ISSN 2229-547X विदेह सदेह २७ गजेन्द्र ठाकुर & रवि भूषण पाठक द्वारा विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथीक सर्वाधिकार सुरक्षित अछि। काॅपीराइट (©) धारकक लिखित अनुमतिक बिना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रतिएवं रिकॉडिंग सहित इलेक्ट्रॉनिक अथवा यांत्रिक, कोनो माध्यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्पादित अथवा संचारित-प्रसारित नै कएल जा सकैत अछि। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्य : भा. रू. ३००/- संस्करण: २०२२ Videha Sadeha 27: A Collection of translated Maithili Prose and Verse by Gajendra Thakur & Rabi Bhushan Pathak (source:Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in ). अनुक्रम १.गजेन्द्र ठाकुर गद्य-खण्ड तेलुगु कथा खण्ड शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफ- जुम्मा (तेलुगु लघुकथा) अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ.३-१३) पद्य-खण्ड ओड़िया कविता खण्ड इप्सिता सारंगी- गप, हिलकोर (ओड़िया कविता) अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. १६-२०) वासुदेव सुनानी- फूसि, अनुमति (ओड़िया कविता) - अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. २१-२४) भरत माँझी- हमर घुरलाक बाद (ओड़िया कविता) - अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. २५-२६) तेलुगु कविता खण्ड अन्नावरन देवेन्दर (अंतिम शब्द; पानि अछि, मात्र आँखिक नोर)-दू टा तेलुगु कविता- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. २८-३६) शीला सुभद्रा देवी- पसीझक काँट (तेलुगु कविता) - अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ३७-३८) एन. अरुणा- ई सेहो अछि प्रवास (तेलुगु कविता) - अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ३९-४०) गुजराती कविता खण्ड हेमांग आश्विनकुमार देसाइ- समीकरण (गुजराती कविता)- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ४२-४३) अजय सरवैया- अहाँक तामस हमर स्वागतपथ (गुजराती कविता) अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर (४४-४५) राजेन्द्र पटेल- बिनु शीर्षकक (गुजराती कविता)- अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ४६-४७) पीयूष ठक्कर- सांध्य बेला (गुजराती कविता)- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ४८-४८) पन्ना त्रिवेदी- आमद (गुजराती कविता)- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ४९-४९) बाबू सुथार- गृहमोह (गुजराती कविता)- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ५०-५२) भोजपुरी कविता खण्ड भिखारी ठाकुर- वृद्धाश्रमक पक्षमे- बिरहा १-२ (भोजपुरी पद्य)- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ. ५४-५५) कश्मीरी कविता खण्ड रहमान राही- छाह सभ (कश्मीरी कविता)- अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (पृ.५७-५९) २.रवि भूषण पाठक निरालाःदेह विदेह (१-४)- हिन्दीसँ मैथिली रवि भूषण पाठक (पृ. ६०-७२) 2
गद्य खण्ड तेलुगु कथा खण्ड जुम्मा (लघुकथा) मूल तेलुगु- शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफ। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद\ गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। जुम्मा (लघुकथा) हमर अम्मीक निर्दोष मुखमंडल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल। ओइ मुखक डर हमरा विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहैए। ई दिन रहै जुम्माक जइ दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहै। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि। हम काजमे व्यस्त छलौं जखन फोन बाजल। फोन उठेलौं तँ दोसर दिस अम्मी छली.. हुनकर फोन ओइ समय नीक आ सहज लागल। ऐसँ पहिने कि हम “अम्मी..” कहितौं ओ चिन्तित स्वरेँ “हमर बाउ...!” कहलन्हि। “की अहाँकेँ ई बुझल छल...?” हम पुछलियन्हि। “हँ एखन तुरत्ते हमरा ई पता चलल.. अहाँ सतर्क रहब! ... लागै-ए अहाँ आइ मस्जिद नै गेल रही हमर बाउ।”, हम हुनका डरसँ सर्द अवाजमे बजैत सुनलौं। जिनगीमे पहिल बेर हमर मस्जिद नै जेबासँ ओ प्रसन्न भेल छली। ई विचार हमरा दुख पहुँचेलक। की हमर अम्मी ई गप बाजि रहल छली? ई ओ छथि जे हमरासँ ई पूछि रहल छथि? ई हमर अम्मी छथि जे ऐ तरहेँ डरलि छथि? हमर मस्तिष्क विचारक विस्फोटसँ भरि गेल आ स्मृतिक बाढ़िमे बहऽ लागल। १ हमर अम्मीकेँ जुम्माक नमाज आस्थाक दृष्टिसँ नीक लगैत छलन्हि। ओ कोनो चीजक अवहेलना कऽ सकैत रहथि मुदा जुम्माक दिन नमाजक नै, से ओ हमरा सभकेँ ओइ दिन घरमे नै रहऽ दैत रहथि। अब्बा सेहो हुनकर दामससँ नै बचि पाबथि जँ ओ घरपर रहबाक प्रयास करथि। हुनकर सन डीलडौल बलाकेँ सेहो हाथमे टोपी लऽ मस्जिद चुपचाप जाय पड़न्हि। हमरा सभक घरमे काजसँ दूर भागऽ बला, आलसी हम आ हमर अब्बा हरदम मस्जिद नै जेबा लेल बहन्नाक ताकिमे रहै छलौं। हमर अब्बा भोरेसँ छाती तनैत कहैत रहै छला जे आइ जुम्मा अछि से कोनो हालतिमे मस्जिद जेबाके अछि। मुदा जखने समय लग अबैत रहै हुनकर बहन्ना शुरू- “अरे! अखने कादोमे हम खसि पड़लौं...” हमर अम्मी लग कोनो रस्ता नै बचन्हि। जे से, तखन ओ हमरा सेहो मस्जिद नै पठा सकै छली... हमरा नहबैत, हमर कपड़ा धोबैत, ओ ई केना कऽ सकितथि? तैयो ओ हाथमे छड़ी लेने आंगन आबथि, हमरापर गुम्हरैत, फेर हमर पुष्ट पिटान करैत आ हमरा अंगनामे कपड़ा जकाँ टंगैत। से हम ऐ चोट खेबासँ नीक बुझैत रही नमाजे पढ़ब। हमर आलसपना मस्जिद पहुँचिते अकासमे उड़ि जाइत रहय। ओत्तऽ पहुँचिते हम दोसर बच्चा सभक संग मिझरा जाइत रही आ सभटा नीक वरदान पेबा लेल प्रार्थना करैत रही- जेना हमर अब्बा लग खूब पाइ होइन्हि, हमर अम्मीक स्वास्थ्य नीक भऽ जाइन्हि, हमरा पढ़ाइमे मोन लागय आ की की। हमर अम्मा बुझाबथि- “हमरा सभकेँ मस्जिद मात्र वरदान मांगबा लेल नै जेबाक चाही हमर बाउ.. हमरा सभकेँ नमाज पढ़बाक चाही... अल्लामे आस्था हेबाक चाही। वएह छथि जे हमर सभक कल्याण देखै छथि।“ जखन दोसर कियो हमर उपराग हुनका दइन्हि, जे हम नमाज काल आस्ते-आस्ते गप करैत रहै छी तँ ओ हमरा आस्तेसँ दबाड़ि बाजथि- “हमर बाउ, प्रार्थना काल बजबासँ अपनाकेँ रोकू... कमसँ कम मस्तिष्कमे दोसर तरहक विचारकेँ एबासँ रोकू। बगलमे बम किए ने फाटय तैयो सर्वदा अपन मस्तिष्ककेँ अल्लापर केन्द्रित राखू...।“ हुनका ओइ दिन ऐ गपक अन्देशा नै रहन्हि जे एक दिन ठीकेमे मस्जिदमे बम फाटत। से आश्चर्य नै जे ओ एतेक आत्मविश्वाससँ बाजि रहल छली। आब जखन ठीकेमे बम विस्फोट भेल अछि, हुनका ई अनुभव भऽ रहल छन्हि जे कतेक भयावह ई भऽ सकैत अछि। हम हुनकर वेदनाकेँ नै देखि पाबि रहल छी। ओ डरायल छली। ओ नमाजसँ डरायल छली। ओ अल्लासँ सेहो डरायल छली। “अम्मी... ।” हम उद्यत भऽ कहलौं। “हमर बेटा...”। ओ दोसर कातसँ बजली। “अहाँ आइ मस्जिद नै गेलौं, नै ने, हमर बाउ?”, ओ फेरसँ पुछलन्हि। हमर हृदय डूमि रहल रहय। शब्द हमर संग छोड़ि रहल रहय। हमर कंठ सुखा रहल रहय। हमर मोन विखिन्न भऽ गेल। विचार जुआरि जकाँ हमरा भीतर उठि रहल छल। हमरा लागल जे क्यो हमरा ठेलि कऽ भूतकालमे लऽ जा रहल अछि। २ जुम्माक दिन मस्जिदसँ घुरलाक बाद हम सभटा घटनाक आवृत्ति अम्मी लग करै छलौं। हम नमाजक एकटा छोट संस्करण हुनका लगमे करै छलौं। हमरा प्रार्थना पढ़ैत देखि ओ हमरा आलिंगनमे लऽ चुम्मा लइ छली, “अल्ला हरदम अहाँक रक्षा करता, हमर बाउ...।“ ओ हमरा आशीर्वाद दैत रहथि। तखन हम निर्णय केलौं जे जौँ हमरामे कोनो ज्ञानप्राण अछि तँ हमरा कोनो नमाज नै छोड़बाक चाही। सभ जुम्माकेँ ओ नमाजक महत्वपर बाजथि आ मस्जिद जेबापर जोड़ दइथ। आन चीजक अतिरिक्त ओ ऐ गपक विषयमे बाजथि जे कुरान जुम्मे दिन बनाओल गेल रहय, जे मनुक्ख अपन कर्मक लेल जुम्मे दिन उत्तर दैत अछि आ विश्व जँ जीवन रहित कहियो हएत तँ सेहो जुम्मे दिन हएत। हमर माथ, छोट रहितो, ई गप बुझि गेल जे जुम्मा किए मुसलमान लेल पवित्र अछि। सभ बच्चा जुम्मा दिन साँझ धरि स्कूलमे रहै छला, मात्र हम दुपहरियाक बादे स्कूल छोड़ि दइ छलौं, मस्जिद जेबाक बहन्ने झोरा झुलबैत घर घुरैत छलौं। हमर अम्मी शिक्षकसँ परामर्श कऽ ई ब्योँत धरेने छली। दोसर छात्र सभ हमरा एतेक शीघ्र घर जाइत देखि ईर्ष्या करैत छला। ओ हमरा भाग्यशाली बुझै छला आ अपनो मुस्लिम हेबाक मनोरथ करैत छला। हुनकर ईर्ष्यालु मुख देखि हम भीतरे-भीतर हँसैत रही। हम खुशी-खुशी घर घुरैत रही जेना हाथीक सवारी केने होइ। हमर अम्मी ओइ महत्वपूर्ण उपस्थिति लेल हमरा तैयार करैत रहथि- गरम पानिसँ नहबैत रहथि, हमर आँखिमे काजर लगबैत रहथि, हमर केशक लटकेँ टोपीक नीचाँ समेटि कऽ राखथि। हम सभ दिन तँ हाफ पैंटमे रहै छलौं मुदा ओइ दिन उजरा कुरता पैजामामे चमकैत छलौं। दोसर स्त्रीगण हमरा देखि अपन हाथ हमर मुखक चारू दिस जोरसँ घुमाबथि आ कोनो दुष्टात्माकेँ भगाबथि आ कहथि, “जखन जुम्मा अबैत अछि अहाँ जुम्माक सभटा भव्यता लऽ अबिते ने छी!” अहाँ जुम्माक साँझमे ई खुशी सभ घरमे देखि सकैत छी, दरगाह केर फ्रेम कएल चित्रक सोझाँमे जड़ैत लैम्प, अगरबतीक सुगन्धी वायुमे पसरैत। अपन माथ झँपने स्त्रीगण घरक भीतर-बाहर होइत आ नारिकेलक दाम दोकानपर बढ़ैत जाइत। दरगाह केर फ्रेम कएल चित्रपर नारिकेल चढ़ेबाक विधक वर्णन एतऽ अहाँ नै छोड़ि सकै छिऐ, किएक तँ हमर अब्बाकेँ अर्पण विधक ज्ञान नै छलन्हि से ओ हजरतकेँ छोटका रस्तासँ घर अनैत रहथि। हमर अम्मी ई सिखेबा लेल अपस्याँत रहथि। “अहाँकेँ ई अन्तरो नै बुझल अछि.. कलमा..आकि गुसुल... हमरा अहाँसँ निकाह करेबाले हमरा अपन अम्मी-अब्बाकेँ दोषी बनाबऽ पड़त... कियो अहाँसँ नीक हुनका सभकेँ नै भेटलन्हि जे अहाँसँ हमर बियाह करेलथि? आब बच्चो सभ अहींक रस्ता पकड़ने अछि...” ओ हुनकासँ ऐ तरहेँ विवादपर उतरि जाथि। “घरक ई उत्पीड़न हमरा लेल असह्य भऽ गेल अछि..।“ तमसाइत जारनि सन पजरैत ओ मस्जिद जाइत रहथि, लाल-पीअर होइत, हजरतकेँ घर अनबाले। हजरत नारिकेलक अर्पण विध पूरा करबाक बाद अपन मुँह आ पएर धोबि आ अपन दाढ़ीमे ककबा फेरि बाहरमे खाटपर बैसैत रहथि। ऐ बीच हमर अम्मी फोड़ल नारिकेलक गुद्दा निकालि ओकर कैक भाग कऽ ओइमे चिन्नी मिलाबथि। ओ तखन ऐ मिश्रणकेँ बाहर हातामे जमा भेल सभ गोटेमे बाँटथि। ओ अन्तमे हमरा लेल राखल दू-तीन टा टुकड़ी लेने हमरा लग आबथि। हम शिकाइत करियन्हि, “यएह हमरा लेल बचल अछि?” “हमरा सभकेँ अल्लाकेँ अर्पित कएल वस्तु पहिने नै खेबाक चाही, हमर बेटा, हमरा दोसरामे ई पहिने बाँटबाक चाही तखनो जखन अपना लेल किछु नै बचय।“, ओ हमरा शान्त करथि। हुनकर मीठ बोल हमरा मोनसँ नारिकेलक पर्याप्त हिस्सा नै भेटबाक निराशाकेँ खतम कऽ दैत छल। बादमे हमर पिता आ हजरत साँझमे अबेर धरि बैसि गप करैत रहथि। अपन वस्त्र बदलि सामान्य वस्त्रमे हम अपना संगी सभक संग पड़ोसक एकटा निर्माण स्थलपर बालूक ढेरपर खेलाय लेल चलि जाइत रही। ई सभ सोचि हमर आँखिसँ नोरक धार बहऽ लागल... “हमर पुत्र, अहाँ किए नै बाजि रहल छी? की भेल? हम डरक अनुभव कऽ रहल छी...बाजू...।”, हमर अम्मी पुछैत रहली। ओना तँ हैदराबाद एना तीन बरख भऽ गेल मुदा एको दिन हम नमाज नै पढ़लौं। असमयक पारीमे काज करबा अनन्तर हम ईहो बिसरि गेलौं जे नमाज पढ़नाइ की छिऐ?। “अम्मी..।”, हम उत्तर लेल शब्द तकैत बजलौं। “अम्मी, हम कहिया हैदराबादमे नमाज पढ़बाक लेल मस्जिद जाइत छी जे अहाँ एते चिन्तित भऽ रहल छी?”, हम बजलौं। हम मोन पाड़लौं ओइ दिनकेँ जखन ओ हैदराबाद आयल रहथि कारण हम कहने रहियन्हि जे हम हुनका हैदराबाद नगर देखेबन्हि। मुदा हैदराबाद आबि अपन विरोध देखबैत ओ बजलथि, “हम कत्तौ जाय नै चाहै छी... हमरापर किए पाइ खर्च कऽ रहल छी?” हम हुनकर मोनक गप बुझैत रही। ओ हमरापर बोझ नै बनऽ चाहथि, मुदा हम हुनकर विरोधपर ध्यान नै देलौं। हमर जोर देलापर ओ एक बेर एली। हम हुनकर हाथ पकड़ि रस्ता पार करबामे मदति करियन्हि। एक बेर खैरताबादक लग सड़क पार करबा काल हुनकर आँखि नोरसँ आद्र भऽ गेलन्हि। “अहाँ कतऽ जन्म लेलौं... कतऽ अहाँ बढ़लौं... अहाँ कतेक टा भऽ गेलौं? अहाँ ऐ पैघ नग्रमे कोना रहै छी? अहाँ बहुत पैघ भऽ गेलौं...” ओ हमर बड़ाइ करैत कानय लगली। “अहाँ जखन बच्चा रही तखन हम अहाँकेँ नानीगाम बससँ लऽ गेल रही। हम अहाँक हाथ कसि कऽ पकड़ने रही जे अहाँ कत्तौ हेरा ने जाइ। आब अहाँ एत्ते पैघ भऽ गेलौं जे हमर हाथ पकड़ि बसपर चढ़बामे मदति करी?”, ई कहैत ओ आँखिमे नोर आबि गेलासँ कने ठहरि गेली। ओ खखसलीह, “खुस...खुस...।” परिश्रमसँ अपन श्वास वापस अनलन्हि। ओ जखन भूतकेँ मोन पाड़ि रहल छली हम हुनका सान्त्वना देलियन्हि आ हुनकर नोर पोछलियन्हि। “अम्मी...हम एतऽ जीबाक इच्छासँ एलौं। हम साहस केलौं आ कतेक रास कठिन क्षणकेँ सहन केलौं। जखन दुखित रही, हम अपनेसँ दबाइ लइले जाइ। ई सभ अम्मी... ई सभ अहाँक आशीर्वादसँ भेल, आकि नै? ऐ नग्रमे अपना कहि कऽ संबोधित करऽ बला हमर क्यो नै अछि, तखनो हम एतऽ असगर रहबाक अनुभूति नै करैत छी।“ अपन आँखिक नोर पोछि कऽ ओ हमरा आशीर्वाद दैत कहलन्हि, “दीर्घायु रहू हमर पुत्र।“ समस्याक आरम्भ तकर बाद भेल। “सभ जुम्मे जुम्मा...अहाँ नमाज पढ़ै छी ने हमर बाउ?”, ओ पुछलन्हि। “नै माँ। कहू ने, कखन हमरा पलखति भेटैत अछि?” “अहाँकेँ कहियो समय नै भेटत, मुदा अहाँकेँ करय पड़त, एकरा छोड़बाक कोनो गुंजाइश नै अछि। मुस्लिमक रूपमे जन्म लेबाक कारण अहाँकेँ कमसँ कम सप्ताहमे एक दिन समय निकालऽ पड़त।”, ओ कहलन्हि। आगाँ कहलन्हि, “धनिक आ गरीब नमाजक काल संग अबैत अछि। ओ सभ कान्हमे कान्ह मिला नमाज पढ़ैत छथि। ओइ दिन ई बेशी गुणक संग अबैत अछि। एक बेर ओ आशीष जँ हेरा जाय तँ अहाँ कहियो से घुरा नै सकैत छी। तइ द्वारे धनिक जे लाखमे रुपैयाक लेनदेन करैत छथि, अपन व्यवसायकेँ एक कात राखि नमाज पढ़ैत छथि। दोकानदार सभ सेहो अपन व्यवसाय बन्न कऽ दैत छथि, बिना ई सोचने जे कतेक घाटा हुनका ऐसँ हेतन्हि। संगे ओ गरीब सभ जे प्रतिदिनक खेनाइक जोगार नै कऽ पबैत छथि, सेहो नमाज पढ़ैत छथि।“ हमरा डर छल जे हमर माँ वएह पुरान खिस्सा फेरसँ तँ नै शुरू कऽ देती? विषय बदलि कऽ हम कहलियन्हि, “की अहाँकेँ बुझल अछि जे एतऽ निजाम नवाब द्वारा निर्मित एकटा पैघ मक्का मस्जिद अछि...?” “एहन अछि की? हमरा अहाँ ओतऽ नै लऽ चलब?”, ओ उत्साहसँ बजली। “जखन अहाँ ओतऽ पहुँचब तँ हमरा नमाज पढ़बाले अहाँ नै ने कहब?”, हम विनयपूर्वक प्रार्थना केलियन्हि। “हमर बाउ...अहाँ ई की कहैत छी? हम अहाँकेँ ई सुझाव अहाँक अपन भलाइ लेल दइ छी।“ “ठीक छै..चलू चली!”, हम सभ ओतऽसँ बस द्वारा सोझे मस्जिद गेलौं। ओ चारमीनार दिस देखलन्हि जे मस्जिदकक मीनारसँ बेशी पैघ रहय। “अम्मी ओ छी चारमीनार। हम पहिने ओतऽ चली आकि मस्जिद?”, हम पुछलियन्हि। “ओतऽ चारमीनारमे की अछि हमर बाउ?” “ओतऽ किछु नै अछि... कोनो दिशामे देखू एके रंग लागत। मुदा अहाँ ऊपर चढ़ि सकै छी। ओतऽसँ अहाँ मक्का मस्जिद स्पष्ट रूपमे देखि सकैत छी... आब देरी भऽ गेल अछि। हम चारमीनार बादमे देखि सकैत छी... अखन तँ हमरा सभ मस्जिद देखी।“, ओ कहलन्हि। मस्जिदक भीतरमे शान्ति रहय। शान्तिक साम्राज्य छल। ई शीतल, शान्त आ विस्तृत रहय। आगन्तुकक आबाजाही बेशी रहै। अम्मी भीतर जेबामे संकोच कऽ रहल छली कारण स्त्रीगण सामान्यतः मस्जिदमे नै प्रवेश करै छथि। मुदा ओ किछु बुरकाधारी स्त्रीगणकेँ ओतऽ देखि ओम्हर बढ़ि गेली। अपन सारीक ओरकेँ माथपर लैत ओ बजली, “हमहूँ अपन बुरका आनि लैतहुँ ने?”, घरसँ चलैत काल ओ ऐलेल कहने रहथि मुद ई हम रही जे हुनका ई पहिरैसँ रोकने रही। अपन ठामपर हुनका लेल एकरा छोड़नाइ सम्भव नै छलन्हि मुदा हम ऐ नव स्थानपर ऐ झंझटसँ मुक्ति देमऽ चाहैत रही। मुदा अपन सम्प्रदायक स्त्रीगणक बीचमे बिन बुरका पहिरने ओ अपनाकेँ बिना चामक अनुभव कऽ रहल छली। जखन हम हुनका स्तंभित आ थरथड़ाइत चलैत देखलियन्हि तखन हम हुनका बुरका नै पहिरय देबाक लेल लज्जित अनुभव केलौं। तैयो अपन रक्षा करैत हम कहलियन्हि, “हम कोना ई बुझितौं अम्मी जे हमरा सभकेँ मस्जिद घुमबाक ब्योँत लागत?” ओ किछु नै बजली। “ऐसँ कोनो अन्तर नै पड़ैत अछि...आउ।“, हम बादमे ई कहि हुनका भीतर लऽ गेलौं। ओ हमर संग एली। हम सभ अपन चट्टी कातमे रखलौं जइसँ बादमे ओकरा लेबामे आसानी हुअय। कतेक गोटे मस्जिदक सीढ़ीयेपर आलती-पालथी मारि कऽ बैसल रहथि। परबाक संग खेलाइत किछु गोटे ओकरा दाना खुआ रहल रहथि। किछु परबा उड़ि गेल आ किछु आन घुरि कऽ उतरल। किछु परबा पानिक चभच्चाक कातमे बैसि कऽ एम्हर-ओम्हर ताकि रहल रहए, एकटा आह्लादकारी दृश्य। अम्मी हुनका आश्चर्यित भऽ देखलन्हि। बादमे ओ हमर पाछाँ एली, जखन हम सीढ़ीक ऊपर प्लेटफॉर्मपर पहुँचलौं। प्लेटफॉर्मकेँ चारू दिस देखैत ओ चिकरि कऽ बजली, “हमर बाउ, एक बेरमे कतेक गोटे एतऽ बैसि कऽ नमाज पढ़ि सकै छथि?” “हमरा नै बुझल अछि अम्मी... कएक हजार हमरा लागैए। रमजानक दिनमे लोक चारमीनार धरि बैसि कऽ नमाज पढ़ै छथि।“, हम उत्तर देलियन्हि। “हँ, ई टी.वी. मे देखबैत अछि।”, अम्मी प्रत्युत्तर देलन्हि। ओ एकरा नीकसँ चीन्हि गेल रहथि, हम मोनेमोन सोचलौं। चारू कात देखा कऽ अन्तिममे हम हुनका मस्जिदक पाछाँ लऽ गेलौं। पाथर चिड़ैक मलसँ मैल भऽ गेल रहय। परबा सभ देबालक छिद्रमे खोप बनेने रहय। ओ मीनारक देबालकेँ छूबि आ आँखिसँ श्रद्धापूर्वक सटा कऽ अति प्रसन्न भऽ गेली। “एतऽ नमाज पढ़ब पवित्र गप अछि, हमर बाउ।”, ओ कहलन्हि। हमरा ऐबेर कोनो अति सम्वेदना नै भेल। “हँ। ठीके, हम एतऽ कमसँ कम एक बेर नमाज अवश्य पढ़ब।“, हम अपनाकेँ कहलौं। हम जतऽ रहै छी मक्का मस्जिद ओतऽसँ बड्ड दूर अछि। जुम्मा आ छुट्टीक दिन बससँ एतऽ एनाइ बड्ड दुर्गम अछि। तैयो अगिला बेर हम एत्तै नमाज पढ़बाक प्रण केलौं। “हम अगिला सप्ताह एतऽ आबि नमाज पढ़ब अम्मी।”, हम कहलियन्हि। ओ प्रफुल्लित अनुभव केलन्हि आ हमरा दिस आवेशसँ देखलन्हि। “ऐ सभ ठाम नमाज पढ़बामे अपनाकेँ धन्य बुझबाक चाही।”, ओ कहलन्हि। “अहाँक अब्बा ओतेक दूर रहै छथि, ओ की नमाज पढ़बा लेल एतऽ आबि सकै छथि? अहाँ अही नग्रमे छी.. एतऽ नमाज पढ़ू।”, ओ कहलन्हि। “नै मात्र एत्तऽ, जत्तऽ कत्तौ पुरान मस्जिद होइ तत्तऽ नमाज पढ़ू। कतेक प्रसिद्ध लोक एत्तऽ नमाज पढ़ने हेता। अल्ला अहाँकेँ निकेना रखता।“ हम मस्जिदमे एना ठाढ़ रही जेना जादूक असरि होइ। हम हुनकर गप सुनलौं, कान पाथि कऽ। बादमे बाहर निकललाक बाद हम सभ किछु बिसरि गेलौं। अपन मस्जिद जेबाक प्रतिज्ञाकेँ सेहो हम कात राखि देलौं। ओइ संध्यामे हम अम्मीकेँ बस-स्टैण्डपर छोड़लौं। तकर बाद दू टा जुम्मा बीतल, मुदा से एना बीतल जेना ओ कोनो जुम्मा नै छल। आब बम विस्फोटक ऐ समाचारक बाद हम जुम्मासँ भयभीत छी। “अम्मी... अहाँकेँ ईहो बुझल अछि जे कोन मस्जिदमे बम फूटल छल?”, हम फोनपर पुछलियन्हि। “कोन मस्जिदमे हमर बाउ?”, ओ उत्सुक भऽ पुछलन्हि। “अहाँ एक बेर हैदराबाद आयल रही, मोन पाड़ू? हम अहाँकेँ एकटा मस्जिदमे नै लऽ गेल रही? मक्का मस्जिद...पैघ सन? ओत्तै, ओही मस्जिदमे... खुनाहनि ओही मस्जिदमे अम्मी... खसैत लहाश.. अहाँ कहने रही, जे कियो जे ओतऽ नमाज पढ़त, धन्य हएत... ओही मस्जिदमे अम्मी।“, हम कहलियन्हि। “छोट बच्चा सभ... ओकर सभक देह शोनितमे सानल... परबा सभ सेहो मरल...।“ नोर अनियन्त्रित दुखमे बहऽ लागल। हम बाथरूम लग नोर पोछबाक लेल गेलौं। हुनक हृदय हमर काननि देख फाटऽ लगलन्हि। ओ सेहो कानऽ लगली। हम आगाँ कहलौं, “अम्मी, नै कानू... अब्बाकेँ हेतन्हि जे हमरा किछु भऽ गेल अछि... हुनका कहबन्हि जे हम निकेना छी।“ कनैत ओ हमरा पुछलन्हि, “फोन नै राखब हमर बाउ।“ “जल्दी अम्मी, कहू।“ “अहाँ चलि आउ...एत्तऽ चलि आउ... हमर गप सुनू।“ “हमरा किछु नै भेल अछि अम्मी।“ “बाहर नै जायब.. हमर बाउ।“ “ठीक छै अम्मी।“ “ओइ मस्जिदमे नै जायब, ओइ मस्जिदक लगो कोनोठाम नै जाउ, हमर बाउ।“ हमर हृदय फटबा लेल फेर तैयार अछि। हम हुनका ई आश्वासन दैत जे ओइ मस्जिदक लगो कोनोठाम हम नै जायब, फोन रखलौं। मुदा विचारक आगम बढ़ैत रहल। कतेक भिन्नता! कतेक परिवर्तन काल्हिसँ! ई हमर अम्मी छथि जे एना बाजि रहल छथि? ई ओ छथि जे हमरा ई कहि रहल छथि जे मस्जिदक लगो कोनोठाम नै जाउ? अल्ला कोनो आन भऽ गेल छथि अपन बच्चाक प्रेमक आगाँ? अपन खूनक आगाँ अल्ला अस्वादु भऽ गेलथि? नमाज विरोधक योग्य भऽ गेल? अल्ला माफी दिअ! क्षमा करू! आन जुम्माकेँ कोनो खुनाहनि नै हो..औज बिल्लाही..मिनाशैतान...निर्राजीम..बिस्मिल्लाह इर्रहमा निर्रहीम...! (ओइ सभ अम्मीजानकेँ समर्पित जिनका मक्का मस्जिदक बाद अपनाकेँ हमर अम्मी जकाँ परिवर्तित होमय पड़लन्हि।- लेखक) पद्य खण्ड ओड़िया कविता खण्ड इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता- गप आ हिलकोर- ओड़ियासँ इंग्लिश इप्सिता सारंगी द्वारा स्वयं, इंग्लिशसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा इप्सिता सारंगी (१९७५- ) क दूटा ओड़िया कविता संग्रह ’पक्षी फेरिनी’ आ ’फेरिबा कथा’ प्रकाशित छन्हि। गप नहरिक थरथड़ाइत पाइनसँ एकटा नान्हि सन बुच्ची बहराइए थुलथुल कजरी सन। धरातलपर सूर्य अदहा झाँपल किरिणक बीच सुखाइए कजरी छोट कोट सन भऽ जाइए स्वप्न- एकटा छोट राजकुमार अबैए एकटङा छरपान दैत हर्षित लैत ओकर हाथ अपन हाथमे खाली ओइ कोट लेल। ओ औंठा आकारक छोट राजकुमारी खोलैए अपन छोट बाकस, ओइ बुच्चीक ठोढ़पर प्रेमपूर्ण मुस्की दैत बिलाइए ओ। एकबेर ओ छोटकी बुच्ची खसैए नहरिमे भीजल फराक आँखि- भरल नोरसँ घोकचल सीढ़ीसँ ओइ बुच्चीक पनिसोखा सन नोर। बहार भेल औंठा आकारक छोट राजकुमार अपन मोलायम तरहत्थीक संग ओकर गाल आस्ते-आस्ते मीड़ैत अछि। ओकर नोरक रंगल बुलबुल्ला बिछि लैए आंगुर सभसँ। सूर्य ओकरा सभकेँ उधियाबैत; ओइ रंग सभकेँ राइतमे पसारैत ई रहहै जे पिरौंछ भोरमे। ओ छोट बुच्ची अगिला भोर देखलक ओ नहरि सुखा गेल, मुदा कजरी- अखनो अछि जिबैत ओइ छोटकी बुच्चीक बाट तकैत, आकि ओइ राजकुमारक? जिबैत टटका स्वप्न जकाँ तुरत्ते बहार होइत पिपनीसँ। हिलकोर कियो नै सिखेलक कहियो एक ठोप माहुर देनाइ बासनमे निर्दोख सरलताक। हम पूर्ण रूपेँ हारि गेलौं। फूसिक मरैत पानि सुच्चा सत्यमे् वा दोसर जीवन नै अछि जीवन, किंशाइत। हम हेरा गेलौं। कोन माहुर विश्वासकेँ संक्रमित केलक, जे लागल सदिखन हुअय मात्र टुकड़ी-टुकड़ी हेबा लेल। अकासक टुकड़ी चिड़ैक भँसियाइत पाँखिमे; नहिये अकास नहिये छाह छल एकर चांगुरमे। विश्वास, जेना पूर्णिमाक रातिक समुद्र जे घुरबैए सभटा लेल बौस्तु जखन ओ घुरबैए हिलकोर। की हिलकोर घुरबैए विश्वासक आरि छोट हाथसँ बालुपर बनल? की हिलकोर घुरा सकैए एकान्त जिनगीमे निराउ बर्खा? पनिसोखाक द्वीपसँ स्वप्न आवेशसँ छोट कागचक नाहमे? आ जीबाक स्थितप्रज्ञ अभिलाषा समयसँ ध्यान हटा कऽ? की हिलकोर घुरा सकैए पराजय? आ, हेरा गेनाइ? (इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता "धेउ कान") मूल ओड़िया कविता वासुदेव सुनानी:ओड़ियाक प्रमुख दलित कवि, तत्कालीन कालाहाण्डी (आब नुआपाडा) जिलाक मुनिगुडा गाममे जन्म। कविताक चारिटा पोथी प्रकाशित। "महानदी बेसिनक दलितक सांस्कृतिक इतिहास" आ जोतिबा फुलेक जन्मचरित लिखबामे आइ काल्हि लागल छथि। ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। फूसि जखन कखनो हमरा भेंट होइ छथि शबनम भौजी हमरा प्रसन्न मुखक आशीष भेटैए ईदक चानसन दीप्त आ ओइ प्रसन्नताक बाद एकटा रहस्योद्घाटन- “तूँ आब बड्ड पैघ भऽ गेल छेँ।” फूसि! पाँच फीट पाँच इंचक मात्र अइ वासुदेव, पएरसँ पहुँचा धरि अखनो हुनकर चौखटिक उपरका भाग नै छूबि सकै अछि! कहियासँ ई भऽ गेल पैघ? पुछू ककरोसँ... सभ कहत कि वासुदेव अछि एकटा मामूली अभागल बाट-बटोही इन्तजारीमे, एकटा बिसरल बस अड्डापर। अनुग्रह कएलापर कने काल लेल बिलमै अछि एकटा बस ओतऽ मुदा जखन ओ चढ़ैबला रहैए, ओकरा छोड़ि कऽ चल जाइए बस। शबनम भौजी एकटा फूसि बाजैवाली यक्षिणी छथि, आ ओ फुइस एहन बजै छथि, जकर नै रहैए कोनो ओरे आकि छोरे। जे कियो एतऽ अपनाकेँ बुझि रहल छी खैरात बँटनिहार, कृपा कऽ रोकू एकटा बस। वासुदेव एकर प्रतीक्षा कऽ रहल बड़ी कालसँ, मड़राइत आत्मविश्वासक पगहाक अन्तिम छोरपर। वासुदेव सुनानी, ओड़िया कविता ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अनुमति हमरा अनुमति अछि श्रीमान! हम कऽ ली विश्राम कने काल? अहाँक आदेशानुसार छाह लग देने छी बहारि, बत्तू केँ देने छी खुआय, अहाँक नालाकेँ कऽ देने छी साफ, नै रहत कोनो दुर्गन्ध आब। हमर छी ढोल, बजबैले मधुमाछी युगसँ अहाँक मनोरंजनार्थ आ हमर आंगुर स्थिरताक राखय आश हम करी विश्राम थोड़बे काल? हम करैत छी अनुभव पुरखाक स्वेद हमर देव, हमर मृतात्मा। तइ लेल प्रिय श्रीमान् घंटा भरिक विश्राम मात्र अभिवादन जकाँ किएक तँ अछि जे हमर दुर्गन्ध, स्वेदक आ किछु आन वस्तुक। हम करय छी प्रतीक्षा अहाँक नीक समयक, तृप्तिक संगे अपन कीट-संक्रमित जिनगीक समाप्तिक संकेतक। प्रतीक्षा सेहो भरि दैत अछि थकान, श्रीमान् प्रियवर जखन लाख बरखक जौँ ई हुअय। से हम करै छी विश्राम थोड़ेक काल, श्रीमान्? कारण हमरो सन तुच्छकेँ बुझल छै छोट-मोट विद्रोहक कला। भरत माँझी, ओड़िया कविता ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हमर घुरलाक बाद हमर घुरलाक बादो ओइ स्थानकेँ नै छोडू रिक्त पकड़ने रहू ओकरा। फूल सभकेँ नै फेकू की कोनो महत्व अछि एकर जे ओ टटका-टटकी फुलयल अछि आकि अछि मौलायल? खोलू हमर सभटा नुकायल भोथिआयल स्वप्न, ओकरा अलंकृत कऽ। उनटि दिअ सभ ठामक लैम्पकेँ, आ रोकि दियौ अन्हारक प्रति घृणा बिना घबरेने देखू समुद्र आ तखनो नै करू घृणा अकाससँ। नेहोरा अछि!!! पृथ्वीकेँ बुझू एकटा सममिश्रित स्थान प्रयास करू आ ठाढ़ रहू ओतऽ। कृपया बाट ताकू अपन आ से करय काल, रहू जागल! मोन राखू, हम घुरब ऐ पृथ्वीपर जे एहन एकेटा अछि राखू मोन जे हम घुरब हम बाउग केने छी पथकेँ सरिसवक बीआसँ, मोन राखू ओ पथ तेलुगु कविता खण्ड मूल तेलुगु पद्य- अन्नावरन देवेन्दर-अंग्रेजी अनुवाद- पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर कवि अन्नावरम् देवेन्दर आन्ध्र प्रदेशक करीमनगर जिलासँ छथि आ तेलुगु भाषाक तेलंगाना बोलीमे तेलंगाना राज्यक संवेदना आ संस्कृति आ ओकर अलग राज्यक लेल संघर्षकेँ स्वर दैत छथि। हुनकर छह टा कविताक संग्रह छपल छन्हि। महात्मा जोतिबा फुले फेलोशिप २००१, रंजनी कुन्दुरती कविता पुरस्कारम् २००६, डॉ. मलयश्री साहिति पुरस्कारम् २००६, रांगिनेनी येनम्मा साहित्य पुरस्कारम् २००७ पुरस्कारसँ सम्मानित। ओ जिला परिषद, करीमनगरक पंचायती राज विभागमे सीनियर असिस्टेन्ट छथि। पी. जयलक्ष्मी, ओस्मानिया विश्वविद्यालयक निजाम कॉलेज हैदराबादमे अंग्रेजी विभागमे एसोसिएट प्रोफेसर छथि। विगत ३० बरखसँ अंग्रेजीक अध्यापन। हुनकर विशेषज्ञता अंग्रेजीमे भारतीय कविता, अनुवाद आ अनुवादशास्त्र अछि। २००३ मे भार्गवी रावक संग मिलि कऽ शीला सुभद्रा देवीक सितम्बर ११ आ ओकर परिणामपर तेलुगु काव्यक अंग्रेजीमे ’वार अ हर्ट्स रैवेज’ नामसँ अनुवाद। २००७ मे गोपीक ननीलू केर अंग्रेजी अनुवाद। स्प्रिन्ग नामसँ अन्नावरम् देवेन्दरक कविताक अंग्रेजी अनुवाद प्रेसमे अछि। (तेलुगु कविता: तेलुगुसँ अंग्रेजी पी.जयलक्ष्मी द्वारा, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) अंतिम शब्द (तेलंगानाक किसान द्वारा आत्महत्यासँ पहिने पत्नीसँ कहल) “लछम्मा, प्रिय! हम छोड़ि कऽ जा रहल छी हमर शिक्षा मोन राखू... अपन बच्चाक नीक पालन करब ई हमरा सकमे नै अछि- जीब कर्ज देनिहार सभ बनि गेल छथि यम। आइ काल्हिक समय नै अछि किसानक लेल हम छोड़ि कऽ जा रहल छी ओ सभ हमरा नै छोड़ता जीवित हम कतबो चाही ई जिनगी कोन तरहक जतऽ अन्न नै अछि खेबाक लेल महाजन सभ तीरि रहल छथि कर्जदाता हमर सम्मानकेँ लज्जित कऽ रहल छथि हम नै जीबि सकब लछमी, नै, नै आब आर! एकटा बीस बा चालीस हजार हमरापर कर्ज छै समाजक- सुनै सएह छी आर पचासेक देबाक अछि साहूकारकेँ आ एकर अलाबे, सुनू! ऋण मारिते रास एत्तऽ आ ओत्तऽ अपनासँ घृणाक अनुभूति ऐ जिनगीकेँ जीबाक विचार मात्रसँ छी लज्जित। ऐ ऋण सभकेँ प्लेग जकाँ बढ़ैत देखि! ऋण देनिहार सभ आबऽ लागल छथि घर सेहो रोकऽ लागल छथि बाटे-घाटे पछोड़ धऽ लइ छथि जखने तखने अपन जिनगीक बाद जतऽ कत्तौ हम जायब जिबैत अपन मुख, बार्लिस सन पातर की हम करब आ केना हम जीब? ई समै नै अछि छोड़ि कऽ ऐ जगकेँ जेबाक कत्तौ पानि नै मुदा नोर बहैत हुहुआइत पोखरि कहियासँ ने अछि सुखायल इनारमे हरियरी देखाइत बोरवेल गरेलामे पाइ मात्र जाइत खुनैत सय फीटसँ बेशी, पाताल धरि कोनो टा मे मुदा पानि नै हम पिटैत हाथसँ कपार खुनल माटिक पहाड़ देखैत हँसीक उद्गम सभक लेल! बोरवेल लेल एकड़क-एकड़ बेचैत जँ एना अछि तँ कतऽ अछि कटही गाड़ी आ कतऽ अछि खेती आ कोना जिबै अछि बच्चा सभ? आउ आब! बरखा नै हएत नहिये जायत अकाल आकि भुखमरी पानि नै बहत नहिये जायत अपन नोर खेत सभ तपि कऽ सुखायल समै सेहो उनटि अछि गेल बरखा जइसँ नै खसै अछि एक्कोटा बुँद बीया बाओग करैत काल सएह बहैत अछि मोनसँ कटनीक समैमे जे एकाध टा दाना रहय बचल बहि गेल बाढ़िक पानिमे जे दाना जइतय कंठमे से बहि गेल नालामे कपासक खेती सेहो तेहने कीड़ा..सभटा कीड़ा, खतम भेल दहोदिश बीयासँ रसायन धरि धोखा...धोखा..बेइमानी चारू दिस बेइमानी बोनिहारसँ सभटा क्षति, जेम्हरे देखू तेम्हरे हानि..आ ओहूसँ बड़का हानि ओकरा दबेबा लेल बिन प्रयोजन कतबो बरिखसँ करैत होइ खेती बिनु प्रयोजन हमर बच्चा सभ अछि पैघ भऽ रहल किसान सभ अछि मरि रहल हमरा ई कहय दिअ, हम सेहो छी मरि रहल हम नै जीबि सकब आर अधिक काल हे लच्छैय्या! छी हम जा रहल! हाल-फिलहाल पाइ के अछि मंगने? की ओ सभ चाहै छथि जे किसान बन्न कऽ दिअय खेती? जकरा चाही दरमाहा जीबाक लेल? केना जीब आ केना मरब.. केना कऽ भरब कर्जक जे अछि अमार.. अपनो बेचि कऽ की चुका सकब? की अपन खेतिहर भूमि सेहो बेचि दी? मुदा से ऐ अकालमे कीनत के? जे हमर जीवन-संघर्ष तेहेन अछि सुनलौं धनिक लोक सभक ओहेन शब्द-सभ? “मरैत, अपच होइत जे ओ सभ लेने छथि।“ हमर बाउ! कतयसँ आनै छी ओ सभ दाना जे अहाँ खाइ छी? एक बेर फेर, ई अछि हिस्टीरिया रोग! जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि रोगमे? जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि जुआमे? आ बढ़ा लेलन्हि अपन धोधि? की अहाँ नै देखि पाबि रहल छी किसानक अँकड़ल पेट? की अन्न देनिहार भऽ गेल रोगी? नै एकटा चातकक माउस ओकरा देहमे, हमर बाउ! धानक खेतीसँ पोसल ई देश आ आब हमरा दाना देबासँ मना कऽ देलौं अहाँ, नै की? ओ कहै छथि हम मरि रहल छी अनुकम्पा राशि लेबा लेल ओ कोना ई कहि सकै छथि...एहन शब्द सभ? की अहाँ देखने छी, हमर लच्छैय्या? ई शब्द सभ दाह उत्पन्न करैत अछि हमरा देहमे, अहाँक पाइक खगता? ककरा छै ई खगता? हम सभ गाय जकाँ छी पवित्र, अहाँ से कहै छी? अहाँ सभ मरब हमरा सभक शाप माथपर लेने हम सभ नै छी ऋणखौक हृदैमे धैर्य राखू.. हम सभ छी स्वाभिमानी मनुक्ख मरि जायब से एतऽ फेर लेब जन्म एतऽ अपन जिनगी काटल गंगासन पवित्रतासँ हम सभ छी ऋणमे डूमल आ ऋणदाता सभ बनि गेल छथि यम, प्रिय हम आब नै.. हम आब नै.. छी जा रहल ............................. लच्छय्या! लच्छय्या! अहाँ एना किए छी कलपि रहल? ई अछि लिखल अपना सभक भाग्यमे ततेक दिन जीब जतेक दिन अछि लिखल हम जा रहल छी जहिया हमरा जेबाक छल ......................... हमर दिनक गनती शुरु अछि भऽ गेल नै स्वीकार करब लच्छैय्या, अनुकम्पा राशि हमरा गेलाक बाद सरकार ई देबाक गप करत ओ नै कहैत अछि जे, हम जे छी मरि रहल से, जे खेलौं तकर अपच भेलासँ छी मरि रहल? ओकरा लऽ जाय दियौ ओ पाइ अपना सारामे? धिक् ओइ घरकेँ। हम जा रहल छी... अहाँकेँ हानिमे दैत, लच्छा! बच्चा सभक लेल नै कियो आर हम जा रहल छी.. जा रहल छी ऋण देनिहार सभक द्वारे” (मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ “आखरी माता”) मूल तेलुगु पद्य- अन्नावरन देवेन्दर, तेलुगुसँ अंग्रेजी पी.जयलक्ष्मी द्वारा, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) पानि अछि, मात्र आँखिक नोर ठोप, ठोपे टा मे टपटप खसैत पानि ठोपे-ठोपे, हम नै कऽ सकै छी वर्णित, पानि नै बहैए निर्विरोध, सुवर्ना नै अछि भरैत कखनो। कलसँ भनसाघर धरि, भनसाघरसँ सोझाँक बारी धरि भागैत एतऽसँ ओत्तऽ एम्हर-ओम्हर करघाक नमरैत ताग सन वस्त्रक संरचना सन एक्के घुमानमे हम जाइ छी घूमि। कनैत बाल, पानि भरबाक अछि काल दूधक झोँक आ हमर रजस्वला एकान्त हुँह ! सभटा एक्के बेर ! पानि मात्र सप्ताहमे दू दिन, छौँकी आ झगड़ा कलपर तैयो छी हम सभ स्त्री जे रहैत छी मिलि कऽ बेकाल मे दैत प्राणोक उत्सर्ग। ई सभटा झंझवात पानिये टा लेल नै कहि सकै छी अहाँकेँ अपन पानिक समस्या- सम्पूर्ण भोर खतम होइत अछि ऐ पन्द्रह मिनटक कार्य लेल कनेक काल भातक बिनु बिसरियो सकै छी मुदा बिनु पानिक जीवन चलत? एकत्रित भेल जे नै अछि हमर बेटो लेल पर्याप्त तइ लेल, रस्सा भरि नमगर पाँति। के अकानैए संघर्ष? घर भरल लोक गाछ जकाँ ठाढ़ आकि कुरसी जकाँ बैसल तमसाइत हमरापर जे हम छी पछुआयल दौगैत छी बिनु लक्ष्यक। मुदा नै हिलबै छथि आंगुरो हमरा सहायतार्थ हमर हाथ ओइ बोरिंगकेँ ठीक करैत भेल जे चोटिल। ओइ पम्पकेँ पीटैत निकलैत अछि मात्र छुच्छ ध्वनि हमर प्राण बहार भऽ जाइए ओतऽ काज करैत कर्र कर्र कर्र कर्र हमर बाँहिक दर्द आ छातीक पीड़ा पाताल धरि पानि बिला जाइए कत्तौ गहींर नीचाँ मुदा तैयो नै बकसैत जे हम काज करै छी खतम करबाले चम्मच भरि पानिक बुन्द सेहो गन्हाइत। कान्ह भेल भोथ ठेला पड़ल सुवर्णा उघैत ब्लाउज फाटल एकटा अल्प जीवनक बाद हमरामे नै अछि एकर जोड़-तोड़ करबाक सक्क हम की कऽ सकैत छी बहिन? पानिक चरचे मात्र मृत्युक डरकेँ अछि खोंचारैत पानि अछि, आँखिक नोर मात्र... (“नीलान्टे कन्नीले...” मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ) शीला सुभद्रा देवी (१९४९- ) कैकटा तेलुगु पद्य संग्रह प्रकाशित। १९९७ ई. मे तेलुगु विश्वविद्यालयसँ उत्तम लेखकक पुरस्कार प्राप्त। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन, तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद। गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। पसीझक काँट बाड़ीमे लगाओल पसीझक काँट गहना लेल केना ओऽ सभ पसड़ैत अछि सोहड़ैत! चुपचाप बुनैत रस्ता आच्छादित करैत स्थान। भीड़-भाड़ सभठाम सभ कोणमे काँटबला पसीझक झाड़ सभ, सभ रोकैत स्नेहक अनवरुद्ध प्रवाह चिन्तन विखण्डित पड़ि काँटक मध्य वाणी अवरुद्ध फँसि कोनो झाड़ मस्तिष्क उर्ध्वपतित चुपचाप हृदय बनैछ मात्र एकटा अंग आ मौन करैत राज यांत्रिक रूपे॥ मुनैत, बहत नै हवा एकताक तेनाकेँ ठुसैत सभक आश कोनहुना निकसी अकास। मुदा की अछि विस्तृत खेत मध्य? कतऽ गेल फूलक क्यारी फुनगैत मित्रताक हिलबैत अपन माथ आमंत्रणमे? कतऽ गेल ओ चाली सभ अपन तन्तुसँ बढ़ैत? सभकेँ समेटैत ओ लता-कुञ्जक मंडप कतऽ गेल छोड़ि मात्र अशोक आ साखुक वृक्ष जे पसारि रहल अकास मध्य अपन हाथ नीचाँ देखैत विश्वकेँ घासक पात सन तुच्छ? यदि हम मोड़ी आ घुमी घोरैत अपनाकेँ नोरमे वेधै बला मोथा नै भोकैत अछि मात्र पएर वरन् आँखि सेहो। सभठाम लोक उन्मुक्त ठाममे मानवीय सम्पर्कसँ घृणा करैत परिवर्तित केलक नगरकेँ सेहो बोनमे। पसारैत काँट सभ ठाम परिवर्तित भेल पसीझक झाड़मे साँसक फुलब पसड़ैत चारू दिस दोसराक संवेदना नै आबऽ दैए विचार जिनगी भेल उसनाइत खेत सन। इच्छा भागबाक पएर केने आगाँ। आश्चर्य, मथि नै सकै छी, औँठा धरि सेहो। देखि सकी जौँ अपनेकेँ मात्र भीतरसँ बाहर पसीझक काँट मात्र। एन. अरुणाक जन्म निजामाबाद लग एकटा गाममे १९४९ ई. मे देलन्हि। तेलुगुमे पाँचटा कविता संग्रह प्रकाशित। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन, तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद। गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। ई सेहो अछि प्रवास अहाँ नै छी मानैत मोटा-मोटी ईहो छी प्रवास एकर गुण षडयन्त्र जकाँ मूल जन्मकालेसँ “तैयो अछि तँ बेटीये” अछि ने ई? कोनो पुरुषक हाथमे तँ जेबाके छै ने एक दिन प्रवास मात्र अमेरिके टा प्रवासक नहियेक नहि नारी सेहो अछि एकटा ई। अहाँ एकर अवहेलना कऽ सकै छी सुविधासँ। तैयो कतेक कठिन छोड़ब जिनगी भरिक लेल अपन जन्मस्थान पायब एकटा अनचिन्हारक आंगुर? अहाँ घुरि सकै छी कखनो काल मुदा बनि मात्र पाहुन। जखने हम पएर राखब कतेक काल धरि अहाँ रहब, पुछब हमर लोककेँ। “जा धरि हम चाही” इच्छा अछि कहबाक मुदा कहबाक साधांश ससरल हमर इच्छापर, बहुत पहिनहि। प्रवास नै अछि हर्खक वस्तु। छोड़ि ई मात्र जे समय बितने बढ़ैत अछि, ई बनैत अछि अभ्यास। गुजराती कविता खण्ड हेमांग आश्विनकुमार देसाइ मूल गुजराती पद्य आ तकर अंग्रेजी अनुवाद- हेमांग आश्विनकुमार देसाइ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर समीकरण दू टा अर्धवृत्त जन्मैत समानान्तर, समानान्तर रेलगाड़ीक पटरी। हाथ भरि नमगर लिबल घास, झुकैत भीतर, बिना डोरीक धनुष सन। सुनबैत खिस्सा भरिगर हेबाक, रातिभरि जन्मैत अस्पष्ट पीठ बेताल सन, जे उड़ि जाइत अछि भोर भेने। आ एतबे आकि कनेक बेशी झुकल बुढ़िया जे अहाँकेँ मोन पाड़त हाँसू। झुकल निश्चल प्रथम श्रेणीक कम्पार्टमेन्टमे, कातमे ठाढ़ कएल गेल ट्रेन अहाँक अपन आँखिसँ कएल प्रतीक्षा बिन कात भेल। एकटा छोटो आहटि एकटा त्वरित चमक कमसँ कम आब, हँ आब ई हमर अधिकार अछि, सत्ते हइए जाइत अछि। दूटा उर्ध्वाधर पटरी टेढ़ कएल बीचमे दू टा तोरण, जमल मृत्यु एकटा तीक्ष्ण गुमारबला दुपहरिया आ अहाँ बनबैत छी एकटा अद्भुत समीकरण। आश्चर्यिय छी अहाँ कष्ट उठबैत छी सोझ बैसबा लेल आ जे हाँसू गीरि गेलौं कताक समय पहिने तोड़त अहाँकेँ खण्डमे अजय सरवैया, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। अहाँक तामस हमर स्वागतपथ “अहाँ आवेष्टित छी प्रतिध्वनि आ मोहक स्वरसँ”. पाब्लो नेरुदा चक्रधर आ पीयुषक लेल “कहिया धरि हम खिचैत रहब एना? ”, ओ पूछत आद्र मुखसँ हेरायल आँखिसँ हम राखब सोझाँ शब्दकेँ, ओ रखती नियमावली हम करब सोझाँ अपन इच्छा, ओ भ्रमकेँ हम देबन्हि मेघ, ओ चक्र हम आनब प्रश्न, ओ पलायन हम प्रतिभाक प्रेमी, ओ बन्धनक हम स्वप्नक आकांक्षी, ओ निर्जनताक कहिया धरि? हम बुझलौं नीक जकाँ हमर भाग्य रहय फराक हमरा सभक दिन राति सेहो ऋतु आ पाबनि तिहार जकाँ समय काल हमरा सभक अन्तर हमरा सभक विभिन्नता रहय विभिन्न हमरा सभ प्रेम करैत रही कतेक दिन धरि? राजेन्द्र पटेल, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। बिनु शीर्षकक हम किए कऽ रहल छी अनुभव धरा बिन शाखक बिना ऐ हाथक? पसारैत दूर आ विस्तृत जीवित साँपक ताकिमे ई सभ हाथ एक दोसरमे ओझरायल आ समाप्त होइत मात्र नहक वृद्धिमे। बाबाक छड़ीक पकड़िसँ बसक ठाढ़ हुअयबला लटकल चक्र मुट्ठी अनैत अछि वएह अविचल शून्याकाश। ओकर करैत अनुभूति ई सभ खेंचल कार कौआक हाथ घुमि जायत अकास दिस सभटा खेत अंकुरित प्रफुल्लित पृथ्वीक गत्र-गत्र पाँजर खेतमे औंगठल बाँहि जकाँ। सभटा हरक फारक चेन्ह भाग्य रेखा हाथक। पंक्ति जोखि सकैए मात्र हाथक लम्बाइ नै एकर जड़ि पहिने हम कऽ सकी एकर निदान हाथक आक्रमण जड़िपर श्वेत धरापर रोशनाइसँ पसरल अपन नव अंकुरित आँखिए उड़ि गेल नव-जनमल पाँखिए ओइ धूसरित गगनक पार आब सभटा मस्तिष्क कोशिकामे हाथ रहैछ अहर्निश प्रवेश कय रहल गँहीर आर गँहीर जड़िमे पीयूष ठक्कर, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। सांध्य बेला साँझ होइते शिशिर आह पर्वतक आच्छादित कएल अकास अविलम्ब पड़त सम्पूर्ण अकास फाँसमे ऐ पर्वतक छाहक पर्वतकेँ भेटत अकास प्रकाशकेँ छाह शरीर सुतत हृदय दुखित ओहिना जेना ईश्वरकेँ भेटल मनुक्ख पन्ना त्रिवेदी, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। आमद हे विदेशी! देखाउ हमरा एहन दृश्य यदि अछि कोनो एहन बिनु प्रकाश बिनु गद्दाक ओछाओन बिनु छाह जतऽ नहिये अछि चुप्पीक अंश व्यथित हृदयक ध्वनि नहिये ध्वनिक आंगुरक नोकक स्पर्श देखाउ हमरा ओ दृश्य यदि अछि कोनो एहन हौ विदेशी! जतय क्यो नै करैछ एकत्रित श्वासक मालगुजारि। बाबू सुथार, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। गृहमोह गंध पहिल बुन्नीक आ हम बैसी आ पसारी एक-दोसर दिस भेदित पड़पड़ाइत बुन्नीक बुन्द बलुआही माटि भेल यथार्थक छननी आयल प्रखर रौदक फोका पाथरक चामपर अविलम्ब झझायत छातक खपराक भूर धारक संग उगडुम करत अदन्त बड़द कछेरपर नाचत। सभटा दोगहीमे बड़द सभ आनत पानि सोलह टा पालो बान्हि गरदनिमे सभ घरमे धरनि सभ नहायत जी भरि देबालपर गाछक छातीपर स्मृतिक शिलालेखपर हदसैत पानि खोलत हस्ताक्षर भगवानक पूर्वजक। बरखाक संगे चमकैत अकास मायक कोमल तरहत्थी। सूर्य करत आच्छादित वृक्षक शाखक पातक पंखुड़िक। टांगल पक्षिक आवास सभ गृहक बाहर मयूर सभ करत नृत्य। जेना प्रिय नव वधु मयूरीक माथपरक जलक घट गामक दोगहीसँ निकलत अनबा लऽ पानि छिटैत नहक आकारक झील वैतरणी डुमायत रीढ़युक्त नागफनीक पात। संग जीव आ शिव करत अष्टमी आ एकादशी चन्द्रमा उगत चुट्टीक कटगर पीठपर आ चाली सभ बहरायत आडम्बरसँ राजसी मुकुट धेने सत्ये किछु अकठ अछि हमरा सभक भाग्यमे आइ आइ गंध पहिल अछारक आ हम बैसि आ पसरैत एक दोसरामे। भोजपुरी कविता खण्ड भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१)- लोकलाकार, छपरा जिला (बिहार)मे जन्म। प्रारम्भक रचना सभ मौखिक मुदा बादमे कैथी लिपिमे सेहो हिनकर हस्तलिखित भोजपुरी रचना प्राप्त भेल। भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद मूल भोजपुरी- भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१), मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर (१९७१- ) वृद्धाश्रमक पक्षमे बिरहा १ कुतुबपुर अछि गाम, भिखारी ठाकुर अछि नाम। बाबू सभ गोटेकेँ करै छी प्रणाम॥ सभ गोटेकेँ करै छी प्रणाम हे राजा। उपरेसँ चिक्कन अछि चामक ओहरन॥ तीन दिनक सेखीमे, उड़बै छी मज्जा। बूढ़ा-बूढ़ीकेँ दुख भेल छनि, लगैए नै लाज॥ बाबू-भइया एकमत भऽ कऽ सभ मिलिये कऽ समाज। एक अरजीपर मोन आनू, मोनकेँ करू ताजा॥ महाबीरक नाम सुमरि लिअ, जइसँ बाजत बाजा। वृद्धाश्रम बनबाउ नै तँ हएत अकाज॥ सभ बाबूक पएर पड़ै छी, भिखारी ठाकुर नाम छी॥ बिरहा २ हिन्दू-मुसलमान, सभ हमर कहलपर दियौ कान। नै तँ होइए बूढ़क अपमान॥ होइए बूढ़क अपमान हमर भाइ। नेनपनेसँ जकरा तूँ कहैत एलेँहेँ माय॥ तकराले किए भऽ गेल छेँ तूँ कसाइ। बड़का हाकिम लग जखन जेमेँ तँ पुछल जेतौ हिसाब-किताब॥ जल्दीसँ बता हमरा की केलेँ तूँ कमाइ। नह जखन झारतौ तखन ओइ काल की करमे उपाय। आँखिसँ नोर खसतौ किछु ने हेतौ बाजल। कहैए भिखारी अखने दे तूँ वृद्धाश्रम बनबाय।। नै तँ होइए बूढ़क अपमान॥ कश्मीरी कविता खण्ड रहमान राही- छाह सभ (कश्मीरी कविता) ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जायबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतय नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलौं। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आ स्व. श्रीमति रमा जैन, ऐ पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व ऐ कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नै रहै छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनीता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गेबाक अनुरोध केलन्हि आ ओ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक ’या कुन्देन्दु ’ सँ शुरु कऽ निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गेलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत केलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कऽ भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित केलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कऽ आ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जइमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आ प्रशस्ति पत्र आ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दऽ कऽ सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य केलन्हि आ महान जवाहरलाल नेहरू जइ पदपर छला ओइ पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कऽ विशेष प्रसन्नता प्रकट केलन्हि। ओ ईहो बजला जे कश्मीरक राज्य सरकार कश्मीरीकेँ मान्यता नै देलकै मुदा ई केन्द्र सरकार द्वारा मान्यताप्रप्त भाषा अछि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन केलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल। अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि। हिनकर निच्चा देल कविता उपस्थित लोककेँ देल गेलन्हि। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता (कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, साभार भारतीय ज्ञानपीठ आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर) छाह सभ अपन नियतिसँ वाद आ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ, यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाउ तइमे। बस्तीक जइ पथपर चलैत रहलौं, ओ धँसि गेल घनगर बोनमे, जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य, शंकासभ द्वारा। आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कऽ भऽ गेल सुनसान। देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला, हाथमे आओत मात्र एकाध विचार, आ असगर एकटा कौआ उजाड़मे। कखनो हमर इच्छा रहय चान-तरेगन गढ़बाक, आब माथ भुका रहल छी, अपन कोनो नामकरण तँ करी। सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरियरी सन, सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन। सभटा देवता हमर अपन छाह छथि, सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन। सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ, सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन। केहन अछि नाओक खेबनाइ, कतय तँ अछि किनार! देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे। हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर, राही तँ आगि-खायबला बताह अछि। समारोह एक घण्टामे खतम भेल आ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण केलन्हि, भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल आ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतऽ ओ २ वर्ष धरि रहत। रवि भूषण पाठक निरालाःदेह विदेह (१-४) हिन्दी भाषा आ साहित्य क केन्द्रीयता स्वातंत्रयोत्तर भारतक एकटा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना ।एकर मूल कारण राजनीतिक आ वाणिज्यिक रहितहु परिणाम बहुआयामी अछि ।हिंदी साहित्यक आ विशेषतः कविता के सौंदर्यात्मक ,वैचारिक आ शैल्पिक वैविध्य सँ पूर्ण करबा मे कवि निराला क योगदान अप्रतिम ।ने केवल कविता बल्कि ईमानदारी मे सेहो निराला क व्यक्तित्व क चर्चा क सेहो कतिपय आयाम । आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व मे निराला अग्रणी छथि,जनिकर व्यक्तित्व आ कृतित्व क हरेक अंश सँ ईमानदारी,रचनात्मकता,आलोचना आ अफवाहक मार्ग प्रशस्त होइत अछि ।निराला काव्य क अनुवादक महत्व विभिन्न प्रसंग आ संदर्भ सँ अछि ।प्राचीन संस्कार आ आधुनिकता क आंदोलनमयी धारा कें आत्मसात करबाक जतेक सामर्थ्य निराला साहित्य मे अछि ,ओतेक अन्यत्र नइ ।दोसर बात ई जे निराला काव्य क माध्यम सँ हिन्दी साहित्य मैथिली आ बांग्ला सँ जुड़ैत अछि ।निराला पर विद्यापति आ रवीन्द्रनाथक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट अछि ।हिंदी आलोचक निराला पर विद्यापतिक प्रभाव पर बहुत नइ लिखने छथि ,मुदा ई प्रभाव देखबा क हो तखन ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे‘ क तुलना विद्यापति लिखित वसंत गीत ‘नव नव विकसित फूल ‘सँ करू । शब्दार्थचिंतामणिकार अनुवादक दू टा अर्थ लिखैत छथिन्ह ।प्रथम ‘प्राप्तस्य पुनःकथने ’आ दोसर ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने ‘ एकर अर्थ भेल पहिले कहल गेल कथन के फेर सँ कहनए आ ज्ञात अर्थ के प्रतिपादित केनए ।प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक रोमन याकोबसन एकरा ‘एक भाषा के शाब्दिक प्रतीक के अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीक के द्वारा व्याख्या‘ मानैत छथिन्ह ।नाइडा आ टेबर कनेक विस्तृत करैत कहैत छथिन्ह कि ई मूल भाषा क संदेशक समतूल्य संदेश के लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत करबा क क्रिया अछि जाहि मे संदेशक सममूल्यता पहिले अर्थ आ फेर शैली क दृष्टिकोण सँ निकटतम आ स्वाभाविक होइत अछि । भाषिक प्रक्रिया होएबा क कारणें अनुवाद क सम्बन्ध भाषेटा सँ नइ बल्कि भाषाविज्ञानो सँ अछि ।ध्वनि ,शब्द,रूप,वाक्य आदि विभिन्न स्तर मिलि के अर्थक संसार रचैत अछि ,ताहि दुआरे ऐ सब स्तर क प्रति सजगता अनिवार्य अछि ।प्रत्येक भाषाक अपन विशिष्ट ध्वनि ,शब्द भंडार आ रूप व्यवस्था होइत अछि ,ताहि दुआरे ऐ स्तर मे निहित अंतर के कारणें समान लागए वला प्रसंग सेहो वास्तविक अर्थ मे अर्थान्तर क संभावना सँ युक्त होइत अछि । ऐ ठाम ई तथ्य उल्लेखनीय अछि कि मैथिली आ खड़ीबोली हिन्दी कोनो दू ध्रुवीय भाषा नइ अछि ।दूनू दू टा प्रादेशिक अपभ्रंशक संतान आ ताहि दुआरे संस्कृत ,पालि आ प्राकृतिक विरासत पर समान रूप सँ अधिकारिणी अछि ।ध्वनि ,शब्द आ रूप क स्तर पर अनगिन साम्य अछि ।संस्कृत क रात्रि मैथिलीए टा मे नइ अवधी,ब्रजभाषा,भोजपुरी सहित कतेको उत्तर भारतीय भाषा मे ‘राति‘ अछि आ ‘दिन‘ त‘ सर्वत्र ‘दिन‘े अछि ।तहिना भोर आ दुपहर अपन विभिन्न ध्वनिभेद क संग विद्यमान अछि ।उदाहरण केवल एक या दू शब्दक नइ अछि ,सुधी पाठक ऐ उभयनिष्ठ आधारक जटिल उपस्थिति सँ परिचित छथि । ई उभयनिष्ठ आधार अनुवाद मे सुविधा लऽ के आबैत अछि,मुदा ऐ ठाम आलस्य आ अनुकरण क खतरा मौलिक अनुवाद के समक्ष चुनौती दैत अछि ।सबसँ बेशी शब्द तद्भव के आ ओहि पर सब भाषा क तेहनें अधिकार तखन ई नबका शब्द कत‘ सँ आनी ,देशज शब्दक प्रयोग प्रचलन आ स्वीकृति क आधारे पर स्वीकार्य होयत ।मिथिला क व्यापक भूभाग मे पजेबा सँ बेशी स्वीकृत शब्द ईंटा अछि तखन ककर व्यवहार करी आ ककर नइ करी ? वैज्ञानिक तथ्य वा गद्यात्मक सूचना क प्रस्थापन अभिधात्मक भाषा मे सुगमता मे संभव अछि ,मुदा भावप्रधान रचना मे अर्थ क अनेक स्तर आ कथनक बहुविधि व्यंजना होइछ,परिणामतः प्रत्यक्ष भाषिक प्रतिस्थापन संभव नइ, ताहि दुआरे अनुवादक के परकाय प्रवेश करऽ पड़ैत अछि ।अनुवादक मूल कृति आ रचनाकार क मनोजगत मे घुसि के भाव आ ओकर अर्थच्छाया के समझैत अछि तथा फेर ओइ भाव के यथासंभव लक्ष्यकृति मे अभिव्यक्त करैत अछि ।कलाकृति के एहन समझ आ फेर ओकर कलात्मक संप्रेषण क लेल सर्जनात्मक प्रज्ञा क विद्यमानता अनिवार्य अछि ।ई प्रज्ञा सर्वत्र एकरूप मे उपस्थित नइ अछि ,ई देखबा क अछि तखन उमर खय्याम क रूबाई क अनुवाद क्रमशः फिट्जराल्ड (अंग्रेजी) आ मैथिली शरण गुप्त, बच्चन जी ,केशव प्रसाद पाठक आ सुमित्रा नंदन पंत(सब हिंदी)क अनुवाद मे निहित भावभंगिमा आ गुणवत्ता क अंतर देखि सकैत छी ।गीतांजलि क अनुवाद मैथिली मे सुमन जी केने छथि आ हिंदी मे अज्ञेय आ अन्य कतेको विद्वान मुदा बांग्ला विद्वानजन सुमन जी द्वारा अनुदित ‘अनुगीतांजलि‘ के ह्रदय खोलि के प्रशंसा केने छथि । ऐ ठाम हम परकायप्रवेशक वांछित योग्यता क साथ उपस्थित नइ छी ।हम निराला काव्य मे निहित व्यंजना क महान शक्ति के स्वीकार करैत छी आ निराला काव्य मे ,ओकर शब्द आ शब्द योजना मे निहित उदात्त के मानैत छी ।ई उदात्त किछ किछ संस्कृतक तत्सम शब्द,सघन वर्णमैत्री,वर्णक ध्वन्यात्मकता मे निहित अछि ,ताहि दुआरे मैथिली पाठक के हम शब्द आ अर्थक अइ स्वर्गिक संसार सँ वंचित नइ करऽ चाहैत छी ।हम अपन अनुवादक सीमा के सहज स्वीकारैत छी अनुवादक एकाधिक रूप मे प्रचलित अछि ।शब्दानुवाद(लिटरल) या मूलनिष्ठ अनुवाद सामान्यतः अभिधात्मक होइत अछि ,ऐ अनुवाद मे श्रोत भाषाक प्रत्येक शब्द आ अभिव्यक्ति क प्रतिस्थापन लक्ष्यकृति क शब्दावली,अभिव्यक्ति तथा संरचना मे होइछ । भावानुवाद मे मूल भाषा क अभिव्यक्ति क स्थान पर ओइ मे निहित आशय के स्पष्ट कएल जाइत अछि ।ई मूलकृति क ढ़ाँचा सँ स्वतंत्र होइत अछि,ताहि दुआरे लक्ष्यकृति क दृष्टि सँ ई बेशी सहज आ स्वाभाविक होइत अछि ।सुरेन्द्र झा सुमन द्वारा ‘गीतांजलि‘ क अनुवाद ‘अनुगीतांजलि‘ भावानुवादक श्रेष्ठ उदाहरण अछि । रूपांतरण कथा साहित्य क क्षेत्र मे लोकप्रिय अछि ।अइ मे अनुवादक मूलकृति क परिवेश ,चरित्र ,आदि के देश-कालानुसार परिवर्तित करैत अछि ।शेक्सपीयर रचित ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ क हिंदी अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम सँ केलाह ।एइ मे एंटोनियो क नाम अनंत ,बसानियो क नाम वसंत आ शायलॉक क नाम शैलाक्ष अछि ।घटना वेनिस नगरक स्थान पर काशी(भारत) मे घटैत अछि। ‘छायानुवाद‘रूपांतरणक एकटा प्रकार अछि ,अइ मे मूलकृति क आधार पर मूल कथ्य के संप्रेषित करबा क लेल स्वतंत्र कृति क निर्माण संपन्न होइत अछि ।अइ मे बिंब विधान ,प्रस्तुतिकरण आदि मूलकृति क प्रतिबिंब होइत अछि ।भगवती चरण वर्मा क उपन्यास चित्रलेखा अनातोले फ्रांस क उपन्यास ‘थाया‘ पर आधारित अछि ।विदेशी फिल्म आ साहित्य क अनधिकृत अनुवाद आ रूपांतरणक लेल अइ विधि क बहुत प्रयोग होइत अछि । ‘सारानुवाद‘ मे मूलकृति क सार लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत कयल जायत अछि ।संप्रेषण केंद्रित अनुवाद क्लासिकी रचना के बच्चा आ किशोर सब के पढ़बा क लेल रूपांतरण मे सहयोगी होइत अछि ।जेना महाभारत वा रामायण पर आधारित संक्षिप्त कथा । ‘टीकापरक अनुवाद‘ मे अनुवाद क साथ ओकर व्याख्या रहैत अछि ।गीताप्रेस क किताब मे एहन अनुवाद प्रचूर मात्रा मे उपलब्ध अछि ।किछु दिन पहिले विद्यापति पदावली क किछु पदक अनुवाद यात्री जी द्वारा कयल गेल दिल्ली विश्वविद्यालयक प्रोफेसर प्रभात रंजन जी क ब्लॉग पर उपलब्ध छल । अंत मे फेर काव्यानुवाद पर आबी ।कविता क अनुवाद नमहर चुनौती अइ दुआरे छैक कि कविता मात्र शब्दार्थ तक नइ सीमित छैक ।ई शब्द सँ आगू वाक्यगठन,लय,छंद,बिंब,प्रतीक,अलंकारयोजना,शैली आदि क मिल जुलल परिणामी काव्यात्मक पर्यावरण पर आधारित अछि ।ताहि दुआरे दाँते आ सर फिलीप सिडनी सन विद्वान काव्यानुवाद के असंभव मानैत छथिन्ह ।कविता क समग्र प्रभाव वा व्यंग्यार्थ ध्वनि ,लय ,बलाघात आ बिंब योजना के माध्यम सँ अभिव्यक्त होइत अछि ।ताहि दुआरे निराला क शब्द चयन ‘विजन-वन वल्लरी‘‘पुलिन पर प्रियतमा‘मैथिली मे यथावत अछि । कविता क दृश्य आ श्रव्य बिंब बहुधा शब्द क नादात्मकता सँ नियंत्रित होइत अछि ।एहिना शब्दालंकार आ अर्थालंकार क विकल्प लक्ष्यभाषा मे सृजित कएनए कठिन अछि ।काव्यानुवाद क सबसँ नमहर समस्या छंद आ लय अछि ।मूल रचना क लेल प्रभावी छंद आ लय के खोजनए अनुवादक लेल सबसँ पैघ समस्या अछि ।यदि कविता क अनुवाद गद्य मे आबैत अछि तखन अनुवाद मात्र शब्दार्थ तक सीमित रहत आ अइ मे कविता क पूरा अर्थ निकलि के बाहर नइ आयत।अनुवाद सम्बन्धी अइ अवधारणा क लेल हम सर्वश्री/सुश्री रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,कृष्ण कुमार गोस्वामी ,कुसुम बांठिया ,गजेन्द्र ठाकुर ,रवीन्द्र कुमार दास जी क आभारी छी । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-१ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) मैथिलीःदेह-विदेह क अइ पहिल किश्त मे निराला जी क दू टा लोकप्रिय कविता क अनुवाद प्रस्तुत क‘ रहल छी ।सहज सँ जटिल आ जटिल सँ जटिलतर दिश ‘‘क्रम क्रम सँ भेल पार राघवक पंचदिवस चक्र सँ चक्र चढ़ि गेेल भेल उर्ध्व निरलस ‘‘(रामक शक्ति पूजा) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्धु (बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु!) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्ध पूछतओ पूरा गाम बन्धु ई घाट छलए जइ पर हँसि के ओ रहए नहाबति रे! धसि के रहि जाइत छलए आँखि फसि के कांपैत रहए दूनू पैर बन्धु ! ओ हँसी बहुत किछु कहए छलए तैयो अपने मे रहए छलए सबके सुनैत सबके सहैत दैत ओ सबके दाँव बन्धु । हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि (किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं ।) हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि दिखाबे टा दर्शन देेेने जा रहल छथि जुड़ल छल सुहागिन केर मोती क दाना ओएह सूत तोड़ने लेने जा रहल छथि छिपल चोट के बात पूछलउं त बजलीह निराशा क डोरी सीने जा रहल छथि ई दुनिया के चक्कर मे केहन अन्हर मरल जा रहल छथि जियल जा रहल छथि खुलल भेद एहि ठां ,जे विजयी कहायल। ओ खूं दोसरा के ,पीने जा रहल छथि । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-२ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) स्नेह निर्झर बहि गेलइ (स्नेह निर्झर बह गया है) स्नेह निर्झर बहि गेलइ देह बाउल सन रहि गेलइ डारि आमक ई जे सूखल दिखल कहि रहल“ने आब छइ ,कोनो कोयल के आयत ,ई पांति मे हमही कहल अर्थ नइ छइ एकर- जीवन जरि गेलइ” “देने छी हम जगत के ,जे फूल फल केने छी अपन प्रभा सँ,चकित-पल छल अनश्वर सकल पल्लवित पल- जीवनक ऐश्वर्य सब ढहि गेलइ ” आब नइ आबइ पुलिन पर प्रियतमा श्यामतृण पर बैसबा ले निरूपमा बहि रहल अछि हृदय पर केवल अमा हम अलक्षित छी ,इएह कवि कहि गेलइ ” 2 हम अकेला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। सूखल पाकल ,आधछिद ई केश हम्मर भेल निष्प्रभ गाल हम्मर मन्द भेलइ चालि हम्मर हटि रहल मेला नदी झरना जानि रहलहुँ छल जे बाँकी पार केनए क‘ चुकल ई देखि हँसलहुँ नाव ल‘ केओ ने एला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-३ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) रंगि गेल धरा ,भेल धन्य धरा जगमग ई जग भेल मनोहरा धरि रंग सुगन्ध भरि मौध मकरन्द गाछक लाली भऽ गेल गाढ़ फुजि पत्रपुष्प केर राग ठाढ़ भेल डेग डेग हरियर पूरा। रंगि.......... ग्ुंाजल कोयली केर पंचम स्वर कुचरइ कौआ मैना मृदुतर सुख सँ कँपैत रमि प्रणय केरि वनश्री चारूतरा । रंगि.......... 2 सखि वसन्त आयल भरल सिनेह जंगल केर मन मे नवोत्थान पसरल । पल्लव पहिरि कोंपरक लत्ती मिलल मधुर प्रिय गाछक पत्ती भंउरा गावइ कोयली सिहकइ नव नव स्वर भावल । कोंपर कल्ली हार बनल हन मद्धिम मद्धिम बहथि पवन सन जागि गेल प्रियवर के नयन मे मधुर प्रकृति अभरल । फैलल गोट पीयर कमलदल तहिना पसरल केशर कलकल खेत पथार सोना सन सुन्दर धरती पर फैलल । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-४ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) छाड़ल कारी कारी बादर एला नइ वीर जवाहर लाल केहन केहन नाचए अधसर नइ एला वीर जवाहर लाल चमकल बिजुरी फन पसारि के नइ एला वीर जवाहर लाल सोझ करू उलटल माथ के ससरैत फूफू करए माथ पर नइ एला वीर जवाहर लाल पूरबा अलगे फूफकारइ छइ प्रतिक्षण विष बकुटि बरसाबइ छुपल कोन गुफा मे हम सब नइ एला वीर जवाहर लाल मंहगाई के बाढ़ि बढ़ल अछि सबके संचित निधि लुटल अछि भुक्खल नॉंगर ठाढ़ लजाबथि नइ एला वीर जवाहर लाल कोना बचउँ बिन भाला लाठी बहल भसल सभ मित्र मंडली राह देखइ छी ,किछु नइ बुझइ छी नइ एला वीर जवाहर लाल विदेह सदेह:२७|| 71 72 || विदेह सदेह:२७
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