SADEHA — 25

Publication: SADEHA · Issue: 25
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह २५ विदेह-सदेह २५, विदेह www.videha.co.in/ पेटार (अंक ३३३-३५०) सँ, मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. ३०००/- संस्‍करण: २०२२ Videha Sadeha 25: A Collection of Maithili Prose and Verse (source:Videha e-journal issues 333-350 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-३८०) गजेन्द्र ठाकुर- सझिया रोपनि (संपादक डा. प्रमोद कुमार)- ४३ टा बीहनि कथा लेखकक सझिया संग्रहक समीक्षा (पृ. २-८) डा. वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार- नबोनारायण मिश्र द्वारा- मैथिलीमे संप्रति जे लिखल जा रहल अछि ताहिसँ हम निराश नहि छी (पृ. ९-१९) डा.योगानन्द झा- प्रवासीक स्नेहसँ ओतप्रोत मातृभूमि (पृ. २०-२३) डा. किशन कारीगर- मिथिला मे बिलुप्त भेल जा रहल भांट/भैंट(घूमक्कर वाचक), लोक कलाकार ढोल पिपही वला के खोज खबैर के राखत?, पुरूस्कारी गुर्गा पुरूस्कार बँटा डकैत, महामारी सन डेराउन भेल जा रहलै? मिथिला स पलायन (परदेश कमाएब), मिथिला मैथिली के दुर्दशा लैए दोखी के सब हइ/अछि?, बोंगपाद बौआक बखारी, भगम भग्गी फैशन, मिथिला मैथिली आंदोलनक मिथक प्रयास आ समाधान?, मोछ वाली मौगी, मैथिलीमे रचना चोरीक विकट समस्या आ समाधान, मैथिली फ़िल्म उद्योग अखनी तक आ नबका प्रयोग, मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी, बीहनि कथा- बाबा भक्त कटाक्ष (पृ. २४-६१) संतोष कुमार राय 'बटोही'- बकरी संस्कृति (पृ. ६२-६५) मणिकांत ठाकुर- चिंता मामा (पृ. ६६-७१) शशिकांत कर्ण- बीहनि कथा-बड़का भक्त (पृ. ७२-७२) सुभद्रा मिश्र भाव्या- बीहनि कथा (हकार, प्रपंच) (पृ. ७३-७४) ज्ञानवर्द्धन कंठ- क्ष त्र ज्ञ, भाषाक झौहरि, केकर मौसा छियौ?, मैथिलीक पढ़ाइ, भोगी बनलाह बाघ, अभिनव दधीचि, जालंधर-यात्रा (पृ. ७५-८७) दीपिका झा- अपराधी तय अछि (पृ. ८८-८८) राजनन्दन लाल दासः परिचय- (पृ. ८९-९०) राजनन्दन लाल दास विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे- (पृ. ९१-९१) मुकेश दत्त- एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व: राजनन्दन लाल दास (पृ. ९२-१०३) दिलीप कुमार झा- मैथिली माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा होइ सएह छलनि स्व. राजनन्दन लालदासक अंतिम इच्छा (पृ. १०४-१०७) अजित कुमार झा- वन मैन आर्मी: श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास, मिथिला मैथिली आन्दोलनक पाथेय: श्रद्धेय रवीन्द्र जी (पृ. १०८-११८) अशोक- सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत (पृ. ११९-१२२) जगदीश चन्द्र ठाकुर’ ’अनिल’- साहित्यकार-सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास, भरि नगरीमे शोर, सभटा सोनारकें नहि गढ़बाक कला होइछ (गजलक समीक्षा : पोथी ‘लेखनी एक रंग अनेक’) (पृ. १२३-१३९) चन्दना दत्त- श्री राजनन्दन लाल दास : क्षीणकायामे असीम उर्जान्वित व्यक्तिव (पृ. १४०-१४६) अमोद झा- क्रान्तिकारी चेतना जगबैत मैथिली नाटक ’संतो’ (लेखक स्व. राजनन्दन लाल दास जी) (पृ. १४७-१५०) अखिलेश झा- मैथिली साहित्यक एकांत साधक राजनंदन लाल दास (पृ. १५१-१५३) चन्द्रेश- मैथिल शिरोमणि राजनन्दन लालदास (पृ. १५४-१६०) जितेन्द्र नाथ दत्त- संस्मरण- माछक रस (पृ. १६१-१६१) कंचन कण्ठ- आदरणीय श्री राजनंदन लाल दास (पृ. १६२-१६५) लक्ष्मण झा ’सागर’- मिथिलाक मुकुटमणि रवीन्द्र, राजनन्दन लालदास: एक उदारचेता सम्पादक (पृ. १६६-१७९) रमेश लाल दास- मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी (पृ. १८०-१८९) शारदानन्द दास परिमल- मैथिली पत्रकारिता मे राजनन्दनक अवदान (पृ. १९०-१९२) नबो नारायण मिश्र: युग प्रवर्त्तक राज नन्दन लाल दास (पृ. १९३-१९८) सुरेन्द्र ठाकुर- मैथिली सेवी कलमक सिपाही: श्रीमान राजनन्दन लाल दास (पृ. १९९-२०५) सुधीर- श्रीयुत् राजनन्दन लाल दास जी ओ मैथिल (पृ. २०६-२०६) कामेश्वर झा ’कमल’- कर्णामृत पत्रिका आ सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास (पृ. २०७-२१०) प्रदीप बिहारी- संस्मरण: राजनन्दन लाल दास::अपने घरमे परगोत्री (पृ. २११-२१९) अरविन्द ठाकुर- “चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म (पृ. २२०-२५०) विजय इस्सर "वत्स"- विभूति संग प्रतिभूति -स्व०राजनंन्दन लाल दास जी (पृ. २५१-२५३) शिव शंकर श्रीनिवास- राजनन्दन लालदासक नाटक (पृ. २५४-२५७) शैलेन्द्र मिश्र- राजनन्दन लाल दास: मिथिला-मैथिलीक एकटा निष्काम योगी आ योद्धा (पृ. २५८-२६१) मुन्ना जी- साहित्यिक जातिवादी सीमा तोड़लनि राजनन्दन जी, बीहनि कथाक विकास मे रचनाकारक योगदान (पृ. २६२-२६९) आशीष अनचिन्हार- जातिवादी राजनंदन लाल दास बनाम दूधसँ धोल आन लोक, गजलक रखबार सूतल अछि, भूमिका एक: फाँक अनेक (आलोचना), हे शिव “एकरा गजल कहितहुँ" होइछ लाज, अनुशासन+विद्रोह=परिवर्त्तन: अनुशासनहीनता+विद्रोह=अराजकता, साहित्य केंद्रित जोगीरा, राम लोचन ठाकुरजीक गद्य रचना, रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीक "कथित गजल" (पृ. २७०-३४९)- रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांकक संदर्भमे- (पृ. ३५०-३५३) श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर- (पृ. ३५४-३६३) प्रदीप पुष्प- गीतक अप्रतिम शिल्पकार: रवीन्द्र नाथ ठाकुर (पृ. ३६४-३६७) नारायणजी- आधुनिक मैथिली गीतक सजग उन्नायक (पृ. ३६८-३७२) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- रवीन्द्रनाथ ठाकुर, हुनक रचना आ जनमानस केर उदासीनता (पृ. ३७३-३८०) पद्य-खण्ड (पृ. ३८१-५१५) प्रदीप पुष्प- २ टा रुबाइ आ २ टा गजल (प्. ३८२-३८४) दिनकर कुमार- ३० टा कविता (पृ. ३८५-४२२) कुमुद "अनुन्जया"- सुक्खा सिम्मड़ कत्तै जोगलो जाय (पृ. ४२३-४२५) आशीष अनचिन्हार- भक्ति गजल, किछु गजल (पृ. ४२६-४३७) राज किशोर मिश्र- आमक गा छी, सुख, नव-संस्कृति ओ गा म, इजोरिआ (पृ. ४३८-४६४) संतोष कुमार राय 'बटोही'- मनुख बनवा मे पै लगैत छै, घरवाली, माए, पिता, भैय्यारी, झालदार चुनाव, राजगद्दी पर उल्लू, पहिल परेम, के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के? (पृ. ४६५-४७८) डाॅ. किशन कारीगर- हौ तोरे त गौंआ छियअह, प्रकृति के बसाबह, हो हो त हो हो, कतअ हेरा गेलै मनुक्खक जिनगी, मिथिला मैथिली के ठीकेदारी?, किछो ने करू, जेकरा देखू सैह नेता?, के दर्शक आ के सब कवि?, बहिन के अंगना भरदुतिया नत पूरब, आबू यौ देखू मिथिला के गाम, आ रे सुग्गा आ आ (बाल कविता) (पृ. ४७९-४९९) कल्पना झा- पान, इजोत, कोइली रे, दीप, नहि रहल लचारी (पृ. ५००-५०९) मुन्ना जी- कविता- दलाल, किछु ताँका (TANKA) (पृ. ५१०-५१३) आशीष नीरज- राजनंदन लाल दास (पृ. ५१४-५१५) सारस्वत- कविता सारस्वतक [१ आ २ (२५ टा); ३.“निमोछिया अबीर "(पिरोजगढ़ युवा समिति दिस सँ देश आ विदेश मे बसल सब व्यक्तिकेँ सारस्वतक अशेष २०१५ होलीक हादिॅक शुभकामना संग)] (पृ. ५१६-५२६) 2

गद्य खण्ड गजेन्द्र ठाकुर सझिया रोपनि (संपादक डा. प्रमोद कुमार)- ४३ टा बीहनि कथा लेखकक सझिया संग्रहक समीक्षा १ सझिया-साझ बीहनि कथा संग्रह माने ४३ टा बीहनि कथा लेखक माने १.घनश्याम घनेरो, २.मुन्नाजी, ३.नारायणजी, ४.प्रमोद कुमार झा 'गोकुल ', ५.डा. प्रमोद कुमार, ६.मुन्नी कामत, ७.अमरेश कुमार लाभ, ८.विद्या चन्द्र झा 'बमबम', ९.सत्येन्द्र कर्ण, १०.विन्देश्वर ठाकुर, ११.आभा झा, १२.शिव कुमार, १३.प्रियंवदा, १४.महाकान्त प्रसाद, १५.प्रभाष अकिंचन, १६.आशीष अनचिन्हार, १७.पूनम झा, १८.शुभ्रा संतोष, १९.जवाहर लाल कश्यप, २०.सुभाष कुमार कामत, २१.नीरज कर्ण, २२.कुमारी आरती, २३.कल्पना झा-१ (बोकारो), २४.कल्पना झा-२ (पटना), २५.सबिता झा 'सोनी', २६.विनीता ठाकुर, २७.मृणाल आशुतोष, २८.अमर ठाकुर, २९.मनीषा झा, ३०.रूबी झा, ३१.ओम प्रकाश झा, ३२.हिमाद्रि मिश्र 'हिम', ३३.इरा मल्लिक, ३४.कंचन कंठ, ३५.राजेश वर्मा 'भवादित्य', ३६.मिसिदा, ३७.जयन्ती कुमारी, ३८.कल्पना कुमारी, ३९.सांत्वना मिश्रा, ४०.नन्दनी झा, ४१.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश', ४२.अमर कान्त लाल आ ४३.दीपा मिश्रा। २३ गोट पुरुष आ २० गोट महिल बीहनि कथाक अछि ई संग्रह। संग्रहक पुरुष बीहनि कथाकार १.घनश्याम घनेरो, २.मुन्नाजी, ३.नारायणजी, ४.प्रमोद कुमार झा 'गोकुल ', ५.डा. प्रमोद कुमार, ६.अमरेश कुमार लाभ, ७.विद्या चन्द्र झा 'बमबम', ८.सत्येन्द्र कर्ण, ९.विन्देश्वर ठाकुर, १०.शिव कुमार, ११.महाकान्त प्रसाद, १२.प्रभाष अकिंचन, १३.आशीष अनचिन्हार, १४.जवाहर लाल कश्यप, १५.सुभाष कुमार कामत, १६.नीरज कर्ण, १७.मृणाल आशुतोष, १८.अमर ठाकुर, १९.ओम प्रकाश झा, २०.राजेश वर्मा 'भवादित्य', २१.मिसिदा, २२.भुवनेश्वर चौरसिया 'भुनेश', २३.अमर कान्त लाल। संग्रहक महिला बीहनि कथाकार १. मुन्नी कामत, २.आभा झा, ३.प्रियंवदा, ४.पूनम झा, ५.शुभ्रा संतोष, ६.कुमारी आरती, ७.कल्पना झा-१ (बोकारो), ८.कल्पना झा-२ (पटना), ९.सबिता झा 'सोनी', १०.विनीता ठाकुर, ११.मनीषा झा, १२.रूबी झा, १३.हिमाद्रि मिश्र 'हिम', १४.इरा मल्लिक, १५.कंचन कंठ, १६.जयन्ती कुमारी, १७.कल्पना कुमारी, १८.सांत्वना मिश्रा, १९.नन्दनी झा, आ २०.दीपा मिश्रा। महिला बीहनि कथा लेखकक ई संख्या आह्लादकारी अछि। आ तइ लेल सम्पादकक अपक्ष दृष्टिकोण प्रशंसनीय अछि। सम्पादकक अपक्ष रहब अखनो मैथिलीमे एकटा गुण सन अछि, से कष्टकारी धरि अवश्य अछि। २ ४३ गोट लेखकक ८६ टा बीहनि कथाक सझिया-साझ रोपनि भेल अछि। घनश्याम घनेरोक “अछोप” मैथिलीकेँ सोंगर दऽ ठाढ़ रखबाक सम्पादकीय प्रयास दिस लक्षित हुअए बा नै मुदा कटाह अछि तँ मुन्नाजीक “फोकस!” खट-मिठाह। नारायणजीक “कुशल” राजमोहन झा केर बीहनि कथा “चलह”(देखू विदेहक ६७म बीहनि कथा विशेषांक https://videha123.files.wordpress.com/2010/10/videha_01_10_2010.pdf) सन मानव प्रकृतिकेँ देखबैत अछि आ एक्के प्लॉटपर अछि। से बीहनि कथामे सेहो प्लॉट होइत अछि आ एक्के प्लॉटपर दू तरहक बीहनि कथा लीखल जा सकैए से सिद्ध भेल। प्रमोद कुमार झा “गोकुल”क बीहनि कथा अलंकृत आ क्लासिकल दृश्यक निर्माण करैत अछि, से बीहनि कथामे तकर पलखति नै, से कहैबला गलत सिद्ध भेला। मैथिलीकेँ सोंगर दऽ ठाढ़ रखबाक सम्पादकीय प्रयासक सम्पादक डॉ प्रमोद कुमारक ५ टा बीहनि कथा ऐ संग्रहमे अछि। आ से बच्चा उचिते कहै छन्हि जे मायकेँ बिरयानी नै बनबऽ अएलै तँ ओ पिछड़ल भेल तँ ओहो गूगल, क्लासरूम आ पी.पी.टी आ किदनि सभ नै बुझने कोरोना-पश्चात कालमे पिछड़ल भेलाह। मुन्नी कामतक फेमिनिज्म “गर्ल्स हॉस्टल”क “फेरसँ देहकेँ स्वतंत्र करबाक प्रयास” सँ परिलक्षित होइत अछि। से बीहनि कथा फेमिनिज्म लेखन लेल सेहो औजार बनबाक योग्यता रखैत अछि। अमरेश कुमार लाभक “करिकी”मे ई मत आर पुष्ट भेल अछि- “पढ़ि लिखि ने लैक आ कोइ बड़का नोकरी लागि ने जाइक!”, आ से कारीसँ गोर हेबाक नव मलहम छी, आ तखन बऽर हेरैमे कोनो मौगति नै हएत। विद्या चन्द्र झा “बमबम” प्रेम-पिशाचसँ अपने ग्रसित छथि “माफ कऽ सकी तँ”मे; आ कक्काकेँ ऐमे ओ सान्हैत छथि “प्रभा”मे आ ऐ पिशाचेकेँ सत्येन्द्र कर्ण बाबाजीक “दिमाग फूजब” कहैत छथि….. अन्तिम सत्य। विन्देश्वर ठाकुर धरि पुरातन लोक छथि हुनका ने बेटाक बदमाशी “सोकाज”मे पसिन्न छन्हि आ ने पुतोहुक बदमाशी “बहसल कनिया” मे। आभा झा केर “लाज” पुरुखक नैतिकताक परिभाषापर चोट अछि। शिव कुमार सेहो “फर्मलिटी”मे परिवारमे नव अर्थव्यस्थाक वातावरणमे होइत झमेलकेँ चिन्हित करैत छथि। प्रियम्वदा “स्वाभिमान”मे- “बेटी केर विवाहक मूल्य”क विरोधमे छथि। महाकान्त प्रसाद “गोली”मे प्रधानमंत्रीक “मोनक बात”क गोलीसँ तुलना करैत छथि, हँ प्रधानमंत्री शब्दक ओ प्रयोग नै केने छथि। प्रभाष अकिंचन विवाहसँ ठामे पूर्व मोन पड़ैत उपनयन संस्कारक सम्बन्धमे “कपरछिल्ला” लिखैत छथि। आशीष अनचिन्हारक “स्थिति” विवाह-पूर्व आ विवाह पश्चात स्त्रीक अवस्थापर अछि तँ पूनम झा “उपदेश”क मादेँ फरिछा दै छथि जे कोना लोकक उपदेश आ करनी मे अन्तर होइ छै। शुभ्रा संतोष “मोल भाव” मे पुरुखक वीभत्स रूप देखबै छथि आ संगे नारीक भितरका शक्ति सेहो। जवाहर लाल कश्यप “कुक्कुर”मे मालिक आ कुक्कुरक मनोविज्ञानमे जाइत छथि आ “हीरो”मे सेक्सपियर सन “गुलाब गुलाबे सन सुगंधित रहत भने ओकर नाम किछु आर भऽ जाय” नाम-चलीसापर लिखै छथि। सुभाष कुमार कामत “कोड वर्ड”क माध्यमसँ देखबै छथि जे बेटीक जन्मक समाचार लोककेँ प्रसन्न करैत छै मुदा समाजक घटनाक डरे ओ ओकरा जन्म नै देमऽ चाहैए। मुन्ना प्रसन्न भेलाह मुदा सुधा टेलीविजन समाचार देखि चिन्तित भऽ गेली। नीरज कर्ण “फादर्स डे” केर माध्यमसँ कुटिलतापर प्रहार करै छथि। कुमारी आरतीक “जीवनसंगी” मुदा स्त्री-पुरुखक पत्नी-पति रूपमे सहमेलू हेबाक सेहो आस बनेने रखैत अछि। कल्पना झा-१ (बोकारो)क “संताप” गंगाक प्रदूषणपर टिप्पणी अछि तँ “सप्पत” बेटा आ साँय केर खाइत देखि बेटीक आक्रोशकेँ गहिंकी नजरिसँ देखबैत अछि। कल्पना झा-२ (पटना) “फेसबुकिया जिनगी” मे वृद्धावस्थाक समस्याक संग फेसबुक पोस्टपर संगे टिप्पणी कऽ जाइत छथि, से बीहनि कथामे छोट आकारक बादो दूटा प्लॉट संगे समाहित भऽ सकैए सेहो सिद्ध करै छथि। सबिता झा “सोनी”क स्त्री-विमर्श “नौत”मे देखार होइत अछि, भूख पुरुखकेँ पहिने लगैत छै की? विनीता ठाकुरक “समय केर मारल” ’समयक फेर’ भूखक माध्यसँ बतेबाक प्रयास थिक। मृणाल आशुतोषक “न्यूटन के थर्ड लॉ” लीव-इन रिलेशनमे रहनिहारि स्त्रीक दशा देखबैत अछि मुदा समापन विवशतासँ नै मुदा क्रिया-प्रतिक्रिया (“न्यूटन के थर्ड लॉ”)क माध्यसँ करैत अछि ओना क्रिया-प्रतिक्रिया शब्दक प्रयोग ओ नै करैत छथि कारण मिथिलामे एतेक साक्षरता तँ आबिये गेल छै जे “न्यूटन के थर्ड लॉ” कहने लोक ओकर अर्थ “क्रिया-प्रतिक्रिया” बुझि जेतै। अमर ठाकुर “नाम उच्च कान बुच्च” मे “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर” केर अर्थ फरिछबैत छथि। मनीषा झा “निपुत्र” केर माध्यमसँ एक्के गोटेक ’अपना का” आ ’अनका काल’ दुनू काल दू तरहक व्यक्तित्व होएब देखबैत छथि। रुबी झा “आस”मे माय आ बच्चाक दू परिस्थितिमे हठ आ “टुगर” मे मनुक्ख आ पशु दुनू क एक्के सन कष्ट अनुभव करबाक विवेचना केने छथि। ओम प्रकाश झा केर “पुरना दलान”- “नव घर उठे, पुरान घर खसे” केर विपरीत पुरना दलानक खसबाक कथा नै वरन चिड़ैक जोड़क आश्रय-स्थानक कथा अछि। बीहनि कथाक ई समीचीन अन्त अछि, हुनकर “स्पेशल परमिट” जे विदेह मैथिली विहनि कथा [विदेह सदेह ५] मे संकलित भेल छल सेहो अही तरहक कबीर-उलटबासी सन अछि। बीहनि कथाक अन्त अही तरहक हेबाक चाही, से गप हम बीहनि कथाक समीक्षाशास्त्र [विदेह सदेह ५] मे लिखने छी। हिमाद्रि मिश्र “हिम” केर “अधिकार” मे सासु-पुतोहुक उतराचौड़ी वर्णित अछि। इरा मल्लिक “पीड़ न जाने कोय” मे दुख बिसरबाक लेल राति भरि जाँत पिसबाक उदाहरण दऽ बीहनि कथामे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करबाक क्षमताकेँ देखबैत छथि, राति काटब मोश्किल होइ छै, दिन तँ कटि जाइ छै। कंचन कण्ठ बराबरीमे बीहनि कथाक अन्त हास्यसँ करैत छथि। राजेश वर्मा “भवादित्य” वर्तमानक भूत बनब आ फेर दुनूमे विवाद हएब केर माध्यम सँ किछु आर कहि जाइ छथि। मनुक्ख रोल बदललापर अपन विचारो अहिना तँ बदलैत अछि। मिसिदा अपन बीहनि कथा “सपना” सेहो ऐ गपकेँ साहित्य, रचना आ राजनीति केर तीन संकल्पनाक माध्यमसँ पाँच पाँतिमे फरिछा दइ छथि।जयन्ती कुमारीक बोल्ड बीहनि कथा अछि “खौंझी”, तामसमे किचेनमे बर्तन पटकबसँ शुरू भेल ई बीहनि कथा घरेलू सहायिका सोनी केर स्त्री विमर्शसँ शुरू भेल मुदा मलकिनी रेखा सेहो ओइ विमर्शक हीस छथि ओतऽ जा कऽ खतम, आ ई करबाक सामर्थ्य, जकरा एपेक्स-समापन कहि सकै छिऐ, लेखिकामे छन्हि। कल्पना कुमारीक “झमारल मोन” हिस्सा-बखड़ापर केन्द्रित अछि। सांत्वना मिश्रे धरि “भगवती जनम लेली” मे स्त्रीक समस्या लेल स्त्रीये दोखी बा स्त्रीयो दोखी बजैत सुनाइत छथि। नन्दिनी झा मुदा “भदबा” मे एकरा उनटि दैत छथि आ सासुक प्रगतिशील हेबाक प्रमाण प्रस्तुत करैत छथि। भुवनेश्वर चौरसिया “भुनेश” अपन “सहमत” मे बकथोथीकेँ प्रयुक्त करैत हास्य उत्पन्न करैत छथि आ सएह अमर कान्त लाल अपन “एम आर पी” मे करैत छथि। दीपा मिश्राकेँ बुझल छन्हि जे “चलाक” बेशी स्त्री होइत अछि मुदा कहै छथि “पुरुखे होइत हेतै” आ से कहि ढेर रास काज पुरुखसँ करबा लैत छथि। ३ सझिया रोपनि (सझिया बीहनि कथा-संग्रह) केर सम्पादक डॉ. प्रमोद कुमार ऐ संग्रहक भूमिकामे बीहनि कथाक गुणक विषयमे लिखैत छथि जे “एकरा मे एगो पैघ कथाक सब गुण होइछ। जेना कथोपकथन, वातावरण, शिल्प, तथ्यक गांभीर्य, उद्देश्य आ प्रासंगिकता आदि।” हुनकर बीहनि कथाक नपना अछि कठोर रूपसँ १०० शब्द जे पढ़ल जा सकय २ मिनटमे- एनामे २ मिनट नूडल्सक विज्ञापन मोन पड़नाइ स्वाभाविक। हुनकर सम्पादकीय सामर्थ्य अछि जे किछु हास्य तँ किछु गम्भीर, किछु स्त्री-विमर्श तँ किछु कोरोना आ फेसबुक सन्दर्भित सभ तरहक बीहनि-कथा ओ ऐ संग्रहमे देलनि। से हास्य कणिका सेहो संदर्भयुक्त रहलापर बीहनि कथाक रूपमे चिन्हित आ संकलित भऽ सकैत अछि (देखू बीहनि कथाक समीक्षाशास्त्र- विदेह सदेह ५) ओ से सिद्ध केलनि। अष्टाध्यायीक भाष्य ओकर आकारक कएक गुणा बेशी आकारमे कएल जेबाक खगता ओकर रचनाक मोटामोटी ५ सय बर्खक बादे अनुभूत भेल आ से भेबो कएल। तहिना ऐ संग्रहक बीहनि कथा सभक समीक्षा संग्रहक हीसक रूपमे नै वरन् स्वतंत्र रूपेँ सेहो जँ कएल जाय तँ ओ सभ अपन आकारसँ कएक गुणा बेशी स्थान छेकत। आ से ऐ संग्रहक संकलित बीहनि कथा सभक विशेषता अछि आ त्इ लेल संकलनकर्ता-सम्पादक धन्यवादक पात्र छथि। डा. वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार- नबोनारायण मिश्र द्वारा- मैथिलीमे संप्रति जे लिखल जा रहल अछि ताहिसँ हम निराश नहि छी डा.वीरेन्द्र मल्लिक नबोनारायण मिश्र एहि साक्षत्कारक इतिहास: २०१६ मे विदेह "वीरेन्द्र मल्लिक विशेषांक" प्रकाशित करबाक घोषणा केने रहए। मुदा अपेक्षित सहयोग नै भेटबाक कारणे ई प्रकाशित नै भऽ सकल। एहि विशेषांक लेल वीरेन्द्र मल्लिक जीक साक्षात्कार नबोनारायण मिश्रजी द्वारा लेल गेल छल। आब ओ साक्षात्कार विदेहमे दऽ रहल छी। ३ जनवरीकेँ मल्लिकजीक जन्मदिन छनि आ पाठक लेल ई दूनू अवसर अछि। पहिल मल्लिकजीक विचार जनबाक आ दोसर हुनक जन्मदिनपर हुनका मोन पाड़बाक। उम्मेद अछि जे पाठककेँ एहि साक्षात्कारसँ नव विचार प्राप्त हेतनि। एहि विशेषांक लेल विदेह द्वारा कुल १६ टा प्रश्न देल गेल छल जे कि एना अछि- 1) आग्नेय कविताक आधार की? वर्तमान आग्नेय कविता कोन दिशामे अछि? 2) ओना पुरस्कार तँ प्रोत्साहन लेल होइत छै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति रुकि जाइत छै। एना किएक? 3) वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक की हाल छै? 4) चेतना समीतिमे एखनो दलित वर्गक प्रवेश निषेध छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? 5) दरभंगे पीठ जकाँ आब सहरसा पीठ बनि रहल छै। ई मैथिलीक लेल नीक की खराप? 6) बहुत दिन धरि मैथिलीमे दलित लेखक केर प्रवेश नै छल। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? एखनुक केहन अवस्था छै? 7) अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्व प्रेरक आ कोन तत्व बाधक रहल? 8) वर्तमान साहित्यकारक मूल्याकंन अहाँ कोना करबै? 9) अहाँक प्रिय साहित्यकारकेँ छथि? 10) साहित्यकारक लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचार एक हेबाक चाही की अलग-अलग? जँ एक हेबाक चाही तँ "वैद्यनाथनाथ मिश्र यात्री"जीक वैचारिक विचलनकेँ अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ। आ जँ अलग-अलग हेबाक चाही तँ ओहन साहित्य ओ साहित्यकारक मूल्य की? 11) मैथिल साहित्यकार बहु विधावादी होइत छथि। मुदा जँ अहाँ एकै विधामे रहितहुँ तँ ओ कोन विधा होइतै ? 12) मैथिलीकेँ तोड़बामे दरभंगा मठाधीश सभहँक कतेक योगदान छै? 13) कलकत्ताक साहित्यकारक गुटबाजी मैथिलीक कतेक अहित केलकै? 14) कलकत्ताक युवासँ की आशा। ओहिमेसँ के आगू जा सकै छथि। 15) अहाँ अपन साहित्यक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रूपें देखै छिऐ? 16) पारिवारिक परिचय जनबाक इच्छा अछि। मुदा उपरमे देल गेल प्रश्न सभ संशोधित भेल (विदेह दिससँ नै) प्रश्न संख्या 1,2,3 आ 5 ओहिना रहल। प्रश्न संख्या 4 आ 6 मिला कऽ एकटा प्रश्न बनल। प्रश्न संख्या 7,8,9,10 आ 11 ओहिना रहल। प्रश्न संख्या 12 आ 13 केर कोनो उत्तर नै भेटल। प्रश्न संख्या 14,15 आ 16 ओहिना रहल। अंतमे नबोनारायण मिश्रजी प्रसंगानुकूल अपना दिससँ 2 टा प्रश्न जोड़लाह। मने फाइनल स्वरूपमे कुल 15 टा प्रश्न भेल जकर उत्तर संग देल जा रहल अछि (संपादक)- 1) आग्नेय कविताक आधार की? वर्तमान आग्नेय कविता कोन दिशामे अछि? मैथिली कवितामे जनवादी वा प्रगतिशील कविताक जन्मदाता "यात्री"सँ जे कविता प्रारंभ भेल छल से निरंतर प्रवाहित होइत मैथिली जनमानसकेँ आलोरित-विलोरित करैत रहल। हुनकर विचारधाराकेँ संवहन करैत जे मैथिलीक काव्यधारा आगाँ बढ़ल छल ओहिमे सोमदेवक सहजतावाद आबि समाहित भेल छलैक आ बादमे अग्निजीवी काव्यधारा सेहो आबि अंतर्भुक्त भेल छलैक। वस्तुतः विचार-वैभव पूर्वहि के छलैक मुदा ओकरा कहबाक ढंग सर्वथा नवीन आ एकर विषय वस्तु जीवन यथार्थसँ संबंद्ध छलैक। ओकरामे एक नव त्वरा छलैक। अग्निक ताप छलैक तँइ लोक (विशेषतः सोमदेव) एहि कविताकेँ अग्निजीवी कविता नाम प्रदान केलक। वर्तमान कविता युगसापेक्ष थिक। ओकरामे अनेकशः परिवर्तन, संवर्धन एलैक अछि। ओकरामे ग्लोबलाइनेशनक गर्मी, नेट, बैट, सैट,चैट सभ आबि आइ समाहित भऽ गेल छैक। "वसुधैव कुटुम्बकम्" केर विराट वैचारिक फलक ओकरामे आबि गेल छैक। 2) ओना पुरस्कार तँ प्रोत्साहन लेल होइत छै मुदा मैथिलीमे पुरस्कार भेटिते साहित्यकारक गति रुकि जाइत छै। एना किएक? कोनो भाषामे पुरस्कार वा सम्मान जे साहित्यकार, कलाकार लोकनिकेँ प्रदान कएल जाइत छै तकरा पाछाँ प्रोत्साहन केर भावना निहित रहैत छैक। पुरस्कार पाबि साहित्यकार गौरवान्वित-आह्लादित होइत छथि और हुनकामे लिखबाक आर बेसी क्षमता आबि जाइत छनि। मैथिली पुरस्कारक जे अवस्था अछि से सर्वविदित अछि। पुरस्कार वितरणमे भ्रष्टाचार एना ने प्रवेश कऽ गेल अछि जे ओकर वर्णन नहि कएल जाए। जिनका लोकनिकेँ पुरस्कार प्राप्त भऽ जाइत छनि ओ पुरस्कारकेँ गंगाजल मानि उदरस्थ कऽ लैत छथि आ सुखक चिरनिद्रामे सूति रहैत छथि। 3) वर्तमान समयमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक की हाल छै? वर्तमानमे मैथिली पत्र-पत्रिकाक दशा अछि तकरा उछतगर नहि कहल जा सकैछ। अधुना कलकत्तासँ प्रकाशित "कर्णामृत" ओ "मिथिला दर्शन" सएह निरंतर समयपर निकलि जाइत अछि। पटनासँ "घर-बाहर" जे निरंतर प्राप्त होइत छल तकरो दशा ठीक नहि बुझना जाइछ। "पूर्वोत्तर मैथिल" कहियो-कहियो कऽ उदित भऽ जाइत अछि। दिल्लीसँ "मैथिली लोकमंच" सेहो प्रकाशित भऽ रहल अछि। ओना संपूर्ण भारतवर्षमे यत्र-तत्रसँ स्मारिकाक बाढ़ि आबि गेल अछि। कोलकातासँ प्रकाशित "कोकिल मंच" प्रति वर्ष प्राप्त भऽ जाइत अछि। धन्य थिक मैथिलीक पत्र-पत्रिका जे मैथिलीकेँ जिया कऽ रखने अछि और साहित्यकार ओ बुद्धिजीवी लोकनिक मानसिक दिशाकेँ तृप्त करैत रहैत अछि। 4) चेतना समीति एवं अन्यान्य मैथिली संगठनमे एखनो दलित वर्गक प्रवेश नगण्य छै। एकरा अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ? चेतने समीति किएक, मिथिलामे जे जतेक जे कतहुँ मैथिली संस्था अछि ओहिमे ब्राह्मणवादक वर्चस्व थिकैक। ब्राह्मण आ कर्ण-कायस्थ जे अदौकालसँ मैथिली बजैत रहलाह अछि ओकरे आइयो मानक मैथिली मानल जाइत अछि। हमरा जनैत एकरा पाछू शिक्षाक प्रमुख हाथ रहलैक अछि। संपूर्ण भारत वर्षमे वैदिक युग किंवा सनातन युगमे जे चारि वर्गमे समाज विभाजित छलैक (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आ शूद्र) ओकरा पाछा गुण आ कर्म छलैक जाहि आधारपर ई विभाजन भेल छलैक। चातुरवर्ण मया श्रष्टा गुण कर्म विभागशः (गीता) चारि युगमे गुण आ कर्मकेँ आधारपर लोक विभाजित छलाह। एकहि परिवारमे एक भाइ ब्राह्मण छलाह जे विद्याक दान वा विद्याध्य्यन करैत छलाह, दोसर भाइ कर्मक आधारपर क्षत्रिय, तेसर वैश्य आ चारिम शूद्र। ईसासँ पूर्वहि ३५०० वर्ष एहि देशमे उत्तर-पश्चिम दिशासँ जे भारतमे विदेशी आक्रमण भेल छल, वएह एतए आबि कऽ हमरा लोकनिक गुण आर कर्म आधारित जे वर्ग-विभाजन छल ओकरा नष्ट-भ्रष्ट कऽ जातिवादकेँ जन्म देलक। वएह जातिवाद आइ वर्तमानमे राजनीतिक प्रधान पोषक तत्व बनि गेल छै। पूर्वमे जे अध्य्यन-अध्यापन करैत छलाह, राजाक ओहि ठाम हुनके सम्मान होइत छलैक। व्यापारी वर्ग सेहो राजेक साथ हाथ मिला कऽ हुनके गुणगानमे लागि जाइत छल। शूद्र वर्ग नितांत एकांकी रहि जाइत छलैक। ताहि समयमे जे समाज संचालकन हेतु नियम कानून बनाओल जाइत छल तकरा पाछाँ एही तीनूकहि हाथ रहैत छलैक। हमरा जनैत एहि सभकेँ पाछाँ शिक्षे छलैक। शिक्षाक अभावक कारण शूद्र आ नारी वर्ग सभसँ पाछाँ रहि गेल। एकैसम शताब्दीमे जे हरिजनकेँ विशेष अधिकार प्रदान कएल गेलैक अछि ताहिमे शिक्षापर विशेष जोर देल गेल छै। आइयो कोनो संस्थामे जे सभ छथि ओ ब्राह्मण, कायस्थ, राजपूत, भूमिहार आदि-आदि वर्गसँ छथि। निम्न वर्गसँ बहुत कम लोक एहि दिशामे एबाक प्रयास करैत छथि। 5) दरभंगे पीठ जकाँ आब सहरसा पीठ बनि रहल छै। ई मैथिलीक लेल नीक की खराप? हमरा जनैत दरभंगे किएक पटनामे सेहो मैथिलीक पीठ रहल अछि। कलकत्तामे सेहो रहल अछि जाहिठाम किछु प्रखर विद्वान लोकनिक, बुद्धिमान लोकनिक बैसार होइत रहल अछि। लोक अपना सुविधाक अनुसार कर्म आ बुद्धिक बलपर सरकारी सहाय्य प्राप्त करैत रहल अछि। जे अधिक चतुर से अधिक लाभान्वित। मैथिलीमे दरभंगा पीठकेँ लऽ कऽ जे विभिन्न पत्र-पत्रिकामे नवतुरिया वर्ग द्वारा जे विद्रोहक स्वर मुखरित कएल जाइत रहल अछि तकरा विस्मृत नहि कएल जा सकैत अछि। तँइ आइ जँ सहरसामे कोनो पीठक स्थापना भऽ रहल अछि तँ एहिमे कोनो आश्चर्यक बात नहि अछि। 6) अहाँक साहित्यिक यात्रामे कोन तत्व प्रेरक आ कोन तत्व बाधक रहल? हम प्रारंभमे हिन्दीमे लिखैत छलहुँ। हमरा पाछाँ कलकत्ताक महान मैथिली सपूत स्व. पीताम्बर पाठक ओ मैथिली पत्रकारिताक दधीचि राजनंदन लाल दास हाथ जोड़ि विनम्र भावे मैथिलीमे लिखबाक हेतु परि गेलाह। पीताम्बर बाबू कहलनि जे अहाँ मैथिलीयेमे सपनो देखू, मैथिलीयेमे सोचू आ मैथिलीयेमे लीखू से हमरा लोकनिक आकांक्षा अछि। ताही दिनसँ मैथिलीमे लेखन प्रारंभ कएल। १९५७-५८ के जे छात्र जीवनक अवधि छल ताही समयमे "मिथिला सांस्कृतिक परिषद्" कलकत्तासँ संबंधित, संपर्कित भेलहुँ। पश्चात ओकर महामंत्री बनाओल गेलहुँ। ताही दिनसँ परम श्रद्धेय बाबू साहेब चौधरीक संपादनमे "मैथिली दर्शन"मे रचना लेखन प्रारंभ कएल। अध्य्यन-मनन और संघर्षक पश्चात विचारमे परिवर्तन आएल आ हम मार्क्सवादी दर्शनसँ प्रभावित भेलहुँ। बादमे माओत्सोतुंग सेहो प्रभावित केलनि। हुनकर कहब छलनि "power comes out of the barrel of a gun" हमरा विशेष प्रेरित केने छल। बादमे "आमार बाड़ी, तोमार बाड़ी, नक्सलबाड़ी" केर नारा गुंजायमान भेल और हमरा चमत्कृत केने छल। मैथिली लेखनमे बाधक तत्व हमरा लेल केओ नहि छल। किछु कालक लेल लेखनमे शिथिलता अवश्य आएल छल तकरा पाछाँ हमर अपन आर्थिक सीमा छल और कोनो व्यक्ति विशेष नहि। 7) वर्तमान साहित्यकारक मूल्याकंन अहाँ कोना करबै? हम जीवन के प्रारंभहिसँ आशावादी रहलहुँ अछि। वर्तमान मैथिली साहित्य विधामे निरंतर अग्रसर भऽ रहल अछि। एकसँ एक रचनाकार माँ मैथिलीक भंडारकेँ अपन लेखन उर्जा ओ शक्तिसँ संपूरित कऽ रहलाह अछि। समयक अनुसार ओ लोकनि आगाँ बढ़ि रहलाह अछि, तखन लेखन जे संप्रतिमे भऽ रहल अछि ताहिमे अध्य्यनक पूर्ण अभाव परिलक्षित होइछ। अधिकांश रचनाकार व्यक्तिकेंद्रित भऽ गेल छथि। हुनका वामा-दहिना देखबाक पलखति नै छनि। ग्लोबलाइजेशनक जे भावना आइ संपूर्ण विश्व साहित्यमे व्याप्त अछि तकर हिनका लोकनिमे अभाव परिलक्षित होइछ। ओना संप्रति जे लिखल जा रहल अछि ताहिसँ हम निराश नै छी। 8) अहाँक प्रिय साहित्यकारकेँ छथि? मैथिलीमे हमर प्रिय साहित्यकार छथि "वैद्यनाथ मिश्र यात्री"| 9) साहित्यकारक लेखकीय विचार आ वास्तविक जीवनक विचार एक हेबाक चाही की अलग-अलग? जँ एक हेबाक चाही तँ "वैद्यनाथ मिश्र यात्री"जीक वैचारिक विचलनकेँ अहाँ कोन रूपमे देखै छिऐ। आ जँ अलग-अलग हेबाक चाही तँ ओहन साहित्य ओ साहित्यकारक मूल्य की? संसारक प्रायः सभ साहित्यमे मुख्य रूपसँ दू धाराक रचनाकार देखना जाइत छथि। रचनाकार लेल ओकर एक वैचारिक आधारकेँ हएब अनिवार्य मानल जाइछ। जकरामे कोनो विचार नै, ओकर कोनो महत्व नहि। मैथिलीये साहित्यमे नहि भारतक विभिन्न भाषाक साहित्यमे सेहो विभिन्न विचारक पोषक रचनाकार परिलक्षित होइछ। हम जे बाजब सएह करब, सएह जीएब एहि अवधारणाक पोषक साहित्यकारक संख्या मैथिली अत्यंत अल्प अछि। आइ वैज्ञानिक युगमे एकसँ एक विचारधाराक जन्म-मरण-पुनर्जन्म भऽ रहलैक अछि। युग बहुत तीव्र गतिएँ आगाँ बढ़ि रहल छैक। ओ मंगलग्रहपर पहुँचबाक प्रयासमे लागल छैक। एहना स्थितिमे एक सीमामे बद्ध भऽ रचना करब आइ संभव नहि बुझना जाइछ। युगानुसारे डेग बढ़बैत जँ रचनाकार अपन वैचारिकताक संग लीखि रहलाह अछि तँ ओ प्रसंशाक पात्र थिकाह। नवतुरियाक कहब थिकैक जे हमरा लोकनिकेँ कठमुल्ला नहि हेबाक चाही। हमरा सभकेँ गत्यात्मक हेबाक चाही। एहि परिप्रेक्ष्यमे यात्रीजीक जे वैचारिक विचलन के जे प्रश्न उठाओल गेल तकर उत्तरमे स्वयं यात्रीजी वएह बात कहलखिन जे हम एखन कहि रहल छी। 10) मैथिल साहित्यकार बहु विधावादी होइत छथि। मुदा जँ अहाँ एकै विधामे रहितहुँ तँ ओ कोन विधा होइतै ? "कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभू:" जे कहल गेल अछि से कोनो अनुचित नहि। मैथिल तँ सभ जन्मना प्रायः कविये होइत छथि, तखन प्रत्येक रचनाकारक कोनो अपन प्रिय विधा होइत छैक जाहिमे ओ लिखबामे आनंदक अनुभूति करैछ। हमरा विचारे जकर जे प्रिय विधा होइक ताहिमे जँ ओ अपन संपूर्ण शक्ति आ उर्जाकेँ लगा दै तँ मैथिलीक ओहि विधा विशेषमे चमत्कार उत्पन्न भऽ सकैत अछि। तँइ तँ कहल गेल अछि "एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न चा तारा सहस्रशः"। (एहि प्रश्नक पहिले भागक उत्तर देल गेल अछि से बुझाइए-संपादक) 11) कलकत्ताक युवासँ की आशा। ओहिमेसँ के आगू जा सकै छथि। हम जीवनकेँ प्रारंभहिसँ नवतुरिया वर्गक समर्थक रहलहुँ अछि। ओकरा हम अंतःकरणसँ प्रोत्साहित आ संवर्धित करैत रहलियैक अछि। युवा वर्गमे सीमाहीन शक्ति रहैत छैक। वएह कोनो देश,जाति, किंवा समाज केर कर्णधार होइत अछि तँइ अंग्रेजीक लेखक newman कहने छथि "It is an established truism that youngmen of today are the countrymen of tomorrow, holding in their hands the high destinies of the land, they are the seeds that spring And bear fruit." कहबाक तात्पर्य जे कलकत्ताक नवतुरिया वर्गमे जे उभरि कऽ एलाह अछि ताहिमे मिथिलेश कुमार झा, चंदन कुमार झा, अनमोल झा, आमोद कुमार झा, अमरनाथ झा 'भारती', भास्करानंद झा 'भास्कर" आदि विशेष प्रभावित कऽ रहलाह अछि। 12) अहाँ अपन साहित्यक यात्राक पड़ाव कतऽ आ कोन रूपें देखै छिऐ? ऐतरेय ब्राह्मण केर कथन छैक- चरैवेति-चरैवेति-चरैवेति मने चलैत रहू-चलैत रहू-चलैत रहू। हम एही सिद्धांतमे विश्वास करैत छी। प्रायः 1960 सँ लऽ कऽ आइ धरि हमर लेखनमे कहियो गतिरोध नहि आएल अछि। हम निरंतर लिखैत रहलहुँ अछि। हम माँ मैथिलीक सेवामे अपनाकेँ समर्पित केने रहलहुँ अछि। हम अंतिम श्वास धरि लिखैत रहब से हमरा विश्वास अछि। 13) पारिवारिक परिचय जनबाक इच्छा अछि। नाम- वीरेन्द्र मल्लिक जन्म-परसौनी (मधुबनी) जन्मतिथि-3 जनवरी 1937 शिक्षा- एम.ए, पी.एस.डी (हिन्दी) माताक नाम-स्व. सत्यभामा पिताक नाम-स्व. अजब नारायण मल्लिक 14) "आखर" के अपने संपादक मंडलमे छलहुँ ओहिमे के सभ योगदान देने छलाह? "आखर"केँ संपादक छलाह-कीर्तिनारायण मिश्र ओ वीरेन्द्र मल्लिक। सहयोगीक रूपमे- राजनंदन लाल दास, स्व. पीताम्बर पाठक एवं स्व. सुन्दरकांत झा। 15) मैथिली रंगमंचमे कलकत्ताक अवदानपर अहाँ अपन मंतव्यसँ पाठकवर्गकेँ अवगत कराबी। मैथिली नाटक ओ रंगमंचक क्षेत्रमे कलकत्ताक सर्वोपरि स्थान रहलैक अछि। ओकर विकास ओ संवर्धनमे एतुक्का विभिन्न संस्थाक योगदान अतुलनीय अछि। बीचमे एक पैघ अंतरालकेँ पश्चात दू टा नाट्य संस्था -१) मिथिला विकास परिषद् २) कोकिल मंच सामने आएल। ई दूनू निरंतर जन्मसँ लऽ कऽ एखन धरि प्रति बर्ष नियमपूर्वक मैथिली नाटकक मंचन करैत आबि रहल अछि। आइयो धन्यवाद एही दूनू संस्थाक रंगकर्मीकेँ जाइत छनि जे मनसा-वाचा-कर्मणासँ मैथिलीक प्रति समर्पित छथि। हम वर्तमान नाट्यमंचनक परिदृश्यकेँ देखैत आशा करैत छी जे ई दूनू नाट्य संस्था नवसँ नव मैथिली नाटकक मंचन प्रस्तुत करैत रहताह और मैथिली नाटक ओ रंगमंचक परिवर्धन-संवर्धनमे अपनाकेँ समर्पित केने रहताह। हमरा दूनू संस्थाक प्रति पूर्ण आस्था आ विश्वास अछि। हम दूनू संस्थाक मंगलकामना चाहैत छी। डा.योगानन्द झा, भगवतीस्थान मार्ग, कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगा-८४६००१ (बिहार) प्रवासीक स्नेहसँ ओतप्रोत मातृभूमि स्वनामधन्य श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र बहुआयामी लेखक छथि।हिन्दी,मैथिली, ओ अंग्रेजीमे समानाधिकार रखनिहार एहि एकान्तसेवी रचनाकारक दर्जनाधिकपोथी प्रकाशित छनि जाहिमे अधिकांश प्रणयन ई मातृभाषा मैथिलीमे कयने छथि । विभिन्न विधामे सिद्धहस्त श्रीमिश्र आत्मकथा,यात्रा-वृतान्त,निबन्ध-प्रबन्ध,कथा ओ उपन्यास आदि अनेक विधामे रचना कयने छथि।खास कऽ हिनक रुचिउपन्यास विधाक प्रणयनमे छनि आ एहि विधामे ई मैथिलीक उपवनमे क्रमशःनमस्तस्यै,महराज, लजकोटर,सीमाक ओहि पार,मातृभूमि,स्वप्नलोक ,शंखनाद, ढहैत देबाल, हम आबि रहल छी,प्रलयक परात,बीति गेल समयआप्रतिबिम्बअभिदानसँ रंग-विरंगक पुष्प-पादप लऽ कऽ प्रस्तुत भेल छथि आआधुनिक मैथिली उपन्यास विधाकेँ समपुष्ट कयलनि अछि । हिनक उपन्याससभ समाज ओ राष्ट्रकअभ्युत्थानक प्रति हिनक चिन्तनक विराट आयामकेँ प्रस्तुत कयने अछि । मातृभूमि उपन्यासक माध्यमे ई मातृभाषा ओ मातृभूमिक प्रति प्रवासी लोकनिक कर्त्तव्य बुद्धिक परिष्कारदिस उन्मुख देखि पड़ैत छथि । एहि उपन्यासक नायक जयन्त थिकाह ।हिनकहि चरित्रकेँ केन्द्रमे राखि उपन्यासक कथावस्तु बुनल गेल अछि ।जयन्तक पिता विद्या-व्यसनी छलथिन आ अपना गाममे निःशुल्क पाठशाला चलाय शिक्षाक प्रचार-प्रसारमे लागल छलाह ।मुदा हुनक असमय मृत्यु भऽ जाइत छनि आ पाठशालाक व्यवस्था छिन्न-भिन्न भऽ जाइत छैक। असहाय जयन्त कौलिक मर्यादाक रक्षा ओजीवन-यापनमे कठिनताक कारणे मृत्युकेँ वरण करबाक विचार कय नदीमे कूदि पड़ैत छथि । मुदा हुनके गामक एकगोट संत नागाबाबा हुनका बचा लैत छथिन । ओ हुनका शारदाकुंज स्थानपर लऽ जाइत छथिन जतऽ निःशुल्क शिक्षाक व्यवस्था छैक ।अपन नैसर्गिक प्रतिभाक वलें जयन्त आश्रममे रहि विविध विषयक शिक्षा ग्रहण करबामे समर्थ होइत छथि । अन्ततः ओ मिथिलाक विद्वत परंपरापर एकगोट शोधग्रन्थक प्रणयन करैत छथि आ ततःपर गाम घुरि अपन पिता द्वारा स्थापित विद्यालयकेँ पुनः स्थापित करबाक प्रयासमे दत्तचित्त होइत छथि । अनेक विघ्न-बाधाकेँ पार करैत जयन्त अपन एहि अभियानमे सफल होइत छथि तथा प्रवासीलोकनिकअपन मातृभूमिक प्रति स्नेहकेँ जगाय हुनका लोकनिक द्वारा गामक उत्कर्ष हेतु नागबाबा विश्वविद्यालयक स्थापना कऽ उच्च शिक्षाकेँ गाम-समाजक हेतु सहज बनयबामे सफल होइत छथि । ई एकगोट आदर्शोन्मुख यथार्थवादी उपन्यास थिक जाहिमे शिक्षाक अभावमे गाम-समाजक दुरवस्थाक यथार्थक चित्रण तँ भेले अछि संगहि उपन्यासकार ई चिन्तन प्रस्तुत कयलनि अछिजे जँ गामक प्रवासीलोकनि प्रवासमे जीवन-यापन करैतअपन मातृभूमिक सम्पर्क-सान्निध्यमे बनल रहथि आ ओकर अभ्युत्थानमे योगदान दैत रहथि तँ मिथिलाकग्राम्यजीवनक विकासमार्ग निरन्तर प्रशस्त होइत चलत ।ई प्रवासीलोकनिक अपन मातृभूमिक प्रति उदासीनते थिक जकर कारणे मिथिलाक ग्राम्यजीवन अधोगतिकेँ प्राप्त करैत जा रहल अछि । सामान्यतः जखन प्रवासीलोकनि अपन जीवन-यापनक हेतु गाम छोड़ि दैत छथि तँ जेना मातृभूमिक प्रति सर्वथा उदासीन भऽ गेल करैत छथि । स्वकीय अर्जन-शक्तिसँ भने ओ सभ प्रवासमे जतबा प्रगति कऽ जाथि मुदा ताहिसँ गामकेँ कोनो लाभ नहि भेटि पबैत छैक । एमहर दयादवादलोकनि हुनक वर्षानुवर्ष अनुपस्थितिक लाभ उठाय हुनक ग्राम्य संपत्तिक अपहरण करबाक उद्देश्यसँअनेक प्रकारक षड़यंत्र करऽ लगैत छथि । जँ कोनो प्रवासी अवकाश प्राप्तिक बाद गाम घुरितो छथि तँ हुनका अनेक प्रकारेँ उछन्नर देल जाइत छनि आ अंततः ओ अपन संपत्ति किछु लऽ दऽ बेचि बिकीन कऽ पुनः प्रवासेमे प्रत्यावर्तिति भऽ जायब लाभकर बुझैत छथि ।एकर परिणामस्वरुप मोनबढ़ू प्रवृत्तिक लोक प्रवासीकेँ गामसँ उपटयबामे समर्थ भऽ जाइत छथि । मातृभूमि उपन्यासक सुधाकर एहने खलनायक थिकाह जे अत्यधिक समय बितलाक उपरान्तजयन्तक घर घुरलापर हुनक पाठशालावला जमीन बलजोरी कब्जा कऽ लेबऽ चाहैत छथिन आ हुनक हत्या पर्यन्त कऽ कऽ हुनका गामसँ उपटाबय चाहैत छथि।गामक लोकक संगहि सरकारी महकमा ओ पुलिस आ न्याय व्यवस्था सेहो ओहने लोकक संग दैत छैक ।मुदा जयन्त अनशनक माध्यमे सत्याग्रह करैत छथि आ प्रवासी राजीव सन अधिकारीक सहायतासँसुधाकरकेँसकपंज करयबामे समर्थ होइत छथि ।ओ विश्वविद्यालयक हेतु अपन पिताक स्थापित विद्यालयक जमीन पर अबैध कब्जाकेँ हटयबामे सफल होइत छथि । ततबे नहि ओ विश्वविद्यालयक हेतु अतिरिक्त चन्दासँ जमीन कीनि उपटल प्रवासीलोकनिकेँ सेहो बसयबाक उद्योग करैत छथि । एहि उपन्यासमे किछुगोट प्रेम कथा सेहो अनुगुम्फित अछि । पहिल कथा थिक शीलाक जेजयन्तक प्रति एकनिष्ठ प्रेम करैत छथि मुदा सामाजिक दबाबक कारणे हुनक पिता हुनका अजग्गि कहला जयबाक भयसँ एकटा अन्य वरसँ विवाह करा दैत छथिन ।शीला सुशील ओ पतिव्रता छथि,तेँ अपन नियतिकेँ अंङ्गीकार कऽ लैत छथि। मुदा हुनकर वर पूर्वहि विआहल रहैत छथि जकर परिणामस्वरुप शीला अपन ससुरक आश्रममे परित्यक्ताक जीवन व्यतीत करबाक हेतु बाध्य भऽ जाइत छथि । कुलीनताक परिचय दैत शीला आग्रह कयलो उत्तर दोसर विवाहक हेतु स्वीकृति प्रदान नहि करैत छथि आ अपन जीवनक लक्ष्य विश्वविद्यालयक सेवा ओ विकासहिकेँ बना लैत छथि। दोसर प्रेमकथा चन्द्रिका ओ जयन्त सँ सम्वद्ध अछि जाहिमे चन्द्रिका केँ सर्पदंश सँ लऽ कऽ उपचार धरिक कथा अतिव्यापकताक सृजन करैत अछि । हुनक पिताक प्रयासेँ अन्ततः चन्द्रिका ओ जयन्त वैवाहिक बन्धनमे बन्हा जाइत छथि आ उपन्यासक सुखद अन्तक द्योतक बनैत छथि। अपन आत्माक बात सुनि सुधाकरक समर्पण आकस्मिक घटना जकाँ बुझना जाइत अछि जे औपन्यासिक संघर्षकेँ कमजोर कऽ देलक अछि तथापि एहि उपन्यासकेँ परस्पर विरोधी पात्र सभक सृजनपूर्वक आदर्शक उपस्थापनाक दृष्टिये उत्तम मानल जा सकैत अछि । उपन्यासक भाषा प्रसादगुण सम्पन्न,सहज ओ रोचक अछि ।पात्र सभक मनोभावक विश्लेषणमे उपन्यासकार सफल भेल छथि।वस्तु विन्यास युग जीवनक यथार्थपर आधारित अछि।मातृभूमिक प्रति प्रवासी लोकनिक दायित्वक उद्बोधनउपन्यासकारक जीवन-दर्शन ओ जननी-जन्मभूमिक प्रति सहज सिनेहकेँ पल्लवित करैत अछि । डा. किशन कारीगर, (मूल नाम- डा. कृष्ण कुमार राय) मिथिला मे बिलुप्त भेल जा रहल भांट/भैंट(घूमक्कर वाचक) अहूं कहब ग ने जे बलू कारीगर भैंट जेका किए बड़बड़ाइए हइ.? अहां सुनियौ ने जे ओइ बड़बड़ि मे कते काजक गप होइ छै आ लोक के रमनगरो लगै छै? भांट हमरा जनतबे बुढ़ पुरान के मुँहे सुनल जे हइ एना किए भैंट जेका बजैत रहै छैं. ताबे दोसर गोटे बाजल जे उ भैंट बजै की छै से सुनीयै ने? मिथिला मे भैंट सब गामे गाम घूमि के लोक सब लक मनोरंजनात्मक रूप मे बजै गबै छलै. जै मे गाम लोक के खिदहांस, बड़ाई, उकटा पैंची, छल कपट, बैमानी शैतानी, झगड़ा सलाह, आदि के वर्णन उ फकड़ा रूपे बाजि,कहि,गाबि के करैत रहै. भांटि के घूमक्कर वाचक सेहो कहि सकब. ओकर मुख्य काज रहै गामे गाम जाके लोक के दूरे दरब्बजे जा के वाचक लोक शैली मे मनोरंजन करब. आ लोक तेकरा बदला मे भैंट के धान चाउर, रूपैया, चीज बौस जेकरा जे जुड़ै से दै. अहि स भैंट के गुजर बसर होइत रहै. भैंट अपना वाचक प्रस्तुति मे समाजिक बेबस्था बैमानी शैतानी नीक बेजाए पर बेस कटाक्ष करै आ हंसि गाबि के तेना जे लोक के अनसोंहातो नै लगै.. भैंटक कहल फकड़ा… कारी मुँह मे उज्जर दांत देखलों उज्जर मुँह मे कारी दांत देखलों धन रहैतो खाइ लै औनी पथारी देखलों बाबूए सीरे खा बमफलाट छौंड़ा देखलो बुढ़बा के केकरो स पटरी खाइत ने देखलो बज्र कोढ़िया के दूरा सर कुटमार ने देखलो अपने मे लड़ै जाइए दियादी मिलान ने देखलों उनटे भैंटे के गरिअबैत फलां बाबू के देखलों सर समाज लै काज करैत चिंला बाबू के देखलों अनके भरोसे बैसल रहैए बाबूू के देखलौं साउस पुतौह के झगड़ा मे आगि लगाएब टोलबैया के देखलों झगड़ा भेल पंचैति काल पंच बाबू के नीपत्ता देखलों (इ फकड़ा सब बुढ़ पुरान क मुँहे सुनल.. जे कहांदिनु हमरो गाम मंगरौना मे (भरौड़ा) गोनू झा के गाम स भैंट सब अबै आ फकड़ा बचै इ सब कहै) फकड़ा स्पष्टीकरण भ रहल जे ओ भैंट सब समाजक सब स्वरूप के देखार चिनहार लोक शैली फकड़ा रूपे क के लोक के मनोरंजन करै. तकरा बाद लोक ओकरा जे जुरै से दै आ ओकर आजीविका चलै. पमरीया जेका भैंटो सबके गाम आ इलाका बांटल रहै आ सब अपना इलाका मे घूमी घूमी बिशुद्ध रूपे लोकक मनोरंजन करै. अपना मे मिलानी बाद भैंट सब एक दोसरा के इलाका मे सेहो जाइत रहै. आब भैंट किनसाइते कतौह देखबा मे अबै छै. जेना उ भैंट सब मिथिला स बिलुप्त भेल जा रहल. ओइ भैंट सब के फेर स ताकि ओकरा संरक्षित करबाक सीमूहिक प्रयास हेबाक चाही. लोक कलाकार ढोल पिपही वला के खोज खबैर के राखत? लोक कलाकार सब के पोसबा संरक्षित करबा मे मिथिलाक लोक के नै कहियो ओतेक उत्साह रहलै आ ताबे कोन तेहेन बेगरते हइ? बड्ड बेसी त दुर्गा पूजा मे बिधि पूराउ, की मूरन उपनेन मे मंगाउ आ बियाह शादी मे जेकरा बैंड पाटी सटा नै भेलै आ की गरीब लोक हइ त ढ़ोल पिपही बला के बजौतै. तकरा बाद ढोल पिपही बला सब जड़ौ की मरौ केकरा कोन माने मतलब हइ आ बलू कथी लै रहतै ग. हमरा अरू कना जीबै खेबै? इ ढ़ोल पिपही केना बांचल रहतै कोइ ने सोचै जाइ हइ? आब ढ़ोल पिपही आस्ते आस्ते उठाएब भ गेलै. डी जे नाच आगू हमरा ढोल पिपही बला के खोज खबैर रखतै ग? पहिने मिथिला के गामे गाम सब मे दुर्गा पूजा, मूरन उपनेन, बियाह तिलक सब मे ढोल पिपही बजबाएब के परंपरा रहै. पिपही (शहनाई) के मांगलिक धून, ओकरा संगे डूगडूगी के डूग डूग, झुनझुना बजौनिहार सब के धून बेस लोक के मोन मोहि लैत रहै. लोक कलाकार ढोल पिपही वला सब लोकाचार, गीत नाद, भगवति सुमिरन, सोहर समदाउन, थोड़े फिल्मी धुन सब सेहो बजबै आ खूब सोहनगर रमनगर लगै. धिया पूता बुढ़ पुरान छौंड़ा मारेर, जनिजाइत सब ढोल पिपही वला सबके कलाकारी देखै सुनै छलै. मोन पड़ैए हमरा अपने पैतृक गाम मंगरौना के नामी ढोल पिपही कलाकार जुगेसर राम, देबन राम, सीताराम राम, बनैया, भोला राम सब जे सब ढोल पिपही कला मे बेस पारंगत रहै जाइ. गामक दुर्गास्थान मे ओ सब ढोल पिपही पर धून बजबै जाइ.. भगवती बसै यै बरी दूर गमक लागे गेंदा के फूल. सोहर, समदाउन बजबै. सुननाहर सब बेस भक्ति भाव, सोहनगर मोन स ढोल पिपही वला के सुनै. जेकरा जे जुड़ै से खुशनामा मे रूपैया पैसा दै. पूजा कमिटी दिस स सेहो रूपैया देल जाइ. दुर्गा पूजा मे इ कलाकार सब 9बो दिन आ दसमी के भसाउन तक ढोल पिपही बजबैत रहै. आब त कोनो कोनो गाम मे ढोल पिपही वला सब बंचलै सेहो आब दुर्गे पूजा टा मे कतौ कतौ देखल जेतै. हमरो गाम कलाकार सह आब नै रहलै आ नव पिढी सब अइ कला के सीखो नै रहलै आ नै मिथिला समाज मे तेहेन ओतेक मोजर देल जाइ छै. कलाकार सब परदेश कमाई लै चल गेलै त कोइ खेती बारी मे लागल यै, त नबका लोक सब सीखबे नै करैए. त आब आस्ते आस्ते ढोल पिपही कलाकार सेहो बिलुप्त भेल जा रहलै. बड्ड चिंता के गप? मिथिला समाज के लोक के आगू बढि लोक कलाकार सब के जियाअ के राखै परतै. ढोल पिपही बला लोक कलाकार के खोज खबैर रखै जाउ. एइ कलाकार सबके प्रोत्साहन आर्थिक मदैद क ढोल पिपही सन रमनगर सोहनगर लोक वाद्य रंग के बंचा के रखै जाइ जाउ. पुरूस्कारी गुर्गा पुरूस्कार बँटा डकैत (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत रहै घिना गेल मिथिला मैथिली. इ मैथिल डकैत आ गुर्गा सब पुरूस्कारी खेल मे त चंबलो घाटी डकैत के कान काटि लेत की? एकरा सबके कोनो लाज धाख छै आ कोन झड़कलहा के पुरूस्कारी धूर्तै के लाज छै? किताब बिकाइ छै नैहे लोक पढ़लकै नैहे आ वरिष्ठ साहित्यकार हेबाक दाबिए चूर रहैए ई डकैत सब. मनमाना पर उतारू यै जे हमरा के की कए लेत? वास्तव मे मिथिला समाजक लोक सब सेहो चोरनुकबा यै त अई डकैत सबके मनमाना के रोकत? के मंगतै जवाब, केकरा माने मतलब छै? हम बजली हौ बाबा भिंसरे भिंसरे की हो गेलहो? घर मे डकैती हो गेलौ? की कोइ भांग खुआए देलकहो जे बाबा तोंई एना बड़बड़ाए रहलौ? पुरस्कार त गेल जाइ हइ ओकरो कहूँ डकैति होलैइए? हमर गप सुन बाबा हां हां के हँसे लगले आ बोललकै हौ कारीगर तोरा सबटा यथार्थ बुझल छह आ यथार्थवादी लेखन माध्यमे लोक के पुरूस्कारी धूर्तै के देखार चिन्हाक कए दै छहक? आ अखैन अनठिया के हमरे स पुछै छह आ हमरे स सुनै चाहै छह? हम बोलली यौ बाबा हम कोनो चोर डकैत के गिरोह मे रहै छी की? हमरा पुरूस्कारी चोरी डकैती बारे मे कुछो ने बुझल है क? बलू अहीं साफ साफ कहू जे पुरूस्कारी डकैती की हइ? बाबा बोललकै देखै नै छहक जे मैथिली साहित्यकार सब चोर डकैत जेंका अपन गिरोह बनेने अछि. जेहेन गिरोह तेहेन पुरूस्कार बँटा डकैत आ तेहने पुरूस्कारी गुर्गा सब. ई सब तेना हो हो करतह जे एकरे सब दुआरे मिथिला मैथिली बांचल होउ? आ एहि धूर्तै मे इ सब मिथिला मैथिली के अपन बपौती बुझि कब्जा जमौने रहल. कतेक नाम गनबिअह? साहित्य अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, मिथिला मैथिली समिति, लेखक संघ, परिषद कतेको एहेन गिरोह आ तेक्कर गुर्गा सब मिली मैथिली पुरस्कारक डकैति मे लागल यै की? यथार्थ कहबहक त डकैत आ गुर्गा सब बतकुट्टबैल क अप्पन चलकपनी कुकृत्य के झँपै के फिराक मे रहतह. मैथिली पुरस्कार मे कोनो निष्पक्ष व्यवस्था कतौ नै भेटतह? जेहेन गिरोह आ जेहेन गुर्गा तेहने पुरस्कार बँटा डकैती. अहि दुआरे त मैथिली पुरस्कार सब महत्वहीन भ गेलै आ घिना के राखि दै जाइ गेलै. यथार्थ कहक त उनटे हमरे तोरे कुंठित कहि चलकपनी करतह. उ डकैत गुर्गा सब अपने कतेक कुंठित अछि जे निष्पक्ष व्यवस्था के बात पर कपरफोरी पर उतारू भऽ जेतह की? हम बाबा स पुछली जे पुरूस्कार देलकै आ भेटलै त अइ मे पुरूस्कारी डकैत आ गुर्गा कैसने हो गेलै? बाबा हां हां के बोलै लगलै हौ कारीगर तहूँ सबटा हमरे मुँहे अइ पुरूस्कार बँटा डकैत सबहक देखार चिन्हार करेबह त हैइए लैह सुनहअ सबटा किरदानी. एकटा गप कहअ हमर तोहर यथार्थवादी बिचार मिलै छह आ अपना सब त कोनो गिरोहो मे नै रहै छि. तइयो हम तोरा बसहा बरद पुरूस्कार द दियअ आ तूं हमरा मिथिलांचल टुडे पत्रकारित पुरूस्कार बाँटि दैए त इ पुरस्कारी डकैति भेलै की नै? चिन्हा परिचे, सर कुटमारी, हिरोहबादी होहकारी, संयोजकीय जोगारी बले मैथिली पुरूस्कार लूट मचल छै आ उनटे अनका उपदेश जे झरकल मुँह झपनै नीक त अइ डकैत सबके अपन किरदानी किए नै देखै छै. एकरो सब लेल कहबी बनतै ने पुरूस्कारी डकैत के अपकरमी मुँह उघारे नीक. पुरस्कारी डकैत सब नैह तन निष्पक्ष व्यवस्था बेर हरहड़ी बज्जर खैस परै छैन्ह की? महामारी सन डेराउन भेल जा रहलै? मिथिला स पलायन (परदेश कमाएब) यथार्थ कहब देखाएब त भक्क दिस लागत किने आ कतेक मखान वला नेता, मिथिलाक बुद्धिजीवी समाज त कुतर्क कए बतकुट्टबैल पर उतारू भेल यथार्थ के नुकेबाक चलकपनी करै जाएब? तइयो मिथिला स पलायन के भयाऔन डेराउन इतिहास आ यथार्थ के मुँह झांपल नै हेतै? मिथिला मे रोजगार लेल छैहे की? रौदी, दाही, बेसी बुझक्करी दाबी, टांगघिच्चा मनोवृति, बंद परल चिनी मिल, पाग मखानक पेटुोसुआ राजनीति आ परदेश कमेबाक बिमारी छोड़ि आरो किछो नै छै? मिथिला समाज कहियो अइ बातक चिंता नै केलक की ओकर धिया पूता सब केना रोजी रोटी कमेतै? आ परदेश कमेबाक बिमारी नव पीढी तक पसरैत गेल? रोजगार नाम पर मिथिलाक लोक सरकारी योजना तंत्र, सरकारी सेवा, परदेश कमाएब (पलायन) भरोसे सब दिन बैसल रहल आ अपना भाग के दोख दैत हक्कन कनैत रहल. रोजगार के विकल्प सब कहियो ने सोचलक आ नै तकर बेगरता कहियो बुझलक? मिथिला मे फैक्ट्री चैकरी, स्टार्ट अप, लघु उद्योग लगेबाक गप करब त अपना पैर पर कुरहैड़ मारब सन भऽ गेलै? केकरो लक इ गप बाजू त लोक हंसी उड़ाउत जे हे हिनका नै नोकरी चाकरी भेटलै तैं एना कहै छै त ई परदेश कमाई नै चाहै छै, परदेश कमाएल नै भेलै? एहने टोंटबाजी स लोक के मनोबल आरो तोइड़ दै छै? त एहेन टांगघिच्चा मनोवृति वला मिथिला समाज मे के उद्योग धंधा लगाउत? पुरना लोक बुढ पुरान सबहक मुँहे सुनल गप जे पहिने मिथिला के बेसी भाग लोक परदेश कमाई लै नै जाइ? बड्ड गरीब लोके सब टा परदेश खटै. लेकिन 1934 के भूइकंप मिथिला के तहस नहस क देलकै. आ गरीबताइ बढ़ैत गेलै आ लोक सब देश परदेश कमाएब खटाएब शुरू केलकै. पहिने मिथिला मे चिनी मिल, खादी भंडार, लोहा कपसिया मे सूत कटैए, रांटी राजनगर सब मे लहाट बनै, बेगूसराय दड़भंगा, सहरसा पूर्णिया सब मे खाद, कागज, चूरा मिल, आरा मिल सब रहै, जइ मे कतेक लोक के रोजी रोटी भेटैत रहै? आस्ते आस्ते मिथिला मे रोजगार के साधन सब बंद होइत गेल आ लोक सबहक परदेश कमेबाक बिमारी बढ़ैत गेल? एहेन भयाबह जे मिथिला लोक के परदेश कमेने बिना गुजर जाएब मोशकिल भऽ जाइत छै. अहाँ मजदूर छि की हाकिम वा बिजनेस मैन परदेशक मूँह देखै परत यौ बाबू? दिल्ली, पंजाब, बंगाल, बंबई, साउथ इंडिया, नार्थ इस्ट, यूपी, गुजरात, सब ठाम मिथिला के मजदूर भेटबे टा करत? मिथिलाक इ मजदूर सब केहेन अभिशप्त जिनगी जिबै लेल मजबूर अछि आब इ डेराउन स्थिति स सब परिचित भेल जा रहलै? एहि मजदूर सबहक सुधि के लेतै? केकरा बेगरता छै? महामारी सन डेराउन भयाबह भेल जा रहलै मिथिला स पलायन. एतुका नेता सब पाग मखान माला के राजनीति आ अपना फायदा दुआरे पटनिया नेता सबहक दलाली करै मे बेहाल टा रहैए? मिथिलाक चुटपुचिया, फोकटिया, मानल नेता सब केकरो बुते चिनी मिल शुरू कराउल नै भेलै आ नै मिथिला मे उद्योग धंधा लेल इ नेता सब कहियो सोचलक? मिथिला समाजक लोक सब सेहो मूइल अछि जे अनके आ सरकार भरोसे बैसल रहल? मिथिला मे रोजगार के कोनो दुआरा नै छै आ अइ ठाम गामे गाम, मिथिला के घरे घरे पलायन (परदेश कमाएलब) महामारी सन डेराउन भयाबह भेल जा रहलै? मिथिला मैथिली के दुर्दशा लैए दोखी के सब हइ/अछि? के नै दोखी हइ? दोखी सब अछि/हइ अहूं हमहूँ आ समाजक लोक हइ जे सुआर्थ दुआरे मिथिला मैथिली के जरा देलकै हअ? सुआर्थी बाभनवाद, पिछलगुआ सोलकन, चोरनुकबा मिथिला समाज मिथिला के दुर्गति के इनार मे खसा देलकै. इ यथार्थ आ सांचो गप हइ जे बाभनवाद बेबस्था मे सुआर्थी आ चलाक बाभन अरू अपने टा फायदा दुआरे आन जाति सोलकन सब के नै अगुआ देलकै ने ओकरा बोली के मोजर बाजब स लिखब तक कतौ ने देलकै आ राड़ कहि उपहास उड़ेलकै. इ कटुचालि दरभंगे राजकाल मे मैथिल अमैथिल के भेद कए मैथिली महासभा रूपे लिखा गेल रहै. कायस्थ सभ के स्थान देल गेलै आ उहो सब अपने फायदा लै मैथिल बनल रहलै आ इहो अरू चुपचाप अपन काज मे रहल आ कहियो बाभनवाद के बिरोध नै केलकै? भूमिहार राजपूत संपन्न रहै ओकरा अरू के मिथिला मैथिली स ओतेक मतलब नै रहलै. ओ सब अप्पन समपन्नता लेल लागल रहल आ इ अरू बलू मिथिला मैथिली पेटपोसुआ वृति स दूरे रहल आ तेहेन कोनो माने मतलब नै रहलै. मिथिला मे सोलकन सब गरीब असहाय कम पढल लिखल रहै आ अन्याय सहैत रहलै बलू राड़ कहा अपमानित होइतो निरलज्ज भेल मिथिला समाज मे रहल. सोलकन मे जे सब थोड़े पढ़ल रहै ओ सब बाभनवाद के पिछलग्गू बनि अपन मान बढेबा लेल नमरी लूच्चा बनल रहल, बाभनवाद के बिरोध ने केलक आ सोलकन बोली संस्कृति के रैछा मान सम्मान लै कहियो ने अगुआएल. एतेक जे पढलाहा सोलकन सब लिखब बाजब आ पहिरब तक मैथिली मानक के आरो सपोट केलक? जेना पाग पहिरब, मानक मैथिली लिखब बाजब, मिथिला राज हो हो आदि. इ कोनो मजबूरी मे नै उहो अपना फायदा बुझि बाभनेवाद मे मूड़ि डोलबैत रहल. एइ दुआरे मैथिली भाषा पर बाभन कायस्थ कब्जा जमौने रहल आ अनजाति के कहियो मोजर ने देलकै आ लाॅबी बना अपन सुआर्थ सिद्धी मे रमकल रहल. साहित्य अकादेमी, आयोजन, पुरस्कार, पत्र पत्रिका, सरकारी फंड सब पर एकरे कब्जा आ दोसर जाति के नाम नै हुअ देबै तै लै नियोजित षडयंत्र होइते रहल. अकादमी पुरस्कार,संयोजक, संपादक के इतिहास मैथिली मे बाभनवाद के देखार चिनहार क दै छै. अपवाद रूपे एक आध सोलकन नाम सिरिफ नाम लेल. आ उहो सोलकन लेखक सब सोलकन के आगा बढबै ले किछो ने करै जाइ गेलै? कहबी लैए सब मैथिल हइ मैथिली सबके भाषा हइ. लिखबा बजबा, पुरस्कार काल से बात छैहे ने? एकेक वर्ग भेद आ जातिवादी बेबहार किनसाइते दोसर भाषा मे देखबै. मैथिली मे जातिवाद गहे गहे पसरल हइ क. विद्यापति छोड़ि सलहेस, दिना भदरी, लोड़िक, सहित आन महान विभूति के जंयति नै मनबै जाइ हइ आ ने तेकर कोनो मोजर देतै ग? मैथिली लाॅबी दुआरे एहि तरहे सोलकन सब मिथिला मैथिली स दूर होइत गेल. अंगिका बज्जिका कोसिकन्हा मधेशी बोली बनि गेलै आ ओकरा मैथिली भाषा मे मोजर नै देल गेलै. आब लोक जागरूक भेल मान सम्मान तकै हइ, जगह मंगै हइ त ओकरा षडयंत्रकारी कैह लाॅबी वला अप्पन दोख झांपै मे लागल हइ? अहि तरहे आस्ते आस्ते मिथिला समाज आ मैथिली भाषा के दुर्दशा होइते रहल आ ओ सामूहिक, सर्वजन, जनसरोकारी नै भऽ एकभगाह, पेटपोसुआ, वर्चस्वादी सुआर्थी होइत गेल आ दुर्गतिक देवार मिथिला समाजक लोक स्वयं ठार केलक. इ कटु सत्य जैनतो मिथिला समाजक लोक ने आगू एलै ने पंचैती केलक आ ने समाधान तकलक? सब परदेश कमा बमफलाट रहल. मैथिली लाॅबी मिथिला मैथिली के सुडाह केलकै ग आ अखैनियो हठ क आन जाति के नाम नैहे दै हइ साहित्य अकादमी मे? बाभन सोलकन मिथिलाक लोक, कोइ जवाब ने मंगलकै एकरा अरू स आ तहि दुआरे इ सब मनमाना क मिथिला मैथिली के दुर्गति क छोड़ि देलकै ग? बोंगपाद बौआक बखारी (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै जे बलू एहनो कहूँ बखारी भेलैए? आंई कहअ त नै राहैरै छै नै खेसारीए आ मटर केराउ त तकने नै भेटल कतौ आ एक्कर दाबी केहेन जे हमरा सन बखारी भइर गाम केकरो नै छैह? ई बोंगपाद बौआक बखारी मे धानक खखरी तक नै भेटल जे बसहो बरद के कुट्टी सानी लगा दैतियै? ई तरकेसरा एक नवंर बोंगपाद भऽ गेल की? एकरा बजबाक कोनो ठेकान नै रहि हेल. हरदम भाषण टा झारत जे हमरा बखारी मे कोन कमी है? हम ई कर देगा त ऊ कर दिया? गाम समाज के हम बिकास कैर देगा. हमरा एलेक्शन मे जीता दियअ त अई बेर केकरो कोनो कमी नै होने देगा? हम्मे बाबा स पूछली की होलै हौ बाबा? बलू केकरा बखारी पाछू परल छहो? किए बड़ बड़ का खिसियाअले छहू? अईं हौ बाबा भोरे भोरे की भागेसर पंडा संगे कुछो हो गेलौ? हमर गप सुनते बाबा बोललकै हौ कारीगर सबटा गप तोरो बुझले छह आ ताल मात्रा खेलाई छह? हम्मे बोललिई हमरा कहाँ कुछो बुझहल छहो हौ बाबा तोंही बोलहो ने जे बखारी मे की होलै? बाबा हां हां के हँसैत बोललकै हौ किशन तोरा मीडिया वला के त सबटा खबैर रहै छह कतह की भेलै? आ अखैन हमरे स सुनह चाहै छह की? अच्छा पहिने एक जुम तमाकुल खुआबह त सबटा गप कहै छियह? हम बाबा लै खैनी बनाबे लगली एक जुम बाबा के आ एक जुम कैमरा वला के खुआ देली. कैमरा चालू इंटरव्यू रिकार्डिंग हुए लागल. बाबा बोललकै हौ देखै नै छहक मिथिलाक लोक केहेन बोंगपाद होईए? रहतह दसो कट्ठा नै आ होहकारी पारतह जे बारहो बिगहा मालिक? कहतह हमरा दरबज्जा पर चौदह टा बखारी आ थारी मे दाइलो तरकारी नै देखबहक की? तहिना ई मिथिला के पेटपोसुआ नेता सब भाषण टा झारतह की मिथिला राज बनैत मातर मिथिला के सब दुख दूर. मगहिया शासन मिथिला मैथिलीक दुशमन अछि? झूठा नेता सब बुते चीनी मील चालू कराउल भेलै नै आ बोंगपादी टा जे मिथिला राज बनतै त ई क देबै ऊ क देगा? मिथिला स पलायन रोकले नै भेलै आ भाषणी बखारी तेहेन जे कि कहबहक? ई तरकेसरा महादेबहो पर चढ़ौलहा रूपैया ल परा जाईए आ भागेसर पंडा के कहलियै जे तोहर बेटा एना किए करैए? त ओ बाजल जे पार्टी फंडमे जमा करतै हाईकमान के आदेश छै बाबा. हमर ताररेसर जीतत त अहीं मंदिर के जीर्णोद्धार हेतै ने बाबा? हम मोने मन कहलियै जे आई तक पोखैर घाट बनेबै नै केलकै तै पर स मंदिर के जीर्णोद्धार क बखारी लगा देतै की? आई तक रूपैया आपस नै केलक तारकेसर? हम्मे बाबा से सवाल केली जे अकादमी पुरस्कारी वला बखारी पर तोंई की कहबहो? त बाबा बोललकै हौ कारीगर ई साहित्य अकादेमी मैथिली वला त आरो बोंगपादी करैए की? सर कुटमार के पुरूस्कार द देतह? अपना गिरोहक लोक के जूरी मेम्बर बना देतह आ पुरस्कारी दाबिए गौरबे चूर रहतह की? आ मैथिली वला सब के किताब लोक पढ़बे नै करै छै नै बिकाईते छै तइओ पुरूस्कारी बोंगपादी? मिथिला समाज साहित्य के बिरास एक्को रति नै आ सम्मान बंटतह एक ढाकी? भांटा मूरै जेंका हाटे बजारे चंदा वला समारोह मे किना बिका रहलै मिथिला सम्मान? हम्मे बाबा स फेर सवाल केली जे विद्यापति बखारी औरी मैथिली साहित्य महोत्सव , मैथिली गीत नाद पर कुछो बोल्हो ने? बाबा हां हां के बोललकै हौ ई विद्यापति समारोह आ मैथिली साहित्य महोत्सव वला सब त दोकनदारी पर उतारू अछि की? विद्यापति स्मृति पर्व नाम पर चंदाखोरी, पाग बांट, असर्द्ध गीत नाद आ भैर रता धमगिज्जर टा होई छै की? समाजक लोक के कहियो कोन उपकार होई छै? तहिना ई गिरोहवादी साहित्यक ठेकेदार सब मैथिली साहित्य महोत्सव के नाम पर अपना गिरोह के प्रमोट करै के फिराक मे रहतह की? हौ ज मिथिला समाज मैथिली साहित्यकार स जुड़ले नै छै त कथिक झूठे साहित्य महोत्सव? साहित्य के नाम पर ई सब अपन दोकानदारी मे लागल अछि की? तहिना ई मैथिली गायक गीतकार सब पैरोडी बना नेहाल करैए आ झूठौ दाबीए चूर जे भोजपुरी वला अशलील आ मैथिली वला सन चोरा नीक लोक कियो नै? बोंगपादी दाबीए चूर रहत सबटा? अंत मे बाबा स हम पुछली जे हौ बाबा मिथिला मैथिली पर तोंई की कहबहो तोहर कहनाम की हौ? बाबा बोललकै हौ कारीगर की हमरा मुँहे मिथिला मैथिली के ठकहरबा सबहक किरदानी देखार करेबह? लैह हईए सुनह. मैथिली वला सब डंका पीटतह जे अंगिक्का, बज्जिक्का, ठेठी, राड़ सबटा मैथिलीए छियै की? आ लिखबा बजबा काल पुरूस्कार बेर केन्द्रीय मैथिली सोतियामी टाोन के मोजर टा करतह की? आ बाद बांकी के राड़ सोलकन बोली कैह दुत्कारतह? यथार्थ कहक त उनटे हमरे तोरे मंचलोभी त कुंठीत कहि अपन ठकहरबा किरदानी झंपबाक चलकपनी मे रहतह? मिथिला मैथिली वला के हाल ओहने जेना बखारी मे राहैर नै छै आ नै खेसारी तइओ बड्ड भैरगर कहे बोंगपाद बौआक बखारी. आई जे मिथिला के नेता, साहित्यकार, मैथिली अकादमी, कलाकार, पत्रकार, समाजक लोक सब एकजुट भऽ समावेशी मैथिली लै काज करै जाई जैतै त मिथिला विकसित भेल रहितै. अई ठाम त सब अपना बखारी दाबिए चूर बोंगपादी टा मे लागल अछि त कहियौ मिथिलांचल के विकास हेतै किनौ. सब अपना बखारी अपन पेटपोसै के फिराक मे बेहाल यै तैं मिथिला अधमौगैते अवस्था मे रैह गेलै की? भगम भग्गी फैशन (हास्य कटाक्ष) बाबा बड़बड़ाइत बजैत रहै जे आब केकरा रोकू? हे केकरा टोकू? ई छौंड़ा छौंड़ी सब त एकटा फैशन जेंका बना लेलक? ई भगम भग्गी फैशन जे ने कराबै? खून खूनामे, केस फौदारी, पुशतियाही दुशमनी जे ने कराबै? तइयो लोक नै चेतल आ नै समाधान करै जाई गेल? अपने भोगान भोगै जाइत की? एतेक भगम भग्गी होइ लगलै जे रोज कोनो गाम शहर मे होइते रहै छै? आ गाम समाज मुँहतक्का बनल रहैईए की? सबट्टा निरलज्जा सब लाज धाख बिसैर जाइ जाइ गेल? हम बाबा स पूछली की होलै बाबा भोरे पहर एतना कैलै बड़बड़ी करै छहू? बलू हरदम छौंड़ा छौंड़ी सबके फैशन पर खिसिआई छहू कैले? जबान लइका बच्चा सब हइ त फैशन न करतै त की तोरे सन दिन भरि बघंबर पहिरने रहतै? नबका जमाना हइ त फैशनो ने करौ? एते बोलै छहू भने कोई पूजो करै लै नै अउतहो तब की करबहो? असगरे भागेसर पंडा संगे तोंई तमाकुल खाईत रहियौ हम्मे त आब घूइरो के नै अएबौ? हमर बात सुनके बाबा बोललकै हौ कारीगर तंहू की ताल करै मे छह? एक जुम तमाकुल खुआबह हे नीचेन स सबटा गप कहै छिअह. हम बाबा लै तमाकुल चुनाबै लगली आउर बाबा बोलैत रहलै हौ छौड़ा छौंड़ी सब कपरा लता, साज सिंगार, देहदेखौआ फैशन सब करैए से अपन करै जा लेकिन ई लगले भगम भग्गी वला फैशन पर उतारू भऽ जाइए से एकदम बरदास्त स फाजिल? हम बाबा के चुनाउल तमाकुल देली औरी पूछली जे भगम भग्गी फैशन ई कोन नबका फैशन एलै हौ बज़ार मे तोंई की बोलै छहो? बाबा बोललकै एह देखै नै छहक गामे गाम छौंड़ा छौड़ी भगम भग्गी क रहल छै? एकटा फैशन बना लेलक ई छौंड़ा छौंड़ी सब? कोनो लाज धाक नै? हौ भाए बहिन तक मनबा लै तैयार नै? कहतह जे हमरा प्यार यै? एहेन कोन प्यार भेलैए जे भाए बहिन लोक लाज तक नै बुझतै? छौंड़ा छौंडी सबके एतबे मोन लचलटाई छै त अपना अपना गारजियन के कहौ बिआह कऽ दै लै? लगले सेहंता पूर भऽ जेतै की? ई सब चुपेचाप वाट्सएप पर भांज लगौने रहतह आ राता राति भगम भग्गी कए लेतह? हौ बिआह ठीक भऽ गेल रहै छै तइयो कतेक छौंड़िया सब भागि जेतह की? आ ई सरधुआ छौंड़ा सब बाल बच्चेदार रहितौ छौंड़ि सबहक फेर मे रहतह आ लाथ केहेन जे हमरा बसपन का प्यार कहीं भूइल नै जाना? हम बजली हं ई भग्म भग्गी बड्ड चिंता के गप हइ क बाबा? बलू गाम समाज के लोक कुछो नै करतहो? हमर गप सुनके बाबा खौंजा गेलौ अउरी बोललकौ हे समाजक लोक तमस्सा देखतह की? फलां के बेटी भगलै कीने? फलां घर मे एना भेलै ने? हमरा कोन मतलब? ई मौगिया सब दिन भरि शिव गुरू मे चिकरैत रहतह आ एक्को बेर चिंता नै करतह जे ओक्कर बेटी उढ़ड़लै अपटलै की कोनो छौंड़ा संगे परेलै? चिकरैत रहतह जागह जागह महादेब? कहअ त हमर त्रीनेत्र ट्वंटी फोर ऑवर जागल रहैइए?हमरा जगेबा स नीक जे अपना धिया पूता के साशन मे राख ओकरा जगा के राखै जो जे ई भग्म भग्गी वला फैशन नै करै जो? बाबा स हम पूछली जे ई मरदाबा सब नै कुछो डांट डपट करै छहो? ओकरा सबके नै कोनो चिंता फिकीर हइ की? बाबा बोललकै हौ ई मुंसा सब अनका भरोसे बैसल तमस्सा देखै मे बेहाल छै की? कोई पंचायत पोलटिक्स मे त कोई चमचै मे त कोई अठजाम भागवत के मनेजरी में? ताबे एम्हर छौंड़ा छौंड़ी भाइग परा जाउ धैन सति लै? अनकर भगलै कीने? आ ज अप्पन बेटी परा जाउ तब कान कपार पीटतह यौ बाबा हमर लड़की भाइग गेल ताकि दियअ यौ. हम की तकबै आ तूं की तकबहक? छौड़ा छौंड़ी कोर्ट मैरिज केनैहिंए औतह? भागेसर पंडा के कतेक बेर कहलियै जे एक बेर बैसार करै जाह सब मिली भगम भग्गी फैशन के रोकै जाह त भागेसरो कानून बतियाइ हमरा कोन काज? जेकरा घर भगलै से जनौ? आ जहिया भागेसर के बेटी गामे छौड़ा संगे दिल्ली परा गेल त बपहारि कटैत रहै जे जुलुम भऽ गेलै? अई भगम भग्गी दुआरे केस फौदारी खून खूनामे दुशमनी तक भऽ रहल आ तइओ समाजक लोक चेतल नै आ छौँड़ा छौंड़ी के समाजिक मरजादा के शिक्षा नै दअ रहल? मिथिला मैथिली आंदोलनक मिथक प्रयास आ समाधान? यथार्थ कहब त भक द लागत. मिथिला मैथिलीक आंदोलन जे भ रहल ओ की समाज हित मे वा पेटपोसुआक हित मे? प्रशन रेखांकित करू यथार्थ देखू ताकू त जवाब स्पष्ट रूपे भेटि जाएत. मिथिला मैथिली आंदोलनक कएटा मिथक छै जे बुझहै परत आ स्पष्ट रूपे चिंता करैए पड़तै. कहै लै जे मिथिला मैथिली सबहक त फेर दूए टा जाति आ ओकर चटिया सब टा किए मैथिली सुख भोग कए रहल? की मिथिला समाजक बारहो बरण तक मैथिली के कहियो पहुँचअ देल गेल? साहित्य अकादेमी मैथिली भोजपुरी अकादमी, मैथिली अकादमी सबठाम दू जातिक वर्चस्व आ कब्जा से किएक? मिथिला मैथिलीक मिथक:- 1. मिथिला मैथिली स जुड़ल आंदोलन बेर बदलाव अनै बेर मैथिली विभागक लोक किए कुंभकरणी नीन में बमफलाट भेल सूतल रहैए.? किए ने आगू अबैए? तनखा उठाएब छोड़ि मैथिली हित मे तेसर कोन काज केलक मैथिली विभागक लोक? 2. मैथिली साहित्य मिथिला समाज तक नहि पहुंचल किए? साहित्यकारक गिरोह तक घूरिया के रहि गेलै आखिर किएक? कोई सवाल जबाज नै केलकै हिसाब नै मंगलकै किएक? 3. लोक के भ्रमित कएल गेलै जे मिथिला अहूँ के छी आ पेटपोसुआ सब टा मैथिली स लाभ उठा समाज मे वर्गभेद करैत रैह गेल? ओकरा खिहारबा काल लोक किए ने अगुआएल? 4. मिथिला मैथिली आंदोलनक जड़ि मे सब जाति के सब इलाका के लोक सब किए ने अछि. लोक के भ्रम मे किए राखल गेलै जे सबहक मिथिला आ सबहक सहभागिता बेर मानकी आ जातिवादी चाबूक. 5. मिथिला मैथिलीक यथार्थ के झंपबाक प्रयास हरदम होइत रहल तेकर बिरोध मे लोक किए नै आएल. गिरोहवादी चटिया बना धूर्तै होइत रहल तेकरा रोकनाहर मे के सब आगू आएल? कियो ने? 6. मैथिली भाषा के अकादमी पुरूस्कार विभागीय नोकरी चंदा/ समारोह तक ओझरा देल गेल? यथार्थ देखितौ लोक बिरोध मे किए ने आगू अबैए? केकरा कोन माने मतलब? 7. मैथिली के अष्टम सूची मे जोड़ाएब सेहो एकटा पेटपोसुआ रणनीति रहै आ तेकर लाभ पेटपोसुआ सब के वाजपेयी जीक अशीर्वादे रूपे प्रसाद भेट रहल 8. मैथिली आंदोलनक नाम पर कतेको संस्था बनल होहकारी सेहो भ रहलै आ मिथिला राजक आ मैथिली भाषा के नाम पर फेर स लोक के ठकबाक नीक स्वांग रचल जा रहल? 9. मिथिला मैथिली दैनिक अखबार चैनल तक नहिं आ गुमाने चूर जे करोड़ो मैथिली भाषी? साहित्यक पत्रिका छापि सोझहे दोकनादारी टा होइत रहलै आ पद कब्जिऔने राखल गेलै. 10. जंतर मंतर पर जा चारि टा चेला चटिया संगे अनशन पर बैसि नेतागिरी वला फोटो देखा मिथिला राजक सपना? आ पटनाक गांधी मैदान मे आंदोलन बेर डरे लघ्घी भऽ जाएब. मैथिली आंदोलनक प्रयास:- 1. मिथिला मैथिलीक आंदोलनक प्रयास मे दू तरहक लोक लागल यै. एकटा एहेन जेकरा लगै छै मिथिला मैथिली मे बदलाव हेतै आ समाजक लोक जागरूक हेतै? 2. दोसर कतेक एहनो अछि जेकर एकमात्र धियेए जे मिथिला मैथिली हो हो क फेर स आधिपत्य बनौने रही. आ देखावटी केने संपूर्ण मिथिला के गप कहि लोक के ठकैत रही. 3. मैथिली स लाभ लेनिहार सब कहियो मैथिली आंदोलन मे आगू नै आएल? ओकरा तनखा उठलै अप्पन पेट भरलै धैन सति लै मिथिला मैथिली? 4. दरभंगा मधुबनी छोड़ि आन जिलाके लोक वा आन जिला मे मैथिली आंदोलन किए ने भ रहलै. मिथिला राजक नक्शा बेर सबटा मिथिले आ पुरूस्कार बेर सहभागिता बेर दूए चारि टा जिला किए? आन जिलाक लोक किए ने आंदोलन करैए? 5. आंदोलन स पहिने समावेशी मैथिली लेल किए ने कहियो डेग आगू बढ़ल? समावेशी मैथिली के बेगरता किए नै बुझाएल आ आंदोलनक नाम पर हो हो टा होइत रहल? 6. मिथिला मैथिली मे निष्पक्षता अबै सब लेल एक समान अवसर बनै तै लै किए ने आंदोलन भेल? मैथिली मानक मे बदलाव लेल किए ने अनशन आ बिरोध प्रदर्शन भेल? 7. मिथिला मैथिली मे धूर्तै के पराकाष्टा रहलै तइयो लोक बिरोध सवाल जवाब बेर चोरनुकबा किए बनल रहल? आभासीओ पटल पर आगां नै अबैए त परोछ रूपे सोझहा किए आउत? समाधन:- 1. मैथिली मानक मे बदलाव आनि संशोधित केने बारहो बरण के शैली के लिखबा बजबा काल मैथिली रूपे मोजर दिअ परत. मिथिला समाज के आमजन तक मैथिली साहित्य के पहुँचाबै पड़त. 2. मिथिला मैथिली मंच के समावेशी बना बारहो बरण स योगय लोक के ताकि हेर के बेरा बेरी मौका दियै पड़त? मैथिली के निष्पक्ष वेबस्था बनाबै पड़त. सब जिला आ सब जातिक लोक के सहभागी बनाबै लै निष्पक्ष डेग आगू बढ़बै पड़त. 3. चोरनुकबा बनने काज नै चलत. यथार्थ देखा तका मिथिला मैथिलीक धूर्त ठकहर पेटपोसुआ सबके खिहारै पड़त. कवि सम्मेलन लोकार्पण पुरूस्कारी धूर्तै सब अविलंब बंद करै पड़त. 4. मिथिला मैथिली के यथास्थिति आ टेक्नीकल मेकानीज्म के आम लोक जन तक स्पष्ट रूपे देखार चिन्हार करै पड़त. पब्लिक यथार्थ देखि बुझि अपने आंगोलनरत हेतै? 5. मैथिली दैनिक अखबार चैनल पत्र पत्रिका के स्थापित करबा मे सामूहिक सहयोग करै पड़त? मिथिला मैथिली नाम पर लाभ लेनिहार सब पर प्रशन चेह्न लगा सवाल जवाब करै पड़त. 6. अकादमी पुरूस्कार मिथिला रत्न चंदाखोरी वरिष्ट साहित्यकार, आंदोलनी सब वला सबटा नटकबाजी बन्न करै पड़त. एहि स नीक जे मैथिली साहित्य के समाज स जोड़ू आ विकसित मिथिला लेल सामूहिक प्रयास भागिदारी करै जाउ. मोछ वाली मौगी (होली पर हास्य कथा) धनिक दोकान दिस सँ अबैत रही कि रस्ते मे खरंजे पर बिकाउ दास भेंट भए गेलाह पूछलनि बच्चा ई कहू करिया के कतहू देखलियैअ। हम बजलहूँ नहि यौ बाबा हम अहँ पोता के एमहर कहँ देखलहूँ। बिकाउ दास बजलाह धू जी महराज हम कारी सँ केस दारही कटाएब आ अहाँ हमरा पोताक भांज कहि रहल छी। लगैए जे आई होरी खेलेबाक निशा मे अहूँ मातले छी। हमरे खनदानी नौआ छल कारी ठाकुर एमहर बिकाउ दासक पोताक नाम सेहो कारी, दूनू गोटे नामक अनुरूप देखैयोअ में ततबेक कारी। कारी जतबाक देखबा में कारी ओतबाक उजर धब. धब आकेर मोछ, बड्ड ईमानदारी सॅ शाही अंदाज मे हजामत करैत छल। ओकरा मोछक आगू मे त राजा महराजक मोछ छुछूआन लगैए। बिकाउ दास के हम कहलियैन बाबा बुझहैए मे धोखा भए गेल कारी नौआ तए अपने बथान दिस भेटत ओम्हरे जाउ ने। ताबैत उतरभारी दिस सँ कारी अपने मगन में झूमैत चलि अबैत रहैए। ओनाहियो फागुन मे सभ अपना धुन में मगन रहैए। कारी के देखैत मातर बिकाउ दास बजलाह अईं रौ करिया एहि बेर जोगिरा गबै लेल नहि एबहि रौ तोहर सिद्धप वाली भाउज खोज पूछारी क रहल छलखुन जे एहि बेर किर्तन मंडली होरी गीत गाबि जोगीरा खेलेताह कि नहि। कारी मोछ पिजबैत बाजल भैया अहाँ जाउ ने भाउजी के कहबैन भांगक सरबत बना के रखतीह। हम सभ पहिने भगवति स्थान में होरी गीत गाबि अबीर चढ़ाएब तकरा बाद अंगने अंगने होरी खेलाएब। कारी के गप सुनि त हमहूँ राग मल्हार मे मोने मोन नाचए लगलहूँ जे आई भांग पीबि क कारी संगे खूम नाचब। एहि बिचार मे मगन रही की कारी बाजल किशन बच्चा अहूँ चलि आएब एहि बेर झाइल बजौनिहार लोक कम छै त अहाँ गीत गाबि झाइलो बजाएब। गाम घर मे नाटक खेलाई त हमही गीत नाद गाबै सँ ल के मंच संचालन तक करी। तहि दआरे निधोखे हम बजलहूँ बेस जाउ हम भगवती सथान में भेंट भए जाएब । दूपहर दू बजे किर्तन मंडलीक सभ कलाकार आस्ते आस्ते जुटान होमए लगलयै। कारी अपना दरवज्जा पर बैसी के चिलम फूकै मे मगन रहैए एक सोंठ खिचनहियै रहै की केम्हरो सँ मनोज क्रांतिकारी धरफराएल आएल आ कारी के देह पर धाईं दिस खसल। बाजल हौ कारी कक्का आई तोरे संगे होरी खेलाएब। एतबाक मे कारी फनकैत बाजल कह त एहनो खसान खसब होइत छैक एखने चिलमक आगि सँ मोछ झरैक जाएत। फेर मनोज बाजल हौ कक्का हमरो स बेसी त डंफाक ओजन छै तही दुआरे धरफरा गेलहूँ। तकरा बाद दूनू गोटे एक एक सोंठ चिलम खिचलक धआँ नाक दए के फेकलकै की कारी बाजल रौ भातिज किर्तन मंडलीक कलाकार सभ कतए नुकाएल अछि। एतबाक में हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल ढ़ूम.ढ़ूमबैत बुद्धना हरमोनियम पिपयबैत आ रामअशीष झाइलि झनकबैत तीनू गोटे तीन दिसि सॅं एकसुरे बजबैत आएल। ताबैत मे मनोज डंफा डूग.डूगबैत बाजल हल्ला गुल्ला बंद करू आ सुनु कारी कक्का के वाणी जी नहि त भरू ढ़ोलकिया के पानि जी। कि एतबाक मे कारी कठझाइल झनकबैत बाजल जोगी जा सारा रा रा त सभ गोटे एक सुरे बाजल सारा रा रा। बुद्धन बाजल रौ मनोजबा तेहेन शास्त्रीय राग मे पानि भरबाक लेल कहलीह जे दू.चारि टा छौंड़ा मारेर त डरे सँ भागी गेल। मनोज बाजल हौ भौया रंग घोरबाक लेल त पानि चाहि ने। रामअशीष बाजल हं रौ भजार ई त ठीके कहलीहि आब ई कह जे एहि बेर भाउजी के बनत। एतबाक में कारी मोछ पिजबैत बाजल रौ भातिज जूनि चिंता कर हम एखन जीवते छी। होरी मे कारी सौंसे गौआक भाउजी बनैत छलैक की बुढ़.पुरान की छौंड़ा मारेर सभ गोटे हंसी खुशी सँ गीत गाबि कारी संगे दिअर भाउज जेंका होरी खेलाइत छल। मनोज बाजल हौ कक्का माउगी बनबहक से साड़ी बेलाउज कहँ छह। कारी बाजल धूर रे बुरिबक जो ने तू अपने माए बला साड़ि नेने आ ने तोरे माए त हमरा भाउजे हेतीह। हौ कक्का तूं मारि टा खूएबह तोरा त बुझलेह छह हमर बाप मलेटी स रिटायर आ हमर माए सेहो मलेटी। ज ई सारी मे लाल पीअर लागल देखतैह त कतेक मुक्का मारत से कोनो ठीक नहि। अच्छा कक्का तू चिंता नहि करअ हम अपने कनियँ वला नुआँ नेने अबैत छी। कारी बाजल रौ भातिज तू बुरहारी मे हमरा गंजन टा करेमेह। हम ससुर भए के पूतहू देहक नुआँ कोना पहिरब रौ राम.राम। लोक त साड़ी देखैते मातर चिन्हि जेतैए जे ई तोरे कनियाँक नुआँ छै तब त लोको कोनो दसा बाँकि नहि राखत। बुद्धन कनेक बुझनुक ओ बाजल हौ तोरा डर किएक होइत छह कियो पूछतह त कहिअक जे ई त बुधनाक साउस के नुआँ छियैक। हमर साउस एखन अपने गाम आएल छथहिन। कारि ई सुनि चौअनियँ मुस्कान दैति एकसुरे दू गिलास देसी भांगक सरबत घोंटि गेल आ बाजल बुधन तूं हरमोनिया बजाअ ताबैत हम समधिन संगे होरी खेलेने अबैत छी जोगी जा सारा रा रा, कि फेर सभ एकसुरे गाबैए लागल जोगी जा सारा रा रा। हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल धूम.धूमबैत बाजल होरी मे कक्का करै छथि बरजोरी बुरहारी मे मोन होइत छनि थोरू थोरू जोगी जा सारा रा रा। मनोज डंफा डूग.डूगबैत बाजल हौ कारी कक्का एना किएक मोन लुपलुपाइत छह। कारी झाइलि झनकबैत बाजल रौ भातिज ई फगुआ होइते अछि रंगीन तोंही कह ने मलपुआ खेबाक लेल केकर मोने ने लुपलुपाइत छैक। हं हौ कक्का एनाहियो होरी मे नएका नएका भाउज सबहक गाल त मलपुए सन पुल पुल करैत रहैत छैक। कारी साड़ी पहिर अनमन माउगी बनि गेल मुदा मोछक देखार चिनहार दुआरे घोघ तनने। कारी हाथ सँ झाइलि ल हम गीत गाबि झाइलि बजबैत होरी गाबै लगलहूँ रंग घोरू ने कनहैया हो खेलैए होरी रंग घोरू ने सभ गोटे गीत गबैत भगवति स्थान बिदा भेलहूँ। भगवति के अबीर चढ़ा प्रणाम करैत मंडलीक सभ कलाकार अंगने अंगने होरी खेलेबाक लेल बिदा भेलहूँ। जेहेन घर तेहेन सरबत कतहु छूछे रंग टा। मुदा लोक हँसी खुशी सँ होरी खेलाई मे मगन, होइत होइत बिकाउ दासक दरवज्जा पर पहुँचलहुँ त होरी गीत शुरू केलहुँ हो हो किनका के हाथ कनक पिचकारी बुधना हरमोनियम पिपयबैत बाजल हो बिकाउ कक्का के हाथ कनक पिचकारी। एतबाक सुनितेंह विकाउ दास अपना बेटा के हाक देलखिहिन हौ मांगनि जल्दी सँ मंडली सभहक लेल दूध भांगक सरबत नेने आबह। ई सुनि हम सभ आर बेसी जोर सँ जोगीरा गबै लगलहूँ ताबैत मनोज एक आध बेर डंफा लेने धरफड़ा के खसि पड़ल। ओकरा उठेलहूँ आ सभ गोटे भरि छाक भांगक सरबत पीबि होरी गबै मे मगन। एम्हर जोगीरा देखबाक लेल कनिया.पूतरा धिया.पूता सभ घूघरू लागल। एतबाक मे सिद्धप वाली दाई अबीर उड़बैत एलीह आ हँसैत बजलीह गे दाए गे दाए ई नचनिहार माउगी के छीयैक, सुखेत वाली कनिया बजलीह माए इहेए चिन्थुहुन ने। दाई बजलीह चिन्हबै की पहिने रंग अबीर सँ देह मुँह छछारि दैति छियैक। दाई निधोखे रंग लगबै लगलीह की घिचा तिरी मे कारीक घोघ उघार भए गेलै। दाई बजलीह गे माए गे माए एहेन मोछ वाली कनियँ त पहिनुक बेर देखलहूँ। ताबैत कारी मुस्की मारैत बाजल भाउजी हम छी अहाँक दुलरूआ दिअर कारी। दाई एतबाक सुनि ठहक्का मारैत बजलीह अईं रौ मोछ वाली कनियाँ ला कनि तोहर मोछो कारीये रंग मे रंगि दैति छियौ। एकटा दिअर भाउज के निश्छल प्रेम त गामे घर में भेटत। तखने मनोज बाजल काकी ई कनियाँ पसीन भेल किने, दाई बजलीह हं रौ मनोज बड्ड पसीन भेल 60 वर्षक अवस्था में पहिनुक बेर देखलहुँ एहेन सुनर मोछ वाली माउगी। मैथिलीमे रचना चोरीक विकट समस्या आ समाधान मिथिला मैथिली स जुड़ल लोक सब एक नम्बर धूर्त,दलाल आ रचना चोर प्रवृति के होइए. इ कटु सत्य स्वीकारह पड़त. कुकृत्य क अहाँ सब कते दिन चोरनुकबा खेला खेलैत अप्पन कुकृत्यक झांप तोप करैत रहब? जसौती कमेबा दुआरे अहाँ मिथिला मैथिली के आयोजक प्रकाशक सलाहकार आदी बनल साहित्य अकादमी वला पुरूस्कारी आयोजनी वेबिनार मलाई खा ढेकरैत फिरै जाई छी से कते दिन छजत? पब्लिक अहाँ के कुकृत्य बुझि गेल यै आ कतेको बेर अोई साहित्यिक दलाल सबहक देखार चिन्हार भेल. तइयो लाजे कथिक निरलज्ज भेल चुपेचाप रचना चोरी क जसौती कमाई लै सबटा अपकर्म कुकर्म करैत रहै जाउ. धूर छिया. रचना चोरी समस्या के कारण:- 1. मैथिली के अधिकांश पत्र पत्रिका साहित्यिक गिरोहक अधिन त्रैमासिक छमाही द्वैमासिक रूपे बहराइत रहलै. जेकर पब्लिक तक कोनो पहुँच नै रहलै. 2. कोनो नीक रचना के चोरा के अपना नामे प्रकाशित क लेब. रचना पठौनिहार वा पब्लिक तक नै पत्रिका पहुँचै देबै आ नै रचना चोरी के दोख लागत. 3. रचना पठौनिहार के कोनो माध्यम स सूचित नै करब जे ओक्कर रचना प्राप्त भेलै प्रकाशित अप्रकाशित? आखिर की भेलै? 4. कोनो अपरिचित वा आन गिरोहक वा स्वतंत्र लेखक के मौलिक रचना के सद्य: वा की पैरोडी तोइड़ मरोईड़ के अपना नामे प्रकाशित करबाक ठकहर प्रवृति. 5. रचना चोर के देखार भेला पर ओकर सामूहिक प्रयास नै क ओई चोरबा चोरनी के गैंगवार बचेबाक प्रयास आ कुकृत्यक झांप तोप क मैथिली मे अहिना होइत एलैए वला राग अलापब. 6. काॅपीराईट अधिनियम के जानकारी नै राखब वा संपदाकीय मनमाना फार्मूला पर चलब. जे के की हमरा कए लेत? 7. रचना चोरी सिद्ध भेलाक बादो ओई रचना चोर सबके मंच देब आ अप्पन गिरोहबादी ठेकदारी के फिराक मे रहब. समाधान:- 1. रचना चोरी करनिहार पुरूष स्त्री जे कोई होऊ तेकर साहित्यिक बहिष्कार आ काॅपीराईट अधिनियम के दुआरा ठोस जुर्माना लगेबाक चाही. 2. रचनाकार के अहि बात के सूचना मेल वा लिखित वाट्सएप माध्यमे सूचना अबस्से दी जे ओकर रचना प्राप्त भेलै तकरा बाद प्रकाशित अप्रकाशित की भेलै. 3. काॅपीराईट अधिनियम के मानब आ जानकारी राखि निष्पक्ष प्रकाशक संपादक व्यवस्था के मजबूती स लागू करब. 4. अहाँ संपादक प्रकाशक के धर्म निरवाह करैत रचना मौलिकता के जाँच वा मौलिक रचना संग छेड़छाड़ करबाक प्रयास अबस्से करी. 5. मौलिक रचना प्रकाशन लेखन प्रोत्साहन दिस सामूहिक प्रयास मे भागिदार बनि रचना चोरी के रोकै मे सहयोग अबस्से करी. मैथिली फ़िल्म उद्योग अखनी तक आ नबका प्रयोग मैथिली फ़िल्म निर्माण अखनी तक संघर्षरत हाल मे हइ आ फ़िल्मी धारावाहिक सब कनि मनि मैथिली फ़िलिम बनैतौ रहै हइ बलू कै टा रिलीजो भेलै. लेकिन अखनी तक ओतेक काज नै भेलै जे फिल्म उद्योग नीक तरीका स स्थापित हो सकैतै? ममता गाबै गीत स लके अभी तक कते नबका फिल्म अइलै जेना सस्ता जिनगी महग सेनूर, लव यू दुल्हिन, सजना के अंगना मे सोलह सींगार, पाहुन, लेकिन अभी आौरी सुपर हिट फिल्म बनबे पड़तौ जइ स बेसी दर्शक सब देखतौ जुड़तौ. तोरा अरू के चिंता करै पड़तौ जे बेसी दर्शक केना जुटतौ आ नै त मैथिली फ़िल्म के हाल सेहो मैथिली साहित्य सन हो जेतौ जे देखलकौ पढ़लकौ दसो टा लोक नै आ पुरूस्कार बंटैत रह एक सै ढ़ाकी? मैथिली फ़िल्म उद्योग निर्माण अखनी तक:- 1. मैथिली फ़िल्म निर्माण धीरे धीरे डेग आगू बढेलक हई तबो बेसी दर्शक तक जुड़बा मे अभी असफल रहल यै. तकर कतेको कारण हइ क आ बलू छैहो. अभी समग्रता पर काज नै होलै जे चिंता के बात छहो. 2. बेसी मैथिली फ़िल्म धारावाहिक सब मे समग्रता के अभाव रहलै. उ फिल्म सबके संवाद पटकथा दृश्य देखला पर स्पष्ट हो जाएत जे इ सब चुपेचाप बाभनवादी मनोदृशय के पोस रहलै. मैथिली साहित्य जेंका फिल्मो वला सब एकभगाह बनल मानकी भजार खेला मे लागल हइ आ बारहो बरण के प्रसंग समस्या पर फिल्मांकन नै करलकै. 3. पैरोडी गीत संगीत मैथिली फ़िल्म के कमजोर कड़ी हइ तइयो फिल्मकार सब सचेत नै भेलै. मालिक गीत संगीत के धियान तोरा अरू के राखै पड़तौ भाई. 4. फिल्मकार, साहित्यकार, संगीतकार, गायक, कलाकार सब मे व्यबसायिक समन्वय आ सामूहिक भावना के खूब अभाव. मंगनीए सबटा काज सुतैर जाए बेसी लोक अही फिराक मे रहैए. पटकथा संवाद गीत लेखन लै लोक नै ताकल जाइए. जेना तेना बिध पूरा काज सुताइर लै जाइ हइ क. 5. निर्माता निर्देशक सब मैथिली फिल्म निर्माणक रिस्क स डेराइए स्वाभाविके? लागतो उपर हएत कीने से चिंता हरदम बनल रहै छै. दर्शक तक पहुँचै ले कोनो बेस सुभितगर प्रयास आ माध्यम के अभाव रहलै. 6. फ़िल्मकार सब सेहो मैथिली साहित्यिक गिरोह जेंका अपना मे बँटल हइ. कोई ककरो चर्च नै करतै आ नै प्रोत्साहन नीति पर काज करै जेतै. सब अपना ताले अगीया बेताल हइ. दर्शक स जुड़ै के कोनो चिंता नै हइ. फ़िल्मकार टैग भेट गेलै बस फूइल के तुम्मा. 7. मैथिली फ़िल्म स बारहो बरण के दर्शक जोड़बाक सामूहिक प्रयास चिंता के बड्ड अभाव रहल हइ. सीनेमा सशक्त माध्यम छै जे सब जाति वर्ग तक फिल्मांकन बाद पहुँचाएल जा सकै हइ. लेकिन मैथिली फ़िल्म उद्योग अइ मे अभी विफल रहलै. नबका प्रयोग सब हेबाक चाही:- 1. मैथिली फ़िल्म के दर्शक तक विभिन्न माध्यम सीनेपलेक्स सीनेमा हाल प्रेजेक्टर आदी माध्यम स पहुँचाबै पड़तै. 2. मिथिला मैथिली के समस्या, स्थानीय समाज जन जीवन, पलायन, वर्गभेद समस्या, शिक्षा स्वास्थ्य समस्या, आदी पर समग्र पटकथा संग फ़िल्म बनाबै पड़त. अइ स बेसी लोक तक मैथिली फ़िल्म पहुँच सकत. 3. मौलिक गीत संगीत पटकथा एक्शन मार धाड़, डायलग सब पर नबका प्रयोग क मौलिक रूपे फिल्म निर्माण पर काज करै पड़त. 4. बारहो बरण के दर्शक तक पहुंचेबाक प्रयास मे सब वर्गक संवाद शैली, जन समस्या, शोषण, सामंतवादी चलकपनी, भौगोलिक भेद भाव सबके दृशय फिल्मांकन पर नव प्रयोग करै पड़तौ. 5. गिरोहबादी वेवस्था के ध्वस्त क सामूहिक मंच निर्माण करै पड़तौ जतअ एक मंच पर फ़िल्मकार, प्रोड्यूसर, साहित्यकार कलाकार, संगीतकार, गायक, स्पाट बाॅय, सब मिली मैथिली फ़िल्म उद्योग के स्थापित करै मे एक दोसरा के प्रचार, व्यबसायिक सहयोग क बेसी स बेसी दर्शक तक मैथिली फिल्म्स के पहुँचबै के सामूहिक प्रयास मे भागीदार बनतै. मिथिला मैथिली के नाम पर दललपनी आ चलकपनी मिथिला मैथिली के कटु यथार्थ यै मैथिली नामे दललपनी करब पेट पोसब आ चलतपनी फिराक जे मैथिली सबहक छियैअ? की जे बारहो बरण के भरमौने रहब आ अप्पन सुआर्थ सिद्ध करैत रहब आ लोको के अप्पन कुकृत्य नै बुझह देबै. मिथिला मैथिली नाम पर कतेको दलाल आ तेकर गिरोह सक्रिय रहल आ मैथिली नामे लाभ ओकरे टा भेटैत रहलै. अहाँ कनियो जागरूक ही क बलू त ओई दलाल सब से पूछहू जे मैथिली बारहो बरण के लिखब बाजब के माोजर हुअ देलकै की? तोरा माई के बोल के संपादित कर जबरदस्ती मानकीकरण कर देल जाई होऊ कैले? की ऊ सब अपन माएक बोल छोड़लकै? त फेर तोरा किए अप्पन बोली छोड़ा देल जाई होऊ? तोरा अरू पिछलग्गू बनि अकरा मान लै छहू? तोरो अरू त अप्पन माईके बोली गिरबी राख दललपनी करले फिरै छहि. मानकी दलाल के त अप्पन माएक बोली छै ओकरा लाभे लाभ. तोरा अरू के की भेटलौ घरिघंटा? मिथिला मैथिली नाम पर दललपनी के आरंभ: 1. जहिए मैथिली महासभा गठित भेल तहिये से मैथिली दरबारी दलाल सबहक कब्जा मे आबि गेलै. ऊ सब सुनियोजित रूपे मैथिली अमैथिल आ मानक के डांइर खीच अप्पन आधिपत्य प्रभाव जमौनै शुरू केलक. 2. लोकभाषा मैथिली के मानकी बना ततेक ओझरा देल गेलै जे आम जन मैथिली स दूर होइत गेलै. यैह त मैथिल दलाल सब चाहैत रहै जे बारहो बरण के मैथिली नै रहू आ गिरोह महासभा वला सब सबटा फायदा लूटैत रहब. 3. बारहो बरण के मैथिली लिखब बाजब के मोजर नै केलकै आ नै हुए देलकै? तकरा राड़ कोसिकन्हा ठेठी, मधेसी दैछणाहा पैछमाहा बोली बना कहा प्रसारित केलकै? खाली मानक टा के मोजर हुअ देलकै आ ई सब अप्पन दललपनी दाउ सुतारैत रहल. 4. साहित्य अकादमी मे मैथिली के मान्यता के बाद त अई पेटपोसुआ दलाल सबके दुनू हाथे लड्डू. अकादमी पुरस्कारक दलाली गिरोहबादी होहकारी केकरो स छुपित नै रहलै. यैह सबटा साहित्य सेवी आ अनका ककरो साहित्य लिखबाक लूइड़ भास नै छै. यैह बात प्रचारित करबा इ सब अप्पन साहित्यिक रोटी सेकैत रहल. 5. मिथिला मैथिली के नाम पर कुकुरमुत्ता जेकां संस्था सब बनलै. छमाही तिमाही दूमासिक पत्रिका छापब शुरू कएल गेलै. आ तेकर पहुँच पब्लिक तक कोनो पहुँच नै रहलै. हं गिरोहक लोक सब एक दोसर के कवि कथाकार उपन्यासकार समीक्षक लेखक के तगमा बँटैत रहलै आ मैथिली नामे लाभ लूटैत रहलै. 6. मैथिली मे पछुआएल लोक, बिना चिन्हा परिचे वला, सोलकन, दलित लेखक सबके कोनो मोजर नै देल गेलै? नै इ सब आंदोलन क अप्पन मोजर लै गेल? उनटे मैथिल दलाल सबहक हं मे हं मिला मानक मानैत गेल आ मंच लोभे अप्पन मौलिक बोली के संपादित करा मानक बजैत गबैत भजैत गेल. 7. वाजपेयी जी के शासनकाल मे बभनौती खेला स मैथिली के अष्टम सूची मे जोड़ा देल गेलै. अइ के बाद त ई दलाल सब बेलगाम होइत गेलै. मिथिला मैथिली नामे मनमाना करैत गेल. के रोकतै के टोकतै एकदम मनमाना. फेर मिथिलाक्षर खेला सक्रिय रूपे चालू भेल आ हो हो शुरू छै. 8. मिथिला राज के बहन्ना बना हो हो क फेर स दलाली के नवका पटकथा लिखा गेल छै. जंतर मंतर पर अभिनय संवाद ढोंग सब चालू छै. लोक सब सेहो असलियत बुझहै लगलै जे दलाली के नबका नाम मिथिला राज. 9. साहित्य अकादमी, मैथिली भोजपुरी अकादमी, मैथिली अकादमी पटना, समिति, लेखक संघ सब वरचस्ववादी दलाल सबहक अड्डा बना देल गेलै. आ फेर मैथिली नामे एकाधिकार बना लाभे लाभ. मैथिली के गिरोहबादी दलाल सबहक हाथ सौंप देल गेलै. मिथिला मैथिली नामे चलकपनी:- 1. आम जन लोक समाज के हरदम भ्रम मे राखल गेलै जे मिथिला मैथिली सबहक हइ छै. आ मैथिली स लाभ ई दलाल सब टा कमाइत रहल. आम जन के मिथिला मैथिली स कहियो ने जोरल गेलै. 2. छूटल बारल लोक आ पछुआएल, दलित वर्गक सुनियोजित रूपे हरदम रस्ता रोकबाक प्रयास केलक. तइयो चलकपनी जे हम कोनो रस्ता रोकने छियै? 3. मिथिला मैथिली नामे बारल हारल झमारल लोक सब नै अई पेटपोसुआ दलाल सबके बिरोध कैलकै? आ नै करतौ? मंच लोभे लेखक तगमा लोभे ओहि दलाल सबहक संस्था मे शामिल हो जेतौ. औरी पाग पहिरले छिछिअले फिरतौ. 4. मिथिला मैथिली नामे विद्यापति के धो पका के खाएब बेचब आ सलहेश लोड़ीक दिना भद्री आदी के कोनो चर्च नै करत. तइयो होहकारी जे मैथिली सबहक छियै. सोलकन सब अपना महापुरूष के आयोजन नै करतौ हं अनकर आयोजन मे माला पहिर पिछलगुआ होहकारी बनतौ. 5. मिथिला रत्न/मैथिली पुरूस्कार, किदैन कहाँ पुरूस्कार बंटबाक खेल चंदा के धंधा केकरो स आब छुपित नै रहलै. तइयो निर्लज्ज बनल सबके भरमाबै जेतै जे मैथिली सबहक? आ चलकपनी क लाभ ले तूंही सब टा. 6. मैथिली बारहो बरण के नै हुअ देल गेलै आ चलकपनी केहेन जे हम केकरो कोनो रस्ता रोकने छियै? तोरा अरू के रस्ता रोक देल गेलौ त बिरोध कैले करबिही तोरो अरू दलाले संग भ जो आ गबैत रह मैथिली मे अहिना होइत एलैइए? अई दललपनी चलकपनी दुआरे मिथिला मैथिली खंड बिखंड होइत रहलै. यथार्थ बुझैतो सब निबदी मारने रहू. मिथिला के जनता जागरूक भ गेल तहिया त अई धूर्त सबहक दललपनी चलकपनी बंद भ जेतै. बीहनि कथा- बाबा भक्त कटाक्ष बाबा- एं हौ मैथिलीयो मे पत्रकारिता होई छै आ सम्मानो बँटा रहलै की? भक्त- हं त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका सबके पत्रकारिता कैह देल जाइ छै. मैथिली दैनिक वा चैनल रहितै त मैथिलीवला धनछोहा? बाबा- एं हौ साहित्यिक दलाल सब सेहो खूब करामात करै लागल? भक्त- ई सब त शेयर आ कोठा दलाल के पछुआ देलकै? दलाले दलाल? बाबा- बरहम बाबा तोहरे भरोसे? हे डाइन जोगिन के तकैत रहू? भक्त- हे झिझिया वाली दाई सब? लोक नृत्य कैह आरो अंधविश्वास के बढ़ाउ? बाबा- मोछ के मधमनी दिस घुमा देब? लहान मे आँखि के अपरेशन करा देब? पामर बला चशमा पहिरा देब? भक्त- यौ बाबा हम छी अहाँ के फैंस मिस ने करू डिल्ली बम्बई कमाई के चैंस? लोंगी डैंस लोंगी डैंस संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम - मंगरौना बकरी संस्कृति (व्यंग्य रचना) गाम मे बकरी पोसनैक चलन बढ़ि रहल अछि। जिनका बथान दिस नजर जाएत एकटा-दूटा बकरी जरूत भेटत। बकरी पोसनै सिहंता सेहो लगैत छै। ओनs भैं , ओनs में ..में..। सृष्टि दोसर के दलान पर बकरी देखि कs हबोडकार भsकs कानल कि माए हमरो बकरी किन दे। बकरी पोसवाक लेल सरकार लोन दैत छै। गरीब लोकनि लोन लेवा सँ कतरैत छथि। डर होएत छन्हि - लोन नहि चुकौला सँ घर केँ कुर्की जब्त भs जाएत। लोन तँ बैंक मैनेजर आओर हुनकर रिश्तेदार , अरोसिया-परोसिया केँ भेटैत छै। बैंक मे दौड़ लागाबैत थाकि जाएब, तबो नहि लोन भेटत। लोन अमीर केँ भेटैत छै जेना अंबानी केँ। बकरी केँ मूत खरैन-खरैन मँहकैत रहैत छै। ओकर नेरी बड़ि पैघ खादक काज करैत छै। भाँटा केँ जड़ि मे दियौ , तs भाँटा बड़ि फड़त। बकरी पालनैक देखौंस लागि रहल छै। बकरीक दूध डेंगू/चिकेन गुइयाँ आओर करोना केँ इलाज मे सरिपौंह कारगर होएत छै , की ? जनमौटी बच्चा केँ माएक दूध सँ पहिने बकरी केँ दूध देल जाएत छलैक। आब इहो संस्कृति बन्न भs रहल अछि। बकरी केँ खून सँ दवा सेहो बनैत छै। बकरा के गुर्दा नीक होएत छै। मौगी जाति केँ खून केँ कमी रहला पर बकरा के कलेजी खेबाक लेल डागडर कहैत छथिन्ह। बकरा केँ 'लेग' पीस नीक मानल जाएत छै। बकरा केँँ तेल नीक मानल जाएत छै। बकरा केँ मुड़ी और गोड़ नीक मानल जाएत छै। एकटा गप्प पर बहस छिड़ल छै कि 'गायक संस्कृति' नीक होएत छै कि 'बकरी संस्कृति' ? गाय आओर माए दुनू केँ स्थान सर्वोपरि मानल गेल छै। गाय केँ सेवा केला सँ स्वर्ग केँँ द्वार खुलल रहैत छै माए केँ सेवा केला सँ स्वर्ग केँ द्वार खुलि जाएत छै। 'गो सेवा' सँ पुत्र रत्न के प्राप्ति होएत छै। ' कामधेनु' केँ चरचा खूब होएत छै। गाय केर संस्कृति केँ सोझा करैत प्रेमचंद ' गोदान' लिखि देलथिन्ह। साहित्य मे गाय पर ढेर राशि लिखल गेल छै। बकरी पर लिखै सँ रचनाकार डरैत छथि। बकरी समाज केँ छोट तबका केँ प्रतीक छियैय। सभ किछु करू, परञ्च बकरी नहि पोसू ! बलि प्रदानक परथा अखनो धरि अछि। आश्विन मास मे माँ भगवती केँ अँड़िया छागड़ केँ बलि देल जैत छन्हि। ओइ कटनिहार केँ साहस देखियौ जे ओ पाँच-पाँच सै छागड़ एक दिन मे काटि दैत छथिन्ह दारू पी केँ। ओकरा पाप नहि होएत छै। क्याक तँ ओ भगवती केँ खुश रखवा लेल इ कट्टा-पिट्टी केँ काज करैत छथि। ओइ कटनिहार केँ समाज मे बेसी सम्मान छन्हि। कलियुग इएहा छियैय ! कहल जाएत छै हुनका पर भगवती स्वयं सवार रहैत छथिन्ह। जखन भगवती हुनका पर सवार रहैत छथिन्ह, तँ ओ दारू क्याक पिबैत छथि ? बिना दारू पिने कहियौन्ह हुनका छागड़ काटै लेल। बकरी लेल गाम, टोल आओर परिवार मे कलह बढ़ि रहल अछि। परिवार मे अइ गप्प लके झगड़ा रहैत छै जे बकरी के चराउत। सभ धिया-पुता कहतै अछि - ''हम नहि... तँ... हम नहि।'' बड घर मे कुत्ता पालल जाएत छै। कुत्ता लेल माँस अबैत छै। स्पेशल आहारक बेवस्था केल जाएत छै। शैम्पू आओर स्पेशल साबून सँ नहौल जाएत छै, सेंट मारल जाएत छै। कुत्ता बेड पर सुतैत अछि। कुत्ता हवाई सफर करैत अछि। परञ्च बकरी अपन भाग्य केँँ कोसैत अछि। बकरी पोसला सँ हाथ गरम होएत छै, परञ्च जिनकर जजात खा लैत छै, ओ 'पुतखौकी बकरीवाली' रूप मे आशीरबाद पबैत छथि। गाछक निमन-निमन पत्ता खैत अछि बकरी। गेहूँ, चना, मकई , गुल्लरिक पत्ता, शिरीठक लौजा पत्ता, जामुनक लौजा पत्ता बकरी के निक लगैत छै। बकरी केँ दाम अनमोल छै। 'बकरीद' पर कुर्बानी लेल लाखों रुपइया मे बकरी केँ पुत बकरा केँ किनल जाएत छै। आइ-काल्हि मिथिला मे मट्टन केँ चलन ब्याह मे बढ़ि गेल छै। बराती केँ अगबे बुट्टी चाही। कतेक बेर बुट्टी नहि पचल तँ अदरस भs गेल। ढेकार आओर मैदान जाएत-जाएत बराती फिरिशान भs जाएत छथि, परञ्च अगिला बराती मे जेबाक लेल फेर ताल ठोकि दैत छथिन्ह। मिथिला पोखरिक माछक लेल जानल जाएत छल, परञ्च आब ' मट्टन' लेल जानल जाएत। शिव चरचा बढ़ि गेलैक , तैओ मैथिल माँसाहारी पर जोर देने छथि। मिथिला मे पोथी-पतरा बचनिहार लोकनि मट्टन पर बेसी चोट करैत छथिन्ह। बकरी संस्कृति केँ कियो कतबो निन्दा क्याक नहि करतुहुन, परञ्च ओ नहि बदलतै। समाजक किछु लोकनि बकरी सँ आगाँ किछु नहि सोचैत छथि। मिथिला केँ लेल दुर्भाग्य अछि, जे ओ पछुएल छथि। पूरा भारत मे गायक गोंत, गोबर वगैरह केँ महत्त्वक चरता भs रहल छै। गोबरक महादेव बनाउल जा रहल छै। सरिपहुँ मैथिल अइ मामला मे पिछड़ल छथि। परिवार आओर समाज केँ पिछड़ै केँ पाँछा ' बकरी संस्कृति' छै। धिया-पुता केँ इस्कूल नहि भेज कs बकरी चरवाहाक डिग्री देनै कुनो भी कीमत पर उचित नहि छै। ज्ञान आओर समझ केँ अभावक कारणे बकरी संस्कृति बढ़ि रहल छै। बकरी पालनै गलत नहि छियैय। खयाल रखवाक छै जे बेटा-बेटी मे बकरी संस्कृतिक संस्कार नहि चलि जै। निक बनेनिहार लोकनि कम छै। दारू पिया कs बकरी जकाँ हुलुल-हुलुल नहि करवाक चाही। पढ़ने-लिखनै क्याक जरूरी छै, इ लोक बुझि जेतै, तँ सभ अपना धिया-पुता केँ जरूर इस्कूल भेजतै। बकरी जरूर पोसू। अर्थ रहतै तँ सभ किछु भs सकैए। ताहि लेल बकरी चराबैत रहु आओर पाठशाला सँ ज्ञान लेल सेहो जाऊ। ज्ञान भेला पर अपन कर्त्तव्य करबा मे आसान रहैत छै। अपन अधिकार केँ सेहो धिया-पुता बुझि जाएत छै। बकरी केँ संस्कृत शब्द रूप - ' अजा अजौ अजा: '.रटैत इस्कूल सँ एकटा विद्यार्थी निछोह गाम दिस कॉपी-किताब लकs परायल जाएत छै, क्याक तँ ओकर माए कहने छै जे दु घंटी पढ़ि कs इस्कूल सँ आबि जहिंए बकरी माठ पर , सिमराहा मे चराबै लेल। बकरी नहि चरेबीहि तँ खेबही की ; बाप तँ मरि गेलौ कलकत्ता ओगरने ! मणिकांत ठाकुर चिंता मामा चिंता मामा हुनक नाम नहि छलैन- हमही सभ से कहैत छलियनि।हमर पित्ती सभ आ गामक अंतरंग लोक सभ हुनका चिंता बाबू कहैत छलथिन मुदा नाम छलनि चिंतामणि मिश्र। हमरा मात्रिक में हमरे जकाँ ओहो पूर्वक भगिनमाने छलाह।सात भाई छलाह आ सभ भाई छ-फुट्टा जवान छलाह। रंग म्लान छलनि मुदा मोंछ स भड़क़दार लगैत छलाह। अधोवस्त्र नहि रहने बेशीकाल एकटा चद्दरिए ओढ़ने रहैत छलाह आ ताही परिवेश में हमरो गाम अबैत छलाह। परिवार निर्धन आ ज़मीन कम, तैं सभ एक्के संग रहथि, खेती-पथाड़ी सभ संगे करथि। आन भाई सभ द त नहि ज्ञात भेल कहियो मुदा चिंता मामा ज़रूर अपना बहीन अर्थात् हमरा माय आ धीयापूता अर्थात् हमरा लोकनि के कुशल मंगलक जिज्ञासा करए साल में दू-तीन बेर हमरा ओतए आबिए जाइत छलाह। अप्पन माम साल-दू साल पर अबैत छलाह मुदा चिंता मामा के अबाई अधिक नियमित छलनि। हुनका पर अतिथिक ऐतिहासिक परिभाषा बहुत किछु लागू होईत छल- “अतति निरंतरं गच्छति भ्रमति इति अतिथिः “ । हमरा ओहि ठाम स निवृत्त भ ओ अपना एकटा बहीन छलथिन लदारी गाम में - हुनके ओतए चलि जाइत रहथि। कहथि- जखन घर स निकलले छी त एक धाप ओहू ठाम जाए कुशल मंगल बुझिए आबी। हमरा घर में जे भनसिया छली से हुनका चलि गेला पर बहुत आफ़ियत अनुभव करैत छली जे एक कोहा अतिरिक्त भात आब नहि रान्हय पड़तनि। चिंतामामा कहिया औताह से अज्ञात रहितो हिनक़ा एबाक ख़बरि सहजे पूरा टोल में तुरंत पसरि जाइत छल। चिंता मामाक अबाई के सभ स पैघ आकर्षण रहैत छल हिनकर भोजनक प्रति स्नेह।भोजन काल में राति हो या दिन, कम स कम आठ-दास गोटा हुनका देखबा लेल त आबिए जाइत छलाह। ई सिलसिला चारि पाँच दिन चलिते छल।हिनक़ा आगू में सब स बड़का थारी में भरि क केवल भाते परसल जाइत छलनि सहो बिना सँठने किएक त शीघ्रे दोसर परिथन के प्रयोजन भ जाइत छलैक।ओ थारी लगभग हिनके एला पर बाहर होईत छल सुविधा ललेल। भातक हरेक परसन संग एक बट्टा क दालि, तकर तरकारी, चटनी आदि ज़रूर पडैत छलनि। तरकारी में अधिक काल सजमनि, क़दीमा, भाँटा बारीक सीम आदि बनैत छल। तरुआ, पापड़, दनौरी आदिक आवश्यकता नहि बुझल जाइत छलैक। ओ भोजन करए काल जल ग्रहण नहि करितथि कियेक त वैदजीक मनाही छलनि। लोको कहनि- औ सुअन्न खाऊ ने, पानि त घरो पर भेटत। एहि बात सभक अधलाह नहि मानैत छलाह- अवधारने छलाह।सज्जन लोक, धुआ-धाजाक हिसाबे बज़ैत कम छलाह। एक बेर चिंता मामा विदा होईत काल कहलनि- बौआ राति क जाड़ बहुत होईत अछि, से एकटा अंगा कि गंजी होईत त नीक। हमरा डर भेल जे हिनक़ा ने त हमर अंगे अँटतनि आ ने गंजीए देह पर चढ़ि सकतनि। देह हमरा स तिनगुन्ना।तखन निर्णय शीघ्र करबाक़ दबाव में हम कहल- मामा, अहां बरू हमर स्वेटरे ल लीअ। नमरि क आंशिको रूपे शरीर के ठंढा स सुरक्षा करत त हैत जे देह पर किछु सटल अछि। ओ तुरंते मानि गेलाह आ जखन आनि क देलियनि त पहिरियो लेलनि घीचि तीर क । छोट रहने कहुना आधा पेट पर आबि स्वेटर लटकि गेलनि। ओ ताहि स कनियों क्षुब्ध नहि भेला। हम तकरा बाद चरण-स्पर्श कैल आ ओ ख़ुशी ख़ुशी पच्छिम मुँह बिदा भेला। आहि रे बा, ओ चारियो डेग ने देने हेता कि पूब स झौं झौं करैत हमरा भाई के अलशीशियन कुकुर “बिजली”हुनका पर टूटल। ओ बाप-बाप करैत पड़ैलाह मुदा कुकुर छड़पि क हुनका लग तुरंत पहुँचि गेल। मामा पड़ा रहल छलाह आ कुकुर खेहारि रहल छल। लोक कुकुर के रोकबा लेल तरह तरह के आवाज़ क रहल छल मुदा बिजली लेखे किछु ने। आख़िर, हुनका घुट्टा धोती के पकड़ि क फाड़ि देलकनि। ओ दूनू हाथे कुकुर के प्रतिकार अथक प्रयास स हौ-हौ द्वारा करबा में व्यस्त छलाह आ ओमहर कुकुर छल जे मानए बला नहि। छाबा में हबकियए लेलकनि। कुकुर के पकडल गेल ताधरि देरी भ चुकल छल। तखन जल्दी स एकटा लालटेम आनि ओकरा मटिया तेल तेल के घाव पर भुभकाएल गेल। घाव के तेल स भिजा देल गेल जे बिक्ख नहि लगैन्ह। मामा आहत आ डेराएल घंटा भरि बिलमि कि आख़िर बिदा भ गेलाह। चारि पाँच मास गुदस्त भ गेल। बेचारी बिजली कुकुर एहि बीच शरीर छोडि देलक। हमर परिवार बहुत दिन धरि शोक-ग्रस्त रहल। ओ मनुक्ख जकाँ बात बुझैत छलि। गेंद पोखरि में फेकि देल जाइक आ जाड़काला क सर्द जलो में छड़पि क ओ बीच पोखरि स हेलि क गेंद आनि दैक आ मुँह दिश ताकि अगिला आदेशक प्रतीक्षा करैक। से बिजली हमरा सभ के छोडि क जा चुकल छल। ताही बीच चिंता मामा एक दिन समागत भेला। साँझ पड़बाक प्रतीक्षा ओ गामक बाहरे बैसि क कए लेने छलाह कुकुरक डsरे आ तखने चोरा नुका क कहुना दरबज्जा पर पाएर देलनि।अबिये हमरे स पूछि बैसलाह-बौआ कुकुर कहाँ अछि? हम उदास होईत कहल- बेचारी चलि गेल छोडि क हमरा सभ के। निश्चित करबा लेल पुनः पुछलनि- कहाँ गेल अछि? हम कहल- भगवान लग। की ने की बुझयलनि, तs फेर जिज्ञासा कैलनि- भगवानपुर में के छथि? हम ज़ोर स कहल- भगवानपुर नहि, भगवान ओतए।त बजलाह- की ओ कटही कुकुर मरि गेल? हम चुप्पे रहलहुँ। ओ तुरंत बजलाह- चलू नीक भेल, एहेन कुकुर केओ राखए ? मरि गेल, नीके भेल। मोन भेल जे कहियनि- अहीं ओकरा बदला मरि गेल रहितहुँ त नीक…। दरबजा पर पोखरि में महाजाल पड़ल छलैक। बहुतो फड़ीक रहु मांछ ऊपर भेल रहैक।संयोग जे चिंता मामा हमरे ओहिठाम छलाह आ वापस गाम जाइए बला छलाह। माए कहलथिन- भैया, दू टा रहु मांछक कुट्टी तरि क दैत छी एकटा चंगेरा में। कनी, हमरा भाई के घर पर आइए पहुँचा देबैक।हमरा भाई के मांछ नीक लगैत छनि। चिंता मामा सहर्ष स्वीकार क लेलथिन। अपनो भरि पेट मांछ भात खा क चंगेरा भरि तरल मांछक सनेश ल क बिदा भेला।समय बीति गेलैक। किछु मास पश्चात हमर मामा हमरा ओतए संयोग स पहुँचला। माय मांछक चर्चा केलथिन त मामा चुप।माए खरियारि कि फेर पुछलथिन त हुनक जवाब छलनि- नहि, हमरा सभ के त एकटा गैंचीओ ने भेटल, रहुक कोन कथा? तकरा बाद मामा चलि गेलाह। दसे दिन बाद संयोग स चिंता मामा पहुँचला।भोजन काल माए जिज्ञासा केलथिन- भैया, पछिला बेर थोडेक मांछ देने रही…। एतबा सुनब छल कि चिंता मामा भयातुर चेहरा बनबैत बजलाह- बच्चा, पूछू नहि। हमर त जाने बांचि गेल। बुझू जे अपटी खेत में प्राण चलि गेल छल। मांछक सुगंध पर कहाँ ने कहाँ स एकटा साँढ़ पहुंचि गेल। हमरा चारु नाल पटकि क सभटा तरल मांछ खा गेल। हम कहुना चंगेरा ओकरे लग छोडि लंक लगा क भगलहुँ जे जान बांचल।एहन साँढ़ नहि देखल बच्चा। हमर माए की बजितथि? कहलथिन- ओ ज़रूर पूर्व-जन्मक कुकुर रहल हैत…। फेर एकर चर्चा कहियो ने भेल। सनेस पठेबाक सिलसिला सहो बंद भ गेल। एक बेरक खिस्सा अछि, एकटा हिनकर पड़ोसी अपना भीजल खेत में बूट छीटए चाहैत छलाह। मुदा कातिक मास रहने, जन-बनिहारक बेशी कमी छलैक आ बेरो बीतल जा रहल छलैक। चिंता मामा सभ के संयोग स पता चललनि त अपना भैयारी में सलाह कए बेरिए में खेतबला ओतए पहुँचलाह। कहलथिन जे ई सभ बूट के टोभक प्रबंध क लेता आ खेत बला चिंता नहि करथि। 5 कट्ठा के कोला छलैक, मुदा बियाक जोगार भ गेलैन। बेशी घरे में रहनि मुदा किछु फरीक स पैंच ल क खेत पर जा, कोला भरि बूट छींटि एला। छलनि जे राति भरि में बूट फूलि जेतैक त भोरे पाँचो भाई जा क ओकरा टोभि लेब। खा पिबि क सभ भाई घूर लग बैसि गपशप कए रहल छलाह। ततबे में खेत बला ओतए धमकलाह आ ओसा क एक्केठाम कहि देलखिन - सुनू, बटाई के मादे हमर बिचार बदलि गेल अछि। खेत हम सभ अपने करब, बिया आ जनक प्रबंध सहो भ गेल अछि।मामा कहलथिन- हौ, हम सभ त जा क बीयो छीटि देल, आब ई कोन तमाशा करैत छह? वाद-विवाद भेल, मुदा खेत बला किन्नहु ने मानलक। कहलकनि- हम सवाई लगा क बिया काल्हि द देब, मुदा हमर अपने जन भोरे जा क टोभत बूट। ई बाजि क खेत बला चल जाइत रहलाह।मामा लोकनि विचारए लगलाह- झगड़ा झाँटी आब व्यर्थ। एना करी जे भोरे हुनकर जन तावत् पहुँचत, ताहि स पहिने हमहि सभ भाई आरि पर पहुँचि जाई आ बाओग भेल बूट के खेत में स बीछब शुरू कए दी।बूट फूलल रहतैक त की, घर आनि, धो-पका क जलखै क लेब। सैह भेल। जाधरि खेत बला जन ल क खेत पर पहुँछथि, मामा पाँचो भाई आधा स बेशी खेतक बूट बीछि चुकल छलाह। एहन कहियो ने सुनल ने देखल गेल छल। खेत बला आ पाँचो जन के त जेना अठबज्जर मारि देलकनि ओ दृश्य देखि क। मुदा आब कैए की सकैत छलाह? एमहर मामा सभ घर पहुँचलाह आ ओमहर खेतबला चिकरैत-भोकरैत गाम में पैसला। लोको सुनैक त आश्चर्ये करैक। मामा कहलखिन- औ पंच लोकनि, ई कनी टा बात नहि, खेत द क आ बूट छिटबा क तखन बात बदलि गेलाह। एहन कतहुँ लोक कएलक अछि? चलू, बूट त एक तरहें व्यर्थ नहि भेल मुदा हुनको अढ़ाएल जन के हर्ज क देला स हमरा सभ के ख़ुशी अछि। शशिकांत कर्ण बीहनि कथा-बड़का भक्त -बाबा!दुखना बड़का भक्त बुझाइए।घंटो-घंटा पिपरक गाछतर बैसि जप करैत रहैए। -हँ हौ। पहिने संतानलेल भगवान- भगवान करै छल,आब संतानदुआरे भगवान-भगवान करैए। सुभद्रा मिश्र भाव्या बीहनि कथा- हकार बहिन दाई ये बहिन दाई क'त छैथ....हकार पुरैए लए नहि जेतीह... बहिन दाई - धूर भोर सॅं हकार पूरैत पूरैत टाॅंग टटा रहल अछि।भरि टोल एक्के सॅंगे उपनयन मूड़न ठानि लैत छैक। छोटकी- चलथु ने.....लाल मैया बड्ड खेखनियाॅं करैत रहैथ..... कहैत छलीह कियो नहि अबैत अछि हमरा ऑंगन मरबा पर गीत गबैक लेल....दूनू साउस पूतोहुॅं रहैत छी बस। बहिन दाई - ऐं दू टूक सुपाड़ी पर दूनू सौस पूतोहुॅं नहि रहती त भरि टोलक लोक रहतनि....कहलके जे। चलु फूलक अंगना चलैत छी। हमर फूल सभ दिन रॅंग विरॅंगक बिगजी परसैत छथि सॅंग गीत गबैत-गबैत कॅंठ सुखाएत त ठंढा सेहो पिएती। बीहनि कथा- प्रपंच विवाहक बीस बरख बाद पूतोहु......माॅं देखथुन ने अहि बेर नैहर गेल रहि तऽ माॅं पायल आ कान महक देलक। सासु- बेस।भोग हुया। किछु दिनक पश्चात पितिया सासु- हे ये कनिया कनि हमरो देखय दिअ मायक देल गहना..... कनिया- देखथुन काकी। काकी- बड्ड दीप...... अपने किनने हैब फूंसियों के नैहरक पत्क्खा फहरबैत छी। कनिया- हिनका जे सोचवाक छैन्ह सोचौथ। किछु दिनक पश्चात- ये कनिया ओहि दिन जे गहना देखि हम नैहरक पत्क्खा बला गप्प कहने रहि.....अहिंक साउस हमरा अहाॅंस कहैक लेल कहने रहैथ। ज्ञानवर्द्धन कंठ क्ष त्र ज्ञ आइ उदयजीक नाम अखबारमे छपलनि अछि। भोरेसँ बधाइ देनिहारक धरोहि लागल छनि। ओ त' बिसरिए गेल छलाह जे ओ कहियो 'अभिनव मैथिल साहित्य विवेचन संस्थान'कें अपन नव रचना डाक द्वारा पठा देने रहथिन,मुदा एकटा भारी गलती भ' गेल रहनि। असलमे भेल ई रहैक जे कोपीक जे पन्ना अपन आलेख बुझि ओ फाड़ने रहथिन ओहिमे हुनक बउआ तीनटा अक्षर लिखने रहनि- क्ष त्र ज्ञ। ई ओकरे लिफाफमे ध' क' साटि देलथिन आ हिनकर लिखल रचना कोपिएमे रहि गेल रहनि। ताहूमे अजगुत ई जे हुलबुल्लीमे भेल एहि गलतीक भान हुनका आइधरि भेले नहि रहनि। ओम्हर डाक पहुँचलाक उपरांत भारी झमेला उत्पन्न भ' गेलैक। पन्नामे त' मात्र तीन गोट अक्षर लिखल रहैक,मुदा ई पन्ना पठाओल किनका गेल अछि,से बुझब मोश्किल भ' गेलैक। अंततोगत्वा लिफाफपरक प्रेषिती- प्रेषकक नाम देखि पंजीमे अंकित कय ओहि डाककेँ अध्यक्ष महोदयक सोझा उपस्थापित क' देल गेलनि। ओ ओकरा संस्थानक विद्वत्समितिक विचारार्थ प्रस्तुत क' प्रतिवेदन प्रस्तुत करबाक लेल निदेशित क' देलथिन। समितिमे गहन समीक्षा भेलैक।अध्यक्ष महोदय जरूर कोनो वैशिष्ट्य देखने हेथिन, तखने एहि विशिष्ट समितिकें एतदर्थ निदेशित केलथिन अछि। सांगोपांग विवेचन-उपरांत प्रतिवेदन निम्न प्रकारें अंकित क' अध्यक्ष महोदयक समक्ष प्रस्तुत कैल गेलैक- 'ई आलेख विलक्षण अछि। मात्र तीन गोट संयुक्त वर्ण नै केवल एकर शीर्षक थिकैक,अपितु एहीमे एकर असीम संभावनासँ भरल कथ्य सेहो समाहित छैक। जे एहिमे जतेक गहींर उतरताह से ओतेक मूल्यवान मोती पओताह।सभ दिनसँ स्वर वर्ण अ, आ, इ ,ई,... सँ शुरूह करबाक जे मिथ छल ताहिकेर जोरगर खंडन क' अंतिम पओदानपर ठाढ़ क्ष, त्र, ज्ञ सँ शुरूह आ अंत करब एकटा प्रबल आ नवोन्मेषी डेग कहल जा सकैछ। भिन्न-भिन्न ई तीनू वर्णकें एकसंग सटा क' लिखलापर एकटा सार्थक शब्द निर्मित होइछ -क्षत्रज्ञ अर्थात् क्षत्रक ज्ञाता वा मर्मज्ञ। एतय 'क्षत्र'सँ आशय छैक- बल,शक्ति वा सत्ता।तकर मर्म जे जानि गेल,से असल तत्व पाबि गेल। एवं प्रकारें एक संग ई तीनू वर्ण एकटा बड़का दर्शन धारण कयने अछि। ई संसारक अतिसूक्ष्म,किंतु सभक सार आत्मसात कयने बड़ मूल्यवान विमर्श दिस ल' जयबामे सक्षम आलेख अछि। एहिमे कथाक की कहल जाय,बड़का उपन्यासक बीज-तत्व समाहित छैक।जे जेहन क्षमतावान,से तेहन विस्तार पाबि सकैत अछि। ई तीनू वर्ण संयुक्त वर्ण थिक जे इशारा क' रहल अछि एकता आ एकताक शक्तिक महत्ता दिस। एहिमे कौमी एकता आ विश्वबंधुत्वक आह्वान समाविष्ट छैक। ई एकटा नवीन साहित्यक मानक उपस्थापित करैछ आ परंपरावादी जड़ता ओ प्रवृत्तिपर जोरगर प्रहार करबामे सक्षम सिद्ध भ' रहल अछि।चूंकि ई देवनागरी लिपिक तीन वर्ण धारण कयने अछि, एहि लेखपर संस्कृत, हिंदी,मैथिली एवम् अन्य ओ सभ भाषाक एक संग दाबी बनैत छैक जे एहि लिपिकें अपनौने अछि। आइधरि एहन बहुभाषिक आलेख कहियो केओ लिखनेहे नहि छल। ई विश्व-मानकक समक्ष एकटा पैघ डरेड़ पाड़ि रहल अछि। तें एहि अद्भुत रचना आ रचनाकारकें सम्मानित करबाक संस्तुति प्रदान कयल जाइछ।' भाषाक झौहरि डुमरा कोर्टमे महादेवक चाह-दोकानपर सँझुका साहित्यिक बैसार खूब जमैक।चारि- चारि खेप चाह चलि जाइक।कविता,कथा,विमर्श सभ किछु होइक।भाषाक बन्हन सेहो नहि रहैक।जाहि भाषामे मोन हुए,लिखू आ प्रस्तुत करू।अपन रचनापर प्राप्त समालोचना सुनि केओ रुष्ट नहि होथि।बड्ड आपकता रहैक। एक दिन एकटा गाहक ओतय चाह पीब' लेल बैसल रहथि।एकटा किशोरकेँ साइकिलसँ जाइत देखि ओ गर्द केलनि- "रे हे!कहमा जाइ हते सालकिल से?" ओ उत्तर देलकनि- "अमधुर-लूची लाबे!" एहि संवादक उपरांत ओतुक्का गोष्ठीमे बड़का विवाद भ' गेलैक।चाँदनीजी ओहि गोष्ठीमे नवे प्रतिभागी छलीह।कलेक्टोरेटमे हालहिमे ओ जॉइन कयने रहथि।ओ पुछि देलथिन- "ई कोन भाषा छियैक एतुक्का?" बेचैनजी कहलथिन-"मैथिलीए छियैक।ओकरे बोली भेलैक।" शीतांशुजी कहलथिन-"एकरा बज्जिका कहै छैक एतय। ई मैथिली..." उग्रेशजी बमकलाह-"ई मैथिली कोना भेलैक?साइकिलकेँ 'सालकिल',लतामकेँ 'अमधुर' आ लीचीकेँ 'लुच्ची' कहल जाइत छैक मैथिलीमे?अहाँ लोकनि त' मैथिलीक हाड़-पाँजर तोड़हेपर लागल छियैक।" आब लालेंद्रजी लाल भ' गेलाह-"ठीके ई मैथिली न हइ।मैथिलीमे 'परेशान' 'फिरसान' हो सकैय','स्कूल' 'इस्कूल' हो सकैय','कागज' 'कागत' हो सकैय',बलु 'साइकिल' 'सालकिल' न हो सकैय'।काहे त' हीन जे कह-बोल देलन ऊ मानक हो गेल आ एन्नेकारी के लोग बोल देलक त' न ऊ मैथिल,न ओकर भाषा मैथिली।वाह रे जबाना!" शीतांशुजी कहलथिन-"नहि-नहि,मैथिलीएक बोली भेलैक ई बज्जिका।" लालेंद्रजी-"अब इहाँ लगली पटियाबे।बज्जिका अलगे भाषा हइ, ऊ मैथिली कल्ला जतइ कहाबे?" बेचैनजी बेचैन भ' गेलाह।बजलाह-"यौ,किएक अपनेमे घोंघाउज करै जाइ छी?हिंदी जेहन दिल्ली-हरियाणामे बाजल जाइए,की बिहारमे सेहो ओहिना बजै जाइ छैक?सभ ठामक बोली भिन्न छैक,मुदा पोथीक भाषा की रहैत छैक?ओकर एकटा मानक छैक।संवादमे बोलीक प्रयोग भ' सकैए,मुदा लेखकीय भाषा मानक-आधारित हेतैक।" लालेंद्रजी-"त' धो-धो चाटल जाउ अपना मानककेँ।मानक अइसन होबे के चाही जे सभ के जोड़े।तोड़ेबला मानक के हमनी न मानब।" ई विवाद बढ़' लगलैक।आरो लोक एहिमे कूदि पड़लाह।चारि प्रकारक समूह बनि गेल। पहिल समूह मैथिलीक ओहि स्वरूपकेँ मानक लेल तैयार छल जे 'मिथिला मिहिर'मे लिखाइत रहैक। दोसर समूह मैथिलीक मानक स्वरूपकेँ मानैत संवादमे मैथिलीक विविध बोलीकेँ बढ़ेबा देबाक पक्षमे छल। तेसर समूह मूल मैथिलीक रूपेँ मिथिलाक समस्त क्षेत्रमे बाजल जाइबला मैथिलीकेँ स्वीकार करबाक आ करेबाक पक्षधर छल। चारिम समूह 'बज्जिका','अंगिका','ठेठी',सुरजापुरी आदिकेँ स्वतंत्र आ मैथिलीसँ फराक मानबाक पक्षमे छल। झौहरि होइत रहलैक।सभ अपने कहैपर छलाह,केओ ककरो सुन'लेल तैयार नहि छलाह। ई विवाद से रंग पकड़लक जे ताहि दिनसँ महादेवक चाह-दोकानक ओ बैसार उसरि गेल। केकर मौसा छियौ? बूढ़ा 'ए टी एम'मे पाइ निकाल' गेलाह।एगो बच्चा पहिनेसँ भीतर रहय।हिनका देखितहि बाजल - "मौसा हो? गोर लगै छियो।पाइ इकाले के हौ?लाब', इकाल दै छियो।बोल',पिन...! नअ'..पैसे न हइ 'ए टी एम'मे।न भेलो।ल' धरा अपन कार्ड।" बूढ़ा घुरल अबै छलाह।तावत बेटा फोन केलकनि- "बाबू हो?पैसा इकाललहू ह'?" बूढ़ा बजलाह- "न इकललइ ह'।'ए टी एम'मे पइसे न हइ।" बेटा-"एह, मोबाइल पर मैसेज एलो ह'।बीस हजार अखुनते इकल गेलो।" आब बूढ़ाक माथा ठनकलनि।रोड पर विलाप करैत जा रहल छथि- "बौओ रे बौओ! रे हम केकर मौसा छियो रे बौओ!" मैथिलीक पढ़ाइ -तोहर मातृभाषा? -कैला? -बाल-बच्चा कथी बजै छह? -हिन्दी बोलै हय। -स्कूलमे कोन भाषामे लिखै-पढ़ै छह? -कॉन्वेंटमे कथी होइ हइ, अंग्रेजिए चलै हइ। -कोन गीत सुनै छह? -ऊ त' बलु भोजपुरिये नीमन लगैय',झमकौआ! -विद्यापतिक नाम सुनने छहक? -कैला न?जय हो उगना महादेव!उगना हो मोर कत' गेला.... -मिथिला धाम कत' छैक? -ले बलैया के!हम सब कहाँ हती?हइ मिथिले धाम नु हइ, अपन जानकी माइ के धाम!इहो कोनो पूछे के बात हइ? -त' तों मैथिल छह कि नहि? -छेबे करियइ। -बंगाली कोन भाषामे लिखै-पढ़ै छैक? -बंगले नु, और कथी? -आ मराठी? -मराठिये। -आ गुजराती? -गुजरातिये। -तोरा मैथिली लिख'-पढ़' अबै छह किने? -समझ-बोल लै हतियै, महज लिखे-पढ़े न अबैय'। -से किएक? -सरकार पढ़े देतइ तब नु?कोनो इस्कुलमे पढ़ाइ होबे देतइ तब नु? -तों किछु नहि करबहक? -कथी करियइ?सभ गोरे त' कानमे ठेपी देलही हइ। भोगी बनलाह बाघ भोगी मैथिलीमे 'बी ए' की कयलाह,बड़का भोगे भोगि रहलाह अछि।जे सभ 'एम ए' रहय ओकरा त' परफेसरीओक आस रहैक,मुदा 'बी ए- बरद'क दरद के बुझैए?मैथिलीक परफेसर भ' सकैत छी,इस्कूलक मास्टर नहि।प्राथमिक कक्षामे जँ पढ़ाइ होइतैक,त' कनी गुंजाइश भइयो सकैत रहैक।मुदा भोगी बाजथि,त' बाजथि की?कहथि त' कहथि ककरा?गुड़क मारि धोकरे जनैए।भोगी पछिला रोटी खयने रहथि। जहिया सोचलनि 'एम ए' क' लैत छी, तहिया यूनिवर्सिटीए जवाब द' देलकनि।काउंटरपरक बाबू मुँह बिदूरि कहलकनि- "एतेक दिन कत' घास छीलैत रही? एडमिसने बन्न भ' गेल आब।पंछी चलल बासके त' जोलहा चलला घास के।" भोगी अपन भागपर अछतैत- पछतैत दिन गिन रहल छलाह। नहि जानि, कहिया दिन घुरतनि! मुदा एक दिन आन्हरोक लेल इजोत होइत छैक।भोगियोक भागक द्वार खुजलनि।भेलैक ई जे नवानीक चैती-दुर्गामे 'हिन्दुस्तान सर्कस' लगलैक।ओकर टेंट लागि रहल रहैक।भोगी लग सहटिक' एकटा सईस एलनि आ पुछलकनि- "कतेक पढ़ल छह?" भोगी बजलाह-"मैथिलीसँ 'बी ए' कएने बेरोजगार भेल फिफिया रहल छी।" पुछलकनि- "सर्कसमे काज करबह?" भोगी अकचका गेलाह -"आँय? सर्कसमे हम कोन काज करबैक?हम कोन काजक लोक छी?" ओ उत्तर देलकनि- "बाघ बन' पड़तह,नीक पाइ भेटतह।मंजूर हुअ त' मालिकसँ बात करा देबह।" भोगी कहलथिन-"हम मनुख त' ओतेक नहिए छी,मुदा बाघ बनि जायब,से ततबो नहि छी।" ओ कहलकनि-"तकर चिंता नहि करह।रिंग मास्टर रहैत छैक।सभटा सिखा देतौह।तों खाली 'हँ' त' कहक।" भोगीक मोन चपचपा गेलनि।अन्हरा चाहय दूनू आँखि।मालिक हिनका राखि लेलकनि।नकली खाल ओढ़ा बाघ बना पिंजरामे ढुका देलकनि।ओहिमे एकटा अजोध बाघ पहिनेसँ बैसल रहय।ओ हिनका देखि मूड़ी उचकाक' देह जोरसँ झाड़लक।भोगीक सिट्टी-पिट्टी गुम!बरहम बाबाकेँ गोहराब' लगलाह- "हे बरहम बाबा!एहि बेरहम बाघसँ बचाबह।बड़ी फँसान फँसल छी।आइ ई बाघ हमरा गिड़नेहे अछि।अपटी खेतमे हमर परान जा रहलए।बरहम भोज करेबह हे बरहम बाबा!अरौ तोरीक तोरी!इम्हरे आबि रहल अछि।बड्ड बरंबताह बाघ बूझि पड़ि रहलए..." तावत ओ बाघ बाघ-बनल भोगीक लग आबि गेल रहैक।भोगीक जीह सकपंज भेल रहनि। करेज भालरि जकाँ थरथर काँपि रहल रहनि।ओ बाघ धीरे-धीरे हिनका सूँघ' लगलनि।तखन ओ अपन मुँह हिनक कान लग ल' गेलनि।भोगी-बाघ बाघ-डरे आँखि मुनि लेलनि।तखने ओ बाघ हिनक कानमे फुसफुसेलनि-"तोहूँ मैथिलीएमे 'बी ए' कयने छह की?" अभिनव दधीचि अप्रैल,2021। इंदिरा गाँधी अस्पताल,नागपुर।आनल जाइत छथि एकटा पचासी सालक वयोवृद्ध।नाम छियनि नारायण दाभलकर।ऑक्सीजन-लेभेल भ' गेल छनि बहुत डाउन।लगैए,गछारने छनि कोरोना।बड्ड दिक्कम-सिक्कम छैक बेडक।बेड कम, रोगी बेसी।बेडक लेल अछरा-पछरी चलि रहल छैक।एत्तहि नहि, सभतरि।सगर देशमे यैह हालति छैक।कोनहुना जोगार लागि जाइत छैक, वयोवृद्धक लेल एकटा बेडक।राहत भेटैत छनि। दू घंटाक अभ्यंतर कोनो महिलाक कातर स्वर कर्णगत होइत छैक।ओकरो चाही अपन पतिक लेल एकटा बेड।कोनो भाइ-बहिन दया क' देथुन। सिउथक सिन्नूर बचा देथुन।प्राण आब-तब भेल छनि।साँस उपरे-उपर भेल छनि।गे मैया गे मैया!हा विधाता! नारायण सुनि लैत छथिन।दाभलकर अपन बेडसँ नीचाँ उतरैत छथि।सिस्टर दौड़ैत छनि- "हाँ-हाँ, अहाँ किएक बेडसँ नीचाँ उतरलहुँ?केमहर विदा भेलहुँ?बाथरूम जेबैक?नहि?घर आपस जेबैक?माथा खराप भ' गेल अछि?एहि हालतिमे?नहि-नहि।किन्नहुँ नहि..." डाक्टर लोकनिक मत छनि जे एहन हालतिमे जोखिम लेनाइ उचित नहि।नारायण जिद्द ध' लैत छथिन- "हम पचासी बरखक छी।अपन जिनगी जी चुकल छी।ओहि महिलाक पतिक बयस चालीससँ बेसी नहि हेतनि।छोट-छोट धीया-पुता हेतनि।हुनकर जिनगी जियान नहि हेबाक चाही।हम अपन बेड हुनका लेल रिक्त कर' चाहैत छी।" अस्पताल-प्रबंधन बुझेलकनि जे एहन कोनो नियम नहि छैक जे रिक्त बेड हुनके भेटनि,मुदा नारायण नहि-के-नहिये मानलथिन।बेटीक बात सेहो बेठीक लगलनि।घर आपस भ' गेलथिन।ओहि व्यक्तिकेँ बेड द' देल गेलैक।तेसर दिन दाभलकरक उर्ध्व-साँस चल' लगलनि।किछुए कालक बाद कालक कोरमे चलि गेलाह ओ अभिनव दधीचि। जालंधर-यात्रा परियोजना-ऑफिसमे आइ हूलि-मालि मचल छैक।जे साहेब हर संचिकापर 'विमर्श' लिखि संभाग-प्रभारीसँ तय-तमन्ना कयने बिनु कहियो 'यथाप्रस्तावित' लिखिते नहि छलाह,वएह साहेब आइ हाइं -हाइं फाइल साइन क' रहल छथिन।रतुका ट्रेन छनि।जहिया साहेब मुख्यालय छोड़ै छथिन तहिया हुनकर एम्बेसडरमे दूटा एयरबैग धराइ छैक।एकटामे पाइ भरल रहैत छैक।ड्राइवर शोएबकेँ सभटा बूझल रहैत छैक।साहेब क्वार्टर चलि गेलखिन।चलैसँ पहिने शोएबकेँ पुछलथिन- "दूनू बैग रख देलहू?" कहलकनि-"एमरी कोनो टसकबे न कलकै।एक्केगो बैग हय समानबला।" साहेब पैजामासँ बाहर।एकाउंट्स अफसरकेँ फोन लगेलनि- "का रे, हम मर गेली का?कहाँ हय साले कंपोनेंट इंचार्ज के नाती सब?आबे दे जालंधर से।" जवाब भेटलनि-"आ रहली ह' हमनी सर।पितायल न जाउ।" तकर बाद एकाउंट्स अफसर ऑफिसमे फनक' लागल- "तनको लाज लगै हय कोढ़िया कंपोनेंट इंचार्ज सब के?रे केकरा नाम पर कोनो दूगो पाइ दै हौ?ओकाद हौ केकरो बाप के?बमकल हौ साहेब।बेटा बेमार हइ, तैसे!आबे देही ओन्नी से।भेंट करेतौ बपहिया से..." तावत एकाउंट्स सेक्शनमे भीड़ लागि गेलैक।धाइं-धाइं स्टाफ सभ जूट' लगलैक।सभक लिफाफ ल' एकाउंट्स अफसर साहेबक क्वार्टरपर गेलाह।संगे टीशन छोड़ि एलथिन। आइ पंद्रह दिनक बाद साहेब घुरलाह अछि।कोनो कंपोनेंट इंचार्जक लिफाफ नहि पकड़ि रहल छथिन।सभ अचरजमे पड़ल अछि।एकाउंट्स सेक्शनमे फेर सभ जुटल।एकाउंट्स अफसर बाजि रहल छथि- "साहेब बदल गेलन साफे-साफ।बेटा के इंजीनियरिंगमे नाउँ लिखा के आयल रहलन।ततना न रैगिंग कलकै आ बरजोरी ड्रग्स खियाबे लगलै जे सनकल लेखा करै हइ।एक्केगो बेटा हइन।साहेब बड़ा रोऐत रहलथिन ह'।बोलैत रहलथिन ह'-हम त' बरबाद हो गेली हो ए.ओ. साहेब।भोग भोग रहली ह'।ई जालंधर-ट्रिप बदल देलको लाइफ।की होइय',की कहियो?गूड़ के मार धोकरे जनै हइ..." दीपिका झा बीहनि कथा- अपराधी तय अछि -- ऐं यै बहिन दाइ! ई बौआ राति क' बेसी काल दरभंगेमे किएक रुकि जाइ छैन..? नव बियाह भेल आ तहन एना...! -- ई त' कनियाँक दोख ने यै। घरबला पर ताकुत करौ। मोनमे मिल क' रहौ। -- से की कहै छथिन्ह.. हमरो घरमे हिनके घर बला रकन्ना छै। एसगर हमर बेटा के छोड़ि ई मधुबनी बाली नैहर ओगरने छै। कहै छै परीक्षा अछि। कोन खेल खेलाइ छै से ई सुद्धा की बूझौ... -- से सत्ते! आब नीक कुल- शीलक मनुक्ख भेटब कठिन...! राजनन्दन लाल दासः परिचय राजनन्दन लाल दास जन्म :5 जनवरी 1934 ई0 पिता स्व0 मनीलाल दास माता : स्व0 विद्या देवी जन्मस्थान : मातृक ग्राम : पटोरी, पंचगछिया, सहरसा पैतृक ग्राम : गोनौन, घनश्यामपुर, दरभंगा शिक्षा : एम0ए0 राजनीतिशास्त्र मे कलकत्ता विश्व विद्यालय सँ 1960 समाज, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास मे योगदान सचिव : अखिल भारतीय मिथिला संघ-1962 मैथिली संग्राम समिति-1967 मिथिला दर्शन प्रा0 लि0 कम्पनी सेक्रेटरी-1963 प्रकाशक : 'आखर' मैथिली मासिक-1967 प्रकाशित कृति : मौलिक: 1) सन्तो. मैथिलीक विभिन्न अधिकार हेतु क्रान्तिकारी नाटक-1970, 2) चित्रा-विचित्रा (आलेख संग्रह) – 2006, 3) प्रबोध नारायण सिंह (विनिबंध) साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित-2012, 4) मिथिला-मेथिलीक विकासमे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान (1974-2011), प्रकाशन वर्ष ज्ञात नै अछि। सम्पादन : 1) मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा, व्यक्तित्व ओ कृतित्व-1978 2) मुन्शी रघुनन्दन दास व्यक्तित्व ओ कृतित्व-1983 3) कर्णामृत मैथिली त्रैमाशिक-1981 सँ अद्यावधि सम्मान : 1) मिथिला विभूति, विद्यापति सेवा संस्थान, दरभंगा द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-1999 2) कल्याण पथदायिनी खुटौना द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2003 3) कर्णगोष्ठी धनबाद द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2004 4) मिथिला सांस्कृतिक परिषद जमशेदपुर द्वारा सम्मान-2004 5) चित्र-गुप्त सभा पटना द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2004 6) विद्यापति स्मारक मंच कोलकाता द्वारा सम्मान ओ प्रशस्ति-2008 राजनन्दन लाल दास विशेषांकक संरचनाक संदर्भमे इच्छा छल जे राजनंदनजीपर नीक जकाँ विशेषांक निकाली मुदा से संभव नै भऽ सकल। आ एकर कारण मात्र हमहीं सभ छी। जहिया विशेषांक केर घोषणा केने रही तहिया राजनंदनजी जीवित छलाह मुदा प्रकाशित करबा समयमे आब ओ एहि दुनियाँमे नै छथि। जे किछु भऽ सकल से तर्पण रूपमे बूझल जाए। एहि विशेषांक केर रचना राजनंदनजीक कालमे सेहो आएल आ हुनक मृत्युक बाद सेहो आएल तँइ लेख केर भाषा अलग-अलग भेटत। ओना तँ विदेहमे टाइप कएल रचना प्रकाशित होइत छै मुदा संयोग एहन जे बहुत रचनाक हस्तलेखे टा पी.डी.एफ रूपमे देबए पड़ि रहल अछि। पाठक एहि लेल माफ करताह। किछु एहनो रचनाक टाइपिंग नै भऽ सकल जे कि बहुत पहिने हमरा लग आएल छल। मुदा एखन जे भऽ सकल ताहीसँ जँ हम सभ राजनंदनजीकेँ स्मरण कऽ सकी तँ नीक रहत। भविषयमे हम सभ एहि हस्तलेखकेँ टाइप रूप अवश्य देब। मुकेश दत्त एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व: राजनन्दन लाल दास दिलीप कुमार झा, आदर्शनगर, नवटोली रोड, मधुबनी मैथिली माध्यमसँ प्राथमिक शिक्षा होइ सएह छलनि स्व. राजनन्दन लालदासक अंतिम इच्छा राजनन्दन लालदास आइ हमरा सभक बीच नहि छथि। सबकें एक दिन एहि धराधामकें छोड़बाक छै। हुनका एतेक मातृभाषा सेवा क' क' एहि धराधामकें छोड़ब निश्चिते आजुक युगमे बहुत सुखद आश्चर्य अछि।अपन जीवनकें कृतार्थ करब थिक। मैथिलीमे समय -समयपर एहन -एहन मातृभाषा सेवी,मनीषी सब होइत रहलाह अछि ,हुनके सबहक सेवा आओर हठयोगक परिणामस्वरुप एतेक अन्हर- बिहारिक अछैतो मैथिली साहित्य फरि -फूला रहल अछि। जेना कि सर्वविदित अछि राजनन्दन लालदास कर्णगोष्ठीक कर्णामृत पत्रिकाक माध्यमसँ लगातार उनचालिस बर्षसँ मैथिली भाषा साहित्यक सेवा करैत रहलाह।रचनामे नब लोकक प्रवेशक आग्रही छलाह।समकालीन मैथिली साहित्यमे अनेको एहन रचनाकार छथि जिनक पहिल रचना कर्णामृतमे प्रकाशित भेल छनि। जहियासँ हम मैथिली जगतकें बुझ' लगलहुँ ,मैथिली माध्यमसँ शिक्षा हुए से जतय कतहुँ अवसर लागल उठबैत रहलहुँ अछि।एहि यात्रामे हमरा तीनटा एहन मनीषीसँ साक्षात्कार भेल जे ओ लोकनि कहलनि बिनु प्राथमिक पाठशालामे शामिल भेने मैथिलीकें भविष्यमे संरक्षित राखब संभव नहि अछि। ओहिमे हमरा सर्वप्रथम भेटलाह स्वनामधन्य डा.जयकान्त मिश्र जे स्वयं एहि अभियानक नेतृत्व करैत रहलाह आओर कतहुँ ने कतहुँ सम्प्रति जे आन्दोलन चलि रहल अछि तकर प्रेरणास्रोत छथि।दोसर,छथि राजनन्दन लालदास जे प्रेरित तँ करिते रहलाह।स्वयं अस्सी बर्षक अवस्थाक पार रहितो एहि मुद्दाकें सरकार समक्ष उठबैत रहलाह।पत्रिकामे एहि बिषयपर लगातार लिखैत रहलाह।तेसर छलाह पं.चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर'।जिनकासँ हम जहिया- जहिया भेट कयल ओहो इएह बात कहलनि जे आब मात्र एक उपाय अछि,प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनय मैथिली। राजनन्दन लालदास चौरासी बर्षक अवस्थामे १४फरवरी २०१७क' भारतक महामहीम राष्ट्पतिकें मैथिली माध्यमसँ शिक्षाक लेल पत्र लिखलनि।भारतक राष्ट्रपति बिहारक मुख्य सचिवकें एहि बिषयपर संज्ञान लेबाक आदेश देलनि मुदा बिहार सरकारक लेल धनसन।आदरणीय दासजी हमरा पत्रक प्रतिलिपि पठौलनि ।हम मैथिली साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति,मधुबनीक माध्यमसँ यथासंभव प्रयास कयल।बिहारक मुख्यमंत्रीकें सेहो सेवायात्राक क्रममे मधुबनीमे एहि पत्रक प्रतिलिपि आओर ज्ञापन हाथोंहाथ देलियनि।माननीय मंत्री विनोदनारायण झा ,विधायक श्री रामदेव महतोक माध्यमसँ सेहो प्रयास कयल।चेतना समितिक मंचपर सेहो उठायल गेल।मुदा धनसन। मैथिली शिक्षाक माध्यम बनय।से विचार राजनन्दन लालदासक मोनमे कियै अबैत रहलनि? राजनन्दन लालदास मैथिलीक अनन्य उपासक छलाह.बंगालमे रहैत छलखह।ओतय बंगभाषीक मातृभाषा प्रेम देखि क' अभिभूत छलाह। बंगभाषी समुदाय अपना भाषाक विकासक प्रति सदति साकांक्ष रहलाह अछि।जे हमरा सबहक लेल प्रेरक अछि।अनेक बंगभाषी विद्वान मैथिली भाषा साहित्यक हित चिंतक रहलाह।मैथिली भाषा साहित्यक विकासमे सेहो सहयोग केलनि। देखि - देखि क' बहुतो मैथिल जे मातृभाषा प्रेमी रहथि ओहो सब अपना मातृभाषाक सम्मान लेल अनेक तरहक काज सब कयलनि।जाहिमे साहित्य लेखन ,नाटक मंचन,सांस्कृतिक कार्यक्रमक आयोजन, प्रकाशन, महाविद्यालय ओ विश्वविद्यालय सबमे मैथिलीक पढ़ाइ।ज्ञातव्य अछि जे सर्वप्रथम कोलकाता विश्वविद्यालयमे 1919ई. मे मैथिलीक पढ़ाइ आरंभ भेल।ओतय बाबू साहेब चौधरी,मिथिलेन्दुजी,प्रबोध नारायण सिंहक प्रभाव राजनन्दन लालदासपर पड़लनि ओ कर्णामृत पत्रिका प्रकाशन करय लगलाह संगहि प्राथमिक शिक्षामे मैथिली लागू होअए सेहो ध्यान देबय लगलाह।एहि सम्बन्धमे हमर विचार अछि मैथिल सब पछता रोटी खयने छथि।पहिने प्राथमिक पाठशालामे मैथिली लागू होअए से कोनो प्रयास नहि कयलनि।तें मैथिली विश्वविद्यालयमे तँ लागू भ' गेल मुदा प्राथमिक शिक्षामे आइ धरि उपेक्षिय अछि।एहि सम्बन्धमे बादेमे सही डा.जयकान्त मिश्र बहुत प्रयास कयलनि बादमे राजनन्दन लालदासक सेहो एहि अभियानमे योगदान छनि।हमसब जे 'मधुबनीसँ पाठशालामे मैथिली'अभियान आरंभ कयलहुँ तखनो ओ उत्साह बढ़बैत रहलाह।आइ डा.जयकान्त मिश्र ओ राजनन्दन लालादासक प्रेरणासँ हमसब एहि अभियानमे लागल छी एहि विश्वासक संग जे हमर पूर्बज सब भाषाक लेल जे त्याग तपस्या कयने छथि तकर प्रतिफल भटबे करत।जरुरति अछि सकल समाज एहिमे योगदान देथि।राजनन्दन लालदासक सपनाकें साकार करथि।वैश्वीकरण ओ बजारबादक एहि आन्हर दौरमे लोक भाषा ,लोक संस्कृति तेजीसँ विलोपित भ' रहल अछि।संसारक अनेक भाषा लुप्त भ' गेल।मैथिलियोपर गंभीर संकट उत्पन्न छैक।अनेक रंगक षडयंत्र मैथिली भाषाक संग भ' रहल छैक।हिन्दी भाषाक साम्राज्यवादी स्वरुप मैथिलीकें घोटि जयबापर विर्त अछि।जखन कि हिन्दी स्वयं अनेक लोकभाषाक मिश्रण अछि। लोकभाषाक तिरोहित भेनाय हिन्दियोक तिरोहित भेनाय छी।से एखन भाषाविद नहि बुझि रहल छथि।खैर जे से ।नीतिक कहब छैक जखन सबटा डुबैत हुए तँ जैह बचा लेब सै बहुत तें मातृभाषाक लेल जे गोटे जाहि मोर्चापर काज क' रहल छथि सब प्रणम्य छथि।हम आदरणीय दासजीक मातृभाषाक लेल कयल गेल काजक लेल श्रद्धा निवेदित करैत छियनि।हमरा लेल सब दिन प्रणम्य रहताह। अजित कुमार झा, यजुआर, मुजफ्फरपुर वन मैन आर्मी : श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास मैथिली ई पत्रिका विदेह मे श्रद्धेय राम लोचन ठाकुर विशेषांकक उपरान्त किनका पर अगिला विशेषांक निकालल जाय से आशीष जी अपन फेसबुक वाल मे जिज्ञासा व्यक्त केने छलथि। एक्कहि क्षण मे हमरा मोन मे श्री राज नन्दन लाल दास जी केर नाम आयल आ हम आशीष जी केर पोस्ट मे हुनक नाम लिखि देल। ओहि केँ उपरान्त अनेको गोटे ओहि नाम केँ समर्थन कयलनि। हमर आनन्दक सीमा नहि रहल जखन आशीष जी अपन फेसबुक वाल पर घोषणा कयलनि जे  विदेहक अगिला संस्करण राज नन्दन लाल दास जी केँ समर्पित रहतन। हम अहि पर अपन प्रसन्नता व्यक्त कैल आ प्रत्युत्तर मे आशीष जी लिखलनि जे अहि अंक हेतु हमरो योगदान अपेक्षित अछि। हमरा मे ओ सामर्थ्य कहाँ जे हम हुनकर साहित्य ओ कृतित्व पर किछु लिखि सकी तखन हम आशीष जी केर आग्रह नहि टारि सकैत छी आ श्रद्धेय दास जी सँ जुड़ल अपन किछु संस्मरण लिखबाक लोभ सेहो संवरण नहि क' पाबि रहल छी। कृतित्व नहि त' व्यक्तित्वे सही किछु चेष्टा क' रहल छी। हमर जन्म कलकत्ता मे भेल छल आ शिक्षा दीक्षा सेहो ओत्तहि सँ। मैथिलीक लगभग समस्त कार्यक्रम देखबाक लेल बाबूजी आ परिवारक अन्य सब सदस्य सबहक संग उपस्थित रहैत छलहुँ। ओहि समय त' गीत नाद छोड़ि अन्य कोनो चीज आकर्षित नहि करैत छल मुदा जखन होश भेल आ बात सब बूझय लगलियै तखन समझ मे आयल जे माँ मैथिली केर सेवा मे समर्पित ओ व्यक्तित्व सब जिनकर भाषण सँ दूर भागैत छलहुँ तिनकर सबहक कि मोल छन्हि? एहन किछु व्यक्तित्व जिनकर सम्पर्क मे बिताओल किछु क्षण हमरा लेल अमूल्य धरोहर अछि आ हमर जीवन केँ एकटा नब दिशा प्रदान कयलनि ताहि मे सँ एक छथि श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी। कोलकाताक दुर्गा पूजा प्रसिद्ध छैक आ ओत्तह रहय वाला सब अहि उत्सव केँ दौरान उत्साह सँ ओतप्रोत रहैत छथि। ओहने उत्सव केँ उमंग कोलकाता पुस्तक मेलाक सेहो रहैत छैक। साहित्यक प्रति बंगाली सबहक प्रेम आ समर्पण देखि मोन मे लालसा होइत अछि जे माँ भगवती मैथिल सब केँ सेहो आशीष देथुन जाहि सँ हमर सबहक सूतल चेतना पुनः जागृत भ' जाय। घटना सन् 1987 केँ अछि । हम अपन मित्र मंडलीक संग कलकत्ताक पुस्तक मेला मे स्टाॅले-स्टाॅले घूमि रहल छलहुँ कि अचानक मैथिली पुस्तकक स्टाॅल देखि मोन गदगद भ' उठल। कहबाक प्रयोजन नहि जे ओ स्टाॅल कर्णामृतक सौजन्य सँ छल। पहिल बेर श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी सँ  गप्प करबाक अवसर भेटल। कोनो भाषाक लेल विपुल साहित्यक भंडार रहब कतेक जरुरी छैक से ओहि दिन हुनक सुनाओल कथा सँ बूझय मे आयल। अहिना साहित्य अकादमिक सूची मे मैथिली केँ स्थान नहि भेटल छलै। भारतवर्षक तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी मैथिली केँ साहित्य अकादमी मे स्थान देबय सँ पूर्व मैथिली पुस्तक सबहक एक प्रदर्शनी देखय चाहैत छलथि। डा० जयकांत बाबू कोना ओहि प्रदर्शनीक आयोजन लेल घरे घरे घूमि मैथिली पुस्तक सबहक ओरिआओन केने छलथि से खिस्सा कहलनि। पहिलबेर सहयोग राशि द' हम कर्णामृतक ग्राहक बनलहुँ। भारतीय वायु सेना मे सेवा समाप्तिक उपरान्त जखन मुजफ्फरपुर अयलहुँ आ पुनः भारतीय जीवन बीमा निगम केर समस्तीपुर शाखा मे पदस्थापित भेलहुँओ हमरा समस्तीपुर आ मुजफ्फरपुर मे सदस्य सबहक मध्य कर्णामृतक वितरण करबाक अवसर देलनि आ हम हुनक आज्ञा केँ शिरोधार्य कैल। एक दिनक घटना अछि हम ट्रेन मे छलहुँ आ हिनकर फोन आयल। हम ट्रेन मे छी जानि हुनका भेलन जे हम ड्यूटीक उपरान्त समस्तीपुर सँ मुजफ्फरपुर घुरि क' जा रहल छी तैँ  ओ कहलनि जे घर पहुँचि क' फोन करु। हुनका सँ फूसि नहि बाजि सकैत छी तैँ हम कहलियन जे किछु व्यक्तिगत जरुरी काज सँ दू दिनक हेतु कोलकाता लेल ट्रेन पकड़ने छी। हमर बात सुनि कहलनि जे कोलकाता आबि रहल छी त' काल्हि डेरा पर आऊ। हुनक आग्रह केँ हम कोना टारि सकैत छलहुँ? सी आइ टी रोड वाला पुरना डेरा त' देखल छल मुदा नबका डेराक कोनो जानकारी नहि छल। ओ हमरा बागुईहाटी सँ सम्भवतः 45 नम्बर बस पकड़य लेल कहने छलथि। ठीक सँ मोन नहि अछि। हम हुनक बताओल बस स्टैंड पर उतरि जखन फोन केलियन तखन हमरा पाँच मिनट प्रतीक्षा करय लेल कहलनि। हमरा भेल जे किनको पठा रहल हेथिन मुदा हमर आश्चर्यक ठेकान नहि रहल जखन ओ स्वयं ओत्तह उपस्थित भेलाह। सच पुछू त' हम लजा गेल छलहुँ कारण किछु महीना पूर्वहि हुनका ब्रेन हैमरेज भेल छलनि। माँ भगवतीक कृपा सँ ओ अपन बीमारी केँ मात दय पुनः माँ मैथिलीक सेवा मे एकाग्र चित्त भ' लागि गेल छलाह। खैर घर पहुँचि हाथक इशारा सँ हमरा बैसय लेल कहलनि आ पाँच मिनट केर समय मङलाह कारण हुनकर दम फूलि रहल छलनि। पाँच मिनटक उपरान्त पुनः कथा वार्ताक दौड़ शुरु भेल। कर्णामृतक भविष्य केँ ल' क' चिन्तित छलथि। मैथिली केँ अष्टम सूची मे स्थान त' भेटलै मुदा एखनधरि प्रारम्भिक शिक्षाक पढ़ौनी मैथिली मे प्रारंभ नहि भ' सकल अछि ताहि लेल सेहो चिन्तित छलथि। अपन आगामी पुस्तक " मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्ण गोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान (1974-2011) " केर प्रकाशन पर विस्तृत चर्चा भेल। मुम्बई केर कर्ण गोष्ठी संस्था हिनका अपन  कार्यक्रम मे सम्मानित करबा लेल उत्सुक छलथि मुदा कोनो सम्मान समारोह मे खर्च करय सँ नीँक ओहि राशि सँ कोनो पुस्तक केर प्रकाशन भ' जाइ से हिनका उपयुक्त बुझेलनि। अहि बात केँ जानि प्रसन्नता होयत जे मुम्बई केर कर्ण गोष्ठी संस्था हिनक बात सँ सहमत भ' गेलाह आ उपर्युक्त पुस्तक केर प्रकाशन ओहि संस्था द्वारा संभव भेल। मिथिला-मैथिली अभियानी द्वारा  प्रस्तुत कयल ई एक अद्भुत उदाहरण अछि जाहि सँ प्रेरणा लेबाक प्रयोजन अछि। कोनो सम्मानित मंच पर पाग दोपटा पहिरि क' सम्मानित होबय सँ बेसी प्रिय हिनका लेल पुस्तकक प्रकाशन रहलनि अछि। बहुत रास गप्प भेल आ लगभग दू घंटाक उपरान्त हम ओत्तह सँ विदा होबय चाहैत छलहुँ मुदा हुनका द्वारा संग मे बैसि भोजन करबाक आग्रह नहि टारि सकलहुँ। हुनकर नतिनी हमरा सब केँ परोसि क' भोजन करौलनि। राति जखन हमरा सँ गप्प कय फोन रखने छलथि तखन हमरा विषय मे चर्चा केलखिन आ हुनक समस्या केँ समाधान हेतु ओ बचिया ओहि दिन कॉलेज नहि गेल छलीह। हमरा सन एक अति साधारण व्यक्ति लेल हुनकर मोनक उद्गार निश्चित रूप सँ हमरा लेल अविस्मरणीय क्षण अछि। ओनाहुतो पछिला तीस-पैँतीस बरख सँ ओ कतेको नवांकुर केँ प्रस्फुटित होयबाक अवसर प्रदान कयलनि अछि  आ निरन्तर सबकेँ प्रोत्साहित करैत रहलनि अछि। के कतेक आगू बढ़लाह से आब हुनक प्रतिभा, लगन, मेहनत आ समर्पण पर निर्भर करैत अछि। सन् 1987 सँ हम कर्णामृतक पाठक छी। बीच मे कखनो काल क्रम भंग सेहो भेल मुदा से फौजी जीवन मे स्थानान्तरण केँ कारण मुदा मौका भेटिते पुनः सहयोग राशि पठा नियमित भ' जाइत छलहुँ । हिनकर क्रान्तिकारी नाटक "सन्तो" पढ़लहुँ। " चित्रा विचित्रा" पढ़बाक अवसर भेटल आ अन्त मे " मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्ण गोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान (1974-2011)" सेहो पढ़लहुँ। सब एक सँ बढ़ि एक आ अहि पर अनेको गोटे अपन दृष्टिकोण रखताह। हिनकर सम्पादकीय एवं मिथिलाक समसामयिक विषय पर  आलेख मोन केँ छूबि लैत अछि। मिथिला एवं मैथिलीक सर्वांगीण विकास कोना होयत ताहि लेल निरन्तर अपन संपादकीय स्तम्भ केर माध्यम सँ निसभेर सूतल मैथिल केँ जागृत करबाक प्रयास करैत रहलनि। मात्र मैथिली लेखने टा नहि अपितु मिथिलाक्षर आ मिथिला चित्रकलाक प्रचार प्रसार मे लागल रहलनि। यात्री जी केर कहब छलनि जे आब नवतुरिए आगू आबौ आ हिनको प्रतीक्षा छन्हि जे कोनो नवतुरिया आगू बढ़ि हिनकर विरासत केँ सम्हारि लौ। आजीवन जाहि प्रतिबद्धता केर संग माँ मैथिली केर सेवा केलनि से निस्संदेह प्रशंसनीय अछि आ हमरा कहबा मे कनिको संकोच नहि भ' रहल अछि जे श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी " वन मैन आर्मी " छथि। हिनकर सम्पादकीय स्तम्भक एक शीर्षक हम एत्तह उद्धृत करय चाहब कारण लगभग 85 बरखक अवस्था मे हिनकर इच्छा छन्हि- " मैथिली केँ एकटा आर भगिरथ चाही।" मिथिला मैथिली आन्दोलनक पाथेय: श्रद्धेय रवीन्द्र जी जीबैत मुदा उपेक्षित लेखक सब पर विदेह डाट काम जे कार्य क' रहल छथि से निस्संदेह प्रशंसनीय अछि। श्रद्धेय राम लोचन ठाकुर जी एवं श्रद्धेय राज नन्दन लाल दास जी पर नीँक काज भेल मुदा ईश्वर केँ मंजूर नहि छलनि जे हुनका सबहक जीबैत मे ई कार्य पूर्ण होइत। खैर अपना हाथ मे त' प्रयासेटा अछि। शेष ईश्वर केर मर्जी। अहि कड़ी मे आशीष जी द्वारा अगिला नाम श्रद्धेय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी केर घोषणा भेल आ अहि महान मिथिला विभूति पर किछु लिखबाक हेतु हमरो आग्रह भेल। जीवन केर आपाधापी मे अहि कार्य हेतु अग्रसर नहि भ' सकल छलहुँ मुदा आइ श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू केर अवतरण दिवस केर अवसर पर आशीष जी केर पोस्ट देखि  अपन शिथिलता केँ त्यागि किछु लिखबाक हेतु प्रेरित भेलहुँ। वास्तव मे पुछु त' श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू पर अपन मोनक उद्गार केँ व्यक्त करबाक लोभ हम संवरण नहि क' पाबि रहल छी। प्रत्यक्ष रुप सँ श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू सँ गप्प करबाक हमरा सौभाग्य नहि प्राप्त भेल अछि मुदा तैयो हम अपना आप केँ अति सौभाग्य वान बुझैत छी जे मिथिला मैथिलीक मंच सँ अपन शब्दक जादूगरी सँ दर्शकवृन्द केँ सम्मोहित करैत हिनका हम लगभग दस-पन्द्रह बेर देखने छियनि। नेना भुटका रही आ मिथिला मैथिलीक लेशमात्र ज्ञान नहि छल तखनो ई मंच अपन चुम्बकीय शक्ति सँ हमरा खिँचैत छल तकर एकमात्र कारण छल श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू आ हुनक पार्टनर महेन्द्र जी। एक गोटे शब्दक जादूगर तँ दोसर स्वर सम्राट। श्रद्धेय रवीन्द्रजी ओना त' साहित्यक हर विधा मे लिखलनि आ धुरझार लिखलनि मुदा हमर मोनक कणकण मे हुनका लेल एकटा प्राकृतिक गीतकारक छवि बसल अछि। गाम-घर, बाध-वन, खेत-खरिहान, पाबनि-तिहार, विवाह दान, मुड़न-उपनयन आ अन्य समस्त अवसर हेतु सुपरहिट गीत हिनकर कलम सँ निकलल छन्हि। धीया-पुता, नवयुवक-नवयुवती सँ ल' क' सबहक मोनक उद्गार केँअपन अनुपम शब्द सँ गढ़ि माँ मैथिलीक कंठहार सजौने छथि। देशक विभिन्न शहरमे अतेक सालक अनवरत मिथिला मैथिली आंदोलनक उपरांत एखनधरि जे स्थिति छैक से बहुत हद तक निराश करय वाला अछि। मात्र आन्दोलन सँ जुड़ल संग्रामी मिथिला विभूति सबहक नाम पर एखनहु भीड़ नहि जुटैत अछि आ जखन भीड़े नहि जुटतै तखन आंदोलन हेतु प्रेरित किनका करबनि? गरीबक धीया-पुता पेट भरि भोजनक लोभ मे सरकारी स्कूल जाइत अछि ' मिड डे मील' लेल जाहि सँ अपन जठराग्नि केँ शान्त क' सकय आ ओहू लाथे किछु ज्ञान सेहो अर्जित क' लैत अछि । कम सँ कम शिक्षाक महत्व त' बूझय लगैत अछि। ठीक तहिना ( ई हमर व्यक्तिगत सोच अछि) श्रद्धेय रवीन्द्र जी मिथिला मैथिली आन्दोलन मे पाथेय केँ रुप मे कार्यरत रहला अछि। वास्तव मे हिनकर योगदान स्वर्णाक्षर सँ अंकित करबा योग्य अछि। हिनकर कणकण मे संगीत रचल बसल छन्हि। पूरा परिवारे संगीतमय छन्हि। ई ओहिकाल मे मंचक शोभा छलथि जखन अहि मंच पर साज बाज नहि पहुँचल छल तथापि हिनकर एक-एकटा शब्द कान मे मिसरी घोरि दैत छल। हिनकर गीत मे उत्सव, खुशी एवं टीसक अनुभूति होइत छल। ई कखनो हँसाबैत छलथि त' कखनो गुदगुदाबैत छलथि। कखनो प्रेमक अथाह सागर मे डुबकी लगबाबैत छलथि त' कखनो नयन सँ दहोबहो नोर झहराबैत छलथि। अद्भुत शब्द संयोजन आ सुमधुर कंठक आशीष हिनका माँ सरस्वती सँ भेटल छलनि। एकबेर एकटा कार्यक्रम मे राजकमल जी हिनका सँ जमसम निवासी महेन्द्र जी केँ भेँट करबेने छलखिन आ हिनका अपन गीत गाबय लेल देबाक आग्रह केने छलखिन। आखिरकार एक दिन अवसर भेटलनि आ दुनुगोटे संयुक्त रूप सँ एक कार्यक्रम मे " बाबा दंडोत, बच्चा जय सियाराम" गीत सँ जे धूम मचौलनि से फेर जीवन मे कहियो घुरि क' पाछू नहि तकलनि। एक केँ बाद एक एवं एक सँ बढ़ि एक सुपरहिट गीत सँ माँ मैथिलीक अक्षय कोष केँ परिपूर्ण करैत रहलाह। पिरिये परान नाथ सादर परनाम, चलू चलू बहिना जहिना छी तहिना, अहाँ लटर पटर कने कम करु, बाँहि मे रहू ने रहू, निहुरि निहुरि क' रोपय बहिना जन बोनिहारिन धान गे, पढ़ क का मे कि की कु कू बदाम के कै को कौ कं कः राम, बिलमि जो गुजरिया अहि मिथिला केँ धाम गे, रोटी अछि त' दुनिया हरियर बिनु रोटी के फाँका रोटी खातिर घेँट कटैया रोटी खातिर डाका आकि हम सच कहै छी नहि यौ आ कि हम गप्प हँकै छी नहि यौ (भांगड़ा धुन पर),  की थिक मिथिला के छथि मैथिल हम कहैत छी ओरे सँ  मिथिला वासी सुनु पिहानी हम कहैत छी ओरे सँ सन सन नाहि जानि कतेको कालजयी गीतक रचना कयने छथि श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू। पहिल मैथिली फिल्म " ममता गाबय गीत" मे विद्यापतिक एकटा गीत केँ छोड़ि अन्य समस्त गीत हिनके कलम सँ लिखायल अछि। एक सँ बढ़ि एक अद्भुत गीत अछि जेना: १. भरि नगरी मे सोर बौआ मामी तोहर गोर, मामा चान सन केँ.. २. अर्र बकरी घास खो, छोड़ि गोठुल्ला बाहर जो ...... ३. घर घर घुमि घुमि तोहर कथा ई बहि बहि कहत बयार चलल कहरिया जे कौने नगरिया.. ४. मिथिला केर ई माटि उड़ल अछि छूबय गगनक छाती भरि दुनिया केँ मंगल हो जन जन गाबय प्राती हाँ रे कहू भैया रामे राम हो भाई माता जे बिराजै मिथिले देश मे... मैथिली फिल्म " ममता गाबय गीत " केर निर्माता श्री केदार नाथ चौधरी आ महंथ मदन मोहन दास जी  छथि आ एकर निर्माणक क्रम मे नाना प्रकारक झंझावात सहैत आगू बढ़ैत गेलाह मुदा पैसाक तंगी आ निराशाक क्षण मे एक दिन अपन स्वप्न केँ मझधार मे छोड़ि भारी मोन सँ केदार बाबू अपन जीवनपथ पर आगू बढ़बाक हेतु सनफ्रांसिस्को विदा भेलाह। पहिल मैथिली फिल्म डिब्बा मे बन्द भ' गेल। जाहि फिल्म केँ महंथ मदन मोहन दास जी लाचारी मे भविष्यक जिम्मा लगा देने छलखिन तकर रील केँ लगभग अठारह वर्षक बाद बन्द डिब्बा सँ निकालि सिनेमा हाल मे प्रदर्शित करबाबय केर दुर्लभ काज अहि फिल्मक गीतकार श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी महंथ जी सँ लिखित अधिकार प्राप्त कयलाक उपरांत पूर्ण कयलनि। महंथ जी केँ शब्द मे- "रवीन्द्रे जी वीर बहादुर बनलाह" । श्रद्धेय रवीन्द्र जी केँ विषय मे केदार बाबूक शब्द जौँ हूबहू राखी त' - " उपनयनक समय मे ढ़ोल पिपहीक धमगज्जर ध्वनि मे लपेटल गीत, चतुर्थी रातिक कनियाँ-वरक प्रथम मिलन मे लजायल-सकुचायल सिहरैत गीत, दुरागमनक समय मे बेटीक नोर मे भीजल गीत, गामक छौंड़ीक काँख तर दाबल छिट्टा खुरपीक खनखन गीत। सभ गीत मे मिथिलाक माटिक अनुपम सुगन्धि"। अहि फिल्मक तेसर निर्माता भानु बाबूजे स्वयं अपन लिखल गीत अहि फिल्म मे देबय चाहैत छलथि से हिनकर गीत सुनि मंत्र मुग्ध होइत बाजल रहथि- " ई व्यक्ति जनिकर नाम रवीन्द्र नाथ ठाकुर अछि, विलक्षण प्रतिभाक स्वामी छथि। हिनकर गीत मे मिथिलाक संवेदनशीलता मुखरित होइए। हिनकर प्रत्येक गीत सँ एक नव खिस्साक निर्माण भ' सकैए। रवीन्द्रक गीत मिथिला मे गीत संगीतक एकटा नवयुग आनत तकर हम कल्पना करैत छी"। कतेक सटिक कहलनि केदार बाबू आ भानु बाबू। वास्तव मे गीत संगीतक एकटा नवयुग अनलनि ताहि मे कोनो संदेह नहि। सच पुछु त' हिनक विपुल रचना संसारक ज्ञान हमरा नहि अछि मुदा हिनकर पंच कन्या आ रवीन्द्र पदावली एखनो अछि हमरा पास मे। किछु पुस्तक केओ ल' गेलाह से फेर द' नहि गेलाह।  ई पोथी सब हमर बाबू जी  स्वयं श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू सँ हुनक कलकत्ता ( एखुनका कोलकाता) यात्राक क्रम मे प्राप्त केने छलथि।  हिनकर रचना सब एकठाम संकलित कय पुनः प्रकाशित होयबाक चाही। एकटा कार्यक्रम मे श्रद्धेय रवीन्द्र बाबूक उपस्थिति मे मंच पर हिनकर रचना केँ कोनो सज्जन अपन  टटका रचना बाजि पाठ कयने छलाह। एहन धृष्टता जौँ हुनका सामने भ' सकैया तखन परोक्ष मे के देखय जायत? एकर संरक्षणक आवश्यकता छैक। अपन आबय वाला पीढ़ी केँ आखिर कोना सही बातक जानकारी भेटतनि। मात्र पोथी प्रकाशनेटा नहि मुदा डिजिटल रुप मे सेहो आनल जाय। मिथिला मैथिली आन्दोलन मे हिनक योगदान केँ बिसरल नहि जा सकैत अछि। हिनक शब्द अमर छन्हि, हिनक स्वर अमर छन्हि। अंत मे जौँ एकटा गीतक चर्चा नहि करब त' हमर मोनक उद्गार अधूरा रहि जायत किएक त' माँ आओर मातृभाषाक अनादर पाप अछि आ नहि जानि कतेक बेर ई गीत सुनि हमर नयन सँ अश्रुधार बहल अछि- जन्म देलनि माय थिकीह, सेहो कने सोचू हमरा कि हमरा त' उसरल बजार बुझु चिट्ठी केँ तार बुझु, बुढ़िया बेमार बुझु ............................................. विशेष: श्रद्धेय रवीन्द्र बाबू केँ सादर समर्पित करैत छियन। ओ स्वस्थ रहथि आ हुनक आशीष हमरा सब पर बनल रहय। कोनो गलती भेल होएत त' क्षमा करब। अशोक सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ कर्णामृत जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ साहित्यकार-सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास भाषा साहित्यक विकासमे पत्रिका सबहक योगदान महत्वपूर्ण होइत अछि | पत्रिका आंदोलनक काज करैत अछि | नव लेखक-वर्ग तैयार करैत अछि | नव पाठक वर्ग तैयार करैत अछि | लेखक सबहक रचनाक माध्यमसं समाजक अतीतक मूल्यांकन करैत अछि, वर्तमानक समीक्षा करैत अछि, भविष्य लेल किछु लक्ष्य निर्धारित करैत अछि | ई सभ करबाक लेल एकटा कुशल नेतृत्वक आवश्यकता होइत अछि, जे सम्पादक होइत छथि | मैथिलीमे पत्रिका प्रकाशनक इतिहास सय बरखसं अधिकक अछि | दरभंगा, पटनाक अतिरिक्त मिथिलांचलसं बाहर जाहि-जाहि ठाम किछु रचनात्मक काज भेल ओहिमे कोलकाताक स्थान महत्वपूर्ण रहल अछि जत’सं मिथिला दर्शन आ ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक प्रकाशन होइत रहल अछि | कर्णामृतक चारि दशकसं बेशीसं नियमित प्रकाशित होइत आबि रहल अछि | एहि पत्रिकाक नियमित प्रकाशनक श्रेय निश्चित रूपसं सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दासजीकें देब’ पड़त | पत्रिकाक नियमित प्रकाशनक लेल जतेक कौशलक आवश्यकता होइत अछि ताहिसं लगैत अछि जे एहि कार्यक लेल अनुभवी कुशल सम्पादकक निर्देशनमे काज करबाक आवश्यता होइत अछि | हमरा नहि बूझल अछि जे आदरणीय श्री राज नन्दन लाल दास जीकें कोना ई कौशल प्राप्त भेलनि | पत्रिकाक कोनो अंक उठाक’ देखू त हिनक कौशल दृष्टिगोचर होइत अछि | हमहूँ कर्णामृतक नियमित पाठक रहल छी | किछु अंकमे हमरहु किछु कविता प्रकाशित भेल अछि | हम एखनहु एहि पत्रिकाक प्रशंसक छी| पत्रिकाक किछु पुरानो अंक सभ सुरक्षित रखने छी | पत्रिकाक शारदीय विशेषांक आ अन्य विशेषांक सभ बेश लोकप्रिय आ संग्रहणीय होइत अछि | हमरा समक्ष शारदीय विशेषांक अक्टूबर-2010 अछि | मुखपृष्ठपर प्रकृतिक कलात्मक अभिव्यक्तिक रूपमे मनोहर दृश्यक छायांकन अछि | एकर भीतरक पृष्ठपर ‘कर्णगोष्ठी’ द्वारा प्रकाशित बीसटा महत्वपूर्ण पोथी सबहक मुखपृष्ठक छायांकन अछि | पहिल पृष्ठ एकटा विलक्षण सूक्तिक संग आरम्भ होइत अछि : समाज, साहित्य,संस्कृतिक पुनर्निर्माणक पत्रिका कर्णामृत मिलि जुलि रही खटी कमाइ, जे किछु लाबी बांटि चुटि खाइ | संघे शक्ति, शक्तिसं जीवन, एहिमे सबहक बुझी भलाइ || दोसर पृष्ठपर नारी अंकक प्रकाशनक योजनाक समाचार दैत साहित्यिक निबन्ध, ललित निबन्ध आ विविधक अन्तर्गत चौबीसटा महत्वपूर्ण बिन्दु सभ पर विद्वतापूर्ण आलेख एवं अन्य उपयोगी रचना सभ आमन्त्रित कयल गेल अछि | जाहि बिन्दु आ विषयपर रचना-आलेख आमन्त्रित कयल गेल अछि, से सम्पादक महोदयक सुरुचि, विद्वता आ विशिष्ट सम्पादकीय निष्ठाक द्योतक अछि | तेसर पृष्ठपर ‘अमृतवाणी’क अन्तर्गत एहि अंकमे कवि दामोदर लाल दास ‘विशारद’क आठ पाँतीक रचना अछि | एहि स्तम्भक अन्तर्गत सभ अंकमे कोनो-ने-कोनो महापुरुषक श्रेष्ठ वचन रहैत अछि | चारिम पृष्ठपर सम्पादकीय स्तम्भ ‘हमर कहब’ मे ‘बिहारक नवनिर्वाचित सरकार एवं मिथिला-मैथिली’ शीर्षक सं मातृभाषाक माध्यमसं नेना सभकें शिक्षाक अधिकारक क्रियान्वयनक लेल मैथिली क्षेत्रक विधायक लोकनिसं अनुरोध कयल गेल अछि जे एहि कार्य हेतु सरकारकें बाध्य करथि | पृष्ठ 5 सं 10 धरि ‘सामयिक’क अन्तर्गत ‘धरोहर’ मे कवि दामोदर लाल दास ‘विशारद’ जीक ‘शरद वर्णन’ अछि जे श्रीकृष्ण चरितामृतसं उद्धृत अछि, सतेन्द्र नारायण दासजीक दूटा गीत अछि, ‘विद्यापति उवाच’ शीर्षकसं विभिन्न पोथी सभसं विद्यापतिक सूक्ति संचयनक प्रस्तुति भेल अछि, ‘मिथिलाक शक्ति साधना’ शीर्षकसं पंडित शशिनाथ झाक निबन्ध प्रकाशित भेल अछि, ‘ईश्वर स्तुति’ शीर्षकसं डा. नित्यानंद लाल दासजीक दसटा दोहा प्रस्तुत भेल अछि| पृष्ठ 11 सं 19 धरि ‘कविता समग्र’क अन्तर्गत शारदानंद दास परिमल,आचार्य सोमदेव,रमाकांत राय ‘रमा’, डा. शेफालिका वर्मा,जीवकान्त,डा. जनक किशोर लाल दास, गजेन्द्र ठाकुर, योगानंद हीरा, कलानंद भट्ट, प्रताप परात्पर, कमल किशोर कर्ण और राजदेव मंडलजीक रचना प्रकाशित भेल अछि | कलानंद भट्ट जीक जे गजल प्रकाशित भेल अछि ओकर टंकण कविते जकाँ भेल अछि, गजल जकाँ नहि, से नीक नहि लगैत अछि | पृष्ठ 20 सं 39 धरि ‘कथा समवेत’क अन्तर्गत श्री चन्द्रेश, डा. उषा चौधरी, कुमार मनोज कश्यप,सुनीति, राधेश्याम झाक कथा, अनमोल झा, सत्येन्द्र कुमार झा और मिथिलेश कुमार झाक लघु कथा आ डा.रमेशचन्द्र वर्माक एकांकी प्रकाशित भेल अछि | पृष्ठ 40 सं 46 धरि ‘धरोहर’ स्तम्भक अन्तर्गत दिनेश्वर लाल ‘आनन्द’क आलेख छन्हि : मैथिलीक अमर सपूत : अच्युतानंद दत्त आ श्री भोला लाल दास जीक आलेख-स्मृति छन्हि : पुलकित लाल दासजी ‘मधुर’ | पृष्ठ पृष्ठ 47 सं 49 धरि ‘स्वास्थ्य चर्चा’ स्तम्भक अन्तर्गत डा. काली प्रसाद कर्णक महत्वपूर्ण आलेख छन्हि : स्वास्थ्य आओर आहार| पृष्ठ 50 सं 65 धरि ‘आलेख एवं निबन्ध’ स्तम्भमे स्वयं सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास,शिव नारायण मल्लिक,लक्ष्मण झा ‘सागर’,सुरेन्द्र नाथ और जगदीश प्रसाद मंडलक महत्वपूर्ण आलेख-निबब्ध प्रकाशित भेल छन्हि | पृष्ठ 66 सं 69 धरि यात्रा-प्रसंग स्तम्भक अन्तर्गत ‘खेल, पर्यटन ओ पर्यावरण-हिमाचल यात्राक प्रसंग’ शीर्षकसं डा. विद्यानाथ झाक यात्रा वृतान्त छन्हि | पृष्ठ क्रमांक 70 सं 87 धरि आलोचना खण्डमे ‘मैथिली बाल काव्यधारा’,’हरिमोहन झाक रचनामे हास्य-व्यंग्यक महत्व’,’शिल्पक दृष्टिये प्रौढ़ भ’ गेल अछि मैथिली लघुकथा’,’गोविन्द दास –भजनावलीक काव्य वैशिष्टय’ आ ‘तखन आ अखन’ शीर्षकक अन्तर्गत प्रो. प्रेम शंकर सिंह,उपेन्द्र प्रसाद यादव, मुन्नाजी, डा. नारायण झा और सतेन्द्र नारायण दास द्वारा विलक्षण आलेख प्रस्तुत कयल गेल अछि | पृष्ठ 88 सं 94 धरि पोथी-समीक्षाक लेल अछि | एहि खण्डमे देवकांत झा,डा. नबोनाथ झा आ अमरनाथ झा द्वारा क्रमशः उपन्यास ‘भारती’, ‘इतिहास दर्पण और ‘मैथिली गीत गोविन्द’ पर सुन्दर समीक्षा प्रकाशित भेल अछि | पृष्ठ क्र.95 सं 99 धरि ‘स्मृति-शेष’ स्तम्भक अन्तर्गत डा. श्रीपति सिंह द्वारा बाबू उमापति सिंह पर ‘बाबू उमापति सिंह : व्यक्तित्व ओ कृतित्व’ शीर्षकसं संस्मरण प्रकाशित भेल अछि | पृष्ठ क्र.100 सं 104 धरि विभिन्न संस्था सभ द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम सबहक वर्णन अछि | पृष्ठ क्र. 105 सं 111 धरि ‘कर्ण गोष्ठी’क 33 आजीवन सदस्य, ‘कर्णामृत’ क 26 टा संरक्षक आ कर्णामृतक 408 टा आजीवन सहयोगी सबहक नाम आ संक्षिप्त पता अछि | पृष्ठ क्र.112 पर मिथिलाक्षर (तिरहुता) सीखू शीर्षक अन्तर्गत सभ अंक जकाँ मिथिलाक्षरसं परिचय कराओल गेल अछि | भीतरक अंतिम कवर पृष्ठपर कर्णामृतक विभिन्न विशेषांक सबहक कवर पृष्ठक छाया चित्र अछि | सम्पूर्ण पत्रिकामे सम्पादक श्री राज नन्दन लाल दास जीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक दर्शन होइत अछि | ओ स्थापित रचनाकारकें सम्मान दैत छथि, नवोदित रचनाकारकें प्रोत्साहित करैत छथि | नव रचनाकार तैयार करैत छथि | पुरान पाठकक ध्यान रखैत छथि, नव पाठक वर्ग सेहो तैयार करैत छथि | स्वस्थ परम्पराक संबर्धनक बाट तकैत छथि | नवीन स्वस्थ परम्पराक समर्थन करैत छथि | अपन पाठक आ लेखकक स्वास्थ्यक चिन्ता करैत छथि | मातृभाषाक माध्यमसं बच्चा सबहक शिक्षाक प्रबन्धक चिन्ता करैत छथि | मिथिला, मैथिली आ देशक हितक कामना करैत छथि | अही सभ रचनात्मक गुणक कारणे श्री राज नन्दन लाल दासजी लाखो मैथिल आ साहित्य जीवी लोकक मध्य अपन एकटा विशिष्ट स्थान बना चुकल छथि | हम हिनक दीर्घ स्वस्थ जीवनक कामना करैत छी | भरि नगरीमे शोर ‘ममता गाबय गीत’ फ़िल्मक ई गीत ‘भरि नगरीमे शोर,बौआ मामी तोहर गोर मामा चान सन’ सौंसे मिथिलामे मिथिलाक माटि-पानि आ बसातक सुगन्धि नेने शोर करैत आएल आ जन-जनक मोनकें आनन्दित,प्रफुल्लित आ दलमल्ल्लितक’ देलक |एच.एम.वी. कम्पनी क रेकॉर्डमे एहि गीतक संग किछु और गीत छलै : ‘अर्र बकरी घास खो / छोड़ि गठुल्ला बाहर जो / लूरू-खुरू बिनु केने बहिना पेट भरय नहि ककरो’ ‘कनी बाजू अमोल बोल भौजी, कहू लेब कोन गहना’ ‘मिथिला केर ई माटि उडल अछि छूबय गगनक छाती भरि दुनियाँ केर मंगल हो आ जन-जन गाबय प्राती चलू भैया रामे-राम हो भाइ, माता जे बिराजै मिथिले देशमे’ ई सभ गीत मिथिला-क्षेत्रमे ओहि समयक फ़िल्मी गीत सबहक प्रभावकें त’र क’ देने छल | उत्सुकता छल बुझबाक जे ई गीत सभ के लिखने छथि | रेकॉर्डमे गीतकारक नाम ‘रवीन्द्र’ लीखल छलै | एहिसँ जिज्ञासा बनले रहल | ई रवीन्द्र के छथि, कत’ रहैत छथि | एक बेर दुर्गा पूजाक अवसरपर मधुबनी जिलाक यमसम गाममे नाटक देखबाक अवसर भेटल | ओत’ नाटकक सभ दृश्यक समाप्तिपर ओही गामक निवासी आ लोकप्रिय गायक महेन्द्र झा जीक स्वरमे उपरोक्त सभ गीतक संग और बहुत रास गीत सभ सुनबाक सुअवसर प्राप्त भेल | ओहू ठाम ई जिज्ञासा बनले रहल जे ई गीत सभ के लिखने छथि | चलू चलू बहिना : एक दिन मधुबनीमे स्टेशन लग एक ठाम एक गोटे लग मधुप जीक ‘टटका जिलेबी’ आ ‘अपूर्व रसगुल्ला’क संग एकटा पोथी देखलहुँ ‘चलू-चलू बहिना’ | ई पोथी हाथमे लेलहुँ | गीतकारक नाम लीखल छलै ‘रवीन्द्र नाथ ठाकुर’ | देखलिऐ जे एहि पोथीमे ओ सभ गीत छै जे सभ एच.एम.बी.क रेकॉर्डमे देखने छलहुँ आ यमसममे महेन्द्र झाजीक मुँहसँ सुनने छलहुँ | पोथीक भूमिका पं.चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’जी लिखने छलाह | ईहो पता चलि गेल जे रवीन्द्र जी पूर्णियाँ जिलाक धमदाहा गामक निवासी छथि | एहि पोथीमे किछु और लोकप्रिय गीत सभ छलै : ‘चलू-चलू बहिना / जहिना छी तहिना / लाल भैया नेने एला लाले-लाले कनियाँ’ ‘माटिक सामा बनली,बहिनो खेल’ चलली, भैया जीब’ हो...’ ‘सुन-सुन-सुन पनिभरनी गे, कनी घुरियो क’ ताक चुप रह छौंड़ा बटोहिया रे, बड़ भेलें चलाक......’ ‘गोरे इजोरियापर तारा के तिलबा, कमाल गोदना लागे गोरे बदनपर कमाल गोदना |’ ‘लाले-लाले साड़ी सेहो रे तिनपढिया लाले रङ आङी लाले सिन्नूर...’ जहिना छी तहिना : महेन्द्रजीक मूँहें किछु और गीत सभ सुनने रही से सभ ऐ पोथीमे नै छलै | महेन्द्रजी किछु लोकोक्ति सबहक पहिल पाँती पढ़ि कहैत छलाह जे ई पाँती त सभ गोटे सुनने हैब, एहिसँ आगाँक पाँती हमरासँ सूनू | जेना : ‘बापक दुलारि बेटी दूरि गेली’ ‘बिढ़नी बिन्ह्लक, तुम्मा फुलौलक, फेर कन्हुआइ छौ तोरेपर’ ‘चकै के चकदुम मकै के लाबा’ ‘करिया झुम्मरि खेलै छी’ ‘दालि ददरी मरीच ददरी’ एक दिन दरभंगा टावर चौकपर रवीन्द्र जीक एकटा पोथी ‘जहिना छी तहिना’ भेटल, ओही पोथीमे एहि तरहक गीत सभ छलै जकर पहिल पाँती मिथिलाक गाम-गाममे लोकोक्तिक रूपमे व्यवहारमे छल | ओहि पाँती सभकें नव जीवन प्रदान करैत रवीन्द्रजी नव-नव प्रयोग करैत अपन विलक्षण प्रतिभाक परिचय देने छलाह | ई गीत सभ लोक सभकेँ अप्पन गीत, अपन गाम-घरक, अपन आँखि-पाँखिक, अपन खेत-पथारक,पोखरि-इनारक,पावनि-तिहारक गीत लगैत छलैक आ होइत रहै छलै जे सुनिते रही | बहुत दिनक बाद रहिकामे विद्यापति पर्वक विलक्षण आयोजनक अवसरपर आदरणीय रवीन्द्रजीसँ किछु कविता आ महेन्द्रजीक संग बहुत रास गीत सभ सुनबाक सुअवसर भेटल | उत्साह, आनन्द, प्रेम, करुणा, हास्य आ व्यंग्यक बहुत रास विषय नेने बहुत गीत सभ लोककें आनन्द विभोर क’ देबाक सामर्थ्य रखैत छल : ‘की थिक मिथिला के छथि मैथिल’ ‘जेम्हरे देखू तेम्हर, ठाकुर ओझा मिसर...’ ‘तोरा अपने हाथें विधिना गढ़लनि अछि मोन लगाक’....’ ‘अहाँकें लगैए किए लाज हे यै कनियाँ...’ ‘बड़ा छणमे छनाक भेलै दाइ गे, गेलै पेटी के कुंजी हेराइ गे’ ‘पिरिए पिराननाथ सादर परनाम’ ‘यार दिलदार यार- की रे भजार यार .....’ ‘कियो लिखि दे दू पाँती सिपहियाके नाम’ ‘अहाँ ई करू, ओ करू, जे करू....’ ‘चारि पाँती सुनू रामकेर नामसँ....’ ‘कोन गामसँ चललें रे भरिया..’ ‘हजमा रे काट-काट बौआ केर केश....’ ‘हे यौ बर बाबू यौ हैत ने बियाह बौआ घर घूरि जाउ.....’ ‘हवा जे चल मिथिलामे चल ....’ ‘हम मिथिले के जलसँ भरब गगरी..’ ‘बटोही भैया, चलिते जाउ बटोही...’ ‘कतेक दिन रहबै यौ मोरंगमे..’ ‘चिट्ठी के तार बुझू, बुढिया बेमार बुझू ...’ ‘हमरा देशक गरीबी छुतहरी गे तों उढरियो त जो...’ पोथीक पथार : देखिते-देखिते रवीन्द्र जी रंग-विरंगक गीत सबहक पोथीक पथार लगा देलनि | स्वतंत्रता अमर हो हमर, सुगीत, प्रगीत, अति गीत, रवीन्द्र पदावली आदि पोथीक बहुत रास गीत बहुत लोकप्रियता अर्जित केलक | गीतक अतिरिक्त कविता आ आनो विधाक पोथी सभ प्रस्तुत कए रवीन्द्रजी मैथिली साहित्यक भण्डार भरबामे महत्वपूर्ण योगदान देलनि | चित्र-विचित्र, नर-गंगा,पंचकन्या,एक राति, श्रीमान गोनू झा,लेखनी एक, रंग अनेक आदि पोथी हमहूँ पढने छी |किछु और पोथी सभ छनि जे हमरा नहि पढ़ल अछि | नव-नव प्रयोग : रवीन्द्रजी गीतमे नव-नव प्रयोग करैत आएल छथि | एकर उदाहरण अछि निम्नलिखित किछु गीत : ‘लटर – पटर दुनू टाङ करय, जे ने ई नबका भाङ करय...’ ‘कोंचा लेटाइ छनि, केश फहराइ छनि, मोछो गेलनि कलकत्ते...’ ‘ आकि हम झूठ कहै छी / नै यौ / आकि हम गप्प हँकै छी / नै यौ .....’ ‘ बाबा डंडोत बच्चा जय सियाराम ....’ ‘सभटा कर्म के कमाल सभटा विधि के विधान.....’ ‘यार दिलदार यार ! की रे भजार यार !....’ युगल गायनक परम्परा : बिना कोनो साज-बाज के पुरुखक स्वरमे आकर्षक युगल गायनक परम्परा रवीन्द्रजी द्वारा स्थापित भेल आ रवीन्द्र-महेंद्रक जोड़ी सम्पूर्ण भारतमे विभिन्न क्षेत्रमे,गाम-गाम आ विभिन्न शहर सभमे सेहो लोकप्रियताक शीर्षपर पहुँचल | यैह लोकनि अपन मनमोहक प्रस्तुतिक बलपर बहुत गोटेक सहयोग पाबि मैथिली फिल्म ‘ममता गाबय गीत’क बाँचल काज पूर्ण करबाय लोकक समक्ष प्रस्तुत करबामे सफल भेलाह | विद्यापति पर्वक लोकप्रियता बढयबामे, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभमे लोकक भीड़ जुटयबामे रवीन्द्र-महेन्द्रक जोड़ीक उल्लेखनीय योगदान रहल अछि | गीतक अतिरिक्त ‘पंचकन्या’क किछु अंशक पाठ एहि जोड़ीक मूँहसँ सुनबाक अवसर हमरो प्राप्त भेल अछि आ ओहि आनन्दक वर्णन हम नहि क’ सकैत छी | सीवानमे गरमीक समय विद्यापति स्मृति पर्वक अवसरपर दुनू गोटे आएल छलाह, दुनू गोटे जखन गाबय लगलाह : ‘हवा रे चल मिथिलामे चल, जतय अनन्त वसन्त हँसैए सुरभित आठहु पल,हवा रे चल मिथिलामे चल |’ हुनक एहि आकर्षक प्रस्तुतिक परिणाम रहै जे लोककें लगलै जेना गरमी भागि गेल होइ आ शीतल बसात चल’ लागल होइ | लोक एतेक आनन्दित अनुभव करैत रहय जे बड़ी राति धरि बैसले रहल, श्रोता नहि थाकल,डटल रह्ल, जखन ई दूनू गोटे चाह्लनि तखने कार्यक्रम समाप्त भेल | एकटा भोजपुरी गीतकार छलाह परशुराम शास्त्री,ओहो सुनैत छलाह, हुनका नै रहल गेलनि, ओ मंचपर चल गेलाह आ रवीन्द्रजीक जीभरि प्रशंसा केलनि | स्कूल, कॉलेज, बैंक, शासकीय विभागक बहुत अधिकारी-कर्मचारी आ स्थानीय साहित्यकार आ आनो लोक सभ श्रोतामे छलाह | बहुत गोटे एहि कार्यक्रमक स्थायी प्रशंसक भेलाह आ फेर कहिया हेतै से पुछैत रहैत छलाह | ओही स्मृतिमे अपन किछु पाँती प्रस्तुत क’ रहल छी : मोन पड़ैए आनन्दक बरखा होइ छल जखन रवीन्द्र-महेन्द्र मंचपर अबै छला बह’ लगै छल शीतल हाबा गरमीमे ‘चल मिथिलामे चल’जखन ओ गबै छला जिनका ‘रवीन्द्र-महेन्द्र’कें सुनबाक सौभाग्य भेटल छनि, तिनका ई अतिशयोक्ति नहि लगतनि : जहिना दिन आ राति सूर्य आ चन्द्र बिना तहिना गीतक मंच रवीन्द्र-महेन्द्र बिना

सभटा सोनारकें नहि गढ़बाक कला होइछ  (गजलक समीक्षा : पोथी ‘लेखनी एक रंग अनेक’) एकटा समय छल जखन मैथिली गजलक नामपर जे किछु लीखल जा रहल छल तकरा भक्ति-भावसँ लोक ग्रहण करैत जा रहल छल | समय बदलल | ओकरा राजनीतिक चश्मासँ देखल जाए लागल | मुदा रचना स्वस्थ दृष्टिसँ नहि पढल जा रहल छल | प्रगति भेल अछि | आब ठीकसँ पढल जा रहल अछि | ओ गजल अछियो कि नहि सेहो देखल जा रहल अछि | कोनहु रचनाक सार्थकता सेहो अहीमे अछि जे ओकरा स्वस्थ दृष्टिसँ पढल जाए, ओकर समीक्षा हुए, कमजोर पक्षक आलोचना हुए, नीक पक्षक प्रशंसा हुए | मुदा, सभसँ पहिने त ई देखब जरूरी अछि जे ओ रचना जाहि विधाक लेल लीखल गेल अछि ओकर योग्यता रखैत अछि कि नहि | मैथिली गजलकें भक्ति-भावसँ अथवा राजनीतिक दृष्टिसँ देखब ओकर उपेक्षा करब हएत | जाहि समयमे, मैथिलीमे गजलक व्याकरण उपलब्ध नहि छल, 111 टा रचना ल’ क’ ‘लेखनी एक रंग अनेक’ प्रकाशित भेल छल, ओहि समय ई एकटा स्पष्ट घोषणा छल जे मैथिलीमे गजल अवश्य लीखल जा सकैत अछि | ई एकटा क्रान्ति छल किएक त ओहि समय किछु साहित्यकार कहैत छलाह जे मैथिलीमे गजल लिखले नहि जा सकैत अछि | एहि धारणाक खण्डन छल ई संग्रह | रचनाकारक गीते जकाँ तथाकथित किछु शेर सभ लोककें आकर्षित केलक | शब्द सभमे गीतहि जकाँ वैह मिथिलाक माटि-पानि आ बसातक सुगन्धि ! मिथिला मिहिरमे पढल किछु शेर सभ हमरो बहुत आकर्षित केलक: ‘हम जे मैथिल थिकहुँ से मूर्ख कालिदास सन जतय बैसल छी सैह डारि काटि रहल छी’ ‘चली जखनसँ सदिखन सोची एखन दहिन की बाम चलै छी राखू अपने विश्व-नगर भरि, हम त अपना गाम चलै छी’ ‘सुखकेर हो कि दुखक बीतैये घड़ी सभटा हो बाँस आ कि बेंतक टुटैये छड़ी सभटा’ एहि संग्रहक रचना सभक जन्म अस्पतालमे भेल छल | अस्पतालसँ बाहर आबि ई शेर सभ दहाड़ मारिक’ चिकरल : ‘गजल मैथिलीक मर्म आब जानि लेने छैक गजल मिथिलामे घर अपन बान्हि लेने छैक’ जे सभ कहैत छलाह जे मैथिलीमे गजल नहि लिखल जा सकैत छैक, सभ शान्त भ’ गेलाह | गीतक महाराजक अश्वमेघक घोड़ा निकलि गेल गजलक मैदानमे | लव-कुशक हाथें पकड़ल गेल घोड़ा | रामक कृत्यक सार्थकता सेहो अहीमे अछि जे घोड़ा पकड़ल जाए लव-कुश द्वारा | अनचिन्हार आखरक साइटपर गजेन्द्र ठाकुर आ आशीष अनचिन्हार द्वारा गजल शास्त्र एलाक बाद जाँच-पड़ताल हुअ’ लागल जे गजलक नामपर जे किछु लिखा रहल अछि से गजल अछियो कि नहि | ई पाछाँ मूहें घुसक’ बला बात नहि भेलै | ई पछिला पीढ़ीक कृत्यकें आगाँ ल’ जेबाक, गौरव प्रदान करबाक,ओकरा परिपूर्ण करबाक, स्वस्थ आ समृद्ध करबाक दिशामे आन्दोलन भेलै | हमहूँ त भक्ति –भावसँ सभ रचनाकें गजल मानिए नेने रही | अनचिन्हार आखर साइटपर उपलब्ध व्याकरणसँ परिचित भेलाक बाद ई पोथी पढ़ि जे किछु नीक –बेजाए देखबामे आएल अछि ताहिसँ अवगत करयबाक प्रयास क’ रहल छी : (1) 109 टा गजलमे 587 टा शेर अछि | एहि संग किछु ‘कतआ’ अछि | (2) 26 टा बिना रदीफक गजल अछि | (3) 5 टा गजलमे मतलाक अभाव अछि ( गजल क्रमांक 35,42,45,54,90 ) (4) 4 टा गजलमे रदीफ मतलामे अछि मुदा ओकर पालन सभ शेरमे नहि भेल अछि ( गजल क्रमांक :49,62,81,82 ) (5) 9 टा गजलक कयटा शेरमे समान काफियाबला शब्द अछि (गजल क्रमांक :65,68,72,77,89,103,105,107,108) (6) 10 टा गजलक मतला छोड़ि सभ शेरमे अनुपयुक्त काफियाबला शब्द अछि ( गजल क्रमांक :5,10,11,23,41,43,62,70,83,93 ) (7) 7 टा गजलक मतलामे काफिया नियमित नहि अछि ( गजल क्रमांक :48,50,63.99,100,101,106 ) (8) 16 टा गजलक एक अथवा अधिक शेरक काफियाबला शब्द सभ उपयुक्त नहि अछि ( गजल क्रमांक : 15,21,25,29,30,31,46,49,59,75,86,87,88,94,97,109 ) (9) रचना सभ ओहि समय लिखल गेल अछि जखन रचनाकारक पयरमे प्लास्टर पड़ल छलनि, ओ अस्पतालमे छलाह | (10) भरिसक मैथिली गजलक नामपर एतेक संख्यामे रचनाक ई पहिल संकलन अछि | (11) कतहु-कतहुसँ किछु गजलक अवलोकनसँ पता चलैत अछि जे बहरक उपेक्षा भेल अछि | (12) किछुए रचनाकें छोड़िक’ सभक अंतिम दू-पाँतीमे रचनाकारक नाम अछि | (13) नमहर भूमिका द्वारा पाठककें आतंकित करबाक अथवा रचनाक त्रुटिकें झाँपन देबाक प्रयास नहि कयल गेल अछि, रचना सभमे पाठककें गुद्गुदयबाक, आनन्द प्रदान करबाक आ जीवनक विभिन्न पक्षक रहस्यकें शालीनताक संग प्रस्तुत करबाक सामर्थ्य छैक | उदाहरणस्वरूप किछु पाँती प्रस्तुत कएल जा रहल अछि : ‘जतय सभ किछु देखार, जकर सभ किछु नुकैल गजल गागरमे सागर तमाशा थिकैक’ ‘मोट मडुआकेर रोटीपर रैंचीकेर साग गजल जीवन केर स्वादहु ठेकानि लेने छैक’ ‘मनसँ मनकेर संचार-सेतु ओहि महासेतुकेर नाम गजल कहलहुँ से गजल, सुनलहुँ से गजल, कहबामे कहू की शेष रहल’ ‘रवीन्द्र’ प्रेम-पंथी से छंदकार जानथि किछुए गजल एहन जे पढ़बाले’ होइत अछि’ ‘रवीन्द्र’ रह-रहाँ एतय होइत अछि एहन कि जैह क’र मूँह धरी, ताहीमे केस’ ‘दाग चेहराक हो कि वस्त्रक, सब दाग थिकै दागे साधूकें छोड़ि चट-पट सब चोरकें धरक चाही’ ‘औंठा ने कटय ध्यान रहय, एहि बातकेर कि कोन गुरु केर अहाँ शिष्य बनल छी’ ‘अस्मिताक प्रश्न अछि त एक भ’ ‘रवीन्द्र’ प्रगट होइत जाउ जे अदृश्य बनल छी’ ‘धकियाय आगू गेल जे, बुधियार छल सब लोक से नाव एखनहुँ अछि हमर, ओहिना पड़ल मझधारमे’ ‘किछुओ ने बचा सकलहुँ किछुओ ने बचा पायब सूझय ने जाल लेकिन, जंजालमे फसल छी’ ‘दर्द अपन गुपचुप सह्बाले होइत अछि हरेक बात नहि हरेककें कहबाले होइत अछि’ ‘आँचर रहयसमेटल,बरु केस रहयफूजल किछु बात त चौपेतिक’ धरबाले’ होइत अछि’ ‘ई बात खानगीमे कहबाक मोन होइछ बैद्य एहन के जे चीन्हैये जड़ी सबटा’ ‘बात केर बात अछि त एक बात हम कहि दी कि बात, बात-बातमे हो, बात से जरूरी नहि’ ‘गुलाब जलक शीशी भरि, पयर धोइत शोषक नोरक इन्होरमे नहाइत अछि लोक’ ‘गाइयो हँ, बड़दो हँ, एहने व्यवस्थामे आँटाक सङे घून सन पिसाइत अछि लोक’ (14) संकलनक कोनो रचनामे मैथिलीसँ इतर कोनो आन भाषाक शब्द नहि लेल गेल अछि |एहि दृष्टिसँ ई संकलन मैथिली गजल-लेखन लेल पथ-प्रदर्शकक योग्यता रखैत अछि |मैथिली गजलक बहुमंजिला भवनकक निर्माणमे एहि संकलनक आधारक उपयोग कयल जा सकैत अछि | प्रकाशनक छत्तीस बरखक बाद एहि संकलनक समीक्षा कि आलोचनाक प्रस्तुति एकटा सादर आ सविनय आश्वस्ति अछि जे ‘लेखनी एक रंग अनेक’ पढल गेल अछि, गुनल गेल अछि आ आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुर जी द्वारा रोपल गेल गाछ आब फुला रहल अछि | चन्दना दत्त श्री राजनन्दन लाल दास : क्षीणकायामे असीम उर्जान्वित व्यक्तित्व अमोद झा क्रान्तिकारी चेतना जगबैत मैथिली नाटक ’संतो’ (लेखक स्व. राजनन्दन लाल दास जी) अखिलेश झा, ग्राम-ननौर(मधुबनी) मैथिली साहित्यक एकांत साधक राजनंदन लाल दास मैथिली साहित्यक एकटा देदीप्यमान नक्षत्र छथि राजनंदन लाल दास। ई सदासँँ अपन योगदान मैथिली साहित्यक भंडारकेँ भरबा मे दैत रहला अछि। कतेको एहन महान विभूति लोकनि भेला जनिका हुनक योगदानक अनुरूप प्रसिद्धि आ प्रतिष्ठा आदि प्राप्त भेलनि, मुदा किछु एहनो भाषा साहित्यक सेवक भेला जे एकांत साधना करैत रहला आ निरंतर आ निःस्वार्थ माँ मैथिलीक सेवा करैत रहला। एतेक काज केलाक बादो इतिहासमे जेना कतहु कतिया देल गेला आ कालक्रममे विस्मृत क' देल गेला। एहने एकटा एकांत साधक छथि राजनंदन लाल दास। हिनक जन्म एकटा सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार मे भेलनि। हिनक जन्म सँ पूर्व परिवार आर्थिक रूपेँ टूटि गेल छल। खेत पथार गाछी विरछी विलटि गेल छलै। हिनक जन्म 5 जनवरी 1934 मे मातृक पटोरी पंचगछिया, सहरसामे भेलनि मुदा ओ अपन गाम दरभंगा जिलाक गोनौनेमे रहैत छला। हिनक पिता मनीलाल दास मधुबनी कोर्टमे कारप्रदाज छला। बादमे राज दरभंगाक पंडौल सर्कलमे लौ विभागमे नोकरी करय लगला। हिनक  माता विद्या देवी कुशल गृहिणी आ धर्मनिष्ठ महिला छली। पित्ती बुच्चीलाल दास सकरीमे मुसलमान जमींदारक दीवान छलथिन। परिवारक भरण पोषण कोनहुना होइत छलनि। हुनक प्राथमिक शिक्षा अपना गामक स्कूल आ किछु दिन मधुबनीमे भेलनि। चारिमसँ सातम वर्ग धरि पंडौल मीडिल स्कूल आ आठमसँ एगारहम वर्ग धरि पंडौलक S.K.H.E स्कूलमे भेलनि। जखन ई आठम वर्गमे छला त' ऐच्छिक विषयक रूपमे मैथिली रखलनि। एही क्रममे कविवर सीताराम झाक पांति ' *पढि लिखि जे नै बजै छह निज मातृभाषा मैथिली*. ...' अत्यधिक प्रभावित केलकनि। एहि कविताक असरिसँ मातृभाषाक प्रति अनुराग बढि गेलनि। 1949 ई. मे दास जी मैट्रिक पास केलनि। घरक स्थिति देखैत पिता चाहै छलथिन जे ई नोकरी करथि मुदा अपन इच्छा आगू पढबाक छलनि। हिनक पित्ती आ जेठ भाई सेहो चाहै छलथिन जे ई आगू पढथि। एहि लेल हिनक जेठ भाई अपन सार(मोदनारायण दास)केँ चिट्ठी लिखलनि जे कलकत्तामे रहै छलथिन। मोदनारायण जी एकटा पैघ मारवाड़ीक धीयपूताकेँ पढबथिन। पत्रक उत्तर देलथिन जे कलकत्ता पठा दियौन। एत्तहि कौलेजमे पढता आ ट्यूशन करता। एहि पर हुनक जेठ भाई हिनका 115 टाका द' क' एकसरे विदा क' देलथिन। शिक्षा पूरा भेलाक बाद नौकरी करितो मिथिला संघक काजमे सहयोग दैत रहला आ संघक सचिव सेहो बनला। गाम एलापर अपन गाम, पाली आ रसियारी हाई स्कूल पर आ बादमे जीवकांत जीक सहयोगसँ खजौली हाईस्कूल पर सभा क' मैथिली भाषाक प्रचार लेल काज करैत रहला। हिनक व्यक्तित्व पर पंडित देवनारायण झाक बेसी प्रभाव पड़लनि, कारण जे ओ प्रत्येक रविकेँ दास जीक भेट करबाक लेल राजेंद्र छात्र निवासपर आबि जाथिन। पछाति दास जी मैथिली पोथी सभक प्रकाशन लेल सेहो अपन महत्वपूर्ण योगदान देबय लगलथिन। जखन कर्णगोष्ठी संस्था बनबाक सूरसार होमय लगलै त' ई ओकर विरोधी छला, कारण जे ई संस्था जातिक नामपर बनि रहल छलै आ एहिमे मूल आ पांजि केर आधारपर भेदभाव सेहो छलै। ई बात दास जीकेँ अनसोहाँत लगलनि। बादमे परिवर्तन भेलै आ कर्णामृत पत्रिका प्रकाशनक नेयार भेलै तखन ई संस्थासँ जुड़ला आ पत्रिकाक भाषा मैथिली रखबाक विचार देलनि। राजनंदन लाल दास 1967 मे 'आखर' पत्रिकाक प्रकाशन केलनि जे मात्र साल भरि चलि सकलै, किन्तु हुनक झुकाव मैथिली पत्रकारिता दिस बढि गेलनि। कर्णगोष्ठीक संस्थापक अर्जुन लाल कर्ण, कर्णामृत प्रकाशनमे नारायण प्रसाद कर्ण आ राजनंदन बाबू अपन बहुमूल्य योगदान देलनि। एक बेर दास जी पर आरोप लगलनि जे ई मात्र कर्ण कायस्थ लोकनिक रचना छपै छथि मुदा बादमे तथ्य देखला पर ई आरोप निराधार साबित भेल। ई बात 2016 केर अप्रैल वला कर्णामृत मे लक्ष्मण झा सागर केँ देल साक्षात्कारमे दास जी कहने छथि।(उपर्युक्त पत्रिकासँ सामग्री सहयोग साभार लेल गेल अछि) दास जी कर्णामृत मे स्थापित लेखकक रचनासँ स्तरीयता बनेबाक प्रयास त' करबे केलनि नवतूरकेँ अवसर द' चमकेबाक काज सेहो केलनि। एकर अतिरिक्त दासजी अखिल भारतीय मिथिला संघ, मैथिली संग्राम समिति, मिथिला दर्शन प्रा.लि. कम्पनी सँ जुड़ि क' मिथिला मैथिली लेल कार्यरत रहला। हिनक मौलिक प्रकाशित कृति छनि-: संतो(नाटक), चित्रा विचित्रा(आलेख संग्रह), प्रबोध नारायण सिंह (विनिबंध) आ मिथिला मैथिलीक विकासमे कर्णामृतक योगदान (शोधग्रंथ) हिनक सम्पादनमे प्रकाशित अछि-: मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा, व्यक्तित्व आ कृतित्व।मुंशी रघुनंदन दास, व्यक्तित्व आ कृतित्व। कर्णामृत (त्रैमासिक) 1981 सँ एखन धरि। राजनंदन बाबू मैथिली मिथिलाक कतेको संस्था आ संगठन द्वारा सम्मानित आ पुरस्कृत भ' चुकल छथि मुदा सभ दिनसँ निस्पृह आ निःस्वार्थ भावसँ मातृभाषाक सेवामे समर्पित रहै छथि। चन्द्रेश मैथिल शिरोमणि राजनन्दन लालदास जितेन्द्र नाथ दत्त संस्मरण- माछक रस कंचन कण्ठ आदरणीय श्री राजनंदन लाल दास श्री राजनंदन दास सदैव आदरणीय व्यक्तित्व छथि। बहुत रास धन्यवाद दै छियनि *विदेह पत्रिका* केँ कि एहन उत्तम विचार ओ कार्य के संपन्न करयकेँ बीड़ा उठौलनि। ताहू सँ बेशी कि हमरा हुनका बारेमे किछु लिखबाक सुअवसर देलनि! हालाँकि हम अपनामे कोनो एहन गुण नहि बुझैत छी कि एहन विशाल व्यक्तित्व के बखान क सकी!  आदरणीय श्री दासजीकेँ जतेक अनुभव छन्हि ओतेक त हमर उमरियो नहि अछि। तथापि एहिमे किछु त्रुटि; जे हेबे करतै, तकरा अपने सभ हमर अतिउत्साह एवं अनभिज्ञता बुझि क्षमा करब।हम बचपनसँ पापाक मुँहेँ सदिखन आदरणीय चाचाजी क चर्चा सुनैत रहलहुँ। ओ बराबरि बतबैत रहलाह कि श्री दास जी एकदम *श्री रविन्द्र नाथ* के *एकला चलो* के सिद्धांत पर छथि। *कर्णामृत* मे पुज्य पापा के आलेख सभ अबैत रहलन्हि।2012 ईमे मुंबई कर्णगोष्ठीक पैतालीसम वर्षगांठ पर सम्मान समारोह आयोजित भेल जाहिमे *श्री राजनंदन लाल दास*, *श्रीमती शेफालिका वर्मा* एवं हमर पिता *डा नित्यानन्द लाल दास* केँ सम्मानित कएल गेल! पु पापा हमरा ओहिठाम शेफालिका आंटीसँ भेँट करौलनि,मुदा चाचाजी अपन स्वस्थ्यसंबंधी परेशानीसँ नहि आबि सकलाह! हमर दुर्भाग्य कि हम हुनकर दर्शन-सान्निध्य नहि प्राप्त कए सकलहुँ। ओतहु हम आदरणीया शेफालिका आंटी ओ पापाक संग समारोहमे वक्ता सभकेँ आदरणीय चाचाजीक बारेमे उद्गार सुनि अभिभूत भऽ गेलहुँ। ओ लोककल्याणकारी कार्य लेल सदिखन प्रयत्नशील रहैत छथि; विशेषकर मिथिला-मैथिलीक लेल! हुनक कार्यक्षेत्र क बारेमे कहि त ओ *संतो* आ *चित्रा विचित्रा* आदि कयैक गोट पोथी लिखलनि अछि जाहि मे *संतो* के तऽ कतेको बेरि मंचन भ' चुकल अनेक ठाम! हुनक आलोचना तीक्ष्ण होइतहुँ कल्याणकारी होइत छन्हि।अपन संपादकीय द्वारा देश दुनियाके स्थिति परिस्थितिकेँ बारे में पैनी नजरि रखैत छथि। आ समय समय पर ओकरा अभिव्यक्ति प्रदान करैत छन्हि। मिथिला-मैथिलीक ओ समर्पित कार्यकर्ता रहलाह अछि! ताहि लेल ओ राजनीति, जातिपाँति सभसँ, कोनो गुटबंदीमें ओझरेने बिना अपन रस्ता चलल जा रहल छथि। मैथिलीक संरक्षण, संवर्द्धन ओ विकासक लेल ओ तन मन धन सँ एखनहुँ लागल छथि। एहिकेँ सभसँ बड़का प्रमाण अछि *कर्णामृत* त्रैमासिक पत्रिका, जकरा ओ समाजक न्यूनतम सहयोगक माध्यमे लगातार चालीस वर्षसँ निकालि रहलाह! सरकारी अथवा आन कोनो सहयोग त नगण्ये! जखन कि बड़का बड़का पब्लिकेशन हाउस सभ तरह - तरहक समस्याक कारणेँ या तऽ समझौता कऽ लेलक या समाप्त भऽ गेल! एहि पत्रिका में हुनकर संपादकीय,आ समय - समय पर भिन्न आलेख सभ हुनक तीक्ष्ण दृष्टिक परिचायक अछि। कर्णामृतक शारदीय अंक भव्य होइत अछि; जकर सुधि पाठक सभ व्यग्रतासँ प्रतीक्षा करैत छथि।  एहि पत्रिकामें जतय वरिष्ठ साहित्यकार सभक आलेख भेटैत अछि; ओतहि नवतुरिया सभकेँ सेहो पर्याप्त स्थान भेटैत अछि। कतेक बेर हुनकर आलोचना कएल गेल की किछु हल्लुक रचना सभके सेहो स्थान भेट जाइछ। मुदा ताहि सँ विचलित भेने बिना ओ अपन दृष्टिकोण रखैत छथि, की लिखै-छपैसँ नवतुरिया सभ उत्साहित हेताह तखनहि ओ आगू सुधारक लेल अग्रसर हेताह! अन्यथा लिखबे छोड़ि देताह - ई हुनकर वात्सल्यसँ भरल प्रोत्साहन आ दूरदृष्टिए कहल जा सकैछ, मैथिली के प्रचार-प्रसार के लेल; जे आइक परिदृश्यमे अत्यंत समीचीन अछि। हमरा सन कतेक लेखक-लेखिका के ओ एहिना पीठ ठोकिकय बढ़ावा देलनि! हमर पहिल रचना दूगोट लघुकथा *लघुकथा विशेषांक*मे स्थान पओलक ! ताहि सँ आत्मविश्वास प्रबल भेल। *कर्णामृत* में समयानुसार सभ विषय के  समेकित स्थान भेटल अछि। चाहे ओ स्त्री विमर्श हो वा कि दिवंगत साहित्यिक व्यक्तित्व सभसँ संबंधित विशेषांक! ओ अनेकानेक मैथिली संग संबद्ध आयोजन सभक अध्यक्षता क चुकलाह। मैथिली के दशा दिशा आ उत्थान-पतनक ओ एकटा सशक्त गवाह छथि। ओ बतबैत छथि कि मैथिली के संविधानमे स्थान दियाबय लेल आदरणीय मणिपद्म जी प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरू के आगाँ निरंतर धाराप्रवाह मैथिलीक समृद्ध् अतीत, पौराणिकता, आजुक समयमे उपयोगिता,ओहि क्षेत्रमे सर्वाधिक बादल जायबला बोली अछि-- आदिक बारे में अपन बात अंग्रेजीमे रखलाह! जे सुनि प्रथम प्रधानमंत्री सन्न रहि गेलाह आ मैथिलीके संविधानमे स्थान भेटल। आगू श्री मणिपद्म जीक निश्छल व्यक्तित्वक बारेमे, हुनकर कला-कलाकारक,महिलाक प्रति दृष्टिकोणक चर्चा करैत ओ  एक घटनाक उल्लेख करैत छथि: जखन #कर्णामृतक अंक ओ श्री मणिपद्म के देखौलनि तऽ ओ मुखपृष्ठ के मिथिला पेंटिंग सँ चकित रहि गेलाह! हुनका पता चललनि कि कलाकार राँटी गामक बेटी श्रीमती सुनंदा चौधरी, जिनक सासुर रामपट्टी छन्हि; ओ कलकत्तेमे रहैत छथि, तऽ ओ भेंट करबाक इच्छा व्यक्त केलनि। श्री दासजी श्री मणिपद्म के स्तरके धियानमे रखैत कहलखिन, "हम बजबा लै छियनि हुनका!" ताहि पर श्री मणिपद्म बजलाह,"ओ महिला भऽ कऽ आबि सकैत छथि आ हम की कलाकार सँ भेंट करय नहि जा सकैत छी! चलू ने हमहीं सभ भऽ आबि!"  एकटा साक्षात्कारमे श्री दास जी सँ पुछल गेलनि; "अपनेक अंतिम इच्छा की अछि!" हुनकर जवाब छलनि,"हम मणिपद्म जी पर एकटा शताब्दी अंक निकालय चाहैत छी!" आ ओ अपन ई इच्छा सफलतापूर्वक 2018 ईमे पूर्ण केलनि।  मिथिला-मैथिलीक लेल एहि समर्पण केँ हमर नमस्कार, प्रणाम! एहिना अनेकानेक साहित्यकार, मिथिला चित्रकलाकार सभकेँ संबंल दैत एलाह।  पोथीके मुखपृष्ठ पर कतेको बेर मिथिलाक्षर के स्थान देलनि। आ मिथिला पेंटिंग तऽ रहिते छन्हि। पृष्ठ भाग पर तऽ मिथिलाक्षर वर्णमाला सदैव विद्यमान रहैछ। पोथी मे विभिन्न समसामयिक बिंदू सँ ल कऽ नवीन पुरान सामग्री, महामना सभक उपलब्धि,अवसान, विभिन्न तरहक लोकहितमे सहयोग करौनाय आदि एक एक आखर जेना हुनकर अपन व्यक्तित्वक साफ स्वच्छ दर्पण पाठककें समक्ष राखि दैत छैक! अपन कष्टक चिंता कएने बिना लोकहित केँ जीवनाधार बनेने चलल जा रहल छथि। हुनक मधुर स्वभाव, आवेश ओ आतिथ्यक ; हमर माँ श्रीमती मालती दास, जखन चर्च करैत छथि तऽ एकटा माधुर्य मुख पर आबि जाइत छन्हि ! चाचाजी अपनेक स्वस्थ रहि हमर सभक एहिना मार्गदर्शन करैत रहि आ हम सभ यथासाध्य एहि काज के आगू बढ़ाबी तकर ईश्वरसँ कामना! लक्ष्मण झा सागर मिथिलाक मुकुटमणि रवीन्द्र तहिया हम मधुबनी मे पढ़ैत रही। 1971- 72 केर घटना थिक। सुनल जे लहेरियासरायमे मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे रबीन्द्र जी मारि-पीट कऽ लेलनि आयोजक लोकनिसँ। कथी लेल त दारू लेल। रवीन्द्र जी कहाँ दन कहै छलखिन जे हमरा लेल बोतलक इंतजाम कियै ने भेल? नै भेल त टाका दिअ हम कीनि लेब। तहीपर बाता-बाती भऽ गेल छल। आ से तखने शान्त भेल जहन हुनका बोतलक दाम भेटलनि। हमरा नजरिमे रबींद्र जीक प्रति बहुत दिन धरि नीक धारणा नै रहल। तकरा बाद हम जहन उच्च शिक्षा लेल 1974 मे कलकत्ता गेलहुँ त चौधरी जीक (स्व बाबू साहेब चौधरी) प्रेस खिलात घोष लेनमे अखिल भारतीय मिथिला संघक किछु पदाधिकारी सभसँ सुनल जे ऐ बेर रबींद्र-महेन्द्रक जोड़ीकेँ बजौल जाय। हमर कान ठाढ़ भऽ गेल। नव-नरस गेले रही। किनको किछु पुछबाक साधंस नै भेल। दू तीन दिनक बाद चौधरी जी अपने हमरा कहलनि जे विद्यापति पर्व समारोहमे रबींद्र- महेंद्रक जोड़ीक उपस्थित भेनाय अनिवार्य रूपेँ आवश्यक भऽ गेल अछि। सभागारमे दर्शक लोकनिक भीड़ मात्र एहि जोड़ीक नाम सुनि उमरि पड़ैत अछि। मैथिली आन्दोलन वाला बात हम सब भीड़क माध्यमसँ बेसीसँ बेसी प्रवासी मैथिल बंधु सभ लग पहुँचा पबैत छी। ई बात हमरा मोनमे जे रबींद्र जीक प्रति अरुचि उत्पन्न भऽ गेल छल तकरा आदर आ श्रद्धामे बदलि देलक। मिथिला मिहिर आ मैथिली दर्शन दुनू पत्रिकाक नियमित पाठक रहल करी। दुनू पत्रिकाक प्रकाशन सुचारू रूपेँ होइत रहल करै। दुनू पत्रिकाक अंतिम दू-तीन पृष्ठ सभा- संस्थाक गतिविधि सब छापैत रहै। हम से सब खूब गहिंकी नजरिसँ पढ़ल करी। देखैत रही जे मिथिला आ प्रवासी मैथिली सेवी अधिकांश संस्था सभ रबींद्र- महेंद्रकेँ बजबैत रहल छलनि। खूब लोकक जुटान भेल करै। दुनू युगल जोड़ीक लोकप्रियता उठान पर रहै। पहिल भेंट हमरा दुनू गोटेक जोड़ीसँ कलकत्तेमे भेल छल आ से विद्यापति समारोहक अवसरपर। हमरो स्वागत कमिटीक एक सदस्य रूपेँ कार्य देल गेल छल अतिथि सभक स्वागतमे सदिखन रहबाक लेल। हमरा तकर लाभ भेटल जे हम दुनू गोटेसँ परिचय पात कऽ लेने रही। रबींद्र जी पूर्णियाँ जिलाक धमदाहा गामक छथि। महेन्द्र जी मधुबनी जिलाक जमसम गामक लोक छलाह। महेंन्द्र जी गीत लिखैत छलाह। आ दुनू गोटे गीत गवैत रहथि। लोक के से नीक लागि रहल छल। पहिने त रबींद्र जी खाली गीत लिखैत रहैत छलाह आ से अपने गबितो रहथि। गला नीक नै रहनि। तही पर प्रो मायानन्द मिश्र जी हुनका कहने रहथिन जे विधातासँ एकटा चूक भऽ गेलनि। तोहर वाला गुण हमरा दितथि आ हमर वाला गुण तोरा दितथुन त कमाल भऽ जइतै। माया बाबुक् स्वर बड़ मीठगर रहनि। खैर, जे से। बेगुसरायक कोनो मैथिली प्रोग्राममे रबीन्द्र जीकें कियो कहलखिन जे एहि युवक के अपना संगे लऽ जइयनु। नीक गबैत छथि। युवक रहथि महेन्द्र जी जे रबींद्र जीक गीत के अपन स्वर दऽ मैथिली गीत के एकटा नव आयाम देलनि। सगरो तहलका मचाय देलखिन। रवीन्द्र- महेन्द्रक जोड़ी आधुनिक मिथिलाक गीतक आरम्भ थिक। मैथिली आन्दोलन के गति देबामे एहि जोड़ीक भूमिका अप्रतिम अछि। तकरा बाद सरस- रमेश, शशिकांत- सुधाकांत, पवन- गोविंद, धीर- महेन्द्र- जयराम( तीजोरी) आ अपना दमपर एसगर प्रदीप मैथिलीपुत्र, चन्द्रभानु सिंह आ चन्द्रमणि जीक नाम आदर पूर्वक नै लेब घोर अन्याय हैत। कवि चूड़ामणि काशीकांत मिश्र मधुप जी, स्नेहलता जी आ डा. बी झाक कतिपय गीत सभ मिथिलाक लोकक जीहपर एखनो बसल अछि जे विद्यापतिक बाद मैथिली गीत साहित्य के जीवंत रखने अछि। हम बात करैत रही रबींद्रजीक से कहय लागल रही जे रबींद्र-महेन्द्रक जोड़ीसँ हमरा बेसी काल भेंट-घाँट होइत रहय लागल। कलकत्तामे एकटा सांस्कृतिक मंचपर दुनू गोटे रहथि। कवि सम्मेलन सेहो रहै। हमरो एकटा गीत फुरायल। गीत गायन भेल हमर। महेन्द्र जी हमरा कहलनि जे अहाँ कियैक गीत गायन कैल? अहाँक त कविता नीक होइत अछि। रवीन्द्र जीक कहब रहनि जे विद्यापति आ बांगलाक रबींद्र नाथ ठाकुर जँ आइ विश्व कवि मानल जाइत छथि त गीतेक बलपर। हम दुनू गोटेक बात सुनि कऽ चुप भ गेल रही। मुदा, जीवन यात्राक क्रममे असरि दुनू गोटेक बातक पड़ल। ई कहब जे रबींद्र जीक गीत यात्राक जे गाड़ी चललनि ताहि गाड़ीक एकटा पहिया महेन्द्र जी छलाह। महेन्द्र जीसँ अंतिम भेंट भेल गुआहाटीमे से पछिला सदीक उत्तरार्धमे। तकरा बाद सुनल जे महेन्द्र जी एहि दुनियाँकेँ टा-टा , बाइ-बाइ कए कऽ चल गेलाह। पत्नी हिनकासँ पहिने चल गेल रहथिन। आब रबींद्र जी एसगर भऽ गेल छलाह। सुनयमे आयल छल जे रबींद्र जी किछु दिन बहुत आर्थिक संकटमे रहल छलाह। कियो हित अपेक्षित घुरि कऽ खोज खबरि नै लैत छलनि। एहि अवधिमे रबींद्र जी पत्रिका निकालैत रहल छलाह। पोथी सब लिखलनि। महेन्द्र जीक नहि रहने रबींद्र जी के कोनो सांस्कृतिक कार्यक्रमक मंचपर नै देखल गेल। जीवनक अंतिम पराव भेलनि दिल्ली। जीवनमे जे उपार्जन केलनि ताहिसँ किछु टाका बचा कऽ दिल्लीमे किछु गज जमीन किनने रहथि। सैह जमीन पैत रखलकनि। जमीनक किछु अंश करोड़ टाकामे बेच कऽ अपन घर बनेलनि। आरामसँ गुजर-बसर हुअय लगलनि। भाइ लोकनि बाजय लागल रहलाह जे रबींद्र जी त आब धन्ना सेठ भऽ गेल छथि। हमरा से सुनि के खुशी होइत छल। पटनामे मैथिली अकादमीक अध्यक्ष रहल छलाह। अपना अवधिमे रबींद्र जी मैथिली गीत -संगीतक संवर्धन लेल अभिनव प्रयोग सब करैत रहलाह। खूब नाम यश भेलनि। कहि दी जे रबींद्र जीक चारि पुश्त मैथिलीक गीत संगीतक विधा के अकाश ठेकाय देलनि। हिनक पिता निष्णात संगीत साधक रहथिन। हिनकर त कोनो बाते नै। पुत्र श्री अवनीन्द्र नारायण ठाकुर दिल्लीमे संगीतक एकटा नामी हस्ती छथिन। हमरा अचानक एक दिन दू साल पूर्व हिनक फोन आयल जे हमर पोती सा-रे-गा-मा प्रोग्राममे नम्बर वन पर आबि जायत जँ बेसी सँ बेसी भोट करै लोक सब। से नै भेलइ मुदा, दू पर त आबिये गेल रहै। सहरसामे कोनो सांस्कृतिक कार्यक्रममे रबींद्र जी सेहो दर्शक रूपे आगूक पाँतीमे बैसल रहथि। मंचपर एकटा कलाकार आबि कऽ हिनके गीत के भोजपुरी टोनमे गाबय लागल छल। बगलमे बैसल रहथिन डा मदनेश्वर मिश्र जी। हिनका कहलखिन जे हौ ई त तोरे गीत के भोजपुरी मे गबैत छहु। रवीन्द्र जी विनीत भावे उत्तर देलखिन जे गाबय ने दियौ अपन मैथिलीक पसार भऽ रहल अछि। हुनका अप्पन प्रचारसँ बेसी मैथिलीक क्षेत्र विस्तार नीक लगैत रहलनि अछि। एक बेर मैथिलीक कोनो कार्यक्रममे रबींद्र-महेन्द्र पंजाब गेल रहथि। महेन्द्र जी कहने रहथिन जे एतय त लोक सब भांगरा बुझैत छै। रबींद्र जी कहलखिन जे चिंता नै करह। रबींद्र जी आशु गीतकार रहलथि अछि। तुरत्ते हिनक जोड़ी शुरू भऽ गेल रहथि- कहू कि हम झूठ कहै छी नै यौ नै यौ......। रवीन्द्र जी प्रयोगवादी गीतकार रहलाह अछि। हिनक गीतक किछु अंशक चर्च नै केने बिना ई आलेख अधूरा रहि जायत। देखल जाय- बाबा दण्ड वत बच्चा जय सियाराम। अर्र बकरी घास खो चलु भैया रामहि राम हो भाइ माता जे विराजे मिथिले धाम मे। बहुत एहन गीत सब अछि जे मनोरंजनक अतिरिक्त अपन माटि अपन पानि अपन सभ्यता संस्कृतिक प्रति लोकक रुचि जगबैत अछि। सचेत करैत अछि। स्वस्ति फाउन्डेशन,सहरसा हिनका प्रबोध साहित्य सम्मान देने छनि। उचिते केने छनि। हालहिमे मिथिला सकल समाज,दिल्लीमे हिनक नागरिक अभिनन्दन भेलनि अछि। बाजिव भेल अछि। आब हम रबींद्र जीक बारे मे अपन किछु संस्मरण कहय चाहब। अस्सी दशक के उत्तरार्धमे रबींद्र जी कलकत्ता आयल रहथि ममता गाबय गीतक प्रीमियर शो करबय लेल। हम तखन कलकत्ता केला बगानक राजेन्द्र छात्र निवासमे रहैत रही। रबींद्र जीक भोजन आवासक बेबस्था सटले श्री सत्य नारायण लाल दास जीक घरमे भऽ गेल रहनि। भोरे रबींद्र जी हमर खोज पुछारि लेल होस्टल आयल रहथि। हम सी ए परीक्षाक तैयारी लेल छुट्टीपर रही दू महिना। कहलनि जे अहींक भरोसपर एतय अयलहुँ। हमरा एहन काज सबमे नीके लगैत छल। पोथी पतरा कात कऽ देने रही। आ लागि गेल रही रबींद्र जीक संग। भोरे आठ बजे निकली आ राति के दस बजे धरि आबि जायल करी। देबाल सबपर मैथिलक घरक पछुआर् सबपर गली चौक सबपर ममता गाबय गीतक पोस्टर आ बैनर साटल करी दुनू गोटे खूब उत्साह आ उमंगसँ। अही क्रममे तत्कालीन मिथिला मैथिलीक अनुरागी लोकनिसँ भेंट सेहो कैल करी। कियो चाह बिस्कुट त कतहु जलखै पनापिआइ आ कैक ठाम त भोजनोक आबेस भऽ जाय। एक दिन श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी जे दूरक लाटें रबींद्र जीक साढ़ू छथि अपना आवासपर दिनका भोजनक नोंत दऽ देलखिन। बुद्धी भाइ तखन साल्ट लेक जे अविकसित इलाका छलमे रहैत छलाह। रवि दिन रहैक। दुनू गोटे गेल रही। भोजनपर बैसल रही तीनू गोटे। गप-सर्रका चलैत रहै। बुद्धी भाइ पुछलखिन जे माछ बनलै नीक। हम चुप्पे रही। रबींद्र जी कहलखिन जे हमरा कने मधनोन लगइए। बुद्धी भाइ बाजल रहथि जे एतय हमरा घरमे नूनक खर्च नै होइए। एतुक्का पानिमे नून मिलाएले रहैत छैक। हमरा साल्ट लेक नामक सार्थकताक बोध भेल। रबींद्र जी बाजल रहथि जे एतय लोक एकादशी कोना पार लगबैत छथि। भरि दिन दुनू मैथिली-पुत्रक बात सब सुनैत रही। लागय जेना हमर परीक्षाक तैयारी भऽ रहल छल। मास दिन धरि रबींद्र जीक संग कलकत्तामे कोना बितल से नै बूझि सकल रही। भरि दिन पोस्टर साटी आ साँझ कऽ अखबार लेल समाचार बनाबी। विश्वमित्र आ सन्मार्गमे खबरि छपै। रवीन्द्र जी सब दिन पेपर कटिंग रखैत जाथि। ताही समयक गप थिक। महाजाति सदनमे कोशी कुसुम पत्रिकाक विमोचन समारोह भेल रहै। संपादिका रहथि श्रीमती अम्बिका मिश्र (श्री मृत्युंजय नारायण मिश्रक पत्नी, ललित बाबूक भावहु आ जगन्नाथ मिश्रक भाउज)। सब गोटे मैथिली पत्रिकाक उन्नयनक बात भाषणमे बाजल करथि। रबींद्र जी अपना भाषणमे बजलाह जे मैथिलीक अभ्युदय लेल मैथिलीक सिनेमापर ध्यान देब बड़ जरूरी काज अछि। हुनक कृतज्ञता देखू जे अपना भाषणमे हमर नामक चर्च केलनि आ हमर परिचय मैथिलीक उर्जावान पत्रकार रूपे देलनि। मैथिल समाजमे एहि गुणक तीव्रतासँ बिलौनी भऽ रहल अछि। रवीन्द्र जीपर बहुत काज हैब बाँकी अछि। मिथिला विश्वविद्यालय हरही-सुरहीपर शोध कार्य करबा रहल अछि मुदा, रबींद्र जीक काजक संज्ञान लेब उचित नै बूझि रहल अछि। एहिसँ दुःखद बात आर की भऽ सकैत अछि। हम आभारी छी विदेह पत्रिका (http://www.videha.co.in/)क समस्त टीमक जे रबीन्द्र जी सन मिथिलाक सपूतपर एकटा अपन फ़राक अंक निकालि रहल छथि। खूब नीक काज भऽ रहल अछि। अंतमे हम अपन अग्रज श्री रबींद्र नाथ ठाकुर जीक स्वस्थ आ दीर्घायु जीवनक लेल माँ मैथिलीसँ मंगल कामना कऽ रहल छी! राजनन्दन लालदास: एक उदारचेता सम्पादक रमेश लाल दास, रमेश लाल दास, वाराणसी. मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी आइ कोलकाता स श्री सुधीर भैयाक फोन आयल जे कोलकाताक मैथिल समाज “बिदेह”  मैथिली पत्रिकाक आगामी अंक “श्री राजनन्दन विशेशांक” निकालय चाहैत छथि जाहि में परम पूज्य मामा श्री राजनन्दन लाल दास जी क “मैथिली आंदोलन आ साहित्यिक सम्वर्धन में योगदान” पर लेख आमंत्रित केलनि अछि I हमरो किछु साल कोलकता प्रवासक अवसर प्राप्त अछि. श्री नबो नारायण जी क आदेश अछि जे हमहू श्री राजनन्दन लाल दास जी क व्यक्तित्व आ कृतित्व पर किछु लिखी. कठिन कार्य अछि. हम कोनो लेखक, कवि, साहित्यकार नहि छी. पेशा स बैंकर छी. कोलकता छोड़ना 40 वर्ष भ गेल. कतेक घटना , संस्थाक नाम, पूज्य मैथिल प्रेमी लोकनिक नाम विस्मरण भ गेल अछि. तथापि किछु प्रयास क रहल छी. भगवती मैथिलीक अनेको सपूत मिथिला मैथिलीक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक आ साहित्यिक धरोहर आ परम्पराक संरक्षण, सम्बर्धन में अपन योगदान करैत आयल छथि I ओही कडी में वर्तमान में मिथिला मैथिलीक उन्नयन, साहित्यिक सम्वर्धन आ मैथिली भाषाक प्रति सामजिक दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तनक प्रयास मे परम पूज्य श्री राजनन्दन लाल दास जीक योगदान सहजहि सब के मोन में अभरैत छन्हि I सौभाग्य स हम हुनकर भागिन छियन्हि I किछु वर्ष कोलकता प्रवास में हुनकर निकटतम सनिध्य में मामा, अभिभावक, गुरु आ मित्र रूप् में रह्बाक सौभाग्य प्राप्त अछि I संगहि हमर किछु बर्षक कोलकता प्रवास में मामा संगे मैथिली संस्था सबहक गतिविधि,पुस्तकक प्रकाशन, वार्षिक सम्मेलन आ सर्वोपरि पूज्य मामा श्री राजनन्दन बाबूक बहुआयामी व्यक्तित्व के नजदीक स देखबाक, गुनबाक अवसर रहल I थोरेक प्रारम्भिक चर्चा जे करी त मामाक जन्म पटोरी (सहरसा) आ र्पैत्रिक गाव गोनौन, घनश्यामपुर के सभ्रांत संयुक्त परिवार में भेलन्हि I गोनौनक प्रसिद्ध दुर्गा स्थान मामाक पुरखा लोकनि द्वारा स्थापित अछि I आइ जखन संयुक्त परिवार लगभग एक परिकल्पना मात्र रहि गेल छैक, हमर मत्रिक परिवार एखनो संयुक्त परिवार छैक. परस्पर प्रेम आ पारिवारिक मर्यादा आइयो परम्परागत छैक जेकर पूर्न श्रेय मामा श्री राजनंदन बाबू के छन्हि. समग्र रुपेन परिवार के आपसी प्रेम आ सद्भावनाक संग हुनकर नेत्रित्व अनुकरनीय छन्हि. अगर समाज एहि गुणक अनुकरण करय त समाज में निश्चित पारिवारिक स्नेह, प्रेम आ सद्भाव प्रतिस्थापित भ जायत. पारिवारिक जिम्मेदारी किशोरेवस्था में आबि गेलन्हि. ओहि काल में कोलकता महानगर औद्योगिक दृष्ट स बर समृद्ध रहैक आ बिहारक लोक के जिविकाक साधन उप्लब्ध हेबाक अवसर भेटैत  रहैक. पंडोल हाइ स्कूल स मैट्रिक पास केलाक बाद मामा श्री राजनंदन बाबू कोलकता आबि गेलाह आ राजेंद्र छात्राबास, कालेज स्ट्रीट में अन्य बिहारी छात्र सबहक संग रहय लगलाह. ट्यूशनक कमाइ स विद्यासागर कालेज में नाम लिखा शिक्षा आरम्भ केलन्हि. कह्बाक आवश्यक्ता नहि जे एहि में कोनो आर्थिक सह्जोग परिवारक नहि छलन्हि. दिन में ट्यूशन, संध्या में कालेज क्लास . अर्थोपार्जनक माध्यम मात्र ट्यूशन जाहि स अपन आ पारिवारिक दायित्वक दुनूक निर्बहन करैत छलाह. विद्यासागर  कालेजक प्रिंसिपल अत्यंत सह्रिदय आ मेधावी छात्रक परम हितैषी आ सह्योगी छलाह. कोलकता विश्वविदयालय स राजनीति शास्त्र मे एम.ए. डिग्री प्राप्त केला उपरांत कोलकता विश्वविद्यालय के स्कूल ओफ बिजिनेस मैंनेजमैट स सेल्स मैनेजमैट एंड मार्केट रीसर्च में डिप्लोमा हासिल केलनि. तुरतहि एक प्रतिष्ठित निजी कंस्त्रक्सन इक़ुइप्मेंत कम्पनी में सेल्स आफिसरक नौकरी प्रारम्भ केलनि. राजेंद्र छात्राबास में अधिकांश मैथिल छात्र रहैत छलाह. शैक्छनिक परिचर्चाक अतिरिक्त मैथिली भाषाक उन्नयन आ सामाजिक चेतनाक विकास  पर सेहो चर्चा होइते रहैत छल जे मामा श्री राजनंदन बाबू के मिथिलाक संस्कृति आ मैथिली भाषा के उन्नयन आ मिथिलाक सामाजिक चेतनाक विकास हेतु प्रेरित करैत छलन्हि.  मिथिलांचल में मैथिली लोक भाषा त छल किंतु धारणा छलैक जे ई मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा थिक . मामा श्री राजनंदन बाबू मैथिली के जातिबादी भाषा स्वरूपक संकीर्ण्ता  स उठा के समग्र मिथिलांचलक भाषा के रूप मे देशिल बयना के रूप  में स्थापित करअ चाहैत छलाह. मैथिली भाषाक  लीपि, व्याकरण, समृद्ध सहित्य आ मिथिलाक समृद्ध सांस्क्रितिक धरोहर के देखैत एकरा जातिबादी/ छेत्रबादी बंधन स मुक्त कय के आन भारतीय भाषा जोंका राष्ट्रव्यापी भाषाक रूप में प्रतिष्ठा, सम्विधान के अष्टम सूची में मान्यता दियबैक अकुलाहति ह्रिदय में हिलोर मारैत रहन्हि. समाज मे समानता, भाषा आ संस्कृति पर सब वर्गक समान अधिकार हेतु सतत चिंतनशील रहैत छलाह. सहित्य समाज के प्रतिबिम्बित करैत छैक. एकरा मध्य में राखि प्रसिद्ध नातक “ संतो “ लिखलथि. एहि में केंद्र में मुख्य पात्र संतो महतो के राखल्खिन्ह जे जातिबादी संकीर्णता स पृथक छैक. मिथिलांचलक सहित्यिक जगत मे एकरा बहुत प्रतिष्ठा भेँटलहि आ एकर उदारबादी दृष्टिकोण समाज के एतेक प्रभावित केल्कैक जे सम्पूर्न मिथिलांचल में और बिभिन्न शहर में प्रवासी मैथिल संस्था सब एकर सफल मंचन क समाज में समानता आ समेकित आंदोलनक चेतना क संदेश देल्खिन्ह. सामाजिक चेतना जाग्रित करबा में  संतो नातकक भूमिका सफल रह्लैक. सन्तोंक दोसर अंकक सप्तम द्रिश्य में आंदोलन जाति, सम्प्रदाय के परिधि के तोरि के जन साधारण के आंदोलन बनि गेलैक अछि. एअह त श्री राजनंदन बाबूक उद्देश्य आ अकुलाहति छन्हि. हमर व्यक्तिगत विचार अछि जे मिथिला मैथिली के प्रतिष्ठित करबा में प्रवासी मैथिल संस्था सभक भूमिका महत्वपूर्न छन्हि ताहू में कोलकताक संस्था आ प्रवासी सबहिक योगदान अग्रणी छन्हि. कतेक मनीषी पूज्य सर्व श्री बाबू साहेब चौधरी, पिताम्बर पाठक, सत्य नारायण लाल दास, उदित नारायन झा, महावीर झा, गणेश शंकर झा, मदन चौधरी, प्रबोध नारायण सिंह, नबो नारायण मिश्र , नरेश झा, दयानंद ठाकुर, ब्रहमानंद झा, राम कृष्णा ठाकुर , अर्जुन लाल कर्ण औरो कतेक समर्पित नाम अछि. संस्था  में आल इंडिया मैथिल संघ, मिथिला सांस्कृतिक परिषद, आदि संस्था सक्रिय छल. हावड़ा समस्तीपुर ट्रेनक नाम मिथिला एक्स्प्रेस रख्ननाइ, सम्विधानक अष्टम अनुसूचि में मैथिली के शमिल करेबाक जुलूस, मंत्री/ मंत्रालय संग पत्राचार, पोस्टर, बैनर  आदि कतेक गतिविधि सब होइत रहैत छल. एहि सब में श्री राजनंदन बाबूक सक्रिय भूमिका रहैत छलन्हि. श्री राजनंदन बाबू आल इंडिया मैथिल संघक अध्यक्ष , सचिव आदि पद पर रहैत मैथिली आंदोलन के सफल नेतृत्व केलन्हि. एकर वार्षिक अधिवेसन में मुख्य अतिथि या मुख्य बक्ता के रूप में निश्चित रूपे ब्राह्मण कायस्थ स अलग जेना श्री बिलत पासवान बिहंगम, श्री फज़्लूर रह्मान हाशमी आदि के निमंत्रित करैत रह्थिन्ह. एक अभिजात्य बर्ग स पृथक बर्ग के मंच पर आमंत्रित आ सम्मानित केला स सामाजिक समानता सहजहि प्रभावित भ मुखर भ जाइक. समस्त मिथिलांचल के एक सूत्र मे समेकित क लई.  मैथिली आ विद्यापति बिना बंगला सहित्य आ हिंदी सहित्य दूनू अपूर्न अछि. वार्षिक सम्मेलन में बंगाली विद्वान सब के सेहो अमंत्रित करैत रह्थिन्ह जाहि स बंगाली विद्वान सब में मैथिली क प्रति जिग्याशा, जागरूकता होइत छलन्हि. मैथिली सहित्यिक पत्रकारिता क्षेत्र  में मिथिला मिहिरक योगदान अविस्मर्निय छैक. मिहिर के बंद भेलाक बाद कतेको पत्रिका मैथिलि में निकलल किंतु बहुत दिन तक नहि चलि सकल. श्री राजनंदन बाबूक हार्दिक बिचार छलन्हि जे मैथिली में एकटा एहन पत्रिका हेवाक चाही जे मिथिला मिहिर के कमी के भरि सकय. ओ सतत चिंतनशील रहैत छलाह. आन शहर जेंका कोल्कतो में कर्ण कायस्थक संस्था “कर्ण गोष्ठी कोलकता” अछि जेकर सदस्य लोकनि कर्णामृत पत्रिका हिंदी में निकालैत छलाह. संयोग स सम्पादक महोदय के कोलकता स बाहर जाइ परलन्हि आ कर्णामृतक सम्पादनक समस्या संगहि आगामी अंकक समस्या आबि गेलन्हि. कर्ण गोष्ठी कोलकताक सम्पादक श्री राजनंदन बाबू स सम्पर्क क कर्णामृतक सम्पादन हेतु निवेदन केल्खिन्ह. श्री राजनंदन बाबू निवेदन केल्खिन्ह जे हम सम्पादनक भार स्वीकार करैत छी. पत्रिकाक नाम कर्णामृत रहत किंतु भाषा मैथिली रहत. आइ लगभग 40 वर्ष स अधिक काल स कर्णामृत निर्बाध श्री राजनंदन बाबूक सम्पादन में निकलि रहल अछि. एहि प्रकारे कर्णामृत कायस्थ जाति विशेष आ हिन्दीक परिधि स बाहर आबि गेल आ समस्त मिथिलांचलक  पत्रिका बनि गेल. समस्त मिथिलांचलक सुधी पाठकगण ग्राहक बनि आ बिद्वत लेखकगण अपन लेख स पत्रिका के अनुप्रानित करैत रहलाह आ कर्णामृत निर्बाध गतिये बैचारिक क्रांति आ आंदोलनक संबाहक बनि मिथिला मैथिलीक सेवा करैत रहल. कतेको बेर श्री राजनंदन बाबू के सफल सम्पादन आ पत्रकारिता हेतु बिभिन्न मैथिली संस्था सब पुरस्कृत क चुकल छन्हि. श्री राजनंदन बाबूक विद्वता, ओजस्वी लेख आ कर्मठता स प्रभावित भ साहित्य अकादमी किछु पुस्तकक अंग्रेजी स हिंदी मे अनुबाद्क दायित्व सेहो देल्कन्हि जेकरा सफलता पूर्वक निस्पादित केलन्हि. हिनकर साहित्यिक योगदान, प्रगतिशील चिंतन एवम अन्य भारतीय भाशाक प्रति समभाव दॄष्टिकोण स प्रभावित भय के साहित्य एकादमी साहित्यिक मीटिंग साहित्यिक परिचर्चा आदि  में आमंत्रित करैत रहैत छलन्हि. प्रकाशनक क्षेत्र में सेहो श्री राजनंदन बाबूक योगदान अतुलनीय छन्हि. आल इंडिया मैथिल संघ आ कर्ण गोष्ठी क तत्वाब्धान में अनेक पुस्तकक प्रकशन श्री राजनंदन बाबूक निर्देशन में भेल अछि जहि में डा. ब्रज किशोर बर्मा मनिपद्मक अर्धनारीश्वर आ अन्य पुस्तक मुख्य अछि. पत्रिका आ साहित्यक मार्केटिंग आ विक्री महत्व्पूर्न  होइत छैक. श्री राजनंदन बाबू कम्पनी कार्य स सम्पूर्न भारतक भ्रमण करैत छलाह. जाहि शहर में जाथि दिन में कम्पनीक प्रोडक्ट आ संध्या में कर्णामृत आ प्रकाशित पोथीक मार्केटिंग आ बिक्री करैत छलाह. कर्णामृत के ग्राहकक कमी कहियो नई भेलैक. मामा कोलकताक अनेक क्न्स्त्रक्सन इक़ुइप्मेंत कम्पनी मे सेल्स मैनेजर पद पर कार्यरत रहथिन्ह. मार्केटिंग अनुभव आ आत्म विस्वास एतेक जे दाबा स कहैत छल्थिन्ह ”कोलकता प्रोडक्ट कंस्त्रक्सन इक़ुइप्मेंत सम्पूर्न भारत में कम्पनी के ब्रांड से नही आर. एल.दास के नाम से बिकता है”. हम अति विश्वास आ दाबा स कहि सकैत छी जे कर्णामृत और मैथिली साहित्य श्री राजनंदन बाबू के सम्पर्क स बिकैत छल. सेल्स में नौकरी सम्पूर्न भारत के भ्रमण के सुयोग देल्कन्हि जे मैथिली आंदोलनक अलख जगाबय आ साहित्य और पत्रिकाक बिक्री में सब राज्य आ शहर में सहायक भेलन्हि. एक बेर में एक एक महीनाक दौरा रहैत छलन्हि. तूरक क्रम में कोनो राज्य,कोनो शहर में प्रवासी मैथिल स सम्पर्क करब, मैथिली सहित्य, पत्रिकाक प्रति रुचि आ प्रेम जाग्रत करब हिनकर अजेंदा में रहैत छलन्हि. कोलकता स बाहर अन्य शहर मे कर्णामृतक ग्राहक संख्या आ साहित्यक बिक्री हिनकर अथक परिश्रम के प्रमाणित करैत अछि. तूर पर जाइ काल हम हावड़ा तक जा बिदा करैत छलियन्हि आ वापस एला पर सम्पूर्न यात्रा ब्रितांत हमरा संग शेयर करैत रह्थिन्ह जे कोन शहर में किनका स भेंट भेल, के सब कर्णामृत के ग्राहक बनला और कतेक पोथी बीकल. अपन कतेक मार्केटिंग तक्निक आ अनुभव  सेहो चर्चा करैत रहैत छ्लाह जे हमर सतत मार्ग दर्शन करैत रहल. उपर हम कहि आयल छी जे श्री राजनंदन बाबू हमर मामा, गार्जियन, मेन्टर आ मित्र छथि. एक ब्यक्ति स मामाक स्नेह, गार्जियनक सख्ती, मेन्टरक मार्ग दर्शन आ मित्रक अनौपचारिक खुलापन सब भेटल. हम अपना के धन्य मानैत छी जे हम बहु आयामी ब्यक्तित्व बाला मामाक भगिन छी आ किछु वर्ष मामाक निकट सानिध्य में रह्बाक अवसर भेटल. हमरा ग्रजुएशनक बाद अपना लग कोलकता बजा लेलन्हि आ हुनकर इक्शा हमरा चार्टर्ड अकॉण्टेट बनेबाक रहन्हि जे कतिपय कारण स नहि भ सकल किंतु ओ हमरा सतत प्रेरित करैत रहलाह आ प्राइवेट अथवा बैंक के नौकरी मे मार्गदर्शन करैत रहलाह. श्री राजनंदन बाबूक आडम्बरहीन निश्काम,निष्कलुष भावेन प्रेममय व्यवहार सबके आकर्षित करैत छलैक. ओ मैथिल, बंगाली, अफसर सब बर्ग में समान रूपेन स्वीकृत आ प्रतिष्ठित छलाह. श्री राजनंदन बाबूक मृदु भाशिता, कर्मठता कंस्ट्रक्शन एक्यूपमेंट उद्योगक विकास में हिनकर योगदान के कोलकताक उद्योगपति सब स्वीकार कय कोलकता बिल्डिंग एसोसिएशन क वाइस प्रेसिडेंटक पद पर सम्मानित केल्कन्हि. मामा सक्रिय सहभागिताक बादो सतत अपन प्रचार प्रसार आ आगू बढ़ि के कोनो काजक सफलताक श्रेय अपना नामे लेबाक पक्ष में नहि रहैत छथि. ओ एकटा निश्काम कर्मयोगी छथि. मामाक ब्यक्तित्वक बर्णन पूजनीया मामीक ब्यक्तित्वक चर्चा बिना अपूर्ण रहि जायत आ कचोटैत रहत. एक मात्र आयक श्रोत आ विशाल सन्युक्त पारिवारिक दयित्व . शिक्षा, विवाह, बीमारी, सर-कुतुम्ब आदिक अतिरिक्त कोलकता निवास पर अनगिनत अन्य सम्बंधी, मित्र लोकनि के कार्यवश आवागमन आ अस्थायी निवास. मामाक काकुरगाछीक निवास, अनेको के लोकल पता छल आ मामा लोकल गार्जियन छलाह से बिना पूजनीया मामी के सहयोगक सम्भव नहि छल. राम काल में जेना भगबती सीता अपन अद्म्य धैर्य,साहस आ संतान निर्माणक संकल्प स राम के मर्यादा पुरूषोत्तम बनाबय में सहायक रहथिन्ह, कृष्ण काल में जेना भगवती राधा सबके कृष्‍ण आ चराचर जगत के प्रेम में सराबोर केने रहथिन्ह. कृष्णा कालीन युद्ध, गीताक ग्यान में कतहु राधाक जिक्र या नाम नहि भेटत किंतु चराचर प्रेम में राधा बिना सब बेकार. अगर आध्यात्मिक दृष्टिकोने देखी त आनंदमय कोश स उपर राधा एक अह्लादिनि शक्ति रूपेण कृष्णा आ चराचर जगत के प्रेम में सराबोर करय बाली शक्ति छथि. तहिना पूजनीया मामी भगवती सीता जेका मामा के सब पारिवरिक दायित्व आ कर्तव्य के निर्बहन में धैर्य आ साहस स मामा के मर्यादाक रक्षा करैत रहल्थिन्ह आ भगवती राधा जेका सबके अपन प्रेम स सराबोर केने रखल्खिन्ह. ततेक प्रेममय रह्थिन्ह जे हमर माँ अपन छोट भाउज अर्थात मामी के प्रेमसागरि कहैत रह्थिन्ह. मामा अक्सर दौरा पर जाइते रहैत छल्थिन्ह. मामी धैर्य पूर्वक असग़र सब बच्चाक संग कोलकता में रहि  शिक्षा , बिमारी अन्य पारिवारिक समस्या आदि समग्र ग्रिहस्ती के निर्बाह करैत  मामा के उचित सह्योग दैत रहल्थिन्ह. संयोग स आइ हमर माँ आ मामी दूनू नहि छथि. हम दूनू के सादर नमन आ भावपूर्ण  विनम्र श्रधांजली अर्पित करैत छियन्हि. मामाक व्यक्तित्व के मोन पारैत लिखैत हमरा ALEXANDER POPE क कविता “ODE ON SOLITUDE” मोन परैत अछि. ओ बस अपन पैतृक धन पर संतुस्त छथि. कोनो प्रचार प्रसारक कमाना रहित. अजस्र  शांति सुखक अनुभव करैत छथि. जे लोक के मेडिटेशन स भेतैत छैक से हुनका सहजहि प्राप्त छन्हि . कविताक अंतिम दू स्तेंजा SOUND SLEEP BY NIGHT; STUDY AND EASE; TOGETHER MIXED; SWEET RECREATION; AND INNOCENCE; WHICH MOST DOES PLEASE WITH MEDITATION THUS LET ME Live UNSEEN UNKNOWN THUS UNLAMENTED LET ME DIE STEAL FROM THE WORLD AND NOT A STONE TELL WHERE I LIE तहिना मामा असगर परिवारक संचालन, समाज , क्षेत्र, भाषा सहित्यक विकास में सक्रिय सह्भागिता के बाबजूद कोनो नाम यशक कामना स उपर निश्काम, केकरो स अपेक्षा नहि, सबके प्रति निश्काम, निष्कलुष, निष्पक्ष प्रेम सद्भाव अपना में संतुष्ट, मस्त, प्रसन्न. व्यक्तित्व बला आधुनिक कर्मयोगी छथि. आइ पृथ्वी पर सांसारिक सम्बन्ध में मामा श्री राजनंदन बाबू  हमर सब स  अधिक पूज्य आ प्रिय छथि आ हम बुझैत छियैक जे हुनको अपन संतानक अतिरिक्त हम सब स प्रिय आ सिनेही छियन्हि. मोन करैत अछि जे एखनो किछुओ दिन मामाक सानिध्य में  रहि हुनकर साहित्यिक सामाजिक चेतना के आत्म्सात क सकितहु से कतिपय पारिवारिक समस्याक कारणे सफल नहि भ रहाल अछि आ कचोटैत रहैत अछि. हम अपन परम पूज्य आ परम सिनेही मामा श्री राजनंदन बाबू के श्री चरण में शत् शत् प्रणाम अर्पित करैत छियन्हि आ परमात्मा स प्रार्थना करैत छियन्हि जे मामा स्वस्थ रहथि आ हमरा सब पर हुनकर आशीर्वाद निरंतर बनल रहय. एखनो मैथिली भाषा आ मिथिलांचल कतेक समस्या स ग्रसित अछि. जेना मध्य विद्यालय तक मातृभाषा में शिक्षा, मिथिलांचल राज्य आ कतेक स्थानीय समस्या. आवश्यकता अछि जे समस्त मैथिल संकीर्न्ताक परिधि स बाहर आबि सामेकित आंदोलन करी.  पूज्य श्री राजनंदन बाबूक अस्वस्थता सं कर्णामृतक सम्पादन में बाधा  उत्पन्न भ रहल अछि. हम विद्वान मैथिल समाज स निवेदन करैत छियन्हि जे कर्णामृतक निर्बाधता के बनौने रहथि. हम कृतज्ञ छी श्री नबो नारायण मिश्र जी के जे हमरा मोन राखने छथि आ  आभारी छियन्हि जे पूज्य मामा श्री राजनंदन बाबू सन व्यक्तित्व के सार्बजनिक करबाक प्रयास केलथि आ हमरो किछु लिखबाक अवसर देलथि. कोलकता समाज स हमरा बहुत स्नेह आ सह्योग भेटल अछि. सबके हमर प्रणाम आ अनन्त मंगल कामना . II   ओम् शम II II जय मिथिला II                   II जय मैथिली II                    II जय भारत II शारदानन्द दास परिमल, पता:-डी-००३अजमेरा ग्रीन एकर्स,कलेना, अग्रहारा बनरघट्टा रोड,बंगलुरु-५६००७६ मैथिली पत्रकारिता मे राजनन्दनक अवदान मैथिली पत्रकारिताक इतिहास मे कर्णगोष्ठी-कर्णामृत,कलकत्ताक यात्रावधि एक एहन स्वर्णिम अध्याय अछि जकर चालिस वर्ष सँ अधिक,लगभग अर्द्ध शताब्दिक यात्रा अनवरत चलति रहबाक श्रेय श्री राजनन्दन लाल दास के नाम जाइत छन्हि ,जे मनसा -वाचा -कर्मणा सम्पूर्ण रूपे समर्पित भावें कर्णामृत कें विना कोनो सुदृढ़ आर्थिक पूँजी रहितो अपन अध्यवसायक बलें चलबैत रहला अछि।हिनक एहि संघर्षशील दीर्घ यात्रा पर ध्यान दै छी ,त सहसा महामना मदन मोहन मालवीय मोन पड़ि जाइत छथि। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय केर स्थापना क प्रसंग मे ओ लम्बा भ्रमण क क धन संग्रह कएने छलाह श्री राजनन्दनक क्रिया-कलाप कर्णामृतक माँदे लगभग तहिना रहल। इहो अपन जीवन-वृत्तिक सिलसिला मे नगर-नगर,डगर-डगर भ्रमण करैत कर्णामृतक झोरा लटकौने जनसम्पर्क करैत ग्राहक बनबैत मैथिली-मिथिलाक सम्बर्धन मे जुटल रहलाह अछि। सन् 1984ई०क आस-पास हमरा हिनका सम्पर्क तखन भेल जखन स्व० सुधाकान्त दास परिचय करौलनि आ कर्णामृतक ग्राहक बनबौलनि। तावत तक हम काव्य रचना दिश प्रवृत्त नहिं भेल छलहुँ;ओना छिट-फ़ुट शौक़िया तौर पर जखन-तखन किछु लिखि लैत रही। तत्पश्चात घनिष्ठता एना बढैत गेल जेना-जेना हमरा सँ कबिता -लेख मँगैत रहला आ हम यथा योग्य सामग्री पठबए लगलियनि। क्रम एहन सन बनि गेल जे साले-साल नव -वर्ष केर आगमन पर अभिनन्दन करैत तथा शारदीय अंक लेल सामग्री सेहो दैत रहलियनि। ओतबए नहिं कर्णामृतक आयु जेना बढैत गेल तेना ओकर दस वर्षक भेला पर,पुन: प्रौढि प्राप्त कएला पर तथा रजत जयन्तिक प्रसंगे कविता लिखैत गेलहुँ। एहि प्रसंग मे ई कहब अतिरंजन नहिं होयत जे मैथिली ल क हमरा न्यूनाधिक सक्रिय बनेबा मे राजनन्दन बाबूक बड़का योगदान छन्हिं।हिनक निष्ठा आ लग्नशीलता देखि क आनो तरहक संगठनात्मक क्रिया-कलाप मे संलग्न हेबाक प्रेरणा हमरा हिनके सँ भेंटैत रहल। जखन हम दिल्ली मे” मिथिलांगन “ नामक संस्था क स्थापन अओर संगठन मे लागल रही ,तखन यथायोग्य परामर्श -दिशा-निर्देश हिनका सँ भेंटैत रहल। ई यदा-कदा दिल्ली अबैत छलाह त हमर मिथिलांगनक बैसक मे सम्मिलित भए उचित परामर्श सँ हमर कार्यकर्ता लोकनि कें प्रोत्त्साहित कै उल्लसित करैत छलाह। ई त हिनक जन-सम्पर्क बढेबाक कला-कौशलक छवि थिक। कर्णामृत रूपी (सकुरीक एक्का)क लगाम पकड़ने ओकरा रथ जकाँ कोना हँकैत रहला तकर आनो कतेक पक्ष अछि। जेना कर्णामृतक शारदीय अंक साले-साल निकालब, पत्रिका प्रकाशनक संगे विभिन्न लेखकक पुस्तक प्रकाशन।एहि प्रकाशन मे लागत ख़र्च पाठक वर्ग सँ प्राप्त करब। संगहिं-संग लेखक कें प्रोत्साहित कए पुस्तक लिखबा क प्रकाशित करब।उदाहरण स्वरूप प्रसिद्ध लेखक मणिपद्मक लिखल पुस्तक सभ त अछिए।, “मैथिली दधीचि भोला लाल दास” ;रामानन्द रेणु रचित तथा आनो आर कतेक लेखकक रचना करणगोष्ठी द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तक अछि। ई सभ कार्य हिनक कृतित्वक महार्घता त प्रमाणित करितहिं अछि संगहिं एकरा सम्पादित करबाक पाछाँ कतेक प्रकारक पारिवारिक एवम वैयक्तिक संघर्ष करेत रहए पडलनि से हिनक युद्धवीर प्राणवन्त हएबाक ठोस प्रमाण थिक । बीच-बिच मे  अनेक एहन अवसर आएल जखन ई भीषण रूपें रोग-ग्रस्त होइत रहला आ दीर्घ कालीन चिकित्सा उपरान्त स्वस्थ भए मैथिलीक सेवा चालू रखलनि। कतेक बेर सामने उपस्थित मृत्यु पर्यन्त के टिटकारि क दूर भगौलनि अछि। मैथिली- पत्त्रकारिता के हिनक अवदान एना चिरस्मरणीय अछि जे हिनकर समानान्तर अथवा समकक्ष मैथिली साहित्यक प्रांगण मे दोसर केओ नहिं देखाइत अछि । हँ हिन्दीक पत्रकारिता मे महावीर प्रसाद द्विवेदी नजरि अबैत छथि। ई धारणा हिनक संघर्ष-साधना केर विविध पक्ष के ध्यान मे राखि क बनल अछि।हिनक साहसपूर्वक साधना मे सहधर्मिनी पत्नीक देहावसान भेलापर हमरा आशंका छल जे एहन वज्राघात सँ हिनक गतिशीलता कहीं अवरुद्ध ने भए जाय।मुदा हिनक संकल्प अप्रतिहत रहल। हमरा कतेको बेर कलकत्ता पहुँचि हिनक भेंट करबाक संयोग बनि-बनि क यात्रा टरि जाइत रहल आ आब त हम वृद्धावस्था जन्य असमर्थता सँ पीड़ित छी। स्वयम राजनन्दन बाबू बजबो-भुकबो सँ असमर्थ छथि। पहिने जेहो किछु वार्तालाप होइत रहइ छल आ भावनाक उष्मा सँ भरि जाइ छलहुँ,से संभव नहिं। तखन कर्णामृतक भविष्यक चिन्ता खेहारने रहैत अछि।आगू चित्रगुप्त भगवानक जे इच्छा। नबोनारायण मिश्र युग प्रवर्त्तक राज नन्दन लाल दास सुरेन्द्र ठाकुर मैथिली सेवी कलमक सिपाही: श्रीमान राजनन्दन लाल दास मोसि सॅ भरल दवात आ लेखनी शिक्षित समाजक एकटा प्रधान अंग रहल छन्हि।जाहि सॅ ओ जन-जीवन सॅ संबंधित विभिन्न पक्षकें युगानुकुल लिपिवद्ध करैत आबि रहल छथि।ब्राम्हण वर्णक अतिरिक्त कायस्थ लोकनि सेहो उक्त उपकरण कें अपन- अपन जीविका अर्जन करबाक लेल प्रमुख आधार बनौलन्हि।आ,अतीतमे राजा-महाराजाक दरबार मे मुंशी-पटवारीक तत्कालिन प्रतिष्ठितपद पर आसीन होइत रहलाह।आधुनिक युग मे सेहो कायस्थ लोकनिसरकारी-असरकारी विभाग मे लेखा लिपिक,लेखापाल आ चार्टर्डएकाउण्टेंट आदि पद पर काज करैत आबि रहल छथि।एंकर अतिरिक्त ई लोकनि सामाजिक ,साहित्यिक,सांस्कृतिक राजनैतिक काज सॅ सेह़ो जुड़ित रहलाह ।एहि क्रममे श्रद्धेय श्री मान् राजनन्दन लाल दास जी से हो वंचित नहि रहलाह। श्रीमान राजनन्दन लाल दास शिक्षा अर्जन करबाक उदेश्येकोलकाता गेलाह।काल-क्रमेंण ओ कलकत्ता विश्व विद्यालय सॅराजनीति शाश्त्र मे स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण कयलन्हि,आ एकटाप्रतिष्ठित ईंजिनियरिंग कम्पनी मे'सेल्स प्रतिनिधि/अधिकारीक रुपमे काज करय लगलाह।अन्ततोगत्वा ओ सेवा निवृतो भेलाह। मुदा,श्रीमान् दास जी अपन जीवन कें मात्र चाकरी जीवन सॅसंबंधित नहि रखलाह।ओ राजनीति शाश्त्र मे मार्क्श-लेनिनक विचार- सिद्धान्त आ गतिविधिक संग रूसी क्रान्ति बा सर्वहाराकसमस्याग्रस्त जीवनक सेहो अध्ययन कयने छलाह।तकर प्रभावहुनक सामाजिक जीवन पर सेहो पड़लन्हि।आ,ओ सामाजिक-राजनैतिक आ आर्थिक सुधारक दृष्टिकोण ल'क' अपन अतिरिक्तसमय मे काज करय लगलाह।मुदा,ओ हमरा जनतबे ,कलकतास्थकोनो राजनैतिक दल विशेष क' कोनो साम्यवादी दल सॅ जुडितनहि रहलाह।मुदा,ओ सामाजिक स्तर पर ओ मिथिला-मैथिलीकसेवाक हेतु काज करय लगलाह। श्री मान् दास जी कोलकतास्थ अपन छात्रावस्था कालहिं मेमैथिली आंदोलनी(स्व०)पं० देवनारायण झा (दरभंगा) क सम्पर्कमे अयलाह।आ,अ०भा०मिथिला संघ(पूर्वक मैथिल संघ) मे प्रवेशक'अबाध गतिएं काज करय लगलाह।ओत्तहिं हिनका भेट भेलरहथिन्ह सर्व श्री पं०हरिश्चन्द्र मिश्र 'मिथिलेन्दु', उदित नारायण झा(बसौली) ,महावीर झा (शुभंकरपुर,दरभंगा), सहपाठी पीताम्वरपाठक (धकजरी, मधुवनी) देवकान्त ठाकुर (दुर्गापट्टी, मधुवनी) आ,बाद मे व्रम्ह नारायण झा(गाम-दुल्हा, मधुवनी)आ युगनारायण झा ( सरिसो, मधुवनी) आदि-२ सदस्य लोकनि। डा०(स्व०) लक्षमण झा क'आह्वान पर मिथिला राज्यक समर्थन मे मैथिल संघक दक्षिण कलकत्ताक शाखा अपन मूलसंगठन सॅ अलग भ'गेल आ,'मिथिला लोक संघ'क नाम सॅ काजकरय लागल।ओही मे प्रमुख रुपेंण छलाह:-सर्वश्री बाबू साहेबचौधरी,डा०प्रवोध नारायण सिंह,पं० देव नारायण झा,वैद्यनाथ झा(डुमरा,मधुवनी)आदि-२लोक।आ,मिथिला लोक संघ उत्तरोत्तरमिथिला राज्यक समर्थन मे बर्षों धरि गाजा-बाजाक संग कलकताक'राजपथ पर प्रदर्शन करैत रहल,काज सभ करैत रहल।मुदा,श्रीमान राज नन्दन लाल दास जी तात्कालिक भूलवश श्रद्धेय' श्रीमिथिलेन्दु जीक संग अपन मूल संगठन 'मैथिल संघ'मे रहि गेलाह। पूर्व मे मूल संगठन'मैथिल संघ' मिथिला राज्य निर्माणक प्रश्नपर एकमत नहि छल।मुदा, ई०सन्:-१९५८ क-२६ जनवरी क'दिन दुनू संगठन मिलि क' एकीकरण कयलक आ,नव नाम:-अखिल भारतीय मिथिला संघ क' नाम सं काज करय लागल।एकीकरणक श्रेय छलन्हि सर्वश्री :-डा० लक्षमण झा, डा०व्रज किशोरवर्मा 'मणिपद्म'आ डा०हरिमोहन झा क'।बाद मे संघ अपनमासिक पत्रिका'मिथिला दर्शन'क प्रकाशन डा०प्रवोध नारायणप्रयास सॅ शुरु कयलक।ओकरा लेल मिथिला दर्शन प्रा०लि०नामक कंपनीक स्थापना कयल गेल।जकर पहिल सचिव श्री मान्राज नन्दन लाल दास जी एं कें बनाओल गेल छल। ईम्हर नव गठित अ०भा०मिथिला संघ मे पुन: किछु मतान्तरक कारणें 'गुटबाजी'शुरु भ'गेल।दुनू ग्रूप परस्पर अपनाआप कें असली मिथिला संघ घोषित क'स्वतंत्र रुपेंण काज करयलागल। ओम्हर डा०प्रवोध नारायण सिंह ,श्री वैद्यनाथ झा क'सलाह पर उक्त संघ कें 'रजिष्ट्रेशन' चुपेचाप करबौलन्हि।तथापिदुनू ग्रूप काज करैत रहल।मुदा,बाद मे ई०सन् १९६५ मे महाजातिसदनक प्रेक्षागृह मे डा०प्रवोध नारायण सिंह 'संघ'क रजिष्ट्रेशनकसंबंध मे खुलाशा कयलन्हि।विरोधी ग्रूप पुन: सक्रिय भेल।मामिलाकलकत्ता हाई कोर्ट मे पहुॅचल।मुदा,डा०प्रवोध बाबू क'ग्रूप केंपूर्वहिं सॅ रजिष्ट्रेशन करयबाक कारणें 'डिग्री'भेटलन्हि।तदुपरान्तविरोधी ग्रूप पूर्वक आॅई० मैथिल संघ कें पुन:जीवित कयलन्हि।श्री मान् राज नन्दन लाल दास जी पुन:ओतहिं खूब जोर-सोर सॅकाज करय लगलाह।ओ उक्त संघ मे समय-समय पर मिथिला -मैथिली हेतु आन्दोलन,प्रदर्शन,मैथिली पुस्तकक प्रकाशन आदि-आदि काज सभ सदस्यक संग करय लगलाह।अपन संघी जीवनमे श्री मान् दास जी सचिव/अध्यक्ष पद कें सेहो बेश सुशोभित कयलन्हि।मिथिला-मैथिली क' लेल काज करब कें ओ आजीवन उदेश्यपूर्ण रुपेंण एकटा'मोटो' बना लेने छलाह। श्री मान् दास जी कलकत्तहिं सॅ प्रकाशित 'आखर'पत्रिका क'प्रकाशन सेहो शुरु कयने छलाह।प्रेरक आ सलाहकार छलथिन्हमैथिलीक सुपरिचित हस्ताक्षर (स्व०)राजकमल चौधरी।सहयोगीवृन्द मे छलथिन्ह सर्व श्री कीर्ति नारायण मिश्र,पीताम्वर पाठक,डा०वीरेन्द्र मल्लिक आदि-आदि। ई०सन्:-१९८३ अबैत-अबैत आॅई० मैथिल संघ क' गति अवरुद्ध भ' गेलैक।सर्वश्री मिथिलेन्दु जी, महावीर झा,उदितनारायण झा,पीताम्वर पाठक,युग नारायण झा,व्रम्ह नारायण झासहित श्रीमान् दास जी आदि सेहो तात्कालिक असक्रिय भ' गेलाह।व्रम्ह नारायण झा दक्षिण कलकत्ता मे 'मैथिल नव जागरण संघ' नामक एकटा अलग संस्था बनौलन्हि।पीताम्वर पाठक टेकनीकली आॅई० मैथिल संघ कें अखिल भारतीय मिथिला संघ मे श्री युग नारायण झा आदिक संग विलयन कयलन्हि। आ,श्री मान राज नन्दन लाल दास जी 'कर्ण गोष्ठी' नामक संस्था मे अपन सहयोग देबय लगलाह। श्री मान दास जी साहित्यिक कर्म सॅ सेहो जुड़लाह।ओ,नाटककारक रुप में 'सन्तो' नामक क्रान्तिकारीनाटक लेखन कयलन्हि।कलकत्ता में ओकर मंचन सेहो कयलन्हि।बहुत वर्षक बाद ओकर एकटा प्रति हमरो उपहार स्वरुप देने छथि।एकर अतिरिक्त ओ' चित्रा-विचित्रा नामक पोथी से हो सम्पादन कयने छथि।कथित पुस्तक 'कर्णामृत' पत्रिका में लिखल- छपल सम्पादकीय सभक संग्रह अछि।ओ तेसर पोथी लिखने छथि-'कर्णगोष्ठी आ कलकत्त्ता'।जाहि मे 'कर्णगोष्ठीक अतिरिक्त कलकत्ताक मैथिली गतिविधिक चर्च अछि। श्री मान् राज नन्दन लाल दास कें हम विशेष रुपेंणजनैत छियन्हि'कर्णामृत'क यशस्वी सम्पादक रुप में।ओलगभग ४० वर्ष धरि ओकर सफल सम्पादन करैत दोसर'कीर्तिमान'(रेकाॅर्ड)स्थापित कयलन्हि।एहि सॅ पूर्व 'मिथिला मिहिर' अपन कीर्तिमान स्थापित कयने अछि।ओना अधिकांश मैथिली पत्रिका सभ अल्पायुए रहल अछि।मुदा, श्री मान् दास जी जखन स्वयं शारिरिक आ मानसिक रुपेंण असक्रिय भ' गेलाह रखने 'कर्णामृत'कप्रकाशन बन्द भ'गेल।ओना ओ नहि चाहैत छलाह जे उक्त पत्रिका बन्द भ'जाइक।बीच-२ बीच में ओ श्री चन्द्रेश जी( दरभंगा) सन साहित्यकार कें 'अतिथि'सम्पादक सेवा सेहो लैत रहलाह।चन्द्रेश जी एक बेर 'कर्णामृत'क लेलनेपाली विशेषांक लेल सेहो‌ अतिथि सम्पादक मनोनीत भेल छथि।श्री मान् दास जी अन्त-अन्त तक 'कर्णामृत' कलेल पूर्णकालिक सम्पादक खोज में लागल रहा।मुदा,ओअसफल रहलाह। 'कर्णामृत'पत्रिका में सर्वस्तरीय रचना सभ छपैत रहल।पहिले ओहि में 'मिथिला मिहिर' आ 'मिथिला मोद'जकाॅ हिन्दी रचना सभ से हो छपैत रहल।एक बेर हम श्री मान् दास जी केंअनुरोध कयने रहियन्हि जे अपने हिन्दीकरचना किएक छपैत छियैक? ओ तुरत्ते हमरा उत्तर देने रहि एखन'कर्णामृत' के जड़ि मजबूत करबाक अछि।शनै-शनै हिन्दीक रचना नहि छपतैक।आ,बाद में सैह भेलैक।'कर्णामृत'पूर्णकालीन मैथिली पत्रिका भ'गेल। ' कर्णामृत'पत्रिका मादे हमरा एकटा महत्वपूर्ण घटनामोन पड़ैत अछि।ओकर प्रकाशनक बादे कलकत्तामैथिली जगत में ई चर्चाक विषय बनि गेल जे उक्त पत्रिका 'कर्ण कायस्थ'सभक जातिक पत्रिका भ'गेल अछि। अ०भा०मिथिला संघ में एकर खूब प्रतिक्रिया भेलैक।मुदा,मैथिली सेनानी बाबू साहेब चौधरी एकरजोरदार समर्थन कयलथिन्ह।ओ 'कर्ण गोष्ठी' द्वारा आयोजित एकटा अनुष्ठान में अपन विचार व्यक्त कयलन्हि:-"हम जातिवादक समर्थक नहि छी।भारत वर्षसॅ जातिवाद शीघ्रे समाप्त नहि हैत।जाधरि ई रोग समाप्तनहि हैत,ताधरि यदि मिथिलाक सभ जाति जौं अपन मातृभाषा मैथिली में अपन-अपन पत्र-पत्रिका प्रकाशित करथि तॅ हर्जे की छैक?एहि सॅ मिथिला-मैथिलीक सर्वस्तरीय आन्दोलन सफल हैंत!!!बस्सकी छल,'संघ'में सेहो 'कर्णामृत'विरोधी स्वर समाप्त भ' गेल।आनो संस्था सभक स्वर बदलि गेलैक।आ,बहुतों सदस्य सभ'कर्णामृत'क ग्राहको बनि गेलाह। श्री मान् राज नन्दन जी मैथिलीक एकटा सफल सम्पादक रहलाह।ओ अपन पत्रिका में सतत् नव-नवरचनाकार कें प्रोत्साहित करैत रहलाह।एते तक की ओस्तरहीन किछु रचना के सेहो यदाकदा प्रकाशित करैत रहलाह।एक बेर हम हुनका सॅ अनुरोध करने रहियन्हि जेअपने एहि तरहक रचना सभ के कियेक प्रकाशित करैतछियैक? पत्रिकाक स्तर दिनानुदिन कमि जाएत।ओ चोट्टहि उत्तर देने रहथि:-"सुरेन्द्र जी ! नव रचनाकारकें प्रोत्साहन देनाई आवश्यक होइत छैक।बाद में एहनेरचनाकार सभ लिखैत-लिखैत चमकि जेताह।आ, हम तखन निरुत्तर भ'गेल रही। प्रसंगवश, हमरा एकटा आरो घटना मोन पड़ैत अछि। हम एक बेर बाबू साहेब चौधरी जी'क निधनक बहुत बादअपन एकटा रचना ल'क' श्रद्धेय दास जी लग गेल रही।प्रकाशित करबाक अनुरोध कयने रहियन्हि।ओ कहने रहि:-"सुरेन्द्र जी!आंहाॅ मात्र एकटा मैथिली कार्यकर्ता छी।हमरा ई नञि बुझल अछि जे आंहाॅ मैथिली में रचना करैत छी।'हम उत्तर देने रहियन्हि:-"दास जी ! अपने ठीके कहल अछि।हम अनियमित रुपेंण रचना सभ सेहो लिखैत छी।हमर निकटवर्ती किछुए लोक कें ई बात बुझल छन्हि।एकाध रचना हमर प्रकाशितो भेल अछि।खैर,जे किछु।स्व०बाबू साहेब चौधरी जी पर केन्द्रित हम अपन एकटा कविता' घूरि आउ-घूरि आउ'बन्द लिफाफ मे हुनका हस्तगत कराओल।ओ हमरा कहलन्हि:-ठीक छैकबाद में हम एकरा देखबैक।एखन कर्णामृत'क संभाव्य अंक प्रकाशित होअ-होअ पर छैक।एकोटा पन्ना बाॅचल नञि हेतैक। दोसर अंक मे हम पूर्ण प्रयास करब।" आ हम चाह पीलाक बाद हुनक निवास सॅ सहर्ष विदा भ'गेलहुॅ। अहि रे बा! ठीक दोसरे दिन श्रद्धेय श्रीमान् दास जीहमर कार्यालय मे फोन कयलन्हि:-सुरेन्द्र जी! आंहाॅक रचना प्रस्तुत अंक में छपि रहल अछि।(स्व०)चौधरी जी पर नीक कविता लिखल अछि।तैं हमहूॅ बाध्य भ'क' प्रेस बला के आग्रह केलियन्हि।ओ, एकटा पन्ना खाली हेबाकबात कहलन्हि।हम कहलियन्हि अबस्से छापि दियौक।तकर बाद हमर ओ बहुत प्रशंशा कयलन्हि।आ,निरन्तरलिखबाक आग्रह से हो कयलन्हि।हम हुनका धन्यवाद देने रहियन्हि।बाद में जखन 'कर्णामृत'हमरा हस्तगत भेल तॅ उक्त कविता कें प्रकाशित देखि हम बेश हर्षित भेल रही।आ,हम तुरन्ते श्री मान् दास जी कें पुन:अशेष धन्यवाद देल। श्री मान् दास जी समयानुसार 'कर्णामृत'क विशेषांक निकाल करथि।स्व०बाबू साहेब चौधरी परएकटा स्वतंत्र विशेषांक प्रकाशित कयलन्हि।स्व०सुरेन्द्रझा 'सुमन'जी आ स्व०पीताम्वर पाठक जी पर संयुक्तविशेषांक से हो प्रकाशित कयलन्हि।एहि तरहें आरो मैथिली मनिषी सभ पर ओ विशेषांक सभ प्रकाशित करैत रहलाह। प्रसंगवश हमरा आरो एकटा अविस्मर्णीय घटना मोनपड़ैत अछि।श्री मान राज नन्दन लाल दास जी'कर्ण गोष्ठी'क दिशि सॅ 'चित्रा-विचित्रा'नामक उत्कृष्ट पोथीकप्रकाशन कयलन्हि।ओ अपन निवास पर बजा क' हमराउक्त पोथीक एकटा प्रति हस्तगत करौलन्हि।पोथीक कभर पृष्ठ कें उनटि क'हम देखल।ओकर सामनेक दोसरपृष्ठ पर लिखा छल:-'रचनाकार सुरेन्द्र ठाकुर जी कें सादरभेंट।' ओह्! हम तखन बहुत भाव-विह्वलित भ'गेल रही।आ,हम हुनका पुन:अशेष धन्यवाद देने रहियन्हि। हमरा प्रति श्रद्धेय श्री मान् राज नन्दन लाल दास जी क' आदर-स्नेह आ प्रेम हमर मोन कें सतत् आनंदित करैत रहैत अछि।ईश्वर सॅ प्रार्थना जे ओ मिथिला-मैथिलीसेवार्थ सशरीर स्वस्थ्य रहथि आ दीर्घजीवी होथि!!! सुधीर श्रीयुत् राजनन्दन लाल दास जी ओ मैथिली कामेश्वर झा ’कमल’ कर्णामृत पत्रिका आ सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास प्रदीप बिहारी, बेगूसराय संस्मरण : राजनन्दन लाल दास::अपने घरमे परगोत्री भाइ राजनन्दन लाल नहि रहलाह। हुनक नहि रहब सम्पूर्ण मैथिली जगतकें दुखी क' गेल। आशीष अनचिन्हार जी हुनका श्रद्धांजलि दैत हुनका पर संभावित अंकक मादे लिखैत छथि जे हुनका जीबैत ओ अंक बहार नहि क' सकलाह। ठीके, समय पर रचना नहि द' सकबाक हुनक एकटा डिफॉल्टर हमहूं छी। भाइ राजनन्दन लाल दास जीसं हमर परिचय 1986 ई. मे भेल छल। ताहिसं पहिने नामटा सुनने रही। अपन उपन्यास विसूवियस लिखलाक बाद मास्सैब (जीवकान्त)क कथनानुसार कर्णगोष्ठी कलकत्ताकें पाण्डुलिपि पठा देने रहियनि। दू-तीन मासक बाद राजनन्दन लाल जीक पोस्टकार्ड भेटल। ओ लिखने रहथि जे संस्था पोथी छपबा लेल तैयार अछि, मुदा संस्थाकें थोड़ेक अर्थाभाव छैक। तें छपाइक खर्च वा कागतक मूल्य जं अहां जोगार क' दियैक, तं पोथी छपि जायत। हम एकरा एहि तरहें बुझलहुं पोथी प्रकाशनक पूरा खर्चकें दू भागमे बांटल गेल अछि । कागतक मूल्य आ तकर बाद छपाइ सम्बन्धित अन्य खर्च। पोथी प्रकाशन सम्बन्धी हमर पहिल अनुभव छल। हम तं बुझैत रही जे प्रकाशक स्वयं सभटा खर्च करैत छथि। करबाको चाही। तखन ने प्रकाशक। दोसर गप ई जे हमर नव-नव नोकरी छल। परिवारमे माय छलीह, पत्नी छलीह, जेठका बेटाक जन्म भ' चुकल छलै, हाइ स्कूल मे पढ़ैत छोट भाइ छल। हम एतेक दायित्व-निर्वहनक संग एहि स्थितिमे‌ नहि रही जे पोथी छपयबामे अपन टाका खर्च क' सकी। हम हुनका पत्र लिखने रहियनि जे प्रकाशककें अपन खर्च क' पोथी छपयबाक चाही। जं संस्था एहि स्थिति मे नहि अछि तं कृपया पाण्डुलिपि घुरा दी, कारण हम पोथी प्रकाशनमे टाका लगयबाक स्थितिमे नहि छी। ओ उतारा देने रहथि जे अहांक मोनमे प्रकाशकक जे छवि अछि, मैथिलीमे तेहन प्रकाशक नहि छैक। मैथिलीमे संस्था सभ पोथीक प्रकाशन करैत आयल अछि आ बेसी संस्था चन्देसं चलैत अछि। किछु सामर्थ्यवान लेखक छथि, जे स्वयं प्रकाशक-वितरक छथि। ओ लिखने रहथि जे समितिक तीनटा सदस्य पाण्डुलिपि पढ़लनि अछि, कर्णामृत पत्रिकाक सहयोगी विद्वान ब्रह्मानन्द जी (ब्रह्मानन्द सिंह झा) सेहो पढ़लनि अछि। निर्णय छैक जे पाण्डुलिपि नहि घुराओल जाय। से पाण्डुलिपि हम सभ नहि घुमायब। तखन इहो निस्तुकी नहि कहब जे एहिबेर हमसभ छापि सकब कि नहि। 'कर्णामृत'क अंक पठौलहुं अछि। एकर सदस्य बनि जायब तं नियमित भेटैत रहत। हम सोचलहुं, भने संस्थे लग राखल रहय। हमहूं थोड़े छपा रहल छी। हम 'कर्णामृत' पत्रिकाक सदस्य बनि गेलहुं। मुदा, किछुए दिनक बाद पत्र आयल जे 'विसूवियस' छपि रहल अछि। हमर मोन मयूर नाचि उठल। पुस्तकाकार पहिल पोथी छल, तकर प्रसन्नता लिखल नहि, अनुभवेटा कयल जा सकैछ। विसूवियस छपल। कलकत्तामे लोकार्पण भेल। लोकार्पण करबा लेल संस्था द्वारा रमानन्द रेणु आमंत्रित छलाह। हम ताहि समय तइस बरखक रही। हावड़ा टीसन पर पहुंचलहुं तं संस्थाक किछु सदस्यक संग श्रद्धेय बाबू साहेब चौधरी आ किशोरी कान्त बाबू हमरा दुनू गोटक स्वागत लेल प्रस्तुत रहथि। हमर एहि तरहक पहिल अनुभव छल। हमरा आचार्य रमानाथ झाक वक्तव्यक ओ अंश मोन पड़ल जाहिमे ओ कहने छथि जे कलकत्ता मैथिलक तीर्थ अछि। हमरो लागल रहय जे तीर्थे कर' आयल छी। लोकार्पणक प्रसंग एतबे। अन्य विवरण सभ कहने विषयान्तर भ' जायत। आइ हमहूं अपन टाकासं पोथी छपबै छी, मैथिलीक बेसी लेखक छपबैत छथि। संस्था सभ पहिने सन उदार नहि अछि। पठनीयता एतेक घटि गेलैए जे पहिने गद्यक पोथी कम-सं-कम एगारह सय छपय, आब तीन सय छपैए। एहिमे किछु अपवाद भ' सकैत छथि।‌पहिने कवितोक पोथी तीन सय नहि छपय। एहन अवस्थामे राजनन्दन लाल दास मोन पड़ैत छथि। हुनका गेला बेसी समय नहि भेलनि अछि। मुदा ओ अपन जिविते कालमे प्रकाशन आ पठनीयताक ई‌ स्थिति देखलनि। कर्णगोष्ठी, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित पत्रिकाक संपादक राजनन्दन बाबू छलाह । प्रधान संपादक अर्जुन बाबू (अर्जुन लाल करण) छलाह। मुदा, पत्रिकाक संपादन लेल संस्था हुनका स्वतंत्र कयने छलनि। पत्रिकाक प्रति हुनक अनुराग, समर्पण आ व्यवहारक कारणे कलकत्ताक रचनाकारलोकनि जेना, बाबू साहेब चौधरी, लूटन ठाकुर, ब्रह्मानन्द सिंह झा, श्रीकान्त मंडल,  वीरेन्द्र मल्लिक,  नवीन चौधरी, रामलोचन ठाकुर, लक्ष्मण झा 'सागर' प्रभृति लेखकलोकनिक सर्वविध सहयोग कर्णामृतकें भेटैत रहलैक। राजनन्दन बाबू मैथिलीक अलावे हिन्दी, बांग्ला आ अंग्रेजीक अधिकृत जनतब रखनिहार लोक छलाह। ओ मार्क्सवादी चिंतनक लोक छलाह। कलकत्ताक कतोक आन्दोलन मे ज्योति बसुक सहयोगीक रूपमे सक्रिय रहलाह, मुदा से रहि नहि सकलाह। एकर कारण ओ कहने रहथि जे परिवारक दायित्व छल, धियापुताक शिक्षा आ कैरियर छल, कोनो पैघ आ समृद्ध पारिवारिक पृष्ठभूमिक लोक नहि रही, तें राजनीतिमे बेसी दूर धरि जयबाक बात नहि सोचलहुं। मुदा, हुनक चिन्तन, इमानदारी आ सहजतामे कोनो अंतर नहि भेलनि। सादा जीवन आ उच्च विचार बला लोक छलाह। राजनन्दन लाल मैथिलीक सुच्चा अनुरागी छलाह। हुनक लेखनी कर्णामृतक संपादकीयमे देखी तं कहियो नीक लागय आ कहियो बेजाय सेहो। जे संपादकीय नीक नहि लागय, माने संपादकीय सन नहि लागय तं हुनकासं पत्राचार होअय, कहियोकाल फोनो पर गप होअय, ताहिमे नीक नहि लगबाक गप कहियनि, कारण सेहो। अचरज जे हुनका प्रसन्नता होनि आ ओ अपन पक्ष इमानदारीपूर्वक राखथि। हुनक ई व्यवहार अनुकरणीय लागल हमरा। मैथिली आ मिथिला लेल जीबैत आ ओही लेल स्वयंकें होमक समिधा बनैत राजनन्दन लाल मैथिलीक प्राय: सभ संस्था आ मंच पर समादृत रहलाह। विसूवियसक लोकार्पणमे पहिल भेंटक बाद हमरा दुनू गोटेक 'भैयारी' भ' गेल। ओना हुनक ज्येष्ठ जमाय आ हमरा बयसमे बेसी तरपट नहि अछि।‌ बयसें हम हुनक पुत्रवत होइतहुं, हुनक अनुज सन छलहुं। तें ओ 'भाइ' कहथि, हमहूं 'भाइ' कहियनि। कखनो क' 'बाउ' सेहो कहथि- बुझलहुं बाउ। ओना कोनो-कोनो पत्रमे‌ 'प्रिय प्रदीप जी' सेहो लिखथि। अपन नोकरीक कारणें हुनका बरोबरि भ्रमण मे रह' पड़नि। बिहार आबथि, तं बेगूसराय अबस्से आबथि। कतोक बेर समस्तीपुर अयलाह, तं बेगूसराय सेहो अयलाह। हमहूं कलकत्ता जाइ तं हुनके घर पर रही। आग्रही आ अनुरागी एहन जे हुनका ओहिठाम जाइ तं प्रफुल्लित भ' जाथि। होनि कत' राखी आ कत' उसारी। आ से सभक लेल। स्थानीय साहित्यकार सभ हुनका ओहिठाम जाथि, तं हुनको लेल तहिना आह्लादित। हुनक एकटा नाटक छनि - सन्तो। ई आन्दोलनकारी नाटक थिक। एहिमे राजनन्दन लाल दास जीक वैचारिक प्रतिबद्धता देखल जा सकैछ। ई नाटक पढ़लाक बाद हमरा एकर नायक सन्तो आ सुक्खी (खजौली)क कम्युनिस्ट नेता सन्तु महतो मे साम्य भेटल। सन्तु महतो खजौली क्षेत्रक उदीयमान नेता छलाह। लोकप्रिय सेहो। हम पुछलियनि, "भाइ! अहांक नाटकक नायक हमरा गाम लग सुक्खीक सन्तु महतोक चरित्रसं बड़ मेल खाइए। की हुनके अहां एहि नाटकक नायक बनौलियनि अछि?" ओ मुस्किआइत बाजल रहथि, "जं हं कही, तं?" "तं की? कोनो हर्ज नहि।" एहि पर ओ बाजल रहथि जे ओ हमरा नीक आ प्रतिबद्ध लोक लगैत छथि। एहन लोकक बात समाज लग अयबाक चाही। हमरा सभकें अपन नायककें चिन्हक चाही। अपन लोककें पहिने अपने लोक नहि चिन्हतै, तं आन कोना चिन्हतै? ओ अपन कार्यालयी काजसं टूर पर रहैत छलाह, तखनो मैथिली आ कर्णामृत हुनका संगे रहैत छल। एकबेरक संदर्भ जे ओ कहलनि, से अछि - ओ विशाखापट्टनम (प्राय:) गेल रहथि। आफिसक काजक बाद घुरैत काल कोनो मोहल्लाक एकटा घरक गेट पर नेमप्लेट देखलनि। ओहि पर कोनो 'झा' लिखल छल। ओ सोचलनि, ई अबस्से मैथिली होयताह। बिनु परिचयक हुनका ओहिठाम पहुंचि गेलाह। एकटा कन्या बहरयलीह। हुनका मैथिलीमे गृहपतिक मादे पुछलनि, तं ओ एहि तरहें भीतर चलि गेलि जेना हिनक बात बुझनहि ने होथिन। राजनन्दन लाल जी चुपचाप ठाढ़ । तखने ओ कन्या मायक संग अयलीह, तं अपन परिचय देलनि। अपन नाम कहैत कहलनि जे कर्णामृत पत्रिकाक संपादक छी, मिथिलासं आयल छी, अहांक गेट पर नाममे 'झा' देखलहुं तं लागल जे अपन लोक छी, तें भेंट कर' आबि गेलहुं। दुनू माय- धी हतप्रभ। गृहपति घरमे नहि रहथि। महिलाक कथनानुसार रातुक आठ बजे फेर गेलाह। झा साहेबसं भेंट कयलनि। गपसप कयलनि आ हुनका पत्रिकाक ग्राहक बना देलनि। कर्णामृतक प्रचार-प्रसार आ संचालन लेल ओ एहन काज विभिन्न शहरमे करथि। पहिल बेर बेगूसराय अयलाह तं कहलनि जे चलू, रिफाइनरी टाउनशिपमे बहुत मैथिल छथि। अहांक परिचयक होयबे करताह, जं नहियो होयताह तं की हर्ज? भेंटघांट कयल जाय, परिचय कयल जाय। आ से जाथि, कर्णामृतक ग्राहक बना लैथि। हमहूं संग होइयनि। भाषा-सेवाक एहि विरल सेवकक प्रयास देखि हम नतमस्तक भ' जाइ। एखनो भ' जाइत छी। जेना हमरा बुझल अछि, ओ बिहारक कोनो शहरमे जाथि, तं मैथिलीए बाजथि। हुनका संग किछु ठाम हम गेल रही, कथा-वार्त्ताक संदर्भमे, तखन हम ई अनुभव कयने रही। आरोप-प्रत्यारोपक संस्कृतिसं कोनो साहित्य आ समाज नहि बांचल अछि, मैथिली साहित्य आ मैथिल समाज ताहिमे अपवाद नहि अछि। कर्णामृत पत्रिका पर आरोप लगलैक जे ई कर्ण कायस्थक पत्रिका अछि। ई आरोप एकबेर नहि, बेर-बेर लगलैक। एहि कारणें पत्रिकाकें किछु घाटा सेहो भेलैक। कर्णामृत आ राजनन्दन भाइक व्यवहार आ कार्यशिल्प हमरा तेहन कहियो ने लागल। तथापि हम पुछने रहियनि, तं अपन चिरपरिचित मुस्कीक संग कहने रहथि जे एहि भ्रमकें मणिपद्म तोड़ि देने छथिन- कर्णामृत माने कानकें जे अमृत समान ध्वन्यात्मक स्वाद दिअय। कहलनि जे एहि मादे ब्रह्मानन्द सिंह झाक लेख सेहो कर्णामृतक कोनो अंकमे छपल छनि। तखनो जिनका भ्रम हेतनि, से रहनि। हम ताहि पर नहि सोचै छी। कर्णामृतमे मैथिलीक प्राय: सभ रचनाकारलोकनिकें छापलनि। रचना मांगि-मांगि क' छापलनि, तगेदाक पोस्टकार्ड पठा-पठा क'। मैथिलीक दिवंगत रचनाकार सभ पर विशेषांक सेहो बहार कयलनि। ताहू सभमे हिनक संपादकीय दृष्टि मोहित करैत अछि। राजनन्दन भाइ कर्मठ लोक छलाह। ठाहिं-पठाहिं कह'बला सेहो। एक बेर हुनक कन्याक हेतु कथा-वार्तामे हम दुनू गोटें एकटा शिक्षकक ओहिठाम गेलहुं। शिक्षक महोदय परिचयक क्रममे जखन हिनक गामक नाम बुझलनि तं बजलाह जे अहांक गामक मधुसूदन बाबू हमरा बड़ मदति कयने छथि। जखन हमरा नोकरी भेल तं एहिठामक लोक हमरा ज्वाइने ने कर' दिअय। मधुसूदन बाबू हमर सभक अधिकारी छलाह। बड़ मदति कयलनि। हुनके प्रयासें हम एत' ज्वाइन क' सकलहुं। राजनन्दन भाइ कहलखिन जे ओ हमर पित्ती छलाह। अगले-बगल दुनू गोटेक आंगन अछि। जखन कथाक गप चललैक तं ओ शिक्षक कहलखिन- "यौ ! अहांक गाममे तं हमरा गामसं वियाह-दान होइते ने छै। मानि लिअ' जे हम पांजिक पात नहियो मानब, मुदा हमर जेठ बालक जे लहेरियासरायमे छथि, प्राय: तैयार नहि होयताह। गृहस्थक ओहिठाम कथा करबा लेल गाममे पहिल डेग प्राय: नहि उठौताह ओ। आ, आब हम भेलहुं बूढ़। वरक जेठ भाइ भेलाह ओ। आब हुनके सभक जूति चलतनि ने। तथापि अहां सन व्यक्तित्वक लेल हम अपना दिससं कहबनि। इहो कहबनि जे ओ मधुसूदन बाबू अहांक पित्ती होयताह।" बूढ़ा चुप भ' गेलाह। तामसे हमर देह तना रहल छल। हम किछु बजबालेल भेलहुं, से राजनन्दन भाइ बूझि गेलाह। ओ नहुएंसं हमर बांहि पर थपकी देलनि आ बजलाह, "मास्टर साहेब। अपनेक गप हम बुझलहुं। अपन जेठजनसं नहि पुछियनु। हमर पित्ती अपन सहृदयताक कारणें अहांक मदति कयने होयताह। स्वजातिक कारणें सेहो कयने होथि। एखनि हमर पित्ती रहितथि तं पछतावा होइतनि जे जातिकें चिन्ह'मे हुनका बुतें बड़का गलती भ' गेलनि।" हमरा दिस तकैत बजलाह, "चलू प्रदीप। उठू।" हम दुनू गोटें बिदा भेलहुं। हुनक डेराक क्षेत्रसं बहराइते भाइ अपन मुस्कीक संग बजलाह, "बुझलहुं प्रदीप! ई जाति...सभ फसादक जड़ि होइए..." हम देखलहुं जे ओ मुस्किया क' अपमान पीबि गेलाह आ मास्टर साहेबकें प्राय: माफ क' देलनि। मुदा, हमरा सन्तु महतोक संदर्भमे हुनक बात मोन पड़' लागल- "हमरा सभकें अपन नायककें चिन्हक चाही।" "मुदा कोना चिन्हत? आंखि होइ, तखन ने।" हम एहि आघातकें कतोक बरख धरि बिसरि नहि सकलहुं आ ओ एहन-एहन आघात सहैत रहलाह आ मुस्किया क' दर्द पीबैत रहलाह। (१५.१०.२०२१, विजयादशमी) अरविन्द ठाकुर “चित्रा-विचित्रा” सं प्रदर्शित होइत मैथिल प्रिमिटिविज्म मैथिली साहित्यक विविध रचना आ ओकर रचनाकार कें प्रकाश मे आनबा मे कलकत्ता सं प्रकाशित ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक अमुल्य योगदान रहल अछि। मैथिलीक प्रायः ई एकमात्र पत्रिका अछि जे अनवरत तीन दशक सं बेसी अवधि तक बहराइत रहल अछि आ एकर अहि निरन्तरताक एकमात्र श्रेय जं किनको छनि त से राजनन्दन लाल दास छथि।कर्णामृत आ कर्ण गोष्ठी तक पहुंचए सं पहिने राजनन्दन जी मिथिला दर्शन आ आखर सं सेहो जुड़ला।पत्रिका प्रकाशनक हुनक जिद एहन रहनि जे ओ शुरुआती विरोधक बावजूद जातीय संगठन सं जुड़बाक समझौता सेहो कएलनि।तीन दशक सं बेसी अवधि तक कर्णामृतक माध्यम सं मैथिली पत्रिका प्रकाशनक निरन्तरता कायम राखि राजनन्दन जी मैथिली मे एकटा इतिहास बनैनिहार अनन्य व्यक्तित्व छथि।अहि मामला मे हुनक कर्मठता, हुनक लगन,हुनक पुरुषार्थ पर कोनो संदेह नहि कएल जाए सकैत अछि,खास तौर पर ई देखैत जे ओ ने कोनो शुद्ध साहित्यकार रहथि आ ने कोनो मौलिक चिन्तक। पत्रिका प्रकाशनक अहि क्रम मे ओ सम्पादकीय आ अन्य टिप्पणीक माध्यम सं जे किछु कहलनि,से हुनक ‘चित्रा-विचित्रा’ नामक संग्रह मे संकलित भेल अछि आ तेकर संकलन आ संपादन करनिहार डा प्रेमशंकर सिंह तहि पर एकटा दीर्घ आलेख लिखने छथि।संग्रहक प्रकाशक कर्णगोष्ठी अछि,तें एकर प्रकाशकीय मे अर्जुनलाल करण सेहो अपन लघु टिप्पणी कएने छथि।मैथिलीक जे परम्परा रहल अछि,तेकर निर्वहन करैत लेखक आ ओकर लेखनक प्रशंसा करबाक काज अहि दुनू लेखक माध्यम सं भेल अछि। कोनोटा मैथिली पोथीक प्रकाशन सं अचल-अटल रहनिहार लीकजीवी बौद्धिकताक लेल एतेक सामग्री यथेष्ट अछि।किऐ त ओसभ पेटे सं पढिकए आएल छथि आ आब हुनका किछु पढबाक बेगरता बुझाइते नहि छनि।एकरहु नहि पढता। नारा,समारोह,हुड़दंग आ चंदा-चिट्ठारत आन्दोलनजीवी बौद्धिकताक लेल त ई संग्रह नित्य पारायण करबा योग्य मानल जाए सकैत अछि।किऐ त मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक माध्यम सं समय-समय पर झूठ-सांच,अर्द्धसत्य,छद्म,वायवीय कल्पना,मिथक आदि-इत्यादिक सहमेल सं यत्नपूर्वक गढल प्रचार साहित्य अहि संग्रह मे बहुलता सं उपस्थित अछि।ओलोकनि अपन काजक वस्तु एकेठाम पाबि सकए छथि,पढि सकए छथि आ विभिन्न मंडली आ मंच पर एकरा बेर-बेर दोहराए सकए छथि।यथार्थ,वस्तुसत्य आ सार्थकताक आग्रही विश्लेष्णात्मक बौद्धिकताक लेल सेहो अहि संग्रहक उपस्थिति सुविधाजनक छै।एकटा वर्ग-विशेष द्वारा भाषा कें अपन उपकरण बनाए ओकर माध्यम सं अपन उपनिवेश स्थापित करबाक ,अपन वर्चस्ववादी संस्कृति कें सर्वहाराक बहुमत पर लादबाक जे प्रयास दीर्घकाल सं चलैत आबि रहल छै,तेकर प्रायः समग्र दस्तावेज राजनन्दन लाल दास जीक अहि संग्रह मे उपस्थित छै।प्रगतिशील बौद्धिकता अपन अन्वेषण,अपन तार्किकताक छूरी-चक्कू सं एकर चीरफाड़ कए सकैत अछि। पश्चिमी महायुद्धक बाद ओतहुका बौद्धिक जगत मे एकटा वैचारिक हवा बहल रहए,जहि मे अहि बातक वकालत कएल जाइत रहए जे सभ्यता दिस अग्रसर हएबे गलत अछि,बेजाय अछि आ सभ्यताहीन आदिम मनुष्यलोकनि सं आवासित अंचल/क्षेत्र मे जाए नुकाएबहि त्राणक एकमात्र रस्ता अछि।पाछू दिस घुरि जएबा कें श्रेयस्कर माननिहार अहि पंथ/विचार कें प्रिमिटिविज्म (primitivism) कहल गेल रहए,जेकरा मैथिली मे आदिमवाद वा प्राचीनवाद कहि सकए छी।ई पंथ त पश्चिमी महायुद्धक बाद अस्तित्व मे आएल रहए,किन्तु मैथिलीक शाश्वत प्रति-क्रिया-पंथीलोकनि द्वारा अहि ‘प्रिमिटिविज्म’ कें सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ मंत्र मानि लेल गेल अछि। ‘चित्रा-विचित्रा’ अहि मैथिल प्रिमिटिविज्मक लिखित दस्तावेज अछि। एना नहि छै जे राजनन्दन लाल दास कें तीरभुक्तिक सामाजिक संरचना,ओकर जीवन-पद्धति,ओकर लोकाचार आ भाषा-संस्कृतिक यथार्थक भान नहि छनि। अहि संग्रहक अनेक आलेख मे हुनक ई समझ सोझां आबैत अछि आ फरिच्छ भए कए आबैत अछि।किन्तु हुनक अहि समझ पर आन्दोलनजीविताक भ्रमजाल तेना कए हावी भए जाइत अछि जे निष्कर्ष पर पहुंचए सं पहिनहि हुनक लेखन भुतलाए कए ओझराए जाइत अछि। अहि भ्रामकताक कारण कलकत्ताक प्रवासी मानसिकता मे खोजल जाए सकैत अछि।कलकत्ता गेल तिरहुत क्षेत्रक सर्वहारा कें अपन मेहनत-मजूरी पर भरोस रहए आ ओ अपन श्रमक बल पर अपन रोजी-रोटीक जोगार करए मे सक्षम रहल। निष्ठापूर्वक खटैत रहल आ तहि सं जे भेटल,तेकरा पेट मे राखि निश्चिन्तताक नींद सुतैत रहल। ई सुख किन्तु अभिजात्य प्रवासीलोकनि कें नसीब नहि भेलनि।ओसभ असुरक्षाक भाव सं ग्रसित त भेबे कएला,अपन श्रेष्टताक प्रदर्शन लेल सदैव व्याकुलता सं भरल रहला।एकरे परिणामस्वरूप ओतय मिथिलाक परिकल्पना वैचारिक अस्तित्व मे आएल।एकर माध्यम सं ओलोकनि संगठित त भेबे कएला, बंगालीसभक बीच हुनकरसभक पहचान सेहो बनलनि।एक बेर ई पहचान बनलाक बाद किछु खास वर्गक वर्चस्ववादी मानसिकता जोर मारए लागल आ अपन जन्मस्थानहि जकां कलकत्ताक समाज मे सेहो अपन जन्मना-कुलीनताक स्थापनाक स्वप्न देखए लगला। कलकत्ताक समय-समय पर बनैत-टुटैत संगठनसभ एकर प्रमाण अछि।कलकत्तो मे वएहसभ कठखेल चललए जे तिरहुत मे चलैत रहल रहए।गैरमैथिललोकनि पर अपन वर्चस्व स्थापित करबाक लेल जे प्रोपगंडाक सिलसिला चलल,तेकर प्रभाव मे लक्ष्य-जाति त अएबे केलए,एकर रचयितालोकनि सेहो एकर दुष्प्रभाव सं नहि बचि सकला।झूठ जखनि बेर-बेर अनवरत रूप सं दोहराएल जाइ छै त एकटा खास अवधिक बाद ओ सत्यक भ्रमाभास दिअए लागए छै आ एकर उत्पादक आ उपभोक्ता दुनू एकर शिकार बनैत अछि।ई कलकत्ता मे भेलए आ एकर प्रभाव ओतय रहनिहार आन रचनाकारलोकनिक संग-संग राजनन्दन जी पर स्वाभाविक रूप सं पड़लनि।‘चित्रा-विचित्रा’क आलेख-टिप्पणी आदि मे अहि कुप्रभावक प्रभाव देखल जाए सकैत अछि। एकर उदाहरणक क्रम अहि पोथीक प्रथमहि आलेख सं शुरू भए जाइत अछि। अहि आलेख मे ओ मैथिलीक भाषा-शैली पर गंभीरता सं चिन्तित देखाइ छथि आ अहि पर विचारणक क्रम मे विभिन्न बिन्दूसभ कें छुबए छथि। आलेख 1967क अछि,तें समय कें देखैत अहि मे नवता मानल जाए सकैत अछि,नहि त ईसभ बेर-बेर दोहराएल गेल गपसभ छै।ओ मानए छथि जे अहि भाषाक दू रूप अछि – एक संस्कृत निष्ठ परिमार्जित मैथिली जे बाबू-भैया बाजए छथि आ दोसर जन-बोनिहार लोकनिक खांटी मैथिली।ई बाबू-भैया लोकनि के छथि,से ओ स्पष्ट नहि कएने छथि।किन्तु अहि आलेख समेत सम्पूर्ण संकलन मे जहि तरहें अनगिनत बेर ‘मिथिला’ शब्दक प्रयोग भेल अछि,तहि सं अनुमान लगाएल जाए सकैत अछि जे ‘बाबू-भैया’ सं हुनक अभिप्राय मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थहि सं छनि। आम सामाजिक स्थापना मे राजपूत,भुमिहार ब्राह्मण आ अम्बष्ट कायस्थ सेहो ‘बाबू-भैया’क श्रेणी मे आबए छथि। हुनकर सभक भाषा कोन रूपक अन्तर्गत आबैत अछि? बाबू भैया आ जन बोनिहार सं अलग एकटा वणिक-समाज सेहो छै,ओसभ की बाजए छथि?स्पष्ट छै जे अहि रूप-विभाजन मे राजनन्दन जी सं चूक भेल छनि आ ओ आन्दोलनजीवी मैथिल आंखि सं एतहुका सामाजिक संरचना कें देखलनि अछि।इएह दृष्टि-भ्रम छै जे संबंधित आलेख मे हुनका भाषाइ एकरूपताक सन्दर्भ मे कोनो स्पष्ट कार्यक्रम वा सुझाव देबए मे अक्षम कएलकनि अछि। आलेखक अंत मे ओ आरोप लगबए छथि जे ‘मैथिलीक विरुद्ध मे हिन्दीक अड़ख्स अंगिका आ बज्जिका कें गढि कए ठाढ कएल अछि’।एहन आरोप विकट अछि आ निस्संकोच हास्यास्पदताक श्रेणी मे राखि देल जेबाक जोगर अछि।कोय मुर्खहि अहि बात पर विश्वास कए सकैत अछि जे एहनो कोनो वीर-पुंगव जनम लेने छथि जे दू-दू टा भाषा गढिकए ठाढ करबाक उद्योग कए सकैत अछि। अहि आलेखक समापन ओ अहि आह्वान सं करए छथि जे ‘मैथिलीक विद्वानलोकनिक ई कर्तव्य थिकनि जे मैथिली भाषाक मौलिकताक रक्षा करैत एहन शैलीक प्रचार करथि जाहि सं मैथिली नेपाल सं संथालपरगना धरि आ चम्पारण सं पुरनिया धरि जनप्रिय साहित्यिक भाषा बनि सकै,संगहि आन समाजक लेल सरल तथा आकर्षक बनायब सेहो जरूरी’।ई अद्भुत आ भयंकर विरोधाभासी दिवास्वप्न अछि। अहि एकटा पंक्ति सं अनेकानेक प्रश्न उठि ठाढ होइत अछि। ‘मैथिलीक मौलिकता’ की छिअए? एहन विद्वानलोकनि कोन लोक सं अवतरित हेता? नेपाल सं संथालपरगना आ चम्पारण सं पुरनिया बला भौगोलिक क्षेत्र कोन ग्रह पर अवस्थित छै? ई ‘आन समाज’ कोन समाज छिअए? ‘सरल आ आकर्षक’क कोन परिभाषा छै? एहन-एहन अनेकानेक प्रश्नबला ई आह्वान शुद्ध किताबी छै।मैथिली भाषाक साहित्य अकादेमीय इतिहास अहि बातक साक्षी छै जे मैथिली सं प्राप्त सभटा आमदनी एक जाति-विशेषक झोड़ा मे जाइत रहल अछि। हिनकरसभक वश चलए त मैथिली कें अपन टोल तक सीमित कए लेता।एकर क्षेत्रफल बढाए कए दावेदारसभक संख्या किऐ बढएता? क्षेत्रफल बढाएब नाराबाजी थिक,प्रपंच थिक,धोखा थिक आ क्षेत्रफल घोंकचाएब वास्तविकता। नाराबाजिए करबाक अछि त एहन संकोच किऐ? एकरा कश्मीर सं कन्याकुमारी आ दिल्ली सं भाया काठमाण्डू होइत तिब्बत आ चीन तक लए जाऊ! ईसभ गप राजनन्दन जी कें नहि बुझल छनि,से बात नहि। अहि संग्रहक विभिन्न आलेख मे ई बात सभ दबलहि स्वर मे,किन्तु उपस्थित अछि।ई अलग बात जे हुनक मानस पर मिथिला-मैथिलक प्रोपगण्डा साहित्यक तेहन प्रभाव छनि जे ई सभ बात ओकर प्रभाव मे दबि कए मौन भए जाइत अछि। हुनकर लेखन आन्दोलनजीविता आ मैथिलवाद कें भने शक्ति दैत हुअए साहित्यक लेल नुकसानदेह भए जाइत अछि। ‘भारतीय जनतंत्र आ मैथिली’ शीर्षक आलेख मे ओ 1940क एकटा घटनाक चर्चा करए छथि। हुनका अनुसार बिहार सरकार द्वारा गठित प्राथमिक शिक्षा व्यवस्थाक पुनर्गठन लेल बनाएल गेल समितिक सदस्य अमरनाथ झा मैथिली कें मिथिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक  माध्यम बनैबाक मांग कएने छला जेकरा नकारि देल गेल। अहि पर राजनन्दन जीक शब्द छनि—‘एहि मांग पर समितिक अन्य वरिष्ठ सदस्य लोकनि कोनो ध्यान नहि दए आसानी सं टारि देलनि।कारण बूझल छलनि जे ॠषि मुनिक संतान मैथिल लोकनि अपन अधिकारक रक्षा करबा मे पूर्ण अक्षम छथि’। अहिना ‘बिसरल नहि जाइछ’ मे हुनक उद्गार छनि – ‘माछ देखि कए आ दही खाय कए यात्रा करब मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा थिक।मैथिल संस्कार।‘ स्पष्ट करबाक बेगरता नहि जे राजनन्दन जी मैथिल केकरा मानए छथि। अहि श्रेणी मे गैर ॠषि-मुनिक संतान (जेकरा ॠषि-मुनिक संतानलोकनि द्वारा चाण्डाल,शुद्र,सोल्हकन,राड़,नान्ह जाति आदि-आदि सम्बोधन सं विभुषित कएल जाइत रहल अछि) नहि छथि आ सएह यथार्थहु छै। अहि यथार्थक भान होइतहु,लिखित रूप मे स्वीकार करितहु राजनन्दन जी अपन आन-आन लेख मे एकटा मृत-राज्यक काल्पनिक क्षेत्र मे रहनिहार समग्र जन-समुदाय कें मैथिल कहि ओकरासभ कें भ्रमित करबाक अपराधक सहकर्मी होइ छथि त ई कोनो गुप्त एजेंडाक लेल जतेक उपयोगी हुअए, ‘सहितस्य भाव साहित्यम’ लेल बहुत दुखद आ अस्वीकार्य। अहि आरोप सं हुनकर बरी हएबाक एकहि टा उपाय बचैत अछि जे चित्रा-विचित्रा मे संकलित लेखन कें साहित्यक श्रेणी मे नहि राखि,प्रचार-साहित्यक (propaganda literature) श्रेणी मे राखि देल जाइ। कलकत्ताक मनोविज्ञान दिआ एकटा बात मशहूर छै जे एतहुका रहवासी अपन सभटा दुख,अपन समग्र समस्याक समाधान/निदान साम्यवाद मे देखैत रहल अछि। स्वाभाविक जे ओतय अपन नियोजनार्थ गेल लोकहु पर एकर प्रभाव पड़ल।मूल बंगाली कलकतिया लेल ई मनोविज्ञान स्वाभाविक रहए किन्तु प्रवासीसभक लेल ई शख वा मजबूरी जकां रहल,तें ई एकदम ओढल जकां—सुविधानुसार ओढी,असुविधा हुअए त उतारि दी। अहुना पुरोहिती संस्कारक लोक लेल वामपंथी हएब प्रायः असंभव जकां मानल जाइत अछि। राजनन्दन जीक जीवनी कहैत अछि जे ओ 1967 तक सीपीआईक कार्ड-होल्डर रहला।किन्तु ‘चित्रा-विचित्रा’क एकहु टा आलेख मे हुनक वामपंथी रूपक दरस नहि होइत अछि।एना बुझाइत अछि जे रोजगारजनित परिस्थिति आ मैथिलवादी तत्वक संगतिक प्रभाव मे हुनक शिक्षा आ वैचारिकता छाउर भए गेलनि। हुनक लेखन मे व्यक्त विचारसभ शुद्ध रूप सं परम्परावादी आ कर्मकांडीय स्थापनासभक पुष्टि मात्र करैत चलैत अछि। अमरकान्त झा होथि वा आन कोनो झा-वादक प्रवक्ता,तिनकरसभक स्थापना कें वामपंथक द्वन्द्ववाद पर परखबाक कोनोटा प्रयास हुनक लेखन मे नहि देखाइत अछि।मैथिली कें मैथिल आ मिथिलाक संग साटि कए जे मायावी प्रपंचजाल पसारल गेल अछि,तेकरा ओ शब्दसः स्वीकार कए लेने बुझाइ छथि।शंका करब,विश्लेषण करब आ तहि सं सत्य कें बाहर करब,तहि प्रगतिवादी,वैज्ञानिक बौद्धिक श्रमक बेगरता हुनका नहि बुझाएल छनि।एना बुझाइत अछि जे हुनका ई त बुझाइए गेल रहनि जे अतीतवाद आ प्रगतिवाद कें एकहि संग साधब हुनक बुत्ताक बात नहि छनि आ कोनो मृतयुगक कोनो कल्पना कें अजुका युग मे साकार करबाक स्वप्न देखब,तहि लेल हूलेलेले करबाक कर्मकांडीय खेलौर करब आधुनिकताक लेल हास्यास्पद अछि।ई बुझितहु ओ आधुनिक हेबाक सत्ती पुरातनपंथी हेबाक मार्ग चुनलनि जे कलकत्ताक अधिकांश प्रवासी द्वारा चुनल गेल छल आ जे कलकत्ताक तहि कालक मैथिलवाद कें आर्थिक सम्पन्नता सं दहोबोर सेहो करैत रहए।दुनियादार लोक सदैव बहुमतक संग रहबाक सुविधाजनक मार्ग चुनए छथि,राजनन्दन जी सेहो चुनलनि।सर्वहाराक संग देब,ओकरा संग समानताक व्यवहार करैत ओकरा अपन पथक सहयात्री बनाएब एकटा दीर्घ आ श्रमसाध्य प्रक्रिया छै,जे आश्रय आ सुविधाभोगी समुदाय कें कहियो पसिन्न नहि भेल अछि।तें राजनन्दन जी पहिने मैथिल महासभा आ अंततः कर्ण कायस्थक जातीय सभा दिस घुरि जएबाक सुगम आ सरल मार्ग चुनि लेलनि। अहि लेल हुनका दोषहु नहि देल जाए सकैत अछि।एहने वातावरण रहए,छै। इएह चहुदिस होइत रहए,भए रहल छै। अचरजक गप छै जे ‘परम्पराक सिक्कड़िमे कर्णकायस्थ’ सन विद्रोही तेवर आ प्रगतिशील चेतना सं आप्लावित लेख लिखनिहार राजनन्दन जीक समग्र लेखन एना अधोमुख किऐ भेल! अहि आलेख मे राजनन्दन जीक लेखनी सर्वाधिक उन्मुक्त,लक्ष्य-बिन्दू पर केन्द्रित आ निष्ठुर आलोचनाक संग प्रगट भेल अछि।एतय हुनका जाति-व्यवस्थाक कुचक्र,पुरोहितवाद सं भेल सामाजिक क्षति आदि खूब फरिच्छ भए कए देखाइ पड़लनि अछि। अहि आलेख मे ओ पुरोहितवाद आ पंजी-प्रबन्ध व्यवस्था कें नीक जकां बेनंगन करए छथि।रमानाथ झाक उक्ति ‘सभी वंशों में कलंक है,जो पांजि के रूप में व्यक्तियों के साथ लगे हैं। अतएव पंजी का गौरव करना अज्ञानता है’  कें उद्धृत करैत हुनक आलोचक अपन आक्रामक प्रखरताक संग प्रबल भेल अछि। ‘कर्णकायस्थ लोकनि संस्कृतक विद्वान होइत छलाह,मुदा पुरोहितवादक आगां हुनका लोकनि कें कोनो स्थान नहि भेटलनि।राजदरबारक राजपंडित तं ब्राह्मणे भए सकैत छलाह चाहे हुनका सं अधिक योग्य कोनो कर्णकायस्थ किएक ने होथि’, ‘पुरोहितवादक दोषपूर्ण प्रभाव सं एखनो कर्णकायस्थ लोकनि मुक्त नहि भेलाह अछि’, ‘श्राद्ध आदि मे दान दक्षिणाक परम्परा एक ढकोसला मात्र थिक।ई सब सं पैघ हथियार रहल अछि कर्णकायस्थक आर्थिक शोषणक’, ‘कर्णकायस्थ समाज ब्राह्मणे जकां पंजीप्रथाक ओझराहटि मे पड़ि गेल।पंजीप्रथाक द्वारा ब्राह्मण एवं कर्णकायस्थ मे जातिगत शुद्धता कें अक्षुण्ण रखबाक लेल एवं विदेशी प्रभाव सं बचेबाक असफल प्रयास कएल गेल।कारण हिन्दूक एहन कोनो जाति नहि,जाहि मे विदेशी मिश्रण समय-समय पर नहि भेल हो’ , ‘कर्णकायस्थ लोकनि श्रमक महत्व कें बुझथि,पुरोहितवादक कुचक्र सं अपना कें मुक्त करथि,जाहि सं व्यक्तिक आर्थिक विपन्नता उत्पन्न होइत छैक’ – ई सभ पंक्ति अही आलेखक अछि आ से कोनो उद्धरण नहि,राजनन्दन जीक अपन विचार छनि। अचरज होइत अछि जे आन्दोलनजीवी मैथिलवादक पक्ष मे जाइतहि राजनन्दन जीक जातीय वा व्यक्तिगत विश्लेषणात्मक बुद्धि,सत्यान्वेषण वृत्ति आ प्रगतिशीलता कतय अलोपित भए जाइ छनि,मिथिला-मैथिल दिस जाइतहि ओ पुरोहिती मायाजालक ओझरी मे किऐ ओझराए जाइ छथि।ई समझ सं बाहरक गप अछि जे जे व्यक्ति अपन जातिक लोक कें अतीत आ पुरोहितवाद सं मुक्त भए आधुनिक आ प्रगतिशील हेबाक आह्वान कए रहल अछि,वएह व्यक्ति अपन समग्र लेखन मे बेर-बेर आन लोक-समाज कें अतीतक कोनो मिथकीय खोह मे घुरि कए सन्हिआए जएबाक आ पुरोहिती प्रपंच मे फंसि जएबाक ललकारा केना दए सकैत अछि,अतीतजीविताक पैरोकारी केना कए सकैत अछि?भोलालाल दास पर लिखैत  ‘पुरना संस्कार आ कुरीतिक भार सं समाजक जर्जर हएब आ कुहरबाक’ चर्चा करनिहार आन ठाम इएह संस्कार आ कुरीतिसभ कें भाषाक अढ मे आधुनिक युग,आधुनिक पीढी पर लाधबाक अनुशंसा केना कए सकैत अछि? ‘कर्णकायस्थ मे विवाहक समस्या’ मे ओ ‘इतिहास गवाही अछि जे मिथिला किऐक संपूर्ण भारतक कोनो जाति सुच्चा नहि अछि’, ’कायस्थ समाज मूलतः बुद्धिजीवी होइतहु आइ बीसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे सेहो मध्ययुगीन धारणा तथा कुसंस्कार सं मुक्त नहि भए रहल अछि’, ‘परम्परागत मध्ययुगीन धारणा तथा मध्यवित्त परिवारक कुसंस्कार सं ऊपर उठि कोनो तरहक प्रगतिशील डेग उठायब अथवा आदर्श स्थापित करबाक साहस कर्णकायस्थलोकनिक युवक-युवती मे नहि छनि’ सन-सन अतिक्रांतिकारी गप कहए छथि आ जातीय संरचनाक किछु विरोधाभाससभ कें चिन्हित सेहो करए छथि।किन्तु  प्रो रामशरण शर्माक  किछु उद्धरण दैत आ राजा हरिसिंह देवक चर्चा करैत अहि आलेखक मुख्य बिन्दू कर्णकायस्थलोकनिक  वैवाहिक सुधार अछि।प्रायः दुनू उद्धरणक माध्यम सं कर्ण कायस्थ कें मैथिल ब्राह्मणक समकक्ष वा समान देखएबाक प्रयास भेल अछि। हरिसिंह देव पंजी प्रबन्ध मे मैथिल ब्राह्मणक संग कर्ण कायस्थ कें सम्मिलित कएलनि आ रामशरण शर्माक उद्धृत कथन कहैत अछि जे लोकनाथ नामक ब्राह्मण पिता-पक्ष सं करण लोकनिक पुर्वज रहथि।जातीय संरचनाक यथार्थ स्थितिक आभास हुनका छनि,जेकर प्रमाण हुनक अहि पंक्तिसभ मे देखल जाए सकैत अछि—‘चौदहम शताब्दी मे आबि राजा हरिसिंह देव मिथिला मे मैथिल ब्राह्मण तथा करणकायस्थ लोकनि कें आर्थिक हैसियतक आधार पर विभिन्न मूल मे विभाजित कए देलनि।ब्राह्मण लोकनि 180 मूल मे बांटल गेलाह जे परवर्ती काल मे लगभग एक हजार उपमूल अथवा उपजाति कें जन्म देलक।तहिना करण कायस्थ लोकनि मे सेहो अनेको मूल तथा उपमूलक जन्म भेल।एहि तरहें ब्राह्मण तथा कायस्थ लोकनि मूलक अतिरिक्त क्षेत्रीय आधार पर सेहो विभिन्न उपजाति तथा उपमूल मे बंटि गेलाह।एहि सं स्पष्ट अछि जे प्रत्येक जाति मे पैघ आ छोटक मान्यताक उत्पति मध्ययुगीन धारणा थिक तथा एकर आधार व्यक्तिक आचार-विचार,क्रिया,विद्वता,समाज सेवा आदि नहि बल्कि आर्थिक उप्लब्धि रहल अछि।जाहि मूलक लोक मध्ययुग मे पैघ मानल जाइत छलाह से आइयो पैघ मानल जाइत छथि चाहे ओ आइ कतबो दरिद्र किएक नहि होथि।व्यक्तिक निजी संस्कार,आचार-विचार,विद्वता आदिक कोनो महत्व नहि रहल।एहि तरहक विभाजन राजतंत्र तथा सामंतवाद कें जीवित राखबाक लेल उपयुक्त छल।‘ राजनन्दन जीक स्पष्ट मत छनि जे पंजी-प्रबंध जातीय श्रेष्टताक नहि आर्थिक श्रेष्टताक आधार पर बनल आ ई अहि मे सम्मिलित दुनू जाति कें जोड़बाक बदला विभाजित कएलक।एतय ई प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठैत अछि जे जखनि ओ अहि दू जातिक स्थितिक एहन सटीक आकलन कए पाबि रहल छथि त अहि दू जाति सं इतर समाजक आकलन मे किऐ चूकए छथि आ शेष-समाज कें सब धन बाइस पसेरी मानि ओकरा पुरोहिती पाखण्डक मायाजाल मे ओझराएल रहबाक लेल अपन लेखन मे मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक शंखनाद किऐ करए छथि? हुनक वैचारिकताक सीमा मैथिल महासभा धरि सीमित अछि अथवा अपन अस्तित्वक व्यक्तिगत पहचान बनएबा वा बनएने राखबा लेल कलकत्ताक प्रवासी-समाजक मानसिकताक संग समझौता कए ओकर सुर मे सुर मिलाए रहल छथि? आकि दुनू जातिक मूलतः एके हेबाक भावना हुनका अहि बात लेल प्रेरित करैत अछि जे नीक-बेजाय दुनू मे एक दोसराक पीठ पर रहब भैयारी-कर्तव्य अछि? क्वालालम्पुर,मलेशिया मे 10 अक्टूबर,1998 कें प्रथम विश्व दलित सम्मेलन कें सम्बोधित करैत कांशीराम कहने रहथि—‘हम जातिक विरुद्ध जातिक इस्तेमाल करए छी। आब जातिक तलवार एकतरफा नहि रहल।किछु हमरासभ कें काटैत अछि,त किछु ओमहरकासभ कें सेहो काटत।‘ कर्णकायस्थ सं सम्बन्धित राजनन्दन जीक लेखसभ कें पढलाक बाद नहि जानि किऐ हमरा ई टिप्पणी मन पड़ि गेल। ‘भारत मे क्षेत्रीय भाषाक भविष्य’ अविश्वसनीय आंकड़ासभ सं भरल अछि। ई लेख प्रकारान्तर सं इहो साबित करैत अछि जे कमजोर तर्क पर ठाढ व्यक्ति अपन दुर्बलता आ असफलताक लेल दोसर कें दोषी ठहराबैत अछि आ ओ दोसर जं अस्तित्व मे नहि हुअए तखनि कोनो काल्पनिक दुश्मन ठाढ करैत अछि। हुनक कहब छनि जे ‘मैथिलीभाषी सम्पूर्ण बिहार मे बहुसंख्यक छथि—50% सं अधिक’। कोनो महा-सनकल लोक वा कोनो महा-निरक्षर-भट्टाचार्यक गप छोड़ू,मिथिला-मैथिलक नाम पर दिन-राति हूले-लेले करैत कोनो महा-आन्दोलनीक गप छोड़ू,मैथिलीक बल पर अपन सौंसे खानदान कें धन आ पुरस्कार सं तिरपित करनिहारक गप छोड़ू, स्वयं राजनन्दन जी कें अहि बात पर विश्वास नहि रहल हेतनि आ लिखलाक बाद तहि क्षण-विशेष मे संभवतः ओहो अपन अहि मजाक पर खूब हंसल हेता जहि क्षण ओ मैथिलवादी प्रोपगंडाक दुष्प्रभाव सं मुक्त भए सामान्य भाव मे रहैत हेता।एकटा खूब प्रचलित कहबी छै जे झूठ तीन प्रकारक होइत अछि—झूठ,सफेद झूठ आ सांख्यिकी।मैथिलवादी आन्दोलनजीवी लोकनि अहि तीनू प्रकारक झूठक धुरझार प्रयोग कएने छथि आ खूब निधोख भए कए कएने छथि। हिनकरसभक सांख्यिकी परिस्थिति आ सुविधानुसार ऊपर-नीचां होइत रहैत अछि। समाज कें भ्रमित करबाक लेल आ सरकारक समक्ष अपन मांग आ दाबी राखबाक लेल ई लोकनि जहि संख्यां कें करोड़क करोड़ कहता,जहि पर जोर देबाक लेल ‘कोटि-कोटि’क हर्स्व कें दीर्घ लगाए ‘कोटी-कोटी’ मे परिणत कए देता,तहि संख्यां कें लाभ हंसोथैत बेर सैकड़ा वा दर्जन कए परिवार आ जाति तक सीमित कए देता। हो-हल्ला मचैबाक बेर,शक्ति-प्रदर्शन बेर सम्पूर्ण जन-समुदायक सहयोग चाही,लाभक बंटवारा बेर परिवार वा गोधिया-दायाद तक सीमित रहबाक चाही।व्याकरणाचार्य लोकनिक समाज अछि,हर्स्व कें दीर्घ आ दीर्घ कें हर्स्व करबाक लेल कोनो आन आश्रम त जेबाक नहि अछि। ‘मिथिला चित्रकलाक सर्वहाराक मसीहा कृष्णकुमार कश्यप’ लेखक शीर्षकहि दोषपूर्ण आ भ्रामक अछि,त ओकर अन्तर्वस्तुक तेहने हएब स्वाभाविक।जहि चित्रकलाक चर्चा राजनन्दन जी कए रहल छथि,से मधुबनी क्षेत्र-विशेषक कला अछि,मधुबनीक अस्मिता सं जुड़ल अछि आ मूलतः सर्वहारा वर्गक जनि-जातिक कला अछि। एकरा मिथिलाक कला कहब तहिना अछि जेना महमूद गजनवी सोमनाथ मन्दिरक निर्माता हएबाक दाबी ठोकए। आमदनीक नीक माध्यम भए गेलाक कारण आइ ई कला भने अनेक महानगर तक प्रसार पाबि लेलक अछि,सोल्हकनसभक घर-आंगन सं बहराए द्विजलोकनिक स्त्रीगण तक पहुंच गेल अछि,क्षेत्रीयताक सीमा तोड़ि आन-आन क्षेत्र तक खुदरिया रूप मे विस्तार पाबि लेलक अछि,किन्तु एकर मूल आ थोक उद्भव-स्थल मधुबनीए अछि आ सेहो मधुबनीक सर्वहारा समुदायक घर-आंगन। अहि कला कें ‘मधुबनी कला’ छोड़ि आन कोनो नाम देब प्रचण्ड थेथरपनीक अतिरिक्त आर किछु नहि। अहि आलेख मे राजनन्दन जी लिखए छथि—‘हम पुछलियनि,ई चित्रकला त मात्र मैथिल ब्राह्मण तथा कर्णकायस्थक परिवार सभ मे प्रचलित अछि जकरा महिला लोकनि अपन नानी,दादी,माय आदि सं सीखने छथि।तखन स्कूलक की प्रयोजन?’ राजनन्दन जीक ई प्रश्न हुनक अज्ञानता सं उपजल अछि कि ओ अहि विषय मे अल्पसूचित-भ्रमित छथि आकि जानि-बुझि कए एकर नव-नामकरणक स्वघोषित पुरोहित बनि रहल छथि,से निर्णय करब कठिन। आ जं राजनन्दन जीक प्रश्नक उत्तर मे अहि लेखक चरितनायक कश्यप जी एकरा ब्राह्मण,कायस्थक अतिरिक्त डोम,दुसाध,मुशहर आ मुसलमान आदिक कन्यालोकनिक माध्यम सं अहि कला कें सार्वजनिक आ सर्वसुलभ बनैबाक दाबी करए छथि त ई प्रपंच-पाखण्डक पारावार अछि।जहि लुरि कें कश्यप जी मां सरस्वतीक वरदान कहए छथि,से वस्तुतः मंथराक कूटबुद्धि बुझाइत अछि। ‘स्मृति किएक?’ मे राजनन्दन जी गछए छथि जे ‘मैथिली मिथिलाक लोक भाषा थिक,लोक चेतनाक संवाहक थिक’। किन्तु एकर बाद हुनक कहब छनि जे ‘एहि मे लोक जीवनक संघर्षक गाथा सभ समाहित अछि,मुदा मैथिली अपनहि संतान द्वारा अवहेलित अछि’।जं अहि अवहेलना सं संबंधित हुनक आरोप सर्वहारा वर्ग पर अछि त अहि आरोप सं सहमत हएबा मे कोनो अतस्तितह नहि हएबाक चाही।ई सत्य छै जे ई भाषा मूलतः गैर मैथिल लोकनिक थिक आ अहि मे लोकजीवनक संघर्ष गाथासभ ठीके समाहित छै,आ से लिखित रूप मे नहि,लोककंठ मे बसल छै।तेकरा लिखि कए दस्तावेजीकृत करबा मे निस्सन्देह ई लोक-समाज चूकल अछि।एतय सोचबाक गप ई छै जे लोकजीवनक संघर्ष गाथा कें लिखित रूप मे आनबाक लेल पढब-लिखब अनिवार्य छै आ जेकरा पर एकर जिम्मेदारी रहए तेकरा पढबा-लिखबा सं वर्जित करनिहारे आइ अहि भाषा पर अपन आधिपत्य जमएने छथि।किन्तु राजनन्दन जीक अपन सीमा छनि।ओ विश्लेषणक प्रक्रिया मे जाइ सं बचए छथि।ओ सरलीकरणक रस्ता चुनए छथि,कोनो बातक चर्चा कए देब,तहि पर चिन्ता व्यक्त कए देब हुनका यथेष्ट बुझाइ छनि। तें ओ चर्चा आ चिन्ता व्यक्त करबाक औपचारिकताक निर्वहन कए सीधे अभिजात्यक लिखल साहित्य दिस आबि जाइ छथि आ कहए छथि जे ‘मैथिलीक वर्त्तमान काव्य साहित्य,कथा साहित्य तथा नाटक भारतक कोनो समृद्ध भाषा साहित्यक समकक्ष ठाढ हैबाक सामर्थ्य रखैत अछि’। अपन अहि कथनक समर्थन मे ओ कोनो लेखक वा कोनो कृतिक उदाहरण देब आवश्यक नहि बुझए छथि। हुनका मात्र ई कहबाक छनि जे तें ओ कर्णामृतक माध्यम सं मैथिलीक साहित्यकार तथा मैथिली आन्दोलन सं जुड़ल सेनानी (?) लोकनिक स्मरण करए छथि।राजनन्दन जीक अपन एजेंडा छनि।तहि पर ओ चलथि तहि मे केकरो की एतराज भए सकैत अछि?किन्तु एकटा पाठकक मन मे ई सभ पढि जे अनगिनत प्रश्न उठैत अछि,तहि सं हुनकहु कोनो एतराज नहि हएबाक चाही।जं मैथिली लोक भाषा अछि त अहि मे संस्कृत परम्परा सं आविर्भूत भेल बाबू-भैयासभ  अपन मनिजनी किऐ चलाए रहल छथि? अहि भाषा मे लोकजीवनक गाथासभ समाहित अछि त से लोक-कंठहि तक सीमित किऐ रहि गेल आ एकर लिखित साहित्य  मे अभिजात्य गाथाक गान किऐ कएल जाए रहल अछि?मैथिली-मिथिलाक इतिहास लोक-जीवनक इतिहास नहि भए कए पुरोहित लोकनिक मरौसीक खतियान किऐ बनल अछि?मणिपद्म छोड़ि आन कोनो लेखक लोक-गाथाक संग्रहण-संकलन आ ओकर लिखित दस्तावेजीकरणक प्रयत्न किऐ नहि कएलनि?मैथिली लोक भाषाक मौलिक रूप मे एकटा श्रमजीवी स्त्री जकां निश्छल, निर्दोष आ पवित्र अछि।तेकरा मैथिलत्वक सोलह वा छप्पन शृंगार कए नगरवधु किऐ बनाए देल गेल?राजनन्दन जी द्वारा अहि भाषा कें लोक भाषा घोषित करैत क्रमानुसार जहि साहित्यकार लोकनि कें स्मरित कएल गेल अछि,तहि मे सं किनकरसभक एकरा लोक भाषाक रूप मे प्रतिष्ठित करबा मे,लोक गाथासभ कें प्रकाशित-सम्मानित करबा मे,भाषा कें लोक चेतनाक संवाहक बनाए कए राखबा मे कोन-कोन आ कतेक योगदान रहल अछि?वर्तनी सं लए कए एकर सभटा वाह्याभ्यन्तर स्वरूप,एकर इतिहास,एकर व्याकरण आ एकर अन्तर्वस्तु पर्यन्त कें एकटा विशिष्ट जातिगत अभिजात्यक जाल मे फांसि कए किऐ बान्हि देल गेल अछि आ अहि काज मे प्रायः सभ आन्दोलनजीवी लोकनि सहभागी किऐ भेल छथि? अद्भुत त इहो गप छै जे अपवादक रूप मे एकटा प्रबोध नारायण सिंह कें छोड़ि,कर्णामृत जतेक लोक कें स्मरण कएलक अछि,से सभ गोटे मैथिल महासभा द्वारा पंजीकृत जातिए सं आबए छथि।रहल मैथिली साहित्यक भारतक कोनो भाषा साहित्यक समकक्ष हएबाक गप,त ई नुकाएल गप नहि अछि जे ई भाषा आइ तक विद्यापति कें छोड़ि आन कोनो अखिल भारतीय व्यक्तित्व नहि दए सकल।साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत कृतिसभ कें जं अहि भाषाक प्रतिनिधि साहित्य मानि ली ( मानबाकहि चाही) त अहि मे सं अधिकांश लेखन आन भाषाक समक्ष ठाढ हएबाक सामर्थ्य नहि राखैत अछि। मणिपद्मक चर्चा करैत लिखल गेल अछि जे, ‘मणिपद्म जी अपन साहित्यिक प्रतिभा सं मिथिलाक प्राचीन गौरव कें जन जीवनक आशा-आकांक्षा कें अपन लेखनी द्वारा लोकतांत्रिक धरातल पर अनलनि। हुनक ई लोकतांत्रिक प्रवृति मिथिला मे भावात्मक एकता आ मैथिलत्व बोधक कुंजी सिद्ध भेल’। मणिपद्मक योगदान निस्सन्देह अनमोल अछि। ओ अहि क्षेत्र-विशेषक लोक-संस्कृति कें लिखित आ दस्तावेजीकृत करबा लेल जे श्रमसाध्य काज कएलनि अछि,तहि लेल ओ सदैव मन पाड़ल जेता। किन्तु राजनन्दन जीक उक्त वक्तव्य परस्पर विरोधाभासी आ वायवीय अछि।राजतंत्रीय गौरव आ लोकतांत्रिक धरातल दुनू दू चीज छिअए।तहिना लोकतांत्रिक प्रवृति आ मैथिलत्व बोध सेहो विपरीतार्थक छै।भावात्मक एकताक गप आ जातीय प्रतिद्वन्द्विता सेहो अलग-अलग गप। ई बात आब नुकाएल नहि रहल जे पौराणिक ‘मिथिला’ कें पुनर्जीवित करब मैथिल महासभाक अनेक रास गुप्त एजेण्डा मे सं एक अछि। अहि पौराणिक कथाक संग एकटा वृहत्तर समाजक धार्मिक भावना जुड़ल रहल अछि,जेकरा खूब नीक जकां भजएबाक काज भेल अछि।वस्तुतः जं कहियो एकर अस्तित्व रहबो करए त विदेह वंशक समाप्तिक बादहि एकर अस्तित्व समाप्त भए गेल।किन्तु एकटा सुनियोजित तरीका सं एकरा त्रेता,द्वापरक युगादि पर सं छड़पाबैत कलियुगक हरिसिंह देव आ घोर कलियुगक दरभंगा सामन्तक शासित क्षेत्र सं जोड़ि देल गेल अछि। पुरोहित समुदाय कें बुझल छनि जे भारतीय जनमानस धार्मिक मामला मे तर्क-वितर्क नहि करैत अछि आ अपन स्वाभावानुसार अहि अविश्वसनीय छड़पान पर सेहो शंका नहि करत। अहि अविश्वसनीय स्थापनाक चौतरफा लाभ पुरोहित लोकनि लेबाक जोगार कएलनि।पहिल ई जे हुनकासभक जातीय शुद्धता पर इतिहास जे शंका उठबैत अछि,से निर्मूल भए जाए आ ‘मिथिला’ शब्द सं ‘मैथिल’ शब्द जोड़ि अपन वंश कें पुराणकालीन समय सं सम्बद्ध कए लेल जाए। दोसर ई जे ठेठी वा पचपनियां वा तिरहुता नाम सं प्रचलित अहि क्षेत्र-विशेषक भाषा कें मैथिली नाम दए एकरा अपन नव यजमनिका वा खबोत्तर बनाएल जाए।तेसर ई जे अहि मिथिला-मैथिल-मैथिलीक प्रपंचत्रयीक माध्यम सं अहि क्षेत्र विशेष कें अपन सांस्कृतिक उपनिवेश बनाएल जाए।ई फेहरिस्त और नमहर अछि,किन्तु तेकरसभक चर्चा बाद मे कतहु।एतय एतबे जे हुनकासभक दुर्भाग्य सं देश आजाद भए गेल,राजशाही ढहि गेल आ चहुदिस लोकतंत्रक बयार पसरि गेल।युग-युग सं शिक्षा,समानता आ न्याय सं वंचित समुदाय शनैः-शनैः अपन अधिकार चेतना सं लैस हुअए लागल आ ओकरा मे प्रश्न उठएबाक साहस जागृत भेल। अहि जागरणक परिपेक्ष्य मे राजनन्दन जीक उपरोक्त वक्तव्य सेहो प्रश्नक घेरा मे अछि। मिथिला नामक कोनो वस्तु जं रहए त ओ राजतंत्र रहए।इतिहास गवाह अछि जे प्रायः शत-प्रतिशत राजतंत्री व्यवस्था शोषण पर आधारित रहए आ जं मात्र मिथिले नामक राजतंत्रक गप करी त ओहि मे कराल जनक सन-सन क्रूर आ पापी शासक सेहो भेल छथि। सीताक पिता आ रामक ससुर जनक सेहो अपन राजमहल आ शाही ठाठबाठ कोनो प्रेत-विद्या वा जादूगरीक प्रताप सं ठाढ नहि कएने हेता,प्रजाक शोषणक माध्यमहि सं कएने हेता,भनहि ओ अत्याचार प्रजालोकनिक बर्दाश्तक सीमाक भीतरे रहल हुअए।बर्दाश्तक भीतर हुअए वा बर्दाश्तक बाहर,कोनो प्रकारक शोषण गौरवक विषय नहि भए सकैत अछि।तखनि ओ कोन गौरव रहए जेकरा मणिपद्म लोकतांत्रिक धरातल पर आनलनि?किछु अपवाद छोड़ि मणिपद्मक प्रवृति लोकतांत्रिक रहनि,किन्तु ओ त भारतीय गणतंत्रक नागरिक रहथि;तखनि ओ भूतकालक यात्रा कए मिथिला मे भावात्मक एकता केना आनलनि? आ जं राजनन्दन जी वर्त्तमानक क्षेत्र विशेष कें मिथिला सम्बोधित कए रहल छथि त ई तथाकथित भावात्मक एकताक आन-आन ठामक दर्शनक गप छोड़ू,ई त मणिपद्मक पोथीसभक प्रकाशनहु मे नहि लखा दैत अछि। आन गैर-मैथिल जातिक गप सेहो छोड़ि दिअ,मैथिल ब्राह्मणक कोनो संगठन वा मंच अहि दिशा मे आगू नहि आएल आ ई काज अन्ततः कर्ण कायस्थ लोकनिक संगठन कर्णगोष्ठीए कें किऐ करए पड़ल?तहिना लोकतांत्रिक प्रवृति त मैथिलत्व-बोधक नम्बर एक दुश्मन अछि।मैथिलत्व बोध वस्तुतः फासीवादक पर्याय अछि। जेना अपन गरदनि मे उनटा स्वास्तिक लटकाए कए हिटलर अपन नस्लीय श्रेष्टताक घोषणा करैत आन नस्लक सफायाक मंशा साधने रहए,तहिना गरदनि मे ताग आ माथ पर पाग राखि ई मैथिलत्व कए रहल अछि। रत्ती-भरि अंतर ई जे दक्षिणाजीवी अहि समुदाय कें नरसंहार करबाक कुब्बत नहि छै आ तें एकर कार्य-पद्धति हिटलर सं कने अलग छै।मने नर-संहार नहि,सर्वहाराक संस्कार-संहार अछि। बाबूसाहेब चौधरी पर लिखल संस्मरण मे मैथिल संगठनसभक जातीय चरित्र प्रकट भेल अछि।किन्तु ई सायास नहि,राजनन्दन जीक व्यक्तिगत अनुभवक अभिव्यक्तिक क्रम मे अनायास भेल बुझाइत अछि। मिथिला संघक मंत्री पद पर अपन निर्वाचनक कथा कहैत ओ लिखए छथि जे, ‘ज्ञातव्य जे एहि सं पूर्व संघक मंत्री कोनो अब्राह्मण नहि भेल छलाह’। ई कथा बाबूसाहेब चौधरीक योगदानक चर्चाक क्रम मे आएल अछि,मिथिला-मैथिल संगठनसभक कारगुजारीक चर्चाक क्रम मे नहि।किन्तु एतबो लिखब कम नहि छै। अहि सभा-समिति-संगठनसभक इएह इतिहास रहल अछि।पांच-सात गो लगुआ-भिरुआ कें जुटाए कए संगठन बनाए लेब,ओहि मे ‘अखिल भारतीय’ शब्द जोड़ि देब आ ओहि मे कोनो गैरमैथिल कें ओहि मे पैसए नहि देब,पैसल त ओकरा पुनकए नहि देब,पैसाएब त ओकरा अपन भरिया वा पचिलगुआ बनाए कए राखब,इएह त होइत रहल अछि। अहि संग्रहक कोनो लेख मे राजनन्दन जी लिखने छथि जे दरभंगाक विद्यापति सेवा संस्थानक संस्थापक मणिपद्म रहथि। आइ अहि संस्थानक की स्थिति छै?एकोहं द्वितियो नास्ति! कहल जाइत अछि जे पटनाक चेतना समिति यात्री जीक परिकल्पना छल—भाषा आ साहित्यक उत्थान लेल।इहो समिति आइ शुद्ध रूप सं मैथिल लोकनिक जातीय संगठन मे तब्दील भए गेल अछि। को बड़ छोट कहऊ अपराधू! ‘विद्यापति स्मृतिपर्वक सूत्रपात’ मे राजनन्दन जी अहि स्मृतिपर्वक शुरुआतक श्रेय नरेन्द्रनाथ दास विद्यालंकार जी कें दए छथि। कतिपय ठाम एकर सूत्रधार कांचीनाथ झा किरण जी कें बताएल जाइत अछि।जे से! ई मैथिल महासभाक भैयारी विवाद भए सकैत अछि,ओएह लोकनि निबटाबथु। आम लोक कें ने एकरा सं कोनो मतलब छै आ ने अहि सं ओकरा कोनो फरक पड़ए छै। महत्वपूर्ण अछि अहि लेख मे व्यक्त राजनन्दन जीक चिन्ता, जे अहि पर्व कें मनैबाक तौर-तरीका सं संबंधित अछि आ सार्वजनिक चिन्ताक विषय अछि। हुनक चिन्ताक सारतत्व ई अछि जे अहि आयोजनसभ मे सभकिछु होइत अछि,बस जिनकर नाम पर होइत अछि,तिनकरे अवदानक कोनो चर्चा समक्ष नहि आबि पाबैत अछि। मैथिली सं जुड़ल के एहन व्यक्ति हएत जे हुनक अहि चिन्ता सं सहमत नहि हएत? किन्तु सोचबाक गप ई छै जे की ई आयोजन विद्यापति कें,हुनक अवदान कें स्मरण करबाक लेल होइ छै वा हुनका विपण्णणक वस्तुक रूप मे प्रस्तुत करबा लेल?एतय त ‘हाथीक दांत देखएबा लेल और,खएबा लेल और’ बला कहबी चरितार्थ भेल छै। नाम विद्यापतिक आ काम व्यक्तिगत विज्ञापन वा अर्थ-संग्रह।तखनि मुश्किल ई छै जे एहन चिन्ता व्यक्त करलाक बादो राजनन्दन जी अहि पैटर्न पर आनो आन कवि,साहित्यकार,गवेषक एवं आन्दोलनकर्ता लोकनिक स्मृतिपर्वक आयोजन करबाक सलाह सेहो दए छथि।विद्यापतिक मूल्य-निर्धारण बंगालक लोकसभ कए चुकल छथि,तें हुनका बेचए मे मैथिल लोकनि कें सुविधा छनि,ग्राहक भेटि जाइत छनि। आनहु कोनो मैथिल महामानव कें तहिना ग्राहक भेटि जएतनि,से के कहत! ‘मिथिलाक अतीत’ मे इतिहास सं सम्बन्धित हुनक चिन्ता अहि शब्द मे व्यक्त भेल अछि—‘सभ सं दुखक कथा जे अद्यावधि मिथिलाक प्रमाणिक ओ निष्पक्ष इतिहास मे अपन पितरक कृतित्वक सही मुल्यांकन उपस्थित नहि भए सकल अछि। अपन अतीतक प्रति एतेक उदासीन भाव अन्यत्र कतहु नहि भेटत’। अहि चिन्ताक क्रम मे ओ सम्पूर्ण भारत मे search for identity (आत्म-परिचिति)क दिशा मे लोकक जागरूकताक चर्चा सेहो करए छथि।ई गप जं गैरमैथिल समाजक लेल कहल गेल रहितए त अही सं शत-प्रतिशत सहमतिक गुंजाइश रहए। पुरोहिती वर्चस्वबला व्यवस्था मे आत्म-विस्मृतिक मारल सर्वहारा गैरमैथिल समुदाय शिक्षा आ शिक्षाजनित चेतनाक अभाव मे अपन इतिहास नहि लिखि सकबाक,अपन पितरलोकनिक पुरुषार्थ आ श्रमजीविताक दस्तावेजीकरण नहि कए सकबाक अपराधी अछि।ई अलग बात जे ओकरासभक अहि अपराधक जिम्मेदारी ओकरासभ कें शिक्षा सं वंचित राखनिहार ब्राह्मणे वर्ग पर अछि। किन्तु जेलोकनि राजनन्दन जीक लेखनक अन्तर्वस्तुक तह मे गेल छथि,तिनका बुझल छनि जे हुनक चिन्ता आ चिन्तनक दायरा मात्र मैथिललोकनि तक सीमित अछि। अहि क्षेत्र विशेषक इतिहास-लेखन दिआ ई नुकाएल गप नहि छै जे अहि क्षेत्रक एकक्षत्र क्षेत्राधिकार मैथिलहि लोकनि हथिअएने रहल छथि,अहि मे मात्र पितरहि लोकनिक गुणगान कएल गेल अछि आ ई गुणगान तहि सीमा तक गेल अछि जे बुद्धि-विवेक सं शुन्य पितरहुं कें पण्डित-महापण्डितक उपाधि सं विभुषित कए देल गेल अछि।इतिहास घटित होइत अछि,निर्देशित नहि।दुर्भाग्यवश मिथिला-मैथिलीक इतिहास-लेखनक नाम पर निर्देशन हाबी रहल अछि आ ई कपोल-कल्पना, मिथक,बनावटी तथ्य आ कालविरोधी कुतर्क आदिक क्षुद्र-समन्वयक फलस्वरूप शुद्ध रूप सं मैथिललोकनिक इतिहास भए गेल अछि।एकर माध्यम सं शेष-समाजक अनदेखी आ मानमर्दनक जे सुनियोजित लिखित षड्यंत्र भेल अछि,से एखनहु चुनौतीहीन अछि, अबाध रूप सं जारी अछि। हं,राजनन्दन जीक अहि वक्तव्य कें कर्ण कायस्थलोकनिक दिस सं छेहा मैथिल-ब्राह्मणीय पितर-पूजनक प्रति दबल स्वरबला प्रतिवाद अवश्य मानल जाए सकैत अछि। अहि प्रतिवादक दोसर रूप हुनक ‘मैथिली मे भ्रष्टाचार’ शीर्षक आलेख मे व्यक्त भेल अछि जेतय ओ महाकवि पंडित लाल दासक रमेश्वरचरित मिथिला रामायणक पुनर्मुद्रण मे डा रामदेव झा द्वारा पोथीक सभटा गूड़ गोबर करबा सं आक्रोषित भए ‘मैथिली मे इतिहास कें अशुद्ध करबाक प्रवृति’ आ ‘इतिहास कें मेटएबाक षड्यन्त्र’ आदिक उल्लेख करए छथि। मैथिलत्वक घटाटोपक बीच सं कर्णत्वक एतबो टा किरिण छटकैत अछि त एकरा भविष्य लेल शुभ लक्षण मानल जएबाक चाही। अहि प्रतिरोधी स्वरक सन्दर्भ मे स्वामी विवेकानन्दक चर्चा करैत चली जे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित एकटा अद्वितीय  व्यक्तित्व रहथि जे सनातन धर्मक उदार पक्ष कें जगजियार कएलनि।ओ वैदिक सभ्यताक पैरोकार सेहो रहथि। अहि क्रम मे ओ भारतीय जाति-व्यवस्था सं बहुत ऊपरक व्यक्तित्व भए गेल रहथि। किन्तु अहि देश पर जातिक जे आत्मघाती प्रभाव छै,से हुनको नहि बकसलक। ब्राह्मण लोकनि द्वारा हुनका शुद्र घोषित करबाक गप जखनि हुनक संज्ञान मे अएलनि त हुनका सन वैश्विक व्यक्तित्व कें सेहो स्पष्टीकरण देबए पर मजबूर हुअए पड़ल छलनि।ओहि स्थितिक कल्पना मात्र सं मन उद्वेलनक पराकाष्ठा पर चलि जाइत अछि जे एकटा संन्यासी जे घर-परिवार सं विमुख भए विश्व-मानव बनि गेल छला,तिनका ब्राह्मणलोकनिक एकटा क्षुद्र टिप्पणीक कारण अपन वैश्विकता कें कात राखि जाति-व्यवस्थाक रौरव नरक मे घुरि अपन जन्मना जातिक उच्चताक गप कहए पड़लनि। हुनक कहब रहनि—“ओ लोकनि हमरा शुद्र कहए छथि आ ललकारि कए पुछए छथि जे शुद्र कें संन्यासी हएबाक की अधिकार अछि? हमर उत्तर अछि जे हमर उत्पत्ति ओहि पुरुष सं अछि,जिनकर चरण पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’ कहैत पुष्पांजलि समर्पित करैत अछि आ जिनकर वंशज अतिशुद्ध क्षत्रिय छथि ……”।रामदेव झाक करतूत पर राजनन्दन जी द्वारा कएल उपरोक्त टिप्पणीक माध्यम सं इतिहास स्वयं कें दोहरएलक अछि।एतय स्वामी विवेकानन्दक एकटा रोचक टिप्पणीक उल्लेख करबाक इच्छा कें नहि रोकि पाबि रहल छी जे ओ अपन एकटा शिष्यक ‘केकरो छुअल अन्न खएबाक’ जिज्ञासाक प्रत्युत्तर मे कएने रहथि। स्वामी जी अहि सन्दर्भ मे आन-आन बात कहबाक संग व्यंग्यात्मक आक्रोष मे ईहो कहने रहथि—‘कलकता मे जाति-विचार त और मजेदार अछि।देखल जाइत अछि जे अनेक ब्राह्मण आ कायस्थ होटलसभ मे भात खाए रहल छथि,किन्तु ओलोकनि होटल सं बाहर निकलि समाजक नेता बनि रहल छथि,वएह लोकनि दोसरसभक लेल जाति-विचार तथा अन्न-विचारक नियम बनबए छथि। हमर कहब अछि जे की समाज कें ओहि पाखंडीसभक बनाएल नियमक अनुसार चलबाक चाही?’ ‘मैथिली बनाम हिन्दी:बदलैत सन्दर्भ’ मे हिन्दीक प्रति हुनक व्यावहारिक आ पुर्वाग्रहमुक्त दृष्टिकोण समक्ष आएल अछि।एतय ओ किरण जीक ‘हिन्दी कुलच्छिनी कें झाड़ू मारि भगएबाक’ प्रतिक्रियावादिता सं दूर छथि। प्रायः एकर कारण ई जे ओ हिन्दीक शक्ति-सामर्थ्य कें बुझए छथि आ अहि भाषाक लाभक भुक्तभोगी रहल छथि।ओहुना कोनो भाषा कोनो भाषाक शत्रु नहि होइत अछि आ इहो बहुत साफ छै जे हिन्दीक विरोध मैथिली सं जुड़ल ओहने तत्व द्वारा भेल अछि जे हीनभावना सं ग्रसित छथि आ हिन्दी मे शुद्ध-शुद्ध दू पंक्ति नहि लिखि सकए छथि। हिन्दी-विरोधी स्वघोषित मैथिली-हितकारी लोकनिक समाजक बीच रहि एहन बौद्धिक साहसक प्रदर्शन लेल राजनन्दन जीक प्रशंसा हएबाक चाही। ‘मैथिलत्वक बोध’ आलेख महासभाइ  मानसिकताक उपज अछि। ‘मैथिलत्वक बोध नहि भेने दृष्टिकोण व्यापक नहि भए सकैछ आ हमरालोकनि अपन विभूति,संत ओ मनीषी कें चिन्हि नहि सकैत छी’ सन टिप्पणी सं सहमत हएब कोनो गैरमैथिल लेल संभव नहि अछि।बल्कि अधिकांश प्रगतिशील मैथिलहुं अहि दृष्टि-संकोचक पक्षधर नहि भए सकता।ई मैथिलत्व बोधहि अछि जे मैथिली साहित्य कें नचारी-जगतक मध्ययुगीन भूलभुलैया मे भटकाए रहल अछि आ एकरा आधुनिकता-बोध सं कतिअएने रहल अछि। अहि तथ्य कें प्रमाणक बेगरता नहि छै जे जेलोकनि अहि मैथिलत्व-बोधक प्रतिगामी मार्ग छोड़लनि,वएह लोकनि आन भाषा-साहित्यक समकक्ष अपन रचना कें ठाढ कए सकला अछि। ‘मैथिलीक विरुद्ध कुचक्र’ अन्हार घर मे सांपे-सांप बला फकरा कें प्रमाणित करैत अछि।पहिनहि लिखि चुकल छी जे कट्टरता आत्मनिरीक्षणक पद्धति कें स्वीकार नहि करैत अछि आ अपन क्षुद्रता,अपन निर्बलताक लेल कोनो आन कें दोषी ठहराबैत अछि आ से दोषी प्रत्यक्ष नहि हुअए त काल्पनिक शत्रु कें ठाढ करैत अछि।एतहु दरभंगा आकाशवाणी द्वारा सीतामढी,समस्तीपुर तथा बेगुसराय कें मैथिली भाषी क्षेत्र सं अलग कए देबाक निर्णय पर रोदना ठानल गेल अछि आ तहि लेल मिथिला मैथिलीक विरुद्ध षड्यंत्रक इतिहासक बड़ पुरान हेबाक दोहाइ देल गेल अछि।प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शत्रुसभ कें दोषारोपी बनैबाक जे मैथिल परिपाटी रहल अछि,तेकर पालन सेहो कएल गेल अछि।एतय स्वाभाविक रूप सं ई प्रश्न उठैत अछि जे अपन पुरोहिती गुमान आ नव-नव यजमनिकाक खोज आ निर्माणक क्रम मे अहां मिथिला नामक मिथकीय भूखण्ड कें वर्त्तमान मे उपस्थित कए एकर अन्तर्गत भारत-भूमिक अनेकानेक क्षेत्रक संग नेपालक नमहर भूभाग कें सम्मिलित  कए लेलिअए। ठीक छै! वर्त्तमान लोकतंत्रीय भारत मे स्वयं कें धर्म-संस्कृति-व्यवस्थाक स्वघोषित ठेकेदार मानि अहां कें राजतंत्रीय संस्कृतिक खेलौर करबाक अछि,त करू।किन्तु अजुका सजग-सचेत भेल समाज कें मध्ययुगीन मानसिकताबला मुर्ख मानि ओकरासभ सं अपन प्रपंच-कर्मक शब्दसः सम्पुष्टिक अपेक्षाक भ्रम किऐ अछि अहां कें? हिन्दीबला जखनि मैथिली कें हिन्दीक उपभाषा कहैत अछि,त अहांक मगज टीकासन धरि लैत अछि।किन्तु अंगिका,बज्जिका,मगही आदि कें मैथिलीक उपभाषा घोषित करैत काल अपन मैथिलत्वक अहं मे ई बिसरि जाइ छिअए जे अहांक अहि मारण-मंत्रोच्चार सं हुनकोसभक पित्त लहरि जाइत हेतनि। अहां अपन इतिहास कें षड्यंत्र-कुचक्र-प्रपंच-छल-छद्मक रोशनाइ सं लिखि स्वयं अपनहि लिखल सं भ्रमित होउ। ठीक छै! आन लोक जं ओकर वस्तुसत्य जानि ओहि कुचालि मे फंसए सं नठए छथि त हुनकासभ पर कुचक्रक दोष देब कतहु सं उचित नहि अछि।कोनो तर्कक आधारभूमि जं यथार्थ पर टिकल नहि हुअए त ओ कुतर्कक श्रेणीक वस्तु थिक।प्रत्येक इलाका सं दू-एक टा मैथिली लेखकक नाम गिनएने सं ने ओ क्षेत्र मैथिलीभाषी भए जाइ छै आ ने ओ मिथिलाक क्षेत्रांतर्गत आबि त्रेतायुग मे घुरिकए स्थापित भए जाइ छै।कलकत्ता त मैथिलीक लेल खूब गतिशील क्षेत्र रहल अछि,आधुनिक विकासक क्रम मे मारिते रास मैथिलीभाषी लोक देशक आनहु-आन विभिन्न क्षेत्रक रहवासी भए गेला अछि आ तें पटना,दिल्ली,मुम्बई,हैदराबाद आदि अनेक नगर-महानगर मे दू-एक टा मैथिलीक लेखक छथि।तेंकि ई सभटा इलाका मैथिलीभाषी आ मिथिला नामक मृत-प्रदेशक यमशासित क्षेत्रांतर्गत भए गेलए? लेखनक अहि अतिवाद सं बचबाक चाही। अहि सं लेखक विवादग्रस्त भए चर्चाक केन्द्र मे आबि सकैत अछि किन्तु ई अतिवाद भाषाक लेल बहुत घातक अछि। ‘बहुतो संघर्ष आ प्रयासक पश्चात बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा मे एक ऐच्छिक विषयक रूप मे मान्यता प्राप्त भेलैक।जकर प्रतिफल ई भेल जे शताधिक मैथिलीभाषी प्रत्याशी सरकारी नौकरी मे परीक्षा पास कए पदासीन भेलाह।एहि मे अधिकांशतः पछुआएले जाति तथा जन-बोनिहार वर्गक परिवार सं आयल शिक्षित युवक-युवती लाभान्वित होइत गेलीह।‘ 1998 ई मे लिखल ई टिप्पणी ‘केन्द्र सरकार ओ मैथिली’ शीर्षक लेख मे आएल अछि। अहि टिप्पणीक पक्ष मे कोनो आंकड़ा देबाक आवश्यकता नहि बुझल गेल अछि।एहन कोनो आंकड़ा अछिओ नहि।यथार्थ सेहो नहि।सत्य ई छै जे बिहार लोक सेवा आयोग मे मैथिलीक रहला सं मात्र मैथिल लोकनि लाभान्वित भेला अछि।पछुआएल जाति आ जन-बोनिहारक बेटा-बेटीक लाभान्वित हएबाक गप मात्र सरकार कें भ्रमित करबाक लेल कहल गेल अछि।मैथिलीए किऐ,आन-आन भाषा सेहो लोक सेवा आयोगक विषय बनए आ विभिन्न भाषाभाषी अहि सं लाभान्वित होथि,से के नहि चाहत।किन्तु तहि लेल अहि तरहक असत्य आ अपुष्ट सांख्यिकीक दुरुपयोग हुअए,से किनकहु स्वीकार नहि भए सकैत अछि। ‘संविधान मे मैथिलीक प्रवेश’ लेख मे राजनन्दन जी संविधानक आठम अनुसू्ची मे मैथिलीक अएबा सं अत्यधिक भावविभोर भेल छथि आ एकर आठ गो लाभ गिनबैत लाभ संख्यां-3 मे कहए छथि—‘मिथिलांचल आब अहिन्दीभाषी क्षेत्र मानल जाएत तथा एहि अंचलक लोक हिन्दी नहि,मैथिली भाषी मानल जयताह।‘ई रुमानी सोचक पराकाष्ठा छिअए। यथार्थविरहित यथार्थ एकरे कहल जाइ छै। एतबे नहि,लेखक अंत मे ओ दूटा निवेदन करए छथि,जहि मे निवेदन संख्या-1 अछि – ‘मैथिलीभाषी आबहु हीन भावना सं मुक्त होथि तथा अपना कें मैथिलीभाषी तथा मैथिल कहैबा मे गौरवक बोध करथि’।ई केहन निवेदन अछि जे हीन भावना सं मुक्त हएबाक गप करैत अछि आ हीनता दिस जएबाक आग्रह करैत अछि! मैथिलीभाषी कें मैथिलीभाषी कहैबा/कहबा मे की आपत्ति भए सकैत अछि?किन्तु युग-युग सं श्रम आ पौरुषक बल पर अपन जिनगीक गाथा गढनिहार लोकनि अपन मस्तक पर दक्षिणाजीविता आ पराश्रयताक समानार्थी बनल शब्द ‘मैथिल’ लिखाएब/लिखब कें स्वीकार किऐ करता? अपन भुजदण्डक सामर्थ्य पर आस्था राखनिहार श्रमजीवी पुरुष भूखल नहि रहि सकैत अछि आ जं दुर्भाग्यवश एहन कोनो स्थिति आबियो जाएत त ओ भूख सं मरि जाएत,याचना करब वा भीख मांगब कबूल नहि करत। राजनन्दन जीक मानस पर कलकत्ताक स्वार्थपोषित आन्दोलनी गतिविधि आ ओकर नाराबाजी सभक तेहन प्रभाव पड़ल छनि जे ओ समस्यासभ कें चिन्हितहु ओकर समाधान लेल गगनविहारिताक मार्ग पकड़ि लए छथि,एकदम रूमानी खयालक दुनियां मे चलि जाइ छथि।‘मिथिला-मैथिलीक विकासक प्रश्न’ लेख मे ‘मिथिला मूलतः कृषि प्रधान क्षेत्र रहल अछि।रौदी,दाही,बाढि आदिक प्रकोप सं त्रस्त। आमलोक सामंती व्यवस्था मे शोषणक शिकार रहबे कएल अछि। अन्न-वस्त्र विहीन,दारिद्र्य,अशिक्षा,रोगग्रस्त जीवन मे एकोपल सुख-चैन सं रहबाक स्थिति नहि भेलैक।भय सं त्रस्त,आंखिक नोर कहियो सुखैलैक नहि।…..आइयो स्थिति अनुकूल नहि अछि……ओहिना रौदी,दाही,बाढि,बिजलीक अभाव,बाट-घाटक अभाव,जीवाक हेतु शुद्ध विकार विहीन जलक अभाव,शिक्षाक हेतु विद्यालयक सुविधा, चिकित्साक हेतु डाक्टर,अस्पताल दवाई-विरोधक अभाव आदि,आदि।‘ सन जमीनी वास्तविकताक विवरण लिखनिहार राजनन्दन जी अहिसभक समाधान लेल ‘चेतना समिति,पटना’ सन संस्थाक सक्रियताक कामना करए छथि। ओ लिखय छथि—‘हमरा जनैत चेतना समिति,पटना सन एनजीओ (NGO) संस्था एहि दिशा मे जं क्रियाशील हो त काज किछु भए सकैत अछि’। चेतना समितिक अचेतना, सुप्त-चेतना दिआ किनका नहि बूझल छनि।भाषा-साहित्यक उन्नयन लेल बनल ई संस्था शुद्ध रूप सं जातीय संगठन आ जातिअहुक एकटा गुट-विशेषक रखनी जकां भेल अछि,जेकरा ने लोकतंत्री-पद्धति पर विश्वास छै आ ने गैर-मैथिलक चिन्ता।जे अपन ढेके सम्हारए मे अपस्यांत अछि,ओ आन लेल शमियाना आ दरी-जाजिम बिछाएत,ई अपेक्षा कोनो होशगर लोक केना करत? जाधरि हम राजनन्दन लाल दास जी कें मात्र ‘कर्णामृतक सम्पादक’ रूप मे देखैत रहलियनि,हमर मन मे हुनकर छवि एकटा कद्दावर साहित्य-सेवी,अल्पायु होइत मैथिली पत्रिकासभक बीच मे ‘कर्णामृत’ कें अपन श्रम आ समर्पणक बदौलत दीर्घजीवन देनिहार एकटा मिशनरी व्यक्तिक बनल रहल। हुनक सम्पादकीय आ अन्य लेखादिक संग्रह ‘चित्रा-विचित्रा’ कें समग्रता मे देखि/पढि हुनक ओ पूर्व छवि खण्डित होइत अछि।तीन मास पर हुनक सम्पादकीय पढबाक क्रम मे कथनसभक पुनरावृति, परम्परा-पोषणक भाव,पाखण्डसभक अंध-संपुष्टि आदिक आभास नहि होइत रहए,जे अहि संग्रहक समग्र अवलोकनक क्रम मे भेल अछि।सम्पूर्ण संग्रह मे मिथिला-मैथिल-मैथिलत्व आदि शब्दक ततेक बेर प्रयोग भेल अछि जे मन एकदम सं खिन्न आ उचाट जकां भए जाइत अछि। पौराणिक पात्र ‘मिथि’क मिथकीय कथा मन पड़ैत अछि,जाहि मे मृत निमिक देह कें ॠषिगण (जे ब्राह्मणे होइत छला) द्वारा मथल गेलाक उपरांत मिथिक प्राकट्य होइत अछि।कथाक अनुसार इएह ‘मिथि’क नाम पर ‘मिथिला’ संज्ञाक उद्भव भेल।ब्राह्मण द्वारा मथल अर्थात ब्राह्मण द्वारा जनित। अजुका युगक कोनो प्रचंड मुर्खहु कें बुझल छै जे कोनो मृत देह कें कतबो मथल जाइ,ओहि सं कोनो जीवित शरीर ठाढ नहि कएल जाए सकैत अछि,चाहे मथनिहार ब्राह्मण हुअए, शुद्र हुअए वा साक्षात अवतरित भेल कोनो विधाता।शाश्वत सत्य छै जे मृत व्यक्ति फेर सं नहि जीबैछ,बीतल राति फेर सं नहि आबैछ आ विगत उच्छ्वास फेर सं नहि घुरैछ। अहि स्थिति मे मनु महाराज द्वारा ‘विदेह’क जे अर्थ देल गेल अछि,से बेसी उपयुक्त आ समीचीन बुझाइत अछि।मनुस्मृतिक अनुसार ब्राह्मण पिता आ वैश्य स्त्री सं उत्पन्न संतान ‘विदेह’ अछि।एतय विदेह शब्दक व्याख्या करब वा ओकर उत्पत्तिक स्रोत खोजब उद्देश्य नहि अछि।एतय मात्र अहि सन्दर्भक चर्चा करब अछि जे पौराणिकताक प्रति अंधताक हद तक जाइत मैथिल-आग्रह हुनकासभ सं ओएहसभ करबा रहल अछि जे पुराणादि मे भेल अछि। ओसभ मानि लेने छथि जे बेर-बेर मथला सं, बेर-बेर गीजला सं मृत देह,मृत विचार,मृत राज्य आदि-इत्यादि कें पुनर्जीवित कएल जाए सकैत अछि। ई भने सायास नहि हुअए,संगतिक प्रभाव सं हुअए,राजनन्दन जीक मानस पर तेकर असर छनि।गोएबल्सक संगति मे रहनिहार हिटलर-दल सेहो एहने प्रभाव मे पड़ल रहए।परिणति की भेलए,से सभ कें बूझल छै। अहि संग्रहक पाठ-यात्रा करैत,एकर आलेखसभ पर नजरि खिरएलाक बाद निष्कर्षतः ई कहि सकए छी जे राजनन्दन जीक आलेख-संग्रह कें साहित्यिक कृति मानला सं अनेक रास विवाद भए सकैत अछि, अहि पर तथ्यमूलक टिप्पणी करबाक परिणामस्वरूप अप्रिय स्थिति बनि सकैत अछि,एकर लोकपक्षी समालोचना सं पुरोहित समुदायक आबालवृद्धलोकनि क्रुद्ध भए गारि-सराप पर उतरि सकए छथि। तें ‘चित्रा-विचित्रा’ कें आन्दोलनजीवी लोकनिक प्रचार-साहित्य/प्रोपगण्डा लिटरेचर मानि लेब सभ सं सुरक्षित विकल्प अछि। हं, ई कहबा/मानबा मे कोनो संकोच नहि जे मैथिलवादी-गिरोह द्वारा अपन एजेण्डाक क्रियान्वयन लेल समय-समय पर की-की अनर्गल प्रचारित कएल गेल आ तेकर प्रभाव मे आबि पढलो-लिखल समाज केना भ्रमित भेल,तेकर अधिकांश कें समग्रता मे जानबाक-बुझबाक लेल ‘चित्रा-विचित्रा’ बहुत उपयोगी संग्रह अछि। विजय इस्सर "वत्स" विभूति संग प्रतिभूति- स्व. राजनंन्दन लाल दास जी

चारि जुलाई (०४-०७-२०२१) कँ समस्त मैथिल समाज शोक संतप्त छल।लगै छलै जेना मैथिलीक कोनों अमुल्य धरोहरक लोप भ' गेल हो। देश-विदेशक प्रत्येक मिथिला-मैथिली सेवी क आँखि सँ अश्रुपात होइत छल।मुदा सभ कियो विवश आ किंकर्तव्यविमूढ़ छलाह ओहिना जेना कोनो परिवारक सभ सँ सुपात्र कमौआ पूतक परल लहास पर संपूर्ण परिवार विवश भेल हकानैत हो। मुदा विधिक विधान, मृत्यु निश्चित, से मृत्यु मिथिला विभूति राजनंदन लाल दासजी कें वरण क लेल।ओ सदेह हमरा सभक बीच नहि रहलाह मुदा हुनक यशोकृति , मैथिलीक प्रति हुनककर प्रेम आ प्रतिबद्धता, अंतिम स्वांस धरि सेवा भाव आ हुनक अपन समाज - मातृभाषा के प्रति निष्कपट सहज भाव मिथिला-मैथिली केनिहार लोकक लेल पाथेय बनल रहत ई हमर दृढ़ विश्वास।

बिना माउसक ठठरी सन सताशी (८७)सालक बूढ़ जर जर देह नेने दास जी अंतिम समय धरि अपन मातृभाषाक प्रेम मे एना मगन छलाह जेना कोनो शिषु अपन माएक कोर मे दुनियाक सब सँ पैग आनंदक अनुभूति करैत अछि।ओ जखन किनको सँ बात करैत छलाह त बस मैथिलीक मादे आ ने त हुनके संपादकीय मे ३९ साल सँ बहराइत प्रतिष्ठित मैथिली त्रैमासिक पत्रिका कर्णामृतक संबंध मे। हुनक सहज आ सरल व्यक्तित्व सँ समस्त मैथिल समाज प्रभावित होइत छलथि।दास जी के मिथिलाक दधिचि पुरुष कहब कोनों अतिशयोक्ति नहि।

दास जी'क आजीवन अवदान सर्वविदित अछि।ओ लेखा जोखा (Data)एतय  हम नैं राखब मुदा एक बात  विशेष प्रभावित करैछ जे राजनंदन लाल दास जी १९६० ईस्वी मे को०वि०विद्यालय सँ राजनीति शास्त्र मे एम० ए० केने छलाह तैयो हुनक जीवन मे राजनीतिक प्रपंच अदृश्य छल। जहन कि बेसी भाग सभा सोसायटी राजनीतिक कठपुतरी बनि नचैत अछि।ओ मिथिला मैथिलीक सेनानी नैँ एहि कालखंडक नायक छलाह।

हमरा मोन परैछ करीब दश-पंद्रह वरष पूर्व परमादरणीय स्व०दयानाथ झा (कक्का जी) हैदराबाद सँ आएल छलथि ऊत्तरपारा ,जतय ओ कैएक दशक सँ रहैत कलकत्ता के मैथिली के ऊर्जान्वित करैत छलाह।हुनक स्नेह हमरा ऊपर रहैत छल।एक दिन हमर कुटिया पर एलनि।भोजन भात भेलैक।समय छलै हमहूँ छुट्टी लेने छलहुं।ओ अपन इच्छा प्रकाश केलनि जे कने राजनंदन लाल दास जी सँ भेंट करबाक अछि तों जँ कने नेने चलितह।हम कहलियनि किएक नैं चलूं।हम दूनू गोटे दासजी के आवास पर गेल छलहुँ।खूब आनंदित छलाह मिलि क' एक दोसर सँ दुन्नु गोटें।हमहूँ मस्त छलहुँ ओहिना जेना डाढ़ि पर दू गुलाबक बीच में कोनो अकिंचन काँट मस्त रहैत छै स्थितिक लेल।ताधरि हमहुँ गीत नादक बहन्ने अपन परिचिति कलकतिया मैथिलीक बीच बना लेने छलहुँ।दास जी केँ हम पहिनहुँ बहुतो मंच के शोभित करैत देखने छलियनि।ओहो हमरा चिंहैत छलाह।कुशल क्षेम पहिनहुँ सँ होइत छल।मुदा बैस के बतियानक सुजोग कहियो नैं भेटल छल।ओहि दिन दास जी हमरो सँ बड रास बात सभ कहलनि सुनलनि।आइयो मोन अछि ओ कहने छलाह विद्यापति गीतक स्वरलिपि पर काज अरब अति आवश्यक।हुनके मुँहें सुनने छलहुँ महान संगीतज्ञ-गायक पं० विश्वनाथ मिश्रक व्यक्तित्व आ कृतित्वक बखान। बहुत रास इच्छा छलनि करबाक मैथिली साहित्य आ संगीतक काज। आब ओ कार्यकर्ता नहि रहलाह मुदा कार्यकर्ताक प्रेरणा श्रोत बनि जीवैत रहता सदैव।

हम नमन करैत छी ओहि पटोरी,पँचगछिया,सहरसाक(मातृक) माटि के जतय ओ जन्म लेलाह।हमर सादर नमन माता-स्व०विद्या देवी, पिता-स्व०मनीलाल  दास,गोगौन, घनश्यामपुर दरभंगा (पैतृक गाम) के जिनका कूल मे आबि ओ धन्य केला।हम मनन करैत छी ०५-जनवरी १९३४(जन्मदिन) पावन दिन के जे मिथिला मे बेर बेर एहने दिन आबौ।हम प्रणाम करैत छी अखिल भारतीय मिथिला संघ, मिथिला संग्राम समिति आ मिथिला दर्शनक सचिव केँ।हमर प्रणाम संतो (क्रांतिकारी नाटक,), चित्रा-विचित्रा(निबंध संग्रह)आ डा०प्रबोध नारायण सिंह(विनिबंध)के यशस्वी लेखक केँ।हमर शत् शत् नमन आखर आ कर्णामृतक ओ अमर प्रकाशक-संपादक केँ।

स्व०राजनंदन लाल दास जी मिथिला मैथिलक विभूति संग प्रतिभूति छलाह,ओ मिथिला- मैथिलीक धरोहर-शाख-पत्र छलाह,ओ प्रतिबद्धताक प्रतिमूर्ति छलाह,ओ मैथिलीक सपूत आ संरक्षक छलाह।सादर नमनशत् शत् नमन शिव शंकर श्रीनिवास राजनन्दन लालदासक नाटक शैलेन्द्र मिश्र राजनन्दन लाल दास : मिथिला-मैथिलीक एकटा निष्काम योगी आ योद्धा कोनो समाज कतेक जागृत अछि ओकर अनुमान ओइ समाज द्वारा अपन नायकक प्रति सम्मान आ उद्गारसँ पता लगायल जा सकैया । हमरा लेल चुनौतीक संग ई गौरवक बात अछि जे हम मैथिली साहित्य ,भाषा ओ संस्कृति के एहेन योद्धा के लेल आलेख लिख रहल छी जिनकर मूल्यांकन एखन धरि नै भेल अछि । हम बात कऽ रहल छी स्व. राजनंदन लाल दास जीक जिनका सन-सन महापुरुषक लेल विदेहक अइ अभियान के हम स्वागत करैत छी आ संग पुरि रहल छी । वस्तुतः ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै कियाक त हिनकर रचना सभ आ पोथी सभ सर्वसुलभ नै छै तथापि जएह किछु स्रोत हमरा भेट सकल तकर आधार पर हम एकटा प्रयास क रहल छी । हिनका सन मातृभाषा –प्रेमी शायद बहुत कम देखबा मे आबि रहल अछि आ सच कही तँ सम्पूर्ण मैथिल समाज में सर्वकालिक रूपसँ सेहो कम्मे भेटत । चालीस बर्ख धरि ‘कर्णामृत’ पत्रिकाक सम्पादन निश्चित रूपसँ दासजीक आत्मबल ओ दृढ़ विचारक हेबाक परिचायक अछि विशेषक मैथिली एहन भाषाक लेल जतय अधिकांश पत्रिका अल्पायु रहैत अछि आ किछु अंक निकलबाक बाद बंद भऽ जाइ छै । ‘कर्णामृत’ पत्रिका जाति विशेषक नाम पर रहितो ओ सभक लेल अछि, सम्पूर्ण मिथिलाक पत्रिका अछि । जाति –संप्रदाय से बढि के मैथिली साहित्य ,भाषा ओ सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार आ नब पौध के प्रेरणा –प्रोत्साहन, प्रशिक्षण आ एकटा दृष्टि देबय मे अपन सम्पूर्ण जीवन के माँ मैथिली के समर्पित कऽ देलथि । आरंभिक कालहिसँ राजनन्दन लाल दास एकटा एहन प्लेटफॉर्म तकैत रहथि जत’सँ मैथिली -मिथिला के लेल ओ वृहत्तर काज कऽ सकथि । हुनकहि शब्द मे –“हमरा एकटा मंचक प्रयोजन छल जतय हम निर्विघ्न बिना कोनो तिकड़मक काज कऽ सकी । सन 1973 ईस्वी में कर्णगोष्ठीक स्थापना भेल । मुदा संस्थाक कतिपय सदस्यक रूढ़िवादी विचार हमरा असह्य छल । तैं, हम ओहि संस्थासँ अलग रही । सन 1981 ईस्वी में कर्णगोष्ठीक एक बैसक में कर्णामृत नामक त्रैमासिक पत्रिकाक निर्णय भेलैक । एकर पंजीकृत संपादक ओ प्रकाशक भेलाह श्री अर्जुन लाल कर्ण, स्वामीत्व रहलैक कर्णगोष्ठीक । पत्रिकाक संपादनक भार हमरा कान्ह पर आबि गेल।" ई चालीस बर्ख धरि ‘कर्णामृत’क माध्यमे मातृभाषा संबंधी काज करैत रहलाह । एकर संपादकीय मे साहित्यिक चर्चा –परिचर्चासँ लऽ कऽ मैथिली भाषा आ पृथक मिथिला राज्यक निर्माण हेतु सभ बात भेट जायत । यदि मात्र हुनकर 41 वर्खक संपादकीय के पुस्तकाकार कयल जाय त विगत चारि दशकक मैथिली –मिथिला सं सम्बन्धित सब महत्वपूर्ण बातक लेखा –जोखा भेट जायत । आइ काल्हि एकटा बड़का भारी समस्या छै जे बहुतों लोक मैथिली साहित्य आ भाषा के लऽ कऽ हीन भावना सँ पीड़ित रहैत छथि हुनका मैथिलीक सामर्थ्यवान साहित्य आकि भाषा मानवा में कठिनाइ होइत छैन्ह । राजनन्दन लाल दासजीकेँ अपना भाषा आ साहित्य पर गर्व छलनि जकर ओ मुक्तभावसँ व्यक्त करैत रहलाह । हुनकहि शब्द में “ मैथिली अपनहि संतान द्वारा अबडेरल रहल अछि । आइ त’ स्थिति बेसी दुर्भाग्यपूर्ण अछि । तथाकथित शिक्षित समुदाय, ताहि में किछु अखरकटुए कियैक ने होथि, मैथिली बाजबा में हीनताक बोध करैत छथि । मैथिली पत्र-पत्रिका तथा पुस्तकक स्तरीयताक प्रति हीन भावना पोसने छथि आ से मात्र अज्ञानतावश । मैथिलीक वर्तमान काव्य साहित्य तथा नाटक भारतक कोनो समृद्ध भाषा-साहित्यक समकक्ष ठाढ़ हेबाक सामर्थ्य राखैत अछि । राजनैतिक समर्थन तथा सहयोगक अभाव रहितहुं, मैथिली साहित्यक विकास अवरुद्ध नहि भेल अछि।“ (संपादकीय, कर्णामृत जनवरी-मार्च 2003)। दासजी में सबसे जे नीक बात छलनि ओ कोनो बातक विश्लेषण योगदान आ गुणवत्ताक आधार पर करैत छलखिन्ह, अपन विचार गोल –मोल आ घुरियायाल नै राखि सोझ आ स्पष्ट रूपसँ रखैत रहलाह बिना कोनो परिणामक फिकीर केने कियाक त ओ चीप पॉपुलरिटी में विश्वास नै रखैत छलाह आ झूठक विरुद्ध अपन विचार खुलि के रखैत छलाह । हुनकर मत छलनि जे महापुरुष मैथिली मिथिलाक लेल जमीन पर ठोस काज केलथि हुनकर जयंती मनाओल जेबयाक चाही नहि की कोनो एहन  प्रभावशाली व्यक्ति के जे खाली हाब-डीव करैत रहलाह । मैथिली भाषाक बिहार सरकार द्वारा लगातार उपेक्षा से ओ एकदम उद्वेलित रहैत छलथि आ कतेको अवसर पर बिहार सरकारक द्वेषपूर्ण व्यवहारक बारे मे अपन बिचार प्रस्तुत करैत रहलाह । कर्णामृतक  अक्टूबर-दिसंबर 2017 के अपन संपादकीय में लिखने छथि –“मैथिली सेवी संस्था द्वारा अपन कार्यक्रममे मैथिलीक अस्मिताक रक्षा हेतु आक्रोशपूर्ण भाषण देल जाइत रहल अछि । बिहार सरकार मैथिलीकें संग सतौत व्यवहार करैत रहल अछि ।मैथिलीकें शिक्षाक माध्यम नै बनबैत अछि आ नै मैथिलीकें बिहारक दोसर राजभाषाक दर्जा दैत अछि । बरोबरि एहि लेल मांग राखल जाइत रहल अछि ।“ श्री अंजय चौधरी अपन पोस्ट में लिखने छैथ जे हुनका सम्बन्ध में समीचीन अछि –“भोला लाल दास, राजेश्वर झा ओ मुंशी रघुनन्दन दास तीनू महानक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक संपादक, प्रबोध बाबू पर विनिबंध लेखक, चारि दशक में अविस्मरणीय अवदान, कुशल प्रबंधक, विलक्षण प्रशासक ओ व्यवस्थित कर्मयोगी रहथि।“कर्णामृतक माध्यमसँ दास जी नवोदित प्रतिभा के प्रोत्साहित करैत रहलाह जाहिसँ ओ सभ आइ लिख रहल छथि , अइ बातसँ ई बात प्रमाणित भऽ जाइत अछि जे ओ मैथिली भाषा आ साहित्यक भविष्यक लेल सदति चिंतित रहैत छलाह ।  दासजी अइ बात के स्पष्ट रूपसँ बुझैत छलथि जे बिना बिहार सरकार द्वारा सरकारी मान्यता के आ शिक्षा में शामिल केने भाषाके विकास भेनाइ संभव नै छै । जनवरी –मार्च 2016 क अंक में हुनका द्वारा ई बात के उठायल गेल छल जे मैथिली के प्राथमिक कक्षासँ उच्च माध्यमिक धरि शिक्षाक माध्यम हएब अति आवश्यक अछि । आ से समाज मे ओहि वर्गक हेतु जे पछुआएल अछि जेना दलित, महादलित ताहूमे जे सभ ग्राम- घरमे बास करैत छथि । दोसर मैथिलीकें बिहारक द्वितीय राजभाषा घोषित करब । अंत में इएह कहि सकैत छी जे राजनन्दन लाल दासजी माँ मैथिली के एकटा सुयोग्य संतान छलथि जे व्यक्तिगत जीवन में विषमता रहितो मिथिला भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवा अपन जीवनक अंतिम क्षण तक करैत रहलाह । हुनकर ई अतुलनीय अवदान अबै बला कतेको पीढ़ी के प्रेरणा दैत रहतै । हुनकर विचार,साहित्य आ काज के प्रचार-प्रसार केनाइ हुनका प्रति श्रद्धांजलि हेतै । हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे हम सभ हुनकर अप्रतिम योगदान के सदैव मोन राखब । मुन्ना जी साहित्यिक जातिवादी सीमा तोड़लनि राजनन्दन जी बीहनि कथाक विकास मे रचनाकारक योगदान खगता सृजनक आधार होइछ।तकरे पूर्ति लेल गद्यक विकास क्रममें जुड़ल बीहनि कथा।सब पीढ़ीक नवका पीढ़ी,नव खगता पूर्ति लेल नव विचार ल' सोझां अबैए। कथा विकासक क्रममें उपन्यास (Novel) आ लघु कथा(कथा/ गल्प, Short stories)क पछाति अपन भाषा साहित्यमें कथाक परिष्कृत आ आधुनिक रूपमें एकटा स्वतंत्र विधाक खगता भेल।जकर खोराक थिक बीहनि कथा। बीसम सदीक अन्तिम दशकमें तत्कालीन नवका पीढ़ी कान्ह उठेलनि।संग एलाह साहित्यक अग्रज पीढ़ीक किछु अभिभावकीय दायित्व बला रचनाकार।ऐ तरहक अवधारणाक परिकल्पना जुलाई 1991मे पैटघाट मे भेल कथा गोष्ठी सं प्रेरित भ' सोझां आयल।एकरा मौखिक सहमति आ कि बल देलनि- डा. धीरेन्द्र आ जीवकान्तजी।करीब तीन चारि बरिख धरि ऐ पर विमर्ष/ घमर्थन चलैत रहल। पछाति 05मार्च 1995कें सहयात्री मंच लोहना( मधुबनी)क सामुहिक बैसारमें सर्वसम्मति सं स्वतंत्र विधाक मूर्त रूपमें सोझां आयल -' बीहनि कथा ' आ ओइ चारि वर्षक बीच भेल घोंघाउज सं निष्कर्षत: जे नाम निश्तुकी भेल ओ नामकरण कर्ता भेलाह श्रीराज 05मार्च 1995कें सर्वसम्मति सं ऐ नव विधाक जे शुरुआत भेल ताहिमें उपस्थित छलाह- श्रीराज, शैलेन्द्र आनन्द, डा.बी.के लाल,ललन प्रसाद,अमल झा , मुन्नाजी, कुमार राहुल, विजयानन्द हीरा, सच्चिदानन्द सच्चू, करणजी, अखिलेश्वर झा, अतुलेश्वर झा । एहि निर्णयक पछाति ऐ दिशामें जे पहिल काज भेल से छल-12मार्च1995कें मुन्नाजीक बीहनि कथा " नामर्द "केर पाठ आ विमर्ष संगहि ऐ विधाक भावी प्रारूप पर चर्चा।जाहि आयोजनक संयोजक वा कर्ता धर्ता रहथि श्री शैलेन्द्र आनन्द।एकरा एक डेग आओर आगू बढ़बैत 20मार्च 1995कें हटाढ़-रूपौली, झंझारपुर (मधुबनी) में भेल पहिल ' बीहनि कथा गोष्ठी' जकर संयोजनक श्रेय ऐछ तत्कालीन नवतुरिया रचनाकार मलयनाथ मिश्र,' मण्डन' जीकें। आब अग्रज सं अनुज धरि उत्साहित भ' बीहनि कथा लिख' लगलाह।प्रारम्भमें हिन्दीक चिलका लघुकथा आ बीहनि कथा मे नामहिक अन्तर छल।ओइ तथाकथित लघुकथा सं बीहनि कथा के फुटेबा वा स्वतंत्र अस्तित्वमे एबा में करीब डेढ़ दशक संघर्षरत रह' पड़ल। 1995सं किछु रचनाकार बीहनि कथाक लेखन आ कथा गोष्ठी मे निरन्तर पाठ करब शुरू केलनि।एहेन रचनाकार में प्रमुख छलाह-मुन्नाजी, विजयानन्द हीरा, कुमार राहुल,मलयनाथ मिश्र, सचिदानंद सच्चू...आदि।इ स्थिति करीब 2000धरि यथावत रहल।तकर पछाति भहरव /भसड़ब शुरू भेल।किएक त' गोटा गोटी इ रचनाकार सब जत' तत' छिड़िया गेलाह।कियो अग्रिम शिक्षा लेल त' कियो रोजगारक खगता पूर करबा लेल।2000इ.सं2009धरिक सांच कहब त' हंसी लागत।एकरा हास्यास्पदक संज्ञा द' सकै छी।सांच इ जे श्रीराजक अतिरिक्त एकरा उघि आगू ल' जाइ बला मे मुन्नाजी एकसरूआ बांचल छलाह।एहि एक दशकक खालीपन में 2003में श्रीराजक पहिल बीहनि कथा ,बीहनि कथा नामे छपल। जकरा जनकपुर,नेपाल सं प्रकाशित मैथिली साप्ताहिक " गाम-घर " मे प्रकाशित करबाक श्रेय एकर संपादक श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरकें जाइत छनि। एहि तरहें श्रीराजक 'वात्सल्य ' भेल पहिल प्रकाशित बीहनि कथा(2003) एहि बीच किछु आओर रचना आ आलेख छपल त' मुदा संपादकक अज्ञानता ,पुर्वाग्रह वा हठधर्मिताक कारणे उधारक, तथाकथित विधा लघुकथा नामे यथा-' नवतुरिया, कानपुर,मिथिलांचल संपर्क,दरभंगा,पल्लव नेपाल.. आदि। जुलाइ- 2010में डा.योगानन्द झाजीक संयोजन में कबिलपुर (दरभंगा) में भेल कथा गोष्ठी में उपस्थित छलाह मैथिली नवजागरणक अग्रदूत श्री गजेन्द्र ठाकुर। हमर बीहनि कथा पाठ पर हुनक प्रतिक्रिया छल-"बीहनि कथा, मैथिली कथा साहित्यक परिमार्जित,निश्शन आ समयानुकूल अवधारणा ऐछ!" एकरा सबलता देलक‌। तकर पछाति गजेन्द्र ठाकुरक संपादन मे प्रकाशित मैथिली इ पाक्षिक विदेहक (अंक 62,अगस्त2010)मे बीहनि कथा नामे छपल मुन्नाजीक रचना " निपुतराहा। (जे आब कथा रूपमें सेहो आबि गेल ऐछ) खूब चर्चित रहल। तकर पछाति विदेहक माध्यमे बीहनि कथा लेखक एकटा हुजुम ठाढ़ भेल। जाहि मे वर्तमान मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक योगदान अविस्मरणीय ऐछ। हुनक अतिरिक्त शेफालिका वर्मा,रविभूषण पाठक,उमेश मण्डल,बेचन ठाकुर, विनित उत्पल, रामविलास साहु,जगदानन्द झा मनु,कपलेश्वर राउत,अमित मिश्रा,संदीप साफी, आशीष अन्चिन्हार,डा.भवनाथ झा,जवाहर लाल कश्यप,मुन्नी कामत,चन्दन झा,बिन्देश्वर ठाकुर,ओम प्रकाश झा,मनोज कुमार मण्डल.....आदि रचनाकार बीहनि कथा विधा मे अपन उपस्थिति बनौने रहलाह। जाहि सं इ विधा सबल होइत रहल। बीहनि कथा मे सक्रिय सब रचनाकारक निरन्तर लेखनीक परिणाममे संग्रह सब आबय लागल।ऐ विधाक पहिल संग्रह देनिहार लेखक छथि-श्री जगदीश प्रसाद मण्डल।हिनकर ' तरेगण ' नामे अक्तुबर 2010मे बहरएल पहिल बीहनि कथा संग्रह।एखन धरि एकर तीन संशोधित संस्करण बहरा चुकल ऐछ।हिनक दोसर बीहनि कथा संग्रह छनि- " बजन्ता - बुझन्ता "(2013)तकर पछाति ऐ विधाक कतेको एकल संग्रह बहरएल।यथा- प्रतीक - मुन्ना जी,(2012), कपलेश्वर राउत,,संदीप साफी,राम विलास साहु(2013,).....आदि 2011मे ऐ विधाक एकटा महत्त्वपूर्ण उपलब्धि छल मुन्नाजीक एकल बीहनि कथाक पोस्टर प्रदर्शनी।जे आदरणीय कथाकार अशोक आ कमलमोहन चुन्नूजीक संयोजनमें भेल कथा गोष्ठी(पटना) में लगाओल गेल छल।जकर उद्घाटन वरिष्ठ कथाकार आदरणीय प्रदीप बिहारी आ श्रेष्ठ आलोचक,संपादक आदरणीय रमानन्द झा 'रमण' द्वारा कएल गेल छल। बीहनि कथाक दू टा महत्त्वपूर्ण कथाकारक पदार्पण 2014मे भेल। पहिल-आठम दशकक चर्चित आ वरिष्ठ कथाकार आदरणीय घनश्याम घनेरो,दोसर-नवतुरिया रचनाकार श्री विद्याचन्द्र झा बम-बम जीक। घनश्यामजी अपन चोखगर कलम आ फरिछएल विचारें जन जन मे बीहनि कथाक प्रति जिज्ञासा जगौलनि। आ लोकक ठोढ़ पर बीहनि कथा शब्द साटि सन देलनि।तकरे फलस्वरूप एलनि पहिल बीहनि कथा संग्रह-" उपरान्त "(2016) बम-बमजी अपन समतुरियाक अनेको अवरोध/बाधा सहि आत्मविश्वासक संग आगां बढ़ैत ऐ सात बरखमें करीब चारि सए सं बेशी रचना ऐ विधाक केलनि।जाहि में करीब 200 वा बेसी प्रेम परक रचना छनि।तीन गोट पोथी प्रकाशनक बाट जोहै छनि। 2015ई., मिसिदा आ कल्पना झा दुनू प्रबुद्ध रचनाकारक प्रवेश ऐ विधा में भेल।दुनू गोटे कतेको बाधक तत्व( लेखक) द्वारा बहटारल जेबाक पछातियो ऐ विधाक विकास मे अविस्मरणीय योगदान देलनि।मिसिदा,ऐ विधाक प्रत्येक रचना पर गहींर आ गम्भीर नजरिये पड़ताल करैत निछरल / निश्शन बनौलनि।कल्पनाजी,अपन फरिछएल आ निश्शन उपस्थिति दैत कतेको लेखिकाकें निर्देशित करैत सोझां अनलनि।हिनक बीहनि कथाक एकल सङोर सेहो अबैया छनि। इ वर्ष (2015) बीहनि कथा लेल ग्रह सं ग्रसित सन छल।जे वृहस्पति वा शनि बनि ठाढ़ छलाह स्वघोषित विद्वान कहेबाक भ्रम सं ग्रसित अग्रज कथाकार।हुनकर विक्षिप्तावस्था सं प्रभावित भ' कतेको रचनाकार बीहनि कथा सं स्वयंकें विलगा लेलनि।इ स्वघोषित विद्वान बीहनि कथाकें रोकबा लेल एकटा हिन्दी पत्रकारक आत्म संस्मरण( छात्र जीवनक प्रसंग)कें नकल करबा आ करेबा लेल अगिया बेताल भ' गेला।मुदा ओ कर्म (जाहिमें कु उपसर्ग लागल छल )के फल धुंआ- धुंआ भ' उड़ि गेल। आ ओ विद्वान आ हुनकर कृत्रिम अनुयायी सब प्रसन्न जे- " नै उठलह त' भारी लगलह ने " एहेन कुवृति सं प्रभावित भेलीह कोसिकन्हाक आंखिगर युवा लेखिका जे बीहनि कथा त' दुर जे साहित्यें सं दुर भ' गेलीह।आब इ विधा अपन रंगत पकड़ि लेने छल।चारु भ'र सबतुरिया लेखक ऐ विधा में तल्लीन भ' गेलाह।जे निस्वार्थ लेखन करथि से अटल आ डटल छथि।जिनका लाभक लोभ रहनि ओ द्वन्द में पड़ि आइयो ओझरएल छथि।ने घरकें ने घाटकें सन भेल बुझू। 2016मे नव प्रवेशी भेलाह-राजीव कर्ण,महाकान्त कामत,नीरज कर्ण,इन्द्रकान्त लाल, अरूण कुमार लाल हिनका सबहक प्रयास सं इ विधा आओर आगां बढ़ल। 2019मे मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित " अखिल भारतीय बीहनि कथा सम्मेलन" रचनाकारक दृष्टि फरीछ आ नव बाट पर चलबाक श्रेष्ठ साधनक रूपें सहयोगी भेल।ऐ आयोजनक पछाति ऐ विधाक रचना सृजनक उत्सुकतावश रचनाकारक एकटा हुजुम ठाढ़ भेल।एकर सब पक्षकें अकानैत डा.आभा झा,सोनी नीलू झा, धर्मवीर कुमार,सबिता झा सोनी,अमरेश चौधरी,सान्त्वना मिश्रा,डा.प्रमोद कुमार,मिन्नी मिश्र,डा.रॉबिन खान,पूनम झा,डा.कैलाश कुमार मिश्र,मोहन झा गगन,राम कुमार मिश्र, अमरकांत लाल, प्रभाष अकिंचन, विनीता ठाकुर,ज्ञानवर्द्धन कंठ,वीरेन्द्र झा,....आदि रचनाकार जुड़िकें/ जुटिकें एकर तत्कालीन स्थिति आ अस्तित्वकें आओर निश्शन ,फरीछ आ सुरेबगर बना आगूक बाट प्रशस्त केलनि।आब विश्व भरिमें पसरल मैथिल रचनाकार जन द्वारा सृजित आ चर्चित भ' रहल ऐछ। 2020 वैश्विक संकट सं दबल लोक घरे में बन्न रहि समय कटबा पर बाध्य छल।ओइ समयक उपयोग करैत ऐ विधाक रचना आ सृजनकर्ता दुनूक श्री वृद्धि एकरा आओर भरल-पुरल बनेलक। आनो विधाक सृजन आसान नै,मुदा विनाशक कोनो बन्हन नै रहला सं लिखबा में तर'दुत नै। बीहनि कथा में शब्द सीमा निर्धारित रहला सं एकर सृजन कने बेसी दुरूह। एको टा अतिरिक्त शब्द भात में आंकड़ सन।तें ऐ विधा में उएह ठठै,बढ़ै छथि जे अपनाकें परिश्रम बलें एकर विधानक योग्य स्वयं के सधबा में सक्षम होइ छथि।दोसर महत्त्वपूर्ण बात जे ऐ विधा लेल मंच पर स्वतंत्र रूपें एखन जगह खतियाओल नै छै।जाहि सं मंच,माला,माइक,धोती,तौनी,लिफाफ सनक लाभक लोभ निर्लोभ में परिवर्तित।जाहि कारणे इ विधा एखन निश्शन भ' उच्च मानकताक संग आगू बढ़ि रहल।ओना आगू दसगरदा भेने इहो ओहोन रोग सं ग्रसित भ' जएत से असंभव नै। 2020 ,घरे मे रहू।के आह्वान बीहनि कथा विधा लेल सकारात्मक रहल।ऐ बीच नव आंखि-पांखि बला रचनाकारक प्रवेश भेल जेना कि-अभिलाषा मिश्रआकांक्षा,रूचि स्मृति,सुभाष कामत,गुफरान जिलानी,कंचन कंठ,कुंदन कर्ण,चन्दना दत्त,प्रियंवदा तारा झा,अनिता मिश्र,इरा मल्लिक,कल्पना झा पटना,कल्पना झा बोकारो। कुल मिला क' कुशल / साधल रचनाकारों संग नव सिखुआ रचनाकारक उपस्थिति आ रचनात्मक सक्रियता सुखद भविष्यक संकेत ऐछ।ऐ बीच मोकामक बाटकें आओर सघन सबल बनेबा में दि जिनकर उल्लेखनीय योगदान रहलनि ओ दू टा प्रमुख नाम ऐछ- डा. आभा झा, दिल्ली आ डा.प्रमोद कुमार, पांडिचेरी।जकर बानगी ऐछ 2020ई.क अन्तमें आयल डा.आभा झाजीक बीहनि कथा संग्रह-" सिनेहक दाम आ डा.प्रमोदजीक "कनकिरबा" बीहनि कथाक बढ़ैत डेग आ विकास वा पसारक क्रमकें किछु निश्शन संपादक, लेखक, आलोचकक उपस्थिति सुखद ऐछ! आदरणीय डा. रमानन्द झा रमण,आ उदयचन्द्र झा विनोदजीक समीक्षकीय विचार आ आदरणीय सतीरमण झा,रेवती रमण झा एवं डा. नारायणजीक प्रायोगिक रूपें ऐ विधामे उपस्थिति ऐ विधा,रचना आ रचनाकार सबकें सबलता देबा में अग्रसर भेल।बीहनि कथा विधाकें स्थापनामें प्रत्यक्ष/परोक्ष रूपें सहयोगी सब रचनाकारक कें शुभकामना! आशीष अनचिन्हार जातिवादी राजनंदन लाल दास बनाम दूधसँ धोल आन लोक (एहि लेखमे राजनंदनजी आ कर्णामृतक अतिरिक्त आन संदर्भक प्रयोग मात्र उदाहरण लेल आ वर्तमान समयकेँ बेसी स्पष्ट करबाक लेल अछि। एकर अतिरिक्त एहि उदाहरण सभहक कोनो आन अर्थ नै) मैथिलीमे प्रगतिशील मूल्यबोध, मानवीय गुण आ वैचारिकतासँ भरल एकटा पत्रिका अछि "अंतिका" जकर संपादक छथि गौरीनाथ (मैथिलीमे गौरीनाथजीक पहिलुक नाम अनलकांत छलनि)। अंतिका केर पाठक सेहो एहि पत्रिकाक प्रगतिशीलताक वंदना करै छथि। मुदा जखन गौरसँ देखबै तँ अंतिकाक अधिकांश अंकमे "भाजपा सरकार" केर विज्ञापन देखाएत। एकर मतलब जे अंतिका चलेबाक लेल संपादककेँ भाजपा सरकारक मदति भेटैत रहलनि अछि (विज्ञापन रूपमे)। वएह भाजपा जकरापर धर्मक राजनीति करबाक आरोप छै, दंगा करबाक आरोप छै । जकर विधायक-लोकसभा सदस्य सभपर बलात्कारक आरोप छै आदि..आदि। तँ एहि ठाम ई प्रश्न उठैत अछि जे तखन अंतिका प्रगतिशील मूल्यबोध, मानवीय गुण आ वैचारिकतासँ भरल पत्रिका कोना भेल? एहि पत्रिकामे प्रकाशित होमए बला लेखक सभकेँ प्रगतिशील कोना मानल जाए? एहि पत्रिकासँ जुड़ल लेखक सभकेँ पारंपरिक, गतिहंता ओ जड़ किएक ने मानल जाए? आखिर एकै पत्रिका, एकै संपादक ओ एकै लेखक सभमे एहन द्वैध किएक छनि? कोनो पार्टीक समर्थक हएब खराब नै (चाहे ओ भाजपे किएक ने हो) मुदा ताहि लेल ढोंग, पाखंड एवं घोघ केर कोन जरूरति छै? विदेहक ई अंक राजनंदन लाल दासजीपर केंद्रित अछि आ हमहूँ राजनंदनेजीपर आलेख लिखबा लेल बैसल छी। आ तँइ पाठककेँ कठाइन लगतनि जे हम राजनंदनजीक बदला अंतिका केर किएक चर्चा कऽ रहल छी। तँ साहेब बात एहन छै जे कलकत्ता केर "कर्णगोष्ठी" नामक संस्था "कर्णामृत" पत्रिका शुरू केलक आ ओकर संपादनक बेसी भार राजनंदनजीकेँ हिस्सामे पड़लनि (शुरूआतमे कर्णामृतक संपादक अर्जुन लाल करण छलाह)। आ अही संग मैथिलीक प्रगतिशील सभ राजनंदनजीकेँ जातिवादी आ कर्णामृतकेँ जाति विशेषक पत्रिका घोषित कऽ देलकै। बादमे वएह प्रगतिशील लेखक सभ अंतिका एहन प्रगतिशील आ मानवीय गुण (भाजपे जकाँ) केर प्रतिनिधि बनि छपैत रहलाह। "कर्णगोष्ठी" निश्चित रूपसँ जाति केंद्रित संस्था छै मुदा "कर्णामृत" कोना जातिवाचक भेलै से एखन धरि हमरा बुझबामे नै आएल। आ जे समाज आइ कर्णामृतकेँ जातिपर आधारित कहि रहल छै काल्हि वएह समाज भारती-मंडन नामक पत्रिकाकेँ सेहो जाति वा व्यक्तिपरक पत्रिका कहि सकैए। मुदा नै, ई कथित प्रगतिशील सभ भाजपा समर्थित पत्रिका ओ आन पत्रिकाकेँ प्रगतिशील कहि देता आ कर्णामृतकेँ जातिवादी पत्रिका। आखिर से किएक? कर्णामृत पत्रिका ओ संपादक राजनंदन लाल दासकेँ जातिवादी रूपमे स्थापित करबामे कलकत्तेक किछु पाठक ओ लेखक केर हाथ लगैए। ओ लेखक जिनका राजनंदनजीसँ मोन नै मिललनि से यत्र-कुत्र राजनंदनजीकेँ जातिवादी स्थापित करबामे लागि गेलाह। कलकत्ताक किछु पाठक कथित प्रगतिशील पत्रिका ओ कथित प्रगतिशील लेखक सभहक प्रसंशामे फोनसँ लऽ कऽ सोशल मीडिया धरिमे आफन तोड़ै छथि मुदा राजनंदनजीक प्रसंगमे मौन रहै छथि। मंडन मिश्र आ हुनक संस्कृतक पोथी मिथिलाक भऽ गेल मुदा कथित प्रगतिशील सभ लेल श्रीधर दास आ हुनक रचना "सदुक्ति कर्णामृत" मिथिलाक नै बल्कि एकटा जातिक भऽ गेल। कर्णामृत नामक प्रश्नक उत्तर एही "सदुक्ति"मे भेटत। मैथिलीमे जँ कोनो लेखक कमजोर रचना करै छथि तँ ओकर बचावमे तर्क दै छथि जे "बड़दक दाम बड़दे कहतै" तखन फेर कर्णामृतक दाम बेरमे ओहि पत्रिकाकेँ किएक ने बाजल देल जाइत छै? ओहि कालमे तँ मात्र प्रकाशक ओ संपादक केर नाम देखि ओकरा जातिवादी घोषित कऽ देल गेलै। हम कथित प्रगतिशील लेखक सभकेँ चैलेंज दैत छियनि जे ओ कर्णामृतक हरेक अंक लेथि आ ओहिमे प्रकाशित लेखक केर जातिक विवरण देथि आ तकर बाद एहि पत्रिका-संपादकपर आरोप लगाबथि। आ जँ से नै कऽ सकथि तँ चुप रहथि कारण कोनो रूपमे कियो मैथिलीक काज कऽ रहल छै। राजनंदन लाल दास जातिवादी छलाह वा कि कथित छद्म प्रगतिशील सभ अपन झरकल मूँह झँपबाक चक्करमे हुनका जातिवादी बना देलक एहि प्रश्नक उत्तर भविषयमे जरूर ताकल जाएत। निच्चामे एकटा फोटो मात्र उदाहरण लेल देल गेल अछि। गजलक रखबार सूतल अछि 1 मैथिलक बड़ हितैषी बनल मैथिलीक सोधनिहार छथि 2 उपरक दू पाँति बैकुंठ झा रचित छनि। बैकुंठ झा मूलतः लघुकथाकार छथि। मुदा हुनका लघुकथा लिखबाकजरूरते किए पड़लनि जखन कि मैथिलीमे कथा नामक विधा छलैहे। आब बैकुंठजी हमरा बहुत रास बात कहता (मने कथा ओ लघुकथाक संदर्भमे), बहुत रास अंतर देखेताह। बिसरि जाइत छथि जखन कि ओ गजल विधामे प्रवेश करै छथि आ गीत-ओ कविताक उपर गजलक लेबल लगा लै छथि। जतबे अंतर कथा आ लघुकथामे भऽ सकैए ततबे अंतर गीत-कविता ओ गजलमे छै। जँ लघुकथाक नियम छै तँ गजलक नियम सेहो छै मुदा बैकुंठजी लघुकथा बेरमे तर्क देता मुदा गजल बेरमे कुतर्क से हमरा विश्वास अछि। 3 "रखबार" नामसँ एकटा कथित गजल संग्रहक आएल अछि जकर लेखक बैकुंठ झा छथि। एहि पोथीक समर्पण एवं भूमिका दूनू पद्येमे अछि जे की नीक लगैत अछि। समपर्णसँ ई पता लगैए जे मैथिलीपुत्र प्रदीपजी पहिल संसर्ग बैकुंठजीकेँ भेटलनि आ भूमिकासँ ई पता चलैए जे बैकुंठजी भ्रम आ पूर्वाग्रह दूनूमे फँसल छथि आ हुनकर रचना सभमे व्याकरणिक स्थिति छनि से हुनको नै पता छनि। चारि पाँति देखल जाए-- ..मात्राक खाँच-साँचमे कसल-फँसल नहि होय गजल अछि से संभव शिरोधार्य सब समालोचना करब ग्रहण अथवा बुझना जाय गजल यदि छंद वितानमे खुटेसल ओहो नहि सायास भेल अछि सहजहिं भेलय शब्दांकन.. एहि केर बाद आरो-आरो तर्क (??) सभ पद्येमे देल गेल अछि। 4 अतेक तँ निश्चित जे बैकुंठजीकेँ गजलक व्याकरण पता नै छनि (अथवा ओ पूर्वाग्रहक कारणे जानए नै चाहै छथि अथवा डर छनि जे सही चीज मानि लेलासँ हुनकर पचासो बर्खक तपस्या खंडित भऽ जेतनि) मुदा जे लोक मात्रिक छंदक अभ्यास केने छथि हुनकर रचना गजलमे बहरे मीरक नजदीक जा सकैए। हम मात्र नजदीक कहि रहल छी पूरा नै। आ हम बैकुंठजीकेँ जतेक जानै छियनि ताहिमे ओ मात्रिक छंदक नीक अभ्यासी छथि। तँइ हुनकर रचना सभमे मात्राक अंतर कम्मे छनि मुदा तैयो मूल अंतर संयुक्ताक्षर एवं चंद्रबिंदु बला अक्षर सभ छै। जाहि कारणसँ प्राचीन मैथिलीमे संयुक्ताक्षर बला नियम हटाएल गेल रहै तकरा सभ बिसरि गेल छथि आ धड़ल्लेसँ संस्कृतक शब्द प्रयोग कऽ रहल छथि। एहन स्थितिमे अहाँ कि हम लाठी हाथे संयुक्ताक्षर बला नियम मानू वा कि नै मानु मुदा उच्चारणमे, आवृतमे ओ नियम अपने आबि जाइत छै। ओहिपर केकरो वश नै छनि। तँइ हम सभ संयुक्ताक्षर बला नियम मानि रहल छी आ जे भाषाक जानकार हेता आ जिनका रचना संग भाषोक संरक्षण करबाक हेतनि से एहि नियमकेँ मानताह। चंद्रबिंदु बला प्रसंगमे मैथिलीमे अराजकता पसरल अछि। पं.दीनबंधु झाजी (मिथिला भाषा विद्योतनमे) चंद्रबिंदुयुक्त अक्षरकेँ दीर्घ मानै छथि जे कि चलि पड़ल मुदा पं. गोविन्द झा “मैथिली परिचायिका” केर पृष्ठ 20पर लिखै छथि जे “अनुस्वार भारी होइत अछि आ चंद्रबिंदु भारहीन” तकरा जनबाक बेगरता मैथिलीक विद्वान सभकेँ नै बुझेलनि। चंद्रबिंदु भारहीन मने लघु होइत छै। ई तथ्य जानब उचित हेतनि बैकुंठ जी लेल। तँइ हम ई कहि सकैत छी जे बैकुंठजीक रचना सभ बहरे मीरक संरचनामे होइत-होइत रहि गेल अछि आ स्पष्ट ओ गजल नै अछि। एहन स्थितिमे आब हम रचनामे भाव ओ वैचारिकत देखब। रचनापर बात करैत काल हम बेसी उदाहरण नै देब। पाठक पोथी कीनथि आ ओहि उदाहरण सभकेँ पढ़थि आ जानथि से हमर उद्येश्य अछि। 5 एहि पोथीक पहिल रचना भक्तिपरक अछि आ ई कोनो खराप बात नै छै। प्रगतिशीलता केर माने बहुत किछु होइत छै। मात्र परंपराकेँ छोड़ए बलाकेँ प्रगतिशील नै मानल जा सकैए। आ ठीक इएह बात बैकुंठजी अपन तेसर रचनामे देने छथि। अहिंसक बंसी विरल प्रतीक अछि एकर स्वागत हेबाक चाही। तेनाहिते साँपक जासूस मूस ईहो विरल प्रतीक अछि। हिनकर वैचारिकतामे विरोधाभास सेहो छनि। उदाहरण लेल दू रचनाक दू-दू पाँति देखू— अगर उठौलक कियो सवाल भौं-भौं-खौं जवाबमे भेल फेर आन दोसर रचनामे कहै छथि- ढेप फेकि गाड़ल झंडापर तों नहि नमहर भ जएबें मान तहन बढ़तौ ओहू सँ झंडा ऊँच गाड़ पहिने स्पष्ट भऽ गेल हएत जे हमर इशारा किम्हर अछि। 6 मैथिलीमे जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानै छथि ताहि लिस्टमेसँ किछु एहन नाम छथि जिनका गजलपर एबामे बेसी मेहनति नै करए पड़तनि। जेना सुधांशु शेखर चौधरी, नरेन्द्र, बाबा बैद्यनाथ, अरविन्द ठाकुर आब एहि लिस्टमे बैकुंठ झा सेहो छथि। सुधांशु शेखर चौधरी बहुत पहिने एहि संसारसँ चलि गेलाह तँइ ओहिपर बात नै हो। नरेन्द्रजी पूर्वाग्रहमे छथि तँइ ओ आगू नै जा सकताह। बाबा बैद्यनाथजीक गजल संग्रह आलोचना हम 2013 मे केने रही। ओ आहत भेल रहथि आ हमर बातक पुष्टि लेल ओ हिंदी गजलकार सभ लग गेल रहथि। जखन ओत्तहु पता लगलनि जे बिना बहर-काफियाक गजल नै होइत छै तखन ओ बहरक अभ्यास केलाह आ हिंदीमे लगभग सात-आठ टा गजल संग्रह प्रकाशितो भेलनि। मुदा दुर्भाग्य मैथिलीक जे ओ ओतेक मात्रामे मैथिली गजल सिखलाक बाद नै लिखलाह। अरविन्द ठाकुर साफे कहै छथि जे अइ उम्रमे सीखब पार नै लागत। कुल मिला कऽ भाव केर हिसाबसँ देखल जाए तँ निश्चिते ई पोथी पाठककेँ पढ़बाक चाही। भूमिका एक: फाँक अनेक (आलोचना) 1 लूरि किछुओ सीख ले नहि सदति अंदाज कर (शाइर-बाबा बैद्यनाथ, मात्राक्रम-2122-212) रचनाकारक तौरपर हम ई मानै छी जे कोनो रचना नीक-खराप भऽ सकैए मुदा एकटा विचारक केर तौरपर हम ईहो मानै छी जे खराप रचनाकेँ येन-केन-प्रकारेण "नीक" साबित करबा उद्योग अंततः रचनाकारक पतनक पहिल सीढ़ी बनैए आ साहित्यक पतन केर सेहो। 2 कथित गजल संग्रह (जे बिना बहर-काफिया केर हो) आब हमरा प्राप्त नै होइए। बहुत रास प्रकाशकीय-लेखकीय निर्देश अनचिन्हारक नामपर देल गेल छै से हमरा बुझाइए (एकर अपवाद सेहो छै) आ तँइ कमल मोहन चुन्नू जीक कथित गजल संग्रह "आबि रहल एक हाहि" केर भूमिका फोटो रूपमे प्राप्त करबाक जोगाड़ हमरा करए पड़ल। एहि ठाम रचनाकार खुश भऽ सकै छथि जे हम एतेक प्रतापी जे हमरा `कियो "इग्नोर" नै कऽ सकल मुदा हुनका शायद ई पता हेतनि जे एहि पाँतिक लेखक केकरो इग्नोर करिते नै छै। कहियो-कहियो आलस आबि जाइए तँ वरिष्ठ सभ कहि दै छथि जे जाहि विधामे छी ताहि विधाक मामूलियो बातकेँ नोटिस लेबाक चाही आ तकर बाद फेर मोन बनि जाइत छै आ तकरे परिणाम अछि ई आलेख (सीधा बात जे ओ सभ हमरा इग्नोर करताह मुदा हम हुनका सभकेँ इग्नोर नै करबनि)। हमर प्रयास रहैए जे मामूलियो बातक मंथनसँ हम साहित्य केर हित कऽ सकी। आ अही कारणसँ मात्र 13 बर्खमे बिना कोनो मंच बिना कोनो फंडकेँ मैथिली गजलमे एकटा एहन विमर्श शुरू भेलै जकरासँ बचि निकलबाक कोनो साधन आब किनको लग नै छनि। अन्यथा मैथिली गजलमे कियो चालिस, कियो पचास बर्खसँ छथि मुदा गजलक लक्ष्य हुनका सभसँ दूर भऽ गेल छनि। 2008 ई.सँ पहिने जे सभ गजलमे सुखासनमे छलाह से सभ आब शीर्षासनमे लागल छथि। लोक केकरो नाम लीखथु वा कि नै नै लीखथु ,बाजथु वा कि नै बाजथु मुदा 2008 क बाद बला एहि विमर्शक पहिचान वाटरमार्क रूपमे हुनकर लीखल -बाजल हरेक पाँतिमे भेटत। कुल मिला कऽ बात ई जे आब हम चुन्नूजीक कथित गजल संग्रहक भूमिकापर बात करब। ई भूमिका पृष्ठ 9 सँ लऽ कऽ 18 धरि अछि। एहि भूमिकामे सेहो 2008 क बाद बला विमर्शक पहिचान वाटरमार्क रूपमे भेटत। 2008 मे मैथिली गजल के पहिल आ एखन धरिक अंतिम शोध ब्लाग "अनचिन्हार आखर" केर निर्माण भेल छल जे एखनो एक्टिभ अछि। राणा प्रताप नहि अकबर नहि असगर चेतक सुल्तान बढल (शाइर-राजीव रंजन मिश्र, मात्राक्रम-22-22-22-22) 3 गजल लिखबासँ पहिने चुन्नूजी नाटक विधामे महारत (अइ महारत शब्दकेँ सर्टिफाइ नाटक विधाक लोक करताह) हासिल केने छथि आ ओहिमे बहुत रास आलोचना-समीक्षा लिखने छथि। संभवतः निनाद आ रंगमंच कहि हुनकर नाटक आलोचनापर दू टा पोथी आएलो छनि। आनो विधापर आलोचना लिखने हेता से हमरा विश्वास अछि। विश्वासक कारण ई जे मैथिलीमे सभा-संस्था वा कि विद्यालय-विश्वविद्यालय बला सभ बाइ-डिफाल्ट विद्वान होइ छथि। एहन अवस्थामे चुन्नूजी सेहो विद्वान हेबे करताह। मुदा हमर सौभाग्य देखू जे आन विद्वानसँ अलग चुन्नूजी साहसी लोक छथि। साहस केर संदर्भ ई जे चुन्नूजीमे शायद अपनाकेँ खारिज करबाक, अपन लिखलकेँ खारिज करबाक साहस छनि। पद पराक्रम मुखर के कहत की कहू दंभ अछि बड़ सुघड़ मुग्ध दरबार सब (शाइर-विजयनाथ झा, मात्राक्रम-212-212-212-212-212) 4 पृष्ठ-10 पर चुन्नू जी अपन रचनाक अप्रत्यक्ष रूपें स्वमूल्यांकन करैत लिखैत छथि जे "बड़दक दाम बड़दे कहत" आ से लीखि ओ अपन लीखल हरेक आलोचनाकेँ ओ खारिज कऽ देलाह। निनाद आ रंगमंच नामक हुनक पोथी नाटक आलोचनापर छनि आ जँ हुनकर वर्तमान मतकेँ (गजल बला) देखल जाए तँ साफे मतलब छै जे नाटक अपन बात अपने कहतै एहि लेल चुन्नूजी सहित आन कोनो लोकक जरूरति नै छै। चुन्नूजी जे लिखलाह तकर साफ-साफ मतलब छै जे ओ अपने (चुन्नूजी) जाहि-जाहि रचना-पोथीपर आलोचना लिखने हेता से रचना-पोथी सभ ततेक बौक रहल हेतै जे ओकरा बाजए लेल चुन्नूजीक सहारा लेबए पड़लै। से आब ओहन लेखक सभ जानथि जिनकर रचना-पोथीपर चुन्नूजी आलोचना लिखने छथिन। जिनकर रचनापर चुन्नूजी लिखने छथिन जँ हुनका बुझाइत छनि जे चुन्नूजीक उपरक देल विचार गलत छनि तँ आगू आबि चुन्नूजीक विचारकेँ गलत कहथि। समयक फेर छै आ तँइ रहीमक हीरा एखनो धरि अपन मोल नै कहि सकल अछि मुदा चुन्नूजीक बड़द अपन दाम कहि रहल छै। संगे-संग हम ईहो बात कहब जे चुन्नूजी द्वारा भविष्यमे लिखल गेल कोनो आलोचना-समीक्षा (भूमिका रूपमे सेहो), आलेखपर सेहो उपरक बात लागू हएत। भविष्यमे जाहि लेखक केर रचनाक उपर चुन्नूजी लिखता तिनका बारेमे ई मानि लेल जेतनि जे हुनकर रचना बौक छलनि तँइ आलोचकक जरूरति पड़लै। विरोधाभास एहन जे अही पृष्ठपर आगू चलि चुन्नूजी लीखि रहल छथि जे "..तें हम अपन गजलक मादे अपनहि किछु नहि कहब"। एकर मतलब साफ छै जे या तँ ओ अपने दाम कहताह वा हुनकर बड़द दाम कहतनि, तेसर कियो नै कहि सकैए। माने जँ हुनकर बड़द अपन दाम नै कहलकनि तैयो ओ कोनो बड़द विशेषज्ञकेँ नै बाजए देताह। जँ बड़द रचना भेल तँ बड़द विशेषज्ञ आलोचक भेलाह। चुन्नूजी अपन लिखल आलोचनाकेँ खारिज कऽ सकै छथि मुदा ओ बहुत महीन रूपसँ नैरेटिभ बना कऽ मैथिलीमे आलोचना विधाकेँ मारबाक जे खडयंत्र केलाह अछि से आपत्तिजनक बात अछि। लेखके नै मैथिलीक आलोचको सभकेँ एहि बातक धेआन रखबाक चाही। सोचियौ खाली चुन्नुए जीक बड़द किए दाम कहतै, सभ लेखक केर बड़द दाम कहतै ने। जेना चुन्नूजी इशारामे विशेषज्ञ केर निषेध करै छथि तेनाहिते दोसरो करतै। एहन स्थितिमे आलोचना विधा रहतै कतए से सोचू। तँइ हम कहलहुँ जे चुन्नूजी बहुत महीन रूपसँ मैथिलीमे आलोचना विधाकेँ मारबाक खडयंत्र केलाह अछि। ई खडयंत्र हम किछु आलोचक जेना भीमनाथ झा, अरविन्द ठाकुर, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, कैलाश कुमार मिश्र, प्रदीप बिहारी, नारायणजी, केदार कानन, विद्यानंद झा, कुणाल, कमलानंद झा, किशोर केशव आदिक सामने स्पष्ट कऽ रहल छी। ओना ई बाध्यता नै छै जे एहि ठाम किनको टिप्पणी करहे पड़तनि। कारण हमर मानब अछि जे सभहक अपन सीमा ओ सुविधा छै। जहिया जिनका जेहन सुविधा बुझेतनि ताहि अनुरूपे ओ अपन विचार व्यक्त करताह। बहुत संभव जे किछु लोक भविष्येमे जा कऽ एहिपर टिप्पणी करथि। हमर काज छल एहि खडयंत्रकेँ सामने आनब आ एकर विरोधमे पहिल पाँति लीखब से हम केलहुँ। त्वरित टिप्पणी आ भविष्यमे जा कऽ लिखल टिप्पणी दूनूक अपन मेरिट-डिमेरिट छै। एहि प्रसंगमे जेना-जेना समय बीतैत चलि जेतै तेना-तेना आलोचक सभहक अपने लिखल आलोचना एहि घटनापर प्रश्न पुछतनि। आ तहिया बहुत बिखाह भऽ कऽ पुछतनि। तँइ सुविधा आ नैतिकता दूनूमेसँ जकर पलड़ा भारी हेतै ताहि अनुरूपे आलोचक सभ एहि घटनापर अपन विचार जरूर देताह से हमरा विश्वास अछि। जे आलोचक चुन्नूजीक बातसँ सहमत छथि से अपन लीखल आलोचनाकेँ अपनेसँ खारिज कऽ रहल छथि। आ से खारिज ओ चुन्नूजी जकाँ साहसक संग करथि तँ बेसी नीक। लोक कतबो हुए जोरगर अन्तमे सभ नचरि जाइए (शाइर-जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल', मात्राक्रम-212-212-212) 5 पृष्ठ-11 पर चुन्नूजी लिखैत छथि जे एक संप्रदाय व्याकरण छंद अक्षुण्ण रखबाक समर्थक छथि चाहे कथ्य विचार आदि चोटलग्गू किएक ने भऽ जाए। मुदा चुन्नू जी अपन बातक पुष्टि लेल एकौटा उदाहरण चाहे गजल कि शेर रूपमे नै राखि सकल छथि। जखन कि बिना व्याकरण-छंद (बहर-काफिया-रदीफ)क गजल नै होइत छै ताहि लेल अनेक उदाहरण रचनाकारक नाम सहित छांदिक संप्रदाय द्वारा देल गेल छै। जँ चुन्नूजी आ हुनकर विचार सही छनि तखन उदाहरण देबामे डर कथिक? जँ कोनो गजल बहर-छंदमे छै मुदा ओ निरर्थक अक्षरक समूह छै तँ ओ उदाहरण सहित जनताक सामनेमे रखबाक चाही चुन्नूजीकेँ। चुन्नुएजी नै हरेक बेबहर कथित गजलकार सभ ई कहने फीरै छथि जे बहर-काफियासँ कथ्य कमजोर भऽ जाइत छै मुदा ओहो सभ कोनो उदाहरण एखन धरि नै दऽ सकल छथि। एकर साफ मतलब भेल जे बहर-काफिया माने असल गजल सभ मजगूत अछि आ बेबहर कथित गजलकार सभ मात्र ढेप फेकि अपनाकेँ ओ अपन गुटकेँ खुश कऽ लै छथि। लोक कहि सकै छथि जे चुन्नूजी अपन गजलक अग्रसारण लेल ई भूमिका लिखलाह तँइ उदाहरण देब उचित नै। मुदा जँ भूमिकामे विधापर बात हो (कोनो रूपमे) तँ ओ अग्रसारण नै रहि जाइत छै आ विधापर बात जँ संदर्भहीन हो तँ ओ उचित नै। कविवर सीताराम झाजीक वैचारिकता बहरक पालनसँ नै टूटै छनि, योगानंद हीरा, जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' जीक नै टूटै छनि, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी सहित आन केकरो वैचारिकता बहरसँ नै टूटै छै मुदा चुन्नूजीक टुटि जाइत छनि तँ एकर मतलब ई भेल जे चुन्नूजीमे गजल कहबाक / लिखबाक क्षमता नै छनि। अरे भलेमानस बाबू, कमसँ कम औपचारिकतोवश कोनो गजल, कोनो शेर दऽ कहू जे एहिमे बहर छै आ बहरक कारण अर्थ नै छै। हम सभ मानि लेब। अथवा ईहो कहि दियौ जे ई गजल वा ई शेर हमरा बुझबामे नै आएल। हम सभ ईहो मानि लेब। चुन्नूजी हमर एहि आग्रहकेँ चैलेंज बूझथि। असल बात ई जे मैथिलीक किछु लेखक अपन कमजोरीकेँ पूरा मैथिली साहित्य / पूरा विधाक कमजोरी बना देबाक सफल अभियान चला लेने अछि। केकरो पाँच सए पन्ना नै लीखल होइत छै तँइ ओ गोलौसी कऽ पचास पन्नाक उपन्यासक सरदार बनि जाइए। केकरो बहर नै सीखल होइत छै तँ वैचारिकताक नाम दऽ गजलमे बहरकेँ बेकार कहि दैए। मैथिली साहित्य केर असल बेमारी इएह आ एहने लेखक सभ अछि। भाषण आमो पर दै छै थुर्री लताम बला लोक (शाइर-प्रदीप पुष्प, मात्राक्रम-22-22-22-2) 6 पृष्ठ-11 पर चुन्नू जी फेर लिखैत छथि जे "मैथिली गजलक संदर्भमे दूटा तत्व सदित चर्चामे रहल अछि। हमरा बुझने ओ दूनू तत्व अछि गजलक वैधानिकता आ गजलक वैचारिकता।" आब कने एहि बातक तहमे जाइ। कुल मिला कऽ मैथिलीमे गजल विधा लगभग 115 बर्खसँ अछि मुदा एहिपर विमर्श???????? चुन्नूजी जाहि हिसाबें लीखि रहल छथि ताहि हिसाबें गजलक विमर्श सेहो 115 बर्खक वा तकर आपस-पासक हेबाक चाही। मुदा ई विमर्श कहियासँ छै से चुन्नूजी नै कहि रहल छथि। नै कहबाक कारण हुनकर कोनो गु्प्त एजेंडा बुझाइए। जँ मैथिली गजलक विमर्शकेँ देखल जाए तँ 1981 मे तारानंद वियोगी जी द्वारा आलेख लीखि एकर शुरूआत भेलै। ओ आलेख केहन छलै से बादक बात मुदा शुरूआत ओहीठामसँ भेलै। पहिने तँ गजलक वैचारिकते केर विमर्श भेलै बादमे 1984मे डा. रामदेव झा जी वैधानिक आ वैचारिक दूनू रूपसँ गजलक विमर्शकेँ नव मोड़ देलाह। आब एहि ठाम अहाँ सभ लग प्रश्न उछाल मारैत हएत जे आखिर चुन्नूजी कोन एजेंडा छलनि? हमरा बुझाइए जे ओ तारानंद वियोगीजीक काजकेँ खारिज करबाक लेल जानि-बूझि कऽ "सदति" शब्दक प्रयोग केलाह अछि। हमर अनुमान निराधार नै अछि आ एहि लेल हम गजल विमर्शक प्रगति कार्ड देखाएब। 1981 सँ शुरू भेल विमर्श कहाँ धरि पहुँचल अछि से देखेबाक लेल हम मैथिली गजल विमर्शकेँ दू खंडमे बाँटब पहिल 1981 सँ लऽ कऽ एखन धरिक विमर्श जे कि मुख्यधाराक कथित गजलकार द्वारा भेल आ दोसर 2008 सँ लऽ कऽ "अनचिन्हार आखर" द्वारा विमर्श। मैथिली गजलकेँ दू खंडमे बँटबाक मूल संकल्पना गजेन्द्र ठाकुरजीक छनि ( देखू हिनकर लिखल गजल शास्त्र)। उपरमे ई निश्चित भेल जे 1981 सँ शुरू भेल अछि तँ 2021 धरि मात्र 40 बर्खक भेलैए आ एहि 40 बर्खमे कथित गजलक उपर बेसीसँ बेसी 20-22 टा आलेख आएल सेहो अधिकांशतः पोथीक भूमिका रूपमे। सोचियौ 40 बर्खमे जाहि विमर्शक शुरूआत वियोगीजी केलाह आ ओ विमर्श अतबो नै छै जे लोक ओकरा बिसरि जाए। बेसी मात्रा रहै छै तखन कने हौच-पौच हेबाक संभावना रहैत छै मुदा 40 बर्खमे कथित गजलक उपर मात्र 20-22 टा आलेख आएल छै आ सेहो चुन्नूजीकेँ मोन नै छै ,ई कोना संभव हेतै। तँइ हमर मानब अछि जे चुन्नूजी "सदित" शब्दक प्रयोग तारानंदजीकेँ कात करबाक लेल केलाह। जँ "अनचिन्हार आखर" बला 13 बर्खक विमर्श देखब तँ लगभग 38-40 टा आलेख (ई आलेख सभ आन रचनाकारक पोथीपर आ गजलक विभिन्न पक्षपर आएल अछि जे कि दू टा स्वतंत्र पोथीमे सेहो संकलित भेल), गजल व्याकरणक मैथिलीकरण आ इतिहास आदि आएल। जँ एहि 13 बर्खमे आएल गजलक पोथीक भूमिकाकेँ जोड़ल जाए तँ आलेखक संख्या 50क पार पहुँचत। विमर्शसँ अलग गजल लेखन केर बात करी तँ एकरो हम दू खंडमे बाँटब पहिल 1905 सँ लऽ कऽ एखन धरिक गजल लेखन जे कि प्रारंभिक गजलकार आ मुख्यधाराक कथित गजलकार द्वारा भेल आ दोसर "अनचिन्हार आखर" द्वारा 2008 सँ लऽ कऽ एखन धरिक। पहिल खंडमे 1905 सँ लऽ कऽ एखन धरि लगभग 3000 (अधिकतम) कथित गजल लिखाएल अछि (जाहिमे पं.जीवन झा, कविवर सीताराम झा, मधुपजी, योगानंद हीरा, विजयनाथ झा, जगदीश चंद्र ठाकुर 'अनिल' आदिक गजल पूर्ण रूपेण बहर-काफिया युक्त अछि मने व्याकरण सम्मत आ बाँकी सभ अपन गीतक उपर गजलक शीर्षक लगेने छथि) जखन कि "अनचिन्हार आखर" बला 13 बर्खमे लगभग 32-33 टा नव गजलकार एलाह जाहिसँ लगभग 5000 गजल, 38-40 टा आलेख, गजल व्याकरणक मैथिलीकरण आ इतिहास, गजलक नव-नव उपविधा जेना बाल गजल, भक्ति गजल तकर परिभाषा, लगभग 200 बाल गजल, 100 भक्ति गजल सहित सैकड़ो मात्रामे रुबाइ, कता, नात, दू टा आलोचनाक स्वतंत्र पोथी आदिक रचना भेल। एहि 13 बर्खमे आएक अधिकांश गजल, बाल ओ भक्ति गजल सहित कता-रुबाइ विभिन्न पोथीमे सेहो संक्ति भेल अछि। एहिमे किछु पोथी प्रिंटमे अछि तँ किछु ई-भर्सन रूपमे। ओना साहित्यिक बेपारी सभ पोथीक डिजिटल रूपमे नै मानै छथि मुदा बेपारीकेँ ज्ञानसँ नै टकासँ मतलब होइत छै। जाहि समाजमे पाथरपर लीखि, ताड़पत्रपर लीखि, अथवा श्रुति परंपरोसँ ज्ञान बचेबाक प्रयास भेल हो ताही समाजमे मात्र पुरस्कार लेल प्रिंट बला चीजकेँ किताब मानब अधोगतिक लक्षण छै। अतबे नै "अनचिन्हार आखर" बला 13 बर्खमे मैथिली गजल आन भारतीय भाषाक गजलक समकक्ष आएल आ वर्तमानमे हिंदी-उर्दू सहित मराठी, हरियाणवी, ब्रजभाषा, नेपाली आदिक गजलकार सभ "अनचिन्हारे आखर" ब्लाग द्वारा मैथिली गजलसँ परिचित भेलाह। ओना ई विवरण एहिठाम उचित नै मुदा चुन्नूजीकेँ बुझाइ छनि जे विधान तोड़ि देलासँ विधाक विकास होइत छै। विकास माने की? 115 बर्खमे 3000 कथित रचना जाहिमे कोनो मेहनति नै छै वा कि 13 बर्खमे 5000 गजल जे कि पूरा विधानक संग अछि। 40 बर्खमे 22 टा आलेख वा कि 13 बर्खमे 50 टा आलेख। विकास माने की? 115 बर्खमे वएह 18-20 टा गजलकार वा कि 13 बर्खमे 30-32 टा नवगजलकार। वएह एकटा आजाद गजल कि 13 बर्खमे गजलक विभिन्न उपविधाक विकास, विकास की छै? विकास कोन खंडमे छै बिना विधान बलामे वा कि विधान बलामे से पाठक तय करताह। जेना भूतक पएर उल्टा होइत छै तेनाहिते चुन्नूजी विकासक परिभाषा उल्टा मानै छथि। किछु लोक ईहो कहि सकै छथि जे मैथिली गजल वा ओकर विमर्शकेँ दू खंडमे बँटबाक कोन जरूरति? तखन हमर कहब जे मैथिली साहित्यमे जे समय, वाद, प्रयोग आदिक नामपर वर्गीकरण भेल छै से किए बाँटल गेलै। जँ ओ वर्गीकरण सभ ध्वस्त भऽ जाए तँ ई गजल बला स्वतः ध्वस्त भऽ जेतै। मैथिलीक कथित मुख्यधारामे गजलक विमर्श कोना होइत छै तकर दू टा उदाहरण दैत छी (उदाहरणकेँ उदाहरणे जकाँ देखबाक आग्रह रहत हमर)। पहिल उदाहरण- दरभंगामे एकटा स्थानीय कवि छथि ओ गीत लीखि ओकरा गजल घोषित करै छथि आ बहस करै छथि जे गजलमे बहर नै हेबाक चाही। बहर-काफियासँ भाव मरि जाइ छै आदि-आदि। ओही कविक एकटा बेटा हिंदीमे गजल लीखै छनि आ नियम मानि लीखै छनि। हिंदीमे बाप-बेटा दूनूक क्रांति घुसड़ि जाइत छनि। ओहि ठाम ओ सभ बहस नै कऽ पाबि रहल छथि। खाली मैथिलीमे ई सभ क्रांति करै छथि। दोसर उदाहरण- 2010मे एकटा युवा "अनचिन्हार आखर" ब्लाग केर माध्यमसँ गजल सिखलाह। तकर एक-दू सालक बाद हुनका पटनाक एकटा साहित्यकारक बेटा मार्फत नौकरी भेटलनि आ ओही साहित्यकारक कृपासँ बियाहो भेलनि। आब ओ युवा कहने घूरै छथि जे गजलमे बहर नै हेबाक चाही। ओना किछु युवा आर छथि जे कि पहिने अनचिन्हार आखरसँ गजल सिखलाह आ तकर बाद लोभ-लाभसँ ग्रस्त भऽ मुख्यधारामे जा कऽ बहरक विरोध कऽ रहल छै। खएर ई सभ चलिते रहै छै। सभकेँ अपन सुविधा-असुविधा चुनबाक हक छै। हम उपरक दू उदाहरण एहि लेल देलहुँ जे कथित मुख्यधारामे विमर्श साहित्य वा विधा लेल नै होइत छै। विमर्श मात्र संबंध, पद आ लोभ-लाभ लेल होइत छै। हमरा विश्वास अछि जे विमर्शक ई फार्मेट गजलक अतिरिक्त मैथिली साहित्य केर आनो विधामे हएत। मुदा से बात आन विधासँ जुड़ल लोक कहताह। एकटा सत्य बात ईहो छै जे कथित गजलक मुख्यधारा ततेक अक्षम छै जे ओहिमे कोनो नव रचनाकार एबे नै केलै। चुन्नूजी जाहि युवा सभपर नाचि रहल छथि ताहिमेसँ अधिकांश "अनचिन्हार आखर"सँ निकलल छै आ एक-दू टा अनचिन्हार आखरक विरोधमे बिना बहरक रचना लीखै छै। कुल मिला कऽ देखबै तँ सभ युवा अनचिन्हारे आखरक देन छै। आब हीरा उगत खेतमे आरि झगड़ाक तोड़ल अहाँ (शाइर-योगानंद हीरा , मात्राक्रम-2122-122-12) 7 पृष्ठ-11 पर चुन्नू जीक अभिमत छनि जे हमरा लेल विधा बात-विचार करबाक साधन अछि तँइ हम ओकर नियम नै मानब। मुदा तखन विधेक कोन जरूरति? जकरा नाटक कहल जाइत छै तकरा उपन्यास कहल जाए आ कथाकेँ संस्मरण कारण सभमे लेखक बाते विचार करै छै। एहन तँ नै छै जे कथामे विचार छै आ कवितामे नै, गीतमे छै आ उपन्यासमे नै। विचार सभमे छै तँइ अनेक विधाक छोड़ि मात्र एकटा विधा हो। आ जँ चुन्नूजी एहिसँ सहमत नै होथि तँ तात्काल मानि लेबाक चाही जे गजलक वैचारिकतापर विचार करैत चुन्नूजी मात्र लफ्फाजी केने छथि। एक तँ मैथिलीक मुख्यधारामे कियो गजलक जानकार नै छै आ ताहिपरसँ जखन ओ अपन संयोजनमे कोनो कार्यक्रम करबै छै तँ स्वाभाविक तौरपर अपनासँ कमजोर वक्ता सभकेँ आनै छै। ओ कमजोर वक्ता सभ उपकृत आ एहसानमंद रहैत छै। तँइ ओहन कार्यक्रममे कोनो वस्तु, कोनो विधाक अनिवार्य घटककेँ "दुराग्रह" मानल जाइत हो तँ से आश्चर्यक बात नै। उदाहरण लेल मानू जे जँ अहाँ चाउर केर खीर बनेबै तँ अहाँ दूध, चाउर आ चिन्नी मिलेबै। आब एतेक मिलेलाक बाद ओ खीर तँ हेतै मुदा जँ ओहिमे काजू-किशमिश आदि मेवा मिलेबै तँ खीर आरो स्वादिष्ट हेतै। मानि लिअ सभ चीज देलियै मुदा चिन्नी बिसरि गेलियै तँ ओ स्वादिष्ट नै हेतै मुदा ओकरा खीरे कहल जेतै। आब फेर सोचियौ जँ पानिमे चाउर, चिन्नी, काजू-किशमिश आदि दऽ बनेबै तँ कि ओ खीर हेतै? फेर सोचियौ जँ दूधमे चाउर छोड़ि आन सभ चीज देबै तैयो कि ओ खीर हेतै? जँ कोनो बुद्धिमान पाठक हेता तँ ओ बुझि जेता जे चाउरक खीर बनेबाक लेल दूध आ चाउर अनिवार्य घटक भेलै। आब जँ कोनो लोक ई कहए जे खीरमे दूध अथवा चाउर देबाक बाध्यता "दुराग्रह" छै तँ फेर मानि लिअ जे ओ एहि धरतीक प्राणी नै छै। तेनाहिते गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य तत्व छै। जँ बहर-काफिया हेतै तखने ओ गजल बनतै आ तकर बादे ओ गजल नीक छै कि खराप ताहिपर बहस हेतै। जखन रचनामे बहर-काफिया छैहे नै तखन ओ गजल तँ भेबे नै केलै। कोनो एक गजलक हरेक शेर एक बहर ओ एक काफियाक नियमसँ संचालित होइत छै। रदीफ गजल लेल अनिवार्य नै मुदा जाहि गजलमे रदीफ देल जाइत छै सेहो एकै हेबाक चाही पूरा गजलमे। पघिलह जुनि बेसी जियान भ' जेबह भाइ पाथर बनबह त' भगवान भ' जेबह भाइ (शाइर-राजीवरंजन झा, मात्राक्रम-22-22-22-22-22-2) 8 चुन्नूजी लग मैथिली गजलक संबंधमे कोनो ठोस जानकारी नै छनि कारण एक दिस ओ मानै छथि जे पं.जीवन झासँ गजल प्रारंभ भेल दोसर दिस ई मानै छथि जे "किछु पितामह रचनाकार लोकनि घोषणा केलनि जे मैथिलीमे गजल असंभव (पृष्ठ-13 पर)। जखन घोषणा केनिहार पितामह केर पितामहे सभ मैथिलीमे गजल संभव कऽ गेल छथि तखन फेर ओहि कथन सभहक औचित्य की? ईहो मोन राखन उचित जे जीवन झासँ लऽ कऽ कविवर सीताराम झा आ मधुपजी धरि बहरमे गजल लिखने छथि। अतबे आ इएह बात सभ साबित करैए जे मैथिलीमे गजलकेँ असंभव संबंधमे घोषणा केनिहार सभ लग जतेक गजलक ज्ञान छलनि ओतबे ज्ञान चुन्नूओजी लग छनि आ चुन्नूजी ओहिसँ आगू नै बढ़ि सकल छथि। फेर चुन्नूजी लीखै छथि जे "यद्यपि ई घोषणा कालांतरमे अमान्य भेल"। मुदा कोना अमान्य भेल से सूचना पाठककेँ नै दऽ रहल छथि। बहुत संभव जे 2021 मे हुनकर पोथी प्रकाशित भेलनि अछि आ ओ अही बर्खसँ अमान्य सिद्ध मानि रहल होथि। टेमी जकाँ कखनो मिझा फेर जरैत गेलियै हारैत कखनो खूब कखनो कऽ जितैत गेलियै (शाइर-अभिलाष ठाकुर, मात्राक्रम-2212-2212-2112-1212) 9 पृष्ठ-14 पर चुन्नूजी वार्णिकता (छंद)केँ अंकगणीतीय रूपकेँ व्यक्त करबाकेँ कृत्रिम मानै छथि। हमरा एहन कथनपर आश्चर्य नै भेल कारण हमरा बूझल अछि जे चुन्नूजी समाजसँ कटल लोक छथि आ समाजसँ कटल लोक किछु लीखि-बाजि सकैए। वस्तुतः समाजक सभ विध कृत्रिमे छै। से लालन-पालनसँ लऽ कऽ शिक्षा-दीक्षा, ओढ़न-पहिरन-भोजन धरिमे। सुख-सुविधासँ लऽ कऽ राग-विराग धरि। समाजमे अनुशासन अनबाक लेल कृत्रिम बिध सभ बनाएल जाइत छै आ हरेक बिधक अंकगणीतीय रूपमे सेहो व्यक्त कएल जाइत छै। उदाहरण लेल घरक नक्शा ओकर अंकगणीतीय रूप छै तँ संगीतमे स्वरलिपि ओकर अंकगणीतीय रूप छै। आब चुन्नूजी मंचपर वा रेडियो-टीभीपर गीत-संगीत सुनि लैत हेता तँइ स्वरलिपि हुनका नै देखाइत हेतनि। अन्यथा बिना स्वरलिपिकेँ कोनो प्रोफेशनल आ विद्वान संगीतकार काज करिते नै छथि। ओतबे किए चुन्नूजीक पोथी सभ जे छपल छनि ओकरो अंकगणित होइत छै जे कते बाइ कतेक पोथी हेतै आ ओहीपर ओकर स्वरूप निर्भर करैत छै। ओना आने बात जकाँ हमरा विश्वास अछि जे चुन्नूजी ई बात सभ नै बुझि सकताह कारण बुझबाक लेल समाजिक होमए पड़ैत छै। समाजिके किए संन्यासियो हएब तँ इएह अंकगणित काज आएत। मंत्रो पढ़ब तँ मंत्रसँ पहिने छंदक नाम, ओकर देवता, ओकर ऋषि आदिक नाम भेटत। मुदा ई बात सभ चुन्नूजीकेँ पता नै छनि। ऋगवेद संहिता, अथ प्रथमं मण्डलम्, सूक्त-१, देवता-अग्निः ; छन्द-गायत्री; स्वर-षड्जः; ऋषि-मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम् ॥1॥ जगत मे थाकि जगदम्बे अहिंक पथ आबि बैसल छी हमर क्यौ ने सुनैये हम सभक गुन गाबि बैसल छी (शाइर-कविवर सीताराम झा, मात्राक्रम-1222-1222-1222-1222) आब जँ चुन्नूजीकेँ गायत्री छन्दक परिभाषा जनबाक छनि तँ ओ "अनचिन्हार आखर"पर जा कऽ पढ़ि सकैत छथि आ संपूर्ण वैदिक छन्द सीखि सकै छथि। हजारो वर्ष पहिने जाहि समाजक कवि साहस संग अपन रचनासँ पहिने ओकर विधान लीखि सकैत छलाह ओही कविक वशंज सभ ततेक कमजोर जे ओ सभ विधान देखिते छुल-छुल मूतए लागै छथि। 10 पृष्ठ 15 पर चुन्नूजी लिखैत छथि जे "हम छंद मे लयक आग्रही बेसी छी"। ई कथन आ चुन्नूजीक वास्तविकता दूनू अलग-अलग अछि। हुनका लय बेसी चाही सेहो छंदमे मुदा छंद कतए छनि? ओ तँ छंद-बहर मानिते नै छथि तखन छंदमे बेसी कि कम लय कोना भऽ सकतै? वास्तविकता तँ ई अछि जे चुन्नूजीकेँ ई पते नै छनि जे लय की होइत छै। साहित्ये नै दुनियाँक कोनो एहन चीज नै छै जाहिमे लय नै होइत हो। लय केर मतलब छै "गति"। चलैत हवाक लय छै तँ नदी संग नालाक सेहो। गुड़कैत पाथरक सेहो लय छै। आब अही लय सभमेसँ जखन कोनो एकटा लय बेर-बेर निश्चित अवधि-अंतरालक संग अबैत छै तखन ओ छंद बनि जाइत छै, ओकर नाम पड़ि जाइत छै। कथा अछि जे साँपकेँ भागैत देखि संस्कृतक "भुजंगप्रयात" छंद बनल अछि। एकर सोझ मतलब भेल जे छंद एकटा विशिष्ट लय केर नाम छै। आब जखन लय छैहे तखन चुन्नूजी कम-बेसी किए रहल छथि तकर हम अनुमान कऽ सकैत छी। हमर अनुमान अछि जे छंद बला रचना एक तँ लिखहेमे कठिन छै आ तकर बाद ओकर धुन बनाएब सेहो कठिन। मुदा बिना छंद-बहर बला रचना तँ केनाहुतो लीखू आ ओकर धुन बना गाबि लिअ। चुन्नूजी मूलतः मंचीय गायक छथि आ चुन्नूजीकेँ मंचपर प्रेशर रहैत छनि गेबाक आ तही प्रेशरक कारणे ओ लयक बेसी आग्रही हेता। मुदा फेर कहब छंद विशिष्ट लयक नाम छै ओहिमे जँ कियो कम-बेसी केर बात करै छथि तँ साफे बुझू जे हुनका लग कान्सेप्ट केर कमी छनि। एहिठाम कियो ई कहि सकै छथि जे गायककेँ मंचपर अनिवार्य रूपसँ जाए पड़तै तँइ मंचीय गायक नामक वर्गीकरण उचित नै। मुदा कवि-साहित्यकारकेँ तँ सेहो अनिवार्य रूपसँ मंचपर जाए पड़ै छै तखन अलगसँ मंचीय कवि-साहित्यकारक वर्गीकरण करबाक कोन जरूरति? जे गुण कोनो कवि-साहित्यकारकेँ मंचीय बना दैत छै ठीक ओहने गुण कोनो गायककेँ सेहो मंचीय बना दैत छै। ओढल ओ शेरक खाल बरु छै तँ सिआरे एहन परजीवीकेँ रगड़बाक समय छै (शाइर-रामबाबू सिंह, मात्राक्रम-2222-2212-211-22) 11 चुन्नूजी गजलक व्याकरण मानिते नै छथि तखन छोट बहर वा पैघ बहरक चर्चा करब संकेत दैए जे चुन्नूजी छोट पाँतिकेँ छोट बहर आ पैघ पाँतिकेँ पैघ बहर मानि लेने छथि से साफे अज्ञानता छै (पृष्ठ-17)। पाँतिसँ बहरक निर्धारण नै होइत छै बल्कि बहरसँ पाँतिक निर्धारण होइत छै से बूझब आवश्यक आ पहिल दू पाँतिक जे बहर-काफिया-रदीफ कायम हेतै सएह पूरा गजलमे अंत धरि निर्वाह हेबाक चाही। ईहो देखि हँसी लागैए जे एक दिस चुन्नूजी गजलक छंद ओ छंदकार सभकेँ खारिज करै छथि मुदा ओही छंदकार, ओही "अनचिन्हार आखर" केर बनाएल परिभाषिक शब्दावली जेना बाल गजल, भक्ति गजल आदिकेँ हपसि कऽ रखबाक प्रयास कऽ रहल छथि (पृष्ठ-18)। बहुत संभव चुन्नूजी ई मानि बैसल होथि जे एहि पारिभाषिक शब्दावली आ सिद्धांतक जन्मदाता हुनकेसँ उपकृत कोनो युवा छै। मुदा हँसिए-हँसीमे एहि सभ बातकेँ कात करैत ईहो विश्वास भऽ जाइए जे मैथिलीमे असल गजलक बाट एनाहिते लक्ष्य धरि पहुँचतै। काँटक ढेरीमे फूल खोजि रहल छी संकटमे हर्षक मूल खोजि रहल छी (शाइर-कुन्दन कुमार कर्ण, मात्राक्रम-222-22-2121-122) 12 चुन्नूजीक भूमिका एकै छनि मुदा ओहिमे फाँक बहुत अछि। अतेक जे एकटा फाँकमे हाथ देब तँ दस टा फाँक केर अनुभव हएत मुदा सभ फाँक किछु मुख्य फाँकमे जा कऽ मीलि जाइत छै। आ तँइ हमर प्रयास रहल अछि जे हम ओही मुख्य फाँक सभकेँ अपन आलोचनाक विषय बना सकी। रहलै बात एहि कथित संग्रह रचना सभकेँ तँ ओ हमरा लग नै अछि मुदा चुन्नूजीक अध्य्यन, क्षमता एवं पूर्वाग्रहकेँ देखैत रचना सभकेँ बिना पढ़ने कहल सकैए जे पोथीमे देल गेल रचना सभ गजल नै हएत। ओ रचना सभ आन जे किछु (गीत-कविता) हुअए मुदा गजल तँ नहिए हएत। आब जँ ओ गीत कि कविता अछि तँ ओ केहन अछि से गीत-कविताक मर्मज्ञ सभ कहता। मैथिलीमे पुरस्कारक जे हाल छै ताहिमे ई बहुत संभव जे हुनकर एहि पोथीकेँ पुरस्कार भेटि जाइक। मुदा मोन राखू पुरस्कार कोनो विधाक मानक नै होइत छै। एकटा बात ईहो जे चुन्नूजी "नाटक" करएमे महारथी छथि आ तँइ ई गजल विधाक संग "नाटक" केने छथि। हीरो नै ऐ नाटकमे बिपटा छै भरमार सजल (शाइर-ओमप्रकाश, मात्राक्रम-22-22-22-2) हे शिव " एकरा गजल कहितहुँ" होइछ लाज (आलेख) कोनो लेखक केर एकटा मुख्य विषय, मुख्य विधा आ मुख्य तेवर रहैत छै जकरा पूरा दुनियाँ जानै छै। मुदा ताही संगे ओहि लेखक केर किछु एहन बात रहै जे दुनियाँ नै जानै छै आ जहिया जानै छै तहिया आश्चर्य लागै छै जे हिनकर ईहो रूप छनि। ई रूप नकारात्मक हेतै से हम नै कहि रहल छी मुदा नीको पक्ष जँ नुकाएल रहए तँ सार्वजनिक भेलापर आश्चर्य होइते छै। एहने सन अनुभव हमरा प्रो. भैरवेश्वर झा द्वारा संपादित "किरण समग्र-खंड चारि, भक्ति एवं श्रृंगार गीत संग्रहःरसमंजरी" नामक पोथी पढ़ि भेल। ई पोथी डा. काञ्चीनाथ झा 'किरण'जीक भक्ति एवं शृंगारपरक रचनाक संग्रह अछि। भक्ति आ शृंगार ताहूमे काञ्चीनाथ झाजी द्वारा लिखल। जखन कि किरणजीक मुख्य तेवर छनि यथार्थवादी रचना आ ओकर पोषण। एहन नै छै जे भक्ति वा शृंगार लिखब अपराध छै मुदा उपरे कहलहुँ जे मुख्य तेवरक बाद जँ आन तेवरसँ परिचय होइत छै तखन आश्चर्य लगिते छै। आ से आश्चर्य पोथीक भूमिकामे सेहो भेटत। आ एहन-एहन गौण पक्षकेँ पाठक लग आनए बला साधुवादक पात्र छथि। तँइ भैरवेश्वरजी सेहो धन्यवादक पात्र छथि। मुदा एहि धन्यवादक संगे हम ईहो स्पष्ट कऽ दी जे किछु बिंदुपर हिनक संपादन कमजोर रहि गेल छनि जकर चर्च हम आगू करब। तैयो भैरवेश्वर जी धन्यवादक पात्र रहबे करताह। भैरवेश्वरजी अपन भूमिकामे कविक प्रारंभिक कालक वर्णन आ हुनकर काव्य शैलीक चर्च केने छथि जे कि पर्याप्त नै अछि। पर्याप्त नै अछि माने जे बहुत रास महत्वपूर्ण बिंदुकेँ छोड़ल गेल अछि। प्राचीन कालमे कोनो मूल कविकेँ अपन भाषाक अनुरूप बना कऽ प्रस्तुत करब अपराध नै होइत छलै मुदा आब एहि प्रवृतिकेँ हेय बूझल जाइत छै। बौद्ध कवि भुसुकपाद केर रचनाक अनुवाद कबीर केने छथि तँ जयदेवक रचनाक अनुवाद विद्यापति। दामोदर मिश्रजीक हनुमानपर आधारित नाटक केर अनुवाद रामचरित मानसमे भेटत। तेनाहिते ज्योतिरीश्वर कृत धूर्तसमागम केर अनुवाद अंधेर नगरीमे भेटत। जँ किरणजीक रचना जे कि एहि पोथीमे संकलित अछि ताहिमे सेहो अनुवाद करबाक प्राचीन परंपराकेँ पालन केलाह अछि जेना कि पृष्ठ़-17 पर "नील कलेवर मुरली मनोहर" रचना। ई शुरूआत अछि जँ पोथी पढ़ैत जेबै तँ एहन उदाहरण भेटैत चलि जाएत। भैरवेश्वरजी एहि बिंदुकेँ अपन भूमिकामे नै उठा सकलाह अछि जाहि कारणसँ आजुक पाठक किरणजीपर नकलक आरोप लगा सकै छथि। पोथीक बहुत रास रचनाक संगे राग-भास केर उल्लेख भेल अछि जे कि नीक अछि। संगे-संग गीतक प्रकार यथा तिरहुत बटगवनी आदिक उल्लेख भेल अछि जकरा भूमिकामे सेहो कहल गेल अछि। मुदा भूमिकामे जे एहि संगे एक चीज छूटल अछि ओ अछि "गजल"। एहि पोथीक पृष़्ठ-87 पर आ ताहिसँ आगू किछु रचनाक उपर गजल शब्दक प्रयोग भेल अछि आ एहि संबंधमे भूमिकामे किछु नै कहल गेल अछि। आगू बढ़ी ताहिसँ पहिने अहाँ सभ गजल लागल रचना सभकेँ पढ़-देखि ली से नीक रहत। 1 प्रिये अपना नैना सँ नैना मिलाउ अहाँ अपना कोइली वयना के सुर सुनाउ अहाँ देखि मुखचंद्र प्रेयसि युगपयोधर उन्नते पान रञ्जित अधर पल्लव मदन मम दसंते अपना कुसमित छाती मे छाती लगाउ अहाँ कुसुम कोमल बाहुलति सँ बान्हि चुमबन देहु मे बसहु काञ्चिनाथ के मन मृदुल बीच मे हमरा सँ यौवन के सेवा कराउ अहाँ। (पृष्ठ -87) 2 कन्हैया कन्त सङ सखिया खेलबै आजु होरी पहिरि कय रेसमी सड़िया उड़ेबै भरि झोड़ी चलेबै काजरित अँखिया सुतिख-तिख वाण हरि रिपु के। सुनेबै फगुआ लोभेबै चित्त साजन के नारिक मान ई यौवन पहुक उत्संग मे बसि के काञ्चिनाथ पिय के हम चढ़ेबै विहुँसी हँसि के। (पृष्ठ-88) 3 कन्त बिना कामिनी खेलाएत कोना भानु बिना कमलिनि फुलाएत कोना चन्द्र बिना चन्द्रिका अमृताएत कोना मेघ बिना दामिनि विलसाएत कोना काञ्चिनाथ विनु लता मुकुलाएत कोना (पृष्ठ-95) 4 तोरि मदभरी यौवन नसाबए हमे हो ओठ पर लाली तोर गाल गुलाबी नयनो मे काजर कटारी मारे हो बेलि कली सभ यौवन खिलल तोर रेशम बनल चोली सताबै मोहे हो काञ्चिनाथ भन तव मुख पंकज मन मधुकर हिये लुभावै मोरे हो (पृष्ठ-95-96) 5 प्रीतम मोर विदेश मे हे अलि, वारि वयस के हम भेलौं फूलल बेली जूही चमेली चम्पा मालति हे आलि कमलिनि कामिनि मुख अलि चूमय रभसि कुसुम रस पीब हे आलि मोरा यौवन बगिया मे सखि फुलल अनुपम दुइ कलिया हे आलि कुसुमक सौरभ चहु दिसि गमकय कौन भ्रमर रस लेता हे आलि काञ्चिनाथ बिनु के मम सखिया उरज कमल रस पीता हे आलि (पृष्ठ-96) 6 नयना चला कै मारल तिखवान गाल गुलाबी शोभय नाक बुलाकी नैना मे कारी कमान नहुँ-नहुँ यौवना कमल कली सम शुभय मदन के थान तोर नयन सर बेधल हृदि मँह लहरय गरल समान (पृष्ठ-97) 7 कमल कुसुम सम फुलु यौवन मम विफल पियाक विना रे निठुर मलय बहु कुसुम सर वलय कोकिल करथि अनोरे गुञ्जि भ्रमर कुल घूमय फूल जलय कमलिनि कामिनि द्वारे काञ्चिनाथ पिय बिनु सखि क्रूरमार सर मारे (पृष्ठ-97) 8 प्रियतम नाजुक रहितै रतिया मे खेलबितौं सजनी बेली चमेली जूही चिनतौं रेशम सूत मे गजरा गथितौं आदर सँ पिया के पहिरबितौं आली, घाड़ाजोड़ी बगिया बुलबितौं सजनी लाल महल मे पलङ बिछबितौं, कुसुम कली सँ सेज सजबितौं अपने सुतितौं पिय केँ सतबितौं, बालम छतिया मे छतिया मिलबितौं सजनी मुसकि-मुसकि युग नैन चलबितौं, प्रियतम मानस मदन जगबितौं जँ किछु कहितथि हँसि मुख फेरितौं, वालम सँ पौना धरबितौं सजनी बिहुँसि उठि पिय अंग लगबितौं गहि भुजपाश तनिक मुख चुमितौं काञ्चिनाथ सङ खेल खेलइतौं आली, नूतन यौवन रसवा लुटबितौं सजनी। (पृष्ठ- 104) जखन अहाँ सभ एहि रचना सभसँ गुजरल हएब तँ साफे पता चलि गेल हएत जे ई रचना सभ गजल विधाक रचना नै अछि। तखन फेर ई की अछि? हमरा बुझने किरणजी गजलकेँ राग बुझि लेने छथिन। ई बात हमरा एहि दुआरे बुझाइए जे आन रचना सभमे राग-भास निर्देश कएल गेल छै। ओनाहुतो गजल गायन अर्ध शास्त्रीय संगीतक बेसी निकट छै तँइ किरणजीकेँ भ्रम भऽ गेल हेतनि। मुदा गजल संगीतक विधा छैहे नै तँइ एहि पोथीमे देल गेल रचना गजल विधाक रचना नै अछि। बहुत संभव जे गजल नामक कोनो राग अथवा कि ताल हो मुदा से हमरा नै पता। जँ गजल नामक कोनो राग वा ताल हेबो करतै तँ संगीतक गजल आ साहित्य केर गजलमे अंतर रहबे करतै। भैरवेश्वरजी अपन भूमिकामे एहि सभ तथ्य दिस कोनो इशारा नै केने छथि जाहिसँ नव रचनाकार लग भ्रम पसरबाक पूरा संभावना बनै छै। एकै रचना किछु पाँति वा किछु शब्दक कारणे दू-दू बेर आएल अछि (देखू पृष्ठ 16-17 केर रचना आ पृष्ठ 79 केर रचना) एहन उदाहरण आर भऽ सकैए। संपादक चाहतथि तँ एकरा संपादित कऽ एक रूपमे आनि सकैत छलाह। मुदा भूमिकामे एहि तथ्य दिस कोनो बात नै कहल गेल अछि। जँ पोथीमे संकलित रचना सभकेँ पढ़ब तँ आधुनिक रोमांटिक गीत सभसँ ई आगू बुझाएत। एक-दू रचना तँ थियेटर (थियेटर के जे अर्थ मैथिलीमे होइत छै से ग्रहण करू) केर चलताउ गीतक बराबर सेहो अछि जेना "छोट-छोट यौवना दू तोर रसाल रे" (पृष्ठ-107)। भैरवेश्वरजी एहू तथ्यकेँ भूमिकामे नै लिखने छथि। "काञ्चीनाथ" भनितासँ एकटा गीत "जगत जननि जगतारिणी" सेहो भेटैत अछि जे कि एहि पोथीमे नै भेटल। बहुत संभव जे हमर नजरिसँ छूटि गेल हो। पाठक हमरा सूचित करथि हम अपन आलेखकेँ सुधारि लेब। अथवा ईहो भऽ सकैए जे "काञ्चीनाथ" भनितासँ आनो कवि लिखने होथि जे कि हमरा पता नै हएत। जे किछु हो मुदा एहि संपादित पोथीमे देल गेल गजल नाम्ना रचना सभ ने तँ गजल अछि आ ने गजलक इतिहासमे उल्लेख करबा योग्य अछि मुदा ओइ बाबजूद मात्र अइ कारणसँ हम विवरण देलहुँ जे काल्हि कियो उठि कऽ कहि सकै छथि जे किरणजी सन महान साहित्यकार गजल लिखने छथि आ सही लिखने छथि। बस एही कारणसँ हम एतेक मेहनति केलहुँ अन्यथा एहि पोथीमे देल गजल नामक रचना सभमे कोनो एहन बात नै। एहि आलेख केर शीर्षक अही संपादित पोथीमे देल किरणजीक एकटा गीतपर आधारित अछि। ओहि गीतकेँ ताकि पढ़ब पाठक केर काज छनि। अनुशासन+विद्रोह=परिवर्त्तन: अनुशासनहीनता+विद्रोह=अराजकता अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा बभूवथुः (ॠगवेदक ई मंत्र अछि जाहिमे अग्नि ओ सोमदेवक निमंत्रण देल गेल छनि आ कहल गेल छनि जे अहाँ दूनू ऐश्वर्यसँ भरल छी, अहाँ दूनू देवत्वसँ युक्त छी। अहाँ दूनू गोटे संयुक्त रूपे एहिठाम आमंत्रित छी। अहाँ दूनू गोटे हमर स्तुति स्वीकार करी। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे हमर हरेक आलोचना लेल लेखक ओ पाठक दूनू सादर आमंत्रित छथि। दूनूक यथायोग्य सत्कार कऽ हम अपनाकेँ भाग्यवान बूझब)। मैथिली साहित्यमे एकटा परंपरा छै जे कोनो गलतीकेँ वेद वाक्य मानि लगभग पूरा लोक ओही गलतीकेँ पकड़ि जीवन भरि चलताह आ मैथिली साहित्यकेँ गलत परंपराक इनारमे खसबैत रहताह। खास कऽ मैथिली गजलक संदर्भमे तँ ई बात आरो देखल जाइए। अही क्रममे हम अरविन्द ठाकुरजीक पोथी "मीन तुलसीपात पर" केर चर्च करब। एहि पोथीमे गजलक व्याकरण आदिक बारेमे एहन प्रश्न सभ उठाएल गेल छै जकर कोनो विशेष माने नै लागै छै। गजलक व्याकरण नहि हो ताहि लेल एहनो बात कहल गेल छै जकर गजल विधासँ कोनो लेना-देना नै छै। आब अरविन्दजीक एहि पोथीक भूमिकाकेँ किछु युवा सत्य मानि लेने छथि। एकर माने ई भेल जे अरविन्द ठाकुर गलत करताह तँ ईहो सभ ओकरा मानि लेताह। युवा केर की अर्थ छै, गलतकेँ हटा सहीकेँ प्रचलन करब वा कि मंच-पुरस्कार लेल गलतकेँ मानि लेब। गलतकेँ मानि चलए बला युवा भइए ने सकैए। अरविन्द ठाकुर अपन पोथीक भूमिकामे की लिखलाह, जे लिखलाह से सही अछि कि गलत, आ ओहि सही-गलत केर आधार की छै से ताकब हमर एहि आलेखक मूल काज अछि। आब एतेक लिखलाक बाद बुझिए गेल हेबै जे "मीन तुलसीपात पर" सेहो एहन पोथी अछि जकर रचनामे बहरक पालन नै भेल अछि आ काफियाक सेहो बहुत दोष अछि। गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य तत्व छै। जँ बहर-काफिया हेतै तखने ओ गजल बनतै आ तकर बादे ओ गजल नीक छै कि खराप ताहिपर बहस हेतै। एहि पोथीमे रचनाक अतिरिक्त 37 पन्नाक भूमिका लिखने छथि अरविन्द ठाकुरजी जकर शीर्षक अछि "संहिताक उपनिवेश नहि अछि साहित्य" आ एहि भूमिकाक शुरूआते कठोपनिषद् केर वचन "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"सँ भेल अछि। मुदा अर्धाली रूपमे। एहन-एहन अर्धाली अरविन्दजी आरो प्रयोग केने छथि अपन भूमिकामे। आगू बढ़बासँ पहिने "संहिता" केर अर्थ जानी संहिता केर सरल अर्थ छै संकलन आ रूढ़ अर्थ छै नियमक संकलन। एकर मतलब भेल जे अरविन्द ठाकुरजी साहित्यकेँ नियमक वा नियम-संकलनक उपनिवेश नै मानबाक आग्रह केने छथि। मुदा जँ साहित्य केर अर्थमे देखबै तँ अरविन्द जीक आग्रह साफे विरोधाभासी अछि। कारण हरेक साहित्य अपना आपमे नियमक संकलन होइत छै। अरविन्दजीक एहि पोथीक बहुत रचना नियम अछि आ तँइ ईहो पोथी संहिता बनि गेल अछि। आब साहित्य केर रचना सत्ता लेल छै, कि जनता लेल छै कि लेखके लेल छै से बात अलग भेल। जेना संहिता संकलन समाजकेँ नैतिकता हिसाबें नियंत्रण करै छै तेनाहिते जे साहित्य जनता लेल छै ओ साहित्य सेहो सत्तापर नैतिकता हिसाबें नियंत्रण करबाक प्रयास करै छै। जे साहित्य सत्ता लेल छै ओ साहित्य जनतापर नियंत्रण करबाक प्रयास करै छै। अपनापर नियंत्रण करबाक लेल बहुत कम साहित्य लिखल गेल अछि। अरविन्दजीक रचना पढ़ि अनुमान लगाएल जा सकैए जे ओ केकरापर नियंत्रण करबाक लेल संहिता रूप लेने अछि। हमर मूल कथन जे साहित्य अंतिम रूपमे संहिते होइत छै। एकरा अहाँ पानि-बर्फ वा मेघ-पानि बला उदाहरणसँ नीक जकाँ बूझि सकैत छी। तँइ हम कहलहुँ जे अरविन्दजीक भूमिकाक शीर्षक विरोधाभासी अछि। अपना समाजक विद्वानक बीच अर्धाली बहुत चलै छै। अर्धाली मतलब कोनो प्रसंगक आधा उल्लेख करब। ई समय बचेबाक लेल होइत छै मुदा ई अर्धाली मात्र शिक्षित ताहूमे सर्वज्ञाता लेल होइत छै। जनता लेल अर्धालीक प्रयोग तँ सर्वथा अनिष्टकारक होइत छै। चतुर लोक मात्र अर्धाली प्रयोग कऽ अपन अभीष्ट सिद्ध कऽ लै छथि। एहने एकटा चतुर लोक छलाह युधिष्ठिर जे कि युद्धमे "अश्वत्थामा हतो..." एहि अर्धालीक प्रयोग कऽ अपन स्वार्थ सिद्ध कऽ लेलाह। महाभारत केर प्रसंग छै ई जे गुरू द्रोण जखन अपन कौशलसँ दुर्योधनकेँ जिता रहल छलाह तखन हुनका विचलित करबाक लेल हुनकर बेटा अश्वत्थामाक नामपर एक वाक्य रचल गेल "अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो" माने अश्वत्थामा मारल गेल आदमी वा हाथी। मुदा घोषणा कालमे एकर अर्धाली "अश्वत्थामा हतो" साफ-साफ बाजल गेल आ दोसर भाग "नरो वा कुंजरो"केँ शंख ध्वनिसँ दाबि देल गेल। एकर असरि ई भेलै जे द्रोण ई बुझलाह जे हमर बेटा अश्वत्थामा मारल गेल आ ओ शोकमे आबि युद्ध छोड़ि देलाह। परिणाम पांडव युद्ध जीति लेलाह। हम ई बिल्कुल नै कहै छी जे अरविन्द जी युधिष्ठिर जकाँ चतुर छथि वा कि ओहो कोनो युद्धपर निकलल छथि। हमर कहब अतबे जे जखन कोनो प्रसंगक उलेल्ख करी तँ पूरा करी। जाहि श्लोक सभहक अर्धालीक ओ प्रयोग केने छथि से श्लोक सभ छंदमे बान्हल मात्र किछुए शब्दक श्लोक छै जेना "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥"। देखियौ बेसी लंबा-चौड़ा तँ छै नै तखन ओकरा पूरा देबामे कोन दिक्कत? एकटा आर प्रसिद्ध अर्धाली देखबै छी- "अहो रूपं अहो ध्वनि:" एकर मतलब ई छै जे अहा की रूप छै, कि ध्वनि छै। माने प्रसंशा भेलै। जनता एकरा अपन प्रेमिका लेल सेहो प्रयोग कऽ सकैए। मुदा एहि अर्धालीक पूरा रूप एना छै " ऊष्ट्राणां विवाहेषु, गीतं गायन्ति गर्दभा: | परस्परं प्रशंसन्ति, अहो रूपं अहो ध्वनि:" आब एकर पूरा माने भेलै "ऊँटक बियाहमे गदहा गीत गेलकै आ दूनू एक दोसरक प्रसंशा केलकै। गदहा ऊँटकेँ कहलकै जे अहाँ की रूप अछि अहाँक आ तकरक जबाबमे ऊँट कहलकै जे अहाँ की ध्वनि अछि अहाँक। तँ बुझि गेल हेबै जे साधरण जनता लेल अर्धाली कतेक भयंकर परिणाम दै छै। हमरा लग अर्धालीपर बहुत रास प्रसंग अछि मुदा उदाहरण लेल मात्र दू टा देलहुँ। अरविन्दजी कहि सकै छथि जे जनता सर्वज्ञाता होइत छै। अरविन्दजी संहितासँ साहित्यकेँ अलग करै छथि मुदा ओ अपन भूमिकामे जतेक अर्धाली देने छथि से छंदक संहितासँ संचालित छै। हुनकर पहिले अर्धाली बला श्लोक देखी- "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥" हम जतेक जनैत छी एहि पूरा श्लोकमे कुल 48 टा अक्षर छै आ ई जगती छंद भेलै (जँ हम गलत होइ तँ ओकरा सुधारबाक लेल आलोचना सादर आमंत्रित अछि)। जगती छंदमे हरेक पादमे अलग-अलग अक्षर संयोजन हिसाबें अलग-अलग नाम पड़ैत छै आ इएह बात आनो छंद जे गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप आदिपर लागू होइत छै। मने अरविन्दोजीकेँ अपन बात कहबाक लेल संहिते केर जरूरति पड़लनि। ई अरविन्दजीक दोसर विरोधाभास छनि। एहि भूमिकामे जे आन श्लोकक उदाहरण अछि सेहो सभ पूरा छंदमे छै। एकर माने ईहो भेल जे तात्कालिक कारण जे हो मुदा अरविन्दजीकेँ ई बात पता छनि जे बिना संहिताकेँ अपन बात नै कहल जा सकैए। "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥" एहि श्लोकक सरल अर्थ छै जे "उठू, जागू आ वरिष्ठक संगमे आबि ज्ञान लिअ मुदा ई काज तलवारक धारपर चलि कऽ पार करब समान अछि से बात कवि (ॠषि) कहै छथि। एहि श्लोकक पहिल भाग महत्वपूर्ण अछि मुदा तकर कारण दोसर भाग छै। दोसर भागमे ई कहल गेल छै जे ई काज तलवारक धारकपर चलबाक समान छै? कोन काज तँ पहिल भागमे छै वरिष्ठक संग आ उठब-जागब। आब एहि ठाम ईहो प्रश्न छै जे कोन वरिष्ठ? जे उम्रमे नमहर होथि वा ज्ञानमे, जे एक ज्ञान नमहर होथि कि दोसर ज्ञानमे?। लोक अपन वरिष्ठे तकबामे समय गमा देताह तखन उठताह वा जगताह कोना। तँइ एहि काजकेँ तलवारक धारपर चलब मानल गेल छै। असल काज छै वरिष्ठे ताकब मुदा कोन वरिष्ठ? सही दिस लऽ कऽ जाए बला कि गलत दिस लऽ जकऽ जाए बला?। जे सही वरिष्ठ ताकि लै छथि से उठि जाइ छथि, जागि जाइ छथि आगू बढ़ि जाइ छथि। जाहि भूमिपर ई संहिता रचल गेल ताही भूमिपर दत्तात्रेय सेहो भेल छथि जिनका अपन वरिष्ठ एहनो चीजमे भेटि गेल रहनि जकरा समाज कोनो जोगरक नै मानै छथि। दत्तात्रेय अपन 24 टा गुरू रखने रहथि तकर सूची देखू- 1) पृथ्वी, 2) जल, 3) वायु, 4) अग्नि, 5) आकाश, 6) सूर्य, 7) चन्द्रमा, 8) समुद्र, 9) अजगर, 10) कपोत, 12) फतिंगा, 12) माछ, 13) हिरन, 14) हाथी, 15) मधुमाछी, 16) मधु निकालए बला, 17) कुरर पक्षी, 18) कुमारि कन्या, 19) नाग, 20) बालक, 21) पिंगला वैश्या, 22) तीर बनए बला, 23) मकड़ी, 24) भृंगी कीट। एहि सूचीमे कोन वरिष्ठ आ केहन वरिष्ठ सभ छथि से ताकि लिअ। पद-पोस्ट, धन-छलसँ पोषित मैथिली साहित्यकार सभ एहि सूचीमे देल वरिष्ठ सभकेँ अपना लेल वरिष्ठ मानताह से संदेह अछि। आब एहि भूमिका केर आन प्रसंगपर आबी। आन प्रसंग सभकेँ हम प्वाइंट बना कऽ दऽ रहल छी। पहिने अरविन्दजीक कथन रहतनि आ तकर निच्चा हमर समर्थन वा विरोध रहत। अरविन्दजी अपन भूमिकामे जे बात उठेने छथि तकर उत्तर हम बहुत पहिने अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे विस्तारसँ देने छी। एहिठाम हम प्रसंगानुकूल संक्षिप्त रूपे दऽ रहल छी। एकटा बातक उल्लेख करब जरूरी बुझाइए जे अरविन्दजी हिंदीक किछु आलोचना पढ़ि ओतहिसँ प्रश्न उठेने छथि। जँ अहाँ सभ देवेन्द्र आर्यजी द्वारा लिखल हुनक आलोचना "हिन्दी ग़ज़ल आलोचना की दिक्कतें" पढ़बै तँ बुझि जेबै जे अरविन्दजी कोन प्रश्न किम्हरसँ लेने छथि (देवेन्द्र जीक ई आलेख पहल पत्रिका, बर्ख 2015 मे प्रकाशित भेल रहै)। अइ संदर्भमे हमर कहब ई अछि जे हिंदी भाषामे गजल संगे जे किछु दिक्कत छै ताहिसँ मैथिलीकेँ कोन मतलब छै। मैथिली गजलक अपन समस्या छै आ तकरा नीक करब मैथिलिएसँ सभंव छै। उदाहरण लेल हिंदीमे बलाघात नै छै, मैथिलीमे छै तँ स्वाभाविक रूपे मैथिलीमे काफिया आ हिंदीमे काफियाक प्रकृति अलग हेतै आ ओहने नियमसँ संचालित हेतै। ई बात सभ हमरा एहिठाम अइ कारणसँ लिखए पड़ल जे बहुत रास मैथिल हिंदी बला गजलक व्याकरण पढ़ि बहस करै छथि जे मैथिलीमे एना किएक नै? तँ आब अरविन्दजीक भूमिकाक अंश आ तकर हमरा द्वारा कएल समर्थन वा कि विरोध देखू--- 1) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहि क्रममे अनेक रास बनल-बनाओल ढाँचा-संरचना हिलैत अछि- किछु हिलिकए टेढ़ भए जाइत अछि, किछु भरभराए कए टूटि जाइत अछि। एहि विस्फोट, एहि विघटनसभक परिणाम होइ छै जे हिंसा-प्रतिहिंसा, पुणर्निर्माण, पुनर्वास, उत्तराधिकार आ ध्वस्त ढाँचासभक प्रेत-छाया ओहि काल-विशेषक अलंकार शास्त्रक (Rhetoric) प्रमुख हिस्सा भए जाइ छै। साहित्य केना एहि सभ सन्दर्भसँ अनछुअल रहि सकै छै, रहिए नहि सकै छै.." हमर कथन- हँ, साहित्य सेहो परिवर्तनसँ कात नै रहि सकैए मुदा अतबो आ एहनो परिवर्तन नै होइ छै जे साफे-साफ निशान मिटा जाइ। असलमे अरविन्दजी परिवर्तनकेँ विनाश मानि लेने छथि जखन कि परिवर्तन मात्र स्वरूपकेँ सुंदर वा कि सरल बनेबाक बात करै छै। जाहिमे स्वरूप बदलियो सकैए आ नहियो बदलि सकैए। मुदा जँ स्वरूप बदलतै तँ नाम सेहो बदलि जाइत छै । उदाहरण लेल एना बूझू जे वैदिक साहित्य सरल वार्णिक छंदमे अछि मने एहन छंद जे अक्षरक संख्यासँ संचालित होइत अछि। अनुष्टुप छंदमे 32 अक्षर होइत छै। बादमे अनुष्टुप केर किछु स्थानपर लघु-गुरू केर स्थान नियत भेलै मुदा अक्षर बत्तीसे रहलै तँइ ओकर नाम अनुष्टुपे रहलै। बादमे एही छंदमे परिवर्तन भेलै आ अक्षरक संगे पूरा मात्राक्रम सेहो नियत कऽ देल गेलै जकरा वार्णिक छंद कहल गेलै आ अक्षर संचालित छंदक प्रयोग कम होइत गेलै। बादमे वार्णिक छंदक प्रचलन सेहो कम भेलै आ तकरा बदला मात्रिक छंदक प्रयोग होबए लगलै। एहि उदाहरणसँ स्पष्ट होइए जे छंदक स्वरूप बदलिते ओकर नाम बदलैत गेलै मुदा छंदक महत्व रहबे केलै। गजलोमे इएह छै। जे बहर अरबी भाषामे प्रचलित भेलै से फारसीमे नै आ जे फारसीमे प्रचलित भेलै से उर्दूमे नै। इएह बात मैथिली गजल लेल सेहो छै। 1222-1222-1222... बहर उर्दूमे अतिप्रचलित छै मुदा संभव जे ई मैथिली भाषाक अनुकूल नै हो आ तकरा बदला 121-1221-1221 वा 1212-1221-1212 वा कि एहने सन आन बहर आबि जाए। तँ ई भेलै परिवर्तन। एहन नै हेतै जे परिवर्तनक नामपर साफे-साफ छंद वा बहरकेँ हटा देल जेतै। 2) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "इतिहासपर दृष्टिपात करी, त स्पष्ट देखाइत अछि जे प्रत्येक काल-विशेषक मनुष्य ओहि काल-विशेषमे अपन कार्य-कुशलता, क्षमता आ परिणामदायी चेतनाक रेखांकन लेल नव औजार, नव उपकरणक आविष्कार कएलक अछि आ अनुपयोगी वा पिछड़ल औजारसभक त्याग कएलक अछि.." हमर कथन- अरविन्दजीक पहिले कथनक छायामात्र अछि ई बात। तँइ पहिले कथन बला हमर उत्तर अहूपर लागू हएत। 3) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "भगवतीचरण वर्मा कहै छथि– नव कवितामे लय आ छन्दके निरर्थक बुझल गेल अछि। किएक त लय आ छन्दक मान्यता प्राचीन छै आ जे किछु प्राचीन छै, ओ सड़ल-गलल छै, ओकरा नष्ट हेबाकहि चाही.." हमर कथन- नव कवितामे जे भऽ रहल छै ताहिसँ उपन्यास वा आलोचना विधाक शिल्पपर कतेक प्रभाव पड़लै से किएक ने कहि रहल छथि अरविन्दजी। जहिया ई बात कहि देता तहिया हमहूँ नव कविताक शिल्पसँ गजलक शिल्पक संबंध कहि देब। रेल गाड़ीक ढाँचा परिवर्तनसँ हवाइ जहाजक ढाँचापर की प्रभाव पड़तै से जनबाक लेल हमहूँ अधीर छी। 4) अरविन्दजी फेर अर्धाली लीखै छथि जे- "गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति...." हमर कथन- मैथिलीमे अवधी, ब्रजभाषा आदिक प्रभावें रस, रीति आ अलंकार आदिपर बहुत चर्चा भेलै मुदा ऐ सभहँक कारणें वाक्य असंतुलित होइत गेलै मने वाक्य केर स्वाभाविकता मरैत गेलै। मुदा अरबी-फारसी-उर्दूमे लोक जेहन अपन घरमे बाजैए ओकर शाइर ठीक ओहने वाक्यसँ शाइरी रचैत अछि तँए शेर-ओ-शाइरी सभहँक जीहपर चढ़ि जाइए मुदा मैथिलीक निज काव्य विधा जीहसँ खसि पड़ैत अछि मने लोक जल्दिए बिसरि जाइत छै। संस्कृतक एकटा प्रसिद्ध वाक्य थिक “गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति” । लोक एकर मतलब निकालै छथि जे कवि लेल गद्य लिखब आवश्यक कारण पद्यमे छंदक हिसाबसँ तोड़-ममोड़ तँ भऽ सकैए मुदा गद्यमे नै। मुदा ई सटीक नै। हमरा हिसाबें एकर गलत अर्थ लगाओल गेल छै। एकर अर्थ एना हेबाक चाही “पद्यमे जे कवि जतेक बेसी स्वाभिक रूपसँ गद्यक प्रयोग कऽ सकता सएह हुनक पद्य लेल निकष हेतनि” । हमरा बूझल अछि ई काज बहुत कठिनाह छै तँए एकरा मानए लेल कवि तैयार नै हेता। गद्यकार तँ अपनाकेँ एही बलें महान मानै छथि तँइ ओ तँ मानबे नै करता। 5) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहि देशमे विद्रोहक पहिल बीया गौतम बुद्ध खसएलनि। ओ बीया अंकुरित चाहे जहिया भेल हुअए, पल्लवित आ पुष्पित ओ तखनि भेल, जखनि सिद्ध-सन्तसभक समय आएल। विद्रोही तेवरहिक संग सिद्धलोकनिक प्राकृतमे लिखल साहित्य आधुनिकताक वाहक बनल आ एतहिसँ परम्परासभकें चुनौती भेटए लागल.." हमर कथन- हँ, परंपरा सभकेँ चुनौती भेटलै। मुदा धेआनसँ सोचियौ गौतम किएक सफल भेलाह विद्रोहमे। एकर मूल कारण छै जे गौतम सनातन धर्मक विशेषता ओ कमजोरी दूनूसँ परिचित भेलाह। ओइ विशेषताकेँ लऽ आ कमजोरीकेँ हटा अनुशासन संगे गौतम अपन नव पंथ चलेलाह जे कि लोकप्रिय भेल। सोचियौ जँ गौतम सनातन धर्मक विशेषता ओ कमजोरीसँ परिचित नै रहतथि तखन की होइतै? जँ ओ अपन नव विचार लेल अनुशासित नै रहितथि तखन कि ओ परिवर्तनक सफल नेतृत्व कऽ सकतथि? परिवर्तन वएह कऽ सकैए जे कि मूल नियमकेँ नीक जकाँ पालन केने होथि, ओकर ज्ञाता होथि मने अनुशासित होथि। एहन भैए ने सकैए जे नियमसँ अनजान लोक ओहि नियममे परिवर्तनक सफल संचालन केने होथि। गौतम बुद्ध बकायदा संघ केर संचालन लेल बहुत रास नियम बनेने रहथि। तखन तँ अरविन्दजीक हिसाबे गौतम बुद्ध सेहो संहिताक उपनिवेश बना देबाक लेल खराप भऽ गेलाह। बौद्ध धर्म अबिते साहित्य केर कथ्यमे परिवर्तन एलै। धेआनसँ पढ़ू कथ्यमे परिवर्तन भेलै। कर्मकांडक विरोध भेलै मुदा छंदेमे। छंदोमे परिवर्तन भेलै मुदा वार्णिक छंदक बदला मात्रिक छंद प्रचलित भेलै। मोन राखू संहिता ओहिना रहलै बस संहितामे नव-नव आकार-प्रकारक नियम सभ जुड़ि गेलै। दोहा-चौपाइ अही कालक देन छै। दोहे-चौपाइमे आन-आन पाँति जोड़ि घत्ता, कड़वक आदि छंद बनलै। आगू बढ़बासँ पहिने सरहपादजीक एकटा दोहा आ एकटा चौपाइ देखू (ई दोहा-चौपाइ हम हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावलीसँ लेने छी)- जीवन्तह जो नउ जरइ, सो अजरामर होइ। गुरु उवएसे विमल मइ, सो पर धरणा कोई ॥ एहि दोहामे देखू ठीक 13-11 केर नियमक पालन छै। आब चौपाइ देखू- पंडिअ सबल सत्य बक्खाणइ। देहहि बुद्ध बसन्त ण जाणइ॥ गमणागमण न तेन विखण्डिअ। तो वि णिलज्ज भणहि हउ पण्डिअ॥ एहि चौपाइ केर चारू पादमे 16-16 मात्रा छै। अरविन्दजी कोन आधारपर बौद्ध धर्मक परिवर्तनकेँ छंदसँ जोड़ि देलखनि से हमरा पता नै। एहि ठाम दुइएटा उदाहरण देलहुँ अछि। पाठक आरो ताकि सकै छथि। बौद्ध धर्ममे अधिकांशतः कर्मकांडक मारल ओ अशिक्षित जन एलाह आ तकर बादो ओ अपन साहित्यमे छंदकेँ नै छोड़लाह। हुनकर आलोचना शक्ति गलत कर्मकांड लेल प्रयोग भेल छंद लेल नै। वस्तुतः छंदे हुनका सभहक साहित्यमे अतेक शक्ति देलक जे हुनकर बात सुगमतासँ जनता लग पहुँचए लागल। आब एखन जे शिक्षित जन छथि से छंद किए छोड़ए चाहै छथि से नै पता। छोड़बाक छनि तँ छोड़ि सकै छथि मुदा पाठक-जनतामे भ्रम पसारब कतेक उचित? छांदिक विधाक नामपर अछंद परसब कतेक उचित। ई सभ अपन रचनाक लेल दोसर नाम किएक नै ताकै छथि। व्यक्तिगत तौरपर हमरा बिना छंद बला रचनासँ दिक्कत नै अछि मुदा अछांदिक रचनाकार सभहक ई दायित्व छनि जे ओ कोनो विधाक नामपर अराजकता नै पसारथि। जँ कियो गजलमे बहरक-काफियाक पालन नै चाहै छथि तँ ओहि रचनाकेँ गजल नै कहथि। गजल जखने कहता तखने गजलक विधान ताकल जेतनि, ओहि आधारपर हुनकर कमजोरी उजागर कएल जेतनि। हमरा पूरा विश्वास अछि जे बौद्ध गण सभ अशिक्षित रहितो संस्कृतक छंद वा गजलक लेखन केने रहितथि तँ जरूरे ओकरो नियम पालन केने रहितथि। कारण ओ सभ अनुशासित छलाह, नियमक महत्वसँ परिचित छलाह तकर उदाहरण उपरमे हम देने छी। 6) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एकटा छोट-सन उदाहरण मुस्लिम स्त्रीक बुर्काक ली त एकर पारम्परिक रंग कारी होइत रहए। कालान्तरमे एकरा कलात्मक कढ़ाइसँ फैशनेबुल बनाएल गेलए आ आब ई उज्जर, कत्थी, भुइला आदि अनेक रंगमे उपलब्ध आ चलनमे छै। नहि आयल जे मुस्लिम सन कट्टर समुदाय पारम्परिकता आ आचार-संहिताक आधारपर एकरा बुर्का मानए सँ इनकार कएने हुअए.." हमर कथन- एक बेर फेर अरविन्दजी परिवर्तनकेँ निशान मिटा देब बूझि लेने छथि। ओ बुर्कामे कढ़ाइ केर उदाहरण दऽ रहल छथि मुदा हम पुछबनि जे कढ़ाइ देलाक बाद बुर्का बुर्के रहलै वा कि बुर्काक बदला साड़ी भऽ गेलै। बुर्का रहबे केलै। तेनाहिते छंद रहबे करतै, बहर रहबे करतै। फेर कहब नियममे परिवर्तन नियमकेँ मानिए कऽ संभव छै। हम बहरे विदेह (22-22-22-22-1) मे गजल कहै छी। अरविन्दजीकेँ दिक्कत हेतनि तँ एहिमे परिवर्तन कऽ बहरे कोसी बन लेताह। ओहिमे दिक्कते की छै। दू टा उदाहरण दऽ रहल छी आ दूनूक पात्र जीबिते छथि। भारतीय शास्त्रीय संगीतमे विश्वमोहन भट्ट प्रख्यात नाम छथि। पं रविशंकरसँ सितार सिखने छथि बादमे भट्टजी सितार आ गिटार दूनूक संयोगसँ अलग वाद्य यंत्र बनेलाह जकर नाम भेलै "मोहनवीणा"। एहने एकटा कलाकार छथि निलाद्रि कुमार। ईहो सितारक महान वादक छथि। बादमे सितारक तारमे किछु परिवर्तन कऽ अलग बनेलाह जकर नाम भेलै "जितार"। एहि उदाहरण सभसँ दू टा बात स्पष्ट अछि जे पहिल जे कोनो मूल चीजमे परिवर्तन करबा लेल ओहि मूल चीजक बारेमे पूरा जानब आवश्यक अछि। दोसर परिवर्तन भेलाक बाद नव चीजक नया नाम होइत छै। अरविन्दजी जँ बहरमे परिवर्तन चाहै छथि तँ हुनका पहिने बहरक पालन करए पड़तनि। अइ बिनु परिवर्तन सफल नै हेतनि। जँ बहरक पालन नै चाहै छथि तँ ओकरो स्वागत मुदा तखन अपन विधा लेल नव नाम ताकथु। अन्यथा गजल लेल जे अनिवार्य तत्व सभ छै से हुनकर रचनामे ताकल जेबे करत आ नै भेटलापर खारिज हेबे करत। आ इएह बात ओहन सभपर लागू होइए जे कि अपन कमजोरी नुकेबाक लेल किछुओ लीखि ओकरा गजल कहि देबाक अभियान चला लेने छथि। 7) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "उल्लेख करैत चली जे हमरा सभक प्राचीनतम काव्य वेदसभमे सुरक्षित अछि, फेर रामायण आ महाभारतमे। एहिना 'नाट्यशास्त्र हि काव्य शास्त्रक प्राचीनतम ग्रंथ अछि जकर समय ईसा पूर्व छठम् शतीसँ लए कए ईसाक दोसर शती तक मानल गेल अछि आ भरत मुनि काव्य-शास्त्रक आदि चिंतक। एहि प्राचीनतम काव्य आ प्राचीनतम काव्य शास्त्रक बीच अनेक शतीक अन्तर अछि। भरत मुनिसँ लए कए पंडितराज जगन्नाथ तक लगभग डेढ़ हजार वर्ष तक पसरल संस्कृत काव्यशास्त्रक परम्परामे अनेक काव्य सिद्धान्तक प्रतिपादन आ खण्डन-मण्डन होइत रहल अछि.." हमर कथन- डेढ़ हजार वर्ष हो कि डेढ़ लाख वर्ष मुदा जे भेल से संहितेक भीतर भेल। नियमक भीतर भेल, छंदक भीतर भेल। हँ एतेक तँ हम जरूर मानब जे गायत्री कि अनुष्टुप छंदमे व्यक्त भेल कर्मकांडक खंडन दोहा-चौपाइ वा कि आन कोनो छंदमे भेल। मुदा जे भेल से छंदेसँ भेल। 8) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "ई अलग बात जे अरबीमे गजल नहि भेटैत अछि.." हमर कथन- ई बात ओहिना भेल जेना कियो कहथि जे भारतमे बौद्ध धर्म जन्मल मुदा बौद्धसँ संबंधित चीज भारतमे नै लिखाएल। अरबीमे गजलक परंपराक एक झलक अरविन्दजी एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि https://www.dawn.com/ 9) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "प्रत्येक युग लीक छोड़िकए चलनिहार सिंह आ सपूतके जन्म देलक अछि त लीक छोड़ि चलनिहार शाइरके सेहो.." हमर कथन- ई बात सही छै जे हरेक कालखंडमे लीक छोड़ि चएल बला सभ हरेक क्षेत्रमे भेलाह अछि। मुदा लीक छोड़ि चलब की छै? की बिनु पएरकेँ लीक छोड़ि चलल जा सकैए? हमरा जनैत अरविन्देजी नै हरेक मैथिल बिनु पएरकेँ चलब लीक छोड़ि चलब मानि लेने छथि। चलब क्रियामे पएर महत्वपूर्ण छै से चाहे पुरने लीकपर हो कि नव लीकपर। एकटा फेर उदाहरण दै छी जकर पात्र एखनो जीबैत छथि। होली उल्लासक पाबनि छै आ तकर गीतमे उल्लासे भाव रहैत छै। होली गीतक प्रमुख पात्र क्रमशः कृष्ण, राम, शिव ओ अन्य छथि। ताहूमे शिव पात्र बला गीत दू खंडमे छै पहिल तँ जेना राम वा कृष्णक छनि। आ दोसर श्मसान बला। आन गीत सभ तँ समाजमे प्रचलित छै मुदा श्मसान बला होली गीत समाजमे प्रचलित एखनो बेसी नै छै। भारतीय शास्त्रीय संगीतमे छन्नू लाल मिश्र नामक गायक छथि जे कि शिवक श्मसान बला होली गीत समाजमे प्रचलित केलाह। गीतक बोल छै "खेले मसाने मे होली दिगंबर.."। एहन नै छै जे ई होली गीतक छन्नु लाल जी देलाह। ई गीत तँ बहुत पहिनेसँ छै मुदा एहि गीतक संग जे धारणा छै से छन्नु लालजी तोड़लाह। मुदा एहि धारणाकेँ तोड़बाक लेल छन्नुजी होली गीतकेँ सोहर, कि चौमासा कि कजरी रागमे नै गेलखिन। होलीक जे राग छै ताही रागमे ओ गेलखिन। लीक तोड़ब इएह भेलै। जँ छन्नू लालजी होलीकेँ सोहर रागमे गेने रहितथि तँ भारतक संगीत समाज हुनका माथसँ पटकि देने रहितनि। साहित्यकार लीक तोड़थि मुदा अपन पएर काटि कऽ नै से जानब आवश्यक। एहिठाम हम अपन नोट- लगाएब जे मैथिली साहित्ये नै, गीत-संगीत, परंपरा, बिजनेस आदि कोनो काजमे आगू नै छथि तकर एक मात्र कारण इएह अछि जे ओ सभ अपन पएर काटबकेँ लीक तोड़ब बुझि लेने छथि। 10) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "1700 ई. अर्थात् आइसँ तीन शताब्दी पहिने वली दक्खिनी (दकनी), जिनका ‘पैगम्बर-ए-सुखन' अर्थात् शाइरीक पैगम्बर कहल गेल छै, शब्दके अपन तरीकासँ लिखबाक छूट लेलनि। ओ 'तुमको' के 'तुमन', 'हमको' के 'हमन', 'से' के '', 'से', 'सेती' आ 'को' के 'कूँ' लिखलनि। ई ‘हमन'बला प्रयोग कबीर लग सेहो भेटै छै- हमन है इश्क मस्ताना.." हमर कथन- भाषायी छूट तँ मैथिलीमे बहुत बेसी छै। केयो बदला कियो, कएल, कयल,कैल.... जतेक छूट लेताह अरविन्दजी से लेथि। एहिमे कोन मनाही छै। मूल बात ई छै जे जेहन शब्द हेतै तकर मात्रा ओनाहिते गनेतै। हमन=12, हमारा=122, हम=2 तेनाहिते केयो=22, कियो=12, एम्हर-22, कएल=121, कयल=12,कैल=21 कतेक रूपक प्रयोग करताह अरविन्दजी। दोसर बात छूटो ओकरे भेटै छै जे अनुशासित होइत छै। अरविन्द जी कबीरक पाँति देलाह अछि "हमन है इश्क मस्ताना.."। ई वस्तुतः गजल छै आ से पूरा बहरमे छै। दू टा शेर दऽ रहल छी- हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दरबदर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या? ई गजल बहर—ए—हजज जाहिमे 1222-1222-1222-1222 केर मात्राक्रम अछि तकर पूरा पालन भेल अछि। उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे छूटो हुनको भेटि सकैए जे अनुशासित छथि। कबीर अनुशासित छलाह तँइ हुनकर भाषायी प्रयोग स्वीकारल गेलनि। मैथिलीमे बहुते भाषायी छूट छै तँइ छंद-बहरक पालन बहुत आसान छै। अरविन्दजी जानथि कि नै जानथि मुदा पाठक एक बात अवश्य जानि लेथि जे प्राचीन क्रांतिकारी कवि जेना पादगण, रैदास, कबीर ओ अन्य सभ छंदक पालन केने छथि। ओ सभ विद्रोह केने छथि, परिवर्तन केने छथि मुदा समाजमे भ्रम पसारि कऽ नै। आ एहि आलेखमे हम उदाहरण स्वरूप हुनकर लिखल सभ सेहो देने छी। 11) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "कोनो गजलक मतलाक शेरक दुनू मिसरामे समान रदीफक प्रयोगक आग्रह रहल अछि। किन्तु उर्दूएक अनेक शाइर एकरा अनेक ठाम अनठिअएने छथि। आ तेकर उदाहरण गालिबसँ लए कए अली सरदार जाफरी आदि तक देखल जाए सकैत अछि। आ ई रदीफ की छै? गालिबक संग्रह (प्रस्तुति : राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली)मे गजलसँ पहिने शीर्षक रूपमे ओकर रदीफ एना लिखल गेल छै– रदीफ अलिफ (अ), रदीफ ते (त), रदीफ जीम (ज), रदीफ दाल (द), रदीफ रे (र), रदीफ सीन (स), रदीफ काफ (क), रदीफ मीम (म), रदीफ नून (न), रदीफ गाफ (ग), रदीफ वाओ (व, ओ), रदीफ ये (ए, इ, ई) आदि। एहन स्थितिमे उर्दूसँ दीगर भाषाबला लोक की करत.." हमर कथन- अरविन्दजी पता नै कोन पोथी पढ़ि एहि बातकेँ गजलसँ जोड़ि देलखिन। हम जतेक जनैत छी ताहि अनुसारे ई गजलक नियम छैहे नै। अरविन्दजी जतेक बात लिखने छथि ताहिसँ बुझाइए जे ओ दीवानक परिभाषा नै बुझि सकल छथि। दीवान कोनो शाइरक एहन गजल संग्रहकेँ कहल जाइत छै जाहिमे गजलक प्रस्तुति ओकर रदीफक अंतिम वर्णानुसार हो। आब उर्दूमे वर्ण कोना होइत छै से बूझल हेतनि अरविन्दजीकेँ से उम्मेद अछि हमरा। मने दीवान गजलक प्रस्तुतिकरण शब्दकोशक नियमसँ चलैत छै। मज्मूआ एहन संग्रहकेँ कहल जाइत छै जाहिमे वर्णानुसार प्रस्तुति नै होइत छै। कोनो शाइर केर रचनाक समग्र प्रस्तुतिकेँ कुल्लियात कहल जाइत छै। आब पोथीमे रचनाक प्रस्तुतिकरणकेँ गजलक बहरसँ कोन आ कतेक संबंध छै से हमरा नै पता। 12) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहिना एकटा आग्रह छै तकाबल- रदीफैन। एकर अनुसार मतलाक बाद बला शेरक पहिल मिसरामे रदीफ नहि अएबाक चाही। रदीफ लमगर है त ओकर अन्तिमहु शब्द नहि अएबाक चाही। किए? उस्ताद एकर उत्तरमे कहताह जे फारसी अरुजक इएह परम्परा छै। चूल्हिमे जाओ परम्परा! अँ कथ्यक सौन्दर्यक लेल दुनू मिसरामे रदीफक अन्तिम शब्द आबि गेलए, रदीफ आबि गेलए त कोन अन्हेर भए गेले.." हमर कथन- हरेक काव्यशास्त्रमे एहन बहुत रास दोषक विवरण होइत छै जकरा हटेलासँ काव्य उत्तम होइत छै। भारतीय काव्य परंपरामे सेहो बहुत रास काव्य दोष छै जेना- शब्द दोष, च्युत संस्कृति दोष, अश्लीलत्व दोष, क्लिष्टत्व दोष आदि सभ छै। एहि दोष सभहक अतबे मतलब भेलै जे काव्यमे जँ ई दोष नै रहितै तँ ई उत्तम काव्य होइतै। जँ कोनो काव्यमे अनिवार्य नियम यथा छंदक आदिक पालन तँ भेल छै मुदा आन कोनो दोष छै तैयो दोषक संग ओ काव्य तँ छैहे कारण ओकर अनिवार्य नियम यथा छंदक आदिक पालन तँ भेले छै। तेनाहिते शाइरीक परंपरामे सेहो बहुत रास ऐब (दोष) केर उल्लेख छै जाहिमे एकटा ऐब छै- तकाबल-ए-रदीफैन। एहि दोषक ई परिभाषा भेलै- जँ मतलाक बाद कोनो आन शेरक पहिल पाँतिक अंतमे बिना काफियाक रदीफ देल जाए तँ ओ दोष भेलै। ठीके ई दोष भेलै। मुदा एकर अपवादो सभ छै मुदा अपवाद नियम नै होइत छै। अपवादकेँ अपवादे मानब उचित। अरविन्दजी अपवादकेँ नियम मानि लेने छथि से हमरा बुझाइए। फेर मोन राखू- काव्य दोषक मतलब छै जे काव्यमे अनिवार्य नियमक पालन भेलाक बादक दोष। एहि दोष लेल अनिवार्य नियमकेँ बेकार मानब कतेक उचित से पाठक वर्ग जानथि। 13) अरविन्दजी लीखै छथि जे- 'कोई हो मौसम थम नहीं सकता रक्से-जुनूँ दीवानो का जंजीरों की झनकारों में शोरे-बहाराँ बाकी है।' अली सरदार जाफरीक एहि गजलक उपरोक्त मतलाक शेरमे दुनू मिसराक अन्तमे रदीफक अनिवार्यता नहि मानल गेल छै..’ हमर कथन-अरविन्दजी अली सरदार जाफरीजीक जाहि पाँतिक उल्लेख केने छथि से जाफरीजीक पोथी "मेरा सफर"सँ लेल गेल अछि जे कि भारतीय ज्ञानपीठसँ प्रकाशित भेल अछि। ई पोथी जाफरीजीक नज्म सभहक संग्रह अछि। ओना नज्मक पोथीमे सेहो गजलक संकलन भऽ सकैए वा कि गजलक संग्रहमे नज्म सेहो भऽ सकैए। कोनो गजलमे मतला नै छै (बहुत एहन उदाहरण भेटत) जकर एकमात्र कारण छै जे बहुत बेर एहन होइ छै जे शेर सभ लिखाएल मुदा ओकर मतले सटीक नै आबै छै तखन या तँ रचनाकार अपने ओकरा संकलन कऽ दै छै वा कि ओकर संपादक ऐतिहासिकताक दृष्टिकोणसँ दै छै। लगभग 100 बर्ख पहिले धरि गजल आ नज्मक शिलपमे ओतबे अंतर रहै जतेक अंतर तसलाक भात एवं प्रेसर कुकर (आब राइस कुजिन सेहो) केर भातमे छै। एकटा नज्मक उदाहरण दै छी जे कि छै तँ नज्म मुदा अरविन्दजी ओकरा गजल मानि लेताह। ई नज्म मजाज केर छनि- शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ अरविन्दजी एकरा गजल मानि लेताह कारण एहिमे काफिया-रदीफक पालन भेल छै। तँ की ई गजल भऽ जेतै? मैथिलीक लेखक सभकेँ शाइरी परंपराक अध्य्यन करबाक चाही। शाइरी माने मात्र गजले टा नै होइ छै। हमरा लगैए जे अरविन्दजी गजल आ नज्मकेँ एकै बूझि लेने छथि। 14) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "गजलक अन्तिम शेर, जेकरा मकता कहल जाइ छै, ताहि शेरमे गजलकार अपन नाम, उपनाम अथवा तखाल्लुस आनै छै। अँ एकर प्रयोग नहि हुअए किंवा मकताक शेरमे प्रयोग नहि कए मतलाक शेरमे वा बीच बला कोनो शेरमे प्रयोग कएल जाइ त एहिसँ गजलकें कोन क्षति होइ छै, जैं फॉर्मेटक बदला कथ्यके महत्व दी त एहिसँ कोनोटा क्षति नहि, रत्तीअहु भरि नहि.." हमर कथन- लगैए अरविन्दजी गजलक प्रकृतिसँ ओतेक परिचय प्राप्त नै कऽ सकल छथि। गजलक हरेक शेर स्वतंत्र रूपमे होइत छै तँइ दोसर शेरकेँ तेसर स्थानपर दऽ दियौ वा कि चारिम कि पाँचम स्थानपर ओहिसँ किछु नै बिगड़तै। हँ, मतलाकेँ अपन पहिले स्थानपर हेबाक चाही अनिवार्य रूपसँ। शेरमे शाइर अपन नाम-उपनामक प्रयोग नहिए करता तँ गजलकेँ की बिगड़ै छै? आब ओनाहुतो नाम उपनामक प्रयोग नै के बराबर छै। जँ शाइर चाहथि तँ अपन नाम-उपनाम बला शेर गजलमे कत्तौ राखि सकै छथि मुदा तकरा "मकता" नहि कहि सकै छथि। नाम-उपनामसँ सजल शेर मकता तखने कहा सकैए जखन कि ओ सभसँ अंतमे आबै। एकटा प्रश्न अरविन्दजी जखन शेरक स्थान लऽ कऽ कोनो दिक्कत नै छै तखन आन स्थानपर नाम बला शेरकेँ मकता कहबाक जिद किए धेने छथि। 15) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "छन्दक उपयोग गेयता लेल, गेयताक उपयोग लोकप्रियता लेल होइ छै आ लोकप्रियताक लालच शाइरके वायवीय संसारमे लए जाइत छै, यथार्थसँ दूर करै छै.." हमर कथन- अरविन्दजीकेँ छन्दक प्रकृति नै बूझल छनि। छंद गेयता लेल नै होइत छै। असंख्य एहन रचना छै जे कि बिना छंदक छै आ ओकर गायन लोकप्रिय छै। ई अलग बात जे छंद बला रचनाकेँ सेहो गाएल जाइत रहलैए मुदा ई अपराध तँ नै छै। छंद एकटा बाटक नाम छै। जँ अहाँकेँ ओहि बाटपर नै चलबाक अछि तँ ई अहाँक मर्जी मुदा छंदक बाटसँ जे लक्ष्य भेटै छै सएह लक्ष्य ओहि बाटकेँ छोड़ि अहाँ क्लेम करबै से मान्य नहि हएत। बिना दोहाक नियम पालन केने अहाँ कोनो दू पाँतिकेँ दोहा कहि देबै से कियो नै मानत। बिना बहरक रचनाकेँ गजल कहि देबै कियो नै मानत। जँ छंदक बाट नै चाही तँ अहाँ अपन रचनाकेँ अलग नाम दियौ। इएह उचित तरीका छै। 16) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "साहित्यकारसँ अपेक्षित अछि जे ओ लोकक रुचि बदलए आ वएह बात कहए जे सत्य छै, भनहि अप्रिय हुअए आ लोककें तत्काल नीक नहिअहु लागए.." हमर कथन- लोकक रुचि बदलबाक काज छंदक नै, रचनाक कथ्यक नै बल्कि लेखक केर आचरणपर निर्भर करै छै। जाहि लेखक केर आचरण नीक रहतै ओहि लेखक केर बिना छंदो बला रचना लोकक रुचि बदलि देतै। जाहि लेखक केर आचरण भ्रष्ट छै से कतबो छंद राखत ओ रुचि नै बदलि सकैए। प्रधानमंत्री आवास योजनामे घूस खाए बला लेखक कि अपन कनियाँ छोड़ि आन ठाम मूँह मारए बला लेखक सभहक नकली गर्जन चमचा सभ सूनै छै समाज नै। अरविन्दजीक लेखन-आचरण एकसमान छनि। जँ ओ बिना भ्रम पसारने अछंदोमे लिखता प्रभावी हेतै मुदा शर्त अतबे जे भ्रम केर संग छोड़ए पड़तनि। समाजमे बिना भ्रम पसारने अपन बात राखब बेसी काज करतै। 17) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "अली सरदार जाफरी सन जिदिआह शाइर सेहो भेला जे अवाजक जोर-आजमाईशक बीच बिनु ऊँचगर आवाज आ बिनु आलाप लेने अपन रचना-पाठकें लोकप्रिय बनाए लेलनि, आ रचना केहन त आजाद आ रदीफ-काफिया रहित। सरदार जाफरी दिआ सिद्धिकुर्रहमान लिखै छथि- ...आजाद आ रदीफ-काफिया रहित नज्मकें जै स्वीकार कए लेल गेल.." हमर कथन- उपरमे हम संकेत देने छलहुँ जे अरविन्दजी गजल आ नज्मकेँ एकै बूझि लेने छथि। से एहि ठाम स्पष्ट भऽ गेल। एक बेर फेर हम कहब जे नज्मक शिल्पकेँ गजलक शिल्पसँ कोन लेना-देना छै। दूनू अलग-अलग विधा छै। हम तँ अतबे कहि सकै छी जे शाइरीमे मात्र गजले नै बहुत रास विधा छै। परिचय प्राप्त करबाक भार अरविन्दजीक उपर छनि। 18) अरविन्दजी लीखै छथि जे-"वाचिक परम्पराहिक परिणाम रहए जे कविता ‘सुनाएल' जाइत रहए, गजल 'कहल' जाइत रहए। स्वाभाविक रहय जे एहि 'सुनाबए' आ 'कहए' के प्रक्रियामे गेयता एकटा प्रमुख कारक भए गेलए.." हमर कथन- हम अरविन्दजीकेँ मोन पाड़ए चाहबनि जे वाचिक परंपरामे कविते आ गजल नै कथो कहल आ सुनाएल जाइत छलै। आ कथे किए वाचिक (मूल परंपरा) रूपे साहित्य केर सभ विधा कहले आ सुनाएल जाइत छलै। मुदा ताहिमे गेयता रहितो छलै आ नहियो रहैत छलै। लिखित परंपरा बहुत बादमे बहुत कम मात्रामे भेलै। बादमे जा कऽ पूरा-पूरी लिखित परंपरा एलै जे कि एखन धरि छै। मुदा ताहूमे आब परिवर्तन भऽ रहल छै। ई सभ तँ छल अरविन्दजीक भूमिकाक संदर्भमे हमर कथन। एहि भूमिकामे बहुत रास बात एहनो अछि जकरा गजल विधासँ नजदीकी संबंध नै छै। हम एहन प्रसंगकेँ छोड़ि देल अछि। आब एहिसँ आगू बढ़ि एहि पोथीक रचनाक कथ्यपर सेहो बात कऽ ली से नीक रहत। ई बात हम बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे मैथिलीमे लगभग सभ रचाकारक कथ्य ठीक रहैत छनि तँइ अरविन्दजीक रचनाक कथ्य सेहो ठीक छनि मुदा एकटा अंतर हमरा देखाइए जे जतेक खुलल वा नीक विषय ई अपन कवितामे निर्वाह करैत छथि ततेक एहि कथित गजल सभमे नै अछि। ई बात तखन छै जखन कि एहि रचना सभमे छंदक निर्वाह नै भेल छै। जँ छंद रहितै तखन कहल जा सकैत छलै जे छंदक कारणे कथ्य बाधित भेलै मुदा बिना छंदक रचना रहितो अरविन्दजी अपन कविता बला तेवर एहिमे नै आनि सकलाह। जे पाठक अरविन्दजी नव कविता संग्रह "सबद मितारथ ध्याया" एवं ई कथित गजलक संग्रह पढ़ने हेता से हमर अइ कथनकेँ जाँचि सकै छथि। ओना अपवाद हरेक नियमक छै तँइ एहि संग्रहमे किछु एहनो पाँति सभ अछि जे नव छै जकरा नीक कविता वा पद्य मानल जा सकैए। एहन पाँति सभकेँ हम निच्चा लिखैत जा रहल छी— अहाँ इशारा करैत गेलौं, हम शत योजन धरि बुलिते गेलिऐ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX नर छै, मादा छै,हिजड़ा छै ई सत्ता, की छिअय किन्नहुँ नञि बुझि पएबह, लाख गत्तर देखि लएह XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX कतेक बाधा टपि ई लत्ती चार पर पहुँचल हेतय जेकर धन जिजीविषा, तेकरेसँ ई बुझल हेतय XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX छिटने छथि जे वीर्य अपन देहक बजारमे अक्षतयोनि कनियाँ संग कोहबर चाहय छथि एहि नीक पाँतिक संगे किछु एहनो पाँति सभ अछि जाहि ठाम हमर अनुभव नै पहुँचि सकल अछि। एहन पाँति सभ अछि— लड्डू जकाँ भिड़ल भैयारी गाम लुटय छै बुनियाँ रामा एहि दू पाँतिमे हमरा बिंबे उल्टा लागल। लड्डू तँ एकताक बिंब हेबाक चाही। कारण लड्डूक सभ घटक एकठाम रहैत छै। अही पोथीक दोसर रचनाक पाँति देखू जाहिमे बिंब ठीक अछि - सभ अंगुरी भए सघन सकत मुक्का भए जाइ छै एका तजि सक्कत पाथर गरदा भए जाइ छै हम पहिने कहने छी जे ई हमर अनुभवजन्य बाध्यता सेहो भऽ सकैए मुदा हम जे इशारा केलहुँ तकरा पाठक नीक जकाँ देखताह से हमरा विश्वास अछि। एहि उदाहरण सभक अतिरिक्त एहि पोथीक भाषोपर बात हेबाक चाही। जँ हम दरभंगा-मधुबनीक आँखिसँ पोथीक भाषाकेँ देखबै तँ एहि पोथीमे सुधारक जरूरति बुझाएत मुदा हमरा सभकेँ एहि पोथीक भाषाकेँ सरहसा-सुपौलक हिसाबसँ देखए पड़त तखने सही तथ्य एतै आ दुर्भाग्यसँ हम ओहि कातक भाषासँ ओतेक परिचित नै छी। मुदा अरविन्दजीसँ हमरा जतेक बात होइए तकर ध्वनि आधारपर हम कहि सकैत छी जे एहि पोथीमे ओहि क्षेत्रक स्थानीय पुट लेने अछि ई पोथी आ से मैथिली लेल शुभ अछि। हमर सभहक (समग्र विदेह पत्रिका) आग्रह हरेक लेखकसँ पहिनेहो रहैत छल आ एखनो अछि जे लेखक अपन परिवेशक भाषामे लीखथि। आ निश्चित तौरपर अरविन्दजी अपन परिवेशक भाषामे लिखने छथि तँइ हुनका द्वारा उठाएल भाषायी छूट (देखू प्वांइट-10) केर कोनो विशेष अर्थ नै लगैए। स पूर्व्यो महोनां वेनः क्रतुभिरानजे। यस्य द्वारा मनुः पिता देवेषु धिय आनजे।। (सामवेदक ई मंत्र अछि जकर मूल अर्थ अछि जे याज्ञिक आदिक सहयोगसँ हविष्यान्नक सेवन करबाक लेल सभ देवताक राजा इंद्र यज्ञ स्थलपर अबैत छथि। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे मैथिली पाठक एहि आलोचनाक आनंद प्राप्त करबाक लेल एहिठाम आएल हेताह) नोट- संस्कृत साहित्यमे हमर गति बेसी नै अछि। हम जतेक जे उदाहरण एवं अर्थ देलहुँ से पोथी सभसँ लेने छी। हँ, ओकर उपयोग कोन ठाम हो से विचार हमर अछि। साहित्य केंद्रित जोगीरा पूर्वांचलमे जे जोगीरा प्रचलित अछि तकर विषय दिअर-भाउज, ननदि-भाउज, सारि-सार-बहनोइ (मने क्षम्य सबंध केर परिधिमे) अछि। प्रेम विषयक किछु जोगीरा सेहो किछु अछि। बहुत बेर कोनो लोककेँ खिसिएबाक लेल सेहो जोगीरा कहल जाइत छै। नब्बे केर दशकमे भोजपुरीमे किछु राजनीतिक जोगीरा केर रचना सेहो भेलै। इम्हर दू-तीन बर्खसँ हम साहित्य केंद्रित जोगीरा केर रचनासँ प्रमुखतासँ क' रहल छी। एहिमे हम साहित्यिक विडंबना केर स्थान दैत छियै। एखन हम मानैत छी जे साहित्य केंद्रित जोगीरा लोककेँ नै नीक लागैत हेतनि कारण ई प्रारंभिक अवस्थामे छै आ दोसर जे एकर गायन लेल एखन गायक उपल्ब्ध नै छथि। मुदा पाँच छह बर्खमे साहित्य केंद्रित जोगीरा अपन स्थान बना लेत से हमरा विश्वास अछि। ओना मैथिलीमे मात्र पहिल हेबाक जोर रहैत छै तँइ हमरा विश्वास अछि जे कियो ने कियो भूतकालमे साहित्यिक जोगीरा लिखने हेता आ तकर बाद ओकरा खत्तामे फेकि अपन नाम इतिहासमे लिखा लेने हेता मुदा साहित्यमे एकर संभावना क्षीण बुझाइए कारण लेखक अपन वर्गक कमीपर टिप्पणी करत से स्थिति मैथिलीमे बहुत कम अछि तँइ ईहो हम मानि सकै छी जे हमरे लिखल साहित्यिक जोगीरा पहिल हो। तँ प्रस्तुत अछि किछु साहित्यिक जोगीरा। ई जोगीरा सभ फेसबुकपर प्रायः बहुत बर्खसँ हम दऽ रहल छी जकरा एहि ठाम हम एकट्ठा कऽ विदेहक पाठक लेल देलहुँ अछि-- 1 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा लड्डू, पेड़ा छेना बँटलहुँ निकहा बुनियाँ तैयो ने देलक हमरा पुरस्कार ई दुनियाँ जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 2 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा बौआकेँ लगलै लेखक बनबाक भूख बौआ चाटै छै पुरस्कार लेल थूक जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 3 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा कहानी भेलै काँच कविता भेलै तीत पुरस्कार लेल जूरी लागै बापोसँ मीठ जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 5 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा पोथी लेने घूमैए बौआ कोने कोन जूरी केर दर्शन भेलै चानी ओ सोन जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 6 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा चाहे गजेनदर हो कि हो अनचिन्हार मठाधीश के चाही विदेहिया भतार जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 7 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा दू दुन्नी चारि पढ़ि बनलै चारि सए बीस जूरी के दरबज्जापर चरबै महींस जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 8 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा जकरा लागै पुरस्कारक पियास तकरे मूँह होइ बेर बेर उदास जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 9 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा चिन्नीसँ बेसी मिठ आलोचक के बोली लेखक सभ खोलि देलकै ओकरा लग चोली जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 10 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा जे लगबै छे जत्ते मक्खन पुरस्कार भेटै तत्ते चिक्कन जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 11 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा पुरना लेखक लेल अनेरे बबाल नवका हँसोथि गेल सभहँक माल जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 12 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा एक हाथक किताबमे दस हाथ के परिचय पन्ने पन्ना लिखने छै अपने जय जय जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 13 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा पटना बला आलोचक केलकै बड़का प्लान दरभंगामे खोलि लेलकै पुरस्कारक दोकान जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 14 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा मंचपर सस्ता भेलै कोनो मिथिला रत्न आत्मसम्मान बेचि क' किनबाक यत्न जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 15 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा एकटा संस्थाक मालिक हजार संस्था बनलै माछक बजार जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 16 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा सहरसा दरभंगा बला ठोकै कपार पटना बला केलकै विदेहिया भतार जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 17 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा दरभंगाकेँ पुरहित पटना के पंडा सहरसाकेँ मुर्गी मधुबन्नी के अंडा जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 18 जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा मंदिरमे जा क' गाबै राधे राधे पुरस्कार पाबि मूतै ठारे ठारे जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 19 सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा कोन खेत केर आलू भाँटा कोन खेत केर सजमनि कोन खेत केर लेखक बाबू भेलैए लतखुर्दनि अइ खेतक आलू भाँटा ओइ खेतक सजमनि पुरस्कार खेतक लेखक बाबू भेलैए लतखुर्दनि जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 20 सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा एक डारिपर दू चिड़ैया दन्नू उड़लै फुर्ररररररर पुरस्कार बिन लेखक बाजै चुर्रररररररररररर जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा 21 सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीजी सारा रारा रारा रारा गुंडा मारै सभ्य लोककेँ आ टीका मारै बीमारी लेखक मारै अपन अत्मा लै पुरस्कार सरकारी जोगीजी सारा रारा रारा रारा रारा रारा ए जोगीरा सारा रारा रारा रारा राम लोचन ठाकुरजीक गद्य रचना काव्य माने रचना से चाहे जे रचना हो। बहुत लोक जानि-बूझि कऽ अपन स्वार्थ सिद्ध करबाक लेल काव्यकेँ मात्र कविता धरि लऽ जाइत छथि। रचनाकारक अपन प्रकृतिक हिसाबसँ काव्य केर प्रकृति भऽ जाइत छै जाहिमे दू टा मुख्य प्रवृति ताकल गेल पहिल सरस दोसर शुष्क। सरस काव्यकेँ पद्य कहल गेल तँ शुष्क काव्यकेँ गद्य। आब पद्योमे छंद, कथन एवं वर्णनक हिसाबें बहुत भेद भेल जेना ॠचा, मंत्र, गाथा, महाकाव्य, गीत गजल, आधुनिक कविता तेनाहिते गद्योमे बहुत भेद भेल जेना खिस्सा, कथा, उपन्यास, समीक्षा, आलोचना, लेख, निबंध व्यंग्य कथा आदि-आदि। आधुनिक युगमे गद्य केर प्रधानता भेल मुदा ताहि संगे एकटा भ्रम सेहो शुरू भेल। भ्रम ई जे किछु लोक गद्यकेँ मात्र कथा-उपन्यास धरि लऽ जाइत छथि। एहन लोक सभकेँ कहैत छथि जे गद्य लीखू मुदा हुनकर दृष्टि मात्र कथा रहैत छनि। कथाकार-उपन्यासकार सभ लेख, निबंध, आलोचना, नाटक आदिकेँ गद्य मानिते नै छथि। लेखककेँ एहि तरहक भ्रमसँ बचि कऽ रहबाक चाही। रामलोचन ठाकुर मैथिली गद्यमे नीक काज केने छथि आ से गद्य केर विभिन्न रूपमे जेना नाटक, लेख-निबंध, व्यंग्य, कथा, संपादकीय, अनुवाद आदि। जँ एकरा हम वर्गीकरण करी तँ एना हएत-- 1) अनुवादित नाटक-जादूगर, फाँस, रिहर्सल, चारि पहर, किशुन जी विशुन जी, बाह रे बच्चा राम (6 टा पोथी) 2) व्यंग्य- बेताल कथा (1 टा पोथी) 3) मैथिली लोककथा (1 टा पोथी) 4) आलेख-निबंध- स्मृतिक धोखरल रंग, आँखि मुनने आँखि खोलने (2 टा पोथी) 5) अनुवादित उपन्यास- पद्मा नदीक माँझी, नन्दितनरके, कठपुतरी नाचक इतिकथा, अयाची संधान, रानी गाइदिन्ल्यू (5 टा पोथी) 6) आत्मकथा- सागर लहरि समाना (1 टा पोथी) कविताक संग रामलोचनजी नाटकमे काज केलाह से काज भने अनुवाद किएक ने हो। ई नाटकक अनुवाद रामलोचनजीक गद्यकेँ बेसी ठोस केलक। नीक नाटक लेल छोट वाक्य बेसी प्रभावी होइत छै। नाटकेक प्रभाव थिक जे रामलोचनजीक आन गद्यक वाक्य छोट अछि। आन काज संगे आलोचक रामलोचन ठाकुरजीक भाषापर काज करथि तँ नीक विषय भऽ सकैए। एहिठाम हम मात्र संकेत केलहुँ अछि। साहित्यसँ हटि हम किछु काल लेल क्रिकेट दिस चली। एहि खेलमे किछु एहन खेलाड़ी भेलाह जिनका बारेमे विशेषज्ञ सभ कहै छथि जे ओ सभ अपन खेल बालर तौरपर शुरू केने रहथि जेना सनथ जयसूर्या, मनोज प्रभाकर, रवि शास्त्री, शोएब मलिक आदि। मुदा ई सभ बादमे बैटिंगमे आबि गेलाह एवं अंतमे हिनकर सभहक पहिल पहिचान बैट्समैन केर भऽ गेल। एखन धरि रामलोचन जीक कुल 16 टा पोथी गद्य केर अछि आ कुल 8 टा पोथी पद्य केर। एहि 16 टामे ओ संपादकीय सभ जोड़ब बाँकी अछि जे कि ओ विभिन्न पत्रिकाक संपादन क्रममे लिखने छथि। एकर मतलब जे समग्र रूपमे रामलोचनजीक गद्य केर संख्या पद्यसँ बेसी अछि। अइठाम आबि हम जोर दऽ कऽ कहब जे रामलोचन ठाकुर अपन साहित्य भने पद्यसँ शुरू केने हेताह मुदा ओ भेलाह गद्यकार। संगमे ईहो हम जोड़ब जे ओ अपन साहित्यिक यात्राक बीचसँ जे गद्यकेँ पकड़लनि से ओ अंत धरि नै छुटलनि आ तँइ हुनकर अंतिम समयक रचना सभ गद्ये टामे भेटत। आब रामलोचन ठाकुरजीक पहिचान गद्यकार रूपमे छनि। (३ अप्रैल २०२२ केँ मिथिला विकास परिषद, कोलकाता द्वारा कार्यक्रममे पठित) रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीक "कथित गजल" रवीन्द्रनाथ ठाकुर मैथिलीमे गीत लेल जानल जाइत छथि मुदा आनो विधामे लिखने छथि जाहिमे एकटा "कथित गजल" सेहो अछि। कथित गजल एहि लेल जे ओ अपने एकरा गजल कहने छथि आ हुनकर समर्थक सेहो मुदा वस्तुतः ओ रचना सभ गजल नै छै। ओ रचना सभ गजल किए नै छै तकर विवेचना करबासँ पहिने आन गजलकार सभक किछु शेर देखू। ओना ई शेर सभ हम अपन हरेक लेखमे दैत छियै कारण मैथिली भाषाकेँ किछु अपढ़ लोक सभ मात्र लिखबाक भाषा बना देने छै पढ़बाक नै। तँइ हम सदिखन हम ई मानि कऽ चलैत छी जे हमर पुरना लेख कियो नै पढ़ने हेता। आ तँइ बेर-बेर हम एकै तथ्यकेँ हरेक आलेखमे दोहराबैत छी जाहिसँ कियो लेखनी-वीर हमरा ई नै कहि सकथि जे हम नै पढ़ने रही। ओना मैथिल तँ बस मैथिल छथि ओ केखनो किछु कहि सकैत छथि। तँ आबी किछु शेरपर। पं जीवन झाजीक एकटा गजलमे वर्णित विरहक नीक चित्रण देखू— अनंङ्ग सन्ताप सौं जरै छी अहाँक चिन्ता जतै करै छी सखीक लाजे ततै मरै छी जतै कही वा जतै कहाबी एहि शेरक मात्रक्रम 12+122+12+122+12+122+12+122 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। झाजीक दोसर गजलक एकटा आर विरहपरक शेर देखू— अहाँ सों भेंट जहिआ भेल तेखन सों विकल हम छी उठैत अन्धार होइए काज सब करबामे अक्षम छी एहि शेरक मात्राक्रम 1222+1222+1222+1222 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। उपरक एहि तीन टा उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे पं. जीवन झाजी मैथिली गजल आ गजलक व्याकरणक बीच नीक ताल-मेल रखने छलाह। फेर हुनक तेसर शेरक एकटा आरो शेर देखू जे कि प्रेममे पड़ल नायक-नायिका मनोभाव अछि— पड़ैए बूझि किछु ने ध्यानमे हम भेल पागल छी चलै छी ठाढ़ छी बैसल छी सूतल छी कि जागल छी एहि शेरक मात्राक्रम 1222+1222+1222+1222 अछि आ पूरा गजलमे एकर प्रयोग भेल अछि। कविवर सीताराम झाजीक किछु शेरक उदाहरण देखू— हम की मनाउ चैती सतुआनि जूड़शीतल भै गेल माघ मासहि धधकैत घूड़तीतल ` मतलाक छंद अछि 2212+ 122+2212+ 122 आब एही गजलक दोसर शेर मिला लिअ- अछि देशमे दुपाटी कङरेस ओ किसानक हम माँझमे पड़ल छी बनि कै बिलाड़ि तीतल पहिल शेर आइयो ओतबे प्रासंगिक अछि जते पहिले छल। आइयो नव साल गरीबक लेल नै होइ छै। दोसर शेरकेँ नीक जकाँ पढ़ू आइसँ साठि-सत्तर साल पहिलुक राजनीतिक चित्र आँखि लग आबि जाएत। स्पष्ट अछि जे बिना व्याकरण तोड़ने कविवरजी प्रगतिशील भावक गजल लिखला जे अजुको समयमे ओतबे प्रासंगिक अछि जतेक की पहिने छल। जे ई कहै छथि जे बिना व्याकरण तोड़ने प्रगतिशील गजल नै लिखल जा सकैए हुनका सभकेँ ई उदाहरण देखबाक चाही। काशीकान्त मिश्र "मधुप" जीक दूटा शेर देखल जाए— मिथिलाक पूर्व गौरव नहि ध्यान टा धरै छी सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियें जड़ै छी सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तहीँ ठाँ हा आइ "आइ गो" टा पढ़ि उच्चता करै छी एहि गजलमे 2212-122-2212-122 मात्राक्रम अछि जे कि गजलक हरेक शेरमे पालन कएल गेल अछि। देखू मधुपजी भिन्न स्वर लऽ कऽ आएल छथि मुदा बिना व्याकरण तोड़ने। ई शेर सभ छल रवीन्द्रनाथजीक पूर्वज गजलकार सभहक। आब आबी हुनकर किछु समकालीन (उम्रमे किछु छोट वा नमहर) गजलकारक शेर सभपर। योगानंद हीराजीक गजलक दू टा शेर— मोनमे अछि सवाल बाजू की छल कपट केर हाल बाजू की मतलाक दूनू पाँतिमे 2122-12-1222 अछि आ दोसर शेर देखू- छोट सन चीज कीनि ने पाबी बाल बोधक सवाल बाजू की हीराजी दोसर गजलक दू टा आर शेर देखू— शूल सन बात ई संसदे जेल अछि आब हीरा कहै जौहरी खेल अछि एहि गजलक हरेक शेरमे सभ पाँतिमे 2122+12 मात्राक्रम अछि। आब अहीं सभ कहू जे हीराजीक गजलमे समकालीनता, प्रगतिशीलता आदि छै कि नै। पहिल शेरमे शाइर वर्तमान जीवनमे पसरल अजरकताकेँ देखा रहल छथि तँ दोसर शेरमे अभावक कारण बच्चा धरिकेँ कोनो चीज नै दऽ पेबाक विवशता छै। तेसर शेर आजुक विडंबना अछि। संसद वएह छै जे पहिने छलै मुदा सांसद सभ आब अपराधी वर्गक अछि तँइ शाइरकेँ ओ जेल बुझा रहल छनि। चारिम शेरमे शाइर प्रायोजित प्रसंशाक खेलकेँ उजागर केने छथि। ई खेल साहित्य कि आन कोनो क्षेत्रमे भऽ सकैए। जगदीश चंद्र ठाकुर "अनिल" जीक गजलक दू टा शेर— टूटल छी तँइ गजल कहै छी भूखल छी तँइ गजल कहै छी मतलाक दूनू पाँतिमे 2222 +12 + 122 छंद अछि आ एकर दोसर शेर देखू— ऑफिस सबहक कथा कहू की लूटल छी तँइ गजल कहै छी भूख केर कथा सेहो व्याकरणयुक्त गजलमे। सरकारी आफिसक कथा सभ जनैत छी। अनिलजी एहू कथाकेँ व्याकरणक संग उपस्थित केने छथि। समकालीन स्वरे नै कालातीत स्वरक संग विजयनाथ झा जीक ऐ गजलक दूटा शेर देखू— चिदाकाश मधुमास मधुमक्त मति मन विभव अछि विविधता उदय ह्रास अपने मतलाक छंद अछि 122-122-122-122 आब दोसर शेरक दूनू पाँतिकेँ जाँच कऽ लिअ संगे संग भाव केर सेहो- खसल नीर निर्माल्य निधि नोर जानल सकल स्रोत श्रुति विन्दु विन्यास अपने जँ आदि शंकराचर्य केर मातृभाषा मैथिली रहितनि तँ शायद विजयनाथेजी सन लिखने रहितथि ओ। आ एहिठाम हम रवीन्द्रनाथजीक कनिष्ठ मने एखनुक गजलकार सभहक शेर नै दऽ रहल छी मुदा उपरका उदाहरण सभसँ स्पष्ट अछि जे मैथिली गजलमे शुरूआतेसँ बहरक पालन भेल छै। संगे-संग उपरक एहि उदाहरण सभसँ ई स्पष्ट भऽ गेल हएत जे व्याकरण केखनो भाव वा विचार लेल बाधक नै होइ छै। हँ, हजारक हजार रचनामे किछु एहन रचना बुझाइ छै जाहिमे व्याकरणक कारण भाव बाधित भेलैए मुदा ई तँ रचनाकारक सीमा सेहो भऽ सकै छै। रचनाकारक सीमा लेल कोनो विधाक नियमकेँ खराप मानब कतेक उचित? ई उदाहरण ईहो स्पष्ट करैए जे 1970 केर बाद गजलक नामपर जे पीढ़ी आएल से ने गजल विधाक अध्य्यन केलक आ ने अपनासँ पहिनेक गजलकारक अध्य्यन केलक। रवीन्द्रनाथ ठाकुर समेत अधिकांश कथित गजलकार खाली फतवा देबामे व्यस्त रहलाह।  आब किछु हिंदी गजलक व्याकरण सेहो देखी। सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाजीक ई शेर देखू- भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि--2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरे रमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। निरालाजी जाहि बहरमे लिखने छथि ठीक ताही बहरमे हुनकोसँ पहिने हसरत मोहानीजी अपन ई गजल लिखने छथि जकर शेर सभकेँ जीहपर छनि- चुपकेचुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है एकर बहर अछि 2122+2122+2122+212 आ अही बहरमे दुष्यंत कुमार लिखने छथि हो गई है / पीर पर्वत /सी पिघलनी / चाहिए, इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए 2122 / 2122 / 2122 / 212 मने एकै बहरपर तीन गजल आ तीनू गजलक भाव ओ प्रभाव अलग-अलग। निश्चित तौरपर मैथिली गजलक शुरूआत प्रभावी छल मुदा बादमे हिनका सभ द्वारा नाश कऽ देल गेल। रवीन्द्रजीक कथित गजल संग्रह नाम छनि "लेखनी एक रंग अनेक"। एहि पोथीक संक्षिप्त भूमिकामे लेखक लिखै छथि जे "..मैथिली गजल लेल अरबी-फारसीक दुआर पर नहि लऽ गेलहुँ अछि तें एकटा हार्दिक संतोष अछि"..। आब लेखक ई किएक लिखलनि से ठोस रूपे जानब संभव नै अछि मुदा हम एकरा दू रूपे देखै छी। बहुत संभव जे एकटा कोनो सही हो मुदा ताही संगे हम दूनू कारणकेँ सेहो खंडन करब। पहिल कारण ई भऽ सकैए जे ओ गजलक व्याकरणपर कटाक्ष केने होथि आ जकरा पालन नै केलापर संतोष व्यक्त केने होथि। जँ ई कारण मानल जाए ओहि कथन लेल तखन निश्चित रूपे ई मानल जाएत जे रवीन्द्रनाथजीकेँ भारतीय परंपरा खास कऽ संस्कृत परंपराक कोनो ज्ञान नै छलनि, कारण जे संस्कृतक वार्णिक छन्द छै सएह अरबी-फारसीक बहर छै। जे तुक छै सएह काफिया छै। जेना संस्कृतक छन्दमे किछु शिथिलताक प्रावधान छै तेनाहितो बहरक पालनमे सेहो छूट वा शिथिलताक प्रावधान छै। बस नामक भेद देखि अलग मानि लेब आ ओकरासँ अलग भऽ संतोष कऽ लेब कतेक उचित? वार्णिक छंद अथवा बहरक माने छै निर्धारित ओ निश्चित मात्राक्रममे रचना रचब। दोसर कारण ई भऽ सकैए जे ओ अपन रचनामे खाँटी मैथिली शब्द लेने होथि आ ताहि लेल संतोष व्यक्त केने होथि। मुदा प्रश्न उठै छै जे गजल कोन भाषाक शब्द छै? आ अहीठाम रवीन्द्रजीक संतोषपर प्रश्नचिह्न लागि जाइत छनि। जाहिमे मैथिलीमे 30-40 प्रतिशत शब्द फारसीक छै ताहि भाषा लेल एहन घोषणा किएक? जे शब्द हमरा भाषामे नै अछि से आन भाषासँ एबाके चाही। हँ, कोनो अवांछित शब्द नै एबाक चाही से ध्यान रहए। ओनाहुतो रवीन्द्रजी आनो भाषाक ओहनो शब्द सभ लेने छथि जे कि किछुए बर्खसँ मैथिलीमे प्रचलित अछि जेना- भँवरा, यार, मस्ती, बहार, लालसा... आदि-आदि। तँइ हमर मानब अछि जे शब्दक स्तरोपर रवीन्द्रजीक संतोष एकटा फतवा मात्र छनि। रवीन्द्रजी एहि कथित संग्रहमे बहुत रास विसंगति अछि। एकटा एहनो विसंगति अछि जे प्रायः हरेक लेखक केर उठानमे होइत छै आ ओ विसंगति अछि अपन कोनो पूर्वज रचनाकारक पाँतिकेँ सीधे अनुवाद कऽ देब। एहन हमरो संग भऽ चुकल अछि मुदा आइसँ सात बर्ख एकर पहिचान कऽ हम फेसबुकपर सार्वजनिक रूपे सभकेँ सूचित केने छियनि। जखन कि रवीन्द्रजी एहि विसंगतिकेँ चिन्हबामे चुकि गेलाह। आन बात कहबासँ पहिने हम दुष्यंत कुमारजीक एकटा ई शेर देखू- मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ एकर बहर अछि 212-212-1222 आब एकटा शेर रवीन्द्रनाथजीक देखू-- हम जे भोगै छी से ओ जेना जीबै छी से रवीन्द्र सैह गजल सबकेँ हम बाँटि रहल छी रवीन्द्रजीक शेरमे कोनो बहर नै छनि मुदा भाव तँ दुष्यंतेजी बला उठाएल छनि। पहिने कहलहुँ एहन अवसर हरेक लेखक लग आबै छै। कियो एकरा चीन्हि अपनाकेँ मुक्त कऽ लै छथि आ कियो रखने रहि जाइ छथि। कुल मिला कऽ देखी तँ रवीन्द्रजीक ई पोथी नीक गीतक पोथी छनि गजलक नहि। रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांकक संदर्भमे नवम्बर 2021 केँ विदेह 'रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक’ प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक आ प्रस्तुत अछि ई विशेषांक। एकरा एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। किछु आलेख एलाक बाद एकटा निश्चित तारीख केर घोषणा अप्रैल 2022 केँ केलक। एकरा एहि लिंकपर देखि सकैत छी घोषणा। रवीन्द्र नाथ ठाकुरजीक रचना संगे सभसँ बड़का विडंबना ई रहलै जे ओ अतिवादक शिकार भेलै। से अतिवाद चाहे हुनका महिमा मंडित कऽ "अभिनव विद्यापति" कहबाक प्रयासमे देखि सकै छी तँ दोसर दिस हुनकर रचनाकेँ मंचीय कहि खारिज करबामे सेहो अतिवादे छै। हमर अपन मत अछि जे जखन कोनो रचनाकारकेँ इग्नोर करबाक हो तखन ओहि रचनाकारक समकालीन द्वारा कोनो ने कोनो नीक तगमा, विशेषण दऽ देल जाइत छै। आ हम रवीन्द्रजीकेँ "अभिनव विद्यापति" कहबाक अभियानकेँ अही संदर्भमे देखै छी। आ अहँ सभ अनुभव केने हेबै तँ अभिनव विद्यापति कहि देल गेलनि मुदा ओहि लेल जे विमर्श चाही से रवीन्द्रजीक रचना-संसारसँ गाएब रहल। एखन धरि ई बुझबाक प्रयास भेबे नै केलै जे रवीन्द्रजी गीतक राजकुमार किए छथि वा हुनकर रचना मंचीय किए छै। भक्त सभ मंचक निच्चाक थपड़ी गानि, ओकरे मानक मानि कऽ खुश होइत रहलाह तँ प्रगतिशील आलोचक सभ हुनकर लोकप्रियतासँ डेराइत रहला। भक्त आ प्रगतिशील आलोचक दूनूक बीचमे रवीन्द्रजीक प्रतिभा मरैत गेलनि। एहि संदर्भमे हम कहि सकै छी जे विदेहक ई प्रस्तुत विशेषांक एहन पहिल प्रयास अछि जाहिमे ई बुझबाक प्रयास कएल अछि जे रवीन्द्रजीक रचना किए महान वा किए अधम अछि। ई अलग बात जे हम सभ कतेक सफल वा असफल भेलहुँ से पाठक कहता। एहि विशेषांक केर शुरूआत विदेहक आने विशेषांक जकाँ नव आलोचक-समीक्षक सभहक आलेखसँ कएल जा रहल अछि। संगे-संग ई क्रम ने तँ उम्रक वरिष्ठता केर पालन करैए आ ने रचनाक गुणवत्ताक। हँ, एतेक धेआन जरूर राखल गेल छै जे पाठकक रसभंग नहि होइन आ से विश्वास अछि जे रसभंग नै हेतनि। पाठक जखन एहि विशेषांककेँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ मुदा ई धेआन रखबाक बात जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। एकर बादो बहुत वर्तनीक गलती रहल गेल अछि जे कि हमरे सभहक गलती अछि।  मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एकरंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छनि, तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छनि आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री रहैत छनि। मुदा हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा समाग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ।  हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। जेना कि नीचा परिचय बला पन्नापर सूचित केने छी जे 18 मइ 2022केँ रवीन्द्रजी एहि संसारसँ चलि गेलाह आ तकर बादो किछु लेख आएल अछि। तँइ एहि विशेषांक केर किछु लेखपर एकर असरि भेटि सकैए। आब एकटा लोक प्रवादपर आबी। प्रवाद एहन चीज छै जाहिसँ राम द्वारा सीताक दोसर बेर निर्वासन भऽ जाइत छै अग्निपरिक्षाक बादो। तँइ एहिपर बात करब उचित। संयोग वा कुसंयोग जे हो मुदा विदेहक विशेषांक केर घोषणा होइते किछु लेखक एहि संसारकेँ छोड़ि देलाह। रवीन्द्रजीक संगे इएह भेल। मुदा हमरा जनैत ई एकटा संयोग छै। विदेहक विशेषांक सभ शुरू होमएसँ पहिने आ तकर बादो ओहन लेखक सभ संसारसँ विदा भेलाह जिनकापर विदेह कोनो घोषणा नै केने छल। निच्चा किछु एहन तथ्य सभ दऽ रहल छी जाहिसँ मैथिली साहित्य केर असल बात बूझि सकबै-- 1) विदेहसँ पहिने ई बूझल जाइत छलै जे लेखक केर विशेषांक मरलाक बादे प्रकाशित हेबाक चाही। जँ अहाँ सभ पुरान पत्रिकाक लेखक केंद्रित विशेषांक देखबै तँ ई बात साबित भऽ जाएत। पुरान किए वर्तमानोमे सेहो मृत्युसँ पहिनेक चर्चा आ मृत्युक बादक चर्चा देखब तँ इएह साबित हएत जे मैथिल मूलतः मृत्युपूजक होइत छथि। मैथिलीक मुख्यधारामे एखनो इएह मानल जाइत छै। विदेह एहि रूढ़िकेँ तोड़लक। आ जेना कि संसारक नियम छै जे अंधविश्वासकेँ टुटबाक समयमे जँ कोनो घटना घटै छै तँ ओकरो तोड़हे बलासँ जोड़ि देल जाइत छै। संभवतः विदेहक संगे इएह भऽ रहल छै। 2) विदेह जिबैत मुदा उपेक्षित लेखकपर प्रयास करै छै आ एहि क्रममे बहुत एहन लेखक छथि जिनकर उम्र पूरि गेल छनि मुदा ओ उपेक्षित छथि। तँइ हमरा सभ लग संकट अछि जे किनकापर निकालू। जँ एकटा वरिष्ठ उपेक्षितकेँ कतिया कऽ दोसर कम उम्र बलापर निकाली तँ ईहो उचित नै। 3) जेना कि उपर कहने छी विदेहक विशेषांकमे साभार आलेख नइ के बराबर लेल जाइत छै तँइ फ्रेश आलेख पुरबामे समय लगैत छै। आ समय लगबाको चाही। नीक वस्तु, नीक रचना लेल समय चाहबे करी। हमरा लोकनि जतेक संभव भऽ सकैए ततबे कऽ रहल छी। ओनाहुतो जेना हमरा सभकेँ सहयोग भेटि रहल अछि ताहि हिसाबें लगभग दस बर्खमे विदेह असगरे ई लक्ष्य पाबि लेत। आभार हुनका सभकेँ जे हमर एहि काजमे कनियों सहयोग दै छथि। विदेह आगुओ एहन विशेषांक केर प्रयास करत। जिनका आपत्ति हेतनि ओ नै करबाक लेल कहता आ हम सभ पाछू हटि जाएब। अइसँ बेसी आर की भऽ सकैए। श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर एहि परिचयात्मक विवरणमे अधिकांश तथ्य आदरणीय रवीन्द्र नाथ ठाकुरजी द्वारा फेसबुकपर पोस्ट कएल विवरणसँ लेल गेल अछि (मूलतः हिंदीमे छल) जे कि संभवतः हुनकर इष्ट-मित्र ओ परिजन द्वारा तैयार कएल गेल हेतनि। हुनका सभ लोकनिकेँ आभार। एहि विवरणमे एक-दू ठाम हमरा विसंगति नजरि आएल जकरा हम अपन ज्ञानसँ ठीक केलहुँ आ ओहिठाम पाठक लेल एकटा सूचना देलहुँ अछि। बहुत संभव जे कोनो आन सूचनाक संबंधमे हमरा ज्ञान नै हो आ विदेहक एहि पन्नापर सेहो विसंगति आबि गेल हो से संभव। पाठक एकरा सही करबाक लेल सहयोग करथि से आग्रह (संपादक)। श्री रवीन्द्र नाथ ठाकुर पिता: स्वर्गीय केदार नाथ ठाकुर जन्म तिथि: 08-08-1938 (आठ अगस्त सन उन्नीस सौ अड़तीस) मृत्यु-18 मई, 2022 (नोएडा) स्थायी पता: ग्राम-पोस्ट - धमदाहा (मध्य), वार्ड संख्या-7, जिला - पूर्णियाँ (बिहार) वर्तमान पता: A -327, सैक्टर-46, नोएडा, जिला- गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश ई-मेल: abhinavvidyapati@gmail.com नोट- बहुत ठाम हुनकर जन्म बर्ख 1936 लिखल भेटत मुदा उपर देल 1938 हुनके द्वारा देल पोस्टसँ लेल गेल अछि। शैक्षणिक पृष्ठभूमि - प्राथमिक शिक्षा: संस्कृत माध्यमिक विद्यालय, धमदाहा (पूर्णियाँ) इण्टर एवं स्नातक: पूर्णियाँ कॉलेज, पूर्णियाँ (बिहार) सेवा (पूर्णकालिक नौकरी)-धमदाहा माध्यमिक विद्यालयमे अस्थायी शिक्षक। • माध्यमिक विद्यालय डुंगरा, भवानीपुरक संस्थापक प्रधानाध्यापक। संस्कृत उच्च वि0 वख्तियारपुर जिला पटनामे उप-प्रधानाध्यापक। वर्ष 1960 मे वित्त विभाग (राष्ट्रीय बचतसंगठन) बिहार सरकारसँ वर्ष 1980 मे राजपत्रित पदाधिकारीक रूपमे ऐच्छिक सेवा-निवृत्त। बिहार सरकार शिक्षा विभाग द्वारा गठित "मैथिली अकादमी"मे लियन सर्विसक अंतर्गत सहायक निदेशक, उप निदेशक एवं निदेशक-सह सचिव केर पदपर क्रमश: अधिसूचनाक आधारपर सेवा दान। (विशेष उपलब्धि- मैथिली भाषाक प्रथम शब्दकोशक दू भागमे प्रकाशन) साहित्यिक कृति - प्रकाशित पोथी- 1) चलू-चलू बहिना (गीत संग्रह) कन्हैया लाल कृष्णदास, दरभंगा वर्ष-1961 2) जहिना छी तहिना (गीत संग्रह) ग्रंथालय प्रकाशन, दरभंगा, वर्ष-1963 3) चित्र-विचित्र (प्रयोदवादी कविता), स्व प्रकाशित, वर्ष-1966 4) नर -गंगा (लघु महाकाव्य), स्वप्रकाशित, वर्ष-1968 5) सीता (खण्डकाव्य) ग्रंथालय प्रकाशन, दरभंगा, वर्ष-1968 6) श्रीगोनू झा (उपन्यास) ग्रंथालय प्रकाशन, दरभंगा, वर्ष-1969 7) एक राति (नाटक) ग्रंथालय प्रकाशन, दरभंगा, वर्ष-1969 8 एक मिनट की रानी (हिंदी नाटक), ग्रंथालय प्रकाशन, दरभंगा, वर्ष-1970 9) स्वतंत्रता अमर हो अमर (देश भक्ति लोक गीत संग्रह), चेतना समिति, पटना, वर्ष-1972 10) अति-गीत(लोकगीत), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1976 11) प्रगीत (लोक गीत), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1976 12) सुगीत (गीतसंग्रह), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1976 13) रवीन्द्र पदावली (भक्ति एवं व्यवहारगीत), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1976 14) पञ्चकन्या (प्रयोगधर्मी खण्डकाव्य), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1976 15) लेखनी एक रंग अनेक (मैथिली ग़ज़ल संग्रह), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1985 16) दो फूल, दीपायतन, बिहार सरकार, पटना 17) प्रत्यय (कविता एवं गीत), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1999 18) श्री सीता चालीसा (धार्मिक पुस्तिका), पूर्वाञ्चल प्रकाशन, पटना, वर्ष-1999 19) रवीन्द्र पद्यावली वर्ष-2022 नोट- लेखनी एक रंग अनेक नामक पोथीक प्रकाशन वर्ष 1978 देल गेल छलै मुदा हमरा हिसाबें ई वर्ष 1985 वा तकर बाद प्रकाशित भेल अछि कारण एहि पोथीक भूमिकामे तारीख 15 अगस्त 1985 केर तारीख लिखल अछि आ भूमिका अपने रवीन्द्रजी लिखने छथि। एहि पोथीक संबंधमे ईहो लिखल भेटल जे ई पोथी "प्रथम मैथिली ग़ज़ल संग्रह" अछि मुदा ई सही नै अछि। एहि पोथीक भूमिका केर फोटो परिचयक अंतमे देल जा रहल अछि (संपादक) ।

विशेष द्रष्टव्य- 1) रवीन्द्र जी द्वारा लिखित खण्ड काव्य द्रौपदी नामक खण्डकाव्य केर अंग्रेजी भाषामे अनुवाद, साहित्य   2) अकादमी, नई दिल्ली द्वारा 'Fifty Years of Indian Literature' मे प्रकाशित। 3) बिहार सरकारक स्कूल एवं कॉलेज केर सिलेबसमे अनेकानेक रचनाएं शामिल छनि। 4) सीता चालीसा का पाठ मिथिलाञ्चलक अनेक परिवार द्वारा नियमित कएल जाइत अछि। 5) भारत सरकारक बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित आखर' कविता संग्रहमे कविता प्रकाशित। नाटक लेखन एवं प्रसारण- 1) घड़ी (हास्य नाटिका,आकाशवाणी पटना) 2) मालिक (हास्य नाटिका,आकाशवाणी पटना) 3) गुरु गुड़,चेला चीनी (हास्य नाटिका,आकाशवाणी पटना) 4) सिंहासन बत्तीसी (,ऐतिहासिक फिक्शन,कुल 34 एपिसोड,आकाशवाणी पटना) 5) पैंच-उधार (हास्य नाटिका,आकाशवाणी पटना) 6) माँटीका गन्ध (हिंदी संगीतसभा,आकाशवाणी पटना) 7) काठक पुतहु चानीक समधि (पद्य नाटिका,आकाशवाणी दरभंगा) 8) उत्तर विद्यापति (नाटक, आकाशवाणी दरभंगा) विशेष द्रष्टव्य- 1) श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखिल एवं निर्देशित नाटक जीरोमाइल, एक दिन एक राति, टू लेट, एक मिनट की रानी (हिंदी) आदि नाटकक मंचन मिथिला सहित बिहारक बहुत जिला एवं अनुमण्डल स्तरपर कएल गेल अछि।

पत्रकारिताक क्षेत्रमे योगदान- 1) स्तम्भकार- मिथिला मिहिर (साप्ताहिक) -सुर-सुर-मुर-मुर 2) स्तम्भकार. आर्यावर्त, हिंदी दैनिक गोनू गवेषणा नामसँ प्रकाशित 3) मुख्य सलाहकार सम्पादक, हिंदी मासिक-संपादक-(धर्मयुग प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित) 4) मुख्य सलाहकार सम्पादक-भवदीय प्रभात (हिन्दी दैनिक) (भू भारती मीडिया प्रा0 लि0 नई दिल्ली) समाजिक कार्य- 1) सेवा निवृतिक पश्चात महाकाली कन्या उच्च वि0 धमदाहा (पूर्णियाँ)क स्थापना (आब सरकार द्वारा प्रोजेक्ट स्कूलक रूपमे अधिग्रहण) 2) नाट्य संस्था "रंगलोक" केर पटनामे स्थापना। 3) संगीतायन संगीत महाविद्यालय केर नोएडामे स्थापना जाहिसँ करीब 2000 छात्र/छात्रा डिग्री लऽ चुकल अछि। 4) A.A.U. इण्टर कॉलेज, आदित्यपुर, जमशेदपुर (झारखण्ड)क स्थापना। 5) बेरोजगार युवक/युवतीकेँ संगीत शिक्षा प्रदान कऽ हुनका सभकेँ रोजगारक योग्य बनेलाह। 6) मैथिली भाषाकेँ अष्टम अनुसूची में शामिल करेबाक लेल अथक प्रयास। 7) मिथिलामे दहेज़ उन्मूलन हेतु संगठित प्रयास, जनजागरण एवं निजी प्रयास द्वारा दहेज़ उन्मूलनमे सशक्त एवं प्रमुख भूमिका। 8) सूखा एवं बाढ़ास्त क्षेत्रमे सघन दौरा कऽ वांछित सहायता प्रदान केलाह। रिकॉईस एवं कैसेट्स- 1) वर्ष 1966 मे मैथिली लोकगीतक ग्रामोफोन रिकॉर्ड H.M.V. कोलकाता द्वारा गीतकार/संगीतकारक रूपमे रिलीज। 2) सीता चालीसा-टी-सीरीज, नोएडा द्वारा रिलीज 3) पूर्वाञ्चल म्यूजिकल रिकॉर्ड्स पटना द्वारा भजनामृत विद्यापति गीत. दोरस (मैथिली, भोजपुरी)क अलावा करीब 15 कैसेट्स रिलीज- वर्ष 1977-78 4) भजन-भारती-सुयोजन फिल्म्स-नई दिल्ली द्वारा रिलीज। 5) सोनी कैसेट्स द्वारा गीतकारक रूपमे रिलीज एल्बम। फिल्म निर्माण एवं टेली सीरियल / वृत्त चित्र- 1) प्रथम मैथिली फीचर फिल्म “ममता गाबय गीत"क निर्माणमे प्रमुख भूमिका । गीतकार/पटकथा लेखक एवं सह-दिग्दर्शकक रूपमे सफल प्रदर्शन। 2) मैथिली फीचर फिल्म "गोनू झा"क पटकथा लेखक एवं गीतकार। 3) आयुर्वेद चिकित्सा पद्धतिपर आधारित टेलीफिल्म- "आयुर्वेद की अमर कहानी" केर पटकथा लेखक एवं निर्देशक संगीतकार। सरकारी विभागों/संस्थान सभ लेल कएल गेल कार्य- 1) पंचायत मंत्रालय, भारत सरकारक लेल वृत्त-चित्रक निर्माण - आपका फैसला आपकी मुट्ठी में। 2) साहित्य अकादमी. भारत सरकार, नई दिल्ली लेल मैथिली भाषाक प्रतिष्ठित विद्वान पण्डित गोविन्द झा, श्री मायानन्द मिश्र तथा हिंदी साहित्य केर विद्वान प्रो. श्रीरामनरेश त्रिपाठीपर वृत्त-चित्रक निर्माण। 3) Beware of God अमरीकामे प्रवासी भारतीय केर आध्यात्मिक द्वन्दपर आधारित वृत-चित्र 4) "नारी" वृत- चित्र 5) गोनू झा (धारावाहिक) दूरदर्शन केन्द्र, गोहाटी (असम)सँ कुल 15 एपिसोडक प्रसारण। 6) "ऐसे बनी बात' केर लखनऊ दूरदर्शन केन्द्रसँ 3 एपिसोड प्रसारित। 7) युवा समस्यापर आधारित "फड़फड़ाते पंख" (हिंदी)क कुल 5 एपिसोडक दूरदर्शन केन्द्र गुहाटीसँ प्रसारण। 8) सुनहरा सफर:-सुयोजन फिल्म्स नई दिल्लीक बैनरसँ (भारतीय सिनेमा के 36 वर्षों का इतिहास) दूरदर्शन केन्द्र जयपुरसँ प्रसारण। 9) साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा निर्मित डॉ0 सुकमार सेनपर आधारित वृत-चित्र। 10) एमईएमंत्रालय केर सौजन्यसँ भारतक शहीद' 'martyr of India' वृत्त-चित्र-5 एपिसोडक निर्माण। पुरस्कार/सम्मान एवं अन्य विशिष्ट उपलब्धि- 1) स्व0 वैद्यनाथ मिश्र यात्री (बाबा नागार्जुन) द्वारा कला भवन पूर्णियाक मंचपर व्यक्तिगत सम्मान अभिनव विद्यापतिक नामसँ अलंकृत। 2) स्वाती फाउण्डेशन कोलकाता (प0 बंगाल) द्वारा प्रबोध साहित्य सम्मान (वर्ष 2014) 3) अखिल भारतीय मिथिला संघ नई दिल्ली द्वारा मिथिला विभूति सम्मान वर्ष-2016 4) तृतीय अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मलेन मुम्बई-द्वारा मिथिला रत्न सम्मान - वर्ष 2016- आयोजक: मैथिल मित्र मण्डल मुंबई। 5) झारखण्ड मैथिली मंच रांची द्वारा लाइफटाइम अचीवमेन्ट अवार्ड. वर्ष 2014 6) विद्यापति सेवा संस्थान दरभंगा द्वारा विशिष्ट मैथिली सेवा सम्मान- (3 बेर)। 7) काया कल्प साहित्य कला फाउण्डेशन . नोएडा (उ0 प्र0) द्वारा कायाकल्प साहित्य शिरोमणि सम्मान - 2016 8) विश्व मैथिली संघ संतनगर, बुराड़ी, नई दिल्ली द्वारा तीन वर्ष धरि विशिष्ट सम्मान। 9) जन जागृति मंच, पालम नई दिल्ली द्वारा विशेष सम्मान- वर्ष 2018 10) वैदेही फाउण्डेशन नई दिल्ली द्वारा विशिष्ट सम्मान-स्थान मावलंकर हॉल. वर्ष 2017 11) इला फाउण्डेशन, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016-17 लेल भाषा साहित्य सम्मान। 12) विद्यापति समिति धनवाद (झारखण्ड) द्वारा वर्ष 2016 मे विद्यापति सम्मान। 13) वाराणसी (उ0 प्र0) मे दूरदर्शन केन्द्र नई दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता कुम्भमे मैथिली भाषाक प्रतिनिधि कविक रूपमे कविता पाठ। 14) काशीमे स्थानीय साहित्यिक संस्था द्वारा विशेष सम्मान। 15) गोहाटी (असम)मे साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा आयोजित कवि सम्मलेनमे रचना पाठ। 16) साहित्य अकादमी, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा आयोजित पूर्णियाँमे एकल काव्य पाठ। 17) आकाशवाणी पटना, दरभंगा द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनोंमे नियमित काव्यपाठ। 18) मैथिली भोजपुरी अकादमी नई दिल्ली द्वारा 15 अगस्त एवं 26 जनवरीकेँ कवि सम्मेलनमे सम्मलेनक अध्यक्षता एवं कविता पाठ। 19) मिथिलांचल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था. नई दिल्ली द्वारा मणिपद्म सम्मानसँ सम्मानित। 20) कुल 40 वर्षसँ मैथिली मंचपर कलाकारक रूपमे सर्वाधिक लोकप्रिय एवं युवा कलाकारक प्रेरणास्रोत। मैथिली लोक संगीत में विशिष्ट योगदान- 1) श्री रवीन्द्रनाथ ठाकर आधुनिक मैथिली मंचक जनक मानल जाइत छथि। 2) श्री महेन्द्र झाक संगे वर्ष 1966-67 मे एहन जोड़ी बनेलनि जाहिमे दू पुरुष द्वारा बिना कोनो वाद्य यंत्रक स्वरचित रचनासँ दर्शक सभहक मनोरंजन कएल जाइत छल। 3) मूल रूपसँ कवि एवं गीतकार श्री रवीन्द्र जीक गायन शैली बिल्कुल नवीन एवं अलग छल जे हुनका लोकप्रियताक शिखरपर पहुँचेलक। 4) रवीन्द्र-महेन्द्रक जोड़ी लोकप्रिय भेलाक बाद मैथिलीमे ई एकटा परंपरा क रूपमे स्थापित भेल। 5) बिहारक अलावा, दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता तथा चैन्नई सहित भारतक सभ प्रदेशमे करीब 10 हजारससँ बेसी मंचपर सफल प्रस्तुति। परिशिष्ट प्रदीप पुष्प गीतक अप्रतिम शिल्पकार: रवीन्द्र नाथ ठाकुर गीत साहित्यक सभसँ लोकप्रिय विधा थिक। साहित्यक वर्णमालासँ अपरिचित कोनो गृहस्थ हो वा कहियो विद्यालय नहि गेल घरक कोनो महिला, गीत सभक प्रिय होइत अछि। गाय- महिंसक चरबाही करय बला लोक हो वा कोनो विद्या-विशारद्, गीत सबकेँ आकृष्ट करैत अछि आ गुनगुनेबाक लेल बाध्य करैत अछि। एकर मधुरता आ भावपूर्णता जन सामान्यक हृदयमे स्थापित भ' लोकक कंठमे बसि जाइत अछि। मैथिली साहित्यमे गीति काव्यक सुदृढ परम्परा रहल अछि। यद्यपि मैथिलीक प्रथम पोथी नाट्यशास्त्र आधारित अछि, तथापि विद्यापतिक गीतक बदौलति मैथिलीक विश्व साहित्यक मध्य अपन विशिष्ट पहिचान बनल अछि। विद्यापतिसँ आरंभ भेल गीतक ई क्रम आगूओ बनल रहल। एहने क्रमे आधुनिक कालमे पदार्पण होइत अछि गीतक राजकुमार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक। रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीक जन्म हिनक मातृक मधुबनी जिलाक ननौर गाममे आठ अगस्त उन्नीस सय अड़तीसकेँ भेल। हिनक पैतृक पूर्णियाक धमदाहा गाममे छल। प्रारंभमे अपन मातृकमे शिक्षा ग्रहण आरंभ क' तत्पश्चात् अपन पैतृक गाममे प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कयलनि। पूर्णिया कॉलेज, पुर्णियासँ  स्नातक धरि शिक्षा ग्रहण क' पहिने विद्यालयमे शिक्षकक रूपमे सेवा देब प्रारंभ केलनि। बादमे, बिहार सरकारक वित्त विभागमे पैघ पद पर नियुक्त भेलाह। अपने मैथिली अकादमीक सहायक निदेशक आ निदेशक केर पदपर सेहो सेवा द' मैथिलीक विकासमे बहुत सहयोग करबाक काज केलौं। रवीन्द्र जीक साहित्य - सृजनक उपवन सदाबहार रहल। ओ कहियो मौलायल नहिं, म्लान नहिं भेल। हिनक अनुसार- "साहित्य सृजन कहियो रूकबाक नहिं चाही, कारण साहित्यसँ भाषाकेँ बल भेटैत छैक ।" कविता, उपन्यास, नाटक जकाँ विभिन्न साहित्यक विधामे रचना करितो गीत हिनक पहिचान रहल। अपन चौदह टा पोथी जे मैथिलीमे लिखलनि ताहिमे अधिकांश गीत संग्रह छल। एक गोट पोथी हिंदीमे सेहो लिखलनि। हिनका विभिन्न संस्था सभक द्वारा बहुतो सम्मान प्राप्त भेल छल यथा- मिथिला विभूति सम्मान, मिथिला रत्न सम्मान, मैथिली सेवा सम्मान, लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान इत्यादि। हिनका प्रतिष्ठित प्रबोध सम्मान(2014) प्राप्त भेल छल। जनकवि यात्री हिनका व्यक्तिगत रूपेण 'अभिनव विद्यापति' सम्मान सँ सेहो सम्मानित केने रहथिन। विद्यापति मैथिली गीति काव्यक जे पैघ अट्टालिका स्थापित केलनि ओ समस्त मिथिला नहिं, अपितु विश्व भरिक साहित्यक लेल एकटा उदाहरण भेल। 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' केर उद्घोष क' विद्यापति साहित्यकेँ जनमुखी हेबाक मार्गक प्रशस्त केलनि। विद्यापतिक बाद आदरणीय मधुपजी आ रवीन्द्रजी दू गोट पैघ हस्ताक्षर भेलाह जे अइ गीति परम्परा केँ सुचारू ढंगसँ निमाहलनि। ओना एहेन नै छै जे अइ बीचमे गीतकार कवि लोकनि नै भेलाह वा गीतक रचना नहिं भेल, तेहेन कोनो गप्प नहिं। मुदा, जाहि तरहेँ विद्यापति अपन गीत मधुरता, भावक कोमलता आ नव लयमे गीतक प्रस्तुति क' जनसामान्यक मन मोहि लैत छलाह ओहेन सफलता हुनका बाद रवीन्द्रजीकेँ भेटल। आदरणीय मधुप जीक गीत साहित्यिक मूल्य आ मैथिली भाषाक विकासक दृष्टिसँ उत्कृष्ट अछि। मधुपजी विद्यापतिक बाद निस्संदेह महाकवि कहेबाक सामर्थ्य रखैत छथि। गीतक गेयता ओकर प्रबल पक्ष थिक। जे गाओल नहिं जा सकैत अछि ओ गीत केहेन होयत? तेँ गीतक भास आ लय प्रमुख तत्व थिक। मौलिक भास आ मोहक भावपूर्ण शब्दसँ सजाओल गीत जन-जनकेँ आनंदित करैत अछि, पसिन पड़ैत अछि। ताहि दृष्टिसँ आदरणीय रवीन्द्र जीक महत्ता अहू लेल आर बेसी भ' जाइत अछि जे विद्यापतिक बाद ओ पहिल गीतकार भेलाह जे अपन रचना लेल खाँटी नव ट्यून ल' मंचस्थ होइत छलाह। जहिना रूचिगर रचना, तहिना ओकर भास। चिट्ठीकेँ तार बुझू, भरि नगरीमे शोर, यार कुसियार यार, तांगा हमर अलबेला, हम गुदड़ी पहिरि जीबि लेबै, चलू चलू बहिना, के थिक मैथिल की थिक मिथिला, पिरिये पिराननाथ, चल मिथिलामे चल,चारि पाँति सुनू रामकेर नामसँ जकाँ अपन बहुतो गीत लेल बहुतो नव नव भास तैयार करब, हिनक रचनाधर्मिताकेँ समस्त भारतीय समकालीन गीति- काव्यमे हिनक श्रेष्ठत्व स्थापित करैत अछि। बंगलामे जहिना रवीन्द्र संगीतक परम्परा स्थापित भेल, तहिना ई विद्यापतिक संगीतक बाद नव तरहक मैथिली गीत- संगीतक स्थापना केलनि। रवीन्द्र जी मैथिली गीत लेखनकेँ स्टारडम दियाबय बला रचनाकार रहथि। महेन्द्र जी संग हिनक जोड़ी जहन मंचस्थ होइत छल त' दूर- दूर सँ लोक आबि क' हिनका सुनबाक लेल भरि राति मंचक आगू बैसल रहैत छल।फरमाइश पर फरमाइश। आग्रह पर आग्रह। आ रवीन्द्र बाबू अपन जोड़ीदार गायक महेन्द्र जीक संग श्रोताक सबटा 'डिमांड' पूरा करैत छलाह। रवीन्द्र बाबू गीतकेँ  घर आंगन, सर-समाज,प्रेम - विरह, माय- बेटा, पूतोहु सँ ल' क' बाध- बोन, खेत -पथार,जन - बोनिहार, रौद- घाम आ पनिभरनी धरि ल' जाइत छथि। ककरो प्रेमिका पनिभरनी सेहो भ' सकैए तकर उन्मुक्त स्वीकारोक्ति रवीन्द्रजीक गीतमे भेलनि। मिथिलाक नारी जीवनक दुरूहता होइ वा रोजगारक लेल पलायन रवीन्द्रजी हरेक विंदुपर नजरि राखि गीतक रचना केलाह। रवीन्द्र जी जनसामान्यक आँखिसँ रचना करैत छथि तेँ हुनक रचना निसंदेह संपूर्ण मिथिलाक प्रतिनिधित्व करैत अछि। नारायणजी आधुनिक मैथिली गीतक सजग उन्नायक संसारक सभ भाषामक साहित्य पद्यसँ आरम्भ भेल अछि। पद्यमे गेयधर्मिता रहैत अछि जे छन्दक बलें पाओल जाइत अछि, जे गीतक निजी विशेषता थिक जे पद्यमे सृजन करबाक लेल सृजनकर्ताकेँ सभ दिनसँ विशेष प्रभावित करैत रहल अछि, आ तँइ कोनो भाषा-साहित्यक आदि रचना पद्यमे भेटैत अछि। स्पष्ट रूपसँ पद्य विधा लोकगीतसँ रसग्रहण कऽ साकार होइत अछि अथवा अपन पथ प्रशस्त करैत अछि। लोकगीत अनाम धर्मा साहित्य थिक से महाकवि विद्यापति धरिकेँ रचनाशील होएबाक लेल प्रेरित कएने रहनि, तकर एकटा उदाहरणस्वरूप देखल जा सकैछ, विद्यापति पदावलीमे संग्रहीत विद्यापतिक गीत ...."मोरा रे अँगनमा चनन केर गछिया.."एहन मानल जाइत हछि जे महाकवि विद्यापति तँइ कतेको लोकगीतक संपादन टा कएलनि। आ मैथिली साहित्यक आरम्भ जे कवि शेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुरसँ मानल जाइत अछि, से वास्तवमे गीतेसँ आरम्भ भेल हएत जे लिखित रूपमे नष्ट भए गेल हएत। महाकवि विद्यापतिक गीतिधाराक भाव, भाषा,विषय, विधा ओ रागक प्रबल वेगमे एकटा कृत्रिम काव्यभाषाक जन्म भेल भऽ गेल जकर नाम "ब्रजबुलि" पड़ि गेल। से थिक जनभाषामे गीति काव्यक अतुल सामर्थ्य आ से बीसम शताब्दीक पूर्वार्ध धरि मैथिलीमे लिखाइत रहल आ जनमानस गीति काव्यक रससँ आलोड़ित होइत रहलाह। एहन विशिष्ट परंपरासँ भिन्न सेहो मैथिलीमे लिखल जाइत रहल हएत, आ से लोक द्वारा अभिनय कएल जाइत रामलीला आ महारासमे, नाचमे, जाहिमे जन-जीवनक राग आ हास्य अवश्य छल हएत, जकरा सभकेँ सुसंस्कारित गीतक परंपरामे फूहड़ बूझल गेल हएत आ जाहि गीत सभकेँ संकलित कए लिखित रूप नहि देल गेल हएत। मुदा मैथिली गीतमे नवताक प्रवेश भेल, जखन अपनामे श्रव्य आ दृश्य-काव्य समेटने अभिनय कएल जाइत लीला, मनोरंजन लेल होइत नाचसँ फूट सिनेमाक पदार्पण भेल आ सिनेमाक गीतक लोकमे प्रिय होबए लागल आ गाओल जाइत मैथिली गीतक लोकप्रियता घटए लागल। मधुपजी लोकमानसमे पसरैत रोग अर्थात घटैत लोकप्रियताकेँ अकानि सिनेमा गीत सभक भासपर मैथिलीमे गीत रचए लगलाह आ से सभ बेस लोकप्रिय भेल। यद्यपि, मधुपजीक संग किछु आर गीतकार सभ गीत रचना केलनि मुदा हुनका लोकनिक छविमे ओ निखार नहि आबि सकल जे मधुपजीमे रहलनि। यद्यपि, प्रदीपजी किछु मौलिक गीतक अवश्य रचना केलनि जे सभ अपन समयमे अनेक मंचसँ गाओल जाइत रहल, मुदा हुनकर रचल गीत सभ सिनेमाक गीतक सोझाँ झूस होइत छल तथा नवताक माँग करैत छल एवं ओ गीत सभ सिनेमाक भासपर रचित मधुपजीक गीतक आगू हल्लुक लगैत छल। मैथिली गीतक लेल व्याप्त एहने दारुण समयमे मैथिलीक गीति-साहित्यिक आकाशमे मैथिलमे पसरल आ परसल जाइत गीत सभमे पाओल जाइत त्रुटिकेँ संपूर्ण सजगतासँ अकानि मैथिली गीतकेँ लोकप्रियताक शिखर धरि लए जेबाक लेल समस्त नवता-बोधसँ युक्त उन्नायक बनि, गीतकारक रवीन्द्र नाथ ठाकुर जे प्रकट होइत छथि से मैथिली गीतक स्वर्णकाल लए जेबाक एकटा चकित करैत घटना थिक। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर, देखलनि जे सिनेमाक गीतक भासक आधारपर जखन लोक मैथिली गीत पसिन्न करैत अछि तखन मैथिलीक सिनेमाकेँ सेहो पसिन्न करत, तँइ ओ मैथिलीमे सिनेमा सेहो बनौलनि जकर नाम "ममता गाबए गीत" थिक जकरा लोकप्रिय बनेबाक लेल, हिंदी सिनेमाक चर्चित अभिनेत्री अजराकेँ सिनेमामे रखलनि तथा चर्चित गायिकासँ गीत गबौलनि, जकर गीतकार आ संगीतकार, हमर थोड़ जनतबमे अछि आ स्वंय रहथि। रवीन्द्र नाथ ठाकुर मैथिलीमे गीत रचनाक लेल एहि क्षेत्रक जनजीवनकेँ गीतक विषय बनौलनि जाहिमे दुःखे-दुःख आएल। कदाचित् हुनकर मानब छलनि जे दुःख लोक सूनए चाहैत अछि। हमर तँ मानब अछि जे विद्यापतिक गीत "कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ" आइयो लोक गबैत अछि आ लोकप्रिय अछि जे ओहिमे दुःखक गप्प भेल अछि। आ हिंदीक कवि मदन कश्यपक कविताक तँ एकटा पाँति अछि जे "मुझको विद्यापति का दुख चाहिये"। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपन गीत रचनाक लेल एक दिस जँ एहि क्षेत्रक जनजीवनक विषयक चुनाव केलनि तँ दोसर दिस ओ अपन गीत लेल अपन लयक सेहो अविष्कार केलनि। एहि दूनूक संगे रवीन्द्रनाथ ठाकुर मिथिलामे प्रचलित पौराणिक पात्रकेँ अपन गीत लेल लेलनि, जाहि लेल हुनका जगज्जननी जानकी, हुनकर कष्टमय जीवन आ हुनकर वेदनामय वाणीसँ बहराएल समाद पर्याप्त छलनि। हुनकर गीतक पाँति द्रष्टव्य अछि-- कने बाजू हे प्राण अहाँ ई की केलहुँ कोना सोनाके अहाँ मानि सीता लेलहुँ हम विदेहक धिया तें विदेही भेलहुँ तथ्य राखब नुकाय हमर सन्तान सँ।। मिथिलाक सभ दिनसँ मुख्य व्यवसाय खेती रहल। खेती, परिवारक सभ सौख-सेहंता पूर्ति नहि कऽ सकैत छल तँइ एहिठामक लोक सभ दिनसँ कमेबाक लेल परदेस जाइत रहल छथि। महाकवि विद्यापतिक गीतमे सेहो एहिठामक लोकक परदेस कमाए लेल जेबाक वर्णन भेटैत अछि। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक रचित गीतमे एहिठामक लोकक परदेस जेबाक जे चर्च भेल अछि तकर मूलमे अभाव थिक। से एहिठामक लोक कतेक अभावमे जीवन बितबैत छल तथा जनसाधारण कतेक बेसी अपमानित आ निर्धनताक जीवन जिबैत छल तकर हृदय विदीर्ण करए बला एकटा बानगी देखू-- बरद एक्केटा छल, सेहो पहिने मरल खेत अनके दखल, तै पर करजा लदल तँ जैह-सैह आबि , जैह-सैह कहि जाइछ सहिते-सहैत आब भथि गेल इनार बुझु काया लचार बुझु, वैदक उधार बुझु कतेक बात लिखब की आफत हजार बुझु... मैथिली साहित्यक समर्पण आ प्रेम सभ दिनसँ मुख्य स्वर रहल अछि। प्रेमक अविरल धारामे बहेबामे मैथिली साहित्य अग्रगामी रहल अछि जाहिमे परकीया प्रेमक स्वर सर्वाधिक मुखर रहल अछि। मुदा दाम्पत्य-प्रेमक जीवनमे अप्रतिम महत्व सर्था रहलैक अछि। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक एकटा गीतक अधोलिखित पाँतिक अवलोकन करू जाहिमे मैथिल संस्कृतिक ओहि विधिकेँ उजागर कएल जाइत अछि जे द्विरागमनक पूर्व हजाम अबैत अछि, तकरा चित्रात्मक अभिव्यक्ति कतेक सहजतासँ देलनि अछि जे मुग्ध आ मोहित करैत अछि- बन्हने छलियै केश फलकौआ कोंचा बला नुआ छलै आँचर घुमौआ लेलक अझक्के मे देखि मुँहझौंसा अहीँ के गामक बुढ़बा हजाम पिरिये पिराननाथ सादर परनाम। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक गीत सभमे नवताक प्रवेश हुनकर अपन प्रतिभा, मैथिली गीतक प्रति सर्वोत्तम समर्पणक बले भेल अछि जाहिमे भाषा आ ओहि प्रचलित शब्दक अप्रतिम योगदान अछि जे शब्द सभ उर्दू-फारसीक थिक आ मैथिल समाजमे बाजल जाइत अछि। गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर मैथिली गीतकेँ, गीतक लोकप्रियताकेँ ध्यानमे राखि जे स्तरोन्नयन केलनि ताहि बाटकेँ प्रशस्त करबामे अनेक गीतकार लागल छथि जाहिमे डा. चंद्रमणि प्रमुख छथि। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर, हुनक रचना आ जनमानस केर उदासीनता हमरा लोकनि अपन मानवीय धरोहरक सम्मान आ सत्कारमे कने कंजूस रहल छी। ई संस्कार आजुक नहि अछि, अदौसँ मानवीय धरोहर केर प्रति निष्क्रियताक स्थानीय धरोहर अथवा संस्कारक रूपमे आबि रहल अछि। आब मैथिल समुदाय बहुत पोखगर अनुपातमे प्रवास आ अपन योगदानक कारणे वैश्विक भऽ रहल अछि। हम सब वैश्विक सोच आ शारीरिक उपस्थिति दुनू रूपमे भऽ रहल छी। वैश्विक भऽ रहल छी तँ हमर सबहक ई दायित्व बनैत अछि जे हमरा लोकनि वैश्विक संस्कृतिक नीक बात, प्रथा, परम्परा आ संस्कारकेँ अंगीकार करी। ई कहब सहज छैक जे हमर संस्कृति, संस्कार, लोक व्यवहार सर्वोत्तम अछि, मुदा ओहूसँ पैघ बात अपन संस्कृतिमे जे घाव अछि तकरा ठीक करब। कायाकेँ निरोग रखबा लेल रुग्ण अंगक समुचित चिकित्सा आ जरुरी पड़ला पर शल्यचिकित्सा सेहो आवश्यक। अहिसँ भले प्रारम्भमे कने कष्टक अनुभूति हो, बादमे जीवन सुखद भऽ जाइत छैक। रवीन्द्रनाथ ठाकुर दीर्घ आयु जिबैत मृत्युलोकसँ अनन्तक यात्रा हेतु प्रस्थान कऽ गेलाह। आब ओ हमर सबहक नित्य स्मरणीय पितर छथि। हुनक रचना पर किछु लिखब नब नहि हएत। एक बात अवश्य जे ओ जन-जनमे व्याप्त गीतकार छथि। हुनकर रचना लोक पढ़ि कऽ कम आ सुनि कऽ, दोहरा कऽ, गुनगुना कऽ, अनुकरण, अनुशरण करैत सीख लैत अछि। अगर बिना पोथी देखने हुनकर रचनाक संकलन करबाक हो तँ 45 आ 80 बरखक बीच केर करीब एक सए स्त्री पुरुष लग चर्च करू, सब मिलि हुनक सब गीत लिखा देताह। अगर ओहूमे आलस्य भऽ रहल अछि तँ सोशल साइट पर लोक सबसँ निवेदन करू, किछुए दिनमे अहाँक संकलन तैयार। लोक कंठमे अहि तरहक कमोवेश मिथिला भूमि – अहि पार, ओहि पार आ तमाम भौगोलिक उपक्षेत्र अथवा पॉकेटमे लिंगभेद ओ जातिक आरि तोड़बाक मोनोपोली महाकवि विद्यापतिक बाद अगर ककरो भेटल अछि तँ ओ छथि रवीन्द्रनाथ ठाकुर। हुनक गीत जखन महेन्द्र जीक गलाक चिपमे सेट भऽ जाईत छल तँ ओकर भाव देसी राहरिक दालिमे घी संग तेजपत, जीरक फोरन जकाँ भऽ जाइत छल। मिथिलामे जन सरोकारक गीत काशीकांत मिश्र “मधुप”, स्नेहलता (कपिल देव ठाकुर), मैथिलीपुत्र प्रदीप आदि लिखलनि। सभक रचना अपना आपमे अपूर्व छल। मधुप स्वयं गबैत नहि छलाह। गीतक वेरिएशन सीमित छलनि; स्नेहलता राधा-कृष्ण आ सीता-राम भक्तिमे एकनिष्ठ योगी जकाँ केन्द्रित रहला; प्रदीप किछु गीत समाजिक व्यवस्थापर केन्द्रित करैत अन्ततः सीता-राम, जगदम्बा आ भगवान भजनमे सन्तक डेगसँ लिखैत रहला। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की नहि लिखलनि? हिनक रचनामे नायक –नायिकाक प्रेम, तरुणक प्रेमक उद्वेग, मिथिला भूमिक कण-कण केर गान, सीताक बेदनाक चित्रण, ओकर ओहि पर सोच, चिंतन, मनन, राम संग लड़बाक हिम्मत, पुरुख मोनमे नारी भावक व्यवस्थापन, बाल गीतमे नेना मोनक अबैत जाइत मनोवैज्ञानिक भावक छोट-छोट खाटी शब्द आ कवित्तसँ प्रस्तुतिकरण भेटत। हिनक गीतमे नाटक भेटत, स्त्री-पुरुषक प्रेम, नोक-झोक भेटत। हिनक गीतमे परदेसिया मैथिलक दर्द, माता पिताक समस्या, जनरेशन गैप, संगतुरिया मस्ती, पर्यटन, यायावरी प्रवृति, गामक लोकक शहर अथवा नगर केर जीवनक अनुभव, ओकर विवेचन, गाम आ नगरमे तुलनात्मक विवेचन सब किछु भेटत । हिनकर गीतमे अतिवादी सेहो लोकवादी बनल अल्हड़ बनल भेटता। हिनक गीतमे की मधुबनी, की पुरनिया, बेगुसराय, सीतामढ़ी, दड़िभंगा आ नेपालक मिथिला सब एकाकार भेटत। रवीन्द्रनाथ जी शब्दक जादूगर छलाह। भावक आ गीत आ छंदक पेटार छलाह। चूँकि स्वयं स्टेज पर गीत गबैत छलाह तँ उतार-चढ़ाव सब बात बुझैत छलाह। श्रोता संग आँखि आ बॉडी लैंग्वेजसँ वार्तालाप करैत तदनुकूल रचना करैत छलाह। हुनक गीतक कुनो एक उदाहरणसँ हम अतए स्थानकेँ अनेरे नहि छेकए चाहैत छी। ताहि हम बिना उदाहरणकेँ अपन बात लिखैत छी। पढ़ैत रहू। रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी केर गीत संग मिथिलाक हवा, पानि, पोखरि, इनार, नदी, खेत , पथार, चिड़इ-चुनमुन सब मस्त छैक। सब हँसै छै। सब पात्र छैक। सभक अभिनय छैक। एक लड़की जे सासुरसँ नैहर जा रहल छैक, आ नदी उमटाम भरल छैक, तकरा लेल मलाह मात्र मल्लाह नहि भैया छैक। वएह धार पार करेतैक। परदेशी मिथिला चलैत मस्त हवासँ वार्तालाप करैत छैक। तप, जप, काम सब किछु छैक। की नहि छैक। अगर किछु नहि छैक तँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल उचित सम्मान। से कियैक ? रवीन्द्रनाथ ठाकुर केर तुलना हमर बउआइत मोन असमिया गीत लेखक आ गायक भूपेन हजारिकासँ करैत अछि। संयोग देखू जे दूनु गोटे समकालीन छलाह। मिथिला अनेक प्राकृतिक आ सांस्कृतिक वैविध्य केर आधारपर असमसँ बहुत लगीच अछि। मल्लाह, हवा, धार, जन मानस, स्थानीय प्रेम आ खाँटी देशी शब्द भूपेन हजारिका आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर दुनुक रहल छनि। दूनू अपन-अपन मातृभाषा क्रमशः असमिया आ मैथिलीसँ बहुत सिनेह करैत छलाह। दूनुक रचना काल एक रहल छनि। ओना भूपेन हजारिका रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ दस बरख पैघ छलाह। दस बरख पैघ छलाह तँ हुनक मृत्यु सेहो रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ लगभग दस वर्ष पहिने 2011मे भेलनि। मुदा दुनूमे आसमान जमीनक स्पष्ट अंतर छनि। की? भूपेन हजारिका स्टार नहि सुपर आमेगा स्टार छथि। हुनका फालके पुरस्कार भेटल छनि। ओ देशरत्न थिकाह। असम केर लोक भूपेन हजारिकामे भगवान देखैत छल। एखनो देखैत अछि । भूपेन हजारिका केर मृत्यु केर बाद हुनका पद्मविभूषण, आ भारतरत्न भेटलनि। भारतरत्न तँ मृत्यक 8 वर्ष बाद भेटलनि। ई सब बात हुनका अलग व्यक्तित्व प्रदान करैत छनि। चाहे असमिया कुनो जाति, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्रक हो, भूपेन हजारिका सबहक पूज्य छथि, असमिया संस्कृति केर नायक छथि। कनेक्टिंग फैक्टर छथि। ई बात ई प्रमाणित करैत अछि जे असम केर लोक अपन मानवीय धरोहर केर सम्मान करब जनैत अछि। हमरा लोकनि अर्थात मैथिल रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ जिबैतमे सेहो दूर धकेलने रहलहुँ अछि। मानवीय धरोहर केर सम्मान कोना करी ई कला हमरा सभकेँ मराठीसँ सिखबाक चाही। ध्यानचंद, कपिलदेव, अमिताभ बच्चन सन धुरंधर लाइनमे लागल रहलनि आ अपन एकता आ मुखर प्रवृति केर बलपर मराठी सब सचिन तेंदुलकरकेँ भारतरत्न दिया लेलक। सचिन केर कंटेम्पररी धोनी मुँह देखैत रहि गेलाह। एकरा कहैत छैक मराठी मानुष केर संस्कार। अपनामे भले लड़ब मुदा अपन आइकॉन लेल, अपन संस्कृति संरक्षण लेल एक रहब। किन्सियाइत ई गुण मैथिल मानुषमे आबि गेल रहैत ! ठीक छैक, मैथिल साहित्यकार केर लॉबी रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ वंचित रखने रहलनि। साहित्यकार लोकनि हुनक प्रयोग जे ओ साहित्यमे गीत लेखनकेँ छोड़ि आन दिशा जेना गद्य लेखन, कविता आदिमे केलनि तकरा संज्ञानमे नहि लेलनि। बहुत रास बात भेल। मुदा ताहि लेल जनताक आक्रोश कहाँ भेटल? मिथिला, पटना आ दिल्लीमे कार्यरत असंख्य संस्था कहाँ कोनो उचावच केलक हिनका लेल! सब सुतल रहल। जनता आ दरभंगा, पटना, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि नगर आ महानगरक संस्थाक सभक सहयोगसँ, निष्ठा आ आन्दोलनसँ राजनीतिक दबाबसँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल पद्मश्री आ पद्मभूषण बहुत छोट चीज छल। मुदा, हाय रे मिथिलाक दुर्भाग्य! अहि लेल संस्था सब सोचबो ने केलक। अपना आपके समाजक प्रतिनिधित्व कहय बला संस्था आ संगठन घोड़ा बेचि सुतल रहल। रवीन्द्रनाथ ठाकुर जेना महेन्द्र जी संग अपन स्टेजकेँ जोड़ी बनेलाह तहिना किछु जोड़ी स्त्री-पुरुष केर तैयार कएल जा सकैत छल। स्त्री पुरुष केर जोड़ी बनलासँ गीत सभहक प्रस्तुति आरो नीक भऽ सकैत छल। यद्यपि 1970 आ 80 केर दशकमे अनेक ठाम पुरूखक जोड़ी बनल मुदा कूनो शाश्वत जोड़ी नहि बनि सकल। बेर-बेर ईमानदारीसँ कहि रहल छी जे हमरा लोकनिकेँ अपन मानवीय धरोहर केर प्रति कनि साकांक्ष होबाक दरकार अछि। साकांक्ष होबा लेल समस्त समाजमे अपन संस्कृति संरक्षण हेतु सामूहिक सिनेह उत्पन्न भेनाइ आवश्यक। कतेक उदाहरण देखैत छी जाहिमे हम सब विध पुरौआ काज करैत लोककेँ, समाजकेँ आ अपना आपकेँ ओहिना मनबैत छी जेना कोनो माता अपन छोट नेनाकेँ पानिसँ भरल थारीमे चान केर प्रतिबिम्ब देखा ओकरा मना दैत छथि जे चान थारीमे आबि चुकल अछि। बहुत दुखद स्थिति अछि। हम सब एखनो धरि चंदा झा (कवि चन्द्र), यात्री, प्रदीप आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल किछु नहि कऽ पाबि रहल छी। तीन महिना जखन मृत्युकेँ भऽ जाइत छनि तखन अपना आपके पैघ कहए बला संस्था लिली रे केर स्मृतिमे शोक सभा बजबैत अछि। कतेक संस्था सब तँ facebook आ सोशल साइट्स पर लिख काज चला लैत अछि। हम एक प्रयोजनसँ किछु दिन लेल अप्रैलमे पटना गेल रही। ओतय कियोक सूचना देलाह जे दिल्ली आ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रक तमाम मिथिला मैथिली लेल कार्यरत संस्था श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर केर सम्मानमे बहुत पैघ कार्यक्रम केर आयोजन नॉएडामे कऽ रहल अछि। ई बात सुनि आनंदित भेल रही। बादमे पता चलल जे ओ कार्यकर्म अति सामान्य रहैक। सब कियोक रुग्ण भेल रवीन्द्रनाथ ठाकुर संग फोटो घिचा अपन व्यक्तिगत आ संस्थागत आर्काइव्जमे संचित कऽ लेलाह। जखन ओ आब नहि छथि तँ सब कियोक हुनकर छवि संग अपन छवि बला फोटोकेँ साथ शोक सन्देश प्रेषित कएलनि। दिल्ली आ राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्रमे लगभग 100 जाग्रत संस्था अछि। सब कियोक सांस्कृतिक कार्यक्रम करैत रहैत छथि। दिल्लीमे मैथिली भोजपुरी अकादमी सनक दिल्ली सरकार केर संस्था अछि। अहि संस्था केर उपाध्यक्ष संजीव झा मैथिल छथि, तीन बेरसँ विधायक छथि, आ दिल्ली सरकारमे हिनक बहुत नीक प्रतिष्ठा छनि। मैथिली-भोजपुरी अकादमी लेल अगर हुनकासँ सब संस्थाक कर्ता-धर्ता लोकनि वार्तालाप केने रहितथि तँ असगरे मैथिली भोजपुरी अकादमी पचास लाख टका आसानीसँ अहि कार्यक्रममे खर्च कऽ सकैत छल। सब संस्था अगर एक-एक लाख खर्च करैत तँ एक करोड़ सहजतासँ भऽ सकैत छल। दिल्ली केर मैथिल उद्योगपति, एवं जन मानस सेहो यथाशक्ति अपन सहयोग दऽ सकैत छलाह। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा उपराष्ट्रपतिकेँ अहि आयोजन केर मुख्य अतिथि बनाओल जा सकैत छल। मुंबईसँ उदित नारायण, दिल्लीसँ मैथिली ठाकुर, बिहारसँ शारदा सिन्हा आदिकेँ आमंत्रित कएल जा सकैत छल। अहिसँ दिल्लीक लोक आन भाषा भाषी, मीडिया, नेता, सभ कियोक बुझैत जे एहेन मैथिल आइकॉन छथि रवीन्द्रनाथ ठाकुर। अतबे मात्र केलासँ हुनका लेल पद्मश्री आसानीसँ भेट सकैत छल। कनिक तत्परता, कने सिनेह, कने समर्पण बहुत किछु कऽ सकैत छल। मुदा भेल की! हुनकर कदकेँ आरो छोट कऽ देल गेल। मुदा दोष आयोजक केर नहि, दोष तँ हमरा लोकनिक सोचक अछि। भऽ सकैत अछि बहुत लोक हमर अहि बातसँ बिलबिला उठथि आ हमरे पर नाना तरहक प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करथि। मुदा ताहिसँ स्थिति थोड़े ने बदलि जायत? मैथिल समुदाय चाहे मिथिला भूमि केर होथि अथवा प्रवासी होथि,मे विद्वान, समाजिक संस्था, युवा संगठन आ विद्यार्थी संगठन अथवा यूनियन केर मध्य सामन्जस्य नहि भेटैत अछि। ई बात आजुक नहि ऐतिहासिक अछि। भोगेन्द्र जीमे सब गुण छलनि मुदा ओ विद्वान सभ कें दिल्ली केर अखिल भारतीय मिथिला संघ केर कोर समितिमे बहुत सघन भूमिकामे नहि आबय देलथिन्ह। भोगेन्द्र जी ओना तँ अखिल भारतीय मिथिला संघ केर पदाधिकारी नहि छलाह मुदा सही अर्थमे वएह सर्वेसर्वा छलाह। ई प्रसंग लिखबाक प्रयोजन ई जे एखनो हमरा लोकनि अहि सब बात पर गंभीर होइ आ सब तरहक समायोजन करी। एखनो हम सब अपन रत्न: लिली रे, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, फणीश्वर नाथ “रेनू”, यात्री, स्नेहलता, प्रदीप लेल बहुत किछु कऽ सकैत छी। कोआर्डिनेशन ताहि लेल बहुत आवश्यक। बहुत बात लिखा गेल। लेकिन सोचब तँ हमरा बातमे कोनो ने कोनो समाधान भेटत। स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर मिथिलाक अनुपम रत्न छथि। ओ सदैव अपना रचनाक संग जनमानस केर ह्रदयमे जीवंत रहताह। पद्य खण्ड प्रदीप पुष्प २ टा रुबाइ आ २ टा गजल रुबाइ १ कोनो परीकेर नगरमे रहितौं हम खा दूध रोटी चट निनियाँ गबितौं हम माँ चूमितय माथ लगा टीका काजर मन होइए फेर सँ नेना बनितौं हम २ छै बियाह आइये ओकर से बिसरा देलियै नोर पोछि लेलियै आ दाढ़ी कटबा लेलियै लग्न जा रहल छलै आ बरियाती भुतिया रहल नाम पूछि दुल्हिनक हम रस्ता देखा एलियै गजल १ भाला बरछी तीर तलवार ककरा लेल ई व्यर्थक रणकेर ललकार ककरा लेल सब दिन भरि वसुधा कुटुम्बे रहल पहिने सँ ई खुनिआँ परमाणु हथियार ककरा लेल नोरक छै सबठाम बिक्री नगरमे आइ तखनो ई मुस्कीक परचार ककरा लेल लागल जकरा भूख भातक तकर सोझामे मेवा मिसरी केर जयकार ककरा लेल बस्ती डेरा जाइ जे मात्र हरहाड़ो सँ तै ठाँ विषधर केर फुफकार ककरा लेल जा धरि रहलै प्राण फुटहो अभावे भेल मुइला उत्तर भोज जयवार ककरा लेल (२२ २२ २१२ २१२ २२१) २ पाखड़ि त'रक मचान मोन पड़ि गेल खपड़ा बला दलान मोन पड़ि गेल तोहर हमर पिरीत भेल अनघोल मारिक पड़ल निशान मोन पड़ि गेल डग डग करय बदन त' लोकसब बाजै भादव बहय बलान मोन पड़ि गेल भूखल दिवस कनैत फेर बीतल त' गामक अपन नवान्न मोन पड़ि गेल तोरे भ' जीवनो कटैत ई 'पुष्प' जातिक मुदा सिमान मोन पड़ि गेल (2212 121 21 221 सब पाँतिमे, तेसर शेरक पहिल पाँतिक अंतमे दीर्घकेँ ह्रस्व मानबाक छूट लेल गेल अछि।पुरान गजल।) दिनकर कुमार, 4-बी-1, ग्लोरी अपार्टमेंट, तरुण नगर मेन रोड, गुवाहाटी-७८१००५ (असम). तीस टा कविता १ प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि साँझ होइते देरी रस्ताके कातमे अर्द्ध निर्मित मंदिरमे एकटा मजदूरक सिद्धहस्त अंगुरी सभ पुरनका हारमोनियम पर भागैत रहैत अछि एकटा मजदूर ढोलक बजबैत अछि और शेष मजदूर सभ थपरीके थाप संगे सुरमे उझलैत रहैत अछि प्राण प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि 'कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ....' 'की लयके शिवके मनायब हे शिव मानत नाही...' एहन बहुत रास गीत जे गाम सS विदा होइत काल ओ सभ स्मृतिके पोटरीमे जोगाके अनने छल प्रवासी मजदूर सभ भजन गबैत अछि आओर भरि दिन बहाओल गेल घामके पीड़ाके बिसरबाक चेष्टा करैत अछि अगिला दिन भिनसरे जिनगी सS दू दू हाथ करबाक लेल स्वयंके प्रस्तुत करैत अछि २ सोमालियामे जेन फोंडा सोमालियामे प्राण त्यागैत एकटा बालकके हाथ पकैर लेलक अछि जेन फोंडा जेन फोंडा बालकके आंखिमे मृत्युके छाहके चिन्हबाक चेष्टा करैत अछि आओर मृत्युके तीव्रता सS अबैत देखैत ची जेन फोंडाके आंखिमे दुख अछि ई दुख हॉलीवुडके सिनेमाक दुख सS भिन्न प्रकारक दुख छी फोटोग्राफरके समूह एहि क्षणके कैमरामे बंदी बना रहल अछि प्रति मिनट मरय बला पंद्रह टा शिशुमे ओ बालक सेहो सम्मिलित अछि जेकर हाथ अखन जेन फोंडा पकड़ने अछि किछु सेकेंडके पश्चात ठंडा भ' क' खसि पडत ओहि बालकके कोमल हाथ ३ जगजीत सिंहके सुनलाक पश्चात वायलिनके स्वर बरसैत रहैत अछि अवसादके दीर्घ रात्रिमे मधुर दिन सभक स्मृति नेनाकालक साओन मास युवाकालक चंद्रमा प्रियतमाके मुखड़ा विरहके वेदना वायलिनके स्वर बरसैत रहैत अछि आ हम भीजैत रहैत छी पिघलैत रहैत छी पथरायल आंखि भीज जाइत अछि संवेदनाके सुखायल माटि ऊर्वर भ' जाइत अछि ४ अरे ओ अभागल अरे ओ अभागल छोट छोट हाथ सS केना स्पर्श करब अकासके केना उठायब दुखके पहाड़के फेर केना चलि सकब सोझ भ' क' एहन नमहर नमहर स्वप्न आंखिमे ल' क' तुच्छताके पृथ्वी पर कहिया धरि करैत रहब छोट छोट गपके लेल समर्पण कहिया धरि अन्हारके भार सहन करैत अनुभव करैत रहब विवशताके ग्लानि अरे ओ अभागल विचलित करय बला परिवेशमे केना संभारब संवेदनाके गंभीर करुणाक दृष्टि हृदयमे स्पंदित प्रेम ५ हमरा नहि झुलायब हमरा नहि झुलायब सराहनाके झूला पर हमरा भ' सकैत अछि मिथ्या अहंकार हम हेरा सकैत छी अपन संतुलन हम मुग्ध भ' सकैत छी स्वयंके प्रति जं द' सकैत छी त' देब कनीक नेह हमर क्लांत अस्तित्वके कनीक छाहैर हमर भीजल स्वप्नके कनीक रौद विषादक क्षणमे दू टा मीठ बोली हमरा नहि झुलायब सराहनाके झूला पर हम बिसैर सकैत छी अपन मार्ग हम भ्रमित भ' क' पड़ावके बूझि सकैत छी लक्ष्य हम विस्मृत क' सकैत छी अपन आदर्श हमरा नहि झुलायब सराहनाके झूला पर ६ ई जे प्रेम अछि सांझ सेहो आहत भेल छल बांसुरीवादकके विषाद सS मेघ नोर खसाके व्यक्त केलक अपन शोक ककरो प्रतीक्षा क' रहल छल राति जेकरा बिछाके सूति रहल छल भिखमंगा धुआं सS आच्छादित जनपदके मानचित्रमे स्पंदित भ' रहल छल जीवन सभ ठाम मारि खेलाक बाद मनुख बिसरल नहि छल प्रेम ७ हमर सतरंगी सपना हम हेरायल वस्तु सभके ताकयके लेल निकलल छलौंह सरिसो फूलक खेत चोरेने छल नेनाकालक किछु पियर सपना हम पहिल बेर बुझलौंह जे पियर मात्र रुग्ण मुखके रंग नहि होइत अछि पियर रंग इन्द्रधनुषके रंग भ' सकैत अछि फूलके रंग सेहो भ' सकैत अछि जलकुंभी सS भरल पोखरि चोरेने छल नेनाकालके किछु हरियर सपना हम सभ बारंबार पोखरिमे डुबकी मारिके जलपरीके संधान केने छलौंह ओहि सुरंगके संधान केने छलौंह जे जाइत चल सोन चांदीके देशमे हम नील अकास आ कुहेसके शुभ्रतामे नील आ शुभ्र सपनाके संधान केलौंह हमर सतरंगी सपना गाम सS नगर धरि पसरल छल आ हमरा आंखिमे तकैत पूछि रहल छल-- टूटबाक कोनो वेदना होइत अछि? ८ करुणा सम्हारिके राखू करुणा सम्हारिके राखू आपातकालके लेल अंग्रेजी पत्रिकाके रंगीन पृष्ठके रक्तरंजित चित्र अहांके विचलित नहि क' सकैत अछि ससरैत घिसियाइत लोक सभ आ ओकर सभके चित्कार सS घमैत नहि अछि अहांके अंदर संवेदना चतुर्दिशके स्तब्धता हताश झरकल मुख भंगिमा अहांके मोनमे कोनो प्रभाव उत्पन्न नहि क' सकैत अछि सम्हारिके राखू करुणा लाभके व्यापार करैत काल ककरो दास बनबैत काल काज आयत करुणा ९ घृणाके संगे सहवास संभव नहि घृणाके संगे सहवास संभव नहि संभव नहि अपन इच्छाके विपरीत कीट जेंका जीवन यापन आदेश-अध्यादेशमे विलीन भ' चुकल अछि भविष्य आ बीमाके किस्तमे विभाजित भ' चुकल अछि स्वप्न अपन स्वर लगैत अछि अपरिचितके स्वर अपन छाह लगैत अछि शत्रुके छाह एहिना बनबैत छी जाल एहिना अपन अस्तित्वके बंदी बनबैत छी हम सभ जीवनके उज्ज्वल बनबयके लेल घृणाके संगे सहवास संभव नहि आ वनवासके सभ मार्ग अवरुद्ध अछि घृणाके आलिंगनमे कोमल भावनाके जीवित बचनाइ संभव नहि अछि १० पछिला शताब्दीके रेलगाड़ीमे पछिला शताब्दीके रेलगाड़ीमे अपन जनपद दिस जाइत काल हम कनैत देखलौंह विस्थापित स्वप्न सभके पलायनके पश्चात प्रत्यावर्तनके यात्रामे हमर जनपदके श्रमिक सभके मुख पर लिखल छल यातना-तिरस्कार-शोषण पछिला शताब्दीके रेलगाड़ी वर्तमानके पटरी पर घुसैक रहल छल जरि रहल छल भूमंडल आ स्थिर भ' गेल छल गाछ-लता तापके आगिमे झरैक रहल छल यात्रीगण पंखा सभ खराब छल आ कतौ खाली स्थान नहि छल ठीक सS पयर रखबाक लेल ११ नीनमे सोहर वृद्ध लोकगायकके करुण स्वरमे रुईया जेंका उड़ल जा रहल छल अंधकार प्राचीन हारमोनियमके धुन पर आसीन भ' क' हम उड़ल जा रहल छलौंह लोकाचारके जगतमे नीनमे सोहर सुनैत सुनैत स्पंदित कंपित भ' रहल छल हृदय करुणाके प्रवाहमे बहुत दिनके पश्चात एना बहल जा रहल छलौंह 'नैया पहुंचा द तनी ओहि पार ओ कन्हैयाजी...' वृद्ध लोकगायकके करुण स्वर समय आ स्थानके सीमाके लांघिके बहुत शताब्दी सS सुनि रहल छलौंह हमर नीनमे भ' रहल छल सूर्योदय १२ चेरापूंजी बरखा बांहि पसारिके दौड़ल आयल सम्मोहित करैत बाजल आऊ प्रिय पर्यटक हम अहींके प्रतीक्षा क' रहल छलौंह बरखा बांहि पसारिके दौड़ल आयल हरीतिमा हमरा शिरा शिरामे व्याप्त भ' गेल सुगंध जेंका सांस जेंका रंग जेंका प्रसन्नता जेंका बरखा बांहि पसारिके दौड़ल आयल कुहेस ओढ़ने नीनायल पहाड़ सभ कहलक आऊ मैदानी अंचलके मनुख उच्चता पर चढ़िके प्रकृतिके विराट स्वरूपके अनुभव करू १३ फूलक बरखा राति भरि होइत अछि फूलक बरखा नगरके दुर्गम अंचलमे राति भरि सुगंध खिड़की वेंटिलेटर सS अबैत अछि शयनकक्षमे मशीन मानव स्पंदित होइत अछि राति भरि होइत अछि फूलक बरखा शरत ऋतुके पदचाप एकांतमे सुनाइत अछि इजोरिया केराके पात पर ससरैत अछि राति भरि होइत अछि फूलक बरखा भिनसर अपराजिताके कालीन पर चलैत अछि नेना सभ ओ सभ कहैत अछि अखनो बाचल अछि पृथ्वी बाचल अछि ऋतु बाचल अछि जीवनके मर्यादा १४ एकटा बोड़ो कवयित्रीके गाममे ओ कहि रहल छल एतय पसरल अछि सभटा बिम्ब सभटा प्रतीक जे हमरा कवितामे बजैत अछि घरके पाछूमे अछि नदी जे हमर नेनाकालके सखी छी आ चारू दिस जे देखि रहल छी हरीतिमा एहि हरीतिमामे कुदैत चलैत एक दिन जवान भेल छलौंह हम देखलौंह हरीतिमाके दृश्यमे एके सैंतालीस संगे सैनिक सभके स्तब्ध भ' गेल छल बतास प्रकृतिके सौन्दर्यके स्थान पर संशयके भाव चारू दिस नाचि रहल छल ओकर माय कहलक परिवारके दू टा सदस्य मारल जा चुकल अछि फायरिंगमे पहिले जेंका सहज सरल जीवन आब नहि खेत सभ सम्हारैत अछि बंटाईदार ओ प्रफुल्लित भ' क' देखा रहल छल फूल एकरा कहैत छै उज्जर जवा आ एहि लतामके गाछ पर चढ़िके हम खाइत छलौंह लताम पहिले ई एतेक नमहर नहि छल तखन हमहूं छोट छलौंह ओकरा लताम मोन परैत छलै ओ नेनाकाल दिस घूरि रहल छल जतय नहि छल हिंसा विकृति राजनीति जतय जीवन छल एकटा मधुर पद्य जतय धानके खेतमे जगमगाइत छल स्वप्न १५ नबका साल आबि रहल छल कुहेस ओढ़िके सूतल छल नदी जखन कैलेंडर बदैल रहल छल जनपदके लोक मंदिरके आगू आगि जरेने भिखमंगा सभ जाड़ सS युद्ध क' रहल छल आयोजित उत्सव सभमे बहायल जा रहल छल मदिरा अठारह डिग्री तापमानमे नचनिया सभके गरम लागि रहल छल आ ओ सभ वस्त्र उतारि रहल छल कुहेस ओढ़िके सूतल छल नदी नबका साल आबि रहल छल आ जादूगर जेंका प्रभुगण मिथ्या स्वप्नके परबा उड़बैत छल तखन सूति रहल छल जनपदके निर्धन प्रजा १६ स्टेशन: अनुभव ओ चिर परिचित रेलवे स्टेशन छल नेनाकाल सS अखन धरि कयक बेर जतय अबैत जाइत रहल छलौंह एकटा गाड़ी सS उतैर दोसर गाड़ीमे यात्रा करके लेल अंतरालक प्रतीक्षाके समय व्यतीत करैत छलौंह परिचित कुलीके संगे कुल्हड़मे चाह पीबैत गप क' रहल छलौंह ओ कहलक पाथरके बैंच पर नहि बैसू ठंडा रहैत छै गार्डके बक्सा पर बैसब सुविधाजनक रहत प्रतीक्षालयके परिचारिका अधबेसू विधवा छल जेकरा गठियाके पीड़ा छल ओकरा दस टाकाके खगता छलय ई शुल्क छल प्रत्येक यात्रीके प्रतीक्षालयमे तीनटा मोट मूस यात्री सभके निद्रामे आवागमन क' रहल छल परिचारिका कहलक एतय बहुत रास मूस अछि मूसके बिसैर विश्राम करू १७ दरिद्रताके उपनिवेश दरिद्रताके उपनिवेशमे गहन अन्हार अछि जेना अनेक शताब्दी सS नहि घमल दुखके पर्वत जेना अनेक शताब्दी सS नहि आयल इजोत जेना अनेक शताब्दी सS मूर्छित भ' क' पड़ल अछि गाम दरिद्रताके उपनिवेशमे गहन अन्हार अछि लोकगीत सभमे अभाव आ क्षुधाके वर्णन अछि कोनो अज्ञात ईश्वर सS प्रार्थना अछि जे यातनाके कतेक दिन उठबय पड़त कतेक दिन जीबय पड़त दरिद्रताके उपनिवेशमे चलैत फिरैत छाहैर अछि छाहैरके संगे चलैत छाहैर अछि छाहैरके नोर पोछैत छाहैर अछि छाहैरके सांत्वना दैत छाहैर अछि एकटा मानचित्र अछि शनैः शनैः नष्ट होइत सभ्यताके १८ शारदा सिन्हाके सुनैत ओहि कंठमे बाझल स्वरके कंपनमे हम प्रवाहित होइत जाइत छी जेना बतासमे उड़इत अछि कोनो तृण अकास दिस समस्त लोकाचारके मधुरता प्रविष्ट होइत जाइत अछि हमरा अंदर आवेग सS भीजैत अछि नयन सीताके विदाईके वर्णन करेजके मथि दैत अछि केना एतेक जतन सS पोसल धीयाके ल' क' चलि जाइत छथि रघुवंशी ओहि कंठमे बाझल स्वरके कंपनमे हम प्रवाहित होइत जाइत छी केना देवता सेहो मनुख सन करैत छथि आचरण केना भिनसरे गौरा जगैत छथि स्वामीके लेल पीसैत छथि भांगक गोला केना अयोध्या सS आयल राजकुमारके मिथिलाके नारी सभ दैत छैन्ह मधुर गारि ओहि कंठमे बाझल स्वरके कंपनमे हम प्रवाहित होइत जाइत छी केना विद्यापति जीवित रहैत छथि जनपदके निरक्षरके मोनमे सोहर समदाओन नचारीके पंक्तिके रूपमे केहन सम्मोहक अछि ई स्वर जे हमरा स्वप्नमे मिश्रित करैत अछि हमर माटिके मादक गंध १९ पलायनके हाहाकारी दृश्य देखैत पलायनके हाहाकारी दृश्य देखैत करेजमे पसरल जाइत अछि अवसाद गामके लगमे छोट स्टेशन पर नवविवाहिता कनिया आ टीनके पेटी संगे बैसल श्रमिक सभ अपन बूढ़ पिता सS कहैत अछि चिंता करयके कोनो आवश्यकता नहि अगिला मास पठायब टाका मायके उपचार भ' जायत आ बंधकी पड़ल खेत सेहो छूटि जायत पलायनके हाहाकारी दृश्य देखैत कानमे ध्वनित होइत रहैत अछि विरहके लोकगीत शनैः शनैः विदा होइत अछि समस्त सर्वहारा समस्त मेधावी समस्त ऊर्जावान लोक गाम बनि जाइत अछि शरणार्थी कैंप जतय रोग शोक दुख सS युद्ध करैत रहैत अछि अक्षम वृद्ध स्त्री नेना किछु धूर्त लोक निर्धारित करैत अछि जनपदके भाग्य २० करेजमे बजैत रहैत अछि प्रेम करेजमे बजैत रहैत अछि प्रेम कोनो लोकगीतके करुण धुन जेंका एकटा प्राचीन नदी जेंका ककरो उपस्थितिमे शिरामे तीव्र भ' जाइत अछि रक्तके आवागमन प्रतिकूल समयमे व्याकुल क' दैत अछि ककरो विषादमे भीजल नयन ककरो कोमल स्पर्श सोखि लैत अछि अंदरके पीड़ा ककरो मंद हास्य धोइत अछि कलुषताके दाग सभ करेजमे बजैत रहैत अछि प्रेम कोनो लोकगीतके करुण धुन जेंका स्मृतिके मार्ग सS डेग बढ़बैत अबैत अछि कियो बतासमे उड़बैत अपन केश श्वासमे सुरक्षित राख़य चाहैत छी ओकर गंध पान करय चाहैत छी सौन्दर्यके अमृत २१ भीज रहल छी दुखके बरखामे भीज रहल छी दुखके बरखामे सावन मासके आर्द्रता लपेटने अछि अपन बांहिमे नागरिक जीवनके समस्त तिक्तता अवरुद्ध केने अछि चारु दिशाके भीज रहल छी दुखके बरखामे खोताके दूरी अकस्मात बढि गेल अछि आश्वासनके छत्ता हेरा गेल कतौ गाछके स्थान पर सुखायल काठ असमर्थ अछि बरखा सS रक्षा करयमे भीज रहल छी दुखके बरखामे देहक रक्त बहि रहल अछि घाम भ' क' बरखा जलमे मिश्रित घामके स्वाद अनुभव क' रहल छी वंचक मेघ सभ क' रहल अछि दुरभिसंधि २२ हमर गामके शहनाई वादक सभ एना किएक लगैत अछि हम ओकरा सभके अंतिम बेर देखि रहल छी तन्मय भ' क' शहनाई बजबैत आंगनके कोनटामे निहुरिके बैसल हमर गामके शहनाई वादक सभ ओकर सभके मंगलध्वनिमे केहन विलक्षण आकर्षण अछि हमर नेनाकालके अनेक उत्सव अछि उल्लासके अनेक अस्पष्ट क्षण केना ध्वनि संगे प्रकट भ' रहल अछि ई केहन आदिम राग छी जे कतेक शताब्दी सS मिश्रित होइत रहल अछि हमर गामके वायुमे हम किएक ओकरा सभके देखिके उदास भ' जाइत छी ओकरा सभके मंगलध्वनिमे त' कोनो विषाद नहि छै कतौ विपन्नताके आक्षेप नहि छै तखन की एहन पीड़ा छै जे हमरा विचलित क' रहल अछि की हम शंकित छी जखन ई शहनाई वादक सभ चलि जायत फेर हमरा गाममे कियो नहि बजायत ई बाजा २३ वैशाख बिहू लोककथाके राजकुमारी जल सS निर्मित मेखला चादर धारण केने तरहत्थी पर ल' क' वर्षाके बुन्नी नैहर घुरैत अछि बिहूके पकवान खाईके लेल बांहि पसारि दैत अछि वैशाख बिहू नर्तकी आंखिमे नेने बिजुलीके ज्योति अबैत अछि झंझावात जेंका बसंतके मादकतामे लीन भ' जाइत अछि दिन राति ढोलकके थाप प्रतिध्वनित होइत रहैत अछि पर्वत-मैदान-वनमे उन्मादित होइत अछि वृक्ष हथकरघा लग बैसल युवती सभ प्रियतमके लेल बुनैत अछि रंगीन स्वप्नके वस्त्र २४ कचरा बीछय बला बालक ओ नगरके सभ सS निर्धनतम परिवार छल जे अपन क्षुधा आ निर्धनता सS मुकाबिला करैत नगरके सभ सS सुखी परिवार बुझाइत छल हम सांझके प्रायः देखैत छलौंह भरि दिन कचरा बीछलाक बाद कबाड़ी सS पाई ल' क' ठेला पर घुरैत छल परिवार पिता चलबैत छल ठेला आ ठेला पर बैसल रहैत छल माता माताके कोरामे छोट बालिका खेलाइत आ लगमे कचरा सS उठायल गेल कोनो टूटल खेलोना सS खेलाइत बारह बरखके बालक कालि हठात सिटी बसके खिड़की सS हम देखलौंह नगरके सभ सS निर्धनतम परिवार ठेला पर बैसल घर घूरि रहल छल मुदा पिता उपस्थित नहि छल पिताके स्थान ल' लेने छल बारह बरखक बालक जेकर छीलल माथ देखिके हम उदास भ' गेल छलौंह २५ अनचिन्हार ई जे मात्र बाहरे देखैत अछि बाहरे बौआइत रहैत अछि प्रति क्षण अस्थिर प्रति क्षण तमसायल कोनो पर्वतके कर्तव्य जेंका उठेने ओ कतेक अनचिन्हार लगैत अछि तैयो ओकरा हम चिन्हइत छी कारण ई छी हमरे प्रतिरूप जे वर्तमानमे विछिन्न अछि संवेदना सS भावुकता सS प्रकृतिके मनोरम दृश्य सS तें ओ प्रति क्षण बुझा रहल अछि एतेक अवसादग्रस्त एतेक हताश जेना कोनो कारावासमे व्यतीत क' रहल अछि जीवन २६ अनुकूलन परिचित परिवेशमे जे वस्तु सभ विचित्र होइत अछि ओ सभ सेहो नीक लागय लगैत अछि विचित्र आ अवांछित वस्तु सभके हमरा अभ्यास भ' जाइत अछि असुविधा सS हमरा कनियो विचलन नहि होइत अछि ऋतुके प्रतिकूलताके कोनो प्रभाव अनुभव नहि होइत अछि वास्तवमे ई छी व्यवस्था तंत्रके खूबी जे हमरा विरोधके हमरा आक्रोशके नट-बोल्ट सS कसि दैत अछि आ एकरा अनुकूलित क' दैत अछि २७ ओ सभ नचारी गायत ओ सभ नचारी गायत आ रोग-शोक-क्षुधाके बिसरयके चेष्टा करत बिसरयके चेष्टा करत माघके शीतलहरीके पेटके क्षुधा अग्निके बिसरयके चेष्टा करत जल प्रलयमे धानके संगे बहल स्वप्न सभके ओ सभ नचारी गायत आ ईश्वरके कष्ट निवारक गोटी जेंका सेवन करयके चेष्टा करत २८ करुण आंखि करुण आंखिमे संभव नहि तकनाइ संभव नहि दुखके गंभीरताके नपनाइ मूर्ति जेंका लोक सभ मात्र शून्य दिस ताकि रहल अछि शून्य सS आरंभ होइत जीवनके गणित समाप्त होइत अछि शून्य पर करुण आंखि अस्तित्वके आर-पार आहत करैत अछि एतेक करुण आंखि जेकरा देखि मोन सिहरैत अछि २९ स्त्री सभके लगमे स्त्री सभके लगमे यातनाके खिस्सा छल ओहि खिस्सामे अपूर्ण नेनाकालके किछु मीठ किछु तीत स्मृति छल स्त्री सभके लग पथरायल आंखि छल जे आंखिमे पहिले एतेक जल छल मंगल गीतके राजकुमार ओहिमे स्नान करैत छल तितली-पोखैर-एकपेरिया-आमगाछीके मधुर क्षण ओहि आंखिके पुलकित करैत छल स्त्री सभके लग मात्र कुपोषणके वर्तमान अछि असमय प्रसवके दंड गिरहस्थीके कोल्हू बेरोजगार पतिके क्रोध दरिद्रताके गह्वर अज्ञानके परिवेश स्त्री सभके लगमे जीवन नहि मात्र जीवनके नाटक अछि ३० ई हमर जनपद छी ई हमर जनपद छी अवसादके पीबैत अछि कष्टके सेवन करैत अछि कुहेसमे कनैत अछि हमरा जनपदमे मात्र विपन्नताके लोकगीत गायल जाइत अछि सरिसोके फूल जेंका पीयर मुख पर स्वप्नके कचोट सर्पदंश जेंका नील दाग जेंका पसरैत अछि हमर जनपदमे स्वाभाविक किछु नहि अछि नहि जीवनके छंद नहि चूल्हाके उत्सव नहि सुखके नीन नहि आशाके भिनसर अंतहीन यंत्रणाके भाठीमे झरैक रहल अछि हमर जनपद (दिनकर कुमार क जन्म 5-10-1967 के ब्रह्मपुरा गाम, प्रखण्ड मनीगाछी, जिला दरभंगामे भेल। नेनाकालमे गुवाहाटी आबिके कर्मभूमि बनेलैथ। 32 वर्ष धरि पत्रकारिता, लेखन आ अनुवादके अनुभव। हिन्दीमे दस टा कविता संग्रह, दू टा उपन्यास, असमियाके साठि टा पोथीके हिन्दी अनुवाद प्रकाशित। पुश्किन सम्मान सहित विभिन्न पुरस्कार।) कुमुद "अनुन्जया" सुक्खा सिम्मड़ कत्तै जोगलो जाय सुक्खा सिम्मड़ कत्तै जोगलो जाय,,, बिना दूध के बच्चा केना पोसलो जाय,, हाथ में रोजगार नय छै... स्वरोजगार के यहां व्यवहार नै छै... भूखलो पेट जयकारा आरो कत्तै लगैलो जाय... सूक्खा सिम्मड़ कत्ते जोगलो जाय,, बिना दूध के बच्चा केना पोसलो जाय,, महंगाई फुलंगी के पार छै भष्टाचार के व्यवहार छै द्वार द्वार भटकी भटकी के केकरो केकरो गोहार लगैलो जाय... सुक्खा सिम्मड़ कत्ते जोगलो जाय... बिना दुध के बच्चा केना पोसलो जाय... अपराध बेलगाम छै व्यवस्था हलकान छै रक्षक आब भक्षक भे गेलय बोलो केकरा केकरा पर एफ आई आर करलो जाय... सुक्खा सिम्मड़ कत्ते जोगलो जाय... बिना दूध के बच्चा केना पोसलो जाय... सुनै लै कोय तैयार नै छै बोले में सब पारंगत होशियार छै अकरकान के सभा मंडली में सत्संग कैकरा कैकरा सुनैलो जाय.. सुक्खा सिम्मड़ कत्तै जोगलो जाय बिना दूध के बच्चा केना पोसलो जाय... साहित्य सें केकरो सरोकार नय छै छपना छपान सब व्यापार भेल छै केकरा -केकरा आरो कहिया तक? नोन तेल हरदी लगैलो जाय... सुक्खा सिम्मड़ कत्तै जोगलो जाय... बिना दूध के बच्चा केना पोसलो जाय... आशीष अनचिन्हार भक्ति गजल छथि सिया जन धिया मैथिली जानकी मोनमे बस रहथि मृणमयी जानकी भूमिमे भूमिका छल बनल ताहि दिन कोखिमे सोन सन पार्थवी जानकी बुद्धि ओ रूपमे तीक्ष्ण आ सौम्य धरि शिव धनुषकेँ उठा कामिनी जानकी राम तोड़ल धनुष जे जनक मोनमे एक भेलथि अपन रामजी जानकी भाग के दोष या राम माया रचल वन गमन सिय हरण मानिनी जानकी राम लक्ष्मण सकल सैन्य हनुमानपर भार छल ताकि आनब सही जानकी क्रूर रावण मरण दामिनी अग्निमे आबि सासुर सुनथि बतकही जानकी राम जानथि मुदा फेर सिय वन गमन गर्भमे रत्न रखने रही जानकी ॠषि वाल्मीकि रखलनि अपन धर्म आ पोसलनि पुत्र अभिमानिनी जानकी अश्व लव कुश पकड़ि युद्ध केलथि बहुत हारि गेलथि अपन रामजी जानकी भूमिजा भूमि गेलीह बड़ दुख सहैत दर्द दुख केर छथि जीवनी जानकी आधुनिक कालमे राम रावण जहाँ आइयो दुख सहथि भगवती जानकी सभ पाँतिमे 212-212-212-212 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम अछि। 11म शेरक पहिल पाँतिक अंतिम लघु छूटक तौरपर लेल गेल अछि। गजल लेखक केर छवि रचनासँ बेसी रचना केर छवि कचरासँ बेसी धोखा देत सदिखन बूझि लिअ से मीलत मोन किछु जकरासँ बेसी जे धेने तराजू पाइ बलपर भेटल ओकरा हिस्सासँ बेसी भदवा केर चलती भेल अहिना आँखिक नोर छै जतरासँ बेसी डेराइत रहू सदिखन अहाँ हम खतरा केर छवि रक्षासँ बेसी सभ पाँतिमे 22-2122-2122 मात्राक्रम अछि। सुझाव सादर आमंत्रित अछि। गजल सुविधा चुनलक नवका आँगन चुप्पे रहलै पुरना आँगन जकरा बुझलहुँ कमला कोसी धधरा धधकै तकरा आँगन के केहन छै केहन नै छै जानै सभहक महिमा आँगन भूखक मारल जनता सौंसे धमगिज्जर छै राजा आँगन अरजै कीनै भोगै बाहर बाँचल रहलै कहुना आँगन सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल छन छनमे जे बदलल दुनियाँ अपने सनकेँ लागल दुनियाँ हमरा कातक साफे सुत्थर हुनका कातक घोंकल दुनियाँ बाहर बाहर संतोषी छै भीतर भीतर दग्धल दुनियाँ कखनो लागै फूलल फूलल कखनो लागै पचकल दुनियाँ अपने आगिसँ जरबे केलै अपने रसमे भीजल दुनियाँ सभ पाँतिमे 22-22-22-22 मात्राक्रम अछि। दूटा अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल चुप्पे चुप छै सभहँक फेस लागल हेतै कत्तौ ठेस अपने रस्ता अपने आरि अपने हारल अपने रेस हुनकर नेहक बनलै जेल हमहूँ हारब जीतल केस इम्हर उम्हर सगरो देखि चल गे सजनी सुंदर देस बहुरुपिया लग रहिते छैक जेहन तेहन बहुते ड्रेस सभ पाँतिमे 22-22-22-21 मात्राक्रम अछि। गजल चिन्ते चिन्ता छै तैयो जिन्दा छै ठक के नगरीमे ठक बासिन्दा छै किछु छै मालिक सन किछु कारिन्दा छै नीके लगलै से केहन निन्दा छै जे राधा रानी से गोविन्दा छै सभ पाँतिमे 22-22-2 मात्राक्रम अछि। ई बहरे मीर अछि। गजल काज कम जोर बेसी मूँह कम ठोर बेसी आँखि हुनकर कहैए दर्द कम नोर बेसी देशमे आबि गेलै आब लतखोर बेसी ई बजट एहने छै माछ कम बोर बेसी हाल पिच केर अतबे सिक्स कम फोर बेसी सभ पाँतिमे 2122-122 मात्राक्रम अछि। गजल मनोबल मनोरम बना देत पक्का मनोकामना सभ पुरा देत पक्का नियम ई सदा मोन राखब अहाँ हम अपेक्षा उपेक्षित बना देत निश्चित कते रोकि रखतै कते दाबि सकतै बहल नोर दुनियाँ जरा देत पक्का कनी आचरण ठीक रखबै तँ अनुभव गजल नीक सुंदर कहा देत पक्का कियो आइ पूजा करैए मुदा ओ विसर्जन कऽ जल्दी भसा देत पक्का सभ पाँतिमे 122-122-122-122 मात्राक्रम अछि (बहरे मुतकारिब मोसम्मन (चारि) मोसम्मन सालिम वा बहरे मुतकारिब सालिम अठरुक्नी)। गजल दुखमे चाहत मोन हमर सुखमे बाँटत मोन हमर अते इयाद लेने जाउ अतबे राखत मोन हमर बेर बखतपर भस्मासुर हमरे मारत मोन हमर कऽ लिअ छल कपट आ जे से किछु ने जानत मोन हमर अपन बूझि अबियौ कहियो अपने लागत मोन हमर सभ पाँतिमे 22-22-22-2 मात्राक्रम अछि। दू अलग-अलग लघुकेँ दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि। ई बहरे मीर अछि। राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी आमक गा छी आमक'गा छ बेकल कतेक छल, छलै देह पर, अगबे पा त, मञ्जर नहि फुलेलै ,कत दि न, भए गेल छलै फरो नि पा त। आबि गेलै ऋतु -संधि -का ल, भए जी र्ण, शि शि र छल जा एबला , शुभा गमन छल ऋतुरा जक ', भए युक्त, सकल मो हक कला । सजलए मञ्जर, आम्र तरु पर, पि अर वसन सँ जनु सि ङा र, किं वा , लगैत छल आम गा छ, पहि र लेने हो कनक-हा र। ई, सरि पहुँ, स्वा गत-गी त छल, जे गा बि रहल छलि को कि ल, अभि नंदन -पर्व छल मना रहल, कौ आ ,सूगा ,सभ कि ओ मि ल। गा छी त 'छल लगभग नि र्जन, पड़ैत रहै छलै, सभतरि , भम्ह, सुन्न कलम मे गा छो सभ के, हो इत छलै की दुः ख को नो कम? आमक'गा छी क' शो भा -सुन्नर जेना लगैत छल, हेरा गेलै, स्थगि त जेना शुभ -का ल भेल हो , एलैक, जखन मजरा गेलै। फूल -फल क' प्रती क्षा सँ, व्यथि त छलैक गा छक हृदय, मो न हो इत छलै, गा बी गी त को नो , उदा सी क लय। आमक 'गा छी क' परि पा र्श्व आब, नव -संस्का र सँ भरि गेल, आनन्द -बसा त बहए ला गल, झुमि -झुमि तरु सभ तरि गेल। चहल -पहल बढ़ि गेल, भरल उत्सा ह -लहरि सँ गा छी , ओगरबा ह की ? सब कि ओ कहता , ' गा छी लेल ,बि दा छी । ' बाँ सक मचा न आ खो पड़ी मि लि , एखनुका त' बूझू, इएह दला न, पर्णकुटी मे अछि भरल, अमृतफल प्रति कतबा सम्मा न? सुमधुर सहका र, बहुरंग मे, आम्र तरु पर अछि सजल, पा कल, सुपा कक'ला गल पथा र, भरि गा छी , धब -धब, खसि रहल। पा बि पवन के स्पंदन, ला गल ना चय सभ डा रि -पा त, गा छ स्वयं कि छु गा बय ला गल, आम -मा स बड़ हरखक बा त। कए गो टे पबैत छथि अर्थ -ला भ, हो इत छथि मुक्त ऋण -पत्र सँ, बहुतो क अर्थ मजबूत हो इत छन्हि , आमक एहि लघु -सत्र सँ। जा हि गा छ पर आम जतेक अछि , ओ ओतबे लि बल अछि , वि नी त, वि नम्र हो इते छथि , जि नका जतेक वि भव, धी -बल अछि । आम-का ल क' अवसा न समय, छलै आबि गेल लगी च, भए जा इत अछि मद्धि म, जहि ना अस्त, मा र्तण्ड -मरी चि । शुरुआत भेल आयो जन के, गा छी मे संध्या -भो जक,' ई का र्यक्रम रो मां चक छल, मनमो हक कतेक, ओ रो चक। टुटतैक गा छ क', बाँ चल आम, उखड़तै ,खो पड़ी ओ मचा न, गा छी के छो ड़ि , एकसरे,रे सब करतै अपन गृह -प्रस्था न। छै पसरल एकटा वि चि त्र शां ति , भ' गेल समग्र गा छी उदा स, एकटक तकैत, गेनि हा र केँ, बि धुआएल, दुः ख छै बहुत रा स। व्या कुल छै चि त्त उभय -पक्षक, इच्छा कथमपि नहि छो ड़' के, ने पएर बढ़ै छै ओगरबा हक, सम्बन्ध ने हो इ छै, तो ड़ 'के। गा छी मे पसरि गेलैक उदा सी , निः शब्द वा ता वरण, गुम -सुम, टूटल हृदयक उदा स स्वर अश्रव्य, नि का लि रहल छल द्रुम। सुख हम ताकि रहल छी पता सुखक' भेटत त' समाद पठाएब, डिगडिगिआ पीट क' सभ केँ, जा-जा क' समाद सुनाएब। अपना तरहेँ ताकि रहल छथि , सभ किओ सुख संसार मे, अपन-अपन छन्हि बाट सबहक, लागैन्हि जे नीक, विचार मे। सुख पाबै छथि किओ गीत गाबि , दए उपरागे, किओ पाओल सुख, सुन्दर-सुंदर, सौंदर्य प्रसाधन सँ किओ सजबैत, छथि निज मुख। घोड़ा-हाथी साजि कए, होइत अछि किनको, सत्कार, किओ, पाबि केवल फूल-पान, क' दै छथि जय जयकार। किनको त' दए रहल अछि सुख, सम्पत्ति के भंडार, आ, किनको लए धन-संग्रह, पूरा पूरी, बेकार। औपचारिकता निबाहब, किनको लेल सर्वोच्च, जीवन बिता लैत छथि , रखैत ओकरे रोच। गुमान पोसय मे किनको, रहैत छन्हि बड़ भारी हुलास, निज अहंकार क' तुष्टि मे, छथि पबैत सुख ओ, बहुत रास। किनको विधु क' चाननि निहारि, होइ ने छन्हि, सुख समटल, माॅलक' कृत्रिम इजोत देखए, किओ, ओकरे लेल रकटल। व्योम मे पसरल, तारा मंडल, ओ दृश्य, किनको छू जाइत अछि, ओही के, किओ देख-देख क' जोर-जोर, ओँघाइत अछि। भौतिक सुख-साधन, किनको, होइत छैन्ह प्राण-समान, संसार-विषय सँ बैरागी, छोड़बैत रहैत छथि जान। भोकारि पारि कनैत छथि किओ, छोड़ैत काल निज गाम, किनको अभिलाषा रहैत छन्हि , जाइ दूर, कोनो ठाम। अठोङर कूटि निबाहैत छथि, बिआहक' सभ रीति-रेबाज, आ', सुख दैत छन्हि किनको , परम्परा तोड़' के काज। मुदित होइत छथि पाबि क' अपनापन-अनुबंध, किनको नीक लगैत छन्हि, राखब बाँतर संबंध। व्यक्ति-व्यक्ति पर परिभाषा, बदलैत रहैत अछि सुखक', किनका लेल की सुख? निर्भर अछि अभिलाषा ओहि मनुखक'। मान, प्रतिष्ठा पाबि जगत् मे, जयजयकार कराबी, खाँहिस जिनकर, कीर्ति मे त्रिलोकक सुख हम पाबी । कर्त्तव्य-पालन मे जिनका , संसारक, सभ सुख भेटल, सुख पओलथि, उपकार, त्याग मे, अनकर दुःख जे मेटल। किनको मोन मे, सुख ओ दुःख, दुहूक मोल, समतूल अछि, हर्ष-विषादक ई समता वैराग्य-भाव के मूल अछि । मुदा, उठैत अछि प्रश्न आब, वास्तव मे, सुख ककरा कही? विषय अछि गूढ़, कठिन अछि उत्तर, की छै गलती? की सही? होइछ सापेक्षिक, सुख क' रूप, हर व्यक्तिक अपन छन्हि परिभाषा, मुदा, प्रत्येक सुख अवश्य बुझय, मानवता आ कानूनक भाषा । जँ मोन खुश, त' बरसैत छै, सभ सुख के पुष्प, अँगना मे, एहि फूलक' गमक, गमकैत छै, डिह-डाबर, हन्ना-हन्ना मे। कथमपि जरूरी अछि ने ई, सम्पत्तिए सँ निकलैत अछि सुख, आओर, अकिंचन के दोआरि, डेरा देने बैसल अछि दुःख। हर्ष-विषाद, समतुल्य बूझि, चलैत छथि जे कर्तव्य क' बाट, सुख ओतहि भेटतन्हि, जे चलाबथि , गृहस्थी किंवा राजपाट। गला-गला क' सुख ओ दुःख मिलाओल जाए समतुल्य, सोच बनत एहि मिश्रण सँ, होएत ई सोच, अमूल्य। नव-संस्कृति ओ गा म तेहन पा ठ ने पढ़लहुँ बौ आ , बि सरि गेलहुँ अहाँ अपन गा म, मा ए -बा प दुहू बा ट तकैत छथि , कहि आ, पूत अओता एहि ठा म। को ना -को ना , बा बूजी पो सलथि , कुटि आ -पि सि आ कैलथि मा ए, 'रहि जा इ अपने भुखलो , मुदा नी क -नि कुत सभ बौ आ खा ए'। सुख -दुः ख का टि अहाँ के पढ़ेलथि , हो न्हि सदैव 'हा कि म बनि जा उ, ओहन प्रति ष्ठा अहाँ पा बि ली , जबा र बा जि उठय 'बा ह बा उ '! दि न -रा ति , अहूँ कैलहुँ मेहनत, आ, पओलहुँ नी क नो करी ओ पद, पैघ घर मे बि आह भेल, आ नमहर अहाँ क हो इत गेल कद। एक बेर, आएल रही गा म, त' बि सरल रही सभ लो का चा र, के गो र लगै अछि पएर छूबि ? ला गथि मा ए -बा प, आब भा र। पा स -पड़ो स,हमहूँ सभ छलहुँए, भेटब तकर रहैत छल, आस, घुमि -घुमि आपस गेलहुँ कतेक बेर, कतबो केलहुँ, भेँटक प्रया स। कनि आँ के सभ ला गन्हि देहा ती , सुनलहुँ, बजथि न्ह -'ई केहन ठा म? कहाँ चलैत छै पंखा -एसी ? चूबि रहल अछि भरि दि न घा म'। एतए,लो क ती तल रहैत अछि , भा वना के वृष्टि मे, बा ह्मा डम्बर के देखैत अछि ? अपना पन के सृष्टि मे। परञ्च, पद के अहंका र, आ नव -धना ढ्यता -गरमी , बाँ हि ममो ड़ि दैत छलै ई, सरल-संबंध क' नरमी । बुझैत छलहुँ,' पड़ो सी अछि या चक, हमर सुख -सुवि धा छी न लेत । प्रा ची न युगक पहि रन -ओढ़न, आ, दरि द्रता दै छै ई खेत' । ला गल, को ना लो क खा इत छै? नी चाँ , मा टि पर बैसि क', अपनैती कतेक छैक गहीं र? देखती ऐ ओहि मे पैसि क'। 'ई हेलो -हा इ'के दुनि या नहि , ने, औपचा रि कता क बना वटी खेल, गा म मे नहि , छद्म -छल, छै ,बन्धुत्व आओर हृदयक मेल । सुख -दुः ख बाँ टि , जी बै छथि सभ कि ओ, आडम्बर नहि , ने टो प -टहङ्का र, नूतन -संस्कृति क चश्मा पहि रि , मौ लि कता कि एक, लगैछ बेका र? नव्यता , दए रहल बहुत, त', छि नबो केलकै बहुत रा स, सुख -सुवि धा के मतलब की ? बनि जा ए भा वना ओकर दा स? एखनो , जी बैत अछि भा वना , गा मक नि ष्कपट पा नि मे, घोँ घा उझ, वि तण्डा हो इत छै, मुदा संग, ला भ ओ हा नि मे। प्रकृति -छा हरि मे लो क जी बैत अछि , बहैत रहै छै, सुंदर बसा त, मौ का पड़ला पर ठा ढ़ हो इत छै, एहि ठा मक सुखलो , खढ़ -पा त। लो कक सदि खन नो र खसैत छै, दुः ख जँ आबहु ककरो मा थ, टुअरो ,एहि लेल नहि बुझैत अछि , गा म मे अपना के अना थ। ई नहि छै ;नूतनता के वि रो धी हो इत अछि गा मक लो क, मुदा , पसि न ईहो नहि छै, देखौ आ संस्कृति क' चा टब फों क। जी वन मे ऋजुता के का रण, लम्फ -लम्फा ने टि टम्भा , कनि ए टा का सँ खर्च चलै छै, देखि लगै छै अचम्भा । कहाँ कहैत छी , गा मक जीवन मे, एकछाहे गुण अछि सभटा , स्वा स्थ्य आओर आन असुवि धा , आ, चा र पर छा रल खपटा । लो को की सभ सज्जने छथि ? कतेको भरल अछि दुर्जन , बेर पर त' छि टकि जा इत छथि , कतेको परि जन -पुरजन। अहूँ त' एहि मा टि -पा नि क', प्रसा द पा बि आगू बढ़लहुँ,हुँ मुदा , बि सरलहुँ, नि र्मो ही भ', प्रथम -पा ठ , जत'पढ़लहुँ। हेरा लेलहुँ सि नेह ओ श्रद्वा , अपनहि री ति -रेबा ज लेल, अनसो हाँ त लगैत अछि , आओर अनठि या परम्परा भेल। बा हरक चका चो न्ह मे नहि चो न्हरा इछ अपन संस्कृति क नयन, संस्का र -सुधा रक्त मे अछि , ने सुखा एत, आ ने छो ड़त मन। जा हि वा यु मे प्रथम साँ स लेलहुँ,हुँओ को ना आब जा एत? जा हि मा टि मे ओतेक खेलेलहुँ,हुँ बंधन त' ओ, ओझरा एत। स्वभा व -सि द्ध छै;संस्कृति सभ आपस मे ओ त' फेँटेतै, मुदा , मूल कमजो र हेतै त', फुनगी मे जड़ि भेटेतै? जे छी से त' छी हे, आ जे छलहुँ सेहो रहबे करब, लय आ ता ल मि ला दि औ, अन्तर्द्वन्द्व सँ कि एक लड़ब ? वि रो धा भा स नहि दू संस्कृति मे,मे ठी के अछि , अपना -अपना ठा म, मुदा , सि नेह, अपना पन के', देखब, नहि खसए कखनहु खा म्ह। डी ह -डा बर बदलि लेलहुँ, बदलल अहाँ क जबा र, जन्म -भूमि , मुदा नहि बदलत , बदलि ओ जा एत कपा र। 'उन्नति के अंति म श्रृंग चढ़ू', अपनैती नहि हो एत बा धक, नि ज मा टि क बंधन -आकर्षण, सँ शक्ति पबैत छथि सभ सा धक। हम सभ भरि -भरि दए रहलहुँ अछि , मो न -हृदय सँ आशी र्वा द, जे कि छु अनुरो ध छल सभहक, ओहि मे अछि भरल, सि नेहक सोआद। इजोरिआ देखलहुँ, राति में टहाटही इजोरिआ सँ आँगन पाटल छल, बुझि पड़ल जेना जे चारु चित्र सभ रजत -पटल पर साटल छल। तरेगन सबहक बीच मे देखलहुँ, छथि मयंक, अध्यक्ष, बनल, ताकू कतहु, अवनि सँ अंबर, सुंदर छल शुक्ल -पक्ष सजल। ज्योतिर्मय छथि तारागण, मुदा, विधुक बात अछिए अलग, की भव्य चाननि निकलि रहल! अकाशे नहि, वसुधो जगमग। अछि मोह जागल, चाननि मे, तएँ,ओतेक दूर सँ आएल अछि, धरा केँ धवल, शुभ्र रंग सँ, गहि-गहि, खूब सजाएल अछि। विभावरी मे घोर तिमिर, इजोत पीबि गौरबाएल छल, भ' गेल निस्तेज इजोत -पुंज, अन्हार सँ ओ घायल छल। बनि वीरांगना, एहेन क्षण मे, कए देलक क्षीण, तमता के, बिधुआएल रजनी करैत छलि स्वीकार चाननिक 'प्रभुता के। व्योम सँ ल'क'वसुधा धरि लगै छल, हो शुभ्र -रश्मि सेतु, इजोरिआ इजोत -सनेस अनलक, नभ सँ वसुन्धरा के हेतु। किंवा, दिन आ' राति के, लएलक कोनो , "मिलानक' विधान, भए अवतरित नभ -लोक सँ, जनु कएलक वसुधा के चुमान। आँगन मे देखलहुँ, कतेक रास उज्जर -इजोत जे पसरल छल, झक -झक अँगना चमकि रहल, जेना ,अन्हरिया ससरल छल। बाहर चलि देखलहुँ, पोखरि के, भरि पोख, उदक सँ छल भरल, परञ्च, समग्र सरोवर के छल तिता देने ओ रश्मि,तरल । जल -पुष्प,प्रस्फुटित तड़ाग मे, डूबल छल सोम-सुंदरता मे, जल -जीव किछु, छल व्यस्त तखनो, छल लागल पेट बेगरता मे। तरु-शोभा देखए लेल, निमंत्रण, इजोरिआ द्वारा, आएल छल संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम- मंगरौना, पोस्ट- गोनौली, थाना- अंधराठाढ़ी, जिला- मधुबनी, बिहार मनुख बनवा मे पै लगैत छै निमन अछि बउवा सभ खूब खेलाउ छाहैर मे खूब जीतू टाका खूब पीउ गाँजा उमिर भs गेल नशेरी बनि कs इतिहास बनाऊ जायदाद बेचू कनिया केँ गहना बेचू धिया-पुता केँ जिनगी बेचू बेचू घर-घरारी पै- पै खेलाऊ । माए-बापक सिनेह बेचू खूब ओंघराऊ चौक-चौराहा पर, गोबर- गुँह गिजू भांग पिऊ, तारी पिऊ दिमाग बेचू बनि जाऊ पागल पागल कहियो सभके 'छिनरा डांस' करू देखार हऊ दुनिया 'धू' छिया करैत अछि ! मनुख बनवा मे पै लगैत छै ? नशा करै मे पै लगैत छै, कुन निक होएत छै - विचार करू ! हाट- बाजार मे नहि बिकैत छै 'संस्कार' आओर 'इज़्ज़त' जिनगी मतलब लबड़ा- लुच्चा नहि होएत छै नरक भs जायत जिनगी समय बलवान होएत छै आब कहिया बुझबै- बूढ़ाड़ी मे ? जवानी जरि जायत तखन। घरवाली आइ धरि नहि बुझलियै कि घरवाली की होएत छै विहंसर की होएत छै आओर साँझ की होएत छै। माए इस्कूल जै सँ पहिने भनसा उतैर जैत छलन्हि बेरहट रखनै कहियो नहि भूलैत छलथिन्ह बेमार पड़लाह पर तेल सँ मालिश करैत छलथिन्ह पेट काटि क' माए पोषलन्हि । पिता कर्तव्य विमुख रहलाह जिनगीभरि पोथी-पतरा वचवा मे लागल रहलाह बीड़ीक धुआँ सँ घर उजाड़लाह पिताक धरम निर्वाह मे चूक भेलन्हि। भैय्यारी नान्हि टा सँ भिन्ने रखलाह पढ़वा-लिखवा मे असहयोग केलाह परिवार केँ बरबाद केलाह भाई की होएत छै से विसरलाह। झालदार चुनाव अइ बेर मंगला जीतबे करताह पहिने सँ बेसी घोटाला करताह 'नलजल योजना' में टोंटीए टा रहलै तैं अइ बेर ढोंरबा-मंगला सभ ठाड़ भेलै। सभ कियो हगैत अछि रस्ते पर 'शौचालय योजना' सभ रहलै कागजे पर लूटिस भेलै मनरेगा में सगरो प्रतिनिधि मालामाल भेलै जनता डुबि मरौ। जते लबड़ा, लुच्चा, लफंगा, छिनरा छल चौबनिया, अठनिया नेताजी बनल जे हगला गुँह पर छौर नहि देनिहार से उजरा कुरता पहिन क' बनल सेवादार। समाजक कल्याण लेल दू पैसा नहि दै वाला बनल अछि पैघ समाजसेवी पहैन क' माला दरवजे-दरवजे गिड़गिडैत अछि वोटक लेल अइ बेर अछि वादा आब हम नहि होयब 'फेल' । राजगद्दी पर उल्लू जंगल मे सभा भ' रहल छै विषय छै राजगद्दी किनकर छियैन्ह उल्लू केर वा कौआ केर जंगलक उन्नति केर प्रश्न छै। डुबकि मारि हंसनी हँसि रहल अछि सियारो चुनाव मे ठाड़़ छथि सिंहक राज नीक कि उल्लू केर ? जोर-शोर सँ चुनाव प्रचार भ' रहल छै सियार हुआँ-हुआँ करैत छै उल्लू दिनभरि कोहवर मे घुसल रहैत छै सिंह बेचारा बौक भेल छै। के जीततै ? बेंग टर्र-टर्र क' रहल छै बगुला टकटकी लगौने छै कुक्कुर छौं-छौं क' रहल छै। आइ चुनावक परिणाम औतै सभ कियो टीवी ओगरने छथि हौ इ की भेलै ? राजगद्दी पर उल्लू ! पहिल परेम ओ घासो तक नहि डालैत छलीह, हम लागि परानि केँ हुनका पाँछा पड़ल छलहुँ, इ हमर जिनगी बनि गेल छलीह, हम मजनू बनि हुनकर दिदार कs रहल छलहुँ। जिनगी नरक बनि गेल अछि , करेज मे कुहुक-कुहुक दरद उठि रहल अछि, इश्क भेल अधकपाड़ , नहि मरैत छी, नहि जीवैत छी। नजरि लागि गेल अछि, के करतीह टोना-टापर हमरा लेल ? पहिल परेम छियैए जिनगी केर, अतबे उमिर मे की की नहि भेल ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के? के छथि राजा, के छथि जन, की हेतै अइ गण के ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? घुन लगलै मुलुक मे, बंटाधार भेलै बेवस्था के, कोतवाल चोर भेलै, के बचौतै अइ धन के? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? भीम फेर जनम लेतै देश मे, कर्ण सन मित के हेतै फेर की हेतै भीष्म केँ प्रण के ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? मंथरा के दोख देनिहार लोकनि, विचार करौथ कि केकैयी केँ मोन साफ छेलैन्ह ? मिथ्या मरयादा ! के भेजलकै सीता केँ वन के ? के बनतै सारथी अइ जन-मन-गण के ? डाॅ. किशन कारीगर (मूल नाम- डा. कृष्ण कुमार राय) हौ तोरे त गौंआ छियअह नीक हइ की अधलाह की करबहक लै? कोई हाकीम रहौ की कोई छै हरबाह? एक दोसरा के हाल चाल पुछैत रहबहक हौ तोरे तं गौंआ छियअह. हमरा गाम मे एना भऽ गेलै उ कम्पीट क गेलै हमरा गामक फलां बड्ड नामी फलां जमींदार धू जी अहाँ की बाजब? अहाँ गाम मे एना भेल? आब गामक बोध वला लोक सब कहाँ रहि गेल? आब नै ओहेन गामे रहलै आ नै गमैया लोक नीक बेजाए सुनला बादो गाम स सीनेह गामक नामे गुमान अभिमान फरिछा लेब मान कोइ ने बोल भरोस देत जे तोरे त गौंआ छियअह? आब वार्ड मे बँटा गेल गाम मुखिया सरपंच के गुलाम भेल गाम ककरो अनका स माने मतलब नै? आफत विपैत मे कोई ककरो संग नै देत? जन हरबाह गिरहत बोनिहार हाकीम अफसर सब एकदोसरा स जुड़ल रहैत रहै आब सब अपना सुआरथे भेल आनहर कतौ बिला गेल तोरे त गौंआ छियअह वला गाम प्रकृति के बसाबह हौ कंक्रीटक महल अटारी मे चूर तूं सब प्रकृति के नै उजारह? हौ सब मिल गाछ बिरिछ लगाबह आबह उजरल प्रकृति के हरियर क बसाबह. गाछ बिरिछ खेत पथार पोखैर इनार सबटा तोरे बेगरता पर काज औतह. चहचह करैत चिड़ै चुनमुन आ चरैत माल जाल देखहक प्रकृति रूप सोहाबन केहेन कमाल. प्रकृति संग मनुक्खो के जिनगी सोहनगर हेतै आबह प्रकृति पर्यावरण के सब मिलि बचाबह देखहक कतेक खुशियार हेतह जिनगी हौ सब मिल गाछ बिरिछ लगाबह. गलवोल वार्मिंग स तबाह भ रहलै मनुक्खक जिनगी तइयो आधुनिकता के चक्करफांस मे प्रकृति के नै उजारह हौ आबो सचेत भऽ जाई जाह महातबाही स बंचअह आबह उजरल प्रकृति के हरियर कचोर क बसाबह हो हो त हो हो (हास्य कविता) आइ तक कोनो पुरूस्कारी मुहें नै कतौअ सुनली? हो हो? जे बलू कि बाभन कि सोलकन? साहित्य मे सब एक समान? हो हो? सब वर्ग के दियौअ मैथिली साहित्य मे स्थान? नै कोई हो हो मिथिलाक सब जाति के समावेशी सम्मान? कोई ने करह हो हो? होहकारीयो नै कहियो बजलै ग साहित्य मे सब रहौ? हो हो? हं पेटपोसै लै मिथिला राज मैथिली मठ बनले रहौ? हो हो? सबटा मैथिली छियै सब मैथिल छै? सब करह हो हो? मानके टा मैथिली आ सर्वजन बाजब के राड़ बोली कहक? हो हो? अंगिका बज्जिक्का षडयंत्र केलकै? हो हो? मैथिली अपने षड्यंत्र केलकै तेकरा झांपह? हो हो? वर्गभेद हेबे करतै कियो देखार ने करै जाह? हो हो? मिथिला मैथिली हमरे टा बपौती रैह जाउ? हो हो? पछुएलहा सबके भ्रम मे राखि पिछलगुआ बनेने रहबै हो हो? मानक बहन्ने मैथिली पर सब दिन कब्जा केने रहबै हो हो? यथार्थ देखा के बिरोध नै हुअ दहक? हो हो चोरनुकबा बनल तमस्सा देखब? बिरोध ने करबै? हो हो हमहू कहबै हो हो तहूं कहक हो हो? मिथिला मैथिली के निदान नै हुअ दहक हे हो त फेर हो हो? के रोकत टोकत? मनमाना करै जाह मैथिली के रोटी खाह? मिथिला विकास मे पछुआले रैह जाऊ? हम तू करब हो हो? कतअ हेरा गेलै मनुक्खक जिनगी हे रूप्पैया रूप्पैया खाली रूप्पैया? सबके रूप्पैया लै बिरड़ो उठल छै? रूप्पैया आगू कोई केकरो ने चिन्ह रहल छै? कतअ हेरा गेलै मनुक्खक जिनगी? हौ आफत विपैत मे कोई केकरो देखनाहर नै? सब अपना सुआर्थे आन्हर भेल जा रहल? केकरा समय? कोई केकरो बोल भरोस नै दै छै? मनुक्खक जिनगी बिला रहल छै? कहां रहलै लोकाचार आत्म सरोकार? सब अपना स्टेटस बढ़बै मे लागल रहै छै? लाज धाख मान राखब सबटा बिसरेलै? केकरो सुधि नै जे मनुक्खक जिनगी हेरा गेलै? फलैट मे बन्न भऽ गेल अछि मनुक्ख? रूप्पैया पावर दुआरे लोक ओझरा गेल? सब एक दोसर के गरदैन कटबा पर उतारू? कतअ हरा गेलै मनुक्खक जिनगी? निसाफ बजनिहार कोई ने बंचलै बात बात पर लोक खून खूनामे पर उतारू? कोई ककरो हंटनाहर डंटनाहर नै बचलै? मुपुर्खीक दखली मे केकरो नै मोजर दै छै? मूइलाक बाद सबटा धन बित रखले रैह जेतै? मनुक्खक करम छोड़ि किछ संगे ने जेतै? तइयो रूप्पैया दुआरे लोक चोरी छिनरपन डकैती? आ शोषण कअ लचार लोकक खून पीबै छै? रूप्पैया स रिशता नाता जोखाई लगलै? आब के केकरा बिपैत मे काज औतै? लोक समाज अपनैती सबटा उधिया गेलै? कारीगर कतेक कनतै? कतौ हेरा गेलै मनुक्खक जिनगी? मिथिला मैथिली के ठीकेदारी? (हास्य कविता) कोनो गतर मे लाजे नै?त बाते की? गारि गंजन लगले कपरफोरियो क लेब? हमरा सन बुझक्कर तेसर के नै जानी? करब हम मिथिला मैथिली के ठीकेदारी? दिन भरि हो हो हो करब? आ गलथोथरी भरल किरदानी? कुतर्के क पेट भरत कहाएब त मैथिली सेबी? चेला चटिया त लगले कहत बुधियार बुद्धजीवि? मिथिला मैथिली के यथार्थ किन्नौ ने मानब? स्वीकारब ने गलती बेमतलबो करैत रहब गलथोथरी? होहकारी विद्या स त राता राति प्रसिद्धी भेटत? कवि साहित्यकार मैथिली सेवी की सब ने कहाएब? कहाँदिन बड्ड फायदा छै लगले रहब हरदम देबै होहकारी? निरलज्जा बनल रहब करब हम मिथिला मैथिली के ठीकेदारी? हम कुतर्को करब तइयो लाॅबीबाज हमरा पोसत अनकर मोजर बेर मे जाति पहिने देखब? के की लेत हमरा हमहीं टा भंगपीबाह खेलाड़ी? मैथिली धो धो खाएब पकाएब आ करब ठीकेदारी? किछो ने करू (हास्य कविता) अहांके कोन चिंता? तै हरदम चुपे रहू अहां सब चितें टा करू समस्या नेदान मे किछो ने करू जोगारी पुरूस्कारी बनू, हरदम लाॅबिक पछोड़ धेने रहू मैथिली मे एहिना होइत एलै, विरोध भेला पर लोक के ठकैत रहू मानकीकरण स मैथिली के खंडित करू अहिं टा काबिल ज्ञानी अनकर लेखनी के कोनो मोजर ने दियौ आयोजन टा मे पाग पहिर बमकल फिरू अहीं टा किताब लिखने पढने लिखलौ अनका बेर इ कहू जे ओहिना लिखलकै के रोकि लेत अहाँ के? सब अहिंक दियाद संगे ठार मैथिली मे खूम वर्ग भेद भैइए रहलै हमरो अहाँ के हइ बूझल विरोधक कोन बेगरता के करत राड़ कारीगर के कहबाक भाव ने बुझू आन जाति ने अकदामी मे सोनहिया जाए ओकरो कहूं नाम ने भ जाइ पिछलगुआ बना ओकरा भरमेने रहू अपना सुआरथे निब्बदी मारने चूप्पे रहू पिछलगुआ किए बिरोध करत जी हजूरी के फिराक मे रहत अहूँ त सैह चाहि जे ओ हो हो करै आ मैथिली बपौती मे हमहीं टा रही मिथिला मैथिलीक आयोजन करू टाइटल जातिक षडयंत्र अहिंक रचल किशन बड्ड अलूइर ने? ओहेन की प्रभावी लिखत? सब मंचदौग्गा साहित्यकार बनल रहू. जेकरा देखू सैह नेता? (हास्य कविता) अहूँ नेता त हमहूँ नेता ? जेकरा देखू सैह नेता? उज्जर कुर्ता पर चमकी वला माला, पंचायत मे के नै नेता? नेता पर नेता? पंचायत भोंट दुआरे जेकरा देखियौ सैह बनल छै बौहअक ओजी पर नेता? सब कहैया पंतायतक बिकास करब? अप्पन पेट भरब की अंगोरा बिकास करब? योजना वला रूपैया स जेबी टा भरब? हे धधकलहा गामक बिकास करब? भोंट दुआरे नेता सब की की ने करैए? हथजोरी, गलजोरी फेर बलजोरी? दिन भैर प्रचार वला नेता सब? दरबज्जा पर धरफरन देने रहै छै? कोन प्रतियोगिता परीक्षा पासक झंझट? तैं जेकरा देखू सैह नेता? नेता पर नेता? जे जेहेन लब्बर झूठबज्जा? ओ ओतेक बड्ड पैघ नेता? आब हमहूँ चमकी वला माला पहिर घूमै छी? पंचायत भोंट मे जेकरा देखू सैह बनल नेता? के दर्शक आ के सब कवि? (हास्य कविता) होइए खूब मैथिली कवि सम्मेलन तै मे दर्शको स बेसी मंच पर बैसल कवि? बूझबा मे ने आउत के दर्शक आ के सब कवि? बानरक हेंज सन अफरजात भेल मैथिली कवि? औ जी एतेक कहूं कवि भेलैए? पुछियौ त उनटे मुँह दुसी देत, छिना झपटी मंचे पर दौगा दौगी किए मंचदौग्गा बनि गेल मैथिली कवि? आयोजक सब बड़का पोस्टर छपाउत चंदा देलक सेहो सब कवि? दू चारि टा त दर्शको मे स मंच पर चढ़ल बीच कार्यक्रम उहो सब बनि गेल कवि? एतेक उपरौंजी आ मंचदौगीय आन भाषाक समेमलन मे नै देखलियै? मैथिली आयोजन मे कनिको ने करत लाज, बूझबा मे ने आउत के दर्शक आ के सब कवि? कारीगर कविता पढ़ब शुरू केने रहै की? कनिये काल मे दर्शको मे स दू टा मंच चढल, हमरा माला पहिरबैत कहलक जल्दी करू हमहू कवि? आयोजक दिसी तकलहुँ? उहो गुम्हरल कि दर्शक आ कवि? बहिन के अंगना भरदुतिया नत पूरब गोबर स निपल आंगन मे पिठारक अरिपन. पिरही पर बैस बहिन के अंगना भरदुतिया नत पूरब. भाई बहिन के निश्छल सिनेह समर्पण. आश बहिन के राखब भैया जुग जुग अहाँ जीयब. आई दौगल अबै हेतै हमरो भैया गाम स बाट तकैत बहिन कहि भैया के नाम लअ भैगना भैगनी सेहो खुशी मनबै छै मामा अबै हथिन नाना गाम स मामा एलै अपना बहिन गाम भरदुतिया नत लेलकै केहेन सिनेहगर भाए बहिन के पाबैन भरदुतिया अबौ सबहक भाईक औरदा रहौ सब बहिन के आश रहौ. जुग जुग जीबौ भाई बहिन सब भरदुतिया मे बहिन अंगना नत पूरब. आबू यौ देखू मिथिला के गाम आबू आबू यौ भैया काका आबू आबू हे दीदी बहिन पोखरि इनार गाछि कलम छै गामे गाम देखू घुमू अहाँ मिथिला के गाम. गामक दलान पर लोक छै बैसल हां हां हीं हीं करैए, नै कोई रूसल? आबू आबू यौ भैया काका आबू यौ देखू मिथिला के गाम मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ दिया बुझब राजा सलेहसक पराक्रम लोक मुँहे सुनब स्वाभिमानी अयाची के साग उपजाएब दियै कहब बंठा चमार के वीरगाथा सेहो अहाँ सुनब. आबू आबू यौ भैया काका आबू यौ देखू मिथिला के गाम दिना भदरी के लोकगाथा सब सुनब कवि विद्यापतिक नचारी पर झूमब बाबा नागार्जुन के जनभावना सब पढ़ब गोनू झा के खिस्सा लोक सब मुँहे सुनब. आबू आबू यौ भैया काका आबू यौ देखू मिथिला के गाम रामफल मंडल सूरजनारयण सिंह के शहादत देखू मांगैन खबास संग राज दरभंगा के कहनाम सुनू पान मखान संग कतरल सुपारी चाउर मरूआ के रोटी पर धनियाक चटनी अंगना नीपैत जलखै बनबैत देखू घर गिरहथनी गीत गबैत धान गहूमक होइए बाध बोन मे कटनी कहैए ‘किशन कारीगर’ अहिं सब स यौ भैया आबू आबू यौ देखू घुमू अहाँ मिथिला के गाम. आ रे सुग्गा आ आ (बाल कविता) आ रे कौआ आ आ आ रे सुगा आ आ आ रे मैना आ आ आ रे बगरा तहूं आबि जो चिड़ै चुनमुन सब आ आ दौगा गौगी बौआ संगे खेलो जो हे सुग्गा तूं बौआ के रोटी नै खैहियै हम तोलो लै रोटी रखने छियौ. है मैना आइ तूं कतअ रैह गेलही हमर बौआ तोरा तकै छेलौ आ रे बगरा जल्दी आबि जो हमर बुच्ची कटोरी मे पानि रखने छौ चिड़ै चुनमुन सब चूं चूं चीं चीं करै हमला बौआ के कते नीक लगलै आ सब मिल के खेलै जाइ जो हे खेलाइत खेलाइत झगड़ा नै करै जाहियैं आ रे सुग्गा आ आ बौआ संगे खेलो जो. कल्पना झा, बोकारो, झारखंड पान फ़िकर करु ने कोनो बात के स्वाद में अछि अतीव, आन मूंह कि सुनब स्वाद में इ "सुपरस्पेशलिट", पान क हम कि करु बखान, केहन सुनरि हरियर हरियर कारगर सन पात अछि, चून कऽथ आ दै सुपारी, सौंफ क संग पान बहार अछि, जर्दा , तुलसी आ निर्मली तकर ओहि पर ताल अछि, ददा क मूंह रमनगर लागै खिल्ली धेने पान अछि, ओझा क मूंह सोहनगर लागय भ रहल गुनगान अछि, बात ओझरायल क्षण में सोझरायल, दैत खिल्ली मूंह दबाय, सरपट दिमाग दौड़ै लागय आन्हरो के रस्ता दियै देखाय, माछ खाऊ या मेवा मिसरी, ज्यों नय पान मूंह दबोलौं, सब टा बुझु व्यर्थ गवेलु हाथ जोड़ि निहोरा करय छी, हमर लाजक राखु मान, छप्पन भोग सजल अति तयो परतर नहि करय पान क आन। इजोत हऽम ! थाकि गेल छी ! इ कथिक इजोत ? ज्ञान क कि डिबिया क ? अंहरिया में थाहैत थाहैत आगु बढलुं, बेर बेर आगु बढैत बडु किछु छुटल, मुद्दा संस्कार के धेने चलैत रहलुं, धिया , भार्या आ जननी के भूमिका जिवित रहै, तयं स्त्री क काया गढैत रहलुं, माय क हहरैत नोर में किछु गुथियैल रहैन, जे झुडियैल चमड़ी पर उंघरायल किछु कहैत रहैन, कोशिश केलवं कि बर्षा के बुनि के तरहथी में भरि ली, मुद्दा अनसोंहात लागैय लागल, ने अधिकार इ वर्षा के बुनि पर, आ नहि रहि गेल विश्वास अपन तरहथी पर, जाबैत धरि चललवं, हम चलिते रहलवं, कतो मोकाम आ कतो छी हम, इ बुझि नहि सकलवं, इ मोन क नेनपन बुझु कि धोखरैत तृषा ! कोइली रे कोइली रे एना कियै तूं, मिठगर बोल बाजय छै, भेल सकाल कू कू क , सगरे शोर करय छै, मह मह करैत गाछी, आ डारि डारि फुदिकय छै, कोन गाम सं तूं अयलै , आ कतय ठाम रखने छै, तोहर बोली क भाषा नय बुझी, कानि रहल कि हंसय छै, कारी झामैस रुप तोहर छव, बोली कते मधूर बजय छै, उठु उठु हे धिया बहिन सब, माय सनेश पठौलक, कू कू करैत हम बटोही, हम त नेहक गीत गाबय छी, जो जो कोइली एना कियै तूं, हमरा मोन पाड़य छै, नैहर भेल अछि कोसों दूर, आ तूं बटगबनी गाबय छै, हमर बोली आबो नय चिन्हलवं, हम अहिंक बाल सखी छी, मोन हमर कोइली बनी उड़ल, हम सब विधना क रचल छी। दीप माटिक मोल अछि बडु अनमोल, आगि में दयैत बनल कठोर, देह धिपैत ने आह करय, बातिक संग ओहो जरय, कनमा भरि तेल जरायब, ज्योत सं विपदा दूर भगायब, महंगाई पर बडु अछि रोष, नहि सिवाय कोनो अफसोस, ककरा हंसोथु कतो पसारु, खखरी में कोना धान के ताकु, दीप जरल अछि कोन डगर, घुमि रहल छी नगर डगर, बिसुरि गेलवं मोनक हुल्लास, क रहल हृदय विलाप, दीप जरैत किलोल करय, अन्न धन लक्ष्मी घर आबय, दरिद्रा बाहर करय, दीप जरल अछि सगरो राति शुभ मंगल होय सबहक प्राति। नहि रहल लचारी उठि 'दिनमा' के भोरहिं सं, माथ पर असबार, नहि तों किछु काज करै, थारी भरि संहारि, मालिक इ कि अनहोर करै छी, फूसि फटका कि बजय छी, जुनि बुझु ने इ हमर लचारी, पुरखा क ड्योढ़ी हम संभारी, नहि किछु बेगरता आब हमरा अछि, भरी रहल हमरो बखारी, गप्प तो किछु नहि पतियै, हमरा सं तों गाल बजोबै, उठा कोदारी लय ‍जो फुलवारी, तामहि खेत बनो तों क्यारी, सुनि 'दिनमा' के सनक फुटि परल, मालिक पहिले दरमाहा दहक, सुनि मालिक सकदम्म भेला, माथ पकरि ठामहि बैसला, नहि किछु आब भेद रहल, छोट पघि सब चेत रहल, हरही सोरही आब नहि कियो रहल, काजक बल पर सब जागि रहल। मुन्ना जी कविता- दलाल जँ राखब हम बन्हकी, अहाँ मोल बेच देब घराड़ीक करब बात , सौंसे टोल बेच देब रहू ज' सदिखन बन्न केने मुँह हम अपन राखि हाथहिं फुटबॉल अहाँ गोल बेच देब बचा के राखू कोना अपन देहक ठठरी अहाँ त' उतारि चामक खोल बेचि देब हम कहिया सँ ताकी असरा इजोतक अहाँ त' गड़िते सब टा पोल बेच देब जँ तखनो मोन नै भरल एतबे सँ अहाँक लगा के मुखड़ा हमर डबल रोल बेच देब किछु ताँका (TANKA) 1-गाम पुरान ताकू नव ठेकान भेलौं जवान अन्हरिया हँटल पुर्णिमा केर चान 2-ललका पाग रंग फीका पड़ल कोना उघत छोडल संस्कार निवहता हएत 3-भाषा बचाऊ हस्तान्तरित करू अगिला पीढी मिथिला हेरएल कोना बचा पएब 4-दुलार करू माथ पर चढाउ बेटा गौरव लतिया भगाओत बेटीये देत काज 5-पाग दोपटा विद्यापतिक नाम माला पहिरू नाम बेचि कमाउ निजभाषा गमाउ 6-जौर जड़ल पुरखा बल पर ऐंठन ऐछ बाट नव बनाउ हएत धरोहर आशीष नीरज, चार्टर्ड एकाउंटेंट, राष्ट्रीय महासचिव, कर्ण कायस्थ महासभा (के के एम), गाम: सरहद, मधुबनी, वर्तमान शहर : दिल्ली राजनंदन लाल दास

5 जनवरी 1934 के दिन छल, मातृक पटोरी में लेलैथ अवतार। दरभंगा के गोनौन पैतृक गाम भेल, राजनंदन बाबू करु नमन स्वीकार।।

एम.ए केलंहु अहां राजनीति शास्त्र मे मुदा रहल अपनेक लेखन सऽ सरोकार 1967  में  " आखर "  पत्रिका  सऽ, शुरू  केलंहु  प्रकाशक  के  कार्यभार।।

1981 सऽ कर्णामृतक संपादन द्वारा, केलंहु मैथिली साहित्य के एकत्र। सहस्त्रों लेखक एवं कवि के प्रवर्तक, कर्णामृत भ गेल प्रसिद्ध सर्वत्र।।

अभामिस के सचिव रहलंहु अहां, अनेको संस्था देलक अहांके सम्मान। केकेएम के द्वारा "कर्ण श्री" भेटल, सम्पूर्ण मिथिला करैत अछि गुणगान।

मिथिला-मैथिली के अनन्य सेवक के, नमन करैत झुका रहल छी हम माथा। राजनंदन बाबू अहा़ं महापुरुष छी, सदा अमर रहत अहांके गाथा।। सारस्वत: कविता सारस्वतक [१ आ २ (२५ टा); ३.“निमोछिया अबीर "(पिरोजगढ़ युवा समिति दिस सँ देश आ विदेश मे बसल सब व्यक्तिकेँ सारस्वतक अशेष २०१५ होलीक हादिॅक शुभकामना संग)] कविता सारस्वतक १ गौंवाँ हमर खेत के काटि रहल छथि धान, पाहुन मकड़ाक जाल बूनि खा रहल छथि पान । छोटकी ननदि तेत्तरि तोड़थि बड़की करथि कुटउन , मँझली बाड़ी साग उखाड़थि मुँह मे लेने पान । खुनियाँ पारा बाध नङहयए हँय - हँय केँ मार डाँङ , गौवाँ हमर खेत के तोड़ि रहल छथि चान । सारस्वत : पिरोजगढ । २ अप्पन माँटिक,अप्पन सुगंध/ मिथिला ,मैथिली जिनगीक कंठ।(1) नूतन,अविरल धरतीक आँखि/ स्वच्छ,सहज संसारक पाँखि।(2) हँसि-हँसि मानुक्ख, साटय प्राण/ प्रखर पहर इंसानक जान।(3) नवकी गाछी,नवका आम/ जिनगी सुन्दर ,दंत समान।(4) सूरजक आतुर, अर्क अबैयए/ चिड़ै कंठक बोल बजैयए।(5) रचि-रचि बदिरा पानि अनैयए/ धरतीक अमृत घोंट भरैयए।(6) उज्जर पाँखिक चन्नामामा/ आबू !,दौड़ू ! , पहीरि पैजामा।(7) रूद्राक्ष,शिव ताण्डव केर धरती/ गाबय हँसि-हँसि, टूटय परती। दरसन एक बेर फेर सँ मिथिलाक/ पायब सुख ,सौ जन्मक सितलाक।(9) , उतरी तोड़ि ,संसार रचैय छी/ रतुके जनमल ,ओस चटैय छी।(10) चुटूटी मुँहक ,लडूडु मीठ/ फह-फह करथि ,हमर सब मीत।(11) देहक संग क्रीड़ा-सुख करितहुँ/ हँसि-हँसि पाहुन पाग पहिरतहुँ।(12) कुक्करक खिस्सा,भेल बलाय/ देशक चिंता,देल सताय।(13) नवकी तोरी,फूल गुलाब/ उक्खरि मुसराक चोट जुराव।(14) ? साँसक सेल्फी,साउस बीमार/ गदही नाँचय अपने ताल।(15) संठी दऽ,धुआँ बहराइयए/ उघड़ल तागक घर बिलाइयए।(16) घरखस्सी मे झूटका भेटल/ हिनका,हुनका तमघैल भेटल।(17) राति सतरिया,दिन कनैयए/ बरदक नाङरि ढ़ील बीछैयए।(18) बड़का लोकक चार छिनार/ अगिला, पछिला उपर जाल।(19) पैसा भेने, भेल धनिक/ एहेन लोक लतमर्दन नीक।(20) धूर्त सियारक,नाङरि पैघ/ कोहा ,बासन उनटल घैल।(21) छाती,चूत्तर,तक्खन गाल/ आँखिक दूसल ,तकरो लाज।(22) छाउरक ढ़ेरी ,पैध अकास/ चौकी बैसल,फेंटथि ताश।(23) गोदना मे भरि गोबरक छत्ता/ कनमा भरि नहि,दूधक पत्ता।(24) , केहेन धरानी,रातिक आगि/ जरिते पुआर,उतरि गेल आगि।(25) सारस्वत;पिरोजगढ़। ३ “निमोछिया अबीर " (पिरोजगढ़ युवा समिति दिस सँ देश आ विदेश मे बसल सब व्यक्तिकेँ सारस्वतक अशेष २०१५ होलीक हादिॅक शुभकामना। गामक विकल्प शहर कहियो नै भऽ सकैछ।) भाङक गाछ तर रङक पुड़िया लेने ठाड़ि हमर नवकी भौजी आर जुआन भऽ गेलीह हेँ। हिनक पछुऐत मे अपन पिचकारी सँ रङ देबऽ मे अहुँकेँ नीक लागत। हउ वियोगी! आबह। सुस्मिताकेँ लगाबह। केदार बहुत लगेलक हेँ। कने प्रदीपोकेँ लगबऽ दहक। देवशंकर बैसल अछि अशोकक मुँह मे सिगरेट दऽ केँ । नचिकेताक मोंछक पमही देखियनहुँ कोना लगौने छथि ससरफानी रामलोचनकेँ। करिया बरदक आँड़ छापऽ मे लागल छथि रमणजी। हिनका शरदिन्दुक नाङरि पकड़ि भीमभाईक सोझहाँ लऽ चलू! सुनलहुँहें सुभाष आइ-काल्हि नवकी छौड़ीक सङ लुंगी घिनबैत छथि अजितक देखौंस कऽकेँ। भ्रमरक गाँती बान्हि बैसल अछि चंद्रेश। स्वंयप्रभाकेँ बढ़ चिक्कन सफाचट बर भेटलनि सौराठ मे मुछैल महदेवा। कामनीक हरियर झंडी लेने ठाढ़ अछि श्रीधरम। आब कतेक ठोर चुसत गौरीनाथ उषाकिरणीक भेस मे? लाहलोट भऽ गेल छथि मंत्रेश्वर प्रेमर्षिक पोन चटैत-चटैत। मरूवाक दाना छीटू नारायणजीक आँखि मे शिवशंकरक कान पकड़ि। कुणालक चश्मा पर बटुक भाइ पीत फेकलनि हेँ। गगनक मुट्ठीमे अछि अक्कूक जीह। चुन्नू चेतनाक मुँह मे गाड़ने छथि बासुकीनामा खन्ती। विभारानी शेफालिकाक सङे कछिया पहिरैक प्रैक्टिस कऽ रहलीहहेँ अमरजीक बथानपर। बिभूतिक हाथ मे पकड़ौवा पड़वा सब पाग पहिरि गोबर पथैत छथि। राजमोहनजीक हाथक अबीर जीवकांतजी लग पहुँच रहल अछि। नवका पतरा मे गोविंद बाबूक बियाहक दिन तकलनि हेँ बिमल शशिबोधक दुआरि पर। अनमोल, मनोज, शंकरदेव, राज, अमलेन्दु, सच्चू, मनुज आबि रहल अछि पिपही बजबैत। दमन अशोक मेहता सङे झालि बजबैत फोड़ि देलनि ढोल सुरबाबाक। मलंगिया भारद्वाजी जनउ पहिरऽ मे रमेशकेँ कोसी टपय देलक। मिथिलाक भाङक अय गाछ तर धुथूरक उज्जर-उज्जर फूल अहाँक हाथ मे अछि सरसजी । से कने रविन्दरोजीकेँ सुघऽ दिअहुँने तरि जयताह रंजनाक गालमे गुलाल लगयकेँ। एक बेर सूघि कऽ तँ देखू! एकर बीयाकेँ एक बेर चखिकेँ तऽ देखू! घोड़-नाङह देनाय अहुँ शुरू कऽ देब अद्धॆनारीश्वरजी बुधिनाथजीक सङे कीतिॅभाइक पटिया पर। नवका-नवका लोकक देह मे पियाउज भऽ गेल अछि देबूबाबू ! बिरेन्दर मल्लिकक मोटकीनामा छुलहँ? प्रेमलताक दुआरि पर किशोर गबैत अछि बरहमासा। पंकजक सङ भास्कर औंरऽह मारैत अछि। लिली रे केँ पकड़िकेँ राखू शैलेन्द्रभाइ! सुकांतक हाथ मे शोभाकांतक टाङ अछि। अहाँ देखै की छी अगिनपुष्प? कृष्णमोहन गिरगिट भऽ गेल अछि चँदेश्वर खाँक टाटपरहक। मधुकांतक सड़ल अंडा आब बच्चा नै दैत अछि। दूइये मास मे एकेडमीक सम्मानित लेखक भऽ जाइत अछि विद्यानन्द झाक साटिपीटी लऽ केँ। अविनाशक आँखि मे आङुर देने ठाढ़ अछि हरेकृष्ण। सबटा कौवा सबकेँ पकड़ि पकड़ि ललका रङ दिअहु तखने नवका-नवका लेखक बनत । नवका-नवका मधुबनी पेंटिग मे बंगलिया कुकूर सब आबि-आबि भूकैत अछि छत्तीसगढ़ी कटोराक पानि चाटिकेँ बूंदेलखंडी बसात मे। लालकिला लग बैसल म्याँउ-म्याँउ करैत हमर लोकतंत्रीय दाय-माय सब अहुँ आउने!पुआ खाउ ने! हमर अय गाम मे भाङक गाछ तर। परतानक भूर मे भोट खसबैत हम छी अहींक निमोंछिया अबीर। अहुँ आबिकेँ खसाउ ने! लटकल अछि तेत्तरि चूसिकेँ तऽ देखू हे हमर प्राणपियारी दाय-माय ! आउ! हमरा सङे अहुँ सब पुआ खाउ। अहींक निमोंछिया अबीर ।- (सारस्वत; पिरोजगढ़) विदेह सदेह:२५|| 515 514 || विदेह सदेह:२५

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एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व : राजनन्दन लाल दास राजनन्दन बाबू मैथिली साहित्य जगत मे कोनो परिचयक मोहताज नजि छथि | हुनका बारे मे वा मैथिली साहित्य मे हुनक योगदानक बारे मे लिखबा वा कहबा योग्य नजि हम छी आ afer हमरा मे ओतेक सामर्थ्ये अछि । तथापि अपन अल्पज्ञान & हुनक मैथिली रचनाधर्मिता आ हुनक सम्पादकीय कार्य पर प्रकाश देबाक धृष्टता HS रहल S| आशा अछि विद्वतजन हमर अल्पज्ञताकेँ क्षमा HS हुनक कार्य अओर मैथिली साहित्य मे हुनक योगदान पर प्रकाश दैत हमर Ue आलेखकेँ आत्मसात LATE | मातृभाषा मैथिलीक अभ्युत्थानार्थ अपन आत्माक असीम अनुराग सँ उठ्प्रेरित; प्रखर मार्क्सवादी; छात्रावस्थाहि सैँ साहित्य अओर स्वतंत्रता संग्रामक सजग प्रहरी; प्रसिद्ध स्तम्भकार, नाटककार; सामाजिक-सांस्कृतिक चेतनाक dares; मैथिली भाषा अओर साहित्यक अस्मिता आ विकासक cet कतेको आन्दोलन मे अहम भूमिका निभेनिहार; साहित्य-संस्कृतिक विकास ध्वजावाहक; 98] & अनवरत मैथिली त्रैमासिक पत्रिका कणामृतक संपादन दायित्व निर्वाह करैत; मौलिक रचना - संतो (क्रान्तिकारी आंदोलनकारी नाटक, 970), चित्रा-विचित्रा (आलेख संग्रह, 2006), प्रबोध नारायण सिंह (विनिवांध, 202); संगहि सम्पादन कार्य मे मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा व्यक्तित्व ओ कृतित्व (979), साहित्यकार मुंशी रघुनंदन दास - व्यक्तित्व ओ कृतित्व (983), मिथिला-मैथिलीक विकास मे वर्णगोष्ठी एवं कर्णात्मक को योगदान (974-207) (202) a मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध करयवला मैथिलपुत्र गनौन (घनश्यामपुर) ग्रामवासी 05 जनवरी 934 केँ एहि धरा पर आयल श्रद्धेय राजनंदन लाल दास (पिता- स्व. मनीलाल दास ait माता- स्व. विद्या देवी) अपन जिनगीक 40 वर्ष एकटा प्राइवेट कंपनी मे मार्केटिंग संकायक प्रमुख SY अपन सेवा देलैन्ह | एहि कार्यावधि मे ओ भारत आ सार्क देशक कतेको बेर भ्रमण कैलेन्ह । 960 ई. मे कलकत्ता विश्वविद्यालय सँ राजनीतिशास्त्र सँ परास्नातक अओर हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली, बंग्ला सहित कतेको भाषाक विदत्त आर. एल. दास नामे विख्यात राजनन्दन बाबू अपन सम्पादकीय लेख आ कला लेल मैथिली साहित्य मे अपन अलग पहचान बना चुकल छथि। अपन जिनगीक 87 वसंत देखि चुकल दास बाबू मैथिल साहित्यकार लोकनिक मध्य अपन सम्पादकीय कला लेल संविदा हुनक पहिल पसंद रहलाह |

हमरा मैथिली लिखबा लेल अओर मैथिली साहित्य दिश अभिप्रेरित करयवला दि जोड़ी मे पहिल छलाह समकालीन TAC अभय कुमार लाल दास (नवानी) आ दोसर छथि श्री राजनन्दन लाल दास (गनौन, हमर पिसा)। पिसाक संपादन कला आ सम्पादकीय हमरा सदिखन उत्साहित आ इच्छुक बनाबैत रहल । कर्णामृतक प्रत्येक अंक मे हिनक “हमर कहब' हमरा मैथिल साहित्यक संग-संग देश-दुनियाक वर्तमान आ इतिहास सैँ अवगत करौलक | हिनक संपादनकला हमरा सदति अपना मे नवाचारक समावेश आ पूर्वक संकलन दिश अग्रसर केलक | एकटा पत्रिका वा पोथी मे पाठककँ कि-कि सब चाहि, एक पीढ़ी सँ दोसर Wide कोना जोड़क चाहि अओर कोना पाठक धरि अपन बातकेँ अभिप्रेषित करक चाहि US गुणक संतुलित आ सम्पादित व्यक्तित्व धनी छथि हमर पिसा- राजनन्दन लाल दास जी । एहि क्रम मे हम हिनक गजबक स्मरणशक्ति, विद्वता, भाषा पर पकड़ (प्रायः अपन वार्तालाप मे ओ एक भाषा मे दोसर भाषाक शब्दक मिलावट नै करैत छथि) आ सम्पादन कला सँ अभिसंचित कर्णामृतक किछु अंकक उल्लेख करब आवश्यक बुझैत छी जाहिसँ पाठकवृन्द एहि महान मैथिल साहित्यकारक ज्ञान मीमांसाकेँ बुझि सकैथ। “हमर HEP द्वारा पाठक ae अपन बातकेँ पहुँचेबाक कला केर किछु बारिकी देखल जाऊ :-- ०». यात्री जीकेँ याद करैत feat छथि :-- मैथिली मात्र सम्मान देलकैन्ह मुदा रोटी नजि as सकलैन्ह । हिंदी रोटी देलकैन्ह आ सम्मान Set | हिन्दीक अपेक्षा मैथिली मे भने कम लिखने होथि मुदा मैथिलीकँ विसरि नहि ance | भारत सरकार द्वारा रूस पठाओल एक शिष्ट मंडल मे यात्री जी सेहो एकटा सदस्य ST छलाह | ताबत “पत्रहीन नग्न TT” पर अकादमी पुरस्कार सै सम्मानित AS चुकल छलाह | रूस मे परिचय पुछला पर स्पष्ट कहलथिन्ह, “मैं हिंदी का नागार्जुन नहीं, मैथिली का यात्री बनकर आया हूँ, क्योंकि भारत सरकार नागार्जुन को नहीं जानती है ।” मातृभाषा मैथिलीक प्रति अगाध प्रेम तथा निष्ठा weirs यात्री जीकेँ । हिन्दी मे लिखलाक कारणेँ अनेकों लोक हुनक आलोचना करैत छलाह । मुदा ओ लोकनि ई बिसरि जाइत छलाह जे जीवाक लेल aS रोटी चाहबे करी । (कणम्ूत :- अंक 75-76; जुलाई-दिसम्बर 999) ०». रमानन्द रेणु जीकँ याद करैत :-- रमानन्द रेणु सँ हमर परिचय भाइ जीवकान्तक माध्यमे आ सेहो दूरभाष पर, जखन रेणुजी निर्मलीमे सत्कार दूरभाष Pe पर कार्यरत छलाह भेल । 'आखरक

प्रवेशांकहि मे रमानन्द रेणुक कथा *करमीक फूल कनैलक बीया' प्रकाशित Hes । उक्त BAS हुनक चेतना आ समाज मे पसरल शोषण, विशेष HS जन-बोनिहारक प्रति SAA अत्याचार, प्रताड़न एवं ओहि वर्गक नारीक प्रति दुव्यव्यहार आदिक प्रति कथाकारक विद्रोही waa परिचय भेटल | यद्यपि एहि तरहक स्थितिक चित्रण कतिपय कथाकार, जे अपनाकेँ प्रगतिशील Heart अघाइत नजि छथि, हुनक कथामे Heat अछि | मुदा ओही सभ मे कथाकार मात्र स्थितिक चित्रण क५ अपन दायित्व निर्वाह att आयल छथि | ओकर प्रतिकार वा विद्रोहक स्वरूपकँ पाठक पर छोड़ि देने छथि, मुदा रमानन्द रेणु अपन उक्त कथामे मात्र नपुंसक सहानुभूति नहि tara विद्रोहक स्वरूपकेँ स्पष्ट रेखांकित केने छथि | (कणम्ूत :- अंक-25; जनवरी-मार्च श072) ०». मणिपदूम जीक जन्मशताब्दीक अवसर पर हुनका याद करैत लिखैत छथि :— मैथिलीक उज्ज्वल भविष्य आ अपन रचनाक उत्कृष्टता प्रति आस्थावान छलाह मणिपदूमजी । राजा सलहेसक प्रेसक कॉपी तैयार करैत काल हम पूछि देने Bears, “मैथिलीमे एतेक fafa रह छी आ केँ ved?” ओ उत्तर देने छलाह - “हमरा विश्वास अछि जे हमरा मरणोपरान्त लोक हमरा ae अलमारी तोड़ि हमर पांडुलिपि TS जायत छापत ST TET |” हुनक एहि उत्तरमे GET छलैन्ह । मैथिलीक श्रीवृद्धि प्रति एहन समर्पित व्यक्तत्व दोसर देखबामे नहि आबैत अछि । आजीवन लिखैत रहलाह आ सेहो मैथिलियेमे । एकटा-दूटा ale, एक सय छिहत्तरि टा पोथीक पांडुलिपि, से विभिन्न विधा पर प्रकाशनक हेतु छोड़ि गेलाह | जे एकटा स्वतंत्र मणिपदूम प्रकाशनक स्थापना SS प्रकाशनक काज चलाओल जाए AS कतेक वर्ष लागि जाएत समस्त पोथीक प्रकाशनमे | (कणम्ूत :- अंक 57; जुलाई-सितम्बर 208) ०». मैथिलीकेँ संविधान मे मान्यता Feat पर :-- aad महत्वपूर्ण काज अछि मिथिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मे मैथिलीकेँ लागू करबाक | से नहि Foret मैथिली भाषा तथा साहित्यक विकास नहि HS सकत। पत्रिका एखनहु कैकटा GUT अछि | पोथी सेहो प्रकाशित Stet अछि, मुदा पाठकक संख्या मे सन्तोष जनक वृद्धि नहि AS रहल अछि | मैथिली जाधरि शिक्षाक माध्यम नहि होएत, पाठकक संस्था मे वृद्धि नजि AS सकत | आब बिहार सरकार तथा भारत सरकार द्वारा संचालित लोकसेवा आयोगक 3

विभिन्न परीक्षा मे मैथिली सेहो एकटा भाषा ea करत । तैं, are मिधिलांचलक स्कूल, कॉलेज आ विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़निहार छात्र-छात्राक संख्या बढ़बाक चाही at एहि सुयोग सँँ लाभ उठेबाक चाही | (कणमूत :- अंक-96; अक्टूबर-दिसम्बर 2004) ०». साहित्य अकादमी मे मैथिलीक मान्यता लेल :-- डॉ. जयकान्त मिश्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय दिशि सं साहित्य अकादेमीक General Council क सदस्य मनोनीत भर गेलाह | आब की छल | मातृभाषाक अन्यन्य सेवी एहि सुअवसरकँ मैथिलीक हेतु उपयोग केलनि ओ पोथी What They say about Maithili आ A case for Maithili छपबाकड General Council मे बटबा देलैन्ह | Academy कलकत्ताक National Library # मैथिली पोथीक सूची मांगलकैक । मात्र साठि पोथीक सूची Sect । एहि जानकारी सँ क्षुब्ध भड डॉ. मिश्र दिल्‍ली मे पुस्तक प्रदर्शनीक आयोजन केलनि | एकर अध्यक्षता केलनि संसदीय मंत्री बाबू सत्यनारायण सिंह तथा उद्घाटन प्रधानमंत्री पं. नेहरू । प्रधानमंत्री अपन मंतव्य मे लिखलनि I have seen a large collection of books and munuscripts in Maithili. It deserves encouragement for development. तकरा बादे साहित्य अकादेमी एकटा Expert Committee क गठन केलक जकर ससदस्य छलाह डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, डॉ. THAN सेन, GT विश्वविद्यालयक डॉ. के. एम. अत्रे, डॉ. हजारी प्रसाद दिवेदी तथा डॉ. सुभद्र झा। संयोग एहेन जे डॉ. दिवेदी कलकत्ता विश्वविद्यालय घनश्यामदास बिड़ला व्याख्यानमाला tare हेतु आयल were | मिथिला संघक कार्यकर्त्ता लोकनि मे मदन चौधरी (आब स्व.) पीताम्बर पाठक (आब स्व.), सत्यनारायण लाल, ब्रह्मना. रायण झा तथा एहि पांतीक लेखक, डॉ. faddt सँँ भेट as मैथिलीक समर्थनक हेतु निवेदन केलथिन्ह | ओ स्पष्ट कहलथिन्ह, “मैं जानता हूँ, राजनीतिक कारण हों से मैथिली को मान्यता नहीं मिलती है। मैं इतना कर सकता हूँ जो Expert Committee की बैठक में नहीं जाऊंगा ।” सैह भेलैक दूनू बंगाली विद्वान aS मैथिलीक पक्ष मे छलाहे। आ सैह भेलैक | मैथिली साहित्य अकादेमी मे मान्यता पाबि गेल । डॉ. freee अवदानकैँ नाहि बिसरल जाय सकैछ sit मैथिलीक आचार्य WHS शुक्ल छथि । (कणम्त :- Ga-0; अप्रैल-जून 2008) ०». राष्ट्रभाषा अओर राजभाषाक iar पर न

सरकारी काम काजक हेतु अंग्रेजीक संगहि हिन्दीकँ Get विकल्प मे मानि aa गेल अछि जकरा देशक ऑफिसियल लैन्गुएज कहल जाइत अछि | राजभाषा कहल जाइत अछि । अतः सभ सरकारी संस्था एवं प्रतिष्ठान मे हिन्दी मे काम काजक सुविधा हेतु राजभाषा विभाग अछि आ अधिकारी राजभाषा देशक राज्य सरकार मे अंग्रेजीक संगहि ओहिठामक क्षेत्रीय भाषाक प्रयोग सरकारी कामकाज कोर्ट-कचहरी आदि मे माध्यम अछि | एतेक विशाल देश मे दुइये चारि राज्य मे मुख्यतः हिन्दीक व्यवहार होइत अछि । एहि स्थिति मे हिन्दी वा कोनो क्षेत्रीय भाषाकेँ समस्त देशक हेतु राष्ट्रभाषा मानि लेब अव्यवहारिक हैत। किछु हिन्दीक कटूटर पक्षधरक कारणे देशमे भाषायी विवाद ठाढ़ AS गेल जकर उदाहरण तमिलनाडु अछि | एहि दिशा मे उदारता चाही । राष्ट्रभाषा आ राजभाषा मे स्पष्ट अन्तरकेँ स्वीकार करब देशक अखण्डताक हेतु आवश्यके ae बुद्धिमानी सेहो a कोनो भाषाक प्रति दुराग्रहक भाव श्रेयस्कर ale थिक । आइ प्रत्येक राज्य मे आन राज्यक आइ.ए.एस., आइ.पी.एस. ऑफिसर छथि | ओ सभ अपन मातृभाषाक अतिरिक्त अंग्रेजी, हिन्दी आ ओहि राज्यक स्थानीय भाषा as अवश्यक जनैत छथि बल्कि ओतुका समाजक संस्कृति, आचार-विचार सँ सेहो परिचित As जाइत छथि sites sit ओहिठाम समाज मे घुलि-मिलि जाइत छथि । ओ सम्मान TS पावितहि छथि, लोक सेहो लाभान्वित eet अछि | (कणम्ूत :- sta-5; जुलाई-सितम्बर 2009) ०»... मातृभाषा मैथिलीक प्रति साहित्यकार एवं बुद्धिजीवीकेँ हुनक दायित्वकेँ याद दियाबैत :-- दुर्भाग्य जे हमर मैथिलीक साहित्यकार लोकनि मात्र कोनो पुरस्कार हेतु उपरौझ मे व्यस्त ta छथि। आइ आवश्यकता अछि जे मैथिलीक समस्त साहित्यकार, शिक्षक एवं अन्यान्य बुद्धिजीवी लोकनि बिहारक मुख्यमंत्रीक समक्ष धरना देथि एवं सरकार लग अपन मांग राखधि जे - () शिक्षाक माध्यम मैथिली (2) मैथिली मे पोथीक प्रकाशन (5) मैथिली शिक्षाक हेतु शिक्षकक नियुक्ति अविलम्ब करय। एहि सम्बन्ध मे हम मिथिला दर्शन (नवम्बर-दिसम्बर - 20) अंक मे सम्पादक नचिकेता जीक नाम पं. गोविंद झाक पत्र दिश ध्यान आकृष्ट करय चाहबनि | की ait एहि दिशामे आगू आबि नेतृत्व HS सकैत छथि? समस्त मैथिली भाषी हुनक HOH रहतनि | नचिकेता जी विश्व भारती, शान्ति निकेतन मे जाहि पदकेँ सुशोभित a रहल छथि aed हम गौरवान्वि छी । आइ एहने प्रभावशाली बुद्धि 5

जीवीक आवश्यकता छैक मैथिली केँ । (क्णामृत :- अंक-26; अप्रैल-जून 202) साहित्यकारक उद्देश्य मात्र महफिल सजायब वा मनोरंजक सामान जुटायब नहि थिक, sient Sid एतेक जुनि खसाउ। ओ दशभक्ति आ राजनीतिक अनुगामी af, बल्कि ओकरा आगू-आगू चलनिहार मशाल देखबैत सत्य थिक । मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार मणिपदूम जीक कथन छैन्ह- कलम तोड़ि कारतूस बना लें । (कणमूत :- अंक-28; अक्टूबर-दिसम्बर 209) ०». मैथिलीक अस्मिताक रक्षार्थ ओ विकास हेतु आह्वान करैत लिखलैन्ह आब Sat अधिक जकर नितांत आवश्यकता अछि ओ थिक मैथिली मे एक दैनिक समाचार-पत्र । ओहिसँँ मिथिलाक जनातक आशा-आकांक्षाक पूर्ति सम्भव भड सकत। मिथिलाक जनताक आवाज अधिकारी लोकनि धरि पहुँच सकत। विभिन्न आयोजन मे जबता खर्चा होइत अछि aes कम-सैँं-कम दू पन्नाक TS एकटा दैनिक समाचार पत्र बाहर He जा सकैछ | सक्रिय कार्यकर्ता लोकनिकेँ चाही जे अर्थ सम्पन्न मैथिल लोकनिकँ एहि दिशा मे प्रेरित करथि । (wore :- अंक-09; जनवरी-मार्च 2008) मणिपद्मजी एक बेर कहने छलाह, “जे समाज अपन मनीषीकँ सप्राण राखत, ओकर Waa केओ अटका नहि सकैछ ।” मात्र फोटो नहि मैथिली साहित्यमे हुनक अवदानक चर्चा सेहो रहबाक चाही | चेतना समिति मणिपदूम एवं महाकवि लालदासक जयंती मनाबैत अछि | ओहि दिन घर-बाहर पत्रिकाक मुखपृष्ठ पर हिनक फोटो एवं संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देल जेबाक चाही | चेतना समिति पं. विनोदा ae झा जे एकबेर बिहारक मुख्यमंत्री भेल छलाह हुनक जयंती सेहो मनाबैत अछि | मुदा, विनोदा aes झा नजि त५ स्वतंत्रता संग्राम मे कोनो भाग लेने were आ नजि मिथिला-मैथिलीक हेतु हुनक कोनो योगदान छैन्ह | डॉ. अमरनाथ झाक जयन्ती Set मनायल जाइत SS । जे लोकनि मैथिलीकँ मिथिलामे शिक्षाक माध्यम बनबय Ted छथि अथवा ware तिनका बुझल हेतैन्ह जे बिहार सरकार एहि लेल एकटा चारि सदस्यीय कमीटिक गठन केने छल जाहिमे एकटा सदस्य डॉ. अमरनाथ सेहो छलाह | मुदा ओ अनुपस्थित As मात्र एकटा विरोध पत्र eS अपन दायित्वक निर्वाह केलैन्ह | ot ई एहि झा at मुक्त नहि Eng as af मैथिलीक विकास हैत आ

नजि मिथिलाक | अतएव हमारा लोकनिकेँ जे सही अर्थमे मैथिलीक हेतु अपन त्याग केलैन्ह तिनका लोकनिक जयंती मनाएब उचित थिक । बाबू भोलालाल दास fede लोक छलाह एवं दरभंगामे वकील See | मुंशी रघुनन्दन दास हुनका ललकारा ta कहि tates जे aes अपन बाड़ीक पटुआ dia किएक लागैत अछि? भोला TGS WH आइन लगलैन्ह आ सभटा छोड़ि मैथिलीक हेतु लागि गेलाह | एहि काजमे हुनक वकालतो बन्द भर TS | (erga :- अंक 48; अक्टूबर-दिसम्बर 207) ०». मातृभाषाक माध्यम मे नेनाक शिक्षा व्यवस्था पर :-- ज्ञातव्य जे पूर्व मे मैथिलीक नाम पर्यन्त हिन्दीक पक्षधर लोकनिकँ नहि सोहाइत छलनि | कहला सँ मुँह बिचका लैत छलाह | मैथिली मे सम्भाषण Hear मे हीनताक बोध करैत छलाह | WEE fee गोटे मात्र घर-बाहरेटा मे नहि अपन घर-परिवार मे धीया-पुताक संगे सेहो हिन्दी मे बाजबा मे गौरवक बोध करैत छथि | आवश्यकता अछि अपना समाज मे सेहो मैथिली विरोधी erst मुक्त हेबाक ante मिथिला मे मैथिलीक माध्यम सैं पढ़ौनी हेबाक | आइ मिथिलाक युवा पीढ़ी बिहार तथा केन्द्र सरकारक प्रशासन मे सम्मिलित HS रहल अछि | तखन शिक्षाक माध्यम हेबा मे कोनो तारतम्य रहत। आउ हमरा लोकनि अपना नेना-भुटकाकेँ साक्षर बनाबी, शिक्षित sare | (कणम्ूत :- sep-9; अक्टूबर-दिसम्बर 200) प्राथमिक शिक्षा मे मैथिलीक माध्यम बनेबाक दिशामे सरकार सब दिनसँ निष्क्रिय रहल अछि | sit इहो सरकार पूर्ववते निष्क्रिय रहय as एहिं स्पष्ट हएत जे बिहार सरकार मैथिलीक विरोधी अछि | तखन as अलग मिथिला राज्यक हेतु आन्दोलनक stra अस्वीकार नहि कएल जाय सकैछ | मैथिली भाषी क्षेत्रक विधायक लोकनिक ई कर्तव्य छनि जे cle कार्यक हेतु सरकारकेँ वाध्य करथि | सम्प्रति पं. ताराकान्त झा (भाजपा) विधान परिषदक अध्यक्ष छथि, श्री विजयकुमार मिश्र (भाजपा) चेतना समितिक अध्यक्ष छथि, श्री नितीश मिश्र (जनतादल-यू) मंत्री छथि । मैथिली भाषी जनता हिनका सँ सार्थक प्रयासक आशा HLT अछि | शिक्षाक माध्यम मैथिली भेने - ()aat सभ बिना रटने पढ़ि ज्ञान अर्जन HS सकत | (2) मैथिली पढ़बाक दिश रूचि बढ़तैक । i

(3) मैथिली भाषामे विभिन्न विषयक पोथी लिखल aad | (4) स्कूल, कॉलेज तथा विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़निहार छात्र/छात्राक संख्या बढ़त | (5) मैथिली पढ़ौनिहार शिक्षक/शिक्षिकाक बहाली बढ़त आदि। (कणम्त :- अंक-20; अक्टूबर-दिसम्बर 200) ०». मिथिला-मैथिलीक विकासक अओर भविष्यक प्रश्न पर :-- मैथिल लोकनिक ahaa बारेमे डॉ. विद्यानाथ झा ‘fated’ अपन उपन्यास “्प्राम-गणराज्य' मे स्पष्ट लिखेत छथि- जाति-धर्म, वर्ग, वर्ण, स्वार्थ, ईर्ष्या, देष आ संघर्षक लौहपड़िका & बनल पिजड़ामे ong मिथिलाक भविष्य वांचयवला सुग्गा स्वयं बन्द अछि। ओ बाहर होबल लेल ओहि लौहक पत्ती पर अपन चांगुर सँँ TERT BS रहल अछि | चारि करोड़ अपन लोकक मुक्तिक आशामे अपलक निहारैत at alfa wea अछि जे कहिया ई पिंजड़ा cea जे हम मिधिलाक कंठवाशिनी मैथिलीक भविष्य एक बेर पुनः सुनाबी | मुदा अखन aS ओहिठामक सभटा पढ़लो सुग्गा सभ बौके-बहिर बनल अछि तखन ओहि पिंजड़ाकेँ & crea? विदित site मन्तव्य कतेक सही अछि से मैथिली संस्था सभक सोच आ क्रिया & स्पष्ट AS oat | मैथिलीक वरिष्ठ एवं पुरान (954) संस्था चेतना समितिक गठन देखि सकैत छी। आइ a कोनो अब्राह्मण एहि संस्थाक अध्यक्ष नहि भड सकलाह। (कणम्त :- अंक-55; जुलाई-सितम्बर 204) प्रथम as मैथिलीकेँ कम-सैं-कम माध्यमिक कक्षा aft शिक्षाक माध्यम कराबधि | मातृभाषाक माध्यम a शिक्षाक आवश्यकता ओहि ai छैक जे पछुआयल अछि | एहि वर्गमे दलित, महादलित एवं SIT अबैत छैक | दोसर जे मैथिलीकँ विहारक द्वितीय राजभाषाक दर्जा दियावधि | कहय नहि पड़त जे मैथिलीएटा एकटा एहन भाषा अछि बिहारमे जकर अपन लिपि छैक तथा विकसित साहित्य oe | विश्वविद्यालय स्तर aft मैथिलीक पढ़ाइ तथा ओहि माध्यममे शोध होइत आयल अछि | तेसर जे मिथिलांचलमे एकटा अओर विश्वविद्यालय at आर.आइ.टी.क नितांत आवश्यकता Sa | राजदरभंगाक राजनगर Sal भव्य भवन ओहिना भकोभन्न पड़ल BH एवं ओकर आस-पासक जगह | एकरा एकटा विश्वविद्यालयक हेतु उपयोग कैल जा सकैछ | संगहि आर.आइ.टी.क स्थापना छात्र-छात्रालोकनिक 8

हेतु आवास, पैघ नजि as छोट-छीन अस्पताल आदि लेल उपयोग कैल जा सकैछ | मुदा ई काज सभ h करत? Whe हेतु स्थानीय विधायक अओर सांसद लोकनि कँ आगाँ बढ़बाक चाही | (Hay :- अंक- 4; जनवरी-मार्च 206) wed पूर्वक अंक सभक सम्पादकीय विमर्शमे दुइ गोट विषय पर लिखैत अयलहूँ अछि जे मैथिली कोना शिक्षाक माध्यम बनत आ मैथिली बिहारक दोसर राजभाषाक दर्जा पाओत। मुदा आइ धरि एहि दिशामे कोनो प्रयास नजि Aer अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक मुजफ्फरपुर इकाई एहि लेल पटना उच्च न्यायालयकेँ एकटा आवेदन देने छल | न्यायालय बिहार सरकारसँ एकर स्पष्टीकरण चाहलक | मुदा, बिहारक राजनीतिमे गठजोड़क स्थितिक कारणेँ wat BMT उत्तर कोर्टकं नहि देल गेल । दुःखक बात जे एहि सम्बन्ध मे कोनो खोज-पुछारि आइ ak केओ नहि dere । नजि कोनो मैथिली संस्था आ नजि मिथिलाक विधायक/सांसद । ay कानमे तूर-तेल eS बैसल रहलाह | ककरहु एहि दिशामे दायित्व बोध afe | ई हमर मात्र अरण्य रोदन HS रहि गेल । (कणम्ित :- stp-l44; अक्टूबर-दिसम्बर 206) ०». मैथिली पत्र-पत्रिका अनियमितता अओर युवावर्गक उदासीनता आ दायित्व पर :-- मिथिलाक युवावर्ग एहि fest आकृष्ट होथि। तखनहि एकर उपयोगिता बूझल जायत। पत्रक शीर्षक देवनागरीक अतिरिक्त मिथिलाक्षर मे सेहो रहबाक चाही जाहिसँ पाठकवर्ग अपन प्राचीन लिपिसँ अवगत as हेवे करताह संगहि ओकर आवश्यकता केँ सेहो बूझताह | मैथिलीक प्राचीन साहित्य मिथिलाक्षर मे उपलब्ध अछि | अपन लिपपिक जानकारी शोधकर्ता लोकनि हेतु उपयोगी होयत | amt पत्र-पत्रिका से दैनिक होए वा साप्ताहिक, मासिक, द्वैमासिक वा त्रैमासिक नियमितता परम आवश्यक होइछ । संगहि सम्पादन, प्रकाशनक अतिरिक्त वितरणक व्यवस्था नजि Fart कोनो पत्रिका लोकप्रिय नहि ws aa तैं, वितरणक समुचित एवं ठोस व्यवस्था आवश्यक अछि। (कणणमृत :- st-I; जुलाई-सितम्बर, 2008) मुदा आइ शहरक युवा मैथिल सभ अपन मातृभाषा a कटि गेल छथि। मिथिला मे शिक्षाक माध्यम मैथिली नजि भेलाक कारण ओहिठामक युवा पीढ़ी सेहो मैथिलीसैँ कटि गेल छथि | घर-बाहर, हाट-बाजार, स्कूल-कॉलेज मे aS सहजहिं 9

सभठाम हिन्दीयेक प्रयोग | मैथिलीक हेतु ई एकटा अशनि संकेत बुझना जाइछ | ot eve स्थिति रहल त5 ओ दिन दूर नहि जखन मैथिली मात्र दादी-नानीक भाषा रहि शनैःशने: विलीन aS जायत! मुदा उक्त भयावह स्थिति सँ उबरबाक प्रयाग हेबाक चाही । भागब अथवा निष्क्रिय AS बैसल रहब कायरता थिक | बिना मैथिलीक मिथिला की? मिथिला as प्राचीन कालहिं a अछि । मैथिलीकँ बचायब सर्वोपरि दायित्व थिक | मिथिलाक विभिन्न राजनीतिक दल मे किछु-नजि-किछु aS युवापीढ़ीक सक्रियता, सहभागिता afea Aerie बचायब सभहक दायित्व थिक | oT मैथिली कम-सैं-कम प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनि जाय aS बूझब जे एक धाप एहि दिशा मे gees | (कणम्ूत :- अंक-8; अप्रैल-जून, 200) ०». मिधिलाक चित्रकलाक प्रचार-प्रसारक आवश्यकता पर :- आब आवश्यकता अछि जे एहि कलाकेँ विवाह एवं आन शुभ अवसर एवं अनुष्ठान आदिक अवसर परक प्रयोगक सीमा सैँ बाहर आनबाक। पारम्परिक विधि-व्यवहारक अवसर पर एकर प्रयोग सांस्कृतिक चेतनाक परिचय दैत अछि | मुदा आइ समाज एवं विश्व-मानव जहि समस्या awe आक्रान्त अछि ओहि सबहि केँ चित्रक माध्यमे अभिव्यक्ति ta आवश्यक अछि जेना समाज मे व्याप्त दहेज प्रथा सन कोढ़, वधु-दाह, नारी शोषण, पर्यावरण एवं आतंकवाद विकलांगक जीवनक समस्या आदि कतिपय एहन समस्या अछि जाहि दिस जनसामान्यक ध्यान आकृष्ट करब आवश्यक अछि । ई काज कलाकार लोकनि HS सकैत BHT | SMT ई काज Ast आर्ट द्वारा दर्शाओल जाए रहल अछि जे प्रदर्शनी सभ मे देखल जाए सकैछ | मुदा मिथिला चित्रशेलीक माध्यमे वर्तमान समस्या सभकेँ उजागर करब आवश्यक अछि। (कणम्त :- अंक-74; अप्रैल-जून 2009) ०». पुरुष अओर नारीक संबंध पर :-- मानव जीवन मे कांचन, कृषि आ कामिनी तीनूक अनिवार्यता अछि । एकरा बिनु जीवनक गाड़ी नहि चलि सकैत अछि । मुदा ईर्ष्या, लोभ, स्वार्थ सं प्रेरित अतिशय arate परिवार, समाज एवं देशमे संघर्ष आ अशान्तिकँ जन्म दैत अछि | रामायण आ महाभारत एकर ज्वलन्त TTT अछि | अदौ सँँ समाज पुरुष प्रधान रहल अछि | नारी असूर्यमपश्या Stet छलीह | मानवीय अधिकार एवं शिक्षासँ वंचित मात्र पुरुषक भोग, विलासिकताक वस्तु आ प्रत्येक स्थितिमे पुरुषक सेविका | ही

प्राचीन काल मे cit कतिपय ऋषि-मुनिक पत्नी विदुषी भेलीह आ मिथिला कँ गौरवान्वित केलैन्ह IS THT अपवादे कहबाक चाही | पुरुष द्वारा कलंकित, प्रताड़ित, अपमानित नारीकेँ जेना- अहिल्या, तारा, Bett, मन्दोदरि अओर द्रौपदी ® पंचकन्याक प्रातः स्मरणीयाक गरिमा दर पुरुष अपन कुकृत्य आ अपराधकेँ झाँपबाक स्वांग रचलैन्ह | (purge :- अंक-22; अप्रैल-जून 20) ई सब WS मात्र हुनक सम्पादकीय कला SAL कहब'क उदाहरण अछि | एहि तरहें केतेको विषय पर ओ अपन सम्पादकीय कलम चलौलैन्ह | हुनकर लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदिक वानगी देखैत बनैत अछि | अपन बात कहबाक बेबाकीनपन at निर्भिकता लेल ओ सदिखन जानल गेलाह | हिनक सम्पादकीय कौशलक ज्ञान एहिसँ लगाओल जा सकैत अछि जे BOT सन्‌ 954 सँँ 977 धरि अओर पुनः 2000 सँ प्रतिवर्ष अक्टूबर-दिसम्बर अंक शारदीय विशेषांक रूपें प्रकाशित mS tec अछि, जहिमे विभिन्न विद्या पर विद्वतजनक आलेखक समाविष्ट हिनक सम्पादकीय wah सम्पुष्ट करैत अछि | विभिन्न साहित्यकारक स्मृति अंकक अलावे विभिन्न विशेषांक, नवांकुर स्तम्भ a अपन लेखनकलाक आरम्भ करयवला कतेको रचनाकार अपन लेखन a मैथिली साहित्यकँ श्रीवृद्धि dere, ई दूरदर्शिता हिनक सम्पादनकलाक पहचान बनल | प्रत्येक अंक मे अमृतवाणीक समावेश, अगामी तीन मासक पावनि-तिहारक जानकारी, संगहिं पोथी भेटल, पत्रिका Fea आदिक सूचना, पोथी प्रकाशनक सूचना, आवरण पर मिथिला चित्रकलाक प्रधानता हिनक सम्पादित पोथीक अभिन्न अंग बनल आ पाठकवूंदक स्नेह अओर जिज्ञासाक केन्द्र । विद्याव्यसनी दास जीकँ कतेको मातृभाषानुरागी लोकनिक साहचर्य Ars जे हिनका मातृभाषक विकासार्थ तन-मन-धनक तर्पण करा हिनक साहित्यिक गतिविधिकेँ सम्पुष्ट as हिनका एकटा विशिष्ट साहित्यकार अओर सम्पादकक श्रेणी मे ठाढ़ HS देलक | विलक्षण स्मरणशक्तिक मालिक दास बाबू अपन व्यांग्यत्मक हाजिर-जवाबी, असवरोपयुक्त, समयोपयुक्त, विषयानुकूल टिप्पणी लेल सदिखन जानल जेताह | ओ मुख्यरूप a मैथिली भाषा-साहित्यकँ सजयबाक, सम्हारबाक आ ओकरा विकसित करवा पर जोड़ देलैन्ह | मैथिली आन्दोलनकेँ तीव्र बना एकटा संयुक्त मोर्चा गठित कई ओकर संयोजन Hers | जाहि क्रममे 967 मे मैथिली संग्राम समितिक गठन केलैन्ह अओर स्वयं मंत्री पदकक ag निर्वहण Here |

UTAH अद्यतन प्रकाशनक श्रेय दास Aa जाइत BS | एकर भाषा, व्याकरण प्रत्येक अंकक हेतु सामग्री संकलन, चयन, संशोधन, प्रूफ रीडिंग, पत्र व्यवहार, पत्रिकाक छपय as वितरण धरिक आज ओ सहर्ष उल्लासक संग स्वंय सम्पन्न करत छथि । एतेक अवस्था भेलोपरान्त हुनक ई उल्लास आइ धरि कम नहि भेल अछि | एकटा जीवट मैथिली भाषानुरागी, साहित्य चिन्तक जकर एकमात्र मूल उद्देश्य अछि जे ओ मनुष्य आ समाजकँ रोग-शोक, अज्ञानता सँ बचा HS ओहिमे आत्मबलक संचार HS ओकरा मे साहित्यक अक्षय निधि भरि सर्वाग रूपेण परिपूण समाजक निर्माण करबा मे सहयेगी बनैथ | हम पहिनहिं कहि चुकल St जे हुनक व्यक्तित्व, कृतित्व, सम्पादकित्व पर fae कहब-लिखब हमरा एहन नवतुर लेल असंभव अछि, तैयो हम किछु लिखबाक प्रयास कएल जे ah दीप देखाबय Gar अछि | पुनः अपन अल्पज्ञता पर fae तजन & क्षमा माँगैत अपन लेखनीकँ विराम दैत छी। सादर मुकेश दत्त मिथधिलांगन, दिल्‍ली (स्रोत :- Lagat केर विभिन्न अंक 2. चित्रावविचित्रा 3. मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान 4. पारिवारिक स्वजन) न

PTA FR कालमे' phe ससय-सूबा सब arn. सेंथिंलीक, निशिन ave frara va ote bie Fyarapy, विशिन् प्सस्तिर HTK ae ae aR | SC cafey wer TIE WITT असत्येलनी TET Dy, awe BRE सम्पाइक AAA KS, * ary व्यक्ति सादिव्मा HAT, of HATA pia ‘ Dra} RAR GIT BRT Hah TIL AVE $ By सस्डतिके VIE pray HIF had है ar > ort करी Daft | Ure - artes Pray SXF WEAK Der TH RA ae) Ore. प्चिकान ALTETF set की PET Sap rere FaPyat तरदे,ऊरफन ETT TT Zr why) Herder FH / 7054 F ee फाबिका athe tet WT TEAS से सन, उमा नई sae T_T ने कानों फचनिका सर Se ober Er] फचिका निकलल aga pecs Ox ae मील | PG बीच सात oa Fer oT lapse: ८2 उ्ाकसामिन, «मास्टर Fe, bra सादिव्य लैल Bice FOT pike 3 wharesr_ agar Pez hh peel ee os aia निलल। GK Rica कद He Be | साल RTA Sura ककाशित Fey जाम कला, पत्चिकाल hae PR Lael ie Eas | ४ VB 7H! शक पे वजोलट Bei un wee SHE | Pe 2 al PUTER, kad anak साल We | VAS AL EZ, ag en FIA FITTER सा Veer, Rr SAT 24 AT age समर a Wout ear | CORT समझा whey BITS

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क्रॉतिकारी चेतना जगबैत मैथिली नाटक ‘Bar लेखक: ao राजनंन्दन लाल दास जी मैथिली नाटक'क अपन सर्वोतमुखी इतिहास रहलैक अछि | प्रस्तुत नाटक संतो'क विबेचन मे ने aS हम पश्चात आचार्य भरत,भामह,दण्डी ओ रुद्रटक श्लोक आदि दय अपन मिथ्या विद्वताक ढकोसला करब,आ ने मैथिलीक तथाकथित विद्वान set कबिलौती जनायब, आ ने हम भाषा विज्ञानक बीहड़ि मे जाएब । हमरा सब्ख ae जे हमरा अहाँ विद्वान बुझी। हम एतय नाटकक सुदीर्घ इतिहासो के नहि लिखब जे प्राय: सबके बुझले हेतनि ! हम Het सबके बेजाय एकटा सूचना दैत छी जे कोलकाता मे मैथिली भाषा साहित्यक एकटा अनन्‍्य सेवक जिनकर हालहि मे देहावसान भेलनि अछि, से छथि विद्वान राजन॑न्दन लाल दास जी | जिनका मैथिली भाषा साहित्यक seater मे आत्मीय तुष्टि sea छलनि | सामाजिक यथार्थ अंकित करबा मे हिनका आत्मीय सुख होइत Geter, 'तकरे प्रतिफल्र मैथिलीक कर्णामृत सन पत्रिक चालीस वर्ष धरि अनवरत चलबैत रहलाह, जे एकटा इतिहास अछि | saat धरि मैथिली मे अनबरत कोनो पत्रिका एना as as नहि प्रकाशित भेलैक। मिथिलाक आ मैथिली भाषाक अतीतक उत्कर्ष -आकर्षक चित्र प्रस्तुत करबा लय मैथिलीक वर्तमान अधोगति के केन्द्रित as मैथिली साहित्यमे सुधार आनबाक लक्ष्य सँँ प्रतिकात्मक शैली के अपनाय. एकटा नाटक लिखलनि ' संतो '. जे सामाजिक धरातल पर मैथिली ऑदोलनक गति विधि कें तेज आ गति देबाक बास्ते क्रॉतिकारी उग्रतम्‌ स्वरूपक संघर्ष के अपन कथ्य बनौलनि अछि। नाट्यालोचनक दिशा मे. पोथीसैँ आधुनिक नाटकक विकास के गति तथा एकटा ब्यापक आयाम ata de | तात्यपर्य जे नवीन चेतना सँ भाषा साहित्यक प्रति आकर्षण प्रेम भावना wis नाटकक प्रेरक प्रसंग छैक || प्रस्तुत नाटक * संतोक ” रचनाक पाछू कोलकाता'क एकटा महत्वपूर्ण संस्था “अखिल भारतीय मिथिला ten” प्लान छलैक मिथिला - मैथिलीक प्रति जनसाधारणक बीच चेतना- प्रसार आ दायित्व बोध करायब, जकर सर्वाधिक योगदान रहलैक अछि | ताहि भाव सँँ मैथिललीक हित चिंतक परमादरणीय स्व० राजनंदन लाल दास जी मैथिली ऑदोलन के जाति धर्म संम्प्रदाय आ अभिजात्य संस्कारक परिधि के तोरि as मुक्त करेबाक धारणा सै एकर रचना केने छलाह। हिनका सँ जखन -जखन गप्प alga Bsa as हिनक क्ावना सँँ अवगत ast Bag जे मिथिलाक सभ जाति, धर्म, वर्णक भाषा ' मैथिली ' थिकैक, ताहि अनुप्रेरणा सँ रचलनि सन्तों नाटक, सन्तो नाम लगैत अछि ब्यंगात्मक बा कही जासूसी परंच नाटककार नायकक शॉतचित नाम शंतो दय भाषा क्रॉतिक ऑदोलन के प्रति जनसामान्यक आक्रोस के जगेबाक आत्म गौरव बुझेबाक प्रयास केलनि अछि। राजनंदन बाबू बुझैत Gore जे ब्यक्ति ओ परिस्थितिक अवधारणा vis साहित्यिक विधाक मार्फेते बुझायब सुलभ बुझलनि।आ अपन मूल धारणा के तकरा जग जाहिर कयलनि SAS तकर एकटा संवाद के अध्ययन ओ मनन सँ स्पष्ट बुझना जाइछ यथा: छात्र -४ (प्रश्न करैत), मास्टर सहाएब मातृभाषा ककरा HE Bay ? शिक्षक: मातृभाषा नहीं समझते हो ? वह भाषा जो हमारी माँ बालती है तथा जिस भाषा मे हम अपनी माँ से बात करते हैं।

'छात्र-५ : हमर मातृभाषा की थिक ? शिक्षक : हिन्दी 'छात्र-६ : हिन्दी ककरा कहैत छैक शिक्षक : जो तुम पढ़ रहे हो , वही हिन्दी है । छात्र -६: मुदा मास्टर साहएब हमर माए एना कहाँ बजैत छैक, आ हमहू सब एना कहाँ बजैत छिऐक ? 'एहना प्रशनक उतर मै गोलमटोल बात पर छात्र के संतुष्टि नहि alga छैक परिणाम मास्टर साहेब प्रताडित कय मुह चुप कय दैत छथिन्ह | ताहि समय नायक संतोक प्रवेश gga छनि आ वर्तालाप संवाद मे शिक्षक अपन अज्ञानता मे सरकारी ब्यवस्थाकबहाना दय पार प्रयास के संतो परखि ca afer झगड़ा झंझट सँ नीक शॉति भाव सँँ संतो महतो ओतय सँ निकलि जाइत छथि ,मुदा समस्याक विस -विसी हुनका लगले रहैत छनि | शिक्षकक ओ कथन “मैथिली मे पढेला सँ नोकरी चल्रि जायत, दोसर आब as हिन्दीएक चलती छैक 2” आदि-आदि धारणा सै ब्यथित dat अपन भाषा साहित्यिक ब्यथा कें एकटा दोसर रूप मे अनबाक लेल माहौल बनेबाक ध्यय सँं तैयारी are लगैत अछि | एहि क्रम मे. संतो के संग sect छनि रेखाक जे कोलकाताक भाषा साहित्यक कॉति भूमिक 'ललना जे अंग्रेजी भाषाक छात्रा छथि, संतो के आश्चर्य लगैत छनि अंगरेजी पढलि आ कोलतामे रहैत हिनका मैथिली सैँ कोन लगाव | पश्चात विदुषी रेखाक अपन सभ्यता ओ संस्कृतिक संग मोह आ ममता नहि रहब अर्थ fot शिक्षा सँँ aga ate छथि, संतोक संग दय मैथिलीक क्रॉतिक अगाह केलनि अछि संतो अपन मार्ग पर बढबाक भावना सँँ विभिन्‍न संस्था सँ संपर्क ata छथि जाहि सँ उत्साहक बदला हतोत्साह बेसी होइत छथि | मुदा रेखा रोल हतोत्साह. संतों के संघर्ष करबाक दिशा मे कोरामिनक कार्य ata छनि ।सतत्‌ संघर्षशील संतो के नेता सबहिक वचार सं दुख होइ़त छनि मुदा सर्वसम्मति सं संघर्ष समिति बनैत अछि | आधुनिक मैथिली नाटकक पृष्टभूमि मे सामाजिक ब्यवस्था मे नवीन जीवन चेतना जीवन शैली दिशि अपना के जगेवाक लेल उत्कट झाव जगलैक, अभिशप्त आकॉक्षा के आचार्य नेमीचंद जैनक पॉती saya axa एहि नाटक “संतोक” प्रसंगे समीचीन सन 'लगैत HF | एहि नाटक के पढला उत्तर एहेन सन प्रतीत होइत HAS जे आजुक आदमी के भीतर आ बाहर संघर्ष मे सेहो भावुकता रहला सँँ , वास्तविक संघर्ष आ संघर्षे जे ब्यक्ति के विचल्रित आ विक्षुब्द ata हो आ बाद मे ओ निष्क्रिय निरपेक्ष आ गतिहीन बना दैत छैक ।तकर प्रमाण नाटकक दोसर मे नेता १ आ २ के विचार बहुत कंजर वेटिव रहैत छनि जाहि सैँ ऑदोलन दुविधा मे पड़ैत अछि, मुदा अंततः: ऑदोलन अपन मार्ग पर आगू बढैत अछि | प्रस्तुत नाटकक कथाबस्तु गतिमान जीवन संघर्षक कथा बस्तु Rss! नवजागरणक काल जे मैथिली मे साठिक दसकक मध्य आयल पश्चात देखल गेलैक जे नव - नव प्रयोग होमय लागल छल | अहीकालक रचना अछि राजनन्दन बाबूक ” संतो” जकर पहिल खेपि 7000 प्रति प्रकाशित भेल रहैक दिसंम्बर 968S0a | राजनंदन बाबू मिथिला संघक कर्मठ चिंतनशील कार्यकर्ता wore | हिनका मे सृजनात्मक गुण ब्याप्त छलनि एहि नाटकक पहिल सफल मंचन (Serax 968 मे सायंकाल कोलकाता युनवर्सिटीक इन्सटीच्युट मंच पर भेल रहैक | ओना संघक अध्यक्ष मदन चौधरी बाबू लिखैत छथि “ प्रस्तुत नाटक मे नायक रचना-शिल्प एवं कलाक cite सँँ किछु त्रुटि रहितो खूब सफल भेल रहैक | ओना मैथिली मे क्रॉतिकारी नाटक बेसी नहि लिखल गेल अछि | स्वातंत्रयोक्त आदि-आदि समस्या के आधार बना पंडित गोविन्द बाबू,, सुधोंसुशेखर बाबू,किरण जी ,गंगेश गुंजन ,सहित बहुत रास विद्वान सब लिखलनि Har दास जी जाहि प्रसंग सें

कथा बस्तुक fore कयलनि अछि से एकटा साहित्यिक धारा मे नवीन ओ साहसिक प्रवाहक जनक छलाह | राजनंदन बाबू | रचना शिल्पक दिशा मे एकटा एकटा नवीन प्रयोग कयलन्हि | आ आधुनिक मैथिली नाटकक पृष्ठिभूमिक अभीप्सित नाटकक कड़ी कही as कोलकाताक जे मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे अपन विशाल आयाम wert अछि से अहिना नहि ! अपन जिजीविषा आ कुण्ठा के अपन भाव a नाट्य कृतिक कथ्य बना . प्रस्तुत करब कोनो साधारण लोक सं संभव नहि अपितु कोनो समर्पित मैथिली सैनानी राजनंदन बाबू सन विद्वत कर्मठ ओ भाषा साहित्यक गंभीर सँँ संभव छलैक। Hat नाटक जे Rags कमी छलैक ताहि पर मदन बाबू संघक अध्यक्ष कहि देने छथिन्‌ तैं बेस किछ 'लिखब उचित नहि , sett कमी wae हमरे सब मे अछि जे हम जतहि Bag अपन भाषा साहित्यक विकासक क्षेत्र मे ओही ठाम छी जे हमर सबहिक दुखद पहलू अछि। ऑदोलन जिंदाबाद अछि मुदा हमसब देशी राजा सदश अपन खेमा बना मात्र कबिलती जनाय अपन पीठ अपने ठोकि Teor छी। "मैथिली ऑदोलन जिंदाबाद” कहि अपन खाना पूर्ति as लैत छी । 'एहि अभिनयक पहिल मंचनक ait पुरूष अभिनेता नाम देव आवश्यक बुझल जे आई सैँ 53/54 वर्ष पूर्व ar पोथी :- सन्तो -लेखक --- Fado राजनन्दन लाल दास निर्देशक: ... श्री कमल नारायण कर्ण पुरूष पात्र कला क्रॉतिकारीक नाम सन्तों ( क्रौतिकारी शिक्षित युवक) स्व० दयानाथ झा शिक्षक: श्री फेकू मिश्र सरकारी वकील श्री मदन चौधरी सफाई पक्षक वकील श्री महावीर झा पेशकार श्री ब्रम्ह नारायण झा अरदलली श्री त्रिभुवन झा संतरी श्री पंचानन मिश्र इंसपेक्टर श्री जगदीश कामत पुलिस श्री पंचानन झा aay गोट आ छात्र ६ a स्त्री पात्र: रेखा (एकटा शिक्षित क्रॉतिकारी ललना ) सुश्री चंद्रकला किरण, THT (छात्रा) कुमारी निलम चौंधुरी ।

नननण इति 222 BI ot आलेख : आमोद कुमार झा गड़िया कोलकाता गाम: मोगलाहा,बाबुबरही मधुबनी He 943300497

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(संस्मरण) माछक रस बहुत साल पूर्वक कहानी अछि | सन्‌ 998 मे हम प्राइवेट नौकरी मे कार्यरत रही । ताहि समय मे हम अपन अनुज श्राता अरविन्द नारायण दत्त (सुमनजी) केँ अपनहिं पास स्टोरकीपर मे रखने रही । अचानक राजनन्दन बाबूक दिल्‍ली आगमन Ferre | कार्यालय निरीक्षण मे किछु घोटाला महसूस भेलैन्ह aS हमरा mers जे परसू हमरा सुमनजी चाही, हम कर्यालयक सब भार सौंप वापस कलकत्ता चलि जायब | जेन-तेन प्रकारेण बहाना बना सुमनजी के अपना लग सँ हटा हुनका सौंप देलियैन्ह | सब व्यवस्था आ सब काम बूझा-सूझाकें WH बाबू रातुक भोजन हेतु हमरा घर एलाह। हमर सबसँ श्रेष्ठ बहिनोई छथि | हुनकर विवाहक बाद हमर जन्म अछि, ताहि आदरपूर्वक सत्कार सँँ हुनका हम अपन किरायाक आवास पर अनलौंह | रातुक भोजनमे माछ-भात आ तरूआ-तीमनक आयोजन छल | भोरके गाड़ीसैं प्रस्थान कड Gare ताहि लेल एकहि सांझक आतिथ्य स्वीकार केने रहथि | भा. जनकाल मे हमर कनिष्ठ MAT बाजल, “पाहुन माछक रस दिय5 की?” मुसकाईत were, “पोखरिक माछ जल पीबि भिसिण्ड भड गेल छल ताहि AS HS ओकर रस पियब ।” राजनन्दन बाबू अपन पेशाक कारणें कतेको भाषा बजबा मे माहिर छलाह, अखनो छथि । सुमनजी लज्जावश बाजल, “नहि, sts ea छी ।” भभा HS हँसि उठलाह, कहलैन्ह, “आब ओकरो (माछकेँ) पेरल जैत तखन रस निकलत ।” ई छल राजनन्दन बाबूक व्यंग्य । वर्तमान मे हमर परिवार वा आंगने नजि हमर टोलेक Tad जेठ जमाई सेहो सशरीर छथि। अखन बेसी अस्वस्थ्य छथि, सुना मे दिक्कत Bes | हम वास्तव मे हुनका संग कथा-कुटमैती मे काफी धूमलौंह, वर्तमान मे एहि मदे जे fag सिखने छी से हुनकरे देन अछि। आब हमर बहिन aS नहि अछि मुदा हम राजनन्दन बाबूक बहुत आभारी fers | 980 मे हम पहिल बेर कलकत्ता गेल रही oS हुनके आवास पर रहि बड़ fg सिखलौंह आ कलकत्ता भ्रमण कलौंह | जीतेन्द्र नारायण दत्त आजीवन सदस्य, मिथिलांगन, दिल्‍ली हू

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92 || विदेह सदेह:२५. मुकेश दत्त एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व: राजनन्दन लाल दास एकटा सशक्त सम्पादित व्यक्तित्व : राजनन्दन लाल दास राजनन्दन बाबू मैथिली साहित्य जगत में कोनो परिचयक मोहताज नजि छथि । हुनका बारे मे वा मैथिली साहित्य मे हनक योगदानक बारे मे लिखबा वा कहबा योग्य नजि हम छी आ नजि हमरा मे ओतेक साम्थ्वें अछि । तथापि अपन अल्पज्ञान सँँ हनक मैथिली रचनाधर्मिता आ हुनक सम्पादकीय कार्य पर प्रकाश देवाक धृष्टता FS रहल छी। आशा अछि विद्वतजन हमर अल्पन्ञताकेँ क्षमा FS इनक कार्य अओर मैथिली साहित्य मे इनक योगदान पर प्रकाश दैत हमर एहिं आलेखकेँ आत्मसात करताह | मातृभाषा मैथिलीक अभ्युत्थानार्थ अपन आत्माक असीम अनुराग a उत्प्ेरित; प्रखर मार्क्सवादी; छात्रावस्थाहि सैं साहित्य अओर स्वतंत्रता संग्रामक सजग प्रहरी; प्रसिद्ध स्तम्भकार, नाटककार; सामाजिक-सांस्कृतिक चेतनाक संवाहक; मैथिली भाषा अओर साहित्यक अस्मिता आ विकासक लेल कतेको आन्दोलन मे अहम भूमिका rafter; साहित्य-संस्कृतिक विकास ध्वजावाहक; 98] सँ अनवरत मैथिली त्रैमासिक पत्रिका क्णामृतक संपादन दायित्व निर्वाह करैत; मौलिक रचना - संतों (क्रान्तिकारी आंदोलनकारी नाटक, 970), चित्रा-विचित्रा (आलेख संग्रह, 2006), प्रबोध नारायण सिंह (विनिवांध, 20:2); संगहि सम्पादन कार्य मे मिथिला दधीचि भोलालाल दास एवं राजेश्वर झा व्यक्तित्व ओ कृतित्व (979), साहित्यकार मुंशी रघुनंदन दास - व्यक्तित्व ओ कृतित्व (I983), मिधिला-मैथिलीक विकास में वर्णगोष्ठी एवं कर्णात्मक को योगदान (974-207) (2072) सै मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध करयवला मैथिलपुत्र गनौन (घनश्यामपुर) ग्रामवासी 05 जनवरी 934 केँ एहि धरा पर आयल श्रद्धेय राजनंदन लाल दास (पिता- स्व. मनीलाल दास अओर माता- स्व. विद्या देवी) अपन जिनगीक 40 वर्ष एकटा प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग संकायक प्रमुख रूपें अपन सेवा देलैन्ह | ofe कार्यावधि मे ओ भारत aT सार्क देशक कतेको बेर भ्रमण Here | 960 ई. मे कलकत्ता विश्वविद्यालय सैं राजनीतिशास्त्र सँ परास्नातक अओर हिन्दी, अंग्रेजी, मैथिली, बंग्ला सहित कतेको भाषाक विदत्त आर. एल. दास नामे विख्यात राजनन्दन बाबू अपन सम्पादकीय लेख आ कला लेल मैथिली साहित्य मे अपन अलग पहचान बना चुकल छथि | अपन जिनगीक 87 वसंत देखि चुकल दास बाबू मैथिल साहित्यकार लोकनिक मध्य अपन सम्पादकीय कला लेल after हुनक पहिल पसंद eae |

विदेह सदेह:२५|| 93 हमरा मैथिली लिखबा लेल अओर मैथिली साहित्य feet अभिप्रेरित करयवला दि जोड़ी मे पहिल Bale समकालीन TAA अभय कुमार लाल दास (नवानी) AT दोसर छथि श्री राजनन्दन लाल दास (गनौन, हमर fen) | पिसाक संपादन कला आ सम्पादकीय हमरा सदिखन उत्साहित आ इच्छुक बनावैत रहल | क्णामृतक प्रत्येक अंक मे हिनक “हमर कहब' हमरा मैथिल साहित्यक संग-संग देश-दुनियाक वर्तमान आ इतिहास & अवगत करौलक | हिनक संपादनकला हमरा सदति अपना में नवाचारक समावेश आ पूर्वक संकलन दिश अग्रसर केलक | एकटा पत्रिका वा पोथी मे पाठककें कि-कि सब चाहि, एक पीढ़ी at दोसर adie कोना जोड़क चाहि अओर कोना पाठक aft अपन बातकें अभिप्रेषित करक चाहि wis गुणक संतुलित आ सम्पादित व्यक्तित्व धनी छथि हमर पिसा- राजनन्दन लाल दास जी । एहि क्रम मे हम हिनक गजबक स्मरणशक्ति, PASAT, भाषा पर पकड़ (प्रायः अपन वार्तालाप मे ओ एक भाषा मे दोसर भाषाक शब्दक मिलावट नै करैत छथि) aT सम्पादन कला सँ अभिसंचित कर्णामृतक किछु अंकक उल्लेख करब आवश्यक बुझेत छी जाहिसँ पाठकवृन्द एहिं महान मैथिल साहित्यकारक ज्ञान मीमांसाकेँ बुझि सकैथ। “हमर कहब' द्वारा पाठक a अपन बातकेँ पहुँचेवाक कला केर किछु बारिकी देखल जाऊ :- eo यात्री sith याद करैत लिखैत छथि :-- मैथिली मात्र सम्मान देलकैन्ह मुदा रोटी afer द५ सकलैन्ह। हिंदी रोटी देलकैन्ठ आ सम्मान सेहो | हिन्दीक अपेक्षा मैथिली मे भने कम लिखने होथि ger मैथिलीकँ विसरि नहि सकलाह। भारत सरकार ANT रूस पठाओल एक शिष्ट मंडल मे यात्री जी सेहो एकटा सदस्य रूपेँ woe | तावत “*पत्रहीन नग्न गाछ पर अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित AS चुकल छलाह | रूस मे परिचय पुछला पर स्पष्ट कहलथिन्ह, “मैं हिंदी का नागार्जुन नहीं, मैथिली का यात्री बनकर आया हैँ, क्योंकि भारत सरकार नागार्जुन को नहीं जानती है ।” मातृभाषा मैथिलीक प्रति अगाध प्रेम तथा निष्ठा sors यात्री जीकेँ । हिन्दी में लिखलाक arch अनेकों लोक हुनक आलोचना Get ware | Har ओ लोकनि ई बिसरि जाइत ware जे tare लेल os रोटी aes करी । (कणमूत :- अंक 75-76; जुलाई-दिसम्बर 999) eo रमानन्द रेणु eh याद करैत :-- TANS रेणु सैँ हमर परिचय भाइ जीवकान्तक माध्यमे आ सेहो दूरभाष पर, जखन रेणुजी निर्मलीमे सत्कार दूरभाष i पर कार्यरत छलाह भेल | 'आखरक

94 || विदेह सदेह:२५ प्रवेशांकहि मे रमानन्द रेणुक कथा “करमीक फूल कनैलक Stay प्रकाशित Tere । उक्त कथासँ हनक चेतना आ समाज मे पसरल शोषण, विशेष ES जन-बोनिहारक प्रति सामन्ती अत्याचार, saree एवं ओहि वर्गक नारीक प्रति दुव्यव्यहार आदिक प्रति कथाकारक विद्रोही भाव परिचय भेटल | यद्यपि एहिं तरहक स्थितिक चित्रण कतिपय कथाकार, जे अपनाकेँ प्रगतिशील कहेबामे अघाइत नजि छथि, हुनक ward Feet अछि । मुदा ओही सभ मे कथाकार मात्र स्थितिक चित्रण कड अपन दायित्व निर्वाह बुझैत आयल छथि | ओकर प्रतिकार वा विद्रोहक ewe पाठक पर छोड़ि देने छथि, मुदा रमानन्द रेणु अपन उक्त कथामे मात्र नपुंसक सहानुभूति नहि देखाय विद्रोहक स्वरूपकँ स्पष्ट रेखांकित केने छथि । (कर्णामृत :- अंक-25; जनवरी-मार्च 20I2) ०». मणिपदूम जीक जन्मशताब्दीक अवसर पर हुनका याद करैत लिखैत aft :- मैथिलीक उज्ज्वल भविष्य आ अपन रचनाक उत्कृष्टता प्रति आस्थावान छलाह मणिपदूमजी । राजा सलहेसक प्रेसक कॉपी तैयार करैत काल हम पूछि देने oleae, “मैथिलीमे एतेक fate रह छी on & पढ़त?” ओ उत्तर देने छलाह - “हमरा विश्वास अछि जे हमरा मरणोपरान्त लोक हमरा ae अलमारी तोड़ि हमर पांडुलिपि as जायत छापत आ पढ़त।” हुनक fe उत्तरमे दूढ़ता छलैन्ह । मैथिलीक श्रीवृद्धि प्रति एहन समर्पित व्यक्तत्व दोसर देखबामे नहि आवैत अछि । आजीवन लिखैत रहलाह आ सेहो मैथिलियेमे | एकटा-दूटा नहि, एक सय छिहत्तरि टा पोथीक पांडुलिपि, से विभिन्न विधा पर प्रकाशनक हेतु छोड़ि गेलाह । जे एकटा स्वतंत्र मणिपदूम प्रकाशनक स्थापना HS प्रकाशनक काज चलाओल जाए oS कतेक वर्ष लागि जाएत समस्त पोथीक प्रकाशनमे । (कणणमृित :- अंक 5]; जुलाई-सितम्बर 208) ०». मैथिलीकेँ संविधान मे मान्यता Feat पर :-- wad महत्वपूर्ण काज अछि मिधिलांचल मे प्राथमिक शिक्षाक माध्यम मे मैथिलीकँ लागू करबाक । से नहि भेलासँ मैथिली भाषा तथा साहित्यक विकास नहिं 4s सकत | पत्रिका एखनहु कैकटा छपैत अछि । पोथी सेहो प्रकाशित होइत अछि, मुदा पाठकक संख्या मे सन्तोष जनक वृद्धि नहि भड रहल अछि | मैथिली जाधरि शिक्षाक माध्यम नहि होएत, पाठकक संस्था मे वृद्धि नजि ws सकत। आब बिहार सरकार तथा भारत सरकार दारा संचालित लोकसेवा आयोगक 3

विदेह सदेह:२५|| 95 विभिन्न परीक्षा मे मैथिली सेहो एकटा भाषा हेवे करत | तैं, आब मिथिलांचलक स्कूल, कॉलेज आ विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़निहार छात्र-छात्राक संख्या बढ़बाक चाही आ we सुयोग सँ लाभ उठेबाक चाही । (क्णामृत :- अंक-96; अक्टूबर-दिसम्बर 2004) eo साहित्य अकादमी मे मैथिलीक मान्यता लेल :-- डॉ. जयकान्त मिश्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय दिशि सँँ साहित्य अकादेमीक General Council क सदस्य मनोनीत FS गेलाह | आब की छल | मातृभाषाक अन्यन्य सेवी एहि सुअवसरकेँ मैथिलीक हेतु उपयोग केलनि at पोथी What They say about Maithili जा A case for Maithili छपबाकड General Council मे बटवा देलैन्ह | Academy कलकत्ताक National Library a मैथिली पोधीक सूची मांगलकैक । मात्र साठि पोधीक सूची भेटलीन। एहिं जानकारी सँ क्षुब्ध as डॉ. मिश्र दिल्‍ली मे पुस्तक प्रदर्शनीक आयोजन केलनि | एकर अध्यक्षता केलनि संसदीय मंत्री बाबू सत्यनारायण सिंह तथा उद्घाटन प्रधानमंत्री पं. नेहरू । प्रधानमंत्री अपन मंतव्य मे लिखलनि I have seen a large collection of books and munuscripts in Maithili. It deserves encouragement for development. तकरा बादे साहित्य अकादेमी एकटा Expert Committee के गठन केलक जकर ससदस्य छलाह डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी, डॉ. सुकुमार सेन, TT विश्वविद्यालयक डॉ. के. एम. aa, डॉ. हजारी प्रसाद दिवेदी तथा डॉ. सुभद्र atl संयोग ues जे डॉ. द्विवेदी कलकत्ता विश्वविद्यालय घनश्यामदास बिड़ला व्याख्यानमाला देवाक हेतु आयल Sere | मिथिला संघक कार्यकर्ता लोकनि मे मदन चौधरी (आब स्व.), पीताम्बर पाठक (आब स्व.), सत्यनारायण लाल, ब्रह्मना. रायण झा तथा एहिं पांतीक लेखक, डॉ. द्विवेदी सै Fe as मैथिलीक समर्थनक हेतु निवेदन केलथिन्ह । ओ स्पष्ट कहलथिन्ह, “मैं जानता हूँ, राजनीतिक कारण Ft से मैथिली को मान्यता नहीं मिलती है। मैं इतना कर सकता हूँ जो Expert Committee की बैठक में नहीं जाऊंगा ।” सैह भेलैक दूनू बंगाली विद्वान aS मैथिलीक पक्ष मे छलाहे। आ सैह भेलैक | मैथिली साहित्य अकादेमी मे मान्यता पाबि गेल। डॉ. मिश्रक अवदानकेँ नाहि विसरल जाय सकैछ । ओ मैथिलीक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल छथि । (arya :- AH-0; अप्रैल-जून 2008) «. राष्ट्रमाघा अओर Sy EE Sa

96 || विदेह सदेह:२५ सरकारी काम काजक हेतु अंग्रेजीक संगठि हिन्दीकें सेहो विकल्प मे मानि लेल गेल अछि जकरा देशक ऑफिसियल लैन्गुएज कहल जाइत अछि । राजभाषा कहल जाइत अछि । अतः सभ सरकारी संस्था एवं प्रतिष्ठान मे हिन्दी मे काम काजक सुविधा हेतु राजभाषा विभाग अछि आ अधिकारी राजभाषा देशक राज्य सरकार मे अंग्रेजीक संगहि ओहिठामक क्षेत्रीय भाषाक प्रयोग सरकारी कामकाज कोर्ट-कचहरी आदि मे माध्यम अछि | एतेक विशाल देश मे asa चारि राज्य मे मुख्यतः हिन्दीक व्यवहार होइत अछि | एहि स्थिति मे हिन्दी वा कोनो क्षेत्रीय भाषाकँ समस्त देशक हेतु राष्ट्रभाषा मानि लेब अव्यवहारिक हैत। किछु हिन्दीक कटूटर पक्षधरक कारणे देशमे भाषायी विवाद ठाढ़ HS गेल जकर उदाहरण तमिलनाडु अछि । तैं एहि दिशा मे उदारता चाही । राष्ट्रभाषा आ राजभाषा मे स्पष्ट अन्तरकँ स्वीकार करव देशक अखण्डताक हेतु आवश्यके नहि बुद्धिमानी सेहो हैत। कोनो भाषाक प्रति दुराग्रहक भाव श्रेयस्कर नहि थिक | आइ प्रत्येक राज्य मे आन राज्यक आइ.ए.एस., आइ.पी.एस. ऑफिसर छथि | ओ सभ अपन मातृभाषाक अतिरिक्त अंग्रेजी, हिन्दी आ ओहि राज्यक स्थानीय भाषा aS अवश्यक जनैत छथि बल्कि ओतुका समाजक संस्कृति, आचार-विचार सँँ सेहो परिचित AS जाइत 'छथि । ओहिसँ ओ ओहिठाम समाज मे घुलि-मिलि जाइत छथि। ओ सम्मान as uaa छथि, लोक सेहो लाभान्वित होइत अछि। (क्णमूत :- अंक-5; जुलाई-सितम्बर 2009) eo मातृभाषा मैथिलीक प्रति साहित्यकार एवं बुद्धिजीवीकेँ हुनक दायित्वकँ याद दियाबैत :-- दुर्भाग्य जे हमर मैथिलीक साहित्यकार लोकनि मात्र कोनो पुरस्कार हेतु उपरौझ में व्यस्त रहैत छथि। आइ आवश्यकता अछि जे मैथिलीक समस्त साहित्यकार, शिक्षक एवं अन्यान्य बुद्धिजीवी लोकनि बिहारक मुख्यमंत्रीक समक्ष धरना eter एवं सरकार लग अपन मांग राखधि जे - () शिक्षाक माध्यम मैथिली (2) मैथिली मे पोधीक प्रकाशन (3) मैथिली शिक्षाक हेतु शिक्षकक नियुक्ति अविलम्ब करय । ufé सम्बन्ध मे हम मिथिला दर्शन (नवम्बर-दिसम्बर - 20L)) अंक मे सम्पादक नचिकेता जीक नाम पं. गोविंद झाक पत्र दिश ध्यान आकृष्ट करय चाहबनि | की ait एहि दिशामे आगू आबि नेतृत्व ms सकैत छथि? समस्त मैथिली भाषी Bam HOH रहतनि | नचिकेता जी विश्व भारती, शान्ति निकेतन मे जाहि पदकेँ सुशोभित as रहल oft sitet हम गौरवान्वि छी । are wet प्रभावशाली बुद्धि 5

विदेह सदेह:२५|| 97 जीवीक आवश्यकता Bap मैथिली कें | (क्णामृत :- अंक-26; अप्रैल-जून 202) साहित्यकारक उद्देश्य मात्र महफिल सजायब वा मनोर॑जक सामान जुटायब नहि थिक, ओकर श्रेणीकेँ एतेक जुनि खसाउ। ओ दशभक्ति आ राजनीतिक अनुगामी नहि, बल्कि ओकरा आगू-आगू चलनिहार मशाल देखबैत सत्य fare | मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार मणिपदूम जीक कथन छैन्ह- कलम aS कारतूस बना लें । (क्णामूत :- अंक-28; अक्टूबर-दिसम्बर 2072) © मैथिलीक अस्मिताक रक्षार्थ ओ विकास हेतु आहूवान करैत frees आब aad अधिक जकर नितांत आवश्यकता अछि ओ थिक मैथिली मे एक दैनिक समाचार-पत्र। aes मिथिलाक जनातक आशा-आकांक्षाक पूर्ति सम्भव भड सकत। मिधिलाक जनताक आवाज अधिकारी लोकनि धरि पहुँच सकत। विभिन्न आयोजन मे जबता खर्चा cea अछि ones कम-सँ-कम दू पन्नाक त5 Weel दैनिक समाचार पत्र बाहर कैले जा सकैछ | सक्रिय कार्यकर्ता लोकनिकँ चाही जे अर्थ सम्पन्न मैथिल लोकनिकेँ एहि दिशा में प्रेरित करधि । (कणमूत :- अंक-09; जनवरी-मार्च 2008) मणिपदूमजी एक बेर कहने छलाह, “जे समाज अपन मनीषीकें सप्राण राखत, ओकर प्रगतिकेँ केओ अटका नहि सकैछ ।” मात्र फोटो नहि मैथिली साहित्यमे हुनक अवदानक चर्चा सेहो रहबाक चाही | चेतना समिति मणिपदूम एवं महाकवि लालदासक जयंती मनावैत अछि । ओहि दिन घर-बाहर पत्रिकाक मुखपृष्ठ पर हिनक फोटो एवं संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देल जेबाक चाही । चेतना समिति पं. विनोदा = झा जे एकबेर बिहारक मुख्यमंत्री भेल छलाह हुनक जयंती सेहो मनाबैत अछि | मुदा, विनोदा Are झा नजि त5 स्वतंत्रता संग्राम मे कोनो भाग लेने Bare आ नजि मिथिला-मैथिलीक हेतु हुनक कोनो योगदान Bre | डॉ. अमरनाथ झाक wast aa मनायल जाइत ठैन्ह । जे लोकनि मैथिलीकेँ मिथिलामे शिक्षाक माध्यम बनबय चाहित छथि अथवा छलाह तिनका बुझल हेतैन्ह जे विहार सरकार एहिं लेल एकटा चारि सदस्यीय कमीटिक गठन केने छल जाहिमे एकटा सदस्य डॉ. अमरनाथ सेहो were | मुदा ओ अनुपस्थित भर मात्र एकटा विरोध पत्र es अपन दायित्वक निर्वाह dere । oft ई एहि झा aed मुक्त नहिं ana as नजि मैथिलीक विकास हैत at

98 || विदेह सदेह:२५. नजि मिथिलाक | अतएव हमारा लोकनिकेँ जे सही अर्थमे मैथिलीक हेतु अपन त्याग केलैन्ह तिनका लोकनिक जयंती मनाएब उचित थिक | बाबू भोलालाल दास हिन्दीक लोक ware एवं दरभंगामे वकील छलाह। मुंशी रघुनन्दन दास हुनका ललकारा दैत कहिं देलखिन्ह जे अहाँकँँ अपन बाड़ीक पटुआ diet किएक लागैत अछि? भोला बाबूकें एकर आइन लगलैन्ड आ सभटा छोड़ि मैथिलीक हेतु लागि गेलाह | एहि काजमे हनक वकालतों बन्द भर गेलैन्ह । (क्णामूत :- अंक 48; अक्टूबर-दिसम्बर 20:7) ०». मातृभाषाक माध्यम मे नेनाक शिक्षा व्यवस्था पर :-- ज्ञातव्य जे पूर्व मे मैथिलीक नाम पर्यन्त हिन्दीक पक्षधर लोकनिकेँ afe सोहाइत छलनि | कहला सँ मुँह विचका तैत छलाह | मैथिली मे सम्भाषण करवा मे हीनताक बोध करैत woe | एखनहैं किछु गोटे मात्र घर-बाहरेटा मे नहिं अपन घर-परिवार मे धीया-पुताक संगे सेहो हिन्दी मे बाजबा मे गौरवक बोध करैत छथि | आवश्यकता अछि अपना समाज मे सेहो मैथिली विरोधी तत्वसैं मुक्त हेवाक संगहि मिथिला मे मैथिलीक माध्यम सँँ पढ़ौनी हेबाक । आइ मिथिलाक युवा पीढ़ी बिहार तथा केन्द्र सरकारक प्रशासन मे सम्मिलित 49 रहल अछि | तखन शिक्षाक माध्यम हेवा मे कोनो तारतम्य रहत | आउ हमरा लोकनि अपना नेना-भुटकाकेँ साक्षर बनावी, शिक्षित बनावी | (क्णमृत :- Fa-9; अक्टूबर-दिसम्बर 200) प्राथमिक शिक्षा मे मैथिलीक माध्यम बनेबाक दिशामे सरकार सब दिनसँ निष्क्रिय रहल अछि | cif इहो सरकार पूर्ववते निष्क्रिय रहय as एहिं स्पष्ट हएत जे बिहार सरकार मैथिलीक विरोधी अछि । तखन as अलग मिथिला राज्यक हेतु आन्दोलनक औचित्यकँ अस्वीकार नहि कएल जाय सकैछ | मैथिली भाषी क्षेत्रक विधायक लोकनिक ई कर्तव्य छनि जे ule कार्यक हेतु were वाध्य करथि। wala पं, ताराकान्त झा (भाजपा) विधान परिषदक अध्यक्ष छथि, श्री विजयकुमार मिश्र (भाजपा) चेतना समितिक अध्यक्ष छथि, श्री नितीश मिश्र (जनतादल-यू) मंत्री छथि । मैथिली भाषी जनता हिनका सँ सार्थक प्रयासक आशा करैत अछि | शिक्षाक माध्यम मैथिली भेने - () नेना सभ feat रटने पढ़िं ज्ञान अर्जन क5 सकत। (श मैथिली पढ़बाक दिश रूचि बढ़तैक | 7

विदेह सदेह:२५|| 99 (5) मैथिली भाषामे विभिन्न विषयक पोथी लिखल जायत | (4) स्कूल, कॉलेज तथा विश्वविद्यालय मे मैथिली पढ़निहार छात्र/छात्राक संख्या बढ़त । (5) मैथिली पढ़ौनिहार शिक्षक/शिक्षिकाक बहाली बढ़त आदि। (क्णमृत :- अंक-90; अक्टूबर-दिसम्बर 200) «. मिधिला-मैथिलीक विकासक अओर भविष्यक प्रश्न पर :-- मैथिल लोकनिक चरित्रक बारेमे डॉ. विद्यानाथ झा 'विदित* अपन उपन्यास “ग्राम-गणराज्य” में स्पष्ट लिखेत छथि- जाति-धर्म, वर्ग, वर्ण, स्वार्थ, Seat, देष आ संघर्षक लौहपट्टिका सँ बनल पिजड़ामे आइ मिथिलाक भविष्य वांचयवला सुग्गा स्वयं बन्द अछि। ओ बाहर होबल लेल ओहि लौहक पत्ती पर अपन चांगुर a प्रहारो BS रहल अछि | चारि करोड़ अपन लोकक मुक्तिक आशामे अपलक निहारैत at सोचि रहल अछि जे कहिया ई पिंजड़ा टूटत जे हम मिथिलाक कंठवाशिनी मैथिलीक भविष्य एक बेर पुनः सुनाबी | मुदा अखन os ओहिठामक सभटा geet सुग्गा सभ बौके-बहिर बनल अछि तखन sie पिंजड़ाकें केँ तोड़त ? विदित जीक मन्तव्य कतेक सही अछि से मैथिली संस्था सभक सोच ott क्रिया सँँ स्पष्ट as जायत। मैथिलीक वरिष्ठ एवं पुरान (I954) संस्था चेतना समितिक गठन देखि सकैत छी। आइ aft कोनो अब्राह्मण एहि संस्थाक अध्यक्ष नहि 45 सकलाह। (कणम्त :- ate-i35; जुलाई-सितम्बर 204) प्रथम oS मैथिलीकें कम-सैं-कम माध्यमिक कक्षा aft शिक्षाक माध्यम कराबधि | मातृभाषाक माध्यम सै शिक्षाक आवश्यकता ओहि play ठैक जे पछुआयल अछि | एहिं वर्गमे दलित, महादलित एवं अन्यान्य अबैत BH | दोसर जे मैथिलीकँ विहारक दितीय राजभाषाक दर्जा दियावथि | कहय नहि usd जे मैधिलीएटा एकटा एहन भाषा अछि fast जकर अपन लिपि Ga तथा विकसित साहित्य Sm | विश्वविद्यालय स्तर aft मैथिलीक पढ़ाइ तथा ओहि माध्यममे शोध होइत आयल SARS | तेसर जे मिधिलांचलमे एकटा अओर विश्वविद्यालय aT आर.आइ.टी.क नितांत आवश्यकता छैक | राजदरभंगाक राजनगर Sates भव्य भवन ओहिना भकोभन्न पड़ल छैक एवं ओकर आस-पासक जगह | एकरा एकटा विश्वविद्यालयक हेतु उपयोग ha जा सकैछ | संगहि आर.आइ.टी.क स्थापना छात्र-छात्रालोकनिक 8

00 || fate सदेह:२५ हेतु आवास, पैघ नजि as छोट-छीन अस्पताल आदि लेल उपयोग कैल जा सकैछ | WET ई काज सभ केँ करत? एकरा हेतु स्थानीय विधायक अओर सांसद लोकनि केँ आगाँ बढ़वाक चाही । (कर्णामृत :- अंक- 4; जनवरी-मार्च 20:6) wed पूर्वक अंक सभक सम्पादकीय विमर्शमे ge गोट विषय पर लिखैत aaa अछि जे मैथिली कोना शिक्षाक माध्यम बनत आ मैथिली बिहारक दोसर राजभाषाक दर्जा पाओत। मुदा आइ A एहि दिशामे कोनों प्रयास नजि भेल | अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषदक मुजफ्फरपुर इकाई एहिं लेल पटना उच्च न्यायालयकेँ एकटा आवेदन देने छल | न्यायालय विहार Me एकर स्पष्टीकरण चाहलक | मुदा, विहारक राजनीतिमे गठजोड़क स्थितिक erect एकर कोनो उत्तर कोर्टकँ नहि देल गेल | दुःखक बात जे एहि सम्बन्ध मे कोनो खोज-पुछारि आइ धरि केओ नहि dere | नजि कोनो मैथिली संस्था आ नजि मिथिलाक विधायक/सांसद | सभ कानमे तूर-तेल द5 वैसल रहलाह | Hae एहि दिशामे दायित्व बोध नहि । ई हमर मात्र अरण्य रोदन भर रहि गेल । (कर्णामृत :- st-l44; अक्टूबर-दिसम्बर श06) «. मैथिली पत्र-पत्रिका अनियमितता अओर युवावर्गक उदासीनता आ दायित्व पर :-- fara युवावर्ग एहि दिश आकृष्ट होथि । तखनहि एकर उपयोगिता बूझल जायत | पत्रक शीर्षक देवनागरीक अतिरिक्त मिथिलाक्षर मे सेहो रहबाक चाही जाहिसँ पाठकवर्ग अपन प्राचीन लिपिसँ अवगत os हेवे करताह संगहि ओकर आवश्यकता केँ सेहो बूझताह | मैथिलीक प्राचीन साहित्य मिथिलाक्षर मे उपलब्ध अछि | अपन लिपपिक जानकारी शोधकर्ता लोकनि हेतु उपयोगी होयत | art पत्र-पत्रिका से दैनिक होए वा साप्ताहिक, मासिक, दैमासिक वा त्रैमासिक नियमितता परम आवश्यक होइछ | संगहि सम्पादन, प्रकाशनक अतिरिक्त वित्तरणक व्यवस्था नजि भेलासँ कोनो पत्रिका लोकप्रिय नहि as सकैछ । तैं, वित्तरणक समुचित एवं ठोस व्यवस्था आवश्यक अछि । (क्णामृत :- sfp-2; जुलाई-सितम्बर, 2008) मुदा आइ शहरक युवा मैथिल सभ अपन मातृभाषा & कटि गेल wer | मिथिला मे शिक्षाक माध्यम मैथिली नजि भेलाक कारणें ओहिठामक युवा पीढ़ी सेहो मैथिलीसँँ कटि गेल छथि | घर-बाहर, हाट-बाजार, स्कूल-कॉलेज मे as सहजहिं 9

विदेह सदेह:२५|| 0I सभठाम हिन्दीयेक प्रयोग । मैथिलीक हेतु ई एकटा अशनि संकेत बुझना जाइछ | ait eve स्थिति wa os ओ दिन दूर नहि जखन मैथिली मात्र दादी-नानीक भाषा रहि शनैःशनैः विलीन as जायत! मुदा उक्त भयावह स्थिति सँ उबरबाक प्रयाग हेबाक चाही | भागव अथवा निष्क्रिय भड बैसल रहब कायरता थिक | बिना मैथिलीक मिथिला की? मिथिला as प्राचीन कालहिं a अछि | मैथिलीकेँ बचायव सर्वोपरि दायित्व थिक | मिधिलाक विभिन्न राजनीतिक दल मे किछु-नजि-किछु as युवापीढ़ीक सक्रियता, सहभागिता afer मैथिलीकें बचायब सभहक दायित्व थिक। oi मैथिली कम-सैं-कम प्राथमिक शिक्षाक माध्यम बनि जाय aS Gere जे एक धाप एहि दिशा में बढ़लहैं | (कर्णामृत :- अंक-8; अप्रैल-जून, 200) ०». मिधिलाक चित्रकलाक प्रचार-प्रसारक आवश्यकता पर :-- आब आवश्यकता अछि जे एहिं कलाकेँ विवाह एवं आन शुभ अवसर एवं अनुष्ठान आदिक अवसर परक प्रयोगक सीमा सँ बाहर आनवाक। पारम्परिक विधि-व्यवहारक अवसर पर एकर प्रयोग सांस्कृतिक चेतनाक परिचय दैत अछि । मुदा आइ समाज एवं विश्व-मानव जहि समस्या ere आक्रान्त अछि ओहि wate & चित्रक माध्यमे अभिव्यक्ति ta आवश्यक अछि जेना समाज मे व्याप्त दहेज प्रथा सन कोढ़, वधु-दाह, नारी शोषण, पर्यावरण एवं आतंकवाद विकलांगक जीवनक समस्या आदि कतिपय wet समस्या अछि जाहि दिस जनसामान्यक ध्यान आकृष्ट करब आवश्यक अछि | ई काज कलाकार लोकनि HS सकैत छथि | ओना ई काज मॉडर्न आर्ट द्वारा दर्शाओल जाए रहल अछि जे प्रदर्शनी सभ मे देखल जाए सकैछ | मुदा मिथिला चितन्नरशैलीक माध्यमे वर्तमान समस्या सभकँ उजागर करब आवश्यक अछि। (moras = sia-L4; अप्रैल-जून 2009) ०». पुरुष अओर नारीक संबंध पर :-- मानव जीवन मे कांचन, कृषि आ कामिनी तीनूक अनिवार्यता अछि | एकरा faq जीवनक गाड़ी नहिं चलि सकैत अछि | मुदा ईर्ष्या, लोभ, स्वार्थ सँँ प्रेरित अतिशय state परिवार, समाज एवं देशमे संघर्ष आ अशान्तिकँ जन्म दैत अछि | रामायण आ महाभारत एकर ज्वलन्त द्रष्टान्त अछि | अदौ & समाज पुरुष प्रधान रहल अछि | नारी असूर्यमपश्या होइत छलीह | मानवीय अधिकार एवं शिक्षासँ वंचित मात्र पुरुषक भोग, विलासिकताक वस्तु आ प्रत्येक स्थितिमे पुरुषक सेविका। शत

02 || fate सदेह:२५ प्राचीन काल मे जौं कतिपय ऋषि-मुनिक पत्नी विदुषी भेलीह आ मिथिला ® गौरवान्वित Hers WS तकरा अपवादे कहबाक चाही | पुरुष द्वारा कलंकित, प्रताड़ित, अपमानित नारीकेँ जेना- अहिल्या, तारा, कुन्ती, मन्दोदरि अओर द्रौपदी के पंचकन्याक प्रातः स्मरणीयाक गरिमा दर पुरुष अपन कुकृत्य आ अपराधकेँ झाँपबाक स्वांग रचलैन्ह | (कणामृत :- अंक-99; अप्रैल-जून 20I!) ई सब WS मात्र हनक सम्पादकीय कला “हमर कहब'क उदाहरण अछि | ue तरहेँ केतेको विषय पर ओ अपन सम्पादकीय कलम चलौलैन्ह । STAT लेख, संस्मरण, साक्षात्कार आदिक वानगी देखैत बनैत अछि | अपन बात कहबाक बेबाकीनपन आ निर्भिकता cet ओ सदिखन जानल गेलाह । हिनक सम्पादकीय कौशलक ज्ञान Ua लगाओल जा सकैत अछि जे *क्णामूत' सन्‌ 954 सैं 977 धरि अओर पुनः 2000 सं प्रतिवर्ष अक्टूबर-दिसम्बर अंक शारदीय विशेषांक रूपें प्रकाशित क5 रहल अछि, जहिमे विभिन्न विद्या पर विद्तजनक आलेखक समाविष्ट हिनक सम्पादकीय कलाकेँ सम्पुष्ट करैत अछि | विभिन्न साहित्यकारक स्मृति अंकक अलावे विभिन्न विशेषांक, नवांकुर स्तम्भ सँँ अपन लेखनकलाक आरम्भ करयवला कतेको रचनाकार अपन लेखन सँ मैथिली साहित्यकेँ श्रीवृद्धि bere, ई दूरदर्शिता हिनक सम्पादनकलाक पहचान बनल | प्रत्येक अंक मे अमृतवाणीक समावेश, अगामी तीन मासक पावनि-तिहारक जानकारी, संगहिं पोथी भेटल, पत्रिका भेटल आदिक सूचना, पोधी प्रकाशनक सूचना, आवरण पर मिथिला चित्रकलाक प्रधानता हिनक सम्पादित पोधीक अभिन्न अंग बनल आ पाठकवूंदक स्नेह अओर जिज्ञासाक केन्द्र । विद्याव्यसनी दास जीकें कतेको मातृभाषानुरागी लोकनिक साहचर्य Acre जे हिनका मातृभाषक विकासार्थ तन-मन-धनक तर्पण करा हिनक साहित्यिक गतिविधिकँ ase a हिनका एकटा विशिष्ट साहित्यकार अओर सम्पादकक श्रेणी मे are aS देलक | विलक्षण स्मरणशक्तिक मालिक दास बाबू अपन व्यांग्यत्मक हाजिर-जवाबी, असवरोपयुक्त, समयोपयुक्त, विषयानुकूल टिप्पणी लेल सदिखन जानल stare | ओ मुख्यरूप 4 मैथिली भाषा-साहित्यकँँ सजयबाक, सम्हारबाक आ ओकरा विकसित ara पर जोड़ देलैन्ह | मैथिली आन्दोलनकेँ तीव्र बना एकटा संयुक्त मोर्चा गठित कर ओकर संयोजन केलैन्ड | जाहि क्रममे 967 मे मैथिली संग्राम समितिक गठन केलैन्ह अओर स्वयं मंत्री पदकक बाधित निर्वहण Has

विदेह सदेह:२५|| 03 क्णामृतक अद्यतन प्रकाशनक श्रेय दास बाबूकँ जाइत SHS । एकर भाषा, व्याकरण प्रत्येक अंकक हेतु सामग्री संकलन, चयन, संशोधन, प्रूफ रीडिंग, पत्र व्यवहार, पत्रिकाक छपय सैं वितरण धरिक आज ओ सहर्ष उल्लासक संग स्वंय सम्पन्न करैत छथि । एतेक अवस्था भेलोपरान्त erm ई उल्लास आइ a कम até भेल अछि । weet जीवट मैथिली भाषानुरागी, साहित्य चिन्तक जकर एकमात्र मूल उद्देश्य अछि जे ओ मनुष्य आ समाजकेँ रोग-शोक, अज्ञानता AF बचा HS ओहिमे आत्मबलक संचार कड ओकरा मे साहित्यक अक्षय निधि भरि way रूपेण परिपूण faa निर्माण करवा मे सहयेगी बनैथ । हम पहिनहिं af चुकल छी जे हुनक व्यक्तित्व, ofa, सम्पादकित्व पर fag कहब-लिखब हमरा एहन नवतुर लेल असंभव अछि, तैयो हम किछु लिखबाक प्रयास कएल जे सूरजकेँ दीप देखाबय जेना अछि | पुनः अपन अल्पज्ञता पर विद्व तजन a क्षमा Atta अपन लेखनीकें विराम दैत छी। सादर मुकेश दत्त मिथिलांगन, दिल्‍ली (स्रोत :- Laitae केर विभिन्न अंक 2. चित्रा-विचित्रा 3. मिथिला-मैथिलीक विकास मे कर्णगोष्ठी एवं कर्णामृतक योगदान 4. पारिवारिक स्वजन) हट

विदेह सदेह:२५|| 9 अशोक सम्पादक राजनन्दन लाल दास आ क्णामृत EN ila wrt phe wa सुबा Hy TF, Beha Bren ae Farrer Het ste pz Farah, चिकना fee HTK GRETA aoe |S cate सम TE TIT आत्योलनी TET oF, a Ae lg : A उन ER - FH दे arfear- ', पा R TA b Ih RAK POT HRT HO TT ary e ia जो सँस्ड्तिके FAL करवाते HAF न कि है Spar जे orth को Batt | Wa ae rary लीरकक AT सम्बादकक RE ae, arte) Gra}. प्रचिकान_सतपादन yr = TT es Sar rary Fa Wal AE BF 5 Cael Lor eer | Hosyy we (7054-7 ee. gear ,सर्कारश्ित let FT, THARTEY ar Se नरिं ऊमूल SET SOT ने arte eae gir A ate दौ। Vat निकलल, AR ee Re ae गील | PA apr तक एचिका सिल ही Ml कल, उन्यकुदन Page oe iTS, - ro OT e agar Ea ee an कम the F757 Whaat agar ven 7g (ee ce sed sia Peete | TG oA ee iis ae सर Seq | सालदर साल TR IT a 'होडत लग का , ae, 7% —— poe FH Una Fr! ae ay poe un रहल SHE] Be. a ly FUT Bans लाल et | WHARF cgay = EGAN poem Su सदन, RRR रस a Brett er, Mat BT Fray weer ATE pathy Br WT weer | TORT Braver कफंद्क BATTS

20 || विदेह सदेह:२५ Vv VERS hay XB AL oP wher we a tit ue BFR | HAL ae of aa As erat ry rhe, मिस AAT, दि TER 3s} 277g!) se “oe ४ sre पीस्ति are aft ही नादरन ५ f Wx zor (4४ HAA” 7 RPT wee डक og a zl ru In A) Rs age Sail ar हस्त! PT be een gee ea मम Cs gas Bia 'पठेककर hig न age अडि। रढप्यति RT RTH Reseed ame Thee an रख PERT / SFA preci ATA AP 7a yet wet WAS रास! PIR जढकान, कारें उठे pea PS wt sat eer] FY TETRA Saar शनितिन Rhee, ये समा जे IGT Jer ara wg Tie ate Fra | BR सदि सेल Het IEE at we kay a ae Pe न <a करत £ FT oni Sg कक Sey SoA जिनका aah सती ahr Pag)? सारा Zam oT TK Wer साल Ta, arg arta ers} S77 OTT Bree. Tap CATR wh Oe ator UF] wey न Gey CTY my VE AVE Re ¥ सपिलीऊ er तरक्की

विदेह सदेह:२५|| 024 gare tra Hah a निगल | “Da लीक HK SHA} res herr HAE Pies पक PPR. reer, 2 ui + AIA ret ter ae rete ge oS कक rf as ie Syact He HP | Sees eer क Sorgen दे Rt BES re BSaeer मर AS Be are area |” aie ~ pr उनसे oer pra he aire , 7 oS ‘ > RES 2 steht pray ने >, . ies, Frege ore awe, | EEA BIS Cassy RTE फाबनि are? Sra AT, sett aa, Bar समाचार, WT seqaeret Bg HP * लि ८ िव्िगाकर) PHL स्वर Pte DTT कप aM दि ma oho arg . poail e 5 मं ok Fe) Ae aa ae | Seek ese wed कि न डे डक De गम esr om Bales Letina ma) Tan’ THEN yin sf 7 ‘Ss eo ee OA. i rey eer SR) समकी = reser TS a री SF an Bee: hat _ जि ही eT me Ve अल

22 || विदेह सदेह:२५ ~ bf ना over fe, et UP ऊदि जराटि ने TT a aa AE | अि कि quae ना gas FAAS a Pe has । . sree लेट Tre अदि | SET gaa ag WE A: sera et अल रन Bat 2 open He या YR Scat उप er vt दो उन लाल की ere TOO Tatas | ae arr arate Wen Im BS ape art Rises paras \ TT v2 नेसिव्ट्स मे जा Fae wary a SRE कर्ण बोस्‍्डीक set aS BTA ure Baa mrs FRY AY pater सर qr अमल Sie ead optag FECT ° a pret 7 RE| Seat Aan walter 37 a, Eugen ove 7. ear Meg हार mie a lc oak se eae He AF Re हे gg pee ata WHIT g sea: "वाल WE vhs f san aK ZH one निचिला इक x a oe we) Eka Base RS EL, SRF ae [ £ सम TH sae SISE L ag See xem A कक ot OU, fay a, मिली aR iy TEP eat Gort |b me निनटणपलससस्लिस ——— फाण्म-&क८थ८१७/

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48 || विदेह सदेह:२५ छात्र : हमर मातुभाषा की शिक ? शिक्षक : हिन्दी छात्र-६ : हिन्दी ककरा ate छैक शिक्षक : जौ तुम पढ़ रहे हो , वही हिल्‍्दी है । छात्र -६: मुदा मास्टर साहएब हमर माए एना कहाँ बजैत छैक, आ हमहू सब एना कहाँ बजैत छिऐक ? एहना प्रशनक उतर में गोलमटौल बात पर छात्र के संतुष्टि नहिं eles छेक परिणाम मास्टर साहेब प्रताडित कय ae चुप ma दैत छथिन्‍्ह | ताहि समय नायक संतोक प्रवेश होइत छनि आ वर्तालाप संवाद में शिक्षक अपन अजञानता में सरकारी ब्यवस्थाकबहाना दय पार प्रयास के संतों परखि लैत छनि झगड़ा झंझट सें नीक शॉति भाव सें संतों महतो ओतय सेँ निकलि जाइत छथि ,मुदा समस्याक विस -विसी हुनका लगले रहैंत छनि | शिक्षकक ओ कथन 'मैंथिली मे star सँँ नोकरी चलि जायत, दोसर आब as हिन्दीएक चलती छैक 7 आदि-आदि धारणा सँँ ब्यथित संतों अपन आषा साहित्यिक ब्यथा कें एकटा दौसर रूप में अनबाक लेल माहौल बनेबाक ध्यय a तैयारी करय लगैत अछि | eft क्रम में संतों के संग भटैत छनि रेखाक जे कोलकाताक आधा साहित्यक कॉति भूमिक ललना जे अंग्रेजी भाषाक छात्रा छथि, संतो के आश्चर्य wa OAT अंगरेजी पढलि आ कोलतामे रहैत हिनका मैथिती सैँ कोन लगाव ! पश्चात विदुषी रेखाक अपन wear ओ संस्कृतिक संग मोह आ ममता नहि रहब अर्थ Stat शिक्षा सैँ aga नहिं छथि, ices संग eu मैथिलीक क्रॉलिक अगाह केलनि अछि संतों अपन मार्ग पर बढबाक भावना सं विभिन्‍न संस्था af संपर्क करैत छथि जाहि सं उत्साहक बदला हतोत्साह बेसी होइत छथि I मुद्दा रेखा रोल eee संतो के संघर्ष करबाक दिशा में कोरामिनक कार्य करत छति ।सतत्‌ संघर्षशील संतो के नेता सबहिक aan ef दुख होइत OP yar सर्वसम्मति a संघर्ष समिति बनैत अछि । आधुनिक मैथिली नाटकक पृष्टभूमि में सामाजिक ब्यवस्था में नवीन जीवन चेतना जीवन HAY दिशि अपना के जगैवाक लेल उत्कट भाव sorte, अभिशप्त आकॉक्षा के आचार्य नेमीचंद जैनक पॉती उद्धृत करब एहि नाटक “ita” प्रसंगे समीचीन सन लगैत अछि । एहि नाटक के पढला उत्तर एहेन सन प्रतीत हौइत अछि जे आजुक आदमी के शीतर आ बाहर संघर्ष मे सेहों भावुकता war सं , वास्तविक संघर्ष आ संघर्ष जे ब्यक्ति के Peeler आ Fagen करत हो आ बाद मे ओ निष्क्रिय निरपेक्ष आ गतिहीन बना दैत छैक ।तकर प्रमाण नाटकक दौसर A नेता ! आ २ के विचार बहुत कंजर बेटिब eter we जाहि सं ऑदोलन दुदिधा में पड़ैत अछि, मुदा अंततः ऑदोलन अपन मार्ग पर आगू बढैत अछि | प्रस्तुत नाटकक कथाबस्तु गतिमाल जौवन संघर्षक कथा बस्तु fate! नवजागरणक काल जे मैथिली में साठिक दसकक मध्य ew पश्चात देखत्र गैलैक जे नव - नव प्रयोग होमय त्रागल set | अहीकालक रचना अछि राजनल्दन बाबूक * संतों" जकर पहिल खेपि 7000 प्रति प्रकाशित ata रैक दिसंस्बर t96ager | राजनंदन बाबू मिथिला संघक कर्मठ चिंतनशील कार्यकर्ता उल्राह | हिनका मे सृजनात्मक गुण ब्याप्त छलनि एहिं नाटकक Sik सफल मंचन tsfeeiay 7968 मैं सायंकाल कौलकाता युनवर्सिटीक इन्सटीव्युट मंच पर भेत्र रैक | औना संघक अध्यक्ष मदन चौधरी arg लिखैत ऊचि * प्रस्तुत नाटक मे नायक रचना-शिल्प एवं कलाक इष्टि a किछु त्रुटि रहिंतो खूब सफल ater रहैक | ओना मैथिली मे क्रॉतिकारी नाटक बेसी नहिं लिखत्र गेल अखि । स्वातंत््योत्र आदि-आदि समस्या के आधार बना पंडित गोविन्द बावू,, सु्घोसुशेखर बाबू,किरण जी ,गंगेश गुंजन ,सहिंत बहुत रास विद्वान सब लिखत्रनि मुद्दा दास जी जाहिं प्रसंग सें

विदेह सदेह:२५|| 49 कथा बस्तुक जिरह कयल्ननि अछि से एकटा साहित्यिक धारा मे नवीन ओ साहसिक प्रवाहक जनक TATE | राजनंदन बाबू | रचना शिल्पक दिशा में एकटा एकटा नवीन प्रयोग कयलन्हिं | आ आधुनिक मैथिली नाटकक पृष्ठिभूमिक अभीप्सित नाटकक कड़ी कही cs कोल्रकाताक जे मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे अपन विशाल आयाम गढने अछि से अहिना नहिं | अपन जिजीविषा आ कुण्ठा के अपन भाव सै नाट्य कृतिक कथ्य बना . प्रस्तुत करब कोनो साधारण ate सें संभव aie अपितु eat समर्पित मैथिली सैनानी राजनंदन बाबू सन विद्वत कर्मठ ST amet साहित्यक गंभीर सें संभव wer) Bat नाटक जे Reg कमी छलैक ताहि पर मदन बाबू संघक अध्यक्ष कहिं देने छथिन्‌ a बेस Pg लिखब उचित aft , बल्की कमी एखनो pa सब मे अछि जे हम जतहि छलहु अपन आषा साहित्यक विकासक क्षेत्र मे ओही ठाम छी जे हमर सबहिक दुखद पहलू अछि। ऑदोलन जिंदाबाद अछि मुदा हमसब देशी राजा सद्दश अपन खेमा बना मात्र कविलती जनाय ऊपन पीठ अपने ठोकि रहल छीं। "मैथिली ऑदोलन जिंदाबाद" कहि अपन खाना पूर्ति कड लैत छी । Ut अभिनयक पहिल मंचनक ati पुरूष अभिनेता नाम देव आवश्यक बुझल जे आई सेँ 53/54 वर्ष पूर्व te छलैक :- पौथी :- Gea -लेखक — Ede राजनन्दन लाल दास निर्देशक: ... श्री कमर नारायण कर्ण पुरूष पात्र कला क्रॉलिकारीक नाम art ( क्रॉलिकारी शिक्षित युवक) Ee दयानाथ झा शिक्षक: at फेकू मिश्र सरकारी वकील श्री मदन चौंधरी सफाई पक्षक वकील श्री महावीर झा. oe श्री see नारायण झा. अरदल्‍्ली A नरिमुवन झा संतरी श्री पंचानन मिश्र इंसपैक्टर श्री जगदीश कामत पुलिस श्री पंचानन झा नेता४ गोट आ छात्र oT स्त्री पाव: रेखा (एकटा शिक्षित क्रॉतिकारी wear) .... सुश्री चंद्रकला किरण, रसा (छावा) कुमारी निलम चौँधुरी ।

50 || fate सदेह:२५ आलेख : आमोद कुमार झा arisen कोलकाता गाम: मोगलाहा,बाबुबरही मधुबनी मो० 943300497

54 || विदेह सदेह:२५ चन्द्रेश मैथिल शिरोमणि राजनन्दन लालदास नाग ig lg em जरुर सूद See Shea sare pronase tat ऊपर TU PAS A li aaa

विदेह सदेह:२५|| 55 i | कर = | ४ डि Guat a a a Mam A OF eT ae a Lah et SATE) 3 2 ACL Sag r ) ms armed aa वि; मे aa ठि हक 7 Sere q for Fert he eos ao ES ae aa ast ee ae बैरविद्वगाप गिल वो STs TE aS Teer es He शत or जाल 2 i a i le hd aR की ene उप ser as rer Fr aaa arr eM लक ARG hr eT थी० aS, ds ARE Tern दाना bps पर Pb Pe = z err :

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विदेह सदेह:२५|| 64 जितेन्द्र नाथ दत्त | नाथ दत्त सस्मरण- माछक रस (संस्मरण) माछक रस बहुत साल पूर्वक कहानी अछि | सन्‌ i998 मे हम प्राइवेट नौकरी मे कार्यरत रही । ताहि समय में हम अपन अनुज भ्राता अरविन्द नारायण दत्त (सुमनजी) कँ अपनहिं पास स्टोरकीपर मे रखने रही । अचानक राजनन्दन बाबूक दिल्‍ली आगमन Fare | कार्यालय निरीक्षण मे fag घोटाला महसूस भेलैन्ह त५ हमरा were जे परसू हमरा सुमनजी चाही, हम कर्यालयक सब भार सौंप वापस कलकत्ता चलि जायब | जेन-तेन प्रकारेण बहाना बना सुमनजी कँ अपना लग सँ हटा हुनका सौंप देलिवैन्ह । सब व्यवस्था आ सब काम बूझा-सूझाकें राजनन्दन बाबू रातुक भोजन हेतु हमरा घर एलाह। हमर सबसँ श्रेष्ठ बहिनोई छथि | हुनकर विवाहक बाद हमर जन्म अछि, ताहि आदरपूर्वक सत्कार सैँ हुनका हम अपन किरायाक आवास पर अनलौंह | रातुक भोजनमे माछ-भात आ तरूआ-तीमनक आयोजन छल | भोरके गाड़ीसैं प्रस्थान HS जेताह ताहि लेल एकहिं सांझक आतिथ्य स्वीकार केने रहथि | भा. Grate मे हमर कनिष्ठ भ्राता बाजल, *पाहुन माछक रस feas की?” मुसकाईत were, “पोखरिक माछ जल tite भिसिण्ड भड गेल छल ताहि aS HS ओकर रस पियब ।” राजनन्दन बाबू अपन पेशाक BROT कतेको भाषा बजबा में माहिर Dare, अखनो छथि । सुमनजी लज्जावश वाजल, “नहि, sits दैत छी।” TAT क5 हँसि उठलाह, कहलैन्ह, “आव ओकरो (Tes) पेरल जैत तखन रस निकलत ।” ई छल राजनन्दन बाबूक व्यंग्य । वर्तमान मे हमर परिवार वा आंगने नजि हमर टोलेक Was जेठ जमाई सेहो सशरीर छथि। अखन बेसी अस्वस्थ्य छथि, सुनबा मे दिक्कत Ses | हम वास्तव मे हुनका संग कथा-कुटमैती मे काफी धूमलौंह, वर्तमान में एहि मदे जे fag सिखने छी से हुनकरे देन अछि । आब हमर बहिन as नहि अछि मुदा हम राजनन्दन बाबूक बहुत आभारी fears! 980 मे हम पहिल बेर कलकत्ता गेल रही aS हुनके आवास पर ae बड़ fag सिखलौंह आ कलकत्ता भ्रमण कलौंह । जीतिन्द्र नारायण दत्त आजीवन सदस्य, मिथिलांगन, दिल्‍ली 3

fade सदेह:२५|| 73 राजनन्दन लालदास: एक उदारचेता सम्पादक राजनन्दन लालदास: व a जद “Gee Assman See ae a Seer रेफर रन SRA का wr! tet Srey Ne Seat \ ऊ ayy aap Ae AE जे TaaR Bete zapt AAR area के डुनका AGA, Sash जन- ART aT cant ‘Watters | shay ay ऊपना के" ate Rahs WSR ea asl wher att <iq wr में औ से fer sap ar @R पत्रकार, ay Sus Sa es A ay aap दि] खेर, औ ही ar ote eae से SR PET ath si | a “SCs wiz ts) “fatten TE Seay का WORN सदा-्त्क Bes Ste Ste TST झव्न SSMAgE भी oma, PAB aS sou Be a Beak va or BNE op Say ET Aa at 9G \ SERS ES ARE AR ear ay STE feats नो oa weer इल। a Safars ah ae ante aa hae Trae ही PATA Ah aor ave yy Maths कोनो दर Wa पनिका में रूस SETS tea AE Oya AWS Way aie AAS EET Soe MPD Saftey Cat ag जेना ऊपीर के wr sSyey car ae | aX AO बुत fete ले ae STRAT vA उऔी- जनहित rep ap zetia Ser gh seifer ay AT Gren अनबन syste Rothe wim a ऊन इज 'विव्वल्ा रू दे लि अर SVT aT से ors SAT Bath ane aWeay ऊपना SENT Trae आे ZB wba, लिव्मस्तम। GS aus ले Sey दि जौ िणीकक्रिल'अकेजासल TP, SET Senate की FAST जा Shey SIR Ania) Wass जल SESS ST a te \ After ston, लेना SAT Sy Stas कर केक EET aR दे AE Remy SAR BY Wes उटक जाति 'विजोस का व्लैलसहिले se Vea MART पा WE fee oe oy देलनि ई- soutien AE थीर) | me i

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76 || विदेह सदेह:२५ ND दिजिक नोकरी A जिम पक ‘ | BONN ay Net yore FaLaaaT aay assy aay A aE | | ae + लिनाइकर \ eres} के ई. देज्वल eer थे _ (Sinema “ater ip at or AR Sr ate) के 2Vavhya'S आर्थिक a ऊन ae anan dsr Rat | SWANS काज' मे err att a } azar Amen) रू WW aA के Set ale N55 maker atm Selle area सै aa oe Eos fae ab ats हुनका ans औैपर्क रत ुरमाक सच्चा जे ब्रीककेक्त onus क रखका As "ENh Sos a Rita सका सनावधि] aE amar मे Gras a) asia AGEN ays Ths Aa (जे ae SssLaver न dem ऊदि) ) AN SES tsi es SESS उच्नीदू कारि ae 5) easy से लिक wars oa AST BENS नोट के Ay 2E ते औ ater के aaa भी Nex enna से ठस्गी Neen है ET, wear से 'णाहीटोलन कर fea से AWE oe TERR ACE Ise सै von aly कर्मजौष्ीक लैंक शक सरिता: saath) कर्गभूद के SPT ae बम अप 53 लिह्यितर fanaa are मे जब्तस्त stat ORK remy | avy अपन SR aera “RED ने प्रति ot aay BE ARES Ay ap Shia ao ati args aha MEAT पहल othe आकर सदस्मक hee नल उन \ areas Sev निडीक azar में RET a ENS aces: sony ap जैक (one जे Smtr ats a Feats) faatae ongr TES aE | sty TROT ने बार्षिक | ert ey Bessy DET Ay Seo ah nace aon जगा व Beg मे tare पर ले oy ees ZENE AR arty eS a . EI wy Ae से मे ऊि। | SNe EW TEN Son फोशल A wea, chara, Say “SUG NEY ऊन Me पद दैज्जल ong SES a | a yl — 3

विदेह सदेह:२५|| 77 ee 4 A wer ish शक WANG eS onto Fy tr इलि। oft a & alerts es SY Amys > onfoaz at A S880 Aor saa ta कला मो को Se Aas chy oa ain ate oat संपादक क wah जिया TER ar AR weary Sta Saar सणाइंकऊ a फ: att TE) चर, ्तजी SENTRA लौक | सीपइक बलि Store) Sacre | ABE oa भूमिका BAe Ne Tee इलाह के artesian भैनिकीक | ara के FRE ce Tors ae AT कर्ताजूत Aer जो झकण' SET AT लत जे पदक थी. ash साहितबर सनोकनि उतादुल दाह SW Gy em ae PRS पी am ay SASK कहना sas Ry ई et) GIST GEES Sag Seo अना, SAG ait हे | ON फत्ननाक उबर eWay Seng gory AGES ater fy OAT Nar £ Shag Sree seq ar SE AGA alae VRS Reap ane Ger ata के Way ay (ear सना देलनि ऊे- aq नैचिस्मीक हित: जज जे ayy जन जेल at | ate 'पढ़िका कु Zor zy RT oka ao a जे Ye SWAT माहिताकार oh a hye APSE गा a 'डीनणा के aay ay ay TEST hay Say कर्भीकृत के ने कर A fore * esr vst ae aa Aware a fir ड्ज्ना oth इति। ae) 2h ap A बेखबर Be ep कण Si sey SE) दुनका ay ate Mey RAAT tee SRS FER ep & avitgr का wae ay awe: aap Ay BOOT a zea ISS उल्दना Ee BV जरूर Dsatr Sa, क से i i ov ar Bee AY Sif सेक सी orga RSS gag Tae eras SBR al Teng ऊादि। दामजीक ART a जे कर्णीजूफ मे saint उभर ay EMD जे ल्नोकनि =i een bone “हिनका = dean टा विभिन्न fra Vay vat ata a ein उढलब्विन' fe) tema ay a2 Fre जबाब Bt *भिसिष्णा-जिदिर a zat AIGA after Ry लाला जे ap BS ale मे ata RAAT ER Tee ER arta ot. 'काजे चुका के ta जा केसे पादर्ष्पितक सर रेस दर

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विदेह सदेह:२५|| 93 नबोनारायण मिश्र युग vad राज AeA लाल दास

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98 || विदेह सदेह:२५

206 || विदेह सदेह:२५ सुधीर श्रीयुत्‌ राजनन्दन लाल दास जी ओ मैथिली

विदेह सदेह:२५|| 207 कामेश्वर झा 'कमल' क्णामृत पत्रिका आ सम्पादक श्री राजनन्दन लाल दास मल की मय नि... aac ies "रत 4

208 || विदेह सदेह:२५

विदेह सदेह:२५|| 209

254 || विदेह सदेह:२५ शिव शंकर श्रीनिवास राजनन्दन लालदासक नाटक (2 शजननरन लाल TAS ATH a शिवीयर श्रीतिषास -राजनन्‌न, बाल TH TEA aes सेवी लाए, Br जीका ae, a4 धाक SAT Gad are ea gee | gir (aor are सम्गाकक लाइट TE SOX कमल TS ae Ser rey आपस आयत 28 | लि हि <a शा वो wee ATE, शेटा गा अब ताम We Sate 7 ee arate fin RT, फनी oor (रूम ER wh) अजित ला BT रीसर ‘sae arate २००9 से (रुढ सब अति हक = shares GATS sya Away ae or = Fe wit ER, Ba HTT TTL aaa Bae हे घना OT opr |” sar ehh HT aire ony Ba A ts" दिसम्बर 968 ote! ae Seay ayea aero aay TAT sig as नै Hi iit: ae SR eS arr डिघु a Pe, Sts arr DBA se Ey ai BT pasar iss Sra gr SL gh सम ES ar ‘Fs जिद AR | ० eS “eS ek eng तीन AG after अँकने MATT gn दासिर Se eT Sh der ees ote ae eat att रियर ae if Bees Va FEAT, ee डे y finer 2 लिन 2 RE ie नि ay फट ATTA Et TN eae Z पा witears विकास a AES 2 erate wae A [ afte sq में, करा pancy Mgt ear i oe, er ATES रस .. ae. fans Hee दस -' कद UT eof. at नाल ai जिस Erase pa SAY को से लात Stee दा fer, <r सम्टुसनिनुट a ai आओ उबर हा और. PaaS Pol ate सेन ay Fe are te, जिश्रित ae gre पुन हे, दर meer दल EF S Sade बला ret Ae ee serena De le St ara S5eT Saas गेल are | By जा - साहित्य jane उत्तति ST TT

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262 || विदेह सदेह:२५ मुन्ना जी साहित्यिक जातिवादी सीमा तोड़लनि राजनन्दन जी

विदेह सदेह:२५|| 363 . = ; = refer weer - . हु erez Pe ‘ Pe ee ed aie बस tow oer eve we, deoheogey by सफल रूरपोर Sere ale bag wie ¥ ewe ee Wo we) दे eae dons ace In मनन सपा cee en ee re fee cee fee eve tor. eve be, (CC कौर ar gee comer eee = Sete for sen arc ef 208 wafyy Oty बोर पक rete बालक ster ete) I nbn on) dinthn oie ae) sbeqee ete we SEL गा set) one gers foe ledge eee nee Blas eal tae age tee etiee fae ser ate at a ware er dee) . bed 2 # ye ete bow खी ale Cee De te Rate! #4 er बाय ery 4९ २ दब पथ बरस, teats 8 vbr) stern on मे Carentan! TSE कप nee cece sen erat कै eee oe ee ecco avet be ‘ence cove td were wee er Seat a foun age aie Sear कर सर ON we stipe ised erate Infett & atew eg 0९ Cee! Sipe thas oe eens de, बकियान te de, a : Toe em, dre fe ga गम आर ae a a बे दि NY Swen were ee wf yawn we noes. STE = Cmte extees whe ake wir Lea Kredur t = = ES: Qe OF, एक alge, एक ot grant” baie wie , नें, फू. न, ुनवियद,.. amare fet हैं एक बल, nt genie ene SI Ce whee gear wet ade fe fed है Re em, et pet’ o> lp ih et ae कि ic स कि गे TS fore. एक, टीका, sete er fat है एक बन, दीप बन eee + age bint She rs aie ave feutg are fre gin ot fete Beare OS SUS Sef Sees fet एक nm, Rs ey Te | = | ltd ee अपने शाकि देखी विदा! Ce Sy cm certs sere fe € ge wen, nite मैन cee : ate NA “¢ 7 fq gers ter आहिसे veers wer हो कि"... es fest है दुक गजल, कूल at aac Aa rem. ५ a ८५ wegte थी. gre tt eae wee C fee . sae ‘oy हर जाइत, थी. tele, भूमि क ete