SADEHA — 26

Publication: SADEHA · Issue: 26
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह २६ डॉ. शम्भु कुमार सिंह & डॉ अरुण कुमार सिंह केर गद्य आ पद्य रचना (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. १०००/- संस्‍करण: २०२२ Videha Sadeha 26: A Collection of Maithili Prose and Verse by Dr Shambhu Kumar Singh & Dr Arun Kumar Singh (source:Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-३७८) डॉ शम्भु कुमार सिंह- यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी (मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण, मैथिली साहित्यक आदिकाल, मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता, आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित: निर्धनताक समस्या, मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु: नारी समस्या, यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन, घसल अठन्नी: एकटा विमर्श), रिपोर्ताज- मैथिलीमे अनुवाद पर अभिविन्यास कार्यशाला समपन्न, जाग’ जाग’ महादेव! (समसामयिक निबंध), भाय-बहिनक व्यथा कथा (कथा निबंध), बीहनि कथा (जेठ आ पूस, सौदागर, गरमी), लघुकथा (अवसरक निर्माण, दूभि), अनूदित लघुकथा (एकटा आर रबि-गैस्पर अल्मीडा, मृत्युकेँ टारब- वसंत भगवंत सावंत, सोंगर- सेबी फर्नानडीस, नागपंचमी- वसंत भगवंत सावंत), अनूदित उपन्यास (पाखलो- तुकाराम रामा शेट) (पृ. २-२९८) डॉ अरुण कुमार सिंह- परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी (स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता, मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना), मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा, भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक सम्पत्ति, सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा, कोशीमे बिताओल एक दिन, उजड़ैत गाम: बसैत शहर?, मैथिलेत्तर भाषी प्रदेशमे मैथिली सीखबा-सीखैबामे कँप्यूटर आओर भाषा विज्ञानक भूमिका, अभिकलनात्मक/संगनणात्मक (Computational) मैथिली व्याकरण, तीन दिवसीय कार्यशालाक आयोजन (पृ. २९९-३७८) पद्य-खण्ड (पृ. ३७९-४०१) डॉ शम्भु कुमार सिंह- अतीत, आस, लोरी, आह्वान, प्रो. चम्पा शर्मा- स्नेह-भरल सनेस (डोगरी कविता)- अनुवाद डॉ. शंभु कुमार सिंह, कुमार संभव ‘भारद्वाज’- हमर भारत देश महान (हिन्दीसँ मैथिली डॉ. शंभु कुमार सिंह) (पृ. ३८०-३९६) डॉ अरुण कुमार सिंह- भारतीय भाषाक हम बेटी मैथिली, सोधनपाल, प्रियवर सम्पादकजी (पृ ३९७-४०१) 2

गद्य खण्ड डॉ. शम्भु कुमार सिंह डॉ.शंभु कुमार सिंह जन्म : 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत। मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) ज्ञान राशिक संचित कोष थिक साहित्य। शब्द आ अर्थक यथावत सद्भाव, जाहिमे मनुष्यक भावना आ बेधन चेष्टा समाविष्ट हो सैह थिक साहित्य। जनताक चित्रवृतिक परम्पराक संग ओकर सामञ्जस्य देखाएबे साहित्यक इतिहास थिक। व्यापक, गहन आ अध्ययनक सुविधाक लेल साहित्यकेँ समयक विभिन्न परिधिमे बाँटब काल-विभाजन थिक। मुदा काल विभाजनक ई तात्पर्य कथमपि नहि अछि जे एक कालक समाप्त भेलाक लागले पश्चात् दोसरहि दिन साहित्यक धारा दोसर दिशामे प्रवाहित होमए लगैत अछि। काल-विभाजन कोनो सुनिश्चित  मापदण्ड अथवा कसौटी नहि अछि,  एहि लेल काल विशेषक नामकरण, कखनहुँ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आ धार्मिक परिस्थितिक परिपेक्ष्यमे होइछ तैँ कखनहुँ रचना विशेषक प्रवृति प्रावल्यक आधार पर। साहित्य अनन्त अछि। कोनो साहित्यक वैज्ञानिक ओ विधिवत ज्ञान ओहि साहित्यक अध्ययन सँ संभव होइत अछि। साहित्यक सम्यक अध्ययनक लेल युग विभाजन वा काल-विभाजन आवश्यक अछि। एकर स्पष्टीकरण ‘मिश्रबन्धु’क निम्न पंक्तिसँ भ’ जाइत अछि: “काल-विभाजन इतिहास के प्रासाद की दीवारें हैं। काल-विभाजन द्वारा यह माना जा सकता है कि, कब, कैसे और किधर लोगों की मनोवृत्ति और विचारधारा प्रवर्तित हुई। किन्तु काल निर्णय कोई सुकर कार्य नहीं। काल की कड़ी के दोनो छोड़ों को पकड़ना बहुत सूक्ष्मदर्शिता और गहरी विवेचना से हो पाता है।  विचारों और उसके प्रकाशन में जब कोई नयी क्रान्ति आ उपस्थित होती है, तभी काल श्रृंखला की नई कड़ी आरंभ होती है।” कोनो निर्जन प्रदेशक शैवलनी सदृश एकर धारा अबाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहल अछि। अतः ओकर सम्यक विचारक परिचय पएबाक हेतु काल-विभाजन प्रयोजनीय अछि, उपयोगी अछि। मैथिली साहित्यक काल-विभाजन पर जखन विचार करैत छी तँ ई एक गोट विचारणीय विषय बनि जाइत अछि। विभिन्न विद्वानक एहि संबंध मे मत अछि एवं प्रसिद्ध इतिहासकार लोकनि एहि प्रसंगे, विभाजन पृथकृ-पृथक कएल अछि। ओना तँ  साहित्य प्रवाहमान धाराक सदृश्य अछि, जिकर विभाजन दुःसाध्य नहि प्रत्युत असंभव भ’ जाइत अछि; किन्तु अध्ययनक सुविधाकेँ दृष्टिमे राखि विभिन्न प्रवृतिक प्रधानता आर अप्रधानताक आधार पर विभाजन क’ लेल जाइछ। ई विभाजन दू प्रकारेँ कएल जा सकैछ: (I)                 देशकृत (II)               कालकृत साहित्य तँ सार्वभौमिक ओ सर्वकालिक अछि। यदि देशकृत विभाजन कएल जाए तँ साहित्य पृथक-पृथक  स्थान पर भिन्न-भिन्न नाम सँ संबोधित कएल जाएत। कालकृत विभाजन किछु विशेष प्रवृतिक आधार पर कएल जाइछ। परिवर्तन मनुष्यक संग अवांछनीय रूपसँ अछि। सामाजिक, धार्मिक ओ राजनीतिक परिवर्तन भेल करैछ। कोनो युगमे कोनो खास तरहक प्रवृतिक प्रधानता पाओल जाइत अछि। ‘प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति’। अतः प्रवृतिक अनुरूप ओहि कालक नामकरण कएल जाइछ; जाहिसँ ई कथमपि नहि बुझबाक चाही जे आन-आन प्रवृतिक अवशेष भए जाइछ, अपितु ओ गौण रूपसँ सदिखन वर्तमान रहैछ। जाहिकालमे कोनो विशेष प्रवृतिक रचनाक प्रचुरता भेटैछ तँ ओ स्वतंत्र भ’ ओकर फराक नामकरण कएल जाइछ। एहि प्रकारेँ कालकृत विभाजनक एकगोट आर विशेषता पाओल जाइत अछि ओ थिक ग्रंथकेँ विशेष प्रसिद्धि भेलासँ कोनो कालक भीतर जाहि प्रकारक अनेक प्रसिद्ध ग्रंथ चलि आबि रहल अछि तेँ ओहि प्रकारक रचनाकेँ ओहिकालक अंतर्गत मानब उचित होएत। यद्यपि आनो-आन पुस्तक सभ ओहि कालक मध्य असाधारण कोटिक किएक नहि प्राप्त हो। अतः मैथिली साहित्यक युग विभाजन एहि रचना प्रवृतिक आधार पर तीन युगमे भेल अछि—पहिल अछि गीतिकाव्य युग, दोसर—नाटक युग, आ तेसरके—गद्य युगक संज्ञा देब उचित होएत। दोसर शब्दमे पहिलकेँ ‘श्रृंगार युग’ दोसरकेँ  ‘भक्ति युग’ आ तेसरकेँ  ‘आधुनिक युग’ कहल जा सकैछ। प्रारंभिक युगमे मिथिलामे गीतिकाव्यक विशेष प्रचार-प्रसार रहलाक कारणेँ प्रायः गीति-युगक संज्ञा देल गेल। एहि युगक प्रवर्तक छलाह अभिनव जयदेव महाकवि विद्यापति ठाकुर। हिनकासँ ल’ कए कवीश्वर चन्दा झा धरि एकर पूर्ण प्रचार-प्रसार रहल। कवीश्वरक मृत्युक पश्चात् एहि युगक अवसान भ’ गेल। मध्य युगमे आबि कए गीति काव्यक मधुर-मधुर गीत संयोगसँ नाटकक रचना दिस लोकक प्रवृति झुकल। अतः एहि युगकेँ ‘नाटक युग’क संज्ञा  देब उचित प्रतीत होइत अछि। एहि युगमे हमरा लोकनिकेँ उमापति उपाध्याय कृत ‘पारिजातहरण’ म.म. रामदास झाक ‘आनंदविजयाभिधान’ काशीनाथकृत ‘विद्याविलाप’ कृष्णदेवकृत ‘महाभारत’ आ धनपतिकृत ‘माधवानल काम कण्डला’ सँ साक्षात्कार होइत अछि। एवं प्रकारेँ नाट्य कलाक विशेष प्रदर्शन भेलासँ लोकक रूचि ओहिसँ बदलैत गेल एवं वर्तमान युग मे लेखकक प्रवृति गद्य लिखबा दिस विशेष झुकल। एहि युगमे लेखक वृन्द गद्य साहित्यमे अपन मौलिक रचनामे उपन्यास, गल्प, कहानी, निबंध, लिख’ दिस विशेष रूचि देखौलन्हि। आब प्रश्न उठैत अछि जे एखन धरि जतेक काल-विभाजन मैथिली साहित्य मध्य कएल गेल अछि ओकर तिथि निर्धारण करबामे विद्वान लोकनिमे मतैक्य किएक नहि अछि? मैथिली साहित्यक प्रथम काल-विभाजन करबाक प्रयास (I) म. म. डॉ. उमेश मिश्र, मनबोध रचित कृष्णजन्मक अपन भूमिकामे कएलन्हि अछि। हिनका मतानुसारेँ: (I)                 आदिकाल        1100 सँ     1300 ई. धरि (II)               मध्यकाल       1300 सँ     1800 ई. धरि (III)              आधुनिक काल  1800 सँ     अद्यतन। उपर्युक्त विभाजन एकतँ  मैथिलीकेँ ध्यानमे राखने अछि आ भाषाक विभिन्न रूपकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल  काल-विभाजन साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन नहि कहाओत। साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन मे भाषाक अतिरिक्त कृत्ति, कर्ता पद्धति ओ विषय पर ध्यान देब आवश्यक अछि। म. म. डॉ. उमेश मिश्र, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्क वार्षिक अधिवेशन, मार्च 1953 मे अध्यक्ष पदसँ “मैथिली भाषा ओ साहित्य” पर भाषण दैत, राजनीति, सामाजिक ओ भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ समस्त साहित्यकेँ निम्न भागमे प्रस्तुत कएने छथि: (I)                 आदिकाल        1000 सँ     1600 ई. धरि (II)               मध्यकाल       1600 सँ     1860 ई. धरि (III)              आधुनिक काल  1860 सँ     1950 ई. धरि। ओ मिथिला भाषा तथा इतिहासकेँ एहि प्रकारक उपादेयता पर विचार करैत तीनू युगमे नामकरण करैत छथि। आदियुगकेँ गीतियुग, मध्ययुगकेँ नाटकयुग एवं आधुनिक युगकेँ गद्ययुगक संज्ञासँ संबोधित कएल अछि। काल विभाजनक प्रसंगमे अपन विचारक परिवर्तनक कोनो युक्तिसंगत कारण म. म. मिश्रजी नहि देने छथि। परन्तु हिनक पूर्वक काल-विभाजन एवं नवीन काल विभाजनक बीच डॉ. जयकान्त मिश्रक प्रबंध प्रकाशित भ’ चुकल छल। डॉ. मिश्रक काल-विभाजन ऐतिहासिक पृष्ठभूमिमे सर्वमान्य अछि तँ आश्चर्य नहि जे म.म. जी अपन मतमे संशोधन कएने होथि। हिनक एहि प्रकारक विभाजनमे कए प्रकारक दोष आबि गेल अछि जे, सम्प्रति 1950 ई. मे आबि कए आधुनिक युगक समाप्ति मानैत छथि। मिथिला वा कोनो देशक जनताक चित्रवृत्त बहुल किछु राजनीतिक, सामाजिक साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितिक होइत अछि, मुदा जखन 1950 पर दृष्टिपात करैत छी तँ सर्वथा असंगत बुझि पड़ैत अछि, एहि कालमे कोनो राजनीतिक वा सामाजिक परिवर्तन नहि पाबि रहल छी जकर आधार मानि म. म. मिश्रजी अपन विभाजन मध्य आधुनिक कालक समाप्ति कएल अछि। जँ हिनक धारणा छनि जे काल-विभाजन राजनीति, सामाजिक एवं भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ कएल जाय तँ राजनीतिक परिस्थितिकेँ ध्यानमे राखि सम्प्रति 1947 मानि सकैत छलाह। एहि प्रकारेँ विवेचना कएला उत्तर जखन हिनक विभाजनक साहित्यिक समीक्षा करैत छी, तँ हिनक परिभाषा अमान्य सिद्ध होइत अछि। (2) डॉ. जयकान्त मिश्र साहित्य अकादमी सँ प्रकाशित अपन शोध-प्रबंध, ‘The history of Maithili Literature, Volume-I’ मे राजनीतिक घटनाक साहित्य परंपरा पर प्रभावक आधार पर काल विभाजनक प्रसंगे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि— (I)   प्राक् मैथिली काल                          8म शताब्दीसँ 12हम शताब्दी धरि (II)  प्रारंभिक मैथिली साहित्य                     1300 ई.सँ 1600 ई. (III) मध्यकालीन मैथिली साहित्य                        1600 ई. सँ 1860 ई. (IV)             आधुनिक मैथिली साहित्य                   1860 ई. सँ अद्यतन। डॉ. मिश्रक उपर्युक्त कथन बहुतो अंशमे तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक कहल जाएत। यद्यपि अपन काल विभाजनक आधार ओ राजनैतिक घटनाक साहित्य परम्परा पर प्रभावे केँ राखलन्हि अछि। हिनका अनुसारेँ भाषा-वैज्ञानिक आ व्याकरणक दृष्टिएँ ई विभाजन समीचीन अछि। मुदा एहिमे सेहो किछु त्रुटि रहि गेल अछि। प्रारंभिक कालक समय जे 1300 ई. स्थिर कएल गेल अछि तकर आरंभ मानबाक कोनो कारण नहि देल गेल अछि। 1300 ई. मानलाक कारणेँ ओहिसँ पूर्वक बहुत रास रचना एहि परिधिमे नहि आबि सकल। मुदा विद्यापतिक पूर्वक साहित्यकेँ प्राक् विद्यापति साहित्यक संगे विस्तारसँ चर्चा कएने छथि। एहि साहित्यमे ‘वर्णरत्नाकर’ तँ हिनक युग आरंभिक रचना थिके, चर्यापदहुक चर्चा ओ बड़ परिश्रमपूर्वक केने छथि। तखन हिनक उपर्युक्त मत स्वतः संदेहात्मक भ’ जाइत अछि। 1300 ई. मे मिश्रजी मुसलमानक आगमनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। मिथिला सर्वदासँ कट्टर धर्मावलम्बी रहल ताहिसँ मिथिलापर मुसलमानक आगमनक कोनो प्रभाव नहि पड़य देल। एकर दोसर हेतु इहो भ’ सकैत अछि जे, जयकान्त बाबूक ध्यान ज्योतिरीश्वरक गद्य ग्रंथ ‘वर्णरत्नाकर’ पर होइन्ह एवं एकर समय 1324 ई. लगभग कहने छथि। 1400 ई. क’ अभ्यन्तर विद्यापतिक प्रभाव साहित्य पर मुख्य रहल। एहि समयमे अपभ्रंशक पतनक अनन्तर पूर्वीय भारतमे मैथिलीक प्रयोग भेटैत अछि। श्री जयकात बाबू एहि काल-विभाजन अवसानक कारण प्रस्तुत करैत ओइनवार वंशक पतनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। एहि प्रकारेँ 1600 ई. सँ मध्यकालक प्रारंभ मानल गेल अछि ताहि हेतु विशेष उल्लेख नहि कएल गेल अछि। एहि युगमे मिथिलामे नाट्य साहित्यक पूर्ण प्रचार-प्रसार छल। जकरा ओ कीर्तनिञा नाटक कहल अछि। हिनका अनुसारेँ विद्यापति पदावलीक जे सशक्त धारा प्रवाहित भेलसे उमापतिसँ नाट्य रचनाक प्राचुर्य द्वारा एक महत्वपूर्ण ओ प्रौढ़ दिशान्तरकेँ प्राप्त कए नवयुग प्रवेश कएल परन्तु हिनक ई धारणा पूर्वाग्रहसँ अनुप्राणित अछि। वस्तुतः जकरा ओ मैथिलीक नाट्य परंपरा कहैत छथि ओ ओहिसँ पूर्व विद्यापति एवं ओहूसँ पूर्व ज्योतिरीश्वरक ‘धूर्तसमागम’ सँ प्रारंभ भेल। एहि समयक उल्लेख करैत मिश्रजी नेपालक जगतप्रकाशमल्ल, उमापति उपाध्याय एवं शंकरदेवक नाम लैत छथि, जे ओ मैथिली नाट्यकलाक प्रवर्तक क’ रूपमे अबैत छथि। एहि कालक अवसान सेहो खण्डवला कुलक अवसानसँ भेल। डॉ. जयकान्त बाबू आधुनिक युगक आरंभ 1860 ई. सँ मानलन्हि अछि, जखन कि दरभंगा राज कोट ऑफ वार्डस (Courts of Wards)क संरक्षण मे चलि गेल आर दरभंगा शहरमे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार भेल। परन्तु जखन हम मिथिलाक सीमा मैथिलीक क्षेत्रकेँ दरभंगा सँ बाहरो मानैत छिऐक तँ खाली दरभंगेक स्थिति पर साहित्यक निर्धारण करब कतए धरि तर्कसंगत होएत? (3) एहि प्रकारेँ प्रो. श्रीकान्त मिश्र सेहो अपन इतिहासमे उपर्युक्त  तथ्यक समर्थन कएल अछि। एवं क्रममे अनेक गतिरोधक मुख्य कारण प्रस्तुत करैत मिश्रजीक कथन अछि जे शिक्षा-पद्धतिमे बरोबरि मैथिलीक अवहेलना होइत रहल। समय पाबि साहित्यक आनहु अंग सभ गद्य, पद्य आदिक विशेष प्रगति होइछ। (4) तेसर काल-विभाजन कुमार श्री गंगानंद सिंहक द्वारा कएल गेल अछि। तथा जकर उल्लेख अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलनक चौदहम अधिवेशनमे ‘मैथिली साहित्यक प्रगति’ शीर्षक निबंध पर भाषण दैत अपन मतक पूर्ण विवेचना कएल अछि: (I)              प्रारंभिक काल             800 सँ      1300 ई. धरि (II)      मध्यकाल                1300 सँ     1800 धरि (III)      आधुनिक काल                  1800 सँ 19म, 20म शताब्दी धरि प्रारंभिक कालमे ओ चर्यापदक आचार्य लोकनिक रचनाकेँ मानैत छथि, आ वाचस्पति मिश्रक ‘भामति टीका’ आ सर्वानन्दक ‘अमरकोष टीका’मे संस्कृत पर्यायवाची अनेक मैथिली शब्दक उल्लेख कएल अछि। परन्तु चर्यापदक भाषा मैथिलीक पूर्व रूप भनहि भ’ सकैछ मुदा ओकरा मैथिली नहि कहि सकैत छी। भाषाविज्ञानक अनुसारेँ ई बुझि पडैत अछि जे लिपिबद्ध नहि भेलाक कारणेँ ओकरा भाषामे बहुत परिवर्तन भेल ताहिसँ ओ बहुत किछु आधुनिक मैथिलीक रूप धारण कए लेने अछि। प्रारंभिक कालकेँ 800 ई. ल’ जएबाक कोनो तेहन युक्ति नहि भेटैत अछि। एहि प्रकारेँ सम्प्रति मध्यकालमे जयकान्त बाबूक प्रारंभिक मैथिली साहित्य ओ मध्यकालीन मैथिली साहित्य दुनूकेँ सन्निहित क’ देल गेल अछि। ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’ केँ मैथिलीक सभसँ प्राचीन उपलब्ध गद्य ग्रंथक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। एहि भाषामे प्रोत्साहन एवं विकास तत्कालीन नृपतिगणक सहयोगक फलस्वरूप भेल। एहिमे अनेक कवि एवं लेखक लोकनिक प्रादुर्भाव भेलासँ साहित्यक अभिवृद्धिमे सहायक सिद्ध भेल। वस्तुतः साहित्यक प्रारंभ ओ विकास एहिठाम केन्द्रित भ’ जाइत अछि। ताहिसँ 1800 ई. सँ वर्तमान काल मानवामे समुचित कारणक आभाव भेटैत अछि। ओ आधुनिक कालकेँ दू भागमे विभाजित करैत छथि। 19म शताब्दी धरि मैथिलीमे जतेक ग्रंथ सभक चर्चा भेटैत अछि ओहि पर भाषा एवं वाक्यविन्यासक दृष्टिएँ 18म शताब्दीक छाप बुझि पड़ैत अछि। परन्तु 20म शताब्दीमे आबि कए क्रमशः एकर प्रयास भेलैक जे जतए जे छटा भेटलैक ओकरा ग्रहण कए मैथिलीक कायाकल्प कएल जाए। एहि विभिन्नताक मुख्य कारण राजनीतिक थिकैक। (5) एहि काल विभाजनसँ मिलैत-जुलैत विभाजन श्री भोलालालदास ‘मिथिला मिहिर’क मिथिलांक मे सेहो कएलन्हि अछि जकर समानता एहि विभाजनसँ अछि। (6) मैथिली साहित्यक मूर्द्धन्य विद्वान आ प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. सुभद्र झा अपन शोध प्रबंध ‘Formation of Maithili Language’ मे सेहो काल-विभाजन करबाक प्रयास कएल अछि। हिनक विभाजनमे सेहो कोनो मतसँ साम्य नहि भेटैत अछि, अतएव एकरा स्वतंत्र विभाजन कहल जा सकैछ। हिनक विभाजन एहि प्रकारेँ अछि: (I)        प्रारंभिक कालक मैथिली                      A.D 1000        सँ     A.D 1300 (II)       मध्यकालीन मैथिली                A.D 1300         सँ     A.D 1800 (III)                          आधुनिक मैथिली                    A.D 1800         सँ     अद्यतन। आलोचक क अनुसारेँ डॉ. झा मैथिली भाषा ओ साहित्यक विकास 1000 ई. पश्चाते मानैत छथि। संभव ई मानि जे ‘वर्णरत्नाकर’ मे प्रयुक्त भाषा ओकर रचनाकाल 300 ई. पूर्व विकसित भेल छल। परन्तु की मिथिला-भाषा विकासक प्रक्रियाकेँ बुझबाक हेतु ‘चर्यापद’ क भाषा सहायक सिद्ध नहि भ’ सकैछ? एहि प्रकारेँ डॉ. झा 1000 ई. पूर्वक रचना पर ध्यान नहि रखलन्हि अछि। 1800 ई. धरि मध्यकाल मानबाक हुनक आधार की अछि तकरा स्पष्ट सेहो नहि केने छथि। डॉ. झा काल विभाजनक क्रममे साहित्य परंपरा पर ध्यान नहि दए भाषाक विकासक दृष्टिएँ देखबाक प्रयास कएलन्हि। मैथिलीक प्रारंभिक काल विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ एवं ‘कीर्तिपताका’ सँ  मानैत छथि। एहि प्रकारेँ ओ अपन निबंधमे लिखने छथि—“Hence as the display the genius of the language they are termed pro to Maithili or Maithili at the earliest stage of its development.” वर्णरत्नाकरसँ कृष्णजन्म धरि मध्यकालीन मैथिलीकेँ उदारहणस्वरूप उपस्थित करैत छथि। ‘कृष्णजन्म’ जकर भाषावलोकन कएलासँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे मनबोधक शैली 18म शताब्दीक प्रतिनिधित्व करैत अछि। जखन कि प्रारंभिक मैथिली एवं मध्यकालीन मैथिलीभाषामे सभ्यता आबि गेल तखन आधुनिक मैथिलीक रूप धारण क’ लेलक। एहि प्रकारेँ एकर उद्भव एवं विकास 19म शताब्दीकेँ मानि सकैत छी। ई कहबामे कठिनता अछि जे कोन युगमे एहि साहित्यक कोन रूप छल एवं कोन स्थितिमे छल मुदा एतबा धरि अवश्य जे प्रत्येक युग अपन युगक छाप लैत अछि। मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध समालोचक स्व. प्रो. रमानाथ झा मैथिली साहित्यक काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मनतव्य डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ रचित ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’क भूमिकामे उपस्थित करैत छथि जे— “काल विभाजनक समस्यापर कोनहुँ आचार्यक मतसँ हमरा संतोष नहि अछि।” हिनक विभाजन एहि प्रकारेँ अछि: (क)             विद्यापति युग- कृष्ण काव्य युग अथवा प्राचीन युग (ख)             चन्दा झा युग – कृष्ण काव्य युग अथवा नवीन युग। समालोचक लोकनिक मतेँ निश्चित रूपेँ उपर्युक्त काल-विभाजन रचना पद्धतिक आधार पर समीचीन होइतहुँ सर्वांगपूर्ण नहि कहल जाएत, कारण मैथिली साहित्यक बहुत रास रचना एहि काल विभाजने नहि आबि सकत जेना ‘चर्यापद’, ‘वर्णरत्नाकर’ आदि। चन्दा झाक युगसँ पूर्वक समस्त मैथिली साहित्यकेँ प्राचीन युग मानब उचित नहि बुझना जाइत अछि। (8) डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ अपन पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’ मे काल विभाजनक प्रसंगमे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि: (1) आदिकाल, प्राक् ज्योतिरीश्वर काल अथवा अपभ्रंश युग—ई. पू. प्रथम शतकसँ 1300 ई. धरि (2) विद्यापति युग—1300 सँ 1860 (क) विद्यापति युग—1700 (ख) उत्तर विद्यापति युग—1700 सँ 1860 (3) आधुनिक काल—1860 सँ अद्यःपर्यन्त (क) वातावरण निर्माण—1860 सँ 1880 (ख) चन्दा झा युग—1880 सँ 1930 (ग) नव-नव विकासक युग—1930 सँ अद्यःपर्यन्त। आलोचक लोकनिक अनुसारेँ हिनक मत बहुत अंश धरि समीचीन एवं तर्कपूर्ण बुझना जाइत अछि। (9) डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध ‘आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास’ एवं मेघातिथिक छद्म नामसँ “मैथिली साहित्यक प्रमुख कविक मैथिली कविताक विकास” शीर्षकमे निम्न तर्क प्रस्तुत कएने छथि: (I)     आदिकाल     1100  सँ 1556 ई. धरि (II)    मध्यकाल    1556 सँ 1857 धरि (III)   आधुनिक काल 1857 सँ अद्यःपर्यन्त। आलोचकक अनुसारेँ हिनक दृष्टि शुद्ध  साहित्यैतिहासिक होएबाक चाही मुदा से नहि अछि। हिनक विभाजनसँ ‘चर्यापद’ मैथिलीक विवेच्य वस्तु नहि रहि जाइत अछि, आ 1100 ई. धरि तँ एहन कोनो कृत्ति नहि अछि जकरा आधार मानि 1100 ई. सँ आरंभिक  काल मानल जायत.....। डॉ. झा काल सीमाक विभाजनमे डॉ. जयकान्त मिश्रसँ प्रभावित बुझि पड़ैत अछि; यद्यपि समग्र रूपेँ ओहो साहित्यिक विकासक मर्म  केँ अनुभव करैत अवश्य प्रतीत होइत छथि। प्रो. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध ‘आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास’ मे उपरोक्त विभाजनक संशोधन करैत निम्नरूपेँ प्रस्तुत कएने छथि: (I)     आदिकाल     1300  सँ 1555 ई. धरि (II)    मध्यकाल    1555 सँ 1857 धरि (III)   आधुनिक काल 1857 सँ अद्यःपर्यन्त। (10) स्वर्गीय डॉ. राधाकृष्ण चौधरी अपन पुस्तक ‘A Survey of Maithili Literature’ मे निम्न रूपेँ काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मत व्यक्त कएने छथि: (I) Early Maithili Literature   900-1350 A.D (II) Middle Maithili Literature            1350-1830 A.D (III) Early Maithili Literature  1830- till dated। समालोचकक अनुसारेँ प्रो. चौधरी, अपन काल विभाजनक हेतु सेहो प्रस्तुत कएने छथि मुदा तकर विश्लेषण कएलासँ ओ सभ समीचीन नहि बुझना जाइत अछि। 1830 ई. सँ आधुनिक युगक आरंभ मानबामे कोनो ठोस कारण नहि भेटैत अछि। ने तँ तत्कालीन कोनो साहित्य उपलब्ध अछि आ ने मिथिलामे एहन कोनो राजनीतिक अथवा सामाजिक घटनाक सूत्र प्राप्त होइत अछि, जकर मिथिलाक सांस्कृतिक जीवनमे प्रभाव पड़ल हो। (11) डॉ. दिनेश कुमार झा ‘मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास’ नामक अपन पुस्तक मे काल विभाजनक प्रसंगमे अपन निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि: (I) आदिकाल/आधारकाल 800 सँ 1350 ई. धरि (II) मध्यकाल 1350 सँ 1857 धरि (III) आधुनिक काल- (क)             ब्रिटिश काल 1857 सँ 1947 धरि (ख)             स्वतंत्रता काल 1947 सँ अद्यःपर्यन्त। डॉ. झा आदिकालक आरंभ सिद्ध साहित्यसँ, मध्यकालक आरंभ विद्यापतिक रचनासँ आ आधुनिक कालक आरंभ अंग्रेज सभक द्वारा राज्य स्थापना एवं नवीन शिक्षाक फलस्वरूप जीवनक नव परिस्थिति उत्पन्न भेला तथा साहित्यक ‘स्पिरिट’ बदलि गेलासँ एवं अंग्रेजी एवं अन्य यूरोपीय साहित्यक मैथिली साहित्यपर प्रचुर प्रभावसँ मानैत छथि। हिनक मत समालोचकक अनुसारेँ बहुत अंश धरि तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक एवं समीचीन अछि। ई शुद्ध राजनैतिक दृष्टिसँ काल-विभाजन कएने छथि, मुदा आदिकालमे हुनक ओ दृष्टिकोण काज नहि कएलन्हि तहिना आधुनिक कालकेँ ब्रिटिश काल आ स्वतंत्रताकालकेँ भागमे विभक्त करब, उचित नहि बुझाइत अछि। 1947मे भारत अवश्य स्वतंत्र भेल मुदा ओहिसँ मैथिली साहित्यमे कोनहुँ ऐतिहासिक दिशान्तर भेल हो तकर कोनो प्रमाण नहि अछि। (12) डॉ. बालगोविन्द झा ‘व्यथित’ अपन पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’मे मैथिली भाषा ओ मैथिली साहित्यक सुदीर्घ परंपरा कए देखि इतिहासमे काल-विभाजन एकर समस्त उपलब्ध कृत्ति, कर्ता, पद्धति ओ विषयकेँ ध्यानमे राखि निम्न रूपेँ कएल अछि: (I) प्राचीन काल 700 सँ 1325 ई. धरि (II) मध्यकाल 1325 सँ 1860 धरि (III) आधुनिक काल 1860 सँ अद्यःपर्यन्त। (13) डॉ. नित्यानंद झा ‘मैथिली साहित्यक काल विभाजन’ शीर्षक निबंधमे अपन मत एहि प्रकारेँ व्यक्त कएने छथि: (I) पूर्व विद्यापति काल           800 ई. सँ 1350 ई. धरि (II) विद्यापति काल                1350 सँ 1700 ई.धरि (III) उत्तर विद्यापति काल         1700 सँ 1900 ई.धरि (IV)आधुनिक काल                  1900 सँ अद्यःपर्यन्त। प्रो. सोमदेव ‘मैथिली भाषा ओ साहित्य’ शीर्षक निबंधमे एहि रूपेँ कहलनि जे मैथिली साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन जँ उपलब्ध सामग्री, प्रवृत्ति, एवं मोड़क दृष्टिएँ कएल जाय तँ एहि प्रकारेँ होएबाक चाही: (I)प्राचीनकाल        8म शताब्दीसँ 1870 ई.धरि (II) मध्यकाल        1870 ई.सँ 1936 ई. धरि (III)नव जागरणकाल— (क)             स्वतंत्रतापूर्व         1936 सँ 1947 ई. धरि (ख)             स्वतंत्रता उपरान्त    1947 सँ 1986 ई. धरि (ग)              जनचेतना युग       1986 सँ प्रारंभ। प्रो. धीरेन्द्र ‘मैथिली प्रकाश’ नवम्बर 1986मे काल विभाजनक प्रसंगे कहैत छथि: (I)आदिकाल 800 सँ 1324 ई. (II) ज्योतिरीश्वर युग 1324 सँ 1412 ई. (III)विद्यापति युग 1412 सँ 1527 ई. (IV)उत्तर विद्यापति युग 1527 सँ 1860 (V)आधुनिक काल 1860 सँ अद्यःपर्यन्त। (क) पुनर्जागरण युग 1890 सँ 1925 (ख) नवयुग 1950 सँ अद्यःपर्यन्त। समालोचक प्रो. झाक विद्यापति युग ओ उत्तर विद्यापति युगक मतसँ सहमत छथि, परन्तु ज्योतिरीश्वर नामसँ एक एक पृथक युगक कल्पनाकेँ उचित नहि मानैत छथि। कारण ‘वर्णरत्नाकर’ सन अमूल्य ग्रंथकारक रचना करितहुँ ओ कोनो विशेष परंपराक स्थापना नहि क’ सकलाह। 1956 सँ नवयुग मानव सेहो अनुचित कहैत छथि, किएक तँ 1950 मे भारत अवश्य पूर्ण रूपेँ स्वतंत्र भेल मुदा ओहिसँ मैथिली साहित्यमे कोनहुँ विशेष उल्लेखनीय ऐतिहासिक दिशान्तर उपस्थित भेल हो तकर कोनो प्रमाण नहि अछि। (15) प्रो. प्रेमशंकर सिंह ‘वैदेही’क 1963 ई., जनवरी-मार्च अंकमे ‘मैथिली साहित्यक काल विभाजन’ शीर्षक निबंधमे नवीन दृष्टिकोणसँ काल-विभाजन प्रस्तुत कएने छथि: (I)अपभ्रंश काल 1000 ई. सँ पूर्व (II)प्रारंभिक युग 1100 ई. सँ 1556 ई. (III)मध्य युग 1556 ई. सँ 1857 ई. (IV)आधुनिक युग 1857 ई. सँ अद्यःपर्यन्त। अपभ्रंश युगकेँ मैथिलीक पूर्व पीठिका मानि सकैत छी। अपभ्रंशकालक अनेक रचनासँ  हमरा लोकनिक साक्षात्कार होइत अछि। अतः भाषाक आधार पर ओकर नामकरण प्रारंभिक कालक पूर्वमे राखल गेल। तथापि एकर अपभ्रंश साहित्य सर्वदासँ समृद्धशाली रहल अछि। एहि युगक ‘प्राकृत पैंगलम’ सदृश अपूर्व ग्रंथ प्राप्त होइत अछि। ‘चर्यापद’ एवं सिद्ध लोकनिक सेहो अनेक रचना सभकेँ एहि कोटिमे राखल जा सकैत अछि। दिल्लीक बादशाह अकबर जखन सिंहासन पर बैसलाह तँ भारतक राजनैतिक स्थितिमे महान परिवर्तन भेल। एहि समयमे मिथिलाक शासनक भार पं. महेश ठाकुर केँ भेटलन्हि, तथा दिल्ली केन्द्रसँ मिथिलाक साहित्यक सेहो महान परिवर्तन भेल। गीति युगक अवसान भेलाक फलस्वरूप मैथिल विद्वानक ध्यान कीर्तनिञा नाटक लिखबा दिस विशेष भेल, परन्तु एहि नाटक सभमे गीत सभक समावेश भेल ओ पाण्डित्यपूर्ण ओ वर्गीय होमए लागल। म. म. उमापति सँ लए कए वर्तमान युगमे कवीश्वर हर्षनाथ धरि मैथिली नाटकक इएह रूप देखल जाइत अछि। 1854  ई. सँ मैथिली साहित्य मध्य नवीन युगक प्रादुर्भाव होइत अछि। 1857 क पश्चात् देशमे एक नव-जागरणक संचार भेल। सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोण सँ एहि सालक नाम इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। एकर नेतृत्व नवीन शिक्षित बुद्धिजीवी वर्गक हाथमे रहल। एहि सालमे भारतमे राजक्रांति भेल जकर फलस्वरूप एकर प्रत्येक क्षेत्रमे परिवर्तन भेल। अतएव भाषा एवं साहित्यक क्षेत्रमे परिवर्तन अवांछनीय नहि कहल जा सकैछ। अतएव नवीन दृष्टिकोणकेँ ध्यानमे राखि मैथिली साहित्यक आधुनिक  कालक प्रारंभ 1857 सँ मानबा मे आपत्ति नहि होमक चाही। मुदा प्रस्तुत विभाजन केँ ल’ कए मैथिली साहित्य मध्य एकगोट आविष्कारक विषय बनि गेल अछि। म. म. जी एवं जयकान्त बाबू आधुनिक कालक प्रारंभ 1860 सँ मानैत छथि, एवं कुमार श्री गंगानंद सिंह तथा भोलालालदासक मतानुसारेँ 1800 ई. मानल गेल अछि। डॉ. जयकान्त बाबू अपन तर्क प्रस्तुत करैत कहैत छथि जे , 1860 मे मिथिलाक शासक ‘कोर्ट ऑफ वर्डस’क अधीन चलि गेल  तकर फलस्वरूप भाषा-साहित्य नवरूप धारण कए लेलक, एहिमे हिन्दीक साक्षात् प्रभाव देखना जाइत अछि, जे रवीन्द्रक कवितासँ प्रभावित भए श्री सुमनजी कविता लिखल। एकर अवलोकनसँ साक्षात् ज्ञात होहत अछि जे देशी एवं विदेशी दुनू दृष्टिएँ एकर प्रभाव मिथिलाक आध्यात्मिक जीवन पर पड़ल। मुदा 1857 सँ आधुनिक युगक प्रारंभ मानबाक सबल प्रमाण भेटैत अछि। अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोणसँ सेहो पर्याप्त छैक। एहि क्रांतिक प्रधान कारण छल जे एहि सँ व्यक्तिक स्वतंत्रताक अभ्युदय हो। एक दिस तँ  ई लोकनि अपन प्राचीन सांस्कृतिक सुरक्षा लेल उत्सुकता देखौलन्हि तँ दोसर दिस ओहि सांस्कृतिक परंपराक सुरक्षा एवं विकासक हेतु सचेष्ट रहलाह। समग्र रूपेँ विचार कएला उत्तर निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ, जे मैथिली साहित्यक मध्य आधुनिक कालक बड़ पैघ महत्व छैक, एतेक दिन धरि भाषा-साहित्य अन्हारमे टापर-टोइया दैत छल मुदा आधुनिक कालमे आबिकए ई नवीन रूप धारण कए लेलक। आधुनिक काव्यक प्रारंभमे चन्दा झाक नाम लेल जाइत अछि। चन्दा झा मैथिलीमे नवयुगक प्रवर्त्तक छलाह। वर्तमानमे मैथिली कवितामे शैली एवं भावधाराक दृष्टिएँ महान परिवर्त्तन भेल। नवीन युगक पदार्पण भेलासँ कविता कामिनी अपन नैसर्गिक सुषमाक भारकेँ वहन करबा मे असमर्थ भेलीह एवं ओकरा संग अग्रलेखक एवं पाठकक अभिरूचि एवं  मनोरंजनक हेतु उपन्यास साहित्य पर विशेष जोर देल गेल। एहि सभ दृष्टिकेँ ध्यानमे राखि 1857 सँ आधुनिक कालक प्रारंभ मानब उचित हैत। मैथिली साहित्यक आदिकाल (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) मानव समुदाय सर्वदा सँ समस्या सभक समाधान करबाक लेल साकांक्ष रहल अछि। कोनो भाषाक जन्म कहिया भेल एहि विषयमे किछु कहब कठिने नहि अपितु असंभव सेहो अछि। यद्यपि किछु विद्वान भाषा सभक जन्मपत्री बाहर करबामे व्यस्त रहलाह अछि किन्तु ओ लोकनि  बरोबरि एहि दिशामे असफल रहलाह अछि। लिखित उपलब्ध साधनपर एतबे कहल जा सकैछ जे अमुक समयमे अमुक भाषा-शब्द प्रचलित छल। इएह हाल प्रत्येक भाषाक संग अछि। साहित्यक शरीर अछि भाषा। संवेगात्मक अनुभूति जकरा साहित्यशास्त्रमे रसक आख्या कहल जाइत अछि, भाषाक माध्यमसँ अभिव्यक्त होइछ, ओ तेँ कोनो साहित्य इतिहास सँ संलिष्ट रहैत अछि। विश्वभाषाक इतिहासमे केवल संस्कृते टा एहन विषय अछि जे पाणिनि द्वारा ‘संस्कृत’  भए तेना ने प्रतिष्ठित भेल जे अद्यापि अपन स्वरूप सभ ठाम सभ विषयमे एकरूप स्थिर कएने अछि। भारतीय साहित्यक आरंभ प्रायः अंधकारमे विलीन अछि। मैथिली साहित्यक संग सेहो इएह चरितार्थ होइत अछि। साहित्यक इतिहासकार मध्य बहुत दिन धरि ई विवादक विषय बनल रहल जे मैथिली साहित्यक उद्भव एवं विकासक प्रारंभ कहिया सँ मानब? प्राचीन समयसँ मिथिला संस्कृतक केन्द्र रहल अछि। सम्पूर्ण भारत विशेषतः पूर्वांचलक छात्र लोकनि संस्कृत  अध्ययनक हेतु मिथिला अबैत छलाह। विद्याक प्रचार-प्रसारक कारणेँ एतए विद्वान लोकनिक संख्या अधिक  छल। ई विद्वान लोकनि दर्शन, न्याय, ज्योतिष, गणित, आदिकेँ महत्वपूर्ण मानैत छलाह। फलस्वरूप जनभाषाक उपेक्षा प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूपमे होइते रहलैक। मुदा एतबा होइतहुँ एहिठामक लेखक तथा कविगण समय-समय पर जमभाषामे सेहो किछु रचना करैत छलाह। एहि कारणेँ प्राचीनकालीन मैथिली सामग्री अत्यंत सीमित रूपमे उपलब्ध होइत अछि। किन्तु  जतबा सामग्री मैथिलीक प्रारंभिक कालक अध्ययनक हेतु उपलब्ध अछि तकरा चारि भागमे विभाजित कएल जा सकैत अछि:- 1. शब्द, 2. वाक्यखंड, 3. सूक्ति तथा 4. लोकगीत एवं लोकगाथा। अध्ययनक सुविधाक हेतु एहि सभ वर्ग पर अलग-अलग प्रकाश देल जा सकैछ। (1)   शब्द भाषा विज्ञानक अनुसार कोनो भाषाक हेतु शब्दक  महत्व सर्वाधिक अछि। पहिने  शब्दक प्रयोग होइत छैक तखन स्वरूपक। एहि दृष्टिएँ प्रथम कोटिमे ओ सभ ग्रंथ अबैत अछि, जाहिमे मैथिली शब्दक प्रयोग कएल गेल अछि।  यद्यपि ओ सभ ग्रन्थ संस्कृतमे लिखल अछि, किन्तु लेखक अपन भावकेँ पूर्ण रूपसँ व्यक्त करबाक हेतु तथा सरल एवं जनसाधारणक बुझबा योग्य बनएबाक हेतु अनेक स्थान पर पर्यायवाची मैथिलीक व्यवहार कएलनि अछि। एहि वर्गमे सर्वप्रथम किछु निबंधकार लोकनि अबैत छथि जे अपना निबंधमे मैथिलीक  स्थान देलन्हि। एहि प्रकारक लेखक लोकनिमे नवम् (9वम) शताब्दीक लेखक वाचस्पति मिश्रक नाम सर्वप्रथम लेल जाइत अछि। ई अपन प्रसिद्ध ग्रंथ शाङ्कर भाष्य टीका ‘भामति’ मे निगड़ शब्दवाची मैथिली ‘हरि’ क प्रयोग कएने छथि। ई शब्द देशी थिक आ हमरा लोकनिक ओतए आइ धरि प्रचलित अछि। ई शब्द मैथिलीक अप्पन अछि आ तेना ने पचि गेल अछि जे एकरा एहिसँ फराक करब असंभव छैक। यद्यपि एखनहुँ विद्वान मंडली मध्य ई विवाद अछि जे ई शब्द सन्ताली छैक। शब्द जैँ प्रचलित छलैक तेँ एकरा अपनाओल गेल, अतएव एहि शब्दकेँ मैथिलीक शुद्ध रूप कहब विशेष उपयोगी हैत। दोसर लेखक छथि 10म् 11हम् शताब्दीक सर्वानन्द। डॉ. सुभद्र झा अपन निबंध (Maithili Words in Sarvanand’s  Amarkosh) मे पूर्ण रूपेँ विचार करैत कहैत छथि जे “सर्वदानन्दक ‘अमरकोष’ मे 400 सँ 600 बीचमे शुद्ध मैथिली शब्दक प्रयोग देखबामे अबैत अछि, जकरा मैथिलीक शुद्ध रूप कहल जा सकैछ।” मैथिली केँ असमी एवं बंगला सँ समता रहबाक कारणेँ एहि पर विवाद कएल गेल जे ई शब्द प्राचीन बंगला एवं असमीक प्रारंभिक रूप थिक। किन्तु ई तँ स्वाभाविक थिक जे तखन भाषा अपन निर्माणक स्थितिमे रहल होएत तैँ ओहि समयक तद्युगीन भाषा सँ कमे अंशमे अंतर रहतैक तथा देशगत भिन्नता रहबाक कारणेँ पूर्ण रूपसँ एकर विकास हैब असंभव अछि। ‘अमरकोष’ में प्रयुक्त ई शब्दावली मैथिलीक निज सम्पत्ति थिक जकरा अस्वीकार नहि कएल जा सकैछ। तृतीय सामग्री हमरा लोकनि केँ पञ्जीमे उपलब्ध होइछ। डॉ. जयकान्त मिश्र एकरा सभसँ प्राचीन मानैत छथि: “The Earliest of these are, of course, the oldest Vernacular names of places and persons found in the early Panji records.” किन्तु एतय एकटा तथ्य विचारसंगत अछि जे पञ्जीक प्रारंभ 1310 ई. मानल गेल अछि, तैँ एहिमे पओल गेल शब्दकेँ वाचस्पति मिश्र एवं सर्वानन्दक पश्चातहिक मानव उचित हैत। पञ्जी सेहो संस्कृतहिमे अछि किन्तु किछु शब्द एहन भेटैत अछि  जे मैथिलीक थिक। शब्द सबहक एहि प्रकारेँ प्रयोग चौदहम एवं पन्द्रहम शताब्दीक अन्य विद्वान सभ यथा चण्डेश्वर ठाकुर, रूचिपति, जगद्धर, वाचस्पति द्वितीय तथा विद्यापति ठाकुर सेहो कएने छथि। डॉ. उमेश मिश्र अपन निबंध शीर्षक “Chandeshwar and Maithili” मे चण्डेश्वर ठाकुर द्वारा प्रयुक्त मैथिली शब्द सभक चर्चा कएने छथि। तथा पुनः ओ “Journal of Bihar Orissa Research Society” 1928 क पृष्ठ संख्या 266 मे “Maithili Words of the 15th Century”  शीर्षक निबंधमे रूचिपति एवं जगद्धर द्वारा प्रयुक्त शब्दक चर्चा करैत  ओ लिखैत छथि “In this commentary  Ruchipati has now and then  used words of Maithili, His mother-tongue, in order to give the exact meaning of some of the words of Sanskrit and Prakrit.” उदाहरणस्वरूप किछु शब्दकेँ देखल जा सकैछ:- संस्कृत                           मैथिली कर्तरिल                              कतरनी जलग्रह                        जलढ़री पलांदु                          पियाजु पोत                           डोंगी कर्मान्तिक                      कामत, कमती विहंगिक                       बँहगी सुवासिनी                       सुआसिन पर्यङ्क                         पलंग पुत्रिक                         पुतरी आलवाल                       थाल, कादो इत्यादि। डॉ. मिश्र ओहि निबंधमे जगद्धर द्वारा प्रयुक्त शब्द सभक सेहो वर्णन कएलनि अछि। जगद्धरक ‘मालती-माधव’ तथा ‘वेणीसंहार’ दुनू टीकामे मैथिली शब्द पाओल जाइत अछि यथा:- संस्कृत                           मैथिली दोड़दह                         दोहर चोर्णकम                       टोप्पर ग्रह                            गोह अलवालम                      थाल, कादो प्राजनम्                        पैना यूथिका                         जूही आदि। वाचस्पति मिश्र द्वितीय द्वारा लिखित ‘तत्वचिन्तामणि’क अंग्रेजी अनुवादक भूमिकामे सेहो डॉ. उमेश मिश्र सिद्ध कएने छथि जे वाचस्पति मिश्र द्वितीय सेहो अनेक मैथिली शब्दक प्रयोग कएने छथि। (2)   वाक्यखंड शब्दक अतिरिक्त हमरा लोकनिकेँ मैथिली वाक्यखंड सभक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। जखन भारतवर्षमे अंग्रेजी राज्यक सुदृढ़ स्थापना भए गेल, तखन अंग्रेज लोकनि भारतक क्षेत्रीय भाषा सभक आधुनिक अनुसंधान प्रणालीक अनुसारेँ अध्ययन प्रारंभ कएलनि। एहि क्रममे  म. म. हरप्रसाद शास्त्री केँ प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ सभक अनुसंधान  करबाक भार भेटलनि। म. म. शास्त्री एहि क्रममे नेपाल गेलाह, ओतए हुनका 1916 ई. मे तीन गोट ग्रंथ भेटलनि, जकरा ओ ‘बौद्धगान ओ दोहा’ नामसँ प्रकाशित करौलनि। उक्त तीनू ग्रंथ थिक (क) दोहाकोष (ख) चर्याचर्य विनिश्चय (ग) डाकार्णव। एहि ग्रंथ सभक रचनाकाल आठम शताब्दीसँ एगारहम शताब्दी धरि मानल जाइत अछि। ओहि समयमे आधुनिक भाषा सभ विकासोन्मुख छल, किन्तु विकसित नहि भेल छल, तैँ हेतु भाषा-विज्ञानी लोकनि ओहि रचनामे भारतीय पूर्वांचलक प्रायः  सभ भाषाक रूप पबैत छथि। सिद्ध लोकनिक विषयमे जखन विशेष अनुसंधान भेल तँ हुनका लोकनिक क्षेत्र गोरखपुर सँ भागलपुर धरि मानल गेल। जे सिद्ध लोकनि जाहि क्षेत्र केँ अपनौलन्हि से हुनका अपन रचनामे ओहि क्षेत्रक भाषाक प्रभाव देखबामे अबैत अछि। मैथिलीक प्रभाव सेहो सिद्ध लोकनिक रचनामे पाओल जाइत अछि। एहि मतक पुष्टि करबाक हेतु निम्न तर्क पर दृष्टि देल जा सकैछ:- 1)      सिद्ध लोकनिक चर्चा ज्योतिरीश्वर अपन ‘वर्णरत्नाकर’ मे कएने छथि जाहिसँ अनुमान कएल जाइत अछि जे ओ लोकनि अपन मतक प्रचारार्थ मिथिला अवश्य गेल हेताह। 2)      पदक शब्दावली सभक वैज्ञानिक अध्ययन कएलासँ ई सिद्ध होइत छैक जे ओ मैथिलीक अत्यंत सन्निकट अछि। 3)      हुनका लोकनिक पदमे जाहि प्रकारक स्थानक वर्णन कएल गेल अछि तकरा मिथिलाक भौगोलिक स्थितिसँ विशेष साम्य छैक। 4)      ओहिमे विभक्ति, विशेषण तथा किछु क्रियापद एहन अछि जे मैथिलीमे प्रचुर मात्रामे प्रयोग कएल जाइत अछि। सिद्ध साहित्यक भाषा, विद्यापतिक कीर्तिलता, कीर्तिपताका, विशुद्ध विद्यापति पदावली तथा ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरक भाषासँ साम्य  रखैत अछि। किछु सामान्य विशेषता एहि सभ पदमे पाओल जाइत अछि यथा:- दन्त्य वर्णक प्रधानता, ‘एँ’ क प्रयोग, चन्द्रबिन्दुक एकहि समान प्रयोग, ‘हि’ ‘एँ’ तथा ‘ए’ क ध्वनिक एकहि समान प्रयोग, जे, एहु, तरक, अप्पन, आदि सर्वनामक प्रयोग इत्यादि विशेषता समान अछि। 5)      ओहि पद सभमे किछु लोकोक्ति तथा किछु वाक्यखंड एहन प्रयोग कएल गेल अछि जो मिथिलामे एखनहुँ प्रचलित अछि, यथा:- (I) पहिल बियान, (II) बलाद बिआएल गबिया बाँझे (बरद बिआएल गाय रहल बाँझे) (III)  बेङ्गसँ साँप बढ़िल जाय (IV) हाक पाड़ई (V) जे जे अएला ते ते गेला (VI) टुटि गेल कन्था इत्यादि। 6)      किछु शब्दावली एहन अछि जे मैथिलीक प्राचीन रूप थिक। ओ शब्द सभ एखन विकसित भए दोसर रूप धारण कए लेलक अछि, यथा:- चर्यापद             मध्यकालीन मैथिली      आधुनिक मैथिली आजि                 आजि                    आइ चापी                 -                       चापिदेब तेन्तलि               -                       तेतरि बिआती               बाइति                   बिअउती टेंगी                  -                       टेंगारी चगेरा                 -                       चङ्गेरा भणइ                 भनइ                    भनथि सिद्ध साहित्यक प्रधान कविगणमे किछु नाम अछि सरहपा, कान्हपा, भुसुकपा, शबरपा, कुक्करीपा, लुईपा, आदि। जतए धरि हिनक सभक समयक प्रश्न अछि, हिनका लोकनिक समय संवत 817 सँ मानल गेल अछि किएक तँ प्रथम कवि ‘सरहपा’क आविर्भाव काल 817 मानल गेल अछि। एहि तरहेँ हिनका लोकनिक समय 8 सँ 12हम शताब्दी धरि निश्चित कएल गेल अछि। दोहाकोषक भाषाकेँ डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी शैरसेनी अपभ्रंश मानैत छथि। ‘चर्याचर्य विनिश्चय’ पर सेहो शौरसेनिक प्रभावकेँ ई स्वीकार करैत छथि: The Charyas belong to the early or old N.I.A Stage. Being the first attempt, the speech is not sure of its own forms learns on its stronger, better established Sisters and Aunts. उपर्युक्त तर्क एवं प्रमाण सभक आधार पर डॉ. सुभद्र झा अपन “Formation of Maithili Language” नामक ग्रंथमे चर्यापदक भाषाकेँ निर्विवाद रूपेँ माथिलीक “छिकाछिकी” शाखाक अन्तर्गत मानैत छथि। किन्तु ई निर्विवाद नहि अछि। एकरा प्राचीन बंगाली, प्राचीन असमियाँ तथा प्राचीन उड़िया सेहो कहल गेल अछि तथापि एतबा विवाद रहितहुँ अधिकांश विद्वान एकर भाषाकेँ प्राचीन मैथिली मानैत छथि। एहि मतक समर्थक छथि-- राहुल सांकृत्यायन, डॉ. के. पी. जायसवाल, म. म. डॉ. उमेश मिश्र, नरेन्द्रनाथ दास, डॉ. सुभद्र झा, श्री शिवनन्दन ठाकुर आदि। अतएव, निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ जे चर्यापदक भाषा प्राचीन मैथिलीक अत्यंत सन्निकट अछि। कारण जे एहिमे प्रयुक्त वाक्यखंड, जे मैथिलीक थिक, आदिक पूर्ण प्रयोग पाओल जाइत अछि। (3) सूक्ति एकर पश्चात् डाकवचनावलीक स्थान अबैत अछि। अतिप्राचीनकालसँ मिथिला कृषि प्रधान मानल जाइत रहल अछि। एतुका भूमिमे ने नदीक आभाव छैक आ  ने भूमि उसर सएह छैक। फलस्वरूप खेती पर पूर्ण जोर देल जाइत रहलैक। मिथिलावासी लोकनि ज्योतिषमे सेहो विशेष आस्था रखैत छलाह, फलस्वरूप कृषि एवं ज्योतिष संबंधी नियम  आदिक विषयमे लोककेँ शिक्षा देबाक हेतु विद्वान लोकनि तत्कालीन प्रचलित जनभाषामे सूक्ति सभक निर्माण करैत छलाह जाहिसँ अनपढ़ लोक सेहो पूर्णरूपसँ लाभान्वित होइत छलाह। एहि सूक्ति सभक अन्तर्गत डाक, घाघ, आदिक वचन सभ अबैत अछि। डाकवचनावलीक भाषाकेँ किछु विद्वान चर्यापदहुँ सँ प्राचीन मानैत छथि। कारण जे चर्यापदहि जकाँ एकरहुँ प्रचार उत्तर प्रदेश सहित समस्त पूर्वोत्तर भारतमे भेल। डाकवचनावलीक दू संस्करण मिथिलामे प्रकाशित भेल, कन्हैयालाल कृष्णदास द्वारा मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा सँ। भाषाक दृष्टिसँ दोसर संस्करण बेसी प्रामाणिक कहल जा सकैछ । कारण जे ई एक प्राचीन हस्तलिखित पोथी पर आधारित अछि।  एकर भाषा अपभ्रंशसँ विशेष साम्य रखैत अछि। प्राचीन तालपत्रमे जे डाकवचन भटैत अछि से ओहि ‘अवहट्ट’ मे भेटैत अछि, जाहिमे महाकवि विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ विद्यमान अछि।  डाकक वचन एखनहुँ मैथिल समाजमे प्रचलित अछि, किन्तु देश कालक व्यवधानसँ हुनक भाषामे अनेक परिवर्तन आबि गेल अछि जाहिसँ ओ आधुनिकताक छाप ल’ नेने अछि। प्राचीन स्वरूपक एकाध उदाहरण थिक:- मुहूर्त विचार:- तिथि परमाणहि साठि दण्डा, से लए करए बारह खण्डा। अद्दा, भद्दा, कार्तिक मूल, भनई डाक सबेटा निर्मूल। तथा,        सनिसत्ते शुष्क लए दुई छठि वेहप्फए होइ विरूई, बुध तीअ दोअसि सूर, मंगल दशमी परिहर दूर, होए एगादशी सोमवारे, दग्धतिथि फुर गहिअ गोआरे।। किछु आर उदाहरण:- साओन पछवा बह दिन चारि चूल्हिक पाछाँ उपजय सारि साओन शुक्ला सप्तमी जौं गरजे अधरात तो जाहू पिया मालवा हम जाएब गुजरात। डाकक समय केँ ल’ कए विद्वान सभक मध्य एखन धरि मतैक्य नहि अछि। हुनक निवास स्थानक विषय सेहो विवादग्रस्ते अछि। बंगाल, उत्तर प्रदेश, तथा मिथिला, सभ हुनका अपन-अपन स्थानक मानैत अछि। मिथिलामे डाकक संबंधमे अनेक किवदंती प्रचलित अछि। एहिसँ ई अनुमान कएल जाइत अछि जे ई अवश्ये मिथिलाक छलाह। मिथिलामे जे किवदंती प्रचलित अछि ताहि अनुसारेँ ई बराहमिहिरक पुत्र छलाह तथा जातिक गोआर। कृषि सँ संबंधित डाकक प्रस्तुत वचन अद्यावधि प्रायः प्रत्येक लोकक कण्ठमे निवास क’ रहल अछि:- थोड़कए जोतिह’ अधिक मटिअबिह ऊँच कए  बान्हिह’ आरि ताहू पर जँ नहि उपजय तँ डाककेँ पढ़िह’ गारि। अथवा साओन पछवा भादव पुरबा आसिन बहै ईशान कातिक कन्ता सिकियो ने डोलै, कतए कए रखब’ धान? अथवा शुक्र दिन केर बादरी, रहे शनिचर छाय कहे डाक सुनु डाकिनी, बिनु बरसे नहि जाय।। अथवा जौं पुरबैया पुरबा पाबै, सुखले नदिया धार बहाबै (4) लोकगीत एवं लोककथा आदिकालक उपलब्ध सामग्रीक रूपमे लोकगीत एवं लोकगाथाक सेहो अपन महत्वपूर्ण स्थान अछि। एहि मे सँ किछु तँ पूर्ण साहित्यिक थिक। एकर एक विशेषता ई अछि जे एहि सभक नायक कोनो अवतारी वा अंशी पुरूष नहि छलाह। एहन रचना सभमे लोरिक, सलहेस बिहुला, गोपीचन्द मरसीयाक गीत सभ अबैत अछि। संसारक प्रत्येक स्थानमे वीरपूजाक भावना वर्तमान छलैक, मिथिला सेहो एहि भावना सँ वंचित नहि छल। उपलब्ध प्रमाणक आधार पर एतबा कहल जा सकैछ जे 13हम 14हम शताब्दीमे ओहि प्रकारक गानक प्रचार एहिठाम छल। कारण जे ज्योतिरीश्वर अपन ग्रंथ ‘वर्णरत्नाकर’ मे लोरिक गीतक चर्चा कएने छथि। अतएव ई सिद्ध होइत अछि जे ई एहिसँ पूर्वक तँ अवश्ये थिक। ई गीत सभ खनहुँ मिथिलामे खूब गाओल जाइत अछि। मात्र जिह्वा पर रहबाक कारणेँ एकर भाषा आधुनिक रूप धारण करैत गेलैक अछि। एहि गीत सभक भाषा अवश्ये प्राचीन मैथिली छल होएतैक, किन्तु दुर्भाग्यवश  ओहि प्रकारक गीत सभक संग्रह एकठाम नहि भेल अछि। एहि दिशामे सर्वप्रथम डॉ. जी. ए. ग्रिर्यसन 19म शताब्दीक अन्तमे किछु कार्य कएलन्हि, हिनक संग्रह प्राचीनतम संग्रह मानल जाइत अछि। एकर पश्चात् ‘लोरिक विजय’ पर श्री मणिपद्मक एकगोट निबंध, दिसम्बर 1953 मे ‘वैदेही’ मे प्रकाशित भेल छलनि जाहिमे ओ प्रमाणित कएने छलाह जे लोरिकक गीत मैथिली साहित्यक अमूल्य निधि थिक। लोरिक गाथाक प्रस्तुत पाँतीमे केहन धरावाहिकता तथा भाषाक प्राचीनता अछि से द्रष्टव्य थिक:- आँगी मे जे झाँगी सोभए रत्तन लागल हार झाँगी मे जे मानिक सोभए हीरा झमकार से हँसइ जखन दामिनी दमकए जकरा दिस उठाकए तक्कए दई करेजा सालि लोरिकक प्रवाह अपूर्व आ ध्वनि-योजना अत्यधिक ओजस्वी अछि। एकर गायक ई गबैत-गबैत जेना प्रभक्त भए उठैत अछि एवं झूमए लगैत अछि, तथा ताल ठोकि टाहि मारैत अछि। एहि बीचमे कनियो एकरा टोकि दिऔक अथवा स्थिर भावेँ गाब’ कहिऔक तँ गायक झमान भए खसत। मंगलाचरणक ई पंक्ति केहन मोहक अछि:- “कंठ दीह कोकिला माय आ मधु सन दीह भास” लोरिकक सदृश मरसीयाक गीतकेँ सेहो देखल जा सकैछ:- वनमे रोए कोयल जंगलमे रोए फातमा घरमे रोए दुलहिन अभागलि रे हाय एक रोए अम्मा दोसर रोवे धन्ना रे हाय तेसर रोए दूध छारि बलवा रे हाय। अतएव, ई दृढ़तापूर्वक कहल जा सकैछ जे 13हम 14हम शताब्दी धरि मैथिली भाषामे गीत तथा कथाक सृजन अवश्य होमए लागल छल। एकरा सभक अतिरिक्त निम्न साक्ष्य सभक सम्यक अध्ययन सेहो कएल जा सकैछ:- (अ) वर्णरत्नाकर:- एकर पश्चात् वर्णरत्नाकरक स्थान अबैत अछि। एहिठामसँ हमरा लोकनि केँ मैथिली भाषाक क्रमबद्ध प्रगति दृष्टिगत होइत अछि। वर्णरत्नाकर मैथिलीक प्राचीनतम गद्य ग्रंथ थिक। 13हम 14हम शताब्दीमे मैथिली एक विकसित भाषा भए गेल। केवल शब्द, वाक्यखंड तथा किछु लोकगीतहिक नहि अपितु वर्णरत्नाकर सदृश प्रौढ़ गद्य ग्रंथ उपलब्ध सामग्रीमे मैथिलीक पूर्ण विकसित रूप ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरक रूपमे भेटैत अछि।  ई 14हम शताब्दीक आदिकाल (1324) क रचना थिक। वर्णरत्नाकरक विषयमे केवल एतबे धरि जोर द’ कए कहल जा सकैछ जे ई प्राचीन उपलब्ध सामग्रीमे मैथिलीक प्रगतिक द्योतक थिक। ई एखन धरि अपन महत्व सँ मिथिला ओ मैथिलीकेँ गौरवान्वित क’ रहल अछि। (ब) एकर अतिरिक्त प्राचीन मैथिलीक किछु सामग्री ‘प्राकृत पैंगलम’ तथा अन्य अपभ्रंश ग्रंथमे सेहो भेटैत अछि। प्राकृत पैंगलममे लोकभाषाक उदाहरण देल गेल छैक। शिवनन्दन ठाकुरक मत छनि जे एहिमे प्रयुक्त किछु शब्द मैथिलीक थिक। (स) विद्यापतिक अवहट्ट रचना ‘कीर्तिलता’ तथा ‘कीर्तिपताका’मे प्राचीन मैथिलीक अनेक विशेषता पाओल जाइत अछि, यथा:- क्रियाक स्त्रीलिंग रूप ए, एँ तथा हिं क प्रयोग पूर्वकालिक क्रियाक हेतु तथा ‘ए’ क प्रयोग आदि। एहि लेल ई ग्रंथ सेहो महत्वपूर्ण भ’ जाइत अछि। एहि सामग्री सभक विषयमे डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी क उक्ति युक्तिसंगत अछि- These specimens allow us to have a glimpses of the language in its formative period. उपर्युक्त सामग्री सभक समीक्षा कएलासँ ई विषय स्पष्ट भए जाइत अछि जे अभिरूचि एहिठामक  लेखकमे 8म शताब्दीसँ प्रारंभ भए गेल छल। एतबा धरि सत्य जे ओहि कालक जे रचना उपलब्ध अछि ताहिमे विशेषतः दार्शनिक एवं व्यावहारिक पक्षक सबलता देखबामे अबैत अछि। आन प्रकारक रचना मौखिके रूपमे लोकक समक्ष उद्घाटित होइत रहल अछि तथा अनुमानसँ लोक एकर प्राचीन रूप जानबाक चेष्ठा करैत अछि। मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) मैथिली भारोपीय भाषा परिवारक, भारतीय आर्यभाषासँ उत्पन्न एक महत्वपूर्ण आर्यभाषा थिक। एहि भाषाक उद्भव ओ विकासक जेहन प्राचीन साहित्यिक मान्यता उपलब्ध अछि ओहन भारतक कोनो आधुनिक आर्य आ द्रविड़ भाषाक नहि अछि। कोनो सशक्त भाषाक अन्तर्गत ओकर अनेक बोली अथवा उपभाषाक निर्माण कालक्रमसँ क्षेत्रानुसार अवश्य होइत रहैत अछि। तकर कारण अनेक अछि। प्रत्येक भाषा अपन चारूकातक भाषा सँ प्रभावित होइत अछि। एहि क्रममे इहो कहल जाइत अछि जे प्रत्येक कोस पर बोली बदलैत अछि आ प्रत्येक जाति वा समाजक भाषा भिन्न होइत अछि। डॉ. सुभद्र झा एवं ग्रियर्सन सन विद्वान लोकनि ई पहिनहि स्पष्ट क’ देने छथि जे मैथिली एक स्वतंत्र का सशक्त भाषा थिक। एहि भाषाक चारूकात चारि गोट भाषा अछि। एकर पूबमे बंगला भाषा, पश्चिममे भोजपुरी, उत्तरमे नेपाली आ दक्षिणमे मगही भाषा अछि। इहो स्वतः सिद्ध अछि जे कोनो भाषा अपन निकटवर्ती भाषा सभसँ प्रभावित होइत रहैत अछि। उपर्युक्त कारणसँ मैथिली भाषामे अनेक बोली अथवा उपभाषाक जन्म भ’ गेल अछि। सर्वप्रथम मैथिली भाषाक विभिन्न उपभाषाक परिचय डॉ. ग्रियर्सन अपन “Linguistic Survey of India” क दोसर भागमे प्रस्तुत कएने छथि। हिनका अनुसारेँ मैथिलीक छः गोट उपभाषा अछि:- (1) मानक मैथिली (2) दक्षिणी मानक मैथिली (3) छिका-छिकी बोली (4) पूर्वी मैथिली (5) पश्चिमी मैथिली (6) जोलहा बोली। ग्रियर्सनक उपर्युक्त उपभाषा वा बोलीक वर्णनसँ पं. गोविन्द झा सहमत नहि छथि। हिनक कहब छनि जे मैथिलीक विभिन्न बोलीकेँ क्षेत्रानुसार पाँच उपभाषामे बाँटल जा सकैछ: (1)  पूर्वी मैथिली (2) दक्षिणी मैथिली (3) पश्चिमी मैथिली  (4)  उत्तरी मैथिली (5) केन्द्रीय मैथिली वा उपभाषा। उपर्युक्त विवेचना सँ लगैत अछि जे गोविन्द झा सेहो ग्रियर्सनक मतानुसार मैथिलीक उपभाषाक वर्णन केने छथि। ओना ओ कतहु-कतहु विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आदिमे कनेक अन्तर क’ देने छथि, अस्तु मैथिलीक वर्तमान रूपकेँ देखल जाय तँ ज्ञात होइत अछि जे ग्रियर्सनक समयमे जे मैथिलीक विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आ रूप छल ओहिमे परिवर्तन भ’ गेल अछि। एकर अतिरिक्त नेपालक तराईमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि ओकरो एकटा फराक रूप छैक। एहना स्थितिमे मैथिलीक उपभाषाक वा बोलीक आठ गोट भेद कएल जा सकैत अछि: 1.      मानक मैथिली:--  एकर क्षेत्र केन्द्रीय ओ उत्तरीय पुरना दरभंगा जिला (मधुबनी, दरभंगा आ समस्तीपुर) थिक। ओना तँ डॉ. ग्रियर्सनक अनुसारेँ मानक मैथिली दरभंगा आ भागलपुर जिलाक उत्तरी क्षेत्रक आ पुर्णियाँ जिलाक पश्चिमी क्षेत्रक ब्राह्मण  लोकनि बजैत छथि। हिनका  लोकनिक अपन साहित्य आ परंपरा छन्हि जे एहि भाषाक विकृत प्रवाहकेँ मन्द कएने अछि। वर्तमान मे ई स्पष्ट भ’ गेल अछि जे मानक मैथिली ब्राह्मणे टाक बोली नहि छन्हि, किएक तँ मैथिली भाषाक पठन-पाठनक प्रवृति ब्राह्मण सँ आनो जातिक मध्य पूर्ण रूपसँ जागल अछि। एहि हेतु मानक मैथिली मिथिलाक सभ जातिक बोली कहल जा सकैत अछि। 2.      दक्षिणी मैथिली:-- डॉ. ग्रियर्सनत दक्षिणी मानक मैथिलीकेँ दक्षिणी मैथिलीमे राखल जा सकैत अछि। एकर क्षेत्र मुंगेर, मधेपुरा, सहरसा ओ समस्तीपुर धरि मानल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ दक्षिणी मैथिलीमे निम्न अन्तर अछि—(I) मानक मैथिली मे जतए धातु स्वर ह्रस्व रहैत अछि ओतए दक्षिणी मैथिलीमे दीर्घ  भ’ जाइत अछि। जेना-मानक मैथिलीमे, ‘जनै छी’ होइत अछि आ दक्षिणी मैथिलीमे, ‘जानै छी’। (II) सर्वनामक रूपमे मानक मैथिलीमे हमर, तोहर, अहाँ, अपने, आदि प्रयुक्त होइत अछि। दक्षिणी मैथिलीमे मोर, तोर, तोहे सर्वनामक प्रयोग होइत अछि। (III) क्रियापदमे सेहो भिन्नता देखल जाइत अछि, उदाहरणस्वरूप मानक मैथिली ‘अछि’ दक्षिणी मैथिलीमे ‘अछ’ भ’ जाइत अछि। 3.      पूर्वी मैथिली:--  ग्रियर्सन एकरा गँवारी मैथिलीक संज्ञा देने छथि। एकर क्षेत्र पूर्णियाँ जिलाक केन्द्रीय आ पश्चिमी भाग, संथाल परगनाक पूर्वी भाग, साहेबगंज आ देवघर धरि अछि। ग्रियर्सन कहैत छथि जे, ई भाषा अशिक्षित वर्ग द्वारा बाजल जाइत अछि। पूर्वी मैथिली, दक्षिणी मैथिली आ दक्षिणी मानक मैथिलीसँ साम्य रखैत अछि। ओना कनेक अन्तर सेहो देखना जाइत अछि—(I) दक्षिणी मैथिलीमे सम्बन्ध कारकमे ‘के’ प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ‘केर’ चिह्नक प्रयोग होइत अछि। (II) दक्षिणी मैथिलीमे ‘छिक’ क्रियाक प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ओकर बदलामे ‘छिकई’ क्रियाक प्रयोग होहत अछि। 4.      छिका-छिकी बोली:--  ई गंगाक दक्षिणी मुंगेरक पुबारी भागमे, दक्षिणी भागलपुर ओ संथालपरगनाक उत्तरी ओ पश्चिमी भागमे बाजल जाइत अछि। ई दक्षिणी मानक मधेपुराक बोलीसँ अत्यधिक साम्य रखैत अछि। एहिमे शब्दक अन्तमे ‘की’ वा ‘हो’ क उच्चारण कएल जाइत अछि, जेना— अपनो, खएबहो, कहबहो, सुनलहो आदि। 5.      पश्चिमी मैथिली:-- एकर क्षेत्र मुजफ्फरपुर ओ चम्पारण जिलाक पुबरिया भाग थिक जाहिपर भोजपुरीक व्यापक प्रभाव अछि। ग्रियर्सनक अनुसारेँ एहि क्षेत्रक कतिपय लोक जे बजैत छथि तकरा भोजपुरी कहल जाय अथवा मैथिली ई कहब कने कठिन। ओना मुजफ्फरपुरसँ अलग भेल वैशाली जिलाक क्षेत्रक भाषाक नाम ‘बज्जिका’ भाषा देल गेल अछि। एहि भाषाक नामकरण लिच्छवी वंशक इतिहासक आधार पर कएल गेल अछि। 6.      उत्तरी बोली:-- एकर क्षेत्र नेपालक तराई आ वर्तमान सीतामढ़ी जिलाक उत्तरी भाग धरि मानल जा सकैत अछि। एहि भाषा पर नेपली भाषाक प्रभाव बुझना जाइत अछि। 7.      जोलहा बोली:-- पुरना दरभंगा जिलाक मुसलमानक बोलीकेँ डॉ. ग्रियर्सन जोलहा बोली मानैत छथि। ओना हिनक कहब छनि जे मिथिलाक मुसलमान मैथिली नहि बजैत छथि। मुजफ्फरपुर आ चम्पारण जिलाक मुसलमान जे बोली बजैत छथि ओहि पर अवधि भाषाक प्रभाव अछि। एकर अतिरिक्त वर्तमान कालक मुसलमानक बोली पर उर्दू आ हिन्दीक प्रभाव सेहो परिलक्षित होइत अछि। 8.      केन्द्रीय मैथिली:-- मध्य मिथिलाक (दरभंगा, मधुबनी, पंचकोशी) सम्पूर्ण क्षेत्रक भाषा जकर निकट कोनो आन भाषा नहि अछि, तकरा केन्द्रीय मैथिलीक नामसँ जानल जाइत अछि। केन्द्रीय मैथिली साहित्यक भाषाक अत्यन्त नजदीक कहल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ केन्द्रीय मैथिलीमे बहुत सामीप्य देखल जाइत अछि। वर्तमानमे मैथिलीक दू टा उपभाषाक नवीन नामकरण भेटैत अछि—अंगिका ओ बज्जिका। छिका-छिकी, अर्थात् पूर्वी बोलीकेँ अंगिका कहल जाइत अछि जकर केन्द्र स्थल थिक भागलपुर। प्रायः भागलपुर महाभारत कालीन अंग राज्यक राजधानी छल तैँ एहि क्षेत्रक भाषाकेँ अंगिका कहल जाइत अछि। बज्जिकाक सम्बन्धमे विवेचना कएल जा चुकल अछि। एतावता ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक क्षेत्रानुसार अनेक उपभाषा अछि। एखनहुँ धरि एकर पूर्णरूपेण सर्वेक्षण नहि कएल गेल अछि नहि तँ किछु आओर उपभाषाक सम्बन्धमे ज्ञात होइत, तैँ एहि बिन्दु पर भाषावैज्ञानिक दृष्टिएँ सर्वेक्षण होएब अत्यंत आवश्यक अछि। आधुनिक मैथिली नाटकमे चित्रित : निर्धनताक समस्या (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) भारत गरीबक देश थिक। एतुका अधिकांश जनता एखनहुँ गाममे रहैत छथि जे कि कृषि कार्य पर निर्भर छथि आ बरखा पर। फलस्वरुप अनियमित बरखा सरकारी उपेक्षा ओ अशिक्षा तथा पिछड़ापनक कारणेँ गामक लोक गरीबीक जीवन बिता रहल छथि। यैह गरीब किसान ओ गामक लोक जखन कमयबा हेतु शहर जाइत छथि तँ मजदूर वा बोनिहार कहबैत छथि। ओतहु हुनका सभकेँ नारकीय जीवन जीवाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। भारतक कुल आबादीक पैंतीस प्रतिशतक लगपास लोक एहन छथि जे जीवनोपयोगी न्यूनतम आवश्यकताक पूर्ति करबामे अक्षम छथि। निर्धनता मनुक्खकेँ बेवस लाचार आ शक्तिहीन बना दैत अछि। निर्धन मनुक्ख पिछड़ल, दीन-हीन बाधाग्रस्त आ सदैव दोसरक दयारपर जीब’ क लेल बाध्य भ’ जाइत अछि। मानव जीवनक भयंकर अभिशाप थिक निर्धनता वा गरीबी। जाहि मनुक्खकेँ दू-साँझक रोटी नहि, पहिर’ क लेल शरीर पर वस्त्र नहि, रहक लेल घर नहि, बीमार भेलापर दवाय-दारूक पाय नहि, ओ जँ आत्माक उच्चताक दावा करत त’ ओ मिथ्याक सिवाय किछु नहि भ’ सकैत अछि। ओ स्वतंत्र कोना भ’ सकैत अछि ? ओ कोनहुँ बड़का काज कोना क’ सकैत अछि ? ओ अपन विचारकेँ स्वतंत्र रूपसँ कोना प्रकट क’ सकैत अछि ? निर्धनताक कारणेँ मनुष्य तंगदिल, तुच्छ, ओछ, कमजोर आ अपन ईच्छाक मार’वला बनि जाइत अछि। मैथिली नाट्य साहित्य मध्य एहि समस्याक विश्लेषण निम्नस्थ नाटकमे भेल अछि। जीवनाथ झाक ‘वीर –वीरेन्द्र’ (1956) भाग्य नारायण झाक ‘मनोरथ’ (1966) बाबूसाहेब चौधरीक ‘कुहेस’ (1967) गुणनाथ झाक ‘कनियाँ – पुतरा’ (1967) महेन्द्र मलंगियाक ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ (1980) नचिकेताक ‘नायकक नाम जीवन’ (1971) अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क ‘आगि धधकि रहल छै’ (1981) गोविन्द झाक ‘अन्तिम प्रणाम’ (1982) गंगेश गुंजनक ‘बुधिबधिया’ (1982) आदि। मनोरथ मे लक्ष्मीनाथ अपन निर्घनताकेँ कोसैत छथि। ओ कहैत छथि---- “हमर नाम तँ दरिद्रनाथ होमक चाही ने कि लक्ष्मीनाथ। एकठाम नाट्यकार गरीबक धीया-पुताक संबधमे कहने छथि जे ओ कोनो काज सोचि समझि कए करैत अछि ओ अपन सुख-सुविधाकेँ त्यागि दैत अछि। एहि परिप्रेस्थमे मैथिली नाट्यालोचक डॉ. प्रेम शंकर सिंहक कथन छनि--- “आर्थिक दशाक क्षीणताक कारणेँ मनुष्यकेँ केहन संकटापन्न समस्याक सामना करय पड़ैछ तकरे दिग्दर्शन एहि नाटकमे होइत अछि।”1 गरीबीक ई पराकाष्ठा छैक जे क्यो खाइत-खाइत मरैत अछि तँ क्यो कमाइत-कमाइत। एतय समुचित व्यवस्थाक आभाव अछि। एतय अधिकांश नेनाक स्थिति एहने अछि जे जन्मोपरान्त रोजी-रोटीक जोगाड़मे लागि जाइत अछि। ‘नाटकक लेल’ मे एहि समस्याकेँ उजागर कयल गेल अछि---- “कतेको लोक एक किनारमे पड़ल कूड़ाक ढेरसँ की सबने बीछि रहल छल, क्यो दू एकटा रोगायल बच्चाकेँ डेंगा रहल छल”2 निम्नवर्गक यर्थाथ चित्रणक दृष्टिसँ ‘ओकरा आँगनक बारहमासा’ मैथिली नाट्य साहित्यमे अद्वितीय स्थान राखैत अछि। एहि नाटकक केन्द्रबिन्दु थिक सर्वहारा वर्गक यातनापूर्ण जीवन, वासन्ती पवन, ग्रीष्मीय निदाध, बर्षाक रिमझिम हेमन्तक शीत आ शिशिरक सिहकी समटा गरीबक हेतु, फुसि थिक। एहिमे एकटा गरीब एरिवारक बारहो मासक दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण कयल गेल अछि, जाहिमे कातिक मासक एकटा बानगी प्रस्तुत अछि----- “कातिक हे सखि बोनियो ने लागै छै, अन्नक नहि कोनो बाट यौ। पेटक ज्वाला राम सहलो ने जाइ छै, घर-घर हुलकय राड़ यौ।”3 वस्तुत: कातिक मास खेतिहर मजदूरक लेल दुखक मास होइत अछि। एहि समयमे अन्नाभाव भ’ जाइत छैक एहन स्थितिमे निम्नवर्ग स्थिति दयनीय भ’ जाइत छैक – “दू गोट कोकड़ा पकबिति पियास लागल हय।”4गरीब लोकक लेल खयबाक हेतु भरिपेट अन्न वस्त्र आ आवासक एकटा जटिल समस्या भ’ गेल अछि एहि समस्या दिस नाटकारक ध्यान जाति छनि--- “अन्न बिना पेट जरिते हय, बस्तर बिना ठिठुरबे केली आ घर त’ दखते छी”5 प्रो. प्रेमशंकर सिंह एहि नाटककेँ “मिथिलाक निम्नवर्गीय समाजक अलबम कहने छथि।”6 “जाहि आँगनक बारहमासा एहिमे टेरल गेल अदि तकर ध्वनि खाली ओहि आँगनसँ नहि आबि रहल अछि, प्रत्युत मिथिलाक लाख-लाख आँगनसँ उठैत ओकर रोस, हाहाकार करैत सोझे मर्मकेँ बेधि देमयवला अछि।”7 आर तँ आर आइ समाजमे एहन गरीबी व्याप्त छैक जे गरीबकेँ मुइलाक उपरान्त कफन किनबाक लेल टका नहि रहैत छैक। “अंतिम प्रणाम” मे समाजक एहन दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण द्रष्टव्य थिक--- “ठीके त’ कहै छिऐ। हमरा आरू गरीब छी मुदा आनि पर दस गोटय मिलि जाय तँ की ने क’ सकैत छी।”8 ‘बुधिबधिया’ मे सेहो गरीबीक दृष्टान्त भेटैत अछि। देश मे कतेको व्यक्तिक स्थिति सोचनीच अछि। किछु व्यक्ति अपन जीवन-यापन विलासितापूर्वक ढगसँ व्यतीत करैत छथि, मुदा सरकारक ध्यान गरीब लोकक दिस नहि जाइत छैक। जँ सरकार द्वारा किछु व्यवस्था कयलो जाइछ तँ ओकर लाभ गरीब लोक घरि नहि पहुँचि सकैत अछि--- “एकरा देह पर एक बीत वस्त्र नहि, एकर अंग-2 उघार अछि।”9 समाजक अधिकांश लोक गरीबी रेखाक नीचाँ अछि। महगी अकाश छुबि रहल अछि। सामान्य लोक अपन परिवारक हेतु भोजन, वस्त्र आवास जुटएबामे परेशान अछि। ‘अंतिम प्रणाम’ मे मुरारीक कथन अछि--- “तीन-तीन टा बच्चोकेँ भुखले सुतैत देखैत रहैत छी----घरवालीकेँ फाटल वस्त्रमे देखैत छी---अहू सँ बेसी किछु अशुभ भ’ सकैत अछि।”10 वर्तमान युगमे सामाजिक चेतनाक निरन्तर बढ़ैत गतिशीलता ओ परंपरागत रूढ़ि व्यवस्थाक जड़ताक बीच एकटा भयंकर संघर्ष आ तनावक स्थिति बनल अछि। आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटकक मूल-स्वर एहि प्रकारक विभिन्न संघर्ष, तनाव आ अनेक सामाजिक समस्या आदिसँ भरल अछि। सामाजिक जीवनक यथार्थक अभिव्यक्ति नाटककारक सामाजिक दृष्टि आ रचना दृष्टि पर आधारित होइत अछि। मिथिलांचलक समाजमे आर्थिक विपन्न जीवनक अस्तव्यस्तता स्वाभाविकतामे परिवर्तित भए गेल अछि। संदर्भ मैथिली नाटक परिचय, डॉ. प्रेम शंकर सिंह, पृष्ठ—96 नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—54 ओकरा आँगनक बारहमासा, महेन्द्र मलंगिया,पृष्ठ--1 वएह, पृष्ठ—2 वएह, पृष्ठ--46 मैथिली नवीन साहित्य, सं. डॉ. बासुकीनाथ झा, पृष्ठ--28 वएह, पृष्ठ—28 अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, बुधिबधिया, डॉ. गंगेश गुंजन अंतिम प्रणाम, गोविन्द झा, मैथिली सामाजिक नाटकक मूल केन्द्र बिन्दु : नारी समस्या (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) स्वातंत्र्योत्तर युगक अधिकांश नाटक सामाजिक विवर्तन पर लिखल गेल अछि। एहि नाटक सभक केन्द्र बिन्दु नारी समस्या रहल अछि। नारी वर्ग मे अशिक्षा, सामाजिक बिडम्बनाक रुपमे तिलक-प्रथा, बाल विवाह एवं बेमेल विवाहक परिणामस्वरुप उपस्थित समस्याक समाधानक लेल नाटककार लोकनि प्रेरित भेलाह तथा एहि विषय बस्तुकेँ अपन नाटकक कथ्य बना सुधारवादी भावनाक प्रचार-प्रसार कयलनि जाहिसँ समाज सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे समाजक अति यथार्थ प्रतिबिम्ब देखबाक हेतु भेटैछ। युग विशेषताक अनुसारेँ एहि कालावधिक नाटकमे नारीक विभिन्न रूपक प्रतिबिम्ब हैब अत्यन्त स्वाभाविक अछि। एहि काल प्रारंभिक नाटकमे नारी संबंधी सहानुभूति ओ करूणाक स्पष्ट चित्र उपलब्ध होइत अछि। किछु नाटकमे तत्कालीन नारी जीवनक, परिवारक मर्यादामे ओकर यथार्थ चित्र अंकित कयल गेल अछि। मैथिलीक कतिपय नाटकमे नारीक वेदनामय रुप परिवारक अन्तर्गत उभरि कए सोझाँ आयल अछि। एहि कालक नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि परिवारमे नारीक दुखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। नारीक सभसँ पैघ मर्यादा ओकर पति तथा वैवाहिक जीवन थिक। कन्याक जीवन मध्यवर्गीय परिवारक हेतु चिन्ताक कारण बनि जाइत अछि। दहेजक समस्या नारीकेँ योग्य वर नहि भेटबामे कठिनता, कन्याकेँ ऋतुमति होएबासँ पूर्वहि विवाहक आवश्यकता जीवनक प्रत्येक क्षणमे मर्यादा रक्षाक चिन्ता, पतिक असामयिक मृत्युक कारणेँ विधवा बनि जयबाक संभावना ओ पराश्रित भ’ कए पतित होयबाक भय, असुरक्षित अवस्थामे समाजक कुदृष्टिक शिकार हैबाक आशंका , वेश्या जीवन व्यतीत करबाक बाध्यता तथा कानूनी दृष्टिएँ पुरूषक एकाधिकार इत्यादि अनेक कारण अछि जे नारी जीवनक वेदनामय, यंत्रणामय ओ पीड़ामय कथा कहैत अछि। अतः स्वातंत्र्योत्तर कालक अधिकांश नाटककार तत्कालीन सामाजिक स्थितिमे नारीक यथार्थ रूपक अंकन कयलनि जे उपर्युक्त समस्यादिक संदर्भमे नारी-जीवनक चित्रण करैत अछि। भारतीय समाजमे नारीक स्थान समाजमे नारी आ पुरूष दुनूक समान महत्व अछि। जाहि प्रकारेँ एक पहियासँ गाड़ी नहि चलि सकैत अछि ओकरा चल’ क लेल दुनू पहियाक ठीक होयब आवश्यक अछि, ओहिना समाज रूपी गाड़ी केँ चलयबाक लेल पुरुष आ नारीक स्थिति समान भेनाइ आवश्यक अछि। दुनू मे सँ जँ एकहु निर्बल अछि तँ समाजक उन्नति सुचारु रूपसँ नहि भ’ सकैत अछि। एक समय छल, जखन भारतमे नारीक स्थान बड़ आदरणीय छल। समाजक प्रत्येक काजमे ओकरा समान अधिकार छलैक। पुरूषक समानहि सभा, उत्सव आ अन्य सामाजिक काजमे भाग लेबाक ओकरा पूर्ण स्वतंत्रता छलैक। धार्मिक काज तँ हुनक सहयोगक बिना अपूर्णे मानल जाइत छल। ओहि समय नारी वास्तविक अर्थमे पुरुषक अर्द्धांगिनी छलीह। कोनहु काज हुनक सम्मतिक बिना नहि होइत छल। पुरूष सेहो ओकरा निरीह मानि अत्याचार नहि करैत छलाह। नारी सहो अपनाकेँ गौरवान्वित महसूस करैत छलीह तथा अपन चरित्र वा आदर्शकेँ उत्तम रखबाक प्रयास करैत छलीह। देशमे सीता, आ सावित्री सन देवी घर-घरमे पाओल जाइत छलीह। समाजमे स्त्री शिक्षाक सेहो खूब प्रचार छलैक। मैत्रेयी, गार्गी, अपाला, विद्यावती, भारती सन विदुषी सँ गौरवान्वित छल। ओहि युगमे नारी वास्तविक अर्थमे देवी छलीह। समाजक लेल नारी गौरवक वस्तु छलीह। ओहि समयक साहित्यमे नारीकेँ स्पष्ट रूपसँ पूजनीय मानल जाइत छल। एहि लेल मनीषी द्वारा कहल गेल छल “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंतु तस्य देवताः” अर्थात जतय नारीक पूजा आ आदर होइत अछि ओतय देवता विचरण करैत छथि। एहि प्रकारेँ संस्कृत साहित्यमे नारीकेँ आदर आ सम्मानक दृष्टिसँ देखबाक वर्णन अछि। समय परिवर्तनशील अछि। देशमे अनेक परिवर्तन भेल, धार्मिक, सामाजिक, आ राजनतिक क्रांति भेल एहि सभक प्रभाव नारी समाज पर सेहो पड़ल। मध्ययुगमे आबि कए नारीक पूर्ववत सम्मान नहि रहल। पूजनीय आ आदरणीय हेबाक स्थान पर ओ केवल उपभोगक वस्तु बनि कए रहि गेलीह। एमहर देशक राजनीतिक स्थितिमे सेहो महान परिवर्तन भ’ रहल छल। विदेशी आक्रमण प्रबल भेल जा रहल छल। देश पर विदेशी सभ्यता आ संस्कृतिक प्रभाव पड़ल जा रहल छल। परिणामतः आब नारी पर अनेक प्रकारक बन्धन पड़’ लागल जकर कोनो कल्पना धरि नहि छल। हुनका पर अनेक प्रकारक सामाजिक बन्धन लाग’ लागल। हुनक स्वतंत्रता आब केवल घरक चौखटि धरि सीमित रहि गेल। आब ओ समाज आ साहित्यमे केवल मनोरंजनक वस्तु रहि गेलीह। जखन मुसलमानी शासन एहि देशमे दृढ़ भ’ गेल, तखन नारीक पतन सीमा आर बढ़ि गेल। मुसलमान जखन निश्चिंत भ’ क’ शासन करय लगलाह, तखन दरबारमे जतय महफिल जमय लागल, सुरा क दौर चल’ लागल ततय पायलक झनकार सेहो होम’ लागल। नारी आब कविक लेल श्रृंगारक वस्तु बनि गेलीह। कवि आब ओकर जननि रूप बिसरि कय ओकर नख- शिखक वर्णनमे डूबि गेलाह। हुनक अश्लील चित्रक अतिरिक्त एहि कालक साहित्यमे आर कोनहु स्थान नहि रहि गेल। आधुनिक युग जागृतिक युग थिक। देशमे जतय सामाजिक आ राजनीतिक क्रांति आयल ओतय नारी समाजकेँ सेहो उन्नतिक अवसर भेटलैक। वास्तवमे ई युग समानताक युग थिक। सत्य त’ ई थिक जे जाधरि नारीक उत्थान नहि हैत ताधरि देश आ समाजक उन्नति असंभव थिक। एक नारीक महानता समस्त परिवारकेँ महान बना दैत अछि। हमरा देशक सभ महान विभूतिक चरित्र निर्माण मे नारीक महत्वपूर्ण स्थान रहल अछि। आब ओ समय आबि गेल अछि जे नारी समाजक संग लागल सभ कुप्रथाक अंत कयल जाय। विधवा-विवाह हो वा पिताक संपत्तिमे कन्याक अधिकार हो, शिक्षाक क्षेत्रक बाधा हो वा पर्दा-प्रथाक सभ क्षेत्रमे जतेको बन्धन अवशेष अछि आइ ओहि सभ कुप्रथाकेँ समाप्त कर’ पड़त। जँ समाज नारीक महत्ताकेँ स्वीकार क’ ओकर सभ अधिकार ओकरा पुनः घुरा देत तखनहि देश पुनः ओहि गौरवकेँ प्राप्त क’ सकत जकरा लेल ओकर जगत्ख्याति प्रसिद्ध रहलैक अछि। एहि दिशामे जतय धरि मैथिली नाट्यकारक प्रश्न अछि, बुझाइत अछि ओ समाजक एकटा सजग प्रहरी जकाँ एहि भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छथि। नारीक कारुणिक स्वरुप नारी, पत्नी वा मायक रुपमे भारतीय परिवारक मूल केन्द्रबिन्दु होइत अछि। एहि हेतु परिवारक उत्थान ओ पतनक इतिहासमे नारीक स्थितिक समीक्षा होएब अत्यंत प्रयोजनीय अछि। वैदिक युगसँ ल’ क’ आइ धरि परिवार मे नारीक स्थितिमे परिणामात्मक परिवर्तन भेल अछि। जतय धरि वैदिक युगक प्रश्न अछि भारतमे अन्य सभ्यताक अपेक्षा नारीक स्थिति कतहुँ नीक छल। अन्य प्रचीन समाजमे नारीक संग निर्दयताक व्यवहार कयल जाइत छल। एतय धरि जे यूनान जे अपन संस्कृतिकेँ अति प्राचीन होयबक दावा करैत अछि, ओतहु नारीक स्थिति नीक नहि छल। इतिहासकार डेविस लिखैत छथि “एथेंस आ स्पार्टा मे नारीक सुखद स्थितिक कोनहुँ प्रश्ने नहि उठैत छल। स्पार्टा मे नारी पशुसँ किछुए उन्नत छल।”1 भारतीय मौलिक सामाजिक व्यवस्था विशेष कए मिथिलाक संदर्भमे नारीकेँ धन, ज्ञान, ओ शक्तिक प्रतीक मानल गेल अछि, जकर अभिव्यक्तिक रुपमे लक्ष्मी, सरस्वती ओ दुर्गाक पूजा एखनहुँ, घर-घर मे कयल जाइत अछि। नारीकेँ पुरुषक अर्द्धांगिनीक रुपमे स्थान देल गेल अछि, जकरा अभावमे पुरुष कोनहुँ कर्तव्यक पूर्ति नहि क’ सकैत अछि। मुदा आइ हमरा सभक दुर्भाग्य थिक जे वैदिक आ उत्तर वैदिक कालक पश्चात् हमरा समाजक मौलिक व्यवस्था रूढ़िक रुपमे परिवर्तित होम’ लागल तत्पश्चात् नारी मे लाज, ममता आ स्नेहक गुणकेँ ओकर कमजोरी मानि पुरुष वर्ग द्वारा ओकर शोषण करब आरंभ क’ देलक। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्थामे नारीकेँ पुरुषक वासना-पूर्तिक एक साधन मात्र बुझल जाइत अछि। ई बात ओहि सभ जाति आ वर्गक लेल सत्य थिक जकर प्रणाली सामन्तवादी विचारसँ प्रभावित अछि। हमर सामाजिक जीवन मुख्य रुपसँ चारि क्रियासँ सम्बन्धित अछि- जनन, परिवारक प्रबंध, आ नेनाक सामाजिकरण। व्यावहारिक रुपमे एहि सभटा क्रिया पर पुरुषक एकाधिकार अछि। अधिकांश लोक द्वारा नारीक नोकरी करब, शिक्षा प्राप्त करब अथवा परिवारक प्रबन्ध मे हस्तक्षेप करब ने केवल संदेहक दृष्टिसँ देखल जाइछ अपितु अपन अहमक विरुद्ध सेहो मानैत छथि। एकैसम शताब्दीक तथाकथित समतावादी समाजहुँमे नारी पर होम’ वला अत्याचारमे कोनो बेसी सुधार नहि भेल अछि, जखन की एहि अत्याचारमे परिवर्तन अवश्यंभावी भ’ गेल अछि। नारी एवं पुरुष समाजक समविभाग अछि। प्रत्येक क्षेत्रमे दूनूक समान अधिकार अछि। किन्तु समाजक संरचना एहन अछि जे पुरुष द्वारा नारीकेँ उत्पीड़ित करबाक प्रवृत्ति मैथिल समाजमे दृष्टिगत भ’ रहल अछि। जँ हम आन-आन भारतीय समाजक तुलना मैथिल समाजसँ करी तँ बुझना जाइछ जे मैथिल समाजमे नारीक उत्पीड़न समस्या कने बेसी गंभीर अछि। एहि कारण सँ पारिवारिक स्वरुप मे सेहो स्पष्ट परिवर्तन दृष्टिगोचर भ’ रहल अछि आ समाजमे नारीक स्थान नगण्य भेल जा रहल अछि। यथासमय खास क’ मैथिल समाजमे नारीक स्थितिमे नारीक समताकारी मूल्यमे परिस्थिति कोन तरहेँ प्रभावित कयलक आ क’ रहल अछि एहि संबंधमे सामाजिक नाटकक माध्यमे विभिन्न मैथिली नाट्यकार नारीक दशाक वास्तविक चित्रण अपन- अपन नाट्यकृतिमे करबाक प्रयास कयने छथि जकर चर्चा निम्न रुपेँ कयल जा सकैत अछि। शारीरिक प्रताड़ना शारीरिक प्रताड़नाक रुपमे हिंसाक बढ़ैत समस्या केवल भारते धरि सीमित नहि अछि अपितु संसारक अधिकांश देशमे ई समस्या गंभीर भेल जा रहल अछि। “कनाडा मे प्रति चारि नारी पर एकक संग मारि-पीटक घटना होइत अछि। बैंकाकमे आधा नारी अपन पति द्वारा पीटल जाइत छथि। अमेरिका सन विकसित देश मे सेहो ई समस्या गंभीर अछि।”2 एकटा नवविवाहिता जाहि संरक्षण प्रेम आ सहयोगक भावना ल’ क’ नव घरमे अबैत अछि ओतय पति, सास वा परिवारक अन्य सदस्यक द्वारा पीटल गेला पर ओकरा कतके असह्य वेदना होइत हैतेक तकर अनुमान हम आसानीसँ नहि लगा सकैत छी। नारीकेँ शारीरिक रुपसँ प्रताड़ित करबाक पाछू पारिवारिक कलह, पारिवारिक विघटन, पारस्परिक अविश्वास आ गरीबी अछि। मैथिली नाटकमे कतिपय नारीक वेदनाक रुप पारिवारक अन्तर्गत उभरि कय आयल अछि। मैथिली नाटककार सुधारक आँखिये समाज ओ परिवारक विभिन्न दोषकेँ देखलनि अछि। परिवारमे नारीक दुःखमय जीवन हुनक सहानुभूतिक पात्र बनलीह। गोविन्द झाक ‘बसात’ नाटक मे सुगिया अपन पतिकेँ परमेश्वर मानि सेवा करैछ। ओ सामाजिक जीवनकेँ व्यवस्थित रखबाक हेतु अपन सम्पूर्ण परिवारक भार उठौने छथि तथापि ओ अपन पति द्वारा प्रताड़ित होइत छथि--- सुगियाः “मड़ुआ उलबैय छलियै। एलैय हल्ला करैत जलखै ला,जलखै ला, हम कहलियै, कोनदन कमाइ क’ के एलाह जे जलखै दिऔन। की बस, ठामहि चेरा उठा केँ पिटपिटा देलक।”3 विडम्बना ई थिक जे इ समस्या केवल ग्रामीण , गरीब आ अशिक्षित नारिये धरि सीमित नहि अछि अपितु शिक्षित मध्यवर्गीय ओ नगरीय परिवारहुँ मे नारीक कमोबेश यैह स्थिति अछि। यौन उत्पीड़न मैथिली नाटकक अध्ययन ओ अनुशीलनक उपरांत जे एक समस्या स्पष्ट दृष्टिगोचर होइत अछि ओ थिक नारी पर होम’ वाला अत्याचार ओ शोषण। मर्यादा, चरित्र कर्त्तव्यपरायण, त्याग, सहनशीलता, शील ओ अन्य गुण सँ महिमामंडित क’ जाहि सुन्दर ढंगसँ पुरुष समाज ओकरा संग छल कयने अछि ओहिमे स्त्रीकेँ सेहो पता नहि चलि सकल जे ओ शोषित भ’ रहल अछि। उत्सर्गक नाम पर पुरुष ओकरासँ सभ किछु माँगैत रहल आ ओकरा लूटैत रहल। नारी कतहुँ महानतासँ विभूषित होयबाक गर्वक मोहसँ ओकरा पर अपनाकेँ निछावर करैत रहल त’ कतहु परिस्थितिवश। मुदा ई स्त्रीयजनित गुण जतय ओकरा लेल एक दिस हथियार सिद्ध भेल ओतहि दोसर दिस ओकर यैह गुण , ओकर कमजोरी, विवशता, लाचारी ओ पतनक कारण सेहो बनल। नारी शोषणक सभसँ घृणित रुप थिक ओकर यौन शोषण। ई एक प्रकारक गहन मानसिक शोषण थिक जे शारीरिक यातनाहुँ सँ बेसी पीड़ादायक अछि। डॉ. प्रबोध नारायण सिंह द्वारा लिखित एकांकी नाटक ‘हाथीक दाँत’ क नेता महिला आश्रमक संरक्षिका बिजली देवीक सहयोगसँ खूब टकाक संग्रह करैत छथि आ जखन ओहि टकामेसँ बिजली अपन कमीशन माँगैत छथि तँ नेताजी बनावटी प्रेमीक रुप धारण कय बिजलीक संग आलिंगनबद्ध भ’ जाइत छथि आ कहैत छथि कतेक टका लेब, ई कपटी नेता चरित्र भ्रष्ट अछि। ई टकाक लोभ देखा बिजलीक संग अनैतिक संबंध त’ रखनहि छथि, बिजलीयेक सहयोगसँ अपन वासनाक भूखकेँ रोहिणी नामक एक युवतीसँ शान्त करैत छथि। परिणाम स्वरुप ओ असहाय लाचार युवती गर्भवती भ’ जाइत अछि। आब ओ बिजलीकेँ परामर्श दैत छथि जे----“धुर औषध कहि के किछु पुड़िया खोआ दियौक ने ?4 वर्तमान समाजमे उच्चवर्गक लोक द्वारा नीच वर्गक स्त्रीक संग कोना यौन अत्याचार करल जाइत अछि तकर स्पष्ट चित्र हमरा भेटैछ कांचीनाथ झा ‘किरण’ द्वारा लिखित ‘कर्ण’ नामक एकांकीमे यद्यपि एकांकीक कथानक आ पात्र पौराणिक अछि मुदा एकांकीकार लाक्षणिक रुपमे सूर्यकेँ उच्च वर्ग आ कुन्तीकेँ अछोप वर्ग मानि समाजमे घटि रहल यौन उत्पीड़न दिस समाजक ध्यान आकृष्ट कयने छथि। एहि एकांकीक माध्यमे समाजमे पैघ लोक कहओनिहारक गुप्त भ्रष्टताक भण्डाफोड़ कयल गेल अछि। देव अर्थात् उच्च वर्गक लोक जे नीच वर्गक संग विवाह तँ नहि क’ सकैत अछि मुदा गुप्त रुपसँ सम्भोग आ सम्पर्क क’ सकैछ जकर कुत्सित परिणाम भोग पड़ैत छैक नीच वर्गक लोककेँ। सूर्यः हम देवता छी। देवता मनुक्खक बेटीकेँ....... कुन्तीः (उत्तेजित स्वरमें) मनुक्खक संगे भोग-विलास कयने देह नहि छूतई छनि आ देस छुति जयतनि ? सूर्यः (विरक्त स्वरमे) मनुक्ख एखन तन-मन-धन लगा क’ देवताक पूजा करैत अछि-- मरलाक बाद स्वर्ग जयबाक लेल। जीबैत स्वर्ग जयबाक कल्पनो नहि करैत अछि। मनुक्खक बेटीकेँ स्त्री बना क’ स्वर्ग ल’ जाय लगबैक तँ ओ भाव रहतैक ? कुन्तीः (अप्रतिभ स्वरमे) तखन मनुक्खक कन्याक संग सम्पर्के किएक करैत छी ? सूर्यः (हँसि) आनन्दक लेल ? मनुक्खकेँ मनुक्ख बना क’ राखैक लेल। कुन्तीः (गह्वरित स्वरेँ) आ जँ संतान भ’ जाइत होइत त’ ओ मनुक्खे भ’ क’ रहैत होयत। सूर्यः हँ, मनुक्खक पेटक देवता कोना होयत ? 5 अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ क नाटक ‘रक्त’ (1992) मे अवैध सन्तानोत्पतिक भयावह परिणाम सँ समाजकेँ एकटा चेतावनी देल गेल अछि। एहि घृणित सामाजिक विभीषिका पर नाटककार कहेन प्रकाश देने छथि से द्रष्टव्य थिक----- किसुनः “तोहर तँ गप्पे अनटटेल होइछ। हौ सड़कक कातमे गरीबक नै तँ धनिकक नेना फकेल रहतैक?”6 तृप्ति नारायण लालक नाटक ‘सप्पत’ मे समाजक एक दुःष्चरित्र व्यक्ति श्रीकान्त, हरिजन युवती नीलमकेँ अपन प्रेमजालमे फँसा ओकर सतीत्व भंग करैछ जाहि करणेँ ओ समाजमे मुँह देखयबाक योग्य नहि रहि जाइत अछि। अन्ततः कोठा परक नारकीय जीवन जीबाक लेल बाध्य होम’ पड़ैत छैक। महेन्द्र मंगगियाक ‘लक्ष्मण रेखा खण्डित’ मे सेहो एहि विषय पर दृष्टिपात कयल गेल अछि---- मनोजः “हँ, एना सकपकेलेँ किएक ? दरोगा साहिब इएह ओ शैतान छी जे कतेको बेटी-पुतोहुक इस्त्रीकेँ लोभ आ बलात्कारसँ भ्रष्ट करैत आयल अछि। गाममे हरदम एकटा ने एकटा उधवा मचबैते रहैत अछि जाहिसँ लोक अशांत अछि।”7 एहि तरहेँ कहल जा सकैछ जे आधुनिक समाजमे नारीकेँ कहक लेल भनहि देवी आ दुर्गाक दर्जा देल गेल अछि, मुदा पुरुषक वासना शिकार ओ कोना भ’ रहल छथि एहि विषय वस्तुकेँ मैथिली नाटककार बड़ सजीव चित्रण कयने छथि। बाल विवाह बाल-विवाहक तात्पर्य विवाहक ओहि प्रथासँ अछि जाहिमे रजोदर्शन सँ पूर्वहि कन्याक विवाह कइल जाइत अछि। अनेक धर्मशास्त्रक नामपर मध्यकालहिसँ जाहि विश्वासकेँ बढ़ावा देल गेल जे कन्याकेँ रजस्वला होम’ सँ पूर्व जँ विवाह नहि कयल गेल तँ एहि सँ माता-पिताकेँ महापाप होइत छैक। एहन विवाह कतके हास्यास्पद अछि से एहि बातसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे हमरा कोनहुँ मूल धर्म ग्रंथमे बाल-विवाहक कोनहुँ निर्देश नहि देल गेल अछि । तथापि ई व्यवस्था आइयहुँ मिथिलामे व्याप्त अछि। बाल-विवाहक प्रचलन मैथिल समाजमे चाहे जाहि परिस्थितिसँ भेल हो मुदा एहि कुप्रथाक कारणेँ आइ समाजमे कतोक प्रकारक गंभीर दोष उत्पन्न भ’ गेल अछि। एक दिस जँ कन्याक अपरिपक्व आयुमे नेनाक पालन-पोषणक भार आबि जाइत अछि तँ दोसर दिस दुर्बल स्वास्थ्य हेबाक कारणेँ लाखक लाख मायक मृत्यु प्रसवक समय भ’ जाइत छैक। एहि समस्याक कारणेँ मैथिल समाजक कन्यामे शिक्षाक दर बहुत निम्न भ’ गेल छैक किएक तँ बाल- विवाहक कारणेँ ने त’ ओ शिक्षा प्राप्त क’ सकैत अछि आ ने एकरा जरूरी बूझल जाइत अछि। एहि प्रथाक कारणेँ विवाह एकटा संयोग मात्र बनि कए रहि गेल अछि। एहिमे उमिरक असमानता हेबाक कारणेँ एक दिस जँ यौन-लिप्सा अतृप्त रहि जाइत अछि तँ दोसर दिस बाल-वैधव्य आ तकर परिणामस्वरूप वेश्यावृति आदि सन समस्यासँ समाज ग्रसित भ’ जाइत अछि। एहना स्थिति मे नारीक जीवन नारकीय भ’ जाइत अछि। मैथिली नाटकमे बाल-विवाहक समस्या ल’ क’ कतोक नाटककार अपन नाट्य रचना कयने छथि, एहिमे एकटा बानगी प्रस्तुत अछि ‘त्रिवेणी’ क नायिका दुर्गाक जनिक विवाह छओ वर्षक उमिरमे पैंतालीस वर्षक बूढ़सँ क’ देल जाइत छैक । कन्याक पिता मधुकान्त पन्द्रह हजार टकाक लोभमे अपन फूल सन कन्याक विवाह एहन वरक संगे क’ दैत छथि जे विवाहक चारिये मासक पश्चात् ओ विधवा भ’ जाइत अछि। नायिका दुर्गा जखनहि बाल्यावस्थाकेँ पार कए युवावस्थामे प्रवेश करैत छथि हुनक देओर नरेश हुनका अपन वासनाक शिकार बनाब’ चाहैत छथि जे दुर्गाकेँ मान्य नहि छनि। अन्ततः ओकरा शरीर पर पेट्रोल ढ़ारि कए आगिमे स्वाहा क’ देल जाइत छैक। कन्याक भावी दुर्दैन्य स्थितिक चित्रण हुनक माय मधुकलाक शब्दमे एना देखल जा सकैछ-- मधुकला— “(उग्र भावेँ) बाप रे बाप ! एहन अन्हेर गप्प कतहुँ सुनल अछि। एक दिस छओ वर्षक पत्नी आ दोसर दिस पैंतालीस वर्षक पति। बड़ अन्हेर होइत अछि। हमर बेटीकेँ ओ बाप सदृश बुझि पड़तैक, नहि कि पति सदृश। हम अपन बेटीक विवाह ओकरासँ नहि करब।’’8 मुदा आश्चर्यक विषय थिक एखनहु समाजमे बाल विवाह भ’ रहल अछि जकर दुष्परिणाम समाज भोगि रहल अछि मुदा ओकर आँखि नहि फुजैत छैक। दहेज मैथिल समाजमे घरेलू हिंसाक सबसँ व्यापक रूप दहेजक कारणेँ नारीकेँ देल गेल यातना आ ओकर हत्याक रूपमे आयल अछि। आश्चर्यक गप्प थिक जे दहेज निरोधक अधिनियम बनि गेलाक पश्चातो विभिन्न समुदायमे कन्या पक्षसँ बेसीसँ बेसी दहेज प्राप्त करबाक प्रचलन समाजमे बढ़िये रहल अछि। अधिकांश माय-बाप वर-पक्षक इच्छानुकूल दहेज देब’ मे असमर्थ रहैत छथि। विवाहक पश्चातो विभिन्न अवसर पर कन्याक माता-पितासँ ओकर सासु-ससुर द्वारा विभिन्न वस्तुक माँग करब एक स्वाभाविक प्रक्रिया बनि गेल अछि। जँ नवविवाहिता अपन माय-बापसँ ओ वस्तु नहि आनि सकैत छथि तँ ओकरा सासुर पक्ष द्वारा कतोक प्रकारक मर्मस्पर्शी ताना सुन’ पड़ैत छैक। बात-बात मे ओकरा अपमानित कयल जाइत अछि। ओ भाँति-भाँतिक लाँछन सेहो लगाओल जाइत छैक। एतबे नहि ई प्रक्रिया ता धरि चलैत रहैत छैक जाधरि ओ सासुर वलाक इच्छाक पूर्ति नहि क’ दैछ। दहेजक कारणेँ भारतीय नारीक केहन दुर्दशा होइत छैक तकर चित्रण हमरा सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी क ‘लेटाइत आँचर’ क नायिका ममताक करूण चीत्कार मे भेटैत अछि--- ममता : “अहाँ हमरा खत्तामे फेकि देलौं। ओकरा रेडियो, साइकिल नै देलियै, ओ दोसर मौगी बेसाहि आनलक। बाबू अहाँ देखलिए ऐ ओकरा ? हम एतहिसँ सभ दिन देखै छियै। ओ सब दिन हमरा लग अबैए, सब दिन हमरा छाती पर आबि कए बैसि जाइए, हमरा छाती पर बैसि कए जाँत पिसैत रहैये । अहाँ ओहि मौगीकेँ कहियो देखने छियै ?” 9 पर्याप्त दहेज नहि देबाक कारणेँ ममता सन नारीक केहन विक्षिप्त अवस्था भ’ जाइत छैक से स्वतः अनुमान कयल जा सकैछ। एतबे नहि एहि पैशाचिक व्यवस्थाक प्रति मोनमे ततेक ने डर समा जाइत छैक जे ओ दोसरहुकेँ एहि परिणामक भविष्य भोक्ता रूपमे देखि सिहरि जाइत छैक— ममता : “भैया, बाउक ससुर जँ बाउकेँ मेटरसाइकिल नै देतै तँ बाउ अपन कनियाकेँ छोड़ि देतै ? एत’ कहियो नै आब’ देतै ?......अहाँ नै बाजै छी बाउ, तोहीं कह’ छोड़ि देबहक ?”10 जाहि परिवारमे ममता सदृश दहेजक मारलि कन्या छैक ओहो अपन पुत्रक विवाहमे टकाक लेन- देन उचिक बुझैत छथि। तिलक दहेजक कारणेँ मैथिल ललनाकेँ एहन दुष्परिणाम भोग’ पड़ैत छैक जे “कनियाँ – पुतराक” नायिका सत्यानाशी दहेज प्रथाक मारिसँ बताहि भ’ जाइत अछि, जाहिसँ सर्वगुण संपन्न भेलो उत्तर ओकरा पति द्वारा दाम्पत्य सुख नहि भेटैत छैक। फलस्वरूप यौवनावस्थामे ओ बताहि भ’ कनियाँ- पुतरा खेलाइत रहैत छैक। द्रष्टव्य थिक ओकर इ वेदना आ अतृप्त लालसा--- निर्मला--- “ठगै छी। (मायसँ) सुनही माँ ! पिपही बाजै छै कि नहि.....? माँ कनियाँ पुतराक विवाह हेतैक की वर कन्याक ? नहि, नहि कनियाँ-पुतराक...कनियाँ-पुतराक ह- ह- ह- ह-”11 पर्याप्त दहेज नहि लयबाक कारणेँ कन्याकेँ एतेक प्रताड़ित कयल जाइत अछि जे ओ प्रायः आत्महत्या धरि क’ लैत अछि। एतबे नहि कखनहु-कखनहु तँ दहेजक लोभमे लोक अपन पत्नी केँ घरक आन सदस्यक संग मिलि कए हत्या सेहो क’ दैत छैक। एहन भावनाक परिचय हमरा मणिपद्म लिखित एकांकी नाटक ‘तेसर कनियाँ’ मे भेटैत अछि जाहिमे दहेज प्राप्त करबाक लेल तरूण पीढ़ी एवं ओकर माय-बाप नरभक्षी बनि दू-टा कन्याकेँ सुड्डाह क’ देलक। एतय दहेज पीड़िताक करूण चीत्कार सुनल जा सकैत अछि---- षोडसीः “हम जीबय चाहै छी राजा, जीबय चाहैत छी, हमरा खोलबा दिअ। रातिए एहि रोगी वृद्धसँ हमर विवाह एहि कारणेँ भेल जे हमरा सुलक्षणा हेबाक कारणेँ ई नहि मरताह। हाय रे सुलक्षणा ! रातिमे विवाह भेल आ आइ हम जरय जा रहल छी। वृद्धाः चुप पपिनियाँ। षोडसीः हमरा बचा लिय राजा, हम जीबय चाहै छी।”12 एहि कुप्रथा आ अनैतिक व्यापारसँ क्षुब्ध भ’ नाटककार स्वयं कहैत छथि— “आरे तिलक आ दहेजक पिशाच, एहि देशक नारीत्वकेँ आ सिनेहसँ पोसल बेटी सभकेँ सुआदि-सुआदि खो।”13 भारतक संदर्भमे दहेजक कारणेँ घरेलु हिंसाक समस्याकेँ एहि चौंकाब’ वला तथ्यसँ बुझल जा सकैत अछि। मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एकटा आँकड़ासँ स्पष्ट होइछ जे एतय प्रतिदिन सोलह नारीक दहेजक कारणेँ हत्या होइत छैक, लगभग सत्तरि प्रतिशत ग्रामीण आ नगरीय परिवार एहन अछि जाहिमे कोनो ने कोनो रुपमे नारीक विरुद्ध हिंसा भ’ रहल छैक। वेश्यावृत्ति वेश्यावृत्ति भारतीय समाजक कैंसर थिक। एहि ज्वलंत समस्यासँ हमर समाज तेनाने ग्रसित अछि। जे ने ओकरा आत्मसात करबाक शक्ति छैक आ ने ओकरा अन्त करबाक सामर्थ्य छैक। एतबा तँ निर्विवाद रुपेँ स्वीकार कयल जा सकैछ जे क्यो नारी जन्मजात वेश्या नहि बनैत अछि, प्रत्युत परिस्थितिक मारिक कारणेँ ओ एहि धन्धाकेँ स्वीकार करैत अछि जकर कतिपय सामाजिक पृष्टभूमि थिक जे एकर निर्माणमे समान रुपेँ सहयोग प्रदान करैत आयल अछि। वेश्याक ने सामाजिक मर्यादा छैक आ ने सामाजिक प्राणी ओकरा इज्जतिक दृष्टिसँ देखैत अछि। तथापि ओकर समाजिक पक्ष एहन अछि जे क्यो स्वेच्छया तँ क्यो परिस्थितिसँ लाचार भ’ समाजमे जीवित रहबाक हेतु एहि धन्धाकेँ स्वीकार क’ लैत अछि। उत्कर्ष युगक मैथिली नाटककार नारीकेँ उच्छृंखल ओ स्वच्छन्द रुपमे देखबाक आकांक्षी नहि छथि, किएक तँ जीवनक गहन अध्ययनक पश्चात् ओ अनुभव कएलनि जे समाजक आधार नारी थिक। किन्तु स्त्रीक प्रति पुरुषक कुत्सित मनोवृत्तिमे अद्यापि कोनो परिवर्तन नहि देखबामे अबैत अछि। पारिवारिक जीवनमे अपन अस्तित्वसँ प्रसन्नता आ संतोष उत्पन्न कएनिहारि नारीकेँ डेग-डेग पर पतिसँ समझौता करय पड़ैत छैक। आधुनिक समाजमे कतिपय एहन पति छथि जे पत्नीकेँ पत्नी नहि बुझि केवल हार-माँस वाली नारीक रुपमे देखैत छथि। ओ अपन स्वार्थ सिद्ध करय लेल पत्नीकेँ अनुचित यौन व्यापार कर’ लेल प्रोत्साहित करैत अछि जकरा वेश्यावृत्तिक नाम देब सर्वथा उचित बुझना जाइत अछि। नोकरीमे पदोन्नति प्राप्त करबाक लेल नारीक सदुपयोग करबाक प्रवृत्तिक दिग्दर्शन हमरा नचिकेताक ‘नाटकक लेल’ मे भेटैत अछि। एकर पात्र शंकर सतीकेँ वेश्यावृत्तिक दिस धकेलि रहल छथि। सतीक संस्कार इच्छा एवं मानसिकता सर्वथा एकर विरोध करैत अछि, किन्तु पुरुष प्रधान समाजमे ओकर महत्व नहि रहि जाइत अछि। ओ अपन इच्छाक प्रतिकूल पर-पुरुषक अंक-शायिनी बनैत अछि जे ओकर निरीहताक परिचायक कहल जा सकैछः- सतीः “(क्रोधसँ असंवृत भए चीत्कार करैत) अहाँ हमरा वेश्या बना रहल छी,अहाँ अपन प्रेमकेँ बेचि रहल छी, अहाँ हमरा समस्त प्रेम-प्रीतिक गला घोंटि देने छी, अहाँक हाथमे तकर चेन्ह अछि। क्षमताक लालसामे अहाँक सभ बातसँ दुर्गंध बहरा रहल अछि।”14 नारी शोषणक विरुद्ध अपन नाटक ‘नायकक नाम जीवनमे’ नचिकेता समाजपर व्यंग्य कयने छथि। नवलः “हम नहि जनैत रही, हमर मुहल्लाक मानल लोक सब रातिक पहरमे जाहि कोठा सबसँ घुरथि छलथि ओहि महक वेश्या सब कालू सरदारक अधीन छैक।’’15 चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ क नाटक ‘दहेज’ मे सेहो वेश्यावृत्तिक चित्र उपस्थित कएल गेल अछि। नाटकक नायक रघुनन्दन अपन विवाहिता पत्नी दुलरीकेँ छोड़ि मोती (वेश्या) क संग वेश्यागामी भ’ जाइत अछि-- रघुनन्दनः “तुम्हारी और तुम्हारी खुबसुरती के अलावा मेरे लिए सोचने का मसाला ही कौन सा है ? मोतीः (सलाम करैत) मैं निहाल हुई मेरे राजा। रघुनन्दनः निहाल यों हुआ जाता है ? मेरे पहलू मे बैठो, मेरे जलते हुए जिगर पर मरहम डालो। तर होने दो मेरे प्यासे लबों को, अपने लवों और शरबते अनार से।”16 एहि तरहँ हम देखैत छी आजुक समाजमे कोना नारीकेँ विवश कयल जाइत छैक वेश्यावृत्तिक लेल। उन्मेष युगक नाटककार एहि रोगक पर्दाफाश कयलनि ओ संगहि चेतावनी द’ रहल छथि एहि कुप्रथाकेँ सुधारबाक हेतु। स्त्री - पुरूष संबंधक नव आयाम वर्तमान समयमे हमरा समाजमे प्रत्येक स्तर पर भ’ रहल परिवर्त्तन केँ लक्षित कयल जा सकैत अछि। ई परिवर्तन नवीन विचारधाराकेँ जन्म देलक जाहिसँ स्त्री-पुरूषक संबंधकेँ बेसी प्रभावित कयलक । हमरा समाजक धूरि परिवार थिक आ परिवारक धूरी पति-पत्नी। एहि तरहेँ ओकरा आपसी संबंधमे आयल परिवर्तनक प्रभाव परिवार ओ समाज पर पड़ब स्वाभाविके अछि। प्रारंभमे पति ओ पत्नीक परस्पर रिश्तामे पतिकेँ ऊँच स्थान प्राप्त छलैक आ ओकर तुलना परमेश्वर सँ कयल जाइत छलैक। शिक्षाक अभावमे पत्नीक जीवन पूर्णरूपेँ पति पर आश्रित छलैक एहि कारणेँ ओ पतिक संग अपन संबंधमे कोनो तरहक परिवर्तन लाब’ मे असमर्थ छलीह। जँ पति अपन अधिकारक दुरूपयोग क’ ओकर उपेक्षा ओ तिरस्कार करैत छल तैयहु ओकरामे ओतेक साहस नहि छलैक जो अपन संग भ’ रहल अन्यायक प्रतिकार क’ सकय। जेना-जेना शिक्षाक प्रति नारीक जागरूकता बढ़ल गेलैक आ नारी शिक्षित होमय लगलीह तहिना-तहिना पति-पत्नीक परस्पर रिश्ता सोहो प्रभावित होमय लागल। किएक तँ शिक्षा नारीकेँ अपन अस्तित्व आ अधिकारक प्रति जागरूक बनैलक। जखन ओकरामे अधिकारक प्रति जागरूकता बढ़लैक तखन ओकरा लेल आवश्यक भ’ गेलैक जो ओ अधिकारक रक्षा करय आ अन्याय भेला पर ओकर विरूद्ध अपन आवाज उठा सकय। आ ई तखने संभव अछि जखन ओ आत्मनिर्भर हो, परिणामस्वरूप नारी शिक्षित होमक संगहि-संग आत्मनिर्भर सेहो होम लागल। गोविन्द झाक नाटक ‘बसात’ मे हमरा एहि दृष्टिकोणक आभास भेटैत अछि। एहि नाटकक नायक कृष्णकान्त एक आदर्शवादी युवक छथि। हुनक पिता फलहारीक पुत्री फुलेश्वरी सँ हुनक विवाह कर’ चाहैत छथि, मुदा कृष्णकान्त अशिक्षिता फुलेश्वरी पर अशिक्षत होयबाक कटाक्ष करैत छथि आ घरसँ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी एहि अपमानकेँ एकटा चुनौतीक रूपमे स्वीकार करैत छथि तथा ओ घर सँ बाहर भ’ शिक्षा प्राप्त करैत अछि आ समाज सेवा करैत अछि। जोतखीजी द्वारा पुष्पा (फुलेश्वरी) क चरित्रकेँ उद्घाटित करैत छथि----- बमबाबा--- “वाह वाह ! बेटी, तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ नहि काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौक—एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहाओत।”17 एहि तरहेँ हम कहि सकैत छी जे शिक्षा ,पाश्चात्य संस्कृति ओ सभ्यताक प्रभाव, स्त्री-पुरूषक समानता आ स्वतंत्रताक भावना नारीमे स्वातंत्र्य भावक जन्म देलक। व्यक्तित्व विकासक संगहि संग ओकर बाहरी दुनियाँ मे हस्तक्षेप बढ़’ लागल एहि तरहेँ नारीक बदलैत परिस्थिति, समाजक बदलैत मूल्य दृष्टि, नव नैतिकता बोध, स्त्री-पुरूषक परस्पर रिश्ताक आयामहि केँ बदलि देलक। पुरूषक प्रति विद्रोहक भावना आधुनिक सामाजिक मैथिली नाटक मध्य नायिकाक चरित्रविकासमे पुरूष-समाजक प्रति विद्रोहक स्वर अनुगुंजित भ’ रहल अछि। ओ परिवारर ओ समाजक बन्धनकेँ ठोकर मारबाक हेतु एकर विद्रूप ओ परिहासकेँ ध्यान नहि द’ अपन व्यक्तित्वक विकासक हेतु शिक्षा ग्रहण करबाक क्षमता दिस आकर्षित भेलीह अछि। एहन नारी अपन विचार ओ अपन व्यक्तित्वकेँ महत्व देलनि तथा वैवाहिक बन्धनकेँ तोड़बाक हेतु तत्पर भ’ गेलीह जकर परिणाम एतबा अवश्य भेल सामाजिक परिप्रेक्ष्यमे एहन परिवारक जीवन अत्यधिक नारकीय बनि गेल अछि। एहन नारीक ध्वंसात्मक ओ विद्रोहत्मक पक्ष अत्यंत सशक्त अछि। एहि हेतु मात्र पुरूषकेँ दोष नहि देल जा सकैछ प्रत्युत ओहि समाज व्यवस्थाक अछि जाहिमे हमर परंपरा बनल अछि जकर फलस्वरूप नारी-पुरूषक स्वस्थ सामंजस्य अधुनातम संदर्भमे अत्यंत दुष्कर भ’ गेल अछि। पुरुष विरोधसँ सामाजिक व्यवस्था पर आघात करैत अछि तँ संभवतः एकांगीकता ओ विक्षिप्तताक आरोप सँ नारी बाँचि सकैत अछि। स्वतंत्र्योत्तर नाटककार किछु एहन नारी चरित्रक अंकन कयलनि जे अपवाद भूत रुपमे चतुर कर्तृत्ववान, मेधावी आ तेजस्वी छथि। पुरुष हुनका समक्ष दुर्बल ओ आत्मकेन्द्रित देखाओल गेल छथि। पत्नी, पति पर हावी रहब श्रेयस्कर बुझैत छथि--- रजनीः--- “हुँह....मान मर्यादा। अहाँकेँ जतेक चिन्ता माय-बापक मान- मर्यादाक तकर दशांशो यदि हुनका लोकनिकेँ अहाँक चिन्ता रहितियन्हि दँ बुझितहुँ आइ धरि ओ की कएलनि अछि अहाँक लेल ?”18 व्यावहारिक रुपसँ पुरूषक विरोधक परिणामकेँ अन्त धरि ल’ जा कए विचारब आवश्यक अछि किएक तँ स्वस्थ ओ मानवाली नारीक यौन- वासनाक पूर्तिक समस्या एहिसँ सम्बद्ध अछि। नारी स्वातंत्र्यक आकांक्षा संभवतः पुरूषसँ पृथक रहिक पूर्ण भ’ सकैछ , किन्तु नारीक नैसर्गिक भावना कोना चरितार्थ हैत। एहन नारी व्यवहार शून्य भ’ जाइत अछि तथा परिस्थितिक अंतरंगताक अनुभव क्षमताक अभाव रहैछ जाहिसँ हुनक विद्वता निरर्थक प्रमाणित भ’ जाइत अछि। एहन स्वरूपक वास्तविक चित्र उपलब्ध होइत अछि परित्यकता ममताक चरित्रमे। पिताक हेतु सब सन्तान एक समान होइत अछि मुदा ‘लेटाइत आँचर’ मे दीनानाथ अपन तीनू संतानक प्रति तीन दृष्टि रखने छथि जकर वास्तविकताक उद्घाटन ममताक कथनसँ स्पष्ट भ’ जाइत अछि--- ममताः— “अहाँ बच्चा भैयाकेँ दुरदुरौने रहैत छियनि.... लाल भैयाक लल्लो-चप्पो मे लागल रहै छी....जे काल्हि डॉक्टर बनताह तनिका छनन-मनन खोअबैत छियनि।”19 समाजक नींव परिवार छैक आ परिवारक आधारशिला पति-पत्नी। पति-पत्नीक परस्पर विश्वास, समझदारी ओ सहयोगहिसँ परिवार सुखी भ’ सकैछ। जँ दुनूमे सँ एकहुँ पंगु भ’ जायत तँ परिवाररुपी गाड़ीक दुर्घटना हेबाक संभावना बढ़ि जाइत अछि। ताहि हेतु आब पुरुषहुँ केँ सोच’ पड़तैन्हि जे नारीक संग मानसिक समायोजन आब अत्यंत आवश्यक भ’ गेल अछि। शिक्षाक प्रति नारीक बदलैत दृष्टिकोण कोनो देश समाज अथवा जाति तावत धरि सभ्य नहि बुझल जायत जाधरि ओहि देश, समाज, अथवा जातिमे नारीक आदर नहि हेतैक। जँ पुरुष देशक भुजा थिक तँ नारी हृदय, जँ पुरुष देशक हेतु दीप थिकाह तँ नारी दीपकक तेल जँ पुरुष द्वारक सुन्दरता छथि नारी घरक प्रकाश, जँ एकक बिनु द्वार सुन्न लागैत अछि तँ एकक बिन घर अन्हार। वैदिक युगमे पुत्रीक शिक्षाक ओतबे महत्व छल जतबा कि पुत्रक। ऋग्वेदमे शिक्षित स्त्री-पुरूषक विवाहहि केँ उपयुक्त मानल गेल अछि। पिता द्वारा कन्याकेँ अपन पुत्राहिक भाँति शिक्षित कयल जाइत छल आ कन्याकेँ सेहो ब्रह्मचर्य कालसँ गुजर’ पड़ैत छलैक। अथर्व वेदमे लिखल छैक जे “कन्या सुयोग्य पति प्राप्त कर’ मे तखने सफल भ’ सकैत अछि जखन कि ब्रह्मचर्य कालमे ओ स्वयं सुशिक्षित भ’ चुकल हो। कतोक नारी शिक्षाक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त कयने छलीह। एतय धरि ओ लोकनि वैदिक ऋचा धरिक रचना कयने छलीह। लोपामुद्रा, धोषा, सिकता, निवावरी, विश्ववारी आदि एहि प्रकारक विदुषी नारी छलीह जनिक उल्लेख ऋग्वेदमे भेटैत अछि। वैदिक यज्ञवादक प्रतिक्रियाक फलस्वरुप उपनिषद्कालमे एक नव दार्शनिक आन्दोलनक प्रारम्भ भेल। ओहिमे नारीक सहयोग कोनो कम नहि छल। ऋषि याज्ञवल्क्यक पत्नी मैत्रेयी परम विदुषी छलीह। ओ धनक अपेक्षा ज्ञान प्राप्तिक कामना बेसी करैत छलीह। बृहदारण्यक उपनिषदमे उल्लेख अछि जे याज्ञवल्क्यक दोसर पत्नी कात्यायनीक पक्षमे अपन सम्पतिक अधिकार छोड़ि अपन पतिसँ मात्र ज्ञानदानक प्रार्थना कएलनि। एहि तरहेँ बृहदारण्यक उपनिषद् मे सेहो विदेहक राजा जनकक सभामे गार्गी आ याज्ञवल्क्यक मध्य उच्च स्तरीय दार्शनिक वाद-विवादक उल्लेख अछि। उत्तर वैदिक कालमे समयक गतिक संगहि-संग नारी शिक्षाक क्षेत्रमे शनैः शनैः ह्रास होम’ लागल। कन्याकेँ सुविख्यात आचार्य ओ प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र धरि भेज’ मे समाजक उत्साह किछु कम पड़ि गेलैक, ई विचार प्रबल भ’ गेल जे घरहि पर कन्याक पिता, भाय अथवा आन कोनो निकट संबंधी हुनका शिक्षित करताह। परिणाम स्वरुप स्वाभाविक रुपसँ ओकर धार्मिक अधिकार शिक्षाक अधिकारमे ह्रास होम लागल। कालक्रमानुसारे शनैः शनैः नारीक प्रति पुरुषक बदलैत धारणाक कारणेँ नारी वर्गमे अशिक्षा व्याप्त भ’ गेल। मैथिल समाजमे एखनहुँ नारी शिक्षाकेँ अधलाह मानल जाइत अछि। नारी जगतमे शिक्षाक अभावक कारणेँ ओकर मूल्य एको कौड़ीक नहि रहि जाइत अछि। एहि संदर्भमे ‘बसात’ केँ देखल जा सकैछ- “जे महिला आजुक युगमे देहरिसँ आगाँ पयर नहि बढ़ा सकय एको कौड़ी अरजि नहि सकय, एतेक तक जे ककरहुँसँ भरि मुँह बाजि नहि सकय तकरा जँ नाँगड़ि कही बलेल कही, बौक कही, गोबरक चोत कही त’ कोनो अनुचित नहि।”20 स्वातंत्र्योत्तर युगमे नारी मे आत्मनिर्भरताक प्रवृति विशेष रुपमे देखल जाइत अछि, आब ओ गोबरक चोत बनि नहि रह’ चाहैत छथि कालीनाथ झा ‘सुधीर’ क नाटक ‘कुसुम’ क नायिका पिताक आज्ञासँ शिक्षा प्राप्त करैत छथि मुदा हुनक माय हुनका एहि लेल तिरस्कृत करैत छथि— कमला- “इ गप्प की छियैक ? हमरा वंशमे आइ धरि कोनो स्त्री नहि पढ़लक तों हमर वंशमे दाग लगौलेँ। मौगीक काज थिक भानस, गीतनाद, कसीदा आ ओइसँ बेसी भेल तँ चिट्ठी - पत्री लिखब । तोँ कि बाप जकाँ अँगरेजिया बनबैं ?”21 ‘बसात’ नाटकमे कृष्णकान्त द्वारा मिथिलाक अशिक्षित नारी पर तीव्र प्रहार कयल जाइत अछि। ओ अशिक्षिता फुलेश्वरी विवाह नहि क’ पड़ा जाइत छथि। फुलेश्वरी कृष्णकान्त द्वारा अपमानित भेला पर अपनाकेँ सुधारैत छथि। शिक्षा प्राप्त कय समाज सेविकाक काज करैत छथि। शिक्षा प्राप्त क’ फुलेश्वरी मैथिल नारीक मस्तक गर्वसँ ऊँच करैत छथि। हिनक चरित्र द्वारा नाटककार मैथिल ललनाक शिक्षाक प्रति जागरूकताक दिस ध्यान आकृष्ट कयने छथि। शिक्षिता फुलेश्वरीकेँ देखि जोतखी द्वारा हुनक प्रशंसा कयल जाइत अछि- बम बाबा—“वाह-वाह! --- बेटी तोहर सफलता पर आइ हमरा अपार हर्ष भ’ रहल अछि, आ कतेक अबलाकेँ सबला बना रहल अछि। आब हमरा विश्वास भ’ गेल। आइ ने काल्हि तोहर प्रतिज्ञा अवश्य पूरा हेतौ- एक दिन फेर मिथिलाक महिला भारतक आदर्श महिला कहओतीह।”22 एहि तरहेँ हम देखैत छी जे उनैसम आ बीसम शताब्दीक आरंभमे राजा राममोहन राय तथा आर्य समाजक प्रयत्नसँ जाहि नारी शिक्षाकेँ आरंभ कयल गेल ओहिमे आइ व्यापक प्रगति भेल अछि, आ एहि विषय के प्रतिपाद्य बना कतोक मैथिली नाटककार मिथिलाक नारीमे शिक्षाक प्रति दृष्टिकोणमे परिवर्तन आनबाक प्रयास कयने छथि। एहि प्रयासक सकारात्मक प्रभाव आजुक समाज पर प्रत्यक्ष देखबामे आबि रहल अछि। नारीक शिक्षाक संदर्भमे ‘पणिक्कर’ लिखैत छथि। नारी शिक्षा विद्रोहक ओहि कुड़हड़िक धारकेँ तेज क’ देने अछि जाहिसँ हिन्दु सामाजक जीवनक झाड़ी केँ साफ केनाय संभव भ’ गेल अछि।23 निष्कर्ष मैथिली सामाजिक नाटकक अध्ययन आ अनुशीलनोपरान्त हम एहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे विशेष क’ स्वातंत्र्योत्तर युगक मैथिली नाटककार सामाजिक विवर्तनकेँ ध्यानमे राखि लिखलनि जाहिमे प्रमुख स्वर रहल अछि नारी समस्या। यद्यपि एखनहुँ मिथिलामे दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जानकी आदिक पूजा कयल जाइत अछि, तथापि आजुक नारी विभिन्न सामाजिक कुप्रथाक कारणेँ मजबूर छथि, लाचार छथि। एहि उत्पीड़नक जड़ि जँ खोजल जाय तँ हमरा जनितेँ सभसँ भयावह स्थिति उत्पन्न होइत अछि दहेज आ विधवा-विवाहक समस्याकेँ ल’ क’ । यद्यपि बाल-विवाह, वृद्ध – विवाह, बिकौआ प्रथा एखनहुँ समाजसँ उठि नहि गेल अछि तथापि एहि दिशामे जागरुकता अवश्ये देखबामे आबि रहल अछि। मैथिली नाटककार लोकनि नारीक कारूणिक दशासँ द्रवित भ’ कए कतोक नाटक मध्य एहि समस्या सभकेँ लक्ष्य बना नाटकक रचना कयने छथि जाहिसँ समाज-सुधारक जागरण जोर पकड़ि सकय। मुदा एतय एकटा प्रश्न उपस्थित होइत अछि जे स्वातंत्र्योत्तर मैथिली नाटकमे सामान्य नारीक प्रतिबिम्ब कतेक दूर धरि स्पष्ट अछि ? एहि कालावधिक नाटककार नारी-चित्रण आत्मीयता एवं सहानुभूतिसँ नहि कयलनि, प्रत्युत पुरूषक दृष्टिएँ कएलनि। स्वातंत्र्योत्तर नाटकमे नारीक निष्प्रेम जीवनक कथा थिक जे सामाजिक प्रतिबन्धक अन्तर्ज्वालामे झुलसि कए नष्ट भ’ रहल अछि। पुरूषक आकांक्षा, आदर्श ओ निर्दयताकेँ टारब हुनका हेतु असंभव भ’ जाइत अछि। नारी जीवनक व्यथा, कठिनता एवं कुण्ठाक चित्रण करबामे नाटककार तत्परता देखौलनि, किन्तु ओ समाजक हेतु निष्प्रयोजनीय प्रतीत भ’ रहल अछि। एहि कालावधिमे मैथिली नाटकमे नारीकेँ जतेक आदर्शवादी ढ़ंगसँ चित्रण कयल गेल अछि, ततेक यथार्थवादी दृष्टिएँ नहि। संदर्भ डेविस, ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ वोमेन, पृष्ठ—172 स्वर्ण सकूजाक लेख, ‘महिला सशक्तीकरण युग में निरंतर असक्त होती नारी’, राधाकमल मुखर्जी चिन्तन परंपरा, जुलाई—दिसम्बर 2001, अंक—1 बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—43 एकांकी संग्रह, सं. सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, मैथिली अकादमी, पटना, 1977,पृष्ठ—133 वएह, पृष्ठ—26 रक्त, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, शेखर प्रकाशन, टेक्सटबुक कॉलोनी, इन्द्रपुरी, पटना, 1992,पृष्ठ—20 लक्ष्मण रेखा खण्डित, महेन्द्र झा, उपेन्द्र झा, ग्राम- मलंगिया, दरभंगा, पृष्ठ—68 त्रिवेणी, परमेश्वर मिश्र, मिथिला प्रेस, 1950,पृष्ठ—41 लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—25 वएह, पृष्ठ—63 कनियाँ-पुतरा, गुणनाथ झा, पृष्ठ—21 सप्तपर्णा, सं. डॉ. देवेन्द्र झा, पृष्ठ--21 तेसर कनियाँ, मणिपद्म, पृष्ठ---16 नाटकक लेल, नचिकेता, पृष्ठ—20-21 नायकक नाम जीवन, नचिकेता, अखिल भारतीय मिथिला संघ, 9/1 खेलात घोष लेन, कलकत्ता, 1971,पृष्ठ—9 दहेज, चौधरी यदुनाथ ठाकुर ‘यादव’ पृष्ठ—46 बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 एना कते दिन, अरविन्द कुमार ‘अक्कू’, चेतना समिति पटना,1985, पृष्ठ—16 लेटाइत आँचर, सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी, पृष्ठ—63 बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—18 कुसुम, कालीनाथ झा ‘सुधीर’, पृष्ठ—3 बसात, गोविन्द झा, पृष्ठ—47 के. एम. पन्निकर यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन          मिथिलाक परम्परागत सीमा बृहदविष्णुपुराण (5म शताब्दी)क मिथिलामहात्म्य खंड मे वर्णित अछि जकर अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा एहि प्रकारेँ कएने छथि: “गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिसि पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा बागमती कृतसारा मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यासारा।”          बृहदविष्णुपुराण मे मिथिलाक बारह गोट नामक उल्लेख भेटैत अछि: मिथिला तीरभुक्तिश्च वैदेहीनैमिकाननम। ज्ञानशीलं कृपापीठं स्वर्णलांगलपद्धतिः।। जानकी जन्मभूमिश्च निरपेक्षा विकल्मषा। रामानन्दकरी विश्वभाविनी नित्यमंगला।।          मिथिलाक आदि शासक विदेहक नामपर मिथिलाक नाम ‘विदेह’ पड़ल।          ‘तिरहुत’ नामक उल्लेख सर्वप्रथम पुरूषोत्तमदेवक ‘त्रिकाण्डकोश’ (12म शताब्दी) मे भेल अछि।          विदेह राज्यकुलक मिथिला पर शासनक समय 3000 ई.पू. सँ 600 ई.पू. धरि अनुमानित अछि।          मिथिलामे पञ्जी व्यवस्थाक सम्पादन कर्णाटवंशीय नरपति हरिसिंहदेवक द्वारा प्रारंभ भेल।          सप्तरत्नाकरक रचयिता छलाह चण्डेश्वर ठाकुर।          मिथिलाक प्रथम कर्णाटवंशीय शासक छलाह ‘नान्यदेव’ (1097 ई.)।          खण्डवला राजकुलक स्थापना म.म. महेश ठाकुर द्वारा 1557 मे भेल।          मिथिला पर ओइनवार राज्यवंशक शासन चौदहम शताब्दीक मध्यमे आरंभ भेल।          मिथिलामे भस्मसँ अंकित त्रिपुण्ड शिवभक्तिक,लम्बाकार श्रीखंडक टीका विष्णुभक्ति एवं सिन्दूरक ठोप शाक्त भावनाक प्रतीक मानल जाइत अछि।          मिथिलाक्षरक विकास तान्त्रिक यन्त्रसँ मान्य अछि। ई मानल जाइत अछि जे तिरहुताक्षरक आरंभ जाहि मंगल चिह्न ‘आँजी’ सँ होइत अछि से तान्त्रिक कुण्डलनीक बोधक थिक।          मिथिलामे  विवाहक अवसर पर गाओल जायबला ‘जोग’ तन्त्रसँ सम्बद्ध मानल गेल अछि।          मिथिलाक धार्मिक जीवनक मुख्यधारा शिव ओ शक्तिमूलक थिक।          मैथिलीय रागरागिनीक प्राचीनतम उल्लेख सिद्ध लोकनिक ‘चर्यापद’ मे उपलब्ध होइत अछि।          कर्णाटनरपति म. नान्यदेव (1097 ई.पू.) मिथिलामे अपन राज्य स्थापित करबाक पश्चात् ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नामक संगीतग्रंथ लिखल जाहिमे सर्वप्रथम ओ मैथिलीय रागरागिनीक उल्लेख क्रमबद्ध रीतिएँ कएल।          मैथिलीय संगीतक सक्रिय गतिविधि ओ विकास-प्रसारक दृष्टिसँ म. हरिसिंहदेव (1296-1326)क राज्यकाल विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि।          ‘तिरहुति’ श्रृंगाररसक मधुरगीत थिक, जाहिमे नायक-नायिकाक संयोग-वियोगक रागात्मक वर्णन होइत अछि।          ‘बटगवनी’ मे सखी सभक संग समागम-गृहमे पतिसँ अभिसारक हेतु जाइत नायिकाक वर्णन होइत अछि।          ‘गोआलरी’ क विषयवस्तु होइत अछि गोपी सभक संग कृष्णक नोंक-झोंक एवं केलिकौतुक।          ‘रास’ मे गोपी सभक संग कृष्णक रासलीलाक वर्णन होइत अछि।          रासक सर्वप्रथम रचयिता छथि ‘साहेबरामदास’।          मिथिलाक लोकवाणी हेतु ‘मैथिली’ शब्दक प्रयोग सर्वप्रथम कोलब्रुक 1801 ई. मे कएल, परन्तु एहि नामकेँ प्रसिद्ध करबाक श्रेय मैथिली भाषासाहित्यक आदि उन्नायक ग्रियर्सन महोदयकेँ छन्हि।          कालानुसारेँ मूल भारोपीय भाषाक समय 2500 ई.पू. मानल जाइत अछि।          प्राचीन भारतीय आर्यभाषाक इतिहास 1200 ई.पू. सँ मानल जाइत अछि।          बौद्धधर्मक सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘ललितविस्तार’मे “वैदेहीलिपि”क उल्लेख अछि जकरा मैथिली लिपिक प्राचीनतम स्वरूप कहल जा सकैत अछि।          कोनहुँ युगमे शिष्ट ओ परिनिष्ठित साहित्यसँ भिन्न जे रचना होहत अछि से ओहि युगक लोक-साहित्य कहबैत अछि।          दीर्घ आख्यान पर आधारित गेयात्मक कथा ‘लोकगाथा’ कहल जाइत अछि।          मैथिलीक किछु प्रमुख लोकगाथा काव्य थिक— लोरिकाइन, सलहेस, अनंगकुसुमा, दुलरादयाल, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, रईया रणपाल आदि।          ‘वर्णरत्नाकर’ निर्विवाद रूपसँ मैथिली साहित्यक प्रथम उपलब्ध गद्य ग्रंथ थिक।          विद्यापतिक ‘पुरूषपरीक्षा’, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि परंपराक संस्कृत नीतिकथा थिक।          विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ अवहट्टक गद्यपद्यमय ग्रंथ थिक।          ‘गोरक्षविजय’ विद्यापतिक संस्कृत नाटक थिक, जाहिमे मैथिली पद सेहो प्रयुक्त भेल अछि।          ‘विशुद्ध विद्यापति पदावली’ विद्यापतिसँ कम सँ कम एक शताब्दीक पश्चातक संकलन थिक।          1879 ई.मे दरभंगा राज हाई स्कूलक स्थापना भेल छल।          1966 ई. मे मैथिली भारतक प्रमुख साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा स्वीकृत भेल।          मैथिली अकादमीक स्थापना 1976 ई. मे भेल।          नाटकमे आंगिक, वाचिक, आहार्य, तथा सात्विक चारू प्रकारक अभिनय आवश्यक होइत छैक।          ‘अंकियानाट’क आदि रचयिता छलाह शंकरदेव (1449-1569)।          मिथिलामे ‘कीर्तनिञानाच’क परिपाटीक आरंभ नवद्वीपक कीर्तनमंडलीक प्रभावसँ भेल 17म शताब्दीक आदिमे। (स्रोत: मैथिली साहित्यक इतिहास, डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’) घसल अठन्नी : एकटा विमर्श साहित्य अथवा काव्य समय-सापेक्ष होइत अछि; एहि कारणेँ समयक संग-संग काव्यक सेहो स्वरूप बदलैत रहैत अछि। काव्य कखनो काल ईश-महिमाक बखान करैत अछि तँ कखनो वीरगाथाक, कखनो कामिनीक देहयष्टिक सांगोपांग वर्णन करैत अछि तँ कखनो सामान्य मानव जीवनक पीड़ा, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदिक। कहबाक तात्पर्य जे साहित्यक यात्रामे काल आ स्थितिक कारणेँ काव्यक उद्देश्य बेर-बेर बदलैत रहैत छैक। अतः मूल रूपमे जँ विचार कएल जाए तँ साहित्य अथवा काव्य रचनाक मुख्य उद्देश्य भेल प्रकृति (सजीव/निर्जीव)क प्रकृतिसँ तारतम्यता स्थापित कए मनुखमे मनुखताक अर्थ ताकब। एहि दृष्टिएँ कविताक सार्वभौमिकता आ सर्वकालिकता एहि शर्त पर निर्भर करैत अछि जे ओहिमे मनुखक संवेदनाक अभिव्यक्ति कतेक प्रभावी रूपेँ भेल छैक। ई संवेदना देश-कालकेँ समान रूपेँ प्रभावित करैत अछि। कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ मैथिली काव्य काननक एकटा एहन नक्षत्र छथि जे अपन कविकर्मक हेतु युग-युगान्तर धरि मैथिली साहित्यमे पूजित रहताह। हम एतए “राधाविरह” सन उच्चकोटिक काव्य रचयिता मधुपक चर्चा नहि करए जा रहल छी। हम चर्चा करए जा रहल छी ‘घसल अठन्नी’क रचयिता मधुपजीक। एतए प्रश्न उठैत छैक जे कोन एहन परिस्थिति रहैत छैक जकरा कारणेँ ‘घसल अठन्नी’ सन काव्य रचना करबा लेल काव्यकार बाध्य होइत छथि अथवा प्रेरित होइत छथि। हमरा बुझने जखन लेखकक समक्ष ओहि कालखण्डक कोनो विस्मयकारी यथार्थ (जे कि घसल अठन्नीमे चित्रित कएल गेल अछि) उपस्थित भ’ जाइत छैक तँ ओहि यथार्थसँ कवि मन सेहो अपना आपकेँ मर्माहत महसूस करैत छथि आ तखने एहि पीड़ाकेँ जनमानसक सोझा आनबाक लेल ओ आतुर भ’ जाइत छथि। बुचनी सन शोषित, पीड़ितक पीड़ाकेँ एहन मार्मिक रूपेँ प्रस्तुत करबाक हिम्मत संभवतः मधुपेजीसँ संभव रहनि किएक तँ समकालीन व्यवस्था किन्नहुँ हुनका पक्षमे नहि छलनि। घसल अठन्नी कविताक अध्ययन केलाक पश्चात् निम्न बिन्दु सभ पर विचार कएल जा सकैछ: शब्द-चित्रक माध्यमे प्रकृतिक चित्रण, भुटकुन बाबू (शोषक वर्ग)क अत्याचार, मखना सन भटकल प्रजावर्ग, बुचनी (शोषित)क रेखाचित्र, घसल व्यवस्थासँ घसाएल अठन्नीक आर्तनाद। घसल अठन्नी कविताक सभसँ पैघ विशेषता थिक एकर व्यावहारिक भाषा, जकर पाठ कएलाक उपरान्त पाठकक मोनमे वैह भाव, वैह चित्र सोझा नाचए लागैत अछि। शब्द-चित्रक एहन जादूगरी कि गरमीक वर्णन पढैत काल पाठकक सोझा ओ दृश्य चलचित्र जकाँ चलए लागैत छैक आ पाठक ओहि स्थितिसँ अपन तादात्म्य स्थापित कए लैत अछि, जेना निम्न पाँति पढ़बा काल अंतिम पाँति पर अएलाक पश्चात् एहन अनुभूति होएत जे जँ आँखिकेँ झाँपि नहि लेब तँ ई तापत धूरा कतहुँ आँखिमे नहि पड़ि जाए; पछबा प्रचण्ड/बिरड़ो उदण्ड/सन सन सन सन/छन छन छन छन/आगिक कण सन/सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। अथवा इनहोर बनल पोखरिक पानि...। वा ई अग्निवृष्टि!/ संहार करत की प्रकृति सृष्टि! आदि कहैत-कहैत जखन ओ कहैत छथि- छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि...तँ बुझाइत अछि जे एहिसँ आगू कविक कल्पना जाइए नहि सकैए। कल्पनाक एहन सजीव चित्रण! एहन विलक्षण पराकाष्ठा! कवि मधुपेसँ संभव छनि। वस्तुतः कविताक पहिल भागमे कवि प्रकृतिक वर्णन करबाक लाथे एकटा भूमिका तैयार केलनि अछि जाहिसँ प्रकृतिक एहि रौद्र रूपकेँ भुटकुन बाबूक सामन्ती प्रवृति पर आरोपित कएल जा सकए। मार्क्सवादी विचारधारामे सम्पूर्ण समाजकेँ दुइए वर्गमे विभाजित कएल गेल अछि-एकटा शोषक वर्ग आ दोसर शोषित वर्ग। एतए भुटकुन बाबू शोषक वर्गक प्रतिनिधित्व करैत छथि आ बुचनी शोषित वर्गक। गै छौक ने डर?/कै खून पचैलनि ई बण्डा/रोइयों न भंग/युग-युग दारोगाजी जीबथु/क’ देबौ खून। पहिने मखनाक अत्याचार- चट-चट-चट-चट/कुलिशहुँसँ कर्कश भीमकाय/मखनाक चाटसँ निस्सहाय/भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत/भ’ गेलि बेहोश। आ ताहूपर मोन नहि भरलनि तँ- दन-दन-दन-दन/मूर्छितो देह पर बेंत वृष्टि/बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन/शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! एतए मखनाक चरित्र ओहि भटकल युवावर्गक सदृश अछि जे अपनहि हाथेँ अपन आ अपन समाजक सर्वनाश करबा लेल आतुर अछि। आखिर मखना सन नोकरकेँ भुटकुन बाबू सन मालिकसँ की सभ सुविधा भेटैत हेतैक? मालिकक पहिरलाहा पुरनका धोती-तौनी, खएबा लेल नीक-नुकुत भोजन आ कोनहुँ जग-जाजन पर खर्च करबाक लेल कर्ज, सैह ने? मुदा मखना सन नोकर एहि भ्रमकेँ नहि तोड़ि पबैत अछि जे यैह कर्ज ओकरा पुश्त-दर-पुश्त भुटकुन बाबूक चाकरी करबाक ले बाध्य करैत रहैत छैक आ करैत रहतैक। मालिकक सह पाबि ओ जाहि प्रकारेँ बुचनी पर प्रहार करैत अछि ताहिसँ सिद्ध भ’ जाइत अछि जे जाधरि मखना सन मूर्ख एहि समाजमे अछि ताधरि भुटकुन बाबू सन शोषकक अत्याचार निर्बाध रूपेँ चलिते रहत। रौ, की तकैत छें मूँह हमर/छोटका लोकक एते ठेसी? जहिया मखना सन लोक एहि ‘छोटका लोक’ आ ‘बड़का लोक’मे भेद जानि जाएत तहिए सँ समाजक कायाकल्प होएब प्रारंभ भ’ जाएत। कहल जा चुकल अछि जे प्रस्तुत कवितामे कवि जे किछु कहने छथि, जाहि कोनो परिस्थितिक वर्णन केने छथि ओ प्रस्तुतिक पराकाष्ठा थिक। बुचनीक दुर्दैन्य दशाक वर्णन करैत काल कवि द्वारा बुचनीक खीचल गेल रेखाचित्र- कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन/हड्डी जागल/सौन्दर्य गरीबीसँ दागल...। आभूखक ज्वालासँ जरक डरें/तारुण्य जकर अबितहिं भागल/पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल/पीयर ओ दूबर-पातर तन/फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर/आमक फाड़ा सन नयन/खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर। एहन देहक परिणति की भ’ सकैछ? शोणितोक आब नहि छैक शेष/पुनि दूधक होएब कोना सम्भव? एहनो स्थितिमे बुचनी अपन आ अपन बच्चाक जीवनक रक्षार्थ एहन भीषण समयमे खेतमे काज करैत अछि। घसल अठन्नी कोनहुँ दोकानमे नहि चललाक स्थितिमे ओ पुनः मालिकसँ गोहारि करैत अछि- ओ घसल अठन्नी चलि न सकल/हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि/छी आबि रहलि/करु कृपा अठन्नी द’ दोसर/एसकरुआ हम/भ’ गेल राति/गिरहत, न आब देरी लगाउ/भूखें-प्यासें हम छी मरैत/लेबै बेसाह/कूटब-पीसब/बच्चा भोरेसँ कानि-कानि/छट-पट करैत अछि जान लैत। मुदा भुटकुन बाबू पर एहि गोहारिक कोनो असर नहि पड़ैत छैक। एतए बुचनीक भूख तँ नहि मेटा सकल, हँ ओकरा अपन शिशुक संगहि एहि इहलोकसँ मुक्ति अवश्य भेटि गेलैक-शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि! एतए बुचनिक मुक्त सृष्टि! क संगहि कविताक अंत नहि भ’ जाइत अछि। हम कत’ जाउ/अवलम्ब पाउ/के शरण?/घसल जनिकर अदृष्टि! कहि कवि समाजक सोझा एकटा बड़का टा प्रश्नचिह्न छोड़ि देने छथि। एतए घसल अठन्नीकेँ समाजक शोषित वर्गक प्रतीकक रूपमे कवि प्रस्तुत केने छथि। अठन्नी अथवा पाइ माने की? अठन्नीक माने मौद्रिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, अर्थव्यवस्थाक रीढ़। आ गरीब-गुरबा वा मजदूर माने की?सामाजिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, समाजक निर्माण, कल्याणक सभसँ पैघ संसाधन। समाजक भौतिक सुख-साधन सँ ल’ कए सभ्यता, संस्कृतिक विकासक लेल दुनूक दोहन आवश्यक। मुदा दोहनक दृष्टिकोण की हेबाक चाही, यैह सभसँ महत्वपूर्ण प्रश्न अछि। भुटकुन बाबू सन सामंती प्रवृतिक लोक दोहनक माने बुझैत छथि ‘खून चोसब’ आ जखन बुचनी सन पीड़ित, शोषितक देहमे शोणितक अंश मात्र रहि जाइत अछि तखन ओकर अस्तित्व मेटा देबाक ई प्रवृति निश्चये दानवी प्रवृतिक द्योतक अछि। तहिना जखन हम घसल अठन्नीक अर्थविस्तारमे जाइत छी तँ ओहिमे समाजमे व्याप्त ओ सभटा कुरीति समा जाइत अछि जे जकरा कारणेँ मनुख जातिक मूल्यक तीव्र गतिएँ ह्रास भेल जा रहल छैक। घसल अठन्नीक एहि आर्तनादक रूपमे वस्तुतः कवि अपन आर्तनादसँ जनमानसक ध्यान आकृष्ट करबाक प्रयास केने छथि। आखिर ई व्यवस्था कहिया धरि चलैत रहत? एकरा सँ त्राण कोना हो? कि एहि व्यवस्थासँ त्राण दिआएब कोनो एक व्यक्ति/संस्था सँ संभव छैक? निश्चिते रूपसँ नहि। एकरा लेल हमरा सभकेँ सामूहिक प्रयास करए पड़त। मैथिलीमे अनुवाद पर अभिविन्यास कार्यशाला समपन्न राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, मैसूर द्वारा अनुवाद साहित्यमे प्रशिक्षण देबाक उद्देश्यक तहत स्थानीय डी. बी. महाविद्यालय, जयनगर, मधुबनीक संयुक्त तत्वाधानमे अनुवाद पर पाँच दिवसीय अभिविन्यास कार्यशालाक उद्धाटन दिनांक 25 नवम्बर,2011 केँ स्थानीय विधायक श्री अरूण शंकर प्रसाद द्वारा कएल गेल। 25 सँ 30, नवम्बर,2011 धरि समपन्न भेल एहि कार्यशालामे विषय विशेषज्ञक रूपमे प्रो. कमलकान्त झा, प्रो. विजय कुमार मिश्र, प्रो. श्रुतधारी सिंह, डॉ. योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ आ डॉ. टी. पी. सिंह, लगभग 43 टा प्रतिभागीकेँ विभिन्न विषयक मैथिली भाषामे अनुवादक गुर सिखौलनि। पाँचो दिन क्रमशः दू सत्रमे संचालित एहि कार्यशालाक प्रथम सत्रमे जतय विभिन्न विशेषज्ञ द्वारा ज्ञान-पाठ्यक अनुवादमे आबए वला समस्या आ ओकर समाधान, अनुवादक प्रकार/सिद्धान्त पर व्याख्यान देल गेल ओतहि दोसर सत्रमे प्रायोगिक रूपमे राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा अंग्रेजीसँ मैथिलीमे अनुवादक हेतु चयनित ज्ञान-पाठ्य क्रमशः ‘द इंडियन कन्टीच्यूशन : अ कॉर्नरस्टोन ऑफ द नेशन, ग्रेनविल’ ‘हीट ट्रान्सफर, होलमैन’ ‘फिजिकल कैमिस्ट्री, वॉल्टर’ ‘आउटलाइन्स ऑफ इंडियन फिलॉसॉफी, एम. हिरियन्ना’ क पोथीसँ दू-दूटा अनुच्छेदक अंग्रेजीसँ मैथिलीमे अनुवाद कएल गेल, पछाति विशेषज्ञ लोकनि द्वारा ओहि अनूदित अनुच्छेदक वीक्षण कए संबंधित विषय पर परिचर्या कएल गेल। कार्यक्रमक आरंभिक संबोधन सत्रमे मिशनक प्रतिनिधि डॉ. शंभु कुमार सिंह मिशनक गतिविधि आ उद्देश्य पर चर्चा करैत कहलनि जे राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, अनुवादक क्षेत्रमे भारत सरकारक एकटा पहल थिक जकर उद्देश्य छैक विभिन्न विषयक अंग्रेजीमे उपलब्ध उच्च स्तरीय ज्ञान-पाठ्य पुस्तकक भारतीय संविधानक आठम अनुसूचीमे सम्मिलित सभटा अठारहो भाषामे अनूदित संस्करण उपलब्ध कराएब। एहि महती उद्देश्य पूर्ति करबाक हेतु दिनांक 01 जुलाई,2008 केँ एहि मिशनक स्थापना भारतवर्षक प्रख्यात भाषाविद्, कवि, लेखक प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’(तत्कालीन निदेशक, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर)क सत्प्रयासेँ भेल छल। एहि अवसर पर मिशनक आन प्रतिनिधि श्री पवन कुमार चौधरी एहि विषय पर प्रकाश देलनि जे वर्तमान परिस्थितिमे मैथिलीमे एहि तरहक अभिविन्यास कार्यशालाक औचित्य किएक अछि? कार्यशालाक संचालन, आगन्तुक अतिथिक स्वागत आ धन्यवाद ज्ञापन मिशनक प्रमुख प्रतिनिधि डॉ. अजीत मिश्र द्वारा कएल गेल। जाग’ जाग’ महादेव ! (समसामयिक निबंध) मिथिला, अनादिकालसँ धर्म, शिक्षा, साहित्य संस्कृति आदिक विशिष्टताक लेल अद्वितीय रहल अछि। एतय एक-सँ बढ़ि कए एक मुनि, मनीषी, तपस्वी भेल छथि, जिनका सभक उपदेश आ आचरण आइयहुँ ओतबे प्रासंगिक अछि। मुदा अनेकानेक कारणसँ आइ बड़ तीव्र गतिएँ सामाजिक विवर्तन भ’ रहल छैक। एहि बदलैत सामाजिक परिस्थितिमे कोन वस्तु आ संस्कार ग्राह्य छैक आ कोन अग्राह्य ताहि विषयकेँ ल’ क’ लोकमे भयंकर द्वन्द्व आ संघर्षक स्थिति उत्पन्न भ’ गेल छैक। मूल रूपसँ पाश्चात्यवादी सभ्यताक अन्धानुकरण ओ आन-आन कारणेँ, लोक अपन सभ्यता, संस्कृति, सँ विमुख भेल जा रहल अछि, परिणामस्वरूप, समाजमे भूख, भय, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अपराध, बेरोजगारी आदिक समस्या दिनानुदिन गंभीर भेल जा रहल छैक। लोक एहि सभ समस्यासँ मुक्तिक लेल अपस्यांत अछि, बैचैन अछि। ओकरा कोनो रस्ता नहि भेटि रहल छैक। मानसिक अशांतिक शांतिक लेल लोक भगवानक शरण मे आबि रहल अछि (ओकरा लागै छैक आब यैह टा रस्ता बचि गेल अछि)। यैह कारण अछि आइ जतय देखू ततहि थोकमे धर्मक दोकान खुजि गेल छैक। हमरो संग सैह भेल, विभिन्न प्रकारक विसंगति आ झंझावात तेना ने हमरा नचार क’ देलक जे हमहुँ अंततः धर्महिक शरण मे गेलहुँ। ई संयोगे छल जे ताहिदिन हमरा सभक दिस धर्मक एकटा टटका दोकान खुजल छलैक- जाग’ जाग’ महादेव! मिथिलाक लेल ई कोनो नव धर्म आ नव संप्रदाय नहि छलैक, हँ, एकटा बात नव अवश्य कहि सकैत छी जे एहिमे बस अहाँ देवाधिदेव महादेवकेँ ‘गुरू’ बना लिअ, आ कि सभ समस्या छू मंतर। हम अपन अनुभव कहि रहल छी, जहिया सँ हम महादेवकेँ गुरू बनैलियन्हि हमर सभटा समस्या सरिपहुँ छू-मंतर भेल जा रहल अछि। महादेवमे दम छनि, से हमर धारणा दिनानुदिन दृढ़ भेल जा रहल अछि। यैह कारण थिक जे कतहुँ अबैत-जाइत, माने जतय कतहुँ महादेवक मंदिर, फोटो देखैत छी, मोने-मोन जाग’ जाग’ महादेव! कह’ लागैत छी। यैह परसूका बात थिक हमरा एक आवश्यक काजे गामसँ सहरसा जयबाक रहय, ने जानि कोन कारणेँ ओहिदिन गाड़ी-घोड़ा बन्न छलैक, हम पयरे चलि देलहुँ। हमरा गामसँ लगभग 10 कि.मी. क दूरी पर महादेवक एकटा मंदिर छैक, बड़ भव्य, प्राचीन आ सिद्ध। गरमीक दिन रहैक, रौद कपारे पर लागैक। सोचलहुँ मंदिरमे जाग’ जाग’ महादेव ! क’ लैत छी, आ कने काल प्रांगणक एहि विशाल बरक गाछतर चबूतरा पर सुस्ता लेब। मंदिरमे माथ टेकि चबूतरा लग आबि बैसि गेलहुँ। हमर मोन कने अशांत रहय तैँ ओतय ध्यानक मुद्रामे बैसि महादेवक स्मरण कर’ लागलहुँ, आकि एहन आभास भेल जे सरिपहुँ साक्षात् महादेव हमरा समक्ष आबि गेलाह। आबितहि पुछलैथ– की यौ शिष्य! की हाल-चाल ? हम कहलियनि-- हे गुरू! से तँ अहाँ जनिते छी ? ओ कहलनि-- चिन्ता जुनि करू शिष्य! सभ समाधान भ’ जेतैक। हम कहलियनि-- हे महादेव! जखन अहाँ लग सभ समस्याक एतेक त्वरित उपचार अछि तखन अपनेक एहि संसारमे एतेक प्रकारक रोग-शोक, व्यभिचार, अनाचार, अत्याचार आदि किएक ? ओ कहलनि-- शिष्य, “मोन चंगा तँ कठौत मे गंगा” अहाँ पहिने हमर अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत छलहुँ ? नहि ने? मुदा आइ जखन अहाँक मोनक श्रद्धा जागृत भेल तँ देखिये रहल छी जे हम साक्षात् अहाँक समक्ष उपस्थित छी। हम कहलियनि-- एकर माने भेल जे अहाँ अपन शिष्ये टा पर कृपा करैत छी, वैह टा अहाँक संतान थिक, आ आर सभ ? की ई प्रश्न अहाँक ‘जगतपिता’ उपाधि पर प्रश्न चिह्न नहि अछि? ओ कहलिन-- कथमपि नहि शिष्य हमरा लेल सभक मान बरोबरि अछि। जाधरि धर्म आ कर्मक गणितकेँ लोक नहि बूझत ताधरि ई समस्या, ई भेद रहबे करतैक। एहिमे हमर कोन दोख। अहीं जे अपन सभ काज-धन्धा छोड़ि कय एतय दिन-राति जाग’ जाग’ महादेव! करैत रहब तँ अहाँकेँ की बुझाइत अछि जे महादेव....। हे महादेव! हमरा सन मन्द-बुद्धि, धर्म आ कर्मक तत्त्वकेँ कोना बुझत? हम तँ बस एक्कहिटा चीज बुझैत छी, महादेव! आर किछु नहि। बस! बस! बस! अहाँक श्रद्धा, विश्वास आ सत्कर्म सैह थिकाह महादेव, सत्यं शिवं सुन्दरम्। हे महादेव! ई बूझब तँ हमरालेल आर जटिल भ’ गेल, सत्य, सुंदर आ शिव केँ बुझ’क सामार्थ्य हमरा कतय? अपन संस्कार, संस्कृति, लोकाचार, भाषा-साहित्य, धार्मिक आचरण, आदिकेँ बुझू, यैह सत्य थिक, यैह सुंदर थिक, यैह शिव थिक। बेस, आब कने-कने बुझलहुँ। हे महादेव! आर सभ छोड़ू एकटा बात बताऊ, एहि गामक अधिकांश लोकनि पढ़ल-लिखल छथि, ज्ञानी छथि, अपन परंपरा, अपन संस्कारादिक प्रति जागरूक छथि तकर पश्चातो हमरा बुझने कतहुँ ने कतहुँ........। औ शिष्य! आइ-काल्हि जे जतेक बेसी पढ़ल-लिखल लोक छथि से ततबे बेसी मूर्ख। ई अहाँ की कहि रहल छी, एहन भ’ सकैत अछि जे कखनहुँ-कखनहुँ पढ़लो-लिखलो लोकसँ गलती भ’ जाइत छैक, मुदा तकर जतेक परिमाण अहाँ बता रहल छी से बात हमरा नहि पचि रहल अछि। औ शिष्य! कहब तँ छक द’ लागत। ई कोनो गुटका (पान-मसाला) छियैक जे पचि जायत। अहीं कहू, अहाँ जे भरि दिनमे 10 पुड़िया गुटखा खा जाइत छी से कोना? ओहि पुड़िया पर नहि लिखल छैक जे “तम्बाकू चबाना स्वास्थ के लिए हानिकारक है”। हे ओहि महाशयकेँ देखियौक, ओ राजधानीक जानल-मानल डॉक्टर छथि, घंटे-घंटे पर सिगरेट (ओहो किंग साइज) पीबैत छैक, जखन की सभटा सिगरेटक पैकेट पर लिखल रहैत छैक, “धुम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” एतबे किएक, हे ओमहर ओहि होर्डिंग पर पढ़ियौक- “सिगरेट पीने से कैंसर होता है, जनहित मे जारी, कैप्सटन फिल्टर, आखिरी कश तक मजेदार।” (हमर माथ शरम सँ झुकि गेल) से जे हो मुदा एहिठामक लोक धर्माचारी आ........। महादेव- हँ, हँ, से त’ अवश्ये, तहिया सँ ठीके आइ काल्हि हमर पूजा पाठ करयबलाक संख्या बढ़ि गेल अछि। मुदा ........। मुदा की ? आब लोकमे ओ भाव नहि रहलैक। आब लोक हमर पूजा कर’ नहि अबैयै, हमरासँ ‘डील’ कर’ अबैये। बुझलहुँ नहि, कने स्पष्ट करू। की-की सभ स्पष्ट करी शिष्य! सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्थामे घून लागि गेल छैक। एकहकटा जँ फरिछा-फरिछा अहाँकेँ कह’ लागी तँ कैक दिन धरि एहिना अहाँ केँ ध्यानमग्न रह’ पड़त। जिज्ञासा कएलहुँ अछि तँ लिअ हम किछु ‘डील’ केर बानगी अहाँकेँ सुना दैत छी..... एकटा (बालक)--- हे महादेव! बाप कहैत छलाह पढ़’क लेल तँ हम गुल्ली-डंडा खैलयबामे भरि साल मस्त रहलहुँ, एहिबेर कहुना पास करा दिय’ तँ ...... एकटा नवयुवक –- हे महादेव! एहिबेर देवघर जयबाकाल हमरा जाहि ‘मालबम’ सँ परिचय भेल छल तकरहिसँ हमर बियाह करा दिअ तँ..... एकटा नवयुवती— हे महादेव! अहाँ हमरा कोनो नीक निर्देशकक सिनेमामे माधुरी दीक्षितक ‘धक-धक’ वला रोल दिआ देब तँ...... दोसर नवयुवती--- हे महादेव! अहाँक देल गेल रूप–गुण सँ संपन्न रहितहुँ हमर बियाह नहि भ’ रहल अछि, हमर माय-बाप विक्षिप्त भ’ गेल छथि। एहि दुनियाँ सँ सबटा दहेजक दानव केँ एक्कहि दिन उठा लिअ तँ.... एकटा प्रौढ़— हे महादेव! जानैत-बुझैत ‘मनीगाछी’क कोठा पर बेर-बेर जाइत रहलहुँ तैँ आइ ‘एडस’ सन लाईलाज बीमारीसँ ग्रस्त छी—जँ अहाँ हमरा एहि सँ मुक्ति दिया दी तँ.... एकटा बेरोजगार— हे महादेव! पढ़ि-लिखि कए झाम गुड़ैत छी, जँ अहाँ हमरा एकबेर लादेनसँ भेंट करा दी तँ........ एकटा वृद्ध दम्पति- हे महादेव! अपनेक दयासँ हमरा बेटा-पुतोहुकेँ कोनो कमी नहि, मुदा हमरा दुनू परानीक पेट ओकरा सभक लेल पहाड़ सदृश छैक। जँ अहाँ हमरा एहि जन्मसँ मुक्ति दिया दी तँ अगिला जनममे ............ एकटा राजनेता— हे महादेव! हमरा पार्टीक सरकार बन’मे एक्केटा सीट घटैत छैक। हम निर्दलीय महाप्रलय सिंह केँ तीन करोड़ टका देब’ लेल तैयार छी अहाँ ओकर मति फेरि दिऔक, जँ हमर सरकार बनि गेल तँ............. एकटा व्याख्याता— हे महादेव! भरि जिनगी चोरि आ जोगाड़क बलेँ नीक अंक सँ पास होइत रहलहुँ आब व्याख्याता छी। छौंडा सभकेँ ततेक ने नेतागिरीक चस्का लगा दिऔक जे साल भरि महाविद्यालय आ विश्वविद्यालयमे ताला लटकले रहय। जँ एहन संभव भ’ जाय तँ..... एकटा अछूत-– हे महादेव! एक्के हार-मांस, एक्के खून, तकरा पश्चातो लोक हमरा अछूत बुझैये। हमरा संग जे भेल से भेल हमरा बेटाकेँ एहन दंश नहि झेलय पड़य। जँ एहन भ’ गेल तँ.... एकटा शराबी --- हे महादेव! पीबैत-पीबैत, सभटा धन-सम्पति स्वाहा भ’ गेल। तीन दिनसँ एक्को ठोप नहि भेटल अछि, हम अपन बेटी सुगियाकेँ ओहि दारूवाला लग.....जँ एक्को बोतल दिआ दी तँ.... मैथिली (भाषा) – हे महादेव! अहाँ तँ जानिते छी जे हमर गौरव, मान, मर्यादा, कहियो मिथालाकेँ के कहए जगत्ख्याति प्राप्त कएने छल, मुदा आइ अपनहि घरमे हम उपेक्षित छी। ओना आइ काल्हि मैथिलीक लेल तथाकथित संघर्षकर्ता लोकानि एतयसँ दिल्ली धरि धरना-प्रदर्शन कर’ चलि जाइत छथि, मुदा सबटा फुसि थिक, सबटा मिथ्याडंबर, तैँ जाधरि हमरा अप्पन घरमे सम्मान नहि भेटत ताधरि हम अपन गौरवकेँ पुनः प्राप्त नहि क’ सकैत छी। जँ एहने स्थिति रहलैक तँ भ’ सकैछ जे हम कहियो निर्वस्त्र भ’ जाएब। हे जगतपति! अहाँ मैथिल लोकनिमे मैथिलीक प्रति नवजागृति आनि दिऔक। एहिसँ अहाँकेँ सेहो लाभ हैत-- फेर कवि विद्यापतिक श्रुतिमाधुर्य नचारीसँ अहाँक मंदिरक वातावरण आप्लावित भ’ जाएत। हम कंगालिन छी, हमरा अहाँकेँ देबाक लेल किछु अछिए नहि, तैं हम की ‘डील’ करी ! हे महादेव सुतल किएक छी, जागू ! एहि अबलाक व्यथा सूनू-जाग’ जाग’ महादेव..... मैथिली ततेक जोरसँ चीकरलीह जे हमर ध्यान दुटि गेल। ने जानि आब कहिया महादेव दर्शन देताह। भाय-बहिनक व्यथा कथा (कथा निबंध) हुनका दुनूकेँ एकटा थाकल-हारल बटोही मानि सकैत छी। दुनूक चेहरा झमारल। आँखि सूजल। एकदम श्रीविहीन। हुनका दुनूमे की संबंध रहनि वा संबंधक निर्धारण कोना भेल हेतैक से कहब कने कठिन मुदा संबोधन सँ बुझाइत छल जे दुनू गोटे भाय-बहिन जकाँ रहथि। बैसतहि मैथिली बरसँ पूछलथि- “कहू भाय की हाल-चाल! एहन बगए किएक बनौने छी?” बर:      बीज रूपमे हम कहिया एहि धरतीक गर्भमे पड़लहुँ, कोना हमर अंकुरण भेल से सभ हमरा एकदम स्मरण नहि अछि। हँ, हमरा अपन नेनपनक किछु बात सभ स्मरण अवश्य अछि। ताहि दिन हमर उमिर यैह कोनो छओ मासक लगधक रहल हैत। तखन हम एकदम छोट रही एहि लेल हमरा माल-जालसँ बचएबाक लेल यैह जगरनाथ मिसर (शिव मंदिरक प्रमुख पुजेगरी) चारू दिससँ जाफरीसँ घेर देने छलाह। ताहि दिन मंदिरमे शिव आराधनाक लेल जतेको लोक-बेद अबैत छलाह, लोटाक बाँचल जल हमरा जड़िमे उझलि दैत छलाह। शिव-प्रांगणमे रहबाक परताप बुझू वा हमर अपन भाग्य, किछु महिला लोकनितँ हमरहुँ जड़िमे जल-फूल-अच्छत केर चढौआ चढ़ब’ लागलीह। देखतहिं-देखतहिं हम अपन पूर्ण यौवनकेँ कहिया प्राप्त क’ लेलहुँ से हमरो पता नहि चलि सकल। भीमकाय हमर देह। हरियर-हरियर पातसँ आच्छादित दूर-दूर धरि पसरल हमर डारि। जखन मंदिरमे शिव नचारी गाओल जाइक तँ पूरा वातावरण संगीतमय भ’ जाइक। बसात उन्मत्त भ’ कए हमरा पात सभकेँ एक्कहि संग झंकृत क’ दिअए आ ओहिसँ निकसल मेहीं सुर जेना नचारीक सुरसँ मिलिजुलि एकटा मनोहर दृश्य उत्पन्न क’ दैक। हमरा डारि-पातक छाहरिमे जेठक दुपहरिमे भरि गामक बूढ़-बुजुर्ग ओहि मचान पर बैसि शीतलताक अनुभव करैत छलाह। नेना सभ कतहुँ खो-खो तँ कतहुँ बुढ़िया कबड्डी खेलाइत रहैत छल। हे ओहि कातमे भरि गामक माल-जाल सभक लेल विश्रामस्थल छलैक। सालमे एकबेर बरसाइत (बटसावित्री) दिन हमर नव रूपेँ श्रृंगार कएल जाए। ओहि दिन हमर सौंसे धरे बुझू जे लाल-पीयर जनौ सँ लदि जाइत छल। हम गर्वोन्मत्त रही। हमरा बुझाइत छल जे सभदिन एहिना हमर जिनगी कटि जाएत। (एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ैत) ....मुदा हमरा सुन्दरताकेँ ककरहुँ नजरि लागि गेल। हमरा घमंडकेँ घून लागि गेल। एकबेर अही गामक लत्तर खाँक छोटका बेटाकेँ सौंसे देह खौजली भ’ गेल रहैक। भरि सहरसाक डागदर-बैदसँ देखेलाक पश्चातो ओकरा कोनो लाभ नहि भेलैक। किओ हुनका कहलकनि जे ‘पाँज भरि अमरलत्तीके जँ तीन-चारि दिन धरि हुनका पयरसँ मोलबा दिऔक तँ खौजली जड़िसँ उपटि जाएत।’ लत्तर खाँ कतए-कहाँसँ भरि पाँज अमरलत्ती आनलनि आ बेटासँ पयर तरेँ मोलबौलथि। खौजली उपटलनि कि नहि, से नहि जानि मुदा हम ओहि अमरलत्ती सँ अवश्य पाटि गेलहुँ। भेलैक ई जे ओहि अमरलत्तीक एकटा टुकड़ी लत्तर खाँ हमरा गाछक उपर फेकि देलथि। आ ओ अमरलत्ती जे ओहुना परजीवी होइत अछि हमरा सन हरियर गाछ पाबि धन्य भ’ गेल। आइ तँ हमरा सौंसे देह पर ओकरहि राज छैक। ओहि आयातित सौंदर्यक नीचाँ हमर नैसर्गिक सौंदर्य फड़फड़ा रहल अछि। हमर तँ दम निकलल जा रहल अछि। बूढ़-बुजुर्ग लोकनि एखनो अबैत छथि, नेना-भुटका सभ एखनहुँ बुढ़िया कबड्डी आ खो-खो खेलाइत अछि मुदा हमर अस्तित्वविहीन भ’ जयबाक परबाहि किनकहुँ नहि छनि। अहाँ त’ देखितहि छी जे हमर विशालकाय गाछ गामक प्रवेश द्वार पर अछि तैँ भरि गाममे बियाह-द्विरागमन, जनौ, मूड़न सन जतेको आयोजन होएत अछि सभमे लोक एत्तहिसँ तोरणद्वार बना अपन-अपन घर धरि भुकभुकिया बल्ब लगा कए बाट केँ झकझबैत अछि। एहन सभ अवसर पर हमरा कतेक कष्ट होइत अछि से हम नहि कहि सकैत छी। हमरा डारि-पात पर गत्तर-गत्तर भुकभुकिया बल्ब सभ लगा देल जाइत अछि जे भरि राति छिनार छौंड़ा-छौंड़ी जकाँ कनखी मारैत रहैत अछि..भुक...भुक...भुक...भुक। हमर तँ गत्तर-गत्तर झरकि जाइ ऐ। एकदिन भोगल पहलमान गामक लोक सभकेँ हमरहि गाछतर बजाकए प्रार्थना केने छलाह जे- “एहि बरक गाछ परसँ सभटा अमरलत्तीकेँ उजाड़ि-उपारि देल जाए नहि तँ ओ दिन दूर नहि जखन ई परजीवी एहि बर गाछकेँ नेस्तनाबूद क’ देतैक” मुदा गामक अधिकांश लोकक कहब रहैक जे- “ई कि कोनो लतामक गाछ छिऐक जे सूखि जेतैक! बर छिऐक बर....” बर तँ हम सरिपहुँ छी, मुदा जँ एहिना ई अमरलत्ती सभ हमरा डारि-पातक खून चोसैत रहत तखन कतेक दिन धरि हम जीबि सकब से भगवतीए जानथि.....। एतबा कहि बर फेर उदास भ’ गेलाह। मैथिली:           हमरो दशा तँ किछु एहने अछि भाय! हमरहुँ जनम कहिया भेल, कहिया हम लोक सभक जीभसँ उच्चरित भेलहुँ से सभ हमरहुँ स्मरण नहि अछि। हमरा तँ अहाँ जकाँ अपन नेनपनो स्मरण नहि अछि। असलमे नेनपन मे हमरा समस्त मैथिल समाजसँ ततेक ने दुलार-मलार भेटैत रहल जे हमर नेनपन अल्हड़पनहिमे बीत गेल। हमरा तँ जे किछु स्मरण अछि से अपन जुआनिएक। जेना अहाँ अपन पूर्णयौवनावस्थामे भीमकाय देह आ अपन विस्तीर्ण डारि-पात पर गर्व करैत छलहुँ तहिना हमहुँ अपन जुआनीमे मिथिलाकेँ के कहए अपन पड़ोसक राज आसाम, बंगाल सँ ल’ कए नेपाल (विदेश) धरि अपन श्रुतिमाधुर्य गुणक बलेँ पसरल छलहुँ। साहित्यक कोनो एहन विधा नहि जाहिसँ हमर श्रृंगार नहि भेल हो। ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, उमापति, चन्दा, मनबोध। हरिमोहन, यात्री, मधुप, ईशनाथ, राजकमल, प्रबोध।। प्रभृति सहस्त्रों कवि-लेखक लोकनिक द्वारा हमर साहित्य-संसारक श्रृंगार कएल गेल छल। ई संभवतः 19म शताब्दीक उत्तरार्ध रहल हेतैक जखन मिथिलो पर अंग्रेजी शासन आ शिक्षाक प्रभाव पड़य लागलैक। नाम कथी लेल कहब (भ’ सकैछ ताहि दिन ओ हमरा लेल शुभे सोचने हेताह) अंग्रेजी साहित्य सँ प्रतिस्पर्धा करबाक कारणेँ सबसँ पहिने ओ हमर अपन लिपि तिरहुता, जे हमर अस्तित्वक प्रतीक चिह्न छल तकरा उतारि कए फेकि देलथि आ हमरा पर देवनागरी थोपि देल गेल। तहिया के जनैत छलैक जे ई देवनागरी हमरा एकदिन साँस लेब कठिन क’ देत? आइ हमरा सौंसे देह पर ओकरहि प्रभाव अछि। ओकरा तरमे हम फरफरा रहल छी। एकर एकटा उदाहरण हम अहाँकेँ द’ सकैत छी-अहाँ भारतक कोनहुँ कोनमे चलि जाउ आ लोकक समक्ष बंगलाक कोनहुँ पाठ्य सामग्री प्रस्तुत क’ कए पुछियौनि जे “ ई कोन भाषा थिक? तँ ओ कहता जे बंगला” आ जँ से नहि तँ बेसी सँ बेसी कहताह- असमियाँ वा उड़िया, मुदा हुनकहि समक्ष कोनहुँ मैथिलीक पाठ्य सामग्री राखि दिऔक तँ ओ फट्ट द’ कहता जे ‘हिन्दी’। आब अहाँ कल्पना क’ सकैत छी जे तखन हमर मनोदशा केहन भ’ जाइत छल होएत। आर तँ आर जखन कखनो हम अपन आन सखी-बहिनपा (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क संग कहियो काल बैसैत छी तँ ओ लोकनि हमरा तेना ने फजीहति करैत छथि से नहि कहि सकै छी। हुनकासभ (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क कहब छनि जे- “देखू हमर धिया-पुता सभ विश्वक कोनहुँ कोनमे किएक नहि होथि, कोनहुँ भाषाक जानएबला किएक नहि होथि मुदा आपसी संवाद ओ लोकनि अपनहि भाषामे करैत छथि आ एकटा अहाँक धिया-पुता सभ छथि.......” साँच पुछू तँ ई सभ उपालम्भ सूनि करेज कटि जाइत अछि। जो रे दैब! जो रे हमर कपार! हमरा (मैथिली) के कहए ओ लोकनि अपन मैथिल संस्कृतिओ केँ तँ तहिना ताक पर रखने जा रहल छथि- धोती, तौनी, पाग, जनौ..., सोहर, समदाउन, बटगमनी, लगनी...., तिलौरी, अदौरी, तिसिऔरी, तिलकोर..., सभटा हेरायल जा रहल अछि...। अपन एहि सभ दुर्दशाक चर्चा जखन कहियो काल आन-आन भाषा लग करैत छी तँ जनैत छी ओ लोकनि हमरा की कहैत अछि? ओ सभ कहैत अछि- तोँ ईष्यालु छेँ, तैँ तोरा आन-आन भाषा सभसँ ईर्ष्या होइत छौक, तोँ आन-आन सभ्यता आ संस्कृतिसँ डाह करैत छैँ, समयक संग जँ नहि चलबेँ तँ एहिना पिछड़ल रहि जेबेँ आदि-आदि। आब अहीं कहू भाय! ई सभ तँ व्यर्थेक दोषारोपण छैक ने? दुनियाँक कोन एहन माए हेतैक जकरा अपन धिया-पुताक सुख नहि सोहाइत हेतैक। अहाँ तँ हमर भाय थिकहुँ, अहाँ सँ हम जे किछु कहब से साँच आ हृदयसँ। हमर धिया-पुता सभ जे आइ विश्वक अनेको कोन मे पसरल छथि, ओ सभ जखन सूट-बूट-टाई पहिरि निकलैत छथि आ फर्र-फर्र अंग्रेजी, जापानी, स्पैनिश, जर्मन, फ्रैंच आदि भाषा बौलैत छथि, फिल्मी गाना गबैत छथि, नीक-नीक होटल मे जा कए काँटा-छूरी सँ खाइत छथि तँ ई सभ देखि सरिपहुँ हमर करेज जुड़ा जाइत अछि। भगवतीसँ गोहारि करैत रहैत छियनि जे “हमर धिया-पुता सभ एहिना अखिल विश्वमे कला, संगीत, साहित्य, राजनीति सभ क्षेत्रमे अपन-अपन नाम आ जस करथु”। यैह परसूका गप्प थिक, फ्रैंकफर्टमे विज्ञानक क्षेत्रमे कएल गेल कोनो पैघ उपलब्धिक लेल हमरहि एकटा ‘सपूत’ केँ पुरस्कृत कएल जाइत रहैक, सौंसे दुनियाँक मीडिया वलासभ ओहि समारोहक कवरेज करैत रहैक, अपन सपूतक उपलब्धि पर गर्व करबाक लेल हमहु कोहुना ओत्त’ पहुँच गेल रही, जहिना-जहिना हुनका सम्मानमे किछुओ बाजल जाइक, तहिना-तहिना हमर करेज गर्वसँ पसरल जा रहल छल, मोन मे होइत छल जे  ओत्तहि मंच पर जा कए हम चिकड़ि-चिकड़ि केँ लोक सभकेँ कहि दिऐक जे- देखू हम ईर्ष्यालू नहि छी, हमरा विश्वक कोनहुँ विषय, भाषा, समुदाय, सभ्यता, संस्कृतिसँ कोनहुँ प्रकारक परहेज नहि......मुदा कार्यक्रमक अंतमे जखन हमर ओहि सपूतसँ पूछल गेलनि जे- अहाँक मातृभाषा की थिक? तँ हुनका मुँहसँ बहरेलनि अंग्रेजी!!! सरिपहुँ कहैत छी भाय! ई सुनितहि हमर करेज...., एतबे नहि घर अयला पर हुनकासँ हुनक पचमा किलासमे पढ़यबला बेटा पुछलकनि- “बाबूजी! बाबा तँ कहैत छथि जे हमरा सभक मातृभाषा मैथिली थिक, तखन अहाँ अंग्रेजीक नाम किएक लेलहुँ? जँ अहाँ सन-सन लोक सभ अपन मातृभाषाकेँ एना अछूत बूझैत रहताह तखन तँ मैथिलीक भविष्य.....।” बाप कहलकनि- चुप रह बुड़ि, ई कोनो आन भाषा थिकैक? मैथिली थिकैक मैथिली, एकर जड़ि पताल धरि पसरल छैक……। आब की कही भाय! हम अपन एहि सपूतक अटूट विश्वास पर विश्वास करी वा हुनक छोट बालक द्वारा कएल गेल हमर भविष्यक चिंताक प्रति आशा...! एतबा कहैत-कहैत मैथिलीक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसय लागलनि। बर, मैथिली केँ सांत्वना दैत रहलथि, हुनका मैथिलीसँ आर किछु सुनबाक अपेक्षा रहनि मुदा मैथिलीक मुँहसँ जेना बकारे नहि बहराइत रहनि, ओ कपसि-कपसि कए कानि रहल छलीह....। जेठ आ पूस (बीहनि कथा) जेठ 10 हजार टका जमा केनाय रामदीनक लेल पहाड़ तोड़’ सन कठिन काज छलैक मुदा ओ बेचारा कओ की सकैत छल? जँ ओहो बुचकुन माँझी जकाँ अपन बेटीकेँ जनम लेतहिं खैनी चटा कए मारि दितै तँ आर गप्प रहितैक। ओ तँ बड़ जतनसँ ओकरा पालि-पोसि पैघ केने रहए से आब ओकर बियाह करबाक लेल दहेज-दानवक क्रूर सपना तँ ओकरा पूरा करहि पड़तैक। ओहो धून केर पक्का लोक निकलल, गामक बीचोबीच बनएवला नव सड़कक लेल ओ हथौड़ा सँ दनादन-दनादन पाथर तोड़ि गिट्टीक ढ़ेर लगौने जा रहल छल। ओ भरि दिनमे तीन-चारि बेर अपन धोतीक गेंठ सँ टका निकालए आ गनए— एक, दू, तीन.....। बस कोनहुँ तरहेँ 3x15 केर एकटा आर ढेरी भ’ जाइक तखन तँ.....। लोग सभ कहैक जे रामदीन पागल भ’ गेल छैक तखनहि तँ जेठक एहन दुपहरिमे ओ अपना-आपकेँ जरा रहल अछि! मुदा रामदीन ककरहुँ बातक कोनहुँ जबाब नहि दैक, बस मोनहि मोन कहैक—‘औ लोकनि! एहि समाजमे जिनका किनकहुँ हमरा सन कुमारि कन्या छनि तिनकासँ पुछऔन्हि जे बेटीक बियाहक लेल जेठक ई दूपहरि केहन शीतलता दैत छैक?’ पूस हौ दैब, हौ दैब! एकटा बाछीक कारणेँ ओ सभ हमरा बेटीक हत्या क’ देलक। रामदीनक घरवाली जोर-जोरसँ अपन छाती पीटैत छलीह। बगलमे ठाढ़ रामदीनक 10 बर्खक बेटा हक्का-बक्का भ’ कए ठाढ़ छल। अपन बहिनक हत्यारा सभकेँ सबक सिखएबाक लेल पूसक ओहि सर्द रातिमे ओकर खून खौलैत रहैक। सौदागर (बीहनि कथा) सभदिन साँझकेँ ओ अपन दिनभरिक कमाइ केर हिसाब-किताब करैत छल आ भोजन-भातक पश्चात् जखन ओ अपन ओछओन पर जाइत छल तँ एकबेर ई अवश्ये सोचैत छल जे ओकर ई धन्धा अनैतिक छैक, मुदा सभदिन एहि प्रश्नक जवाबो ओकरा एक्कहि रंगक भेटैक— पाइ कमेबाक लेल सभकिछु उचित अछि। ने जानि ओकरा सन प्रतिभावान ओ मेधावी लोक एहन धन्धामे कोना आबि गेल। ओ सुन्नर-सुन्नर युवती लोकनिकेँ टकाक लोभ देखा फँसबैत छल आ शहरक नामी-गिरामी होटलक मालदार ग्राहक धरि पहुँचबैत छल। सभक लेन-देन केलाक पश्चात् ओकर जे कमीशन बनैक ओ राशि लगभग 3,000 सँ 3,500 धरि प्रतिदिन भ’ जाइत छलैक। संक्षेपमे ओकर महिनवारी आमदनी लगभग 1 लाखक लगधक पहुँच जाइत छलैक जकर उदाहरणों ओ प्रस्तुत केने छल। पछिले साल ओ अपन एकलौती बहिनकेँ अपन शहर सँ बहुत दूर एकटा महानगरक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजमे जथगर डोनेशन द’ कए नाम लिखवा देने छलैक। आइ साल भरिक पश्चात् ओ अपन बहिन सँ भेंट करबाक लेल ओहि शहर पहुँचल छल। अपना-आपकेँ ओ एकटा बिजनेसमैन बुझैत छल से एहु शहरमे अपन धन्धाक संभावना ताकबाक हेतु ओ निकलि पड़ल। बेस छानबीन केलाक उपरान्त ओकरा एहि शहरक एकटा उच्चस्तरीय वेश्यालय केर पता लागलैक। सौदा तय करबाक क्रममे ओकरा ओतुका दलालसँ कहासुनी भ’ गेलैक। दलाल कहैत रहैक— औ जी! अहाँकेँ अपन देहक लेल एकटा देह सैह चाही ने! तखन फेर ओकर चेहरा आ बोलीसँ अहाँकेँ कोन मतलब? जँ मंजूर होअए तँ.....। ओ एक-एक क’ कए सभक गदराओल देहक तजबीज करैत छल। ओहिमे सँ एकटा देह पर ओकर नजरि ठहरिए नहि रहल छलैक.....ओ इशारा केलक.....हे ई.....। युवतीक चेहरा पर नकाब रहैक। एतबो धरि स्पष्टे छल जे ओ सेहो अपना समक्षक लोककेँ नहि देखि सकैत छलीह आ मुँह तँ किओ खोलिए नहि सकैत छल। कहबाक तात्पर्य जे दुनूक बीच केवल स्पर्शक एहसास हेबाक रहैक। .....सी.....सी.....  अलबत्ते ई आबाज दुनूक मूँहसँ एक्कहि सँग बहरेलैक। दुनूक देह आब निष्क्रिय भ’ गेल रहैक मुदा दिमागमे बिजुरी चमकैत रहैक। दुनूकेँ एक दोसराक आबाज जानल-पहिचानल लागलैक। अन्तर्द्वन्द्व एतेक बढ़ि गेलैक जे ओ युवती उनटा मुँहें ठाठ भ’ कए अपन नकाब उठा एनाक परछाँहमे अपन सौदागरक चेहरा देखिए लेलकैक। क्षणहि भरिमे सौदागर सेहो अपन बहिनकेँ चीन्हि गेल। ने जानि दुनूमे सँ के अपना-आपकेँ पाथरक सदृश कठोर होइत अनुभव केलक! गरमी (बीहनि कथा) -बाबूजी, अहाँ हमरा कॉन्वेन्टमे किएक पढ़ा रहल छी? -किएक तँ हमरा मुन्नाकेँ पढ़ि-लिखि पैघ लोक बनबाक अछि तेँ। -मुदा सौम्या तँ कहैत छलीह जे ई स्कूल खाली पैघ बापक धिया-पूताक लेल छैक? -नहि बेटा, हुनका बात पर अहाँ ध्यान नहि दिअ, जँ एहन रहतैक तँ अहाँक नाम फादर लिखतथि? बाजू! -अपन घरक सोझाँ उतरैत प्रतीक बाजलाह—बाबूजी, बाबूजी, आइ बहुत जोरक शीतलहरी छैक, चलू घरहिमे आराम करब। एहनमे सवारियो तँ नहिए भेटत। -नहि बेटा, एखन हाट-बजारक समय छैक, दूइयो चारिटा सवारी तँ भेटिए जाएत, अहाँ घर जाउ। हम जँ काज नहि करब तखन हमरा मुन्ना राजाक लेल किताब-कॉपी ओ महग ड्रेस सभ कोना आओत? आ हमरा जाड़ लगितो कहाँ अछि? हम जखन उचकि-उचकि कए रिक्सा चलबैत छी तखन अपनहि देहमे गरमी आबि जाइत अछि। -अहाँ फूसि बाजि रहल छी बाबूजी, उचकि-उचकि कए रिक्सा चलएलासँ गरमी नहि अबैत छैक, घूस लेलासँ गरमी अबैत छैक। आइ भोरमे सौम्याक माय सेहो बी.डी.ओ. अंकलकेँ ऑफिस जेबासँ मना केने छलीह मुदा ओ कहलनि जे— आइ पच्चीसटा लोककेँ इंदिरा आवासक पाइ भेटबाक छैक, सभसँ हमरा 500 सय टकाक दरसँ घूस भेटएवला अछि, तखन ने मुट्ठी गरम रहत? -एहिबेर रामदीन बिन किछु बजनहि अपन रिक्सा आगू बढ़ा लेलथि आ मोनहि मोन सोचय लगलाह— हँ बेटा, गरमीएक परिभाषाकेँ बूझबाक लेल तँ हम अहाँ केँ पढ़ा रहल छी। लघुकथा- अवसरक निर्माण (1) धनमाक थुथूने देखि हम बुझि गेलहुँ, जे आई फेर ओकर कुहबा पाबनि भेल छैक। प्रो. साहेबक ओहिठाम नोकरी करबाक ई धनमाक चरिम मास छलैक। ओकर बड़का भाय सेहो हिनकहि ओहिठाम दूइ बरखसँ नोकरी करैत रहैक, पछिले मास ओकर ट्राँसफर प्रो. साहेबक छोट भाय लग झरिया भ' गेलैक। धनमाक भाइये तीन मास सँ ओकरा ट्रेनिंग दैत छलैक बर्तन-बासन सँ ल’ कए रसोई बनाएब, बोरहनि पोछा, कपड़ा-लत्ता साफ करब आदि-आदि। सभ लूरि तँ धनमा सीखि नेने रहय, खाली ओकरा तरकारी मे नून देबाक ठेकान नहि रहैक आ ताहि कारणेँ ओकरा कहियो-कहियो कुहबा पाबनि सहय पड़ैक। बारह बरखक धनमा देख’ मे एकदम गोर-नार। उज्जर दग-दग अँगाकेँ जखन ओ सिलेठिया रंगक हाफ-पेन्टक तर बिना बेल्टहिक डोराडोरि चढ़ा अंडरसेटिंग करैक त’ बुझाइक जे कोनो अंगरेजी स्कूलक चटिया हो। छौंड़ा चौथा किलास धरि पढ़लो रहैक, बाप कहलकै “गरीबक बेटा आब एहिसँ बेसी पढ़ि कए की करतैक? जो नोकरी कर ग’ घरमे दू पाइक मदति भ’ जाएत।” ने जानि किएक हमरा धनमासँ सिनेह भ’ गेल छल। तैं जहिया-जहिया हम प्रो. साहेबक बासा पर रातिकेँ ठहरी, भरिपोख धनमासँ गप्प-सप्प करी। नेना जाति, पहिल बेर घरसँ निकलल रहैक, से जखन-जखन ओकरा अपन माय-बापक यादि आबैक ओ कपसि-कपसि कए कानय लागय। ओकर कानब आ मनोदशा देखि हमरा ओकरा पर दया आबि जाइत छल। ओकरा प्रति दया हेबाक कारण हमरा आ धनमा मे एकटा सामानता रहैक। धनमो अपन परिवारक लेल नोकरी करैत रहय आ हमहुँ अपन परिवारक खातिर नोकरी करैत छलहुँ। अंतर यैह छलैक जे धनमाक उमिर रहय 13 बरख आ हम रही 25 बरखक। धनमा अपन सभटा दरमाहा अपन-माय-बापकेँ द’ दैत छल आ हम दरमाहा मे सँ किछु बचा कए पढ़ितो छलहुँ। एखन हम एम.ए. क छात्र रही। ओना तँ धनमा सभ दिन ड्राइंग हॉलमे सूतैत छल मुदा ओहिदिन ओ हमरहि पलंगक नीचाँ अपन पटिया-दरी बिछा पड़ि रहल। जखन राति निशबद भ’ गेलैक, प्रो. साहेब आब सूति गेल हेताह, ई जानि धनमा हमरा टोकलक। “अइं यौ भाइजी, टाटाक नून आर नूनसँ बेसी नूनगर होइत छैक की?” “नहि त’!” नहि यौ भाइजी हम से नहि मानब, एहिसँ पहिने हमरा ओहिठाम ‘कैप्टन कूक’ नून अबैत रहैक, तरकारी मे दूई चम्मच दियैक तखनो मालिक आ मलिकाइन किछु नहि बाजय। ई सार टाटाक नून जहियासँ आएल छैक हमरा एकर अंदाजे नहि रहै यै। डेढ़ चम्मच दिऔक तखनो जहर आ एक चम्मच द’ दिऔक तखनो जहर। अही नूनक खातिर हम एतेक मारि खाइत छी। अच्छा एकटा बात कह धनमा, “तोरा ओहिठाम टाटाक नून कहिया सँ अबैत छौक?” “एक मास सँ।“ “एहि एक मासमे तोरा कैक बेर मारि लागलौ?” “अही बेर।” “बस । एकर माने भेलैक जे गलती तोहर छौक नूनक नहि।” आ हमरा मालिकक कोनो गलती नहि? ओ नहि बुझि सकैत छथि जे धिया-पुता छैक एक दिन गलतीए भ’ गेलैक त’ की हेतैक, एहन छोट-सन गलतीक लेल एहन मारि? हुनक बेटो तँ हमरे तुरिया छैक, ओकरा किएक नहि मारै छथिन? जानै छी भाइजी काल्हिए गणेश हमर 30 टा टका चोरा क’ आइसक्रीम खा’ लेलक, मुदा चोरि-सन अपराधक बाबजुदो मालिक ओकरा किछु नहि कहलथिन। “तोहर 30 टका चोरा लेलकौक! तोरा कत सँ टका एलौ?” हुँ-हुँ भाइजी, हमरा 93 गो टका छैक। मालिकक ओहिठाम जे पर-पाहुन सभ अबैत छथिन से हुनका सभक अटैची आ बैग जे नीचाँ धरि ल’ जाइत छियैक तँ ओ सभ कहियो-कहियो हमरा पाँच-दस टका द’ दैत छथि। हम ई टका अपना मालिकीनिकेँ द’ दैत छियैक राख’ लेल। ओहि घरमे टेबुल पर एसनो वला एकटा उजरा डिब्बा देखने छिऐक? ओहिमे हमर सभटा टका रहैत छैक। 100 सय टका पूरि जतैक तँ हम अपना छोटकी बहिन लए फराक कीनबै। काल्हि गणेश ओहिमे सँ टका चोरा नेने छलैक। अच्छा कोनो बात नहि, प्रो. साहेब गणेशकेँ किछु नहि कहलथिन एकर माने भेलैक जे आगू चलि कए ओकर संस्कार खराब भ’ जेतैक। तोँ चोरि नहि करैत छैं एहि लेल तोहर संस्कार नीक भ’ जेतौक। एखन तो नेना छैँ ई सभ बात नहि बुझबेँ। हँ यौ भाइजी, हम सभ बात बुझै छियै। गणेश पढ़ै लिखै छैक ओकर संस्कार कतबो खराब हेतैक तैयो ओ बाबूए कहौताह आ धनमा धनमे रहि जाएत। एहन बात नहि छैक धनमा, गुलटोपीकेँ चिन्हैत छही? ओ कतेक पढ़ल-लिखल छैक से जानैत छही? नहि ने! ओ औंठा छाप छैक, औंठा छाप, आ केहन चमचम करैत गाड़ी पर चढ़ैत छैक? ओकर मुंसी बी.ए.पास छैक। गुलटोपी ठिकेदार छियै। लोकमे बस मेहनति, लगन आ इमानदारी हेबाक चाही ओ कहियो किछु क’ सकैत अछि। ई सभ बात तोँ एखन नहि बुझि सकबेँ कने आर चेठनगर भ’ जो तखन अपनहि बुधि भ’ जेतौक। .............................. “अइँ यौ भाइजी! अहुँ गरीब छियै?” “के कहलकौ?” प्रो. साहेब बाजैत रहथिन जे “विवेक बड्ड गरीब छैक। कमा क’ घरो देखै छैक आ पढ़बो करै छैक।” “हँ, ठीके कहलथुन।” तँ अहाँ मैथिली किएक पढ़ैत छी, साइंस किएक नहि पढ़ैत छी? साइंस पढ़िकए लोक डागदर, इंजीनियर बनैत छैक। प्रो. साहेब कहैत रहथिन “बेचारा साइंस कत’ सँ पढ़तैक? ट्यूशनक टका कत’ सँ आनतैक तैं मैथिली पढ़ैत छैक।” अइं यौ भाइजी मैथिली बड़ खराप विषय होइत छैक? नहि रौ बकलेल। भाषा कोनहुँ खराप नहि होइत छैक। भाषाक विषयमे सोचएबला खराप होइत छैक। अच्छा एकटा बात बता “तोरा जँ मैथिली बाज’ नहि आबितौक तँ तू हमरा सँ बात क’ सकितेँ?” नहि यौ भाइजी! प्रो. साहेब फूसि बाजैत रहथिन। मैथिली सन सरस आ नीक आन कोनो भाषा भइये नहि सकैये। हुनका देखैत छियैन जे ओ प्रो. सभक संगे मैथिली बाजैत-बाजैत अंगरेजीमे किदन कहाँ गिटिर-पिटिर, गिटिर-पिटर बाज’ लागैत छथिन। अच्छा ई बताउ मैथिली पढ़ि कए अहाँ प्रो. बनि सकै छी? हँ, किएक तहि! तखन तँ अहाँ प्रो. अवश्ये बनब भाइजी। धुर, पकलाहा नहितन। भाइजी एकटा बात आर कहू, “गरीब लोक कहियो धनिक बनि सकैत अछि?” “एकदम बनि सकैत अछि?” धनमा कने काल चुप रहल, आ चुप्पे-चुप सुति रहल। (2) हम साल भरिसँ दिल्लीक एकटा प्राइवेट कम्पनीमे काज करैत छी। प्रेमनगर सँ लाजपतनगर धरि प्रायः बस सँ आन-जान होइत अछि, कहियो काल लोकल ट्रेनसँ सेहो चलि जाइत छी। आइ कम्पनीमे कने बेसी काल रुक’ पड़ल से भूख सँ छोहाटल रही, तैं पापड़-पापड़’क शब्द सुनि पापड़वलाकेँ बजेलिए – “ऐ पापड़वाले! एक पापड़ देना।” पापड़ वला सोझाँ आएल, पापड़ देलक। पाय देब’ लागलिऐक की ओ पापड़ वला हमरा पयर पर खसि पड़ल आ बड़ दुखी स्वरेँ बाजल—“भाइजी हमरा नहि चिन्हलियै? हम धनमा।” धियान सँ देखलहुँ ओ धनमे छल। हमरा कने ग्लानिओ भेल। हम तत्क्षण उठि धनमाकेँ हृदय लगा लेलिऐक दुनू गोटे भाव-विभोर भ’ गेलहुँ। हम धनमाकेँ अपन कातमे बैसाबैत पूछलिऐक, “कह धनमा की हाल-चाल, एतय कोना?” ओ बाजल भाइजी अपनेकेँ स्मरण अछि हमर ओ मारि? ओ राति? हम ओतए मारि खाइत-2 तंग भ’ गेल रही। तरकारीमे नून बेसी भ’ गेल त’ मारि, नून कम भ’ गेल त’ मारि, कपड़ामे दाग रहि गेल त’ मारि......। भाइजी अंतिम रातिकेँ जे हमरा अपनेसँ भेंट भेल छल तकर परातेक बात छियै, प्रो. साहेबक डेराक नीचाँ जे चाहक दोकान रहैक हलाल खान केर, तकरहि बेटा दिल्ली मे दरजीक काज करैत रहैक, ओकरे सँ हमर भेंट भेल तँ ओ कहलक—“चल हमरा संगे दिल्ली, ओतए कपड़ा मे काज-बुटाम लगबिहें बैसल-2, खेनाय-पिनाय आ पाँच सय टका महिना देबौ।” हमरा लग भाड़ा जोगड़ पाय रहबे करए, ओहिदिन भागि गेलहुँ ओतए सँ। तीन मास धरि ओकरहि दोकान पर रहलहुँ। ओहि दोकानक बगलहिमे एकटा पापड़वला रहैक जकरा ओहिठाम सँ नितदिन देखिऐक हमरे सभक तुर केर बच्चा सब थाकक-थाक सेदल पापड़ ल’ जाइक। एक दिन हम ओहि दोकान पर गेलिऐक तँ भाइसाहेब (पापड़वला) हमरा कहलक- “पापड़ बेचोगे? देखते हो ये लोग तुम्हारी ही उम्र के हैं 100 रुपया रोज कमाता है। पूंजी भी तुम्हारी नहीं लगेगी, बस यहाँ से सेंका हुआ पापड़ ले जाओ, दिन भर घूम-घूमकर बेचो और शाम को पैसा जमा कर दो। एक पापड़ का तुमको 50 पैसा देना होगा उस पापड़ को दो रुपये में बेचो। मतलब एक पापड़ पर तुमको 1.50 पैसा बचेगा, जितना बेचोगे उतना ही कमाओगे।” हमरा ई बिजनेस जँचि गेल। हम दोसरहि दिनसँ पापड़ बेच’ लागलहुँ। पहिने किछु दिनतँ करोलेबाग धरि रहैत छलहुँ, मुदा आब तँ ततेक ने उडाँत भ’ गेल छी जे दिल्लीक साइते कोनो एहन कोन हेतैक जतय हम नहि गेल छी। एखन हमर दू टा बिजनेस चलै यै भाइजी। भोर 8 बजे सँ 11 बजे धरि राम मनोहर लोहिया अस्पतालक गेट पर नारियर बेचैत छी, ओहुमे एक पीस पर सरपट आठ अनाक बचत छैक। दू सय पीस तँ निदान बिकिए जाइत छैक। सय टका रोज हमरा ओहिसँ अबैत अछि। साँझ चारि बजे सँ राति नओ बजे धरि बस, ट्रेन, पार्क सभमे पापड़ बेचैत छी तँ ओतहुँ निदान 4-5 सय पीस पापड़ बेचिये लैत छी। हम मोने-मोन हिसाब लगब’ लागलहुँ, “नारियर मे 100 सय टका आ पापड़ मे 400 डयोढे 600 टका। एकर माने धनमाक कमाय एखन 700 सँ 800 टका रोज छैक।” धनमा आगू बाजल—भाइजी, हम तीन साल धरि ने घरमे कोनो चिठ्ठी-पत्री देलिऐक आ ने ककरो जान’ देलिऐक जे हम कत’ छी। हमर माय-बाप आ गाम समाजक लोक बुझय जे “धनमा मारि-हरि गेल।” तीन सालक बाद गाम गेलहुँ। ओतए दू कोठलीक पक्का ढोकलहुँ। तीन बिगहा खेत किना, देलिऐक बाउकेँ। एक जोड़ बड़द आ एकटा पम्पिंगसेट सेहो कीनि देलिऐक। अगिला मास एकटा टेक्टर किन’ चाहैत छी। हमर बड़का भाइ आब गामहिमे रहिकए खेती-बारी करै यै। ओकरो प्रो. साहेबक भायक ओहिठाम सँ चाकरी छोड़ा देलिऐक। हमर बहिन मिल्लत स्कूल दरिभंगा मे पढ़ैत अछि। ओ एखन दसमा मे छैक। पढ़’ मे बड़ चन्सगर, सभ साल अपन कक्षामे फस्टे करैत छैक। कहैत छैक “हम डाकदर बनब”। हमरा विश्वास अछि भाइजी हम ओकरा डागदर बना देबैक। धनमा आगू बाजल—“अहाँ अप्पन कहू भाइजी अपने एत कोना?” हम एतए एक बरखसँ छी, एकटा प्राइवेट कम्पनी मे काज क’ रहल छी । 5000 हजार टका दरमाहा अछि हमर। “बस पाँच हजार! एहिमे कोना गुजर करै छी यौ भाइजी?” रौ धनेसर तोरा बुझल छौक ने जे हम मैथिली सँ एम.ए. केने रही। मैथिलीक सर्टिफिकेट ल’ क’ सौंसे दिल्ली धांगि देलिऐक? एतए भाषा नहि टेक्निकल ज्ञान चाही। धनमा कनेकाल चुप भ’ गेल..... ओ बाजल-- भाइजी अहाँ तेँ तेहन ने बात हमरा कहि देलिऐक जे हमरा किछु फुरिते नहि यै? आब आइ हम अहाँ केँ नहि छोड़ब, अहाँ केँ हमरा बासा पर जाय पड़त। धनमा हमरा विवश क’ देलक, ओहि दिन हम करोले बाग टीसन पर उतरि गेलहुँ। धनमाक बासा करोलबाग टीसन सँ लगीचे रहैक। ओहि छोट-सन घरक एक हिस मे रसोई बनएबाक बरतन-बासन रहैक, दोसर दिस मे ओकर कपड़ा–लत्ता, ओछाओन आदि आ शेष भाग मे एकटा बड़का-टा रैक रहैक जाहिमे किताब सभ ढाँसल। ओकरा ओछाओन पर सेहो कैक टा मैथिलीक पत्र-पत्रिका सभ छिड़िआएल रहैक, से देख हमरा कने अचरज भेल। धनमा हमर मनोदशाकेँ भाँपि लेलक। ओ बाजल—“भाइजी ई हमरे डेरा थिक निश्चिन्त रहू। हम अहाँ केँ एतय नहि अनितहुँ, अहाँ जतबे बाजि देलियैक जे मैथिली सँ एम.ए.....। भाइजी हमरा अहाँक ओ उपदेश सभ एखन घरि स्मरण अछि। अही ने हमरा एकदिन कहने रही जे, प्रेमचंद गणितमे फेल भ’ गेल छलाह, जयशंकर प्रसाद पचमे धरि पढ़ने छलाह, गुलटेन औंठा छाप अछि आ...., भाषा कोनो नहि खराप होइत छैक, मेहनति, लगन, इमानदारी सँ.......। भाइजी अहाँ मैथिलीक धनेसार कामति केँ जनैत छियैन?” हँ, हुनकर किछु रचना सभ पढ़ने छी, चेहरा सँ हम हुनका नहि चिन्हैत छियनि। ओ बाजल त’ लिअ आइ चेहरो देखिए लिअ – हमहीं छी अहाँक धनेसर कामति। भाइजी हम अही सँ प्रेरणा ल’ क’ आइ स्वाध्यायक बलेँ मैथिली साहित्य मध्य धनेसर कामतिक नामे ख्यात् छी। यौ आइ हम प्रतिमास ओतेक टका कमा लैत छी जतेक प्रो. साहेबक दरमाहा छनि। भाइजी अहाँ पढ़ल-लिखल लोक छी, 5000 केँ 50000 मे कोना बदलल जाय ? से अहाँ सोचि सकैत छी। माफ करब भाइजी! छोट मुँह पैघ बात। हमरा जनिते अहाँ अवसरक प्रतीक्षा क’ रहल छी, किछु नहि भेटत, किछु नहि क’ सकब, भाइजी अवसरक निर्माण करू, निर्माण.....। हम मोने-मोन सोच’ लेल बाध्य भ’ गेलहुँ जे 18 बरखक अनपढ (?) धनमा नीक आकि हमरा सन 30 वर्षीय मैथिलीक स्नातकोत्तर? लघुकथा-दूभि 09 मई 2008 क बात थिक। गाम गेल रही। साँझ चारि बजे तरकारी किनबा आ घुमबाक लाथे तिरंगा चौक दिस चलि गेलहुँ, घुरैत काल स्कूल लग अबैत-अबैत दीया-बातीक बेर भ’ गेलैक। गरमीक दिन छलैक मोन भेल कनी काल स्कूलक ओहि प्रांगणमे सुस्ता ली जतय कहियो बैसि हम अपन पाठ याद करैत रही। जहिना बैसबाक उपक्रम कयलहुँ कि एकटा अप्रत्याशित स्वर सुनबामे आयल... हे बाउ! ओतय नहि एमहर आउ। हम चौंकि गेलहुँ, देखैत छी तँ सरिपहुँ एकटा स्त्री हमरा सोझामे ठाढ़ छलीह आ बैसबाक आग्रह क’ रहल छलीह। हम बैसि गेलहुँ, हमरा सम्मुख ओ स्त्री सेहो बैसि गेलीह। हम साश्चर्य ओहि स्त्रीकेँ देखय लागलहुँ जिनक रूप-रंग किछु एना रहनि---हरितवर्णक शरीर ताहिपर हरियर रंगक मैल,पुरान-सन साड़ी जे कहुना हुनकर स्त्रीयांगकेँ झाँपने रहनि, ताहूमे कतोक ठाम पियन लागल, शेष शरीर उघारे बुझू। सम्पूर्ण शरीरमे छोट-पैघ घाव जाहिसँ पीज बहैत रहनि। एक-दू ठाम मैला सेहो लागल, जे दुर्गन्ध करैत छल। बामा जाँघ पर ढ़ल-ढ़ल करैत फोका, दहिना जाँघ पर गोदना जकाँ कोनो विशिष्ट आकृति, दुनू हाथ नोछड़ल जकाँ, माथक केश गोबरछत्ता जकाँ जाहिमे शिखर, पान-पराग, तुलसी, रजनीगंधा, माणिकचंद गुटखा, आदिक फाटल-चिटल पुड़िया, अखबार, कागदक टुकड़ी, जड़लका सिगरेटक पुत्ती आ टुकड़ी, सुखल गोबर, सूगरक मैला आदि-आदि सभ ओझरायल। एहि नारीक विचित्र ओ दयनीय दशा देखि हमर उत्कंठा बढ़ि गेल। हम पुछलियनि-- अहाँ के छी? ओ कहलनि-- हम दूभि थिकहुँ। वैह दूभि जाहि पर अहाँ एखन बैसल छी। वैह दूभि जतय बैसि अहाँ नेनपनमे नीरजक कविता पढ़ैत छलहुँ “यह जीवन क्या है निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, सुख-दुख के दोनो तीरों से चल रहा राह मनमानी है...।” हम फेर पुछलियनि –अहाँक एहन दुर्दशा किएक ? ओ बजलीह--- बाउ, हम देखि रहल छी जे अहाँ तखनसँ हमर अंग-प्रत्यंगकेँ खूब नीक जकाँ निहारि नेने छी। पहिने अहाँ बताउ, हमरा सुनबामे आयल अछि जे अहाँ साहित्यमे उच्च शिक्षा प्राप्त केने छी, ओहुमे मैथिली सन सरस साहित्यमे। हम कहलियनि—सत्ते कहलहुँ। तखन संभव भ’ सकय त’ हमर एहि दयनीय दशाकेँ अहाँ कोनो पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित करबा दिऔक। आ ओ आश्वस्त हैत बाजय लगलीह—बाउ, हमर शरीर स्कूलक एहि हातामे पसरल दूभिक प्रतीक थिक तैँ हरियर। हमरा माथ पर जे अहाँ गुटखा, सिगरेटक टुकड़ी, अखबार आ कागदक टुकड़ी देखैत छी से एहि स्कूलक छौंड़ा-छौंड़ी सभक किरदानी थिक, हम अहाँकेँ कहैत जाइत छी आ अहाँ एमहर-ओमहर नजरि दौड़ा-दौड़ा क’ देखने जाउ....। हमर देह जे घावसँ दागल अछि से सिगरेटक जड़लका पुत्तीसँ, हाथ जे नोछड़ल देखैत छी से थिक मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकरक किरदानी, ओ सभ दिन एतय आबि छिल्ला छिलैत अछि, दिनमे कैक बेर सूगर, महिस, गाय, बकरी आदि हमरा दूषित करैत रहैत यै, बाम जाँघ पर ई ढ़ल-ढ़ल फोका थिक वैह मंगरूआक लोकक किरदानी, ओ काल्हि राति चूल्हिक अँगोरा हमरा देह पर फेंकि देलक, आ हमरा दहिना जाँघ परक ई चेन्ह जकरा अहाँ गोदना बुझि रहल छी से वस्तुतः कोन चीजक आकृति थिक से हमरा कहितहुँ लाज लागि रहल ऐ, साँझहिकेँ, माने एखनसँ कनी कालक पश्चाते देखबैक जे एहि गामक गँजेरी छौंड़ा सभ हेज बनाकेँ आओत, सिगरेटमे भरि कए गाँजा पीयत आ हमरा झरका-झरका कए एहन अश्लील आकृति बनबैत अछि, हे! ओहिठाम देखियौक..., ई जे मैला देखि रहल छी, से थिक एहि आस-पड़ोसक स्त्रीगणक काज, कने रतिगर भेलाक बादे एक दिस सँ पथार जकाँ बैसि जाइत छथि। हे! ओमहर देखियौक हत्ताक कछेड़मे... की कहू बाउ, जीयब दूभर भ’ गेल अछि। (एकटा दीर्घस्वास लैत) ओ फेर बाजय लगलीह--बाउ, अहाँकेँ अपन नेनपनक बात स्मरण अछि ने ? ताहि दिन प्रातः 10 बजे (प्रायः) स्कूल पहुँचलाक पश्चाते सभसँ पहिने सरस्वती वन्दना होइत छलैक जाहिमे शिक्षक-छात्र सभ क्यो भाग लैत छलाह। तकरा बाद श्रीवास्तव मास्टर साहेब सभ नेनाकेँ एक पतियानीसँ बैसा दैत छलाह, आ ओसब नेना एकहक टा कागद आ आन-आन सभ प्रकारक गंदगी सभ चुनि-बीछि लैत छल। हमर काया एकदम साफ भ’ जाइत छल। कक्षा सभमे जखन हाजरी होइत छलैक तँ नाम पुकारल जाइत छलैक, हरेराम, युगलकिशोर, शंभु, कुमारसंभव, चन्द्रकला, रहीम, कौशल्या, कतेक मधुर आ सार्थक नाम! सुनि कए मोन तृप्त भ’ जाइत छल। साँझ के नेना सब कबड्डी आ खो-खो खेलाइत जखन गिर जाइत छल तँ हम ओकरा बेसी चोट नहि लागय दियैक, वात्सल्यक अनुभव करैत छलहुँ तहिया। शनि केँ विशेष आयोजन होइत छलैक। शनिचराक गुर-चाउर बाकुटक-बाकुट नेना सभ खाइत छल, की कहू बाऊ, अहाँ सभक हाथ सँ गिरलाहा गुर-चाउर खयबा लेल हमहुँ शनि दिनक प्रतीक्षा करैत छलहुँ। दोसर पहरमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक। “जगदम्ब अहीं अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आस ककर...। कखन हरब दुःख मोर हे भोला बाबा... । दुनियाँ मे तेरा है बड़ा नाम, आज मुझे भी तुमसे पर गया काम....।” अहाँकेँ तेँ स्मरण हेबे करत बाउ रमाकान्त एकबेर गयने छलाह “चल चमेली बाग मे मेवा खिलाऊँगा.....” ताहिपर मोलवी मास्टर साहेब हुनका चुत्तर पर ततेक ने छौंकी मारने रहनि जे बेचारेक सभटा मेवा घोसड़ि गेल रहनि। आ अहाँकेँ ओ अन्त्याक्षरी वला बात याद अछि की नहि? तहिया अन्त्याक्षरी मे कविताक पद्य सभ पढ़ल जाइत छलैक, अहाँ एकबेर ‘य’ पर अटकि गेल रही, गाब’ लगलहुँ—“ये मेरा दीवानापन था....”अहाँकेँ मोलवी साहब बजा कए पुछने छलाह “यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ......अहाँ काल्हिये ने याद केने छलहुँ, तँ बिसरि कोना गेलहुँ ? ” आ तकरा बाद हुनक छड़ी आ अहाँक दुनू हाथ। एकदिन रविशंकरक चुगली एकटा नेना क’ देने रहैक जे “मास्टर साहेब ई अपन ककाक जड़लका बीड़ी पीबैत रहय” एहि लेल श्रीवास्तव मास्टर साहेब रविशंकरकेँ रौद मे एक घंटा धरि अहीठाम मुरगा बना देने रहथि। ताहिदिन ककर मजाल रहैक जे एहि स्कूलक हाता मे क्यो गाय, महीस, आ बकड़ी-छकड़ी ल’ कए घुसि जायत। यैह मोद बाबू (मुखियाजी) क नोकर एतय एकबेर छिल्ला छिलय बैसल रहय, मुखियाजी हुनका ततेक ने गारि-बात दलकैक, तकर ठेकान ने। ओ बजने जाइत छलीह आ हम अपन अतीतलोकमे विचरण क’ रहल छलहुँ। अचानक हम हुनका टोकि देलियनि-- अच्छा एकटा बात कहू, आइ काल्हि की एहन व्यवस्था नहि छैक एतय ? आब तँ देखै छियै जे ताहि दिन सँ बेसी सरकारक ध्यान शिक्षा पर छैक। लोक सेहो जागरूक भेल अछि शिक्षाक प्रति। हम त’ देखि रहल छी जे नीक भवन अछि, पानि पीबा लेल कल अछि, मूत्रालय अछि, शौचालय अछि, उचित संख्यामे शिक्षकगण छथि, आब की चाही ? ओ बजलीह-- औ बाउ! अहाँ जे किछु बजलहुँ सेहो साँचे थिक मुदा अहाँ आइ एलहुँ काल्हि चलि जायब। हम तँ कतोक बरखसँ एतहि छी आ प्रत्यक्षदर्शी छी, तैँ हमहुँ जे कहल आ जे कहब से फूसि नहि। एतय दूई भवन मे चारि टा कक्ष छैक आ विद्यार्थी 400 सयक करीब, एक तिहाई बच्चा कक्षमे बैसैत छैक आ शेष एहि हातामे आ ओहि बड़क गाछतर घुड़दौड़ करैत रहैत छैक, क्यो गुटखा, क्यो....., क्यो चरैत महिसक सींग पर दय ओकरापर चढ़बाक अभ्यास करैत अछि तँ क्यो........। शौचालय, मूत्रालयकेँ अहाँ एकबेर देखि अबियौक एकोटामे पल्ला नहि लागल छैक, उपरसँ ततेक दुर्गन्ध जे राम कहू ! कल अहाँ काल्हि आबि कए देखि लेब। ई तँ परसू जलघर बाबूक बेटीक बियाह छलनि ताहिलेल ओ अप्पन कल एतए लगौने छलाह, आ शौचालयमे बोराक चट्टी। काल्हिए कलो खुलि जेतैक ? एतय गड़लाहा पाइपे टा स्कूलक छैक। की कहू, कल जहिना लागै छैक पाँचे-दस दिनमे क्यो चोरा लैत छैक। हे लियह! कुकुरक झौहड़ि सुनि रहल छी ने अहाँ ? बराती सभ जे काल्हि भोरमे चूड़ा-दही खा-खा क’ पात सभ स्कूलक पछुआड़ि मे फेकने छल ततहि कुकुर सभ लड़ि रहल अछि। खैर! छोडू ई सब बात। आब पढ़ाईक व्यवस्था सुनू--- अहाँ केँ तँ बुझले हैत जे हमरा सभक दयानिधान मुखमंत्रीजी कॉन्ट्रेक्ट पर कैक लाख लोककेँ बिना कोनो परीक्षे-तरीक्षे नेने मास्टर बना देलथिन, सेहो की जे गामक लोक गामहिमे शिक्षक हेताह। तैँ ढ़ोरहाय-मंगड़ू सब शिक्षक बनि-बनि एतय आबि गेल छथि, जिनकामे सँ कतोक केँ तेँ अपन नामो.....। प्रार्थना आब नहि होइत छैक। जँ कहियो काल होइतो छैक तँ चारि सय मे सँ चारिये टा नेनाक मुँहसँ स्पष्ट शब्द बहराइत छैक बाँकी सब आऊँ-आऊँ, ऊँ-ऊँ करैत रहैत छैक। हाजरी मे नाम पुकारल जाइत छैक-–डबलू, बबलू, डेजी, रोजी, स्वीटी.....। शनिचराक प्रथा उठि गेल छैक। सांस्कृतिक कार्यक्रम एखन धरि होइत छैक, एखनो गीत गाओल जाइत छैक—“एक आँख मारूँ तो पर्दा हट जाये, दूजा आँख मारूँ कलेजा फट जाये.........। तनी सा जींस ढीला कर.... आदि।” एक दिनक बात कहैत छी, एकटा विद्यार्थी गाना शुरू कएलक—“चोली के पीछे क्या है......” आकि सबटा मास्टर ठेठिया-ठेठिया क’ हँस’ लागलाह। मंजय मास्टर साहेब केँ नहि रहल गेलनि ओ नेनाकेँ डाँटि कय बैसा देलथिन। ताहिपर, मंतोष मास्टर साहेब आ मंजय मास्टर साहेबमे नीक जकाँ बाझि गेलनि। मंजय मास्टर साहेब कहलैथ—मेरा मानना है कि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है, अगर यही गाना गाना उस बच्चे की मजबूरी है, तो हम एक शिक्षक होने के नाते इसी गाने के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल सकते हैं, बस एक वाक्य में समझाकर की, “चोली के पीछे, ‘माँ’ होती है, जिसका अमृतपान करके हम, आप, सबके शरीर को जीवन मिला है।” एहि घटनाक बाद सभ शिक्षक मिलि कए मंजय बाबूक नव नामकरण कय देलकनि ‘मायराम’। तहिया सँ ओहि कागमंडली मे हंस सदृश्य मंजय बाबूक बुधिये हेरा गेलनि। एकटा आर गप्प सुनू, यैह पिछले शनि दिनक बात छैक, अन्त्याक्षरी चलैत रहैक, एक सँ बढ़िकए एक कटगर फिल्मी गाना सब नेना लोकानि गबैत छल, अचानक ‘य’ पर एकटा दल अटकि गेलैक….. एकटा बच्चा उठल आ कहलक, “यह लघु सरिता का बहता जल, कितना शीतल, कितना निर्मल.......।” एकटा मास्टर साहेब ओहि बच्चकेँ लगमे बजौलकनि आ कहलथि-- “अहाँ काल्हिये ने अपन मम्मी-पप्पाक संग सिनेमा देख’ सहर्षा गेल रही, ओहि सिनेमाक गाना, ये गोरी गोरी बाँहे, ये तिरछी तिरछी.......,बिसरि गेलहुँ ? बड़ भोदू छी अहाँ।” दुभि रानीक कथा चलितहि रहनि की एहि बीचमे हमरा एकटा आर नारीक कर्कश स्वर सुनाए पड़ल... “गै माय के छियै ई मुनसा! ऐतेक कालसँ एतय की क’ रहल छैक? बुझैत नहि छैक जे ई लोक-बेदक, बाहर-भीतर करबाक बेर छैक?” हमर ध्यान ओमहर गेल, अन्हारमे बुझा पड़ल जे तीन-चारिटा स्त्रीगण एम्हरे बढ़लि चलि आबि रहल छलीह। हम जा एमहर ताकी ताधरि दूभिरानी निपत्ता ! हमहुँ उठि कए घर दिस चलि देलहुँ। ओहि भरि राति हमरा निन्न नहि भेल। कारण छल जे हम ई निर्णय नहि क’ सकलहुँ जे ओ सरिपहुँ दुभिए छलीह आ कि हमरा मोनक भ्रम ? जतेक सोचैत गेलहुँ ओतेक ओझराइते गेलहुँ, मुदा एकटा बात हमरा मोनमे घर क’ लेलक जे ई घटना एकटा कथाक रूप अवश्य ल’ सकैत अछि। काल्हिए हमरा मैसूर जेबाक रहय। सोचलहुँ एकर पांडुलिपि बना कए कोनो पत्रिकाक संपादक लग प्रेषित क’ देबैक, जँ ई कथा छपि गेल तँ हमहुँ अपन सीना तानि कए कहब जे “हम मैथिलीक कथाकार छी” सोझे-सोझ मैथिलीक एम.ए., पी-एच.डी. कहयलासँ कोनो प्रतिष्ठा नहि। मैथिली पढ़ि जँ मैथिलीक कथाकार, साहित्यकार नहि कहयलहुँ, तँ मैथिली पढ़बे किएक कएलहुँ ? हँ एकटा समस्या तँ रहिये गेल, एहि कथाक शीर्षक की दिऐक ? चलू जेहने कथा तेहने शीर्षक, ‘दूभि’। मूल अँग्रेजी कथा : अनदर संडे कथाकार : गैस्पर अल्मीडा मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह एकटा आर रबि ओ अपन पड़ोसक पाथरसँ भरल फर्श वला हातामे जयबाक लेल जहिना दरबज्जा खोललक, भोरक शीतल हवा ओकर स्वागत केलकैक। ओतए केवल पाँचे टा घर छलैक जाहिमे रह’ वलाक अपन पुश्तैनी नाम छलैक, ओकर वार्ड केर पुश्तैनी नाम छलैक, अल्मीडा वाडो। दरबज्जाक बाहर पुरनका कल, जकरा बहुत पहिनहि नबका कल केर कारणेँ छोड़ि देल गेल छलैक, ताहिसँ नमगर नोकगर बरफ लटकल रहैक। ओकरासँ सटले इनार देख-रेख केर अभावमे सूखि गेल छलैक। तैयहुँ एहिपर एखनधरि बालु नहि जमल छलैक। रोल्डाओ ब्रेगेन्जा झुकल, आँगुरसँ ओकरा पकड़लक आ ओहि जमलका बरफकेँ एखनहि पूरब दिससँ आबि रहल सुरूजक किरण केर समक्ष उठौलक। ओहि बरफ पर प्रकाश केर किरण पड़ितहि इन्द्रधनुषी रंग जगमगा उठलैक। छोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक, ई आवाज हाता केर जानवरकेँ सचेत क’ देलकैक। जे कि ओकर प्रतीक्षा क’ रहल छल, बुझनामे आयल जे ओ सभ कहि रहल हो, “चारा केर समय तँ कखनहि भ’ चुकल छैक? रोल्डाओ पाथरक बाट छोड़ि भूसासँ झाँपल धरती पर आएल आर पयरक नीचाँ नरम मौसममे बनल खुरसँ बनल उभर-खाभर बाट महसूस कएलक। पूबरिया देवालक इमारतकेँ पार क’ कए जखन ओ दरबाजा खोललक तँ ओकर स्वागत बाछाक आवाज आर परिचित जानवर सभक महक कएलक। उठलका कूड़ादानक मुँह खुजल आर देवालसँ लागि कए टनटनाएल, आर एकटा भुरा केश (फर) फहराएल, जेना जलखै क’ रहल मूस उछलि पड़ल हो। ओकरा ठोरपर छोट-सन अपभाषा एलैक आ ओ चारा नापै वला बरतनसँ मूसकेँ मारलक। आगूक एक घंटामे ओ बिना किछु बिसरने अपन दिनचर्या एक नियत गतिसँ पूर्ण कएलक। ओ अपन भोरक कएल गेल काजसँ आनन्द उठौलक आ परिचित दायित्व ओकरा आत्मसंतुष्टिक अनुभूति देलकैक। रोल्डाओ बहुत बेसी प्रेम व्यक्त कर’ वला व्यक्ति नहि छल, मुदा चारा देबा काल बाछा ओकर हाथ चाटैत रहैक आ बिलाइ ओकरा पयरसँ अपन पीठ नहु-नहु रगड़ैत छल, एहिसँ ओ बेसी आह्लादित भ’ रहल छल, जाहि भावकेँ ओ प्रायः छिपौने रहैत छल, ताकि लोक भाँपि नहि सकए। ओकर सब काज पूर्ण होइत-होइत सुरूज बगैचा आ आन गाछ-विरीछ पर पड़ल ओसकेँ मेटाबैत-जराबैत अपन छाँही छत आर बगैचाक अधखुला स्थान पर पसारने जाइत छल। भानसघरमे घुसतहिँ ओकरा एकटा सुखद अनुभूति भेलैक किएत तँ मद्धिम आँच पर सूगरक माउस शनैःशनैः सीझैत रहैक, जकर तेज महक ओकरा आह्लादित कएलक। अपना जेबीमे हाथ डालि ओ सलाय निकाललक जकरा ओ प्रायः एकटा चामक बौगलीमे राखैत रहैक, आ एक दिन पहिलुका पाईपकेँ भर’ आ सुनगाब’ क लेल ओ बढ़ल। ओकर ई काज ओकर स्थिर आ मन्द गति वला नियामकक अनुरूप छलैक। जेना-जेना प्रकाश अपन पयर पसारलक, मद्धिम लील रंगक मेघसँ हवा भरि गेलैक। स्टोवक लौ जहिना एकटा भभकारक संग कम-बेसी होइक तहिना ओकर ध्यान प्रतिदिनक चीज-बीत पर चलि जाइक। जाड़मे बाहर अएलाक बाद ओकरा भानसघरक गरमी दिवास्वप्न जकाँ बुझाइक। क्यो ओकरा आइ याद केने हेतैक, ओ सोचलक, मुदा नास्ता पर किछु बाजि नहि भेलैक.....कखनहुँ किछु बेसी नहि कहल गेलैक, कतेक समय बीत गेलैक एखन धरि? ओ साठिक अछि वा एकसठि केर? ओ स्मरण नहि क’ सकल। ठीक! ओ धीरे सँ बाजल, “जँ हम नहि याद क’ सकैत छी तँ क्यो आन किएक?” ओ अपन पयर पसारलक आ ठाढ़ भ’ गेल। दरबज्जा लग खूँटीसँ टाँगल कोट केँ पार करैत ओ अपन जैकैट पहिरलक ओ कोनमे राखल छड़ीकेँ हाथमे एना पकड़लक जेना ओ ओकर पुरान मीत होइक। रोल्डाओ दरबज्जासँ बाहर निकलि सड़क पार कएलक, चारू दिस गामक अवलोकन कएलक। कोना एहन एहि छोट-सन गाम ‘पारा’ मे सभ चीज बदैल गेलैक। वर्षक अवधिमे सभ किछु उसराह भ’ गेलैक, मुदा ओ जानैत छलैक जे धरतीक नीचाँ सूतल जीवन समयक जादूसँ फेर जागि उठतैक। ओ घुमल आ नापल-जोखल पयरेँ सड़कक नीचाँ दिस चलि पड़ल, एकटा छोटका बाट पर जतए एकटा करिया-झबड़ा कुकुर प्रतिदिन दौड़क प्रत्याशामे प्रतीक्षा करैत छल। कुकुर अपन उर्जाक पहिल स्फोटमे गाछ आ झुरमुट दिस दौड़ पड़ल, ओ विभिन्न प्रकारक गंधकेँ सूँघलक आ निरीक्षणक बाद नव आनन्दमे डूबि गेल। कुकुर ‘ब्लैकी’ रूकल, अपन कानकेँ ठाढ़ कए बुझू जेना हवामे अपन परिचित जूताक चालिक ध्वनिकेँ पकड़’ चाहैत हो। उर्जाक दोसरहि स्फोटमे ओ सक्रिय भ’ गेल, अपन मालिकक चालिक अनुसरण करए लागल, सड़कक कात-कात रोचक चीज सभकेँ ओ जाँच’ लागल। पयर उठाकए ओ अपन जागीरकेँ कुकुरक मुद्रामे निश्चिन्तताक संग चिह्नित कएलक। गलीक मोड़ पर रोल्डाओ अपन छड़ीकेँ एकटा प्लास्टिक बैग, जाहिपर—दुबई ड्यूटी फ्री—फ्लाई दुबई—स्पष्ट रूपसँ लिखल रहैक आ जकरा जारमे कोनो लापरवाह फेक देने छलैक, ताहिमे खोधबाक लेल रूकल। ओ सावधानीसँ एहि वस्तुकेँ उठाकए कूड़ेदानी दिस ल’ गेल, ई सोचैत जे ओ एना करबलाक बगैचामे फेकि देत। मोनमानी जेहन चीज ओकरा भीतर क्रोध उत्पन्न क’ दैत छलैक, ओ व्यवस्था ओ नियमक पक्षधर छल, सभ चीज-बीतक लेल एकटा नियत स्थान आ सब स्थानक चीज-बीत अपन स्थान पर। कोनो चीज खराब नहि होइत छलैक, तागक टुकड़ी सभ जमा कएल जाइत छलैक आ प्लास्टिक के पन्नी धरि तह लगा कए राखल जाइत छलैक। जकरा ओ व्यर्थ पदार्थ बुझैत छल ओकरा अपन पियरगर लाल रंगक टाइलसँ बनल घरक पिछुआड़मे उचित मौसम आ हवाकेँ देखिकए ओकरा जरा दैत छलैक। रोल्डाओ एक जागरूक व्यक्ति छल, भोरसँ ल’ कए साँझ धरि काज करबाक आदति ओ अपन उमिरक आरम्भिकहि अवस्थामे डालि नेने छल, माँटिसँ जीविका निकालबाक आ ओकरा संगहि अपन परिवारक जीवन-यापन चलएबाक लेल अपना-आपकेँ योग्य बनएबाक ओकरा गर्व छलैक। ओकरा अपना-आप पर गर्व हेबाक एकटा आर कारण छलैक ओ ई जे ओ ने तँ ककरहुँ सँ किछु माँगैत छल आ ने ओकरा पर ककरहुँ कोनो कर्ज छलैक। ओकरा भगवानसँ डर लागैत छलैक आ ओ ईश्वरीय तत्वकेर निर्भरतासँ अवगत छल, मुदा गामक चर्च-प्रशासन, संगहि पवित्र क्रॉस केर छोट पदाधिकृत छोट चैपल केर आलोचक सेहो छल। ओ ने केवल अपन विचार सबकेँ वा अपन कोनो जान’वलाकेँ सुनबैत छल, अपितु अपन भावनाकेँ अपन स्पष्ट मुखमुद्रासँ व्यक्त सेहो क’ दैत छल अथवा गप्पक काल विषयक उत्तर चुप्पीसँ द’ दैत छल। नमहर तंग सड़कसँ खेत धरि ओकर यात्रा आर एक छोट नदी पतझड़ केर पातसँ भारी भ’ गेल छल आ ओकरा पयर तर दबा गेल छलैक, कखनहुँ-कखनहुँ डारिकेँ टुटबाक आवाज केँ छोड़ि। कुकुर अपन नाँगरि आ मुँहक संग कखनहुँ-कखनहुँ कटनूर मूसक बिलक लग सूँघि लैत छल, जतय मूस भोरे-भोर अपन घरक विस्तार करबाक हेतु बहुत रास माटि बहार कएने छल, ओ ओकर ताजा गंध चिन्हैत छल। जहिना ओ गाछसँ बाहर आएल, रूकि गेल। कुकुर “ब्लैकी” फव्वारासँ जे कि सालो भरि बलबलाइत रहैत छलैक, पानि पी कए खद्धासँ बाहर आएल, माथ हिलाकए पानि झाड़लक आ एकटा चिपकल गुरचाकेँ निकालबाक लेल ओ अपन कान हिलबैत नीचाँ बैसि गेल। अपन प्रेक्षण स्थानसँ रोल्डाओ गाड़ीक बाट देख’ लागल, मानू गाम पर कोनो चोटकेर निसान छैक, शोरगुल करैत गाड़ी धुइयाँ निकालैत एना बुझाइक जेना कंकरीटक फीता पर चुट्टी चलि रहल हो। गामक शांतिक भीतर आत्मघातक जल्दीबाजीमे ओ गाड़ी सभ चुपचाप देख’ जायसँ अन्जान बढ़ल जाइत छल। रोल्डाओ बनाओल जा रहल सड़ककेँ ध्यानसँ देखलक, अमोल जमीनसँ हाथ धो लेबाक कारणेँ ओकरा दुख छलैक, मुदा ओकरा बदलामे देल गेल हरजानासँ ओ खुश छल। ओ माँटि खोध’ वला उपकरणसँ चकित छल, ओकर आकार आ काज करबाक क्षमतासँ ओ अभिभूत छल, अंततः परिणाम जे ओ आश्चर्यचकित छल किएकतँ जे किछु ओकरा देखा पड़ैत छल ओ ओकरा समझसँ दूर छलैक। अपना जवानीक दिनकेँ याद करैत ओ अपन साठि बरखक अवस्थासँ पाछू देखलक, जखन केवल खेत आ गाछ-बिरीछ, पड़ोसक गाम नगोआ, सेलिगाओ धरि देखल जा सकैत छल आर पहाड़क उपर मान्टे-डी-ग्यूरिम इसकूलक भवन..... जतय धरि ओकर दृष्टि जा सकैत छल। कैक तरहक परिवर्तन भेल छलैक मुदा रोल्डाओ स्पष्टतः एकरा स्वीकार नहि क’ सकल जे, जे किछु भेलैक से नीकेक लेल भेलैक। भिनसरबाक काजक लेल आवाज दैत चर्च केर घंटा हवामे स्पष्ट सुनबामे आएल, समय देखबाक लेल ओ दहिना हाथ सँ वास्कट वला जेबीसँ घड़ी निकाललक आ कैक बेर घुमा-फिरा कए देखलाक बाद ओकरा आपिस राखि देलक। फेर ओ पाइप भरबाक लेल अपना हाथ पर तमाकुल रगड़लक, अपन अभ्यस्त हाथक आँगुरसँ विधिवत पाइप भरलक आ आगिक सुलगा सोंटलक। आगू बढ़बासँ पूर्व ओ कैक बेर सोंट मारि धुइयाँ निकालि अपनाकेँ आश्वस्त कएलक जे तमाकू बरोबरि जड़ैत रहए। घरक बाहर लटकल धातुक बुरूश सँ ओ अपन जूत्तामे लागल माटि झारलक आ फेर बुरूश सँ गंदगी साफ कएलक। ओ भानसघरमे गेल जूता उतारलक आ दरबज्जा लग पुर्तगाली कुर्सी पर बैसि गेल, अपन पछिला जनमदिन पर भेटल पनही (चप्पल) अपन पयरमे पहिर लेलक। दुपरहक भोजन (डिनर) बारह बजे मेज पर राखल जाइत छलैक। आन चीज जकाँ भोजन सेहो नियत समय पर खा लेल जाइत छलैक, लंच शब्दक प्रयोग नहि होइत छलैक. दूध दूह’ आर चारा देलाक पश्चात् नाश्ता आठ बजे देल जाइत छलैक। बारह बजे डिनर, चारि बजे चाह आर दस बजे सपर (रातिक भोजन) । एहि तरहेँ सभ दिनक दिनचर्या नियत छलैक, ई क्रम तखनहि बदलैक जखन क्यो भेंट कर’ आबैक वा कोनो समाचार देब’ आबैक। मेज पर बैसैत ओहि रबिक भोजन करबाक हेतु ओ काँटा आ चक्कू उठौलक.....बदामी रंगक भाफ निकलैत सालनसँ झाँपल पुडिंग केर सुनहरा रंग पैघ टुकड़ा। एकर बाद ओकरा समक्षहि बीफ (सुगरक माउस) राखल रहैक, जकरा ओ अपन समक्ष राखल चक्कूकेँ स्टील पर धार तेज करैत निकाललक। ककरहुँ आन प्रकारक भोजन पसिन्न हेबाक स्थितिमे ओहो सभ भोज्य पदार्थ ओतए राखल रहैक, सामान्यतः रबिक भोजन ककरहुँ लेल पर्याप्त होइत छल। चाहक समय चारि बजे भलैक। चाह पीलाक पश्चात् ओ खिड़कीसँ आबैत रोशनीक दिस पीठ क’ कए बैसबाक लेल सामने वला घरमे गेल। अपन चश्मा लगौलक आ शेष दुनियाँक समाचार जानबाक लेल ओ रबि दिनका समाचार-पत्र उठौलक। ओ शीघ्रहि अलसा गेल, जहिना ओकरा पर निन्न सवार होमए लागलैक, ओ माथकेँ आरामसँ कुरसीक कुशन पर राखि देलक। घर मे लोकक आवाजसँ रोल्डाओ जागि गेल—दौड़बाक कारणेँ पयरक खड़बड़ाहटि आ दूई बच्चा द्वारा एक दोसराकेँ धकेलैत दरबाजा खोलबाक आवाज, ओहि दुनूकेँ ओकरा लग पहुँचि पार्सल देबाक जल्दी। ओ कुरसी पर चढ़ल ओकरा चुमलकै आर जन्मदिन केर बधाई देलकैक, ओ बड़ कुशलतासँ एक दोसराकेँ अपन बाहुपाशमे जकड़लक। पहिने ककर पार्सल खोलल जाय? एहि समस्याक समाधान ‘लेडीज फर्स्ट’ कहि कए समाधान कएल गेल। बालक बाजल, “दादा नीक चीजकेँ बादक लेल राखैत छथि”। जहिना टकराव केर स्थिति उत्पन्न भेलैक, ओ ओहि दुनूकेँ कपड़ा बदलबाक आ बाहर जा कए खेलबाक लेल कहलकैक। जेना ओकरा दुनूकेँ मोनमे आनन्दक अनुभूति भेलैक, ओकरा कानमे हँसी केर आवाज आबि टकराएल। भानसघरमे नओ बजबाक आवाज सुनबा धरि, दुपहरसँ साँझ धरि ओकर मीत, संबंधी लोकनिक बधाई ओ उपहार ल’ कए अएबाक क्रम चलितहि रहलैक। ओ रातिकेँ पहिर’ जाएवला पयजामा पहिरलक, खूट्टीसँ स्कार्फ खींचलक गरदनिमे लपेटलक आ जाड़क अनुसारेँ ओकरा नीक जकाँ बान्हलक, सभ दिनक रात्रिकालीन नियमक अनुसार लकड़ीक नमगर ‘अदाम्बो’ सँ मुख्य द्वार धरि खिड़की ओ दरबज्जाक छिटकिनी जाँचलक। खिड़की लग राखल एक बहुत महत्वपूर्ण चीज—छओ सेलवला बड़का टार्च उठौलक, ओकर प्रकाशमे अपन सभ सामान केर निरीक्षण कएलक। ओकरासँ कनेक आगू सदा ओकरा संग रह’वला ओकर कुकुर ब्लैकी ओकरा संगहि-संग घूमल। अकाशमे जगमग करैत तरेगण केर रातिमे जहिना ओ उपर देखलक, शीतल बसात ओकरा गाल पर थपेड़ा मारलकैक, एकटा मद्धिम प्रकाशक संग चान फार्म केर घरकेँ आलोकित करैत रहैक। आपस आबैत ओ सभ दरबाजाकेँ बंद कएलक आर ई सुनिश्चित कएलक जे सभ किछु सुरक्षित अछि कि नहि। तखन ओ उठिकए भानसघरमे राखल चमचम करैत कागदक टुकड़ा उठौलक। कागदक नीचाँ लिखल शब्द रहैक, “जन्मदिन मुबारक.....दिन मंगलमय हो ”। ओ लिखावट पर ध्यान देलक, शब्दकेँ धीरे-धीरे पढ़लक आर फेर मोनहि-मोन मुसकी देलक आ जोरसँ कहलक। “भगवानक सौगन्ध, हँ........ई एकटा नीक रबि रहल।” कोंकणी कथा :             मर्णताळणी मूल कथाकार :            INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/VasantBhagvantSavant.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/VasantBhagvantSavant.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/VasantBhagvantSavant.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/VasantBhagvantSavant.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/VasantBhagvantSavant.jpg" \* MERGEFORMATINET वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद :            डॉ. शंभु कुमार सिंह ओ श्री INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/sebifernandez.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/sebifernandez.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/sebifernandez.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/sebifernandez.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/sebifernandez.jpg" \* MERGEFORMATINET सेबी फर्नांडीस मैथिली अनुवाद :        INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET  डॉ. शंभु कुमार सिंह मृत्युकेँ टारब “कनिष्ठ अभियंताक जीप आबि रहल अछि.....सभ केओ काज पर लागि जाउ।” गाछ पर चढ़ि मौध निकालबाक प्रयास क’ रहल फ्रांसिस पहाड़ीक बाटे हपसैत  अबैत जीपकेँ देखि सभ मजदूरकेँ चेतएबाक स्वरमे चिकरल आ स्वयं सेहो शीघ्रहिं नीचाँ उतरि गेल। बीड़ी पीबाक बहन्ना सँ काम बन्न क’ कए गप्प कर’ वला आ लगपासमे बैसल सभटा मजदूर हाँइ–हाँइ उठि हाथमे दबिया ल’ क’ गाछ–बिरीछ काटए लागल। आइ  भोरहि सँ मजदूर सभ मोन लगा कए काज नहि केने छल। हमरा सभकेँ दाणे पहाड़ दए चढ़िकए अबैत–अबैत साढ़े नओ बजि गेल रहय । आइ हम स्वयं ओकरा सभक समक्ष ठाढ़ भ’ कए काज नहि ल’ रहल छलहुँ एहिलेल ओहो सभ नहुएँ–नहुएँ काज क’ रहल छल। बिना काजक दिन खेपैत देखियो कए हम ओकरा सभ पर गोस्सा नहि क’ सकलहुँ। आइ हमर मोन नीक नहि रहय। भोरहिं सँ हम पहाड़क टिल्हा पर सातनक गाछक नीचाँ बैसल रही। हम जतए बैसल रही ओतए सँ नीचाँ सलावली नहरक काज चलैत रहैक, जे साफ झलकैत रहैक। बहुतो रास मशीनक हल्ला होइत रहैक। नहरक काज आधासँ बेसी भ’ चुकल छलैक। आगूक पाँच–छओ बरखक भीतरहिं काज पूर्ण भ’ जएबाक उमेद रहैक आर ओहि नहरक पानि पीबा आर आन प्रयोगक लेल एहि दाणे पहाड़ पर ट्रिटमेंन्ट प्लान्ट बन’ वला रहैक। हमरा एतुका कार्यभार भेटबासँ पूर्वहिं निरीक्षण भ’ गेल रहैक। यैह किछु दिनमे काजक ठीका (निविदा) निकालि ठिकेदारकेँ काज संपन्न करएबाक आदेश द’ देल गेल रहैक। अगिले सप्ताह मुख्यमंत्रीक हाथेँ शिलान्यास हेबाक रहैक। एहिलेल ओहि जमीनकेँ चिह्नित करबाक लेल कार्यपालक अभियंता साहेब एतेक मजदूरकेँ लगा कए एहि महत्वपूर्ण जमीनकेँ साफ करबाक लेल कहने छलैक। काल्हि आ परसू तँ मजदूर सभकेँ लड़ा–चड़ा कए हम नीक जकाँ काज करा लेने रही मुदा आइ हमर मोन काजमे नहि लागि रहल छल। कनिष्ठ अभियंताक जीप पहाड़ीक बाटे एम्हरे आबि रहल छलैक आ ओहिसँ आबए बला आवाजसँ हमर बेचैनी बढ़ल जा रहल छल। सभ मजदूर दौड़ि कए काज करबाक नाटकमे लागि गेल, मुदा हमरा उठि कए ठाढ़ होएबाक साधंस नहि भेल। हमरा बुझाइत छल जेना हमरा देहसँ प्राण निकलल जा रहल हो। काल्हि भोरहिंतँ कनिष्ठ अभियंता द्वारा कार्यस्थल केर निरीक्षण क’ लेल गेल छलैक तखन एखन दिनक बारह बजे ओ किएक आबि रहल छलैक? निश्चित रूपेँ ओ हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल’ कए आबि रहल हेताह, हमरा लागल। “आइ काज पर नहि जाउ” भोरहिसँ हमर घरक लोक सभ कहैत छलाह। बाबूजी कखन अपन अंतिम साँस लेताह भरोस नहि। ओछाओन पर पड़ल बाबूजीक हालति एकदम खराप भ’ गेल छलनि। मुदा दाणे पहाड़केँ साफ करएबाक काज हमरा भेटल रहय। जँ एहिकालमे कोनहुँ प्रकारक व्यवधान भेलैक तँ हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी कार्यपालक अभियंता पहिनहिं द’ देने रहय। हम कनिष्ठ अभियंताक व्यवहारसँ नीक जकाँ अवगत रही एहिलेल हम घरक लोकसभक कथनी नहि मानि डिब्बामे दूटा रोटी राखि काज पर चलि देलहुँ। हमरा दाणे जंक्शन धरि पहुँचतहि आठ बजि गेल छल। सभ मजदूर अपन–अपन दबिया आ डिब्बा ल’ कए हमर बाट देखैत छल। दाणे पहाड़ दिस जाएबला ट्रक सभक बाट नहि देखि हमसभ पयरे चलब आरंभ क’ देलहुँ जे जँ बाटमे कतहुँ ट्रक भेटि गेल तँ ओकरा हाथ द’ देबैक। मुदा कुर्डे पहुँच’ धरि हमरा सभकेँ एक्को टा गाड़ी नहि भेटल। ओतए सँ एकपेरिया बाटे अएबाक कारणेँ हमरा सभकेँ बड्ड विलम्ब भ’ गेल। मरणशय्या पर पड़ल हमर बाबूजीक चिन्ता आर पैदल चलिकए अएबाक थकानक कारणेँ हमर प्राण कंठ धरि आबि गेल छल। आ एखन हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल’ कए आब’ वला जीपकेँ देखिकए हमरा आँखिक सोझाँ तारा नाचए लागल। गाड़ी ऊपर आबि रहल छल। केहनो हृदयविदारक समाद हो हम ओकरा सुनबाक लेल अपना मोनकेँ एकाग्रचित्त केलहुँ आ आँखि मुनि लेलहुँ। हमरा आँखिक समक्ष चित्र सभ नाचय लागल – ‘आब ओ जीप ठहरत.....कनिष्ठ अभियंता जीपसँ उतरि जेताह.....काज करएवला मजदूर सभसँ “पर्यवेक्षक कतए छथि ?” पूछताह.....ओ लोकनि गाछ दिस आँगूर देखेतनि, अभियंता घुमिकए हमरा दिस उपर अओताह.....हमरा कान्ह पर हाथ राखि बजताह.....मिस्टर नायक......हमसभ एखन सांगे केर कार्यालय जाएब।’  हम चुप रहब। अहाँक लेल एकटा खबरि अछि....इट इज नॉट मच सिरियस.....(ओतेक चिंताजन नहि अछि.....) मुदा अहाँकेँ शीघ्रहिं घर बजाओल गेल अछि। हम जीप ल’ कए ओम्हरे जाएबला छी.....ओतहिसँ अहूँकेँ छोड़ि देब। कनिष्ठ अभियंता जानि-बूझिकए हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि नुका रहल अछि, ई हमरा पता लागत.....हमर करेज फाटि जाएत, हमरा आँखिमे नोर आबि जाएत। यू इडियट (बदमाश).....,एमहर आउ ! राजा जकाँ बैसल छथि....नॉनसेन्स (बेकूफ)। अहाँकेँ देल गेल काजक कोनो परवाहि नहि अछि? आब अहाँकेँ घरहिं पठा देब.....। सोचलहुँ की आ क्षणहिंमे भ’ गेल की, हमरो पता नहि चलि सकल। आँखि खोलिकए देखलहुँ तँ कनिष्ठ अभियंताक जीप ल’ कए आएल कार्यपालक अभियंता हमरा पर डाँट–फटकारक बरखा केने जा रहल छल। अपना समक्ष राक्षस सदृश ठाढ़ कार्यपालक अभियंताकेँ देखि हमर तँ हड्डी काँपि गेल। हे भगवान, एहि ब्रह्म बबाक चाँगुरसँ हमरा मुक्ति दिया दिअ। मोनहि–मोन भगवानसँ प्रार्थना करैत हम कार्यपालक अभियंताक समक्ष ठाढ़ रहलहुँ। अहाँक ओकादि एतेक बढ़ि गेल? मजदूर सभपर ध्यान नहि राखि, हमरा अबैत देखियहुकेँ ओतए साहूकार जकाँ बैसल रहलहुँ? ई सभटा काज चारि दिनक भीतरहिने संपन्न करएबाक लेल कहने रही , कमीना नहितन? एना तँ अहाँ हमरहु संकटमे द’ देब....ठहरू ! एखनहि हम अहाँकेँ सबक सिखबैत छी....हम एखनहि कार्यालय जा कए, अहाँक ‘टर्मिनेशन ऑर्डर’ निकालि दैत छी...। क्षण भरिक लेल हमरा एहन बुझाएल जेना एकटा अल्सेशियन कुकुर हमरा पर भूकैत एम्हरे आबि रहल अछि। हमरा मुँहसँ एक्कहुटा शब्द नहि नकलि सकल। साहेब, हिनक बाबूजी बहुत बेराम छनि....एहिलेल ओ कनेक कालक लेल बैसि गेल छलाह, एकटा मजदूर हमर पक्ष लैत कार्यपालक अभियंताकेँ समझएबाक प्रयास कएलक मुदा साहेब पर हुनक बातक कोनहुँ असरि नहि भेलनि। बेराम छथि तँ होमए दिऔक, जीवैत तँ छथि ने? एहि तरहक बहन्ना बना कए अहाँ काज परसँ बेसी नागा नहि रहल करू, नहि तँ सभदिनक लेल घरहिं बैसा देब। कार्यपालक अभियंता हमरा पर आओर भड़कि गेलाह। ओहि भरल दुपहरियामे हमरा आँखिक समक्ष तरेगन झिलमिलबए लागल। यूजलेस सुपरवाइजर....(बेकाम पर्यवेक्षक....) एतए आउ.....देखू ई सभटा गाछ–बिरीछ कटवा लेब। परसू धरि ई सभटा साफ भ’ जएबाक चाही। मंगल दिन सी.एम. (मुख्यमंत्री) अओताह, ओहिसँ पहिने कनिष्ठ अभियंताकेँ चिन्हित करबाक लेल ई जगह साफ–सुथरा भेटबाक चाही। जँ ठीक समय पर ई काज नहि भेल तँ हम अहाँकेँ देखि लेब। अहूँ सभ केओ सुनि लेलहुँ की नहि? सभ मजदूरकेँ सुनएबाक लेल ओ ओकरा दिस देखलक आ जा कए जीपमे बैसि गेल। पल भरिक लेल हमरा एहन लागल जेना ढ़लानसँ उतर’ वला ओहि जीपक पाछू हमरा डोरिसँ बान्हि घिसियाओल जा रहल अछि। हमरा आँखिमे नोर आबि गेल। नोकरीसँ निकालि देबाक धमकीसँ हमर सौंसे देह सुन्न भेल जा रहल अछि, हमरा एहन बुझाएल। एहि नोकरीसँ हाथ धो लेब हमरा बसक गप्प नहि छल। बी.कॉम. कएलाक बाद लगभग दू वर्ष धरि हम बेरोजगार रही। पछिले साल बाबूजीकेँ लकवाक प्रकोप भेल छलनि ओ तहिएसँ ओछाओन पकड़ि नेने छथि। बाबूजीक दवाइ, कॉलेजमे पढ़ए वला अपन छोट भाय आर मैट्रिकमे पढ़यवाली अपन छोटकी बहिनक सभटा दायित्व हमरहिं कन्हा पर छल। कतेकोक पयर पकड़लाक पश्चात् हमरा हिसाब-किताबक काज भेटल छल, मुदा डेढ़ दूइ सय टकासँ बेसी हमरा कहियो नहि भेटि सकल। कतेको पैरवीक केलाक पश्चात् हमरा बारह टकाक दैनिक मजदूरी पर सुपरवाइजर (पर्यवेक्षक)क ई काज भेटल छल। हमर दुब्बर-पातर कद-काठी देखि कनिष्ठ अभियंता हमरा सुपरवाइजरक नोकरी देबाक लेल किन्नहुँ राजी नहि छल, मुदा ओकरा लग ल’ जाएबला हमर शुभचिन्तक हमर विषम परिस्थिति आ लचारीक तेना ने बखान कएलनि जे नहियों चाहैत ओ हमरा ई नोकरी द’ देलक। हमर छोटो छिन गलती केँ ल’ कए ओ हमरा सदिखन उँच-नीच कहैत रहैत छल। पछिला तीन माससँ तीन-सवा तीन सय टकाक महिनवारी दरमाहासँ हम साधारण रूपेँ अपन जिनगी चला रहल छलहुँ। एहि सप्ताह बाबूजीक तबीयत बिगड़ि जेबाक कारणेँ हमरा लग जतेको पाइ छल, सभटा हुनक दबाइ आ डागदरक पाछू खर्च भ’ गेल। जँ बाबूजीक संग किछु भ’ गेलनि तँ हम कोना की करब, से सोचबाक साहस आब हमरामे नहि रहि गेल छल। हम अंतर्द्वन्द्व मे फँसि गेल रही। कार्यपालक अभियंता हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी द’ कए गेल छल।  हमरा बुझाइत छल जेना हमर हड्डीक मज्झा जमल जा रहल अछि। कोनो मजदूर दौड़ि कए हमरा थाम्हि लेलक आ गैलन मे भरल पानिसँ हमरा आँखि पर छिट्टा देलक नहि तँ हम ओतहिं अचेत भ’ कए गिर जेतहुँ। खएलाक पश्चात् हम भारी मनसँ ओतए आबि ठाढ़ भ’ गेलहुँ जतए आन मजदूर सभ काज करैत रहथि। हमर नजरि घूमि-फिरि ओहि बाटक दिस जा रहल छल। बाबूजीक मरबाक खबरि ल’ कए जीप आब आएल तब आएल, यैह सोचैत-सोचैत हम आधा दिन बिता देलहुँ। हमर एहि स्थिति पर दया करैत मजदूर सभसँ जतेक संभव भ’ सकलैक ततेक काज क’ देलक। जँ मजदूर सभ एहने लगनसँ काज करैत रहल तँ ई काज काल्हि धरि पूरा भ’ जेतैक, हमरा बुझाएल। साँझुक पहर हम जल्दीए निकलि कए पहाड़ीक बाटे उतरैत नीचाँ आबि गेलहुँ। लकड़ी ल’ जाएबला ट्रक भेटि गेलाक कारणेँ हम राति हेबासँ पहिनहिं बजार पहुँचि गेलहुँ। झटकि कए चलि हम घरक बाट पकड़लहुँ। पिचरोड खतम भेलाक बाद गली वला माटिक सड़क पर हमर चालि कने मद्धिम भ’ गेल। एहि गलीक ओहि छज्जाकेँ पार कएलाक बाद हम अपन वार्डमे पहुँचि जेतहुँ। हम सोचए लागलहुँ जे हमरा आँगनमे हमर किछु पड़ोसी लोकनि हाथ पर हाथ ध’ ठाढ़ छथि। हमरा देखतहिं ओ लोकनि अपनामे गप्प करए लगलाह। हम जेना-जेना घरक दिस बढ़ैत रही तहिना-तहिना कानबाक शोर बढ़ैत जा रहल छल। जहिना हम अँगना पहुँचब, एकटा पड़ोसी आबि हमरा गल-बाँही द’ घर ल’ जैताह। घरमे बाबूजीक प्राणहीन लहास पड़ल रहतनि। एकटा कोनमे कानि-कानि कए बेदम भेल हमर माय आ बहिनकेँ सम्हारबाक लेल पड़ोसक औरत लोकनि बैसल हेतीह। हुनका सोझाँ सोडाक बोतल आ काटल पेयाजु राखल रहतनि। बाबूजीक लहासक समक्ष एकटा दीप राखल हेतनि। एक दिस तश्तरीमे अगरबत्ती राखल रहत। लगहिमे एकटा पात्रमे चीनी राखल रहत। ओहिमे लोक सभ द्वारा चुट्टासँ उठाओल गेल चीनीक चेन्ह होएत। हमहूँ ओहिमेसँ एक चुट्टा चीनी उठाएब आ बाबूजीक फूजलका मुँहमे ध’ देबनि आ “बाबा” कहि जोरसँ कानए लागब। जखन हम आँगन पहुँचलहुँ तँ हमरा केओ नहि देखना मे आएल। घरसँ ककरहुँ बाजबाक आवाज आबि रहल छलैक। हम जूता खोललहुँ आ नहुएँ-नहुएँ पयर राखैत भीतर चलि गेलहुँ। आउ बाउ! शायद अहींक खातिर हिनकर प्राण कंठ धरि आबिकए अटकि गेल छनि। आब हिनका एहि कष्टसँ मुक्तिए भटि जेबाक चाहियनि, हमरा भीतर अबैत देखि हमरा माय लग बैसलि एकटा औरत बाजलि। हम बाबूजीक ओछाओन दिस देखलहुँ। जाहि गतिएँ हुनक छाती उपर-नीचाँ होइत छलनि, हमरासँ देखल नहि जा रहल छल। मुँह सँ निकल’ वला शब्द सुन’ मे नहि आबि रहल छल। आँखि खुजले छलनि। बाबूजीक ई स्थिति देखि हमरा बुझा पड़ल जेना ओ सरिपहुँ हमरहिं बाट जोहि रहल छलाह। हमर  छोटकी बहिन हमरा चाह देलनि। चाह पीबि हम अँगपोछासँ अपन मुँह झाँपि बाबूजीए लग बैसि गेलहुँ। देखा पर चाही, जँ आजुक राति ई काटि लैत छथि तँ..... नहि जँ आइ रातिए किछु भ’ गेलनि तँ एहना स्थितिमे एमहर-ओमहर दौड़ब नहि, काल्हि भोरहिं उठिकए संबंधी लोकनिकेँ समाद पठा देबनि, की ठीक ने? हमरा भरोस देबाक लेल एकटा पड़ोसिन कहलथि। अँगपोछासँ झाँपल अपन माथ डोला हम हँ कहलियनि। राति बढ़ल जा रहल छलैक मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हम ओतहि बैसल रहलहुँ। रातिक बारह बाजि गेल रहैक मुदा बाबूजीक घर्र-घर्र केर आवाज एखनहुँ नहि कम भेल रहनि। घरक आन सभ सदस्य एमहर-ओमहर कोनमे सूति रहल छलाह। राति तीन बजे धरि बाबूजीक हालतिमे कोनहुँ सुधार नहि भेलनि। मुदा भोर होइतहिं हम द्वन्द्वक स्थितिमे आबि गेलहुँ। आब की करी? नोकरी पर जाइ, वा नहि? काज एकदम अनिवार्य रहैक आ  जँ हम नहि गेलहुँ तँ कार्यपालक अभियंता हमरा छोड़त नहि। जँ कार्यपालक अभियंताक डरे नोकरी पर चलियो गेलहुँ आ एमहर बाबूजीक संग किछु खराप भ’ गेलनि    तखन की हैत? माए.... हम नोकरी पर चलि जाउ? हम साहस क’ कए माए सँ पूछलहुँ। माए तँ किछु नहि बाजलीह मुदा एखनहि हमरा घर आयल हमर किछु पड़ोसी सभ हमरा पर अपन गोस्सा निकालए लगलाह। साँचे अहाँक दिमाग ठौर पर अछि कि नहि?  एतए अहाँक बाबूजी मरण-शय्या पर पड़ल छथि आ अहाँकेँ नोकरी सूझैत अछि? नहि, नहि हमर कार्यपालक अभियंता बड्ड खरूस छथि। ओ शैतान छथि की? नीक-बेजाए केर ओकरा ज्ञान नहि छनि? हम चुप भ’ गेलहुँ। दुपहर होइत-होइत घर्राहटि आर बढ़िते गेलनि। चलू नीके छैक.... आइ बृहस्पति दिन छैक, प्राण छोड़बाक लेल आजुक दिन उत्तम अछि। हमर बूढ़ पड़ोसिन बाजलथि। एतबा सुनतहि हमर माए आर जोर-जोर सँ कानए लगलीह। साँझ होइत-होइत हमरा मोनमे आर डर समा गेल। जँ आइयो बाबूजी प्राण नहि निकललनि आ हुनक मृत्यु नहि भेलनि तँ ‘काल्हि काज पर किएक नहि आएल छलहुँ?’ एकर स्पष्टीकरण हम कनिष्ठ अभियंता केँ कोना देबनि? बाबूजी मरि गेलाह तकर पहिलुक दिन अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ? एहि तरहक प्रश्न सभ पूछि-पूछि ओ हमर पिंड नहि छोड़ताह.....जँ हम नोकरी पर नहि गेलहुँ आ मजदूर लोकनि काजकेँ आर बेसी घिच लैक तखन.......? आ एहि गोस्साक कारणेँ जँ ओ हमर ‘टर्मिनेशन आर्डर’ निकालि देलक तखन.....? कार्यपालक अभियंताक काल्हुक पल-पल केर दृश्य हमरा आँखिक सोझाँ नाचय लागल। दू बजेक पश्चात् खराप नक्षत्र आरंभ होइ बला रहैक, ओहिसँ पहिनहि हुनका मुक्ति भेटि जयबाक चाहियनि.....! केओ एहन बाजलथि। मुदा हमरा बुझाएल दू बजे नहि बारह बज’ सँ पहिनहि हुनक प्राण जयबाक चाहियनि, ताकि बाबूजीक मृत्यु बृहस्पतिए दिन भ’ गेल छलनि, कार्यपालक अभियंताकेँ बतएबामे हमरा सुविधा होएत। राति आठ बजे हम एक बाटी मरगिल्ला खा बाबूजी लग बैसि गेलहुँ। काल्हि राति भरिक जगरनाक कारणेँ हमरहुँ आँखि निन्नक बाट जोहि रहल छल। एखन हमर आँखि लागलहि छल कि केओ हमरा हाथ लगा उठा देलक। घरमे सात-आठ पड़ोसी लोकनि ठाढ़ छलाह। हुनका सभक आँखि बाबूजी पर स्थिर भ’ गेल छलनि। बाबूजीक मुँहसँ होमए वला घर्र-घर्र केर आवाज आर बेसी भ’ रहल छलनि। हम जल्दीसँ उठिकए बैसि गेलहुँ। बाबूजीक आवाज आर बढ़ि गेलनि। क्षण भरिक लेल हुनक सौंसे देह हिललनि आ अचानक सभ किछु शांत भ’ गेल। कतेक बाजि रहल छैक, कने ध्यानसँ देखियौक केओ? केओ बजलाह। केओ आगू बढ़ि पलंग सँ लटकल बाबूजीक हाथ सीधा क’ कए हुनक फुजल आँखि बन्न क’ देलकनि। हमर माए आ बहिन एक्कहि सँग जोर सँ चिकरैत बाबूजीक लहास पर हाथ राखि कानब शुरू क’ देलथि। एखन धरि ठाढ़ भए हमरा बाबूजीकेँ देख’वला हमर भाए झुकिकए गिरहि वला छल कि तखनहि केओ हुनका पकड़ि लेलकनि आर ओकरा मुँह पर पानिक छिट्टा देलकनि। मुदा हमरा तँ नीक लागल। हम एकटा दीर्घ निसाँस लेलहुँ आर देखलहुँ.....हमर बाबूजी.....हमर खून, हमरहि सोझाँ मरल पड़ल छथि.....,हमर साक्षात् बाबूजी हमरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेल छलाह। हम ई देखतहिं रहि गेलहुँ। ने जानि कोन-सन अनुभूति हमरा करेज सँ बाहर आबि गेल, बाबूजीकक लहास पकड़ि हम फूटि-फूटि कए कानब शुरू क’ देलहुँ..... हम्मर बाबूजी.........। सोंगर INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image001.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/image004.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Dr_Shambhu_Singh.jpg" \* MERGEFORMATINET सेबी फर्नानडीस डॉ. चन्द्रलेखा डिसौजा डॉ. शंभु कुमार सिंह मूल कोंकणी कथा : खपच्ची लेखक : सेबी फर्नानडीस हिन्दी अनुवाद : डॉ. चन्द्रलेखा डिसौजा मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह 13 सितम्बर, दिन मंगल। भोरे-भोर मोबाइल खनकल। हमरा ओछाओनक लगहिमे मोबाइलक प्रकाश एना झिलमिलाइत छल जेना भिनसरे कोनो अस्पतालक ‘वैन’ रोगी केँ ल’ क’ निकलल हो। हम अपन आँखि मलैत मोबाइल उठौलहुँ...देखलहुँ तँ नम्बर चिर-परिचित छल। शैली केर। शैली माने हमर मिता, जे हमरे ऑफिस मे काज करैत अछि। बहुत नीक आ जिम्मेवारीक पद पर ओकर नियुक्ति भेल छैक। ओना देखल जाय तँ अपन स्वभाव सँ ओ एकदम सरल आ अपन काजसँ मतलब राखय वाली। नरम-नरम घोंघा-सन। जँ क्यो किछु कहि देलक तँ चुपचाप सुनि लए वाली। साँच पुछू तँ ओ हमरो बड़ नीक लागैत अछि। हमरा बुझने सभ कन्याकेँ शैलीए-सन हेबाक चाही। हम अपन मोनक बात कैक बेर ओकरा बतएनहुँ छी मुदा ओ ओकरा अनसुना करि दैत अछि। हम सभ एक दोसराकेँ लगधक सात बरखसँ जानैत छी। हमरा सभक दोस्ती विश्वविद्यालयमे पढ़बाकाल भेल छल। शैलीक हँसबाक अंदाज आ ओकर सरल स्वाभाव दुनू हमरा अतीव पसिन्न अछि। संभवतः यैह कारण रहल हेतैक जे हम ओकरा दिस झुकल चलि गेलहुँ। आइ तँ जेना ओ हमर मिता नहि अपितु हमर छाँह हो तहिना बुझाइत अछि। आइ ओ हमरा लेल हमर सभसँ करीबी बनि गेल अछि। हेलो..... हम मोबाइल उठबैत कहलहुँ। “शागू हम शैली बाजि रहल छी.... हम एखनहि अहाँसँ भेंट कर’ चाहै छी।” शैलीक ई जबाब तँ जेना हमरा आँखिक निन्ने उड़ा देलक। “मुदा बाद की थिक? से तँ साफ-साफ बताउ.......” “बताएब, सभ किछु बताएब। मुदा अहाँ भेंट त’ दिअ।” ठीक छैक भेंट क’ रहल छी... ऑफिस मे... 9:30 बजे। “नहि, नहि एखनहि मिलबाक अछि।” शैली बाजलि। “मुदा एखन...” “नहि, नहि हम किछु नहि सुन’ चाहैत छी।” कहितहि ओकर बोली जेना काँप’ लागलैक। “देखू शैली कानू नहि प्लीज.....” “हम की करी शागू! हमरा समझमे किछु नहि आबि रहल अछि।” ओ बाजलि। हमरा शैली पर दया आबि गेल। “ठीक छैक, हम एखनहि अहाँक ओतए आबि रहल छी। साढ़े आठ बजे धरि हम आबि जाएब, अहाँ घबराउ जुनि।” ओकर साहस बढ़बैत हम कहलिऐक। “ठीक छैक, हम अहाँक बाट देखि रहल छी।” कहैत शैली मोबाइल बन्न क’ देलक। हे भगवान ! की भेल हेतैक ? ई सोचैत-सोचैत हम हाँइ-हाँइ केँ मुँह धोलहुँ, कल्हुके पहिरलाहा अंगा-पेंट पहिर निकलि गेलहुँ। घरसँ निकलतहि हमरा मोनमे कैक प्रकारक शंका-कुशंका केर चक्र चल’ लागल। आखिर की भेल हेतैक शैलीकेँ? की ओकर मोन खराब भ’ गेलैक? वा अचानक टकाक कोनो बेगरता पड़ि गेलैक? हम आर झटकि कए चल’ लागलहुँ। पौने आठहिं बजे हम शैलीक घर पहुँच गेलहुँ। पछिला बेर जे शैली अपन घर गेल छलीह तँ ओ “वाल” (एक प्रकारक तरकारी) क लत्ती आनने छलीह। आब ओ लत्ती नरम-मोलायम पातक संग सोंगरक सहारे उपर दिस बढ़ि रहल छल, संगहि ओ अपन जड़ि जमएबाक जतन क’ रहल छल। दरबज्जा खटखटएलासँ पूर्वहिं शैली दरबज्जा खोललक। ओ शायत हमर पयरक आहटि सुनि नेने छल। जहिना हम घरमे प्रवेश कएलहुँ, शैली दरबज्जा बन्न क’ हमरासँ लिपटि गेल। शैलीक ई व्यवहार हमरा लेल एकदम अप्रत्याशित छल। “शैलीक व्यवहार एहन किएक भ’ गेलैक?” हम मोने-मोन सोचलहुँ। जरूर किछु विशेष भेल छैक, तखनहि तँ ओ हमरा अपन हितचिंतक बुझि एना क’ रहल अछि? हम नहुँए-नहुँए ओकर पीठ सहलाबैत रहिलऐक। “की भेल शैली? ऐना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छी? किछु बाजबो तँ करू?” ओ शनैः-शनैः अपनाकेँ हमरासँ अलग कएलक आ हमरा मुँह दिस निहार’ लागलीह। हमरा बुझा रहल छल जे जरूर शैलीक संगे किछु अनिष्ट भेल छैक? ओकरा आँखिसँ नोर तेना बहैत रहैक जेना भदवारिक इनारसँ पानि बहराबैत छैक। हमरा मोन पड़ल अपन गामक “सेजांव” उत्सव जाहिमे लोक इनारमे कूदि जाइत छैक आ छपाक होइतहि पानिक छींटा एमहर-ओमहर पसरि जाइत छैक। शैलीक आँखिक पानि फेर उफन’ लागलैक। ओ फेर हमरासँ लिपटि गेल। एहिबेर ततेक नोर बहलैक जे हमर अँगा भीज गेल। ओकर शीतलता मानू हमरा हृदयकेँ सेहो भीजा देलक। हमहूँ बरफ जकाँ पिघल’ लागलहुँ। हमरा जीवनमे सदैव एकटा दृढ़ गाछक सदृश ठाढ़ रहएवाली शैली आइ सिगरेटक पुत्ती जकाँ ढ़हि रहल छलीह। “शैली आखिर किछु बताउ त’! आब तँ हम अहाँक समक्ष छी।” ई सुनतहि शैली आर फफकि-फफकि कए कानए लागलीह। “देखू शैली, एना कानने कलपने सँ काज नहि चलत, जाधरि अहाँ किछु बताएब नहि हम कोना बुझू?” “हम लूटि गेलहुँ शागू.... हम तबाह भ’ गेलहुँ.....फँसि गेलहुँ....हमर इज्जति पानि भ’ गेल.... हमरा लूटि लेल गेल.....।” “अरे.....अरे.....शैली, ई अहाँ की बाजि रहल छी? बाज’ सँ पहिने अपन शब्दकेँ नापि-जोखि लेल करू।” हमरा लेल ओकर ई बात बहुत दुखदायी छल। आइ शैली एना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छलीह? एहिसँ पहिने तँ ओ हमरा संगे शब्दक एहन खेल नहि खेलने छलीह? “बाजू शैली, की भेल...” “हमर कपारे मे आगि लागि गेल अछि....। हमर महीनवारीक दिन बीत गेल अछि, आ....। काल्हि हम डॉक्टरसँ चेकअप करौलहुँ त’...।” ओ ई बात! तँ शैलीक परेशानीक ई कारण छैक। हम मोने-मोन सोचलहुँ। “पछिला महीनवारीक कोन तारीख छल? हम पुछलिऐक।” “दुइ अगस्त।” ओ बाजलि। हम मोनहि-मोन गिनती लगएलहुँ....कैक दिन निकलि चुकल छलैक। हमरा किछु बाज’ सँ पूर्वहि शैली बाजल—सात दिन धरि हम बाट देखैत रहलहुँ काल्हिए डॉक्टरसँ देखएलहुँ, रिपोर्ट + + आएल छैक। + + केर माने भेलैक जे शैलीक कोखिमे नव ‘जीव’ अस्तित्वमे आबि गेल छैक। हमरा मिताकेँ बियाहसँ पहिनहि कल्याणक योग भ’ गेलैक। हम ई की सुनि रहल छी? कोना भ’ गेलैक ई सभ? हमरा माथ घूम’ लागल... कैक प्रकारक सवालसँ हमर माथ फाटल जा रहल छल। ओमहर शैली अनवरत रूपेँ कानि रहल छलीह। हे भगवान! शैलीक घरक लोककेँ जखन एहि बातक आभास हेतैक तखन की हेतैक? एखन शायत शैलीकेँ सान्त्वनाक आवश्यकता छलैक। शैलीक कपार पर विपतिक पहाड़ टूटल रहैक आ हम पत्ता जकाँ काँपि रहल छलहुँ। जेना जाड़क दिनमे शीशीक तेल जमि जाइत छैक तहिना हमहुँ जड़वत भेल जा रहल छलहुँ। के छी जे शैलीकेँ एहि दशामे आनि देलक? ई जानब हमरा लेल आवश्यक भ’ गेल छल मुदा ताहिसँ पहिने ई जानब जे, जे किछु शैली कहि रहल छलीह से साँचे थिक वा...। “शैली भ’ सकैछ अहाँक अंदाज गलत भ’ गेल हो..। भ’ सकैछ डॉक्टरक रिपोर्ट गलत हो....। अहाँ घबराउ जुनि। हम हरदम अहाँक संग छी, दुखमे, सुखमे सभमे।” हमरा बातसँ शैलीक मोन कने हल्लुक भेलैक। आइ धरि जे बात हम शैलीकेँ नहि कहबाक साहस केने रही से आइ एतेक आसानी सँ कहा गेल। शैली एकर माने की निकालने हेतैक से भगवाने जानथि। ओना शैली एखन जाहि मानसिक स्थितिसँ गुजरि रहल छलीह एहनमे हुनकासँ एहन सभ बात पर उमेदो करब उचित नहि छलैक। “शैली अहाँ जे कहि रहल छी से गलतो तँ भ’ सकैछ? पहिने डॉक्टरसँ नीक जकाँ पूछि त’ लिअ।” “आ जँ डॉक्टर फेर वैह बात कहलक तखन?” शैली बाजलि। “ओ बादमे देखल जेतैक।” हम कहलिऐक। “हम अपन जान द’ देब। मरि जाएब। हम आब जीब’ नहि चाहैत छी।” कानैत-कानैत ओ बाजलि। “हमसभ आइए डॉक्टर लग जाएब।” हम कहलिऐक। “कखन?” शैली तपाकसँ बाजलि। “ऑफिसक बाद, छओ बजेक लगधक। आइ हमहुँ अपन ऑफिसक काज जल्दीए जल्दी निपटा लेब।” ई कहैत हम ओकरा सांत्वना देबाक प्रयास कएलहुँ। शैली हमरा मुँह दिस देखैत रहलीह। हम ऑफिससँ जल्दी निकल’ वला नहि छी से शैली नीक जकाँ जानैत छलीह। ओ सोचि रहल हेतीह जे “शायत हम हुनका समय द’ कए मुकरि जाएब।” “अरे हम अहाँसँ प्रॉमिस क’ रहल छी हम अवश्य आएब। चाहे कतेको काज किएक नहि हो।” शैली किछु पल केर लेल अपन आँखि बन्न क’ लेलक। जेना ओ सोचि रहल हो जे जँ हम नहि आएब तखन की हैत? “शैली अहाँ जल्दी-जल्दी तैयार भ’ जाउ। हम बाहर अहाँक बाट जोहि रहल छी। कहैत हम ओकरा गाल पर हाथ फेरलहुँ आ ओकर आँखिक नोर पोछलहुँ।” “अहाँ डरब नहि चलू देखैत छी जे आइ साँझ केँ डॉक्टर की कहैत छथि”—कहैत हम ओकर देहरी पार कएलहुँ। शैली शीघ्रहि अपन कपड़ा बदललक आ हम दुनू बाहर निकलि गेलहुँ। अहाँ नाश्ता कएलहुँ की नहि? ई पूछब हम उचित नहि बुझलहुँ, तथापि पुछलहुँ--- “ऑफिसेक कैंटीन मे क’ लेब” ओ बाजलि। ओहि दिन भरि रस्ता शैलीक पयर नहुँए-नहुँए आगू बढैत रहल। ओकर मोन जे टूटि गेल रहैक! हम ओकर ओहि मोनक टुटलका तागकेँ जोड़बाक प्रयास क’ रहल छलहुँ। हमरा मोनमे एक पल केर लेल भेल जे हम शैलीक हाथ अपन हाथमे थामि ली, मुदा बाट चलति एहि तरहक व्यवहार हमरा शोभा नहि देत, ई जानि हम अपन विचार दमित क’ देलहुँ। गुमसुम शैली अपनहि विषयमे किछु सोचि रहल छलीह ई जानि हम ओकरा टोकलिऐक---- हाँ.....25। शैली उत्तर छल। “की भेल?” हम पुछलिऐक। शैली मौन रहलीह। हम फेर पुछलहुँ। शैली मौन। हमरा मोनमे भेल जे शायत शैली सीढ़ी चढ़ैत काल अपन उमिरक संबंधमे सोचि रहल छलीह। हम पाछू मूड़ि कए सीढ़ीक गिनती कएलहुँ ओ ठीक पच्चीसे छल। पच्चीस सीढ़ी आ पच्चीस साल, मेल बड़ नीक छलैक। पच्चीस सीढ़ी चढ़लाक पश्चात् ऑफिसमे प्रवेश आ पच्चीस सालक पश्चात् माय बनब......कुमारि माय? शायत एहि लेल ई क्षण ओकरा लेल सुखदायी नहि छलैक। कैंटीनमे हमरा दुनूक नास्ता-पानि भेल आ साँझमे मिलबाक बात क’ हम दुनू अपन-अपन ऑफिस चलि गेलहुँ। पूरा दिन काज करैत हम शैलीएक संबधमे सोचैत रहलहुँ। बीचहिमे हम एकबेर ओकरा इंटरकॉम नम्बर सँ फोन केलिऐक। शैली, केनह छी अहाँ? देखू धैर्य राखब, हम अवश्य आएब....कहैत हम फोन राखि देलहुँ। दूपहरमे एकबेर फेर हमसभ लंचक समय मे मिललहुँ। ओ भोजन करबासँ मना करैत छलीह। हमहुँ उपासे करब। ऐहने नाजुक समयमे तँ मितकेँ मितक आवश्यकता होइत छैक। हम ओकरा सहारा द’ रहल छलिऐक ई सोचि हमरा खुशी भ’ रहल छल। एखन घड़ीमे पाँच बजैत रहैक। ठीक ओहि काल शैली हमरा मोबाइल पर ‘मिसकॉल’ द’ क’ समयक संबंधमे आगाह कएलक। साढ़े पाँच बज’ सँ पूर्वहि हम ऑफिससँ बाहर आबि गेलहुँ। शैलीओ केँ झटकि कए आबैत देखलिऐक। “चली?” हमर प्रश्न सुन’ सँ पहिनहि शैलीक पयर बढ़ि चुकल छलैक। हमसभ अस्पताल पहुँचलहुँ। हमरा आभासो नहि भ’ सकल जे कखन शैली हमर हाथ कसि कए पकड़ि नेने छलीह। ओ डरि रहल छलीह। ओकर हाथ काँपैत छलैक। “डॉक्टर छथि?” हम स्वागत कक्षमे पुछलिऐक। “हँ, हँ छथि” कहैत ओ स्वागत अधिकारी हमरा बगल कुर्सी पर बैसबाक इशारा कएलथि। हम दुनू जा कए कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। हम डॉक्टरक कक्षमे हुलकी मारलहुँ, आ सामने नामपट्ट पर सेहो, लिखल रहैक—डॉ. गीता। हम बुझि गेलहुँ जे यैह डॉ. थिकीह। देख’ मे एकदम सुन्नरि, सौम्य। हम मोने मोन सोचलहुँ जे शायत डॉ. गीता कहतीह—“शैली अहाँ एकदम नार्मल छी” आ हुनक ई वाक्य शायद हमरा सभक मोनक भ्रम तोड़ि देत। एतबहिमे नर्स आवाज देलक—“अहाँ सभ अन्दर जाउ।” डॉ. गीता एकदम मधुर आवाजमे पुछलथि—“कहू की तकलीफ अछि।” डॉक्टरक पश्न सुनि हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। डॉ. केर प्रश्न एखन चलिए रहल छलैक। हम हुनका दिस देखलिएनि की ओ हमरा कहलथि—“कनेक कालक लेल अहाँ बाहर जाउ” हम ओतए सँ उठि बाहर ओहि कुर्सी पर जा बैसलहुँ जतय पहिने बैसल रही। नर्स दरबज्जा बन्न क’ दैलकैक। हमरा मोनमे तखन कतेको प्रकारक प्रश्न सभ उठि रहल छल। थोड़बे कालक बाद डॉ. दरबज्जा खोललक। हमरा फेर बजाओल गेल। हमरा ओत’ पहुँच’ सँ पहिने शैली डॉ. केँ किछु बता रहल छलीह। डॉ. हमर नाम पुछलथि--- “शागू गांवकर।” हम जवाब देलियनि। डॉ. हमर नाम पुरजा पर लिख लेलथि। हम देखतहि रहि गेलहुँ। हमरा अपनहि आँखि पर विश्वास नहि भ’ रहल छल। हम अपन आँखि आर कने बिदोड़ि कए देखलहुँ—हँ! ई शालीए रहैक। शैली, शाली कहिया भ’ गेलैक? “हँ तँ अहाँ सभकेँ बच्चा एखन नहि चाही, यैह ने?” डॉ. हमरा दुनूसँ पूछलक। “जी नहि। हमरा सभक आर्थिक परिस्थिति एखन बच्चा जन्म देबाक इजाजत नहि द’ रहल अछि।” शैली उर्फ शाली चोट्टहि बाजलि। हम ओकरा दिस साश्चर्य देखतहि रहि गेलहुँ। “तँ ई निर्णय अहाँ दुनूक छी ने?” “जी हँ, डॉक्टर! हमरा दुनूक यैह सम्मति अछि।” शैली बाजलि। शैलीक जवाब मानू हमरा अंतर्मनकेँ झकझोरि कए राखि देलक। बच्चा ककरहुँ हो मुदा ओकरा प्रति कने ममता तँ हेबाक चाही? डॉ. ओहि पुरजा पर आर किछु लिखलक आ हमरा दुनूसँ हस्ताक्षर करबा लेलक। शैली, शाली गांवकर नामसँ हस्ताक्षर केने छल जे पूर्ण रूपसँ जाली छलैक। अपन हस्ताक्षर केलाक पश्चात् ओ कलम हमरा हाथमे थमा देलक। हम की करी, की नहि एहि अंदर्द्वन्द्वमे रही। शैली एकबेर हमरा दिस देखलक---हम बात बुझि गेलिऐक, हमहुँ हस्ताक्षर क’ देलिऐक। डॉ. अपन अलमारीसँ किछु दबाइक गोली आ एकटा करिया-सन शीशीमे दबाइ शैलीकेँ थमा देलकैक। शैली अपना पर्ससँ आठ सय टका निकाललक आ तीन सय हमरासँ माँगलक। हम ततेक ने नर्वस भ’ गेल रही जे शैलीए हमरा जेबीसँ ओ टका निकालि डॉ. केँ देलकैक। शैलीक ई व्यवहार देख डॉ. केँ हँसी लागि गेलैक। “साँचे अहाँ दुनूक प्रेम बेजोड़ अछि।” हमरा दुनूक बीच पति-पत्नीक संबंध अछि, ई विश्वास डॉ. केँ दिएबाक लेल शैलीक ई नाटक एकदम ‘परफेक्ट’ साबित भेलैक। “मि. शागू! अपन पत्नीक ध्यान राखब, हिनका एहि समय अहाँक सख्त आवश्यकता छैक।” ई कहैत डॉ. गीता हमरा सभकेँ बिदा कएलथि। हम आ शैली बाहर एलहुँ। पेशेंट सभकेँ स्ट्रेचर पर ल’ जएबाक जे पथ होइत अछि ओहि बाटे हम सभ अबैत रही हमरा बुझाएल जे जेना हमर अपन संतुलन बिगड़ि रहल अछि। हम शायत अपनहि सँ उलझि गेल छलहुँ। किछु आगू चललाक पश्चात् शैली दबाइक दोकान पर पुरजा दैत किछु आर दबाइ किनलक। हमरा मोनमे एकटा जबरदस्त जद्दोजहद भ’ रहल छल। “हम पापी छी, हत्यारा छी, हमरहि कारणेँ आइ एकटा ओहन शिशुक हत्या भ’ रहल छैक जे एखन धरि दुनियाँ मे आएलो नहि छैक” कोनहुँ बच्चाक लेल संसारक सभसँ सुरक्षित स्थान होइत अछि ओकर माइक कोखि, हम ओहि कोखिक लेल मृत्युक सौदागर बनि गेल रही। दबाइ सभ गर्भनाड़ीकेँ बन्न क’ नेना भ्रूणकेँ समाप्त करबाक प्रक्रिया भ’ रहल छलैक। हमरा लागल आइ हम एहन अपराध केने छी जकरा लेल भगवान हमरा कहियो माफ नहि करताह। मुदा जँ हम एहन नहि करितहुँ तँ शैलीओ तँ आत्महत्या क’ लेतिऐक? यैह सभ सोचैत हम बहुत कालक लेल एकदम गुम्म भ’ गेल रही। जखन हम कॉलेजमे पढ़ैत रही आ परीक्षामे कम अंक आबए तखन मैडम पापा केँ बजा कए आनए कहैत छलीह। तखन हम गलीक नुक्कुड़ पर जा कए “साइकिल पायलट”केँ दस-बीस टका द’ कए किछु कालक लेल भाड़ाक पप्पा बना कए ल’ जाइत छलहुँ। परीक्षाक अपन गलती छुपएबाक लेल भाड़ाक पप्पासँ नाटक करबैत छलहुँ....। आइ हम अपनहि नाटक करैत रही। शैली केँ बचएबाक नाटक। बातो तँ साँचे रहैक, घौर बला केलाक गाछमे जेना संतुलन बनएबाक लेल ‘सोंगर’ लगाओल जाइत अछि, तहिना आइ हम शैलीक संतुलन ठीक रखबाक लेल सोंगरक काज क’ रहल छलहुँ। “चलू चलैत छी।” दबाइ ल’ कए घूरि आएल शैली बाजलि आ हम अपन विचारसँ बाहर निकलबाक प्रयास कएलहुँ। ओहि दबाइमे ओहि छोटका “जीब”क लेल “जहर” छलैक। हम शैलीकेँ ओकरा घर धरि पहुँचा देलिऐक। शैली हमरा बैसबाक लेल कहलक। शायत ओ बुझैत छलीह जे आइ जे किछु भेल छैक तकर परिणामस्वरूप हमरा मोनमे की भ’ रहल हैत। आइ भोरसँ जे किछु भ’ रहल छैक तकर जड़ि केर संबंधमे हम ओकरासँ पुछबैक। मुदा काल्हि भेंट करब, ई कहि हम ओकर मोन हल्लुक क’ देलिऐक। “गुड नाइट” कहि हम चलि देलहुँ। राति शनैः-शनैः भीजल जाइत छलैक आ ओकरा संगहि हमर चिंतन सेहो गंभीर भेल जा रहल छल। हमर एकटा मोन हमरा लांछित करैत छल आ दोसर मोन मजगूत क’ रहल छल। एहि अनजान शहरमे हमरा सिवाय शैलीक क्यो नहि छलैक। जँ हम आइ ओकरा सहारा नहि देतिऐक तँ ओ अपन इहलीला समाप्त क’ लेतिहैक। हे भगवान! हमरा माफ करब! जाहि भ्रूणकेँ अहाँ जनम देब’ चाहैत छलहुँ हम ओकरहि विनाश करबाक लेल शैलीक संग देलहुँ। कतेक पैघ गद्दार छी हम! दोसर दिन शैली ऑफिस नहि अएलीह। हमहुँ ओकरा सँ मिलबाक साहस नहि जुटा पएलहुँ। एहिना कैक दिन बीति गेल। एक दिन अकस्मातहि हमरा शैली सँ ऑफिस मे भेंट भ’ गेल। “शागू हम घर जा रहल छी।” शैलीक बात सुनि हम छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ। “मुदा एना अचानक?” “काल्हि भेंट करब” ई कहैत ओ ऑफिस चलि गेलीह। काल्हि शनि रहैक, से हम शैलीक घर जयबाक सोचलहुँ। आइ शुक्र दिन देर धरि ऑफिसक काज करैत रहलहुँ। दोसर दिन हम शैलीक घर पहुँचलहुँ तँ देखैत छी जे ओकरा घरमे ताला लागल छल। तालाक भूरमे एकटा पर्ची खोंसल रहैक। ओ संभवतः हमरे लेल हैत से जानि हम ओकरा खोललहुँ। हमरे चिट्ठी छल। प्रिय शागू, हम घर जा रहल छी। घरक लोक सभ हमर बियाह तय क’ देने छथि। अहाँक कएल गेल उपकारकेँ हम जिनगी भरि नहि बिसरब। हमरा जीवनक लेल अहाँ बहुत महत्वपूर्ण छी। हम बुझैत छी जे हमरा बिसरि जाएब अहाँक लेल एकदम असंभव हैत। मुदा हम आइसँ अहाँकेँ बिसरैत छी, संभव भ’ सकय तँ अहूँ हमरा बिसरि जाउ। शैली चिट्ठी पढ़ि हमरा लागल जेना एकटा जोरगर समुद्रक लहरि आएल आ हमरा पयरक निचलका सभटा बालु बहा कए ल’ गेल। हमरा आँखिसँ नोरक दूइटा बुन्न कखन ओहि चिट्ठी पर पड़ि पसरि गेल के हम नहि बुझि सकलहुँ। “काल्हि भेंट करब” कहएवाली शैलीकेँ काल्हि आ आजुक बीचक अंतर किएक नहि बुझि मे एलैक? शैली हमरा एहि तरहेँ किएक फँसौलक? शायत ओ सोचने हेतीह जे हम ओकरा बियाह करबा सँ मना क’ देबैक। जखन हम ओकरा गर्भपात करबैत काल नहि रोकलिऐक तँ एखन किएक रोकि देतिऐक? शैली आब पहिनुक शैली नहि रहल। ओ आब बहुत समझदार भ’ गेल छलीह। आब समाजक सामना करबाक साहस ओकरामे भ’ गेल छलैक। शैली शुक्र दिनक रातिएमे रेल सँ चलि गेलीह आ छोड़ि गेलीह हमरा लेल कैकटा अनुत्तरित प्रश्न सभ। ओहि दरबज्जाक आगू हमर ध्यान गेल जतय शैली कहियो “वाल” केर लत्ती लगौने छलीह। ओ लत्ती आब खूब पैघ भ’ गेल रहैक। ओकर जड़ि चतरि गेल छलैक आ ओहि लत्ती पर आब कैकटा फूल-फल लागि गेल छलैक। एहि “आल” केर फूल-फल आ ओकर पातक तरकारी खएबाक लेल शैली एतए नहि छलीह। शैली बियाहक लग्न मंडपमे छलीह। ई सभ सोचैत हम देबालक कोनसँ सटि गेलहुँ एकदम “सोंगर” जकाँ। मूल कोंकणी कथा : नागपंचम लेखक: वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद: सेबी फर्नानडीस मैथिली अनुवाद: डॉ. शंभु कुमार सिंह वसंत भगवंत सावंत सेबी फर्नानडीस डॉ. शंभु कुमार सिंह नागपंचमी अश्लेशा नक्षत्रहि सँ बरखा झमाझम होमए लागलैक। गत सात दिनसँ बरखा होइत छलैक। साओन मे तँ बरखा बन्न भ’ जएबाक चाही, मुदा ओ तँ बन्न हेबाक नामहि नहि ल’ रहल छलैक। बोलकर्णें केर द्वीप पानिसँ दहाबोह भ’ गेलैक। गामक खेतक फाटक सहित दहोदिस पानि मे डूबि गेलैक। मल्लिकार्जून मंदिरक दूइ सीढ़ी धरि बरखाक पानि छूबि लेलकैक, मुदा ठेह पर रह बलाक लेल कोनो असौकर्य नहि रहैक। मजूरी आ रोजीमे व्यवधान हेबाक कारणेँ लोक सभ हकोबको भ’ गेल छल। साँच त’ ई थिक जे खेती-बारीक काज साओन धरि भ’ गेलाक पश्चात् लोक गोबरछत्ताक धंधामे लागि जाइत छल। बहुतों जंगलक खाक छानलाक पश्चात् लोक गोबरछत्ता जमा कए लगीच वला साकोड्डें नामक गाममे बेचि दैत छल। ओहुना ओ सभ ककड़ी ओ गैता फोंडाक बजारमे बेचैत छल। जँ पैघ-सन माछ हाथ आबि गेलनि तँ ओकरा देसाई परिवारमे बेचि 10-20 टका कमा लैत छल। मुदा एहि बेर बरखा बेसी हेबाक कारणेँ भरि साल रोजगार बाधित भ’ गेलैक। नाह चलाब’ वला मलाह सभ तँ कखने अपन-अपन नाहकेँ उपर आनि राखि देने छल। ओकरा नीक जकाँ लकड़ीक गुटखासँ अटका देल गेल छलैक। ओकरा उपर नारियरक पातक छतरी सेहो बनाओल गेल छलैक जकर सुरक्षाक लेल ओकरा नारियरक गाछसँ बान्हि देल गेल छलैक। हरि भगत अपन बरण्डामे एकटा सोंगरक सहारे अपन पीठ अटका कए बैसल छल, बेर-बेर नदीमे आयल बाढ़ि के देखैत छल। घनघोर बरखाक कारणेँ ओ नदीक दोसर दिसक गाम साकोर्डें केँ सेहो नहि देख सकैत छल। ओहि क्षण ओ सपनहिमे अपन भविष्यक सोच केँ मूर्त रूप देमए लागल। आड़िक बाटे जेबाक बजाए ओ बिसू भट्टजीक गाछी बाटे रस्तासँ निकलि गेल। वेगसँ बहैत नलीकेँ पार क’ कए पनशी पहुँच गेल आ गाड़ीक प्रतीक्षा करए लागल। बरखाक कारणेँ गाड़ीक आवाजाही बहुत कम भ’ गेल छलैक। मोलें सँ एकटा टेंपू आबैत रहैक। मोलें साकोर्डें सँ लोक ससत दाम पर गोबरछत्ता कीनए गेल छलैक आ आब ओकरा मडगांवक बजारमे बेचबाक लेल जाइत रहैक। हरि ओहि टेंपू सँ लिफ्ट ल’ कए तिस्क्यार आबि गेल। डॉक्टर सँ मिलिकए बेमार नेनाक लेल औषधि लेलक आ दूधक सोसोइटीमे सभ दिन दूध लेबाक लेल आबय वला टेंपू पर बैसि ओ सांकोर्डें आबि गेल। नदीक कछेर आबितहि ओकर पयर काँप’ लागलैक। नदी पानिसँ लबालब रहैक आ दुनू दिस बस पानिए पानि देख’ मे आबि रहल छलैक। ओकर रूप वीरभद्र (रौद्र) जकाँ बुझाइत रहैक। ओहि काल ओकरा नजरिक समक्ष ओकर बेमार नेनाक सूरति आबि गेलैक। ने जानि ओकरा देहमे तखन कतए सँ उर्जा आबि गेलैक, ओ आव ने देखलक ताव झटसँ ओहि भयानक नदीमे कूदि गेल। ओकरा समक्ष केवल मृत्युये देखार दैत छलैक, मुदा ओ कोहुना हेलैत नदी पार क’ गेल। ओकर सौंसे देह पानिमे भीज गेल रहैक। ओ अपन सौंसे देहकेँ टटोललक त’ देखलक जे ओकर सभटा पीब’ वला औषधि आ गोटी भीज गेल छलैक। * * * खाइक लगा दी.....खाएब ने? पत्नीक टोकलाक पश्चात् ओ होशमे आयल। सपनासँ जागल लोक जकाँ ओ एमहर-ओमहर देखलक। कन्हा पर राखल गमछासँ ओ अपन मुँह पोछलक आ किछु कालक लेल आँखि मुनि एकटा नमहर साँस लेलक। खाइक लगा दिऔक, हरि बाजल। पत्नी खाइक लगा देलकैक। स्नानघर जा कए ओ हाथ-पयर धोलक। चिलका कखन सुतल? एखनहि सुतल छैक.....पत्नी नहुएँ बाजलीह। बोखार उतरलैक? “........” ओकरा गोटी खोआ देलियैक? हँ जे बाँचल छलैक ओ द’ देलिऐक। आब कोन दबाइ दियैक किछु बुझनामे नहि आबि रहल अछि। बुझाइत अछि जेना ई अपन जन्महिसँ मुँहमे दबाइक चम्मच ल’ कए आएल अछि। देखियौक ने काल्हि नागपंचमी छियैक हम बूट फूलबा लेल द’ देने छिऐक, भगवती करैथ चिलकाक बोखार कने कम भ’ जाइक। हँ, साँचे काल्हि तँ नागपंचमी छैक। ई तेसर खेप छियैक...... ओ एकटा गहिरगर साँस लेलक। बुझाइत अछि एहु साल हमरा सभक लेल अपशकुने अछि, ओ बहुत आर्त स्वरमे बाजल। भगवतीक ईच्छा.......। ई कहि ओकर पत्नी ओकरा मुँह पर अपन हाथ राखि देलकैक आ ओकरा आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लागलैक। तकर बाद दुनूक मूँहमे एक्कोटा दाना नहि गेलैक। गामक सभटा नेना-बूढ़ राणू भगत (हरिक बाबूजी) केँ भ्रष्टाचारी भगत केर नामसँ चिढ़बैत छलैक। राणू भगत समूचा गाममे धार्मिक ओ आन अनुष्ठान करबैत छल। गामक गरीब लोककेँ भगवानक नाम पर फँसयबामे ओ ततेक माहिर छल जे तकर कोनो सीमा नहि। खेती-बारी सहित आन सभटा जिम्मेदारी ओ हरिक कान्ह पर लादि देने छल आ स्वयं आरामक बंसी बजबैत छल। हरिकेँ अपन बाबूजी एक्कोटा आदति पसिन्न नहि छलैक, मुदा राणू भगत कहियो हरिक बात नहि बुझलकैक। ओतहि राणू सदति हरि आ ओकर पत्नी केँ अधलाहे बात कहैत रहैक। हरिक बियाहक तीन मास भ’ गेल रहैक आ ओहि काल एकदिन राणू नेनपन जकाँ मजाक करबाक लेल नारियरक गाछ पर चढ़ि गेलैक आ ओतए सँ जे गिरलैक तँ अपन डाँड़ तोड़ि खाट पकड़ि लेलक। राणूक खाट पकड़ि लेलासँ हरिक जिम्मेदारी दुगूना भ’ गलैक। “एहि हराशंखिनीक कारणेँ हमरा घरक सभटा खुशी पानि भ’ गेल अछि” राणू सदैव हरिक पत्नीकेँ कहैत रहैक। एतेक सुनलाक पश्चातो हरिक पत्नी ओकर देखभालमे कोनो कसरि नहि छोड़ैक। दिन पर दिन बीतल गेलैक, राणू चढ़िते अखाढ़ परलोक सिधारि गेलाह आ एहि कारणेँ हरिक पत्नीकेँ तीन मासक लेल घर छोड़ए पड़लैक। बाबूजीक मृत्युक कारणेँ ओ ओहि बरख नागपंचमी नहि मना सकल। दोसरहि बरख हरिक पत्नी एकटा नेनाकेँ जन्म देलकैक आ सोइरी हेबाक कारणेँ ओ ओहू बरख नाग देवताक पूजा नहि क’ सकल। एहि बेर एक बरखक चिलका बोखारसँ जूझैत रहैक.....। जेना-जेना समय बीतैत छलैक, चिलकाक हालति आर बिगड़ले जाइत छलैक। आयुर्वेदिक औषधिक सेहो कोनो असरि नहि भ’ रहल छलैक। दोसर दिस नदीक पानि बढ़िते जाइत छलैक आ चिलकाकेँ ल’ कए नदी पार करब संभव नहि छलैक। हरि अपन गाछीक मोड़ पर ठाढ़ छल। जँ हमर चिलका नीक भ’ जाएत तँ हम एहि बेर भगवान, कुलदेवता, ग्रामदेवता आदिकेँ छागर बलि देबैक। ओकर मनौन सुनि कए ओकर पत्नी अबाके रहि गेलीह। जाधरि ओ ओकरा देखैत ताधरि ओ नदी पार क’ कए हाथमे पूजाक समान ल’ कए मंदिर पहुँचि गेल। * * * अहाँ हिम्मति नहि हारब बाउ! बोखार उतरि जेतैक, एकटा पड़ोसनी ओकरा सांत्वना देलकैक। तखनहि मंदिरक घंटा बाजि उठलैक आ दुनू गोटे हाथ जोड़ि लेलक। ई हम एकदम साँच कहि रहल छी, ई कहि ओ चिलकाक माथ पर हाथ राखि देलक। देखियौक बोखार उतरि रहल छैक। पसेना चलि रहल छैक। हरि मंदिरसँ आनल भेभूत चिलकाक माथ पर लगा देलकैक। ओकर पत्नी बड़ भक्ति-भावसँ ओ भेभूत चिलकाक सौंसे देहमे मलि देलकैक। चिलकाक बोखार उतरैत देखि ओ दुनू परानी बेस खुश भेल। हरिक पत्नी भीजल बूटकेँ देखबाक लेल गेलैक आ हरि जंगल सँ आनल माटिसँ देबाल पर नागक आकृति बनब’ लागलैक। ओहि पर कुंकुम सँ ओकर रेखांकन कएलक आ कोयलासँ ओकरा पर “ओउम” बना देलकैक। हाथ धोलाक पश्चात् हरि फेर दरबज्जा पर आबि ठाढ़ भ’ गेलैक आ नदीक बहैत पानि दिस देख’ लागल। खेतमे एकनहुँ पानि भरले रहैक, मुदा बीच-बीचमे छोट-छोट गाछ सभ लखा दैत छलैक। हरि घुमबाक लेल नकलि गेल आ ताहि समय चिलकाक कानब-कुहरब सुरह भ’ गेलैक। हरिक पत्नी ओकरा छातीसँ सटा दूध पियौलकैक। चिलका एक मिनटक लेल तँ चुप भेलैक मुदा चोट्टहिं जोर-जोरसँ कानए लागल। चिलका एकबेर ओछरलक आ सभटा दूध बाहर आबि गेलैक। चिलकाकेँ अचानक एकटा चक्कर लागलैक आ ओ काठ जकाँ कठोर भ’ गेलैक। हरि केँ ई समाद कोनो आन नेनाक माध्यमे भेटलैक। हरिक हाथमे दू टा नारियर छलैक, ओ ओकरा ओत्तहि फेकलक आ हकासल घर दिस भागल। घरमे पड़ोसियाक भीड़ लागल रहैक। ओकर पत्नी जोर-जोरसँ कानैत रहैक आ ओकरा दू टा पड़ोसिया सभ सम्हारबाक प्रयासमे लागल रहैक। चिलकाक आँखि बन्न क’ रहल छलैक। एकटा पड़ोसिन किछु औषधिय पातक चूर्ण बना क’ ओकरा नाक लग राखि देलकैक। चिलकाक केवल साँसे टा चलैत रहैक। हरिक लेल ओतए बिलमब मोसकिल भ’ गेलैक, ओ बाहर आबि बरण्डा पर अपन दुनू हाथेँ माथ पकड़ि बैसि रहल। करिया मेघमे छिपल सूरूज,पछिम दिस डूबहि बला छल। आब हरिक जिनगीमे एकटा आर आफत आबहि बला छल आ नागपंचमीक पाबनि ओहि आफतमे शरीक होम’ बला रहैक। सभटा मनौती आ प्रार्थना बाढ़िक पानिमे भासि गेलैक। चिलका एखन धरि आँखि नहि खोलने छलैक। लोहारक भट्ठी जकाँ हरिक छाती धड़कैत रहैक। चिलकाकेँ देखबाक लेल आएल लोक सभ अपन-अपन घर आपस जा रहल छल। पड़ोसी सभक शब्द हरिक हृदयमे तीर जकाँ लागैत रहैक ओ घवाह भ’ रहल छल। शाबा! चिलका आइ राति नहि काटि सकतैक, एकटा स्त्री बाजल। हमरा तँ बेचारा हरि पर दया आबि रहल अछि, दोसर बाजल। भगवाने जानथि ई कोन बेमारी चलल छैक, तेसर बाजल। एक-एक करि कए बहुत भयानक बेमारी पसरि गेलैक अछि। किछु दिन पहिलुके बात थिक, मालूक पोता, जे मात्र डेढ़ बरखक रहैक, ओकरो एहने चक्कर ऐलैक आ छओ घंटाक भीतरे मरि गेलैक। ई गाम ककरो लेल शुभ नहि अछि। चारू दिस पानिए पानि। एहनामे डॉक्टरो-बैद केँ कि क्यो आसानीसँ बजा आनि सकैत अछि? साँच पूछू तँ हम एकटा बात कही, हरिक भक्तिमे निश्चये कोनो-ने-कोनो खोट हेतैक यैह कारण छैक जे ओ आइ तेसर बेर नागपंचमी नहि मना सकत। हँ सत्ते ..... काल्हि तँ नागपंचमी छैक? माटिकेँ तँ हाथो नहि लगा सकैत छी, आ एहनामे जँ चिलका मरि गेलैक तँ ओकरा गाड़तैक कोना? हरिकेँ किछुओ नहि सुझैक। काल्हि नागपंचमी छैक आ माटिकेँ घवाह नहि करबाक चाही। जँ चिलका भोरहि मरि गेल तँ शव अंतिम संस्कारक बिना भरि दिन आर भरि राति घरहिमे पड़ल रहत.....आर...... ओ आर किछु नहि सोचि सकल...... उठल आ घरक कोनमे पड़ल कोदारि आ गैंता ल’ क’ घरक बाहर निकलि गेल अन्हारेमे। ओ खाधि खुनब सुरह क’ देलक..... काल्हि मर’ वला चिलकाकेँ गाड़बाक लेल.......! कला अकादमी गोवासँ साहित्य पुरस्कार प्राप्त कोंकणी उपन्यास (1980-81) पाखलो तुकाराम रामा शेट अनुवाद डॉ. शंभु कुमार सिंह लेखक तुकाराम रामा शेट, (जन्म : 31.07.1952), कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रहक रचनाक संगहि कतेको पोथीक अनुवाद, संपादन आ प्रकाशनक काज करैत एकटा प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित केने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1980-81 में ‘गोवा कला अकादमी’क साहित्य पुरस्कार भेटि चुकल छनि। संप्रति, गोवामे रहैत साहित्य साधना मे लीन छथि। अनुवादक डॉ. शंभु कुमार सिंह, (जन्म : 18.04.1965), माता : श्रीमती जयमाला देवी, पिता : श्री चतुर्भुज सिंह, ग्राम : लहुआर, पत्रालय : तेलहर, अंचल : महिषी, जिला : सहरसा, पिन कोड : 852216, (बिहार) पाखलो © मूल कोंकणी : तुकाराम रामा शेट मुखपृष्ठ आ भीतरक चित्र : चन्दन विश्वास द्वारा ------------------------------------------- PAKHALO : A Konkani Novel by Tukaram Rama Shet, translated into Maithili by Dr. Shambhu Kumar Singh. अनुवादकक दिससँ प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास ‘पाखलो’क अनुवाद हम सुरह केने रही वर्ष 2009 मे, जकर अनूदित संस्करण www.videha.co.in क वेबसाइट पर “विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई- पत्रिका” मे 15 जुलाई 2009 सँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशन आरंभ भेल छल। हम एहि अनुवादक मादे विस्तारसँ एकर हिन्दी संस्करणक भूमिकामे लिखने छी, जकर सारांश ई अछि जे हमरा एहि उपन्यासकेँ मैथिली भाषामे आनबाक लेल पहिने एकर हिन्दीकरण करए पड़ल जाहिमे हमर सहयोग केलनि हमर कार्यालयक सहयोगी श्री सेबी फर्नांडीस। तैँ सेबीजीक प्रति पहिल कृतज्ञता ज्ञापित करब हम अपन कर्त्तव्य बुझैत छी, किएक तँ बिनु हुनक सहयोगक मैथिलीक ई सेवा हमरा बुते असंभवे रहितए। हम दुनू गोटे राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे संगहि-संग काज करैत छी। एहिलेल कार्यालयसँ अवकाश भेटलाक पश्चाते हम दुनू गोटे एकठाम बैसि सकी, जे संजोग बहुत मोसकिलसँ भेटैत छल। यैह ओ कारण थिक जे एहि पोथीक अनुवादमे एतेक बेसी समय लागि गेल। ने केवल एहि अनुवादक मादे अपितु जँ हम अपन वर्तमानक समस्त शैक्षणिक गतिविधिक चर्चा करी, तँ श्रीमती शुचिता सिंह (तत्कालीन समन्वयक, वेलिडेशन एण्ड लेक्सिकल बिल्ड, परियोजना, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर), ओ प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ (तत्कालीन निदेशक, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर) क नामोल्लेख केने बिना हम उऋण नहि भ’ सकैत छी, किएक तँ वर्ष 2008 मे भारतीय भाषा संस्थान अएबासँ पूर्वक किछु वर्ष धरि हमर सम्पर्क कलमसँ छूटि गेल छल। दोसर शब्दमे जँ कही तँ ई कहल जा सकैछ, जे कलम हमरासँ विमुख भ’ गेल छलीह आ हम कलमसँ दूर भागि गेल रही। एहन विषमकालमे हिनके सभक परतापेँ हमरा हाथमे पुनः कलम आबि सकल जे हमरा वर्तमान जीवनक आधार/आहार बनल। तैँ हिनका सभक प्रति अपन भावातिरेकक अभिव्यक्ति शब्दक माध्यमे हमरासँ संभव नहि अछि। हँ, हम श्रद्धावनत् अवस्से भ’ सकैत छी। बिना कोनो शर्तक ‘पाखलो’क अनुवाद ओ ई-प्रकाशनक अनुमति दए लेखक श्री तुकाराम रामा शेट जे सहृदयता देखौलनि अछि, ताहिलेल हम हृदयसँ हुनकर आभारी छियनि। धन्यवादक पात्र छथि समकालीन मैथिली साहित्यक एकटा विशिष्ट हस्ताक्षर “विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई- पत्रिका”क संपादक, श्री गजेन्द्र ठाकुरजी, जे एहि अनूदित कृतिक ई-प्रकाशन केलनि। एहि महती उपकारक लेल हम हुनका प्रति कृतज्ञ छी। एकटा सूचना आर, मूल पोथीमे श्री अशोक मनभुटकरक लिखल समीक्षाकेँ सेहो अंतमे स्थान देल गेल छैक तैँ हमहूँ ओकरा यथास्थान राखि देने छी। ई अनुवादकर्म शतशः हमरे थिक, तकर दाबी हम नहि क’ सकैत छी, किएकतँ अनुवादक क्रममे हमरा कतोक कोंकणी, हिन्दी आ मैथिलीक विद्वान लोकनिसँ परोक्ष वा प्रत्यक्ष रूपेँ मदति लेबए पड़ल अछि। हिनका सभकेँ कोटिशः साधुवाद। आ अंतमे, एहि अनुवादकर्मक मादे सुखद परिणामक प्राप्त्याशा हमरा मैथिलीक सुधीजन आ विद्वान लोकनिसँ नहि अछि, अपितु जँ हमरा प्रयासक त्रुटि पर ओ लोकनि अपन ध्यान केन्द्रित करथि तँ ई हमर अहोभाग्य होयत। किएक तँ हम अपन प्रस्तुतीकरण ने तँ एकटा विद्वानक रूपमे आ ने अनुवादकक रूपमे चाहैत छी। हम अपन प्रस्तुतीकरण एकटा विद्यार्थीक रूपमे करए चाहैत छी। अपने लोकनिसँ बहुत किछु सीखए चाहैत छी। बहुत किछु......... बहुत रास...........। मैसूर डॉ. शंभु कुमार सिंह 19 अप्रील, 2013 चैत्र, रामनवमी एक आइ रबि छैक। हमर निन्न कने देरी सँ खुजल। हम अपन कम्मल सुलूकेँ ओढ़ा देलिऐक। ओछाओन पर पड़ल-पड़ल हमर नजरि देवाल पर गेल। गोविन्द अपना संगहि भगवानक दुनू फोटो ल’ गेल छल। चिक्कनि माटिसँ ढौरल देवाल पर आब कोनो फोटो नहि रहैक। ओ एकदम सुन्न बुझाइक। हम ओछाओने पर पड़ल-पड़ल सोचैत रही। गोविन्द नोकरी करबाक लेल पणजी शहरमे छल। बाबूजीक मुइलाक पश्चात् ओ अपन मायकेँ अपना संगहि पणजी ल’ गेल छल। हम दुनू गोटे एहि घरमे रहैत रही। हम आ हमर भगिनी। हम उठलहुँ, खिड़की खोललहुँ, आ दरबाजा खोलहि वला रही कि एतबहिमे आलेसक आवाज सुन’ मे आएल। “यौ पाखलो! एखन धरि सुतले छी? पाखल्या... यौ पाखल्या.....” बिना किछु बजनहि हम दरबाजा खोलि देलहुँ। हम दरबाजा बन्न केलहुँ आ एकटा बासन ल’ कए लगीचक होटल जएबाक लेल ओकरा पाछू-पाछू चुपचाप चलि देलहुँ। आलेस हमर नेनपनक मीत थिक। हमसभ एखनहुँ नीक मीता छी। एक्कहि ठाम काज करैत छी। ओहो ड्राइवर आ हमहूँ। एक्कहि कम्पनीमे नोकरी करैत छी आ एक्कहि रंगक ट्रक चलबैत छी। हमरा गुमसुम चलैत देखि ओ बाजल— “औ जी! कोन सोचमे डूबल छी? “किछुओ तँ नहि? चेतना अएलाक बाद हम कहलहुँ। “किछु कोना नहि? ओहिना बाजि रहल छी की? कने सोचू, जँ अहाँक बियाह भ’ जाय तँ भगिनीकेँ देख’ वाली किओ तँ भ’ जेतीह?” एहि बात पर हँसैत हम पूछि देलिऐक— “के देत हमरा अपन बेटी?” ई बात सुनितहि ओ जोर-जोरसँ हँसए लागल। ओकर हँसी रोकबाक लेल आ किछु आर बाजबाक लेल हम ओकरा सँ पूछलहुँ— “ऐं यौ आलेस, अहाँक पासपोर्ट बनि गेल की?” “हँ।” “तखन दुबई कहिया जा रहल छी?” हम पुछलियनि। “अगिला सप्ताह, कपेल (छोट गिरिजाघर)क प्रार्थनोत्सव केर बाद।” “कपेलक प्रार्थनोत्सव केर बाद?” “हँ, बरु ओहि दिन।” “ओहि दिन किऐक? उत्सवक बाद चलि जाएब…।” “नहि, असलमे ओहि दिन हमर मीत जा रहल अछि, एहि लेल हम ओकरहि संगे जा चाहैत छी।” “तखन तँ अहाँकेँ हमरा कम्पनीक नोकरी छोड़’ पड़त।” “एहन भिखमंगा नोकरी करबो के करए? ओहुना भारतमे रहि कए के नीक पाइ कमा सकैत अछि? ओतए मजूरीयो तँ बेसी छैक?” “तखन अहाँक विदेश जायब एकदम पक्का ने?” “हँ”, एतबा कहि ओ अपन पैन्टक बेल्ट आर कसय लागल। “विदेश जुनि जाउ।”, हम पछिला किछु दिनसँ आलेससँ कहैत रहिऐक। “हमरा बाटमे अड़ँगा जुनि लगाउ।”, ओहि समय ओ हमरा कहलनि। हम चुपचाप बाट चलैत रहलहुँ। जखन गोविन्द गाम छोड़ि पणजी शहर गेल छलाह, तखन हमरा बड़ खराप लागल छल, मुदा आब तँ आलेस अपन गाम आ देश छोड़ि परदेस जा रहल छल, आइ हमरा कनेको खराप नहि लागि रहल अछि। हम दुनू गोटे होटल पहुँचलहुँ। भीतर जयतहि सभ किओ हमरा घूरि-घूरि कए देखय लागल। हम मोनहि-मोन सोचलहुँ, “बुझाइत अछि जे ओकरा सभक नजरि हमर कैल टनटन केश आ कैल रोइयाँ पर चलि गेल छैक, हमर लहसुनियाँ आँखि, उज्जर चाम आ गसगर देह…” “पाखलो, अहाँक बासनमे दूध दी, आकि चाह?” होटलवला हमरासँ पूछलक। हम भरि बासन चाह ल’ लेलहुँ। दू टा बड़का पाँवरोटी आ एकटा कांकण (वलयाकार पाँवरोटी) लेलहुँ। आलेस अपन मीतक संग दुबई जाइवला बात करैत रहल। ओकर मीत ओतएसँ ओकरा लेल कोनो विदेशी समान लएबा लेल कहैत रहैक। विदेश जयबासँ संबंधित बात करएवला आलेसकेँ छोड़ि हम अपना घरक बाट लेलहुँ। पड़ोसक रुक्मिणी मौसी हमरा घर आयल छलीह। ओ सुलूकेँ उठा कए मुँह धोबाक लेल कहलथि आ ओकरा छींटगर लाल फ्रॉक पहिरैलथि। हमहुँ अपन हाथ-मुँह धो लेलहुँ। दू टा गिलासमे चाह ढ़ारलहुँ आ रुक्मिणी मौसीकेँ चाह पीबाक लेल पूछलियनि, “अहाँकेँ चाह चाही की?” “नहि बाउ! हम एखनहि घरसँ चाह पीबि कए आएल छी, ओहुना हम होटलक चाह नहि पीबैत छी।” रुक्मिणी मौसीक एहि जबाब पर हम चुप भ’ गेलहुँ। हम सुलूकेँ बजेलहुँ। ओ थपड़ी पाड़ैत हमरा लग आयलि आ पूछ’ लागलि, “मामा आइ रबि छियैक ने? आइ तँ अहाँ काज पर नहि जाएब?”हम ‘हँ’ कहि अपन माथ डोलौलहुँ। “मौसी आइ अहाँ हमरा अपना ओहिठाम नहि ल’ जाएब। आइ हम एतहि रहब…मामाक संगे।” ओ मौसीसँ बाजलि। “ठीक छैक दाइ.....आइ हम अहाँकेँ नहि ल’ जाएब।” हम दुनू गोटा चाह पीबैते रही तावत रुक्मिणी मौसी अपन डाँरक साड़ी सम्हारैत घरक बरतन-बासन धोबाक लेल चलि गेलीह। सुलूक बाबूजी ओकरा सम्हारबाक लेल तैयार नहि रहथि। ओहि समय ओ मात्र डेढ़ बरखक छलीह। नीक जकाँ बाजियो नहि होइक। केवल दूई चारि शब्दहि बाजि सकैत छलीह। आब तँ ओ साढ़े तीन बरखक भ’ गेल अछि, मुदा देखबामे पाँच-साढ़े पाँच बरखक बुझाइत छलीह। गोर-नार चेहरा! हम ओकरा माथ पर अपन हाथ फेरलहुँ। मोम-सन नरम केश आ लहसुनियाँ आँखि! हम ओकरा आँखिमे देखलहुँ, आ ओ हमरा आँखिमे देखलक। ओ अपन आँखि पैघ कए लेलक। ओकर लहसुनियाँ आँखिमे एक्कहि संग कैकटा दृश्य उभरि गेल। एहन बुझाइत छल जेना ओ किछु पूछए चाहैत छलीह! हमरा कने आश्चर्य भेल। “अहाँक लहसुनियाँ आँखिसँ हमर कोनो पुरान संबंध अछि!” हमर नजरि ओकर गुलाबी केश पर गेल। ने जानि किएक ओकर गोर-नार चाम, गुलाबी केश देखि हमरा एहन बुझाएल जेना पूरा आकाश मेघसँ आच्छादित भ’ गेल होअए, ठीक तहिना हमर मोन अतीतक स्मरणसँ भरि गेल…। ताधरि रुक्मिणी मौसी घरक काज पूरा क’ कए अपन घर जाहि पर रहथि, कि हम सुलूकेँ हुनका संगहि ल’ जयबाक लेल कहलियनि। “हम नहि जायब।” सुलू अपन माथ डोला कए जबाब देलक। “नहि, हमरा काज पर जयबाक अछि, अहाँ मौसीक संग चलि जाउ। दूपहरमे हम जल्दीए आबि अहाँकेँ ल’ आएब।” एतबा कहि हम सुलूकेँ समझएबाक प्रयास कएलहुँ। सुलू कानय लागलीह, मुदा पछाति जा कए ओ मौसीक संगे जयबाक लेल तैयार भ’ गेलीह। रुक्मिणी मौसी सुलूकेँ ल’ कए चलि गेलीह। हम दरबाजा बन्न क’ लेलहुँ। हमरा दिमागमे आयल सभटा पुरान स्मृति एकटा गरज आ चमक केर संगहि बिखरि गेल! बुझू हम अपना आपकेँ पूर्ण रुपेण ओकरहिंमे ताक’ लागलहुँ…. अपन पहिचानक खोज करय लागलहुँ…। दू गोविन्दक दादी द्वारा कहल गेल खिस्सा एखन धरि पाखलो केँ स्मरण छलनि। शाली आ सोनू दुनू भाय-बहिन रहथि। गामक सीमान पर हुनक घर छलनि आ अपन किछु खेती-बारी सेहो। ओ अपनहुँ खेती-बारी करैत छल आ दोसरोक खेतमे काज करबाक लेल चलि जाइत छल। एकर अतिरिक्त ओ गरमीमे मजूरीयोक काज करैत छल। एकदिन शाली लकड़ी काटबाक लेल जंगल गेल छलीह। कुमारि शालीक संग तीन टा आर स्त्री लोकनि छलीह। आन दिन जकाँ ओ सभ लकड़ी काटि कए ओकर बोझ सेहो बना नेने रहथि; तखनहि हुनका सभकेँ सीटीक आवाज सुनबामे अयलनि। ओ चारू गोटे डरि गेलीह। ताहि दिन पाखले (पुर्तगाली फिरंगी) जंगलमे शिकार करबाक लेल अबैत छलाह, ओ सभ एहन सुनने छलीह। फिरंगी सभक मनमानी आ स्त्रीगण पर कयल गेल अत्याचारसँ ओ सभ परिचित छलीह। ओहि सीटीक आवाज सुनि कए ओकरा सभक तँ जेना होशे-हवास गुम भ’ गेल। ओ सभ बहुत घबरा गेलीह। तावत हाथमे बंदूक नेने तीनटा पाखले ओतए पहुँचि गेल। बाघ केँ सोझाँ आबि गेलाक पश्चात् जेना लोक लंक ल’ लैत अछि ठीक ओहिना ओ सभ लकड़ीक बोझ छोड़ि भागल। तीनू पाखले ओकरा सभक पीछा करय लागल। अपन जान बचयबाक लेल भाग’ वाली शाली गिरैत-पड़ैत बहुत थाकि गेल छलीह। आब आर बेसी गतिएँ दौड़ब ओकरा बुता केर बात नहि रहि गेल छल। ओ पाछू ताकलक, तँ देखलक जे एकटा फिरंगी अपन कन्हा पर बंदूक आ छाती पर एकटा तमगा लगौने मिलिट्री वेशभूषामे ओकरहि पाछू दौड़ल आबि रहल छल। ओहि पाखलोकेँ देखि शाली अपन जान बचएबाक लेल अपन अंतिम शक्ति लगा कए दौड़लीह। ओ सभटा स्त्रीगणकेँ पाछू छोड़ैत आर जी-जानसँ दौड़’ लागलीह। बहुत बेसी दौड़बाक कारणेँ आब ओ थाकि कए चकनाचूर भ’ गेल छलीह। जोर-जोरसँ उपर नीचाँ करैत ओकर छाती आब फाटि कए बाहर निकलि जेतैक, ओकरा एहने बुझाब’ लागलैक। ओकर दौड़बाक गति मंद होम’ लागलैक आ एतबहिमे ओ पाखलो ओकरा लगीच पहुँचि गेल। लगीचक आन-आन स्त्रीगणकेँ छोड़ि ओ पाखलो शालिएक दिस बढ़ल आ अंततः ओ शालीकेँ अपन बाँहिमे कसि लेलक। एतबहिमे पाछूसँ दू टा आर पाखले ओतए पहुँचि गेल। ओहो सभ शालीक दिस अपन हाथ बढ़ौलक, मुदा ओ पाखलो ओहि दुनू पाखलेकेँ पुर्तगाली भाषामे किछु कहलकैक। ई सुनि ओ दुनू पाछू हटल आ आगू भागए वाली स्त्री सभक पीछा करए लागल। पाखलोक बाँहिमे शालीक साँस फूल’ लागलैक आ ओकर वाक् सेहो बन्न भ’ गेलैक। ओहि फिरंगीक देहमे शैतान आबि गेल छलैक! शालीकेँ होस आबि गेलैक। एखन धरि साँझ परि गेल रहैक। पूरा जंगलमे अन्हार व्याप्त भ’ गेल रहैक। एहि अन्हारकेँ देखि शालीकेँ बुझाइक जे जेना फेर ओकर दम निकलि जेतैक। ओकरा देह पर कोनोटा नूआ नहि रहैक, मुदा ओकरा देह पर किछु फाटल-चिटल नूआ राखि देल गेल रहैक। ओकरा माथक नीचाँ कोनो कड़गर चीज रहैक, मुदा की? से पता नहि चलि सकलैक। ओ जड़वत भ’ गेलीह। ओकर करेज धक-धक करैत रहैक, देहक पोर-पोरमे दरद होइत रहैक। ओ जतय कतहुँ अपन हाथ रखैक ओकरा सूखल खून हाथ लागैक। ओ बहुत डरि गेल छलीह, मुदा कानि नहि सकैत छलीह। ओ उठि कए बैसि गेलीह; तखने अकस्मात् टॉर्चक इजोत भेलैक। ओकर इजोत ओकरा देह पर पड़लैक त’ ओकर आँखि चोन्हिया गेलैक। छन भरिक लेल अपन आँखि बन्न क’ कए फेर खोललक त’ देखलक जे वैह पाखलो ओकरा लगीच आबि रहल छलैक। आन दूटा पाखलो जतए ठाढ़ रहैक ओत्तहि रहल। पछाति जा कए ओ दुनू ओहि टॉर्चक इजोतमे आगू बढ़ि गेल। शाली दिस आबि रहल पाखलो नांगटे देह छल। ओ फेर डरसँ सिहरि गेलीह। ओ फटलका नूआ-फट्टा ल' कए अपना छातीकेँ झाँपैत ठाढ़ हेबाक प्रयास करए लागलीह, मुदा टूटल गाछ जकाँ धरती पर गिर गेलीह। ताधरि ओ पाखलो शालीकेँ झट दए अपन हाथेँ पकड़ि लेलक। ओ पाखलो शालीक देहक नीचाँ ओछाओल गेल कपड़ा उठा लेलक। शालीक माथक नीचाँ राखल टोपी शालीक माथ पर राखि ओ जोर-जोरसँ हँसय लागल। शालीक घबराहटि बढिते जा रहल छलैक। ओ डरेँ थरथर काँपय लागलीह। ओकरा बुझेलैक जे एकटा बड़का अजगर खूब पैघ मुँह बौने ओकरा अपन ग्रास बना लेतैक। ओ जोरसँ चिकरलीह, मुदा ओकर आवाज ओकरा मुँहसँ नहि निकलि सकल। ओ फेरसँ शालीकेँ चुम्मा-चाटी करब सुरह क’ देलकैक आ ओकरा अपन बाँहिमे कसि लेलकैक। ओहि अन्हार घुप्प जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे क’ लेलकैक। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब तरहेँ आवाज आब’ लागलैक। साँझ पड़तहि ई बात सौंसे गाममे पसरि गेलैक। सीता कहैत छलीह, जे कोना ओ पाखलोक चंगुलसँ बाँचि गेलीह। शाणूक घरनी बतबैत छलीह जे कोना पाखलो कुमारि शालीकेँ उठा कए भागि गेल ओ ओकर इज्जति लूटि लेलक। शालीकेँ तँ पाखलो नोचि-चोथि नेने हेतैक, ई सभ सोचि-सोचि आन सभ लोक ओकरा प्रति अपन दया भाव देखबैत रहैक।

“पाखलो शालीक शीलभंग क’ देलकैक।” ई बात सौंसे गाममे आगिक भांति पसरि गेलैक। ओकर भाय जे नोकरीसँ घर घुरैत रहैक ओकरहुँ ई बात बुझनामे आबि गेलैक। ओ गोस्सासँ लाल भ’ गेलैक, संगहि डरि सेहो गेलैक। ओकरा हाथमे कुड़हरि रहैक जकरा ओ अपन कन्हा पर राखि लेलक। “एहि कुड़हरिसँ जँ हम ओहि पाखलोकेँ जित्ते नहि काटि देलियनि तँ हमरहुँ नाम नहि।” ओ बेर-बेर यैह शब्द दोहराबैत रहैक। शालीकेँ ताक’ जएबा लेल ओ कतेको लोकसँ मिनती केलक मुदा किओ ओहि अन्हार जंगलमे जएबा लेल किएक तैयार होइतैक? ओ एकटा लालटेम जरौलक आ एसगरे चलि देलक। लोक सभ ओकरा पागल कहए लागलैक। “पाखलो अहाँकेँ गोली मारि देत।” ई कहि लोक-सभ ओकरा डरएबाक प्रयास केलकैक मुदा ओ अपन जिद पर अड़ल रहल। ओ एसगरे चलि देलक, तखने दादी सेहो ओकरा संगे जएबाक लेल तैयार भ' गेलैक। दादी कार्रेर (बस) क चालक रहैक। शकल-सूरतमे ओ सोनूएँ-सन रहैक। दुनू युवा जएबाक लेल तैयार भ’ गेल। दादी शालीक कानमे किछु कहलकैक। ओ दुनू पातोलेक बाटे जंगल नहि जा कए सीधे गामक पुलिस स्टेशन दिस चलि देलक। एहन देखि गामक किछु आर बूढ़ आ जुआन सभ ओकरा संग भ’ गेलैक। सब किओ पुलिस-स्टेशन पहुँचि गेल। दादी पुलिस-स्टेशनक कैब, (पुर्तगाली पुलिस अधिकारी) देसाई साहेबकेँ शोर पारलकैक। ओ दरबज्जा नहि खोलि खिड़की खोललक आ ओतहिसँ बाहरक दृश्य देखलक। “पाखलो भीतरमे छैक की?” दादी कान्स्टेबलसँ पुछलकैक। “नहि।” साधारण भेषमे कान्स्टेबल कहलकैक। “तखन गेलैक कत”? दादी फेर पुछलकैक। “कार्मोक प्रधान आ हुनक दूई टा संगी भोरे-भोर शिकार पर गेल छथि, एखन धरि नहि आएल छथि। हुनका पणजी शहर सेहो जेबाक छनि, एहिलेल आब ओ काल्हिए औताह।” कान्स्टेबल कहलकैक। “साँचे?” “हँ, साँचे”, देवकीकृष्ण भगवानक किरिया। कान्स्टेबल देसाई कहलकैक। नहि, नहि ओ झूठ बाजि रहल अछि। हमरा सभकेँ पुलिस स्टेशनक भीतर जा कए देखबाक चाही। “पहिने दरबज्जा खोलू, हमरा सभकेँ देखि कए पाखलो भीतरे गुबदी मारि देने हैत।” सोनू जोरसँ चिकड़ि कए कहलक आ अपन कुड़हरि नचब’ लागल। जाउ! जाउ! बन्न करू अपन ई नाटक। कान्स्टेबल गोस्सासँ कहलकैक। “एखन जँ अहाँक बहिनक इज्जति पाखलो लूटि नेने रहितए तँ अहाँ कि एहिना चुप बैसि रहितहुँ?” सोनू गोस्सासँ बाजल। “आब अहाँ किछु बेसिए बाजए लागलहुँ अछि, एहिसँ बेसी जँ किछु बाजलहुँ तँ हमरा बन्दूक निकालए पड़त।” “अहाँ एना किएक बाजि रहल छी कॉन्स्टेबल?” दादी बीचहिमे टोकलक। कारी शीशमक लकड़ी सन देहवला दादी कोयला जकाँ गरम भ’ गेल। “अहाँ कि कोनो बाहरी लोक छी? फिरंगीक पेटपोस्सा, अपन आ आनक कोनहुँ गरैन नहि? एहन-एहन केँ तँ पाखलोएक संग भगा देबाक चाही।” “हाँ साँचे!” एतबा कहि सभ लोक हँ मे हँ मिलेलकैक। नहि, नहि हमरा सभकेँ अहाँक बात पर भरोस नहि अछि। हमरा सभकेँ देखए दिअ, पाखलो निश्चिते भीतर दुबकल अछि। एतबा कहि सोनू भीतर जएबाक जिद करए लागल। “नहि, नहि एहन बात नहि छैक। जँ एहन रहतैक तँ अहाँ सभ एखन धरि पड़ा गेल रहितौं। पाखलो सँ अहाँ सभकेँ गोली खाए पड़ितए। अहाँ सभकेँ जँ एखनहुँ विश्वास नहि होइत अछि तँ भीतर आबि जाउ मुदा जल्दीए बहरा जाएब।” सभ किओ पुलिस स्टेशनक भीतर ढुकि गेल। ओतए तीनटा पुलिसक अतिरिक्त किओ नहि रहैक। एक कान्स्टेबल देसाई, दोसर नायक कासीम आ तेसर धोणू पुलिस। सोनू आ दादी, दुनू शालीकेँ ताकबाक लेल पातोलेक जंगल दिस चलि देलक। सोनू शालीक नाम ल’ ल’ कए चिकड़’ लागल, मुदा ओकरा कोनो जबाब नहि भेटलैक। जंगलमे भालू सभ कानैत रहैक। चारू दिस कीड़ा-मकोड़ाक आबाज अन्हार आ सन्नाहटि पसरल रहैक। दुनूगोटे राति भरि जंगलक खाक छानैत रहल मुदा ओकरा कानमे मात्र ओकरहि द्वारा लगाओल गेल आबाजक प्रतिध्वनि सुनाइत रहलैक। सोनू छन भरिक लेल बहुत निराश भ’ गेल। गाम-घरमे ककरो देहमे भा आबि गेलासँ जे स्थिति होइत छैक ओहिना सोनूक देह काँपए लागलैक। ओ अपन देह पर नियंत्रण केलक आ अपन आँखि नमहर क’ कए गोस्सासँ बाजए लागल— “हम सौंसे जंगलमे आगि लगा देबैक, आ जरा कए सुड्डाह क’ देबैक। यैह जंगल पाखलो केँ शरण देने छैक। सुड्डाह क’ देबैक एकरा, सुड्डाह क’ देबैक। ओ बुदबुदाब’ लागल।” एतबा कहैत ओ काँपए लागल। ओ लालटेमक बतिहरि उकसा देलकैक। लालटेमक इजोत भभक’ लागलैक। ओहि बतिहरिसँ ओ सौंसे जंगलकेँ जरएबाक तैयारी करए लागल, मुदा दादी ओकरा रोकि लेलकैक। “अहाँ ई कोन पगलपन क’ रहल छी?” “ई पगलपन नहि छैक दादी। एहि जंगलमे आगि लगा कए हम ओहि पाखलोकेँ सुड्डाह क’ देबैक।” सोनू अपन दाँत आ ठोर पीसैत बाजल। “नहि, नहि, एना ओ तँ नहि मरि सकत, हँ जंगल अवस्से जरि कए सुड्डाह भ’ जेतैक। एतबा कहि दादी ओकरा रोकबाक प्रयास केलकैक। एहि बातकेँ ल’ कए दुनूमे घिच्चातानी भ’ गेलैक, आ एहि बीच सोनूक हाथसँ लालटेम गिर गेलैक आ बुता गेलैक। चारू दिस घुप्प अन्हार भ’ गेलैक। बहुत राति भीजला पर ओ दुनू गाम घुरल। एखन मुर्गा पहिले-पहिल बाँग देने हेतैक। खाम्हसँ ओंगठि कए बैसल सोनूकेँ निन्न आबए लागलैक, तखनहि दरबाजा पर खट-खट केर आबाज भेलैक। सोनू उठि कए दरबाजा लग गेल। ओकरा दरबाजा लग पहुँच’ सँ पहिनहि दरबाजा धकेलि कए तीनटा पाखले भीतर आबि गेलैक। सोनू ओहि दरबाजा लग खाम्हे जकाँ ठाढ़ रहल! घरमे बरैत लालटेमक इजोतमे ओ पुलिस प्रधान कार्मो रेयस केँ चिन्ह गलैक । गोर-गहुमा चाम आ ताहिपर गुलाबी मोंछ। पुलिस प्रधान अपन कन्हासँ शालीकेँ नीचाँ उतारि देलकैक। ओ शालीकेँ कहुना बैसएबाक प्रयास केलक मुदा असफल रहल, हारि कए ओ अपन अंगा खोलि ओछा देलकैक आ ओहि पर शालीकेँ सुता कए तीनू पाखले घूरि गेल। ओकरा सभक जूत्ताक आबाज शनैः-शनैः कम भेल जा रहल छल। शाली धरतीए पर घोलटल छलीह। ओकर आँखि खुजले रहैक। सोनूकेँ तँ बुझू जे किओ ओकरा पएरमे काँटी ठोकि देलकैक, ओ भावशून्य ठाढ़ भ' सबकिछु देखैत रहल। ओकर नजरि कोनमे राखल कुड़हरि पर गेलैक। लालटेमक इजोतमे ओहि कुड़हरिक चमकैत धार सोनूक असहायता पर हँसैत रहैक। ओ चमक सोनूक करेजकेँ चालनि केने जा रहल छल। सोनू जखन शाली लग आएल, तँ शाली नहुँ-नहुँ अपन आँखि खोललक। दुनूक अवाके बन्न भ’ गेल रहैक। सोनू शालीकेँ शोर पारलकैक तँ ओ ‘आहि-आहि’ कहि कए जबाब देलकैक। सोनू ओकरा पानि पीबाक लेल देलकैक। एतबहिमे सोनूक अंदरक भाव बाहर निकलि गेलैक। शालीक शीलभंग कएलाक पश्चात् पाखलो ओकरा सोनूक ओहिठाम छोड़ि देने छलैक एहिलेल गामक लोक सभ सोनूकेँ समाज सँ बाड़ि देने छलैक। शालीकेँ गर्भ छनि ई बात सौंसे गाममे पसरि गेलैक। सौंसे गाममे ने तँ किओ सोनूसँ बात करैक आ ने किओ ओकरा काज पर बजबैक। सोनूक रोजी बन्न भ’ गेलैक। ओहि घटनाक दोसरहिं दिन शाली आत्महत्या करबाक प्रयास कएने छलीह, मुदा सोनूकेँ बीचहिं मे घर आबि जयबाक कारणेँ ओकर जिनगी बाँचि गेलैक। गर्भवती हेबाक लाजक कारणेँ ओ कैक बेर घरसँ भागि गेल छलीह मुदा सब बेर सोनू ओकरा घुरा लैक। ओकर घर गामक सीमान पर रहैक। एहि लेल गामक आन लोकसँ ओकरा विशेष संपर्क नहि रहैक। तकरा बादो गामक मौगी सभ शालीकेँ देखि ओकरा नाम पर थूक फेकैक। ओकरा पर फब्ती कसैत रहैक। शाली बेचारी सभ किछु सहन केने जा रहल छलीह। “चाहे जे किछु भ’ जाए मुदा अपन जान नहि देब शाली!” सोनू ओकरा कहलकैक। ओ इहो कहलकैक—“बीया चाहे कथुक हो वा केहनो हो जँ एकबेर ओ माटिमे पड़ि जाइत छैक तँ ओकर पालन-पोषण माटि कए करहि पड़ैत छैक। माटि बंजर नहि हेबाक चाही।” सोनूकेँ काज भेटब मोसकिल भ’ गेलैक, आ ओ दुनू प्रायः उपासे रहय लागल। उपरसँ लोक सभक ऊँच-नीच सुनैत-सुनैत ओ आजिज भ’ गेल छल। ओ बहुत परेशान रहय लागल। “जँ आर किछु दिन गाममे रहलहुँ तँ भूखसँ मरि जाएब आ लोकक ऊँच-नीच तँ सुनहि पड़त।”, एहना सोचि कए ओ एकदिन गाम छोड़ि कए शेलपें चलि गेल। शाली घरमे एसगरे रहि गेलीह। सोनू कहियो-काल गाम आबैक आ शालीकेँ अन्न-पानि द’ कए आपस चलि जाइक। भोरका पहर रहैक। शाली दरबाजासँ झलकैत सरंग दिस निहारैत छलीह। तखने ओ दरबाजासँ भीतर अबैत कार्मो प्रधानकेँ देखलकैक। ओकर तँ करेजा धक् द’ रहि गेलैक। अपन कनहा आ छाती पर तमगा लगौने कार्मो प्रधान अपना हाथक बंदूक धरती पर राखैत ओत्तहि बैसि गेल। शाली तँ डरक मारल काँपय लागलीह। कार्मो प्रधान ओकरा किछु कहय चाहैत छल मुदा बाजि नहि सकल। ओकरा कोंकणी नहि अबैत रहैक साइत एहि लेल ओ चुप रहि गेल। पछाति जा कए ओ जे किछु पुर्तगाली भाषामे कहलकैक ओकरा शाली नहि बुझि सकलीह। ओ शालीकेँ अपना लगहि मे बैसबाक इशारा केलकैक। आ फेर किछु खिन्न भ’ कए चुप रहि गेल। भ’ सकैछ जे ओकरा पश्चाताप भेल हो, “एहन शाली केँ लागलैक।” ओ उठल, अपन बंदूक अपना कनहा पर राखलक आ चलि देलक। ओकरा जूताक आबाज शालीक करेजक धुकधुकीक पाछाँ गुम्म भ’ गेलैक। शाली अपना घरमे पाखलो केँ सहारा देने छैक, किओ ई बात सौंसे गाममे छिड़िया देलकैक। ई खबरि सौंसे गाममे लुत्ती जकाँ पसरि गेलैक। सोनूकेँ ई खबरि जखन शेलपेंमे भेटलैक तँ ओ अपन हाथसँ कान दाबि लेलक। आब ओ कोन मुँहे गाम जाएत? ऐहन सोचि ओ अपन कान ऐंठ लेलक। कार्मो रेयश पुलिस स्टेशनक सभ पाखलोक प्रधान छल। ओकरा लिस्बनसँ भारत एनाइ छओ-सात बरखक लगधक भ’ गेल रहैक आ एहि गामक पुलिस-स्टेशनमे ओकर दोसर बरख रहैक। ओकर डील-डॉल- लाल, गोर, गुलाबी केश आ मोछ वला रहैक। बाघ-सन ओकर दुनू आँखिसँ लोककेँ डर भ’ जाइक। ओ जहियासँ एहि गाममे आयल तहिये सँ एहि गामक लोक पर अपन हुकुम चलबए लागल छल। दू महीना धरि ओ लोक सभकेँ खूब डरौलक-धमकौलक-सतौलक आ पीटलक। आब ओ लोककेँ सताएब तँ बन्न क’ देने छल मुदा गामक लोककेँ ओकरासँ बहुत डर लागैक। दोसरहिं दिन साँझकेँ जखन शाली अपन घरक दीप लेसैत छलीह, तखनहि दरबाजा पर जूताक आबाज सुनलक। कार्मो प्रधान सीधे घरमे घूसि गेलैक, आ बन्दूक कनहा परसँ नीचाँ राखि बैसि गेल। डरसँ शालीक हाथसँ दीप छूटि गलैक आ चारू दिस अन्हार भ’ गेलैक। प्रधान अपना जेबीसँ सलाइ निकालि दीप लेसलक आ हँसए लागल। ओकरा हँसबाक आबाजसँ पूरा घर गूँजायमान भ’ गेलैक। ओ शालीकेँ अपना लग बैसा लेलक आ ओकर गाल, ठोर आर ठुड्डीकेँ सहलाब’ लागलैक। ओ स्वयं हँसि रहल छल आ शालियो केँ हँसएबाक प्रयास क’ रहल छल। मुदा शाली डरसँ काँपि रहल छलीह। जाहि समय पाखलो शालीकेँ अपना बाँहिमे घीचैत छल ठीक ओहि समय ओकर नजरि ओकरा नोर पर गेलैक। ओ ओकर गरम नोरकेँ पोछलक आ ओकरा समझएबा-बुझएबाक लेल ओकरा पीठ पर थपकी मारए लागल। बादमे ओ शालीक ठुड्डीकेँ उठबैत ओकरा अपना दिस देखबाक लेल इशारा करए लागल। मुदा शाली ओकरा दिस नहि देखि सकलीह। ओ अपन दुनू हाथेँ अपन आँखि झाँपि, काँपैत-काँपैत ओतएसँ जयबाक उपक्रम करए लागलीह। एतबहिमे पाखलो ओकरा अपन दुनू हाथेँ अपना बाँहिमे कसि लेलकैक। दोसर दिनसँ भोरे-भोर गामक लोक सभ कार्मोकेँ शालीक घरसँ निकलैत देखलकैक। ओकरा देखतहि लोक सभ शालीक नाम पर थूक फेकय लागल आ ओकरा संबंधमे भिन्न-भिन्न प्रकारक बात सभ करए लागल। “हे-बे देखिऔक! शालीक भड़ुआ।” “ओ पाखलो केँ अपना घरमे राखि धंधा सुरह क’ देने छैक वा अपन नव दुनियाँ बसा नेने अछि?” “दुनियाँ केहन यौ? धंधा कहियौक, धंधा।” “छी! छी! ओ लाज-शरम पीबि गेल अछि।” “औजी! लाज-शरम रहतैक कतए सँ! ओ तँ अपन जातिओ-धरम भ्रष्ट क’ नेने अछि।” तीन गामवलाक नजरिमे हम पाखलोएक रूपमे एहि धरती पर जनम लेलहुँ। ठीक ओहि साल पुर्तगाली सरकार गामसँ पुलिस-स्टेशन हटा लेलकैक। हमर बाप ओहि समय गाम छोड़ि पणजी शहर चलि गेलाह। हुनकर रूप कहियो हमरा आँखिक समक्ष नहि आबि सकल। नेनपनमे हम हुनका कहियो देखने रहियनि की नहि? सेहो हमरा स्मरण नहि अछि। हमर माए शाली, वास्तवमे एकटा देवीक रूपमे एहि संसार मे आएल छलीह। हुनकर वर्ण तँ श्याम छलनि मुदा सुन्नरि छलीह। एकदम सोटल देह। ओ प्रायः लाल आ कि हरियर रंगक साड़ी पहिरैत छलीह आ माथ पर सिनूरक टीका लगबैत छलीह। एहि परिधानमे ओ एकदम सुन्नरि लागैत छलीह। एकदम सांतेरी माए-सन। हमर जनम एकादशी दिन भेल छल, एहि लेल माए हमर नाम ‘विठ्ठल’ राखने छलीह। ओहि एकादशीक दिन सांतेरी मायक मंदिर मे त्योहार भ’ रहल छलैक। एहि धरतीक पाथरसँ बनाओल गेल श्री विठ्ठल केर कारी प्रतिमा ओहि दिन ओहि मंदिरमे स्थापित कएल गेल रहैक। ई बात हमर माए बतौने छलीह। ओ अपन मधुर आबाजसँ हमरा ‘विठू’ कहि बजबैत छलीह। कार्मो प्रधानकेँ पणजी शहर चलि गेलाक पश्चात् हमर मायक हालति आब सरिपहुँ बहुत खराप होमए लागल छल। सौंसे गाम ओकरा मंदिरक दासीक सदृश देखैत रहैक जखन कि ओ एकटा पतिव्रता नारी छलीह। गामहिमे एकटा ब्राह्मणक घरमे नौरीक काज क’ कए ओहिसँ प्राप्त मजूरीसँ ओ हमर पालन-पोषण कएने छलीह। दादी अपन बेटा गोविन्दक संग हमरहुँ स्कूल भेजए लागल। ओहि दिनसँ हम आ गोविन्द दुनू गोटे खास मीत बनि गेलहुँ। विद्यालयक प्रवेश-पंजीमे शिक्षक हमर नाम पाखलो लिख देलनि। अही नाम सँ हम ओहि विद्यालयमे मराठी माध्यमसँ चारिम कक्षा धरि पढ़ाइ केलहुँ। हाजरी दैत काल हमर एहि नाम पर हमरा कक्षाक आन-आन छात्र लोकनि हमर खूब मजाक उड़ाबए जे हमरा बहुत खराप लागैत छल। प्रवेश-पंजीमे हमर नाम पाखलो लिख देल गेल रहए इहो लेल हमरा बहुत खराप लागैत छल। गोविन्द हमरा सँ एक कक्षा आगू छल तकर पश्चातो हमरा ओकरासँ दोसती भ’गेल छल। हम ओकरा संगहि माल-जाल ल’ क’ जंगल धरि जाइत रही। जंगल जाइत काल हमरा काँट-कुशक कोनो डर नहि होइत छल। ओतए हम सभ कणेरा-काण्णां, चारां-चुन्नां (जंगली फल) खाइत छलहुँ। ‘घूस-गे बाये घूस’ (गोवाक क्षेत्रमे खेलल जाएबला एकटा खेलमे प्रयुक्त शब्द जाहिमे एहन मान्यता छैक जे ई शब्द बाजलासँ कोनो खास लोकक देहमे कोनो आत्माक प्रवेश भ’ जेतैक।) शब्द बाजि कए एक दोसरा पर भा आबए धरि कोयण्या-बाल, गड्ड्यांनी (गोवा क्षेत्रमे नेना सभक द्वारा खेलल जाएबला एकटा खेल।) आदि खेलैत छलहुँ। आन-आन चरवाह सभक सँग हमहुँ चरवाह बनि गेल छलहुँ। गोवा केँ स्वतंत्र हेबासँ पहिनुके बात थिक। तखन हमर उमिर नओ-दस बरखक रहल होएत। गामक बन्न पड़ल पुलिस-स्टेशन एकबेर फेर चालू भ’ गेल रहैक। ओतए तेशेर नामक एकटा नव पुलिस प्रधानक नियुक्ति भेल छलैक। ओ कहियो काल सैह पणजीसँ गामक पुलिस स्टेशन अबैत-जाइत छल। ओ अपना लेल ओतए एकटा धौरबी राखि नेने छल। ओकरा ओ अपना संगहि घोड़ा-गाड़ी पर घुमबैत रहैत छल। गामक बगल वला जमीनक लेल दत्ता जल्मी आ सदा ब्राह्मणक बीच बहुत दिनसँ विवाद छलैक। ओकरा सभक बीच मोकदमा चलि रहल छलैक। दू-तीन साल बीत गेलाक पश्चातो एखन धरि ककरहुँ पक्षमे फैसला नहि भेल छलैक। सदाकेँ एकटा युक्ति सुझलैक। एकबेर ओ नव पुलिस प्रधान (तेशेर)केँ अपना घर बजाकए खूब मासु-दारू खुऔलक-पिऔलक। ओहि दिन ओकर नजरि ओकरा स्त्री पर गेलैक। ओहि क्षण ओ ओकरा प्रति आसक्त भ’ गेल आ ओ जाहि कक्षमे रहथि ताहि दिस देखतहि रहि गेल। सदा प्रधानसँ विनती केलक जे ओ मोकदमा ओकरहिं पक्षमे करा दैक। कने काल चुप रहलाक पश्चात् प्रधान ओकरा हँ कहि देलकैक। शर्तक रूपमे ओ सदासँ ओकर स्त्री माँगि लेलकैक। सदाकेँ जल्मीक जमीनक संगहि-संग गामक सभसँ पैघ जमीन केगदी भाट(क्षेत्र विशेषक नाम) भेटए बला रहैक। चारिए-पाँच दिनक बाद पुर्तगालीक विरोधमे काज करबाक अभियोगमे दत्ता जल्मीकेँ भीतर क’ देल गेलैक। तकर बाद ओकर की भेलैक ताहि संबंधमे ककरहुँ कोनो पता नहि चलि सकल। केओ कहैक जे दत्ता फेरार भ’ गेलैक तँ केओ कहैक जे प्रधान ओकरा मारि देलकैक। ओहि दिनक बाद सँ सदाक घर लग सभ दिन एकटा गाड़ी लागए लागलैक। सदाक स्त्री सभ साँझकेँ नव-नव साड़ी पहिरए, नीक जकाँ अपन केश-विन्यास करए, काजर, बिंदी, पौडर आदि लगा अपन श्रृंगार करए आ तेशेरक गाड़ी मे बैसि जाए। तेशेरक गाड़ी सदाक बंगला पर धूरा उड़बैत फुर्र भ’ जाइक। दोसर भोर ओ गाड़ी हुनका एतए पहुँचा दैक। ओ गाड़ीक पछिला सीट पर लेटल रहैत छलीह। हुनकर केश आ चोटी सभ उजरल-उभरल रहैक, आँखिक काजर नाक आ गाल पर लेभराएल रहैत छलैक। मोकदमाक फैसला सदा जमींदारक पक्षमे भ’ गेल छलैक एहि लेल ओ सत्यनारायण भगवानक पूजा करबाक लेल सोचलक। पूजामे अएबाक लेल ओ भरि गामक लोककेँ हकार देलकैक। सदा ओ ओकर स्त्री पूजा पर बैसि चुकल छलीह। तखनहि प्रधान तेशेर अपन गाड़ी ल’ कए ओतए आबि गेल। ओ पूजा पर बैसलि सदाक स्त्रीकेँ उठा लेलक। पूजामे आएल सभ लोककेँ एहि घटनासँ बड्ड आश्चर्य भेलैक। केगदी चास-बास केर कागद-पत्तर सदाकेँ थम्हबैत ओ ओकरा स्त्रीकेँ ल’ कए आगू बढ़ल, तखनहि सदाक छोट भाय ओकरा रोकबाक प्रयास केलकैक। तेशेर ओकरा पर बन्दूकसँ निसान साधि लेलकैक आ आब गोली दागहि वला रहैक की सदा ओकरा रोकि देलकैक। तेशेर अपन बन्दूक नीचाँ क’ लेलक। तकरा पश्चात् ओ जनूकेँ एक दिस धकलैत ओकरा स्त्रीक हाथ पकड़ि आगू बढ़ि गेल। एहि पर सदा अपना स्त्रीसँ कहलकैक— “ओकरा संग एना जा कए अहाँ हमर नाक कटाएब की?” ई सुनि सदाक स्त्री अपन मुँह चमकबैत बजलीह— “अहाँकेँ नाको अछि की? जँ अहाँकेँ नाके चाही तँ हे ई लिअ...” एतबा कहि ओ अपन नाकक नथिया निकालि सदाक पयर लग धरती पर फेकि देलकैक आ प्रधान तेशेरक संग चलि देलक। तेसरे दिन प्रधान ओकरा ल’ कए पुर्तगाल चलि गेल। प्रधान तेशेरकेँ पुर्तगाल जेबासँ ठीक एकदिन पहिनुके गप्प थिक। रातिक लगभग दू वा तीन बजैत हेतैक। केओ हमरा घरक केबाड़ खोलि हमरा घर घूसि गेल। हमर माय कम कएल लालटेमक इजोतकेँ कने तेज केलक। देखलहुँ तँ एकटा अनभुआर लोक! ओ बाजल— “बहिन हमरा कतहुँ नुका दिअ, हमरा पाछू फिरंगी पुलिस लागल अछि। एकबेर जँ हम ओहि पुलिस प्रधान तेशेरक हाथ आबि गेलहुँ तँ ओ हमर जान ल’ लेत। हम जीवित नहि बाँचि सकब।” एतबहिमे दूरसँ अबैत जूता ध्वनिसँ बुझाइक जे किओ आबि रहल छैक। हमर माय ओकरा ओढ़बाक लेल अपन साड़ी देलकैक आ ओ साड़ी ओढ़ाकए ओकरा हमरहिं लग सुता देलकैक। किछुए क्षण केर पश्चात् घरमे इजोत देखि प्रधान तेशेर हमरा घरमे घुसि गेल। हमर माय बहुत डरि गेलीह। तेशेर सौंसे घरक तलाशी ल’ लेलकैक आ ओतए के सूतल छैक? ओकरा संबंधमे पूछय लागल—हमर माय डरैत-डरैत बजलीह— “ओ हमर ब-ब-बहिन थिकीह.....साहेब।” एतबा सुनि ओ लोकनि चलि गेल। ओहि राति ओ अनभुआर लोक हमरहि ओहिठाम ठहरल ओ भोर होइतहि चलि गेल। ओ अपन नाम रामनाथ कहने छल आ ओ गोवाक स्वतंत्रता संग्राममे भाग नेने छल। ओ आ ओकर दूटा संगी, गामक पुलिस-स्टेशनकेँ उड़एबाक लेल आएल छल। ओकरा संगीकेँ तँ फिरंगी पकड़ि नेने छलैक मुदा एकरा पकड़बाक लेल ओ सभ एकर पछोर क’ रहल छलैक। ओ डाइनामाइट लगा कए पुलिस-स्टेशन उड़ा देलकैक। भोर होइतहि ई खबरि गाम आ आस-पासक इलाकामे पसरि गेलैक। ई ताहि दिनक गप्प थिक जखन गोवाकेँ मुक्ति भेटल छलैक। ओहि दिन दूटा बड़का धमाका सूनल गेल छलैक। ई धमाका बम केर छलैक, ई बात लोककेँ पछाति जा कए पता लागलैक। उजगाँव आ बाणस्तारी गामक दुनू पुल उड़ा देल गेल रहैक। भारतीय सेनाकेँ गोवामे प्रवेश करबासँ रोकबाक लेल ओ पुर्तगाली मिलिट्री द्वारा तोड़ल गेल छलैक। ओ के आ किएक तोड़ने छल, पहिने एहि बातक पता ककरो नहि चलि सकलै। दूपहरमे गामक आसमानमे एकटा हवाइजहाज उड़ैत रहैक। ओहि हवाइजहाजसँ परचा सभ गिराओल जा रहल छलैक जे हवामे लहराबैत रहैक। ओहि परचा सभकेँ लूटबाकक लेल हम सभ बच्चा लोकनि बहुत दूर धरि दौड़लहुँ। हमरो एकटा परचा भेटल, जकरा ल’ कए हम दादीक ओतए पहुँचलहुँ। परचा पुर्तगालीमे लिखल रहैक जकरा दादी हमरा सभकेँ अपन भाषामे सुनबैत रहथि—“ई इंडियन मलेटरीक पत्रक छैक। ओ कहने छथि— अहाँ सभ डरब नहि, अहाँ सभक जिनगीकेँ कोनहुँ खतरा नहि अछि। अहाँ सभ पुर्तगाली राजसँ मुक्त भ’ गेल छी।” ओहि दिन हमरा विद्यालयमे छुट्टी छल। कांदोले गाममे उत्सवक माहौल रहैक। किछु लोक लौह अयस्कक बार्ज (मालवाहक जहाज) सँ पणजी गेल छल। गोवाकेँ मुक्ति भेटलाक किछुए दिन बाद गोविन्दक दादी हमरा घर आएल छलाह। “भारत सरकार बहुत रास पाखले केँ पकड़ि ओकरा जहाजमे बैसा पुर्तगाल भेज देने अछि।” हमरा मायकेँ ई खबरि वैह देलनि। बुझाएल जे एहि खबरिसँ ओ किछु हतप्रभ भेलीह, मुदा ओ चुप आ गुमसुम रहलीह। हमर बाबूजी कार्मो चीफ, जे पणजी शहरमे छलाह, हुनकहुँ ओहि जहाजसँ भेज देल गेल छलनि, एहि लेल मायकेँ दुःख भेलनि की? से हम बुझि नहि सकलहुँ। मुदा बादमे हुनका आँखिमे नोर आबि गेल छलनि। हम बारह-तेरह बर्खक रहल हएब, तखनहि हमर माय मरि गेलीह। बरखाक मौसम रहैक। कतेको दिनसँ दिन-राति लगातार बरखा भ’ रहल छलैक। नदीक बाढ़िक पानि गाम धरि पहुँचि गेल रहैक। गामक केलबाय मंदिरक चारू दिस बाढ़िक पानि आबि गेल रहैक। ओहि बाढ़िमे पाँचटा गर गिर गेल छलैक। माल-जाल आ गोहाल सभ बाढ़िमे भासि गेल रहैक। हमर घर सीमानक बाहर पहाड़ीक कोनमे कनेक ऊँच स्थान पर छल। एखन धरि बाढ़िसँ घरकेँ कोनो छति नहि भेल छलैक मुदा लगातार होइत बरखा आ हवाक कारणेँ हमरो घर ओहि दिन गिर गेल। घरक एकटा चार कर्र-कर्र केर आबाजक सँग टूटि कए गिर गेल। हम जखन सूतल रही तखने ओ हमरा पर गिरल। हम आ हमर माय दुनू गोटे मरि जइतौंक। हमर माय हमरा बचयबाक लेल दौड़ि कए अएलीह जकरा कारणेँ हुनका माथमे बहुत चोट लागि गेलनि। पहिने तँ हुनका माथ पर कोरो टूटि कए गिरल आ पछाति जा कए पूरा चारे हुनका माथ पर गिर गेलनि। ओ बेहोश भ’ गेलीह। हम हुनका मुँहपर पानिक छीट्टा देलियनि तखन हुनका चेत एलनि। हम बचि गेलहुँ आ हमरा चोट नहि लागल, ई जानि ओ बहुत खुश भेलीह। बादमे हमरा अपन गोदीमे ल’ कए खूब कानए लगलीह। जखन ओ हमरा गोदी नेने छलीह तखनहि हमरा हाथमे हुनक चोटसँ निकलल खून लागल। देखलहुँ तँ हुनका माथ मे चोट लागल छलनि। हुनक माथ काँच जकाँ फूटि गेल रहनि। हम जोरसँ चिकरलहुँ, मुदा माय हमरा चुप रहबाक इशारा केलथि। हमर चिकरब सुनि कए एहि बरखाक रातिमे किओ आबय बला नहि छल। हुनकर कहनानुसार हम हुनका लजौनीक पात पीसि कए हुनका माथ पर लगा देलियनि। किछु कालक बाद हुनका माथसँ खून बहब बन्न भ’ गेलनि। घरक बचलका हिस्साकेँ हम सोंगर लगेलहुँ। हवा बहते रहैक आ रुकि-रुकि कए बरखा सेहो भ’ रहल छलैक। संगहि हवा घरक बचलका हिस्साकेँ नोचने जा रहल छल। छप्पड़क बीच दए पानि आबि रहल छलैक। घरमे कनेको सूखल जगह नहि छलैक। मायकेँ बहुत चोट लागल छलनि तैँ ओ दरदसँ कराहैत छलीह आ बीच-बीचमे अपन टाँग हिला रहल छलीह। दीया जरा हम हुनका सिरमा लग बैसि गेलहुँ। दीयाक बतिहर हवाक कारणेँ बीच-बीचमे बुता जाइत छलैक जकरा हम फेरसँ जरबैत रही। अन्हर आ बरखा आओरो तेज भ’ गेल रहैक। हम पानि गरम क’ कए मायकेँ पिऔलियनि। चोटक दरदक कारणेँ ओ भरि राति कुहरैत रहलीह। राति भीजला पर हुनका बोखार आबि गेलनि आ से बढ़िते गेल। “भोर होइतहि हम डाकदरकेँ बजा अनबनि।” हम सोचलहुँ। मुदा राति कटतहि नहि रहए। दोसर दिन, भोरे-भोर गोविन्दक दादी डागदर केँ बजा अनलनि। डागदर हुनका सुइया-दवाई देलथि, मुदा कोनो लाभ नहि भेल। ओ बीच-बीचमे आँखि खोलैत छलीह। हुनक सौंसे देह उज्जर भ’ गेल रहनि आ हुनक आँखि भीतर दिस घीचल जा रहल छल। हुनक हाथ-पयर काँपि रहल छलनि। ओ हमरा अपना लग बैसबाक इशारा केलनि। ओ हमरा किछु कहए चाहैत छलीह से तँ हम बुझि गेलहुँ मुदा ओ किछु बाजि नहि सकलीह। ओहि दिन हुनक बोखार बहुत बढ़ि गेल रहनि। हुनक आँखि बन्न होमए लागल रहए। बोखारसँ ओ काँपि रहल छलीह। बादमे हुनका गरसँ घर्र-घर्र केर आबाज भेल ओ ओहि आबाजक संगहि ओ जतए सुतल छलीह किछुए पलमे सभ किछु शांत भ’ गेल। ओ हमरा छोड़ि कए चलि गेलीह! हमरा अनाथ क’ कए चलि गेलीह! दादी एसगरे आबि कए अंतिम संस्कारक तैयारी करए लगलाह। शेलपें मे रहएवला मामा धरिकेँ खबरि देमए बला हमरा किओ नहि भेटल। बरखा बहुत जोरसँ सँ भ’ रहल छलैक। गाममे आएल बाढ़िक पानि एखन धरि घटल नहि छलैक। श्मशान घाट पर दादी एसगरे चिता पर लकड़ी राखैत जा रहल छलाह आ हम हुनक संग द’ रहल छलिऐक। हमर मायक अंतिम यात्रामे दादीक अलावे आन किओ नहि आएल रहए। अनहार-मुनहार भ’ गेला पर चिता बनि कए तैयार भेलैक। हम मायक लहाशकेँ चिता पर चढ़ा कए अपना हाथेँ आगि देलिऐक। मुदा चिताकेँ आगिए नहि लागैक। एकतँ तीतल लकड़ी आ ताहूपर बरखा से। दादी बहुत प्रयास केलनि, मुदा बरखा आ तेज हवाक कारणेँ चिताकेँ धाह धरि नहि लागि सकलै। अधरतिया भ’ गेल रहैक आ हम दुनू गोटा एखन धरि श्मशान घाटमे छलहुँ। चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयासमे दादी थाकि चुकल छलाह। जखन कोनहुँ उपाय नहि चललनि तँ चुपचाप काम करए वला दादी किछु कालक ले ठाढ रहलाह आ बजलाह— “बाउ! अहाँक हाथे अहाँक मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि? आब की उपाय?” “आब कोनहुँ तरहेँ एहि लहाशकेँ माटिमे गारए पड़त!” एतबा कहि ओ कोदारिसँ माटि खोदब सुरह क’ देलनि। हुनकर बात सुनिकए हम सोचए लागलहुँ— “हँ, हम ठहरलहुँ भागहीन पाखलो! पाखलेक वंशज छी, एहि लेल हमरा हाथेँ मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि। हमरा पाखलो नहि हेबाक चाही। हमर ई पाखलेपन हमरा मोनकेँ चोट पहुँचा रहल छल। आइ एहि पाखलेपनक एहसास हमरासँ सहन नहि भ’ रहल छल।” एक आदमीक लम्बाईक बरोबरि एकटा खदहा खोदल गेल। “माटि देबासँ पहिने अपन मायकेँ प्रणाम करिऔन।” दादीक एतबा कहलाक उपरांत हम होशमे एलहुँ आ दुनू हाथ जोड़ि मायकेँ प्रणाम केलहुँ। किछुए दिनमे हम पाखलोसँ खलासी बनि गेलहुँ। जाहि कार्रेर पर गोविन्दक दादी ड्राइवर छलाह ओहि कार्रेर पर ओ हमरा खलासीक रूपमे राखि लेलनि। हमर काज छल यात्री सभक समान उपर चढ़ाएब आ उतारब। बाजारक दिन तँ कार्रेरमे बहुत भीड़-भाड़ रहैत छलैक। कार्रेर केर भीतर यात्री लोकनि, तँ उपर केलाक घौर, कटहर, अनानास सन बहुतो रास चीज होइत छल। कार्रेर बुझू हकमैत-हकमैत सड़क पर चढैत-उतरैत छल। मुदा जाधरि हम खलासी रहलहुँ ताधरि कार्रेरकेँ किछु नहि बिगड़लैक आ ने तँ हम एक्कहु टा ट्रिप चुकए देलिऐक। बस मालिकक भाय यात्री लोकनिसँ पाइ असूलैत छल। ओ बहुत ठसकमे घूमैत छल, मुदा राति होइतहि ओकर सभटा हेकड़ी खतम भ’ जाइत छल। घर पहुँचलाक बाद ओ पावलूक ओहिठाम जा कए भरि दम शराब पीबि लैत छल। एकदिन ओ हमरा शराब आनबाक लेल कहलनि। हम हुनका शराब तँ आनि देलियनि मुदा दादी हमरा देख लेलथि आ बहुत डाँट-फटकार केलथि। “आब फेर कहियो शराब आनए नहि जाएब।” एतबा कहैत ओ हमरा गामक केलबाय देवीक किरिया देलथि। एकटा आर एहने सन स्मरण......एकबेर गैरेजक मैकेनिक लाडू आ हम कार्रेर धोबाक लेल नाली पर गेलहुँ। हमसभ गाड़ीक पीतरिया चदराकेँ इलायचीसँ रगड़ि-रगड़ि साफ केलहुँ। गाड़ी धुबैत काल हमसभ पानिसँ भीज गेल छलहुँ। सौंसे देह जाड़सँ काँपए लागल छल, एहि लेल लाडू एकटा बीड़ी सुनगा कए अपना मुँहमे दबौलक आ गाड़ी धोबए लागल। ओ एकटा बीड़ी हमरो देलक। हमहुँ बीड़ी सुनगेलौं आ पीब’ लागलहुँ। एतबहिमे दादी ओतए पहुँचि गेलाह आ हमरा बीड़ी पीबैत देखि लेलथि। ओ हमरा पर बहुत गोस्सा भेलाह आ संगहि ओहि गोस्सामे हमरा पर कैक थापड़ मारि बैसलथि। हम कानए लागलहुँ। हम हुनकर पयर पकड़लियनि, माँफी माँगलियनि, मुदा एहि सभसँ दादीक गोस्सा कम नहि भेलनि। “आब जँ फेर अहाँ कहियो बीड़ी पीलहुँ तँ अहाँकेँ अपन मायक किरिया!” ओ हमरा किरिया देलथि। हम जहियासँ खलासी बनल छलहुँ तहियेसँ दादीक ओहिठाम रहैत छलहुँ। हम आ गोविन्द दुनू गोटे भाइक सदृश भ’ गेल छलहुँ। गोविन्द हमरासँ बेसी बुधियार आ चलाक छल, संगहि तत्वज्ञानी आ आस्तिक सेहो। हमर माय जहियासँ हमरा छोड़ि के गेल रहथि तहियेसँ हम प्रायः कानैत रहैत छलहुँ। एहना स्थितिमे नेना रहितहुँ गोविन्द हमरा समझाबैत-बुझाबैत रहैत छल। ओ कहैत छल, “अहाँकेँ पता अछि! जखन हमर तामू गाय बच्चा देने छलीह तँ ओहो चारिए मासक भीतर मरि गेल छलीह, तखन हुनका बाछाकेँ के देखने रहैक? ओहि समयक छोट बाछा आइ बड़का बरद बनि गेल छैक। पाखल्या! …..यौ पाखल्या! कानू जुनि! अहाँकेँ देखि हमरहुँ कानब आबि जाइत अछि।” हमर आजी सेहो पछिले साल भगवानक घर गेल छलीह। ओ कहैत छलीह, “सभटा जन्म लेबएबला प्राणीकेँ एकदिन मरहिं पड़ैत छैक, एकरा लेल लोककेँ दुख नहि करबाक चाही।” ई सभ सुनि कए हमर कानब बन्न होइत छल। हम ओकर भाषण सुनैत जा रहल छलहुँ आ ओ कोनो तत्वज्ञानी जकाँ बाजतहि जाइत छल...... “मनुक्ख जन्मक संगहि मृत्यु सेहो अपना संगहि आनने अछि। जन्मकालमे ओ नेना रहैत अछि, नेनासँ ओ जवान भ’ जाइत अछि, जवानसँ बूढ़ आ फेर जन्मक आखिरी आ अंतिम अवस्थामे मनुक्खकेँ मृत्यु भेटैत छैक। अवस्थाक एहि चक्रसँ हरेक प्राणीकेँ गुजरहि पड़ैत छैक। जतए-जतए प्राणी छैक ओतए-ओतए मृत्यु पसरल छैक। धरती हो, जल हो वा आकाश, सभठाम मृत्यु निश्चित अछि।” जखन हम हुनकासँ पुछियनि, “अहाँ ई सभ कतए सीखलहुँ? ई सभ अहाँ किताबमे पढ़ने छी की?” तखन ओ जबाब दिअए, “हमरा ई सभ विणे आजी बतबैत छलीह।” एकबेर फेर मायक याद अबितहिँ हमरा आँखिमे नोर आबि गेल आ हमरा समक्षहि हमरा छोड़िकए गेल हमर मायक मूर्ति हमरा सोझमे ठाढ़ भ’ गेल। रामायण, महाभारत आ आन-आन कथा-पिहानी सुनाब’ वाली....., हमरा मरगिल्ला खोआकेँ पैघ करएबाली....., हम बचि गेलहुँ एहि खुशीमे हमरा अपन छातीसँ लगबएवाली हमर माय....., अपना आँखिक सोझमे देखल गेल हुनक मृत्यु, हुनक लहाश, ई सभटा हमरा याद आबि गेल। आँखिमे आएल नोर पोछि हम हुनका प्रणाम केलियनि। चारि गोविन्द जाहि बरख पणजीमे नोकरी पर लागल, पाखलो ओहि बरख लौह–अयस्क केर खदान पर ट्रक ड्राइवर बनि गेल। ओकर काज देखि कए एक बरखक भीतरहि कम्पनी ओकर नोकरी पक्की क’ देलकैक। ओकरा चारि सौ पचास रुपैया दरमाहा भेटैत रहैक आ एकर अलावे ओवरटाइम सेहो। ओकर खेनाय-पीनाय होटलमे होइत छलैक आ ओ कतहुँ सुति जाइत छल। पाखलो आ आलेस दुनू अपन पयरक तरेँ दूभिकेँ मसोड़ति लदानक गैरेज लग जा रहल छल। काल्हि आनल गेल लौह–अयस्क केर चूर्णक ढेर देखिकए ओ बहुत अचरजमे पड़ि गेल। ओ दुनू गैरेज पहुँचल। ट्रक स्टार्ट क’ कए धूराक मेघकेँ पाछू छोड़ैत ओ लोकनि ट्रक तेजीसँ बढ़ौलक। साँझमे पाखलो आ आलेस अपन-अपन ट्रक आनि गैरेज लग लगा देलक। ओ काल्हिक अपेक्षा आइ एक खेप बेसी लगौने छल। आइ दुनू बहुत बेसी प्रसन्न देख’ मे आबि रहल छल। पाखलो अपना देह पर एक नजरि देलक। ओ धूरा सँ सानल बुझाइत छल। ओकर कपड़ा पूर्ण रूपसँ धूरामे सानल रहैक। माथक केश, मोछ आ सौंसे देह धूरा सँ सानल रहैक। ओ हाथ-पयर धोबाक लेल आलेसक संग नल दिस चलि देलक। नल पर जमा भेल सभटा मजुरनी पाखलोक मजाक उड़ाब’ लागलीह। एकटा मजुरनी अपन एकटा छोट सन एना निकालि पाखलो केँ ओकर अपनहिं रूप देखबा लेल देलकैक। ओ एना लेलक, ओहिमे अपन अजीब रूप देखि ओकरा हँसी लागि गेलैक। ओकरा बुझेलैक जो ओ ललका मुँह बला बनरबा छैक। “पाखल्या, बगल वला झीलमे जेना धूरा जमैत छैक तहिना तोरहुँ देह पर जमल छह।” एकटा मजुरनी पाखलो केँ पयर सँ माथ धरि देखैत कहलकैक। “ओ तँ धूरेक मिल पर नोकरी करैत छैक।” एकटा दोसर मजुरनी ओकर मजाक केलकैक। ई सुनि सभटा मजुरनी हँसय लगलीह। ओकरा संग पाखलो सेहो हँसए लागल। “ओ धूरासँ भरल अछि एहिलेल अहाँसभ ओकरा पर हँसि रहल छी?” आलेस मजुरनीसँ पूछलकैक….; “नहएलाक बाद ओकरा देखि लेबैक, ओ सेब सन लाल आ एकदम फिरंगी सन भ’ जाएत, जे देखि कोनो बाप ओकरा अपन बेटी देबा लेल तैयार भ’ जेतैक।” “आलेस, पाखलोक लेल अहाँ अपनहि जातिमे कोनो कन्या ताकि दियौक”, पहिल मजुरनी कहलकैक। “…….से किएक? ओकरा तँ कोनो पाखलिने चाही। पाखल्या! अहाँ अपना लेल लिस्बन सँ एकटा पाखलिन ल’ कए आबि जाएब।” एहि बात पर सभ केओ हँसय लागल मुदा पाखलो केर भौंह तनि गेल। “ओ.......हो...... एकर मामाक बेटी छैक ने?” बीचहिमे स्मरण आबि गेलासँ दोसर मजुरनी पहिलसँ बाजलि। “एकर मामा सोनू परसूए शेलपें सँ गाम आएल छैक। ओकर बेटी बियाह करबाक जोग भ’ गेल छैक।” “शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?” “पाखलो सँ ओकर बियाह.....? शी.....” पहिल मजुरनीक अपन डाँड़ पर बान्हल तोलिया झारैत कहलक। ओकर ई कहब सुनिकए सभ किओ चुप भ’ गेल। पाखलो केँ बहुत खराप लागलैक आ ओकर भौंह तनि गेलैक। नहा-धो कए ओ लोकनि नीचाँ उतर’ लागल। उतरैत काल आलेस सीटी बजा रहल छल आ पाखलो चुपचाप चलि रहल छल। ओहि मौनक स्थितिमे ओकरा अपन मामा, सोनूक पछिला बात सभ स्मरण आबि गेलैक। सोनूक बियाहमे पाखलोक माय, ओकरा गोदीमे ल’ कए गेल छलीह। बियाहसँ ठीक दू दिन पहिने, सोनू अपन बियाहक खबरि अपन बहिनकेँ देने छलैक। ओ बियाहमे कोनो बिध-व्यवहार करबाक लेल तैयार नहि रहथि, मुदा सोनूक जिद्दक कारणेँ ओकरा मानय पड़लैक। सोनूक दुनियाँ केवल दू बरख धरि चलि सकल। ओकरा एकटा बेटी भेलैक मुदा तेसरहि बरख ओकर घरनी ओकरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेलीह। पाखलो एकटा पैघ साँस छोड़लक। ढलानसँ नीचाँ उतरैत ओकर पयर लड़खड़ा गेलैक। आलेस आ पाखलो नदीक कछेर वला होटल पहुँचि गेल। आन दिन जकाँ ओ सभ होटलक भीतर जयबाक लेल अपन-अपन माथ नीचाँ झुकौलक। पाखलो चाह पीबि लेलक मुदा ओकरा दिमागसँ एखन धरि ओहि बातक निसाँ नहि उतरल छलैक। आलेस ओतए जमा भेल मित्र सभसँ गप्प करए लागल। पाखलो होटलसँ बाहर निकलल आ खेत दिस खुलल पेड़ा बाटे चलय लागल। ओ बहुत दुखी अछि, एहन ओकरा चेहरासँ बुझाइत छलैक। मजुरनी सभ द्वारा कएल गेल गप्पक नह ओकर करेजके नोचने-फारने जा रहल छलैक। “शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?” “पाखलो सँ ओकर बियाह.....? शी.....” ई आवाज मंगुष्ठी झरनाक पानिक छल, ने कि कपड़ा-लत्ता धोबा आ पानि भरबाक लेल आबए बाली कन्या आ स्त्रीगणक बाजबाक। आइ पाखलो कने देरीसँ आएल रहय। ओ किछु अन्यमनस्क सन लागैत छल। ओ झरनासँ गाम दिस जाएबला लोकपेड़िया दिस देखलक। ओहि लोकपेड़ियाक बाटेँ अन्हरिया गाममे पयर रखने छल। ओ अपन देह सँ कपड़ा उतारलक आ मंगुष्ठक गाछक जड़िमे राखि देलक। ओ झरनाक कछेरमे बैसि गेल। बहैत पानिमे ओ अपन पयर खुलल छोड़ि देलक। ओकरा जाड़ लागलैक। ओ जाड़ ओकरा नसमे समा गेलैक। ओ अपन आँखिक पिपनी बन्न क’ लेलक। दूपहरमे धूरा पर चलैत जे पयर छक-छक पाकैत रहैक ओहि पयरकेँ एखन जाड़ लागि रहल छलैक। ई सोचि पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक आ आँखि बन्न क’ लेलक। ओ प्रायः आबिकए पहिने अपन पयर ठंढा पानिमे डुबबैत रहय। जखन सभटा कन्या आ स्त्रीगण पानि भरि कए चलि जाइक, तखनहि ओ नहबैत छल आ अपन कपड़ा-लत्ता धोबैत छल। ओ पानिमे डुबकी लगौलक। छपाक केर आवाज भेलैक एहिलेल ओ अपन माथ उठौलक तँ देखलक जे शामा हँसि रहल छलीह। ओहो हँसल। शामा झरनाक उपरका धार पर अपन घैल भरए लगलीह। “आइ पानि भरबामे देरी किएक भेल?” पूछबनि, पाखलो सोचलक। मुदा ओ चुप रहल। शामा घैल अपना डाँर पर राखलक आ छोटकी घैल अपना हाथमे राखि चलि देलीह। नजरिसँ दूर होइत धरि पाखलो ओकरा देखतहि रहि गेल। ओ होशमे आएल! की शामा पानिमे पाथर फेकने छलीह? ओ सोच’ लागल, ‘हँ’, ओकर एक मोन कहैत छलैक जे “ओ आएल छलीह आ हमरा सचेत करबाक लेल ओ पाथर फेकने छलीह। ओकर दोसर मोन कहैक– नहि, ओ पाथर मार’ एहन काज नहि क’ सकैत अछि। भ’ सकैछ उपरका मंगुष्ठ नीचाँ गिरल होइक।” ओ ई सोचतहिं छल ताधरि एकटा मंगुष्ठ पानिमे गिरलैक। पाखलो ओ लाल मगुष्ठ उठौलक। ओकरा फोड़लक। फोड़लाक बाद ओ ओहि खटमिट्ठी मंगुष्ठकेँ अपना मुँहमे लेलक। खाइत काल ओकरा एकटा घटना याद एलैक। एहि घटनाक बहुतो बरख भ’ गेल रहैक। जंगलमे काजू आ काण्ण खाइत-खाइत गोविन्द आ ओ एहि झरना पर आएल छल। मंगुष्ठी झरनाक मंगुष्ठ बहुत पाकि गेल छलैक। पाखलो आ गोविन्द ओहि मंगुष्ठ पर पाथर मारए लागल। ओहि समय शामा झरना पर आबि रहल छलीह, ई गोविन्द देखलक आ देखतहिं अपना हाथसँ पाथर फेकि देलक आ पाखलो सँ कहलकैक – “पाखल्या, हाथसँ पाथर फेकि दियौक, विन्या मामाक शामा आबि रहल छथि।” “किएक?” पाखलो पुछलकैक। “यौ, मंगुष्ठी झरनाक जगह ओकरे छैक ने, हमसभ जे मंगुष्ठ झटाहि रहल छी ई बात जँ ओकरा बाबूकेँ पता लागि गेलनि तँ से नीक गप्प नहि होयत। ओ गारिओ देताह आ मारबो करताह। गोविन्दक कहलाक पश्चातो पाखलो अपना हाथसँ पाथर नहि फेकलक। ओ लगातार झटाहते रहल। गोविन्दक रोकलाक पश्चातहिं ओ रुकल। ताबत शामा ओतए आबि गेलीह। ओ लाल रंगक पाकल मंगुष्ठकेँ देखलक। ओकरो मंगुष्ठ खएबाक मोन भेलैक। ओहो पाथर मारि-मारि मंगुष्ठ झखारए लागलीह। ओकर दू-तीन पाथरसँ एकटा पातो नहि गिरलैक। पाखलो आ गोविन्द दुनू हँसए लागल। ओ लजा गेलीह। ओकरहिं आनल पाथरसँ पाखलो मंगुष्ठ झटाह’ लागल। जल्दीए ओ पाथर ओतहि फेकि मंगुष्ठक गाछ पर चढि गेल आ मंगुष्ठक गाछक डारिकेँ हिलाब’ लागल। मंगुष्ठ सभ ढब-ढब कए गिरए लागलैक। छिट्टा आनबाक लेल शामा घर चलि गेलीह। मुदा आपस अबैत काल ओकरा संगे ओकर बाबूजी सेहो आबि गेलाह। धरती पर पसरल काँच मंगुष्ठ देखि कए ओ पाखलो केँ ओकरा माए आ ओकर जाति लगा कए गारि देलकैक। तकरा बादसँ जखन कहियो शामा ओकरा बाटमे भेटैक ओ अपन माथ झुकाकए चलि जाइत छलीह। जाहि दिनसँ पाखलो ड्राइवर भेल छल ताहि दिनसँ ओ मंगुष्ठी झरना पर नहएबाक लेल अबैत छल। पाखलो केँ देखि शामा कहिओ-कहिओ हँसि दैत छलीह। शामाक यौवनक भार देखि कए ओकरा मोनमे उमंग आबि जाइत छलैक। एकदिन तँ शामा ओकर आ गोविन्दक हाल-समाचार सेहो पूछने छलीह। ताहि दिन, ओ प्रायः पाखलो केँ देखि कए हँसैत छलीह आ पाखलोक मोनमे ओकरा प्रति नब अंकुर पनकी द’ रहल छलैक। पाखलो सँ ई खबरि सुनि, गोविन्द पाखलोक खूब मजाक उड़ौलक। “पाखल्या, हुनकर स्वभाव बहुत नीक छनि। ओ कने कारी अवश्य छथि मुदा देख’मे नीक छथि। अहाँक जोड़ी खूब जँचत।” ई बात पाखलोक मोनमे घूमैत रहैक आ ओ नहबैत काल अपना-आपमे ओ उफान महसूस करैत छल। दोसर दिन रबि रहैक। पाखलो घूमबाक लाथे बाहर निकलल। बाट चलैत-चलैत ओ मंगुष्ठ झरना लग पहुँचि गेल। झरनाक शीतल पानिसँ ओ एक आँजुर पानि पीबि लेलक आ लगीचक आमक गाछ दिस चलि देलक। ओहि आम गाछक नमहर जड़ि उपर धरि आबि गेल रहैक आ कोनो नेना जकाँ अपन कुल्हा उपर कए धरती पर पसरि गेल रहैक। पाखलो एकटा जड़ि पर बैसि गेल आ प्रकृतिक सौंदर्य देख’ लागल। आइ चैत मासक पूर्णिमा छलैक। गामक लोक सभ सांतेरी मंदिर लग बसंत पूजा करए बला रहैक मुदा ताहिसँ पहिने प्रकृति फूल आ फल सभक लटकनि लगा कए बसंत ऋतुक स्वागत क’ चुकल छलैक। आमक गाछक अजोह आम सभ गोटपंगरा पाकए लागल छलैक। काजूक गाछ पर लाल आ पीयर काजू लागल रहैक। हरियर अजोह काजू सभ पाकबाक बाट जोहि रहल छल आ एखन धरि डारि पर फुल्ली सभ डोलि रहल छलैक। शनैः–शनैः बसात सिहकए लागलैक। पाखलो केँ लागलैक– आब ई प्राणदायी बसात एहि प्रकृतिकेँ नब जान द’ देतैक। गाछ–बिरीछकेँ पागल बना देतैक। बसातक सिहकबक संगहि पाखलोक मोनमे विचारक लहरि हिलकोर मार’ लागलैक। ई बसात पच्छिम दिसक पहाड़केँ पार करैत, खेतक बीचोबीच धरतीकेँ चीरैत नदीकेँ पार करैत पूबरिया पहाड़ दिस उछलैत बिना रूकनहि आगू बढि जाएत। ओ कतए सँ आएल हेतैक? कोन ठामसँ आएल हेतैक? ई कहब ओतेक सरल नहि अछि। ओ सभ ठाम भ्रमण करएबला प्रवासी अछि। बसातकेँ अबितहिँ धरती ओहि बसातमे रंग उछालि ओकर स्वागत केलक। बसात धरतीक माथक चुम्मा लेलकैक। गाछ सभक आलिंगन केलकैक। लत्तीसभकेँ बाँहिसँ पकड़ि कान्ह पर राखलकैक आ फेर नीचाँ राखि देलकैक। फूल, फल आ पात सभक चुम्मा लेलकैक आ पूरा बगैचामे सभकेँ हाथसँ इशारा करैत ओ आपस चलि गेल। पाखलोकेँ मोनमे भेलैक, “जे हमहुँ बसाते जकाँ एहि इलाकामे घूमि-फिरि रहल अछि। हम अपन जन्महि कालसँ एहि इलाकामे रहि रहल छी। मुदा हम बसात जकाँ आबि कए चलि नहि जाइत छी अपितु एतुका निवासी भ’ गेल छी। एहि आम गाछक सदृश हमरहुँ जड़ि बहुत भीतर धरि गेल अछि। एहि माटिक बल पर हम पैघ भेलहुँ, फरलहुँ-फुललहुँ। एहि माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल पाखलो थिकहुँ हम।” साँझ खतम भ’ कए गोधूलि भ’ रहल छलैक। मंगुष्ठी झरना पर पानि भरि कए कन्या आ स्त्रीगण घर जा रहल छलीह। पाखलोक ध्यान ओमहर नहि छलैक, अपितु आइ शामा पानि भरबाक लेल नहि आएल छलीह, एहि लेल ओकरा जीवनकेँ फाँसी लागि गेल रहैक। हाड़-मांसुसँ बनल पाखलो केँ एकटा कुमारि कन्यासँ सिनेह भ’ गेल रहैक आ ओ ओकरासँ बियाह करबाक लेल सोचि रहल छल। जकरा एक नजरि देखि लेलासँ ओकरा नस-नसमे उमंग आबि जाइत छलैक वैह शामा आइ झरना पर नहि आयल छलीह, तैँ ओ अपनाकेँ मंद महसूस करैत छल। गोधूलि खतम हेबा पर रहैक आ अन्हार अपन पयर पसारि रहल छल। सांतेरी मंदिर लग पाखलोकेँ पेट्रोमैक्सक जगमग करैत इजोत देखा पड़लैक। ओकरा आइ होमएबला बसंत पूजाक स्मरण आबि गेलैक। बसंत पूजा दिन सांतेरी मायक पालकी बड़ धूमधामसँ बाहर निकलैत छैक। ओ प्रकृतिमे आएल बसंत ऋतुसँ भेंट करैत छथि। ओहि राति ओ मंदिर आपस नहि जाइत छथि अपितु बाहरे प्रकृतिक संग रहैत छथि। बसंत ऋतुक दिन गाम भरिक लोक भरि राति उत्सब मनबैत अछि। पूजाक लेल तँ शामा अवस्से अओतीह, तखनहिँ हम हुनकासँ भेंट क’ लेब। पाखलो सोचलक। शामासँ भेंट करबाक बहन्ने ओकरा पूरा देहमे जोश आबि गेलैक, आ गामक दिस जयबाक लेल ओ तीव्र गतिएँ चलए लागल। मंगुष्ठी झरना पर सभ दिन जकाँ पाखलो आइयो अपन कपड़ा धोबैत छल। रबि लगाकए आइ तीन दिन भ’ गेल रहैक। गोविन्द रबिकेँ किएक नहि अएलाह? ओ यैह सोचि रहल छल। एतबहिमे दूरसँ – “पाखल्या! यौ पाखल्या!” गोविन्द सन आवाज सुनबामे आएल। ओ पाछू घूमिकए देखलक। गोविन्दकेँ देखतहि पाखलो तुरन्त उठल आ ओकरा दिस दौड़िकए गेल। दुनू एक दोसरासँ हाथ मिलेलक। गोविन्दक कनहा अपन हाथसँ हिलबैत पाखलो पुछलकैक – “अहाँ रबि दिन किएक नहि एलहुँ?” “की कही, हमरा ऑफिसक मित्र लोकनि हमरा पिकनिक पर ल’ कए चलि गेल छलाह। हम जाएवला नहि रही, मुदा की करितहुँ ओ सभ हमरा जबरदस्ती ल’ गेलाह। हमर मोन करैत रहय जे आबि कए अहाँसँ भेंट करी।” गोविन्द अपन मोन खोलि देलक। “जाय दिअ, एखनहिं मिललहुँ यैह की कम अछि? “चलू पहिने अहाँ नहा लिअ” गोविन्दक कहला पर पाखलो झरनामे नहाबए लागल। गोविन्दकेँ किछु कहबाक उत्सुकता रहनि। ओ अपना हाथसँ पानि निकालि पाखलोक देह पर छिट्टा मारए लागल, पाखलो सेहो हुनका पर पानि फेकलक। ओहिसँ गोविन्दक कपड़ा नीक जकाँ भीजि गेलैक। पाखलो केँ कने खराप लागलैक। ओ गोविन्दसँ माफी माँगलक। गोविन्द एकरा सभकेँ मजाकमे उड़ा देलथि। पाखलो नहाकए अपन देह पोछलक। अपन कपड़ा सुखबाक लेल लारि देलकैक। बादमे दुनू गोटे आमक जड़ि पर आबि बैसि गेल। पाखलो गोविन्दक आँखिमे देखलक। गोविन्द किछु कहए चाहैत छल, ई हुनका आँखिसँ पाखलोकेँ पता लागि गेल। “कोनो नब समाचार?” पाखलो पुछलकैक। “समाचार? एकटा नब समाचार अछि।” “कोन समाचार?” “हमरा लेल एकटा संबंध आएल अछि।” “अहाँक लेल संबंध? कतएसँ? केकर?” पाखलो एकक बाद एक प्रश्न केलक। “ई सभ हम अहाँकेँ बादमे कहब। पहिने बताउ, जे शामा आइ पानि भरबा लेल आयल छलीह?” “हँ….नहि......, एखन धरि तँ नहि।” पाखलो सोचिकए जवाब देलक। “नहि ने? तखन तँ हमर अनुमान ठीके भेल। हम अहाँकेँ आर नहि उलझाएब। हमरा लेल विन्या आपाक दिससँ शामाक लेल संबंध आएल अछि। हम ओकरा साफ मना क’ देलिऐक।” पाखलोकेँ बतएबाक लेल आनल गेल रहस्य गोविन्द खोलि देलक। “मुदा संबंधक लेल अहाँ मना किएक कहलहुँ?” पाखलो फेर प्रश्न केलक। “एकर जवाब तँ बड्ड सरल छैक यौ।” गोविन्द बाजल— “शामाक जोड़ीक लेल अहाँक प्रयोजन अछि हमर नहि। अहाँकेँ स्मरण अछि, हम एकबेर अहाँकेँ कहने रही – “शामा आ अहाँक जोड़ी केहन रहत?” किछु कालक लेल दुनू गोटे चुप भ’ गेल। बादमे गोविन्द बाजए लगलाह— “हम दुपहरकेँ घर गेल रही। खएलाक बाद माय हमरा एहि संबंधक बारेमे बतौलनि। हम साफ मना क’ देलियनि, मुदा किएक? से नहि बतौलियनि।” “नहि गोविन्द, एहि संबंधकेँ नकारि अहाँ नीक नहि केलहुँ। अहाँ हमरा लेल त्याग क’ रहल छी। ई हमरा नीक नहि लागि रहल अछि।” पाखलो कहलक। “एहन नहि छैक पाखलो, अहाँ बुझैत नहि छी। अहाँकेँ किओ नहि अछि। आ शामा अहाँकेँ पसिन्न सेहो अछि। ओ अहाँकेँ भेटि जेतीह तँ हमरा खुशी होएत।” “मुदा हमरा संग.....” पाखलो किछु कह’ वला रहथि। “ओ सभ बादमे देखल जेतैक।” एतबा कहि गोविन्द चुप भ’ गेल। पाखलोक मोन विचलित भ’ गेलैक, मुदा शामाक सभ स्मरण एखनहुँ ओकरा मोनमे महकैत रहैक। शामा द्वारा गोविन्दक लेल कएल गेल पूछारि....., ओकर मीठ-मीठ बोली....., फूल-सन ओकर हँसी.....सभटा। ओकरा दुनूकेँ देखि शामा झरनासँ बिना पानि भरनहिं आपस चलि जाइत छलीह। तकर बाद ओ शामासँ भेंट केलक आ “हमरासँ बियाह करब?” पूछलकैक। शामा ओकरा “हँ” कहतैक ओकरासँ यैह अपेक्षा छलैक पाखलोकेँ, मुदा ओ बाजलि, “नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ! ” पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छल आकि ओ ओतएसँ चलि देलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक। पाँच शंभुक होटलमे रातिक भोजन कएलाक पश्चात् हम दीनाक घर दिस चलि देलहुँ। आइ बहुत काज केने रही तहि लेल सौंसे देहमे दरद छल। भूइयाँ पर पड़ितहि हमरा निन्न आबि जाएत, एहन बुझाइत छल। बान्ह पर पहुँचबाक देरी नहुँ-नहुँ बसात सिहक’ लागल। अहा!........ केहन शीतल बसात छैक! बसात लगितहिँ देहमे हरियरी आबि गेल। बान्हक एक दिस खेत-पथार आ दोसर दिस मांडवी नदी बहैत छलैक। बगलक नारियरक गाछसँ आवाज आबि रहल छलैक। चारू दिस अन्हारे-अन्हार छलैक! एहि अनहरियामे जान आबि गेल रहैक। अन्हारमे उपर भगजोगनी भुकभुक करैत छलैक। नदीक कारी पानिमे माछ सभ उछलैत रहैक आ ओकर लहरि भगजोगिनिएँ जकाँ दीप्यमान भ’ रहल छलैक। बान्हक बीचहि मे मूलपुरुष (ग्रामदेवता)क मंदिर नुकाएल रहैक। ओ मंदिर एकदम टूटि गेल रहैक। मंदिरक उपर चार नहि छलैक। मंदिरक चारू कातक देवाल सभमेसँ आगूक देवाल तँ एकदम्मे टूटि गेल रहैक। बाँकी तीनू देबाल पर सिम्मर, बर, अश्टी सन पैघ-पैघ गाछ सभ जनमि गेल छलैक। गोविन्दक विचारसँ मूलपुरुषकेँ खुब पैघ खुलल मंदिर भेटल छनि। ओ कहैत छल – “एहि चारू गाछ पर आकासक छत छैक आ एहि मंदिरमे मूलपुरुष रहैत छथि।” चलैत–चलैत हम मूलपुरुषक मंदिर लग पहुँच गेलहुँ। एहि मंदिरमे हम एकबेर साँप देखने रही, ओ स्मरण अबितहिं हमर सौंसे देह सिहरि गेल। नेनपनमे एकबेर हम आ गोविन्द माछ मारबाक लेल नदी पर गेल छलहुँ। बहुत कालक बाद हमरा बंसीमे एकटा खर्चाणी (माछ) फंसल छल। ओकरा हम एकटा नारियरक सिक्कीमे गूथि लेलहुँ। बाटमे मूलपुरुषक मंदिर भेटल। बंसी नीचाँ राखि हम दुनू गोटे मूलपुरुषकेँ गोर लागबाक लेल गेलहुँ। मूलपुरुषक कारी मूर्ति, मंदिरक टूटलका भागमे पाथरक ढेरीक बीचमे छलनि। हम अपन हाथक माछ मंदिरक सीढी पर राखि देलहुँ। हम दुनू गोटे मूर्ति लग माथ टेकलहुँ। ने जानि कतएसँ ओहि मूर्ति लगक पाथर पर एकटा साँप आबि अपन फन काढ़ि ठाढ़ भ’ गेलैक। हम दुनू गोटे बहुत डरि गेलहुँ आ पाछू हटि गेलहुँ। पछाति जा कए ओ साँप ससरि कए ओहि पाथरक ढेरीमे ढूकि गेल। गोविन्द तँ डरक कारणेँ बुझू जे पाथरे बनि गेलाह। हम सभ भगवानक सीढी पर माछ रखने छलहुँ, एहिलेल हुनका खराप लागलनि की? हमरा मोनमे एहन भेल। हम आपस सीढी लग गेलहुँ आ ओतए राखल माछ उठाकए नदीमे फेकि देलहुँ। हमसभ पुनः मूलपुरुषक पयर पर गिर कए हुनकासँ माफी माँगलियनि। हम गोविन्दसँ पूछलियनि, “हम माछ राखने छलहुँ एहिलेल मूलपुरुषकेँ गोस्सा आबि गेलनि की? मंदिर भ्रष्ट भ’ गलैक की?” “नहि यौ, एहन कतहुँ होइक? गामक लोकतँ हुनका माछो चढबैत छनि।” गोविन्द जवाब देलक। “तखन साँप किएक देख’ मे आएल? हम माछ राखने रही, एहिलेल मूलपुरुषक मंदिर भ्रष्ट भ’ गेलैक की?” “अहाँक माछ रखलासँ मंदिर कोना भ्रष्ट भ’ जेतैक?” “हम..............।” “चुप रहू, पाखलो भेलहुँ तँ की भेल? पछिला बेर तँ हम इमली आ आँवला रखने छलहुँ, तखनहुँ मंदिर भ्रष्ट भेल छलैक की? नहि ने! अहाँ चुप रहू आ ककरो किछु नहि बतेबैक।” हम मूलपुरुषक मंदिर लग पहुँचि गेलहुँ। मंदिरक चारू दिस पहाड़ छलैक आ बीचमे मंदिर। रातुक अन्हारमे पहाड़ कारी देखाइत रहैक। उपर तरेगणसँ सजल अकाश। जेना घरक धरेन आ छप्पड़, एहि दुनूक बीचसँ इजोत अबैत छैक ओहने इजोत अकाश आ पहाड़क बीच पसरि रहल छलैक। हम अपन जूता खोललहुँ आ मूलपुरुषकेँ गोर लागलहुँ। रातिक अन्हारमे मूलपुरुषक मूर्ति नहि लखा दैत रहैक। हमरा भेल जे जेना मूलपुरुष एतए अन्हारक एकटा बड़का टा रूप ल’ कए पूरा संसार पर पसरि गेल छथि। मूलपुरुषक मंदिर बहुत प्राचीन छैक। मांडवी नदीक कछेर पर एहि गाम केँ बसौनिहार आदिपुरूष वैह छथि। पहिने ई गाम बाढ़िमे डूबि जाइत छलैक मुदा मांडवी नदी पर बान्ह बान्हि ओ एहि गामक सृष्टि केने रहथि। हुनका मरलाक उपरान्त एहि गामक लोक सभ हुनकर स्मरणमे ई मंदिर बनौने छल। एहि तरहेँ ई मंदिर आ मूलपुरुष द्वारा बनाओल गेल ई बान्ह, दुनू बहुत पुरान अछि। हम मूलपुरुष द्वारा बनाओल गेल ओहि बान्ह दए चलि रहल छलहुँ। आ एहि बान्हक कारणेँ बसल गाममे हम, माने पाखलो रहैत रही। दीनाक बैसकी घरमे सभ दिन जकाँ हम चटाय बिछा कए बैसि गेलहुँ। दिनाक बेटा एकटा चिट्ठी आनि हमरा हाथमे थमा देलक। ओ चिट्ठी गोविन्देक छलैक। बहुत दिनक बाद ओ हमरा चिट्ठी लिखने रहय, एहिलेल हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल। गोविन्दक संग घूमब-फिरब, केगदी भाटक पोखरिमे नहाएब, हेलब, ई सभ सोचैत-सोचैत हम चटाय पर सूति गेलहुँ आ माथ धरि कम्मल ओढ़ि लेलहुँ। बहुत राति बीति गेल, मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हमरा मोनमे केगदी भाटक पोखरिक चित्र बेरि-बेरि आबि जाइत छल! लील रंगक आकाशक प्रतिबिंब पानिमे चमकैत छलैक। आकाशक रंगीन मेघ पोखरिक लहरि पर हेलि रहल छल। आकाश अपन छवि पोखरिक पानिमे देखि मोनहि-मोन खूब प्रसन्न होइत छल आ “ई रूप नीक नहि अछि।” ई सोचि ओ अपन रूपकेँ नव रूपमे रंगैत छल आ मेघक वस्त्र पहिरैत छल। पोखरिक लग केगदी (केबड़ा) झाड़ ओ केबड़ाक गाछ सभक बड़का टा जंगल रहैक, ओ पोखरिक महार केबड़ाक झाड़ीसँ भरल रहैक। जखन केबड़ाक झाड़ पर फूल फूलाइत छैक ओहि समय हमसभ नहएबाक लेल गेल छलहुँ। केबड़ा फूला गेल छलैक। पीयर-पीयर केबड़ा हरियर-हरियर पातसँ बाहर आबि, अपन जी देखा-देखा कए कबदा रहल छलैक। पूरा वातावरण केबड़ाक सुगन्धसँ भरल रहैक। हम आ गोविन्द पोखरिमे कूदि गेलहुँ। दुनूगोटे हेलैत-हेलैत केबड़ाक द्वीप लग पहुँचलहुँ। द्वीप पर केबड़ाक बहुत घनगर जंगल रहैक। दुनू गोटे केबड़ाक झाड़क अंदर घूसि केबड़ाक फूल तोड़ए लागलहुँ। फूल तोड़ि पोखरि पार केलहुँ। ओ सभटा पोखरिक कछेर पर राखि देलिऐक। बादमे बेंग जकाँ हमसभ पोखरिमे डुबकी लगौलहुँ। भरि दम साँस घीचि ओहिना पानिमे डूबि गेलहुँ, तँ ओहि साँसक संगे बाहर भेलहुँ। सौंसे देह डूबल छल, मुदा माथक केश हेलैत नारियर सदृश बुझाइत छल। हमरा गाम क्षेत्रफल आन गामक अपेक्षा कने पैघ छैक। गाममे खेतक मैदान, जंगल ओ पहाड़ हमरा सभकेँ घूमबाक लेल कम पड़ि जाइत छल। नाह पर पतवारि चलाबैत हमसभ नदीमे झिझरी खेलैत रही। नदीमे नहएलाक पश्चात् हेलिकए नदी पार करैत रही। अज्ञातवासक कालमे पांडव लोकनि द्वारा बनाओल गेल पोखरिमे हमसभ नहएबाक लेल जाइत रही। ओ पोखरि बहुत सुन्नर रहैक। पैघ-पैघ पाथर पर पोखरिक चारू दिस नीक चित्रकारी कएल गेल रहैक। चारू दिससँ सीढी होइत लोक पोखरिमे ढूकैक छल। पोखरिक चारू दिस पाथरक मेहराब छलैक। हर एक मेहराबक भीतर दू-तीनटा कक्ष इजोतसँ भरल। एहि कक्ष सभक देबालक खाम्ह पर लत्ती सभ आ आदिकालीन माल-जाल, चिड़ै-चुनमुनीक आकृति बनल रहैक। एहन बुझाइत रहैक जेना एहि मनोहर आकृति वला कक्षमे भगवान अमृत-कलश राखि देने होथि, ठीक ओहिना लेटेराइट पाथरसँ निर्मित एहि पोखरिमे कौआक आँखि-सन साफ पानि देखिकए ककरहुँ मोन मुग्ध भ’ जाइत छलैक। एतेक स्वच्छ पानिमे हमसभ नहाइत छलहुँ। नहएलाक बाद गोविन्द मेहराबक कक्षमे जा कए कोनो ऋषि-मुनि जकाँ ध्यानस्थ भ’ बैसैत रहथि। तखन बुझाइक जे ओहि लेटेराइट पाषाणसँ महाभारतक काल घुरि एलैक। पछिला किछु सालक स्मृतिसँ हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। ओह......हमर माय! हमरा एहने लागल, जे हमर साँस केओ बन्न क’ देलक, हमरा गरमे फंदा बान्हि देलक। एकबेर हम आ गोविन्द जखन एहि पोखरिमे नहा रहल छलहुँ तखनहिं भट बाबू ओहि बाटे जा रहल छलाह। हमरा पोखरिमे नहाइत देखि ओ, “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकर’ लागलाह! हुनकर चिकरब सुनि ओतए पाँच–छओ लोक जमा भ’ गेल। भट बाबू हुनका लोकनिकेँ आदेश देलथिन, जे ओ सभ हमर कान घीचि कए बाहर आनथि। ओ लोकनि हमर कान घीचैत हमरा बाहर आनलथि। बादमे भट बाबू अपन छड़ीसँ हमरा खूब मारलथि। ओ हमरा मारैत-मारैत सांतेरी मंदिर धरि ल’ गेलाह। भरि गामक लोक हमरा देखबाक लेल ओतए जमा भ’ गेल छल। ओ हमरा सांतेरी मंदिरक सीढ़ी पर नाक रगड़बाक लेल बाध्य केलथि। हम अपन नाक रगड़लहुँ, माँफी माँगलहुँ, मुदा ओ हमरा पोखरिक लग बला लोहाक स्तंभसँ बान्हि देलनि। काल्हिए हम एहि स्तंभ पर नारियर फोड़ने छलहुँ। सभक संग ढोल आ ताशा बजाकए शिगमो (धार्मिक उत्सव) खेलने छलहुँ आ आइ हम स्वयं गामबलाक लेल एकटा तमाशा बनल रही। भट बाबू हमरा उपर नारियरक खट्टा ताड़ी उझलि देलथि। एतबे नहि किओ हमरा उपर घोरणक छत्ता झारि देलक। घोरण काटतहि हम जोर-जोरसँ चिकरए लागलहुँ। मुदा हमर असहायता पर किनकहुँ कनेको क्षोभ नहि भेलनि। हमर ई हालति देखि गोविन्द कानैत-कानैत दौड़ल हमरा मायकेँ बजा आनलक। ओ “हमर बच्चा…”,“हमर बच्चा…” कहैत कानल-कानल, दौड़ल एलीह मुदा हमरा सोझ अबितहिं ओ एकदमसँ गिर गेलीह। ओ बेहोश भ’ गेलीह आ बहुत काल धरि उठि नहि सकलीह। हुनका उठएबाक लेल हम दौड़हि वला रही, मुदा जतए बान्हल रही, ओत्तहि रहि गेलहुँ। हुनका किओ नहि उठौलक, उनटे लोक सभ ई तमाशा देखैत रहल। कनेक कालक बाद ओ अपन ठेघुन टेकैत उठलीह। हुनका नाकसँ शोणित बहैत रहनि। हाथ आ पयर मे घाव भ’ गेल रहनि। ओ उठि कए हमरा लग अएलीह आ “हमर बच्चा…” कहैत हमरा गर लगौलीह। हम दुनू गोटे कानए लागलहुँ। ओ हमर बन्हन खोलबाक प्रयास करए लागलीह मुदा ओहि समय चारि-पाँच लोक हुनका पाछाँ घीचि लेलकनि। बादमे हुनकहुँ घीचि कए मंदिर लग ल’ गेल। ओ हमरा छोड़एबाक लेल भट बाबूक हाथ-पयर पकड़ैत रहलीह मुदा ओ हुनका ठोकर मारि धकेलि देलनि। एतबा देखतहि हमरा गोस्साक पारावार नहि रहल। हमरा देहक गरम खून दौड़ए लागल। हम जतय बान्हल रही ओत्तहि चिकरि-चिकरि कए रहि गेलहुँ। बादमे हमर खून ठंढा भ’ गेल आ ओ शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाबए लागल......, हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक सभटा खून बहि गेल हो! हमर माय कानि रहल छलीह आ हुनका सभक पयर पकड़ि रहल छलीह, मुदा हुनक गोहारि किओ नहि सुनि रहल छल। ओ जहिना हमरा छोड़ाबए आगू आबथि, लोक हुनका रोकि लैक। बादमे जखन ओ गोस्सासँ महाजनकेँ गारि पढ़ब सुरह क’ देलनि तँ लोक सभ हुनकहुँ घसीट’ लागल आ जाहि स्तंभसँ हम बान्हल रही ओहि स्तंभसँ हुनको बान्हि देलनि। आब हमर मुँह पूब दिस तँ हुनक मुँह पच्छिम दिस भ’ गेल। हम दुनू गोटे एकहि स्तंभ सँ बान्हल छलहुँ, मुदा एक दोसराकेँ देखि नहि पबैत छलहुँ। ओ “हमर बच्चा…”,“हमर बच्चा…” कहि कए कानैत छलीह, तँ हम माय....., माय....., चिकरि कए कानि रहल छलहुँ। किछु समयक पश्चात् ओ कोनहुँ तरहेँ अपन हाथ पाछू आनि हमरा छूलनि। हम दुनू दिनभरि ओहि स्थिति मे रहलहुँ। पोखरिक शुद्धिकरण करएबाक लेल ओ होम-जाप करौलनि। चारिटा केराक थम्ह आनल गेल आ पुरहित लोकनि होम सुरह केलनि। ओ लोकनि होमाग्नि जरौलनि। मंत्रोच्चारण करैत ओ लोकनि ओहिमे समिधा झोंकए लगलाह। हमरा बुझाएल जे ई सभ हमरा आ हमरा माय, दुनूकेँ एहि आगिमे झोंकि देत। होम चलितहि काल एकटा पुरहित ओहि होमसँ आगि आनि हमरा पयर पर राखि देलक। हमरा बुझाएल, जेना हम काल्हि होलिका जरौने छलहुँ तहिना ई सभ आगि लगा हमरा दुनू माय-पूत केँ जरा देत। मुदा ओ एना नहि केलक। आगिक कारणेँ हमरा पयरमे फोका भ’ गेल छल जे दर्द करैत रहए। होम-हवन चलि रहल छल आ फाँसी पर चढ़’ वला अपराधी जकाँ हम जतए बान्हल रही, ओतहिसँ हुनका सभकेँ देखि रहल छलहुँ। गामक लोक सभ एहि घटनाकेँ एकटा उत्सव जकाँ देखि रहल छलाह। दादी ओहि दिन गामसँ बाहर गेल रहथि। साँझ खन घुरितहि गोविन्द हुनका हमरा सभक खबरि देलक आ संगहि ल’ कए पोखरि पर आबि गेल। हमरा आ हमरा मायकेँ स्तंभ सँ बान्हल देखि कए दादी बहुत दुखी भेलाह। जाहि दादीक आँखिमे हम आइधरि नोर नहि देखने रही; ओहि दिन देखि लेलहुँ। ओ हमरा छोड़ा देलथि। ओहि काल ई देखबाक लेल ओहिठाम गामक किओ नहि रहथि। एहि घटनाक पश्चात् हमरा गामक लोक पर कनेको गोस्सा नहि आएल, किएक तँ गाममे हमरा छोड़ाकए आनएवला आ गोविन्द सन हितैशी आर किओ नहि रहथि। नारियरक फुटलका खोली जकाँ गरि जाइवला एहि घटनाक स्मृति आब शेष रहि गेल अछि। एहि घटना सभमे सँ एक, स्तंभ पर नारियर तोड़बाक अछि, ई बताबए वाली हमर माय....., हमरा प्रह्लादक होलिकाक आगिसँ बचाबए वाली हमर माय....., हमरा आँखिक सोझ ठाढ रहलीह आ हमरा आँखिसँ अनायासे नोर खसय लागल। हम गोविन्दक मायकेँ शोर पारलहुँ। ओ हमरा घरक भीतरहिसँ आबाज देलथि। ओहि समय ओ चाउर बीछैत छलीह। ओ उठि कए बाहर एलीह आ हमरा देखि कए बजलीह, “आउ बाउ, बैसू!।” हम घरक अंदर गेलहुँ। ओ हमर हालचाल पूछय लागलीह। “एतेक दिन धरि कतए छलहुँ अहाँ?” “नहि बाय...... ” हम किछु कहए चाहैत छलहुँ “.... आइ-काल्हि काजमे बेसी व्यस्त रहैत छी ताहि लेल अएबाक अवसर नहि भेटैत अछि की?” “...असलमे आइयहु तेहने काज छल, मुदा गोविन्दसँ भेंट करबाक रहए एहिलेल ओवरटाइम छोड़िकए आएल छी।” ओ अदहनमे चाउर गिराब’ गेलीह आ हम ओहिठामक बेंच पर बैसि गेलहुँ। बेंचक एक कोनमे ट्रंक आ ओहिपर गोविन्दक किताब राखल छलैक। हम एकटा उपरला किताब निकाललहुँ, ओ अंग्रेजी मे छल, एहिलेल हम नहि पढ़ि सकलहुँ आ ओ आपस राखि देलिऐक। बादमे सबसँ नीचा वला किताब निकालहुँ, मुदा ओ पुर्तगाली मे छल एहिलेल ओहो राखि देलहुँ। ट्रंक लग कपड़ा टाँगबाक एकटा हैंगर रहैक जाहिपर दादीक दू टा कमीज आ गोविन्दक एकटा पैन्ट टाँगल रहैक। एखन धरि तँ गोविन्दकेँ पणजीसँ आपस आबि जएबाक चाही! एहिलेल हम खिड़कीसँ बाहर देखलहुँ। मुदा रस्ता सून छल। मैदानसँ होइत ओ रस्ता अपन देह टेढ-मेढ़ केने सीधे गाम धरि आबि रहल छल। आगू पैघ-पैघ गाछ-बिरीछक कारणेँ शहर गेल गोविन्दक छाँह धरि नहि बुझाइत छलैक। दादी बजारसँ आबि गेल छलाह। ओ हमर हालचाल पूछलनि। हम कनी मोटगर-डटगर भ’ गेल रही एहि लेल ओ हमर प्रशंसा केलनि। ओहि दिन दूपहर धरि दादी, ओकर माय, आ हम, गोविन्दक रस्ता-पेड़ा देखैत रहलहुँ। ओ नहि आएल, एहिलेल हमसभ कने निराश छलहुँ। बहुत कालक बाद हमसभ भोजन केलहुँ। दादी सुतबाक लेल गेलाह आ हम ‘पुनः आएब’ ई कहि चलि देलहुँ। रस्तामे आलेससँ भेंट भेल। ओकरा देखि हमरा कने आश्चर्य भेल, किएततँ ओ कहियो अपन ओवरटाइम नहि छोड़ैत छल। एतए धरि जे रबियोक दिन ओ भोरे-भोर उठि कपेल गेलाक बाद ओ काज पर जाइत छल। हम पुछलियनि— “आलेस! बीचहि मे काज छोड़िकए आएल छी की?” “आबए पड़ल! नारियरक गाछसँ रस निकाल’ वला मजदूर पेद्रूक देहांत भ’ गेलैक।” आलेस बतौलनि। “की भेल छलैक ओकरा?” हम पूछलहुँ। “पता नहि, हमरा निकलतहि ओ मरि गेल।” आलेस कहलनि। आलेसक संगहि हमहू ओकरा घर धरि गेलहुँ। दोसर दिन पेद्रूक अंतिम संस्कारमे हमरहु जाय पड़ल। छोटका गिरिजाघरक लगीच वला श्मशान घाटमे ओकर अंतिम संस्कार भेलैक। पेद्रू एकटा हिन्दू मौगी रखने रहए, किन्तु ओ ओकरासँ बियाह नहि केने रहय। ओ जा धरि छलीह ताधरि पेद्रूक संसार नीक जकाँ चललै, मुदा जखन ओ मरि गेलीह तँ ओकरा श्मशानक बाहरे गारल गेल छलैक। किएक तँ ओकर अंतिम संस्कार श्मशान घाटमे नहि करय देल गेल रहैक एहि लेल पेद्रू कानि रहल छल। ई घटना स्मरण अबितहि हम स्वयं उधेड़बुन मे पड़ि गेलहुँ। एहि उधेड़बुन मे हमरा एकटा पछिला गप्प स्मरण आबि गेल। एहि छोटका गिरिजाघरमे हमरा बपतिज्म (ईसाई धर्मदीक्षा) देल गेल छल। ताहि समय हम बहुत छोट छलहुँ। तखन स्कूलो नहि जाइत छलहुँ। अपन मायकेँ बता कए हम आलेसक ओहिठाम गेल रही। ओकरा घरमे ओकर पिताजी हमरासँ पूछलथि— “अहाँ त’ पाखलो छी ने?” “हँ” हम जबाब देलहुँ। “किएक तँ अहाँ पाखलो छी एहिलेल ईसाई भेलहुँ ने?” हम चुप रहलहुँ। “अहाँ काल्हि आलेसक संग आएब, काल्हि उत्सव छैक।” दोसर दिन हम आलेसक संग गेलहुँ। ओहि समय हमरा ओतुका पादरी बपतिज्म देलनि। एहि बातक खबरि हम ककरो नहि लागए देलिऐक। घर अएलाक बाद, आलेसक ओहिठाम जे हमरा बिस्कुट खएबा लेल देल गेल छल, ओकरा हमर माय बाहर फेकि देलथि। ओ हमरा धमकी देलथि—“विठू! एना जँ अहाँ ककरो-कहाँसँ किछुओ खएबाक चीज ल’ लेब तँ हम अहाँक जान ल’ लेब।” हमरा गाममे एहिसँ पहिने ईसाई आ हिन्दूक बीच कहियो झगड़ा-फसाद नहि भेल छल, मुदा ‘ओपिनियन पोल’क समय गामक बजारक वार्डमे ईसाई आ हिन्दू, दुनू समुदायक लोकक बीचमे झगड़ा भ’ गेल। ओहि दिन किओ एक दोसराकेँ ओकर धर्म लगा केँ गारि देलकै, आकि झगड़ा बाझि गेल। ओहि राति एक दोसराक घरक आगूक तुलसी चौरा आ क्रॉस तोड़ि देल गेल। घर-दरबज्जाक आगू तोड़ल गेल तुलसी चौरा आ क्रॉसक माटिक ढेर लागि गेल। दोसर दिन झगड़ा आर भयानक रूप ल’ लेलकै। लोक सभ डंडा, तलवार आ ढाल ल’ कए एक दोसराकेँ मारि देबाक लेल तैयार छलैक। किछुकेँ मारियो देल गेलैक। हम एहि दुनू समुदायक बीच घूमि रहल छलहुँ, आ की भ’ रहल छैक देखि रहल छलहुँ। हमरा मारबाक लेल किओ नहि अबैत छल। “हम नहि तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, एहिलेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबंध दुनूसँ अछि, एहिलेल हमरा ओ लोकनि नहि मारलनि की?” हमरा मोन मे एहि तरहक प्रश्न उठय लागल। दुनू समुदायमे हमर मीत लोकनि छलाह आ हम हुनका सभसँ मिलैत छलहुँ। जँ झगड़ा आर बढ़ि जेतैक तँ खूनक नाली बहि जेतैक, एहिलेल दुनू समुदायक लोक डरि गेलाह। बादमे हम दुनू समुदायक लोकसँ मिलिकए हुनका सभकेँ समझौलहुँ-बुझौलहुँ, हुनका बीच समझौता करबौलहुँ। ओहि समय हम हुनका सभकेँ एकजुट करएवला आ एक दोसराक समाद ल’ जाएवला दूत बनि गेल छलहुँ। एहि गाममे हमर परिचय फकत एतबा अछि जे हमर नाम पाखलो थिक, हमर जाति पाखलो थिक, आ हमर धर्म सेहो पाखलो थिक। छओ केगदी भाटक पैंतीस-चालीस रैयत, मूलपुरुषक मंदिर लग जमा भ’ गेल छल। सुभलो आ सोनूक बीच बैसल दादी सभसँ नीक लगैत छलाह। रैयत, किसान, कुणवी (गोवा राज्यक आदिनिवासी) सहित गामक सभ लोक ओतए जमा छल। रैयत सभ अपन-अपन माँग ओतए राखलक। जमींदार ककरो घर तोड़ि देने रहैक तँ ककरो घर नहि बनाब’ दैत रहैक। किछु रैयतकेँ जमींदार बेदखल क’ देने रहैक तँ किछुकेँ हफ्ताक नारियर नहि देने रहैक। एहि तरहक बहुत रास माँग रहैक। सभक चेहरासँ गोस्सा आ नाराजगी झलकैत रहैक। प्रस्तुत कएल गेल सभ माँग पर जखन चर्चा होमए लागल तँ किछु हल्ला-गुल्ला होमए लागलै। सुभलो गाँवकर लोक सभकेँ चुप करबाक प्रयास केलनि, मुदा हल्ला आर बढ़िते गेल। तखनहि दादी उठि कए अपन दमगर आबाजमे बाजए लागल— “हम सभ एहि कांदोले गामक गाँवकर सदा जमींदारक केगदी भाट रैयत थिकहुँ। ओना हमरहिमे सँ किछु ओकरा खेतक हिस्सेदार सेहो छी। हम सभ ओकरा खेत-भाटमे काज करैत छी, मुदा हमरा जतबाक आवश्यकता अछि ततबो हमरा पेटकेँ नहि भेटैत अछि, अपितु ओ सभ जमींदारक गोदाममे चलि जाइत अछि। केगदी भाटमे हरएक नारियर तोड़बाक दिन लाखो नारियरक ढेरी लागि जाइत अछि, मुदा सदा जमींदारक मर्जीक बिना हमरा सभकेँ एकोटा नारियर खएबा लेल नहि भेटैत अछि। एहि भाटमे नारियरक गाछ लगाबी हमसभ, ओकरा पानि पटा कए नमहर करी हमसभ, भाटमे खाद छीटी हमसभ, ओकर ओगरबाहि करी हमसभ, ओकर हत्ता बनाबी हमसभ, सुरक्षा करी हमसभ आ दू टा नारियर खएबा लेल हमरा सभकेँ जमींदारक मुँह देख’ पड़ैत अछि। एहि माटिक पूतकेँ एहि भाटमे घर-मकान नहि बनाब’ देल जाइत छैक। ताहू पर जबरदस्ती ओकरा सभक घर तोड़ि देल जाइत छैक। आब हमरा सभकेँ हमर न्याय भेटबाक चाही। हमरा सभ पर जे अत्याचार भेल अछि से दूर हेबाक चाही, माने दूर हेबाक चाही।” “हँ, हँ”, जमा भेल भीड़सँ एहि तरहक नारा सुन’ मे आएल। बादमे दादी आर जोरसँ बाजए लागल। ओकर आवाज लोकक कानमे गूँजए लागलैक। पाखलोक पूरा देहमे बिजलौका चमकि गेलैक। ओ अपन गरम भेल कान पर गोविन्दकेँ हाथ रखबाक लेक कहलकैक। भगवान पर अक्षत छीटलाक पश्चात् हुनकर गोहारि केलासँ जे लोकक शरीर पर भा आबि जाइत छैक, तहिना दादीक भाषण सुनि कए लोक सभ पर भा आबि गेलैक, एहने बुझाइक! दादीक बाजब जारी रहैक— अपन मौगीक परतापें ओकरा ई केगदी भाट भेटल छैक। यैह सदा, दत्ता जल्मीकेँ जित्ते मारि कए ओकर खाजन भाट (क्षेत्र विशेषक खेत) फिरंगीक सहायतासँ अपना नामे करवा नेने अछि। ओकरा कनेको लाज-शरम नहि छैक। ओहू पर ओ गाममे राजा जकाँ घूमि रहल अछि। ई गाम सदा जमींदारक नहि थिकै। गामक खेत-भाट हमरा सभक थिक। एहि खेत मे काज करएवलाक खेत-भाट थिकै। कागत पर लिखा नेने ई ओकर नहि भ’ जेतैक। जँ एहन हेतैक तँ ओ एहि देशकेँ सेहो कागत पर लिखवाकेँ राखि लेत आ ओ एहि देशहुँकेँ कागत पर लिखि ककरो हाथेँ बेचि लेत। आब हमसभ जमींदारकेँ देखा देबैक जे ई खेत-भाट हमरे सभक थिक। खेत-भाटमे काज करएवलाक थिक। हमरा सभक असहयोगेक कारणेँ केगदी भाटमे नारियर तोड़ब एखन धरि बाँकी रहि गेल अछि। ओहि समय जमींदारकेँ एहसास भ’ जेबाक चाही रहए। मुदा ओ तँ अकिले केर आन्हर अछि। सुनलहुँ अछि जे भाटमे नारियर तोड़बाक लेल ओ गामसँ बाहरक पाडेकर (पेशेवर नारियर तोड़’ वला) केँ लाबए बला अछि। ओकरा अएबासँ पहिनहि हम सभ सभटा नारियर तोड़ि कए देखा देबैक जे ओ भाट हमरा सभक थिक। चलै चलू, आइए, एखने ओहि भाटक सभटा नारियर तोड़ि देबैक, चलै चलू, ढाल आ गड़ाँस ल’ कए अबैत जाउ! सभ किओ ओहि जोशक संग उठल आ ढाल-गराँस ल’ कए केगदी भाटक दिस चलि देलक। भाटमे हर एक नारियरक गाछमे गुच्चाक गुच्छा नारियर लागल रहैक। एतेक पैघ केगदी भाट, जकर नारियर तोड़बाक लेल महीनाक महीना लागि जाइत छलैक, एकहि दिनमे एक चौथाई सँ बेसी नारियर तोड़ि देल गेलैक। गुच्छाक गुच्छा नारियर गिर रहल छल। भाटमे नारियरक बड़का-बड़का ढेर लागि गेल छलैक। साँझ पड़ि गेल रहैक मुदा एखन धरि सभ किओ नारियर तोड़बामे व्यस्त रहए। एतबहि मे, “पाखलो गिर गेलैक, पाखलो गिर गेलैक”, एहन हल्ला मचि गेल। नारियर तोड़ब छोड़ि सभ किओ पाखलो लग जमा भ’ गेल। पयरक छान छूटि गेलाक कारणेँ पाखलो नारियरक गाछसँ नीचा गिर गेल छल। नारियरक गाछसँ ओकर पेट, जाँघ, हाथ-पयर आ छाबा घसीटा गेल छलैक जकरा कारणेँ ओकर चाम निकलि गेल छलैक। ललाटक घावसँ खून बहि रहल छलैक। दादी आ सोनू ओकरा सहारा दए उठाकए बैसैलक आ पानि पियौलक। होशमे एलाक पश्चात्, की भेल छल? ई जानि पाखलो हँसय लागल। बैसल पाखलोकेँ गोविन्द हाथक सहारा दए उठौलक। चलू, घर चलैत छी! गोविन्द पाखलोसँ कहलक। सोनू बाजल, “नहि, पाखलोकेँ हम अपन घर ल’ जाएब, ई बहुत जख्मी भ’ गेल छैक आ एकरा बहुत चोट लागल छैक। एकरा हम घर ल’ जा कए जे किछु दवाई-बिरो करबाक हेतैक से करबा देबैक।” ओहि दिनक नारियर तोड़ब बन्न भेल। पाखलो अपन मामाक घरक रस्ता पर चलि रहल छल। दोसर दिन फेर नारियर तोड़ब सुरह भेल। पाखलो अपना माथ पर रुमाल बान्हि ठाढ भ’ गेल। दोसरा जकाँ ओहो नारियर तोड़बा लेल सोचि रहल छल, मुदा ओकर मामा ओकरा गाछ पर चढबासँ मना क’ दलकैक। एकर बाबजूदो ओ नारियर तोड़ि लितए, मुदा सौंसे देहमे भ’ रहल दरदक कारणेँ ओ एहन नहि क’ सकल। रजनी जीरा पीसि कए ओकरा पीठ आ कन्हा पर लगौने छलीह। घावसँ जीरा नहि निकलि जाय एहिलेल ओ नारियरक गाछ पर नहि चढ़ल। काल्हि रजनी पाखलोक शरीर पर भेल घावकेँ धो-पोछि कए दवाइ लगौने छलीह। ललाट पर जे घाव भेल रहैक, ओहि पर दवाई लगा कए पट्टी बान्हने छलीह। कुल्हा आ पीठ पर जीरा पीसि कए लगौने छलीह। रजनीक ई रूप देखि कए पाखलोकेँ अपन मायक स्वरूप याद आबि रहल छलैक। रजनी केलबायक मूर्ति-सन सुन्नरि लागि रहल छलीह। रजनी ओकर मामा एकलौती बेटी छलीह। ओ बहुत शांत आ विनम्र स्वभावक छलीह। रजनी जखन दूध आनि कए पाखलोकेँ पीबाक लेल देने छलीह, ओ पीबैत काल पाखलोकेँ रजनीक वात्सल्य भावक एहसास भेल छलैक। क्षण भरिक लेल ओकरा मोनमे भेलैक जे एहि ममतामयी देवीक चरण छूबि ली। काल्हिसँ पाखलो एकटा अलगे दुनिया मे विचरण क’ रहल छल। ओकरा मोनमे कतहुँ कोनो मंदिरक रचना भ’ रहल छलैक। जखन जीपक हार्न सुन’ मे एलैक तखन पाखलो होशमे आएल। देखलक तँ केगदी भाटमे पुलिसक एकटा गाड़ी आएल छल, जकरा संगे सदा जमींदार सेहो छल। पुलिस जहिना केगदी भाटमे आएल तहिना हवामे दू-तीन फायरिंग केलक। सभ किओ डरि गेल आ नारियर तोड़ब बन्न क’ देलक। दादीकेँ बहुत गोस्सा एलै आ ओ गोस्सेमे सभसँ कहलक— “अहाँ सभ ककरो सँ डरब नहि। नारियर तोड़ब जारी राखू।” इन्स्पेक्टर अपन रूल हाथमे नेने आगू आएल। ओ दादीकेँ अपना हाथेँ पकड़लक आ ओकरा जीपमे बैसैबाक लेल घीच’ लागल। पाखलो ओकरा रोकलकै। सभ किओ पुलिसक चारू दिस जमा भ’ गेल। दू-तीन गोटे जीपमे बैसल जमींदारकेँ नीचा उतारि देलक। इन्स्पेक्टर चिकड़ल, आ गोस्सासँ बाजल— “अहूँ सभ जँ बेसी बकबक केलहुँ तँ अहूँ सभकेँ मारि लागत।” “जाउ, जाउ, चुप रहू! जँ अहाँ एतए बेसी रंगबाजी केलहुँ तँ एतए जमा भेल सभ गोटए अहाँ सहित अहाँक पुलिसो केँ पीटत। हमसभ पुर्तगाली पुलिसक हाथ तँ ढेर एलहुँ तँ अहाँ सभक हाथ कतएसँ आएब।” दादी चिकरल। ताधरि पुलिस पर किओ दू-तीन चपत धरा देलकै। ओ संभवतः पाखलो छलैक। इन्स्पेक्टर पाखलो केँ पकड़ि लेलक, मुदा दादी ओकरा छोड़ा लेलकै। इन्स्पेक्टर दादीक दिस ‘चिबा जाइ आकि गिर जाइ’ वला नजरिसँ देखलक। “अहाँ सभ एतए लोकक रक्षा करए आएल छी वा गोलीसँ उड़ाब’?” दादी इन्स्पेक्टरसँ पुछलकै। “अहाँ केँ तँ सबसँ पहिने ओहि लोककेँ अंदर करबाक चाही छल, जे अहाँकेँ एतए आनने अछि। वैह असली चोर थिक, लुटेरा थिक, आ दोसराक दम पर अपन पेट भरएवला थिक, आ ओकरहि कहला पर अहाँ हमरा सभकेँ चलान करए आएल छी?” दादी उच्च स्वरेँ इन्स्पेक्टरसँ पूछि रहल छल आ जमींदार गोस्सासँ दादीक दिस देखि रहल छल। “अहाँ हमरा थाना ल’ जएबाक लेल आएल छी ने! त हमरा सभकेँ ल’ चलू। सब किओ जीपक अंदर आबि जाउ।” एतबा कहैत पाखलो जीपमे बैसि गेल। ओकरा संगहि आर पन्द्रह-सोलह लोक जीपमे बैसि गेल। बाँकी लोकक लेल जीपमे बैसबाक जगह नहि छलैक। इन्स्पेक्टर आठ-नओ लोककेँ जीपसँ नीचा उतारि देलकैक आ बाँचल सात गोटा कए ल’ कए चलि देलक। बाँकी लोकनि ओहिना मुँह ताकैत रहि गेल। सातो लोककेँ ओहिदिन पुलिस-स्टेशनहिमे रहय पड़लैक। दोसर दिन सोनू आ सुभल्या गाँवकरक संग पाँच लोककेँ छोड़ि देल गेलैक मुदा दादी आ पाखलोकेँ नहि छौड़लकैक। जेना श्राद्धक घरमे छूतकाह रहैत छैक तहिना केगदी भाटमे नारियर यत्र-तत्र पड़ल रहैक मुदा किओ ओकरा हाथ नहि लगाबैक। गाममे एकटा आर पैघ घटना भ’ गेलैक। दादी सहित गामक आनो-आन लोक पर जमींदार मोकदमा क’ देलकैक। गामवला सभ सेहो मोकदमा लड़ल। मोकदमा बहुत प्रसिद्ध भ’ गेलैक मुदा फैसला जमींदारक पक्षमे भ’ गेलैक आ दादी आ पाखलोकेँ एक मासक कैद भ’ गेलैक। ओहि दिन गामवासीकेँ बहुत दुख भेल रहैक। दोसरहिं दिन जमींदारकेँ सेहो कैद भ’ गेलैक, किएक तँ ओ सरकार लग जमीनक नकली कागजात पेशी केने रहैक। दोसर दिस मजदूर आ रैयत लोकनिकेँ सेहो ओ बिना कारणेँ फँसौने छलैक, एहि गुनाहक खातिर जमींदारकेँ सजा भेटल छलैक। ‘जकर जोत तकर जमीन’, एहि नियमक तहत कार्यापाट आ उबरेदांडो गाम रैयत सभकेँ भेटलैक आ केगदी भाट, खाजन भाट मजदूर लोकनिकेँ। एहि गामवला सभकेँ बुझाइत छलैक जे आब ओ वास्तवमे स्वतंत्र भ’ गेल अछि। पूरा एक महीना धरि जेहलक सजा काटलाक पश्चात् दादी आ पाखलो छूटि कए आएल। भाटसँ नारियर चोरि करबा आ लोक सभकेँ भड़कएबाक जुर्ममे पाखलो आ दादीकेँ एक महीनाक सजा भेल छलैक। ओ दुनू गोटे बड़ स्वाभिमानक संग एलाह। गामक हितमे लड़एवला एकटा सम्माननीय गामवासीक नजरि सँ गामक लोक सभ हुनका लोकनिकेँ फूलक माला पहिरा कए स्वागत कएल। लोक सभ दादीकेँ सम्मान दए गाम मे स्वतंत्रतताक उत्सवक मनौलनि। एहिसँ पहिने एतेक रास खुशी गामक लोक कहियो नहि महसूस केने रहए। दादीक घर मिलबाक लेल गाम ओ बाहरो सँ लोक सभ आबि रहल छल। एहि समय पाखलो दादीएक ओहिठाम बैसल रहए, मुदा पाखलो केँ किओ पुछलकै धरि नहि, एहिलेल ओकरा कने खराप लागलैक। “लोकक नजरि मे हुनका हमर पाखलेपन नजरि एलनि। हुनका सभक बीच हम एकटा पाखलो थिकहुँ” ओकरा लागलैक। ओ तखनहि ओतएसँ निकलि गेल। घरसँ बाहर एलाक बाद ओ सोनू मामाक घरक रस्ता पकड़ि लेलक। ओकरा मोनमे विचार आबि रहल छलैक—“रजनी हमरा देखि कए बहुत प्रसन्न हेतीह। ओ हमरासँ पूछतीह तँ हम हुनका कैदक सभटा खिस्सा सुनेबनि। हमरा पीठ पर जे रूलसँ मारल गेल अछि तकर दाग देखेबनि, ई देखि ओ अपन दुख प्रकट करतीह, आ फेर तेल गरम कए हमरा पीठ पर लगौतीह......।” सोचैत-सोचैत पाखलो सोनू मामाक घर पहुँचि गेल। रजनी ओकरा दूरहिसँ अबैत देखि लेलक। ओकरा चिन्हतहि ओ ‘विठू’ कहि दौड़ैत ओकरा सोझाँ आबि गेलीह। सात कैदसँ छूटलाक पन्द्रहे दिनक अंदर दादीक देहान्त भ’ गेलैक। हमरा रस्ता दखौनिहार चलि गेलाह। खाली हमरे किएक? अपितु सौंसे गामे केँ सम्हार’ मे ओकर पूरा हाथ छलैक। सौंसे गामे कानि रहल छल। ओहि दिन केगदी भाटमे नारियर तोड़ैत काल दादी आ हमरा सभकेँ पुलिस पकड़ि कए ल’ गेल छल आ हमरा सभकेँ खूब मारल-पीटल गेल छल। पुलिसक मारिसँ दादीक एकटा पयरमे घाव भ’ गेल रहैक जे अन्त धरि ठीक नहि भ’ सकल रहैक। कैदसँ छूटलाक पश्चात् ओ घाव आर विस्तार भ’ गेलैक आ जतए घाव रहैक ओकर चारु भाग लोहा सदृश कड़ा भ’ गेल रहैक। घावसँ खून बहैत रहैक। गमैया डागडर आ बैद्य लोकनिसँ बहुतो दवाई-बिरो कएल गेल मुदा तकर कोनो असर नहि भेलैक। ओहि राति हम, गोविन्द, गोविन्दक माय, सुभलो गाँवकर आ गामक किछु लोग दादीक लग बैसल रही। दादीकेँ बोखार रहनि आ हुनक आँखि बन्न भेल जा रहल छलनि। अधरतियामे दादीक गलामे एकटा हिचुकी भेलनि आ ओहि हिचुकीक संगहि दादी अपन अंतिम साँस लेलनि। बुझाएल जेना ब्राह्माण्डसँ गरम श्वासक तंतु टुटि गेल हो। बिना हिलल-डोलल हुनक शरीर शांत भ’ गेलनि। ओहि दिन हमरा लागल जे हमरा पर बड़का बिपति आबि गेल। सौंसे गाम दादीक अंतिम संस्कारमे आएल रहैक। गामक हितमे अपन जीवनमे कष्ट उठौनिहार दादीक ई आत्मबलिदान दिवस रहैक। अपन पिताजीकेँ मुखाग्नि दैत गोविन्द पर की बीतल हेतनि? ई अनुमान करब ओतेक सहज नहि अछि। हमरा मुँहसँ शब्द नहि निकलि रहल छल। एहि तरहक दुखक मापन कोनो मापक यंत्रसँ संभव छैक की? चिता धधकैत रहैक। गोविन्दक आँखिसँ बरखाक बूँद जकाँ अश्रुप्रवाह भ’ रहल छल। हमरा आँखिक तँ बुझू जे नोरे सूखि गेल हो। ई दृश्य हम अपन आँखिक सोझामे देखि रहल छलहुँ। गोविन्द ओहि दिनसँ गुमसुम रहय लागल। ओना तँ पहिनहुँ ओ बहुत किछु सोचैत आ गम्भीर रहैत छल, मुदा आब तँ ओ आओरो गंभीर रहय लागल। हम ओकरा समझेलहुँ-बुझेलहुँ, आ ओ बुझिओ गेल, मुदा ओ अपना आपकेँ बदलि नहि रहल छल। नोकरी पर जयबाक लेल ओकरा पन्द्रह दिन पहिनहि चिट्ठी आबि गेल रहैक, किन्तु ओ घरहि पर बैसल रहल। चिट्ठी एलाक एक मासक बादहि ओ नोकरी पर जा सकल। ओकर माय एतए घर पर एसगरे रहि जेतीह, एहि बातक दुःश्चिन्ता ओकर खेने जा रहल छलैक। ओ अपन माइयोकेँ अपना संगहि पणजी ल’ जयबाक लेल सोचलक। गोविन्दक माय अपन बेटाक संग पणजी जा रहल छलीह, एहिलेल हुनका बिदा करबाक लेल आस-पड़ोसक कैकटा स्त्रीगण आएल छलीह। गोविन्द अपन सभटा समान बान्हि नेने छल। अंत मे ओ देवाल पर लटकल दादीक फोटो आ महादेवक फोटो उतारि पणजी ल’ जाएवला समानक बीच राखि लेलक। भगवान जानथि एहि बातक खबरि गामक बुजुर्ग सुभलो गाँवकरकेँ कोना लागि गेलनि? ओ गोविन्देक घर दिस आबि रहल छलाह। हाथमे एकटा बाँसक लाठी नेने ओकरा जमीन पर टिकबैत ओ आगू बढि रहल छलाह। ओ तौलिया आ कमीज पहिरने छलाह। “ओ आबि रहल छथि”, ई गप्प हमही सोनूकेँ कहने रही। ओ घर धरि पहुँचि गेलाह। गोविन्द हुनका बजाकए बैसैलथि। “बेटा गोविन्द! अहाँ अपना माइयोकेँ पणजी ल’ जा रहल छी की?” सुभलो गाँवकर पूछलनि। “हँ” गोविन्द नहुएँ बाजल। “तखन हम जखन कखनहुँ एहि बाट दए जाएब तँ हमरा के बजाओत?” एहि प्रश्नक जबाब गोविन्द लग नहि रहैक। ओ चुप रहल। “ई गप्प हम बुझि सकैत छी जे नोकरिएक चलते अहाँकेँ पणजी जाए पड़ि रहल अछि, आ हमसभ अहाँकेँ बिदा करए आएल छी, ई कने नीक नहि लागि रहल अछि।” “आखिर हम की करी? नोकरीक कारणेँ जाए पड़ि रहल अछि।” गोविन्द बाजल। “आब गामक सीमान बाँचबो कहाँ केलैक? लोकबेद अपन सीमानकेँ लाँघि सौंसे दुनिया दिस अपन रुख क’ रहल अछि।” जाहि सोच-विचारसँ गोविन्द शहर जएबाक निर्णय केने रहए, ओ ओहि विषयमे कहि रहल छलाह। कनेक काल धरि सभ किओ चुप रहल। “खैर! अहाँ जतए कतहुँ जाउ नीके रहू!” अपन ई इच्छा व्यक्त करैत सुभलो गाँवकर बाहर निकलि गेलाह। पणजी ल’ जाएवला सभटा समान ओ बान्हि नेने रहए। हम कहलियनि— “गोविन्द, गाड़ी छूट’ मे आब कम्मे समय अछि।” हमर कहब ओ संभवतः नहि सुनलनि। हुनकर आँखि भरि एलनि आ हुनका आँखिसँ टप-टप नोर खसय लागलनि। समान सभकेँ कन्हा पर लादि हम गाड़ी लग गेलहुँ ओकरा उपर चढ़ा देलिऐक। गाड़ी छूटबाक समय भ’ गेल रहैक। गोविन्द अपना मायक संगे ओहिपर बैसि गेल। हम पुछलियनि— “आब कहिया आएब?” “देखा पर चाही।” “एहि पन्द्रह दिनक बाद खामिणी आ सांतेरी देवीक मेला छैक, आएब की नहि? आ अगिला तीन मासमे गामक केलबाईक शिगमो सेहो छैक। आएब की नहि?” हम जल्दीसँ पूछलिऐक। “केलबाईक शिगमोमे आएब।” “आ खामिणी सांतेरी?” हम पूछलियनि। “नहि।” “हम एसगरे कोना आबि सकैत छी?” गाड़ी चलि पड़ल। हम आर जे किछु पुछलहुँ से सभटा ओहि गाड़ीक आबाजमे दबि गेल। गोविन्द अपन हाथ हिलाकए हमरासँ बिदा लेलनि। गाड़ी आगू बढि गेल आ अगिला मोड़क बाद ओ आँखिसँ ओझल भ’ गेल। गोविन्दक पणजी चलि गेलाक पश्चात् हम अपना आपकेँ एसगरुआ बुझए लागलहुँ। हम दिनभरि पीपरक गाछक नीचा चबूतरा पर बैसि गोविन्देक संबंधमे सौचैत रही। ओहि समय सोनू मामा ओहि रस्ता दए जा रहल छलाह। ओ अपना डाँड़मे तोलिया लपेटने रहथि आ उपर उज्जर कमीज पहिरने रहथि। हमरा सोझ अबितहि ओ पूछलनि— “अहाँ एतए बैसि की सोचि रहल छी?” “किछुओ त’ नहि।” हम कहलियनि। “किछु कोना नहि, अहाँक मीत पणजी चलि गेलाह, अही लेल अहाँ उदास छी ने?” हम चुप रहलहुँ। “चलू, हमरा घर चलू।” हम हुनका संग चलि देलहुँ। पछिला किछु दिनसँ हम सोनू मामाक ओहिठाम आन-जान करैत छलहुँ। दुपहरिक रौदमे चलैत-चलैत हमसभ घर पहुँचलहुँ। घरक भीतर गेलाक बाद कने ठंढा महसूस भेल। लाल आ कारी रंगक फ्रॉक पहिरने रजनी दू लोटा पानि भरि बरंडाक बैसकमे राखि घर चलि गेलीह। हम दुनूगोटे हाथ-पयर धोबि तोलियासँ हाथ पोछलहुँ। भोजनक लेल पीढ़ी रखबाक आबाज अंदरसँ आएल। ताबत रजनी बाहर एलीह आ हमरा सभकेँ भोजन पर बजा कए ल’ गेलीह। हमरहु बहुत जोरसँ भूख लागल रहए। भोजन कएलाक पश्चात् हम बरंडाक सोपो (कुर्सीनुमा बैसकी) पर बैसि गेलहुँ। कोनो आन काजसँ हम घरसँ बाहर निकलहि वला रही तावत हमरा किओ आबाज देलक। “विठू।” हम उनटि कए देखलहुँ। ई रजनीए छलीह जे हमरा आबाज द’ रहल छलीह। “हँ।” हम ओकरा कहलिऐक। ओ हमरा माय सन मधुर आबाजमे बजा रहल छलीह। ओहि समय हमरा लागल जेना हम अतीतमे पहुँचि गेल छी। हमरा संबंधमे हमर सभटा खिस्सा सोनू मामा ओकरा बता देने रहथि संगहि हमर माय द्वारा राखल हमर नाम सेहो। रजनी हमरा किछु कहए चाहि रहल छलीह, मुदा बहुत देर धरि हुनका मुँहसँ कोनो शब्दे नहि निकललनि। ओ ओतहि ठाढ रहलीह। “विठू, अहाँ एतहि रहल करू। अहाँ अपन सभटा कपड़ा-लत्ता एतहि ल’ आउ।” ई सुनतहि हम ओकरा दिस आश्चर्यसँ देखलहुँ। बादमे हम अपन माथ झुका अपन पयर दिस देखए लागलहुँ। ओ हमरासँ बेर-बेर आग्रह केने जा रहल छलीह आ हम अपन पयर निहारने जा रहल छलहुँ। “किछु नहि सोचू, अहाँ एतहि रहू।” “ओ बेर-बेर हमरासँ आग्रह केने जा रहल छलीह। हुनकर आग्रह तोड़बाक हिम्मत हमरामे नहि रहए।” हम ‘हँ’ कहि देलिऐक। सात-आठ मास धरि रजनी हमर सहोदर बहिन सदृश सेवा करैत रहलीह। हमरा कपड़ा-लत्ता, ओछाओन सभटा वैह साफ करैत रहलीह। नहएबाक पानि गरम करएसँ ल’ कए सभटा काज वैह करैत छलीह, एहिलेल हम कहियो काल गोस्सा क’ कए ओकरा डाँटियो दिऐक, मुदा ओ चुप रहैत छलीह। एकदिन हम हुनका कहलियनि, “हम की अहाँक सहोदर भाय थिकहुँ जे अहाँ हमर एतेक ध्यान राखै छी?” एतबा सुनतहि हुनका आँखिमे नोर आबि गेल छल। ओ अपन बाँहिसँ तकरो पोछलथि। “सहोदर नहि छी ताहिसँ की? से जे हो, छी तँ अहाँ हमर भाइए ने? आ हम तँ अहाँकेँ अपन सहोदरे भाय मानैत छी।” एतबा कहैत ओ कपसि-कपसि कए कानए लगलीह। हम हुनकासँ माँफी माँगलियनि। हमरो आँखिमे जखन नोर आबि गेल तखनहि ओ चुप भ’ सकलीह। हम जहिना हँसलहुँ, ओहो हँसय लागलीह आ कपड़ा धोबए इनार पर चलि गेलीह। हम चिन्तामे डूबि गेलहुँ। पाखलोक जनमल कतहुँ रजनीक भाय बनि सकैत अछि? खूनक संबंध नहिओ रहने ओ हमर बहिने सदृश हमर सेवा करैत रहलीह, तेँ की ओ हमर बहिन नहि भेलीह? एहि तरह एकक बाद एक प्रश्नमे हम उलझैत गेलहुँ। फेर हम गोविन्दक प्रश्नक तंतु केँ सोझराबए लागलहुँ। ओहि दिन बेर-बेर याद आबि रहल छल। नारियरक गाछसँ गिरलाक बाद रजनीक दवाई लगेलासँ जे जलन भ’ रहल छल तकरा कम करबाक लेल ओ घाव पर नहुँ-नहुँ फूक मारि रहल छलीह। तखन हमर संबंध ओकरासँ की छल? हमरा ओ ओकरा बीच कोनो संबंध नहि रहलाक बाबजूदो ओ हमरा दबाई लगौलक। हम कष्टमे रही आ ओ हमरा घाव पर दबाई लगाब’ वाली ममतामयी छलीह। सभटा घावक संग-संग भौं आ पिपनीक घाव ठीक भ’ गेल रहए, मुदा ओतए करिया दाग रहि जएबाक कारणेँ रजनीकेँ बहुत खराप लागैक। ओ हमरा बेर-बेर कहैत छलीह— “भौं पर कारी दाग नहि रहबाक चाही। एतेक सुन्दर गोर-नार देह पर आमक कोलपति जकाँ बुझाइत अछि। आब ओकर की करब?” भौंहेक कारणेँ लहसुनियाँ आँखि बाँचि गेल। “हम चुपचाप ओकर गप्प सुनने जा रहल छलहुँ। कारी दाग रहि गेल छल, एकर हमरा एकोरत्ती दुख नहि छल। हमरा बुझाइत छल जे हमर लहसुनियाँ आँखि बाँचि जेबासँ नीक होइतए, ओकरा फूटि जेबाक चाहि रहए आ संगहि दागसँ सौंसे देह कारी भ’ जएबाक चाही रहए। हमरासँ हमर गोराइ सहन नहि भ’ रहल छल। मुदा भगवान हमरा गोर बनेने रहथि, एकरा लेल रजनी भगवानक उपकार मानैत छलीह।” “हमरा भगवाने भाय भेजने छथि, हमरा ओकरा ठीक करबाक अछि।” रजनी बेर-बेर बजने जा रहल छलीह आ हमरो भगवाने सदृश बनएबाक लेल हमर सेवा क’ रहल छलीह। तखन हम हुनका कहियनि, “हमरो भगवान देवी सदृश बहिन भेजने छथि।” एतबा कहितहि हमरा कानमे मंदिरमे बाजएवला घंटाक सदृश आभास होमए लागल। आठ रजनीक बियाह भेल एक मास भ’ गेल रहैक। ओ दुरागमनमे अपन नैहर आबए वला रहथि, तैँ सोनू मामा खेतक काज जल्दीए निबटा कए आबि गेल छलाह। रजनीकेँ नीक खेती-बारी वला घर-बर मिलल रहैक तैँ सोनू मामा बहुत खुश छलाह। मुदा दोसर दिस हुनका एहि बातक दुखो रहनि जे बहुत कम्मे उमिरमे ओ रजनीक बियाह क’ देने रहथि। ओकरा नेनपनहिमे ओकरा माथ पर सांसारिक बोझ आबि गेल रहैक। ओकरा एहन बुझाइक। ओ पाखलो पर बेकारक शंका करैत रहथि, एहि बातक हुनका ग्लानि भ’ रहल छलनि। पाखलो आ रजनी, एक दोसराकेँ नीक जकाँ बूझैत रहथि, एहिलेल सोनू मामाकेँ एहिमे किछु खराप नहि बुझा रहल छल। मुदा जँ यैह संबंध कहियो कोनो दोसर मोड़ ल’ लिअए तखन? तखन तँ गाममे जगहँसाइये भ’ जाएत। ई गामे ओकरा छोड़’ पड़ि जाइतैक। एहिलेल ओकर मोन सशंकित रहैत छल। एहि खातिर जतेक जल्दी भ’ सकए, रजनीक बियाह भ’ जएबाक चाही, यैह नीक रहत। सोनू मामा सोचने रहथि। रजनीक बियाह करपें गामक भास्करक संग बड़ उधव-बाधवसँ भेल रहैक। बियाहक तैयारीमे पाखलो पन्द्रह-बीस दिन धरि बहुत कष्ट उठौने रहए। बियाहोक दिन ओ खूब मेहनति केने रहए। बियाहक दोसरे दिनक गप्प रहैक। रजनीकेँ घरमे नहि रहलाक कारणेँ पाखलो कनमूँह सन रहए। ओ एहिना घरसँ बहराइत छल, तखनहि दरबज्जा पर ओकरा सोनू मामासँ भेंट भेलैक। ओ पाखलोसँ पूछलनि—“की भेल?” “किछु नहि।”, कहैत पाखलो घरसँ निकलि गेल। ओहि दिनक बादसँ पाखलोक पहिनहि जकाँ होटलमे खेनाइ-पीनाइ आ कतहुँ सुति गेनाय आरंभ भ’ गेल। ओकरा बुझाइत छलैक जेना ओ एहि गाममे एकटा अजनबी सदृश छैक आ ओकरासँ सिनेह राखएवला एतए किओ नहि छैक। ओ बहुत उदास रहैत छल। ओकरा माथ पर किछु रेखाक अलावे किछु नहि देखाइक। बीच-बीचमे ओ खेनाइयो-पीनाइ छोड़ि दैक। ओ पूर्ण रूपेँ कमजोर हाथी सन भ’ गेल रहए। ओकर हाड़ सभ झलकए लागल रहैक, गाल पिचकि गेल रहैक आ आँखि धसि गेल रहैक। पाखलो काज पर नहि गेल छल। ओ दूपहरकेँ पीपरक गाछक चबूतरा पर बैसल रहए। आलेस आ ओकर मीत सभ काज पर सँ आपस आबि गेल रहथि। “पाखलो आइ काज पर नहि गेल आ भरि दिन चबूतरे पर बैसल रहल” ई कहि ओ सभ पाखलोकेँ किचकिचब’ लागल। “पाखलो! आइ अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ?” “ओहिना।” “ओहिना किओ अपन काज छौड़ैत छैक की? किएक यौ! अहाँ पाखलोक जनमल छी एहिलेल अहाँ मामा अपन बेटी नहि देलनि की?” आलेसक एतबा कहब सुनि पाखलोकेँ बहुत गोस्सा आबि गेलैक। ओ गोस्से सँ आलेसक दिस देखलक। “अहाँ ओहिना हमरा पर नाराज नहि होउ। मामाक बेटीक बियाह भेलाक बादसँ अहाँ किछु बदलि सन गेल छी। अहाँक पागलपनक हालति देखिकए........।” “चुप रहू आलेस! हमरा बेकारक गोस्सा नहि दिआउ।” एतबा कहि पाखलो ओतएसँ चलि देलक। ओकरा आइ आलेस पर बहुत गोस्सा एलैक, मुदा करबो की करितए? यैह बात भरि गामक लोक-बेद बाजि रहल छल। तखन हुनका सभक मुँह पर के ताला लगाबए? हिनका सभक सोचे एहन छनि तखन कैल की जाय? पाखलो एहन सोचलक। ओकरा माथमे बहुत दरद भ’ रहल छलैक। “जँ हम एहिना सोचैत रहलहुँ तँ एक दिन निश्चिते हम पागल भ’ जाएब। हमरा मोनकेँ चिन्ता करबाक आदति सन भ’ गेल अछि, हम एकरा सँ नहि निकलि सकब।” सोचैत-सोचैत ओ रस्ता पर चलि रहल छल। जुवांव ओकरा आबाज देलकैक। जखन कि जुवांव केँ देखतहि ओकरा गोस्सा आबि जाइत छलैक, मुदा आइ ने जानि की भ’ गेलैक? पाखलो ओकरा जबाब देलकैक आ दारूखानामे पैसि गेल। जुवांव हँसल आ ओकरा बैसबाक लेल एकटा मछिया देलकैक। पाखलो बैसल नहि। ओ एकटा पँचटकही निकाललक आ ओकरा दिस बढेलक। जुवांव नारियरक फेनी (शराब) ओकरा गिलासमे ढारि देलकैक। क्षण भरिक लेल ओकरा मोनमे भेलैक जे एहि गिलाससँ जुवांवक माथ फोड़ि दी। जुवांव गिलास उठाकए पाखलोक हाथमे थमा देलकैक। नव गैंहकीक खुशीमे ओ हँसि रहल छल। पाखलो एकबेर गिलासकेँ मुँहसँ लगौलक आ क्षणहिमे हँटा लेलक। ओकरा गरामे जलन भ’ रहल छलैक तैयहुँ ओ गिलासकेँ मुँहसँ लगौलक आ गटागट पीबि गेल। ओकर गरा छिला गेलैक। खाली गिलास जुवांव फेरसँ भरि देलकैक। दोसर गिलास पाखलोक गरामे एकटा हिचुकीक संग अटकि गेलैक। गरा आ नाक जरय लागलैक। ओकरा लागलैक जे ओकर नियंत्रण बिगड़ि रहल छैक, ओ ओतहि बैसि रहल। रजनी घर आएल छलीह, एहन ओकरा किओ बतेने छलैक। एतबा सुनतहि ओ सोनू मामाक घर दिस अपन पयर बढौलक। घरमे सोनू मामा खेत जएबाक हड़बड़ी मे रहथि। हुनका कान्ह पर हर छलनि। पाखलो पूछलक— “रजनी आएल छलीह की?” “आएल छलीह। दू दिन रहि कए चलि गेलीह।” रजनी आएल छलीह, सोनू मामा हमरा किएक नहि बतौलनि? ओ सोनू मामसँ पूछबाक लेल सोचि रहल छल, मुदा चुप्पे रहल। बाहर जेबाक हड़बड़ीमे सोनू मामा अपन घरक केवाड़ बन्न केलनि आ पाखलो ओतएसँ मुँह लटका कए आपस भ’ गेल। एक दिन आलेस पाखलोकेँ गोविन्दक संबंधमे खबरि देलक। गोविन्द अपन ऑफिसमे काज करएवाली एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ नेने छल। ई गप्प सुनि पाखलोकेँ बहुत आश्चर्य भेल रहैक। गोविन्दकेँ गाम एला एकटा अरसा बीति गेल रहैक। ओ मेला आ शिगमोमे सेहो नहि आएल छल। गोविन्दक संबंधमे ई खबरि सुनि ओ ओकरासँ भेंट करबा सोचलक। पणजी शहरक एकटा बड़का भवनमे गोविन्दक ऑफिस छलैक। “हम ओहि ऑफिस कोना जाउ?” पाखलो यैह सोचि रहल छल। फेर ओ हिम्मत केलक। पणजी शहरक ‘जुन्ता हाउस’क सीढी चढैत ओ ओकरा ऑफिस पहुँचल। ऑफिसक सभटा कर्मचारी ओ स्त्रीगण ओकरा देख’ लागल। ई कोन नव प्राणी आबि गेल? सभ किओ आश्चर्यक दृष्टिसँ पाखलोकेँ देखए लागल। किछु स्त्री आ युवती सभ ओकरा देखिकए हँसय लगलीह। पाखलोकेँ अपना-आपमे कोनादन लागलनि। एतबहिमे अपन बॉसक केबिन गेल गोविन्द बहरायल। ओ पाखलोक लग आएल। गोविन्दसँ मिललाक बाद, ऑफिसक मायावी संसारमे आएल पाखलोकेँ कने राहत भेटलनि। “यौ गोविन्द!” पाखलो शोर पारलक। गोविन्द हुनका जबाब नहि द’ कए हुनकर हाथ थामि कैंटीन दिस ल’ गेल। दुनू एक दोसराक हाल-समाचार पूछलक। बहुतो दिनसँ गोविन्द गाम नहि गेल छल एहिलेल पाखलो ओकरा उलहन देलकैक। दुनू गोटे चाह पीबए लागल। “हम यैह एलहुँ।” एतबा कहैत गोविन्द बीचहिमे चाह पीब छोड़ि बहरा गेल आ जल्दिए एकटा युवतीक संगे घुरि आएल। ओ साड़ी पहिरने छलीह। हुनका माथ पर एकटा टिकुली सेहो रहनि आ ओ बहुत धनिक घरक बुझाइत छलीह। “ई हमर मिता थिक, हमसभ एकरा पाखलो कहैत छियैक।” गोविन्द ओकरा पाखलोक माने बुझेलकै। पाखलो ओकरा दिस देखलक। ओ हँसलीह। किछु काल पहिने यैह युवती पाखलोकेँ देखि कए हँसैत छलीह। गोविन्द पाखलो सँ आगू कहलकैक, “भविष्यमे यैह हमर घरनी हेतीह। हिनक नाम मारिया थिकनि।” पाखलो जखन आश्चर्यसँ गोविन्दक दिस देखलक तँ गोविन्द अपन माथ नीचा दिस झुका लेलक। “जँ गोविन्द एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ लेत तँ गामक लोक एकरा संबंधमे की सोचत? ओ सभ की चुप बैसतैक?” पाखलोकेँ एहन बुझेलैक। मुदा ओ चुप रहल। बादमे ओ अपन एहि बेमतलबक विचारकेँ एकदिस राखि हँसए लागल। पाकलोकेँ हँसैत देखि बुझू जे गोविन्दक माथक भार कम भ’ गेलैक। “आब जाति-पाति आ धरम कतए रहि गेल छैक? दक्खिनी आ उत्तरी ध्रुव आब सटि गेल छैक।” गोवन्द एहने सन किछु बात करताह। पाखलोकेँ लागलैक। मुदा गोविन्द चुप रहल। पाखलोकेँ गोविन्दसँ बहुत रास गप्प करबाक छलैक, मुदा गोविन्द लग ओतेक समय नहि रहैक। बादमे पाखलो दुनूकेँ “अच्छा, फेर भेंट हेतैक!”, कहलक आ बहरा गेल। पाखलो लिफ्टमे चढ़ल। ओहि काल ओकरा एकटा बातक स्मरण भ’ गेलैक— “आलेस दुबई जाइवला छथि एहिलेल ओ पासपोर्ट बनएबाक जोगाड़मे रहथि। किछुए दिनमे ओहो विदेश चलि जेताह आ एहि तरहेँ गाममे हमर एकोटा मीत नहि रहि जाएत। हम एकदम एसगर भ’ जाएब।” ई गप्पतँ गोविन्दकेँ कहब बिसरिए गेलहुँ। आब तँ गोविन्दो कहियो गाम एताह, एहनो संभावना नहिएक बरोबरि छल। बुझाइत अछि जे गोविन्दो आब गामबलाक लेल बाहरिए लोक भ’ गेलाह। पाखलो लिफ्टसँ नीचा उतरए लागल तँ ओकर माथ घूमए लागलैक। ओकरा बुझेलैक, जेना-जेना लिफ्ट नीचा दिस जा रहल अछि तेना-तेना ओहो नीचा गिरल जा रहल अछि। लिफ्ट रुकलाक बाद ओ एसगर भ’ गेल, ओकरा एहने बुझेलैक। ओ लिफ्टसँ बाहर निकलल। पणजीसँ गाम अएबा काल बसमे ओकरा रुक्मिणी मौंसीसँ भेंट भेलैक। “रजनीकेँ बेटी भेल छैक।” ई समाचार पाखलो केँ वैह देने छलीह। ई सुनि पाखलोक खुशीक कोनो ठेकान नहि रहलैक। बससँ उतरि पाखलो एकपेड़िया हैत हाली-हाली गाम जाए लागल। साँझ पड़ि गेल रहैक। पूर्णिमाक चाँद आसमानमे साफ झलकैत रहैक। पाखलोक मोनमे रजनीक बेटीक छवि आबि रहल छलैक। ओ देख’ मे केहन हेतीह? ओ अपन माय-सन हेतीह आकि ककरो आन सन? एहि तरहक कैकटा प्रश्न ओकरा मोनमे उठए लागलैक। रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छैक। ओकरा चन्द्रमाक एहि ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही। काजर लगएलाक बाद कारी आँखि वाली ओकरहि सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहैक आ जेना नहरक पानि बहैत छैक तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन ज्योत्सना पसारने छलैक। रजनी पाँच महीनाक अपन बेटीकेँ संग लए कांदोले गाम अपन बाबूजीक घर आएल छलीह। पन्द्रह-बीस दिन बीति गेल छलैक, मुदा एखन धरि ओ अपन पतिक घर नहि गेल छलीह। ओ अपन बेटीक नाम सुलू राखने छलीह। ओ देख’ मे बहुत गोर आ सुन्नरि छलीह। ओकर केश गुलाबी छलैक आ आँखि लहसुनियाँ। ओ कोनो फिरंगीक बेटी सन बुझाइत छलीह। रजनीकेँ ओकर घरवला घरसँ निकालि देने छथि, ई अफवाह सौंसे गाममे पसरि गेल रहैक, आ साँचो रहैक। ओकर घरवला ओकरा मारि-पीटि कए सुलूक संग ओकरा बापक ओतए पठा देने रहैक। “रजनीकेँ पाखलोए सँ ई बेटी भेल छैक।” ई आरोप ओकर घरवला ओकरा पर लगौने रहैक, आ सरिपहुँ देख’ मे फिरंगी सन लागएवाली सुलूकेँ देखि लोको सभ एकरा साँच मानि नेने रहैक। रजनी अचानक अपना बेटीकेँ ल’ कए घर आबि गेल छथि। ओहि दिन ई सुनि सोनूकेँ बहुत धक्का लागल रहैक। ओ एना किएक एलीह? सोनूक मोनमे एहन प्रश्न उठए लागलैक। अपना बापकेँ देखि रजनीक सब्रक बान्ह टूटि गेलैक आ ओ कानए लगलीह। आखिर भेलैक की? ओ बुझिए नहि पाबि रहल छल। बादमे रजनीक देह पर दाग सभ देखि कए ओकरा सभकुछ समझमे आबि गेलैक। ओ रजनीकेँ सांत्वना देलकैक। बहुत देर धरि तँ ओ चुप रहलीह मुदा पछाति जा कए सभटा घटना हुनका बता देलीह। सुलूएकेँ ल’ कए ओकर घरवला ओकरा पर शंका करैत रहैक। ओकर ई आरोप रहैक जे, “पाखलोए सँ रजनीकेँ ई बेटी भेल छैक।” ई आरोप साँचो भ’ सकैत अछि। सोनूओकेँ एहिना बुझेलैक आ ओकरा बहुत गोस्सा आबि गेलैक। ओकर आँखि लाल भ’ गेलैक आ ओ गोस्सासँ पाकलोकेँ गरियाब’ लागलैक। “पहिनहि हमर बहिन पाखलोक जातिमे हमर नाक कटा चुकल अछि। आ आब ओकरहि बीया हमरा बेटीक भविष्य खराप करबा पर तुलल अछि” सोनू बाजए लागल। बादमे ओकर गोस्सा आर बढिते गेलैक आ एहिसँ आगू ओ किछु बाजि नहि सकल। “एहिमे पाखलोक कोनो दोष नहि छनि। हमर घरेवला हमरा पर झूठ आरोप लगा रहल छथि।” रजनी सोनूकेँ कहलकैक। मुदा ओ ई सभ सुनबाक लेल तैयारे नहि छलैक। बहुत कालक बाद ओ सभ किछु सुनलक आ कहलक— “हमर तँ भागे फूटल अछि।” दोसर दिन ओ रजनीक घरवलासँ भेंट कए सभ किछु समझाकए कहलकैक— “सुलू सन बच्चा बहुतो लोककेँ भ’ जाइत छैक, ई सभ तँ भगवानक हाथमे छनि।” ओ बहुत समझएबाक प्रयास कएलक, मुदा रजनीक घरवला किछुओ नहि मानलकैक। सुलूक पालना आब नानाक घरमे झूलय लागलैक आ रजनी अपन बेटीक संग अपन समय बिताबए लगलीह। पाखलो एहि बीच प्रायः भोरे-भोर काज पर निकलि जाइत छल आ रातिएक पहर काजसँ घुरैत रहए। रजनीकेँ ओकर घरवला घरसँ निकालि देने छैक आ आब ओ अपन बापेक संग रहि रहल छलीह, ई गप्प ओकरा पता नहि रहैक। सभ किओ पाखलोकेँ एकटा अलगे दृष्टिसँ देखए लागल छल, मुदा लोक सभक ई दृष्टि पाखलोकेँ आने समय जकाँ बुझा रहल छलैक। पाखलो दूपहरकेँ होटल जाइत छल। होटलमे आर पाँच-छओ लोक बैसल रहैक आ गप्प क’ रहल छलैक। फेर ओकरा सभक हँसबाक आबाज एलैक। पाखलोकेँ भीतर घुसतहि आबाज बन्न भ’ गेलैक। बादमे ओ सभ पाखलोकेँ देखि फुसफुसा कए बाजब सुरह केलक। “हमरामे कोनो परिवर्तन भेल अछि की?” एहन प्रश्न पाखलोक दिमागमे एलैक। ओ अपन सौंसे देहकेँ निहारलक। ओहिमे कोनहुँ परिवर्तन नहि भेल छलैक। पैट-सर्ट जतए छलैक ओतहि तँ रहैक! आ दाढ़ी तँ ओ काल्हिए नौआसँ कटौने छल। एहना स्थितिमे हम हिनका सभकेँ कौआ कोना नजरि आबि रहल छी। पाखलोक मोन मे ई उधेड़बुन होमए लागलैक। रजनी गाम आएल छलीह, ई गप्प पाखलोकेँ बीस दिनक बाद पता लागि सकलैक। ओ दोसरहिं दिन भोरे-भोर उठिकए सोनू मामाक घर दिस चलि देलक। बियाहक बाद ओ रजनीसँ भेंट नहि केने छल। बीचमे ओ रजनीसँ भेंट करबाक लेल दू-तीन बेर सोनू मामाक घर गेलो रहैक, मुदा रजनीसँ भेंट नहि भ’ सकलैक। मुदा आइ ओकरा रजनीसँ निश्चिते भेंट हेतैक, ई जानि ओ जल्दी-जल्दी मामाक ओहिठाम पहुँचि गेल। दरबाजासँ भीतर जाइकाल ओकर माथ चौखटिसँ टकरा गेलैक, जकर आबाज सुनि रजनी बहरएलीह। देखलनि तँ पाखलो आएल छलाह। पाखलोकेँ देखि रजनी बहुत खुश भेलीह। “अहाँक माथमे चोट लागि गेल अछि ने!” रजनी पाखलो सँ पूछलक। “हँ! मुदा भेल किछु नहि।” “किछु नहि भेल! चलू देखए दिअ।” रजनी देखलनि, हुनका माथ पर एकटा टेटर भ’ गेल छलनि। रजनी ओकरा दबाबए लागलीह। “ओह! हमरा किछु नहि भेल अछि, आ ने दरदे क’ रहल अछि।” एतबा कहैत पाखलो अपन माथसँ ओकर हाथ हटा देलकैक। रजनी सुलूकेँ बाहर ल’ अएलीह का बजलीह, “देखू दाय! मामा आएल छथि।” पाखलोकेँ देखि सुलू हँसि पड़लीह। सुन्नरि सुलूकेँ देखि पाखलो रजनीसँ कहलकैक, “रजनी, सुलूकेँ कारी काजर लगा देल करिऔक, नहि तँ एकरा ककरो नजरि लागि जाएत।” एतबा कहि पाखलो हँसय लागल। ताबत घरसँ निकलल सोनू मामा सेहो आबि गेलाह। सोफो (कुर्सीनुमा बैसकी) पर बैसल पाखलोकेँ देखि ओ ठाढ़े रहलाह आ दरबज्जा दिस आँगुरक इशारा करैत बजलाह, “निकल जाउ एतएसँ। आजुक बाद फेर कहियो हमरा ओतए नहि आएब।” पाखलोकेँ किछुओ बुझ’ मे नहि एलैक। ओ अवाक भ’ ओतहि ठाढ रहल आ सोनू मामाक दिस ताकतहि रहि गेल। सोनू मामा पुनः गोस्सासँ बाजए लगलाह, “अहीँक कारणेँ ई सभ भेल छैक। जँ अहाँ एतए नहि रहितहुँ तँ एतेक सभकिछु नहि होइतैक। अहींक कारणेँ रजनीक घरवला ओकरा घरसँ निकालि देने छैक। अहाँ एतए कहिओ नहि आबि सकैत छी।” पाखलो अवाक भए देखतहि रहि गेल। “रजनीक घरवला रजनी पर आरोप लगौने छैक जे एकर बेटी अहींक जनमल छी। अहीँक कारणेँ ई सभ भेल छैक, ई खबरि अहाँ नहि सुनने छी की? एतए अएबामे अहाँकेँ कनेको शर्म नहि भेल? दोसरक बेइज्जती कराब’ एतए आएल छी?” रजनी बीचहिमे टोकलक, “एहिमे हिनकर कोनो दोष नहि छनि, अहाँ अनेर हिनका पर शंका क’ रहल छी।” रजनीक ई कहब सोनू मामा नहि सुनलथि। ओ बाजतहि जा रहल छलाह.... “अहीँक कारणेँ रजनीक भाग फूटि गेलैक। जँ अहाँ एतए आएब तँ लोकबेद एहि आरोपकेँ साँच मानि लेत, एहिलेल अहाँ एतए कहियो नहि आएल करु। पाखलोएक जाति हमर नाक कटौने अछि, ओकरे खून थिकहुँ अहाँ। पाखलोक वंशज छी अहाँ। अहीँ हमर बर्बादीक कारण थिकहुँ।” पाखलोक पयर थरथरबए लागलैक। ओकरा किछुओ समझमे नहि आबि रहल छलैक, मुदा धीरे-धीरे सभ किछु समझमे आबि गेलैक। ओकर बेटी फिरंगी-सन लागैत छलीह एहिलेल ओकर घरवला ओकरा पर ई आरोप लगौने छल। पाखलो एहि संबंधमे किछु बाजए वला रहथि मुदा सोनू मामा ओकरा निकलि जएबाक लेल कहने रहथि एहिलेल ओ बाहर आबि गेल रहए। ओकरा माथमे चक्कर भ’ रहल छलैक आ बुझाइत रहैक जेना ओ फाटि जेतैक। ओकरा दिमागमे सोनू मामा शब्द कोनो मड़िया जकाँ चोट क’ रहल छलैक। “.....रजनीक घरवला घरसँ बाहर क’ देलकैक.....रजनीकेँ अहीँसँ बेटी भेल छैक...... पाखलोएक जाति हमर नाक कटौने अछि..... पाखलोक वंशज छी अहाँ......अहाँ एतएसँ चलि जाउ।” “बारह चौबीस ट्रकक दुर्घटना भ’ गेलैक!” “केकर? ट्रक ड्राइवर के छलैक?” “पाखलो!” एकटा खलासी नीचा आबि लोक सभकेँ ई खबरि देलकैक। सभ किओ उपर दिस दौड़ल। किछु गोटए ट्रकसँ गेल तँ किछु ओहिना दौड़ि पड़ल। रस्ता नदीक कछेर होइत एकटा घाटीक बीचसँ जाइत रहैक। रस्ताक एक दिस घाटी रहैक आ दोसर दिस खदहा! उपरका रस्तासँ जाइवला एकटा ट्रक नीचा खदहामे गिर गेल छलैक। ट्रकक परखच्ची उड़ि गेल रहैक जाहिमे पाखलो मारल गेल। एहन सभकेँ बुझाइत छलैक। किछु लोक नीचा गेल। देखलनि तँ क्षतिग्रस्त ट्रकक बगलमे पाखलो पड़ल छल। ओकरा देहक कपड़ा फाटि गेल रहैक आ सौंसे देह नोचा गेल रहैक। पाखलो अपन क्षतिग्रस्त ट्रककेँ देखलक। ट्रकक अगिला शीशा टूटि गेल रहैक। लोहाक चदरा पूर्ण रूपसँ ट्रकसँ पिचकि गेल रहैक। ओकरा देखि पाखलोक आँखिमे नोर आबि गेलैक। पाखलो उठल। ट्रकक सामने गेल आ ओहि पर अपन हाथ फेरलक। आब ओहि ट्रक पर भगवानक कोनहुँ फोटो नहि रहैक, मुदा ट्रकमे लगाओल गेल चाननक माला एखनहुँ धरि रहैक जे कि पाखलो लगौने रहैक। पाखलो जखन ठाढ भ’ रहल छल तखन ओकरा कानमे बहुत रास प्रश्न सभ उठए लागलैक। दुर्घटना कोना भेलैक? हम बाँचि कोना गेलहुँ? एहि तरहक कतेको प्रश्नमे ओ उलझि-सन गेल। पाखलो नीचेसँ रस्ताक एक दिस झाड़ी दिस आँगुर देखौलक। ओकरा कमीजक एकटा बड़का टा टुकड़ी ओहि झाड़ीक बीच लटकल रहैक। दुर्घटनाक समय ट्रकक दरबज्जा अचानक खुजलैक आ ओ बाहर गिर गेल छल। ओतएसँ ओ सीधा झाड़ी पर गिर अटकि गेल, जाहिसँ ओकर कमीज फाटि गेलैक आ देह नोचा गेलैक। ओतएसँ ओ धीरे-धीरे नीचा गिरल, जखन कि ओकर साथी ट्रक गँहीरगर खदहामे गिर गेलैक। एतेक पैघ ट्रक आटाक लोइया बनि गेल रहैक आ एकटा हाड़-मांसक लोक बचि गेलैक। “पाखलोक भाग नीक रहैत तैँ ओ बचि गेल।” लोक सभ एहने कहैत रहैक। कारण ताकला उत्तर जखन लोककेँ जबाब नहि भेटैत छैक तँ ओ ओकरा अपन भाग पर छोड़ि दैत छैक। पाखलो केँ डागदरक ओहिठामसँ एलाक बाद कम्पनीक प्रबन्धक दुर्घटनाक जाँच करब सुरह केलक। प्रबन्धक ओकरासँ बहुत रास प्रश्न केलकैक, मुदा ओ एकोटा प्रश्नक जबाब नहि देलकैक। ओकरा दिमागमे दुर्घटनाक विषयमे किछुओ नहि रहैक। आइ भोरे जे किछु भेल छलैक, ओकरा दिमागमे बेर-बेर वैह प्रश्न आबि रहल छलैक। असलमे वैह प्रसंग दुर्घटनाक कारण छलैक। ओ भोरे सोनू मामाक ओहिठामसँ आएल आ ओहि तनावमे ट्रक पर चढि गेल। ट्रक चलबैत काल वैह घटना ओकरा दिमागमे चलि रहल छलैक। रजनीक संग भाय-बहिनक संबंध रहितो ओकरा पर ई आरोप लागल छलैक। सोनू मामा ओकरा कहने रहथि, “एतएसँ निकलि जाउ, आ कहिओ नहि आएब!” “चलि जाउ” ई कहि ओकरा निकालि देल गेल छलैक। तखन सोनू मामाक रिश्तामे ओ किओ नै रहैक? पाखलो सोचि रहल छल। वैह विचार ओकरा दिमागमे टीस मारि रहल छलैक आ ओ अचेतन अवस्थामे चलि गेल छलैक। ठीक ओहि काल अगिला मोड़ पर ट्रकक दुर्घटना भ’ गेल रहैक। एखन धरि वैह विचार, वैह प्रश्न ओकरा दिमागकेँ झकझोरि रहल छलैक। कम्पनीक प्रबंधक द्वारा पूछल गेल सवालक जबाब हम नहि द’ रहल छलिऐक एहिलेल ओ गोस्सा भ’ गेल आ ओहि गोस्सा मे ओ हमरा गाल पर फटाफट दू-तीन थापड़ मारि बैसल। पाखलोक गाल पर थापड़क निशान भ’ गेलैक। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा सौंसे देहमे भ’ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नहि द’ रहल छलैक, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहैक ओ एखन धरि हरियर रहैक। सात-आठ महीनासँ पाखलोक व्यवहार देखि लोककेँ बुझाइक जे पाखलो पागल भ’ गेल छैक। ओकर केश, दाढ़ी आ मोंछ बढि गेल छलैक आ ओहि दाढीमे ओकर मुँह नुका गेल रहैक। ओकर माथ तँ झलकैते नहि रहैक। गाल पिचकि गेल रहैक आ आँखि धँसि गेल रहैक। देख’मे ओ बहुत विचित्र लागि रहल छलैक। जँ कोनो अनजान लोक ओकरा देखि लैक तँ डरि जाइक। जाहि दिन ट्रकक दुर्घटना भेल छलैक ओहि दिन पाखलो जंगल चलि गेल रहैक। ओ ओत्तहि चारि-पाँच दिन बितौलक आ बादमे गाम घुरल। ओहि दिनसँ ओ गाममे अजीबोगरीब तरहेँ बाजए लागल आ संगहि अपन हाथ सेहो हिलबैत रहैत छल। बीच-बीच मे अपन आँखिकेँ सेहो विचित्र रूपसँ छोट-पैघ करैत रहैत छल। ओ दिनभरि घूमतहि रहैत छल। जंगल, भाट, मळार, दोउड़े आदि ठाम घूमतहि रहैत छल आ कतहुँ बैसि जाइत छल। नारियर, कटहर, आमक गाछ सब पर चढैत रहैत छल आ कतहुँ दूर अपन नजरि गड़ौने रहैत छल। लोक सभक कहब रहैक जे, “ओ बहुत डरि गेल छैक।” ओकरा कार्या केर देवचार (एकटा आत्मा) गड़ैस नेने छैक। लगातार काजसँ अनुपस्थित रहबाक कारणेँ कम्पनी ओकरा नोकरीसँ निकालि देने रहैक। यद्यपि ओकर जतेको हिसाब निकलैत रहैक से कम्पनी ओकरा द’ देने रहैक। ओ पाइ पाखलो ओहि दिन गामक बूढ़-बुजुर्ग आ नेना लोकनिमे बाँटि देने छल। दोसर दिन धरि ओकरा लग खएबा धरिक पाइ नहि रहलैक। ओ अपन पैन्टक जेबी उनटौलक आ ओहि स्थितिमे गाममे घूमए लागल। ओ मात्र घूमतहि रहैत छल। घूमैत काल ओकरा दिन-रातिक कोनो परवाहि नहि रहैत छलैक। एतेक धरि जे ओ रौद आ बरखामे सेहो घूमिते रहैत छल। ओकरा घूमबाक कोनहुँ सीमा नहि रहैक। ओकर किछु मीत लोकनि ओकरा कहियो काल चाह-पानि द’ दैत रहैक। कहियो काल खोआ-पीआ सेहो दैत रहैक, नहि तँ ओ भूखले रहैत छल। एहि सभक बाबजूद ओकर घूमब-फिरब बन्न नहि भेल रहैक। ओ कखनो केगदी भाटमे देखाइक तँ कखनहुँ खेतक बान्ह पर। ओ कहिओ ककरो भाटसँ नारियरकेँ हाथ धरि नहि लगौलक। ककरो कोनहुँ कष्ट नहि देलक, एकरा सभक बाबजूद लोक ओकरासँ डरए लागल छल। एतए धरि जे छोट-छोट नेनासभकेँ ओकर माय, पाखलोक नाम ल’ कए डराब’ लागल छलैक। ओहि दिन बरखा भ’ रहल छलैक। पाखलो सोनू मामाक घर लगक पीपरक गाछक नीचा ठाढ़ छल। ओकरा देखि रजनी दौड़कए ओकरा लगीच गेलीह ओकरा अपना घर बजा अनलीह। “सुलू दाई! एतए आउ, देखू अहाँक मामा आएल छथि।” रजनीक एतबा कहितहि सुलू घरसँ दौड़लि अएलीह, मुदा पाखलोकेँ देखतहिँ डरि गेलीह। “ई अहाँक मामा छथि! हुनका लग जाउ!” रजनी सुलूकेँ कहलथि। तखन पाखलोक बजएला पर सुलू ओकरा लग गेलीह। पाखलो ओकरा गोदी मे उठौलक आ फेर नीचा राखि देलकैक। सुलू हँसलीह। पाखलो सेहो हँसए लागल। दुनूक हँसी देखि रजनीकेँ नीक लागललैक। पाखलो अपन फटलका पैन्टक जेबीमे किछु ताकबाक प्रयास केलक मुदा ओकरा किछुओ नहि भेटलैक। तखन ओ अपन दोसर पैन्टक जेबीमे हाथ देलक आ ओहिसँ दू टा आमला निकालि सुलूक हाथ पर राखि देलक। बादमे ओ सुलूक माथ पर अपन हाथ फेरलक, ओकरा गाल पर चुम्मा लेलक आ दुलार-मलार करए लागल। “विठू! अहाँ एहि तरहक पगलपन नहि करल करू, एहि तरहेँ पगलपन कए अहाँ अपन की हालति बना नेने छी से कहिओ देखने छी? अहाँक गाल पिचकि गेल अछि आ आँखि धँसि गेल अछि।” एतबा कहैत रजनीक आँखिमे नोर आबि गेलैक। ई देखि पाखलोक मोन सेहो पसीज गेलैक आ ओ बाजल— “अहाँ कानि किएक रहल छी?” “नहि तँ! हम कानि कहाँ रहल छी? ओहो! एखन धरि अहाँ ठाढे छी? आउ बेंच पर बैसू, हम भीतर जा रहल छी, पहिने अहाँकेँ किछु खुआएब तखन हमसभ गप्प-सप्प करब।” रजनी भोजन परसय भीतर चलि गेलीह। पाखलो सुलूकेँ दुलार करए लागल। रजनी पाखलोक लेल भोजन परसि बाहर आबि कहलीह, “चलू भोजन लागि गेल अछि।” एतबा कहि ओ ओकर हाथ धुआब’ लगलीह। एतबहिमे दरबज्जा पर किनको छाँही देखा पड़लैक। दरबज्जाक बाहर सोनू मामा अपन पयरक जूता निकालि रहल छलाह। सोनू मामाकेँ देखि पाखलो घरसँ भागल आ बहुत दूर धरि भागितहिँ रहल! सोनू मामा, रजनी आ सुलू ओकरा देखितहि रहि गेल। पाखलो आब गाममे छोट-पैघक लेल हँसीक पात्र बनि गेल छल। नेना सभक संग आब पैघ लोक सभ सेहो पाखलोक मजाक उड़ाबए लागल छल। नेना सभतँ ओकरा पाछूए लागि जाइत छलैक। ओकरा पर पाथर फेकैक, ओकरा ‘पागल पाखलो’ कहि कुढाबैक। जखन पाखलोकेँ बहुत गोस्सा आबि जाइक तँ ओ नेना सभ दिस आँखि तरेर कए देखैक जाहिसँ नेना सभ डरि कए भागि जाइक। पाखलो कलमाक चबूतरा पर बैसल छल। तखनहि नेना सभक एकटा दल आबि धमकलै। सभटा नेना ओकरा लग जमा भ’ गेल आ ‘पागल पाखलो’, ‘पागल पाखलो’ कहि ओकरा कबदाब’ लागल। एतबहिमे ओ अपन माथ नोचब सुरह क’ देलक आ फेर जोर-जोरसँ हँसैत बाजए लागल— “हम पागल पाखलो! हा, हा, हा, हा........ हम पाखलो नहि छी! हम पागल छी! पागल! हा, हा, हा, हा........।” “अहाँ पागलो छी ओ पाखलो सेहो छी।” नेना सभ बाजए लागल। एकटा नेनातँ ओकरा पर पाथर फेकि देलकैक आ पछाति जा कए सभटा नेना सभ हल्ला-गुल्ला करए लागल। “अहाँ पागल पाखलो, पाखलो, पाखलो।” पाखलो ओकरा सभक दिस आँखि तरेर कए देखलक आ “हम पाखलो नहि, हम पाखलो नहि” कहैत अपन माथ ओहिठाम चबूतरा पर पटकए लागल किछुए क्षणक बाद ओ बेहोश भए ओतए गिल पड़ल। तकर बाद ओतए जमा भेल नेना सभकेँ किओ भगा देलकैक। दोसर दिनसँ पाखलो रस्ता पर रौदे मे रहए लागल। अपन गोर देह, गुलाबी केशमे कारिख पोतए लागल। अपन कारी देहकेँ देखि ओ हँसए लागल आ रस्तासँ आबए-जाएबलाकेँ कहए लागल—“देखू! हमहूँ अहीँ सन बनि गेलहुँ ने?” अपना आपकेँ कारी करबाक लेल भरि-भरि दिन रौदमे ठाढ़ रहए लागल। कारिख लगा कए कारी कएल गेल ओकर देह किछुए दिनमे बेरंग भ’ गेलैक ओ फेर पहिने-सन देखाबए लागल। ओ अपन सभटा गुलाबी केश काटि लेलक आ पूरा टकला भ’ गेल। मोंछ आ दाढीक संग ओ अपन आँखिक पिपनी सेहो काटि लेलक। ओकर जतेको गुलाबी केश छलैक ओ सभटा काटि लेलक जकरा कारणेँ ओ आओरो बदरंग लागए लागल। ओहि दिन साँझकेँ ओ एकटा आमक गाछक नीचा जतेको सूखलका पात छलैक से सभटा जमा केलक आ ओहिमे आगि लगा देलक। “हमर गोर चाम जरि जेबाक चाही आ हमरा कारी भ’ जेबाक चाही।” एतबा सोचि ओ अपन फाटल कपड़ा सहित आगिमे ठाढ भ’ गेल। ओकरा कपड़ामे आगि लागि गेलैक। ओहि समय किओ आबि ओकरा आगिसँ बाहर धकेल देलकैक आ आगि मिझा देलकैक। ओहि आगिमे पाखलोक देहक किछु रोइयाँ झुलसि गेलैक। हाथ-पएर आ मूँहक चाम जरि गेलैक। देहमे फोका निकलि गेलैक आ सौंसे देह लाल भ’ गेलैक। अस्पतालमे जतए ओकरा राखल गेल रहैक, ओतए ओ दू दिन बितौलक। जहिना ओकर मोन कने नीक भेलैक ओहिना ओ दोसरहिं दिन अस्पतालक ड्रेसमे भागि गेल आ गाम आबि गेल। गामक लोककेँ अस्पतालक ड्रेसमे पाखलोक पागलपनक एकटा नव रूप देखबामे एलैक। ओ पहिनहि जकाँ गाममे एमहर-ओमहर घूमए लागल। पातोले जंगलमे किछु स्त्रीगण आ किछु युवती सभ लकड़ी बीछैत छलीह। ओकरा सभकेँ देखि पाखलो ओतए गेल। ओहिमे शामा सेहो छलीह। ओकरा देखि ओ शोर पारलक आ ओकरा लग गेल। शामा डरि गेलीह आ पाछू हटए लगलीह। पाखलो ओकरा रूकबाक लेल कहलकैक मुदा ओ रूकलीह नहि भागए लगलीह। “ठहरू, ठहरू!” कहैत पाखलो ओकरा पाछू दौड़ए लागल। दौड़ैत-दौड़ैत ओ रूकल। जोरसँ चिकरैत शामा गामक दिस भागलीह। “पागल पाखलो युवती सभक पाछू पड़ल छैक।” ई गप्प सौंसे शहरमे पसरि गेल। नओ तेसर दिन धरि हम ओहि घटनाक संबंधमे सोचि रहल छलहुँ। हम की केलहुँ? किएक केलहुँ? हमरा किछुओ नहि बुझ’ मे आबि रहल छल। हम शामकेँ देखि ओकरा लग गेल छलहुँ। ओकरा आबाज लगेलहुँ। ठहरू! एहिमे हमरा किछु बेसी खराप नहि देखा रहल छल, मुदा आब यैह गप्प हमरा सालि रहल छल। हम किएक ओकरा रूकए कहलिऐक आ ओकरा पाछू किएक दौड़लिऐक? एहि तरहक प्रश्न हमरा दिमागमे बेरि-बेरि घूमि रहल छल। मुदा हँ...ओहि दिन खूब मोन लागल रहए। ओहि दिन शामाक ओतए जाएब व्यर्थ भ’ गेल रहनि। ओ हमरासँ बियाह करबाक लेल तैयार नहि छलीह आ हमरा पाखलो कहैत छलीह, ओहि मुँहेँ हम हुनका चिकरबाक लेल बाध्य केलहुँ! हमरा पागल कहैत छलीह ने! शी! शी! ई सब ठीक नहि। ओहि दिन ओकरा पयरमे काँट गरि गेल हेतैक! हम ई नीक नहि केलहुँ। रजनीक घरवला रजनीकेँ फेर अपना घर ल’ गेल छलाह। ऐहन लोक सभ बजैत छलाह। हमहूँ एहने किछु सुनने रही। ई गप्प साँच छैक की? यैह जानबाक लेल आ रजनीक संबंधमे पूछबाक लेल हम शामाकेँ रूकबाक लेल कहने रहिऐक। शामा हमर जान-पहिचानक छलीह, मुदा हमरा द्वारा ठहरू! ठहरू! कहबाक माने ओ किछु आर निकालि लेलथि की? आकि हम ओहिना हुनका रूकए कहलियनि? हमरा कोना जवाब नहि भेटि रहल छल। गोवा जखन स्वतंत्र भेल रहैक ओहि समय पाखलो लोकनि जंगलमे यत्र-तत्र नुका गेल रहए। भूखक कारणेँ ओ सभ जहर वला फल खा-खा कए मरि गेल छल। हमहूँ ओहिना मरब की? ई सोचि हम डरि गेलहुँ। हम द्वन्द्वमे पड़ि गेलहुँ आ हमरा मोनमे डर समा गेल। गाम जएबासँ हम डरि रहल छलहुँ। गाम जएबामे हमरा लाज लागि रहल छल। पाखलो युवती सभक पाछू भागि रहल छलैक। ओहो बापे जकाँ भ’ गेलैक। लोक सभ एहने कहैत रहैक। ओ सभ हमरा मारि देताह, हमरा मारताह आ जित्ते गारि देताह। हमरा छोड़ाकए आनएबला आब ओहि गाममे किओ रहबो नहि केलैक। दादीतँ नहिए रहलाह आ गोविन्द तँ गामे नहि अबैत छलाह। ओ तँ गामक लेल बाहरी लोक भ’ कए रहि गेलाह अछि, आ हम, एकटा एसगर पाखलो। गाम गेलहुँ तँ गामक नेना सभ हमरा पाखलो, पाखलो, पागल पाखलो कहि कए कढ़ौताह। सभ किओ हमरा पाखलोएक नजरिसँ देखैत रहए। हम ओकरा सभ जकाँ देखबाक लेल की नहि केलहुँ। कारी हेबाक लेल रौदमे ठाढ रहलहुँ आ गुलाबी दाढ़ी-मोंछ काटि लेलहुँ। अंतमे फोका हेबा धरि, घाव हेबा धरि हम अपन देह जरबैत रहलहुँ। देहक चाम जरि गेल आ घावसँ खून बहि गेल। वासनाक कारणेँ जनम लेबएवला पाखलेपन तँ आब हमरा देहसँ चलिओ गेल हैत। कंकाल पर ठाढ भेल एहि देहकेँ ई धरती सम्हारि नेने अछि। हमर पहिलुक रूप बदलि गेल अछि। सौंसे देह कारी भ’ गेल अछि। लोकक रुप रंग आ हमर रूप रंगमे आब कोनो फरक नहि रहि गेल अछि। हम एत्तहि जनमलहुँ, पैघ भेलहुँ आ हिनके सभक बीच रहलहुँ। हम एतुके लोक सभमे सँ एक छी। एहि माटिक संस्कारमे पललहुँ, बढ़लहुँ, तखन हम पाखलो कोना? हमर माय हमर नाम ‘विठू’ रखने छलीह! ओ हमरा विठूए कहि बजबैत छलीह। हमर नाम विठू थिक। एहि नामसँ किनकहुँ तँ बजएबाक चाही ने? आ जँ हमरा किओ विठू कहि नहि बजबैत अछि तँ की हम विठू नहि भेलहुँ? हम विठू छी! हम विठूए छी! रजनीक शोर पारब हम एखन सुनि रहल छलहुँ। हमर कान, मोन आ हमर सौंसे संवेदनाकें हम विठू छी, ई बूझ’ मे आबि रहल छल। जंगलक रस्ता पार करैत हम पहाड़ी पर चढ़ि गेलहुँ। ओहि पहाड़ीसँ नीचाँ रजनीक सासुर देखाइत रहैक। हम जखन पहाड़ीसँ नीचाँ उतरि रहल छलहुँ तखने हमरा स्मरण आएल। रजनीक घरवला ओकरा पर आरोप लगा ओकरा घरसँ बाहर निकालि देने रहैक आ एक बरखक बाद घर ल’ गेल रहैक। एखन जँ हम रजनीसँ भेंट केलहुँ तँ ओकर घरवला फेर ओकरा घरसँ निकालि देतैक। हमरा एहन लागल आ संगहि एकटा झटका सेहो। हम ओतहि ठाढ़ रहलहुँ। हमर एक मोन कहैत छल, जे हम ओतए गेलहुँ तँ नीक नहि हैत, आ दोसर मोन हमरा आगू दिस घीचि रहल छल। रजनीक घरवला ओकरा घर ल’ जा कए नीक केने रहए। हमरा ऊपर लगाओल गेल दोषारोपण आब नहि रहल। लोकक नजरिमे आब हम पाक-साफ छलहुँ। ओहो! नीके भेलैक। हमरा दिमागसँ द्वन्द्व हटि गेल। तनाव चलि गेल। आब हमरा आजादी महसूस भ’ रहल छल। आब हम रजनी आ सुलूसँ भेंट करब। रजनी हमरा भाय मानैत छथि आ हम ओकरा बहिन। ई गप्प हम ओकरा घरवलासँ कहबैक। बादमे हम निर्णय लेलहुँ आ पहाड़ी दए नीचाँ उतरए लागलहुँ। हम पहाड़ीसँ उतरि हाली-हाली जा रहल छलहुँ। ओतए कुळवाड्याक चरवाह नेना सभ हमरा देखलक। “यैह देखू पाखलो! यैह देखू पाखलो! पाखल्या!” ओकरा सभक ई शोर सुनि हम डरि गेलहुँ आ काँपए लागलहुँ ओ पहाड़ीक ढलानसँ दौड़ए लागलहुँ। पाखलो, पाखलो, एहि तरह आबाज पाछूसँ आबि रहल छल। हम दौड़ैत-दौड़ैत पहाड़क सुनसान घाटीमे पहुँचि गेलहुँ। साँझुक पहर ओहि घाटीक समूचा क्षेत्र बड्ड मनोरम बुझाइत रहैक। मुदा हम ओहि दिस बेसी ध्यान नहि देलहुँ। घाटी पार कए हम कारपें गामक सीमान पर पहुँचलहुँ। सीमानक लग एकटा बड़का टा झील रहैक आ ओहि झील लग एकटा पोखरि सेहो रहैक। रस्ता चलैत काल ओहि पोखरिमे किछु गिरबाक आबाज एलैक। हम पोखरिक लग गेलहुँ। एक ठाम पानिमे घुरमी होइत रहैक आ पानिक बुलबुला आबि रहल छलैक। चरवाह आकि आन किओ ओहि पोखरिमे किछु फेंकने हेतैक यैह मानि हम आगू-पाछू देखए लागलहुँ, मुदा ओतए किओ नहि छल। हम पोखरि कातसँ कुसरीक फूलक एकटा कोंढी तोड़लहुँ आ रजनीक घर दिस ओकरासँ भेंट करबाक लेल हाली-हाली चलए लागलहुँ। मुनहारि साँझकेँ हम रजनीक गाममे पयर राखलहुँ। ओतुका लोक सभ घरसँ बाहर आबि हमरा देखए लागल। हम रजनीक घर लग पहुँचि गेलहुँ। ओतए देहरीएसँ आबाज देलिऐक मुदा घरसँ कोनो उत्तर नहि आएल। हम ओतएसँ बहरएलहुँ, देखलहुँ घरसँ बाहर सुलू कानि रहल छलीह। हम ओकरा आबाज लगेलिऐक आ गोदीमे उठा लेलिऐक। ओ हिचुकी-हिचुकी कानि रहल छलीह। हम ओकरा चुप करबाक प्रयास केलहुँ। अपन हाथक कसरीक फूलक कोंढ़ी ओकरा हाथमे द’ देलिऐक। हम ओकरासँ पूछलिऐक—“माए कतए गेल छथि?” “हम नहि जनैत छी।” “हुनका बहुत मारने छथि।” “के, कखन?” “बाबा।” सुलूक कहब सुनि हमरा कने अजगुत-सन लागल। राति भ’ गेल रहैक। पड़ोसक दू-तीन गोटे हमरा लग अएलाह। पहिने तँ ओ लोकनि हमरासँ पूछताछ केलनि आ फेर रजनीक खबरि देलनि। “जाहि दिनसँ रजनीक घरवला ओकरा बापक ओहिठामसँ आनने छल, ओहि दिनसँ शराब पीबि-पीबि कए ओकरा मारए-पीटए लागल छल। तकरा बाद तँ नित राति ओकर घरवला रजनीसँ झगड़ा करैक आ मारैक। दू दिन पहिनहि ओ ओकरा घरसँ निकालि देने रहैक आ ताहि दिनसँ ओ घरक बाहरे देहरी पर रहि रहल छलीह।” सुलू हमरा गोदिएमे सूति गेल छलीह। बहुत राति भ’ गेल रहैक आ रजनी एखन धरि आपस नहि आएल छलीह। रजनी पोखरिमे कूदि अपन जान द’ देने छथि, ई गप्प जँ हमरा रस्तासँ अबैत काल पता लागि जएतै तँ हम निश्चये हुनका बचा लेतिऐक। किओ पोखरिमे पाथर फेकने हेतैक एहिलेल पानिमे बुलबुला आबि रहल छलैक, हम यैह बुझने छलहुँ। ओहि समय ओहि पोखरिमे एहन हृदयविदारक मृत्यु नुकाएल रहैक, ई हमरा पता नहि छल। रजनीक घरवला ओकरा कांदोळे गामसँ आपस अनने रहैक, मुदा किछुए दिनक पश्चात् ओ फेर ओकरा पर वैह आरोप लगौने रहैक। रजनीकेँ मारए-पीटए लागल छलैक आ एकदिन ओकरा दागि देने रहैक। ओ ओकरा जीबैतै मारि देब’ चाहैत रहैक। ओहिदिन, “पाखलो युवती सभक पाछू लागल छैक।” हमरा संबंधमे ओकरा ई खबरि भेटल रहैक। ओहि दिनसँ ओ रजनीकेँ देहरीक बाहरे राखए लागल रहैक। रजनी तंग आबि गेल छलीह आ ओहि समय ओ सोहावतीक श्रृंगार केलक आ आत्महत्या करए चलि गेलीह। ओहि पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छलहुँ से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नहि अपितु रजनीक खोपामे लगाओल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहैक! यादक लेल सफेद, सुगन्धित! दस रजनीक याद में हमरा आँखिमे नोर आबि गेल छल आ हम ओहि समय वैह पोछि रहल छलहुँ, एहि सभ यादसँ हमरा मोनमे ओ सभ चित्र उभरि कए आबि रहल छल। हम पाखलो, एहि माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल विठू छलहुँ। एहि माटिक सबूत छलहुँ। बहुत कालसँ आकाशमे कारी-कारी मेघ घुमड़ि रहल रहैक। बिजलौकाक संग गरज भ’ रहल छलैक आ बरखा सेहो भेल रहैक, जकरा कारणेँ लाल माटिक सुगंध चारू दिस पसरि रहल रहैक। मिरगिसरा शुरू हेबामे एखन पन्द्रह दिन बाँकी रहैक। मिरगिसराक बरखा शुरू भेलाक पश्चात् गाममे खेती-बारीक काज आरंभ भ’ जाइत रहैक। एहि साल सोनू मामाक खेत परती रहि जेतैक, हमरा एहि बातक डर रहए। दू महीना पहिने सोनू मामाकेँ लकबा मारि देने रहैक। ओकर दहिना हाथ बेकाम भ’ गेल रहैक, जाहिसँ हाथ नहि हिला सकैत छलाह। अपन नातिनसँ मिलबाक लेल आ ओकरा देखबाक लेल ओ ओहू स्थितिमे गोविन्दक घर आएल छलाह। हुनक माथक केश उज्जर भ’ गेल रहनि आ देह बहुत कमजोर। एतए आबि ओ सुलूसँ भेंट केलनि। सुलूसँ गप्प केलनि, मुदा हमरासँ बिना गप्प केने ओ आपस चलि गेलाह। जँ ओ बरखामे भीजि के काज करताह तँ निश्चिते हुनक रोग आर बढि जेतनि आ ओहुना आब हुनकासँ कोनो काज कहाँ होइत छलनि। ओकरा एहन बुझेलैक। आ तखन ओ खेतमे हाथ बँटेबाक लेल रुक्मिणी मौंसीक माध्यमे खबरि भेजौलक। हमरा बुझाएल जे सोनू मामाक खेत परती रहि जेतैक, मुदा जाधरि हमरा देहमे जान अछि ताधरि कोनो डर नहि। भोरसँ दूपहर भ’ गेल रहैक। हम घरमे जतए बैसल रही ओतहि एकक बाद एक याद दोहरा रहल छलहुँ। आब सभटा याद खतम भ’ गेल, हमरा एहन लागल आ ओहि सून देवाल जाहिपर चिक्कनि माटिसँ ढौरल गेल रहैक ओकरा एकटक देखैत रही। हम घरक चारू दिस नजरि दौड़ेलहुँ, तखने हमरा रुक्मिणी मौंसीक ओहिठाम गेल सुलूक याद आबि गेल। आँखिक समक्ष ओकर निष्पाप, अनजान आ बहुत सुन्नर मूर्ति ठाढ भ’ गेल। ओकर लहसुनियाँ आँखिसँ सुखद भाव प्रकट भ’ रहल छलैक। तखन ओकर एतए नहि हेबाक बाबजूदो हमरा ओकरा माथ पर हाथ फेरबाक आ ओकर चुम्मा लेबाक इच्छा भेल। एतबहिमे दरबाजा खुजबाक आबाज भेल। देखलहुँ तँ सुलू घर आबि गेल छलीह। हमरा देखि ओकर खुशी दूगूणा भ’ गेलैक। ओ दौड़िकए एलीह आ जाधरि हम ओकरा गोदी लेतिऐक ताधरि ओ “मामा” कहि कए हमरा शोर पारलक आ हमरा पयरसँ लिपटि गेलीह। हर एक लोक आ माटिक कथा ‘पाखलो’ उपन्यासकेँ दुइए तीन बरखमे ख्याति भेटि गेल रहैक। ‘राष्ट्रमत’ द्वारा एकरा औपन्यासिक प्रतिस्पर्धामे पुरस्कार भेटलैक। कला अकादमीक पुरस्कार सेहो भेटलैक। ‘पाखलो’ उपन्यास पणजी आकाशवाणीसँ मराठी भाषामे नवोनाट्य स्वरूपमे प्रसारित भेल। एहि तरहेँ मराठी साहित्यमे सेहो पाखलो अपन उपस्थिति दर्ज करौलक। कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’ अपन विशिष्ट शैलीक कारणेँ ठाढ रहल। तुकाराम शेटक ‘पाखलो’ क जड़ि आमक गाछ सदृश गोवाक माटिक गहराई धरि पहुँचि गेल। एहि माटिक सुगंध ‘पाखलो’क सौंसे जीवनमे सुरभित भ’ रहल अछि। मुदा ‘पाखलो’ सँ शालीकेँ जनमल एहि बच्चाकेँ अपनासँ दूर रखैत अछि। ओ अपना-आपसँ सेहो साक्षात्कार नहि क’ सकैत अछि। यैह तनाव, यैह व्यथा पाखलोक हृदयमे घर बना रहल अछि आ एहि व्यथासँ ‘पाखलो’ उपन्यासक जन्म भेल। कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’क कथा एकटा नव आ ज्वलन्त विषय ल’ के आएल अछि। एहि उपन्यास विषय जतेक नव अछि ततबे मौलिक। पाखलोक बीजसँ गोवाक एक सामान्य स्त्रीक गर्भसँ पलिकए गोवाक माटिक संस्कारकेँ अपनएबाक लेल तड़पि रहल अछि। पाखलोक रूप, गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, लाली गोराय अछि, मुदा ओकरा पर जे संस्कार पड़ल छल ओ गोवाक माटिक, हिन्दूक, शालीक, विठूक छल। बाँकी गोवावासी जकाँ इहो पाखलो माटिएक विठू थिक, मुदा समाज एकरा पाखलोक नजरिसँ देखैत अछि। ओ शालीक विठू थिक। ओ विठूए थिक, ओकरा एहन बुझाइत छैक। मुदा समाज ओकरा विठू नहि बनए दैत छैक। लेखक श्री तुकारामक नजरिमे ई विरोधाभास देखबामे आएल। पाखलोक जीवनकेँ एक विरोध बना कए एकपक्षीय आधारक रचना कएल अछि। पाखलोक कथा घुलि-मिलि रंगीन भ’ गेल अछि। पाखलो बनि कए, विठू बनि कए...... ओहो एहि माटिक सपूत बनि जाए, एहि इच्छाकेँ पालि पाखलो पाठकक मोनमे एकटा विशिष्ट छाप छोड़ि दैत अछि। पाखलो उपन्यास पढ़ैत काल पाठक सेहो स्वयं पाखलो बनि जाइत अछि। यैह एहि उपन्यासक विशेषता थिक। उपन्यासक निवेदन दूई प्रकारसँ कएल गेल अछि—अध्याय 1,3,5,7,9 आ 10 मे पाखलो स्वयं निवेदनि करैत अछि आ 2,4.6,8मे लेखक स्वयं निवेदन करैत छथि। निवेदनक ई शैली केश जकाँ गूथल अछि, यैह एकर सौंदर्य अछि। मात्र लेखकक निवेदनक कारणेँ एहि उपन्यासक सौंदर्य नहि बढि जाइत अछि। एहि तरहक शैली आत्मनिवेदनात्मक उपन्यासक दोष, बन्हन मिटएबाक कारण बनि गेल अछि। विषयकेँ नीक जकाँ रँगि देबाक निवेदन शैलीक बहुत नीक जकाँ चित्रण भेल अछि। ई दुनू निवेदन शैली एक दोसराक पूरक थिक। तुकाराम शेट उपन्यासक सभटा प्रसंगकेँ बड़ सावधानीक संग रंगने छथि। कतहु अतिरेकक कारणेँ उपन्यासमे बाधा नहि आएल अछि। उदाहरण स्वरूप जखन शीलीक बलात्कार होइत छैक तखन यै प्रसंग लए ओ एहि तरहेँ लिखैत छथि। “ओहि अन्हार घुप्प जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे क’ लेलकैक। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब तरहेँ आवाज आब’ लागलैक।” शालीक मृत्युक प्रसंग सेहो किछु एहिना अछि। पाखलो चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयास करैत अछि मुदा जखन चिताकेँ आगि नहि लगैत अछि तँ दादी कहैत अछि— “बाउ! अहाँक हाथे अहाँक मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि? आब की उपाय?” पाखलोक दुर्दैव किछु शब्दमे लेखक एतए देखौने छथि। एकबेर पाखलो पोखरिमे नहबैत अछि, ई देखि बाबू भट “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकरए लागैत अछि। पाखलोकेँ घीचि कए ओकरा स्तंभसँ बान्हि ओकर हाल-बेहाल क’ दैत अछि। जखन शाली ओकरा छोड़ाब’ जाइत छथि, ओ ओकरो बान्हि कए राखैत अछि। ओकरा देखि पाखलोकेँ लगैत छैक— “हमरा देहक गरम खून दौड़ए लागल.... बादमे हमर खून ठंढा भ’ गेल आ ओ शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाबए लागल......, हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक सभटा खून बहि गेल हो!” पाखलोक असहायता संयमसँ खुजैत अछि। एहि सभटा प्रसंगकेँ जीवित रखबाक हेतु भाषाशैली सेहो ओतबे प्रभावी अछि। प्रसंगक लेल उपयुक्त अछि। जेना नालीसँ शांत पानि बहैत अछि तखन बहुत कोमल आबाज अबैत अछि, ओहिना एकर भाषा अछि। सुन्नरि युवतीक पयरक पैंजनीक आबाजमे हेरा जाएब-सन, जाहि तरहेँ आँखि बन्न क’ कए मात्र आबाज सुनि लैत छी ओहिना ओहि भाषाक मन्द आबाज ताकब, आ लय-तालकेँ ओ पाठक पर विजय प्राप्त करैत अछि। हृदयमे घर बना लैत अछि। एहि तरहक वाक्यमे भाषाशैली बहुत सुन्दर भ’ गेल अछि। लेखकक ई भाषा शैली प्रसंगक अनुसारेँ मोड़ लेबाक कारणेँ प्रसंगक सौंदर्य बढ़ि गेल अछि। पाखलो एहि उपन्यासक नायक अछि। एहि व्यक्तित्वक चारू दिस अन्य पात्र सभ अछि, सोनू, दादी, शाली, रजनी, आलेस, गोविन्द, सुलू ई सभटा द्वितीयक पात्र छथि। उपन्यासमे नायकक चरित्र-चित्रण बहुत नीक ढंगे कएल गेल अछि। अपन हृदयसँ निकलल व्यथा, वेदनाक सहारे ओ जीबि रहल अछि। ओकरा मेटएबाल लेल ओ संघर्ष करैत अछि। यैह पाखलोक जीवन थिक। जँ अपन व्यथामे नायक जड़ैतो रहल अछि तथापि ओ ओहि परिधिमे नहि रहैत अछि। केगदी भाटमे नारियर तोड़बाक लेल वैह आगू बढैत अछि। हिन्दू आ ईसाईक बीच भेल झगड़ाकेँ वैह सुलझबैत अछि, मुदा ओ अपन दर्द नहि बिसरि सकल। ओकरा बुझाइत छैक— “हम नहि तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, एहिलेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबंध दुनूसँ अछि, एहिलेल हमरा ओ लोकनि नहि मारलनि की?” अपन अस्तित्व ताक’वला ई पाखलो सोनू मामाक बेटीकेँ अपन बहिन बुझि सिनेह करैत अछि, मुदा ओहि सिनेहकेँ रजनीक अलावा किओ नहि बुझि सकल अछि। जाहिसँ ओकर व्यथा आओरो तीव्र भ’ जाइत अछि। पाखलोक मनोदशा देखएबाक लेल पाखलोक सही भावना व्यक्त करबाक लेल एतए लेखककेँ खूब अवसर भेटल छनि। दादी एतए समाजक एकटा विशिष्ट व्यक्ति छथि। पाखलोकेँ ई गाम नहि अपनौलक, एकरा बाबजूद दादी ओकरा अपन बेटा गोविन्दक सदृश सिनेह देलक। ओकरा नोकरी पर लगौलक। रैयत लोकनि पर भेल अत्याचारकेँ मेटएबाक लेल ओ महीना भरिक कैद काटलक। सोनू मामा सेहो पाखलोसँ सिनेह करैत छथि मुदा अपन बेटीक खातिर ओ पाखलोकेँ भगा दैत छथि। आन लोक जकाँ आ रजनीक पति जकाँ ओहो पाखलो पर आरोप लगबैत अछि। सोनू मामाक चित्रण उपन्यासमे अएलाक बाद ओकर व्यक्तित्व स्पष्ट नहि भ’ सकलैक। ओहिना शालीक व्यक्तित्व चित्रण जाहि ढंगे हेबाक चाही से नहि भ’ सकल। ओकरा तुलनामे रजनीक व्यक्तित्व नीक जकाँ उभरि कए आएल अछि। गोविन्द बुद्धिमान, होशियार, आ तत्वज्ञानी अछि, जे पाखलो स्वयं कहैत अछि—“मनुक्ख जन्मक संगहि मृत्यु सेहो अपना संगहि आनने अछि..... धरती हो, जल हो वा आकाश, सभठाम मृत्यु निश्चित अछि।” एहन तत्वज्ञानक शब्द कहएवला गोविन्द पाठकेँ नहि पचैत अछि। हमरा ई तत्वज्ञान हमर आजी देने रहथि, एहन स्पष्टीकरण जँ गोविन्दक मुँहसँ भेलो अछि तथापि नेनपनमे गोविन्द एतेक तत्वज्ञानक गप्प क’ सकैत अछि से कने अजगुत लगैत अछि, आ गोविन्द एकटा बुजुर्ग सन बुझाइत अछि। ओ तत्वज्ञानी आ बुद्धिमान होइतहुँ एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ लैत अछि, आ अपन गाम छोड़ि दैत अछि। भारतमे रहिकए पाइ नहि कमा सकैत अछि एहिलेल आलेस दुबई चलि जाइत अछि, मुदा पाखलो एहिगामक संस्कृति, माटिसँ चिपकल रहैत अछि। उपन्यासक एकटा गाम एहि उपन्यासक व्यक्तित्व भ’ गेल अछि। गोवाक माटिक विशेषता एहि गाममे देखाइत अछि। प्रकृति सौंदर्यक चित्रण बहुत नीक जकाँ दर्शाओल गेल अछि। रजनीकेँ ‘पाखलो’सन लड़की होइत छैक। गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, गोर चाम। वास्तवमे तँ ई लड़की रजनीकेँ ओकरा अपन पतिसँ होइत छैक तथापि ओ लड़की देख’ मे पाखलो-सन बुझाइत अछि एहिलेल ई पाखलोक पैदाइश छैक, ई आरोप ओकर पति ओकरा पर लगबैत छैक। रजनीकेँ पाखलोसँ लड़की हेबाक कारण ओकरा मोनमे पाखलोक प्रति शाश्वत प्रेम भ’ सकैत अछि। एहि मनोदशाक कारणेँ रजनीकेँ पाखलो सन लड़की हेबाक संभावना देख’ मे आबि रहल अछि। पाखलो गोवाक माटिक अछि। मुदा एकरा पढि मोनमे एहन शंका होइत अछि जे ‘पाखलो’क संबंध कतहु मराठी साहित्यमे चि.त्र्यं. खानोलकरक ‘चानी’ उपन्याससँ तँ नहि अछि? मुदा ‘पाखलो’क विशिष्टता ‘चानी’ मे नहि अछि। भूतकाल आ वर्तमान कालक स्पर्श एहि उपन्यासमे अछि। कथानकक परिधि पूरा करबामे दुनूक भूमिका अछि। एकटा रविक दिन सभटा पुरान स्मरण एकटा गरज आ चमकक संग खतम भ’ जाइत अछि। ओहिमे पाखलो अपन पहिचान ताक’ लगैत अछि। फेर पाखलो अपन जनमसँ लए आइधरिक कथा अपना मोनमे स्मरण करैत अछि। दूपहर भ’ जाइत अछि। सुलू पाखलोकेँ ‘मामा’ कहि ओकर पयर पकड़ि लैत अछि। कथानक केर परिधि पूरा भ’ जाइत अछि। वर्तमान कालसँ भूतकालमे जा कए ‘पाखलो’ फेर वर्तमानमे आबि जाइत अछि। उपन्यासक प्रारूप प्रशंशाक योग्य अछि। उपन्यासक हरेक अध्यायक अपन महत्व छैक। हरेक अध्यायक शुरूआत आ विशेष रूपेँ अंत कलात्मक अछि। नीचाँक उदाहरण देखू— “नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ! पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छल आकि ओ ओतएसँ चलि देलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक।” चारि “एहि गाममे हमर परिचय फकत एतबा अछि जे हमर नाम पाखलो थिक, हमर जाति पाखलो थिक, आ हमर धर्म सेहो पाखलो थिक।” अध्याय “रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छैक। ओकरा चन्द्रमाक एहि ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही…. काजर लगएलाक बाद कारी आँखि वाली ओकरहि सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहैक आ जेना नहरक पानि बहैत छैक तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन ज्योत्सना पसारने छलैक।” “पाखलोक गाल पर थापड़क निशान भ’ गेलैक। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा सौंसे देहमे भ’ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नहि द’ रहल छलैक, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहैक ओ एखन धरि हरियर रहैक।” अध्याय आठ “ओहि पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छलहुँ से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नहि अपितु रजनीक खोपामे लगाओल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहैक! यादक लेल सफेद, सुगन्धित!” अध्याय नओ “ओ दौड़िकए एलीह आ जाधरि हम ओकरा गोदी लेतिऐक ताधरि ओ “मामा” कहि कए हमरा शोर पारलक आ हमरा पयरसँ लिपटि गेलीह।” अध्याय दस हरेक अध्यायक एहि तरहक कलात्मक अंत छैक। हरेक अध्यायक अंतमे उपन्यासक अंत भ’ सकैत अछि। ई उपन्यास एतेक कलात्मक अछि। गोवाक संवतंत्रताक पार्श्वसँ ई कथा रंग आनैत अछि। स्वतंत्रता भेट’सँ पूर्वहि शुरू भेल ई कथा स्वतंत्रताक पश्चातो चलैत रहैत अछि। मुदा उपन्यासमे स्वतंत्रताक विषय जतेक एबाक चाही, से नहि आबि सकल अछि। मुदा एहि कारणेँ एहि उपन्यासमे बाधा आबि गेल छैक, से नहि छैक। ओहि समयक तीव्र स्वतंत्रता आन्दोलनक पदचिह्न जँ उपन्यासमे अबितैक तँ एकर पृष्ठभूमि आँखिकेँ जँचतैक। कार्मो चीफ जंगलमे शालीक बलात्कार करैत अछि, बादमे बहुत दिनक बाद, पाखलोक जन्मक बादो ओ शालीसँ भेंट करैत अछि। बिना बतौने ओकरो मोनमे शालीक प्रति सिनेह जागि जाइत छैक आ बलात्कारक तीव्रता कम भ’ जाइत छैक। कार्मो चीफक ई प्रकृति पाठककेँ उधेड़बुनमे डालि दैत छैक।......कार्मो चीफकेँ बेर-बेर शालीक ओतए देखि लोकसभ, “शालीक भड़ुआ।” कहैत छैक आ शालीक संबंधमे—“ओ पाखलो केँ अपना घरमे राखि धंधा सुरह क’ देने छैक वा अपन नव दुनियाँ बसा नेने अछि?” कहैत छैक। बलात्कारक तीव्रता कम कए लेखक पाठककेँ की कहए चाहैत छथि? ई बुझ’मे नहि अबैत अछि। पाखलोक ‘विठू’ एकबेर कहैत छैक—“ ओ एकटा पतिव्रता नारी छलीह” मुदा एकरो कोनो माने नहि निकलैत अछि। एहि तरहक किछु दोष एहि उपन्यासमे अछि, मुदा ई सूक्ष्म दृष्टिएँ देख’ बिना नजरिमे नहि अबैत अछि। पाखलो उपन्यास मात्र पाखलोक कथा नहि थिक। एकटा माटिक कथा थिक। हरेक लोकक, हरेक माटिक कथा थिक। एहन कथा इतिहास बतबैत अछि। हरेक लोककेँ इन्सानक रूपमे जीवन बितएबाक काल ओकरा अपन घर, अपन लोक, अपन समाजक आवश्यकता होइत छैक। अपन संस्कृतियोक आवश्यकता होइत छैक। जँ इ सभ ओकरा नहि भेटैत छैक आकि ओकरा एहि सभसँ दूर राखि देल जाइत छैक तखन ‘पाखलो’क उदय भ’ जाइत छैक। मोनक ई भावना, वेदना आ व्यथा मात्र गोवाक संस्कृतिमे उपजल एकटा पाखलो लोकक नहि थिक, अपितु सभ लोकक कथा थिक। केवल वातावरण ओ संदर्भ बदलि जाइत छैक। मूल भावना रहैत छैक ‘विठू’ बनि कए जीबाक। स्थान, काल आ मर्यादा एहि उपन्यासमे नहि अछि। एहिमे व्यक्त कएल गेल भावना, हरेक लोकक ज्वलंत कथा थिक, वेदना थिक। लोक सभमे सँ हरेक ‘पाखलो’ ‘विठू’ बनिकए जीबाक लेल संघर्ष करैत अछि। (कोंकण टाइम्स, दिवाली अंक, 1981 मे प्रकाशित आलेखक अंश, अशोक मनभुटकर) डॉ. अरुण कुमार सिंह, एल. डी. सी. आई. एल., भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6. जन्म स्थान- अर्राहा, पो.- अर्राहा, भाया- मठाही, थाना- घैलाढ़, जिला- मधेपुरा, बिहार, पिन-852121 स्वातन्त्र्योत्तर मैथिली कथामे सामाजिक समरसता (परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भाक्-भवेत्।’ उपनिषदक ई सूत्र वाक्य समरसतेक उन्नायक व परिचायक अछि। मानवमात्रक हितक कामना, सुख, समृद्धि एवं कल्याणक भावने सामाजिक समरसता अछि जे विभिन्न जाति, वर्ण, धर्म, सम्प्रदाय, भाषाई लोकक मन वाणी आओर कर्मसँ समरूप भए अपन प्रस्थिति एवं भूमिकाक निर्वाह करैत लक्ष्य प्राप्ति दिस प्रेरित करैछ। सामाजिक समरसता भारतीय संस्कृतिक आत्मा अछि। धर्म सापेक्षीकरण धर्म निरपेक्षीकरण, सर्वधर्म समभाव, मानवतावाद, बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय आदि अवधारणा सामाजिक समरसताक पोषक व परिणाम रहल अछि। विविधतामे एकरूपताक भावना समरसतेकेँ प्रतिनिधित्व करैत अछि। संत, साहित्यकार, समाजवैज्ञानिक आदि सब सामाजिक व्यवस्था एवं प्रगति लेल - सामाजिक संगठनक स्थिरता लेल सामाजिक समरसताक अपेक्षा करैत रहल अछि। सामाजिक समरूपताक प्रचार-प्रसारक प्रति साहित्यकार सदैव सजग रहलाह अछि। सामाजिक प्राणीक रूपमे ओ समाजक शिल्पीए टा नहि अपितु शिक्षक, पथ-प्रदर्शक, विश्लेषक व सर्जक सेहो अछि एतदर्थ हुनक सृजनमे सामाजिक समरसताक सन्देश रहब स्वाभाविके अछि। मिथिलेत्तर प्रान्त मध्य विद्यापतिक सम्मान आओर आधुनिक युगक प्रथम मैथिली गद्यकार चन्दाझाक यश देखिकेँ मिथिलाक विद्वानमे सेहो अपन निज भाषाक सेवाक उत्सुकता जागल जकर फलस्वरूप मैथिली कथासाहित्यक निर्माण प्रारम्भ भेल। मैथिली साहित्यक समालोचक डॉ. रामदेव झाक कहब छन्हि जे आरम्भमे मैथिली कथा लेखकक लेल रचनाक दुई आदर्श छल पहिल संस्कृत परम्पराक आख्यायिका-उपाख्यायन, नीति कथा आदि तथा दोसर पाश्चात्य परिपाटीक सामाजिक परिवेश पर रचित कथा उपन्यास। ओहि समय धरि अंग्रेजी वा अन्य पाश्चात्य साहित्यसँ मैथिली साहित्यकारक साक्षात् परिचय नहि भए सकल छल, परंच बंगला साहित्य मे पाश्चात्य कथा - उपन्यासक अनुवाद आओर ओहिसँ प्रेरित-प्रभावित अभिनव कथा-उपन्यास विशेष समृद्ध भए बंगाल आओर बंगालसँ बाहर लोकप्रिय भए चुकल छल। मिथिला आओर मैथिलीक पूर्वोत्तर राज्य-आसाम एवं बंगालसँ प्राचीन कालहिसँ घनिष्ट सम्बन्ध रहल अछि, जाहिक कारणेँ मैथिली कथा साहित्यक आरम्भिक कथामे बंगला साहित्यक प्रभाव दृष्टिगोचर होइत अछि। हम कहि सकैत छी जे एकरे फलस्वरूप मैथिली कथा साहित्य मे नव युगक संग-संग नव दृष्टिकोणक सूत्रपात भेल एवं पाश्चात्य साहित्य एवं भारतीय साहित्यसँ प्रभावित भए मैथिली कथासाहित्य क्रियाशील भेल अछि। मैथिली साहित्य मध्य 1922-23 ई. क आसपास जखन मौलिक कथा लिखल जाए लागल ताहि मध्य कुमार गंगानन्द सिंह, कालीकुमार दास, लक्ष्मीपति सिंह, कांची नाथ झा ‘किरण’ आदिक कथा मध्य मिथिलाक वर्त्तमान समाजक स्थितिकेँ देखैत मैथिली कथासाहित्यकेँ सामाजिक जीवनसँ जोड़बाक भरपुर प्रयास कएलन्हि। एहि मे कुमार गंगानन्द सिंहक ‘पंचपरमेश्वर’ एवं ‘बिहाड़ि’ मे सामाजिक समरसताक वातावरणक अक्षरशः पालन होइत देखल गेल छल। स्वातन्त्र्योत्तर युगमे मैथिली साहित्यकार लोकनि अपन साहित्य मध्य पात्र चयन करबामे क्रमशः आभिजात्य मोहक तिरस्कार करैत सामाजिक समरसताक नियोजन (समावेश) करैत गामघरक ओहि पात्रसभकेँ साहित्यमे प्रतिष्ठित कएलनि जे परम्परासँ शोषित ओ प्रताड़ित रहल छलाह। स्वातन्त्र्योत्तर कालक कथाकारमे ललित, राजकमल, सोमदेव, मायानन्द मिश्र, धीरेन्द्र, रामदेव झा, हंसराज एवं लिली रे आदि प्रमुख अछि। मैथिली कथा साहित्य मध्य सामाजिक समरसताक दिशामे वस्तुतः ललितेक ‘रमजानी’ ओहि समयक श्रेष्ठ कथा सिद्ध भेल जे अखन धरि टटका बनल अछि। हिनक ओवरलोड, कंचनियाँ, मुक्ति एवं जानवर आदि कथा मे समकालीन स्थितिकेँ चिन्हैत जीवनक यथार्थक चित्रणक क्रममे समाजक सामन्ती विकारकेँ जगजियार करैत सामाजिक समरसताक बोध तँ देलनि मुदा मुक्तिक रास्ता नहि बना सकलाह। धीरेन्द्रक अधिकांश कथाक जन्म समाजक ओहि क्षेत्रक व्यथासँ होइत अछि जे सामाजिक स्तर पर तिरस्कृत अछि। शारीरिक स्तर पर बात-बात पर दण्डित कएल जाइत अछि। आर्थिक स्तर पर औंठा बोरबा लेल अभिशप्त अछि। हिनक कथा घंटी, सवाइ, हिचुकैत बहैत सेती, गामक ठठरी, मादा काँकोड़, बन्हकी आदि कथामे सामाजिक समरसता देखार दैत अछि। रामदेव झाक मनुक संतान, एक खीरातीन फाँक आदि कथामे स्वतन्त्र भारतक आर्थिक संघर्षक सामाजिक भावनासँ जाति विभेदकेँ समाप्त करैत वर्ग-संघर्षसँ मुक्त भए जाइत अछि। सामाजिक एवं प्रशासकीय व्यवस्थाक विद्रूपताकेँ देखार करैत दलित वर्गक विद्रोहक स्वरकेँ संगठन मे परिवर्त्तन करैत तत्कालीन समकालीन जीवनक यथार्थक चित्रण करैत अछि। सोमदेव विशिष्ट कथाकार छथि। हिनक प्रमुख कथा भात, अंगाचोर आदि मे निम्न वर्गक जीवनक यथार्थक अत्यन्त आत्मीयतासँ चित्रण भेल अछि। प्रभाष कुमार चौधरीक ‘मलाहक टोल’ कथा शोषित वर्गकेँ अपन अस्तित्वक रक्षा लेल प्रेरित करैत अछि। रामानन्द रेणु आर्थिक विसंगति जन्य निम्न वर्गक दंश एवं कुण्ठाकेँ अपन कथा मध्य विश्लेषित कएने छथि। जीवकान्तक ‘इनकिलाव’ तत्कालीन राजनीतिक सामाजिक जीवनक यथार्थसँ अछि। 1970 ई. क दशकमे बैंकक राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्सक समाप्ति, भूमि सुधार सम्बन्धी आन्दोलन, आदि किछु एहन घटना थिक, जाहिसँ सामाजिक जागरण भेल तँ दोसर दिस साम्यवादी आन्दोलनसँ पूँजीपति एवं श्रमिक मध्य संघर्षमे वृद्धि भेल। दलित वर्गमे सह-अस्मिताक भावमे वृद्धि भेल। एहि यथार्थक प्रवक्ता कथाकारक रूपमे सुभाषचन्द्र यादवक नाम महत्त्वपूर्ण अछि। हिनक महत्वपूर्ण कथा छन्हि- घरदेखिया, काठक बनल लोक, फँसरी एवं ‘बनैत बिगड़ैैत’ कथा संग्रहक कथा आदि। कथाकार दलित अस्मिताक स्वर दैत समकालीन यथार्थक चित्रणसँ पूर्ण सफल भेल छथि। कथाकार महाप्रकाश, सुकान्त सोम, मनमोहन झा, उपेन्द्र दोषी, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, रामनरेश सिंह, राजाराम प्रसाद, महेन्द्र, विभूति आनन्द, अशोक, रमेश, तारानन्द वियोगी, देवशंकर नवीन, प्रदीप बिहारी, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, रमेश रंजन, शैलेन्द्र आनन्द, केदार कानन, जगदीश प्रसाद मंडल, उमेश पासवान, डॉ. धीरेन्द्र, उमाकान्त, सुशील, रघुनाथ मुखिया, कामिनी कामायनी, ऋषि वशिष्ट, उमेश मंडल, वीरेन्द्र कुमार यादव, रामदेव प्रसाद मंडल झारूदार, मनोज कुमार मंडल, दुर्गानन्द मंडल आदि अपन कथा मध्य तथाकथित रूपेँ शोषित-दलित निम्नवर्गक छोटसँ छोट घटनाक्रमकेँ अपन कथानक बनबैत समाजक वास्तविक चित्रक चित्रण कए रहल छथि। एवं प्रकारेँ मैथिली कथा अपन स्वरकेँ परिवर्त्तित करैत, नव डेग दैत सामाजिक समरसता कायम करबा दिस विकासोन्मुख अछि। सहायक ग्रंथसूची 1 झा, बासुकीनाथ (डॉ.) (सम्पादक), समकालीन कथा साहित्यःसामाजिक परिप्रेक्ष्य, चेतना समिति, पटना,1976 2 झा, दिनेश कुमार(डॉ.), मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास,मैथिली अकादमी, पटना, 1989 3 झा, श्री दुर्गानाथ ‘श्रीश’ (डॉ.), मैथिली साहित्यक इतिहास, भारती पुस्तक केन्द्र, दरभंगा, 1991 4 भारद्वाज, मोहन (सम्पादक), मैथिली आलोचना,पत्रिका, मित्र गोष्ठी द्वारा डॉ. भीमनाथ झा, लक्ष्मीसागर, दरभंगा, फरबरी 1992 5 झा, रामानन्द ‘रमण’(डॉ.), अखियासल, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, मधुबनी,1995 6 नबीन,देवशंकर, आधुनिक साहित्यक परिदृश्य, अंतिका प्रकाशन, दिल्ली 2000 7 ठाकुर, प्रो. वीणा, वाणिनी, मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर, लहेरियासराय, दरभंगा, 2010 8 झा, रामानन्द ‘रमण’(डॉ.), हिआओल, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, मधुबनी,2012 9 झा बाल गोविन्द “व्यथित” (डॉ.) मैथिली साहित्यक इतिहास, पटना भारती भवन, 1981 10 झा, बासुकीनाथ (डॉ.) (सम्पादक) मैथिली साहित्यक रूपरेखा, पटना चेतना समिति, 1976 11. http://www.videha.co.in मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना (परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी) परिचय ‘निरंकुशाः कवयः’ केँ सार्थक करैत संसारक कोनो बाधाकेँ बिनु अंगीकार कएने, अपन इच्छानुसार काव्यक सृष्टि-सर्जन करयवला युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा कवि चूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ स्वभावत: जन्मजात सारस्वत प्रतिभा-सम्पन्न संस्कारेसँ आशुकवि छलाह। जाहि वस्तु पर नजरि गेलनि, भाव उमड़लनि, बस्स, तकरा अपन लेखनीसँ भव्यता प्रदान कए देलनि। पं॰ सुरेन्द्र झा ‘सुमन’सँ प्रभावित भए मैथिलीमे लेखन कार्य प्रारंभ करयवला कलमक जादूगर मधुपजीक गीत विद्यापतिए जकाँ मिथिलाक सभ अंगनामे सभ अवसर पर सुनल जाइत छल। एहि ठाम छलसँ अभिप्राय अछि वर्त्तमान समयमे मैथिलीक वस्तुस्थिति। प्रकाशित कृति मधुपजीक प्रकाशित रचनाकेँ सुविधाक लेल निम्न भागमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि- महाकाव्य- राधाविरह(1969); मुक्त मधुप(2006)। गीतकाव्य- अपूर्व रसगुल्ला(1941); टटका जिलेबी(1945); पचमेर(1949); गीत मंजरी(1963); चौंकि-चुप्पे(1968); विदागीत(1973); बटसावित्री(1975); बोल-बम(1981)। मुक्तक काव्य- झंकार(1942); शतदल(1944); ताण्डव(1959); गंगातरंगावली(1974); मधुप-सप्तशती(1982); परिचय-शतक(1988)। कथाकाव्य- त्रिवेणी(1945); त्रिकुशा(1958); द्वादशी(1979)। संस्मरणात्मक आ आत्मकथात्मक काव्य- प्रेरणापुंज(1980)। प्रशस्तिकाव्य- कोबर गीत(1945)। अनुवादकाव्य- दुर्गासप्तशती, मैथिली-सुधा(1977)। दलित चेतना : एक परिचय धर्मसूत्र तथा दोसर ब्राह्मण पुस्तकमे ब्राह्मण, क्षत्रिय आओर वैश्यकेँ छोड़ि सभ श्रमजीवी जातिकेँ शूद्र घोषित कए देल गेल छल। महाभारतक अनुशासन पर्वमे कहल गेल अछि जे शूद्र मजदूर अछि। शूद्र नहि रहत तँ परिश्रमक काज के करत? नृसिंह पुराणमे कहल गेल अछि जे खेती-बारी शूद्रक काज थिक। ई निर्विवाद जे सबटा औद्योगिक उत्पादन करयवला लोककेँ भारतीय समाजमे हजारक हजार वर्षसँ शूद्र कहिकेँ दुर्दशाग्रस्त जीवन बितैबाक लेल बाध्य कएल गेल अछि। एहि स्थितिक विरोध अठारहवीं सदीसँ शुरु भेल जे अन्ततः बीसवीं सदीमे एकटा पैघ सामाजिक आन्दोलनमे परिवर्त्तित भए गेल। पंजाबसँ दक्षिण भारत धरि, पूर्वमे बंगालसँ महाराष्ट्र धरि जातीयता आओर वर्णव्यवस्थाक कारणेँ उत्पीड़ित समाजमे सामाजिक, राजनैतिक आओर सांस्कृतिक मुक्ति आन्दोलन होएब प्रारंभ भेल। एहि सामाजिक क्रांतिमे महाराष्ट्रमे ज्योतिबा फुले, केरलमे नारायण गुरु, तमिलनाडुमे रामास्वामी पेरियार, उत्तरप्रदेशमे झण्डुदास, बंगालमे चाँद गुरु ओ मध्यप्रदेशमे घासी दास आओर सम्पूर्ण राष्ट्रीय रुपमे बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकरक भूमिका एहि अर्थमे बहुत पैध छल जे ओ लोकनि समाजक उपेक्षित वर्गक मुक्ति आंदोलनकेँ तार्किक, वैचारिक आओर सैद्धांतिक आधार देलन्हि। भारतीय इतिहासक ई एकटा दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठ अछि जे लगभग तीन हजार वर्षसँ बेसी अवधि धरि शूद्र घोषित जनसमुदायकेँ अन्तहीन दासता आओर दुर्दशा भोगए पड़ल। एहिमे संदेह नहि जे भारतक जे संस्कृति ब्राह्मणधर्मक प्रभावसँ मुक्त छल ओ एहि दुर्दशासँ बचल रहल, उदाहरणस्वरुप शिल्पी समाजकेँ देखल जाए सकैछ। बौद्ध, जैन आओर लोकायतक जीवन दर्शनमे शूद्र व्यवस्थाक सबसँ तीखगर तार्किक विरोध बुद्ध कएने छलाह। संभवतः इएह कारण अछि जे आइ भारतक सवर्णेत्तर समाजमे सबसँ बेसी आदर बौद्ध धर्मकेँ देल जाइछ। बौद्ध विचारक समाजकेँ अंधविश्वाससँ बाहर निकालि तार्किक बौद्धिक संस्कृतिक विकास कएने छलाह। समाजक निम्न वर्गक आन्दोलनक इएह बुनियादी ताकत रहल अछि। अम्बेदकर प्रेरित दलित पैन्थर आन्दोलन मराठी कविता एवं कथासाहित्यमे सहसा एकटा चमत्कार आनि देने छल, जकर आबाज मैथिलीमे सेहो सुनल गेल। तकरे परिणाम थिक मधुप विरचित कथा काव्य ‘द्वादशी’क अन्तर्गत समाहित ‘घसल अठन्नी’, जकरा मध्य दलित चेतनाकेँ देखब हमर ध्येय अछि। घसल अठन्नीमे दलित चेतना घसल अठन्नी ‘मधुप’क सर्वाधिक प्रख्यात, सर्वाधिक प्रशंसित कथाकाव्य थिक। एहिमे दलित वर्गक एकटा विधवा स्त्री बुचनीक चित्रण कएल गेल अछि। ओ जेठक विकराल समयमे खेतमे बिनु जलखै-कलोक काज करबाक लेल विवश छल, अपन आ अपन बच्चाक जीवन रक्षार्थ। एहि काजक बदला ओकरा भेटतैक मात्र आठ आना। ओकर पति मरि गेल छैक। ओकरा एकटा छौ मासक नेना छैक। साँझमे ओकरा भुटकुन बाबू दिससँ बोनिमे भेटैत छैक अठन्नी, जे कोनो दोकानमे नहि चलैत छैक कियैकतँ ओ घसल छैक। बुचनी ओहि अठन्नी लएकेँ परेसान अछि आ ओ भुटकुन बाबू लग पहुँचि बदलि देबाक आग्रह करैत छैक। ताहि पर भुटकुन बाबू औरतक त्रियाचरित्रकेँ व्याख्यायित करैत उचित बोनि देलासँ अपन कुलमे दाग नहि लगोताह सन बात कहैत ओकरा पिटैत छथिन्ह आ एहि दुहू माय-बेटाक प्राणांत भए जाइत छैक। ई तँ भेल कविताक संक्षिप्तसार। द्वादशीक आमुखकक अनुसारेँ- ‘‘प्रस्तुत द्वादशी संकलन एहने करुणाक निर्झरिणी थिक जाहिमे अवगाहन कयलासँ करुणाक एहि आवरणमे क्रांतिक ज्वालामुखी पाठककेँ दृष्टिगोचर होयतनि। एहि संकलनमे 1940सँ 50 ई.क मध्य रचित 12 गोट करुण रसात्मक कथाकाव्य संकलित अछि। ई संकलन सामाजिक वैषम्य, शोषण ओ अत्याचारक जीवन्त चित्र समक्षमे उपस्थित करैत अछि।’’- आमुख, पृ.- ख उपरोक्त परिप्रेक्षमे आलेखक मूल उद्देश्य बुचनीक मुँहसँ निःसृत पाँति- ‘‘मालिक! हम कर्ज नहि छी मँगैत अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु उपजले बोनि टा देल जाए’’ सँ अछि। जाहि मध्य दलित चेतनाक अवगाहन होइत अछि। बुचनीक वाणीमे दृढ़ता छैक जे भुटकुन बाबूक अहंकार अत्याचरक समक्ष टूटि भनहि गेल अछि, मुदा झुकल नहि। बहुत रास आलोचकक कहब छन्हि जे मधुपजीक कविताक पात्र विद्रोहक स्वर मुखरित नहि कऽ परिस्थितिक आगू आत्मसमर्पण कए दैत छनि। मुदा एहि ठाम हम कहए चाहब जे एकाएक बिद्रोहक स्वर नहि उठैछ अर्थात् बिनु चेतनाक बिद्रोह कोना संभव भए सकैछ? स्वतंत्रतासँ पूर्व दलित वर्ग अपन हकक प्रति सावधान भए उचित मांग करब प्रारंभ कए देलनि सैह तँ भेल दलित चेतना। जेकि ‘घसल अठन्नी’क बुचनी अपन पारिश्रमिक मांगैत सिद्ध कए देलनि। एक हिसाबेँ बात बड्ड छोट छैक, अदौसँ सामर्थ्यवान असहायकेँ कष्ट पहुँचबैत आएल छथि, जनिका लग शक्ति छनि, ओ ओकर उपयोग निरीह पर करैत अएलाह अछि, मुदा ‘घसल अठन्नी’ अपन प्रकाशनक संग सभक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करबाक हेतु वाध्य कएलक, जे एकर सबसँ पैघ उपलब्धि मानल जाए सकैछ। शक्तिशाली होथि वा शक्तिहीन, सभ केओ एहि दिशामे किछुओ काल अवश्य मनन कएलनि, जाहिसँ एहि साहित्यक उद्देश्य सोलहो आना सफलता प्राप्त कएलक, जे चिकड़ि-चिकड़ि ओहि साहित्यकारक गुणगान अदौसँ आइ धरि कए रहल अछि, एहिसँ बेसी एकटा साहित्यकारसँ एहि समाजकेँ अपेक्षा की? निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे समाजक दलित-पीड़ित वर्गक वेदनाकेँ मुखर करब, ओकरा समाजक सहानुभूति अर्जित करैब हिनक कथाकाव्यक उद्देश्य रहल अछि। हिनक कथाकाव्यक नायक दलित वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि तथा खलनायक सामन्त वर्गक। शोषित वर्गक अमानुषिक अत्याचारक चक्कीमे दलित वर्गकेँ पिसाइत देखाएब एवं ओकरामे अपन हकक प्रति चेतनाकेँ जागृत करब हिनक ध्येय छन्हि। मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा किछु समयसँ देशमे उच्चशिक्षाक माध्यम एवं विषयवस्तुकेँ लए कए विमर्श चलि रहल अछि। एक दिस बाबा रामदेव अनशनक समय अपन मांग मे भारतीय भाषाक माध्यमसँ उच्च शिक्षाक मांग रखलन्हि, तँ दोसर दिस मुंबई उच्च न्यायालयक एक गोट फैसलामे कहल गेल अछि जे लोक सेवा आयोगक अंतिम परीक्षा अर्थात् साक्षात्कारमे परीक्षार्थी अपन मातृभाषामे जबाब दए सकैछ। एक तरहेँ ई कार्यपालिका पर दुईतरफा दबाब अछि । एक दिसतँ लोकतांत्रिक दबाब जनसमूहक रूपमे रामलीला मैदानमे जमा भएकेँ, तँ दोसर दिस न्यायपालिका भारतीय भाषाक पक्षमे निर्णय दए केँ। विश्वमातृभाषा दिवसक अवसर पर दिल्लीमे बुद्धिजीवी एवं लेखकक प्रतिनिधिमण्डल सरकारकेँ एक गोट विज्ञापन देने छलाह, जाहिमे कहल गेल छल जे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नियमावलीमे पी.एच.डी.क लेल अनिवार्य दुई शोध-पत्रमे सँ एक मातृभाषामे हो। एहि तरहेँ देखल जा रहल अछि जे अंग्रेजीकेँ कात करैत भारतीय भाषाकेँ प्रश्रय देबाक बात शुरु भए चुकल अछि । मातृभाषा ओहन भाषा होइछ, जकर माध्यमसँ कोनो नेता अपन घर, परिवार आओर समाजकेँ बुझि पबैछ। पहिल भाषा होएबाक कारणेँ मातृभाषे कोनो व्यक्तिक चिंतन-प्रक्रियामे कार्य करैछ। एहि लेल प्रतिभाक सभसँ पैघ अभिव्यक्ति पहिल भाषे मे होइछ। जँ कोनो व्यक्ति बहुभाषी अछि तँ ओ पहिल भाषाक पृष्ठभूमि पर कोनो दोसर भाषा सीखैछ आओर एक तरहेँ चिंतन-प्रक्रियाक बीचे मे मातृभाषा आओर दोसर भाषाक बीच अनुवाद करैत रहैछ। एहि स्थितिमे ओ दोसर भाषामे कतबा निपुण अछि ई एहि पर निर्भर करैछ जे ई मानसिक अनुवाद ओ कतबा कम समयमे कए पबैछ। संविधान स्वीकृत 22 भाषामे जतबा उच्च शिक्षण कार्य भए रहल अछि, ओहिसँ बहुत बेसी एक मात्र अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ भए रहल अछि। आब प्रश्न उठैछ जे जाहि शिक्षण-पद्धतिकेँ मैकालेक विरासत एवं आओर अंग्रेजी साम्राज्यक विस्तार कहल जाइछ, ओकर कोनो ठोस विकल्प आइ धरि किएक नहि उभरि पाओल? एकर प्रमुख कारणमे भारतीय भाषाक आपसी संघर्षकेँ नजरअंदाज नहि कएल जाए सकैछ। दोसर ई जे एहि भारतीय भाषाक ज्ञान-परंपरामे कतए धरि पहुँच अछि? की आइ प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, चिकित्सा, विधि, प्रबंधन आदि विधाक उच्चतम रूपकेँ भारतक कोनो क्षेत्रीय भाषामे सहजतासँ अभिव्यक्त कएल जाए सकैछ? हमरा बुझने कठिन अछि। एहन बात नहि अछि जे भारतीयभाषाक क्षमता संदिग्ध अछि, जखनकि लोकभाषाक शब्द-सामर्थ्य बहुत रास भाषाक तुलनामे समृद्ध अछि। मुदा विषयवस्तुक उपलब्धता एकटा पैघ समस्या अछि। एहि बातकेँ सहर्ष स्वीकार कएल जएबाक चाही। ओनाहूँ कोन भाषामे कीसब सामग्री रहबाक चाही ई भाषा नहि, अपितु समाजक जिम्मेदारी होइछ। जँ भाषा दरिद्र अछि, तखनो आर समृद्ध अछि तखनो। विकासक अपन परिवेश आओर अपन शब्दावली होइछ, जकरा दोसर भाषामे सम्पूर्ण रूपसँ घुलि-मिलि जएबामे सालक-साल लागि जाइछ। उदाहरणस्वरूप ‘हेलो’ शब्दकेँ लेल जाए सकैछ। कहल जाइछ जे अमेरिकी आविष्कारक थॉमसन पहिल बेर टेलीफोनसँ ई जानबाक लेल जे ओकर आबाज पहुँचि रहल अछि कि नहि ताहि लेल ‘हेलो’ शब्द बजने छल। तहियासँ आइ धरि टेलीफोनक कतेक स्वरूप सोझ आएल, मुदा पहिल बेर बाजल शब्द ‘हेलो’ मे कोनो परिवर्त्तन नहि आएल। जँ इएह आविष्कार भारतमे भेल’ रहैततँ ई पहिल शब्द कोनो-ने-कोनो भारतीय भाषाक शब्द रहल होएत। जँ आत्मालोचनक दृष्टिसँ देखल जाए तँ भारतीय भाषाक वैज्ञानिकता पर कोनो संदेह नहि अछि। मुदा ओहिमे अभिव्यक्त विज्ञानकेँ संदिग्धताक घेरासँ बाहर नहि लाबल जाए सकैछ। किएकतँ विज्ञान एहि भाषामे जन्म नहि लैछ, अपितु अनुदित होइछ। आय जँ एक दिस विश्व बजार पर स्थापित होएबाक प्रतिस्पर्धा चलि रहल अछि तँ दोसर दिस अपन क्षेत्रीयताक पहचान समाप्त नहि भए जाए तकर दबाब सेहो देखल जाए रहल अछि। एहन परिस्थितिमे भारतमे उच्च शिक्षामे स्थानीय भाषाक प्रयोगक चहुँदिस मांग एक स्वागतयोग्य डेग भए सकैछ। परंच ओकर स्थायी स्तित्व तखन रहत जखन मूल एहि भाषामे पल्लवित-पुष्पित हो। भाषा अभिव्यक्तिक साधन होइछ; आत्माक अभिव्यक्तिक आओर सत्ता अभिव्यक्तिक सेहो। वर्त्तमान मांगक फलस्वरूप जाहि लोकभाषासँ भूख आओर प्रतिरोध अभिव्यक्त होइछ एवं एकरा माध्यमेँ सत्तामे घूसपैठक चर्चा सेहो भए सकैछ। की ई प्रयास सत्तासीन वर्गकेँ मंजूर भए सकैछ? तेँ ई देखब बेस उत्सुकताक विषय होएत जे कोर्टक फैसलासँ लाभान्वित होइत छात्र मातृभाषामे साक्षात्कार दए केँ चयनित होएबामे कतबा सफल होइछ। भारत एक बहुभाषिक देश अछि, जतए 1652 मातृभाषा अछि। संविधान जाहि 22 भाषाकेँ मान्यताक देलनि अछि ओहो कोनो अंतिम भाषा नहि अछि। संवैधानिक मान्यताक लेल बहुत रास भाषा-भाषीक एक पैघ समूह बरोबरि सक्रिय अछि, आओर कोनो एहन तर्क नहि अछि जकर आधार पर एकर सक्रियताकेँ नजरअंदाज कएल जाए सकैछ। जखन कोनो भाषा रोजगारसँ जुड़ैछतँ एहि तरहक प्रयासकेँ आर बल भेटैछ। ओनातँ मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थानक अन्तर्गत भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’मे नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक माध्मयमे मैथिलीकेँ मशीनसँ जोड़बाक काज प्ररांभ भए गेल अछि संगहि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन ज्ञानपरक पोथीक भारतक 22 भाषामे अनुवादक योजनापर काज कए रहल अछि। एहि सबसँ माध्यम भाषे मे बदलाव आओत, जखनकि आवश्यकता एहि बातक अछि जे एहि भाषासभमे ज्ञानपरक सामग्री उपलब्ध हुए जाहिसँ समाजक आग्रह स्वतः एहि भाषासभक प्रति बनए आओर उच्च शिक्षामे भारतीय भाषाक संग-संग मैथिली सेहो अपन वृहत्तर दायित्वक सामंजस्यपूर्वक निर्वहन कए सकए। ई सब तखन संभव भए सकत जखन मैथिल (मिथिलामे निवास करए वला सभ जाति, वर्ग, धर्म एवं सम्प्रदायक लोक) अपन मौलिक चिंतन एवं शोधक माध्यमसँ एकर नेतृत्त्व करताह। भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक सम्पत्ति भाषाक उत्पति समाजमे भेल अछि आओर समाजक विकास भाषाक आधार पर होइछ। एहि तरहेँ भाषा आओर समाज दुनू अन्योन्याश्रित अछि। एहि मादे हम कहए चाहैत छी जे मैथिली भाषा कोनो जाति विशेषक सम्पत्ति नहि अपितु ई तँ सामाजिक सम्पत्ति थिक। सामाजिक व्यवहारे भाषाक मुख्य उद्देश्य अछि। भाषाक विकास आ संरक्षण समाजमे होइछ आओर एकर प्रयोग सेहो समाजमे होइछ। मैथिलीकेँ दूरगामी क्षति पहुँचाबैवला किछु लोकक कहब अछि जे घर-घरारी सदृश मैथिली सेहो हमरा सभक पैतृक संपत्ति अछि, जे कि सर्वथा अनुपयुक्त, किएकतँ सम्पूर्ण मिथिलामे रहएवला सभ वर्गक नेना जन्मेसँ अपन मातृभाषा मैथिली बजैछ। हमसब भाषाक बलेँ असगरमे सोचैत एवं मनन करैत छी मुदा ओ भाषा एहि सामान्य यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीक पर आधारित भाषासँ भिन्न होइछ। भाषा आद्योपांत समाजसँ संबंधित होइछ।भाषा एक सामाजिक सम्पत्ति अछि। एहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे कोनो साहित्यकार वा भाषाप्रेमी भाषाक निर्माता नहि भए सकैछ। भाषामे होइबला परिवर्तन व्यक्तिकृत नहि भएकें समाजकृत होइछ। भाषाक सामाजिक स्तर पर अन्तर भए जाइछ। विस्तृत क्षेत्रमे बाजल जायवला भाषाक आपसी भिन्नता देखल जाए सकैछ। सामान्य रूपमे सम्पूर्ण मिथिलाक लोक मैथिलीक प्रयोग करैछ,मुदा अलग-अलग क्षेत्रक मैथिलीमे पर्याप्त भिन्नता होइछ। एहन भिन्नता ओकर शैक्षिक, आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक,सांस्कृतिक तथा भौगोलिक स्तरक कारणेँ होइछ। पढल-लिखल लोक जतबा साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग करैछ, साधारण अथवा बिनु पढल-लिखल लोक ओतेक साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग नहि कए सकैछ। एहन स्तरीय बात कोनो भाषाक समय विशेषमे कएल गेल भाषा-प्रयोगसँ अनुभव कएल जाए सकैछ। विश्वक सबटा काजक संपादन प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ भाषेक माध्यमसँ होइछ इ तथ्य सर्वमान्य अछि। सबटा ज्ञान भाषे पर आधारित अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक संबंध वा समाज-व्यक्तिक संबंध भाषाक अभावमे असंभव अछि, इहो भाषाक सर्वव्यापकताक प्रबल प्रमाण अछि। मनुष्यक संग-संग भाषा सतत गतिशील रहैछ। समाजक संग भाषाक आरंभ भेल आओर आइ धरि गतिशील अछि। मानव समाज जा धरि रहत ता धरि भाषाक अस्तित्व बनल रहत। कोनो व्यक्‍ति वा समाजक द्वारा भाषामे कमोवेश परिवर्त्तन कएल जाए सकैछ, परंच एकरा समाप्‍त करबाक सामर्थ्य ककरोमे नहि रहैछ। भाषाक परिवर्त्तनशीलताकेँ व्यक्‍ति वा समाज द्वारा रोकल नहि जा सकैछ। संसारक सभ वस्तु सदृश भाषा सेहो परिवर्त्तनशील अछि। जेना-संस्कृतमे ‘साहस’ शब्दक अर्थ अनुचित वा अनैतिक काजक लेल उत्साह देखाएब छल, मुदा आब ई शब्द मैथिलीमे नीक काजमे उत्साह देखैबाक अर्थमे प्रयुक्त होइछ। भाषा परिवर्त्तनशील अछि। इएह कारण अछि जे सब भाषा एक युगक बाद दोसर युगमे पहुँचि कए बहुत फराक भए जाइछ। एहि प्रकारेँ परिवर्त्तनक कारणेँ भाषामे विविधता आबि जाइछ। जँ भाषा-परिवर्त्तन पर साफे नियंत्रण नहि राखल जाएत तँ तेजीसँ परिवर्त्तनक परिणामस्वरूप किछुए दिनमे भाषाक रूप अबोध्य भए जाएत। भाषा-परिवर्त्तन पूर्ण रूपसँ रोकल तँ नहि जा सकैछ, परंच भाषामे बोधगम्यता बनाकेँ रखबाक लेल ओकर परिवर्त्तनक क्रममे एकटा मानक रूप रहब अति आवश्यक। अन्ततः हम कहए चाहब जे भाषा अपन समाजक संप्रेषणक अन्यतम साधन थिक। एकर माध्यमसँ वर्त्तमान एवं अतीतकेँ परखल जा सकैछ संगहि ओकर भूत एवं वर्त्तमानक पृष्‍ठभूमि पर भविष्यकेँ देखल जा सकैत अछि। भाषा मुखरित भए व्यक्‍तिकेँ सम्प्रेषित करैछ, मुदा कतेको बेर मौन रहि सम्पूर्ण समाजक भावनाकेँ अभिव्यक्‍त कए दैत अछि। भाषाकेँ भाषेक माध्यमसँ बुझल जाइछ आ तेँ ई प्रक्रिया एतेक सरल प्रतीत होइत अछि। यद्‍यपि इहो देखल जाए सकैत अछि जे हमसब एकर सही क्षमताकेँ नहि आंकि दिगभ्रमित भए जाइत छी। अंततः समाजेकेँ बहुत रास चीज गमाकेँ एकर क्षतिक आकलन करए पड़ैत छैक, जे कि कोनो भाषाक विकासकेँ अवरूद्ध ओ गतिहीन बनबैछ। सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा आइ जखन विश्व-मानव इक्कैसम सदीक दोआरि पर ठाढ़ अछि, भारतीय गणतंत्र अपन सतसठिम वर्ष गाँठ मना चुकल अछि, खासकए एहन हालतिमे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक, जे मिथिलाक एकटा भूभाग अछि, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक अवलोकन, विश्लेषण आओर ओकर पुनर्निर्माणक आवश्यकता बहुतो दिनसँ अनुभव कएल जाए रहल अछि। एहि क्रममे साक्षात् होइछ किछु विषय, जेना- गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे आजादीक सतसठि वर्ष कोना बीतल? भारतीय गणतंत्रक एगारहम (11) पंचवर्षीय योजनाक एहि क्षेत्रमे की परिणाम निकलल? एहि क्षेत्रक वर्त्तमान स्थिति केहन अछि? एकर अध्ययन एक गोट आकर्षक विषय अछि; कारण जे आब हमरासबकेँ एकटा स्वतंत्र मिथिला राज्य चाही। सर्वप्रथम गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक भौगोलिक परिवेश, पर्यावरण आ परिस्थितिसँ परिचित भेल जाए। ई अछि बिहारक उत्तर पूर्वांचल क्षेत्र- नदी संस्कृतिक परिशिष्ट भूमि, मैथिली भाषायी प्रदेश.... एहि क्षेत्रक शीर्ष पर अछि नेपालक सप्तरी आओर मोरंग राज धन-धान्यबला प्रांगण... गांजाक खेती तथा ओकर तस्करी.... एकर नीचाँक भाग अछि- दक्षिण गंगाक कछेर ...झरवेर, पटेर, झौआ, बांस तथा अनकठ-गाछक जंगल- कछेरसँ कछेर धरि कतोक कोसक बीहड़! जतए चोर-डकैतक आतंकसँ भयंकर राति लग-पासक लोकक नीन हराम करैत रहैत अछि। कज्जलबन नामधारी एतुका खोपड़ीवला गाम, जे बासाक रुपमे बसैत आ उजड़ैते रहैत अछि, जकर कतहु कोनो स्थायी अस्तित्व नहि- आइ एतएतँ काल्हि ओतए। आखिर कछेर पर बसल लोकक अस्तित्वे की? कखनहुँ प्राकृतिक आपदासँ राति-दिनु सामना तँ कखनो भूखमरीक समस्या, ई तँ साधारण व्यक्तिक दैनन्दिनी, एहीमे किछु एहनो जे अपन लूटि-खसोटिसँ अर्जित सम्पत्तिक भंडाफोड़ भए जएबाक डरसँ प्रशासनकेँ रोकबाक लेल कृतसंकल्पित, मुदा स्थिति दुहूक एकहि अर्थात् सुतलोमे सदिखन जगले रहबाक हेतु विवश। एकर दोसर भाग अछि कोशीक उपत्यका.... कास एवं मोथा वला घाससँ आच्छादित मैदान। एहि भू-भागक पूरबमे पश्चिम बंगाल एवं बंगला देशक सीमा तँ पश्चिममे अछि सारन तथा चम्पारनक भोजपुरी भाषी गाम! एही सीमा-रेखासँ बान्हल ई छोटसन द्वीप खण्ड जकर गाम, शहर तथा कसबाक अपन इतिहास छैक जे कखनहुँ कोशीक ताण्डवक बीच भसिआइत रहल, तँ कखनहुँ ओकर कछेरक लोककेँ बीतल संस्कृतिक बोध करबैत रहैत अछि। एहि कोशीक भौगोलिक पृष्ठभूमि एकहि सङ्ग अत्यन्त मनोहारी ओ कुख्यात रहल अछि। एतुका पुरबा बयारमे भोर-साँझ एक दिस जतए कृषि कार्यक सुगन्धि व्याप्त रहैत अछि तँ दोसर दिस विभिन्न जीव जन्तुकेर अवसानक दुर्गन्ध, हँ बीच-बीचमे भिन्न-भिन्न माछक सुकठिक गन्ध-सुगन्धि सेहो....भने हम किछु गोटए ओकर गन्धसँ नाक सिकोड़ि ली, मुदा पड़ोसी बंगाली मोसाएसभक निन्नतँ एकरहि सुगन्धिसँ खुजैत छनि। एकर पच्छिम कुशगामा गाम अछि- कुश आ काससँ आच्छादित भूखंड, उत्तर नेपालसँ सटल कुनौली आ दक्षिण बुढ़िया कोसीक कछेर, जतए नदी समय-समय पर कालबद्ध भए अपन बाट बदलैत रहल छथि.... कखनहुँ पाँच-सात कोसक लपेटमे बालु आ परती-पराँत भू-भाग तँ कखनहुँ धरतीक हरिअरीकेँ सज्जित-सुसज्जित करैत शस्य श्यामला। बिहारसँ बहएवाली गंगाक उत्तरी कछेरक विस्तार- तिरहुत, दरभंगा, कोशी तथा पूर्णियाँ प्रमण्डल एवं नवगछिया अनुमंडलक लगभग 56,980 वर्ग किलो मीटर क्षेत्रमे अछि। हिमालयक गिरिपादमे बसल गंगाक ई उत्तरी मैदान कौशिकी अपन सर्वाधिक उर्वर-भूमि एवं उन्नत संस्कृतिक लेल आदिकालहिसँ मानव समुदायक आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। किएक नहि हो भला? हिमालयसँ निकलि कए गंगा मिलन करएवाली- घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, बलान, बागमति, कोसी तथा महानंदा सदृश सालो भरि पानि भरल नदीसँ अभिसिंचित ई भूमि भला ककरा ने नीक लगतैक? नदी-चओर, बाड़ी-फुलबाडी, खेत-खरिहान, गाछ-बिरिछ, पशु-पक्षी, अन्न-फल, तीमन-तरकारी आर माछ-दूधसँ सम्पन्न ई चौरस मैदान अपन कोरामे मैथिल संस्कृतिकेँ पोषण दए रहल अछि। एतबे नहि शस्य-श्यामल, हरित-पीत वसन पहिरने एहि कौशिकीक गौरव-गाथा गुनगुनएबाक इच्छा हो तँ मनन करू मैथिली, हिन्दी आर बंगलाक भाषा- साहित्य। सर्वविदित अछि जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जलवायु, मौसम एवं भौगोलिक स्थिति अत्यन्त मनमोहक, रुचि पूर्ण आ अनुकूल अछि। समतल मैदानमे प्रकृति अपन समस्त सम्यकताक संग उपस्थित भेल छथि। ई ओ क्षेत्र थिक जतए जीवन नहि तँ अतिशय गर्मीक कारण झुलसैछ आ नहि अत्यधिक जाड़सँ ठिठुरैछ। बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न समशीतोष्ण वातावरणक ई समतल भूमि अकूत प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन रहितो सोचबाक हेतु बाध्य करैछ जे हमसभ प्रतियोगिताक एहि विश्व-बाजारमे किएक पिछड़ैत रहल छी? अदौसँ कृषि मानव-जीवनक अनिवार्य आ आधारभूत उद्योग अछि। एतए एक बेर फेर किंकर्त्तव्यविमूढ़क स्थितिमे अपनाकेँ पबैत छी जे मूलतः कृषि आ तद्जनित उद्योग पर आधारित जीवन-यापन करएवला गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जन समुदाय इक्कैसम सदीक स्वागत कोन अक्षत-चंदन आ फर-फूलक भोग लगाकेँ करए? कौशिकी भारतीय गणतंत्रक ओ हिस्सा थिक, जतए आजादीक सतसठि साल बादो 85.5% लोक कृषि पर आधारित जीवन-यापन करैत छथि, जाहिमे 70%सँ बेसी भूमिहीन मजदूर, 20%सँ बेसी छोट किसान आ 5%सँ कमे पैघ काश्तकार छथि। फलतः आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रमे भूमि-विवाद विकराल रूप धारण कए सामूहिक नर-संहारकेँ जन्म दैत रहल अछि। एहि भूमि-विवादकेँ नहि तँ बिनोबाक भूदान आन्दोलन शान्त कए सकल आ नहि तँ कम्युनिष्टक कोनो लड़ाइ वा सरकारेक कोनो नीति। आइयो एहि क्षेत्रसँ नहि तँ सामंतशाही टूटल अछि आर नहि तँ हदबन्दी-चकबन्दी योजना सफल भेल अछि। मुदा नारा फेर वैह लगाओल जाए रहल अछि--‘इन्कलाब जिन्दाबाद’, ‘हमरा हमर धरती दियऽ।’ आखिर फेरसँ ई नारा किएक?..... ककर धरती आ ककर देश? हमरा तँ हमर देश भेटि गेल, हमर धरती भेटि गेल। तँ फेर?....नहि-नहि, धरतीक मालिककेँ धरती नहि भेटल। .... धरती ओकरे होइछ, जे धड़सँ धार बहाबैत अछि; कन्हा पर जे हर-फार उठबैत अछि.... तखन एहि धरतीक असली मालिक अछि के?....??? नहि, नहि, नहि। नाना प्रकारक विसंगतीसँ जूझैत एहि देशक आ एहि प्रश्नक एकेटा उत्तर अछि- हजारक हजार, लाखक लाख लोक जे पुआरमे सिकुड़ि, फाटल-चीटल कपड़ामे जाड़क पैघ राति गुजारि लैत अछि। भारतीय गणतंत्रक आरम्भिक कालमे पंचवर्षीय योजनाक अन्तर्गत हरित-क्रांतिक लप्पो-चप्पोक संग गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे सेहो विभिन्न नदी योजना (सन् 1955 मे कोसी नदी योजना आदि) एवं कृषि आधारित उद्योग धंधाक विकास कार्य आरम्भ भेल; मुदा शीघ्रहि एहि क्षेत्रक एक-एक कए चीनी, चाउर आ जूट मिल बन्न भए गेल अर्थात् नदी-योजना टाँइ-टाँइ फिस्स। नहि तँ पनबिजली (20 मेगावाट, कटैया) उत्पादन भेल आर नहि तँ नहर-योजनाक पटौनी व्यवस्था किछुओ चमत्कार देखा सकल। अनेक बाढ़-नियंत्रक योजना सभक लूट होइत रहल आ बाढ़ि अपन तबाही मचबैत रहल। पटौनीक पर्याप्त व्यवस्थाक नाम पर लूट चलैत रहल आर सुखाड़मे ई क्षेत्र जरैत रहल। आश्चर्यक विषय थिक कि नहि, जे आजादीक सतसठि वर्ष बितलाक आ एगारहम पंचवर्षीय योजनाक समाप्तिक बादो बिहार सरकार अखन धरि मात्र 14.83 लाख हेक्टेयर भूमिमे वास्तविक पटौनीक सुविधा उपलब्ध करा सकल अछि; जखन कि बिहारक अधिकतम 122.89 लाख हेक्टेयर जमीनक पटौनी सुविधाक आवश्यकता अछि। एहिमे तँ कोनो शक नहि जे बिहारक सिंचाई विभाग लूटक एकटा पैघ केन्द्र रहल अछि। तेँ तँ जाहि परियोजनाक पूर्ण होएबामे महज 8 करोड़ रूपैयाक खर्च अबिते, ओकरा बिहार सरकार 30 वर्षसँ लगभग 66 करोड़ रूपैया खर्च कएकेँ पूरा नहि कए सकल अछि। फलतः ओहि परियोजनाकेँ एगारहम पंचवर्षीय योजनामे सेहो सम्मिलित कए लेल गेल। ई कोनो उलटबासी नहि अछि-- सत्ता आ राजनीतिक खेलमे सब किछु जायज अछि? पटौनीक व्यवस्था गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक कृषि-संस्कृतिक लेल कतबा अहम्, अनिवार्य आ अपेक्षित अछि? किऐकतँ समुचित पटौनी-योजनाक विकास आ सफल क्रियान्वयनसँ एहि क्षेत्रकेँ नहि तँ केवल सुखाड़सँ बचाओल जाए सकैत अछि, अपितु जल-वितरणक समुचित व्यवस्था कए बाढ़िसँ सेहो एहि क्षेत्रक रक्षा कएल जाए सकैछ। बाढ़ि आ सुखाड़ सदृश प्राकृतिक आपदासँ बचाव होइते एहि क्षेत्रक आधि-व्याधि, दुःख-संताप सभ किछु दूर भए जाएत। मुदा ओएह गप्प, बिलाइकेर गरदनिमे घण्टी के बान्हत? जखन दुनियाक सबसँ उपजाऊ जमीनमे सँ एक गंगाक उत्तरी मैदान पर बसए वला जन-समुदायक एहि औद्योगिक-पूंजीवादी वैज्ञानिक युगमे एतबा खास्ता हाल भए जाए तँ आश्चर्य होइत अछि अपन पूर्वजक सोच पर जे अपन संततिक रक्षार्थ एहि नदीक कछेर, समतल मैदानमे अपन सभ्यता आ संस्कृति विकसित नहि कए सकलाह। ध्यान देबाक छैक जे बीसम सदीक उत्तरार्द्धमे भारतक कोन रंग विकास-यात्राक अग्रिम सोपान मानल जाइत छल? लोक पहाड़ी आ पठारी भागक तुलनामे समतल मैदानमे बसब बेसी पसंद करैत छलाह; किएक तँ ई सामान्य धारणा छल जे पहाड़ी प्रदेशमे जीवन कने कठिन होइत अछि, जखन की समतल मैदानक जिनगी सरल। गंगाक उत्तरी किनार विशाल समतल मैदान अछि। जाहिमे बिहारक 60% आवादी निवास करैत छथि; जखन की ई क्षेत्र बिहारक कुल क्षेत्रफलक 40% अंश थिक। ई भारतक सर्वाधिक आबादी घनत्व (885 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर) वला क्षेत्र अछि। विचारणीय अछि जे आजादीक सतसठि वर्षसँ भारतीय गणतंत्रमे ओ केहन शतरंजी राजनीति चलैत रहल जे आइ गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक लोक सबसँ बेसी चिंतित छथि? चिंता स्वाभाविक छैक। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक एहि पछुआएल क्षेत्रमे नहि तँ उर्जा-स्रोत अछि, नहि तँ कोनो सफल उद्योग; नहि तँ वैज्ञानिक कृषि-तकनीकि अछि आ नहि तँ उन्नत यातायात। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक ई समतल इलाका आइयो लालटेन युगमे जीवन बसर कए रहल अछि। बिहारक एहि क्षेत्रमे गामक परिकल्पना करैत लालटेन युगक बात के कहय, एतएतँ शहरोमे अन्हारे पसरल अछि। कारण स्पष्ट छैक- एहि क्षेत्रमे पनबिजली आ ताप विद्युत उत्पादनक विकासक दिशामे आइ धरि सरकारक डेगे नहि बढ़ल अछि। सन् 1971-72 मे गंगाक उत्तरी मैदानी भागक प्रति व्यक्तिक बिजली-खपत क्षमता मात्र 10.10 किलोवाट प्रतिघंटा छल जखन कि एही वर्ष गंगाक दक्षिणी मैदान आ छोटानागपुरमे उर्जाक खपतक क्षमता क्रमशः 41.5 किलोवाट एवं 201.9 किलोवाट प्रतिव्यक्ति प्रतिघंटा छल। मानल तँ इएह जाइछ जे उर्जा-खपतक क्षमता जीवन-स्तरक सूचक होइत अछि। उर्जा-स्रोत सदृश यातायातक विकास सेहो कोनो क्षेत्रक सर्वांगीण विकासक कारण आओर परिणाम होइत रहल अछि। किएकतँ यातायात ओहि ठामक जनजीवनकेँ मात्र आवागमनक सुविधे नहि प्रदान करैत अछि, अपितु उत्पादनक आयात-निर्यात एवं वितरण-उपभोग द्वारा ओहि ठामक जीवन-स्तरकेँ सेहो प्रभावित करैछ। एहि वैज्ञानिक युगमे मनुक्ख जल, थल आओर नभ सदृश तीनू मार्ग पर विजय प्राप्त कए लेने अछि। मुदा दुर्भाग्य छैक जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे हवाई अड्डाक संख्या ईकाई अंककेँ पार नहि कए पओलक अछि। आइयो एहि क्षेत्रमे एहन मैथिल भेटि जएताह जे हवाई जहाज नहि देखने छथि; किएकतँ कहियो-काल कोनो सरकारी कार्यक्रमक अवसरे पर कोनो हवाई जहाज एहि क्षेत्रमे उतरैत अछि। हवाई-मार्गक विकास नहि भेलासँ एहि क्षेत्रक लोककेँ कोनो मलाल नहि छनि; किएकतँ एहन खर्चावला यात्राक हेतु क्षमतो तँ होएबाक चाही? मुदा दुख अछि तँ एहि बातक जे कमे खर्चमे सुगम यात्रावला जल मार्ग, जकर विकासक अकूत सम्भावना एहि क्षेत्रमे बनैत छैक, किएकतँ एतुका सभ नदीमे सालो भरि पानि रहैत अछि, तकरो हाल तँ ओएह छैक। रहल-सहल एक मात्र थल मार्गक विकासमे सरकार सतसठि वर्षसँ प्रयासरत अछि, मुदा नतीजा ढाकक तीन पातक बराबरिओ नहि निकलैत अछि। एक दिस भारत सरकार मैट्रो रेलवेक विकासमे लागल अछि; आ दोसर दिस ई क्षेत्र बड़ी रेल लाइन मधेपुरा-कटिहार एवं सहरसा-फारबिसगंज शाखाक लेल संघर्षरत अछि। आइ जखन विश्व-बैंक सम्पूर्ण दुनियामे सड़कक जाल बिछैबाक लेल प्रयासरत अछि, तखनो एहि क्षेत्रक कतेको अनुमंडल जिला मुख्यालयक सड़क मार्गसँ जुड़बाक लेल लालायित अछि। एहनो नहि छैक जे सड़क योजना-मदमे कम खर्च भेल अछि। मुदा ओ तँ भारतीय नौकरशाहीक लूटक कमाल अछि जे बहुत रास देशी-विदेशी योजनाक बादो एतुका खाधि सबमे सड़क आ कि सड़कमे खाधि से ताकब मुश्किल अछि। योजना-कार्यालयसँ ठीकेदार धरिकेर पसरल लूट तंत्रक परिणाम भुगतैत सड़क आइ गिट्टी आ अलकतराक लेल तरसि रहल अछि। जा धरि सड़ककेँ ‘भूमि क्षरण’आ पानिक बहावसँ बचाओल नहि जाओत-- ता धरि मजबूत सड़क सेहो टिकाऊ नहि भए सकैत छैक, मुदा लूटक शिकार बनल ई सड़क एहिना कहिआ धरि टिटिआइत रहत? सर्वाधिक सघन आवादीकेँ पालन-पोषण देबाक एकमात्र साधन अछि-- पारम्परिक कृषि। एम्हर भारत सरकारक कृषि-नीतिक हाल ई अछि जे पंचवर्षीय योजनामे कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्रक विकासक लक्ष्य दिनानुदिन घटबैत जाए रहल अछि। पंचवर्षीय योजनाक माध्यमसँ भारत सरकार भनहि पंजाब एवं हरियाणामे हरित-क्रांति आनि लेने होअए-- मुदा गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी आइयो अपन बदहाली आ बदकिस्मतीक गीत गाबि रहल अछि। आइयो ई क्षेत्र भारत एवं बिहार सरकारक कृपा-दृष्टिक लेल लालायित अछि। आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमतामे 100% क वृद्धि भेल ; जखन कि एतबहि दिनमे एहि क्षेत्रक जनसंख्यामे 125% क वृद्धि भेल अछि। आब एहि क्षेत्रमे आओरो कृषि-भूमिक विस्तार सम्भव नहि अछि। हँ, कृषि-विज्ञानमे वैज्ञानिक तकनीकी विकास कए एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमताक विकास कएल जाए सकैत अछि; परंच प्राकृतिक संसाधनक वैज्ञानिक विकासक अभाव आ अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट एहि क्षेत्रक सामाजिक-आर्थिक हालतिकेँ बदतरि बना देलक अछि। फलस्वरूप एतए बेरोजगारीक एहन भयानक विस्फोट छैक जे जनसेवा, गरीबरथ, महानंदा, नार्थ-ईस्ट एवं दिल्ली तथा पंजाब जाइबला सभ ट्रेन एहि क्षेत्रसँ पलायन कएनिहार मजदूरकेँ ढोएबाक कीर्त्तिमान स्थापित कएल अछि। मजदूर सभक पलायनसँ दिल्ली सरकार चिंतित भए रहल अछि। की, ई भारतीय गणतंत्रक असमान विकास गतिक प्रमाण नहि थिक? की, भारत सरकारक श्रम एवं कल्याण मंत्रालयकेँ एकर चिंता नहि करबाक चाही? मजदूरक बहुसंख्य पलायन एहि क्षेत्रक अनियंत्रित आबादी आ श्रम-नियोजनक अभावक परिणाम एवं प्रमाण थिक। आइ आजादीक सतसठि वर्ष बाद भारतक संसदीय राजनीतिमे क्षेत्रीय दलक बढ़ैत दबाव स्पष्ट देखा रहल अछि। मुदा आइ धरि गंगाक उत्तरी मैदानी भाग अर्थात मिथिलाक समस्याकेँ केन्द्रमे राखि राजनीति जन्म नहि लए सकल अछि। अतः आवश्यकता छैक गंगाक उत्तरी मैदान अर्थात मिथिलाक सांस्कृतिक समुदायक सामूहिक राजनीतिक हस्तक्षेपक, जे भारतीय गणतंत्रमे एहि क्षेत्रक समस्याकेँ केन्द्रमे राखिकए एकर अधिकारक लेल संघर्ष करए। कोनो क्षेत्रक पर्यावरण ओतुका जन जीवनक प्राण होइत अछि। गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी समशीतोष्ण वातावरण, अपार जल, बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न अछि। कहल जाइत अछि जे अकबरक जमानामे जखन भूमि बंदोबस्त करए टोडरमल जी एहि क्षेत्रमे आएल छलाह तँ ई क्षेत्र एक गोट घनघोर जंगल छल। नतीजतन भूमिक बंदोबस्ती नहि भए सकल। मुदा अकूत प्राकृतिक संसाधन एवं अनुकूल पर्यावरणक कारण एहि क्षेत्रक जनसंख्या तीव्र गतिसँ बढ़ैत गेल। बढ़ैत आवादीकेँ पोषण देबाक हेतु जंगल काटिकए खेती योग्य जमीन बनाओल गेल। तखन पारिस्थितिक संतुलन बिगड़बाक डर किनका छलनि? परंच आइ एहि क्षेत्रक साठि वर्षीय सभ व्यक्ति बेबाकीसँ कहि सकैत अछि जे एहि क्षेत्रक सभ नदी कृशकाय भए गेल अछि। सामान्यतः गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक मूल भौगोलिक समस्या अछि-- बाढ़ि, सूखार, अनियंत्रित वन विनाश, मृदाक्षरण, नदीसँ पानिक सूखब शुभ संकेत नहि अछि। ई दुबर-पातर होइत नदी रहि-रहिकए बरसा मासमे अपन तामसकेँ जगजाहिर करैत सम्पूर्ण क्षेत्रकेँ बाढ़िक चपेटमे लए लैत अछि। एहि नदी सभक तामसकेँ बुझए पड़त। ई बान्हल नदी जाहि रफ्तारसँ एहि क्षेत्रकेँ बालूक ढेरमे बदलैत जाए रहल अछि, जाहि गतिसँ एहि जमीनसँ पैघ गाछसभ समाप्त भए रहल अछि-- ओ एहि क्षेत्रकेँ रेगिस्तानमे बदलि जएबाक संकेत दैछ। ओहुना हिमालयक ग्लेशियर फटबाक आतंक पूर्वेसँ एहि क्षेत्र पर मौजूद अछि। पर्यावरण केँ लएकए हाय-तौबा मचाबैवला लोकक नजरिसँ किऐक ओझल अछि ई क्षेत्र कौशिकी। पृथ्वीक ई सुन्दरतम अंश गंगाक उत्तरी समतल मैदान कौशिकी आइ पारिस्थितिक असंतुलनक भंवर जालमे फँसि गेल अछि। आजादीक आरम्भिक सालमे नहरक काते कात वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाओल गेल, मुदा रख-रखावक अभावमे ओ हरियर हरियर गाछो सुखिकए रक्षकक भक्षण भए रहल अछि। खासकए सुपौल, सहरसा, अररिया आ मधेपुरा जिलाक नहर-शाखाक काते कात लगाओल शीशोक गाछ पानिक बिना सुखिकए जारन भए गेल। बेचारा नहरे की करत? ओ तँ अपने पिआसल अछि, तखन खेत आ गाछकेँ कतएसँ पानि पिआओत? उत्तम नस्लक पशु एवं चरागाहक अभाव, कृषि-भूमि पर जनसंख्याक बेस दबाव, स्थिर आ असंतुलित औद्योगिक प्रगति, शक्ति स्रोतक अल्प विकास तथा जनसंख्या एवं संसाधनक बीच असंतुलनक वृद्धि, तेँ आवश्यक अछि-- भूमि-संरक्षण, वृक्षारोपण एवं जलाशयक सुरक्षा कए एहि क्षेत्रक पर्यावरणकेँ बचाएब। एहि क्षेत्रक नदी सभकेँ बान्हसँ बान्हब बान्हक काते-कात वृक्षारोपण द्वारा जंगल उगाएब, यातायातक लेल सड़क मार्ग विकसित करब, नहर योजना द्वारा सिंचाई आ उर्जाक व्यवस्था करबाक चिर आकांक्षित सपनाकेँ साँच करबाक आवश्यकता अछि जे आब मिथिला राज्य बननहि सम्भव अछि। मिथिला राज्य आब हमरासभक हेतु प्राण-वायु सदृश् आवश्यकता बनि गेल अछि, जकर अभावमे एहि क्षेत्रक विकासकेर सपनो देखब असम्भव सन बुझबामे आबि रहल अछि। यद्यपि दोष अनका पर मढ़ब अति साधारण छैक, अपन दोष-अपन कर्मच्युतताकेँ जँ देखबाक सामर्थ्य हमसभ मिथिलावासी प्राप्त कए ली तँ ककर सामर्थ्य छैक जे हमरासभकेँ अपन अधिकारसँ वंचित करत। मुदा, की हमसभ अपन-अपन छाती पर हाथ राखि एहि विषयक गॉरन्टी दए सकैत छी जे हमसभ सबतरि अपन कर्मपथ पर सजग-सतर्क भए प्रयासरत छी? हमरा जनैत जँ केओ एकर गॉरन्टी देबाक असफल प्रयास करबो करताह तँ कमसँकम ओहि राति तँ हुनका निन्न निश्चये नहि होएतनि। कतेक सोचनीय विषय अछि जे मिथिला क्षेत्रक तथाकथित पब्लिक विद्यालयमे बंगलाक सङ्ग-सङ्ग आनो क्षेत्रीय भाषा पढ़ाओल जाए रहल अछि, मुदा मैथिली नहि। मैथिलीकेँ संवैधानिक मान्यता भेटबासँ पूर्व ओहि विद्यालयक संचालक महोदयलोकनिक कहब छलनि जे मैथिली पढ़ि की होएत? मुदा आब? आब तँ मैथिली पढ़ि भारतक सबसँ पैघ परीक्षा यूपीएससी पास कएल जाए सकैछ, तखन आब कोन समस्या? हँ समस्या अछि मानसिक हीनताक, जाहिसँ एखनहुँ धरि हमसभ निकलि नहि सकलहुँ अछि। ई तथाकथित विद्यालय चलौनिहार केओ कि मिथिलासँ बाहरक छथि, तखन फेर एना किएक? तेँ आवश्यकता अछि जे हमसभ सबसँ पहिने निचुला स्तरसँ एहि दिसमे आगाँ बढ़ी तँ परिणाम सार्थक भए सकैछ। जँ मिथिलावासी निश्चय कए लेथि जे सम्पूर्ण मिथिलाक पढ़ाइ ओकर मातृभाषाक माध्यमे होएत, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ मिथिलावासी अपन आवेदन मात्र मैथिलीमे लिखब प्रारम्भ कए देथि, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ हमसभ अपन पावनि-तिहारमे अपन संस्कृतिकेँ बढ़एबाक निश्चय कए ली तँ फेर के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? मुदा, ई तँ होएत नहि, कारण जे हमसभ तँ “तीन तिरहुतिआ तेरह पाक”मे विश्वास करैत आएल छी आ तकरे फल उठाए हमर-अहाँक संस्कृतिकेर दुश्मन लोकनि मैथिलीकेँ जाति-विशेषसँ बान्हि अपन मनोवांछित फल प्राप्त करबाक प्रयासमे लागल छथि। यद्यपि आशा नहि पूर्ण विश्वास जे ओ दुश्मनलोकनि कहिओ अपन एहन नीच कर्ममे सफलता प्राप्त नहि कए सकताह, मुदा हमर प्रयासकेँ शिथिलतँ कइए सकैत छथि। तेँ आवश्यक अछि जे हमसभ एकजूट भए एहि दिशामे सोची आ अपन पीठ थपथपएबासँ पूर्व दोसराक पीठ थपथपएबाक कार्य करी। ई दृढ़ विश्वास रखबाक आवश्यकता छैक जे ककरहु नीक कार्यक फल आइ-ने-काल्हि भेटबे करतैक, ओकर कार्य जनसाधारण द्वारा चिन्हले जएतैक। तेँ शुद्ध मनसँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीक विकास दिशामे सोचनिहारकेँ आगाँ आबि नेतृत्व सम्हारबाक आवश्यकता अछि जे अदौसँ आबि रहल मिथिलाक मांगकेँ पूरा करबाक सामर्थ्य प्राप्त करताह। कोशीमे बिताओल एक दिन की कहू बहुत दिन पर 1जून 2012केँ कॉलेज गेल रही। कॉलेज की गेलहूँ जेबी खाली होएब प्रारंभ भए गेल। पहिनेतँ सेक्रेटरीक नैतक जन्म-दिन पटनासन शहरकेँ छोड़ि कोशीक कछेर पर बसल ‘बलुआहा’ आ पूर्वी तटबन्धक कात मे स्थापित हमरा सभक कॉलेज माने शिक्षकक, छात्रक, समाजक कॉलेज नहि अपितु सेक्रेटरीक वैयक्तिक सम्पत्ति कॉलेज मे मनाऔल जा रहल छल। एहि अवसर पर शिक्षित आज्ञाकारीक फौजमे हमहुँ शामिल छलहुँ। जहिना ओहि ठाम पहुँचलहुँ कि सेक्रेटरीक नजरि हमरा पर पड़तहि कहि उठलाह, “ओ अरूण बाबू कहिया अएलहुँ, खोजो- खबरि नहि रखैत छी, एनामे कोना काज चलतै? अपनेतँ मैसूर जाएकेँ हमरा सबकेँ बिसैरियै गेलहुँ। मुदा हम अहाँ सभक लेल कतेक खटू। आब हमरो उमैरि भेल। अहाँ तँ जनितै छियैक जे, जे काज टाकासँ हैतेक ओतँ टकै करते ने। देखियौक ने टाकाक अभावमे कॉलेजक छतक ढलाई रूकल अछि। आ, एकटा बात जानलहुँ कि नहि एहि बेरसँ फस्ट पार्ट मे एडमिशन सेहो होएत।” तखनहि हुनक नैत आबि कहैत छैक नानाजी हमरा पैसाब लागल अछि, हम कतए पैसाब करब से एहि ठाम कतहुँ बाथरूम कहाँ देखैत छियैक; ताहि पर ओहि ठाम एम.ए. पासक जमघट बाजि उठलाह एतेकटाक फील्ड अछि कतहु अहाँ पैसाब कए लिअ। ओ बच्चा कनेक काल चुप रहल आ बाजल एना कतहुँ खूजलमे बाथरूम कएल जाइत छैक जँ इन्फेक्शन भए जाएत तँ? नामी-गिरामी विश्वविद्यालयसँ प्राप्त डीग्रीधारीक लेल एहि प्रश्नक कोनो उत्तर नहि छल। छौड़ू हमहूँ कोन फेरामे फँसि गेलहुँ जे आधुनिकता आ वैज्ञानिकता एवं प्रकृति आ परंपराक बखानमे ओझराइत जा रहल छी। अखन जन्म-दिनक कैक कटबामे एवं मौसक भोजमे बिलम्ब छल। भगवान जी, अरबिन्द जी, प्रांजलभाइजी एवं विजय चाचाक विचार भेल जे किऐक नहि एहि बीचक समयमे कोशी पर बनैत पूल देखल जाय। सभगोटे ए.सी.सँ सुसज्जित गाड़ीमे बैसलहुँ एवं कोशी बान्ह दिस बिदा भेलहुँ जे कॉलेजसँ मात्र एक किलोमीटर पर छल। ‘बलुआहा’ बाजारमे ओ लोकनि अपन-अपन पसंदक हिसाबसँ खैबा-पिबाक लेल वस्तु-जात किनैत गेलाह एवं गाड़ीकेँ बान्ह पर लगा सबगोटे ओतुका दृश्य एवं बनैत पूलक कार्यक गतिशीलताक आनन्द खाइत-पीबैत लैब प्रारंभ कएल। एहि ठाम हम एकटा बात कहि दी जे विजय चाचा जनिका हम कहलहुँ ओ हमर छोट माय रंजनक ससूर श्रीचन्द्रकुमारसिंहक दियाद भेलाक कारणेँ चाचा भए गेलाह मुदा एहि सम्बन्धसँ बहुत पहिनहिसँ हमरा हुनका बीच परिचय छल, तहिया ओ केवल हमरा लेल विजय जी छलाह। ओ अपन पंचायतक प्रधान (मुखिया) सेहो छथि। हिनक परिचय एतबेमे खत्म नहि भए जाएत अपितु ई सहरसा जिलाक महिषी प्रखण्डक सबसँ पैघ जमींदार स्व. गंगा बाबूक एकलौता पुत्र सेहो छियाह। करीब सतरह वर्ष पहिने प्रो. (डॉ.) सुभाषचन्द्र सिंह (मैथिली प्राध्यापक, ए.एन.कॉलेज, पटना)जीक आवास बहादुरपुर पर जखन हुनकासँ परिचय भेल छळ एवं परिचय जखन आत्मीयतामे परिवर्त्तित भए गेल छल तखन ओ कहने छलाह कहियो अहाँ हमर गाम चलू; हम अहाँकेँ कोशी नदीमे नाह पर बैसा झिल्लहरि खैलबाक आनन्द दियैव एवं कोशीक ओहि पारक अपन कचहरी (कामत, बासा) देखाएब। समय सापेक्ष नहि भेलाक कारणेँ एहन संभव नहि भए सकल छल। मुदा आइ कोशी बान्ह पर गप्पक क्रममे ओतेक वर्ष पहिनुका बात चलि पड़ल। ओ बाजि उठलाह अरूण जी आब हमर कचहरी पर चारि चक्का चलि जाइत अछि। हम ई सुनि विस्मिततँ भेवे कएलहुँ एवं अविश्वसनियता सेहो बनल रहल। बान्है पर सबगोटेक बिचार भेल जे तेसर दिन हम सब कोशीक ओहि पार कचहरी पर जाएब एवं ओहि ठाम दिन-रातिक भोजन कए रातिएमे वापस भए जाएब। विचय चाचा ओहि ठामेसँ मोबाइलक माध्यमे अपन कचहरीक मैनेजरकेँ बीस-पच्चीस गोटेक दिनुका एवं रतुका भोजनक व्यवस्था करबाक लेल आवश्यक निर्देश दए देलन्हि। हम सब कॉलेज आबि भोजनोपरांत सहरसा घुरि गेलहुँ। पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमक अनुसारेँ कोशीक पूबरिया एवं पछबरिया धारक बीच अवस्थित झारा पंचायतक शिशौना गाम जैबाक जे तिथि निश्चित छल ओकरा प्रति हम कनेक उदासीन छलहुँ किऐकतँ सूर्य भगवानक प्रकोपक कारणेँ प्रचण्ड गरमीमे घरसँ बहरैब लू केँ आमंत्रण देब सन छल। की कहू निर्धारित तिथिकेँ फोनक घंटी बाजब प्रारंभ भए गेल एवं हमरो जाइए पड़ल। सहरसासँ जाइबलाक लेल दूटा ए.सी. युक्त स्कारपियो लागल एवं हम सब ओहिमे सबार भए बिदा भए गेलहूँ ‘उजड़ैत गाम आ बसैत शहर’क वास्तविकताक अवलोकनार्थ। ए.सी.युक्त गाड़ी एवं ढण्ढ़ा पेय पदार्थक कारणेँ यात्रामे कोनो बैस तकलिफ नहि भए रहल छल। हम सब बलुआहा मे कोशी पर बनै वला पूलाक एप्रोच पूलपरसँ टपि ओहि पार शिशौना गाम दिस बढ़लहुँ। ओहि पंचायतक प्रधान (मुखिया) श्री अरूण यादव जकर पैतृक गाम शिशौने अछि सेहो हमरा सभक स्वागतार्थ एवं रस्ता मे कोनो तरहक तकलिफ नहि हो ताहि लेल हमरासभक संग छलाह। कामत पर शीघ्रताशीघ्र पहुँचबाक लेल सड़क मार्गकेँ छोड़ि कोशी नदीक काते कात गाड़ी बढ़ए लागल। बाढ़ अएबासँ बहुत पहिनहि कोशीक कटनियाँ एवं ओहिसँ उपटैत लोकक दृश्यसँ हृदयतँ द्रबित भैवे कएल एवं कोशी मैयाक एहन ताण्डवसँ डरो भेल जे कही हमरहुँ सभक गाड़ी कटनियाँक कारणेँ नदीमे नहि समा जाय। ओहि ठामक लोकक जीवन हमरा नजैरिमे कतेक दुरूह छल से हम अपन लेखनीसँ उजागर करी एहन सामर्थ्य हमरामे नहि अछि। ए.सी. युक्त गाड़ी रहलोपरांत हमसब सुरूज भगवानक क्रोध महसूस कए रहल छलहुँ परंच ओहि ठामक नेना भूटका, पैघ-वृद्ध सभ कयो अपन-अपन काजमे मस्त छल। कोशीमैयाक धारमे छोट-छोट नेना-भुटकाकेँ उमकैत देखलहुँतँ हमर देहक रूइआँ डरसँ भुटकए लागल जे जँ ई सब भासि जाएत तँ कोना बचतै। ओ सबतँ जेना एहन स्थितिसँ अनभिज्ञ अपनामे मस्त भए कोशीमैयाक धारमे निश्चित भए उमकैत छल जेना मायक कोरामे नेना। खेत वा खेतक बीच ट्रैक्टर एवं टायर गाड़ीक लीख पर चलैत हमरहुँ सभक गाड़ी घुरा उड़बैत खीरा, ककरी, परबल, कदुआ, कदिमा, मुंग एवं मकईक भूट्टाक ठाम-ठाम लागल ढ़ेरीक अनुपम दृश्य जेना अनपूर्णा स्वतः एहि ठाम बास करैत हो सन दृश्यक बीचे-बीच हम सब गंगा बाबूक कचहरी एवं युवा प्रधान अरुण यादवक गाम पहुँचि गेलहुँ। शिशौना पहुँचतहि सम्पूर्ण गामक लोक स्वागतार्थ एवं जिज्ञासार्थ आबि गेलाह। महपुरा निवासी श्री रामनरेश सिंह उर्फ ‘मुखियाजी’ आकाशवाणी पटना, विजय चाचा, प्रांजल भाईजी एवं अरबिन्दजीकेँ ओतुक्का लोक पहिनहिसँ चिन्हैत छलतेँ हुनका सभकेँ ओ लोकनि नाम एवं सम्बन्धक आधार पर प्रणाम करैत गेलाह एवं हम, मदनेश्वर ठाकुर उर्फ ‘भगवान जी’ (महिषी), मिथिलेश, लक्ष्मण एवं सिकन्दरकेँ औपचारिकता एवं आतिथ्यवश प्रणाम करैत बैसाओल। अरूण यादव जे ओहि गामक बेटाक अतिरिक्त विकासपुत्र प्रधान (मुखिया) एवं विजय चाचा जँ ओहि गामक जमीनदाता अछि दुनूक लोकप्रियता ओहि ठाम एकत्रित ग्रामीणक आवभगतसँ बुझन गेल। किछु समयोपरांत विजय चाचाक इशारा पर करिया खस्सीक मौस, भात, रोटी, सलाद एवं दहीक संग भोजन लगाओल गेल एवं हम सब भोजनोपरांत आरामक मुद्रा मे आबि गेलहुँ। मुन पड़ि गेल ‘उजरैत गाम बसैत शहर’ जे एहि ठाम सभ तरहेँ खारिज होइत प्रतीत भेल। पाँच-छौ बजे साँझक आसपास हम सब ओहि ठामक कोशीक पछबरिया धार जे बेलदाबर नदीक नामसँ जानल जाइछ एवं एहि नदीमे कोशीक कोनो धारसँ पैघ माछ पाओल जाइछ ताहि लेल बिख्यात नदीक कात गेलहुँ जतए हटिया लागल छल। हम सब ओहि बेलदाबर नदीक कछेर पर छोट-छीन हटियाक अवलोकन कएलहुँ एवं पानखाइत ओतुक्का स्थिति पर बात करैत रहलहुँ। हम एवं मुखिया जी (आकाशवाणी, पटना)केँ छोड़ि सभ गोटे बेलदावर नदीमे उतरि खूब उमकैत गेलाह एवं भगवान जी ओहि क्रममे अपन गरक सोनाक बनल मायतारा मैयाक चकती सेहो गमा देलाह। झलफल अन्हार भेलोपरांत हम सब कचहरी पर वापस अबैत गेलहुँ। गरमीक अधिकताक कारणेँ ओहि गामक दुइ मंजिला स्कूलक छत पर ओछाओन लगाओल गेल एवं हमसब ओहि ठाम आराम करए लागलहुँ। शिशौनाक पूव भागमे एकटा पैघ भवनक निर्माणकेँ देखि हम पूछि बैसलहुँ जे एतेक पैघ पक्का के बनबा रहल अछि ताहि पर ओतुक्का मुखियाजी अरुण यादव कहलाह ई बाढ़ राहत सेन्टरक रूपमे सभ गाममे बनाओल जा रहल अछि। कोशीक ढ़ेबमे बसल गाममे दू महला स्कूल, बाढ़ राहत भवन, कतहु सौलिंग युक्त सड़क तँ कतहुँ-कतहु कच्ची सड़क जे एक गामसँ दोसर गामकेँ जोड़ैत, एतबे नहि गामक बीचो-बीच सिमेन्टसँ ढ़ालल सड़क देखि एवं ओतुक्का लोकक मुँहसँ नितिश राज्यक सुशासनक बखान सुनि बिहारक कल्याणक संभावना जगैत देखलहुँ। रातिमे हमसब फेर भात-रोटी, माछ, सलाद एवं दहीक संग भोजन कएलहुँ एवं पान खाए सहरसा वापस जएबाक आग्रह कएल तँ ओहि ठामक लोक कहए लगलाह जे एना कतो भेले यै, जे एतेक रातिकेँ द्वारि परसँ अतिथि बिदा होएत। गौंवा सबकेँ मनबैत हम सभ बिदा भए गेलहुँ एवं सहरसा अपन आवास पर सेहो पहुँचि गेलहुँ मुदा हमर मुन ओहि कोशीक बीच बसैत गाम शिशौना एवं ओहि ठाम निवास करैत निश्च्छल लोकक सम्पूर्ण विकास दिस उठाऔल सरकारक कदम आओर तेज कोना हो ताही बीच ओझरा गेल। उजड़ैत गाम : बसैत शहर? की कहू, बहुत दिन पर 1जून 2012केँ महावीर हास्पीटल गेल रही। हास्पीटल की गेलहूँ, मित्र मंडली संग कोशी कात जएबाक अवसर परि लागि गेल। अवसरो एहन जे नागो बाबू सेक्रेटरीक नातिक जन्म-दिन पटनासन शहरकेँ छोड़ि कोशीक कछेर पर बसल ‘बलुआहा’ आ पूर्वी तटबन्धक कात मे स्थापित महिषी प्रखंडक एकलौता कॉलेज, माने शिक्षकक, छात्रक, समाजक कॉलेज नहि अपितु सेक्रेटरीक वैयक्तिक सम्पत्ति, मे मनाओल जा रहल छल। एहि अवसर पर शिक्षित आज्ञाकारीक फौजमे हमहूँ समाहूत छलहुँ। जहिना ओहि ठाम पहुँचलहुँ कि सेक्रेटरीक नजरि हमरा पर पड़तहि कहि उठलाह, “ओ अरूण बाबू! कहिया अएलहुँ, खोजो- खबरि नहि रखैत छी। अपनेतँ मैसूर जाएकेँ हमरा सबकेँ बिसैरियै गेलहुँ। आब हम हिनका सभक लेल कतेक खटू। आब हमरो उमैरि भेल। अहाँ तँ जनितै छियैक, जे काज टाकासँ हैतेक ओ तँ टकै करतै ने। देखियौ ने टाकाक अभावमे कॉलेजक छतक ढलाई रूकल अछि आ, एकटा बात बुझलहुँ कि नहि, एहि बेरसँ फस्ट पार्ट मे एडमिशन सेहो होएत।” तखनहि हुनक नाति आबि कहैत छनि जे- “नानाजी हमरा पैसाब लागल अछि, हम कतए पैसाब करब, एहि ठाम कतहुँ बाथरूम कहाँ देखैत छियैक? ताहि पर ओहि ठाम जमकल बैसल एम.ए. पाससभमे सँ केओ बाजि उठलाह- ‘एतेकटा फील्ड अछि कतहु अहाँ पैसाब कए लिअ।’ ओ बच्चा कनेक काल चुप रहल आ सोचैत बाजि उठल- ‘एना कतहुँ खूजलमे बाथरूम कएल जाइत छैक, जँ इन्फेक्शन भए जाएत तँ?’ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयसभसँ प्राप्त डिग्रीधारीक लेल एहि प्रश्नक कोनो उत्तर नहि छल। अच्छा छौड़ू, हमहूँ कोन फेरामे फँसि गेलहुँ, आधुनिकता - वैज्ञानिकता एवं प्रकृति - परंपरामे ओझराएल जा रहल छी। अखन जन्म-दिनक केक कटबामे एवं मासुक भोजमे बिलम्ब छल। भगवान जी, अरबिन्द जी, प्रांजलभाइजी एवं विजय जीक विचार भेल जे किऐक नहि एहि बीचक समयमे कोशी पर बनैत पूल देखल जाय। सभगोटे ए.सी.सँ सुसज्जित गाड़ीमे बैसि कोशी बान्ह दिस बिदा भेलहुँ जे कॉलेजसँ मात्र एक किलोमीटर पर छल। ‘बलुआहा’ बाजारमे ओ लोकनि अपन-अपन पसिन्नक हिसाबसँ खएबा-पिबाक लेल वस्तु-जात किनैत गेलाह। गाड़ीकेँ बान्ह पर लगा सबगोटे ओतुका दृश्य एवं बनैत पूलक कार्यकेर गतिशीलताक आनन्द खाइत-पीबैत लेब प्रारंभ कएल। एहि ठाम हम एकटा बात कहि दी जे विजय जी, जे अपन पंचायतक प्रधान (मुखिया) सेहो रहि चुकल छथि, सहरसा जिलाक महिषी प्रखण्डक सबसँ पैघ जमींदार स्व. गंगा बाबूक एकलौता पुत्र थिकाह। करीब सतरह वर्ष पहिने प्रो. (डॉ.) सुभाषचन्द्र सिंह (मैथिली प्राध्यापक, ए.एन.कॉलेज, पटना)जीक आवास बहादुरपुरमे हुनकासँ परिचय भेल छल एवं परिचय आत्मीयतामे परिवर्त्तित भेलोपरांत ओ कहने छलाह कहियो अहाँ हमर गाम चलू; हम अहाँकेँ कोशी नदीमे नाह पर बैसा झिलहरिक संग कोशीक ओहि पारक अपन कचहरी (कामत, बासा) देखाएब। समय सापेक्ष नहि भेलाक कारणेँ एहन संभव नहि भए सकल छल। मुदा आइ कोशी बान्ह पर गप्पक क्रममे ओतेक वर्ष पहिलुका बात चलि पड़ल। ओ बाजि उठलाह- ‘अरूण जी आब हमर कचहरी पर चारि चक्का चलि जाइत अछि।’ हम ई सुनि विस्मिततँ भेवे कएलहुँ, अविश्वसनीयता सेहो हुलकी मारि रहल छल। बान्हे पर सबगोटेक बिचार भेल जे तेसर दिन हम सब कोशीक ओहि पार कचहरी पर जाएब एवं ओहि ठाम दिन-रातिक भोजन कए रातिएमे आपस भए जाएब। विजय जी ओतहिसँ मोबाइलक माध्यमे अपन कचहरीक मैनेजरकेँ बीस-पच्चीस गोटेक दिनुका एवं रतुका भोजनक व्यवस्था करबाक लेल आवश्यक निर्देश दए देलन्हि। पछाति हम सब कॉलेज आबि भोजनोपरांत सहरसा घुरि गेलहुँ। पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमक अनुसारेँ कोशीक पूबरिया एवं पछबरिया धारक बीच अवस्थित झारा पंचायतक शिशौना गाम जएबाक जे तिथि निश्चित छल ओकरा प्रति हम कनेक उदासीन छलहुँ, किएकतँ सूर्य भगवानक प्रकोपक कारणेँ प्रचण्ड गरमीमे घरसँ बहराएब लू केँ आमंत्रण देब सन छल। की कहू! निर्धारित तिथिकेँ फोनक घंटी बाजब प्रारंभ भए गेल एवं हमरो जाइऐ पड़ल। सहरसासँ जाइबलाक लेल दूटा ए.सी. युक्त स्कारपियो लागल एवं हम सब ओहिमे सबार भए बिदा भए गेलहूँ ‘उजड़ैत गाम आ बसैत शहर’क वास्तविकताक अवलोकनार्थ। ए.सी.युक्त गाड़ी एवं ढण्ढ़ा पेय पदार्थक कारणेँ यात्रामे कोनो बेसी तकलीफ नहि भए रहल छल। हम सब बलुआहामे कोशी पर बनै वला पूल टपि ओहि पार शिशौना गाम दिस बढ़लहुँ। ओहि पंचायतक प्रधान (मुखिया) श्री अरूण यादव जनिक पैतृक गाम शिशौने छनि, सेहो हमरा सभक स्वागतार्थ एवं रस्तामे कोनो तरहक तकलीफ नहि हो, ताहि लेल हमरासभक संग छलाह। कामत पर शीघ्रताशीघ्र पहुँचबाक लेल सड़क मार्गकेँ छोड़ि कोशी नदीक काते कात गाड़ी बढ़ए लागल। बाढ़ि अएबासँ बहुत पहिनहि कोशीक कटनियाँ एवं ओहिसँ उपटैत लोकक दृश्यसँ हृदयतँ द्रबित भेवे कएल, अपितु कोशी मैयाक एहन ताण्डवसँ डरो भेल जे कहीं हमरहुँ सभक गाड़ी कटनियाँक कारणेँ नदीमे नहि समा जाय। ओहि ठामक लोकक जीवनकेर मार्मिक चित्रण मैथिली साहित्यकेँ के कहय, भारतक आनेको साहित्य मध्य विद्वान लेखक लोकनि प्रस्तुत कए चुकल छथि, तेँ ओतुका दुरूहताक हम की बखान करू, एहन शब्द-सामर्थ्य हमरामे नहि अछि। ए.सी. युक्त गाड़ी रहलोपर हमसब सुरूज भगवानक प्रकोपक पूर्ण अनुभव कए रहल छलहुँ, परंच ओहि ठामक नेना-भुटका, वृद्ध-वणिता सभ केओ अपन-अपन काजमे मस्त छल। कोशीमैयाक धारमे छोट-छोट नेना-भुटकाकेँ उमकैत देखलहुँ तँ हमर देहक रोइयाँ डरसँ भुटकए लागल जे कही ई सब भासि ने जाए। ओ सबतँ जेना एहन स्थितिसँ अनभिज्ञ अपनामे मस्त भए कोशीमैयाक धारमे निश्चित भए उमकैत छल जेना मायक कोरामे नेना। खेत वा खेतक बीच टायर गाड़ी एवं ट्रैक्टरक लीख पर चलैत हमरहुँ सभक गाड़ी धूरा उड़बैत, खीरा, ककरी, परोड़, सजमनि, कदीमा, मुंग एवं मकईक भुट्टाक ठाम-ठाम लागल ढ़ेरीक अनुपम दृश्य देखि लागल जेना अनपूर्णा स्वतः एहि ठाम बास करैत होथि, गंगा बाबूक कचहरी एवं युवा प्रधान अरुण यादवक गाम पहुँचि गेल। शिशौना पहुँचतहि सम्पूर्ण गामक लोक स्वागतार्थ एवं जिज्ञासार्थ आबि गेलाह। महपुरा निवासी श्री रामनरेश सिंह उर्फ ‘मुखियाजी’ आकाशवाणी पटना, विजयजी, प्रांजल भाईजी एवं अरबिन्दजीकेँ ओतुक्का लोक पहिनहिसँ चिन्हैत छलतेँ हुनका सभकेँ ओ लोकनि नाम एवं सम्बन्धक आधार पर प्रणाम करैत गेलाह। हम, मदनेश्वर ठाकुर उर्फ ‘भगवान जी’ (महिषी), मिथिलेश, लक्ष्मण एवं सिकन्दरकेँ औपचारिकता एवं आतिथ्यवश प्रणाम करैत बैसाओल गेल। अरूण यादव जे ओहि गामक बेटाक अतिरिक्त विकासपुत्र प्रधान (मुखिया) एवं विजयजी, जे ओहि गामक जमीन्दार छथि, दुनूक लोकप्रियता ओहि ठाम एकत्रित ग्रामीणक आवभगतसँ बुझना गेल। किछु समयोपरांत विजयजीक इशारा पर खस्सीक मासु, भात, रोटी, सलाद एवं दहीक संग भोजन लगाओल गेल एवं हम सब भोजनोपरांत आरामक मुद्रामे आबि गेलहुँ। पाँच-छओ बजे साँझक लकधक हम सब कोशीक पछबरिया धार, जे बेलदाबर नदीक नामसँ जानल जाइछ एवं एहि नदीमे कोशीक कोनो धारसँ पैघ माछ पाओल जाइछ, क कात गेलहुँ, जतए हटिया लागल छल। हम सब ओहि बेलदाबर नदीक कछेर पर छोट-छीन हटियाक अवलोकन कएलहुँ एवं पान खाइत ओतुक्का स्थिति पर बात करैत रहलहुँ। हम एवं मुखिया जी (आकाशवाणी, पटना)केँ छोड़ि सभ गोटे बेलदावर नदीमे उतरि खूब उमकैत गेलाह एवं भगवान जी ओहि क्रममे अपन गरक सोनाक बनल मायतारा मैयाक चकती सेहो गमा देलनि। झलफल भेलोपरांत हम सब कचहरी पर आपस अबैत गेलहुँ। गरमीक अधिकताक कारणेँ ओहि गामक दुइ मंजिला स्कूलक छत पर ओछाओन लगाओल गेल एवं हमसब ओहि ठाम आराम करए लगलहुँ। शिशौनाक पूव भागमे एकटा पैघ भवनक निर्माणकार्य देखि हम पूछि बैसलहुँ जे एतेक पैघ पक्का के बनबा रहल अछि, ताहि पर ओतुक्का मुखियाजी अरुण यादव कहलनि जे ई बाढ़ि राहत सेन्टरक रूपमे सभ गाममे बनाओल जा रहल अछि। कोशीक ढ़ेबमे बसल गाममे दू महला स्कूल, बाढ़ि राहत भवन, कतहु सौलिंग युक्त सड़क तँ कतहुँ-कतहु कच्ची सड़क, जे एक गामसँ दोसर गामकेँ जोड़ैत, एतबे नहि गामक बीचो-बीच सिमेन्टसँ ढ़ालल सड़क देखि एवं ओतुक्का लोकक मुँहसँ नीतिश राज्यक सुशासनक बखान सुनि बिहारक कल्याणक संभावना जगैत देखलहुँ। रातिमे हमसब फेर भात-रोटी, माछ, सलाद एवं दहीक संग भोजन कएलहुँ एवं पान खाए सहरसा आपस जाए देबाक आग्रह कएल तँ ओहि ठामक लोक कहए लगलाह जे एना कतो भेले यै, जे एतेक रातिकेँ द्वारि परसँ अतिथि बिदा होएत। गौंआ सबकेँ मनबैत हम सभ बिदा भए सहरसा अपन-अपन आवास पर पहुँचि गेलहुँ । मुदा हमर मनमे बसल‘उजड़ैत गामःबसैत शहर’क संगक संग, जे ओही ठाम सभ तरहेँ खारिज होइत प्रतीत भेल, सद्यः देखल कोशीक बीच बसैत गाम शिशौना, ओहि ठाम निवास करैत निश्च्छल लोकक सम्पूर्ण विकास दिस उठाओल सरकारक डेग आओर तेज कोना हो ताही बीच ओझरा गेल। मैथिलेत्तर भाषी प्रदेशमे मैथिली सीखबा-सीखैबामे कँप्यूटर आओर भाषा विज्ञानक भूमिका भूमिका भारत एकटा बहुभाषी देश अछि। एतय भारोपीय, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक आओर चीनी-तिब्बती चारि भाषा परिवारक लगभग 1650क ऊपर भाषा बाजल जाइत अछि। एक मतक अनुसार लगभग 1455 भाषा एहन अछि जकरा 10 हजारसँ कमे लोक बजैत अछि। ‘सेंसस डाटा 2001’क अनुसार-मैथिली बाज’ वलाक संख्या 12,179,122 बताओल गेल अछि। आइ संविधान मान्यता प्राप्त 22 भाषा (मैथिली, हिंदी, संस्कृत, मलयालम, तेलगु, तमिल, कन्नड़, मराठी, बंगला, पंजाबी, गुजराती, कश्मीरी, उर्दू, उड़िया, असमिया, बोडो, संथाली, सिंधी, डोगरी, कोंकणी, मणिपुरी,नेपाली) अछि। तथा 100सँ बेसिए एहन भाषा अछि जे आठवीं अनुसूचीमे नहि अछि। भारतक एहन बहुसंख्यक भाषाई परिदृश्य पर बाज’वलाक संख्या आओर भौगोलिक दृष्टि सँ जखन विचार कएल जाइछ तें पता चलैछ जे मैथिलीक महत्त्वकेँ नजरअंदाज नहि कएल जा’ सकैछ; कियाक तँ ई देशक एकटा पैध भू-भागक भाषा थिक। ई बिहारक प्रमुख भाषा अछि, तथा कतोक प्रदेशमे गौण भाषाक रूपमे सेहो व्यवहृत अछि। विश्वभ्रामक संकल्पना तँ तकनीकी (Technology)केँ चरण पर पहुँचा देल अछि। आधुनिक तकनीकीक विकासमे कँम्प्यूटरक आविष्कार एकटा युगांतकारी घटना अछि। कम्प्यूटर आइ जीवनक लगभग क्षेत्रमे अपन जगह बनाए लेल अछि। चूँकि भाषा जीवनक अभिन्न अंग अछि तेँ ओ कम्प्यूटरसँ कोना असम्पृक्त रहि सकैछ। आइ भाषिक अध्ययन आओर विश्लेषणक लेल कँम्प्यूटरक उपयोग बहु अनिवार्य भ’ गेल अछि। अतः मैथिली भाषाक समृद्धि एवं प्रचार- प्रसारक लेल कँम्प्यूटरीकरण नितांत आवश्यक भ’ गेल अछि। प्रस्तुत आलेखमे द्विती भाषाक रुपमे मैथिली सिखैबामे कंप्यूटर आओर भाषा विज्ञानक भूमिका पर विचार करबाक प्रयास कएल गेल अछि। भाषा शिक्षण एवं भाषा विज्ञान मानव-उच्चराण अवयव द्वारा उच्चरित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकक ओहि व्यवस्थाकेँ जकर माध्यमसँ मानव समुदाय-विशेषक लोक परस्पर विचार-विनिमय करैत अछि, ओकरा बाजब, पढब, लिखब एवं सुनब तथा समझबाक शिक्षाकेँ भाषा-शिक्षण कहल जाइत अछि। ई झाँच अछि जे मैथिलेत्तरभाषी लोकक अपन मातृभाषा होइछ एवं ओकरा संगहि ओकर पहिल भाषा सेहो होइछ एहिलेल मैथिलीकेँ द्वितीय भाषाक रूपमे सीखबामे की-की कठिनाई अबैछ एवं ओहि कठिनाईकेँ भाषा-विज्ञान आओर कंम्प्यूटर कत’ धरि समाधान क’ सकैछ एहि पर विचार करब समीचीन होएत। प्राचीने कालसँ जीविकोपार्जन एवं ज्ञानार्जन आदिक लेल अधिकांश लोककेँ मातृभाषाक संगे-संग दोसर भाषा सीखबाक आवश्यकता पड़ैत आबि रहल अछि। एहि दोसर भाषाकेँ द्वितीय भाषा कहल जाइछ। एहि द्वितीय भाषाकेँ सीखबाक लोककेँ भाषार्जनक जटिल प्रक्रियासँ बैस सतर्कतापूर्वक गूजर’ पड़ैछ। भाषा विज्ञान तथा शिक्षा शास्त्रक दृष्टिसँ पहिल भाषासँ हँटिक’ सीखल जायवला सभ देशी बा विदेशी भाषा द्वितीय भाषाक श्रेणीमे अबैछ। आधुनिक युगमे द्वितीय भाषा-शिक्षणकेँ गंभीरतापूर्वक लेल जा रहल अछि आओर एहि बातक पूरजोर प्रयास कएल जा’ रहल अछि जे विद्यार्थी कमसँ कम समयमे भाषाकेँ ठीक ढंग सँ सीखए आओर सुगमतापूर्वक प्रयोग करबामे सक्षम भ’ सकए। एहि संबंधमे चारि प्रारंभिक भाषा कौशल (Language Skills) सुनब, बाजब, पढ़ब आओर लिखबकेँ ध्यानमे राखि भाषा-शिक्षणकेँ अंजाम देल जा’ रहल अछि। एहिमे पहिल दुई भाषाक उच्चरित रूपसँ सम्बद्ध अछि जखनकि अन्तिम दुई भाषाक लिखित रूपसँ। उच्चरित भाषासँ संबंधित कौशलमे भाषाक बोलीगत रूपसँ सम्बन्धित दुई प्रमुख कौशल-सुनबाक तथा बोलबाक अन्तर्गत निम्नलिखित भाषिक पक्ष लेल जाइत अछि—1. ध्वनीमे भेद करबाक योग्यता, 2. उच्चारणमे अनुकरणक सामर्थ्य, 3. उपकाव्य संरचना, 4. वाक्य संरचनाक नियमक ज्ञान, 5. मुक्त भाषण, 6. पदबन्ध, 7. शब्दावली, 8. श्रवण बोधन, 9. मुक्त बोधन, 10. गप-सप। वस्तुतः पहिल दुई सुनबासँ संबंधित अछि आओर शेष बाजबासँ। लिखित भाषासँ सम्बन्धित प्रमुख कौशल-पढ़बाक आओर लिखबाक अन्तर्गत निम्नलिखित भाषिक पक्ष अबैत अछि—1. लिपि चिह्नक पहिचान, 2. लिपि चिह्नक लेखन, 3. संकेतक सहायतासँ लेखन, 4. सन्दर्भ व्याकरण, 5. मुक्त लेखन, 6. मुक्त पठन 7. सन्दर्भक पहिचान 8. पत्राचार, 9. वर्ण बोधन, 10. कोश देखबाक अभ्यास। भाषा-शिक्षणमे बहुत रास पद्धति (Methods) प्राचीन कालेसँ उपयोगमे लाबल जा’ रहल अछि। एहिमे प्रमुख निम्नवत अछि व्याकरण-अनुवाद पद्धति (Grammar translation Method) ई पद्धति बहुत बेसी प्रचलित रहल अछि कियाकतँ एकरे माध्यमे शिक्षक अनुवादसँ भाषाक शिक्षण प्रदान करैत छलाह। विद्यार्थीकेँ अनुवादक माध्यमसँ द्वितीय भाषाक ओ सभ आवश्यक जानकारी देल जाइत छल जे भाषा सिखबाक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। परंच व्याकरण-अनुवाद पद्धतिक त्रुट ई छल जे छात्र नहि तँ भाषाक जीवंत तत्त्वसँ परिचित भ’ पबैत छल आओर नहि तँ व्यावहारिक ज्ञानें प्राप्त करबामे समर्थ सिद्ध होइत छलाह। हुनक ज्ञान, भाषाक केवल सैद्धान्तिक पक्षे धरि सीमित रहैत छल, जाहि कारणेँ विद्यार्थी लक्ष्य भाषा (Target Language) केँ बाजबाक क्षमता कतोक वर्षक प्रयासक बादो नहि प्राप्त क’ पाबैत छल। एकर मूल कारण ई अछि जे शिक्षक प्रारम्भेसँ विद्यार्थीकेँ मात्र द्वितीय भाषामे अनुवाद करबाक आओर व्याकरणकेँ रटबाक शिक्षा दैत रहैत छलाह। कखनहुँ विद्यार्थीकेँ लक्ष्य भाषाकेँ बाजबाक अवसर कक्षा वा कक्षासँ बाहर नहि भेटि पबैत छल। जे आधुनिक दौरमे कोनो भाषाकेँ सिखबाक लेल अति आवश्यक अछि। व्याकरण-अनुवाद पद्धति आइयो देशक विभिन्न पाठशाला, मदरसा, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयमे प्रचलित अछि। जकर माध्यमसँ विद्यार्थीकेँ लक्ष्यभाषा (Target Language)क तँ ज्ञान प्राप्त भ’ जाइत अछि, परंच ओकरामे लक्ष्यभाषाकेँ सूक्ष्मतासँ बाजबाक वा व्यवहारमे लाबक क्षमता विकसित नहि भ’ पबैछ। विद्यार्थी अपन समय मात्र भाषाक अनुवादेमे खपा दैत अछि। आइ हमसब भलीभाँति जनैत छी जे व्याकरणक नियमक ज्ञान आओर अनुवादक योग्याकेँ कोनो प्रकारेँ हम ओहि भाषामे बाजबाक, पढ़बाक आओर लिखबाक सक्षमताकेँ उचित मानक स्तर पर नहि राखि सकैत छी। प्रत्यक्ष पद्धति (Direct Methods) ई पद्धति वर्त्तमान समयमे प्रभावशाली मानल जा रहल अछि। एहि पद्धतिक मूलभूत सिद्धान्त ई अछि जे मातृभाषे सदृश दोसरो भाषा सीखल वा सीखाओल जाय। यद्यपि एहिमे मातृभाषाक उपयोग नहि होइछ। परंच लक्ष्य भाषाकेँ सुनब, बोलब, लिखब, पढ़ब सिखाओल जाइत अछि। एहि पद्धतिक माध्यमे शिक्षण देलासँ विद्यार्थीमे भाषाकेँ बाजबाक क्षमताक विकास अत्यन्त तीव्रगतिसँ होइत अछि। इएह कारण अछि जे आइ अंग्रेजी माध्यम विद्यालयमे प्रत्यक्ष पद्धतिकेँ पूर्णरूपसँ अपनाओल जा’ चुकल अछि, आओर एकर पूरा फाइदा विद्यार्थीसभकेँ मिलि रहल अछि। ओ एहि पद्धतिसँ द्वितीय भाषा (Secondary Language) केँ सरलतासँ सीखि जाइत अछि आओर हुनक उच्चारण सेहो बड्ड बेसी संतोषजनक रहैत अछि। परंच एकरा संग दोसर विकसित पद्धति सेहो सहारा लेल जाय तेँ शिक्षण आओर अधिगम (Learning) दुनू काज सरल भ’ जाइत अछि। प्रत्यक्ष पद्धकिक अतिरिक्त जे दोसर पद्धति अछि ओहिमे स्वाभाविक पद्धति, मनोवैज्ञानिक पद्धति, अनुकरणात्मक पद्धति, वार्तालाप पद्धति, भाषा प्रयोगशाला पद्धति ऑडियो लिंग्वल मेथड, चलचित्र पद्धति आओर कम्प्यूटर-पद्धति आदि प्रचलित अछि। एहिमे ऑडियो लिग्वल मेथड (Audio Lingual Method) एवं भाषा प्रयोगशाला पद्धति (Language Laboratory Method) बहुत बेसी प्रचलित अछि। परंच एहि पद्धतिक किछु सीमा अछि; एहि कारणेँ विद्यालय तथा शैक्षणिक संस्थामे ई पद्धति बहुत कमे देखबामे अबैत अछि। एकर मूलकारण ई अछि जे भाषा प्रयोगशाला पद्धति बहुत बेसी खर्चावला अछि। एकरा कोनो साधारण संस्था वहन नहि क’ सकैछ। जाहि संस्थामे एहि पद्धतिक प्रचलन अछि, ओहि संस्थामे भाषा सीखि रहल विद्यार्थीक क्षमता एवं दक्षता व्याकरण-अनुवाद पद्धति आओर प्रत्यक्ष पद्धतिसँ द्वितीय भाषा सीखि रहल विद्यार्थीक तुलनामे बेसी बढ़ियाँ अछि। भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरक सात क्षेत्रीय भाषा-केन्द्र मैसूर, भुवनेश्वर, गुवाहटी, लखनऊ, पटियाला, पुणे, आओर सोलेनमे मैथिली, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, डोगरी, कश्मीरी, पंजाबी, उड़िया, संथाली, उर्दू, गुजराती, कोंकणी, मराठी, सिंधी, असमिया, बोडो, मणिपुरी आओर नेपाली भाषा द्वितीय भाषाक रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। ओहिमे ‘प्रत्यक्ष पद्धति’ आओर ‘ऑडियो लिंग्वल मेथड’क माध्यमेकेँ अपनाओल जा रहल अछि आओर विद्यार्थीक बाजबाक क्षमताक विकासक लेल सम्बन्धित भाषिक क्षेत्रमे पन्द्रह दिनक टूर सेहो कराओल जाइत अछि। जकर नीक परिणाम देखबाक लेल भेटैछ। जाहिसँ प्रशिक्षुक भाषिक क्षमता दस महीनामे एतबा विकसित भ’ जाइछ जे ओ लक्ष्यभाषाक पठन-पाठनमे पूर्ण रूपसँ समर्थ भ’ जाइछ। आइकाल्हि ‘ऑन लाइन शिक्षण’ (Internet Learning) सेहो एहि दिशामे एक नव प्रयास अछि। उपरोक्त पद्धतिक सन्दर्भमे ईहो बात उल्लेखनीय अछि जे जत’ एहि पद्धतिसँ भाषा-शिक्षणमे लाभ अछि, ओतहि एहि पद्धतिक किछु सीमा सेहो अछि। आधुनिक युगमे ध्वनि विज्ञानक बड़ पैघ महत्ता अछि। ध्वनि विज्ञानक द्वारा विद्यार्थीमे लक्ष्य भाषा (target language)केँ शालीनता आओर शुद्धतासँ बाजबाक क्षमता विकसित होइत अछि। ध्वनि विज्ञानक महत्त्व इहो लेल बढ़ि जाइछ जे जखन विद्यार्थी कोनो दोसर भाषाकेँ सीखैत अछि तँ ओ भाषा ओकर मातृभाषासँ कतोक तरहेँ भिन्न होइत अछि। अर्थात् जखन ओ द्वितीय भाषा सीखैत अछितँ सीखबाक क्रममे विद्यार्थीकेँ द्वितीय भाषाक कतोक नव ध्वनिक सामना कर’ पड़ैछ। जकर उच्चारणमे विद्यार्थीकेँ बहुत बेसी समस्या होइछ। विद्यार्थी द्वितीय भाषाक शब्दकेँ सुचारू रूपसँ उच्चारण नहि क’ पबैछ। भाषाशिक्षणमे उच्चारणक महत्वकेँ कोनो प्रकारेँ नकारल नहि जा’ सकैछ; उच्चारणक महत्व रीढ़क हड्डीक समान होइत अछि। एकर सहि ढंगसँ प्रयोग कयलासँ नहि केवल भाषा अपन प्रारकृतिक दशा एवं सुगमताक संग प्रभावित करैछ, अपितु शब्दक उचित अर्थ एवं भाव सेहो प्रकट होइछ। ‘भाषा विज्ञान’ द्वितीय भाषा-शिक्षण आओर प्रशिक्षणमे उत्पन्न हुअ’ वला समस्याक निराकरणमे महत्वपूर्ण भूमिका निबाहल अछि। जँ शिक्षक भाषाविज्ञानसँ सभ तरहेँ परिचित अछि तँ ओ उच्चारण सदृश समस्याक समाधान सहजतापूर्वक क’ सकैत अछि। भाषाक एहने सब समस्याकेँ देखैत व्यतिरेकी भाषा विज्ञान (Contrastive Linguistics) अस्तित्वमे आयल। जकरा द्वारा शिक्षक विद्यार्थीक मातृभाषाक संरचना (Structure)क द्वितीय भाषाक संरचनासँ तुलनात्मक अध्ययन (Comparative study) कएल अछि आओर तत्पश्चात् एहि बातक पता लगैबाक प्रयास कएल जे लक्ष्य भाषाक कोन एहन ध्वनि अछि जे विद्यार्थीक मातृभाषामे नहि अछि। ओहन ध्वनि जे दुनू भाषामे पाओल जाइत अछि, ओ छात्रकेँ कोनो प्रकारक समस्या उत्पन्न नहि करत। परंच ओ ध्वनि जे द्वितीय भाषामे तँ अछि मुदा मातृभाषामे नहि अछि एहन ध्वनि समस्यात्मक ध्वनि (Problematic Sounds) कहाऔत आओर भाषा सीखबामे समस्या उत्पन्न करत। शिक्षककेँ एहि ध्वनिक उच्चारणमे पूर्णतः साबधानी बरत’ पड़त आओर एहि ध्वनिक उच्चारण प्रारंभिक मध्य आओर अन्तिम अवस्थआमे छात्रसँ कराब’ पड़त। एहि तरहेँ बेर-बेर उछ्चारण करौलासँ छात्रक उच्चारण ठीक होएत। अभ्यासक मात्रा मातृभाषा तथा द्वितीय भाषा-शिक्षणक उद्देश्य, शिक्षार्थीक अवस्था, अध्ययन-अध्यापनक लेल उपलब्ध समय आदि पर निर्भर करैछ। सैद्धान्तिक तथा व्यावहाहिक दृष्टिसँ मातृभाषा तथा द्वितीय भाषाक शिक्षण-प्रक्रिया तथा तकनीकमे किछु अन्तर हैब स्वाभाविक अछि। भाषा कौशलक अभ्यास-मात्रा तथा ओकर प्रायोगिक पक्षमे जे अंतर देखार दैत अछि, तकर मातृभाषा तथा द्वितीय भाषाक शिक्षण-प्रक्रियासँ पर्याप्त संबंध अछि। भाषा शिक्षकेँ एहि भिन्नताकेँ दृष्टिमे राखि भाषा अध्यापन करबाक चाही, जे भाषा शिक्षार्थीक लेल सरल ओ बोधगम्य भ’ सकए। भाषा शिक्षणमे कॉर्पस (Corpus in Language Teaching) भाषाविज्ञानमे कॉर्पस (कॉर्पोराक बहुवचन) पाठसभक एकगोट पैध आओर संरचनात्मक संग्रह अछि जाहिमे कोनो भाषाक शब्द तथा वाक्यकेँ संग्रहित क’ ग्राह्य एवं पढ़बायोगय रूपमे राखल जाइत अछि। कॉर्पस एके भाषा (एकभाषी कॉर्पस) वा एकसँ बैसी भाषा (बहुभाषी कॉर्पस)मे पाठकेँ संग्रहित करैत अछि। बहुभाषी कॉर्पसकेँ प्रारूपित क’ केँ तुलनात्मक दृष्टिसँ संरेखित समानांतर कॉर्पस सेहो कहल जाइत अछि। कॉर्पस दुई प्रकारक होइछ। लिखित कॉर्पस (Written Corpus) एहिमे भाषाक लिखित रूप जेना, साहित्य, समाचारपत्र, कहानी, नाटक, उपन्यास, आलोचना आदिमे प्रयोग हुअ’ वला भाषाकेँ रखैत छी। वाचिक कॉर्पस (Speech Corpus) एहिमे सामान्य लोकक बीच सामान्य बोलचालक भाषाकेँ रिकार्ड क’ संग्रहित कयल जाइछ। कॉर्पसक प्रयोग प्रमुख रूपसँ कोशकारिता, मशीनी अनुवाद, वर्तनी संशोधक, भाषा शिक्षण, भाषिक अनुसंधान इत्यादि काजक लेल कयल जाइत अछि। कॉर्पसमे लिखित तथा वाचिक डेटा द्वारा उपकरण बनाओल जाइत अछि जे बेसी सार्थक तथा उपयोगी होइत अछि। एहिमे एकत्रित कयल गेल डेटामे सामान्य लोकक गप्प-सप्प तथा फराक-फराक समय पर एक लोक द्वारा प्रयोगमे लाबल जायवला भाषा एवं शब्दाबलीमे बदलाव आदिक जानकारी होइत अछि। मैथिली शिक्षणमे समानान्तर कॉर्पस, तुलनात्मक कॉर्पस, डोमेन स्पेशिफिक कॉर्पसक योगदान बैस महत्त्वपूर्ण होयत। सूचना प्रत्यानयन (Information Retrieval) आजुक समय भूमण्डलीकरणक प्रभावसँ मानवक परिवर्त्तित जीवन-शैलीमे कमसँ कम समयमे बेसीसँ बेसी सूचनाक आवश्यकता भ’ सकैछ। एहने संकल्पना पर आधारित प्रक्रिया केँ सूचना-प्रत्यानयन कहैत छी। एहिमे कोनों पैध पाठ वा दस्तावेजसँ निश्चित सूचनाकेँ प्राप्त कयल जा’ सकैत अछि। बल्कि एकर सम्पूर्ण प्रक्रिया संगणक पर आधारित होइत अछि अतः समयक कम लागब स्वाभाविके अछि; जेहन कि एहिमे होइतो अछि। एहिमे वेबमे मैथिलीक लेल ‘सर्चइंजन’क निर्माण तथा कोशमे खोजबाक काज सरल भ’ सकैछ। खोज इंजनमे गूगल (Google), याहू (Yahoo), अल्ताविस्ता (Altavista), गुरूजी (Guruji.com), वेबखोज (Webkhoj), रफ्तार (Raftar) आदि उपलब्ध अछि। जाहिमे निरंतर नव-नव वर्जन लांच भ’ रहल अछि। गूगल हालिहमे ‘क्रोम’ नामक नव वर्जन लांच कयल अछि। भाषा सीखबामे एहिसँ बहुत बेसी सहयोग लेल जा’ सकैछ अछि। की वर्ड इन कान्टेक्स्ट एण्ड की वर्ड इन अदर कान्टेक्स्ट प्रत्यानयन (KWIC and KWOC Retriever) एहि टूलक सहायतासँ भाषा शिक्षणमे सेहो सहायता लेल जा सकैत अछि। कोनो शब्द कोन-कोन संदर्भमे प्रयुक्त भ’ सकैत अछि, एकर जानकारी कमसँ कम समयमे प्राप्त कयल जा सकैत अछि। ई टूल कॉर्पस पर आधारित होइत अछि। जेना-कॉर्पसँ एहि टूलक सहायतासँ ई ज्ञात क’ सकैत छी जे—बहब क्रिया कोन-कोन संदर्भमे आबि सकैत अछि। उदाहरण – खून बहब, पानी बहब, धाम बहब इत्यादि। वर्तनी संशोधक (Spell checker) ई संगणकक माध्यमसँ मैथिली भाषाक मानक रूपकेँ संरक्षित एवं निर्धारित क’ सकैत अछि, संगहि वर्तनी सम्बन्धी त्रुटिकेँ चिह्नित क’ सकैत अचि। ई संगणक आधारित भाषा-शिक्षणमे सेहो महत्वपूर्ण योगदगान द’ सकैत अछि। एकर सहायतासँ मैथिली भाषाक वर्तनीक शुद्धताकेँ सुधारल जा’ सकैत अछि। संगहि शुद्ध लेखनमे सहायक भ’ सकैत अछि। रूपिमिक विश्लेषक (Morphological Analyzer) मैथिलीक मूल धातु रूप (Root Form)क डाटाबेस बनाक’ एहिमे प्रयोगक समय जुड़ल अतिरिक्त संरचकक रूपमे प्रतिपादककेँ छाँटि क’ एकर भाषा-सापेक्ष विश्लेषण क्रमशः करैत अछि। एकर बाद उपसर्ग एवं प्रत्ययक संग्रहित सूचनाक आधार पर अपन विश्लेषणकेँ आगू बढ़बैत अछि। लिप्यंतरण (Transliteration) एक लिपिसँ दोसर लिपिमे अंतरणक प्रक्रिया लिप्यंतरण कहबैछ। लिप्यंतरणक द्वारा सेहो कोनो भाषाकेँ सीखबामे बहुत बेसी सहायता मिलैत अछि। कर्नाटकमे संस्कृतक बहुत रास टेक्स्ट कन्नड़ लिपिमे लिप्यंतरित अछि। जेना-रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, दुर्गाशप्तसती आदि। एत’ धरि जे स्नातकोत्तर संस्कृतक उपाधि सेहो लोक कन्नड़ लिपिमे लिखिक’ प्राप्त क’ रहल अछि। Mozila FireFox’s Girgit add-onक द्वारा सेहो भारतीय भाषासँ सीधे दोसर भारतीय भाषामे लिप्यंतरण क’ सकैत छी। LDC-IL, CIIL सेहो लिप्यंतरण टूलक विकास कएल अछि। ऑनलाईन मैथिली शब्दकोश (Online Maithili Dictionary) भाषा सीखबाये ऑनलाईन मैथिली शब्दकोशक भूमिका सेहो महत्वपूर्ण अछि। जकर अवलोकन https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ लिंक पर कयल जा’ सकैत अछि। किछु प्रमुख ऑनलाईन शब्दकोश निम्न वितान स्थली पर उपलब्ध अछि http://www.shabdkosh.com www.tdil.gov.in http://tdil.mithov.in/download/bharatiyabhasha.’htm’ आवृत्ति शब्दकोश (Frequency Dictionary) भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे एकगोट महत्त्वाकांक्षी परियोजना ‘भारतीय भाषाक भाषावैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’ (LDC-IL)क अंतर्गत मैथिली कॉर्पस पर आधारित दस हजार शब्दक आवृत्ति शब्दकोश लगभग पूर्णताकेँ प्राप्त क’ रहल अछि। एहिये समाविष्ट शब्द एहन अछि जे सभसँ बेसी प्रयोगमे अबैछ। ई पूर्णरूपसँ कॉर्पस पर आधारित अछि। LDC-IL अखन धरि कन्नड़, बंगाली एवं हिन्दी मे आवृत्ति शब्दकोशक निर्माण क’ चूकल अछि। एवं अष्टम् अनुसूचिक भारतीय भाषामे काज चलि रहल अछि। उच्चारण शब्दकोश (Pronunciation Dictionary) (LDC-IL)क अन्तर्गत मैथिली कॉर्पस पर आधारित उच्चारण शब्दकोश बनयबाक दिशामे सार्थक प्रयास भ’ रहल अछि। एहिमे प्रयुक्त शब्द जे सबसँ बेसी प्रयोगमे अबैत अछि तकरा स्थान भेटि रहल अछि। एकर उच्चारण अहाँ सुगमतासँ सुनि सकैत छी आओर सीख’बलाकेँ अभ्यास कराओल जा’ सकैत अछि। LDC-IL अखन घटि कन्नड़, बंगाली, एवं हिन्दीमे उच्चारण शब्दकोशक निर्माण क’ लेल अछि एवं अष्टम अनुसूचिक भारतीय भाषामे काज चलि रहल अछि। उपसंहार भूमण्डलीकरणक एहि दौरमे भारत एक पैध बाजारक रूपमे उभरि रहल अछि एवं मैथिली बाज’ वलाक संख्या भारत एवं भारतसँ बाहर देखि एहन संभावना लागि रहल अछि जे मैथिलीकेँ कमोवेश सम्पर्क भाषाक रूपमे प्रयुक्त कयल जा’ सकैछ। मनहि एकर एक निर्धारित सीमा कियैक नहि हो। मैथिली राष्ट्रक सांस्कृतिक चेतनासँ जुड़ल अछि। मैथिलीमे संस्कृत शब्दावलीक समावेशक कारणेँ मैथिलेत्तर भाषी लोक सेहो थोड़ प्रयासक बाद एकरा बुझि जाइत अछि। एकर कारण अछि जे दोसर भारतीय भाषामे संस्कृतक शब्दक पहिनेसँ समावेश अछि, चलन अछि। एहि कारणेँ शब्दावली परिचयक स्तर पर साम्यक स्थिति बनि जाइत अछि आओर दुई व्यक्तिक बीच संवाद स्थापित करैब’ मे मैथिली सेहो सक्षम भ’ सकैछ। सहायक ग्रंथ सूची 1. श्रीवास्तव, रविन्द्रनाथ, ‘भाषा शिक्षण’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992 2. श्रीवास्तव, रविन्द्रनाथ, तिवारी भोलानाथ, गोस्वामी कृष्णकुमार, ‘अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान’, आलेख प्रकाशन, दिल्ली 1980 3. भाटिया कैलाशचन्द्र, ‘आधुनिक भाषा-शिक्षण’, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001 4. Subbia, Pon, ‘Tests of Language Proficiency’, Central Institute of Indian Languages, Mysore, 2005 5. अनुवादपत्रिका (कंप्यूटर-अनुवाद विशेषांक-2), भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली, Apr-Jun 2007 6. गवेषणा (सूचना प्रौद्योगिकी विशेषांक), केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, Oct-Dec 2007 7. जैन, वृषभ प्रसाद, ‘अनुवाद और मशीनी अनुवाद’, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995 8. मल्होत्रा, विजय कुमार, ‘कम्प्यूटर के भाषिक प्रयोग’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002 Website www.ldcil.org www.tdil.mit.gov.in www.cdac.in www.indic-computing.sourceforge.net www.ciil.org http://censusindia.gov.in/census-dat-2001/census-data-online/language/statetment1.htm अभिकलनात्मक/संगनणात्मक (Computational) मैथिली व्याकरण प्राचीन कालहिसँ भाषाक सोद्देश्‍यता पर चिन्तकक नजरि रहल अछि। आइ भाषा-अध्ययनक एहि परम्परापरक स्वरूपमे परिवर्त्तन आएल अछि। एकर अनुसारेँ भाषामे सोद्देश्‍यता एवं प्रयोजनमूलकताक भाव पूर्वनियोजित रूपेँ पैदा कएल जाए रहल अछि। भाषाक इएह बदलैत भूमिकाक कारणेँ व्याकरणक स्वरूप एवं उद्देश्‍यमे परिवर्त्तन होएब स्वाभाविके अछि। किछु चुनल शब्द, प्रयोग आओर वाक्यकेँ सूचीबद्ध करबासँ लए कए भाषाक साँगोपाँग गंभीर विवेचन धरि व्याकरणक विस्तार मानल जाए सकैत अछि। कोनो भाषाक प्रयोग-क्षेत्र भनहि सीमीत रहल हुए परंच ओकर उपयोगिताकेँ लए कए कहियो विवाद नहि रहल अछि। आब प्रश्‍न उठैत अछि जे व्याकरणक उपयोगिता का अछि ? छोट-छोट नेना नान्हिटामे अपन घर-परिवारमे बाजए बला भाषा सीख लैत अछि। जाबत धरि कोनो नेनाकेँ ओकर मातृभाषाक व्याकरणिक औपचारिक जानकारी देल जाएत अछि, ताबत धरि ओ नेना ओहि भाषाक व्यवहारमे दक्ष भए चुकल रहैछ। एहना स्थितिमे ई प्रश्‍न उठब स्वभाविके अछि जे व्याकरणक आवश्यकता की अछि ? एहि प्रश्नक प्रत्युत्तरमे महर्षि पतंजलि महाभाष्यमे व्याकरणक प्रयोजन बतबैत कहैत छथि- ‘‘ कानि पुनः शबदानुशासनस्य प्रयोजनानि? रक्षोहागमलध्वसंदेहा: प्रयोजनम् ’’ अर्थात् रक्षा, ऊह, आगम, लघु एवं असंदेह यैह पाँचटा व्याकरणक प्रयोजन अछि। रक्षासँ तात्पर्य अछि- वेदक रक्षा, यथा – ‘‘रक्षार्थ वेदनां – मध्येय व्याकरणं। लोपागमवर्णविकारज्ञो हि सम्यग् वेदान् परिपालिष्यतीति।’’ अर्थात् लोप, आगम, आदेशक व्याकरणिक प्रक्रियाक जिनका ज्ञान रहैत छन्हि सैह वेदक शुद्ध रूपसँ रक्षा कए सकैत छथि। संदर्भक अनुसार समुचित शब्दक कल्पना करब एंव तद्‍नुरूप ओकर व्यवहार करब ऊहक कोटिमे राखल गेल अछि। आगमक अनुसारेँ मानल गेल अछि जे व्याकरण पद आ पदार्थक ज्ञानक उपरान्त वाक्य आओर पदार्थक ज्ञान प्राप्त करएमे सहायक होइछ। नव-नव वाक्यक उत्पादन एवं प्रयोग आगमक कारणेँ संभव होइत अछि। लघुसँ तात्पर्य अछि जे किछु सीमित नियमक सहयोगसँ सम्पूर्ण भाषाक ज्ञान प्राप्त कएल जा सकैत अछि। किएकतँ कोनो भाषाक विपुल शब्द-भण्डारकेँ कंटस्थ नहि कएल जाय सकैत अछि। एनामे ई भाषा शिक्षणमे उपयोगी होइछ। असंदेहसँ तात्पर्य अछि जे भाषाक संरचनागत संदिग्धताक स्थितिमे व्याकरणक ज्ञान ओकर निवारण करैत अछि। व्याकरणक एहि प्रयोजनकेँ देखल जायतँ एहिमे व्याकरणकेँ एकटा साधनक रूपमे देखल गेल अछि। एकटा तथ्य इहो स्वीकारब आवश्यक अछि जे महाभाष्यमे वर्णित स्थित सँ आजुक भाषिक परिवेश बड्ड बेसी भिन्न भए गेल अछि। एकरे परिणाम अछि जे वर्त्तमान समयमे अभिकलानात्मक व्याकरणक संकल्पना प्रासांगिक अछि। जँ भाषाकेँ एकगोट व्यवस्थाक रूपमे अभिहित कएल गेल अछि तँ निश्‍चित रूपसँ व्याकरणे ओहि भाषिक व्यवस्थाक तार्किक आधार गढ़ैत अछि। कोनो भाषा अपन विकाश-क्रममे निरन्तर परिवर्त्तनशील रहैत अछि। संभव अछि जे एहि परिवर्तनक गति कम हो, परंच भाषामे आएल आंशिक बदलाव स्वयं भाषाक सजीवता लेल अपरिहार्य होइछ। भाषामे व्याप्त एहि विकासक गतिशीलताक स्वभावक बादो एक आदर्श व्याकरणसँ अपेक्षा कएल जाइत अछि जे ओ ओहि भाषाकेँ समग्र रूपेँ विश्‍लेषित एवं निरूपित कए सकय। अभिकलानात्मक व्याकरणक लेल मानवक भाषाई अनुप्रयोगक स्वरूप, भाषिक समाजक विकासक गत्यात्मक रूप तथा भाषाक प्रायोगिक स्तरक मूल स्थिति पर नव रूपेँ विचार करब प्रासांगिक भए जाइत अछि। आजुक सामाजिक परिवेश औद्योगिक-क्रांति एवं सूचनाक्रांतिक बीचक स्थितिक साक्षी बनल अछि। एहि स्थितिक दबाबस्वरूप जे भाषा मानव एवं मानवक बीच संवादक माध्यम अछि वैह भाषा आइ मानव एवं कम्प्यूटरक बीच संवाद स्थापित करबाक लेल तत्पर अछि। दरअसल यैह ओ स्थिति अछि जाहिमे अभिकलनात्मक व्याकरणक पृष्ठभूमि तैयार कए रहल अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक आशय ओहि व्याकरणसँ अछि जकरा माध्यमे प्राकृतिक भाषाकेँ कम्प्यूटरक माध्यमसँ बुझल जा सकैछ। एकरा संगहि व्याकरण होएबाक कारणेँ एकरासँ इहो अपेक्षा कएल जाइत अछि जे ई एतबा वैज्ञानिक एवं परिपूर्ण हो जे एकर नियमक द्वारा कम्प्यूटरक माध्यमसँ प्राकृतिक भाषाक नव-नव वाक्यक सृजन कएल जाए सकय। फलस्वरूप ई व्याकरण मानव-मशीन अंतरापृष्ठक समय अपन भूमिकाक निर्वहन कए सकय। भाषा-कम्प्यूटिंगक लेल ई आदर्श स्थिति होएत जे एहन अभिकलानात्मक व्याकरणक विकास कएल जाए सकय जे प्राकृतिक भाषाक सभ संरचनाक तार्किक विश्‍लेषण प्रस्तुत कए सकय। एकर तात्कालिक लाभ ई होएत जे भाषा-प्रौद्योगिकीक विभिन्न अनुप्रयोग जेना- मशीनी अनुवाद, सूचना-प्रत्यानयन, सूचना- संचयन, व्याकरण जाँचक, पाठ-विश्‍लेषण आदिक विकासमे दीर्घकालिक समाधान उपलब्ध भए सकय। एहि क्षेत्रमे भए रहल शोधक लक्ष्य सेहो यैह अछि ; मुदा वर्त्तमान समयमे भाषाक छोट-छोट संरचने पर शोधार्थीसभक ध्यान केन्द्रित अछि। एहि कारणेँ रूप-विश्‍लेषण (Morph Analysis), टैगिंग (Tagging), आ पदानिरूपण (Parsing)क स्तरे धरि ध्यान केन्द्रित भए सकल अछि आओर एहिमे सफलता सेहो भेटल अछि। आवश्‍यकता एहि बातक अछि जे प्राकृतिक भाषाकेँ आधार बना कए एहन नियम विकसित कएल जाय जे नहि तँ मात्र कम्प्यूटरमे सहज स्वीकार्य हो, बल्कि प्राकृतिक भाषा पर केन्द्रित भाषा-प्रौद्योगिकीय लक्ष्यकेँ सेहो प्राप्त कएल जा सकय। ई सर्वविदित तथ्य अछि जे कम्प्यूटरक प्रचालन-व्यवस्था मूलतः द्वयंक प्रणाली (Binary System : 0 & 1) पर निर्भर अछि आ ठीक एकर विपरीत मानवीय भाषामे असंख्य शब्द-संपदा एवं अनेक तरहक वाक्य संरचना अछि। आब प्रश्‍न उठैछ जे मानव-कम्प्यूटरमे संवाद कोना संभव होएत? इएह महत्वाकांक्षा मानवकेँ कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence)क क्षेत्रक अंतर्गत शोधक लेल प्रेरित करैत अछि। एहिमे मूल समस्या ई अछि जे मानव-मशीन अंतरापृष्ठ (Interface)मे एक दिस मानव होइछ जे अपन असीम शब्द-संपदा एवं भावना, चेतना सदृश अनेक मानवीय गुणसँ भरल होइछ तँ ओहिठाम दोसर दिस मशीन होइछ जे एकटा स्थल उपकरण मात्र अछि। एहन स्थितिमे मानवीय भाषासँ संवाद बैसा पायब कठिन बुझन’ जा रहल अछि। तथापि वर्त्तमानमे भए रहल शोध भविष्यमे की रंग लायत एहि पर आशातीत दृष्टि राखब सैह ठीक रहत। बरहाल यैह ओ स्थिति अछि, जकर कारण अभिकलानात्मक व्याकरणक आवश्यकता महसूस कएल जाए रहल अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक संकल्पना नव अछि एवं अखन धरि कोनो सटीक अभिकलानात्मक व्याकरणक विकास नहि कएल जाए सकल अछि। मुदा सामान्य व्याकरण एवं अभिकलानात्मक व्याकरणमे व्याप्त अंतरकेँ संकल्पनात्मक रूपसँ एतय उद्‍घाटित कएल जाए रहल अछि। यथा- सामान्य व्याकरण मानवीय व्यवहारक लेल होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरण कम्प्यूटरक माध्यमसँ मानवीय व्यवहारक लेल होइत अछि। सामान्य व्याकरण प्राकृतिक भाषा की अछि? कियैक अछि? सदृश प्रश्‍नक पड़ताल करैत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरण प्राकृतिक भाषा कोना काज करैत अछि? सदृश प्रश्‍नक जाँच-पड़ताल करैत अछि। सामान्य व्याकरण सहज एवं मौलिक होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरण ‘सामान्य व्याकरण’ सँ उर्जा ग्रहण करैत नितांत कृत्रिम होएत। सामान्य व्याकरण अपन स्वरूपमे व्यापक भए सकैछ। अभिकलानात्मक व्याकरण स्पष्ट, एकनिष्ट एवं लक्ष्य केन्द्रित होएत। सामान्य व्याकरणक उद्‍देश्‍य मूल रूपसँ मानवकेँ लाभ पहुँचाएब होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक उद्‍देश्य अपन विभिन्न उत्पादक माध्यमसँ मानवकेँ लाभ पहुँचाएब होइत अछि। सामान्य व्याकरण प्रस्तुतीकरणमे ई सहज होइत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक प्रस्तुतीकरणमे गणितीय होइत अछि, जकरा कम्प्यूटर स्वीकार कए सकए। चामस्की व्याकरणकेँ ‘भाषाक तर्कशास्त्र’ कहलन्हि अछि। व्याकरणक उद्‍देश्‍यकेँ स्पष्ट करैत चामस्की कहलनि अछि जे ‘व्याकरण ओएह होएबाक चाही जकरा द्वारा भाषाक सभ वाक्यक वर्णन आओर सृजन कएल जाए सकय।’ आब एतय अभिकलानात्मक व्याकरणमे जे नव प्रसंग जुड़ैत अछि ओ एकर कम्प्यूटरापेक्षी होएब अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक उद्‍देश्य मूलतः ‘प्राकृतिक भाषासंसाधन’क संकल्पनाकेँ सार्थक एवं सफल बनाएब अछि आओर एहिमे अभिकलानात्मक व्याकरण साधनक रूपमे प्रयुक्त होइछ। जखनकि एकर साध्यतँ परोक्ष रूपसँ ‘प्राकृतिक भाषा संसाधने’ अछि। एहने स्वरूपमे अभिकलानात्मक व्याकरणसँ अपेक्षा कएल जाइत अछि जे ओ भाषाकेँ वैज्ञानिक ढ़ंगसँ विश्‍लेषित एवं सर्जित कए सकय, जे कम्प्यूटरापेक्षी हो। आब विचारणीय ई अछि जे ‘प्राकृतिक भाषा संसाधन’क संकल्पना स्वयंमे एक व्यापक संकल्पना अछि आओर दोसर जे एहिमे प्रयुक्त व्याकरण सेहो अपन स्वरूपमे व्यापके होएत। कियैक तँ आइ कोष निर्माणसँ लए कए पाठ-निर्माण धरि सबमे प्राकृतिक भाषाक कोडीकरणक आवश्यकता पड़ैत अछि। एहि सबकेँ कम्प्युटेशनल व्याकरण कहब सैह उचित होएत। एहि स्थितिमे अभिकलानात्मक व्याकरणक मूल उद्‍देश्य तँ प्राकृतिक भाषाकेँ एहि तरहेँ सूत्रबद्ध (Formulized) करबाक अछि जाहिसँ कम्प्यूटर एकरा स्वीकार कए सकय। एकर परिणामस्वरूप ‘प्राकृतिक भाषा संसाधन’क क्षेत्रक विभिन्न लक्ष्य मशीनी अनुवाद ( Machine Translation), सूचना प्रत्यानयन (Information RetrievalInformationRetrie) वाक्-संश्लेषण (Speech Synthesis), शब्द-संसाधन (Word Processing), दृश्य-संसाधन (Visual Processing) तथा ज्ञान-निरूपण (Knowledge Representation) आदि मुख्य बिन्दु अध्ययनक लेल सोझमे आबि रहल अछि जकर मुख्य उद्‍देश्य कम्प्यूटरक सापेक्ष भाषा-प्रजनन करब तथा मानव-मस्तिष्कक सापेक्ष भाषा-बोध कराएब  अछि। एहि व्याकरणमे इहो पायल गेल अछि जे भिन्न-भिन्न उपकरणसभमे एके तथ्यकेँ अलग-अलग ढंगसँ केन्द्रीकृत कएल जाइत अछि। जेना- मशीनी अनुवाद प्रणालीमे लक्ष्य-भाषा पदनिरूपण (Parsing) तथा श्रोत-भाषाकेँ सर्जित(Generation) कएल जाइत अछि। एहिमे एकेटा नियम- ‘वाक्य= संज्ञापदबंध+ क्रियापदबंध’क उद्‍देश्य लक्ष्य भाषाकेँ विश्‍लेषित करब होइत अछि। जखनकि श्रोत भाषाक एकर समतुल्य निर्माण करब होइत अछि। एहि सूचना-प्रत्यानयनमे पदनिरूपणक आधार ‘मूल पद’ होइत अछि। एकर आधार पर प्रणालीकेँ सूचीकृति सूचनाक सटीक मिलान करब होइत अछि। एकर व्याकरणक स्वरूप मशीनी अनुवादमे पदनिरूपणक नियमसँ भिन्न होएत। एहि तरहेँ अन्य उपकरण सभमे अलग-अलग प्रक्रियाक तहत एकर उद्‍देश्य भिन्न वा एकरा कोडीकृत करबाक तरीका भिन्न भए सकैत अछि। अभिकलानात्मक व्याकरणक स्थिति एवं महत्त्वकेँ देखैत जँ गंभीरतासँ विचार कएल जाय तँ स्पष्ट होइत जे संदर्भक अनुसार छोट-छोट नियमसँ काज निकालल जा रहल अछि। जाहिमे सर्वप्रथम रूपकेँ चिन्हब आओर एकर विश्‍लेषण कएल जाइत अछि। एहि क्रममे पदक व्याकरणिक कोटिक निर्धारण कएल जाइत अछि, जकरा टैगिंग (Tagging) कहल जाइत अछि। एकरा लेल आवश्यक होइत अछि जे व्याकरणक कोटि एवं ओकर गुण (Attributes)क आधार पर एकटा पहिनहिसँ तैयार टैग-सेट (Tag-Set) हो। मैथिलीक लेल एतय एकटा टैग-सेट (Tag-Set) देल जा रहल अछि जकर स्रोत LDC-IL, CIIL, Mysoreमे हमरा द्वारा कएल जाए रहल काजक अछि। S.No Category Label Examples Remarks Main Category Sub Category 1 Noun N 1.1 Common NN पोथी, कलम, पंडित, खवास 1.2 Proper NNP रंजन, दिनेश, अतुल 1.3 Nloc NST आगू, पीछू, ऊपर, नीचा 2 Pronoun PR 2.1 Personal PRP तोँ, हम, ई, ओ 2.2 Reflexive PRF अपना, अपने, स्वयं 2.3 Relative PRL जे, जिनका, जिनकर, जकरा 2.4 Reciprocal PRC एक-दोसरकेँ, आपस, परस्पर 2.5 Wh-word PRQ के,की, कथी ककर 2.6 Indefinite PRI केओ, किछु/ किउछ 3 Demonstrative DM 3.1 Deictic DMD ई,ओ,अहाँ,हम 3.2 Relative DMR जे, जाहि 3.3 Wh-word DMQ के,की,कोन 3.4 Indefinite DMI केओ, किछु/ किउछ, कोनो 4 Verb VM 4.1 Main VM देख, पढ़, पी, गा, ले, उठ, खा 4.2 Auxiliary VAUX अछि,छी,छल,छथि,छलाह,रहत,होएब,थिक 4.3 Gerund VGN धोएब, पीटब, दौरब, नहाएब 4.4 Causative Verb VCT मरबाएब, छरबाएब, लदबाएब, लिखबाएब, दुहबाएब 4.5 Compound Verb CVP मारब-पीटब, काट-छाँट, कानब-खीजब, धर-पकर 5 Adjective Adj नीक, मोटका, ललकी, 6 Adverb Adv भने, अनायास, क्रमश:, एकाएक, एहन 7 Postposition PSP सँ, केँ, लेल 8 Conjunction CC 8.1 Co-ordinator CCD आओर, परंच, मुदा, वा, आ 8.2 Subordinator CCS जँ, तँ, जे 9 Particles RP 9.1 Default RPD भरि, यौ, हौ, रौ 9.2 Classifier CL टा, गोट, गो, ठो 9.3 Interjection INJ ओह-ओ, अहा, वाह, हा 9.4 Intensifier INTF बहुत, बेसी, सबसँ 9.5 Negation NEG नहि, ऊहुँ, न 10 Quantifiers QT 10.1 General QTF कनेक, बहुत, किछु 10.2 Cardinals QTC एक, एकटा, दुई, बीसगोट, तीन, चारि 10.3 Ordinals QTO पहिल, दोसर, तेसर, चारिम 11 Residuals RD 11.1 Foreign word RDF A word written in script other than the script of the original text 11.2 Symbol SYM $, , *, (, ) For symbols such as $, & etc 11.3 Punctuation PUNC ., : ; Only for punctuations 11.4 Unknown UNK A word written in script other than the script of the original text 11.5 Echo words ECH जलखे- (तलखे), मोंट-(सोंट) This POS tag set for Maithili Prepared by: Dr. Arun Kumar Singh,JRP,Maithili, LDC-IL,CIIL अपन योजनाक अनुरूप टैग-सेटक निर्माण कएल जाइत अछि। टैग-सेटक लेल प्राथमिकता होइत अछि जे ई वैज्ञानिक, विस्तृत, योजना-केन्द्रितक संग-संग अनुप्रयोग विशेषक तैयारीक अनुकूल सेहो हो। रूपक आधार पर टैगिंग सर्वाधिक लोकप्रिय प्रक्रिया अछि, मुदा योजनाक अनुरूप पदबंध एवं वाक्यक सेहो आब टैगिंग होइत अछि। एकरा संग-संग प्रोक्तिक सेहो आब टैगिंग होमए लागल अछि। अभिकलनात्मक व्याकरणक निर्माणक चरणमे पदनिरूपण(Parsing) एकगोट महत्वपूर्ण पड़ाव होइत अछि। एहिमे पदक अंतिम व्यवहार्यताक अनुसार वाक्यक विश्लेषण होइत अछि। प्राय: एकर बादक विश्लेषणकेँ वृक्षारेखक दृष्टिसँ निर्धारित कए देल जाइत अछि। एकरा नियमबद्ध करबाक लेल कोनो रूपवादक आधार लेल जाइत अछि किएकतँ विश्लेषण चरणबद्ध एवं वैज्ञानिक भए सकए। पदनिरूपण अनेक स्तर पर शुरु होइत अछि आ एकरे अनुरूप एकर वर्गीकरण कएल जाइत अछि। ई कखनो बामसँ शुरू भए कए दहिन दिस तँ कखनो दहिनसँ बाम दिस जाइत अछि। एकरे समानान्तर ई उपरसँ नीचा एवं नीचासँ उपर दिस काज करैत अछि। ई बहुत किछु भाषाक प्रकृति पर निर्भर होइत अछि। मैथिली सदृश क्रिया केन्द्रित भाषामे पदनिरूपणक प्रक्रिया प्राय: क्रियेसँ शुरु होइत अछि। ई सुविधाजनक अछि किएकतँ क्रियापदमे अधिकतम व्याकरणिक सूचना भेटि जाइत अछि, जकर आधार पर एक सक्षम पदनिरुपण प्रणालीक विकास कएल जाए सकैत अछि। अभिकलनात्मक व्याकरणमे पूर्वनिर्धारित टैगसँ पदकें चिह्नित कएल जाइत अछि, तत्पश्चात ओकर भाषा-संरचनाक अनुरूप प्राय: वाक्य केन्द्रित विश्लेषण कएल जाइत अछि। एहि आधार पर प्रयास कएल जाइत अछि जे एहन व्याकरणिक नियम तैयार कएल जाय जाहिसँ सम्पूर्ण संरचनाक विश्लेषण भए सकय। व्यवहारमे पदनिरूपणक प्रक्रिया एक एहन चरणक रूपमे अबैत अछि जतए एहि नियमक परीक्षण होइत जाइत अछि। जँ बनल नियमसँ वाक्यक पदनिरूपण सही भेल अछि तँ ई एहि बातक द्योतक अछि जे एहि स्तर धरिक नियम तैयार भए गेल अछि। एही प्रकारें सम्पूर्ण भाषाक विश्लेषण आओर ओकर अनुरुप नियमक गुच्छ बनैबाक प्रक्रिये अभिकलनात्मक व्याकरणमक निर्माणक प्रक्रिया होएत। *************** संदर्भिका मैथिली 1.     ग्रियर्सन,जी.ए.,भारतक भाषा सर्वेक्षण(मैथिली), मैथिली अकादमी, पटना,1978 2.     मिश्र, डा. धीरेन्द्र नाथ, मैथिली भाषा शास्त्र, भवानी प्रकाशन, मुसल्लहपुर, पटना,1986 3.     ग्रियर्सन,जी.ए., मैथिली व्याकरण, सम्पादक, डा. रमानंद झा ‘रमण’, अनुवादक, पं. गोविन्द झा, चेतना समिति, पटना, 2011 4.     झा, पं. गोविन्द, मैथिली परिशीलन, मैथिली अकादमी, पटना, 2007 5.     झा, दीनबन्धु, मिथिला भाषा विद्योतन, मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगा, 1946 6.     मिश्र, नवोनाथ, मैथिली भाषा विज्ञान, मिथिला पुस्तक केन्द्र, दरभंगा, 1984 हिंदी 1.     झा, पं. गोविन्द, मैथिली भाषा का विकास, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना,1974 2.     कुमार, सुरेश, शब्द अध्ययन और समस्याएँ, केन्द्रिय हिंदी संस्थान, आगरा, 1990 3.     गुप्ता, मनोरमा, भाषा अधिगम, केन्द्रिय हिंदी संस्थान, आगरा, 1995 4.     जैन, वृषभ प्रसाद, अनुवाद और मशीनी अनुवाद, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995 5.     तिवारी, भोलानाथ, आधुनिक भाषा विज्ञान, लिपि प्रकाशन, नई दिल्ली, 1985 6.     मलहोत्रा,विजय कुमार, कम्प्यूटर के भाषिक अनुप्रयोग, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002 7.     सिंह, सूरजभान, अमग्रेजी-हिंदी अनुवाद व्याकरण, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003 8.     त्रिपाठी, अरिमर्दन कुमार, भाषा के समकालीन संदर्भ, साहित्य संगम, इलाहावाद,2012 अग्रेजी 1.     Allen, James, Natural Language Understandings, Second Edition, Pearson Education, Singapore, 2005 2.     Atkins, B. T. S. and A. Zampoli, Edited, Computational Approaches to the Lexicon, Oxford University Press, New York, 1984 3.     Meadow, Charles T., Man-Machine Communication, John Wiley & Sons, New York, 1970 4.     Rajpurohit, B. B., Technology and Languages, Central Institute of Indian Languages, Mysore, 1994 5.     Sampson, Geoffrey, Natural Language as a Special Case of Programming Language, American Journal of Computational Linguistics, Microfiche-25, 1975 6.     Grierson, George A.  An Introduction to The Maithili Language of North Bihar, Part 1,Grammar, Calcutta, Asiatic Society of Bengal, 1881 7.     Jha, Subhadra, A Survey of Maithili Literature, LuZac & Company, LTD,A6, Great Russel Street, London W. C.  I., 1958 8.     Yadav, Ramawatar, A Referece Grammar of Maithili, Munshiram Manoharlal Publisher Pvt. Ltd., Post Box 571554 Rani Jhansi Road, New Delhi, 1997 तीन दिवसीय कार्यशालाक आयोजन INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar3.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar3.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar3.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar3.JPG" \* MERGEFORMATINET विगत 19 सँ 21 सितम्बर 2011धरि ‘भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’( एल.डी.सी.आई.एल.), भारतीय भाषा संस्थान मैसूर-6 द्वारा तीन दिवसीय कार्यशालाक आयोजन कएल गेल। मैथिली, हिन्दी, उर्दू विषयक ‘पार्टस आफ स्पीच’ सँ संबंधित कार्यशालाक विषय छल ‘लेक्चर कम वर्कशाप आन पी. ओ. एस.-मार्फ: उर्दू, हिन्दी एण्ड मैथिली’। एहि कार्यशालामे उक्त विषयक विशेषज्ञक रूपमे छओ गोटए व्याख्यान देलन्हि। एतय ध्यातव्य अछि जे मैथिली भाषाक लेल नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक क्षेत्रमे पहिल बेर मैथिलीक पार्टस आफ स्पीच एवं ओकर एट्रीव्यूटस (विशेषता) पर विस्तारसँ चर्चा कएल गेल। एल.डी.सी.आई.एल.क दिससँ मैथिलीक लेल पार्टस आफ स्पीच एवं ओकर एट्रीव्यूटस पर डा. अरूण कुमार सिंह एवं एल.डी.सी.आई.एल.टीम द्वारा बनाओल मैथिली टेग सेट पर मैथिली भाषा वैज्ञानिक डा. गिरीश नाथ झा (जे.एन.यू.), डा संजीब चौधरी (बीट्स पिलानी,राजस्थान), डा. कमल चौधरी(आई. आई. टी.रोपर,पंजाब) एवं डा. अनिल ठाकुर(बी.एच.यू.,बनारस)क संग सम्पूर्ण एल.डी.सी.आई.एल. परियोजनाक विषय प्रतिनिधिक संग-संग मैथिलीक विषय प्रतिनिधि डा. अरूण कुमार सिंह, दिनेश मिश्र एवं अतुलेश्वर झा परिचर्चामे भाग लेलन्हि । INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar4.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar4.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar4.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar4.JPG" \* MERGEFORMATINET विगत 12 एवं 13 दिसम्बर 2011केँ ‘भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’ भारतीय भाषा संस्थान मैसूरक तत्त्वधानमे राष्ट्रीय संगोष्ठीक आयोजन कएल गेल जकर विषय छल ‘पार्टस आफ स्पीच एनोटेशन फार इण्डियन लेंग्वेजस: इसू एण्ड प्रोस्पेक्टीभस’। जाहिमे डा. पी. पी. गिरिधर,ए. डी. आई., भारतीय भाषा संस्थानक अध्यक्षतामे आयोजित एहि राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सर्वप्रथम स्वागत भाषण डा. एल. रामामूर्त्ति(प्रोजेक्ट डाइरेक्टर,  एल.डी.सी.आई.एल.)क द्वारा कएल गेल। पछाति बीज भाषण डा. गिरिश नाथ झा (जे.एन.यू.) देलनि। देशक विभिन्न भागसँ बीसगोट विद्वान एहि सेमिनारमे अपन आलेखक पाठ कएलन्हि। एहि अवसर पर डा. अरूण कुमार सिंह ‘टूवार्डस मैथिली पार्टस आफ स्पीच टेगिंग’विषय पर आलेख पढलन्हि। INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar5.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar5.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar5.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar5.JPG" \* MERGEFORMATINET विगत 22 दिसम्बर 2011केँ राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा ‘भाषा-दिवस’क रूपमे मैथिली,बोडो, संथाली एवं डोगरीक संवैधानिक मान्यता प्राप्त करबाक विशिष्ट दिवसक अवसर पर एकगोट कार्यक्रम भारतीय भाषा संस्थान मैसूरक प्रीभ्यू थियेटरमे दुई सत्रमे आयोजित कएल गेल। एकर पहिल सत्र शैक्षिक सत्र छल जकर अध्यक्षता भारतीय भाषा संस्थानक कार्यवाही निदेशक डा.के.कफो कएलन्हि, मुख्य अतिथिक रूपमे निवर्त्तमान निदेशक डा. सचदेवा उपस्थित छलाह।  उपर्युक्त भाषा प्रतिनिधिक रूपमे डोगरीक डा. बीणा गुप्ता, बोडोक डा. अनिल बोडो ओ संथालीक डा. के. सी. टूडू आएल छलाह। मैथिलीक अतिथिक रूपमे डा. श्रुतिधारी सिंहकेँ अएबाक छलन्हि मुदा फ्लाइटक केन्सिलेशनक कारणेँ नहि आबि सकलाह।मंच संचालनक काज डा. अजीत मिश्र, स्वागत भाषण पवन चौधरी एवं धन्यवाद ज्ञापन डा. नरजरी कएलन्हि। मंचासीन विद्वान द्वारा अपन-अपन भाषाक विशेषता एवं कठिनाईक चर्चा कएल गेल। डा. सचदेवा एवं डा. कफो अपन-अपन विद्वतापूर्ण विचारमे भाषाक सर्वांगिण विकास पर चर्चा कएलन्हि। दोसर सत्रमे सांस्कृतिक कार्यक्रमक अवसर पर मैथिली, बोडो, संथाली, डोगरी एवं किछु दोसरो भाषा- भाषी अपन-अपन भाषामे कविता, गीत,गजल,लधुकहानी आदिक पाठ कएलन्हि। एहि अवसर पर डा. अजित मिश्र ‘गोसाउनिक गीत’ गावि मैथिलीक कल्याणक कामना कएलन्हि तँ डा. अरूण कुमार सिंह मैथिलीकेँ उचित विस्तार नहि भेटल अछि तकरा आधार बना ‘भारतीय भाषाक हम बेटी मैथिली’ कविताक पाठ कएलन्हि।आन-आन भाषा-भाषीक संग दिनेश मिश्र सेहो मैथिली कविताक पाठ कएलनि। ज्ञातव्य हो जे भारतीय भाषा संस्थान मैसूरमे भाषा दिवस मनएबाक स्वथ्य परंपराक श्रीगणेश करबाक सम्पूर्ण श्रेय ‘राष्ट्रीय अनुवाद मिशन’क प्रोजेक्ट डाइरेक्टर डा. अदिति मुखर्जीकेँ जाइत छन्हि किऐकतँ हुनकहि संरक्षणमे भाषा दिवस कार्यक्रम संभव भए सकल। INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar6.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar6.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar6.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar6.JPG" \* MERGEFORMATINET   INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar7.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar7.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar7.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar7.JPG" \* MERGEFORMATINET विगत 16 सँ 19 दिसम्बर 2011धरि ‘नवम् इन्टरनेशनल कांफ्रेंस आन नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंग’(आइकान-2011), अन्ना विश्वविद्यालय, चैन्नईमे आयोजित कएल गेल। ‘भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’ भारतीय भाषा संस्थान मैसूरक दिससँ मैथिली भाषाक सहभागीक रूपमे डा. अरूण कुमार सिंह गेल छलाह। INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar8.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar8.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar8.JPG" \* MERGEFORMATINET INCLUDEPICTURE "http://www.videha.co.in/Seminar8.JPG" \* MERGEFORMATINET विगत 07 सँ 16 जनवरी 2012धरि ‘भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’( एल.डी.सी.आई.एल.), भारतीय भाषा संस्थान मैसूर आओर ‘भाषा विज्ञान विभाग’, काशी हिन्दु विश्वविद्यालयक संयुक्त तत्वाधानमे दस दिवसीय ‘ओरिएनटेशन कम ट्रेनिंग प्रोग्राम(कार्यशाला) आन नेचूरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग’ मैथिली एवं हिन्दी भाषाक आयोजन भेल। काशी हिन्दु विश्वविद्यालयक कला सेकायक एनी बेसेन्ट सभागारमे नेचूरल लैंग्वेज प्रोसेसिंगक प्रशिक्षण कार्यशालाक उद्धाटन समारोहक मुख्य अतिथि डा. रवि भूषण मिश्रा,विभागाध्यक्ष संगणक अभियंत्रिकी, प्राद्यौगिकी संस्थान, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय छलाह आओर संयोजक डा. अनिल ठाकुर प्रवक्ता, भाषा विज्ञान विभाग, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय छलाह। उद्‍घाटन समारोहक अध्यक्षता प्रो. कमल शील, कला संकायाध्यक्ष, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय द्वारा कएल गेल। धन्यवाद ज्ञापन डा. संयुक्ता घोष, प्रवक्ता, भाषा विज्ञान विभाग, काशी हिन्दु विश्वविद्यालय कएलन्हि। एहि कार्यशालाक मुख्य उद्देश्य भाषा विज्ञानक उभरैत अनप्रयुक्त क्षेत्र, भाषा प्रौद्योगिकी क्षेत्रमे विद्यार्थी एवं शोधार्थीकेँ प्रशिक्षित करब अछि। कार्यशालामे देशक दोसर संस्थानसँ लगभग 15 शोधार्थी सहित काशी हिन्दु विश्वविद्यालयक भाषाविज्ञान संगणक अभियंत्रिकी एवं आन-आन भाषाविभागक 15 शोधार्थी एवं विद्यार्थी सम्मिलित कएल गेलाह। प्रशिक्षण देब’ बलामे डा. अनिल कुमार सिंह, डा. संयुक्ता घोष, प्रो.(डा.) रामबक्स मिश्रा, डा. अनिल ठाकुर, डा.रवि भूषण मिश्रा, डा. जितेन्द्र कुमार सिंह, डा. अरूण कुमार सिंह, अरूणधति, डा. सत्येन्द्र अवस्थी, अतुलेश्वर झा,अदितिदेव शर्मा एवं राजेश आदि कार्यशालामे उपस्थित शोधार्थी एवं विद्यार्थीकेँ नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक सब भागसँ अवगत करबैत कोना काज कएल जाइछ तकरा वाचिक एवं प्रायोगिक रूपमे बुझाओल गेल। ज्ञातव्य अछि जे मैथिली भाषाकेँ एहि तरहक कार्यशालामे सहभागिताक अवसर बहुत कम प्राप्त होइत रहलैक अछि, तेँ एहन-एहन कार्यशालासँ मैथिली भाषा ओ ओकर अध्यवसायीकेँ बहुतो लाभ होएबाक सम्भावना बनैत अछि। पद्य खण्ड डॉ. शंभु कुमार सिंह अतीत अतीत छल, थिक वर्तमान आब ओ सम्हार’ चाहै छी जे काल्हि थिक अतीतक पन्ना पढ़िकए बुझाइत अछि ओ नीक-बेजाए, अल्हड़, बीहड़ जे किछु छल अपना समय केर साक्षी आ आब’ वला काल्हि केर लेल ज्ञान केर सागर छल अतीत जे लेलक ओ स्मृति थिक जे देलक ओ स्थिति थिक ई वर्तमान केर बात थिक जँ स्मृति आ स्थितिक मंथन करी तँ काल्हुक भविष्य.... भ’ सकैछ नीक। आस कटि जाएत राति फेर आओत दिवस ल’ संग रितु पावन पावस छी एखन विवश ! छी तम मे समय विषम मे, झंझावात भरल अछि हमरा जीवन मे भ’ मुखरित एहि असार संसार मे नित नव भाव-उल्लास संजोगने मोन मे आस छी आस मे आब’ वला काल्हि केर सत्य, स्वच्छन्द, कर्मफलदायी समय चपल केर! लोरी तू लोरी गा हम सूति जाएब माए लोरी गा हम सूति जाएब लय नहि छौक तँ की स्वर तँ छौक? छी भूखल, देह अछि काँपि रहल ठंढक सँ ई माया नगरी अछि, हमरा बसन नहि अछि तँ की भेल ज’र त’ अछि? माए! हे देखही.. ओकरा गाड़ीमे उजरा कुकुर अछि घूमि रहल खा दूध-भात ई पशु जाति किछु खाइत अछि आ किछु करैत अछि जियान तू मानव छेँ करैत छेँ श्रम दिन रातिक श्रम केर ई फल छौक तोहर नेना अन्नक लेल बेकल छौक कलुष-भेद-तम-नियम विषम केर ई नदी आब नहि बहतैक हमर जाति ई कुठाराघात काल्हिसँ नहि सहतैक टूटि जेतैक एक्कर विषदंत भ’ जेतैक काल्हि एक्कर अंत अछि अस्त्र नहि मुदा हाथ तँ अछि? आ फेर उपर ‘हर’ तँ छथि? तू लोरी गा हम सूति जाएब माए लोरी गा हम सूति जाएब। आह्वान भारत भूमिक नवतुरिया हमर कविताक आह्वान सनू भ’ तन्मय अपन कान खोलि छथि बाजि रहल भारती से सुनू हे भारत ! ई भारती थिक अति विवश भाव भंगिमा नेने हिल रहल ठोर किछु कहबा लेल प्रेरित क’ रहल किछु करबा लेल कखनहुँ अहाँक कखनहुँ हमर एहि लेल बाट निहारैत छथि बस त्राहि-माम पुकारैत छथि छथि कहथि देखू हमर ई दशा शोणित सँ रंजित श्वेत वसन नखसँ शिख धरि अछि जख्म भरल लूटि रहल हमर अछि अमन-चैन पंजाब,असम,गुजरात,आँध्र कश्मीर सहित अन्यान्य प्रान्त अछि सिसकि रहल भ’ भयाक्रान्त छल कहियो उत्तुंग गर्वसँ हम्मर सिर प्रकृति प्रदत्त पावन कश्मीर केसरिया सेब क’ रहल श्रृंगार लहलह-हरियर बाग निशात उज्जर बर्फशिला बाँटि रहल छल शांतिकेर संदेश उधार छल बहैत जतय शीतल समीर चहुँदिस आब बरसैत अछि गोली नहि खेलू, नहि खेलू रोकू ई खूनक होली जाति-धर्मक उन्माद भड़का जे उन्मादी अहाँकेँ लड़ाबैत छथि हुनकर तँ कुरसीक प्रश्न छैक मुदा की यैह अहाँक मानवता थिक ? डोगरी कविता मूल : प्रो. चम्पा शर्मा (अवकाश प्राप्त संस्थापक अध्यक्ष, स्नातकोत्तर डोगरी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू) हिन्दी अनुवाद : श्रीमती रजनी शर्मा मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह स्नेह-भरल सनेस बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? रहबाक अहाँक नहि कोनो ठेकान, आइ ‘सियासी’ काल्हि ‘पुलगामा’ आँखिएमे अहाँ काटी राति, जड़कल्ला आकि हो बरसाति। पठाबी स्नेहक मनि-आडर, पूँछ’ ‘रजौरी’ ‘डोडा’, ‘पाडर’ अहाँ लिखि भेजू, कतए पठाबी, अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कनहा पर सभदिन बोझ उठौने, ठाम-कुठाम अहाँ डेग बढौने। गरम सीरकमे हमसभ सूती, अहाँ छातीसँ बन्दूक लगौने। एक बरोबरि दिन आ राति, की साँझ आ की परात। कतए करै छी अहाँ विश्राम? कोन ठाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? ‘सियाचीन’मे कोना रहै छी, बर्फ-बिछौना कोना सहै छी? सहैत हएब अहाँ बहुत ठंढ नहाएब तँ बुझू हैत दंड। नीक-सन एकटा पैटर्न चूनिकए, स्नेहक एकटा स्वीटर बुनिकए छी रखने, बाजू कतए पठाबी अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? उत्तरलाई आ जैसलमेर भेल अहाँक ड्यूटी कैक बेर। चलैत बलुआही तुफ़ान भेल हैब अहाँ केहन हरान? करैत अमावस-सन अन्हार, अपनहुँ चेहरा भेल अनचिन्हार। स्नेह भरल हम चान चढ़ाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जहाज उड़ाएब भ’ जाए सरल, सदिखन सीमान पर आँखि गरल। दुश्मन बैसल अछि ताकमे, नहि ओकर इरादा पाक अछि। छल-कपट करि ओ घेरए नहि, अहाँक मति ओ फेरए नहि। स्नेहक हम बरखा बरसाबी, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कोच्चि, गोवा, विशाखापट्टनम् अंडमान आ चेन्नई दक्खिन। जल-सेना केर बेड़ा तारल, देशक दुश्मनकेँ अहाँ मारल। विश्व प्रशंसक अछि अहाँक, स्वयं वरूण छथि रक्षक अहाँक। एहिसँ बढ़िकए हम कहि की सकै छी? अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? साहस ऊँच, जेना की ‘पीर’ कारगिल जाउ आकि कश्मीर। रक्षा अहाँक करताह महेश, गौरी-नन्दन श्रीगणेश। देश बचाएब, धरम निभाएब, ‘जोरावर’ सन यश अहाँ पाएब। आशीर्वचनक खाता फुजाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? खाखी, चिट्टी, लीलहा वर्दी अछि सरिपहुँ हमरा हमदर्दी। माथ सँ ल’ कए पयर धरि, बुझू ईश्वर केर रूप अनेक। मिलत जखन वीरता केर तगमा, रचब एकटा सुन्नर-सन नगमा। तार मुबारक केर पठायब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जखन सुनै छी अहाँके फोन, प्रमुदित भ’ उठैछ हमर मोन। चिन्तामुक्त भ’ हम सुतै छी, मुक्त गगनमे हम उड़ै छी। सभ कुछ लागए हमरा मीत। मोन करए लिखू कोनो गीत, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? यौ विक्की, गुरदीप कि तारक, होमए अहाँकेँ जनम दिन मुबारक। समय भेटए तँ गौशाला जाएब, हरियर घास गायकेँ ओगारब। घूरि कए करब फोन जलंधर, दादी संग एखन जाइ छी मंदिर। अशेष स्नेह लेल धूप जरायब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? भूल्ली भैंसक दूधक घी, सेहो छी हम संजोगने । कुलदेवता केर पूजासँ पहिने, खा ने केओ सकता जे हो। श्री-पुलाव अहाँकेँ भाबए, ‘जल्दी बनाउ’ आबि कही ‘माए’! सभ इच्छा हम पूर करब खाइत छी किरिया हम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? बहुतो दिनसँ एकादशीक हम व्रत छी रखने, करब उद्यापन आएब अहाँ घूरि घर जखने, काज तँ आओरो.... छैक घर पर दिल खोलि हम ककरा देखाउ? हम्मर प्राण! बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? पागल-सन भेल अछि अहाँक बहिन, कुशल पूछैत छथि ओ सभ दिन। ‘राहड़ा’* करैत छथि अहाँके नामक, चर्च करैत छथि अहाँके काजक। वीर हमर युद्ध जीतकेँ औताह, कबुला करथि जा कए बाहवे। देवी माँ केँ भेंट चढौती अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? युद्ध जीत कए अहाँ जे आएब, करब यज्ञ आ भोज कराएब। ठाम-ठाम पर फूल बिछायब, रंगोलीसँ घर-द्वार सजायब। अमृतसर, बाहवे, सतवारी जाएब ओतए हम बेरा-बेरी। पीर-मज़ार पर रोट चढ़ाएब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? देखि अहाँकेँ चान चढ़ए, केतनहुँ किएक नहि काज बढ़ए। देखी अहाँके सूरत कोमल, सदिखन रहए मोन अति हुलसल, चहुँ-दिस आबि जाएत बहार, बसात गबै अछि मेघ-मल्हार। गीत प्रीत केर गबै अछि कोयल अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? *‘राहड़ा’ (जम्मू क्षेत्रमे मनाओल जाएवला भाय-बहिनक एकटा महत्वपूर्ण पर्व) कुमार संभव ‘भारद्वाज’ (उम्र-12 बर्ष, कक्षा-8, ग्राम- लहुआर, पत्रालय तेलहर, अंचल-महिषी, जिला-सहरसा, बाबू चतुर्भुज सिंहक प्रथम पौत्र छथि। मूल रूपसँ हिन्दीमे लिखल गेल ‘मेरा भारत देश महान’ हिनक पहिल कविता छियनि।) मैथिली अनुवादक: डॉ. शंभु कुमार सिंह हमर भारत देश महान हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान विद्या केर भंडार एतय अछि कुरीति केर विनाशक अछि आन कलामे परिपूर्ण अछि व्यापक अछि ई अनुपम अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान कहल जाइछ एहि देशक आगू सब क्यो माथ झुकौने अछि आन नदी आ पर्वत सभ सेहो एकर गुणकेँ गौने अछि, एहि धरती पर गंगा-यमुना केर बहैत निर्मल धारा अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान वीर पुरूषसँ भरल पड़ल ई हमर मुल्क हमर समाज ई कुँवर सिंह आ गाँधीजी केर यैह निवास स्थान अछि, एहि धरती पर जनम नेने छथि राम, कृष्ण ओ बुद्ध सेहो एहि धरती पर जनम नेने छथि सीता ओ सावित्री सेहो, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान। डा. अरुण कुमार सिंह भारतीय भाषाक हम बेटी मैथिली हम बेटी तँ छी माय, अहिंक मुदा अष्टम अनुसूचिमे पहुँचि विकासक बाट जौहेत विस्तारक लेल छटपटाइत हम बेटी तँ छी परंच अहाँक प्रतीक्षाक केन्द्रबिन्दु नहि अहाँक सांस पर माय लिखल अछि कोनो आन नाम नहि दए सकैत छी हम अहाँकेँ आगियो धरि जन्मेसँ हक-वंचित एहिना, माय जखन नाम बनिकए भारतीय भाषा बनि जाइत छी तखनो एकटा प्रश्न नक्शा पर उभड़िये अबैछ हम के छी? अहाँक महीमा गीतमे अपन चर्चोसँ महरूम हमर नामक आगू ‘श्री’ लागो वा ‘मरहूम’ हम धनी रही वा गरीब अहाँकेँ की नहि जीत छी अहाँक नहि अहाँक हार छी हम जरैत दियाक पातर अन्हार छी अहाँ भारतीय भाषा छी माय हम मैथिली छी माय, हम मैथिली छी! सोधनपाल एकटा छथि गोपाल गोपाले सन मस्त रंगो गोपाल सन स्वभावो छन्हि व्यसानुकूल पढबाक नाम पर छथि प्रतिकूल जैताह नीत स्कूल लिखताह नहि पढताह मारि धरि खौताह तैयो बिहुँसल स्कूलसँ घूरताह एक दिन अनचोकेमे दलानक बगलेमे लागल लारक ढेरीमे लगोलन्हि सलाईसँ आगि भ’ त’ जाइत जुलूम मुदा कौहुना आगि मिझाओल गेल सौंसे गौऊँआक नजरिमे गोपालसँ भेलाह सोधनपाल। प्रियवर सम्पादकजी (सम्पादक विदेह, गजेन्द्र ठाकुरकेँ सम्बोधित) प्रियवर सम्पादकजी यथोचित अहिना सम्पादकीय लिखैत रही मने-मन हर्षित होइत रही सत्यसँ भेंट करैत रही शब्दक अर्थ बुझैत रही गरल मुर्दाकेँ उखारैत रही नव-नव इतिहास बनाबैत रही मिथिला,मैथिली एवं मैथिलकेँ परिभाषित करैत रही युग-युगसँ परिव्याप्त गलतफहमीकेँ सुधारैत रही परिवारवादसँ मैथिलीक रक्षा करैत रही वर्त्तमान् क कुचक्र चालिक पर्दाफाश करैत रही मैथिलीक हत्याराकेँ सजा दियाबैत रही मैथिल,ननमैथिल एवं सोइतक झगड़ाक फरिच्छोंठ करैत रही मैथिलीक आवाजकेँ जनता-अदालत धरि पहुँचाबैत रही आक्रोषितक आक्रोषकेँ आशीर्वचण बुझि अपनाबैत रही मैथिलीकेँ लहटा दिस जएबामे मदति करैत रही मैथिलीक प्रकाण्ड विद्वान प्रोफेसरकेँ शुद्ध- शुद्ध उच्चारण सिखाबैत रही कब्रमे लटकल पाइरकेँ अपन प्रतिष्ठा बचैबाक पाठ पढबैत रही अवसरवादीक अवसरवादिताकेँ बाँचैत रही वैशाखी छोड़ि अपना बलेँ खाड़ होइत रही मिथिलाक्षरकेँ पुनरस्थापित करबाक प्रयास करैत रही विधि, विज्ञान,वाणिज्य एवं नव-नव प्रौद्योगिकीक संग मैथिलीकेँ जौड़ैत रही मिथिला,मैथिलीक विकासमे सदति लागल रही सम्पूर्ण विश्वमे अपन स्थान निर्धारित करैत रही विदेह सदेह:२६|| 407 406 || विदेह सदेह:२६

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