति सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल लंफ लंफा संगमे नै ढेर शंका संगमे नै आपरूपी इष्ट भेटल धैर्य हमरा संगमे नै ई उपासे ओ उपासे पैंट अंगा संगमे नै पाइ कोठा फ्रीज सोफा बीत बिग्घा संगमे नै काँट हँसलै देखि अतबे फूल भमरा संगमे नै देह पूरा ठीक लेकिन रीढ़ हमरा संगमे नै सभ पाँतिमे 2122-2122 मात्राक्रम अछि (बहरे रमल मोरब्बा सालिम वा बहरे रमल सालिम चारि रुक्नी)। गजल पेटक लड़ाइमे हारत के खेतक लड़ाइमे हारत के वचन हुनकर महामिलन केर भेंटक लड़ाइमे हारत के फरिया ने सकलै जीवन भरि नेहक लड़ाइमे हारत के टेटर कहाँ कियो देखि सकल घेघक लड़ाइमे हारत के अनचिन्हारक विरुद्ध समाज जीतक लड़ाइमे हारत के सभ पाँतिमे 222-222-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल दुभि धान जान हमर फुल पान जान हमर सुर तान जान हमर अनुमान जान हमर प्रत्यक्ष आस रहल अनुमान जान हमर छै सीता राम लखन हनुमान जान हमर कमजोर देह मुदा बलवान जान हमर सभ पाँतिमे 2212-112 मात्राक्रम अछि।चारिम शेरक पहिल पाँतिमे एकटा दीर्घकेँ लघु मानबा छूट लेल गेल अछि। गजल अपने जन्मल इफ आ बट चुप्पे पसरल इफ आ बट
किंतु परंतु के फेरमे पित्ते लहरल इफ आ बट
संबंधक नकली मुँहपर बहुते चमकल इफ आ बट
बाहर बाहर मिलजुल मन भीतर उपजल इफ आ बट
ईगो संदेहक संगे सजि धजि निकलल इफ आ बट
सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। "मिलजुल मन" हिंदीक एकटा प्रसिद्ध पोथीक नाम सेहो छै। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल बाजै घंटी सोभै आसन ऊधो पापी लगबै चानन किम्हर किम्हर भागल घूरत रामा ताकै देशक शासन धन्ना सेठक दुन्ना तागति कबिरा जनता ताकै राशन गहुमन शोभित मंचक आगू राधे भाषण देलक धामन देहक सुविधा मोनक दुविधा माधव बूझू सजनी साजन सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। आभा झा अस्मिता हम सिया धिया मिथिलाक, निहित निज शक्ति जगाब' अयलहुॅं शोषण- सज्जन- प्रतिकार-हेतु, वसुधा विदीर्ण क' अयलहुॅं माध्यम की, केहन, व्यर्थ प्रश्न, उद्देश्य प्रमुख हम बुझलहुॅं राजर्षि जनक दुहिताक रूप,निश्छल स्नेहामृत छकलहुॅं।। आदर्श सुता, कुलवधू, प्रिया भार्या स्वतंत्र हम वामा छी आदर्श संमंधक रखितहुॅं हम, साकार रूप में गरिमा छी। अपहृता रावणक छलहुॅं किन्तु, साहस छल स्पर्श असुर करितय? रवि सम प्रचण्ड भर्ता- तेजक सम्मुख खद्योत कोना अबितय? भय अग्नि प्रवेशो नञि किंचित, धूमिल होमय नञि पतिक कीर्ति पति राजधर्म रक्षा करितथि, वनवास पुनः, नञि कोनो भीति।। लव- कुशक जन्म, शिक्षा- दीक्षा व्यक्तित्व सबल निर्माण कयल सेसर बनाय सुत जनक- शक्ति, माताक धर्म निर्वाह कयल।। नञि सुखक कामना मिसिया भरि, स्त्री शक्तिक परिचय हमरा सॅं अस्मिता न कौखन संकट मे, तप- शौर्यक आश्रय हमरा सॅं मैथिल ललना की दीन- हीन, नञि अग्निक तेज मिझाउ क्वचित् प्रतिरोध, मान- रक्षा, न ध्वंस, ओ सृजन समाजक यत्किंचित्।। महामानव जखन एहि काल केर पहरा,फुलायल अनय-तरु देखल चिता जरइत मनुजता केर,धधरा गगन धरि निरखल भरोसक कांच अछि भांगल,रुधिरक धार जे टघरल ईशक दूत बनि आयल, चिकित्सक देखि जी हुलसल।। भयानक भूख केर ज्वाला,विपन्नक आंखि लखि घायल अनसुलझल प्रश्न वृत्तिक अछि, अनिश्चय घटा घिरि आयल कारी निज भविष्यक चित्र लखि, यौवन जखन भरमल परक भूखक शमन हित बढ़ल कर लखि, हिय हमर ठहकल।। बिना औषधि, बिना वायुक, स्वजन जिनकर छुटल असमय आंखिक कोर छनि सूखल,व्यथा-अम्बुधि नुका विषमय लागल ओ अहर्निश प्राणपण सॅं उपकरण कर धय बिना उपचार एहि भू पर,अनकर प्राण नञि निकसय।। कष्टक अन्त नञि सरिपहुॅं,मनुजता किंतु जीवित अछि गोटेक छथि दनुजवत्, सगरो दया लेकिन न सूतल अछि बिसरि निज श्रान्ति,लागल छथि मनुज निज कष्ट सॅं निकसय धरा केर ओ महामानव,जनिक बल मही बाॅंचल अछि।। आकांक्षा कर्ण बेटी हमर अभिमान अहां बेटी छी ,अभिमान हमर! अहींछी लक्ष्मी, अहींछी दुर्गा, अहींछी नव युग के सीता रावण से नै अहां के डर अहां बेटी छी, अभिमान हमर! आब नै अहां अग्नि परीक्षा देब, आब नै कोनो अत्याचार सहब उठु अहां, आगू बढू ,चढू कामयाबी के शिखर अहां बेटी छी, अभि मान हमर! देखा दियौ विश्वके ,अहां नै छी कमजोर उठु, पोछू आंखि के नोर ज्ञान के बनाउ अपन हथियार, निकलू ज्ञान के गहना संबनि संवर अहां बेटी छी, अभि मान हमर घर के अहां रोशनी छी, आंगन के अहां खुशबू छी अपन महक से सुगंधि त करू समाज के कोना हर अहां बेटी छी, अभिमान हमर अहां बेटी छी, अभि मान हमर! सोनी कर्ण बेटी अाई उ घडी बहुत आस पास छल जखन हम मा के गर्भ स् बाहर मा के पज्रा धए टुक टुक निहारब सभ बेचैन भ घडी के समय टिक टिक पर नज़र धय हर एक स् पुछैत बौआ के जन्म भेल केहन खुशी हैत हमर अन्तः करण मे हमर जन्म के इंतजार मे सभ क आइख रही रही चमैक रहल मन खुसी स् दमैक रहल हमर कीलकारी स् गुइन्ज गेल पूरा माहौल सब उठल चहईक बेटी आयल बेटी आयल घर क लक्ष्मी बेटी आयल अनायास की भेल सभ क आइख क चमक उडि गेल सभ् क मुह उतैर गेल खुसी मे उदासी छा गेल ई की भेल सम्झैत समझेत बुझ्लौ बेटा के छल इन्तार भ गेल बेटी के कीलकार सभ क उमीद के किरण पर परल अन्धकार किया बेटी के जन्म के नै छल इन्तजार बेटा हि हैत और बेटा हि होबाक चाहिं तेकर की छल आधार हम बेटी भ जन्म लेंब तेकर नै छल कोनो अधिकार आव जन्म त भ गेल छल आई सब दिल पर पत्थर राइख लेलनी हमरा काखि तर दाईब और प्रवेश केलौ घर क दुआइर लालान पोषण मे मा केलक नै कोनो कमी कमजोरी बचपन स् ई सुइन सुइन जीवन के भागा दौरी बेटी त होइत अाई पराया धन और अहिना बितल हमर बचपन जन्म लेलौह जहिया जखन् नहीं गायल गीत नहीं बाजल बाजा आई बिदा भ जायेव त भ रहल गीत बाजय बाजा।। रागिनी प्रीत सखी सखी चलू पुनः एक बेर बचपन में कुह-कुह कैs आबी। सखी चलू पुनः एक बेर अँगना नेनपन में घुरि आबी। घूमि साथ पोखैर पगडंडी भरल याद के फोड़ू हाँडी ईंखक रस सँन चूसि-चूसि कऽ मिठ्ठ करू मन फेर नेन्ना बनि कऽ। सखी चलू पुनः एक बेर यादक गुल्लक फोड़ी लुटाबी सखी चलू पुनः एक बेर बचपन में कुह-कुह कैs आबी। छुपम-छुपाई खेल मोन अछि गामक कोना बाट तकैत अछि चलू सखी खोजी आँखि मूंदी कऽ संग जगाबी याद नींद सँ। सखी चलू पुनः एक बेर बस्ता सँ किछ याद निकाली सखी चलू पुनः एक बेर बचपन में कुह-कुह कैs आबी। नाव बना कागज़क बहाबी माटी सँ घर फेर बनाबी और उड़ा चुनरी अम्बर में बनी चिड़ै चहकी उपवन में। सखी चलू पुनः एक बेर मिल कऽ प्रेमक गीत सुनाबी सखी चलू पुनः एक बेर बचपन में कुह-कुह कैs आबी। पोथी पोथी पढ़ैत उमर बीतल पन्ना-पन्ना सभ टा उधरल लेकिन उर ज्ञान बिना सूखल संतोषक भान कहाँ भेटल? आखर रटि रटि सुग्गा भेलौं घिस कऽ स्याही जिनगी रंगलौं हम आब कहाँ ऊ प्राणी छी रट्टा वाला अभिमानी छी। पढ़ि कृष्ण सूरज कहाँ बनलौं मीरा सन प्रीति कहाँ कैलौं आडम्बर माथा पर बैसल ज्ञानक दीपक अंतः सिकुड़ल। भेल दुहरिया देह जरै नेहक बरसा के राह तकै पोथी पांती सब घन बनि कऽ चितवन हर्षावे जल बनि कऽ। रागिनी मनोरथ शिक्षा भोर भेल सूरज घर आयल खोलू मनऽक किवाड़ चलू आखर-आखर जिनगी पढ़ी कऽ जीवनके उद्धार करू। कटनी, कुटनी सब भऽ जायत घर अंँगना सभ रचि-बसि जायत हल शिक्षाके मन जौं चलतै दिव्य कमल मनमे खिल जायत। देर भेल किछ मन नै मारू अखनेसँ शुरुआत करू आखर-आखर जिनगी पढ़ी कऽ जीवनके उद्धार करू। ज्ञानक कुंजी जे मन धारे जीवन भव हर्षित तरि जाए बिन शिक्षा पशुगत जीवन अछि गहन तिमिर भटकैत बुरि जाए। शिक्षाके जगमग दुनियाके आऊ सब सत्कार करू आखर-आखर जीनगी पढ़ी कऽ जीवनके उद्धार करू। प्रीति प्रभा, जमशेदपुर मनोरथ एक मनोरथ पूर्ण करू हे दाता रहे सकल जग स्वस्थ विधाता मात भवानी अहिं पर आसरा सबके करै छी नित सुमिरन अहीं के अंबे बाल -गात सब बिखरल- पसरल कतःविलोकित चहक विभोर प्रातः वंदन करी हम जगदंबे अहिं छी सबहक पालनहार मानव तअ अछि कठपुतरी करियौ माफ नादानी-कुविचार। अप्पन ह्यास के रचयिता हमसब भौतिक सुख में उजाड़ल बाग महल सुख के चाहत बनल अछि कतःदेखब आब विपिन देवदार उचित ज्ञानपूँज दियौ हे अंबे घर -घर गुँजत शहनाई,आँगन घुटरून बाल गोपाल एक मनोरथ पूर्ण करू हे दाता रहे खुशहाल जगत के प्राणी गुँजै भँवरा झूमे जन जन हरित रहै पादप परिवार। संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम- मंगरौना, पोस्ट- गोनौली, जिला- मधुबनी, बिहार- 847401 गड़बड़झाला आयल पंचायत चुनाव मुस्की मारै बिलाय कुक्कुर करै हुंकार बकरी केँ सभ कियो पहनाबै माला बउआ हौ पंचायत मे भेलै वर-वर घोटाला। महिष पोखरि खूनै माछ मारै सियार मखान चोराबै बौना के बजतै ? सभ खाएत छै पान-मसाला हँ यौ गाम-गाम मे भेल छै गड़बड़झाला। पढ़ायल सुगा बौर गेल चौक-चौराहा लबड़ाक भेल आब की किनको छन्हि बथान ? गरीबक लेल अखनो धरि सभ दफ्तर मे ताला के सुनतै ? सभ कियो बनल छै लाला। अमर ठाकुर आवाहन सुनियौ-सुनियौ हे मैथिल जन आब भरु हुंकार। मिथिला जौँ शिथिला भ’सुततीह दरिद्रा सटले रहत कपार। बाबू भैया यौ! मैया दैया यै!! सिरजु-सिरजु मिथिलो में रोजगार। ■ बूढ़ बाप हक्कन कानयछथि, माय के फाटल साड़ी। आओर नवोढ़ा सिसकि रहल छथि, बेदराक कोन पुछारी। घरक गोसाउनि बन्हक लागल बजितो होयत अछि लाज बाबू भैया यौ! मैया दैया यै!! सिरजु-सिरजु मिथिलो मे रोजगार। ■ अहँक अतीत भरल गौरव सँ, अयाचिक संतोख। अपना माटिक सेवा करब, रहब हँसैत भरि पोख। जे जोगर से काज करू, जुनि करू फुसियाँहिक लाज। बाबू भैया यौ! मैया दैया यै!! सिरजु-सिरजु मिथिलो मेरोजगार। ■ बहुत भेल अधिकार कटौती, बहुत गलेलहुँ चाम। एक-एकटा ओलि सधबियहु, बहुत चुबेलहुँ घाम। शासन के सिंहासन डोलय, तेहेन भरू हुँकार। बाबू भैया यौ! मैया दैया यै!! सिरजु-सिरजु मिथिलो में रोजगार। मोमबत्ती जरैत मोमबत्ती पिघलैत मोमबत्ती, घटैत मोमबत्ती मुदा जरैत मोमबत्ती। अनका लए प्रकाश सिरजैत, स्वयं अन्हारमेरहैत, मुँहअप्पनजरबैत मोमबत्ती। घटैत मोमबत्ती मुदा जरैत मोमबत्ती। आलोकित दुनिया केँकरैत, परोपकारक कथा कहैत क्षणभंगुरताक प्रमाण दैत मोमबत्ती। घटैत मोमबत्ती मुदा जरैत मोमबत्ती। विभा रानी (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तरण- मुन्ना जी) स्तन, योनि आ गर्भाशय हे ईश्वर ! काटि दियय हमर स्तन, बना दिय' हमरा बिनु स्तन आ योनिकें, निकालि दिय' हमरा देह सं गर्भाशय किए ? त' नै पचैए बौद्धिककें तोरा देखब। रहि लेब हम बिनु गर्भधारण केने, जी लेब बिनु अपन देहकें निहारने वा ओहि पर बिनु गर्व केने ककरो सं नै कहबै कि तोहर सृष्टिक निर्माणमें कतेक सहायक ऐछ देह। पीट लेब छाती आ बान्हि लेब ओइ पर कसिकें कोनो लत्ता, निकलवा पर दूध ऐ स्तन सं। हम मरि रहलौं भटकि रहलौं चाहि रहलौं कि जी जए एक जोड़ी स्तन एक्टा योनि आ एकटा गर्भाशय। किएक कि बचि जए एकटा स्त्री एकटा घर एकटा माए एकटा बेटी कैंसर सं। हे ईश्वर! बजबितौं नै कहियो अहांकें मुदा ऐ बेर अहां आबि जाउ आ किछु अहीं करू समाजक मगजमें भरल- ऐ कैंसरकें भगेबाक उपाय जनेबाक ऐछ जे हमरा गरियेबा आओर मारबा- जरेबा लेल सेहो ओहीठां सं जए पड़त आगू अन्यथा नै आबि सकब ऐ धरती पर जं नै हुअए उपस्थित इ स्तन,योनि आ गर्भाशय। कल्पना झा, बोकारो किछु छुटि गेल तेतरिक खट्टा लतामक भक्खा खेसारिक झक्खा मोन परै ओ अमलता। हीत सन मीत नय कोइलिक सन बोल नय रातिक अन्हरिया में भगजोगनिक सन इजोरिया नय। ठोढ पर लाली तयौ मुंह खाली पानक दिक में किलोल करय सुपारी। बिसरी गेलवं सोहारी कतो भेटत बुआरी भखरि गेल इनार सब पोखरिक अछि लचारी। धानक पांज नय खेत बनल घरारी गाम में शहर क सेंध परल बिसरि गेलवं कोठी आ बखारी। ममता कर्ण, जमशेदपुर बरसात पिपहिया जक ाबाट तकैया प्राणी बरसात कहिया हायत मुँहमे फिफड़ी पड़ल अछि बर्तनके लम्म्मबा..... लाइन लागल अछि किनको गर्मीस हाल बेहाल किनको पियासे गला सुखल घंटा भैर बाद नल खुजत बर्तनके लाइन देखि सब चिंतामे अस्त-व्यस्त पुरूष सब परेशान डियूटी छुटि रहल अयछ महिला सब परेशान नेनाके छोड़ि आएल छी किछ बुजुर्गों नजरी आइब रहल छैथ जे चाण्डाल सन धुपमे अस्त-व्यस्त भ रहल छैथ किछ सरकारस शिकायत क रहल छैथ केहन बोरिंग कराक देलक सरकार जे सबटा सुखल पड़ल अयछ आपसी बहस अतेक तेज भय गेल कियो सरकारपर खुन्नस निकालै छैथ कियो भगवानक ेकोसय छैथ कियो पैसाबला बिल्डरके कोसय छैथ कि अतेकदुरमे एकटा तालाब छल जाहिमे हम गरीब नहाई सुनाई छलौं कतेको गरीबक सहारा तकरो इ अमिर लोक पाइट देलैथ उचाँ बिल्डिंग बनाक एक बुजुर्ग बिच बचाव केलैथ सरकार त बोरिंग करा देलैथ गर्मी चरमपर अयछ से सब सुखि गेल कनि इंतजार करु आयत बरसात फेर धरत ीभिजत फेर पानी भेटत आपसमे नय लड़ू कनि धिर धरु लिय नल खुजल सब पानी भरू। निर्भर जनक सुता माँ मैथिली रहय वाली महलमे पलयवाली महलके सदिखन घिरल सखिके संग आगु-पाछु सेविका प्रचुर अर्धांगिनी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामके सुर्यवंशी कुलक कुलवधू दुर्भाग्यवश वनवासिनी भेली कुटिया बिच बसर केली विपत्तिके पहाड़ ढोली उखड़ि मुसरस धान कुटली अपने हाथस लकड़ी कटली पानि उभली भानस बनेली किनको नै आश केली स्यंमपर आत्मनिर्भर भेली निजसुतके आत्मनिर्भर बनेली सहन शक्ति माँ सीताके सब मिथलानीके आदर्श बनली। जानकी नवमीके शुभकामना संग किताब कतेक मुश्किल अछि जिनगी के किताब पढ़नाइ जतेक रटैत छि कम पैर जाइय पन्ना दर पन्ना उलटैत जाइ छि जतेक रटैत छि उलैझते जाइ छि मन पड़ैया माय के ओ बात किताब , डिबिया , सलाइ सिरमा के लगे राखिक सुतिहेयाँ भोरुका पहर ब्रम्ह मुहूर्त में किताब के रटिहेयाँ तखन माँ सरस्वती बिचरण करै छथिन जे रटबे सब कण्ठस्थ भ जेत्तौ बात साँच कहैछी अझक्के नीन सुतै छलौं समय पर उठि खुब रट्टा लगबै छलौं परिणाम पुर्णरुपे पबैत छलौं आइ बुझि पड़ैत अछि जिनगी शायद उ किताब नैय जकरा रैट अव्वल आइब जाइ बड़ उतार चढ़ाव कत्तो गहिंर खदिया त कत्तो उंच आइर कखन ढनमना जाएब भरोस नय के डेंग धरत ककरा पर आश करब वयस अपराह्न के सुरुजक जका ढैल रहल अछि अन्हार पसरल जा रहल अछि किछ आर पाब के आश लय तृष्णा बैढ़ते जा रहल अछि बुइझ नय पाबैत छि कहिया बुइझ पाएब एही गुढ़ रहस्य के नय बड़ कठिन अकरा पढ़ब एहि तरहे सब शेष भ जाएत एक दिन शायद कियो नय पैढ़ सकला एहि किताब के कियो नय । थाकल मजदूर चलैत-चलैत थाकल मजदूर मनमे अनेक प्रश्नके उद्दभेदन करैत अचानक आसमानमे ताकि कएक अंजान शक्तिस बहुत करुणस्वरमे , शिकायतक रहल छैथ हे परमात्मा , हे अन्तरयामी हम मजदूर छी एहिमे हमर कोन कसूर हमरा किया बनेलौं मजदूर कि हम शौखे परदेश एलौं अपन जन्मस्थान , जन्म धात्री , परिवार , समाज सबके छोड़िक आखिर हमर इ दशा किया कियाकि हम मजदूर छी हम उच्च शिक्षा प्राप्त नै छी किया नै हमर सुधी लै छैथ कोइ खुन पसिना बहाक मेहनतके रोटी खाइत छी छी अपने देशमें तैयो प्रवासी कहाइत छी मालिक स ल क नेता तकके फुर्सत नै हमर कोइ सुधी लेता अबै छैथ पत्रकार सबक लै छैथ तरह – तरहके सवाल नै छैन मरहम किनको पास आब हम करब ककर आस आई नाराज छी अपन भाग्य विधातास शिकायत अछि अपन भाग्यपर करैत छी करबद्ध प्रार्थना पहुंचा दिय अपन गंतव्य तक हे निराकार सुनु हाहाकार दिय शक्ति आब नै कहियो लौटक आएब जौं एही बेर पहुँचब अपन गाम , अपन गाम आरती प्रकृति काल नाच करैत अछि सबहक उपर आयु लेलक छीन प्रकृति सँ खिलवाड़ जुनि करू नय बुझु अपनासँ हीन बेसी काबिल जँ बनव त देत पछाड़ धोबिया पाट चारू खाने चित भऽ जायब उड़ि जायत होश हवाश हृदय विदारूण दृश्य अछि सब तरि मरण केर तांडव पसरल अछि लील गेलय कते केर जिनगी इ केहेन प्रकोप आयल अछि आबो नहि जौं चालि सुधारब प्रकृति कऽ जौं नहि सम्हारब होइत रहत एनाहि दुर्गति चाहबो न होयत कबहु प्रगति सविता 'सुमन', सहरसा (बिहार) उमंग मनके उमंग मनहीं रहि गेल सब दिस पसरल करोनाके बेल हाटबजार सब बंद पड़ल कोनाके जायब सौदाके लेल छोट-बबुआके मुड़न छल केश लईपीसी नहि आबि सकल कोनाके बबुआके केश कटायब कर-कुटुम्बके कोना बजायब सबहक कलेजा कांपि रहल के करत घरक टहल सुन पड़ल अछि बाबाके द्वार कहिया धरि खूजत हुनक केवाड़ असगर रहि सब समय बितायब खुशी अकेला कोना मनायब करजोरि सब बाबाके मनाबू यौ बाबा अहां समय घुराबू उम्मीद उम्मीदक फसल उपजाबैत किसान राति दिन जोगैत खलिहान देहक पसिना धूपेमे सुखाबैत पेटक आगि सहैत किसान नैना भूटका आस लगौनै रातिदिन अनता बाबा फसल बेची हमरो लई एकटा सोहनगर अंगा किन बुढ़िया माय छैन खाट पड़ल उम्मीद आसमे सांस चढ़ल जौं फसिल होयत भरि खलिहान बेटा लऽ जाइत बाबा केर धाम उम्मीदक आसमे बहुरिया कल जोरि ठाढ़ विनती करैत दिन-दुपहरि सांझ राति अन्हरिया बहुते डराबै उजरल छप्पर सौं भगजौगनि घर आबै सौनभादोके दुख सहलो नहि जाए भरिराति सब बैठि बिताबै टपकैत घरके अहिबेर छराइब जौ नीक होयत फसल सबदुख दूर भगायब उम्मीदक फसल उपजाबैत किसान रातिदिन जोगैत खलिहान माँ सहस्त्र दीपक के आलोक में खिलैत अहां के मुस्कान जेना अनेकों सूरज के जगमगाहट सौन्दर्य के अप्रतिम गरिमा सौं मण्डित कोमल उद्यान्त अहां हमर मां अहां कतेऽछी हमर हृदय के घाव पर शीतल लेप लगबैत हमर मां कतेऽछी अहां के स्नेह भरल दृष्टि अहां के स्नैहिल आदेश मधुर प्यार सौं भरल झिड़की हमर सुतल आत्मा के जगबैत छला अहां के नोर जेना धिपल धरती पर बारिशक पहिल बौछार हमर दर्द के पीड़ा के सहलाबैत जेना कोनो अदृश्य छुअन हमर खुशी खिलखिलाबैत हमर दुख में कनैत हमर मां अहां कतेऽछी आजु दूर अहां हमरा सौं आशा आ विश्वास सौं रिक्त अन्हार आ अनचिन्हार रास्ता में हे मां हमर विश्वास टुटि रहल अछि हमर प्रर्थना अछि अहां सौं हमरा राह देखाबू हमर डूबैत मिटैत विश्वास के लौटाबू हे हमर मां अहां कतै छी आनन्द दास “गौतम”, "बाबाअंगना", नवानी, नेतागिरी जारी अछि… संवेदना खत्म भ' रहल अछि, सगरो पसरल लाचारीअछि। भायभाय केयो नहि बांचत, सबहक नेतागिरी जारी अछि।। दिनोंदिन सांस उखरि रहल, हरघर स' अर्थी निकलि रहल। चहुंदिश मचल हाहाकार, आ… भविष्य धियापुताक कारी अछि।। सांसद-विधायक चुनि-चुनि अनलहुं, चुनि-चुनि अनलहुं हीरा सब। आम जनताके एना बिसरलथि, जेनाकि नालीक कीड़ा सब।। हमर नेता बड़नीक आ हेतौ तोहर बड़ खराप। गलती सबटा तोरे सबहक, हमरा नेताके किया सराप…? बच्चा स' बूढ़ देखु परि रहल छथि, ऑक्सीजनक अकाले मरि रहल छथि। नेता सब काटय सबटा गाछ छथि, आ कहथि... कहां केयो लगबैत एक्कोटा गाछ छथि !! नय लड़ू, दौड़ चलु, ख़ूब हंसु, बढ़ि चलु। केकरा लेल, लड़ब अहां, ई सब... नेताक, काजे कहां !! नोर आंखिक सुखि चुकल अछि, घर घरारी बिक चुकल अछि। की गाम आ की शहर..., हर घर फैलल महामारी अछि। अखनों नेतागिरी जारी अछि… सबहक नेतागिरी जारी अछि।। फागु एलयफगुआ फागुनके रंग, आई मचत हुड़दंग। मुंह अछि पान आ मिजाजमे भंग।। बाजै ढ़ोलक पर थाप, नाचय नटुआ। एलय फगुआ, हो... एलय फगुआ।। साईर सबके देखिते, गेलथि चौन्हरा। पिचकारी ल' पाहुन, गेलथि ओन्घरा।। सार सब देलकनि, एगो टोलीमे फंसा। नटुआ संग नाचि-नाचि, भेलथि नटुआ।। एलय फगुआ, हो... भौजी देलथि गटकि, दु गो लस्सी गिलास। रंग लगबति लेलथि, भायजीके किलास।। फगुनिया फगुआयल, आबि कानमे बाजल। आऊ होलीमे सासुर, मिलत भांगक पुआ।। एलय फगुआ, हो... (फगुनिया :भायजीके साईर) मस्ती कोनों जुर्म नहि आ जोगीरा... इहो कोनों कम नहि। गाल लाल अछि, चश्मा पीयर। आऊ ना डिअर नियर।। फागमे भंग संग, रंग मनायब। हम अहीं दीदीक दीयर।। जोगीरा... सर र ररर... फगुनियाएलि बाहिर, त' मोनमे जागल आस। या त' लागत गुलाल, या त' ठामहि सन्यास।। फगुनिया शातिर खिलाड़ी, केने ख़ूब रास तैयारी। फेक रंगक गुब्बार स', देलखिन्ह गर्दा उड़ा।। एलय फगुआ, हो... झुमका झमकदार देखि, जुआन बुढ़बो नाचथि। मधुजाम लय बैसल कक्का, मोने मोन बाचथि।। आई त' अपने हाथे, हमहुं खुएबै निमालपुआ। एलखिन्ह य एहोलीमे गाम…, आब हेतै…फगुए फगुआ, हेतै फगुए फगुआ।। बाजै ढ़ोलकपर थाप, नाचै नटुआ। एलय फगुआ, हो... एलय फगुआ।। सोनी दास मौन मौन भ' अपने स' गप्प करैत छी भगवती क' समक्ष चुप्प भ' संवाद करैत छी हम भ' जाय छी चुप्प जखैन चुप्पी संवाद करैत छै चान- सुरुजक चंचल रश्मि आय किया चुप्पी स' संवाद करैत छै प्रगल्भ किछ नै होय छै सत्य सदिखन मौन रहैत छै शांत मोन स' काएल गप्प प्रतिपल अपन गप्प कहैत छै सभ एतय बनल छैथ बहीर नै क्यो ककरो आश करैत छैथ तैयो मोनक गप्प करैत छैथ चुप्पी के संग अपन गप्प करैत छैथ मौन भ' अपने स' गप्प करैत छी सभहक समक्ष मौन भ' संवाद करैत छी कंचन कंठ आराधना (सभकेँ जानकीनवमीकेँ हार्दिक शुभकामना ओ प्रणाम) जगजननी अहाँ लिय अवतार दुष्ट कोरोनाकेँ करू संहार भक्षक रहल जनु कोनो फर किछुक असरि नहि एकरापर मानवताक रक्षा करू हे माय मानवपर आब होऊ सदाय भूमिसँ लेलहुँ अहाँ अवतार भूमिजा कहय सकल संसार बाल्यकाल करपिनाक उठेलहुँ पिता जनकके चकित कय देलहुँ अपने छी शक्तिक भंडार असीम अहाँक सीमा विस्तार अछि अनंत स्वरुप महान से जानथि सकल जहान रामहु जखन कयल शक्ति पूजन तखनहि कयल संहार ओ रावण जखन मनुख भेल मदमे चूर दर्प तनिक कयलहुँ क्षणमे दूर सहस्ररावण छल जे अति बलवान तनिकहुँ पठेलहुँ यम केर धाम दया केर फेरु दृष्टि हे मैथिली भयसँ बालक भेल विथुति ममतामयी हेरु एक बेर सोर करैत भेल बरू देर छेमब मनुजक अपराध बुझि अपन बालक नेनमति अबोध करुणामयी दौड़ल चलि आऊ सकल जहानक संताप मेटाऊ जय माँ अंबे मैया हे पुरबहु आस हमर अयलहुँ अहींकेँ शरणमे हे जग तारिणी माँ जगदंबे हरु कष्ट नहि करू विम्लबे दुष्ट दलन करु ताप हरण करु दीन दुखी जन के संताप हरू छी जगमाता सभ सुख दाता शरण आब हम ककर धरु हम पड़ल छी अज्ञान कूपमे दय ज्ञान,सुमति बुद्धिक संचार करू नहि करी दुष्कर्म पाप कखनहुँ एतबे टा माँ सदबुद्धि दिय हम छी बालक अहीं केर मैया चरण शरण लगाय लिय शिक्षा जय जयभैरवीसँ करैत छी सुप्रभात दिनमें कन्या भ्रूण हत्या करै छी कि शिक्षित छी हम ? बेटाके कान्वेंट, बेटीके बाल-विवाह की शिक्षित छी हम? बेटीके उड़ानक पाँखि लेल उछाह पुतहुके सपना चूल्हामे झौंकि की शिक्षित छी हम? मंदिरमें दान लाखोंके भूखे बिलखैत जाड़सँ ठिठुरैत मरैत बालक की शिक्षित छी हम? बनाबावी बड़का अस्पताल जाहिमें बिलक मारामारि कतहुँ दवाईक कालाबाजारी कतहुँ आक्सीजनक हाहाकार धन्वंतरिक संतान की शिक्षित छी हम? मानव अंगक तस्करी आब त' खून ओहवातकके कालाबाजारी कतय गेल ओ शिक्षा जे विनय, सदाचार, मृदु व्यवहारक छल परिचायक जे सिखबैत छल दया धर्मके मूल अछि पाप मूल अभिमान। डिग्री तक हासिल केलहुँ बिसरलहुँ सभटा ज्ञान साँस सभके चलि रहल मुदा भ' गेल छी निष्प्राण! चित्र: श्वेता झा चौधरी महेन्द्र हजारी से छथि रामलोचन सम दृष्टिक भाव जनिक छनि से छथि रामलोचन लोचनमे जनिक कमान छनि से छथि रामलोचन अपन काजमे सहजहि तत्पर समाजक जे राखथि खयाल से छथि रामलोचन मिथिला-मैथिल-मैथिलीक करथि सम्मान से छथि रामलोचन सबहक जे मोनसँ करथि सम्मान से छथि रामलोचन ज्येष्ठ-श्रेष्ठकेँ जे श्रद्धा करथि समवयस्क संग करथि हास्य-विनोद से छथि रामलोचन छोट-छीन लार-प्यार करथि से छथि रामलोचन कवि-लेखक कथा-पिहानीक रचियता छथि रामलोचन मैथिली नाटकमे जे अभियन करथि से छथि रामलोचन पत्र-पत्रिकाक जे करथि संपादन से छथि रामलोचन साम्यवाद जे करथि विश्वा, समाजवादक नहि अविश्वासी जन-जनमे श्रद्धाभाव से छथि रामलोचन मैथिली-बंगला-हिंदीमे रचना करथि से छथि रामलोचन सभ-सोसाइटी, कविगोष्ठीक करथि संचालन मैथिली लिपिक करथि प्रचार मरदनसुमारीमे मैथिली मातृभाषा लिखबाक आग्रह करै छथि मैथिली बजबाक आग्रह करै छथि से छथि रामलोचन नेनपनसँ शिवजीक पूजा-पाठ करैत छथि गीताकेँ धर्मशास्त्र मानै छथि से छथि रामलोचन मिथिलाक प्रसिद्ध गाम बाबू-पालीमे जन्म लेलनि काली क्षेत्र कोलकातामे कर्मक्षेत्र बनौलनि नाम यश जे बेस कमौलनि, महेन्द्रक छथि यार से छथि रामलोचन संप्रति ओ भुतियाय गेल छथि, कोनो पक्षकेँ ताकि रहल छथि घट-घटमे अपन द्रष्ट ताकि रहल छथि से छथि रामलोचन संपादकीय-नोट- ई कविता विदेहक "रामलोचन ठाकुर विशेषांक" केर अंतिम दिनमे आएल छल मुदा ओ विशेषांकमे कविता सभ देबाक विचार नै छल आ तकर बाद रामलोचनजीक मृत्युक समाद आएल। रामलोचनजी मूलतः मैथिलीमे लिखलनि, बंगलासँ मेथिली अनुवाद केलथि आ मिथिला-मैथिलीसँ संबंधित दू-तीन टा रचना हिंदीमे केलाह। मरदनसुमारी मने जनगणना। नारायणजी श्रद्धेय रामलोचन ठाकुरकें स्मरण करैत मिथिला चिट्ठी आएल अछि दूर देशसं आएल ई चिट्ठी कतेक धार आ पहाड़ आ जंगल पार क' आएल अछि, हम नहि जनैत छी कतेक हाथक स्पर्श अछि एहि चिट्ठी पर (अदृश्य अछि) मुदा,देखाइत अछि डाकखानाक लागल मुहर आ अपन पता जकर निच्चांमे लिखल अछि 'मिथिला'। मिथिला नित्य पुरनाइत एहि देशमे कोनो प्रान्त-नगर आ गाम नहि रहि गेल अछि किएक लिखल गेल अछि हमरा धरि आएल एहि चिट्ठी पर मिथिला? सभसं बेसी मोन पाड़ैत अछि की अपन बीतल युगकें लोक? अपन भौगोलिक अभिव्यक्ति लेल की छटपटाय रहलीह अछि मिथिला? जेना ग्लोब पर अएबाक लेल छटपटाए रहल अछि फिलिस्तीन। कहियोक मिथिलासं बाहर आइ जे गुजर- बसर करैत छथि नाभि-नाल गाड़ल छनि एहि भूखण्डमे जिनकर वैह सपनाइत छथि की मिथिला? मिथिला हुनके सपनामे जाए कनैत छथि कलिंग देवी सन तकैत छथि एकटा खाड़बेल,एकटा योद्धा? भरोस उठि गेलनि अछि की एहि जनपदक बसनिहारसभ परसं मिथिलाक? दूर-देशमे रहैत छथि घाम चुअबैत छथि घरक फाटल आकाश सिबैत छथि जुड़ाइत छथि संसारक बहैत बसातसभसं दृढ़ भ'अएलनि अछि हुनकामे मिथिलाकें साकार करबाक इच्छा हुनके आत्मामे अंकुरित भेलनि अछि मुक्ति-बीज वैह लिखलनि अछि चिटृठीक निच्चांमे-'मिथिला'। विनोद कुमार झा राम लोचन हमर प्रेरणा पुरुखा छलाह आदिमानव केलनि कतेको श्रमसाध्य काज भेटल हेतनि कोनो जंगल, पहाड़, जमकल नदी । छोट पाथरके छेनी पैघ पाथरके बनौने हेताह हथौड़ी ठोकि-ठाकि, काटि-छांटि बनौने हेताह शस्त्र-हथियार, कलम गढ़बाक, रचबाक जे छलनि इतिहास । पाथरके रगड़ि- रगड़ि निकालने हेताह आगि भेल हेताह गरम, चूबल हेतनि घाम घमल हैत ठंडा ग्लेशियर बनल हैत धार, बहल हैत नदी व्यग्र नदी पहुंचबे करत सागर धरि । कोरने-कमेने हेताह माटि केने हेताह कदबा बाउग केने हेताह बीज, तखन उपजौने हेताह अन्न भरल हेतैक कतेकोके भूखल पेट आ मोन । लोक-लोकके जोड़ि, बनौलनि परिवार परिवारके जोड़ि समाज प्रवासी समाजके जोड़ि केलनि क्रांति सिखौलनि मातृभाषा लेल संघर्ष केलनि साहित्यक आंदोलन । एतेक काज करबामे लागि गेलनि कतेको बरख सम्पूर्ण जिनगी इतिहास हंता बनल पुनर्जागरणक नव इतिहासक अग्रदूत । राम लोचन ठाकुर केलनि त' बहुतो काज मैथिली साहित्यक विकास यात्रामे बनताह इतिहास-पुरुष हमर सबहक प्रेरणा स्रोत । संपादकीय-नोट- ई कविता विदेहक "रामलोचन ठाकुर विशेषांक" लेल आएल छल मुदा ओ विशेषांकमे कविता सभ देबाक विचार नै छल आ तकर बाद रामलोचनजीक मृत्युक समाद आएल। बिनय भूषण रामलोचन ठाकुरक झिझिरकोना आ... (१-५) १.रामलोचन ठाकुरक झिझिरकोना आ... तीन चारि दिन सँ निपत्ता भ' गेल अछि हमर निन्न चौबीसो घंटा देखैत रहै छी व्हाट्सअप आ फेसबुक । रामलोचन जी हमरा सभक संग खेलताह एतेक झिझिरकोना कहियो नञि सोचल । हुनका मादेँ सोचैत - सोचैत नोरा' जाइत अछि आँखि हुनका सन सचेतन लोक कोना भ' सकैत अछि बिसरभोर ? कहाँ मानैत अछि हमर मोन ? एखनहु दू बजे राति मे जखन कि एखने लागल अछि आँखि ओ जगा रहल छथि हमरा कहि रहल छथि हमरा कतेक सुतबह जाग' - जाग' बड्ड आराम केलह । काज कर' हाथ - पायर मार' मिथिलाक लेल कर' किछु काज मनुक्खक लेल कर' किछु काज । से सत्ते करबाक अछि काज काज बहुत काज मनुक्खताइ केँ बचेबाक काज सामाजिकताक प्रसारक काज संस्कृतिक संरक्षणक काज सत्य आ इमानक अस्तित्व केँ संजीवनी प्रदान करबाक काज काज अनन्त काज । कहि रहल छथि हमरा हमर चिन्ता जुनि कर' बिनय हम स्वस्थ छी सकुशल छी हम तोँ सभ करैत रह' काज पढ़' - गुन' - लिख' इतिहास केँ बूझ' सिरज नवका इतिहास । २.खौलैत खुन मे बोरल आंगुर सँ लिखाइत कविता ओ जे महसूसैत अछि भूखल लोकक पेटक अँतड़ीक दर्द । ओ जे दर्द सँ हाकरोस करैत लोकक हृदय मे मारैत रहैत अछि हुलकी अहर्निश । ओ जे उपेक्षित लोकक आँखिक नोरक स्वाद केँ चिखि होइत रहैत छथि मर्माहत अहर्निश । ओ जे रक्तविहीन काया केँ चाम सँ झाँपल ठठरी केँ निहारैत रहैत छथि अनवरत । ओ जिनकर हृदय मे सदिखन उमरैत रहैत अछि दयाक महासमुद्र । ओ जे आक्रोशित कायाक नश मे बहैत खुनक उबाल केँ महसूसैत रहैत अछि अहर्निश । ओ जे कलम छिनायल हाथक मर्म केँ बूझैत हो नीक जकाँ । ओ जे मजूरक खौलैत खुन केँ बना' लैत हो मोसि आ अपन आंगुर केँ बना' लैत हो कलम । ओ जे असीम आशाक संग नवका भोरक संधानक लेल रचैत रहैत हो कविता अहर्निश । ओ जे सामाजिकता आ मनुक्खताइक लेल संवादक सपना केँ जोगने रहैत हो अपन आत्मा मे । ओ अचक्के अपना आप केँ परिवार आ समाज सँ क' लेत दूर से नहि मानैत अछि हमर मोन । ३.अहाँक ई फर्ज़ बनैत अछि रामलोचन जी अहाँ तँ लोकक दुख - दर्द केँ बूझैत छियैक अपन निजी दर्द । रामलोचन जी अहाँ तँ बूझैत छियैक स्त्रीक मोनक पहाड़ सन जीवनक मर्म । रामलोचन जी अहाँ केँ लेबाक चाही ओहि बुढ़ियाक सुधि जे अपन माय - बाप आ अपन समाज केँ छोड़ि अहाँक संग लगौनय छलीह सात - सात फेरा । रामलोचन जी अहाँ ललनजी आ आलोक केँ देनय छियैक केहन दारूण पीड़ा ओ बुच्ची जे सदिखन सटल रहैत छल अहाँक करेज मे हुनका सभक ह्रदय पर पसरल निराशाक घोर अन्हार केँ करबाक चाही अहाँ केँ अनुभव । रामलोचन जी सम्पूर्ण मिथिलाक कोटि - कोटि आँखि अहाँ केँ देखबाक आश मे लगौनय अछि वकदृष्टि । एहन विकट परिस्थिति मे अहाँक बनैत अछि फर्ज़ जे बिना कोनो देरी के एखनहि हँसैत - हँसैत चलि आबू अपन घर सम्पुर्ण मिथिला केँ द' दियौ उलहन - उपराग जे अहाँ सभ कहिया मनायब हमर जन्मदिन हम आबि गेल छी अप्पन घर पालन करू हमर जन्मदिन । अहाँ देखबै विदेह - वैदेहीक पावन धरती पर ज्योतिरीश्वर आ विद्यापतिक मिथिला मे राजकमल आ यात्रीक गाम मे सोमदेवक वाधित कण्ठ मे भ' जेतैक कालध्वनिक संचार अम्बरक भीतरक शून्य सँ बहराब' लगतैक भाषायी चेतनाक अमृत - मंत्र गोबिन्द बाबू टांग मे आबि जेतैक अजस्र ताकति साहित्यक मैदान मे दौड़य लगताह सरपट । अहाँक चेतना मे सदिखन लैत रहैत अछि सांस मिथिलाक संस्कृतिक पवित्र प्राणवायु अहाँक कलमक नोक सँ अनायास टपकय लगैत अछि दुखित आ पीड़ित लोकक घाम आ नोर क्षणहि मे अहाँक शब्द सँ बहराब' लगैत अछि आक्रोशक सार्थक धधरा । से बनैत अछि अहाँक फर्ज़ जे एखनहि अविलंब घूरि अयबाक चाही अहाँ केँ अप्पन घर । ४.फगुआ २०२१ आ रामलोचन ठाकुर रामलोचन जी ! अहाँ कतय छी पता नञि हम सभ सजल आँखि सँ खोजि रहल छी अहाँ केँ सभ बेर जकाँ एहि बेर सेहो अहाँक संग मनाबय चाहै छी हम सभ फगुआ - ठहक्का प्रेम सँ अहाँक कलम के पिचकारी सँ बहराइत कविताक रंग सँ सराबोर होम' चाहै छी हम सभ । रामलोचन जी ! अहाँक अनुपस्थिति मे सुन्न - सपाट लागि रहल अछि कोलकाताक कविताक दलान आजुक बाजारवादी समाज मे जतय धधकि रहल अछि परोपकारक भावना अलोपित भेल जा रहल अछि आपकताक भाव उड़ाओल जा रहल अछि स्वार्थ आ कुटिलताक अबीर अहंकारक पिचकारी सँ बहरा' रहल अछि दमनक कारी रंग ततय अहाँक उपस्थितिक अनिवार्यता कहाँ बिसरि रहल अछि कोलकाताक सुधी समाज । रामलोचन जी ! बर्ख मे एक्के दिन सही प्रेमक रंग सँ सराबोर भ' जाइत अछि लोक जीवन मे नवल वसंतक होम' लगैत अछि संचार सभक ठोर पर थिरक' लगैत अछि मुस्कानक राग आपकताक रंग सँ रंगा' जाइत अछि लोकक मोन अहाँक थिरकैत ठोर देखि अहाँक मुँह सँ बहराइत अमृतवाणीक स्पर्श सँ सभक कान मे गुंज' लगतैक वसंतक राग । रामलोचन जी ! अहाँ कतौ हैब , सकुशल हैब से करै छी हमसभ कामना भींजल आँखि सँ पठा' रहल छी फगुआक शुभकामना सुनैत छियैक जे स्मृतिलोपक बेमारी मे कखनो काल घूरि आबैत अछि स्मृति से शीघ्रे एखनहि घूरि आबय अहाँक स्मृति से करै छी हम सभ कामना कतेक नीक लगतैक हमरा सभ केँ जौं आबि जेबै अहाँ तखन सत्ते हमरा सभक मोन मे भ' जायत नवल वसंतक संचार । रामलोचन जी ! अहाँक प्राणप्रिय माय मैथिलीक असंख्य लव - कुश ताकि रहल छथि अहाँ केँ अपन सचेतन आ ऊर्जावान भाइ केँ अपन धरोहर केँ , अपन इतिहास केँ अहाँक लेल कानि रहल छथि मैथिली अहाँ जानैत छी अहाँक ठोर पर सदिखन उपस्थित रहैत छथि मैथिली अहींक कलम सँ फगुआ मे हँसैत छथि मैथिली से एहि बेरक फगुआ कोलकाताक साहित्यिक फगुआ फगुआ ठहक्काक आयोजन वेकल भ' क' रहल अछि अहाँक इन्तिज़ार । ५.ओ कहैत छथि रामलोचन जी कहैत छथि जे एक दिन अचक्के ओ आंगनक सीमा नांघि बहरा' गेल छलाह वाट पर अपन मोन मे ओ जोगनय छलाह एकटा क्रांतिकारी आ रचनात्मक सपना जन - जनक पीड़ा सँ दग्ध भ' गेल छलैक हुनक आत्मा एहि पिरथी केँ पिरथी विशाल पिरथी केँ सुन्दर सँ सुन्दरतम बनेबाक कामना हुनक हृदय मे बना' लेनय छलैक अप्पन जग्गह हुनकर मोन मे छलन्हि इ अटल विश्वास जे एहि वाट मे हुनका भेटि जेतनि असंख्य समानधर्मा सहयात्री जे कखनो नञि लिखताह उजरा कागत पर करिया मोसि सँ कोनो कपोल - कल्पित निरर्थक कविता कोनो कृत्रिम मनोहारी कथा कोनो अप्रयोजनीय इतिहास । रामलोचन जी कहैत छथि जे ओ अपना हाथ मे एकटा चमकैत पँचकमिया भाला लेनय चलि पड़ल छथि इतिहासक वाट पर एकटा सार्थक कामनाक संग जे लाल टुह- टुह रक्त सँ पिरथीक विशाल वक्ष पर लिखबाक छन्हि हुनका मनुक्खक सुखमय जीवनक लेल एकटा सार्थक कविता एकटा यथार्थ कथा एकटा रचनात्मक इतिहास ओ प्रतिवद्धताक संग कहैत छथि जे हुनका बनबाक छन्हि स्वयं एकटा घटना एकटा नाम एकटा इतिहास । सहजतावादक प्रवर्तक अग्निजीवी कवि सोमदेव केँ ओ कहैत छथि जे आजुक प्रजातंत्री राजतंत्र मे सत्ता प्राप्तिक लेल आयोजित होइत अछि यज्ञ एहि यज्ञ मे देल जाइत अछि निम्मुधन जनताक देल जाइत अछि वलि एहि परम्पराक उपटौनीक लेल हुनका संग मिलि असंख्य अग्निजीवी कवि संग मिलि ओ करताह अग्निकविताक संधान समाजक जमीन पर जनमल विषमता आ ईर्षाक घास केँ जारि केँ सुड्डाह करबाक लेल संगोर' पड़तैक प्रगतिकामी विचारक आगि गाब' पड़तैक विध्वंसक राग निर्माणक लेल आवश्यक अछि विध्वंस कुटिलता आ दमनकारी विचारक विध्वंस एहि विध्वंसक पश्चात हमर समाज मे हमर देश मे गुंज' लगतैक प्रेम आ आपकताक राग । जीवकांत केँ इमानदारीक संग कहैत छथि रामलोचन जी जे ओ लिखि नञि पाबैत छथि हुनकर भाषा हुनकर भाषा मे हुनक पत्रक उतारा देब असम्भव छैक हुनका लेल हुनका पता नञि छन्हि जे केना फुलाइत छैक कमलक फूल ओ बिसरि गेल छथि ओड़हूल फूलक रंग हुनका मोन नञि छन्हि जे केहन होइत छैक खजन चिड़ैया ओ नहि लिखि पाबैत छथि प्रकृतिपरक काव्य वसंतक आशक निरर्थक स्वप्न मे हुनका नहि छन्हि मिसियो भरि विश्वास ओ चाहैत छथि जे आभासी वसंतक स्वप्न यथार्थ मे भ' जाइ परिवर्तित एहि धरतीक कोटि - कोटि पीड़ित - उत्पीड़ित लोकक जीवनक वसंतक जोगार करबा काल हुनका बिसरा' गेल अछि फूल - पत्ती आ प्राकृतिक सौन्दर्य ओ अत्यंत धैर्यक संग कहैत छथि जे जखन एहि धरती पर समस्त मनुक्खक जीवन मे आबि जेतैक वास्तविक वसंत तखन ओ जरूर गौताह प्रसन्नचित्त मुद्रा मे वसंतक गीत । संपादकीय-नोट- ई कविता विदेहक "रामलोचन ठाकुर विशेषांक" लेल आएल छल मुदा ओ विशेषांकमे कविता सभ देबाक विचार नै छल आ तकर बाद रामलोचनजीक मृत्युक समाद आएल। आइ पिरथी दिवस अछि ग्लोबक कोन - कोनमे भऽ रहल अछि माय धरती के जयजयकार पिरथीक संरक्षणक लेल ठाम - ठाम भऽ रहल अछि जुटान गणपति सभ मना रहल छथि पिरथी - दिवस के उत्सव समस्त लक्ष्मीपतिक भीजल ठोरसँ निकसि रहल अछि ओजपूर्ण वक्तव्य धरतीकेँ हरियर कचोर बनेबाक लेल पिछला वर्ख जकाँ पुनः दोहराओल जाइत अछि संकल्प गणपति सभ पिरथीकेँ बचेबाक लेल सिरजैत अछि असंख्य विधान धरतीक मुस्कानकेँ अक्षुण्ण रखबाक लेल जंगलकेँ बचा कऽ रखबाक लेल जाइत अछि सपथ सदानीरा नदी जे मिझबैत अछि पिरथीक पियास तकर अस्तित्वक संरक्षणक लेल बनाओल जाइत अछि कानून आब एहि ब्रह्मांडक कोनो देश नहि करत एक्कोटा परमाणु - परीक्षण टी० वी० पर मचैत छैक अनघोल पीचरोड पर आब कम भऽ जेतैक धूइयां वला गाड़ी आब चिमनीसँ बहरेतैक प्रदूषणकारी धूइयां बहुत कम आब किसानीक लेल बचाओल जयतैक धरती गाय - भैंस आ बरदक पालनकेँ कयल जयतैक उत्साहित रासायनिक खादसँ बाँझ होइत धरतीकेँ बचेबाक लेल गोबरक खादसँ बढ़ाओल जेतैक धरतीक ताकति लागि रहल छैक जेना पिरथीक समस्त समस्याक आइये भऽ जेतैक समाधान । मुदा किछुए दिनक पश्चात समस्त गणपति आ लक्ष्मीपति अर्थयुद्धक दौड़मे एक दोसराकेँ पछाड़बाक लेल लगब' लगबैत अछि सरपट दौड़ न'केँ निन्यानवे करबाक नव - नव तकनीकक होम' लगैत अछि आविष्कार स्वयंकेँ सर्वश्रेष्ठ साबित करबाक लेल कर' लगैत अछि प्रकृतिक दोहन काटल जाइत अछि हरियर - हरियर गाछ अन्धाधुन्ध लगाओल जाइत अछि फैक्ट्री देश आ देशक बीच अपन प्रभुत्वकेँ बढ़ेबाक लेल होम' लगैत अछि हथियारबन्दीक होड़ असंख्य गाड़ी दौड़' लगैत अछि वाट पर गरम होब' लगैत अछि हवा पटपटाब' लगैत अछि पिरथीक काया औनाब' लगैत अछि पिरथीक सन्तान पिरथीक आँखिसँ बह' लगैत अछि कोशी कमला बलान हवामे गुंज' लगैत अछि पिरथीक क्रन्दनक कारुणिक स्वर । अपन सन्तानक समस्त दुखकेँ दूर करबाक लेल रोगाह काया रहितो पिरथी सिरज' चाहैत अछि जीवन उच्च तापक्रमक बोखारसँ पीड़ित रहितो अपन घबाह वक्ष पर पिरथी रोपि लैत अछि असंख्य गाछ लुटब' लगैत अछि असंख्य स्वादिष्ट फल विपरीत परिस्थिति रहितो अपन काया पर पिरथी सिरजैत अछि हरियरी गम्हरैत धानक शीशमे भरैत अछि जीवन रस पिरथी गहुँमक सोनुहला शीशमे पिरथी भरैत अछि जीवनक सुगंध चाहैत अछि पिरथी जे ओ मुक्त हस्तसँ परसय सुख - समृद्धिक समस्त सनेस दूर करय जीवक समस्त क्लेश पिरथीक वक्ष पर जे मनुक्ख लगौनय जा रहल अछि पजेबा, बालु आ सीमेंटक जंगल ओहि जंगलमे संताप आ खतराक अदंककेँ अपन हियामे जोगने कछमछाइत जीबि रहल अछि लोक पिरथीक आँखिसँ बह' लगैत अछि ममताक नोर पता नहि कियैक आइ जखन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मना रहल अछि पिरथीक पावनि हमर कानसँ टकरा' रहल अछि पिरथीक कर्णभेदी झौहरि । आखिर एना कियैक लागि रहल अछि एखन पूव क्षितिजसँ हुलकि रहल छथि बालारुण सूर्य निशाक घोर तिमिरकेँ ललकारि रहल छथि बाल - दिवाकर फूला गेल अछि राजीव पंकजक मुस्किआइत पाँखिक प्रतिबिंबसँ आह्लादित भऽ गेल अछि सरोवरक निर्मल तल पोखरिक महार पर ठाढ़ पाकरिक गाछ पर चुनमुना' रहल अछि चिड़ैं हरियर - हरियर दूभि पर चमकि रहल अछि मोती हम घरसँ बहरयबाक क' रहल छी प्रयास आँखिक आगू देखाइत अछि अन्हार हम जंगलासँ हुलकि - हुलकि जोह' लगैत छी कोनो इजोतक अाश चारूकात देखाइत अछि अन्हार अन्हार अन्हारे - अन्हार हमर हृदयमे पैसल अदंकक नागफेनी क' दैत अछि लोहुलोहान हमर आत्माकेँ हम डेराइत - डेराइत घरसँ बहरेबाक लेल संगोर' लगै छी धैर्य आ साहसक अमृत सुरूज तँ प्रारंभहिसँ अपन ज्योति आ धाहसँ अपन अजस्र ऊर्जाक स्रोतसँ करैत रहल अछि सदिखन आवेशित हमर आत्माकेँ हमर जिजीविषाकेँ सदिखन करैत रहल अछि उद्वेलित सुरूज सुरूजे तँ परसैत रहल हमरा लेल समस्त जीव - जगत लेल जीवन अमृत पता नहि कियैक आइ हमर आँखिक आगू देखा' रहल अछि भय आ अदंकक हवा हमर जीवन - संघर्ष आ साहस हमर अक्खड़पन आ अपराजित होयबाक अटल संकल्प तिलमिला' रहल अछि आइ । जीवन जीवाक लेल जरूरी अछि रोटी रोटीक लेल जरूरी अछि श्रम श्रम करबाक लेल जरूरी अछि शक्ति शक्तिक लेल जरूरी अछि रोटी रोटीक लेल जरूरी अछि अन्न अन्नक लेल जरूरी अछि श्रम श्रमक लेल जरूरी अछि ताकति आ आरोग्य आरोग्यक लेल जरूरी अछि स्वच्छ हवा स्वच्छ पानि आ स्वच्छ माटि हमर कानसँ टकराइत अछि बेरि - बेरि जे हवामे मिझरा' गेल अछि कोरोनाक जहर सुनैत छियैक जे इ कोरोना ल' लैत अछि मनुक्खक प्राण हम अपना अापकेँ अपन घरमे बन्न करबाक लैत छी निर्णय सोच' लगै छी जे किछु दिन धरि भूखल रहबाक करी अभ्यास सुरूज जे हमरा जीयत रखबाक लेल एहि पिरथी पर अस्तित्वक संरक्षण लेल जरैत छथि स्वयं अजस्र धाहमे अपन धाहसँ सिरजैत अछि जीवन एहि पिरथी पर दैत रहल छथि साहसक सनेश एहि पिरथीक समस्त जीवकेँ पता नहि कियैक आइ भोरे भोर ओ कहि रहल छथि हमरा घरेमे रहू ,जुनि बहराउ कोनो आन ठाम । पेटमे धधकैत भूखक आगिकेँ मिझेबाक लेल आवश्यक अछि रोटीक जोगार हमर घरक पछुआरमे एकटा मैदानमे फुदकैत किछु खजन चिड़ैया हमर झुर्रियायल चेहरा देखि हमरा पर ठठा'केँ हँसल छलीह चरी करैत - करैत मुँह दुसने छलीह हमरा हमरा विस्मय भेल छल ओहि खजन चिड़ैयाँ पर हम तँ एकरासँ करैत छी आत्मिक प्रेम कतेको बेरि जखन ओ लुब - लुब करैत हमर छरियायल दानाकेँ खाइत होइत छलीह अत्यंत प्रसन्न ओकर आँखिमे चमकैत छलैक कृतज्ञताक इजोत शायद ओ हमर अकर्मण्यता आ विवशताक उड़ा' रहल छलीह मजाक हमर अन्तरमे जन्मैत विस्मयक औंकुरी सुखा' जाइत अछि अनायास हम सोच' लगै छी अपन नियति नाप' लगै छी जीवन आ मृत्युक बीचक दूरी देख' लगै छी मनुक्खताइ आ सामाजिकताक बदलल परिदृश्य आँखिक आगु अत्यंत निर्मम मुद्रामे ठाढ़ देखाइत अछि यमराज डोल' लगैत अछि हमर आत्मविश्वासक कैलाश हमर मोन कहियो नञि सोचनय छल जे हमर आँखिक आगू ठाढ़ होयताह यमराज आइ अनायास सोचि रहल अछि मोन जे हम आबि गेल छी मृत्युक लगीच मृत्यु - भूखसँ मृत्यु मृत्यु - कोरोनासँ मृत्यु । माँक आँचरक स्नेहिल बसात... हमर जीवन यात्राक प्रत्येक डेग पर हमरा आगू बढ़बाक लेल प्रेरित करैत रहैत अछि कोनो देवी हम चलैत रहै छी जीवनक उबर - खाबर बाट पर । कखनहु गिर' लगै छी गँहीर खाधि मे प्रेमक संग हमर बाँहि केँ पकड़ैत अछि एकटा हाथ हम सम्हरि जाई छी बढ़' लगैत अछि हमर डेग । कखनहु गीरि पड़ै छी अनजान धारक अतल गहराई मे किछुए क्षणक पश्चात हमर देह पुलकि उठैत अछि कोनो देवीक स्नेहिल कोरा मे । हमर कान सँ टकराइत अछि कोनो देवीक दुलार भरल शब्द हमर ठोर पर फुला' जाइत अछि हर्षक असंख्य फूल । हम देख' लगै छी ओहि देवीक आँखि अाँखि मे भरल रहैत अछि ममताक महासमुद्र हमर हृदय भ' जाइत अछि तृप्त । हमर जीवन यात्रा मे हमर माथ टकराइत अछि पाथरक पहाड़ सँ लहु- लोहान भ' जाइत अछि हमर माथ कोनो देवी एकटा स्नेहिल आँचर सँ पोछैत रहैत अछि हमर माथक शोनित हमर हृदय सँ बिला' जाइत अछि पाथरक पहाड़क अदंक फूटल माथक घावक दर्द कपुर जँका भ' जाइत अछि अलोपित । अपन जीवन यात्रा मे कइएक बेर हम हेरा' जाइत छी मायावी जंगलक भूल- भूलैया मे कोनो देवी हमर आंगुर पकड़ि ल' अबैत अछि हमरा एकटा सत्पथ पर रित्ती- रित्ती भ' जाइत अछि हमर मस्तिष्कक भ्रम- जाल । हम विस्मित भ' ताकय लगै छी ओहि देवी केँ हम ताकैत छी ओहि देवी केँ एहि लेल जे हम क' सकी हुनक पूजा । हमर आँखिक आगू ठाढ़ भ' जाइत अछि असंख्य देवी - देवता फटकार' लगैत अछि हमरा । समस्त देवी- देवताक समवेत फटकार सँ केराक भालरि जँका काँप' लगैत अछि हमर आत्मा । अचक्के हमर आँखिक आगू ठाढ़ भ' जाइत अछि हमर माँ हमरा अपन माँक चेहरा मे देखाइत अछि हमर जीवन उद्धारक देवीक चित्र कर जोड़ि हम लबि जाइत छी मायक पायर दिस । समस्त देवी - देवता पुनः हँसैत अछि समवेत हँसी समवेत स्वरेँ कहैत छथि ओ भेटि गेलौ ने ओ देवी जकरा ताकैत छलै तु सकारक मुद्रा मे हिल' लगैत अछि हमर माथ । समस्त देवी - देवता भ' जाइत छथि अलोपित हमर आँखिक आगू ठाढ़ रहैत छथि हमर माँ हमर गत्र - गत्र केँ करैत अछि स्पर्श माँक आँचरक स्नेहिल बसात । कोरोना- काल मे माँ एहि कोरोना काल मे हमर हृदयक जमीन पर सदिखन औंकुरैत रहैत अछि असंख्य अदंकक गाछ । एहि अदंकक गाछ मे सदति फुलाइत रहैत अछि मृत्युक कारी - सियाह फूल । मृत्युक श्यामवर्णी फूल बढ़ा' दैत अछि हमर कछमछी संदेहक विखाह हवा पैसि जाइत अछि हमर हृदय मे । मृत्यु केँ लगीच देखि हमर जिजीविषा कर' लगैत अछि संघर्ष । आँखिक आगू देखाइत अछि गाम मे अतिचिन्तित मुद्रा मे एकान्त घर मे बैसल एकटा महादेवीक चित्र । ओ प्रत्येक वर्ख हमर जीवन रक्षाक लेल राखैत छथि जितिया पावनिक व्रत । ओ हमर जीवन रक्षाक लेल बाबा भैरव केँ गोहराबैत रहैत छथि अहर्निश । गोसाईं घरक सिराक आगू सातो बहिन सँ हमर जीवनक लेल करैत रहैत छथि निहोरा । तुलसी चौड़ा लग जल चढ़ाबैत व साँझ केँ जरैत दीप देखाबैत तुलसी माता सँ मांगैत रहैत छथि सदिखन हमर जीवनक भीख । प्रत्येक वर्ष छठि परमेश्वरी केँ पूजैत छथि हमर माँ मांगैत छथि हुनका सँ हमर जीवनक वरदान । सुरूज केँ जल चढ़बैत हमर माँ मांगैत छथि हमरा लेल अजस्र तेज आ दीर्घ जीवनक भीख । फोन पर सदिखन गाम आबि जयबाक करैत रहैत छथि आग्रह । हम जानैत छी नीक जकाँ जे माँक आग्रह आग्रह नहि होइत छैक आदेश । ओहिना हमर मोन माँक अँचराक ममतामयी बसातक मधुर सुगंधक लेल ललायल रहैत अछि अहर्निश । आई जखन कहैत अछि लोक निंघटि रहल अछि प्राणवायु तखन माँक अँचराक स्नेहिल बसातक सुगंधक लेल उद्वेलित अछि हमर मोन । आई जखन लोकक शिकार क' रहल अछि कोरोना लोकक समस्त प्रयास केँ नञि गुदानि रहल अछि मृत्युदूत तखन माँक आशीर्वादक मंत्रक लेल वेकल होम' लागल अछि मोन । महानगरीय जीवनक अर्थजाल मे ओझरायल हमर जीवन बनल जा रहल अछि मशीन मशीन संवेदनाशून्य मशीन । हम एहि जीवन सँ मुक्त होयबाक कर' लागै छी प्रयास तखने कोरोना कालक अनेकानेक चेतौनी डेरा' दैत अछि हमरा । माँ करैत छथि फोन बौउवा ! समय विकराल छै घरे मे रहब कतौ नञि बहरायब । माँक नजरि हमरा पर हमर नजरि माँ पर भागीरथी आ कोशीक दूरी बूझाइत अछि अकास आ पातालक बीचक दूरी हार' लागैत अछि हमर हिम्मति । तैयो जखन अबैत अछि हमरा माँक आशीर्वचनक मंत्र लगैत अछि जेना किछु नञि क' पाओत कोरोना हमरा गदगदाइत हमर मोन प्रसन्नचित्त मुद्रा मे गाब' लागैत अछि एकटा जीवन गीत जे हम छी अजर - अमर । मृत्युगीतक डेराओन राग कोरोनाक ठोर पर थिरकि रहल अछि मृत्युगीत एकर गीतक स्वर सँ बहरा' रहल अछि विध्वंस - राग एहि राग मे सन्हियायल अछि संदेह , भय आ अदंक मनुक्खक आर्तनाद केँ बना' रहल अछि आओर बेशी त्रासद ई गीत असंख्य व्यंग्य - भावक रस मे बोरल अछि एहि गीतक स्वर एहि गीतक कोलाहल सँ डेरायल अछि मृत्यु कान सँ टकराइत अछि मृत्युक अरण्य - रोदन जोर - जोर सँ घिनाओन हँसीक संग अट्टाहस क' रहल अछि कोरोना । मृत आत्माक लेखा - जोखा करैत अकच्छ भ' गेल छथि चित्रगुप्त महाराज फेंकि देनय छथि खाता - पत्तर थाकि गेल अछि यमराजक महींस उठान हारि रहल अछि महींस पैदल दौड़ैत - दौड़ैत थाकि गेल छथि यमराज प्राण राखबाक लेल यमराजक झोड़ा मे नञि अछि मिसियो भरि जग्गह यमराज अकानि रहल छथि कोरोनाक संगीतक ध्वनि यमराजक ह्रृदय मे उमरि गेल अछि दयाक महासमुद्र भोकारि पारि केँ कानि रहल छथि यमराज यमराजक आँखि सँ बहि रहल अछि दहो - बहो नोर । निःसहाय भ' गेल अछि लोक समस्त असरा पर लोक केँ नञि अछि मिसियो भरि विश्वास अस्पतालो मे कहाँ बाँचि पाबैत अछि लोकक प्राण एहि कोरोना - कालक गाल मे समा' गेल अछि असंख्य आत्मीय लोकक प्राण मित्र आ परिजन - पुरजनक आँखि मे कहाँ बाँचल अछि मिसियो भरि नोर कानैत - कानैत लोकक सुखा' गेल अछि कण्ठ बौक बनल लोकक हृदयक जमीन पर पसरि गेल अछि मृत्युक मरुस्थलक दृश्य । आत्मनिर्भरताक महामंत्र कहाँ आबि रहल अछि काज भगवानक पूजा - पाठ समस्त कीर्तन - भजन यज्ञ परयोजन तंत्र मंत्र लागि रहल अछि व्यर्थ कोरोनाक तांडवक आगां भगवानो भ' गेल छथि हतप्रभ अपन सन्तान केँ काल - कवलित होइत देखि भगवानोक आँखि सँ बहि रहल अछि दहो - बहो नोर नीमन दिनक संभावनाक आश मे कोरोनाक कीड़ाक भय केँ ललकारैत अपन बाधित श्वासक संग दौड़ैत - दौड़ैत सकाले पहूँचि गेल छल मतदान - केन्द्र अत्यंत उत्साहक संग टिपने छल बटन लोक गणपति पर आश लगौनय असीम आशाक संग निश्चिन्त भ' सुख - चैन सँ घर मे सुतबाक सपना सजौनय छल लोक । आइ प्राणवायुक लेल अहुँछिया काटैत - काटैत लोक त्यागि रहल अछि अपन प्राण असगरे घर मे बैसल - बैसल थस्स ल' रहल अछि काया निस्तेज भेल जा रहल अछि माथ संदेहक सियाह अन्हार मे औना' रहल अछि लोक अपन हृदय मे अदंक केँ जोगने डर आ मृत्युक डेराओन कारी बादरि केँ निहारि रहल अछि लोक अपन परिजन - पुरजन , दोस - महीम दर - दियाद , सर - समाज आ कर - कुटुम सँ दूर दूर - बहुत दूर रहबाक विवशताक संग उठैत - बैसैत , भूख सँ कुहरैत एकान्त मे सुनैत रहैत अछि वीभत्स आ डेराओन संगीतक स्वर । कोरोना खौंझा' रहल अछि लोक केँ लोक कोरोना सँ लड़बाक लेल गाब' चाहैत अछि एकटा विजयोल्लासक गीत लोक कोरोनाक विनाशक लेल गढ़' चाहैत अछि एकटा अस्त्र लोक लोक केँ भरोस देबाक लेल लिख' चाहैत अछि एकटा आशावादी महागाथा कोरोना कोनो मायावी जकाँ बदलि रहल अछि अपन रुप कोरोना रचि रहल अछि असंख्य भयाओन विध्वंस - राग कोरोनाक संगीतक स्वर भेल जा रहल अछि डेराओन डेराओन आओर बेशी डेराओन । ठमकि गेल अछि लोकक पायर सुन्न भ' गेल अछि लोकक माथ टूटि गेल अछि सम्बन्धक डोरि थमि गेल अछि कलम नमरल जा रहल अछि लोकक स्वार्थक क्षेत्रफल धरती बनि गेल अछि फूटबालक मैदान लोक गेंद जकाँ खा' रहल अछि आजुक बुधियार लोकक पायरक ठोकर कतेको गमा' देलक अपन प्राण बहि गेल गंगाधार मे श्मशान मे अंत्येष्टिक इन्तिज़ार करैत -करैत निभरोस भ' रहल अछि असंख्य लहास लहास सँ बहराइत अछि डेराओन गंध एहि गंध मे मदमस्त भ' प्रफुल्लित मुद्रा मे नाच' लागैत अछि कोरोना नदी मे बहैत लहास सँ बहरा' रहल अछि कोरोना गाबि रहल अछि नव - नव मृत्युगीत नव - नव परिधान मे सजि - धजि गली - गली घूमि रहल अछि कोरोना क' रहल अछि महामृत्युक नृत्य कोरोनाक संगीतक विध्वंस - राग सँ दलमलित भ' गेल अछि हवा पतनुकान लेनय लोकक मोन मे जनम' लागल अछि एकटा संगीत संगीत मे मिझरायल अछि एकटा राग राग - अदंकक राग । कुर्सीक चिन्ता आ कोरोनाक कहर जनताक पेट मे धधकि रहल अछि भूखक आगि जनताक हृदय मे सन्हियायल अछि कोरोनाक अदंक जनताक दिमाग मे औना' रहल अछि भविष्यक चिन्ता जनताक ह्रदय केँ क' रहल अछि लोहुलोहान अप्पन परिजन - पुरजनक आकस्मिक मृत्यु - संवाद । जनता केँ लगैत अछि कोरोना भ' रहल अछि निपत्ता अन्नमन्न ओहिना जेना कोनो अन्धर - तुफान किछु समयक लेल धरती पर मचबैत अछि तांडव आ भ' जाइत अछि अलोपित ओ सोचैत अछि कोशीक बाढ़िक तबाही केँ ओकर आँखिक आगू नाच' लगैत अछि माय कोशीक तमसायल चेहरा आ हुनक रक्तवर्णी आँखि ओकर मोन मे जन्मैत अछि आश जे अहिना समय भ' जेतैक ठीक - ठाक लगैत अछि ओकरा समय सुधरि गेल अछि आब कोरोना भ' गेल अछि निस्तेज । निर्भीक भ' जनता मेहनति करबाक लेल अपन काया केँ कर' लगैत अछि तैयार संगोर' लगैत अछि ताकत आ साहस मृत्यु - भयक सन्देह केँ अपन हृदय सँ भगा' दैत अछि दूर दूर बहुत बहुत दूर ओकर देह सँ चूअ' लगैत अछि घाम काया पर टघरैत घाम सँ बहराइत अछि स्वाभिमानक सुगंध । सत्तासीन नेताक आँखिक आगू नाच' लगैत अछि श्रमशील जनताक स्वाभिमानक चित्र ओकरा पता छैक जे जनताक हृदय मे जनमैत स्वाभिमानक भाव खतरनाक अछि कुर्सीक लेल डोल' लगैत अछि ओकर कुर्सी अपन कुर्सी केँ बचेबाक लेल जनता सँ ओकर भोट हथियेबाक लेल जनता केँ फुसलेबाक लेल माइक्रोफोन पर चिकर' लगैत अछि नेता अनघोल होम' लगैत अछि अकास मे आश्वासनक मंत्रोच्चार । नेता केँ पता छैक कहाँ कतौ गेल अछि कोरोना ओकरा इहो पता छैक जे अपन मारक क्षमता केँ रसे रस बढ़ा' रहल अछि कोरोना ओकरा पता छैक जे जखन कोरोना देखैत अछि भीड़ ओकर ठोर पर जोर - जोर सँ ठहक्काक संग थिरक' लगैत अछि अट्टाहस भोटक लेल तइयो ओ लगाबैत अछि मजमा जनताक कान्ह पर थमाबैत अछि झंडा थाकल पायरेँ राजपथ पर दौड़ैत अछि ओकर रोगाह काया पीठ मे सटल पेट चोटकल गाल आ पपरियायल ठोरक संग जोर - जोर सँ लगबैत अछि जिन्दाबादक नारा खत्ता मे नुकायल आँखि सँ राजपथ पर खिड़बैत अछि ओ नजरि बहीर भेल अपन कान केँ ठेकियाबैत अछि नेताजीक भाषण पर नेताजीक आँखि मे ओ ताक' लगैत अछि अपन स्वप्न । जनता केँ पता नहि छैक जे ओकर पाछाँ - पाछाँ घूमि रहल अछि कोरोना ओकरा पता नहि छैक जे कखनहु भ' सकैत अछि ओकर अकालमृत्यु नेता केँ चाही भोट भोट कुर्सीक संरक्षणक लेल ओ सोचैत अछि जे जनता द'' दिअय अपन भोट जनता तँ कोनो ने कोनो बटन केँ टिपत जरूर जनता सोचैत अछि एखन धरि सभ ठकबे केलक एहि बेर शायद नञि ठकाएब ओ कोरोना संँ बेखबर जल्दी - जल्दी भोट खसा' रोटीक जोगार मे तोड़' लगैत अछि अप्पन देह मोने मोन गज्जैत नेता कुर्सीक गद्दी केँ झार' लगैत अछि आ कर' लगैत अछि आत्मविश्वासक संग भोटफलक इन्तिज़ार । अप्पन-अप्पन ताल प्रजातंत्रक आशक इजोत केँ बूझैत अछि जनता अप्पन हिस्साक इजोत कखनो - कखनो जनता केँ लगैत अछि जेना ई प्रजातंत्र छियैक ओकर अप्पन बखरा एकर इजोतक धवल किरिण मे बिला' जेतैक ओकर निराशाक अन्हार । प्रजातंत्रक आशक इजोत केँ आओर बेशी दैदीप्यमान बनेबाक लेल भोटक पंचवर्षीय पावनि केँ ओ मनबैत अछि धूमधाम सँ नेता सभक भाषण केँ अकानैत अछि ओ नेताजीक भाषण मे ताकैत अछि ओ अप्पन जीवनक आश सोचि - समझि अछताइत - पछताइत ओ टिपैत अछि इवीएमक बटन । भोटपर्वक विसर्जनक पश्चात जनताक आँखि सँ बहराइत अछि प्रसन्नताक इजोत नेताजीक वचनबद्धता सँ ओकर ह्रृदयक जमीन पर जनम' लगैत अछि अप्पन अधिकारक गाछ दिन पर दिन बितैत जाइत अछि आश्वासन पूर्तिक आश मे ओकर अधिकारक गाछ मे फुलाबय लगैत अछि असंख्य संकटमोचक फूल लगैत अछि जेना सत्ते एखनहि धमकि जेतैक ओकर हृदयक बाड़ी मे निम्मन दिनक फूलबाड़ी । ओ सोचय लगैत अछि सत्ते बदलि रहल अछि ओकर दिन आब ओकरा नञि रहय पड़तैक उपास मे दिनक दिन आब ओकरा जरूरे भेटि जेतैक फूटपाथी जिनगी सँ मुक्ति आब जरूरे ओकरा भेटि जेतैक एकटा अप्पन छत बेमारीक आश्रय बनल ओकर काया सँ जरूरे भागि जेतैक जिद्दियाह व्याधि ओ जरूरे आब सीखि लेत अपन दसखत अपने सँ पढ़त दरखास्त ओ बूझय लागत आधार कार्ड आ भोटकार्डक महत्व । नेताजीक आगमनक आश मे मोटा' गेल अछि ओकर आँखि नेताजी विकासक नारा केँ आओर बेशी प्रभावी बनेबाक लेल बेश शक्तिशाली माइक्रोफोनक भ' रहल अछि आविष्कार जनताक दुख केँ दूर करबाक लेल भगवान सँ कयल जा रहल अछि प्रार्थना आयोजित भ' रहल अछि असंख्य पूजा - पाठ आ यज्ञ भगवान सँ कयल जा रहल अछि कामना भूखल - पियासल रहबाक अभ्यासी जनता केँ राखल जाय संतुष्ट बढ़ैत रहय हुनक सुख - समृद्धि । कल जोड़ने जनता पूजा - पाठ मे भ' रहल अछि शामिल नेताजीक चेहरा मे जनता केँ देखाइत अछि भगवानक साकार रूप जनता केँ विश्वास अछि भगवान हुनक बात नहि सुनताह भगबान जरूरे सुनताह नेताजीक बात जनता केँ बूझाइत अछि जे नेताजीक बड़का पूजा - पाठ लग ओकर छोट - छीन गोहारिक नञि अछि कोनो महत्व । जनताक अधिकारक स्वप्नक आस्था मे होम' लगैत अछि परिवर्तित दुख - दर्द केँ जनता मान' लगैत अछि अपन नियति शोषण केँ ओ मान' लगैत अछि नेताजीक परसाद अपन रोगाह काया केँ ओ मानैत अछि अपन पूर्वजन्मक फल नेताजीक विजय जुलूस मे भूखल पेट आ सूखल ठोरक संग होइत अछि शामिल एखनो ओकरा आश अछि ओकर जीवनक समस्त दुख - दर्द जरूरे पड़ा' जेतैक सात समुद्दर पार । यात्री (१-३) १ यात्रीक यात्रा नहि थमै अछि *** *** *** *** के अछि भूखल , के अछि मारल अन्यायी सत्ता के भीतर ककर माथ अछि आइ झमारल तकर सुधि मे सतत बढै छथि यात्रीक यात्रा नञि थमै अछि । चलल तरौनी सँ जे यात्रा अन्त समय धरि चलैत रहल कालीदासक हृदय पैसि ओ बाल्मीकि के मर्म बूझि ओ शब्दक यात्रा करैत रहल पदचिह्नक अंकण वाट- वाट पर यात्रीक यात्रा नञि थमै अछि । के अछि भूखल ----- कविक स्वप्न ओ रचि रहल छल वाचस्पति - उदयन खोजि रहल छल ललकारा लेल औनाअ् रहल छल क्रांतिक सपना देखि रहल छल श्रमजीवी के रक्तक कीमत आइओ तँ ओ गुनि रहल छथि। के अछि भूखल ------ अहिवातक पातिल फोड़ि चलल छल पुरना परिचय केँ तोड़ि चलल छल परिजन - पुरजन केँ छोड़ि चलल छल गरीबक खातिर अन्न - पानि हित यात्रीक यात्रा नञि थमै अछि । के अछि भूखल------ कमला कातक टूटल पुल सन काव्यक रूदन सुनि रहल छल मिथिलाक तरुणीक अरण्य विलाप केँ सुनि सुनि दग्धित भअ् रहल छल बूढ़ वरक एहि सड़ल रस्म केँ काव्य - वाण सँ भेदि रहल छल रूढि - ध्वंसक खातिर कखनहुँ यात्रीक यात्रा नञि थमै अछि । के अछि भूखल -------- २ यात्री नहि छथि एहि जगत मे *** *** *** *** मोन हमर नहि मानि रहल अछि । चिर निद्रा मे सूतल यात्री मोन हमर आइ कानि रहल अछि ॥ नवतुरिया के जोशक संवल क्रांति गीत ओ गावि रहल छल। जन सँ निकसित दर्दक गंगा हुनक शब्द मे आवि रहल छल ॥ इतिहासक पन्ना पर एखनहु क्रांति शब्द ओ लिखि रहल छथि। यात्री नहि छथि,,, ,, , , , राजनीति के पर्दा भीतर नाटक जेहन भअ् रहल छल । हुनक शब्द के डोरिक माँदें परदा सभटा खुजि रहल छल । क्रांति खातिर एखनहुँ ओ तँ नवतुरिया केँ जोहि रहल छथि । यात्री नहि -------- -- जन - जन के बनि बाबा ओ तँ स्नेह शब्द ओ लुटाअ् रहल छल । मानवता के रक्षा खातिर काव्य धार मे नहा रहल छल । काव्यक दुनिया मे एखनहुँ ओ दर्द शब्द तँ रचि रहल छथि । यात्री नहि - - सतरंगी सपनाक दुनिया केँ नीक जँका ओ बूझि रहल छल । पूंजीवाद के शोषण केँ तँ नीक जँका ओ बूझि रहल छल । जन- जन के सुखमय जीवन खातिर जीवन रस ओ ताकि रहल छथि । यात्री नहि -- - ---- दर्द केर उपटौनी खातिर चप्पा -चप्पा ओ घूमि रहल छल । दर्द शब्द रचना के खातिर राति- राति ओ जागि रहल छल । यात्रीक यात्रा कोना केँ ठमकल मोन हमर आइ कानि रहल अछि । यात्री नहि ---:---:---:---:--- ३ वैद्यनाथ के धाम तरौनी *** *** *** *** वैद्यनाथ के धाम तरौनी नागार्जुनक गाम तरौनी यात्रीक जन्म स्थान तरौनी कविता के अछि गाम तरौनी चित्राक अछि संधान तरौनी पत्रहीन जे नग्न गाछ अछि तकर पीड़ाक नाम तरौनी । त्रेता के विदेह जनक छल आइओ तँ विदेह उपस्थित जीवन काल सदेह विदेह छल आइओ तँ छथि अमृत रंजित अमर यात्री देखा रहल छथि मिथिला के अछि तीर्थ तरौनी । वैद्यनाथ के धाम ,,,,,, पारोक पीड़ा मर्दन खातिर नवतुरिया सम्मानक खातिर मेहनतकश के मानक खातिर सतयुग के संधानक खातिर क्रांतिक झंडा थामि हाथ मे शहर नगर आ कारावास मे प्रवर्तक यात्रीक थान तरौनी । वैद्यनाथ के धाम ,,, , , राजनीति परिवर्तन लेल सत्ता के प्रवर्तन लेल विद्रोहीक संघर्षक लेल रुढि के विध्वंसक लेल साहित्यक सम्मानक लेल अथक यात्रा लीन यति सन्यासीक स्थान तरौनी । वैद्यनाथ के धाम ……. चित्र: श्वेता झा चौधरी 916 || विदेह सदेह:२४ विदेह सदेह:२४|| 915
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€ > CG @ facebook.com/anchinhar/ x 2 @: HE Apps Qh SingerMail @ E-WeyBill System [डा Reading ist oP 4, + ८ | Q Search Facebook R 2 8 नि हुक + OB vw oe Ashish Anchinhar © Add to Story & Edit Profile oo v GS gee . April at 20:56 -@ दिव्या आकृति मिश्रा... गोपाल जी नन्दलाल — Mohar Misra थी a प्रकाशित as गेल 'रामलोचन ठाकुर विशेषांक" पढ़बाक लेल विदेहक एहिं लिंकपर आउ http://www.videha.co.in/ fag लेखक केर नाम आधा आएल्र छनि, लिंक खोललासँँ पूरा नाम आबि जाइत कै. Life events See all आभार Kishore KeshavAmar Kant Lal ! प्रदीप FoqShailendra MishraaftaaTey Maha Kant Arvind Thakur Amod JhaShivashankar ShriniwasUdaya Narayana SinghDilip Kumar JhaNabo Narayan MishraKathakar ‘AshokSurendra ThakurNarayan JeeRam Bharos Kapari Bhramar Manoj KarnJagdishchandra ThakurKedar KananYogendra Pathak ViyogiPradip BihariKailash Kumar MishraLekhak RameshSantoshi Kumardea@? @xsiatKameshwar Jha KamaljiRaman Kumar SinghAnmol JhaVidyanand JhaMithilesh Kumar JhaAmar Nath JhaGanga JhaBinay Bhushan ThakurAjit Travelled to Durgapur, “tated studying at AzadBinod Kumar JnaGangesh Gunjanlshnath Jhatfa भूषण West Bengal uneducated but ‘aTeeKunalHimkar BharadwajAravind AkkooRishi BashisthaHirendra Kumar 22 December 2022 literate JhaPravin Narayan Choudharykrishna Mohan JhaAntika PrakashanBibhuti 985 Anand / VIDEHACOIN Privacy «Terms - Advertising - Ad choices [>- Cookies - More (Ree प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका G Facebook © 2027. A विदेह नूतन अंक संपादकीय संदेश विंदेह नूतन अंक गद्य बल re ~ a im a a al = i > तु Fi =) ® | || ० | g G | fez) Hs (= | = Desktop #9 [Px Thursday
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468 || विदेह सदेह:२४ eta aru =) Rag tee shares ———____ __ दि oy A Ons ae ee अनार a Raa पा oe हें प्लान aa कम मेल & Fears a ae _ BEM जीना Ge aga fag peary — me cs Ot te ay Se IS, GT carey ~~ ee at aa YF मरी के “QTE iz: 5 ——! I OT Ory जैडी Be a ape [ar मानक ee nt car — = Beg sts tea esq eg पा i क्र ae SRT ang aq eis thats 2 ee a ener ie preg रन Ss + — frat oa गुर मै aa DEAE, Sst तक ae — i ng sorb erty is Lilet a आग — Ura aga TR ae steep apt — : 4 जे कप अर rol ate: a er BRT aT Se apne {aig PS खुल EAS कट अहदि कक i m5 कब इस ee ; I असल स्पी पिएं १ तर ME Ok pli 7 एन हु... a, a Bie et abl ye - 2 पानी बेर aT SBP ae = i ge गई दा ir Lor a a दर पेल ने, पाठ Gaia acc है . ee उन पिन अणही की, BST STs aR gra — E a Eee Atm TT, Bl Scanned with CamScanner
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विदेह सदेह:२४]| 489 @ अनमोल झा कोलकाता परिसरक मैथिलीक मणि श्री रामलोचन ठाकुर
490 || विदेह सदेह:२४ a) Bream पीरेसरकत मैंफिलीक मणि: af ore ढाकुट_ कर ए Me ara oar Mut साहित्य 2 ah crea ठाकुरक नाम Ree साइित्मकाटक रूप Fy दाकिए | WEEN) SOIT ei area जी eam Pee pth wai | ।9 6८० को कलुनाड़ी soca & We wer किलाक aE को Tate Aa wean WAS aes | oS agar मे 7m oy मात्र Fes qu esta | tsar “aor aR) (पाली atsa) रचजौली , read BI ch] seca ई ora Rhy A पीड़ेले से oan Sash ot azars rec Pray लग दात्रलफ | पगदद ay (See केक Sya She से sve wer AN ea ad} oN at on मे सूकर) aT Zee गाए से ons ZB लगा ss aa पौड़ने OR क्ूलकता STAI. FAA >. का DAR रुलाक, ale HVA aT तक Fitch GA -फलेड़ा SA oe ACH SPE AAT ! BH करन TSS <5 We मो फिनका Sora Sag dy aca) Shad) oh ate | 2h Zea) ore) कोना gia A sy sec GM ee Bi den S कोलकाता को ane जे gaa aac Fate लेल साज़ात्काट- Sha ashy ae फिगकू & -वाज्ञात्कर्ती Gear — HEA) Py re zaera?, § asatera एन ma Sage, am ome) | Cal aga श्रलन्द ocr apy | ore gece - WA 'चिद्वापरिरेट. Bar गाज seen
विदेह सदेह:२४]| 494 ह . @ $ axa - है , जानी , w Hach ot Ga प्ञा $- जग wa ORR HE wars Taath oki मात्रा | ar aah az fen ah atari aa WY oH UT amt Sat ZS । a 'तकरा arp ot यात़ात्कार्टकर्ता at Pray a Sern or लौकी on गेल Zath ara Ton मे । aaa Tray के दो ton azetty aft OG § area केनें za FT awe Sm May oar ATToqaT BM Wea tH aii तकर spy मी Fare जो oi Sarracenia ayer on दहशत ah WAR Ath oh $9 Dray C) Nh eit | Cc) नौकरी ata $ aay Bay Soe area } यदबक्रूलीद are ard at लिखेगे xh an Tema गाज... क्रेललि Lets aon मे सी Hern Retacet मै Harel Teen Sat cad APT | that oraz ' मे जयवन ़ैकिलीक gaa - पत्र शिगका atk Sea awa § जाये करलखिन जे रकट ABA Hw | को , घ्रडठ- चर Wiad war ors से Cac ay Ser yz -घलि गेल She | कम Preah वा af के बटानट: ः signi Thee कारण sag Ty स्लतुका बदला aad नघलि the | ml AAA aN घड़-चल्र कोन Ray ome क' के ame Mor Bd Shad Gl away § BAL सियखत्ताद | ईडी रीवा पा WE SI नव बाला aA Aare ज़ी "अपना BP sera L
492 || विदेह सदेह:२४ @ | j दर zea ज़ी जगत छा मै ae oor war & ई atte Tra MCE केमे <र्शकि | crea * के ha Were atk daa aha S ors Tie ator TR ae ag के स्काधित केलनि \$ ae ya am abe BEA , HHI HITT naa wet ih, ea am सै Bet Bore) ales मे eT Hah) कुमार TAY arp eave sae! (RTH rte) कक ZS MH ।% 8। So मे wat wa awh AUG ah Gan am oy Paar Aer gs oar ¢ ferme at | ayaa of ate, att, cons, aterm, रेडमी, Aa - Torre , HS one ore TH FaA eH =a | @) Team aoa Shes, पोजी at 4. उपिड़ासद्रंता (कौचिता ms) - '977 50 2: Amat war (STea- Gry) न (98! So 3 Prt ce el —|983 a 4 Fi —aie 3a है dog हू co Dare नाम दे ava Paden (ates HHL) 7 96629 ६- arg (कौविश SHA) — 296 5° ; भू. लाख WEA BGA ( कौषता- संगत) पर : दि az हि CoP EPI E =— oO oO . 8: ERTS ape (ea) सत्ता 9. Ase Ha Bia <td (Zee - 295 Fo \
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494 || विदेह सदेह:२४ Trae tian जीलिक Wears wy सम्याद्नद्, aap? wah Yeah Gite | trp नी Hamam UTA Wie aie ate ई जाक़सवाही gasped मैकिलीक्र : िज़ित्दू स्पनाकार, ae | Hew, Tater Sua, SAIL ait, Team wore yey cae She Catto) रुपस्ठवाहीता फिनका 3 ore ahi! 7 AG ढ़ से दाहि-पदाड़ि HR पर नीड़ san | ई जात Team) Gal से ew रखेंत ate | राजलेननन CFL ! भाषा भारती ' amy, | ‘Pky | gama "water साला ' agg #7 व्ात्रोरो waa सफ़्मात़ ये ई. सम्मानित ate | फैनक Aga गुण में रुऊस ड़ुण ई alt, जे aa लियवक / Biz जो am पर्स शो ota wa ae SAR उत्साफित / घोतसादित करत aqui | हम स्वयं Aaa कल] काजल रही व्या ame ark फेल zy a इजरो लेखजकर, OS बूझत,घोत्याफित dah 7 an सन So Bye) tet “gh | oh er A tks Seow टेलिग्रैल ay ak Hh Src a apftame CS) adie “bx X88 | जखन IW साब्टलेक VES ER a) काए से क्ीन पत््चीस चरख vib छुनका डेटा फट cot छोडट्टी ara) AIS HSH सन Ay Ca , one Sot aan ठग, जिकितिहा जी , orn Fay ah, sia some Shel sf, sae भारती जी, ee EA staz. Boar जी ants cra जाए, aa one waa SA Tea oti Ts aa डोठ | al कौचित! eh ah grag Poa कि | से रूक् नेट ah aeeaz| aaa Sag whee ha ‘gas fare Frew Braz. cha छोउत ally तक Five Dyers मी Py rae i = =a avant हा a a AMIBIA BI A सन पढ़ल AMSA lds वा श्र नया, Garam Ss Cite । ¥ aah बी malig ate से -चलि रउल “दि : : लि Pate gaia yar: a जे HF - FH 2009 A MT ote gz atiand) corps रामलौन्नद्र At ues | दि AeA कारण मार्च 2020 पा oat arta) a rae Ss । aS LEER A डिनका AMX पट परनाक MPa
विदेह सदेह:२४|| 495 (©) aha) सम्याद्रक HO | = otk an At am aa a bie een Lh ler ALA A PAATCAL रोग BW We सलाद [yA जात a Pak AUK, AIECEAS कमी Sa Hah, rt an में Ream, AGH Fea wath का को (2-02.202/ B aie gp TA कलकत्ताक SHIM रोड Teut we से कहूँ भति Dens | नापग ot) Brena) सेण में गो पढ़ exh वात anh FATS | mean Peay लोक के eh ares Yar EoD व Borda xo Ha | खाना srr ke Bho, aaa or D य्यपलकोर झोल | कलमगक BT ailkormray ty Oa Pine peyrtn teat erect ny 2-93 we aire et Asa Wa Pot SP ce AM Ha केलक | we aS aA Tar the -पलला ate cfs त्मालेटव orks >सन तक | प्मान BM oa माय बे ठप८, wre peasy Ate ae, से Werth zatrey जगत © Be सब wahica | कांदिए and Bar लगि बढ़त Baa ©) sue जाणि dey Ha Re | Hor Sea Bacio aka oP XA Atha YR जाकि। =e L
विदेह सदेह:२४|| 749
750 || विदेह सदेह:२४ पद्य खण्ड =) i हू थी SS “ew NN is Hela HA WY, LEN NES PAMEA \: हक yi ap : प्रीति ठाकुर
9I8 || fate सदेह:२४ ; : : ae eo ee ( A ही | ae 7 : leo “ a ardrit aoe \ Me Kas A jae | = | : F aS) | ce 2 oN Soe XK ( S To = Beet teed @ चित्र: Re हर : श्वेता झा चौधरी an