अनूदित गद्य खण्ड शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफ- जुम्मा (तेलुगु लघुकथा) शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफ। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। जुम्मा (लघुकथा) हमर अम्मीक निर्दोष मुखमंडल अबैत अछि हमर आँखिक सोझाँ, चाहे आँखि बन्द रहए वा खुजल रहए। ओहि मुखक डर हमरा विचलित करैत अछि। एखनो हुनकर डराएल कहल बोल हमर कानमे बजैत रहैए। ई दिन रहए जुम्माक जाहि दिन मक्का मस्जिदक बीचमे बम विस्फोट भेल रहए। सभ दिस कोलाहल, टी.वी. चैनल सभपर घबराहटिक संग हल्ला, पाथरक बरखा, आदंक आऽ खुनाहनि। हम काजमे व्यस्त छलहुँ जखन फोन बाजल। फोन उठेलहुँ तँ दोसर दिस अम्मी छलीह..हुनकर फोन ओहि समय नीक आ सहज लागल। एहिसँ पहिने कि हम “अम्मी..” कहितहुँ ओ चिन्तित स्वरेँ “हमर बाउ...!” कहलन्हि। “की अहाँकेँ ई बुझल छल...?” हम पुछलियन्हि। “हँ एखन तुरत्ते हमरा ई पता चलल..अहाँ सतर्क रहब! ...लागै-ए अहाँ आइ मस्जिद नहि गेल रही हमर बाउ।” हम हुनका डरसँ सर्द अवाजमे बजैत सुनलहुँ। जिनगीमे पहिल बेर हमर मस्जिद नहि जएबासँ ओ प्रसन्न भेल छलीह। ई विचार हमरा दुख पहुँचेलक। की हमर अम्मी ई गप बाजि रहल छलीह? ई ओ छथि जे हमरासँ ई पूछि रहल छथि? ई हमर अम्मी छथि जे एहि तरहेँ डरलि छथि? हमर मस्तिष्क विचरक विस्फोटसँ भरि गेल आ स्मृतिक बाढ़िमे बहए लागल। १ हमर अम्मीकेँ जुम्माक नवाज आस्थाक दृष्टिसँ नीक लगैत छलन्हि। ओ कोनो चीजक अवहेलना कऽ सकैत रहथि मुदा जुम्माक दिन नमाजक नहि, से ओ हमरा सभकेँ ओहि दिन घरमे नहि रहए दैत रहथि। अब्बा सेहो हुनकर दामससँ नहि बचि पाबथि जे ओ घरपर रहबाक प्रयास करथि। हुनकर सन डीलडौल बलाकेँ सेहो हाथमे टोपी लए मस्जिद चुपचाप जाए पड़न्हि। हमरा सभक घरमे काजसँ दूर भागए बला, आलसी बच्चा, शिकारी हम आ हमर अब्बा हरदम मस्जिद नहि जएबा लेल बहन्नाक ताकिमे रहैत छलहुँ। हमर अब्बा भोरेसँ छाती तनैत कहैत रहैत छलाह जे आइ जुम्मा अछि से कोनो हालतिमे मस्जिद जएबाके अछि। मुदा जखने समय लग अबैत रहए हुनकर बहन्ना शुरू- “अरे! अखने कादोमे हम खसि पड़लहुँ...” हमर अम्मी लग कोनो रस्ता नहि बचन्हि। जे से, तखन ओ हमरा सेहो मस्जिद नहि पठा सकैत छलीह...हमरा नहबैत, हमर कपड़ा धोबैत, ओ कोना कऽ सकितथि? तैयो ओ हाथमे छड़ी लेने आँगन आबथि, हमरापर गुम्हरैत, हमर पुष्ट पिटान करैत आ हमरा अँगनामे कपड़ा जकाँ टँगैत। से हम ई चोट खएबासँ नीक बुझैत रही नमाजे पढ़ब। हमर आलसपना मस्जिद पहुँचिते अकाशमे उड़ि जाइत रहए। एक बेर ओतए पहुँचिते हम दोसर बच्चा सभ संग मिझरा जाइत रही आ सभटा नीक वरदानक लेल प्रार्थना करैत रही- जेना हमर अब्बा लग खूब पाइ होन्हि, हमर अम्मीक स्वास्थ्य नीक भऽ जान्हि, हमर पढ़ाईमे मोन लागए आ की की। हमर अम्मा बुझाबथि- “हमरा सभकेँ मस्जिद मात्र वरदान प्राप्त करबाक लेल नहि जएबाक चाही, हमर बाउ..हमरा सभकेँ नमाज पढ़बाक चाही...अल्लामे आस्था हेबाक चाही। वैह छथि जे हमर सभ कल्याण देखैत छथि”। जखन दोसर हुनका हमर उपराग देन्हि जे हम नमाज काल आस्ते-आस्ते गप करैत रहै छी तँ ओ हमरा आस्तेसँ दबाड़ि बाजथि- “हमर बाउ, प्रार्थनाक काल बजबासँ अपनाकेँ रोकू...कमसँ कम मस्तिष्कमे दोसर तरहक विचारकेँ अएबासँ रोकू। बगलमे बम किएक ने फाटय तैयो सर्वदा अपन मस्तिष्ककेँ अल्लापर केन्द्रित राखू...”। हुनका ओहि दिन एहि गपक अन्देशा नहि रहन्हि जे एक दिन ठीकेमे मस्जिदमे बम फाटत। से आश्चर्य नहि जे ओ एतेक आत्मविश्वाससँ बाजि रहल छलीह। आब जखन ठीकेमे बम विस्फोट भेल अछि, हुनका ई अनुभव भऽ रहल छन्हि जे कतेक भावह ई भऽ सकैत अछि। हम हुनकर वेदनाकेँ नहि देखि पाबि रहल छी। ओ डरायलि छलीह। ओ नमाजसँ डरायल छलीह। ओ अल्लासँ सेहो डरायल छलीह। “अम्मी...”। हम उद्यत भऽ कहलहुँ। “हमर बेटा...”। ओ दोसर कातसँ बजलीह। “अहाँ आइ मस्जिद नहि गेलहुँ, नहि ने, हमर बाउ”? ओ फेरसँ कहलीह। हमर हृदय डूमि रहल रहए। शब्द हमर संग छोड़ि रहल रहए। हमर कंठ सूखि रहल रहए। हम घुटनक अनुभव कएलहुँ। विचार ज्वारि जकाँ हमरा भीतर उठि रहल छल। हमरा लागल जे क्यो हमरा ठेलि कए सोखिं कए भूतमे लऽ जाऽ रहल अछि। २ जुम्माक दिन मस्जिदसँ घुरलाक बाद हम सभटा घटनाक आवृत्ति अम्मी लग करैत छलहुँ। हम नमाजक एकटा छोट संस्करण हुनका लगमे करैत छलहुँ। हमरा प्रार्थना पढ़ैत देखि ओ हमरा आलिंगन मे लऽ चुम्मा लैत छलीह, “अल्ला हरदम अहाँक रक्षा करताह, हमर बाउ...”। ओ हमरा आशीर्वाद दैत रहथि। तखन हम निर्णय कएलहुँ जे जहुँ हमरा कोनो ज्ञानप्राण अछि तँ हमरा कोनो नमाज नहि छोड़बाक चाही। सभ जुम्माकेँ ओ नमाजक महत्वपर बाजथि आ मस्जिद जएबापर जोड़ देथि। आन चीजक अतिरिक्त ओ एहि गपक विषयमे बाजथि जे कुरान अही दिन बनाओल गेल रहए, कि मनुक्ख अपन कर्मक लेल अही दिन उत्तर दैत अछि आ जे विश्व जीवन रहित जे कहियो होएत तँ सेहो अही दिन होएत। हमर माथ, छोट रहितो, ई गप बुझि गेल जे जुम्मा किएक मुसलमान लेल पवित्र अछि। सभ बच्चा जुम्मा दिन साँझ धरि स्कूलमे रहैत छलाह, मात्र हम दुपहरियाक बादे स्कूल छोड़ि दैत छलहुँ, मस्जिद जएबाक बहन्ने झोरा झुलबैत घर घुरैत छलहुँ। हमर अम्मी शिक्षकसँ परामर्श कए केने छलीह। दोसर छात्र सभ हमरा एतेक शीघ्र घर जाइत देखि ईर्ष्या करैत छलाह। ओ हमरा भाग्यशाली बुझैत छलाह आ अपनो मुस्लिम होएबाक मनोरथ करैत छलाह। हुनकर ईर्ष्यालु मुख देखि हम भीतरे-भीतर हँसैत रही। हम खुशी-खुशी घर घुरैत रही जेना हाथीक सवारी कएने होइ। हमर अम्मी ओहि महत्वपूर्ण उपस्थितिक लेल हमरा तैयार करैत रहथि- गरम पानिसँ नहबैत रहथि, हमर आँखिमे काजर लगबैत रहथि, हमर केशक लटकेँ टोपीक नीचाँ समेटि कए राखथि। हम सभ दिन तँ हाफ पैंटमे रहैत छलहुँ मुदा ओहि दिन उजरा कुरता पैजामामे चमकैत छलहुँ। दोसर स्त्रीगण हमरा देखि अपन हाथ हमर मुखक चारू दिस जोरसँ घुमाबथि आ कोनो दुष्टात्माकेँ भगाबथि आ कहथि, “जखन जुम्मा अबैत अछि अहाँ जुम्माक सभटा चक लए अबिते ने छी”!! अहाँ जुम्माक साँझमे ई खुशी सभ घरमे देखि सकैत छी, दरगा केर फ्रेम कएल चित्रक सोझाँमे जड़ैत लैम्प, अगरबतीक सुगन्धी वायुमे हेलैत; अपन माथ झँपने स्त्रीगण घरक भीतर-बाहर होइत; आ नारिकेलक दाम दोकानक खिड़कीपर बढ़ैत। दरगा केर फ्रेम कएल चित्र पर नारिकेल चढ़ेबाक विधक वर्णन एतए अहाँ नहि छोड़ि सकैत छियैक। किएक तँ हमर अब्बाकेँ अर्पण विधक ज्ञान नहि छलन्हि से ओ हजरतकेँ छओटका रस्तासँ घर अनैत रहथि। हमर अम्मी ई सिखबाक लेल हुनकर पछोर धेने अबैत रहथि। “अहाँकेँ ई अन्तरो नहि बुझल अछि कलमा..आकि गुसुल...हमरा अहाँसँ निकाह करेबाक लेल अपन अम्मी-अब्बाकेँ दोषी बनाबए पड़त...कियो अहाँसँ नीक हुनका सभकेँ नहि भेटलन्हि, अहाँसँ हमर बियाह करेलथि। आब बच्चो सभ अहींक रस्ता पकड़लथि हँ...” ओ हुनकासँ एहि तरहेँ विवादपर उतरि जाथि। “अहाँ ..घरक...ई उत्पीड़न हमरा लेल असह्य भऽ गेल अछि..”। पजरैत, ओ मस्जिद जाइत रहथि लाल-पीयर होइत हजरतकेँ घर अनबा लए। हजरत नारिकेलक अर्पण विध पूरा करबाक बाद अपन मुँह आ पएर धोबि आ अपन दाढ़ीमे ककबा फेरि बाहरमे खाटपर बैसैत रहथि। एहि बीच हमर अम्मी फोड़ल नारिकेलक गुद्दा निकालि ओकर कैक भाग कए ओहिमे चिन्नी मिलाबथि। ओ तखन एहि मिश्रणकेँ बाहर हातामे जमा भेल सभ गोटेमे बाँटथि। ओ अन्तमे हमरा लेल राखल दू-तीन टा टुकड़ी लेने हमरा लग आबथि। हम शिकाइत करियन्हि, “यैह हमरा लेल बचल अछि”? “हमरा सभकेँ अल्लाकेँ अर्पित कएल वस्तु नहि खएबाक चाही, हमर बेटा..हम दोसरामे एकरा बाँटी तैयो जहुँ हमरा सभ लेल किछु नहि बचए”। ओ हमरा शान्त करथि। हुनकर मीठ बोल हमरा मोनसँ नारिकेलक पर्याप्त हिस्सा नहि भेटबाक निराशाकेँ खतम कए दैत छल। बादमे हमर पिता आ हजरत साँझमे अबेर धरि बैसि गप करैत रहथि। अपन वस्त्र बदलि सामान्य वस्त्रमे हम, अपना संगी सभक संग पड़ोसक एकटा निर्माण स्थलपर बालूक ढेरपर खेलाय लेल चलि जाइत रही। ई सभ सोचि हमर आँखिमे नोरक इनार बनि गेल... “हमर पुत्र, अहाँ किएक नहि बाजि रहल छी? की भेल? हम डरक अनुभव कऽ रहल छी...बाजू...” हमर अम्मी पुछैत रहलीह। ओना तँ हैदराबाद एनाइ तीन बरख भऽ गेल मुदा एको दिन हम नमाज नहि पढ़लहुँ। असमयक पारीमे काज करबा अनन्तर हम ईहो बिसरि गेलहुँ जे नमाज पढ़नाइ की छियैक। “अम्मी..” हम उत्तर लेल शब्द तकैत बजलहुँ। “अम्मी, हम कहिया हैदराबादमे नमाज पढ़बाक लेल मस्जिद जाइत छी जे अहाँ एतेक चिन्तित भऽ रहल छी”? हम पुछलहुँ। हम मोन पाड़लहुँ ओहि दिनकेँ जखन ओ हैदराबाद आएल रहथि कारण हम कहन्र् रहियन्हि जे हम हुनका हैदराबाद नगर देखेबन्हि। मुदा हैदराबाद आबि अपन विरोध देखबैत ओ बजलथि, “हम कतहु जाए नहि चाहैत छी...हमरापर किएक पाइ खर्च कऽ रहल छी”? हम हुनकर मोनक गप बुझैत रही। ओ हमरापर बोझ नहि बनए चाहथि, मुदा हम हुनकर विरोधपर ध्यान नहि देलहुँ। हमर जोर देलापर ओ एक बेर अएलीह। हम हुनकर हाथ पकड़ि रस्ता पार करबामे मदति करियन्हि। एक बेर खैरताबादक लग सड़क पार करबा काल हुनकर आँखि नोरसँ आद्र भऽ गेलन्हि। “अहाँ कतए जन्म लेलहुँ...कतए अहाँ बढ़लहुँ...अहाँ कतेक टा भऽ गेलहुँ? अहाँ एहि पैघ नगरमे कोना रहए छी? अहाँ बहुत पैघ भऽ गेलहुँ...” ओ बड़ाई करैत कानए लगलीह। “अहाँ जखन बच्चा रही तखन हम अहाँकेँ नानीगाम बससँ लऽ गेल रही। हम अहाँक हाथ कसि कऽ पकड़ने रही कि अहाँ कतहु हेराऽ ने जाइ। आब अहाँ एतेक पैघ भऽ गेलहुँ जे हमर हाथ पकड़ि बसपर चढ़बामे मदति करी”। ई कहैत ओ नोरक द्वारे ठहरि गेलीह। ओ खखसलीह, “खुस...खुस...” परिश्रमसँ अपन श्वास वापस अनलन्हि। ओ जखन भूतकेँ मोन पाड़ि रहल छलीह हम हुनका सान्त्वना देलियन्हि आ हुनकर नोर पोछलियन्हि। “अम्मी...हम एतए जीबाक इच्छासँ अएलहुँ। हम साहस केलहुँ आ कतेक रास कठिन क्षणकेँ सहन कएलहुँ। जखन दुखित रही, हम अपनेसँ दबाइ लए ले जाइ आ संगमे तखनो प्रत्यन करी।, ई सभ अम्मी...ई सभ अहाँक आशीर्वादसँ भेल, आकि नहि? एहि नगरमे अपना कहि कऽ संबोधित करए बला हमर क्यो नहि अछि, तखनो हम एतए बिना असगर रहबाक अनुभूतिक रहैत छी”। अपन आँखिक नोर पोछि कऽ ओ हमरा आशीर्वाद दैत कहलन्हि, “दीर्घायु रहू हमर पुत्र”। समस्याक आरम्भ तकर बाद भेल। “सभ जुम्मा..जुम्मा...अहाँ नमाज पड़ए छी हमर बाउ”? ओ पुछलन्हि। “नहि माँ। कहू ने, कखन हमरा पलखति भेटैत अछि”? “अहाँकेँ कहियो समय नहि भेटत, मुदा अहाँकेँ करए पड़त, एकरा छोड़बाक कोनो गुन्जाइश नहि अछि। मुस्लिमक रूपमे जन्म लेबाक कारण अहाँकेँ, कमसँ कम सप्ताहमे एक दिन समय निकालए पड़त”, ओ कहलन्हि। आगाँ कहलन्हि, “धनिक आ गरीब नमाजक काल संग अबैत अछि। ओ सभ कान्हमे कान्ह मिलाए नमाज पढ़ैत छथि। ओहि दिन ई बेशी गुणक संग अबैत अछि। एक बेर हरेलापर अहाँ ओ आशीष कहियि घुरा नहि सकैत छी। ताहि द्वारे धनिक आ एहनो जो लाखमे रुपैयाक लेनदेन करैत छथि, अपन व्यवसायकेँ एक कात राखि नमाज पढ़ैत छथि। दोकानदार सभ सेहो अपन व्यवसाय बन्न कऽ दैत छथि बिना ई सोचने जे कतेक घाटा हुनका एहिसँ हेतन्हि। संगहि ओ गरीब सभ जे प्रतिदिनक खेनाइक जोगार नहि कऽ पबैत छथि, सेहो नमाज पढ़ैत छथि”। हमरा डर छल जे हमर माँ वैह पुरान खिस्सा फेरसँ तँ नहि शुरू कऽ देतीह। विषय बदलि कऽ हम कहलियन्हि, “की अहाँकेँ बुझल अछि जे एतए निजाम नवाब द्वारा निर्मित एकटा पैघ मक्का मस्जिद अछि...”? “एहन अछि की? हमरा अहाँ ओतए नहि लऽ चलब”? ओ उत्साहसँ बजलीह। “जखन अहाँ ओतए पहुँचब तँ हमरा नमाज पढ़बा ले अहाँ नहि ने कहब”। हम विनयपूर्वक प्रार्थना कएलियन्हि। “हमर बाउ...अहाँ ई की कहैत छी...हम अहाँकेँ ई सुझाव अहाँक अपन भलाइ लेल दैत छी”। “ठीक छैक..चलू चली”! हम सभ ओतएसँ बस द्वारा सोझे मस्जिद गेलहुँ। ओ चारमीनार दिस देखलन्हि जे मस्जिदकक मीनारसँ बेशी पैघ रहए। “अम्मी ओ छी चारमीनार। हम पहिने ओतए चली..आकि मस्जिद”? हम पुछलियन्हि। “ओतए चारमीनारमे की अछि हमर बाउ”? “ओतए किछु नहि अछि...कोनो दिशामे देखू एके रंग लागत। मुदा अहाँ ऊपर चढ़ि सकैत छी। ओतएसँ अहाँ मक्का मस्जिद स्पष्ट रूपमे देखि सकैत छी...आब देरी भऽ गेल अछि। हम चारमीनार बादमे देखि सकैत छी...अखन तँ हमरा सभ मस्जिद देखी”। ओ स्वीकृति देलन्हि। मस्जिदक भीतरमे शान्ति रहए। शान्तिक साम्राज्य छल। ई शीतल, सुखकारी आ विस्तृत रहए। आगन्तुकक आबाजाही बेशी रहए। अम्मी भीतर जएबामे संकोच कऽ रहल छलीह कारण स्त्रीगण सामान्यतः मस्जिदमे नहि प्रवेश करैत छथि। मुदा ओ किछु बुरकाधारी स्त्रीगणकेँ ओतए देखि ओम्हर बढ़ि गेलीह। अपन सारीक ओरकेँ माथपर लैत ओ बजलीह, “हमहूँ अपन बुरका आनि लैतहुँ ने”? घरसँ चलैत काल ओ एहि लेल कहने रहथि मुद ई हम रही जे हुनका एकरा पहिरएसँ रोकने रही। अपन ठामपर हुनका लेल एकरा छोड़नाइ सम्भव नहि छलन्हि मुदा हम एहि नव स्थानपर हुनका एहि झंझटसँ मुक्ति देमए चाहैत रही। मुदा अपन सम्प्रदयक स्त्रीगण बीचमे बिना बुरका पहिरने ओ अपनाकेँ बिना चामक अनुभव कऽ रहल छलीह। जखन हम हुनका स्तंभित आ थरथराइत चलैत देखलियन्हि तखन हम हुनका बुरका नहि पहिरए देबाक लेल लज्जित अनुभव कएलहुँ। तैयो अपन रक्षा करैत हम कहलियन्हि, “हम कोना ई बुझितहुँ अम्मी जे हमर सभकेँ मस्जिद घुमबाक ब्योँत लागत”। ओ किछु नहि बजलीह। “एहिसँ कोनो अन्तर नहि पड़ैत अछि...आऊ”। हम बादमे ई कहि हुनका भीतर लऽ गेलहुँ। ओ हमर संग अएलीह। हम सभ अपन चप्पल कातमे रखलहुँ जाहिसँ बादमे ओकरा लेबामे आसानी होए। कतेक गोटे मस्जिदक सीढ़ीयेपर आलती-पालथी मारि कए बैसल रहथि। परबाक संग खेलाइत किछु गोटे ओकरा दाना खुआ रहल रहथि। किछु परबा उड़ि गेल आ किछु आन घुरि कए उतरल। किचु परबा पानिक चभच्चाक कातमे बैसि कऽ एम्हर-ओम्हर ताकि रहल रहए, एकटा आह्लादकारी दृश्य। अम्मी हुनकाँ आश्चर्यित भऽ देखलन्हि। बादमे ओ हमर पाछाँ अएलीह जखन हम सीढ़ीक ऊपर प्लेटफॉर्मपर पहुँचलहुँ। प्लेटफॉर्मकेँ चारू दिस देखैत ओ चिकरि कए बजलीह, “हमर बाउ, एक बेरमे कतेक गोटे एतए बैसि कऽ नमाज पढ़ि सकैत छथि”? “हमरा नहि बुझल अछि अम्मी...कैक हजार हमरा लागए-ए। रमजानक दिनमे लोक चारमीनार धरि बैसि कऽ नमाज पढ़ैत छथि”। हम उत्तर देलियन्हि। “हँ, ई टी.वी. मे देखबैत अछि” अम्मी प्रत्युत्तर देलन्हि। ओ एकरा नीकसँ चीन्हि गेल रहथि, हम अपनामे सोचलहुँ। चारू कात देखाऽ कऽ अन्तिममे हम हुनका मस्जिदक पाछाँ लऽ गेलहुँ। पाथारक फलक चिड़ैक मलसँ मैल भेल रहए। परबा सभ देबालक छिद्रमे खोप बनेने रहए। ओ मीनारक देबालकेँ छूबि आ आँखिसँ श्रद्धापूर्वक सटा कऽ अति प्रसन्न भऽ गेलीह। “एतए नमाज पढ़ब पवित्र गप अछि, हमर बाउ”, ओ कहलन्हि। हम एहि बेर कोनो अति सम्वेदना नहि भेल। “हँ। ठीके, हम एतए कमसँ कम एक बेर नमाज अवश्य पढ़ब”। हम अपनाकेँ कहलहुँ। हम जतए रहैत छी मक्का मस्जिद ओतएसँ बड्ड दूर अछि। जुम्मा आ छुट्टीक दिन बससँ एतए अएनाइ बड्ड दुर्गम अछि। तैयो, अगिला बेर हम एतहि नमाज पढ़बाक प्रण कएलहुँ। “हम अगिला सप्ताह् एतए आबि नमाज पढ़ब अम्मी”, हम कहलियन्हि। ओ प्रफुल्लित अनुभव कएलन्हि आ हमरा दिस आवेशसँ देखलन्हि। “एहि सभ ठाम नमाज पढ़बामे अपनाकेँ धन्य बुझबाक चाही”, ओ कहलन्हि। “अहाँक अब्बा ओतेक दूर रहैत छथि, ओ की नमाज पढ़बाक लेल एतए आबि सकैत छथि? अहाँ अही नगरमे छी..एतए नमाज पढ़ू”, ओ कहलन्हि। “नहि मात्र एतए, जतए कतहु पुरान मस्जिद होए ततए नमाज पढ़ू। कतेक प्रसिद्ध लोक एतए नमाज पढ़ने होएताह। एहि सभ ठाम नमाज पढ़लाक बाद कोनो घुरए केर गप नहि अबैछ। अल्ला अहाँकेँ निकेना रखताह”। हम मस्जिदमे एना ठाढ़ रही जेना जादूक असरि होए। हम हुनकर गप सुनलहुँ, कान पाथि कऽ। बदमे, बाहर निकललाक बाद हम सभ किछु बिसरि गेलहुँ। अपन मस्जिद जएबाक प्रतिज्ञाकेँ सेहो हम कात राखि देलहुँ। ओही संध्यामे हम अम्मीकेँ बस-स्टैण्डपर छोड़लहुँ। तकर बादा दू टा जुम्मा बीतल, मुदा से एना बीतल जेना ओ कोनो जुम्मा नहि छल। आब बम विस्फोटक एहि समाचारक बाद हम जुम्मासँ भयभीत छी। “अम्मी...अहाँकेँ ईहो बुझल अछि जे कोन मस्जिदमे बम फूटल छल”? हम फोनपर पुछलियन्हि। “कोनमे हमर बाउ”? ओ उत्सुक भऽ पुछलन्हि। “अहाँ एक बेर हैदराबाद आएल रही, मोन पाड़ू? हम नञि अहाँकेँ एकटा मस्जिदमे लऽ गेल रही...मक्का मस्जिद...पैघ सन? ओतहि, ओही मस्जिदमे...खुनाहनि ओही मस्जिदमे अम्मी...खसैत लहाश.. अहाँ कहने रही जे कियो जे ओतए नमाज पढ़त, धन्य होएत...ओही मस्जिदमे अम्मी”। हम कहलियन्हि। “छोट बच्चा सभ...ओकर सभक देह खोनमे लेपटाएल...परबा सभ सेहो मरल...”। नोर अनियन्त्रित दुखमे बहए लागल। हम बाथरूम लग नोर पोछबाक लेल गेलहुँ। हुनक हृदय हमर काननि देख फाटए लगलन्हि। ओ सेहो कानए लगलीह। हम आगाँ कहलहुँ, “अम्मी, नहि कानू...अब्बाकेँ होएतन्हि जे हमरा किछु भऽ गेल अछि...हुनका कहियन्हि जे हम नीकेना छी”। कनैत ओ हमरा पुछलन्हि, “फोन नहि राखब हमर बाउ”। “जल्दी अम्मी, कहू”। “अहाँ चलि आउ...गाम चलि आउ...हमर गप सुनू”। “हमरा किछु नहि भेल अछि अम्मी”। “बाहर नहि जाएब..हमर बाउ”। “ठीक छैक अम्मी”। “ओहि मस्जिदमे नहि जाएब, हमर बाउ”। हमर हृदय फटबा लेल फेर तैयार अछि। हम हुनका ई आश्वासन दैत जे ओहि मस्जिदक लगो कोनोठाम हम नहि जाएब, फोन रखलहुँ। मुदा विचारक आगम बढ़ैत रहल। कतेक विभिन्नता! कतेक परिवर्तन काल्हिसँ! ई हमर अम्मी छथि जे एना बाजि रहल छथि? ई ओ छथि जे हमरा ई बाजि रहल छथि जे मस्जिदक लगो कोनोठाम नहि जाऊ? अल्ला कोनो आन भऽ गेल छथि अपन बच्चाक प्रेमक आगाँ? अपन खूनक आगाँ अल्ला अस्वादु भऽ गेलथि? नमाज विरोधक योग्य भऽ गेल? अल्ला माफी दिअ! क्षमा करू! आन जुम्माकेँ कोनो खुनाहनि नहि हो..औज बिल्लाही..मिनाशैतान...निर्राजीम..बिस्मिल्लाह इर्रहमा निर्रहीम...! (ओहि सभ अम्मीजानकेँ समर्पित जिनका मक्का मस्जिदक बाद अपनाकेँ हमर अम्मी जकाँ परिवर्तित होमए पड़लन्हि...लेखक) डॉ. प्रभा खेतान- छिन्नमस्ता (हिन्दी उपन्यास) डॉ. प्रभा खेतान- छिन्नमस्ता (हिन्दी उपन्यास); हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद सुशीला झा डॉ. प्रभा खेतान (१ नवंबर १९४२- २० सितंबर, २००८) प्रभा खेतान फाउन्डेशनक संस्थापक अध्यक्षा, नारी विषयक कार्यमे सक्रिय, फिगरेट नाम्ना महिला स्वास्थ्य केन्द्रक स्थापक, १९६६- १९७६ धरि चमड़ा आ रेडीमेड वस्त्रक निर्यातक कंपनी 'न्यू होराइजन लिमिटेड' क प्रबंध निदेशका, हिन्दीक प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवि आ नारीवादी चिंतक। कोलकाता विश्वविद्यालयसँ दर्शन शास्त्रमे स्नातकोत्तर उपाधि, "ज्यां पॉल सार्त्रक अस्तित्त्ववाद" पर पी.एच.डी.। हिनकर आठटा उपन्यास- आओ पेपे घर चले, तालाबंदी(१९९१), अग्निसंभवा(१९९२), एडस, छिन्नमस्ता (१९९३), अपने -अपने चहरे(१९९४), पीली आंधी(१९९६) आ स्त्री पक्ष (१९९९) आ दूटा लघु उपन्यास “शब्दों का मसीहा सार्त्र” आ “बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ” प्रकाशित छन्हि। फ्रांसीसी लेखक सिमोन द बोउवाक पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ क हिन्दी अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ आ आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ सेहो प्रकाशित। डॉ. प्रभा खेतान श्रीमति सुशीला झाकेँ अपन उपन्यास “छिन्नमस्ता”क मैथिली अनुवादक अधिकार देने छलीह जे सुशीला झा पूर्ण केलन्हि। विदेह अपन ७७ म अंक(१ मार्च २०११) जे नारी विशेषांक सेहो अछि, मे एकरा ई-प्रकाशित कऽ गौरान्वित अछि। ई उपन्यास ओड़ियामे सेहो अनूदित भेल अछि। छिन्नमस्ता- हिन्दी उपन्यास- डॉ. प्रभा खेतान ; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद सुशीला झा छिन्नमस्ता ‘प्लेन मे बैसल बैसल डॉर अकड़ि गेल, माथक दर्द सँ मन व्याकुल लगै’छ। वड्ड गलती कयलहुँ। एतेक दूरीक फ्लाइट नहिलेबऽ चाही।’ प्रिया दूनू हाथे माथ दबैत सोचलनि। बगल मे बैसल व्यक्ति शायद पूर्वी यूरोपियन वा हंगेरियन-हेतै’ हंगेरियन गोलाश सूप’क गंध महसूस होइछ। हूँ, किछु लोक कतहु कतेक आराम सँ सुति रहै’छ मुँह खोलि केहन ढररऽ पड़ि रहल अछि। एहि खर्राटाक घर-घर सॅ आयल निन्नो उचटि गेल। हमहूँ कखनौकऽ भसिया जाइत छी नहितऽ अइ एयरलाइन सँ नहि अबितहुँ। आब ई विमान बेलग्रेड मे उतरतै’। फेर घंटा डेढ़ घंटाक ट्रांजिट .......... तकरबाद सोझे कलकत्ता। सोझे- कलकत्ता पहुँचैइ ए मे मजा छै...... नहितऽ भरि दिन दिल्ली या बम्बई मे बर्बाद करू। नहिजानि कियेक हमरे देश मे अधरतिया मे लगभग बारह बजे से दू अढ़ाई के बीच सब फ्लाइट्स उतरै’छ। अइ अधरतिया मे या तऽ एयरपोर्ट पर बैसू या एयरपोर्टक होटल मे चारि-पाँच घंटाक लेल पन्द्रह सौ टाका फेकू। एक्सपोर्टक काज मे एतेक रईसी असंभव। ओहूना दिनोदिन यात्रा महंगे भेल जाइछ। ....... कोनो मित्रा केँ अधरतिया मे जगायब प्रिया केँ नीक नहिलगैत- छैन्हि, मुदा मोन बड्ड खराब बुझाइत छैन्हि। जी हौड़ैंत छैन्हि होइत छैन्हि अब रद्द भऽ जाएत। प्रिया एयरहोस्टेसक बत्ती जरौलनि मोने मोन बजलीह- ‘एहि यात्राक कहियो अन्त’ हेतै?’’ .......... ‘यस मैडम।’ विहुँसैत एयरहोस्टेस बजलीह। .......... ‘‘क्या आप मुझे कोका कोला दे सकती हैं?’’ ‘जरूर’ हदमद मोन मे कोका कोलाक स्वादो अजीब लगलैन्हि। बुझाइछ कलकत्ता पहुँचलापर दू दिन धरि बिछाओन पर पड़ले रहब। दू बेर डिस्प्रिन खेलैन्हि तइओ मथबथ्थी कम नहिभैलेनिह । विमान ध्ीरे-ध्ीरे नीचाँ उतरि रहल छल। प्रियाक ऑखि खिड़की सॅ बाहर भोरका इजोत मे बेलग्रेडक विमानपत्तन पर गड़ल छलैन्हि। पश्चिमी यूरोप टपिते गरीबीक झलक भेँटऽ लगै’छ बरू बीच मे दुबई आ कुवैतक एयरपोर्ट भनहिं चमकैत देखाइछ। न्यूयार्क, लन्दन या- फ्रैंैकफर्ट क एयरपोर्टक मुकाबला तऽ नहिएँ कऽ सकै’छ। ......... ‘ट्रांजिट के पैसेंजर- पहले उतर जाएँ, अपना-अपना समान प्लेन में ही छोड़ सकते हैं। हां, पासपोर्ट लेना न भूलें।’ एयरहोस्टेसक अवाज छलै। प्रिया अपना हाथ मे अटैची उठौलनि। ट्रांजिट मे घंटा भरि समय लगतै। भऽ सकै’छ हाथ मुँह धेला सॅ मन हल्लुक होमए। नहिजानि कियेक दिनोदिन स्वास्थ्य खसल जा रहल अछि? ट्रांजिट लाउंच मे बामा दिस जयबाक छलनि। एकबेर पैर लड़खड़ा- गेलैन्हि। फेर हिम्मत कऽ साँस धऽ देवारक सहारा लऽ पीठ ओंगठा कऽ ढाढ़ि भलीह। दू डेग बढ़लैन्हि कि चक्कर आबि गेलैन्हि। जाबत किछु सोच विचार करितथि तइँस पहिने आँखिक आगू अन्हार पसरि गेलैन्हि ठामहि अचेत भऽ खसि पड़लीह। होश भेला पर ऑखि पफोलिचारूभर देखलनि हम कतऽ छी? तखनहिं अंग्रेजी मे युगोस्लावियन डाक्टर पूछलकैन्हि- ‘आब मोन केहन अछि?’ प्रिया उतारा देबऽ चाहैत छलथिन मुदा से असंभव बुझना गेलैन्हि अगल-बगल कर देवार ऊपर नीचाँ होइत बुझेलैन्हि। लगलैन्हि जेना पफेरू ऑखिकऽ आगू अन्हार पसरि गेल होए, बेहोश भऽ गेलीह। डाक्टर एयरपोर्ट स्टाफ सॅ कहलथिन-इमरजैंसी। एंबुलेंस एलै आधा घंटा मे अस्पताल पहुँचलीह। अइबेर होश होइते देखलनि उजर देवार, उजर पोशाक पहिरने नर्स अस्पताल मे छी से बुझि गेलीह। हाथ अँकरल सन बुझेलैन्हि सोझ करऽ चाहलैन्हि। तखनहिं स्नेह सँ नर्स कहलकैन्हि- ‘अहाँ बेलग्रेडक सरकारी अस्पताल मे छी। हाथ के एहिना रहऽ दिऔ ग्लूकोज चढ़ाओल जाइछ।’ -‘हमरा की भेल अछि?’ ‘चिन्ता जुनि करू। एखनहिं डाक्टर अबैत छथि बता देता।’ ‘हम अपना घर कलकत्ता संवाद पठाबऽ चाहैत छी।’ ‘मैडम, अहंाक पासपोर्ट देखि ओतऽ पफोन कयल गेल अछि।’ - ओह, ओइमेतऽ हमर सासुर क पता छला की अहाँ हमरा एहि नम्बर पर पफोन करबा सकैत छी?’ प्रिया एतबा कहि’ हालैंऽ मे रहनिहार मित्रा पिफलिपक’ नम्बर देलथिन। - पिफलिप मात्रा सात घंटा मे बेलग्रेड पहुँचलाह। पिफलिप के देखिते प्रियाक सूखल ठोर पर खुशी क हँसी छिहुलल। लग आबि प्रियाक माथ चुमैत पिफलिप- बजलाह-‘प्रिया आब चिन्ताक कोनो बात नहि हम डाक्टर से बतिएलहुँ कहलनि आब एकदम स्वस्थ छथि। आब हम आबि गेलहुँ सब ठीक भऽ जेतै।’ ‘पिफलिप! ध्न्यवाद। मुदा हम बुझि ने पबैत छी-हमरा की भेल अछि?’ - ‘अहाँ के किछु नहिभेल अछि... मात्रा काजक ठेही। अहाँ केँ आराम चाही। शियर एक्जॉशन। प्रिया अहॉ काजक पाछू अपना शरीर पर कनिको ध्याने नहिदैत छी। क्षमता से वेशी खटैत रहैत छी तै इ हाल भेल।’ - ‘पिफलिप, साफ-साफ कहू कहीं हार्टक प्राब्लम तऽ नहि ............?’ - ‘नहि, नहिजैट लैग मे .......;हवाई यात्रा मे बैसल बैसल पैर अॅकड़ि जायब स्वभाविकेद्ध दोसर गप्प ई जे बिना किछु खयने-पीने हवा मे उड़ैत रहने कतेक बेर तऽ ‘वैसो बैगल एटैक’ भऽ जाइत छैक। सच-सच कहू अहाँ खाना खयने छलहुँ कखन? - ‘शिकागो मे।’ ‘मतलब, दू दिन भऽ गेल भोजन कयला आ प्लेन मे अहाँ कोका कोलाक अलावा आर किछु पीने नहिहेवै’। हम अहाँ के खूब नीक जकाँ चिन्हऽ गेलहुँ अछि। पन्द्रह वर्ष सँ देख रहल छी’ काजक पाछू अहाँ पागल भऽ गेलहुँ अछि।’ - ‘पिफलिप! प्लीज।’ ‘नहिप्रिया! अहि प्लीजक असर हमरा पर नहिहोएत। एखन मोन होइछ अहाँ के खूब कसिकऽ क्लास ली जेना इलोना केँ क्लास लैत छिऐन्हि कोनो गलती कयला पर।’ ‘इलोना नीकेँ छथि ने? हुनकर पढ़ाई केहन चलि रहल छैन्हि? आ जूडीक कुशल क्षेम कहू।’ ‘जुडी नीकेँ छथि अहाँक समाचार सुनिचिन्तित भऽ गेलीह। इलोना स्वस्थ छथि नीक जकॉ पढ़ाई चलि रहल छैन्हि।’ -पिफलिप! अहाँ नीना सँ गप्प कऽ लेब कहि देबैन्हि एतुका समाचार ठीक छैक। अन्यथा ओ हड़बड़ा कऽ एतऽ आब जेतीह।’ ‘अहाँ चिन्ता जुनि करू। एहि सभक जिम्मा हम जुडी केँ दऽ आयल छी- भऽ सकै’छ ओ आइ सांझि मे अहाँ से बात करतीह। अहॉक खबरि सुनि हम सभ स्तब्ध् भऽ गेल छलहुँ ओ हमरा संगहि आबऽ चाहैत छलीह। कहुना हुनका कहि सुनि हम अयलहुँ।’ पिफलिप पफेरू सांझि मे अस्पताल औता। हम कतबो सुतऽके प्रयास करैत छी मुदा निन्न नहिहोइत अछि मोन बोझिल लगै’छ। नर्स एकटा दबाई ढेलक आ हॉट चाकलेट। एखन माथ पर कतबो जोर दैत छी तइओ किछु सोचि नहिपबैत छी। लगै’छ जेना मानसाकाश मे छोट-छोट बादलक टुकड़ा हिलकोर मारि रहल अछि। -सत्ते इम्हर किछु दिन सँ हम काजक पाछु तेइन अपस्यॉत रहलहुँ अछि जे ने दिन केँ दिन बुझलिऐ ने रातिकेँ राति। ई शिकागोक प्रदर्शनी लेल तऽ करीब पन्द्रह दिन सॅ राति मे तीने चारि घंटा सूतैत हएब से निश्चिन्त भऽ नहि। नीना कहैत छलीह-भौजी एतऽ कनि’ आराम कऽ लिअ ओतऽ शिकागो मे तऽ एको पल पलखति नहिभेँटत देह कोना ठाढ़ रहत!’ तखन हम कहैत छलिए- ‘नहिनीना एखन आराम करबाक बेर नहिछै एहन मौका फेर भेँटत की नहि। स्पिलवर्ग स्वयं-स्टाल लगयबाक आफर देलक अछि।’ -नीना तीसवर्षक भऽ गेलीह मुदा एखनहुँ विवाह नहिकऽ रहल छथि आब विवाह कऽ लेबऽ चाही। ओना हमर ओ दहिन हाथ छथि सबसॅ वेशी हुनके सहारा अछि हमरा। इएह सभ गुन-ध्ुन करैत छलीह ध्ीरे-ध्ीरे ऑखि मुना गैलेन्हि। ख्ूाब गहीर निन्न मे सूतल छलीह। भोर मे निन्न टूटलैन्हि तऽ सामने टँगल कैलेंडर पर नजरि पड़लैन्हि आइ अट्ठाईस अप्रैल भऽ गेलै। गुड मार्निंग कहैत नर्स चौकठी टपलीह। - ‘‘की हम बहुत अबेर धरि सूतलि रहलहुँ?’’ - ‘‘हां, आह अहाँ खूब सुतलहुँ। एखन अहाँ पहिने नास्ता करब की स्नान?’’ - ‘स्नान कऽ ली तऽ नीके लागत।’ - ‘वेश, चलु। अहाँ केँ कमजोरि तऽ नहिबुझा रहल अछि?’ - ‘नहि, एकदम नहि।’ ‘वाह!’ नर्स प्रियाकेँ पलंग सॅ उतारलनि, सुसुम पानि सॅ नहा कऽ प्रिया के ताजगी महससू भेलैन्हि। नास्ता मे गरम-गरम क्रोशा, मक्खन, जैम आ दूध् संतराक रस पीलनि ब्लैक कापफी पीलनि। पश्चिमक प्रत्येक होटल मे ऐहि तरहक नास्ता करबाक आदत भऽ गेलैन्हिए। नास्ता क तृप्त भऽ सोचऽ लगलीह प्रिया चमड़ाक ई व्यवसाय शुरू कयल कतेक वर्ष बीत गेल! आ कहिया सॅ एहन यायावरी जिन्दगी जीवि रहल छी!! हम एहन एक्सपोर्टक काज शुरू हे कियेक कयलहुँ? देश-विदेश हरदम यात्रा मे समय बीतैत अछि। कोन दुःख दर्द बिसरऽ लेल ई यात्रा शुरू कयलहुँ? आ सुख? सुख कहिया भेँटल?? मोन ने पड़ै’छ कोनो सुखक क्षण। मुदा आई मोन मे स्नेहभावक उदवेग ककरा लेल एहन कोनो खास व्यक्ति ने मोन पड़ैछ ने रिश्ता-नाता। हँ, छोटकी माँ आ नीनाक प्रति स्नेह स्वभाविक बुझना जाइछ। स्नेहक पात्रा अछि हमर स्टाफ जे राति-दिन हमरा संग खटैत रहै’छ। अबैत काल संग-संग आबि माल जहाज पर चढ़बैत अछि। जँ से सभ बिमारीक समाचार सुनता तऽ बहुत चिन्तित हेताह। -किछु आर आत्मीय व्यक्ति छथि हुनको खबरि भेँटले हेतैन्हि। छोटकी मां क स्वभाव तऽ बुझले अछि परम्पराकेँ निमाहऽ वाली ओ नरेन्द्र के पफोन द्वारा अवश्य सूचित कयने हेथिन। एतके नहिओ संजु आ निध् िके पठयबाक लेल आग्रहो कयने हेथिन पफेरू मनाहि सुनि ठाकुर कड़ी मे बैसि कनने होएतीह। एतहु विदेश भूमि मे हमर किछु आत्मीय बन्ध्ु छथि जाहि मे सबसे वेशी निकटा अछि पिफलिप उठा जुडी सँ। अस्पताल मे आइ दोसर दिन बीता रहल छी। मोन पड़ै’छ अपन आन्तरिक संवेदनाक स्मृति स्मृतिक ओ क्षण जकरा हम विस्मृतिक खोह मे धकेल देने छलिऐ आई सेह क्षण बरे-बरे स्मृतिक पटल पर झलकै’छ एतबा दिन हम बिसरने छलहुँ चाहैत छलहुँ सभ दिन बिसराएले रहए जेना अनजान शहर क भीड़ मे कतेक अजनबी चेहरा लोक देखै’छ संगहि चलै’छ पैदल वा कोनो सवारी मे मुदा फेर ओ स्मरण कहाँ रहैत छैक। यात्रा क बाद सब अपन-अपन ठेकान दिस बढ़ै’छ ककरो मुँह कान मोनो ने पड़ैत छै। अन्हार गुज-गुज सुरंग मे ध्ड़ध्ड़ाइत टयूब रेल मे अगल-बगल बैसल यात्राी एक दोसरा से असंपृक्त रहै’छ होइत जे तहिना हमर स्मृति दिन-राति दर्दक सुरंग मे हकमैत दौड़ैत रहत मुदा ओ कहियो-सुरंग सॅ बाहर आबि हुलकियो ने मारत। कखनहुँ नहि। -तखन आइ एना कियेक भऽ रहल अछि। एक बेर एक संग नहि बेरा-बेरी टुकड़ा-टुकड़ा मे ऑखिक आगू पसरि जाइछ। रूम मे दवाईक गंध्, पिफलिपके आनल टयूलिपक गमक संग मिझरा कऽ एकटा अजीब गंध्...... उज्जर दप-दप देवार स्वच्छ फर्स आ रंग-बिरंगक-ट्यूलिप। कहने छलाह पिफलिप- अइ मौसमक ई पहिल ट्यूलिप छै। यूरोप मे एखन- पूर्णरूपेण बर्फ पिघललै अछि नहि, तैँ अप्रैलोमासक ट्यूलिप के रंग हल्लुक छैक- दूध्यिा गुलाबी, पीअर आ नव रंग-रूप लेबऽ लेवन आतुर उज्श्र........हरियर पात। हम बहुत कष्ट झेलने छी। शोषण, उत्पीड़नकेर पीड़ा आ त्रासदी मे झुलसी एक-एक क्षण व्यतीत कयलहुँ अछि। जाहि दिन एहि त्रासदीकेँ अपन जिनगीक शर्त बुझलिऐ ताहि दिन सॅ आत्मस्वीकृतिक संग बेकार बेमतलबक विरोध् से जूझब छोड़ि देलहुँ। किछु विशेष अर्थ मे एकरा हमर समर्पण बूझल गेल। समस्त शोषण उत्पीड़न क सोझा अपना के सलीब पर टँगल रहबाक अनुभूति भेल। मुदा एहि एकटा फायदा भेल आब हम अपना के जिनगीक समस्त चुनौतिक सामना करबा लेल तैयार छलहुँ। पूर्व स्मृति नहुँए सँ कान्ह-छुबै’छ कि सोझा मे हमर हम सम्पूर्ण रूप मे ठाढ़ होइछ एकदम शान्त निर्विकार। पहिलुका संस्मरण वापस चलि जाउछ। -‘ओइ दिन नरेन्द्र हमरा सोझा मे टका सँ भरल ब्रीफकेश खोलिकऽ उझलैत चिचिआयल छलाह लिअ, अहाँके कतेक टका चाही?’ लाख, दस लाख, करोड़? टका, टका, टका राति-दिन टकाक पाछू अपस्याँत रहैत छी? बाजू, बाजु ने कतेक टका चाही लऽ लिअऽ।’ आ फेर क्रो( से तमतमाइत दस-दस हजारक गडóी उठाकऽ हमरा देह पर पफेकऽ लगलाह। हम नीचाँ मे बैसल अपना बक्सा पैक करैत छलहुँ। डायरी मे लिखल समानक मिलबैत छलहुँ- कोट, कार्डिगन, नाइटी, ब्रा, पैंटी, शर्ट्स, पैंट, सलवार-समीज, साड़ी ब्लाउज...............की दू टा साड़ी सँ निमही जाएत। दवाई लऽली एहि बीच नरेनद्र तुफान उठौलनि। नहिरहि भेल हुनका दिस तकैत बजलहुँ- नरेन्द्र। ई व्यवसाय हम टका अर्जित करबा लेल नहिकऽ रहल छी। ई हमर आइडेंटिटी अछि। हँ, चारि साल पहिने जहिया काज शुरू कयने छलहुँ तहिया भनहिं टका क जरूरत छल। आइ टका सॅ वेशी एकर महत्व छैक जे ऐहि देश सॅ विदेशक उड़ान हमरा जिनगीक कैनवास के बहुत पैघ बनबै’छ। नित नव व्यक्ति सॅ परिचय जान-पहिचान जीवन शैलीकेँ बूझऽ सूझऽ क अवसर दै’छ। -‘सोझ बात बाजु ने जे ऐहि व्यवसायक लाथे एसगर मौज मस्ती करबा मे नीक लगै’छ। -‘नरेन्द्र! अहाँ की बाजि रहल छी?’ -‘हम बिल्कुल सही कहि रहल छी। अहाँ विदेश मे की करैत छी से हम-देखऽ जाइत छी? देखू, हमरा दिस देखू मोन पाडन्ऩ् जहिया ई व्यवसाय शुरू कयने छलहु तहिये हम चेता’ देने छलँहु’ - काज करू मुदा ई नहिबिसरब जे अहाँ विवाहिता छी, एकटा बच््याक मां छी, अग्रवाल हाउसक पुतौहु छी।’ -‘नरेन्द्र, बिना बात क दोष नहिदिअ ककरो पर इल्जाम बिनु बुझने नहिलगाबी। एहन शक होइछ तऽ संगे चलू देखू हम ओत की करैत छी।’ - वाह! हम अहाँक संगे चलू! अहाँके पाछू-पाछू सैंपलक बक्सा उठौने? ध्न्य छी श्रीमती जी! अपन पतिक केहन दिव्य खाका-घिंचलहुँ अछि? हम आब चुप्पे रहनाई-नीक बुझि अपन फाईल उनटेलहुँ। जँ कोनो कागज छुटि जाएत तऽ ओतऽ प्रर्दशनी मे आफत भऽ जाएत। एखन धरि-श्यामल कॉस्टिंग पेपर्स नहिपठौलक। सांझुक पाँच बाजि रहल छै सैंपलो पूरा नहिआयल अछि। एयर इंडियाक बारह बजेक-फ्लाइट अछि। ई फ्लाइट सोझे लंदन- पहुँचतै। हम कनखि सॅ नरेन्द्र दिस तकलहुँ चेहरा घृणा सँ विकृत बुझना गेल। हे भगवान! ई फेर ने कोनो उत्पात मचाबए एक तऽ ओहिना यात्राक समय खासकऽ व्यापारिक यात्राकाल तनाव से माथ फटैत रहै’छ। -बेर पर कखनौ कोनो वस्तु नहिभेँटतै अछि तऽ कखनहुँ कोनो आवश्यक कागजात। जकर डर छल सेह भेल-पफेरू चिचिएनाइ शुरू भेल- ‘दरअसल हमरे गलती अछि एतेक छूट देबहि ने चाही। उड़ऽ सॅ पहिने पॉखि कतरि देबऽ चाहैत छला केना अहाँक बात मे आबि गेलहुँ। चेहरा देखि क्यो बुझियो ने सकै’छ जे अहाँ केहन मक्कार औरत छी।’ -आहत मन सॅ बजलहुँ-‘आबहु चुप्प होउ!’ ‘नहिहम चुप्प नहिरहब। पहिने तऽ अहाँ कहैत छलहुँ मोन नहिलगैत अछि घर मे गुमसुम बैसल रहने। तऽ मोन बहटारऽ लेल ई काज शुरू कयलहुँ। आ आब काजक अलावा आर कोनो बातक होशे नहिअछि? एकदिन-कानि- कानि कऽ अहीं कहने छलहुँ’ - ‘नरेन्द्र! हमरा मे आत्मविश्वासक कमी अछिं! कोनो मन लग्गू काज- करब तखने तनांव कम होएत आ स्वस्थ होएब।’ - ‘तऽ की आब हम स्वस्थ नहिछी? पहिने सॅ वेशी संतुलित, आत्मविश्वास नहिबुझाइत अछि?’ ‘‘संतुलन आ अहाँ? अहाँ तऽ सदैव ‘वन टैªक माइंड’ छी। पागल जकां जे करब ताहि मे अपस्यॉत रहब। भोरे आठ बजे-घर से बहराइत छी आ राति मे आठ बजे घरि घुरिकऽ आबि तऽ भाग्य सराहि।’’ - हम कतहु चलऽ कहब तऽ हम थाकल छी माथ मे दर्द होइत अछि, मुदा क्यो अहाँक व्यापारी आबि जाय तऽ ओकरा संगे बारह- बजे राति घरि बाहर रहब। तखन ने माथ मे दर्द होएत ने थकनी, खूब चहकैत-रहब।’ ‘नरेन्द्र! अहाँ जनैत छी- हम काज सॅ बाहर जाइत छी मुँह लटका कऽ बैसने हमर काज नहिभऽ सकै’छ। हम कतहु ककरा संग नेह-छोह लेल नहिजाइत छी।’ - ‘इएह तऽ हम जानऽ चाहैत छी- जे दिनो-दिन अहाँ मशीन कियेक बनल जा रहल छी? अहाँक व्यत्तिफत्व मे कनिको रस बुझाइते ने अछि केहन निरस भऽ गेलहुँ। कनि देह पर हाथ रखैत छी तऽ छिहुलिकऽ हटि जाइत छी जेना बिजलीक करेंट छूबि गेल होइ। एकदम फ्रैंिजिड........... होपलेस। अहीं कहने छलहुँ हम हरदम घरे मे बैसल रहब तऽ पागल भऽ जाएब।’ - हँ, हम कहने छलहुँ तऽ? - तऽ इएह जे आब की भेल? कतऽ गेल अहाँक शर्त? - नरेन्द्र! केहन शर्त! आ के चलै’छ शर्त पर? अहाँ चलैत छी शर्त पर? दुनियाँ मे सब अपन सुविधनुसार शर्त केँ तोड़ि-मरोड़ कऽ चलै’छ।’ - ‘यानि आपसी ईमानदारी, स्नेह-समर्पण........... सभटा पफुसी।’ - ‘नरेन्द्र! इ सभ शब्दक भ्रमजाल छैक! औरत केँ इसभ पाठ एहि पढ़ाओल जाइत छै जे ओ एहि शब्दक चक्र- ब्यूह से बहराई नहि। अन्यथा युग-युग से आहुति देबाक जे परम्परा छै से चालु कोना रहैत? - ‘हमरा अहाँक पिफलॉसपफी ने सुनबाक रूचि अछि ने बहस करबाक। हँ, एकटा बात अहाँ सुनि लिअजँ आइ राति-अहाँ लन्दन जायब तऽ घुरिक अइ-घर मे नहिआबि सकैत छी । कथमपि नहि।’ - ‘ठीक छै।’ हम यथासाध्य अपना केँ संयत रखलहुँ। ऑखिक नोर ऑखिये मे सुखा गेल। एखन यात्राक बेर मे हुनका से उलझब ठीक नहि। ओहिना ततेक तनाव अछि, बीच मे इ बखेड़ा। बिना मतलब के बकझक! गलती हमरे अछि। सोचने छलहुँ शनि के चंलला से कम से कम एक दिन रवि केँ लन्दन मे आराम कऽ लेब, फेर ओतऽ से शिकागो- चलि जायब। मुदा इ नहिसोचने छलहुँ जे बक्सा पैक देखि नरेन्द्र एतेक - उत्पात मचौता। मोने-मोन इएह सभ गुनध्ुन करैत छलहुँ कि पफेरू नरेन्द्र दहाड़ऽ लगलाह- ‘सुनू प्रिया! हम सीरियस छी... आइ मीन इट..... अहाँ आब अइ घर मे घुरि कऽ नहिआबि सकै छी।’ - ‘हम हँसैत पूछलिऐन्हि - की ई घर-मात्रा अहिंक अछि?’ सोचने छलहुँ एना बजने वातावरण किछु हल्लुक होएत। ओ वातावरण के हल्लुक कियेक होमऽ देताह। विषाह लोक वातावरण केँ विषात्तफ बनाओत ने। क्रो( सँ बजलाह-‘हँ, हँ कानि खोलि कऽ सुनि लिअ ई घर हमर अछिआ कानूनक नजरि मे बेटाक कस्टडी बापे के भेँटैत छैक तैँ सँजु हमरे लग रहत।’ - ‘नरेन्द्र ! अहाँ के की भऽ गेल अछि? की आलतु-फालतु बात लऽ कऽ बैस गेलहुँ क्यो बाहर सॅ सुनत तऽ की कहत?’ - ‘जकरा जे बुझबाक होइ बुझए। हम अहाँक तलाक देबऽ चाहैत छी।’ ‘राक्षस!’ एकाएक मुँह से उएह शब्द- बहराएल। ‘हँ, हम तऽ राक्षस छी आ अहाँ? अहाँ की देवी छी ! शैतान क जड़ि छी, ओहिना एतेक व्यापार पसरि गेल?’ आइ हेट यू ..... आइ रियली हेट यू।’ - ‘नरेन्द्र! व्यापार पसरल मेहनत आ ईमानदारी सँ ध्ूर्तै सॅ नहि! आ ने इ हमरा विरासत मे भेँटल अछि।’ - ‘ओह! तऽ विरासत कहि कऽ अहाँ हमरा पर व्यंग्य करैत छी। प्रिया ई जुनि बिसरू हम पुरूष छी-अई घरक मालिक! - ‘अइ घर मे हमर मर्जी चलत सिर्फ हमर।’ - ‘से तऽ हम देखिए रहल छी। अहिंक मर्जी चलै’ छ। आ हम अहाँक कोनो सुख मे बिघ्नो नहिदैत छी। चुपचाप अपन काज कऽ रहल छी।’ - इ काजतऽ बहाना अछि पाई कमएबाक भूत सवार भेल अछि। असल मे अहाँ आत्ममुग्ध् महिला छी। अपने रूप के सजबैत रहऽ चाहैत छी। अहाँक महत्वाकांक्षा दिन दुगुना राति चौगुना बढ़िते जा रहल अछि।’ - की महत्वाकांक्षी भेनाई अपराध् छैक? की अहाँ टकाक पाछु अपस्यॉत नहिरहैत छी? शेयर के भाव बुझऽ लेल दिन-राति पफोन कान सँ सटेनहि रहैत छी। एतऽ सॅ लेलहुँ ओतऽ बेचलहुँ। तऽ अहाँक हमर कमाइ सँ जलन कियेक होइछ? अहाँ तऽ साल मे करोड़ो कमाइत छी हमरा तऽ मुश्किल सँ पाँच सँ सात लाख होइछ! की अहाँ ‘पिफकड्ढी’ क प्रेसीडेंट होमऽ नहिचाहैत छी? सभा-सोसायटी मे मंच पर बैसकऽ मे हार पहिरनाई नीक नहिलगै’ छ? - ‘ओह! तऽ अहाँके’ हमरा सँ जलन होइछ? तैँ सजि-ध्जि कऽ इंडिया टू डे मे पफोटो छपबेलहुँ? ए ग्रेट बिजनेस इंटरप्राइजर मिसेज प्रिया-अग्रवाल।’ ‘नरेन्द्र! सत्ते एखन अहाँक मूड खराब अछि।’ - ‘मूड’ क बहाना छोडू़ । हम फेर सिरियस भऽ कहैत छी, जँ आई अहाँ लंदन जायब तऽ अइ घर में घुरि कऽ नहिआबि सकैत छी। - दुर इहो कोनो जिनगी भैले जखन देखू तखन बस बिजनेस। आइ कस्टमर आबि रहल अछि तऽ काल्हि सैम्पल बनबाबऽ मे पफैक्ट्री मे आध राति बीत जाइछ। राति मे मिनट-मिनट पर पफोनक घंटी बजैत रहै’ छ। घर ने भेल पागलखाना भऽ गेल।’ - ‘अहाँ केँ दिक्कत नहिहोमय तैँ तऽ हम अलग कमरा मे रहैत छी। पापा क देहांतक बाद तऽ .......।’ - ‘बाजू, बाजू ने चुप्प कियेक भऽ गेलहुँ? अहाँ इउह ने कहऽ चाहैत छी जे आबतऽ हम लड़की सभ केँ घरो लऽ अबैत छी?’ - ‘सब बुझिते छी। शान्त होउ। हम लंदन-अवश्य जायब।’ - ‘तऽ अहॉ जयबे करब ........ अहाँके एतेक हिम्मत?’ - हुनका ऑखिक लाली हिंसाक संकेत दऽ रहल छल करेज कॉपऽ लागल। पफेरू चिचिएलाह - ‘अंतिम बेर कहैत छी सुनि लिअ घुरि कऽ एत नहिआयब। गेटे पर से ध्क्का दऽ बाहर कऽ देब।’ बाहर हाल मे सोफा पर माथ पकड़ने सासु बैसल छलीह- पाथरक मूरूत जकाँ। ऑखि से दहो-बहो नारे झहरैत छलैन्हि। घरक केवाड़ लग ठाढ़ भेल सँजू सभटा बात सुनैत छंल। पैर पटकैत नरेन्द्र घर सँ बहरेलाह। पलंग पर खुजल ब्रीफकेश ओहिना ध्एल छल सभटा टका छिड़ियाल छलै। सँजु हमरा भरि पाँज पकड़ि कानऽ लागल। - ‘मां।’ ‘हँ, बौआ बाजू की ?’ - ‘मां की अहाँ केँ लंदन’ जाएब बहुत जरूरी अछि?’ - ‘हँ, बेटा काज समये पर करऽ पड़ैत छै।’ - ‘मुदा इ पापा के पसंद नहिछैन्हि। आ, मां..... अपना सभके पाइक अभाबो तऽ नहिअछि।’ - ‘बेटा हमरा तऽ टका क जरूरत अछि।’ मोने-मोन सोचलहुँ - एतेक समझौता कयलाक बाद ई हाल अछि पतिदेवक। संजु हमरा गरदनि मे बॉहि ध्ऽ जोर सँ कानऽ लागल। हम अपना केँ कहुना जप्तकऽ कोमल स्वर मे कहलिऐ - ‘बौआ, चुप्प भऽ जाउ। जिनगरिक बाट आसान नहिछैक।’ हाथ मे ताजा ट्यूलिपक गुच्छा नेने पिफलिप के देखलिएन्हि। लग आबि-नहुँए सॅ माथ पर हाथ रखैत पूछलैन्हि - - ‘आब केहन मोन अछि प्रिया?’ - ‘तरोताजा।’ - ‘की अई फूल जकाँ?’ दूनू गोटे भभाक हँसलहुँ। ‘जूडी अहाँ के याद करैत छलीह । हम अहाँक रहबा लेल डूयब्रवनिक मे होटल बुक करा देलहुँ अछि। एखन कम से कम दस दिन आरामक जरूरत अछि। सेतीस्टेफा मे पैघहस्ती छुटीð बिताबऽ अबै’ छ। देखऽ योग जगह छैक।’ ‘महग हेतै?’ ‘प्रिया! अहाँ एपफोर्ड कऽ सकैत छी।’ ‘तथापि....?’ ‘प्रिया नहिजानि कियेक भारतीय नारी अपना आप केँ प्यार कियेक नहिकऽ पबै’ छ? अहाँस्वयं एतेक कमाइत छी’ तखन एहन अवस्था मे अपना लेल सुख भोगब अन सोहाँत कियेक लगैत अतिछ?’ ‘ओह! पिफलिप! हमरा शब्द नहिभॅटैत अछि की कहि ध्न्यवाद दी!’ - ‘अच्छा! पिछला पन्द्रह वर्षक दोस्ती मे एखनहुँ ध्न्यवादक औपचारिकताक लेल जगह खालि छैक । अरे, हम एक दोसराक नीक अध्लाह नंहिसोचब तऽ के सोचतै? असल मे जूडीक इच्छा छलनि जे हम अहाँ के अपने घर नेने आबि। मुदा हम जैनेत छी अहाँ एकान्त वेशी पसिन करैत छी। हँ जँ मन अबि जाए तऽ हालैंड ऊबि जायब। ऑखि नोरा गेल एतेक अपनत्व? मानल हुँ एतेक वर्ष सँ मित्राता अछि साल मे कतेक बेर भेंट होइछ? हँ एतबा अवश्य जे एको दिन लेल भेंट होइछ तऽ आध-आध राति धरि जूडी, पिफलिप आ हम गप्पे करैत रहि जाइत छी। कॉपफी पर कॉपफी पिबैत-अतीत सॅ लऽलऽ वर्तमान धरिक वृतान्त कहैत-सुनैत बीतै’ छ। संजु पिताक वारिस बनल हुनके लग छल। हँ बीच-बीच मे हमरा सँ भेंट करऽ अबैत छल सहमल-सहमल बुझना जाइत छल। हम नहिचाहैत छलँहु जे हमरा दूनूक दोगला राजनीति मे इ लड़का पिसाइत रहए। ओना अपना भरि ओ हमरा खुश करऽ चाहैत छल। ध्ीरे-ध्ीरे संजु पूर्ण रूपेण नरेन्द्रक मुट्ठी मे बन्द होइत गेल। बापक डरेँ हमरा सँ दूर-दूर रहऽ लागल। नरेन्द्रक व्यवहार देखि हम शुरूहे सॅ क्षुब्ध् छलँहु। सच कहू तऽ हमरा नजरि मे ओ-हेल्दी एनिमल छलाइ। हम लंदन सँ घुरि कऽ कतऽ गेल छलहुँ। आई अस्पताल मे हमर तेसर दिन छल। भोर मे बहुत देर घरि बगीचा मे टहलैत रहलहुँ। डाक्टर आइभरि एतहि रहऽ कहलक अछि। काल्हि प्रातःकाल डूयब्रवनिक चलि जायब। नीना सॅ गप्प भेल ओ बेर-बेर कहैत छलीह भाभी अहाँ चिन्ता नहिकरब, एतऽ हम सब सम्हारि लेब। खिड़कीक उज्श्र पर्दा पर डूबैत सूर्यक-उदास छाया वातावरण के पफीका कऽ गेल। ध्ीरे-ध्ीरे उज्श्र आकाश मे रातुक स्याही पसरए लागल। हम करौट फेरलहुँ अतीतक परछॉही आँखि मे हुलकी मारऽ लागल। सबसे पहिने देखलहुँ नेनपनक एकटा सांझि। स्मृतिक बाट पर नहुँ-नहुँ डेग बढ़ेलहुँ। तइओ स्मृतिक जंगल झाड़ मे करवनहुँ आँचर ओझराइत छल तऽ करवनहुँ पैर मे ठेस लगैत छल पाथर सॅ, करवनहुँ कुहेस सॅ भरल आकाश ....... कतहु किछु ने सुझाए तऽ कौखन शीतल ओसक स्पर्श से पैर से देह धरि भुलुकि उठय। पफेरू मोन पड़ल ऑखि से झफहरैत नोर! बहुत दूर से बीतलल अतीतक परछॉही के डोलैत देखलहुँ! मात्रा साढ़े नौ वर्षक नान्हिटा- बच््यी सांझि ए सॅ गुमसुम खिड़की पर बैसल- छैक! आई खेलऽ लेऽ नीचॉ नहिउतरल। संगी सहेली बजाबऽ एलै तऽ झनकि कऽ मना कऽ देलकै। शान्त गुम्म भऽ देवार पर अबैत-जाइत छॉही केँ देखैत रहल। सूर्य डूबि गेलै। अन्हार पसरि गेलै तइओ ओ ओतहि बैसल हल। ठंढ़ा बसात बहलै, दाई मां स्वेटर पहिरा देलथिन। - खेनाई ले’ पूछलकै दाई मां तऽ मना कऽ देलकै। सामने मे रहै’ छै चित्रा ओकरा एतऽ खेलहु नहिगेल। के छै इ लड़की? के? ई तऽ हम छी हम! अपने नेनपनक तऽ इ परछॉही देख रहल छी। नेनपनक ओ दुर्घटना कहियो बिसरा सकै’ छ। रतुका साढ़े नौ बाजक छलै-सुतबाक बेरा गुप्ता हाउस मे सब काज घड़ीक सूई संग होइत छै सभक समय निर्धरिक छैक। दाई मां हमर नाइटी पैंटी, देहपोछबा लेल तौलिया पावडर क्रीम सब चीज राखि रहल छलीह। एहनाबेर में हम वेशी काल चुप्पे बैसल रहैत छलहुु। कपड़ा राखि कऽ दाई मां दूध् उठा टोस्ट लऽ कऽ आबि गेलीह, चल बुच््यी, कनि दूध् पी’ ले सूतऽ क बेर भऽ गेलै’। दूध् पीबि हम बाथरूम मे घुसलहुँ। ब्रश-कयलहुँ। नहिजानि कियेक मां क सोझा मे नाइटी पहिन कऽ जयबा मे लाज लगैत छल ाई मांक सोझा किध्ु पहिरक चलि जाइत छलहुँ कनिको धख नहिहोइत छल। पैंटी बदल लहुँ समीज लेल हाथ बढ़ाबिते छलहुँ की दाई मां क नजरि हमरा पैंटी पर पड़लै’। उज्श्र पैंटी मे खूनक ध्ब्बा! ‘बाप रे, ई की भेल? ई खून..... एखन तऽ दसमां बरस शुरूहे भैले ए.... हे भगवान! हमरा बच््यीकेँ इ की भऽ गेलै?’ दाई मां! अहाँ कियेक चिचिआइत छी मां के सब मास एना खून लगिते छै कपड़ा मे? तऽ.... दाई मां एखनहुँ आतंकित छलीह। - ‘लड़का भैया आई हमरा ..............’ ‘अरे कसाई! अपन सहोदर बहिनो के नहिछोड़लें। ओना ओकर बानि तऽ बुझले अछि। बहुरानी केँ डरेँ किछु नहिबजैत छै। ‘दाई मां! भैया एना कियेक कएलन्हि? हम रोकने छलिएन्हि चिचिआय लगलहुँ तऽ जारे से थापड़ मारलैटि आ हमर मुँख बान्हि देलनि! हम मां के सबबात कहि देबई।’ ‘नहिबौआ नहि। आब अहॉ केँ शीलभंग तऽ भइए गेल। बुच््यी ई बात कहियो ककरो लग नहिबाजब।’ बजैत-बजैस दाई मां कानऽ लगलीहा हमरा अपना करेज मे सटने कतेककाल धरि हुचुक हुचुक के कनैत रहलीह। दाई मां क ममता हमरो मोून सिहरि उठल मन मे भेल जे हमरा सँ कोनो भयंकर गलती भऽ गेल अछि। अपराध् बोध् भेल, पहिल बेर जिनगी मे बुझायल जे एकरे पाप कहल जाइछ। ‘दाई मां! ....... मां हमरा कियेक भारतीह? भैय तऽ हमरा जबरदस्ती बाथरूम मे लऽ गेल छलाह आ हमर पैंटी खोलि कऽ.......।’ ‘हम कतबो कभैत रहलहुँ तइओ हमरा नहिछोड़लनि। हमर गलती तऽ नहिअछि तऽ मां हुनके बजथिन, बाबूजी क गेलाक बाद तऽ घर मे पैघ पुरूष भैये छथिन। मां कहैत छथिन भैया बड्ड बुझनुक छथि हरदम भैयाक बड़ाई करैत रहैत छथिन। मां कहैत छथि भैया नहिरहितथि तऽ हम साभ भूखे मरि जैयतहुँ। हमहुँ कभैत छलहुँ आ दाई मां तऽ कनिते छलीह। हम बरे बरे बजैत छलहु दाई मां हमर कोन दोष मां हमरा कियेक भारतीइ कहबैनिध्त? दाई मां भाभी नैहर। - गेल छलथिन तकर प्रात हम एसगर अइ रूम मे छलहुॅ तऽ भैया पैंटक बटन खोलैत छलाए तखने चमेलिया आंबि गेलै तऽ भैया बाहरन चलि गेलाह।’ दाई मां हमराकरेज सटनहि छल। फेरन बाजल-बुच््यी! हमर बात मानू एखने नहिजिनगी मे कहियो ककरो लगई बात नति×ा बाजब। ब्याह हेत तऽ पति परमेश्वरी से नहिबाजबा आ आई सँ हरदम हम अपना नजरि से ओझल नहिहोम देब। बुच््यी! हम अहाँ केँ छोड़ि कऽ कतहु न×ि जाएब। सत्ते दाई मां! अहाँ अपना गाँव नहिजायब। दाई मां! अहाँ हरदम हमरा लग रहब? दाई मां घर मे अहीं तऽ हमरा दुलार करैत छी आर क्यो हमरा खूब मानैत छलाह, बाबूजी कियेक चलि गेलाह?’ ‘की कहू बुच््यी भगवानक मर्जी।’ हमर छोट छीन दिमाग सोचऽ मे व्यस्त भऽ गेल। पलंग पर पड़ल-पड़ल सोचैत छलहुँ बाबूजी कोना चलि गेलाह? हमरा त कखनौ काल लगै’ छ जे खड़ाम पहिरने बाबूजी हॉल मे चलि रहल छथि। ओई दिन बाबूजी ऑपिफस गेलाह से घुरि कऽ नहिअयलाहा राति मे बारह बजे खाली गाड़ी लऽ ड्राइवर घुरल छल दरबजे पर चिचिआइत ध्ड़ाम सॅ खसल -बड़का बाबूजी नहिरहलाह। हुनका हार्ट पफेल भऽ गेलैन्हि।’ दाई मां हमरा जगाकऽ कहने छलीह-बुच््यी! -अनर्थ भऽ गेलै, बड़का बाबूजी केँ आपिफसे मे हार्ट पफेल भऽ गेलैन्हि। देवता सन मालिक आब नहिरहलाह जुलुम भऽ गेलै। दाई मां ूदनू हाथ माथ पीटैत छल। मांक रूम सॅ कननइक स्वर आबि रहल छल हम दौड़ैत हुनका लग गेलहुँ। मां देवार सॅ कपाड़ पफोड़ि रहल छलीह सरला दीदी कनैत-कनैत बजलीह-मां, एना करबै तऽ हमरा सभके के देखत, आब अहींक सब सम्हारऽ पड़त। बड़का भैया काज सँ रंगून गेल छलाह। काल्हि भोर मे आबऽ बला छलाह। भैयाक कईसी बाबूजी के नहिसोहाइत छलैन्हि। हुनकर पिफजुलखर्ची देखि बहुत दुखी रहैत छलाह। रोज नव-नव सूट, इत्रा सॅ गमकैत रूमाल, केश मे तेल नहिबिल क्रीम लगबैत छथि। जहिया बाहर जाइत छलाह ओहू- दिन बाबूजी कहने छलथिन - विजयक मां, अहॉके बेटाक रईसीक अन्त नहि। कतबो कमाएत बचतै नहि।’ मां के नहिनीक लगलैन्हि लोहदि कऽ बजलथिन- ‘यौ, अहाँ तऽ हरदम ओकरे पाछु पड़ल रहैत छी कम से कम यात्राकाल तऽ शुभ-शुभ बाजू।’ बाबूजी ओहुना बड्ड कम बजैत छलाह। आ जखन मां क प्रलाप प्रारम्भ होइत छलै तखन तऽ सोझे उठि कऽ अपना रूम मे चलि जाइत छलाह। हँ घर बच््या सभ लेल हुनकर रूम हरिदम खुजले रहैत छल। बाबूजीक घर मे नेवारवाला पलंग छैलैन्हि ताहि खूब मोट गद्दा आ मसनद छलै। बाबूजीक पाछाँ-पाछाँ हरदम छोटका भैया चलैत छलाह। तकरा पाँछा। -सरोज आ हम बड़की दीदीक दूनू नेना रवि जकरा हम सभ बुल्ली कहैत छलिऐ से आ नीलू बुल्ली आ नीलू प्रायः एतहि रहैत छल। हम चारू सरोज, बुल्ली, नीलू। आ हमरा सभ मे मात्रा एक-एक साल क अन्तर। मां क दहिन हाथ छलथिन बड़का भैया आ बाम हाथ सरला दीदी। सरला दीदी के घर मे सब सल्लो कहि कऽ शारे पाड़ैत छलनि। सल्लो दीदी कें बड्ड पैछ घर मे विवाह भेल छलनि। जीजा जी देखबा मे कुरूप कारी छलाह बाबूजी हुनका देखि कऽ विवाह लेल मना कयने छलथिन। मुदा अइ विवाहक प्रस्ताव अनने छलाह मामा। ओ मां के बुझा सुझा कऽ मना लेलथिन। खानदानी घर छै, अपन जुटमिल, कॉटन मिल, बैरकपुर मे लोहाक कारखाना, चाय बगान छै। ई तऽ बेटीक भाग्य अन्यथा कहाँ हमरा लोकनि कहॉ हुनकर परिवार। मां मानि गेलथिन! बाबूजी केँ पसंद नहिनहिछलैन्हि। मामा केँ कहने छलथिन- ‘जय कुमार जी, सटोरिया परिवारक कतेक गुणगान करब? भऽ सकैंद काल्हि सटाð मे ओकर जुटमिल आ कॉटन मिलबिका जाइ? आ ओ लोकनि कोना पाइ बटोरलनि से हम नहिजनैत छिए? अहाँ कनिको अघलाह नहिलगैं’छ एहन सोनपरी सन भगिनी कें कारी कौआ सॅ ब्याह तय करब? हमरा कहीक कभी अछि? हँ, भौतिकता मे हुनका सॅ उन्नीस छी सेह ने! मुदा हमर खानदान? खनदानक बात सुनिते मां भड़कि गेलीह। हँ, हँ बड्ड नीक खानदान अछि अहाँक? - ने ककरो डेªस सेंस अछि ने बातचित करबाक शऊर। अहॉक मां के कहिकऽ थाकि गेलहुँ मुदा ओ सारी बिनु पेटीकोटे के पहिरतीह। कतेक खराब लगैत छॅ। ओई दिन भगवानक कथा सुनबा लेल रूँगटा हाउस गेल छलहुँ जमुना मौसी टोकिए देलनि - ए कस्तुरी ! अहाँक सासु-केहन पफुहड़ छथि एक छिन्ना सारी पहिरैत छथि आ ऊपर उघाड़ ब्लाउज नहि। आ तेहन गंवार भाई सभ अछि। बहिनक कोन गप्प ने कथुक लुरि व्यवहार ने पढ़ल लिखल। मामा जी इस भटाा वृतांत सुनिते कुटिल मुसकि छोड़लनि। बाबूजी हारि मानि बजलाह। - ‘ठीक दै अहाँ बेटीक मां छी आ इ अहाँक भाई छथि तऽ अहाँ दूनू गोटे के इ ‘कथा’ पसिन्न अदि तऽ त करू। मुद्र एकटा बात हम पहिने कहि दैत छी हम एक लाख टका पहिनहिंु दऽ देबैन्हि ओ जेना जे खर्च करथि बाद मे हमरा सॅ उम्मीद नहिराखथि। -जीजा जी, अहॉ कोन चर्चा लऽ कऽ बैसि गेलहुँ। अरे हुनका कथीक कमी छैन्हि? सेठानी चौअन्नीक आकारक पाँच-पाँच ट हीरा पहिरने रहैत छथि। पाँच-पाँच टा हीरावाला करोड़पतिक गुणगान मांक सॅ सदतिकाल सुनैत छलहुॅ। दूनू काने मे चौअन्नीक बराबर हीरा नाकक छक हीराक आ दूनू आंगुर मे हीराक अंगुठी। हॅ मायिओ के हीरा क अंगुठी छलैन्हि आ जमुना मौसीके हीरा क अंगुठी छैन्हि। पाँच टा हीरा तऽ मां के देहो पर झलकैत छैन्दि मनहिं छोट-छोट छैन्हि। अच्छा। -ओइ समय जे बाबूजी एक लाख टका देने छलथिन आइ चालीस साल बाद ओकर कतेक कीमत हेतै? करीब-करीब करोड़ टका सॅ ऊपर दहेज मे ढ़ेल गेल छलै। सोचबाक क्रम जारी छला एतेक दिनक बादो बाबूजीक स्मरण होइते ऑखि डबडबा जाइत अछि। ‘हँ, जहिया हमरा बरबाद कयने छलाह बड़का भैया तहिया कतेक हब्बी ढ़कार कनैत सोचैत छलहुँ जॅ बाबूजी एखन आबि जाएताह ...... मुदा मुइल लोक कतहु घुरि कऽ आबय।’ ....... ‘सूति रहू बुच््यी, उऽाक कनने की ..........’ दाई मांक ममत्व हुनकर हॅसोथैत हाथ देह मन कें शक्ति देने छल ऑखि कखन मुना गेल नहिबुझलिऐ । हम सब छह भाई-बहिन छलहुँ । बड़की दीदीक नाम छलैन्हि सुमित्रा। हुनक चौदहे वर्ष मे विवाह भेल छलैन्हि आ तइसम वर्ष होइत-होइत चारि बच््याक मां भऽ गेलीह। बड़की दीदीक विवाह समय मां मात्रा अटाòइस वर्षक छलीह। हुनका बाद छलीह मंझली दीदी सरला हुनका बाद बड़का भैया विजय पफेरू छोटका भैया अजय आ सरोज हमरा से एक साल मैघ। दाई मां कहने छलीह हमर नाम प्रिया डाक्टर अमृता कौर रखने छलीह। सब भाई-बहिनक रंग गोर छलै हमरे टा गेहुआँ रंग छल। कॉलेज मे संगी गेहुआँ गोर आ कटबार ऑखि नाक वाली कहैत छलीह। अपन रंग-रूपक नीक कॉम्पिलमेंट कॉलेजे में सुनलहुँ! बड़की दीदी सरोज बड्ड चंचल छलीह जखन तखन भैया आ दीदी कामक चुगली बाबूजी लग करैत छलीह। - हुनका सँ सब डरल-सहमल रहैत छल कखन ककरा बात पर हंगामा कऽ देतीह जोर-जोर कानऽ लगतीह तकर कोनो ठेकान नहि। ‘देखऽ मे बड्ड सुध्ंग मुदा एक नमरकेँ चुगलख्.ाोर जहरक पुड़िया।’ भैया आ सरला दीदी इएह कहि हुनका खौंफ बैत छलथिन। आ सब सँ छोट रहितहुँ हम ने दुलारे छिड़िआइत छलहुँ ने करो चुगलीए करैत छलहुँ। तैं हम बड्ड नीक जकरा जे मोन होई हमरा कहैत छले । डूयब्रवनिक मे होटलक नाम छै ‘सेतीस्टेफा’। कमरा नम्बर 211 केवार पफोलि भीतर गेलहुँ। खूब पैध् साफ सुथरा बाथरूम। खिड़की सँ सटल बालकनी। कमरा मे आराम दायक दू टा पलंग। ईस्टर के छुटीð मे इ होटल टूरिस्ट सॅ भरल रहैत छैक तखन इएह रूमके डबल रूमक चार्ज लगैत छै। प्रत्येक दिनक कतेक डालर लगैतै ? अपन आइ सोच पर हँसी लागल। पिफलिप ठीके कहने छलाह ‘अहाँ केँ अपना आप सॅ प्रेम नहिअछि? भूख लागल अछि। आब की करू? ........ ककर दोष हमहीं चाहैत छलहुँ - ठीक छै आब रूम सर्विस केँ पफोन कऽ चाह आ टोस्ट के आर्डर दऽ दैत छिएक। - ‘मैडम अहाँ लेल क्ररेार अरलजहुँ अछि एखन तुरत बेकरी सॅ एलैए।’ मने मन हँसी लागल इ होटल वला सथ अपन गेस्टक कतेक ध्यान रखैत अछि आ समयानुकूल सुझाव दऽ देत। रूम सर्वेट केँ जाइते हम पफेरू पलंग पर आंघरा गेलहुँ पंख से भरल मुलायम तकिया नीक लगै’ छ पफेय मोन पड़क कोसा तऽ दऽ गेल चाह नहिढेलक। पफेरू पफोन कयलहुँ-चाह आबि गेल। एक घुंट पीलहुँ एकदम बेस्वाद। - लागत, क्रोसा कहुना आध खेलहुँ जी हौरंऽ लागल। अचानक नहिकी भऽ गेल? एखन हम सड़क पर छी मोन एखनहुँ नीक नहिलगै’छ घुरि कऽ होटल आबि गेलहुँ सम्पूर्ण शरीर मे थकनि दर्द क अनुभव होइछ ऑखि मुनि पलंग पर सुति रहलहुँ नहिजानि करवन ऑखि मुना गेल। भोर मे उठलहुॅ तऽ मन हल्लुक लागल। सोचलहुँ आब ऑर्गनाइज कऽ ली समय। सांझि भोर ऐहि होटल मे खायब, ओना हमरा लेल भोजन आतेक महत्व नहिरखैं’छ। घूमब प्रत्येेक दिन घंटाा दू घंटा चारि घंटा। से हो केहन घुमनाई? लक्ष्यहीन । वर्तमानक झरोखा सॅ अतीत बेर बेर हुलकी भारैत अछि। से हो क्रमब( नहि आगा पॉछा बेढंगा। लिखऽ चाहैत छी मुदा कोना लिखू? हँ एकटा अनुभूति भऽ रहल अछि जे एसगर रहने एकटा लाम-भेल अछि जे भीतर मे जमल बर्फ पिघलऽ लागल अछि तरल पारदर्शी चेतना, अतीत मे बीतल घटना केँ हूबहू देख रहल छी आ बहुतो बात एहन छै जकर आब अपेक्षा नहिकयल जा सकै’ छ। हमर इ नितान्त अपन एकान्त कोना काजक व्यवस्तता मे ओझल रहैत हल। मुदा आब अपना के ठगब होएत एकरा अन्ठाएब। अपना के एसगर रहबाक त्रासदी केँ की कहिऐ आतंक की कर्मक फल? ऑखिक नीर के तीव्र गति सॅ जीवनक दौड़ मे सुखबैत रहलहुँ अछि। पछिला दस वर्ष सॅ काजक पॉछा तेहन व्यस्त रहलहुँ जे कहियो अतीतक विषय मे सोचबाक लेल पलखति नहिभेँटल। - आ जँ काजक व्यस्तता नहिरहैत तऽ की हम जी सकितहुँ? हम्हर दस दिन सँ ई प्रश्न पूर्ण अस्मिताक संग हमरा आगाँ ठाढ़ रहै’ छ- उतारा मंगै’छ हम की उत्तर दिऐ? जिनगी व्यतीत करबाक आर बहुत तरीका छैक-मुदा कोन तरीका? जूडी हरदम कहै’ छ ‘प्रिया! अहाँ अपन मनक बात डायरी मे लिखल अरू मन क मार हल्लुक हेतऽ । महिला एखनहुँ मौन रहैत दथि मुदा हुनकर नीर दुनियॉ हॅसैत छैन्हि। हिस्टिरियाक दौड़ा पड़लापर कानब, चिकड़ब सुनि पुरूष कान मुनि लै’ छ। मुदा शब्दक महत्व छैक शब्तक अपन इतिहास छैक..... आ जॅ प्रकाशित भऽ जाय तऽ ओकर अपेक्षा नहिकएल जा सकै’ छ। - ‘मुदा जुडी एहन किछु हम नहिलिख सकैत छी।’ लिखाई शुरू करब तऽ अपना सन हजारो-लाखो महिलाक मन सँ संवाद स्थापित कऽ सकब। नहिजानि कतेक के अहाँक शब्द मरहम जकाँ घाव केँ शीतलता देतै! अनगिनत मौन महिला केँ मुखर बनाओत। गोंगा बनलि छथि से बजतीह हँ, हँ इ कथा सत्य छै एहन हमरो संग भेल अछि।’ आइ एतऽ अपन परिचित लोकवेद सॅ दूर भौगोलिक परिवेश सॅ सुन्दर छी तऽ लगै’छ जेना पियाजक छिलका जकॉ परत दर परत उघड़ि रहल अछि जे किछु हमर अपन वास्तविकता अछि जतबा बाहरी दुनियाँ के संघातक दौरन हम आत्मसात कयने छलहुँ से सभटा ऑखिक आगू नाचि रहल अछि। - आब जरूरी छै एकटा सभकेँ नीक जाकाँ चिन्हब। भनहिं हमरा पर परिस्थितिक प्रभाब परल आ हम जीनगीक जरूरतक अनुसार नव बाट पकड़लहुँ नव परिस्थिति गढ़लहु। मुदा आब कतेक चमत्कृत करै’छ जे आब हम परिस्थितिक हाथक कठपुतरी नीन्नो जेना पहिने परिस्थितिकेँ अपन नियति बुझि लेने छलहुँ से बात आब नहिरहल। एहि विराटक प्रक्रिया मे कोना छोट छीन प्रयास सम्मिलित होइत रहलै से भाव उभड़ै’छ तऽ आत्मविश्वास और बढ़ै’छ। की कहू, जिनगीक मादेँ खासकऽ हमर जिनगी तऽ विरोधभासक बंडल आछि। ओझराएल ताग, बीच बीच मे गीरह पड़ल लगै’छ नहि जे सोझरा सकबा मुदा आब उलझन संग जीयब सीख लेलहुँ अछि। आ इएह समझदारी जिनगीक प्रति लगाव केँ जीवित रखने अछि। एहि सँ आन्तरिक एहन अहोभावक अनुभूति होइछ जकर वर्णन करबा लेल शब्द नहिभेँटै’छ ने एहि आनन्दक बखान कऽ सकैत छी। आश्चर्यक गप्प त ई जे आइधरि अपना विषय मे सोचैत ने अपना सॅ अतेक लग हलहुँ ने कहियो अपना सॅ एतेक दूरे। एक ही पल मे दूनू तरहक घटना घटित होएब केइन अजगुत लगै’छ जिनगीक। माथक ऊपर सॅ दू टा कारी कौआ फड़फड़ाइत उड़ि गेल। ऊपर नजरि गेल देखलिए होटल तग जे गेट सॅ सटले गुपटी छै ताहि पर बैसल छै कौआ। भोर का सुनहरा सूर्यक किरण फूल पात पर पड़ल ओसक बुन्नकेँ सोखि रहल छल। लग सॅृ। - वृ( जर्मन पति-पत्नी हँसैत बढ़लीह। जहिया सॅ अयलहुँ अदि वृ( दम्पतिक हँसमुख चेहरा देखि मन-प्रसन्न भऽ जाइछ। ‘प्रेम’ ई उढ़ाई आखर मनुष्यताक सम्पूर्ण पुरम्परा केऽ उद्धेय करैं’छ। ................की प्रेम एखनहुँ बॉचल छैक? ऐहि जर्मन दम्पतिकेँ देखि भरोस होइछ हॅ एखनहुँ एहन भाग्यशाली लोक अछि एहि संसार मे जे अढ़ाई उठाखरक अर्थ बूझै’छ कतेक स्नेह सॅ बूद जर्मन पत्नी केँ कॉपफीक प्याली पकड़बैत छैक। बेर-बेर ससरैत शॉल के ठीक करैत रहैत छै। दूनू बेकती पूर्वी जर्मनी सॅ आयल छथि। इ लोकनि अंग्रेजी नहिजनैत छथि आ जर्मन भाषा नहिजनैत छी ब्रेक फास्ट टेबुल पर स्टिवार्ड जोसेफ दुभाषियाक काज कयलनि।नहिजानि कियेक जोसेफ हमर परिचय लेखिकाक रूप मे कयलनि हम तऽ लेखिका छी नहि। ओह! अब बुझलिए ई प्रपंच पिफलिपक छैन्हि ............हमरा एकान्त चाही तैँ ओ हमरा लेखिका कहि रूम रिर्जव रौने हेता आ अई देश मे लेखक केँ विशेष आदर-सम्मान छैक। एहि वृ( दम्पति केँ देखिकऽ बुझाइछ प्रेमक कोनो सीमा नहि! एहि संसार मे सुखी वैवाहिक जीवन सॅ बढ़िकऽ किछु आर नहिभऽ सकै’छ मुदा एहन सुख कतेक लोक केँ नसीब मे होइत छैक? मुइल सम्बन्ध् केँ उद्यैत रहब बड्ड कस्टकर होइत छैक। एहन सड़ल-गलल सम्बंध् के पफेंकनहि कुशल-जिनगी बड्ड हल्लुक गमगम सुमन सौरभ सन लगैत छैक जॅ स्नेह रस सॅ सराबोर रहए। - रूमक खिड़की सँ सटल अंजीरक गाछ छै आ ओकेरे दोग सॅ झलकै’छ नीला आकाश। आ रूम सॅ सअले अछि सन बालकनी जतऽ बैसिकऽ समुद्र के दूर-दूर धरि देखल जा सकै’छ अनन्तक एहि विस्तार मे क्षितिजक महज कल्पना कयल जा सकै’छ। लहरक एहि संसारक ने दै ने अन्त! हमरा संग अछि हमर अकेलापन जे जीवनक सही अर्थ समझा रहल अछि। हम कोना-कोना अपनाके बचेलहुँ अछि, अपना जीवन मूल्य के संयोगि के रखलहुँ अछि। हां, टूटलहुँ अछि कतेक बेर मुदा हिम्मत नहिहारलहुँ तय चोटक निशान नहिरहल........दुनियाँ क पैर तर थकुचाइओ केँ माटिक मुरूत नहिबनलहुँ! अड़तालिसम वर्षक अवस्था मे अदद औरत छी जे जिनगी के आब पफैले’छ नहिहँसैत समय बीता रहल अछि। अपना उपलब्ध् िपर गौरव होइछ। मित्राता लेल हाथ बढ़ा गर्मजोशी सॅ लोक केँ लग कऽ लैत छी। आब हम एसगर नहिछी पहिने कहियो छलहुँ। आह तऽ नील आकाशक एक नव अर्थ लागल अछि-पहिने कहियो आकाशक विस्तार के अपना ऑखि सॅ नपबाक कोशिशो नहिकयने छलहुँ। एखनहुँ की दूनू ऑखि सॅ आकाशक विस्तार केँ नापि सकब? मुदा कहन अद्भूत आनन्दक अनुभूति मऽरहल अछि। नेनपन मे एसगर बरामदा मे बैसि चिड़ै-चुनमुनी संग एकालाप बड्ड नीक लगैत छल। - स्वयं प्रश्न करैत छलहुँ आ स्वयं उत्तर दैत छलहुँ। एक दिन की भेलै कि हम चुनमुनी संग नहिजानि की सभ गप्प करैत छलहुँ- रेलिंग पर बैसल। हमर उमर इएह पाँच छह वर्षक रहल दोएत। खूब मगन भऽ ओकरा सॅ पूछैत छलि अले, चनमुनि चिलियॉ आइ तू कतऽ कतऽ गेले कहने। चिलियाँ काली कौआ देखकऽ तोलो उल लगैछौ? बाज ने - तू हूॅ हमला से नहिबात कलबे?........ उतबा मे खूब जोर सॅ टहाका पाड़ि हँसब सुनलहुँ पाछाँ घुरिकऽ तकलहुँतऽ छोटका भैया, सरोज, नीलू आ बुल्ली छल। देखू, देख एहि पागल के चिड़ैँ सॅ बतिआइत छल ‘....... तू हू हमला से नहिबात कलबे ......? बड्ड बदमाश छयि छोटका भैया एक नम्बर केँ नकलची। हमरा चिढ़ाबलेल बेर-बेर सभकेँ कहैत छलथिन - अले, अले बाज ने चिड़ियाँ ........... तोतराही के दॉत चिड़ैए के चोंच जकां बहराएल छै। हम चिकड़ी-चिकड़ी कनैत छलहुँ आ हमर भाई-बहिन पेट पकड़ि हँसैत छल। कम्हरो सॅ सल्लो दीदी आबि गेलीह हरा कनैत देखि दया भेलौन्हि। लग आबि दुलार कयलनि कोरा मे उठा ले लैन्हि दुलार मलार पबिते हम तुरते चुप्प भऽ गेलहुँ। दीदी बड्ड नीक छघि। मोन पड़ल एक मासक बादे दीदीक ब्याह भऽ जेतैन्हि। हमर सबसँ नीक बहिन सल्लो दीदी सासुर चलि जयतीह। ई बात मोन पड़िते आँखि फेर नोरा गेल। खूब ध्ुमधम सॅ विवाहक तैयारी भऽ रहल छै। ओ र्ध्मशाला हमरा एखनो याद अछि। ताहि दिन बाबूजीक पाँचो भाई। - दादी जीवित हलथिन। चौक आ सीढ़ि पर कोन मे ठंढ़ई लेल राखल रंगीन बर्फक सिल्ली एखनो याद अछि। र्फक सिल्लीक तर मे तरह-तरह के फल जमाओल गेल छलै। कोनो सिल्लीक तर मे आम झलकैत छलैतऽ कोनो सिल्लीक तर मे फालसा। अ तऽ बुल्ली हमरा बतौलक जे इ सभ नकली फल छैक सजावट लेल राखल छै। दीदीक ब्याह भेलैन्हि 1949 क गर्मीक मौसम मे। बाबूजी केँ तहिया खूब आमदनी हलैन्हि तैँ दिल खोलि खूब खरच कयलैन्हि। सासुर सँ दीदीक जेवर अयलैन्हि से देखि सभक ऑखि फाटि गेलै’ नाक, कान, गर सभमें हीरे हीरा झलकैत छलै ं पहिल बेर गुप्ता खानदान मे सासुर सॅ हीरा आयल हलै। नानी बड्ड प्रसन्न छलीह बाबूजी अपना भाई सभ मे अलगे सँ चमकैत छलाह। हुनकर रूआब क दब दबा छलै। बालीगंजक पॉश मकान मे हम सभ रहैत छलहुँ। हमर जन्मो एहि मकान मे भेल छल। दाई मां कहैत छलीह डा. अमृता कौर हमर जन्मकाल हलीह। हमर जन्म होइते डाक्टर अमृता दाई मां के कहने छलैन्हि - तुम्हीं जाकर सेठ जी से कहो लड़की हुआ है। हम बोलेगा तो हमारा प्रेक्टिस खराब हो जायेगा। सब कहेंगें डाक्टर अमृता से जापा करबाने से लड़की ही होती है। दाई मां केँ बाहर अबिते दादी पूछलथिन की भेलैन्हि? ‘बेटी भेलैन्हि मां जी। कार्तिक नवमी मे घर मे लक्ष्मी एलैन्हि लक्ष्मी।’ ‘हे भगवान एखन तऽ दू टा कुमारिए तेसर जुमि गेलै। खरचेक घर।’ बाबूजी बजलाह ‘माँ, सब अपन-अपन भाग्य लऽ कऽ अबैत छै। भगवतीक जे इच्छा।’ हे भगवान! चारि-चारि टा बेटी आबि गेलै बेटा ले ऑखिमुनने छथिन देव-पितर! - ‘अच्छा जे भेलै से नीके रहए-मां अहाँ आराम करू जा कऽ।’ ‘हँ, बाबू! आध राति सॅ वेशी बीत गेलै हम सूतऽ जाइत छी।’ दादी मां, मांक रूम मे झॉकबो नहिकेलथिन्हा डा. अमृता कौर दाई मांक कोरा मे हमरा ध्ऽ कऽ चलि गेलीह। बड़की दीदी मां क सिरमा मे बैसल छलीह। - ‘सुमित्रा, बाबूजी भोजन परसि दहुन भोर सॅ भूखले हथिन।’ मांक निराशा रोआँ-रोआँ मे परसल छलैन्हि। पलंग सँ नीचा पैर रोपबा मे तीन मास लागि पलंग सँ नीचा पैर रोपबा मे तीन मास लागि गेलैन्हि। हम्हर सल्लो दीदीक ब्याहक तैयारी करबाक छलै। मां पलंग पर पड़ले पड़ल आर्डर दैत हलथिन। सभ वस्तुक देख-रेख सुमित्रा दीदी करैत हलथिन। बच््ये सॅ देखैत हलिएन्हि मां, कहियो स्वस्थ नहिछलीह। हमरा मां कहियो कोर मे लऽ दुलार कयने होयतीह से मोन नहिपड़ै’छ। नहिजानि किएक शुरूहे से मां केँ हमरा सॅ कोन चीढ़ छलैन्हि। वा हुनक घार निराशाक। प्रतिक्रिया स्वरूप हमरा देख नहिचाहैत छलीह। हमरा पाललनि-पोषलनि दाई मां। अपन तीन सालक बेटा भोलाकेँ छोड़ि कऽ ओ विध्वा और भूख आ गरीबी सँ तंग आबि कऽ एत आयल हल। नानी जीक ओतऽ जे दाई काज करैत हलै से दाई मांक पिसिऔत सासुु हलै सम्बंध् सँ। दाई मां के एतऽ पिसिऔत सासुए रखबौने छलै। हमरा कोर मे लैते’ दाई मांक स्तन में दूध् होमऽ लगलैन्हि। हमर रंग गेंहुआ गोर अछि आ स्वास्थ नीक ताहि पर सॅ दाई मांक पालन-पोषण। हमर सर्वस्व छलीह दाई मांक। हम हुनकर आँचरक खूंद चौबिसो घड़ी छयने रहैत छलहुँ। ओ बेचारी बाथरूमो मे जाइत छलीह तऽ हम कानऽ लगैत छलिए। हमरा लेल मां माने दाई मां। ने अपना मां क कोरा मे रहबाक स्मरण अछि ने ओकर स्पर्श वा दुलार भलार। हमर नामे पड़िगेल छल दाई मांक बेटी। सुमित्रा दीदी हमरा बाछी कहैत छलीह हम चारि छाप मे हाल मे अइकात सँ ओइ कात पार भऽ जाइत छलहुँ। हँ नेना ये हमरा एकटा आर नाम भेटँल छल मिलिट्री घोड़ी। हमर शरीर स्वस्थ छल आ मांक प्रिय बेटी सरोज रोगियाहि छलै। हँ एकटा आर घटना स्पष्ट याद अछि। एतेक वर्षक बादो माथक घोघरि मे आहिना घतेक वर्षक बादो माथक घोघरि मे आहिना घएल अछि। किछु तेहन स्मृति रहैत छै जाहि पर कालक कनिको प्रभाव नहिपड़ैत छै। नहिजानि कोनो-कोनी स्मृतिक क्षय कहियो कोना नहिहोइत छैक। हम बरंडा पर बैसल खेलाइत छलहुँ। बाबूजी हमरा कोरा मे लऽ मांक बगल मे सुता देलनि। एखनहुॅ ओहिना याद अछि। मां क चिकड़ब। .... ‘ओह ई की हम ओहिना मरल जाइत छी-एको क्षण चैन नहिसेँटै’छ ताहि पर अहॉ एकरा आनिकऽ हमरा करेज पर लादि देलहुँ।’ मांक क्रिश्चियन नर्स बगले मे ढाढ़ि छलीह राध। ओकरा डपटैत कहलथिन ‘राध की देख रहल छेँ उठा एकरा आ जो चमेलियाक मां’ लग घऽ बाबूजी आहत भऽ बजलाह - ‘ए विजयमां अहॉ केँ एकरा सॅ एतेह यदि कियेक अछि? ई हो अहींक बेटी अछि।’ ‘की कहू! सत्ते हमरा ई नहिसोहाइत अछि। जहिया सॅ जनमल अछि हम खाट घऽलेलहुँ।’ बाबूजी हमरा कारे मे उठबैत बजलाह ‘हमर ई लक्ष्मी बेटी अछि। जहिया सँ जनमल अछि टका बरसि रहल अछि। संयोग एहन जे अपना मकान सबसँ पहिने एकरे जन्म भेलै।’ ‘तऽ हम की करू? खेलाउ लक्ष्मी बेटीकेँ। हमरा सँ नहिसम्हरत।’ मांक ओ कर्कश स्वर आइओ कान मे बजैत रहै’छ ‘लऽ जाउ एकरा, हटाउ! पटकि दिऔ एकरा दाई मांक कोरा में .....।’ बाबूजी सॅ भेटँ करऽ एकटा कनकटा ज्योतिषी अबैत छलैन्हि। बाबूजी हुलसी हमरा लऽ गेलाह ज्योतिषी लग। ओ हमरा देखिते बाजल छलाहु - ‘सेठ जी, ई लड़की बउऽ् यशस्वी होएत, अहाँक खानदानक नाम रौशन करत ...।’ मां सुनलनि तऽ लोहछि कऽ बजलीह - खूब नाम हेतैं’। मूँह मे बकार तऽ छैहे नहि। जे पबै छै से चोटि घीचलै’ छै जकरा मोन होइ छै से थापड़-मुक्का सॅ थोपिया दैत छै। बात सही छै। सरोज के क्यों कनि देह छुबिकऽ देखौ। कोनो भाई-बहिन कनि डॉटि-ऽपटी दौ सौंसे घर ओकरा चिचीएनाइ सॅ सहमि जाइ छै। ककर मजाल छै क्यो किछु कहि देतैं। कनैत-कनैत सबके पेरशान कऽ दैत छै आ सांझि जखन बाबूजी एथिन तखन अपराध्ी केँ जाबत सजा नहिभेँटतै ओ ककरो चैन सॅ सांस नहिलेबऽ देतै। बुल्ली तऽ हमरे बतारी छल तैँ हमरा वेशी तंग नहिकरैत छल ओना छीआ-पूताक खेल मे मारि-पीट होइते छै। मगर हमर छोटा भैया बड्ड उत्पाती छलाह। हमरा चारू बच््या केँ कनयाब छोड़ि हुनका आर कोनो काजे नहिछलैन्हि। बाबूजीक दुलरूआ छलाह हुनका के किछु कहैतन्हि। मुदा ऊहो सरोज दीदी सँ डेराइत छलाह हल्लाकऽ सौंसे घर माथ पर उठा लेतै कनिको छू ढेला पर। नीलू बड्ड सुकुमारि मांक ऑखिक पुतरी ओकरा के मारतै’ पीटतै या खौंझेतै’। बुल्ली तऽ भैयाक शागिर्दे छलैन्हि ओकरा किछु करथिन्ह तऽपोल खुजि जेतैन्हि। तऽ सबसे निमूह बचलहुँ हम। तऽ कखनहुँ घंटी हमरा मुर्गा बना एक पैर पर ढाढ़ कऽ दैत छलाह तऽ कखनहुँ सुतला मे हमर चोटीक पफीता खिड़कीक ग्रील सॅ बान्हि दैत छलाह। निन्न टूटला पर हम चिचिआइत छलहुँ ................ दाईमां कतऽ गेलहुँ केश दुखाइत अछि ......देखू हमर पफीता खिड़की क ग्रील मे बान्हल अछि........।’ भैया आराम सँ कुर्सी पर बैसल छलाह-‘कान......आर कान दाई मां तऽ स्नान करऽ गेेल छौ.....।’ हम हुनका नेहोरा करि-भैया, गोर लगै छी भैया! - खोलि दिअ पफीता..... केश बड्ड दुखाइत अछि। आब अहाँ जे कहब हम करब...........।’ ‘वेश प्रॉमिस कर.........।’ ‘हं, भैया प्रॉमिस।’ - ‘ठीक छै। चल छत पर।’ भैयाक संग-संग गेलहुँ दत पर। तमाशबीन सरोज आ बुल्ली पाछाँ-पाछाँ चलल। छत पर जाइते भैया हमरा दूनू हाथे उठा कऽ पानिवाला हॉज मे ध्ऽ देलनि। हम ऊपर आबऽ के कोशिश करि तऽ फेर दाबि देल जाए। बुल्ली आ सरोज थप्पड़ी पारि खूब हँसैत छल। एहि नाटक कचरम सीमा पर पहुँचैत दाई मां हमरा तकैत ऊपर एलीह। ‘बापरे बाप! .......सब मिल कऽ बुच््यीक जान लऽ लेतै’। अजय बबुआ। हमरा बुच््यीक मारिए देबै। आब हम चुप्प नहिरहब आबऽ दियौन्ह मालिक केँ सब वृतांत सुना देबैन्ह। केहन अत्याचारी भऽ गेलै भाइ्र-बहिन!’ दाई मांक डॅटला सॅ सब भागल। दाई मां हॉज सॅ बाहर कऽ उनटा लेटाकऽ पेट सॅ पानि निकाललीह तखन हमरा होश भेल। कपड़ा बदलि कोरा मे लऽ हमर देह हॅसोथि रहल छलीह आ मुँह सॅ बजैत छलीह-नहिजानि कियेक सब हमरे बुच््यीकेँ नंग-चंग कयने रहै’छ। सरोज आ बुल्लीके अजय बाबू कहियो छुबि कऽ देखथुन। सबटा दोष मालकिन के छैन्हि। सब ले’ स्नेह अड़ैत रहै’ छैन्हि। बुच््यी पफुटली ऑखि नहिसोहाइत छैन्हि। बेटा नहिा भेलैन्हि तइमे बुच््यीक कोन दोष!’ ‘दाई मां! हमरा खाली अहां आ बाबूजी दुलार करैत छथिआर क्यो नहि।’ ‘बुच््यी। बाबूजी तऽ देवता छथि हुनकर परतर के करत।’ ‘दाई मां! अहाँ तऽ हमरा खूब प्यार करैत छी। अहॉ हमरा छोड़ि कऽ कतौ नहिजाउ दाई मां! राध कहैत छल-अहाँ अगिला सोमदिन अपना गाँव जाएब। दाई मां! हमरा दूध् के पियाएत? के खाना खुआएत। के हमरा सबसॅ बचा दे? सब मिलक मारत। दाई मां अहां नहिजाऊ?’ दाई मां किछु नहिबजलहि हमरा करेज सटा कऽ माथ सोहराबऽ लगलीह।’ ओई दिन स्कूल सॅ घुरिकऽ आयल छलहुँ तऽ बुल्ली सीढ़िए पर ढाढ़ छल थपड़ी पारी हॅसैत बाजल। ‘तोहर दाई गेलौ, आब के बचेतौ?’ ‘हरिया! कह हमर दाई मां चलि गेल? हम पूछलिऐ। ‘हँ, बौआ दाई मां अपना गाम गेल। हमरा ऑखि सॅ नोट टघरऽ लागल। हरिया गिलास मे दूध् दऽ गेल हम क्रो( मे दूध् ओकरे देह पर उझलि देलिऐ। ओ चुप्पे चलि गेला पिफर राध आयल कपड़ा बदलाबऽ हम ओकरो दनादन थापड़-मुक्का सॅ मारऽ लागलिए। सभके बड्ड आश्चर्य होइ हमर एहन रौद्र रूप क्यो नहिदेखने छल। हम चिचिआइत छलहुॅ दाई मां किये गेलै? दाई मां के बजा। हमर एहन जिद्द क्यो देखने छल ने क्रो(ा । बेचारी दाई मां सात सालक बाद अपना गाम गेल छल। ओकरो छोट-छोट नेना छलै। आ एत दर्जनो दाई नौकर दलै। गोविन्द महराज रसोइया छल, बलिया जिलाक नथुनीसिंह दरबान, पहाड़ी रामसिंह ड्राइवर, मीनीम कालूरामजी आ एकटा नर्स। कुल मिला कऽ चौदह जन स्टाफ। दक्षिणी कलकत्ताक शानदार कोटी मे हमर कोठी सबसँ भव्य। कोठीक भव्यता एहन जे लोक देखऽ अबैत छलै। - ताहिदिन हमर काका, काकी समस्त गुप्ता परिवार बजारवला पुरनका हवेली मे रहैत छलाह। नानीयोक घर छलै ओतहि बड़ा बाजार क हैरिसन रोड मे। सरोज पुरना हवेली मे जाएबाक नामे सॅ नाम भौं सिकोड़ि लै’छ-मां हम ओतऽ नहिजेबै बाथरूम बड्ड गंदा रहै छै। पुरना हवेली मे बड़की टा आंगन छलै चारू कात रूमा बाथरूम फड़क। रसोइघर छत पर। सब काकी केँ एक-कएटा घर छलैन्हि ओहि मे सूतब बैसब चारि-चारि पांच-पांचटा घियापुता संग। ‘हं, तऽ ओई दिन सात बजे बाबूजी ऑपिफस सॅ एलाह। हम तीन बजे स्कूल सॅ आयल छलहुँ तखन सॅ एक घोंट पानियों नहिपीने छलहुँ-मां खिसियाकऽ दू थापड़ मारनहु छलीह-‘मर चमेलियाक मां लग जा कऽ राक्षती ! बुझाइते नहिछै हमरा कोखि सॅ जनमल अछि? आबऽ दहि आब चमेलियाक मां के ओकरो करबै एकदम बिगाड़ी देलकैए।’ ‘बाबूजी समटा बात सुनला पर हमरा लग आबि कोरा लऽ कऽ कहलनि-चल बौआ खाना खा ले।’ हम हुनका लग अबिते उतार हुचुकि-हुचुकि कान लगलहुँ। कोरा लेलनि तऽ मरि पॉज पकड़िक कहलिऐनह ‘बाबूजी, हमर दाई मां ...... बजा दिअऽ।’ बाबूजी कहलनि-हं, बौआ हम बजा लेबै। ‘नथुनी सिंह! सुनू एखने रतुका गाड़ी सँ जाउ, उठा एकरा दाई मांकऽ नेने आयब अपने संग। हं, चमेलिया के कहबै एत नेने आब ओकर इलाज हम करा देबै।’ - मां बाजलीह-‘सुनू दरबानजी, जँ चमेलियाकेँ छुतहा रोग होइ तऽ ओकरा नहिअनबै।’ - मां! चमेलियाक छोड़िकऽ दाई मां नहिअबै तऽ? ‘चुप्प रह! दाई मां, दाई मां रटð लगौने छेँ जो पर दाई मां लग।’ हम मां क कर्कश स्व्र सुतिन सहमल बाबूजीक कुरता हाथ सॅ पकड़ने टुकुड़-टुकुड़ हुनकर मुँह तकैत छलहुँ। बाबूजी हमरा भरोस दैत बजलाह-‘दाई मां जरूर आयत।’ खैर चारिमदिन नथुनी सिंह के संग दाई मां चमेलियाक लऽ कऽ पहुऽचल। चमेलिया केँ निमोनियॉ बोखार छलै, टीफ्रैंबीफ्रैं नहि। पफैमिली डाक्टर गांगुली कहलथिन-‘चिन्ताक बात नहिं इंजेक्शन सॅ जल्दी ठीक भऽ जेतै।’ चमेलियाक उम्र बड़की दीदी सॅ वेशी छलै। दाई मां के एकगोट इएब बेटी आर तीनटा बेटा छै-छेदी, मंगला आ भोला। दाईमां अबिते हमर कोरा लऽ करेज सॅ सटा लेलक हमर देह आगि जकॉ छीपल छलु ज्वर सॅ। डाक्टर गांगुली बबूजी केँ कहलथिन-‘गुप्ता साहेब! दाई मां तो एई मेये मां, ओ के आर जेूते देबेन ना। सेठानी जीर तो शरीर भालों थाकेें ना । एई निरीह मेय के आर के देखबे। ए तो दाई मां छोड़ेू किछु कोरचे ना.......।’ मां सत्ते अस्वस्थ रहैत छलहि। हमरा जहिया सॅ होश भेल ताहिया सॅ पलंगे पर सूतल देखैत छिऐन्ह कखनौ कऽ कुर्सी पर बैसैत छथि। कहियो ठाढ़ होइतो नहिदेखलिऐन्ह। लोकसभ बजैत छै जे हमरा जन्मक बाद तीन मास घरि ब्लीडिंग होइते रहलनि। ताहि दिन शायद युट्रेस निकालनाई कठिन ऑपरेशन बूझल जाइत छलै। मां के दिक्कत नहिहोइन्ह तयॅ प्रत्येक बच््या लेल एक-एक टा नौकर या दाई राखल गेल छलै। हरियाक काज छलै सब बच््याक नास्ता भोजन करेनाई। राध मांक देख-रेख करैत छलीह आ सरोज आ नीलूक जवाबदेही छलै। बच््या सभ शारे-गुल सॅ मां बेहोश भऽ जाइत छलीह। दोसर अइ बात क दुख छलैन्हि जे एकटा आर बेटे होइ तैन्हि, तैँ हमरा देखऽ नहिचाहैत छलीह। मां बड्ड पैघ ध्रक बेटी छलीह। नाना खानदानी रईस लोक कोलकिंग कहैत छलैन्हि। मां क शरीर आ तेवर दूनू राजसी छलैन्हि। मां क श्रीरआ तेवर दूनू राजसी छलैन्हि। बाबूजी मां के जी जान सॅ चाहैत हलथिन डाक्टर गांगुली केँ कहैत छलथिन-‘डाक्टर साहेब-विजय के मां के किछु भऽ जेतैन्हि तऽ हम बच््या सभकेँ कोना सम्हारबै? कहुना हुनका बचालिअ, कोनो उपाय करू।’ बड़का सॅ बड़का डाक्टर अबैत छलाह मास मास दिन धरि अंग्रेज डाक्टर वाटकिन आ नलिनी रंजन दत्ता क इलाज चलैत छलै मुदा कोनो फायदा नहि। महीना मे बीस-बीस दिन धरि ब्लीडिंग होइत रहैत छलैन्हि। आखिर एक दिन अयलाह डाक्टर विधन चन्द्र राय जो बंगालक मुख्मंत्राी छलाह। विधन बाबू अयला पर घर मे आर्डर भेलै ‘साइलेन्स प्लीज।’ विधन बाबू पंाच मिन धरि मांक नब्ज पकड़ने सोचैत रहलाह। -फेर बजलाह-‘रेडियम थेरेपी दी जाए।’ दादी बात बुझलथिन नहिमुदा बुझेूलैन्हि बहुत खरचाबला इलाज छै। ओ बाबूजी के अपना लग बजा कऽ कहलथिन-‘बाउ! सभ टकातऽ बहुए मे खरच भऽ रहल छऽ। सात-सात गो बच््या जन्मांकऽ ध्ऽ देलथुन ओकरो सभ्ज्ञक वास्ते सोचऽ। ई नखरावाली पलंग पर सूतल-सूतल तोरा नचा रहल छऽ .............।’ मां क ब्लीडिंग बंद भेलैन्हि मुदा टानसिल बढ़ि गेलैन्हि। अहि बीच बड़का भैयाक ब्याह तैय भऽ गेलैन्हि। बाबूजीक जिगरी दोस्त बालूरामजी केडियाक भाईक बेटी सॅ। एक दिन भोर-भोर बालूरामजी हमरा घर पर अयलाह। जाड़क समय छलै। बाहर वला रूम मे बदामक हलुआ खाइत बजलाह -‘भैया साँवर! अहॉ हमर प्रिय मित्रा छी हम एहि मित्राता केँ आपसी सम्बन्ध् कऽ स्थायी बनाबऽ चाहैत छी।’ बाबूजी कहलथिन ‘से कोना हम बुझलहुँ नहि।’ ‘देखू अहॉक बेटा अछि आ रघुक बेटी हमर भतीजी अछि। टकाहम दू लाख गनि देब बस अहॉ हॅ कहि दिअऽ।’ - ‘बालू! मात्रा टकाक बात नहिछै हमरा सोचबाक समय दिअ। लड़की कतेक पढ़ल लिखल अछि?’ ‘अहॉके नौकरी करयबाक अछि। अरे घर गृहस्ती सम्हारबाक लुड़ि छै’। एतबा कहि ओ अपन पगड़ी उतारि बाबूजीक पैर पर घऽ देलथिन। बाबूजी गुम्म भऽ गेलथिन। दोसर दिन हम सभ होमऽ वाली भाभी के देखऽ विक्टोरिया मेमोरल पाछूवला गेट पर गेलहुँ। मां गेलथिन डाक्टर गांगुलियो केँ। मां के सबसे वेशी हमदर्द, सबसे बड़का साइकोथेरापिस्ट, समसत घरेलू समस्याक सलाहकार छथिन डाक्टर गांगुली डाक्टर साहेब के बड़का भाई अपल गांगुली छथि बाबूजीक सालिसिटर। गांगुली बाबू बड्ड पैध् घरानाक लोक। मांक कहब छैन्हि कु समय तीनेटा संग दैत छै पुलिस, वकील आ डाक्टर गांगुली परिवारक बड़का बेटा पुलिस विभाग मे उच्च पद पर छथिन मांझिल अनिल बाबू वकील हुनका सॅ छोट भाई उदयन जे किच्छु कोरेना शुघु गान कोरे ओ कोबिता लेखे।’ हॅ तऽ भाभी के देखि मां बजलीह-‘बांगुली बाबू! लड़की बड्ड दुबर कमजोर बुझाइछने?’ नहि, नहि। सेठानीजी ब्याहक बाद तऽ सब लड़की मोटा जाइत छै।’ मुदा गांगुली बाबू रंग श्याम छै से?’ से तऽ श्यामा मां क रंग कारी छैन्हि। हमरा बंगाली समाज तऽ चोख, नाक देखै’छ मैदा सन उज्जर के कोन महत्व। बड़का भैया शौकिन मिजाजक लोक देखब मे खूब सुन्दर। ओइ समय मे ग्रेजुएट। तैॅ बाबूजीके लड़की देखलाक बाद मन में भेलैन्हि बेटाक लायक पुतौही नहिहेती। मुदा दोस्तीक कारण किछु नहिबजलाह। मामाजी पूछलथिन-‘बहिन ! लड़का राजी अछि?’ मां कहलथिन- ‘हॅ।’ -तखन हम की कहू - ‘अहॉ आ जीजा जी कहियो व्यवहारिक नहिहोएब। एखन सरलाक ब्याह मे एतेक खर्च भेल। बेटीक बाप पाइबला लोक छै। एत आयत तऽ एकटा अंग्रेज गवर्नेस राखि देबै-पूरा ट्रेनिंग भऽ जेतै। -ई तर्क बाबूजी के नीक लगलैन्हि। कहलथिन-जयकुमार ठीके कहैत छथि। पढ़ा-लिखाकऽ स्मार्ट बनाओल जा सकैं’ छ। सरला दीदीके सास तऽ मैट्रिकक परीक्षा नहिदेबऽ देलथिन। बाबूजी विवश छलाह। तै मां के कहैत छलथिन ‘अजयक मां! देखबै हम तोता, मैना केँ खूब पढ़ेबै’-हमरा आ सरोज केँ तोतो, मैना कहैत छलथिन बाबूजी। बाबूजी अपने मात्रा चौथा पास छलाह मुदा स्वाध्याय सॅ तेहन फर्राटेदार अंग्रेजी बजैत छलाह जे क्यो ग्रेजुएट की बाजत। सरिपहुँ बाबूजी जीनियस ब्यक्ति छलाह। मुदा मों अपना कें बाबूजी सॅ वेशी बु(िमान बुझेैत छलीह वेशी महीनी आ सोपिफयानाक दाबी छलैन्हि। कोलकिंगक बेटी छलीह। नानीक आंगनको बैसऽ लेल चॉदीक सिल्ली छलैन्हि। मामा एकलौता बेटा। चर्चारा चारिटा मामा छलाह। पाँचो भौजाई के पाँच-पाँचटा हीरा छलैन्हि। आ हमरा गुप्ता परिवार मे पहिलबेर पॉचटा हीरा क जेवर मां के छलैन्हि तकरबाद सल्लो दीदीक सासुर सॅ हीरा कनेकलेस, अंगुठी, टाप्स नाकक छल सभटा छलैन्हि। बड़का भैयाक ब्याह खूब ध्ूमधम सॅ भेलैन्हि। पन्द्रह दिन घरि उत्सव चलल। बाबूजी हिया खोलि खरच कयलैन्हि। सब नोकर चाकर के इनाम भेॅटलै उतबे नहिओकरा सभक गांव मे जे कर्ज छलै से हो चुकता कएल गेलै। खूब दान र्ध्म मे खर्च भेलै। बाबूजी हमरा सॅ पूछलैन्हि - ‘तोेरा दाई मां के की दिऔ?’ हम कहलिएन्हि - ‘सोनाक चेन आ कंगन।’ राधनर्स इ सुनि जरि गेल। नहिबर्दास्त भेलैं तऽ बाजल-इंह, चमेलोक मां सोन पहिरत..........? मुँह ने कान बीच मे दोकान।’ दाई मां के बाबूजी दू भरिक चेन आतीन भरिक कंगन देलथिन । हमर खुशीक ठेकान नहि। दाई मां के कहलिएन्ह-‘दाई मां बरियात मे अहूँ चलब राध सन लाल साड़ी पहर कऽ।’ -दाई मां बजलीह - राम - राम बुच््यी एहन बात नहिकहू हम विध्वा छी। आइ हमर घरवला रहैत तऽ.......’ दाई मं के उदास भऽ एना बजैत सुनि हमरा भेल कोनो अध्लाह बात हम कहि देलिए। भाभी आबि गेलीह। विवाहक बाद भैया बिमार रहऽ लगलाह। आब हमरा बुझाइत अछि जे मन लायक पत्नी नहिभेलैन्हि तयॅ हुनकर नर्वस ब्रेक डाउन भेल छलैन्हि। मुदा मां के भ्रम छलैन्हि जे क्यो टोना-मोना कऽ देलकैए। बाबूजी बहुत दुखी रहैत छलाह इ की भऽ गेल बेटा क संग। भाभी एको आखर अंग्रेजी नहिजनैत छलीह ने पढ़बा-लिखबाक सेहंता छलैन्हि। छमास धरि सांझि भेर मिसेज विल्किन माथा हुनका संग माथापच््यी करैत रहल मुदा कोनो फायदा नहिभाभीजी केॅ पढ़बा मे मोने नहिलगैत छलैन्हि। हारि थाकि कऽ मिसेज विल्किन बजलीह-मिस्टर गुप्ता-शी इजए रौंग मैच फार योर सन .............दे आर पोल्स अपार्ट।’ ढ़रैत पिअर सांझिक ज्योति समुद्री लहरि संग मिझराकऽ हरियर भेल जाइछ। एखने कनिकाल मे इ समस्त दृश्य कारी भऽ जेतै’। दूर पुरनका किलाक बुर्ज पर नारंगी रंगक रोशनी जरऽ लागत। पता नहिपफोकस लाइट कतऽ पिफट कयने छै। एतऽ बरांडा पर सॅ देखने लगै’छ जेना गुच्छा क गुच्छा रोशनी समुद्रक लहरि सॅ बहरा कऽ किलाक देवार आ बुर्ज पर छिड़िया रहल छै। नहिजानि कियेक एतेक दूरो सॅ ई जादुई-माहौल मे डूयब्रवनिक केर कारी समुद्री राति हमरा बड्ड नीक लगै’छ। तरेगण केहन चटख लगैत छै। तेहने अपूर्व लगै’छ नारंगी रौशनी मे डूबैत समुद्रक लहरि। होटल केर डेक सॅ बान्हल पॉच छहटा मोटर वोट लहरक कोर मे मचलै’छ हम दूनू ऑखि ई दृश्य पीवि रहल छी। हमरा लेल मनोरम दृश्यक अवलोकन आवश्यको अछि अहि नशा मे हम अतीतक छिलका सोहि सकब। कखनौकऽ दूर घुमावदार सड़क पर कोनो गाड़ी तीव्र गति सॅ भगै’छ तथापि बहुत शान्ति छै वातावरण मे। छपाक सॅ एकटा माछ लहरिक ऊपर कूदलै दूर बहुत दूर चलि गेलै। हमर तन्द्रा टूटल। अख्यिासऽ लगलहुँ की सोचैत छलहुँ कथी यादें? हम सोचि रहल छी। सोचैत जा रहल छी। हमरा चारू कात रातुक कुहेस खूब सघन भऽ गेल अछि। दर्दक अनुभव होइछ। जनैत छी ई दर्द हड्डीक भीतर घुसल अछि एकर कोनो इलाज नहि। स्मरण करबाक प्रयास करैत छी लगै’छ जेना बेर बेर कोनो अदृश्य दैत्यक पंजा मुँह के जोर सॅ दाबि रहल अछि असहड्ढ पीड़ा सॅ कछमछा रहल छी। नहि, आब नहिचुप रहब हम। हम कह चाहैत छी अहॉ सॅ हुनका सॅ सब सॅ। अपना मां क लेल दुखी होएब वा हुनकर स्मरण क ई अर्थ नहि जे हमरा हुनका प्रति स्नेह अछि। ओ तऽ कहियो अपना कोर मे लऽ हमरा दुलरो नहिकयलनि। घंटो हुनका रूमक चौकठी लग ठाढ़ देखि अपना लग बजौतीह......... शायद अपना लग रजाई मे सुतौतीह। मुदा नहिकहियो कनिको काल ले अपना लग नहिआब ऽ देलनि। मां बैटीक बीच एकटा शाश्वत दूरी बनल रहल। मां हमरा कहियो अपन बेटी नहिबुझलनि। ममत्वक प्रसंग मे मोन पड़ै’छ दाई मां एखनो बुझाइछ कखनौक’ दाई मां दुलार सॅ हसोथि रहल छथि। पाढ़िवला उज्जर साड़ी, ढ़ील ढ़ाला बड़कीटा ब्लाउज सीध पल्ला आंचरक खंूट मे बान्हल खैनी। भोर सात बजिते दाई मां हमरा रूम मे पहुँच जाइत छलीह आ तखने सॅ हमर जिनगी शुरू भऽ जाइत छल। अविते हमरा चुम्मा लऽ कहै छलीह - बुच््यी ऊठू, जल्दी करू सात बाजि गेलै........ तुरत स्कूल जयबाक बेर भऽ जाएत। मुॅह-हाथ धेआ दैत छलीह फेर हुनका हाथ सॅ दूध्क गिलास लऽ गटगट पीबि जाइ। शुरू भऽ जाइत छल दौड़ ध्ूप किताब कॉपी। प्रफाक क बटन दाई मां जल्दी करू.......पफीता कतऽ छै? दाई मां हमर बेल्ट, दाई मोजा नहिभेंटैए ई नहिनवका जूता-मोजा। देखिऔ दाई मां सरोज हमर नवका जूता मोजा पहिर लेलक अछि। सरोज खोल हमर जूता.....।’ ‘नहि, नहिदेबौ जे करबे से कर।’ दाई मां सरोज जूता नहिदेलक कानऽ लगलहुँ तऽ दाई मां चुप्प करा कहलनि-‘बुच््यी स्कूल जाय मे देरी भऽ जायत। आऊ पुरनके जूता पहिर लिअ सरोज मांक दुलएआ बेटी छै। सरोज के स्कूल जाइतकाल मांक नर्स राध तैयार करैत छलै। बढ़ियॉ सॅ चोटी गूथै रीबनक फूल बना दैतत छलै। दाई मां नीक सॅ ने गूथै छल ने रीबन बन्हैत छल। केश मे तेल ततेक छऽ दैत छल जे माथ पर चुअैत रहै छल ऑखि मे मोट काजर। मुदा की कयल जाय दीदी सभ लग जा कऽ केश बन्हाबी से साहस नहि। स्कूलो मे संगी सभ हॅसैत छल। राध सरोज कें तैयार कऽ नीलू कें तैयार करैत छल बिल्लू के हरिया। खाना मे सब दिन एके चीज भात, दालि आलूक भूजिया से हो जल्दी-जल्दी बस छुटबाक डर। सरोज आ नीलू पहिने तैयार भऽ जाइत छल मुदा हमरा सब दिन किछु ने किछु ताकऽ मे देरी भऽ जाय। क्यो कोनो वस्तु एकठाम नहिरहऽ दैत छल। कहियो जाइत काल देखि जूता मे पॉलिश नहिभेल अछि दाई पॉलिश करऽ बैसए तऽ लेट भऽ गेल। दौड़ैत गेलहुँ ताबत बस हार्न बजबैत भागल। मुँह-लटका कऽ घर घुरलहुँ। मां आठ बजे सॅ पहिने उठैत नहिछलीह। बाबूजी भोरे 6 बजे जूटमील जाइत छलाह। हमर देखिते मां गर्ज लगलीह। ‘बस छुटि गेलौ ने आब बैस घर मे के जेतौ स्कूल पहुँचाबऽ।’ दाई मां कहलथिन-बहुरानी! कनि दरबानजीके कहियौ ने - ‘टैक्सी पर बैसरा देथिन।’ ‘पाई नहिलगै छै टैक्सी मे।’ फेर दाई मां कते निहोरा कयलनि तखन स्कूल गेलहुँ। एखन किछु सोचि नहिपबै छी। बाहर रोशनी जगमगा रहल छै, नीचां डाइनिंग हॉल मे बीथोबन केर सिम्फनी बाजि रहल छै। आ एत बरांडा मे हमरा चारू भर रतुका सन्नाटा पसरल अछि। ई सन्नाटा हमर संग कखन छोड़लक? भरल लोकक भीड़ मे एसगरे तऽ रहैत छी! बड़का घरक बेटीआ बड़का घर क पुतौहु दून्नू ठाम सम्पन्न मुदा हुम केहन विपन्न छी कतेक अभाव झेलैत रहलहुँ अछि! दर्द क संग सुतैत रहलहुँ दर्द क संग उठलहुँ कहाँ? साबुत बॉचल छी। विवाहक एक साल के बद भाभी जी केँ बेटी भेलैन्हि। बाबुजी नाम राखलथिन - गुडीó। गुडीó वास्तव मे गुड़िया सन छल। रंग छलै दादी सन दुध्यिा गोर मां सन कटगर आँखि नाक आ पापा सन तेजस्वी दिमाग। दू वर्ष पुरैत - पुरैत ओ रंग - बिरंगक खेल करय तोतरा तोतराक गीत गबैत छल ओकरा संग खूब मोन लगै छै सबसे मन मोहि लैत छल। एक दिन भाभी आकरा कोरा मे लऽ बरांडा पर ठाढ़ि छलीह गुडीó आ चिलियाँ आ चिलियाँ कहैत रेलिंग सॅ नीचा झुकलै आ मां क हाथ सॅ ससरि गेलै। तीन तल्ला पर सॅ नीचाँ खसलै कोन काल बिसा गेलै से नहिजानि। गुडीóक वियोग सॅ बाबूजी भीतर सॅ टूटि गेलाह। कखनौ गुडीóक बिसरि नहिपबैत छलाह। हरदम ओकर बाललला मोन पड़ैत छलैन्हि। दस मास बीतैत-बीतैत-भाभी जी केँ बेटा भेलैन्हि। मां बड्ड प्रसन्न छलीह। चांदीक थारी बजौलनि। खूब इनाम बक्खसीस बॅटललनि। मुदा बाबूजी कनैत ग्हलाह गुडीóक विरोग मे। शायद ताहि दिन बाबूजी को व्यापार मे बहुत घाटा भेल छलैन्हि। बाबूजी जीवन मे पहिलबेर एहन घाटा उठौलनि छल। समय कच्क बाबूजी कें सेठिया ओतऽ वर्किग पार्टनर शिप स्वीकारऽ पड़लनि। काका सभ व्यंग्य मे कहैत छलथिन ‘भैया! अहाँ सेठजी सॅ बाबू बनलहुँ आ आबतऽ नौकरी करऽ लगलहुँ!’ खैर सेठियाक ओत कहबा लेल वर्किग पार्टनरशिप छलै मुदा बनबारी लाल सेठिया बाबूजीक कोनो निर्णय पर दखल नहिदैत छलनि। स्वतंत्रा रूपें निर्णय लैत छलाह। हिनका अनुभव सॅ सेठिया कें खूब आमदनी बढ़लै। मुदा आमदनी बढ़िते ओकर नीयत ब्रोली गेलै हिस्सेदारी मे बड्ड बेईमानी कएलक। मन-मुटाव बढ़ि गेलै। जूट बाजार मे इ खबरि पसरि गेलै। मामाजी के स्वयं जूटमील छलैन्हि हुनका भनक लगलैन्हि। ओ मां के कहलथिन-‘जीजा जी पानि मे रहि कऽ मगरमच्छ सॅ असरि ठनलनि अछि। हमरा जनते एकर परिणाम-नीक नहिहेतै’।’ मामक आशंका निर्मूल नहिछलैन्हि। बाबूजी कें जिगरी दोस्त समध् िबालूरामजी आ बनबारी लाल सेठिया जहर दऽ मारि देल कैन्हि। ‘दोसर दिन अखबार मे ईसनसनीक खबर छपलै ‘ प्रसि( उद्योगपति श्री सॉवर मलजी गुप्ताक मृतशरीर ..... रहस्यमय मौत। लाश सोना गाछीक बाथ हाउस मे पाओल गेल।’ मॉ कुहरि उठलीस जालिम! एक तऽ बेकसूर पतिक हत्या कयलक ोसर देवतासन पुरूष पर एहन घिनाउन इल्जाम! बाबूजी मौत के बाद नहिमां के कहॉ सॅ अतेक शक्ति आबि गेलैन्हि जे कहियो पार्वान त्यौहर आ शुभ काजक अलावा कहियो पलंग सॅ नीचाँ पैर नहिरखैत छलीह कनिको शोर गुल भेला पर माथक दर्द सॅ बेहाल भऽ सैरिडन खाइत छलीह। से शेरनी जकॉ दहाड़ि कऽ बजैत छलीह-हमर पति मुइलाह नहिहुनका राक्षस सभ मारि देलकनि। हमर घर उजड़ि गेल। हत्यारा सभ के कहियो चैन नहिभेँटतै हमरे जकॉ बहु-बेटी कनतै।’ शायद ऊपर बला मांक आर्तनाद सुनलनि बालूराम जी आन्हर भऽ कऽ मुइलाइ आ बनबारी लाल सेठिया बीस बरस धरि जाबत जीवित रहल घर सॅ बाहर नहिबहरायल अपंग भऽ गेल। पफेफड़ा मे से हो कोनो खतरनाक बिमारी भऽ गेलै प्रायः आक्सिजन पर दिन खेपलक। ओ राति कहियो ने बिसरत बड्ड बोझिल वातावरण छलै। मां एक-एक कऽ अपन पाँचो हीरा खोललनि आर दोसरो जेवर खोलि लेलनि लग मे मात्रा सल्लो दीदी छलथिन। मां सल्लो दीदी कें कहलथिन दादी या काकी सीा पता नहिचलै जे हम जेवर खोलिकऽ कतऽ राखलहुँ ओरिया कऽ राखि दे।’ हम स्तब्ध् छलहुँ किछु ने पफुराइत छल। मां लग ठाढ़ि सरोज सॅ पूछलिऐ दीदी, हार्ट पफेल ककरा कहेै छै? की होइ छै? दीदी जवाब मे कहलनि - ‘एंखन चुप्प रह।’ भोरे बड़का भैया आबि गेलाह। अखबाक समाचार पढ़ि मारवाड़ी समाज आश्चर्यचकित छल तकरा संग एहन सलूक! काका सभ पोस्टमार्टम के बाद दूपहर मे लाश अनलनि। ‘ज़हर खुआक हमरा भाई के मारलक हम बदला लऽ कऽ रहबै।’ मुदा के बदला लेलकै? हमरा ओ दृश्य नहिबिसराइत अछि जखन बाबूजी के चारूभाई कन्हा पर अर्थी पर लऽ गेलथिन। बाबूजी चारू कन्हा पर छलाह पाछू-पाछू दूनू भाई आ जीजा जी ताहि संगे सैकड़ों लोक। अनगिनत गाड़ी। हम खिड़कीक छड़। हमरा सभ मे कुमारि लड़की श्मशानघाट नहिजाइत छैक। मने मन होइत छल ई हमर बाबूजी नहिछलाह जकरा सभ नेने जाइत छै। मूँहो तऽ झाँपल छलै। नहिरहि भेल तऽ दाई मां सँ पूछलिऐ-दाई मां, दाई मां, हमर बाबूजी औता नै। ई जरूर ककरो आन लोकक लाश हेतै। झूठे खबरि छै जे हमर बाबूजी कें जहर खोआ कऽ मारि देलकैन्हि।’ दाई मां तऽ अपने कनैत-कनैत बेहाल छलीह-हे भगवान केहन दिन - देखयलह......।’ कनिते-कनिते दाई मां हमरा आ सरोज कें नहौलक। हम कनैत-कनैत सुति रहलहुँ फेर कानब सुनि निन्न टूटल। देखलिए-घाट पर सॅ सब घुरिकऽ आयल छलाह। डाक्टर गांगुली मां क नब्ज पकड़ि कऽ बैसल छलाह। मां जोर-जोर सॅ बजैत छलीह-डाक्टर साहेब हुनकर हत्या कयल गेलैन्हि। हत्यारा हमर सोहाग उजाड़ि देलक। ‘भाभी अहाँ शान्त रहूँ! हम सभ बदला जरूर लेबै।’ ‘कोना बदला लैबै? आब हम बाल बच्चाक पोसब की घर-द्वारि बेचकऽ ममला-मुकदमा लड़ब?’ बहुत दिनक बाद सल्लो दीदी कहने छलीह जहिया बाबूजी दुनियॉ से गेलाह तहिया मां लग मात्रा पाँच सौ टका छलैन्हि। बाबूजीक अचानक मौत भेलैन्हि। सब टका पाई तऽ बालूजीक गददी मे जमा छलै। आर कतऽ कतऽ पाई छलैन्हि से ककरो बूझलो नहिछलै। बालूजी तऽ सभटा टका पचाइए लेलथिन। ‘काल्हि की हेतै’ बच्चा सभ के कोना पोसब पालब? मां एहि छगुंता मे सदति काल रहैत छलीह। एक दिन बड़का कका कहलथिन-भाभी आब रईसी नहिचलत बड़ा बजारक मकान मे चलू आई दाई नौकरक पफौज हटाऊ।’ मां मुँह झपनहिं कहलथिन-हम कतौ नहिजायब जेना होइत एलैए तहिना सब हेतै हुनकर मान-मर्यादा मे बटाð नहिलागऽ देबै।’ ‘खर्चा चलल कहाँ से?’ भगवान देथिन। स्वर्ग में बैसल बाप अपना बाल बच्चाक एतबो ख्याल नहिराखथिन?’ एहन पफुहड़ि औरत कें के समझाओत? खिसियाक बड़का कका चलि गेलाह। ‘मामला-मुकदमा लेल टका चाही? दोसर कका बजलाह। तऽ मां कहलथिन- हम पैघ खाना दानक बेटी छी अनपढ़ गंवार नहि! हमरा अपना बाल-बच्चा भविष्य देखबाक अछि। मुकदमा कोट-कचहरी सॅ हमरा सभ के सबूत अछि। सार सेठिया के पफॉसी दिया सकैछी। भाई साहब खानकदानक नाक छलाह।’ से जे होइ मुदा हम मामला-मोकदमा क चक्कर मे नहिपड़ब! के जानए काल्हि ओ विजय संग किछु कऽ बैसए!’ ‘की विजय एसगर छै बाप नहिछथिन तऽ कको सभ मरि गेलै? खैर अहाँ के जे इच्छा होए करू हम सभ नहिबाजब।’ मंझिलो कका चलि गेलाह। मामा - मां के कहलथिन-बगल मे जे खालि जमीन छै ताहि मे मकान बना कऽ किराया पर लगा दिऔ। मासे-मास टका भेंटैत रहत घरक खर्च लेल। मां कहलथिन ‘मकान बनाबऽ लेल बहुत टका चाही हम कतऽ अनबै ओतेक टका?’ ‘हम बात तऽ कहलहुँ लाख टका क। तखन रुपैया पैसा एखन हमरो हाथ पर नहिअछि। अहाँ जनिते छी सोध्पुरक कारखाना बन्द भऽ गेल अछि।’ ‘भैया हम अहाँ सँ टका कहाँ मंगैत छी?’ ओहि राति भैया बाबूजी के सपना मे देखलथिन बाबूजी कहलथिन-‘अहाँ सभ जुनि घबराऽ बड़का तिजोरीक दहिनाकातक ड्राअर खोलिक कहियो मां के देख।’ भैया हड़बड़ाक उठलाह मां के जगा कऽ सभटा बात कहलथिन-। मां तिजोरी खोललनि। दहिना ड्रॉअर मे बैंक के पासबुक छलै जाहि मे दस लाख टका जमा कयल छलै। पासबुक मे मां आ भैया दूनू गोटेक नाम छलैन्हि भोरे-भोरे भैया बैंक गेलाह टका निकालननि काजग वास्ते आर टका दोसर बैंक मे जमा कऽ देलथिन। मां अपन हीरक चारू चुड़ी बेच देलथिन। श्रा( कर्म मे कोनो कभी नहिकयल गेलै। अइबेर दिवाली मे ककरो उत्साहे नहिछलै कहुना विध् पुरल गेलै। दिवालीक बाद बगलबला खालि जमीन पर मकानक नेउ देल गेलै’ ध्ीरे-ध्ीरे मकान बनि गेलै। काल्हि राति मे अजीब सपना देखलहुँ। राति मे बारह बजेके बाद ऑखि मुनने होएब। सोचैत-सोचैत अचेतन अवस्था मे घॅसैत चलि गेलहुँ। सपना मे देखलिऐ हम एकटा पैद्य रूम मे बन्द छी। क्यो हमरा दिस झपटैत अछि। आ हम छलांग मारि रूम सँ बाहर लाबी मे भगैत जा रहल छी। अचानक एक्जिट देखाइत अछि। हम घड़घड़ाइत घुमावदार सीढ़ी पर उतरैत जा रहल छी बुझु जे दस मंजिला सॅ एक मिनट मे उतरि गेलहुँ। बड्ड हॉकि रहल छी। देह थाकि कऽ चूर-चूर भ्ज्ञऽ गेल अछि। बुझाइत अछि जे क्यो रस्सी सॅ करेज बान्हि रहल अछि।......फेर एकटा स्वीमिंग पूल........नहिई तऽ गंगा नदी छै बड्ड तीव्र वेग ठहरल पानि नहि। तखने एकटा छोट लड़की के देखैत छी चारि पाँच बरसक ओकरा हेलऽ नहिअबैत छै। ऊब डूब भऽ रहल अछि। अरे ई तऽ डूबि रहल छै हम झटकि कऽ ओकरा लग गेलहुँ। अपना दूनू तरहथ्थी पर ओकरा उनटा पारिकऽ हेलनाई सीखा रहल छी। धरक तेज प्रवाह मे हम तलमलाइत छी। मन मे होइत ई हरिद्वारक गंगा फेर होइछ नहिई बंगला देशक प(ा छै। प(ाक धरक एहन तीव्र वेग! खैर ओ बच्ची हेलनाई सीख गेल। आब ओ भभाकऽ हँसि रहल अछि। ‘देखू, आब हमरा हेलऽ आबि गेल।’ हमरा हमरा ई सुनि अद्भूत आनन्द भेंटल। प्रसन्नता सॅ कहलिऐ- हं, बेटा एहिना हेलब सीखैछ सब।’ भोरे निन्न टूटल। खिड़की सॅ देखलहुँ दूर-दूर धरि अनन्त अथाह समुद्र मोन पड़ल खुका सपना। अर्न्तमनक द्वन्द्व सॅ कहिया छुटकारा भेंटल! की करु!! कलकत्ता जायब तऽ फेर काजक चक्करघिन्नी मे घुमैत रहब। ब्रेकफास्ट के बाद वापस आबि बरांडा पर राखल डेक चेयर पर ऑखि मुनि बैसि रहलहुँ। पिफलिप जबरदस्ती हमरा समुद्रक कात मे पठौलनि। हमरमोन समुद्रक निरन्तरगर्जन सॅ घबरा जाइत अछि। हमरा पहाड़ नीक लगैत अछि। काल्हि रातिबला सपना फेर मोन पड़ल। ओइ सपनाक मतलब नहिबुझाइल कहियो जूडी सॅ भेंट होएत तऽ पूछबै जरूर। ओकरा साइक्रियाटीक अनुसार और सपनाक विश्लेषण की हेतै।’ पिफलिप आ जूडी भारत सॅ एतेक दूर रहितहुँ कतेक निकट लगै’छ। शायद कलकत्ता मे एतेक अपनत्व ककरो सॅ नहिअछि शायद आब क्यो दोस्तो नहिए अछि। काल्हि रातिमे अपन नेनपनक बाते सभ सोचैत सुतल छलहुॅ ताहु मे वेशी मोन पड़ल छल बाबूजीक मृत्युक बात सभ। बाबूजीक मृत्युक समय हम लगभग साढ़े नौ बरसक रहल होएब। बाबूजीक मृत्युक बाद घरक आर्थिक हाल दिनोदिन बिगड़ैते गेलै। ओना बाहरी आडम्बर झाड़ फनूस, तोरण सजाकऽ यथास्थिति रखबाक कोशिश मे मां जी जान सॅ लागल रहैत छलीह। भीतर सॅ रिक्त-तिक्त भऽ गेल छलीह किछु आर कठोर मुदा ध्यिा-पुता लेल बहुत स्नेह आवेश बुझना जाइत छल। नर्स छलैन्हि राध तकरा हटा देलथिन। आब डाक्टर गांगुलि यो वेशी काल नहिअबैत छलथिन। हं, आब दाई मां हुनकर आव-भगत मे लागल रहैत छल। दाई मां सलाहकार, सेविका, हमदर्द जे बुझि सभ छलैन्हि। मां क पलंग-बड़कीटा छलैन्हि से बाबूजीक बिना सुन्न लगैत छलै खाली-खाली सन। दाई मां ओहि घर मे नीचॉ मे गदाक्क ओछा कऽ हमरा सुता दैत छलीह। सरोज, बुल्ली आ छोटका भैया बाबूजीक रूम मे सूतैत छलाह। नीलू कहियो काल नानीक ओत रहैत छल कहियो दीदी लग। हम बाबूजी घर मे जाइत घंटो बरांडक कोना मे बैसल रहैत छलहुँ। आकाश दिस तकैत छलहुॅ तऽ ध्ॅुआ-ध्ॅुआ सन लगैत छल। वेशी काल हम गोरैया चिड़ैं सॅ बतिआइत रहैत छलहुॅ मुदा आब मोने-मोन बतिआइत छलहुँ डर होइत छल फेर जॅ भैया सझ सुनता तऽ की करता की नहि। गोरैया जखन रेलिंग पर आबि कऽ बैसैत छल तऽ हम पूछैत छलिऐ- ‘ए चिड़ियॉ कह ने हमर बाबूजी कहिया औता?’ कहियोकऽ स्कूल सॅ आबि तऽ सीढ़ी पर चढ़ैत काल मन मे होइत छल-बाबूजी अपना रूम मे कान सॅ टेलिपफोन सटौने बतिआइत हेताह। मुदा से दिन कहियो ने भेलै। करीब छ मास बीतैत-बीतैत हमरा विश्वास भऽ गेल आब बाबूजी कें नहिदेखबैन्हि ओ सत्ते हमरा सभ कें छोड़िकऽ चलि गेलाह। तकरा बाद हमरा संग दुर्घटना भेल भैया बला। पैंटी मे जहिया दाई मां खून देखलनि तहिये सॅ मां क रूम मे हमरा सुताबड़ लगलीह। दाई मां बहुत देर घरि मां कें मालीश करैत छलथिन मां औधा जाइत छलीह तखन मालीश करब छोड़ैत छलीह। मांक संग मालीशकाल खूब बतिआइत छल खाली बाबूजी विषय मे। हम चाहैत छलहुँ जे सभटा बात सुनि मुदा ऑखि मुना जाइत छल। एक राति अधरतिया मे निन्न टूटि गेल तऽ सुनलहुॅ मां हुचुकि हुचुकि कनैत छल तइओ पैर दाबि ध्ीरे-ध्ीरे मां लग पहुँचलहुॅ। आ दाई मां के दाई मां उठलीह हुनका ऑखि पनिया गेलैन्हि हमरा कहलनि-बुच्ची! मां कनतीह नहितऽ की करतीह दुःखक पहाड़ खासि पड़लैन्हि माथ पर। दाई मां फेर हमरा लग एलीह तखन नहुॅए सॅ पूछलिऐन्हि- दाई मां दिन मे मां के कनैत नहिदेखैत छिऐनह! बुच्ची अहॉक बहुत जीवटवालीं छथि। जहिया सॅ मालिक विदा भेला कहियो राति मे चैन सॅ नहिसूतलनि। मुदा दिन मे करेज पर पत्थर राखि, सभटा भार सम्हारैत छथि। कहै’ छथिन-‘चमेलिया माथ हम कनबै तऽ बच्चा सभ दिहरू भऽ जायत। कतेक जतन सॅ ध्यिा-पुता के पालैत पोषैत छलथिन। एकरा सभके कष्ट हेतै तऽ हुनकर आत्मा दुखी हेतैन्हि। प्रात भऽ कऽ ई बात हम सरोज दीदी के कहलिउे जे राति मे मां दाई मां संग बाबूजीक बात करैत छै आ कनै छथि। सरोज एक नमर के चुगलखोर ओ ई बात बड़का भैया आ भाभी कें कहि देलकैन्हि। भाभी जी दूनू दीदी कें पफोन पर कहि देलथिन। दूनू बहिन एहि बात पर मां के पफोन कऽ बजलथिन ‘मां अहां एना कनबै तऽ हमरा सभके के देखत।’ सुमित्रा दीदी कहलथिन फेर सरला दीदीक पफोन एलै-मां अहा कहि तऽ किछु दिन लेल हम आबि जाय अहाँ एना कियेक कनैत छी बाबूजी तऽ चलिए गेलाह अहां सब दिन अस्वस्थ रहैत छी एना मे अहूॅ नहिरहब तऽ हम सब तऽ टूअर भऽ जायब।’ मां कहलथिन-‘नहिहम कहॉ कनैत छी के कहलक अहॉ के? हमर तऽ चारूधम सब तीरथ अहीं सब छी। हमर घर तऽ मंदिर अछि। आ अहांक बाबूजी कतहु नहिगेलाह अछि हमरे सभ्क बीच एखनहु छथि। हं, हमरा लोकनि हुनका देख नहिपबैत छिऐनह। एहि पफोनक बाद मां हुक्म भेल जे आब प्रिया बच्चा बला रूम मे सूतत। आब सरोज आ हम एक रूम मे सूतैत छलहुँ आ दोसर रूम मे छोटका भैया आ बुल्ली। दोसर रूम मे सूतैत छलहुँ मुदा दाईमंा हरदम हमरा पर नजरि रखैत छलहि। हमरा याद अछि बाबूजीक देहान्तक शायद छ मासक बाद सल्लो दीदी सासुर सॅ आयल छलीह विवाहक दस वर्षक बाद बेटा भेल छलैन्हि। मां चान्दी थारी बजौलनि। रसगुल्ला बॉटल गेलै। मुदा भीतरे-भीतर हुनका चिन्ता सॅ मन बेचैन छलैन्हि खिचड़िक नेग मे बहुत खर्च होइत छै कोना हेतै’? आइ ओ रहथिन तऽ कम से कम पच्चीस हजारक खिचड़ि देल जाइत। बिल्लू भेल छलैतऽ शानदर नेग बाबूजी पठौने छलथिन। आइ सॅ पैंतिस वर्ष पहिने पच्चीस हजार टकाक महत्व छलै। हलांकि बगल मे मकान बनि गेलै। दस हजार टका प्रत्येक मास किराया मे अबैत छै। आब घर खर्च लेल मां निश्चिनत भऽ गेलीह। मुदा ई ऊपरि खर्च कोना निमाहल जायत। बाबूजी क गेलाक बाद शायद अहि चिन्ता पिफकिर सॅ मां क स्वभाव मे चिड़चिड़ापन आबि गेलैन्हि। बात-बात को खिसिया जाइत छथि। मुदा आर अहठाम हम कियेक मांक अतीतक पोथा लऽ कऽ उनटा रहल छी? कियेक कखनौक एकटा असहम वेदना यॅ कुहइि उठैछ मन-प्राण? केहन अन्सोहाँत लगैत छै अपन मांक आलोचना करब। मुदा बात छै तेहने मां हमरा कहियो स्नेह नहिदेलनि मांक ममता केहन होइ छै हम कहियो नहि बुझलिऐ! तकर कारण इएह जे हम चारिम बेटी छलिऐ। अइमे हमर कोनो दोष? मां चाहैत छलीऐ तीनटा बेटी कछिए आब बेटा होमए। तऽ की गुप्ता हाउस मे बेटी क रूप मे जन्म लेब वा बेटाक रूप मे हमरा वश मे छल? ओनो कखनौ काल मां पर दया होइछ- हुनका जिनगी मे भेटँलनि की? संघर्ष मात्रा संघर्ष। मुदाइ हो सत्य छै जे ओ स्वयं सुखक चिडै़ंक पॉखि नोचि-नोचि कऽ पफेकैत रहलनि। मां एकटा अहंकारी जिद्दी बच्चा जकां छलीह जे परसल थारी पटकी भखलो बैसल रहै छैै। नहिजानि कियेक हुनका व्यथा आ त्रासदी मे कोन सुख भेंटैत छलैन्हि। मंच पर एक सफल निर्देशक जकाँ हमरा सभकेँ अपन त्रासदीक भागीदार बनाइए कऽ सांस लैत छलीह कखनौ अपने व्यथित रहैत छलीह तऽ कखनौ पर पीड़न सॅ सुख भेंटैत छलैन्हि। हुनकर बोली-वाणीक आक्रमकता आ शब्दक चाबुक तड़ाक-तड़ाक पीठ पर पडै़त छलै नील निशान रहि जाइत छलै आ लोक दर्द सॅ कुहड़ि उठैत छल। हम आ छोटका भैया मां क कोप भाजन वेशी काल बनैत छलहुँ। हमरा बुझना जाइछ मां क दृष्टिकोण सॅ महिला क जन्म पाप छला महिला माने एहन हीन स्थिति जेहन क्यो गुलाम होइ जे मालिक बिना जीवित नहिरहि सकै’छ। जँ मालिक असमय चलि गेलाह-सिंहासन खालि भऽ गेलै तऽ युवराज ओइ आसन पर बैसथु। आ सेह भेलै। बड़का भैया युवराजक रूप मे खालि भेल सिंहासन विराजमान भेलाह। मां के हमर किछु नीक नहिलगैत छलैन्हि। ने मुँह-कान ने पैध्-केश ने नमछर देह। सबसॅ वेशी अखरैत छलैन्हि हमर स्वस्थ कद काठी दसम वर्ष होइत-होइत पीरियड्स शुरू भेनाई किशोरी जकां उभार। हरदम टोकैत छलीह- ध्म-ध्म करैत चलै छेँ नहुँ-नहुँ चल ढंग सॅ बैस। कतेक जोर सॅ हँसैत छेँ। केना खों खों कऽ खॉसैत छँ खोंखी दाबि ली तऽ माल-जाल जकॅा गरगराइ छेँ कियेक। कोनो तरेहँ चैन नहि। हमरा एखनो आहिना याह अछि मां के पानि पीबऽ बला बहुत सुन्दर शीशाक केटली छलैन्हि जे हमरा हाथ सॅ छुटिकऽ पफुटि गेलै। चिचियाक क पुछलैन्हि- की पफुटलै। हम-हुनकर आवाज सुनिते भुगलहुँ पछिला बरांडाक रेलिंग पर। एक पैर अइ कात दोसर ओइ कात ध्ऽ नीचॉ खसबैतऽ हमहुॅ मारि जायब।नीके हेत मरि जाइतऽ। हमरा मरला पर कयो कानबो नहिकरत। हं, एकटा दाई मां हमरा ले’ कनतीह। मां तऽ नहि ए कनतीह हुनका तऽ हम मरि जाइ तऽ खुशी हेतैन्हि। हं सरोज आ बुल्ली कनतै। मुदा मरलाक बाद हम बुझबै कोना जे के कनै’छ के नहि? दाई- मां कहै छथिन जे अल्पआयु मे मरैत छै से प्रेत भऽ जाइ छै..... इएह सभ सोचैत छलहुँ ताबत चिचिआइत दाई मां दौड़ल एलीह - बाप रे बाप। ई को करै छी बुच्ची।’ आ हमरा ध्यि कऽ रेलिंग पर सॅ उतारंलनि। सोचत छी तऽ लगैए जे केहन असहाय, अनाथ सन छल हमर बचपन! शायद बैध्ब्य महिलामे हीनभाव आ असुरक्षाक बोध् सॅ कठोर स्वभाव भऽ जाइत छै। मां एसगर भऽ गेल छलीह तैँ हरदम ककरो ने ककरो सॅ बतिआइते रहैत छलीह। पहिने लोक सँ एतेक कहाँ बतिआइत छलथिन। आब तऽ कखनौ दीदी सब सॅ कखनौ बड़की भाभी सॅ तऽ कखनो यमुना मौसी या कमला मौसी सॅ। कखनौ काकीक बेटी राध सॅ। एके बात एकहि घटना मौका बे-मौका सभ सॅ बतिआइत छलीह। ओहुना कोनो बात के बतंगर बनाकऽ दू-दू घंटा। बतिआइत छलीह विषय किछु भऽ सकै’छ। हरिया गँाव-गेल दू दिन लेल आइधरि ध्ुरिकऽ नहिआयल। गोविंद महाराज आब देरी करताह तऽ नौकरी सॅ हाटाइए देबैन्हि। .....बाजार मे सभ वस्तुक दाम बढ़ले जा रहल छै फल कतेक महग भऽ गेलै। आब सब बच्चा केँ मौसमीक जूस देब संभव नहि। आर नहिकिध्ु तऽ बेट क बढ़ई। श्रवण कुमार अछि हमर बेटा! एहन बुझनुक बेटा नहिरहैत तऽ हम सभ एखन-सड़क पर रहितहुँ......। हमर अपन दियादनी सभ की सभ नहिकयलनि जादू टोना समेत मुदा भगवतीक कृपा हमर बेटा सरिपहुँ मातृभक्त अछि। एक मात्रा बड़की काकी के माहेँ मां नहिकिछु बजैत छलीह ओ चुकी निर्दलीय छलीह जे क्यो किछु अदगोई- बदगोइ कहैत छलैन्हि से अपने मन मे रखैत छलीह। दियाछनीक बाद ननदि सभक सिधंस शुरू करैत छलीह..... सभ खालि लेबऽ लेल मुँह बौने रहैत छथि...। दरअसल मां के भेटँलनि की? कोन विषय पर चर्चा करतीह। हर साल एकटाक बच्चा जन्मौलनि! आ बच्चाक कारण महिलाक शरीर खोखला भऽ जाइत छै ताहू अतेक संतति। पहिने अपनाध्यिा- पुताके कयलहूँनी फेर सन्तानक बच्चाकोँ। इहए सब खरेहा लोक केँ सुनबैत छलीह। .......की कहँू कहियो चैन नहि सालोभरि पावनि त्यौार ताहि मे बेटी सभक सासुर मे सनेश पटेनाई! खर्चक कोनो अन्त नहि। अहिना गप्प पर गप्प पफोनो पर आ लोकोलग। ओना कोनो काजक गेर कखनौ हरिया के तऽ कखनौ लक्षमिनियॉ वा सीताराम केँ मुदा गप्प करबाकाल बड्ड पफुर्ति रहैत छैन्हि। अर घर मे पछिला पचास वर्ष सॅ नौकर बदलाइत रहल अछि मुदा कोनो नब नाम नहिसुनलहुॅ। जे आयल तकरा पुरनके नौकर वला नाम सम् शारे पाड़ल जाइत रहल अछि। खैर नाम मे की राखल छै हँ, तऽ बेचारा सीताराम तीन वर्ष धरि बर्तन-बस्सन मंजैत रहल ओकरा गेलाक बाद जे आयल तकरो नाम रहलै सीताराम। एहिना हरी छोटे मे आयल छल पहने हरि फेर हरिया कहल जाइत छलै जखन बूढ़ भऽ रिटायर भऽ गाम गेल तऽ आयल बेचन ओकरो नाम रीलै हरिया। दाई मां क अलावा दू टा नौकरानी छलैन्हि मां केँ। राध नर्स चलि गेलै मुदा एखन जे नौकरानी छै तकरो नाम छै राध। जखन मां क्रो( मे रहैत छथि तखन रध्यिा कहि कऽ शोर पाडै़त छथिन। पछिला तीस वर्ष सॅ छाई मां के गेलाक बाद मां के देख-रेख करैत छैन्हि रध्यिा आ कृष्णा। तकर अलावा साक्षात राजलक्ष्मी बड़की पुतौहु आगाँ-पाछाँ करैत रहैत छथिन। मां क कहव छैन्हि भगवानक नाम रखने अनायास लोक अनेक बरे भगवानक नाम लऽ लै’छ। तखन हमर नाम प्रिया के राखलक? डा॰ अमृता कौर नहि, नाम रखलक राध नर्स! कृतज्ञ छी हम नर्स राध्क। सुमित्रा, सरला सरोज आ तकर बाद जँ हमर नाम सावित्राी राखल-जाइत तऽ? ओ तऽ राध नर्स राध नर्स कहलकै आब ‘स’ अक्षर सॅ नाम नहिरखियौ नहितऽ पांचम बेटीए होएत। एकटा बात बुझलहुँ मां के जँ दूइओ मिनट एसगर रहऽ पडै़त छैन्हि तऽ ओ घंटी पर घंटी बजा कऽ आडन घर केँ आन्दोलित कयने रहैत छथि। पलंग के सिरमा लग भैया कॉलिंग वेल लगबा देलथिन। मां बटन दबबैत रहैत छथि लोक दौड़ल- जाइत छैन्हि पूछऽ। वेशीकाल बड़की भाभीजी आ छोटकी भाभी जी जा कऽ पूछैत छथिन - ‘मां जी! की भेल? किछु चाही?? -नहि, रानी! ई रध्यिा कखनौ एकठाम टिकते नहिअछि। आ अहाँ सभके अपन ध्आि पुता ओझरौने रहै’छ। हमरा माथ मे दर्द होइत अछि तैँ घंटी बजौने छलहुँ जे रध्यिा बाहर सॅ आओत। - ‘मां जी कहू न कोन दवाई दी?’ - ‘सरिडान आ एकटा हार्टवला दवाई लिब्रियमा दवाई दऽ कऽ भभी जी घुरऽ लगैत छलथिन तऽ मां कहैत छलथिन अरे क्यो तऽ रहू- हमरा लग। हमरा लग। हमर मन घबरा रहल अछि।’ आ बड़का भैया केँ जँ ऑपिफस सँ घुरिकऽ। घर आबऽ मे आधे घंटाक देरी भेला पर हाय तौबा मचा दैत छलीह.......’ हे भगवान! आकाश मे बिजुरी चमकै’छै चारू भर मेघ लागल छै..... हमरा बड्ड चिन्ता भऽ रहल अछि। करेज थरथरा रहल अछि.... कहीं एकसीडेंट नहितऽ भऽ गेलै?’ - ‘मां जी! किछ नहिभेल हेतै’ अबिते होयताह कियेक चिन्ता करै छी।’ जँ रातुक बेर रहैत छलै तऽ कहैत छलथिन- ‘सब दिन कहैत छिऐ वशी राति कऽ नहिअबि। जमाना खराब छै, बाट-घाट मे चोर-डकैत अवसरक ताक मे रहै’छै।’ जहिया सही समय पर भैया घुरि कऽ अबैत छलथिन तऽ सबसे पहिने मां क रूप मे जाइत छलाह मां बैसल रहैत छलथिन ओ हुनके- लग सूतल-सूतल अपन दिनचर्चा सूनबैत छलथिन। ओ समय समिट कांप्रफेन्सक रहैत- छलै तखन आर क्यो गप्प-सप्प भेला क बाद मां बेटा भोजन लेल बैसैत छलाह तऽ बड़की भौजी बैसि कऽ भोजन करबैत छलथिन। बाबूजीक स्थान लेलैन्हि बड़का भैया। ध्रक आर सदस्य सहमल-सहमल अपना-अपना रूपमे रहैत छल। सभकेँ अंदेशा रहैत छलै नहिजानि आइ ककर पेशी हेतै’? ककरा डॉट-फटकार लगतै?’ एकटा सांझि ओहिन याद अछि। ओना त अपन नेनपनक कतेक सांझि ओहने बीतल छल। छुटीð मे सब दुपहरिया मां क नाम समर्पित करऽ पडै़त छल। हुनका नजरिक सामने बेसल रहू हुनका कंखन कोन वस्तुक जरूरत पड़तैन्हि। पहरा दैत बीतैत छल दुपहरिया। हं, तऽ सांझि भेल जाइत छलै’। पछिला बरांडा मे मां कुर्सी पर बैसल छलीह। बगल मे मोढ़ा पर बैसल सल्लो दीदी स्वेटर बुनैत छलीह। नीचॉ सॅ सरोज, नीलू आ बुल्लीक आवाज सुनाइत छल। किछु पड़ोसियोक ध्यिा-पुता खेलाइत छलै खूब जोर-जोर सँ सब बजैत छल- ‘आलकी पालकी जय कन्हैया लालकी......... मां हमहूँ जाउ खेलऽ।’ की एक दिन नहिखेल जयबें तऽ मरि जयबें? देखैत छहीं सल्लो चुपचाप बेसल छै, यानी पीरियड्स मे। किछु बुझऽ सूझऽक अवगति नहि। जरलाहो मासे-मास ई आफत! ;पीरियड्सद्ध आ बड़की ;बड़की भैजीद्ध राजलक्ष्मी नैहर गेल छथि मां बजौने छलथिन। मास दू बेर-तीन बैर नैहरकचक्कर लगबैत छथि। मां-दस दिन बीतैत-बीतैत पफोन करऽ लगैत छथिन ‘समध्नि! पारो केँ पठा दिअ।’ मन तऽ होइत कहिऐन्ह सब दिन राखि लिअ अपने ओतऽ। एक दिन आजीज भ कऽ कहबो कयलन्हि - ‘एक आबऽक काजे कोन ओतहि रहतीह!’ -पुतौहु बजलीह- मां अहाँ एना कियेक बजलिऐ?’ कोन अनर्राल बजलहुँ। अपने तऽ जाइते छी संगे मुन्नो के लऽ जाइत छी। घर केहन सुन्न भऽ जाइछ। मोन नहिलगैए। दोसर बात ई जे ओतऽ अल-बल खा लै छै आ बिमार पड़ि जाइत छै। तखन डाक्टरक पफीस कियेक नहिनानी दैत-छथिन। कहू तऽ चोर बगान रहऽ योग जगह छै? चारू भर रांदगी नाक नहिदेल जाइ छै।’ फेर हमरा दिस तकैत बजलीह- ‘प्रिया जो हमर केश झाड़ऽ बला ब्रश नेने आ।’ जाए लगलहुँ ब्रश आनऽ नऽ सल्लो दीदी के कहलथिन ‘सल्लो, देखहि ई तऽ दिन दुगुना राति चौगुना बढ़िते जाइत छै ऊँट जकां। आ बु(ि-ज्ञान रत्ति भरि नहि।’ मां क ब्रश देलऐन्हि केश झाड़ वला तऽ बजलीह बिना अयनाक केश थकड़ब? सल्लो! कनि एकए टूेनिंग दऽ लुड़ि-व्यवहार सीखा। केना सासुर जायत एहन अलबटाहिके कोन लड़का पसिन्न करतै? हम अयना लऽ कऽ झटकल एलहुँ तऽ कहलनि जाइत छलेँ तऽ पूछिते ने आर की चाही? मूँहपोछऽ वला तौलिया आनि दे।’ तौलिया आन जाय- लागलहुँ तऽ फेर चिकरलनि-‘कत जाइत छेँ?’ ‘तौलिया आनऽ।’ तौलिया गेल भाड़ मे। पहिने ‘चूडि कोलोन’क शीशी आनि दे। बाप रे माथ मे दर्द होमऽ लागल। -‘यूडिोलोन’क शीशी लऽ कऽ एलहुँ फरमान जारी भेल-माथ मे लगा। माथ मे यूडकोलोन लगबैते छलिऐन्हि की फेर बजलीह-माथ दाबि दे दर्द- होइए।’ माथ दबैत छलिऐन्ह तऽ हुकुम भेल- ‘ध्ुरऽ केना जातै छेँ हाथ मे दम नहिछौ? खाइ छथि भरि थारी......।’ हमर ऑखि नोरा गेल सल्लो दीदी दिस तकलहुँ मुदा हुनका हिम्मत छलैन्हि जे किछु बजितथि! कनि कालक बाद फेर चिकड़लनि ‘बाप रे बाप कत्ते जोर सॅ दाबि रहल छेँ हाथ छै की लोहा....? जो हट हमरा टेलिपफोन आनि कऽ दे। -टेलिपफोन आनि कऽ देलऐन्ह तऽ कहलनि ‘यमुना मासी से बात करा।’ नमबर लगा कऽ चोंगा कान मे सटेलहुँ -‘मां ऑपरेटर कहैत अछि एखन लाइन एंगेज छै।’ -गदही, मुँह मे बकरा नहिछै-‘कहलही कियेक नहि जे अर्जेंट बात करबाक छैक, जलदी-लाइन दे।’ फेर हमरा कपड़ा पर नजरि पड़लनि। समीज एतेक गंदा केना भऽ गेलौ? हरदि कोना लगलौ? खा कऽ समीज मे हाथ पोंछि लेलेँ। केहन ढ़हलेल भऽ गेलै’ ई कहियो नहिसुध्रत!’ मां, हमरा समीज मे बुल्ली हाथ पोछि लेलक। हम तौलिया सॅ हाथ पोछैत छी।’ ‘पोछऽ कियेक देलही? जो बदल कपड़ा चमैन सन लगैत छौ!’ ढ़हलेल, अपराजक, अलबटाहि कतेको उपाध् िसॅ विभूषित भऽ हम कपड़ा बदलऽ गेलहुँ। बुझायल पीरियड्स शुरू भऽ गेल। ओह! आब जँ एखन मां कहबनि तऽ फेर चालू भऽ जयतीह ध्ंटो की कहॉ बजैत रहतीह। ठीक छै आइ पहिल दिन छै परसू माथ धे कऽ नहा लेब। पैड लेब लेल डेराइत-डेराइत मां के कहलिऐन्ह -‘मां पीरियड्स......’ मुँहक बात बहराइते भयानक विस्पफोट भेलै। -‘चंडाल! आइए इ हो होयबाक छलौ। काल्हि तोहर बाबूजीक बरखी छैन्हि। पीसी, काकी सब जुटतै। एकर काकी क तऽ गी(क दृष्टि छै ओ तऽ देऽते कहथिन- सल्लो! ई तऽ दस साढ़े- दस बरख उमरे मे चौदह बरसक देऽबा मे लगै’छ। मां बड्ड असहज भऽ दीदी दिस तकलनि। दूनू गोटा किछु पफुसुर-पफुसुर बतिऔलनि हम नहिसुनि सकलहुँ। हँ भीतरे-भीतरे उफान उटल छल पीरियड्स होइछ ताहि मे हमर कोन दोष? बिना अपराधे के हरदम बात सुनैत छी। आ केहन निर्मम सजा भेँटैत अछि काल्हि भरि दिन पाछँा बला बराांडा मे बन्न रहऽ पड़त। बीच मे नास्ता, भोजन दाई मां दऽ जाइत छलीह -ऽा ले बुुच्ची।’ -‘दाई मां हम बाथरूम जायब।’ -बुच्ची, भरल आंगन लोकसभ छै हम कोना एऽन लऽ कऽ जाउ? बहुरानी त हमरा कांचे जीबा जेती। कनि ध्ैर्य राऽू चुच्ची। आहंक पीसी आ काकी सभ आंगन सॅ हटतीह तऽ हम लऽ जायब। भादवक उमस बला दुपहरिया आ एसगर गुमसुम बैसल रहब। हमर अस्तित्व डॅामाडोल भऽ रहल अछि। मां हमर कोन दोष? हमरा की नीक लगै’छ दूनू जांघक बीच ऽुन बहब? आ नाहि लेल एहन चातना। हमरा केहन आत्मग्लानि होइछ से मां के बूझल छैन्हि? की ओ हमर अपराध् बोध् अनुभव करैत छथि? एऽन धरि ई कस्ट सरोज के नहिभोगऽ पड़लै ओ तऽ हमरा सॅ पैघ अछि! सुनैत छिऐ जे सल्लो दीदी के चौदहम वर्ष मे पीरियड्स शुरू भेल छलैन्हि। तऽन हमरा अहि उम्र मे कियेक भेल? पॉच बजे मे दाई मां बरांडाककिवाड़ ऽोललैन्हि। मां ध्ीरे सॅ कहलनि कपड़ा तेना पफेकीहे जे ककरो नजरि नहिपड़ै।’ सरोज, बुल्ली, नीलू आ छोटका भैया बाहर ऽेलाइत छल। बुल्ली हमरा देऽिते चिढ़ाबकऽ लागल -‘ए अछूत कन्या! अछूत....।’ लाजे ऑऽि झुकि गेल। तऽ सब केँ बूझल छै? ‘दाई मां! हमरा देह सॅ प्रत्येक मास कियेक ऽून निकलै’छ!’ दाई मां कहलनि -‘होइत छै सबके मुदा अहॉ केँ -जल्दी भऽ गेल।’ ‘हमरा जल्दी कियेक भेल?’ -आब हम की कहू-दाई माँ उसाँस लैत बजलहि। -ओइ दिनक दुर्घटनामे पैंटी मे ऽून लागल छल। आ ओकर दू मासक बादे सॅ मासे-मास ऽून ऽसैत अछि। एकर माने हमर कस्टक कारण छथि बड़का भैया। सौंसे शरीर मे जेना आगि लागि गेल। बड़ी काल धरि कनैत रहलहुँ। -‘दाई मां! हरा सँ मां चिढ़ल कियेक रहैत छथि?’ बुच्ची! अहाँ सब तऽ शहर मे छी। गाँव मे तऽ जँ कोनो लड़कीकेँ ब्याह सॅ पहिने मासिकर्ध्म होइत छै तऽ लोक कहै छै जे माय-बाप केँ पाप बढ़ैत छै?’ -दाई मां अहीं कहैत छी पीरियड्स केँ मासिकर्ध्म! तऽ र्ध्म मे पाप केना बढ़ै?’ दाई मां कहलनि हम पढ़ल-लिऽल नहिछी लोेकक मूँहेँ जे सुनलिऐ से कहलहुँ।’ हमरा किछु बुझबा मे नहिआयल। बस एतबे बुझलिऐ जे हमरा संग बहुत गलत भेल। शायद एकरे पाप कहैत छै। आ तैँ मां हमरा सॅ एतेक घृणा करैत छथि। हमर कोनो बात नीक नहिलगैत छैन्हि-हॅसब, बाजब, चलब एतवे नहिदेह बाढ़ि सॅ देह मे लुत्ति लागि जाइत छैन्हि! हम एतेक लम्बा कियेक भऽ रहल छी? हमर रंग ऽूब उज्जर दूध्यिा गोराई नहिअछि। मां बाबूजी दूनू गोटे ध्प-ध्प गोर। दूनू भाई आ बहिन सभके रंग ऽूब साफ हँ बड़की दीदी के गेहुऑ गोराई छैन्हि हमरे जकॉ। नहिजानि कियेक बाहरी लोक केँ चाह देबऽ काल हमर हाथ कॉपऽ लगै’छ। तहिना कतबो सतर्क रहैत छी तइओ चलैत छी तऽ ध्म-ध्म आवाज होइत छै। हम हरदम ओइ परिक कल्पना करैत रहैत छी जे अपना छड़ी सॅ छूबि कऽ लोककेँ सिंडूेला बना दैत छै एक बेर हमरो ओहि छड़ि सॅ छुबि दैत तऽ हमहूँ सिंडेला बनि जाइ। आब हमरा एकदम मन नहिलगै’छ कछु मे। मोन नहिपडै़ए जे कऽनौ कनैत काल मां दुलार कऽ कोरा मे उठौने हेजी। चाहेँ हम भूऽ सॅ कनैत होइ या पेटक दर्द सॅ। कतौ ऽसलौह कतहुँ छिला गेल या कथु सॅ आंगुर कटि जाय। मां चिचियाकऽ दाई मां के शोर पाड़तीह ‘ए चमेलिया माय देखियौ की भेल बेटी केँ। आब एऽन सॅ करैत रहू दवाईबिराँ। हमरसभटा परिचर्या करब दाईमांक काज छलैन्हि। हमरा बोखार लगैत छल तऽ राति-राति भरि दाई मां सिरमा मे बैासल रहैत छलीह। आ जँ बोखार दू-तीन दिन मे कम नहिहोइत छल तऽ दाई मां- मां लग जा कऽ रिरिआइत छलीह - ‘बहुरानी! तनि गांगुली बाबू के बजा दियौ ने। तीन दिन सॅ बुच्चीक बोखार सॅ देह ध्ीपल रहैत छै अहॉके कनिको दया-मया नहिअछि? एऽन सरोज बौआ या नीलू केँ कनि सर्दी हेतै’ तऽ तुरते डाकटर साहेब के बजालेब।’ -‘हमरा की कहै छेँ तोहर बेटी तऽ धेड़ा सन मजबूत छौ ठीक भऽ जेतै। डाक्टर गांगुली मंगनी मे नहिअबैत छथिन पफीस देबऽ पड़ैत छै।’ दाई मां ऑचर सॅ नोर पोछैत हमर रूम मे आबि सिरमा मे बैस जाइत छलीह वा तरबा सोहरबैत छलीह। आ हुनकर आत्मलाप शुरू भऽ जाइत छल। -‘लगिते नहिछै जे बहुरानीक ई अपन बेटी छैन्हि, कनिको दया-मायाक लेस नहिसतौतो माय के एहन पत्थर करेज नहिदेऽलहुँ! जहिया सँ मालिक गेलाह हिनकर स्वभाव आर कठोर भऽ गेलैन्हि।’ हम चुपचाप सोचैत रहैत छलहुँ मां केँ कोना ऽुश करि। तैँ ऽेलऽ कूदऽ के वयस मे हम सियान नर्स जकाँ हुनकर सेवा करैत छलिऐन्ह। मुदा ध्ीरे- ध्ीरे हमरा बुझा गेल सभटा व्यर्थ प्रयास अछि। ठुनका हमरा प्रति रत्ती भरि स्नेह ने छैन्हि ने कहियो हेतैन्हि। एक दिन हम अपना ने संगि सॅ पफोन पर बतिआइत छलहुँ। मां आबि गेलिह। हाथ सॅ टेलिपफोनक चोंगा ल कऽ नीचाँ मे पटकि देलथिन आ तड़ाक-तड़ाक थापड़ मारलनि -दिन भरि पफोन कान मे सटौने रहत।’ मां क आवाज सुनि बड़की भाभी दौड़ल एलीह। ठोर पर आंगुर राऽि हमरा चुप्प रहबाक इशारा कयलनि। बहुत देर के बाद पता चलल बगलबला मकान सँ एकटा किरायादार जा रहल छै। तैँ मां क पारा गरम छलैन्हि जाबत नव किरायादार नहिएतै ताबत दूसौ रूपयाक घाटा हेतै। जे होउ हमर कोन गलती क्रोध् होइत छैन्हि तऽ हमरे बात कहि मोन शान्त करैत छथि घर मे आर बाल-बाच्चा नहिछैन्हि? की सरोज-पफोन पर नहिबतिआइत छै- ओकरा कऽनो टोकबो करैत छथिन। हमरे एतेक गंजन कियेक करैत छथि की हम हुनकर बेटी नहिछिऐन्ह? मोन बड्ड अशान्त छल। दाईमां के पूछलिऐन्ह -दाई मां सच-सच कहू आहँके हमर सप्पत हम अहॉक बेटी छी? ओ हमर मां नहिछथि?’ हे भगवान! ई कोन बात भेलै। अई मे सप्पत देब बला कोन गध्! अरे बुच्ची अहूँ हुनकेकोऽि सॅ जनमलहुँ। डाक्टर अमृता साक्षी छथि। हमर भेला ताहि दिन तीन बरऽक छल। हमरा बड्ड दूध् होइत छल। भोला के गाम में छोड़ि कऽ आयल छलहुँ तऽ अपन दूध् अहिँ के पीबैत छलहुँ। तऽ हमर संगी कुमकुम कियेक कहलक जे ‘ई तोहर अपन मां नहिछौ सौतेली मां छौ?’ ‘सुनू बुच्ची! ओकर सभक बात पर ध्यान नहिदिअ। असल मे ओ देऽैत छै जे आर सभ बाल-बच्चा केँ दुलार-मलार करैत छथिन अहाँके कऽनौ नीक बातो नहिकहै छथि। तैँ हने हेत। मुदा ई बात जँ अहांक मां के कान मे जेतैन्हि तऽ ओ अहिंक कपाड़ पफोड़ि देती। कुमकुम केँ की बिगड़तै।’ -‘एऽन हम कतऽ छी? ई कोन स्थान छै?’ .......ओइ हम तऽ डूयब्रवनिक छी। आँऽि निन्न सॅ एऽनो बोझिल लगै’छ। सूर्यक- घाही एऽनो छै। हम डेक चेयर पर बैसल बैसले सूति रहल छलहुँ। पैर लग कॉपफीक कप ओध्रायल छल। एक दिस किताब आ डायरी छल। आई शुक्र छै। एत आयल चारी दिन भऽ गेल। उठि कऽ ठाढ़ भैलहुँ। हमरा ई बालकनि बड्ड नीक लगै’छ। दूर-दूर धरी लहराइत समुद्र। किलाक बुर्ज पर किछु सैलानी ठाढ़ छै जे एतेक दूर सॅ मात्रा छोट सॅ आकृति बुझाइछ। हवा कझोंका पहाड़ दिस सॅ आबि कऽ गाल छूबैत अछि शीतलता सॅ मन प्रसन्न भऽ जाइछ। हमरा ऽिड़की सॅ बगीचाक देबालक पीठ झलकै’छ आ किछु लतर देऽाइत अछि ओइ लतर पर भोर का सूर्य क किरण चमकै छै। लगे मे अंजीरक ऽूब पैध् गाछ छै एकटा अल्हड़ लड़कीक ऽिलऽिलाक हॅसऽ जकाँ हवा पात-पात पर झुमैत बुझाइछ। ई हवा हमर आशान्त मन के प्रपफुलित कऽ नव ताजगी दऽ रहल अछि। हमरा ऽिड़कीक पर्दा पर ध्ूप-छॉह का ऽेलौड़ भऽ रहल छै। आइ पूर्ण विश्राम लेब। ओना तन ध्ुर-ध्ुरिकऽ अतीत के ऽुरचैत रहै’छ। मुदा ओइ-ऽुरचन मे हमरा भेटँत की ...... की हम अपना आपके वापस कऽ सबक? मन क जख्मी चिथड़ा के टुकड़ाकेँ जोड़ि सबक? हं प्रयास कऽ सकैत छी। आ सेह कऽ रहल छी। नहिजानि कियेक बचपन मे हमरा मां बौकी ढ़हलेल, बकलेल नामे ध्यने छलीह। बाबूजी कहियो एना नहिबजैत छलाह ओत सदति काल बजैत छलाह-हमर ई बेटी बहुत तेज अीछ ऽून पढ़त विदुषी होएत। आ मां हमरा एकदम फूहड़ बुझैत छलीह। हुनकर देल विशेषण एऽन धरि अचेतनमन मे सई जकां गंथल अछि। आ तैँ अहू उम्र मे जँ क्यो हमर प्रशंसा करैत अछि तऽ विश्वास नहिहोइत आछि। कोनो कॉम्पटनीमेंट केँ हम ग्रेसपफुली नहिलऽ पबैत छी। हँसैत काल दांत देऽाइत छल त सब भाई-बहिन हमरा दंतुली नाम ध्यने छल। सबसॅ रंग कम छल तऽ मां क आया राधक कहब छलै कतबो साबुन लगौती प्रिया तइओ सरोज सन उज्जर नहिए होयतीह। अपना वर्ग मे सबसे वेशी लम्बस छलहुँ तयॅ हमरा सब दिन पछिला बेंच पर बैसऽ पड़ैत छल। कहियो कोनो प्रश्नक जवाब नहिदऽ पबैत छलहुँ। घर मे हमरा लेल नव जूता अबैत छल तऽ पहिने सरोजे पहिरैत छल नव डूेस आबयतऽ पहिने सरोज पहिरए। साज-श्रृंगार मे हमरा कहियो रूचि नहिरहल। स्कूलक बाद जऽन कालेज मे प्रवेश कयलहुँ तऽ संगी साथी सब कहलक चेहरा केहन सुरेबगर छै! तऽ हमरा विश्वासे नहिभेल। लड़का सब सँ हम सहमल रहैत छलहुँ। दोसर बात ई जे सब हमरा नजरिमे बच्चे छल। पता नहिहमर केहन दिमाग छल जे चौबीस-पच्चीस वर्षक हमरा बच्चा सन बुझाइत छल। समय सॅ पहिने हम सियान भऽ गेल छलहुँ! -रिजेक्ट! रिजेक्ट देम टोटली-हमर मन कहैत छल। हमर सपना बदलि गेल छल आ हम ऽुब चैन सॅ ओइ सपना के देऽैत छलहुँ। ऽासकऽ सपना ओहने देऽैत छलहुँ जकर वास्तव मे अभाव ऽटकैत- छल। असल मे हमरा अर्न्तमन मे एक असुराक्षित लड़की छल जकरा एऽनो अपन बाबूजी रक्षक छलह। हुनकर जीवन शैली सभटा हमरा लेल गौरव क बात छल। हम पुरूषक निर्मम पक्ष नहिदेऽने छलहुँ कियेक तऽ हमर पिता शाऽा-प्रशाऽा पसारने एकटा वट-वृक्ष छलह। तैँप्रत्येक पुरूष मे हम हुनके छवि तकैत छलहुँ। सुरक्षा हं, सुरक्षाक गप्प तऽ छलैहे जे हमरा बड़का भैया सॅ बचाबए। हमरा ओ राति नहिबिसराइत अछि जहिया भाभी जी बड्ड बिमार छलीह आ सरोज सूतैत छलहुँ। ओ राति मे ससारिक हमरा पीठ लग सटि कऽ पफुसपफुसाकऽ बजैत छलाह प्रिया ए प्रिया आ तकर बाद हम सांस रोकि भगवान के नाम लऽ मने मन विनती करि हमरा बच्चा लिअ भगवान। बहुत देर धरि पीठ पर कोनो कड़ा वस्तुक रगड़बाक अनुभव होमए करेज ध्क-ध्क करैत छल। फेर लगैत छल लसलस जकां समीज मे चादर मे। दाई मां भारे मे विछावन झाडै़त काल चादरि मे दाग देऽि हमरा दिस तकैत छलीह तऽ हमरा हुनका दिस ऑऽि उठा कऽ ताकि नहिहोइत छल। एकटा पाथर पर जीवित आदमी अपना केँ ध्सैत छल। सब दिन एहन नहिहोइत छलै मुदा तीन चारि मास मे कतेको बेर एहन भेलै। हम राति-राति भरि डरेँ सूति नहिपबैत छलहुँ! बी.ए. फाइनल के परीक्षा छल आ मोन एकाग्र नहिभऽ रहल छल। कॉलेज सॅ घर घुर बाक इच्छा नहिहोइत छल। सूरज डूबिते एकटा दहशत घेर लैत छल। पता नहिआइ भैयाकतऽ सूतता जॅ फेर हमरे रूम मे.....।’ एक राति सूतल छलहुँ डरेँ निन्न तऽ नहिए भेल छल कि भैया जोर सॅ बिठुआ कटलनि- हम उठिकऽ भगलहुँ बरांडा दिस दाई मांक विछावन नीक लागल अपन पलंग केर डनलप सॅ। भोर मे उठलहुँ तऽ दाई मां कहलनि- बुच्ची आब हम चुप्प नहिरहब। आब बहुरानी के अवएसे कहबैन्हि।’ -नहिदाई मां! अहॉ केँ हमर शपथ। दाई मां। अहाँ ककरो किछ नहिकहबै। ई हमर कर्मक दोष अछि। आब हम कुमारी छी कहाँ? दुःऽ आ क्षोभ सॅ दाई मां करेज पीटऽ लगलीह। अइ- बड़का घरक दाई मां बड़का घरक बेटीक दुऽ सॅ दुऽी भऽ बस एतबे बजलीह- केहन कुकर्मी छै अपना माय बहिन के नहिछोड़लक से कतौ मनुष होइ ई तऽ साक्षात राक्षस छै एहन देह मे आगि उठलै तऽ कोठा पर जाइत।’ मुदा आब हम बजबै। बाजऽ पड़त। मुदा कहबै ककरा? आर ककरा कहबै ऊ राक्षस आय एतै तऽ कहबै। की कहबै? हमरा नहिध्ू। निर्लज मानि जायत। हमरे उनटे गरदनि दवा देत। अहि घर मे सरोज छै ओकरा कहाँ ध्ुबऐ छै? हम एमरे शोषण कियेक करैत अहि? मां ठीके कहैत छथि- हम बौकी छी। बेवकूफ छी, अप रोजक छी .....।’ राति मे साढ़े नौ बजे भैया बरांडा पर ठाढ़ भेल ािगरेट पीबैत छलाह आर क्यो नहिछलै। हम शान्ति पूर्वक ओइठाम जा कऽ ठाढ़ भेलहुँ। -‘भैया।’ हमरा दिंस तकैत बजलाह ‘ओह, अहाँ।’ ‘हं, हम छी। हम एऽने ऊपर सॅ कुदिक आत्महत्या करऽ जाइत छी....’ एतबा बाजि हम एकटा पैर रेलिंग पर रऽलहुँ। -‘शट अप! यू स्टूपिड गर्ल.....।’ आ ओ हमर हाथ पकड़ि लेलैन्हि। हम लोहछि कऽ बजलहुँ- हमर हाथ छोडू।’ -‘पहिने प्रामिस करू अहां कोनो एहन काज नहिकरब।’ ‘तऽ पहिने अहीं प्रॉमिस करू जे....।’ हां, प्रॉमिस बाबूजीक शपथ छल।’ महा झंझावात के बाद क शान्ति छल। आब ओ दोबरा कहियो नहिछुलैन्हि। मुदा हमरा अपने सॅ घृणा भऽ गेल। हं, ओ हमर उपेक्षा करऽ लगलाइ पफीस लेल पाइ नहिदैत छलाह कोनो छोट-छीन जरूरतो लेल तरसैत छलहुँ। ऽैर आब घर सुरक्षित-बुझाइत छल। हमरा मोन नहिपडै़ए हमर दादी केहन छलीह ने कऽनौ नानीक मुँहकान याद अछि। हं, नानीक घरक स्मरण अछि बड़ा बाजार मे हैरिसन रोड मे। हमसब साल मे मात्रा चारि बेर नानी ओतऽ जाइत छलहुँ। साओनक तीज मे। होलीक गनगौर मे राऽी मे दिवालीक दोसर दिन। गनगौरक सिंधरा मे नानी ग्यारह रूपया दैत छलीह। भोजन मे तिवारी दुकानक समोसा, उजरा रसगुल्ला कचौड़ी, आलूक रसदार, भरूआ परोर आ छोहराक - चटनी। दिवाली मे दिलरवुश बरपफी, दही बड़ा, आलू मटर के तरकारी, कोबीक भुजिया। मां कोबिक फूल कहलाकपर ऽौंझाइत छलीह आ नानी तऽ किछु बजने चट मां के शिकायत करैत छलीह ‘कस्तुरी! तोहर बेटी बड्ड तर्कदैत छौ? हम बिनु अपरोध् नहुँ-नहुँ छोटकी नानीक घर मे जा कऽ नुका जाइत छलहुँ। हमरा छोटकी नानी ऽूब मानैत छलीह। मुदा मां आ यमुना मौसी छोटकी नानी केँ देऽऽ नहिचाहैत छलीह। नहिजानि नाना दूटा ब्याह कयने छलाह की कोनो ओ रहैत छलीह। हं, मामा दून्नू नानी केँ एक रंग आदर करैत छलथिन। कोनो भेदभाव नहि। मामा अपनो दूटा ब्याह कयने छलाह। छोटकी मामी मामा सॅ तीस वर्षक छोट छलीह। छोटकी मामी के कीनकऽ आनल गेल छलैन्हि। दुबर-पातरि ऽूब सुन्दर पफैशनवाली। मुदा बड़की मामी सन सम्मान नहिछलैन्हि परिवार मे। बहुत दिनक बाद एक दिन मामी हमरा मां केँ कहैत छलथिन -अहांक भाई हमरा कियेक ब्याहिकऽ अनलनि जऽन परिवार मे क्यो हमरा मनुष बुझिते नहिअछि! ऽालि बच्चा जनमाबऽ लेल ब्याह भेल हमर! बच्चो कहां हमरा अपन मां बुझैत अछि। कैलाश त बच्चे सॅ बड़कीए मां लग रहै’छ, हुनके हाथे ऽायत हुनके लग सूतत। पैध् भेल तऽहमरा संग कतहु जयबा मे लाज लगैत छै। कहैए अहाँ तऽ हमर भाभी सन लगैत छी। कुल मिला कऽ नेनपन मे हमरा ककरो प्यार-नहिभेँटल। एकहि खूटा छलै गड़ल एकेठाम चाहे दिन होउ या राति, जाड़क मौसम गर्मीक मौसम होउ या बरसातक, बिना कोना लोभ-लाभ के दाई मां दुलार करैत छलीह हमर जरूरत क ध्यान रखैत-छलीह। मोन नहिपड़ैत अछि जे कहियो क्यो हमरा लेल खेलौना किनकऽ अनने होमय। हे दाई मां सब मंगल केँ काली मंदीर जाइत छलीह ओ हमरा लेल पेड़ा, आ कोनो ने कोनो वस्तु अनैत दलीह। हम दाई मां के अबिते हुनका पकड़िकऽ पूछऽ लगैत छलिऐन्ह- दाई मां देखाउ ने हमरा लेल की अनलहुँ अछि। दाई मां पेड़ा रखने छी आ हमरा लेल चूड़ी अनलहुँ की नहि? पफीता कहने छलहु आनि देन। हं, दाई मां प्रसाद ककरो नहिदेबइ एकोटा पेड़ा नहिदेब सरोज केँ। -‘नहि, बुच्ची, हम ककरो नहिदेबइ।’ ई बात-चित्त होइते रहैत छल ताबत सरोज आबि जाइत छल। आ बुल्ली बिना पूछने मतने मिठाईक दोना पर झपटा मारैत छल। आ सरोज पेड़ा खाइओ लैत छल आ मां लग जा कऽ चुगलिओ करैत छल। बस मां झनकैत बाजऽ लगैत छलीह- ‘ए चमेलिया माय अहाँ बजारक सड़ल-गलल मिठाई खोबैत-छिऐ बच्चा सभ के। आ मोन खराब हेतै तऽ?’ हं, हं, काली मायक प्रसाद सॅ बच्चा बिमार पड़ि जेतई? हम सरोज दिस तकैत कहै छलिऐ- ‘खचड़ी कही के।’ दाई मां डॅटैत बजैत छलीह- ‘एक बुच्ची एहन गारि कतऽ सिखलहु? बहुत खराब बात छै नहिबाजि एहन बात।’ -‘तऽ कहू अहॉ देलिऐ किये सरोज केँ प्रसाद।’ -‘अच्छा आब नहिदेबै। उफ हो त बेटिए छै।’ नहि, दाई मां अहॉक बेटी हम छी आर केयो नहि। दाई मां क गरदनि पकड़िक कोरा मे बैसिकऽ कहैत छलिऐ- -दाई हमरा तऽ सब कहैए’ झल्लो माई, कल्लोमाई, आयी आयी, दाई मां की बेटी आयी।’ हमरा घर मे तुकबन्दी करबा मे छोटका भैया उस्ताद छलाह। भैया, दीदी सब हमरा खिसियबैत छल। इ तऽ दाई भऽ गेलै दाई मां क संग खाइत अछि। ठीके हम कतबो खा-पी लैत छलहुँ तइओ जाबत दाई मांक संग नहिखाइत छलहुँ ताबत मोन नहिभरैत छल। नौकर-चाकर लेल फटक सरसोक तेल मे लहसून-पिआज बला तरकारी आ मसूरिक दालि बनैत छलै। दाई मां जखन खाइत छल पहिने हमरा भात-दालि सानि कऽ खुआ दैत छल तकर बाद अपने खाइत छल। भरि घरक लोक खा लैत छलै तखन दाई नौकर बरांडा पर बैसकऽ खाइत छलै। कहियो-कऽ दाई मांक थारी मे तरकारी नहिरहैत छलै भात-दालि आ हरियर मिरचाई पिआज संग खाइत छल। हम पूछिऐ- ‘दाई मां तरकारी नहिछै?’ तऽ कहैत छल- ‘हरिया सब हँसोथि लेलकै।’ -अहॉ रोकालिऐ कियेक नहि?’ -‘की हेतै’ आइ हम बिना तरकारिए के खा लेब।’ -‘अच्छा, आइ आबऽ दियौन्ह बाबूजी केँ, हम कहि देबैन्हि।’ -‘नहिबुच्ची! एकदम नहि। ई छोट छीन बात पुरुष केँ कान मे नहिदी।’ ई दाई मांक ट्रेनिंगक कमाल छलै जे हमरा जीवन मे क्षुद्र लोभ, लाभ दिस ध्यान नहिगेल। के हमरा की देलक आ हमरा सॅ बदला मे की लेलक तकर हिसाब नहिकयलहुँ। दाई मां-कहियो लेन-देन के हिसाब कहाँ कयलनि। दाई-मां जहिया गाम सॅ अबैत छलहि तऽ हुनका पोठरी मे रंग-बिरंगक खेलौना, जरीक चोटी, जौ के सतुआ आर कतेक वस्तु हमरा लेल अनैत छलीह। माँ जखन देखैत छलीह कपड़ाक बनल गुड़िया माटिक सुग्गा मैना तऽ हमरा पर हँसैत छलीह। उफँट सन भऽ गेलीह आ खेलतीह गुड़िया सॅ। हँ, दस वर्षक उम्र में हम औरत बनि गेलहुँ। तथापि कोनो कोन मे एखनहु नेनपन छल हम गुड़िया लऽ कऽ खेलाइत छलहुँ दाई मांक आनल जरीवला चोटि लगाकऽ खूब प्रसन्न होइत छलहुँ। आ दाई मां जे सतुआ। अनैत छलीह से तऽ ककरो पता लगिते नहिछलै। दाई मां चुपचाप नुकाकऽ खुआ दैत छलीह। -हम कहैत छलिए -‘दाई आर सत्तु दिअ ने।’ तऽ कहैत छलीह- ‘नहिबुच्ची एके दिन वेशी खा लेब तऽ खराबी करत, काल्हि फेर देब।’ दाई मां क बेटी चमेलिया हमरे ओत आबि गेल छल मुदा ओ अलग रूम मे रहैत छल हमरा-सब संग नहि। ओकर बोखार उतरि गेल छलै। मुदा हमरा मां के शक होइत छलैन्हि कोनो-छुतहा रोग छै तैँ हमरा सबके ओकरा लग नहिजाय दैत छलीह। मुदा हम कहां मानऽ वाली छलहुँ। दाई मां हमरे कारण घर नहिजाइत छलीह तऽ चमेलिया केँ अहिठाम लऽ अयलीह। तैँ हम दाई मांक संग चमेलियाक कोठरी मे- जाइत छलहुँ। मां-बेटीक बात सुनैत छलहुँ। वेशी काल चमेलिया मां के देखि कनैते रहैत छल। हमरा ओकर कानब नहिनीक लागय। हं, चमेलिया कपड़ाक खूब सुन्दर गुड़िया बनबैत छल। पुरान उज्जर कपड़ा लऽक मूँह-बनबैत छल फेर ओइ मे एइया भरैत छल। -कारी सूत सॅ ऑखि बनाबए लाल सूत सॅ डोर आ बिन्दी बनबैत छल। मुँह के धड़ बनाबय रूई ठुसि ठुसि कऽ छाती बनाबय पैर बनबय तऽ दाई मां के देखाकऽ पूछैत छलै- ‘देख तऽ माय ठीक बनल की नहि?’ जखन कखनौ चमेलिया जोर सॅ हँसैत छलै तऽ दाई मां डँटैत छलथिन- ‘एना जोर-जोर सॅ-कियेक हँसैत छेँ। आराम करऽ नहित फेर बिमार पड़बे तऽ हम कतौके नहिरहब!’ हम अपन गुड़िया लऽ कऽ नीचाँ खेलऽ गेलहुँ। हमरा देखलक गुड़िया नेने तऽ सराज अपन वॉकी-टॉकी विलायती गुड़िया लऽ कऽ आयल। नीलू अपन बेबी डॉल अनलक जकरा हाथ मे एकटा शीशी छलै। नीलूक गुड़िया जखन शीशी सॅ पानि पीबैत छलै तऽ पेशाब करै आ सब हँसैत छलै। ई दूनू गुड़िया बाबूजीक मित्रा इतालवी अनने छलै। ओ देखने छल हमरा आ सरोज केँ मुदा जहिया ओ-गुड़िया लऽ कऽ आयल तहिया नीलू नानी घर सॅ आबि गेल छल। तऽ मां बेबी डॉल नीलू केँ देलथिन आ वॉकी-टॉकी सरोजझपटि लेलकै। मां कहियो देलथिन दूनू बहिन मिल कऽ खेला तखन हम दाई मां के कोरा मे बैसकऽ बड्ड कनलहुँ। खैर, आब हमरा नव-नव गुड़िया बना कऽ देबऽ कहलक- ‘हम कालीमाय के किरिया खा कऽ कहैत छी- ‘अहाँ के छोड़ि हम ककरो गुड़िया बना कऽ नहिदेबै।’ एक दिन चमेलियाक बनायल गुड़िया लऽ कऽ हम दाई मांक संग हुनकर संगी खेदरबाक माय के घर गेलहुँ। हमर गुड़िया देख कऽ खेदरबा बड्ड खुश भेल। ओ हमरा कहलक हम दूनू गोटे गुड़ियाक ब्याह करब। आब कहबै चमेलिया के कनि नम्हर गुड़िया बनाबए आ ओकरा घाघरा पहिरा देतै। -हमरा मोन पड़ल सल्लो दीदी ब्याह से घाघरा पहिरने छलीह। आ मां क भारी भरकम घाघरा त चर्चे नहि। ओइ मे असली मोती टांकल छलै। मां के बड़का-बड़का बक्सा मे कतेको रंग-बिरंगक पोशाक छलैन्हि। भारी-भरकम जरदोजीक काज कयल घाघरा, ओढ़नी असली जरीक काज कयल बनारसी साड़ी। मुदा मां केँ भारी साड़ी नहिसोहाइत छलैन्हि। कहियोकाल अपन अतीतक चिट्ठा लऽ कऽ सल्लो दीदी संग बतिआइत छलीह आरे ओ जमाना छलै भारी-भरकम घाघरा पहिरू, बोग्ला बान्हू बड़की टाक ओढ़नी ओढ़न्न्। हाथ मे चूड़ा, पैर मे पायल। हमर दादरी तेहन वेष बना दैत छलीह जे की कहियौ। आ भोरे चारिए बजे उठि कऽ दादी आ तोहर काकी जॉत पर बैस जाइत छलथुन ऑटा पीसऽ। जॉत पिसकाल जॅतसार गीतो गाबथि। नानी कहियो घाघरा नहिपहिरैत छलीह। मां क नैहर मे सब रंगरेजक रांगल ढाकाक महीन मलमल क सारी कढ़ाई कयल पहिरैत छलैन्हि। लम्बा कुरता जकॉ ब्लाउज। तैँ मां के घाघरा फूहड़ ड्रेस बुझाइत छलैन्हि। हं, कड़की मे मां अपना एक-एक घाघरा सॅ दस-दस किलो चॉदी-निकालि कऽ ओकर थारी, बाटी गिलास बनबाकऽ बड़की दीदीक बेटीक ब्याह मे पठौने छलथिन। हं, तऽ हम चमेलिया के कहलिऐ- एकटा खूब सुन्दर आ नमहर गुड़िया बना दे ओकरा घाघरा पहिरा दिहे। ठारह भऽ सकय से ध्यान रखिह नहितऽ ‘वर’ गला मे वरमाला कोना पहिरेतै।’ चमेलिया के ई सुनि कऽ छगुन्ता भऽ गेलै। ढारह होमऽ वला गुड़िया कोना बनाओत। ओना सरोज आ नीलूक गुड़िया तऽ चलितो छै मुदा ओ विलायती गुड़िया छै। -तऽ की देसी गुड़िया ब्याह मे वरमाल काल ठाढ़ नहिभऽ सकै’छ? दुनियाँ भरिके उत्कंठा हमरा आवाज मे छल। फेर हम चमेलिया केँ कहलिऐ- ‘सुनै छेँ हम अपन गुड़ियाक ब्याह खेदरबाक गुड्डा सॅ पक्का कयलहुँ अछि एहि शिवराति केँ ब्याह हेतै।’ चमेलिया मूँह मे ऑचर धऽ हँसैत बाजल- उफ खेदरबा बहु केँ ब्याह मे चढ़ायत की? ओकरा त एकटा चौअन्नी टा नहिछै।’ -‘हं चमेलिया, इ त हम सोचबे नहिकयलहुँ! आब कोन उपाय करू? एक बेर हं, कहिकऽ आब नहिकोना कहबै?’ ‘अच्छा छोड़ऽ जेहन गुड़ियाक भाग।’ -‘तऽ गुड़िया बनि जयतै ने?’ ‘हँ, अइ शर्त पर जे अहां बेर-बेर उफपर नहिआउ हमरा समय भेंटत त नीक गुड़िया बनत।’ -‘किये चमेलिया हम कोनो तोरा तंग करैत छिऔ?’ -‘नहिसे बात नहिछै। असल मे हमरा धूत वला बिमारी अछि जॅ अहाँ पटि जायत तऽ अहूँ बिमार पड़ि जायब।’ -‘धूतहा रोग छौ तोरा?’ फेर मोन पड़ल सत्ते कहैत अछि। राधा मां के कहैत छलैन्हि चमेलियाक बर्त्तन अलग रखबाउ। ई सुनि हमार दाई मां बड़ी काल धरि कनैत रहलीह। चमेलिया सत्ते गुड़िया बना देलक। जरीक घाघरा चोली पहिरने घोघ तनने गुड़िया ठाढ़ छल। बड्ड सुन्दर लगैत छल देखऽ मे गुड़िया। पातर डॉर- ताहि मे मोतीक डरकस। अपूर्व! हम चमेलियाक पकड़ि हुलसैत कहलिऐ- ‘सत्ते चमेलिया तू- बड्ड गुणमंती छेँ।’ -‘चमेलिया तोरा कतेक बेर कहलियौ बात किये ने बुझैत छेँ? फेर दाई मां हमरा दिस तकैत बजलीह- बुच्ची चमेलियाक संग एना सटल रह छी आ बहुरानीक कान मे ई बात पड़तैन्हि तऽ हमरा कतेक गंज्जन करतीह? -दाई मां हम जाइत छी- खेदरबा के कहऽ ओ अपन गुड्डा के लऽ एतै।’ हम, चमेलिया आ दाई मां छतवला कोठरी मे बैसल बतिआइत छलहुँ दोपहर छलै तीन बजैत हेतै। ‘दाई मां हम खेदरबा के खाय लेल की देबै?’ ‘बुच्ची, सतुआ छै ने।’ हम दाई मांक हाथ धयने सीढ़ी सँ उतरलहुँ। सड़क पार क खेदरबाक माय लग पहुँचलहुँ। दाई मां ओकरा संग बतिआय लागल। खेदरबा गुल्ली-डंडा खेलाइत छलै’ हम शोर पाड़लिऐ। खेदरबा दौड़ल आयल। हम पूछलिऐ ‘तू अपना-गुड्डाक ब्याह हमरा गुड़िया से करबें?’ खेदरबा केँ एकटा विलायती प्लास्टिक गुड्डा छलै कता कूड़ा मे भेँटल छलै। खेदरबा खुश भऽ बाजल, हं हम अपना गुड्डाक ब्याहकरब। कहकहिया?’ ‘एखने।’ दाई मां चलू। -‘ए बुच्ची कनि सांस लेबऽ दिअ।’ दाई मां फेर बतियान मे लीन भऽ गेलीह। खेदरबाक मां हुनका हाथ मे हुक्का धरा देलकैन्हि। हम खेदरबा के कहलिऐ- ‘चल हमरा गुड़िया के देखऽ।’ खेदरबा हमरा संग आयल। पैर दाबि नहुँ-नहुँ सीढ़ी-पर चढ़लहुँ। गुड़िया ओहिना सजल-धजल ठाढ़ छल खेदरबा मुग्ध भऽ ओकरा देखते रहि गेल। ‘बहुत सुन्दर दै गुड़िया एकरा हम बढ़ियॉ सॅ रखबै’ खेदरबा बाजल। ताबत आबि गेल बुल्ली। बुल्ली के देखते हम गुड़िया के अपना कोरा मे नुका लेलहुँ। -ओ जिद्द करऽ लागल देखा की छै हमरा देखा दे...बुल्ली के छीनाझपटी करैत देख चमेलिया कहलक प्रिया, देखा दिऔ ने बराती लेल तऽ लोक चाहीने। ताबत सरोज आ नीलू दूने पहुँचल। -‘केहन सुन्दर गुड़िया छै अरे ई त ठाढ़ भऽ जाइ छै वाह!’ कहैत गुड़ियाक घाघरा उठा कऽ देखऽ लागल। हम चिचिएलहुँ छोड़ हमरा गुड़िया के तू सभ केहन बेशरम छे?’ मुदा हमर बात के सुनैत। नीलू चहकल-देखही-सरोज ई गुड़ियाक बांसक खपच्चीक पैर बनल छै। तीनू मिल कऽ गुड़िया लऽ हँसैत नारा लगाबऽ लागल प्रियाक गुड़िया क जय, जय। हम कनैत नीचॉ मे ओंघराए लगलहुँ। खेदरबा भागि गेल छल। सरोज, नीलू आ बुल्लीक संग-संग अइ जुलूस मे सांझिकऽ खेलऽ वला आर धिया-पुता सामिल भऽ गेलै। सब मिलकऽ गुड़ियाक तहस-नहस करऽ लागल बांसक खपची निकालि देलकै आ जोर जोर सॅ नारा लगौलक प्रियाक बच्ची, बॉसक खपच्ची...तकरबाद घरक पैघ लोक ताना मारनाइ शुरू कयल। दीदी मां के कहलथिन: मां प्रियाक ब्याह खेदरबा सॅ कऽ दही भरि दिन गोइठा ठोकैत रहतै।’ शायद ई गप्प बाबूजी सुनि गेलथिन। हरिया के पूछलथिन त ओ सभटा वृतांत जतबा ओ जनैत छल कहल कैन्हि। बाबूजीक फरमान जारी भेल- ‘हरिया चमेलियाक मां के कहि दही प्रिया के अपना संग जतऽ ततऽ नहिलऽ जाई। ओइ राति ढाई मां आ हम दूनू बड्ड कनलहुँ। हम हुनकर नोर पोछैत छलहुँ आ ओ हमर। हुचुकैत दाई मां बजलहि- ‘बुच्ची गरीबी सब से बड़का अभिशाप छै।’ हं, दाई मां, आब हम कहिओ गुड़ियाक ब्याहक चर्चा नहिकरब। बहुत दिन धरि छोटका भैया आ दीदी सब हमरा खेदरबाक नामलऽ खौंझबैत छल। खेदरबा गोइठा ठोकऽ बाली गरीब महिलाक बेटा छलै आ हम महल मे रहऽ बाली बड़का घरक बेटी! मुदा बड़का घर क बेट रहितहुँ हमरा लग कहाँ विलायती वॉकी-टॉकी गुड़िया छल। ककरा हमरा सुधि छलै जे हमरा लेल खेलौना किनैत! हमरा तऽ दाई मां क- गेठरी मे भेँटैत छल खेलौना। चमेलिया बनाकऽ दैत छल गुड़िया। ओकर बाद तऽ हम गुड़िया खेलनाईए बिसरि गेलहुँ। हम जखन सरोज अ नीलूक गुड़िया देखैत छलहुँ तखन मोन कानि जाए। दाई मां फेर कहियो हमरा खेदरबाक घर नहिलऽ गेलीह। दाई मां हमर दुःख बुझैत छलीह मुदा ओ की कऽ सकैत छलीह। किधु दिनक बाद सॅ बाबूजी विदा भऽ गेलाह। एकटा एहन समय आयल जहिया हमरा दाई मां आ अपन स्तरक बीचक दूरीक पता चलल। इ हो-बुझबा मे आयल जे दाई मां आ हमरा मां क संस्कार आ तौर तरीका मे जमीन आसमानक फर्क छै। हमर मनक बहुत प्रश्न अनुत्तरित छल ककरो लग जकर उत्तर नहिछलै। आब हम पैघ भऽ गेल छलहुँ बी.ए. पास भऽ गेलहुँ। दाई मां के ऑखि मे मोतिया बिंद पाकि गेलैन्हि, डॉर झुकि गेलैन्हि। आब कोनो काज कयल-नहिहोइत छलैन्हि। कोनो ने कोनो दाई नौकर हुनका खिसियबैत रहैत छैन्हि आ ओ गारि पढ़ैत रहै छथिन। हुनका बैसऽ उठऽ मे कष्ट छलेन्हि केहियो ठेहुना में दर्द होइत छलैन्हि कहियो डॉर मे दर्द। एक-एक कऽ सभटा दॉत टूटि गेल छलैन्हि। आब दाई मे दालि मे रोटी गुरिकऽ खाइत छलीह। मां बिना किछु कहने-सुनने अपना काजक वास्ते कृष्णाकेँ राखि लेने छलीह। कृष्णा एखन जवान छल चारि लोकक काज एसगर करऽ वाली खूब रिष्ट पुष्ट। कोनो ने कोनो बात पर मां केँ दाई मां सँ रोज झगड़ा होइत छौन्हि। दाई मां हमरा कॉलेज सॅ घुरैत काल-नीचॉ गेट पर बैसल रहैत छथि। हुनका अगल-बगल दरबान, ड्राइबर, बगल मे काज करऽ बाली दाई सभक जमघट लागतल रहैत छै। दाई माँ बिड़ी पीबैत बड़बड़ाइत रहैत छथि-अरे जाबत मालिक छलाह ताबत गरीब-गुरबाक ख्याल रखैत छलाह ओ मनुष्य नहि देवात छलाह। हुनकर परतर के करत। आब ने ओ राजा ने ओ कराह। हमरा देखिलेते हुलसिकऽ कहैत छलीह। अरे, आबि गेल हमर बेटी। हिनके मुँह देखिकऽ एतऽ छी नहितऽ एत कियेेक रहितहुँ। हम अनायासअपना के अपराध्ी बुझैत छलहुँ। दाई मांक भविष्य एकदम अन्ध्कारमय लगैत छल। शायद आई फेर मां दाईमां मे कहासुनी भेल हेतैन्हि। आब हम नेना नहिछी मां क दर्द बुक्षऽ लागलहुँ आछि। जेहन छथि जे छथि हमर जननी। जँ मां हिम्मतवाली नहिरहितथि तऽ काका सभत तऽ कहिया ने घर के बर्बाद कयने रहताह। एक दिन संवेदना छल निःस्वार्थ स्नेह दोसर हिस परिवारक प्रतिष्ठा उवा अन-बान शानक रक्षा लेल मां संघर्षशील छलीह। मां के कोन सुख भेटँलैन्हि? एक-एक पाइ जोडिृकऽ परिवार चलौलनि चारि-चारिटा बेटीक ब्याह कयलनि। की हुनका नहिबुझल छलैन्हि भैयाक चालि-चलन, हुनकर रईसी? ओ सब जनैत छलथिन मुदा विवश छलीह-किछु कऽ नहिसकैत छलीह। सदतिकाल बजैत छलीह आमदनि थोड़ खरचा अनन्त। एकबेर हम कहने छलिऐन्ह- मां, एतेक नौकर चाकर के रखबाक कोन जरूरी छै-समटा पाई तऽ एकरे सभ पर बुका जाइत छै ........ तऽ कहने छलीह-सबसे पहिने तू अपना दाई मां के गाँवा पठा। अपने जे खाय- पीबए तहि लेल कोनो मनाहीनहिछै मुदा भोज-भंडारा करत से नहिचलऽ बाला छै। रोज एकरा गाम से क्यों ने क्यों अबिते रहैत छै। एखने एक डेकची में भरिकऽ नीबूक शर्बत बना कऽ नेनेजाइत छल टोकलिऐ जे एतेक शर्बत की हैतै तऽ डेगची पटकि कऽ भागि गेल। की सभ ने बाजल ........... हमर मेहमान आयत तऽ ओकर खाय-पीअऽ लेल नहिदेबई ? भाभीजी कहलनि-‘बौआ, आई दुपहरे सें नीचे में बैसल अछि जखन से मां टोकलथिन। पूरा मोहल्लाक दाई-नौकर घेरने रहै छै ओ समक लीडर अछि। ओकरा अहीं बजा कऽ आनु’ सब जनै छै-हमरे बजौने ओ उफपर आयत। आई दाई मांक मन बउ्ड व्यथित छलै। बड़ी कालधरि कनैत रहलीह। आब हमरा हुनकर कानब -रवीजव बर्दास्त नहिहोइत अछि। घर में अेहिना हरदम तनाव बनल रहैत छै। बड़की भाभी बहुत दिन से बीमार छथिन। मां पानि जकॉ पाई बहा रहल छथि काल्हि क्यों कहैनहिजे ठीक से इलाज नहिभेलै। भाभी सात बरसक बेटाक निहारैत डाक्टर से पूछलथिन ‘हम स्वस्थ भऽ सकै छी डाक्टर साहेब? मां हुनकर बात सुनि अपना रूम मे जा कऽ कानऽ लगलीह। बाबूजी गेलाक बाद अब कनि रास्ता पर ससरल छल परिवारक गाड़ी। सोचैत छलीह मां अब कहुना सरोजक ब्याह कऽ लेब। आ अब ई आफत बेटाक घर उजड़ि रहल छैन्हि। हम ओई राति दाई मां से बात कयलहुँ। ‘ए बुच्ची हम तऽ आहींक मुँह देखिकऽ छी-अइ घर मे। हम तऽ कहिया ने चलि गेल रहितहुँ अपना गाम। अइबेर तऽ हमरा छेदी कहलक तोहर बेटा आब कमाइत छौ। मुदा बुच्ची अहाँ तऽ हमर जिम्मेदारी छी। अहांक बयाह भऽ जाए तऽ हम बूक्षब गंगा नहा लेलहुँ। दाई मां उफहाँ कान खोलिकऽ सुनि लिअ-‘हम एखन ब्याह नाहिकरब। आ अहाँके आब काज कयल नहिहोइछ। आब क्यों अहां संग नीक बात व्यवहार नहिकरैछ।’ ‘मुदा हम उफहाँके छेड़िकऽ कोना जाउ? राक्षस ..........?’ ‘दाई मां अहाँ चिन्ता नहिकरू। अब भैया हमरा संग किछ नहिकऽ सकैछ।’ ‘से कोना बुक्षैत छिऐ........?’ ‘हम कड़ा चेतावानी दऽ देलिऐ।’ ‘अरे आब ध्मकी देला सँ की। औरत के जिनगी जँ एकबेर बरबाह भेल तऽ सब खतम।’ ‘दाई मां अहाँ कोन युग के बात कऽ रहल छी?’ ‘तऽ अइ युग मेें की होइ छै अहांक अंग्रजीक किताब मे की लिखल अछि।’ ‘दाई मां हम अहाँ के कोना बुक्षाउ। अच ई कइने जे अहाँ नोकरी नहिकरितहुँ तऽ बाल- बचाक कोन हाल होइत सबसे पहिने औरत के अपना पैर पर ठाढ़ होमऽ चाही ’ स्वावलखन ब्याह से बेशी जरूरी छै।’ अरे हम कोनो खुशी से नौकरी कयलहुँ। आई अहाँँक बाबूजी रहितथि तऽ कहिया ने अहांक ब्याह मेल रहैत। एखन धरि तऽ हम नातिक मुँह देखने रहितहुँ!’ दाई मां के समक्षेनाई असम्भव छल। बहस से कोना फायदा नाहितखन हम एकटा काज कयजहुँ अपना पाकेट मनी से किछु टका हुनका दऽ हैत छलिऐन्हि ई कहि जे अहाँक मेहमान आबय या ध्रक लोक तऽ बाजार सँ मंगाकऽ नास्ता भोजन करा देबई। ककरोसे बकझक नाहिकरब। परीक्षाक बाद भेल गर्मी छुटीð। हमरा छुटीðक समय हरदम बोझिल लगैत छल। एक दिनक छुटीð रवियों के तनाव बढ़ि जाइत अछि। छुटीðक दिन मांक सखती बढ़ि जाइत छैन्हि। दीदी के हुकूम सुना दैत छथिन-टूनू धैड़ी के काज ध्ंध सिखा।’ ई गप्प स्कूले दिन से सुनि रहल छी। काज-ध्ंधक मतलब चाइर दालि बीछनाई राई जमाइन, जोर मरीच ध्नि सभके साफ कऽ सुखाउ। मां आरामकुर्सी पर बैसैत छलीह आ हुनका सोझा में हम, सरोज, दूनू भाभी आ दीदी काज करैत छलहुँ। मां कोन माटिक बनल छलीह से नहिजानि। पता नहिकोन शाप-पाप के ढ़ो रहल छलीह। आइ एतेक समय बीतलो पर सचाई सँ ऑखि मुनब कठिन लगै’छ। असल मे हम मां क स्वरचित नरक केँ ह कहियो स्वीकारि नहिपयलहुँ। एकबेर जाड़ मे बहुत सर्दी पड़ल छलै मां एक सौ कम्बल मंगा कऽ गरीब के बॅटलनि आ हुकूम भेल‘ हम सभ बाजि-कस्तुरी देवीक जय।’ ‘बाज जोर सँ बाज। ए लछमनियॉ, हरिया, सीताराम एकरा सभकेँ कहियै हम जगदम्बाक अवतार छी। हमर बाल-बच््या हमर पूजा करैत अछि।’ मन मे भेल कहबाक जे मां अहां ई नाटक छोड़ू प्लीज देवि जुनि बनू। साधारण लोक जकॉ व्यवहार करू। कहियो काल कतहु जाउ घूमू पिफरू।’ मुदा से कहाँ बाजि भेल। एक-एक कऽ मानवीय प्यार-व्यवहारक समस्त द्वार ओ बंद कऽ लेलैन्हि। ओ कखनौ नीचाँ मे नहिबैसैत छलीह। हुनक कहब छलैन्हि डाक्टर नीक सॅ हार्नियॉक आपरेशन नहिकयलक पैर क एकटा नस कटि गेल अछि। हलांकि डाफ्रैं एफ्रैं केफ्रैं सेन अइ बात केँ नहिस्वीकारैत छलाह। ओ कतहु जाइतो छलीह तऽ गाड़ीक डिक्की मे हुनकर कुर्सी जाइत छलैन्हि। दू टा नौकर हुनका बड़का पीढ़ि पर बैसाकऽ उतारैत छलैन्ह। एकटा आया आ दूनू भाभी मे क्यो एकटा संग जाइत छलथिन। ओना तऽ ओ कहियो कतहु जाइते नहिछलीह कोनोकाज परोजन मे नैहर या दीदीक सासुर काका-काकीक घर तऽ एनाइ जेनाइ बंदे भऽ गेलै छल। हं ज कोनो घर मे पेरशानी होइ या क्यो बीमार पड़ैत छलैतऽ हुनका बड़ड पफुर्ती भऽ जाइत छलैन्हि। अपना देहोक होश नहिरहैत छैन्हि। मुदा सब भऽ गेलाक बाद अपना ढगयबाक हताश भाव मन मस्तिष्क केँ जकड़ि लैत छैन्हि। स्वार्थी लोकक चलाकी सॅ मर्माहत भऽ जाइत छथि। हुनकर इ मनोभाव दिनोदिन मुखर भेल जाइत छैन्हि दीदी यो सब बुझि गेलथिन। मां दुःखी छलीह अपन सन्तानक स्वार्थी स्वभाव सॅ, आपसी होड़, जलन आ ईर्ष्या सँ दुखी छलीह घरक सम्पत्ति पर बड़का भैयाक कब्जा सॅ। एक दिन कॉलेज सॅ घुुरलहुॅ तऽ देखलिए छोटकी भाभी मांके उजरा सारीक रफ्रफू करैत छलीह। हमरा मुॅह सॅ बहरायल ‘भाभी अहाँ कियेक एतेक मेहनत करैत छी। दाई मां अपने सीब लेतै।’ भाभी गुम्मे छलीह मां हमर बात सुनिते लोहदिकऽ बजलीह ‘सौ-सौ रूपयाक ढ़ाकाक महीन साड़ी तोरा दाई मां के दऽ दिछि। पाइ कतौ गाछ मे फड़ैत छै? फाटल छैतऽ की हेतै हम रातिकऽ पहिरब।’ हमर आत्मा कुहड़ि उठल-हमर मां जे कहियो पुरान नहिपहिरैत छलीह से आब फाटल साड़ी सीब कऽ पहिरतीह! काल्हिए बड़का भैया आ भाभी प्लैन सॅ दिल्ली गेलाह! मास दिन पहिने सल्लो दीदी केँ सासुर जाइतकाल बक्सा भारि कऽ कपड़ा देलथिन। तखन कतऽ सॅ टका आयल छलै? मां के अपना लेल हरदम अभावे रहैत छैन्हि! आब घरक लेल कतेक आहुति देतीह? मुदा हमरा हिम्मत नहिभेल जे हुनका किछु कहबैनिह। हं मने-मन संकल्प कयलहँु आब अइ घर सॅ एको पाई नहिले। पेफर हमहूँ तऽ मां ए जकां तिलतिल अपन छोट-छोट सुख क गला घोंटैत रहलहुँ। पुरूष के प्रति देवत्व भाव, एक निष्ठ श्र(ा स्वीकार करैत रहलहुँ अछि। की बेटीक मन मे अचेतन मे मां क प्रतिछाया प्रतिष्ठित रहैत छैक? उम्र क संग-संग कतेक बेर जीवन मे छल प्रपंचक शिकार भेलहुँ स्वयं केँ दोषी पयलहुँ। व्यथा आ अन्तर्द्वन्द्वक क्षण मे अपना आचरण मे मां क व्यवहारक छवि देखलहुँ। हं, विशु( ममत्व छल दाई मां क निःस्वार्थ स्नेह। दाई मां सन महिला आब कतहु भेटँत? मां के तऽ अपन ठोस अहम के प्रति, अपन संतति के प्रति ममता आ त्याग छलैन्हि। मुदा दाई मां तऽ आनक बेटी के लेल व्याकुल रहैत छलीह सत्ते व्यवहार एहन उदार हृदय मन ककरा हेतै? दाई मां क ममता मे सत्ताक संग्राम नहिछलै। हुनकर निश्छल वात्सल्य मे कोनो अपेक्षा नहिछलै। मुदा तै की हमर इ कर्त्तव्य अछि जे हम स्वयं अपन मांक कफन के कपड़ा सीबी की इएह सोहाद्र छै? जॅ से करब तऽ की अपन व्यत्तिफत्वक कमि नहिसूझत? ओ तऽ चौकठी पार कऽ तीनो डग कहियो नहिचललैन्हि आ हम तऽ तीन डेग मे दुनियॉ धॅगि लेबऽ क कल्पना करैत छी। हं, तऽ हम गर्मी क छुटीðक बात करैत छलहुॅ। छुटीðक दिन मे एकटा नव रूटीन बनैत छल भोर दस बजे सॅ सांझुक पांच बजे धरि केँ। की मजाल जे क्यो टस सॅ मस करतै। जाड़ मे स्वेटर बुनब, गर्मी के रेशम कर कढ़ाई सिलावय ऊपर से मां के आर्डर दस दिन मे बेडकवर बनि जयबाक चाही। एक दिन रूमाल तकियाक खोल। जँ रेशम ओझरा जाय वा आंगुर मे सुई गड़ि गेल त मां बड्ड फझूति करैत छलीह-नहिजानि पढ़ाई मे कोना फर्स्ट भऽ जाइछ। मन मे होमय जे इ रेशमे कर फूल पात बनौनाइ आ पढ़ाई मे कोन सम्बंध्? कोनो तुक नहिबुझाइत छल मुदा प्रतिवाद करबाक साहस कहां? - सरोज महाध्ूर्त ! मन होइतऽ कढ़ाई करए नहितऽ पढ़ाईक बहाना बना उठि जाए। कखनहुँ जानि कए खॉसऽ लागए। मां के हरदम ओकरस्वास्थक चिन्ता रहैत छलैन्हि। जाड़ मास मे सर्दी खांसी घऽ लैत छलैतऽ परीक्षाक समय मे उल्टी होमऽ लगैत छलै। सब दिन ओकर स्वास्थ खराबे रहैत छलै। ठीक से भोजन करतै नहिछल। कहुना दू टा रोटी खाइत छल आ नीलू बस एकटा आ हम तीनटा रोटीक बाद कनि भातो खाइत छलहुँ। तैँ हमर देह-दशा ओकरा सभ सॅ नीक छल मुदा हमरा मां केँ हमर डिलडौल कहियो ने सोहाइत छलैन्हि। आ बड़की काकी तऽ खोध्-िखोधि। - कऽ पूछैत छलथिन- ‘बहिन प्रिया कतेक पैघ भऽ गेल हमरा विमलाक बतारि अछि मुदा क्यो कहैतै जे दूनू क जन्म एकहि मास मे भेल छलेै।’ आ एहि सभ सँ तंग भऽ हम जहिया दसमा मे पढ़ैत छलहुँ तहिए मां हमर ब्याह क बात मीराक भाई सॅ चलौने छलीह ओना ब्याहक चर्चा शुरू कयने छलथिन मीराक मां। हुनका हम पसिन्न छलिऐन्हि तैँ अपन मांझिल बेटा जे ताहि दिन ओकालत पढ़ैत छलैन्हि तकरा वास्ते हमर चयन कयने छलीह फेर की भेलै की नहि बात आगां नहिबढ़ैलै। तकर बाद मां क हमरा प्रति व्यवहार आर कठोर भऽ गेल छलैन्हि भाई - बहिन के नजरि मे तऽ हम कुरूपे छलहुँ। मंा बजैत छलीह- ‘सरोज के तऽ क्यो रीजेक्ट नहिकरैत- मुदा प्रियाक ब्याह कोना हेतै’? हमरा मन में विद्रोहक भाव बढ़ऽ लागल नहिहेत ब्याह नहिहोऽ हमरा ब्याह करबाक इच्छो नहिअछि। दाई मां के छोड़ि सभक प्रति उपेक्षा अवज्ञा बढ़ैत रहल। घरक लोक सॅ वेशी अपनत्व बाहरी लोक सॅ भेँटैत छल। मां क स्थान स्कूलक प्रधनअध्यापिका लेलैन्हि। हमर किशोर मन आब जीवनक अभाव केर पूर्ति कल्पना सँ करैत छल। स्नेही मांक कल्पना करैत छलहुँ। कल्पना मे कोनो भाई बहिन लेल जागह नहिछलै हम एसगरे छलहुँआ संग छलीह हमर दाई मां। - मुदा बहुत जल्दी हमरा एहि काल्पनिक संसारक सीमाक बोध् भऽ गेल। हम बुझ लगलहुँ जे जिनगी कल्पनाक सहारा सॅ नहिचलि सकै’छ। बहुत तरहक झंझटि छल जाहि मे हम ओझरायल छलहुँ। लाइब्रेरी सॅ सप्ताह मे एकहिटा किताब लऽ सकैत छलहुँ, हमर भूख बढ़िते जाइत छल। क्लास मे पाँच छह टा संगीक ग्रूप छल जे अपने पढ़ए वा नहिहमर चूनल किताब ओ सभ अपना नाम पर इसू करबा लैत छल। बस हम अपन किताबक दुनियाँ मे मगन रहैत छलहुँ ने मां क झिड़की ने भैयाक खौफ। शरतचन्द्रक पारोक घुटन एन कोन काजक पागलपन। ओ प्रेमचंदक जालपा? जे गहना लेल पति केँ चोरि करबा लेल विवश कयल? मुदा र्ध्मवीर भारतीक गुनाहों का देवता’ पढ़ि हम बहुत दिन धरि कनैत रहलहुँ। हमरा मन मे स्वस्थ सहज प्रेमक कल्पना कहियो नहिभेल। हमर दिवास्वप्न नायक सतत् व्यथित दुखी शोषित वा जीवन सॅ उदासीन आ हम छलहुँ ओकर अभावक पूर्ति करऽ बाली। की पढ़बाक चाही आ की नहिसे कहियो नहिसोचलहुँ। श्लील-अश्लील जे भेँटए पढ़ैत छलहुँ। घर मे पढ़वला कुर्सी मेज पर बैसिकऽ कोर्सक किताब के बीच मे उपन्यास राखि कऽ पढ़ैत छलहुँतऽ क्यो बुझितो नहिछल। दोसर बात इ जे हमर चिन्ता ककरा छलै। जखन प्रेसीडेंसी कालेज मे गेलहुँ तऽ चारू भर किताबे-किताब छल। हमरा घर मे दू टा वर्ग छलै-एकटा शोषण करऽ वला सदस्यक वर्ग जकरा हाथ मे तिजोरीक चाबी छलै। ओकरा सभकेँ जौ कनि सर्दियो होइतऽ डाक्टर गंगुलिए नहिसौ टका पफीस लेब बला डाक्टर नलिनीरंजन दताक केँ बजाओल जाइत छलै। हुनका सभके घरऽक सब वस्तु पर अध्किार छलैन्हि। अइ दल मे छलीह-मां बड़का भैया, बड़की भाभी आ नान्हिटा चारि-पाँच वर्षक हुनकर बेटा, सल्लो दीदी, डाक्टरी पढ़ऽबाली सरोज। दलित वर्ग मे छलहुँ हम, छोटका भैया जे कोनो समझौता करबा लेल कखनहुँ तैयार नहिछलाह आ हमर छोटकी भाभी जे सदतिकाल मांक सेवा मे जुटल रहैत छलीह। बड्ड मध्ुर वाणी सबसॅ स्नेह सित्तफ व्यवहार जेठजीक हर बात के माथ झुका-स्वीकार कर वाली। जे व्यापारक आमदनी होइत छै आ किरायाक पाइ अबैत छै सब बड़के भैयाक हाथ मे जाइत छैन्हि। हाथ उठा कऽ ओ जकरा देथिन। पिताक सम्पत्तिक दूनू भाई बराबर के वारिस मुदा छोटका भैयाक हाथ मे एकटा पाइ नहि। मां कहैत छलथिन बड़का भैया केँ-‘अरे, आब घर-गृहस्थी वला भेलै एकरा अपना संग आपिफस ल जाहीं तोरा संग-संग रहतै तऽ काज ध्ंध सिखतै’ मां के कहला पर भैया छोटका भैयाकेँ घर सॅ ल जाइत छलथिन मुदा किछ दूर गेला पर मेट्रो सिनेमा हाल लग सिनेमाक टिकट हाथ मे दऽ कहैत छलथिन-‘जो सिनेमा देख।’ भैया व्यथिन भऽ घर घुरि अबैत छलाह। सांझि मे बड़का भैया घर अबिते मां केँ कहैत छलथिन। - ‘की करू मां किछ ने पफुराइत अछि।’ अहांक कहला पर हम लऽ गेलिऐ ऑपिफस। ओतऽ सँ कहलिऐ फाइल लऽ कऽ इन्कमटैक्स ऑपिफस जयबा लेल तऽ चलि गेल सिनेमा देखऽ। एतबा सुनिते मां आगि बबुला भऽ जाइत छलीह। ‘कहाँ छै अजैया, आ इम्हर। खेऽ लेल अढ़ाई सेर चाही दू बेटाक बाप भऽ गेलेँ आ एक पाई कमाबऽ के लूरि नहि। लक्ष्मी सन पत्नीक जीवन बरबादकऽ देलकै।’ छोटका भैया बरांडा मे बैसल चुपचाप सब सुनैत छलाह कोनो प्रतिवाद नहि। बजैत-बजैत मां चुप्प भऽ जाइत छलीह तखन जरला पर नून छीटऽ लेल पहुँचैत छलीह बड़की भौजी। मां जो, अहॉ कियेक चिन्ता करैत छी समय अयला पर छोटका बौआ अपने सुधरि जेथिन। एतेक क्रो( करब तऽ अहॉक बल्डप्रेशर बढ़ि जायत। बस मांक आहि अलम शुरू भऽ जाइत छल । छोटकी भौजी के ऑखि सॅ दहो-बहो नीर घुबैत छलैन्हि भैया मांक बात सुनि कऽ झट नीर पोछि पहुँच जाइत छलाह मांक सेवा मे। ‘मां कोन दवाई दिअ।’ ‘कोरामिन दऽ दिअ रानी! हार्ट ....।’ सत्तो बात बजबाक साहस नहिछलैन्हि छोटकी भाभी केॅ। बेचारी निरीह जकां सभक बात सहैत छलीह नैहरो तेहन नहिछलैन्हि जे तकर गुमान होइतैन्हि ओना कहबा लेलतऽ राज परिवारक बेटी छलीह कहियो राजसी ठाठ छलैन्हि मुदा आब तऽ भोजनो पर आफत छलै। छह बहिनक ब्याह करोड़पतिक घर मे भेल छलैन्हि ताहि दिन एहन विपन्न नहिछलाह। हिनकर सम्बंध् हमर मसिऔत भाई करौने छलथिन। कहने छलथिन ‘पीसी, लड़की हजारो मे एक छै। दिल्लीक लेडी डरविन कॉलेज सॅ आईफ्रैं एफ्रैं पास छै। संगीत मे ग्रेजुएट, संस्कृत मे विशारद् घरकलुरि-व्यवहार मे कुशल। नाम छै सविता।’ तखन मां, बड़का भैया केँ लड़की देखऽ पठौने छलथिन। हुनका पसिन्न पड़लैन्हि तुरत चारि टा गिन्नी हाथ पर घऽ शगुन दऽ देलथिन। क्यो छोटका भैया सॅ किछ पूछबाक जरूरत नहिबुझलकैं। सल्लो दीदी कहबो कयलथिन्ह जे एकबेर अजय के लड़की देख लेब चाही’-की देखतै पफोटो तऽ आयले छै आ विजय देखिए लेलकै। एक दिन रूम मे बैसल भैया कपसि-कपसिकऽ कनैत छलाह। मूक गाय जकाँ भाभी अहुरिया कटैत छलीह। एकाएक भैया उठलाह पैर में चप्पल पहिर बाहर चलि गेलाह। मां हॉले मे कुर्सी पर बैसल छलीह पूछलथिन-‘अजय कतऽ जाइ छेँ’? ‘काज करऽ।’ ‘हॅ, खूब काज करबें!’ मांक ओल सन बोल सुनि ओ विदा भेलाह। जखन चारि बजे सांझि धरि नहिघुरलाह तऽ सभ के चिन्ता भेलै। खोज शुरू भेल। छोटकी भाभी के कनैत्-कनैत ऑखि लाल भऽ गेल छलैन्हि हम कहलिएन्ह मां के-‘मां आइ भोर में भौयाके कनैत देखने छलिऐन्ह। बड़का भैया घर अयलाह तऽ मां क कानब खीझब चालू भऽ गेलैन्हि। ‘ए बौआ, ऊ कसाई हमरे दुःख देबऽ लेल जनमल अछि। बाबूजी गेलथुन से दुःख की कम छल जे ई हमरा आर व्यथा दऽरहल अछि। डर होइछ किछ भऽ जेतै तऽ एहन लक्ष्मी सन पुतौहु के कोना मुँह देखब?’ भैया पफोन कऽ पारिवारिक सालि सिटर सॅ राय-विचार लेलैन्हि। तखन मां के कहलथिन - ‘हम पुलिस स्टेशन जा कऽ पता लगबैत छी।’ भैया सीढ़ि पर उतैरते छलाह कि देखलथिन बड़का जीजाजी क संग छोटका भैया आबि रहल छलाह। मां एतबा काल मे अनगिन मनौती मानलैन्हि हनुमान-जी के सवामन केँ दाल-चूरमाक प्रसाद, राणीसती जी केँ चूड़ा-चूनरी क चढ़ावा आर नहिजानि कोन-कोन देवता-देवीक मनौती मान लैन्हि। आ छोटका भैया केँ देखते चिचिआ उठलीह - ‘चंडाल! कतऽ छलैंह एखन धरि। एक भोरे के गेल आब घर क सुध् िभैलौ।’ - छोटका भैया बिना किछु बजने अपना रूम मे चलि गेलाह। जीजा जी मां आ बड़का भैया केँ कहलथिन। - ‘अहाँ दूनू गोटे भीतर चलू-बात करबाक अछि।’ दू घंटा धरि मां, बड़का भैया आ जीजा जी नहि, जानि की-पफुसुर पफुसुर बतिआइत रहलाह’ फेर खौंझायल जकॉ ध्ुरिकऽ चलि गेलाह एक कप चाहो नहिपी लैम्ह। हुनका जाइते घर मे भूकम्प मचि गेलै। मां बजलीह-‘अजैया! तोहर एहन हिम्मत जे तू बॉट-बखड़ाक बात करैत छेँ? जीजाजी केँ पंच बनाबऽ गेल छलैंह ।’ अपना हिस्साक बात करैत छेँ? मां अपना पैर सॅ चप्पल खोलि दोड़लीह छोटका भैया दिस।’ छोटकी भभी झट दऽ हुनकर पैर पर खसि पड़लीह-‘नहिमां जी एना जुनि करू।’ बड़का भैया अबिकऽ मांक हाथ पकड़ि बैसा देलथिन। छोटका भैया दिस गुम्हरैत बजलाह-इ एना नहिमानतै’ आब एकर इलाज हमरे करऽ पड़त।’ बाजू ने कोन इलाज करब? अहाँ की कमाईत छी से हमरा नहिबूझल अछि। हमर बाल बच््या एक टका क वस्तु लेल तरसैत रहैंछ। छोटका भैया के करेज फाटि-गेलैन्ह! मां किछ कहऽ चाहैत हलथिन ताबत बड़का भैया बजलाह-‘तू बुझैत छठीं जे बॅटबाड़ा कयने बाबूजीक प्रतिष्ठा बढ़ि जयतैन्ह? इएह जीजाजी हमरा सॅ फरक कऽ तोहर टका तोरा लग रहऽ देथुन?’ जीजाजी के दोष नहिदिऔ। हम नेना छीजे ओ हमरा सॅ टका लऽ लेता? दूनू भाइ आमने-सामने बजैत छलाह कि मां तड़ाक सॅ छौटका भैया गाल पर थापड़ मारलथिन-‘नालायक! हमरा कोखि केँ कलंकित कयलक।’ ‘मां जी.... मां जी! एना जुनि करूँ? अपना के सम्हारू!’ छोटकी भाभी अनुनय-विनय करैत छलथिन। मां ध्म्म सॅ कुर्सी पर बैसलीह-अचेत भऽ गेलीह। की भेलै मां के की भेलै? कहैत, भैया दौड़लाह। ‘जल्दी पफोन लगा डाफ्रैं गांगुली केँ। ‘सविता, जल्दी सॅ कोरामीन लाउ। छोटकी भाभी तरबा रगड़ैत छलथिन। बड़की भाभी कोरामीन दऽ पंखा हौंकऽ लगलीह। बड़का भैया गरजलाह-‘आई जँ मां के किछ भेलै तऽ अजय केँ जान मारि देबै।’ छोटका भैया कनैत मां केँ पैर पकड़ि कहऽ लागलथिन। -‘मां मां हमरा माफ कऽ दिअ। हमरा नहिचाही ध्न सम्पत्ति। नहिलेब अपन हिस्सा बखड़ा।’ नहिजानि कियेक अवाक् छलहुँ। कान मे बिना कोनो प्रतिक्रियाक एकहिटा बात गंुजि रहल छल-‘तू बूझैत छहीं बॅटबाड़ा सॅ स्वर्गीय बाबूजीक प्रतिष्ठा बढ़ैतन्हि? घर्र-घर्र-घर्र स्वर.......अरे इ तऽ सीलिंग पफैनक आवाज छैक। आ हमरा होइछ जे एतेक सालक बादो भैयाक कर्कश स्वर अइ हॉलक कोनो कोन सॅ आबि रहल छै। हं, तऽ मां क बेहोशी टूटलैन्हि। दूनू भाभी सहारा दऽ कऽ रूम मे पलंग पर सुता देलथिन। ताबत डाक्टर गांगुली आबि गेलाह। ‘डाक्टर बाबू, आइ तऽ बुझू हमर हार्ट पफेले भऽ जाइत। हमरा कोखि सॅ कंस जनम लेलक अछि। बड़का बेटा तऽ श्रवण कुमार अछि राति-राति भरि हमर सेवा करै’छ। -‘शोब ठी भऽ जायत। विजय बाबू के अजय के अपना संग काज करऽ लऽ जाय। अहॉ सभतऽ लड़काक काज-ध्ंध से पहिने शादी कऽ दैत छिऐ।’ की कहू डाक्टर साहेब हमर दियादनी सभ माथा खराब कयने छल। सदति काल एकहि गप्प अजय क ब्याह कहिया करबै? बूढ़ारी मे ब्याह देत? -‘अच्छा! आब बायॉ बायॉ करौट पफेरू। हं, कनि पेटिकोट ढ़ीला करू। एकटा सूई दैत छी आराम हेत। अहां कें नरबस ब्रेकडाउन भऽ गेल अछि।’ ‘हम तऽ एकदम बुझू डाउन भऽ गेलहुश् अछि जहिया सॅ साहेब गेलाह।’ ‘साहेब तऽ देवता छलाह। मां कालीक मोर्जी। सूई लगाबऽ से पहिनहिं मां-आह -ऊह करऽ लगलीह हुनकर ई पुरान आदत छैन्हि। डाक्टर गांगुली हॅसैत बजलाह-‘ओ मां हम तऽ एखन सूई लगेबहु ने कयलहुँ आ अहॉ आह-आह करैछी? मां चुप्प भऽ गेलही। मां के निन्न भऽ गेलेन्हि। छोटका भैया बिना खयने पीने चुपचाप हुनका अगल मे बैसल छलाह। छोटकी भाभी सेवा मे जुटल छलीह। मां के आदेशानुसार खास-खास व्यक्ति के पफोन कऽ देलथिन बड़की भाभी। सबसे पहिने अयलाह मामाजी। मां क प्रिय आदर्श पुरूष। खूब खुसुर-पफुसुर भेलैन्हि दूनू गोटे मे। पाछू पता चलल जे मामा मां के कहलथिन जावत बेटी सभक ब्याह नहिहोइछ ताबत घर के बान्हि के राखू। किन्नहु बॉट बखड़ा नहिहोमए। लोक के तऽ मजा अबैछै घर पफुटने मुदा ई सोलहो आना सच छै जे घर करोड़ोक से पफुटने चौअन्नीक भऽ जाइछ। मामा जी गेलाह। मां के ई बात बुझबामे कोनो भांगठ नाहिभेलैन्हि जे बड़का जमाय अजय केँ पक्षध्र छथि हुनके ई आगि लगाएल अछि। बस ओ किराया बला मकान बड़का भैया क नाम लिख देलथिन। बड़का भैया मां के सामने घर क पूजा घर मे जा भगवतीक सोझा आ स्वर्गीय पिताक पफोटो केँ साक्षी मानि शपथ खयलनि-जहिया मां कहतीह मकानक आध हिस्स अजय के दऽ देबै। मां मने-मन निश्चय कयलनि करिया नाम क दांत तोड़ब। ओ तऽ हम बेहोश भऽ गेलहुँ तयँ बात नहिबढ़लै अन्यथा अजय बहनोई सई पर कोर्टक दरवाजा खटखटबैत। तैँ मां बड़की दीदी केँ बजाकऽ बेटी जमाय दूनू कें बड्ड बात कहलथिन । तकरबाद कबुला कयने छलीह से हनुमान जीक सवा मन क दालि-चूरमा क प्रसाद चढ़ा सबकेँ बजाकऽ खूब महोत्सव मनौलनि। फेर भादोक अमावस्या दिन खूब ध्ूमधम सॅ अढ़ाई हजारक चूड़ा-चूनड़ सती राणी के चढ़ाओल गेल। मारवाड़ी समाजमे सतीराणीक चढ़ाओल चूड़ा-चूनड़ सोहागिन ननदि आ बेटी के देल जाइत छै। तऽ बड़की दीदी सॅ मां नाराज छलीह तऽ चूनड़ सल्लो दीदी कें भंेटलनि। सल्लो दीदी पन्द्रह वर्ष क बाद जखन बेटी ब्याह मे ओ चूनड़ देलथिन तखन ओकर कीमत छलै पच््यीस हजार। अइ सभक परिणाम इ भेल जे सब ध्न बड़का भैयाक हाथ मे छलै आ सभटा गहना बड़की भाभी के जिम्मा। मां बहला पफुसियाक छोटकी भाभी क डायमंड केर कानवला आ डाइमंडक अंगुठी लऽ कऽ तिजोरी मे रखबा देलथिन। तिजोरीक चाभी रहैत छलैन्हि भाभीक हाथ। मतलब बड़का भैया आ भाभी घरक मालिक। किछ दिनक बाद सल्लो दीदी आ मंा बतिआइत छलीह आ हम ओहिठाम बैसल सरोज के सांठ मे देबऽ लेल बैडकवर पर फूल काढ़ैत छलहुँ। मारवाड़ी परिवार मे जहिया सॅ बेटी जन्मै छै बेटी क मां सांठ मे देबऽ लेल टीशूक थान, जरदोजीक साड़ी, घाघड़ा, ओढ़नी, चांदीक बर्त्तन जोगाबऽ लगैत छै। -आ सारोज तऽ आब मेडिकलक पार्टवन के फाइनल दऽ रहल छै। तैँ बेडकवार, तकियाक खोल आ रूमाल पर नव-नव डिजाइनक कढ़ाई कयल जाइत छै। मां धीरे-धीरे सल्लो दीदी कें कहैत छलथिन। ‘हम बगल बला मकान विजय क नाम लिख देलिऐ। अजयक कोन भरोस कखन रखन कोन तमासा ठाढ़ करत।’ हमरा हुनकर बात नहिनीक लागल तैं बजलहुँ मां अहां देखबै बड़का भैया ओई मकान मे छोटका भैया के हिस्सा नहिदेथिन। तड़ाक सॅ गाल पर थापड़ मारलैन्हि पॉचो आंगुर क निशान पड़ि गेल पूरा कान झनझना उठल। ऊपर सॅ कर्कश स्वर मे बजलीह -‘फेर कहियो एहन बात बजबें तऽ जीह उखाड़ि लेबौ।’ हमरा ओतऽ नहिरहि भेल उठि कऽ बरांडा पर चलि गेलहुँ। बड़ी काल घरि कनैत रहलहुँ। ओना आई-काल्हि हम कनैत नहिछलहुँं। अपना मन के बुझा लेने छलहुँ। ‘प्रिया जाबत अइ घर मे छे गांध्ीजी क तीनू बानरक अनुशरण कर। ने किछ बाज ने सुनमे किछ देख। जतबा संभव होइ चुप्प रह। एहि घर मे सरोज जखन जे फरमाइश करैत छै तुरत पूरा कयल जाइत छै आ तू दस टका क किताब किनबा लेल तरसैत छें।’ दिन बीतैत रहल। हमर बीफ्रैंएफ्रैं क परीक्षा समाप्त भेल। सरोज मेडिकल फाइनल मे छल। बड़का भैया हमरा दूनू बहिन, बुल्ली दूनू भतीजा कें कश्मीर घुमाबऽ लऽ गेलाह। जिनगी मे पहिलबेर पहाड़ देखलहुँ। पहिलबेर एफ्रैं सीफ्रैं कम्पार्टमंेट मे एतेक दूरक यात्रा कयलहुँ। खूब ऐश मौज कयलहुँ। मुदा एत बेर-बेर छोटका भैया आ भाभी क उदास चेहरा मोन पड़ैत छल। मां क देख-रेख के करतै से कहि छोटका भैया-भाभी के नहिआलथिन। कोन ठेकान अगिलो गर्मी मे छोटका भैया-भाभी घूम एती की नहि? कहॉ सॅ एताह बच््याक दूध्क पाइके हिसाब देबऽ पड़ैत छैन्हि। हुनका हाथ मे छैन्हि की? कश्मीर सॅ घुरला पर बड़की भाभी बीमार रह लगलीह। ओतुका हवा-पानि सूट नहिभेलैन्ह। भैयाा रोज राति मे एक दू पैग व्हिस्की पीबैत छलाह भाभी के नहिबर्दास्त होइत छलैन्हि। हुनका ई शराब पीयब चारित्राहीनताक लक्षण लगैत छलैन्हि ओ पुरान संस्कार क महिला छलीह। भैयाक इच्छा छलनि ओ सूट पहिरकऽ बाहर घूमथि। लिपिस्टिक लगाबथि भाभी कहैत छलथिन हम कुलबध्ु छी कोठा पर बाली नहि। भाभी जॅ मां लग भैयाक शिकायत करैत छलीह तऽ मां हुनके फझति करैत छलथिन-‘भरि दिन खटिकऽ अबैत छै तऽ राति मे एक गिलास औरंजक जूस पीबैत छै से अहॉ के बर्दास्त नहिहोइत अछि? -‘मां जी! ओ शराब पीबैत छथि जूस नहि।’ -‘हे, फालतू बात जुनि करू। हमर ओ श्रवण-पुत अछि। अहॉ के होइत अछि जे ओ मां के सेवा कियेक करैछ? अहाँक इशारा पर कियेक ने नचैत अछि?’ भाभी गुम्म भऽ जाइत छलीह। बड़की दीदी सॅ फरियाद कयलनि। तऽ दीदी साफ-साफ कहलथिन‘भैयाक खिलाफ बाजि कऽ के मां सॅ उलझत? अहाँ अपन परिवारक बात अपने सोझराउ।’ भैया क चरित्रा क गुनध्ुन मे भाभी क चिन्ता बढ़ैत रहलनि। भैया जाति-पाति नहिमानैत छलाह आ भाभी छूआ-छूतमानैत छलीह। कश्मीर यात्रा मे ध्रक बनल पेठा-पकवान आ फले खाइत छलीह। हाउसबोट मे मुसलमान खाना बनबैत छलै मुदा ओ अपन र्ध्म नहिछोड़लनि। भाभी मनोव्यथा बढ़ैत रहलनि। कश्मीर सॅ घुरलीह तहिया सॅ दुखिते छलीह। पेट मे बच््या छलैन्हि। दिन भरि उल्टी करैत छलीह। एक दिन बेहोश भऽ खसि पड़लीह। डाफ्रैं गांगुली एलाह। ब्लड प्रेशर चेक भेलै। डाफ्रैं अमृता कौर कहलथिन ‘तुरत एर्बार्शन कराओल जाय नहितऽ मांक जान नहिबचा सकबै। भाभी छमासक भू्रण हत्या क पाप अपना माथ पर नहिलेब चाहैत छलीह। मुदा भैयाक आगु हुनकर बात के मोजर की छलैह। मुदा भैयाक आबुगु हुनकर बात के मोजर के दितै। एर्बार्शन भेलै मुदा भाभी फेर उठि कऽ ठाढ़ नहिभेलीह खाट घऽ लेलैन्ह। डाफ्रैं गांगुली आ डाफ्रैं अमृताक दवाई काज नहिकऽ रहल छलै। डाक्टर नलिनी सेन गुप्ता के बजाओल गेल। डाफ्रैं शरत सेन अयलाह सम्पूर्ण शरीरक जॉच भेलै तऽ पता चललै हार्ट उनलार्ज्ड भऽ गेलैन्हि, थायरडो काज नहिकरैत छलैन्हि। दवाई आ इलाज सॅ किछ सुधर भेलैन्ह मुदा भाभीजीक मनरोग नहिछुटलैन्ह। जहिया कऽ भैया हुनका ग्रैंड होटल मे संग लऽ जाइत छलथिन भोजन कराबऽ तहिया ओ अबिते बाथरूम मे उल्टी करऽ लगैत छलीह। हुनका नजरि मे भैया अबारा चरित्राहीन शराबी छलाह। भैया ताहि दिन खूब पाइ पीटैत छलाह तइओ खर्चा आमदनी सॅ दुगुना छलै तैं पाइ जमा नहिभऽ पबैत छलै। सरोजक ब्याह के चिन्ता मे मां उदास रहैत छलीह। मां कें खुश करबा लेल भैया मांक हाथ पर किछ टका दऽ दैत छलथिन मुदा नीक घर, वर लेल 1962 ई क समय मे लाख टका सॅ कम दहेज नहिलगैत छलै। इं हमरा आइ कतेक तरहक बात याद आबि रहल अछि। मां क स्वभाव मे कनि नरमि अयलैन्हि। आब हमरे नहिसरोजी के मासिक शुरू भऽ गेलै। हम दूनू गोटे बड़की दीदी के कहि सुनि कऽ मां के मना लेलहुँ जे ‘आब हम सभ तीन दिन घरि छुआ छुत नहिमानब। हं प्रिफज नहिछुअब, रसोई घर मे नहिजायब ने अहॉक घर मे मुदा आब एसगर एक कोन मे बैसल नहिरहब तीन दिन घरि।’ खैर इ तऽ समझौता भऽ गेल मुदा बात अटकि गेल बस हमरा वास्ते। हमर वाह्य शरीरक रूपांतरित भऽ रहल छल। बारह वर्षक किशोरी देखबा मे युवती लगैत छलहुँ। आ हमर ई उभारसॅ मां परेशान छलीह। सत्ते हम उम्र सॅ वेशी पैध् लगैत छलिए। हमर स्वास्थ्य नीक छल दिन-प्रतिदिन देह भराएल जाइत छल। एक दिन सल्लो दीदी एकटा नव समीज देलैन्हि जकर डॉर सॅ ऊपरका भाग छलै जैकेट जकाँ। कहलनि ‘इ पहिर।’ पहिरलहुँ बहुत टाइट छलै। दीदी के कहलिऐन्ह । ‘दीदी इ हमरा साइज सॅ दू इंच छोट छै।’ दीदी कहलैन्ह-‘ तैं पहिर ऽ देलिऔ। सबटा बटन लगा। अइ सॅ छाती सपाट लगतौ।’ ओहातऽ हिनका सबके हमर छातीक उभार अखरैत छैन्हि। हम तऽ बाथरूमक अयना मे प्रस्पफुटित होइत रूप के देखि प्रसन्न होइत छी। साहस कऽ फेर बजलहुँ ‘दीदी ई बहुत टाइट दै अकशक लगैए।’ ‘अकशक लगने मरि नहिजएबें। आदत पड़ला पर सब ठीक भऽ जेतौ। समीज क तर मे सब दिन पहिर।’ -‘से कियेक?’ से अइद्वार जे नेना छे लोक युवती नहिबुझै। ‘अहॉ कियेक ने पहिरैत छी? -‘कुमारि छलहुँ तऽ हमहूँ पहिरैत छलहुँ। मुदा थोडबे दिन पहिरलहुँ। हमर ब्याह बारहे वर्ष मे भऽ गेल छल। आ तोरा जकॉ दसे वर्ष मे हमरा पीरियड्स श्ुारू नहिभेल छल।’ स्कूल गेलहुँ तऽ बुझाइत छल जेना दमपफुलैए, पानि पीबऽ के छुटीð लऽ बाथरूम गेलहुँ। ऊपरका समीज खोलि ओइ जैकेट केर सिलाई खोलिकऽ पहिरलहुँ। आब मोन अकशक नहिकरैत छल। घर घुरलहुँ- दुपटाð ओढ़ने छलहुँ तइओ मां क नजरि सॅ किछ नुकाएल नहिरहल। ओ हमरा नहिकिछ कहलनि मुदा दीदी के कहने हेथिन। हम अपना रूम मे जा कऽ किताब रखिते छलहुँ कि दीदी पहुँचलीह। केवाड़ बंद कऽ आर्डर देलैन्हि। प्रिया समीज खोल।’ ‘नहिदीदी। आब हमरा किछ नहिकहूॅ। क्लास मे हमरा सांस नहिलऽ होइत छल।’ ‘ठीक छै हम किछ नहिकहबौ। चल मां लग कहुन जे सांस नहिलऽ होइए।’ हमर बोलती बंद भऽ गेल मां क नाम सुनिते। ‘दीदी-सरोज आ नीलू तऽ एहन जैकेट नहिपहिरैत छै?’ -‘सुन वेशी बात नहिबना। जहिया समय एतै ओकरो सभके पहिरऽ पड़तै। अच्छा खोल हम कनि ढ़ीला कऽ के सीब दैत छिऔ।’ दीदी ई घरो मे पहिरऽ पड़त?’ -‘हं, घर-बाहर, सांझि, भोर राति-दिन हरदम।’ हमरा मोन पड़ल पर्ल-बर्क क एकटा नायिका। जकरा बचपन मे लकडीक जूता पहिराएल गेलै पैर छोट रखबा लेल। जखन औ पैद्य भेलैतऽ पैर ततेक छोट भऽ गेल छलै जे आकरा चलबा मे कष्ट होइत छलै। ओ दासीक सहारा लऽ कऽ चलैत छल। की आब ई पहिरने हमरो विकास रूकि जाएत? पुरूष जकाँ सपाट.... नहिएहन नहिहोमऽ देबै’ लोक हमरा हिजड़ा कहत। दाई मां हमर प्रश्न के उत्तर नहिदेलैन्हि। ओ कहलनि-बुच््यी। अहाँक उम्र मे तऽ हमरा छेदी जनमल छल। ‘तऽ ओइ समय मे अहॉक साइज की छल ?’ ‘अच्छा ई कहू जे एखन जेहन छाती अछि तेहने पहिने छल?’ ‘नहिपहिने एहन नहिछल। ई तऽ छह-छहटा नेना के दूध् पिला सॅ एना टूटि गेल। आब हम बूढ़भेल हुँ।’ ‘तऽ मां आ दीदी हमरा कियेक तोड़ऽ चाहैत छथि?’ बुच््यी मासिक भेला क बाद औरत जवान होमऽ लगैत छै। अहॉ समय से पहिने जुआन भेल जाइत छी। आ अइ सभ भेल ओइ राक्षस के कारण पफुलाय सॅ पहिने ओ तोड़ि देलक।’ ओह तऽ असमय युवती होइबाक कारण अछि हमर निर्दय बड़का भैया रोआँ-रोआँ कलपि उठल। ओहि दानव के कारएा हमर इ हाल भेल। बच््ये मे पीरियड्स फेर इ उभार जॅ क्रम चलिते रहितै तऽ पेट मे बच््यो। ओई राति एको घड़ी चैन सॅ सूतलहुँ नहि......। असमय बोझिल कैशोर्य, कुम्हलाएल नेनपन जो राक्षस तिल-तिल के मॅरबें हमर नोर क श्राप पड़तौ। हमर सम्पूर्ण अस्तित्व हाहाकार कऽ रहल छल। दाई मां क शब्द बेर-बेर माथ पर हथौड़ी कचोट जहॉ काँ बुझना जाइत छल......‘कलि के फूलाए सॅ पहिने मयोड़ि देलकै।’ ने हम फूल बनलहुँ ने नागफनीक कॉट। एक सुनगैत अंगारे! छुॅआ उगलैत ऑखिक नोर सॅ भीजल जारन। की कहल जाए । हमर तऽ व्यक्तित्वे चूर-चूर भऽ गेल। एक दिस विद्रोहक आंगि मे जड़ैत दोसर दिस भयाक्रान्त। हम तऽ सब पुरूष मे अपन दुष्ट भाईक प्रतिबिम्ब देखऽ लगलहुँ। सहमल, भीतरे-भीतर कुहरैत लड़की। कहॉ चलि गेलाह बाबूजी। आब कहियोनहिऔता? हुनकर आश्वस्त करैत ओ सुदीर्घ कद, सुरक्षाक बोध् करबैत ममत्वपूर्ण नयन-अपन उपेक्षित बेटी कें दाई मां क कोर मे प्रसन्न देखि प्रसन्नता छलकैत चेहरा। जँ बाबूजी भैयाक कुकर्म बुझि जयताह तऽ ओ की करितथि? की भैया के घर सॅ निकालि देथिन छल? नहिकथमपि नहि। मां किन्नहुँ बेटा के घर सॅ निकालऽ नहिदेथिन छल ओ बेटाक गलती नहिमानि सकैत छषि वरू हमरा ब्याहि घर से हटा दितथि। आ इएह होइत रहलै ए युग-युग सॅ। लड़कि के पैघ होमऽ सॅ पहिने ब्याहिक सासुर पठा घर का पुरूष कें नजरि मे खटकए ताहि सॅ पूर्व घर सॅ भगा। पता नहिअलबल सोचैत हमर ऑखि कखन मुनाएल सपना मे देखलहुँ क्यो बरांडा सॅ उठा कऽ बाहर सड़क पर पफेक देलक। मुदा हमरा किछ भेल नहिचोटो नहिलागल। बस गरदा झाड़ि कऽ उठलहुँ आ मकानक पाछूवला बरांडा सॅ लटकैत सीढ़ि पर चढ़ि वापस घर आबि गेलहुँ। मां क घर होइत हुनका बिनु देखनहिं हॉल टपलहुँ। फेर बाबूजी क रूम तकरबाद ओ बरांडा फेर वएह दृश्य बरांडा सॅ उठा कऽ पफेकब.. दहशत सॅ चिचिआ उठलहुुँ। -‘की भेल बुच््यी? कियेक कनै छी?’ मम्त्वपूर्ण हाथ माथ हसौं थि पूछैत अछि। -‘दाई मां, दाई मां!’ बुच््यी! हम कहैत छी सूतऽ से पहिने हाथ पैर धे कऽ हनुमान चालीसा पढ़ि कऽ सूतू, मुदा हमर बात अहॉ किये मानब। हम तऽ गंवार अनपढ़ औरत छी? जाउ, एखन ऑखि मुनि सूति रहू। देरी सॅ उठब तऽ मां बजतीह।’ -‘हं, दाई मां! अहूँ सूति रहू ऊतऽ सपना छल।’ हमरा माथ पर हाथ रखने ओहिठाम दाई मां सूति रहलीह। हमहूँ ऑखि मुनि पड़ल छलहुँ। निन्न टूटल। अरे! ई तऽ डूयब्रवनिक छै। सांझुक लुक-झुक बेर छलै। कतहु किछ नहि। शून्य-साफ विस्तृत आकाश उड़ैत सांगल पाखी। निःशब्दता भंग करैत निरन्तर छप-छप लहरि समुद्रक। अइ बेर मे नहिजानि कियेक होटलो शान्त भऽ जाइत छैक। लोक सब पफुसपफुसाक बाजत। दूर सॅ कोनो-जहाजक सीटी सुनाई पड़ल। अई क्षणिक गोध्ूलि बेर मे कतबा किछ घटित भऽ जाइत छै। अनाम उदासी हवा मे भिझरायल बुझना जाइछ। संझुका पहर प्रायः टूरिस्ट किलाक भीतर सजल दोकानक मे चक्कर लगबै’छ। अइ छोट छीन शहरक सबसॅ वेशी आकर्षणक केन्द्र छैक इएह किला। अहि मे सजल ध्जल छोट छोट बाजार, रेस्टोरेंट आखरी छोर पर एकटा ऊँच जगह छै जतऽ कहियो काल नाटक होइत छै। किला मे जाइते बाम भाग मे कन्सर्ट हॉल छै। दहिन भाग मे आबिजान के चित्राक प्रदर्शनी लागल छै। हम मोने-मेन संकल्प कऽ लेलहुँ जे लड़की बनल रहब औरत नहि। तैं समीजक नीचा पहिरऽ बला जैकेट के खूब कासिकऽ पहिरऽलगलहुँ। आब सत्ते ऊपर सॅ एकदम सपाट करेज बुझाइत छलै। मुदा तइओ नहिजानि हमरा चेहरा मे की अभरैत छलै। जे लड़का, पुरूष सभके गि( दृष्टि हमरे चेहरा पर गड़ल रहैत छलै। ने ओइ नजरि सॅ क्यो सरोज कें देखैत छलै ने नीलू कें। सभक कामुक दृष्टि हमरे पर कियेक? जहिया एगारह वर्षक छलहुँ तखन हमरा माथ मे कतहु कतहु केश झड़ि जाए आ उज्श्र चकत्ता भऽ जाइत छल। पहिने अठन्नी जकॉ फेर ओहू सॅ पैध्। भाभी के देखेलिएन्ह। भाभी मां के कहि देलथिन। मां माथ ध्ुनऽ लगलीह। बजैत बजैत हुनकर मुँह टेढ़ भऽ गेलैन्हि ओ बेहोश भऽ गेलीह। भाभी झट कोरामिन आनऽ गेलीह दाई मां मँह पर यूडीकोलोन छींटलथिन, बड़की भाभी पंखा सॅ हैंकात छलीह। होश भेलैन्हि। दाई मां हुनकर तरबा रखड़ैत बजैत छलीह- ‘बहुरानी। हिम्मत राखू इलाज हेतै सब ठीक भऽ जेतै।’ मांक पुफेर विलाप शुरू भेलैन्हि-चमेलिया भाय। एकर भागे फूटल छै कोना एकर ब्याह हेतै।? सौसें माथक केश उड़ि जेतै? हे देव-पितर। बालाजी।। आब अहिंक हाथ मे लाज अछि। हे राणी सत्ती दादी-हमर अहिंक हाथ मे लाज अछि। हे राणी सत्ती दादी हम झुझणु जा कऽ चूड़ा चुनड़ी चढ़ायब हमरा बेटीक रोग छुटि जाए। हे मां एकरा पर कृपा करिऔ’ एतबा कहि मां फेर बुक्का फाड़ि कानऽ लगलीह फेर मुँह टेढ़ भऽ गेलैन्हि। नहिजानि कियेक मां कें एना विलाप करैत देख हमरा भीतर सॅ खुशी भऽ रहल छल। पहिल बेर अनुभव भेल जे ओ हमरो मां छथि। पहिल बेर हुनका मुँह सॅ सुन लहुँ बेटी कहैत। हमरा लेल चिन्तित छथि से देखि सुख भेँटल। भाभी फेर हुनका कोरामीन पिया कऽ विछावन पर लऽ जा कऽ सुता देलथिन। दुपहरक समय छलै दू बजैत रहै। गर्मीक छुटीð छल। भीषण गर्मी मे हम माथ झुकौने सरोज के सॉठ मे देबऽ लेल आरगंडी साड़ी मे महीन शैडोवर्क के फूल काढ़ैत छलहुँ। आत्मा भीतर सॅ तृप्त छल-मां के हमर चिन्ता छैन्हि। हमरो मानैत छाथि। कनैत-कनैत बेहोश भऽ गेलीह। दाई मां गोरथाड़ी मे बैसल मां क पैर जॅतैत छलीह। आइ भोर सॅ दाई मां हुनके सेवा मे लागल छथि किछ खयबो नहिकयलैन्हि। मां आई जतेक हमरा लेल कनलनि ततेक ककरो लेल कहाँ कनै छथि। बुल्लियो के माथ मे चकत्ता भेल छै। मां ओकरा लऽ कऽ डाक्टर ओतऽ गेलीह। तखन सॅ डाफ्रैं पंजाक देल दवाई सॅ रोज ओकरा माथ मेमालिश करबैत छथिन। मुदा ओकरा लेल कहियो कानलथिन? हम सिलाई कऽ के उठलहँु। मां के कहलिएन्ह ‘मां हम पैर जॉति दै छी। दाई मां नहा खा लेतीह। मां इशारा सॅ दाई मां के जाय कहलथिन। हम हुनकर पैर जॅतैत छलहुँ। थोड़ेकालक बाद मां बजलीह-‘जा बैआ सूतऽ। आराम करऽ।’ नहिमां। अहांक मोन खराब अछि हम एखन नहिसूतब। हम विजयोल्लास मे सरोज दिस ताकि ओकर मूँह दूसलिऐ। देख मां हमरा कतेक मानैत छथि। डाक्टर गांगुली अयलाह। एखनो मां क मुँह टेढ़ै छलैन्हि। मां के देख डाक्टर गांगुली बजलाह। ‘शोब ठीक भऽ जायत। मिसेज गुप्ता।’ की ठीक हेतै डाक्टर बाबू। चारि मास सॅ बुल्लीक इलाज भऽी रहल छै। कतेक डाक्टर बदललै। खैर बुल्ली तऽ लड़का छै चीनी क लड्डू टेढ़ो भला। मुदा प्रिया लड़की छैं कोना हेतै ब्याहदान? ओहिना त एखन बारहोवषक नहिभेल अछि आ लगैत छै जेना सोलह वषक होई। किछ करू डक्टर साहब। कहुना एकर केश नहिउड़ै, आ उजरा चकत्ता मेटा जाइ। -ठीक छै हम सोचिक कहब। अहाँ एखन किछ नहिसोचू। डाफ्रैं गांगुली असली मनुष के ताकि कऽ आनत।’ आइ काल्हि हमरा सभक सहानुभूति भेंट रहल अछि। सबसे पहिने मां बड़का भैया कें हमर माथ देख बैत कहलथिन। ‘देखहि अठन्नीक बराबर उज्श्र चकत्ता भऽ गेलैए।’ मां, अहाँ चिन्ता जुनि करू। जँ एतऽ ठीक नहिहेतै तऽ हम एकरा बम्बई लऽ जेबै इलाज कराबऽ। ‘छोट-पैघ सब देखलक। बुल्लीकऽ अहिना माथ मे कतेक ठाम केश उड़ल छै आ उज्श्र चकत्ता भऽ गेलैए। मुदा तैं की ओ तऽ लड़का छै। हँ, हमरा कोनो रोग ग्रसित कऽ लेत तऽ हमर ब्याह कोना हेत?’ दोसर दिन मां हमरा लऽकऽ नानीक घर गेलीह। नानी हमरा माथक केश हटा कऽ उज्श्रा दाग देखलनि तऽ माथ पर हाथ घऽ बैसि गेलीह- ए कस्तुरी! एकटा नीक जकॉ इलाज कराबऽ पड़तै। लड़की छै ब्याह-दान करबा मे कठिनाइ हेतै। मामा, मामी देखलनि। मामा कहलथिन-‘बौआ, कलकत्ता मे तऽ एकरा टोप डाक्टर छै डाफ्रैं बीफ्रैं सीफ्रैं राय। तोरो ओकरे सँ इलाज भेल छलौ।’ ताहि पर मामी बजलीह-मुदा ओतऽ आइ काल्हि पेशेंट के देखते नहिछै।’ -‘अरे, पाइ रहऽ चाही। टका मे बहुत तागत छै। टका छै तऽ सब छै टका नहितऽ किछ नहि। टका भेला सॅ कलिया मुनिम के आब लोक कालूराम जी कहै छै।’ मामा डाक्टर राय सॅ बात कयलनि। समय लऽ लेलथिन। मामा मामी आ हम डाफ्रैं बीफ्रैं सीफ्रैं राय ओत गेलहुँ। डाफ्रैं राय विटामिन क इंजेक्सन सप्ताह मे तीन-दिन लेबऽ कहलनि। पानि सन कोनो लोशन देलनि आ केश मे जवाकुसुम तेल लगाबऽ कहलनि। डाफ्रैं साहेब मामा कें कहलथिन-‘किछु दिन मे बिमारी जड़ि सॅ खत्म भऽ जेतै जँ ठीक नहिहेतै तऽ डाफ्रैं बीफ्रैंसीफ्रैं राय अपन नाम बदलि लेताह। ध्ुरती काल मामीजी हमरा रैली सिंह के गुलाबक शरबत पिऔलनि। हमरा एतेक इम्पार्टेन्स क्यो कहियो नहिदैत छल। हम तऽ कल्पनो नहिकरैत छलहुँ जे मां हमरा डाक्टर सॅ इलाज कराबऽ लऽ जयतीह। आब बुझलिऐ मां बड्ड नीक छथि हमरो सॅ स्नेह छैन्हि। दू दिन सॅ तेहन अन्हर बरसात भऽ रहल छै जे सूर्यक दर्शनो नहिभेल। नीचाँ उफनैत समुद्र ऊपर बरसैत आकाश। मोटाक मोटा पानि उझलि रहल छै आकाश तइओ नहितृप्त होइत छै समुद्रक पिआस। जतबा पानि पीबै’छ समुद्र ततबे नशा मे मां तल रहै’छ। समुद्रक सतह गतिहीन छै, बरखा क चोट सॅ लहरि लगै’छ स्तब्ध्! एखन हम बाहरे सॅ टहलि कऽ अबि रहल छली। छाता लऽ कऽ गेल छलहुँ मुदा तइओ ऊपर सॅ नीचॉ धरि भीजल छी किछ लोक एसगर रहऽ मे घबराइत छै। तैं मन बहटारऽ लेल ककरो सॅ दोस्ती कऽ लै’छ सेह तॅे सब गप्प-सप्प मे मगन छल। हम सोचैत छलहुँ कतऽ बैसि हॉल मे की लाउन्च मे। मदा लाउन्च मे त कतहु जगह नहिछै। जर्मन दम्पति भरि दिन ताश खेल मे मस्त छल। जोसेफ हमरा कहलक ‘मैडम! अहाँ कनिएक प्लम ब्रांडी लऽ लिअ।’ हम एक घांेट पीलहुॅ कि बुझाएल जेना कंठ सॅ पेटक अॅतरि धरि आगि लेस देलक। ओ बाजल-‘मैडम! ब्रांडी ताहू मे प्लम ब्रांडी एना नहिपीअल जाइछ।’ हम ओकरा कहलिए -‘जोसेफ अहॉ कहलहुँ दवाई जकॉ पीब जाउ तऽ हम पी लेलहुँ मुँह कान सॅ लऽ कऽ कंठ करेज सब मे धह दऽ रहल अछि!’ -मैडम घाह तुरते ठीक भऽ जाएत। हं एसागर बैसल छी। चलू, दू टा अमेरिकन काल्हि ए आयल अछि ओकरा सँ दोस्ती कऽ लिअ।’ -‘नहि, जोसेफ। अमेरिकन बड्ड बजैत छै आ हम......।’ -हँ, हँ, हम बुझि गेलहुँ अहॉंके एकान्त प्रिय अछि अहा लेखिका छी।’ हमरा हँसी लागल। सत्ते अइठाम लेखक के बड्ड सम्मान छै। ‘मैडम! अहाँ कोन भाषा मे लिखैत छी?’ -‘हिन्दी मे।’ ‘अंग्रेजी मे कियेक नहिलिखैत छी?’ ‘हमरा लेल ओ विदेशी भाषा अछि।’ ‘मुदा हम पढ़ित हुँ.........।’ -‘ठीक छै कहियो अंग्रेजी मे अनुवाद कऽके पठा देव।’ ‘ध्न्यवाद! मैडम आब मोन केहन लगैए। आब तऽ कनिको ठंडा नहिलगैत हेत?’ ‘नहिसत्ते कनिको ठंडा नहिलागि रहल अछि। प्लम ब्रांडी क लेल ध्न्यवाद आब तऽ ताजगी महसूस कऽ रहल छी।’ -‘वेश तऽ मैडम आब अहाँ लंच कऽ लिअ। हम वेजिटेबल प्लेट सजा दैत छी।’ ‘जोसेफ! किछ और नहिभेंट सकैए। एहन मौसम मे ई टीन वेजिटेबल। ऊँ हूँ।। ओहूना इ खाइत-खाइत मोन ऊबि गेल अछि।’ ‘जोसेफ उदास भऽ गेल। फेर किछु सोचैत बाजल मैडम अहाँ लेल कढ़ी बनबैत छी। राइस एंड कढ़ि।’ ‘बना लेब ?’ ‘हं, कियेक नहि। अहॉ पहिने फरमाइश कयने रहितहुँ। हमरा तऽ होइत छल जे डाक्टर अहॉ कें ऊसनल तरकारी कहलक अछि। बेलग्रेड सॅ अहॉक दोस्त इएह निर्देश देने छलाह।’ -पिफलिप! ओह! तऽ ई पिफलिपक कारस्तानी छै। सॉरी। जोसेफ, हमर दोस्त किछ वेशीए हमर ध्यान रखैत छथि। आब अहा केँ जे इच्छा होमय बना कऽ दिअ।’ जोसेफ खुश भऽ गेल। ओ कहलक आइ राति मे अहाँ केँ स्पेशल ‘कीश’ बनाकऽ खोआब आ ओकरा संग चीज बॉल। ओह हमरा पहिने कहने एहितहुँ। सॉरी वेरी सॉरी!!’ ‘गलती हमर अछि अहॉ क कोन दोष?’ जोसेफ टमाटरक रस मे तरकारी सिझौलक नीक स्वाद छलै भातो बढ़ियाँ छलै आ ताहि संग छलै’ स्टाबेरी टर्टि। मुँह क स्वाद कतेक दिनक बाद बदलल। विछाबन पर सूतिते प्लम बांडीक असर बुझाएल। खूब गहरा निन्न मे सूतलहुँ। निन्न टूटल तऽ खिड़की लग जा कऽ ठाढ़ भेलहुँ। समुद्र मे खसैत मूसलाधर वर्षा आ ध्ुआँ-ध्ुआँ सन उठैत समुद्री लहरक बाहरि। सप्पूर्ण शहर भींजल तितल। चटाðन पोर-पोर भीजल ओइ पर पड़ैत बौछरक नजारा अद्भूत लगैत छल। लगैत छल खिड़की लग ठाढ़ छी से हवा तऽ लगिते छल पानियो पीबऽ रहल छी। थोड़ेक काल एहिना ठाढ़ रहलहुँ। बॉलकनि मे एखन बैसब कठिन छै। तऽ की करू? लिखू बुझाएल जेना जूडी आदेश दऽ रहल अछि। मुदा एहन मौसम मे एना एसगर -एसगर ....? त की भीड़ भाड़ मे लिखल जाइछ? अपन बेवकूपफी पर अपने हॅसलहुँ। एसगरक तहे-तह जिनगीक झंकार सुनाई पड़ल। बरसाक कारण माटिक सोंह सुगंध् नाक मे हलचल मचौने छल। चारू भर ध्ुंध् छलै तैं ककरो चेहरा-चिन्हब मुश्किल छल। कखनौ कऽ बरसाक बौछार कम भऽ जाइत छलै तऽ बीच-बीच मे बत्तीक झिलमिलाहट झलकैत छल। बुझाइत छै आइ बरसा घुटतै नहि। भोरे उठि कऽ हम बॉलकनि मे गेलहुँ। बरसा थम्हि गेल छलै। ताजा खिलल गुलाब सन भींजल भोर का समुद्र क शान्त लहरि बड्ड नीक लगैत छल। सबटा मकान राह-बाट, गाछ-बिरीछ फूल-पात सब मे ताजगी छलै। मन मे अजीब बेचैनी महसूस भऽ रहल अछि, माथक नस मे तनाव। भीतर मे किछु घुमड़ि रहल अछि। अथाह समुद्र। गरजैत लहरि संग किनार पर ठाढ़ि एसगर छी। निस्पंद। कतहु सॅ आवाज आबि रहल छै मुदा हम नहिसुनि रहल छी। समुद्रक लहरि के शोरगुल मे आवाज स्पष्ट नहिभऽ रहल अछि तथापि चेष्टा करैत छी। के अछि ओइ पार? समुद्रक ओइ पार, क्षितिज के पार जतऽ जमीन क कोनो कोन मे हम सब संग छलहुँ......... जतऽ हमर घर छल, बाबूजी छलाह। गप्प कर ऽ चाहैत छी सबसॅ जे बहुत पॉछा छुटि गेल। ‘हेलो आपरेट?’ ‘यस’ ‘कैन यू गिव मी दिस नम्बर?’ हम ओकरा पिफलिपक नम्बर दैत छिऐ। एमस्टरडमा सॅ पचास मील दूर वाल वाइक केँ जतऽ पिफलिप आ जूडी रहैत छयि। व्यापारक रिश्ता घनिष्ठ मित्राता मे बदलि गेल अछि। निःस्वार्थ, निस्पाप पारस्परिक सद्भावना। किछु ए दिनक परिचय क बाद व्यापार के फरक कोनों कंपनर मे राखि देल गेलै। व्यापारे तऽ करैत छी हम सब। ढ़ेरो व्यापारी एकटा भऽ जायत, किनऽ बला बेच बला मुदा मीत? बड्ड मुश्किल सॅ भेंटैत छै मन क मीत ई कहब छैन्हि जुडि केँ। हेला! ........... हं, पिफलिप.........हँ हम एकदम स्वस्थ छी। की....आवाज मे उदासी? नहिएहन कोनो बात नहि। हं, हम चाहैत छी किछ दिन आब अहीं सबके संग रहि?.... नहिहम कतहु घूमऽ नहिजाए चाहैत छी। बस हमरा अहिंक घर....। ओह पिफलिप पफोन पर सबटा नहिकहि सकब। .... ओह अहॉ तऽ सदिकाल जेट स्पीड मे रहैत छी। जूडी कतऽ छथि? ऑपिफस मे? कहि देवैन्हि हम याद करैत छिऐन्ह। ओ के भोजन करैत काल हम फेर सोचऽ लगलहुँ। मां आब कतेक वर्षक भेल हेती? पचासीक ऊपर त अवस्से भेल हेती। लगैं’छ दिनोदिन हुनके जकां शिथिलता आ चिड़ चिड़ापन हमरा रग-रग मे लहु संग दौड़ रहल अछि। की तैं हम कहियो अपना के नहिस्वीकारि पबै छी? अर्न्तमन मे दस वर्षक अबोध् लड़की कें जीबैते जरा देलिए। नहि, हम ओहन औरत नहिबनऽ चाहैत छी? मां अहॉ जकॉ या दीदी सब जकॉ जिनगी कें हम नहिस्वकारि सकैत छी? ने बड़की भाभी जी जकां भीतरे-भीतर कुहूकैत मरऽ चाहैत छी। तइओ परम्पराक जड़ि हमर पछोड़ नहिछोड़ि रहल अछि। युग-युग करे एहन अमानवीय परम्परा के कोन रोगक नाम देल जाए जकरा कारण हमरा सन विद्रोही महिनाला समर्पित पत्नी आ मां बनऽ लेल विवश होइछ। हम तऽ जिनगीक बहुत लम्बा हिस्सा मां सन नहिबनऽ मे बितेलहुँ संघर्ष करैत। तथापि इच्छाा मां प्रसन्न रहथि,....... मुदा नहिओ तऽ बाबूजीक मुइला क बाद अपना जीवन क रेगिस्तान बना लेलैन्हि। ने कतहु जायब ने ककरो सॅ कोनो तेहन मैत्राी। बाबूजी जाबत जीवित छलाह हमरा लोकनि प्रत्येक साल पूजाक छुटीð मे लाव-लश्कर संग यानी महराज, मुनीम, चारि टा ढ़ेनामा, देनमी, दूनू भाई सल्लो दीदी कलकत्ता सॅ बाहर जाइत छलहुँ। से हो दूर-दूर कहियो हजारीबाग तऽ कहियो जसीडीह या देवघर। बिहारक लाल-लाल माटि, सांय-सांय करैत शीतल बसात, ऊबाऊ दुपहरिया आ कखनौ नहिखत्म हुअबला राति। जाय सॅ पूर्व डाक्टर गांगुलीक सोझा मे सब घिया-पुताक वजन लेल जाइत छलै। डायरी मे मुनीम जी नाम संग सभक वजन नोट करैत छलाह। मां कहैत छलथिन-‘बच््या सभ दुबरा गेल अछि। बंगालक अइ बरसाती मौसम मे बाहर रहत त शरीर स्वस्थ रहतै।’ डाफ्रैं गांगुली ताहि पर टिपैत छलाह हं सात्ति कहै छथि एतुका गरम हवा ऑत के सड़ा दै छै एखन बच््या सभ लेल पाश्चिमक के हवा जोरूरी छै।8 मां स्वयं बिमार रहैत छलीह बाहर जायब हुनको लेल जरूरी छलै। तऽ एक मास पहिने सॅ तैयारी शुरू होइत छल। सबसे पहिने एकटा कोठी भाड़ा पर लेल जाइत छल। सल्लो दीदी लिस्ट बनबैत छलीह कोन-कोन बक्सा जेतै। बड़का बड़का लोहाक कारी बक्सा मे कोनो मे बर्तन-बासन कोनो मे भोजनक सामग्री कोनो मे दवाई, गरम कपड़ा सभक ओढ़ना बिछौना बिस्तरबंद बड़का-बड़का बंडल। स्टेशन पर बाबूजीक परेशान चेहरा। कालूरामजी के रूपैया क थैली सम्हारबाक डियुटी बड़का भैया क सख्त आदेश। तखन पहुँचैत छलहुँ हजारीबाग क सुनसान जंगल क सुन्न बंगला मे। बंगलाक चारू भर बड़का बड़का गाछ-बिरीछ। दाई मां सॅ राति मे हरिया बतिआइत छल-‘मौसी काल्हि राति ओइ गाछ तर भूतनी बैसल छलै।’ ‘सच््ये।’ ‘हं, हं हम सुनने रहिऐ छन-छन आवाज अबैत छलै मोन तऽ भेल लग जा कऽ देखिए मुदा ऽर भेल।’ -‘हे भगवान! एहन गलती नहिकरिहे जान चलि जेतौ।’ -‘हम पूछलिऐ-दाई मां भूतनी कें लोक कोना चिन्हतै? -‘भूत-प्रेत क डरेँ वरके गाछ लग चबुतरा छै ओम्हर क्यो नहिजाइत छल। खाली दाई मां जाइत छल शिवजीक जल ढ़ारऽ। दाई मां कहैत छल-‘भूत प्रेत शिवजी लग रहिते छै। -पहिल सप्ताह नीक जकॉ बीतैत छल। मां अपन दवाई बिरो बन्द कऽ लैत छलीह। भोजनक रूचि बढ़ि जाइत छलैन्हि आ खोराको। राध कहैत छलै-जॅ मैडम तीन मास एतऽ रहथि तऽ पूर्ण स्वस्थ भऽ भयतीह। मां कहैत छलथिन तीन मास तऽ नहिसवा मास धरि अवश्य रहब, ध्नतेरस दिन कलकत्ता। पहुँचब। सप्ताह बीतैत-बीतैत राध आ दाई मां क बीच लड़ाई शुरू भऽ जाइत छलै। मां क आर्डर छल ध्यिा-पुता के तेल-उबटन राध लगेतै। राध कामचोर ककरो ठीक सॅ मालिश नहिकरै ताहि पर दाई मां टोकि दै। फेर महराज क भोजन हमरा सभकेँ नीक नहिलगैत छल। रोज सजमनि आ पालक, मूंगक पातर दालि। आलू-मटर कोबी कहियो पत्ता कोबी। सब मे एके स्वाद। जीर आ हींग सॅ छौकल हरैद, ध्नियॉ, लाल मिरचाईक क सूखल पावडर आ खटाई। हं तऽ झगड़ा होइत छलै भानस ध्से चमेलियाक मां गेलै सब ध्ुआ गेल। चमेलियाक मां जाइत छल जखन महराज इनार पर स्नान करैत छलाह। ओ ध्यिा-पुता लेल पिआज दऽ भुजिया बना दैत छलै से पिआजक गंध् लगैत छलैन्ह महराज कें। दोसर हल्ला होइत छल जे लछमनियाँ पानि छू देलकै। हरियाक ई हिम्मत जे बच््या सभकेँ टमाटरक सलाद मे पिआज दऽ देतै? महराज जी चौकला-बेलना पटकि कऽ पछुआर मे जाऽ कऽ बैसथि। घ मे सब खेतै आ ब्राह्मण कोणा भूखल रहताह तैँ दाई मां पूरा रसोई धो पोछिदैत छलथिन। तइओ ओ गरि-सराम दऽ रसोई मे जाइत छलाह। हम दाई मां के कहैत छलिए - ‘दाई मां अहां महराज के मनाबऽ किये जाइत छी ओ गारि सराप दैइ ए।’ -जाय दिऔ बुच््यी! ब्राह्मणक गारि, सराप आर्शीवाद होइ छै। एक दिन हरिया बगीचा मे दू टा ईंट जोड़ि कऽ लकड़ी जरा कऽ लहसून-पिआज आ गरम मसाला दऽ कऽ खिच््यड़ि बनौलक आ बगीचा सॉ गाजर-मूरै आ टमाटर पिआजक सलाद संग केेरा के पात पर परसि कऽ बच््या सभके खुऔलक। सब प्रसन्न भऽ खूब खेलक। महराज जी क मक्खन वला टिकिया घयले रहि गेलै। एहन बेइज्श्ति। महराज जी बड़बड़ाइत गेलाह मुनीमजी लग-‘मनीम जी हम तऽ चललहुँ बहुरानी के कहि देबैन्ह।’ मुनीम जी कतबो खुशमद कयलनि, मुदा ओ सरपट भगलाह लछमिनियॉ स्टेशन घरि हुनका पाछु गेलै मुदा ओ टेनू मे बैसिए गेलाह। हुनकर राम छलैन्ह सुजानगढ़। हम सब खूब खुब खुश छलहुँ। महारज जी लहसून पिआज नहिदैत छलाह कथु मे। आब दाई मां आ हरियाक हाथक बनल खास खास तरकारी बनत आलूदम, आलूबड़ी, पिआज बला भुजिया आ सांझि मे पिआजक कचड़ी भेँटत। सप्ताह बीतैत-बीतैत भानसघर अराजकता सॅ मां परेशान भऽ गेलीह। मुनीम जी अलगे बड़बड़ाइत छलाह -‘बहुरानी! नोकरी करैत छी तकरकी मतलब छुआछुत के नहिमानी? सब ध्यिा पुताक मुँ सॅ लहसून-पिआजक गंध् अबैत छै। घी मे बनल बदामक हलुआ रसखले रहि जाइछ आ सब चाट पकोड़ा खाइए। एतेक तेल मसाला ध्आि पूता खाएत तऽ लीवर खराब भऽ जेतै। ओना मां लेल बिनु तेल मसालाक तरकारी बनैत छलै तइओ रोज झमेला होइत छल। मां क माथा गरम भऽ गेलैन्हि जखन बाबूजीक संग तीन-तीन टा गाड़ी मे हुनकर मित्रा अन्तिम सप्ताह बीता बऽ आयल छलैन्हि। दिन भरि ताशक महपिफल आ पर चाह। नास्ता लेल बाबूजी कलकत्ता सॅ अनने छलाह बीकानेरके भुजिया आ कलकत्ते सॅ बनबाक मंूग दालि के भरल कचोड़ी, रंग-बिरंगक मिठाई। मां क अनुसार तीनेटा मध्ुर स्वास्थ के लेल नीक होइछ मामड़ा बदामक बपर्फी संदेश आ उजरा रसगुल्ला। सूजी आ खोआक तड्डू, गुलाब जामुन, पेड़ा इ सभ स्वास्थ लेल हानिकारक। बच््याक सेहत लेल एकदम वर्जित ताहू मे सरोज आ नीलू दूनू रोगाही। कनिएक जॅ छींकत तऽ मा क हिसाब सॅ खान-पान के गड़बड़ी क कारण तैँ मां क अति सतर्कता के वजह सॅ हेल्थफूड एकदम स्वादहीन। आ मेनू लिखैत छलाह डाक्टर गांगुली। घी-तेल सॅ छह-छह करैत मारवाड़ी भोजन सॅ डाफ्रैं गांगुली के चीढ़ छलैन्हि। एक बेर बरसात क सांझि मे बाबूजी डाफ्रैं गांगुली के ताशक महपिफल मे शामिल कयने छलथिन भोजन मे बनल छल पचमेल दाल-बाटि आ चूरमा सूखल संागर क मिरचाई मसाला बला तरकारी आ लहसूनक चटनी। मुंग, उड़िद, चना राहड़ि आ छिलकाबला मूंग के पफेंटल गाढ़ दालि जकरा लौंग इलायची, दालचीनी दऽ घी सॅ छौकल गेलै। आ बाटी तऽ लिटीð जकरा गोइठा पर सेद कऽ घ्ीक डेगजी मे डूबा देल गेलै। चुरमा मे तऽ घी पुस्ट सॅ देले जाइत छै खादार ऑटा मे मोयन दऽ कड़ा सानिकऽ मुड़िया बनाकऽ घी मे तरह जाइत छै। फेर चीनी आ इलांइची घऽ कऽ कुटि कऽ आध-आध पौआक लड्डू बनलै। डाफ्रैं गांगुली सबक संग खूब स्वाद लऽ खयलनि। मुदा राति मे हुनकर मोन खराब भऽ गेलैन्हि। बारह बजे रति मे पफोन एलै अरे भाई मिफ्रैं सांवर जी हमरा की खोआ देलहुत्र तेहन कड़ा लड्डू छलै जे पेट मे गुड़-गुड़ करैए। बाबू जी ओतेक राति मे नेबोक रस मे सुखाएल हरियर पीपरवटी आ पत्थर हजम चूड़न दादी क बनाओ लऽ कऽ गेलाह। गरम पानि संग चूड़न खयने कनिकालमे पेटक गैस बहरे लैन्ह त चैन सॅ सूतलाह डाफ्रैं गांगुली के किछ भऽ जेतैन्हि तऽ मां क की हेतैन्ह एहन नीक लोक कतऽ भेँटत। ताहि दिन सॅ मारवाड़ी भोजन सॅ डाफ्रैं गांगुली ए के नहिबल्कि मां क मन मे बैस गेलैन्हि जे ओ गरिष्ट होइत छै। डाफ्रैं गांगुलीत चीढ़ले छलाह मारवाड़ी भोजन सॅ तैं मां के कहैत छलथिन जे ‘बच््या देर ओइ झोल भात दिन आरा कांचा कला आर पेपे शे(ो।’ बाबूजी केँ हजारीबाग अबिते आर झमेला बढ़ि गेलै। एक तऽ गोविन्द महाराज रूसिक चलि गेल छलाह। बीस लोकक नास्ता, भोजन, पिकनिक के समान दाई मां दिन भरि भानसे घर मे रहैत छलीह। मां किछ करतीह से ककरचनो नहिकयल जा सकै’छ। बड्ड करती तऽ चटनीक लेल ध्निक पात, पुदिनाक पात बिछ-चुनि कऽ राखि देतीह आ एहु लेल टोपिया मे पानि आ हाथ मे तौलिया नेने नर्स राध ठाढ़ रहैत छला। हं, मोनपड़ल भोजनक संदर्भ मे मां क बनाओल खिच््यड़ि। साओनक मास छलै। महराज गाम गेल छलाह। कलकत्ता मे खूब जोर सॅ फ्रलू पसरल छलै। हम बड़का भैया, मां आ बाबूजी के अलावा सब बिमार छलै। दाई मां क देह आगि जकॉ गरम छलैन्ह आ भोर सॅ हरियो माथ पर पटीð बान्हि सूतल छल। लक्षमीनियाँ आ राध मिलकऽ खाना बना सकैत छल मुदा मां क छुआ-छुति बला रोग छैन्हि। र्ध्म-कर्म जाति पाति के वहम मााि मे कुंडलीमारी कऽ बैसल छनि। खासकऽ मेहतर सॅ बडड घृणा छैन्हि। मेहतर के चढ़ऽ लेल फरक सॅ सीढ़ी बनल। आलीशान आध्ुनिक मकानरहैंत मां कें कारण एटेच्ड बाथरूम नहिबनल। तैं स्नान घर फरक छै। दू टा लैटरीन एकटा अंग्रेजीक स्टाइल बला एकटा भारतीय। पेशाब घर फरक। माटि सॅ हाथ धेबऽ पड़ैत छल बाद मे लाल साबुन सॅ हाथ धेबऽ लगलहुँ डाफ्रैं गांगुली के कहला पर। बड़की टा स्नान घर जाहि मे एक दिन बाथटब छल तऽ दोसर दिसन चबुतरा बैस कऽ स्नान करबाक लेल, इटालियन मार्बलक बसिन छलै मतलब पूरब आ पछिम स्टाबूलक खिच््याड़ि। मेहतरक सीढ़ी पर आर क्यो लात नहिघऽ सकैत छल। मेहतरक सीढ़ी पर आर क्यो लात नहिघऽ सकैत छल। मेहतर ग्यारह बजे घरि शोर पाड़ैत अबैत छल ‘पानि दिअऽ।’ ओकर नल ध्ुबऽक मनाही छलै। लछमिनियाँ नल खोलिकऽ बाल्टीए बाल्टी पानी दैत छलै मेहतर कें मेहतर आबि गेलै मे सुनिते मां नाक पर रूमाल घऽ घर मे बैसि रहैत छलीह। मेहतर के गेलाक बाद लछमिनियाँ बाथरूम आ लैट्रिन खूब पानी उझलि कऽ साफ करैत छल। एहि क्रिया कलाप मे करीब एक डेढ़ घंटा लागि जाइत छलै अइ बीच मे जॅ ककरो पैखाना लागि जाय त आ छटपटाइत रहैत छल। लछमिनियाँ जखन साफ कऽ बाल्टी लऽ कऽ हॉल पार कऽ ऊपर जाइत छल तऽ रामू हॉल मे पोछा लगबै’छ। हम कहैत छलहुँ मां क रसोई के विषय मे। हरिया के अचानक बहुतर जोर सॅ बुखार लगलै आ लछमिनियॉ त मेहतर कें पानि दैत छलै फेर बाथरूम साफ करैत छलै तैं मां ओकरा अछूते बुझैत छलथिन। रामू कपड़ा साफ करऽ गेल छलै। राध नर्स क्रिश्चियन छै रसोई घर मे कोना जाएत। शंभु बाबूजीक नौकर छैन्ह ओ भोरे आमक पथिया लऽ बड़की दीदीक सासुर गेल छल एखन धरि घूरल नहि। साढ़े ग्यारह बाजि गेलै आध घंटा मे बाबूजी जूट मील सॅ आबि जेथिन आ खाना नहिबनलै। भोर मे सबके दवाई आ बार्ली बनाकऽ हम देने छलिए। खाना बनाबऽ हमरा अबितो नहिअछि। हारि-थाकि कऽ मां गेलीह रसाई घर मे। आलू उसनऽ लेल चुल्हि पर चढ़ौलनि। थारी मे चाउर तऽ कऽ सुनऽ बैसलीह। राध के कहलथिन सबके अनारक रस निकालिकऽ पीयाबऽ। हम कहलिएन्ह ‘मां आइ भोर सॅ दाई मां किछु नहिखयने छथि।’ मां झनकैत बजलीह-क्यो मना कयने छै? कियेक नहिखाइत छै? राध बात के नमरबैत बाजल हम त कतेक बकर खाय लेल पूछऽ गेलिए किछ खाइते नहिछै। हमरा चुप्प नहिरहि भेल-‘झुठी कहीं के। एको बेर दाई मां क रूम मे झांकऽ नहिगेल अछि। मां हम दाई मां कें दूध् दऽ अबिए? ‘हं, आ जँ साबूदाना या बार्ली खेतई तऽ दऽ दिहे बुखार उतरलै की नहिथर्मामीट लगाकऽ देख। चमेलियाक मांक बिमार पड़ने हमर हाथे-पैर टूटि गेल अछि।’ हम दूध् लऽ कऽ जाइत छलहुँ तऽ सुनलिऐ मां कें राध कहैत छलै-‘प्रिया कें दूध् लऽ कऽ कियेक जाय कहलिऐ फ्रलू के ध्ूत जल्दी पटैत छै। चमेलियाक मां के बुखार हेतै नहिओ भारे-भोर उठि कऽ नहाएत पूजा करत बड़का पूजारिन बनैए। हमहूँ सब तऽ जीसू के मानै छी। हम घुरिकऽ मां के कहलिएन्ह मां राध के कहि दिऔ दाई मां क आदगोई बदगोई बंद करय नहितऽ ओकरो बुखार लागि जेतै।’ - मां, कहलनि-‘अच्छा जो चुपचाप।’ ‘हम जल्दी जल्दी सीढ़ी पर चढ़ि दाई मां क रूम मे गेलहुॅ। माथ छू कऽ देखलिएन्ह-दाई मां आब के हम मन अछि?’ दूध् पी लिअ। दाई मां कहलनि-‘मोन बड्ड बेचैन लगैए। हम एखन दूध् नहिपीयब।’ ओहिठाम हरिया सूतल छलै। दाई मां दूध्क गिलास हरिया के दैत बजलीह ले दूध् पी ले। हम बूढ़ पुरनियॉ छी ठीक भइए जेत। हरिया गटागट दूध् पी गेलै हमरा नीक नहिलागल। आइ भोर मे हरिया नास्ता कंयनहि छल ओकर बाद आकरा बोखार लगलै। तैं हम दाई मां के कहलिए ‘फेर दूध् लऽ कऽ अबै छी।’ दाई मां मना कऽ देलनि। कहलनि-नहिहमरा एक गिलास पानि दिअ आ पोटरी मे बान्हल धनक लावा छै आ गुड़ से खोलि कऽ दिअऽ।’ दाई मां लावा गुड़ खा, पानि पी नीचां उतरल। रसोई घर मे खिच््यड़ि चढ़ल छलै मां पीढ़ी पर बैसल छलीह राध पाछू मे ठाढ़ हुनका पंखा हौंकैत छल। दाई मां के देख कऽ मां बजलीह-‘चमेलिया मां कियेक नीचॉ उतरलें हम बना लेबै खिच््यड़ि आ साना।’ तइओ दाई मां रसाई मे जा कऽ आलू के ठंडा पानि मे रखलनि आलू बड्ड गलि गेल छलै। फेर खिच््यड़ि के देखऽ गेलीह-हे भगवान! बहूरानी ई की बनेलहुँ? एतेक ने पानि ध्ऽ देलिऐ चाउर-दालि के पते नहिछै? ‘तऽ हम की करिए हमरा मानस घर मे गर्मी सॅ माथ ध्ूमऽ लगैए। आब जे भेलै से भेलै। अइमे नेबो गारि कऽ जूस जकॉ सबके पिआ देबै। आ, साहेब के? हुनको इएह जूस देबैन्ह?’ हम किछ नहिकरबै सब इएह खाएत चल राध हमरा माथ मे यूडिकोलोन लगा दे माथ फाटल जाइए। आ हमर प्रिय मां गेलीह अपना रूममे। जिनगी मे शायद पहिल बेर मां रसोई घर मे गेल छलीह। दाई मां बड़बड़ाइत छलीह छह बच््याक मां छथि आ एकटा खिचड़ियो बनबऽ नहिअबैत छैन्ह। हमरा कहलनि-‘बुच््यी अहॉ ई खिचड़ीक जूस सबके दऽ आउ। हम साहेब लेल’ खाना बना दै छी।’ दाई मां कनि खिच््यड़ि अहूँ खा लिअ। ‘सुनू तऽ हमर बुच््यीक बात। अरे घर क मालिक एखन खयलनि नहिताबत हमहीं खाउ?’ बुखार सॅ ध्ीपल शरीर बेर-बेर पसीना पोछत पयपन वर्ष क प्रौढ़ा आ तकर एहन स्वामिभक्ति.......एतेक ममता। बाबूजी खाना खाय बैसलाह ताबत मां सैरिडानक दू टा गोली खा लेलनि आ बजैत छलीह-गृहस्थी औरत लेल बड़का अभिशाप छै। असल मे मां के अइबात क दुःख छलैन्ह जे सब एके बेर कियेक बिमार पड़ि गेल। सबसॅ वेशी कष्ट छलैन्ह जे हरिया आ दाई मां बिमार पड़लै। तैं बजैत छलीह जे आब महराज आयत तऽ ओकरा नौकरी सॅ हटाइए देबै हरबम गांव जइत रहैए। आई मां के मानस घर मे जाए पड़लनि खिच््यड़ि बनौलनि आ डाफ्रैं गांगुली के अयलापर बच््याक रूम मे बैसऽ पड़लनि। बाबूजी तुरत आपिफस मे पफोन कऽ कालूरामजी के कहलथिन जे जल्दी ठेका पर काज करऽ बला रसोइया पठाउ। आ डाफ्रैं गांगुली के पफोन प बहलथिन सांझि मे आबि कऽ फेर रोगी सब के देख लेबैं’ हमर गाल थपथपबैत बजलाह ई हम्मर बहादुर बेटी अछि। ‘हं, ई तऽ खा-खा कऽ पहलवान भऽ गेल अछि। मां खौंझ कऽ बजलीह। नीक बात छै स्वस्थ अछि अंग्रेजी मे कहबी छै हेल्थ इज वेल्थ। अहॉ अहॉक खुश होमऽ चाही जे ई स्वस्थ अछि तैं अहॉक मदति कऽ रहल अछि।’ हुनका सुनल नहिभेलैन्हि। झट आर्डर देलनि-‘प्रिया जो सरोज के थर्मामीटर लगा कऽ देखहि।’ पता नहिकियेक आइ एतेक बात मोन पड़ि रहल अछि। घड़ि देखलहु रातुक बारह बाजि रहल छै। समुद्रक लहरि कें मंथर स्वर सुनाई पड़ैत छल। आइ सेतीस्टेफा मे अन्तिम राति अछि। ऊठि कऽ बरांडा मे गेलहुँ। पूर्णिमाक राति छलै। चानी जकॉ चमकैत छै समुद्रक लहर। मंत्रा मुग्ध् बड़ी काल धरि निहारैत रहलहुँ फेर कुर्सी पर बैस गेलहुँ। छिट-पफुट बहुत बात मोन पड़ल-इ सभ याद रहत-लिख सकबै? ठेकनाबऽ लगलहुँ हजारीबागक बात सब। बाबूजी आबि गेलाह। आब के तेल-मालिश करा कऽ रौद मे बैसत? फेर सुसुम पानि मे नीमक पात घऽ नहाओत। मां क सब योजना पफेल भऽ जाइत छैन्हि। रोज सांझि मे गरम-गरम नास्ता बनै छल बदलि-बदलिकर बाबूजी के बुझल छै माहाराज कें हन नास्ता भोजन बनबैत छथि तै ँ सोहन महाराज कें ठेका पर बजालेलथिन। ओ नास्ता मे कहियो समोसा बनबैत छल तऽ कहियो गरम-गरम जिलेबी, कहियो आलू -मटर भरल कचौड़ी आ सूजीक हलुआ। सोहन महाराज के छुआ-छूति के रोग नहिछलैन्ह। तै ँ दाई मां हमर पसिन्न के आटॉ बला हलूआ बना दैत छलीह गुड़ ध्ऽ कऽ। एक दिन प्रोग्राम बनल हजारी बाग सॅ सौ मील दूर रॉचीक हुडरूपफॉल पिकनिक पर जयबाक। बाबूजीक संग तीन टा गाड़ी आयल छलै। भरतीय जी आ बाबूजी पहिने रॉची चलि गेल छलाह पिकनिक मे ओतई सॅ पहँुचता। मां ओतऽ जयबा लेल किन्नहु राजी नहिभऽ रहल छलीह। बाबूजीक बहुत आग्रह पर तैयार भेलीह मुदा हुनकर शर्त छलैन्ह-अलगे गाड़ी मे जयतीह संग मे राध नर्स रहतैन्ह आ हरिया। मां क टिपिफन भोरे चारी बजे उठि कऽ दाई मां बनौने छलथिन-घी मे छानल नरम-नरम पुरी, आलू-मटर कू सूखल भूजिया आ नीबूक अंचार, छेनाक संदेश, थर्मस मे संतराक जूस। एकटा अटैची मै चारि टा तौलिया, साड़ी ब्लााउज, पेटीकोट, माथ दर्द क दवाई, उल्टीक दवाई, पेट ददर्क दवाई आ हार्ट बाला दवाई। दून्नू भाई बाबूूजीक संग आगॉवला गाड़ी पर बैसलाइ। दादी मां घरक रखवारी करऽ डेरा पर छलीह। हुनकर कहब छलैन्ह हम की करऽ जायब कोनो कुम्भ के मेला छै। जखन गाड़ी स्टार्ट होमऽ लगलै तऽ मां आर्डर देलथिन एकटा बच्चा के हमरा संग बैसा दिउनै सब एके ठामा रहत तऽ उफध्म मचा देत। राध गेट खोलैत बाजल-‘आउ प्रिया अहाँ मां लग बैसू’। ‘नहिहम नहिउतरब।’ नहिजानि कोना आइ हमरा मुँह सॅ विद्रोह स्वर बहराएल। नहिसुनिते मां क पारा गरम भऽ गेलैन्हि। जोर सॅ बजलीह ‘उतरैत छेँ की नहि?’ हरिया जो ओकरा लऽआ। मन मे भेल कहिऐ-मां, हमर कोन काज पड़ि गेल? मुदा हिम्मत नहिभेल। ऑखि नोरा गेल। तऽ मां राध के कहलथिन- ‘सरोज बात नहिमानैत आ बिल्लू तऽ बानरे छै भरि बाट तबाह कऽ दैत।’ नीलू मां क दुलरूआ छै तैँ ओ कोना मे खिड़की लग बैसल छल। एकटा हमहीं दब्बू छी जे मां क हुकूम पर नचैत छलहुँ। सुनसान रास्ता मे मां राध सॅ बतिआइत रहलीह। ‘राध! हम तऽ फेर अस्वस्थ भऽ गेलहुँ। दस दिन मे जे कनि सुधर भेल छल सब चौपट भऽ गेल। साहेब जहिया सॅ अयलाह हरदम हंगामा होइते रहैत छै बच्चाक संग बच्चे बनि गेलाह। संग मे दूचारि टा सब दिन दोस्त रहिते छैन्ह। हमर एहन शरीर, अहाँ तऽ कहियो स्वस्थ रहितेनहिछी!’ अरे हंम की स्वस्थ रहब। एतेक ध्यिा-पुता के पालब पोसब आसान छै। किछुए दिन पहिले देखलहुँ ने बरसात मे सब बिमार पड़ल छल। ‘हं, गांगुली बाबू तऽ कहनहि छलाह-अहाँ के ँ एखन आराम करऽ चाही।’ घुर! हमार नसीब मे आराम लिखले नहिअछि। जहियासॅ साहेब अयलाह अछि रोज घोड़ दौडे़ भऽ रहल अछि। ‘सत्ते कहैत छी। आब दूपहरो मे बच््या सभ हल्ला गुल्ला करिते रहे छै। क्यो नहिसूतै छै।’ ‘राध। हमर सभक जिनगी मे खुशी कहाँ? जहिया सॅ विवाह भेल साले-साल बच््या पर बच््या। एकटा लड़कातऽ मुइले जन्म लेने छल। पहिल बेटी आठ वर्षक उम्र मे मुइल। चारिबेर तऽ ओगण ;एबसिनद्ध भेल। शरीर मे शक्ति रहत कोना? सुमित्रा के देखियौ चौदहम मे ब्याह भेलै आ पन्द्रहम मे बुल्ली भऽ गेलै।’ -‘ह, ई उम्र मे कतहु बच््या होइ?’ अटाòईस वर्ष क उम्र मे चारि-चारिटा बच््या। तैं बुल्ली आ नीलू के हम अपने लग रखैत छिए। ऊ त चमेलियाक मां छै जे सबके सम्हारै छै। ‘घुर, चमेलियाक मां कोन जोकरक छै। एकदम गंवार छै कनिको अक्किल नहि। प्रिया पर कोन जादू कयने छै जे अहां सॅ वेशी मोजर प्रिया ओकरे दैत छथि।’ दू घंटा सॅ गप्प पर गप्प होइत रहल अछि। राध दाई मां के देखऽ नहिचाहै’छ तैं मौका तकैत रहै’छ हुनका विरोध् मे बजबाक। हम खिड़की सॅ बाहर माथ झुकौने नागपुरक पहाड़, जंगल आ आकाश् मे घुमड़ैत बादल देख रहल छलहुँ। गप्प बंद भेलै तऽ मां क ध्यान इम्हर भेलैन्हि। हमरा कहलनि-‘खिड़की बन्द कर ठंढ़ा लगतौ।’ फेर हुकुम भेल-‘सोझ भऽ कऽ बैस मुदा बजबाक साहस नहिभेल। सुसू करबाक छल से हो हिम्मत नहिकोना बाजू? ऑखि नोरा गेल। अइ घर मे दाई मां क सिवाय आर क्यो हमर जरूरत नहिबूझै’छ। हम अपना के एकदम एसगर बुझैत रहलहुँ अछि। अनचाही सन्तान से हो बेटी! पेट मे दर्द होमऽ लागल बुझाइत छल आब उल्टी भऽ जाएत। एकाएक उल्टी भइए गेल। से हो मां क देह पर! जुलूम भऽ गेलै। मां जोर से बजलीह-‘गाड़ी रोकू, ड्राइवर जी।’ राध फरके चिचिआइत छल। हमरा सम्पूर्णशरीर ऐंठ रहल छल आ भयभीतभऽ मां दिस तकैत छलहुँ। ई हम की कयलहुँ? मां क चेहरा सॅ घृणा आ जुगुप्साक भाव झलकैत छल। मां के तऽ मेहतरक नामे सुनि कऽ जी ओकिआए लगैत छैन्ह। गाड़ी रूकल। ड्राइवर-दौड़ल पानि आनऽ। मुदा पानि कतऽ भेँटतै? पछिला गाड़ी मे पानि बला थर्मस छलै। मां काठक मुरूत जकां ठाढ़ छलीह सड़क पर। राध तौलिया भीजाक उल्टी साफ कयलक। मां कुरूर कयलनि। राध हुनका कपड़ा बदलि देलकैन्हि। मां बजैत छलीह-हमरा जी ओकिआ रहल अछि। राध जल्दी-जल्दी गाड़ी साफ कऽ यूडी कोलोन छीटलक। मां गाड़ी मे बैसलीह। सरोज आ नीलू झाड़िक अढ़ मे सुसूकरऽ गेल। बुल्ली सड़के पर ठाढ़े ठाढ़ पेशाब कयलक। मुदा हमरा एखनो बकौर लागल छल कुरूर करबा लेल एक गिलास पानियो मांगबाक हिम्मत नहिभेल। मुँहक स्वाद खटाइन लगैत छल। आब मां क ध्यान हमरा दिस भेलैन्ह। राध के कहलथिन हाथ-मूँह छोआ कऽ कपड़ा बदलऽ। ताबत नीलू के हरिया मांक गाड़ी मे बैसौलक। हम दोसर गाड़ी मे खिड़की लग बैसलहुँ। बुल्ली कहलक हम अपन सीट सॅ नहिहटबै। सरोज बाजल-ले हमहीं बीच सॅ उठि जाइत छी। कोन ठेकान फेर उल्टी हेतै तऽ? बुल्ली आ सरोज दूनू हमरा सॅ हटि कऽ बैसल। आगाँ गाड़ी गेलै तऽ देखलहुँ-बाबूजी गाड़ी रोकि कऽ ठाढ़ छथि। की भेलै? गाड़ी कतहु रूकलै छल? मां झुझलाकऽ सबटा बात कहलथिन। बाबूजी चिन्तित भऽ हमरा लग आबिकऽ पूछलनि बौआ, आब केहन मोन छौ? एखनो जी हौडै छी? अजय, एकरा जमाइन दहिं।’ मन विहवल भऽ गेल अपना के संयत कयलहुँ। हंडरू फाल पर सब नीचां उतरि स्नान करऽ गेल। मां हमरा मना कऽ देलैन्ह। फेर मोन खराब भऽ जेतै प्रतिवाद करबाक हिम्मते नहिभेल। राध दिस ताकि कऽ मां बजलीह-उल्टीक दुर्गंध् सॅ माथ मे दर्द भऽ रहल अछि ऊपर सॅ ई रौद! मां चटाðनक सीढ़ी पर उतरियो ने सकैत छलीह। तैं मां आ हम रहि गेलहुँ। राध मां क पैर जॅतैत छलीह। हम चुपचाप सीढ़ी दिस तकैत छलहुँ। दूर सँ अबैत झर-झर झरनाक स्वर कान मे जा पूछैत छल-उल्टी भेल ताहि मे हमर कोन दोष? खूब ऊपर पहाड़, पहाड़ सॅ झहरैत पानिके झर-झा स्वर! मोने मन होइत छल मां, एहन अपूर्व सुख के कियेक नकारैत रहैत छथि आ अपना-संग-संग हमरो छोट-छोट सुख सॅ वंचित रखैत छथि? आध घंटाक भीतर राम सिंह ड्राइभर दौडै़त आयल। -‘बड़ा बाबूक पैर मे चोट लागि गेलैन्हि दू गोटे सहारा दऽ ऊपर आनि रहल छैन्हि।’ ‘की भेलै? की वेशी चोट लगलैए? घबराहट मे बड़बड़ाइत छलीह-पहाड़ पर चलबाक अभ्यास नहिछै। किछ भऽ जेतै तऽ? एक ने एक आफत अबिते रहै छ। हमर मोन ठीक हेएत कोना? कहियो शान्ति सॅ समय बीतैत अछि?’ ताबत बाबूजी के सहारा दऽ हरिया अबैत छला। चोट गंभीर छले। दिहिना पैर क घुठòीक हड्डी निकलि गेल छलैन्ह। पन्ना महराज जल्दी सॅ चूना लऽ कऽ अयलाह। मां ध्यिा-पुता दऽ पूछलथिन- ‘विजय आ अजय कत छै। आ तीनू छोटका?’ बाबूजी कहलथिन -‘नहा कऽ अबिते हेतै। एलैए मौज-मस्ती करऽ।’ ‘भेलै खूब मौज-मस्ती भऽ गेलै। भाई जी। आब हम हिनका लऽ कऽ कलकत्ता जायब। कहीं पैर मे अबाह भऽ जेतैन्ह।’ मां क जिद्द क आगॉ ककरो वश नहिचललै। हजारी बाग जयबाक बदला दू गाड़ी मे मां, बाबूजी, बड़का भैया, बालू जी, हरिया आ राध पुरूलियाक बाट दिस बढ़़ल। एकटा गाड़ी मे छोटका भैयाक संग हम सब हजारीबाग घुरलहुँ। दू दिनक बाद पूरा लाव-लश्कर कलकत्ता चलल। सत्ते बाबूजी के चोट गंभ्ज्ञीर छलैन्ह। छह मास घरि ओ लंगारा क चलैत छलाह। आ मां सब दिन हुडरूफालक पिकनिक मादे बजैत छलीह। एहिना हमरा लोकनि प्रत्येक साल मां क संग पश्चिमक हवा मे सॉस लेबऽ कहियो देवघर कहियो जसीडीह कहियो रॉची-तऽ कहियो हजारीबाग जाइत छलहुँ। हं, एक बेर ‘पुरी’ गेल छलहुँ कुल मिला कऽ सोलह वषक उम्रधरि मां क संग हमर वार्षिक छुटीð बीतल छल। जाहि मे सब खेप हम एक-एक दिन गनैत बीतबैत छलहुँ जे कहिया ई छुटीð खत्म हेत आ स्वास्थ लाभक कर्म कांड सॅ पिंड छूटत। जहिया ट्रेन सॅ घुरैत छलहँुतऽ बंगालक हरियरि देखते थप्पड़ी पीटैत छलहुँ-‘सरोज देख, देख ने बाहर कतेक नीक लगैत छै धनक खेत। आ देखहि ने आम-कटहर बला गाछी। कतहुँ घरक चार पर सजमनि आ छिंगुनीक लती छलै तऽ कतहु खेत। आ देखहि ने आ छिंगुनीक लती छलै छलै तऽ कतहु कदीमाक लती। एक पतिआनि सॅ नारियरक गाछ बड़ड नीक लगैत छलै देख मे। बंगालक भूमि जत ने गर्दा-ध्ूल ने खालि परती पॉतर! सौन्हगर माटिक महक सॅ मनात प्रपफुल्लित भऽ जाइत छल नयन हरियरि देख जुड़ाइत छल। हमसब महालयाक दोसर दिन जाइत छलहुँ। पाँच-सात दिन छुरछुरि पटाखाक छोड़ में बीतैत छल। मां सॅ चोराऽ कऽ छोटका भैया दू सौ अनार बनबाकऽ अनैत छलाह एहि मे लछमिनियाँक पूरा सहयोग हुनका भेँटैत छलैन्हि। दिवालीक चारि-पाँच दिनक बाद फेर घर क सोझा मे स्कूलक बस ठाढ़ होइत छलै। किताब-कॉपी लऽ जल्दी जल्दी भगैत छलहुँ बुझू जे जेल सॅ कैदी भगैत होई। सत्ते हमरा घर जेलखाना बुझाइत छल। कनि पैघ भेलहुँ तऽ बोर्डिग हाउस मे रहऽ लगलहुँ। हमरा स्कूलक दुनियॉ बड्ड प्रिय छल। संगी सभक स्नेह भेंटैत छल। शिक्षिका प्रशंसा करैत छलीह। बहन जी मां क स्थान लऽ लेलैन्ह। हुनक घवल वस्त्रा में श्वेत केश मे आ शु( आचरण तक कतहु बनाबटीपन नहिनजरि अबैत छल। हमर समस्त समस्याक व्यवहारिक समाधन करैत छलीह बड़ी बहन जी। ककरो बुझौ ने दैत छलथिन। कहियो मां के जाऽ कऽ बुझबैत छलथिन कहियो पफोन पर कहैत छलथिन-‘प्रिया के एनफ्रैं सीफ्रैं सीफ्रैं कैम्प मे जाए दिऔ।’ आब दाई मां लग बैसऽ मे मोन नहिलगैत छल। आब हमरा लग छल मन लग्गु किताब आ संगी सहेली, आब दाई मां साल मे दू बेर कऽ गामो जाइत छलीह। हं एखनो राति मे माथ मे तेल घऽ चोटी बनेनाई आ तरबा मे बिनु तेल लगौने हुनकर मोन नहिमानैत छलैन्हि। बीफ्रैं एफ्रैं मे जाइते हमरा संग पढ़वाली संगी सभक एकां एकी ब्याह होमऽ लगलै। सब से पहिने पुष्पा इंदौर चलि गेलीह। सुनीता बम्बई चलि गेलै। विभा पढ़ऽ दिल्ली चलि गेल आ सुध के ब्याह भऽ गेलै। एकटा हमहीं मारवाड़ी प्रेसिडंेसी कॉलेज मे पढ़ि रहल छलहुँ। नव संगी, नया महौल को-एजूकेशन बला कॉलेज। विद्वान प्रोफेसर सब। आब बुझाना जाइछ जे आर्य कन्या महाविद्यालयक बहिन जी के कतेक कम ज्ञान छलैन्ह। मुदा ओ हमर घर छल। बाहरी दुनियाँ मे आब पैर रखलहुँ अछि। किलाक पूब बला पहाड़ि पर सांझुक झल-फल दृष्टिगोचर भेल। नहुँ-नहुँ बसात फूल पात के छुबि रहल छै। अचानक नजरि गेल शान्त समुद्रक लहरि केँ डूबैत सूर्य देख खितिज दिस लहराइत। आकाश मे अन्हार पसरल जाइत छै आ सब दिस परछॉही कें पकड़ि पबैत छी? सबटा कोना मिझराएल जाइछ। सुखःदुख, ध्ूप-छाँह रोशनी मे सभक भुतिएनाई। कतऽ कतऽ ताकू? मोनक कोन-कोन कोना मे झाँकू? जिनगी केहन रहस्यमय भऽ जाइत छै जखन अहाँ ओकरा आखर मे अभिव्यक्त नहिकऽ पबैत छी। जखन कि अहाँ प्रयत्नशील रहैत छी पारदर्शिता देखयबा लेल। मुदा कि जिनगी कें सिसोहि कऽ व्यक्त कयल जा सकै’छ? ऊँच आर ऊँच हिलोर लैत लहरि। सूर्य निपत्ता भऽ गेलाह समुद्रक पफेन में। ओना लाली खत्म नहिभेलैए। हम मुग्ध् भऽ देख रहल छी समुद्र में नील आ लाल रंग क छिड़काव। शान्त, निस्तब्ध् गोध्ूलि बेर, हल्लुक सन स्पर्श सॅ जेना एक क्षण लेल सब किछु ठहरि गेल होइ पुनः सांझ बसातक ऑचर पकड़ि क्षितिज दिस भगैत अछि। आ हमरा भीतर एक टा सुप्त वेदना सिसकि उठै’छ। थाकल सांसक संग हमर ऑखि दूर-दूर धरि-अन्हार मे किछ टटोलि रहल अछि। स्मृतिक अयना मे एक पर एक झलकै’छ। पहिने की सोचू आ ककरा पाछू धकेल दिअ। कल्हुका गोछूली वेला मोन पड़ल। भरि दिन बरसैत पानि प्लम ब्रॉडी.......... फेर अतीतक घटना क विषय मे सोचैत-सोचैत सूति रहब।भोर मे कॉपफी क कप। मोन पड़ै’छ तहिया हम बीफ्रैं एफ्रैं अन्तिम वर्ष मे छलहुँ। मूसलाधर वर्षा भेल छलै। सड़क पर बुझाइत रहेै जे नदि बहि रहल छै। घर जेनाई असंभव छल। किछ लड़का-लड़की जकर घर लग छलै से हाथ पकड़ि-पकड़ि पानि ठेलैत आगॉ जाइत छल। संझुका साढ़े चारिए बाजल छलै। दूर जकर घर छै से कोना जाएत? हमर एकटा सहपाठी असीम लैंस डाउन रोड लग रहैत छल। सीध सादा लड़का। देखबा मे खूब सुन्दर। प्रायः लाइब्रेरी सॅ घुरैत कावल ओकरे संग बतिआइत घर घुरैत छलहुँ। ओकरे कहलिए-‘चलब पैदल।’ -‘एतेक डॉर भरि पानि मे?’ ‘केहन डरपोक छी?’ ‘वेश चलू।’ रमेश बाबू हमर दर्शन विभागक प्रोफेसर, ओहि ठाम ठाढ़ छलाह। -‘ई प्रिया जे अछि..... हम झटकि कऽ बदलहुँ जेना किछ नहिसुनने होई। दू घंटा मे हम सब लैंस डाउन रोड के मोड़ घरि पहुचलहुँ। पानि डॉर सॅ कनी ऊपरे छल से पैर जेना एक-एक मन के भारि भऽ गेल छल। डेग उठाबी तऽ लगैत रहए जे आब खसलहुँ। शायद इएह हाल छलै असीम के मुदा ओ एकदम चुप्प छल डरपोक क विश् ोषण सुनि। दूनू एक-दोसर के सहारा दऽ बढ़ैत छलहुँ। म(िम इजोत मे चारू भर पानिए पानि देखाइत छल ताहि मे डूबल गाड़ी, बस। चलैत अभरल एक टू टा रिक्सा या मिलिट्री या पुलिसक जीप। आब एलगीन रोड क मोड़ पर छी। -‘असीम, आब कतेक चलऽ पड़त?’ ‘झोसीक रानी! थाकि गेलहुँ?’ ‘नहिचलू।’ फेर हिम्मत कऽ आगाँ बढ़लहुँ। बेचारा असीम अपने अध्मरू भऽ गेल छल मुदा की बाजत? हम ओकर हाथ छोड़ि देलिए। -‘प्रिया आगॉ ख(ा छै आ मैन होल खुजल छै सम्हरि कऽ चलू।’ -‘अहॉ अपन ध्यान राखू।’ तखने कात दऽ एकटा रिक्सा जाइत छलै। पूछलक ‘जरूरी अछि’? हमरा बाजऽ सॅ पहिने असीम बाजल ‘हं भाई रूकऽ। सर्दन एवेन्यू जयबाक अछि।’ ‘पच््यीस टका लेब से हो एडवांस।’ हम सब अपन-अपन पाई देखलहुँ। तय भेलै जे पाँचटका घर पहुँचला पर देबै। घड़ी मे साढ़े सात बाजि रहल छले। दूनू गोटे रिक्स पर बैसलहुँ। ध्ीरे-ध्ीरे वर्षा भऽ रहल छलै। रिक्सावला पर्दा लगा देलकै। थाकल देह मन के राहल भेँटल असीम हाथ सॅ हमरा कान्ह पर कसियारिक पकड़ने छल जोर बढ़ले जाइत छलै। ओ पागल जकॉ हमरा चूमि रहल छल। उन्नमाद.....? एहन उन्माद? नहिइ देहक र्ध्म छै एकरा नकारल नहिजा सकै’छ। सुखद अनुभूतिक तात्कालिकता मे के नहिबहकि जाए। हमरो ठोर ओकरा ठोर सॅ सटल फेर लजाक मुँह घुमा लेलहुॅ। मुदा ओ आर कसिकऽ पकड़ि लोलक दूनूक सांस भिझरा गेल कि तखने रिक्सा रूकलै। पर्दा उठा रिक्सावला बाजल-हम कनि सुस्ता लैत छी। हम दूनू गोटे विहुँसलहुँ। बड्ड मासूम, निर्दोष छल ओ मुस्कान। नीक परिवारक सज्श्न लड़का जकरा प्रोफेसर कहैत छलै भालो छेले।’ ‘भालो छेले’ कहएबा लेल प्रेसीडेंसी कॉलेज मे किछ विशेष विशिष्टा जरूरी छलै। ओ कोनो पैघ डाक्टर, बैरिस्टर वा आईफ्रैंएफ्रैंएसफ्रैं के बेटा होई। बीड़ी-सिगरेटक आदत नहिहोइ। लड़कीक चक्कर नहिलगबैत होमए। मृदु भाषी शिष्ट व्यवहार, मेघावी आ सुदर्शन होमए। विश्वविद्यालय मे प्रथम या द्वितीए स्थाना होइ। असीम सॅ पालिटिकल सांइसक लेक्चरर आ विभाग अध्यक्ष के इएह अपेक्षा छलैन्ह। दर्शन विभागक हेड आफ डिपटिमेंट डाफ्रैं सुखमय चटर्जी एक दिन हमरा बजा कऽ पूछलैन्ह-‘अहॉक भविष्यक योजना की अछि? -‘कहियो सोचलहु नहि, मुदा आक्सपफोर्ड या कैंब्रिज मे पढ़बाक मन अछि।’ ‘की प्रोफेसर बनऽ चाहैत छी?’ ‘नहिबैरिस्टर।’ -‘ठीक छै। तखन प्रथम आ द्वितीय स्थान मंजुला आ सुबोध् लेल रहऽ दिऔ।’ कॉलेज में लड़का संग पढैतौ हमरा कोनो लड़का सॅ विशेष सम्पर्क नहिछल ने क्यो तेहन प्रिय। असलमे हमरा औरतपना सॅ चीढ़ छल। एकर परिभाषा छलै क्ला समे ताक-झांक, रोमांटिक बातचित, रूमानी कल्पना फेर विवाहक सपना। सबटा बकवास। मुदा सरिपहुँ नीक लागल छल युवा शरीर क स्पर्श, आलिंगन, उत्तेजित गर्म साँस, चुम्बन आ ओ सिहरन! घर पहुँचैत-पहुँचैत रातुक नो बाजि गेल। बहुत बात सुनऽ पड़ल कियेक तऽ बड़का भैया पुलिसक जीप लऽ कॉलेज पहुँचलछलाह हमरा आनऽ। ओतऽ पता लगलैन्ह हम दोस्त संग पैदल विदा भेलहुँ। मुदा हमरा ककरो बात क असर कहॉ पड़ल। मां की सभ बजलीह बुझबो नहिके लिए। हम तऽ अजीब नशा मे मद्मस्त छलहुँ। रग-रग कसमसा रहल छल। सपने देखैत राति बीतल। भोर होइत-होइत बहुत तेज बोखार भऽ गेल। तीन-चारि दिन घरि बोखाकर नहिउतरल तखन खून टेस्ट कराओल गेल। डॉक्टर गांगुली कहलथिन-‘टायपफॉयड छै।’ मतलब कम से कम पन्द्रह दिन घरि कॉलेज जेनाई बंद। हमरा इ सुनि नीके लागल। पता नहिकियेक हम दोबरा असीम सॅ भेंट नहिकरऽ चाहैत छलहुँ। अपन देह के एना अपका भेनाई नीक नहिलागल छल। आ प्रेम? हमरा न ककरो सॅ प्रेम करबाक अछि ने ककरो सॅ विवाह। विवाह फेर बच््या। ऊँ हूँ!! मां केँ कहियो सुखी नहिदेखलिऐन्ह। ओना उपन्यास मे पढ़ने छलहुँ जे बच््या भेला पर औरत सम्पूर्ण होइछ। मुदा मां तऽ अपन बच््या पर हरदम कुपित रहैत छथि। सदति काल खौझाएल। देखैत छिए जे बड़की दीदी के चारिटा बच््या छैन्ह तखनहुँ सम्पूर्ण कहाँ छथि हरदम माथे दर्द होइत रहैत छैन्ह हरदम झखैत रहैत छथि। आ सल्लो दीदी के माइग्रेन सॅ छटपटाइत देखैत छिऐन्ह। बड़की भाभी के सतत् घुटन महसूस होइत छैन्ह। ककरो खुश नहिदेखैत छी। हमरा जनैत जे समाजक बनल फ्रैंेम मे अपना कें कोनो तरहें पिुट नहिकऽ पबैछ ओ अपना नजरि मे खसिते नहिअछि बल्कि अपना पर संदेशों करऽ लगैत अछि। इम्हर किछ दिन सॅ अड़ोसी-पड़ोसी आ सर-सम्बन्ध्ी सरोज आ हमरा ब्याह लेल बड्ड उत्सुक छल-‘बेटीक ब्याह नहिकरबै थी? अजग भऽ गेल कतेक दिन घर मे बैसाने रहबै?.... बड़की दीदी घोषित कयलनि हम बेटीक ब्याह कऽ रहल छी’। नीलू हमरा सॅ छमास छोट अछि। मां सरोेज लेल जे सांढक वस्तु ओरिऔने छलीह सबटा नीलू के दऽ देलथिन। भात मे मामाक घर सॅ जतबा टका जाय चाही तकर दुगुना समान गेलै। क्यो ई नहिबूझय जे टकाक अभाव मे विवाह नहिभऽ रहल छै। ताहि दिन आर्थिक स्थिति नीक छलै आ सरोज के लेल चूँकी ओ डाक्टरी पढ़ि रहल छलै कतेको वर के प्रोपोजल अबैत छलै मुदा ओ मना कऽ दैत छलै। हं, हमरा लेल कहियो कोनो ठाम सॅ प्रस्ताव नहिआयल छल। हम अपनो नजरि मे कुरूप छलहुँ। कॉलेज मे जॅ कोनो लड़का हाथ बढ़ावऽ चाहैत छल तऽ ओकरा तेना डपटि दैत छलिऐ जे ओकरा सिटीð-पिटीð गुम्म भऽ जाइत छलै। टाइपफॉयड सॅ मुक्त भऽ जखन कॉलेज गेलहुँ तऽ हमरा देखि कऽ असीम प्रसन्न भऽ बाजल-‘कॉपफी पीअ चलब?’ हम एकदम रूखऽ उतारा देलिऐ-‘नहि।’ बस मे हम सब चढ़लहुँ संगहि मुदा संग उतरलहुँ नहि। हम कहलिए-‘हमरा गरियाहाट बड़की दीदीक ओतऽ जयबाक अछि।’ ओकर खुलम खुल्ला उपेक्षा करऽ लगलहुँ। ओ जतबे हमरा मे सटऽ चाहैत छल हम ओतबे दूर हटैत छलहुँ। औ घंटो बस स्टॉप पर हमर प्रतीक्षा करैत छल। आ हम या तऽ तखन कॉमन रूम सॅ बहराइते नहिछलहुँ या आन बस पर संगी सबक संग चढ़ैत छलहुँ। एक दिन ओ एसगर मे भेंटल। हमरा सॅ नाराज छी?’ ‘नहितऽ’ ‘तखन एना दूर-दूर कियेक रहैत छी?’ ‘साफ बात छै। अहॉ जे चाहैत छी से हम नहिदऽ सकैत छी।’ ‘हम प्रतीक्षा करब। सत्य कहैत छी प्रिया! हम आजीवन प्रतीक्षा करब।’ ‘हमरा देवदास वला लचपच भावुकता सॅ सख्त चीढ़ होइछ।’ अइ तरहक अपमान सॅ ओकर चेहरा स्याह भऽ गेलै। ओ बाजल-‘प्रिया अहाँ एहन कठोर कोना भऽ गेलहुँ। हम देवदास बनबाक दावा कखनौ नहिकयलहुँ।’ ‘तऽ आजीवन प्रतीक्षाक बात कोना बजलहुँ?’ ‘प्रतीक्षा करबा मे आ तिल तिल कऽ मारऽ मे फर्क होइत छै।’ ‘हम बुझलहुँ नहि।’ बुझि जेबई एक दिन। हम चाहैत छी अहाँ कें। मनींह एकहि क्षण हमरा भेंटल, यदि क्यो दोसर देत तऽ ओकरा अपन बना लेब मुदा अहाँ कें कहियो बिसरब नहि। प्रिया! अहाँके क्षण भरि जकरा स्पर्श भेंटतै ओ कहियो नहिबिसरत। ‘छोडूजखन ककरो संग चलिए जायब तखन कोन बातक दावाक बात करैत छी? जाऊ, प्रतीक्षा करबाक कोन प्रयोजन?’ ‘ओह! आब बुझलहुँ। अहाँ अपना जिनगी मे एकटा आरक्षित स्थान राखऽ चाहैत छी?’ ‘मतलब ?’ ‘मतलब इएह जे हम प्रेम करैत छी आ ई एकटा एहन मध्ुर स्वप्न अछि जे हम चाहब आजीवन ई जीवंत रहए ....... मुदा आरक्षित स्थानक पूरक भऽ रहब.......? ऊ हूँ! प्रिया हम एहन सस्ता नहिछी।’ तखन ओकर बात क सही अर्थ नहिबुझने छलिऐ आ ने बुझबाक प्रयास कयने छलहुँ। ताहि दिन हमरा एकटा ध्ुन सवार छल अपन प्रत्येक कोमलभावना के थकुचबाक आ एना मे आनन्द भेंटैत छल। एकदम पुरखाह स्वभाव भेल जाइत छल। हं, कतेको वर्षक बाद एक दिन ओकरा सॅ भेँट भेल छल। हम जर्मनीक बिजनेस ट्रीप सॅ घुरल छलहुँ। एयर इंडियाक फ्लाइट मे भेंटल। ओ अपना पत्नीक संग भारत आबि रहल छल। बाबाक मृत्युक बाद असीम लन्दन मे अपना मौसीक संग रहऽ लागल। बार एट लॉ ओहिठाम कयलक। विवाहो भेलै लंदने मे। मांक देहान्त भऽ गेल छलै बच््या छल तखने। मौसी अमीर छलै आ सगरे छलै। कोनो अंग्रेज सॅ ब्याह कयने छलै ताहि अपराध् मे लंदनक कारावास मे बन्द छलै। पीटर कहिया ने छोड़ि देने छलै आब कोन मुँह लऽ बंगाल घुरैत! -‘एखन कोनो काज सॅ भारत जा रहल छी?’ ‘हं, पुरनका स्मरण के ताजा करऽ।’ ओकर ऑखि मे पुरना स्वप्नक इन्द्रध्नुषी रंग अभरल। असीम कहलक-‘व्यापार मे लागल छी?’ ‘से कोना बुझलहुँ?’ ‘इंडिया टुडे’ मे अहॉक विषय मे पढ़ने छलहुँ। अहाँ सब दिन विद्रोही ए रहलहुँ।’ -‘असीम! आब तऽ विद्रोहक भाषा बिसरि गेलहुँ। हम चाहैत छी जिनगी मे क्रान्ति! हम अपन जिनगीक खालि पन्ना पर अपने तारीख लिखलहुँ अछि।’ ‘की एतेक एसगर चलब जरूरी छै? एहन त भऽ ने सकै’छ जे अहाँ पर ककरो नजरि नहिपड़ल होइ?’ ‘हम तऽ एक बच््याक मां छी।’ ‘मुदा इंडिया टुडे मे एकर कोनो चर्चा नहिछै?’ ‘हम रहैत छी एसगरे।’ ‘ओह।’ ‘असीमक ऑखि मे एखनहुँ एकटा अजीब सन पिआस झलकल। की एकर पत्नी पिआस केँ तृप्त नहिकऽ सकलै? के ककरा तृप्त कऽ पबैत छै? हम जकरा लेल अपन जिनगीक होम कयलहुँ से संतुष्ट अछि?’ ‘ए प्रिया! की सोचऽ लगलहुँ एहन व्यथा वेदनाक भाव!’ ‘नहि, किध् नहि! जाउ अहॉ अपन पत्नीक संग बैसू।’ ‘की हम अहॉक मित्रा नहिछी? अपन कार्ड नहिदेब?’ हमर कार्ड खत्म भऽ गेल अछि। अहों अपन कार्ड दिअ हम करब सम्पर्क।’ ‘जरूर देब। जहिया लंदन जाउ सम्पर्क करब। हमर ऑपिफस पार्क एवेन्यु मे अछि ताकऽ मे कोनो दिक्कत नहिहेत।’ ओकर पैघ-पैघ ऑखि हमरे पर गड़ल छलै। फेर हमरा ओकरा ऑखि मे पुरनका पिआस बझलकल आ एतेक वर्षक बादो हम फेर महिलाक अई पक्ष कें नकारि देलिए जकरा कारण बेर-बेर ठगाइत छी। कहि नहिभेल जे असीम अहूँ विवाहित छी हमरा की दऽ सकब? आ हमरे आब की बॉचल अछि? बहुत कानि लेलहुँ। प्रेम कऽ ओई पुरूषक लेल अपन आधा जिनगी कनैत बीतेलहुँ। नहिअसीम! नहि!! आब ऑखि मे नोर सूखा गेल आब हिम्मत नहिबांचल अछि कानबाक! आ सबसॅ पैघ बात ई छै जे हम भ्रम मे जी नहिसकैछी। आ ‘प्रेम’ ओ उठैत-खसैत लहरि छै मात्रा मृग मरीचिका। हम प्रेम क कोनो वैश्विक परिभाषा नहिकऽ रहल छी। ई हमर निजी अनुभवक निचोड़ अछि। आ अपन तित-मीठ अनुभव कें के नकारि पबै’छ? लोक ओकरे दोहर बैत छै जकर अभ्यास रहैत छै। प्रेम नहिकरबाक अभ्यस्त भऽ गेल छी। हं, सत्ते कहैत छी ‘असीम’ आब कानि यो ने सकब? मुदा असीम के हम किछ नहिकहलिऐ। चुपचाप हाथक किताब मे ऑखि गड़ौने बैसल छलहुँ। विमान दिल्लीक हवाई अडाó पर उतरि रहल छल। ओ उठिकऽ पत्नी लग जा कऽ बैसल पत्नीक बगल मे गुलथुल चारि सालक बच््या बैसल छलै। पत्नी खूब सुन्दरि शालीन छलै। सुखी जिनगी बुझना जाइछ तखन ओकरा ऑखि मे ओ पुरनका पिआस कोना झलकलै? हमरा लोकनि हजारों वर्ष सॅ किछ रोमांटिक शब्द सॅ मन-मानस कें अनुकूलित नहिकयने छी? मुदा एक सपना कें पिआस के जिनगी भरि जोगौने राखब कनिटा बात नहि। से हो अइ युग जमाना मे। अई सॅ आसान छै अपना के मारब। हं, हम कायर छी। प्रेम करऽ सँ चोट सॅ डेराइत छी। सच छै हम डेराइत छी नोर सॅ प्रतिकूल व्यवहार सॅ। कॉलेजक समय सॅ जेना-जेना हम पैद्य भऽ रहल छलहुँ। दुनियाँक देखबाक दृष्टिकोण बदलि रहल छल। हं एकटा बात गहाई सॅ मन मे जमि गेल छल जे हम मां सन जीवन नहिजीयब। ने बड़की भाभी जकॉ घुटन जिनगी मे बर्दास्त करब। हम अपन जीवन नोर मे नहिबहाबऽ चाहैत छी। की एक बुन्न नोरे मे महिलाक समस्त ब्रह्माण्ड घुसिया जाए? कियेक? कनैत नोर बहबैत नोर क नदी, समुद्र मे हेलैत रहू? मां, दीदी, बड़की भाभी, पीसी, काकी एतेक धरि जे हमर शिक्षिको जिनका दिस हम बड्ड उम्मीद सॅ तकैत छलहुँ जे हमरा नजरि मे क्रान्ति चेता छलीह से हो अपन-अपन नोर सॅ समुद्र के भरैत छलीह। लड़कियो सब कियेक नहिउन्मुक्त भऽ भभाकऽ हँसै’छ जेना मदमस्त लड़काहँसैत छै? कॉपफी हाउस मे जाइत अछि लड़िकियो सब मुदा सभक ध्येय रहैत छै आत्मप्रदर्शन। जहॉ चारिटा लड़की एक टेबुल पर जमा भेल कि बस बात शुरू हेतै इश्क, मोहब्बत आ फलां लड़का सुन्दर छै तऽ फलां स्मार्ट। हम चाहैत छलहुँ किछ सार्थक बहस होमए। ताहि दिन विश्वविद्यालयक प्रांगण मे छात्रा परिषद् केर समर्थक जोर अजमाइस करैत छल। बात बात मे बम पफेकल जाइत छल। घंटा भरि मे आठ टा ट्राम आ कतेको बस जरा देल गेल। रमेश बाबू बजैत छलाह ई प्रतिक्रिया छैक क्रान्ति नहि। तऽ क्रान्ति ककरा कहैत छै? जे इतिहासक तारीख बदलए। की हम कहियो इतिहासक तारीख बदलि सकब? कम से कम अपन जीवनक इतिहास के तारीख बदलि ली सेह बहुत। एक दिन डाफ्रैं चटर्जी स्टाफ रूम मे बजौलनि। ‘की बात छै? देख रहल छी आइ काल्हि अहाँक मोन क्लास मे नहिलागि रहल अछि।’ ‘सर, हमरा मन मे दर्शनक जे रूप रेखा छल से नहिपढ़ाओल जाइछ। सर..।’ ‘हं, हं, बाजू डरू जुनि।’ सर, देकार्त, कांट, हीगेल, ब्रैडले सब पढ़ि लेलहुँ । एतेक अभूर्त बात, आध बात तऽ बूझऽ मे अबिते नहिछै ........... आ सर भारतीय दर्शन तऽ आर विकट बुझाइछ अद्वैंत, वेदांत...... ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या ई वाक्य बस हम रटैत छी। रटि कऽ लिखला सॅ कोन लाभ? -‘अहॉ दर्शन शास्त्राक चुनाव कयलहुँ कियेक? नम्बर बढ़ियॉ आयल छल- पोलिटिकल साइंस या अर्थ-शास्त्रा लितहुँ।, ‘सर नहिजानि कियेक बिना सोचने-विचारने हम चुनाव कयलहुँ। मुदा जाबत हम अपना कें अपन स्थिति के नहिजानब-बूझब ताबत पढ़ने कोन फायदा? हमरा मात्रा समाज शास्त्राक विषय नीक लगैत अछि। जान स्टुअडि, मिल विदकेनस्टाइन आ सर सबसे नीक लगै’छ मार्क्स फेर दर्शन।’ हूँ। डाफ्रैं चटर्जी गंभीर भऽ माथ डोलौलनि। ओ एंटी एसफ्रैं एफफ्रैं छलाह। गांध्ीक परम भक्त। त की मार्क्स के नाम लेने नम्बर कटि जायत? कटौ हमरा कोन फर्स्ट क्लास चाही। ‘काल्हि एहि समय मे आऊ। हम किताबक लिस्ट तैयार राखब। हं, किछ अर्मूत धरणा के समझनाईयो जरूरी छ।’ ‘मतलब?’ ‘अरस्तु आ प्लेटो, हीरोल आ शंकराचार्य अइचारू मे मात्रा शंकरा चार्यक अद्वैत वेदांत ध्यान सँ पढ़ि ली तऽ मानस-भूमि पोख्ता भऽ जायत।’ ‘हम कोशिश करब।’ नहिकोशिशे नहिभारतीय दर्शन अवश्य पढ़ू, बेर बेर पढू। अर्थक खोंइचा उद्यड़ैत-रहत। हं अहांक भीतर तीन बातक जरूरी हेत-अभीप्सा, जिज्ञासा आ संकल्प। आ सबसे वेशी जरूरी छै बेर-बेर दोहरयबाक अभ्यास’। दोसर दिन डाफ्रैं चटर्जी किताबक लम्बा लिस्ट देलनि। फेर पूछलनि-‘कीन सकब? किछ किताब एहन छै जे अवश्य किनबाक चाही। ओहुना-किताब किनबाक अभ्यास जरूरी छै। हम लिस्ट देखलहुॅ-हीगेल, नीत्शे, कीर्केगार्द, हर्सेलक पोइट्री, डाइडेगरक बीइंग, सार्त्राक साइकोलॉजी ऑफ इमैजिनेशन, ईगोक सि(ात, लार्नाशेक उपन्यास, प्लेग, मिला आफ सिसिपिफस, मार्लो पोंतीक नोट्स। सर कहलनि ‘अध्ययन शुरू करू जतऽ बूझबा मे भांगठ होमए हमरा सॅ पूछि लेब। स्टाफ रूम वा हमरा घर अयबा मे संकोच नहिकरब। अहाँक मानसक जे बनाबट अछि आ अहां जे तकैत छी ओ सभटा किताब मे भेंटत। हं, एकटा बात आर जे दर्शनक पैद्य व्याध् िछै जे ओ विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के विकसित करैत छै। आ हमरा विचारें जीवनक एकटा समग्र दृष्टिकोण अपनाबऽ चाही। गीता के धर्मिक पोथी जकां नहिपढ़ू, महाकाव्य जकाँ पढ़ैत-पढ़ैत अर्थ बोध् गम्य हेत। ओना होना हिन्दी अनुवाद भैल छै। हं एकटा बात पर ध्यान राखब-कॉपफी हाउसक राजनीति मे कहियो भाग नहिलेब।’ ‘मुदा अराजनैतिक दृष्टिकोण?’ ‘पहिने महिलाक गुलामीक विषय मे सोचू विचारू।’ -हम स्टाफ रूम सॅ सोझे लाइब्रेरी मे गेलहुँ। डाफ्रैं चटर्जीक स्पेशल नोट मे छल मोट-मोट पोथी। पहिने हम ओइ पोथी सबके संघैत रहलहुँ फेर चिक्कन कागज के हाथ सॅ छू लहुँ। तकरबाद पढ़ब शुरू कयलहुज मैं कौन हूँ .... मैं सॅ शुरू होम वला समस्या, चुनावक समस्या........।’ आब हम दू दिन तीन दिन पर लगातार डाफ्रैं चटर्जी लग जाइत छलहुँ। ओ अपन व्यस्त समय सॅ एक घंटा, आध घंटा जे निकालि पबैत छलाह से हमरा पढ़ाबऽ मे बीतबैत छलाह। एक दिन घटना मोन पड़ै’छ। सर नीत्शे के समझा रहल छलाह जे नीत्शेपर प्रभाव पड़ल छलै फ्रैंेंच दार्शनिक वर्गसांक। हम भाव-विभोर भऽ सुनि रहल छलहुँ। स्टाफ रूमक एक कोन मे रमेश बाबू साप्ताहिक परीक्षाक पेपर करेक्ट कऽ रहल छलाह ‘कांट की कैटगरी’ हमर पेपर लऽ डाफ्रैं चटर्जीक मेज पर अयलाह। ‘देखियौ की लिखलनि अछि ‘कांट’ पर.. डाफ्रैं चटर्जी हंसैत कहलथिन-रमेश, हिनका ‘कांट’ पर नोट्स द दिऔ। आ ई जे पढ़ऽ चाहैत छथि से पढ़ऽ दिऔ।यौ, कतेक विद्यार्थी फर्स्ट-क्लासक मोह छोड़ि ज्ञानक पिपासा रखै’छ? ‘अच्छा’ प्रिया ! कहू गुरूदक्षिणा मे की देब?’ ‘सर हम की दऽ सकै छी।’ -‘बहुत किछ। नारी भेनाई कोनो अपराध् नहिहँ, नारीत्वक नोर कें नियति मानब बहुत पैद्य अपराध् छै। अपना नियति कें बदलि सकब तऽ ओ एकलव्य केर गुरू दक्षिणा हेत।’ हम तऽ अवाक भऽ हुनका देखते रहि गेलहुँ। ओ गौरवपूर्ण उन्नत ललाट, घंुघरल कारी केश स्वच्छ पारदर्शी दृष्टि, .......... पुरूषक एहनो रूप होइत छै? हम उठि कऽ हुनक चरण-स्पर्श कयलहुँ-सर आइ सॅ अहॉ हमर गुरू भेलहुँ। ‘नहिकोनो बाहरी व्यक्ति कें गुरू नहिमानि। जे क्यो किछु सिखाबय से कृतज्ञता सहित ध्न्यवाद दऽ आगॉ बढ़ऽ चाहि। आत्मे आत्माक गुरू भऽ सकै छै।’ विधताक विधन एहन जे एक दिन स्टापफेरूम मे चक्कर आबि गेलैन्ह ओ खसि पड़लाह। हुनका तुरत पीफ्रैं जीफ्रैं अस्पताल मे लऽ गेलैन्ह। खूनक उल्टी भेलैन्ह। ब्रेन ट्यूमर छलैन्ह। हुनकर देल किताबक लिस्ट, ओ स्वच्छ हँसी आ ओहन आदेश। औरत होएबाक नोर के नियति कहियो नहिस्वीकारब हम हुनक बात क स्मरण करैत छलहुँआ डाफ्रैं चटर्जी दुनियाँ सॅ विदा भऽ गेलाह। सूरत आखरी साँस लऽ रहल छल। मन मे भेल एखन क्यो एतऽ रहैत भनहि ओ अजनबी रहैत। सोझा मे बैसल चाह पीबैत। बातचित नइओ होइत। एक दोसर के उपस्थित रहबाक एहसास तऽ होइत। समयक ऑचर सॅ हम अइ क्षण के एक टुकड़ा काटि कऽ राखि लेब चाहैत छी। जिनगी कतेक छोट छै आ से हम बेवकूपिफ मे दोसर कें खुश राखऽ मे बीता देलहुँ? ओना कनि-मनि तऽ सक्रिय छलहँु हम मुदा कोन फर्क पड़ैत जॅ नहिकिछ करित हुँ? एतऽ समुद्र पर अचानक राति पसरि जाइत छै। आ कखनौ-कखनौ बुझाइत छै जे समुद्रक गर्भ सॅ आदिम अन्हरिया बहराइत होई आ सम्पूर्ण ध्रती के अपना बॉहि मे समेटऽ लेल छटपटाइत होइ। आकाश मे एखन तुरत निकलल शुक्र ताराक चमक मे हम मुग्ध् भऽ रतुका अन्हरियाक तरलता मे ऊब-डूब होइत रहलहुँ। आइ अइठामक आखरी इजोरिया राति अछि। बाल्कनि मे बैसल रजत रागिनी क स्वर मे सब किछु बिसरल छी। चान बढ़ैत-बढ़ैत अपन पूर्ण आकार मे विहुँसै’छ। समुद्रक लहरि पर मंद बसात नक्षत्राक जगर-मगर प्रकाश आ प्रकृतिक शोभा श्री केहन विलक्षण दृश्य छैक। आ एहन मनोहारी वातावरण मे हमरा मन के अनाम व्यथा मथऽ लागल। आब हम अपना कें अपना प्रति सहज समर्पित के नाई सीख लेलहुँ अछि। ई आत्मकेन्द्रित भाव नहि। फ्रैंायड के बाद नारसिसिस्म या आत्मपूजा सन विशेषण बड्ड पफैशनेबुल भऽ गेल छै। मुदा आत्मस्थ भेनाई तऽ वास्तव मे अपनाके जेना छी तेना स्वीकारब होइत छै। अपना प्रति आश्वस्त भेनाई ए ...... ई स्वीकृति वास्तव मे नव शक्ति दैत छै। ब्रेकफास्टक टेबुल पर बैसल हम फेर चिन्तन करऽ लगैत छी। काल्हि राति फेर व एह पुरनका सपना देखलहुँ। अई सपनाक दहशत सँ कहिया मुक्ति भेंटत? जहिया ई सपना देखैत छी भरि दिन उदासी मे बीतैत अछि। कियेक देखैत छी एहन सपना? हम बिसरि जाय चाहैत छी-मुदा बिसरब आसान छैक? सदिकाल पुरूष सॅ एतेक डर? कखनौ क्यो एसगर मे? डाफ्रैं चटर्जी सन व्यक्तियोक लेल मन मे एहने भय छल। ककरा कहबै मन क भय। एकटा दाई मां छलीह जे हमर अतीत जनैत छलीह। मात्रा ओ साक्षी छलीह। भेदभाव सॅ भरल नेनपन। खैर हमरा आब कोनो फर्क नहि। हमरा किछ नहिचाही एहि बड़का घराना सॅ। नहिबसऽ चाहैत छी बड़का गाड़ी मे। नहिचाही कीमती वस्त्रा। भैया आ मां क विशेष स्नेह भाजन छल सरोज। ओ डाक्टर बनतै खूब पाइआ यश कमाओत। आ प्रिया!..... सामने वाली पड़ोसनीक कुतिया पर रिसर्च करत! कहैत छल सब हँसी मजाक मे मुदा की हमरा दुःख नहिहोइत छल। हमरे संग एहन क्रूर मजाक कियेक? ई भाई बहिनक चुनाव की हम कयने छलहुँ? एक दिस तऽ बूझाइत अछि जे हम एकरा सब सॅ फरक छी हमर चेतनाक ध्रातल बदलि रहल अछि, दोसर दिस भय कातरता, दहशत सॅ चिचिआइत लड़की, टूटल बिखरल, मरनासन्न! कखनौक अयना मे अपन नग्न शरीर निहारैत छलहुँ कतहु किछ टूटल तऽ नहि? चिक्कन-चुनमुन मांसल शरीर पर कोनो खंरोचक निशान तऽ नहि? तइओ खंरोचक एहसास! हम भीतरे-भीतर कुहूकैत रहैत छी। छिः! घीन होइत अछि पुरूष जाति सॅ। घोर घृणा होइत अछि जे अबोध् बच््िययो कें नहिछोड़ैत छै। आब ई बुझबा मे अबैत अछि जे सब समाज मे इनसेस्ट प्रेम पर एतेक भयानक टैबू कियेक छै। कियेक सहज प्रकृतिक मृत्यु-र्ध्म इससेस्ट प्रेम पर लागू होइत छै। नहितऽ जन्मे सँ औरत’...... असहाय औरत। ने पिता छोड़ैत छै ने भाई। अपन नारी देह मे, स्वयं क्षत विक्षत भऽ जाइछ। ओ कहियो पर पुरूष कें प्यार नहिकऽ पबै’छ ने सृजनक सबसे सुन्दर रूप ककरो बीजक रक्षा अपना गर्भ मे कऽ पबै’छ। मानव जातिलेल एकर प्रसार जरूरी छै। मुदा की समाज नारीक रक्षा कऽ पबैए? की कामुक पुरूषक हवस के शिकार होमऽ सॅ अबोध् बच््यी बचैत छै? कत, कखन नहिहमरा पर आक्रमण भेल? केहन नेनपन छल। अपन भाई ए नहिबल्कि एक दिन तऽ एकटा नौकरो अपना कोर मे बैसाने छल। तखन हम बहुत छोट छलहँ मात्रा पाँच वर्षक! तहिया तऽ बाबूजी जीविते छलाह आ दाईमां देख लेने छलै। बाध्नि जकॉ दाई मां झपटि कऽ हमरा अपना कोरा मे लेने छल आ खूब गारि पढ़ने छलीह। हम किछ नंहिबूझने छलिए। हं फ्रैंाक मे लसलस किछ लागल छल जे दाई मां रगड़ि-रगड़ि के छोड़ने छलीह।....... तू हमर बेटा मंगल के उमरक छेँ...... बेटा जकां नहितऽ आइ हम तोहर गरदनि छोपि दितिऔ..भाग सरघुआ......, फेर दाई मां क आदेश ‘ए बुच््यी इ बात कहियो ककरो लग नहिबाजब। भगवान औरत के जिनगी मे एतेक दुःख कियेक लिखैत छथिन। के जानय हुनकर माया।’ मौन! हरदम मौन!! आखिर कहिया धरि? कहियो कोनों पुरूषक हाथ कान्ह पर। सिनेमा हॉलक छुप्प अन्हरिया मे शरीर मे सैकड़ो कीड़ा क देह पर ससरबाक अनुभूति! क्रिसमस दिन हम छोटका भैया आ सरोज न्यू मार्केट मे गेल छलहुँ क्रिसमस के खेलौना आ टापफी किनऽ। तहिया हम बारह वर्षक छलहुँ। ठसाठस भीड़। देह पर देह। चलनाइ कठिन। कहुना डेग उठाबी कियेक तऽ पीरियड्स क समय छल आ हमरा पाछाँ-पाँछा अबैत ओ पुरूष जे पैंटक बटन खोलने छल। पौरूषक नग्न प्रदर्शन.....। आ हमरा हिम्मत नहिहोइत छल जे भैयावा सरोज के कहिए। किये? किये हम एहन दब्बु छलहु? -की दाई मांक कारण भय बला संस्कार ग्रसित कयल? की मांक उमेक्षा सॅ वा भऽ सकै’छ हमरा समाज मे हजारो लाखो महिला आ बच््यी सभक संग एहिना होइत होइ। आ सब मौन धरण करैत होइ। मां सॅ आदेश भेंटैत होइ चुप्प रहबाक। बड़की बहिन सिखबैत होइ कतौ नहिबाजऽ लेल। की इएह कारण छै जे बेटीक जन्म लेला पर मां दुखी होइत छै? औरत भेनाईए अभिशाप छैक। हम कहियो ककरो सॅ प्रेम नहिकरब। ब्याह नहिकरब। सेक्स सॅ घृणा होइछ। पुरूषा सॅ बदला लेबाक इएह उपाय हमरा सूझैत छल। हम तऽ सोचने छलहुँ पुरूषक सम्पर्क सॅ दूर रहब, मुदा बचल रहलहुँ? एमफ्रैं एफ्रैं क परीक्षा माथ पर छल आ लॉ के इंटरमीडिएट..... तखने ओ पुरूष हमरा जिनगी मे आयल। ओ बडड पैद्य घरक संभ्रात परिवारक एकलौता बेटा। जखन ओ कलास मे लेक्चर देबऽ लेल ठाढ़ होइत छलाह तऽ प्रत्येक विद्यार्थी मंत्रा-मुग्ध् भऽ सुनैत छल। हम अगिला बेंच पर बैसैत छलहुँ। बातक शुरूआत भेल ऑखि सॅ। दू ऑखि चारि भेल। कल्पनाक सोलह पॉखिक रथ पर सवार भऽ मनोरथ दुनियॉ क सैर करऽ लगलहुँ। रंग-बिरंगक सपना देखऽ लगलहुँ। एक दिन ओ हमरा स्टाफ रूम मे बजौलनि। हुनका लग मे ठाढ़ होइते करेजक ध्ड़कन बढ़ल जा रहल छल। ओ पूछलनि ‘हमरा घर चलब?’ वशीभूत भेल जकॉ हम कहलिऐन्ह-हं।’ ओ आगाँ-आगाँ हम पॉछाँ। बस स्टाप सॅ 2--बीफ्रैं पर चढ़लहँुं। गरियाहाटक मोड़ से पहिने उतरलहुँ। ओ हमरा सॅ आठ दस डेगक दूरी बना कऽ चलैत छलाह सांझुक लुकझुक बेर छलै। जाड़क समय। बीच-बीच में पाछॉ घूमिकऽ हमरा दिस ताकि विहुँसैत छलाह। दू तल्ला मकानक आगाँ रूकलाह। फेर भीतर गेलाह। हमझिझकैत आगाँ बढ़ि रहल छलहुँ। हुनकर पैरक आहट ऊपर सीढ़ि सॅ अबैत छल। फेर ताला खुजबाक आवाज सुनलहुँ। सीढ़ि पर चढ़ैत पीठ देखलिए। एक क्षण ठिठकि कऽ ठाढ़ रहलहु। हम ई की कऽ रहल छी? किछ नहिपफुराएल आ भीतर गेलहुँ। ओ केवाड़ बन्न कऽ हमरा दिस घुरलाह। हमर ऑखि झुकल छल। सांसक गति तीव्र। ओ हमरा डॉर में हाथ घऽ अपना दिस घिचलनि हम लत्ती जकॉ झुकैब गेलहुँ जे होएबाक छलै भऽ गेलै। देह अपन र्ध्म निमाहलक। कान मे मध्ु मिश्री सन स्वर गेल ‘हम अहॉ से प्रेम करैत छी। बस अहीं सॅ।’ ओइ दिन हमरा कनिको ग्लानि महसूस भेल ने जुगुप्सा। पुरूषक स्पर्श एतेक मादक होइत छै, एहन सुखद! एतेक मनलग्गू आकर्षक से आइ पहिल दिन महसूस भेल। हम बाइस वर्षक होइत-होइत पूरा औरत बनि गेल छलहुँ ओ बत्तीस वर्षक अनुीज्ञवी पुरूष छलाह। सप्ताह मे दू-तीन दिन ई खेल छमास घरि चलैत रहल। परीक्षा माथ पर छल। एक दिन ओ कहलनि-‘परीक्षा लग आबि गेल आब अहॉ पढ़बा मे ध्यान दिअ।’ -चाहैत छी एकाग्रमन सॅ पढ़ि मुदा अहाँ बिना मोने नहिलगैए। फेर ओहने उन्माद ओहने आवेग। इम्हर किछ दिन सॅ ओ कॉलेज नहिआबि रहल छलाह। हमर मन एकदम बेचैन छल। की भेलै? बिमार नहितऽ छथि? एक दिन हम स्टाफ रूम मे जा कऽ प्रोफेसर दास गुप्ता सॅ पूछलिऐन्ह-‘सर! प्रोफ्रैं मुकर्जी नहिआबि रहल छथि?’ -‘ओ पन्द्रह दिनक छुटीð लेने छथि,’ ई सुनि हमरा रूकल नहिगेल। की भेलै? ओ पफोन कऽ सकैत छलाह। संकोच भेल हेतैन्ह। ठीक छै हमहीं जाकऽ देखैत छिऐन्ह। ओ घर मे एसगरे रहैत छथि। हमर पैर हुनका घर दिस बढ़ल। घर मे ताला नहिलागल छलै। ओ! तऽ घरे मे छथि। अवस्से बिमार हेताह। हम मने मन क्षुब्ध् छलहुँ ओ हमरा आबहु आने बुझैत छथि। के हुनकर सेवा टहल कैत हैतेन्ह? घंटी बजेलहँु। केबाड़ फूजल। करेज ध्क-ध्क कऽ रहल छल। आब ओ सोझा मे हेता देखते भरि पाँज ध्ऽ चूमऽ लगताह। केवाड़ खूजल। उम्र मे हमरा सॅ किछ पैद्य खूब सुन्दर महिला ठाढ़ छलीह। मांग मे सिन्दुर, लाल तांतक साड़ी, भरि हाथ सोना क चूड़ि, शाखा, नोवा। गला मे सोनाक सीताहार, कान मे हीरा जड़ल सतफूल। हमरा पूछलनि-‘अहाँ के?’ हम प्रोफेसर मुकर्जी सॅ भेंट करऽ आयल छी। ओ छथि।’ आऊ भीतर आऊ। रूम क सजावट बदलल छलै। नव सोफा सेट, खिड़की पर नव पर्दा, ओ महिला हमरा बैसाक भीतर गेलनि। प्रोफ्रैं अयलाह-आग्नेय दृृष्टि सॅ हमरा दिस तकलनि। आश्चर्य भेल। घबराइत बजलहुँ। ‘हम नहिअबितहुँ मुदा नहिरहि भेल चिन्तित छलहुँ अहॉ बिमारने होई।’ ओ किछ सुनबा लेल तैयार नहिछलाह। ध्ीरे सॅ गुर्राक बजलाहऽ मूर्ख लड़की। हम कहिया कहलहुँ अहां सॅ विवाह करब? दूनू मौज कयलहुँ खिस्सा खत्म। फेर कहियो आइठाम नहिआयब। हम विवाहित छी।’ ओह! एतेक अपमान। हमरा चक्कर आबि गेल। हुनक पत्नी चाय-नास्ताक ट्रे लऽ ठाढ़ छलीह। ‘अरे, अहाँ हिनकर छा×ाा छी-मूँह मीठ क के जाउ।’ ‘नहि, एखन हम बहुत जल्दी मे छी फेर कहियों।’ हम तीर जकां बहरेलहुँ। सांझुक पाँच बजि रहल छलै। फरवरी मास। कतऽ जाउ? सामने सॅ डबल डेकर बस आबि रहल छलै। मोन भेल एकरे चक्का तर कूदि जाइ। फेर कहलक-नहिमरब कियेक? नहि, हमरा की भेल? पढ़ल-लिखल सभ्य पुरूष धेखा देलक। हमरा संग ओ एना कियेक कचल? भारतीय वेदांत पढ़ाबऽ बला व्यक्ति एहन नीच! एतेक निर्मम!! हम झोंक मे चलल जा रहल छलहुँ। होश नहिछल कम्हर जा रहल छी। बस एकहिटा बात दिमाग मे घुरिया रहल छल-हमरा किछ तऽ कहैत। हम तऽ किछ मांगने नहिछलिऐ शर्तहीन समपर्ण। तखन ओ ठगलक कियेक। आर क्लास मे छात्रा छलै। लड़की क कोनो कमी छलै। आखिर हमरे संग एहन धेखा कियेक? लेक के कात मे ठेहुन पर माथ झुकौने कनि रहल छलहँ। बुझाएल क्यो छै माथ उठेलहुँ। देखलिए तीन चारि टा छोड़ा ठाढ़ छल। हड़बड़ाक उठलहुँ। सुनलिऐ एकटा छोड़ा बजैत छल- ‘प्रेम कोरेछे, ताइ जोन्नो कान्ना।’ ;प्रेम कयने होएत तैँ कानि रहल अछि।द्ध दोसर टिपलकै-‘अहा ! मोरी-मोरी।’ ;मुइलहुँ, मुइलहुँ।द्ध तेसर बजलै-‘की दीदी! आमादेर पछोन्दो होबे की? ;की हम पसिन्न छी?द्ध हम ओतऽ सॅ भगलहँु। पॉछॉ सॅ आवाज आयल-‘एई रे पालिये छे बेचारी।’ ;अरे बचारी भगलै।द्ध हम बुझू दौड़ैत जा रहल छलहुँ.............कापफी दूर धरि। अचानक रूकलहॅु। बाट चलैत लोक सब आश्चर्यचकित भऽ हमरा देख रहल छल। हम विवेकानन्द पार्क लग सॅ घर क बाट छएलहुँ। एक मासक बाद एमफ्रैं एफ्रैं क परीक्षा अछि। आ हम एको लाइन पढ़ि ने पबैत छी। हमरा संग एतेक पैद्य धेखा? कियेक? हम की बिगाड़ने छलिए। पढ़ल लिखल दानव। हम कखनौ बाथरूम मे, कखनहुँ बरांडा मे हुचुक-हुचुक कनैत छलहुँ हमरा अपने नजरि मे अपन तस्वीर कॉचल टुकड़ा जकां छहों छित भऽ गेल। दरार कें जोड़ल जा सकै’छ, खु(ा के भरल जा सकै’छ मुदा कांचक टुकड़ि के ने जोड़ल जा सकैछ ने पूर्ण प्रतिरूप देखल जा सकै’छ। हं, हम प्यार कयने छलहुँ, पूरा ईमानदारी सॅ अपना कें समप्रित कयने छलहुँ, बिना कोनो शर्त कें ककरो सॅ बिना किछ पूछने। बहुत दिनक बाद बुझलिए जे बिना सोचने-विचारने बिना कोनो शर्तक सम्बंध् भनहिं मानवीयताक द्योतक होइ मुदा ओ अहॉक व्यवहारिक दिवालियापन के परिचायको बुझल जाइछ। जेना-तेना परीक्षा देलहुँ तकर बाद यूनिवर्सिटी को कहियो पैर नहिदेलहुँ। ने कलकत्ताक भीड़-भाड़ वला जन-समुदाय मे कहियो ओ नजरि आयल। ओ जीवित अछि की मुइल से हो नहिजनैत छिऐ मुदा ओकर दोगलापन कहियो नहिबिसरा सकै’छ। ओ हत्दयक अन्हार कोन मे एखनहुँ खटकैत अछि। ओ घटना हमरा आत्मबल के छहोंछित कऽ देलक विश्वास क्षत-विक्षत भऽ गेल। आब हमरा पुरूषक जरूरत महसूस भऽ रहल छल। हमरा सुरक्षा चाही। ई दुनियॉ दानव सॅ भरल छै। जे हम ऑखि सॅ देखैत छिऐ सेह नहिछै वास्तव मे। ब्रैडले सत्ते कहने छै-‘एपिरियन्स इज नॉट रियल्टी।’ उपाध् िरहित व्यक्ति की रहि जाइछ? निगुर्ण ब्रह्म। एकर पहिचान की छै? नेति-नेति। हं, हमरा जीवन मे प्रेमक भूमिका नेति-नेति रहल। किछ नहि............अन्त मे किछ नहि। केवल शून्य।। सबटा पूफसि ............ धेखा......। प्रेम, समर्पण, पारंपरिकता की अई सब शब्द कें दोहरबैत दोहरबैत हम आत्मसम्मोहित नहिभऽ गेलहुँ ? औरत प्रेमक जाल मे कियेक पफँसैत अछि। राति-राति भरि हम इएह सब सोचैत रहि जाइत छलहुँ। पीड़ा, भयानक यंत्राणा आ प्रचंड क्रो(। मुदा आश्चर्य होइछ अपने पर हम ओकरा दोष नहिदैत छलिऐ अपने कें अपराध्बिुझैत छलहुँ। हमहीं दोषी छी अपने पर क्रो( होइत छल। आ तैं अपने सॅ बदला लेबऽ चाहैत छलहुँ। अपन प्रस्पफुटित होइत जीवन कें अन्हार कोन में सौ-सौ तेज धरवला अस्त्रा शस्त्रा नुकौने छलहुँ। आब हम ततेक जोर सॅ ठहाका लगबैत छलहुँ जे माँ, भैया कें टोकऽ पड़ैत छलैन्ह। हम अपन समस्त अपमान कें ठगयबाक यातना कें हँसी कहिलोर मे डूबा देबऽ चाहैत छलहुँ। सरोज विदेश जयबाक तैयारी कऽ रहल छल आ हमरा आगां भबिष्यक अन्हरिया छल। प्रेम, सेक्स, विवाह ई समस्त शब्द हमरा युग-युग केर घसल पुरान सिक्का बुझाइत छल। शब्द नहिमासुक टुकड़ा, टपकैत लिघुर। अइ शब्दक पाछाँ पागलपन आ आदिकाल सॅ अबैत परम्पराक चेहरा औरतक नोर सॅ तरबतर छै। हम आब हरदम हँसैत रहबाक चेष्टा करैत छलहुॅ। खुश छी तकर एलान करैत छलहुँ। ओ हमर उदासीक दौर छल। भीतर सॅ कुहूकैत बाहर सॅ हँसैत समय बीता रहल छलहुँ। हम औरत बनऽ नहिचाहैत छलहुँ मुदा बनि गेल छलहुँ अदद औरत! एतबा बुझि गेल छलहुँ जे कानला सॅ किछ नहिहोमऽ बला छै। डिप्रेशन से डिप्रेशन आर बढ़ैत छै। बड़की भाभीक मृत्यु भऽ गेलैन्ह। हुनक मृत्युक छ मासक बाद नव भाभी आबि गेलीह। ई भाभी भैयाक अनुकूल व्यवहार करैत छलथिन। भैया आब पूर्ण सुखी स्वस्थ-प्रसन्न छलाह। घरक सम्पत्ति पर पूरा अध्किार छलैन्ह। आब ककरो किछ नहिभेंटऽ बला छै। सरोज के कम से कम विदेश जयबाक खर्च तऽ भेंटलै। मुदा हम तऽ जहिया मां के देखलिऐन्ह सियल साड़ी, तहिये मने मन संकल्प कयने छलहुँ जे आब घर सॅ अपना खर्च लेल एको पाइ नहिलेब। एमफ्रैं एफ्रैं क पफीसो अपन संगी विभा सॅ लऽ कऽ भरने छलहुँ। तीन सौ टका आर उधर लेलहुँ। कछ किताब किनबाक छल। पढ़बाक प्रयास करैत छलहुँ मुदा मन एकाग्र नहिहोइत छल। क्षत-विक्षत मन बेर-बेर पूछैत छल कियेक एना भेल? हमर कोन अपराध्? ओ पढ़ल-लिखल सभ्य पुरूष एना धेखा कियेक देल। बात-बात में गीता आ उपनिषद्के श्लोक बॉचऽ बलाक एहन नीचताई हमरा मोन पड़ल ईशोपनिषद्क श्लोक-‘हे प्राणी! तू अपने कर्म का स्मरण कर........ स्मरण कर।’ ओह! की ई सभ पढ़ावहि लेल पढ़ैलैन्ह प्रोफेसर! जेना-तेना कऽ एमफ्रैं एफ्रैं क परीक्षा खत्म भेल। हमरा फर्स्टक्लास नहिभेँटल-विभागाध्यक्ष नाराज भेलाह! हं, तर्कशास्त्रा मे गोल्डमेडल भेंटल। तर्क आ विश्लेषण। हम अपन जीवनक परिस्थितिक रेशा-रेशाक विश्लेषण करैत छलहुँ। विश्लेषण चीड़-फाड़। अजीब द्वन्द्व अपना होमऽ आ नहिहोमक बीच। ठोस हाड़-मासु वला जीवित शरीरक भीतर ई कोन अभावक कीड़ा कैंसर जकां तरे-तर शरीर के खोखला कयने जा रहल अछि। अई सॅ पूर्व कोनो पुरूष दिस नजरि उठैत नहिछल आ आब हिरणी जकॉ ऑखि नचैत रहै’छ। जेना शराब बिना शराबीक हाल होइत छै तहिना हमरो हाल छल। हमहीं उचित-अनुचित के द्वन्द्व में कियेक झुलैत रहू? ई दुनियाँ हमरा संग न्याय कयलक? जे हमरा संग भेल तकर औचित्य सि( कयल जा सकै’छ? आ सदतिकाल अपना प्रति हताश भाव! एहना मे भविष्यक कोन रूप रेखा बनओल जा सकै’छ? आ हमरा लेल सबसे पहने आपना पैर पर ठाढ़ भेनाई अत्यन्त आवश्यक अछि। घर मे दूनू समय भोजन तऽ भेंट जाएत मुदा एकर अलावा आर किछ नहि। ओना अई बड़का घर मे दस बारह टा एखनो नौकर रहैत छै दाई, महराज, दरबान, ड्राइवर, मुशी, किछु विशिष्ट सदस्य लेल खीरा, ककड़ी, मौसंबी। ओना फल खयबा लेल आतुरता नहिछल मुदा मने-मन विद्रोह होइत छल। मां क एहन भेदभाव देख भूखो मरि जाइत छल। संतराक जूस मां बड़का भैया, सरोज आ छोट ध्यिा-पुता के दैत छलथिन। जँ मौसम क पहिल दिन महँगा मटर अबैत छलै तऽ ओ बड़का भैया आ सरोजक थारी ए मे परसल जाइत छल। एक दिन तऽ हद भऽ गेलै। दाई मां हमरा थारी मे एकटा संदेश ध्ऽ देलैन्ह। संदेश राखल छलै विशिष्ट लोक लेल। बस मां ई देखिते आगि बबूला भऽ गेलीह। ‘चमेलिया मां! राति-दिन तोरा अपने बेटीक चिन्ता रहैत छऽ आर छै बाल-बच््या। बूझल छौ जे आइ-काल्हि दूध् कम लेल जाइत छै। संदेश विजय बाबू लेल राखल छलै।’ ‘हम विजय बाबू के पूछने छलिएन्ह ओ नहिलेलथिन।’ ‘तऽ सरोज के थारी मे ध्ऽ दितिऐ। बेचारी दस दिन सॅ खाँसी से परेशान छै ताहि पर सॅ डाक्टरीक पढ़ाई।’ बहूरानी! आब हमरा सॅ नौकरी कयल नहिहेत। खाइत काल एना दुश्मन जकॉ जे मन मे अबैए बजने जाइत छी। कनि प्रियाक मूँह देखिऔ केहन कननमूॅह भऽ खाइत अछि।’ हं, हं बुझलिए आब पहिलुका बला बात नहिछै जे शाही खर्च हेतै।’ ठीक छै। पहिलुका दिन नहिरहल तऽ आब हमरा सॅ नोकरियो नहिपाड़ लागत।’ हम डबडबाएल ऑखि सॅ छेनाक संदेश कहुना पानि संग घोंटलहुँ। ओकर बाद रोटी-दालि तरकारी भात के अलावा कोना विशिष्ट व्यंजन वा मध्ुर दही ठोर मे नहिसटेलहुँ। बड़का घरक बेटी ओइ घर मे कहियो ने बदामक बपर्फी ध्ूलक ने संदेश! हं, कहबा लेल हमहुँ बड़का घर क बेटी छलहुँ। ओई घटनाक सप्ताह दिन बाद दाई मां क चिटीò पाबि बेटा मंगला एलै दाई मां के लऽ जाए। ओइ दिन संदेश बला बात पर दाई मां बरामदा पर बैसल मां के दू रंगा व्यवहार लेल खिध्ंासे करैत रहलनि। आब अइ बुढ़ारी मे दाई बहुत बदलि गेलीह अछि। पहिने बात बात पर कनैत छलीह आब कनैत नहिछथि ने ककरो सॅ डरैत छथि बल्कि आब कोनो बात पर अड़ि जाइत छथि आब बहुत कठोर भऽ गेलीह अछि, बुझाइत अछि अन्याय देखैत-देखैत दाइ मांक एहन स्वभाव भऽ गेलैन्ह। दाई मां आब नीक जकाँ बूझि गेलीह जे हमर विवाह नहिहेतै। दहेज लेल टका चाही आ मां क हाथ छैन्ह खालि। झूठ शान शौकत लेल मां क जेवर बिका रहल छैन्ह। तैं दाई मां बूझि गेलीह जे ओ जे सपना देखैत छलीह जे हमर ब्याह ध्ूमधम सॅ पैद्य खानदान मे होएत नाति के कोर मे खेलाकऽ मुइब से सौख पूरा नहिहोमऽ बला छै। तैं ओ गाम चलि गेलीह। हम बहुत काल धरि बरामदा मे ठाढ़ भेल कारी पिअर टैक्सी के जाइत देखैत रहलहुँ। गरमीक उमस बला सांझि छलै। एकटा थाकल गोरैया आबि बरामदाक रेलिंग पर बैसल। हम उदास ऑखि सॅ ओकरा दिस तकलहुँ। आइ हम दूनू चुप्प छलहुँ। गोरैया ऑखि झपकबैत छल आ हम बेर-बेर ऑखि पोछैत छलहुँ। हम नहिचाहैत छलहुँ जे क्यो हमर नोर देखए। आइए दुपहर मे हम मां आ भाभी के बतिआइत सुनने छलिऐन्ह-‘भने’ चमेलियाक मां गाम जा रहल अछि। दिन भरि हंगामा मचौने रहैत छल।’ ‘मां जी की कहिऐन्ह-ततेक खाना बना कऽ नीचॉ लऽ जाइत छल जे पाँच लोक खइतै। टोकला पर कहैत छल हमर घर क लोक आयल अछि खाय-पीऽ लेल नहिदेबै?’ हं, अइ मंहगायी मे कहॉ से एतेक लोकक खर्च जुटतै। पींड छुटल।’ दाई माँ के जाइत काल हम अपना गला सॅ खोलि कऽ चेन जबरदस्ती हाथ मे दऽ देने छलिऐ। नहिलैत छल तऽ कहलिऐ। दाई मां बेटीक एकटा यादगार नहिराखब?’ - ‘नहिबुच््यी, ई सिकड़ी अहीं राखू। बेर वक्त पर काज देत। मां बेटीके दैत छै बेटीक चीज लै छै नहिहमरा पाप लागत।’ ओ महामहिला सोनाक चेन नहिलेलक। किछ नहिलेलक विदा भऽ गेल। ओ ठीके कहने छल एक दिन हम ओ सोनाक चेन दू हजार टका मे बेच देलिऐ। हमरा विभाक कर्ज चुकएबाक छल आ आगाँक खर्च लेल टकाक काज छल। दाई मां सँ भेंट करऽ हम सब गेल छलहुँ भैयाक विवाहक समय। दोसर भाभी छलीह इलाहाबादक। फल-मिठाई लऽ कऽ मिर्जापुरक अहीर टोला मे गेल छलहुँ। आंगन मे खाट पर बैसल छलीह-मोतियाबिंद के कारण सूझैत नहिछलैन्ह। -‘दाई मां! अहाँ नीकें छी?’ ‘अरे हमर बुच््यीक आयल अछि। ए मंगला मंगल, दुलहिन सब गोटे आ देख हमर बेटी आयल अछि..........।’ आ तकर बाद सूखल झुलैत हाथ सॅ हमर सौंसे दह हँसोथि करेज मे सटबैत बाजल छल ‘ए बुच््यी देह तऽ एकदम सूखि गेल-कोन जरूरी छै एतेक दिन-राति पढ़ाई करऽ के। विजय बाबू हमर बुच््यीक आब जल्दी ब्याह कऽ दिऔ।’ थोड़े कालक बाद हम-सब घुरलहुँ। दाई मां अबैत काल अपना पोटरी सॅ पाँच टका निकालिकऽ हमरा हाथ मे देलनि। मंगलाक बहू कहलक माई राति-दिन अहिंक चर्चा करैत रहैत छथि। अहां जे टका-पाई पठबैत छिऐ से सब जोगाकऽ रखने छथि जे बुच््यीक ब्याह हेतै’ तऽ हम बनारसी बिहौति जोड़ा लऽ कऽ जायब।’ सत्ते प्रेम मे लोक प्रतिदान नहिचाहैत छै। वास्तविक प्रेम कयनिहार मात्रा समिध बनि हवन कुंड मे स्वाहा होइछ। साल भरि के बाद मिर्चापुर सॅ मंगल के लिखल चिठीò एलै-‘माई का स्वर्गवास हो गयां’ हमरा घर मे एकर कोनो प्रतिक्रिया नहिभेल। मां क मुँह सॅ बहरे लैनह-‘बेचारी बड्ड नीक छल निः स्वार्थ भाव सॅ प्रियाक पालन पोषण कयलक।’ बस आर ककरो किछ कहबाक ने समय छलै ने इच्छा। हम घर मे बिना ककरो किछ कहने चलि गेलहुँ बालूघाट गंगा स्नान करऽ आब हम सत्ते अनाथ भऽ गेलहुँ। हम एकटा नर्सरी स्कूल मे काज करऽ लागलहुँ। साढ़े तीन सौ रूफ्रैं मास भेँटैत छल ताहि सँ हमर व्यक्तिगत खर्च निमहि जाइत छल। पढ़ेनाई हमरा वश क बात नहिछल पढ़ेनाई नीक नहिलगैत छल। खैर अहि बीच हम यादव पुर विश्व विद्यालय मे थीसिस लेल आवेदन दऽ देने छलिऐ। आर्थिक सहयोग तऽ नहिभेंटल मुदा परमीशन भेंट गेल। हम सांझि मे एकटा टयूशन शुरू कयलहुँ। एकटा मारवाड़ी महिला कें अंग्रेजी पढ़बाक सौख भेलै। दू सौ टका मासिक पर। सांझि मे छ बजे से आठ बजे धरि सप्ताह मे पाँच दिन। एक मास बीतैत बीतैत असली बात बुझलिऐ जे ओकर पतिदेव राति मे अबेर कऽ घर अबैत छलथिन। बेचारी एसगर बोर होइत छल तैँ एकटा लोक व्यथा-कथा सुनऽ बला चाही तऽ हम छलहुँ कान। एक दिन संझि कऽ गेलहुँ तऽ ओ नहिछलीह हुनका पतिदेव के देख लिऐन्ह हम चोटे घुरि एलहुँ। तकरबाद फेर हम कहियो नहिगेलिऐ। अहिना जिनगी खेपने जाइत छलहुँ। सरोज चलि गेल छल लंदन पढ़ऽ। ओतऽ नोकरियो कऽ रहल छल। ओ पत्रा लिख कऽ पूछने छल टकाक वास्ते। हम मना कऽ देलिऐ। घर मे मांक बक-झक भैया-भाभीक उपेक्षा। जखन कखनौ दीदी सब अबैत छथि तऽ एकहीटा रटनी-एकर नैया कोना पार लगतै-‘तुसब नहिमदति करबें तऽ केकरतै?’ ‘लॉ’ क फाइनल उपर छल मुदा पढ़बा मे मोन नहिलगैत छल। परीक्षा नहिदेलिऐ। बड़का भैया आर कुपित भेलाह। हमरा मे एहन कोनो गुण नहिछल जाहि पर गर्व कयल जा सकए। क्यो हमरा सॅ कियेक विवाह करबा लेल तैयार होइत? एतेक पढ़ाई के बाद लड़का भेंटनाई कठिन छलै। खैर एक दिन बिलाड़िक भागें सींक टूटल। रामकुमार हजाम विवाहक दलाल छल से एकटा कथा लऽ कऽ आयल छल। इएह हजाम भैयाक दोसर ब्याह करौने छलनि। ओ अबिते भैया के कहलकैन्ह -‘बड्ड नामी परिवार छै अग्रवाल छथि हिनका परिवार के परिचय पूछऽ के काज नहि। अहां ऑखि मुनि कऽ सम्बन्ध् कऽ सकैत छी। एकलौता बेटा छैन्ह। करोड़पति छथि। लड़का देखबा मे स्मार्ट, अमेरिका सॅ बिजनेस मैनेजमेंट पढ़ि कऽ आयल अछि। आब अहॉ सब अपना मे विचारि लिअ।’ ‘कतेक खर्च करऽ पड़त ?’ - पहिनेतऽ हुनका सब के लड़की पसंद होइ तखन ने आगां क बात करब। हुनका घर मे तऽ लक्ष्मीक वास छैन्ह ओ चाहैत छथि पढ़ल-लिखल बेटा योग पुतोहु। मां आ बड़का भैया दूनू गोटे एके बेर बजलाह। -‘रामकुमार अहाँ इ सम्बन्ध् करा दिअ तऽ हम जनम भरि अहॉक गुण गबैत रहब।’ -‘कनि एकबेर हमरा लड़की देखा दिअ।’ भाभी झट तैयार कऽ मां क रूम मे हमरा लऽ कऽ अएलीह । हजाम क दृष्टि हमरा पर पड़लै-बाजल ठीक छै-‘हम कथा पटा देब मुदा हमर दलाली नहिमारब।’ ओ लाकनि हमरा देख अयलाह। नरेन्द्र हमरा सॅ दू-चारिटा बात अंग्रेजी मे कयलनि आ है कहि देलथिन। क्यो हमर इच्छा, अनुमतिक जरूरत नहिबुझलकै। ओना सत्ते नरेन्द्र स्मार्ट युवक छलाह। नरेन्द्र के मां आ पापा हमरा हाथ पर पाँचटा गिन्नी ध्ऽ सगुन कऽ चलि गेलाह। बड़का भैया तुरत न्यूमार्केट गेलाह। फल के एकाबन टा टोकरि पठौलनि-सब तरहक फल। सबटा बात ततेक जल्दी सॅ भेलै जे किछ सोचऽ-विचारऽ क मौका भेटबे नहिकयलै। भोरे प्रस्ताव आयल छलै आ मात्रा चारि घंटा मे भैया सब पता लगा लेलथिन। बड्ड प्रसन्न छलाह भैया, कराड़पति छथिन लड़काक पिता आ इएह एकमात्रा वारिस! अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। प्रिया क उम्र तेइस वर्ष आ लड़का क छब्बीजम। राति धरि घर पूरा भरि गेलै दीदी सब आबि गेल छलीह। हँसी-मजाक सॅ आँगन-घर क वातावरण मे उल्लास स्पष्ट झलकैत छलै। हमहँ हँसैत छलहुँ। अपना सौभाग्य पर विश्वासे नहिभऽ रहल छल। हं, माथक धोध्री मे एकटा लालबत्ती बेर-बेर जरैत छल। कहीं ओ अतीतक विषय मे ने पूछथि। हम तऽ कुमारि छी नहि, सोहागराति मे जँ पता चलि जाइ? की सब बात साफ-साफ कहि दिऐ। मुदा से सब सुनला पर जँ सम्बन्ध् करबा सॅ मना कऽ देताह तऽ? नहिएहन गलती नहिकरब। विवाह भेलाक बाद आन क्यो शोषण नहिकरत। तैं बहुत सोचि-विचारि कऽ चलऽ चाही। एखन स्वीकृति आ सुरक्षा दूनू भेंट रहल अछि। आब हम नेना नहिछी। बिना व्यवस्थाक स्वीकृतिकें हम किछ नहिकऽ सकैत छी। बिना कोनो प्रयास कें एखन परसल थारी मे छप्पन भोग उपलब्ध् भऽ रहल अछि। कहाँ सड़कपर चप्पल घुसीटैत छलहुँ नौकरी लेल कहां एकेबेर करोड़पति क पत्नी.........।’ खूब ध्ूमधम सॅ विवाह भेल। हमर ससुर के एकहि टा मांग छलैन्ह बरियातक स्वागत खूब नीक जकां होमए। भैया बरियातक स्वागत मे कोनो कमी नहिराखलथिन। तिलक के समय हमर ससुरजी एक लाख टका क थैली पहिने पठा देलथिन-हुनके टका हुनका देल गेलैन्ह। एहिना विदाई काल एकटा चॉदीके कटोरा मे सवालाख टका भैया के चुपचाप दऽ देलथिन भैया हुनकर पैर पकड़ि लेलथिन.............। ‘‘शाहजी, अपनेक एहि एहसान क तर मे दबि गेलहुँ एकरा हम कोना चुका सकब?’ ई अहाँ की बजै छी विजय बाबू? अहाँक इज्श्त आब हमरो इज्श्त अछि। विदाईकाल हमरा कनिको करेज नहिफाटल। मन मे भेल अइ नरक सॅ पिंड छूटल। मां के एतेक खुश कहियो नहिदेखने छलिएन्ह। हमरा सासुर सॅ आयल गहना-कपड़ा चीज वस्तु देख गदगद छलीह। बेटी मर्सिडीज गाड़ी मे विदा भऽ रहल छलैन्ह। ओ बजलीह-‘सल्लो। ज्योतिषी सत्ते कहने छलै एकर भाग्य बहुत नीक छै राज करत।’ हमरा दाई मां मोन पड़लीह। आइ दाई मां जीवित रहैत तऽ केहन खुश होइत। विवाहक जोड़ा...........। ब्रेक फास्ट टेबुल पर हम बहुत देर धरि बैसले रहि गेलहुँ। प्रायः सभटा टेबुल खालि भऽ गेल। तेसर बेर जब वेट्रेस पूछलक-‘मैडम, सम मोर कॉपफी?’ ‘ओ नो थैक्स।’ वेट्रेस वर्त्तन बासन समटऽ लगलीह। ओकर गाल लालटेस छलै आ केश कारी घुघरल ऑखि खूब पैध्। बड्ड हॅ समुख खूब सुन्दर मुँह मुदा मोट-मोट हाथक आंगुर परूषाह कड़ा काज करैत-करैत एहन भऽ गेल हेतै। आब हमरा अइठाम सॅ उठि जयबाक चाहि ओ हाथ मे स्पंज नेने ढाढ़ि छल पोछा लागबऽ लेल। हम उठ लगलहुँ तऽ कहलक-‘हैपी डे मैडम........।’ टिप लेल किछ सिक्का ध्ऽ बढ़लहुँ। काउंटर पर बैसल औरत चिन्हल सन मुसकी सॅ स्वागत कयलक। बिल पर साइन कऽ हाथ मे छाता लऽ सड़क दिस बढ़लहुँ। बिना कोनो उद्देश्य कें टहलब बड्ड नीक लगै’छ खास कऽ जँ मन मे कोनो कहानीक ताना-बाना बुनैत होइ। हं विदा होइत काल गाड़ी मे बैसल-बैसल हम सोचैत छलहुँ आब हम बड़का घरक पुतौहु छी। सासु आदर पूर्वक गाड़ी सॅ उतारलनि। हमरा देह पर छल पचास हजारक घाघरा आ दस लाखक हीराक सेट। इ ह सेट ससुर जी चुप चाप पठौने छलाह। आब भविष्य मे जे होमए एखन त हम या परिवारक लोक जेहन कल्पनो नहिकयने छल। तेहन सम्बंध् भेल। एहि गुनध्ुन मे हम माथ झुकौने पीढ़ा पर बैसल छलहुँ ओतऽ मुदा मन कतहु आन ठाम छल। हँसी वा गाीत-नाद किछ मन के छुबैत नहिछल। कपड़ा बदलि कऽ नरेन्द्र अयलाह तऽ हमरा ओहिना बैसल देख झुझलाक बजलाह-‘मम्मी की हिनका एहिना मूरूत जकां बैसौने रहबैन्ह? बड़की पीसी बजलथिन-‘अरे मुन्ना ई आइ तोरा लग नहिजेथुन काल्हि सोहागराति हेतै।’ से कियेक? हुनका स्वर मे झुझलाहट....आवेग उत्कंठाक अलावा दर्प के बोध् भेल। ‘बेटा, ब्याहक राति फरक रहैत छै कनियाँ वर काल्हि देवी, देवता क आराध्नाक बाद सोहागक थारी मे भोजन कऽ वर कनियॉ कोबर घर मे जाइत छै’ मां बड्ड मोलायम स्वर मे बजलथिन। ‘हम ई पूजा-पाठ के नहिमानेत छी सब पोंगापथी गप्प छै।’ हाल मे ससुर जीक संग आर दू चारि गोटे छलाह। नरेन्द्र दृढ़ता सॅ ठाढ़ छलाह। मने-मन सोचलहुँ ई केहन लोक दथि कुल देवताक पूजा सॅ पहिने.... बड़की पीसी किछ कहिथिन ताहि सॅ पहिने मां हुनका रूम मे लऽ गेलथिन। लग मे बैसल चचेरी ननदि हँसी मे बजलीह-‘यौ नरेन्द्र भैया, एको राति प्रतीक्षा नहिकऽ सकैत छी?’ ससुर जी लोक सभक संग नीचाँ चलि गेल छलाह। आ हम लाजे माथ झुकौने छलहुँ। ई केहन तमाशा शुरू कऽ देलनि ई हमरो बुझल अछि पहिल राति वर-कनियाँ संग नहिसूतैत छै। करेज ध्ुक-ध्ुक करैत छल कोनो अपशकुन ने भऽ जाए। नरेन्द्र ओहिना ठाढ़ छलाह तऽ सासुमां बड़की पीसी के हाथ। पकड़ि बाहर लऽ गेलथिन। बेटा के कहैत गेलथिन ‘बौआ ठीक छै जे अहॉक उचित बुझाए सेइ सही।’ ‘पहिने हिनका कपड़ा बदलाव दिऔन्ह अइ कपड़ा मे कोना आराम करतीह।’ सासु ध्ीरे सॅ हमरा कान मे कहलनि ‘चलू कपड़ा बदलि लिअ।’ निन्न आ थकनि सॅ सब औंघाएल छल बड़की पीसी सोफा पर बैसल छलीह तामस सॅ मुँह लाल लगैत छलैन्ह। हमरा सासु के देखकऽ बजलथिन ‘भाभी अइ घर क रीत नीत सब बदलि गेलै?’ हमरा कीकहैत छी ‘आब बौआ नेना नहिछथि।’ -तखनहु.........। हमर सासु रूकलैन्ह नहिएक तरहें हमरा घीचने बढ़ि गेलीह। सुहागराति मे हम बर्फ बनल छलहुँ-छब्बीस वर्षक युवक नरेन्द्र देह के नोंचैत-खंसोटैत रहलाह मुदा हमरा कोनो उछाह नहि। देहक एकटा स्वाद होइत छैक.............जेना झाग बला बीयर! हमरा उत्साह होइत कोना? हम तऽ डरें सूखल पात जकाँ थर-थर कँपैत छलहुँ। प्रत्येक पुरूष हमरा दंशित कयने छल। हम बेर बेर नरेन्द्र कें कहऽ चाहैत छलिए-‘हम कुमारि नहिछी... हमर तन-मन टूटल अछि ... अहॉ हमर सहचर छी.... हम सब बात साफ-साफ कहि देबऽ चाहैत छी-सभटा ईमानदारी पूर्वक। नरेन्द्र अहाँ पढ़ल-लिखल छी अमेरिका सॅ एमफ्रैं बीफ्रैं एफ्रैं कऽ के घुरलहुँ अछि, मुदा नहिओ एतेक अवसर कियेक दितथि बीस मिनट मे अपन भूख शान्त कऽ करोट फेर सूति रहलाह। हम थाकल, क्षुब्ध् पड़ल छलहुँ। औंघएल स्वर मे बजलाह-‘बत्ती बन्द कऽ दियौ रौशनी मे ऑखि.....। हम चुपचाप उठि कऽ बत्ती बंद कयलहुँ। बाथरूम मे जा कऽ बाथटब मे बैसलहुँ। मेंहदी लागल हाथ सॅ ऑखिक नोर पोछ लहुँ। फेर शावर खोलि देलिऐ बहुत काल धरि देह मलि-मालिकऽ नहाइत रहलहुँ। शीतल जल सॅ तन-मन कें राहत भेंटल। ई हमर जिनगीक प्रथम-मिलन छल जीवन संगीक संग। दू दिनक बाद हम सब हनीमून मनाब गेलहुँ। दहेज मे आयल समान खोलि कऽ देखलनि। बजलनि। किछ न×ि। अध्कितर समान बक्से मे रहलै। बक्सा बंद कऽ बॉक्स रूम मे राखि देलथिन। मां सॅ वेशी गहना कपड़ासासुर क देल छल। कीमती साड़ी, पश्मीनाक कश्मीरि शाल। हनिमूनक बाक्सा सासुए पैक कयलनि। रंग-बिरंगक ब्रा आ पैंटी। एक सॅ एक सुन्दर मॅहगा नाइटी, दू टा सूट आ दू टा साड़ी। संभवतः बेटाक स्वभाव बुझल छैन्ह मां कें। नरेन्द्र दस दिन क हनीमून के समय मे मात्रा दू-दिन बाहर घूमऽ गेलाह। नरेन्द्र कहियो हमर अतीत के विषय मे नहिजानऽ चाहलनि ने हमर पसन्द बूझऽ चाहलनि। भोजनक आंडरो दैत छलाह अपने इच्छा अनुसार। भोजन करैत काल पेट भरि गेला। पर पानि पीबि उठि जाइत छलाहटा इ हो नहिदेखैत छलाह जे हम एखन एको टो रोटी नहिखयलहुँ अछि। नरेन्द्रक वहशी भूख सॅ हम आंतकित छलहुँ दिनोदिन हुनकर सेक्सुअल भूख बढ़िते गेलैन्ह। रातिए मे नहिसंाझि दिन-दुपहर आ भोर बेर-कुबेर कखनहुँ। कतेक बेर पार्टी मे जयबा लेल तैयार होइत छलहुॅ कि घर घीच कऽ लऽ जाइत छलाह। ‘प्रिया.........एखन अहॉ बहुत सुन्दर लागि रहल छी पार्टी मे जे देखत तकरा लेर चुबऽ लगतै तऽ अपन वस्तुक पहिने अपने कियेक ने स्वादि ली।’ - ‘छिः नरेन्द्र एखन ई बेर छै?’ ‘ अहॉक मने तऽ कखनहु बेर नहिहोइ छै? आइ घरि कहिओ अहॉ के सेक्स के जरूरत भेल अछि?’ ‘नरेन्द्र हमरा एकर भूख नहिस्नेहक भूख अछि।’ ‘तऽ की बिना स्नेहकें हम अहांक पाछू पागल भेल छी?’ ‘मुदा स्नेह आ सेक्स मे फर्क होइत छै।’ ‘अहाँ अपन पिफलॉसपफी अपने लग राखू।’ ‘नरेन्द्र एक बेर हमर बात तऽ सुनू ............... मुदा के सुनत फेर चारू हाथ-पैर कसल बहशी उन्माद........! नरेन्द्र मे गजब छलनि। इएह पैशन गदहा-जकॉ राति-दिन खटबैत छलनि। टका, आर टका, जाहि दिन कोना सफल डील होइत छलनि तहिया भोजन काल कोनो विशेष वस्तुक फरमाइश करैत छलाह वा ऑपिफसे सँ पफोन कऽ दैत छलाह-‘भोजन बढ़िया बना कऽ राखब।’ आब बढ़ियाँ भोजनक अर्थ बूझि गेल छलहुँ तैं सोझे रसोई घर मे जा कऽ महराज जी कें कहि दैत छलिऐन्ह बा मां के कहैत छलिऐन्ह-मां सुनि कऽ हर्ष सॅ विभोर भऽ जाइत छलीह। मां-बेटा मे एकटा अजीब समानता छैन्ह। एके रंग संग्रही वृति आ भावनात्मक लगाव मे कमी। मम्मीक देखैत छलिऐन्ह दिन-राति शॉपिंग चूड़ी, मैचिंग चप्पल हुनका ड्रेसिंग रूम मे एक लाइन सॅ आलमारी छलैन्ह ओह मे कम से कम एक हजार साड़ी ब्लाउज, पेटीकोट आ रंग-बिरंगक चूड़ी, चप्पल के कतार लागल ततबे मेकअप के समान। ओना ओ वेशी काल हल्का लिपिस्टिक लगबैत छलीह मुदा राखल छलै सब रंगक लिपिस्टिक, बिन्दी। हमरा एहन संग्रही वृति सॅ विरोध् छल हम चीज वस्तु किनैत छलहुँ व्यवहारिक दृष्टिकोण सॅ। पहिने सासु टोकितो छलीह ‘प्रिया नीक साड़ी पहिरू ई की गर सुन्न, हाथ सुन्न... श्रृंगार तऽ सोहागिन क....। -मम्मी! हमरा जेवर पहिरनाई असुविध जनक लगै’छ आ भरि दिन कपड़ा बदलैत रहब समय के दुरूपयोग नहितऽ आर भी? हुनका हमर उतर नीक नहिलगलैन्हि-चेहराक भाव सँ बुझलहुँ। मां-बेटाक विपरीत स्वभाव छलैन्हि पापाक लम्बा छरहरा शरीर, गौर वर्ण, खादीक कुरता आ धेती मे सौभ्य व्यक्तित्व। अति मिलनसार, मृदु भाषी कहियो जोर सँ बजैत नहिसुनने छलहुँ। तखन बेटा एहन प्रचंड। नरेन्द्र के स्वर मे अनुरोध् क बदला आदेशक गर्जना रहैत छलनि। हुनका सोझा सब जी हजुर क मुद्रा ठाढ़ रहैत छलनि। दूध्क गिलास नेने नरेन्द्र के पाछू नेहोरा करैत छलीह - ‘बौआ दूध् पी लिअ।’ भऽ सकै’छ ओ एखनहुँ एहिना नेहोरा करैत होयतीह। बचपन सँ आइ धरि हुनकर जूताक पफीता बन्हैत छैन्ह नौकर। ऑपिफस सँ घुर ला पर ओ सोझे अपना रूम मे जाइत छथि। जूता पहिरने बिछाबन पर ओंघरा जाइत छथि कोट एक दिस पफेकल रहैत छै नौकर जूता खोलि, मोजा खोलैत छै फेर तौलिया पानि मे भिजाकऽ तरबा रगड़ि पावडर लगा दैत छैन्ह। नरेन्द्र एखनहुँ बदलल नहिहोएताह। ओ कहियो अपना हाथ मे ब्रीफकेश लऽ आपिफस लेल विदा नहिहोइत छलाह। रामू ब्रीफकेश नेने जाइत छलै गाड़ी मे ध्ऽ दैत छलै। मां के घर मे हम ककरो नौकर सॅ जूता पहिरैत देखने छलिऐ ने खोलैत। हमरा तैं अजीब लगैत छल। नरेन्द्र केश कटाबऽ लेल सेलून मे नहिजाइत छलाह । सेलून बला अबैत छलनि पेडिक्योर आ मेनिक्युर करऽ। पता नहिदिन मे कतेक बेर सेंट लगबैत छलाह। कपड़ा क आर्डर होइत छल तऽ एक बेर मे कम से कम एक दर्जन। हुनकर सबटा हिसाब-किताब रहैत छलनि पिफक्सड आ रिजिड। नाक क सोझ मे चल बला नरेन्द्र कें कखनौ बाम-दहिन देखबाक पलखति नहि। आब तऽ हम इ हो बुझि गेलिए जे ओ कखन कोना हाथ बढ़बैत अछि कतेक लग मे घिचै’छ आ कतेक काल हँपफैत रहै’छ। ध्न कमयबाक तरीको ओकर अपने ढंगक छलै मेहनत नहिकरैत छल। स्पेक्यूलेीशन....... गजब छलै सत्ते कुशाग्र बु(ि छै। माल स्टाक करब तखन वेशी सॅ वेशीकीमत मे बेचब। कहियो पेट्रोलियमक कोनो वस्तु कहियो केमिकल, कहियो स्टील तऽ कहियो दालि। कोनो तरहक वस्तुक स्टाक कऽ सकैत छल जँ दलाल ओकरा सॅ वेशी पाइ न असुलै। ओ हारनाइ जनिते नइ छल। जाहि दिन शेयर बाजार मे मंदी होइत छलै बस माइग्रेन के दौर शुरू भऽ जाइत छलै। घंटों माथ दबैंत रहैत छलिऐ तइओ आराम नहि। मम्मी जी दस बेर भोजन लेल आग्रह करथिन तऽ ‘ओह! मम्मी हमरा तंग नहिकरू एखन भोजन नहिकऽ सकब।’ ‘खा लिअ, बौआ! हमर बात राखऽ लेल एकोटा पफुलका खा लिअ नहितऽ हम राति भरि बेचैन रहब।’ शायद हमरा एसगर खाइत मम्मी के नीक नहिलगैत छलैन्ह मुदा ओ अपनो एसगरे खाइत छलीह। अजीब घर छै नास्ताक टेबुल के अलावा चारू सदस्य कहियो संग बैसकऽ भोजन नहिकरैत छथि। पापा सांझि मे चाह पी कऽ बहराइत छथि तऽ राति कऽ घर अबैत छथि। पहिने हम बुझैत छलिऐ जे पापा क्लब जाइत छथि ताश खेलऽ। तैं एकदिन मम्मी के कहने छलिऐन्ह-मम्मी पापा रोज ताश खेलऽ बाहर जाइत छथिन त कियेक नहिएकदिन घरे पर ताश पार्टीक आयोजन कयल जाए? एतबा सुनिते मांक सांस तीव्र गति सँचलऽ लगलैन्हि ओईठाम सँ उठैत बजलीह-‘अहीं पापा सॅ पूछि लेबैन्ह!’ सत्ते हम किछ नहिबूझने छलिऐ। मम्मीक अचानक एहन व्यवहार सॅ चिन्तित छलहुँ तऽ मोन पड़ल-सल्लोदीदी आ मां पफुसुर-पफुसुर बतिआइत छलीह-मां हुनका घर क वातावरण नीक नहिछै नरेन्द्र के पापा क एकटा बंगालिन सॅ सम्बंध् छैन्ह।’ ‘ताहि सॅ की कोनो घर मे रखने छथिन।’ ‘मां, ओइ बंगालिन के एकटा बेटियो छै।’ ‘सल्लो दू बच््याक मां भऽ गेलहुँ आ एखनहु ज्ञान नहिछौ। जैं किछ कमी छै तैं ने करोड़पति हमरा ओतऽ ब्याह करबा लेल तैयार भेल। आ लड़का मे कोनो कमी नहिछै एहन घर वर किन्नहु पार लगैत।’ हम सोचैत छलहुँ पाप जतऽ जाइत छथि आ आतेक राति क घुरैत छथि से की मम्मी के बूझल छनि? मुदा मां क चेहरा देखला सँ तऽ कनिको किछ नहिबुझना जाइछ एकदम सपाट कोनो व्यथाक लकीर नहिचेहरा पर। हँ, कहियोकाल नास्ताक टेबुल पर ऑखि लालटेस फूलल पल देखैत छिऐन्ह जेना राति मे कानल होथि। तखन पापा क स्वर आर मोलायम खुशामद करैत सुनैत छी आ मम्मी मात्रा हं, नहिमे उतारा दैत छथिन। कहियोक हमहीं पूछैत छिऐन्ह-मम्मी, मोन खराब अछि? ‘नहि, बेटी, हम एकदम नीके छी।’ ‘अहॉक ऑखि सूजल अछि?’ ओ हड़बड़ाक कहैत छथि सर्दी मे हमरा एना भऽ जाइत अछि।’ ‘पापा माथ झुकौने चाहक कप मे चम्मच सॅ चीनी मिलबैत रहैत छथि आ नेरेन्द्र क हिंसक ऑखि पापाक चेहरा पर चिपकल रहै’छ। लगै’छ टहलैत-टहलैत हम बहुत दूर आबि गेलहुँ अछि। एकदम खुजल आकाश आ चमकैत पहाड़। एक दिस उगैत सूर्य आ दूर क्षितिज पर दोसर दिस मेघ खंड। गर्मी महसूस होइछ कोट खोलिक हाथ मे राखि लेलहुँ। दुपटाð सॅ मुँह-कान पोछलहुँ। आब कतेक चलब? घुरऽ चाही। होटल पहँुचैत-पहुँचैत साढ़े बारह बाजि गेलै। भूख लागल छल कियेक ने भोजन कऽ ऊपर जाइ। मुदा एखन स्नानो नहिकयने छी। खैर, कोनो बात नहिबाद मे स्नान कऽ लेब। भोजन करैत काल जर्मन दम्पति पर नजरि पड़ल। जोसेफ कखन पॉछा मे आबि कऽ ठाढ़ भेल बुझबे नहिके लिऐ। -‘मैडम।’ हम चौंकलहुँ। -‘अहाँ जर्मन जनैत छी?’ ‘नहि।’ ‘आ, ओ लोकनि अंग्रेजी नहिजनैत छथि नहितऽ अहा सॅ अवश्य गप्प करितथि।’ हमरा खुशी होइत। नीक लोक बुझाइत छथि। -‘हँ, बड्ड नीक लोक छथि। प्रत्येक वर्ष पन्द्रह-बीस दिन एतऽ रहैत छथि।’ ‘कहिया सॅ आबि रहल छथि।’ ‘पछिला दस वर्ष्ज्ञ सॅ। मैडम अहाँ स्ट्राबेरी सूफले लेब? एकदम फूल-सन हल्लुक बनलैए, मुँह मे रखिते गलि जाएत।’ ‘जोेसेफ बुझाइत अछि अहाँकें मीठ बहुत पसंद अछि।’ - ‘मुदा हमरा बुढ़िया खाय ने दैत अछि।’ - ‘से कियेक?’ ‘हमरा बाप केँ डाइबिटीज छै ओकरा छै हमरो भजेतै। ‘अहाँक बहुत मानैत छथि। अहाँ कें बाल-बच््याक अछि की नहि?’ ‘इएह तऽ दुःख अछि। बच््या नहिअछि हम सोपफीक बिग बेबी छी।’ हम दूनू खूब हँसलहुँ। जर्मन दम्पत्ति हमरा विश कयलनि हम अंग्रेजी मे उतारा देलिएन्ह। आब हमरा दूनूक बीच जोसेफ दुभाषिया बनि गेल छल। हुनका हमर कुरताक कढ़ाई बड्ड नीक लगलैन्ह। फेर पुछलनि हम की लिख रहल छी कोन भाषा मे लिख रहल छी। सुफला आनऽ जोसेफ गेल त हमरा सभके हँसी लागल कियेक तऽ गप्पक पुल बनल छल। अपना रूम मे जा कऽ परि रहलहुँ तुरत भोजन कऽ स्नान कोना करब। कखन ऑखि मुना गेल नहिबुझलिऐ। ऑखि खुजल तऽ चारि बाजि रहल छलै। उठिकऽ बालकनी मे अयलहुँ। दूर-दूर धरि समुद्रक अथाह पानि आ कछेड़ मे पाथर....... कुर्सी घिच कऽ ओहिठाम बैसि गेलहुँ। एहिना हम बच््या मे बालकनी मे बैसैत छलहुँ। ओत ऽत गोरैया रहैत छल कोन चिड़ैंक चूनल जाए ? आ चुनाव सॅ हमर चिड़ै भेंट जाएत? भऽ सकै’छ भेंट जाए’ मुदा हम अपन भविष्यक चुनाव कऽ सकैत छी? ............ व्यवस्था जतऽ सुरक्षा दैत छै ओतऽ दमघोंटु वातावरण। तथापि शुरू मे हम सहज रूपें सभटा स्वीकारने छलहुँ। नरेन्द्र के पाछू लागल रहैत छलथिन मम्मी जी। अपन सुपुत्राक प्रत्येक श्वास गनैत रहैत छलीह आ चाहैत छलीह हमहूँ हुनके जकॉ नरेन्द्रक आगॉ-पाछॉ डोलैत रहि-बहुत दिन धरि हम ओहिना करैत छलहुँ। तऽ हमरा महसूस भेल जे नरेन्द्र हमरा अपन पत्नी सॅ वेशी सेक्रेटरी आ नौकरानी बुझैत छथि। नरेन्द्र कखनहुँ कहैत छलाह ‘प्रिया अइ नम्बर सभ पर पफोन मिलाउ तऽ कखनहु आर्डर दैत छलाह-‘ई पार्टीक लिस्ट छै हिनका सभके समय पर कार्ड भेंट जाए चाही। आ सुनू काल्हि हमरा पार्टीक मेनूक लिस्ट बनाक ऽदऽ देब।’ हम घंटो मेनू लेल माथापच््यी करैत छलहुँ फेर कहियो कोनो कैटरर सॅ तऽ कहियो कोनो कैटरर सॅ बात करैत छलहुँ। सभटा एवन होइबाक चाही। हं लगातार पाँच वर्ष धरि हम एकदम जुटल रहैत छलहुँ तऽ पार्टी एवन होइतो छलै। मरि-मरि कऽ सभटा ओरियान करैत छलहुँ फूल सजेनाई हरदम मेज पर नव क्रॉकरी। एपल पाई सूफले कतऽ के नीक टार्ट बनबैत अछि से तकैत अपस्यॉत रहैत छलहुँ। सब खेप नव-नव डिश लेल तबाह रहैत छलहुँ। दिन पक्का सोलह घंटा मेहनत। प्रात भऽ सब बर्तन के साफ करबेनाई, लॉन साफ करेनाई खर्च क हिसाब किताब। हमरा सॅ वेशी मम्मीजी के पार्टी क उत्साह रहैत छलनि हँ, हुनकर बड्ड सहारा भेंटैत छल। मुदा पापा लेखे ध्न्न सन्न ओ चुपचाप कोनो कात मे ठाढ़ रहैत छलाह एकदम निरपेक्ष जेना ओइठाम रहितो ओतऽ नहिहोथि। वेशी काल तऽ गेस्टके अबिते नहुँ-नहु ओतऽ सॅ विदा भऽ जाइत छलाह। दोसर दिन फेर देखैत छलिऐन्ह मम्मी जीक मुरझाएल मुंह फूलल लाल ऑखि। सफाई दैत छलीह पार्टीक थकनि सॅ एना लगै’छ। पार्टी क दिन मात्रा घर क सजावट आ लॉन मे मेज सजौनाईए नहिअपनो सजऽ पड़ैत छल। आर्डर दैत छलाह-‘प्रिया पिफरोजी प्रेंफच शिपफॉन पहिरब जे अइबेर हम पेरिस सॅ अनने छलहुँ ओकर संग पिफरोजी सेट पहिरब। लोक देखै हमर श्रीमतीक शान-शौकतं’ नीचाँ उतरैत-उतरैत फेर सवाल-‘इ की अहॉ कार्टियरबला घड़ी नहिपहिरलहुज? अंचार बनाएब रंग-बिरंगक घड़ी रहैत एहन पहिर लेलहुँ! कतेक बेर कहलहु कनि नीक जकां मेकअप करू कनि स्टाइल सॅ रहू बस पोनीटेल कऽ लैत छी? ‘हम मने-मन क्षुब्ध् होइत छलहुँ।’ आ पार्टी मे बहुत गर्व सॅ नरेन्द्र बैंकक चेयर मैन सँ हमर परिचय मे कहैत छलाह-दर्शन मे पीफ्रैं एचफ्रैं डीफ्रैं छथि। प्रिया इम्हर आउ ई छथि जस्टिस बनर्जी, मिस्टर कौल, ई छथि हमर पत्नी आ अहॉ कलक्टर कस्टम्स। प्रिया-ई छथि शंकर भाई पापाक खास दोस्त। आ हमर अखरल छल-शंकर भैयाक भेदैत नजरि बुझू जे साड़ी क भीतरी शरीर धरि पहुँचल होमय। एहिना ई फलां छथि ओ फलां छथि....... ई सब शुरूह मे भेलै। सब दिन पार्टी हंगाम राति मे देह चूर-चूर लगैत छल। मन मे होइत छल की एहिना हमर जिनगी बीतत? मारवाड़ीक दू अढ़ाई सौ करोड़पति खान दान सब पार्टी मे वएह चेहरा हुनके बीच घूमनाई। कला-मंदिर जाइ तखनो वएह लोक। क्लब जाइ तऽ एकहिटा रटल रटाओल शब्द-अहॉ कोना छी?.... नीकें छी, कुशल-क्षेम......बहुत बढ़ियाँ........ फेर क्यो भेंटल त वएह शब्द दोहराउ। सब परिचित मुदा क्यो मित्रा नहिबनल। नरेन्द्र के परिचितक परिध् िछल गुलरके फल जाहि मे असंख्य बीज रहैत छै। आब हम अइ सब सॅ ऊबऽ लागल छलहुँ। बात-बात मे चिड़चिड़ापन। दाई नौकर पर बजैत छलहुँ। ऊबि गेल छलहुँ बैंकाक सॅ मंगाएल पपीता, लीचू, कीवीआ आ अमरूद सॅ। बम्बई सॅ आयल अलपफांसो आम आ स्टाªेरीक सूफले सॅ। स्काईरूम सॅ अबैत छल एपल स्टूडल, चितरंजन मिष्ठान भंडार सॅ रसगुल्ला आ मोहन भोग, नूतन बाजार सॅ संदेश कौलेज स्ट्रीट सॅ कांचा गोला, शमकि केशरिया राबड़ी.... ऊँ हूॅ आब नहि। जिनगी भरि खाउ आ खुआउए टेबुल सजाए घर सॅ लान धरि सजाउ, बर्त्तन बाहर कराउ फेर रखबाउ एकहिटा रूटिन बड्ड नीरस लगैत छल। ..... ई गृहस्थीक झमेला कहियो एकऽ वला नहि। कीएकरे संसार-सागर कहल जाइत छै? ई रिपीटेशन ........ सबटा ओहने कहियो कोनो बदलाव नहि। विवाहक डेढ़ साल बाद संजुक जन्म भेलै। हमरा मांक स्थिति दिनो-दिन खराबे भेल गेलैन्ह। सास-ससुरक उदारता फेर देखलिए। अपने एक लाखक समान बंटलनि। ससुर जी लग फेर गाड़ी मे भैया मिमिआइत बजलाह-‘शाह जी हम तऽ अपनेक एहसान कहियो नहिचुका सकब।’ ससुरजी फेर दोहरा देलथिन ‘विजय बाबू आब अहांक इज्श्त हमरो इज्श्त अछि।’ राति मे मम्मी जी चारिटा थारी मे फल आ मिठाई सजौलनि एकटा कीमती साड़ी आ ग्यारह सौ टाका एकटा लिफाफ मे ध्ऽ पुरनका ड्राइवर राम सिंह के पफुसपफुसाक किछ कहलथिन। हम एतबे सुनलिए जे ‘राम सिंह देखब नरेन्द्र बाबू नहिबुझथि।’ आइ पहिल बेर हम मम्मी जी सॅ पूछलिऐन्ह-‘मम्मी जॅ ओ बुझिए जेथिन तऽ की हेतै? आ हुनका सॅ नुका कऽ कियेक पठबैत छिऐ?’ ‘हम की करू। बाप बेटाक लड़ाई मे हमहीं पिसाइत छी। नहिपठेबै तऽ ओ मुँह पफुला लेता आ नरेन्द्र के कान मे ई खबरि जेतै तऽ घर मे महाभारत मचि जेतै।’ हम मम्मी जी क बु(िमत्ताक लोहा मानि लेलहुँ। अपना स्वत्व लेल हमर सासु कुटनीति सॅ काज लैत छथि। जे बात अपने नहिकहऽ चाहैत छथिन से बात नरेन्द्र सॅ कहबा दैत छथिन। तैं बेटो वश मे छैन्ह आ पति दूनू। हम डेढ़ मास क बाद पहिलबेर संजुके लऽ कऽ नैहर गेल छलहुँ तऽ घुरती काल राम सिंह के कहने छलिऐ-राम सिंह! कनि कारनानी स्टेट्स चलब।’ ओ कहलक..... मुदा छोटा साहब? ‘ओ नहिबुझताह।’ हं, तऽ पापाक दोसर पत्नी के हम पहिल बेर देखलिएन्ह। मुन्ना के करेज सॅ सटा लेलैन्ह हुनकर ऑखि डबडबा गेलैन्ह। पचास वर्षक अई प्रौढ़ाक पैर छुवि प्रणाम कयलिऐन्ह मुदा पफुराइत नहिछल की कहि हुनका सम्बोध्ति करिऐन्ह? फेर अनायास हमरा मुँह सँ ‘छोटकी मां’ बहराएल। ओ भरि पॉज घऽ अपना हाथक सोनाक मोटका कंगन निकालि कऽ पहिरा देलैन्ह’ ‘छोटकी मां! ई जरूरी छै?’ ‘हं, बहुत जरूरी छै पहिल बेर अहांक मूंह देखलहुँ अछि। ब्याह मे नहिजा सकलहुँ। नीना बड्ड कनैत छलीह मुदा समाज मे ककर-ककर मूँह बन्द कयल जा सकै’छ?’ ‘एखन कत छथि नीना?’ ‘अबिते हेतै। अहां के देख कऽ बड्ड खुश हेतै।’ ‘कतेक टा छथिन ?’ ‘उन्नीसम वर्ष छैक।’ मन भेल जे पूछिऐन्ह-‘अहाँ अइ जीवन सॅ असंतुष्ट होउब! नीनाक भविष्य लऽ चिन्तित रहैत हेवई?’ यद्यपि ओ पापाक नामक सिन्दुर लगबैत छथि। गला मे मंगलसूत्रा पहिरने छथि। मुदा ओ मम्मी जी क स्थान नहिपाबि सकैत छथि। मोन पड़ल विवाहक समय मांक रोषपूर्ण स्वर- ‘बौआ विजय, शाहजी के एकटा बात फरीछाक कहि दहुन जे बरियात मे अपन दोसर पत्नी के नहिआनथि। लोक दुर छी दुर छी करत ककर-ककर मूँह बन्न करबै दस लोक दस मुँह बाजत जे समध् िरखैल रखने छथिं’ डेराइत-डेेराइत सल्लो दीदी पूछने छलथिन जे रखैल ककरा कहैत छै तऽ बड़की दीदी कहलथिन जकरा सॅ विवाह बिना कयने सम्बन्ध् रहैत छै आ भरण-पोषण करैत छै तकरे उप पत्नी वा रक्षिता रखैल कहैत छै।’ तऽ हम एहि सासुक शान्त-स्निग्ध चेहरा देख रहल छलहुँ। अहू उमर मे भव्य लगैत छथि सोना सन दमकैत रंग-रूप। के कहतै एहन पवित्रा व्यक्तित्व क स्वामिनी के कलंकनि? छोटी मां के मुँहे सुनलहुँ जे हुनकर पिता कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसि( बैरिस्टर छलथिन। हमर ससुर तहिया बैरिस्टर शुभेन्दु सेन ओतऽ मवक्किल के रूप मे जाइत-अवैत छलाह। तखने दोस्ती भेलैन्ह। पापाक उम्र तखन लगभग चालिस वर्ष छलैन्ह। आ छोटी मां एक्कैस वर्षक नव युवती। लॉरेटो कॉलेज सँ अंग्रेजी मे बीफ्रैं एफ्रैं आर्नस। पापा बैरिस्टर सेन के परिवारक सदस्य जकॉ निर्धेख जाइत अबैत छलाह। बैरिस्टर साहेब कें एकटा बैटा छलनि जे बार एटलॉ करबा लेल लंदन गेल छलैनह से ओतहि बैसि गेलैन्ह। पापा संग मम्मी जी जाइत छलथिन। छोटी मां शुरूहे सँ हुनका दीदी कहैत छलथिन। पापा, मम्मी आ छोटी मां जकर नाम छलैन्ह तिलोत्तमा संग प्रेम प्रसंग बढ़बैत रहलाह। मम्मी जाबत बुझलथिन ताबत बात बहुत आगाँ बढ़ि चुकल छलै। छोटी मां क पापा क्रो( मे हुनका घर से भगा देलथिन। पापा कालीघाट जा कऽ छोटी मां सॅ विवाह कऽ लेलैन्ह। कानून मानै या नहिमानै मुदा साक्षी छलैन्ह र्ध्म मां काली। बिना कोनो शर्तक पापा लेल मौन स्वीकृति छलैन्ह एकोन्मुखी अग्नि जकाँ अहर्निस जरैत रहब। हं, नैहर सॅ नाता टूटि गेल छलैन्ह सब दिन लेल नैहर सॅ क्यो अबैत छलैन्ह ने छोटी मां कहियो नैहर गेलीह। नीना अपन नानाक मुँहो नहिदेखलैन्ह। बाबा हमरा माफ नहिकयलनि हम हुनका लेल कलंक छलहुँ। अइ घटनाक बाद पापा बैरिस्टर समाज मे कहियो माथ उठा क नहिचललाह......... छोटी मां अपन अतीतक कथा सुना रहल छलीह। औरत क जिनगी विचित्रा होइत छैक कनि खरोंचि दिऔ कि दुःख-दर्द, व्यथा-पीड़ा आ त्रासदीक क बहैत समुद्र देखब। नीना कें देखिते नैन जुड़ा गेल मन प्रसन्न भेल। उन्नीस वर्षक नवयुवती एकहरा देह नाम, कारी-कारी लम्बा केश, पैद्य-पैद्य ऑखि ठोर लाल पापा सन पातर, घूरी सन नाक। ‘नीना.....।’ हम शोर पाड़लिऐन्ह। ‘भाभी!’ कहि ओ गर ध्ऽ लपटि गेलीह। ‘भाभी ब्याहक बाद अहाँ आर सुन्दर भऽ गेलहुँ।’ ‘ब्याह सॅ पहिने अहॉ हमरा देखने छलहुँ?’ ‘हँ, ब्याहे दिन। हम सब सॅ नुका कऽ गेल छलहुँ। ककरो पता नहिलगलै ने पापा के ने मम्मी के, ने आर क्यो बुझि पाओल। हमरा आन्तरिक इच्छा छल भैया-भाभी केहन लगैत छथि से देखी।’ हमर ऑखि नोरा गेल। केहन निष्ठुर छै इ। दुनियाँ एहन मौसुम बच््यीक संग एतेक निष्ठुरता। हम एकटक नीनाक मुँह देख रहल छलहुँ। एकटा अपूर्व चमक छलै नीनाक चेहरा मे। पैघ-पैघ आकर्षक ऑखि, पातर-सुगबा नाक बंगालक नजाकत आ राजस्थानक कद-काठी। लॉरेटो मे बचपन सॅ एखनधरि अध्ययनरत अइ लड़की मे रचल-बसल छलै खुलापन। कनिको कुठा नहि। सहज-सरल ढंग सॅ बात करऽ बाली। आगां की करऽ चाही, की नहिसे नीक जकाँ बुझैत छथि। ‘भाभी, पापा चाहैत छथि हमर ब्याह आब भऽ जाए चाही। मुदा हम से नहिहोमऽ देबै। हम पहिने अपना पैर पर ठाढ़ होएब।’ ‘पहिने अहाँ एमफ्रैंएफ्रैं करऽ आवश्यक नहिछै। हम काल्हिए ग्रैंड होटल मे इंटरव्यू दऽ कऽ अएलहुँ अछि। बुझाइत अछि नौकरी भेंट जाएत। ‘इ नौकरी पापा पसंद करता?’ ‘भाभी सब बात मे हुनकर इच्छा-अनिच्छाक ध्यान देब आवश्यक छैक? भाभी हम नीक जकां जनैत छी-जे हम पापाक नजायज संतान छी। मां भनहिं पापाक नामक लाल सिन्दुर लगाबथु मुदा ओइ लाल रंग मे करिखा लेभरल छै।’ ‘नीना मन मे एतेक कड़बाहट रखने अपने नुकसान हेत’ ने।’ ‘नहिहम से नहिमानैत छी। जीवित रहबा लेल आ अपन स्वत्त्वक लड़ाई लड़बा लेल आवश्यक छै जे अपन अपमान आ वंचना के सदति काल याद राखी। हमरा नीक नहिलगै’छ जँ क्यो सिखबैत अछि जे चुप रहू।’ ‘ठीक छै। मुदा अइ सॅ अहा दुखी नहिरहैत छी?’ ‘हं दुखी छी तैँ चाहैत छी सुख अर्जित करऽ। स्वाब लम्बी महिला केँ क्यो निरादर नहिकऽ पबैत छै। सच कहैत छी भाभी पापा जे मासे मास टका पठबैत छथि ताहि सॅ हमरा घृणा होइत अछि। पापा सन डेरबुक व्यक्ति सॅ हमरा घोर घृणा अछि।’ ताबत चाभीक गुच्छाक स्वर सुनलहुँ। छोटी मां ट्रे मे चाह-नास्ता लऽ कऽ आबि गेल छलीह। हुनकर पति-भक्ति, उदार-हृदय, सहज-समर्पण आ बहिर गाय जका स्थिति सॅ मूक समझौता हमरा मन मे कतेको प्रश्न चिन्ह..। सीढ़ी पर उतरैत काल ओ नहु-नहु बेटी प्रिया अहाँ अयलहुँ से क्यो बूझए नहिखासकऽ अहांक मां आ दीदी। मुदा हम चाहैत छी जे फेर मौका पाबि अहॉ अइठाम आउ।’ पता नहिछोटीमांक स्नेह-सिक्त व्यवहार मे कोन एहन जादू छलनि जे हम हुनका करेज मे मुँह सटा कानऽ लगलहुँ। हुनका करेज मे सटिते हमरा दाई मां मोन पड़ल। आ तकरबाद मोन बड्ड हल्लुक भऽ गेल। पापा, आब हमरा प्रति कृतज्ञ रहै छथि। आ हमरो मन के शान्ति भेंटैत अछि छोटकी मांक घर गेला सॅ। आ नीना तऽ हमर अन्तरंग सखी, बहिन सब किछु छथि। हम सदतिकाल सोचैत रहैत छी नीनाक विषय मे। एहन होनहार लड़की छथि केहन हेतैन्ह हिनकर भविष्य? मां-बापक कलंक? बीच-बीच मे हम सँजुकें पठा दैत छलिऐ छोटकी मां लग। एक दिन की भेलै जे भोजनक मेज पर बैसल ओ बक बक कऽ रहल छलै-‘हम नीना पीसी कें कहलिऐन्ह जे जाबत अहाँ हमरा संग लूडो नहिखेलब हम कहियो.....।’ हमर सासु गरजैत पूछलथिन-कोन नीना पीसी? सँजु तऽ नेना अछि हम जाबत किछ कहितियै ताहि सॅ पहिने सॅजु बाजि देलकै। ‘ओ जे हमर सभक दोसर घर अछि.. जत छोटकी दादी मां छथिन..हमरा खूब मानैत छथि....।’ हमर सासुक चेहरा क्रो( आ अपमान सॅ लाल भऽ गेलैन्ह। आ नरेन्द्र त बुझू जे जेना फूस मे चिनगी सॅ ध्ध्कि उठैत छै तहिना छऽ छऽ कऽ लगलाह। ‘संजु कें लऽ कऽ के छलै ओतऽ ? पापा अहाँ ??’ ‘व्यथा आ अपमान सॅ पापाक चेहरा स्याह भऽ गेलैन्ह। हमरा नहिरहि भेल तऽ कहलिऐ-‘हम पठौने छलिए।’ ‘कियेक आ ककरा आर्डर सॅ?’ नरेन्द्रके क्रो(क ज्वाला बढ़ले जा रहल छलै। अपना घर मे अपने दादी आ पीसी लग जयबाक लेल संजु के आर्डर लेबऽ पड़तै?’ ‘की बकबक कऽ रहल छी। बिना सोचने-विचारने जे मन होइ ए से करैत छी आ बजैत छी।’ ‘हम गलत कतऽ छी? की चुटकी भरि सिन्दुर सॅ क्यो पत्नीक हक पाबि लैत छै? आ बीस वर्ष धरि बिना सात पफेरा लेने जे सम्बन्ध् कें जीबैत छै से नकारल जेतै?’ ‘ओ रखैल छै......मिस्ट्रेस......हमर मां नहि।’ घृणा सॅ हमरा तन-मन मे आगि लागि गेल। आइ पहिल बेर देखलिऐन्ह सासुके निष्क्रिय चेहरा पर परमतृप्तिक भाव। पापा उठिकऽ चलि गेल छलाह। सुनू प्रिया। ‘आब कहियो संजू ओतऽ नहिजेतै’ ई नरेन्द्रक रोषपूर्ण फरमान छल। ‘तऽ अहूँ सुनि लिअ, हम ओतऽ जेबै आ हमरा संग संजुओ जेतै ओ मात्रा अहीं के बेटा नहिअछि ओकरा पर हमरो हक अछि। छीः अहाँ सभ के तऽ ने दया अछि ने ममता। इंसानियत ककरा कहैत छै से संवेदनहीन व्यक्ति कोना बुझतै? पापा ककरा भरोसे चलि पिफर रहल छथि?’ ‘प्रिया! हम कहैत छी चुप्प रहू।’ ‘नहि, आब हम चुप्प नहिरहब। नीना हमर ननदि छथि, संजुक पीसी, अइ घरक बेटी।’ ‘तड़ाक! सँ एक थापड़ दहिना गाल पर पड़ल। हम हतप्रभ भेल चालीस वर्षक नबालिग पुरूष के देखते रहि गेलहुँ। एहिना, एक दिन एकटा पुरूष कहने छल, ‘बेवकूफ लड़की के कहने छल हम अहाँ से ब्याह करब?’ हां, हं, एहिना...... की एहिना हमरा संग होइत रहत? हम नोराएल ऑखिए सासु दिस तकलहुँ ओ गुम्म भेल माटिक मूरूत जकाँ बैसल छलीह। शून्य, प्रतिक्रिया विहीन गोर चिक्कन चुनमुन..... नाक मे हीरा क लौंग चमकैत छलैन्ह। माथ पर लाल बिन्दी मांग मे सिन्दुर। सुहागिन.....पत्नी......जायज संतान! छीः औरत लेल ई समाज केहन निर्मम छै? आ एहि समाजक निर्माण करऽ बला पुरूष केहन कायर? सत्ते नरेन्द्र संवेदन शून्य पुरूष अछि। ओ मात्रा टका, नीक भोजन आ सेक्स जनै’छ। हमरा अपना चारूभर सभटा ओझराएल सन लगैत छल।...... गाल पर थापड़, सासुके चुप चाप तकैत रहब, पापाक उठि कऽ बाहर जायब आ सबसॅ वेशी अखरैत छल अपन कर्पूर जकां विद्रोह मे ध्ध्कब आ तुरत नोर बहाकऽ शान्त भऽ जायब। अपन अइ प्रवृति कें हम कखनहुँ दया, कखनहुँ उपेक्षा आ कखनहुँ किछ आर विशेषण दैत छलहुँ । अपन अइ खंडित व्यक्तित्वक परिसीमा सॅ परिचित छलहुँ। नरेन्द्र के छोड़ि नहिसकैत छी। कारण-सुरक्षाक भाव? व्यवस्थाक स्वीकृति? अपने सॅ प्रश्न पूछैत छलहुँ-‘सच,सच कहू प्रिया! अई घुप्प अन्हार गुफा सॅ कहिया बाहर निकलब? एकटा मन कहैत छल सब चुपचाप रहैत रहू। मुदा कतेक दिन की सब सहैत रहब-गारि-बात, मारिपीट आ अन्तहीन शोषण क समर्थन करैत घरक लोक के उपदेीश सुनैत रहू?’ किछ नहिपफुराएल तऽ आलमारी खोलि अपन दू-चारि टा साड़ी लेलहुँ आ पर्स मे एक हजार टका पैर मे चप्पल पहिर सीढ़ी सॅ उतरलहुँ। हमर मन हमरे पर हँसैत छल-वाह! मिसेज प्रिया अग्रवाल, इ कोन पिफल्मक दृश्य छैं?’ ‘हाथ दहिना गाल पर अनायास गेल अहिठाम थापड़ मारने छल नरेन्द्र। तारा सिंह के कहलिए गाड़ी गेट पर आनऽ। ‘मां के घर जयबाक अछि।’ नैहर पहुँचलहुँ। मां लग जा कऽ चुपचाप गद्दा, पर बैसलहुँ। मां कुशल-क्षेम पूछलैन्ह । भाभी पूछलैन्ह ‘की लेब चाह की शर्बत?’ ‘हम, हम..... एतऽ रहऽ आयल छी।’ बजैत-बजैत स्वर खड़खड़ा गेल। हं तऽ रह ने। नैहर मे लोक रहैत नहिछै। हम तऽ कतेक बेर कहलिऔं किछ दिन एतऽ रहऽ।’ नहि, मां! हम आब ओत नहिजयबैऽ। हम नरेन्द्र सॅ तलाक लेबऽ चाहैत छी।’ ‘की बक-बक कऽ रहल छेँ?’ मां जी, बुझाइत अछि प्रिया जी कें नरेन्द्र बाबू सॅ झगड़ा भेलैन्ह अछि। आपस मे ककरा झगड़ा नहिहोइत छै। सब ठीक भऽ जेतै। अहाँ चिन्ता नहिकरू।’ भाभी बजने छलीह। ‘भाभी, हम सत्ते सीरियस छी। अहाँ मां के समझा दिऔ ............. हमरा ओइ नरक मे कियेक पठौलैन्ह? ‘हमरा ओ की बुझौतीह आ तू की कहबें? तोहर केहन स्वभाव छौ से हम नहिजनैत छिऔ। ब्याहक बाद तऽ आर बिगड़िए गेलौ बोली-वाणी।’ अच्छा, प्रिया जी एखन अहाँ चलू हमरा रूम मे आराम करू फेर गप्प-सप्प् हेतै। हं एकटा बात कहैत छ जे आब अहाँ कें मुन्नाक ध्यान मे राखिकऽ किछ बात-व्यवहार करऽ चाही। दस वर्षक भऽ गेल, दस वर्षक बाद पुतौहु घर आयत।’ प्रिया! तू जनम लेने तहिए सॅ हमरा दुःख दैत रहलें। हमरा आर बेटा-पुतौहु अछि मुदा ककरो एहन कड़ा स्वभाव नहिछै। सरोज डाक्टरद छै। मुदा कहियो कमल बाबू कें शिकायतक मौका नहिदैत छैन्ह। सुन-हम अइ घर सॅ विदा कऽ देलिऔ आब तोहर घर छौ ओतऽ। एखन हिं तोहर सासुक पफोन आयल छलौ। बेचारी कनैत-कनैत कहलनि। ‘समध्नि! आब हमर इज्श्त अहींक हाथ मे अछि। अहाँ जनैते छिऐ-‘नरेन्द्रक स्वभाव क्रोध्ी छै मुदा प्रियो चुप्प नहिरहैत छथि।’ ‘ओह! तऽ एतबे काल मे ओ अहाँ कं पफोनोकऽ देलैन्ह?’ ‘तऽ बेचारी कोन अघलाह कयलनि बेचारी गाय छथि आनठाम कतहु ब्याह होइतौ तऽ पता चलितौ।’ ‘प्रिया छोड़ू इसभ बात। मियाँ-बीबी मे झगड़ा होइते रहैत छै। अहाँक भैया क बोली कड़ा नहिछैन्ह?’ हम उठिकऽ भाभी क संग हुनका रूम मे गेलहुँ। जाइत-जाइत सुनलहुँ मां बजैत छलीह-‘प्रियाके समझा-बुझा कऽ पठा दिऔ काल्हि अहाँ सभक बेटीक ब्याह कोना हेत? कहै छै तलाक लऽ लेब एहनो बात क्यो बजैंछ कुल मयार्दा किछ नहिबुझैत छै। हम भाभीक बिछावन पर बैसते छलहुँकी नरेन्द्र के पफोन आयल-‘हम आबि रहल छी।’ दूनू भाभी मंद-मंद मुसुका रहल छलीह। छोटकी भाभी झट रसोई घर गेलीह। नरेन्द्र अयलाह। हमरा देखते ‘अपन कान पकड़ैत छी....उठठू चलू। हम मंत्रा-मुग्ध् भेल नरेन्द्र संग विदा भेलहुँ।’ घर अयलहुँ। सासु सोफा पर बैसल छलीह संजु कोरा मे बैसल-छ लैन्ह। संजु के देख कऽ हमरा करेज फाटि गेल बुक्का फाड़ि कनलहुँ। हम एखन फेर अपनाके डरल सहमल, व्यवस्थाक क सुरक्षा तकैत नीरीह लड़की जकां देखलहुँ। आब हमरा अपन निर्णय बचपना बुझाइत छल। पलंग पर पड़ल छलहुँ ऑखि सॅ नोर टघरैत छल। नरेन्द्र आबि कऽ भरि पॉज छऽ नोर पोछैत बजलाह-‘प्रिया हम तऽ क्रो(ी छिहे अहूँ के बजैत काल होश नहिरहैत अछि जे मन मे होइए बाजि दैत छी।’ अपना दिस घुमबैत बजलाह हे, हमरा ऑखि मे देखिऔ हम अहाँके कतेक मानैत छी। अहाँ केँ हमर शपथ फेर कहियो एहन डेग नहिउठायब। हमर नोर देख ओ करेज सॅ सटा लेलैन्ह एना बताहि जकाँ कियेक कनैत छी। मारू अहूॅ हमरा थापड़ मारू। फेर हमरा चूमऽ लगलाह-हम नहिजानि कोना सम्पूर्ण समर्पण-घबरा कऽ केवाड़ दिस तकलहुँ त हँसैत बजलाह-घबराउ जुनि केवाड़ बन्द छै।’ ओइ दिन पापा कहने छलाह-‘बेटी! प्रिया अहाँ पढ़ल-लिखल छी।’ ‘नरेन्द्रो तऽ पढ़ल-लिखल छथि पापा।’ डिग्री सॅ की होइत छै जकर जेहन मानस भूमि तकर तेहन सोच। अहाँ संवेदनशील छी। तैं हम अहाँ कें कहि रहल छी। हमरा लेल अहॉ अपन जीवन के नरक नहिबनाउ। अहॉक दुगर्ति हमरा नहिबर्दाश्त हेत। अपन अपराध्क सजा हम अपने भोगब। हम जनैत छी नरेन्द्र हमरा कहियो माफ नहिकरत! कनि रूकि कऽ फेर बजलाह इ हमर त्रिकोण अछि, अइ मे अहॉ नहिओझराउ। आ संजुके ओतऽ नहिजाए दिऔ।’ हमरा मोन मे कतेको प्रश्न घुड़िआइत छल-बहुत किछ पापा के कहबाक छल बहुत प्रश्न क उत्तर सुनाबक छल। बेर-बेर मन मे होइत छल पापा सॅ पूछिऐन्ह की छोटी मांक प्रति हुनकर कोनो दायित्व नहिछैन्ह? हिनका बाद छोटी मांक देखरेख के करतैन्ह? नीना हिनकर बेटी नहिछैन्ह.......ओ कतेक दिन धरि नजायज संतानक संताप सहैत रहतीह........?’ मुदा हम किछ नहिपूछलिऐन्ह । पापा उठि कऽ चलि गेलाह। हुनकर झुकल कान्ह जेना आओर झुकि गेलैन्ह। ध्ीरे-ध्ीरे दिन ढ़रल। गाछ बिरीछ केर नमरल छॉही अपन बेचैनी हवा मे मिझरा रहल छल। वातावरण मे नीरस शुष्क पारदर्शित ऊबाऊ लगैत छल। हम स्वयं सँ दूर अपन अस्तित्वक निषेध्क तत्त्वक आगाँ नमस्तक छलहुँ। निन्न टूटल। देखल प्रात प्रभा स्नात, चिडैँ़ चुनमुनिक चुं-चु, डाइनिंग हाल मे बजैत सिम्फनीक मध्ुर स्वर संग नील आकाशक राग-रागिनी सुनलहुँ। चाहक चुसकि लैत सोचैत छलहुँ की करू? मोन नहिपड़ल आइ कोन तारीख छैक। एतऽ अयला मात्रा सात दिन भेल अछि मुदा बुझाइत अछि जेना महीनों सॅ एतऽ रहि रहल छी। समुद्रक लहरि आ दूर सॅ अबैत लाल मोटर बोट केर एकटा अद्भूत आनन्द कें महसूस करैत छी। हवा मे सुगंध् छै जे श्वास-श्वास कें सुवासित कऽ रहल अछि। हमर अपन जिनगी? जिनगी मे गर्म चटाðनक ऊष्मा अछि जे समुद्रक नमकीन लहरि के चुमि-चुमि ताजगी दऽ रहल अछि। अपना कें सम्बोध्ति कऽ मन बजै’छ-प्रिया वर्तमान के भोगब सीखू समय अयला पर इएह स्वतः सृजनक कृति क रूम पे उभरत। वर्तमानक एहि वैभव के छोड़ब बु(िमानी नहि। हमर एकटा अतीत अछि जे वर्तमानक संग घिसियाइत रहैत अछि। संजु वला घटनाक साल भरि बाद पापा क देहान्त भेलैन्ह। हमरा होइत क्यो जा कऽ छोटी मां के लऽ अबितैन्ह। पापाक अत्तिमबेर दर्शन भऽ जेतैन्ह छल। मुदा नहिप्रतिष्ठित अग्रवाल हाउस मे ओ कदापि नहिआबि सकैत छथि-नरेन्द्र बाजल छलाह। निष्ठुर, संवेदनहीन आर नहिजानि की सभ मोने-मोन हम बाजल छलहुँ। फेर साहस कऽ नहु-नहु सासु के कहलिएन्ह-ओ आर जोर सॅ कानऽ लगलीह। पीसी सान्त्वना देत छलथिन ‘भाभी, अपना कें सम्हारू। हिम्मत सॅ काज लिअ..... अहॉ तऽ सब दिन बर्दाश्त करैत रहलहुँ अछि।’ हमरा ऑखिक सोझा छोटी मां चेहरा बेर-बेर अबैत छल हुनकाऽ तऽ क्यो दू टा बोल भरोस देबहु बला नहिछैन्ह के ककरा बर्दाश्त कएल से के कहि सकै’छ। हं, बाबूघाट पर बहुत दूर एकटा औरत के नहाइत देखलिए। अरे ..... इ तऽ छोटी मां.... एसगरे.....चूड़ी पफोड़ैत...... सिन्दुर मेटाएल एकदम एसगर......फेर हुनका जाइत देखलिऐन्ह! मोन पड़ैत अछि ओ दृश्य तऽ एखनहु ऑखि नोरा जाइत अछि! हमरा सासु के द-दस टा औरत आगाज-पाछाँ छलैन्ह। मुदा हम ककरा दोष देबै? व्यक्ति के? समाज के? की परम्परा के? की छोटी मां स्वयं अइ सभक जिम्मेदार नहिछलीह हरदम निष्क्रिय मौन छलीह। हुनके खून छैन्ह नीना जे एलान करै’छ सुख नहिअछि तऽ अर्जित करब।’ पापाक गेलाक बाद घर मे चुप्पी पसरल रहैत छल आ नरेन्द्र आर पावर पफुल भऽ गेलाह। पहिने कनिको लाज-धख तऽ छलैन्ह पापाक। आब तऽ ओ स्वयं सम्पूर्ण परिवारक कर्ता-र्ध्ता छथि। विवाहक मात्रा पांच वर्ष बीतल छल आ हमर सभक आपसी सम्बंध् क्षत-विक्षत होमऽ लागल छल। कनि-मनि खरोंच तऽ बहुत पहिने लागल छल....सुहाबराति...... वा हनीमून के समय ऊँ हूँ संभवतः संजुक भेलाक बाद। नीक जकां मोन नहिपड़ि रहल सब दिन तऽ बक झक होइते रहैत छल दिनो-दिन दू हृदय मध्य दूरी बढ़िते रहल। शायद दूनूक भिन्नविचार के कारण। दूनू गोटेक स्वभाव एकदम भिन्न छल। एक दोसर के सहन करब कठिन छल। नरेन्द्र के संग हम पहिलबेर अमेरिका गेल छलहुँ त पन्द्रह दिन संग रहब कठिन भऽ गेल छल। न्यूयार्क मे हमर इच्छा छल आर्ट गैलरी देखबाक, राति मे ब्राडवे मे कोनो नाटक..... मिफ्रैं नरेन्द्र अग्रवाल..........? भोर सॅ शापिंग के चक्कर मे हम परेशान भऽ जाइत छलहुँ कहितो छलिऐ। नरेन्द्र एतेक वस्तुक कोन प्रयोजन ?......’ ‘अहॉके कोनो वस्तु नहिचाही ठीक छै। अहाँ जोगिन बनल रहू। मुदा हमरा किछ किनऽ काल टोकू जुनि।’ शापिंग, शापिंग, शापिंग। भोर सँ सांझि घरि। शर्ट, पैंट्स, स्वेटर्स, जैकेट, टाई, परफ्रयूम, साबुन, पेस्ट की कहॉ एक दू नहिसब दर्जनक हिसाब सॅ। आ राति मे भोजन लेल भारतीय वा चाइनीज रेस्टोरेंटक खोज। भोजनक बाद ब्लू पिफल्म देखनाई! सेक्स के फूहड़ प्रदार्शन!! हम अकछि कऽ बजैत छलहुँ नरेन्द्र एक बेर देखलहुँ दू बेर देखलहुँ की रोज-रोज.......।’ अरे, की बजैत छी एहन थ्रील देखबालेल फेर कहिया भेंटत? आ ओतऽ सॅ घुरला पर होटल मे वएह वहशी उत्तेजना हमर एक-एक अंग निस्पंद भऽ जाइत छल। महिलाक शरीरक फूहड़ प्रदर्शन सॅ कोनो महिला कोना उत्तेजित भऽ सकै’छ? शायद ककरो होइत होइ मुदा हमरा तऽ ओ देखि घृणा भेल। सत्ते पश्चिमी भोगवादी समाज मे औरत मात्रा वस्तु बनि गेल छैक। ओ लाइव शो देखि कऽ हमरा मोन पड़ल छल सर्कस। ओना आबतऽ सबठां खुलापन बढ़ले जाइत छैक अपन-अपन रूचि। खैर हम जखन वाश्ंिाटन जाए लागलहुँ तऽ हमर शर्त छल जे हम ऐतिहासिक स्थानके देखब। ‘नरेन्द्र! अहॉ हमरा ईष्ट विलेजो नहिदेखऽ देलहुँ।’ ध्ुर, की देखितहुँ। आ इ अमेरिकन सबठां लाइन लगाकऽ ठाढ़ होइछ। हमरा सॅ लाइन मे ठाढ़ भेनाई नहिपार लागत। तऽ सबसे पहिने हम सब वाशिंगटन के म्यूजियम मे गेलहुँ। स्पेश क्ररफ्रटक विभाग मे एकटा विशाल पर्दा पर पूरा सौर मंडल जगमगाइत छलै आ एकटा छोट सन चमकैत बिन्दु छलै जत लिखल छलै-‘पृथ्वी।’ हमरा एकटा विचित्रा सन वैश्विक अनुभूति भेल। हम बाजि उठलहुँ एहि असंख्य ग्रह-नक्षत्रा मे एकटा छोट छीन पृथ्वी, ताहि पृथ्वी पर असंख्य मनुष मे एकटा हम तखन एतेक अहंकार! कनि सोचिऔ नरेन्द्र! बिना मतलब के कतेक अहंकार डेबने रहैत छी। हमर ‘हम’ की अछि? किछ नहिमहा सागर मे जेना एक बुदा पानि मुदा नरेन्द्र छलाह कहां ओत? हम बेचैन भऽ चारू भर तकलहुँ कतऽ गेलाह। तऽ देखलिऐन्ह कापफी क काउंटर पर ठाढ़ भऽ पोटाटो चिप्स खाइत छलाह। मन झूर झमान भऽ गेल। हम दूनू गोटे दू भिन्न दिशा मे सोचऽ वला मनुष छी। कखनहुँ संवाद संभव नहि। एकर बाद अइ यात्रा क्रम मे हम कतहु जयबाक जिद्दनहिकएलहुँ। अपना मन के बुझालेलहुँजे भऽ सकैंछ हम पहिलबेर आयल छी तँय सभटा एतेक आकर्षित कऽ रहल अछि। नरेन्द्र तऽ कतेक बेर आयल छथि दोसर बात जे ओ बिजनेस मैनेजमेंटक कोर्स व्हार्टन स्कूल आफ मैनेजमेंटस सेॅ कयने छथि। आ अपन-अपन रूचिक बात छै। मुदा पढ़ल-लिखल व्यक्तिक रूचिकारिष्कृत परिमार्जित नहिभऽ सकै’छ? भऽ सकै’छ मुदा मिस्टर अग्रवाल के नहिभऽ सकै’छ। कखनौ मन कहैत छल-की हम हुनक रूचि नहिबदलि सकैत छी प्रयास करऽ चाही। कखनौ मन कहैत छल-सब प्रयास हमहीं करबै की हुनकर जिम्मेवारी नहिछैन्ह किछ? जिम्मेवारी दूनू गोटेक अछि। गलत बात व्यवहार लेल दूनू गोटे सहअपराधी होएब। हं, ई हमर दोष अछि जे हम गुलामी स्वीकारि ..... गुलाम बनल रहबाक अपन नियति मानि ली। कोनो एकटा घटना होमए तऽ ओकर विश्लेषण कयल जाए। वैवाहिक जीवनक कोनो एकटा पक्ष कमजोर रहैत तऽ ओकरा पर ध्यान नहिदितिऐ मुदा जखन बात सम्पूर्ण अस्तित्वक होइ तऽ क्यो कोना अनठा देत? महिलाक आदर करब तऽ नरेन्द्र सीखबे नहिकयलनि। घर मे पीसी अबैत छलथिन या सर कुटुम्बक भाभी बहिन ककरो टेउरैत नहिछलाह प्रणाम-पाति वा कुशल क्षेम किछ नहिबस अबैत जाइत काल ‘हाय-हेलो।’ आ जाबत पीसी किछ कहिथीन ताबत ओ आगाँ बढ़ि जाइत छलाह। एतेक धरि जे अपना मां के आदर पूर्वक कखनौ गप्प-सप्प करैत कहां देखैत छिऐन्ह ..... मां अहॉ किछ नहिबूझैत छिऐ फूहड़ जकां बजैत छी.... अहाँ के कोनो तौर तरीका नहिबूझऽ अबैत अछि।... ओह अहॉ के किछ नहिबनबऽ अबैत अछि वएह वदामक हलुआ की मालपुआ धुर.....जेमन मे अबैत छैन्ह बकऽ लगैत छथि। मां भोरे सॅ लागल छलथिन छेना फाड़ि कऽ मालपुआ बनौने छलीह बेटाक बात सुनि अपरतीप सन भेल हमरा कहलनि पहिने इएह मालपुआ क फरमाइश करैत छल आब नीके नहिलगैत छै अहीं मन पसंद वस्तु बना दिऔ।’ मम्मी ‘अहॉक बनाएल एतेक स्वादिष्ट नास्ता नहिनीक लगैत छैन्ह तऽ हम की बना कऽ देबैन्ह जएता कल्ब मे, ओतहि खयता। हमरा सॅ नहिहेतै।’ नहिहेत? बस श्रृंगार-पटार करू रंडी जकॉ आ ऑपिफस जाउ। कहैत कॉचक मेज पर जोर सॅ चम्मच पटकि उठिकऽ ठाढ़ भऽ गेल छलाह। ‘रे’ इ कोन बाजऽ के तरीका छै’? मां कहने छलथिन। हम बेमन सॅ पुआ टुंगैत रहलहुँ। दस वर्षक संजु एक बेर हमरा एकबेर पापा के टुकुर-टुकुर देखैत छल। पापा के गेलाक बाद बाजल-‘दादी, बहुत नीक बनल अछि मालपुआ खूब टेस्टी। पापाक मूड खराब छलैन्ह तैं नीक नहिलगलैन्ह।’ बेचारा सँजु-मां-पापा क झगड़ा मे अनेरो पिसाइत छल। सम्बन्ध्क इतिहास होइत छैक मुदा घटना जे घटित होइत छैक तकर कोनो तारीख दर्ज नहिहोइत छै। कहिया, कखन कोन घटना हमरा दूनू गोटे के फरक-फरक दिशा मे धकेलऽ लागल मोन नहिपड़ैत अछि। बस एतवे मोन पड़ैत अछि हथौड़ी सॅ क्यो ध्माक-ध्माक हमरा अस्तित्व के थुड़ि रहल छल। घुटन दिनो-दिन बढ़िते रहल। तखन हम किताब मे मन लगयबाक कोशिश करऽ लगलहुँ। अहू लेल नरेन्द्र कहने छलाह...... ‘इन्टेलेक्चुअल शो ऑफ।’ जम्हर देखू किताबे-किताब। बेकार पाइ बर्बाद करैत छी नेशनल लाइब्रेरी सॅ आनि के पढू़ ‘किताब नहिपढ़ूतऽ की करूॅ? कोना समय बिताऊ?’ ‘आर महिला कोना समय बीतबै छै?’ कहबाक मोन भेल मुदा चुप्पे रहलहुँ। हिनकर मित्रा आ ओकर पत्नी ताशपार्टी छै। रंग-बिरंगक नास्ताक प्लेट, शिवासक बोतल, फूहड़ मजाक बचकानी चुटकुला मात्रा सेक्स पर चर्चा। ओइ बैसक मे हम सामिल नहिभऽ पबैत छलहुँ। नरेन्द्र अहू पर व्यंग्य करैत छलाह-‘की ओकर सभक पत्नी पढ़ल-लिखल नहिछै ओ सभ तऽ बैसल रहैत छै। अहींक मानसिक स्तर उच््य अछि?’ ‘नरेन्द्र हम से कहाँ कहैत छी? छुटीðक दिन दोसरो ढंग सँ बीता सकैत छी कतहु घूम जाइ वा घरे मे बैस कऽ संगीत सुनि......। ’ ‘प्रिया, हम जे पिफल्म अनैत छी से हो अहाँ के नीक नहिलगैत अछि।’ नरेन्द्र अहाँ कतेक दिन धरि ब्लू पिफल्म देखैत रहब ? आब त संजुओ पैद्य भऽ रहल अछि।’ संजुक अलग रूम छै ओइ रूम मे अलग विडीओ छै।’ हम जिनगी भरि देखैत रहब ब्लू पिफल्म।’ संजु ओ पिफल्म अइठाम सॅ उठा कऽ लऽ जेतै तऽ?’ ‘अहॉ करैत रहू रखवारी।’ सत्ते हम उबिया गेल छलहुँ ओइ वातावरण मे ? बस दिन भरि किताब नेने बैसल रहैत छलहुँ पढ़ऽ सॅ बेशी सोचैते रहैत छलहुँ। सासु कहैतो छलीह-‘प्रिया, केहन मुँह-कान बनौने रहैत छी। एखन नहिसजब-ध्जब तऽ की बुढ़ारी मे सजब? मने नहिहोइए मम्मी जी। ‘एकटा बच््या भऽ जाइत तऽ ओइ मे अहॉ बाझल रहित हुँ......।’ हम सोचऽ लगलहुँ की बच््या भेला सॅ हमर खलिपन भरि जाएत-आ से कतेक दिन एक वर्ष, दू वर्ष अध्कि सॅ अध्कि पाँच वर्ष? मोन भेल सासु से पूछिऐन्ह मम्मी जी अहाँ केँ समय बीतेनाइ कठिन नहिलगै’छ ? कोन एहन काज करि जाहि मे व्यस्त रहि से नहिपफुराइत छल। हं मन भेल पढ़ौनीक काज करि । नरेन्द्र सँ पूछलिऐन्ह। उतारा भेंटल-अहॉक दिमाग खराब भऽ गेल अछि ऽ आब अहाँ गुप्ता हाउसक बेटी नहिअग्रवाल हाउसक पुतौहु छी। संकेत छल कुमारि मे एकटा स्कूल मे पढ़बैत छलहुँ। सुनि कऽ काठ भऽ गेलहुँ। फेर एहन संयोग जे नरेन्द्र स्वयं प्रोपोजल देलनि। सत्तर केर दशकं विदेशी मुद्राक अभाव, विदेश गमन पर पाबंदी। आ मिफ्रैं अग्रवाल मित्रा मंडली मे शान बधरैत छलाह साल मे दू-दू बेर विदेश जा कऽ। आब कछमछी छयने छैन्ह।बजलाह ‘प्रिया हम चाहैत छी अपनो एक्सपोर्टक ध्ंध शुरू करू। सार प्रमोद दिन-राति उठैत-बैसैत विलायतक डींग मारैत रहैत अछि।’ प्रमोद नरेन्द्रक जिगरी दोस्त छलै। पच््यीस वर्षक दोस्ती मुदा तइओ ओकरा शिकायत छलै प्रमोद जी सँ। इम्हर पाँच वर्ष सॅ ओ जिनगीके पटरी पर आनलनि अछि। सोझ, सच्चरित्रा लोक। बापक मुइलाक बाद भाई सब ध्न दाबि लेलथिन। बेचारा पत्नीक जेबर बेच कऽ सिल्कक कारोबार शुरू कयलनि। अपना करोड़ोक ध्ंध ध्ैन्ह तइओ प्रमोदक उन्नति सॅ जरैत छथि। पार्टी मे प्रमोदके बजबैत छथिन मुदा ककरो सँ परिचय नहिकरबैत छथिन। एक दिन बजलाह आइ प्रमोद के बजा कऽ कहबै अपना कम्पनी मे हमरा डाइरेक्टर बना दे। प्रमोद जी बड्ड शालीनता सॅ ई बात टारि देलथिन। ओ जनैत छलथिन नरेन्द्र के लेबऽ आ देबऽ बला तराजू भिन्न-भिन्न छैक। प्रमोद जी कहलथिन। ‘भाई! एकटा व्यापारी भारत सॅ हैंडीक्राफ्रट अयात करऽ चाहै’छ....जँ कोनो हैंडीक्राफ्रटक वस्तु पढाओल जाए तऽ कारोबार शुरू भऽ सकैत छै।’ ‘अरे, तऽ ई कोन पैद्य समस्या छै कोनो मैनेजर.....’ हं, मैनेजर राखि लिअ, आ एक वर्षक बाद अपन एक्सपोर्ट शुरू भऽ जाएत। मुदा एतेक छोट स्केलक काज तऽ अपने हाथे करऽ पड़त।’ ‘से तऽ छै मुदा हमरा ओतेक समय कहाँ रहैए?’ हम किछ बजितहुँ ताहि सॅ पहिने प्रमोद भैया कहलथिन-‘अहाँ केँ समय नहिअछि तऽ भाभी जी के कहियोन्ह कारोबार सम्हारऽ लेल।’ ‘हूँ, प्रिया आ एक्सपोर्ट......। रसोई घर मे तऽ जाइते नहिछथि।’ हमर मोन झुर-झुमान भऽ गेल। ‘भाई, हमरा जे कहबाक छल कहि देलहुँ आब अहॉ दूनू गोटेक जे इच्छा होइ करू। कलात्मक रूचि बिना ई व्यापार नहिभऽ सकै’छ आ प्रिया भाभीक व्यक्तित्व मे कलात्मक रूझान छैन्ह।’ ‘आर्डर कतेक दिन मे भेटतै?’ ‘जहिया कहू। अगिले मास ओ एमस्टरडम सॅ आबऽ बला छै। भभी जी कें कोनो ऑपिफस मे भरि दिन रहऽ पड़तैन्ह मात्रा दू-तीन घंटा क बात छै। एहि व्यापारक बहाना सॅ जतेक बेर इच्छा होइ विदेश घूमि आयब। जिनगी मे पहिलबेर आ शायद आखरीबेर सासु हमर पक्ष लेलैन्ह-‘नरेन्द्र, प्रिया के इ व्यापार सम्हार दिऔ मन बाझल रहतैन्ह।’ हं, तऽ हम मोन लगाबऽ लेल काज शुरू कयलहुँ। जे बनि गेल हमर जीवनी शक्ति। छोटे स्तर पर छलै कारोबार मुदा हम व्यापारक सम्पूर्ण संरचना कें बुझबाक प्रयास कयलहुँ। हैंडीक्राफ्रटक पूरा इतिहास पढ़ि लेलहुँ। गाँव-गाँव जा कऽ देखलिऐ कोन वस्तु कोना बनैत छै। आब बुझलिऐ हमर देश केहन समृ( अछि! ......... पीतर आ ताम्बाक मूर्ति, हाथी दाँतक समान, लकड़ीक लुगदीक बनल वस्तु........। पहिल बेर हम नरेन्द्र संग विदेश गेलहुँ। पिफलिप के ऑपिफस में घुसऽ से पहिने नरेन्द्र कहलनि-‘प्रिया, अहाँ चुप्पे रहब।’ हम चुप्प छलहुँ। पिफलिप जे समान बनयबाक-सप्लाईक बात कहैत छलथिन तुरत नरेन्द्र कहैत छलथिन-‘नो प्रॉब्लम।’ हम जनैत छलिए कोनो वस्तु बनयबाक मे कतेक समस्या उत्पन्न हेतै। मुदा हमरा मनाही छल तैं चुप्पे छलँहु। अन्त मे बजलाह पिफलिप-मिस्टर नो प्रॉब्लम! हमरा अछि एकटा समस्या। हम चाहैत छी ‘जे प्रदर्शनी मे भारतक व्यापारी भारतीय शिल्प के विषय मे चर्चा करए।’ प्रदर्शनी मे कतेक दिन रहऽ पड़ैत ?’ -‘सात-आठ दिन।’ ‘सात-आठ दिन? बट आइ एम ए बिजी पर्सन।’ -पिफलिप बजलाहः ‘देन डोंट डू दिस वर्ष। ओ. के.। कहि घड़ी देखऽ लगलाह पिफलिप । बात टूटैत देख नरेन्द्र के चेहरा पर तनाव झलकैत छलैन्ह। हम डराइत-सकुचाइत बजलहुँ- ‘मि. रॉथवेल! अहाँ हमरा पाँच मिनट समय दऽ सकैत छी?’ ‘हं, हं, कियेक नहि?’ ‘सुनू-हमरा हैंडीक्राफ्रटक विषय मे किछु जानकारी अछि। -अहाँ जाहि मूर्तिक विषय कहि रहल छी, तकर दू-चारि टा पीस त हूबहू बनि जायत मुदा हजारक संख्या मे असंभव छैक।’ ‘कियेक?’ ‘कारण स्पष्ट छैक हाथ सॅ बनाओल जेतैं प्रत्येक कारीगरक अलग-अलग ढंग होइत छैक। रंग मे फर्क भऽ सकैत छै तैँ।’ ‘मुदा हमर गांहक?’ ‘ई अहाँक काज अछि जे अपना गांहक के हैंडीक्राफ्रटक अर्थ बुझाबी। हाथ सॅ बनैत छैक तैं मात्रा वैरियेशन एकर सुन्दरता छै। मशीनक बनल वस्तु लेल अहाँ हमरा देश नहिआयब। मशीनक बनल वस्तु तऽ अहाँ कें ताईवान मे भेंट जायत।’ ‘अहाँ एकदम सत्य बाजि रहल छी।’ पिफलिप के चेहरा प्रसन्नता सॅ खिलल छलै। नरेन्द्र कें कहलथिन बुझाइत अछि अहाँक पत्नी अहाँ सॅ वेशी बुझैत छथि एहि विषय मे।’ ई सुनि नरेन्द्र के चेहरा फक भऽ गेलैन्ह। पिफलिप एक लाख टकाक आर्डर देलनि। हम अति प्रसन्न छलहुँ। खुशी सॅ ध्रती पर पैर नहिपड़ैत छल। होटल पहुँचिते नरेन्द्रके गर पकड़ि लपटैत बजलहुँ ‘लेट्स सेलेब्रेट नरेन्द्र! चलू शैम्पन पीबऽ।’ ‘हँू, एक लाखक आर्डर की भेंटलनि, रानी जी नाचऽ लगलीह। हम करोड़ो कमाइत छी तइओ एना नहिउधिएलहुँ कहियो।’ हम गुम्म भऽ गेल छलहुँ। संभवतः आपसी सम्बन्ध् मे ओहि दिन पहिलगांठ परि गेल छल, एमस्टरडमक रॉयल होटल, कमरा नम्बर तीन सौ चारि मे। कमराक घंटी बाजल। चौंकलहुँ। ‘कम-इन’ कहैत केवाड़ खोललहुँ। रूम क्लीनिंग लेल होटलक नौकरानी आयल। ‘गुड मार्निग मैमऋ कहि सफाई मे जुटि गेल। घड़ी देखलहुँ दस बजैत छै यानि सात बजे सॅ हम अहि बालकनि मे बैसल छी! नौकरानी सफाई कऽ चलि गेल। हम शीशा मे अपन मुँह देखलहुँ ओझराएल केश। उदास ऑखि आ थाकल देहक पोर-पोर। विदेश मे अइठामक परिवेश वातावरण सॅ अपना के कटल-छंटल अनुभव होइत छै तयॅ लोक अपना के संदर्भ हीन बुझऽ लगै’छ । चाहैत छलहुँ अपन कथा लिखब मुदा सोचिते रहि गेलहुँ। एखन घरि एको पॉती नहिलिखलहुँ अछि। कतऽ सॅ शुरू करि की लिखी से पफुराइते ने अछि। ऑखि गेल दूर लहराइत समुद्रदिस। नील झिलमिल लहरि टूटल चटाðन क टुकड़ा कछेड़ पर देखाइत अछि। अचानक हमरा सब किछ ऊबाऊ लागऽ लागल। काल्हिए पिफलिप ओतऽ वालवाइक चलि जायब। हम आपरेटर सॅ वालवाइकक नम्बर मांगलिऐ। एखन पिफलिप ऑपिफस मे हेतै। ‘हं पिफलिप, हम काल्हि आबि रहल छी लुफ्रतांसाक फ्लाइट सँ बेलग्रेड होइत। कनफर्म्ड बुकिंगऋ नहि, ओ नहिभेंट जेतै। की बेलग्रेड सॅ नहिभेंटतै? जँ नहिभेंटतै तऽ हम सूचित कऽ देब। अहाँ एयरपोर्ट पर नहिआयब हम एमस्टरडम उतरि ट्रेन सॅ पहुचबा हं, बुझलहुँ, गलती भऽ गेल पहिने कनफर्म्ड कऽ लितहुॅ तखन पफोन करऽ चाही। कहि तऽ रहल छी सॉरी पिफलिप। अहाँ सांझि मे पफोन कऽ रहल छी। ठीक। जूडी के हमर स्नेह....... बाई।’ पफोन रखलहुँ। अपन गलतीक एहसास भेल। दिमाग एहन सुस्त कोना भऽ गेल? अतीतक स्मरण की नरेन्द्रक व्यंग्यवाण सुनि! ‘.............. प्रमोदे के कारण अहाँ कें पिफलिप सॅ परिचय भेल’। मोन भेल कहिऐ-परिचय तऽ अहूँ के भेल छल तखन लोक के कियेक हमरा सॅ दोस्ती भऽ जाइत छै आ अहॉ सॅ छीह कटैत अछि? जोर सॅ भूख लागल। काल्हि राति मे खाना नहिखयने छलहुँ। नहा कऽ जल्दी-जल्दी कैपफे दिस बढ़लहुँ। एखन ने ब्रेक फास्ट के बेर छै ने लंचक। कापफे प्रायः खालिए छल मात्रा दू चारि गोटे कापफीककप नेने अखबार पढ़ैत छल। सर्विस वाली लड़की खिड़की लग बैसल औंध रहल छल। हमरा देखिते पूछलकः ‘ह्नाट कैन यू आफर? -ओनली चीज एण्ड ब्रेड ‘मैडम इट्स यू लेट’ कहि हसॅऽ लागल। फेर पूछलक -‘कैन यू पिफक्स ए सैंडविच?’ हम कहलिऐ ‘एस व्हाई नॉट?’ नास्ता कऽ घूम बहरेलहुँ। फेर तुरंत वापस आबि गेलहुँ। मोन पड़ल जा बुकिंग क बारे मे नहिपूछलिऐ? खैर, बुकिंग भेल। सांझि मे पिफलिप पफेान करबे करत। पिफलिपे हॉफमैन सॅ परिचय करौने छल। हाफमैन जर्मनी मे चमड़ाक व्यापारी छै। पिफलिप कहने छल चमड़ाक व्यापार मे वेशी स्कोप छै। फेर वएह सड़क गाछ बिरीछ। की करू? कत जाउ? मन कहलक चलैत रहू थाकि जायबतऽ बैस रहब। काज ध्ंध तऽ अछि नहि। कतेक दिनक बाद एहन चैन भेंटल अछि। ..... दूर क्षितिज दिस तकैत छी....... ओई पार हमर घर छल। हमर नेनपन, बाबूजी, मां, दाई मां, सरोज, बुल्ली, नीलू ............ फेर ब्याह एकटा नव घर....... विदाई काल माँ कहने छलीह-बेटीक नैहर सॅ डोली उठैत छै आ सासुर सॅ अर्थी। तखन अइ घिसल-पिटल कहबी पर हँसी लागल छल। मुदा नैहर तऽ सत्ते छुटि गेल, आ सासुर तऽ कहियो अपन घर बनबे नहिकयल। घर छैन्ह नरेन्द्रक, सँजुक आ हमर सासुके। ओतुका व्यवस्था जाहि मे हम अपना के पूरा इमानदारी सॅ झोंकलहु मुदा रहलहुँ मिसपिफट। जहिया मां के घर मे कोनो परेशानी होइत छल तऽ मन के मना लैत छलहुँ कहियो हमरो अपन घर हेत। आ आब ओहू घर सॅ हटा देल गेल तऽ आब कतऽ जाउ? कतेक सहजभऽ नरेन्द्र कहि देलनि-‘एत घुरिकऽ नहिआयब। यह, आइ मीन इट...... आइ एम सीरियस। हम कतेक परेशान छलहुँ जखन प्लेन दिल्ली उतरि रहल छल, विमानक भीतर एयर होस्टेस क स्वर गंूजि रहल छल ‘लंदन सॅ चलल प्लेन दिल्लीक इन्दिरा गांध्ी हवाई अडाó पर उतरि रहल अछि। आशा अछि अहाँ लोकनिक यात्रा सुखद रहल होएत। लंदन सँ दिल्लीक दूरी हम आठ घंटा मे पूरा कयलहुँ। अहाँ सभके सूचित कऽ रहल छी बाहरक तापमान एखन 28 डिग्री सेलसियस छैक।’ हम दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरि कऽ सोचलहुँ कतऽ जाउ? कलकत्ता..... नहि। नरेन्द्रक स्वर दसो दिन यात्रा मे माथ पर हथौड़ीक चोट जकां खटखट बुझाइत रहल-एत घुरिकऽ नहिआयब ........कहियो नहि। आ मां, मोन पड़ल कोना बजने छलीह आ हम फेर नरेन्द्र संग विदा भेल छलहुँ। हमर अपन क्यो नहिअछि? एतेक कारोबार पसरल अछि, एतेक बड़का आर्डर लऽ कऽ आयल छी। तखन तऽ चाहैते छथि झगड़ा बढ़ए मुदा अइ लडाई सॅ फायदा? मुदा एतबा सच छै जे ओ हमरा घर मे घुस नहिदेत। फेर मन कहलक-कानूनी सहायता सॅ नरेन्द्र अग्रवाल कें चौबिस घंटा क भीतर जेल पठा सकैत छी। मुदा अइ सॅ फायदा? फेर मोन पड़ल वीरेन ओ एक दिन कहने छल ‘दीदी! अहींक भरोसे हमर सभक दू सौ लोकक भातक हंडी चूल्हा पर चढ़ैत छै। अहां आब एसगर नहिछी।’ आ लंदन जाइतकाल नीना बाजल छलीहः ‘भाभी! आब हम कारनानी स्टेट्स मे नहिरहैत छी। बालीगंज मे अपना फ्रलैट मे रहैत छी। अहाँ मां के छोटी मां कहैत छिऐतऽ हम सब आन कोना भेलहुँ?’ आ तखन हम सोचि रहल छी कतऽ जाउ? छोटी मां बहुत आहुति देलनि पापक नाम पर। हुनका मुइलाक बाद कहियो ऑखिक नोर नहिसुखलैन्ह। वातावरण कें हल्लुक करबा लेल नीना बजैत छथि-‘भाभी, ई भारतीय मानसून छै।’ -नीना! एहन कटुवचन जुनि बाजू छोटी मांक लेल।’ -अहीं कहू-मां कियेक अन्याय सहलनि। अपन हक पर अध्किार कियेक ने कयलनि।’ -ओह, नीना, अहाँ नहिबूझबै। अहाँ ने ब्याह कयलहुँ अछि ने प्रेमक जाल मे पफॅसलहुँ......... छोटी मां जे जेहन छलै सेह स्वीकारलनि।’ नीना कें पापा सॅ घृणा छलै। आ नरेन्द्र कें मि0 कोबरा कहैत छथि बड़ी मां के देवी जी। ग्रैंड होटल मे ओ इंटीरियल पर्सनल मैनेजमेंट पोस्ट पर छलीह। सब संग हॅसैत-बजैत खुशमिजाज। बस छोटी मां के नोर देखिकऽ उदास भऽ जाइत छलीह। कहैत छलीह-भभी! हमरा लोकनिके आर सभटा बात सिखाओल जाइत छै मुदा खुश रहनाइ सिखाओल नहिजाइछ। मम्मी ने कतहु जाइत अबैत छथि ने मनोरंजन क लेल हुनका समय छैन्ह। एकसंझा भोजन आ मात्रा पूजा घर देखैत छिऐ। लड्डूगोपालक सोझामे ध्यान लगौने तऽ हमरा होइत अछि गुडाó-गुड़िया राखल छै। शायद मां कें बेटा नहिभेलैन्ह तकर रिक्तस्थानक पूर्ति करैत छथिन बाल-गोपाल।’ हम सिनेह सॅ भरि पाँज पकड़ि नीना के कहलिऐन्ह-नीना आब अहॉ बड्ड बक-बक करऽ लगलहुँ अछि आब अहाँ लेल हम वर ताकब। कहू केहन लड़का चाही? ‘की ब्याह कऽ अहाँ खुश छी? खुश छथि बड़ी मां, मम्मी..... भाभी अहाँ के तऽ मिफ्रैं कोबरा भेंटलनि आब हमरा कोनो बानरक गरमे बान्ह्ऽ चाहैत छी?’ -मिफ्रैं लॉयन या मिफ्रैं टाइगर कियेक नहि?’ ‘घुर आइ काल्हि के लड़का?’ हम मने-मन प्रार्थना कयलहुँ भगवती! नीना के नीक सहचर भेंटए।’ दुनियाँ मे सुहृदय, संवेदनशील पुरुषोछै। मुदा नीना अपना कें ततेक इंसक्युलेट कऽ लेने छथि जे बाहरी हवा क ताजगी लेल कतहु कनिको टा भूर नहिभेंटैत छे। नीना अपन साथी लग कहियो पापाक चर्चा नहिकयलनि। एतबे कहने छथि जे हम बहुत छोट छलहुँ तखने पिताक मृत्यु भऽ गेलैन्ह। नीनाके सँजु सॅ कनि लगाव भऽ गेल छलै तऽ ओकरा अइठाम अयबालेल रोकिए देल गेलै। नरेन्द्र आ ओकर दादी नीक जकॉ सिखा-पढ़ा देलथिन जे ओ सभ नीक लोक नहिछै ने ओ जागह ध्यिा-पुताक जाय जोग छै। तोहर मां तऽ राति-दिन पढ़ैते-लिखैत रहै छौ तयँ ओकरा व्यवहारिक ज्ञान नहिछै। एयर इंडियाक फ्लाइट साढ़े तीन बजे दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर छल। कलकत्ताक विमान साढ़े आठ बजे जायबला छलै। सुस्त-सूतल एयरपार्ट जागि रहल छल-चाय-कॉपफी। हमरा दिस बला काउंटर खुजलै। श्रीनगर, बम्बई, जामनगर, आ हैदराबाद केर काउंटर खुजि रहल छल। देह झाड़ि उठलहुँ। बैसल-बैसल डॉर अकड़ि गेल छल। हम बगल मे बैसल महिला कें कहलिए-अहॉ कनिकाल हमर समान पर नजरि राखब? ओ बजलीह-‘हं, हं कियेक नाहि।’ यात्रा करैत-करैत अनुभव भेल अछि जे यात्रा में प्रायः महिला अपना के असुरक्षित महसूस करैत छथि आ सहयात्राी लेल आत्मीयता कनि वेशिए रहैत छनि। बाथरूम सॅ हम हाथ-मुँह धेऽ कऽ बहरेलहुँ। दू कप कॉपफी अनलहुँ। एक कप कॉपफी हुनका देलिऐन्ह। कॉपफी लैत बजलीह-‘बहुत-बहुत ध्न्यवाद! बहिन, हम तऽ इ बच््याक लऽ कऽ कतहु जा नहिपबैत छी। अहॉ कतऽ जा रहल छी?’ ‘कलकत्ता।’ ‘हमहूँ कलकत्ते जा रहल छी। न्यूयार्क सॅ राति पैन-एम सॅ उतरलहुँ अछि। छोट बच््याक लऽ कऽ यात्रा करबा मे बड्ड असुविध होइत छै। आब अहांक संग नीक लागत।’ हम हुनकर बात सुनि सोचऽ लगलहुँ-आब, ई महिला हमरा चैन सँ किछ सोचऽ विचारऽ नहिदेत। इम्हर-अहर उम्हर तकलहुँ। ठाढ़ भऽ हुनका कहलिऐन्हहम कानिकाल आगाँवला कुर्सी पर पैर पसारि आराम करऽ जाइत छी। अहॉक कोनो हर्ज नहिने।’ ‘नहि, नहि।’ हम अपन अटैची उठाकऽ आगाँवला कुसी पर जा कऽ पैर पसारि ऑखि मुनि लेलहुँ । मन मे फेर वएह प्रश्न घुड़िआए लागल........ कत जाउ?’ हमरा एतेक स्पष्ट बुझल अछि जे नरेन्द्र हमरा सँ खुल्मखुल्ला लड़ाई करऽ चाहैत छथि। यद्यपि आब हमरा सेक्स भाव प्रायः खत्म भऽ चुकल अछि। मुदा हमर उद्दाम महत्वाकांक्षों कें नरेन्द्र बेर-बेर सेक्सुअल फ्रैंस्ट्रेशन क नाम दैत छथि। कतेक बेर मोन मे भेल अछि जे पूछिऐन्ह अहीं सन खेलाड़ी अहाँक कतेको मित्रा छथि हुनक पत्नी कियेक न्यूरोटिक छैन्ह? नरेन्द्र क्रूर टेढ़यालि। ओ सोचैत छथि हम हक लेलड़ब। केहन हक आ कथित हक? जखन प्रीत प्रतीत नहिएको क्षण लेल मध्ुर सम्बन्ध् नहितखन की बाँचल अछि? आ ध्न-सम्पत्ति? नरेन्द्रक ध्न? खरीद बिक्री, टका, टकाक सूदि ब्याज दर ब्याज। एनफ! बहुत भेल, जें मोन होइन्ह करथु मुदा हमर पछोड़ छोड़थि। आ सँजु?’ एकमात्रा संजु हमर कमजोरि अछि बलिके बकरा जकॉ छटपटाइत छी। कानूनी दांव-पेंच के तौर पर सँजुक कस्टडी नरेन्द्रे के भेंटतैन्ह। हम सभ दिन आहुतिए दैत रहलह अछि। एहि जीवन यज्ञक मे इ हमर पूर्णाहुति होएत संजुँ अग्रवाल वंशक कुलदीपक। जहिया सॅ जनमल अछि। एखने सॅ बात-बात पर पापाक तरफदारी करैत अछि। बात-व्यवहार मे नरेन्द्रेवला ठसक। कहैत अछि-‘मम्मी, देखबै हम बहुत बड़का इंडस्ट्री बनायब। इ एक्सपोर्टक काज तऽ सर्विस-ओरियंेटेड काज छैक के सार ‘गोर चमड़ी वलाक तड़बा रगड़त। सँजु! अहॉ इ गाड़ि पढ़ब कतऽ सॅ सिखलहुँ?’ मम्मी! हम कोन गलत बात बजलहुँ? पापा कहिलनि जे इ श्वेत अंग्रेज हमरा देशक शोषण कयने अछि। तऽ ओकरा गाड़ि नहिपढ़बै तऽ स्तुती करबै? अच्छा बहुत बुझनुक भऽ गेलहुँ। पापा ई नहिबतौलनि जे ओ स्वयं ककर-ककर शोषण करैत छथि?’ बेचारा मासूम नेना हमर बात सुनि टकटकी लगा हमरा देखैत रहल। स्त्राीगण शोषणक परम्परा कें कोना झेलैत छथि से संजु की जानऽ गेल! राति भरि जागले छलहुँ से ऑखि बेर-बेर मुना जाइत छल। आवाज सुनि ऑखि खुजल। एयरहोस्टेस पूछलनि-‘अहॉ चाय, कॉपफी किछ लेब? अहॉ सूतल छलहुँ।’ -‘चाह सर्ब करबा मे असुविध तऽ नहिहोएत?’ ‘नहि, नहि, हम तुरत अनैत छी।’ एयरहोस्टेस के देखि कऽ हमरा नीना मोन पड़लीह। नीना एयरहोस्टेस बनऽ चाहैत छलीह। मुदा छोटी मां के कनने खिझने गैं्रड होटल मे नौकरी कयलनि। पिताक स्थान पर लिखने छलीह स्वर्गीय अग्रवाल। इ बात ओ निःसंकोच हमरा कहने छलीह। एयरपोर्ट पर नीना छलीह। ‘भाभी! मां बजौलेनि अछि घर चलू। नहि, नीना, हमरा सबके अपन अपन लड़ाई स्वंय लड़ऽ पड़त। दोसर बात इ जे अहाँ कें बूझल अछि मिस्टर कोबराक जहर........।’ हम टैक्सी लऽ सासुर एलहुँ। हमरा देखिकऽ सासु प्रसन्न छलीह । दाई-नौकर सब खुश भेल। ‘बहू, अहाँक आइ अएबाक छल से सँजु बाबू कें बुझल नहिछलनि?’ बुझल रहैत छैन्हि तऽ ओ भोरे सॅ हमरा कहऽ लगैत छथि-रामसिंह समय पर एयरपोर्ट चलि जाए मम्मी आबि रहल छथि। ताबत नरेन्द्र ऊपर सॅ उतरलाह। करैत साँप जकाँ पफुफकार छोड़ैत बजलाह-‘अहाँ एतऽ एलहुँ कियेक? जाऊ एखन तुरत हमरा घर सॅ बाहर जाऊ।’ ‘सुनू, वेशी हल्ला नहिकरू। इ घर हमरो अछि। तथापि हम दस दिनक भीतर अलग फ्रलैट लऽ लेब। एखन दस दिन हम एतहि गेस्ट रूम मे रहब।’ भीतरे-भीतर आगि ध्ध्कि रहल छल। नहिजानि कियेक इ पराया घर के ह बाँटऽ नहिचाहैत छलहुँ। ओना अइठामक ध्न-सम्पत्तिक लेल रति भरि मोह नहिअछि। आ नरेन्द्र तऽ कहिया सॅ हमरा सॅ दूर भऽ गेल छथि। मन मे इएह बात सब घुरिआइत छल कि नरेन्द्र बजलाह। ‘हमर ऑपिफस खालि कऽ दिअ।’ ‘आर किछ........’ ‘लॉकर के चाभी ककरा लग छै?’ मां लग। ‘मुदा ओइ मे तऽ हमर गहना अछि?’ बहुत गहना संयुक्त परिवारक छै। हीराक सेट आ चूड़ी कंगन सब मां के नाम सँ छै। ‘आ हमर गहना............ ?’ ‘अहाँ नैहर सॅ अनने की छलहुँ? मात्रा दस भरि सोना से लऽ लिअ। ‘नरेन्द्र?’ हे वेशी बाजू जुनि। बकबास करबत अहॉक व्यापारो बन्द करबा देब। बसएकटा चिटीò रिजर्व बैंक के लिख देबै।’ -‘यू........ यू ब्लैकमेलर!’ आ, अहाँ खिसियाल बिलाड़ि घुरखुर नोंचए।’ हमरा तऽ बुझू बकौर लागि गेल। हे भगवान क्यो एतेक नीचॉ खसत, हम कल्पनो ने कयने छलहुँ। इनारो मे नीचॉ जमीन रहैत छै........ आ नरेन्द्रक नीचताई अन्तहीन छै कतहुँ ठौर ठेकान नहि। हमरा किछु नहिपफुराइत छल। गेस्टरूमक केवाड़ बन्द कऽ ध्ड़ाम सॅ पलंग पर खसलहुँ। नोर हिचकी...... आ सबसॅ कष्टकर अनुभूति निहथ्था एसगर लड़बाक बोध्। हम कोना निपटब एहन खूंखार जानवर सॅ ? कहिया अन्त होएत समझौता करबाक। मन मे नरेन्द्रक प्रति केहन प्रतिक्रिया छल क्रो(! नहिक्रो( नहि। अर्न्तमन मे आहत पशु क चित्कार छल। होइत छल जॅ आब एको शब्द बजताह तऽ गरदनि दाबि देबैन्ह। आर किछ तऽ नहिकयलहुॅ हं, अपन चप्पल खोलि ठेकनाक देह पर पफेकलहुँ। मन कनि शान्त भेल। ग्लानि कनिको नहिभेल ने पश्चाताप। नरेन्द्रक प्रतिक्रिया आर तीव्र-‘राक्षसी .......... अपनाकें बड्ड बु(िमती बुझै’छ पढ़ल-लिखल हूँ...।’ मेज पर राखल फूलदान उठाकऽ जोर सॅ देवार पर पटकलनि......... ‘जाउ जतऽ जयबाक मन होए जाउ मुदा अपन मुँह हमरा नहिदेखाउ। हम एको क्षण अहाँ कें देखऽ नहिचाहैत छी। आ तमतमा कऽ घर सॅ बहराइत हमरा मुँह पर पच््य सॅ थुकलनि। हम भोकारिपारि कनैत रहलहुँ अपने हाथे अपन कपार पीटैत छलहुँ। शायद ओइ दिन फेर हमरा भीतर ओएह दस वर्षक बालिका अन्तिम बेर सुरक्षाक लेल संरक्षण मांगि रहल छल। नरेन्द्र वापस नहिघुरलाह। भरि घर शीशाक टुकड़ि पसरल छल। हम रूमाल सॅ सबके बटोरि रहल छलहुँ आ मने-मन सोचि रहल छलहुँ हम इ शीशाक टुकड़ि कियेक समेट रहल छी? जखन ककरो हमर जरूरते नहिछै तऽ घर मे किछ पसरल रहऔ ताहि सॅ हमरा की? ओ छमास पर सेक्रेटरी बदलैत रहैत छथि एक सॅ बढ़ि कऽ एक सुन्दरी जे हिनकर भूख शान्त करैत छैन्हि। ई तमासा पापा छलथिन तखने सॅ देख रह छी। पापाक गेलाक बाद तऽ रूप-सुन्दरी सब घरो पर आब लागल। खैर, जकरा सॅ हमरा कनिको लगाव नहिसे किछ करय। हं, एक बेर एकटा सेक्रेटरी छमासक बदला डेढ़ साल रहिगेल छलै। ओ वास्तव मे नरेन्द्र सॅ प्रेेम करैत छल। ओकरा गर्भ मे नरेन्द्रक सन्तान छलै तइओ इ राक्षस ओकरा हटा देने छलै। ओकरा कहने छलै-बिसरि जाउ हमरा सॅ प्रेम भेल छल, शपथ खेने छलहुँ! बाजु कतेकटका जाही इ ऑपिफस छोड़बा लेल? ओ कहने छलै- ‘टका? यू वास्टर्ड सन ऑफ विच। की अहाँ बुझैत छी जे टका सॅ कोनो औरत कें मुँह बन्द कऽ देबै? हम अहाँ कें बर्बाद कऽ चैन लेब।’ बिजली जकाँ ओकर कड़कैत आवाज घर देवार के झकझोरि रहल छलै, आ नरेन्द्र मुसुकैत ओकरा पकड़ि कऽ घर सॅ बाहर ध्केलने छलै। ओ बताहि जकॉ केवाड़ पीटैत छल। हमर मन हहरि उठल मुदा हम ओकरा सॅ नहिपूछलिए जे अइ पुरूषक विषय मे तो सब बात जनैत छलै बूझल छलौ’जे विवाहित भऽ रोज औरत बदलैत छै तखन कोन भ्रमवश एकरा पर विश्वास कयलें। मुदा बिना किछ पूछने ओकरा हम अपना रूम मे लऽ एलिऐ। बड़ी कालधरि ओ हमरा पकड़ि कनैत रहल फेर शान्त भऽ चलि गेल। ओकरा गेलाक बाद नरेन्द्र व्यंग्य सॅ बजने छलाह-‘बड्ड हमदर्दी भऽ गेल। सौतिन आनि दिअ?’ एकबेर जूरीक लग हम अइ घटनाक चर्चा कयने छलहुँ। नरेन्द्रक क्रूरताक प्रसंग मे। तऽ जूरी कहने छल-अपना स्वार्थ पर चोट पड़ने लगभग सब लोकक प्रतिक्रिया एहने हिंसक होइत छैक, कियेक तऽ हमर आजुक सम्पूर्ण सभ्यता हिंसा आ प्रमादे पर टिकल अछि। नहि, प्रिया एहन नहिछै जे मात्रा महिलाक शोषण होइत छै पुरुषो क शोषण होइत छैक। व्यक्तिक अपन-अपन संवेदनशीलता छै एम्पैथी-दोसरक दुःख दर्द के अनुभव करबाक क्षमता। तखन हम पूछने छलिए जूडी सॅ खैर, इ कहू जे गलती हमर छल? नहिप्रिया नहि। असल मे अहाँक आ नगेन्द्रक सम्बन्ध् निगेटिव रूप लऽ लेने छल जत एक दोसर के मारऽ पर उताहुल छलहुँ हम अहॉ कें दोष नहिदऽ रहल छी-मुदा हमरा विचार सँ नीक होइत हटि जायब। एक दोसर पर निर्मम प्रहार करबा सॅ। कनैत-कनैत नहिजानि कखन सूति रहलहुँ। ऑखि खुजल केवाड़ ढ़कढ़कयबाक आवाज सँ। केवाड़ खोललहुँ। सॅजु हब्बोढ़कार कानि रहल छल। नरेन्द्र पसीना सॅ लथ-पथ आतंकित छलाह। सँजु हमरा भरि पाँज पकड़ि एखनहु हुचुकि हुचुकि कानि रहल छल। सासु माथ पकड़ने नीचाँ मे बैसल छलीह। सब दाई नौकर, महराज..... हम घबड़ाकऽ पूछलिए-‘की भेलै?’ क्यो किछ नहिबाजल। सँजु कहलक-‘मां। पापा बुझलथिन अहाँ जहर खा कऽ सूतल छीं।’ ‘ओह।’ ‘मम्मी!’ सँजु फेर कानऽ लागल। आया मम्मीजी के उठाकऽ सोफा पर बैसौलकिन। मिस्टर कोबरा ऊपर अपना रूम मे चलि गेल छलाह। होस्टल आबि, भोजन कऽ सूति रहलहुँ। पिफलिप के पफोन सँ निन्न टूटल।पिफलिप कें कहि देलिऐ-हम काल्हि आबि रहल छी। बुकिंग पक्का भऽ गेल। चाह पीबि पैकिंग मे जुटि गेलहुँ। नीचाँ जा कऽ बिल बनाबऽ कहलिऐ। अइ सात दिन मे एत सॅ लगाव भऽ गेल छल। सभक चेहरा परिचित सन लगैत छल एकटा आत्मीय भावक अनुभूति होइत छल। राति मे भोजनकाल जोसेफ पूछने छल-‘मैडम, अहाँ काल्हि जा रहल छी?’ ‘हँ!’ ‘मैडम हमर वेजिटेरियन प्लेट नहिनीक लागल?’ ‘जोसेफ-हमरा खूब नीक लागल आ सबसे बेशी नीक लागल तोहर आत्मीयता।’ ‘मैडम किताब पूरा भऽ गेल?’ नहि, जोसेफ एखन हम सोचिए रहल छी। जोसेफ गंभीरता सॅ माथ डोलबैत कहलक फ्रैंांसक बड्ड पैद्य लेखक ठहरल छलाह। मैडम की कहू ओ ततेक पीबैत छलाह। मैडम की कहू ओ जतबे पीबैत छलाह, ततबे लिखैतो छलाह। जखन ओ जाइत छलाह तऽ बड़का बक्सा कागज सॅ भरल छलैन्ह। ‘हुनकर नाम की छलैन्ह?’ ‘सॉरी, मैडम हम अपन मेहमानक नाम नहिबता सकैत छी। अच्छा, अहॉ लेल मीठ की आनु?’ -‘आइ मीठ की बनेलहुँ अछि?’ ‘पीचमल्वा.....मेडिटेरियन पीच के स्वाद अपूर्व होइत छैक.....इटली सॅ मंगाओल गेल अछि। कान लग आबि पफुसपफुसाकऽ बाजल मैडम ई डिश हमरा एत खास मेहमान लेल छै।’ अच्छा! हमरा हॅसी लागल। ‘लऽ जाऊ?’ ‘हँ-हँ।’ हम जोसेफ कें कहलिए हम अपन कोनो ने कोनो उपन्यास मे तोहर पीच मल्वाक चर्चा अवश्य करब। फेर ओकरा हाथ मे किछ डालर दऽ ओकरा सॅ विदाई लेलहुँ। ऊपर जा कऽ सूति रहलहुँ भोरे चारिए बजे उठबाक छल। एक मन भेल जे एक बेर समुद्र देखि मुदा नहिगेलहुँ। निन्न टूटल आपरेटरक आवाज सॅ-गुडमार्निंग, मैडम, इट इज टाइम टू वैक अप।’ हड़बड़ाकऽ उठलहुँ। एयरपोर्ट या स्टेशन जयबा लेल हमरा हरदम हड़बड़ी रहैत अछि। जँ समय सॅ आध घंटा पहिने पहुँच जाइ तऽ कोन हर्ज? पहिने पहुँचने तनाव नहिहोइछ। डूयब्रवनिक एयरपोर्ट पर शायद हमहीं पहिल यात्राी छलहुँ। काउंटर खुजलो नहिछलै। हम कोना वला कुर्सी पर जा कऽ बैसलहुँ- प्लेन जखन उड़ि रहल छल। खिड़की लग हमर सीट छल। स्वच्छ नील आकाश, उज्जर-उज्जर ठाम-ठाम बादरि नीचाँ आल्प्स करे बर्फ सॅ झॉपल पहाड़ि। भूरा चितकबरा चटाðन पर बर्फक तिरछाह रेखा बुझाइत छल। असीम तनाव वला समय छल। लंदन सॅ घुरिकऽ घर आयल छलहुँ मुदा छलहुँ बेघर। सँजु बेचारा निरीह नेना। कखनौ पापाक अगवाज सुनि दौड़ैत अछि तऽ कखनौ मम्मी के कोरा मे बैसिकऽ दुलार मलार करै’छ। ‘मां अहाँ अहिठाम रहू ने? पापा क बातक दुःख नहिकरू। ओ तऽ सबके डँटैत रहैत छथिन। काल्हि राति दादी बड्ड कनैत छलीह। हम मने-मन सोचलहुँ-दादी एतेऽ बढ़ावा देलथिन आब कानऽ के अलावा की करतीह। पैंतालीस वर्षक एकलौता बेटा। आ हुनका जे संस्कार छैन्हि पुरुषक वर्चस्व वला ताहि हिसाबें बेटा क बात-व्यवहार अनुचित्त लगितो नहिछैन्ह। हमर संस्कार दोसर अछि हम सँजुक सहारा लऽ नहिजी सकब। ने जिनगीक सहारा बेटा भऽ सकै’छ ने पति ने प्रेम। हँ हिनक संग सहयोग सॅ जीयब सहज भऽ सकै’छ। मन केँ भरोस भेटैत छै जे अपन क्यो अछि हमरा संग। मुदा जॅ ओ संग नहिदेमए उनटे एकतरफा कर्त्तव्यक निर्वाह करैत अपन आहुति दैत रहि तऽ एक संग रहब कठिन भऽ जाइत छै। तैं हम अपना मन के मना लेने छलहुँ एकलाचलो रे जे संघर्ष करबाक होएत से करब। हम अपना दृष्टिकोण सॅ सही छी तऽ आनकऽ नजरि मे सही स्थापित करबा लेल कठिन तपस्याक कोन काज? बिल्कुल व्यर्थ। खास कऽ ई व्यर्थता क एहसास सॅ तखन आर कचोट होत छैक जखन बुझना जाइछ जे हमर बात सामने वला सुनऽ चाहिते ने अछि। अपना मन के कतेक तरहे बुझबैत छलहुँ मुदा हमर मन छल जे बुझियौ कें अबुझ बनल छल। हमर बेटा? एकलौता बेटा...... नहिनरेन्द्र किन्नहु नहिछोड़त। ओ नरेन्द्रक मुठीò मे छै कानूनो नरेन्द्रेक पक्ष मे छै। समाजो ओकरे संग देतै। प्रिया, अपना करेज पाथर पर राखू मुदा ओइ अबोध् नेनाकेँ बेघर नहिहोमऽ दिऔ। ओकरा अपना दादी सॅ लगाव छै पापा, पापा दिन भरि रट लगौने रहै’छ एको दिन पापा बिना नहिरहि सकै’छ। हँ, हमरो सॅ स्नेह छै-मुदा हमरा ओकरा जिनगी सॅ चुपचाप हटऽ पड़ल। दादी आ पापा सँजु केँ नीक जकाँ लालन-पालन कऽ लेथिन। प्रिया, स्वार्थी जुनि बनू ने अपना मातृत्व केँ महिमा मंडित करबा लेल बेचैन होउ। जँ स्वार्थी छी तऽ से स्वीकारि लिअ। कम से कम अपना आत्मा सॅ छल नहिकरऽ चाही। सत्य तऽ ई छै जे अहाँ बेटा सॅ वेशी अपना रोजगार कें चाहैत छी.....अहाँ के जँ स्नेह अछि तऽ अपना सॅ।मानलहुँ अपना आपके के नहिनेह करै’छ। इ हो बुझैत छी जे आइ धरि मात्रा महिले अपन आहुति दैत रहल अछि। मुदा से कियेक? अदौ से इएह होइत रहलैए तैं? मुदा जे अहॉ से होइत रहलै अछि सेह एखनहु होमए ई कोनो तर्क छै? तऽ..... हमकी करू?..... हे भगवान अइठाम ई अलाय बलाय सोचैत सोचैत हम पागल भऽ जायब। आ एकटा न्यरोटिक, राति-दिन कनैत-खीझैत मां लग कोनो नेना कतेक काल रहैत। एखन अबोध् छै दस वर्षक बाद बीस वर्षक युवा हमरा संग रहत किन्नहु नहिआ तखन हमर उम्र होएत पैंतालीस वर्ष! तऽ की पैंतालिसम वर्ष मे हम मृत्युक प्रतीक्षा करब? अपन समस्त स्वप्न कें आहूति दऽ दिअ?? भोर मे निन्न टूटल तऽ अपने सॅ पूछलहुँ-आब की करबाक चाही? आब कतेक दिन धरि कनैत रहू? आब कोनो ने कोनो रास्ता चुनऽ पड़त-अपन जंग अपने लड़ पड़ैत छै। नरेन्द्र सबसे पहिने हमरा नैहर मे हमरा मां क सोझा मे हमरा विरू( बात उठेलैन्ह-प्रियाक बड्ड गर्म मिजाज छैन्ह! मां, ओ चप्पल उठा कऽ हमरा देह पर पफेकलनि। सँजु तऽ हिनका डरें थर-थर कँपैत रहै’छ अहाँ तऽ एतेक दिन सँ हमरा मां के जनैत छी-अहीं कहू हमर मां कहियो हिनका कथु लेल रोक-टोक कयलथिन? मुदा ई कहियो अपन घर-गृहस्थी बुझलनि? सोझे मे कहैत छी पूछियौन्ह-कहियो भोजन बनौलनि? अहीं कहूॅ हिनका काज करबाक कोन जरूरत छै? ई कियेक भोर सॅ सांझि धरि खटैत रहैत छथि? ई हो नहिजे कलकत्ते मे रहैत छथि आइ दिल्ली काल्हि मद्रास। घर घुरलनि कि फेर लंदन तऽ अमेरिका। हिनका ऑपिफस सॅ सेक्रेटरी पफोन कऽ आया कें कहैत छै-‘मेम साहब के बक्सा सैंत कऽ राखि देबै’ ओ रतुका प्लेन सँ हांगकांग जयतीह।’ कहू तऽ आया बक्सा सैंत सकै’छ मम्मी कें हिनकर बक्सा सैंत कऽ राखऽ पड़ैत छैन्ह! की कहू ई अपन आलमीरा क चाभी धरि आया के सौंप कऽ चलि जाइत छथि। ऑपिफस सॅ हड़बड़ाइत औतीह आ विदा होमऽ लगतीह’ हमर मां दूध् क गिलास लऽ हुनका पाछू लागल रहैत छथि-प्रिया दूध् पी लिअ।’ बड़का भैया हं मे हं मिलबैत बजलाह। नरेन्द्रबाबू अहॉक कहब उचित अछि-सरासर प्रियाक गलती छै। अहू घर मे पुतौहु छै एकरा जकॉ करतै क्यो तऽ एको दिनबास नहिहेतै।’ सेह, बुझियौ अहां सब। विजय बाबू की सब कहू ई हमरा राक्षस, कसाई आ जानवर कहैत छथि।’ आब मां कें रहल नहिगेलैन्ह। गुम्हरैत बजलीह। ‘प्रिया तोहर ई हिम्मत! छीः छीः तू जन्म लैते कियेक ने मुइलें।’ नरेन्द्र, हम गलत के गलते बुझैत छिऐ अपन बेटी अछि तैं की हम एकर पक्ष कखनहुँ ने लेलिऐ से अहॉकें बूझल अछि।’ मां, से तऽ हम बूझैत छी मुदा ‘ई प्रिया तऽ सबटा दोष हमरे दैत छथि। जनै’ छी ई हमरा कहलनि अछि जे चौबिस घंटाक अन्दर ई हमरा जेल मे बंद करबा सकैत छथि। ‘कोन आधर पर?’ बड़का भैया गरजैत बजलाह। पर स्त्राीगमन.....मानसिक अत्याचार.....शोषण..... प्रिया एखन चुप्प कियेक छी बाजू ने की हम झूठ बजैत छी? कोन-कोन उपाध् िसॅ हमरा विभूषित करैत रहैत छी। हं, ई हमरे गलती अछि जे हम हिनका प्रेम मे पागल भऽ जे कहैत छलीह से करैत छलहुँ हिनका इशारा पर नचैत रहलहुँ। ई एक्सपोर्टक व्यापार करऽ चाहलनि हम यथासंभव सहयोग देलिएन्ह। हमरो भेल जे बैसल मन नहिलगैत छैन्ह हैंडी क्राफ्रटक काज छै मन लगतैन्ह किछु टको भऽ जैतेन्ह ‘हमरा ई कहाँ बूझल छल जे हिनकर महत्वाकांक्षाक सीढ़ि कहियो खत्म नहिहेतैन्ह। हिनकर लक्ष्य भारत सरकार सँ प्रथम पुरस्कार प्राप्त....... -नरेन्द्र ई सत्य छै जे हमरा पुरस्कार भेंटल मुदा हम कखनहुँ चर्चा कयलहुँ की एकर प्रचार कयलहुँ? ‘प्रिया, हमरा कहऽ दिअ-हम विवाहक बाद- पन्द्रह वर्ष धरि चुप रहलहुँ आब हम चुप नहिरहब। हम पलंग पर पड़ल-पड़ल करैट पफेरैत रहैत छी आ ई आबि कऽ कारपेट पर सूति रहैत छथि। बत्ती ऑफ कऽ कहतीह ‘हम बहुत थाकल छी आब सूतब’। हरदम इएह सुनैत छी-‘...हम व्यस्त छी विदेश सॅ ग्राहक आयल अछि।’ आ नहितऽ फाइलक गठठर लऽ औती घर ऑपिफस बनि जाइछ।’ - ‘एकर कोनो मध्यम मार्ग ताकल जाए।’ बड़की दीदी बजलीह। -‘पूछिऔ अपना बहिन सँ। काज दिनो-दिनो बढ़ले जाइत छैन्ह।.....हिनका हमरा सॅ कम्पटिशन छैन्ह........टका अहींटा नहिकमा स कैत छी हमहूँ कमा कऽ देखा सकै छी। एतेक अहंकार?’ ‘हम की बाजू नरेन्द्रक बाबू! ई बेटी तऽ हमर सभक नाक कटा देलक। समाज मे कतहु मुँह देखाबऽ योग नहिरहलहुज। आर बेटी अछि क्यो एना-तमाशा नहिकएलक। हमरा तऽ आब चिन्ता होइछ हमर पोती सभक विवाह कोना होयत जकर पीसी एहन छै?’ भैया तऽ आर मक्खन बाजी शुरू कयलनि। समय पर उधरी टका भेटैत छैन्ह नरेन्द्र सँ। मां अन्तिम निर्णय सुनौलनि-प्रिया, हमर बात एखनहुॅ मान सोझे चलि जो नरेन्द्र बाबूक संग।’ ‘प्रिया, मां ठीके कहैत छथि जे भेलै आब घर-गृहस्थी पर ध्यान दे। एहनघर-वर बड्ड भाग्य सॅ भेटैत छै।’ बड़की दीदी कहलनि। बड़का भैया डपटैत बजलाह-‘अगर एखन नरेन्द्र बाबूक संग नहिगेलें तऽ तोरा लेल अइ घरक दरवाजा बन्द भऽ जयतौ।’ छोटकी भाभी बजलीह-सरोज जी डाक्टर छथिन तइओ घरक खाना अपने बनबैत छथि। अहाँ आबहु चेत जाउ, लोक कहैए ताहि पर ध्यान दिऔ। सत्ते कहैत छी नरेन्द्र बाबू सन पति अग्रवाल हाउस सन सासुर भेंटत ने देवी सन सासु।’ ओह! सब एकतरफा न्याय कऽ रहल अछि एखन धरि सभक बात सुनि ऑखि सॅ टप-टप नोरे चुबैत छल। आब नहिरहि भेल हम अपन पफैसला सुना देलिऐ-ठीक छै सभक नजरि मे हमहीं दोषी छी। तऽ हमरा नहिचाही एहन घर ने एहन वर ने देवी तुल्य सासु ने अग्रवाल हाउस! हमर अपन खून, अपना कोखिके बेटा कानूनन नरेन्द्रे के हेतैन्ह। आब सब सम्हारथु नरेन्द्र।’ मां अहू उम्र मे कड़कैत बजलीह-‘प्रिया चुंप रहबें की लगाबिऔ-थापड़?’ हम ओइठाम सॅ चुपचाप उठलहुँ। बाथरूम मे जा कऽ हाथ मुँह धे नीचा उतरलहुँ। अपना गाड़ी पर बैसक विदा भेलहुँ। गाड़ी स्टार्ट भेला पर ओ सब बुझलनि। बहादूर गाड़ीक पाछू दौड़ल-गाड़ी रोकू प्रिया बौआ, मां जीक आर्डर छैन्ह.......।’ सब स्वाहा भऽ गेल। किछु नहिबाँचल। ने अपन खून अपन होइत छै ने पानि। तखन अपन ककरा कहल जाए? छोटी मांक कोर मे बैसल कनैत रहलहुँ। पारंपरिक संस्कार आ स्वभाव बाली छोटी मां हमरा घर वापस पठा देलनि। हम दिन भरि पलंग पर पड़ल-पड़ल अपन अतीत आ वर्तमान देखैत रहलहुँ। घर क मुँह पर आबि सासु बजलीह-‘कनियाँ भरि दिन उपासले रहब? आउ कनि खा लिअ।’ ओह! आब सासुमां के हमर ध्यान अयलैन्ह! ठीक बेटे बला स्वभाव। मां बेटा दूनू के पर-पीड़न में आनन्द भेंटैत छैन्ह। आजीवन अपने वेदनाक प्रतिमूर्ति बनि बेटाक सहानुभूति बटोरि पापा के बात कहलथिन। एकदम संवेदन शून्य छथि। मुदा बेटा लेल तऽ बड्ड संवेदनशील छथि। खैर हमरा अइ सब सॅ आब कोन मतलब? एखन तऽ हमर अपने आस्तित्व पर संकट अछि। एखन चोटाह सांप जकॉ पूफकार छोड़ैत नरेन्द्र पहुँचताह। भोजन करऽ गेलहुँ। मुदा दू कौर कहुना खा कऽ उठि गेलहु। बेचारा संजु मां-बापक लड़ाई मे पिसा रहल अछि। हाथ धे कऽ अयलहु तऽ सासु बजलीह। ‘प्रिया! घर नहिउजारू। एहन काज सॅ कोन फायदा। नरेन्द्र नहिचाहैत छै तऽ व्यापार छोड़ि दिअ। बात आगॉ’ नहिबढ़ाऊ।’ सँजुक सोझा मे मां क ई सब बाजब हमरा नहिनीक लागल। बजैत-बजैत चुप भऽ गेलहुॅ जे घर तऽ उजड़ि गेलै। अहॉक बेटा के हमर कोनो जरूरत नहिछैन्हि छ मास पर सेक्रेटरी बदलैत छथि। सब सुख भोगैत छथि। देखाबऽ लेल हम पत्नी छिऐन्ह। मुदा कहलिऐन्ह नहिकिछ। बुझल अछि मां अपना बेटाक कोनो गलती नहिस्वीकारती ठीक छै। हमहीं बदमाश छी। नरेन्द्र पहुँचलाह तऽ हम कहलिऐन्ह ‘हमरा किछ कहबाक अछि।’ ‘अहाँ के हमरा सँ एना लड़ब-झगड़ब...... -हम लड़ैत छी..... ‘शांति पूर्वक बाजू। हम कोनो समझौताक बात नहिकहि रहल छी।’ ‘तऽ की कहऽ चाहैत छी?’ काउंटर चैलेंज। हं, अहां एकरा ध्मकी कहि सकैत छी। अहां हमरा कहने छलहुँ ने जे बिजनेश बंद करबा सकैत छी?’ ‘हं, कहू तऽ कऽ के देखा दी।’ ‘व्यापार हमर अन्तिम सहारा अछि।’ आ अहि व्यापारक बलें अहाँ कूदैत छी। अहाँ ई जुनि बसरू जे अहाँ सफल उद्योगपतिक पत्नी छी।’ ‘देखू अहाँ फेर हमरा ध्मकी दऽ रहल छी।’ ‘ई ध्मकी नहि, आई मीन इट........ , तऽ की बाजू ने। हम इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, एक्साइज संग सभटा घुरी पफंदी क भंडा पफोड़ब देखब अहाँ कोना बचैत छी? ‘ओह! तऽ अहॉ अतेक धरि सोचि लेन छी तऽ आब इ सब करबा सॅ पूर्वहि अहॉक गरदनि दबा दी सेह नीक।’ हं, इहो सौख पूरा लिअ। हम थाना मे एफफ्रैंआईफ्रैंआरफ्रैं कऽ के आयल छी। हम मुइलहुँ त अइ संसार मे एक व्यक्ति एहन छै जे हमर मौत के बदला अहाँ सँ अवश्य लेत। पिशाच जकाँ विकृत हँसी हँसल नरेन्द्र। फेर व्हिस्कीक छूंट पिबैत बजलाह ‘अच्छा, ई इशारा सँजु दिस तऽ नहि। हम बेर-बेर कहि चुकल छी हमरा कुल-दीपक दिस कखनौ वक्र दृष्टि सॅ नहिदेखू अन्यथा.....।’ ‘सूनू नरेन्द्र हम सॅजु बिना रहब जीयब। अई झागड़ा मे हम बेटाक बलिनहिचढ़ायाब। हम नीना क बात कऽ रहल छी।’ नीना? नीना क नाम सुनिते भौंचक रहि गेलाह। आब गुम्म कियेक भऽ गेलहुँ। अहाँ बड़का व्यवसायी छी हमर व्यवसाय तऽ बड्ड छोट अछि मुदा हमरा जे अपन स्टाफक लॉयलटी भेंटल अछि से अहाकें नहिअछि। आ हमर गांहक सात समुद्र पार रहैत अछि जे हमरा सॅ चमड़ाक बैग किनैत अछि। हम सती सावित्राी छी-कि चरित्रा हीन ताहि सॅ ओकरा कोनो मतलब नहिछै’ तैँ एतेक हिम्मत! बौखलाउ जुनि। हमर बात पर ध्यान दिऔ। हमरा बस दू मासक समय दिअ, हम ऑपिफस, घर, जेवर कपड़ा आ सँजु के छोड़ि देब।’ एतबा कहि हम सीढ़ी सॅ उतरलहुँ। हाल मे सासु बैसल छलीह। हमरा तमतमाकऽ उतरैत देखि पूछलनि ‘की-भेल प्रिया?’ ‘नहिकिछ नहिहम अपना रूम मे जा रहल छी।’ केवाड़ बन्द कऽ लेलहुँ। करेज फाटि गेल। आँचर से मुँह बन्न कयने छलहुँ तथापि हिचकी बहरा रहल छल। हमरा संग सब दिन एना कियेक होइत अछि नेनपन सॅ एखन धरि कहियो चैन सॅ समय नहिबीतल। एना कियेक? हमर कोन अपराध् ?? दोसर दिन भोरे उठि सबसे पहिने मकानक दलाल के पफोन कयलहुँ....‘दो कमरे का छोटा सा फ्रलैट चाहिए, कम से कम सलामी। दलाल बेर-बेर पूछैत छल मिसेज अग्रवाल फ्रलैट ककरा लेल चाही। अन्त मे कहऽ पड़ल हमरा अपने लेल। ‘अपना लेल?’ ‘हां, आब वेशी पूछताछ नहिकरू।’ नहि, आब किछु नहिपूछब। बस हमरा दस-दिनुका समय दिअ पता लगा कऽ सूचित करब। ओना एकटा फ्रलैट कारनानी स्टेट्स मे खाली छै, आ आब ओइ बिल्डिंग के रेपुटेशन नीक भऽ गेलैए पहिलुका बला बात नहिछै।’ ‘अहाँ पूरा पता लगाकऽ बताऊँ।’ ऑपिफस जा कऽ हम सैम्पल सॅ भरल बक्सा वरेन के ध्रा देलिए। ‘आर्डर नीक भेंटल अछि....समय पर माल सप्लाइ कऽ दिऐ तऽ कोनो परेशानी नहिहेतै।’ ‘कतेक के आर्डर छै दीदी। ई पार्टी तऽ एखन धरि बहुत कम आर्डर देलक अछि।’ हुनका हमर माल पसंद छैन्ह तैं जतबा बना सकब ततेक ओ लऽ लेता।’ एकर बाद हम बैंक मे पफोन कऽ एफ्रैंजीफ्रैंएमफ्रैं सॅ समय लेलहुँ। हम जनैत छी-नरेन्द्र सॅ डेढ़ लड़ाई मे नहिसकब तैं सोझ बाट पकड़लहुँ। यूनियन बैंक पूरा सहयोगक वचन देलक। जँ एलफ्रैंसीफ्रैंपर माल जेतै तखन कोनो दिक्कत नहिहेतै। यूनियन बैंक सॅ हम सोझे इलाहाबाद बैंक गेलहुँ। चेयरमैन सॅ पार्टी मे परिचय भेल छल। कार्ड देखिते भीतर बजौलक। ‘हम यूनियन बैंक सॅ एकाउन्ट शिफ्रट करऽ चाहैत छी। अहाँ सॅ सहयोग भेंट सकै’छ?’ ‘पूर्ण सहयोग भेंटत। चेयरमैन फेर सब स्टेप्स एक-एक कऽ बुझौलनि। तकर बाद पूछलनि की हम जानि सकैत छी अहाँ बैंक कियेक बदलि रहल छी?’ बैंकर सँ कोनो बात नुका लेब गलत बुझाएल तैं साफ-साफ कहलिऐ-‘व्यक्तिगत कारण छै। हम पति, पत्नी फरक भऽ रहल छी आ फरक भेला पर पति हमरा लेल गारंटी नहिदेब चाहता।’ ‘अहॉ अपन व्यक्तिगत गारंटी की दऽ सकै’छ?’ ‘किछ नहि। मात्रा इएह जे हम ग्राहक दस लाख के रिवाइविंग एलफ्रैंसीफ्रैं खोलबाक लेल तैयार छथि।’ चेयरमैन कनिकाल गुम्म रहल फेर पूछलक-अहांक भाई वा दोस्त?’ ‘नहि, हम ककरो सॅ मदद नहिचाहैत छी आ हम तऽ एलफ्रैंसीफ्रैंक संग माल पठा रहल छिऐ।’ ‘वेश, मुदा जॅ कहियो ओवर ड्राफ्रिंटगक जरूरत पड़ए तऽ?’ ‘नहिसे जरूरत नहिहेत।’ ‘तखन कोनो समस्या नहि।’ दस दिन के भीतर कारनामी स्टेट्स मे फ्रलैट भेंटल कहियो एहिठाम छोटी मां रहैत छलीह। आब इएह हमर घर आ आपिफस। छोटी मां अहि मे रहैत छलीह, मुदा आइ जे एत रहऽ आयल अछि से अग्रवाल हाउसक पुतौहु नहिमात्रा ‘प्रिया’ नामक महिला अछि। लोक बुझि नहिपबैछ कहिया, कखन जिनगी क गति विस्पफोटक भऽ जेतै। आ कखन अतीत के पफेकि कऽ ठाढ़ भऽ जायत।’ ओई दिन नरेन्द्र सॅ हमर आखरी बातचित भेल छल। अन्तिम राति छल ओइ बड़का घर मे। भोर होइते हम अपन बक्सा लऽ सीढ़ि सॅ उतरैत छलहुँ। हमरा बक्सा लऽ उतरैत देखि सासु माथ पकड़िकऽ पाथरक मूरत जकाँ गुम्म बैसल छलीह। नरेन्द्र निरपेक्ष भाव सॅ नास्ता कऽ रहल छलाह। सँजु स्कूल गेल छल। हम जानि बुझिक अहि समय मे विदा भऽ रहल छलहुँ। सँजु स्कूल सॅ अयला पर की सोचत? फेर मन कहलक प्रिया कानूनन सँजु पर अहाँक कोनो हक नहिअछि। तखन करोड़ोक रोज सौदा करऽ बला ओकर बाप की बेवकूफछै ओ सँजु के मां क बदला टका सॅ स्नेह करब सिखा देतै आ मां क जे तस्वीर ओकर मन मे छै तकरा छहों छित्त कर खत्म कऽ देतै। आ सेह भेलै। हम अयलहुँ कारन नी स्टेट्सक फ्रलैट मे तऽ हमरा सॅ भेंट करऽ अयलीह सबसे पहिने नीना आ छोटी मां। छोटी मां हमरा अपना करेज मे साटि कानऽ लगलीह। हमर दुःख-दर्द आ एकाकीपीन के अनुभव इएह कऽ सकै छथि। नीना-हाथ बढ़ा कहलनि की हम अहॉक काज मे किछ मदति कऽ सकैछी अहॉ हमरा अपन छोट बहिन,दोस्त वा बेटी किछ मानि आदेश दऽ सकैछी। हम अपन जी, जान लगा देब मुदा अहॉके प्राण, प्रतिष्ठा पर खरोंच नहिलागऽ देब।’ फेर संजु आयल कनैत। हमर बेटा! ‘मम्मी, घर चलू ने...।’ ‘नहिबौआ हम ओतऽ नहिजाएब।’ ‘मम्मी हम की करू?’ ‘जे दादी कहथि से करब आ बेटा पापाक वात मानब।’ हमरा अपना खून मे पफेंटल पानिक एहसास भेल। सँजुक कोन दोष! जहिया सॅ जनमल स्वार्थे देखैत रहल अछि। अइ नेना कें पैद्य लोक कोन मूल्यक बोध् करौल कै। जेहन वातावरण मे रहै’छ ओहने बनत। आ बच्चा कें हमरा इमोशनल ब्लैकमेल करब बड्ड अनुचित बुझनाजाइछ। मातृत्वकें देखाबटी महिमा मंडित करबाक कखनौ-इच्छा नहिभेल। चारि वर्षक बाद सँजु अठारह वर्षक बालिग पुरुष भऽ जायत। हां, ओहि दिन सांझि मे हम नरेन्द्रक के पफोन के लिए कियेक तऽ ओई करोड़पति कें हमरा हिसाब देबाक छल जे हम की सभ अपना संग एतऽ अनलहुँ अछि-‘नरेन्द्र! हम सभटा ओतहि छोड़ि के आयल छी। मात्रा बीस पल्ला साड़ी आ अपन किताब एतऽ आनलहुँ अछि।’ बहुत बढ़ियाँ ध्न्यवाद!’ ‘हं, सँजु के कहियो-कहियो एतऽ आबऽ देबै, कहीं एहन ने होमय जे ओकरा देखबा लेल हमरा कोर्ट जाए पड़ए।’ ‘बड्ड तैश मे बात कऽ रहल छी?’ ‘नरेन्द्र! मनुषक भाषा मे बाजू। अपन घर कोन महिला छोड़ चाहै’छ? आ, अहाँ तऽ हमर बेटो के राखि लेलहुँ?’ ‘उचित कयलहुँ अछि। अपना कें सम्हारि लिअ सेह बहुत। अपन ठेकान नहिबेटा कें पालन-पोषण करतीह! विलायत आ अमेरिका बेटा के लऽ कऽ जायब? हाट फ्रयूचर कैन यू गिव हिम? टेल मी?’ हम व्यर्थ बुझैत छी किछ कहब दंभी व्यक्ति केँ नरेन्द्र आर किछ बकैत छल हम रिसीवर राखि देलिए। -प्लेन एमस्टरडाम के एयरपोर्ट पर उतरि रहल छल। हम अपन ब्रीफकेश बन्द कयलहुँ। हैंड पर्स मे टिकट, पासपोर्ट, टैªवेलर्स चेक सब केँ चेक कयलहुँ। एयरपोर्ट पर पिफलिप ठाढ़ छल। लम्बा सुदर्शन आकर्षक व्यक्तित्व उम्रक प्रभाव सॅ खिचड़ी पाकल दाढ़ी खूब फबैत छै। पिफलिप हमर दहिन गाल चूमैत पूछलक मित्रा, आब स्वास्थ केहन अछि? ‘एकदम नीक।’ ‘हॅ देखऽ सॅ एकदम प्रफेश लगितो छी।’ ओकरा ऑखि मे बहुत जिज्ञासा छलै। मुदा संकोच संभ्रान्त संस्कार क ब्रिटिश मैनरिर्ज्मा हरदम हँसैत छथि पिफलिप पर। जूडी अमेरिकन छथि। गाड़ी स्टार्ट करैत पिफलिप पूछलक की प्रोग्राम अछि? आब उतर देबहि पड़त। ‘पिफलिप हम लिखऽ चाहैत छी।’ - ‘कि?’ ‘अपन स्मृति। ओ सम्पूर्ण अतीत जकरा ठीक सॅ एखन सोचि नहिपयलहुँ अछि।’ ‘मुदा ककरा लेल?’ से नहिसोचलहुँ अछि। जूड़ी घरे पर छलीह गाड़ी सॅ उतरिते लपटि गेलीह। पिफलिप कहलकैन्ह-‘प्रिया एत एकान्त मे किछ लिखऽ चाहैत छथि।’ ‘वाह।’ कहि जूड़ी हमरा दिस तकलैन्ह। हम हुनकर हाथ नहुए दाबि कहलिऐन्ह हं, जूड़ी हमरा अहॉक सान्निध्यक, अहां दूनू गोटेक आवश्यकता अछि। हमर मनः स्थिति अहीं दूनू गोटे नीक जकां बुझि सकैत छी। ‘ओ. के. डियर! चलू हाथ-मुँह धे फ्रैंेश भऽ भोजन करू। पिफलिप चलि गेल। लगे मे ऑपिफस छै। छह बेडरूम बला मकान छै, पाँच टा गाड़ी, एकटा बेटी छै जे लंदन मे पढ़ैत छै। एत रहै’छ बस मियाँ-बीबी। पिफलिप के तरह-तरह के गाड़ीक सौरव छै। आ जूड़ी सॅ गप्प करबाक। हम फूसि नहिकहैत छी.... बड्ड भेटक दृष्टि छै ओकर आर-पार धरि सब देख सकै’छ। हम किचेन क पर्दा निहारि रहल छलहुँ। जूडि कोना बूझि गेल। ‘प्रिया, ए प्रिया कोन दुनियाँ क सैर कऽ रहल छी?’ -कतहु नहि। अपने अड़तालीस वर्षक लेखा-जोखा कऽ रहल छलहुँ। ‘जतेक सोचब ततेक सिलसिला टूटत।’ ‘सत्ते कहैत छी जुड़ी। क्रम भंग भऽ जाइछ। अपन सम्पूर्ण तस्वीर नहिबना पबैत छी। कखनहुँ माथ गायब तऽ कखनहुँ हाथ-पैर, अंग-प्रत्यंग छिड़ियाएल लगै’छ अजीब हैल्यूसिनेशन।’ ‘मन मे जखन जे घटना मोन पड़ए तुरत से लिख लेल करू।’ ‘मुदा एना लिखने आत्मकथा कोना हेतै।’ प्रिया हम वा अहाँ साधरण मनुष छी। सजि ध्जि कऽ क्रमानुसार विशिष्ट व्यक्तिक जीवन वृतान्त लिखाइत छै।’ वाह जूडी अहा सरिपहुँ जीनिइस छी। हमर सब समस्याक समाधन अहाँ लग रहैछ।’ -‘सब समस्याक नहि। कतेक बेर तऽ अहाँ आ पिफलिप कोनो समस्या मे तेहन ओझराएल रहैत छी जे हमरा ओइठाम सॅ उठऽ पड़ैत अछि। अच्छा चलू आब अहाँ अपन रूम देख लिअ।’ ‘वाह रूम बहुत मेहनत सॅ सजौने छी मन गदगद भऽ गेल। एहन नीक दोस्त भाग्य सॅ भेंटैत छै। ओतऽ’ कलकत्ता में एक-एक कऽ सब दोस्त घूटल जा रहल अछि। लगैछ जेना अपन शहर नहिहोमए। ओत क्यो अपन नहिरहल। मात्रा घर आ पफैक्ट्री अछि। साल मे छमास तऽ बाहरे रहैत छी। कहियो कतहु तऽ कहियो कतहु। हँ, दिल्ली या बम्बई जाइत छी तऽ क्यो पुरान परिचित भेंट जाइत अछि.......।’ -‘ए प्रिया नीचाँ आयब?’ ‘पिफलिप जूड़ि के मना कयलो पर हमरा शोर पाड़लक, ई ओकर आदति छै। ओ जाबत सबटा बात फरिछा कऽ बूझि नहिलेत ताबत सांस नहिलेबऽ देत। हमर जीवनक कोनो बात तऽ एकरा दूनू बेकती सॅ नुकायल नहिछै।’ कलम राखि नीचॉ गेलहुँ। एखन धरि मात्रा किछ प्वाइंट्स आ तारीख नोट कयलहुँ अछि। जूड़ी पूछलक ‘किछ लिखलहुँ की नहि।’ -‘नाम मात्रा।’ ‘अहाँ नी के छी ने कहैत हमर बॉही पकड़ि पिफलिप सोफा पर बैसौलक।’ ‘किछ नहि। पिफलिप हम अपना विषय मे लिखऽ चाहैत छी आत्मकथा तऽ नहिओकरा आत्म विश्लेषण कहल जा सकै’छ। ‘आ जूडी अहाँ........?’ हम जा रहल छी किचेन मे करीब आध घंटा हमरा लागत खाना बनाबऽ मे। ‘हं, तऽ प्रिया.....?’ की हँ, तऽ? ‘मतलब अहाँ कथा-पिहानी लिखब!’ ‘हँ, सेह सोचि रहल छी।’ ‘कतेक दूर धरि सोचलहुँ अछि?’ ‘की कहू।’ ‘की कहू नहि, लिखब शुरू करू।’ ‘हं, मुदा अजीब सन ब्लॉकेड लगै’छ एहन कोनो खास तऽ नहिअछि जहि सॅ हमरा जीवनीक प्रति ककरो रूचि होई?’ ‘ई, तऽ अहाँक जर्नल अछि ने?’ ‘हँ।’ पिफलिप सॅ गप्प करैत छलहुँ आ अर्न्तमन मे एकटा कथा जन्म लऽ रहल छल। गप्प करैत करैत पिफलिप एकाएक गुम्म भऽ गेल। फेर हमरा आगाँ हाथ हिला कऽ पूछल ‘प्रिया अहाँ कतऽ छी?’ हम वापस अयलहुँ। पिफलिप कहने छलाह-‘प्रिया, कखनौ कऽ अहाँ कें बूझब कठिन भऽ जाइछ। ‘तऽ छोड़ि दिऔ ने प्रियाक बूझब’ इ जूड़ी बजलीह। सत्ते जूडी पिफलिप पर खिसियाल छलीह-‘अहाँ फेर प्रिया के बिमार पाड़ि देबै, अपना ढंग सॅ रहऽ दिऔ।’ हम उठि कऽ अपना रूम मे आबि गेलहुँ। किछ नहिपफुराइत छल। बिछावन पर पड़ि रहलहुँ ऑखि मुना गेल। भोर मे ऑखि खुजल। खूब सूतलहुँ तथापि तन्द्रा मे बेचैन छलहुँ। पर्दा हटाकऽ खिड़की खोल लहुँ शीतल ताजा हवा नीक लागल। घड़ी देखलहुँ पांच बजै छै। आकाश ललछौंह छै एखन सूरज नहिउगैत। आकाश मे मेघ लागल छै। सामने लैम्पपोस्ट पर रौबिन चिड़ै बैसल छै। एत गोरैया नहिछै। जूड़ी क्लास लेबऽ रोज पचास मील गाड़ी चलाकऽ जाइत छै। पिफलिप अपन बी.एम.डब्लू या पोर्शे मे हजार मीलक यात्रा करै’छ। मुदा जखन दूनू-गोटे रहै’छ तखन ने देश पराया लगै’छ ने ई घर। जूड़ीक व्यवहार बड्ड नीक छैक स्वभाव अति मधुर। लगै’छ जूडीक जन्मे सॅ प्रज्ञा जागृत छै बिना किछु कहने सब बात बुझि जाइछ। लगै’छ जूडी जागि गेलीह नीचाँ कीचेन सॅ बर्तन क आवाज आबि रहल छै। ऊपर तकलक जूडी हमरा पर नजरि पड़िते विहुँसैत पूछलक-‘हाय, प्रिया राति मे निन्न भेल?’ ‘हँ, आ नहि।’ से की? असल मे हम सूतैते छी कम। मोन नहिपड़ैत अछि जेना लोक राति भरि चैन सॅ सूतैत छै तेना हम कहियो सूतल होइ! मानसिक त्रासदी मे क्यो कोना सूतत? तिल-तिल कऽ मरैत लोकक लेल आनन्द कहाँ? ‘आ जूडी अहाँकबूझल अछि तऽ एहन क्रूर भऽ कोना पूछैत छी?’ प्रिया, क्रूर हम नहि। क्रूर अछि अहाँक अर्न्तमन मे बैसल हजारो सालक परम्परा सँ ग्रसित रूग्न सोच जे अहाँ कें कहियौ चैन सँ रहऽ नहिदैत अछि। अपन उपलब्ध् िसॅ खुश नहिहोमऽ दै’छ। अहाँ स्वयं अपना प्रति आक्रमक छी। तैं सलीब पर लटकल अपने तरहथ्थी पर कील ठोकैत रहैत छी! की भेंटैत अछि आत्मपीड़न सॅ। ‘आत्मपीड़न?’ हमर स्वर आहत छल। गलत नहिकहि रहल छी। सोलह आना सच आत्मपीड़न। अहीं कहू की अहाँ के बुझि पड़ै’छ जे अहाँक जिनगी मे एकदम सन्नाटा अछि एकदम नीरस। हमरा लोकनिक कोनो महत्व नहिहमर प्रेम देखाबटी अछि? नीना आ छोटी मां क अहाँ लेल कोनो महत्व नहि? प्रिया, अहॉ पिफक्स इमजेक शिकार छी। पति, पत्नी, बच्चा...... पारम्परिक परिवार......’। ‘सॉरी जूड़ी हमरा बात सॅ अहाँ केँ तकलीफ भेल।’ तकलीफक बाते छै। अहाँ अपनो कनैत छी आ दोसरो के कनबैत रहैत छी। अहाँ सँ तऽ वेशी बुझनुक नीना अछि। नीना के लेल आगि होइ वा पानि सब कें जिनगीक र्ध्म मानैत अछि। ओकरा। जिनगीक मे एकटा लय छै गति छै ओकरा कखनौ एकाकीपन चूभैत नहिछै। जिनगी समस्त तूफान कें हँसि कऽ स्वागत करै’छ आ निर्भय, निःशंक भऽ जिनगी जीबैत अछि। ‘गुडमार्निंग लेडिज! की हम भीतर आबि सकैत छी?’ पिफलिप रसोई घरक, चौकठी लग हँसैत बाजल। फेर जिज्ञास कयल-‘की जूडीक सैशन भोरे-भोर शुरू भऽ गैलेन्ह?’ अरे नहि, पिफलिप! ई प्रियाक दिमाग खराब भऽ गेलैए राति-दिन अपने तन-मन पर चाबुक सॅ प्रहार करैत रहै’छ। ओना एखन गप्प करू ने तऽ बुझाएत तेहन-सन जेना एहन संतुलित क्यो भइए ने सकै’छ। ‘की डाक्टर के देखिते रोगी शान्त....।’ हम बजलहुँ। अरे चुप्प रहू बेवकूफ महिला! हम अहाँक दोस्त छी कोनो साइकियाट्रिस्ट नहि। हम जूड़ी लग जा कऽ ओकर हाथ चूमि लेलिऐ। ‘प्लीज, जूड़ी हँसी दिअ। हम अहॉक भावना बूझैत छी।’ ‘सुनू प्रिया......।’ अरे रे जूडी, अहाँक क्लास ग्यारह बजे सॅ शुरू होएत। एखन तऽ भोरका छः बाजि रहल छै.... -जुडि भभाकऽ हँसल-हम एकरा जतबे प्यार करैत छी ऐ इ ततबे.. ततबे की? हम जूडी दिस तकैत पूछलिऐ। ‘किछ नहि। आब हम चललहुँ स्नान करऽ अहाँ पिफलिप संग माथापच्ची करू।’ हम पिफलिप के कान्हा पर हाथ ध्ऽ घूमि कऽ जुड़ी दिस तकलहुँ जूडी खिड़की लग ढाढ़ि छलीह। हम पूछलिऐन्ह। ‘जूड़ी अहाँ स्नान करऽ गेलहुँ नहि?’ अहाँ कें दुखी छोड़ि कऽ हम कतहुँ नहिजायब, चलू ऊपर कनिकाल गप्प-सप्प करब। पिफलिप नौ बजे जयबा लेल कहने छलाह। जूडी कहलनि नहिहम सब संगे बहराएब। ग्यारह बजे अहाँ आ पिफलिप लंच पर आबि जायब आ हम अपना क्लास मे रहब। प्रिया, आइ एम सॉरी हम जानऽ चाहैत छी जे अहाँक सम्बन्ध् एहन ऊबाऊ कोना भऽ गेल? स्मरण करैत अतीतक घाव सॅ पीबऽ बहऽ लगै’छ श्रम सॅ बहार होइते एकटा निःशब्द दहशत घेर लै’छ। निरन्तर दुःखक सुरंग मे डूबि जयबाक भय। कठोर सत्यक सामना करबाक भय। स्वयं के भय। कठोर सत्यक सामना करबाक भय। स्वयं के प्रति संशय। अतीतक एहन कोनो हिस्सा नहिअभरैत छल जतऽ चोट, दर्द टीस नहिहोमए। थूरल-थकुचल बचपन जे झट सॅ किशोरी बना देलक फेर संघर्ष करैत औरत जे व्यवस्था सॅ समझौता करब कहियो सीखऽ नहिचाहलक। ईमानदारी सॅ तेहन ग्रसित मानसिकता अछि जे कोनो सम्बंध् मे बनाबटीपन या कृत्रिमता नहिस्वीकारि पबै’छ। सूनू, जिनगी के फेर सॅ शुरू करबाक लेल जीवित रहबाक लेल असीम साहस आ ध्ैर्य चाही। हम पश्चिमी महिला की कम संघर्ष कयलहुँ अछि? जखन हमर घर उजड़ल, बच्चा संग छोड़लक, साठि वर्षक पुरुष पाईक बल पर बीस वर्षक लड़की संग भोग करऽ लागल तखन हमहुँ सभ तिलमिला उठल छलहुँ। पुरूषक भोगवादी प्रवृति चरम पर छलै आ भोग्या छलीह हमर बहिन-बेटी। सामंतवादक नंगा नाच देखने छी। आइ तऽ कम से कम हम एतबा जनैत छी जे इलोना एक व्यक्ति जकाँ सोचैत अछि अपन निर्णय अपने लैत अछि अपना शर्त पर जीबैत अछि। ‘अहॉ ठीके कहैत छी।’ जूड़ी उसाँस लैत बजलीह-‘प्रिया, आब अहाँ तैयार भऽ जाउ। हमरो क्लास लेब जयबाक अछि।’ ‘जूडी अहाँ तऽ साइकियाट्रिस्ट छी ने?’ ऊँ हूँ सबटा भूमिका पाछाँ हम एकटा संवेदनशील महिला छीं महिलाकदुःख दर्दक अनुभव करैत छी। प्रिया, मात्रा अहींक शोषण नहिभेल अछि। प्रत्येक महिलाक अपन-अपन दर्दक तहखाना छैक।’ ‘जूडी, नरेन्द्रक संग जीवन-यापन करबाक लेल हम प्रत्येक क्षण समझौता करबाक प्रयास कयलहुँ मुदा सबटा असफल भेल। हम नीक जकाँ बुझि गेलिऐ नरेन्द्रक परिवेशक जे ढ़ॉचा छै ताहि मे कनिको फेर बदल असम्भव! हँ ओ चाहैत छल हम ओकरे अनुकूल भऽ जाइ ओकरे परिवेश मे दूध् पानि जकॉ हमर व्यक्तित्व घुलि जाए। मुदा हम ओइ ढंग सॅ ने सोचि सकलहुँ न ओइ अनुरूप हमर व्यक्तित्व बदलल। ई ककर दोष? तैं हम मात्रा अपने के दोषी बुझैत छी। नैहर मे मां, भाभी, दीदी सब बजैत छलीह मां जतबे प्रियाक विवाहक लेल चिन्तित छल प्रियाक ततबे नीक घर-वर भेंटलै। की ठाठ छै प्रियाक कतबो टका गनने दोसर बेटी कें एहन हैसियत बला घर-वर भेंटलै। कहै छै ने जे गुड़क मारि धेकड़े भोगैत छै सेह। हम केहन अभाव क अनुभव कऽ रहल छी से के बुझि सकै’छ हम अपना कंे एकदम एसगर पबैत छी क्यों हमर अपन नहिने मां, ने भाई-भाभी, ने दीदी एतऽ अपन पति छथि से हो अपन नहि। कखनौक मन मे होइत जखन हमरा सुख-दुःख मे संग देनहार क्यो नहिअछि तखन केहन रिश्ता-नाता? हमहीं कियेक ककरो लेल सोचू? विपत्तिकाल जॅ घर-परिवार समाज क्यो पूछनिहार नहितऽ ककर लेहाज करू कोन समाजक भय? समाज नाम क भीड़ केँ हम कहियो जानि पयलहुँ ने किछ बुझलहुँ। मनुष के जीवऽ लेल बहुत कम लोकक आवश्यकता होइत छैक से एतेक टा संसार मे हमरा अपन क्यो नहिभेंटै’छ? जे सबसॅ निकट अछि जकरा सॅ अपनापन बोध् होइत से तऽ बुझाइत जे हम आ नरेन्द्र उत्तरी आ दक्षिणी ध््रुव छी। दूनू क बात व्यवहार सोच सब मे आकाश-पतालक भिन्नता। मोन पड़ै’छ कॉलेजक दिन! ओ किताब-पोथी जाहि मे मानवीय मूल्य क विषय मे पढ़ने छलहुँ। सत्ते बहुत घुटन महसूस होइछ। व्यवस्थाक विपरीत चलऽ बला पुरुष के क्रान्तिकारी कहल जाइछ आ महिला के हेय दृष्टि सॅ देखल जाइछ। महिला कें कतहु ठौर नहि। तथापि हमरा नोर बहाबऽ बाली महिला नहिसोहाइत अछि। निष्क्रियता सॅ नीक संघर्ष करब। ‘कोनो महिलाकेँ अपन लड़ाई अपने लड़ऽ पड़ैत छै। जॅ महिला व्यवस्थाक प्रतिकूल पैर बढ़बैत अछि तऽ ओकरा कीमत ओकरा चुकाबऽ पड़ैत छै। हम जनैत छी जे भारतीय हमरा सभ पर हँसैत अछि ओ सभ बुझैत अछि जे पश्चिमी महिला बड्ड स्वच्छंद जीवन बीतबैत अछि कोनो रोक-टोक नहिजकरा संग मोन होमए राति बिताबी एतबे नहिहमरा लो कनि के घर उजाड़ऽ बाली बुझल जाइछ।’ हम स्वयं एहन बात नहिसोचैत छी।’ मात्रा अहॉ या किछ आंगुर पर गनऽ जोग लोक नहिसोचैत होइ मुदा भारतीय दृष्टिकोण इएह छैक। मुदा एकटा बात याद राखू इतिहास, समाजशास्त्रा मानव शास्त्रा वा मनोविज्ञान सभटा पुरूषक लिखल छैक इ मात्रा पूरबे नहिपश्चिमो मे। आज सच त इएह छैक जे कोनो पुरूष परिवर्तन नहिचाहैत छै ‘युग-युग सँ जे सुविध प्राप्त छैन्ह से कियेक छोड़ऽ चाहता।’ ‘जूडी से तऽ अहॉ सत्ते कहैत छी। व्यवस्थाक बाहर पैर रखने हमरा बहुत कठोर सजा भेंटल। अपना मन के हम टुकड़ा-टुकड़ा कऽ बॉटि लेलहुँ अछि।’ आब हम आत्मनिर्भर छी। अपना काज मे खूब मोन लगैए व्यस्त रहैत छी। हं, अतीत कें बिसरऽ चाहैत छी से नहिभऽ पबैए।’ ‘ओना प्रिया हम एकटा बात कहऽ चाहैत छी जे दुनियॉ मे सब पुरूष ने नरेन्द्रे सन छै ने डा बनर्जी सन। नीको लोक छै दुनियॉ मेँ।’ हं, जूड़ी, हम मानैत छी जे नीको लेक छै दुनियॉ मे। तऽ की महिलाक जिनगी क लक्ष्य सही सहचरक तलाश करब छैक? आइ धरिके अनुभवक आधार पर हम कहि सकैत छी जे पुरूषके सत्ताक लोभ रहैत छै। सत्य कहैत छी जूड़ी-एहन प्रेम हमरा लेल बड्ड कठिन अछि। समर्पणक ई परम्परा....ई तऽ दूनू दिस से होमऽ चाही?’ .....‘हूँ, पुरुष कहै’छ जे ओकर समर्पण देवत्वक प्रति रहै’छ तै ओ स्वयं भगवानबनऽ चाहै’छ। आ ओकर’ अपेक्षा रहैत छै जे महिला पुरूष के अपना सॅ वेशी महत मानि समर्पित भऽ अपन आहुति दै।’ मुदा से कियेक? अपना सॅ वेशी महत महत मानबाक कोनो तर्क छै? एतबे नहिजॅ आहूति देबऽ बला आहूतिक कीमत बूझै तऽ ओकरा कहल जाइछ जे निःस्वार्थ, शर्तहीन स्नेहक कीमत नहिहोइत छै ! हमरा तऽ अपना जीवन मे निःस्वार्थ स्नेह मात्रा दाई मां सॅ भेंटल। अन्यथा सब ठाम प्रतिस्पर्ध प्रतियोगिता, प्रथम पंक्ति मे बनल रहबाक कोशिक देखलहुँ। जूड़ी, पुरुष हरदम जीतऽ कियेक चाहै’छ? प्रिया, तकर मुख्य कारण छै जे ओ नीक जकाँ जनै’छ जे ओ दिनोदिन हारि रहल अछि। मालिक बनल रहबाक वा सत्ता के पकड़ने रहबाक एकटा भिन्न प्रकारक पीड़ा होइत छै। मुदा ओ किछ कऽ नहिपबै’छ। कोनो विकल्प नहिभेंटैत छै। ‘मतलब स्त्राी-पुरूषक सम्बन्ध्क अर्थ मालिक आ गुलाम! भोक्ता आभोज्या!! कहिया धरि, प्रिया कहिया धरि इ द्वन्द्व चलैत रहतै?’ ‘प्रिया! अहाँ कें अध्लाह नहिलागय तऽ एकटा बात कहऽ चाहैत छी। हम आ पिफलीप दूनू गोटे अइ विषय पर बहस कयलहुँ अछि आ हमरा ग्रुप थेरेपी मे अइ पर प्रायः चर्चा चलैत रहैत छै।’ एखन सभ्यताक संक्रमण काल छैक। तैं अहॉ एतेक कष्ट झेललहुँ। मुदा अइ कष्ट सॅ अहाँक भ्रम टूटल। अहॉ बनल बनायल रूढ़िग्रस्त व्यवस्थाक प्रतिकार कऽ पारस्परिकता क सम्बन्ध् स्थापित कयलहुँ। मुदा नरेन्द्र! ओकर चेतना त मालिकाना अहम तर दबले जा रहल छै। ध्न आ सत्ताक मद ओकरा केहन अहंकारी आ पागल बना देलकैए। ओ बूझैत छै टका क बल पर सब हासिल कऽ लेत। मुदा अहिं सोचि कऽ देखिऔ ओ की हासिल कऽ लेलक? ककरा सहानुभूति छै ओकरा सॅ? के स्नेह करैत छै ओकरा सॅ? ओकरा मुठीò मे बन्द भेल सँजु खुजल हवा मे साँस लेबऽ लेलि आकुलाइत नहिछै? आ कोन जीवन मूल्य देलकै अछि नरेनद्र सँजु कें? हँ, जूडी! हम अइ बात सॅ सहमत छी-मुदा कखनौ कऽ होइत अछि जे एकरा पाछॉ हमहूँ अपराध्ी छी। संजूक प्रति नरेन्द्र जकॉ तऽ नहिमुदा ओहि परम्पराक हिस्सेदार बुझैत छी अपना कें। तखन होइ ए जे सँजु कें हम अपना संग कियेक ने राखलिऐ?’ तऽ की ओ अहाँक संग रहैत? मानलहुँ दू-चारि वर्ष, रहि जाइत मुदा फेर ओ नरेन्द्र लग जाइत। ‘नहिजानि ओ रहैत, की नहि। मुदा हमरा कचोट अछि जे हम मां क भूमिका नहिनिभााहलहुँ। ओना तऽ एक तरहें अपन कोनो भूमिका क निर्वाह नहिए कयलहुँ अछि। भऽ सकै’छ सँजुओ हमरे गलत बूझए ओकरो मन मे इ बात उठि सकैत छै जे हम अपना महत्वाकांक्षाक कारण ओकर अवहेलना के लिऐ?’ ‘अहाँ जहिया इ व्यवसाय शुरू कयलहुँ तहिया ओ कतेक वर्षक छल?’ ‘बारह वर्षक।’ ‘तऽ अहीं कहू बारह वर्षक लड़का के मां क जरूरत रहैत छै की पिताक?’ ‘पिताक । शायद मां आ पिता दूनूक। बालवाइक सॅ करीब-करीब चालीस मील दूर जंगलक बीचो-बीच एकटा खूब सुन्दर रेस्टोरेंट छलै। पिफलिपक कोशे अपना गति सँ चलि रहल छलै। हम नहुए नहुए अपन सीट के कनि नीचॉ कऽ चित्त भऽ पड़ि रहलहुँ। ऊपर आकाश दिस तकैत छलहुँ पॉछा छुटैत गाछ बिरीछक कतार देखैत छलहुँ फेर कखनौ ऑखि मुनि लैत छलहुँ। कखनौ-कखनौ मित्राक संग कतेक सुख भेंटैत छै? पिफलिप आ जूडी केहन मन क मीत अछि। दूनू मे के वेशी अपनत्व दै’छ कहब कठिन। आइ धरि ने पिफलिप पूछलनि जे जूडी संग की बतिआइत छलहुँ ने जूडी कहियो पूछलनि जे पिफलिप संग की बात भेल। तनाव ग्रस्त मे हम एतऽ आबि गेलहुँ से नीके भेल। ‘प्रिया, अहॉक व्यापार केहन चलि रहल अछि? शिकागोक प्रदर्शनी केहन रहल? किछ आर्डर भेंटल?’ पिफलिपक स्वर सुनि हम मुनाइत ऑखि खोललहुँ।’ ‘नीक जकाँ चलि रहल अछि पिफलिप। प्रत्येक व्यापारक अपन व्यवस्था होइत छै, अहाँ व्यापार शुरू किये कयलहुँ? अहाँक टकाक कोनो कमी नहिछल?’ ‘जँ सच कहि तऽ टकाक अभाव छल। अमीरीक आवरण तर गरीब मनक ओछपनि झेलैत झेलैत हम थाकि गेल छलहुँ। कनि-कनिटा वस्तुलेल पाइ मांगऽ पड़ैत छल नरेन्द्र सॅ। एतबे नहिकथि मे कतेक पाइ खर्च भेलै से हिसाबो देबऽ पड़ैत छल। रोज अहिलेल बकझक होइत छल।’ से की? ‘नरेन्द्र सॅ खर्च लेल टका मांगऽ मे एक तऽ हमर स्वाभिमान आहत होइत छल दोसर ओकर बाद व्यंग्यवाण सॅ मानसिक तनाव बढ़ैत छल। टका दैत काल नरेन्द्र कहैत छलाह खूब पाइ उड़ाऊ, खर्च करऽ मे खूब मन लगैए आ जँ हिसाब मांगब तऽ रानी जी कहतीह हमरा सॅ दू-चारि टकाक हिसाब नहिलिखल पार लगै’छ। आखिर एतेक टका जाइ छै कतऽ पांच हजार टका हाथ खर्च लेल दैत छी।’ आ दोसर दिस घर खर्चा सॅ बांचल लाखो टका मम्मीक लगमे जमा रहैत छलनि जकर कोनो हिसाब किताब नहि।’ हम कतेक बेर कहनहु छलिए - ‘नरेन्द्र ओहि पाँच हजार टका मे सँजुक पढ़ाई-लिखाई कपड़ा लत्ता सब होइत छै। ‘तऽ कहैत छल ‘नरेन्द्र हमरा हिसाब चाही।’ ‘नरेन्द्र! हिसाब नौकर सॅ मांगल जाइत छै हम अहांक पत्नी छी।’ ताहि लॅ की मम्मी तऽ आलू-परबल किनैत छथि से हिसाब लिखकऽ रखैत छथि। की ओ घर क सदस्या नहिछथि?’ एहन मनुष्य सॅ के मुँह लगाबय हमतऽ कहियो नहिदेखलिऐ जे मम्मी आलू परबल के हिसाब लिखने होइतीह। बाबूजी सॅ मम्मी कहियो टका मंगैत नहिछलथिन जे अपना मन सॅ दैत छलथिन ताहि सॅ खर्च करैत छलीह। हमकहियो हुनका पाई मंगैत नहिसुनलिऐन्ह। नरेन्द्र तऽ कहियो समय पर पाई दैते नहिछथि। संजुक स्कूल सॅ रिमाइंडर अबैत छलै तऽ मम्मी जी अपन टका सॅ कहैत छलीह पफीस दऽ देब। ओ सत्ते व्यवहारिक छथि बेर-कुबेर लेल अपन टका राखने रहैत छथि। तखन पिफलिप बजलाहः कोनो व्यक्तिक किछतऽ अपन कौशलिया ;नीजि पाईद्ध रहैए चाहि। पॉकेटमनी पर दोसर के कोन अध्किार ओ तऽ खर्चे करबा लेल देल जाइत छै। जकर जेहन औकादि से ततेक टका बाल बच्चा आ पत्नीकें दैत छै। की कहू, पिफलिप! हमरा घरक बात अनोखे छै। जहिया नरेन्द्र कहैत छलथिन आइ घर पर भोजन नहिकरब ताहि दिन मम्मी रसोइ घर मे जा कऽ कहैत छलथिन महराज जी आइ छोटे बाबू खाना नहिखेथिन तैं हमरा तीनू गोटे ;मम्मी हम आ संजुद्ध लेल भरबा परबल बना लेब। अ। गनिकऽ छटा परोर दैत छलथिन। भनसिया आ नौकर दाई लेल आलू आ साग-पात। जँ कहियो कोनो काज लेल हम रुपया लैत छलिऐन्ह तऽ एकटा पुर्जा लिखकऽ थमा दैत छलीह प्रिया, अहाँक नाम पर एतेक टका अछि। कहबाक लेल तऽ हम बड़का घर क पुतौहु छलहुँ मुदा हमरा कोनो हक नहिछल। आ अइ बड़का घरक नौकर जाकर जँ ककरो कोनो आफत होउ तऽ ककरो लग मुँह नहिखोलैत बस आबि कऽ हमरे कहैत छल बहुरानी! हमरा सौ टका चाही बेटा बीमार अछि इलाज बिना मरि जायत। ककरो घर दहा-भासिया जाय वा आगि लागि जाइ तऽ कहैत छल बहुरानी! अहीं कें कहि सकैछी कहुना उबारि दिअ। छोटे बाबू या मां जी कें कहने कोनो फायदा नहि। बड़ा बाबू छलाह तऽ बेर-कुबेर बुझैत छलथिन। हम दऽ दैत छलिऐ। आ अइ सौ-दू सौ टका क हिसाब हमरा लग नहिरहैत छल। मां जी ककरो जँ सौ टका देतो छलथिन त प्रत्येक मास बीस-बीस टका काटि लैत छलथिन दरमाहा सॅ। हमरा सॅ एहन हिसाब किताब असंभव छल। दर्जी कपड़ा सीबि कऽ अनैत छलै आ जँ कहै ‘मां जी सिलाई दू सौ साठि टका भेल’ तऽ ओकरा अढ़ाई सौ दऽ कहैत छलथिन बस भऽ गेल आब एको टका नहि।’ हमर मन विचलित भऽ उठैत छल बेचारा दू-तीन हजारक कपड़ा सीब कऽ दऽ गेल आ अहाँ ओकर मेहनतक दस टका पचा लेलिए ताहि सॅ कतेक बचत भऽ जायत। हँ, एकटा हमर अपन व्यक्तिगत खर्च छल किताब कीनब जे नरेन्द्र के एकदम पिफजूल खर्ची बुझाइत छलैन्ह।’ ‘प्रिया नरेन्द्र तऽ एम.बी.एम. कयने छथि ने। से हो अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। तखन किताबक प्रति एतेक उदासीनता।’ हं, पिफलिप ओ अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। तइओ हुनक कहब छैन्ह ‘प्रिया अहाँ लाइब्रेरी मे जा कऽ कियेक ने पढ़ैत छी। मैगजीनक खर्च तऽ बुझबा मे अबै’छ मुदा ई हजारो टका क किताब? की कहू एकबेर पुस्तक-मेला सॅ किछ किताब किन कऽ अनने छलहुँ किताबक ढ़ेर देखि मन पुलकित छल होइत छल कखन खोलिकऽ पढ़िा। तखने नरेन्द्र अयलाह। किताब देखिते बजलाह-प्रिया अहूँ ध्न्य छी कोन जरूरी छल एतेक किताब किनबाक? हमरा जनैत ई देखाबऽ लेल किनलहुँ अछि आधे किताब पढ़ब नहि। टका फूकबाक ध्ुन अछि फूकि लिअ।’ ‘हमरा तत्काल किछ नहिफूरल गुम्मे रहि गेलहुँ। घर क पुरान ठाकुरा पच्चीस वर्ष सॅ काज करैत छल आब रिटायर्ड भऽ घर जा रहल छलै। हमरा लग आबि अपन दुखरा सुनाबऽ लागल-बहुरानी। अहीं घरक लक्ष्मी छी। छोटे बाबू त हजार टका हाथ पर घऽ देलनि बस भऽ गेलै। आइ जॅ बड़ा बाबू जीवित रहितथि तऽ.....।’ ‘........ठाकरा जी, मोन छोट जुनि करू। छोटे बाबू अहॉक बहुत चाहैत छथि अहाँ हुनका अपना कारे मे खेलौने छिऐन्ह।’ ‘नहि, बहुरानी नहि! आब हुनका किछ याद नहिछैन्ह। सभटा बिसरि गेलाह।’ हम आलमीरा खोली दू हजार टका आ नरेन्द्रक पुरान दू टा सफारी सूट अपन पुरान साड़ी आ सँजुक पुरान कपड़ा ठाकरा जी के देलिऐन्ह।’ भगवान अहॉ के भरल-पुरल राखथि। बहुरानी अहाँ लक्ष्मी छी लक्ष्मी। ओ हमरा आशीष दैत गेठरी बन्हैत छल तखने नरेन्द्र आबि गेलाह। हमर करेजक धुकधुकी बढ़ि गेल आ ठाकरा जी खुशी सॅ बजैत जाइत छल छोटे बाबू देखियौ बहुरानीक करेज केहन पैद्य छैन्ह देखू हमरा दू हजार टका देलनि अछि ई कपड़ा सब। भगवान सदा सुहागिन राखथिन।’ ठाकरा जी के जाइते बम गोला फाटल प्रिया, अहाँक कहिया बु(ि विवेक हेत? अहाँ ककरा सॅ पूछि कऽ दू हजार टका आ हमर सूट देलिए? की सभक मालकिन अहीं छी?’ ‘प्रिया, बुझि-सुझि कऽ कोनो काज करबाक चाही!’ सासु बजलनि। मने-मन बजलहुँ हँ, मम्मी जी अहाँ जकाँ नौकर-चाकर के कलपैत देखबाक सामर्थ रहैत तऽ नहिदितिऐ ककरो टका-पाई वा कपड़ा लत्ता। अहीं जकाँ एक के दू टका हिसाब मे लिखितहुँ तऽ हमरो बक्सा मे कपड़ा, टका भरल रहैत। आब सासु चुप्प छलीह। हुनको बदला बेटा गरजैत छलैन्ह ‘लुटा दिऔ सभटा, खोलि लिअ सदाव्रत।’ मम्मी आब अहीं कें सँजुक पढ़ाई-लिखाई, कपड़ा लत्ता लेल टका देब। प्रिया के मात्रा हाथ-खर्चा लेल देबैन्ह। सुनिकऽ स्तब्ध् रहि गेलहुँ। फेर नहिरहल गेल तऽ बजलहुँ ‘नरेन्द्र। हम की नेना छी? हमरा बूझऽ नहिअबैए? की हमर कोनो उसूल नहिअछि कोनो सि(ान्त नहि, कोनो मानवीय भावना नहि? अहाँ बजैत छी कियेक तऽ अहाँ कमाइत छी, घर क मुखिया छी?’ ‘हं, हं, हम कमाइत छी? कमाकऽ पाइ आनु तऽ बुझब।’ आब ओतऽ ठाढ़ रहब कठिन भऽ गेल हम अपना रूम मे आबि कानऽ लगलहुँ। एतेक अपमान घर क नौकर-चाकर सभक सोझा मे! मालकियत के एतेक अहंकार!! काल्हि पार्टी मे शंकर भैयाक सोझा मे गप्प हँकैत छलाह-पापा की छोड़ि कऽ गेलाह आइ दस करोड़ अछि हमरा हाथ मे। जे मन होए खाइ पहिरि। मन भेल कहिऐ जा कऽ नरेन्द्र जहिया अहाँ मरब तहिया संजु के कहि देबै ओ अहॉ लेल टकाक चिता सजाबए। घुटन बढ़ले जा रहल छल। मानसून सॅ पहिने जेना समस्त वातावरण मे उमस रहैत छै, अबैत-जाइत श्वास आकाश दिस टकटकी लगौने रहैत छै, कखन मेद्य लगतै बुन्न टपकैत जे लोक क तन-मन शीतल हेतै-तहिना श्वास प्रश्वास शीतलता लेल व्याकुल छल।.......... बात-बात मे ऑखि सॅ नोर ढ़रकैत छल व्यथा के मरहम लगएबा लेल मुदा आइ ऑखि मे जल नहिमात्रा उमस सूखा गेल नीर नयनक।..... नव टटका घाव छल मन-प्राण पर जाहि पर खूनक पपड़ी जमि गेल छलै दर्द सॅ स्याह भऽ गेल छल। सम्पूर्ण अस्तित्व मे टीसक अनुभव भऽ रहल छल। मन कुहरि छल टका-टका-टका जन्म सॅ एखन धरि वैभव बीच रहलहुँ मुदा हाथ पर कहियो टका नहिजेना छप्पन भोग परसल होमए मुदा मुँह मे एक कौर नहिजाए! ई पारिवारिक ढाँचा ऐतिहासिक छैक। आत्मग्रस्तताक सीमा पार ......ई लोकनि केहन ग्रस्त छथि टका सॅ? सासुके आलमीरा मे लाखोक समान छै मुदा.....। कम से कम मां स्वभाव सॅ भावुकतऽ छलीह। सन्तुलनक अभाव छलैन्ह मुदा मन होइत छलैन्ह तऽ सबटा उठा कऽ दऽ दैत छलथिन। हं, हुनका एतबे दुख छलैन्ह जे ओ आदरणीयॉ देवी नहिबनलीह ने घर मे ने समाज मे। नहिजानि कियेक ओई दिन मां के प्रति सहानुभूति भेल छल हुनक पीड़ाक बुझबाक प्रयत्न कयने छलहुँ। हमर सासु तऽ लोकक नजरि मे देवी छथि-आत्मदाह आ वेदनाक प्रतिमूर्ति। ककरो कोनो सहायता नहिकरैत छथि तथापि प्रशंसा होइत छैन्ह। बजतीह किछ करतीह किछ कथनी आ करनी मे कोनो तालमेल नहि। ई पापा कें हरदम महसूस करौलथिन जे ओ अपराध्ी छथि। बेटो के सह देलथिन बाप क प्रति घृणाभाव कें। पापाक सोझा मे तेहन दयनीय मनोभाव देखबैत छलथिन जे ओ सतत् क्षति पूर्तिक लेल प्रयत्न करैत रहलथिन। छोटी मां के काली मंदिर मे कालीजी क समझ पापा सिन्दुर लगौने छलथिन। तऽ की ओ विवाह नहिभेलै? धूर हमहू हदे छी की सोचऽ बैसैत छी आ कतऽ चलि जाइत छी। मन मे अबैत भाव आ विचार के छॉटनाई संभवो नहिछै। गाड़ी रूकल। देखलहुँ छोट सन एकटा रेस्टोरेंट सामने अछि। खूब पैद्य-पैघ बर्च आ पाइनक पेड़.......किछ आर गाड़ी लागल छलै। रेस्टोरेंट मे गेलहुँ कोना मे बैसैत पिफलिप सॅ पूछलिऐ-‘अहाँ किछ पूछने छलहुँ?’ ‘हं, एक घंटा पहिने अहाँ तऽ कल्पना लोक मे रहैत छी। फेर हमर माथ छुबैत बजलाह प्रिया रिलैक्स......आइ से रिलैक्स।’ नहिकहू ने की व्यापारक सम्बन्ध् मे पूछने छलहुँ?’ ‘कहैत छी ने हम किछ तेहन नहिपूछने छलहुँ। हे, देखिऔ केहन नीक रौद छै। खाना खा कऽ चलब टहलऽ। की लेब? नीक बवारियन वाइन मंगाउ? अहाँ के मीठ स्वाद बला डसर्ट बाइन नीक लगैत अछि।’ ‘एखन मोन नहिहोइए।’ बहुत अपनत्व सॅ देखैत बाजल-प्रिया अहॉ बहुत बहादुर महिला छी, एना जुनि करू टूटि जायब। आब तऽ अहॉ आत्मनिर्भर छी। अतीत के बिसरि जाउ। याद कयने कोनो लाभ नहिं’ ‘से तऽ सत्ते कोनो फायदा नहिछै। हम चाहैतो नहिछी बीतल बात मोन पारऽ जूड़ी ठीक कहने छलीह। शायद बीमारीक वजह सॅ वा व्यस्तातक कारण पछिला पन्द्रह वर्ष मे कहियो किछ सोचबाक पलखति नहिभेंटल।’ हम सब ग्रेप-जूस पी रहल छलहुँ जाहि मे छोट-छोट मिंट के पात आ संतराक छिलका क कतरन छलै। स्टुआर्ड आर्डर लिखैत छल-पिफलिप के हमर स्वादक वस्तु बुझल छैन्ह। डेनमार्क मे आलूके ततेक तरह क व्यंजन भेंटैत छै जे कि कहू। मक्खन, आलू, चीज आ चीनी सॅ छौंकल ऊपर सॅ नमक आ मरीच निबू संग मे वाइन .......... हम कोकाकोला लेलहुँ, खाना खा कऽ खूब टहललहुँ। पिफलिप पूछलक-‘हाफमैनक आर्डर कतेक के छैक?’ ‘करीब-करीब दू तिहाई।’ ‘हैंडबैग, की आर किछ?’ ‘सब मिलल-जुलल।’ ‘प्रापिफट?’ ‘मार्जिन तऽ बहुत कम दैत छै। मुदा ओकर तीनटा बात बहुत नीक बुझाइत अछि। समय पर एल.सी. खोलि दैत अछि। क्वालिटी कनिको गड़बड़ भेला परमीन मेष निकालैत अछि मुदा क्लेम नहिकरैत अछि आ तेसर बात इ जे रेगुलर आर्डर दैत अछि।’ ‘बड्ड तेज अछि हाफमैन। एहन खरीददार बड्ड कम भेंटत। हमरा तऽ जूडीक जिद्द के कारण एतेक नीक सप्लायर कें छोड़ऽ पड़ल। जूडीक कहब छै जे हमरा सभकें आर स्प्लायर भेंट जायत प्रियो के गाहक भेंटतै मुदा दोस्ती? ओकरा’ नजरी मे दोस्तीक महत्वपूर्ण स्थान छैक।’ आ अहॉक नजरि मे?’ सच तऽ ई छै जे जखन कलकत्ता या दिल्ली सॅ समय पर माल नहिभेंटैत अछि तऽ अहॉ सॅ समय पर माल नहिभंेटैत अछि तऽ अहाँ सन नीक सप्लायर कें हाफमैन सॅ जोड़बाक पछतावा होइत अछि। ‘पिफलिप एक तरहें ई नीके भेलै जे अहॉ ओइ समय नव-नव काज शुरू कचने छलहुँ तैं एल.सी.नहिखोलि पयलहुँ आ नरेन्द्र अहॉक संग हमरा काज करऽ दैत नहि। आब इ चमड़ाक व्यापार शुरू कऽ हमरा ई तऽ होइत अछि जे हम स्वयं काज शुरू कयलहुँ।’ ‘से नीके कहैत छी प्रिया! हमरा क्रेडिट पर माल लेबाक छल आ अहॉ क्रेडिट पर नहिदऽ सकैत छलहुँ। तखन बैंक सॅ रुपया लेबाक लेल हाफमैन सन पैघ व्यापारीक जरूरत छलै।’ हं, मोन पड़ल, नरेन्द्र अहाँकें ध्मकी देने छल। अहाँक बैंकक गारंटी वापस लऽ लेने छल। ओकर छह सात दिनक बादे तऽ हम सब कलकत्ता पहुँचल छलहुँ आ अहाँक माल तैयारो नहिभेल छल ने सप्लायर के देबऽ लेल टका छल।’ ‘तऽ अहीं एक लाख टका एडवांस देने छलहुँ आ हम अहाँ के सबटा बात साफ-साफ कहि देने छलहुँ।’ ‘हँ, तखन हमरा लाखे टका संग मे छल आर रहैत तऽ वेशी दितहुँ। ओहि दिन हम कहने छलहु फरक व्यवसाय शुरू करऽ लेल। मुदा प्रिया सत्य कहैत छी दैट वास्टर्ड। हम पुरूष होइतो ओकरा बुझि नहिपबैत छी।’ एकदम सही कहलहुँ! पिफलिप हमरो कतेक बेर मोन भेल नरेन्द्रकें गरियाबक! की कहू पिफलिप ओइ बेर लंदन सॅ घुरलाक बाद हम ओइ घर मे एक छत के नीचा रहैतो ककरो संग नहिछलहुँ। अन्त मे हमरा कठोर कदम उठाबऽ पड़ल।’ ‘से की?’ ‘ओ हमरा ब्लैकमेल करऽ चाहलक तखन हमरा ध्मकी देब पड़ल।’ एक बेर ओ चुप्प भेल। मुदा जखन ओ देखलक जे ओकरा बिना सहयोगक हमर काज सुचारू ढंग सॅ चलि रहल अछि तखन आर खुुंखार भऽ गेल। ओ अहंकारी पुरुष बर्दाश्त नहिकऽ पबैत छल जे पत्नी ओकरा बिना आगॉ बढ़ि रहल छै। ओह! पिफलिप अहाँ तऽ कल्पनो नहिकऽ सकब ओकर नीचताई के विषय मे।’ एतबा बजैत-बजैत प्रभाक स्वर थरथराए लगलैन्ह। ऑखि ऊपर उठलैन्ह गाछक पफुनगी पर होइत आकाश दिस तकैत रहलीह। पैरक नीचॉ सूखल पातक खर-खर स्वर। मन मे एहन हाहाकार जे चाहैत छलीह पिफलिप के करेज मे सटि खूब कानि। बहुत दिन सॅ ऑखि नोर सूखल छैन्ह फेर तुरत दोसर मन बरजैत कहलकैन्ह की जिनगी मे एकटा पुरुषक सम्बल एहन जरूरी छै? फेर मोन पड़लैन्ह जूडी कहैत छथि मात्रा महिले पुरुष सॅ सम्बल नहिचाहै’छ पुरुषो स्त्राीक सम्बल लेल आकुल-व्याकुल रहै’छ। हं, याचक बनिकऽ सम्बल कथमपि नहिस्वीकारि!’ हमरा नरेन्द्रक परिवार सॅ भनहिं किछ नहिप्राप्त होमए मुदा एकटा अदद वस्तु भेंटल अकारण आक्रमकता, निर्ममता मे डूबल व्यंग्य वाण जे शूल जकॉ गरल रहै’छ। ई इक्कैसम शताब्दीक समाज छैक की अठारहवीं शताब्दी से बुझब अइठाम कठिन। हम जखन कखनौ कोनो पार्टी मे जाइत छलहुँ तऽ सोझे-सोझे मुँह पर चाबुक मारैत शब्द उछलैत छल-‘आइ काल्हि अहॉकें एसगरे देखैत छी नरेन्द्र जी अहॉक संग नहिरहैत छथि?’ ‘नहिरहैत छथि।’ ‘कियेक?’ आब अइ कियेक के उत्तर की देल जाए? हम असमंजस मे रहैत छी लोक कनखी मारि एक दोसरा के किछ संकेत कऽ जहरीला हँसी हँसऽ लगै’छ। हम साहस कऽ बजैत छी इ हम्मर व्यक्तिगत सवाल अछि..बात पूरा होमऽ से पहिने व्यंग्यवाण पीठ पर भोंका जाइछ-अरे हमर सभक घरबला की व्यापार नहिकरैत छथि? प्रिया जी अहॉ किछ वेशीए व्यस्त रहऽ लगलहुँ अछि मिसेज वर्मा अहीं कहू ने हम फूसि बजैत छी? ‘हे हम की बाजू मियां-बीबी क झगड़ा जे बाजए से लबड़ा।’ एना पल्ला झाड़ने समाज मे काज नहिचलैत छै की मिसेज आहूजा? हं, हमरा विचार सँ तऽ महिला के समझौत कऽ लेबऽ चाही.....ई अनगिन व्यंग्यवाण आ आगाँ-पाछाँ बामा, दहिना गरल ऑखि सॅ लहुलुहान भेल मन-प्राण समस्त शरीर मे झुनझुनी-की बाजू कतेक प्रश्नक उत्तर दिऐ? संग कियेक ने रहैत छी?....कोन बातक झगड़ा.....? आब की एसगरे रहब.....? आअइ सभक मूक गवाह हमर सासु! हुनका लेल छन्न-सन क्यो हमरा किछ कहए हम कतबो आहत होउ ओ मूक मौन रहतीह, निरूत्तर पत्थरक मूर्ति जकाँ। हुनक एहन सर्द उपेक्षा क लेल कोनो आखर नहिभेंटैत अछि। जखन ओ पुतौहु लेल एहन संवेदनहीन छथि तखन छोटी मां लेल सहानुभूति क प्रश्ने व्यर्थ ओ तऽहिनकर सौतिन छथिन! उनटे हुनका होइत छैन्ह जे हम परम्पराक अनुसार कियेक ने व्यवहार करैत छी? जेना घरक पुतौहु रहैत छै तेना कियेक ने रहैत छी? से हो मुँह खोलि कऽ नहिबजतीह आ हुनक ई चुप्पी सौ-सौ बिच्छुक डंक मारै’छ हमरा मन पर। आ हम मुखौटा। लगा नहिसकैत छी जे हुनका हं मे हं मिलाउ। एहन ओ कऽ सकै’छ जकरा पीठ मे रीढ़ नहिहोई मरुदंडहीन मनुष मुँहदेख बजै’छ ओ जकरा कोनो क्षुद्र स्वार्थक पूर्ति करबाक होइ वा बहुत एहन जाहिल महिलाक सम्पर्क सॅ वेशी एक्सपोजर के कारण, खैर जे होइ हमरा क्रोध् होइछ पुरुष पर। खास कऽ ओहन पुरुष पर जे शक्तिशाली आ सामर्थ्यवान बुझै’छ अपना कें। शुरू मे हम सभटा बर्दाश्त करैत छलहुँ होइत छल एना कयने ओ सुध्री जयताह। तैं अपमान, वंचना सब चुपचाप बिना कोनो प्रतिरोध् कयने सहैत छलहुँ। आब तऽ एहन बात सब लिखबाक मोनो ने होइत अछि। ने हाथक कलम ओहन लिखबाक लेल तैयार होइछ। जीवन के जीवंत बनाबऽ लेल हम सबसे पहिने नरेन्द्र संग जोड़ल गेठबन्हनक गेंठ खोलनाई शुरू कयलहुँ। जतऽ जतऽ ओ हमरा संग जाइत छलाह ओतऽ हम अपना कें लूल्ह-नांगर महसूस करैत छलहुँ। पार्क स्ट्रीटक मोड़ पर एक दिन देखने छलिऐ लूल्ह-नांगर कें भीख मंगैत लागल जेना हमहूँ ओहने अपंग छी आ समाज सॅ स्वीकृतिक भीख मांगि रहल छी। हम कतेक आ कतऽ धरि। जे नितांत एकांत क्षण मे जखन नरेन्द्र लग मे रहैत छलाह अन्तरंग गप्प-सप्प वा कोनो क्रिया कलाप मे हुनक वर्यस्व-भाव आ व्यवस्थाक विषाक्त लहरि तनाव बढ़ा दैत छल। एकर परिणाम भेल जे हम नरेन्द्र सॅ दूर रहबाक चेष्टा करऽ लागलहुँ तथापि भयभीत क्षुब्ध छलहुँ। हरदम मन मे होइत छल जे नरेन्द्र नराज ने भऽ जाए। हमर सफलता सॅ जरैत रहैत छल तैं अपन सफलता पर खुशी सॅ वेशी ओकर प्रतिक्रिया डर होइत छल। सब दिन एके रंगक रूटिन छल। भोरे आठ बजे घर सॅ बहराइत छलहुँ दिनभरि काज मे व्यस्त रहैत छलहुँ घर आबितऽ घर गृहस्थीक काज मे ओझरा जाइ फेर पढ़ब-लिखब आध-आधा राति धरि जागले रहि। ऑखि मे नन्नि नहिढ़ेरो संशय कोनो राति चैन सॅ दूइओ तीन घंटा सूतल नहिहोएब। ‘की अहॉ के समाज सॅ डर होइत छल?’ नहि, पिफलिप समाज सँ नहिडर होइत छल पिफलिपक सर्कल सॅ। नहिजानि कियेक ओकर सभक सामना नहिकऽ पबैत छी। ओकरा सभक सोझा मे हम अपने कें अपराध्ी बुझऽ लगैत छलहुँ। ‘फालतुडर! अरे, अहाँ व्यापार करैत छलहुँ कोनो अपराध् नहितखन डर कथिन?’ ‘ई बात सही छै मुदा ई बुझऽ मे हमर आध जिनगी बीत गेल। नहिजानि ई केहन राजसिंहासन छलै जकर पाया पकड़ने-पकड़ने तरहत्थ लहूलुहान कऽ लेलहुँ।’ ‘प्रिया सम्मान ककरो क्यो दैत नहिछै ओ लेाक के स्वयं अर्जित करऽ पड़ैत छै।’ अच्छा, पिफलिप अहीं कहू हम की सभ अर्जित करितहुँ, की एहन कतहु देखलिऐ ए जे अपने घर मे आन जकॉ लोक रहए हम एना छलहुँ जेना ककरो कोनो मतलब नहि। एकदम उपेक्षित ककरो हमर कोना परवाह नहि। हमरा अपन पीठ अपने ठोकऽ नहिअबैत अछि ने हम अपना पीठ पर अपन त्यागक ब्यौरा साटिकऽ घूमि सकैत छलहुँ। तखन पफैसला हमरा पक्ष मे होइत कोना? हँ, ई संघर्ष सॅ एतबा सीख भेंटल जे जिनगी मे जँ एकटा गलत समझौता करै’छ तऽ सौटा गलत समझौता करऽ पड़ैत छै। अहाँ जँ एक व्यक्तिक पैर तर तरहत्थ रखबै तऽ आबऽ बला प्रत्येक व्यक्ति अहाँक तरहत्थ के पैर पोछना बूझत। ‘हं, ई एकदम शोध्ल बात बजलहुँ।’ आब हम चुप्प मने-मन सोचैत छलहुँ। केहन छल हमर अतीत? कखनौ क्षोभ, कखनौ असहय व्यथा झेलैत रहलहुँ तऽ जिनगी विध्ेयक बनैत कोना। सही आ गलत की होइत छै इ मात्रा नैतिक विवादक विषय नहितैं हम हरदम जिनगीक गुणवत्ता पर विचारैत रहलहुँ। ई केहन जीवन हम जीवि रहल छी? भविष्यक भयावह छवि के कोना सुधरू जे व्यवस्थाक ठेकेदारक नजरि बदलए। एकरा हमर जिद बुझिवा बेवकूपफी। असंभव करे कल्पना करब आ व्यवस्थाक चुनौती देब नीक बुझाइत छल। चटाðन सॅ टकराइत विघ्न-बाध सॅ जुझैत निरन्तर प्रयासरत छलहुँ। मुदा हमर समस्त प्रयास विफल भऽ रहल छल। असल मे संघर्ष करबा लेल जे हथियार छल से एकदम भोध् छल मुदा से बुझबा मे बड्ड समय गवां चुक्लहुँ। आब हमर मन हमरे सॅ पूछैत छल-कहू प्रिया, ककरो अहाँक जरूरत छै? तऽ विवेक उत्तर दैत छल-‘ककरो नहि।’ आ हमर अहम? ठोस एकटन लोहाक सख्त वजनदार ईगो कहैत छल नहिहम हार नहिमानब पैद्य से पैघ कीमत चुकाएब आर आहुति देब। देखै छी कोना क्यो उपेक्षा करै’छ? हमर जरूरत छै परिवार के समाज के हम नींव के पत्थर बनब। ई केहन अर्न्तद्वन्द्व मे हम पिसारहल छी मन क दू हिस्सा एकटा पूर्ण स्वतंत्रा सजग सतर्क दोसर डेग-डेग पर भय भीत। चारूभर बुझाइत छल जे सभक ऑखि मे प्रश्न प्रति प्रश्न छै व्यंग्य छै। सभके ई डरजे एहन महिलाक असर कहीं हमरो बेटी, पुतौहु पर पड़ि ने जाए। लोक हमरा सॅ एकटा दूरी बनाबऽ लागल। एहन खुल्लम खुल्ला अपमान! बिना कोनो अपराध् कयनहुँ लोकक लांछना!! नरेन्द्र क पत्नीक चालिचलन नीक नहिछै। आब हमरा ध्ैर्य संग छोड़ऽ लागल एहन बहिष्कृत जिनगी? हमर अपन परिवारक सदस्य, कुटुम्ब, अड़ोसी-पड़ोसी सभक चेहरा पर एकटा अजीब भाव भंगिया! अई सभक बहुत प्रभाव पड़ैत छलै सँजु पर ‘बेचारा ककर तरफदारी करत मां क की पापाक। आ हमरा होइत छल जे लोकक हमरा प्रति एहन धरण कोना बनलै? हम तऽ घर के जोड़ने रखबाक प्रयास मे रहलहुँ तोड़लिऐ कोना? आ नरेन्द्र के हमर सफलता पर प्रसन्नता होमऽ चाही शिकायत छै तकर साफ मतलब छै जे ओ हीन ग्रंथि सॅ ग्रसित छथि। हम न्यूरोटिक भेल जा रहल छलहुँ। हम जनैत छी जे पागल के इलाज भऽ सकै’छ मुदा जे स्वयं अपन न्यूरोटिस बुझैछ, जे बेर-बेर हिस्टिरिक दौरा पड़ला पर हिंसक आक्रोशक कारण अपने देह के थकुचए बकए हे भगवती हमरा लऽ चलू तकर कोन इलाज? एक दिन हमर काज-व्यवसाय मे हमर क्षमता बु(िमताक प्रशंसा होइछ दोसर दिन परम्पराक ठेकेदार के बहुत-बहुत शिकायत छैन्ह। तखन विचारलहुँ जे जॅ हम सफल व्यवसायी छी टका कमाइत छी तऽ अपन व्यक्तिगत समस्याक समाधन कियेक नहिकऽ सकै छी। एतेक पढ़ला लिखलाक बादो एना कियेक मनोविज्ञान बुझितो आक्रमक औदास्य आ डिप्रेशनक घुन जकाँ तरे-तर खा रहल अछि? महीना मे दू-तीन बेर दौरा पड़ैत अछि। ट्रिगर पाइन्ट तऽ नरेन्द्र अछि आ ओकर द्वेषभाव क्यो आमंत्रित कयने छलै पूरा परिवार के मुदा आब नरेन्द्र हमरा कतौ नहिलऽ जाइत छथि। क्यो पूछितो छैन्ह तऽ कहि दैत छथिन-ओ बड्ड व्यस्त छथि। जेकरा जे मोन होइत छै अनुमान लगबैत अछि। हम सोचैत छी दोसर औरत के घर आनऽ बला ई पुरुष हमरा पर हाथ उठबैत अछि, लोक क सोझा मे अपमानित करैत अछि तइओ ओ हमर पति अछि? इ हमरे गलती अछि जे हमर संवेदना गहींर अछि वा हमर मूल्यबोध् भिन्न अछि। दिन-प्रतिदिन त्रासदी मन क भीतर अपन पैशाचिक पंजा गड़ौने बिना नहिरहै’छ क्षत-विक्षत हृदय कहै’छ बस काज मे व्यस्त रहू सभटा बिसरल रहत। ई काजे व्सवसाय तऽ ग्रह अछि एकरे कारण एतेक अपमान होइछ...मुदा ई छोड़ि देब से हो असंभव! छोड़बाक प्रश्ने नहिउठै’छ? ‘प्रिया! बुझाइत फेर अहॉ कतहु भसिया गेलहुँ।’ ‘सॉरी पिफलिप! बात ई छै जे......।’ ‘आखिर अहॉ एतेक की सोचौत रहैत छी?’ पिफलिप कखनौ कऽ होइत अछि जे एहि व्यवसाय लऽ कऽ हमर दूनू गोटे मे दूरी बढ़ल?’ ‘प्रिया! असल बात ई छै जे नरेन्द्र सन पुरुष महिलाक महत्वाकांक्षा कें सहन नहिकऽ पबै’छ। भनहिं ओ आन सफल महिला दिस आकर्षित होउ मुदा अपना पत्नी कें दबाऽ कऽ रखबामे ओकर अहं संतुष्ट होइत छै हे, देखू अहॉ मे कतबो प्रतिभा होमए रहब हमरे अध्किार मे।’ अच्छा अहॉक कहियो जूडीक प्रति एहन भाव रहल अछि?’ प्रिया हम सत्य कहैत पता नहिजूडी अहाँ के कहियो कहलक की नहि। एलोना घर सॅ गेल तहिया सॅ हम दूनू गोटे पति-पत्नी सॅ वेशी दोस्त जकॉ रहैत छी। हमरा दूनू गोटे के एक दोसरा क प्रति परस्पर स्नेह सद्भाव अछि। हमरा ओ सम्मान दैत छथि आ हम हुनका सम्मान दैत छिऐन्ह स्वतः कोनो दबाव नहि। हुनकर काजक महत्व दैत छिऐन्ह ओ हमरा काजक महत्व दैत छथि। मुदा नरेन्द्र मे परस्पर प्रेम क भाव नहिछै ओ अपना के अहॉक मालिक बुझैत छथि। वास्तव मे अहॉक देश मे पति क वर्चस्व रहलैए तैं जॅ पत्नी चेतन शील रहैत छै तऽ वैवाहिक व्सवस्था दम तोड़ऽ लगैत छै।’ हम एकदम चुप्प भऽ गेलहुँ। पिफलिप इमानदारी पूर्वक उत्तर देने छलाह हम हुनक बात सॅ सहमत छी। भोजन परसल गेल मेज पर। दूनू गोटे चुपचाप खाइत रहलहुँ। मुदा हमर मन चुप्प नहिछल दिमाग मे चलैत टेप-रेकार्डर के बन्द करब अपना वश के बात नहि। हम नरेन्द्र के अध्ीन भऽ जे काज करैत छलहुँ से हुनका नीक लगैत छलैन्ह। मुदा जहिया सॅ हम अपन स्वतंत्रा निर्णय लेब लगलहुँ तहिया सॅ हम पफुटलो ऑखि नहिसोहाइत छलिऐन्ह। बात-बीत मे टीका-टिप्पणी। जहिया हमरा घर सॅ बाहर जएबाक रहैत छल अरबैध् कऽ तहिये घर मे पार्टी क आयोजन होइत छल। हमरा सम्पर्क मे जे अबैत छल तकरा ओ देखऽ नहिचाहैत छलाह। आइ घरि कहियो हमरा व्यवसाय के विषय मे कोनो उत्सुकता देखौलनि ने किछ पूछलनि। जहिया पहिल बेर हाफमैन सँ हमरा आर्डर भेंटल छल हम बहुत प्रसन्न छलहुँ। हुलसैत कहने छलिऐ ‘नरेन्द्र आब तऽ अहाँ ई स्वीकारब जे हम स्वयं अपना स्तर पर नीक व्यवसाय कऽ सकैत छी?’ ‘तऽ की अहाँ स्वयं कयलहुँ अछि? हाफमैन सॅ परिचय तऽ ओ अहॉक मित्रा की नाम छै.....पिफलिप हां पिफलिप करौने छल।’ ‘अहॉ की बुझैत छिऐ जे मात्रा परिचय सॅ काज भऽ जाइत छै?’ हं, होइते छै।’ एहन विबाह बोल सुनि हम गुम्म भऽ गेलहुँ। अइ व्यक्ति संग गप्प करब असंभव। हमरा दूनू गोटेक बीच एकटा विचित्रा जंग चलि रहल छल। हम ई नहिकहैत छी जे हमरा मे कोनो कमी नहिअछि हम तऽ शुरूहे सॅ मुँहदुब्बर अन्तर्मुखी लड़की छलहुँ। कहियो बहादुरीक मुखौटा लगएबहु ने कयलहुँ। सभा-सोसायटी, पार्टी/भीड़भाड़ मे एकदम असगर भऽ जाइत छी आ तखन हमर ऑखि ताकऽ लगैत छल नरेन्द्र केँ। जेना भीड़ मे नेना मां के तकै’छ। आ अई समस्त प्रक्रियाक प्रमुख कारण हमरा दृष्टिकोण सॅ अत्यअध्कि संवेदनशीलता वा आत्मविश्वासक कमी। हम नरेन्द्र कें कतेक बेर कहने छलिऐन्ह ई पैद्य लोकक सोशल सर्कल, ब्याह क भोजभात, कॉकटेल पार्टी मे हम सहज भऽ नहिरहि पबैत छी बहुत असहाय अनुभव होइछा एकतऽ घंटो पहिने तैयार होमऽ मे लगै’छ फेर डर कोनो ने कोनो कमी बताकऽ नरेन्द्र भरि बाट बजताह.....अहाँ के कोनो लूरि नहिअछि....केहन साड़ी पहिरलहुँ आ अहॉक लग मैचिंग जेवर नहिअछि....कार्टियार बला घड़ी क अंचार बनैत......? अपना देहो पर ध्यान नहिरहै’छ कतेक मोट भेल जा रहल छी। ऑखि डबडबा जाइत छल.....नरेन्द्र अहॉक ई भाषण सुनैत सुनैत हम हीनभाव सॅ ग्रसित छी आब अपनो नजरि मे.... हम स्वीकारैत छी जे हम अहॉक लायक नहिछी। हम देखैत छी जे पार्टी मे अहाँक आगाँ-पाछाँ, बाम दहिन एक सॅ एक रूपसी डोलैत रहै’छ ओइ रूपसी मे ककरो कोनो विषयक अध्ययन-मनन मे रूचि नहि, अपन कोनो व्यक्तित्व नहि। ओई सर्कल मे पाँचो मिनट क्यो कोनो विषय पर गम्भीरता पूर्वक बाजि नहिसकै’छ तथापि सब मगन रहै’छ हमहीं ओतऽ असहज भऽ जाइत छी। तइओ कोशिश करैत छी व्यवहारिक बनबाक, अहाँक अनुकूल बनबाक कोशिश करैत छी अपन व्यथित अतीत के बिसरबाक। मन होइत छल जे अहाँ के अपन मित्रा बनाबी मन क बात कही - सुनी मुदा ने अहॉ कखनौ शान्तिपूर्वक हमरा लग बैसलहुँ ने कहियो पूछलहुँ कियेक उदास छी? की हम अहॉक पाछू दौड़ैत-दौड़ैत अपन अतीत सुनाबितहुँ? दोसर बात ई जे जाबत अहॉ चैन सॅ नहिसूनब ताबत अध्खरू बात पर उखड़ि जायब अंट-संट बाजऽ लागब हमर कुंठित व्यक्तित्व के एकटा आर विशेषण दऽ देब। कियेक त अहॉक तर्क मे दू आ दू मात्रा चारि होइछ। अहॉ कहब प्रिया दू आर दू कहियो पाचँ नहिभऽ सकैछ? असंभव छै- प्रिया। ‘प्लीज बी लॉजिकल ....’ इएह तऽ अहाँ कहैत रहलहुँ अछि। तै ॅ नेकहलहुँ अतीत क व्यथा कथा ने कहब। एतेक वर्षक बाद आब हम अपन अतीत के बूझऽ लगलहुँ अछि। मात्रा बुझिए सकैत छी ओकरा बदलल नहिजा सकैत छ। वेटर पिफलिप के प्लेट उठा रहल छलै। हम जल्दी-जल्दी खालि कयलहुँ। पिफलिप बात ई छै जे हमरा अर्न्तमन मे जबरदस्त विरोधभास शुरू भऽ गेल अछि। हम नरेन्द्र केँ कहने छलिऐन्ह-हमारा कनि समय दिअ । जिनगीक एक विशेष। स्थिति सॅ जूझि रहल छी। सन्तुलन बनयबाक प्रयास कऽ रहल छी। हमरा घर मे अबिते स्वंय महसूस होइछ जे हम सासुक नजरि मे नीक पुतौहु नहिछी ने अहॉ लेल नीक पत्नी ने सॅजुक नीक मां। मुदा हम की करू समय के अभाव तैं कोनो भूमिका मे सफल नहिभेलहुँ। ‘अच्छा ई कहूँ जे अपना व्यवसाय तऽ अहॉक बहुत यश प्रतिष्ठा देलक’ से नहिमहसूस करैत छी? पिफलिप! होइछ अनुभूति। मुदा समस्त सफलताक बादों हृदय स्थल मे जे घाव अछि। तकर टीस बेचैन कऽ दैत अछि। एकटा एहन समय छल जहिया घर-बाहर सभठां लोक-हमरा सूली पर चढ़यबाक लेल सदिकाल आतुर छल। समाजक ठेकेदार केँ शायद मन होइत छलनि जे एक औरत एना विरोध् - भेलो पर व्यवसाय कऽ रहल अछि विदेश-धरि एसगरे जाइछ तऽ एकरा देखा देखी दोसरो घरक बेटी - पुतौहु के हिम्मत बढ़तै, ओ आत्मनिर्भर होेएबाक प्रयास करत।’ ‘पिफलिप बजलाह हे, कनि रूकब हमरा पिआस लागल अछि।’ हं, हं कियेक नहि? गाड़ी सॅ उतरि हमहूँ डॉर सोझ कयलहुँ। पाइन आ बर्च के बड़की-बड़की टा गाछ। पैरक नीचा सूखल पात। कनि ठंढ़ दुपहरक मीठका रौद। पिफलिप नहुॅए सॅ हमरा कन्हा पर अपन - कोट ध्ऽ दैत छथि एक दोस्तक गर्म संवेदनाक अनुभूति ..........निःस्वार्थ स्नेह ....एहन दोस्त भाग्य सॅ भेंटैत छैक। ‘शायद एहन दोस्तक स्नेह-सदभाव नहिभेंटैत तऽ शायद हम किछ नहिसकितहुँ अथबल भऽ बड़का घर मे नोर चुबैत बैसल रहितहुँ। मुदा आब दोस्तक प्रोत्साहन सॅ लगैछ जीनाई सीख लेलहुँ। अइ ध्रती पर हमरा हिस्साक हवा, पानी आ रौद सब प्राप्त अछि। अपन एक गति अछि लय अछि जे हमरा आगॉ बढ़ा रहल अछि। प्रिया, पहुँचऽ कतऽ चाहैत छी?’ ‘पिफलिप! सदिखन लोक चलैछ कतहुॅ पहुँचबा लेल नहि! ओहुना चलैत रहब बिना उद्देश्य के ताहु मे एकटा आनन्द छै।’ ‘ओह प्रिया! अहॉ तऽ दार्शनिक छी हम नहितैँ अहाँक एहन भाषा बुझब हमरा लेल कठिन अछि।’ ‘ऊँहूँ दर्शन नहि। असल मे अइ त रहक अहाँ के अनुभव नहिभेल अछि तऽ बुझबै कोना? जखन मन क बात दबबैत-दबबैत ऑखिक नोर सूखा जाइत छै तखन....’ - ‘की तखन की होइत छै?’ बुझाइत छै जे करेज पर राखल पाथरक बोझ सॅ साँस बन्द होमऽ लगैल होए। आ अतीत हुलकी मारऽ लगैत छै.........। ‘पहिने दर्शन आब कविता! प्रिया अहाँ के बूझल अछि हमरा साहित्य सॅ कहियो नाता नहिरहल.......’ ‘हम भभाक हँसैत छी। की सत्ते पिफलिप-अहॉ किछ नहिबुझलहुँ! एतेक काल सॅ हम व्यर्थे बक-बक कयलहुँ।’ प्रिया, अध्लॉह नहिमानब मुदा एकटा सच छै जे अहाँ एखनहुँ अपन अतीत। रूढ़िवादी समाज आ घर परिवार सॅ मुक्त नहिभेलहुँ अछि।’ हं, जूडी कहैत छथि जे एकर कारण छै- ज हम अपराधबोध सॅ ग्रसित छी। की अहॉ ककरो हत्या कयलहुँ अछि की चोरी डकैती?’ -‘किछ नहिमुदा अपना पैर ठाढ़ एक आत्म निर्भर महिला केँ स्वीकारऽ मे समाज के समय-लगतै। खैर, अब चलू घर। चारि बाजी रहल छै जुड़ी आबि गेल होएतीह।’ गाड़ी पर बैसलहुँ। पिफलिप चुप छल। हमरा चुप्प नहिरहि भेल मन क बात बाजिए देलिए-पिफलिप! मुइल सम्बन्ध् केँ उघऽ मे जतबा शक्ति लगैत छै तकर चौथाई शक्ति मे व्यापार चमकऽ लगैत छै। अपना पर क्रो( होइत अछि जे नरेन्द्र के बुझऽ समझऽ मे एतेक समय कियेक नष्ट कयलहुँ।’ ‘होइत छै एहन। अहाँक की बुझाइए जे हमरा मन मे कोनो द्वन्द नहि अछि?’ आब हम चुपचाप सौन्दर्य निहारि रहल छी खाली-खाली सड़क साफ आकाश मन हल्लुक लगै’छ ठीक कहैछ पिफलिप आ जूडी सबके कोनो ने कोनो समस्या रहैत छै। -पिफलिप कतेक दिन धरि आपसी तनाव झेलने अछि। समय एकरंग सब दिन नहिरहै छै। पिफलिप बड़ी काल सॅ गुम्म छलाह। एकाएक पूछलनि -‘अहाँ एतेक भावुक कियेक भऽ जाइत छी’ व्यस्त रहबा लेल ढ़ेरो काज अछि?’ की कहू पिफलिप हम तऽ अतीत बिसरि गेल छलहुँ आ वर्तमान मे आन कहिया अपन बनि गेल से बुझबो नहिके लिए। हम बेटी ककर छी सेह नहिबुझैत छलहुँ मां के बदला दाई मां हमरा पोसलनि अपना सासु के बदला छोटी मां सम्हारलनि। छोटी मां अपन गहना बेच कऽ टका देलनी जाही सॅ हम दमदम बाला पफैकट्री लगाबऽ लेल। काज मे हमरा सब दिन मोन लागल। आ आब तऽ हमर द्वन्द्व खत्म भऽ गेल। ओकर बाद तऽ कोनो परेशानी नहिभेल? कोनो प्रकारक दुःख?’ हं, एकबेर जहिया सँजुक विवाह छलै ओ बाप सँ लड़िकऽ आयल छल हमरा बजाबऽ।’ अहाँ गेल छलिऐ विवाह मे?’ ‘नहि’ ‘से कियेक?’ ‘जाहि घर मे छोटी मां आ नीना नहिजा सकै छ ओतऽ हमरा जयबाक प्रश्ने नहिउठै ‘छ’। ‘तखन तऽ सत्ते अहाँ के बहुत दुःख भेल होएत आ सँजुओ के खराब लागबे कएलै ओ फेर कहियो घुरिकऽ आयल नहि।’ ‘मुदा हमरा अपना ईमानदारी पर संतोष भेल।’ -‘तऽ अहाँ पहिल बेर कहिया पुतौहुक मुँह देखलहुँ?’ -निधि ;हमर पुतौहुद्ध एक दिन चोरा क आयल छलीए बेटा के लऽ कऽ। हम निध् िके ओ कंगन देलिऐन्ह जे - छोटी मां हमरा देने छलीह। सँजु सॅ वेशी इमानदार छथि निध् िसंवेदनशील - बु(िमती । मुदा पिफलिप सच कहैत छी आब हमरा लेल ई समस्त संसार अपने बुझाइछ पहिने जे अपन कहऽ बला रिश्ता-नाता क संकीर्ण घेरा छल जकरा हम शाश्वत बुझौत छलिऐ से सम्मोहन आब टूटि गेल।’ ‘तऽ की आर बात क दुःख अछि?’ नहि, आब कनिको दुःख नहि होइछ। हं, शुरू मे दुःख होइत छल जहिया सीमित परिध् िसॅ - बहरएबाक प्रयास करैत छलहुँ। पिफलिप दू-तिहाई जिनगी खत्म भऽ गेल व्यर्थक विवाद मे। देखल स्वप्न टूटि गेल छल चाहैत छलहुँ नया सपना देखि, शरीर चाहैत छल स्नेहक स्पर्श। नरेन्द्रक नहि...... एक पुरूषक जे हमरा बूझए हमर दोस्त बनए।’ ‘बुझाइछ जे कॉलेजक समय जे अहाँक अपफेयर छल तकरे याद अबैत होएत।’ ‘नहि, पिफलिप ! ककरो याद स्पष्ट वा आवेगमय नहिछल तखन एसगर नीक नहिलगैत छल। जखन हम छोटी मां आ नीना भोजन करऽ बैसैत छलहुँ तऽ होइत छल जे कोनो पुरूष उपस्थित रहैत....... पापा रहितथि वा नीना क विवाह ककरो सॅ भेल रहितै? होइत छल जेना हम तीनू महिला समाज सॅ कटल छी। फेर तकर बाद?’ ‘बाद मे बुझना गेल जे आत्मनिर्भर महिलाक लेल पारम्परिक बन्हन तोड़ब कठिन नहि।’ गाड़ी ध्र के सोझा पहुँच गेल छल। गैरेज खोलि पिफलिप गाड़ी रखलनि। दरवाजा क ताला खोलैत पूछलनि ‘कतऽ बैसब?’ -‘उपर टेरेस पर ।’ ‘ठीक छै। अहाँ चलू हम कॉपफी लऽ कऽ अबैत छी।’ शीतल बसात, सांझुक लुक झुक बेरआ अतीतक अतल - तल मे गोंता लगबैत हमर मन। -‘कॉपफी लिअ।’ आ इतमिनान सँ कहू- की कहऽ चाहैत छलहुँ।’ इएह जे पुरूष कमाइत अछि आ अपन आश्रितक पालन पोषण करैत अछि तऽ ओकर पौरूष मानैत छै लोक समाज। मुदा जॅ महिला कमाइत छै तऽ परम्परावादी समाज ओकरा हेय-दृष्टि सॅ देऽैत छै।’ मुदा इ संसार मात्रा परम्परावादी लोके धरि सीमित नहिछै। आ हम इहो बुझैत छी जे हम औरत भऽ जे समाजक उपकार कऽ सकैत छी से नरेन्द्रर पुरूष भऽ नहिकऽ सकै छ।’ पुरूष भूमि, आकाश, हवा, जल आ अम्नि अछि महिला बीया जे ध्रतिक तरमे रहैछ समय पर अंकुरिकऽ शाखा-प्रशाखा मे पसरैत छै। पुरुष वा महिला प्रत्येक व्यक्ति एक इकाई होइछ मुदा वास्तव मे जैविक ईकाइ ओ होइछ जे पुरूष प्रधन समाजक वर्यस्व के तोड़ि समतामूलक नव-निर्माण मे योगदान दैछ। ‘से तऽ छैक। प्रिया अहॉक बहुतो एहन पुरूष भेंटत जे लिंगभेद के मेटएबालेल सतत् प्रयत्नशील रहैंछ। तऽन एकटा बात छै जे पुरूष वा महिला एसगर रहने अपूर्ण रहैछातैँ एक-दोसराक जरूरत दूनू के छै परस्पर प्रेम रहने स्व केँ रिजेकशन नहिहोइ छै बल्कि एहि स्वीकृति सॅ पुरूष वा महिला अध्कि संवधर््ित होइछ अपना आगाँक पीढ़ी लेल किछु देबाक साम्थर्य रखै’छ। अपन सृजनात्मक उर्जा सॅ समाजक कुरीति के दूर करै’छ। ‘हँ, से बुझैत छिऐ पिफलिप!’ तखन कियेक बेर-बेर व्यथाक समुंद्र मे डूबैत छी?’ से की हरदम हम व्यथित रहैत छी? आब ओ समय बीत गेल, बीतल हमर अभिशापित अतीत बीतल। आब तऽ हमर मन हरियर पात, फरल पफुलाएल ड़ारि जकॉ तरोताजा रहैछ आ हृदय करूणाक ओस सॅ भीजल-सरस सजल। सच कहैत छी पिफलिप एहन दूनू तरहक स्वभाव सॅ हमरा होइछ जे एहन-उतार चढ़ाव सॅ हमर व्यक्तित्व असंतुलित तऽ नहिअछि। एक बेर हम ई बात जूडि सॅ पूछने छलिऐ - ‘कहू साफ-साफ की हमर व्यक्तिव अहाँ केँ असंतुलित बुझाइत अहि? हमरा कोनो मानसिक रोग तऽ नहिभऽ गेल?’ जूडी कहने छलीह-डोंट बी सिली प्रिया। अहाँ-एकदम सहज स्वभाविक रूप में छी? औरत-माने पाथर नहिने औरत कोनो बालूक समतल मैदान जे सब ट्टतु मे एके रंग रहतै! मनुष के नीक अध्लाह बात व्यवहारक प्रभाव पड़ैत छै ओ कखनहुँ हँसैत अछि तऽ कखनहुँ कनैत अछि। एहन कोनो औरतेक संग नहिहोइत छै पुरुषो के नीक-अध्लाह बातक प्रभाव पड़ैत छै। जॅ एहन नहिहोइतै’ तऽ ओ शराब नहिपीबैत! ने ओ रोज नव-नव महिलाक संग संभोग कऽ पौरुष क दंभ भरैत। ने बात-बात पर लाठी आ बंदूक लऽ मरऽ मारऽ पर उताहुल होइत। कोनो पुरुष देवता नहिमनुषे होइछ। अच्छा आब हमरा एकटा प्रश्नक उत्तर ‘दिअ अहॉक जीवन मे सुख-शान्तिक क्षण कतबा छल आ आब सबसॅ वेशी संतुष्टि कथि मे भेंटैत अछि?’ ‘बात ई छै जे एखनहुँ अतीत मोन पड़ैत अछि मुदा ओकरा हम बिसरौने रहैत छी तथापि ओकर प्रभाव वर्तमान पर झलकै’छ। हं तखन आब अपन काज जाहि मे सृजन आ अभिव्यक्तिक सुख भेंटैत अछि इएह हमर सबसँ पैघ आलंबन अछि, मुठीò भरि बीया छींटने छलहुँ से फरऽ पफुलाए लागल अछि। पिफलिप महिला बिना लगाव, नेह-छोह के जीविए नहिसकै’छ। हमरा मां के लगाव छलैन्ह बेटा सॅ दाई मां के छलै हमरा, सॅ ओना हम ओकर के छलिऐ? आ हमर आत्मीयताक परिध् िहुनका सबसँ- विस्तृत अछि तैं हम एकरा अपन उपलब्ध् िबुझैत छी। आर किछु नहि। हम विशिष्टताक बोझ तर अपना के दाबल राखियो ने सकैत छै। एकदम सहज भऽ समय बीताबऽ चाहैत छी। दोसर गप्प ई जे हमरा अगिला पीढ़ी हमरा सँ वेशी बुझनुक, व्यवहारिक सशक्त आ ईमान्दार अछि। नीना के हम जखन देखैत छिऐ तखन अनुभव होइत अछि जे हम जे नहिकऽ सकलहुँ से ई कऽ सकैत छथि। हमरा होइत अछि जे काज हम शुरू कयलहु तकरा नीना आगॉ बढ़ाबथि। हमरा हुनका विवाहक चिन्ता नहिअछि ओ अपना योग सहचर ताकि लेतीह जँ मनक अनुकूल नहिभेंटतैन्ह तऽ अपन उपलब्ध् िके व्यर्थ नहिबुझतीह।’ ‘अहॉक एतेक विश्वास अछि नीना पर?’ हँ, अपना सॅ वेशी विश्वास अछि। हम शताब्दीक अस्त होइत परिणाम छी। नीना आ नीध् िसन असंख्यलड़की, औरत हमर सभक कल्पनाकें साकार करऽ बाली भविष्यक ज्योति अछि। एखनधरि समाजक परिपाटि रहलैए जे प्रत्येक घर मे बेटीक मां अपना के विवश बुझैत रहल अछि हीनभाव सॅ मुक्त नहिभऽ समाज परिवार स्वजन-परिजन सब टोका टाकी करैत-करैत बेगुनाह लड़की के गुनाहक सजा दैत छै। आ हमर मां क तेहन सोच छलै जे हमरा जन्म भेला पर ने अपना कें कहियो माफ कएलनि ने हमरा। हमर सासु पति के परमेश्वर बुझैत छलीह आ छोटीमां के महापापी। अहीं कहू पिफलिप अपराध्ी पापा छलथिनकी छोटी मां? आ एहन वातावरण मे रहि नरेन्द्र सीखलनि औरत सॅ घृणा करब। हुनका नजरिये औरत के कोनो महत्व नहिओ मात्रा भोग्या छै।’ प्रिया हमरा दृष्टिकोण सॅ मनुष आखिर मनुषे होइछ, समस्त भूमिका सॅ हटि कऽ ओकर प्रेम के उपेक्षा कयने हमरा मनुषक कोटि मे रहबाक हक नहि बनै’छ। प्रेम हमहूँ कयलहुँ अछि बहुतो सॅ प्रेम भेल ककरो एक क्षण तऽ ककरो वेशी काल ककरो सॅ मात्रा स्वप्न मे। अन्त मे इएह निष्कर्ष भेल जे स्थायी प्रेम क समतल जमीन पर ठाढ़ रहब कठिने नहि असंभव छैक?’ ‘पिफलिप। एहन कियेक ?’ प्रिया हमरा जनैत शाश्वत प्रेम, स्थायी रिश्ता वा सम्बन्ध् ई मिथक के अनावृत कयल जाए तऽ जीवन मे की बॉचल रहतै? विश्लेषण करब तऽ अहॉक स्वभाव अछि बिना चिड़-फाड़ कयने अहाँ रहब नहिमुदा हमर आग्रह अछि ने अइ बात पर ध्यान दिऔ।’ ‘एहन सत्य सॅ जीवन नीरस नहिभऽ जेतै।’ ‘अहीं कहू अहाँ कें महसूस होइत अछि जे अहॉक भ्रम नहिटूटैत से नीक? पुरुष मात्रा सॅ अहॉक विश्वास उठल की नहि?’ हं, से तऽ सही कहलहुँ। मुदा पिफलिप स्त्राी पुरुषक सम्बन्ध्क जे परम्परा छै ताहि परम्परा सॅ विश्वास उठबाक मतलब ई नहिजे हमरा जिनगी सॅ विश्वास उठि गेल। जेना जेना हम अपना काज मे स्थापित होइत गेलहुँ तेना प्रेमक जरूरत कोना पुरुषक आवश्यकता क चाह खत्म होइत गेल। पहिने अपनत्व नहिभेंटला पर हम अपने के चीड़ फाड़ कऽ तकैत छलहुँ जे हमर गलती की अछि। आब से नहिहोइए मन मे। आब सोचैत छी जे क्यो हमरा मोजर देबए वा नहिलोकक मर्जी। क्यो अइ सच के नकारि नहिसकै’छ जे ई सीमित दुनियॉ मे हमर सच अन्तिम सच नहिअछि। हमर स्वक परिध् िवृहद् सॅ वृहत्तर दिस अग्रसर भऽ रहल अछि। हम अइ दुनियाँ मे असुरक्षित नहिछी। हमर अपन व्यवसाय अछि। अइ व्यवसाय के माध्यम सॅ हमरा नित नव-नव लोक सॅ भेंट होइछ। हं, एक दिन मने-मन निश्चय कएलहुँ जे आब आर नहि। पाथर पर माथ पटकने कोनो लाभ नहि। हमरा चारूभर मनुष नहिचटाðन अछि जे या तऽ जड़वत अछि वा पहाड़ जकॉ गुरगुराइत नीचॉ लुढ़कै’छ ओकर अपने ततेक शोरगुल छै जे हमर सिसकी सुनल नहिजा सकै’छ। हं, ताहि दिन सॅ हम सबकिछ बिसरि जएबाक प्रयास कयलहुँ। अतीत के खाध्खिुनि ध्ऽ देलिए तरमे। अनावश्यक चुनौती केँ ‘महत्व नहिदैत छी। आब जीयब जीवंत भऽ जी कऽ देखेबै दुनियाँ कें। अपन अस्तित्वक एहसास बड्ड सुखद लगैछ। भविष्यक आधर भूमि हमर इएह वर्तमान बनत।’ पिफलिप पूछलनि ‘आर कापफी?’ ‘नहिजॅ आब पीयब कॉपफी तऽ निन्न नहिहेत।’ अन्हार पसरल जाइत छलै वातावरण एकदम शान्त। हृदयक ध्ड़कन जाबत संग दै’छ ई दुनियाँ तखने धरि। ई अन्हरिया राति, ध्ंुध् मे मिझराएल पीयर इजोत बल्बके, नहँ-नहुँ अबैत आहट आ बगल मे बैसल पिफलिप। की पिफलिप सत्ते हमर मित्रा अछि? मन कहै’छ। हं, हं।’ बालवाइक छोट-छीन छै मुदा भव्य शहर अछि एकदम अलग व्यवस्था छै एतऽ। जूडी ऑपिफस सॅ एलैन्ह। दूनू हाथ मे भोजनक वस्तु क थैला छलैन्ह। ‘अबिते आश्चर्य सॅ बजलीह-एँ, अहॉ दूनू गोटे एना गुमसुम कियेक बैसल छी’? झगड़ा भऽ गेल की?’ ‘नहि, झगड़ा त नहिभेल अछि हम प्रियाक जिनगीक ध्ुनकें पकड़ऽ के प्रयास कऽ रहल छलहुँ।’ ‘पिफलिप अहॉ अपन सिम्फनिऐक ध्ुन सुनैत रहू।’ ‘ओ. के., हम आब चललहुँ।’ आब पिफलिप घंटो गाना सुनैत रहताह। हमहँु सभ अपना-अपना रूम मे गेलहुँ। हम तीन घंटा सॅ बतिइआइत छलहुँ मुदा बात खत्म भेल? कहियो खत्म हेएत ई बात? नरन्द्र केहन क्षुद्र लड़ाई लड़ने छल। पुरुष की एके रंग होइत छै? पलंग पर सूतल-सूतल इएह सब सोचैत छलहुँ। हमरा राति मे जल्दी निन्न होइते ने अछि।’ अन्त-अन्त धरि नरेन्द्र हमरा संग न्याय नहिकयलनि। हुनके कारण समाज हमरा जलील कयलक। करौ ओकर समाज छै के कतेक टा? मात्रा दू सौ अढ़ाई सौ मातवर घरानाक समाज? ओइ घराना सॅ कै गुणा वेशी छैक मानव समाज। आ जहिया सॅ हमर डेग बढ़ल अइ वृहत्तर समाज दिस तहिया सॅ हम रूकलहुँ एको क्षण? हम जतेक अपना व्यवसाय मे सफल होइत रहलहुँ ततेक कचोटैतछल नरेन्द्रक क्षुद्र लोभ-लाभ द्वेष भाव। व्यापारक दुनियाँ मे काज क हमर आत्म-विश्वास बढ़ैत छल। हम स्वतंत्रा भऽ व्यापार मे दस टा संभावना मे एकटा चुनैत छलहुँ। स्वतंत्रा व्यक्तिक हैसियत सॅ अपन चुनाव पर डटल रहऽ मे कोनो कठिनाई महसूस नहिहोइत छल। आ नरेन्द्रक प्रेम ओ तऽ हमरा जीवनक अंकुरैत संभावना के देखिए कऽ सहमि जाइत छल। हुनका संग मे दस करोड़ टका छलैन्ह मुदाओ हमर दस लाख टका बर्दास्त नहिकऽ पबैत छलाह। हरदम हुनका मुँह सँ बहराइत छलैन्ह ऊँह, एतेक महत्वाकांक्षा। ई औरत हमरा तबाह कऽ देलक। एखनो संतोष नहिहोइ छै। ओ अपना के मालिक बुझैत छलाह। बढ़ैत गाछ के जड़िए सॅ काटि कऽ ओकरा बौना बनाबऽ मे आनन्द भेंटैत छलैन्ह। हमर विकास कोना सहन होइतैन्ह? एकटा गुलामक नजरि मालिकक कुर्सी पर रहतै? क्रो(े ऑखि कोना लाल भऽ गेल छलैन्ह जखन ओ हमरा पहिल बेर आपिफस मे कुर्सी पर बैसल देखने छलाह। व्यंग्यवाण छोड़ने छलाह ओह, हो, सीगल एक्सपोर्टक मैनेजिंग डाइरेक्टर? आब अहाँ कें हमरा सॅ टका-पाई लेबाक कोन जरूरी? हमर आनल वस्तु कियेक नीक लागत आब तऽ श्रीमती जी अपने पाइ कमाइत छथि.... ‘नरेन्द्र हम पाइ लेल काज नहिकरैत छी।’ तऽ काज करैत छी कथि लेल? भोर सॅ सांझि घरि एक पैर पर घिरनी जकॉ नचैत कियेक रहैत नरेन्द्र! हम अपन आइडेंटिटी, व्यक्तित्वक विकास.... दिन-राति पोथा पढ़ि-पढ़ि कऽ पगला गेलहुँ अहाँ, अपना के महान, जीनियस बुझैत छी? अहाँ के होइत अछि मैडम क्यूरी, वा फ्रलोरेंस नाइटंेगल बनि जाएब? घर-गृहस्थी क लुरिए नहिचललीह महान बनऽ। एहन कोनो रंग रूप भगवान देनहुँ ने छथि।’ हम अपना के ने जीनियस बुझैत छी ने महान बनऽ चाहैत छी। मुदा की साधरण औरत के अपना ढ़ंग सॅ जीवऽ के अध्किार नहिछै? काज कयने हमर आत्मविश्वास बढ़ैत अछि। नहिजानि कियेक अहॉ सदिकाल हमर आत्मबल कें थूरैत रहैत छी? मोनतऽ भेल कहिऐ-नरेन्द्र अहीं कोन महान पुरुष छी? पापा क कमाएल ध्न मे दू-चारि करोड़ आर जोड़लहुँ। हम ककरो देल पूँजी सँ व्यवसाय शुरू नहिकएलहुँ। गली-गली घूमि कऽ काजक शुरूआत कएलहँु। अहाँ के तऽ एयरकंडीशन मर्सीडिज मे बैसल-बैसल पसेना चूबैत अछि अहॉ कोना बुझबै जे सैम्पलक बक्सा हाथ मे उठौने कतेक बौआइत छी, कारखाना मे मजदूरक संग खटैत छी।’ मुँह टेढ़ कऽ नरेन्द्र फेर बजलाह-बहुत अहंकार अछि अपना पर?....... हं, नरेन्द्र अहाँक मापदंड दोहरा अछि जे अहाँक लेल आत्मसम्मान से हमरा लेल अहंकार! ‘की अहाँ नहिचाहैत छी घर, परिवार, पाई समाज मे रूतबा.........? तखन हम किछ चाहैत छी तऽ अहॉ एतेक बौखलाइ छी कियेक? बजैत काल हमर स्वर स्वतः ऊँच भऽ गेल। नरेन्द्रक कोना सहन करताह तैं व्यंग्यवाण छोड़लनि-चिचियाउ नहिई हमर आपिफस अछि। हमहीं बेवकूफ छी। कोना एहन महिलाक मुँह लगलहुँ जकरा पाई क अलावा किछ सुझिते नहिछै?’ ‘पाईक भूख हमरा? परसल थारी लग बैसल भूखल व्यक्ति केहन जीवन जीयत? पाई-पाई के हिसाब। ई करू ई नहिकरू एक, एक क्षण हुकूमत! हँ गहना छल आंजुर मे अॅटए नहिततेक हीरा। मुदा कतेक सफाई सॅ अहाँ कहने छलहुँ सभटा मां के नाम छैन्ह एहि मे से किछ संयुक्त परिवारक थाती छै। ई गहना अग्रवाल हाउसक पुतौहु पहिर सकै’छ घर सॅ जाय बाली औरत नहि।’ ‘हं, हं अहाँक रंग-ढंग देखिए कऽ हम अहाँक एकाउन्ट सँ सब जेवर निकालि लेने छलहुँ। ‘हमर अनुमति बिना!’ ‘नहिसे कोना होइतै हे देखिओई कागज अहॉक हस्ताक्षर!’ एतेक पैद्य विश्वास घात। मने मन सोचलहुॅ हमरा कहियो अविश्वास नहिभेल। जखन जाहि कागज पर कहैत छलाह हस्ताक्षर कऽ दैत छलिऐ। खैर आब ई सोचने विचारने की....। ई नीक जकॉ बुझि गेलहुँ अइ व्यक्ति सॅ अरारी ठानने परिणाम घातक होएत। पहिनहि बहुत किछ गंवा चुकलहुँ। आब जे समय शेष अछि से एकरा सॅ झगड़ा मे व्यर्थ किएक बीताबी। किछ टका-पाई भेंटत से अपना पेट भरऽ योग अपने अर्जित करैते छी। जखन कोनो सम्बन्ध्े नहिरहल तखन विषध्र सॅ दूर रहनहिं कुशल! तखन सँजुक लेल हृदयक हाहाकार विचलित करैत छल। मुदा हम इ हो जनैत छी जे नरेन्द्रक आतंक सॅ संजु के बकार नहिपफुटैत छै ने पगडंडी पर चलैत हमर लहुलूहान पैर क पाछाँ ओकर कोमल पैर बढ़ि सकैछ ओ तऽ राजमार्ग पर चलबाक अभ्यासी अछि। जँ ओ हमरा संग रहबो करैत तऽ कहिया ने चलि जाइत पिता लग। बिरासत मे मात्रा सम्पत्तिए नहिभेंटैत छै स्वभावो भेंटैत छै। भूआ क बच्चा बिना रोऑ क भऽ सकै’छ? काल्हि हम भारत घुरि रहल छी। की करू की नहिसे नहिपफुराइत अछि। जूड़ी ट्रे मे गरम मपिफन आ ब्लैक कॉपफी ने ने अयलीह। ‘गुड मार्निग प्रिया!’ गुड मार्निग स्वीट हार्ट! ब्रेेक फास्ट उफपर आन क कोन काज छल हम आबि जैतहुँ नीचॉ। ‘तऽ हम दूनू गोटे रजाई मे घुसियाक कोना कॉपफी पीबतहुँ।’ वेश, त हम ब्रश कयने अबैत छी। ‘ओह! तखन तऽ कॉपफी सेरा जेतै। अच्छा पिफलिप के कहैत छिऐन्ह गरम कापफी कनिकाल मे दऽ जयता।’ ‘नहि, हम अपने लऽ आयब ओइ बेचारा के परेशान नहिकरऔि।’ ओ. के.। जूडी हमरा रजाई मे घुसियाकऽ हाथ मे कापफी नेने किछ सोचैत छलीह। ‘हम तुरत अबैत छी।’ हम नित्यक्रिया बिना कयने किछ नहिखा सकै छी। मुदा इ बात कहबै तऽ जूड़ी हमर मानस के अनुकूलन पर भाषण शुरू कऽ देतीह। ‘कॉपफी लऽ ऽ अयलहुँ तऽ देखलिऐ जूडी हमरा नीचाँ सॅ ऊपर घरि निहारि रहल छलीह।’ ‘अहॉ तऽ एकदम यंग लगैत छी।’ ‘जूडी, हमरा तऽ बुढ़ापा नीक लगैत अछि।’ अइ पागलपन के कोनो जवाब छै। लेकिन सत्य कहैत छी अहॉ एखनहुँ चालीस सॅ ऊपर के नहिलगैत छी। जूडी हम चालीस सॅ वेशी उम्र क लगैत छी वा नहिताहि सॅ कोनो फर्क नहि। मुदा आब हमर केश पकैत अछि ठेहुन मे दर्द होइत रहै’छ एतबे नहिआब सैम्पलक भारी बक्सा उठा कऽ एक एयरपोर्ट सॅ दोसर एयरपोर्ट धरि पहुँचऽ मे बहुत थाकि जाइत छी। इमिग्रेशन आ कस्टमक कागज बिना चश्मा लगौने पढ़ि नहिपबैत छी। आब सबसे वेशी नीनाक ऑखि मे हेलैत स्वप्न, काजक प्रति ललक आ आगाँ बढ़बाक संकल्प बेर बेर कहैछ जे भाभी हम बिना अध्कि लागत के माल उत्पादन मे बीस प्रतिशत बढ़ा सकैत छी से सुनि होइछ जे आब हम व्यर्थ दौड़ ध्ूप करैत छी। सरिपहुँ नीना लौह महिला अछि। तैं आब हम विश्राम चाहैत छी। अइ व्यापारक दुनियॉ सॅ बाहर होइबाक इच्छा अछि। ‘व्यापारक दुनियॉ सॅ बाहर भऽ की करऽ चाहैत छी?’ ‘किछ नहिमात्रा अपन अनुभव। पचासवर्षक एक महिलाक महिला होएबाक अनुभव।’ ‘तखन एकटा किताब लिखू। प्रॉमिस?’ ‘प्रॅामिस।’ पतझड़ क मौसम। अक्टूबर मे कलकत्ताक वातावरण सम पर रहैत छैक पाबनि-तिहार शुरू भऽ जाइत छै। हम अपन किताब क भूमिका लिखब शुरू कयलहुँ। सैंतीस वर्षक नीना हाफमैनक बेटा सॅ विवाह कऽ रहल छथि। अपन देश छोड़ि रहल छथि। हमरा पूछलनिः ‘भाभी मां जर्मनी मे नहिरहि सकै’छ?’ ‘नीना, छोटी मां पैंसठ वर्षक उम्र मे जर्मनी मे कोना रहतीह?’ भाभी! मां क उदास देखि हमरा अपराबोध् होइत अछि। शायद मां के ई विवाह पसंद नहिछै तऽ हम नहिकरब विवाह।’ हमरा ऑखि मे साकार होइछ छोटी मांक झुर्रि भरल मुँह, कॅपैत हाथ उज्जर साड़ी मे लपटल मझोला कद। फेर मोन पड़ै’छ बाल गोपाल कें भोग लगबैत छोटी मां क ध्यानमग्न चेहरा। ‘नीना, मन छोट नहिकरू। सभक बेटी सासुर जाइत छै-मां उदास होइतो बेटीक विदाक परम सुख पबैछ। ‘भाभी हम सच कहि रहल छी एंडरू चाहै’छ मां हमरा सभक संग रहए। की ओ मां के बेटा नहिछै’? ‘नीना-अहॉ निश्चिन्त रहू एत हम छी ने।’ ‘अहाँ एसगरे व्यवसाय सम्हारि लेबै?’ ‘जतबा दिन चलतै चलेबै।’ ‘भाभी तैं हमरा होइछ जे हम गलत कऽ रहल छी।’ नीना प्लीज! अहॉ अपना कें अपराध्ी जुनि बूझू। जे भऽ रहल छै से नीके भऽ रहल शुभ-शुभ विवाह भऽ जाय।’ ‘नहिभाभी, जे भऽ रहल छै से मां क दृष्टिए नीक नहिभऽ रहल छै हुनकर इच्छा छनि भारतीय लड़का सॅ विवाह होइतै।’ नीना आब ई चर्चा करब व्यर्थ छै। भाभी हमरा अपराध् बोध् भऽ रहल अछि........। हम मने-मन सोचलहुँ नीना क स्थान पर जँ छोटी मांक बेटा रहितैन्ह तऽ ओकरा अपराध् बोध् होइतै? आ जँ से होइतै तऽ अपन जर्मन पत्नी के लऽ कऽ कलकत्ते मे रहैत वा मां के ओतऽ लऽ जाइत जे नीना नहिकऽ पबैत छथि दोसर पुरुष एहनो कऽ सकै’छ जे एकटा पत्नी जर्मन, जर्मनी मे रहितै दोसर भारतीय मां लग। तइओ ओ अपना के अपराधी नहिबुझैत। मन मे होयबो करितै अपराध् बोध् तऽ नीना जकाँ ईमानदारी पूर्वक हमरा लग स्वीकारैत नहि। हमरा तऽ डर होइछ जे एहि अपराध् बोध् सॅ नीना डिप्रेस ने भऽ जाए। औरत कतऽ नहिकनै’छ? कखन नहिकनै’छ? सड़क पर झाड़ू लगबैत काल, खेत मे काज करैत, एयरपोर्ट पर बाथरूम साफ करैत, लोकक घर मेचौका बर्तन साफ करैत वा समस्त ऐश्वर्य सुख-सुविधक रहैत हमरा सासु जकॉ एसगर सूतल करौट बदलैत। हाड़-मासुक बनल महिला-अपना ढंग अपना शर्त पर जीवन व्यतीत करऽ लेल छटपटाइत रहै’छ। हमर तऽ ऑखिक नोरे सूखा गेल। हृदय आ मन मे नून जकॉ जमल जा रहल अछि नूनक पहाड़ जमले जा रहल अछि। बाहर सॅ लोक के बुझाइत छै जे हम बहुत मजबूत छी, हिम्मतबाली। बुझए लोक। आब तऽ के की बुझै’छ तकर कोनो मायने नहि। ओह बड्ड पिआस लागल अछि। निन्न टूटल केहन अजीब-अजीब सपना देखऽ लगलहुँ अछि। सत्ते कंठ सूखि रहल अछि। थर्मस सॅ पानि ढ़ारि पूरा गिलास पीब गेलहुँ। एखन कतऽ छी हम? ओह, हं कलकत्ता मे छोटी मां क बगल मे अपना फ्रलैट मे। नीना जर्मनी सॅ आयल छलीह। मासदिन एतऽ रहि कऽ घुरलीह। कोर मे दस मासक खूब सुन्दर नेना छैन्ह। जर्मन आ भारतीय मिक्चर गोर रंग भूरा केश आ भूरा ऑखि। छोटी मां के कतहु ने कतहु मन मे कचोट छैन्ह किछ बजैत नहिछथिन मुदा मुँह सँ हरदम बहराइत छैन्ह जे हमर बेटी तऽ प्रिया छथि। नीना के दुःख होइत छैन्ह। मां एना कियेक बजै’छ? हम तऽ जेहन चाहत छलहुँ तेहन घर-वर भेंटल! हम बहुत सुखी छी। ‘नीना अहॉ खुश छी से सुनि बहुत प्रसन्नता भेल भाभी अहॉ कें एसगर रहबा मे मन ऊबै’छ नहि?’ नहिनीना एकान्त तऽ प्रिय अछि। ओना एकबेर ई एसगर सॅ दोसराइत होइबाक भूल कऽ चुकल छी। बड्ड भयंकर परिणाम भोगलहुँ समझौता कऽ के। आइ हम कहऽ लेल एसगर छी मुदा हमरा आस-पास दू चारिटा एहन लोक अछि जकरा पर हम ऑखि मुनि भरोसकऽ सकै छी। आ ई भरोस, आस्था जीवन लेल अनिवार्य छै। एहन कोन नायिका हेतै जे अभिमानिनी होइ, स्वतंत्रा विचार वाली होइ तइओ संयमित रहै, सुरूचि होइ, मौलिक चिन्तन वाली होइ आ पुरुषक केहनो दुर्व्यवहार के हँसैत सहन करए ओकरा करेज मे सटल रहए? की एहन क्यो भऽ सकै’छ? हँ, कथा, उपन्यासक नायिका एहन भऽ सकै’छ कियेक तऽ पुरूष रचनाकार एहने नायिकाक कल्पना करै’छ।...... परिस्थितिक दास के नहिहोइछ? मुदा अमानवीय करण केर चरम विन्दु पर अपना के साबुत बचाकऽ राखब सभक वश के बात नहि। हमरा लेल तऽ असंभव। हमरा तऽ जे क्यो आहत कएल तकरा हम कखनहुँ बिसरि नहिपबैत छी। हं, ओइ स्मृति दंश के प्रति आब मन मे उपेक्षा क भाव रहै’छ। आ सत्य कहैत छी पुरूषक कोनो भूमिका क आब जीवन मे महत्व नहिबुझना जाइछ। क्यो की देत? एकरा हमर अहंकार नहिबुझू यर्थाथ कहि रहल छी आइ हम हाथ खोलि खर्च करैत छी मुदा क्यो रोक-टोक कयनिहार नहिने ककरो हिसाब देबऽ पड़ै’छ।.... नीना विवाह कएल......हमर अध्ूरा स्वप्न ओकरे मे पूर्ण होमए। संवेदना, मित्राता, नेह ई सब परस्पर होइत छैक मालिक आ गुलाम बुझतै तऽ स्नेह नहिभऽ सकै छै। नरेन्द्र करोड़पति छल मुदा हमरा सॅ एक-एक पाइक हिसाब लैत छल। पेट भरबा लेल दू टा रोटी चाही ताहि लेल ओतेक अपमान! जे भेल से नीके भेल। जँ नरेन्द्र सॅ मन नहिटूटैत त एतेक प्रगति कऽ सकितहुँ ? मोम के गुड़िया जकॉ पिघलैत रहितहुँ। घुर, इ हो कोनो जिनगी भेलै? हजारों साल सॅ पुरुषके अपन पत्नी के फ्रैंेम’ क कल्पना एकहि बिन्दु पर अटकल छै जे पिजराक सुग्गा जकॉ जे रटबए सेह दोहरबै। आ हमरा सभके देखू आध्ुनिकाक भूमिकाक नित नव-नव भूमिका जुड़ल जा रहल अछि आ सफलतापूर्वक नित नव प्रतिमान गढ़ि रहल छी। प्रत्येक क्षेत्रा मे पुरुष से बीस साबित भऽ रहल छी उन्नीस नहि। तखन एकटा बात एकदम सही छै जे किछु पाबऽ लेल किछ छोड़ऽ पड़ैत छै। हमरे देखू जे संजु क मन मे होइत हेतै जे हम मां क भूमिका नीक जकॉ नहिनिमाहलहुँ। आब नहिनिमाहि पयलहुँ तऽ की करू? हमर मां हमरा जन्म देलनि की ओ अपन भूमिकाक निर्वाह कयलनि? नहिने। आ ने हुनका तकर कचोट भेलैन्ह।.... सँजू के तइओ हम बारह वर्ष धरि मातृत्वक भूमिकाक निर्वाह कयलहुँ तखन नरेन्द्र लग छोड़लिए। सॅजु उगैत गाछ छल संभावना रहित ठूंठ नहि। कानूनो तऽ नरेन्द्रक पक्ष लितै। आ किएक हम ओइ नादान बच्चाक जीवन बर्बाद करितिऐ? हमरा सॅ वेशी सामर्थयवान नरेन्द्र छल। भऽ सकै’छ नरेन्द्र कें क्यो दोसर औरत खुश राखि सकितै’ मुदा हमरा तऽ ओकरा संग रहब कठिन छल। हम अपन स्वप्न कें अपने हाथे चकनाचूर नहिकऽ सकै छी। तखन ऑखिक नोर! नहिजानि ई नोर क परम्परा कहिया खत्म हेतै? प्रशान्त महासागर क पानि की कम नूनछराह छै जे सागर के सागर बनल रहबाक लेल महिलाक नोर क जरूरत रहै छै? नीना चलि गेलीह। हमरा काज मे ओ सहारा दैत छलीह। तथापि अहू उम्र मे हमरा ऑखि मे सपना शेष अछि टटका फूलक रस मे डूबल मध्ुसन मीठ, ओस मे भीजल गुलाब क सुगंध् मे साराबोर गमकैत, भोर का आकाश सन स्वच्छ। ई हमर जिनगीक सपना हमर अपन अछि एकदम निजि अपन। मात्रा रोमान्सेक सपना नहिसंयोगै’छ नयन आ ने स्नेहक जुनून सॅ जिनगीक सब कोन भरि जाइत छै। इम्हर दू वर्ष सॅ हम स्वयं गाड़ी चलबैत छी आ मोन होइए जेएसगरे सम्पूर्ण भारतक भ्रमण करि। मन होइछ कोनो आदिम शहरक एसगरे यात्रा करि। आदिम शहरक गुफा मे अंकित महिलाक मूर्ति सॅ पूछिऐ की अहूँ ओ व्यथा सहलहुँ अछि जे हम भोगलहुँ? हृदयक जड़ता कम भेल अछि। कुंठाक बर्फ पिघलल आब ई जिनगी बहुत सुन्दर लगै’छ ऐनमेन कविता सन। हं, आब हम जीवंत जीवन जीबैत छी। बेर-बेर प्रसन्नता क पुलक सॅ रोऑ-रोऑ आनन्दित रहै’छ। एतेक हल्लुक पारदर्शी जीवन व्यतीत करबाक बहुतो तरीका छैक। हम ओ तरीका अपनाएबाक प्रयास कयलहुँ मुदा कतहु समझौता नहिकयलहुँ। समझौता नहिकऽ सकलहुँ बस! ई जरूरी छै जे लोक अपन प्रत्येक असमर्थताक विश्लेषण करए? तर्क दऽ अपन औचित्य स्थापित कऽ अनका गलत साबित करए? ई सभ बिना कहने सुनने पृथ्वी अपन धुरी पर घूमैत रहत। सूर्य क उदय अस्त होएत। चन्द्रमाक बढ़ैत-बढ़ैत पूर्णिमाक इजोरिया राति हेतै आ घटैत-घटैत अमावस्याक अन्हरिया राति। मौसम बदलैते रहतै, नदी बहैत रहतै ककरो हमर विश्लेषणक अपेक्षा ने छै ने रहतै। तखन एकटा बात महत्वपूर्ण्ण छै जे हम आइ धरि ई नहिबुझि। पयलहुँ जे हम के छी? की चाहैत छी? हँ, शिकायत रहल जे ई प्राप्त नहिभेल ओ प्राप्त नहिभेल। अन्तःकरण सॅ सदति इएह आवाज अबैत रहल। क्षण मे प्रसन्न क्षणे मे व्यथित। की इ सब एहिना चलैत रहऽ दिऐ सहज गति सॅ? हम छी एहने एखन कोनो आदर्श लऽ डेग उठा कऽ बढ़ब फेर कखनौ निराश भऽ पाछु घुरब। हम समस्त अतीत बिसरि गेलहुँ अछि। पाछु सॅ कोनो शोर पाड़ैत स्वर सुनि कान मुनि लैत छी। जिनगीक संघर्ष मे सक्रिय छी। भऽ सकै’छ एहने मे कहियो चुपचाप मृत्यु आबि हमर के बार खटखटाबए। तखन हम तुरत ओकर आहट पर प्रस्तुत हेबै। आ अपन छोट छीन जिनगीक विषय मे ओकरा संग बतियाब। खलील जिब्रान- गोल्डन बेल्ट (अंग्रेजी सीड स्टोरी) खलील जिब्रान- गोल्डन बेल्ट (अंग्रेजी सीड स्टोरी) गोल्डन बेल्ट (अनुवाद-मुन्नाजी) सालमिस नगर दिस जाइत दू गोटेक संग भऽ गेलौं।दुपहरिया धरि ओ धारक कछेरमे पहुँचि गेल जाहिपर कोनो पुल नै छलै। आब ओकरा लग दूटा विकल्प छल- हेलि कऽ धार टपि जाए वा दोसर कोनो रस्ता ताकि लिअए। “हेलिये कऽ पार भऽ जाइ छी।”, ओ एक दोसरासँ कहलक। “धारक पेट बेसी चौरगर तँ अछि नै।” ओइमे सँ एक गोटे जे नीक तैराक छल बीच धारमे जा भसियाइ लागल। दोसर गोटे जकरा हेलबाक पूर्ण अभ्यास नै छलै, ओ आरामसँ हेलैत दोसर कात पहुँचि गेल। ओतऽ पहुँचलाक पछाति ओ पुनः धारमे कूदि हाथ-पएर चलबैत अपन संगीकेँ पार आनि लेलक। “तोँ तँ कहै छलेँ जे तोरा हेलबाक अभ्यास नै छौ, तहन तोँ एतेक असानीसँ कोना धार पार कऽ गेलँ? ”, पहिल व्यक्ति पुछलक। “मित्र।”, दोसर व्यक्ति बाजल, “हमरा डाँरमे बान्हल ई बेल्ट बान्हल देखै छीही, ई सोनाक बनल छैक, जकरा हम साल भरि मिहनत कऽ अपन कनियाँ आ बच्चा लेल कमेने छलौं। तेँ ई पहिरने असानीसँ धार पार कऽ गेलौं। हेलबा काल अपन पत्नी आ बच्चाकेँ अपना मोनमे याद कऽ रहल छलौं।” ग्रिगोरी गोरिन (रूसी नाटककार)- एकटा ईमानदार आदमी मुन्नाजी- एकटा अन्तर्राष्ट्रीय लेखकक एकटा बीहनि कथा- संदर्भ सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत बीहनि कथा ग्रिगोरी गोरिन (रूसी नाटककार)- एकटा ईमानदार आदमी जखन परिवेश बदललै, दृष्टिगत फरिछता एलै, सामाजिक समरसता पसरलै। तहन समाजक छुआछूत मात्रक अवलोकन होइत छलै। मुदा आइ ओहि छुआछूतसँ भेल परिणाम, जाति-पातिमे बान्हल लोकक दृष्टि-परिवर्तन, आर्थिक सम्पन्नता, पैघक संग सभ बिन्दु। विषय वा स्थानपर ओहो अछोप सन, निंघेष बनल लोकक सहचर बनब, सभकेँ देखाओल जाए लागल आजुक लोककथामे। आब विषय विस्तार स्वतः सभ तरहक घटनाकेँ छुबैत कागचपर आबऽ लागल अछि। आबक परिवेशमे दहेजक पसार भऽ गेल अछि। एहेन पसार जकरा आब विशेष मुद्दा नै बना, बल्कि ओकरा जीवनक सामान्य क्रियाकलाप बुझि, परम्पराकेँ उघबाक प्रक्रियाकेँ दर्शाओल जाए लागल अछि। तहिया दहेज दानव जकाँ छलै। जे रचनाकारक लेल प्रमुख विषए छल। आइ दहेज दानव मात्र नै महादानव बनि ठाढ़ अछि मुदा परिवेश बदलल छै, माने कि आब तहियाक अपेक्षा आर्थिक सम्पन्नता बढ़ि गेलैए तेँ लोककेँ ई महादानव अपन जीवनक एकटा अंग बनि गेल अछि, कोनो बड्ड पैघ समस्या नै। आब तँ ओइसँ पैघ-पैघ समस्या रचनाकारकेँ उद्वेलित करैत अछि। यथा बिआहक खुजल रस्ता, कियो कोनो जाति-धर्मसँ बिआह कऽ सकैए आ ओकरा न्यायालय प्रमाणित तँ करिते अछि। सरकारी संरक्षण सेहो भेटै छै। ओहिसँ ऊपर दहेज उन्मूलनक दिशामे समलिंगी बिआह समाजकेँ जतऽ डेरा रहल अछि, ओतै रचनाकारकेँ एकटा नव दृश्यांकनक अवसर दऽ रहल अछि। एहि सन्दर्भमे एकटा अन्तर्राष्ट्रीय लेखकक एकटा बीहनि कथा राखि रहल छी- ग्रिगोरी गोरिन (रूसी नाटककार) एकटा इमानदार आदमी “हम टैक्सीबलाकेँ अबाज देलौं आ टैक्सी रुकि गेल। “की हमरा अहाँ सोमोकन्या स्क्वेयर लऽ चलब? ओ जगह एतऽ सँ बड्ड दूर नै छै, मुदा हमरा जल्दी अछि।” पाँच मिनट बाद हम ओकरा रोकलौं। मीटर उनचास कोपेक देखबैत छल। हम एक रूबल निकाललौं। “हमरा लग छुट्टा पाइ नै अछि।” ड्राइवर कहलक। हम अपन जेबीमे तकलौं तँ पचास कोपेकक एकटा सिक्का भेटल। “अफसोच अछि जे हमरा लग एको कोपेक नै अछि।” “कोनो बात नै।” “किएक नै! ” ड्राइवर विरोध प्रकट केलक, “हम एना नै कऽ सकैत छी। अहाँ जनैत छी जे सवारीसँ मीटरसँ बेसी पाइ नै लेल जा सकैत अछि। हम इनामो नै लैत छी।” “बड्ड नीक, मुदा हम की करू? ” “वामा कोनापर एकटा तमाकूबलाक दोकान अछि, ओ खुल्ला कऽ देत।” पाँच मिनट पछाति हम ओइ दोकानपर पहुँचलौं, मुदा तावत धरि खेबाक छुट्टी भऽ गेल छल। मीटर आब सन्तानबे कोपेक बता रहल छल। “कोनो बात नै”- ड्राइवर सहानुभूति जतौलक, “कीव टीशनलग एकटा बैंक अछि, ओइमे काज करऽवाली लड़कीकेँ हम जनैत छिऐक, ओ अहाँकेँ पाइ खुल्ला कऽ देत।” हम कीव टीशन दिस गेलौं, मुदा बैंक बन्द छल। मीटर पूरे तीन रूबल देखा रहल छल। हम ड्राइवरकेँ तीन रूबल देलौं, ओ पाइ जेबीमे राखिकऽ मीटर बन्न कऽ देलक। “हमरा बड्ड दुख अछि”, ओ कहलक। हम सवारीसँ बेसी पाइ नै लैत छी। “बहुत आभारी छी, मुदा हम सोमोकन्या स्क्वायर कोना पहुँचब? ” “हम अहाँकेँ ओतऽ लऽ चलब।” ड्राइवर कहलक आ हमरा टैक्सीमे बैसते मीटर चालू कऽ देलक। पाँच मिनट बाद हम पहुँच गेलौं। मीटर फेरो उनचास कोपेक देखा रहल छल। हम छोट छीन चक्कू निकालि कऽ ड्राइवरक गरदनि लग व्लगा देलौं आ ड्राइवरक हाथमे जबरदस्ती पचास कोपेकक सिक्का राखि टैक्सीसँ कूदि कऽ भागि गेलौं। बादमे बहुत बाद धरि, जे नैतिक भ्रष्टाचार हम ओइ इमानदार आदमीक संग केने छलौं, हमरा ग्लानिक अनुभव होइत रहल। बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन नाटककार)- गपशप, महाशय “क” जखन कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत अछि मुन्नाजी- एकटा अन्तर्राष्ट्रीय लेखकक दूटा बीहनि कथा- संदर्भ सामाजिक सरोकारकेँ छुबैत बीहनि कथा बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन नाटककार)- गपशप, महाशय “क” जखन कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत अछि पहिने लोकक विपन्नता सेहो दृष्टि संकुचनक पर्याय छल। ई स्वाभाविक छै जे पेट भरल रहतै तखने लोकक सोच ओइसँ दूर धरि जेतै। नै तँ सभटा सोच भूखसँ उत्पन्न भेल आकुलतामे समाहित भऽ रहि जाएत। आब स्थिति उनटल अछि। आर्थिक उदारीकरण आ वैश्वीकरणक आएल चलनसारिमे आब लोक आर्थिक रूपेँ सम्पन्न भेल अछि। आर्थिक सम्पन्नता आब पेटक भूखसँ इतर आन-आन भूख जगेलक अछि। जाहि कारणेँ चोरि, हत्या आ बलात्कारक सेहो बढ़ावा भेल अछि जे ओकरे रूप/ प्रतिरूप बदलि गेल अछि। तँ आजुक लेखककेँ कलम चलेबा लेल आ बदलल प्रतिरूप हथियारक रूपमे भेटि गेल आ रचनाकार सभ ऐ सभ अपराधक अपन कलमक माध्यमे नवीनीकरण कऽ सोझाँ आनि रहल छथि। सम्प्रति रचनाकार सभ पदयात्रासँ ऊपर उठि मंगलग्रह यात्रापर जा रचनारत छथि। पहिलका जमानामे लोक शुद्ध दूध ग्रहण करैत छल, आब दूध तँ दूर पानिक समस्या लोककेँ घेरने जा रहल छै। कतौ पानिक कमीसँ हाहाकार मचैए तँ कतौ लोक बाढ़िक कोप भाजन बनि भूखे बिलबिलाइत नाङट भेल छतविहीन लोकक असरा तकैए। आ लेखक ऐ सभपर अपन दृष्टिए नजरि गरा कागचपर अनै छथि। एहि सन्दर्भमे एकटा अन्तर्राष्ट्रीय लेखकक दूटा बीहनि कथा राखि रहल छी- बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन नाटककार) गपशप “आब हम सभ आपसमे किन्नहुँ गप्प-सप्प नै कऽ सकैत छी”, महाशय “क” एकटा लोकसँ कहलनि। “किएक”?, ओ चौकैत पुछलक। “हम अपन तर्कपूर्ण गप्प आब अहाँक सोझाँ नै राखि सकैत छी। ”, महाशय “क” लचारीवश अपन विचार रखलनि। “मुदा अइ बातसँ हमरापर कोनो फर्क नै पड़त। ”, दोसर अपन संतुष्टि देखौलक। “हमरा बूझल अछि।”, महाशय “क” खौंझाइत कहलक, मुदा हमरापर एकर असरि अवश्य पड़त। महाशय “क” जखन कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत अछि महाशय “क” सँ पूछल गेल, जखन अहाँ कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत छी तखन की करैत छी? ” महाशय “क” उतारा देलक, “हम ओहि व्यक्तिक एकटा खाका बनबैत छी आ फेर ऐ फिकिरमे रहैत छी जे ओ हुबहु ओकरे जकाँ बनए। ” “के, ओ खाका? ” “नै।”, महाशय “क” जवाब देलक, “ओ आदमी।” संस्कृत (लोक बालबोधिनी कथा)- शरीरक मूल्य संस्कृत लोक बालबोधिनी बीहनि कथा- शरीरक मूल्य [साभार चन्दमामा (संस्कृत), जून २०१० अंकक शरीरस्य मूल्यम्।]- अनुवादक बिपिन कुमार झा शरीरक मूल्य उदयगिरिनगरक राजा छलाह उदयसेन। ओ धर्मात्मा आ प्रजावत्सल छलाह।ओ प्रजा केर् हित में भाँति भातिक जीविका के उद्योग केने छलाह। और ओहि प्रकार सँ आर्थिक व्यवस्था सेहो कयने छलाहह अस्तु सभ प्रजा अपन योग्यता क अनुरूप जीविका प्राप्त करैत छलाह ओतय दरिद्रता क नामोनिशान नै छल।कतहु कतहु वृद्ध अथवा विकलांगे टा भिक्षाटन करैत भेटि सकैत छल ओहि ठाम। ओहि देश में एकटा भिखमंगा युवक छल।ओ बच्चहि सँ भिक्षावृत्ति अपनेने छल। अस्तु ओ परिश्रम नै करय चाहैत छल। महराजक शासन सं भिखमंगा त कम भ गेल छल। लोक सेहो भीख नै दिय चाहैत छल। अस्तु ओकर जीवन कष्टमय भय गेल। एकदिन ओ भोर स दुपहरिया तक भीख मंगलक किन्तु किछु नहि भेटलैक। दोपहरिया में रौद स त्रस्त भ ओ गाछक निच्चा में बैस गेल आ बटोही सभ स दैन्य भाव स मांग लागल। किन्तु कोई ध्यानो नै देलकैक। सोचलक जे भगवान के नामे स किछु भेटजायत ई सोचि ओ कहलक ’हे भगबान भूखल के अन्न दियौक हमर एहेन गरीबक उद्धार करू।’ लोक अपन अपन काज मे व्यस्त छल कोई ऐ पर ध्यान नै देलकैक। तखै ओ छौडा भगबान पर तमसा गेल। कहलक हौ भगवान तों त ठक छ। तोही हमरा बनेलह आ हम भुखल छी तों चुप छह। तो न जगदीश्वर् छ न जगत्पालक। ओ मोन भरि भगबान क निन्दा कयलक। ओही समय ओ राजा ओहि रास्ता स गुजरलाह। भिखमंगा के बकर बकर सुनि के घोडा के रोकलथि।ओकर नजदीक आबि के पुछलथि अहा केकरा आ कियाक निन्दा करैत छियैक? ओ कहलक भगबान के । ओ धूर्त अछि बहीर अछि…। राजा पुछलथि भगवान कोन अपराध कयलन्हि? भोर स घुमलहुं तैय्यो खेनाइ त छोरू वराटिका तक नै भेटल। रजा कहलथि अहाँ पैसा चाहैत छी कि? हम ऐ देशक राजा छी। एकटा हाथ दिय हम एक हजार रुपया दैत छी। हाथ द के हम केना जियब्- ओ बाजल।रजा फ़ेर कहलथि अच्छा एकटा काज करू अहाँ एकटा पैर दिअ हम दू हजार रुपया दैत छी। दुनू आंखि दिय आदहा राज दैत छी। ओ बाजल अंग केना द सकैत छी?ओ त हमर प्राण छी। एहेन धन स कोन् अलाभ? राजा कहलथि तखनि त अहा भाग्यशाली छी।एक् एक टा अंग हजातर सं बेसी महत्त्व रखिअत अछि।दुनू आंखि अदहा राज स बेसी महत्त्व के अछि। ई सभटा भगवाने क दया सँऽ। ओ त पूजनीय छथि उपकार बिसरि के निन्दा कियाक? पशु सेहो कयल गेल उपकार नै बिसरैत अछि। अहा पशु स सेहो बेकार छी? उठू। अनमोल हाथ पैर के सहायता सँऽ आहार क इन्तजाम करू। ओही काल सँ ओ बिखमंगा भीख मंगनाई छोडि देलक। परिश्रम कय जीविकोपार्जन करय लागल। देवब्रत बसु- सुख केँ मृगमरीचिका बुझू (संस्कृत बीहनि कथा) देवब्रत बसु- सुख केँ मृगमरीचिका बुझू (संस्कृत बीहनि कथा) [बालबोधिनी- मूल संस्कृत लेखक श्री देवब्रत बसु, अनुवाद बिपिन कुमार झा] सुख केँ मृगमरीचिका बुझू कोनो राजा अपन वृद्धावस्था मे अपन बेटा के राज्यक भार दय के स्स्वयं जंगल दिस तपस्या करबाक हेतुअ प्रस्थान कयलथि। बाटहि मे कोनो तेजस्वी पुरुष सऽ भेंट भेलन्हि। राजा हुनका नम्रता पूर्वक नमस्कार केलथि। ओ तेजस्वी पुरुष पुछलथि हे राजा ! आई नहिं त अहाँक संग कोनो सैइक अछि नहि तऽ कोनो राजचिह्न! न रक्षक , न घोडा। एना असगरेअ कतय जाइत छी? राजा बजलाह- महोदय! संसारमोह के छोडि कें जंगल जाइत छी। तेजस्वी कहलथि- की अहाँ केर निश्चय दृढ अछि? क्रोध सँ, अपमानित भय के, उपेक्षित भय के, पराजय मे अधिक हानि प्राप्त कय के कदाचित् संसार त्याग करबाक मन करैत अछि। किन्तु बितैत समय केर संग स्वयं के संसार मे सामंजस्य बनेबाक लोक प्रयास करैत अछि। अहाँ तऽ ओहि प्रकारक नहि छी जे हारि मानि ली? हे महात्मा! हम उत्तम राजवंश मे उत्पन्न भेलहुँ। हमर बहुतो रानी सन्तान छथि। हम बहुतो इनार आ पोखरि खुनाओल। पूजा व्रत आदि बहुत कयल। बहुतो देश जितलहुँ। विद्यालय आ चिकित्सालय सेहो प्रतिष्ठापित करायल। किन्तु कतहु हमरा सुख नहिं भेटल। एकर की कारण? कनिक काल रुकि के ओ तेजस्वी नजदीके मे विद्यमान नीमक गाछ देखा के बजलाह- हे राजा! ई नीमक गाछ तीते टा होइत अछि। प्रार्थना सँ, दान सँ, पूजा सँ की एकर मधुर फल प्राप्त कयल जा सकैत अछि? संसारो अही नीमक गाछ जँका अछि। ओ मृगमरीचिका अपना सभ के एम्हर स ओम्हर घुमबैत अछि। मृत्यु नजदीक एलाओ पर सुख नहि भेटैत अछि। सत्कर्म आ अनुष्ठान सँ, भगवान केर धान सँ, शरणागति सँ सुखक आशा रखबाक चाही न कि अन्य प्रकार सँ। दोसरे क्षण ओ तेजस्वी नहिं देखाई देलथि। भगवाने वस्तुतः हुनक तत्त्व बुझेबाक हेतु एहि रूप आयल छलाह ई सोचि राजा डेग आगू बढवैत भगवान केर स्मरण करैत बढि गेलाह। डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र- वीरभोग्या वसुन्धरा, अति सर्वत्र वर्जयेत् (संस्कृत बीहनि कथा) डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र- वीरभोग्या वसुन्धरा, अति सर्वत्र वर्जयेत् -लेखिकाक संस्कृत बीहनि कथा संग्रह “लघ्वी”सँ मैथिली रूपान्तर- डॉ. योगानन्द झा द्वारा वीरभोग्या वसुन्धरा दुर्भाग्यसँ गृहस्वामी देवदत्तक मृत्यु भऽ गेलनि। लगले हुनक दुनू पुत्र हुनक श्राद्धादिक कर्मक बाद आपसी बाँट-बखरा कऽ लेलनि। ज्येष्ठ रमेश स्वभावसँ किसान छल। ओ अपन काजक व्यवस्था स्वयं संचालित करऽ लागल। मुदा छोट पुत्र सुरेश परम आलसी छल। ओकर खेती-बाड़ी जन-मजूरपर आश्रित रहऽ लगलैक। तेँ ओकर उपजा-बाड़ी अत्यल्प भऽ गेलैक। क्रमशः ओ अत्यन्त दरिद्र होइत चल गेल। एक दिन ओ अपन भाइसँ पुछलक- भाइजी यौ, हमर खेत सभक उपजा-बाड़ी किएक कम होइत चल गेल? हमरासँ कोन त्रुटि भेल अछि? हमहूँ तँ अहींक संगे समयेपर रोपनी-पटौनी आदि करैत अएलहुँ अछि मुदा तैयो हमरा खेतमे पहिने जकाँ उपजा नहि भऽ पाबि रहल अछि। आखिर कोन ढंगक दोष हमरासँ भऽ रहल अछि? रमेश बाजल- सुरेश! तोँ किछु करऽ नहि चाहैत छेँ। तोहर खेती-बाड़ी जने-मजूरपर टिकल छौक। ई जानिले जे जाधरि तोँ स्वयं अपन खेतमे परिश्रम नहि करबेँ ताधरि पर्याप्त अन्न नहिञे उपजतौ। सनातनसँ ई नीतिवाक्य प्रचलित छैक- “वीरभोग्या वसुन्धरा”। अति सर्वत्र वर्जयेत् कोनो दुर्घटनामे महेशक अकालमृत्यु भऽ गेलनि। तखन हुनक युवती पत्नी माधुरी आ दुइ गोट छोट-छोट नेना अकस्मात् अनाथ भऽ गेलनि। पर-परिजन सभ हुनका सभकेँ सांत्वना दऽ अपन-अपन काजमे लागि गेल। केशव महेशक बालसंगी छलैक। ओ माधुरीक सहायताक हेतु कृतसंकल्पित भेल। ओ सरकारी कार्यालयमे वरीय लिपिक छल। ओ अपन माइक संग माधुरीयेक पड़ोसमे रहैत छल आ निराश्रिता माधुरीक ध्यान राखैत छल। ओ माधुरीक हेतु बजार जाय खाद्य सामग्री कीनि कऽ अनैत छल आ ओकर आनो आवश्यकताक पूर्तिक हेतु कटिबद्ध रहैत छल। ओकर एहि प्रकारक प्रयासक कारणे माधुरी कहियो कष्टक अनुभव नहि कऽ सकल। केशवक माय सेहो माधुरीक धिया-पुता सभक ताक-छेम कएल करथि। ई सभ देखि कऽ लोकापवाद प्रचलित होमऽ लगलैक- “ई सभ कोनो परोपकारक भावनासँ नहि कएल जा रहल अछि। माधुरीक युवावस्था ओ सौन्दर्य एकर मूल कारण अछि। केशव माधुरीपर आकर्षित भऽ गेल अछि आ ओकरासँ प्रेम करऽ लागल अछि”। एहि तरहक सन्देहक दृष्टि सर्वत्र व्यापक होइत चल गेल। से सभ देखि केशवक माय बजलीह- बेटा, आइसँ माधुरीक घर जाएब बन्न करू। कहलो गेल अछि- “अति सर्वत्र वर्जयेत्”। लोक निरंकुश होइत अछि। असगर वजाहत- हम हिन्दू छी (हिन्दी लघु कथा) असगर वजाहत- हम हिन्दू छी (हिन्दी लघु कथा)- अनुवाद विनीत उत्पल हम हिन्दू छी एहेन कन्नारोहट जे मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे.. हम कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं, अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल। अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै। 'लाहौलविलाकुव्वत. . .' अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि 'खुदा नै जानि ई किए सुतलेमे किए चित्कार करऽ लगैए।' अम्मा बजली। 'अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै. . .' हम कहलिऐ। 'ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै', अम्मा बजली। सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि, 'एकरा कहू छतपर सुतल करए।' सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबैए। तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करैले, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई साधन बनि गेल अछि। सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए। सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने आएल कोनमे कटल पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टा खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मांसँ कएक बेर जगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकें हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हमसभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्मांक हृदय ओ जीत लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्मांकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेलै आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल। नग्रमे दंगा ओहिने शुरू भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लै जाइ छल जे किएक तँ ई माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा बेसीकेँ लुटल गेल।छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल। दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तइ दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कूची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छातक ऊपरसँ देवारकेँ तड़पैत किछु एहनो रस्ता बनि गेल छल जे ओकरा जानैबला मोहल्लाक एक कोनसँ दोसर कोन आरामसँ जा सकैत छल। मोहल्लाक लोक तैयारी युद्ध जकाँ केने छल। एहेन बेबस्था रहै जे जँ एक्को मास धरि जँ कर्फ्यू जाइए तैयो जरूरतक बौस्तुजात मोहल्लेमे भेटि जाए। दंगा मोहल्लाक छबारी सभकेँ अद्भुते उत्साह देखेबाक मौका दैत छल। रौ.. हम सभ तँ ऐ हिन्दू सभकेँ गर्दा फँका देबै.. की बुझि राखने अछि ई धोती बान्हैबला सभ.. धुर्र डरपोक होइ जाइए ई सभ।.. एक मुसलमान दस हिन्दूपर भारी पड़ैए.. हँसि कऽ लेने छी पाकिस्तान, लड़ि कऽ लेब हिन्दुस्तान.. एहने सन वातावरण बनि जाइ छल। मुदा मोहल्लासँ बाहर निकलैक नामपर सभक जान निकलऽ लागै छलै। पी.ए.सी.क चौकी दुनू दिस रहै। पी.ए.सी.क बूट आ राइफलक हत्थाक मारि कतेको गोटेकेँ मोन रहै, से मौखिक धरि तँ सभ ठीक रहै मुदा ओइसँ आगाँ…. संकटमे एकता लोक सीखि लैत अछि। एकता अनुशासन आ बेबहार। सभ घरसँ एकटा छौड़ा पहरापर रहत। हमर घरमे हमरा अलाबे, आ हम २५ बरख पार कऽ गेल रही से हमरा छौड़ा नै कहल जा सकैत छल, छौड़ सैफ टा छल, से ओकरा रतुका पहरापर रहऽ पड़ैत छलै। रतुका पहरा छातपर होइत छल। मुगलपुरा किएक तँ नग्रक सभसँ उपरका हिस्सामे छल से छातपर सँ सम्पूर्ण नग्र देखाइ पड़ैत छल। मोहल्लाक छौड़ा सभक संग सैफ पहरापर जाइत छल। ई हमरा लेल अब्बा लेल आ साफिया लेल बड्ड नीक गप छल। जँ हमरा घरमे सैफ नै रहितए तँ शाइत हमरे रातिमे धक्का खाए पड़ितए। सैफक फरापर जेबाक कारणसँ ओकरा किछु सुविधा सेहो देल गेल रहै, जेना आठ बजे धरि ओकर सूतऽ देल जाइत रहै। ओकरासँ बाढ़नि नै दिआएल जाइत रहै। ई काज साफियाक जिम्मा भऽ गेल छल जे साफियाँकेँ एक्को रत्ती पसिन्न नै रहै। कखनो-कखनो रातिमे हम सेहो छातपर चलि जाइत रही, लाठी, लकड़ी आ पजेबाक ढेरी एम्हर ओम्हर लागल छलै। दू चारिटा छौड़ा लग देशी पेस्तौल आ बेसी लग चक्कू रहै। ओइमे सँ सभ छोट-मोट काज करैबला कारीगर छला। बेशी गोटे तालाक कारखानामे काज करै छला। किछु दर्जी, काठ-लकड़ी सन काज करैत छला। एम्हर बजार बन्न छल से हुनकर सभक काज सेहो बन्न छल। ऐमे बेशी गोटेक घरमे कर्जासँ चूल्हि जरि रहल छलै। मुदा ओ सभ प्रसन्न रहथि। छातपर बैसि कऽ ओ सभ दंगाक नव खबरि पर टीका-टिप्पणी करै जाइ छला आ नै तँ हिन्दू सभकेँ गारि पढ़ै जाइत छला। हिन्दूसँ बेशी गारि ओ सभ पी.ए.सी.केँ दैत छला। पाकिस्तान रेडियोक सभटा कार्यक्रम हुनका सभकेँ जबानी मोन छलन्हि आ कम अबाजमे ओ सभ रेडियो लाहौर सुनल करथि। ऐ छौड़ा सभमे दू-चारि गोटे जे पाकिस्तान गेल रहथि हुनकर सभक इज्जति हाजी सन छल। ओ सभ पाकिस्तानक रेलगाड़ी “तेजगाम” आ “गुलशने इकबाल कॉलोनी”क एहेन खिस्सा सुनबैत रहथि जे लगै छल जे स्वर्ग जँ कतौ अछि तँ ओ पाकिस्तानमे अछि। पाकिस्तानक बड़ाइसँ जखन हुनकर सभक मोन भरि जाइ छलन्हि तखन ओ सैफ संगे हँसी करै जाइ छला। सैफ पाकिस्तान, पाकिस्तान आ पाकिस्तानक वर्णन सुनलाक बाद एक दिन पुछि देने रहए जे ई पाकिस्तान अछि कतऽ? ऐपर सभ गोटे ओकरा संग बड हँसी केने रहथि। ओ किछु बुझने रहए मुदा ओकरा ठीकसँ ई पता नै चललै जे पाकिस्तान अछि कतऽ? ई पहरुआ छौड़ा सभ सैफकेँ मजाकमे दरबैत रहथि, “देख सैफ, जँ हिन्दू तोरा देख लेतौ तँ बुझै छहीं की करतौ? पहिने तोरा नाङट कऽ देतौ।” छौड़ा सभकेँ बुझल रहै जे सैफ अर्द्ध बताह हेबाक बादो नंगटे भेनाइकेँ बड खराप आ अधला गप बुझै छल, “तकर बाद हिन्दू सभ तोरा तेलसँ मालिश्त करतौ।” “किए, तेल-मालिश्त किए करत?” “किएकि जखन ओ सभ तोरा बेंतसँ मारौ तँ तोहर खाल निकलि जाउ। तकर बाद धीपल छड़सँ तोरा दागै जेतौ।…” “नै”, ओकरा बिसवास नै भेलै। रातिमे ओकरा डरौन आ मारि-काटि बला जे खिस्सा सुनाओल जाइ छल, ओइसँ ओ खूब डरा गेल छल। कखनो काल ओ हमरासँ भसियाएल गप करऽ लागै छल। हमरा रञ्ज होइ छल आ ओकरा चुप करा दै छलौं, मुदा ओकर मोनक प्रश्नक उत्तर नै भेटि पाबै छलै। एक दिन ओ पूछऽ लागल- “भैया, पाकिस्तानमे सेहो माटि होइ छै की?” “किए? ओतऽ माटि किए नै हेतै?” “ओतऽ खाली सड़के सड़क नै छै? ओतऽ टेरीलीन भेटै छै.. ओतऽ सस्त छै.. आ” “देखू ई सभटा मोनक गढ़ल गप अछि… तूँ अल्ताफ आ ओकर संगी सभक गपपर काने नै दिअ।” हम ओकरा बुझेलिऐ। “भैया, की हिन्दू आँखि बहार कऽ लै छथि..” “फूसि.. ई तोरा के कहलकौ?” “बच्छन।” “फूसि।” “तखन चरसा सेहो नै खिचैत छथि?” “ऊँह.. ई की सभ पूछि रहल छेँ..” ओ चुप भऽ गेल, मुदा ओकरा आँखिमे सैकड़ाक संख्यामे प्रश्न छलै। हम बाहर चलि गेलौं। ओ साफियासँ यएह सभ गप करऽ लागल। कर्फ्यू बढ़िते गेल। रतुका पहरेदारी सेहो चलैत रहल। हमर घरसँ सैफे जाइत रहल। किछु दिन बाद एक दिन अनचोक्के सुतलमे सैफ चिकड़ऽ लागल। हम सभ घबड़ा गेलौं मुदा ई बुझबामे भाङठ नै रहल जे ई सभ ओकरा डराएल जएबाक कारणसँ अछि। अब्बाकेँ छौड़ा सभपर बड्ड पित्त लहड़ल छलन्हि आ ओ मोहल्लाक एकाध मुँहपुरुख लोकनिकेँ ई गप कहनहियो रहथिन्ह, मुदा तकर कोनोटा असरि नै भेल। छौड़ा सभ आ सेहो मोहल्लाक छौड़ा सभ किए ऐ मनोरंजनकेँ छोड़ितथि? बात कतऽसँ कतऽ धरि पहुँचि गेल अछि एकर कनियो अंदेशा हमरा ओइ दिन धरि नै भेल जहिया सैफ हमरासँ खूब गम्भीर भऽ पुछलक, “भैया, हम हिन्दू बनि जाउ?” प्रश्न सुनि हम गुम्म पड़ि गेलौं, मुदा तुरत्ते हमरा बुझऽ मे आबि गेल जे ई रातिमे डरौन खिस्सा सुनाओल जएबाक परिणाम अछि। हमरा तामस उठि गेल, फेर सोचलौं जे बताहपर तामस केलासँ नीक जे तामस पीबि जाइ आ ओकरा बुझेबाक प्रयत्न करी। हम पुछलिऐ, “किए? अहाँ हिन्दू किए बनऽ चाहै छी? बचबा लेल? एकर माने भेल जे हम नै बचि पाएब?” “तँ अहूँ बनि जाउ..”, ओ बाजल। “आ तोहर कक्का, हमर अब्बा”, हम अपन अब्बा आ ओकर कक्काक गप पुछलिऐ। “नै.. हुनक सभकेँ…”, ओ किछु सोचऽ लागल। अब्बाजानक उज्जर आ नमगर दाढ़ीमे कतौ ओ ओझरा गेल छल। “देखलौं, ई सभ छौड़ा सभक किरदानी छी जे अहाँकेँ भटकाबैए। ई जे ओ सभ अहाँकेँ कहै छथि, से सभटा झूठ अछि। रौ, महेशकेँ नै चिन्है छेँ?” “ओ जे स्कूटरपर अबै छथि…” ओ प्रसन्न भऽ गेल। “हँ हँ, वएह।” “ओ हिन्दू छथि?” “हँ हिन्दू छथि”, हम कहलिऐ। पहिने तँ ओकर मुँहपर निराशाक छाह एलै फेर ओ गुम्म भऽ गेल। “ई सभ उच्क्का सभक काज छी.. नहिये हिन्दू लड़ैत अछि आ नहिये मुसलमान… उच्क्का सभ लड़ैत अछि, बुझलौं?” दंगा शैतानक अँतड़ी सन नमड़ैत गेल आ मोहल्लामे लोक परेशान हेबऽ लगला- भजार न्ग्रमे दंगा करैबला हिन्दू आ मुसलमान उचक्का सभकेँ जँ मिलाइयो देल जाए तँ कतेक हेता.. बेशीसँ बेशी एक हजार, चलू दू हजार मानि लिअ। तँ भाइ दू हजार गोटे लाख लोकक जिनगी नर्क बनेने छथि आ हम सभ घरमे सुटकि कऽ बैसल छी। ई तँ वएह भेल जे दस हजार अंग्रेज कोटि हिन्दुस्तानीपर राज करैत छला आ सम्पूर्ण सरकार ओकर अन्तर्गत चलैत छल, आ फेर ऐ दंगासँ फाएदा ककर अछि, फाएदा? औ जी हाजी अब्दुल करीमकेँ फाएदा अछि जे चुंगीक चुनाव लड़त आ ओकरा मुसलमान वोट भेटतै। पंडित जोगेश्वरकेँ हेतै जकरा हिन्दूक वोट भेटतै। आब तखन हम की छी? तूँ वोटर छेँ हिंदू वोटर, मुसलमान वोटर, हरिजन वोटर, कायस्थ वोटर, सुन्नी वोटर, शिआ वोटर, यएह सभ होइत रहत ऐ देशमे? हँ, किए नै? जतऽ लोक मूर्ख अछि, जतऽ भाड़ापर हत्या केनिहार भेटै छै, जतऽ राजनीतिज्ञ अपन गद्दी लेल दंगा करबै छथि ओतऽ आर की भऽ सकैए? भजार, की हम लोक सभकेँ पढ़ा नै सकै छी? बुझा नै सकै छी? हह- हह- तूँ के होइ छह पढ़बैबला, सरकार पढ़ेतै। जँ चाहत तँ सरकार आ जँ नै चाहत सरकार तँ ऐ देशमे किछु नै भऽ सकैए? हँ.. अंग्रेज हमरा सभकेँ यएह सिखेने अछि.. हम एकर अभ्यासी छी.. चलू छोड़ू, तखन दंगा होइत रहत? हँ होइत रहत। मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा मुसलमान हिन्दू भऽ जाथि? लाहौलविलाकुव्वत ई की कहि रहल छी? बेस तँ मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा हिन्दू मुसलमान बनि जाथि? सुभान अल्लाह केहेन चोटगर गप कहलौं.. तखन की दंगा रुकि जाएत? ई तँ सोचबा जोग गप अछि। पाकिस्तानमे शिया सुन्नी एक दोसराक जानक पाछाँ छथि.. बिहारमे ब्राह्मण दलितक छाहसँ बचैत छथि.. तँ की भजार लोक आकि मनुक्ख कहू सार अछिये एहेन जे लड़िते रहऽ चाहैए? ओना देखू तँ जुम्मन आ मैकूमे बड़ दोस्तियारी छै। तँ किए ने मैकू आ जुम्मन बनि जाइ… एह, केहेन बात कहि देलौं, माने… माने… माने… हम भोरे-भोर रेडियोक कान अमेठि रहल छलौं, साफिया बहारि रहल छलि आकि राजाक छोट भाइ अकरम भागैत भागैत आएल आ फूलल साँसकेँ रोकबाक असफल प्रयत्न करैत बाजल, “सैफकेँ पी.ए.सी. बला सभ मारि रहल अछि।” “की? की कहि रहल छी?” “सैफकेँ पी.ए.सी. बला मारि रहल अछि”, ओ कने रुकि कऽ बाजल। “किए मारि रहल अछि? की बात अछि?” “की जानी.. चौबटियापर..” “ओतऽ जतऽ पी.ए.सी.क चौकी अछि?” “हँ, ओतै।” “मुदा किए…”, हमरा बुझल छल जे आठ बजे सँ दस बजे धरि कर्फ्यू खुजऽ लागल अछि आ सैफकेँ आठ बजेक करीब अम्मा दूध अनबा लेल पठेने छलि। सैफ सन बताहोकेँ बुझल रहै जे जल्दी-जल्दी आपस एबाक अछि, आब तँ दस बाजि गेल अछि। “चलू हम चलै छी।”, रेडियोसँ बहराइत अनटोटल अबाजक चिन्ता केने बिनु हम तेजीसँ बहरेलौं। बताहकेँ किए मारि रहल अछि पी.ए.सी.बला सभ, ओ कोन एहेन कर्म केलक अछि? ओ कइये की सकैत अछि? अपने एहेन भयभीत रहैत अछि जे ओकरा मारबाक आवश्यकते की.. फेर की कारण भऽ सकैए? पाइ, औजी ओकरा तँ अम्मा दू टका देने अछि। दू टका लेल पी.ए.सी. बला सभ ओकारा मारत? चौबटियापर मुख्य सड़कक बराबर कोठापर मोहल्लाक किछु गोटे जमा रहथि। सोझाँमे सैफ पी.ए.सी.बलाक संग ठाढ़ छल। ओकर सोझाँमे पी.ए.सी.क जवान सभ छल। सैफ जोर-जोरसँ चिकड़ि रहल छल, “हमरा तूँ सभ किए मारलेँ.. हम हिन्दू छी.. हिन्दू छी…” हम आगाँ गेलौं। हमरा देखलाक बादो सैफ बजिते रहल, “हँ, हँ हम हिन्दू छी..”, ओ थरथरा रहल छल। ओकर ठोढ़क कोनसँ शोनितक एक बुन्न निकलि कऽ टघरि कऽ ठोढ़ीपर ठाढ़ छल। “तूँ हमरा मारलेँ कोना.. हम हिन्दू..”। “सैफ… ई की भऽ रहल अछि… घर चलू।” “हम.. हम हिन्दू छी।” हमरा बड्ड आश्चर्य भेल.. की ई वएह सैफ छी जे ई छल.. एकर तँ रूपे बदलि गेल अछि। ई एकरा भऽ की गेल अछि? “सैफ, होशमे आउ”, हम ओकरापर जोरसँ तमसेलिऐ। मोहल्लाक लोक सभ नै जानि केकरापर भितरे भीतर दूरसँ हँसि रहल रहथि। हमरा पित्त चढ़ल। सार, ई सभ ई नै बुझै छथि जे ओ बताह अछि। “ई अहाँक के अछि?”, एकटा पी.ए.सी. बला हमरासँ पुछलक। “हमर भाए छी.. कनेक मानसिक परेशानी छै एकरा।” “तँ एकरा घर लऽ जाउ”, एकटा सिपाही बाजल। “हमरा सभकेँ बताह बना देलक”, दोसर बाजल। “चलू… सैफ घर चलू। कर्फ्यू लागल अछि, कर्फ्यू..”। “नै जाएब… हम हिन्दू छी.. हिन्दू.. हमरा… हमरा…”, ओ हबोढकार कानऽ लागल। “मारलक… हमरा मारलक.. हमरा मारलक.. हम हिन्दू छी.. हम”, सैफ चितंग निच्चा खसल.. शाइत बेहोश भऽ गेल छल.. आब ओकरा उठा कऽ लऽ गेनाइ आसान छल। कुरानक पहिल अध्यायक सात टा आयत- अरबी-हिन्दी कुरान कुरानक पहिल अध्यायक सात टा आयत - अरबी-हिन्दी कुरान- अनुवाद- आशीष अनचिन्हार) (ई अनुवाद मधुर संगम संदेश द्वारा अरबी-हिन्दी कुरान पर आधारित अछि) कुरानक पहिल अध्यायकेँ " अल-फातिहा" कहल जाइत छै। एहि अध्यायमे सात टा आयत छै ( आयत मने श्लोक )। ई सातो आयत पैगम्बर मोहम्मद मक्का नामक जगह पर कहला। १) शुरू करै छी अल्लाह खुदा भगवानक नामसँ जे की एकमात्र प्रशंसा केर हकदार छथि। २) जे की बड़का कृपाशील आ दयावान छथि। ३) जे की रोजे-रजा ( बदला लेबए आ देबएकेँ ) मालिक छथि। ४) जिनकर हम सभ पूजा करैत छिअन्हि आ जिनकासँ मदति माँगै छिअन्हि। ५) जे की हमरा सोझ आ सही बाटपर चलबा लेल प्रेरित करै छथि। ६) ओहि लोकक बाट पर सेहो चलबाक लेल कहै छथि जे की खुदा केर प्रिय छथि। ७) आ हुनका संग रहबा लेल सेहो प्रेरित करै छथि जे की ने नीच छथि आ ने पथभ्रष्ट। तुकाराम रामा शेट- पाखलो (कोंकणी उपन्यास) कला अकादमी गोवासँ साहित्य पुरस्कार प्राप्त कोंकणी उपन्यास (1980-81) पाखलो तुकाराम रामा शेट अनुवाद डॉ. शंभु कुमार सिंह लेखक तुकाराम रामा शेट, (जन्म : 31.07.1952), कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रहक रचनाक संगहि कतेको पोथीक अनुवाद, संपादन आ प्रकाशनक काज करैत एकटा प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित केने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1980-81 में ‘गोवा कला अकादमी’क साहित्य पुरस्कार भेटि चुकल छनि। संप्रति, गोवामे रहैत साहित्य साधना मे लीन छथि। अनुवादक डॉ. शंभु कुमार सिंह, (जन्म : 18.04.1965), माता : श्रीमती जयमाला देवी, पिता : श्री चतुर्भुज सिंह, ग्राम : लहुआर, पत्रालय : तेलहर, अंचल : महिषी, जिला : सहरसा, पिन कोड : 852216, (बिहार) पाखलो © मूल कोंकणी : तुकाराम रामा शेट मुखपृष्ठ आ भीतरक चित्र : चन्दन विश्वास द्वारा ------------------------------------------- PAKHALO : A Konkani Novel by Tukaram Rama Shet, translated into Maithili by Dr. Shambhu Kumar Singh. अनुवादकक दिससँ प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास ‘पाखलो’क अनुवाद हम सुरह केने रही वर्ष 2009 मे, जकर अनूदित संस्करण www.videha.co.in क वेबसाइट पर “विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई- पत्रिका” मे 15 जुलाई 2009 सँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशन आरंभ भेल छल। हम एहि अनुवादक मादे विस्तारसँ एकर हिन्दी संस्करणक भूमिकामे लिखने छी, जकर सारांश ई अछि जे हमरा एहि उपन्यासकेँ मैथिली भाषामे आनबाक लेल पहिने एकर हिन्दीकरण करए पड़ल जाहिमे हमर सहयोग केलनि हमर कार्यालयक सहयोगी श्री सेबी फर्नांडीस। तैँ सेबीजीक प्रति पहिल कृतज्ञता ज्ञापित करब हम अपन कर्त्तव्य बुझैत छी, किएक तँ बिनु हुनक सहयोगक मैथिलीक ई सेवा हमरा बुते असंभवे रहितए। हम दुनू गोटे राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे संगहि-संग काज करैत छी। एहिलेल कार्यालयसँ अवकाश भेटलाक पश्चाते हम दुनू गोटे एकठाम बैसि सकी, जे संजोग बहुत मोसकिलसँ भेटैत छल। यैह ओ कारण थिक जे एहि पोथीक अनुवादमे एतेक बेसी समय लागि गेल। ने केवल एहि अनुवादक मादे अपितु जँ हम अपन वर्तमानक समस्त शैक्षणिक गतिविधिक चर्चा करी, तँ श्रीमती शुचिता सिंह (तत्कालीन समन्वयक, वेलिडेशन एण्ड लेक्सिकल बिल्ड, परियोजना, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर), ओ प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ (तत्कालीन निदेशक, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर) क नामोल्लेख केने बिना हम उऋण नहि भ’ सकैत छी, किएक तँ वर्ष 2008 मे भारतीय भाषा संस्थान अएबासँ पूर्वक किछु वर्ष धरि हमर सम्पर्क कलमसँ छूटि गेल छल। दोसर शब्दमे जँ कही तँ ई कहल जा सकैछ, जे कलम हमरासँ विमुख भ’ गेल छलीह आ हम कलमसँ दूर भागि गेल रही। एहन विषमकालमे हिनके सभक परतापेँ हमरा हाथमे पुनः कलम आबि सकल जे हमरा वर्तमान जीवनक आधार/आहार बनल। तैँ हिनका सभक प्रति अपन भावातिरेकक अभिव्यक्ति शब्दक माध्यमे हमरासँ संभव नहि अछि। हँ, हम श्रद्धावनत् अवस्से भ’ सकैत छी। बिना कोनो शर्तक ‘पाखलो’क अनुवाद ओ ई-प्रकाशनक अनुमति दए लेखक श्री तुकाराम रामा शेट जे सहृदयता देखौलनि अछि, ताहिलेल हम हृदयसँ हुनकर आभारी छियनि। धन्यवादक पात्र छथि समकालीन मैथिली साहित्यक एकटा विशिष्ट हस्ताक्षर “विदेह-प्रथम मैथिली पाक्षिक ई- पत्रिका”क संपादक, श्री गजेन्द्र ठाकुरजी, जे एहि अनूदित कृतिक ई-प्रकाशन केलनि। एहि महती उपकारक लेल हम हुनका प्रति कृतज्ञ छी। ई अनुवादकर्म शतशः हमरे थिक, तकर दाबी हम नहि क’ सकैत छी, किएकतँ अनुवादक क्रममे हमरा कतोक कोंकणी, हिन्दी आ मैथिलीक विद्वान लोकनिसँ परोक्ष वा प्रत्यक्ष रूपेँ मदति लेबए पड़ल अछि। हिनका सभकेँ कोटिशः साधुवाद। आ अंतमे, एहि अनुवादकर्मक मादे सुखद परिणामक प्राप्त्याशा हमरा मैथिलीक सुधीजन आ विद्वान लोकनिसँ नहि अछि, अपितु जँ हमरा प्रयासक त्रुटि पर ओ लोकनि अपन ध्यान केन्द्रित करथि तँ ई हमर अहोभाग्य होयत। किएक तँ हम अपन प्रस्तुतीकरण ने तँ एकटा विद्वानक रूपमे आ ने अनुवादकक रूपमे चाहैत छी। हम अपन प्रस्तुतीकरण एकटा विद्यार्थीक रूपमे करए चाहैत छी। अपने लोकनिसँ बहुत किछु सीखए चाहैत छी। बहुत किछु......... बहुत रास...........। मैसूर डॉ. शंभु कुमार सिंह 19 अप्रील, 2013 चैत्र, रामनवमी एक आइ रबि छैक। हमर निन्न कने देरी सँ खुजल। हम अपन कम्मल सुलूकेँ ओढ़ा देलिऐक। ओछाओन पर पड़ल-पड़ल हमर नजरि देवाल पर गेल। गोविन्द अपना संगहि भगवानक दुनू फोटो ल’ गेल छल। चिक्कनि माटिसँ ढौरल देवाल पर आब कोनो फोटो नहि रहैक। ओ एकदम सुन्न बुझाइक। हम ओछाओने पर पड़ल-पड़ल सोचैत रही। गोविन्द नोकरी करबाक लेल पणजी शहरमे छल। बाबूजीक मुइलाक पश्चात् ओ अपन मायकेँ अपना संगहि पणजी ल’ गेल छल। हम दुनू गोटे एहि घरमे रहैत रही। हम आ हमर भगिनी। हम उठलहुँ, खिड़की खोललहुँ, आ दरबाजा खोलहि वला रही कि एतबहिमे आलेसक आवाज सुन’ मे आएल। “यौ पाखलो! एखन धरि सुतले छी? पाखल्या... यौ पाखल्या.....” बिना किछु बजनहि हम दरबाजा खोलि देलहुँ। हम दरबाजा बन्न केलहुँ आ एकटा बासन ल’ कए लगीचक होटल जएबाक लेल ओकरा पाछू-पाछू चुपचाप चलि देलहुँ। आलेस हमर नेनपनक मीत थिक। हमसभ एखनहुँ नीक मीता छी। एक्कहि ठाम काज करैत छी। ओहो ड्राइवर आ हमहूँ। एक्कहि कम्पनीमे नोकरी करैत छी आ एक्कहि रंगक ट्रक चलबैत छी। हमरा गुमसुम चलैत देखि ओ बाजल— “औ जी! कोन सोचमे डूबल छी? “किछुओ तँ नहि? चेतना अएलाक बाद हम कहलहुँ। “किछु कोना नहि? ओहिना बाजि रहल छी की? कने सोचू, जँ अहाँक बियाह भ’ जाय तँ भगिनीकेँ देख’ वाली किओ तँ भ’ जेतीह?” एहि बात पर हँसैत हम पूछि देलिऐक— “के देत हमरा अपन बेटी?” ई बात सुनितहि ओ जोर-जोरसँ हँसए लागल। ओकर हँसी रोकबाक लेल आ किछु आर बाजबाक लेल हम ओकरा सँ पूछलहुँ— “ऐं यौ आलेस, अहाँक पासपोर्ट बनि गेल की?” “हँ।” “तखन दुबई कहिया जा रहल छी?” हम पुछलियनि। “अगिला सप्ताह, कपेल (छोट गिरिजाघर)क प्रार्थनोत्सव केर बाद।” “कपेलक प्रार्थनोत्सव केर बाद?” “हँ, बरु ओहि दिन।” “ओहि दिन किऐक? उत्सवक बाद चलि जाएब…।” “नहि, असलमे ओहि दिन हमर मीत जा रहल अछि, एहि लेल हम ओकरहि संगे जा चाहैत छी।” “तखन तँ अहाँकेँ हमरा कम्पनीक नोकरी छोड़’ पड़त।” “एहन भिखमंगा नोकरी करबो के करए? ओहुना भारतमे रहि कए के नीक पाइ कमा सकैत अछि? ओतए मजूरीयो तँ बेसी छैक?” “तखन अहाँक विदेश जायब एकदम पक्का ने?” “हँ”, एतबा कहि ओ अपन पैन्टक बेल्ट आर कसय लागल। “विदेश जुनि जाउ।”, हम पछिला किछु दिनसँ आलेससँ कहैत रहिऐक। “हमरा बाटमे अड़ँगा जुनि लगाउ।”, ओहि समय ओ हमरा कहलनि। हम चुपचाप बाट चलैत रहलहुँ। जखन गोविन्द गाम छोड़ि पणजी शहर गेल छलाह, तखन हमरा बड़ खराप लागल छल, मुदा आब तँ आलेस अपन गाम आ देश छोड़ि परदेस जा रहल छल, आइ हमरा कनेको खराप नहि लागि रहल अछि। हम दुनू गोटे होटल पहुँचलहुँ। भीतर जयतहि सभ किओ हमरा घूरि-घूरि कए देखय लागल। हम मोनहि-मोन सोचलहुँ, “बुझाइत अछि जे ओकरा सभक नजरि हमर कैल टनटन केश आ कैल रोइयाँ पर चलि गेल छैक, हमर लहसुनियाँ आँखि, उज्जर चाम आ गसगर देह…” “पाखलो, अहाँक बासनमे दूध दी, आकि चाह?” होटलवला हमरासँ पूछलक। हम भरि बासन चाह ल’ लेलहुँ। दू टा बड़का पाँवरोटी आ एकटा कांकण (वलयाकार पाँवरोटी) लेलहुँ। आलेस अपन मीतक संग दुबई जाइवला बात करैत रहल। ओकर मीत ओतएसँ ओकरा लेल कोनो विदेशी समान लएबा लेल कहैत रहैक। विदेश जयबासँ संबंधित बात करएवला आलेसकेँ छोड़ि हम अपना घरक बाट लेलहुँ। पड़ोसक रुक्मिणी मौसी हमरा घर आयल छलीह। ओ सुलूकेँ उठा कए मुँह धोबाक लेल कहलथि आ ओकरा छींटगर लाल फ्रॉक पहिरैलथि। हमहुँ अपन हाथ-मुँह धो लेलहुँ। दू टा गिलासमे चाह ढ़ारलहुँ आ रुक्मिणी मौसीकेँ चाह पीबाक लेल पूछलियनि, “अहाँकेँ चाह चाही की?” “नहि बाउ! हम एखनहि घरसँ चाह पीबि कए आएल छी, ओहुना हम होटलक चाह नहि पीबैत छी।” रुक्मिणी मौसीक एहि जबाब पर हम चुप भ’ गेलहुँ। हम सुलूकेँ बजेलहुँ। ओ थपड़ी पाड़ैत हमरा लग आयलि आ पूछ’ लागलि, “मामा आइ रबि छियैक ने? आइ तँ अहाँ काज पर नहि जाएब?”हम ‘हँ’ कहि अपन माथ डोलौलहुँ। “मौसी आइ अहाँ हमरा अपना ओहिठाम नहि ल’ जाएब। आइ हम एतहि रहब…मामाक संगे।” ओ मौसीसँ बाजलि। “ठीक छैक दाइ.....आइ हम अहाँकेँ नहि ल’ जाएब।” हम दुनू गोटा चाह पीबैते रही तावत रुक्मिणी मौसी अपन डाँरक साड़ी सम्हारैत घरक बरतन-बासन धोबाक लेल चलि गेलीह। सुलूक बाबूजी ओकरा सम्हारबाक लेल तैयार नहि रहथि। ओहि समय ओ मात्र डेढ़ बरखक छलीह। नीक जकाँ बाजियो नहि होइक। केवल दूई चारि शब्दहि बाजि सकैत छलीह। आब तँ ओ साढ़े तीन बरखक भ’ गेल अछि, मुदा देखबामे पाँच-साढ़े पाँच बरखक बुझाइत छलीह। गोर-नार चेहरा! हम ओकरा माथ पर अपन हाथ फेरलहुँ। मोम-सन नरम केश आ लहसुनियाँ आँखि! हम ओकरा आँखिमे देखलहुँ, आ ओ हमरा आँखिमे देखलक। ओ अपन आँखि पैघ कए लेलक। ओकर लहसुनियाँ आँखिमे एक्कहि संग कैकटा दृश्य उभरि गेल। एहन बुझाइत छल जेना ओ किछु पूछए चाहैत छलीह! हमरा कने आश्चर्य भेल। “अहाँक लहसुनियाँ आँखिसँ हमर कोनो पुरान संबंध अछि!” हमर नजरि ओकर गुलाबी केश पर गेल। ने जानि किएक ओकर गोर-नार चाम, गुलाबी केश देखि हमरा एहन बुझाएल जेना पूरा आकाश मेघसँ आच्छादित भ’ गेल होअए, ठीक तहिना हमर मोन अतीतक स्मरणसँ भरि गेल…। ताधरि रुक्मिणी मौसी घरक काज पूरा क’ कए अपन घर जाहि पर रहथि, कि हम सुलूकेँ हुनका संगहि ल’ जयबाक लेल कहलियनि। “हम नहि जायब।” सुलू अपन माथ डोला कए जबाब देलक। “नहि, हमरा काज पर जयबाक अछि, अहाँ मौसीक संग चलि जाउ। दूपहरमे हम जल्दीए आबि अहाँकेँ ल’ आएब।” एतबा कहि हम सुलूकेँ समझएबाक प्रयास कएलहुँ। सुलू कानय लागलीह, मुदा पछाति जा कए ओ मौसीक संगे जयबाक लेल तैयार भ’ गेलीह। रुक्मिणी मौसी सुलूकेँ ल’ कए चलि गेलीह। हम दरबाजा बन्न क’ लेलहुँ। हमरा दिमागमे आयल सभटा पुरान स्मृति एकटा गरज आ चमक केर संगहि बिखरि गेल! बुझू हम अपना आपकेँ पूर्ण रुपेण ओकरहिंमे ताक’ लागलहुँ…. अपन पहिचानक खोज करय लागलहुँ…। दू गोविन्दक दादी द्वारा कहल गेल खिस्सा एखन धरि पाखलो केँ स्मरण छलनि। शाली आ सोनू दुनू भाय-बहिन रहथि। गामक सीमान पर हुनक घर छलनि आ अपन किछु खेती-बारी सेहो। ओ अपनहुँ खेती-बारी करैत छल आ दोसरोक खेतमे काज करबाक लेल चलि जाइत छल। एकर अतिरिक्त ओ गरमीमे मजूरीयोक काज करैत छल। एकदिन शाली लकड़ी काटबाक लेल जंगल गेल छलीह। कुमारि शालीक संग तीन टा आर स्त्री लोकनि छलीह। आन दिन जकाँ ओ सभ लकड़ी काटि कए ओकर बोझ सेहो बना नेने रहथि; तखनहि हुनका सभकेँ सीटीक आवाज सुनबामे अयलनि। ओ चारू गोटे डरि गेलीह। ताहि दिन पाखले (पुर्तगाली फिरंगी) जंगलमे शिकार करबाक लेल अबैत छलाह, ओ सभ एहन सुनने छलीह। फिरंगी सभक मनमानी आ स्त्रीगण पर कयल गेल अत्याचारसँ ओ सभ परिचित छलीह। ओहि सीटीक आवाज सुनि कए ओकरा सभक तँ जेना होशे-हवास गुम भ’ गेल। ओ सभ बहुत घबरा गेलीह। तावत हाथमे बंदूक नेने तीनटा पाखले ओतए पहुँचि गेल। बाघ केँ सोझाँ आबि गेलाक पश्चात् जेना लोक लंक ल’ लैत अछि ठीक ओहिना ओ सभ लकड़ीक बोझ छोड़ि भागल। तीनू पाखले ओकरा सभक पीछा करय लागल। अपन जान बचयबाक लेल भाग’ वाली शाली गिरैत-पड़ैत बहुत थाकि गेल छलीह। आब आर बेसी गतिएँ दौड़ब ओकरा बुता केर बात नहि रहि गेल छल। ओ पाछू ताकलक, तँ देखलक जे एकटा फिरंगी अपन कन्हा पर बंदूक आ छाती पर एकटा तमगा लगौने मिलिट्री वेशभूषामे ओकरहि पाछू दौड़ल आबि रहल छल। ओहि पाखलोकेँ देखि शाली अपन जान बचएबाक लेल अपन अंतिम शक्ति लगा कए दौड़लीह। ओ सभटा स्त्रीगणकेँ पाछू छोड़ैत आर जी-जानसँ दौड़’ लागलीह। बहुत बेसी दौड़बाक कारणेँ आब ओ थाकि कए चकनाचूर भ’ गेल छलीह। जोर-जोरसँ उपर नीचाँ करैत ओकर छाती आब फाटि कए बाहर निकलि जेतैक, ओकरा एहने बुझाब’ लागलैक। ओकर दौड़बाक गति मंद होम’ लागलैक आ एतबहिमे ओ पाखलो ओकरा लगीच पहुँचि गेल। लगीचक आन-आन स्त्रीगणकेँ छोड़ि ओ पाखलो शालिएक दिस बढ़ल आ अंततः ओ शालीकेँ अपन बाँहिमे कसि लेलक। एतबहिमे पाछूसँ दू टा आर पाखले ओतए पहुँचि गेल। ओहो सभ शालीक दिस अपन हाथ बढ़ौलक, मुदा ओ पाखलो ओहि दुनू पाखलेकेँ पुर्तगाली भाषामे किछु कहलकैक। ई सुनि ओ दुनू पाछू हटल आ आगू भागए वाली स्त्री सभक पीछा करए लागल। पाखलोक बाँहिमे शालीक साँस फूल’ लागलैक आ ओकर वाक् सेहो बन्न भ’ गेलैक। ओहि फिरंगीक देहमे शैतान आबि गेल छलैक! शालीकेँ होस आबि गेलैक। एखन धरि साँझ परि गेल रहैक। पूरा जंगलमे अन्हार व्याप्त भ’ गेल रहैक। एहि अन्हारकेँ देखि शालीकेँ बुझाइक जे जेना फेर ओकर दम निकलि जेतैक। ओकरा देह पर कोनोटा नूआ नहि रहैक, मुदा ओकरा देह पर किछु फाटल-चिटल नूआ राखि देल गेल रहैक। ओकरा माथक नीचाँ कोनो कड़गर चीज रहैक, मुदा की? से पता नहि चलि सकलैक। ओ जड़वत भ’ गेलीह। ओकर करेज धक-धक करैत रहैक, देहक पोर-पोरमे दरद होइत रहैक। ओ जतय कतहुँ अपन हाथ रखैक ओकरा सूखल खून हाथ लागैक। ओ बहुत डरि गेल छलीह, मुदा कानि नहि सकैत छलीह। ओ उठि कए बैसि गेलीह; तखने अकस्मात् टॉर्चक इजोत भेलैक। ओकर इजोत ओकरा देह पर पड़लैक त’ ओकर आँखि चोन्हिया गेलैक। छन भरिक लेल अपन आँखि बन्न क’ कए फेर खोललक त’ देखलक जे वैह पाखलो ओकरा लगीच आबि रहल छलैक। आन दूटा पाखलो जतए ठाढ़ रहैक ओत्तहि रहल। पछाति जा कए ओ दुनू ओहि टॉर्चक इजोतमे आगू बढ़ि गेल। शाली दिस आबि रहल पाखलो नांगटे देह छल। ओ फेर डरसँ सिहरि गेलीह। ओ फटलका नूआ-फट्टा ल' कए अपना छातीकेँ झाँपैत ठाढ़ हेबाक प्रयास करए लागलीह, मुदा टूटल गाछ जकाँ धरती पर गिर गेलीह। ताधरि ओ पाखलो शालीकेँ झट दए अपन हाथेँ पकड़ि लेलक। ओ पाखलो शालीक देहक नीचाँ ओछाओल गेल कपड़ा उठा लेलक। शालीक माथक नीचाँ राखल टोपी शालीक माथ पर राखि ओ जोर-जोरसँ हँसय लागल। शालीक घबराहटि बढिते जा रहल छलैक। ओ डरेँ थरथर काँपय लागलीह। ओकरा बुझेलैक जे एकटा बड़का अजगर खूब पैघ मुँह बौने ओकरा अपन ग्रास बना लेतैक। ओ जोरसँ चिकरलीह, मुदा ओकर आवाज ओकरा मुँहसँ नहि निकलि सकल। ओ फेरसँ शालीकेँ चुम्मा-चाटी करब सुरह क’ देलकैक आ ओकरा अपन बाँहिमे कसि लेलकैक। ओहि अन्हार घुप्प जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे क’ लेलकैक। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब तरहेँ आवाज आब’ लागलैक। साँझ पड़तहि ई बात सौंसे गाममे पसरि गेलैक। सीता कहैत छलीह, जे कोना ओ पाखलोक चंगुलसँ बाँचि गेलीह। शाणूक घरनी बतबैत छलीह जे कोना पाखलो कुमारि शालीकेँ उठा कए भागि गेल ओ ओकर इज्जति लूटि लेलक। शालीकेँ तँ पाखलो नोचि-चोथि नेने हेतैक, ई सभ सोचि-सोचि आन सभ लोक ओकरा प्रति अपन दया भाव देखबैत रहैक।
“पाखलो शालीक शीलभंग क’ देलकैक।” ई बात सौंसे गाममे आगिक भांति पसरि गेलैक। ओकर भाय जे नोकरीसँ घर घुरैत रहैक ओकरहुँ ई बात बुझनामे आबि गेलैक। ओ गोस्सासँ लाल भ’ गेलैक, संगहि डरि सेहो गेलैक। ओकरा हाथमे कुड़हरि रहैक जकरा ओ अपन कन्हा पर राखि लेलक। “एहि कुड़हरिसँ जँ हम ओहि पाखलोकेँ जित्ते नहि काटि देलियनि तँ हमरहुँ नाम नहि।” ओ बेर-बेर यैह शब्द दोहराबैत रहैक। शालीकेँ ताक’ जएबा लेल ओ कतेको लोकसँ मिनती केलक मुदा किओ ओहि अन्हार जंगलमे जएबा लेल किएक तैयार होइतैक? ओ एकटा लालटेम जरौलक आ एसगरे चलि देलक। लोक सभ ओकरा पागल कहए लागलैक। “पाखलो अहाँकेँ गोली मारि देत।” ई कहि लोक-सभ ओकरा डरएबाक प्रयास केलकैक मुदा ओ अपन जिद पर अड़ल रहल। ओ एसगरे चलि देलक, तखने दादी सेहो ओकरा संगे जएबाक लेल तैयार भ' गेलैक। दादी कार्रेर (बस) क चालक रहैक। शकल-सूरतमे ओ सोनूएँ-सन रहैक। दुनू युवा जएबाक लेल तैयार भ’ गेल। दादी शालीक कानमे किछु कहलकैक। ओ दुनू पातोलेक बाटे जंगल नहि जा कए सीधे गामक पुलिस स्टेशन दिस चलि देलक। एहन देखि गामक किछु आर बूढ़ आ जुआन सभ ओकरा संग भ’ गेलैक। सब किओ पुलिस-स्टेशन पहुँचि गेल। दादी पुलिस-स्टेशनक कैब, (पुर्तगाली पुलिस अधिकारी) देसाई साहेबकेँ शोर पारलकैक। ओ दरबज्जा नहि खोलि खिड़की खोललक आ ओतहिसँ बाहरक दृश्य देखलक। “पाखलो भीतरमे छैक की?” दादी कान्स्टेबलसँ पुछलकैक। “नहि।” साधारण भेषमे कान्स्टेबल कहलकैक। “तखन गेलैक कत”? दादी फेर पुछलकैक। “कार्मोक प्रधान आ हुनक दूई टा संगी भोरे-भोर शिकार पर गेल छथि, एखन धरि नहि आएल छथि। हुनका पणजी शहर सेहो जेबाक छनि, एहिलेल आब ओ काल्हिए औताह।” कान्स्टेबल कहलकैक। “साँचे?” “हँ, साँचे”, देवकीकृष्ण भगवानक किरिया। कान्स्टेबल देसाई कहलकैक। नहि, नहि ओ झूठ बाजि रहल अछि। हमरा सभकेँ पुलिस स्टेशनक भीतर जा कए देखबाक चाही। “पहिने दरबज्जा खोलू, हमरा सभकेँ देखि कए पाखलो भीतरे गुबदी मारि देने हैत।” सोनू जोरसँ चिकड़ि कए कहलक आ अपन कुड़हरि नचब’ लागल। जाउ! जाउ! बन्न करू अपन ई नाटक। कान्स्टेबल गोस्सासँ कहलकैक। “एखन जँ अहाँक बहिनक इज्जति पाखलो लूटि नेने रहितए तँ अहाँ कि एहिना चुप बैसि रहितहुँ?” सोनू गोस्सासँ बाजल। “आब अहाँ किछु बेसिए बाजए लागलहुँ अछि, एहिसँ बेसी जँ किछु बाजलहुँ तँ हमरा बन्दूक निकालए पड़त।” “अहाँ एना किएक बाजि रहल छी कॉन्स्टेबल?” दादी बीचहिमे टोकलक। कारी शीशमक लकड़ी सन देहवला दादी कोयला जकाँ गरम भ’ गेल। “अहाँ कि कोनो बाहरी लोक छी? फिरंगीक पेटपोस्सा, अपन आ आनक कोनहुँ गरैन नहि? एहन-एहन केँ तँ पाखलोएक संग भगा देबाक चाही।” “हाँ साँचे!” एतबा कहि सभ लोक हँ मे हँ मिलेलकैक। नहि, नहि हमरा सभकेँ अहाँक बात पर भरोस नहि अछि। हमरा सभकेँ देखए दिअ, पाखलो निश्चिते भीतर दुबकल अछि। एतबा कहि सोनू भीतर जएबाक जिद करए लागल। “नहि, नहि एहन बात नहि छैक। जँ एहन रहतैक तँ अहाँ सभ एखन धरि पड़ा गेल रहितौं। पाखलो सँ अहाँ सभकेँ गोली खाए पड़ितए। अहाँ सभकेँ जँ एखनहुँ विश्वास नहि होइत अछि तँ भीतर आबि जाउ मुदा जल्दीए बहरा जाएब।” सभ किओ पुलिस स्टेशनक भीतर ढुकि गेल। ओतए तीनटा पुलिसक अतिरिक्त किओ नहि रहैक। एक कान्स्टेबल देसाई, दोसर नायक कासीम आ तेसर धोणू पुलिस। सोनू आ दादी, दुनू शालीकेँ ताकबाक लेल पातोलेक जंगल दिस चलि देलक। सोनू शालीक नाम ल’ ल’ कए चिकड़’ लागल, मुदा ओकरा कोनो जबाब नहि भेटलैक। जंगलमे भालू सभ कानैत रहैक। चारू दिस कीड़ा-मकोड़ाक आबाज अन्हार आ सन्नाहटि पसरल रहैक। दुनूगोटे राति भरि जंगलक खाक छानैत रहल मुदा ओकरा कानमे मात्र ओकरहि द्वारा लगाओल गेल आबाजक प्रतिध्वनि सुनाइत रहलैक। सोनू छन भरिक लेल बहुत निराश भ’ गेल। गाम-घरमे ककरो देहमे भा आबि गेलासँ जे स्थिति होइत छैक ओहिना सोनूक देह काँपए लागलैक। ओ अपन देह पर नियंत्रण केलक आ अपन आँखि नमहर क’ कए गोस्सासँ बाजए लागल— “हम सौंसे जंगलमे आगि लगा देबैक, आ जरा कए सुड्डाह क’ देबैक। यैह जंगल पाखलो केँ शरण देने छैक। सुड्डाह क’ देबैक एकरा, सुड्डाह क’ देबैक। ओ बुदबुदाब’ लागल।” एतबा कहैत ओ काँपए लागल। ओ लालटेमक बतिहरि उकसा देलकैक। लालटेमक इजोत भभक’ लागलैक। ओहि बतिहरिसँ ओ सौंसे जंगलकेँ जरएबाक तैयारी करए लागल, मुदा दादी ओकरा रोकि लेलकैक। “अहाँ ई कोन पगलपन क’ रहल छी?” “ई पगलपन नहि छैक दादी। एहि जंगलमे आगि लगा कए हम ओहि पाखलोकेँ सुड्डाह क’ देबैक।” सोनू अपन दाँत आ ठोर पीसैत बाजल। “नहि, नहि, एना ओ तँ नहि मरि सकत, हँ जंगल अवस्से जरि कए सुड्डाह भ’ जेतैक। एतबा कहि दादी ओकरा रोकबाक प्रयास केलकैक। एहि बातकेँ ल’ कए दुनूमे घिच्चातानी भ’ गेलैक, आ एहि बीच सोनूक हाथसँ लालटेम गिर गेलैक आ बुता गेलैक। चारू दिस घुप्प अन्हार भ’ गेलैक। बहुत राति भीजला पर ओ दुनू गाम घुरल। एखन मुर्गा पहिले-पहिल बाँग देने हेतैक। खाम्हसँ ओंगठि कए बैसल सोनूकेँ निन्न आबए लागलैक, तखनहि दरबाजा पर खट-खट केर आबाज भेलैक। सोनू उठि कए दरबाजा लग गेल। ओकरा दरबाजा लग पहुँच’ सँ पहिनहि दरबाजा धकेलि कए तीनटा पाखले भीतर आबि गेलैक। सोनू ओहि दरबाजा लग खाम्हे जकाँ ठाढ़ रहल! घरमे बरैत लालटेमक इजोतमे ओ पुलिस प्रधान कार्मो रेयस केँ चिन्ह गलैक । गोर-गहुमा चाम आ ताहिपर गुलाबी मोंछ। पुलिस प्रधान अपन कन्हासँ शालीकेँ नीचाँ उतारि देलकैक। ओ शालीकेँ कहुना बैसएबाक प्रयास केलक मुदा असफल रहल, हारि कए ओ अपन अंगा खोलि ओछा देलकैक आ ओहि पर शालीकेँ सुता कए तीनू पाखले घूरि गेल। ओकरा सभक जूत्ताक आबाज शनैः-शनैः कम भेल जा रहल छल। शाली धरतीए पर घोलटल छलीह। ओकर आँखि खुजले रहैक। सोनूकेँ तँ बुझू जे किओ ओकरा पएरमे काँटी ठोकि देलकैक, ओ भावशून्य ठाढ़ भ' सबकिछु देखैत रहल। ओकर नजरि कोनमे राखल कुड़हरि पर गेलैक। लालटेमक इजोतमे ओहि कुड़हरिक चमकैत धार सोनूक असहायता पर हँसैत रहैक। ओ चमक सोनूक करेजकेँ चालनि केने जा रहल छल। सोनू जखन शाली लग आएल, तँ शाली नहुँ-नहुँ अपन आँखि खोललक। दुनूक अवाके बन्न भ’ गेल रहैक। सोनू शालीकेँ शोर पारलकैक तँ ओ ‘आहि-आहि’ कहि कए जबाब देलकैक। सोनू ओकरा पानि पीबाक लेल देलकैक। एतबहिमे सोनूक अंदरक भाव बाहर निकलि गेलैक। शालीक शीलभंग कएलाक पश्चात् पाखलो ओकरा सोनूक ओहिठाम छोड़ि देने छलैक एहिलेल गामक लोक सभ सोनूकेँ समाज सँ बाड़ि देने छलैक। शालीकेँ गर्भ छनि ई बात सौंसे गाममे पसरि गेलैक। सौंसे गाममे ने तँ किओ सोनूसँ बात करैक आ ने किओ ओकरा काज पर बजबैक। सोनूक रोजी बन्न भ’ गेलैक। ओहि घटनाक दोसरहिं दिन शाली आत्महत्या करबाक प्रयास कएने छलीह, मुदा सोनूकेँ बीचहिं मे घर आबि जयबाक कारणेँ ओकर जिनगी बाँचि गेलैक। गर्भवती हेबाक लाजक कारणेँ ओ कैक बेर घरसँ भागि गेल छलीह मुदा सब बेर सोनू ओकरा घुरा लैक। ओकर घर गामक सीमान पर रहैक। एहि लेल गामक आन लोकसँ ओकरा विशेष संपर्क नहि रहैक। तकरा बादो गामक मौगी सभ शालीकेँ देखि ओकरा नाम पर थूक फेकैक। ओकरा पर फब्ती कसैत रहैक। शाली बेचारी सभ किछु सहन केने जा रहल छलीह। “चाहे जे किछु भ’ जाए मुदा अपन जान नहि देब शाली!” सोनू ओकरा कहलकैक। ओ इहो कहलकैक—“बीया चाहे कथुक हो वा केहनो हो जँ एकबेर ओ माटिमे पड़ि जाइत छैक तँ ओकर पालन-पोषण माटि कए करहि पड़ैत छैक। माटि बंजर नहि हेबाक चाही।” सोनूकेँ काज भेटब मोसकिल भ’ गेलैक, आ ओ दुनू प्रायः उपासे रहय लागल। उपरसँ लोक सभक ऊँच-नीच सुनैत-सुनैत ओ आजिज भ’ गेल छल। ओ बहुत परेशान रहय लागल। “जँ आर किछु दिन गाममे रहलहुँ तँ भूखसँ मरि जाएब आ लोकक ऊँच-नीच तँ सुनहि पड़त।”, एहना सोचि कए ओ एकदिन गाम छोड़ि कए शेलपें चलि गेल। शाली घरमे एसगरे रहि गेलीह। सोनू कहियो-काल गाम आबैक आ शालीकेँ अन्न-पानि द’ कए आपस चलि जाइक। भोरका पहर रहैक। शाली दरबाजासँ झलकैत सरंग दिस निहारैत छलीह। तखने ओ दरबाजासँ भीतर अबैत कार्मो प्रधानकेँ देखलकैक। ओकर तँ करेजा धक् द’ रहि गेलैक। अपन कनहा आ छाती पर तमगा लगौने कार्मो प्रधान अपना हाथक बंदूक धरती पर राखैत ओत्तहि बैसि गेल। शाली तँ डरक मारल काँपय लागलीह। कार्मो प्रधान ओकरा किछु कहय चाहैत छल मुदा बाजि नहि सकल। ओकरा कोंकणी नहि अबैत रहैक साइत एहि लेल ओ चुप रहि गेल। पछाति जा कए ओ जे किछु पुर्तगाली भाषामे कहलकैक ओकरा शाली नहि बुझि सकलीह। ओ शालीकेँ अपना लगहि मे बैसबाक इशारा केलकैक। आ फेर किछु खिन्न भ’ कए चुप रहि गेल। भ’ सकैछ जे ओकरा पश्चाताप भेल हो, “एहन शाली केँ लागलैक।” ओ उठल, अपन बंदूक अपना कनहा पर राखलक आ चलि देलक। ओकरा जूताक आबाज शालीक करेजक धुकधुकीक पाछाँ गुम्म भ’ गेलैक। शाली अपना घरमे पाखलो केँ सहारा देने छैक, किओ ई बात सौंसे गाममे छिड़िया देलकैक। ई खबरि सौंसे गाममे लुत्ती जकाँ पसरि गेलैक। सोनूकेँ ई खबरि जखन शेलपेंमे भेटलैक तँ ओ अपन हाथसँ कान दाबि लेलक। आब ओ कोन मुँहे गाम जाएत? ऐहन सोचि ओ अपन कान ऐंठ लेलक। कार्मो रेयश पुलिस स्टेशनक सभ पाखलोक प्रधान छल। ओकरा लिस्बनसँ भारत एनाइ छओ-सात बरखक लगधक भ’ गेल रहैक आ एहि गामक पुलिस-स्टेशनमे ओकर दोसर बरख रहैक। ओकर डील-डॉल- लाल, गोर, गुलाबी केश आ मोछ वला रहैक। बाघ-सन ओकर दुनू आँखिसँ लोककेँ डर भ’ जाइक। ओ जहियासँ एहि गाममे आयल तहिये सँ एहि गामक लोक पर अपन हुकुम चलबए लागल छल। दू महीना धरि ओ लोक सभकेँ खूब डरौलक-धमकौलक-सतौलक आ पीटलक। आब ओ लोककेँ सताएब तँ बन्न क’ देने छल मुदा गामक लोककेँ ओकरासँ बहुत डर लागैक। दोसरहिं दिन साँझकेँ जखन शाली अपन घरक दीप लेसैत छलीह, तखनहि दरबाजा पर जूताक आबाज सुनलक। कार्मो प्रधान सीधे घरमे घूसि गेलैक, आ बन्दूक कनहा परसँ नीचाँ राखि बैसि गेल। डरसँ शालीक हाथसँ दीप छूटि गलैक आ चारू दिस अन्हार भ’ गेलैक। प्रधान अपना जेबीसँ सलाइ निकालि दीप लेसलक आ हँसए लागल। ओकरा हँसबाक आबाजसँ पूरा घर गूँजायमान भ’ गेलैक। ओ शालीकेँ अपना लग बैसा लेलक आ ओकर गाल, ठोर आर ठुड्डीकेँ सहलाब’ लागलैक। ओ स्वयं हँसि रहल छल आ शालियो केँ हँसएबाक प्रयास क’ रहल छल। मुदा शाली डरसँ काँपि रहल छलीह। जाहि समय पाखलो शालीकेँ अपना बाँहिमे घीचैत छल ठीक ओहि समय ओकर नजरि ओकरा नोर पर गेलैक। ओ ओकर गरम नोरकेँ पोछलक आ ओकरा समझएबा-बुझएबाक लेल ओकरा पीठ पर थपकी मारए लागल। बादमे ओ शालीक ठुड्डीकेँ उठबैत ओकरा अपना दिस देखबाक लेल इशारा करए लागल। मुदा शाली ओकरा दिस नहि देखि सकलीह। ओ अपन दुनू हाथेँ अपन आँखि झाँपि, काँपैत-काँपैत ओतएसँ जयबाक उपक्रम करए लागलीह। एतबहिमे पाखलो ओकरा अपन दुनू हाथेँ अपना बाँहिमे कसि लेलकैक। दोसर दिनसँ भोरे-भोर गामक लोक सभ कार्मोकेँ शालीक घरसँ निकलैत देखलकैक। ओकरा देखतहि लोक सभ शालीक नाम पर थूक फेकय लागल आ ओकरा संबंधमे भिन्न-भिन्न प्रकारक बात सभ करए लागल। “हे-बे देखिऔक! शालीक भड़ुआ।” “ओ पाखलो केँ अपना घरमे राखि धंधा सुरह क’ देने छैक वा अपन नव दुनियाँ बसा नेने अछि?” “दुनियाँ केहन यौ? धंधा कहियौक, धंधा।” “छी! छी! ओ लाज-शरम पीबि गेल अछि।” “औजी! लाज-शरम रहतैक कतए सँ! ओ तँ अपन जातिओ-धरम भ्रष्ट क’ नेने अछि।” तीन गामवलाक नजरिमे हम पाखलोएक रूपमे एहि धरती पर जनम लेलहुँ। ठीक ओहि साल पुर्तगाली सरकार गामसँ पुलिस-स्टेशन हटा लेलकैक। हमर बाप ओहि समय गाम छोड़ि पणजी शहर चलि गेलाह। हुनकर रूप कहियो हमरा आँखिक समक्ष नहि आबि सकल। नेनपनमे हम हुनका कहियो देखने रहियनि की नहि? सेहो हमरा स्मरण नहि अछि। हमर माए शाली, वास्तवमे एकटा देवीक रूपमे एहि संसार मे आएल छलीह। हुनकर वर्ण तँ श्याम छलनि मुदा सुन्नरि छलीह। एकदम सोटल देह। ओ प्रायः लाल आ कि हरियर रंगक साड़ी पहिरैत छलीह आ माथ पर सिनूरक टीका लगबैत छलीह। एहि परिधानमे ओ एकदम सुन्नरि लागैत छलीह। एकदम सांतेरी माए-सन। हमर जनम एकादशी दिन भेल छल, एहि लेल माए हमर नाम ‘विठ्ठल’ राखने छलीह। ओहि एकादशीक दिन सांतेरी मायक मंदिर मे त्योहार भ’ रहल छलैक। एहि धरतीक पाथरसँ बनाओल गेल श्री विठ्ठल केर कारी प्रतिमा ओहि दिन ओहि मंदिरमे स्थापित कएल गेल रहैक। ई बात हमर माए बतौने छलीह। ओ अपन मधुर आबाजसँ हमरा ‘विठू’ कहि बजबैत छलीह। कार्मो प्रधानकेँ पणजी शहर चलि गेलाक पश्चात् हमर मायक हालति आब सरिपहुँ बहुत खराप होमए लागल छल। सौंसे गाम ओकरा मंदिरक दासीक सदृश देखैत रहैक जखन कि ओ एकटा पतिव्रता नारी छलीह। गामहिमे एकटा ब्राह्मणक घरमे नौरीक काज क’ कए ओहिसँ प्राप्त मजूरीसँ ओ हमर पालन-पोषण कएने छलीह। दादी अपन बेटा गोविन्दक संग हमरहुँ स्कूल भेजए लागल। ओहि दिनसँ हम आ गोविन्द दुनू गोटे खास मीत बनि गेलहुँ। विद्यालयक प्रवेश-पंजीमे शिक्षक हमर नाम पाखलो लिख देलनि। अही नाम सँ हम ओहि विद्यालयमे मराठी माध्यमसँ चारिम कक्षा धरि पढ़ाइ केलहुँ। हाजरी दैत काल हमर एहि नाम पर हमरा कक्षाक आन-आन छात्र लोकनि हमर खूब मजाक उड़ाबए जे हमरा बहुत खराप लागैत छल। प्रवेश-पंजीमे हमर नाम पाखलो लिख देल गेल रहए इहो लेल हमरा बहुत खराप लागैत छल। गोविन्द हमरा सँ एक कक्षा आगू छल तकर पश्चातो हमरा ओकरासँ दोसती भ’गेल छल। हम ओकरा संगहि माल-जाल ल’ क’ जंगल धरि जाइत रही। जंगल जाइत काल हमरा काँट-कुशक कोनो डर नहि होइत छल। ओतए हम सभ कणेरा-काण्णां, चारां-चुन्नां (जंगली फल) खाइत छलहुँ। ‘घूस-गे बाये घूस’ (गोवाक क्षेत्रमे खेलल जाएबला एकटा खेलमे प्रयुक्त शब्द जाहिमे एहन मान्यता छैक जे ई शब्द बाजलासँ कोनो खास लोकक देहमे कोनो आत्माक प्रवेश भ’ जेतैक।) शब्द बाजि कए एक दोसरा पर भा आबए धरि कोयण्या-बाल, गड्ड्यांनी (गोवा क्षेत्रमे नेना सभक द्वारा खेलल जाएबला एकटा खेल।) आदि खेलैत छलहुँ। आन-आन चरवाह सभक सँग हमहुँ चरवाह बनि गेल छलहुँ। गोवा केँ स्वतंत्र हेबासँ पहिनुके बात थिक। तखन हमर उमिर नओ-दस बरखक रहल होएत। गामक बन्न पड़ल पुलिस-स्टेशन एकबेर फेर चालू भ’ गेल रहैक। ओतए तेशेर नामक एकटा नव पुलिस प्रधानक नियुक्ति भेल छलैक। ओ कहियो काल सैह पणजीसँ गामक पुलिस स्टेशन अबैत-जाइत छल। ओ अपना लेल ओतए एकटा धौरबी राखि नेने छल। ओकरा ओ अपना संगहि घोड़ा-गाड़ी पर घुमबैत रहैत छल। गामक बगल वला जमीनक लेल दत्ता जल्मी आ सदा ब्राह्मणक बीच बहुत दिनसँ विवाद छलैक। ओकरा सभक बीच मोकदमा चलि रहल छलैक। दू-तीन साल बीत गेलाक पश्चातो एखन धरि ककरहुँ पक्षमे फैसला नहि भेल छलैक। सदाकेँ एकटा युक्ति सुझलैक। एकबेर ओ नव पुलिस प्रधान (तेशेर)केँ अपना घर बजाकए खूब मासु-दारू खुऔलक-पिऔलक। ओहि दिन ओकर नजरि ओकरा स्त्री पर गेलैक। ओहि क्षण ओ ओकरा प्रति आसक्त भ’ गेल आ ओ जाहि कक्षमे रहथि ताहि दिस देखतहि रहि गेल। सदा प्रधानसँ विनती केलक जे ओ मोकदमा ओकरहिं पक्षमे करा दैक। कने काल चुप रहलाक पश्चात् प्रधान ओकरा हँ कहि देलकैक। शर्तक रूपमे ओ सदासँ ओकर स्त्री माँगि लेलकैक। सदाकेँ जल्मीक जमीनक संगहि-संग गामक सभसँ पैघ जमीन केगदी भाट(क्षेत्र विशेषक नाम) भेटए बला रहैक। चारिए-पाँच दिनक बाद पुर्तगालीक विरोधमे काज करबाक अभियोगमे दत्ता जल्मीकेँ भीतर क’ देल गेलैक। तकर बाद ओकर की भेलैक ताहि संबंधमे ककरहुँ कोनो पता नहि चलि सकल। केओ कहैक जे दत्ता फेरार भ’ गेलैक तँ केओ कहैक जे प्रधान ओकरा मारि देलकैक। ओहि दिनक बाद सँ सदाक घर लग सभ दिन एकटा गाड़ी लागए लागलैक। सदाक स्त्री सभ साँझकेँ नव-नव साड़ी पहिरए, नीक जकाँ अपन केश-विन्यास करए, काजर, बिंदी, पौडर आदि लगा अपन श्रृंगार करए आ तेशेरक गाड़ी मे बैसि जाए। तेशेरक गाड़ी सदाक बंगला पर धूरा उड़बैत फुर्र भ’ जाइक। दोसर भोर ओ गाड़ी हुनका एतए पहुँचा दैक। ओ गाड़ीक पछिला सीट पर लेटल रहैत छलीह। हुनकर केश आ चोटी सभ उजरल-उभरल रहैक, आँखिक काजर नाक आ गाल पर लेभराएल रहैत छलैक। मोकदमाक फैसला सदा जमींदारक पक्षमे भ’ गेल छलैक एहि लेल ओ सत्यनारायण भगवानक पूजा करबाक लेल सोचलक। पूजामे अएबाक लेल ओ भरि गामक लोककेँ हकार देलकैक। सदा ओ ओकर स्त्री पूजा पर बैसि चुकल छलीह। तखनहि प्रधान तेशेर अपन गाड़ी ल’ कए ओतए आबि गेल। ओ पूजा पर बैसलि सदाक स्त्रीकेँ उठा लेलक। पूजामे आएल सभ लोककेँ एहि घटनासँ बड्ड आश्चर्य भेलैक। केगदी चास-बास केर कागद-पत्तर सदाकेँ थम्हबैत ओ ओकरा स्त्रीकेँ ल’ कए आगू बढ़ल, तखनहि सदाक छोट भाय ओकरा रोकबाक प्रयास केलकैक। तेशेर ओकरा पर बन्दूकसँ निसान साधि लेलकैक आ आब गोली दागहि वला रहैक की सदा ओकरा रोकि देलकैक। तेशेर अपन बन्दूक नीचाँ क’ लेलक। तकरा पश्चात् ओ जनूकेँ एक दिस धकलैत ओकरा स्त्रीक हाथ पकड़ि आगू बढ़ि गेल। एहि पर सदा अपना स्त्रीसँ कहलकैक— “ओकरा संग एना जा कए अहाँ हमर नाक कटाएब की?” ई सुनि सदाक स्त्री अपन मुँह चमकबैत बजलीह— “अहाँकेँ नाको अछि की? जँ अहाँकेँ नाके चाही तँ हे ई लिअ...” एतबा कहि ओ अपन नाकक नथिया निकालि सदाक पयर लग धरती पर फेकि देलकैक आ प्रधान तेशेरक संग चलि देलक। तेसरे दिन प्रधान ओकरा ल’ कए पुर्तगाल चलि गेल। प्रधान तेशेरकेँ पुर्तगाल जेबासँ ठीक एकदिन पहिनुके गप्प थिक। रातिक लगभग दू वा तीन बजैत हेतैक। केओ हमरा घरक केबाड़ खोलि हमरा घर घूसि गेल। हमर माय कम कएल लालटेमक इजोतकेँ कने तेज केलक। देखलहुँ तँ एकटा अनभुआर लोक! ओ बाजल— “बहिन हमरा कतहुँ नुका दिअ, हमरा पाछू फिरंगी पुलिस लागल अछि। एकबेर जँ हम ओहि पुलिस प्रधान तेशेरक हाथ आबि गेलहुँ तँ ओ हमर जान ल’ लेत। हम जीवित नहि बाँचि सकब।” एतबहिमे दूरसँ अबैत जूता ध्वनिसँ बुझाइक जे किओ आबि रहल छैक। हमर माय ओकरा ओढ़बाक लेल अपन साड़ी देलकैक आ ओ साड़ी ओढ़ाकए ओकरा हमरहिं लग सुता देलकैक। किछुए क्षण केर पश्चात् घरमे इजोत देखि प्रधान तेशेर हमरा घरमे घुसि गेल। हमर माय बहुत डरि गेलीह। तेशेर सौंसे घरक तलाशी ल’ लेलकैक आ ओतए के सूतल छैक? ओकरा संबंधमे पूछय लागल—हमर माय डरैत-डरैत बजलीह— “ओ हमर ब-ब-बहिन थिकीह.....साहेब।” एतबा सुनि ओ लोकनि चलि गेल। ओहि राति ओ अनभुआर लोक हमरहि ओहिठाम ठहरल ओ भोर होइतहि चलि गेल। ओ अपन नाम रामनाथ कहने छल आ ओ गोवाक स्वतंत्रता संग्राममे भाग नेने छल। ओ आ ओकर दूटा संगी, गामक पुलिस-स्टेशनकेँ उड़एबाक लेल आएल छल। ओकरा संगीकेँ तँ फिरंगी पकड़ि नेने छलैक मुदा एकरा पकड़बाक लेल ओ सभ एकर पछोर क’ रहल छलैक। ओ डाइनामाइट लगा कए पुलिस-स्टेशन उड़ा देलकैक। भोर होइतहि ई खबरि गाम आ आस-पासक इलाकामे पसरि गेलैक। ई ताहि दिनक गप्प थिक जखन गोवाकेँ मुक्ति भेटल छलैक। ओहि दिन दूटा बड़का धमाका सूनल गेल छलैक। ई धमाका बम केर छलैक, ई बात लोककेँ पछाति जा कए पता लागलैक। उजगाँव आ बाणस्तारी गामक दुनू पुल उड़ा देल गेल रहैक। भारतीय सेनाकेँ गोवामे प्रवेश करबासँ रोकबाक लेल ओ पुर्तगाली मिलिट्री द्वारा तोड़ल गेल छलैक। ओ के आ किएक तोड़ने छल, पहिने एहि बातक पता ककरो नहि चलि सकलै। दूपहरमे गामक आसमानमे एकटा हवाइजहाज उड़ैत रहैक। ओहि हवाइजहाजसँ परचा सभ गिराओल जा रहल छलैक जे हवामे लहराबैत रहैक। ओहि परचा सभकेँ लूटबाकक लेल हम सभ बच्चा लोकनि बहुत दूर धरि दौड़लहुँ। हमरो एकटा परचा भेटल, जकरा ल’ कए हम दादीक ओतए पहुँचलहुँ। परचा पुर्तगालीमे लिखल रहैक जकरा दादी हमरा सभकेँ अपन भाषामे सुनबैत रहथि—“ई इंडियन मलेटरीक पत्रक छैक। ओ कहने छथि— अहाँ सभ डरब नहि, अहाँ सभक जिनगीकेँ कोनहुँ खतरा नहि अछि। अहाँ सभ पुर्तगाली राजसँ मुक्त भ’ गेल छी।” ओहि दिन हमरा विद्यालयमे छुट्टी छल। कांदोले गाममे उत्सवक माहौल रहैक। किछु लोक लौह अयस्कक बार्ज (मालवाहक जहाज) सँ पणजी गेल छल। गोवाकेँ मुक्ति भेटलाक किछुए दिन बाद गोविन्दक दादी हमरा घर आएल छलाह। “भारत सरकार बहुत रास पाखले केँ पकड़ि ओकरा जहाजमे बैसा पुर्तगाल भेज देने अछि।” हमरा मायकेँ ई खबरि वैह देलनि। बुझाएल जे एहि खबरिसँ ओ किछु हतप्रभ भेलीह, मुदा ओ चुप आ गुमसुम रहलीह। हमर बाबूजी कार्मो चीफ, जे पणजी शहरमे छलाह, हुनकहुँ ओहि जहाजसँ भेज देल गेल छलनि, एहि लेल मायकेँ दुःख भेलनि की? से हम बुझि नहि सकलहुँ। मुदा बादमे हुनका आँखिमे नोर आबि गेल छलनि। हम बारह-तेरह बर्खक रहल हएब, तखनहि हमर माय मरि गेलीह। बरखाक मौसम रहैक। कतेको दिनसँ दिन-राति लगातार बरखा भ’ रहल छलैक। नदीक बाढ़िक पानि गाम धरि पहुँचि गेल रहैक। गामक केलबाय मंदिरक चारू दिस बाढ़िक पानि आबि गेल रहैक। ओहि बाढ़िमे पाँचटा गर गिर गेल छलैक। माल-जाल आ गोहाल सभ बाढ़िमे भासि गेल रहैक। हमर घर सीमानक बाहर पहाड़ीक कोनमे कनेक ऊँच स्थान पर छल। एखन धरि बाढ़िसँ घरकेँ कोनो छति नहि भेल छलैक मुदा लगातार होइत बरखा आ हवाक कारणेँ हमरो घर ओहि दिन गिर गेल। घरक एकटा चार कर्र-कर्र केर आबाजक सँग टूटि कए गिर गेल। हम जखन सूतल रही तखने ओ हमरा पर गिरल। हम आ हमर माय दुनू गोटे मरि जइतौंक। हमर माय हमरा बचयबाक लेल दौड़ि कए अएलीह जकरा कारणेँ हुनका माथमे बहुत चोट लागि गेलनि। पहिने तँ हुनका माथ पर कोरो टूटि कए गिरल आ पछाति जा कए पूरा चारे हुनका माथ पर गिर गेलनि। ओ बेहोश भ’ गेलीह। हम हुनका मुँहपर पानिक छीट्टा देलियनि तखन हुनका चेत एलनि। हम बचि गेलहुँ आ हमरा चोट नहि लागल, ई जानि ओ बहुत खुश भेलीह। बादमे हमरा अपन गोदीमे ल’ कए खूब कानए लगलीह। जखन ओ हमरा गोदी नेने छलीह तखनहि हमरा हाथमे हुनक चोटसँ निकलल खून लागल। देखलहुँ तँ हुनका माथ मे चोट लागल छलनि। हुनक माथ काँच जकाँ फूटि गेल रहनि। हम जोरसँ चिकरलहुँ, मुदा माय हमरा चुप रहबाक इशारा केलथि। हमर चिकरब सुनि कए एहि बरखाक रातिमे किओ आबय बला नहि छल। हुनकर कहनानुसार हम हुनका लजौनीक पात पीसि कए हुनका माथ पर लगा देलियनि। किछु कालक बाद हुनका माथसँ खून बहब बन्न भ’ गेलनि। घरक बचलका हिस्साकेँ हम सोंगर लगेलहुँ। हवा बहते रहैक आ रुकि-रुकि कए बरखा सेहो भ’ रहल छलैक। संगहि हवा घरक बचलका हिस्साकेँ नोचने जा रहल छल। छप्पड़क बीच दए पानि आबि रहल छलैक। घरमे कनेको सूखल जगह नहि छलैक। मायकेँ बहुत चोट लागल छलनि तैँ ओ दरदसँ कराहैत छलीह आ बीच-बीचमे अपन टाँग हिला रहल छलीह। दीया जरा हम हुनका सिरमा लग बैसि गेलहुँ। दीयाक बतिहर हवाक कारणेँ बीच-बीचमे बुता जाइत छलैक जकरा हम फेरसँ जरबैत रही। अन्हर आ बरखा आओरो तेज भ’ गेल रहैक। हम पानि गरम क’ कए मायकेँ पिऔलियनि। चोटक दरदक कारणेँ ओ भरि राति कुहरैत रहलीह। राति भीजला पर हुनका बोखार आबि गेलनि आ से बढ़िते गेल। “भोर होइतहि हम डाकदरकेँ बजा अनबनि।” हम सोचलहुँ। मुदा राति कटतहि नहि रहए। दोसर दिन, भोरे-भोर गोविन्दक दादी डागदर केँ बजा अनलनि। डागदर हुनका सुइया-दवाई देलथि, मुदा कोनो लाभ नहि भेल। ओ बीच-बीचमे आँखि खोलैत छलीह। हुनक सौंसे देह उज्जर भ’ गेल रहनि आ हुनक आँखि भीतर दिस घीचल जा रहल छल। हुनक हाथ-पयर काँपि रहल छलनि। ओ हमरा अपना लग बैसबाक इशारा केलनि। ओ हमरा किछु कहए चाहैत छलीह से तँ हम बुझि गेलहुँ मुदा ओ किछु बाजि नहि सकलीह। ओहि दिन हुनक बोखार बहुत बढ़ि गेल रहनि। हुनक आँखि बन्न होमए लागल रहए। बोखारसँ ओ काँपि रहल छलीह। बादमे हुनका गरसँ घर्र-घर्र केर आबाज भेल ओ ओहि आबाजक संगहि ओ जतए सुतल छलीह किछुए पलमे सभ किछु शांत भ’ गेल। ओ हमरा छोड़ि कए चलि गेलीह! हमरा अनाथ क’ कए चलि गेलीह! दादी एसगरे आबि कए अंतिम संस्कारक तैयारी करए लगलाह। शेलपें मे रहएवला मामा धरिकेँ खबरि देमए बला हमरा किओ नहि भेटल। बरखा बहुत जोरसँ सँ भ’ रहल छलैक। गाममे आएल बाढ़िक पानि एखन धरि घटल नहि छलैक। श्मशान घाट पर दादी एसगरे चिता पर लकड़ी राखैत जा रहल छलाह आ हम हुनक संग द’ रहल छलिऐक। हमर मायक अंतिम यात्रामे दादीक अलावे आन किओ नहि आएल रहए। अनहार-मुनहार भ’ गेला पर चिता बनि कए तैयार भेलैक। हम मायक लहाशकेँ चिता पर चढ़ा कए अपना हाथेँ आगि देलिऐक। मुदा चिताकेँ आगिए नहि लागैक। एकतँ तीतल लकड़ी आ ताहूपर बरखा से। दादी बहुत प्रयास केलनि, मुदा बरखा आ तेज हवाक कारणेँ चिताकेँ धाह धरि नहि लागि सकलै। अधरतिया भ’ गेल रहैक आ हम दुनू गोटा एखन धरि श्मशान घाटमे छलहुँ। चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयासमे दादी थाकि चुकल छलाह। जखन कोनहुँ उपाय नहि चललनि तँ चुपचाप काम करए वला दादी किछु कालक ले ठाढ रहलाह आ बजलाह— “बाउ! अहाँक हाथे अहाँक मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि? आब की उपाय?” “आब कोनहुँ तरहेँ एहि लहाशकेँ माटिमे गारए पड़त!” एतबा कहि ओ कोदारिसँ माटि खोदब सुरह क’ देलनि। हुनकर बात सुनिकए हम सोचए लागलहुँ— “हँ, हम ठहरलहुँ भागहीन पाखलो! पाखलेक वंशज छी, एहि लेल हमरा हाथेँ मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि। हमरा पाखलो नहि हेबाक चाही। हमर ई पाखलेपन हमरा मोनकेँ चोट पहुँचा रहल छल। आइ एहि पाखलेपनक एहसास हमरासँ सहन नहि भ’ रहल छल।” एक आदमीक लम्बाईक बरोबरि एकटा खदहा खोदल गेल। “माटि देबासँ पहिने अपन मायकेँ प्रणाम करिऔन।” दादीक एतबा कहलाक उपरांत हम होशमे एलहुँ आ दुनू हाथ जोड़ि मायकेँ प्रणाम केलहुँ। किछुए दिनमे हम पाखलोसँ खलासी बनि गेलहुँ। जाहि कार्रेर पर गोविन्दक दादी ड्राइवर छलाह ओहि कार्रेर पर ओ हमरा खलासीक रूपमे राखि लेलनि। हमर काज छल यात्री सभक समान उपर चढ़ाएब आ उतारब। बाजारक दिन तँ कार्रेरमे बहुत भीड़-भाड़ रहैत छलैक। कार्रेर केर भीतर यात्री लोकनि, तँ उपर केलाक घौर, कटहर, अनानास सन बहुतो रास चीज होइत छल। कार्रेर बुझू हकमैत-हकमैत सड़क पर चढैत-उतरैत छल। मुदा जाधरि हम खलासी रहलहुँ ताधरि कार्रेरकेँ किछु नहि बिगड़लैक आ ने तँ हम एक्कहु टा ट्रिप चुकए देलिऐक। बस मालिकक भाय यात्री लोकनिसँ पाइ असूलैत छल। ओ बहुत ठसकमे घूमैत छल, मुदा राति होइतहि ओकर सभटा हेकड़ी खतम भ’ जाइत छल। घर पहुँचलाक बाद ओ पावलूक ओहिठाम जा कए भरि दम शराब पीबि लैत छल। एकदिन ओ हमरा शराब आनबाक लेल कहलनि। हम हुनका शराब तँ आनि देलियनि मुदा दादी हमरा देख लेलथि आ बहुत डाँट-फटकार केलथि। “आब फेर कहियो शराब आनए नहि जाएब।” एतबा कहैत ओ हमरा गामक केलबाय देवीक किरिया देलथि। एकटा आर एहने सन स्मरण......एकबेर गैरेजक मैकेनिक लाडू आ हम कार्रेर धोबाक लेल नाली पर गेलहुँ। हमसभ गाड़ीक पीतरिया चदराकेँ इलायचीसँ रगड़ि-रगड़ि साफ केलहुँ। गाड़ी धुबैत काल हमसभ पानिसँ भीज गेल छलहुँ। सौंसे देह जाड़सँ काँपए लागल छल, एहि लेल लाडू एकटा बीड़ी सुनगा कए अपना मुँहमे दबौलक आ गाड़ी धोबए लागल। ओ एकटा बीड़ी हमरो देलक। हमहुँ बीड़ी सुनगेलौं आ पीब’ लागलहुँ। एतबहिमे दादी ओतए पहुँचि गेलाह आ हमरा बीड़ी पीबैत देखि लेलथि। ओ हमरा पर बहुत गोस्सा भेलाह आ संगहि ओहि गोस्सामे हमरा पर कैक थापड़ मारि बैसलथि। हम कानए लागलहुँ। हम हुनकर पयर पकड़लियनि, माँफी माँगलियनि, मुदा एहि सभसँ दादीक गोस्सा कम नहि भेलनि। “आब जँ फेर अहाँ कहियो बीड़ी पीलहुँ तँ अहाँकेँ अपन मायक किरिया!” ओ हमरा किरिया देलथि। हम जहियासँ खलासी बनल छलहुँ तहियेसँ दादीक ओहिठाम रहैत छलहुँ। हम आ गोविन्द दुनू गोटे भाइक सदृश भ’ गेल छलहुँ। गोविन्द हमरासँ बेसी बुधियार आ चलाक छल, संगहि तत्वज्ञानी आ आस्तिक सेहो। हमर माय जहियासँ हमरा छोड़ि के गेल रहथि तहियेसँ हम प्रायः कानैत रहैत छलहुँ। एहना स्थितिमे नेना रहितहुँ गोविन्द हमरा समझाबैत-बुझाबैत रहैत छल। ओ कहैत छल, “अहाँकेँ पता अछि! जखन हमर तामू गाय बच्चा देने छलीह तँ ओहो चारिए मासक भीतर मरि गेल छलीह, तखन हुनका बाछाकेँ के देखने रहैक? ओहि समयक छोट बाछा आइ बड़का बरद बनि गेल छैक। पाखल्या! …..यौ पाखल्या! कानू जुनि! अहाँकेँ देखि हमरहुँ कानब आबि जाइत अछि।” हमर आजी सेहो पछिले साल भगवानक घर गेल छलीह। ओ कहैत छलीह, “सभटा जन्म लेबएबला प्राणीकेँ एकदिन मरहिं पड़ैत छैक, एकरा लेल लोककेँ दुख नहि करबाक चाही।” ई सभ सुनि कए हमर कानब बन्न होइत छल। हम ओकर भाषण सुनैत जा रहल छलहुँ आ ओ कोनो तत्वज्ञानी जकाँ बाजतहि जाइत छल...... “मनुक्ख जन्मक संगहि मृत्यु सेहो अपना संगहि आनने अछि। जन्मकालमे ओ नेना रहैत अछि, नेनासँ ओ जवान भ’ जाइत अछि, जवानसँ बूढ़ आ फेर जन्मक आखिरी आ अंतिम अवस्थामे मनुक्खकेँ मृत्यु भेटैत छैक। अवस्थाक एहि चक्रसँ हरेक प्राणीकेँ गुजरहि पड़ैत छैक। जतए-जतए प्राणी छैक ओतए-ओतए मृत्यु पसरल छैक। धरती हो, जल हो वा आकाश, सभठाम मृत्यु निश्चित अछि।” जखन हम हुनकासँ पुछियनि, “अहाँ ई सभ कतए सीखलहुँ? ई सभ अहाँ किताबमे पढ़ने छी की?” तखन ओ जबाब दिअए, “हमरा ई सभ विणे आजी बतबैत छलीह।” एकबेर फेर मायक याद अबितहिँ हमरा आँखिमे नोर आबि गेल आ हमरा समक्षहि हमरा छोड़िकए गेल हमर मायक मूर्ति हमरा सोझमे ठाढ़ भ’ गेल। रामायण, महाभारत आ आन-आन कथा-पिहानी सुनाब’ वाली....., हमरा मरगिल्ला खोआकेँ पैघ करएबाली....., हम बचि गेलहुँ एहि खुशीमे हमरा अपन छातीसँ लगबएवाली हमर माय....., अपना आँखिक सोझमे देखल गेल हुनक मृत्यु, हुनक लहाश, ई सभटा हमरा याद आबि गेल। आँखिमे आएल नोर पोछि हम हुनका प्रणाम केलियनि। चारि गोविन्द जाहि बरख पणजीमे नोकरी पर लागल, पाखलो ओहि बरख लौह–अयस्क केर खदान पर ट्रक ड्राइवर बनि गेल। ओकर काज देखि कए एक बरखक भीतरहि कम्पनी ओकर नोकरी पक्की क’ देलकैक। ओकरा चारि सौ पचास रुपैया दरमाहा भेटैत रहैक आ एकर अलावे ओवरटाइम सेहो। ओकर खेनाय-पीनाय होटलमे होइत छलैक आ ओ कतहुँ सुति जाइत छल। पाखलो आ आलेस दुनू अपन पयरक तरेँ दूभिकेँ मसोड़ति लदानक गैरेज लग जा रहल छल। काल्हि आनल गेल लौह–अयस्क केर चूर्णक ढेर देखिकए ओ बहुत अचरजमे पड़ि गेल। ओ दुनू गैरेज पहुँचल। ट्रक स्टार्ट क’ कए धूराक मेघकेँ पाछू छोड़ैत ओ लोकनि ट्रक तेजीसँ बढ़ौलक। साँझमे पाखलो आ आलेस अपन-अपन ट्रक आनि गैरेज लग लगा देलक। ओ काल्हिक अपेक्षा आइ एक खेप बेसी लगौने छल। आइ दुनू बहुत बेसी प्रसन्न देख’ मे आबि रहल छल। पाखलो अपना देह पर एक नजरि देलक। ओ धूरा सँ सानल बुझाइत छल। ओकर कपड़ा पूर्ण रूपसँ धूरामे सानल रहैक। माथक केश, मोछ आ सौंसे देह धूरा सँ सानल रहैक। ओ हाथ-पयर धोबाक लेल आलेसक संग नल दिस चलि देलक। नल पर जमा भेल सभटा मजुरनी पाखलोक मजाक उड़ाब’ लागलीह। एकटा मजुरनी अपन एकटा छोट सन एना निकालि पाखलो केँ ओकर अपनहिं रूप देखबा लेल देलकैक। ओ एना लेलक, ओहिमे अपन अजीब रूप देखि ओकरा हँसी लागि गेलैक। ओकरा बुझेलैक जो ओ ललका मुँह बला बनरबा छैक। “पाखल्या, बगल वला झीलमे जेना धूरा जमैत छैक तहिना तोरहुँ देह पर जमल छह।” एकटा मजुरनी पाखलो केँ पयर सँ माथ धरि देखैत कहलकैक। “ओ तँ धूरेक मिल पर नोकरी करैत छैक।” एकटा दोसर मजुरनी ओकर मजाक केलकैक। ई सुनि सभटा मजुरनी हँसय लगलीह। ओकरा संग पाखलो सेहो हँसए लागल। “ओ धूरासँ भरल अछि एहिलेल अहाँसभ ओकरा पर हँसि रहल छी?” आलेस मजुरनीसँ पूछलकैक….; “नहएलाक बाद ओकरा देखि लेबैक, ओ सेब सन लाल आ एकदम फिरंगी सन भ’ जाएत, जे देखि कोनो बाप ओकरा अपन बेटी देबा लेल तैयार भ’ जेतैक।” “आलेस, पाखलोक लेल अहाँ अपनहि जातिमे कोनो कन्या ताकि दियौक”, पहिल मजुरनी कहलकैक। “…….से किएक? ओकरा तँ कोनो पाखलिने चाही। पाखल्या! अहाँ अपना लेल लिस्बन सँ एकटा पाखलिन ल’ कए आबि जाएब।” एहि बात पर सभ केओ हँसय लागल मुदा पाखलो केर भौंह तनि गेल। “ओ.......हो...... एकर मामाक बेटी छैक ने?” बीचहिमे स्मरण आबि गेलासँ दोसर मजुरनी पहिलसँ बाजलि। “एकर मामा सोनू परसूए शेलपें सँ गाम आएल छैक। ओकर बेटी बियाह करबाक जोग भ’ गेल छैक।” “शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?” “पाखलो सँ ओकर बियाह.....? शी.....” पहिल मजुरनीक अपन डाँड़ पर बान्हल तोलिया झारैत कहलक। ओकर ई कहब सुनिकए सभ किओ चुप भ’ गेल। पाखलो केँ बहुत खराप लागलैक आ ओकर भौंह तनि गेलैक। नहा-धो कए ओ लोकनि नीचाँ उतर’ लागल। उतरैत काल आलेस सीटी बजा रहल छल आ पाखलो चुपचाप चलि रहल छल। ओहि मौनक स्थितिमे ओकरा अपन मामा, सोनूक पछिला बात सभ स्मरण आबि गेलैक। सोनूक बियाहमे पाखलोक माय, ओकरा गोदीमे ल’ कए गेल छलीह। बियाहसँ ठीक दू दिन पहिने, सोनू अपन बियाहक खबरि अपन बहिनकेँ देने छलैक। ओ बियाहमे कोनो बिध-व्यवहार करबाक लेल तैयार नहि रहथि, मुदा सोनूक जिद्दक कारणेँ ओकरा मानय पड़लैक। सोनूक दुनियाँ केवल दू बरख धरि चलि सकल। ओकरा एकटा बेटी भेलैक मुदा तेसरहि बरख ओकर घरनी ओकरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेलीह। पाखलो एकटा पैघ साँस छोड़लक। ढलानसँ नीचाँ उतरैत ओकर पयर लड़खड़ा गेलैक। आलेस आ पाखलो नदीक कछेर वला होटल पहुँचि गेल। आन दिन जकाँ ओ सभ होटलक भीतर जयबाक लेल अपन-अपन माथ नीचाँ झुकौलक। पाखलो चाह पीबि लेलक मुदा ओकरा दिमागसँ एखन धरि ओहि बातक निसाँ नहि उतरल छलैक। आलेस ओतए जमा भेल मित्र सभसँ गप्प करए लागल। पाखलो होटलसँ बाहर निकलल आ खेत दिस खुलल पेड़ा बाटे चलय लागल। ओ बहुत दुखी अछि, एहन ओकरा चेहरासँ बुझाइत छलैक। मजुरनी सभ द्वारा कएल गेल गप्पक नह ओकर करेजके नोचने-फारने जा रहल छलैक। “शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?” “पाखलो सँ ओकर बियाह.....? शी.....” ई आवाज मंगुष्ठी झरनाक पानिक छल, ने कि कपड़ा-लत्ता धोबा आ पानि भरबाक लेल आबए बाली कन्या आ स्त्रीगणक बाजबाक। आइ पाखलो कने देरीसँ आएल रहय। ओ किछु अन्यमनस्क सन लागैत छल। ओ झरनासँ गाम दिस जाएबला लोकपेड़िया दिस देखलक। ओहि लोकपेड़ियाक बाटेँ अन्हरिया गाममे पयर रखने छल। ओ अपन देह सँ कपड़ा उतारलक आ मंगुष्ठक गाछक जड़िमे राखि देलक। ओ झरनाक कछेरमे बैसि गेल। बहैत पानिमे ओ अपन पयर खुलल छोड़ि देलक। ओकरा जाड़ लागलैक। ओ जाड़ ओकरा नसमे समा गेलैक। ओ अपन आँखिक पिपनी बन्न क’ लेलक। दूपहरमे धूरा पर चलैत जे पयर छक-छक पाकैत रहैक ओहि पयरकेँ एखन जाड़ लागि रहल छलैक। ई सोचि पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक आ आँखि बन्न क’ लेलक। ओ प्रायः आबिकए पहिने अपन पयर ठंढा पानिमे डुबबैत रहय। जखन सभटा कन्या आ स्त्रीगण पानि भरि कए चलि जाइक, तखनहि ओ नहबैत छल आ अपन कपड़ा-लत्ता धोबैत छल। ओ पानिमे डुबकी लगौलक। छपाक केर आवाज भेलैक एहिलेल ओ अपन माथ उठौलक तँ देखलक जे शामा हँसि रहल छलीह। ओहो हँसल। शामा झरनाक उपरका धार पर अपन घैल भरए लगलीह। “आइ पानि भरबामे देरी किएक भेल?” पूछबनि, पाखलो सोचलक। मुदा ओ चुप रहल। शामा घैल अपना डाँर पर राखलक आ छोटकी घैल अपना हाथमे राखि चलि देलीह। नजरिसँ दूर होइत धरि पाखलो ओकरा देखतहि रहि गेल। ओ होशमे आएल! की शामा पानिमे पाथर फेकने छलीह? ओ सोच’ लागल, ‘हँ’, ओकर एक मोन कहैत छलैक जे “ओ आएल छलीह आ हमरा सचेत करबाक लेल ओ पाथर फेकने छलीह। ओकर दोसर मोन कहैक– नहि, ओ पाथर मार’ एहन काज नहि क’ सकैत अछि। भ’ सकैछ उपरका मंगुष्ठ नीचाँ गिरल होइक।” ओ ई सोचतहिं छल ताधरि एकटा मंगुष्ठ पानिमे गिरलैक। पाखलो ओ लाल मगुष्ठ उठौलक। ओकरा फोड़लक। फोड़लाक बाद ओ ओहि खटमिट्ठी मंगुष्ठकेँ अपना मुँहमे लेलक। खाइत काल ओकरा एकटा घटना याद एलैक। एहि घटनाक बहुतो बरख भ’ गेल रहैक। जंगलमे काजू आ काण्ण खाइत-खाइत गोविन्द आ ओ एहि झरना पर आएल छल। मंगुष्ठी झरनाक मंगुष्ठ बहुत पाकि गेल छलैक। पाखलो आ गोविन्द ओहि मंगुष्ठ पर पाथर मारए लागल। ओहि समय शामा झरना पर आबि रहल छलीह, ई गोविन्द देखलक आ देखतहिं अपना हाथसँ पाथर फेकि देलक आ पाखलो सँ कहलकैक – “पाखल्या, हाथसँ पाथर फेकि दियौक, विन्या मामाक शामा आबि रहल छथि।” “किएक?” पाखलो पुछलकैक। “यौ, मंगुष्ठी झरनाक जगह ओकरे छैक ने, हमसभ जे मंगुष्ठ झटाहि रहल छी ई बात जँ ओकरा बाबूकेँ पता लागि गेलनि तँ से नीक गप्प नहि होयत। ओ गारिओ देताह आ मारबो करताह। गोविन्दक कहलाक पश्चातो पाखलो अपना हाथसँ पाथर नहि फेकलक। ओ लगातार झटाहते रहल। गोविन्दक रोकलाक पश्चातहिं ओ रुकल। ताबत शामा ओतए आबि गेलीह। ओ लाल रंगक पाकल मंगुष्ठकेँ देखलक। ओकरो मंगुष्ठ खएबाक मोन भेलैक। ओहो पाथर मारि-मारि मंगुष्ठ झखारए लागलीह। ओकर दू-तीन पाथरसँ एकटा पातो नहि गिरलैक। पाखलो आ गोविन्द दुनू हँसए लागल। ओ लजा गेलीह। ओकरहिं आनल पाथरसँ पाखलो मंगुष्ठ झटाह’ लागल। जल्दीए ओ पाथर ओतहि फेकि मंगुष्ठक गाछ पर चढि गेल आ मंगुष्ठक गाछक डारिकेँ हिलाब’ लागल। मंगुष्ठ सभ ढब-ढब कए गिरए लागलैक। छिट्टा आनबाक लेल शामा घर चलि गेलीह। मुदा आपस अबैत काल ओकरा संगे ओकर बाबूजी सेहो आबि गेलाह। धरती पर पसरल काँच मंगुष्ठ देखि कए ओ पाखलो केँ ओकरा माए आ ओकर जाति लगा कए गारि देलकैक। तकरा बादसँ जखन कहियो शामा ओकरा बाटमे भेटैक ओ अपन माथ झुकाकए चलि जाइत छलीह। जाहि दिनसँ पाखलो ड्राइवर भेल छल ताहि दिनसँ ओ मंगुष्ठी झरना पर नहएबाक लेल अबैत छल। पाखलो केँ देखि शामा कहिओ-कहिओ हँसि दैत छलीह। शामाक यौवनक भार देखि कए ओकरा मोनमे उमंग आबि जाइत छलैक। एकदिन तँ शामा ओकर आ गोविन्दक हाल-समाचार सेहो पूछने छलीह। ताहि दिन, ओ प्रायः पाखलो केँ देखि कए हँसैत छलीह आ पाखलोक मोनमे ओकरा प्रति नब अंकुर पनकी द’ रहल छलैक। पाखलो सँ ई खबरि सुनि, गोविन्द पाखलोक खूब मजाक उड़ौलक। “पाखल्या, हुनकर स्वभाव बहुत नीक छनि। ओ कने कारी अवश्य छथि मुदा देख’मे नीक छथि। अहाँक जोड़ी खूब जँचत।” ई बात पाखलोक मोनमे घूमैत रहैक आ ओ नहबैत काल अपना-आपमे ओ उफान महसूस करैत छल। दोसर दिन रबि रहैक। पाखलो घूमबाक लाथे बाहर निकलल। बाट चलैत-चलैत ओ मंगुष्ठ झरना लग पहुँचि गेल। झरनाक शीतल पानिसँ ओ एक आँजुर पानि पीबि लेलक आ लगीचक आमक गाछ दिस चलि देलक। ओहि आम गाछक नमहर जड़ि उपर धरि आबि गेल रहैक आ कोनो नेना जकाँ अपन कुल्हा उपर कए धरती पर पसरि गेल रहैक। पाखलो एकटा जड़ि पर बैसि गेल आ प्रकृतिक सौंदर्य देख’ लागल। आइ चैत मासक पूर्णिमा छलैक। गामक लोक सभ सांतेरी मंदिर लग बसंत पूजा करए बला रहैक मुदा ताहिसँ पहिने प्रकृति फूल आ फल सभक लटकनि लगा कए बसंत ऋतुक स्वागत क’ चुकल छलैक। आमक गाछक अजोह आम सभ गोटपंगरा पाकए लागल छलैक। काजूक गाछ पर लाल आ पीयर काजू लागल रहैक। हरियर अजोह काजू सभ पाकबाक बाट जोहि रहल छल आ एखन धरि डारि पर फुल्ली सभ डोलि रहल छलैक। शनैः–शनैः बसात सिहकए लागलैक। पाखलो केँ लागलैक– आब ई प्राणदायी बसात एहि प्रकृतिकेँ नब जान द’ देतैक। गाछ–बिरीछकेँ पागल बना देतैक। बसातक सिहकबक संगहि पाखलोक मोनमे विचारक लहरि हिलकोर मार’ लागलैक। ई बसात पच्छिम दिसक पहाड़केँ पार करैत, खेतक बीचोबीच धरतीकेँ चीरैत नदीकेँ पार करैत पूबरिया पहाड़ दिस उछलैत बिना रूकनहि आगू बढि जाएत। ओ कतए सँ आएल हेतैक? कोन ठामसँ आएल हेतैक? ई कहब ओतेक सरल नहि अछि। ओ सभ ठाम भ्रमण करएबला प्रवासी अछि। बसातकेँ अबितहिँ धरती ओहि बसातमे रंग उछालि ओकर स्वागत केलक। बसात धरतीक माथक चुम्मा लेलकैक। गाछ सभक आलिंगन केलकैक। लत्तीसभकेँ बाँहिसँ पकड़ि कान्ह पर राखलकैक आ फेर नीचाँ राखि देलकैक। फूल, फल आ पात सभक चुम्मा लेलकैक आ पूरा बगैचामे सभकेँ हाथसँ इशारा करैत ओ आपस चलि गेल। पाखलोकेँ मोनमे भेलैक, “जे हमहुँ बसाते जकाँ एहि इलाकामे घूमि-फिरि रहल अछि। हम अपन जन्महि कालसँ एहि इलाकामे रहि रहल छी। मुदा हम बसात जकाँ आबि कए चलि नहि जाइत छी अपितु एतुका निवासी भ’ गेल छी। एहि आम गाछक सदृश हमरहुँ जड़ि बहुत भीतर धरि गेल अछि। एहि माटिक बल पर हम पैघ भेलहुँ, फरलहुँ-फुललहुँ। एहि माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल पाखलो थिकहुँ हम।” साँझ खतम भ’ कए गोधूलि भ’ रहल छलैक। मंगुष्ठी झरना पर पानि भरि कए कन्या आ स्त्रीगण घर जा रहल छलीह। पाखलोक ध्यान ओमहर नहि छलैक, अपितु आइ शामा पानि भरबाक लेल नहि आएल छलीह, एहि लेल ओकरा जीवनकेँ फाँसी लागि गेल रहैक। हाड़-मांसुसँ बनल पाखलो केँ एकटा कुमारि कन्यासँ सिनेह भ’ गेल रहैक आ ओ ओकरासँ बियाह करबाक लेल सोचि रहल छल। जकरा एक नजरि देखि लेलासँ ओकरा नस-नसमे उमंग आबि जाइत छलैक वैह शामा आइ झरना पर नहि आयल छलीह, तैँ ओ अपनाकेँ मंद महसूस करैत छल। गोधूलि खतम हेबा पर रहैक आ अन्हार अपन पयर पसारि रहल छल। सांतेरी मंदिर लग पाखलोकेँ पेट्रोमैक्सक जगमग करैत इजोत देखा पड़लैक। ओकरा आइ होमएबला बसंत पूजाक स्मरण आबि गेलैक। बसंत पूजा दिन सांतेरी मायक पालकी बड़ धूमधामसँ बाहर निकलैत छैक। ओ प्रकृतिमे आएल बसंत ऋतुसँ भेंट करैत छथि। ओहि राति ओ मंदिर आपस नहि जाइत छथि अपितु बाहरे प्रकृतिक संग रहैत छथि। बसंत ऋतुक दिन गाम भरिक लोक भरि राति उत्सब मनबैत अछि। पूजाक लेल तँ शामा अवस्से अओतीह, तखनहिँ हम हुनकासँ भेंट क’ लेब। पाखलो सोचलक। शामासँ भेंट करबाक बहन्ने ओकरा पूरा देहमे जोश आबि गेलैक, आ गामक दिस जयबाक लेल ओ तीव्र गतिएँ चलए लागल। मंगुष्ठी झरना पर सभ दिन जकाँ पाखलो आइयो अपन कपड़ा धोबैत छल। रबि लगाकए आइ तीन दिन भ’ गेल रहैक। गोविन्द रबिकेँ किएक नहि अएलाह? ओ यैह सोचि रहल छल। एतबहिमे दूरसँ – “पाखल्या! यौ पाखल्या!” गोविन्द सन आवाज सुनबामे आएल। ओ पाछू घूमिकए देखलक। गोविन्दकेँ देखतहि पाखलो तुरन्त उठल आ ओकरा दिस दौड़िकए गेल। दुनू एक दोसरासँ हाथ मिलेलक। गोविन्दक कनहा अपन हाथसँ हिलबैत पाखलो पुछलकैक – “अहाँ रबि दिन किएक नहि एलहुँ?” “की कही, हमरा ऑफिसक मित्र लोकनि हमरा पिकनिक पर ल’ कए चलि गेल छलाह। हम जाएवला नहि रही, मुदा की करितहुँ ओ सभ हमरा जबरदस्ती ल’ गेलाह। हमर मोन करैत रहय जे आबि कए अहाँसँ भेंट करी।” गोविन्द अपन मोन खोलि देलक। “जाय दिअ, एखनहिं मिललहुँ यैह की कम अछि? “चलू पहिने अहाँ नहा लिअ” गोविन्दक कहला पर पाखलो झरनामे नहाबए लागल। गोविन्दकेँ किछु कहबाक उत्सुकता रहनि। ओ अपना हाथसँ पानि निकालि पाखलोक देह पर छिट्टा मारए लागल, पाखलो सेहो हुनका पर पानि फेकलक। ओहिसँ गोविन्दक कपड़ा नीक जकाँ भीजि गेलैक। पाखलो केँ कने खराप लागलैक। ओ गोविन्दसँ माफी माँगलक। गोविन्द एकरा सभकेँ मजाकमे उड़ा देलथि। पाखलो नहाकए अपन देह पोछलक। अपन कपड़ा सुखबाक लेल लारि देलकैक। बादमे दुनू गोटे आमक जड़ि पर आबि बैसि गेल। पाखलो गोविन्दक आँखिमे देखलक। गोविन्द किछु कहए चाहैत छल, ई हुनका आँखिसँ पाखलोकेँ पता लागि गेल। “कोनो नब समाचार?” पाखलो पुछलकैक। “समाचार? एकटा नब समाचार अछि।” “कोन समाचार?” “हमरा लेल एकटा संबंध आएल अछि।” “अहाँक लेल संबंध? कतएसँ? केकर?” पाखलो एकक बाद एक प्रश्न केलक। “ई सभ हम अहाँकेँ बादमे कहब। पहिने बताउ, जे शामा आइ पानि भरबा लेल आयल छलीह?” “हँ….नहि......, एखन धरि तँ नहि।” पाखलो सोचिकए जवाब देलक। “नहि ने? तखन तँ हमर अनुमान ठीके भेल। हम अहाँकेँ आर नहि उलझाएब। हमरा लेल विन्या आपाक दिससँ शामाक लेल संबंध आएल अछि। हम ओकरा साफ मना क’ देलिऐक।” पाखलोकेँ बतएबाक लेल आनल गेल रहस्य गोविन्द खोलि देलक। “मुदा संबंधक लेल अहाँ मना किएक कहलहुँ?” पाखलो फेर प्रश्न केलक। “एकर जवाब तँ बड्ड सरल छैक यौ।” गोविन्द बाजल— “शामाक जोड़ीक लेल अहाँक प्रयोजन अछि हमर नहि। अहाँकेँ स्मरण अछि, हम एकबेर अहाँकेँ कहने रही – “शामा आ अहाँक जोड़ी केहन रहत?” किछु कालक लेल दुनू गोटे चुप भ’ गेल। बादमे गोविन्द बाजए लगलाह— “हम दुपहरकेँ घर गेल रही। खएलाक बाद माय हमरा एहि संबंधक बारेमे बतौलनि। हम साफ मना क’ देलियनि, मुदा किएक? से नहि बतौलियनि।” “नहि गोविन्द, एहि संबंधकेँ नकारि अहाँ नीक नहि केलहुँ। अहाँ हमरा लेल त्याग क’ रहल छी। ई हमरा नीक नहि लागि रहल अछि।” पाखलो कहलक। “एहन नहि छैक पाखलो, अहाँ बुझैत नहि छी। अहाँकेँ किओ नहि अछि। आ शामा अहाँकेँ पसिन्न सेहो अछि। ओ अहाँकेँ भेटि जेतीह तँ हमरा खुशी होएत।” “मुदा हमरा संग.....” पाखलो किछु कह’ वला रहथि। “ओ सभ बादमे देखल जेतैक।” एतबा कहि गोविन्द चुप भ’ गेल। पाखलोक मोन विचलित भ’ गेलैक, मुदा शामाक सभ स्मरण एखनहुँ ओकरा मोनमे महकैत रहैक। शामा द्वारा गोविन्दक लेल कएल गेल पूछारि....., ओकर मीठ-मीठ बोली....., फूल-सन ओकर हँसी.....सभटा। ओकरा दुनूकेँ देखि शामा झरनासँ बिना पानि भरनहिं आपस चलि जाइत छलीह। तकर बाद ओ शामासँ भेंट केलक आ “हमरासँ बियाह करब?” पूछलकैक। शामा ओकरा “हँ” कहतैक ओकरासँ यैह अपेक्षा छलैक पाखलोकेँ, मुदा ओ बाजलि, “नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ! ” पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छल आकि ओ ओतएसँ चलि देलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक। पाँच शंभुक होटलमे रातिक भोजन कएलाक पश्चात् हम दीनाक घर दिस चलि देलहुँ। आइ बहुत काज केने रही तहि लेल सौंसे देहमे दरद छल। भूइयाँ पर पड़ितहि हमरा निन्न आबि जाएत, एहन बुझाइत छल। बान्ह पर पहुँचबाक देरी नहुँ-नहुँ बसात सिहक’ लागल। अहा!........ केहन शीतल बसात छैक! बसात लगितहिँ देहमे हरियरी आबि गेल। बान्हक एक दिस खेत-पथार आ दोसर दिस मांडवी नदी बहैत छलैक। बगलक नारियरक गाछसँ आवाज आबि रहल छलैक। चारू दिस अन्हारे-अन्हार छलैक! एहि अनहरियामे जान आबि गेल रहैक। अन्हारमे उपर भगजोगनी भुकभुक करैत छलैक। नदीक कारी पानिमे माछ सभ उछलैत रहैक आ ओकर लहरि भगजोगिनिएँ जकाँ दीप्यमान भ’ रहल छलैक। बान्हक बीचहि मे मूलपुरुष (ग्रामदेवता)क मंदिर नुकाएल रहैक। ओ मंदिर एकदम टूटि गेल रहैक। मंदिरक उपर चार नहि छलैक। मंदिरक चारू कातक देवाल सभमेसँ आगूक देवाल तँ एकदम्मे टूटि गेल रहैक। बाँकी तीनू देबाल पर सिम्मर, बर, अश्टी सन पैघ-पैघ गाछ सभ जनमि गेल छलैक। गोविन्दक विचारसँ मूलपुरुषकेँ खुब पैघ खुलल मंदिर भेटल छनि। ओ कहैत छल – “एहि चारू गाछ पर आकासक छत छैक आ एहि मंदिरमे मूलपुरुष रहैत छथि।” चलैत–चलैत हम मूलपुरुषक मंदिर लग पहुँच गेलहुँ। एहि मंदिरमे हम एकबेर साँप देखने रही, ओ स्मरण अबितहिं हमर सौंसे देह सिहरि गेल। नेनपनमे एकबेर हम आ गोविन्द माछ मारबाक लेल नदी पर गेल छलहुँ। बहुत कालक बाद हमरा बंसीमे एकटा खर्चाणी (माछ) फंसल छल। ओकरा हम एकटा नारियरक सिक्कीमे गूथि लेलहुँ। बाटमे मूलपुरुषक मंदिर भेटल। बंसी नीचाँ राखि हम दुनू गोटे मूलपुरुषकेँ गोर लागबाक लेल गेलहुँ। मूलपुरुषक कारी मूर्ति, मंदिरक टूटलका भागमे पाथरक ढेरीक बीचमे छलनि। हम अपन हाथक माछ मंदिरक सीढी पर राखि देलहुँ। हम दुनू गोटे मूर्ति लग माथ टेकलहुँ। ने जानि कतएसँ ओहि मूर्ति लगक पाथर पर एकटा साँप आबि अपन फन काढ़ि ठाढ़ भ’ गेलैक। हम दुनू गोटे बहुत डरि गेलहुँ आ पाछू हटि गेलहुँ। पछाति जा कए ओ साँप ससरि कए ओहि पाथरक ढेरीमे ढूकि गेल। गोविन्द तँ डरक कारणेँ बुझू जे पाथरे बनि गेलाह। हम सभ भगवानक सीढी पर माछ रखने छलहुँ, एहिलेल हुनका खराप लागलनि की? हमरा मोनमे एहन भेल। हम आपस सीढी लग गेलहुँ आ ओतए राखल माछ उठाकए नदीमे फेकि देलहुँ। हमसभ पुनः मूलपुरुषक पयर पर गिर कए हुनकासँ माफी माँगलियनि। हम गोविन्दसँ पूछलियनि, “हम माछ राखने छलहुँ एहिलेल मूलपुरुषकेँ गोस्सा आबि गेलनि की? मंदिर भ्रष्ट भ’ गलैक की?” “नहि यौ, एहन कतहुँ होइक? गामक लोकतँ हुनका माछो चढबैत छनि।” गोविन्द जवाब देलक। “तखन साँप किएक देख’ मे आएल? हम माछ राखने रही, एहिलेल मूलपुरुषक मंदिर भ्रष्ट भ’ गेलैक की?” “अहाँक माछ रखलासँ मंदिर कोना भ्रष्ट भ’ जेतैक?” “हम..............।” “चुप रहू, पाखलो भेलहुँ तँ की भेल? पछिला बेर तँ हम इमली आ आँवला रखने छलहुँ, तखनहुँ मंदिर भ्रष्ट भेल छलैक की? नहि ने! अहाँ चुप रहू आ ककरो किछु नहि बतेबैक।” हम मूलपुरुषक मंदिर लग पहुँचि गेलहुँ। मंदिरक चारू दिस पहाड़ छलैक आ बीचमे मंदिर। रातुक अन्हारमे पहाड़ कारी देखाइत रहैक। उपर तरेगणसँ सजल अकाश। जेना घरक धरेन आ छप्पड़, एहि दुनूक बीचसँ इजोत अबैत छैक ओहने इजोत अकाश आ पहाड़क बीच पसरि रहल छलैक। हम अपन जूता खोललहुँ आ मूलपुरुषकेँ गोर लागलहुँ। रातिक अन्हारमे मूलपुरुषक मूर्ति नहि लखा दैत रहैक। हमरा भेल जे जेना मूलपुरुष एतए अन्हारक एकटा बड़का टा रूप ल’ कए पूरा संसार पर पसरि गेल छथि। मूलपुरुषक मंदिर बहुत प्राचीन छैक। मांडवी नदीक कछेर पर एहि गाम केँ बसौनिहार आदिपुरूष वैह छथि। पहिने ई गाम बाढ़िमे डूबि जाइत छलैक मुदा मांडवी नदी पर बान्ह बान्हि ओ एहि गामक सृष्टि केने रहथि। हुनका मरलाक उपरान्त एहि गामक लोक सभ हुनकर स्मरणमे ई मंदिर बनौने छल। एहि तरहेँ ई मंदिर आ मूलपुरुष द्वारा बनाओल गेल ई बान्ह, दुनू बहुत पुरान अछि। हम मूलपुरुष द्वारा बनाओल गेल ओहि बान्ह दए चलि रहल छलहुँ। आ एहि बान्हक कारणेँ बसल गाममे हम, माने पाखलो रहैत रही। दीनाक बैसकी घरमे सभ दिन जकाँ हम चटाय बिछा कए बैसि गेलहुँ। दिनाक बेटा एकटा चिट्ठी आनि हमरा हाथमे थमा देलक। ओ चिट्ठी गोविन्देक छलैक। बहुत दिनक बाद ओ हमरा चिट्ठी लिखने रहय, एहिलेल हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल। गोविन्दक संग घूमब-फिरब, केगदी भाटक पोखरिमे नहाएब, हेलब, ई सभ सोचैत-सोचैत हम चटाय पर सूति गेलहुँ आ माथ धरि कम्मल ओढ़ि लेलहुँ। बहुत राति बीति गेल, मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हमरा मोनमे केगदी भाटक पोखरिक चित्र बेरि-बेरि आबि जाइत छल! लील रंगक आकाशक प्रतिबिंब पानिमे चमकैत छलैक। आकाशक रंगीन मेघ पोखरिक लहरि पर हेलि रहल छल। आकाश अपन छवि पोखरिक पानिमे देखि मोनहि-मोन खूब प्रसन्न होइत छल आ “ई रूप नीक नहि अछि।” ई सोचि ओ अपन रूपकेँ नव रूपमे रंगैत छल आ मेघक वस्त्र पहिरैत छल। पोखरिक लग केगदी (केबड़ा) झाड़ ओ केबड़ाक गाछ सभक बड़का टा जंगल रहैक, ओ पोखरिक महार केबड़ाक झाड़ीसँ भरल रहैक। जखन केबड़ाक झाड़ पर फूल फूलाइत छैक ओहि समय हमसभ नहएबाक लेल गेल छलहुँ। केबड़ा फूला गेल छलैक। पीयर-पीयर केबड़ा हरियर-हरियर पातसँ बाहर आबि, अपन जी देखा-देखा कए कबदा रहल छलैक। पूरा वातावरण केबड़ाक सुगन्धसँ भरल रहैक। हम आ गोविन्द पोखरिमे कूदि गेलहुँ। दुनूगोटे हेलैत-हेलैत केबड़ाक द्वीप लग पहुँचलहुँ। द्वीप पर केबड़ाक बहुत घनगर जंगल रहैक। दुनू गोटे केबड़ाक झाड़क अंदर घूसि केबड़ाक फूल तोड़ए लागलहुँ। फूल तोड़ि पोखरि पार केलहुँ। ओ सभटा पोखरिक कछेर पर राखि देलिऐक। बादमे बेंग जकाँ हमसभ पोखरिमे डुबकी लगौलहुँ। भरि दम साँस घीचि ओहिना पानिमे डूबि गेलहुँ, तँ ओहि साँसक संगे बाहर भेलहुँ। सौंसे देह डूबल छल, मुदा माथक केश हेलैत नारियर सदृश बुझाइत छल। हमरा गाम क्षेत्रफल आन गामक अपेक्षा कने पैघ छैक। गाममे खेतक मैदान, जंगल ओ पहाड़ हमरा सभकेँ घूमबाक लेल कम पड़ि जाइत छल। नाह पर पतवारि चलाबैत हमसभ नदीमे झिझरी खेलैत रही। नदीमे नहएलाक पश्चात् हेलिकए नदी पार करैत रही। अज्ञातवासक कालमे पांडव लोकनि द्वारा बनाओल गेल पोखरिमे हमसभ नहएबाक लेल जाइत रही। ओ पोखरि बहुत सुन्नर रहैक। पैघ-पैघ पाथर पर पोखरिक चारू दिस नीक चित्रकारी कएल गेल रहैक। चारू दिससँ सीढी होइत लोक पोखरिमे ढूकैक छल। पोखरिक चारू दिस पाथरक मेहराब छलैक। हर एक मेहराबक भीतर दू-तीनटा कक्ष इजोतसँ भरल। एहि कक्ष सभक देबालक खाम्ह पर लत्ती सभ आ आदिकालीन माल-जाल, चिड़ै-चुनमुनीक आकृति बनल रहैक। एहन बुझाइत रहैक जेना एहि मनोहर आकृति वला कक्षमे भगवान अमृत-कलश राखि देने होथि, ठीक ओहिना लेटेराइट पाथरसँ निर्मित एहि पोखरिमे कौआक आँखि-सन साफ पानि देखिकए ककरहुँ मोन मुग्ध भ’ जाइत छलैक। एतेक स्वच्छ पानिमे हमसभ नहाइत छलहुँ। नहएलाक बाद गोविन्द मेहराबक कक्षमे जा कए कोनो ऋषि-मुनि जकाँ ध्यानस्थ भ’ बैसैत रहथि। तखन बुझाइक जे ओहि लेटेराइट पाषाणसँ महाभारतक काल घुरि एलैक। पछिला किछु सालक स्मृतिसँ हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। ओह......हमर माय! हमरा एहने लागल, जे हमर साँस केओ बन्न क’ देलक, हमरा गरमे फंदा बान्हि देलक। एकबेर हम आ गोविन्द जखन एहि पोखरिमे नहा रहल छलहुँ तखनहिं भट बाबू ओहि बाटे जा रहल छलाह। हमरा पोखरिमे नहाइत देखि ओ, “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकर’ लागलाह! हुनकर चिकरब सुनि ओतए पाँच–छओ लोक जमा भ’ गेल। भट बाबू हुनका लोकनिकेँ आदेश देलथिन, जे ओ सभ हमर कान घीचि कए बाहर आनथि। ओ लोकनि हमर कान घीचैत हमरा बाहर आनलथि। बादमे भट बाबू अपन छड़ीसँ हमरा खूब मारलथि। ओ हमरा मारैत-मारैत सांतेरी मंदिर धरि ल’ गेलाह। भरि गामक लोक हमरा देखबाक लेल ओतए जमा भ’ गेल छल। ओ हमरा सांतेरी मंदिरक सीढ़ी पर नाक रगड़बाक लेल बाध्य केलथि। हम अपन नाक रगड़लहुँ, माँफी माँगलहुँ, मुदा ओ हमरा पोखरिक लग बला लोहाक स्तंभसँ बान्हि देलनि। काल्हिए हम एहि स्तंभ पर नारियर फोड़ने छलहुँ। सभक संग ढोल आ ताशा बजाकए शिगमो (धार्मिक उत्सव) खेलने छलहुँ आ आइ हम स्वयं गामबलाक लेल एकटा तमाशा बनल रही। भट बाबू हमरा उपर नारियरक खट्टा ताड़ी उझलि देलथि। एतबे नहि किओ हमरा उपर घोरणक छत्ता झारि देलक। घोरण काटतहि हम जोर-जोरसँ चिकरए लागलहुँ। मुदा हमर असहायता पर किनकहुँ कनेको क्षोभ नहि भेलनि। हमर ई हालति देखि गोविन्द कानैत-कानैत दौड़ल हमरा मायकेँ बजा आनलक। ओ “हमर बच्चा…”,“हमर बच्चा…” कहैत कानल-कानल, दौड़ल एलीह मुदा हमरा सोझ अबितहिं ओ एकदमसँ गिर गेलीह। ओ बेहोश भ’ गेलीह आ बहुत काल धरि उठि नहि सकलीह। हुनका उठएबाक लेल हम दौड़हि वला रही, मुदा जतए बान्हल रही, ओत्तहि रहि गेलहुँ। हुनका किओ नहि उठौलक, उनटे लोक सभ ई तमाशा देखैत रहल। कनेक कालक बाद ओ अपन ठेघुन टेकैत उठलीह। हुनका नाकसँ शोणित बहैत रहनि। हाथ आ पयर मे घाव भ’ गेल रहनि। ओ उठि कए हमरा लग अएलीह आ “हमर बच्चा…” कहैत हमरा गर लगौलीह। हम दुनू गोटे कानए लागलहुँ। ओ हमर बन्हन खोलबाक प्रयास करए लागलीह मुदा ओहि समय चारि-पाँच लोक हुनका पाछाँ घीचि लेलकनि। बादमे हुनकहुँ घीचि कए मंदिर लग ल’ गेल। ओ हमरा छोड़एबाक लेल भट बाबूक हाथ-पयर पकड़ैत रहलीह मुदा ओ हुनका ठोकर मारि धकेलि देलनि। एतबा देखतहि हमरा गोस्साक पारावार नहि रहल। हमरा देहक गरम खून दौड़ए लागल। हम जतय बान्हल रही ओत्तहि चिकरि-चिकरि कए रहि गेलहुँ। बादमे हमर खून ठंढा भ’ गेल आ ओ शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाबए लागल......, हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक सभटा खून बहि गेल हो! हमर माय कानि रहल छलीह आ हुनका सभक पयर पकड़ि रहल छलीह, मुदा हुनक गोहारि किओ नहि सुनि रहल छल। ओ जहिना हमरा छोड़ाबए आगू आबथि, लोक हुनका रोकि लैक। बादमे जखन ओ गोस्सासँ महाजनकेँ गारि पढ़ब सुरह क’ देलनि तँ लोक सभ हुनकहुँ घसीट’ लागल आ जाहि स्तंभसँ हम बान्हल रही ओहि स्तंभसँ हुनको बान्हि देलनि। आब हमर मुँह पूब दिस तँ हुनक मुँह पच्छिम दिस भ’ गेल। हम दुनू गोटे एकहि स्तंभ सँ बान्हल छलहुँ, मुदा एक दोसराकेँ देखि नहि पबैत छलहुँ। ओ “हमर बच्चा…”,“हमर बच्चा…” कहि कए कानैत छलीह, तँ हम माय....., माय....., चिकरि कए कानि रहल छलहुँ। किछु समयक पश्चात् ओ कोनहुँ तरहेँ अपन हाथ पाछू आनि हमरा छूलनि। हम दुनू दिनभरि ओहि स्थिति मे रहलहुँ। पोखरिक शुद्धिकरण करएबाक लेल ओ होम-जाप करौलनि। चारिटा केराक थम्ह आनल गेल आ पुरहित लोकनि होम सुरह केलनि। ओ लोकनि होमाग्नि जरौलनि। मंत्रोच्चारण करैत ओ लोकनि ओहिमे समिधा झोंकए लगलाह। हमरा बुझाएल जे ई सभ हमरा आ हमरा माय, दुनूकेँ एहि आगिमे झोंकि देत। होम चलितहि काल एकटा पुरहित ओहि होमसँ आगि आनि हमरा पयर पर राखि देलक। हमरा बुझाएल, जेना हम काल्हि होलिका जरौने छलहुँ तहिना ई सभ आगि लगा हमरा दुनू माय-पूत केँ जरा देत। मुदा ओ एना नहि केलक। आगिक कारणेँ हमरा पयरमे फोका भ’ गेल छल जे दर्द करैत रहए। होम-हवन चलि रहल छल आ फाँसी पर चढ़’ वला अपराधी जकाँ हम जतए बान्हल रही, ओतहिसँ हुनका सभकेँ देखि रहल छलहुँ। गामक लोक सभ एहि घटनाकेँ एकटा उत्सव जकाँ देखि रहल छलाह। दादी ओहि दिन गामसँ बाहर गेल रहथि। साँझ खन घुरितहि गोविन्द हुनका हमरा सभक खबरि देलक आ संगहि ल’ कए पोखरि पर आबि गेल। हमरा आ हमरा मायकेँ स्तंभ सँ बान्हल देखि कए दादी बहुत दुखी भेलाह। जाहि दादीक आँखिमे हम आइधरि नोर नहि देखने रही; ओहि दिन देखि लेलहुँ। ओ हमरा छोड़ा देलथि। ओहि काल ई देखबाक लेल ओहिठाम गामक किओ नहि रहथि। एहि घटनाक पश्चात् हमरा गामक लोक पर कनेको गोस्सा नहि आएल, किएक तँ गाममे हमरा छोड़ाकए आनएवला आ गोविन्द सन हितैशी आर किओ नहि रहथि। नारियरक फुटलका खोली जकाँ गरि जाइवला एहि घटनाक स्मृति आब शेष रहि गेल अछि। एहि घटना सभमे सँ एक, स्तंभ पर नारियर तोड़बाक अछि, ई बताबए वाली हमर माय....., हमरा प्रह्लादक होलिकाक आगिसँ बचाबए वाली हमर माय....., हमरा आँखिक सोझ ठाढ रहलीह आ हमरा आँखिसँ अनायासे नोर खसय लागल। हम गोविन्दक मायकेँ शोर पारलहुँ। ओ हमरा घरक भीतरहिसँ आबाज देलथि। ओहि समय ओ चाउर बीछैत छलीह। ओ उठि कए बाहर एलीह आ हमरा देखि कए बजलीह, “आउ बाउ, बैसू!।” हम घरक अंदर गेलहुँ। ओ हमर हालचाल पूछय लागलीह। “एतेक दिन धरि कतए छलहुँ अहाँ?” “नहि बाय...... ” हम किछु कहए चाहैत छलहुँ “.... आइ-काल्हि काजमे बेसी व्यस्त रहैत छी ताहि लेल अएबाक अवसर नहि भेटैत अछि की?” “...असलमे आइयहु तेहने काज छल, मुदा गोविन्दसँ भेंट करबाक रहए एहिलेल ओवरटाइम छोड़िकए आएल छी।” ओ अदहनमे चाउर गिराब’ गेलीह आ हम ओहिठामक बेंच पर बैसि गेलहुँ। बेंचक एक कोनमे ट्रंक आ ओहिपर गोविन्दक किताब राखल छलैक। हम एकटा उपरला किताब निकाललहुँ, ओ अंग्रेजी मे छल, एहिलेल हम नहि पढ़ि सकलहुँ आ ओ आपस राखि देलिऐक। बादमे सबसँ नीचा वला किताब निकालहुँ, मुदा ओ पुर्तगाली मे छल एहिलेल ओहो राखि देलहुँ। ट्रंक लग कपड़ा टाँगबाक एकटा हैंगर रहैक जाहिपर दादीक दू टा कमीज आ गोविन्दक एकटा पैन्ट टाँगल रहैक। एखन धरि तँ गोविन्दकेँ पणजीसँ आपस आबि जएबाक चाही! एहिलेल हम खिड़कीसँ बाहर देखलहुँ। मुदा रस्ता सून छल। मैदानसँ होइत ओ रस्ता अपन देह टेढ-मेढ़ केने सीधे गाम धरि आबि रहल छल। आगू पैघ-पैघ गाछ-बिरीछक कारणेँ शहर गेल गोविन्दक छाँह धरि नहि बुझाइत छलैक। दादी बजारसँ आबि गेल छलाह। ओ हमर हालचाल पूछलनि। हम कनी मोटगर-डटगर भ’ गेल रही एहि लेल ओ हमर प्रशंसा केलनि। ओहि दिन दूपहर धरि दादी, ओकर माय, आ हम, गोविन्दक रस्ता-पेड़ा देखैत रहलहुँ। ओ नहि आएल, एहिलेल हमसभ कने निराश छलहुँ। बहुत कालक बाद हमसभ भोजन केलहुँ। दादी सुतबाक लेल गेलाह आ हम ‘पुनः आएब’ ई कहि चलि देलहुँ। रस्तामे आलेससँ भेंट भेल। ओकरा देखि हमरा कने आश्चर्य भेल, किएततँ ओ कहियो अपन ओवरटाइम नहि छोड़ैत छल। एतए धरि जे रबियोक दिन ओ भोरे-भोर उठि कपेल गेलाक बाद ओ काज पर जाइत छल। हम पुछलियनि— “आलेस! बीचहि मे काज छोड़िकए आएल छी की?” “आबए पड़ल! नारियरक गाछसँ रस निकाल’ वला मजदूर पेद्रूक देहांत भ’ गेलैक।” आलेस बतौलनि। “की भेल छलैक ओकरा?” हम पूछलहुँ। “पता नहि, हमरा निकलतहि ओ मरि गेल।” आलेस कहलनि। आलेसक संगहि हमहू ओकरा घर धरि गेलहुँ। दोसर दिन पेद्रूक अंतिम संस्कारमे हमरहु जाय पड़ल। छोटका गिरिजाघरक लगीच वला श्मशान घाटमे ओकर अंतिम संस्कार भेलैक। पेद्रू एकटा हिन्दू मौगी रखने रहए, किन्तु ओ ओकरासँ बियाह नहि केने रहय। ओ जा धरि छलीह ताधरि पेद्रूक संसार नीक जकाँ चललै, मुदा जखन ओ मरि गेलीह तँ ओकरा श्मशानक बाहरे गारल गेल छलैक। किएक तँ ओकर अंतिम संस्कार श्मशान घाटमे नहि करय देल गेल रहैक एहि लेल पेद्रू कानि रहल छल। ई घटना स्मरण अबितहि हम स्वयं उधेड़बुन मे पड़ि गेलहुँ। एहि उधेड़बुन मे हमरा एकटा पछिला गप्प स्मरण आबि गेल। एहि छोटका गिरिजाघरमे हमरा बपतिज्म (ईसाई धर्मदीक्षा) देल गेल छल। ताहि समय हम बहुत छोट छलहुँ। तखन स्कूलो नहि जाइत छलहुँ। अपन मायकेँ बता कए हम आलेसक ओहिठाम गेल रही। ओकरा घरमे ओकर पिताजी हमरासँ पूछलथि— “अहाँ त’ पाखलो छी ने?” “हँ” हम जबाब देलहुँ। “किएक तँ अहाँ पाखलो छी एहिलेल ईसाई भेलहुँ ने?” हम चुप रहलहुँ। “अहाँ काल्हि आलेसक संग आएब, काल्हि उत्सव छैक।” दोसर दिन हम आलेसक संग गेलहुँ। ओहि समय हमरा ओतुका पादरी बपतिज्म देलनि। एहि बातक खबरि हम ककरो नहि लागए देलिऐक। घर अएलाक बाद, आलेसक ओहिठाम जे हमरा बिस्कुट खएबा लेल देल गेल छल, ओकरा हमर माय बाहर फेकि देलथि। ओ हमरा धमकी देलथि—“विठू! एना जँ अहाँ ककरो-कहाँसँ किछुओ खएबाक चीज ल’ लेब तँ हम अहाँक जान ल’ लेब।” हमरा गाममे एहिसँ पहिने ईसाई आ हिन्दूक बीच कहियो झगड़ा-फसाद नहि भेल छल, मुदा ‘ओपिनियन पोल’क समय गामक बजारक वार्डमे ईसाई आ हिन्दू, दुनू समुदायक लोकक बीचमे झगड़ा भ’ गेल। ओहि दिन किओ एक दोसराकेँ ओकर धर्म लगा केँ गारि देलकै, आकि झगड़ा बाझि गेल। ओहि राति एक दोसराक घरक आगूक तुलसी चौरा आ क्रॉस तोड़ि देल गेल। घर-दरबज्जाक आगू तोड़ल गेल तुलसी चौरा आ क्रॉसक माटिक ढेर लागि गेल। दोसर दिन झगड़ा आर भयानक रूप ल’ लेलकै। लोक सभ डंडा, तलवार आ ढाल ल’ कए एक दोसराकेँ मारि देबाक लेल तैयार छलैक। किछुकेँ मारियो देल गेलैक। हम एहि दुनू समुदायक बीच घूमि रहल छलहुँ, आ की भ’ रहल छैक देखि रहल छलहुँ। हमरा मारबाक लेल किओ नहि अबैत छल। “हम नहि तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, एहिलेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबंध दुनूसँ अछि, एहिलेल हमरा ओ लोकनि नहि मारलनि की?” हमरा मोन मे एहि तरहक प्रश्न उठय लागल। दुनू समुदायमे हमर मीत लोकनि छलाह आ हम हुनका सभसँ मिलैत छलहुँ। जँ झगड़ा आर बढ़ि जेतैक तँ खूनक नाली बहि जेतैक, एहिलेल दुनू समुदायक लोक डरि गेलाह। बादमे हम दुनू समुदायक लोकसँ मिलिकए हुनका सभकेँ समझौलहुँ-बुझौलहुँ, हुनका बीच समझौता करबौलहुँ। ओहि समय हम हुनका सभकेँ एकजुट करएवला आ एक दोसराक समाद ल’ जाएवला दूत बनि गेल छलहुँ। एहि गाममे हमर परिचय फकत एतबा अछि जे हमर नाम पाखलो थिक, हमर जाति पाखलो थिक, आ हमर धर्म सेहो पाखलो थिक। छओ केगदी भाटक पैंतीस-चालीस रैयत, मूलपुरुषक मंदिर लग जमा भ’ गेल छल। सुभलो आ सोनूक बीच बैसल दादी सभसँ नीक लगैत छलाह। रैयत, किसान, कुणवी (गोवा राज्यक आदिनिवासी) सहित गामक सभ लोक ओतए जमा छल। रैयत सभ अपन-अपन माँग ओतए राखलक। जमींदार ककरो घर तोड़ि देने रहैक तँ ककरो घर नहि बनाब’ दैत रहैक। किछु रैयतकेँ जमींदार बेदखल क’ देने रहैक तँ किछुकेँ हफ्ताक नारियर नहि देने रहैक। एहि तरहक बहुत रास माँग रहैक। सभक चेहरासँ गोस्सा आ नाराजगी झलकैत रहैक। प्रस्तुत कएल गेल सभ माँग पर जखन चर्चा होमए लागल तँ किछु हल्ला-गुल्ला होमए लागलै। सुभलो गाँवकर लोक सभकेँ चुप करबाक प्रयास केलनि, मुदा हल्ला आर बढ़िते गेल। तखनहि दादी उठि कए अपन दमगर आबाजमे बाजए लागल— “हम सभ एहि कांदोले गामक गाँवकर सदा जमींदारक केगदी भाट रैयत थिकहुँ। ओना हमरहिमे सँ किछु ओकरा खेतक हिस्सेदार सेहो छी। हम सभ ओकरा खेत-भाटमे काज करैत छी, मुदा हमरा जतबाक आवश्यकता अछि ततबो हमरा पेटकेँ नहि भेटैत अछि, अपितु ओ सभ जमींदारक गोदाममे चलि जाइत अछि। केगदी भाटमे हरएक नारियर तोड़बाक दिन लाखो नारियरक ढेरी लागि जाइत अछि, मुदा सदा जमींदारक मर्जीक बिना हमरा सभकेँ एकोटा नारियर खएबा लेल नहि भेटैत अछि। एहि भाटमे नारियरक गाछ लगाबी हमसभ, ओकरा पानि पटा कए नमहर करी हमसभ, भाटमे खाद छीटी हमसभ, ओकर ओगरबाहि करी हमसभ, ओकर हत्ता बनाबी हमसभ, सुरक्षा करी हमसभ आ दू टा नारियर खएबा लेल हमरा सभकेँ जमींदारक मुँह देख’ पड़ैत अछि। एहि माटिक पूतकेँ एहि भाटमे घर-मकान नहि बनाब’ देल जाइत छैक। ताहू पर जबरदस्ती ओकरा सभक घर तोड़ि देल जाइत छैक। आब हमरा सभकेँ हमर न्याय भेटबाक चाही। हमरा सभ पर जे अत्याचार भेल अछि से दूर हेबाक चाही, माने दूर हेबाक चाही।” “हँ, हँ”, जमा भेल भीड़सँ एहि तरहक नारा सुन’ मे आएल। बादमे दादी आर जोरसँ बाजए लागल। ओकर आवाज लोकक कानमे गूँजए लागलैक। पाखलोक पूरा देहमे बिजलौका चमकि गेलैक। ओ अपन गरम भेल कान पर गोविन्दकेँ हाथ रखबाक लेक कहलकैक। भगवान पर अक्षत छीटलाक पश्चात् हुनकर गोहारि केलासँ जे लोकक शरीर पर भा आबि जाइत छैक, तहिना दादीक भाषण सुनि कए लोक सभ पर भा आबि गेलैक, एहने बुझाइक! दादीक बाजब जारी रहैक— अपन मौगीक परतापें ओकरा ई केगदी भाट भेटल छैक। यैह सदा, दत्ता जल्मीकेँ जित्ते मारि कए ओकर खाजन भाट (क्षेत्र विशेषक खेत) फिरंगीक सहायतासँ अपना नामे करवा नेने अछि। ओकरा कनेको लाज-शरम नहि छैक। ओहू पर ओ गाममे राजा जकाँ घूमि रहल अछि। ई गाम सदा जमींदारक नहि थिकै। गामक खेत-भाट हमरा सभक थिक। एहि खेत मे काज करएवलाक खेत-भाट थिकै। कागत पर लिखा नेने ई ओकर नहि भ’ जेतैक। जँ एहन हेतैक तँ ओ एहि देशकेँ सेहो कागत पर लिखवाकेँ राखि लेत आ ओ एहि देशहुँकेँ कागत पर लिखि ककरो हाथेँ बेचि लेत। आब हमसभ जमींदारकेँ देखा देबैक जे ई खेत-भाट हमरे सभक थिक। खेत-भाटमे काज करएवलाक थिक। हमरा सभक असहयोगेक कारणेँ केगदी भाटमे नारियर तोड़ब एखन धरि बाँकी रहि गेल अछि। ओहि समय जमींदारकेँ एहसास भ’ जेबाक चाही रहए। मुदा ओ तँ अकिले केर आन्हर अछि। सुनलहुँ अछि जे भाटमे नारियर तोड़बाक लेल ओ गामसँ बाहरक पाडेकर (पेशेवर नारियर तोड़’ वला) केँ लाबए बला अछि। ओकरा अएबासँ पहिनहि हम सभ सभटा नारियर तोड़ि कए देखा देबैक जे ओ भाट हमरा सभक थिक। चलै चलू, आइए, एखने ओहि भाटक सभटा नारियर तोड़ि देबैक, चलै चलू, ढाल आ गड़ाँस ल’ कए अबैत जाउ! सभ किओ ओहि जोशक संग उठल आ ढाल-गराँस ल’ कए केगदी भाटक दिस चलि देलक। भाटमे हर एक नारियरक गाछमे गुच्चाक गुच्छा नारियर लागल रहैक। एतेक पैघ केगदी भाट, जकर नारियर तोड़बाक लेल महीनाक महीना लागि जाइत छलैक, एकहि दिनमे एक चौथाई सँ बेसी नारियर तोड़ि देल गेलैक। गुच्छाक गुच्छा नारियर गिर रहल छल। भाटमे नारियरक बड़का-बड़का ढेर लागि गेल छलैक। साँझ पड़ि गेल रहैक मुदा एखन धरि सभ किओ नारियर तोड़बामे व्यस्त रहए। एतबहि मे, “पाखलो गिर गेलैक, पाखलो गिर गेलैक”, एहन हल्ला मचि गेल। नारियर तोड़ब छोड़ि सभ किओ पाखलो लग जमा भ’ गेल। पयरक छान छूटि गेलाक कारणेँ पाखलो नारियरक गाछसँ नीचा गिर गेल छल। नारियरक गाछसँ ओकर पेट, जाँघ, हाथ-पयर आ छाबा घसीटा गेल छलैक जकरा कारणेँ ओकर चाम निकलि गेल छलैक। ललाटक घावसँ खून बहि रहल छलैक। दादी आ सोनू ओकरा सहारा दए उठाकए बैसैलक आ पानि पियौलक। होशमे एलाक पश्चात्, की भेल छल? ई जानि पाखलो हँसय लागल। बैसल पाखलोकेँ गोविन्द हाथक सहारा दए उठौलक। चलू, घर चलैत छी! गोविन्द पाखलोसँ कहलक। सोनू बाजल, “नहि, पाखलोकेँ हम अपन घर ल’ जाएब, ई बहुत जख्मी भ’ गेल छैक आ एकरा बहुत चोट लागल छैक। एकरा हम घर ल’ जा कए जे किछु दवाई-बिरो करबाक हेतैक से करबा देबैक।” ओहि दिनक नारियर तोड़ब बन्न भेल। पाखलो अपन मामाक घरक रस्ता पर चलि रहल छल। दोसर दिन फेर नारियर तोड़ब सुरह भेल। पाखलो अपना माथ पर रुमाल बान्हि ठाढ भ’ गेल। दोसरा जकाँ ओहो नारियर तोड़बा लेल सोचि रहल छल, मुदा ओकर मामा ओकरा गाछ पर चढबासँ मना क’ दलकैक। एकर बाबजूदो ओ नारियर तोड़ि लितए, मुदा सौंसे देहमे भ’ रहल दरदक कारणेँ ओ एहन नहि क’ सकल। रजनी जीरा पीसि कए ओकरा पीठ आ कन्हा पर लगौने छलीह। घावसँ जीरा नहि निकलि जाय एहिलेल ओ नारियरक गाछ पर नहि चढ़ल। काल्हि रजनी पाखलोक शरीर पर भेल घावकेँ धो-पोछि कए दवाइ लगौने छलीह। ललाट पर जे घाव भेल रहैक, ओहि पर दवाई लगा कए पट्टी बान्हने छलीह। कुल्हा आ पीठ पर जीरा पीसि कए लगौने छलीह। रजनीक ई रूप देखि कए पाखलोकेँ अपन मायक स्वरूप याद आबि रहल छलैक। रजनी केलबायक मूर्ति-सन सुन्नरि लागि रहल छलीह। रजनी ओकर मामा एकलौती बेटी छलीह। ओ बहुत शांत आ विनम्र स्वभावक छलीह। रजनी जखन दूध आनि कए पाखलोकेँ पीबाक लेल देने छलीह, ओ पीबैत काल पाखलोकेँ रजनीक वात्सल्य भावक एहसास भेल छलैक। क्षण भरिक लेल ओकरा मोनमे भेलैक जे एहि ममतामयी देवीक चरण छूबि ली। काल्हिसँ पाखलो एकटा अलगे दुनिया मे विचरण क’ रहल छल। ओकरा मोनमे कतहुँ कोनो मंदिरक रचना भ’ रहल छलैक। जखन जीपक हार्न सुन’ मे एलैक तखन पाखलो होशमे आएल। देखलक तँ केगदी भाटमे पुलिसक एकटा गाड़ी आएल छल, जकरा संगे सदा जमींदार सेहो छल। पुलिस जहिना केगदी भाटमे आएल तहिना हवामे दू-तीन फायरिंग केलक। सभ किओ डरि गेल आ नारियर तोड़ब बन्न क’ देलक। दादीकेँ बहुत गोस्सा एलै आ ओ गोस्सेमे सभसँ कहलक— “अहाँ सभ ककरो सँ डरब नहि। नारियर तोड़ब जारी राखू।” इन्स्पेक्टर अपन रूल हाथमे नेने आगू आएल। ओ दादीकेँ अपना हाथेँ पकड़लक आ ओकरा जीपमे बैसैबाक लेल घीच’ लागल। पाखलो ओकरा रोकलकै। सभ किओ पुलिसक चारू दिस जमा भ’ गेल। दू-तीन गोटे जीपमे बैसल जमींदारकेँ नीचा उतारि देलक। इन्स्पेक्टर चिकड़ल, आ गोस्सासँ बाजल— “अहूँ सभ जँ बेसी बकबक केलहुँ तँ अहूँ सभकेँ मारि लागत।” “जाउ, जाउ, चुप रहू! जँ अहाँ एतए बेसी रंगबाजी केलहुँ तँ एतए जमा भेल सभ गोटए अहाँ सहित अहाँक पुलिसो केँ पीटत। हमसभ पुर्तगाली पुलिसक हाथ तँ ढेर एलहुँ तँ अहाँ सभक हाथ कतएसँ आएब।” दादी चिकरल। ताधरि पुलिस पर किओ दू-तीन चपत धरा देलकै। ओ संभवतः पाखलो छलैक। इन्स्पेक्टर पाखलो केँ पकड़ि लेलक, मुदा दादी ओकरा छोड़ा लेलकै। इन्स्पेक्टर दादीक दिस ‘चिबा जाइ आकि गिर जाइ’ वला नजरिसँ देखलक। “अहाँ सभ एतए लोकक रक्षा करए आएल छी वा गोलीसँ उड़ाब’?” दादी इन्स्पेक्टरसँ पुछलकै। “अहाँ केँ तँ सबसँ पहिने ओहि लोककेँ अंदर करबाक चाही छल, जे अहाँकेँ एतए आनने अछि। वैह असली चोर थिक, लुटेरा थिक, आ दोसराक दम पर अपन पेट भरएवला थिक, आ ओकरहि कहला पर अहाँ हमरा सभकेँ चलान करए आएल छी?” दादी उच्च स्वरेँ इन्स्पेक्टरसँ पूछि रहल छल आ जमींदार गोस्सासँ दादीक दिस देखि रहल छल। “अहाँ हमरा थाना ल’ जएबाक लेल आएल छी ने! त हमरा सभकेँ ल’ चलू। सब किओ जीपक अंदर आबि जाउ।” एतबा कहैत पाखलो जीपमे बैसि गेल। ओकरा संगहि आर पन्द्रह-सोलह लोक जीपमे बैसि गेल। बाँकी लोकक लेल जीपमे बैसबाक जगह नहि छलैक। इन्स्पेक्टर आठ-नओ लोककेँ जीपसँ नीचा उतारि देलकैक आ बाँचल सात गोटा कए ल’ कए चलि देलक। बाँकी लोकनि ओहिना मुँह ताकैत रहि गेल। सातो लोककेँ ओहिदिन पुलिस-स्टेशनहिमे रहय पड़लैक। दोसर दिन सोनू आ सुभल्या गाँवकरक संग पाँच लोककेँ छोड़ि देल गेलैक मुदा दादी आ पाखलोकेँ नहि छौड़लकैक। जेना श्राद्धक घरमे छूतकाह रहैत छैक तहिना केगदी भाटमे नारियर यत्र-तत्र पड़ल रहैक मुदा किओ ओकरा हाथ नहि लगाबैक। गाममे एकटा आर पैघ घटना भ’ गेलैक। दादी सहित गामक आनो-आन लोक पर जमींदार मोकदमा क’ देलकैक। गामवला सभ सेहो मोकदमा लड़ल। मोकदमा बहुत प्रसिद्ध भ’ गेलैक मुदा फैसला जमींदारक पक्षमे भ’ गेलैक आ दादी आ पाखलोकेँ एक मासक कैद भ’ गेलैक। ओहि दिन गामवासीकेँ बहुत दुख भेल रहैक। दोसरहिं दिन जमींदारकेँ सेहो कैद भ’ गेलैक, किएक तँ ओ सरकार लग जमीनक नकली कागजात पेशी केने रहैक। दोसर दिस मजदूर आ रैयत लोकनिकेँ सेहो ओ बिना कारणेँ फँसौने छलैक, एहि गुनाहक खातिर जमींदारकेँ सजा भेटल छलैक। ‘जकर जोत तकर जमीन’, एहि नियमक तहत कार्यापाट आ उबरेदांडो गाम रैयत सभकेँ भेटलैक आ केगदी भाट, खाजन भाट मजदूर लोकनिकेँ। एहि गामवला सभकेँ बुझाइत छलैक जे आब ओ वास्तवमे स्वतंत्र भ’ गेल अछि। पूरा एक महीना धरि जेहलक सजा काटलाक पश्चात् दादी आ पाखलो छूटि कए आएल। भाटसँ नारियर चोरि करबा आ लोक सभकेँ भड़कएबाक जुर्ममे पाखलो आ दादीकेँ एक महीनाक सजा भेल छलैक। ओ दुनू गोटे बड़ स्वाभिमानक संग एलाह। गामक हितमे लड़एवला एकटा सम्माननीय गामवासीक नजरि सँ गामक लोक सभ हुनका लोकनिकेँ फूलक माला पहिरा कए स्वागत कएल। लोक सभ दादीकेँ सम्मान दए गाम मे स्वतंत्रतताक उत्सवक मनौलनि। एहिसँ पहिने एतेक रास खुशी गामक लोक कहियो नहि महसूस केने रहए। दादीक घर मिलबाक लेल गाम ओ बाहरो सँ लोक सभ आबि रहल छल। एहि समय पाखलो दादीएक ओहिठाम बैसल रहए, मुदा पाखलो केँ किओ पुछलकै धरि नहि, एहिलेल ओकरा कने खराप लागलैक। “लोकक नजरि मे हुनका हमर पाखलेपन नजरि एलनि। हुनका सभक बीच हम एकटा पाखलो थिकहुँ” ओकरा लागलैक। ओ तखनहि ओतएसँ निकलि गेल। घरसँ बाहर एलाक बाद ओ सोनू मामाक घरक रस्ता पकड़ि लेलक। ओकरा मोनमे विचार आबि रहल छलैक—“रजनी हमरा देखि कए बहुत प्रसन्न हेतीह। ओ हमरासँ पूछतीह तँ हम हुनका कैदक सभटा खिस्सा सुनेबनि। हमरा पीठ पर जे रूलसँ मारल गेल अछि तकर दाग देखेबनि, ई देखि ओ अपन दुख प्रकट करतीह, आ फेर तेल गरम कए हमरा पीठ पर लगौतीह......।” सोचैत-सोचैत पाखलो सोनू मामाक घर पहुँचि गेल। रजनी ओकरा दूरहिसँ अबैत देखि लेलक। ओकरा चिन्हतहि ओ ‘विठू’ कहि दौड़ैत ओकरा सोझाँ आबि गेलीह। सात कैदसँ छूटलाक पन्द्रहे दिनक अंदर दादीक देहान्त भ’ गेलैक। हमरा रस्ता दखौनिहार चलि गेलाह। खाली हमरे किएक? अपितु सौंसे गामे केँ सम्हार’ मे ओकर पूरा हाथ छलैक। सौंसे गामे कानि रहल छल। ओहि दिन केगदी भाटमे नारियर तोड़ैत काल दादी आ हमरा सभकेँ पुलिस पकड़ि कए ल’ गेल छल आ हमरा सभकेँ खूब मारल-पीटल गेल छल। पुलिसक मारिसँ दादीक एकटा पयरमे घाव भ’ गेल रहैक जे अन्त धरि ठीक नहि भ’ सकल रहैक। कैदसँ छूटलाक पश्चात् ओ घाव आर विस्तार भ’ गेलैक आ जतए घाव रहैक ओकर चारु भाग लोहा सदृश कड़ा भ’ गेल रहैक। घावसँ खून बहैत रहैक। गमैया डागडर आ बैद्य लोकनिसँ बहुतो दवाई-बिरो कएल गेल मुदा तकर कोनो असर नहि भेलैक। ओहि राति हम, गोविन्द, गोविन्दक माय, सुभलो गाँवकर आ गामक किछु लोग दादीक लग बैसल रही। दादीकेँ बोखार रहनि आ हुनक आँखि बन्न भेल जा रहल छलनि। अधरतियामे दादीक गलामे एकटा हिचुकी भेलनि आ ओहि हिचुकीक संगहि दादी अपन अंतिम साँस लेलनि। बुझाएल जेना ब्राह्माण्डसँ गरम श्वासक तंतु टुटि गेल हो। बिना हिलल-डोलल हुनक शरीर शांत भ’ गेलनि। ओहि दिन हमरा लागल जे हमरा पर बड़का बिपति आबि गेल। सौंसे गाम दादीक अंतिम संस्कारमे आएल रहैक। गामक हितमे अपन जीवनमे कष्ट उठौनिहार दादीक ई आत्मबलिदान दिवस रहैक। अपन पिताजीकेँ मुखाग्नि दैत गोविन्द पर की बीतल हेतनि? ई अनुमान करब ओतेक सहज नहि अछि। हमरा मुँहसँ शब्द नहि निकलि रहल छल। एहि तरहक दुखक मापन कोनो मापक यंत्रसँ संभव छैक की? चिता धधकैत रहैक। गोविन्दक आँखिसँ बरखाक बूँद जकाँ अश्रुप्रवाह भ’ रहल छल। हमरा आँखिक तँ बुझू जे नोरे सूखि गेल हो। ई दृश्य हम अपन आँखिक सोझामे देखि रहल छलहुँ। गोविन्द ओहि दिनसँ गुमसुम रहय लागल। ओना तँ पहिनहुँ ओ बहुत किछु सोचैत आ गम्भीर रहैत छल, मुदा आब तँ ओ आओरो गंभीर रहय लागल। हम ओकरा समझेलहुँ-बुझेलहुँ, आ ओ बुझिओ गेल, मुदा ओ अपना आपकेँ बदलि नहि रहल छल। नोकरी पर जयबाक लेल ओकरा पन्द्रह दिन पहिनहि चिट्ठी आबि गेल रहैक, किन्तु ओ घरहि पर बैसल रहल। चिट्ठी एलाक एक मासक बादहि ओ नोकरी पर जा सकल। ओकर माय एतए घर पर एसगरे रहि जेतीह, एहि बातक दुःश्चिन्ता ओकर खेने जा रहल छलैक। ओ अपन माइयोकेँ अपना संगहि पणजी ल’ जयबाक लेल सोचलक। गोविन्दक माय अपन बेटाक संग पणजी जा रहल छलीह, एहिलेल हुनका बिदा करबाक लेल आस-पड़ोसक कैकटा स्त्रीगण आएल छलीह। गोविन्द अपन सभटा समान बान्हि नेने छल। अंत मे ओ देवाल पर लटकल दादीक फोटो आ महादेवक फोटो उतारि पणजी ल’ जाएवला समानक बीच राखि लेलक। भगवान जानथि एहि बातक खबरि गामक बुजुर्ग सुभलो गाँवकरकेँ कोना लागि गेलनि? ओ गोविन्देक घर दिस आबि रहल छलाह। हाथमे एकटा बाँसक लाठी नेने ओकरा जमीन पर टिकबैत ओ आगू बढि रहल छलाह। ओ तौलिया आ कमीज पहिरने छलाह। “ओ आबि रहल छथि”, ई गप्प हमही सोनूकेँ कहने रही। ओ घर धरि पहुँचि गेलाह। गोविन्द हुनका बजाकए बैसैलथि। “बेटा गोविन्द! अहाँ अपना माइयोकेँ पणजी ल’ जा रहल छी की?” सुभलो गाँवकर पूछलनि। “हँ” गोविन्द नहुएँ बाजल। “तखन हम जखन कखनहुँ एहि बाट दए जाएब तँ हमरा के बजाओत?” एहि प्रश्नक जबाब गोविन्द लग नहि रहैक। ओ चुप रहल। “ई गप्प हम बुझि सकैत छी जे नोकरिएक चलते अहाँकेँ पणजी जाए पड़ि रहल अछि, आ हमसभ अहाँकेँ बिदा करए आएल छी, ई कने नीक नहि लागि रहल अछि।” “आखिर हम की करी? नोकरीक कारणेँ जाए पड़ि रहल अछि।” गोविन्द बाजल। “आब गामक सीमान बाँचबो कहाँ केलैक? लोकबेद अपन सीमानकेँ लाँघि सौंसे दुनिया दिस अपन रुख क’ रहल अछि।” जाहि सोच-विचारसँ गोविन्द शहर जएबाक निर्णय केने रहए, ओ ओहि विषयमे कहि रहल छलाह। कनेक काल धरि सभ किओ चुप रहल। “खैर! अहाँ जतए कतहुँ जाउ नीके रहू!” अपन ई इच्छा व्यक्त करैत सुभलो गाँवकर बाहर निकलि गेलाह। पणजी ल’ जाएवला सभटा समान ओ बान्हि नेने रहए। हम कहलियनि— “गोविन्द, गाड़ी छूट’ मे आब कम्मे समय अछि।” हमर कहब ओ संभवतः नहि सुनलनि। हुनकर आँखि भरि एलनि आ हुनका आँखिसँ टप-टप नोर खसय लागलनि। समान सभकेँ कन्हा पर लादि हम गाड़ी लग गेलहुँ ओकरा उपर चढ़ा देलिऐक। गाड़ी छूटबाक समय भ’ गेल रहैक। गोविन्द अपना मायक संगे ओहिपर बैसि गेल। हम पुछलियनि— “आब कहिया आएब?” “देखा पर चाही।” “एहि पन्द्रह दिनक बाद खामिणी आ सांतेरी देवीक मेला छैक, आएब की नहि? आ अगिला तीन मासमे गामक केलबाईक शिगमो सेहो छैक। आएब की नहि?” हम जल्दीसँ पूछलिऐक। “केलबाईक शिगमोमे आएब।” “आ खामिणी सांतेरी?” हम पूछलियनि। “नहि।” “हम एसगरे कोना आबि सकैत छी?” गाड़ी चलि पड़ल। हम आर जे किछु पुछलहुँ से सभटा ओहि गाड़ीक आबाजमे दबि गेल। गोविन्द अपन हाथ हिलाकए हमरासँ बिदा लेलनि। गाड़ी आगू बढि गेल आ अगिला मोड़क बाद ओ आँखिसँ ओझल भ’ गेल। गोविन्दक पणजी चलि गेलाक पश्चात् हम अपना आपकेँ एसगरुआ बुझए लागलहुँ। हम दिनभरि पीपरक गाछक नीचा चबूतरा पर बैसि गोविन्देक संबंधमे सौचैत रही। ओहि समय सोनू मामा ओहि रस्ता दए जा रहल छलाह। ओ अपना डाँड़मे तोलिया लपेटने रहथि आ उपर उज्जर कमीज पहिरने रहथि। हमरा सोझ अबितहि ओ पूछलनि— “अहाँ एतए बैसि की सोचि रहल छी?” “किछुओ त’ नहि।” हम कहलियनि। “किछु कोना नहि, अहाँक मीत पणजी चलि गेलाह, अही लेल अहाँ उदास छी ने?” हम चुप रहलहुँ। “चलू, हमरा घर चलू।” हम हुनका संग चलि देलहुँ। पछिला किछु दिनसँ हम सोनू मामाक ओहिठाम आन-जान करैत छलहुँ। दुपहरिक रौदमे चलैत-चलैत हमसभ घर पहुँचलहुँ। घरक भीतर गेलाक बाद कने ठंढा महसूस भेल। लाल आ कारी रंगक फ्रॉक पहिरने रजनी दू लोटा पानि भरि बरंडाक बैसकमे राखि घर चलि गेलीह। हम दुनूगोटे हाथ-पयर धोबि तोलियासँ हाथ पोछलहुँ। भोजनक लेल पीढ़ी रखबाक आबाज अंदरसँ आएल। ताबत रजनी बाहर एलीह आ हमरा सभकेँ भोजन पर बजा कए ल’ गेलीह। हमरहु बहुत जोरसँ भूख लागल रहए। भोजन कएलाक पश्चात् हम बरंडाक सोपो (कुर्सीनुमा बैसकी) पर बैसि गेलहुँ। कोनो आन काजसँ हम घरसँ बाहर निकलहि वला रही तावत हमरा किओ आबाज देलक। “विठू।” हम उनटि कए देखलहुँ। ई रजनीए छलीह जे हमरा आबाज द’ रहल छलीह। “हँ।” हम ओकरा कहलिऐक। ओ हमरा माय सन मधुर आबाजमे बजा रहल छलीह। ओहि समय हमरा लागल जेना हम अतीतमे पहुँचि गेल छी। हमरा संबंधमे हमर सभटा खिस्सा सोनू मामा ओकरा बता देने रहथि संगहि हमर माय द्वारा राखल हमर नाम सेहो। रजनी हमरा किछु कहए चाहि रहल छलीह, मुदा बहुत देर धरि हुनका मुँहसँ कोनो शब्दे नहि निकललनि। ओ ओतहि ठाढ रहलीह। “विठू, अहाँ एतहि रहल करू। अहाँ अपन सभटा कपड़ा-लत्ता एतहि ल’ आउ।” ई सुनतहि हम ओकरा दिस आश्चर्यसँ देखलहुँ। बादमे हम अपन माथ झुका अपन पयर दिस देखए लागलहुँ। ओ हमरासँ बेर-बेर आग्रह केने जा रहल छलीह आ हम अपन पयर निहारने जा रहल छलहुँ। “किछु नहि सोचू, अहाँ एतहि रहू।” “ओ बेर-बेर हमरासँ आग्रह केने जा रहल छलीह। हुनकर आग्रह तोड़बाक हिम्मत हमरामे नहि रहए।” हम ‘हँ’ कहि देलिऐक। सात-आठ मास धरि रजनी हमर सहोदर बहिन सदृश सेवा करैत रहलीह। हमरा कपड़ा-लत्ता, ओछाओन सभटा वैह साफ करैत रहलीह। नहएबाक पानि गरम करएसँ ल’ कए सभटा काज वैह करैत छलीह, एहिलेल हम कहियो काल गोस्सा क’ कए ओकरा डाँटियो दिऐक, मुदा ओ चुप रहैत छलीह। एकदिन हम हुनका कहलियनि, “हम की अहाँक सहोदर भाय थिकहुँ जे अहाँ हमर एतेक ध्यान राखै छी?” एतबा सुनतहि हुनका आँखिमे नोर आबि गेल छल। ओ अपन बाँहिसँ तकरो पोछलथि। “सहोदर नहि छी ताहिसँ की? से जे हो, छी तँ अहाँ हमर भाइए ने? आ हम तँ अहाँकेँ अपन सहोदरे भाय मानैत छी।” एतबा कहैत ओ कपसि-कपसि कए कानए लगलीह। हम हुनकासँ माँफी माँगलियनि। हमरो आँखिमे जखन नोर आबि गेल तखनहि ओ चुप भ’ सकलीह। हम जहिना हँसलहुँ, ओहो हँसय लागलीह आ कपड़ा धोबए इनार पर चलि गेलीह। हम चिन्तामे डूबि गेलहुँ। पाखलोक जनमल कतहुँ रजनीक भाय बनि सकैत अछि? खूनक संबंध नहिओ रहने ओ हमर बहिने सदृश हमर सेवा करैत रहलीह, तेँ की ओ हमर बहिन नहि भेलीह? एहि तरह एकक बाद एक प्रश्नमे हम उलझैत गेलहुँ। फेर हम गोविन्दक प्रश्नक तंतु केँ सोझराबए लागलहुँ। ओहि दिन बेर-बेर याद आबि रहल छल। नारियरक गाछसँ गिरलाक बाद रजनीक दवाई लगेलासँ जे जलन भ’ रहल छल तकरा कम करबाक लेल ओ घाव पर नहुँ-नहुँ फूक मारि रहल छलीह। तखन हमर संबंध ओकरासँ की छल? हमरा ओ ओकरा बीच कोनो संबंध नहि रहलाक बाबजूदो ओ हमरा दबाई लगौलक। हम कष्टमे रही आ ओ हमरा घाव पर दबाई लगाब’ वाली ममतामयी छलीह। सभटा घावक संग-संग भौं आ पिपनीक घाव ठीक भ’ गेल रहए, मुदा ओतए करिया दाग रहि जएबाक कारणेँ रजनीकेँ बहुत खराप लागैक। ओ हमरा बेर-बेर कहैत छलीह— “भौं पर कारी दाग नहि रहबाक चाही। एतेक सुन्दर गोर-नार देह पर आमक कोलपति जकाँ बुझाइत अछि। आब ओकर की करब?” भौंहेक कारणेँ लहसुनियाँ आँखि बाँचि गेल। “हम चुपचाप ओकर गप्प सुनने जा रहल छलहुँ। कारी दाग रहि गेल छल, एकर हमरा एकोरत्ती दुख नहि छल। हमरा बुझाइत छल जे हमर लहसुनियाँ आँखि बाँचि जेबासँ नीक होइतए, ओकरा फूटि जेबाक चाहि रहए आ संगहि दागसँ सौंसे देह कारी भ’ जएबाक चाही रहए। हमरासँ हमर गोराइ सहन नहि भ’ रहल छल। मुदा भगवान हमरा गोर बनेने रहथि, एकरा लेल रजनी भगवानक उपकार मानैत छलीह।” “हमरा भगवाने भाय भेजने छथि, हमरा ओकरा ठीक करबाक अछि।” रजनी बेर-बेर बजने जा रहल छलीह आ हमरो भगवाने सदृश बनएबाक लेल हमर सेवा क’ रहल छलीह। तखन हम हुनका कहियनि, “हमरो भगवान देवी सदृश बहिन भेजने छथि।” एतबा कहितहि हमरा कानमे मंदिरमे बाजएवला घंटाक सदृश आभास होमए लागल। आठ रजनीक बियाह भेल एक मास भ’ गेल रहैक। ओ दुरागमनमे अपन नैहर आबए वला रहथि, तैँ सोनू मामा खेतक काज जल्दीए निबटा कए आबि गेल छलाह। रजनीकेँ नीक खेती-बारी वला घर-बर मिलल रहैक तैँ सोनू मामा बहुत खुश छलाह। मुदा दोसर दिस हुनका एहि बातक दुखो रहनि जे बहुत कम्मे उमिरमे ओ रजनीक बियाह क’ देने रहथि। ओकरा नेनपनहिमे ओकरा माथ पर सांसारिक बोझ आबि गेल रहैक। ओकरा एहन बुझाइक। ओ पाखलो पर बेकारक शंका करैत रहथि, एहि बातक हुनका ग्लानि भ’ रहल छलनि। पाखलो आ रजनी, एक दोसराकेँ नीक जकाँ बूझैत रहथि, एहिलेल सोनू मामाकेँ एहिमे किछु खराप नहि बुझा रहल छल। मुदा जँ यैह संबंध कहियो कोनो दोसर मोड़ ल’ लिअए तखन? तखन तँ गाममे जगहँसाइये भ’ जाएत। ई गामे ओकरा छोड़’ पड़ि जाइतैक। एहिलेल ओकर मोन सशंकित रहैत छल। एहि खातिर जतेक जल्दी भ’ सकए, रजनीक बियाह भ’ जएबाक चाही, यैह नीक रहत। सोनू मामा सोचने रहथि। रजनीक बियाह करपें गामक भास्करक संग बड़ उधव-बाधवसँ भेल रहैक। बियाहक तैयारीमे पाखलो पन्द्रह-बीस दिन धरि बहुत कष्ट उठौने रहए। बियाहोक दिन ओ खूब मेहनति केने रहए। बियाहक दोसरे दिनक गप्प रहैक। रजनीकेँ घरमे नहि रहलाक कारणेँ पाखलो कनमूँह सन रहए। ओ एहिना घरसँ बहराइत छल, तखनहि दरबज्जा पर ओकरा सोनू मामासँ भेंट भेलैक। ओ पाखलोसँ पूछलनि—“की भेल?” “किछु नहि।”, कहैत पाखलो घरसँ निकलि गेल। ओहि दिनक बादसँ पाखलोक पहिनहि जकाँ होटलमे खेनाइ-पीनाइ आ कतहुँ सुति गेनाय आरंभ भ’ गेल। ओकरा बुझाइत छलैक जेना ओ एहि गाममे एकटा अजनबी सदृश छैक आ ओकरासँ सिनेह राखएवला एतए किओ नहि छैक। ओ बहुत उदास रहैत छल। ओकरा माथ पर किछु रेखाक अलावे किछु नहि देखाइक। बीच-बीचमे ओ खेनाइयो-पीनाइ छोड़ि दैक। ओ पूर्ण रूपेँ कमजोर हाथी सन भ’ गेल रहए। ओकर हाड़ सभ झलकए लागल रहैक, गाल पिचकि गेल रहैक आ आँखि धसि गेल रहैक। पाखलो काज पर नहि गेल छल। ओ दूपहरकेँ पीपरक गाछक चबूतरा पर बैसल रहए। आलेस आ ओकर मीत सभ काज पर सँ आपस आबि गेल रहथि। “पाखलो आइ काज पर नहि गेल आ भरि दिन चबूतरे पर बैसल रहल” ई कहि ओ सभ पाखलोकेँ किचकिचब’ लागल। “पाखलो! आइ अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ?” “ओहिना।” “ओहिना किओ अपन काज छौड़ैत छैक की? किएक यौ! अहाँ पाखलोक जनमल छी एहिलेल अहाँ मामा अपन बेटी नहि देलनि की?” आलेसक एतबा कहब सुनि पाखलोकेँ बहुत गोस्सा आबि गेलैक। ओ गोस्से सँ आलेसक दिस देखलक। “अहाँ ओहिना हमरा पर नाराज नहि होउ। मामाक बेटीक बियाह भेलाक बादसँ अहाँ किछु बदलि सन गेल छी। अहाँक पागलपनक हालति देखिकए........।” “चुप रहू आलेस! हमरा बेकारक गोस्सा नहि दिआउ।” एतबा कहि पाखलो ओतएसँ चलि देलक। ओकरा आइ आलेस पर बहुत गोस्सा एलैक, मुदा करबो की करितए? यैह बात भरि गामक लोक-बेद बाजि रहल छल। तखन हुनका सभक मुँह पर के ताला लगाबए? हिनका सभक सोचे एहन छनि तखन कैल की जाय? पाखलो एहन सोचलक। ओकरा माथमे बहुत दरद भ’ रहल छलैक। “जँ हम एहिना सोचैत रहलहुँ तँ एक दिन निश्चिते हम पागल भ’ जाएब। हमरा मोनकेँ चिन्ता करबाक आदति सन भ’ गेल अछि, हम एकरा सँ नहि निकलि सकब।” सोचैत-सोचैत ओ रस्ता पर चलि रहल छल। जुवांव ओकरा आबाज देलकैक। जखन कि जुवांव केँ देखतहि ओकरा गोस्सा आबि जाइत छलैक, मुदा आइ ने जानि की भ’ गेलैक? पाखलो ओकरा जबाब देलकैक आ दारूखानामे पैसि गेल। जुवांव हँसल आ ओकरा बैसबाक लेल एकटा मछिया देलकैक। पाखलो बैसल नहि। ओ एकटा पँचटकही निकाललक आ ओकरा दिस बढेलक। जुवांव नारियरक फेनी (शराब) ओकरा गिलासमे ढारि देलकैक। क्षण भरिक लेल ओकरा मोनमे भेलैक जे एहि गिलाससँ जुवांवक माथ फोड़ि दी। जुवांव गिलास उठाकए पाखलोक हाथमे थमा देलकैक। नव गैंहकीक खुशीमे ओ हँसि रहल छल। पाखलो एकबेर गिलासकेँ मुँहसँ लगौलक आ क्षणहिमे हँटा लेलक। ओकरा गरामे जलन भ’ रहल छलैक तैयहुँ ओ गिलासकेँ मुँहसँ लगौलक आ गटागट पीबि गेल। ओकर गरा छिला गेलैक। खाली गिलास जुवांव फेरसँ भरि देलकैक। दोसर गिलास पाखलोक गरामे एकटा हिचुकीक संग अटकि गेलैक। गरा आ नाक जरय लागलैक। ओकरा लागलैक जे ओकर नियंत्रण बिगड़ि रहल छैक, ओ ओतहि बैसि रहल। रजनी घर आएल छलीह, एहन ओकरा किओ बतेने छलैक। एतबा सुनतहि ओ सोनू मामाक घर दिस अपन पयर बढौलक। घरमे सोनू मामा खेत जएबाक हड़बड़ी मे रहथि। हुनका कान्ह पर हर छलनि। पाखलो पूछलक— “रजनी आएल छलीह की?” “आएल छलीह। दू दिन रहि कए चलि गेलीह।” रजनी आएल छलीह, सोनू मामा हमरा किएक नहि बतौलनि? ओ सोनू मामसँ पूछबाक लेल सोचि रहल छल, मुदा चुप्पे रहल। बाहर जेबाक हड़बड़ीमे सोनू मामा अपन घरक केवाड़ बन्न केलनि आ पाखलो ओतएसँ मुँह लटका कए आपस भ’ गेल। एक दिन आलेस पाखलोकेँ गोविन्दक संबंधमे खबरि देलक। गोविन्द अपन ऑफिसमे काज करएवाली एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ नेने छल। ई गप्प सुनि पाखलोकेँ बहुत आश्चर्य भेल रहैक। गोविन्दकेँ गाम एला एकटा अरसा बीति गेल रहैक। ओ मेला आ शिगमोमे सेहो नहि आएल छल। गोविन्दक संबंधमे ई खबरि सुनि ओ ओकरासँ भेंट करबा सोचलक। पणजी शहरक एकटा बड़का भवनमे गोविन्दक ऑफिस छलैक। “हम ओहि ऑफिस कोना जाउ?” पाखलो यैह सोचि रहल छल। फेर ओ हिम्मत केलक। पणजी शहरक ‘जुन्ता हाउस’क सीढी चढैत ओ ओकरा ऑफिस पहुँचल। ऑफिसक सभटा कर्मचारी ओ स्त्रीगण ओकरा देख’ लागल। ई कोन नव प्राणी आबि गेल? सभ किओ आश्चर्यक दृष्टिसँ पाखलोकेँ देखए लागल। किछु स्त्री आ युवती सभ ओकरा देखिकए हँसय लगलीह। पाखलोकेँ अपना-आपमे कोनादन लागलनि। एतबहिमे अपन बॉसक केबिन गेल गोविन्द बहरायल। ओ पाखलोक लग आएल। गोविन्दसँ मिललाक बाद, ऑफिसक मायावी संसारमे आएल पाखलोकेँ कने राहत भेटलनि। “यौ गोविन्द!” पाखलो शोर पारलक। गोविन्द हुनका जबाब नहि द’ कए हुनकर हाथ थामि कैंटीन दिस ल’ गेल। दुनू एक दोसराक हाल-समाचार पूछलक। बहुतो दिनसँ गोविन्द गाम नहि गेल छल एहिलेल पाखलो ओकरा उलहन देलकैक। दुनू गोटे चाह पीबए लागल। “हम यैह एलहुँ।” एतबा कहैत गोविन्द बीचहिमे चाह पीब छोड़ि बहरा गेल आ जल्दिए एकटा युवतीक संगे घुरि आएल। ओ साड़ी पहिरने छलीह। हुनका माथ पर एकटा टिकुली सेहो रहनि आ ओ बहुत धनिक घरक बुझाइत छलीह। “ई हमर मिता थिक, हमसभ एकरा पाखलो कहैत छियैक।” गोविन्द ओकरा पाखलोक माने बुझेलकै। पाखलो ओकरा दिस देखलक। ओ हँसलीह। किछु काल पहिने यैह युवती पाखलोकेँ देखि कए हँसैत छलीह। गोविन्द पाखलो सँ आगू कहलकैक, “भविष्यमे यैह हमर घरनी हेतीह। हिनक नाम मारिया थिकनि।” पाखलो जखन आश्चर्यसँ गोविन्दक दिस देखलक तँ गोविन्द अपन माथ नीचा दिस झुका लेलक। “जँ गोविन्द एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ लेत तँ गामक लोक एकरा संबंधमे की सोचत? ओ सभ की चुप बैसतैक?” पाखलोकेँ एहन बुझेलैक। मुदा ओ चुप रहल। बादमे ओ अपन एहि बेमतलबक विचारकेँ एकदिस राखि हँसए लागल। पाकलोकेँ हँसैत देखि बुझू जे गोविन्दक माथक भार कम भ’ गेलैक। “आब जाति-पाति आ धरम कतए रहि गेल छैक? दक्खिनी आ उत्तरी ध्रुव आब सटि गेल छैक।” गोवन्द एहने सन किछु बात करताह। पाखलोकेँ लागलैक। मुदा गोविन्द चुप रहल। पाखलोकेँ गोविन्दसँ बहुत रास गप्प करबाक छलैक, मुदा गोविन्द लग ओतेक समय नहि रहैक। बादमे पाखलो दुनूकेँ “अच्छा, फेर भेंट हेतैक!”, कहलक आ बहरा गेल। पाखलो लिफ्टमे चढ़ल। ओहि काल ओकरा एकटा बातक स्मरण भ’ गेलैक— “आलेस दुबई जाइवला छथि एहिलेल ओ पासपोर्ट बनएबाक जोगाड़मे रहथि। किछुए दिनमे ओहो विदेश चलि जेताह आ एहि तरहेँ गाममे हमर एकोटा मीत नहि रहि जाएत। हम एकदम एसगर भ’ जाएब।” ई गप्पतँ गोविन्दकेँ कहब बिसरिए गेलहुँ। आब तँ गोविन्दो कहियो गाम एताह, एहनो संभावना नहिएक बरोबरि छल। बुझाइत अछि जे गोविन्दो आब गामबलाक लेल बाहरिए लोक भ’ गेलाह। पाखलो लिफ्टसँ नीचा उतरए लागल तँ ओकर माथ घूमए लागलैक। ओकरा बुझेलैक, जेना-जेना लिफ्ट नीचा दिस जा रहल अछि तेना-तेना ओहो नीचा गिरल जा रहल अछि। लिफ्ट रुकलाक बाद ओ एसगर भ’ गेल, ओकरा एहने बुझेलैक। ओ लिफ्टसँ बाहर निकलल। पणजीसँ गाम अएबा काल बसमे ओकरा रुक्मिणी मौंसीसँ भेंट भेलैक। “रजनीकेँ बेटी भेल छैक।” ई समाचार पाखलो केँ वैह देने छलीह। ई सुनि पाखलोक खुशीक कोनो ठेकान नहि रहलैक। बससँ उतरि पाखलो एकपेड़िया हैत हाली-हाली गाम जाए लागल। साँझ पड़ि गेल रहैक। पूर्णिमाक चाँद आसमानमे साफ झलकैत रहैक। पाखलोक मोनमे रजनीक बेटीक छवि आबि रहल छलैक। ओ देख’ मे केहन हेतीह? ओ अपन माय-सन हेतीह आकि ककरो आन सन? एहि तरहक कैकटा प्रश्न ओकरा मोनमे उठए लागलैक। रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छैक। ओकरा चन्द्रमाक एहि ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही। काजर लगएलाक बाद कारी आँखि वाली ओकरहि सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहैक आ जेना नहरक पानि बहैत छैक तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन ज्योत्सना पसारने छलैक। रजनी पाँच महीनाक अपन बेटीकेँ संग लए कांदोले गाम अपन बाबूजीक घर आएल छलीह। पन्द्रह-बीस दिन बीति गेल छलैक, मुदा एखन धरि ओ अपन पतिक घर नहि गेल छलीह। ओ अपन बेटीक नाम सुलू राखने छलीह। ओ देख’ मे बहुत गोर आ सुन्नरि छलीह। ओकर केश गुलाबी छलैक आ आँखि लहसुनियाँ। ओ कोनो फिरंगीक बेटी सन बुझाइत छलीह। रजनीकेँ ओकर घरवला घरसँ निकालि देने छथि, ई अफवाह सौंसे गाममे पसरि गेल रहैक, आ साँचो रहैक। ओकर घरवला ओकरा मारि-पीटि कए सुलूक संग ओकरा बापक ओतए पठा देने रहैक। “रजनीकेँ पाखलोए सँ ई बेटी भेल छैक।” ई आरोप ओकर घरवला ओकरा पर लगौने रहैक, आ सरिपहुँ देख’ मे फिरंगी सन लागएवाली सुलूकेँ देखि लोको सभ एकरा साँच मानि नेने रहैक। रजनी अचानक अपना बेटीकेँ ल’ कए घर आबि गेल छथि। ओहि दिन ई सुनि सोनूकेँ बहुत धक्का लागल रहैक। ओ एना किएक एलीह? सोनूक मोनमे एहन प्रश्न उठए लागलैक। अपना बापकेँ देखि रजनीक सब्रक बान्ह टूटि गेलैक आ ओ कानए लगलीह। आखिर भेलैक की? ओ बुझिए नहि पाबि रहल छल। बादमे रजनीक देह पर दाग सभ देखि कए ओकरा सभकुछ समझमे आबि गेलैक। ओ रजनीकेँ सांत्वना देलकैक। बहुत देर धरि तँ ओ चुप रहलीह मुदा पछाति जा कए सभटा घटना हुनका बता देलीह। सुलूएकेँ ल’ कए ओकर घरवला ओकरा पर शंका करैत रहैक। ओकर ई आरोप रहैक जे, “पाखलोए सँ रजनीकेँ ई बेटी भेल छैक।” ई आरोप साँचो भ’ सकैत अछि। सोनूओकेँ एहिना बुझेलैक आ ओकरा बहुत गोस्सा आबि गेलैक। ओकर आँखि लाल भ’ गेलैक आ ओ गोस्सासँ पाकलोकेँ गरियाब’ लागलैक। “पहिनहि हमर बहिन पाखलोक जातिमे हमर नाक कटा चुकल अछि। आ आब ओकरहि बीया हमरा बेटीक भविष्य खराप करबा पर तुलल अछि” सोनू बाजए लागल। बादमे ओकर गोस्सा आर बढिते गेलैक आ एहिसँ आगू ओ किछु बाजि नहि सकल। “एहिमे पाखलोक कोनो दोष नहि छनि। हमर घरेवला हमरा पर झूठ आरोप लगा रहल छथि।” रजनी सोनूकेँ कहलकैक। मुदा ओ ई सभ सुनबाक लेल तैयारे नहि छलैक। बहुत कालक बाद ओ सभ किछु सुनलक आ कहलक— “हमर तँ भागे फूटल अछि।” दोसर दिन ओ रजनीक घरवलासँ भेंट कए सभ किछु समझाकए कहलकैक— “सुलू सन बच्चा बहुतो लोककेँ भ’ जाइत छैक, ई सभ तँ भगवानक हाथमे छनि।” ओ बहुत समझएबाक प्रयास कएलक, मुदा रजनीक घरवला किछुओ नहि मानलकैक। सुलूक पालना आब नानाक घरमे झूलय लागलैक आ रजनी अपन बेटीक संग अपन समय बिताबए लगलीह। पाखलो एहि बीच प्रायः भोरे-भोर काज पर निकलि जाइत छल आ रातिएक पहर काजसँ घुरैत रहए। रजनीकेँ ओकर घरवला घरसँ निकालि देने छैक आ आब ओ अपन बापेक संग रहि रहल छलीह, ई गप्प ओकरा पता नहि रहैक। सभ किओ पाखलोकेँ एकटा अलगे दृष्टिसँ देखए लागल छल, मुदा लोक सभक ई दृष्टि पाखलोकेँ आने समय जकाँ बुझा रहल छलैक। पाखलो दूपहरकेँ होटल जाइत छल। होटलमे आर पाँच-छओ लोक बैसल रहैक आ गप्प क’ रहल छलैक। फेर ओकरा सभक हँसबाक आबाज एलैक। पाखलोकेँ भीतर घुसतहि आबाज बन्न भ’ गेलैक। बादमे ओ सभ पाखलोकेँ देखि फुसफुसा कए बाजब सुरह केलक। “हमरामे कोनो परिवर्तन भेल अछि की?” एहन प्रश्न पाखलोक दिमागमे एलैक। ओ अपन सौंसे देहकेँ निहारलक। ओहिमे कोनहुँ परिवर्तन नहि भेल छलैक। पैट-सर्ट जतए छलैक ओतहि तँ रहैक! आ दाढ़ी तँ ओ काल्हिए नौआसँ कटौने छल। एहना स्थितिमे हम हिनका सभकेँ कौआ कोना नजरि आबि रहल छी। पाखलोक मोन मे ई उधेड़बुन होमए लागलैक। रजनी गाम आएल छलीह, ई गप्प पाखलोकेँ बीस दिनक बाद पता लागि सकलैक। ओ दोसरहिं दिन भोरे-भोर उठिकए सोनू मामाक घर दिस चलि देलक। बियाहक बाद ओ रजनीसँ भेंट नहि केने छल। बीचमे ओ रजनीसँ भेंट करबाक लेल दू-तीन बेर सोनू मामाक घर गेलो रहैक, मुदा रजनीसँ भेंट नहि भ’ सकलैक। मुदा आइ ओकरा रजनीसँ निश्चिते भेंट हेतैक, ई जानि ओ जल्दी-जल्दी मामाक ओहिठाम पहुँचि गेल। दरबाजासँ भीतर जाइकाल ओकर माथ चौखटिसँ टकरा गेलैक, जकर आबाज सुनि रजनी बहरएलीह। देखलनि तँ पाखलो आएल छलाह। पाखलोकेँ देखि रजनी बहुत खुश भेलीह। “अहाँक माथमे चोट लागि गेल अछि ने!” रजनी पाखलो सँ पूछलक। “हँ! मुदा भेल किछु नहि।” “किछु नहि भेल! चलू देखए दिअ।” रजनी देखलनि, हुनका माथ पर एकटा टेटर भ’ गेल छलनि। रजनी ओकरा दबाबए लागलीह। “ओह! हमरा किछु नहि भेल अछि, आ ने दरदे क’ रहल अछि।” एतबा कहैत पाखलो अपन माथसँ ओकर हाथ हटा देलकैक। रजनी सुलूकेँ बाहर ल’ अएलीह का बजलीह, “देखू दाय! मामा आएल छथि।” पाखलोकेँ देखि सुलू हँसि पड़लीह। सुन्नरि सुलूकेँ देखि पाखलो रजनीसँ कहलकैक, “रजनी, सुलूकेँ कारी काजर लगा देल करिऔक, नहि तँ एकरा ककरो नजरि लागि जाएत।” एतबा कहि पाखलो हँसय लागल। ताबत घरसँ निकलल सोनू मामा सेहो आबि गेलाह। सोफो (कुर्सीनुमा बैसकी) पर बैसल पाखलोकेँ देखि ओ ठाढ़े रहलाह आ दरबज्जा दिस आँगुरक इशारा करैत बजलाह, “निकल जाउ एतएसँ। आजुक बाद फेर कहियो हमरा ओतए नहि आएब।” पाखलोकेँ किछुओ बुझ’ मे नहि एलैक। ओ अवाक भ’ ओतहि ठाढ रहल आ सोनू मामाक दिस ताकतहि रहि गेल। सोनू मामा पुनः गोस्सासँ बाजए लगलाह, “अहीँक कारणेँ ई सभ भेल छैक। जँ अहाँ एतए नहि रहितहुँ तँ एतेक सभकिछु नहि होइतैक। अहींक कारणेँ रजनीक घरवला ओकरा घरसँ निकालि देने छैक। अहाँ एतए कहिओ नहि आबि सकैत छी।” पाखलो अवाक भए देखतहि रहि गेल। “रजनीक घरवला रजनी पर आरोप लगौने छैक जे एकर बेटी अहींक जनमल छी। अहीँक कारणेँ ई सभ भेल छैक, ई खबरि अहाँ नहि सुनने छी की? एतए अएबामे अहाँकेँ कनेको शर्म नहि भेल? दोसरक बेइज्जती कराब’ एतए आएल छी?” रजनी बीचहिमे टोकलक, “एहिमे हिनकर कोनो दोष नहि छनि, अहाँ अनेर हिनका पर शंका क’ रहल छी।” रजनीक ई कहब सोनू मामा नहि सुनलथि। ओ बाजतहि जा रहल छलाह.... “अहीँक कारणेँ रजनीक भाग फूटि गेलैक। जँ अहाँ एतए आएब तँ लोकबेद एहि आरोपकेँ साँच मानि लेत, एहिलेल अहाँ एतए कहियो नहि आएल करु। पाखलोएक जाति हमर नाक कटौने अछि, ओकरे खून थिकहुँ अहाँ। पाखलोक वंशज छी अहाँ। अहीँ हमर बर्बादीक कारण थिकहुँ।” पाखलोक पयर थरथरबए लागलैक। ओकरा किछुओ समझमे नहि आबि रहल छलैक, मुदा धीरे-धीरे सभ किछु समझमे आबि गेलैक। ओकर बेटी फिरंगी-सन लागैत छलीह एहिलेल ओकर घरवला ओकरा पर ई आरोप लगौने छल। पाखलो एहि संबंधमे किछु बाजए वला रहथि मुदा सोनू मामा ओकरा निकलि जएबाक लेल कहने रहथि एहिलेल ओ बाहर आबि गेल रहए। ओकरा माथमे चक्कर भ’ रहल छलैक आ बुझाइत रहैक जेना ओ फाटि जेतैक। ओकरा दिमागमे सोनू मामा शब्द कोनो मड़िया जकाँ चोट क’ रहल छलैक। “.....रजनीक घरवला घरसँ बाहर क’ देलकैक.....रजनीकेँ अहीँसँ बेटी भेल छैक...... पाखलोएक जाति हमर नाक कटौने अछि..... पाखलोक वंशज छी अहाँ......अहाँ एतएसँ चलि जाउ।” “बारह चौबीस ट्रकक दुर्घटना भ’ गेलैक!” “केकर? ट्रक ड्राइवर के छलैक?” “पाखलो!” एकटा खलासी नीचा आबि लोक सभकेँ ई खबरि देलकैक। सभ किओ उपर दिस दौड़ल। किछु गोटए ट्रकसँ गेल तँ किछु ओहिना दौड़ि पड़ल। रस्ता नदीक कछेर होइत एकटा घाटीक बीचसँ जाइत रहैक। रस्ताक एक दिस घाटी रहैक आ दोसर दिस खदहा! उपरका रस्तासँ जाइवला एकटा ट्रक नीचा खदहामे गिर गेल छलैक। ट्रकक परखच्ची उड़ि गेल रहैक जाहिमे पाखलो मारल गेल। एहन सभकेँ बुझाइत छलैक। किछु लोक नीचा गेल। देखलनि तँ क्षतिग्रस्त ट्रकक बगलमे पाखलो पड़ल छल। ओकरा देहक कपड़ा फाटि गेल रहैक आ सौंसे देह नोचा गेल रहैक। पाखलो अपन क्षतिग्रस्त ट्रककेँ देखलक। ट्रकक अगिला शीशा टूटि गेल रहैक। लोहाक चदरा पूर्ण रूपसँ ट्रकसँ पिचकि गेल रहैक। ओकरा देखि पाखलोक आँखिमे नोर आबि गेलैक। पाखलो उठल। ट्रकक सामने गेल आ ओहि पर अपन हाथ फेरलक। आब ओहि ट्रक पर भगवानक कोनहुँ फोटो नहि रहैक, मुदा ट्रकमे लगाओल गेल चाननक माला एखनहुँ धरि रहैक जे कि पाखलो लगौने रहैक। पाखलो जखन ठाढ भ’ रहल छल तखन ओकरा कानमे बहुत रास प्रश्न सभ उठए लागलैक। दुर्घटना कोना भेलैक? हम बाँचि कोना गेलहुँ? एहि तरहक कतेको प्रश्नमे ओ उलझि-सन गेल। पाखलो नीचेसँ रस्ताक एक दिस झाड़ी दिस आँगुर देखौलक। ओकरा कमीजक एकटा बड़का टा टुकड़ी ओहि झाड़ीक बीच लटकल रहैक। दुर्घटनाक समय ट्रकक दरबज्जा अचानक खुजलैक आ ओ बाहर गिर गेल छल। ओतएसँ ओ सीधा झाड़ी पर गिर अटकि गेल, जाहिसँ ओकर कमीज फाटि गेलैक आ देह नोचा गेलैक। ओतएसँ ओ धीरे-धीरे नीचा गिरल, जखन कि ओकर साथी ट्रक गँहीरगर खदहामे गिर गेलैक। एतेक पैघ ट्रक आटाक लोइया बनि गेल रहैक आ एकटा हाड़-मांसक लोक बचि गेलैक। “पाखलोक भाग नीक रहैत तैँ ओ बचि गेल।” लोक सभ एहने कहैत रहैक। कारण ताकला उत्तर जखन लोककेँ जबाब नहि भेटैत छैक तँ ओ ओकरा अपन भाग पर छोड़ि दैत छैक। पाखलो केँ डागदरक ओहिठामसँ एलाक बाद कम्पनीक प्रबन्धक दुर्घटनाक जाँच करब सुरह केलक। प्रबन्धक ओकरासँ बहुत रास प्रश्न केलकैक, मुदा ओ एकोटा प्रश्नक जबाब नहि देलकैक। ओकरा दिमागमे दुर्घटनाक विषयमे किछुओ नहि रहैक। आइ भोरे जे किछु भेल छलैक, ओकरा दिमागमे बेर-बेर वैह प्रश्न आबि रहल छलैक। असलमे वैह प्रसंग दुर्घटनाक कारण छलैक। ओ भोरे सोनू मामाक ओहिठामसँ आएल आ ओहि तनावमे ट्रक पर चढि गेल। ट्रक चलबैत काल वैह घटना ओकरा दिमागमे चलि रहल छलैक। रजनीक संग भाय-बहिनक संबंध रहितो ओकरा पर ई आरोप लागल छलैक। सोनू मामा ओकरा कहने रहथि, “एतएसँ निकलि जाउ, आ कहिओ नहि आएब!” “चलि जाउ” ई कहि ओकरा निकालि देल गेल छलैक। तखन सोनू मामाक रिश्तामे ओ किओ नै रहैक? पाखलो सोचि रहल छल। वैह विचार ओकरा दिमागमे टीस मारि रहल छलैक आ ओ अचेतन अवस्थामे चलि गेल छलैक। ठीक ओहि काल अगिला मोड़ पर ट्रकक दुर्घटना भ’ गेल रहैक। एखन धरि वैह विचार, वैह प्रश्न ओकरा दिमागकेँ झकझोरि रहल छलैक। कम्पनीक प्रबंधक द्वारा पूछल गेल सवालक जबाब हम नहि द’ रहल छलिऐक एहिलेल ओ गोस्सा भ’ गेल आ ओहि गोस्सा मे ओ हमरा गाल पर फटाफट दू-तीन थापड़ मारि बैसल। पाखलोक गाल पर थापड़क निशान भ’ गेलैक। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा सौंसे देहमे भ’ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नहि द’ रहल छलैक, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहैक ओ एखन धरि हरियर रहैक। सात-आठ महीनासँ पाखलोक व्यवहार देखि लोककेँ बुझाइक जे पाखलो पागल भ’ गेल छैक। ओकर केश, दाढ़ी आ मोंछ बढि गेल छलैक आ ओहि दाढीमे ओकर मुँह नुका गेल रहैक। ओकर माथ तँ झलकैते नहि रहैक। गाल पिचकि गेल रहैक आ आँखि धँसि गेल रहैक। देख’मे ओ बहुत विचित्र लागि रहल छलैक। जँ कोनो अनजान लोक ओकरा देखि लैक तँ डरि जाइक। जाहि दिन ट्रकक दुर्घटना भेल छलैक ओहि दिन पाखलो जंगल चलि गेल रहैक। ओ ओत्तहि चारि-पाँच दिन बितौलक आ बादमे गाम घुरल। ओहि दिनसँ ओ गाममे अजीबोगरीब तरहेँ बाजए लागल आ संगहि अपन हाथ सेहो हिलबैत रहैत छल। बीच-बीच मे अपन आँखिकेँ सेहो विचित्र रूपसँ छोट-पैघ करैत रहैत छल। ओ दिनभरि घूमतहि रहैत छल। जंगल, भाट, मळार, दोउड़े आदि ठाम घूमतहि रहैत छल आ कतहुँ बैसि जाइत छल। नारियर, कटहर, आमक गाछ सब पर चढैत रहैत छल आ कतहुँ दूर अपन नजरि गड़ौने रहैत छल। लोक सभक कहब रहैक जे, “ओ बहुत डरि गेल छैक।” ओकरा कार्या केर देवचार (एकटा आत्मा) गड़ैस नेने छैक। लगातार काजसँ अनुपस्थित रहबाक कारणेँ कम्पनी ओकरा नोकरीसँ निकालि देने रहैक। यद्यपि ओकर जतेको हिसाब निकलैत रहैक से कम्पनी ओकरा द’ देने रहैक। ओ पाइ पाखलो ओहि दिन गामक बूढ़-बुजुर्ग आ नेना लोकनिमे बाँटि देने छल। दोसर दिन धरि ओकरा लग खएबा धरिक पाइ नहि रहलैक। ओ अपन पैन्टक जेबी उनटौलक आ ओहि स्थितिमे गाममे घूमए लागल। ओ मात्र घूमतहि रहैत छल। घूमैत काल ओकरा दिन-रातिक कोनो परवाहि नहि रहैत छलैक। एतेक धरि जे ओ रौद आ बरखामे सेहो घूमिते रहैत छल। ओकरा घूमबाक कोनहुँ सीमा नहि रहैक। ओकर किछु मीत लोकनि ओकरा कहियो काल चाह-पानि द’ दैत रहैक। कहियो काल खोआ-पीआ सेहो दैत रहैक, नहि तँ ओ भूखले रहैत छल। एहि सभक बाबजूद ओकर घूमब-फिरब बन्न नहि भेल रहैक। ओ कखनो केगदी भाटमे देखाइक तँ कखनहुँ खेतक बान्ह पर। ओ कहिओ ककरो भाटसँ नारियरकेँ हाथ धरि नहि लगौलक। ककरो कोनहुँ कष्ट नहि देलक, एकरा सभक बाबजूद लोक ओकरासँ डरए लागल छल। एतए धरि जे छोट-छोट नेनासभकेँ ओकर माय, पाखलोक नाम ल’ कए डराब’ लागल छलैक। ओहि दिन बरखा भ’ रहल छलैक। पाखलो सोनू मामाक घर लगक पीपरक गाछक नीचा ठाढ़ छल। ओकरा देखि रजनी दौड़कए ओकरा लगीच गेलीह ओकरा अपना घर बजा अनलीह। “सुलू दाई! एतए आउ, देखू अहाँक मामा आएल छथि।” रजनीक एतबा कहितहि सुलू घरसँ दौड़लि अएलीह, मुदा पाखलोकेँ देखतहिँ डरि गेलीह। “ई अहाँक मामा छथि! हुनका लग जाउ!” रजनी सुलूकेँ कहलथि। तखन पाखलोक बजएला पर सुलू ओकरा लग गेलीह। पाखलो ओकरा गोदी मे उठौलक आ फेर नीचा राखि देलकैक। सुलू हँसलीह। पाखलो सेहो हँसए लागल। दुनूक हँसी देखि रजनीकेँ नीक लागललैक। पाखलो अपन फटलका पैन्टक जेबीमे किछु ताकबाक प्रयास केलक मुदा ओकरा किछुओ नहि भेटलैक। तखन ओ अपन दोसर पैन्टक जेबीमे हाथ देलक आ ओहिसँ दू टा आमला निकालि सुलूक हाथ पर राखि देलक। बादमे ओ सुलूक माथ पर अपन हाथ फेरलक, ओकरा गाल पर चुम्मा लेलक आ दुलार-मलार करए लागल। “विठू! अहाँ एहि तरहक पगलपन नहि करल करू, एहि तरहेँ पगलपन कए अहाँ अपन की हालति बना नेने छी से कहिओ देखने छी? अहाँक गाल पिचकि गेल अछि आ आँखि धँसि गेल अछि।” एतबा कहैत रजनीक आँखिमे नोर आबि गेलैक। ई देखि पाखलोक मोन सेहो पसीज गेलैक आ ओ बाजल— “अहाँ कानि किएक रहल छी?” “नहि तँ! हम कानि कहाँ रहल छी? ओहो! एखन धरि अहाँ ठाढे छी? आउ बेंच पर बैसू, हम भीतर जा रहल छी, पहिने अहाँकेँ किछु खुआएब तखन हमसभ गप्प-सप्प करब।” रजनी भोजन परसय भीतर चलि गेलीह। पाखलो सुलूकेँ दुलार करए लागल। रजनी पाखलोक लेल भोजन परसि बाहर आबि कहलीह, “चलू भोजन लागि गेल अछि।” एतबा कहि ओ ओकर हाथ धुआब’ लगलीह। एतबहिमे दरबज्जा पर किनको छाँही देखा पड़लैक। दरबज्जाक बाहर सोनू मामा अपन पयरक जूता निकालि रहल छलाह। सोनू मामाकेँ देखि पाखलो घरसँ भागल आ बहुत दूर धरि भागितहिँ रहल! सोनू मामा, रजनी आ सुलू ओकरा देखितहि रहि गेल। पाखलो आब गाममे छोट-पैघक लेल हँसीक पात्र बनि गेल छल। नेना सभक संग आब पैघ लोक सभ सेहो पाखलोक मजाक उड़ाबए लागल छल। नेना सभतँ ओकरा पाछूए लागि जाइत छलैक। ओकरा पर पाथर फेकैक, ओकरा ‘पागल पाखलो’ कहि कुढाबैक। जखन पाखलोकेँ बहुत गोस्सा आबि जाइक तँ ओ नेना सभ दिस आँखि तरेर कए देखैक जाहिसँ नेना सभ डरि कए भागि जाइक। पाखलो कलमाक चबूतरा पर बैसल छल। तखनहि नेना सभक एकटा दल आबि धमकलै। सभटा नेना ओकरा लग जमा भ’ गेल आ ‘पागल पाखलो’, ‘पागल पाखलो’ कहि ओकरा कबदाब’ लागल। एतबहिमे ओ अपन माथ नोचब सुरह क’ देलक आ फेर जोर-जोरसँ हँसैत बाजए लागल— “हम पागल पाखलो! हा, हा, हा, हा........ हम पाखलो नहि छी! हम पागल छी! पागल! हा, हा, हा, हा........।” “अहाँ पागलो छी ओ पाखलो सेहो छी।” नेना सभ बाजए लागल। एकटा नेनातँ ओकरा पर पाथर फेकि देलकैक आ पछाति जा कए सभटा नेना सभ हल्ला-गुल्ला करए लागल। “अहाँ पागल पाखलो, पाखलो, पाखलो।” पाखलो ओकरा सभक दिस आँखि तरेर कए देखलक आ “हम पाखलो नहि, हम पाखलो नहि” कहैत अपन माथ ओहिठाम चबूतरा पर पटकए लागल किछुए क्षणक बाद ओ बेहोश भए ओतए गिल पड़ल। तकर बाद ओतए जमा भेल नेना सभकेँ किओ भगा देलकैक। दोसर दिनसँ पाखलो रस्ता पर रौदे मे रहए लागल। अपन गोर देह, गुलाबी केशमे कारिख पोतए लागल। अपन कारी देहकेँ देखि ओ हँसए लागल आ रस्तासँ आबए-जाएबलाकेँ कहए लागल—“देखू! हमहूँ अहीँ सन बनि गेलहुँ ने?” अपना आपकेँ कारी करबाक लेल भरि-भरि दिन रौदमे ठाढ़ रहए लागल। कारिख लगा कए कारी कएल गेल ओकर देह किछुए दिनमे बेरंग भ’ गेलैक ओ फेर पहिने-सन देखाबए लागल। ओ अपन सभटा गुलाबी केश काटि लेलक आ पूरा टकला भ’ गेल। मोंछ आ दाढीक संग ओ अपन आँखिक पिपनी सेहो काटि लेलक। ओकर जतेको गुलाबी केश छलैक ओ सभटा काटि लेलक जकरा कारणेँ ओ आओरो बदरंग लागए लागल। ओहि दिन साँझकेँ ओ एकटा आमक गाछक नीचा जतेको सूखलका पात छलैक से सभटा जमा केलक आ ओहिमे आगि लगा देलक। “हमर गोर चाम जरि जेबाक चाही आ हमरा कारी भ’ जेबाक चाही।” एतबा सोचि ओ अपन फाटल कपड़ा सहित आगिमे ठाढ भ’ गेल। ओकरा कपड़ामे आगि लागि गेलैक। ओहि समय किओ आबि ओकरा आगिसँ बाहर धकेल देलकैक आ आगि मिझा देलकैक। ओहि आगिमे पाखलोक देहक किछु रोइयाँ झुलसि गेलैक। हाथ-पएर आ मूँहक चाम जरि गेलैक। देहमे फोका निकलि गेलैक आ सौंसे देह लाल भ’ गेलैक। अस्पतालमे जतए ओकरा राखल गेल रहैक, ओतए ओ दू दिन बितौलक। जहिना ओकर मोन कने नीक भेलैक ओहिना ओ दोसरहिं दिन अस्पतालक ड्रेसमे भागि गेल आ गाम आबि गेल। गामक लोककेँ अस्पतालक ड्रेसमे पाखलोक पागलपनक एकटा नव रूप देखबामे एलैक। ओ पहिनहि जकाँ गाममे एमहर-ओमहर घूमए लागल। पातोले जंगलमे किछु स्त्रीगण आ किछु युवती सभ लकड़ी बीछैत छलीह। ओकरा सभकेँ देखि पाखलो ओतए गेल। ओहिमे शामा सेहो छलीह। ओकरा देखि ओ शोर पारलक आ ओकरा लग गेल। शामा डरि गेलीह आ पाछू हटए लगलीह। पाखलो ओकरा रूकबाक लेल कहलकैक मुदा ओ रूकलीह नहि भागए लगलीह। “ठहरू, ठहरू!” कहैत पाखलो ओकरा पाछू दौड़ए लागल। दौड़ैत-दौड़ैत ओ रूकल। जोरसँ चिकरैत शामा गामक दिस भागलीह। “पागल पाखलो युवती सभक पाछू पड़ल छैक।” ई गप्प सौंसे शहरमे पसरि गेल। नओ तेसर दिन धरि हम ओहि घटनाक संबंधमे सोचि रहल छलहुँ। हम की केलहुँ? किएक केलहुँ? हमरा किछुओ नहि बुझ’ मे आबि रहल छल। हम शामकेँ देखि ओकरा लग गेल छलहुँ। ओकरा आबाज लगेलहुँ। ठहरू! एहिमे हमरा किछु बेसी खराप नहि देखा रहल छल, मुदा आब यैह गप्प हमरा सालि रहल छल। हम किएक ओकरा रूकए कहलिऐक आ ओकरा पाछू किएक दौड़लिऐक? एहि तरहक प्रश्न हमरा दिमागमे बेरि-बेरि घूमि रहल छल। मुदा हँ...ओहि दिन खूब मोन लागल रहए। ओहि दिन शामाक ओतए जाएब व्यर्थ भ’ गेल रहनि। ओ हमरासँ बियाह करबाक लेल तैयार नहि छलीह आ हमरा पाखलो कहैत छलीह, ओहि मुँहेँ हम हुनका चिकरबाक लेल बाध्य केलहुँ! हमरा पागल कहैत छलीह ने! शी! शी! ई सब ठीक नहि। ओहि दिन ओकरा पयरमे काँट गरि गेल हेतैक! हम ई नीक नहि केलहुँ। रजनीक घरवला रजनीकेँ फेर अपना घर ल’ गेल छलाह। ऐहन लोक सभ बजैत छलाह। हमहूँ एहने किछु सुनने रही। ई गप्प साँच छैक की? यैह जानबाक लेल आ रजनीक संबंधमे पूछबाक लेल हम शामाकेँ रूकबाक लेल कहने रहिऐक। शामा हमर जान-पहिचानक छलीह, मुदा हमरा द्वारा ठहरू! ठहरू! कहबाक माने ओ किछु आर निकालि लेलथि की? आकि हम ओहिना हुनका रूकए कहलियनि? हमरा कोना जवाब नहि भेटि रहल छल। गोवा जखन स्वतंत्र भेल रहैक ओहि समय पाखलो लोकनि जंगलमे यत्र-तत्र नुका गेल रहए। भूखक कारणेँ ओ सभ जहर वला फल खा-खा कए मरि गेल छल। हमहूँ ओहिना मरब की? ई सोचि हम डरि गेलहुँ। हम द्वन्द्वमे पड़ि गेलहुँ आ हमरा मोनमे डर समा गेल। गाम जएबासँ हम डरि रहल छलहुँ। गाम जएबामे हमरा लाज लागि रहल छल। पाखलो युवती सभक पाछू भागि रहल छलैक। ओहो बापे जकाँ भ’ गेलैक। लोक सभ एहने कहैत रहैक। ओ सभ हमरा मारि देताह, हमरा मारताह आ जित्ते गारि देताह। हमरा छोड़ाकए आनएबला आब ओहि गाममे किओ रहबो नहि केलैक। दादीतँ नहिए रहलाह आ गोविन्द तँ गामे नहि अबैत छलाह। ओ तँ गामक लेल बाहरी लोक भ’ कए रहि गेलाह अछि, आ हम, एकटा एसगर पाखलो। गाम गेलहुँ तँ गामक नेना सभ हमरा पाखलो, पाखलो, पागल पाखलो कहि कए कढ़ौताह। सभ किओ हमरा पाखलोएक नजरिसँ देखैत रहए। हम ओकरा सभ जकाँ देखबाक लेल की नहि केलहुँ। कारी हेबाक लेल रौदमे ठाढ रहलहुँ आ गुलाबी दाढ़ी-मोंछ काटि लेलहुँ। अंतमे फोका हेबा धरि, घाव हेबा धरि हम अपन देह जरबैत रहलहुँ। देहक चाम जरि गेल आ घावसँ खून बहि गेल। वासनाक कारणेँ जनम लेबएवला पाखलेपन तँ आब हमरा देहसँ चलिओ गेल हैत। कंकाल पर ठाढ भेल एहि देहकेँ ई धरती सम्हारि नेने अछि। हमर पहिलुक रूप बदलि गेल अछि। सौंसे देह कारी भ’ गेल अछि। लोकक रुप रंग आ हमर रूप रंगमे आब कोनो फरक नहि रहि गेल अछि। हम एत्तहि जनमलहुँ, पैघ भेलहुँ आ हिनके सभक बीच रहलहुँ। हम एतुके लोक सभमे सँ एक छी। एहि माटिक संस्कारमे पललहुँ, बढ़लहुँ, तखन हम पाखलो कोना? हमर माय हमर नाम ‘विठू’ रखने छलीह! ओ हमरा विठूए कहि बजबैत छलीह। हमर नाम विठू थिक। एहि नामसँ किनकहुँ तँ बजएबाक चाही ने? आ जँ हमरा किओ विठू कहि नहि बजबैत अछि तँ की हम विठू नहि भेलहुँ? हम विठू छी! हम विठूए छी! रजनीक शोर पारब हम एखन सुनि रहल छलहुँ। हमर कान, मोन आ हमर सौंसे संवेदनाकें हम विठू छी, ई बूझ’ मे आबि रहल छल। जंगलक रस्ता पार करैत हम पहाड़ी पर चढ़ि गेलहुँ। ओहि पहाड़ीसँ नीचाँ रजनीक सासुर देखाइत रहैक। हम जखन पहाड़ीसँ नीचाँ उतरि रहल छलहुँ तखने हमरा स्मरण आएल। रजनीक घरवला ओकरा पर आरोप लगा ओकरा घरसँ बाहर निकालि देने रहैक आ एक बरखक बाद घर ल’ गेल रहैक। एखन जँ हम रजनीसँ भेंट केलहुँ तँ ओकर घरवला फेर ओकरा घरसँ निकालि देतैक। हमरा एहन लागल आ संगहि एकटा झटका सेहो। हम ओतहि ठाढ़ रहलहुँ। हमर एक मोन कहैत छल, जे हम ओतए गेलहुँ तँ नीक नहि हैत, आ दोसर मोन हमरा आगू दिस घीचि रहल छल। रजनीक घरवला ओकरा घर ल’ जा कए नीक केने रहए। हमरा ऊपर लगाओल गेल दोषारोपण आब नहि रहल। लोकक नजरिमे आब हम पाक-साफ छलहुँ। ओहो! नीके भेलैक। हमरा दिमागसँ द्वन्द्व हटि गेल। तनाव चलि गेल। आब हमरा आजादी महसूस भ’ रहल छल। आब हम रजनी आ सुलूसँ भेंट करब। रजनी हमरा भाय मानैत छथि आ हम ओकरा बहिन। ई गप्प हम ओकरा घरवलासँ कहबैक। बादमे हम निर्णय लेलहुँ आ पहाड़ी दए नीचाँ उतरए लागलहुँ। हम पहाड़ीसँ उतरि हाली-हाली जा रहल छलहुँ। ओतए कुळवाड्याक चरवाह नेना सभ हमरा देखलक। “यैह देखू पाखलो! यैह देखू पाखलो! पाखल्या!” ओकरा सभक ई शोर सुनि हम डरि गेलहुँ आ काँपए लागलहुँ ओ पहाड़ीक ढलानसँ दौड़ए लागलहुँ। पाखलो, पाखलो, एहि तरह आबाज पाछूसँ आबि रहल छल। हम दौड़ैत-दौड़ैत पहाड़क सुनसान घाटीमे पहुँचि गेलहुँ। साँझुक पहर ओहि घाटीक समूचा क्षेत्र बड्ड मनोरम बुझाइत रहैक। मुदा हम ओहि दिस बेसी ध्यान नहि देलहुँ। घाटी पार कए हम कारपें गामक सीमान पर पहुँचलहुँ। सीमानक लग एकटा बड़का टा झील रहैक आ ओहि झील लग एकटा पोखरि सेहो रहैक। रस्ता चलैत काल ओहि पोखरिमे किछु गिरबाक आबाज एलैक। हम पोखरिक लग गेलहुँ। एक ठाम पानिमे घुरमी होइत रहैक आ पानिक बुलबुला आबि रहल छलैक। चरवाह आकि आन किओ ओहि पोखरिमे किछु फेंकने हेतैक यैह मानि हम आगू-पाछू देखए लागलहुँ, मुदा ओतए किओ नहि छल। हम पोखरि कातसँ कुसरीक फूलक एकटा कोंढी तोड़लहुँ आ रजनीक घर दिस ओकरासँ भेंट करबाक लेल हाली-हाली चलए लागलहुँ। मुनहारि साँझकेँ हम रजनीक गाममे पयर राखलहुँ। ओतुका लोक सभ घरसँ बाहर आबि हमरा देखए लागल। हम रजनीक घर लग पहुँचि गेलहुँ। ओतए देहरीएसँ आबाज देलिऐक मुदा घरसँ कोनो उत्तर नहि आएल। हम ओतएसँ बहरएलहुँ, देखलहुँ घरसँ बाहर सुलू कानि रहल छलीह। हम ओकरा आबाज लगेलिऐक आ गोदीमे उठा लेलिऐक। ओ हिचुकी-हिचुकी कानि रहल छलीह। हम ओकरा चुप करबाक प्रयास केलहुँ। अपन हाथक कसरीक फूलक कोंढ़ी ओकरा हाथमे द’ देलिऐक। हम ओकरासँ पूछलिऐक—“माए कतए गेल छथि?” “हम नहि जनैत छी।” “हुनका बहुत मारने छथि।” “के, कखन?” “बाबा।” सुलूक कहब सुनि हमरा कने अजगुत-सन लागल। राति भ’ गेल रहैक। पड़ोसक दू-तीन गोटे हमरा लग अएलाह। पहिने तँ ओ लोकनि हमरासँ पूछताछ केलनि आ फेर रजनीक खबरि देलनि। “जाहि दिनसँ रजनीक घरवला ओकरा बापक ओहिठामसँ आनने छल, ओहि दिनसँ शराब पीबि-पीबि कए ओकरा मारए-पीटए लागल छल। तकरा बाद तँ नित राति ओकर घरवला रजनीसँ झगड़ा करैक आ मारैक। दू दिन पहिनहि ओ ओकरा घरसँ निकालि देने रहैक आ ताहि दिनसँ ओ घरक बाहरे देहरी पर रहि रहल छलीह।” सुलू हमरा गोदिएमे सूति गेल छलीह। बहुत राति भ’ गेल रहैक आ रजनी एखन धरि आपस नहि आएल छलीह। रजनी पोखरिमे कूदि अपन जान द’ देने छथि, ई गप्प जँ हमरा रस्तासँ अबैत काल पता लागि जएतै तँ हम निश्चये हुनका बचा लेतिऐक। किओ पोखरिमे पाथर फेकने हेतैक एहिलेल पानिमे बुलबुला आबि रहल छलैक, हम यैह बुझने छलहुँ। ओहि समय ओहि पोखरिमे एहन हृदयविदारक मृत्यु नुकाएल रहैक, ई हमरा पता नहि छल। रजनीक घरवला ओकरा कांदोळे गामसँ आपस अनने रहैक, मुदा किछुए दिनक पश्चात् ओ फेर ओकरा पर वैह आरोप लगौने रहैक। रजनीकेँ मारए-पीटए लागल छलैक आ एकदिन ओकरा दागि देने रहैक। ओ ओकरा जीबैतै मारि देब’ चाहैत रहैक। ओहिदिन, “पाखलो युवती सभक पाछू लागल छैक।” हमरा संबंधमे ओकरा ई खबरि भेटल रहैक। ओहि दिनसँ ओ रजनीकेँ देहरीक बाहरे राखए लागल रहैक। रजनी तंग आबि गेल छलीह आ ओहि समय ओ सोहावतीक श्रृंगार केलक आ आत्महत्या करए चलि गेलीह। ओहि पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छलहुँ से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नहि अपितु रजनीक खोपामे लगाओल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहैक! यादक लेल सफेद, सुगन्धित! दस रजनीक याद में हमरा आँखिमे नोर आबि गेल छल आ हम ओहि समय वैह पोछि रहल छलहुँ, एहि सभ यादसँ हमरा मोनमे ओ सभ चित्र उभरि कए आबि रहल छल। हम पाखलो, एहि माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल विठू छलहुँ। एहि माटिक सबूत छलहुँ। बहुत कालसँ आकाशमे कारी-कारी मेघ घुमड़ि रहल रहैक। बिजलौकाक संग गरज भ’ रहल छलैक आ बरखा सेहो भेल रहैक, जकरा कारणेँ लाल माटिक सुगंध चारू दिस पसरि रहल रहैक। मिरगिसरा शुरू हेबामे एखन पन्द्रह दिन बाँकी रहैक। मिरगिसराक बरखा शुरू भेलाक पश्चात् गाममे खेती-बारीक काज आरंभ भ’ जाइत रहैक। एहि साल सोनू मामाक खेत परती रहि जेतैक, हमरा एहि बातक डर रहए। दू महीना पहिने सोनू मामाकेँ लकबा मारि देने रहैक। ओकर दहिना हाथ बेकाम भ’ गेल रहैक, जाहिसँ हाथ नहि हिला सकैत छलाह। अपन नातिनसँ मिलबाक लेल आ ओकरा देखबाक लेल ओ ओहू स्थितिमे गोविन्दक घर आएल छलाह। हुनक माथक केश उज्जर भ’ गेल रहनि आ देह बहुत कमजोर। एतए आबि ओ सुलूसँ भेंट केलनि। सुलूसँ गप्प केलनि, मुदा हमरासँ बिना गप्प केने ओ आपस चलि गेलाह। जँ ओ बरखामे भीजि के काज करताह तँ निश्चिते हुनक रोग आर बढि जेतनि आ ओहुना आब हुनकासँ कोनो काज कहाँ होइत छलनि। ओकरा एहन बुझेलैक। आ तखन ओ खेतमे हाथ बँटेबाक लेल रुक्मिणी मौंसीक माध्यमे खबरि भेजौलक। हमरा बुझाएल जे सोनू मामाक खेत परती रहि जेतैक, मुदा जाधरि हमरा देहमे जान अछि ताधरि कोनो डर नहि। भोरसँ दूपहर भ’ गेल रहैक। हम घरमे जतए बैसल रही ओतहि एकक बाद एक याद दोहरा रहल छलहुँ। आब सभटा याद खतम भ’ गेल, हमरा एहन लागल आ ओहि सून देवाल जाहिपर चिक्कनि माटिसँ ढौरल गेल रहैक ओकरा एकटक देखैत रही। हम घरक चारू दिस नजरि दौड़ेलहुँ, तखने हमरा रुक्मिणी मौंसीक ओहिठाम गेल सुलूक याद आबि गेल। आँखिक समक्ष ओकर निष्पाप, अनजान आ बहुत सुन्नर मूर्ति ठाढ भ’ गेल। ओकर लहसुनियाँ आँखिसँ सुखद भाव प्रकट भ’ रहल छलैक। तखन ओकर एतए नहि हेबाक बाबजूदो हमरा ओकरा माथ पर हाथ फेरबाक आ ओकर चुम्मा लेबाक इच्छा भेल। एतबहिमे दरबाजा खुजबाक आबाज भेल। देखलहुँ तँ सुलू घर आबि गेल छलीह। हमरा देखि ओकर खुशी दूगूणा भ’ गेलैक। ओ दौड़िकए एलीह आ जाधरि हम ओकरा गोदी लेतिऐक ताधरि ओ “मामा” कहि कए हमरा शोर पारलक आ हमरा पयरसँ लिपटि गेलीह। अशोक मनभुटकर- हर एक लोक आ माटिक कथा ‘पाखलो’ अशोक मनभुटकर हर एक लोक आ माटिक कथा (‘पाखलो’)-अनुवाद शम्भु कुमार सिंह ‘पाखलो’ उपन्यासकेँ दुइए तीन बरखमे ख्याति भेटि गेल रहैक। ‘राष्ट्रमत’ द्वारा एकरा औपन्यासिक प्रतिस्पर्धामे पुरस्कार भेटलैक। कला अकादमीक पुरस्कार सेहो भेटलैक। ‘पाखलो’ उपन्यास पणजी आकाशवाणीसँ मराठी भाषामे नवोनाट्य स्वरूपमे प्रसारित भेल। एहि तरहेँ मराठी साहित्यमे सेहो पाखलो अपन उपस्थिति दर्ज करौलक। कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’ अपन विशिष्ट शैलीक कारणेँ ठाढ रहल। तुकाराम शेटक ‘पाखलो’ क जड़ि आमक गाछ सदृश गोवाक माटिक गहराई धरि पहुँचि गेल। एहि माटिक सुगंध ‘पाखलो’क सौंसे जीवनमे सुरभित भ’ रहल अछि। मुदा ‘पाखलो’ सँ शालीकेँ जनमल एहि बच्चाकेँ अपनासँ दूर रखैत अछि। ओ अपना-आपसँ सेहो साक्षात्कार नहि क’ सकैत अछि। यैह तनाव, यैह व्यथा पाखलोक हृदयमे घर बना रहल अछि आ एहि व्यथासँ ‘पाखलो’ उपन्यासक जन्म भेल। कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’क कथा एकटा नव आ ज्वलन्त विषय ल’ के आएल अछि। एहि उपन्यास विषय जतेक नव अछि ततबे मौलिक। पाखलोक बीजसँ गोवाक एक सामान्य स्त्रीक गर्भसँ पलिकए गोवाक माटिक संस्कारकेँ अपनएबाक लेल तड़पि रहल अछि। पाखलोक रूप, गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, लाली गोराय अछि, मुदा ओकरा पर जे संस्कार पड़ल छल ओ गोवाक माटिक, हिन्दूक, शालीक, विठूक छल। बाँकी गोवावासी जकाँ इहो पाखलो माटिएक विठू थिक, मुदा समाज एकरा पाखलोक नजरिसँ देखैत अछि। ओ शालीक विठू थिक। ओ विठूए थिक, ओकरा एहन बुझाइत छैक। मुदा समाज ओकरा विठू नहि बनए दैत छैक। लेखक श्री तुकारामक नजरिमे ई विरोधाभास देखबामे आएल। पाखलोक जीवनकेँ एक विरोध बना कए एकपक्षीय आधारक रचना कएल अछि। पाखलोक कथा घुलि-मिलि रंगीन भ’ गेल अछि। पाखलो बनि कए, विठू बनि कए...... ओहो एहि माटिक सपूत बनि जाए, एहि इच्छाकेँ पालि पाखलो पाठकक मोनमे एकटा विशिष्ट छाप छोड़ि दैत अछि। पाखलो उपन्यास पढ़ैत काल पाठक सेहो स्वयं पाखलो बनि जाइत अछि। यैह एहि उपन्यासक विशेषता थिक। उपन्यासक निवेदन दूई प्रकारसँ कएल गेल अछि—अध्याय 1,3,5,7,9 आ 10 मे पाखलो स्वयं निवेदनि करैत अछि आ 2,4.6,8मे लेखक स्वयं निवेदन करैत छथि। निवेदनक ई शैली केश जकाँ गूथल अछि, यैह एकर सौंदर्य अछि। मात्र लेखकक निवेदनक कारणेँ एहि उपन्यासक सौंदर्य नहि बढि जाइत अछि। एहि तरहक शैली आत्मनिवेदनात्मक उपन्यासक दोष, बन्हन मिटएबाक कारण बनि गेल अछि। विषयकेँ नीक जकाँ रँगि देबाक निवेदन शैलीक बहुत नीक जकाँ चित्रण भेल अछि। ई दुनू निवेदन शैली एक दोसराक पूरक थिक। तुकाराम शेट उपन्यासक सभटा प्रसंगकेँ बड़ सावधानीक संग रंगने छथि। कतहु अतिरेकक कारणेँ उपन्यासमे बाधा नहि आएल अछि। उदाहरण स्वरूप जखन शीलीक बलात्कार होइत छैक तखन यै प्रसंग लए ओ एहि तरहेँ लिखैत छथि। “ओहि अन्हार घुप्प जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे क’ लेलकैक। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब तरहेँ आवाज आब’ लागलैक।” शालीक मृत्युक प्रसंग सेहो किछु एहिना अछि। पाखलो चिताकेँ आगि लगएबाक प्रयास करैत अछि मुदा जखन चिताकेँ आगि नहि लगैत अछि तँ दादी कहैत अछि— “बाउ! अहाँक हाथे अहाँक मायक चिताकेँ आगि नहि लागि रहल अछि? आब की उपाय?” पाखलोक दुर्दैव किछु शब्दमे लेखक एतए देखौने छथि। एकबेर पाखलो पोखरिमे नहबैत अछि, ई देखि बाबू भट “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकरए लागैत अछि। पाखलोकेँ घीचि कए ओकरा स्तंभसँ बान्हि ओकर हाल-बेहाल क’ दैत अछि। जखन शाली ओकरा छोड़ाब’ जाइत छथि, ओ ओकरो बान्हि कए राखैत अछि। ओकरा देखि पाखलोकेँ लगैत छैक— “हमरा देहक गरम खून दौड़ए लागल.... बादमे हमर खून ठंढा भ’ गेल आ ओ शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाबए लागल......, हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक सभटा खून बहि गेल हो!” पाखलोक असहायता संयमसँ खुजैत अछि। एहि सभटा प्रसंगकेँ जीवित रखबाक हेतु भाषाशैली सेहो ओतबे प्रभावी अछि। प्रसंगक लेल उपयुक्त अछि। जेना नालीसँ शांत पानि बहैत अछि तखन बहुत कोमल आबाज अबैत अछि, ओहिना एकर भाषा अछि। सुन्नरि युवतीक पयरक पैंजनीक आबाजमे हेरा जाएब-सन, जाहि तरहेँ आँखि बन्न क’ कए मात्र आबाज सुनि लैत छी ओहिना ओहि भाषाक मन्द आबाज ताकब, आ लय-तालकेँ ओ पाठक पर विजय प्राप्त करैत अछि। हृदयमे घर बना लैत अछि। एहि तरहक वाक्यमे भाषाशैली बहुत सुन्दर भ’ गेल अछि। लेखकक ई भाषा शैली प्रसंगक अनुसारेँ मोड़ लेबाक कारणेँ प्रसंगक सौंदर्य बढ़ि गेल अछि। पाखलो एहि उपन्यासक नायक अछि। एहि व्यक्तित्वक चारू दिस अन्य पात्र सभ अछि, सोनू, दादी, शाली, रजनी, आलेस, गोविन्द, सुलू ई सभटा द्वितीयक पात्र छथि। उपन्यासमे नायकक चरित्र-चित्रण बहुत नीक ढंगे कएल गेल अछि। अपन हृदयसँ निकलल व्यथा, वेदनाक सहारे ओ जीबि रहल अछि। ओकरा मेटएबाल लेल ओ संघर्ष करैत अछि। यैह पाखलोक जीवन थिक। जँ अपन व्यथामे नायक जड़ैतो रहल अछि तथापि ओ ओहि परिधिमे नहि रहैत अछि। केगदी भाटमे नारियर तोड़बाक लेल वैह आगू बढैत अछि। हिन्दू आ ईसाईक बीच भेल झगड़ाकेँ वैह सुलझबैत अछि, मुदा ओ अपन दर्द नहि बिसरि सकल। ओकरा बुझाइत छैक— “हम नहि तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, एहिलेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबंध दुनूसँ अछि, एहिलेल हमरा ओ लोकनि नहि मारलनि की?” अपन अस्तित्व ताक’वला ई पाखलो सोनू मामाक बेटीकेँ अपन बहिन बुझि सिनेह करैत अछि, मुदा ओहि सिनेहकेँ रजनीक अलावा किओ नहि बुझि सकल अछि। जाहिसँ ओकर व्यथा आओरो तीव्र भ’ जाइत अछि। पाखलोक मनोदशा देखएबाक लेल पाखलोक सही भावना व्यक्त करबाक लेल एतए लेखककेँ खूब अवसर भेटल छनि। दादी एतए समाजक एकटा विशिष्ट व्यक्ति छथि। पाखलोकेँ ई गाम नहि अपनौलक, एकरा बाबजूद दादी ओकरा अपन बेटा गोविन्दक सदृश सिनेह देलक। ओकरा नोकरी पर लगौलक। रैयत लोकनि पर भेल अत्याचारकेँ मेटएबाक लेल ओ महीना भरिक कैद काटलक। सोनू मामा सेहो पाखलोसँ सिनेह करैत छथि मुदा अपन बेटीक खातिर ओ पाखलोकेँ भगा दैत छथि। आन लोक जकाँ आ रजनीक पति जकाँ ओहो पाखलो पर आरोप लगबैत अछि। सोनू मामाक चित्रण उपन्यासमे अएलाक बाद ओकर व्यक्तित्व स्पष्ट नहि भ’ सकलैक। ओहिना शालीक व्यक्तित्व चित्रण जाहि ढंगे हेबाक चाही से नहि भ’ सकल। ओकरा तुलनामे रजनीक व्यक्तित्व नीक जकाँ उभरि कए आएल अछि। गोविन्द बुद्धिमान, होशियार, आ तत्वज्ञानी अछि, जे पाखलो स्वयं कहैत अछि—“मनुक्ख जन्मक संगहि मृत्यु सेहो अपना संगहि आनने अछि..... धरती हो, जल हो वा आकाश, सभठाम मृत्यु निश्चित अछि।” एहन तत्वज्ञानक शब्द कहएवला गोविन्द पाठकेँ नहि पचैत अछि। हमरा ई तत्वज्ञान हमर आजी देने रहथि, एहन स्पष्टीकरण जँ गोविन्दक मुँहसँ भेलो अछि तथापि नेनपनमे गोविन्द एतेक तत्वज्ञानक गप्प क’ सकैत अछि से कने अजगुत लगैत अछि, आ गोविन्द एकटा बुजुर्ग सन बुझाइत अछि। ओ तत्वज्ञानी आ बुद्धिमान होइतहुँ एकटा ईसाई युवतीसँ बियाह क’ लैत अछि, आ अपन गाम छोड़ि दैत अछि। भारतमे रहिकए पाइ नहि कमा सकैत अछि एहिलेल आलेस दुबई चलि जाइत अछि, मुदा पाखलो एहिगामक संस्कृति, माटिसँ चिपकल रहैत अछि। उपन्यासक एकटा गाम एहि उपन्यासक व्यक्तित्व भ’ गेल अछि। गोवाक माटिक विशेषता एहि गाममे देखाइत अछि। प्रकृति सौंदर्यक चित्रण बहुत नीक जकाँ दर्शाओल गेल अछि। रजनीकेँ ‘पाखलो’सन लड़की होइत छैक। गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, गोर चाम। वास्तवमे तँ ई लड़की रजनीकेँ ओकरा अपन पतिसँ होइत छैक तथापि ओ लड़की देख’ मे पाखलो-सन बुझाइत अछि एहिलेल ई पाखलोक पैदाइश छैक, ई आरोप ओकर पति ओकरा पर लगबैत छैक। रजनीकेँ पाखलोसँ लड़की हेबाक कारण ओकरा मोनमे पाखलोक प्रति शाश्वत प्रेम भ’ सकैत अछि। एहि मनोदशाक कारणेँ रजनीकेँ पाखलो सन लड़की हेबाक संभावना देख’ मे आबि रहल अछि। पाखलो गोवाक माटिक अछि। मुदा एकरा पढि मोनमे एहन शंका होइत अछि जे ‘पाखलो’क संबंध कतहु मराठी साहित्यमे चि.त्र्यं. खानोलकरक ‘चानी’ उपन्याससँ तँ नहि अछि? मुदा ‘पाखलो’क विशिष्टता ‘चानी’ मे नहि अछि। भूतकाल आ वर्तमान कालक स्पर्श एहि उपन्यासमे अछि। कथानकक परिधि पूरा करबामे दुनूक भूमिका अछि। एकटा रविक दिन सभटा पुरान स्मरण एकटा गरज आ चमकक संग खतम भ’ जाइत अछि। ओहिमे पाखलो अपन पहिचान ताक’ लगैत अछि। फेर पाखलो अपन जनमसँ लए आइधरिक कथा अपना मोनमे स्मरण करैत अछि। दूपहर भ’ जाइत अछि। सुलू पाखलोकेँ ‘मामा’ कहि ओकर पयर पकड़ि लैत अछि। कथानक केर परिधि पूरा भ’ जाइत अछि। वर्तमान कालसँ भूतकालमे जा कए ‘पाखलो’ फेर वर्तमानमे आबि जाइत अछि। उपन्यासक प्रारूप प्रशंशाक योग्य अछि। उपन्यासक हरेक अध्यायक अपन महत्व छैक। हरेक अध्यायक शुरूआत आ विशेष रूपेँ अंत कलात्मक अछि। नीचाँक उदाहरण देखू— “नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ! पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छल आकि ओ ओतएसँ चलि देलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक।” चारि “एहि गाममे हमर परिचय फकत एतबा अछि जे हमर नाम पाखलो थिक, हमर जाति पाखलो थिक, आ हमर धर्म सेहो पाखलो थिक।” अध्याय पाँच “रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छैक। ओकरा चन्द्रमाक एहि ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही…. काजर लगएलाक बाद कारी आँखि वाली ओकरहि सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहैक आ जेना नहरक पानि बहैत छैक तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन ज्योत्सना पसारने छलैक।” “पाखलोक गाल पर थापड़क निशान भ’ गेलैक। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा सौंसे देहमे भ’ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नहि द’ रहल छलैक, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहैक ओ एखन धरि हरियर रहैक।” अध्याय आठ “ओहि पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छलहुँ से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नहि अपितु रजनीक खोपामे लगाओल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहैक! यादक लेल सफेद, सुगन्धित!” “ओ दौड़िकए एलीह आ जाधरि हम ओकरा गोदी लेतिऐक ताधरि ओ “मामा” कहि कए हमरा शोर पारलक आ हमरा पयरसँ लिपटि गेलीह।” दस हरेक अध्यायक एहि तरहक कलात्मक अंत छैक। हरेक अध्यायक अंतमे उपन्यासक अंत भ’ सकैत अछि। ई उपन्यास एतेक कलात्मक अछि। गोवाक संवतंत्रताक पार्श्वसँ ई कथा रंग आनैत अछि। स्वतंत्रता भेट’सँ पूर्वहि शुरू भेल ई कथा स्वतंत्रताक पश्चातो चलैत रहैत अछि। मुदा उपन्यासमे स्वतंत्रताक विषय जतेक एबाक चाही, से नहि आबि सकल अछि। मुदा एहि कारणेँ एहि उपन्यासमे बाधा आबि गेल छैक, से नहि छैक। ओहि समयक तीव्र स्वतंत्रता आन्दोलनक पदचिह्न जँ उपन्यासमे अबितैक तँ एकर पृष्ठभूमि आँखिकेँ जँचतैक। कार्मो चीफ जंगलमे शालीक बलात्कार करैत अछि, बादमे बहुत दिनक बाद, पाखलोक जन्मक बादो ओ शालीसँ भेंट करैत अछि। बिना बतौने ओकरो मोनमे शालीक प्रति सिनेह जागि जाइत छैक आ बलात्कारक तीव्रता कम भ’ जाइत छैक। कार्मो चीफक ई प्रकृति पाठककेँ उधेड़बुनमे डालि दैत छैक।......कार्मो चीफकेँ बेर-बेर शालीक ओतए देखि लोकसभ, “शालीक भड़ुआ।” कहैत छैक आ शालीक संबंधमे—“ओ पाखलो केँ अपना घरमे राखि धंधा सुरह क’ देने छैक वा अपन नव दुनियाँ बसा नेने अछि?” कहैत छैक। बलात्कारक तीव्रता कम कए लेखक पाठककेँ की कहए चाहैत छथि? ई बुझ’मे नहि अबैत अछि। पाखलोक ‘विठू’ एकबेर कहैत छैक—“ ओ एकटा पतिव्रता नारी छलीह” मुदा एकरो कोनो माने नहि निकलैत अछि। एहि तरहक किछु दोष एहि उपन्यासमे अछि, मुदा ई सूक्ष्म दृष्टिएँ देख’ बिना नजरिमे नहि अबैत अछि। पाखलो उपन्यास मात्र पाखलोक कथा नहि थिक। एकटा माटिक कथा थिक। हरेक लोकक, हरेक माटिक कथा थिक। एहन कथा इतिहास बतबैत अछि। हरेक लोककेँ इन्सानक रूपमे जीवन बितएबाक काल ओकरा अपन घर, अपन लोक, अपन समाजक आवश्यकता होइत छैक। अपन संस्कृतियोक आवश्यकता होइत छैक। जँ इ सभ ओकरा नहि भेटैत छैक आकि ओकरा एहि सभसँ दूर राखि देल जाइत छैक तखन ‘पाखलो’क उदय भ’ जाइत छैक। मोनक ई भावना, वेदना आ व्यथा मात्र गोवाक संस्कृतिमे उपजल एकटा पाखलो लोकक नहि थिक, अपितु सभ लोकक कथा थिक। केवल वातावरण ओ संदर्भ बदलि जाइत छैक। मूल भावना रहैत छैक ‘विठू’ बनि कए जीबाक। स्थान, काल आ मर्यादा एहि उपन्यासमे नहि अछि। एहिमे व्यक्त कएल गेल भावना, हरेक लोकक ज्वलंत कथा थिक, वेदना थिक। लोक सभमे सँ हरेक ‘पाखलो’ ‘विठू’ बनिकए जीबाक लेल संघर्ष करैत अछि। (कोंकण टाइम्स, दिवाली अंक, 1981 मे प्रकाशित आलेखक अंश, अशोक मनभुटकर) हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग (हिन्दी बायोग्राफी) मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ" “मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग” मैथिलीमे पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in मे धारावाहिक रूपमे ई-प्रकाशित भेल छल। श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ जन्म: 1 जनवरी, 1934, एम.ए. (हिन्दी), बी.एल., विद्यावाचस्पति, प्रकाशित कृति: अर्चना (गीत काव्य), आनंद (खंड काव्य), एक बनजारा विजन में (काव्य), मधेपुरा में स्वाधीनता आन्दोलन का इतिहास, शैव अवधारणा और सिंहेश्वर स्थान आदि विनीत उत्पल जन्म : 7 अप्रैल, 1978. मधेपुरा, बिहार. एक दशकसें बेसी अवधि धरि राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान जेहन अखबारमे पत्रकारिताक बाद आय काल्हि अध्यापन. सम्प्रति जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक मे शोधरत. अहाँक प्रकाशित कृति सभमे हम पुछैत छी (मैथिली काव्य-संग्रह), नए समय में मीडिया (संपादन), साहित्य अकादेमी सं पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदय प्रकाशक कथा ‘मोहनदास’क मैथिली अनुवाद. हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग लेखक हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ" संपादक श्रीगोपाल पंडित हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल समर्पण ऋष्यश्रृङ्ग आश्रमक महान साधक आ श्रृङ्गेश्वर (सिंहेश्वर नाथ) मंदिरक एकनिष्ठ आराधक गोलोकवासी हमर नानाश्री बेनी प्रसाद, हमर मामाश्री सहदेव प्रसाद, लक्ष्मी प्रसाद आ रामचंद्र प्रसादक पावन स्मृतिमे तर्पण तरहे श्रद्धाश्रु निवेदित- तृप्यन्ताम! तृप्यन्ताम! तृप्यन्ताम!!! -हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ श्रृङ्गेश्वर (सिंहेश्वर नाथ) महादेवजीक पौराणिक कामना लिंगक मधेपुरा (बिहार) केँ स्मरण करैत. परमपुरीवासीने परमगुरु परमात्मने नमः सम्पादकीय भारतक अइ पूब क्षेत्र, एखुनका कोशी अंचलमे भारतीय सांस्कृतिक उदय प्रागैतिहासिक कालमे भेल छल आ ऐतिहासिक प्रक्रियाक सामानांतर एकर विकास भेल. इतिहाससँ संबद्ध भेलाक बादो ई अंचल अप्पन इतिहास केँ आवश्यक नै बुझलक. तकर बादो ई अप्पन पुरना धरोहरकेँ महाकाव्य आ पुराणमे मणि मुक्ता सन सम्हारि क’ राखलक. एतौका संस्कृति नै तँ राजा, महाराजा आ उच्चवर्गक अछि, मुदा ई संस्कृति विश्वामित्र आ ऋष्यश्रृंग सन वैज्ञानिक तपस्वी ऋषि सबहक देन अछि जकरा उत्तर वैदिक कालसँ ल’ क’ आइ धरि अइ ठामक लोक आत्मसात केने अछि. तइसँ ई सामान्य लोकक संस्कृति अछि, विशुद्ध जनवादी संस्कृति. कतेक जातिक परस्पर संघर्ष, संपर्क आ संतुलनसँ एकटा दीपसँ असंख्य दीप श्रृंखला जोड़ैत आ ओकर अधिग्रहण आ अस्वीकार करैक परंपराकेँ विकसित करैक संस्कृति. कतेक रास अलग-अलग जातिक संस्कारक, उत्तर वैदिक कालसँ आइ धरि, अप्पन सर्वोच्चताकेँ सुरक्षित राखने अछि. कोशी अंचलक सभसँ महान सांस्कृतिक पीठ श्रृंगेश्वर स्थान (सिंहेश्वर स्थान) क स्मरण करैत एतौका तपः पूत ऋष्यश्रृंग अप्पन समग्रतासँ उपस्थित भ’ जाइ छथिन. हुनकर सम्पूर्ण जीवन एकटा आदर्श अछि. बाल्यावस्थामे ब्रहमचर्य पूर्वक अध्ययन, गृहस्थ आश्रममे निःस्वार्थ समाजसेवा, यज्ञानुष्ठान, अनार्य संस्कृतिक आर्य संस्कृतिमे समन्वित करब आ ओकर राष्ट्रक मुख्य धारामे प्रबल टकरावक बादो जोड़ैमे सक्रिय हएब, ई अइ ऋषिराजक महान उपलब्धि छल. ऋष्यश्रृंगक जीवनवृत बाल्मीकीय रामायण, महाभारत, भागवत आ अन्यान्य पुराण आ भवभूतिकृत ‘उत्तररामचरित’ मे कनीटा संकलित अछि. हुनकर सम्पूर्ण जीवनक वृत्तात्मक अध्ययन अखैन धरि नै भेटैत अछि. कोशी अंचलक वरिष्ठ साहित्यकार आ क्षेत्रीय इतिहासकार श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ बड निष्ठा आ परिश्रमसँ अइ अभावकेँ दूर करैत ऋष्यश्रृंगसँ संबंधित ऐ प्रामाणिक, वैज्ञानिक आ गवेषणात्मक पोथी लिख क’ आबएबला पीढी आ शोधार्थी लेल मार्ग प्रशस्त केने अछि. जखन सम्पूर्ण भारत युद्धक आगिमे झुलसि रहल छल, देवासुर संग्रामक नाम पर लाशसँ धरती पाटल जा रहल छल आ ऋष्याश्रममे शताघ्नी तैयार होइत छल, तखन कोशी कातक ऋष्यश्रृंग आश्रम एक दीपसँ दोसर दीप केँ बारि उत्तर भारतसँ दक्खिन भारत मे शांति–मंत्र बिछाबैत छल. ई तहियोका इतिहासक एकटा महत्वपूर्ण इतिहास अछि. व्रात्यक क्षेत्रमे व्रात्यक स्वामी भगवान शिवक इष्ट लिंगकेँ पुनर्जागृत क’ ई महान तपस्वी वेदविरुद्ध आ वेदविहित मतकेँ समन्वित करैबला काज केलक जे देश, जाति आ समाजक समन्वयवादी ऋषिराजक सुकृत्यसँ प्रभावित भ’ भगवान राम, सागरक कात शिवलिंगक स्थापना केने छल जे ठाम तहियोका रक्ष-संस्कृतिक केंद्र छल आ भगवान शिव अइ संस्कृतिक संपोषक रावणक आराध्य देव छल. अइमे मत-भिन्नता हेबाक बादो प्रमाण तथ्य ई अछि जे अइ महान ऋषिक जन्म कोशीक कात अखुनका सिंहेश्वर स्थानमे भेल छल. ई ठाम महर्षि विश्वामित्रक तपस्याक ठाम सेहो रहल छल. हुनकर नामपर अखनो कोशीक कातमे ‘कुसहा’ नामक कतेक रास गाम बसल अछि जे कौशिक ऋषि विश्वामित्रक स्मृति केँ अप्पन नाममे संजोगने अछि. ऋष्यश्रृंगक आश्रम अइ देशमे कतेक ठाम अछि. हम लगभग सभटा आश्रमक परिभ्रमण केने छी. मुंगेरसँ 30 किलोमीटर नैऋत्य कोणमे आ भीम बांधसँ पंद्रह किलोमीटर वायव्य कोणमे दुर्गम पर्वत शिखरपर जनशून्य आ प्रकृति अप्पन चमत्कारी हाथसँ सजल एकटा दर्शनीय ऋष्यश्रृंग आश्रम अछि. एतौका गोपालक सँ हम पुछलौं जे ऋष्यश्रृंगक मूर्ति कतए अछि? ओ सहज भावसँ बाजल, ई पैघ पहाड़, गाछ-वृक्ष, पाथरक टुकड़ा यएह तँ ऋष्यश्रृंग छथिन. कतेक रास रस्तासँ बहि क’ आएल निर्झरिणीक जल एतेक शीतल छल जे हम नहाबैक लोभ छोड़ि नै सकलौं. गोपालक अप्पन गमछा देलक आ हम नहेलौं. हमरा बताएल गेल जे अइ निर्झरिणीक जल अखैन गर्मीमे जतेक शीतल अछि, ठार मे ओतबे गरम. मुंगेरसँ दक्खिन ऋष्यश्रृंगक तप्त कुंड अछि आ सीताकुंडसँ दस किलोमीटरपर हिनकर आश्रम अछि. ऋष्यश्रृंग आश्रमक आस-पास कतेक रास वैष्णव आ बौद्ध मूर्ति भग्न स्थितिमे भेटल अछि. ई निश्चते सनातन हिन्दू आ बौद्धक पारस्परिक संघर्षक परिणाम रहल हएत. अइ मनोरम ठामक ‘एशियाटिक रिसर्च’ क अंक सातक पृष्ठ 376 पर उल्लेख अछि. किंवदन्ती अछि जे राजा दशरथ एतए अप्पन चारू बेटाक मुड़न करेने छल. वएह पर्वतमाला पश्चिम दक्खिन दिस बढ़ैत गेल अछि. अखुनका भागलपुरसँ 42 किलोमीटर दूर पश्चिम आ बरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिममे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि. ऊ मैरा पहाड़ीसँ बनल एकटा गोल सन घाटीमे अछि. ऐ आश्रम लग ऋषिकुंड नामक एकटा पोखैर अछि, जे ठार आ गरम जल स्रोतक एकटा समन्वित जलराशि अछि. अइ पोखैरक उत्तर दिस ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिता विभांडक साधनामे रत रहै छल. कजरा रेलवे स्टेशनक दक्खिन 12 किलोमीटर दूर ऋष्यश्रृंग पहाड़ क ऋषिराजक तपोवन हेबाक सम्मान अछि. ‘प्राचीन भारतक ऐतिहासिक भूगोल’ नामक पोथी मे डा. विमल चरण लाहा एकरा ल’ क’ पृष्ठ 429 मे लिखने अछि. एहन लगैत अछि जे अइ ऋष्यश्रृंग पर्वतमालाकेँ ऋष्यश्रृंगक ससुर राजा रोमपाद हुनका कन्या-दानमे देने छल. अइ पर्वत श्रृंग पर तपस्या क’ ऋष्यश्रृंग एकरा आ सम्पूर्ण क्षेत्र केँ महिमा मंडित क’ देलक. अइ ऋषि केँ धारक कात आ वन्य पर्वत श्रृंगक कोरा बेसी प्रिय छल. ओ प्रकृति पूजक छल आ हुनकर आराध्य प्रकृति जगतक रूप-रूपान्तर अछि. जाज्वल्यमान रश्मिवंत सूर्य, रातिमे मधु वर्षा करैत शीतल चंद्रमा, यज्ञवेदी बा पाकशाला मे धधकैत आगि, मेघक तूणीरसँ तीर सन निकलैत विद्युत्माला, दिनक स्वच्छ आ रातिक नक्षत्रमंडित आकाश, धारमे बहएबाली वेगमयी जलधारा, प्रकृतिक अचिन्त्य शक्तिक प्रतीक अइ चेतन रूपमे ऋषिराजक स्पष्ट आ रचनात्मक कल्पना हुनका देवत्वक दर्शन देलक. वेदमंत्रमे कतेक देवता सभकेँ प्राकृतिक जगत अधिष्ठाता मानि, हुनकर आवाहन आ स्तवन कएल गेल अछि, जेना आकाशक देवता द्यौ, वरुण, सौर मंडलक देवता सूर्य, मित्र, सवृत, पृषण, आ विष्णु, प्रभातक देवता अश्विनी आ उषा, अन्तरिक्षक देवता इंद्र, अपानापात, रूद्र, गरुड़, वायु, पर्जन्य आ आपः, धरातलक देवता पृथ्वी, अग्नि आ सोम आ सिन्धु, विपाशा, शतद्रु आ सरस्वतीक धार. ऋष्यश्रृंगक आरंभिक जीवन प्रकृतिमे एतेक रमल, रचल आ बसल छल जे महाकवि वाल्मीकि हुनकर ‘स वने नित्य सम्वृद्धो मुनिर्वनचरः सदा’ वन्य प्रकृति मे एकाकार भ’ जाइक कल्पना केने अछि. एहन ऋषि गूढ़ रहस्यक जानकार, तथ्यक अन्वेषक, शोधकर्ता आ गवेषणात्मक चिंतन आ विचारसँ पूर्ण समलंकृत होइत अछि आ निष्णात वैज्ञानिक सेहो. कौशिकीसँ ल’ क’ तुंगभद्राक तीर आ हिमालय सँ ल’ क’ नीलगिरिक उपत्यका आ वनखंड हुनका बेसी प्रिय छल. ओ कतेक रास यज्ञक आचार्य छल. हुनकर सम्पादित वृष्टि यज्ञ, पुत्रेष्टि यज्ञ, द्वादश वर्षीय यज्ञादिक अनुष्ठान तहियोका भरतखंडक इतिहासमे कतेक रास स्वर्णिम अध्याय जोड़लक. हुनका तँ जलप्रबंधनमे सेहो विशेषज्ञता छल. एखौनका चम्पानगरक चम्पानालाक निर्माण, महानदीक उद्भव आ ओकर मार्गक निर्धारणकेँ ओकरा खेती जोगर बनाएब, हुनकर वैज्ञानिक सूझबूझक जवलंत प्रमाण अछि. कोशी अंचलक एहन महान सपूत ऋष्यश्रृंगपर पूर्ण पोथी लिखि क’ ई विद्वान लेखक बड़ पैघ काज केने अछि. अइ विषयपर आगू जे कोनो गवेषणात्मक काज हएत, ओकर आधार यएह पोथी हएत. हमर एहन विशवास अछि. एतदर्थ ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि सिंहेश्वर स्थानमे ऋष्यश्रृंग शोध संस्थानक स्थापना अइ विद्यान लेखकक संजोकत्वमे कएल गेल अछि. सिंहेश्वर मंदिर न्यासक प्राथमिकता मे ई उल्लिखित अछि- क्रमांक 3 : न्यासक दिससँ धार्मिक पोथी, वार्षिक पंचांग, धार्मिक फोटो, कलेंडर, पत्र-पत्रिका आदि लागत मूल्य पर विक्रय आ प्रकाशन. क्रमांक 4 : सार्वजनिक वाचनालयक निर्माण. क्रमांक 6 : सिंहेश्वर मंदिरक ऐतिहासिक, पुरातात्विक, धार्मिक वृतांत आ लोक कथा सबहक संकलन अ शोध. क्रमांक 8 : युग आ संस्कृत शिक्षणक व्यस्था. जतए धरि क्रमांक 3 आ 6 क प्रश्न अछि, अइ ग्रंथक विद्वान लेखक श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ सिंहेश्वर स्थानपर पहिलुक शोधात्मक पोथी ‘शैव अवधारणा और सिंहेश्वर स्थान’ लिखि क’, ऋष्यश्रृंगक पुनर्जागृत सिंहेश्वर स्थानक पावन इष्ट लिंगक पहिलुक सारस्वत अर्चना केने अछि. अइ पोथीक पाँच सौ प्रति मंदिर न्यास दिससँ कीन क’ न्यासक विद्यानुरागी आ उदार सचिव श्री राम नारायण मंडल, अनुमंडल पदाधिकारी, मधेपुरा लेखकक उत्साह बढ़ेलक अछि. तइसँ ऋष्यश्रृंग शोध संस्थान दिससँ अइ पुनीत काज लेल हम न्यासक अध्यक्ष श्री ज्योतींद्र नाथ पाण्डेय, अपर समाहर्ता, मधेपुरा आ श्री राम नारायण मंडल, अनुमंडल पदाधिकारी, मधेपुरा केँ हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करै छी. न्यासक प्राथमिकताक कंडिका 3 आ 6 क मोताबिक, न्यास द्वारा भूमि आ भवन केँ आवंटित करै लेल लेखक द्वारा अनुरोध कएल गेल अछि, जइसँ ऋष्यश्रृंग शोध संस्थान सिंहेश्वर स्थानमे कार्यरत भ’ सकए. जाधरि भूमि आ भवनक आवंटन नै भ’ जाएत, ताधरि एकर मुख्यालय कला कुटीर, अशेष मार्ग, लक्ष्मीपुर मुहल्ला, मधेपुरामे रहत. हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे न्यासक माननीय विद्वान पदाधिकारीगण जल्दिये अइ शोध-संस्थान लेल भूमि, भवनक व्यवस्था करत. हमर ममतामयी मामीजी स्वर्गीय सावित्री देवी सिखवाल आ अनंत श्री विभूषित, पूर्व अध्यक्ष अखिल भारतीय सिखवाल महासभा, हमर पूज्य मामा श्री स्वर्गीय कन्हैया लालजी पंडित अप्पन अध्यक्ष पदसँ मुक्त होइ क’ बाद राजस्थान गेस्ट हॉउस, कलकत्ता मे अप्पन कार्यकालमे कएल गेल काजमे सँ एक केँ पूरा नै होइसँ दुखी छल. ऋष्यश्रृंगक पावन चित्रक संग-संग हुनका सँ संबंधित एकटा प्रामाणिक आ गवेषणात्मक पोथीक रचना नै भेल. हुनकर इच्छा अइ पोथी रचनाक संग पूरा भ’ रहल अछि. आह, आइ जौं ओ दुनू जीवित रहतिऐ तँ कतेक प्रसन्न हेतिऐ. ऋष्यश्रृंगक भव्य संगमरमरक मूर्ति सिंहेश्वर मंदिरमे हमर माताश्री पार्वती देवीक आदेशानुसार हमर पूज्य पिताश्री (स्वर्गीय) मोहनलाल जी पाण्डेयक स्मृतिमे हमरा द्वारे स्थापित कएल गेल अछि. दिनांक 20.06.2002 क गंगा दशहराक दिन वैदिक मंत्रोच्चारणक संग एकर प्राण प्रतिष्ठा कएल गेल. अइ तरहे ऋष्यश्रृंग महाराज सेहो एतए स्थापित भ’ चुकल छथिन. हुनकर संबंध मे ई गवेषणात्मक पोथी प्रकाशित भ’ चुकल अछि. आब दोसर शोध कार्य, अध्ययन आदि चलैत रहए, ऐ लेल भूमि, भवन आ वित्तक आवश्यकता अछि, जेकरा पूरा करै लेल मंदिर न्यास सँ अनुरोध कएल जा चुकल अछि. ऋष्यश्रृंगः महाप्राज्ञः शान्तः शान्ताधिनायकः प्रज्ञानिमानी मूर्वाणि सफलानि कुरिस्वंगे. ऋष्यश्रृंगाय मुनये, विभाण्डक सुते वै नमः शान्ताधिपतयेसद्यः सद वृष्टि हेतये. पर्जन्य सूक्तक उपरका चारि लाइनक संग हम अप्पन पूर्वज ऋष्यश्रृंग केँ सादर प्रणाम करैत छी. विद्यान लेखक केँ साधुवाद दै छी आ सिया राम मय सब जग जानी करहु प्रणाम जोरि युग पानी. श्री गोपाल पंडित फाइव-236, सेक्टर-12, नोएडा-201301 लेखकीय ऋष्यश्रृंगक विराट व्यक्तित्वकेँ आंकब हमरा सन मंत्रहीन, क्रियाहीन आ तुच्छ प्राणी लेल कतेक संभव अछि, एकरा हम स्वयं बुझैत छी. मुदा संतोषक गप ई अछि जे अप्पन युगक अइ महान वेदपुरुषक जन्म जइ कौशिकीक तटपर भेल छल, ओइ तटक वासी हमहूँ छी. हमरो जनम ओइ कौशिकीक तटपर भेल अछि. हम सभ एक्के ठामक वासी छी. वन्ध्यानां पुत्रकर्ता त्वं सद्यो वृष्टि प्रदायिने. श्री विभांडकक पुत्राय कौशिकी तीर वासिने. अइ तरहेँ ऋष्यश्रृंगक संबंधमे किछु कहैक दायित्व हमरो अछि. हम अइ दायित्वक निर्वाह कतए धरि केलौं, ई विद्वान पाठक अइ ग्रंथक अनुशीलन क’ हमरा सूचित करैक कृपा करब. हमर ऋषिराज कोशी क्षेत्रक सांस्कृतिक संवाहक छल, मुदा सहिष्णु. उत्तर वैदिक कालमे विरोधी सभकेँ पराजित करै लेल ऋषिगण शास्त्र, शस्त्र आ शापक सहारा लैत छल. प्रायः सभटा ऋषि एहन केने अछि. मुदा ऋष्यश्रृंग एकर अपवाद छल. ओ कहियो शस्त्र नै उठैलक आ नै केकरो शाप देलक. ओ शास्त्रक अध्ययन, अध्यापन, अनुशीलन, कतेक रास यज्ञक संपादन, लोक कल्याण आ लोक मंगलमे अप्पन सम्पूर्ण जीवन लगा देलक. ई अछि कोशी अंचलक विभूति ऋष्यश्रृंगक गौरवोज्ज्वल वृतांत आ हुनकर द्वारा पुनर्जाग्रत श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) क संक्षिप्त परिचय. ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारबिसगंज, अररिया निवासी, सम्प्रति नोएडामे व्यवसायरत श्री गोपाल पंडितक ऋणी छी, जे तगादा पर तगादा भेज हमरासँ पोथीक रचना करेलक आ एकर संपादन केलक. हुनकर ममतामयी माता पार्वती देवीक सेहो आशीर्वाद हमरा भेटैत रहल. मधेपुराक वरिष्ठ अधिवक्ता आ साहित्यकार श्री शिवनेश्वरी प्रसादसँ अनवरत प्रेरणा भेटैत रहल आ सदिखन हुनकर देल गेल परामर्श अमूल्य सिद्ध भेल. कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मलेन, मधेपुराक सचिव आ कवि लेखक डा. भूपेंद्र नारायण यादव ‘मधेपुरी’ पोथीक पाण्डुलिपि अप्पन देख-रेखमे तैयार करेलक. ओ हम्मर भारकेँ हल्लुक क’ देलक. मित्रवर श्री भोला प्रसाद सिन्हा आ श्रीमती विमला सिन्हाक विदुषी आत्मजा डा. लीना सिन्हा, हमर विद्वान आत्मज डा. अरविन्द कुमार श्रीवास्तव आ हमर धर्मपुत्र श्री संजीव कुमार सिन्हा, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय आ ऋष्यश्रृंगक वंशज श्री एस.एन.त्रिपाठी. डी.सी.पी. राजस्थान पुलिस, जयपुर सेहो कतेक रास सामग्री द’ क’ अइ पोथीक विषय वस्तु विश्लेषण क’ बेसी गन्वेषणात्मक बना देलक. हम हुनका प्रति प्रेम आ स्नेह व्यक्त करै छी. ई सभ लोक अप्पन सारस्वत साधना सँ अइ कोशी अंचल केँ पल्लवित, पुष्पित आ हरित करैत रहए, यएह कामना अछि. ऋष्यश्रृंगक ससुर चम्पानगर, नाथनगर, भागलपुरक निवासी हम्मर सम्मानित समधि श्री चाँद बिहारी लाल आ हुनकर जमाता हमर जेष्ठ आत्मज आनंद कुमार श्रीवास्तव सँ बड रास महत्वपूर्ण तथ्यक जानकारी भेटल. हुनका प्रति हमर असीम स्नेह अछि. अइ पोथीमे जे दुर्लभ चित्र संलग्न कएल गेल अछि, ओ श्रीमती राजरानी पंडित आ हुनकर कनिष्ठ आत्मज श्री कामेश्वर सिखवाल आ ओइ फोटो सबहक फिनिशिंग आ कवर पृष्ठ हुनकर दोसर आत्मज श्री संजय सिखवाल, नोएडा तैयार केने अछि. एकर संगे अहि पोथीक मुद्रणक सबटा काज श्रीमती संगीता राजेश शर्मा (सिखवाल), शाहदरा, दिल्ली अप्पन देखरेखमे सम्पन्न करेने छथिन. हुनका प्रति हम हार्दिक आभार व्यक्त करै छी. सर्वोपरि हम परमपुरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री केशवानन्द पुरीजी महाराज महामंडलेश्वर (निरंजनी) क आभारी छी जे अइ पोथीकेँ मुद्रण पूर्व पढ़ि क’ एकर तथ्य प्रमाणिकतापर अप्पन मोहर लगाक’ हमर अप्पन स्नेहाशीष प्रदान केलक. हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’ कला कुटीर, अशेष मार्ग, मधेपुरा, बिहार-852111 विषय-सूची क्रम सं. विषय वस्तु सम्पादकीय लेखकीय प्रथम परिच्छेद अंग महिमा, प्राचीन निवासी, कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम दोसर परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक जन्म वृतांत, ब्रहमचर्य आ अध्ययन, अंग नरेश रोमपाद वृतांत, ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान, मालिनीमे वृष्टि आ पुत्रेष्ठी यज्ञ. तेसर परिच्छेद अयोध्या मे अश्वमेघ यज्ञ आ पुत्रेष्ठी यज्ञ चारिम परिच्छेद ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना, वेदक मंत्रदृष्टा ऋष्यश्रृंग, यजुर्वेदक विभाजन, माध्यन्दिन शाखा, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, सभ्यताक समन्वय, दक्षिणात्यमे तपस्या, श्रृंगवेरपुर वृतांत, पुण्याश्रममे द्वादश यज्ञ, महानदीक प्रगट होयब, वंश-विस्तार पांचम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम, सिद्धाश्रम, राजा जनकक आश्रम, भारद्वाज आश्रम, अगस्त्याश्रम, महर्षि अत्रिकक आश्रम, बाल्मीकि, वशिष्ठ, शौनक, सुतीक्ष्ण आदिक आश्रम. छठम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर स्थान) पौराणिक आ परवर्ती साक्ष् किरातक भूमि कुषाण वंशीय राजभर निषादक धरती मूर्ति स्थापना सिंहेश्वर मेला. सातम परिच्छेद उपसंहार परिशिष्ट पुत्रेष्ठी यज्ञ ऋष्यश्रृंगक सासुर मालिनी (इतिहासक आइनामे चम्पानगर) शंकराचार्य आ सिंहेश्वर (जगत प्रसिद्द शंकर मंडन मिश्र शास्त्रार्थ सिंहेश्वरमे) सहायक आ सन्दर्भ ग्रंथक सूची ऋष्यश्रृंग आ हुनकर आश्रमक स्मरण करैत पहिलुक परिच्छेद अंग महिमा प्राचीन अंगक निर्माणकेँ लऽ कऽ कतेक रास कथा प्रचलित अछि। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक, जतए शोभाशाली कामदेव अप्पन अंग छोड़ने छल, ओ अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। अयोध्यासँ सिद्धाश्रम जाए कऽ बाटमे राम-लक्ष्मणक संग विश्वामित्र एक राति गंगा आ सरयूक कातमे बितौने छल। ओतए शुद्ध अंत:करणबला महर्षि सबहक पवित्र आश्रमक परिचय दैत विश्वामित्र बाजल छल जे कहियो एतए भगवान शिव चित्तकेँ एकाग्र कऽ तपस्या करैत छल। ओइ काल कामदेव मूर्तिमान छल। ओ अप्पन देह धारण कऽ विचरण करैत छल। एक दिन भगवान शिव समाधिसँ उठि कऽ मरुद्गणक संग कत्तौ जा रहल छल। ओइ काल ओ दुर्बुद्धि हुनकापर आक्रमण कऽ देलक। भगवान शिव हुंकार कऽ हुनका रोकलक आ अवहेलनापूर्वक ओकरा दिस ताकलक। फेर तँ कामदेवक सभटा अंग हुनकर देहसँ जीर्ण-शीर्ण हुअए लागल। कठिन तापसँ दग्ध भेल कामदेव ओतएसँ भागि गेल। जइ ठाम पर कन्दर्पक देह पूरा तरहे नष्ट भेल, वएह प्रदेश अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। अंग देशक नामकरण ओतुक्का एकटा राजा अंगक नामपर भेल छल। आनव राज्य, जकर धूरी अंग छल, पाँच टा राज्यमे विभक्त छल, जकर नामकरण राजा बलिक पाँचटा पुत्रक नामपर भेल छल। आनवक अधिकारमे संपूर्ण पूर्वी बिहार, बंगाल आ उड़ीसा छल, जइमे अंग, बंग, पुण्ड्र, सुहा आ कलिंङ्क राज्य छल। अइ मे अंग एकटा बड़ शक्तिशाली जनपद छल। वाल्मीकि रामायणक मुताबिक सुग्रीव सीताकेँ ताकै लेल अप्पन वानर सैनिककेँ पूरबक देशमे भेजने छल,जइमे अंग सेहो एकटा छल। तइ कालमे अंगक विस्तार असीम छल। किएकि बलि पुत्र अंगक बाकी चारि भायक राज्यक सत्ताक केंद्र अंग राज्य छल। ई तथ्य सेहो विचारणीय अछि जे महाभारतक (शांतिपर्व, 296) मुताबिक, आदिकालमे चारि टा गोत्र छल, भृगु, अंगिरा, वशिष्ट आ कश्यप। ऋग्वेदक दोसर, तेसर, चारिम, छअम आ आठम मंडलमे जइ ऋषि सभकेँ मंत्र प्राप्त होइत अछि ओ अछि, गृत्समद, गौतम, भारद्वाज आ कण्व। आचार्य अश्वलायन अष्टम मंडलक वंशकेँ गोत्र द्योतक मानैत अछि, संग-संग अइ मंडलक ऋषिक प्रगाथा सेहो कहल जाइत अछि। हुनका अनुसार, अइ मंडलक पहिलुक सूक्तक ऋषि प्रगाथ छल जे स्वयं कण्व वंशी छल। अइ मंडलक एगारह वालखिल्य मिल कऽ कुल १०३ सूक्त कण्वक अछि। गौतम आ भारद्वाज अंगिरा वंशक मानल जाइत अछि आ कण्व सेहो अंगिरसेक अछि। अइ तरहेँ अइ पाँच मंडलमे अंगिरसक प्रधानता स्वयं सिद्ध अछि। अइ मंडलक ऋषि कुल अंगिरस, अंग द्वीपक ऋषि छल। स्वयं इंद्रक ऐरावत हाथी पदमर्दन कऽ देने छल, अइसँ तमसाएल दुर्वासा इंद्रकेँ शाप दऽ कऽ हुनका सत्ताच्युत कऽ देलखिन। इंद्र राजा बलिसँ सहायता मांगलक। राजा बलि इंद्रक संकेतपर देवलोकेपर अधिकार कऽ लेलक। बलि अंगद्वीपक राजा छल। ओ अप्पन पाँच शक्तिशाली पुत्रमे अंगक जनपद बाँटि हुनका सभकेँ ओइ ठामक राजा बना देलक। एकर बादो अंग असुर-सुर संस्कृतिक मुख्य केंद्र छल। ऋग्वेदसँ स्पष्ट ज्ञात होइत अछि जे अंगिरस आ हुनकरे वंशज यज्ञ कर्मक जनक छल। ओ अइ रहस्यक पहिलुक ज्ञाता छल जे यज्ञाग्नि काष्ठमे निहित छल। अइ तरहेँ अंगिरिस सभ अग्निक प्रयोगसँ सभसँ पहिलुक यज्ञोत्सवक नींव देने छल। प्राचीन भारतमे जे सोलह महाजनपदक चर्चा अछि, ओइमे अंग प्रमुख छल। शेष महाजनपद छल,मगध, काशी, कौशल, बज्जि, मल्ल, वत्स, चेदि, पांचाल, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति,गान्धार आ कम्बोज। अंग आ मगधमे निरंतर संघर्ष चलैत रहैत छल। बुद्ध कालमे मगधक राजा बिम्बसार अंगकेँ जीत कऽ मगधमे मिला लेने छल। अंग वा अइ पूर्वी प्रदेशक लोग आ राजतंत्र ब्रााह्मण ग्रंथमे व्रात्य नामसँ जानल जाइत अछि। व्रात्यक शाब्दिक अर्थ अछि व्रतकऽ धारण करैबला मुदा एतए एकर प्रयोग बड़ गर्हित अर्थमे भेल अछि। एकर तात्पर्य अछि अनार्य, वैदिक कर्मकांड विरोधी आ वर्णसंकर। सावित्री आ उपनयनसँ भ्रष्ट द्विजातिकेँ मनुस्मृतिमे ब्राात्य कहल गेल अछि। द्विजात्य: सवर्णास्त जनयन्तवुतास्तयान। तान सावित्री परिभ्रष्टान व्रात्यानिति विनिर्दिशेत।। मनुस्मृति 10/20 महाभारतमे व्रात्यकेँ पातकी कहल गेल अछि। एकरा मुताबिक, व्रात्यकेँ आग लगाबैबला, विष दैबला,मदिरा बेचैबला, कुसीद भक्षण करैबला, मित्र द्रोही, भ्रूण हत्यारा, व्यभिचारी आ ब्रह्मघाती कहल गेल अछि। अइ तरहेँ व्रात्यकेँ ब्रााह्मण ग्रंथमे पतित कहल गेल अछि। वेदमे सेहो अइ ठामकेँ बड़ हेय दृष्टिसँ देखल गेल अछि। ऋग्वेदक प्रमगन्द शब्द अंग भंग आ मागध लेल प्रयुक्त भेल अछि। मागधकेँ वेदमे कीकट कहल गेल अछि। एहन लागैत छै जे संपूर्ण पूर्वी प्रदेश कोनो सांस्कृतिक अभिशापक आगिमे झुलसि रहल अछि आ वैदिक राजनीतिक शिकार बनि गेल अछि। अइ ठामक लोकक लेल चुनल-चुनल खराब शब्दक प्रयोग करैमे नै तँ वेद मंत्रकार पाछाँ रहल आ नहिये महामुनि व्यासे। ऋग्वेदमे एकटा ऋषि इंद्रसँ प्रार्थना करैत अछि, मगधक गाय कोन काजक अछि जकर दूध यज्ञमे अहाँक काज नै आबैत अछि। (यानि कीकटक गायक दूध सेहो अपवित्र अछि आ ओकरासँ यज्ञ कर्म करैक लेल वर्जना अछि) सोमरसक संग मिल कए ओ दूध यज्ञपात्रकेँ गर्म नै करैत छै। तइसँ हे इंद्र! ओइ नैचाशाख प्रमगन्दक (निचला शाखाक अंग बंग आ मागध) ओ धन हमरा दिअ। अथर्ववेद तँ एक डेग अओर आगू अछि। अथर्ववेदक एकटा ऋषि कहैत अछि, जेना मनुख आ उपभोगक अन्य सामान एक ठामसँ दोसर ठाम भेजल जाइत अछि, ओइ तरहेँ ज्वरकेँ गन्धार भूजवान,अंग, मगध प्रदेशमे भेजि देल जाइत अछि। आखिर वेद ब्रााह्मण ग्रंथकेँ अइ प्रदेशपर एतेक कोप किए अछि? आउ, विचार करी। ब्रााह्मण द्वारा विनिर्मित जइ यज्ञ-योगादि क्रियाक उदय सप्त सिंधुक घाटीमे भेल, बड़ जोर मारलाक बादो ई विधि-क्रिया भारतक अइ पूब क्षेत्रमे अप्पन जड़ नै जमा सकल आ ने ब्रााह्मणवाद आ ब्राह्मण विचारधारा अइ भागमे अप्पन सत्ता काएम कऽ सकल। किएकि व्रात्य आर्य भेलाक बादो वैदिक कर्मकाण्ड, पशु हिंसाबला यज्ञ आ बड़ खर्चबला विधि कर्मक विरोधी छल। ब्रााह्मण अपनो अइ धरतीपर बसै लेल नै चाहैत छल। एतुक्का निवासी स्वतंत्र विचारक, ज्ञानी आ तपस्वी छल। ओ अपन आचरण, व्यवसाय आ संस्कृतिपर ब्रााह्मणक छाया धरि सहन करै लेल तैयार नै छल। जे कोनो ब्रााह्मण तपस्वी तपस्याक लेल अइ क्षेत्रमे छल, सेहो कमलक तरहेँ जलसँ ऊपर छल। हुनका एतुक्का व्रात्यसँ कोनो संपर्क नै छल। स्वयं ऋष्यश्रृंङ्ग लऽ कऽ रामायणकार वाल्मीकि कहैत अछि- सदिखन पिताक संग रहैसँ विप्रवर ऋष्यश्रृंङ कोनो दोसराकेँ नै जानैत छल।" अइसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण ऋषि जन-सामान्यक संपर्कसँ अपनाकेँ अलग राखैत अछि। कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम विश्वामित्र सेहो तपस्याक लेल अइ पूर्वी इलाकाकेँ चुनने छल। कोशीक कातपर ओ बड़ कठिन तपस्या केने छल जइसँ सृष्टिक मूलचक्रे हिल गेल छल। एहन भूभागमे कतेक तत्वज्ञानी क्षत्रिय-ब्रााह्मण केर चलाएल गेल विधि क्रियाकेँ त्यागब प्रतिष्ठित करैपर जोर देलक। अइ भागक पिछड़ल आ गरीब जनताक लेल ई नब आ क्रांतिकारी मार्ग-पद्धति अनुकूल सिद्ध भेल। चारू दिस नदीसँ आच्छादित अंगक ई उत्तरबरिया हिस्सा, घना जंगलसँ परिपूर्ण छल। एकर रमणीयता सेहो अद्वितीय छल। तइसँ महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक नामक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ भूभागकेँ नीक बुझने छल। ब्रााह्मण ग्रंथक मुताबिक, राजा बलि अंगक शासक छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर स्त्री सुदेक्षणा दीर्घतमा नामक ऋषिसँ पाँचटा पुत्रकेँ जन्म देलक। ई ऋषि आन्हर छल। महाभारतक मुताबिक, ई ऋषि सभ लोकक सोझाँमे स्त्री संभोग करैत छल। हुनकर पिता छल उत्तथ,जिनकर स्त्रीकेँ वरुण भगा कऽ लऽ गेल आ हुनका संग संभोग करलक। बादमे वरुणकेँ दंडित कऽ उत्तथ अप्पन स्त्रीकेँ वापस आनि सुखपूर्वक रहए लागल। गर्हित पौराणिक मिथकीय कथा जाल आ ओकर टीकाकार, भाष्यकार, रचनाकारसँ बचैत ई कहएमे कोनो संकोच नै अछि जे पूरा अंगक वासी आ राजतंत्र आर्य आ अनार्य संस्कृतिक संगमपर फल-फूलि रहल छल। विभिन्न जाति, विचार आ संस्कृतिसँ समन्वित ई इलाका प्राचीन षोडश महाजनपदमे प्रमुख छल। वैदिक ग्रंथमे जलाशय, जल आ धारक प्रशस्ति अछि। ऋग्वेदमे तँ कतेको ऋचामे ई अछि। जलक पवित्रता प्राकवैदिक अछि यानी आर्यकेँ आबएसँ पहिनेसँ अछि। एकर जीवात्मा आ उर्वरतासँ गहींर संबंध अछि। तइसँ महर्षि कश्यपक तेजस्वी पुत्र विभाण्डक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ कोशिकाच्छादित भूभागकेँ सभसँ उपयुक्त बुझलक। तीर्थ तपस्याक लेल नै होइत अछि। तीर्थक प्रथा तँ अनार्य स्रोतसँ ग्रहीत भेल अछि। हिन्दूक सभटा तीर्थ आर्यक मूल स्थानसँ बाहरक अछि। आर्यक आगमनसँ पहिने एतुक्का धर्ममे तीर्थ छल। आर्यक सम्मिलन स्थल यज्ञ छल आ अनार्यक तीर्थ। ई तीर्थ शब्द सेहो वेदवाह्य अछि किएकि वेद विरोधी मतकेँ तैर्थिक मत कहल जाइत अछि। तइसँ तपस्याक लेल तीर्थ नै, अरण्य आ पवित्र धारक कात सभसँ उपयुक्त अछि। तइसँ व्रात्यक भूमि भेलाक बादो महर्षि विभाण्डक उत्तरबरिया अंगक सघन अरण्य क्षेत्रमे कौशिकीक धारक कातमे अप्पन आश्रम बनेने छल। कोशी एकटा पौराणिक धार अछि। एकर कातमे साक्षात भगवान शंकर बसै छै। इंद्र, विष्णु आ ब्रह्मा केँ भगवान शिवसँ भेंट करहि कऽ पूर्व, निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम ई कोशीक मनोरम तीर अछि। अप्पन बहिन कौशिकीक संबंधमे स्वयं विश्वामित्र कहैत अछि, दिव्य पुण्योदकारम्या हिमवन्तमुपाश्रिता। लोकस्य हित कार्यार्थो प्रवृत्ता भगिनी मम।। अप्पन बहिनक प्रति स्नेहक कारण अइ काजमे विश्वामित्र निअमसँ बड़ सुखसँ निवास करैत छल। ओ यज्ञसँ जुड़ल अप्पन निअमक सिद्धिक लेल अप्पन बहिन कौशिकीक सानिध्यकेँ छोड़ि सिद्धाश्रम आएल छल। अइ कौशिकीक कात विश्वामित्र सहस्र बरख धरि घनघोर आ अतिशय कठोर तपस्या केने छल जइसँ सभटा सृष्टि चक्र हिल गेल छल। कौशिकी तीर मसाध तपस्तेपे सुदारुणम तस्य वर्ष सहस्त्रणि घोरं तप उपासते। रामायण 1-34-25 वाल्मीकि रामायणमे कतेको बेर कौशिकी सरितां वरा (सभ धारमे श्रेष्ठ कौशिकी) बालकाण्ड श्लोक 11,कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलो द्योतकारी इव (धारमे श्रेष्ठ कौशिकी सेहो अप्पन कुलक कीर्ति केँ प्रकाशित करैवाली छथिन। श्लोक 21) जेहन उक्ति आएल अछि, जइसँ पुण्य सलिला कोशीक महिमा रेखांकित होइत अछि। तइसँ कश्यप पुत्र महर्षि विभाण्डकक तपस्या लेल कोशीक कात सभसँ उपयुक्त छल,जतए विश्वामित्र कठोर तपस्या कऽ कतेक रास सिद्धि प्राप्त केने छल। धारक कात सुदूर धरि फैलल पैघ पाथरक अद्भुत श्रृंखला सेहो विद्यमान छल, जे कोशीक तीव्र धारकेँ नियंत्रित करैत छल। लगभग साढ़े सात हजार बरखक भौगोलिक परिवर्तनक परिणामस्वरूप ओ पाथरक (चट्टान) श्रृंखला जमीनक भीतर गहींरमे चलि गेल आ ओकर ऊपर माटिक मोटका परत जमैत गेल। वेगवती नदी, विशाल चट्टान, रमणीय प्रकृति, समिधा बाहुल्य, आैषधियुक्त वनस्पतिसँ आच्छादित अरण्य आ कुलांच भरैत मृगादि वन्य पशु, एहन शांत स्थानमे छल विभाण्डक ऋषिक आश्रम, कोशीक धारक कज्जल वनमे। कोशी आ ओकर छाड़न धारक कातपर अप्पन सघनताक लेल प्रसिद्ध कज्जल वन स्थित पुण्याश्रम पूरे आर्यावर्तमे प्रसिद्ध छल। ई क्षेत्र असुरक प्रभावसँ सेहो मुक्त छल। तइसँ एतए कऽ ऋषि आश्रम निरापद छल। एतए निर्विध्न वेद पाठ चलैत छल आ आश्रमवासीक समए समिधा संचय, अग्निहोत्र आ कृषि काजमे व्यतीत होइत छल। ई आश्रम ऋषि आ कृषि परंपराक अद्भुत संगम स्थल छल। भूमि बड़ उर्वरा छल। महर्षि विश्वामित्र अप्पन कालक महान कृषि वैज्ञानिक सेहो छल। हुनकर तपस्या आ प्रयोग स्थल कोशीक मनोहर तट सेहो छल। पूरा इलाका वन्य पशुक अभ्यारण्य छल। विश्वामित्र केर अप्पन कठोर तपस्यासँ ऊर्जावान बनाएल इलाका मुनि विभाण्डक लेल सर्वथा उपयुक्त छल। अप्पन वंश परंपराक अनुरूप ओ सेहो विपुल प्रतिभाक पुंज छल। महर्षि व्यास हुनकर वंश परिचय एना देने अछि:- मरीचि: मनसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्कारश्यप: जात: तस्यसुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ तस्य पुत्रोस्ति।। ब्रह्माक मानस पुत्र मरीचक पौत्र विभाण्डक छल। उच्च वंशोद्भव ई ऋषि वेद विहित संस्कारसँ संपन्न छल। कोशीक कातक ई कज्जल वन हुनकर साधना तपस्याक लेल पूर्ण उपयुक्त आ निरापद छल। अति प्राचीन कालमे (महाभारत, पुराण, वराहमिहिर आ भास्काराचार्यक मतानुसार) भारत नौ खंडमे विभक्त छल। ई खण्ड छल, इंद्र, कसेरुमत, ताम्रवर्ण, गभस्तिमत, कुमारिक, नाग, सौम्य, वरुण आ गान्धर्व। पौराणित साक्ष्य आ एकर पहचानक जे संकेत भेटल अछि, ओकर मुताबिक पूर्वी भारतक ई क्षेत्र इंद्रखण्ड छल। अइ क्षेत्रपर इंद्रक विशेष कृपा छल। तइसँ ई सदिखन हरिअर फल-फूल आ धान्यसँ संपन्न क्षेत्र छल। धार सदानीरा छल। ऋग्वेदमे अंगक उल्लेख नै अछि। तइसँ एहन लागैत अछि जे उत्तर वैदिक कालमे अंग जनपदक उदय भेल अछि। ऋग्वेदमे कीकट शब्दक प्रयोग भेल अछि जेकरा मगध आ अंग क्षेत्रक लोक लेल प्रयोगमे आनल गेल हएत। मुदा कतेक रास आचार्य एकरा सप्त सिन्धुक पर्वतीय भाग लेल सेहो प्रयुक्त करैत अछि। जे भी भेल हुअए, रामायण युगक आर्य सभ्यता केर अइ क्षेत्रमे उदय भऽ चुकल छल। मुदा राक्षसी सभ्यता अओर आर्येतर वानरी सभ्यता एतए अप्पन जमीन नै बना सकल छल। अइ क्षेत्रमे स्थापित ऋषि आश्रम अध्ययन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रियाक संपादन लेल उपयुक्त छल। दोसर परिच्छेद ऋष्यश्रृङ्क जन्मक वृतान्त महाकाव्य, पुराण आ दोसर पुरना ग्रंथक निर्मल जलमे प्रक्षेपक शैवाल जाल कम नै अछि। प्रक्षेपमे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर क्षीर विवेचन निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। महाभारतक वनपर्वक 110 केर ई वृतांत विश्वसनीय भऽ सकैत अछि जे महर्षि विभाण्डक मृगिसँ संभोग केने छल। कतेक परवर्ती ऋषिकेँ लऽ कऽ एहेन चर्चा अछि। ऋषि दम सेहो मृगिक संग संभोग केने छल। मृगवेशमे अप्पन कनियाक संग रतिक्रीड़ा करैत एकटा ऋषि पांडुक द्वारा वध कऽ देल गेल छल, आदि। (आदि पर्व 118) मुदा, नहि तँ ई विश्वसनीय अछि आ नहिये कोनो चिकित्साशास्त्रक आधार पर तथ्यपरक अछि जे कोनो मृगिक पेटसँ मनुखक शिशु जन्म लेने अछि। ऋष्यश्रृंङ्ग केँ लऽ कऽ कतेक आधारहीन लोकोक्ति प्रचलित अछि। कतेक कथामे हुनका मृगिक पेटसँ जन्मल मनुखक नेनाक रूपमे देखाएल गेल अछि, जे पूरा तरहे भ्रामक अछि। महाभारत (शांतिपर्व 296) सँ ज्ञात होइत अछि जे वशिष्ठ, ऋष्यश्रृङ्ग, कश्यप, वेद, तांड, कृपाचार्य, कक्षिवत, कमठ, यवक्रीत, द्रोणाचार्य, आयु, मतंग, दत्त, द्रुमद, मात्स्य आदि ऋषि अशुद्ध योनीमे जन्म लऽ कऽ तपस्या कऽ मूल पिताक वर्णमे पहँुचल। ऐसँ ई स्पष्ट अछि जे ऐ सभ ऋषिक माय आर्येतर आ ब्रााह्णेतर स्त्री छली। तइसँ हुनका अशुद्ध योनि कहल गेल। मुदा कर्मक सिद्धांतक अनुसार, ओ ऋषि अप्पन कठोर तपस्या आ साधनाक बल पर अप्पन पिताक कोटिमे पहुँचल। ई स्मरण रहबाक चाही जे स्त्री योनीक बिना मनुखक संततिक उत्पति असंभव अछि। पुरना भारतक संस्कृतिमे आत्मसात आ समन्वयक प्रवृत्ति एत्ते प्रबल छल जे तहियौका दूटा आदिम समूह आर्य आ अनार्यक परवर्ती जुग मे ऐ तरहेँ परस्पर समन्वय भऽ गेल जे ओ अप्पन गुणक कर्मक अनुसार चारि वर्णमे बँटि गेल। पूर्व वैदिक कालमे आठ तरहक विवाह नै छल। ई उत्तरकालक देन अछि, जे सूत्रकाल धरि आबैत-आबैत पूरा तरहे संगठित भऽ गेल छल। तहियौका समाज विवाहक सभ रूप केर मान्यता देने छल। स्थापना उत्तर वैदिक कालमे बड़ प्रचलित छल आ ऐ समन्व्यवादी प्रवृत्तिक प्रवर्तक दूरदर्शी ऋषिगण छल। ई भारतीय समाजक उत्कर्षक द्योतक छल। महर्षि विभाण्डक उत्तर वैदिककालक ऋषि छल। कोनो संदेड नै जे हुनकर स्त्री आर्येत्तर नारी छल। हुनका गर्भसँ एकटा प्रखर शिशुक जन्म भेल जे ऋष्यश्रृङ्गक नामसँ विख्यात भेल अछि। “भागवत दर्शन"क मुताबिक, विभाण्डक त्यागी, तपस्वी, संयमी आ स्वाध्याय-परायण छल। एक दिन पोखरिमे ठाढ़ भऽ कऽ मुनि तप कऽ रहल छल। ओइ काल स्वर्गसँ उतरि कऽ उर्वशी ओतए नहाबै लेल आएल। हुनकर अनुपम रूप लावण्य देखि कऽ मुनिक मन विचलित भऽ गेल। ओ अपलक ओइ अप्सराक सौंदर्य देखैत रहल। अनजानमे हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। ओइ काल आश्रममे पलय बला एकटा हिरणी जल पीबय लेल आएल छल। ओ जलक संग ओइ अमोघ वीर्यकेँ सेहो पीब लेलक। ओ गर्भवती भऽ गेल। ओकर उदरसँ महामुनि ऋष्यश्रृङ्क जन्म भेल। कहल जाइत अछि जे ओ साधारण हिरणी नै छल। पूर्व कालमे ओ एकटा देवकन्या छल। कोनो पुण्यात्मा राजाकेँ देखि कऽ ओ हिरणी जकाँ अप्पन पैघ-पैघ आँखिसँ राजाक अनुराग पाबैक लेल हुनक विलोक कऽ रहल छल। ब्राह्माजी कन्याक ऐ अविनय व्यवहारकेँ देखि कऽ तमसा कऽ शाप दऽ कऽ मृत्य लोकक हिरणी बना देलक। शापमे आगू ई व्यवस्था देल गेल जे ओकर उदरसँ यशस्वी ऋषिक जन्म हएत, तखन ओ शापसँ मुक्त भऽ जाएत। वएह देवकन्या एतए हिरणी बनि कऽ रहए लागल। ओ अप्पन शापक खत्म हेबाक प्रतीक्षा करैत रहल। एक दिन उर्वशी ओम्हरसँ निकलल। जखन ओ अप्पन सखीकेँ हिरणीक रूपमे देखलक तँ ओइपर ओकरा बड़ रास दया आबि गेलै। ओ सोचए लागल जे कोन तरहेँ ओकर उदरमे ऋषिक शुक्राणु पहुँचए। ओइ काल पोखरिमे तपस्यारत विभाण्डक ऋषिपर उर्वशीक दृष्टि पड़ल। ओ लज्जा भरल भावकेँ देखाबैत पोखरिमे उतरल आ नहाबैक बहानासँ अप्पन समूचा अंगकेँ अनावृत करए लागल। विधिक विधान, मुनिक दृष्टि हुनकापर पड़ल। ओ कामातुर भऽ उठल आ हुनकर वीर्य स्खलित भऽ गेल। मृगी ओकरा पीब गेल आ एकटा पुत्रकेँ जन्म दऽ कऽ स्वर्ग सिधारि गेलि। मुनि विभाण्डक ओइ नेनाकेँ गो दूध पिया कऽ पालन-पोषण करए लागल। महाभारत आ श्रीमद्भागवतमे, विभाण्डक आश्रममे शापित देवकन्या मृगीक उदरसँ ऋष्यश्रृङ्गक जन्मक उल्लेख अछि। आजुक काल मे आदिवासी लोकमे पशुक नाम पर ओकर गोत्र जानल जाइत अछि, जेना डुंगडुंग (माछ), कच्छप (कछुआ), हांसदा (हंस) आदि। ओइ तरहेँ ऋष्यश्रृङ्गक मां मृग गोत्रीय आर्येतर कन्या छल। ओ एकटा रूपवती छल उर्वशी तरहे। तइसँ पुराणकार हुनका उर्वशीक सखिक तरहे उल्लेख केने छल। ऋष्यश्रृंगक मां केँ एकटा हिरण हेबाक एकटा मिथक अछि। ओ अयोनिज संस्कृतिमे जन्म लऽ कऽ ओकर नैसर्गिक गुण व रूप सौष्ठवक परिचायक छल। ओकर नाम मृगम्बदा छल। ओ रूपवती कन्या आषाढ़ पूर्णिमाक दिन एकटा महान शिशु केँ जन्म देलक जे संपूर्ण आर्यावर्तक तत्कालीन इतिहासकेँ एकटा नब धारा प्रदान कऽ गरिमा युक्त कऽ देलक। वाल्मीकि रामायणमे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक आ महर्षि विभाण्डक पुत्र सुप्रसिद्ध मुनि ऋष्यश्रृङ्ग भेला। शास्त्रक गहन अनुशीलनसँ एहन लागैत अछि जे ऋष्यश्रृङ्ग अप्पन पिताक संग वनमे रहैत छल आ वनमे हुनकर लालन-पालन भेल छल। कोनो पुरनका महाकाव्य, काव्य वा पौराणिक ग्रंथमे हुनकर माँक उल्लेख नै भेटैत अछि। प्राचीन आख्यानमे योनिज आ अयोनिज, ऐ दू तरहक जातक उल्लेख भेटैत अछि। योनि शब्दक अर्थ मूलत: “घर" होइत अछि आ पुरान ग्रंथमे ऐ अर्थमे एकर प्रयोग भेटैत अछि। जिनकर जन्म घरमे नै भेल अछि, ओ अयोनिज संतान अछि। सीता, शकुंतला, द्रौपदी आदि अप्पन माता-पिताक अयोनिज संतान अछि। यज्ञभूमि मे 'वामदेव्यव्रत" केर उत्पन्न नेना सेहो ओइ कोटिमे आबैत अछि। जइ नेनाक जन्म अप्पन घरमे भेल ओ योनिज कहाबैत अछि। हम्मर विचारसँ ऋष्यश्रृंङ्ग अप्पन पिताक योनिज आैरस संतान छल। जन्मक पश्चात ऋषि अप्पन नेनाकेँ आर्येतर माँ सँ अलग कऽ विद्याध्ययन केर अप्पन तपोस्थलीमे राखलक। एकटा दोसर वृतान्तक मुताबिक, शिशुकेँ जन्म दऽ कऽ माँ स्वर्ग सिधार गेलि। तइसँ पिता विभाण्डक अपना लग राखि कऽ शिशुक लालन-पालन आ सभटा संस्कार देलक। महर्षि विभाण्डक ब्राह्माक मानस पुत्र मरीचिक वंश परंपरामे परम तेजस्वी आ वेद केर प्रकांड पंडित छल। महर्षि व्यास एकर वर्णन एना केने अछि, मरीचिॅ मानसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:। मश्यपात्काश्यप: जात: तस्य सुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ्ग तस्य पुत्रास्ति।। महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृङ्गक छह बरखक आयुमे उपनयन संस्कार करा कऽ यज्ञोपवीत धारण करौलक आ वेद विधिसँ वेदारंभ संस्कार कऽ गायत्री मंत्र प्रदान केलक। ब्राह्मचर्य धारण करा कऽ ब्राह्मचारी कठिन व्रत, तप, स्वाध्याय, प्रात: सायं गायत्री जप आदि कराबैत वेदक अध्ययन करौलक। ब्रह्मचर्य एवं अध्ययन श्री भागवत दर्शक अनुसार, विभांडक सोचैत छला जे अप्सरा उर्वशीक देखलेसँ हुनकर तेज नष्ट भेल। तइसँ ओ अप्पन नेनाकेँ गलतीयोसँ कोनो स्त्रीक दर्शन नै कराएत। ओकरा विशुद्ध ब्रह्मचारी बनाएब, ई सोचि कऽ ओ अप्पन नेना ऋष्यश्रृंगकेँ आश्रमसँ बाहर नै जाइले दै छल। ओ हुनकासँ तप, अग्निहोत्र कराबैत छल, वेद पढ़ाबैत छल आ पैघ-पैघ ऋषिकेँ छोड़ि कऽ ओकरा केकरोसँ भेँटो नै करऽ दै छल। स्त्रीकेँ तँ ओ अप्पन आश्रमक परिधि धरिमे पएरो नै राखऽ लेल दै छल। कोनो बूढ़ ऋषिक स्त्री सेहो ओतए नै आबि सकैत छल। आबैक गप तँ दूर, ओ अपन नेनाक आगू कोनो स्त्रीक नाम धरि नै लैत छल। ऋष्यश्रृंग जानितो नै छल जे मुनिक अलाबे कोनो अओर स्त्री-पुरुख होइत अछि। ओ नै तँ कोनो नग्र देखने छल आ नहिये नग्रक कोनो वस्तुए। ऋष्यश्रृंगक समय अग्नि आ अप्पन तपस्वी पिताक सेवामे बितैत छलै। स्त्रीक अस्तित्वक तँ हुनका पतो नै छलनि। तकर बादो ओ वेदक परगामी विद्वान छल। रामायणकार हुनका शक्तिशाली महर्षि कहने छथि। हुनका विषय-सुखक कनियो टा ज्ञान नै छल। ओ अखंड ब्रह्मचारी छल। अप्पन समाजमे एहन मान्यता अछि जे बच्चा सभकेँ विषय-सुखक कनियो ज्ञान नै दियौ तखने ओ पक्का ब्रह्मचारी बनि सकैत अछि। ई विचार प्राकृतिक निअमक विपरीत अछि। ऐ ढोंगसँ जइ दुर्गक रक्षा कएल जाइत अछि, ओ बड़ आसानीसँ शत्रुक हाथ मे चलि जाइत अछि। ऋष्यश्रृंग वृतांत सेहो एहने अछि। हुनकामे काम चेतना सुप्त छल, ओकर संबंधमे रामायणकारक ई टिप्पणी द्रष्टव्य अछि।– “राजन! लोकमे ब्रह्मचर्यक दूटा रूप विख्यात अछि आ ब्रााह्मण सदा ओइ दुनू स्वरूपक वर्णन केने अछि। एक तँ अछि दंड, मेखला आदि धारण रूप बला मुख्य ब्राह्मचर्य आ दोसर अछि ऋतुकालमे स्त्री समागम रूप गौण ब्रह्मचर्य। ऋष्यश्रृंग जेहन महात्मा ऐ दुनू प्रकारक ब्रह्मचर्यक पालन केने हएत।" अप्पन विद्वान पिताक कठोर अनुशासन मे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग कतेक रास व्यवहारिक ज्ञान सेहो प्राप्त केने छल। कौशिकीक तट पर निवास करबाक कारण एकर जलक समुचित उपयोग आ व्यवस्थामे हुनका विशेषज्ञता प्राप्त छल। आश्रमक चारू कात ओहिना नदीक जल-प्रवाहकेँ व्यवस्थित कऽ ओ रंग-बिरंगक फूल-मूल उपजाबै छल, सेहो पर्याप्त मात्रामे। वाल्मीकि रामायणक बालकांडक “चित्राण्यत्र बहूनिस्र्यमूलानि च फलानि" 10/27 मे उपयुक्त गप रेखांकित अछि। अंग नरेश रोमपाद वृत्तांत ओइ काल रोमपाद अंग प्रदेशक नरेश छल। ओ राजा दशरथक मित्र छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर दुख देखि कऽ दशरथ अप्पन पहिलुक रानी कौशल्याक गर्भसँ उत्पन्न शान्ता नामक पुत्रीकेँ हुनकर पुत्रीक रूपमे दऽ देने छल। रोमपाद शान्ताकेँ पुत्रीक रूपमे पाबि नेहाल भऽ गेल छल। ओकर लालन-पालन महाशक्तिशाली अंग नरेशक राजकीय गरिमाक अनुरूप राज प्रासाद मे भेल। राजा रोमपाद ययाति वंशक क्षत्रिय छल। “वंशोमन्मन्तरानि च" कऽ मुताबिक, पुराणमे ऐ वंशक राजाक संबंधमे सूचना अछि। विष्णुपुराण 4/18 क मुताबिक, ययातिक चारिम पुत्र “अनु" केँ तीन पुत्र भेल, समानल, चक्षु आ परमेषु। ई वंश अनुवंश कहैलक। समानलक पुत्र कालानल भेल आ कालानलक सृंजय, संृजयक पुरंजय, पुरंजयक जनमेजय, जनमेजयक महाशाल, महाशालक महामना, महामनाक उशीनर आ तितिक्षु नामक दूटा पुत्र भेल। उशीनरक शिवि, नृग, नर, कृमि आ वर्म नामक पाँचटा पुत्र भेल। ऐ मे शिविक वृषदर्भ, सुवीर, केकय आ मद्रक नामक चारि टा पुत्र भेल। विविक्षुक पुत्र रूशद्रथ भेला। हुनकर हेम, हेमक सुतपा अओर सुतपाकेँ बलि नामक पुत्र भेल। ऐ राजा बलिक रानी सुदेक्षणासँ आन्हर ऋषि दीर्घतमा पाँच पुत्रकेँ जन्म देलक, जे अंग, बंग, कलिंग, पुण्ड्र आ सुहा भेल। राजा बलिमे पुत्र उत्पन्न करबाक क्षमता नै छल। हुनकर प्रथम पुत्र अंगसँ अनपान, अनपान सँ दिविरथ, दिविरथसँ धर्मरथ आ धर्मरथसँ चित्ररथक जन्म भेल। ऐ चित्ररथक दोसर नाम रोमपाद छल। श्रीमदभागवतक अनुसार, वस्तुत: शान्ता महाराज दशरथ आ कौशल्याक पुत्री छल आ अंग नरेश रोमपाद दशरथक सखा छल। “भवभूति" सेहो अप्पन “उत्तर रामचरित..." मे ऐ गपक उल्लेख केने अछि। कन्या दशरथो राजा शान्ता नाम व्यजीजनत। अपत्य कृतिका राज्ञे रोमपादाय या ददौ।। उत्तर रामचरित प्रथमांग अपत्य शब्द संतान लेल प्रयुक्त होइत अछि आ कृतक (स्त्रीलिंग कृतिका) केर अर्थ अछि कृत्रिमा। ऐसँ स्पष्ट अछि जे शान्ता राजा रोमपादक कृत्रिम (दत्तक) पुत्री छल। ऋष्यश्रृंगक मालिनी प्रस्थान रामायणमे रोमपादकेँ महाप्रतापी आ बलवान राजा कहल गेल अछि। एहन कहल गेल अछि जे ऐ राजाक धर्मक उल्लंघनक कारण हुनकर राज्य मे घोर अनावृष्टि भऽ गेल छल। ऐसँ जनता भयभीत भऽ गेल। मालिनी सेहो गंगा कात अवस्थित छल। अंगमे जल संसाधनक प्रचुरता छल। तकर बादो जलक समुचित उपयोग नै हेबाक कारणसँ अकालक स्थिति आबि गेल छल। राजा ऐ लऽ कऽ बड़ दुखी छल। ओ एकर निवारणक लेल वेदज्ञ पंडितसँ मंत्रणा केलक। सभटा पंडित, सर्वमतसँ अनुशंसा केलक जे महर्षि विभाण्डक पुत्र ऋष्यश्रृंग वेदक पारगामी विद्वान अछि। हुनका कोनो तरहे ऐ राज्यमे बजा कऽ नीकसँ सत्कार कएल जाए आ वैदिक विधिक अनुसार अप्पन कन्या शान्ताक ब्याह कऽ देल जाए। दूरदर्शी राजा रोमपाद सहर्ष ऐ प्रस्तावक अनुमोदन कऽ देलक। मुदा हुनका ऐ गपक चिंता छल जे ऐ शक्ति संपन्न ऋषिकुमारकेँ कोना ओतए आनल जाए? ओ अप्पन मंत्री आ पुरोहितकेँ पठा ऋष्यश्रृंगकेँ सत्कारपूर्वक मालिनी अनबाले चाहै छल। मुदा ऐ दबंग ऋषिक स्वभावकेँ ओ जानैत छला तइसँ ओ राजाकेँ स्पष्ट कहि देलनि जे ओ ऐ ऋषिसँ डरैत अछि, तइसँ हुनका ई कार्य नै देल जाए। तकर बादो मंत्रीगण सोचि-समझि राजाकेँ जे उपाय बतौलखिन, ओकरा करएमे कोनो दोष नै छल। संगे-संग ऐ कार्यमे कोनो विध्न-बाधा अएबाक कोनो संभावना सेहो नै छल। वनचर जीवन व्यतीत करऽ बला ऋषिकुमार श्रृंग कहियो कोनो स्त्री केँ नै देखने छल। ओ स्त्रीकेँ चिन्हितो नै छल आ विषय सुखसँ अनभिज्ञ छल। एहन कठोर चित्तकेँ मथि दैबला मनोवांछित विषयक प्रलोभन दऽ कऽ हुनका मालिनीमे अनबाक योजना बनए लागल। ऐ योजनाक सफलताक लेल तय कएल गेल जे सुंदर आभूषणसँ विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्या ऋष्यश्रृंग कतय जा कऽ अनेकानेक उपायसँ हुनका लोभा कऽ मालिनी आनए। राजाज्ञासँ एहने व्यवस्था कएल गेल। कतेक रास नाओकेँ जोड़ि कऽ बेड़ा बनाओल गेल। ओकरा मनोरम पातसँ सजाओल गेल। नाओमे कतेक रास मिष्ठान आ मधुर फल राखल गेल। नगरक मुख्य-मुख्य रूपवती वेश्याकेँ सभ मंत्रणासँ अवगत करेलाक बाद जलमार्गसँ आश्रम दिस पठा देल गेल। आश्रमसँ कनी दूर ठाम कोशीक पावन कात बेड़ा रोकि देल गेल। वेश्या ओतएसँ ऋषिकुमारसँ मिलय कऽ उपाय करए लागल। अंतर्मुखी स्वभावबला ऋष्यश्रृंग बड़ धीर-गंभीर छल। हुनका अप्पन पिताक सानिध्य बेसी सुखकर लागैत छल। यएह कारण छल जे ओ आश्रमसँ बाहर नै कऽ बराबर निकलैत छल। ओ एत्ते एकांतशील व्यक्ति छल जे वन मे रहि कऽ अप्पन पिताक अलावा स्त्री सभक गप तँ छोड़ू, कोनो दोसर पुरुख धरि केँ नै देखने छल। तखैन भला ऐ ऋषिमे चेतना कोना आैतिऐ? कोनो अज्ञात प्रेरणासँ ऋषिकुमार घुमैत-फिरैत कोशीक ओइ धारक कात पहुँचल, जतए रूपवती वेश्याक बेड़ा ठाढ़ छल। मंद-सुगंध पवनक संग मीठ आवाजमे संगीत सुनाइ दऽ रहल छल। अगरू धूम आ दोसर सुगंधित द्रव्यसँ वातावरण बड़ रमणीय भऽ रहल छल। ऋषिकुमार सुन्नर वेश आ बड़ आकर्षक रूपवाली वनिता सभकेँ देखलक। ऋषिकुमारकेँ अप्पन एतए आएल देखि कऽ वनिता सभ हर्षोत्फुल भऽ गेल। ओ मंद मानक स्वरमे गाबैत ऋषिकुमार लग आएल। ऋषिकुमार सेहो हतप्रभ छल। वनिताक कल्पना तँ ओ केने नै छल। हुनका भान भेल जे ई ऋषिगणे अछि, जे कोनो दोसर लोकसँ आएल अछि। एखैन धरि ओ स्त्री केँ देखने नै छल तँ ओकरा संबंधमे ओ की सोचतिऐ? वनिता हुनकर सत्कार केलक आ स्नेह प्रदर्शित करैत कहलक, हे ब्रााह्मण! अहाँ के छी? की करैत छी? स्त्रीक कमनीयता देखि कऽ ऋषिकुमार मंत्रमुग्ध छल। हुनकर अंतर्मनसँ स्नेहक धारा फूटए लागल। ओ अप्पन पिताक आ अप्पन परिचय देलक। ऋष्यश्रृंग बाजल जे महर्षि कश्यप वंशक महर्षि विभाण्डक हमर पिता छथि। भूमंडलमे प्रसिद्ध छथि। ठामे हमर आश्रम अछि। अहाँक दर्शन हमरा लेल कतेक रास सुखक मूल अछि। अहाँ सभ देखयमे बड़ सुनर छी आ देह सँ आभा सेहो फूटि रहल अछि। अहाँ सभकेँ हम प्रणाम करैत छी। ऋषिकुमार वनिताकेँ अप्पन आश्रम लऽ कऽ आएल। संजोगवश हुनकर पिता आश्रममे नै छल। ऋषि हुनका ऋष्योचित सत्कार आ विधिवत पूजन कऽ कन्दमूल फल-फूल दऽ कऽ संतुष्ट केलक। वनिता सभकेँ ऋषिकुमारक पिता विभाण्डकक एबाक डर सेहो लागि रहल छल। तइसँ ओ तुरंत आश्रमसँ जाइ लेल उत्सुक छल। ऋषि कुमारक पूजा आ फलक उपहार स्वीकार कऽ वनिता हुनका पर्याप्त आत्मसंतुष्ट केलक। संगे-संग अप्पन संग आनल मिष्ठान आ फल सेहो ऋषिकुमारकेँ भेंट केलक। ओ जल्दीसँ ओकरा खाइ लेल अनुरोध केलक। ऋषि ऐ पदार्थ आ फलकेँ खा कऽ अपूर्व सुखक अनुभव केलक। किछु कालक लेल ओ स्वर्गिक आनंदमे डूमि गेल। वनिता सभ हर्षसँ भरि हुनकर आलिंगन केलक आ कतेक रास फल आ भांति-भांतिक मधुर देलक। ऋषि कुमार मधुरकेँ फल बुझि कऽ खा लेलक। किएकि ओ वनमे रहैत कहियो मधुर नै खेने छल, तइसँ ओ ओकर रसास्वादनसँ अनजान छल। भला सदिखन वनमे रहएबला लोककेँ एहन पदार्थक स्वाद लेबाक अवसर कतए अछि। एकर बाद महर्षि विभाण्डकेँ एबाक आशंकासँ डरल वनिता व्रत आ अनुष्ठानक बहाना बना कऽ अप्पन वेड्रापर घुरि गेल। मुदा ऋषि कुमारकेँ गाढ़ालिंगनमे भरि चतुर वनिता हुनका मनमे कामदेवक विजयी दुन्दुभिकेँ बजा देलक। चिरकालसँ सुप्त भावना एक-एक कऽ जागए लागल। ऋषि ओइ वनिता सभक जाइक पश्चात दुखमे डूमि गेल आ इम्हर-उम्हर टहलय लागल। नै नीन, नै चैन, ऋषि कुमार ओइ कमलमुखी वनिताक चिंतनमे डूमल रहल। दोसर दिन शक्तिसंपन्न ऋष्यश्रृंग बेर-बेर ओइ वनिताक संबंधमे सोचैत-विचारैत अपनेसँ ओइ बेड़ा लग पहुँचल जतए वेश्या हुनकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल। ऋषि कुमार आकर्षक डोरमे बन्हि अपनेसँ उपस्थित भऽ गेल। वेश्या पहिनेसँ तैयार छल। ऋषिकुमार हुनकर रूपाकर्षणक जालमे फँसि चुकल छल। वनिता सभ अप्पन स्वरमे रस घोरैत बाजल- सौम्य! हमर आश्रमपर चलू। एतए कतेक रास फल-फूल अछि, मुदा ओतए सेहो ऐ पदार्थक कोनो अभाव नै अछि। ई कहि वनिता हुनका अप्पन बेड़ामे बैसा लेलक आ भरि बाट ऋषिकुमारक मनोविनोद करैत अंगक राजधानी मालिनी लऽ आनलक। जीवनमे पहिल बेर ऋष्यश्रृंग कोनो नगरकेँ देखलक। हुनक नगरमे प्रवेश करते इंद्र पूरा जगतकेँ प्रसन्न करैत पानि बरसाएब शुरू कऽ देलक। ऋष्यश्रृंग जेहन विद्वान ऋषि कुमारकेँ वेश्या मालिनी लऽ आनएमे सफल भऽ गेल। हुनका ई सफलता एक-दू दिनमे नै भेटल हएत। एकर एकटा दोसर वृत्तान्त स्वामी अद्वैतानन्दपुरी प्रवचन संग्रह सच्चिदानन्द प्रकाश (पृष्ठ सं. ३१८) मे भेटैत अछि। रोमपादक माँजल चतुर वनिता कोशीक धारक कात अप्पन शिविर लगा आ पुण्याश्रमसँ किछु दूर रहि ऋषिकुमारक दिनचर्याक सूक्ष्म निरीक्षण करए लागल। ऐ काजमे महीनो लागि गेल। वनिता सभ अप्पन गहन अध्ययनमे देखलक जे तपस्तयारत ऋषिकुमारकेँ जखन भूख लागैत अछि तँ ओ विशेष जातिक गाछक तनामे अप्पन मुँह सटाबैत अछि आ भरपेट ओकर रस चुसि कऽ वापस तपस्यामे बैसि जाइत अछि। वेश्या सभ एकांत पाबि ओइ विशेष गाछ आ रस चूसए कऽ ठाम पर चिन्ह लगा देलक। संगे-संग ओइपर मीठ तरल पदार्थ (संभवत: गुड़) लेप देलक। फेर दूर ठाम ठाढ़ भऽ कऽ ऋषिकुमारक गतिविधिकेँ देखैत रहल। ऋष्यश्रृंग गाछक रसमे किछु दोसरे स्वाद पेलक। ओ अतृप्त भावसँ ऐ तरल पदार्थकेँ चाटए लागल। ई क्रम चलैत रहल। वेश्या आब ऐ तरहक स्वादिष्ट मधुर ऋष्यश्रृंगकेँ खुआबए लागल। आब हुनका पूर्ण विश्वास भऽ गेल जे ऋषिकुमारकेँ स्वादिष्ट मधुरमे आनंद आबए लागल अछि, तखन ओ ऐ क्रमकेँ एकाएक रोकि देलक। ऋष्यश्रृंगकेँ पुछलापर वेश्या बाजल जे ऐ तरहक स्वादिष्ट भोजन बनाबैमे धन लागैत अछि आ ओ धन राजाकेँ एतएसँ आबैत अछि। राजा आब धन नै दऽ रहल अछि। जौं अहाँ राजा लग जाइ तँ धन भेटि सकैत अछि। अप्पन इच्छा पूर्तिक लेल ऋष्यश्रृंग वनिता सभक संग राजा एतए जाइ लेल तैयार भऽ गेल। राजा रोमपाद राजप्रसादसँ बाहर आबि कऽ ऐ महान तपस्वीक अगवान केलक आ पृथ्वीपर माथ टेक कऽ हुनका साष्टांग प्रणाम केलक। फेर एकाग्रचित भऽ ऋषिसँ वरदान मांगलक जे हुनका ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिताश्री महर्षि विभाण्डक असीम कृपाक प्रसाद भेटए। राजाकेँ शंका सताबए लागल जे कपटसँ ऋषिश्रृंगकेँ मालिनी आनए लेल जौं महर्षि विभाण्डक हुनकापर रूष्ट भऽ जाएत तँ राजाक कल्याण नै अछि। फेर ऋषिकुमारकेँ अप्पन अंत:पुरमे आनि कऽ अप्पन पालिता कन्या शान्तासँ हुनकर बियाह कऽ देलक। ऐ शुभ काजसँ राजपरिवार आ प्रजामे प्रसन्नता पसरि गेल। इम्हर जखन महर्षि विभाण्डक अप्पन आश्रम घुरल तँ अप्पन पुत्रकेँ ओतए नै देखि बेचैन भऽ गेल। हवन सामग्री इम्हर-उम्हर पसरल छल। आश्रममे बाढ़नि धरि नै लागल छल। लता आ गाछ टूटल छल आ पात सभ इम्हर-उम्हर बिखरल छल। आश्रमक मृग शावक आब उछलि नै रहल छल। ओ पूरा जंगल ताकि लेलक मुदा ऋषिकुमारक कोनो पता नै चलल। की कोनो राक्षसक माया छी। ओ तपस्यामे विघ्न-बाधा दैक ताकमे रहैत अछि। महर्षि दुख आ क्रोधसँ भरि उठल। ओ ध्यानस्थ भऽ बैसि गेल आ ध्यानमे सभटा चित्र आबैत गेल। अंग नरेशकेँ दंडित करै लेल ओ मालिनी दिस प्रस्थान केलक। ओ नदी आ गाम-घर पार करैत आगू बढ़ल जा रहल छल। उम्हर राजा रोमपाद सेहो शंकित छल जे पुत्रकेँ नै देखि महर्षि विभाण्डक क्रोधक अग्नि जौं धधकि उठल तँ अनर्थ भऽ जाएत। मंत्रीसँ सलाह कऽ राजा ई प्रबंध केलक जइसँ महर्षिक क्रोध शांत भऽ जाए। एकरा लेल राजा जंगलसँ लऽ कऽ राजधानी धरि सभटा बाटपर एक सएसँ बेसी दुधारू गायक संग ओकर ग्वालकेँ सेहो ठहरा देलक। ग्वालसँ कहल गेल जे महर्षि विभाण्डक ऐ बाट देने आबैबला अछि। हुनकर भरपूर स्वागत-सत्कार करब आ कहब जे ई खेत, ई गाय-बड़द सभटा अहाँक पुत्रक संपत्ति अछि। हम सभ अहाँक अनुचर छी, हमरा आदेश दियौ जे हम सभ अहाँक लेल की करी। एहन कहि-सुनि सभ तरहसँ मुनि विभाण्डक क्रोधकेँ शांत करबाक प्रयास कएल गेल। रोमपाद अप्पन योजनामे सफल रहल। क्रोधसँ मुनिक आँखि लाल भऽ रहल छल, एना लागैल छल जे ओ रोमपादकेँ जरा कऽ भस्म कऽ देथिन। मुदा बाट भरि ग्वाल सभ हुनका दूध आ दोसर दुग्ध पदार्थ (दही, घी, पायस, तक्र आदि) सँ खूब स्वागत केलक आ सभटा गोधन आ खेतकेँ हुनकर पुत्रक संपदा बता कऽ हुनकर क्रोधकेँ शांत कऽ देलक। रोमपादकेँ राजभवन पहुँचैत विभाण्डक ऋषिक क्रोधाग्नि ममता आ प्रेममे बढ़ि गेल छल। राजाक अपूर्व सत्कारसँ ओ धन्य भऽ चुकल छल। ओ देखलक जे हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग राजभवनमे ओना विद्यमान अछि, जेना अमरावतीमे इंद्र। हुनका बगलमे राजा रोमपादक राजकुमारी शान्ता ऋष्यश्रृंगक स्त्री विराजल छल, जेना इंद्रक संग शची। ऐ शोभाकेँ देखि विभाण्डक रोम-रोम पुलकित भऽ उठल। ओ राजा रोमपादकेँ आशीर्वाद देलक आ राजाक इच्छाकेँ पूर्ण करबाक आदेश अप्पन पुत्रकेँ देलक। संग-संग इहो कहलक जे एकटा पुत्रक प्राप्तिक बाद वन घुरि आएब। ऋषिश्रृंगक ई कथा महाभारत वनपर्वमे लोमश ऋषि सुनौने छल। अप्पन पुत्र ऋष्यश्रृंग लग पहुँचि विभाण्डक बड़ प्रसन्न छल आ हुनकर उत्कर्ष देखि कऽ हर्षोत्फुल छल। राजा सेहो हुनकर सत्कारमे कमी नै केलक। मुदा महर्षि राजमहल परिसरमे रहबाकेँ उचित नै बुझलक। हुनका सघन वन आ गुफा चाही जतए ओ निर्विघ्न ध्यान, तप, व्रत, अनुष्ठान आदि कऽ सकए। राजा रोमपाद हुनकर इच्छाक सम्मान करैत मालिनसँ पश्चिम मेरूक पर्वतपर हुनकर आश्रम बना कऽ हुनकर रहैक व्यवस्था कऽ देलक। ई महर्षि विभाण्डक अस्थायी आश्रम छल। ई स्थल वर्तमान भागलपुरसँ ४२ किलोमीटर पश्चिम आ वरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम कोनपर छल। ई ऋषिकुंड वा ऋष्यश्रृंग आश्रमक नामसँ प्रसिद्ध मरूक पर्वत या भैरा पहाड़ीसँ बनल गोलकार घाटीमे स्थित छल। ऐ आश्रमक लग एकटा पोखरि छल जे ठार आ धीपल रुाोतक एकटा समवाचित जलराशि छल। ओइ पोखरिक उत्तर दिस ध्यान स्थली अछि जतए ऋषि ध्यान लगाबैत छल। कजरा रेलवे स्टेशनसँ बारह कि.मी. दक्षिण स्थित ई पहाड़ ऋष्यश्रृंग पर्वतक नामसँ प्रसिद्ध अछि। एखन ई ठाम पर्यटकक लेल आकर्षणक केंद्र अछि। मालिनीमे वृष्टि यज्ञ आ पुत्रेष्ठि यज्ञ मालिनीमे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद आ हुनक विद्वान मंत्रीसँ अंग देशमे अनावृष्टि आ सूखासँ प्रजाकेँ बचाबैक लेल उपायपर विचार-विमर्श केलक। एकर संगे ऐ देशमे उपलब्ध जल-संसाधनक समुचित उपयोगक संबंधमे सेहो मंत्रणा केलक। ओ मालिनीमे वृष्टि यज्ञ केलक जइसँ राज्यमे दीर्घकाल धरि अकाल नै पड़ए। आजुक चम्पानाला ओइ ऋषिश्रृंगक गहन पर्यवेक्षणमे तैयार कएल गेल हएत जकर उपयोगिता साढ़े सात हजार बरख बादो सिद्ध अछि। काल बितैत गेल। राज्यमे वर्षा हुअए लागल। प्रजा धन-धान्यसँ संपन्न हुअए लागल। आब शान्ता एकटा सुनर आ स्वस्थ पुत्रक जन्म देलक, जकर नाम सारंग राखल गेल। संपूर्ण राज्यमे आनंदक लहरि छा गेल। एक दिन शान्ता अप्पन पतिदेव ऋष्यश्रृंगसँ सविनय अप्पन मनोरथ कहलक। ओ बाजल जे हुनका कोनो भाय नै अछि, तइसँ हुनकर माता-पिता बड़ दुखी रहैत छन्हि। हुनकर दुखसँ हम बेचैन रहैत छी। शान्ता साग्रह केलक जे अहाँ एहन कोनो उपाय करू जे हमरा एकटा भाय भऽ जाए। विद्वान ऋष्यश्रृंग चिंतन कऽ कहलक जे ओ विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रतक पालन कऽ वेदक अध्ययन केने अछि। ओ पुत्रक निमित्त अप्पन ससुर महाराज रोमापादक पुत्रेष्ठि यज्ञ कराएत। ऐ यज्ञक प्रधान देवता इंद्र रहत। ओ महाराजकेँ यशस्वी पुत्र प्रदान करत। शान्ता हर्षोत्फुल भऽ उठल। ओ यज्ञ संपादनक सूचना अप्पन माता-पिताकेँ देलक। राजा रोमपाद कतेक रास वेदज्ञ पंडितकेँ बजा यज्ञक संपूर्ण तैयारी केलक। कतेक रास राजा-महाराजा आमंत्रित कएल गेल। ऐ मे राजा रोमपादक परम मित्र अयोध्या नरेश दशरथ सेहो हएत। बड़ धूमधामसँ यज्ञ संपन्न भेल। एकर तत्काल फल सेहो भेट गेल, इंद्र प्रसन्न भऽ राजाकेँ पुत्रवान हेबाक वरदान देलक। रानी गर्भवती भेल आ समय एलापर एकटा पुत्रकेँ जन्म देलक। माता-पिता ओइ शिशुक नाम चतुरंग राखलक। अंग देशक राजाक वंशावली, जे चतुरंगसँ शुरू भऽ महाभारत कालक कर्ण धरि जाइत अछि, ओ निम्नलिखित अछि- रोमपादक पुत्र चतुरंग, चतुरंगक पुत्र पृथुलाक्ष आ पृथुलाक्षक चम्पा नामक पुत्र भेल, जे चम्पानगरी बसौने छल। चम्पाकेँ हर्यंग नामक पुत्र आ हुनकर पुत्र भेल भद्ररथ, भद्ररथकेँ वृहद्रथ आ वृहद्रथकेँ वृहत्कर्मा नामक पुत्र भेल। वृहत्कर्माकेँ वृहदभानु, वृहदभानुकेँ वृहन्मना आ वृहन्मना संजयद्रथक जन्म भेल। जयद्रथकेँ ब्राह्मण आ त्रिय संयोगसँ उत्पन्न भेल स्त्रीक गर्भसँ विजय नामक पुत्रक जन्म भेल। विजयकेँ धृति, धृतिकेँ धृतव्रत, धृतव्रतकेँ सत्कर्मा आ सत्कर्माकेँ अधीरथ नामक पुत्र भेल। यएह अधीरथ नहाइ लेल गंगा तटपर गेल रहथि जिनका पिटारमे सुरक्षित राखल एकटा बालक भेटल छल। ऐ बालककेँ पृथा (कुंती) जन्म देलाक बाद गंगामे बहा देने छल, जेकरा अधीरथ पुत्रक रूपमे ग्रहण केने छल। ई बालक कर्ण भेल जे महाभारतक सुप्रसिद्ध महारथी छल। कर्णक पुत्र वृषसेन। अंग नरेशक एतबेटा वंशावली पुराणमे उपलब्ध अछि। तृतीय परिच्छेद अयोध्यामे अश्वमेध आ पुत्रेष्ठि यज्ञ अवध नरेश राजा दशरथक राजधानी अयोध्या छल। ई नगरी सरयू धारक कातमे बसल अछि। ई प्रचुर धन-धान्यसँ संपन्न, सुखी आ बड़ समृद्धशाली छल। अयोध्या सभ लोकमे विख्यात छल। एकरा महाराज वैवश्वत मनु बसौने छल। हुनके पुत्र छल इक्ष्वाकु, जिनकर तीन शक्तिशाली पुत्र (विकुक्षि, निमि आ दण्डक) मे विकुक्षिक वंशमे दशरथ एकटा चक्रवर्ती सम्राट छल। वाल्मीकीय रामायणक अनुसार, ई महापुरी बारह योजन नम्हर आ तीन योजन चौड़ा छल। अयोध्यासँ दोसर जनपदमे जाइ लेल जे बड़ प्रशस्त आ चौड़ा राजमार्ग छल, ओकर दूनू कात कतेक रास सघन गाछसँ आच्छादित हेबाक कारण ओइ कालक दोसर मार्गसँ अप्पन फराक पहचान बना रहल छल। अयोध्यामे कतेक रास बाजार छल। ई सभ तरहक यंत्र आ अस्त्र-शस्त्रसँ संचित छल। अप्पन नामक अनुसार ई युद्धमे पराजित होइबला नगरी नै छल। एतए ऊँच-नीच अट्टालिका छल, जकर ऊपर ध्वज लहरा रहल छल आ गुंबदपर शतध्नि (तोप) लागल छल। सुरक्षाक दृष्टिसँ अयोध्या अजेय छल। ओकर चारू कात गहींर खधाइ छल, जेकरा लांघब बा पार करब कठिन छल। नगरमे कतेक रास सांस्कृतिक कार्यक्रम लेल नाटक मंडल छल। ओकरामे स्त्रिये टा नृत्य आ अभिनय करैत छल। चारू कात आमक गाछ छल। नगरमे कतेक रास कूटागार (नुकायल घर आ स्त्री क्रीड़ा घर) छल। राजा दशरथ ऐ संपन्न नगरमे रहि कऽ अप्पन प्रजाक पालन करैत छल। रामायणमे अयोध्यापुरीक वर्णन आ राजा दशरथक शासनकालमे अयोध्या लोकक उत्तम स्थिति अवलोकन करैमे आदि कवि वाल्मीकि कोनो तरहे कृपणता नै कएने अछि। रामायणक अनुसार अयोध्यामे कत्तौ कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख आ नास्तिक मनुख देखबामे नै भेटैत अछि। सभ लोक धर्मशील, संयमी, प्रसन्न, शीलवान आ सदाचारी छल। सभ लोक कुंडल, मुकुट आ पुष्पहार धारण करैत छल आ हुनकर अंग चंदनक लेप आ सुगंधी संयुक्त छल। एतुक्का सभ लोक श्री संपन्न, रूपवान आ राजभक्त छल। इंद्रक अश्व उच्चैश्रवाक तरहे काम्वोज आ वाह्लीलक देशमे उत्पन्न भेल शक्तिशाली अश्व आ सिंधुनदमे पालल दरियाइ घोड़ा अयोध्यामे भरल छल। विन्ध आ हिमालय पर्वतमे जन्मल मत्त गजराज सेहो बड़ संख्यामे अयोध्याक शौर्यक अनवरत वृद्धि करैत छल। अयोध्या सभ तरहेँ सुरक्षित छल। एतए आबि कऽ केकरो लेल युद्ध करब असंभव छल, तइसँ ई पुरी अयोध्या सत्य आ सार्थक नामसँ प्रकाशित होइत छल। ऐ यशस्वी राजा दशरथक राजकीय काजक संपादन लेल मंत्री-परिषदमे आठ मंत्री छल, धृष्टि, जयंत, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल आ सुमन्त। सुमन्त अर्थशास्त्र उद्भट विद्वान छल। एकरा संगे महर्षि वशिष्ठ आ वामदेव, महाराज दशरथक दूटा विद्वान ऋत्विज (पुरोहित) छल। एकर अलावा, सुयश, जावलि, काश्यप, गौतम, दीघार्य, मार्कण्डेय आ कात्यायन जेहन तपायल ऋषिक दरबारमे मंत्रीपद प्राप्त छल। ऐ महर्षिक संग कौशल नरेशक पहिलुका परंपरागत ऋत्विज सेहो मंत्रीक कार्य करैत छल। सभ तरहेँ ताकत भेलाक बादो राजा पुत्र विहीन छल। हुनकर तीनटा रानी छल। मुदा, सूर्यवंशकेँ चलाबै बला कोनो पुत्र नै छल। राजा मंत्रसँ मंत्रणा कऽ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठान करबाक विचार केलक। वेद विद्याक पारंगत विद्वान ऋषिमे श्रेष्ठ सुयश, वामदेव, जावलि, काश्यप, वशिष्ठ सभकेँ ससम्मान बजा कऽ नरेश अप्पन मंतव्य देलक। दशरथ अप्पन इच्छा व्यक्त केलक जे शास्त्रोक्त विधिसँ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञसँ भगवानक भजन करब हुनका लेल एकमात्र उपाय अछि। वेदज्ञ पंडित एकर अनुमोदन केलक। राजा दशरथ व्याकुल भऽ कऽ महर्षि वशिष्ठसँ ऐ फलदायक पुत्रेष्ठि यज्ञ अपनेसँ कराबैक अनुरोध केलक। ओ कनमुँह भऽ अप्पन कुल पुरोहित वशिष्ठसँ बाजल जे हुनकामे तपस्याक एतेक विपुल शक्ति अछि जे हुनके लऽ कऽ ब्रह्मा युगमे परिवर्तन कऽ देने अछि। फेर एकटा साधारण पुत्रेष्ठि यज्ञ ओ किअए नै कऽ सकैत अछि? ऐपर गुरु वशिष्ठ गंभीर भऽ कऽ बाजल, -हे राजन! पुत्रेष्ठि यज्ञ कोनो साधारण यज्ञ नै अछि। ई यज्ञ वएह करा सकैत अछि जे ब्रह्मचर्य अवस्थामे शास्त्रमे कहल गेल आठ तरहक मिथुनक दृढ़तासँ त्याग केने हएत। स्त्रीक स्मरण, स्त्रीकेँ लऽ कऽ गप, स्त्रीक संग क्रीड़ा करब, स्त्रीकेँ देखब, स्त्रीसँ नुका कऽ गप करब, स्त्रीसँ भेँट करबाक निश्चय आ संकल्प करब आ स्त्री प्रसंगक गप करब। ऐ आठ तरहक अवगुणसँ जे पूर्णत: रहित हुअए, निष्ठावान ब्रह्मचारी हुअए, ओ अप्पन ब्रह्मचर्य कालमे कोनो गृहस्थक अन्न नै खेने हुअए, वएह ऐ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। हम अहाँक वंशक राजाक कतेक तरहक अन्न खेने छी। तइसँ ऐ यज्ञक संपादन हम नै कऽ सकैत छी। महर्षि वशिष्ठ ध्यान लगौलक, फेर आँखि खोललक आ बाजल, पुण्याश्रममे महर्षि कश्यपक पुत्र विभाण्डक ऋषि अछि आ हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग अप्पन पिताक संग रहि रहल अछि। ओ सभ तरहेँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करबाबएमे सक्षम अछि। ओ उक्त शास्त्रोक्त कठोर ब्रह्मचर्यक पालन केने छल। ओ ब्रह्मचर्य कालमे ई जानबे नै केलक जे स्त्री की होइत अछि। ऐ यज्ञक संपादनार्थ अंग नरेश राजा रोमपादक जमाए ऋष्यश्रृंगकेँ सादर आमंत्रित करबाक निश्चय कएल गेल। रोमपाद राजा दशरथक अभिन्न मित्र छल। ओ नीक कालमे मंत्री आ रानीक संग अप्पन मित्र अंग नरेशक एतए प्रस्थान केलक, जतए ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्री शान्ताक संग निवास करैत छल। प्रज्ज्वलित अग्निक संग तेजस्वी ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद लग विराजमान छल। गहींर मित्रताक कारण रोमपाद अप्पन मित्रक विधिवत सत्कार केलक आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार पूजन केलक। संगे-संग अप्पन विद्वान जमाएसँ अप्पन अभिन्न मित्रक परिचय करेलक। ऋष्यश्रृंग सेहो राजा दशरथक बड़ सम्मान देलक। राजा दशरथ अंग नरेशक एतए सात-आठ दिन धरि मित्र पाहुन तरहेँ रहि गेल। एकर बाद राजा दशरथ राजा रोमपादकेँ अश्वमेध अनुष्ठान केँ लऽ कऽ अप्पन मनक इच्छा बतौलखिन आ एकर निअमसँ संपादनार्थ ऋष्यश्रृंग आ शान्ताकेँ अयोध्या लऽ जाए लेल अनुमति मांगलक। रोमपाद दुनू गोटेकेँ सहर्ष अयोध्या जेबाक अनुमति दऽ देलक। रामायणकारक अनुसार, रोमपादक अनुमति लऽ कऽ ऋष्यश्रृंग आ शान्ता महाराज दशरथक संग अयोध्याक लेल प्रस्थान केलक। राजा दशरथकेँ विदा करैत काल रोमपाद बड़ भावुक भऽ गेल। दुनू गोटे हाथ जोड़ि कऽ एक-दोसराकेँ छातीसँ लगा कऽ अभिनंदन केलक। दशरथ अप्पन द्रुतगामी दूतकेँ अप्पन नगरवासी सभकेँ समाद भेजि कऽ सूचित केलक जे विभाण्डक तनय ऋष्यश्रृंग अयोध्या आबि रहल अछि। नगरमे तोरण द्वार बनाओल जाए, एकरा सजाओल जाए। सभ ठाम अगरू धूमक सुवास हेबाक चाही। नगरक सभटा बाट बहारल जाए आ ओकरापर पाइन छींटल जाए, जइसँ ओकरापर कनियोटा गरदा नै रहै। पूरा नगरकेँ ध्वज पताकासँ अलंकृत कऽ देल जाए। राजाक आदेशक पालन भेल। नगरमे शंख, दुन्दुभि आ दोसर वाद्ययंत्र बाजए लागल। बाटक सभटा कठिनाइ केँ बिसुरि कऽ राजा स-दलबल प्रफुल्लित छल। राजा ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कऽ नगरमे आएल। ऐ द्विजकुमारक दर्शन कऽ नगरक लोग, कृतार्थ भऽ उठल। सभ कियो पराक्रमी महाराज दशरथक संग ऋष्यश्रृंगकेँ अयोध्यामे आबैत पुष्पवृष्टिसँ स्वागत केलक। राजा अप्पन महान पाहुनकेँ अंत:पुरमे आनि कऽ शास्त्रोक्त विधिसँ पूजा-अर्चना केलक। ओतुक्का स्त्री सभ देवी शान्ताकेँ अप्पन बीच पाबि बड़ खुश छल। वाल्मीकीय रामायणक बालकांडक द्वादश सर्गक अनुसार, अंत:पुरमे ऋष्यश्रृंग सपत्नीक रहए लागल। बड़ काल बीत गेल। वसंत ऋतुक आगमन भेल। दशरथ एहन कालमे यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल विचार केलक। एकर बाद देवता सन सुकान्ति बला ऋष्यश्रृंगकेँ आगू कर जोड़ि कऽ दशरथ प्रणाम केलक आ अप्पन विमल वंशक परंपराक रक्षाक लेल पुत्र पाबैक निमित्त यज्ञ करबाक लेल हुनका वरण केलक। ऋष्यश्रृंग तथास्तु कहि हुनकर प्रार्थना स्वीकार केलक। ऋषिक आदेशक मुताबिक, यज्ञ सामग्री जमा हुअए लागल, भूमंडलमे भ्रमण करबाक लेल महाराज दशरथक अश्वकेँ छोड़बाक व्यवस्था हुअए लागल, पारंगत आ ब्रह्मवादी ऋषि आ पंडितकेँ बजैलक। सुयज्ञ, वामदेव, जावलि, काश्यप आ वशिष्ठ संग दोसर पंडित सेहो आएल। दशरथ सभ लोकक विधिवत पूजन केलक। पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठानक गप दोहराएल गेल आ विश्वास व्यक्त कएल गेल जे ऋष्यश्रृंगक प्रभावसँ हुनकर सभटा कामना पूर्ण हएत। ऋषि सभ राजाक ऐ महान संकल्पक लेल साधुवाद देलक। ऋष्यश्रृंग आ दोसर ब्राह्मण भविष्यवाणी केलक जे ऐ यज्ञसँ चारिटा पराक्रमी पुत्र प्राप्त हएत। राजा प्रसन्न भेल। मंत्रीकेँ आदेश भेटल जे गुरुजनक आदेशानुसार यज्ञक सामग्री जुटाओल जाए आ शक्तिशाली वीरक संरक्षणमे यज्ञक अश्वकेँ छोड़ल जाए। अश्वक संग प्रधान ऋत्विज सेहो रहता। सरयूक उत्तर दिसक तटपर यज्ञशालाक निर्माण भेल आ शास्त्रोक्त विधिक अनुसार क्रमश: शांतिकर्म पुण्याह वाचन आदिक विस्तारपूर्वक अनुष्ठान कएल जाए, जइसँ विघ्नक निवारण हुअए। अहाँ सभ कियो एहन साधन प्रस्तुत करू जइसँ ई यज्ञ निर्विघ्न विधिपूर्वक संपन्न भऽ जाए। मंत्री सभ राजाक आदेशक पालन केलक आ ओइ मुताबिक व्यवस्था सेहो केलक। ऐ तरहेँ एक वर्ष बीत गेल। दोसर वर्ष वसन्तागमन भेल। अयोध्याक आमक गाछी कोइलीक कूँक सँ गूँजि उठल। राजा अश्वमेधक दीक्षा लै लेल गुरु वशिष्ठ कतए पहुँचल। ओ न्यायत: गुरुक अर्चना केलक आ अनुरोध केलक जे शास्त्रविधिसँ ओ ऐ यज्ञकेँ संपन्न कराबथि आ एहन व्यवस्था करथि जे कोनो ब्रह्म राक्षस ऐ मे विघ्न नै उत्पन्न कऽ सकए। दशरथ कहलखिन, -अहाँक बड़ स्नेह हमरापर अछि, अहाँ हमर सुहृदए, हितैषी, गुरु आ परम महान छी। ऐ महान यज्ञक भार अहीं वहन करू। पुलकित भऽ कऽ गुरु वशिष्ठ अप्पन स्वीकृति देलखिन आ कहलखिन, -हे नरोत्तम! हम वएह सभ काज करब जइ लेल अहाँ प्रार्थना केने छी। तकर बाद, गुरु वशिष्ठ यज्ञ काजमे निपुण आ यज्ञ विषयक शिल्प काजमे कुशल, परम धर्मात्मा, वृद्ध ब्राह्मण, यज्ञ काज खत्म हुअए धरि ओइमे सेवा करए बला सेवक, शिल्पकार, कमार, खधाइ खोदएबला, ज्योतिषी, कारीगर, नट, नचनियाँ, विशुद्ध शास्त्र वेत्ता आ बहुश्रुत पुरुख सभकेँ बजा कऽ हुनका सभसँ कहलक, -अहाँ सभ महाराजाक आज्ञासँ यज्ञकाजक लेल आवश्यक प्रबन्ध करु। जल्दीसँ हजार ईंटा मंगाबियौ। बजाओल गेल राजाक रहैक लेल, हुनका भोजन योग्य आ पीबए आदिक उपकरण युक्त कतेक रास महल बनाओल जाए। ब्राह्मणक लेल आन्हर-पाइनक निवारणमे समर्थ सैकड़ो आवास बनाओल जाए। ऐ तरहेँ पुरवासीक लेल घर आ दूर ठामसँ आएल भूपालक लेल सभ सुविधासँ युक्त महल तैयार कएल जाए। हाथीक लेल हथसाल आ घोड़ा लेल घुड़साल, सामान्य लोकक विश्राम करबाक लेल रैन बसेरा आ दोसर देशक सैनिक लेल छावनी बनाओल जाए। बड़ रास मेहनत करए बला सेवक आ शिल्पी केँ धन आ अन्न दऽ कऽ सम्मानित कएल जाए। सभ अप्पन-अप्पन काजमे लागि गेल। तकर बाद वशिष्ठ मंत्री सुमंतकेँ आदेश देलक जे ऐ धरतीक सभटा धार्मिक राजा आ चारू वर्णक सभटा लोककेँ ऐ यज्ञमे भाग लेबाक लेल आमंत्रित कएल जाए। मिथिलाक नरेश शूरवीर सत्यवादी जनक, देवता सन सुकांतिबला काशी नरेश, महाराज दशरथक ससुर वृद्ध केकेय नरेश, अंग देशक महाधनुर्धर राजा रोमपादक पुत्र सहित कौशल राज भानुमान, मगध राज प्राप्तिज्ञ आदि केँ अपनेसँ जा कऽ सादर सत्कारपूर्वक बजओने आएल। महाराजक आदेश लऽ कऽ पूब देशक नरेश, सिंधु सौवीर आ सुराष्ट्र देश व दक्षिणक नरेशक विशेष दूतसँ निमंत्रण भेजल जाए। निर्धारित दिन विभिन्न राज्यक नरेश महाराज दशरथक लेल बहुमूल्य रत्न भेंट लऽ कऽ अयोध्या जाए लागल। वांछनीय वस्तुक संग सरयूक उत्तरबरिया कातपर यज्ञशालाक तुरंत निर्माण भऽ गेल। लागल एना जे मनक संकल्पसँ ई बनि गेल। मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगक आदेशसँ शुभ नक्षत्र बला दिन राजा दशरथ यज्ञक लेल राजम वनसँ निकलल। एकर बाद वशिष्ठ जेहन श्रेष्ठ द्विजवर ऋष्यश्रृंगक नेतृत्वमे यज्ञकार्य शुरू केलक आ तखने राजा दशरथ अप्पन स्त्रीक संग ऋष्यश्रृंगसँ यज्ञक दीक्षा लेलक। इम्हर वर्ष पूर्ण होइक संग अश्व भूमंडलक परिक्रमा कऽ वापस घुरि आएल। अश्वमेध यज्ञ शुरू भेल। ऋष्यश्रृंग आदि महर्षि अप्पन अभ्यास कालमे सीखल अक्षर संयुक्त स्वर अ वर्ण सँ संपन्न मंत्रसँ इंद्र आदि श्रेेष्ठ देवता सबहक आह्वान केलक। सभ हुनकर योग्य हविष्यक भाग समर्पित केलक। यज्ञशालामे तीन सए पशु बान्हल गेल छल आ दशरथक ओइ अश्वरत्न केँ सेहो ओतए बान्हल गेल छल। रानी कौशल्या ओइ अश्वक संस्कार कऽ ओकरा तलवारसँ तीन बेर स्पर्श केलक आ धर्म पालन करबाक इच्छासँ ओइ अश्व लग एक राति निवास केलक। सभटा वर्ण द्वारा अश्वक स्पर्शक पश्चात चतुर जितेंद्रिय ऋत्विक विधिसँ अश्वकंदक गूदा निकालि शास्त्रोक्त विधिसँ पकौलक। ओइ गूदाक आहुति सेहो देल गेल। राजा दशरथ अप्पन पापकेँ दूर करबाक लेल ओकर धुआँ सूंघलक। अश्वमेध यज्ञक अंगभूत जे हवनीय पदार्थ छल, ओइ सभक संग सोलह ऋत्विक अग्निमे विधिवत आहुति दिअए लागल। अश्वमेध यज्ञ पूर्ण भेल। ऋत्विककेँ जे धन दक्षिणामे भेटल, ओ सभटा ओ मुनिवर वशिष्ठ आ ऋष्यश्रृंगकेँ सौंपि देलक। ई दूनू महर्षि न्यायपूर्वक बँटवारा कऽ सभ ब्राह्मणकेँ संतुष्ट केलक। एम्हर दशरथ ऐ उत्तम यज्ञक पुण्यफल प्राप्त कऽ मने मन प्रसन्न भेल। ओ ऋष्यश्रृंगसँ बाजल, -उत्तम व्रतक पालन करएबला मुनीश्वर! आब जे कर्म हमर कुलक परंपराकेँ बढ़बै बला हुअए, ओकर संपादन कएल जाए। ऋष्यश्रृंग राजाक चारिटा यशस्वी पुत्र हेबाक भविष्यवाणी केलक। राजा प्रसन्न भेल आ ऋष्यश्रृंगसँ एकरा लेल पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ करबाक लेल अनुरोध केलक। ऋष्यश्रृंग अतुलित मेधावी छलाह आ वेदक सेहो ज्ञाता. ओ कनी कालक लेल ध्यान लगा अप्पन भावी कर्तव्यक निश्चय केलक। फेर ध्यान भंग भेलापर दशरथसँ बाजल, -राजन! हम अहाँकेँ पुत्र प्राप्तिक लेल अर्थवेदक मंत्रसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ करब। वेदोक्ति विधिक अनुसार, अनुष्ठान केलापर ई यज्ञ अवश्य सफल हएत। ऋष्यश्रृंग अप्पन जुगक महान चिकित्साशास्त्री छल आ शरीर विज्ञानमे हुनकर गहींर पइठ छल। ओ दीर्घकाल धरि आयुर्वेदक सेहो अध्ययन केने छल आ ओइमे अर्हत्व प्राप्त केने छल। ओ राजा दशरथ आ हुनकर तीनू रानीक चिकित्सा शास्त्रीय परीक्षण केलक। ओ ओकरे मुताबिक जड़ी-बूटी आ आयुर्वेदिक गुण संयुक्त समिधा सेहो इकट्ठा केलक। परम तेजस्वी ऋष्यश्रृंग पुत्र भेटबाक उद्देश्यसँ पुत्रेष्ठि यज्ञ प्रारंभ केलक। ओ श्रौत विधिक अनुसार, चिकित्सीय गुण युक्त समिधा सभक आहुति अग्निमे देब शुरू केलक। ऐ महान यज्ञमे देवता, सिद्ध, गंधर्व आ महर्षिगण अप्पन अप्पन भाग लै लेल पहुँचल। पापी सभक विनाश आ संतक कल्याणक लेल सभटा देवता यज्ञस्थल पर उपस्थित भेल आ अप्पन भाग प्राप्त कऽ यथेष्ट आशीर्वाद देलक। यज्ञकुंडक आैषधि तैयार भऽ गेल। ई खीरक रूपमे तैयार कएल गेल। प्रज्ज्वलित अग्निक समान ई दिव्यौषधि दैदीप्यमान भऽ रहल छल। ई जम्बूनद नामक सुवर्णसँ बनल बड़ पैघ रास परातमे चांदीक ढक्कनसँ झाँपल छल। आैषषि तैयार हेबाक संग एकर सुगंध सभ दिशामे पसरि गेल। ऋष्यश्रृंग अप्पन सफलतासँ प्रफुल्लित छल। ओ यज्ञाग्निसँ ओइ अमोघ आैषधिसँ भरल पात्रकेँ निकालि महाराज दशरथकेँ देलक आ कहलक, -राजन! अहाँ एकरा ग्रहण करू। राजाक अंत:पुरक स्त्री सभमे हर्षोल्लास भरि गेल, जेना निर्धनकेँ कुबेरक खजाना भेट गेल। राजा ओइ खीरक आधा हिस्सा महारानी कौशल्याकेँ देलक। फेर बचल आध हिस्सा रानी सुमित्राकेँ। फेर दुनूकेँ देलाक बाद जतेक खीर बचल छल ओकर आध हिस्सा रानी कैकेयीकेँ आ हुनका देलाक बाद जे खीरक अवशिष्ट भाग बचल, से चतुर नरेश किछु सोचि-समझ कऽ फेर सुमित्राकेँ दऽ देलक। रानी श्रद्धा आ विश्वासपूर्वक ऐ आैषधि युक्त खीरक सेवन केलक। जल्दीये ओ अलग-अलग गर्भधारण केलक। (देखू परिशिष्ट क) चारिम परिच्छेद ऋष्यश्रृंग आश्रमक स्थापना किछु दिन अयोध्याक रनिवास मे रहैक बाद ऋष्यश्रृंग अप्पन स्त्रीक संग मालिनी घुरल। मालिनी सं पश्चिम भाग स्थित अप्पन आश्रम कऽ सुव्यवस्थित केलक। ओहि आश्रम मे वेदक अध्ययनक व्यवस्था करल गेल, जे कतेक रास आचार्यक देख-रेख मे संचालित छल। एकर बाद ऋष्यश्रृंग शान्ताक संग कौशिकीक कातक कज्जल वन स्थित अप्पन पुण्याश्रम सेहो घुरल। ई वहि पुण्याश्रम छल, जतय सं गणिका हुनका अंगक राजधानी मालिनी लऽ गेल छल। अंतर्मुखी युवक ऋष्यश्रृंगक बिना ई आश्रम सून छल। मन सं वेदक सार्थक पाठ करय बला ऋष्यश्रृंग के आबैत लता हिल-हिलकऽ स्वागताभिवादनक मुद्रा मे आबि गेल। पिता विभाण्डक अप्पन पुत्रक अहि उपलब्धि पर हर्षोत्फुल छल। शान्ता जेहन पुत्रवधू कऽ पाकऽ ओ पुलकित भऽ उठल। अहि पुण्याश्रम मे ऋष्यश्रृंगाश्रमक स्थापना केल गेल, जाहि के पहिलुक कुलपति ऋष्यश्रृंग छल। उत्तर वैदिक काल मे विश्वविद्यालयक स्तरक मान्यता अहि आश्रमके प्राप्त छल। तहियौका आर्य जातिक शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक, भौतिक आ सांग्रामिक उन्नतिक कारण हुनकर शिक्षा प्रणाली छल। रामायण काल में ऋष्यश्रृंगाश्रम बड़ चर्चित छल। महाभारत मे सेहो एकर संक्षिप्त विवरण भेटैत अछि। पंडित रामदीन पांडेय लिखैत अछि जे ऋष्यश्रृंग अप्पन युगक महान आचार्य छल। चिकित्सा शास्त्र मे हुनकर अद्भुत प्रवेश छल। महाभारत युग मे ई आश्रम बड़ रास हरिहर छल। युधिष्ठिर वनवास काल मे लोमश ऋषिक संग अहि आश्रम मे आयल छल। आश्रम मे दस हजार छात्र सभोजन, सवस्त्र आ निशुल्क शिक्षा प्राप्त करैत छल। अहि आश्रमक ब्रह्मचारी मे भक्ति, शुद्धता आ पवित्रताक संग धार्मिक वृत्तिक उदात्त आ गरिमामय छल। ओ सभ दैनिक क्रिया, संध्योपासन, व्रतक अनुपालन आ धर्म समन्वित उत्सव से हुनक जीवन मे उन्नति, आत्मविश्वास, आत्मबल आ आत्मिक शक्ति प्रचुर रूप सं भेटैत छल। आचार्य कुल मे अग्नि-परिचर्याक सभ दिन पालन, ब्रह्मचारीक लेल एकटा धार्मिक व्रतक समान छल आ ई आश्रमक अनुशासनक महत्वपूर्ण अंग छल। आचार्य ऋष्यश्रृंगक कुशल कुलपतित्व मे ई आश्रम जम्बूद्वीप में चर्चित भऽ गेल। वेद आ ओकर सभटा अंगक संग चिकित्सा शास्त्रक गहन ज्ञान ब्रह्मचारी छात्र सभके देल जायत छल। समिधा आ मेखला सं अप्पन व्रतक नियम सं पालन करैत ब्रह्मचारी श्रम, तप आ गुरुसभक आशीर्वादक प्रभाव सं अध्ययन मे सफलता प्राप्त करैत छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम मे तप ब्रह्मचर्य जीवनक आवश्यक अंग छल। तप सं हुनका मे आत्मसंयम, आत्मचिंतन, आत्मविश्वास, आत्मविश्लेषण, न्याय प्रवृत्ति, विवेक भावना अ आध्यात्मिक वृत्तिक उदय होयत छल। कुलपति ऋष्यश्रृंग अपने यज्ञ देवताक साकार रूप छल। कहल जायत अछि जे ओ जीवनभरि यज्ञ केलक आ करौलक। ओ एहन कतेक रास यज्ञक संपादन करैलक जकरा लेल मात्र वहि टा सक्षम छल। गृहस्थक लेल ओहि युग मे पांच महायज्ञक विधान छल। ओ यज्ञ छल, व्रह्म यज्ञ, पितृ यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ आ नृयज्ञ। पहिलुका विद्वान ऋषिक प्रति श्रद्धा व्यक्त करैत वेद मंत्रक पाठ कऽ अप्पन बौद्धिक उत्कर्ष करब आ याज्ञिक समारोहक अवसर पर स्वाध्यायक व्यवस्था करब ब्रह्मयज्ञक विधानक अंतर्गत छल। पितरक श्राद्ध तर्पण सभ पितृ यज्ञक अंतर्गत संपन्न होयत छल। देवताक लेल अग्निक आहुति आ इंद्र, अग्नि, प्रजापति, सोम, पृथ्वी अदि देवताक नाम अग्नि मे समिधा प्रदान करव देव यज्ञ छल। अनिष्टकारी प्रेतात्माक तुष्टिक लेल भूत यज्ञ आ अतिथि देवताक सत्कार नृयज्ञ छल। वेदक मंत्रद्रष्टा ऋष्यश्रृंग वेदक महत्ता सार्वदेशिक आ सार्वकालिक अछि। सभ्यताक उषाकाल सं वेद समादृत आ अपौरुषेय अछि। अहि देशक प्रज्ञा पर्वत सं निकलल पतित पावनी गंगाक संस्पर्श पात्र सं सभटा विश्व चमत्कृत आ आह्लादित भेल अछि। शुक्ल यजुर्वेदीय ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मणक स्पष्ट कथन अछि, 'यावन्तुं ह वै इमा पृथिविं वित्तेन पूर्ण ददत लोकं जयति त्रिभिस्तावनां जयति: भूयांसं च अक्षयं च य एवं विद्वान: अदृश्व: स्वाध्यायमधीते, तस्मात् स्वाध्याये अधेयतव्य:।' शतपथ व्राह्मण 11-5-6-11 (अर्थात धनसं परिपूर्ण पृथ्वीक दान करहि सं जतेक फल भेटैत अछि, वेदक अध्ययन से सेहो ओतेक फल भेटैत अछि। ओतबै टा नहि, ओकरो से वढि़ के मनुख अविनाशशाली अक्षय लोक कऽ प्राप्त करैत अछि। ताहि सं वेदक स्वाध्याय करब वड़ आवश्यक आ उपादेय अछि।) पुरान कालक ऋषि वड़ निष्ठावान आ तप:शील मनुख छल। समाधिस्थ अवस्था मे ओ अप्पन परिवेशक अतिक्रमण कऽ मंत्रक दर्शन केलक। ताहि सं ऋषि वेदमंत्रक रुाष्टा नै, द्रष्टा कहल जायत अछि। ऋग्वेदक प्रत्येक मंत्रक द्रष्टा कियो नै कियो ऋषि अछि। हुनकर संख्या लगभग तीन सौ टा अछि। अहि मे किछु ऋषिक नाम अछि. मधुच्छन्द, शुन:शेष, कण्व, गौतम, अगस्त्य, गुत्समद, विश्वामित्र, ऋषभ, देवश्रव, वामदेव, अत्रि, पृथु, कृष्ण, अपाला, देवल, भृगु, च्यवन, सुमित्र, अग्निपूर्य, वर्हिष, सुदास, श्रष्यश्रृंग, प्रचेता, उध्र्वग्रीवा, अधमर्षण, भारद्वाज, वीतहव्य, गर्ग, वशिष्ठ, मेधातिथि, वत्स, शशकर्ण, नारद, विश्वमना, नाभाग आदि। ई पुरुष सभक अलावा स्त्री सेहो मंत्रद्रष्टा छल। अहि मे लोपमुद्रा, गौरी, जुहू, शची, घोषा, लोमशा, विश्वधारा आदिक नाम उल्लेखनीय अछि। ई ऋषि सभ अप्पन मंत्रमे मूलत: ईश्वरक दिव्य विभूतिक प्रति अप्पन श्रद्धात्मक उद्गार व्यक्त केने अछि। यजुर्वेदक विभाजन चतुर्वेद मे यजुर्वेदक संबंध यज्ञानुष्ठान से अछि। अहि मे संकलित मंत्रक विषय यज्ञ विधिक संपादन करब अछि आ कोन यज्ञ मे कोन कांडक मंत्रक व्यवहार करबाक चाहि, ओकर विधि यजुर्वेद मे देल गेल अछि। ताहि सं वेद कर्मकांड प्रधान अछि। वर्षक गणना ते कठिन अछि, मुदा ऋष्यश्रृंग सं लगभग पांच पीढ़ी पहिने यजुर्वेदक विभाजन भऽ गेल छल, जे कृष्ण यजुर्वेद आ शुक्ल यजुर्वेदक नाम से जानल जायत अछि। अहि संबंध मे विष्णु पुराणक तृतीय अंशक अध्याय पांच मे एकटा कथा अछि। महर्षि वैशम्पायन यजुर्वेद जेहन वृक्षक सत्ताइस शाखाक रचना केने अछि। ओकरा अप्पन शिष्य के पढ़ौलक। हुनकर परम धार्मिक आ हुनकर सेवा मे तत्पर रहि बला शिष्य याज्ञवल्क्य छल। एकटा काल मे सभटा ऋषि सभ ई नियम बनौअलखिन जे कियो ऋषि महामेरु पर स्थित हमर अप्पन समाज मे शामिल नहि होयत ओकर सात राति के भीतर ब्रह्महत्याक पाप लागत। अहि तरह जाहि काल के ऋषि सभ नियत केने छल,ओकर वैशम्पायन अतिक्रमण कऽ देलक। एक बाद ओ प्रमादवश अप्पन भानजाक हत्या कऽ देलक। एकर बाद ओ अप्पन शिष्य सं बाजल, अहां सभ कोनो तरहक विचार नै कऽ हमरा लेल ब्रह्महत्याक पाप के दूर करहि बला व्रत करू। अहि पर याज्ञवल्क्य बाजल, 'भगवन! ई सभ ब्राह्मण बड़ निस्तेज अछि। हुनक कष्ट दैके कोन जरूरत अछि? हम असगरे अहि व्रत अनुष्ठान करब। अहि सं वैशम्पायन तमसा गेल। ओ बाजलखिन, अहां ई सभ ब्राह्मणक अपमान केने छी। अहां जे किछु हमरा सं पढ़ने छी,ओ छोडि़ दिओ। अहां अहि द्विज श्रेष्ठ के निस्तेज कहैत छी। हमरा अहां जेहन आज्ञा भंगकारी शिष्यक कोनो प्रयोजन नहि अछि। 'लिओ, हम जे किछु अहां से पढ़ने छी, ओकरा घुरा रहल छी'। ई कहि याज्ञवल्क्य रुधिर सं भरल मूर्तिमान यजुर्वेद वमन कऽ हुनका घुरा देलक आ स्वेच्छा सं चलि गेल। याज्ञवल्क्य के वमन करल यजुश्र्रुती के दोसर शिष्य तीतर बनिके ग्रहण कऽ लेलक। ताहि सं ई सभ तैत्तिरीय कहौलक। याज्ञवल्क्य यजुर्वेदक प्राप्तिक इच्छा सं संयम चित्त सं सूर्यनारायणक स्तुति करलक। भगवान सूर्य अश्व रूप मे प्रगट भऽ कऽ अभीष्ट वर मांगहि लेल कहलक। तखन याज्ञवल्क्य हुनका प्रणाम कऽ बाजल, अहां हमरा ओहि यजुश्र्रुतीक उपदेश दिये जे हमर गुरु नहि जानैत अछि। हुनकर एहन कहला पर सूर्य हुनका 'अयातयाम' नामक यजुश्र्रुतीक उपदेश देलक, जकरा हुनकर गुरु वैशम्पायन सेहो नहि जानैैत छल। माध्यन्दिन शाखा याज्ञवल्क्य ओहि वाज श्रुत के अप्पन कण्व आदि पंद्रह शिष्य के प्रदान करलक। ओहि मे मध्यन्दिन महर्षि द्वारा प्राप्त यजुर्वेदक विशेष शाखा के माध्यान्दिन कहल जा लागल। शुक्ल यजुर्वेदक माध्यान्दिन शाखाक मंत्र के महर्षि कात्यायन महर्षि कश्यप के, महर्षि कश्यप महर्षि विभाण्डक के आ महर्षि विभाण्डक ऋष्यश्रृंग के देलक। ऋष्यश्रृंग अहि मंत्रक प्रखर दृष्ट छल। अहि मंत्रक सं अे राजा रोमपादक एतय वृष्टि यज्ञ केने छल। ऋष्यश्रृंग अहि शाखाक मंत्रद्रष्टाक संग अहि शाखा स्वरूपक ओत-प्रोत ब्रह्मनिष्ठ छल, जाहि सं ओ जतय कत्तौ जायत छल, ते हुनकर पदार्पणक संग ओहि भूमि पर इंद्र देवता वर्षा कऽ दैत छल। वाजसेनी पुत्र याज्ञवल्क्य द्वारा नष्ट हय के कारण शुक्ल यजुर्वेदक अहि संहिताक नाम वाजसनेय संहिता पड़ल। अहि प्रकार यजुर्वेदक तैत्तरीय आ वाजसनेय अहि दोनों शाखाक निर्माण भेल। वाजसनेय संहिता मे राष्ट्रक उन्नति आ ओकर सुख-शांतिक लेल बड़ रास भावना सभ अभिव्यक्त केने अछि। 'हे पितृदेवो! नमस्कार! अहांक कृपा से वसंत ऋतु राष्ट्र के सुखी करय'। 'हे पितर नमस्कार! अहांक कृपा से देश मे ग्रीष्म अनुकूल रहय'। ऋतु सभके राष्ट्रक अनुकूल बनाबै आ जल प्रबंधन मे विशेषज्ञता प्राप्त करय बला ऋष्यश्रृंग अप्पन समय मे मंत्रक सिद्धता प्राप्त कऽ चुकल छल। बाल्मीकिक काल मे शुक्ल यजुर्वेदक बड़ प्रभाव छल। ऋष्याश्रम मे एकर गहन अध्ययन होयत छल। मुदा ओहि काल तैत्तिरीयक शिक्षालय सेहो कार्यरत छल। अयोध्यामे एहन एकटा शिक्षण संस्थानक उल्लेख वाल्मीकि केने अछि। अयोध्या काण्ड (32-15,16) मे राम लक्ष्मणक आदेश दैत अछि, लक्ष्मण! यजुर्वेदीय तैत्तरीय शाखाक अध्ययन करहि वला व्राह्मण के जे आचार्य आ संपूर्ण वेदक विद्वान अछि, संग ही जाहि मे दान प्राप्तिक योग्यता अछि आ जे माता कौशल्याक प्रति भक्तिभाव राखि प्रतिदिन हुनका लग आवि के हुनकर आशीर्वाद प्रदान करैत अछि, हुनका सवारी, दास, दासी, रेशमी वस्त्र आ जतेक धन सं व्राह्मण संतुष्ट हुयअ, ओतेक धन खजाना से दियाविओ। आश्रम व्यवस्था रामायण कालक विभिन्न ऋष्याश्रमक अध्ययन सं ई ज्ञात होयत अछि जे आश्रम मे गुरुक वाद आचार्य आ कुलपतिक गणना केल जायत छल। कुलपतिक अधीन दूर-दूर ठाम सं आयल सैकड़ों छात्र विद्याध्ययन करैत छल। श्रोत्रियक संज्ञा ओहि अध्यापक वर्ग कऽ देल जाय छल जिनकर तामसिक वृत्तिक परंपरागत वैदिक अध्ययन आ तपस्या सं शमन भऽ चुकल अछि। तापसगण तपोनिरत रहैत आ अपना लग आवहि वला के शिक्षा दैत छल। ओ वनवासी छल अ हुनकर उपदेश अरण्यक मे लिपिवद्ध अछि। उपाध्याय लोक शुल्क लऽ कऽ शास्त्र विशेष वढ़ावैत छल। ललित कलाक अध्यापक शिक्षक छल। तुंवरू अप्सराक गान-शिक्षक छल। एकर अलावा, आश्रम मे परिव्राजक सेहो रहैत छल। ओ निवृत्ति मार्गी होयत छल। ओ अवकाशक काल घूमि-घूमि कऽ निर्वेद आ वैराग्यक जीवनक सर्वोच्य ध्येयक तरहे प्रचार करैत छल। दोसर आश्रमक तरहे अहि ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे अध्यापक के कोनो वान्हल आय नहि छल। शिष्य सं नियत शुल्क लै के प्रथाक प्रमाण नै भेटैत अछि। एतय गुरु पुरोहित सेहो होयत छल। अहि सं यज्ञ याज्ञादिकक अवसर पर दान दक्षिणा पर्याप्त भेट जायत छल। एकर अलावा, अतिरिक्त आश्रम के कृषि सं सेहो पर्याप्त आय होयत छल। आश्रमक छात्र मे तपस्वी जना त्याग आ सहिष्णुता अपेक्षित छल। स्नातक वनहि धरि हुनकर नैष्ठिक व्रह्मचर्य व्रतक पालन करव अनिवार्य छल। अहि आश्रम मे ज्ञान-विज्ञानक अजरुा धारा वहैत छल। विद्यार्थी पिता-पुत्रक परंपरा सं वरावर आवैत रहैत छल। अहि आश्रम मे कतेक रास परिवारक कतेक पीढ़ी शिक्षा प्राप्त कऽ चुकल छल। अहि आश्रम मे मुनि-शिक्षक अप्पन स्त्री (मुनि पत्नय:) आ संतान (मुनि दारका:) संग रहैत छल। प्राचीन भारतक इंद्र खंडक (पूर्वी भाग) दूटा आश्रम मिथिलाक सीरध्वज जनकाश्रम आ अंगक उत्तरवरिया भाग स्थित कज्जल वनक ऋष्यश्रृंग आश्रम तत्वक विवेचन, विश्लेषण, चिंतन, अनुसंधान आ निर्णयक लेल प्रसिद्ध छल। तहियौका भारतक सभ आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षा देल जायत छल। स्वयं राम वशिष्ठाश्रम सं दोसर विषयक संग संग्रामिकता मे स्नातक आ विश्वमित्रक सिद्धाश्रम से स्नातकोत्तरक शिा पायल छल। आश्रम मेे संग्रामिकताक शिक्षा शत्रु (असुर) के संहार शक्ति के चुनौती दैक लेल छात्र के देल जायत छल। जतय-जतय असुरक सैन्य छावनी छल ओतय स्थित आश्रम मे संग्रामिकताक उच्चा शिक्षा दैक व्यवस्था छल। ऋष्यश्रृंग आश्रम आसुरी गतिविधि सं दूर एकांत प्रदेश मे छल। ताहि सं अहि आश्रम मे संग्रामिकताक शिक्षाक कोनो महत्व नहि छल। यज्ञ ऋष्यश्रृंग अपने वृष्टि यज्ञक अद्वितीय आचार्य छल। अप्पन ससुर अंग नरेश रोमपादक राज्य मे कहियो अकाल नहि पड़य, एकरा लेल ओ शुक्ल यजुर्वेद संहिताक वाजसेनीय मध्यन्दिन शाखा सं कतेक रास ऋषि-मुनिकऽ साक्षी राखि सफल वृष्टि यज्ञ केने छल। वैदिक युग मे यज्ञक सवसे वेसी महत्ता छल। यज्ञ अग्नि संपन्न होयत छल। उत्तर वैदिक काल मे सेहो यज्ञक महत्व कम नहि छल। देवता आ मनुखक वीच संवंध स्थापना मे यज्ञक महत्वपूर्ण स्थान छल। उत्तर वैदिक काल धरि कतेक रास यज्ञ प्रचलित भऽ गेल छल जहि मे अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चतुर्मास्य, आग्रयण, निरूढ़, सौत्रामणी, पिण्डपितृ यज्ञ, सोम यज्ञ, षोडशी, अतिरात्र, पुरुषमेध आ पंचमहायज्ञक अलावा गवामयन, वाजपेय, राजसूय आ अश्वमेध जेहन यज्ञ तहियौका भारतीय समाज मे मान्य छल। यज्ञ आर्यक मिलन स्थल सेहो छल। ऋष्यश्रृंगाश्रम मे यज्ञक संपादनक विशेष पाठ¬क्रम छल। कज्जल वनक पुण्याश्रम वेद ध्वनि सं गुंजायमान छल। सभ्यताक समन्वय उत्तर वैदिक कल मे भगवान शिवक महत्ता वड़ वढ़ल छल। ओ युग आर्य आ आर्येतर जाइतक सम्मिलन, सम्मिश्रण आ समन्वयक युग छल। भगवान शिव आर्येतर जाइतक अराध्य देव छल। हुनका दरकिनार कऽ समन्वित आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक गठन असंभव छल। एहन स्थिति मे युगद्रष्टा ऋषि केर भगवान शिव दिस आकृष्ट होयव स्वाभाविक छल। वैदिक रुद्र जे उपहन्तु (ध्वंसक) छल, ओ उत्तर वैदिक काल मे कल्याणकारी शिव वनि गेल। वेद मे रुद्र सं कतेक रास रुद्र के उद्भूत मानल गेल अछि, जे भगवान शिवक व्यापकता कऽ रेखांकित करैत अछि। ताहि सं अहि रुद्र के गणपति, कुम्भकार, कर्मकार, रथकार, वाजीगर आ निषाद जेहन दलित, उपेक्षित आर्येतर जाइतक स्वामीक तरहे स्वीकार करल गेल अछि। अहि तरहे भगवान शिव उपर्युक्त शोषित, दलित, उपेक्षित आ अनार्य जाइतक उपास्य आ आराध्य देव छल। तत्कालीन तत्वदर्शी ऋषि अहि आर्येतर जाइत के आर्य सभ्यता संस्कृतिक महासिन्धु मे विलीन कऽ दैक लेल संकल्पित छल। एकरा लेल ओ शिवक सामान्य देवक तरहे नहि मुदा महादेवक रूप मे पूजा करलक। अनार्यक परमपूज्य आराध्य देवता रहैत भगवान शिवक प्रतिष्ठा, महानता आ व्यापकताक कारण ई छल जे ओ अप्पन ऐश्वर्य सं देवता के, शक्ति सं असुर के आ योग सं प्राणि सभके पराभूत केने छल। ई निर्विवाद अछि जे भारतीय सभ्यता आ संस्कृतिक गठन मे भगवान शिवक विराट भूमिका अछि। जौं शिव के अहि सं अलग कऽ देल जाय ते अहि सभ्यता, संस्कृति के स्थित हेवाक लेल कोनो आधार नहि भेट सकत। ऋष्यश्रृंग आश्रमक समस्त क्षेत्र मे व्रात्यक निवास छल। अथर्ववेदक (11-2-7) अनुसार देवता सभ महादेव के विभिन्न दिशाक व्रात्यक स्वामी नियुक्त केने छल। संभवत: अहि प्रतीकक स्वरूप भगवान विष्णु एतय व्रह्मशिला पर शिवलिंगक स्थापना केने छल। वराहपुराणक उत्तराद्र्धक एकटा पुरा कथा मे अहि तथ्य कऽ रेखांकित करल गेल अछि। विष्णु द्वारा स्थापित शिवलिंग के ऋष्यश्रृंग फेर सं पुनर्जागृत करलक। एकर उल्लेख शिव पुराणक चतुर्थ रुद्र संहिताक सातम श्लोक मे भेल अछि। एकर अनुसार, कौशिकी कात स्थित शिव धाम मे दधीचिक रणभूमि मे श्रृंगेश्वर, वैद्यनाथेश्वर आ जपेश्वर नामक शिवलिंग प्रसिद्ध अछि। 'श्रृंगेश्वरश्च नाम्नावै वैद्यनाथ स्तथैव च। जप्याश्वरस्तथा ख्यातौ यो दधीचिरण स्थले।' चौवीस हजार श्लोक वाले वायु पुराणक एकटा अंश शिवपुराण अछि। ऋष्यश्रृंग द्वारा पुनर्जागृत केल जाय वला भगवान शिवक ई इष्टलिंग उत्तर वैदिक काल सं आय धरि मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय वा पूजनीय अछि। दूर ठाम धरि फैलल विशाल व्रह्मशिला सं ई इष्टलिंग जुड़ल अछि। एखुनका शिवलिंग सं तीन गुना वेसी मोट ओ दस फीट नीचा व्रह्मशिला धरि अछि। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत अछि। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर उत्कीर्ण अछि। ऋष्यश्रृंग अहि शिवलिंग के पुनर्जागृत कऽ आर्य आ आर्येतर संस्कृति कऽ एकाकार कऽ देने छल। ऋष्यश्रृंग द्वारा एकरा पुनर्जागृत करहि के कारण ई इष्टलिंग श्रृंगेश्वरक (या सिंहेश्वर) नाम सं विख्यात भेल। दक्षिणात्यमे तपस्या उत्तर वैदिक काल धरि आर्य संपूर्ण उत्तर भारत मे पसैर चुकल छल। अे कतेक रास समृद्ध जनपदक सेहो स्थापना केलक। उत्तर भारत मे कतेक रास ऋष्यश्रृंग आश्रम स्थापित छल। कनि-कनि असुर दक्षिणापत्य दिस सिमटैत गेल। एतय मुख्यत: हुनकरे शासन छल। तकर वादो आर्य सभ्यता आ संस्कृति के दक्षिणात्य मे पसारैलक उद्देश्य सं कतेक रास ऋष्याश्रम मिशनरीक तरहे काज कऽ रहल छल। अहि ऋष्याश्रम के समय-समय पर निरीक्षण करैक दायित्व भगवान शिव पर छल। ओ अहि ठाम अवाध आवैत-जायत छल। क्याकि ओ असुर सभहक सेहो अराध्य देव छल। राम सवसे पहिलुक आर्य देवता छल जे दक्षिणात्व मे पइर राखलक। ओ एतय कार्यरत आर्य ऋष्याश्रम के असुर सं अभय कयलक। निशिचर हीन करौं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह। उत्तर भारतक ऋषि सेहो दक्षिणात्य जा कऽ तप करैत छल। तपक लेल दक्षिणात्यक ठाम वड़ उपयुक्त चल। ऋष्यश्रृंग सेहो दक्षिणात्यक जे ठाम मे अखण्ड तपस्या केने छल ओ तप:पूत स्थल आय श्रृंगेरी क्षेत्रक नाम से चर्चित अछि। श्रृंगेरी ग्राम, श्रृंगेरी पर्वत आ श्रृंगेरी तालाव आययो ओहि महान तपस्वीक तपस्याक साक्षी अछि। हजार वरखक वाद आद्य शंकराचार्य अप्पन पहिलुक मठ श्रृंगेरी मे स्थापित केने छल आ ओतय सं दिग्विजयक लेल अप्पन अभियान शुरू केने छल। शंकराचार्य ओहि ठाम पर देखलक जे प्रकृति विरोध धर्म प्रेम, सेवा आ दयाक आगू प्राणी कोन तरह अप्पन स्वाभाविक धर्म के विसुरि के कल्याण काज मे निरत भऽ जायत छल। थाकल-मांदल योगी शंकर एकटा वटवृक्षक नीचा वैसल छल। वड़ गर्मी चल। आपसी द्वेष के विसुरि के एकटा नेवला आ सांप खेल रहल छल। ओतय सांप अप्पन आहर एकटा वेंग कपा मुंह सं पकडि़ पइन मे छोडि़ दैत छल। ओ विस्मित भऽ जायत अछि। ई ऋष्यश्रृंगक तपस्या स्थली छल, जकर महत्ता आय धरि दृष्टिगोचर होयत अछि। अे महान ऋष्यश्रृंगक प्रति श्रद्धावनत भऽ कऽ अप्पन शिष्य सं कहै छथिन, जतय व्रह्म मे अप्पन अंतकरण के लगा दै वला ऋष्यश्रृंग आय धरि तपस्या कऽ रहल अछि। आ जतय स्पर्श मात्र सं कल्याण दहि वला तुंगभद्रा सुशोभित होयत अछि, जतय अभ्यागत पुरुषक पूजा सं कल्पवृक्ष के सेहो लजावै वला, समस्त वेद कऽ पढ़य वला, सैकड़ों टा यज्ञ सं प्रसन्न हैय वला शान्तचित्त सज्जन लोक सभ निवास करैत अछि। शंकराचार्य अहि तपस्थलीक स्तुति करलक आ ओतय विद्याग्रहण मे समर्थ विद्वान शिष्य के अप्पन मुख्य भाष्यक अध्ययन सेहो करैलक। एतय सं वौद्ध के सेहो शास्त्र से पराजित कऽ सनातन धर्मक पुनस्र्थापनाक लेल दिग्विजयक लेल चलल छल शंकराचार्य। अभियानक पूर्व आचार्य शंकर श्रृंगेरी मे अप्पन पहिलुक मठ निर्माण कऽ वेदांत विद्यापीठक स्थापना कएलक। एत्ते सं सनातन धर्मक प्रचारार्थ मीमांसक व्रह्मचारीक समुदाय सन्यास सम्प्रदाय मे दीा ग्रह करैत छल। ऋष्यश्रृंग सेहो अप्पन कालक अद्वितीय मीमांसक छल। ओ ऋषि कुल आश्रम मे कतेक ऋषिक आत्मज आ मानस पुत्र के मीमांसाक अध्ययन करावैत रहल। श्रृंगवेरपुर वृतान्त ऋष्यश्रृंग अप्पन प्रताप सं उत्तर पश्चिम गंगाक वाम कात पर सेहो तपस्या करले छल। ई ठाम निषाद शासकक अधीन छल। आजुक काल मे ई ठाम इलाहावाद-उन्नाव राजमार्ग पर स्थित अछि। एतय गंगा कात पर एकटा वड़ पैग टील अछि जकर लगभग आधा हिस्सा गंगा मे कटि चुकल अछि। यहि ठाम अछि ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि श्रृंगवेरपुर। एतय मंदिर मे ऋष्यश्रृंग आ मां शान्ताक भव्य मूर्ति स्थापित अछि। रामायण मे श्रृंगवेरपुरक वड़ महत्व अछि। अप्पन वनवासक काल श्रीराम अप्पन अनुज आ स्त्रीक संग एतय नाव सं गंगा पार केने छल। पुरवासी सभक संग भरत जखन राम मे मिलैक लेल चित्रकूट गेल छल, तखन ओ श्रृंगवेरपुर आयल छल। कालिदासक रघुवंश आ भवभूतिक उत्तर रामचरित मे अहि पुण्य स्थलक गौरवपूर्ण उल्लेख अछि। तुलसीदास एकर सिंगरौरक प्राचीन नाम सं उल्लेख केने अछि- 'केवट कीन्ह वहुत सेवकाई सो जामिनी सिंगरौर गंवाई।' ई ठाम ऋष्यश्रृंगक तपस्या भूमि अछि। ऋष्यश्रृंग मंदिर सं आध किमी दूर गंगा मे विभाण्डक कुण्डक नाम सं घाट सेहोवनल अछि। श्रृंगवेरपुर निवासी राजा रामदत्त सिंह (18वीं सदी) आध्यात्म-रामायणक टीक मे एतय ऋष्यश्रृंग आश्रम हेवाक संग अहि महर्षिक जीवनक अन्यान्य वृतान्त के अहि ठाम सं जोड़वाक यत्न केने अछि। हमर विचार सं अप्पन जन्मभूमिक प्रति मोह हेवाक कारण राजा एहन केने होयत। श्रृंगवेरपुर के ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि मानवाक एतिहासिक भूल अछि क्याकि महाभारत मे स्पष्ट लिखल अछि- 'एषा देवनदी पुण्या कौशिकी भरतर्षभ विश्वामित्राश्रमौ रम्य एश चात्र प्रकाशते। आश्रमश्चैव पुण्याख्य: काश्यपस्य महात्मन:। ऋष्यश्रृंग सुतौ तस्य तपस्वी संयतेन्द्रिय:।' कौशिकीक कात पर जतय विश्वामित्रक आश्रम छल, ओतय पुण्याश्रम मे महर्षि काश्यपक जितेन्द्रिय वंशज ऋष्यश्रृंगक आश्रम छल। एक ऋषिक अप्पन मुख्य आश्रमक अलावा कतेक ठाम हुनकर उपआश्रम होयत छल। पुण्याश्रम मे द्वादश वर्षीय यज्ञ ऋष्यश्रृंगक मुख्य आश्रम कौशिकीक कात पर पुण्याश्रम मे छल। ओ जतय-जतय तप करलक ओतय उपाश्रम वनौलक। ओ अप्पन जीवन मे कठिन तप आ योग साधनाक संग यज्ञ के मोक्ष प्राप्तिक साधना वनैलक। ओ समस्त भारतक पवित्र स्थलक सेहो भ्रमण केलक। ओ कतेक रास कठिनतम यज्ञ केलक, जाहि मे द्वादश वर्षीय यज्ञ सेहो छल। अहि यज्ञक वड़ पैग मार्मिक वर्णन भवभूति अप्पन उत्तर रामचरितक प्रथमांक मे केने अछि। अयोध्या मे सभ दिन कोनो नै कोने उत्सव हैत छल। अहि वीच एकटा विदेशी अयोध्या आवैत छल आ राजधानी मे उत्सव नै हैत देखि के एकर कारण जानैल चाहैत अछि। नट एकर उत्तर दैत अछि जे उत्सव नै हैक कारण अछि जे रामक माता महर्षि वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग अप्पन दामाद ऋष्यश्रृंगक आश्रम मे यज्ञ देखहि लेल गेल छथिन। 'वशिष्ठाधिष्ठिता देव्यो गता रामस्य मातर:। अरुन्धती पुरस्कृष्य यज्ञे जामातुराश्रमम्।' ई सुनि के ओ विदेशीक प्रश्नाकुलता आरो वढि़ जायत अछि। ओ पूछि दैत अछि जे ई जमाता के अछि? नट उत्तर दैत अछि जे राजा दशरथक पुत्री शान्ताक पति अछि ऋष्यश्रृंग, हुनके कते हैवला यज्ञ मे भाग लैक लेल रामक माता सव गेल छथिन। 'विभाण्डक सुतास्ताम ऋष्यश्रृंग उपयेमे तेन च साम्प्रतं द्वादश वार्षिक सत्र माख्यं। तदपुरोधात कठोर गर्भापति वधूं जानकी विमुप्य गुरुजनस्तत्र: गत:।' ई स्पष्ट अछि जे रामक माता ऋष्यश्रृंग के अप्पन जमाता मानैत अछि। यहि कारण अछि जे गर्भवत सीता के छोडि़ के अप्पन पुत्री शान्ता आ जमाता ऋष्यश्रृंगक प्रति अकूत स्नेहक कारण माता ऋष्यश्रृंगक अश्रम मे पधारैत अछि। मुनि अष्टावक्र सेहो यज्ञ मे उपस्थित छल। ओ अहि महान यज्ञक समाचार लऽ कऽ पहिने अयोध्या घुरैत अछि। राम शान्ता के अप्पन पैग वहीन आ ऋष्यश्रृंग के अप्पन पैग वहनोई जेहन सम्मान दैत यज्ञ कऽ लऽ कऽ पूछैत अछि 'निर्विघ्न: सोमपीथी आवुंते मे भगवान ऋष्यश्रृंग आर्या च शान्ता।।' राम ऋष्यश्रृंग के आवुंत (वहनोई) आ भगवान (पैग) आ शान्ता के पैग वहीन (आर्या) जेहन सम्मान दैत अछि। सीता सेहो कुशल पूछैत अछि, ‘अवि कुशलं स जमातु अस्स।‘ एतवे टा नै सीता के ईहो जिज्ञासा अछि जे ऋष्यश्रृंग के हुनकर याद आवैत अछि की नै? ‘अहमेव सुमरेति?’ अष्टावक्र एकर उत्तर त्वरित दैत अछि. ‘अथ किम्? ‘(आओर की?) मुुनि अष्टावक्र सीताक लेल हुनकर ननद शान्ता के ई प्यार भरल संदेश सेहो राम के दैत अछि जे सीताक गर्भावस्थाक काल जहि वस्तुक इच्छा हुए, ओ हुनका उपलव्ध कराओल जाय। गर्भ दोधेअस्या भवति सोऽवस्यम चिरात सम्पादयित्व। एकर संगे अष्टावक्र सं संदेश भेजकऽ ऋष्यश्रृंग सलहज के यज्ञ मे नहि वजावैक कारण वुझावैक संग संवोधोचित परिहास सेहो कऽ लैत अछि वत्से! कठोर गर्भेति नानितासि। वत्सोऽपि रामभद्रस द्विनोदार्थमेव स्थापित:। तत्पुत्र पूर्णोत्संगामायुष्यति दक्ष्याम्। अर्थात वत्से! (वच्ची) गर्भवती हेवाक कारण अहां एतय नहि आवि सकलहुं आ वत्स राम ते अहांक मनोरंजनक लेल अयोध्यामे अछियै। हम ते अहां के पुत्र सं भरल गोदवाली देखव। ऋष्यश्रृंग द्वारा राम के वत्स आ सीता के वत्से कहिके पुरारव सं स्पष्ट अछि जे दूनूक प्रति ऋष्यश्रृंगक छोट साढ़ आ सलहजक प्रेम छल। ई द्वादश वर्षीय महायज्ञ कौशिकी तट स्थित ऋष्यश्रृंगक मूल आश्रम मे भेल छल। किछु विद्वान एकरा रेवा नदी (नर्मदा) आ समुद्रक संगम स्थल पर हय के गप करैत अछि। जे संदिग्ध अछि। ओहि साधन विहीन युग मे अप्पन मूल आश्रम सं हजार मील दूर एतेक वृहद दीर्घकालीन कठिन यज्ञक संपादन करव उपयुक्त नहि जानि पड़ैत अछि। ओहि ठाम पर अहि यज्ञक कोनो चिह्न सेहो नहि अछि। कोनो ठोस वहिर्साक्ष्य सेहो नहि अछि जे सिद्ध कृ सकय जे यज्ञ अमुक ठाम पर भेल छल। मुदा ऋष्यश्रृंगक कौशिकी तट स्थित मूल आश्रम अहि महान यज्ञक साक्षी अछि। आश्रमक लग कोशीक कात मे सतोखर गाम वसल अछि। एतय हजारों वरख पुरान सात विशाल यज्ञ कुण्ड तालावक रूप में एखनो अछि। दू टा कुंड ते कोशी के पेट मे चलि गेल मुदा पांच टा एखनो अछि। किछु दशक पहिने अहि कुंडक जीर्णोद्धार करय लेल खोदल गेल ते ओहि मे राखक वड़ मोट-मोट परत निकलल छल। परत एतेक मोट छल जे ओ कोनो एक दिन या एक माहक यज्ञक राख नहि भऽ सकैत अछि। ई निश्चित रूप सं वरख भरि चलल यज्ञक राख होयत। सात कुंड एक संग रहवाक कारण एकरा सप्त पुष्कर कहल जायत छल। कुंड पुष्करेक रूप छल। वहि सप्त पुष्कर आव सतोखर वनि गेल अछि। ऋष्यश्रृंग जेहन महान वैज्ञानिक द्वारा संपादित अहि तरहक यज्ञ कतेक अर्थ मे महत्वपूर्ण अछि। ई आैषधिक अनुसंधान, शोध आ परीक्षण सेहो अप्पन यज्ञशाला मे करैत छल। आयुर्वेदिक गुण सं युक्त समिधाक चयन आ प्रयोग, वनस्पतिक गुण-दोष विवेचन आ हुनकर व्यवहारक गवेषणात्मक अध्ययनक लेल अहि ठामक अतिरिक्त आैरो ठाम ओ एहि तरहक महान यज्ञ करने होयत ते ऋष्यश्रृंग जेहन महान याज्ञिकक लेल असंभव नै। मुदा सभी कोण सं परीक्षणक पश्चात ई निर्विवाद अछि जे ओ ऋष्यश्रृंग आश्रम (वर्तमान सिंहेश्वर) मे द्वादश वर्षीय यज्ञ केने छल, जाहि मे आर्यावर्तक सभ ऋषि-मुनि भाग लेने छल। संगेसंग अयोध्या सं रामक माता, वशिष्ठक स्त्री अरुन्धतीक संग यज्ञ मे भाग लैक लेल आयल छल। वारह वरख तक अनवरत ई क्षेत्र वेदमंत्रक समूह गान सं गूंजैत रहल छल। महानदीक प्रगट हेवाक प्राकृतिक जल रुाोत के सुव्यवस्थित कऽ ओहि सं सिचार्ईक व्यवस्था करहि मे ऋष्यश्रृंग सिद्धहस्त छल। एखुनका छत्तीसगढ़क सिहोवा मे महानदीक उद्गम अछि। ऋष्यश्रृंग सं पहिने अहि नदीक अस्तित्व नहि छल। विशाल पत्थर सं झांपल उद्गम के भगीरथक प्रयास सं ई ऋषि नदी मे अवतरित केने छल। परीक्षण सं हुनका ज्ञात भेल जे सिहोवाक शिला मे अगाध जल रुाोत अछि। जौ जल रुाोतक निकासी आ वहाव सुव्यवस्थित कऽ देल जाय, ते ई एकटा वड़ पैग नदीक रूप लऽ सकैत अछि। ऋष्यश्रृंग एहने करलक। ओ लोककल्याण, लोक रंजन आ लोक मंगलक लेल जनसहयोग सं अहि दुष्कर काजक संपादन करलक। अहि प्रकार महानदी प्रकट भेल। किंवदंति ते ई अछि जे हुनकर कमंडल मे पुत्रेष्ठि यज्ञक वचल मंत्रसिक्त जल छल। ओहि से ऋष्यश्रृंग महानदीके प्रगट केलक। कथा जे भी हिए, सिहोवा एखुनका रायपुर जिला मे अचि। ई दण्डकारण्य क्षेत्रक प्रमुख स्थान अछि। सिहोवा पर्वत शिखर पर ऋष्यश्रृंगक मंदिर अछि आ माता शान्ताक नाम पर एकटा गुफा सेहो अछि। प्राकृतिक वातावरण सं संपन्न ई एकटा दर्शनीय स्थल अछि। महानदीक उद्गमक रमणीयता ते अकथनीय अछि। मध्य प्रदेश मे चांदा (चन्दनपुर) मे सांदक या भाण्डक आश्रम अछि जे विभाण्डकक विगड़ल रूप अछि। सोयतकलां (शाजापुर) मे ऋष्यश्रृंगक मंदिर सेहो अछि। वेहट (जिला ग्वालियर) ऋष्यश्रृंग गुफा मे हुनकर मूर्ति स्थापित अछि। उज्जैन मे सेहो ऋष्यश्रृंगक आश्रम अछि, जतय वर्षाक लेल हुनकर मूर्ति वनाके अनुष्ठान केल जायत अछि। वंश विस्तार ऋष्यश्रृंगक वंश विस्तार सेहो भेल अछि। हुनकर पुत्र सारंग ऋषि छल। ओ वड़ तपोनिष्ठ छल। ओ वेदक गहन अध्ययन केने छल। हुनकर चारि टा पुत्र भेल। चारो पुत्र उग्र, वाम, भीम आ वामदेव आजन्म व्रह्मचर्य व्रत धारण कऽ योग साधनारत भऽ कऽ व्रह्म मे लीन भऽ गेल। शेष चारि पुत्र वत्स, धौम्यदेव, वेददृग आ वेदवाहु व्रह्मचर्य पूर्वक गृहस्थ आश्रम मे प्रवेश कयलक। हुनकर वंशज शिखवाल (श्रृंगीवाल) व्राह्म अछि, जे संपूर्ण देश मे पसरल अछि। ओ समृद्ध, विद्यानुरागी आ उत्कृष्ट समाजसेवी अछि। वेदवेत्ता सारंगक पुत्र वत्सक वंश मे मीमांस शास्त्रक रचयिता जैमिनी भेल। ओना ऋष्यश्रृंग वैदिक कर्मकाण्ड आ याज्ञकर्म मे विशेष दक्ष छल। मुदा अहि ऋषिराजक पश्चात व्राह्मण ग्रंथ आ उपनिषदक रचनाकाल मे ऋषि सभ द्वारा जीव व्रह्म संवंधी विशेष चिंतन मनन अन्वेषण करैत रहय सं वैदिक यज्ञादि परंपरा मे विकृति आ विभिन्नता आवि गेल। तखन महर्षि जैमिनी यज्ञ मे पूर्ववत एकरूपता आनय के उद्देश्य सं वेदक प्रमाणक मुताविक, यज्ञक निरूपण आ प्रतिपादन करैत यज्ञादि कर्मक सार्थक विवेचन करलक। अप्पन कामनाक पूर्तिक लेल विधिवत यज्ञ करव जैमिनीक अनुसार धर्म अछि। ताहि सं ओ मीमांसाक दर्शन आरंभ अथातो धर्म जिज्ञासा सूत्र सं केने अछि। ओना तै वैदिक कर्मकाण्डक विधान मे तहियौका विरोधक निवारण आ वैदिक उक्तिक अर्थक समुचित निरूपण दिस श्रुतिकाल मे ऋषि सभहक ध्यान गेल छल जकर प्रमाण वैदिक संहिता मे प्रयुक्त मीमांस आदि संज्ञा पद सं भेटैत अछि। ई दर्शन कर्म पर विशेष वल दैत अछि आ वेदक अपौरुषेय आ नित्य मानैत अछि। एकर साहित्य संपत्ति सेहो विशाल अछि। पाचम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक समकालीन दोसर चर्चित ऋष्याश्रम रामायणकालक शिखर पुरुख छल ऋष्यश्रृंग। हुनकर आश्रम विद्याक स्थायी केंद्र छल। एकर अलावा पूरे देश सेहो आश्रम सं भरल-पुरल छल। ओहि मे ज्ञान-विज्ञानक अजस्त्र मंदाकिनी प्रवाहित छल। रामायण काल आसुरी शक्ति पर आर्यक विजयक जुग छल। ई विजय अस्त्र-शस्त्र सं संभव नै छल। अहि काल मे आर्यावर्त छोट-छोट राज्य मे वंटल छल। सव राज्य स्वतंत्र छल आ सभहक अप्पन पृथक सेना छल। महर्षि वनहि सं पहिने विश्वामित्र लग सेहो चतुरंगिणी सेना छल। सेना मे हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सभ चल। चित्रकूट यात्राक काल भारतक अक्षौहिणी सेना मे नौ हजार हाथी, साठ हजार रथ, दोसर-दोसर आयुधधारी असंख्य धनुर्धर आ एक लाख अश्वारोही सैनिक छल। अहि तरहे रामायणकाल शस्त्र परिचालनक युग छल। अहि कारण देश मे पसरल प्राय: सभटा आश्रम मे सैन्य शिक्षा, आयुध परिचालन, शोध आ निर्मणक शिक्षा अनिवार्य छल। सिद्धाश्रम, भारद्वाजाश्रम, अगस्त्याश्रम, सुतीक्षण आश्रम, वाल्मीकि आश्रम, वशिष्ठ आश्रम आदि मे संग्रामिकताक शिक्षाक भरपूर प्रवंध छल। आर्य सभ्यता आ संस्कृतिक समूल नष्ट करहिक लेल रावण मलद, करुष आ जनस्थान मे अप्पन विशाल सैन्य छावनी वनैने छल। अहि स्थान मे आर्य ऋषि-महर्षिक वड़ पैग-पैग आश्रम छल जतय रहि के विद्यार्थी सव तरहक शिक्षा आ व्यावहारिक ज्ञान ग्रहण करैत छल। विश्वामित्रक सिद्धाश्रम आ अगस्त्याश्रम मे जखैन कहियो अध्ययन, चिंतन-मनन, अनुसंधान आ यज्ञादि क्रिया होयत छल, तखैन आसुरी छावनी मे तैनात सेना विघ्न उपस्थित करैत छल। ई राक्षस वलवान आ युद्ध कला मे निपुण छल। स्वयं विश्वामित्र एकरा दशरथक आगू स्वीकार केने छल- मारीचश्च सुवाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ रामायण वालकांड 20/5 एहन वलवान राक्षसक संहारक लेल सिद्धाश्रम मे गहन शोध कऽ निर्माण करल गेल दूटा विद्या उल्लेखनीय अछि। ई दूटा विद्या सभ तरहक ज्ञानक जननी छल। वला आ अतिवला, एकर प्रभाव सं भूख-प्यासक कष्ट नहि होयत छल। राम पहिने आचमन करि के अपना के पवित्र केलक आ फेर महर्षि विश्वामित्र सं अहि दूनू विद्या के ग्रहण करलक। अहि प्रकार कतेक रास रहस्यमई विद्या सेहो आश्रम मे सृजित केल जायत छल। आश्रमक वायुमंडल वैदिक मंत्रक घोष सं गुंजायमान रहैत छल। ई वैदिक मंत्रक पूर्ण फल प्राप्त करहि के लेल एकरा शास्त्रानुसार यथा स्वर पढ़हि के विधान छल। अर्जित ज्ञात कतो शिथिल या विस्मृत न भऽ जाय, एकरा लेल प्राचीन शिक्षाविद दैनिक स्वाध्याय आ अभ्यास प्रणाली निकाललक। स्वाध्याय के अपने मे स्वयं शिक्षण विधि करव वेसी उपयुक्त अछि। मुनि कुमार ऋष्यश्रृंग छात्र जीवन मे पितृ सेवा आ स्वाध्याय मे एत्ते निमग्न रहैत छल जे हुनक मे काम चेतनाक उदय नहि भेल। स्नातक मे सामाजिक कत्र्तव्यक पालन करावैक लेल तत्कालीन शिक्षाविद ऋणानि त्रीणि केर सिद्धांतक प्रतिपादन केलक, जकर समाज मे महत्वपूर्ण ठाम अछि। एकर मुताविक, संसार मे जन्म लय वला सभ लोक पर देव ऋण, ऋषि ऋण आ पितृ ऋणक भार आवि जायत अछि। यज्ञक अनुष्ठान, शास्त्रक स्वाध्याय आ संतानोत्पादन सं मनुख अहि सभ ऋण सं मुक्त भऽ सकैत अछि। स्नातक सभ मे पवित्र सामाजिक उत्तरदायित्वक भावना उत्पन्न करहि के लेल ई सिद्धांत वड़ उपादेय छल। ऋष्यश्रृंगक काल मे दोसर जे महत्वपूर्ण आश्रम आर्यायर्त मे संचालित छल, ओकर संक्षिप्त परिचय एना अछि- सिद्धाश्रम मलद प्रदेश मे आधुनिक वक्सर लग विश्वामित्रक ई चर्चित आश्रम छल। एकरा महाश्रम सेहो कहल जायत अछि। एतय छात्र सभके अलग-अलग तरहक अस्त्र-शस्त्रक शिक्षा देल जायत छल। एतय नव-नव अस्त्र-शस्त्रक अविष्कार आ ओकर परीक्षण सेहो करल जायत छल। आर्य सभ्यता-संस्कृतिक ई पूर्वी केंद्र छल। रावण जेहन महाप्रतापी सम्राट सेहो अहि महाश्रम सं सदिक्खन डरल रहैत छल। यहि कारण छल जे ओ एकटा सैनिक छावनी एतय वनैले छल जे मारीच, सुवाहु, ताड़का जेहन महाभट सं संचालित होयत छल। करुष मलदक स्त्री सेहो वड़ वहादुर आ साहसी होयत छल। विश्वामित्र भगवान राम के एतय सैनिक शिक्षा देने छल। संगेसंग ओ कतेक रास नव आ परंपरागत पचपन दुर्लभ अस्त्र देलक आ हुनकर प्रयोग करहि के विधि वतौलक। कोशी तट पर सेहो हुनकर तपस्या स्थल छल। एतय ओ एतेक कठिन तपस्या केने छल, जाहि सं सृष्टिक मूल चक्र धरि हिल उठल छल। ओ कोशी तट पर पइन माइट आ वातावरणक अनुसार चीना, मडुआ, खेरही जेहन अनाज आ भैंस जेहन पशुक विकास करलक। ओ अप्पन कालक प्रख्यात कृषि आ पशु वैज्ञानिक सेहो छल। उत्तर वैदिक काल मे आर्यक वीच ई विवाद भऽ गेल जे विजित दस्यु कऽ की करल जाय? जौ ओकर वध करल जाय ते आर्यक सेवा चाकरी के करत? जौं ओकर जीवित राखल जाय ते समाज मे ओकर की पद होयत आ दासी-पुत्रक कुटुम्व मे कोन स्थान होयत? ई विवाद युद्धक रूप लऽ लेलक। शास्त्रक अनुसार, वशिष्ठ आ विश्वामित्र मे अहि समस्याक लऽ कऽ विरोधभाव वढि़ गेल। वशिष्ठ रक्त शुद्धिक पक्षधर छल आ विश्वामित्र दस्यु सभ के आर्य वनावैल चाहैत छल। विश्वामित्रक अनुसार, आर्यत्व जन्म सं नै गायत्र मंत्रक जप सं शुद्ध भऽ कऽ सत्य आ ऋत सं प्रेरित भऽ कऽ यज्ञोपवीत धारण करहि सं ओकर शुद्धि होयत अछि। कोनो मनुख अहि प्रकार सं नया जन्म ग्रहण कऽ सकैत अछि। द्विज वनि के आर्य भऽ जायत अछि। तहियौका समाज मे ई उदारवादी रीति वहि सिखैने अछि। अहि तरहे तहियौक भारतीय समाज संरचना मे विश्वामित्रक वड़ पैग योगदान अछि। ई हुनकर कौशिकी तटक चिंतन-साधनक प्रतिफल अछि। राजा जनकक आश्रम महर्षि याज्ञवल्क्य अहि आश्रमक आचार्य छल। ई मिथिलाक विद्वान नरेश सीरध्वज जनकक देख-रेख मे संचालित होयत छल। एतय जागतिक रहस्य, जीवनक विभिन्न जटिल गुत्थी, जीवन-मरणक समस्याक समाधान आ ज्ञान-विज्ञानक तत्व के सार्थक अन्वेषण करल जायत छल। अहि आश्रमक नाम एतेक पसैर गेल छल जे मिथिलाक अमराई के संचालित गौतम आश्रम फीका छल। भारद्वाज आश्रम ई आश्रम प्रयाग मे छल। एकरा विश्वविद्यालयक मान्यता प्राप्त छल। ई सर्वशक्ति आ साधन संपन्न आश्रम छल। श्रीराम के मना कऽ भरत सदलवल फेर सं अयोध्या लऽ जाय के लेल चित्रकूटक वाट मे प्रयागक भारद्वाज आश्रम मे एक रात्रि निवास केने छल। वाल्मीकीय रामायणक अयोध्याकण्डक अध्याय 89-90 मे एकर वर्णन अछि। ई स्वागत वृतांत सं पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक साधन संपन्न छल। भारद्वाज विश्वकर्मा, इंद्र, यम, वरुण, कुवेर, पृथ्वी, आकाश, नदी, देव, गंधर्व, अप्सरा, चित्ररथ वन (जेकर गाछ अलंकार सं लदल अछि), उत्तम अन्न, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य आ चोष्यक प्रचुर मात्रा मे व्यवस्था करैत भगवान सोम आदि देवताक आह्वान कयलक आ देवता सभ हुनकर आदेशानुसार भरत केर स्वागतक सभ व्यवस्था कयलक। एतवे टा नै, हुनकर योगवल सं मलय अ दर्दुर नामक पर्वतक सुगंध युक्त शीतल हवा सभ लोकक थकान ह लेलक। आमंत्रित नदी मे मैरेय भरि गेल। सैनिक छक कए एकर रस पान केलक। पांच योजन धरि समतल धरती पर नीलम आ वैदुर्य मणिक समान कतेक तरहक कोमल घास उगि गेल। आश्रम मे वेल, कैथ, कटहल, आंवला, विजौरा आ आमक घना वृक्ष छल। चारि-चारि कोठली सं युक्त असंख्य चवूतरा छल। हाथी, घोड़ाक राखहिके लेल अलग शाला छल। राजपरिवारक लेल सुनर द्वार युक्त दिव्य भवन छल। एतय सव तरहक दिव्य रस, दिव्य भोजन आ दिव्य वस्त्र छल। भरतक लेल कतेक प्रकारक रत्न सं सज्जित महल छल। अतिथिक स्वागत लेल हजार दिव्यांगनाएं छल। एतय अप्सराक नृत्य आ गीत चलि रहल छल। सभ लोक भरपेट मन जोगर भोजन केलक आ छककय मैरेय केर पान केलक। अप्सराक संयोग पावि के भरतक सैनिक हम अयोध्या नहि घुरव, अहि दण्डकारण्य मे रहव, जेहन परस्पर गप करि रहल छल। मृग, मोर अ मुर्गाक मांसक संग मदिरापान कऽ सैनिक झूमि रहल छल। आजवाइन मिलाकऽ वनाओल गेल, वराही कंद सं तैयार करल गेल आ आम आदि फल के गरम करल रस मे पकाओल गेल उत्तमोत्तम व्यंजनक संग्रह, सुगंधमय रसवला दाल आ श्वेत रंगक भात सं भरल सहस्त्र स्वर्ण आदि केर पात्र ओतय सभ दिस राखल छल, जेकरा फूलक ध्वजा सं सजाओल गेल छल। भरतक संग आयल सभ लोक हुनका आश्चर्यचकित भऽ के देखलक। आश्रम मे सहस्त्र सोना के अन्न पात्र, लाख व्यंजन पात्र आ एक अरव थाली संग्रहित छल। सात-आठ तरुणी स्त्री मिलकऽ एक-एक पुरुख के नदीक मनोहर तट पर उवटन लग के नहावैत छल। पैग-पैग आंखि वाली रमणी अतिथि सभ के पैर दवावैक लेल आयल छल। ओ हुनकर भीजल अंग के सूखल वस्त्र सं पोछि के वस्त्र धारण कराकऽ हुनक स्वादिष्ट पेय पियावैत छल। महर्षि भारद्वाज द्वारा सेना सहित भरत के करल गेल ई अनिर्वचनीय आतिथ्य सत्कार अद्भुत आ स्वप्नक समान छल। अहि वृतांत सं ई पत चलैत अछि जे ई आश्रम कतेक समृद्ध आ साधन संपन्न छल। सैनिक शिक्षाक उद्देश्य सं ई आश्रम वनल छल, एहन प्रतीत होयत अछि। अगस्त्याश्रम नासिक सं 36 किलोमीटर दक्षिण पूर्व वर्तमान अगस्तिपुर मे ई आश्रम छल। एकर कुलपति महर्षि अगस्त्य छल। ई सैनिक शिक्षा, आयुध-अनुसंधान आ व्रह्म विद्याक केंद्र छल। ई क्षेत्र जनस्थान कहल जायत अछि। महर्षि अगस्तक आश्रम ते ओहि युग मे भय आ आदरक सम्मानित छल। अहि आश्रम मे एतेक विध्वंसक शस्त्र-अस्त्र तैयार होयत छल जहि सं राक्षसराज रावणक ह्मदय मे सदिक्खन आतंक वनल रहैत छल। रावण अहि डर सं ओतय अप्पन पैग सैनिक छावन कायम कऽ देने छल। राम रावणक वध पैतामह नामक अस्त्र सं केने छल। महर्षि अगस्त्य अप्पन आश्रम मे रावण-वधक लेल एकर अविष्कार केने छल। भगवान राम के ओ अहि उद्देश्य सं हुनका भेंट केने छल। पैतामह अस्त्र मे पहाड़ के वेधय के शक्ति छल। एकर अतिरिक्त अगस्त्य राम के हीरा आ सुवर्ण जड़ल दिव्य धनुष, सूर्यक समान देदीप्यमान अमोघ वाण, तीक्ष्ण आ प्रज्जवलित अग्निक समान वाण सं सदिक्खन भरल रहि वला अक्षय तरकस आ सोनाक म्यान आ सोनाक मूठ वला तलवार भेंट दऽ कऽ राक्षस केर संहारक लेल आह्वान केने छल। अगस्त्य आश्रम मे ज्ञानक विभिन्न विभाग छल। व्रह्म थान, अग्नि थान, विष्णु थान, महेंद्र थान, विवस्वान थान, वायु थान, वारुण थान प्रभृति। व्रह्म थान मे वेदक अध्ययन होयत छल। अग्नि थाम मे साम गान होयत छल। एतय मंत्रोच्चारणक संग समिधा आहूत होयत छल। विष्णु थान मे राजनीति, अर्थाशास्त्र, पशुपालन, आक्रमणकारी आ रक्षणशील आयुधक ज्ञान प्रदान करल जायत छल। विवस्थान थान मे ज्योतिषक पढ़ाय होयत छल। चिकित्सा विज्ञान सेहो एतय पढ़ौओल जायत छल। गरुड़ थान मे यातायात, यान आदि के ज्ञान उपलव्ध होयत छल। कार्तिकेय थान मे व्रह्मचारी गुल्म,पत्ति, वाहिनी आदिक संचालनक शिक्षा प्राप्त करैत छल। कौवेर थान मे जल संतरण, पोत संचालन आदि केर शिक्षा देल जायत छल। महर्षि अत्रि आश्रम ई आश्रम चित्रकूटक दक्षिण मे संचालित छल। ई तहियौका आर्य सभ्यताक मुख्य केंद्र छल। हस्तशिल्प कला मे ई अग्रणी छल। वनवास काल मे महर्षि अत्रिक स्त्री अनुसूइया सीताजी के एहन दिव्य वस्त्र आ आभूषण पहिनेने छल जे नित्य नवीन, निर्मल आ सुहावना वनल रहैत छल। संगेसंग ओ सीताजी के पतिव्रत धर्मक सेहो शिक्षा देने छल। वाल्मीकि आश्रमक संवंध मे इतिहासकार मे मत अलग-अलग अचि। ई तमसाक तट पर स्थित छल। ई विश्वविद्यालय अप्पन काल मे शिक्षाक महान केंद्र छल। महाकवि भवभूतिक अनुसार, एतय छात्रा सभ सेहो अध्ययन करैत छल। एतय अलग-अलग शास्त्रक संग शस्त्र/अस्त्रक सेहो शिक्षा देल जायत छल। एकर प्रमाण स्वयं रामक पुत्र लव-कुश छल। वशिष्ठ आश्रम अयोध्या मे स्थित छल, जतय भगवान राम शिक्षा पाओल। गुरु गृह गये पढ़न रघुराई, अल्पकल विद्या सव पाई। रामचरितमानस, वालकाण्ड महर्षि वशिष्ठक दोसर आश्रम हिमालयक तलहटी मे सेहो छल, जकर वर्णन रघुवंश नामक महाकाव्य मे कालिदास केने अछि। अहि आश्रम मे छात्र संघ सेहो छल, जकर वाल्मीकि मेखलीना महासंघा कहि के उल्लेख केने अछि। अहि संघक राजसभा मे सेहो प्रभाव छल। नैमिषारण्य मे महर्षि शौनक के सेहो चर्चित आश्रम छल। एतौका अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी सभ वड़ प्रसिद्ध छल। अहि मे धार्मिक, राजनीतिक आ वैज्ञानिक विचार पर संवाद होयत छल। एकर अलावा, महर्षि सुतीक्ष्ण, महर्षि शरभंग, महर्षि मतंग आ महर्षि जावालिक आश्रम शिक्षाक प्रमुख केंद्र छल। छअम परिच्छेद ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) विहार राज्यक जिला मुख्यालय मधेपुराक रेलवे स्टेशन दौरम मधेपुरा कहलावैत अछि। एतय सं आठ किलोमीटर उत्तर ऋष्यश्रृंगक श्रृंगेश्वर आव सिंघेश्वर या सिंहेश्वर थानक नाम सं प्रसिद्ध अछि। लगभग दू सौ वरख पहिने हरिचरण चौधरी नामक एकटा लकड़ीक व्यवसायी कोशीक जलमार्ग सं नेपाल सं लकड़ी आनि के व्यवसाय करैत छल। एक वेर हुनका व्यवसाय मे वेसी लाभ भेल। ओ शिवभक्त व्यवसायी श्रृंगेश्वर नाथ (सिंहेश्वर नाथ) केर एकटा भव्य मंदिर वनैलक। जखन भागलपुर केर जिला आ सत्र न्यायाधीश केर एतय क्षेत्रीय सनातन धर्मी वनाम पंडागण (जय नारायण ठाकुर आ 13 अन्य) वाद संख्या 3/1937 चलि रहल छल, ओहि सिलसिला मे हरिचरण चौधरी के पैंसठ वर्षीय प्रपौत्र दरवारी चौधरी अप्पन गवाही मे वाजल छल जे वर्तमान मंदिरक पूव भरि दीवाल पर स्वयं हरिचरण चौधरी, पश्चिम भरि दीवाल पर लालजी चौधरी आ उत्तर भरि दीवाल पर शिवू चौधरी के चित्र अंकित अछि। अहि तथ्यक पुष्टि ओ अप्पन साक्ष्य मे केने छल। ताहि सं कतिपय स्थानीय वुद्धिजीवी द्वारा मंदिर मे उत्कीर्ण अहि चित्र के वुद्ध आ दोसर वौद्ध भिक्षु केर मानव सरासर भूल अछि। ऋष्यश्रृंगक जन्मभूमि आ कर्मभूमि हेवाक कारण अहि क्षेत्रक प्राचीन महत्व अछि। एतय के कण-कण मे ऋष्यश्रृंग एखनो रमैत अछि। एतय के माटि अहि ऋषिराजक यज्ञाग्निक वुझल भस्म अछि। ताहि सं नदी सं आच्छादित ई क्षेत्र वड़ उर्वर अछि। एकर प्राचीनता के वुझैक लेल सवसं पहिने श्रृंगेश्वर नाथ (स्ंिाहेश्वर) केर नदी सभ (कोशी आ ओकर दोसर सभ धार) केर अध्ययन करव आवश्यक अछि। कोशीक कतेक रास छाड़न धार सूखि गेल अछि आ ओकर धार आव निस्तेज भऽ गेल अछि। मुदा भारत सरकारक कोशी नियंत्रण योजना सं पहिने चीन के ह्वांगहो नदी सं वढि़ के अप्पन विनाशकारी वाढ़ कोशी जग जाहिर छल। देखू जे भोलानाथक नगरी आ ऋष्यश्रृंगक तपस्थली मे कोशी आ ओकर छाड़न धारक स्थिति की छल? कोशी धार भगवान शिव के वड़ प्रिय अछि। महाकवि कालिदासक अनुसार, कोशीक तट पर साक्षात शंकर वसैत अछि। ताहि सं कोशी शंकरक तरहे तांडव करैत अछि। महाभारत मे कौशिकी तीर्थक वृहत चर्चा अछि, जे अहि देशक सांस्कृतिक भूगोल केर रेखांकित करैत अछि। एकरा जानैक लेल सिंहेश्वर मे प्रवाहित कोशीक विभिन्न धारक जानकारी आवश्यक अछि। मुख्य कोशी नदी भीमनगर सं दक्षिण चलिके शिवनगर गामक निकट दू भाग मे वंटि जायत अछि। ओतय पूव भरि वला धार से वैवाह (धसान) आ चिलौनी नामक धार वनैत अछि आ पश्चिम भरि वला धार सं परवाने, तिलावै, वड़हरी आ सोनेह नामक धार अपन स्वरूप ग्रहण करैत अचि। तिलावै नदी एखन सुपौल जिलाक थुमहा, वसहा, तुलापट्टी, रामनगर, रामपुर आदि गाम के स्पर्श करैत सिंहेश्वर स्थानक चर्चित गाम वभनी भेलवा आवैत अछि। ई गाम रामपुरक अग्निकोण मे आ तिलावै के पाश्र्व भाग मे अछि। कहल जायत अछि जे कहियो ई गाम भववावा थानक नाम सं प्रचलित छल। मुगल सम्राट शाहजहांक काल मे भववावा एकटा समाज सेवी छल, जिनकर जन्म अहि ठाम पर भेल छल। 350 ईपू अहि गाम मे हुनकर स्मारक छल। तिलावै वभनी भेलवा गाम सं कनि नैऋत्य कोण मे झुकि के सिंहेश्वर थानक मार्र्ग मे स्थित गम्हरिया नामक गाम आवैत अछि। अहि गाम मे सोनाय महाराज नामक एकटा धार्मिक आ समाज सेवी लोकदेवक स्मारक अछि, जिनका प्रणाम करि के तिलावै सं आगू वढि़ जायत अछि। सोनेह एकटा छोट धार अछि जे सिंहेश्वर थानक नैऋत्य कोण स्थित दलदली चौर सं प्रवाहित होयत अछि। ई परवाने धारक एकटा टूटल धार अछि। ई अप्पन उद्गम सं दक्षिण दिस चलि के लंवा दूर तय करि के वंशीरौता गाम मे तिलावै धार मे प्रवेश करि जायत अछि। परवाने धार रूपौली सं दक्षिण चलि के सिंहेश्वरक चर्चित गाम रामपट्टी मे प्रवेश करैत अछि, जतय धसान आ वरहरीक धार अहि मे मिलिकए एकर जलभंडारक वृद्धि करैत अछि। परवाने आ धसानक ई संगम सिंहेश्वर आ गौरीपुर सं कनि दूर ठाम अछि। धसानक अलग अस्तित्व अछि मुदा वरहरी परवानेक एकटा उपधार अछि, जे आव मृत भऽ गेल अछि। एक चौर सं चलि के वरहरीक धारा परवानेक समानांतर दक्षिण भरि चलैत अछि आ अप्पने वाम भाग सं डंडारी, चम्पानगर, वैरवन्ना आदि गामक स्पर्श करैत अछि। परवाने धार रामपट्टी सं चलिके सिंहेश्वर थान आवैत अछि, जतय ओ भगवान शंकरक चरण स्पर्श करैत अछि। कोशीक चिलौनी धार लालपुर सं दक्षिण चलिके दाहिना पाश्र्व मे सरोपट्टी गाम के स्पर्श करैत अछि। लालपुर गाम के लगभग दू सौ वरख पहिने भानुदास नामक कुशाग्र वंशीय राजभर सरदार वसैने छल। अहि गामक लग गौरीपुर अछि। सिंहेश्वर नाथ मंदिर लग चिलौनी दू भाग मे वंटिके समानांतर मधेपुरा आवैत अछि। गौरीपुर सं दक्षिण पूर्वी धारक कात रामपुर नामक गाम अछि, जतय दू सौ वरख पुरान एकटा व्रह्मस्थान अछि। चम्पारण्य तीर्थ महाभारत मे वर्णित कौशिकी तीर्थ मे एकटा तीर्थ अछि चम्पारण्य। ई क्षेत्र तत्कालीन अंग नरेशक अधीन छल। महाभारत सं पूव अंग देशक राजधानी मालिनी छल। वाद मे राजा रोमपादक प्रपौत्र चम्पा नामक एकटा राजाक नाम पर चम्पा या चम्पावती कऽ देल गेल। महाभारत काल मे ई चम्पा नगरी चम्पकक वाग सं परिवृत छल। ताहि सं अहि चम्पारण्य सं चम्पा राज्यक अरण्य भाग वुझवाक चाहि। एकरा एखुनका चम्पारण जिला वुझवाक भौगोलिक भूल अछि। छठम शताव्दीक रचना शक्ति संगम तंत्रक अनुसार विदेह भूमिक सीमा अहि तरहे देल गेल अछि, 'गण्डक तीरमारम्य चम्पारण्यान्तक शिवे विदेह भू समाख्याता तैरमुक्त भिवं सुत।' शक्ति संगम तंत्र 7/27 विदेह भूमि पश्चिम मे गण्डकी तीर आ पूव मे चम्पारण्य धरि पसरल अछि। विदेह भूमि मिथिलाक पूव ई क्षेत्र चम्पारण्य अछि। वर्तमान चम्पारण जिला मिथिलाक पश्चिम मे स्थित अछि। महाभारतकार जे चम्पारण्य तीर्थक वर्णक केने अछि, ओ तीर्थ वड़ पुण्य प्रदान करय वला अछि। महाभारतक अनुसार, ओतय एक रात्रि रहय सं सहरुा गाय केर दानक फल भेटैत अछि। ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि कौशिकी तीर्थ मे वीराश्रम आ कुमारतीर्थ सेहो अछि, जे चम्पकारण्य तीर्थक उत्तर भरि के सीमा आ पूव सीमा पर स्थित क्रमश: वीरपुर आ कुमारखंड के रेखांकित करैत अछि। ई चम्पकारण्य तीर्थ सिंहेश्वर थान निर्दिष्ट होयत अछि। ई समस्त क्षेत्र चम्पा नरेशक अरण्य भाग छल। एतौका वेसी गाम मे चम्पा देवीक पूजा होयत अछि। शंकरपुर मे वरहगाडि़याक जमींदार वावू एकदेश्वर सिंह चम्पा देवीक मंदिर वनाय के ओतय चम्पाक मूर्ति स्थापित केलक आ एकटा पोखैर बनाके अहि ठामके रमणीय बनैलक. एकर अलावा, निशिहरपुरमे सेहो चम्पा देवीक मूर्ति स्थापित अछि, जतय प्रत्येक वर्ष मेला लागैत अछि। अन्य देवी-देवताक अलावा वांतर जाइतक मान्य कुल देव चम्पावती सेहो अछि। वांतरक अलाा दोसर कतेक रास जाइत चम्पादेवीक भगैत गावैत अछि। ताहि सं सिंहेश्वर थानक चम्पारण्य तीर्थ नै मानव एकटा एतिहासिक भूल अछि। परवाने नदी सिंहेश्वर सं दक्षिण दिस चलि के जोतनार गाम के स्पर्श करैत अछि। कौशिकी तीर्थ मे एकटा ज्योतिस्मर तीर्थ सेहो अछि, जतय ह्मद मे नहावय सं वड़ पुण्य भेटैत अछि। ई जोतनार गाम महाभारत कालीन ज्योतिस्मर तीर्थ अछि। तहयौका भौगोलिक साक्ष्यक आधार पर समूचा क्षेत्र चम्पा राजाक वनभाग छल। चम्पावतीक वनदेवी सेहो कहल गेल अछि। जो एकटरा पौराणिक मान्यता अछि। महाभारतक अनुसार ऋषि आ राजाक एकटा दल प्रभास तीर्थ सं यात्रा शुरू कऽ कौशिकी तीर्थ सेहो गेल छल। अहि दल मे भृगु, वशिष्ठ, गालव, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, यजदग्नि, अष्टक, भारद्वाज, अम्वरीष आ वालखिल्य ऋषि छल आ राजा मे शिवि, दिलीप, नहुष, अम्वरीष आदि छल। अहि यात्रा वृतांत अहि क्षेत्रक पौराणिकता आ दर्शनीयता के रेखांकित करैत अछि। पौराणिक सिंहेश्वर थान सिंहेश्वर स्थान भगवान शंकरक पावन तपस्थली अछि। षोड महाजनपद मे शीर्षस्थ जनपद अंग देशक ई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल अछि। अंग देशक निर्माण मे सेहो भगवान शिवक उल्लेखनीय योगदान अछि। दक्षिण मे मन्दराचल पर्वत आ उत्तर मे मूजवान पर्वत धरि पसरल विशाल वन्य प्रदेश श्लेषात्मक वन छल, जतय कन्दर्प दहनक पश्चात भगवान शिव समाधिस्थ भेल छल। कोशी के कतेक धार वन मे वहैत छल। वाराह पुराणक उत्तरार्धक एकटा पुरा कथाक अनुसार, ओहि वन मे भगवान शिव के खोजैत देवराज इंद्रक संग विष्णु आ व्रह्मा पहुंुचल। भगवान शिव एकटा सुनर हरिणक रूप मे विचरण करैत छल। तीनों अंतयार्मी देवता अहि हरिण के देखहि के वुझि गेल जे ई भगवान शंकर अछि आ ओ हरिण के पकड़हि मे सफल भऽ गेल। इंद्र हरिणक सींगक अग्र भाग, व्रह्मा मध्य भाग आ विष्णु निम्न भाग पकड़लक। एकाएक सींग तीन भाग मे टूटिके विभाजित भऽ गेल। तीनो देवताक हाथ मे सींगक एक-एकटे भाग रहल आ हरिण लुप्त भऽ गेल। तखनै आकाशवाणी भेल कि आव शिव नहि भेटत। देवता सभ अप्पन-अप्पन हाथ मे आयल सिंहक भाग के पावि के संतोष कऽ लेलक। कहल जायत अछि जे विष्णु लोक कल्याणार्थ अप्पन भागक सींग के जहि ठाम पर स्थापित करलक, ओ वर्तमान सिंहेश्वर (श्रृंगेश्वर) अछि। अहि तरहे एकर सिंहेश्वर नाथ नाम सार्थक भेल। वाराह पुराणक अहि पुरा कथाक अनुसार तीनों देवता कोशीक तीर पर भगवान शिव से भेंट करय लेल पहुंचल छल। अहि तथ्य के कालिदास कृत कुमारसंभव मे स्पष्ट करल गेल अछि। ओकर अनुसार, कोशी के प्रपात लग भगवान शिवक निवास अछि आ देवता सं ओतय भेंट करयक स्थान निर्दिष्ट करल गेल अछि। अत: कोशीक तीर पर इंद्र, विष्णु आैर व्रह्मा का शंकर सं भेट करव पूर्व निर्दिष्ट आ निर्धारित ठाम दिस हुनकर आगमनक सूचक अछि। मुदा वाराह पुराणक अंतिम अध्यायक कथा जे प्रमाणक रूप मे प्रचलित अछि, ओ स्पष्ट नै अछि जे मृग रूप महादेवक श्रृंग मूल पावैक भगवान विष्णु ओकरा एतय स्थापित केने छल। ताहि सं अहि विषय पर प्रवुद्ध पाठक अपने सं विमर्श, विश्लेषण आ विवेचन करय, यहि उचित अछि। मिथिला तत्व विमर्श, पृष्ठ 80 मे विद्वान लेखक महामहोपाध्याय परमेश्वर झाक सेहो यै मत अछि। चौवीस हजार श्लोक वला वाराह पुराण एकटा सतोगुण पुराण अछि, जहि मे विष्णुक वराह अवतार वर्णित अछि। महाभारत आ पद्मपुराण ओहि वड़ क्षेत्रक उल्लेख तऽ नै अछि, मुदा अहि क्षेत्रक स्थान निर्देशक लेल अप्पन जानकारी केर वेस स्पष्ट करैत अछि। ओहि मे अतीतकालीन पुरा कथा अछि, जे जागतिक रहस्य केर उद्घाटन करैत अछि। एहन पुराणक निर्मल जल मे प्रक्षेपक शैवाल जाल सेहो कम नै अछि। प्रक्षेप मे संकलित पुराकथाक तात्विक नीर-क्षीर विवेचन निष्पक्ष-प्रवुद्ध वर्ग कऽ सकैत अछि। परवर्ती साक्ष्य कहल जायत अछि जे सिंहेश्वरक जंगल मे पर्याप्त गोचर भूमि छल। एतय दूर-दूर ठामक गोपाल अप्पन गाय कऽ चरावैक लेल आवैत छल। एहन मान्यता अछि जे एकटा विशेष ठाम पर कुंआरी गाय आवैत छल आ ओकर थन सं दूध टपकैत लागैत छल। ई सिलसिला अनवरत चलैत रहल। एक दिन गोपालक दूध टपकैत दृश्य अप्पन आंखि सं देखलक। ओकर वाद कतेक दिन धरि ओ ई देखैत रहल। ओहि निर्दिष्ट ठाम पर ओहि गाय के आविके आ ओकर थन सं दूध टपका केर ओहि ठाम के सिंचित करव एकटा कौतूहल छल। ओहि गोपालक जिज्ञासावश ओतय सं माटि हटाकऽ देखलक ते ओ विस्मित भऽ गेल। एकटा शिवलिंग माटिक नीचा झांपल छल, जतय गायक धन सं दूध टपकैत छल। ओ गोपालक सेहो नियमित अहि शिवलिंगक पूजा करय लागल। दोसर सव गोपालक सेहो ओतय भक्ति अर्चना करय लागल। वाद मे कोनो भक्त ओतय छोट-सन मंदिर वनैलक। कहल जायत अछि जे यहि ठाम ओ पूर्वकालक गोचारण स्थल अछि आ सिंहेश्वर मंदिरक शिवलिंग वहि अछि जेकरा कोनो अनाम गोपालक माटि सं हटा के दर्शन-पूजन केने छल। सिंहेश्वरक थानक अलावा देवघर आदि मंदिरक शिवलिंगक कथा किछु एहिने तरहे अछि। जे भी हुए सभ शिवलिंगक स्थापना आ ओकरा खोज निकलैक श्रेय गोपाल केर जायत अछि। मुदा एकर प्रत्यक्ष लाभ दोसर समुदायक लोक के भेटैत अछि। शिवलिंगक तीन रूप अछि, भावलिंग, प्राणलिंग आ इष्टलिंग। भाव कलाविहीन, सद्रूप काल आ दिक् सं अपरिच्छिन्न आ परस्पर अछि। एकर साक्षात श्रद्धा सं होयत अछि। प्राण लिंग कलाहीन आ कला युक्त दूनू अछि। वुद्धि सं एकर साक्षात संभव अछि। इष्ट लिंग कला युक्त होयत अछि ताहि सं नेत्र सं एकर दर्शन संभव अछि। अहि तीनो के क्रमश: सत, चित आ आनंद कहल गेल अछि। परम तत्व भाव लिंग अछि, सूक्ष्म प्राण लिंग अछि आ स्थूल इष्ट लिंग अछि। सिंहेवर थान मे स्थापित शिवलिंग इष्ट लिंग अछि, जे मंत्रयुक्त, मंत्रहीन, क्रियायुक्त, क्रियाहीन, ज्ञानी, अज्ञानी सभक लेल दर्शनीय आ पूजनीय अछि। कहल जायत अछि जे लगभग एक सौ वरख पहिने सिंहेश्वर मंदिर मे स्थापित शिवलिंगक सव तरफ जलढ़रीक निमित संगमरमर वैसावैक लेल खोदल गेल छल। मजदूर सभ करीव आठ फीट नीचा खोदलक। ओ किछु अद्भुत दृश्य देखलक। लिंगक आंतरिक स्वरूप भव्य आ अद्भुत छल। शिव पार्वतीक असंख्य प्रतिमा ओहि पर मुद्रित छल। वाह्य रूप सं तीन गुना मोटा आकार नीचा पसरल छल। एकर विशालता देखहि के ओ चकित रहि गेल। किछु मजदूर ते अप्पन संतुलन सेहो विसुरि गेल। एहन स्थिति मे खुदाईक काज स्थगित कऽ देल गेल। एकर सत्यापन किछु अभियंता केने अछि। ओ शिवलिंग सं अलग खुदाई केलक ते आठ-दस फीटक गहराई मे एकटा विशाल चट्टान देखलक जाहि सं शिवलिंग जुड़ल छल। एकटा विशाल चट्टानक कारण कोशीक उफनावैत धार अहि मंदिर के क्षति नहि पहुंचा सकल। अहि मंदिरक पौराणिकताक देखैत आय धरि एकर जाहिना के ताहिना वनरल रहैक श्रेय अहि चट्टानी आधारशिला के देल जा सकैत अछि। किरातक भूमि अहि मे कोनो मत भिन्नता नहि अछि जे प्राचीन काल मे एतय घनघोर जंगल आ नदीक संग पहाड़ सेहो छल जे कतिपय भौगोलिक कारण सं धरतीक संग धंसि गेल। एहने ठाम भगवान शिवक लेल उपयुक्त छल क्याकि उपनिषदकरक मुताविक भगवान शिव निर्जन जंगल आ पहाड़ मे निवास करैत छल। जंगल, गिरिगह्वर मे रहै वला किरात जेहन निवासी मे हुनकर लोकप्रियता वढ़ैत गेल। कालांतर मे ओ जगत्पति आ देवताक द्रष्टा मानल जा लागल आ ओ आर्य आ अनार्य दूनूक द्वारा पूजित हुए लागल। प्राचीन काल मे जहि कियो विदेशी जाइत भारत पर आक्रमण कऽ अप्पन विस्तार केलक आ अप्पन राज्य स्थापित केलक हुनकर वर्णन महाभारत, पातंजलिक महाभाष्य, मनुस्मृति आ अन्यान्य स्मृति ग्रंथ मे अछि। महाभारतक अनुसार, यवन, शक, पह्लव, किरात, चीन आदि जाइतक प्रवेश भारत मे भऽ चुकल छल। मनुक मुताविक, पौण्ड्रक, द्रविड़, कम्वोज, किरात, दरद, चीन, खश, यवन, शक, पारद आ पह्लव विदेशी जाइत छल। अहि विदेशी जाइत आर्य सभ्यता अा संस्कृति पर प्रभाव डालैत भारतीय धर्म आ संस्कृति मे अपना केर आत्मसात कऽ देलक। कलांतर मे ओ विदेशी नहि रहि गेल। हुनकर पूर्ण रूप सं भारतीयकरण भऽ गेल। एहने विदेशी जाइतक एकटा जइत किरात छल, जकरा प्राचीन वर्ण व्यवस्था मे मनु शुद्रक रूप मे मान्यता देलक। तहियौका हिन्दू समाज जहि समुदायक तिरस्कर केलक, ओ भगवान शिवक शरण मे गेल। क्याकि अमरकोश मे किरात के म्लेच्छक एकटा भेद मानल गेल अछि। कुमार संभव (8.29) केर मुताविक, ई जाइत हिमालयक परवर्ती प्रदेश मे रहैत छल। भगवान शिव हिमालयक कैलास शिखर पर रहैत छल ताहि सं ई जाइत के भगवान शिव के तादात्मक कथा जुड़ल अछि। वायु पुराण (47.48) आ व्रह्मांड पुराण मे हुनकर धारक कात मे रहय वला जाइतक तरहे उल्लेख करल गेल अछि। संगेसंग विष्णु पुराण (2.3.8) मे एकर निवास स्थान पूर्वी भारत मानल गेल अछि। भले ही भारतीय पुरा साहित्य मे अहि जाइत के विदेशी आ अनार्य मानल गेल अछि, मुदा एकर मूल पुरुष आर्य छल। एकर प्रमाण हरिवंश पुराणक महाराज सगरक चरित-वृतांत मे स्पष्ट अछि जे राज्य मे लोग सं विजयी क्षत्रिय देशांतर गेल छल, मुदा ओ अप्पन व्राह्मण पुरोहित के नहि पावि के अप्पन मूल आर्य धर्म सं भ्रष्ट भेल गेल जाहि सं कतेक रास जाइत निकलल. बड रास संभव अछि जे भारत घुरीके ई जाइत व्राह्मणक वर्चस्व के स्वीकार नै भेल ताहि सं म्लेच्छ कोटि मे दऽ देल गेल। भागवत पुराणक स्कन्द 9 के 23म अध्याय मे उल्लिखित अछि जे महाराज ययातिक पुत्र द्रुह्यक संतान उत्तर दिश जाइके म्लेच्छक राजा भऽ गेल। अहि तरहे गतायातक प्रक्रिया चंद्रगुप्तक काल धरि भेल गेल। एकर अलावा, अहि देशक लोग तहियौका सैन्य-वल मे नियुक्त भऽ कऽ म्लेच्छक देश मे जा के म्लेच्छ वनि गेल। मुद्राराक्षस नाटकक पंचम अंक मे एकर उल्लेख अछि। अहि देश मे वर्जन (जाइत-च्युत) कऽ प्रथा वड़ पुरान अचि। जौं केकरो सं ज्ञात आ अज्ञात, छोट या वड़ अपराध भेल अछि ते धर्मक ठेकेदार हुनक जाइत सं वहिष्कार कऽ देत छल आ ओकर एत्ता वेसी तिरस्कार करैत छल जे ओकर लाख अनुनय-विनय करहि के वादो ओकर जाइत मे नहि घुरावैत छल। नतीजा ई हैत छल जे हुनकर दोसर उदार समुदाय मे शामिल भऽ मूल सनातन धर्म सं विस्थापित भऽ तथाकथित म्लेच्छ मे शामिल हेवाक कारण हुनकर संख्या वढ़ैत गेल। हुनका फेर सं सनातन धर्म मे आनय केर प्रयास नहि भेल। हालांकि याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकार एहन तरहक अपराधक प्रायश्चितक व्यवस्था देने अछि मुदा ई स्मृति मे सिमटल रहि गेल। जेकर हाथ मे न्याय आ धर्मक व्यवस्था छल हुनकर हठधर्मिता आ सदा सर्वथा समाज मे वर्चस्व स्थापित राखवाक प्रवृति अहि समाज कऽ क्षीणकाय कऽ देलक। किरात आदि जाइत केर अहि धरती पर वहुलांश अहि रहस्य के रेखांकित करैत अछि। महाभारत काल मे अहि क्षेत्र पर किरातक वाहुल्य छल। गंगा सं उत्तर आ महानन्दा सं पूरव नेपाल धरि ई जाइत पसरल छल। अहि क्षेत्र मे हुनकर सशक्त संस्कृति फलफूल रहल छल। राजा विराटक दोसर स्त्री सभ मे एकटा किरात कन्या सेहो छल, जे मोरंग वा नेपालक तराई मे रहि वाली छल। किरात एक शक्तिशाली जाइत छल। तहियौका किरातार्जुन कीर्ति जेहन परवर्ती साहित्य मे एकर चर्चा आयल अछि। अहि क्षेत्र मे अन्यान्य जाइतक संग किरता के सेहो वड़ संघर्ष करय पड़ल। महाभारत मे अर्जुन पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि हिमालय जाइत अछि। ओतय भगवान शिव अप्पन प्रिय भक्त किरातक वेश मे भेटैत अछि। शिव के नहि चिन्ह सकय के कारण अर्जुन ओहि किरात वेश शिव सं युद्ध करैत अछि, मुदा हुनका सं परास्त भऽ जायत अछि। फेर शिवक वास्तविकता के वुझि अ अहि अवढरदानी के प्रसन्न करहि के लेल अर्जुन माटिक वेदी वनाके हुनकर अराधना करैत अछि आ वेदी पर पुष्प अर्पण करैत अछि। ओ ई देखहि के आश्चर्यचकित रहि जाइत अछि जे जे फूल शिवक लेल ओ मृत्तिका वेदी पर चढ़ावैत अछि ओ ओहि किरात पर आवि जायत अछि। आव अर्जुन किरात वेश शिव के चिन्है मे विलम्व नै होयत अछि। विक्रमोर्वशीयम (1.11) मे कालिदास सेहो लिखने अछि जे पाशुपतास्त्र प्राप्त करहि के लेल अर्जुन कठिन तपस्या केने छल। भारत मे जखैन शिशुनाग वंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, शुंग वंश, आंध्र वंश आदि केर राज्य छल। ओकर समानांतर नेपाल मे लगभग सात सौ वरख धरि किरातक राज्य छल। अशोकक धर्म चक्र विजय काल मे नेपाल मे किरात राज्य स्थ्यांकु छल। वौद्ध धर्मक अनुश्रुति मे सम्राट अशोक अप्पन कन्या चारुमति आ जामाता देवपालक संग नेपाल जाकऽ किरात शासकक सहायता सं कतेक रास विहार आ वौद्ध स्तूप वनैने छल। किरात दवंग आ स्वतंत्र विचार वला जाइत छल। सातम शतावद् मे व्राह्मणवादी व्यवस्था आ कर्मकाण्ड के सर्वथा नकारैक कारण एतौका किरातक नव नामांकरण वांतर करल गेल जकर अर्थ अछि कुपथ्य आ त्याज्य। तहियौका समाज व्यवस्थाकार एकरा संगठित हिन्दू समाजक लेल कुपथ्य मानलक। जहि जाइतक सभ्यता संस्कृति महाभारत सं लऽ कऽ गुप्त-स्वर्ण-युग धरि अप्पन यशोज्जवल गाथा कहय मे सक्षम हुए, जाहि जाइत हजार वरख धरि राज्य सत्ताक संचालन केने हुए, ओ म्लेच्छा आ शुद्रे टा नै, समाजक लेल कुपथ्य सेहो भऽ गेल। व्यस्थाकार वर्ण व्यवस्थाक वंधन एतेक मजवूत कऽ देलक आ शासक के सदण्ड एकर कार्यान्वयनक दायित्व सौंपलक जाहि सं सामाजिक कलस्विनीक प्रवाह स्थिर भऽ गेल। ई सच अछि जे मनु द्वारा संचालित वर्ण व्यवस्था मे ऊंच-नीचक भावना आ भेद-भावक दृष्टि छल, जे परवर्ती हिंदू समाज के जर्जरित करय के कारण वनि गेल। भगवान वुद्ध अहि व्यवस्था पर एतेक वेसी प्रहार करलक जे मरणासन्न अवस्था मे आनि के छोडि़ देलक। मुद शुंगक काल मे ई फेर जीवित भऽ गेल। अलवरुनी ग्यारहम शताव्दी मे भेल छल। हुनकर कथन अछि, प्राचीन काल मे कर्म परायण राजा जनता के कतेक रास श्रेणी आ कर्म मे विभक्त करहि मे जोड़ दैत छल। संगेसंग हुनक एक-दोसरा सं भेंट आ क्रम तोड़ैक सं रोकहि के यत्न करैत छल। ताहि सं ओ भिन्न-भिन्न श्रेणीक लेक के एक-दोसरा सं संवंध राखहि सं रोकि देलक आ प्रत्येक श्रेणीक लोग के विशेष प्रकारक काज आ शिल्प सौंप देलक। ओ कोनो लोक के अप्पन वर्गक अतिक्रमण करहि के लेल अनुज्ञा नै दैत छल। जे अप्पन श्रेणी सं संतुष्ट नहि छल, हुनका दंड देल जायत छल। एहने समाजक संवेदनशीलता मारल गेल आ एक-दोसरा सं नै मिलय आ पारस्परिक संपर्कक अभाव मे हुनकर गतिशीलत अवरुद्ध भेल। व्राह्मण सेहो व्यवस्थाक नाम पर अप्पन अधिकार के खुलि के दुरुपयोग केलक। विराट भारतीय समाज मे रहि के कतेक रास जाइत अहि सं विमुख भऽ कऽ अप्पन दायरा मे सिमटल चलि गेल। जे कहियो गतिशील जाइतक रूप मे चर्चित छल, ओ अंतर्मुखी वनैत गेल। ग्यारहम सदी मे निशिहरदेव किरात वंशी राजा भेल जिनकर राजधानी निशिहरपुर छल ई वर्तमान शंकरपुर अंचल अछि। हुनकर भवन आ दुर्गक अवशेष एकटा टीलाक रूप मे अवस्थित अछि आ जाहि पर एकटा मंदिर निर्मित अछि। मंदिर परिसर मे राखल गेल राजभवनक स्मृति चिह्न, नक्काशीदार प्रस्तर खण्ड, प्रस्तरक चौखट आदि पालयुगक प्रतीत होयत अछि। संभवत: ई किरातक अंतिम राजा छल। हुनकर अराध्य उगरी महाराज नामक एकटा सिद्ध पुरुष छल जे गुडि़या (त्रिवेणीगंज निवासी) कमार जाइत छल। हुनका लोक देव खेदन महाराज सं वैर छल। टेंगराहा चौर मे ओ मायाक वाघिन के भेजि के खेदन महाराजक वध करैने छल, जे खेदन महाराज के भगैत गीत सं ज्ञात होयत अछि। कर्नाट क्षेत्रीय नान्यदेव 1097 ई. मे अहि क्षेत्र पर अप्पन अधिकार जमा केर सत्तासीन भऽ चुकल छल। आहि काल सिंहेश्वर मे किरात आ कुषाण वंशक छोत्त-छोट राज्य छल जे वाद धरि कर्नाटक करद वनल रहल। कुषाण वंशी राजभर कुषाण चाइत चीनक गोवी प्रांत मे रहय वला यू-ची जाइतक एकटा शाखा छल। यू-ची जाइतक पांचटा शाखा छल, हिऊमी, चाउयांग-मी, ही-तुम, ताउ-मी आ कोई-चाउआंग। कोई-चाउआंग के कुषाण कहल जायत अछि। गोवी प्रांत मे हुं-ग-नू जाइत यू-चि जाइत पर आक्रमण कऽ हुनका सभ के गोवी प्रांत से निकालि कऽ वाहर कऽ देलक। ई सभ लोक भागि के सरदरिया आयल। मुदा ओतय सं सेहो हुनका सभ के भागय पड़ल। सरदरियाक यु-सुन नामक एकटा जाइत हूणक सहायता सं हुनका सभ पर आक्रमण कऽ देलक आ ओतय सं सेहो विस्थापित कऽ देलक। लगभग 140 ईपू ई सभ वैक्ट्रिया आयल। ओहि काल वैक्ट्रिया मे शकक शासन छल। एहि पर रहैत कुषाण अप्पन शेष चारि शाखा पर विजय प्राप्त कऽ वेसी शक्ति संपन्न भऽ गेल। ओकर प्रथम राजा कुजूल कैडफिसेस छल, जे शक्तिशाली आ महत्वाकांक्षी छल। ओ पह्लव शासक के परास्त कऽ गन्धार आ सीमाप्रांत केर अप्पन अधीन कऽ लेलक। ओ वाद मे वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ अस्सी वरख धरि युद्ध मे संलग्न छल। ओ कुषाण वंशक नीव के आओर मजवूत करलक। एकर वाद ओकर पुत्र विमकैडफिसेस सत्तासीन भेल। ओ अप्पन योग्य पिताक योग्य पुत्र सावित भेल। भारत विजयक सेहरा हुनके सिर वान्हल गेल। हुनकर मृत्युक वाद हुनकर पुत्र कनिष्क प्रथम आ ओकर वाद कनिष्क द्वितीय कुषाण वंशक शासक भेल। कनिष्क अप्पन राजधानी सीमा प्रांतक पुरुषपुर मे वनौअलक। ओ अप्पन प्रभुत्व पुरुषपुर से पाटलीपुत्र धरि स्थापित केलक। मान्यताक अनुसार, कनिष्क कठोर संघर्षक वाद पाटलीपुत्र के पराजित केलक आ वौद्ध विद्वान अश्वघोष के जमानतक रूप अपना संगे लऽ गेल। अश्वघोषक संपर्क मे आवि के ओ सेहो वौद्ध धर्मावलम्वी भऽ गेल। ओ पहिलुक शैव धर्मावलम्वी छल। संभावत: अश्वघोष जेहन वौद्ध विद्वान अप्पन अधिकार मे लहि के लेल ओ मगध पर चढ़ाय केलक। ओ पूर्वी भारत पर अप्पन अधिकार जमा के शांति स्थापित केलक। तिरहुत प्रमंडल मे कनिष्कक छिद्रांकित ताम्र-मुद्रा प्राप्त भेल अछि अहि क्षेत्र मे सेहो नवीन प्रशासनिक इकाईक रूप मे विभक्त कतेक रास राज प्रतिनिधिगण कुषाण शासक अधन क्षेत्र विशेषक सत्ताक संचालन करैत छल। कुषाणक पतन आ गुप्त साम्राज्यक उदय आ मध्यवर्ती युग मे दूटा प्रमुख राज्य सत्ता अस्तित्व मे आयल। पहिलुक नाग वंश आ द्वितीय वाकाटक वंश। अहि दूनू के अतिरिक्त भार शिव वंश कुषा साम्राज्यक भग्नावशेष पर सत्तासीन भेल, जकर प्रभुत्व अहि पूर्वी क्षेत्र मे वेसी छल। हिन्दू पालिटी (भाग-2 कलकत्ता, 1924) मे डॉ. काशी प्रसाद जायसवालक अभिमत अछि कि ई भार शिव नागा, अपने कंधे पर भगवान शिव के भार को ढोते थे। ई वहि जाइत अछि जे कुषाण वंशक पतनक वाद सेहो लगभग दू सौ वरख धरि अहि क्षेत्र मे सत्तासीन छल। कोशी आ दरभंगा प्रमंडल मे वहि लोक 15म शताव्दी धरि कतो-कतो शासक रूप मे अवस्थित छल। एहन मान्यता अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक संग विहारक कुषाण वहुलांश मे प्रवेश केलक। ई उत्तर आ दक्षिण विहार दूनू दिस पसैर गेल। ई वहादुर आ कष्ट सहिष्णु छल। जा धरि राज्य सत्ता पर हिनकर अधिकार रहल ता धरि ई क्षत्रपक रूप मे सम्मलित होयत रहल। सिंहेश्वर थान मे ई वड़ संख्या मे छल। ओ शैवमत अपनैलक आ कालांतर मे शिवक भार ढोयै के कारण ई भार शिव नागा सेहो कहावय लागल। वड़ वाद शिवनागा शव्द गौण भऽ गेल आ ओ मात्र भार या राजभरक नाम पर चर्चित भऽ गेल। डॉ. के.पी. जायसवालक अनुसार उत्तर विहारक अधिकंश ठाम पर गुप्त युगक उदय सं पूर्व भार शिव नागा द्वारा राच्य करहि के संकेत अछि। सिंहेश्वर के रायभीर, वसंतपुर आदि गाम मे भर जाइतक निवास अछि। रायभीर सं ओ अप्पन राज्यक संचालन करैत छल। ओतय हुनकर दुर्ग सेहो छल जे कोशीक भीषण वाढ़ धो-पोंछकऽ खत्म कऽ देलक। एखुनका सिंहेश्वर मंदिर कुषाण वंशीय भर जाइतक छल। दीर्घकाल धरि अहि मंदिरक व्यवस्था करैत आ ओकर भाग खायत छल। पिछला सर्वे मे भानुदास नामक एकटा व्यक्तिक नाम खतियान मे दर्ज अछि, जे सिंहेश्वर थान मंदिरक भूमिक स्वामीत्व दीर्घकल धरि छल। भानुदास मंदिर मे सेवक आ अन्यान्य कार्यकर्ता सभहक नियुक्ति करैत छल आ मंदिरक आय प्राप्त करैत छल। अहि व्यवस्था मे किछु विकृति आवि गेल। भानुदास कुषाण वंशी राजभर जाइतक छल। अव राजभर (या भर) मंदिरक अधिकारी वनि गेल आ प्रत्यक्ष रूप सं दान-दक्षिणा आ चढ़ौआक राशि स्वयं ग्रहण करय लागल। अहि जाइत केर दान-दक्षिणा आ चढ़ौआ ग्रहण करहिक नै ते कोनो धार्मिक आधार छल आ न अधिकार। क्षेत्रीय लोक सभ एकर विरोध केलक आ संघर्ष छेड़ देलक। आखिर दीर्घकाल सं मंदिर मे स्थापित अप्पन स्वामीत्वक जनाक्रोशक कारण राजभर छोडि़ देलक। वाद मे परसरम निवासी वावू हरदत्त सिंह मंदिर पर स्वामीत्व ग्रहण केलक। मुदा हुनको भागय पड़ल। मंदिर परिसर मे रहय वला सन्यासीक दवंगताक आगू हुनको किछु नहि चलल। कहल जायत अछि जे वावू हरदत्त सिंह सं कतेक वेर सन्यासीक घोर संघर्ष भेल। मुदा अहि सन्यासीक प्रवलताक आगू ओ सेहो अप्पन हथियार डालि देलक। अहि सन्यासी मे रघुवरदास आ स्वामी वीर भारती वड़ चर्चित भेल। रघुवरदास मंदिर परिसर मे रामजानकी मंदिरक निर्माण करैले छल। ऊपर उल्लेख करल जा चुकल अछि जे कनिष्कक पाटलीपुत्र विजय अभियानक पश्चात कुषाण वहुलांश मे विहार मे प्रवेश करलक। ओ उत्तर विहारक संग दक्षिण दिस सेहो गेल। रांची जिलाक वेल्दाग आ कर्रा मे क्रमश: कुषाण राजा जुविष्कक एक स्वर्ण मुद्र आ कनिष्कक ताम्र मुद्रा भेटल अछि। जे दक्षिण विहार मे कुषाणक शासनक पुष्टि करैत अछि। राजा सीत आ वसंत कुषाण वंशीय छल। राजा सीतक गढ़ कोडरमा मे अछि। ओ टिकैत राजा छल। छोटा नागपुर मे कहावत अछि, घटले घटवाल वढ़ले टिकैत। यानी धन घट जाने से घटवाल आ धन वढि़ जाय सं ओ टिकैत भऽ जायत छै। छोटा नागपुर मे वड़ संख्या मे घटवाल वसैत अछि। ओ अपना के क्षत्रीय कहैत अछि। मुदा विहार सरकार हुनकर उत्तर विहार के राजभर य भर के तरहे हुनका सेहो पिछड़ी जाइतक सूची मे दर्ज कऽ देने अछि। घटवलक नाक-नक्श आ शारीरिक संरचना भर जइत से मिलैत-जुलैत अछि। दूनू के परंपरा आ धार्मिक कृत्य सेहो समान अछि। दूनू शिवक उपासक अछि। अहि सं ई मानय मे कोनो संकोच नहि अछि जे घटवाल सेहो कुषाण वंशीय अछि। छोटा नागपुरक प्राकृतिक परिवेश हुनका आओर वेसी श्यामवर्ण वना देने अछि जखैनकि हिमालयक पाश्र्वभूमि मे निवास करैक कारण भर या राजभर हुनका सं वेसी साफ अछि। घटवाल सेहो टिकैतक रूप मे कतेको रास राजवंश स्थापित केने अछि। एखनो अहि राजवंशक लोक क्षत्रीय सं अप्पन संवंध जोड़ैत अछि। राजा सीत केर छोट भाय राजा वसंतक गढ़क भग्नावशेष सिंहेश्वरक वसंतपुर गाम मे अछि। छोटानागपुरक घटवल सिंह या राय पदवी धारण करैत अछि। उत्तर विहार के भर या राजभरक उपाधि सेहो राय अछि। रायभीर अहि उपाधि केर द्योतक अछि आ राय उपाधि राजवंशी हेवाक प्रमाण अछि। राय का अर्थ होयत अछि राजा। वसंतपुरक वड़ भूभाग मे राजा वसंतक गढ़क अवशेष पसरल अछि, जाहि मे ओकर गौरवशाली अतीतक कथा जुड़ल अछि। कालांतर मे सिंहेश्वर सं तीन कुषाण वंशीय राजकुमार श्रीदेव, विजलदेव आ कांपदेव क्रमश; श्रीनगर (मधेपुरा), विजलपुर (पंचगछिया) आ कांप (सोनवर्षा) मे अलग-अलग अप्पन राजधानी वनैलक। श्रीनगर मे राजा श्रीदेव निर्मित विशाल गढक अवशेष अछि। अहि गाम मे एहन दूटा अवशेष अछि। दूनू पर मंदिर अछि जतय भगवान शिव स्थापित अछि। मुख्य अवशेषक ऊंचाई 12 सं 15 फीट धरि अछि। अहि अवशेषक उत्तर भागक मंदिर परिसर मे सैकड़ों प्रस्तर खंड पड़ल अछि जाहि पर कोनो अनाम मूर्तिकार वड़ कुशलत, निष्ठा आ शालीनता सं दुर्लभ नक्काशी केने अछि। अवशेष के एकटा प्रस्तर स्तंभ (शिलालेख) पर मकरध्वज जोगी 100 अंकित अछि। अहि पर गहन गवेषण आ पुरातात्विक सर्वेक्षणक आवश्यकता अछि। मधुवनी जिलाक अन्धराठाड़ गाम मे गंगासागर पोखरि पर स्थित मंदिरक एकटा प्रस्तर स्तंभ कर सेहो मकरध्वज जोगी 700 अंकित अछि। अहि मिथिला तत्व विमर्श मे कोनो वौद्ध भिक्षु सं संवंधित मानल जायत अछि। भऽ सकैत अछि जे मकरध्वज योगी नाथ पंथी आ सहजयान सम्प्रदायक कोनो योगी हुए। निषादक धरती अन्यान्य उपेक्षित समुदाय मे निषाद जाइत सेहो छल, जाहि पर भगवान शिवक विशेष कृपा छल। अथर्ववेद (6.39.3) मे भगवान रुद्र आदिम जाइतक संग निषादक स्वामीक रूप मे स्वीकार करल गेल छल। चर्म धारण करहि के कारण शिव के कृतिवासन कहल गेल अछि। संभवत: निषाद सं संवंध हेवाक कारण शिव के चर्म परिधान धारण करय वला मानल गेल अछि। तहियौका समाज मे चतुर्वणक अतिरिक्त अनुलोम प्रतिलोम जेहन अंतर्जातीय विवाहक कारण कतेक रास जाइत आ ओकरा सं कतेक रास उपजाइतक विकास भऽ चुकल छल। वोधायन एहने वर्णसंकर जाइत के व्रात्यक संज्ञा देने अछि। अहि सूत्र मे वोधायन निषाद जाइत चर्चा केने अछि, जेकरा मुताविक व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं निषादक उत्पति भेल अछि। मुदा गौतम धर्म सूत्र (4.14) केर अनुसार निषाद व्राह्मण पिता आ क्षत्रिय माता से भेल अछि, जे उत्तम संकरताक परिचायक अछि। विष्णु पुराण मे ते एकर उद्भवक एकटा अद्भुत कथ कहल गेल अछि, जकर मुताविक ऋषि सभ पुत्रहीन मृत राजा वेनक जांघ केर पुत्रक लेल यत्नपूर्वक मंथन करलक। ओकर जांघ के मथय सं एकटा पुरुख उत्पन्न भेल, जे जलल ठूंठक समान कारि, वड़ नाट आ छोट मुह वला छल। ओ अति चतुर भऽ कऽ ओहि सभ व्राह्मण सं वाजल, हम की करी? व्राह्म कहलक, निषीद (वैठ)। ताहि सं ई निषाद कहलायल। ओहि सं उत्पन्न लोग विन्ध्याचल निवासी पापपरायरण निषाद गण भेल। अहि कथा लेखनक पांछा पुराणकारक मंशा जे रहल हुए मुदा रामायण मे निषादराज गुहक वृतांत अछि जे सानुज आ सपत्नीक भगवान राम के नदी पार करैने छल। हुनकर भक्तिक प्रशंसा वाल्मीकि आ तुलसीदास सेहो केने अछि। महाभारतक अनुसार, निषाद व्राह्मण पिता आ शूद्र माताक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि। मनु निषाद के मत्स्य धातो निषादानां कहने अछि जे मछली मारय वला जाइत छल। मनुक मुताविक, निषाद नाव खेवैत अछि आ हुनकर निम्न जाइत मे गणना करल गेल अछि। जंगल, पहाड़ मे ई आखेटक रूप मे जानल जायत अछि। आखेट कर्मक कारण ई व्याध सेहो कहल जायत अछि। मिथुन-रत क्रौंच के एकटा निषाद द्वारा वध किए जाय सं दयाद्र्र भऽ कऽ महर्षि वाल्मीकि के एत्ते पैग शोक भेल आ वहि श्लोकक रूप मे परिणत भऽ गेल। निषादक कतेक रास उपजाइत वनल, एहन स्मृति मे उल्लेख अछि। तहियौक पुक्कस जाइत निषाद पुरुख आ शूद्र स्त्रीक संयोग सं उत्पन्न भेल अछि। अहि जाइतक काज विल मे रहय वला जीव के मारव छल। व्राह्मण पुरुख आ शूद्र स्त्री सं उत्पन्न पारशव जाइत के सेहो निषाद कहल जायत अछ। ओहि तरहे शूद्र पुरुष आ निषाद स्त्री से कुक्कुटक जाइतक उद्भव भेल। निषाद जाइतक पुरुख आ आयोगव जाइतक स्त्री सं जे संतान होयत अछि ओ मार्गव कहलायल जाइत अछि जे आर्यावर्त मे कैवर्त सेहो कहल जायत अछि। हुनकर कर्म नाव चलावैक छल। 'निषादं मार्गवं सूते दासं नौकर्म जीविनम् कैवर्त मिमियं प्राहुरार्यावर्त निवासिन:।1' तैत्तिरीय संहिता (10.34) निषाद पुरुष आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न प्राचीन काल मे चमड़ाक काज करहि वला कारावर जाइत उल्लेख अछि। निषाद स्त्री अ वैदेह पुरुख सं उद्भूत आंध्र जाइतक सेहो उल्लेख वायु पुराण (10.36) आ मत्स्य पुराण(50.76) मे अछि। मनु अप्पन स्मृति (10.37) मे निषाद पुरुख आ वैदेह स्त्री सं उत्पन्न अहिण्डक जाइतक चर्चा केने अछि, जे कारागारक देखभाल करैत छल। एहन कतेक रास निषाद प्रसूत जाइतक आपस मे मिश्रण भऽ जेवाक कारण समान कर्मा शक्तिशाली जाइतक विलयन भऽ गेल। उपयुक्त उपजाइत आव ते खोजै सं नहि भेटैत अछि। एहन कतेक रास उपजाइत समान व्यवसाय परक निषाद, धीवर, मल्लाह, कैवर्त आदि जाइत मे विलन भऽ गेल। ओहि छोट-छोट उपजाइतक अप्पन अस्तित्व रक्षाक लेल एहन भऽ जायव स्वभाविक छल। वैश्य पुरुष आ क्षत्रीय स्त्री सं उत्पन्न संतान कर्मा जाइत धीवर कहैलक। कौरव आ पांडवक दादा शान्तनु धीवर(मछुआरा) जरूथक पुत्री योजनगन्धा (सत्यवती) सं व्याह केने छल। अहि विवाहक पूर्व योजनगन्धा महर्षि वशिष्ठक पौत्र पराशरक संयोग सं कृष्ण द्वैपायन के जन्म देने छल, जे अप्पन कालक महाना आचार्य भेल आ महर्षि वेदव्यासक नाम सं विख्यात भेल। आदिकवि वाल्मीकि के किछु लोग व्याध (निषाद) मानैत अछि। मुदा दूनू व्राह्मण छल। रामायण आ महाभारत एकर साक्ष्य अछि। रामायण मे वाल्मीकि दू ठाम पर अप्पन परिचय स्वयं दैत अछि। राम द्वारा संपादित अश्वमेघ यज्ञक काल वाल्मीकि अहि यज्ञ मे सीता कऽ लऽ कऽ आवैत अछि आ राम के अप्पन परिचय दैत अछि प्रचेतसोअहं दशमपुत्रौ (उत्तरकांड 96/19) अर्थात हम प्रचेताक दसवां पुत्र छी। एक दोसर ठाम वाल्मीकि परोक्ष रूप सं अप्पन रामायण में अप्पन परिचय देने अछि। इति संदिश्य वहुशो मुनि प्राचेतसस्तदा वाल्मीकि परमोदारस्तष्णी मासीन्महा (उत्तरकांड 93/17) अर्थात अहि तरहे महायशस्वी प्रचेताक पुत्र वाल्मीकि दूनू शिष्यक शिक्षा दऽ कऽ चुप भऽ गेल छल। प्रचेता व्रह्मक पुत्र छल। मनुस्मृति (1.34.35) केर अनुसार व्रह्मा प्रजाक सृजनक कामना सं घोर तप द्वारा शुरू मे प्रजाक पति दस महर्षि के उत्पन्न केलक। ओ महर्षि मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु आ नारद अछि। वाल्मीकि अहि दस महर्षि मे एकटा प्रचेताक पुत्र छल। ताहि सं हुनकर व्राह्मण हेवाक मे कोनो संदेहक गुंजाइश नहि अछि। आध्यात्म रामायण (अयोध्या काण्ड, सर्ग6, श्लोक 65, 66) मे राम आ वाल्मीकिक वन मे मिलय केर प्रसंग अछि। वाल्मीकि राम के अप्पन विषय मे वतावय अछि, हम जन्म से द्विज छलहुं मुदा हमर आचरण शूद्र जेना छल। शूद्र स्त्री सं हमरा अजितेन्द्रिय द्वारा कतेक रास पुत्र उत्पन्न भेल। चोरक संग रहैक कारण हम सेहो चोर भऽ गेलहुं। स्कन्द पुराण मे सेहो उल्लेख अछि जे ओ व्राह्मण छल आ हुनकर नाम अग्नि शर्मा छल। मुदा शिकार (व्याघ्र कर्म) आ दस्युकर्म मे ओ लिप्त छल। वाद मे सप्तर्षिक कृपा सं ओ महर्षि वाल्मीकि वनि गेल छल। ओहि तरहे वेदव्यास सेहो व्राह्मण छल नै कि शूद्र। महाभारतक आदि पर्व मे हुनकर जन्मक कथा अछि। ओ महर्षि पराशरक पुत्र छल। हुनकर मां सत्यवती एकटा अप्सराक कन्या छल। राजा उपरिचर अहि कन्याक पालन-पोषणक भार मल्लाहक मुखिया जरूथ केर सौंपने छल। ओ नाव चलावैक लेल तट पर जायत छलि जतय हुनकर मिलन ऋषि पराशर सं भेल। संपूर्ण कथ महाभारत (आदिपर्व 63.70-86) मे अंकित अछि। पराशर महर्षि वशिष्ठक पौत्र छल। सत्यवती सं जन्म लऽ कऽ कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) गुण, जाइत आ वर्णक दृष्टि सं महर्षि पराशरक वंश मे आवैत अछि। पराशरक पुत्र भला कोन आधार पर शूद्र कहल जायत अछि? समान व्यवसाय परक जाइत मे कतेक उपजाइतक तिरोहित भऽ जायके पश्चात निषादक वाइस उपजाइत एखनो अस्तित्व मे अछि. ई उपजाइत अछि, कोवट, कैवर्त, चौरा, तीवर, धीवर, वेलदार, विन्द, मल्लाह, सुरहिया, वनपर, गोढ़ी,खुलवट, कौल, जेठौत, परवतिया, चौदहा, राजवंशी, लहेरिया, महिषी, मुरियारी, केवट आ धोवी। निषादक अहि उपजाइत मे कैवर्त आ गोढ़ी सिंहेश्वरक कमरगामा, दुलार, , चम्पानगर, डंडारी, वभनी, गम्हरिया, टोका जीवछपुर, जलवार, महुली आदि गाम मे वहुलांश मे रहैत अछि। ई संपन्न कृषक अछि आ राजनीति मे हिनकर वर्चस्व अछि। ई एखनो भगवान शिवक उपासक अछि। मूर्ति स्थापना प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा केर कौशिकी मे नव जल उतरैत अछि। जलधारा तीव्र गति सं आगू वढ़ैत अछि। प्रत्येक वरख आषाढ़ पूर्णिमा के इतिहास क्षण भरि एतय रूकि के पद्म पलाश अर्पित कऽ जायत अछि। लागैत अछि, शून्य मे वेद ध्वनी गूंजि रहल अछि। नै जानय कहिया सं श्रृंगेश्वरक कौशिकीक जल पीयर भऽ गेल। तहिया सं कोशी पाण्ड, पडुआ या परवान धार वनि गेल। श्रृंगेश्वर थान मे ऋष्यश्रृंग एखनो जीवित अछि। श्रीमद्भागवत सुनावैत शुकदेवजी कहैत अछि 'गालवो दीप्तिमान रामो द्रोण पुत्र: कृपस्तथा। ऋष्यश्रृंग पितास्माकं भगवान वादरायण:।। इमे सप्तर्षयस्तत्र भविष्यन्ति स्वयोगत:। इदानि मासते राजव स्वे स्वे आश्रम मण्डले।।' (गालव, दीप्तिमान, राम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग, महर्षि वेदव्यास ई सातों ऋषि आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि पद पर आरूढ़ होयत) अहि श्लोक सं ई सिद्ध भऽ गेल अछि जे ऋष्यश्रृंग आव आवय वला आठम सावर्णी मन्वन्तर मे सप्त ऋषि मेे से एकटा पद अवश्य ग्रह कऽ अहि कौशिकी अंचल के फेर सं महिम मंडित करत। ऋष्यश्रृंगक मूर्तिक स्थापना ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि सिंहेश्वर थान मे अहि ऋषिराजक भव्य प्रतिमाक अभाव खटकैत छल। ऋष्यश्रृंग वंशोद्भव फारविसगंज (अररिया) निवासी गोलोकवासी मोहनलाल जी पाण्डेयक आत्मज श्री गोपाल पंडित (सिखवाल व्राह्मण) कुचामण सिटी जिला नागौर (राजस्थान) निवासी द्वारा संगमरमर निर्मित ऋष्यश्रृंगक भव्य प्रतिमा अप्पन माता श्रीमति पार्वती देवीक आदेशानुसार मंदिर परिसर मे स्थापित करैलक। अहि प्रतिमाक प्राण-प्रतिष्ठा-अनुष्ठान वैदिक मंत्रोच्चारणक संग दिनांक 20 जून, 2002 (गंगा दशहरा) के संपन्न भेल। मंदिरक विकास मे ई एकटा नव अध्याया जुडि़ गेल। सिंहेश्वर मेला एतय प्रत्येक वरख फाल्गुन शिवरात्रि मे वड़ मेला लागैत अछि। जखैन कोशीक विभीषिकाक कारण अहि क्षेत्र मे यातायातक घोर असुविधा छल, पूर्णिमा आ भागलपुर सं एकर संवंध टूटि जायत करैत छल तखैन अहि ऐतिहासिक मेलाक वड़ उपयोगिता छल। वैलगाड़ी पर सवार भऽ कऽ दूर-दराजक लोग अप्पन रसद-पइनक संग अहि मेला मे आवैत छल, अप्पन शिविर लगावैत छल, मेलाक आनंद लैत छल आ साल भरिक लेल अप्पन घरेलू उपयोगक वस्तु कीनैत छल। एतवेटा नै, पहिने ई मान्यता प्रचलित छल जे वावा (भगवान शिव) केर विवाह भऽ जाय केर वाद लोक अप्पन वाल-वच्चा सभहक विवाह तय करैत छल। एतदर्थ फाल्गुन महाशिवरात्रि के कन्य आ वरक देखा-देखी आ संवंध तय भऽ गेलाक संग व्याहक लेल उपयोगी समानक खरीद-फरोख्त सेहो अहि मेला मे होयत छल आ दहेज मे दैक लेल मवेशी सेहो मेला मे कीनन जायत छल। अप्पन दूरक कुटुम्व से भेंट-मुलाकात सेहो अहि मेलाक विशिष्ट ठाम छल। तहैयौका काल मे अहि मेलाक आर्थिक टा नै सांस्कृतिक महत्व सेहो वड़ छल। कोशीक वाढ़, मलेरिया आ दोसर प्राकृतिक आपदा सं जूझैत लोकक लेल ई एकट उल्लेखनीय विश्राम स्थल छल, जतय आवि के किछु दिनक लेल लोक अप्पन कष्ट कं विसुरि जायत छल, आगूक योजना वनावैत छल, आ अप्पन जिजीविषा के तरंगित कऽ जय भोलानाथ, जीयव के फेर आयव, जेहन प्रार्थना कऽ घुरैत छल। ई मेला सदी सं उल्लास आ आनंदक संगम रहल अछि। वावा भोलेनाथक पूजा-अर्चनाक वाद माटि खोदि केर वनायल चूल्हा पर अपने सं भोजन वनायव, दिन भरि मेल घूमव, टिकुली-सिनूर सं लऽ कऽ दोसर घरेलू सामान कीनव आ रात मे पन्ना लाल थियेटर कंपनीक नौटंकी देखव मेला दर्शनार्थी सभहक दिनचर्या छल। ई थियेटर कंपनी उत्तरप्रदेश सं प्राय: सभ वरख आवैत छल। एकर संस्थापक पन्ना लाल अपने एकटा कुशल कलाकार छल। लैला मजनूं, शीरी फरहाद, सुलताना डाकू, भक्त पूरन मल, माया मछन्दर, अमर सिंह राठौर आदि हुनकर श्रेष्ठ आ चर्चित नाटक छल जकर अहि मेला मे सफल मंचन होयत छल। नगारेक आवाज पर वहरेतवील मे सभ कलाकार अप्पन भूमिका के गावि के प्रस्तुत करैत छल। मंत्रमुग्ध दर्शक पात्र सं अप्पन साधारणीकृत कऽ अपूर्व आनंद, प्रेम, करुणा, राग-विराग, आक्रोश आदि भावक अनुभव करैत छल। अहि थियेटरक ई एकटा विशिष्ट गुण छल। गलढर सं चौठारी धरि चारि दिन धर मधेपुरा कचहरीक हाकिम-हुक्काम अहि मेलाक कैम्प करैत छल। सीरिज इंस्टीट्यूशनक चुनल गेल स्काउट कैलाश पति मंडल शिक्षक नेतृत्व मे मेला आ मंदिर परिसरक विधि व्यवस्थाक संचालन करैत छल। अनुमंडल मुख्यालय सं आरक्षी वल आ चौकीदारक ड¬ूटी सेहो मेला मे रहैत छल। कतेक वरख मेलाक अंत मे हैजा आ आगलग्गी सं जान आ सामान के क्षति सेहो भेल अछि। सभ रविवार आ वुधवार के हाट मे विक्र-वट्टाक अलावा अहि मेला मे भरपूर कमाई कऽ एतौका दुकानदार भगवान शिवक प्रसाद वुझि वरख वाद अगुलका मेलाक प्रतीक्षा करैत छल। मुदा, धीरे-धीरे समय वदलि गेल। यातायातक सुविधा सं लोकक पारस्परिक दूरी कम भऽ गेल। अहि क्षेत्रक कतेक गाम शहर वनि गेल जतय घरेलू उपयोगक सामान वहुलांश मे भेटय लागल। पहिने भगवान शिवक दरवार मे जतेक यज्ञ मुण्डन आ मनौतीक लेल ओयत छल आव वुद्धिवादक विस्तारक कारण ओहि मे गुणात्मक कमी आवि गेल। आव एतवै टा जरूर भेल अछि जे सभ साल हजार व्याह अहि मंदिर परिसर भे हुए लागल। सिनेम थियेटरक महत्व के किछु कम कऽ देने अछि, मुदा थियेटरक रंगीनी दिन-प्रतिदिन वढ़ैत गेल। पन्ना लालक मर्यादित थियेटर आव नै अछि। हुनकर स्थान रौता कम्पनी, शोभा थियेटर आदि लऽ लेने अछि। आव मर्यादित मनोरंजनक स्थान अश्लीलता ग्रहण कऽ लेने अछि। यै कारण अछि जे प्रशासन के विधि व्यवस्था आव आओर कड़ा करय पड़ैत अछि आ समय-समय पर असामाजिक तत्व सं मुकावला सेहो। अहि मेला मे सर्कस आ मौतक कुआं सेहो दर्शक के वड़ आकर्षित करैत अछि। सरकार द्वारा कृषि, उद्योग आ अन्यान्य नव-नव उपकरणक प्रदर्शनीक संग जनसंपर्क विभाग, खादी ग्रामोद्योग आदिक स्टाल मे दर्शकक भीड़ रहैत अछि। जीप, ट्रैक्टरक वाहुल्यक कारण आव हाथीक उपयोगिता कम भऽ गेल अछि मुदा मवेशी मे घोड़ा, बैल,भैंस आ वकरी सभहक खरीद-विक्री होवत अछि। सरकारी स्तर पर ई मेला पंद्रह दिन धरि, मुदा ओना एक माह धरि चलैत अछि। सातम परिच्छेद उपसंहार उत्तर वैदिक कालसं भारतीय संस्कृतिक जय यात्रा आरम्भ होयत अछि. अहि युगमे नै जानय कतेक संभावना साभ्यतिक यथार्थक विराट समुच्चयमे संग हेबाक लेल तैयार बैसल छल, जे बादमे महाकाव्यात्मक सम्पूर्णतामे अवतरित भेल. अप्पन वर्चस्वक लेल ब्राहमण, क्षत्रियमे भयंकर युद्ध सभ्यताक एहन यथार्थ छल जे अहि देशक सांस्कृतिक जीवनके बेसी क्रियाशील बना देलक. पुरुष सूक्तक ब्राहमणोस्य मुखमासीद वाहू राजन्यः कृतः, के मोताबिक सभ वर्णमे ब्राहमण श्रेष्ठ छल. अप्पन ज्ञान-विज्ञानक कारण समाजक सांस्कृतिक बागडोर हुनके हाथमे छल. ब्राहमण सत्व शक्ति सम्पन्न छल, ते छत्रिय रजः शक्ति सम्पन्न. उत्तर वैदिक कालमे ब्राहमणक विशिष्टता आ श्रेष्ठताके फेर सं प्रतिपादित करल गेल छल. अहि कालमे समाजक संगठन सेहो शुरू भ’ चुकल छ्ल. संगे वर्ण व्यवस्थाक स्वरूप सेहो निश्चित भ’ रहल छल आ सभ वर्णक श्रेणीक निर्धारण सेहो. उत्त्तर वैदिककालीन समाज व्यवस्था आ महाकाव्यकालीन समाज व्यवस्थामे कोनो अंतर नै छल. महाकाव्यमे वर्णित समाजक आधारशिला पूर्ववर्ती समाज व्यवस्था छल. अहि समाजमे अध्ययन, अध्यापन, यजन-याजन आ दान-प्रतिग्रह जेहन प्रमुख कार्य सं राज्य आ समाजक सभ क्षेत्रमे ब्राहमणक सर्वोच्च पद भेटल छल. शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आ आर्थिक विशेषाधिकार हुनका प्राप्त छल. ब्राहमण सभ वेदक ज्ञाता आ सभ विद्यामे मर्मज्ञ होयत छल. विद्वता आ ज्ञानक कारण ओ भारतीय समाजमे सर्वश्रेष्ठ छल. अप्पन सक्रियता, दूरदर्शिता आ कर्तव्य परायणता सं ओ समाजक निर्माण करैत छल. धार्मिक क्रियाक उद्देश्य समाजमे एकजुटता आ अटूट संगठन स्थापित करब सेहो छल. अहि धार्मिक क्रियामे राज्य आ समाजक कल्याण निहित छल. ओ राजा आ समाजक कल्याणक निमित्त यज्ञ सम्पन्न करैत छल. ऋग्वेद (10.71.9) के मोताबिक, शत्रुक आक्रमणक काल ओ अप्पन राजाक संग युद्धभूमिमे जाइके सैनिकक उत्साह बढाबैत छल. ब्राहमण राजाके अप्पन प्रजा आ राष्ट्रक प्रति कर्तव्यबोध करबैत छल. शतपथ ब्राहमण (11.5.7.1) के मोताबिक राजाक राज्याभिषेकक काल ब्राहमण पुरोहित उपस्थित जनसमुदायके संबोधित करैत छल, ‘हे प्रजा, ई व्यक्ति अहाँक राजा अछि. ब्राहमणक राजा ते सोम अछि.’ अहि कथन सं स्पष्ट अछि जे ब्राहमण राजासं उपर बेसी आश्रित नै छल, मुदा राजा स्वयं ब्राहमणक मुखापेक्षी छल. क्याकि ब्राहमणक बिना राजाक अभिषेक हैय पायब कठिन काज छल. धार्मिक काजमे ब्राहमणक अनिवार्यता पुरोहितक पदक विकास केलक. संकटकालीन स्थितिमे ब्राह्मण शस्त्र सेहो ग्रहण क’ सकैत छ्ल. दोसरा दिस, क्षत्रिय सेहो ब्रह्मतेज के पाबय लेल अनवरत क्रियाशील छल. ओ अप्पन श्रेष्ठताक स्थापित करैक लेल कतेक रास प्रयास केलक. क्षत्रिय ब्राहमणक बौद्धिक चुनौती स्वीकार नै केलक, मुदा कतेक रास विद्वान, दार्शनिक आ तत्वज्ञानी क्षत्रिय शासक कतेक रास ब्राहमणके अप्पन शिष्य बनौलक. एहन क्षत्रिय शासकमे जनक, अश्वपति कैकेय, काशिराज अजातशत्रु, प्रावहण जैवलि आदि प्रमुख छल. छान्दोग्य उपनिषद (5.3.7) के मोताबिक पंचाग्नि-विधाक उद्भव आ उन्नयन क्षत्रिय सबहक कारण भेल छल, जेकर दर्शन तत्व छल आवागमनक सिद्धांतक प्रतिपादन. ई विद्या ब्राहमणक लग नै गेल छ्ल. ताहि सं सम्पूर्ण लोकमे अहि विद्या सं क्षत्रिय के शिष्यों क’ ल’ क’ अनुशासन हैत रहल छल. (दृष्टव्य प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, डा. जयशंकर मिश्र, पृष्ठ 121-122) ब्राहमणक तरहे क्षत्रियक अध्ययन-अध्यापनक अधिकार छ्हल मुदा ओ यज्ञ नै करा सकैत छल. अहि तरहे समाजमे क्षत्रियक अधिकार ब्राहमणसं फरछायल छल. ज्ञानक आलोक भेटलासँ क्षत्रिय अपनाकेँ सात्विक दिस मोड़ैक प्रयास केलक. आ सांस्कृतिक क्षेत्रमे अप्पन वर्चस्व काएम करए चाहलक. ई स्मरणीय अछि जे अइ युगमे पौण्डरक, ओडू, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, करद आ खश जेहन हस्ती सभ सेहो अइ देशमे आएल. जे अप्पन कुशलता आ सक्षमतासँ ब्राहमण द्वारा चतुर्वर्णमे विधिवत समाविष्ट कएल गेल. एहन संघर्षशील संगठनात्मक व रचनात्मक कालमे ब्राहमणक सूझबूझ, तत्परता आ याचिक कर्मकांड आ क्षत्रिय कर्तव्य कर्म आ तेजक प्रभाव छल जे तहियाक भारतीय समाज एतेक संवर्धित भेल. मुदा, जाइ ब्रह्म्बल आ बाहुबलक सामंजस्य ऐ देशक आ भारतीय समाजक अविस्मर्णीय विकास केलक आ राष्ट्रीय धाराकेँ गतिमान केलक ओही स्पर्धा आ ईर्ष्याक कारण ओ एक-दोसराकेँ रणक्षेत्रमे ललकारए लागल. वशिष्ठ आ विश्वामित्रक युद्ध (देखू पांचम अध्याय), परशुराम आ क्षत्रियक लोमहर्षक संग्राम (दृष्टव्य ब्रहमवैवर्त पुराण, गणपति खंड, अध्याय 40), दधीचि आ क्षुवधु नामक राजाक युद्ध (शिवपुराण, अध्याय 38, 39) आदि एहन वृतांत अछि, जे ब्राहमण-क्षत्रिय स्पर्धा जनित अछि. दधीचिक युद्धभूमि तँ अखुनका सिंहेश्वर स्थान अछि. श्रृंगश्वरश्च नाम्ना वै वैद्यनाथ स्तथैव च. जपेश्वर स्तथा ख्यातो यो दधीचि रण स्थले. शिवपुराण (रुद्रसंहिता) अ.2 अर्थात दधीचिक रणभूमिमे श्रृंगश्वर, वैद्य्नाथेश्वर आ जपेश्वर नामक लिंग प्रसिद्द अछि. अइ युद्धमे क्षत्रिय राजाक सहायता करै लेल स्वयं भगवान विष्णु आएल छल, जकरा दधीचिसँ हारए पड़ल छल. कतेक रास संघर्षक बादो समाजमे ब्राहमणक श्रेष्ठता बनल रहल. क्षत्रिय एकरा छीन नै सकल. विश्वामित्र क्षत्रिय छल. ओ ब्रह्मर्षि पदक प्राप्तिक लेल कठोर तप केलक. हुनका ब्रह्मर्षि बनि जेबाक प्रमाणपत्र वशिष्ठकेँ दिअए पड़लै. ब्रह्मा सेहो प्रगट भ’ क’ हुनका वर मांगैले कहलक. विश्वामित्र कहलखिन जे हम ब्रह्मर्षि हुअए चाहै छी. मुदा मात्र अहाँकेँ ब्रहर्षि कहलासँ हमरा संतोष नै हएत जाधरि स्वयं वशिष्ठ आबि क’ हमरा ब्रह्मर्षि नै मानि लेत. महर्षि भृगुक विष्णुकेँ लात मारब सेहो ब्राहमण-क्षत्रियक झगड़ाक वृतांतक एकटा कड़ी अछि. ओहि वृत्तांतसँ ई स्पष्ट अछि जे ब्राहमण क्षत्रिय सँ श्रेष्ठ अछि. ऋष्यशृंग ओइ युगमे उच्च कुलोद्भव ब्राहमण छल मुदा तहियोका ब्राहमणमे व्याप्त युद्धोन्माद सँ ओ दूर छल, बड दूर. ओ अप्पन कालक महान समन्वयवादी ऋषि छल. ओ क्षत्रियक विरोध नै केलक, मुदा हुनकर हितक काज, जाइसँ समाज उन्नति करए, तकरे संपादन केलक. हुनकर आगू जातीय स्वार्थ नै, राष्ट्रक कल्याण आ मंगलभावना छल. ओ क्षत्रिय राजा रोमपादकेँ अप्पन ससुर बनौलक. ई जानैत जे रोमपाद उच्च कोटिक क्षत्रिय नै अछि आ हुनकर वंश शाप भ्रष्ट अछि. ओ ओइ संबंधक सहर्ष स्वागत केलक. एकटा वृत्तांतक मुताबिक रोमपादक पूर्वज महाराज बलिक स्त्री महारानी सुदेक्षणासँ अंध दीर्घतमा अंग, बंग, कलिंग, पुंडर, सुहा आ आंध्र छहटा नेना जन्म लेलक. कतेक रास वृतांतमे आन्ध्रक उल्लेख नै अछि. पांचटा नेनाक उल्लेख अछि. कहल जाइत अछि जे गर्भाधानक काल किछु एहन घटना भ’ गेल छल जे दीर्घतमा अइ नेनाकेँ क्षत्रियत्व सँ भ्रष्ट क’ देलक. ई स्मरणीय अछि जे राजा बलि संतानोत्पत्तिक लेल अप्पन स्त्री सुदक्षणाकेँ आन्हर ऋषि दीर्घतमाक पास पठेने छल. रानी ‘हँ’ त’ कहि देलक मुदा ओइ दिस हुनकर रूचि नै छल. ओ सोचलखिन, एकटा त’ ऋषि अछि, दोसर आन्हर. संगे-संग हुनकर देह सेहो कार आ कुरूप छल. ताइसँ ओ अप्पन एकटा दासीकेँ लग भेज देलक. मुनि ओकरासँ कक्षीवान आदि कतेक रास पुत्र उत्पन्न केलक. जखन वस्तुस्थितिक जानकारी राजाकेँ भेटल तखैन राजा बड्ड बुझा-सुझा क’ रानी केँ तैयार केलक आ दीर्घतमा लग पठौलक. दीर्घतमा आन्हर होइक बादो बड रतिप्रिय छल. सुरभिक नेना वृषभसँ ओ गोधर्मक शिक्षा प्राप्त केने छल. आँखि नै रहबाक कारण ओकरा शील संकोच सेहो नै छल. कत’ मानव धर्मक मर्यादित परिवेशमे रहएवाली सुदेक्षणा आ कत’ गोधर्ममे निष्णात दीर्घतमाक उद्दाम रति व्यवहार. भला कोन मेल हुअए? ताइसँ ई तमसाएल ऋषि अप्पन नेनाकेँ क्षत्रियत्वसँ च्युत क’ देलक. ई सभटा पुत्र यशस्वी राजा जरूर भेल मुदा विशुद्ध क्षत्रिय नै भ’ क’ एकटा विशिष्ट जाति बला भेल. अइ वंशमे महाभारत कालमे ‘अधिरथ’ भेल जिनकर ‘सूत’ आ हुनकर पुत्र ‘कर्ण’ ‘सूतपुत्र’ कहल गेल. अइ क्षेत्रक निवासी आ राजवंश ब्राहमण ग्रन्थमे व्रात्य कहल जाए लागल. (देखू, व्रात्य, पहिलुक परिच्छेद) जेना राजा बलि क्षेत्रमे दीर्घतमा आ पुत्र उत्पन्न केलक, जे ब्राहमण भेल. (दृष्टव्य श्री भागवत दर्शन खंड 35, पृष्ठ : 39-46) ऋष्यशृंग अइ सभटा भेदभावसँ ऊपर छल. ओ अप्पन मनमे ई भाव आनबे नै केलक जे ओ उच्च कुलोद्भव ब्राह्मण आ महान आचार्य होइक बादो निम्न कोटिक क्षत्रिय कन्याक पाणिग्रहण क’ रहल अछि. संगे पहिनेसँ चलल आबि रहल क्षत्रियक प्रति ब्राहमणक द्वेषकेँ ओ समग्र रूपसँ निरस्त क’ देलक. अइ तरहेँ शान्ताक पाणिग्रहणक बाद क्षत्रिय आ ब्राहमणमे प्रसन्नताक लहर आबि गेल. ई स्वाभाविके छल. आब दुनू एक-दोसराक प्रति युद्धक कटुताकेँ बिसरि शांति, सद्भावना, समन्वय आ समरसताक स्थापनामे जुटि गेल. अइ परिवेशमे विकासक काज बेसी भेल. देशक सभ टा क्षत्रिय राजा ऋष्यश्रृंग केँ जमाय जेना सम्मान देलक. ब्राहमण आ क्षत्रिय शान्ति चाह’ लागल. ओ सभ कियो महासमर, दशराग्य युद्ध, वशिष्ठ-विश्वामित्र, परशुराम आ सहस्त्रार्जुन युद्ध आदि सबहक़ विभीषिका देखि चुकल छल. दशराग्य युद्धमे पचास हजार सँ बेसी ब्राहमणक वध भेल छल. राजा रोमपादक अइ वैवाहिक अनुष्ठानकेँ सम्पन्न कराबैक पश्चात ब्राहमण-क्षत्रिय एकता सभ दिन लेल स्थायित्व प्राप्त क’ गेल. ईहो एकटा कारण भ’ सकैत अछि जे भारतमे क्षत्रिय सभ ऋष्यशृंगक कतेक रास मंदिर बनबौने अछि. मुदा, कतिपय कट्टरपंथी केँ ब्राहमण-क्षत्रियक ई मेल आ आर्य-अनार्यक समन्वयक प्रयास नै सोहाएल. समाजमे एहनो लोक रहैत अछि जे स्नेह, सद्भावना आ समन्वयक वातावरण नै, अशांति आ विघटन पसिन्न करैत अछि. अहिने लोक सभ ऋष्यशृंगक प्रतिभा आ लोकप्रियतासँ ईर्ष्या सेहो कर’ लागल. ई गप सर्वविदित अछि जे ऋष्यशृंग सभसँ पहिने पुत्रेष्टि यज्ञ करेने छल आ एकर मंत्रदाता आ मंत्रोचित अनुष्ठानक मंत्रक पुरोधा छल. मुदा हरिवंश पुराणमे संकलित पुत्रेष्टि-यज्ञक सैकड़ासँ बेसी मंत्रक संग कत्तौ ऋष्यशृंगक नाम धरि नै अछि. ओतए मात्र ‘ऋषि उवाच’ टा अंकित अछि. कोनो ऋषिक नाम नै अछि. हमर विचारसँ ई उत्तर वैदिक कालमे सभसँ पैघ षड्यंत्र छल. तपोपुंच समन्वयवादी ऋष्यशृंगक छविकेँ मैल करैक लेल कट्टरपंथी सभ कतेक रास घृणित षड्यंत्र रचने छल. ओ कट्टरपंथी ऋष्यशृंगक उदारवादी नीतिसँ जरैत छल. ऋष्यशृंग आर्य टा मे नै, अनार्य मे सेहो अप्पन साधना तपस्याक पावन स्थल बनौलक. पूबमे वर्तमान अरुणाचल प्रदेशक सुनसरी नदीक तट पर ओ तपस्या केलक. हुनकर स्मृति चिह्न ई स्थल आइ धरि समेट क’ राखने छल. हुनकर ई तपस्थल ‘श्रृंग गुड़ी’ क नामसँ चर्चित रहल हएत, जे बाद मे ‘सिंगोड़ा’ बनि गेल. अइ क्षेत्रमे ‘गुड़ी’ शब्द ठामक लेल प्रयुक्त होइत अछि. वेगवती सुनसरीक धारक कात सिंगोड़ा घाट आ घाटपर स्थित विभंडक आश्रम एखनो ऋष्यशृंगक तपस्याक साक्षी अछि. एकर आगू वनाच्छादित पहाड़ी अछि. ओकर नीचा ऋष्यशृंग मंदिर. एत’ सभ बरख फाल्गुन कृष्ण पक्षपर शिवरात्रिक मेला लागैत अछि. एतौका मोपा, शर्दुकमेन, दिगारू, निशि, अपतनी, हिलमिरी, तगिन, खुम्परी, बाँचू, तंगसा, मिजि आदि भाषा-भाषी आदिवासी लोकसँ पूछू. ई अहाँकेँ ‘सिंगोमुनी’ केँ ल’ क’ बताएत, कलकल करैत सुनसरी धार आ पहाड़पर झुमैत खेती सभटा ‘सिंगोमुनी’ केर प्रसाद अछि. ईसाई धर्मक अइ इलाकामे प्रचार-प्रसारक बाद अइ ठामक महत्व किछु गौण भ’ गेल अछि. मुदा पुरना पीढीक आदिवासीक मनमे अइ ठामक चमत्कारिक वृत्तांत अखनो पुरान नै पड़ल अछि. किछु दिन बाद भ’ सकैत अछि जे ई स्मृति-चिह्न कालक प्रवाहमे बहि जाए. भारतक ई पूर्वी प्रदेश जत’ अस्पृश्य नरभक्षी अनार्य जाति निवास करैत छल, ओइ युगमे आर्य आ अनार्य दुनू फराक-फराक कोनपर अछि. मुदा शांति, तप आ समन्वयक पुरोधा ऋष्यश्रृंगक लेल आर्यावर्तक समुच्चा धरती हुनकर साधना स्थली छल. ओ अस्पृश्यताकेँक धर्मक कलंक आ एकटा दानवीय कृत्य मानैत छल. सनातन धर्ममे अस्थायी अस्पृश्यता कालांतरमे जन्मजात अस्पृश्यताक जे रूप ग्रहण केलक ओ अइ धर्मक विघटनक कारण भेल. ऋष्यश्रृंग दूरदर्शी रहथिन. ओ अप्पन कालमे देखि लेने छल जे रक्त-शुद्धि आ दस्यु व अनार्यकेँ आर्य धर्ममे संस्कारित करबाक प्रश्नपर महर्षि वशिष्ठकेँ अप्पन दृढ़ सिद्धांतक आकाशचारी आसनसँ नीचाँ उतरि वास्तविक आ जीवनगत यथार्थक सन्दर्भमे लाचार भ’ क’ अप्पन व्यवहार बदलए पड़ल किएकि दुनू जातिक समन्वयसँ राष्ट्रक मुख्यधारा तीव्रगतिसँ प्रवहमान छल. विश्वामित्रक बाद ऋष्यशृंग अइ धाराकेँ बेसी गति देलक. विश्वामित्र शस्त्रक सेहो प्रयोग केलक मुदा ऋष्यशृंग विपरीत सांस्कृतिक क्षेत्रमे भावनात्मक जनसंपर्क, शास्त्र ज्ञान, यज्ञ आ तपसँ हुनका सांस्कृतिक दृष्टि सँ पराभूतकेँ अप्पन धारामे जोड़ै लेल आजीवन क्रियाशील रहल. सुदूर पूबक मोपा, मिज, तंगसा जेहन अति दुर्गम क्षेत्र हुअए बा दक्षिणक तुंगभद्राक सघन वनाच्छादित द्रविड़ क्षेत्र, ऋष्यशृंग निर्भय आ निर्विकार भावसँ एत’ तप करैत छल, शास्त्रज्ञानसँ जनजीवनमे नव आलोक प्रदान करैत छल आ एक दीपसँ दोसर दीपकेँ प्रज्ज्वलित करैत छल. देशक पश्चिम आ उत्तरमे ऋष्यशृंगक ढेर रास मंदिर अछि, जे या तँ हुनकर तपस्या आ यज्ञस्थलीक स्मृतिक चिह्न अछि या हुनकर वंशक बनाओल स्मारक स्वरूप मंदिर आ समाधि. ओइ ऋष्यशृंग वंशज मे किछु ब्राहमण, किछु क्षत्रिय आ किछु दुनूक बीच एकटा दोसर जाति अछि जना श्रंग्वाल, श्रृंगी, शिखवाल, सिखवाल, श्रीन्ग्पुरी (महाराष्ट्र मे), नायक (मध्यप्रदेश मे), श्रृंगी ऋषि (कर्नाटक मे) ब्राहमण . दोसर दिस श्रिंगा (राजस्थान मे), विशेनवंशी, सेंगर वंशीय, शुंघ वंशीय जेहन कतेक रास क्षत्रिय समुदाय अछि जे अपनाकेँ ऋष्यशृंगक वंशज मानैत अछि. ताइसँ देशक विभिन्न भागमे हुनकर वंशजक बनाओल कतेक रास मंदिर, आश्रम आ समाधिक रूपमे अइ महान ऋषिक स्मृति चिह्न अछि. एकरामे कतेक रास एहन चर्चित स्थल अछि जे ऋष्यशृंगक जन्म आ मृत्युसँ हुनकर संबंध जोड़ैत अछि. पुराकाल मे ऋषि विशेषक मुख्य समाधिक अतिरिक्त आर ठाम पर कतेक रास समाधि होइत छल. एहन समाधिमे श्रद्धालु दिवंगत ऋषिक दांत, कमंडल, खड़ाम, चुट्टा आदि समाधिक भीतर राखि देल जाइ छल. यवनक आश्रमसँ कतेक मंदिर ध्वस्त भ’ गेल आ समाधिक धरतीकेँ गीरि गेल. कतेक स्मारक पुनर्निर्माण बादमे श्रद्धालुक वंशज करौलक. महाराष्ट्रमे भुसावलमे ऋष्यशृंगक एकटा मंदिर छल. ताप्ती धारमे बान्ह बनलासँ ई मंदिर धारक पानिमे समाधि ल’ लेलक. एत’ स्थापित ऋष्यशृंगक मूर्तिकेँ सरकारक सहयोगसँ श्रद्धालु फराक मंदिर रावेरमे फेर सँ स्थापित केलक. मन्दिरमे ऋष्यशृंगक पूजा होइत अछि मुदा समाधिमे नै. किएकि आर्य संस्कृतिमे समाधि पूजाक विधान नै अछि, एकरा श्मशान पूजन जेहन अशुद्ध कर्म मानल जाइत अछि. भारतवर्षक प्रायः सभ राज्यमे ऋष्यशृंगक मंदिर अछि. एहन गौरव कोनो दोसर ऋषिकेँ नै भेटल अछि. किछु मंदिरक विवरण नीचाँ देल जा रहल अछि. बिहार श्रृंगेश्वर स्थान (सिंहेश्वर स्थान) जिला मुख्यालय मधेपुरासँ आठ किलोमीटर उत्तर ई सुप्रसिद्ध शैव तीर्थ स्थल अछि. मुख्य शिव मंदिरमे ऋष्यशृंग अप्पन मंदिरमे स्थापित छथिन.(देखू परिच्छेद छठम) ऋषिकुंड (देखू सम्पादकीय) राजगीर पटनासँ 120 किलोमीटर दक्षिण ऋष्यशृंगक तपस्या स्थल. नीलगिरी पर्वतसँ जुड़ल सप्तकुंड. रत्नगिरि पर्वतक नीचाँ एक तप्त कुंड जेकरा ऋष्यशृंग कुंडक नामसँ जानल जाइत अछि. आइ-काल्हि ई मकदुम कुंडक नामसँ चर्चित अछि. उत्तरप्रदेश श्रृंगवेरपुर (देखू चारिम परिच्छेद) परीक्षितगढ़ मेरठ रेलवे स्टेशनसँ एक किलोमीटर दूर पर ऋष्यशृंग आश्रम. कन्नौज ऋष्यशृंग मंदिर. सिहीराम (श्रृंगीराम) फरुखाबाद भगीरथीक कात ऋष्यशृंग मंदिर. एत’ सभ बरख दशहरामे मेला लागैत अछि. अगस्त्य नगर (अगस्त्य मुनि, चमोली) उत्तरांचलक अलकनंदा पर्वतपर ऋष्यशृंग आश्रम. नेमिषारण्य (सीतापुर) लखनऊ सीतापुर रेलवे लाइनक कात भव्य मंदिर. मध्यप्रदेश आ छतीसगढ़ चांदा (चंदपुर) सादक (मांडक) नामक स्थानपर ऋष्यशृंगक पिता श्री महर्षि विभाण्डकक प्राचीन आश्रम (सादक आ मांडक विभाण्डक क बिगड़ल रूप अछि) झरबाबरवासागर झाँसी मांदेर रोड पर पुत्रेष्टि यज्ञ स्थल आ मंदिर. सिहोबा (देखू चारिम परिच्छेद: महानदीक प्रगट हएब) मंदसौर गीताभवनमे ऋष्यशृंग मंदिर आ धर्मशाला. गुजरात बिलोद (भड़ोच) नर्मदा धारक कात ऋष्यशृंग आ शान्ताक तपस्या स्थल आ अइ क्षेत्रक प्रमुख ऋष्यशृंग आश्रम. महाराष्ट्र कोपरगांव गोदावरी धारक कात ऋष्यशृंगक समाधि आ महर्षि विभाण्डक मंदिर. एत’ सभ बरख चैत्र मासमे मेला लागैत अछि. तापसवाडी (ल. राकेर, जिला. जलगाँव) ऋष्यशृंगक प्राचीन मंदिर, जे श्रीन्ग्य देवक नामसँ प्रसिद्द अछि. सींगत (पो. तांदुलवाडी, त. रावेर जिला. जलगाँव), तांदुलवाडी भुसावलसँ 14 किलोमीटर सुखल धारक कात ऋष्यशृंगक प्राचीन मंदिर. रिश्य्श्रीन्ग्य पदमासन मे. आष्टी (नांदेड़) ऋष्यशृंग आश्रम आ मंदिर. अनसिंग (जिला. वासिम, महाराष्ट्र) ऋष्यशृंग मंदिर. कारला (त. पुषद, जिला. यवतमाल) ऋष्यशृंग समाधि. राजस्थान ढ्सुक (जिला. अजमेर) मंदिर सरेडी (जिला भीलवाड़) मंदिर आ स्कूल. विजय स्तम्भ दोसर, चारिम आ छअम महल पर ऋष्यशृंग आ शान्ता माताक मूर्ति लागल अछि. (महाराणा कुम्भाक सम्मान शोधक विषय). मात्रिकुंदिया (जिला चित्तौड़गढ़) बनास धारक कातक मंदिर. बून्दी मंदिर आ धर्मशाला. संगावदा (जिला बूंदी) त्रिवेणीक कात मे. चंदेसरा (जिला उदयपुर) मंदिर. जैतारण (जिला पाली) मंदिर आ धर्मशाला. केशवराय पाटन (जिला बूंदी) मंदिर. जयपुर मंदिर आ ऋषि श्रीन्ग्यश्रम. केकड़ी (जिला अजमेर) मंदिर आया धर्मशाला. रवैरावाद (जिला कोटा) मंदिर. भ्रिभासनी (जिला नागौर) मंदिर. उदयपुर रिश्य्श्रीन्ग्य मंदिर. भीलवाड़ा ऋष्यशृंग संस्थान. रिश्य्श्रिंग आ माता शान्ताक मंदिर. 19 मई, 1996 केँ मूर्ति मे प्राण-प्रतिष्ठा भेल. विशाल परिसर, स्कूल, धर्मशाला आदि. पुष्कर. ऋष्यशृंगक मंदिर, अ. भा. सिखवाल ब्राहमण महासभाक कार्यालय. चित्तौड़गढ़ (बड़ामठ) ऋष्यशृंग आश्रम आ छात्रावास. कोलर (पाली) अरावली पर्वत श्रृंखलापर मंदिर. फुलाद रेलवे स्टेशनसँ 35 किलोमीटर. मूर्तिक प्राण-प्रतिष्ठा 4 मई, 1987 केँ भेल. वर्षा ऋतुमे प्राकृतिक छटा दर्शनीय. कर्नाटक शृंगेरी मठ (देखू चारिम परिच्छेद) श्रृंग गिरि (देखू चारिम परिच्छेद) आंध्रप्रदेश हैदराबाद ऋष्यशृंग मंदिर आ धर्मशाला. हिमाचल प्रदेश बागी (बनजार जिला कुल्लू) ऋष्यशृंग मंदिर संकीर्ण (त. वंजार, जिला. कुल्लू), जे नौ मास बर्फसँ झाँपल रहैत अछि. अति प्राचीन ऋष्यशृंग मंदिर आ लगमे हुनकर योगनी कुंड. धौंधी (वंजार) ऋष्यशृंग मंदिर (ई पांच सौ साल पुरना अछि) एकर अलावे दोसर-दोसर ठाम अज्ञात ठामपर सेहो ऋषिराजक स्मृति चिह्न हएत. ई ऋष्यशृंगक गौरवोज्ज्वल कीर्तिक साक्षी अछि. अइ ग्रन्थक समापनक पहिने हम श्रद्धापूर्वक यजुर्वेदक सर्व शक्तिमान परमेश्वरक विराट स्वरूपक स्मरण करैत छी. सहस्त्र शीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात. सह भूमिं सर्वतः स्प्रत्व त्यातिष्ठद्द्शालान्ग्लम. तस्माद्द्याग्यात्सर्वहुत ऋचः समानी जज्ञिरे. छंदासी जज्ञिरे तस्मात्यास्त्जुत्तास्माद्जायत. सृष्टिकक आरम्भ मे परम पूर्ण अत्यंत पूजनीय सर्वहुतः परमात्मा सँ (ऋचः) ऋग्वेद (सामानि) सामवेद (जज्ञिरे) उत्पन्न भेल. (तस्मात) ओइ परमेश्वरसँ (छन्दां॑सि) अथर्ववेद (जज्ञिरे) उत्पन्न भेल. (तस्मात्यजुः अजायत) ओइ प्रभुसँ यजुर्वेद उत्पन्न भेल. आ चराचर मे व्याप्त मंत्रदृष्टा ऋष्यशृंगक असीम अनुग्रहकेँ दुनू हाथ जोड़िक’ प्रणाम निवेदित करैत छी. ऊं ऋष्यशृंगे नमः परिशिष्ट (क) पुत्रेष्टि यज्ञ ब्रहमचारी कृष्णदत्त 30 बरखक युवक छल. ओ पढ़ल-लिखल नै छल. कोनो विद्यालयमे ओ प्रवेश नै लेने छल. ओ महान योगी छल. ओ योग निकेतन ऋषिकेषक श्री योगेश्वरानंदजी महाराजक शिष्य छल. जखन ब्रहमचारी कृष्णदत्तयोग समाधिमे लीन भ’ जाइ छल तखन हुनकामे दिव्य ज्ञानक धारा प्रवाहित हुअए लागैत छल. कहल जाइत अछि जे ऋषिक आत्मा हुनकापर उतरैत छल आ ओ अर्धचेतन आ अचेतनावस्थामे ओइ ऋषि सभसँ कतेक रास काज-धाज क’ आध्यात्मिक आ वैज्ञानिक व्याख्या करैत छल. एहन लागैत छल जे ओ सतयुग मे पहुँच गेल अछि जाइमे वैदिक संस्कृति देवत्व, सत्य, धार्मिक आ पवित्र आत्मा सर्वोपरि अछि. ब्रहमचारी कृष्णदत्तक अचेतावस्थामे एहन वैज्ञानिक आ आध्यात्मिक व्याख्या आ विश्लेषण विजडम ऑफ़ द एंसियेंट रिसीज (WISDOM OF THE ANCIENT RISHIES)मे संकलित अछि. एकर प्रकाशक अछि वैदिक अनुसंधान समिति III, E-31 लाजपतनगर, नई दिल्ली-24. अहि ग्रंथक मूल हिंदी मे आब नै भेटैत अछि. अंग्रेजी मे अनूदित ग्रंथ उपलब्ध अछि. पुत्रेष्टि यज्ञक संबंधमे अइ अमूल्य ग्रंथक एकटा उद्धरण प्रस्तुत अछि. अइ ग्रंथमे लेखकके ऋष्यशृंगक पुनरावतार कहल गेल अछि. Puttreshthi Yajna (Sacrificial ceremony for a son’s birth) and medicines. A herb- ‘Kathakuta’ growing on mountains, blooms with the white flower, keeps one thousand insects in the lower part of its root. Its body is white blue and leaves look like pun sagati. Sweet in its root and bitter in its top, this herbal medicine has to be mixed with another medicine known as ‘ShankhaAnuvat’. Its flower looks like the flower of an Almond plant. It has a bitter bark although its root is replete with ‘Baka’ a tasteless juice which is also known as Akrata. The three doses of its leaves, bark and root be mixed with the five of that of ‘Kirkir’ (an herb I have already mentioned) to make a perfect ‘Astanga’. A leaf like cake should be prepared of this substance and be kept in an earthen pot to absorb its poisonous properties. This refined medicine has a curative effect on all gynecological troubles of urethra, eyes, Anawat (a vein) and other physical deficiency, if administered of a period of forty days. The panchang and the trigat are other prepa rate on like Astang. I had studied all of them along with the other skills of Ayurveda for 84 years before I (Shrangi Rishi) conducted ‘Puttereshthi’ Yajna for the emperor Dashratha. This Yajna can be successful performed only by a master of Ayurvedic knowledge. Only a few crudité scholars of this science know this therapy by which ailing organs of human body viz. eyes, ears, tongue etc. can be cured. Diagnose of Dashratha Before setting up a yajnashala or the place for sacrifice of ‘Puttreshthi’, I examined the king Dashratha well and examined closely his ‘Akrata-Dwar’ one of the entrances in human body each haunted by a deity. The two eyes are consecrated by Jamdagni and Vishwamittra. The front of ear and that of nose is enshrined by Bharadwaj and Ashwani Kumar respectively. To purify them, one has to know these different medicines which are named after their name. Accordingly they are called Jamdagni medicine, Bharadwaj medicine and so on. These medicines have different therapeutic range. In Puttreshthi, in addition to other articles, the fuel (woodenslices) of aak, shami, Jatamansi, Trikata, Chandari (AnubhutaSamubhukta) Anikrata are required. The altar hasin in Yajnashala be shaped as virginal canal of womanand that too of the same size which the virginal canal of the woman desiring son, has held. The smoke and odor created by such a sacrifice can cure and make up all diseases and deficiencies of my barren daughters. This is a miracle of Ayurveda which can’t be mastered in a single span of human life. Diagnose of the Wives of Dashratha I, (Shrangi Rishi) had also availed the occasion of the examining perfectly all the three wives of Dashratha. On the basis of Ayurvedic Knowledge, I had to see the shape of their virgina-canals without which, I could have never set up the desired Yajnashala. Though a disgraceful act, yet MaharashiVashistha insisted upon showing their vital organs to me, in spite of the reluctance of Arundhati. In this way, I could set up three altars of three different shapes. Diagnose in one thousand pages I recordedmy experience of the so called puttreshthi in many articles. These commentaries, compiled in a book, concentrate on various types of diagnose, each covering one thousand pages, are missing. I doubt whether Mahanandji (An unborn soul wandering in space since thousands year and casually interpreting the Bramchachari with its expositions and prophesies) shall be able to find out this volume which made to realize the vastness of the subject, after I wrote it. परिशिष्ट (ख) ऋष्यशृंगक सासुर मालिनी (इतिहासक अएनामे चम्पानगर) पुराण आ महाकाव्यक अलावा उत्तरकालीन संस्कृति, साहित्य, बुद्ध आ बुद्धोत्तरकालीन संस्कृति, पालि साहित्य, मालिनी (चम्पापुरी) क पूर्ण ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करै लेल बेसी महत्वपूर्ण अछि. जकर पूरक जैन आ ब्राहमण साहित्य सेहो पर्याप्त अछि. भगवान बुद्धक आविर्भावसँ पहिने आ बाद मालिनी (चम्पापुरी) क इतिहास आ भूगोलक सभसँ महत्वपूर्ण अध्याय षोडश महाजनपदक उत्कर्ष आ विपर्ययक इतिहास, भौगोलिक स्थिति आ दोसर विवरणक लेल जैन ग्रंथ आ महाभारतक कर्ण पर्वक अनुपूरित अन्यान्य पालिग्रंथ प्रमुख स्रोत अछि. आउ, ऐ स्रोतक आधारपर ऋषिराजक सासुर मालिनीक गौरवशाली इतिहासक अध्ययन कएल जाए. मालिनीक समृद्धि ऋष्यशृंगक मालिनी एबाक संग लखाह दिअए लागैत अछि. जे मालिनी बहुत काल धरि अकालक चपेटमे छल, ओ ऋषिराजक आबएसँ हरित-पल्लवित-पुष्पित आ अकूत धन-धान्य सँ परिपूर्ण भ’ गेल. संस्कृत कथाकार आ महाकवि दंडी विरचित दशकुमार चरितम (मदन मोहन तर्कालंकार संस्करण, पृष्ठ 59) क मुताबिक चंपामे गंगाक कात महर्षि मरीचि रहैत छल. ई ज्ञातव्य अछि जे महर्षि मरीचि ऋष्यशृंगक पूर्वज छल. ताइसँ जाइ इलाका सँ महर्षि मरीचि अप्पन साधना-तपस्याक लेल नीक बुझलक ओकरा हुनकर विद्वान आ तपोनिष्ठ प्रपौत्र ऋष्यशृंग अप्पन विपुल ज्ञान-विज्ञानसँ बड रास तपोज्ज्वल क’ देलक. अंगक अलावा आनव सभक राजनैतिक धुरि मालिनी छल. ई निर्विवाद अछि जे रामायण कालमे ऋष्यशृंगक महिमासँ ई नगर समृद्ध भेल छल. महाभारत कालमे अतुलित दानवीर आ शक्ति पुंज कर्णक कारण ई बेसी प्रसिद्द भेल. राजा रोमपादक प्रपौत्र पृथुलाक्षक पुत्र ‘चम्प’ मालिनीक नाम चंपा राखलक. तहिया सँ ई चम्पापुरी बनि गेल. चम्प बड शक्तिशाली राजा छल. मत्स्य पुराण 48/97 क मुताबिक:- ‘पृथुलाक्ष सुतश्चापी चम्प नामा वभूव वै. चम्पस्यतु पुरी चम्पा तीर्थ या मालिनी भवत. अइ श्लोकसँ स्पष्ट अछि जे चम्पा पहिने मालिनी छल. संगे-संग ओ चर्चित तीर्थ सेहो छल. राजा चम्पाक बारहम पीढ़ीमे अधिरथ भेल जे कर्णकेँ गंगामे प्रवाहसँ निकालि क’ पोष्यपुत्र बनौलक. संभवतः अधिरथक काल अंग कुरुक अधीन हुनकर करद राज्य छल. गंगाक उत्तर ‘कुरसेला’ अछि, जतए कोशी गंगासँ संगम करैत अछि. ओ प्राचीनकालमे ‘कुरुशिला’ छल, जे कुरु सबहक राज्य हेबाक प्रमाण अछि. पुर्णिया गजेटियर पृष्ट 737 क मुताबिक कुरुशिलासँ कुरु राजाक राज्यक पहाड़ी भागकेँ बुझबाक चाही. एखुनका कुरसेलासँ दखिन गंगा कातपर बटेश्वर पर्वत श्रृंखला अछि, जाइपर महादेवक बड रास पुरना मंदिर अछि. योद्धा कर्ण केँ ओकर मित्र दुर्योधन आ दोसर कौरव प्रमुखक आग्रहपर अंग राज्याभिषेक कराएल गेल छल. ‘प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनी नगरी मय’ महाभारत (शांतिपर्व 5/6) पद्मपुराण (स्वर्ग खंड, 38/72) क मोताबिक भारतक चर्चित सनातन तीर्थमे चम्पापुरीक नाम श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि. ततश्चम्पा समासाद्य भगीरथ्यांकृतोद्वः देंडापर्ण समासाद्य गों सहस्त्र फलं लभेत. पुराणकार भागीरथीक कात पर अइ चम्पापुरीमे ‘दंडापर्ण’ नामक एकटा तीर्थक उल्लेख केने अछि, जेकर दर्शनसँ सहस्त्र गोदानक पुण्य भेटैत अछि. ‘जिनप्रभसूरि’ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’मे लिखने अछि जे कौशिक ऋषिक आर्य शिष्य ‘अंगर्षि’ आ ‘रुद्रक’ चम्पामे विधिसँ एकटा पैघ यज्ञ केने छल. (अस्यां कौशिकार्य शिश्यांगर्षि रुद्रकाभ्याख्यान संविधानकं सुजात प्रियंग्वादि संविधान कानि च जज्ञिरे). ओ आगू लिखने अछि जे मालिनी (चम्पा) मे नीक लोग बासित अछि. ओ मणि-मुक्ता सँ अलंकृत अछि, जे हुनकर समृद्धिक सूचक अछि. ‘उत्तमतम नरनारी मुक्तामणि घोरणिप्रस वसुवतः नगरी विविधादभुवस्तु शालिनी मालिनी जयति.’ विविध कल्प तीर्थ, पृष्ठ 69 चम्पा तहिया भारतक छहटा महानगरमे एकटा छल. ई महानगर छल साकेत, राजगृह, श्रावस्ती, चम्पा, कौशाम्बी आ वाराणसी. दीर्घनिकाय II-146 क मोताबिक मल्लक शालवनमे जखन भगववान बुद्ध परिनिर्वाण प्राप्त क’ रहल छल तखन हुनकर शिष्य धर्म भण्डागारिक ‘आनंद’ हुनकासँ कोनो महानगरमे परिनिर्वाण करैक लेल प्रार्थना करैत काल चम्पाक सेहो उल्लेख महानगरक रूपमे केने छल. चम्पा विश्वक पुरना नगर सभमे एक छल. ई उत्तरवैदिक कालमे बसाएल नगर अछि. ई पाटलीपुत्रोसँ पुरना अछि. रामायण आ महाभारत कालमे पाटलीपुत्रक कोनो उल्लेख नै अछि, मुदा मालिनी (चम्पा) ओइ युगमे सेहो चर्चित छल. बौद्ध साहित्यमे पाटलीपुत्रक उल्लेख अछि. ताइसँ चम्पा पाटलीपुत्रसँ बड पुरना नगर अछि. भारतक ई प्रमुख व्यावसायिक केंद्र सेहो छल. एतौका व्यापारी सुदूर ‘इंडोचीन’ मे जा क’ ‘चम्पा’ नामक नगर बसौने छल. ओइ काल समुद्रसँ व्यापार करएबला व्यापारीक दल अइ चम्पा नगरमे रहैत छल. जिनकर नौबेड़ा सदिखन गंगाक लहरपर चलैत रहैत छल आ चम्पाक गंगामे लंगर द’ क’ ठाढ़ रहैत छल. अइ तरहे कतेक कथा-कहानी आ इतिवृत्ति सँ भरल ई चम्पापुरी अछि जकर प्राचीर गर मे गंगाक लहरक भुजा सदिखन आवेष्टित रहैत छल. चम्पाक व्यापारी सिन्धु सौवीर देशक अनवरत यात्रा करैत छल. (दृष्टव्य विधार की नदी, पृष्ठ 91-93) चम्पा सनातन हिन्दू सबहक अलावा बौद्ध आ जैन सबहक सेहो महिमामंडित तीर्थ अछि. एकर सर्वाधिक चर्चा बौद्ध आ जैन साहित्यमे भेल अछि. चम्पाक रानी ‘गर्गरा’ अइ नगरक दक्खिन पच्छिम भागमे एकटा रमणीय पोखैर खुनौने छल. अश्वघोषक मोताबिक अइ पोखैरक कातमे पाँच तरहक चम्पाक फूल सँ युक्त उपवन छल. दीर्घनिकाय (शोणदंड सुत्त I/4) क मोताबिक भगवान बुद्ध अप्पन पाँच सौ भिक्षुक संग अइ उपवनमे रहल छल. चम्पामे भगवान बुद्धक दिनचर्याक विवरण विनय पिटक (1/7 312-315) सँ भेटैत अछि. गर्गरा पुष्करणी परिव्राजक, मुनि आ संन्यासीक विश्राम स्थलक रूपमे प्रसिद्धि प्राप्त क’ लेने छल. ई दार्शनिक परिसंवादक ध्वनिसँ अनवरत गुंजैत रहैत छल. चम्पामे बुद्धक यएह स्थान निवास लेल बेसी उपयुक्त छल. चम्पामे अप्पन प्रवासक क्रममे चम्पा राज्यक अस्सपुर नगरमे बुद्ध भिक्षुक प्रति ‘महा’ आ चुल्लअस्सपुर सुत्तांतक प्रवचन केने छल. चम्पाक लोक स्वादिष्ट आ शुद्ध भोजन करैत छल. जातक VI-256 क मोताबिक हिमालयक ऋषि पाकल स्वादिष्ट भोजनक रसास्वादन करैले चम्पा आबैत छल. दीर्घनिकायक शोणदंड सुत्तक मोताबिक चम्पापुरीमे पाँच सौ बहुश्रुत ब्राहमण निवास करैत छल. ओइ ब्राहमणक प्रमुख ‘शोणदंड’ छल, जे दोसर ब्राहमणक संग गर्गरा पुष्करणीक कातपर बुद्धसँ भेंट केने छल. बुद्धक प्रभापूर्ण आकृति देखि क’ ओ अभिभूत भ’ गेल. बुद्धसँ गपक काल हुनकर वचनक खंडन शोणदंड नै केलक. ब्राहमणक परिषद् जे शोणदंडक संग गेल छल, ओ मूक छल. बुद्ध हुनका शील प्रज्ञा आदि विषयमे बुझौलक. शोणदंड बुद्धक उपासक बनि गेल आ दोसर दिन हुनका खाइ लेल नोत देलक. मुदा ओ ब्राहमण परिषदक त्याग नै केलक. यएह कारण छल जे बुद्धक प्रति आस्थावान होइतो चम्पाक ओ दबंग लोक भगवान बुद्धकेँ कखनो झुकि क’ गोर नै लागलक. शोणदंड मगध सम्राट बिम्बिसारक स्थापित चम्पाक अधिपति छल. ओ हाथ उठाक’, रथ पर चढलापर चाबुक उठाक’ बा बुद्धसँ भेँट काल अप्पन मुरेठा उठाक’ संकेत सँ (मुदा, अप्पन माथकेँ उठा क’) बुद्ध केँ गोर लागैत छल. सम्राट अशोकक माँ ब्राहमण कन्या छलि, जे चम्पाक छलि. ओ संभवतः अइ ‘शोणदंड’ क वंशज छलि. आर.एल. मित्राक नेपालीज बुद्धिष्ट लिटरेचर, पृष्ठ 8 क ‘अशोकवदान’ क मोताबिक चम्पापुरीक एक ब्राहमण समुद्रांगी नामक अप्पन पुत्री राजा बिम्बिसारकेँ उपहारस्वरूप देने छल. पहिने बौद्ध भिक्षु लेल बिना पदत्राणक चलैक निअम छल. ओ ‘पनही’ धारण नै क’ सकैत छल. मुदा विनय पिटक 1/179 क अनुसार अप्पन चम्पा प्रवासमे बुद्ध अप्पन भिक्षुकेँ चप्पल आ खडामक प्रयोग करबाक आज्ञा देने छल. चम्पाक निवासी धन-धान्य सम्पन्न छल. एतुक्का कतेक श्रेष्ठि तँ करोड़पति छल. महाबग्गो (5/1) सँ जानकारी भेटैत अछि जे चम्पापुरीमे ‘शोणकोटिविन्श’ नामक एकटा श्रेष्ठि रहैत छल. हुनका लग बीस करोड़ स्वर्ण मुद्रा छल. संगे अइ श्रेष्ठिक निजी कोषागारमे अस्सी बैलगाड़ी हिरण्यमुद्रा छल आ हुनकर द्वारपर उनचास मत्त हाथी छल. एत’ जैन धर्मावलम्बी ‘कामपाल’ नामक श्रेष्ठि छल जे अठारह करोड़ स्वर्णमुद्रा आ दस करोड़ गायक स्वामी छल. कुमार नंदी नामक एकटा बड धनी स्वर्णकार चम्पापुरीमे महावीर स्वामीक गोशीर्ष चन्दनक प्रतिमा बनबाक’ ओकरा स्वर्णाभूषण सँ अलंकृत क’ स्थापित केने छल. जैन चम्पक श्रेष्ठि कथाक अनुसार चम्पा बड समृद्धशाली छल. एत’ गन्धी, मसाला आ मिश्रीक विक्रेता, जौहरी, चमार, मालाकार, कमार, सोनार आ बुनकरक संख्या बड छल. चम्पापुरी कल्प पृष्ठ 66 क मोताबिक धन, ऐश्वर्य, आंतरिक आनंद आ सुख सभसँ परिपूर्ण चम्पा नगर यथार्थतः धरतीक स्वर्ग छल. प्राचीन जैनागम औपपातिक सूत्रक मोताबिक महावीरक शिष्य सुधर्मणक कालमे ‘पुण्यभद्द’ नामक एकटा देवालय (चैत्य) चम्पाक गंगा कातपर छल, ओ बड महिमामंडित छल. जैनक बारहम तीर्थंकर ‘वासुपूज्य’ क जन्मभूमि चम्पा छल. एत’ ओ प्रव्रज्या, कैवल्य, ज्ञान आ निर्वाण प्राप्त केने छल. ‘विविध कल्प तीर्थ’ क ‘चम्पापुरी कल्प’ क मोताबिक वासुपूज्यक पुत्रक नाम ‘मधव’ छल, जे ओइ काल चम्पाक अधिपति छल. ओइ ग्रंथक मोताबिक तीर्थंकर वासुपूज्य अश्विनी नक्षत्रसँ युक्त फाल्गुन कृष्ण पंचमीक दिन अपराह्न कालमे छह सौ मुनिक संग परिनिर्वाण प्राप्त केने छल. गुणभ्रद्राचार्य क ‘उत्तर पुराण’ सँ ज्ञात होइत अछि जे हुनकर परिनिर्वाण ‘मंदार’ पर्वत पर भेल छल. मगधक राजकुमार चम्पाक उपराजा होइत छल. बिम्बिसार सेहो अप्पन पिताक जीवन कालमे चम्पाक उपराजा छल. बिम्बिसारक मरलाक बाद हुनकर पुत्र अजातशत्रु किछु दिनक लेल राजगृहकेँ छोड़ि चम्पा आबि गेल छल. महाभारतसँ ल’ क’ बुद्धकाल धरि चम्पा चम्पक बागसँ भरल छल. मझिझम निकाय (1/128) क मोताबिक बुद्धक काल चम्पामे कतेक रास महाशाला या स्नातक संस्था छल, जे मगधराज प्रसेनजित आ बिम्बिसारक देल अनुदान आ भूमिदानक माध्यमसँ संचालित छल. महागोविंद सुतांतक मोताबिक महागोविंद अइ तरहक सात स्कूलक स्थापना अपना कार्यकालमे केने छल, जाइमे चम्पा सेहो छल. ओ सभ धर्मशास्त्रीय स्कूल छल, जाइमे केवल ब्राहमण तरुण (माणवका) केँ प्रवेश भेटै छल. अइ स्कूलमे तीन सौ छात्र विद्याध्ययन करैत छल. कुलपतिक बड प्रसिद्धिक कारण कतेक रास ठामसँ छात्र एत’ पढ़ै लेल आबैत छल. ‘चंपेय जातक’ क मोताबिक अंग आ मगध दुनू पड़ोसी राज्यमे युद्धक वर्णन अछि. एक बेर हारलाक बाद अंगक सैनिककेँ पाछाँ करला पर मगध नरेश अंग आ मगधक बीचमे बहएवाली गंगामे कूदि क’ जान बचौने छल. बादमे ओ अंग नरेशक घनिष्ठ मित्र भ’ गेल. ओ सभ बरख चम्पा धारक कातपर एकटा समारोह करैत छल आ अर्घ्य दैत छल. संयुक्त निकाय (1/195-96) क मोताबिक चम्पाक बौद्धभिक्षुक आचरण विनयक निअमक प्रतिकूल भ’ गेल छल. अप्पन चम्पा प्रवासमे बुद्ध बंगीस नामक एकटा बौद्ध भिक्षुक अप्पन प्रशंसामे एकटा गाथा कहैत सुनने छल. बुद्धकेँ बोधि प्राप्त करबाक एक दशकक भीतर चम्पाक संग महत्वपूर्ण नगरमे बौद्धक प्रमुख वास स्थापित भ’ चुकल छल. ओइमे सँ सभ ठाम पर बुद्ध केँ कोनो ने कोनो प्रसिद्द शिष्यक नेतृत्व आ पथ-प्रदर्शनमे भिक्षुकक एकटा संप्रदाय विकसित भेल. जैन लेखक ‘जिनप्रभसुरि’ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ मे कत्तौ-कत्तौ चम्पाक नाम ‘लोमपाद्पू’ आ ‘कर्णपू’ सेहो लिखने छल. अइ ग्रंथक पृष्ठ संख्या 65 आ 69 क मोताबिक जैन ऋषि ‘प्रभव’ आ ‘स्वयंभव’ अप्पन चम्पा प्रवासमे केने छल. एकटा किंवदंतीक मोताबिक चम्पामे सुभद्रा नामक एकटा सती छलि जे चालैन सँ इनारसँ पानि भरै छली. चम्पामे पाथरसँ बनल चारिटा गोपुर द्वार छल, जे बड दिन सँ बन्न पड़ल छल. ई स्त्री चालैन सँ पानि भरि तीन द्वारकेँ भिजा क’ खोलि दै मे सफल भेल रहथि. कहल जाइत अछि जे चौदहम शताब्दी धरि ई द्वार बन्न छल. एकरा लखनौतीक सुलतान शमसुद्दीन विक्रम संवत 1360 मे उखाड़ि क’ शंकरपुर किलामे लगौने अछि. जिनप्रभसूरी अइ वृतांत केँ अप्पन ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ क पृष्ठ संख्या 65 मे लिखने अछि. अइ ग्रन्थमे दानवीर कर्णक कतेक रास ठाम केँ सेहो चिन्हित कएल गेल अछि. पांचम सदी मे चीनी यात्री फाहियान गंगाक कात-कात पाटलीपुत्र सँ अठारह योजन पैदल चलि चम्पा नगरी आएल छल. सातम शताब्दीमे ह्वेनसांग एत’ आएल छल. हुनकर मोताबिक चम्पा राज्यक परिधि 4000 ली सँ बेसी छल. एक ली छह मीलक बराबर होइत अछि. अइ नगरीमे दू सए सँ बेसी हीनयान बौद्ध भिक्षु रहैत छल. ओ किछु नष्टप्राय बौद्ध विहार सेहो देखने छल. ओइ काल चम्पामे सनातन हिन्दूक कतेक देव मंदिर छल. एतुक्का खेत समतल छल. जमीन उर्वरा छल. एतुक्का लोक सोझ-साझ होइत छल. ओ चम्पा केँ ‘चेन पो’ कहने अछि. ह्वेनसांगक कालमे चम्पा राज्यक परिधि सिमटि क’ सत्तर मील बचि गेल छल जइमे केवल नगरक परिधि सात मील विस्तृत छल. चम्पापुरीक देवार पजेबाक बनल छल. ई कत्तौ-कत्तौ तँ कतेक रास फीट ऊँच छल. केनिंघम ह्वेनसांगक वृतांतक आधार पर अंगक राजनैतिक सीमा लखीतराय (लखीसराय) सँ राजमहल धरि आ पारसनाथ पहाड़ी सँ भागीरथीक कात कलना धरि रेखांकित केने अछि. चम्पापुरी अप्पन राज्यमे कतेक रास राजनैतिक उतार-चढाव देखने छल. बौद्ध युग मे वत्स देशक शासक शतानिक परन्तप चम्पाक राजा दधिवाहनपर आक्रमण केने छल, मुदा अइ युद्धक परिणामक जानकरी नै अछि. एतेक तय अछि जे एकर बाद अंग शक्तिशाली होइत गेल. ओ मगध शासक भट्टिय केँ युद्धमे हरेने छल. मुदा अइ भट्टियक पुत्र बिम्बिसार (603 -551) अप्पन पिताक हारिक बदला अंगपर विजय प्राप्त क’ चुका देलक. अइ युद्धमे अंग नरेश ब्रहमदत्तक वध क’ देल गेल आ अंगपर मगधक शासन भ’ गेल. बिम्बिसारक मरलाक बाद अजातशत्रु (551-519 ई.पू.) चम्पा केँ अप्पन राजधानी बनेने छल. मुदा हुनकर पुत्र उदयन (519-503 ई.पू.) चम्पासँ अप्पन राजधानी पाटलीपुत्र ल’ आनलक. परतंत्र भेलाक बाद चम्पाक लोकमे आस्ते-आस्ते नैतिकताक ह्रास हुअए लागल आ अप्पन ख़राब चरित्रक कारण लोक उद्दंड हुअए लागल. दशकुमार चरितम अध्याय 1, पृष्ठ 3-6 आ अध्याय 2, पृष्ठ 7,11 आ 12 मे सेहो उल्लेख अछि जे चम्पा मे दुष्टक बाहुल्य छल. अंग शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग आ गुप्त युग सेहो देखलक. संगे कुषाणक आधिपत्य आ राजभरक सेहो शासन देखलक. गुप्त सम्राट माधव गुप्तक पुत्र आदित्य सेनक मंदर पर्वतपर भेटल शिलालेखक अनुसार अइ क्षेत्रक शासकक कीर्तिक बड रास साक्ष्य आगू आबैत अछि. आदित्य सेन आ हुनकर धर्मपत्नी कोणदेवी मंदार पर्वतपर विष्णुक नरसिंह मूर्तिक स्थापना केने छल आ ओत’ पापहरणी नामक पुष्करणी केँ खोदबेने छल. कहल जाइत अछि जे यएह शासक अश्वमेघ आ कतेक रास यज्ञ सेहो केने छल. अइ तरहेँ कर्ण सुवर्णक शासक शशांक आ ओकर बाद हर्षवर्धनक अधीन अंग आबि गेल छल. चीनी यात्री ह्वेनसांग अइ सम्राटक कालमे भारत आएल छल. हुनकर आगमन काल चम्पापर खातौरीक शासन छल. ई शक्तिशाली छल (दृष्टव्य भागलपुर गजेटियर 1962, पृष्ठ 41). पालवंशक अभ्युदय आ चम्पापर पालवंशक अधिकारक बाद एकर विकास भेल. विश्वचर्चित विक्रमशिला विश्वविद्यालयक स्थापना (वर्तमान अन्तीयक) भेल. तकर बाद सँ वंशक शासनमे चम्पा आएल. ई शासन लक्ष्मणसेन धरि शक्तिशाली रहल. मुदा अंतिम समय हुनकर शासन अवसाद सँ भरल रहल. मुसलमानक भीषण आक्रमण हुअए लागल. बख्तियार खिलजी बंगालपर विजय प्राप्त केने छल. ओ बिहारपर सेहो कब्ज़ा करै लेल बड रास संख्यामे सैनिकक संग चढ़ाइ केलक. एतुक्का सभटा विश्वविद्यालय केँ ओ दुर्दांत आगिमे झोंकि देलक. मास भरि आगि जरैत रहल जाइमे भारतीय ज्यां-विज्ञान, धर्म, साहित्य-संस्कृति जरैत रहल. अइ तरहे चम्पा मुसलमान आ फिरंगीक कालमे अप्पन सभ्यता-सांस्कृतिक चम्पक वन केँ नष्ट होइत देखने अछि. चम्पा राज्यक नदीमे चाननक विशिष्ठ ठाम अछि. एकर मूल स्रोत मुंगेर प्रमंडलक पठारी भाग अछि. अइ मूलक स्रोत लग दखिन पठार पर ‘बारो’ गाम आ वर्तमान बांका जिलाक कटोरिया थानाक ‘बाक’ गाम किउल-आसनसोल रेलमार्गक आरपार बसल अछि. अइ दुनू गाम सिमुलतल्ला आ ‘गढ़जोरा’ रेलवे स्टेशनक एक्के सामान दूरी अछि. एतएसँ चाननक मुख्यधारा बहैत मुंगेर प्रमंडलक ‘करपा’ आ ‘बारो’ गाम होइत भागलपुर जिलामे आबैत अछि आ ‘बांक’ गाम सँ होइत पूब दिश बढैत अछि. अइ पूब प्रवाहमे देवघरक उत्तर भागक किछु छोट पर्वतीय स्त्रोत चाननमे खसि ओकर जलभंडार केँ बढ़ाबैत अछि. ई ज्ञातव्य अछि जे दक्खिन पहाडीक बेसी जलभंडार चानन ग्रहण करैत अछि. भागलपुर गजेटियर 1962 (पृष्ठ 11)क मोताबिक, चाननक उद्गम देवघरक पहाडी सँ भेल अछि, ई सत्य नै अछि. अइमे कतेक रास छोट-छोट पर्वतीय जलधार आबि क’ सेहो मिलैत अछि. ई लगभग पांच सौ वर्गमीलमे पसरल अछि आ ऐ धारमे भरि बरख पानिक पर्याप्त मात्रा रहैत अछि. ई संथाल परगनाक पर्वतीय भाग सँ पर्याप्त पानि ग्रहण करैत अछि, मुदा चम्पा राज्यक दक्खिन वर्तमान बांका जिलाक समतल भूमिमे बहिक’ ई बड पैघ भूभाग केँ अप्पन विपुल जलराशि सँ पटबैत अछि. अप्पन गंगा संगम स्थल सँ लगभग 50 किलोमीटर दक्खिन एकर एकटा शाखा पूब दिस बढैत अछि आ दक्खिन दिस मुड़ि क’ घोघा लग ई गंगामे मिल जाइत अछि. चानन (चन्दन) क ऊपर बला जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ आ वन सँ आच्छादित अछि. ई धार तीन सौ वर्गमील जंगल पहाड़पर विचरैत आ अलग-अलग जलस्रोत केँ अप्पन उदरमे लैत लगभग दू सौ वर्गमील मे कतेक रास स्रोत, नहर आ उपनहरसँ समतल भूमि केँ पटबैत गंगासँ संगम करैत अछि. चाननक धार लगभग 15 अलग-अलग स्रोतमे बहैत अछि, मुदा ओकर तीन टा स्रोत गंगासँ संगम करैत अछि. जगदीशपुर लग चानन छिन्न-भिन्न भ’ जाइत अछि. एकर दू टा पातर धार ‘नाढा’ आ ‘अन्हरी’ क नाम सँ पश्चिम उत्तर कोण दिस बढैत अछि. ई ‘बडुआ’ क बरसाती पानिकेँ समेटैत ‘जमुनिया’ क नामसँ गंगामे प्रवेश करैत अछि. प्राचीन अंगक अइ कटी प्रदेशक सुरक्षा लेल प्रकृति गंगाक दक्खिन कात धरि मुंगेरसँ ल’ क’ कहलगांव, लगभग एक सौ किलोमीटर धरि तीन किमी सँ बेसी चाकर, चून-पाथरक बड पैघ पट्टीक निर्माण क’ देने अछि. अइ अजेय पट्टीपर प्राचीन अंगक राजधानी चम्पापुरी हजार बरख पहिने सँ बसल अछि. अइ चून-पाथरक पट्टीक कारण गंगाक कटाव सँ ई नगर मुक्त अछि. अइ तरहेँ प्राकृतिक जलस्रोतसँ चम्पा परिपूर्ण अछि. एकर माथपर अक्षय जलराशि ल’ क’ स्वयं गंगा अछि आ गंगाक ओ भाग जाइमे कौशिकी सन सदानीरा धार अप्पन दर्जन भरि छाड़न धारक संग गंगासँ संगम करैत अछि आ पार्श्वमे मालिनी अछि जे महाकवि कालिदासक अगाध प्रेमक धार अछि. महाकवि कालिदास शाकुंतलमक तेसर अंकमे ऐ धारक उल्लेख केने छल, जकर पुलिनपर अप्पन सखी संग शकुंतला विहार करै लेल गेल छल. बिहारक नदी: ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक सर्वेक्षण पृष्ठ संख्या 91 क मोताबिक गंगा प्रवाह भागलपुर नग्र पहुँचैसँ पहिने चम्पा नगरक पश्चिम कात दिस जमुनिया धार गंगासँ संगम करैत अछि. ई कोनो कालमे बडुआक संगम छल. बादमे बडुआ आ जमुनिया मिल क’ एत’ संगम करए लागल. बडुआक पुरना नाम बहुला छल, जकर चर्चा महाभारत (भीष्म पर्व अध्याय 9 श्लोक 27) मे भेटैत अछि. भागलपुर जिलामे चाँद सौदागार आ हुनकर पुत्रवधू सती बिहुलाक पूजा होइत अछि आ हुनकर गाथा गाएल जाइत अछि. भ’ सकैत अछि जे वर्षा ऋतुमे मनाओल जाएबला बिहुला पर्व अइ बिहुला नदीक गाथा अछि. जे किछु हुअए, ई पर्व शिवपूजा, नागपूजा आ एकटा सतीक उच्चादर्शक गाथा अछि. ई बडुआ धार जमुई जिलाक चकाई सिमुलतल्ला मार्गक कात ‘कर्णगढ़’ आ ‘चरघरा’ गामक कातसँ बहैत अछि आ कतेक रास पहाडी स्रोतकेँ ल’ क’ ओ चम्पा राज्यक दक्खिन-पश्चिम भागमे हनुमनापर्वतक लग ‘सुइयाथान’ गाम लग समतल भूमिपर उतरैत अछि. (ई ज्ञातव्य अछि जे ई सभटा पर्वत ऋष्यशृंग पर्वतक पसरल श्रृंखला अछि). अइ ठाम धारमे पक्का बान्ह बना क’ एकटा भारी जलभंडारक निर्माण कएल गेल अछि, जतएसँ मुंगेर आ भागलपुर जिलाक बड पैघ भागमे पटाबै लेल नहर निकालल गेल अछि. निर्जन पहाडीक बीच एकटा पैघ झील बनि गेलासँ अइ बान्हक दृश्य बड नीक देखाइए. ई सुरम्य ठामसँ चलि क’ ‘बडुआ’ धार उत्तर दिस बढैत अछि आ साहेबगंज, मोहनपुर, सिलौटा आदि गाम लगसँ होइत तारापुरसँ पूब आबि जाइत अछि. एतए ई कतेक रास धारमे बँटि जाइत अछि आ ओ धार करहरिया, दीनदयालपुर, रतनपुर, दौलतपुर, बाथू सन ठामसँ होइत अन्हार, कटहरा, ऊँचा गाँवक तालमे हरा जाइत अछि. जहियासँ बडुआ धारपर हनुमना बान्ह बनाओल गेल अछि आ नहर निकालल गेल अछि, तहियासँ अइ धारक निचला भागमे पानिनक प्रवाह कम भ’ गेल अछि आ पानिक मात्रा कम आबैत अछि. ई बडुआ कोनो कालमे चम्पा नगरसँ सटि क’ पश्चिमसँ बहि क’ गंगामे प्रवेश करैत छल, जतए आब जमुनिया धार बहैत अछि. जमुनिया धार चानन धारक एकटा उपधारा अछि जे राजपुर आ खंजरपुरमे चाननक मुख्यधारासँ फराक होइत अछि. ई धारा मोहद्दीपुर, कनकैथी, बहादुरपुर आदि गामक लगसँ होइत नाथनगरसँ सटल पश्चिममे आबैत अछि आ उत्तर दिस मुड़िक’ गंगामे प्रवेश करैत अछि. जमुनियाक उपरी हिस्साक नाम ‘अन्हरी’ अछि. चम्पानगरक एकटा भाग नाथनगर अछि. कहल जाइत अछि जे प्राचीनकालमे ‘नाथमल’ नामक एकटा मैथिल ब्राहमण संत एतए रहैत छल आ कालांतरमे हुनकर नामसँ अइ गामक नाम ‘नाथनगर’ पड़ि गेल (देखू भागलपुर गजेटियर पृष्ठ 623). आब ई नगर बनि चुकल अछि आ ई 2.51 मीलमे पसरल अछि. चम्पानगरमे जैन धर्मक दिगंबर संप्रदायक एकटा मंदिर आ धर्मशाला अछि. अइ मंदिरमे पाँचटा वेदी अछि, जाइमे चारिटा तँ चारि कोनपर अछि आ एकटा वेदी मध्यमे अछि. अइपर जैन प्रतिमा चाँछल गेल अछि आ ओइपर तीर्थंकर वासुपूज्यक चरण चिह्न अंकित अछि. चरण चिन्हक आगू किछु पंक्ति अंकित अछि, जइसँ ज्ञात होइत अछि जे अइ ठाम वासुपूज्य जन्म ल’ क’ ध्यान आ ज्ञान प्राप्त केने छल. चम्पाक अइ पैघ जैन मंदिरमे वासुपूज्यक श्वेत प्रस्तर प्रतिमा अछि, जकर प्रतिष्ठा संवत 1932 क माघ शुक्ल दशमी तिथि केँ भेल अछि. एकर अलाबे, वासुपूज्यक दोसर प्रस्तर प्रतिमा, पार्श्वनाथ स्वामीक दूटा प्रस्तर प्रतिमा आ स्वामी ऋषभदेवक एकटा प्रतिमा सेहो स्थापित अछि. वेदीक मध्य धर्मचक्रक चिन्ह सेहो अंकित अछि, जकर दुनू कात दूटा हाथीक प्रतिमा उत्कीर्ण अछि। मध्य वेदीक ऊपर चांदीक सिंहासनपर साढ़े चारि फीट ऊँच पीतवर्णक पाषाणक प्रतिमा सेहो दर्शनीय अछि. अइ मंदिरक आगू एकटा 35 फीट ऊँच आ दोसर 55 फीट ऊँच दूटा पाषाण खुट्टा सेहो ठाढ़ अछि, जकर बगेबानी मुगलकालीन अछि. अइ पैघ जैन मंदिरसँ लगभग एक किमी दूर चम्पा नहर लग श्वेताम्बर सम्प्रदायक एकटा जैन मंदिर आ धर्मशाला अछि. अइ मंदिरमे आदिनाथ आदि कतेक रास जैन मुनिक प्रतिमा स्थापित अछि. अइ मंदिरक बड रास प्रतिष्ठित प्रतिमा एहन अछि जे पार्श्वमे बहएबला चम्पा नहर सँ भेटल अछि. ई विधर्मी सबहक कएल गेल धर्मस्थल आ शिक्षालयक विध्वंसक जीवंत साक्ष अछि. दिगंबर जैन सबहक पैघ मंदिरसँ श्वेताम्बर जैनक ई मंदिर बेसी पुरना अछि. अइ आलेखमे जे ‘पुण्यभद्द’ नामक देवालय आ चैत्यक उल्लेख अछि, ओ संभवतः ई जैन मंदिर भ’ सकैत अछि, किएकि औपपातिक सूत्रक मोताबिक, ‘पुण्यभद्द’ चैत्य गंगा कात स्थित छल. वर्तमान चम्पा नाला (चम्पा नहर) सेहो ऐतिहासिक घटनाक साक्ष्य रहल अछि. स्थानीय लोक आपसमे अंगिका भाषामे बजैत अछि, ‘चम्पा नाला छोटो-मोटो नहरो नै छै. एकरो कोनो आदमी नय बनैलो छय. ई रोमपाद के जमाय ऋष्यशृंग के दूतभूत के बनैलो छय. बहुत बड़ो अकाल पडलो छलय, तभिये ई नहरों के रूप में बनलो छय जथि में बहुते नदी के पानी मिलै छै.’ ऋष्यशृंग विश्वक पहिल वैज्ञानिक छल जे कतेक रास धार केँ परस्पर जोड़ि क’ ओइ क्षेत्र विशेष केँ बाढ़िसँ मुक्त आ अकालमुक्त क’ देने छल. लगभग बीस बरख पहिने नाथनगर स्थित अप्पन आवासपर वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी पुण्यश्लोक रास बिहारी लाल अइ लेखककेँ बतौने छल जे चम्पा नाला सामान्य नाला नहर नै अछि, मुदा चम्पा राज्यमे अकाल पड़लापर राजा रोमपाद नहरक रूपमे एकरा बनबौने छल जाइमे चम्पा, बडुआ आ जमुनियाक अक्षय जलस्रोत प्रवाहित होइ छल. ओ अप्पन ठेठ अंगिका भाषामे एकर संबंध मे कतेक रास कथा आ मिथकक सेहो उल्लेख केने छल. जातक IV पृष्ठ 454 क मोताबिक, चम्पा धार पूबमे अंग आ पश्चिममे मगधक सीमा अछि. डा. विमल चरण लाहाक मोताबिक, ई वएह धार अछि जे चम्पानगर नाथनगरक पश्चिम मे अछि, जेकरा पहिने मालिनी कहल जाइ छल (दृष्टव्य : प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल, पृष्ठ 360). पुर्णा अंगक सभटा धार एक-दोसर सँ कोनो नै कोनो तरहे जुड़ल अछि. एहन ठामपर बाढ़ि एबाक संभावना नै रहैत अछि. सम्प्रति चम्पा तसर उद्योग मे आगू अछि. ई छल ऋषिराज ऋष्यशृंगक ससुर मालिनी (चम्पा)क संक्षिप्त एतिहासिक आ सांस्कृतिक वृतान्त. परिशिष्ट ‘ग’ शंकराचार्य आ सिंहेश्वर (जगत प्रसिद्ध शंकर-मंडन मिश्र शास्त्रार्थ सिंहेश्वर मे नै) सिंहेश्वर मंदिर न्यास किछु बरख पहिने एकटा हस्तपत्रक छपने छल जइमे ई उल्लेख छल जे आदि शंकराचार्य आ मंडन मिश्रक शास्त्रार्थ सिंहेश्वर स्थानमे भेल छल. ई हस्तपत्रक जतेक विवादस्पद अछि, अइ विषयक अध्ययन ओतेक रोचक. पुण्यश्लोक मंडन मिश्र आ शंकराचार्य अप्पन कोनो ग्रंथमे आपसमे भेंट करैक, शास्त्रार्थ करैक बा परस्पर जीतब-हारबक संबंधमे एकोटा शब्द नै लिखने अछि. शंकराचार्यक विजय विषयक कतेक रास ग्रंथ अछि, जे हुनकर जीवनकालमे नै, मुदा लगभग छह सौ बरख बाद हुनकर धर्म-ध्वजधारी शिष्य लिखलक, हुनका महिमामंडित करैमे अप्पन विशेष योगदान द’ क’ गुरु-ऋण सँ मुक्त हेबाक उपक्रम केलक. अइ ग्रंथमे माधवाचार्य रचित ‘शंकर दिग्विजय’, सभसँ बेसी प्रसिद्द अछि. अइ ग्रंथक प्रामाणिकतापर तखने प्रश्नचिन्ह लागि जाइत अछि जखन अइमे शंकराचार्यक संग महाकवि बाणभट्ट, मयूर, दंडी, अभिनवगुप्त, श्रीहर्ष आदि केर शास्त्रार्थ वर्णित अछि, जे शंकरसँ पूर्ववर्ती बा परवर्ती छला. आठम शताब्दीक शंकराचार्य ग्यारहम शताब्दीमे जन्म लेल उदयनाचार्य आ श्रीहर्षकेँ शास्त्रार्थमे केना हरा सकैत अछि, ई अइ ग्रंथक लेखकक छल-छदम आ अनर्गल प्रतापक अलावा की भ’ सकैत अछि. शंकराचार्यसँ संबंधित दोसर विजय ग्रंथमे आनंदगिरी कृत ‘शंकर विजय’, राजचूड़ामणि कृत ‘शंकराभ्युदय’, चिलविलासेन्द्र कृत ‘शंकरविजय’, सदानंद कृत ‘शंकर जय’, कांचीपीठक अध्यक्ष रहल सर्वज्ञ सदाशिव बोध कृत ‘पुण्यश्लोक मंजरी’, महादेवेंद्र सरस्वतीक शिष्य आत्मबोध रचित ‘पुण्यश्लोक मंजरी परिशिष्ट’, कांची मठाधीश परम शिवेंद्र सरस्वतीक शिष्य सदाशिव ब्रह्मेन्द्र कृत ‘गुरुरत्नमाला’ आ काशीलक्ष्मण शास्त्रीकृत ‘गुरुवंश काव्य’ बेसी चर्चित अछि. एकर अलाबे, स्कंद्पुराणक नवमांश, मार्कंडेय संहिता, शिव रहस्य पुराण, श्री विर्धानव आ शक्ति-संगम तंत्रमे श्री शंकर चरित उपलब्ध अछि. ई सभटा वर्णन इतिहासकार आ शोधार्थी, अध्येता सबहक दृष्टिसँ अप्रमाणिक अछि. ऐ सभ रचनामे शंकरक चरित्रकेँ चमत्कारी बा लोकोत्तर बना केँ प्रस्तुत कएल गेल, जइसँ जनसाधारणमे हुनका प्रति श्रद्धा आ भक्ति बढ़ए. मंडन मिश्र आ शंकराचार्य दुनू समकालीन छल. दुनूकेँ एक-दोसराक सिद्धांतक सभटा जानकारी छल. दुनू अद्वैत वेदान्तक पृष्ठक पोषक छल. मुदा शंकरक अद्वैत वेदान्त संन्यासीक अछि जखन कि मंडन मिश्रक अद्वैत गृहस्थ आ कर्मयोगीक रहल अछि. ऐ तरहेँ दुनू एक-दोसरासँ असहमत अछि. ई दुनू विद्वान अपन-अपन ग्रंथ मे एक-दोसराक मतक खंडन केने अछि. विद्वान विचारक एलेन राइट थ्रेशर सेहो अइ बिन्दुपर विस्तारसँ विचार केने अछि. ओ अप्पन शोध ग्रंथ ‘द अद्वैत वेदांत ऑफ़ ब्रह्मसिद्धि’ मे मंडन मिश्र रचल ‘ब्रह्मसिद्धि’ आ शंकराचार्यक रचल ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ क पंक्ति सेहो उद्धृत केले अछि, जइसँ ई तथ्य सत्यापित होइत अछि. अइ दुनू विद्वानक विचारक तुलनात्मक विवेचनक लेल पंडित सहदेव झा विरचित ‘मंडन मिश्र आ हुनकर अद्वैत वेदांत’ आ आचार्य धीरज रचित ‘विज्ञानमक्षरम’ (भूमिका हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’) अवलोकनीय अछि. अलग-अलग साक्ष्यक आधार पर मंडन मिश्रक जे काल निर्धारण कएल गेल अछि, ओ निम्नांकित अछि- पी.वी. काणे (धर्मशास्त्र का इतिहास) (690-710ई.) कुप्पूस्वामी शास्त्री (ब्रह्मसिद्धि भूमिका) (615-690ई.) एल. स्मिथसेन (विभ्रम विवेक टिप्पणी) (700 ई.) बी.ए.रामास्वामी शास्त्री आ के.ए. शिवरामकृष्णन (भावना विवेक टिप्पणी) (650 ई. क बाद) टी. बेट्टर (ब्रहमसिद्धि भूमिका)(700 ई.) टी.आर. चिन्तामणि (स्वतंत्र लेख मे) (650-70 ई.) पी. हेक्कर (विवर्त) (सातम शताब्दी) एस. एन. दास गुप्ता (भारतीय दर्शन का इतिहास) (800 ई.) के. कुन्जुनिराजा (मंडन एंड धर्मकीर्ति) (8-9वम सदी) मंडन मिश्रक जन्मभूमिक विषयमे माधवाचार्य अप्पन ‘शंकर दिग्विजय’ पोथी मे ‘महिष्मति’ आनाद्गिरी अप्पन पोथी ‘शंकर विजय’ मे ‘विजल विन्दु’ (संभवतः उत्तर प्रदेशक बिजनौर), चिद विलास यति अप्पन पोथी ‘शंकर विजय विलास’ मे कश्मीर आ काशी लक्ष्मण शास्त्री अप्पन पोथी मे ‘गुरुवंश काव्य’मे मगध मानल अछि. अइ संबंधमे हमर मान्यता अछि जे माधवाचार्यक ‘शंकर दिग्विजय’ भ्रामक आ अप्रमाणिक पोथी अछि. ‘विजल विन्दु’ लेल बिजनौर जिलाक कोनो गाम अप्पन दावेदारी प्रस्तुत नै केने अछि. यएह स्थिति कश्मीरक अछि. ओतए कोनो गाम आ नगर मंडन मिश्रक जन्मभूमि होइक दावा नै करैत अछि. माधवाचार्यकक आधारपर गोवर्धन पीठक शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ मंडन मिश्र केँ नर्मदा कातक वासी (उज्जैन, मध्य प्रदेश) बतौने अछि आ ओतुक्का मंडला नगरकेँ महिष्मती सिद्ध केने छल. मध्य प्रदेशक नर्मदा कात बसल ‘महेश्वर’ नामक उपनगर छल, ओकरा मान्धाता, मंडला या मंडलेश्वरक नामसँ उद्धृत कएल गेल अछि. ‘महेश्वर’ ‘महिष्मती’ अछि. ई तर्कसँ असंगत लागैत अछि. मत्स्य पुराणमे ‘महेश्वरपुर’ क उल्लेख एकटा तीर्थक रूपमे अछि. ओतए ‘स्वाहा’ नामक देवी सती स्थापित छल. अखैन ओतए जे देवी अछि, ओ ‘मंगला गौरी’ क नामसँ पूजित अछि. ब्रहमांड पुराणक मोताबिक ‘स्वाहा’ प्रसूतिक गर्भसँ उत्पन्न दक्षक पुत्री अछि, जिनकर पति अग्नि अछि. ((मंडन मिश्र और उनका अद्वैत वेदांत, पृष्ठ 16) महेश्वरक अप्पन अलग गरिमा अछि, ओकर पहिचान महिष्मतिक रूपमे क’ वितंडा ठाढ़ करैक अलावा की भ’ सकैत अछि? भाषा वैज्ञानिक सभ एकर परीक्षण करए जे महिष्मतिक ध्वनि साम्य महिषीसँ बेसी वैज्ञानिक बैसैत अछि जतए ‘म’, ‘ह’, ‘ष’ आ ‘ई’ क वर्ण आ मात्रा विद्यमान अछि, आ फेर माहेश्वर, मान्धाता, मंडला आ मंडलेश्वर सँ वाचस्पति मिश्र सेहो अप्पन पोथीमे महिष्मतिक उल्लेख पाटलीपुत्रक संग केने अछि (मंडन मिश्र और उनका अद्वैत वेदांत, पृष्ठ 22, विज्ञानक्षरम, पृष्ठ 51) पटनाक संग मिथिलाक महिषीक उल्लेख समीचीन अछि, स्वाभाविक अछि आ भूगोल सम्मत अछि. मिश्र उपाधि धारण करएबला महान दार्शनिक मिथिलामे भेल अछि, जइमे वाचस्पति मिश्र, सुचरित मिश्र, पक्षधर मिश्र, जीवनाथ मिश्र, भवनाथ मिश्र (अयाची मिश्र), शंकर मिश्रक संग जगत प्रसिद्द अद्वैत वेदांती मंडन मिश्र प्रसिद्द अछि. सभ कोणसँ परीक्षणक बाद लगैए जे मंडन मिश्र महिषी (कोशी प्रमंडल, बिहार) क रहएबला छल. मंडन मिश्र आ शंकराचार्यक बीच शास्त्रार्थ भेल छल बा नै, ओइ संबंधमे दुनूमे कियो अप्पन पोथीमे चर्चा नै केने अछि. हमर मत अछि जे पंडित वाचस्पति मिश्रक मंडन मिश्रक प्रति अकूत श्रद्धा देखैत शंकरक अनुयायी हुनकासँ तमसाएल रहए आ वाचस्पति मिश्रक प्रति असम्मानजनक विशेषण प्रयोग केने छल. ओकर बाद मंडन मिश्रक कद छोट करबा लेल माधवाचार्य आ दोसर लेखक शंकराचार्यक पक्षमे कतेक रास पोथी लिखने छल. ई लेखकक मात्र कल्पना कहल जा सकैत अछि. ई इतिहास सम्मत सेहो नै अछि. स्वामी अपूर्वानन्द अप्पन पोथी ‘आचार्य शंकर’ (प्रकाशक: रामकृष्ण मठ, नागपुर) मे भारती शंकराचार्य सँ शास्त्रार्थ करैत जे प्रश्न पुछने छल, ओकरा अइ तरहेँ लिखने अछि, कामक लक्षण की होइत अछि? काम कला कतेक तरहक होइत अछि? देहक कोन अंगमे काम रहैत अछि? कोन-कोन क्रियासँ ओकर अविर्भाव आ तिरोभव होइत अछि? शुक्ल पक्ष आ कृष्ण पक्षमे पुरुष आ नारीक शरीरमे कामक ह्रास-वृद्धि कोना होइत अछि आ नारी कोन तरहेँ पुरुषक ऊपर कामकलाक विस्तार करैत अछि? आब प्रश्न ई उठैत अछि जे कोनो संस्कार वाली विदुषी शास्त्रार्थमे कोनो बाल ब्रह्मचारीसँ कामशास्त्र संबंधित प्रश्न पूछत? शंकरमतक अनुयायी आ तलस्पर्शी विद्वान स्वामी सच्चिदानंद भारतीक कन्नड़ कृति ‘श्री शंकर भगवत्पाद वृतांत सार सर्वस्य’ केँ संदर्भित करैत श्री नारायण दत्त धर्मयुगक अप्रैल, 1996 मे प्रकाशित अप्पन लेख मे उपयुक्त विचार देने छल. स्वामी अपूर्वानंदक दृष्टिमे शंकर दिग्विजयमे वर्णित परकाया प्रवेशक मिथक शंकराचार्यक मूल व्यक्तित्वकेँ खंडित क’ दैत अछि. की हुनकर सन जितेन्द्रिय ब्रहमचारी महज शास्त्रार्थ जीतै लेल अप्पन अनमोल व्रत तोड़ि काम शास्त्रक व्यावहारिक ज्ञान सीखै लेल तैयार भ’ जाएत? स्वयं शंकर संप्रदायक अनुयायी ई स्वीकार करैत अछि जे अइ मिथक द्वारा हुनकर सभक परमगुरुक उज्जवल छविकेँ धूमिल कएल गेल अछि. स्वामी अपूर्वानन्द पोथी ‘आचार्य शंकर’ (पृष्ठ 95)मे आगू लिखैत अछि जे भारतीक संग शंकराचार्यक संग कोनो शास्त्रार्थ भेलैने नै. तइसँ शंकरक परकाया प्रवेशक कोनो प्रश्न नै उठैत अछि. माधवाचार्य ई लिख क’ शंकरकेँ अलौकिक शक्ति सम्पन्न प्रतिपादित केने अछि. मुदा अनजान वंशजक आचार्यक जितेन्द्रीय हेबापर प्रश्न चिन्ह लगाक’ ओकर महान चरित्रक संग खिलवाड़ क’ देने अछि. शंकराचार्यक सन्दर्भमे सिंहेश्वरपर विचार करैत काल ई कहल जा सकैत अछि जे वर्तमान कोशी अंचल रामायण काल मे ‘ऋष्यशृंग आश्रम’ आ महाभारत काल मे चम्पकारण्य (चम्पा राजक असंख्य भाग) छल. ई क्षेत्र बुद्धकाल मे ‘आपण निगम’ क नामसँ प्रसिद्द छल. गंगाक उत्तर विशाल क्षेत्रमे पसरल छल ‘आपण निगम’. हिंदी आ अंगिकाक प्रसिद्ध विद्वान डा. तेज नारायण कुशवाहा चिट्ठीसँ सूचित केने अछि जे कटिहार जिलाक सेमापुरकेँ ओ ‘आपण निगम’ क रूपमे चिन्हित केने छथिन. जखन कि श्री हवलदार त्रिपाठी सहृदय महिषी वनगाँवके ‘आपण निगम’ मानने छथिन. आपणक अर्थ बजार होइत अछि आ ‘निगम’ समितिक बोध करैत अछि. अर्थ विस्तारमे ई ‘कारपोरेशन’ क रूपमे लेल जा सकैत अछि. अइ तरहेँ ‘आपण निगम’ क क्षेत्र विस्तार ओइ कालमे सम्पूर्ण कोशी प्रमंडलमे छल, जइमे कतेक गाम समाहित छल. एकर मुख्यालय जन बहुल गाम एखौनका महिषी-बनगाँव छल. प्रशासनिक दृष्टिसँ ई व्यवस्था दीर्घकाल धरि चलल. भ’ सकैत अछि जे मंडन मिश्रक कालमे अइ क्षेत्रक यएह स्थिति रहल हएत. सिंहेश्वर शैव तीर्थ आ महिषी शक्तिपीठक रूपमे ख्याति प्राप्त छल आ दुनू एक्के निगमक अंतर्गत छल. जौं शास्त्रार्थ आ विचारक आदान-प्रदान करै लेल शंकराचार्य एखौनका महिषी (जिला सहरसा) आएल हेतिऐ तँ सिंहेश्वर सेहो आएल हएत. सभ कोनसँ परीक्षणक पश्चात ई पूर्णतः निर्विवाद अछि जे मंडन मिश्र, मैथिल ब्राहमण छल आ महिषी ग्रामक निवासी छल. ओ तहियोका भारतवर्षक सर्वाधिक प्रखर अद्वैतवादी वेदांती छल. एक ठामक तीर्थ हेबाक कारण महिषी आ सिंहेश्वरक संबंध अटूट रहल छल आ ओ आइयो अछि. सहायक आ सन्दर्भ पोथीक सूची ऋग्वेद, वैदिक संशोधन मंडल, पूना यजुर्वेद, संपादक श्रीपाद शर्मा, औंधनगर अथर्ववेद, संपादक श्रीपाद शर्मा, औंधनगर बाल्मीकीय रामायण, गीता प्रेस, गोरखपुर महाभारत, पारडी संस्करण (श्रीपाद दामोदर सातवलेकर) हरिवंश पूरण. चौखम्भा, वाराणसी श्रीमदभगवत पुराण, चौखम्भा, वाराणसी तैत्तिरीय अरण्यक, चौखम्भा, वाराणसी छान्दोग्योपनिषद, चौखम्भा, वाराणसी विष्णु पुराण, गीता प्रेस, गोरखपुर शतपथ ब्राहमण, अच्युत ग्रंथमाला, वाराणसी वायु पुराण, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई गौतम धर्मसूत्र, आनन्दाश्रम संस्कृत सीरिज बोधायन धर्मसूत्र, आनन्दाश्रम संस्कृत सीरिज श्वेताश्वर उपनिषद, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई मनुस्मृति, कुल्लकभट्ट टीका, बम्बई अमरकोश, भंडारकर रिसर्च इंस्टिट्यूट, पूना कुमारसंभव, चौखम्भा, वाराणसी मत्स्य पुराण,बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई दशकुमार चरितम, चौखम्भा, वाराणसी पदमपुराण, बैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई विविध तीर्थ कल्प, हिंदी जैन पीठ, शांति निकेतन दीघनिकाय, नालंदा पालि प्रतिष्ठान विनय पिटक, नालंदा पालि प्रतिष्ठान महाबग्ग आर्य भूषण प्रेस, शिवनग रपूना मझिझम निकाय, नालंदा पालि प्रतिष्ठान संयुक्त निकाय, महाबोधि, सारनाथ औपपातिक सूत्र, जैन विद्यापीठ, भारतीय विद्या भवन, बम्बई पुर्णियाँ गजेटियर भागलपुर गजेटियर नेपालीज बुद्धिस्ट लिटरेचर, कोलकाता शैव अवधारणा आ सिंहेश्वर, हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’, मधेपुरा बौद्ध धर्म आ बिहार, हवलदार त्रिपाठी सह्रदय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना बिहार की नदियाँ, वहि रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर प्राचीन भारत मे संग्रामिकता, पंडित रामदीन पाण्डेय, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना भागवत दर्शन, 35वां खंड, प्रभुदत्त ब्रहमचारी, झूंसी महाभारत कथा, चक्रवर्ती राजगोपालचारी, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली भागवत कथा, सूरजमल मेहता, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली रिश्य्श्रिंग स्मृति ग्रंथ, कुंवरलाल शर्मा, कोटा, जस्थान सिखवाल ब्राहमण परिशीलन, लेखक श्री बुद्धिप्रकाश देव उपाध्याय, ब्यावर, राजस्थान मिथिला लोक संस्कृति कोश, डा. लक्ष्मीप्रसाद श्रीवास्तव, दरभंगा रामायण कालीन संस्कृति, शांति कुमार नानुराम व्यास, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली लोपमुद्रा, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, नवयुग प्रकाशन, दिल्ली मिथिला तत्व विमर्श, म.म. परमेश्वर झा, तरौनी, दरभंगा प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, डा. जयशंकर मिश्र, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना प्राचीन भारत का एतिहासिक भूगोल, डा. विमल चरण लाहा, उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, लखनऊ ग्यारहवीं सदी का भारत, डा. जयशंकर मिश्र, वाराणसी प्राचीन भारत का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, ए.के. मित्तल, आगरा कल्याण, मासिक, गोरखपुर अखंड ज्योति, मासिक, मथुरा कादम्बनी, मासिक, नई दिल्ली सहरसा, गजेटियर, 1965 जर्नल ऑफ़ रायल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल विजडम ऑफ़ द एंसियेंट रिसीज, ब्रहमचारी कृष्णदत्त, वैदिक अनुसंधान समिति, नई दिल्ली सच्चिदानंद प्रकाश, भाग एक, स्वामी अद्वैतानन्द पुरीजी महाराज स्मारिका राज. प्रदेश सिखवाल ब्राहमण सभा, जयपुर, प्रधान संपादक एस.एम. त्रिपाठी, जयपुर हिमाचल प्रदेशक कुल्लू अंचल मे सभ वाहन पर ऋषिराजक जयकारा लिखल भेटैत अछि. ऋषिराज एतौका पहिलुक देवता अछि. तइसँ एतए श्री गणेशजी महाराजसँ पहिने हिनकर पूजा होइत अछि. ऋष्यश्रृंग पहाड़ी (बंजार हिल रेंज, हिमाचल) . सामनेबला पहाड़ीकेँ मारकण्डे पहाड़ी कहैत अछि, जतए देवी त्रिपुरबाला सुन्दरीजी प्रकट भेल छल आ एतए ओ दुर्गा सप्तसी आदि देवी-पोथीक रचना केले छथिन. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग श्री ऋषिराजक महानताकेँ मानैत अछि.. श्रृंगी ऋषि मार्ग जे जलोड़ी-पास मार्गसँ अलग भ’ क’ श्रृंगी ऋषि पहाड़ीक परिक्रमा मंदिरक पैदल मार्ग धरि जाइत अछि,. हिमाचल प्रदेशमे ऋषिराजक मंदिर धरि 30 मीटर पैदल चढ़यके संकेत चिन्ह. हिमाचल प्रदेशमे पूजित ऋष्यश्रृंगजी महाराजक दिव्य मूर्ति जेकरा स्थानीय लोक श्रृंगाऋषिक नामसँ पूजा करैत अछि. बागी (हिमाचल प्रदेश) क लगभग छह सौ पुरना ऋष्यश्रृंगक महाराजक मंदिरक दृश्य, जे सालमे आठ मास बर्फसँ झापल रहैत अछि. ई मंदिर समुद्रतल सँ छह हजार फीटक ऊँचाईपर अछि. हिमाचल प्रदेशक श्रृंगा ऋषि (ऋष्यश्रृंग) क सोनाक पालकी केँ ल’ जाइत भक्तगण. अइ प्रदेशक मान्यता अछि जे ई देवता सभसँ बेसी ठामक भ्रमण करैत अछि. ऋषिराजक महानदीक प्रकट स्थल सिहोवा पहाडीमे दक्खिन दिससँ उत्तर वाहिनी बहैत अछि धार. ऋषिराजक तपोभूमि महानदी उद्गम स्थल सिहोवा पहाड़ीपर तपस्यारत साधु-संन्यासी. ऋष्यश्रृंगक तपोभूमि ‘सिहोवा’ छतीसगढ़क पहाड़ी पर जाइ छथि श्रद्धालु. श्री सिंहेश्वर मंदिरक मुख्य प्रवेश द्वारक महत्त्व. श्री सिंहेश्वर मंदिरक मध्य प्रवेश द्वारक महत्त्व. श्री सिंहेश्वर महादेवजीक मंदिर. श्रृंगेश्वर (सिंहेश्वर) मंदिर स्थित शिव-गंगा (पुरातन नाम श्रीविभांडकक कुंड) क महत्त्व. श्री सिंहेश्वर मंदिर (बिहार) मे श्रद्धालु विभांडक कुंडसँ नहाक’ दंड प्रणाम करैत (लेट-लेटा क’) मंदिरमे प्रवेश करैत छथि. श्री सिंहेश्वर स्थापित मंदिरक प्रांगणमे ऋष्यश्रृंगक प्रतिमा. श्री सिंहेश्वर मेलामे कुटीर उद्योगक सामान बेचै छथि ग्रामीण स्त्रीगण. श्रृंगवेरपुरमे ऋष्यश्रृंग आ माता शान्ताक मुरुत छनि. रावेर, जिला जलगाँव, महाराष्ट्र लग ‘श्रृंगार ऋषि’ क मंदिर अछि. अनसिंग, जिला वासिम, महाराष्ट्र क ऋष्यश्रृंग मंदिरमे ऋष्यश्रृंग आ भगवान शिवक मुरुत अछि ओतऽ पुजारी छथि श्रीसदाशिव पाटिलजी. कारला, यवतमाल, महाराष्ट्रमे ऋष्यश्रृंगक समाधि मंदिर अछि. कारला, यवतमाल, महाराष्ट्र ऋष्यश्रृंग समाधि मंदिर जइ लेल भव्य सीढ़ी अछि. सिंगत, तहसील रावेर, जिला जलगाँव मे ऋष्यश्रृंग जी महाराजक समाधि मंदिर अछि जे नौ मास जलक भीतर रहैत अछि. ऋषिकुंड, मुंगेरमे तेसर गरम जलक कुंड अछि. भीमबांध, मुंगेर, जतऽ बिहारक झरनासँ बहि क’ आबैत गरम पानिक जलधारा अछि, जे भीमबाँधक नामसँ प्रसिद्द अछि. भीमबांध सँ आबएबला गरम जल धारक संग ठाढ़ पानिक दोसर धारक संगम होइछ. दृष्टव्य-अंगराज रोमपाद ऋष्यश्रृंगकेँ ई क्षेत्र कन्यादानमे देने छल आ ऋषिराज अइ गरम पानिक कुंड आ झरनाक निर्माण केलक. कालांतरमे द्वापर युगमे अइ विशाल जल प्रपातपर भीम बान्ह बनौने छल आ जाइ कारणसँ अइ गरम पानिक झरनाक नाम भीमबाँध पड़ि गेल जे खड़गपुर अनुमंडल, जिला मुंगेर, बिहारमे अछि. ऋषिकुंड मे गरम पानिक कुंड अछि, जे बरियारपुर, जिला मुंगेर, बिहारमे अछि. अइ तरहक तीन गरम पानिक कुण्ड अइ ठाम अछि. ऊपरका पहाड़ीपर श्री ऋष्यश्रृंगक मंदिर आ गुफा सेहो अछि. ऋषि कुंड, जिला मुंगेर, बिहारमे दोसर गरम पानिक कुंड अछि. सिगंरीरिसी ऋषि स्थल, क्यूल, बिहार मे दुर्गम बाट अछि. सिंगरीरिसी, क्यूल, बिहार मे पंचधारा अछि. ऐ जलस्रोतक स्रोत कतए अछि केकरो आइ धरि जानकारी प्राप्त नै भेल अछि. उदय प्रकाश- मोहनदास (हिन्दी दीर्घकथा) मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल) उदय प्रकाश (१९५२- ) “मोहनदास”- हिन्दी दीर्घ कथाक लेखक उदय प्रकाशक जन्म १ जनवरी १९५२ ई. केँ भारतक मध्य प्रदेश राज्यक शहडोल संभागक अनूपपुर जिलाक गाम सीतापुरमे भेलन्हि। हुनकर हिन्दी पद्य-संग्रह सभ छन्हि: सुनो कारीगर, अबूतर कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है। हिनकर हिन्दी गद्य-कथा सभ छन्हि: तिरिछ, और अन्त में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, दत्तात्रेय के दुख, अरेबा परेबा, मैंगोसिल, मोहनदास। मोहनदास- दीर्घकथा लेल हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१० (हिन्दी लेल) देल गेल अछि। अनुवादक: विनीत उत्पल (१९७८- ) आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र। आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक। "हम पुछैत छी" मैथिली कविता संग्रह प्रकाशित। मोहनदास पोथीक आवरण-चित्र माकूर्स फोरनेलक चित्रक उदय प्रकाश द्वारा रूपान्तरण। (आवरण पर ऐ कृतिकेँ साहित्य अकादेमी पुस्कार देबाक बर्ख गलतीसँ २०१० केर बदलामे २०१२ छपि गेल अछि।) मोहनदास : उदय प्रकाश (२०१० मे साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित पोथी) ई उपन्यास मैथिलीमे पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in मे धारावाहिक रूपमे देवनागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे संगे-संग ई-प्रकाशित भेल छल। मोहनदास डरक रंग केहन होइत अछि? भटरंग, खकस्याह, खुनाहनि सन , कारी-स्याह आकि फेर छाउर सन? एहन छाउर जकरामे आगि एखन धरि मिझाएल नै गेल अछि!... आ फेर कोनो एहन रंग, जकरा पाछाँसँ एकबैग कियो सून-मसान सन ताकए लागैत अछि आ ओकर फाटल ठाममे सँ कनेके दूरीपर कोनो कानैक गधमिसान थकमकाएल सन लखा दैत अछि। समुद्र आ धारक कोनो धारसँ अनचोक्के बालुपर तरपि कऽ पटकल माछक आँखि कहियो अहाँ देखने छिऐ? दम तोड़ैत, खुजल-फाटल आँखि...?...ओहिनो तरहक रंग...! फिल्मक नीकसँ नीक हीरो सेहो अप्पन आँखिक डिम्हा, तकर चारू कातक उजरका स्थल आ मुँहपर कतबैयो कोशिश केलाक बादो ओ रंग नै आनि सकैत अछि जे असल जिनगीमे कोनो बड़ डराएल जिबैत मनुखक आँखि आ मुँहपर देखा पड़ैत अछि। एहन मनुखक, जे कत्तौ बेरिया काल धरि काज कऽ थाकि-हारि कऽ घर घुरि रहल अछि। ओकर हाथमे एकटा झोरा अछि, ओइमे नेनाक लेल कम्मे दामबला टॉफी आ खिलौना छै आ कनियाँक खोंखीक गोली सेहो , मुदा एक्के कोनक आगू ओ दंगा करऽबला सभक बीचमे कोनो सुन-मसान ठामपर अनचोक्के लसकि जाइत अछि आ दुर्भाग्यसँ ओ ओइ संप्रदाय, नस्ल आ संगोरक नै अछि जे भीड़ ओकरा घेरने छै। तखने ओइ काल अप्पन हत्याक एकाध क्षण पहिने ओइ मरैबलाक आँखि, मुँह आ समूच्चे देहमे वएह रंग देखाइ पड़ैत छै, जेकर चर्चा हम केने छी आ जकरा ओइ दिन हम मोहनदासमे देखने रही। "शिंडलर्स लिस्ट' आ फेर ओहने कतेक सिलेमामे अहाँ ओइ जर्मन रेलगाड़ीक दृश्य देखने होएब, जकरा कतौ दूर ठाम पठाएल जा रहल छै। ओइ रेलगाड़ीक डिब्बाक खिड़कीसँ बाहर ताकैत नेना, मौगी आ बुढबाक मुँह अहाँक मोनमे होएत! आ एखन किछु दिन पहिने गुजरातक कतेक शहर-मोहल्लाक घरक छत, खिड़की आ छातमे सँ बाहर ताकैत मुँह। डरक रंग किछु-किछु ओहने रंगक होइत अछि। मोहनदास आगू ठाढ़ अछि आ अप्पन थरथराइत, दुब्बर अबाजमे कहैत अछि,-"कका, कोनो तरहेँ हमरा बचा लिअ! हम अहाँक आगू हाथ जोडै़त छी!...नेना-बेदरा सभ अछि हमरा! बूढ़ बाप मरि रहल अछि टी.बी.सँ!... अहाँ कही तँ हम अहाँक संग चलि कऽ कोर्टमे हलफनामा दै लेल तैयार छी जे हम मोहनदास नै छी। हम ऐ नामक कोनो मनुखकेँ नै चिन्हैत छी! कियो आर होएत मोहनदास! खाली कोनो तरहेँ हमरा बचा लिअ!' मोहनदाससँ जखन अहाँक भेंट होएत तँ पहिने तँ अहाँकेँ ओकरापर दया आएत मुदा अहाँ डरा जाएब। किएक तँ ई काल डरैएबला काल अछि आ ई आर डरैबला भेल जा रहल अछि। मोहनदास आ हुनकर परिवारक कएकटा पीढ़ीकेँ हम जानैत छी। गाम-घरमे तँ एहने होइत अछि। हुनका देखि कऽ अहाँ सोचियो ने सकैत छी जे ओ ऐ जिलाक सरकारी एम.जी. डिग्री कॉलेजसँ ग्रेजुएट छथि। फर्स्ट डिवीजनक संग! ...आ विश्वविद्यालयक टॉपर सूचीमे, आइसँ दस बरख पहिने हुनकर नाम दोसर नंबर पर छल। हुनकर आजुक देह-दशा हुनकर ओइ कालकेँ लऽ कऽ कोनो गप नै करैत अछि। एकटा फाटल, बेदरंग भेल, ठामे-ठाम चिप्पी लागल, कोनो काल नील रंगक डेनिमक फुलपैंट, सस्ता टेरिकॉटक आधा बाँहिक, दहिना कन्हा लग उघड़ल अंगा। एकरामे कोनो काल चौखाना बनल रहैत, जेकरासँ ओ डरीड़ मेटा रहल अछि, जेकर रंग कहियो हल्लुक रहल होएत। आ एकटा रबड़क सस्ता-बरसाती पनही, जकरा माटि, धूरा, दुख, पानि, काल आ रौद एत्ते चाटि गेल अछि जे आब ओ कखनो चमड़ा तँ कखनो माटिक बनल देखा पड़ैत अछि। मोहनदासक उमेर अखन पैंतीस-सैंतीस बर्खक होएत, मुदा देखबामे ओ हमरे बराबर आकि हमरासँ बेसी लागैत अछि। एक तरहेँ हकासल आ दौड़-भाग करैत ओकरा हम सदिखन देखलहुँ। गाममे कत्तौ बैसि कऽ गप करैत, ताश खेलाइत, हँसी-ठहक्का दैत आ टीवी देखैत नै देखलहुँ। कियो कतबो लचार आ डराएल वा जल्दीमे अछि; ई ओकरा कत्तौ ठाढ़ नै हुअए दैत अछि। मोहनदासकेँ लऽ कऽ लोक-बेद कहैत अछि जे ओ सदिखन कोनो-नै-कोनो काज पकड़िये कऽ राखैत अछि, किएक तँ ओकरा पानि पीबाक लेल सभ दिन एकटा नबका इनार कोड़ऽ पड़ैत छै आ सोहारी खेबाक लेल नित्तः नवका फसिल जनमाबऽ पड़ैत छै। ओकरा परिवारमे रोटी-पानिक लेल ओकर बाट जोहैबला एक गोटा नै पाँच गोटा छै। पाँचटा पेट आ पाँचटा मुँह। मोहनदासक बाप काबा दास, जकरा पछिला आठ बरखसँ टी.बी. छै। ओकर माए पुतलीबाइ, जकर आँखि कोनो मंगनीक नेत्र शिविरमे मोतियाबिंद आपरेशन भेलाक बाद आन्हर भऽ गेल छै आ चारू दिस अन्हारे-अन्हार लखा दै छै। ओकर कनियाँ कस्तूरी बाइ, जे किछु नै, अप्पन वरक छाह छिऐ। कस्तूरी बाइ मोहनदासक काजमे संग दैत छथिन आ घरक चूल्हा-चौका ओरियाबैत छथिन। गामक लोक कहैत अछि जे आइ धरि कहियो दुनूकेँ लड़ैत- झगड़ा करैत नै देखने छी। लागैत अछि ओ विपैत आ आफैत होइत अछि, जे स्त्री-पुरुखक संबंधक नीवकेँ कमजोर करैत अछि। बचल दूटा प्राणीमे एकटा अछि देवदास आ दोसर अछि शारदा। मोहनदास आ कस्तूरीक दुइटा संतान। उमेर आठ आ छह बरख। देवदास गामक प्राथमिक पाठशालामे पढैत अछि आ स्कूलक बाद गामसँ जाइबला सड़कपर खुजल "दुर्गा ऑटो वर्क्स' मे गाड़ीमे हवा भरैए, पंचर साटैए आ स्कूटर-मोटर साइकिलक छोट-मोट भङठी करबामे हेल्परक काज करैए। ऐ काजक लेल ओकरा मासमे सए टका भेटैत छै। तइमे सँ कहि सकैत छी जे मोहनदासक बेटा अप्पन पढ़बाक संग अप्पन दालि-भातक इंतजाम अप्पन मेहनतिसँ कऽ रहल अछि। तइपर सँ ओ अप्पन पएरपर ठाढ़ अछि। पाठशालाक मास्टर साहेबक कहब अछि जे चारिम क्लासमे देवदास पढबामे सभसँ नीक रहए। मुदा जखन ई गप ओकर पिता मोहनदासकेँ बतौलन्हि तँ ओकर आँखि कत्तौ टंगि गेलै। ओकरा जेना अकाशी लागि गेलै। ओकरा मुँह परक डरीड़ थरथराइत छै। आँखिक तेजी मिझाए लागैत छै। जेना कोनो गह्वरसँ ओकर कंठक अवाज बहराइत अछि, "हमहूँ तँ बी.ए. फर्स्ट क्लास छी। दिन-राति घोटैंत रही...! की भेल?" एकर बाद मोहनदासक आँखि चमकि जाइत अछि आ ओ पपड़ी पड़ल ठोरसँ हँसैत कहैत अछि, "आइ काल्हि हम कमप्यूटर सिखैत छी। बस स्टैंडपर जे "स्टार कमप्यूटर सेंटर' अछि, ओतए हम जाइत छी। इमारती समान आ हार्डवेयरक दोकान चलबैबला मोहम्मद इमरानक बेटा शकील ऐ कमप्यूटर सेंटरक मालिक अछि आ ओ कहैत अछि, "कका, टाइपिंग, कंपोजिंग आ प्रिंट निकालैबला काज बुझि गेलहुँ तँ छह सए टकासँ बेसी देब।' मोहनदास कहैत अछि जे, "टाइपिंगमे ऐ मास हम तीसक स्पीड निकालि लेलहुँ। छोट-मोट काज भेट जाइत अछि मुदा एखन बहुत रास गलतियो भऽ जाइत अछि आ बहुत रास काल ओइ गलतीकेँ ठीक करैमे लागि जाइत अछि।' मुदा ई सभटा गप बहुत काल पहिलुके अछि। मोहनदासकेँ भारी विपैत पड़ल छै आ ओ बेर-बेर कहैत अछि- "हमर नाम मोहनदास नै अछि।... हम अदालतमे हलफनामा दै लेल तैयार छी। जेकरा बनैक छै ओ बनि जाए मोहनदास। कोनो तरहेँ अहाँ सभ हमरा बचा लिअ!... हम अहाँ सभक कऽल जोड़ैत छी!' मोहनदासक दिक की अछि? ई बताबैक पहिने ओकर परिवारक पाँचम प्राणी माने मोहनदासक घरक छह बरखक शारदाक गप कऽ लेल जाए। छह बरखक शारदा गामक सरकारी प्राथमिक पाठशालामे दोसर कक्षामे पढ़ैत अछि आ स्कूलक बाद ओ अढाइ किलोमीटर दूर, दू पोखरि पार बसल गाम बिछिया टोला चलि जाइत अछि, जतएसँ ओ माँझ रातिकेँ करीब नौ-दस बजे घर घुसैत अछि। बिछिया टोलामे ओ बिसनाथ प्रसादक एक बरखक बेटाकेँ सम्हारैत अछि आ ओकर घरक काज-धाज हाथे-पाथे करैत अछि। बिछिया गामक पैघ किसान आ जीवन बीमा निगममे बाबूगिरी करैबला नगेंद्रनाथक कलेक्टरीसँ लऽ कऽ मंत्री धरि पहुँच आ धाख छै। दूइ बेर ग्राम पंचायतक सरपंच आ एक बेर जिला जनपदक उपाध्यक्ष रहल अछि। बिसनाथ प्रसाद, जिनकर एक बरखक बेटाकेँ शारदा सम्हारैत छन्हि, ऐ नगेन्द्रनाथक पाँच मे सँ एक बेटा छथिन्ह। हुनकर असली नाम विश्वनाथ प्रसाद अछि मुदा गामक लोक हुनका बिसनाथ कहि कऽ बजाबैत अछि आ पीठ पाछाँ कहैत अछि, "असूल करैत अछि बिसनाथ। गजबक बिखधारी। ककरो फूकि मारि दिअए तँ बूझू जे टें...। बाप नागनाथ तँ बेटा सांपनाथ...। ओ अहाँकेँ देखि कऽ मुस्किया रहल अछि आ गुड़क रसमे लपेटि कऽ कहि रहल अछि तँ अहाँ साकांक्ष भऽ जाऊ। डसबाक पूरा तैयारी अछि।' बिसनाथक लग एकटा चीज नै अछि, ओ अछि ईमान। कखनो शराब पी लेलाक बाद ओ अपने मुँहसँ कहैत अछि, "एकक टोपी दोसराक मुँहमे टांगैबला हेराफेरीमे जे आनंद छै भइया, तकर सोझाँ अनकर कनियाँकेँ जांघक नीचाँ दाबैबला मजा बड्ड छोट चीज छै...! हा...हा...हा...!' ओकर उठब-बैसब सेहो गामक आ एम्हर-ओम्हरक तेहन लोक सभक संग अछि, जेकरा लऽ कऽ कहियो कोनो नीक गप नै सुनल गेल। बिसनाथ ऊँच जातिक अछि मुदा मोहनदास नीच जातिक कबीरपंथी अछि। ओकर बिरादरीक कतेक लोक सभ आइयो सूप-चटाइ, दरी-कंबल बुनैत अछि। मोहनदास हमरे गाम नै, आसपासक कतेको गाममे अप्पन बिरादरीक पहिलुक लड़का हएत जे बी.ए. पास केने छल। आ ओहो फर्स्ट डिवीजनसँ आ मेरिटमे दोसर नंबरक संग। (एतए थम्हि जाऊ। सत्त बताऊ जे कतौ अहाँकेँ ई तँ नै लागैए जे हम अहाँकेँ कोनो प्रतीकवादी कूटकथा सुनाबै लेल बैसि गेलहुँ? एहि कथाक मुख्यपात्रक नाम मोहनदास, ओकर कनियाँक नाम कस्तूरीबाइ, माएक नाम पुतलीबाइ आ बेटाक नाम देवदास...? कस्तूरी बाइ नामसँ कस्तूरबाक मोन पड़ैत अछि, मोहनदास तँ साफे अछि। मुदा अहाँ महात्मा गांधीक "आत्मकथा' माने "दि स्टोरी ऑफ माइ एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ' पढबै तँ पता लागत जे हुनकर पिता करमचंदक दोसर नाम काबा सेहो रहन्हि। आ माएक नाम सेहो पुतली बाइ... फेर हुनकर बेटा देवदासक खिस्सा केकरा नै बुझल छै? जे अहाँ मोहनदासक बगे-बानी आ देह-दशा देखबै तँ अहाँकेँ फेर ओ इतिहास घेर लेत। अंतर बस एतबे जे ओ एहन मोहनदास सन अछि जेकरा पोरबंदर, काठियावाड़, राजकोट, विलायत, दक्खिन अफ्रीका आ बजाज-बिड़ला भवनमे नै छत्तीसगढ़ आ विंध्यप्रदेशक बोन-झाँकुड़, खोह-तरहरि, खेत-पथारमे रौद-भूख, रोग-घाम आ अन्याय-अपमानक आँचमे पालल-पोसल गेल छै।... आरो सभ सभटा ओहने... ...मुदा ऐठाम हम, कथाक बीचेमे ठाढ़ भऽ ई कहि दैत छी, जे बगे-बानीक मिलान एकटा संजोगे अछि। जखन हम अहाँक लेल ई कथा लिखैले बैसलहुँ, ओइ काल हमरा अपने नै बुझल छल जे हमर गामक मोहनदास आ ओकर परिवारक लोकक लिस्टमे इतिहासक कोनो एहन अनुगूंज सेहो नुकाएल छै। विश्वास करू, एहन किछु नै अछि। ई कोनो प्रतीक कथा, रूपक आकि कूटाख्यान नै अछि। ई तँ एकटा साफे सरल खिस्सा छी। मुदा सत कही तँ ई कोनो खिस्सा नै अछि। किएक तँ हम सदिखन काल जना खिस्साक आड़िमे, अहाँकेँ फेरसँ अप्पन काल आ समाजक एकटा असल जिनगीक ब्यौरा दै लेल बैसल छी। मोहनदास वास्तवमे एकटा जीवैत असल मनुख अछि आ ओकर जिनगी एखन बड़ संकटमे छै। हँ, ई गप अवश्य अछि जे हम सत गपमे सदिखन जना ऐबेर फेरसँ कम-बेस हेरफेर केने छी। मुदा ई हेरफेर तेहने अछि, जेना कियो हाथीकेँ नुकेबा लेल ओकर बड़का देहक ऊपर डेढ़ हाथक गमछा ओछा दैत अछि। अहाँकेँ मानऽ पड़त जे सत गप एकटा हाथी होइत अछि आ जखन कोनो कवि आ कहानीकार ओकर ऊपर गमछा ओछा कऽ ओकरा नुका कऽ रोमि कऽ सभक आगू ठाढ़ करैत अछि, तँ तखन ओकर अपनक जिनगीक सभटा पुल टूटि जाइत छै आ ओकर सभटा नाह जरि कऽ छाउर भऽ जाइत छै। ...तँ... मोहनदास एकटा असल लोक अछि। एकर पुष्टि अहाँ चाही तँ हमर गामेक लोकसँ नै ऐ देशक कोनो गामक कोनो लोकसँ पूछि कऽ कऽ सकैत छी।) मोहनदास जखन बी.ए. पास केलक तँ बाप काबा आ माय पुतलीबाइकेँ आशा रहै जे आब ओकरा तुरत्ते नोकरी भेट जएतै। मोहनदासक बियाह चौदह-पंद्रह बरखमे कटकोना गामक विरंजुक सुन्नर सन बेटी कस्तूरी बाइक संग भऽ गेल छल। कस्तूरी बड़ काज करैवाली छल। सासुर आबैक संग ओ घरक सभटा काजे टा नै सम्हारलक मुदा एम्हर-ओम्हर छोट-मोट मजूरी कऽ किछु पाइयो कमाबै लागल, जइसँ मोहनदासक पढ़बाक खर्चा निकलि जाए। सभक आँखि मोहनदासेपर लागल रहै। बी.ए. करैबला ओ जाइत-समाजक पहिल बच्चा रहए। सेहो फस्ट डिवीजन। परीक्षाक रिजल्ट जखैन बहराएल तखन ओकर कएकटा फोटो सेहो अखबारमे छपल। कोचिंग चलाबैबला कंपनी सेहो ओकर फोटो छापलक। मोहनदास रोजगार कार्यालयमे अप्पन नाम लिखौलक आ "रोजगार समाचार' मे छपैबला विज्ञापनकेँ देख कऽ जत्तऽ–तत्तऽ दर्खास्त पठाबए लागल। लिखित परीक्षामे सभसँ ऊपर रहै छल मुदा जखन इंटरव्यू होइत रहै तँ ओकरा अनुत्तीर्ण कऽ देल जाइत छल। ओ देखैत छल जे ओकर ठाम आठम-दसम पास, थर्ड-सेकेंड डिवीजनसँ बी.ए. करैबला लड़काकेँ नोकरी भऽ जाइत अछि। ओइमे सभक लग कोनो-ने-कोनो पैरवी रहैत छलै। सभ कोनो-ने-कोनो अफसरक, नेताक आ पैघ लोकक जमाय, बेटा, भातिज, भागिन आ लल्लो-चप्पो करैबला आकि कर्मचारी रहैत छल। मोहनदास सभ बेर असफल भऽ कऽ घुरैत छल मुदा ओ अप्पन आस नै छोड़लक। ओ बुझैत छल जे हिन्दुस्तानमे भ्रष्टाचार बड्ड रास छै मुदा तखनो सैकड़ामे दस-बीसटा लोककेँ अप्पन मेरिट आ योग्यताक दमपर नोकरी भेट जाइत छै। आस्ते-आस्ते मोहनदासकेँ ईहो बुझऽमे आबि गेलै जे कतेक रास नौकरी लेल बोली लागै छै। ओकर बाप काबा दास लग जे लाख-पचास हजार रहितियै तँ दू-तीनटा एहन नौकरी हाथ जे ओकर हाथसँ छुटलै तइमे ओ घूस दऽ बहाल भऽ सकै छल। काल बितैत गेलै। ओकर उमेर सरकारी नोकरीक आयुरेखा पार करऽ लगलै। घरक लोक सभ असोथकित हुअए लागल। तैयो कस्तूरी बोल-भरोस दैत छल। कोनो गप नै, सरकारी नौकरी नै भेटत तँ प्राइवेटमे देखि ले। नै तँ कोनो धंधा कऽ ले। आइ-काल्हि पढ़ब-लिखब बेरोजगारक लेल सरकारक कएकटा योजना अछि। कुक्कट पालन कऽ ले। अंडाक धंधामे कतेक रास फाएदा अछि। मोमबत्ती, अगरबत्ती आ आटा-दलिया बनाबैक कारखाना खोलि ले। सरकार बैंकसँ लोन दैत छै। एक बेर साक्षरताक काज आएल छल। शिक्षाकर्मीक अस्थायी काज ओकरा भेट सकै छलै। मुदा बादमे पता चललै जे जाइ अफसरक नीचाँ ई काज छल ओ अप्पन जाति आकि एक-दू राजनीतिक पार्टीक लोककेँ ओइमे भरि रहल अछि। मोहनदास नीचाँक जातिक छल आ कोनो पार्टीक सदस्यो नै छल। मोहनदास बड़ सोझ, संकोची आ स्वाभिमानी छल। ऐ काजक लेल जतेक दौग-भाग करऽ पड़ितै, जतेक अफसर-हाकिमक हाथ-पएर जोड़ै पड़ितै , एतए-ओतए जे खुआबऽ–पियाबऽ पड़ितै ओ ओकरा सक्कमे नै रहै। ओइ संगे नौकरीक जकाँ एतए सेहो लड़ाइ-झगड़ा सेहो छलै। एहन नै छल जे मोहनदास प्रतिस्पर्धासँ डराइ छल, एहन रहितै तँ ओ बी.ए. क परीक्षाक मेरिटमे कोना अबितै? मुदा ओ जल्दीये बुझि गेल जे स्कूल-कॉलेजक बाहरक असल जिनगीक खेल एकटा एहन मैदान अछि, जतए ओ गोल बना सकैत अछि जकरा लग दोसराकेँ लंगड़ी मारबाक तागति छै। आ ई तागति पैरवी-पैगाम, जोड़-तोड़, घूस, चिन्हल-जानल, धुरफंदी एहन कतेक अवैध आ अनैतिक बौस्तुसँ बनैत अछि, जकरामे सँ एक्कोटा मोहनदासक बूताक गप नै छल। मोहनदासे टा नै, ओकर कनियाँ कस्तूरी, बाप काबा आ माय पुतलीबाइ सभक भीतर ओकर सरकारी-अफसर-हाकिम बनैक आस मिझा गेल, आब तँ लऽ दऽ कऽ सएह लागैत छल जे एहन किछु भेट जाए, जकरासँ बेरोजगारी आ असगर रहनाइसँ मोहनदासक पिंड छुटि जाए आ घरक दालि-रोटी कोनो तरहेँ चलए लागै। अही बीच काबा दासकेँ टी.बी. भऽ गेलै। ओ खाँसै लागल आ कफक संग खून बोकरऽ लागल। ठीक एकर बाद एकटा खैराती नेत्र चिकित्सा शिविरमे पुतलीबाइक आँखिक इजोत चलि गेलै। कस्तूरीपर घरक काज-धाज आ बाहरक मजूरीक संग सास-ससुरक सेवा-सुश्रुषाक भार सेहो आबि गेलै। सेहो एहन कालमे जखन ओकरा सुस्ताइक जरूरी छलै, किएकि ओ गढ़ुआरि छल। गर्भमे देवदास आबि गेल छलै। मोहनदासकेँ देखिये कऽ लागैत छल जे ओ कतेक दिनसँ बेमार अछि। गाममे ओ कम्मे लोकसँ भेंट करैत छल। गाम-घरक लोकक आगू आबैसँ ओ नुकायल रहैत छल। सभटा लोक लग एक्केटा प्रश्न होइ छलै- , "की कऽ रहल छी? कोनो जोगाड़ भेल?' गामक लग कठिना नामक एकटा धार बहैत छल। मोहनदास गर्मीमे गामक दोसर लोक जकाँ धारक बालूमे खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज रोपैक काज केलक। कनियाँ कस्तूरी टा नै, ओकर बाप-माय काबा आ पुतलीबाइ सेहो ओतए जाइत छल आ पलिया बना कऽ धारक पानिसँ छोट लत्तीकेँ पानि पटा कऽ खेती करैत छल। दुपहरिया आ रातिमे बेरा-बेरी पहरा दैत छल। बरख भरिमे आठ-दस हजार टाका अही तरहे भऽ जाइत छलै। मुदा कतेक रास बिन कालक पानि पड़ैसँ धारक पानि बढ़ि जाइत छल। मोहनदास संगे एहन दू बेर भेल छलै। कनी-कनी कऽ बड़का अवसाद आ निराशा ओकरा भीतर बैसए लगलै। जइ दिन कस्तूरी देवदासकेँ जन्म देलक, ओइ राति मोहनदास अप्पन घर नै घुरल। ओ कठिना धारक बालुपर निचाट पड़ल आकाशक सून-सपाटकेँ ताकि रहल छल। संजोगेसँ ओइ राति सेहो अमावशक राति छल, जै राति देवदासक जन्म भेल। प्रसवक काल एक बेर तँ एहन भऽ गेलै जे कस्तूरी मरत की जीत। नालक गड़मे फँसि गेलासँ बच्चा अधबीचेमे रहि गेल छल आ प्रसव करबै लेल आएल बिलसपुरहिन घबरा कऽ कष्टमे बेहोश कस्तूरीकेँ मुइल घोषित कऽ देलक। आन्हर भऽ गेल माय पुतलीबाइ आ टीबीसँ खोँखी करैत बाप काबा दास, दुनू अप्पन बेटा मोहनदासकेँ ताकैत रहल, मुदा ओ कतए भेटतियै? ओ तँ ओइ राति कठिना धारक रेतमे, अमावशक आकाशकेँ कोनो मुर्दा जना घूरि रहल छल, अप्पन भीतर जीवनक कोनो चिह्न ताकि रहल छल। हुनकर देहक नसमे ओइ राति खून नै, अमावशक कारि अन्हार बहि रहल छल। आ हुनकर सुन्न भेल मगजमे नीन नै, ओ डराएल सपना उमड़ि-घुमड़ि रहल छल, जे कोनो भ्रष्ट आ पतित भऽ गेल व्यवस्थाक कोखिसँ जन्म लैत अछि। मोहनदास ओइ राति धारक कातमे बेहोश छल, तइसँ ओकरा अप्पन बाप काबा आ माय पुतलीबाइक टेर सुना नै पड़लै आ नै कस्तूरीक कानब; आ नहिये भिनसरे चारि बजेक आसपास अप्पन नवजात बेटा देवदासक कानब। भोरक सुरुज ऊपर आबि गेल छल, जखैन रौदक आँच गामसँ एक किलोमीटर दूर कठिना धारक रेतमे सुतल मोहनदासक नीन आ मूर्च्छा तोड़लक। मोहनदास कतेक काल धरि धीपल रेतपर ओहिना पड़ल रहल। ओकर देह पाटल छलै आ स्मृति मिज्झड़ छलै। ओकरा ई बुझबामे कनेक काल लगलै जे ओ अप्पन घरक ओसार आ आंगनमे नै, कठिनाक ओइ रेतपर पड़ल अछि, जतए किछु दिवस पहिने ओ मतीरा, ककड़ी, खरबूज आ कुम्हर-टमाटर रोपने छल आ कालक पानिसँ उगडुम धारक पानि सभटा गीरि गेल छलै। मोहनदास जखन घर घुरल तँ ओतए गामक कतेक रास लोक ठाढ़ छल। स्त्रीगण सेहो छलै। लागैत छल जे सभ कियो ओकरे लऽ कऽ गप करैत छल। किएकि ओकरा देखिये कऽ सभ चुप भऽ गेल आ एकाएकी सभ कियो ओतएसँ चलि गेल। "पूत खाली दयऊक किरपासँ बचल। गामक लोक तँ तुलसी-गंगाजल लऽ कऽ आबि गेल छल।” माय पुतलीबाइ आँचरसँ नोर पोछैत कहलखिन। "जा कऽ देखि लियौ। देउता सन झलकैए।' मोहनदास ओइ सोइरी घर गेल, जाइमे कस्तूरी एखने किछु काल पहिने मृत्युक मुँहसँ बहार भऽ अप्पन नेनाक संग खाटपर सुतल छल। बोरसीमे गोइठाक संग नीम-अजवाइन जड़ैत छल आ कोठरीमे तकर धुआँ भड़ल छल। कस्तूरी थाकल आँखिसँ मोहनदासकेँ देखलक। ओकरा देखबेमे एतेक असहायता आ ग्लानि छलै जे मोहनदासक करेज धकसँ रहि गेलै। एकटा आर पेट आजुक दिन घरमे जन्म लऽ लेलक। आब कमसँ कम छह-आठ मास धरि सभ दिन आध सेर गायक दूधक इंतजाम करैए पड़त। कस्तूरीक लेल मास भरि देसी सोंठ, गुड़ आ घी आ हरदिक संग भात। छठ्ठी, बरहों आ पसनी (अन्नप्राशन) मे लोकक खुआबैक खर्चा सेहो। मुदा तखने मोहनदासक नजरि कस्तूरीक बगलमे सुतल बच्चापर पड़ल। मोट-सोंट, गोल-मटोल बच्चा निश्चिन्त भऽ माएसँ सटि कऽ सुतल छल। बड़ सुन्नर आ अबोध। सतमे कोनो देवताक बच्चा लागैत छल। मोहनदासक भीतर पहिलुक बेर एक बापक संवेदना जन्म लेलक। हुनकर आँखि बच्चापर सँ नै हटैत रहए। तखने बाहर ओसारेसँ काबाक चिकरैक अबाज सुनाइ पड़ल। "सीताराम डाकिया आएल छल। कोनो कारड देने छल।' मोहनदास देखलक, एहि जिलाक सभसँ पैघ कोलियरीसँ नोकरीक लेल इंटरव्यू लेटर आएल अछि। मोहनदास लग पछिला कतेक माससँ एहन तरहक कार्ड नै अबैत छल। तँ की रातिमे कठिना धारक रेतमे जे किछु ओ सोचैत छल, ओकरे कोनो भनक आकाशक कोनो ग्रह-नक्षत्रकेँ लागि गेल छलै? कोनो देवता हुनकर दुख आ आफत जानि गेल? की कस्तूरी तँ नै जे आइ भिनसरे बेटा जन्म देलक, वएह सतमे कोनो देवदूत अछि जे अप्पन जन्मक संग अप्पन परिवारक लेल एकटा नबका जीवनक केवाड़ खोलि रहल अछि। ओरियंटल कोल माइंसकेँ पठाओल गेल आ रोजगार कार्यालयक मार्फत ओकरा भेटल इंटरव्यू कार्डमे मोहनदासकेँ एकटा नबका भविष्यक भोर झिलमिलाइत लखा दैत छल। कतेक काल बाद ओकर हृदएमे फेरसँ आशाक एकटा हरियरका नरम दूबि उगै लागल। ओइ राति मोहनदास नीक जना नै सुति सकल। अप्पन जीवनक जै गाछकेँ ओ एकटा ठुट्ठ बुझऽ लागल छल, ओइमे कतौसँ फेर नबका पात बहरा रहल छल। ओरियंटल कोल माइंसमे ओइ दिन ओ साक्षात्कारक कालसँ एक घंटा पहिने पहुँचि गेल छल। अप्पन कुलदेवी मलइहा माय आ सतगुरु कबीरदासजीक नाम जपैत ओकर भीतर एहि बेर एकटा अलगे आत्मविश्वास छल। कोनो तरहेँ नोकरी भेटैक जोश। एक घंटाक लिखित परीक्षा छल, फेर एक घंटाक अंतरालक बाद शारीरिक परीक्षा। मोहनदास भरि मोनसँ आ जान लगा कऽ जुमि गेल। एक घंटाबला लिखित परीक्षा ओ आध घंटासँ कम्मे कालमे पूरा कऽ लेलक। प्रश्न बड़ आसान छलै आ ओकर जवाब तँ ओतए नीचामे लिखल छलै। बस सही उत्तरपर सहीक चेन्ह लगाबैक छलै। एकर बाद १५०० मीटरक दौड़, भागि कऽ चलब, मैदानक पाँच चक्कर लगाबैक, आँखिक परीक्षण, रंगकेँ चिन्हबाक आदिक शारीरिक परीक्षामे दू घंटा लगलै। मोहनदास एतए ककरोसँ उन्नैस नै छल। साँझ चारि बजे कोलियरीक भरतीक दफ्तर दरवाजासँ डेढ़ सए प्रतियोगीमे सँ चुनल गेल पाँचटा नाम पुकारल गेल, ओइमे पहिलुक नाम मोहनदासक छल। मोहनदासक हृदए धरधड़ कऽ रहल छलै। एकटा एहन गप भऽ रहल छल। आब कतेक जल्दी ओकर जीवनक अनिश्चितताक अंत होइबला छलै। सभ मास ओकरा दरमाहा भेटतै। घरमे सभ दिन चूल्हि जरतै। आ तरकारी बनतै। बाप आ मायक इलाज हेतै। देवदासक लालन-पालन आ पढ़ाइ नीकसँ हेतै। कस्तूरीकेँ मजूरीमे दोसरा जकाँ नै खटऽ पड़तै। कोलियरीक बाबू मोहनदाससँ हुनकर सभटा सर्टिफिकेट आ मार्कशीट जमा करेलक मुदा बी.ए. मार्कशीट देखैत ओ कहलक, "आंय हो, एखन धरि कोना नै अहाँ नोकरीक जोगाड़ कऽ सकलिऐ? एकरामे तँ अहाँकेँ थोड़-बेस लमरा-पहुँच कैलासँ कोनो नीक सन नोकरी भेट जैतियै।” "ज्वाइनिंग कहियासँ होएत?” जखन मोहनदास पुछलक तँ जवाबमे बाबू कहलखिन, "ज्वाइनिंगे बुझू। ऐ हफ्तामे भीतरे-भीतर कागजी काज पूरा भऽ जाएत आ अगिला हफ्ता धरि नियुक्ति पत्र अहाँक पतापर पठा देल जाएत।...बेसीसँ बेसी पंद्रह दिन लगा कऽ चलू।” मोहनदासक घरमे एकटा नब युग आबि गेलै। पोस्ट आफिसक खातामे जे दू हजार टका छल तइसँ मोहनदास नबका मसहरी, एक सेर देशी घी, चिन्नी, सोंठ, किछु नब बरतन आ कस्तूरी आ देवदासक लेल किछु कपड़ा किनलक। अपना लेल सेहो ओ नील रंगक जींसक पैंट, टेरिकॉटक चौखाना बनल अंगा, तीस टकाक पर्स आ पाँच-पाँच टकाक दू टा रूमाल किनलक। परसूकेँ कहि कऽ ओ रोज भिनसरे आध सेर दूधक सेहो व्यवस्था कऽ देलक। गाममे ई गप हुअए लागल जे मोहनदासकेँ आखिरीमे ओरियंटल कोल माइंसमे नीक सन नोकरी भेट गेल अछि। गाममे जे सभ ओकरासँ सोझ मुँह गप नै करैत छल, सेहो ओकरासँ मेल-जोल बढ़ाएब शुरू कऽ देलक। जे सभ ओकर मेहनति आ पढ़ैक हँसी करैत छल, सेहो नीकसँ बाजब शुरू कऽ देलक, "ई तँ हेबाके छलै। एहन डिग्री आ पढ़ाइक बाद मोहनदास कहिया धरि खाली बैसितियै।” किछु लोक सभ ईहो टिप्पणी केलक, "असलमे मोहनदास जै बंसहर-पलिहा जातिक अछि, ओकरा आब रिजर्वेशनमे राखि देल गेल छै। नौकरी ओकरा कोटासँ भेटल छै किएकि ऐ जातिक कोनो दोसर लड़का बी.ए. छेबे नै करै।” ओइ हफ्ता मोहनदासक घरमे एक बेर खीर सेहो बनल आ एक बेर आलू-मटरक मसल्हा सेहो। माय पुतलीबाइ अप्पन आँखिक अन्हारकेँ बिसरि गेली आ आंगुरसँ छूबि-हथोड़िया दऽ सूपमे पसरल दालि आ चाउरसँ कांकोड़ बिछै लागल। तोड़ीक तेल आ नून-अमचुरसँ लाल मिरचाइक चटनी सेहो बनौलक। बाप काबादास गणेश छाप मंगलूरी बीड़ीक पूरा कट्टा आ नबका जहाज छाप सलाइक डिबिया किनलक, जकर काठीकेँ रगड़पट्टीमे आस्तेसँ घिसलासँ फर्रसँ आगि जरि जाइत छल। घरक बाहर ओसारपर बैसल, सुट्टा मारैत काबा कतेक राति भोकारि पारि कऽ कबीरदासक भजन गओलक आ ओकरा नै तँ एक्को बेर खोँखी भेलै आ नहिये खूनक संग कफ बाहर निकललै। एक दिन भोरे-भोर आन्हर पुतलीबाइ आंगनमे खुशीसँ घूमि-घूमि कऽ नाचैत जोर-जोरसँ गाबऽ लागल, "टोरबा-पुतऊ की कोठरिया माझे अलोपी मइना खोंथा डारिस हबै। भाग आइस, कलेस गइस...!!! किसमत जागिस...' जै हो मलइहा माइ...! तोराले गोर लागी सतगुरू महराज...!!! जै हो...जै हो!' सभ कियो देखलक जे मोहनदासक आन्हर मायक आँखि अलोपी मैनाक जे खोता कस्तूरी-देवदासक कोठरीमे देखने छल, ओ सत छल। मोहनदास दोसर हफ्तासँ कोलियरीक चिट्ठीक बाट जोहै लागल। मुदा ओइ हफ्ता डाकिया नै आएल। एकर बादक हफ्ता सेहो बीति गेल। बीस-बाइस दिन भऽ गेल छलै। पता चललै जे कांसाकोड़ाक कंचलमल शर्माक बेटा संतोष कुमार शर्माकेँ चिट्ठी पहिने भेट गेलै आ ओ नोकरी सेहो ज्वाइन कऽ लेलक। मोहनदास बेचैन भऽ गेल। ओ राज्य परिवहनक बस पकड़लक आ कोलियरी पहुँचल। भर्ती दफ्तरमे ओ बाबू कहलक जे एखन लेटर पठाओल जा रहल अछि। पोस्ट तीन टा छल, चुनल गेल छल पाँच टा लोक। मुदा जगह नै बढ़ाओल गेल तँ दू कैंडिडेट कटत। मोहनदास डरि गेल। ओकर झाइ पड़ल चेहरा देखि कऽ बाबू भरोस देलकै, उम्मीद अछि जे दू टा पोस्ट बढ़ि जाएत आ नै बढ़त तँ मोहनदासक नाम नै कटत किएकि लिस्टमे हुनकर नाम पहिल अछि। मोहनदास घुरि गेल। बाबू ओकरा एकाध मास इंतजार करै लेल कहलक आ पूरा भरोसा देलक। मुदा मोहनदासक भीतर किछु मिझा गेलै। ओकरा चिन्ता हुअए लगलै जे परसू मास बितैत दिनक आधा सेरक दूधक पूरा हिसाब देबऽ पड़तै। जोशमे एतए-ओतए किछु उधारी सेहो भऽ गेल छलै। आब सभटा कोना चुकाओल जाएत? कस्तूरी ओकरा ढाढ़स राखऽ लेल कहलक। माय पुतलीबाइ मलइहा माइसँ गछलक। हँ, काबा दास किछु दिनसँ चुप रहऽ लागल। रातिमे भजन गाओल ओ छोड़ि देलक आ ओकरा खोँखी आबऽ लगलै। डेढ़ मासक बाद मोहनदास फेर ओरियंटल कोल माइंस गेल। कतेक प्रतीक्षा केलाक बाद बाबू ओकरा भरती दफ्तरक भीतर आबऽ देलक। ओ ओकरा आर इंतजार करैले कहलक। मुदा ऐ बेर ओ इंतजार लेल कोनो अंतिम समए नै बतेलक। ऐ बेर ओकर आवाजमे पहिने सन अपनापा सेहो नै छलै। मोहनदास चलैसँ पहिने जखन जोर दऽ कऽ पुछलक तँ अमनसँ ओ कहलक, "ओना पता करबाक जरूरत की अछि? चिट्ठी भेटत तँ अपने आप पता भऽ जाएत।' फेर ओे कहलक, "असलमे ओइ दिन कैंडीडेटकेँ सलेक्ट करै लेल बिहारसँ कोल इंडियाक जे अफसर आएल छल, ओ एकटा पोस्टपर अप्पन जमायकेँ फिट कऽ देलक। सभटा ऊपर बलाक खेल छी।' मोहनदासक आंखिक आगू अन्हार पसरऽ लगलै। अगिला मास मोहनदास फेर पता करै लेल गेल। कतौसँ किछु भऽ जाए। भोर दस बजेसँ लऽ कऽ दुपहरियाक साढ़े तीन बजे धरि ओकरा दफ्तरक बाहर बैसल रहऽ पड़लै। चपरासीक चिरौती-बिनतीक बाद जखन ओकरा भीतर आबऽ देल गेलै तँ पता चललै जे पहिलुक बाबू छुट्टीपर गेल अछि आ ओकरा ठाम जे दोसर मोट-सन बाबू ओकर काज देखि रहल अछि, ओकरा ओइ फाइलक कोनो जानकारी नै छै। मोहनदासकेँ अप्पन मार्कशीट आ सभटा ओरिजनल प्रमाणपत्र केँ लऽ कऽ चिन्ता हुअए लगलै। जखन ओ एकरा दिया पुछलक तँ नबका मोटका बाबू कहलकै जे अहाँक सर्टिफिकेटक हम की करब? नौकरी नै देल जाइत तँ रजिस्ट्रीसँ आपस घुरा देब, नै तँ अगिला बेर आबि कऽ अप्पन संगे लऽ जाएब। मोहनदास फेर घुरि गेल। ओकरा मोनक सभसँ भीतरी कोन सेहो नीकसँ बुझि गेल छल जे ओकर जिनगीक ठूठ गिरहसँ जै नबका कोंपरक कल्लै आश्चर्यसँ बहराइबला छलै, आकाशक देवता ओकर बिपतिकेँ जानि, ओकरा लेल दयाक जे बून खसेने छल, तकरा दुर्भाग्य आ भ्रष्टाचारक लू झरका देलक। आब कोनो आस कतौसँ नै बाँचल अछि। जौँ ओकरा संग कोनो नकदी जमा-पूँजी होइत तँ कोनो दलालसँ भेट कऽ टका ऊपर धरि पहुँचा कऽ ओ ऐ नोकरी केँ लऽ लितए। मोहनदासक हालत गामक धनीक लोक सभसँ पहिने बुझि गेल आ पहिने जकाँ ओ फेर ओकर पढ़ाइ आ प्रतिभाक हँसी करऽ लागै गेल। ओइ दिन मोहनदास अपमानक कड़ू घूँट पीब कऽ रहि गेल, जाइ दिन पंडित छत्रधारी तिवारीक बेटा विजय तिवारी, जे ओकरा संगे कॉलेजमे पढ़ैत छल आ थर्ड डिवीजनसँ बड़ मुश्किलसँ बी.ए. पास भऽ सकल छल मुदा अप्पन ससुरक तिकड़म आ पैरवीसँ पुलिसमे सब-इंस्पेक्टर भऽ गेल छल, ओकरापर गरैज कऽ बाजल आ कहलक, "मोहना, परसुए हम सरकारी योजनामे दस टा महीस किनने छी। डेयरी खोलि रहल छी। जौं ठीक बुझी तँ महीससक सानी-भुस्सा, गोठुल्लाक काज कस्तूरी भऊजीक संग सम्हारि लिअ। सभ मास पहिलुक तारीखकेँ दरमाहा तँ भेटबे करत, इंदिरा आवास योजनामे हम अहाँकेँ मकान पक्का सेहो करबा देब। भऊजीक मोन लागि जाएत हम्मर गोसारेमे।' "सोचि कऽ बताबैत छी।' मोहनदास जबाव देलक आ अप्पन भीतर उठैत अपमानक आगिकेँ मुँह घुमा कऽ नुका लेलक। विजय तिवारीक मुँहसँ कस्तूरीक नाम सुनि कऽ ओकरा भीतर कतौ अप्पन असहायता आ निर्बलताक अहसास गहींर भऽ गेलै आ एकटा डर सेहो दिमागक कोनो-कोनामे आबि गेलै। जल्दिये किछु करए पड़तै, नै तँ ओकर परिवार टूटि कऽ छिड़िया जाएत। कोनो एहन काज, जे ओकरा वशमे छै। जकरा लेल ककरो मदति आ तिकड़मक जरूरत नै छै। कस्तूरीक सुन्नर चेहरा आ विजय तिवारीक शातिर आँखि बेर-बेर ओकरा आगू घुमि जाइत छल। ओइ काल ओ सोचि लेलखिन जे ओ अप्पन प्रमाणपत्र, अंक-सूची आ दोसर कागचक पता करबा लेल ओरियंटल कोल माइंस नै जाएत, किएकि ओइ कागचक टुकड़ाक मूल्य कतौ किछु नै रहि गेल छलै। जइ आधारपर नोकरी भेटैत छल आ सरकारी योजनाक लाभ उठाओल जाइत छल, ओ आधार ओकरा सन लोक लग नै छलै। मोहनदास ओइ राति खेनाइ खेलाक बाद घरमे नै सुतल। कस्तूरीसँ भोरमे घुरैक गप कहि कऽ कन्हापर कोदारि राखि आ रोपा टांगि कऽ ओ कठिना धार दिस चलि गेल आ भरि राति कोनो बताह प्रेत सन मतीरा, खरबूज, कुम्हर, तरबूज, टमाटर, भट्टा, ककड़ी लगाबैक लेल पलिया बनाबैमे लागल रहल। भोर साढ़े चारि बजेक आसपास, जखन उत्तरबरिया कात ध्रुवतारा अप्पन पूर्ण आभामे दोसर ताराक एक्का-एक्की मिझैलाक बाद चमकि रहल छल, मोहनदास अप्पन माथ आ छातीक पसेनाकेँ पोछि आ कनी-कनी बुलैत कठिनाक धारमे ठाढ़ भऽ गेल। अंजुलिमे पानि भरि ओ अप्पन माथपर छींटा मारलक आ दुनू हाथ जोड़ि कऽ बाझल गड़सँ कहलक, "बस अहाँ टा आँखि नै मोरब कठिना माय। तोहरा मलइहा मायक किरिया। हमर बेटा देवदासक किरिया। हमर पसेनाक उपजिसँ अप्पन पेटक जठर आगि नहि बुझाएब कठिना माय...! नै तँ...दयऊ कसम, बीच असाढ़ तोहर धारमे बाल-बच्चा संग कूदि कऽ तोहर पेट हम भरि देब...।' मोहनदास जखन सतगुरु कबीरक नाम जपैत कठिना धारसँ बाहर आबि रहल छल, तखैन ओकर आँखिसँ बहैत नोर कठिना धारक पानिमे ढबकि कऽ बहि रहल छल, जतए छोट-छोट कोतरी माँछ ओकर नूनकेँ चीखै लेल एक-दोसरासँ उपरौंझ कऽ रहल छल। जखन मोहनदास घर पहुँचल तँ ओ देखलक जे कस्तूरी पूरा आंगैनकेँ गोबरसँ नीपि कऽ राखने छल, माय पुतलीबाइ सूपपर मतीरा, कद्दू, खरबूजक बिया पसारि कऽ अप्पन आंगुरसँ लजबिज्जीकेँ बीछ रहल छै, बाप काबादास परछीक कोनमे बाँसक कमची निकालैमे लागल छै आ मांझ आंगनमे ओकर डेढ़ बरखक बेटा देवदास खुरपीसँ घासकेँ छिलैक बुतरूबला खेल खेलाइमे मगन छै। ओकर बुलबाक आहट सुनि कऽ पुतलीबाइ अप्पन मूड़ीकेँ ऊपर केलक आ किछु नै लखा दैबला आँखिसँ अप्पन बेटाक आँखि मिला कऽ मुस्काइत कहलक, "जानैत छीहीं मोहना, आइ अलोपी मैनाक खोतामे मादा मैना दुइ टा बच्चाकेँ जन्म देलक।' पुतली बाइ बेसी खुश हेतियै जौं लखा दैतियै जे ओकर गप सुनि ओकर बेटा मोहनदासक चेहरापर खुशी कोन तरहेँ दिपदिपा रहल छै। ओइ दिन-रातिमे बियारीक बाद मोहनदास कस्तूरी आ देवदासकेँ सेहो अपना संग कठिना धार लऽ गेल। कस्तूरी अप्पन डाँड़क खोंइछ-ओटनीमे कतेक रास बीया राखने छल आ कान्हपर देवदासकेँ बैसैने छल। मोहनदासक कान्हपर रांपी, कोदारि आ बगइक डोरी छल। देवदास कनी कालमे धारक कातक ठाढ़ हवाक झोंकसँ भेटैबला सुखमे डूमि कऽ गहींर नीनमे सूति गेल छल। कस्तूरी आ मोहनदास बीया उगाबैक पलियामे गोबरक खाद दऽ कऽ अलगे-अलग फल आ तरकारीक पलहा बनाबैमे लागल रहल। दुइ घंटामे काज भऽ गेल। कस्तूरी जखन बासन-घैलासँ कठिनासँ पानि आनि कऽ बीयाकेँ पलियामे पटा रहल छल तँ आकाशमे टिमटिमाइत रहल ताराक इजोतमे मोहनदास ओकर सुंदरताकेँ देखि रहल छल। आकाशक नक्षत्रसँ झरैत सलेटी चानीक मद्धिम आभामे कस्तूरीक पिरसाम देह मलइहा मायक मढ़ियाक बाहर राखल ओइ पुरनका पाथरक मूर्ति जेहन देखा दऽ रहल छल, जे बन्हेरू पोखरिकेँ कोड़ै काल निकलल छल आ जेकरा आनि कऽ लोक सभ ओतए राखि देने छल। देह, डांड़, बांहि, छाती, जांघक ठीक ओहिने कटाव आ ओहने सुंदरता, जना कोनो कारीगर छेनी-हथौरी लऽ कऽ मन लगा कऽ बरखमे हुनका रकम-रकम गढ़ने छल। अधासँ बेसी राति बीत गेल छल। टिटहरी आ पनकुकरीक शोर कखनो-काल सुना जाइत छल। कठिना धारक भारी हवाक भारीपनमे कस्तूरीक देहसँ उठएबला पसेनाक गंध मोहनदासकेँ चारू दिससँ घेर लेलक। ई स्त्री ओकरासँ ब्याह करै काल कोन सपना देखने हेती आ ओकरा की भेटल? भोरसँ लऽ कऽ राति धरि, सभ दिन बिना नागाक, सभ सुख-दुख, हारी-बेमारी, भूख-प्यासमे ओ ओकरा संग ठाढ़ छल। मोहनदासक मनमे कस्तूरीक लेल बड़ सहानुभूति आ आत्मीयता आएल। ओ ओकरा एकटकसँ ताकि रहल छल। कस्तूरी बासनकेँ बालुपर टिकौलक आ ठाढ़ भऽ कऽ अप्पन जूड़ा बान्हऽ लागल। मोहनदास उठि कऽ ओकरा लग आएल। कस्तूरी चुप छल। "ऐ कस्तूरी, कबड्डी खेलब?' मोहनदास मुस्काइत कहलक, "हू...तू...तू...!' ओ कस्तूरीक बाँहिकेँ पकड़ि लेने छल आ ओकर बगली आ पेटमे गुदगुदी करऽ लागल छल। कस्तूरी ओकरासँ छूटऽ लेल छटपटा रहल छल, "ईह...ईह...! देवदास जागि गेल...! की करैत छी? छोड़ि... दिअ...हमरा छोड़ू ने!...छोड़ू...! ' कस्तूरी देखलक जे मोहनदास ओकरा छोड़ैबला नै अछि तँ ओ ओकरा धक्का दऽ देलक आ घुरि कऽ कठिना धार दिस भागि गेल। ओ कोनो उल्लसित स्वतंत्र हिरण जना तरपान मारि नक्षत्रक धुँआइत सिलेटीक फरीच्छमे नीचाँ दूर धरि पसरल धारक रेतपर दौगि रहल छल। "आ...आ...आ...! हमरा छुबौ....तँ जानियह....! आ...आ....!' ओकर आवाज सभ पल दूर भेल जाइत छल आ ओ प्रति पल छाह बनैत अन्हारमे बिलायल जा रहल छल। "हू...तु...तू...तू...तू...तु...तू...तू...! ' कहैत मोहनदास खूब जोरसँ ओकरा दिस दौगल। कस्तूरी आओर दम लगौलक। मोहनदास सभ पल ओकरा लग आबि रहल छल। ओ आर जोर लगेलक आ कठिना धारक काते-कात, पानिमे छप-छप करैत पूरा जी जानसँ भागैत चलि गेल। "आ...आ...! छूबौ हमरा...तँ हम मानब!' ओकर दम फुलऽ लगलै। ओ हाँफै लागल छल। मोहनदासक "हू...तु...तू...तू...' सभ क्षण ओकर कान लग आबि रहल छलै। कस्तूरी बुझै छल जे ओ आब मोहनदासकेँ आर छका नै सकत, तकर बादो ओ आखिरी जोर लगौलक। मुदा तखैन धरि एक्के तरपानमे मोहनदास ओकरा पकड़ि लेलक। दुनू कठिनाक धारमे छपाकसँ खसि गेल। "छोड़ू...! ऐ...छोडू!' ओ झगड़ा कऽ रहल छल आ मोहनदासक ऊपर पानि उपछि रहल छल मुदा मोहनदास ओकरा छोड़बाक बदला ओकरासँ आर सटल जा रहल छल। धारक भारी हवामे दुनूक साँस एक-दोसरामे पैसि रहल छल। ओ जेहन तरहे ओकर देहमे अप्पन आंगुरसँ गुदगुदी कऽ रहल छल, ओइसँ कस्तूरीक गरसँ निर्बन्ध किलकारी आ हँसी बहरा रहल छलै। ओकर छद्म प्रतिरोध शिथिल भऽ रहल छलै आ ओ सेहो मोहनदासकेँ दूर धकेलैबला दिखावाक संगे ओकर देहसँ सटल जा रहल छल। तहिना जना लोहाक कोनो टुकड़ा कोनो चुंबकसँ सटै छै। मोहनदास कठिनाक पानिमे ओकरा खसा देलक आ ऊपर ससरि कऽ कहलक, "अहाँ बड़ नीक छी आ कतेक सुंदर छी कस्तूरी...! देखू हमरा...!' आ ओकर चुम्मा लेलक। वैशाख ओ गरम रातिमे दूर आकाशमे टिमटिमाइत ताराक मद्धिम सलेटी इजोतमे, कठिना धारक शीतल पानिमे दूइटा जवान गोंछ वा पाढ़िन मांछ सन ओ दुनू उद्दाम आ निर्बंध छपाछप कऽ रहल छल। बीच-बीचमे कस्तूरीक कंठसँ उठैत हँसी आ किलकारीक संग मोहनदासक भारी साँससँ निकलैत "हू...तु...तू...तू' रातिक निस्तब्धताकेँ चिरैत जाइत छल। थाकल कस्तूरी धारसँ घुरि कऽ भीजल नुआमे देवदासक बगलमे सुति गेल छल मुदा मोहनदास नै जानि कतेक राति धरि कठिनाक कातक उथली धारमे पड़ल रहल, आकाशक देवताकेँ तकैत गाबि रहल छल, "पंछी-परौना बाजैत अछि, कतऽ गेल हे संगवारी, करउंदा फरत हे... करउंदा फरत हे... मोर बाली हे उमरिया करउंदा बता तोला के...' ओकर गरमे आइ एकटा एहन सुर उतरि गेल छल जे दूर धरि सुना दैत पुनकुकरी आओर टिटहरीक बोल सेहो ओकरा लग आबि कऽ संगत करऽ लागल। बादमे शारदा ओइ रातिक स्मृति बनल। ओइ बरख तँ ककड़ी-तरबूज आओर तरकारीक फसिल नीक भेल मुदा बाजारक भाव मंदा भऽ गेलासँ कमाइ कोनो खास नै भेलै। कस्तूरी गढ़ुआरि छल, तकर बादो ओकरा दोसरक मजूरी करहि पड़ैत छलै। मोहनदास सेहो जी-तोड़ मेहनति करैत छल। कठिना एक बेर तँ ओकर प्रार्थना सुनि नेने छल मुदा बादमे बेसी काल ओइमे पानि झझा जाइत छलै। काबा दासक खोँखी बढ़ऽ लागल छलै। मुदा छह किलोमीटर दूरक कस्बाक सरकारी अस्पतालमे एकटा खूब नीक डॉक्टर आबि गेल छलै, डॉक्टर वाकणकर, आ मोहनदासकेँ बुझेलै जे टी.बी.क लेल अस्पतालमे मुफ्त दबाइ भेटैत छै आ ओकर बापकेँ एकर पूरा कोर्स करबाक चाही। ओ हुनका एकटा पॉलिथिनक थैलीमे दू मासक दवाइक खुराक भरि कऽ देलक मुदा काबादास नै तँ समएपर खुराक लैत रहथिन आ नै परहेजे राखि सकैत छल। खाइ-पीबैक कोनो ठेकान नै छलै। माय पुतलीबाइ आँखिक लेल डॉक्टर वाकणकरकेँ कहलखिन जे आपरेशनसँ चालीस पैसा इजोत घुरि जाएत मुदा एकरामे आठ-दस हजार टकासँ कम खर्चा नै होएत। ओ मोहनदासकेँ भरोस देलक जे जौं जिलामे कोनो नीक आ ईमानदार कलेक्टर आओत तँ ओ ओकर ई काज करबा देत। मुदा बरखपर बरख बीतल गेल, एहन कलेक्टर नै आएल। बीचमे एक बेर एकटा स्वयंसेवी संस्था दिससँ एकटा लड़का आ एकटा लड़की बंसहर-कबीरपंथीक बस्तीमे आबऽ लागल छल। ओ कस्तूरी आ मोहनाकेँ कतेक रास आश्वासन देलक जे जल्दिये ओ एहन कोनो व्यवस्था कऽ देत जे ओकर परिवार अप्पन गुजर-बसर आरामसँ करऽ लगताह। ओ कतेक रास अर्जी सेहो लिखलक आ ओकरापर मोहनदाससँ दस्तखत सेहो करौलक। मुदा फेर ओकर आएब-जाएब बंद भऽ गेल। पता लागल जे दुनू लड़का-लड़की ब्याह कऽ लेलक आ ओ दिल्ली चलि गेल। ओ लड़की आब कोनो टी.बी. चैनलमे काज करैत अछि आ लड़का दिल्लीमे अप्पन आइ.ए.एस. फूफाक सहायतासँ झुग्गीमे रहैबला लोक लेल काज करैए बला संस्था खोलि लेल छल आ देश-विदेशक जत्रापर रहैत अछि। समए बितैत गेल। मोहनदास आ कस्तूरी अप्पन मेहनत-मजूरी आ मलइहा मायक कृपासँ कोनो तरहेँ दिन गुजरि रहल छल। शारदा दू बरखक भऽ गेल छल आ देवदास चारि बरखक। काबा आब बेसी-खाटेपर पड़ल रहैत छल। बगइक डोरी कखनो काल बना दैत छल वा बाँसक कमची निकालि दैत छल। मुदा ओकर खोँखी बढ़िते जा रहल छल। ओकर छातीक एक-एकटा पसली गानल जा सकैत छल। कतेक बेर ओ खांसैत छल तँ कफक संग खूने टा नहि, लागैत छल जना मौसक थक्का बाहर निकलि रहल छै। ओम्हर डॉक्टर वाकणकरक बदली नेता-अफसर कोनो दोसर जिलामे करा देलक। आब मोहनदासकेँ अस्पतालसँ टी.वी.क मुफ्त गोली दैबला कियो नै छल। जखन कखनो ओ जाइत छल, ओ अगिला हफ्ता आबैक लेल कहि देल जाइत छल। ओकर बाप काबा एतेक कमजोर भऽ गेल छल जे खोँखीकेँ थूकलाक बाद, खाटपर पटायल-पटायल चुपचाप धरतीकेँ देखैत रहैत छल। चिट्ठा आ माँछी धरि ओकर खोँखीक आवाज चिन्है छल, पता नै कतएसँ मटा आ चिट्टा ओकर कफ दिस झुंड बना कऽ दौगि पडै़त छल। एक दिन तँ काबा हदसि गेल, जखन ओ देखलक जे ओकर खोंखी करैत देरी गिद्धा माछी भिनभिन करैत ओकर चारू दिस मँडराबऽ लागल। काबाकेँ अप्पन अंत लग आएल बुझाए लागल छल। ओ पुतलीबाइकेँ शोर करऽ चाहलक मुदा जखैन धरि ओकर आवाज निकलितियै, तकर पहिने खोँखीक तेज दौरा ओकर गरकेँ फेरसँ अप्पन कब्जामे कऽ लेलकै आ आखिरमे ओतएसँ आँजुर भरि खून आ मांसक थक्का बाहर निकलल। मोहनदास आ कस्तूरी कठिनाक पलिया संभारै लेल जा चुकल छल, घरमे आन्हर पुतलीबाइ टा छल। ओ दौगि गेल, गिरैत-पड़ैत आएल आओर अप्पन वर काबाकेँ छुबि-छुबि कऽ कानऽ लागल। पौरुकासँ ओकर ठेहुनमे गठिया धऽ लेने छल। काबा बेहाल रहै। कनी देरीमे ओकर साँस स्थिर भेल आ पुतलीबाइकेँ बिगड़ि कऽ कहलक, "कानै किए छी अंधरी? हम एखन नै मरब। देवदासक बियाह आ शारदाक दुरागमन करा कऽ मरब। ...नै कानू।' काबा अप्पन कनियाँक माथपर हाथ फेरलक आ कहलक, "दिअ हमरा बाँस आ कुरहड़ि। हम बाँसक कमची छील दैत छी।' (एतए ठाढ़ भऽ जाउ एक मिनट। अहाँकेँ लागि रहल हएत जे हम हिन्दीक कथा सम्राट प्रेमचंदक सवा-सएम जयंतीक अवसरपर समकालीन कथाक बहन्ने अहाँकेँ कोनो सवा सए बरख पुरनका खिस्सा सुना रहल छी। मुदा सत तँ ई अछि जे एहन पुरनका आ पिछड़ल शैली, शिल्प आ भाषामे जे ब्यौरा अहाँक सोझाँ अछि ओ ओइ कालक अछि जखन ९/११ सितम्बर भऽ गेल छै आ न्यूयार्कक दूटा गगनचुंबी व्यापारिक इमारतकेँ खसबाक प्रतिक्रियामे एशियाक दूटा सार्वभौमिक, संप्रभुता-संपन्न राष्ट्रकेँ गर्दा आ कदबामे बदलल जा चुकल छै। जखन अमेरिका आ योरोपक भगवानक अलावा बाकी सभटा भगवानक आगू प्रार्थनामे ओ लिबल फासिस्ट, आतंकवादी आ सांप्रदायिक मानि लेल गेल। तेल, गैस, पानि, बजार, नफा आ लूटैक लेल सभ दिन कंपनी, सरकार आ सेना समुच्चा धरतीपर दिन-राति निर्दोषक हत्या कऽ रहल छै। एहन काल, जकरा नीक जना देखू तँ जे कोनो सत्तामे छै, ओइमे सभ कियो एक-दोसराक क्लोन अछि। सभ कियो एक सन ब्रांडक उपभोक्ता अछि। ओ एक्के जेहेन चीज पाबि रहल अछि, एक्के सन चीज खा रहल अछि। एक्के सन कंपनीक कारमे घुमि रहल अछि। सभक एकाउंट एक्के सन बैंकमे अछि। सभक जेबीमे एक्के सन ए.टी.एम. वा क्रेडिट कार्ड आ हाथमे एक्के सन मोबाइल अछि। एक्के सन ब्रांडक शराबक नशामे अखबारक पेज एकसँ लऽ कऽ पेज थ्री धरि वा टीवी क एकटासँ लऽ कऽ सत्तर चैनल धरि ओ एक्के जेहन धूर्त, निर्लज्ज आ नांगट अछि। नीकसँ देखू, हुनकर चमड़ीक रंग आ हुनकर भाषा एक्के अछि।) मोहनदासक नील रंगक जींसक पेंट आ चरिखाना बुश्शर्टक रंग उड़ि गेल छल आ ठामे-ठाम कस्तूरीक लगाएल चिप्पीसँ भरि गेल छल। काबा दास दिशा-मैदान करबे टा लेल खाटसँ उठैत छल मुदा जखन ओकर नैत-नातिन देवदास आ शारदा ओकरा लग रहतिऐ, ओकरा लागैत रहै जे ओकर देहक मरबठट्ठीमे प्राणे टा नै वरन ममता आ वात्सलताक रस लबालब भरल छै। देवदास अप्पन बब्बा काबाक खाटपर कूद-फान मचाबैत छल आ शारदा अप्पन आजी पुतलीक कोरामे छिड़ियाइत खेलाइत रहैत छल। ओइ दिन आंगनमे मोहनदास आ कस्तूरी बांस आ छींदीक पटिया, खोंभरी आ पथिया-पकउथी बनाबैमे लागल छल। बजारक मोहनलाल मारवाड़ीक दुकान "विंध्याचल हैंडीक्राफ्ट्स' सँ एतेक बड़का आर्डर भेटल छलै जे दू-तीन मास धरि मोहनदास आ कस्तूरीकेँ दम मारबाको फुरसति नै छलै। काबा आ पुतली बच्चा सभकेँ संम्हारने रहै। पचासटा पटिया, पचास टा खोंभरी आ तीसटा पकउथी बनाबैक रहै। काबा बीच-बीचमे अप्पन खाटसँ उतरि जाइत छल आ जखन धरि खोंखी ओकरा बेहाल नै कऽ दैत छलै, बाँस-कमची छीलहिमे ओ लागल रहैत छल। पुरान ईलम आ तर्जुबा छलै। कस्तूरी पटिया ओहिना बुनैत छल जेना ओकर आंगुरकेँ कोनो मशीन चला रहल होइ। साढ़े चारि बरखक देवदास खोंभरीकेँ माथपर लगा कऽ हाथमे बाँसक लाठी लऽ कऽ अढ़ाइ बरखक शारदाकेँ बकरी सन "अर्र अर्र...' करैत जा रहल छल आ छोट सन शारदा तरहत्थी आ ठेहुन भरे गुड़कैत बकरी बनल छल, आंगनक एक कोनसँ दोसर कोन धरि, खसैत-पड़ैत गुड़कि रहल छल। तखने दरवाजापर आहटि भेल। मोहनदासक साढू गोपाल दास अप्पन साइकिलकेँ देवालसँ अड़का कऽ भीतर आएल। ओ बजारक "नर्मदा टिंबर एंड फर्नीचर' मे आरा मशीन चलबैत छल आ मालिकक कहलापर ओसूली लेल साइकिलसँ एतए-ओतए जाइत रहैत छल। गोपालक आबैसँ कस्तूरी बड़ खुश भेल। कतेक दिन बाद ओकर नैहर लगक गामसँ कोनो पाहुन ओकर सासुर आएल छल। पानि-तमाखूक बाद गोपाल मोहनदासकेँ बतौलक जे एखन तीन दिन पहिने ओ ओरियंटल कोल माइंस कोनो काजसँ गेल छल। ओतए गेलापर ओकरा मालूम भेलै जे बिछिया टोलक बिसनाथ ओतए मोहनदासक नामसँ पछिला चारि बरखसँ डिपो सुपरवाइजरक नौकरी कऽ रहल अछि आ दस हजारसँ बेसी सभ मास दरमाहा लऽ रहल अछि। गोपालदास कहलक जे ओकरा पता लगलै जे बिसनाथक बाप नागेंद्रनाथ भर्ती दफ्तरक बाबूकेँ पटिया कऽ मोहनदासबला नोकरीक चिट्ठी अप्पन अवारा बेटा बिसनाथकेँ दऽ देलक। मोहनदास साक्षात्कारक दिन जे प्रमाणपत्र आ अंक-सूची जमा केने छल ओइमे मोहनदासक फोटो नै लागल छलै, एकर फाएदा उठा कऽ बिसनाथ अपनाकेँ मोहनदासक रूपमे प्रस्तुत कऽ देलक आ सभ ठाम अप्पन फोटो लगा कऽ अदालती हलफनामासँ लऽ कऽ गजेटेड अफसर धरि सँ ओकरा प्रमाणित करा लेलक। ऐ तरहे बिसनाथ ओरियंटल कोल माइंसमे मोहनदास बल्द काबा दास, जात कबीरपंथी विश्वकर्मा बनि कऽ निचेनसँ डिपो सुपरवाइजरक नोकरी करऽ लागल आ दस हजार मास दरमाहा लिअ लागल। गोपालदास कहलक जे ओ बिसनाथकेँ कोलियरी लग एकटा होटलमे चाह पिबैत देखने रहए, ओकर गरमे जे प्लास्टिकक आइ. कार्ड टांगल छलै ओइमे नाम तँ मोहनदासक छल मुदा फोटो बिसनाथक छल। एतबेटा नै ओकरा संग ओइ काल जतेक लोक छल ओ सभ ओकरा मोहनदासे कहि रहल छल। ओतए इहो पता लागल जे बिसनाथ अप्पन गाम बिछिया टोलामे रहब चारि सालसँ छोड़ि देने अछि आ आब ओरियंटल कोल माइंसक वर्कर्स कॉलोनी "लेनिन नगर' मे बाल-बच्चा संग रहि रहल अछि, जतए ओकर कनिया ब्याजपर टका देबाक धंधा करैत छै आ चिटफंड चलाबैत छै। मजाबला गप ई रहै जे लेनिन नगरमे रहैबला सभ गोटे बिसनाथकेँ मोहनदास आ ओकर कनिया अमिताकेँ कस्तूरी मैडम नामसँ जनैत छै। बिसनाथ मोहनदासे जना बी.ए. तँ छै नै, दसमा फेल छै, ताइसँ कोलियरीमे काज करबाक बदला अफसरक चापलूसी, कोयलाक तस्करी आ यूनियनबाजीमे लागल रहैत छै। अप्पन साढू गोपालदासक गप सुनि मोहनदासक माथ घुमि गेलै। एना कोना भऽ सकैत छै? कोनो लोक ओना कोना दोसर लोक बनि सकैत अछि? आ सेहो दिने-देखारे, सोझाँ-सोझी एना भऽ कऽ? एकाध दिनक लेल नै, पूरे चारि सालसँ? मुदा मोहनदास अप्पन गरीबी आ लचारीमे जेहन दिन देखले छल आ अप्पन बाप काबासँ ओ ओकर जिनगीक जे पुरान खिस्सा सुनने छल, ओइसँ ओकरा लागलै जे अफसर-हाकिम, धनीक-मनीक आ पार्टीबला लोक एतेक तागतिबला होइत अछि जे किछु नहि कऽ सकैत छी। ओ कुकुरकेँ बड़द, सुग्गरकेँ बाघ, खधाइकेँ पहाड़, चोरकेँ साहु- ककरो किछु बना सकैत अछि। मोहनदासँके अप्पन साँस रूकैत सन बुझाएल। हे सत् गुरु, केहन काल अछि जे चारि बरखमे एतए एक्को टा लोक एहन नै भेल जे कहि सकैत छल जे ओरियंटल कोल माइंसमे जे लोक मोहनदासक नामसँ सभ मास दस हजार दरमाहा लऽ रहल अछि ओ मोहनदास नै बिसनाथ अछि, जकर बापक नाम काबा नै नगेंद्रनाथ छिऐ, जकर कनियाँक नाम कस्तूरीबाइ नै अमिता भारद्वाज छिऐ आ जकर माए पुतलीबाइ नै, रेनुका देवी छिऐ?...जे पुरबनरा गामक नै बिछिया टोलक बसिन्दा अछि? जे बी.ए. पास नै दसमा फेल अछि...? ओइ दिन पटिया बुनैत-बुनैत मोहनदास बेर-बेर ठमकि जाइत छल। ओकर आँखि कतौ बिसरा जाइत छलै आ ओ किछु-किछु सोचैत गुम भऽ जाइत छल। बाँसक कमची बनबैत-बनबैत ओकर हाथ भसिया जाइत छल। एक बेर तँ कचियासँ ओकर हाथ कटैत-कटैत बचल। कस्तूरी सभ किछु देखि रहल छल आ अप्पन वरक भीतर चलि रहल उथल-पुथल आ बेचैनीकेँ नीकसँ बुझि रहल छल। ओ मोहनदासक हाथसँ कचिया लऽ लेलक आ कहलक, "आइ रौद किछु बेसिये छै। जाउ, अहाँ हाथ-मुँह धो कऽ कनी काल पटाय रहू।” अगिला भोर सात बजेबला बस पकड़ि मोहनदास ओरियंटल कोल माइंसक लेल बिदा भेल। राति भरि ओकरा नीकसँ नीन नै एलै। ठीक साढ़े दस बजे ओ कोलियरी पहुँचि गेल। दिक्कत ई छल जे ओ ओतए ककरासँ गप करितिऐय? केकरो तँ ओ जनैत नै छल? ऊपरसँ ओकर बगेबानी एहन छलै जे केकरो ई मानबामे दिक्कत होइतै जे असली मोहनदास वएह छी जे एम.जी. कॉलेजसँ बी.ए. फस्ट डिवीजन अछि आ आइसँ किछु बरख पहिने जकर फोटो अखबारमे छपल छल। दिक्कत ईहो छलै जे ओकरा लग ओ अखबार नै बचल छलै जइमे छपल अप्पन फोटो देखा कऽ ओ बता सकैत छल, "देखू, हमहीं छी मोहनदास, वल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, जिला अनूपपुर, मध्यप्रदेश जे एम.जी. शासकीय डिग्री कॉलेजसँ बी.ए.क परीक्षामे मात्र किछु बरख पहिने, फस्ट डिवीजनक संग मेरिटमे दोसर स्थान हासिल केने छल। चेहराक मिलान कऽ देखि लियौ। हमहीं छी असली मोहनदास।' बड़ मोश्किलसँ मोहनदासकेँ फाटकक भीतर आबऽ देल गेल। ओकर नील रंगक पैंट ठेहुन धरि फाटि गेल छल। पाछाँसँ घसा कऽ ओ जाफरी बनि गेल छल जतए कस्तूरी ओही रंगक चिप्पी साटि देने छलै, जे या तँ ओकर पुरना ब्लाउजमे सँ निकालल गेल छल या पुरना चद्दरिमे सँ। रौद, गुमार, ठंढी, कड़ाचूर मेहननि आ एतेक दिनुका भूख-पियास मोहनदासक चेहरा आ चामक रंगकेँ स्याह-पकिया बना देने छलै। दुख आ बिपति ओकर चेहरापर एतेक डड़ीर खेंचि देने छलै जे लागैत नै छल जे ओकर उमेर एखन चालीसकेँ पार नै केने अछि। जतेक बेर अप्पन अभावक बोझसँ ओ कुहरैत छल आकि अपमानक आगिमे चुपचाप लहकैत रहल, ओकर भौं आ हाथ-छातीक रोइयां उज्जर भेल गेल। तीस-पैंतीसक उमेरमे ओ पचास-पचपन सन लगैत छल। मोहनदास ओइ दफ्तरक आगू ठाढ़ छल जतए चारि बरख पहिने ओ अप्पन सभटा सर्टिफिकेट आ कागज जमा करै लेल गेल छल आ जतए काज करैबला बाबू भरोस देने रहैक जे अहाँक नाम तँ कहियो कटि नै सकैत अछि, किएकि लिखित आ शारीरिक परीक्षामे अहाँ सूचीमे सभसँ ऊपर छी। मोहनदास देखलक जे वएह बाबू ओइ कोठलीमे बैसल अछि, जकरासँ ओ पहिने भेँट करैत छल। ओकर कुर्सी पैघ भऽ गेल छलै आ आगूक टेबुल सेहो। ओकर पीठक पाछाँ ठाढ़ हवा फेकैबला ए.सी. लागल छलै। मोहनदास दरबज्जा लग ठाढ़ भऽ कऽ देखि रहल छल जे बाबू बिस्कुट खा आ चाह पीब रहल अछि आ ओकर आगूक कुर्सीपर दू गोटे बैसि कऽ आस्ते-आस्ते रकम-रकम गप कऽ रहल अछि। एकाएक बाबू ओकरा दिस देखलक तँ मोहनदास कल जोड़ि कऽ नमस्कार केलक आ पुरनका यादकेँ जगाबैक लेल ओकरा दिस देखि कऽ मुस्कुरायल। बाबूक माथपर जोर पड़ि गेलै। किंसाइत ओ ओकरा चीन्हि नै सकल। मोहनदास ओकरा दोबारा कल जोड़ि कऽ नमस्कार केलक आ बाजल, "साहब, हम मोहनदास...!' मुदा तखन धरि बाबू अप्पन मेजक नीचाँ लागल घंटीक स्विच दबा देलक। बड़ जोर कटाह सन खरखरायल अवाज भेल आ एकटा चपरासी दौगैत भीतर गेल। बाबू ओकरापर कनी बिगड़ल जे मोहनदास नै सुनि सकल। चपरासी आबि कऽ कोठलीक पर्दा खेंचि देलक आ मोहनदासकेँ माथसँ पएर धरि निङहारि कऽ कहलक, "की काज अछि? जाउ ओम्हर बैसू, ओसाराक ओइ ब्रेंचपर...! एम्हर कोना आएल छी?' मोहनदास ओकरा कहऽ चाहलक जे ओकर नाम मोहनदास छिऐ आ आइसँ चारि बरख पहिने ओ कोलियरीमे नोकरी लेल सलेक्ट भेल छल आ अप्पन सभटा कागज ओइ आफिसमे जमा केने छल मुदा ओकर ठाम कियो आर लोक ओकर नामसँ नोकरीपर लागि गेलै....। ओकर अवाज ततेक कमजोर छलै, ऊपरसँ चपरासी ओकरा जेना धकलैत ओसाराक कोनामे राखल बेंच दिस लऽ जा रहल छल, ओइसँ धरफड़ीमे बाजल गेल ओकर गपक लाइनमे कोनो तारतम्य नै रहि गेल छलै। गरमे किछु फँसि रहल छलै आ ओ तोतरा रहल छल। मोहनदासकेँ बकौर लागि गेलै मुदा ओ चपरासीसँ अप्पन बाँहि छोड़ाबैत बाजए लागल, "भाइ, एक बेर ओइ बाबूसँ भेँट करा दिअ। हमरा अप्पन प्रमाणपत्र आ मार्कशीट वापस लेबाक अछि।' चपरासी हुनका धकियाबैत देवालसँ सटल लकड़ीक बेंचपर बैसा देलक आ जाए लागल। मोहनदास बुझि गेल जे आब ओकरा दोबारा एतए धरि आएब मुश्किल हेतै। ई आखिरी बेर छै। ओ जोरसँ चपरासीपर गरजल जे भर्ती कार्यालयक दरवाजासँ भीतर पैसि कऽ नपत्ता होए बला छल। " हे...हे..! जा कऽ ओइ बाबूसँ कहियौ जे मोहनदास बी.ए. आएल अछि आ 18 अगस्त, 1997 केँ जमा कराएल अप्पन सभटा कागज आपस मांगैत अछि...। तमाशा बना कऽ राखि देने छै। कोठली आ कुर्सीमे बैसि गेल छै तँ कि अंधेर मचेतै? ...दिअ, पर्ची दिअ, हम अप्पन नाम लिख दैत छी...! बाबूकेँ दऽ देबै!' चपरासी एक बेर तँ सन्न रहि गेल। कोनो बूढ़ भिखमंगा सन चेथरीमे घोंसिलाएल एहि लोकक गरसँ बड़ नीक फरिछायल भाषा निकलि रहल छै। एहन भाषा आ लहजा जे पढ़ल-लिखल बाबू आ अफसरक होइत अछि। चपरासी दरवाजापर किछु काल ठमकल आ मोहनदासकेँ निङहारैत रहल। फाटल बेरंग भेल, ठामे-ठाम चिप्पी लागल पेंट, फाटल घिनायल चौखुटा बुश्शर्ट। चनेल भेल माथपर सुखल बिखरल खिच्चड़ि सन अधपक्कू केस। झुर्री आ भङतराह सन, टेढ़-टूढ़ झुर्रीसँ भरल पकिया रंगक अस्कताइत चेहरा। गहींर, धँसल, कनी-कनी मिझाइत सन अपनाकेँ देखैत, हताश कमजोर आँखि। नीचा पएरक आंगुरमे कोनो तरहे ओझराएल रबड़क कतेक पुरान, सस्त चप्पल, जकरा बेरोजगारी, अभाव, दुख आ हताश रबड़क रहैये नै देलक, माटि, काठ आ कागचक बना देल छल। "बुरबलेल...! सार बताह...! बहानचो... कोन पार्टी आ अफसर अहि ससुर भुक्खलक संग देत?' यएह ई फदरैत रहै जइसँ चपरासीक ठोढ़ तामसे हिलि रहल छलै। मोहनदासकेँ लागलै जे चपरासीकेँ ओकर गपपर विश्वास नै भऽ रहल छै मुदा भगवान जानै छल जे ओ सत बाजि रहल छल, ताइसँ ओ बेंचसँ उठि कऽ आत्मविश्वाससँ भरि सधल चालिसँ ओकरा दिस बढ़ल। ओकरा मनमे छल जे ओ जा कऽ ओकरा बुझाबैक प्रयत्न करत जे विसनाथ ओकरे संग टा नै वरन ओरियंटल कोल माइंसक संग जालसाजी आ धोखाधड़ी कऽ रहल अछि। मोहनदास जेहन व्यग्रता आ जल्दीसँ चपरासी दिस बढ़ि रहल रहै आ ओकर चेहरापर दिमागमे चलि रहल उठा-पटकक कारण टेढ़-टूढ़ डड़ीर बनि रहल छल, गहींर धसल आँखिमे जे एकटा खास कछमछीक चमक आबि गेल छलै आ अप्पन सभटा गप एक्के संग कहि दै लेल उग्र व्याकुलतामे ओकर सुखायल पपड़ी पड़ल ठोढ़ जेना थरथरा रहल छलै, ओइसँ चपरासी सत्ते डरा गेल छल। ओ मोहनदास दिस देखैत जोरसँ चिकरल: "हे...हे...! एक्को डेग आगू नै बढ़ाउ, बुझलिऐ! ठाढ़ भऽ जाउ ओइ ठाम बरगाही भाइ...! हम कहै छी, ठाढ़ भऽ जाउ...ओही ठाम...!' "हे...हे... भाय! ...हमर गप तँ सुनू...!' मोहनदास बिगड़ि गेल। गपकेँ सम्हारबा लेल किछु जोरसँ बाजल। मुदा ओकर गपमे विनम्रता कम आ किंसाइत बेचैनी बेसी छलै, जाइसँ गप आर बिगड़ि गेल। चपरासी तति कऽ ठाढ़ भऽ गेल आ जोरसँ चिकरल; "बहीर छी की? थम्हि जाउ ओइ ठाम, नै तँ खुइन कऽ गारि देब बरगाही भाइ! एक्को डेग आगू बढ़ेलियै तँ!' दरवाजा पर हो हल्ला सुनि कऽ दफ्तरक भीतरसँ चारि-पाँच गोटे बाहर बहरा कऽ आएल। ओ अफसर नीक कपड़ामे छल आ घुरि कऽ मोहनदासकेँ माथसँ पएर धरि देखि रहल छल। "के छी?...एतए भीतर धरि कोना आबि गेल?' "सिक्योरिटी ऑफिसर पांडेकेँ बजाबियौ?...ई गार्ड खैनी रगड़ि कऽ कुर्सीपर सुतल रहैए।' "आइ मेन गेटपर ड्यूटी केकर-केकर रहै? ड्यूटी रजिस्टर आनू?' "हे, भगाउ एकरा।' "ई तँ अकड़हर कऽ देलक...! कियो ऐ तरहे अंदर पैसि जाइत अछि, ककरो ठांय-ठांय गोली मारि देत...! हे, किछु नै तँ बमे फोड़ि दितियै...!' "पुलिसमे दऽ दियौ। शर्माजी, मिलाबू अप्पन मोबाइल...वएह सए नम्बर!' मोहनदासक गप कियो नै सुनि रहल छल। ओकरा धकियायल जा रहल छल। माथ, पीठ, कनहा आ मुँहपर थापर, मुक्का, आ कोहनी बरसि रहल छल। मोहनदास दुनू हाथसँ अप्पन चेहरा झांपि कऽ अप्पन आँखि बचा रहल छल। "हम्मर गप तँ सुनि लियौ!...हे...मारू नै! हे...हे...!' एतबैयेमे तीन-चारिटा गार्ड दौगैत आएल। ओइमे एकटा कऽ हाथमे बारह बोरक दुनाली छलै, जेहन बैंकक चौकीदार लग रहैत छै। आ सभक हाथमे डंटा छलै। मोहनदासक पीठ खलोदार भऽ गेलै। ओकर आँखिक आगू कठिना धारमे अमावशक रातिमे देखल सभटा नक्षत्र हहारो करैत, कुहरैत, उकापतंग सन टूटि-टूटि कऽ खसऽ लगलै। कोनो एहन वज्र चोट कतौ पड़लै जे ओकर गरसँ ठीक ओहने कुहरबाक अबाज निकललै, जेहन ओइ सुगरक गरसँ निकलैत छै, जकर टांगकेँ बान्हि कऽ ओकरा गरकेँ रेतल जाइत छै। ओ एहन जोरसँ कुहरल जे कोइला खदानक सभटा कामगार बाहर निकैल गेल आ घेरा बना कऽ ओइ तमाशाकेँ देखऽ लागल। (ध्याद दियौ, ई घटना ओइ कालक छी जखन हिंदूक जगदगुरु अप्पन मठमे बैसि एकटा स्त्रीक संग वएह सभ किछु कऽ रहल छल जे हजार किलोमीटर दूर, कतेक समुद्र पार, व्हाइट हाउसक कुर्सीपर बैसल अमेरिकाक राष्ट्रपति कऽ रहल छल। जखन दजला आ फरात धारक लग कोनो खधाइमे अप्पन जान बचाबैक लेल नुकायल गिलगमेशकेँ एकटा पुरान समुद्री डाकूक वंशज बाहर खींच कऽ ओकर दाँत गानि रहल छल। एहन काल जाइमे जकरा लग जतेक मात्रामे सत्ता छल ओ विलोमानुपात नियमसँ ओतेक बेसी निरंकुश, हेहर, खुनीमा, अनैतिक आ शैतान भऽ गेल छल।...आ ई गप राष्ट्र, राजनीतिक दल, जाति, धार्मिक समुदाय आ लोक धरि एक्के सन लागू होइत छै।) मोहनदास ओरियंटल कोल माइंसक मुख्य गेटक बाहर सड़कपर ठाढ़ छल। एकदम बीचोबीच। ओकर दिमाग किछुओ सोचब छोड़ि देने छलै। एकटा डरौन सन गुमकी छलै जे सौंसे वातावरणमे सांय-सांय करैत बाजि रहल छलै। ओकरा ईहो होश नै छलै जे ओ सड़कक ठीक मांझमे ठाढ़ अछि आ ओकर दुनू कातसँ ट्रक, मेटाडोर, टेंपो आ दोसर गाड़ी हॉर्न बजाबैत ओकरा कोनो तरहेँ थकुचेबासँ बचाबैत तेज गतिसँ लगातार जा रहल छलै। मोहनदासक जेबीमे ओ पर्स एखनो छल जे ओ नोकरी लागैक आसमे तीस टकामे किनने रहए। ओइमे अखनो एक सए सत्तरि टका छलै। ओकर मेहनति आ कमाइक टका। पैंसठि टका बसक किराया देलाक बादो ओकरा लग एत्ते टका बचल छलै। अप्पन जेबीक पर्स छुलासँ ओकर दिमाग शांत हुअए लागल। एत्ते काल बाद ओकरा एकाएक रौदक तेज हेबाक अनुभूति भेलै। ओ झटकारि कऽ सड़कक कात आबि गेल। ओकरा भूख लागल छलै। "मोटू वैष्णव शुद्ध शाकाहारी होटल” ढाबामे खाइत काल ओकरा पता लगलै जे साँझमे एतएसँ राज्य परिवहनक दूटा आर एकटा प्राइवेट बस सेहो ओकर गाम पुरबनरा दिस जाइ छै। एखन तँ खाली एक्के बजल छै। ओ निर्णय लेलक जे ओ एक चक्कर ओरियंटल कोल माइंसक कॉलोनी "लेनिन नगर' दिस घुमि आबए। ओतए किंसाइत चिन्हन-जानल कियो देखा जाए। स्कूल-कॉलेजक कोनो पुरनका सहपाठी आकि कियो आन। लेनिन नगरमे एतएसँ ओतए धरि ओ घुरिआइत रहल। दुपहरिया काल छलै। सभटा फ्लैट एक्के जेहन बनल छलै। लोक काज करबा लेल कोलयरी जाइ गेल छल। घरमे स्त्रीगण आ नेना सभ टा छल। स्कूलक एकटा बस ठामे-ठाम ठाढ़ होइत बच्चा सभकेँ उतारि कऽ आगू चलल जा रहल छल। लेनिन नगर बड़ पैघ कॉलोनी छल। जौँ हमरा संग धोखाधड़ी आ जालसाजी नै कएल गेल होइत तँ हमहूँ अप्पन परिवारक संग लेनिन नगरक एहने कोनो फ्लैटमे रहतौं, सभ मास दरमाहा भेटतिऐ, देवदास आ शारदा ऐ तरहेँ स्कूल ड्रेस आ जूता-पैताबा पहिरि कऽ ऐ बससँ उतरितिऐ। कूलर-पंखामे सुतितिऐ। मुदा केहन भाग्यक खेला छल जे मोहनदासकेँ बिसनाथक फ्लैटक पता पूछै लेल अप्पन नाम लिअ पड़ि रहल छलै। "मोहनदासक फ्लैट कोन छै, भाइ साहेब?' "कोन? ओ सुपरवाइजर साहब?' "हँ...!” "आगू चलि जाउ सोझे। तीन कट छोड़ि कऽ चारिममे बामा हाथ घुमि जाएब। तेसर मकान छै। ए बट्टा एगारह। डॉक्टर जनार्दन सिंहक बगलबला फ्लैट।' फ्लैटक दरबज्जा बंद छल। बाहरी देवालपर नेम प्लेट लटकि रहल छल, जाइपर लिखल छल- "मोहनदास विश्वकर्मा, कनिष्ठ आगार अधिकारी, ओरियंटल कोल माइंस”। मोहनदास कनी काल धरि गुम्म भऽ नेम प्लेट पढ़ैत रहल, फेर ओ कॉलबेलक स्विच दबौलक, जे ठामे नेम प्लेटक नीचाँ छल। मोहनदास एक बेर तँ डरि गेल किएक तँ जे आवाज भेल ओ ठीक वएह कटाह आवाज छल जे भर्ती दफ्तरक बाबूक टेबुलबला घंटीसँ भेल छलै आ तकर बाद ओकरा संग ई दुर्घटना भेल छलै। दरवज्जा एकटा चौदह-पंद्रह बरखक बच्चा खोललक। "साहब नै अछि! अखने निकलल अछि। आगूबला बजारमे लस्सी पिबैत हएत।' छौरा एक्के सूरमे बाजल। "पिबै लेल पानि भेटत की?”, मोहनदासक ठोंठ सुखा रहल छल। रौद बड़ तीख भऽ गेल छलै आ हवामे लू बहै छलै, से ओ झरका रहल छलै। कोलयरीमे जखन ओकरा धक्का मारि कऽ पिटैत बाहर निकालल गेल छल। ओकर कोहनी, गाल आ पीठपर एक-दू ठाम नोछार लागि गेल छलै। ओ नोछार घामक नूनसँ लहरि रहल छलै। "अहाँ एतए ठाढ़ रहू, दैत छी।' छौरा ओकरा माथसँ पएर धरि निङहारलाक बाद कहलक आ भीतर चलि गेल। मोहनदास तीन गिलास पानि सुरकि गेल। छौरा फ्रिजसँ ठरल बोतल निकालि कऽ आनने रहै। पानि पिलासँ ओकर देहमे जान एलै, आँखिमे रोशनी घुरलै आ मोन किछु शांत भेलै तँ ओ देखलक जे गिलास घुरा कऽ लऽ जाएबला छौरा ओकरा सहानुभूतिक संग देखि रहल अछि। "ओकर घरमे एखन के-के छै?', मोहनदास पुछलक। "कियो नै। कस्तूरी मैडम टा छै।...एखन सुतल छै। अहाँ पांच बजेक बाद आउ।' छौरा खाली बोतल आ गिलास लऽ कऽ अंदर जाय लागल तँ मोहनदास कहलक, "अहाँक साहब आबथि तँ हुनकासँ कहब जे पुरबनरा गामसँ मोहनदास आएल छल। साँझकेँ हम फेर आएब।' लड़का भीतर जाइत-जाइत ठाढ़ भऽ गेल। ओ मोहनदासकेँ निङहारि कऽ देखलक आ कहलक, "की कहलिऐ?...के आएल छल!” "मोहनदास!”, मोहनदास जोरसँ बाजल आ रकमे-रकमे मइ मासक आगिमे जरैत आ पसिझैत कोलतारक सड़कपर घुरि कऽ आबि गेल। लेनिन नगरक मार्केट बड़ पैघ नै छल। मुदा आधुनिक हेबा लेल ओ छटपटा रहल छल। तीन-चारि डिपार्टमेंटल स्टोर्स, किछु खुदरा सन किरानाक छोट सन दोकान। डोसा-इडली-बड़ा बला "कावेरी फास्ट फूड”। दू तंदूर, साल मखनी, कड़ाही पनीर, बटर चिकेन, आलू पराठा बला होटल। एकटा देशी आ अंग्रेजी शराबक दोकान, जइमे "एतए शीत बीयर सेहो भेटैत अछि' क बोर्ड लागल छल। पान-सिकरेटक दूटा गुमटी आ प्लास्टिक, इलेक्ट्रानिक्स आ इलेक्ट्रॉनिक्स सामानक, सीसा बला शो-विंडोजबला दूटा दोकान। एकटा कपड़ाक बड़ पैघ हालसन दोकान छल, जकर आगू गेटपर आ सीसाक भीतर सेहो, जालीदार ब्रोसरी आ जालीदार जंघिया पहिरने, अप्पन सभ किछु देखबैत, आदम-ईव सन उज्जर फाइबरक पुतुल ठाढ़ छल। मोहनदास देखलक जे लक्ष्मी वैष्णव भोजनालयक आगू पुलिसक टाटा सुमो ठाढ़ छल, जइमे दू-तीन टा सिपाहीक संग ओकर गामक पंडित छत्रधारी तिवारीक लड़का विजय तिवारी, जे अप्पन ससुरक घुरपेंचसँ दरोगा भऽ गेल छल, लस्सी पीबि रहल छल।...आ बिसनाथ सेहो ओतै छल। बिसनाथ कोनो गपपर ठठा कऽ हँसि रहल छल आ अप्पन लस्सी सठा कऽ टाटा सुमो दिस बढ़ि रहल छल, तखने ओकर नजरि मोहनदासपर पड़लै। ओ सतर्क भऽ गेल। एक क्षण लेल ओकर चेहराक रंग उड़ि गेलै। एखन धरि जे हँसी ओकर चेहरापर नाचि रहल छलै से तुरत्ते बिला गेलै। बिसनाथक चेहरापर आएल गड़बड़ीकेँ अकानि कऽ विजय तिवारी घुरि कऽ देखलक। ओ गाड़ीमे ड्राइवर सीटपर बैसल छल, वर्दीमे सजल-धजल। मोहनदास चेथड़ीमे, लू मे झरकैत, सड़कक कात, बिजलीक खाम्ह लग, लगभग पंद्रह गजक दूरीपर ठाढ़ छल। एकटा तनावसँ भरल गुमकी अनचोक्के ओइ दुपहरियाक रौदमे एतएसँ ओतए धरि पसरि गेल छलै। बिसनाथ गाड़ीपर चढ़ि गेल। विजय तिवारी चाभी घुमा कऽ इंजन स्टार्ट केलक आ एक्के धक्कामे ओकरा दौगबैत जोरसँ ओइ दिस आएल जेम्हर मोहनदास ठाढ़ छल। मोहनदास थकमका गेल आ डोलि कऽ बिजलीक खुट्टा दिस सहटल। विजय तिवारी जोरसँ ब्रेक मारलक आ गाड़ीकेँ मोहनदासक ठीक आगू ठाढ़ कऽ देलक। ब्रेक नै लगितियै तँ मोहनदास खुट्टा संग ओकर चपेटमे आबि जैतियै। मोहनदासकेँ अदंक लऽ लेलकै। "एम्हर आ!', विजय तिवारी ओकरा बजेलकै। आइसँ मोटामोटी सात-आठ बरख पहिने, यएह विजय तिवारी ओकरा संग एम.जी. डिग्री कॉलेजमे पढ़ैत छल। सभ दिन एक्के क्लासमे ओ बैसैत छल। पढ़ै-लिखैमे ओ लद्धढ़ छल। ओकर बाप पंडित छत्रधारी ओकरा मोहनदासक उदाहरण दैत छलै जे सभ बरख फर्स्ट आबैत छल। अखन वएह विजय तिवारी पुलिसक वर्दीमे बत्ती आ लाउडस्पीकर लागल टाटा सुमोमे बैसल ओकरा जइ तरहे निङहारि रहल छल, ओइमे अनचिन्हार बनबासँ बेसी हिंसा आ तामस साफ-साफ लखा दैत छल। एहन की भऽ रहल छल? की मोहनदास गरीब आ निचलका जातिक छल, ताइसँ? वा ताइसँ जे ओ बेरोजगार छल आ अप्पन मेहनतिसँ चुपचाप अप्पन परिवारक आजीविका चला रहल छल? वा ऐ लेल जे ई सभ लोक ओकरा ठकने छल। ओकर अहं मारि देने छल आ आब एतए ओकर सोझाँ ओकर आजादी आ मौज-मस्तीमे बाधा बनि रहल छल? "खुट्टा बचा लेलकै बरगाही भाइ, नै तँ अखन लोथ बनि गेल रहतिऐ!” विजय तिवारी रकमसँ फुसफुसा कऽ कहलक। "हौ छोड़ू! माछी मारि आर हाथ गंध करत!' बिसनाथ बाजल। "ओहिने हुड़कि दैत छिऐ! कखनो एम्हर दिस नै ताकत सार!' मोहनदास अखन धरि अप्पन ठामसँ हिलल नै छल। विजय तिवारी जोरसँ कतेक बेर हॉर्न बजेलक, आ तकर बाद एकाएक गाड़ीक ऊपर लागल स्पीकरमे ओकर आवाज चारू दिस गूंजै लागल, "हे हौ बिसनाथ! गाड़ीक आगू किए कुदलह हौ बिसनाथ? तोहर दिमाग सनकि गेल छह की बिसनाथ? बिसनाथ, बाजैत किए नै छह? बहीर भऽ गेल छह की हौ बिसनाथ! बिसनाथ, हे हौ बिसनाथ!” गाड़ीक भीतर जोरसँ ठहक्का उठऽ लागल छल। "भौजीकेँ एतए नै आनलौं बिसनाथ? असकरे मरै लेल आएल रहह...हे!” बिसनाथ गाड़ीसँ उतरल आ मोहनदास लग आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओ अप्पन जेबीसँ पाँच सएक एकटा नोट निकालि कऽ मोहनदासक शर्टक जेबीमे खोंसि देलक। "सुनू, आब अहाँ अप्पन पुरनका नाम बिसरि जाउ आ आब आइक बाद कहियो लेनिन नगर दिस पएर नै बढ़ाएब! बुझलिऐ! आइ तँ हम दारू नै लस्सी पीबि राखने रही, ऊपरसँ बिजलीक खाम्ह आबि गेल, नै तँ आइ चापि दैतौं। दोबारा कतौ आसपास देखा देलौं तँ कॉलयरीक भट्टीमे छाउर बना देब।” एकर बाद बिसनाथ घूमल आ मोटू वैष्णव ढाबा दिस देखैत जोरसँ गरजल, "हे हौ नंद किशोर, ऐ बिसनाथकेँ एक गिलास लस्सी पिया देबहीं ठंडा! बरफ दऽ कऽ! बरफ दऽ कऽ हौ! हम्मर पड़ोसी गामक अछि बिसनाथ...!” टाटा सुमोक भीतरसँ अनवरत ठहक्काक आवाज आबि रहल छल। बिसनाथ सेहो हँसऽ लागल छल। घुरि कऽ गाड़ीमे चढ़ैत-चढ़ैत ओ रकमसँ विजय तिवारीसँ कहलक, "ई नंद किशोर अछि तँ भखारक ढीमर मुदा एतए बाभन बनि कऽ वैष्णव शाकाहारी होटल चला रहल अछि। सजनपुरक चौबे घरेनक बहूकेँ बियाहि आनलक सार। "पंडीजी कहियौ तँ फूलि कऽ कुप्पा भऽ जाइत छै।” "नीके छै! समांग बढ़ैत छै।”, विजय तिवारी बाजल आ ठहक्का लगा कऽ ढाबा दिस मुँह कऽ बाजल, "बिसनाथकेँ कनेटा सम्हरि कऽ लस्सी पिआयब पंडितजी, उपरका पेंच कनी लूज भऽ गेल छै...! हाँ रूपा हम्मर खातामे चढ़ा लेब।” निफिकिर रहू! निफिकिर! घरक काज छिऐ! पेंच तँ हम सेट कऽ देबै!” मोहनदासक मुँहमे टाटा सुमोक धुरा-गर्दा आ धुँआ छोड़ैत ओ सभ चलि गेल। मोहनदास ओइ ठाम ठाढ़ रहल, बिजलीक खुट्टाकेँ अप्पन हाथसँ थाम्हने। की ई कोनो फिल्म छल जकर सीन एखने-एखन पूरा भेल आ जाइमे ओ सेहो एकटा पात्र छल? वा ई कोनो अजीबे सपना छल? मोटू वैष्णव शाकाहारी ढाबासँ गोर-नार, कारी-चमकैत आँखिक अधवयसू बड़का पेटबला हलुवाइ नंद किशोर लस्सीक गिलास हाथमे थम्हने गरजि रहल छल- "आबू भाइ बिसनाथ! लस्सी तँ पीबैत जाउ!” मोहनदास जखन लेनिन नगरक मार्केटसँ बस स्टैंड दिस जा रहल छल तँ ओकर रस्तामे एकटा परेशान-सन अबैत लोक देखाइ पड़ल। ओ लेनिन नगर दिस जा रहल छल। ओकर अंगाक रंग कहियो लाल छल हेतै जे आब मैल आ पुरान भऽ कऽ कत्थइ भऽ गेल छलै। मोहनदास लग आबि कऽ ओे रूकल आ पुछलक- "भाइ, लेनिन नगरमे सूर्यकांतक फ्लैट कोन छै?” मोहनदासक मोनमे एलै, जखन ओ बिसनाथक पता ताकि रहल छल, तखने ओ ई नेम-प्लेट देखने छल। ओ मन पाड़ैक कोशिश केलक। "आगूसँ दहिन हाथ घुमि जाएब आ सए गज आगू जा कऽ तिनमुहानी लग, मटियानी चौक लग ककरोसँ पूछि लेब। ओतै छै।” जखन ओ सभ जाए लागल तँ मोहनदास रकमसँ ओकरासँ पुछलक- "अहां केकर फ्लैट ताकि रहल छी?” "सूर्यकांतक! उन्नाव लगक गामक छै।” "ओकर गामक की नाम छिऐ?” "गढ़ाकोला...!” "आ अहाँक की नाम छी?” ओ लोक कनी काल चुप रहल। ओकर ठोढ़ थरथरेलै, गहींर धसल आँखिसँ पानि खसऽ लगलै। ओकर सुखाएल गरासँ एकटा क्षीण भरभराएल आवाज एलै- "सूर्यकांत! गढ़ाकोलाक सूर्यकांत।” ओ आदमी घुमल आ रकम-रकम थरथराइत लेनिन नगर दिस बढ़ि गेल। (ई खिस्सा ओइ कालक अछि जखन संसारक सभ देशक सभ सरकारक अर्थनीति आ राजनीति एक्कहि रंगक छल, जखन धनीकक आ गरीबक बीचक खधाइ एत्ते गहींर आ चाकर भऽ गेल छलै जे ओकर कोनो प्रायोजित विज्ञापन नुका नै सकै छल...ओइ काल जखन बीसम सदीक शुरूमे उत्पीड़ित आ शोषित मनुष्यताकेँ लऽ कऽ क्रांति करैबला तागति, साझा सरकार बनाबै लेल, पेट्रोलक दाम कम करबाक आ गरीबपर राज करबाक शतरंज खेला रहल छल...आ एहन समए जाइमे ऐ देशमे जे कियो ईमानदार छल आ अप्पन श्रम आ प्रतिभापर जिबैत छल, ओकरा मारबा वा थकुचबा लेल एकैसम सदीक उत्तर औद्योगिक लोकतंत्रमे एकटा अभूतपूर्व सर्वदलीय ऐतिहासिक सहमति छल...। राजनीतिक सभटा रूप सत्ताक एहन उपकरणमे बदलल गेल छल, जकर इस्तेमाल प्रजाक उत्पीड़न, दमन आ ओकरापर अन्याय लेल भऽ रहल छल।) रातिमे एगारह बजे मोहनदास अप्पन घर पहुँचल। सभ कियो ओकर बाट जोहि रहल छल। कस्तूरी भात-दालि आ रामझुमनीक खुशीमा बनेने रहथि। कनीटा काँच आमक चटनी सेहो ओ सिल्ला-लोरहीपर पिसने छली। देवदास आ शारदा सुति गेल छल। काबा ओसारपर खाटपर पड़ल-पड़ल खोंखी कऽ रहल छल। "आइ तीन बेर खोंखीक संग खून आ मौस खसल।” कस्तूरी बतेलकै। पुतलीबाइ ओतए काबाक खाटक नीचाँ शतरंजी ओछा कऽ सुति गेल छलि। कस्तूरी एखनि धरि नै खेने छलि। ओ थारीमे अप्पन आ मोहनदासक खेनाइ लगा कऽ झाँपि देने छल। हाथ-पएर धोलाक बाद जखन मोहनदास अप्पन कपड़ा उतारलक आ गमछा लपेटलक तँ ओकर उघार देहमे लागल चोट आ नोछारक चेन्ह कस्तूरीकेँ देखा पड़लै। ओ चिंतित भऽ गेलि। "की भऽ गेल? कत्तऽ खसि पड़लिऐ?”, कस्तूरी उठि कऽ ओकरा लग आयलि आ ध्यानसँ ओकर देहकेँ छूबि-छूबि कऽ देखऽ लागलि। "हे दाइ! ई तँ मारि-पीटक घाव छिऐ!”, मोहनदास चुपचाप हाथ-पएर धोइत रहल। ठार पानिक संग ओकर दिन भरिक थकान धुआ कऽ नालीमे बहैत जा रहल छलै। मंजनौटे लग बेलक एकटा पैघ सन गाछ लागल छलै जइमे कतेक रास फूल भेल छलै आ ओकर महक भरि आंगनमे भरल छलै। मोहनदास सांस घीचि कऽ अप्पन कलेजामे भरि लेलक आ कनी काल धरि आँखि मूनि कऽ सतगुरु कबीरक जाप करैत रहल। कस्तूरी खेबाक थारीक ऊपरसँ परात हटेलक तँ भरि आंगनमे भातक गमक भरि गेलै। लोहंदी चाउर छलै, पुरनका। गोठल्लाक कोनो कोनमे पुतलीबाइ नुका कऽ राखने छल आ बिसरि गेल छल। आइ ओकरा ओ जोगाएल चाउर मोन पड़लै जे छुबि-छुबि कऽ ओ पोटरी ताकि कऽ निकालने छल। मोहनदास हपसि कऽ खेलक। ओ आमक चटनी आंगुरमे लगा कऽ चाटि रहल छल तँ कस्तूरी कहलक- "बिसैंधी आमक गाछपर खूब फल आएल छल। बेचलापर कमसँ कम हजार-दू हजार तँ भेटबे करत। काल्हि बेचि दी की?” मोहनदास तिरपित भऽ कऽ बड़का ढेकार मारलक आ कहलक, "अहाँक हाथक पकाएल भोजनमे जादू अछि कस्तूरी। आमक चटनी, भात आ भूखक संग जौं अहाँक हाथसँ परसबाक संयोग भऽ जाए तँ स्वर्गे भेट जाइत अछि।” कस्तूरीक आँखि नोरा गेलै। ओ बुझैत छल जे आइ मोहनदासक संग कोनो अनहोनी भेल छै, जकरा ओ सभ दिन जकाँ ओकरासँ नुका रहल छै। ओइ राति कस्तूरीकेँ बड़ राति धरि जगरनाक बाद सुतल भेलै मुदा मोहनदासक आँखि एक्को क्षण लेल नै लगलै। ओ बेर-बेर उठैत छल आ गटागट पानि पिबैत छल। ओकर दिमागक भीतर कोनो धुरा-गर्दा आ कुहेससँ भरल तेज आन्ही चलि रहल छलै। आन्हिये नै, कोनो कतेक रास घुरमैत बिर्रो। मोहनदास दू-एक बेर फेर ओरियंटल कोल माइंस गेल मुदा ओतए जाएब व्यर्थ भेलै किएकि ओतए आर लेनिन नगरमे ई उक्का पसारि देल गेल छलै जे एकटा बताह हफ्ता-पंद्रह दिनपर एतए अबैत अछि आ अपनाकेँ माइंसक असली डिपो सुपरवाइजर आ असली मोहनदास बी.ए. कहैत अछि। जौं ओकरा बिसनाथ कहि कऽ गरजियौ तँ अंट-शंट बाजऽ लागैत अछि आ ओकरा बतहपनीक दौड़ा पड़ै छै। मोहनदास हारि गेल आ ओ कोलियरी जाएब छोड़ि देलक। ओ दिन-राति पजरैत रहल। कठिनाक रेतपर राति भरि जागि कऽ चुपचाप आकाशकेँ घुरैत रहैत छल। गाममे ओहिनो कबीरपंथी बंसहर-पलिहा निचला जातिक मानल जाइत छल। ओ अनुसूचित जातिक अछि वा आदिवासी वा आदिम जनजातिक, एखन धरि सरकारी गजेटमे ई फरिछाएल नै छल। दस बरख पहिने भेल जनगणनामे ओकर जातिक आगू "बंसोर” वा "पलिहा” टा लिखल छल। दोसर कागजमे धर्म "हिन्दू' आ राष्ट्रीयता "भारतीय”। ओकर सभक संख्या कम छलै। ओकर समांगक कोनो लोक पार्टी वा सरकारमे नै छल। ओइसँ मोहनदास एतए मजाक आ ठट्ठाक विषय बनि गेल छल। ऊँच जातिक धनीक लोक ओकरा देखैत आ पुछैत छल, "तोहर नोकरी कहिया लागि रहल छौ रे मोहना?” कियो ओकरा सलाह दैत छलै जे विजय तिवारीक महिसवारी सम्हारि ले। कमसँ कम खाइ-पिबैले तत्ता-सिहर तँ नै हेतौ। कस्तूरी सेहो मौज करतौ। साड़ी-सैंडिलक दिक्कत नै रहतौ।” कियो-कियो तँ ओकरा लेनिन नगर जा कऽ बिसनाथक पएर पकडि़ कऽ ओकर घरक चाकरी करबाक सुझाव दैत छल। मोहनदास गामक पैघ लोककेँ देखिये कऽ रस्ता बदलि लै छल। ओ ओकरा देखये कऽ दूरसँ घुमि जाइ छल। एहनो नै छल जे ओकरा लऽ कऽ गामक लोककेँ सहानुभू्त नै छलै। सत तँ ई छै जे बेसी लोक ओकरा लऽ कऽ चिंतित छल। कोनो-नै-कोनो तरहे ओकर मदति करऽ चाहै छल। मुदा ई ओ लोक छल जे अपने कतेको तरहक संकट आ विपदामे बाझल छल। एकरामे सँ ककरो कत्तौसँ ऊपर धरि पहुँच नै छलै। ओ सभ अप्पन घाम आ अप्पन-अप्पन नोरक संग ऐ कालमे चुपचाप जीबैबला लोक छल। घनश्याम एहने लोकमे एकटा रहए। जातिक कुर्मी रहै। मुदा ओ गरीब नै रहए। तीस बीघाक खेती छल। बैंकमे किस्तपर ओ ट्रैक्टर लेने छल। शाक-सब्जी आदि उगाबैक अलावा ओ अप्पन ट्रैक्टर किरायापर उठा रखने छल। तखनो सभ मास साढ़े सात हजारक किस्त कटायब ओकरा मुश्किल होइल छलै। खेतमे उपजैबला अनाज आ दोसर फसलक दाम बाजारमे नै रहि गेल छलै। लग-पासक गाम बलहराक बिसेसर जे ग्रामीण बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ सोयाबीनक खेती केने छल, दू मास पहिने अप्पन खेतकेँ नीलामीसँ बचाबै लेल बिजलीक खुट्टापर चढ़ि नांगट तारसँ सटि कऽ मरि गेल छल। छोटका किसान आ जोन-मजदूर गाम छोड़ि-छोड़ि शहरक दिस भागि रहल छल। घनश्याम सेहो परेशान रहैत छल। ओइ दिन मोहनदासकेँ कनी जूड़ी चढ़ल छलै। दिन भरि सूप-टोकरी बुनाय आओर बड़ राति धरि पलियामे पानि पटाबैक बाद ओ एत्ते थाकि गेल छल जे बिना खाएल-पीएल सुति गेल छल। भिनसरे उठल तँ देह गरम छलै। परछीमे पटाएल छल तखने घनश्याम आबि गेलै। ओ अपना संगमे मोहनदासक साढू गोपालदासकेँ सेहो पकड़ि कऽ आनने छल। दुनू मोहनदाससँ कहलक जे ओकर चिन्हार एकटा लोक भेट गेल जे ओरियंटल कोल माइंसक जी.एम. (जनरल मैनेजर) ए.के. सिंहकेँ जानैत अछि। ओ मोहनदाससँ कहलक जे ओ एखन तुरत हाथ-मुंह धो कऽ तैयार भऽ जाए, अगला बससँ ओतए चलबाक छै। घनश्याम आ गोपालदास दुनू उत्साहमे छल। ओ सभ कहलकै जे आइए पहुँचब ऐ लेल जरूरी छै किएक तँ परसू सँ जी.एम. एक मासक छुट्टीमे बाहर जा रहल छै। गोपालदास अप्पन झोरासँ मोहनदासक पहिरबा लेल एकटा पैंट आ एकटा शर्ट सेहो कीन कऽ आनने छल। ओ हसैत कहलक, "लिअ, एकरा पहिर लिअ! बुढबा बड़दक पोथा सन मैनेजर लग चेहरा लटका कऽ नै जाउ।" मोहनदास जूड़ीमे हँसए लागल। ओरियंटल कोल माइंसक जनरल मैनेजर एस.के. सिंहसँ भेंट करबामे कोनो दिक्कत नै भेलै। गोपालदासक पैंट आ बुश्शर्ट मोहनदासक भीतर नव आत्मविश्वास भरि देने छलै। ओ जी.एम. केँ सभटा खिस्सा बतौलक जे कोना 18 अगस्त, 1997 केँभर्ती परीक्षामे ओ नोकरी लेल सलेक्ट भेल छल आ पाँच कैंडिडेटक लिस्टमे ओकर नाम सभसँ ऊपर छलै। ओइ दिन ओ अप्पन सभटा सर्टिफिकेट आ कागच दफ्तरमे जमा कऽ देने छल मुदा ओकरा लग कहियो नियुक्ति पत्र नै एलै आ आब कोना बिछिया टोलाक बिसनाथ ओकर नामसँ पिछला पाँच बरखसँ एतए नोकरी कऽ रहल छै आ डिपो सुपरवाइजर बनि दस हजारसँ ऊपर दरमाहा लऽ रहल छै। मोहनदासकेँ घनश्याम कहि कऽ राखने छल जे ओ जी.एम. केँ ओइ दिनुका घटना नै बताबै, जहिया ओ कोलियरी अप्पन कागज मांगै लेल आएल छल आ भरती दफ्तरक बाबू सभ ओकरा मारने छलै आ फेर बादमे लेनिन नगरमे पुलिसक दरोगा विजय तिवारी आ बिसनाथ ओकरा धमकी देने छलै। ऐ लेल मोहनदास एतबेपर रुकि गेल। ओकर गपक समर्थन ओतए बैसल घनश्याम आ गोपालदास सेहो केलक। जनरल मैनेजर एस.के. सिंह केँ लऽ कऽ ई प्रसिद्ध छल जे ओ बड़ सोझ अफसर अछि। धुरफंदीबला लोकक संग जौँ ओ रहितो अछि तँ ऐ लेल जे ओकरा महग दारूक हिस्सक छै। नै तँ ओ एत्ते सोझ छै जे ओ नै तँ केकरो अधलाह कऽ सकैत अछि, नहिये केकरो नीक। मुदा जी.एम. मोहनदासक सभटा गप सुनि कऽ ओरियंटल कोल माइंसक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तवकेँ ऐ मामिलाकेँ जांचैक आदेश देलक आ कहलक जे अगला मास जखन ओ छुट्टीसँ घुरताह, तखन धरि हुनका जांच रिपोर्ट भेट जेबाक चाही। मोहनदास एस.के. सिंहक एहि रूखसँ एतेक भावुक भऽ गेल जे बेर-बेर ओकर आँखि नोरा जाइ छलै। ओ मोने मोन सतगुरू कबीर आ मलइहा माइक नाम जपि रहल छल। अगिला हफ्ता जांच भेल। वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव लेनिन नगरक फ्लैट नंबर ए बटा एगारह पहुँचल। बिसनाथकेँ एक-एक गपक जानकारी पहिनेसँ छलै। ओकर तार सभ जगह फिट छलै। पछिला पाँच बरखसँ ओ लेनिन नगरमे मोहनदास नामसँ रहि रहल छल ताइसँ ओ लेनिन नगरमे मोहनदासक नामसँ जानल जाइत छल। ए.के. श्रीवास्तव जकरासँ पुछैत छल जे फ्लैट नंबर ए बटा एगारहमे रहैबला लोकक की नाम छै तँ सभ कियो एक्के जवाब दैत छल, "मोहनदास।” ओ सेहो पछिला चारि-पाँच बरखसँ जकरा मोहनदास नामसँ जानैत छल आ जकरा लेल ओ वर्कर्स वेलफेयर फंडसँ लोन सेहो सेंक्शन केने छल ओ "मोहनदास' माने बिसनाथ छल। फेर ओइ दिन जी.एम. क चैंबरमे जकरा ओ देखले छल जे अपनाकेँ मोहनदास कहि रहल छल, ओकरा देखि कऽ ओकर मोनमे कत्तौ-नै-कत्तौ संदेह भऽ रहल छलै जे एहन लखा दै बला लोक ग्रेजुएट कोना भऽ सकैत अछि? अप्पन साढू गोपालदासक कपड़ा पहिर लेलाक बादो एत्ते बरखक बेरोजगारी, मेहनत आ अभावसँ मोहनदासक चेहरा आ समुच्चा देहक हुलिया एहन बनि गेल छलै जे एक नजरिमे ओ बेमार, बताह आ अनपढ़ नजर आबैत छल। इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तवक मन बेर-बेर कहैत छल जे भऽ सकैत अछि जे मोहनदास बनल लोक डिपो सुपरवाइजर मोहनदास नै हुअए मुदा कियो आर हुअए मुदा ई जे अपनाकेँ मोहनदास हेबाक दाबी कऽ रहल अछि ओ सेहो कत्तौसँ मोहनदास नै लगैत अछि। बिसनाथ जबरदस्त व्यवस्था कऽ के राखने छल। अप्पन फ्लैटमे ओ श्रीवास्तवजीक खूब सत्कार केलक। अप्पन कनियाँ अमिताकेँ ओ लो कट ब्लाउज आ नीचाँ सारीमे शर्बतक ट्रे लऽ कऽ ड्राइंग रूममे आबै लेल कहि देने छल। लेनिन नगर मार्केटमे एम्हर खुजल शिल्पा ब्यूटी पार्लरमे जा कऽ अमिता अप्पन फेशियल करौने छल। ओ शर्बतक ट्रे टेबुलपर राखैत मुस्कुराइत छ्ल जखन श्रीवास्तवजीकेँ ओ नमस्ते केलक आ कहलक, "सरिता दीदीकेँ संगमे नै आनलिऐ सर?” तँ एकाएक ओतुक्का वातावरण आत्मीय, घरेलू आ ऐंद्रिक भऽ गेलै। इंक्वायरी ऑफिसरक नजरि बेर-बेर अमिताक खुजल ढोढ़ीपर जाइत छल। टीवीपर तखन दिल्ली-मुंबइ मे चलैबला फैशन शो कार्यक्रमक समाचार चैनल नर-बड़ देखल जाइत छल। मुदा एतए तँ एकदम्मे जिंदा मॉडल जेहन स्त्री आगू ठाढ़ छलै। ई समाचार नै मुदा एकटा सत छलै। "ई हमर कनिया अछि सर!” बिसनाथ नमकीन बिगजी श्रीवास्तवजी दिस बढ़बैत कहलक-"कस्तूरी!' "नाम कोनो पुरान स्टाइलक नै लगैत अछि?” इंक्वायरी ऑफिसर ठाम टेबुल पर नमकीनक राखल प्लेटसँ एकटा बिसकुट उठबैत मुस्कियाइत कहलक। अमिताकेँ हँसी लागि गेलै। "ई की अछि सर जे ज्योतिषी पिताजीसँ कहने छल जे मीन राशिवाली लड़कीकेँ अप्पन बाजैबला नाम सेहो राशि बला राखबाक चाही...! तखन फल होइत छै। तइसँ हमहूँ सेहो कहलिऐ...चलू कोनो गप नै! राखि लैत छी।” "ओह! तँ कस्तूरी अहाँक राशिबला नाम छी?” इंक्वायरी ऑफिसर आब अमितासँ गप्प कऽ रहल छल। "अच्छा तँ बाजैबला नाम की छी अहाँक?” ओकर हँसीमे आत्मीयताक घनत्व लगातार बढ़ि रहल छलै। अमिताक चेहरापर असमंजसक डरीड़ बनऽ लागलै। एक पल लेल ओ चुप रहि गेल। बिसनाथ ऐ गपकेँ तत्काले बुझि गेल। "खूब छी! आब नाम बताबैमे कथी लेल लजाइ छी कस्तूरी!" बिसनाथ ठहाका लगौलक-"चलू, हमहीं बता दैत छी!... सर हिनकर बाजैबला नाम छन्हि अमिता!... अमिता भारद्वाज। घरमे सभ यएह कहै छन्हि।” इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तव हंसै लागल। "लेडिज केँ लाज नै हुअए तँ नीक नै लागैत छै। कनीटा किछो तँ लेडिजपना बनल रहबाक चाही आकि नै!...चलू कस्तूरीजी हम अहाँकेँ अमिताजीए कहब! कोनो ऑब्जेक्शन तँ नै अहाँकेँ?” "नै सर! एक्को रत्ती नै!" अमिता फुदकि उठल। "मुदा सत गप तँ ई अछि जे जखन कियो हमरा अमिता कहैत अछि तँ लागैत अछि जे ओ हमरे घर दिसका अछि।” अमिता एकटा बड़का सांस भरलक, "ऐ इलाकामे अप्पन सन किछु लागिते नै छै! बैकवर्ड छी हम सभ! बोर भऽ जाइत छी हम सभ।” "एखन डेवलप हैमे टाइम लागत। ओना प्रोग्रेस तँ बड़ छै एम्हर। दू बरख पहिने की छल एतए?' श्रीवास्तवजी सहज भऽ रहल छल। "अहाँकेँ टाइम कोना पास होइत अछि एतए, लेनिन नगरमे?” "बस भऽ जाइत अछि कोनो तरहे। किट्टी पार्टी भऽ जाइत छै। एक-दू कमेटे डालि देने छी, गरीब मजदूरक भलाइ लेल। सोशल सर्विसमे मन लागि जाइत अछि।” "नीक अछि, नीक अछि। सरिताकेँ सेहो बड़ शौक छै सोशल सर्विसक। अहाँ आएल करू हमरा दिस। सरिताकेँ सेहो इनवाल्व करू अपना सँ।” श्रीवास्तवजी बिसरि गेल छल जे ओ एतए कोन काज लेल आएल छल। बिसनाथक बांहि फूलि गेलै। मौका सही छलै। ओ बाजल, "देखू सर, ई लेनिन नगर एहन कॉलोनी छै जतए पड़ोसिये पड़ोसीक दुश्मन अछि। कियो ककरो हंसी-खुशी आर बढ़ैत देखिये नै सकैए। आब यएह बिन-बातक बात। आर किछो नै भेटलै तँ पकड़ि आनलक ककरो दू-चारि दाना फेंक कऽ आ कऽ देलक शिकाइत। हम जानैत छी ककर कारस्तानी छिऐ ई। जातिवाद बेसी पसरि रहल छै आइ-काल्हि। ई सभ आब माथपर बैसत। हम बुझै छी जे ककर कराएल छै ई सभटा खेल मुदा जाए दियौ। साँचकेँ आँच की? अहाँ अपन इंक्वायरी निष्पक्ष भऽ कऽ करू।” इंक्वायरी ऑफिसर डायरी निकाललक आ पुछलक, "फादरक की नाम छी अहाँक?” "बाबूजी! ओ बाबूजी! कनी बैसकीमे आबि जाउ!” बिसनाथ जोरसँ चिकरल आ फेर मुस्कुरा कऽ कहलक, "देखू संजोगे छै जे माय-बाबूजी दुनू काल्हि एतए आएल छथि। अचार सभ बनल रहै। पहुँचाबैक बहन्ना चलि आएल, बेटा-बहुकेँ देखबा लेल! हमर बल्दियत अहाँ हमर फादर-मदरसँ पूछि लियौ।” "हम तँ जाइत छी।” अमिता कहलक, "ट्रेडिशनल फैमिली अछि हमर।” ओ उठि कऽ भीतर चलि गेलि। नगेंद्रनाथक पाछाँ ओकर कनियाँ रेणुका देवी सेहो ड्राइंग रूममे आबि गेलि। तिलक चंदन देखि कऽ इंक्वायरी ऑफिसर श्रीवास्तवजी अपन सोफासँ उठि कऽ हुनका नमस्कार करबासँ अपनाकेँ रोकि नै सकल। बड़ विनम्रताक संग ओ पुछलक, "अप्पन-अप्पन शुभ नाम बता दिअ अहाँ दुनू गोटे। असलमे कागजी कारवाइ छै। पूरा तँ करैए पड़ैत छै।” नगेंद्रनाथ एक्को पलक देरी नै केलक, "हम्मर नाम छी काबादास।” ओ कुरताकेँ गरमे सँ खींच कऽ माला निकालि बाजल- "ई तुलसीक माला जहियासँ धारण केने छी, तहियासँ तुलसीदासक चौपाइ हम्मर ओढ़ना-बिछौना अछि। "दास” नाम हम तहियेसँ जोड़ि राखने छी।...आ ई अछि हमर कनिया पुतलीबाइ। मोहनाक महतारी।" रेणुका देवी मूड़ी डोला कऽ हँ कहलक। ऐ तरहे इंक्वायरी पूरा भऽ गेल। ओरियंटल कोल माइंसक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव अप्पन जांचमे पेलक जे मोहनदास बल्द काबा दास, ग्राम पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपनगर, मध्यप्रदेश केँ लऽ कऽ उठाओल गेल सभटा आपत्ति निराधार अछि। ओ पुष्टि लेल पुरबनराक सरपंच छत्रधारी तिवारी आ जिला जनपद सदस्य श्यामला प्रसादक कएल गेल तस्दीकक कागज सेहो रपटक संग नत्थी कऽ देलक जे ओकरा बिसनाथ देने रहै। बिसनाथ आ अमिता माने मोहनदास आ कस्तूरीक आग्रहपर श्रीवास्तवजी दुपहर धरि ओतए विश्राम केलन्हि, साँझमे बियर आ बादमे व्हिस्की सेहो ओतए पिलन्हि, सामिष आहारमे देशी मुर्गा आ जखन ओ राति एगारह बजे अप्पन नबका "मारुति जेन” सं ओतएसँ बिदा भऽ रहल छल, तखन बेर-बेर अमिताकेँ "कस्तूरीजी” संबोधित करैत अप्पन घर आबैक लेल आ अप्पन वाइफ सरिताकेँ समाज सेवामे इन्वाल्व करैक आग्रह कऽ रहल छल। मुदा नशाक बादो ओकर आँखि अमिताक ढोढ़ीपर टिकल छलै जे रातिक अन्हारमे पैघ भऽ कऽ ओकर समुच्चा चेतनापर आच्छादित भऽ गेल छलै। (ई सभटा गप ओइ कालक अछि जखन पंजाबमे लोक सेवा आयोगक चयन समितिक अध्यक्ष करोड़ो टका घूस खा कऽ, पूरा राज्यमे हजारो सरकारी अधिकारीक नियुक्ति कऽ देने छल आ सी.बी.आइ.क छापा मारल गेलापर फरार भऽ गेल छल। ...जखन पैघ-पैघ मंत्रीक आवासमे जेड सिक्योरिटीक भीतर सूटकेस आ नोटक बंडल पहुँचि रहल छल आ ओतए भारतक कोनो साधारण लोकक प्रवेश वर्जित छल।...जखन हरियाणाक एकटा आइ.जी. आओर उत्तरप्रदेशक एकटा कबीना मंत्री स्त्रीगणक संग अवैध संबंध आ हत्याक आरोपमे गिरफ्तार छल आ मुंबइमे एनकाउंटरसँ अंडरवर्ल्डक अपराधीकेँ मारैबला "सुपरकॉप” सेहो माफियाक "सुपारी किलर"छल।...एहन काल जखन ऐ उपमहाद्वीपक प्रजाक भाषा हिंदी आ उर्दू केँ "राजभाषा' बनेलाक बाद प्रेमचंद, नेरूदा, फैज आ नजरूल-निराला केँ "राज-लेखक” बनेबा लेल सत्ताधारी राजनीतिक दलक लोक लेखकक मुखौटा लगा कऽ कमेटी बना रहल छल। ...एहन काल जखन दिल्लीक एकटा बेमार आ कर्जदार दर्जी अप्पन दूटा संतान आ अप्पन कनियाकेँ माहुर खुआ कऽ मारि देलाक बाद अप्पन हत्याक प्रयास करैत पकड़ल गेल, किएक तँ ओकरा लग आजीविकाक कोनो विकल्प नै रहि गेल छल। आब ओकरा जेलमे दऽ कऽ इंडियन पीनल कोडक धारा 302 आओर 309 लगा कऽ हत्या आ आत्महत्याक कोशिशक मुकदमा चलाओल जा रहल छल। ...आ...) पाँचम आ अंतिम खेप ओरियंटल कोल माइंसक इंक्वायरी कमेटीक रिपोर्टक बाद मोहनदास टूटि गेल। घनश्याम आओर गोपालदास जनरल मैनेजर एस.के. सिंहसँ एक बेर आओर भेँट कऽ हुनकासँ दोबारा इंक्वायरी करबाक मांग केलक मुदा ओ कहि देलकन्हि जे बेर-बेर ई नै हएत। हमर सभसँ सक्षम आ ईमानदार अधिकारी एकर जाँच केलक, दोबारा इंक्वायरीक आदेश दऽ कऽ हम हुनकापर संदेह पैदा नै हेबऽ दै चाहै छी। बादमे पता चलल जे बिसनाथ आ अमिता जनरल मैनेजरकेँ सेहो लेनिन नगरक अप्पन घरपर बजा कऽ खुआयब-पिआयब शुरू कऽ देने छल आ ओकर कनियाकेँ सेहो "समाज सेवा' आ किटी पार्टीमे इनवाल्व कऽ देने छल। कोल माइंसमे अफवाह ईहो छल जे अमिता जनरल मैनेजर एस. के. सिंहकेँ फाँसि लेने छै आ आब रहरहाँ ओकर कार लेनिन नगरक फ्लैट नंबर ए बटा एगारहक बाहर मोहनदास, कनिष्ठ आगार अधिकारीक फाटकपर ठाड़ रहैत छ। खबर ईहो छल जे बिसनाथ सेहो हुनका पटा लेने अछि। सिंह साहेब ओहिनो मौज-मस्ती, खाइ-पीबैक शौकीन लोक छल। मोहनदास टूटि कऽ छिड़िया गेल। नै तँ ओ ठीकसँ खा सकैत छल, नै तँ सुति सकैत छल। कोनो काजमे ओकरा मोन नै लागै छलै। केहन-केहन प्रश्न आओर संदेह ओकर दिमागमे आबैत छल आ ओ बेचैन भऽ जाइत छल। ओकरा लागैत छल जे जत्ते लोक नौकरीमे छै वा ऊँच जगहपर बैसल छै, कारमे घूमि रहल छै आ जे नाम आ चेन्हसँ ओ सभ जानल जा रहल छै ओ असलमे कियो आर छै आ ओ जालसाजी कऽ कोनो आन मुखौटा लगा रखने छै। की लेनिन नगरमे कोनो असली लोक, अप्पन नाम, वल्दियत, पता-ठेकानक बचलो छै वा सभ बिसनाथे सन बहुरूपिया आ डुप्लीकेट छै? मोहनदासकेँ सेहो अपनापर संदेह हुअए लागल जे आखिर ओ के छी? मोहनदास वा बिसनाथ? आकि ओ एम.जी. डिग्री कॉलेजसँ बी.ए. क परीक्षामे जे डिग्री पौने छल ओ बिसनाथक लेल छल? की सभक संग अहिने होइत छै? ओ घरक भितरे कोनमे सरकारी रोजगार दफ्तरसँ पठाओल गेल पुरनका पोस्टकार्डकेँ तकैत रहतिऐ। नै भेटलापर कस्तूरीसँ लड़ितिऐ-झगड़ा करितिऐ। ओ किछु बरख पहिलुका एहन कतेक पोस्टकार्ड ताकि कऽ निकालने छल, जइमे ओकर नाम आ पता लिखल छलै। ओ गाममे अप्पन लोककेँ ओ सभ चीज देखाबै छल। लोक सभ या तँ चुप रहैत छल वा ओकरा कोनो अफसर आकि नेतासँ भेंट करबाक सलाह दैत छल। मोहनदास जेहन हालम ल, ओइमे एहन भऽ सकब संभव नै रहि गेल छल। पुरबनराक सरपंच पंडित छत्रधारी सेहो ई लिखित प्रमाणपत्र दऽ देने छल जे बिसनाथ पुरबनराक मोहनदास छी। ओकर बेटा विजय तिवारी तँ ओहिनो बिसनाथसँ मिलल छल। कस्तूरीपर ओकर नजरि सेहो छलै आ गिदरमारा जकाँ ओ अही इंतजारमे छल जे एक नै एक दिन टूटि कऽ मोहनदास ओकर पएरपर आबि खसत आ ओकर महिसवारीक काज सम्हारि लेत। मोहनदास देखैत छल जे सरकार दिससँ ग्राम पंचायतकेँ जे हैंडपंप स्वीकृत होइत रहै ओ पैघ लोकक घरक आगू लागि जाइ छलै। शिक्षाकर्मीक नियुक्ति होइत छल, स्त्रीगणक लेल आंगनबाड़ी आ शिक्षिकाक पद निकलैत छल, इंदिरा आवास योजनामे घर बनाबै लेल अनुदान भेटै छल, इनार आ खेतकेँ ठीक करबा लेल ग्रामीण विकास विभागसँ टका अबैत छल, नेहरू रोजगार योजनामे शिक्षित बेरोजगारक लेल कोनो परियोजना आबैत छल तँ ई सभ ओइ लोकक बीच बँटि जाइ छलै। शारदा आ देवदास कहैत छै जे स्कूलमे दुपहरियामे जे खेनाइ बँटै छै ओइमे भेदभाव होइत छै। ओइ दिन मोहनदास कतेक बरखक अप्पन नेनाक संगी बीरन बैगाक घर जा कऽ महुक दारू उतरबौलक आ सुगरक माउस बनबौलक। संगमे ओकर साढू गोपालदास सेहो छल। ओ चारि-पाँच लोक छल आ साँझ सात बजेसँ ओ सभ पिनाइ शुरू कऽ देलक। ढोल-मंजीरक इंतजाम करने रहय। ओइ दिन मोहनदासकेँ "विंध्यांचल हैंडीक्राफ्ट' बला सेठ बाँसक मालक भुगतान केने छल। बारह सए टका ओकरा भेटल छलै। गोपालदासक जेबी सेहो ओइ दिन भरल छल। घर तँ बीरन बैगाक छल मुदा दारू-माउसक सभटा खर्चा मोहनदास उठेने छल। बीरनक घरबाली आ ओकर बहिन महुक दारू एतेक नीक उतारै छल जे भीतपर जोरसँ रगड़ि दियौ तँ भक्कसँ आगि लागि जाइत छल। मोहनदास ओइ राति अप्पन दोस्तक संग रास-रंगमे किछु क्षण लेल अप्पन सभटा दुख बिसरि गेल छल। बिहारी ढोल बजा रहल छल, परमोदी मंजीरा। मोहनदास मस्ती आ नशामे गाबि रहल छल: "पता दइ जा रे, पता लइ जा रे...गाड़ीबला.... तोहर नामक, तोहरा गामक पता दइ जा... माया रे, मायाक ठाम बताबै मायाक आनथि खबरिया काया माया दुनू नाच नचाबै, मायाक सगर नगरिया पता दइ जा रे, पता लइ जा रे...गाड़ीबला...।' बीरनक घरवाली जखन खाना परसलक तँ रातिक दू बाजि गेल छलै। भूख सभकेँ लागल छलै। तोरीक तेलमे मसल्ला-लहसून-पियाजु दऽ कऽ सुअरक मौस बीरनक बहिन रान्हने छल। रसक गंध पूरा आंगनमे पसरल छल। सभ लोक हाथमे रोटी लऽ कऽ खाइपर टूटि पड़ल। टोकना भरि भात सेहो बनल छल। मुदा मोहनदास चुप छल। गीत गबैत-गबैत ओकरा भीतर कतौ कोनो एकटा फाँस, जना एकबैग गरि गेल छल। ओकर टीस बेर-बेर ओकर छातीक भीतर जागैत छल, जकरा दबाबै लेल आ बिसरैले ओ आर लोकसँ बेसी पी लेने छल। खाइत-खाइत एकाएक कौर हाथमे रोकि कऽ मोहनदास बेर-बेर सभकेँ देखलक फेर ओकर गरसँ हिचकी निकलऽ लगलै। ओ कूही भऽ कानऽ लागल। गोपालदास, बीरन, बिहारी, परमोदी सभ कियो एत्ते भूखाएल छल आ एत्ते दिनक बाद एत्ते नीक खेनाइ भेटि रहल छलै जे ओकरा सभकेँ मोहनदासक ऐ काल कानब नीक नै लागै छलै। सभ कियो अप्पन मुँहसँ भरि-भरि कौर चबा रहल छल आ पुछैत सेहो जा रहल छल जे की भेल! पहिने खेनाइ किए नै खा रहल छिऐ? "अहाँ के छी? अहाँक नाम की?' "हमर नाम छी बीरन। बीरन बइगा।” बीरनकेँ हंसी आबि गेलै। "आ अहाँक बल्दियत? अहाँक बाप के छथि?” मोहनदास फेर पुछलक। "हमर बापक नाम डिंडवा बैगा अछि।” बीरन हँसैत जवाब देलक। अहाँकेँ महुक दारू चढ़ि गेल अछि। सब हँसऽ लागल। मोहनदासक आँखि लाल भऽ गेल। ओ हाथक कौर छिपलीमे दऽ देलक आ गरजि कऽ बाजल: "हौ बीरन, हौ परमोदी...हम के छी? सत सत बाजू? हमरा बुरबक नै बनाउ। अहाँ सभकेँ मलइहा माइक किरिया!” "अहाँ छी मोहनदास! अहाँक बाप काबा दास आ माइ पुतलीबाइ!” बीरन अप्पन अइंठ हाथ मोहनदासक छातीपर गड़ाबैत जोरसँ जवाब देलक। सभ कियो हँसऽ लागल। मोहनदास कनी काल चुपचाप बीरनकेँ निङहारैत रहल, फेर बेरा-बेरी सभकेँ ताकऽ लागल। ओ अप्पन शंका मेटाबऽ चाहै छल जे ओ सभ असली लोक अछि वा कियो आर अछि? कनी-कनी ओकरा लागै छल जे ई सभ ओकरे सन ठकाएल गेल असली लोक अछि। एकरा सभकेँ धोखा देल गेल छै। अन्तर मात्र एतबे जे ओ ऐ रहस्यकेँ बुझि गेल अछि आ एकरा सभकेँ एखन धरि नै पता चलल छै। मोहनदास अप्पन नेनाक संगी-साथीकेँ बताबऽ चाहै छल जे अहाँ सभ कियो सरकारी दफ्तरमे, शहरक ऊँच-ऊँच बिल्डिंगमे आ पैघ-पैघ बंगला-कोठीमे, कोइला खदान-कारखानामे आ लेनि नगर, गांधीनगर, अंबेडकर नगर, शास्त्रीनगर जेहेन कॉलोनीमे जा कऽ पता करू जे कतौ ओतए अहाँक नाम, बल्दियत आ पता-ठेकानाक कियो दोसर फर्जी जालसाजी तँ नै बैसल अछि, जे अहाँक हक छीन लेने अइ। मुदा निशाँक बादो ओकरा लागि रहल छल जे एहन गप कहलापर ई सभ कियो ओकरासँ कहत जे अहाँपर ठर्रा निशाँ बेसी चढि़ गेल अछि। बीरन, परमोदी, गोपालदास, बिहारी सभ कियो खाइमे लागल छल। बीरनक घरवाली सितिया आ ओकर बहिन रमोली सेहो आबि गेल छल। ओ दुनू सेहो महु पीबि रहल छल आ चुहुलक जवाब चुहुलसँ दऽ रहल छल। सभ कियो हँसि-बाजि, खा-पी रहल छल। मुदा मोहनदास सभसँ फराक, भीतक कोनमे बोतल लऽ कऽ बैसि गेल छल आ हिचकीक बीच कबीरदासक पद गेबाक संग पीब सेहो रहल छल। भोरक चारि बाजि गेल छल जखन ओकर संगी ओकरा लादि-टांगि कऽ घर धरि पहुंचौलक। कसतूरी पहिल बेर अप्पन साँयक ई हालत देखले छल। ओ गोपालदास आ बीरनपर कबदय लागल। मुदा जखन गोपालदास ओकर तरहत्थीपर एक हजारसँ ऊपर टका राखलक आ दुखी भऽ कऽ कहलक, "हम कतेक रोकलहुँ जे मोहना नै पी...नै पी मुदा ई नै मानलक। ई टका राखि लिअ। एकर जेबीसँ बाहर खसि पड़ल छल।” तँ कस्तूरी चुप भऽ गेल। भोर सात बाजल छल जखन काबा दासकेँ खोंखीक दौरा पड़ल। कोनो आन्ही जना खोंखी भेल छल। थमैक नामे नै लऽ रहल छल। आन्हर पुतलीबाइ डोरी टूटल गाए सन चारू दिस खसैत-पड़ैत भसियाएल दौगि रहल छल। ओकर कानब पूरा बस्तीमे गूंजि रहल छलै। कस्तूरी सेहो जागि गेल आ मोहनदासकेँ हिला-हिला कऽ जगेबाक कोशिश कऽ रहल छल। मुदा ओ महुक नशामे धुत्त पड़ल छल आ उठबाक नाम नै लऽ रहल छल। कस्तूरी डोलमे पानि लऽ कऽ आएल आ ओकरा मोहनदासक ऊपर ढारि देलक। मोहनदासक आँखि खुजल। ओ एतेक लाल छल जे ओकरामे खून हेल रहल छल। ओकर नशा नै उतरल छलै। कस्तूरी चिकरि कऽ बाजल, "उठियौ...यौ! डॉक्टरकेँ लऽ कऽ अबियौ! बाबूकेँ खोंखी भऽ रहल छै!” गामसँ लोक-वेद आ स्त्रीगण-नेना सभ आबऽ लागल छल। देवदास आ शारदा डरायल अप्पन बाबा काबाक खाट लग ठाढ़ छल। काबाक गर जना फाटि गेल छलै आ ओइमे सँ खून आ मौसक थक्का सभ बेर खोंखीक संग बाहर निकलि रहल छल। धरतीपर चिट्टा-मट्ठाक धारी लागल छल। गिद्धा मांछीक झुंड ओकर चारू कात भिनभिनाइत घूमि रहल छल। लोक मोहनदासकेँ उलटा-पुलटा रहल छल आ ओकरा जगाबैमे लागल छल। बड़ मुश्किलसँ मोहनदास हाथ टेक कऽ कनी टा उटंगा भेल आ खून जेहन लाल आँखिसँ चारू दिस भकुआएल चोन्हराएल देखऽ लागल। ओ केकरो चिन्ह नै सकै छल। ओकर नजरि कतौ स्थिर नै भऽ रहल छल। एकाएक ओकर ठोढ़पर हँसी एलै। ओ अप्पन आँखिपर जोर लगा कऽ रमइ कक्काकेँ चिन्ह गेल। ओ गरसँ टूटल अवाज निकाललक, "कक्का, हम के छी? हमर नाम की अछि कक्का! हमरा कहू कक्का, हमरा बतबियौ?” आ ओ बेदम भऽ कऽ ओइ ठाम ओंघरा गेल। गामसँ आएल स्त्रीगणक कानब आ चिकरबाक हल्ला उठल। पुतलीबाइक चिकरब सभसँ ऊँच छल। कनी काल सभ स्त्रीगण जना कोनो लयमे कानै लागल। काबा दास मरि गेल। ओकर खाटक नीचाँ राखल बाँस आ कचियापर माँछी भिन-भिन करै लागल। काल्हि अदहा राति धरि ओ टोकरीक लेल कमची छीलैमे लागल छल। काल्हि दुपहरमे बजारक विन्ध्याचल हैंडीक्राफ्ट्ससँ तीस टोकरी आ पच्चीस सूप बनाबैक आर्डर भेटल छलै। ओइ भोर करीब साढ़े सात बजे कस्तूरीक कोठरीमे बिलैया झपट्टा मारलक आ अलोपी मैनाक जोड़ाकेँ खा गेल। मादा मैनाक पेटमे नब अंडा आएल छल। ओकर नोचल पाँखि आ खूनक दाग कोठरीक माटिक जमीनपर बचल रहि गेल छल। कस्तूरी एक्के दिन पहिने गोबरसँ ओकरा निपने छल। ओइ दिन मोहनदासकेँ किछु नै बुझल भेलै जे ओकर बाप काबा दासक दाह-क्रिया कोना भेलै, ओकरा ओसारपर नशामे बेहोश छोड़ि कऽ गाम-बिरादरीक लोक काबाक लाशकेँ श्मशान धरि लऽ गेल, ओकर माए पुतलीबाइ कोनो तरहेँ काबाक खाटपर माथ पटकैत रहल आ बाँस, पथिया, कमची, पटिया, लोटा आ कचियासँ ओकर खून धाबैत-धुआबैत कानि-कानि कऽ गाबैत रहए, छोट-सन देवदास कोना अप्पन बाप मोहनदासक बदला अपनेसँ अप्पन बबाक चितामे आगि देलक आ ओकर नेनाक संगी बीरन बैगा ओकर किरिया-करम केलक! मोहनदासकेँ किच्छो पता नै। गोसार्इं कस्तूरीसँ पाँच सए टका सुतारलक, पाँच सए जंगलक फारेस्टगार्ड लऽ लेलक। ओ पतेरासँ काबाक चिता लेल सुख्खल लकड़ी बिछै लेल नै दऽ रहल छल। कस्तूरी लग ओ सभटा टका खत्म भऽ गेल जे गोपालदास ओकरा देने छल। मोहनदासक गरसँ फोंफ कटबाक ध्वनि लगातार निकलि रहल छल। एकाध बेर ओ अप्पन आंखिकेँ खोलि, चारू कात एहन तरहेँ देखतियै, जना ओ कोनो नब आ अनचिन्हार ठामपर आबि गेल छै आ फेर ओ सुति जाइत छल। ओ नीन छल वा फेर महुक दारूमे यूरिया वा लैंटिनाक पात मिला कऽ उतारल शराब छल वा सुगरक मौसमे कोनो छूति लागल छल। मुदा एहन हैतियै तँ ओइ राति ओकरा संग खाइ-पीबैबला बीरन, परमोदी, बिहारी, सितिया, रमोलीक संगो एहने हेतियै। ओ सभ कियो तँ ठीक छल आ काबाक मरलापर लकड़ीक जोगाड़सँ लऽ कऽ खांड़ा गाम जा कऽ गोसाईंकेँ बजाबै आ सभटा कर्म निपटाबैमे तँ वएह सभ कियो लागल छल। मोहनदासक नशा साधारण नै छलै। "दारू दिमाग धरि चढ़ि गेल छै। दहीमे जीरा-जमैन धरिकेँ कंठक भीतर दियौ।” बीरन बैगा सलाह देलक। कस्तूरी बाटीमे जीरा-जमैनक घोर लऽ कऽ मोहनदास लग आएल आ गोपालदास ओकर माथकेँ अप्पन कोरामे राखि कऽ जखन ओकर मुँह खोलय लागल तँ मोहनदासक आँखि खुजलै। ओ कस्तूरी आ गोपालदासकेँ एना देखलक जना ओ ओकरा चिन्हैत नै छलै। ओ बड़ कमजोर आ खरखरायल अवाजसँ कस्तूरीसँ पुछलक- "अहाँ के छी बाइ? आ हम के छी? हमरा बताबियौ?' एकर बाद ओ कस्तूरी दिस ताकि-ताकि कऽ मुस्कियाइत नीक अवाजमे गाबऽ लागल- "अहाँ बिलसपुरहिन छी, हम छी रैगड़िया, हमर-अहाँक जोड़ी, सजल अछि बड़ बढ़िया....।" कस्तूरीसँ रहल नै गेलै। ओ कूही भऽ कानऽ लागल। शारदा सेहो अप्पन पिताक हाल देखि कऽ कानऽ लागल। गोपालदास अपनाकेँ संयमित करैत कस्तूरीक हाथसँ बाटी लऽ लेलक आ मोहनदाससँ कहलक, "लिअ, ई काढ़ा पीब लिअ।” मोहनदास कतेक रास गहीर आँखिसँ गोपालदासकेँ किछु काल धरि देखलक आ फेर कोनो बच्चा सन बाटी मुँह लगा कऽ सभटा काढ़ा गटागट पीब गेल। शाइत ओकर दिमागक कोनो कोनमे अपनाकेँ ठीक करबाक सेहन्ता एखनो दम मारि रहल छल। कस्तूरी आ गोपालदासकेँ आफियत भेलै। जौं दवाइ असर कऽ जाए तँ ठीक नै तँ डॉक्टरकेँ बजाबऽ पड़त। मोहनदास फेर सुति गेल। मोहनदास अप्पन घरक ओसारपर ओनाहिते पाँच दिन आ चारि राति लगातार सुतल रहल। गाममे ई गप पसरि गेल जे ओकर दिमाग सनकि गेल छै आ ओ केकरो चिन्हैत नै अछि, एतए धरि जे अप्पन कनियाँ कस्तूरी आ बच्चा धरिकेँ नहि। कियो कहतिऐ जे महुक दारूमे यूरियाक फेँटक कारण एहन भेल , कियो कहतिऐ जे ओ ओरियंटल कोल माइंसक कॉलोनी लेनिन नगरमे लू लागि गेलासँ खसि गेल छल, तखनेसँ ओकर स्मृति चलि गेल। विजय तिवारी ई गप पसारि देलक जे ओकर कबरा कुत्ता मोहनदासकेँ धोखासँ काटि लेलकै, आब देखैत रहब, जहिना पानि बरसत ओ कुकुर जना भूकत। जतेक मुँह छल ओतेक गप छल। मुश्किल देवदास आ शारदाक संग सेहो छल। ओ स्कूल जाइत छल तँ ओतए मास्टर आ बच्चा ओकरा सँ पुछैत छल, की अहाँक बाप बताह भऽ गेल अछि? अहाँक बाप अहाँकेँ चिन्हैत नै अछि की? की ओ सुतल रहैत अछि? तखन फेर ओकर दातमनि-सफाइ आ हगब-मूतब कोना होइत छै? एकटा अफवाह इहो पसरल जे एक राति मोहनदास एकाएक उठल आ अप्पन बाप काबा दासक कचिया लऽ कऽ घरक सभ लोककेँ काटै-मारै लेल दौगल। ओ तँ कस्तूरी ओकरासँ ओझरा गेल आ आन्हर पुतलीबाइ ओकरा रस्सीसँ बान्हि देलक, नै तँ पता नै की भऽ जैतिऐ। (ई सभ घटना ओइ कालक छी जखन "इंडिया शाइन' कऽ रहल छल आ वित्तमंत्री आ विश्वबैंकक दावा छल जे सन १९९० सँ शुरू भेल ५.८ प्रतिशतक आर्थिक विकासक अखुनका विकास दर जौं एतेक साल भरि आओर बनल रहल तँ इंडिया अमेरिका बनि जाएत किएकि ऐ सँ अदहा विकास दरपर पचास बरखक भीतर अमेरिका अमेरिका बनि गेल। ...वएह काल जखन हमरा अस्थि-यक्ष्मा भेल छल आ हमर रीढ़क हड्डी एल.आर-४ आ ५ गलि गेल छल। हम नौ मास ओछाओनपर रहि आ कांधारमे बमियानक पहाड़मे बुद्धक मुस्काइत मूड़ीकेँ फिरकापरस्त ोर लांचर-मिसाइलसँ तोड़ि रहल छलौं... ...वएह काल जखन दिल्लीमे गरीब मजदूरक चारि सालक घामसँ, १९ हजार टन लोहा आ ४ लाख ५७ हजार घन मीटर धरतीकेँ खोदि कऽ एशियाक सभसँ पैघ, दुनियाक सभसँ महग आ आधुनिक मेट्रो रेल बनाओल जा रहल छल...।...जखन साढ़े तीन हजार बान्हक लेल पाँच करोड़सँ बेसी आदिवासी आ दलितक घर-खेत-बाड़ी पानिमे डुमा देल गेल छल...। जखन देशक २० करोड़ लोक लग पिबाक लेल पानि धरि नै छलै...आ साठि करोड़ लोक लग हगै, नहाबैक आ मूतैक लेल जगह नै छलै.. ...जखन सरकारमे साझीदार वामपंथी पार्टी पेट्रोलक दाम नै बढ़बै लेल दिल्लीमे हल्ला मचा रहल छल, जखन हिन्दुस्तानक पूरा आबादीक ९० प्रतिशत माने लगभग ९२ करोड़ लोककेँ पेट्रोलसँ किछु लेनाइ-देनाइ नै छल... ...जखन राजस्थानक गंगानगर आ टोंकक एक दर्जन गरीब किसानकेँ पुलिस ऐ लेल गोली चला कऽ मारि देने छल किएकि ओ अप्पन सुखाइत फसिलकेँ पानि पटाबैक लेल पानि मांगैत पत्थरबाजीपर उतरि गेल छल... ...वएह काल जखन अब्दुल करीम तेलगी कतेक हजार करोड़ टकाक जाली टिकट बेचले छल आ ऐ घोटालामे देशक कतेक पैघ अफसर आ नेता मिलल छल!...वएह काल जखन हिन्दीक एकटा बूढ़ आलोचक एक अफसरकेँ मुक्तिबोध आ दोसर खुर्राट दोसर अफसर केँ प्रेमचंद आ फणीश्वरनाथ रेणु घोषित कऽ रहल छल...जखन पोखरणमे बम फूटि गेल छल आ कारगिलक बाद सद्भावना बस चलाओल ज रह छल... ...वएह काल जखन पुरबनराक कठिना धारक पानि एकटा कागजक कारखानाक लेल लकड़ी सड़ाबैक बान्हमे बदलल जा रहल छल आ ओ सभटा हिस्सा पानिमे डूमि गेल छल, जतए मोहनदास पलिया बना कऽ तरबूज, ककड़ी, खरबूज, सजमनि उगाबै छल... ...आ जतए एक राति "हु तु तू...तू तू..' करैत ओ कस्तूरीक छपाकसँ कठिनाक धारमे खसि कऽ प्रेम केने छल आ नक्षत्रक सलेटी आभामे कएल गेल ओइ उद्दाम सहवासक स्मृतिक रूपमे ठीक नौ मासक बाद शारदाक जन्म भेल छल...) मुदा असलमे मोहनदास नै तँ पागल भेल छल, नै ओकर स्मृतिमे कोनो खोट छल। ओकर चेतनामे जे घाव लागल छल ओ लगभग एक हफ्ताक अखंड नीन, मूर्छा वा नशा काल चुपचाप भरि गेल। जखैन ओ जागल तँ ओ फेर पहिलुके जेहन मोहनदास छल, जे नीक तरहेँ बुझैत छल जे असली मोहनदास वल्द काबा दास, साकिन पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपपुर, मध्यप्रदेश वएह रहै, जे आठ-दस बरख पहिने शासकीय एम.जी. कॉलेजसँ बी.ए. कएने छल आ मेरिटमे दोसर ठाम हासिल कएने छल। असली मोहनदास वएह छल जकरा नौकरी ऐ द्वारे नै भेटल छल किएकि ओकरा लग कोनो पैरवी, चिन्हल-जानल तिकड़म आ घूसक लेल टका नै छलै। ओ कोनो गिरोह वा माफियाक सदस्य नै छल, किएकि ओ ओइ जातिक आ वर्गक नै छल, जै जाति-वर्गक लग तागति छल। ओकरा नीक जकाँ बूझल छलै जे ओकरा संग आ ओकरा जेहन असंख्य लोकक संग लगातार पिछला कतेक सालसँ धोखाधड़ी आ छल कएल जा रहल छल मुदा ओ किछु कऽ सकैमे असहाय छल। मोहनदासकेँ ई सेहो नीकसँ बुझल छलै जे बिछिया टोलाक बिसनाथ बल्द नगेंद्रनाथ, जे लेनिन नगरमे मोहनदास विश्वकर्मा बल्द काबा दास बनि कऽ ओरियंटल कोल माइंसमे कनिष्ठ आगार अधिकारीक नौकरी करैत दस हजारसँ बेसी दरमाहा लऽ रहल छल, ओ कत्तौसँ मोहनदास नै छल। ओ एकटा बदमाश, कट्टर जातिवादी जालसाज अछि, जकर तागति एतेक बेसी छलै जे मोहनदास ओकर आगू कोनो लाचार-बीमार मूस सन छल। मोहनदास बुझै छल जे ओकर बाप माने असली काबा दास, जे टी.बी.क रोगी छल आ जे खोंीक संग खूनक कै करैत बाँसक टोकरी, सूप आ पटिया बनाबै छल, ओ मरि गेल छल मुदा एकरा साबित कऽ सकब ओकर वशमे नै छलै, किएकि बिसनाथक बाप नागेंद्रनाथ काबा दासक रूपमे बिछिया टोल आ लेनिन नगरमे अखनो रहै छल आ ओकरा सभ लग एकर दस्तावेजी सबूत छलै। मोहनदास चुप रहब शुरू कऽ देने छल। ओ कम्मे बजैत छल। कठिनामे बान्ह बनि गेलासँ ओकर रोजी-रोटीक एकटा आसरा छिना गेल छलै तइसँ ओ बजारमे इमरानक "स्टार कंप्यूटर सेंटर' पर टाइपिंग, प्रिंट आउट आ जीरॉक्सक काज सीखब शुरू कऽ देलक। ओकर बेटा देवदास, सड़कक कात "दुर्गा ऑटो रिपेयरिंग वर्क्स” मे पंचर लगाबए आ पाना-पेचकसक लमरा-पहुँची करएबला हेल्परक काज करए लागल छल। मासमे सए-दू सए धरि ओ कमा लैत छल आ अप्पन पढ़बाक खर्चा अपनासँ उठाबऽ लागल छल। शारदा तँ दू बरखसँ बिछिया टोलमे बिसनाथक बच्चाकेँ सम्हारैक काज धेने छल आ घरक काज छोड़ि देने छल किएकि रेनुका देवी लेनिन नगर जाए अप्पन वर बिसनाथ लग रहए लागल छल। शारदाकेँ पछिला एक बरखसँ बजारमे "ऐश्वर्या ब्यूटी पार्लर” मे नोकरी भेट गेल छल। ओतुक्का शिखा मैडम ओकरासँ बड़ प्रेम करै छल आ ओकरा पढ़बामे मदति करैत छल। ओ कहैत छल- "शारदा हम अहाँकेँ एक दिन एहन मॉडल बनाएब जे अहाँ मिस वर्ल्ड बनि जाएब आ टी.वी. पर आच्छादित भऽ जाएब!” आठ बरखक शारदा सत्तेमे रातिमे एहन सपना देखऽ लागल छलि। कस्तूरी गाम-मोहल्ला मे खेत-मजूरी कऽ फसलक ओगरबाहीक काज कऽ लैत छल। हँ, मोहनदासक माँ पुतलीबाइक दुनू ठेहुन काबा दासक मरलाक बाद पाथर भऽ गेल छल आ ओ चलि-फिरि नै सकै छल। दिशा-फराकत लेल सेहो घिसियाइत-घिसियाइत पछवड़िया कातक बारी धरि जाइत छल आ फेर घुरि कऽ परछीक कोनमे ओछाओल पटियापर बैसि जाइत छल। ओकर आँखिमे अन्हार गहींर भऽ गेल छल। "स्टार कंप्यूटर सेंटर' मे हर्षवर्धन सोनीसँ मोहनदासक भेंट भेल। हर्षर्धन ओतए किछु अदालती कागजातक फोटोकॉपी आ किछु टाइपिंगक काज करबा लेल गेल छल। ताधरि मोहनदासक टाइपिंग स्पीड ठीक-ठाक भऽ गेल छलै आ ओ कम्मे गलती करैत छल। ओतए मोहनदास अपनेसँ हर्षवर्धनकेँ अप्पन सभटा खिस्सा बतौलक। बीसम सदीक उत्तरार्धमे जेहन विचारधारा बला पार्टीमे हम लगभग बीस बरख धरि काज कएने रही, हर्षवर्धन सोनी ओही पार्टीमे छल। ओकर जीवन कतेक तरहक दुख-संघर्षसँ आ उत्थान-पतनसँ भरल छल। माध्यमिक स्कूलक एकटा मास्टरक बेटा हर्षवर्धन शुरूहेसँ संवेदनशील आ स्वतंत्र विचारक छल। ओकर पैघ भाए श्रीवर्धन सोनी बी.इ.क परीक्षामे टॉप केने छल आ इंजीनियरिंगक डिग्रीक बादो, छह बरख धरि खींचल बेरोजगारीसँ हताश भऽ, पाँच बरख पहिने एक राति अप्पन कोठलीक सीलिंग फैनमे रस्सीक फंदा लगा कऽ आत्महत्या कऽ लेने छल। बजारमे छोट-सन दुकान चलाबैबला बूढ़ बाप आ मिडिल स्कूलक मास्टरी करएवाली माँक बेटा हर्षवर्धन सोनीक मोनमे अप्पन भाइक आत्महत्याक घटना एकटा एहन गहींर घा छल जे पढ़ै कालेसँ ओ छात्र आंदोलनमे भाग लिअए लागल छल। ओ दोसर जातिमे बियाह केने छल आ ओकर दंडमे ओकरा जातिसँ पैरछा देल गेल छल। हर्षवर्धन सोनी एल.एल.बी. कऽ लेने छल आ अप्पन पार्टीक संग स्थानीय अदालतमे ओकालतक काज करैत अप्पन आजीविका चला रहल छल। ओ ओइ दिन जखन "स्टार कंप्यूटर सेंटर” मे मोहनदाससँ ओकर खिस्सा सुनलक जे असलमे खिस्सा नै, एकटा असल जिनगीक सत्यक खेरहा छल, तँ ओ ऐ केसकेँ लऽ कऽ अदालतक शरणमे जएबाक फैसला केलक। "अहाँ लग ऐ लेल कतेक पाइ यए?', मोहनदासक बेरंग, फाटल-चीटल, पैबंद लागल, कोनो जमानामे नील रंग रहल डेनिम पेंटकेँ तकैत हर्षवर्धन बाजल, "हम अहाँक केस लड़ब आ अहाँकेँ न्याय दिआएब।” मोहनदासक आँखिमे चमक आबि गेल। ओकर दुब्बर-पातर देह एक-दू बेर थरथरायल। एक बेर तँ ओकरा विश्वास नै भेल जे कियो ऐ तरहेँ ओकर संग दऽ सकैत अछि, फेर ओ बाजल, "हमरा संग ऐ काल अस्सीटा टका अछि। दू-चारि दिनमे चालीसक जुगाड़ कऽ देब। इमरानसँ सए-दू सए पेशगी भेट जाएत।” हर्षवर्धन बुझि गेल जे मोहनदास बेसीसँ बेसी चारि-पांच सए टका जोगाड़ मास भरिमे कऽ सकैत अछि जखन कि अदालतमे केस दाखिल करबामे कुल खर्च करीब पाँच हजार टका छल। एकक बाद दोसर सरकारक ओ आर्थिक नीति, जे देसक महानगरकेँ अमेरिका बना रहल छल, ओही देशक गाम आ पिछड़ल इलाकाकेँ कंगाल बना कऽ ओतए असंख्य इथियोपिया, रवांडा आ घानाकेँ जन्मा रहल छल। दिल्ली-लखनऊ, मुंबई-भोपाल, कोलकाता-पटनामे जखन सभ राजनीतिक पार्टी आ विचारधाराक प्रोफेसर चालीस-पचास हजार वेतन लऽ रहल छल आ छोटसँ छोट फ्री-लांसर धरि दू पन्नाक रपटपर पाँच सएसँ हजार टका कमा रहल छल, तखन गाम आ छोट कस्बामे, मेहनति कऽ काज करएबला मोहनदास जेहन लोककेँ चारि सए टका जोगाड़ करबामे मास लागि जाइ छै। हर्षवर्धन बुझि गेल जे मोहनदासकेँ अदालतसँ न्याय दियाबैक लेल ओकरा अपनेसँ टका जमा करए पड़तै। ओ एक हजार टका अपना लगसँ लगेलक, दू हजार किछु दोस्तसँ मांगलक आ बाकी टका लायंस क्लबक चैरिटी फंडसँ डोनेशनमे लेलक, माने संक्षेपमे जे जोगाड़ भऽ गेल। तँ ऐ तरहेँ आखिरीमे मोहनदासक मामला गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी), जे सिगरेट नै पीबै छल आ बड़ दुब्बर छल, जकर गालक हड्डी छुरी सन छल आ उभरल छल आ जकर माथपर असंख्य टेढ़-टूढ़ डड़ीर छलै, क अदालतमे दाखिल भऽ गेल। मोहनदास बल्द काबा दास जाति विश्वकर्मा, साकिन पुरबनरा, थाना आ जिला अनूपपुर, म.प्र. बनाम विश्वनाथ बल्द नगेंद्रनाथ, जाति ब्राह्मण साकिन बिछिया टोला, हाल-वाशिन्दा ए/11, लेनिन नगर, ओरियंटल कोल माइंस, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़। मामिलाक दाखिल हेबाक संगे अदालत ओरियंटल कोल माइंसक महा-प्रबंधक एस.के. सिंह आ वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव संग कतेक आओर प्रबंधक श्रेणीक अधिकारीकेँ तलब केलक आ ओकरासँ अदालतक आगू ई साक्ष्य पेश करै लेल कहलक जे ओ प्रमाणित करए जे ओकर कंपनी ओरियंटल कोल माइंसमे जूनियर डिपा. ऑफिसरक पदपर पछिला कतेक बरखसँ काज करैबला मोहनदास विश्वकर्मा असल मे बिछिया टोलाक विश्वनाथ बल्द नगेंद्रनाथ कियो आन नै अछि? न्यायिक दंडाधिकारी गजानन माधव मुक्तिबोध अनूपनगर आ दुर्गक जिलाधीशकेँ आदेश देलक जे ओ ऐ मामिलाक शासकीय जाँच करए आ दू सप्ताहक भीतर अदालतक सोझाँ अप्पन जांचक रिपोर्ट पेश करए। बीड़ी पियैबला न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधक ऐ आदेश आ अदालतक सम्मनसँ ओरियंटल कोल माइंसमे हड़कंप मचि गेल। स्थानीय अखबारमे एकर खबरि छपल- "असल'" मोहनदास के?” "एन.डी.टी.वी.” आ "आज तक” ैनलक स्थानीय संवाददाता क्रमश: अनिल ादव आ खालिद रशीद ऐ मामलाक बाइट दिल्ली आ भोपाल पठेलक मुदा समाचार "राष्ट्रीय स्तर” आ "अखिल भारतीय परिव्याप्ति” क नै भऽ सकल, कारण जे ऐ मे दिल्ली-भोपाल-लखनऊ क कोनो पैघ नेता वा अफसरक नाम शामिल नै छल, तइसँ ई प्रांतीय वा राष्ट्रीय "खबर” वा "सूचना'क रूपमे प्रसारित नै कएल गेल। (...ई ओइ कालक ब्यौरा अछि, जखन विधु विनोद चोपड़ाक फिल्म "मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.”, बॉक्स ऑफिसपर सुपर हिट भऽ गेल छल। जॉर्ज बुश आ टोनी ब्लेयर, दुनू अप्पन-अप्पन देशमे दोबारा चुनाव जीति कऽ सत्तामे आबि गेल छल, अमेरिकाक जहलमे भिखमंगा फकीर जेहन दाढ़ी आ नाक, झाइसँ भरल चेहराबला सद्दाम हुसन अरबमे कविता लिखऽ लागल छल आ मंडल आयोगक सिफारिश लागू करैबला भारतक पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंहकेँ कैंसर भऽ गेल छल, किडनी खराब छल। ओ जे.पी. जकाँ डायलिसिसपर छल आ दिल्लीक एक कोनमे कैनवासपर चुपचाप चित्र बना रहल छल... ...वएह काल जखन पटनाक कलेक्टर बाढ़ राहतक करोड़ों टका मारि कऽ नपत्ता भऽ गेल छल आ नव सरकार फिल्म सेंसर बोर्डक पुरान अध्यक्षकेँ हटा कऽ जकरा नव अध्यक्ष बनौने छल, ओ बालीवुड फिल्मसँ बाहर लखाह दैत रहल ओइ दृश्यपर सेंसरक कैंची चलेबापर विचार कऽ रहल छल, जइमे एकटा खानदानी नवाबक जिप्सीसँ शिकारमे मारल गेल कालिया मृग, दूटा खरगोशक लाश, सर्च लाइट आ बंदूकक बरामदगीक शॉट छल। ...ई वएह काल छल जखैन लगातार पंद्रह बरखसँ हिंदी भाषाक संबंधित पदक चयन समितिक सभ सदस्य, खाली पदपर अप्पन जमाय, बेटा, बेटी, समैध, चापलूस, सेवककेँ निर्लज्जतासँ नियुक्ति कऽ दैत छल आ ओइपर नै कोनो सी.बी.आइ. इंक्वायरी होइल छल, नै राज्यसभा वा लोकसभामे कोनो सवाल उठैत छल... ...जखैन सभ सत्ताधारी पार्टी, मानव संसाधन मंत्रालय, पब्लिक सेक्टर भ्रष्ट कारखाना बनि गेल छल आ ई सभ विद्वान, शिक्षामित्र, समाजशास्त्री, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, इतिहासकार, कलाकार, अध्यापकक उत्पादन कऽ रहल छल... आ बच्चाक दिमागपर कब्जा करै लेल शिक्षा-संस्थानमे इतिहास आ पाठ्य¬पुस्तककेँ दोबारा-तिबारा लिखबाक राजनीतिक जंग चलि रहल छल... ...तखन भारत भ्रष्ट देशक सूचीमे...संसारमे ८३म, परमाणु बम बनाबै बला देश मे ६अम, जनसंख्यामे दोसर आ भयावह गरीबीमे खाली बांग्लादेश टासँ ऊपर छल।) हर्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दुनूकेँ मुदा उम्मीद छल जे न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधक अदालतमे दूधक दूध आ पानिक पानि भऽ जाएत। ऐ विश्वासक पाछाँ दूटा मुख्य कारण छल। पहिल तँ ई जे दंडाधिकारी बीड़ी पिबैत छल आ ठेलाक कड़क चाय सेहो। आ हुनका कोनो तरहक घूस वा लालचसँ भ्रष्ट नै कएल जा सकैत छल... ...आओर दोसर ई जे सत मोहनदास दिस छल किए तँ असल मोहनदास बी.ए. वएह छल। "झूठक पएर-मूड़ी किच्छो नै होइत अछि! भिनसरेक इजोत सन सभ किछु साफ लखाह भऽ जाएत! जै हो मलइहा माइ! कृपा बनल रहए सतगुरू कबीर!” कस्तूरीक मौलाइल जिनगीमे आशाक एकटा खूब नव हरियर कोमल दूबि उगि रहल छल। पुतलीबाइक आँखिमे अन्हार तँ काबाक जेबाक बादेसँ बढ़ि गेल छल मुदा परछीक कोनमे चटाइपर कोनो बूढ़, पंखझरी चील सन बैसल ओ अप्पन कान लगातार कोनो भीतर कोठली दिस लगओने राखै छल। आ एक दिन भिनसरे जखन मोहनदास अदालतक पेशीमे जएबा लेल बासि भात आ अल्लूक तरकारी खा रहल छल, तखने एकाएक पुतलीक खुशीसँ भरल बोल आंगनमे गूंजि गेल। ओकरा गरसँ जेना कोनो प्रसन्न चिड़ै बाजि रहल छल: "हे...ऐ...कनियाँ! हे देवदास! कोठरीक भीतर ताकि कऽ देखियौ! लागैत अछि जे अलोपी मैना नबका घोंसला बनेने छै की? दौगू-दौगू...!” मोहनदास जल्दी-जल्दी खाइमे लागल छल, जइसँ बेरसँ पहिने अदालत पहुँचि जाए किए तँ लोक कहैत छल जे बीड़ीक सुट्टा मारैबला जज टाइमक बड़ पाबंद अछि। जौं पांच मिनटक बेर भेल तँ पिछला पेशीमे अगला तारीख दऽ कऽ अगला पेशी शुरू कऽ दैत छै। जखन मोहनदास दिन भरि लेल, भरि पेट भात-तरकारीक कलेवा खा कऽ घरसँ बाहर निकलि रहल छल तँ पाछाँ ओकर आन्हर-बूढ़ चिड़ै सन माँ पुतली जोर-जोरसँ पुलकित भेल गाबि रहल छल: "चोला तर जइ रामा...तन तर जइ रामा, सत गुरु साखी ला...चोला तर जइ... ...चोला तर जइ' अदालत मे ओरियंटल कोल माइंसक महाप्रबंधक एस.के. सिंह हाजिर नै भेल छल। हुनकर अर्जी वकील पेश कऽ देलक। कॉलयरीक वेलफेयर ऑफिसर ए.के. श्रीवास्तव अप्पन इनक्वायरीक सभटा फाइल आ संगमे लागल सभटा दस्तावेज न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणीक अवलोकनार्थ हुनकर टेबुलपर राखि देलक। हर्षवर्धन सोनीक चेहरा उड़ल छलै किए तँ बिछिया टोलासँ जै तीनटा गवाहकेँ अदालतमे आबि कऽ साक्ष्य देबाक छल, जे मोहनदास नामक जे क्यो ओरियंटल कोल माइंसमे पछिला कतेक बरखसँ कनिष्ठ आगार अधिकारीक नौकरी कऽ रहल छल, ओकरा ओ सभ नेनासँ नीकसँ चिन्हैत छल जे ओ मोहनदास नै बिश्वनाथ अछि। ओइ तीन गवाहमे सँ दूटा गवाह अदालतमे हाजिर नै भेल आ तेसर गवाह दिनेश कुमार साहू पलटी मारैत भरि अदालतमे तस्दीक कऽ देलक जे विश्वनाथ मोहनदास छी। ओ आंगुरसँ ह्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दिस इशारा करैत ईहो कहलक जे ई दुनू गोटे मास भरि पहिने ओकर घर आएल छल आ ओकरासँ कहलक जे जौं अहाँ हमर सिखायल बयान कोर्टमे दऽ देब तँ हम अहाँकेँ पाँच हजार टका देब। न्यायिक दंडाधिकारी गजानन माधव मुक्तिबोध अगला सुनवाईक लेल एक मास बादक तारीख धऽ देलक। हर्षवर्धन आ मोहनदास दुनू स्तब्ध छलाह। आब सभटा आस जिलाधीशक जाँच रिपोर्टपर लागल छल। मोहनदासकेँ न्याय जौं भेंट सकैत छल, तँ तखन जखन सत आगू आबतिऐ। अगला पेशीमे दुर्ग आ अनूपपुर, दुनू जिलाक कलेक्टरक जाँच रिपोर्ट जखन अदालतमे पेश कएल गेल तँ हर्षवर्धन आ मोहनदास अवाक रहि गेल। ओइ जाँच रिपोर्टमे छल जे मोहनदास वल्द काबा दास, जूनियर डिपो ऑफिसर, ओरियंटल कोल माइंसक नाम आ शिनाख्तीकेँ लऽ कऽ उठाएल गेल सभटा आरोप निराधार अछि। दस्तावेज, आवश्यक साक्ष्य, परिस्थितिगत प्रमाण, कएकटा ग्रामीण आ पंचायत सदस्यसँ गपसपक बाद निर्विवाद रूपसँ ई सिद्ध होइत छल जे मोहनदास, मोहनदासे अछि, विश्वनाथ नै। बादमे पता चलल जे विश्वनाथ ऐ बेर दुर्ग आ अनूपपुर दूनू जिलाक संबंधित पटवारीकेँ दस-दस हजार टका घूस आ दारू-मुर्गा देने छल। विजय तिवारी सेहो पुलिस गाड़ीमे बिसनाथकेँ बैसा कऽ पटवारीकेँ घूस पहुँचाबऽ लेल गेल छल। असलमे जेहन प्रशासनिक परिपाटी छल, ओइमे कलेक्टर माने जिलाधीश माने डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेटक इंक्वायरीक असल मतलबे होइत छल संबंधित तहसील वा परगनाक पटवारीसँ जाँच। जौं कोनो अदालत कलेक्टरकेँ कोनो जाँचक आदेश दैत छल तँ कलेक्टर नोट लगा कऽ ओइ आदेशकेँ अप्पन मातहत, संबंधित इलाकाक एस.डी.एम. केँ पठा दैत छल। एस.डी.एम. ओकरा तहसीलदार आ तहसीलदार ओकरा नयब तहसीलदारकेँ दऽ दैत छल। ऐ तरहेँ रेवेन्यू इंस्पेक्टर माने आर.आर. माने कानूनगोसँ भेल आखिरमे ओ आदेश पटवारी लग पहुँचि जाइ छल। माने आखिरमे पटवारी कलेक्टरक आँखि-कान आ नाक बनि जाइ छल। ओइ राति जखन गाम बिछिया टोला आ पुरबनराक पटवारी कमल किशोरकेँ बिसनाथ आ विजय तिवारी दस हजार टकाक गड्डी देलक आ मैकडॉवल नंबर वन व्हिस्कीक संग बटर चिकेन आ मटन जींसक कबाब खुएलक तँ कमल किशोर पटवारी जमीनपर दुनूक पएरपर लोटपोट करए लागल। "यौ, अहाँ सभक हुकुम हम कहियो टारब यौ?...एत्ते एमाउंटमे तँ हम सार मूसकेँ हाथी, खेतकेँ सड़क आ बलगोविनाकेँ छह बच्चाक माए बना देब।” कमल किशोर पटवारी मगन भऽ कऽ नोटकेँ अप्पन झोरामे धऽ कऽ उड़ि रहल छल। ओ मैकडॉवल नंबर वनक पटियाला पैग एक घोंटमे गराक नीचाँ उतारलक आ ओतए ओकर सभका सोझेँ, बिना कत्तौ गेने, मामलाक सभटा तफ्तीश कऽ देलक आ पंद्रह मिनटमे मोहनदास बनाम विश्वनाथ मामिलामे जिलाधीश द्वारा पूर कएल गेल इंक्वायरीक पुख्ता रिपोर्ट सफेद कागजक एकटा पन्नापर तैयार भऽ गेल। अर्थात अंग्रेजक गुलाम भारतपर शासनक लेल तैयार कएल गेल नौकरशाहीक ऐ बीझ खाएल लौह ढाँचामे, जे आजादीक साठि बरखक बादक आधिकारिक सरकारी दस्तावेज धरि विश्वनाथ वल्द नगेंद्रनाथ छल, केँ मोहनदास वल्द काबा दास बना देलक। मोहनदास फेर टूटए लागल। ओ लगातार कबीरक जाप करैत छल। मलइहा माइक मढ़ियाक ड्योढ़ीपर ओ घंटो बैसल रहैत छल। मलइहा माइ मलाइ टाक भोग लगाबैत छल। सेहो बकरीटा दूधक मलाइक। ऊँच जातिक लोक ओकर मढ़ियामे नै जाइत छल। ठाकुर, बनिया, बाभन, लालाक देवी-देवता दोसर छल। मलइहा माइक पूजाक काज ब्राहमण नै गोसाईं करैत छल। कहैत छै जे दलित-आदिवासीक संग भात-रोटी, बेटा-बेटीक संबंध बनाबैक कारण, जाति-पातिसँ निकालल गेल ब्राह्मण गोसाईं कहबैत छल। मोहनदास खाड़ा गाम जा कऽ सिउनारायण गोसाईंकेँ बजौलक, ओकरा बीस टका आओर दालि-चाउर, नून, हरैद, चुदक, सीधा देलक। ओकरासँ ओ मलइहा माइक पूजा करौलक आ शुद्ध बकरीक दूधसँ निकालल गेल पाव भरि मलाइक भोज चढ़ेलक। ऐहि बीच एकटा घटना आर भऽ गेल। एक दिन भिनसर काल, जखैन कस्तूरी गामक दू-तीन टा मौगी संगे दिशा-फरकत करए लेल गेल, ओकरा सभकेँ जंगल-झाड़क पाछाँ कोनो हलचलक आभास भेलै। जेना कियो ओतए नुकाएल छै। कस्तूरी आइ-काल्हि अप्पन हिफाजत लेल हरदम कछनीमे कचिया खोँसि कऽ राखैत छल। ओकरा ऐ गपक नीकसँ आभास छलै जे दू बच्चाक माए बनि गेलाक बादो ओ एखन धरि गाममे सभसँ सुन्नर काठी आ चेहरा-मोहराक मौगी अछि। आओर कतेक दिनसँ गामक ठकुरान-बभान शोहादक नजरि गिद्ध जेहन ओकरापर गड़ल छै। कस्तूरी उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। ओ डाँरमे खोँसल कचिया निकालि कऽ हाथमे थाम्हि लेलक आ समधानल डेगसँ जंगल-झाड़ दिस बढ़ल। ओकर पाछाँ रमोली, सितिया, चंदना आ सावित्री छल। “की छी...केकर भीतर हबस पैसल छै! निकल तोहर गर्मी निकालि दैत छी टटीबे! मुँहझड़को।” कस्तूरी चिकरलक। बाँकी मौगी सभ सेहो बोन-झाँकुरकेँ घेरब शुरू कऽ देलक। सभक हाथमे एक-एक दिसा-फारकतबला लोटा छलै। झाँकुरसँ फटाकसँ निकलि कऽ छत्रधारीक लड़का विजय तिवारी भागल। गंजी-जंघियामे ओकर चर्बी चढ़ल थुलथुल देह भागैत काल गोलमटोल तरबूज जेहन लखाह दऽ रहल छल। कस्तूरी किछु दूर धरि हाँसू तानि कऽ ओकरा दिस दौगल। रमोली, सितिया आ सावित्री गरियाबैत पोखरि दिसक लोटा खेंचि-खेंचि कऽ मारलक। दरोगा विजय तिवारी खसैत-पड़ैत लंक लऽ भागि रहल छल। मौगी सभ पाछाँसँ चिकरि रहल छल: 'यौ, टी.वी. बलाकेँ बजाउ, सीन खीचू।' 'दौड़ऽ हे दौगऽ! दरोगा कछियामे हगि रहल छै...' ओइ दिन सच्चेमे विजय तिवारी डरि गेल छल जे कत्तौ मोहनदास अप्पन वकील हर्षवर्धन सोनी संग मिल कऽ टी.वी. आ अख़बारमे किछु अंट-शंट नै देखा-छपा दिऐ। (ई सभ किछु ओइ दिनक घटना छी जखन समुच्चा एशियाक राजनीतिक इतिहासमे पहिल बेर एकटा भारतीय स्त्री कम्युनिस्ट पार्टीक पोलित ब्यूरोक सदस्य बनल छलि, एकटा दोसर स्त्री प्रधानमंत्रीक कुर्सी ठुकरा देने छलि......आ स्त्री, संसारक ओइ सभसँ प्रतिष्ठित जूरीक सदस्य बनि गेल छलि, जइमे ऋत्विक घटकक सुवर्ण रेखा वा कोमल गांधार वा शैलेंद्रक तीसरी कसमक स्क्रीनिंग धरि नै भऽ सकल छल......आ ओही काल जखन बगदादक अबू गरीब जेलमे एकटा अमेरिकी स्त्री ईराकी पुरुषकेँ नांगर कऽ ओकरा एक-दोसराक ऊपर लादि कऽ एकटा पिरामिड जेहन बना देल छल आ अमेरिकी झंडा लऽ कऽ ओकर ऊपर चढ़ि गेल छलि......ओही काल जखन पावर सत्यमे जेंडरकेँ परिभाषित कऽ रहल छल!...ओइ काल जखन दिल्लीक धौलाकुआँ लग उत्तर-पूर्वक एकटा लड़कीकेँ कारक भीतर खींच कऽ राजधानीक सभ वी.आइ.पी. सड़कपर अढाइ घंटा धरि लगातार दिल्लीक पाँच पुरुष बलात्कार करैत रहल छल...आ इम्फालमे मनोरमाक बलात्कार आ हत्याक विरोधमे कृष्णक उपासना करएवाली कएक सए मैतेइ स्त्रीगण तामसमे आ हतास भऽ नांगट भऽ गेल छलि......ओइ काल जखन दूटा स्त्री सरदार सरोवरमे ४०.००० दलित आ आदिवासीक घर-जमीन-जायदादकेँ पानिमे डुमा दै बला योजनाक विरुद्ध लड़ाइ हारि गेल छल आ जलप्लावनमे वन्य प्राणी, वनस्पति, गाछ सभ किछु डूमि गेल छल......टी.वी.पर ओइ टटाएल स्त्रीगणक कानैत, हरल चेहरा लगातार लखाह भऽ रहल छल......वएह काल जखन हम दिल्ली छोडि कऽ वैशाली आबि गेल रही आ हमर छतसँ गाजियाबाद ओ झंडापुर साफ लखाह दैत छल, जतए ठीक पंद्रह बरख पहिने ओइ क्रांतिकारी कलाकार आ रंगकर्मीक हत्या भेल छल, जाकर नाम सफ़दर हाशमी छल...) गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंधाधिकारी (प्रथम श्रेणी) क अदालतमे सभ गवाह, सबूत, जाँच रिपोर्ट एतए धरि जे दू-दूटा जिलाधीशक इनक्वायरी ई सिद्ध कऽ देलक जे बिसनाथे मोहनदास अछि। तखन जे गरीब सन आदमी मोहनदास हेबाक दावा कऽ रहल छल ओ के अछि?- एकर अदालतमे चलि रहल मामलासँ कोनो सोझ कानूनी संबंध तँ नै छलै। ओ एकटा अलग केस भऽ सकैत छल, मुदा से तखन जखन ओकर दरख्वास्त अदालतमे कोनो वकील वादी दिससँ दाखिल करए। हर्षवर्धन सोनी तीन दिन, तीन राति धरि सुति नै सकल। ओ नीकसँ बुझै छल जे मोहनदास मोहनदास छी, मुदा एकरा प्रमाणित कऽ सकब लगातार कठिनेटा नै असंभव भऽ रहल छलै। ओ हमरा ई-मेल पठेलक: "ई तँ हद छै! नै हमरा किछु खाएल-पीएल भऽ रहल अछि, नै रातिमे नीन आबैत अछि। ओम्हर मोहनदासक सेहो यएह हालत छै। सभ कियो बुझैत अछि जे असली मोहनदास यएह छी मुदा एकरा साबित कऽ सकब मुमकिन नै रहि गेल छै। की करी किछु सुझैत नै अछि। मोहनदास आ हमरा दुनू गोटेकेँ धमकी देल जा रहल अछि जे चुप भऽ कऽ बैसि जाउ....ऐ बीच पता चलल जे बिसनाथ रासबिहारी रायकेँ अप्पन वकील बनौने अछि। हुनका तँ अहाँ जनैत छियन्हि, सत्ताधारी पार्टीक बड़ पैघ नेता छथिन। वहु नगर निगमक अध्यक्ष छनि आ कतेक सरकारी-गैर-सरकारी संगठनक प्रमुख छथिन। मोहनदासक पक्षमे आब चारि-पाँच लोक गवाही दै लेल तैयार भेल अछि- बीरन बैगा, गोपालदास, बिहारीदास, रमोली, सितिया...मुदा ओकर सभ बगे-बानी एहन छै जे लागैत छै जे एहन गवाह तँ पचीस-पचासमे कत्तौ भेट जाएत। भिखमंगा लागैत अछि सभ गोटे। ...सोचैत छी हम न्यायिक दंडाधिकारीसँ सोझे भेंट कऽ कए देखिऐ। ओ बीड़ी पीबैत छथि आ किछु अजीब सन लागितो छथि। जी.एम. मुक्तिबोध हुनकर नाम छन्हि। मराठी छथि मुदा हुनकर हिन्दी अद्भुत अछि। कोर्टक बाद सड़कक कात रामदीनक ठेलापर कड़क चाह पिबैत छथि। ...हम नोट केने रही जे ओ जखन अदालतमे मोहनदास दिस देखैत छथि तँ ओकर आँखिमे एकटा बेचैनी आबि जाइ छनि। हुनकर माथक एकटा नस उभरल छनि आ जखन ओ किछु सोचैत छथि तँ ओ फुलि जाइ छनि।....हमरा डर लागले रहैत अछि जे कत्तौ कोनो दिन ओ नस फाटि ने जाए। हुनकर आँखिमे किछु एहन तँ अछि जना ओ कोनो जासूस वा खुफियाक आँखि हुअए जे कानि कऽ चुपचाप केकरो आत्माक भीतर धँसि कऽ ओकर सभ किछु पखारि सकैत अछि। ...सभ कहैत अछि जे हुनकर घरमे कतेक रास किताब छन्हि आ ओ तीन बजे राति धरि पढै़त रहैत छथि। एकटा विचित्र सन गप हमरा ईहो पता लागल जे जी.एम. मुक्तिबोध छथि तँ प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी मुदा सरकार हुनकर पाछाँ सी.आइ.डी. लगा कऽ राखने छल...।' कोनो दोसर बात नै देखि हर्षवर्धन एक तरहेँ जुआ खेलेलक। कोनो विचाराधीन मामिलाक संबंधमे भेंट करब, सेहो एहन जजसँ जे किछु रहस्यपूर्ण देखबामे लगैत अछि, एकटा खतरासँ भरल निर्णय छल। जौं जी.एम. मुक्तिबोध तमसा जेतथि तँ ओकर कैरियर बर्बाद भऽ सकैत छल। हर्षवर्धन सोनीक अतीत ओहिनो बड़ कठिनाइ, संघर्ष आ दु:खसँ भरल छलै, बेरोजगारीमे भाइक हताश आत्महत्या ओकर मनसँ कखनो एक्को पल लेल नै जाइ छलै। वकालत तँ खाली नाम मात्र लेल छलै। ओकरा लग बेसी वएह सभ अबैत छल जकर जेबीमे महग वकील करबा लेल टका नै होइ छलै। मोहनदासक मोकदमामे ओकरा किछु नै भेट रहल छलै, ऊपरसँ ओकरा पाँच हजार टका अपनेसँ जोगाड़ करए पड़ल छल। तकर बादो ओ न्यायिक दंडाधिकारीसँ भेंट करबाक खतरा लेलक। हर्षवर्धनकेँ आश्वस्ति भेलै जखन अप्पन फ्लैटपर ओकरा देख कऽ गजानन माधव मुक्तिबोधक चेहरापर एहन भाव एलै जना ओकरा पहिनेसँ ओकर एबाक गप बुझल हुअए। जना हुनका पहिनेसँ पता छल जे हर्षवर्धन ओकरा लग अएबे करत। ओ एकरा लेल लकड़ीक एकटा पुरनका कुर्सी राखि देलक आ "बैसू! हम चाह बनाबैत छी!, कहि कऽ भीतर चलि गेल'। हर्षवर्धन कोठलीमे नजरि दौगेलक। ओतए सभटा चीज बेतरतीब छल। कतेक किताब एतए-ओतए पसरल छल आ ओकरामे सँ कतेक पन्ना खुजल छल, जकर बीचमे पेंसिल, कार्ड आ गाछक पात खोँसल गेल छल। भऽ सकैत अछि जे किताबक ओ पृष्ठ ओकरा बड्ड पसीन हेतै आ ओ बेर-बेर ओकरा पढ़ैत छल होएत। कोठलीक हालत देखि कऽ लागैत छल जे ओ एतए असगरे रहैत छथि। हर्षवर्धनकेँ पता लागल जे ओकर बदली अधिक काल ओइ आदिवासी आ पिछड़ल इलाकामे कऽ देल जाइत अछि, जतए एहन मुकदमा नै आबैत छै, जकरासँ कोनो पैघ लोक आ व्यापारीकेँ कोनो नुकसान भऽ जाए। हर्षवर्धनक आँखि ऊपर उठलै। भीतपर गाँधीजी आ मार्क्सक चित्र टांगल छल। एकटा कोनमे गणेशक प्रतिमा सेहो ाखल छल। वाम भागक भीतसँ लागल बुकसेल्फ छल, जइमे कानूनक कतेक किताब राखल छल, जना ओकरा कतेक बरखसँ खोलले नै गेल हुअए। जी.एम. मुक्तिबोध चाह लऽ कऽ आबि गेल छल। संगेमे एकटा छिपलीमे कनीटा बेसनक सेब छल। चाहकेँ मचियापर राखि कऽ मुक्तिबोध तख्तापर बैस गेलथि। चाह बड़ कड़गर आ महोर छल। खूब औंटल आ भफाएल। कतेक काल धरि कोठलीमे सुन-सन्नाटा रहल। हर्षवर्धनकेँ हिम्मत नै भऽ रहल छलै जे ओ ओकरासँ गप शुरू करितिऐ। सोझाँक भीतपर एकटा पुरान घड़ी छल जे चाभी भरलासँ चलैत होएत। मुदा लागैत छल जे कतेक कालसँ कियो ओकरामे चाभी भरनहिये नै अछि। ओ ठाढ़ छल। घरमे एकटा कलेंडर टांगल छल, जइमे माथपर मुरेठा बान्हल बाल गंगाधर तिलकक चित्र छपल छल। हर्षवर्धन देखलक जे ओ कलेंडर सन 1964 क अछि। -हम जानैत छी जे (एकटा बड़ पैघ कतेक दूरसँ जा कऽ घुरैत साँस).... मोहनदासे असली मोहनदास अछि। न्यायिक दंडाधिकारीक अवाज जना कोनो गहींर इनार वा तरहरिमे सँ आबि रहल छल। बड़ रकम, मद्धिम अवाज। ओ चाहक एकटा बड़का चुस्की भरलक। ओ घोंट आ स्वाद जेना ओकर माथक तनावकेँ कनी कम कऽ देलक। "...आ ओ दोसर लोक फ्रॉड अछि। ओ सरासर इमपर्सोनेट कऽ रहल अछि। हमरा बुझल यऽ ओ विसनाथ वल्द नगेंद्रनाथ, जूनियर डिपो ऑफिसर छी जे ए बटा एगारह, लेनिन नगरमे अवैध ढंगसँ मोहनदासक आइडेंटिटी, चोरा कऽ रहि रहल अछि। ही इज अ चीट, अ क्रिमिनल। अ स्काउंड्रल!' हुनकर बाजब बड़ पातर मुदा कोनो धातु जेहन धग्गड़ आ दृढ़ छल। ओ अप्पन जेबीसँ बीड़ीक बंडल निकालन्हि आ ओइमेसँ एकटा बीड़ी निकालि कऽ पहिने ओइमे उल्टा फूक मारलक, फेर सलाइक काठीसँ ओकरा पजारि कऽ एकटा गहींर सन सुट्टा मारलक। हर्षवर्धनकेँ लागल जेना ओ अप्पन कालसँ बाहर, कोनो टाइम मशीनपर बैसल, कोनो दोसर कालमे पहुँचि गेल अछि। ओ बाजल, "हम यएह तँ बताबैक लेल अहाँ लग आएल रही। मुदा अहाँ कोना जानि लेलिऐ जे असली मोहनदास के छिऐ।' "एकरा जानब तऽ बड़ हल्लुक अछि। जौं अहाँ लग कनियो संवेदना आ विवेक हुअए”, मुक्तिबोध बाजल आ ओ चिंतित भऽ कऽ किछु सोचऽ लागल। ओ बीड़ीक एकटा खूब गहींर सोंट लेलक। "हम तीन रातिसँ लगातार जागि रहल छी। आइ कांट स्लीप फॉर अ मोमेंट! ...इट इज अबसर्ड एंड अ वेरी टेंस एक्सपीरिएंस।’ हुनक आंगुरक बीचमे फँसल बीड़ी मिझाइबला छल। हुनकर आँखि जेना कत्तौ आर नै, अपनाकेँ देखऽ लागल छल। "दि होल सिस्टम हैज टोटली कोलैप्सड...! जस्ट लाइक ट्विन टॉवर्स इन न्यूयार्क...नाइन इलेवन!...नाउ व्हाट इज लेफ्ट फॉर दि सबजेक्ट्स एंड पुअर इज अनार्की एंड कैटॅस्ट्राफ!! (सभटा व्यवस्था ढहि गेल अछि, न्यूयार्कक जोड़ा मीनार सन...सितम्बर एगारह!...आब प्रजा आ गरीबक आगू अराजकता आ विनाश टा बचल छै।) हमरा लगैत अछि, पूँजी आ सत्ता...कैपिटल एंड पावरकेँ एकटा एकदम्मे नव रूपमे आगू अछि। मोहनदास इज बिइंग डिनाइड ऑफ अ सिंपल इसेंशियल लीगल जस्टिस, किए तँ ओ न्यायकेँ कीनि नै सकत! ओह!” गजानन माधव मुक्तिबोधक माथक नस फूलि रहल छल। ओकर आंगुर थरथरा रहल छल। ओ बेचैन भऽ कऽ ठाढ़ भऽ गेल छल। ओ मिझाएल बीड़ीकेँ देखलक आ जेबीसँ सलाइ निकालि कऽ ओकरा फेर सुनगाबै लागल। "सभटा सिद्धांत खत्म भऽ सकैत छै।...कहियो बड़ परिवर्तनकारी लागैबला बौद्धिक आ दार्शनिक संरचना बदलैत कालमे खाली वाग्जाल, अनर्गल बकवास आ ठकक प्रवचनमे बदलि सकैत छै। इतिहासमे एहन बेर-बेर भेल छै। मुदा...' ओ बीड़ीक एकटा गहीर सोंट भीतर खींच कऽ साँस कनी काल लेल रोकि लेलक। लगैत छल जे ओ अप्पन चढ़ैत बेचैन साँसकेँ निकोटीनक धुआँसँ शांत करबाक कोशिश करैत छल। ओकरा खोंखी भऽ गेलै। बामा हाथसँ ओ अप्पन छातीकेँ किछु काल धरि दबा कऽ राखलक, फेर खरखर अवाजमे बाजल, "मुदा मनुखक भीतर एकटा चीज एहन अछि जे कहियो कोनो जुगमे कोनो तरहेँ सत्तासँ मेटाएल नै जा सकैत अछि!...आ ओ अछि न्यायक आकांक्षा! डिजायर फॉर जस्टिस इज इनडिस्ट्रक्टबल...! इट इज आल्वेज इम्मोर्टल...! न्यायिक आकांक्षा कालातीत अछि!' ओ अप्पन मध्यमा आ तर्जनीक बीच फसल बीड़ीकेँ खिड़कीसँ बाहर फेकि देलक। ओ मिझा गेल छल। हर्षवर्धन सोनी मंत्रविद्ध छल। ई केहन लोक अछि। एहन लोककेँ न्यायिक दंडाधिकारीक तरहेँ आइक कालमे देखब कोनो असंभव स्वप्न छल। एकटा दुर्लभ फैंटेसी। ओ बेचैनीक संग कोठलीमे टहलि रहल छल। एकाएक ओ ठाढ़ भऽ गेल आ ओकर आँखिमे एकटा गहींर आत्मीय हँसी कोनो तरल द्रव्य सन झिलमिल करै लागल। "अहां जाउ, हर्षवर्धन!...डोंट वरी मच! हमरा पता अछि जे अहूँ पछिला कतेक रातिसँ सुतल नै छी। हमरे सन'! ओ बड़ जोरसँ एकटा ठहक्का लगेलक आ बाजल, "पार्टनर, बेफिकिर भऽ कऽ सुतू। स्लीप लाइक अ डेड हॉर्स। नाउ, आइ हैव गॉट विद समथिंग'। एकर बाद ओ हर्षवर्धन लग आएल। ओकर कान्हपर ओ हाथ राखलक। हर्षवर्धनकेँ लागल ओकर हाथमे कोनो भार नै छै। कागज, फूल, स्वप्न आ भाषासँ बनल हाथ। गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी रकमसँ हर्षवर्धनक कान लग फुसफुस कऽ बाजल, "हमरा लग एकटा पावर अछि। बस एकटा पावर। दैट इज... सीक्रेट जूडीशियल इंक्वायरी। हम अपना सँ ई जाँच करब। गोपनीय न्यायिक जांच। जस्ट लीव इट टु मी'। हर्षवर्धन सोनी जखन मुक्तिबोधक फ्लैटसँ बाहर आएल तँ ओकरा लगलै जे ओ कोनो बड़ पैघ स्वप्नक बीहड़िसँ बाहर निकलि कऽ अप्पन काल आ यथार्थमे घुरि रहल रहए। ओतए जतए मोहनदास अछि, बिसनाथ अछि, ओ सेहो अछि आ आइक यथार्थ अछि। चारि दिन बादे विश्वनाथ आ ओकर बाप नागेंद्रनाथकेँ जी.एम. मुक्तिबोध न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी) क आदेशपर जालसाजी, धोखाधड़ी, फरेब, चोरी आ गबनक जुर्ममे इंडियन पीनल कोडक धारा 419/420/464/467/ आ 403 क तहत गिरफ्तार कऽ जेल पठा देल गेलै। अदालत ओरियंटल कोल माइंसक जनरल मैनेजर एस.के. सिंह केँ आदेश देलक जे ओ मोहनदास विश्वकर्मा उर्फ विश्वनाथ, जूनियर डिपो ऑफिसरक विरुद्ध तुरंते कार्रवाइ कऽ कार्रवाइक सूचना दू हफ्ताक भीतर अदालतमे पेश करए। एकर अलाबे ऐ पूरा प्रकरणमे प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूपसँ सम्मिलित आ लिप्त अधिकारी आ कर्मचारीक विरूद्ध उपयुक्त विभागीय जाँच आ कार्रवाई शुरू कएल जाए। जौं ओरियंटल कोल माइंस ऐ सभक विरूद्ध न्यायिक आपराधिक प्रक्रियाक अंतर्गत अपराध काएम करए चाहैत अछि तँ ई न्यायालय एकर अनुशंसा करैत अछि। हरबिर्रो मचि गेल। अखबारमे नकली मोहनदासक गिरफ्तारीक खबर प्रमुखतासँ छपल। ओरियंटल कोल माइंसे टा नै मुद कतेक खदान आ सार्वजिनक उपक्रम अधिकारी, यूनियन नेता आ कर्मचारीक होश उड़ि गेलै। चारू दिस भागा-दौरी छल। लेनिन नगर, गाँधीनगर, अंबेडकर नगर, जवाहर नगर, शास्त्री, नेहरू आ तिलक नगर जेहेन सुव्यवस्थित कॉलोनीमे हजारो बिसनाथ जेहन लोक छल जे कोनो दोसर पहचान, अधिकार, योग्यता आ क्षमताकेँ चोरा कऽ कतेक बरखसँ बैसल छल आ कएक हजारमे दरमाहा लऽ रहल छल। बादमे मालूम भेल जे गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी (प्रथम श्रेणी), अनूपपुर, (म.प्र.) अप्पन आपातकालीन सुरक्षित न्यायिक अधिकारक इस्तेमाल कऽ अपनेसँ ऐ मामिलाक गोपनीय जाँच कएले छल। ओइ राति बड़ी काल धरि ओ पढ़ैत रहल। भोरमे ओ नौ बजे ड्राइवरकेँ फोन कऽ अप्पन सरकारी गाड़ी मंगौलक, जकर इस्तेमाल ओ अदालतेटा जएबा आ ओतएसँ घुरबा लेल करैत छल। दोसर फोन ओ एच.एस. परसाई (हरिशंकर परसाई) केँ कएलक, जे पब्लिक प्रॉसिक्यूटर छल। तेसर फोन ओ एस.बी. सिंह (शमशेर बहादुर सिंह) केँ कएलक, जे अनूपपुरक एस.एस.पी छल। ई सभटा अधिकारी अप्पन-अप्पन कर्तव्यनिष्ठा आ ईमानदारीक लेल जानल जाइत छल। चारिम फोन ओ हर्षवर्धन सोनीकेँ कएलक आ ओकरासँ एतबेटा बाजल- "पार्टनर, स्टैंप पेपर लऽ कऽ तुरत आबि जाउ'! शमशेर बहादुर सिंह बतौलक जे न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी सीधा लेनिन नगरमे मटियानी चौक लग, ए/11 नंबरक फ्लैटपर रूकल। बिसनाथ ओइ काल विजय तिवारीक संग कोनो नेताक सरोकारमे बाहर गेल छल। फ्लैटमे ओकर कनियाँ कस्तूरी माने रेनुका देवी टा छल, जे चिटफंड, सोशल सर्विस, किटी पार्टी आ फाइनेंसक धंधा करैत छल। न्यायिक दंडाधिकारी ओकरासँ सोझे ओकर बल्दियत आ ओकर नैहरक पता पुछलक। कस्तूरी मैडम माने रेनुका देवी सरकारी बत्तीनला गाड़ी आ एत्ते लोककेँ देखि कऽ घबड़ा गेल छल। एकर बाद न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी लेनिन नगरसँ निकलि कऽ मिर्जापुर-बनारस जाए बला सड़कपर दौगय लागल। ठीक पैंसठि किलोमीटर बाद ई गाड़ी आवाजपुर गाम दिस जाएबला कच्ची सड़कपर उतरि गेल आ आध घंटा बाद लंकापुर नामक गाममे एकटा भव्य पक्काक मकानक आगू ठाढ़ भऽ गल। न्यायिक दंडाधिकारी ओतए ओइ मकानमे रहैबला लालू प्रसाद पांडे आ ओकर कनियाँ जय ललिता पांडेसँ दूटा सवाल केलक। पहिल ओकर आ ओकर बेटा-बेटीक की नाम छै। आ दोसर ओकर जमाय सबहक नाम आ पता। एकर बाद ओ पब्लिक प्रासिक्यूटर एच.एस.परसाईकेँ निर्देश देलक जे ओ हर्षवर्धन सोनीसँ स्टैंप पेपर लऽ कऽ ओकर हलफनामा तैयार कऽ लिअए। न्यायिक दंडाधिकारीक गाड़ी एकर बाद ग्राम पंचायतक सरपंचक घरपर रूकल, जतए सरपंच आ किछु गवाहक बयान दर्ज कएल गेल। एस.एस.पी. शमशेर बहादुर सिंह जोरसँ ठहक्का लगा कऽ बाजल, "जालसाज तँ एत्ते धरि सोचलो नै छल आ सभक सभ फँसि गेल। हम तँ लंकापुरसँ अनूपपुर थानाक एस.एच.ओ. केँ फोन कऽ देने रही जे बिछिया टोला आ लेनिन नगर जा कऽ नगेन्द्रनाथ आ बिसनाथकेँ थाना लेने आबू, नै तँ फरार भऽ गेल तँ मोसीबत भऽ जाएत। एकर बादक विवरण बड़ संक्षिप्त अछि। हर्षवर्धन सोनी आ मोहनदास दुनू ऐ जीतसँ बड़ खुश भेल। कस्तूरी सौंसे पुरबनरामे नचैत रहल। आन्हर पुतलीबाइ गठुल्लामे लजबिज्जीक बीच नुका कऽ राखल एकटा पोटरी फेर खोजि कऽ निकाललक, जइमे बिसुनभोग चाउर छल। मोहनदासक घरक सभटा कोन बिसुनभोग, खेसारी आ बकरीक दूधसँ बनैबला खीरक गमकसँ गमकि गेल। अलोपी मैनाक खोतामे अंडाक खोलकेँ अप्पन छोट-छोट लोलसँ भीतरसँ फोड़ि कऽ दूटा सुन्नर बच्चा बाहर निकलि आएल छल आ ओकर अबोध चिचियेनाइ कोठरी आ ओसारमे एकटा नव संगीत भरि देलक। पुतलीबाइक गठियाक दर्द कम भऽ गेल आ पहिलुक बेर ओ आंगन आ परछीमे अपनेसँ बाढ़नि लगेलक। ओ मगन भऽ कऽ चलल जा रहल छल मुदा ओइ गीतमे कोनो प्रसन्न चिड़ैक कंठक संग एकटा कोनो उदास-सन स्वर सेहो छल: "अहाँ बिन जग लागे सुन्न... जग लागे सुन्न... नै भावै हमरा सोना-चानी महल अटारी...' हर्षवर्धन सोनी मोहनदाससँ कहलक जे आब अगला केस ओरियंटल कोल माइंसमे तोरा तोहर नोकरी घुरा कऽ दियाबैक लेल दाखिल होएत। अदालत बिसनाथक सर्विस बुकसँ अहाँक सभटा सर्टिफिकेट, मार्कशीट आ टेस्टिमोनियल जब्त कऽ लेने अछि। ओ अहाँकेँ दऽ देल जाएत। मोहनदास हर्षवर्धनसँ लिपटि गेल। ओकर कमजोर-गरीब शरीर थरथरा रहल छलै। ओकर गर भारी छल आ आँखिसँ कृतज्ञता आ आह्लादक नोर लगातार बहि रहल छलै। जना अषाढ़- साओनक तोर लागल हुअए। बीरन बैगाक घरमे फेर रास रंग भेल। सितिया तोरीक तेल, रसून-प्याज आ गरम मस्सलामे रसदार सुअरक मौस रान्हलक। तीन मटकी महुक शराब उतारलक। ढोलक, मंजीराक संग ऐ बेर राम करन हारमोनिया सेहो लऽ कऽ आएल छल। गोपालदास, बीरन, बिहारी, परमोदी, मोहनदास सभ कियो पीलक। सितिया, रमोली, कस्तूरी, सावित्री सेहो ठर्रा पीब कऽ भेर भऽ गेल। ओ नाचि रहल छल आ गाबि रहल छल। मोहनदासकेँ पता नै कतए-कतएसँ एकक बाद एक गीत मोना पड़ि रहल छलै। सभ मस्त भऽ गेल छल। कस्तूरीकेँ आइ दारू किछु बेसी चढ़ि गेल छलै। ओ बेर-बेर मोहनदासक हाथ पकड़ि कऽ खींचऽ लागल। "हु तू तू ...तु...तु! हमरा संग कबड्डी खेलब? हु तू तू तू तु तु...!' ओ मोहनदासक देहमे गुदगुदी लगाबऽ लागल। " जो भाग ऐ ठामसँ! जो दरोगा तिवारीक महिसवारीकेँ सम्हार...!' मोहनदास ओकरासँ चुहुल कऽ रहल छल। सभ हँसैत-हँसैत लोटपोट भऽ रहल छल। जखन सावित्री एकाएक गरजि कऽ बाजल, "दौगऽ हौ...दौगऽ! तिवारी दरोगा धरियामे हगि रहल अछि!!' तँ हँसी आ ठहक्का एक्के बैग बम जना फूटल, जकर धमक्कासँ आध रातिमे पूरा पुरबनरा डोलि उठल। मोहनदास आ बीरन बैगा उठि कऽ आंगनक बीचोबीच ठाढ़ भऽ गेल छल। जना ओतए कोनो अदालत चलि रहल हुअए। दुनू डायलॉग मारि रहल छल। मोहनदास: ए...हे! अहाँ के छी? अहाँक नाम की? चलु कोरटक नाम बताउ! बीरन बैगा: हमर नाम छी बीरन बैगा। आ हमर बापक नाम अछि डिंडवा बइगा! डिंडवा बइगा!! मोहनदास: ए हे! आ हम के छी? हमर की नाम? बीरन बैगा: (आगू बढ़ि कऽ ओकर छातीपर आंगुर गड़ाबैत) हे साँढ़ भुक्खड़! तोहर नाम छियौ मोहनदास! मोहनदास!! (गरजि कऽ) मोहनदास कबीरपंथी बंसोर!!! मोहनदास: आ हमर बापक नाम की छी? बीरन बैगा: तोहर बाप तँ मरि गेलौ! तोहर बापक नाम रहौ काबा दास! मोहनदास: ए हे! हम मोहनदास एम्हर आ हमर बाप काबा दास ओम्हर ऊपर, सरगमे...तँ सार ओ ओम्हर अनूपपुरक जेलखानामे के बैसल अछि? बीरन दास: (कूदि कऽ हाथ नजाबैत गरजैत अछि)...ओ देहजरा बिसनाथ! चारि सौ बीस...! ओकर बाप डबल चारि सौ बीस! ओकर मौगी चारि सौ बीस...! कोइला खदानबला लेनिन नगरक अफसर नेता सभ कियो चारि सौ बीस! (परमोदी, सितिया, बिहारी, रामकरन, रमोली, सवित्री, गोपाल दास सभक मिलल ठहाकाक संग ढोलक, मंजीरा, हारमोनियमक संगीत) ऐ पूरा कथाक उदास, हताश धूसर रंगक बीचमे चटख प्रसन्न रंगक ई छिट्टा अहाँकेँ कोनो क्षेपक सन लागि रहल होएत। कि नै? अहाँक सोच एकदम्मे सत अछि। गरीब आ अन्यायक शिकार लोकक जिनगीक खरखर यथार्थमे एहन सुन्नर रंग कहियो-काल खाली एहने किछु पल लेल अबैत अछि। सत्ता आ पूंजीसँ जुड़ल तागति एकाएक कोनो बाज सन झपट्टा मारि कऽ अलोपी मैनाक खोताकेँ उजाड़ि दैत अछि आ बाहर लखाह दैत छै चिड़ैक छोट-छोट गेल्हक पंख आ खूनक किछु दाग। ई दाग कोनो पार्टीक सरकारक मानव संसाधन मंत्रालयसँ लिखाएल इतिहासक पाठ¬पुस्तकमे कहियो नै लखाह दैत अछि। किएकि इतिहासकारक पेशे अछि जे अपना कालक सत्ताक आँचरक दागकेँ नुकाएब। ओ मास कतेक रास अजगुत घटनासँ भरल छल। भारतक राजधानी दिल्लीसँ एक हजार पचास किलोमीटर दूर जे किछु भऽ रहल छल, ओकर सूचना आ खबरि ऐ खिस्साक अलाबे अहाँकेँ आर कत्तौसँ नै भेटत। अनूपपुरमे मोहनदासक जीवन जइ हलातसँ गुजरि रहल छलै, ओकर संक्षिप्त विवरण ई अछि: गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणीक बदली एकाएक राजनांदगांव भऽ गेल आ ओ अनूपपुर छोड़ि कऽ चलि गेल। बिसनाथक वकील रास बिहारी राय, जे सत्ताधारी पार्टीक पैघ नामवर- मातबर नेता छल आ जकर पुतोहू नगर निगमक अध्यक्ष छल ओ एक्के पेशीमे बिसनाथ आ ओकर बाप नगेंद्रनाथक जमानत करा देलक। रास बिहारी राय एखुनका राजनीतिक माँजल खिलाड़ी छल। विश्वनाथ माने मोहनदासकेँ जेलसँ रिहा करैत, पुलिससँ गठजोड़ कऽ ओ ई चलाकी केलक जे पुलिस रिकार्डमे मोहनदासे नाम दर्ज रहए देलक। किएकि जाधरि अदालत अंतिम फैसला नै सुनैबितिऐ ताधरि मोहनदास माने विश्वनाथ अपराधी नै कानूनी रूपमे खाली संदिग्ध भरि छल। माने पुलिसक दस्तावेज आ आधिकारिक कागजमे अनूपपुर जेलसँ जे दूटा कैदी जमानतपर रिहा कएल गेल छल ओ अप्पन पुरान नाम मोहनदास माने विश्वनाथ आ काबादास माने नगेंद्रनाथक नामसँ जेलसँ बाहर छल। ओइ दुनू टाक रिहाइबला दस्तावेजपर बादबला नाम एहन तरहे लेभरा कऽ लिखल गेल छल जे पढ़बामे नै अबै छल। ओम्हर एकाएक एक दिन खबर भेटल जे राजनांदगांवमे न्यायिक दंडाधिकारी जी.एम. मुक्तिबोधकेँ ब्रेन हेमरेज भेल अछि आ हुनका अचेतावस्थामे बिलासपुरक अपोलो अस्पतालमे भरती कएल गेल अछि। अपोलोमे कांग्रेस पार्टीक महामंत्री श्रीकांत वर्मा आ मुक्तिबोधक अभिन्न मित्र नेमिचंद जैन हुनका लग छल। मुदा 72 घंटा धरि जीवन-मृत्युक बीच चलल कठिन संग्रामक बाद गजानन माधव मुक्तिबोध, न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी अप्पन अंतिम साँस लेलक। ...ऐ अंतिम साँसमे ओ "हे राम!' कहलक। ओकर मृत्युक सूचना भेटलापर हर्षवर्धन सोनीक संग कूही भऽ कानैबला पुरबनरा गामक मोहनदास कबीरपंथी बंसोर सेहो छल। ओकर जिनगीक आशाक असगर इजोत मिझा गेल। अखुनका हाल ई अछि जे बिसनाथ अप्पन कनिया रेनुका संग मिलि कऽ कोलियरीक दलालीमे बड़ पाइ कमा लेने अछि। विजय तिवारीक संग ओकर बैसकी अखनो चलैत अछि। ओ अखन सोझाँ भऽ राजनीतिमे आबि गेल अछि आ जिला जनपदक अध्यक्ष पदक चुनाव लड़ि रहल अछि। ओकर जाति-बिरादरीक लोक तँ ओहिनो ऊँच जगहपर अछि। ओ सभ तरहेँ ओकर मदति करैत अछि। ओ कहैत अछि, "असली मोहनदास के अछि आ नकली के, एकर फैसला तँ हम करब। ओ सार दू कौड़ीक कल्लर बंसोर हमर इज्जतिपर बट्टा लगौलक, लागल-लगाएल नोकरी छिनलक, आब हम अपन तागति ओकरा देखा देबै। अखन पछिला हफ्ता जखन हम अप्पन गाम गेल रही तँ हर्षवर्धनक चेहरा उड़ल छलै ओकर आँखि लाल छलै। ओ बाजल, "पछिला तीन रातिसँ हम सुतल नै छी। बुझबामे नै अबैत अछि जे की करी। बिसनाथकेँ लऽ कऽ पुरबनराक लोग सत कहैत अछि। गज भरिक बिसधारी। असल करैत'। ओ बड़का साँस भरलक आ बाजल, "लेनिन नगरक इलाकामे बिसनाथ सभ दोसर-तेसर दिन कोनो-नै-कोनो क्रिमिनल अपराध करैत अछि। कखनो केकरो चेन खींच लैत अछि, कखनो ककरो संग मारिपीट करैत अछि। ओकर कनियाँ फाइनेंस आ चिटफंडक जइ धंधामे अछि, ओकर वसूलीमे ओ कर्जदारसँ मारिपीट करैत अछि आ घरमे पैसि कऽ समान उठा लैत अछि।...आब थानामे जे एफ.आइ.आर. दर्ज होइत अछि ओ तँ मोहनदासक नामसँ दर्ज होइत अछि किएकि ओतए बेसी लोक बिसनाथकेँ अखन धरि मोहनदासक नामसँ जनैत छल। आ ओम्हर पुलिस पुरबनरा जा कऽ ऐ बेचारा असली मोहनदासकेँ पकड़ि लैत अछि। हर्षवर्धनक आँखिमे असहायताक नोर छल। बिसनाथ पुलिस इंस्पेक्टर विजय तिवारीसँ भेंट कऽ थानाक सिपाहीकेँ खुआ-पिआ कऽ राखने अछि। ओ मोहनदासकेँ पीट-पीट कऽ ओकर हाथ-पएर तोड़ि देने छल। ओ चलि-फिरि नै सकै छल। ओकर माइ पुतलीबाइ सेहो चारि दिन पहिने इनारमे खसि कऽ मरि गेल छल। कस्तूरी हाड़-तोर मजूरी कऽ कोनो तरहेँ चूल्हाक आगि जरौने रखने छल। हमर आँखि ऊपर उठल। आगुएसँ मोहनदास नंगड़ाइत बुलल आबि रहल छल। ओकर देहपर पुरनका बेरंग, चिप्पी लागल पेंट आ चेथड़ी भेल चौखुट्टा अंगा नै, एकटा धरियाटा बचल छल। ओकर माथक केस खसि गेल छल आ आँखिमे गोल फ्रेमक सस्ता सन चश्मा लागल छल। ओ रकम-रकम डगमग करैत लाठीक संग कोनो बेमार बूढ जना बुलि रहल छल। "कका, राम राम'! ओ हमरा देखि कऽ हाथ जोड़लक। ओकर चेहरापर पीड़ा आ हारबाक गहींर डड़ीर आबि गेलै। हम देखलहुँ ओ बड़ बूढ लागि रहल छल। अस्सी-पचासी सालक आसपास। लाठी टेक कऽ ओ ओतए धरतीपर बैस गेल। ओकर गरसँ कुहरैक संग भारी अवाज निकलल, मुदा ओ अवाज जेहन भाषामे छल ओ छल राजभाषा हिन्दी। ओ बाजल: "हम अहाँ सभक हाथ जोडै़त छी। हमरा कोनो तरहेँ बचा लिअ। हम कोनो अदालतमे चलि कऽ हलफनामा दै लेल तैयार छी जे हम मोहनदास नै छी। हमर बाप काबा दास नै अछि आ ओ मरल नै अछि, अखनो जिबैत अछि। बड़ मारने अछि हमरा पुलिस, बिसनाथक कहलापर। सभटा हड्डी तोड़ि देने अछि। सांसो टा लेबामे छाती दुखाइत अछि।' हम देख रहल रही, मोहनदासक ठोढ़ कटल छल आ मुँह पोपटा गेल रहै। शाइद थानामे ओकर दाँत तोड़ि देल गेल छल। ओकर अवाज टूटि कऽ छितरा रहल रहै: "जकरा बनबाक छै बनि जाए मोहनदास। हम नै छी मोहनदास। हम कहियो कत्तौसँ बी.ए. नै केलहुँ। कहियो टॉप नै केलहुँ। हम कहियो कोनो नोकरीक काबिल नै रही। खाली हमरा चैनसँ जिबैत रहल देल जाए। आब हिंसा नै करू। जे लुटबाक अछि लुटि लिअ। अप्पन-अप्पन घर भरू। मुदा हमरा तँ अप्पन मेहनतिपर जियए दिअ। काका, अहाँ सभ हमर संग दिअ'। पता चलल मोहनदासक बारह बरखक बेटा देवदास दस दिनसँ घर नै घुरल अछि। कियो कहैत अछि जे बिसनाथ ओकरा गाएब करा देलक, कियो कहैत अछि जे ओ डरे मुंबई भागि गेल छै... ...आ कियो-कियो ईहो कहैत अछि जे ओकरा परसू बस्तरक जंगलमे देखल गेल अछि। (ई ओइ कालक गप अछि, जखन भरूच लगक एकटा ऊँच डिम्हापर राघव नामक एकटा तीस बरखक धनुहार ठाढ़ भेल छल। ओ राति भरि जागि कऽ बाँस चीर-चीर कऽ कतेक रास तीर बनेने छल। ओ धनुषक प्रत्यंचा चढ़ा कऽ आकाश दिस तीर चलबैत छल, फेर दौगि कऽ डिम्हाक नीचाँ खसल तीरकेँ बिछि कऽ आनैत छल। दोबारा, तिबारा...पता नै कते बेर ओ ऐ तरहे तीर अकाश दिस चलबैत रहल आ धरतीपर ओकरा बिछैत छल। मुदा कतेक रास तीर आब पानिमे डूमए लागल छल। ओकरा ताकब आ बीछब मुश्किल भेल जा रहल छल। किएकि पहाड़क बीच, दूर-दूर धरि पसरल मैदानमे पानि भरल जा रहल छल, गाछ डूमि रहल छल। दिशा आ स्मृति सभ किछु डूमि रहल छल। ...तीस बरखक राघव मुदा ओइ डिम्हाक ऊपरसँ अकाश दिस ताधरि तीर चलबैत रहल आ दौग-दौग कऽ ओकरा बिछैत रहल, जाधरि ओ सेहो डूमि नै गेल... राघव आब कत्तऽ अछि? जतए ओ छल, ओतए आब पानिये-पानि रहए। अजग अथाह जल।...ओतए बिजली पैदा होएत।...भरूचमे हिलसा माछ होइल छल। भारतक धारक सभसँ महान आ संसारक विलक्षण माँछ। हिलसा बहैत पानि टामे, धारक तेज धारे टामे जिबैत रहि सकैत अछि। ...हिलसा आब ठाढ़ बान्हक बेमार आ प्रदूषित पानिमे मरि गेल होएत। ...ई ओइ कालक गप अछि, जखन हम ई खिस्सा अहाँक लेल जइ भाषामे लिख रहल छी, ओइ भाषाक भीतर हम बगदादक अबु गरीब जेलमे इराकीक तरहे छी! वा 1943 क जर्मनीक कोनो गैस चेंबरमे यहूदी सन! वा कोनो बीमार प्रदूषित ठाढ़ पानिमे डूमल हिलसा माँछ जेहन!...वा अखनो संग्रामरत राघव धनुहार जेहेन! ...ई वएह काल अछि, जइमे मोहनदास अछि, अहाँ छिऐ, हम छी आ बिसनाथ अछि। आ आइक यथार्थ अछि। ...ओइ काल, जकरा एकैसम शताब्दीक पहिल दशकक रूपमे सभ कियो जनैत अछि आ जखन हम सभ हिन्दीक कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंदक सवा सएम जयंती सत्ताधारीकेँ मनाबैत देखि रहल छी... मुदा सत बताउ, मोहनदासक गाम पुरबनराक नाम की अहाँकेँ पोरबंदरक मोन नै पाड़ैत अछि?...) काशीनाथ सिंह- रेहनपर रग्घू (हिन्दी उपन्यास) काशीनाथ सिंह- रेहनपर रग्घू (हिन्दी उपन्यास)- अनुवाद- विनीत उत्पल) रेहनपर रग्घू (२०११ मे साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित पोथी) ई उपन्यास मैथिलीमे पहिल बेर विदेह ई-पत्रिका www.videha.co.in मे धारावाहिक रूपमे ई-प्रकाशित भेल छल। ***** कोलकातामे तेजस्वी पत्रकार बांग्ला-हिन्दी सेतु अपन छोट भाइ कृपाशंकर चौबे लेल ***** जँ “काशीक अस्सी” हमर नग्र छल तँ “रेहनपर रग्घू हमर घर अछि” आ किंशाइत अहाँक सेहो। -काशीनाथ ****** रेहनपर रग्घू ** जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा रहए दुपहरिया। कनी काल पहिने रौदे छल। ओ खेनाइ खेने छल आ खा कऽ अखन अप्पन कोठलीमे पटायले छल आकि एकबैग बिर्रो ऐल। घरक सभटा खुजल खिड़की-दरबज्जा धाँइ-धाँइ करैत अपनेसँ बन्द हुअए लागल आ खुजए लागल। किल्ली उड़ि कऽ कतौ खसल आ भट-भट की-की केना-केना खसऽ लागल, लागल जेना धरती थरथरा रहल अछि आ भीत हीलि रहल अछि। अकास कारी खटखट भऽ गेल छल आ चारू दिस अन्हार गुज्ज छल। ओ उठि कऽ बैसि रहल। अंगना आ दरबज्जा बड़का-बड़का ओला आ बरफक पाथरसँ छरा गेल, दलानक रेलिंग टूटि कऽ दू लग्गा दूर जा कऽ धड़ामसँ खसल। एकर बाद जे निराउ बर्खा बरिखब शुरू भेल तँ ओ पाइनक बुन्नी नै छल, लागए जेना पाइनक बड़हा छल, जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहए तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतऽ सँ ओ छोड़ल आकि खसाएल जा रहल छल। मेघ लगातार गरजि रहल छल, दूर नै, लगेमे माथक ऊपर जेना बिजलौका लौकि रहल छल, दूर नै, खिड़कीसँ भीतर आँखिमे।एकहत्तरि बर्खक बूढ़ रघुनाथ अवाक! ई एकाएक की भऽ गेल? की भऽ रहल छै? ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, देहपर पड़ल सीरक हटेलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला अड़काक टेकसँ खुजल छल आ बाहर दिस देखि रहल छल। घरक आगुए कदम्बक बड़का गाछ छल मुदा ओकर पता नै चलि रहल छल, अन्हारक कारण, आ बर्खाक कारण जे धऽ कऽ तोपने छल, पथियाक पथिया उझील रहल छल। छातक डाउन-पाइपसँ पाइनक धार खसि रहल छल आ ओकर हहारो अलगेसँ सुना दऽ रहल छल। एहेन मौसम, एहेन पाइन आ एहेन हवा ओ कहिया देखने छल? दिमागपर जोर देलापर मोन पड़ल- साठि-बासठि बर्ख पहिने! ओ स्कूल जाए लागल छल, गामसँ दू माइल दूर। मौसम खराप देखि कऽ मास्टर समयसँ पहिने छुट्टी दऽ देने छल। ओ सभ नेना-भुटकाक संगे गाछी पहुँचले छल आकि आन्ही-बिर्रो-पाइन आबि गेल आ अन्हार पसरि गेल। सभ कियो आमक गाछक अढ़ लेबऽ चाहलक मुदा बिर्रो ओकरा सभकेँ जेना लऽ कऽ उड़ि गेलै आ गाछीसँ बाहर धानक बाधमे लऽ जा कऽ पटकलकै। ककरो झोराक आ किताब-पत्तरक कोनो पता नै छलै। पाइनक बुन्नी ओकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छलै आ ओ मारे चिचिया रहल छल। बिर्रो थम्हलाक बाद जखन पाइन-बुन्नी कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ डिबिया लऽ कऽ बहार भेल छल ताकै लेल। ई एकटा अनहोनी छल आ अनहोनी जँ नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा अनहोनीये छल जे बाहर एहेम मौसम छै आ ओ कोठलीमे अछि। कत्ते दिन भऽ गेल बर्खामे भिजना? कत्ते दिन भऽ गेल गरमी मासक दुपहरियाक बहैत लूमे घुमना? कत्ते दिन भऽ गेल जेठक गुमारमे झरकनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे बौएनाइ? कत्ते दिन भऽ गेल ठारमे ठिठुरि दाँत कटकटेनाइ? की ई अही लेल होइत अछि जे हम एकरासँ कोना बचि कऽ रही? बचि-बचि कऽ चली? आ अही लेल की एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्तियारी करी, गप करी, माथपर बैसाबी? हम एकरासँ एना व्यवहार कऽ रहल छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए कऽ रहल छी एहेन? एम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लगैत छलन्हि जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, एकर ऐश्वर्य, एकर सौन्दर्य- ई मेघ, ई रौद, ई गाछ-बृच्छ, ई फसिल, ई धार, कछार, जंगल, पहाड़ आ ई सभ किछु एतऽ घुरि जाएत। ओ ई सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैक चाहैत अछि जेना ओ जँ चलियो जाएत तँ ओकर आँखि अतै रहि जेतै। चमड़ीपर सभ चीजक थाप सोखि लै लऽ चाहैत अछि जेना चमड़ी केंचुल जकाँ एतऽ घुरि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका लग पहुँचैत रहत। हुनका लागैत छल जे बेसी दिन आब हुनका नै अछि जाइमे। भऽ सकैए जे ओ दिन काल्हि हुअए, जहिया हुनका लेल सुरुज नै उगै। उगत तँ अबस्से मुदा से दोसर लोक सभ देखत, ओ नै। की ई सम्भव नै अछि जे ओ सुरुजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए, ने ओ रहत, ने ओ उगत आ नहिये कियो आर ओकरा देखत! मुदा एकटा सुरुजे सौंसे धरती तँ नै, ओ कोन-कोनक बौस्तुकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखबासँ रोकत? हुनकर हाथ एतेक नम्हर किए नै भऽ जाइ छन्हि जे ओइमे सभटा धरतीकेँ समेटि लिऐ आ मरै वा जिअए तँ सभक संग! मुदा एकटा मोन आर छल, रघुनाथक जे हुनका धिक्कारि रहल छल, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम? धरतीसँ प्रेमक ई आतुरताइ? ई अहलदिली? काल्हि सेहो ई धरती छल। यएह मेघ, अकास, तरेगण, सुरुज, चन्द्रमा छल। धार, निर्झर, सागर, जंगल, पहाड़ छल। यएह गली, मकान, चौबटिया छल। कतऽ छल ई अहलदिली? फुरसति छल हुनका ई सभ देखै कऽ? आइ जखन मृत्यु बिलाड़ि जकाँ आस्तेसँ कोठलीमे ढुकि रहल अछि तखन बाहरक जिनगीक अबाज सुनाइ दऽ रहल अछि? सत-सत बाजू रघुनाथ। अहाँकेँ जे भेटल अछि ओकरा लऽ कऽ कहियो सोचने रही? कहियो सोचने रही जे एकटा छोट सन गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब? ओसारपर पिरहीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नून खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैसि कऽ लंच आ डिनर करब? मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अबाज बाहरक गड़गराहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अप्पन सकमे नै छल। ओकर नजरि कोनमे राखल लाठी आ छत्तापर गेल। जाड़क ठंढ़ी ओहिने भयंकर छल आ ऊपरसँ ई ओला आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। किल्ली खोलि कऽ ओ ठाढ़ भेल तँ दरबज्जा अपने खुजि गेल। सिहकैत बसात सनसना कऽ भीतर पैसि गेल आ ओ डरा कऽ पाछाँ हटि गेल। फेरसँ ओ साहस केलक आ बाहर जेबाक तैयारी शुरू कऽ देलक। पूरा बाँहिबला गरम गंजी पहिरलक, ओइपरसँ सूती अंगा, ओइपरसँ स्वीटर आ ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट ओ पहिनहिये पहीर लेने छल। यएह ओकर जाड़क मासमे भोरमे टहलबाक वस्त्र छल। मोफलर सेहो छलै मुदा ओइसँ बेसी जरूरी छलै गमछा। बर्खाकेँ देखैत जेना-जेना कपड़ा भिजैत जेतै ओ एकाएकी उतारैत जाएत आ फेकैत जाएत आ अन्तिममे रहि जेतै मात्र ई टा गमछा। ओ अप्पन पहिराबा-ओढ़ाबासँ आब सभ तरहेँ निश्चिन्त छल मुदा खाली माथकेँ लऽ कऽ ओ ततमतमे छल, कनटोप ठीक रहतै आकि माथमे गमछा बान्हि लए। ओला जतेक खसबाक रहै से खसि गेल छलै। आब ओकरा कोनो अन्दाज नै छलै। ओ गमछाकेँ गरदनिक चारू दिस लपेटि लेलक, खालिये माथ बहरा गेल। आब ने कियो रोकैबला छलै आ ने टोकैबला। ओ कहलक- “रौ मोन! घुरि कऽ आबि जेमेँ तँ वाह-वाह आ नै घुरि कऽ आबि सकमे तँ वाह-वाह।” बर्फ सन पाइनक अन्हार बीहरिमे उतरबासँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भार संग एक्को डेग बढ़ैब ओकरा लेल मोश्किल हेतै। ओ कोठलीसँ तँ बहरा गेल मुदा गेटसँ बाहर नै जा सकल। छत्ता खुजलासँ पहिने जे पहिलुक बुन्न ओकर बिन झाँपल केशहीन चानिपर पड़लै तँ ओ तुरत्ते बूझि नै सकल जे ई बिजलौका खसल छलै आकि लोहाक किल्ली खसल छलै जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतर तरबा धरि पहुँचि गेलै। ओकर सम्पूर्ण शरीर झनझना गेलै। ओ पानिक अछारसँ डरा कऽ बैसि गेल मुदा भिजबासँ नै बचि सकल। जाधरि छत्ता खुजितै ताधरि ओ पूरा भीजि गेल छल। आब ओ ओझरीमे पड़ि गेल छल, बर्फ सन बसात आ अछारक बीच। हबा टूटल दूभि सन हुनका उड़ा रहल छल आ अछार धरतीपर पटकि रहल छल। भीजल कपड़ाक भार हुनका उड़ऽ नै दै छल आ हबा हुनका घिसिया रहल छल। हुनका एतबेटा मोन छन्हि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसला आ ई बेर-बेर तखन धरि भेल जखन छत्ताक कमची टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बहार जा कऽ बिला गेल। आब ओकरा एना लगै छल जेना बसात ठामे-ठाम नोचि रहल होइक आ पाइन धीपल लोहसँ दागि रहल होइक। बेहोश भऽ कऽ खसबासँ पहिने ओकरा लग दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे एलै। ओ दू बेर आत्महत्या करबाक विचार केने छल- पहिल बेर लोहता स्टेशनक रेलक पटरीपर गाम-घरसँ दूर निर्जनमे, जतऽ कियो आबै जाइ नै छल। तइ काल ओ सामान्य पैसेंजर वा मालगाड़ीकेँ नै, एक्सप्रेस वा मेलकेँ चुनने छल, किएक तँ जे हुअए से हुअए खट दऽ, एक्के निशाँसमे, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल आकि मेल अबैत देखा पड़लै। पता नै किए ओकरामे जीवनसँ मोह उत्पन्न भऽ गेलै आ ओ उठि कऽ भगबापर छल आकि ठेहुन लगक एकटा पएर खचाक। ई तँ मरैसँ बेसी खराप भेलै। बैशाखीक आश आ घरक लोकक गाइर आ धुत्कारी। एक बेर फेर आत्महत्या करबाक धुनि सवार भेलै ओकरापर। ऐबेर ओ चुनकक सिमानपरबला इनार। ओ अप्पन बैशाखी फेकि कऽ ओइमे फांगि गेल छपाकसँ आकि एकटा बरहा पकड़िमे आबि गेलै। तीन दिन बिन खेने पीने भूखल सोर पाड़ैत रहल ओ इनारमे आ निकलल तँ दोसर पएर तोड़बा कऽ। आइ वएह ज्ञानदत्त - बिन पएरक ज्ञानदत्त- चौबटियापर भीख मंगैत अछि। मरबाक ओकर इच्छा ओकरा कतौ कऽ नै छोड़लकै। मुदा ई हरमजदा ज्ञानदत्त ओकरा मोनमे एलै किए नै? ओ मरबाक लेल तँ नै निकलल छल? निकलल तँ छल ओ पाइनक ठोपक लेल, ओला सभक लेल, बसात लेल। ओ ऐ बातपर आबि गेल जे जीवनक अनुभवसँ पैघ अछि जीवन। जखन जीवने नै तँ अनुभव केकरा लेल। ** पहाड़पुरमे रघुनाथ एक्केटा छल। ओना कहैक लेल रामनाथ, शोभानाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ सेहो सभ छल मुदा ओ रघुनाथ नै छल। आ रघुनाथक ई भाग्य छल जे जतऽ कतौ ओ देखा पड़ै छल, गाम घरक लोक बिख-सबिख भऽ जाइ छल आ पैघ साँस लैत कहै छल- बाह! की भाग्य पेलक अछि ई बिरनल! रघुनाथ पहाड़पुर गाममे असगरे पढ़ल लिखल लोक छल। डिग्री कॉलेजक अध्यापक। दुब्बर-पातर नमगर-छरगर देहबला। शुरुहक दस बरख धरि साइकिलसँ अबैत जाइत छल, बादमे स्कूटरसँ। पछिला सीटपर पहिने बेटी बैसै छलै, बादमे बेटा बैसऽ लगलै। कहियो एकटा, कहियो दुनू। मोटा-मोटी पाँच-छह माइलक दूरी रहै। सभ सुखी आ सफल लोक सन रघुनाथ सेहो अपना जीबा लेल, आगाँ बढ़बा लेल आ अकास छूबा लेल किछु ईलम ताकि लेने छल। सत्य पूछू तँ ओ तकने नै छल, ओकरा प्रकृतिमे छलै। ओ खाली बूझि गेल छल आ ओकरा ओ नित्य व्यवहारक संग बनौने छल। ओ पातर आ नमगर छल आ तइसँ कने लीब कऽ चलै छल। कतौ अबैत-जाइत काल, केकरोसँ भेँट-घाँट करैत काल, बाजैत काल ओ कनी लीबल रहै छल। पहिल बेर ओ अप्पन बारेमे केकरो दोसरासँ गप्प करैत प्रिन्सिपल साहेबक मुँहसँ “विनम्रता” शब्द सुनलक। एहेन हुनकर प्रशंसामे कहल गेल छल। जइ लीबल रहैमे ओ लाजक अनुभव करै छल, ओकर वएह खूबी छल, ई नव बोध ओकरा भेलै। ऐमे ओ आगू जा कऽ दूटा खूबी आर जोड़ि देलक, मुस्कियेनाइ, आ सहमति देनाइ। कियो किछु कहितिऐ ओ मुस्कियाइत रहितिऐ आ समर्थनमे मूड़ी हिलाबैत रहितिऐ। ई तखने सम्भव छलै जखन अहाँ अपना दिससँ कम बाजी। ऐ तरहेँ रघुनाथ विनम्रता, कम बाजाभूकी आ मुस्की संगे जीवनक यात्राक प्रारम्भ केने छल। आ एकरा संयोगे कहियौ जे ओ कहियो असफल नै भेल। ऐ संयोगकेँ दोसर लोक सभ “भाग्य” कहैत छल। आ ऐपर रघुनाथ सेहो विश्वास कऽ लेने छल। भेल ई जे एक बेर ओ जखन कॉलेजसँ साइकिलसँ घर घुरि रहल छल तखन ओ देखलक जे ओकर साइकिलक चेन टूटि गेल छै। ओ साइकिलकेँ कॉलेजमे छोड़ि देलक आ बुलि कऽ आबऽ लागल। गर्मी मास, रौद खूब, हवा कतौ नै, देह घामसँ भीजल। बाटमे कतौ गाछो-पात नै। अकासमे मेघ छलै मुदा दुरस्तमे। हुनकर मोन बाजल- “ओह! ई मेघ जँ रहितए माथक ऊपर छत्ता सन।” आ देखू, एक फर्लांग एबे कएल रहए आकि मेघ सत्ते ओकर माथक ऊपर आबि गेलै। आ एतबेटा नै, ओ मेघ हुनका संगे छाह करैत गाम धरि आएल। अगिला दिन ई सिद्ध भऽ गेल जे ई मात्र भ्रम नै छल। ओ वर्गमे पढ़ेबा लेल जहिना बिदा भेल, तहिना ध्यान गेलै जे कलम नै छै। चाहे तँ ओ घरेमे छूटि गेलै आकि बाटमे खसि पड़लै। ओ एखन क्लासमे पहुँचलो नै छल आकि आगू हॉलमे ओकरा एकटा कलम खसल लखा देलकै, रौदमे चमकैत। एहेन गप आन लोकक संग सेहो होइत अछि मुदा नै जानि किए हुनका लगै छल जे दीनदयालु परमपिताक हुनकापर विशेष कृपा छन्हि। ओ हुनकर सभ सुविधा-असुविधाक ध्यान रखैत अछि। ऐसँ जे ओ चाहैत छथि ओ देर सबेर भऽ जाइत अछि।आ देखू जे ओ जखैन-जखैन चाहलक, जे जे चाहलक से भेल गेल। हुनका किछु करऽ नै पड़ल, अपने मोने भऽ गेल। पढ़ाइ खतम केलाक बाद ओ शोध कऽ रहल रहथि आ हुनकर मोन नै लागि रहल छलन्हि। आब कहिया धरि ओ करैत रहितिऐ शोध? कतौ नोकरी भेटि जेतिऐ तँ जान बचितिऐ। आ बेसी दिन नै बितलै आ हुनका नोकरी भेटि गेलन्हि। एकर श्रेय ओ हालेमे जन्मल अपन बेटीकेँ देलक। बेटी लक्ष्मी होइत अछि। वएह अप्पन संगे आ अपना लेल हुनकर नोकरी लऽ कऽ आएल छल। मुदा आब एकर बाद एकटा बेटा चाही। ई ओ नै, हुनकर हृदय बाजल। आ देखू, चारि बर्खक बाद बेटा सेहो आबि गेल। एकर बाद एकटा आर बेटा- बस! ऐ तरहेँ एकटा बेटी, दूटा बेटा, शीला आ रघुनाथ, सभ कियो मिला कऽ पाँच लोकक परिवार। छोट परिवार, सुखी परिवार। परिवार सुखी रहल हुअए वा नै, रघुनाथ सुखी नै छल। जिनगी हुनका लेल पहाड़पुरक धूल-धक्कर आ हँसी खेल नै छल। जन्मले छल तँ स्वयं कीड़ा-मकोड़ाक योनिमे किए नै जन्म लेलक? ओ ओतऽ जनमि सकै छल मुदा नै, भगवान जँ हुनका ऋषि-मुनिक लेल दुर्लभ योनिमे जनम देने अछि तँ एकर पाछाँ हुनकर कोनो उद्देश्य रहल हेतन्हि। जे जाउ, साठि-सत्तरि बरखक मौका दैत छी अहाँकेँ, जाउ धरतीकेँ सुन्नर आ सुखी बनाउ। धरती सुन्नर आ सुखी तखैन हएत जखैन अहाँक बाल-बच्चा सुखी, सुन्नर आ सम्पन्न हएत। अहाँकेँ जे बनबाक अछि ओ तँ अहाँ बनि गेलौं, आब बच्चा अछि जिनकर आगू पूरा जिनगी आ दुनियाँ राखल छै। यएह अहाँक भविष्य अछि। जीबू तँ हुनकर जिनगी, मरू तँ हुनकरे जिनगी। आ रघुनाथ से केलक। हुनकर सभटा शक्ति आ सभटा बुद्धि आ सभटा पूँजी हुनका सभकेँ बनबैमे लागल रहल। ओ चाहलक- सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करितिऐ। सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करऽ लागल। ओ चाहलक- संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियर बनितिऐ। संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियरटा नै बनल, अमेरिका तक पहुँचि गेल। ओ चाहलक- मैनेजर समधी हुअए। संजय ई नै चाहलक। ओ से केलक जे ओ चाहलक। रघुनाथक आस रहि गेल। दयानिधान किछु मदति नै कऽ सकल हुनकर। हुनका दुख ऐ गपक छल जे मैनेजर एकरा बाप-बेटाक मेलपेंच बुझलक। ओ बड़ मानसिक तनावमे चलि रहल छल, मुदा कॉलेजक हुनकर सहयोगी हुनका बधाइ दऽ कऽ भरोस देलक जे एकटा अन्हार खधाइमे खसबासँ ओ बचि गेला। ऐमे प्रिन्सपलक भूमिका आर नीक छल। ओ मोटामोटी तीस साल पहिने रघुनाथक संग कॉलेज पकड़ने छल। दुनुक दोस्तियारी छलै। जखैन भेटितिऐ हँसी मजाक, हाहा हूहू करितिऐ। ओ एक दिन आस्तेसँ कहलक- “यौ रघुनाथ, हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे एतबेटा गप अहाँकेँ बुझैमे किए नै आएल? ओ अहाँक बेटीक बदलामे अहाँक बेटाकेँ खरीद रहल छल।” ऐ तरहेँ रघुनाथ सहज भऽ रहल छल जे एक दिन घरपर हुनका प्रिन्सपलक दसखतबला नोटिस भेटल। आरोप दूटा छल- “नेग्लिजेन्स ऑफ ड्यूटी”(काजमे ढिलाइ) आ “इनसबऑर्डिनेशन”(उच्च अधिकारीक गप नै मानब)। एहेन कोनो संकेत अपन गपमे नै देने छल ओ पहिने कहियो। ई दुनूटा आरोप छल निराधार। एकरा रघुनाथेटा नै, सहयोगी सभ सेहो जानैत छल आ प्रिन्सपल सेहो। सबहक सहानुभूति ओकरा संगे छलै, मुदा संग देबा लेल कियो तैयार नै छल। ओ उत्तर दऽ देलक मुदा ओ ई जानैत छल जे एकरासँ कोनो लाभ नै अछि। ओ फेंफियाइत एतऽ सँ ओतऽ दौगैत गेल। आजिज आबि कऽ प्रिन्सपलसँ भेँट केलक आ हुनकासँ सलाह मांगलक। ओ कहलक- “देखू रघुनाथ, अहाँ जतेको दौड़-धूप करू, निलम्बनक मोन बना लेने अछि मैनेजर। हुनकर शक्ति आ पहुँचकेँ अहाँ जनिते छी। एकर बाद अहाँ कचहरी जाएब, फौदारी लड़ब, ई कहिया धरि चलत, कियो नै जनैत अछि। भऽ सकैत अछि जे फैसला होइसँ पहिने अहाँ मरियो जाइ। हँ, जाधरि मुकदमा चलत, ताधरि पेंशन रुकल रहत। ई सभ देखि कऽ हमर तँ सलाह अछि जे अहाँ वी.आर.एस. (वॉलन्टरी रिटायरमेन्ट स्कीम, स्वेच्छासँ सेवानिवृत्ति सुविधा) लऽ लिअ। रघुनाथ बड़ी काल धरि चुप रहल। हुनकासँ किछु बाजल नै गेल। “ठीक अछि, मुदा एकटा अहाँ मदति करू।” “कहू, की कऽ सकैत छी हम?” “निलम्बनकेँ अहाँ ताधरि लटकेने राखू जाधरि बेटीक बियाह नै भऽ जाए। फेर हम सएह करब जे अहाँ कहने छी।” मनुष्यताक लेल ई करबाके छल। प्रिन्सपल चिन्तित भऽ कऽ बाजल- “जाउ, कोशिश करै छी, मुदा ई गप अहाँ कतौ नै बाजी, से।” आ प्रिन्सपल कहिया धरि बाट तकितिऐ। एहेन मुसीबतमे रघुनाथकेँ किओ आन नै हुनकर अप्पन बेटे धऽ देने छल। बेटोमे संजय! संजय टा! आ ई नम्हर खिस्सा अछि- राँचीसँ कैलिफोर्निया धरि पसरल। संजय प्रेम केने छल सोनलसँ! ई प्रेम कोनो चौौबटियापर घुमैत लफुआ छौड़ाक अनगढ़ प्रेम नै छलै, ऐमे गुणा-भाग सेहो रहै आ जोड़-घटा सेहो! जतेक गहींर छल ततबे व्यापक। संजयक सोनल प्रोफेसर सक्सेनाक बेटी छल। सदिखन प्रथम श्रेणी, व्याख्याताक योग्यता परीक्षा पास आ दर्शनशास्त्रसँ पी.एच.डी.। नौकरी तँ पक्का छल, बनारसक विश्वविद्यालयमे, जतय ओकर माय कुलपति छल, मुदा ओइमे अखन देरी छलै, तखनि धरि बियाहक बाट तकबाक छल! बियाहमे बाधा भऽ रहल छल, ओकर ठोढ़सँ बाहर आएल दाँत आ सटल नाक जकर क्षतिपूर्ति ओ अप्पन सर्टिफिकेटसँ करैत छल। छूटल-बढ़ल कसरि पूरा कऽ रहल छल सक्सेनाक पसारल ई फूस कि हुनका एकटा एहेन कलामी सॉफ्टवेअर अभियन्ताक आवश्यकता छन्हि जे अमेरिकाक एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनीक तीन बर्खक कान्ट्रेक्टपर कैलीफोर्निया जा सकए। ऐ आवश्यकताक अनुभव सम्पूर्ण इन्स्टीट्यूट बुझैत छल। संजय अन्तिम परीक्षा दऽ देने छल, रिजल्टक घोषणा बाकी छल! एम्हर कतेक बेर माँ-बापक संदेश आएल छल जे आबू, लड़कीकेँ देखि लियौ। लड़कीकेँ की देखब, ओ तँ देखले छल! रघुनाथ जइ कॉलेजमे पढ़बैत छल, पूर्व विधायकक बेटी तकर मैनेजर छल। गोर, नमछुरुक, सुन्नर आ आकर्षक। एम.ए.। नीक गृहणी। मैनेजर पुरान जमानाक जमीन्दार, अथाह सम्पत्तिक मालिक। रघुनाथक कोनो हैसियत नै छलै ओकर आगू। नहिये नीक सन घर दुआर, नहिये जमीन-जत्था। आठ बिगहा खेत आ हरक जोत। नेनपन आ युवावस्था बड्ड तंगीमे बितलै। बच्चा सभकेँ पढ़ेलक तँ खेतकेँ बन्हकी लगा कऽ आ कॉलेजसँ ऋण लऽ कऽ। स्पष्ट छल, मैनेजर “सॉफ्टवेअर अभियन्ता” केँ देखने छल, अप्पन कॉलेजक मास्टर रघुनाथकेँ नै। ई सम्बन्ध रघुनाथक लेल सपनासँ आगूक चीज छल । फाएदे-फाएदा छल ऐसँ! जिलामे पहिचान आ प्रतिष्ठा जे भेटतिऐ, से अलग। ओ कीसँ की भेल जा रहल छल। तँ गाम आबैसँ पहिने सक्सेना सर सँ बिदा लै लेल गेल छल संजय। एकरा अहिनो कहि सकैत छी जे ओकरा सक्सेना सर डिनरपर बजेने छल। गर्मीक साँझ। अप्पन लॉनमे सक्सेना बेंतक कुर्सीपर चुपचाप बैसल छल। माली गमलामे पाइन दऽ रहल छल। बंगलाक भीतरक बत्ती जड़ि रहल छल। कोनो कोठलीसँ संगीतक धुन आबि रहल छल। अवकाश प्राप्तिक करीब, हृदयक मरीज प्रो. सक्सेना संजयक एबासँ अनजान चुपचाप बैसल छला आ आगू देखि रहल छला। बड़ी कालक बाद ओ पुछलक, “कोन इन्स्ट्रूमेन्ट अछि”। संजय बिना बुझने माथ हिलेलक। “आ राग? कोन राग अछि?” संजय निरुत्तर, फेर माथ हिलेलक। ओ ससरि गेल आ ऊँच अबाजमे बजेलक- “सोनू”। जीन्सक पेंट आ टी-शर्टमे कूदैत सोनू आएल- “हँ पापा”। संजय ठाढ़ भऽ गेल। सक्सेना मुस्की देलक, पहिने संजयकेँ देखलक, फेर सोनलकेँ। सोनल सेहो मुस्की देलक। संजय सोनलसँ भेँट तँ कते बेर केने छल मुदा देखने पहिलुके बेर छल। ओकरा लगलै जे कोनो छौड़ीकेँ टुकड़ीमे नै “सम्पूर्णता”मे देखबाक चाही। कतेक फर्क पड़ि जाइत छै। संगे संग छौड़ी आ कनियाँकेँ एक तरहेँ नै देखबाक चाही। रूप-रंग, ढीब-ढाब, मान-मनौअलि छौड़ीमे देखल जाइत अछि, कनियाँमे नै! ई सभटा पुरान धारणा अछि, हमर पापा-मम्मीक जमानाक, हमर नै। सक्सेना गुम्मी तोड़लक- “ई अछि सोनम, जइमे हमर प्राण बसैत अछि। सितार, सरोद, संतूर माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस एकरा पसिन्न नै। फिल्मी गीतकेँ ई गीत नै मानैत अछि। किएक तँ ई अपने कथक नृत्यांगना रहल अछि। तँ की खुआ रहल छी हमरा सभकेँ आइ?” “ओ तँ तखने पता लागत जखन खाएब।” सोनल लजा कऽ भागि गेल। “बैसू संजय।” ई कहैत सक्सेना सेहो मूड़ी झुका कऽ बैसि गेल। किछु सोचैत। टूटल स्वरमे बाजल- “कोना रहब एकर बिना, रहब कोना से नै बुझि पड़ैत अछि। ई चौदहे बर्खक छल जखन एकर माय गुजरि गेलै।” तकर बाद ओकर आँखिसँ नोर खसऽ लगलै- “तीन चारि बरखसँ लगातार आबैत रहल अछि लड़का। एकसँ एक। अहाँक सीनियर सेहो, क्लासफेलो सेहो। मुदा बेटा भारी संकटमे छी, अहीं उबारि सकै छी ऐ संकटसँ। पछिला बरख ई बाजल छल जे बियाह करब तँ संजयसँ, नै तँ नै करब बियाह। अपना भीतर नुकेने रहलौं ऐ गपकेँ। आइ बाजि रहल छी, सेहो ऐ दुआरे जे फैसलाक घड़ी आबि गेल अछि। तीन-चारि मास आर अछि कैलिफोर्निया जेबामे। ऐ बीच बियाह अछि, हवाइ टिकट अछि, पासपोर्ट अछि, वीजा अछि, सभटा तैयारी अछि। सोनल अमेरिका आ हनीमूनकेँ लऽ कऽ उत्साहित अछि।” ओ आँखि पोछलक आ संजयकेँ देखलक। “सभ बापक सपना होइ छै आ हमरो अछि। नै हेतिऐ तँ सेंट्रो कार किए लैतिऐ? अपना लेल फिएट तँ छेबे करल। नव घर गृहस्तीक समान किए जुटैबितिऐ? अहाँक नग्रमे एकटा कॉलोनी अछि अशोक विहार। ओइमे एकटा छोट सन बंगला बनबैले छी। सभ किछु कम्प्लीट अछि। बस फिनिशिंग टा बाकी अछि। सोचले रही जे एतऽसँ रिटायर करब तँ काशीवास करब। सभ लोक यएह चाहै छै। अहाँक पापा-मम्मी सेहो चहैत होएत। मुदा सोचैत छी जे काल्हि सोनल विश्वविद्यालयमे ज्वाइन करत तँ कतए रहत? हमर तँ सभटा जीवन राँचीमे बीतल, सभटा दोस्त-मित्र, सर-सम्बन्धी एतए अछि। ओतऽ जा कऽ की करब? तइसँ बंगला ओकरे नाम कऽ रहल छी।” संजय चिन्तित भेल। ओकर आँखिमे पापा-मम्मीक चेहरा घूमि रहल छलै। ओकरा लागि रहल छलै जे ओ हुनका हँ करैमे जल्दी कऽ देने छल। बाजल “बड देर कऽ देलौं सर सोनलक बात बताबैमे।” “देर सबेर किछु नै होइत अछि संजू, सभ चीजक बेर होइ छै। आब यएह देखू, हमर साढ़ू प्रोफेसर अस्थानाकेँ बनारस मे एहने घड़ीपर कुलपति किए हाँकि देने छल जखन सोनल थीसिस जमा कऽ रहल छलि?” ओ सिगरेट जरेलक- “ओना तँ सिगरेट मना अछि मुदा कहियो काल एकाध सोंटा लऽ लैत छी। तँ अहाँक पापा। हुनकर परेशानी बुझि सकैत छी। कहैत रहल छी हुनका लऽ कऽ। छोट भाइ अछि अहींक। पछिला तीन-चारि बर्खसँ कैट-मैट परीक्षा दऽ रहल अछि। लोक सेवा आयोगक परीक्षा दऽ रहल अछि। आ कोनोमे नै आबि रहल अछि- ओकर परेशानी। गप आएल बीचमे तैं, परेशान भऽ कऽ किछु कऽ नै लिअए तेँ ओइसँ पहिने कोनो मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूटमे नामांकन करा दियौ। एना नै तँ डोनेशन दऽ कऽ। ऐं यौ, कत्ते लागत? डेढ़ लाख, दू लाख, आर की? अहाँ बतेने छलौं जे अहाँक पढ़ाइ लेल ऋण लेल गेल छल आ खेत सेहो भरनापर राखल अछि। ऐ सभ परेशानीसँ बहार होइले कतेक जरूरति हएत हुनका? हुनकासँ गप कऽ कए तँ देखू। की चाहैत छथिन ओ। देखू, बरियाती, धूम-धरक्का, गाजा-बाजा ई सभ फुसियाहींक बखेरा छी। कोनो जरूरति नै अछि देखावटी व्यवहार आ तमाशाक। बियाह लेल कोर्ट अछि आ दोस महीम लेल एकटा स्वागत समारोह राखि देबै। ई हम कऽ देब, फेर? ओना एकटा गप बता दै छी, जेहेन कम्पनी आ जेहेन शर्तपर अमेरिका जेबाक अछि ओइसँ तीन बरखमे कियो एते कमा लेत जे जौँ ओकर बाप चाहै तँ गामक गाम कीनि लेत। बुझलौं?” “प्रश्न ई नै अछि सर। पिताजी कने लोक-लाज आ जाति-पातिमे विश्वास करऽबला पुरान ढङक लोक छथिन।” सक्सेना गम्भीर भऽ गेला। कनी काल धरि चुप रहलखिन। ऐ बीच सोनल साड़ीमे आएल। खाइक लेल बजाबैक लेल। “देखू संजू। लॉ ऑफ ग्रेविटेशनक निअम गाछ आ फड़ धरि लेल मात्र लागू नै होइत अछि। मनुक्खक सम्बन्धपर सेहो लागू होइत अछि। सभ बेटा-बेटीक माँ-बाप पृथ्वी अछि। बेटा ऊपर जाइले चाहैत अछि आर ऊपर, कनिक आर ऊपर तँ माँ-बाप अपन आकर्षणसँ ओकरा घिचैत अछि। आकर्षण संस्कार भऽ सकैत अछि आ प्रेम सेहो, माया-मोह सेहो। मंशा गिराबैक नै होइत अछि। मुदा खसा दैत अछि। जँ हम अपन बापक सुनने हेतिऐ तँ हेतमपुरमे पटवारी बनि गेल हेतिऐ। तँ ई अछि। हमरा जे कहबाक रहए, से कहि देलौं। अहाँकेँ जे नीक लगैत अछि से करू। हँ, जाइसँ पहिने सोनलसँ गप कऽ लेब।” ** जुलाइमे बियाह भऽ गेल चिरंजीवी संजय आ सोनलक कोर्टमे। नहिये बरियाती आ नहिये बाजा-गाजा। प्रीतिभोजक लेल नोत आएल छल, रघुनाथक नामसँ सेहो। मुदा ओ नै गेला। एहेन चोट लागल छल रघुनाथ आ शीलाकेँ जे ओ दोसरकेँ नै देखा सकैत छल आ नहिये ककरोसँ नुका सकै छल। एहेन ठामपर जाएब ओ बन्द कऽ देने छल जतऽ दू-चारि गोटे जुमैत होथि। ओ मानि लेने छल जे दू बेटामे एकटा बेटा मरि गेल। जखन माए-बापक प्रतिष्ठाक ओकरा चिन्ते नै तँ मरले बुझू।सितम्बरमे ओ अमेरिका जाए आकि नर्क, ऐसँ ओकरा कोनो सरोकार नै। ऐ घड़ी लेल ओ ओकरा पालने-पोसने छल, पढ़ेने-लिखेने छल, गाछ कटने छल, कर्ज लेने छल, भरनापर खेत देने छल, आ दुनिया भरिक तगेदा सुनने छल? हुनकर लाख मना केलाक बादो राजू गेल छल, रामू माने संजयक भाए धनंजय, घुरल तँ ओकरा हाथमे एकटा ब्रीफकेश छल जे रघुनाथ लेल सक्सेना पठेने छल। रघुनाथ कॉलेजक तैयारी कऽ रहल छल। कुमोनसँ ब्रीफकेश दिश देखलक आ बाजल- “राखि दियौ।” “ऐं, एना कोना राखि दी। अप्पन संदूकमे राखू।” बाबा जमानाक सन्दूकमे की कहाँ राखै छल रघुनाथ आ ओकर चाभी ओ ककरो नै दै छल। बिना किछु बजने ओ चाभी ओकरा दिश फेकि देलक।राजू ब्रीफकेशकेँ संदूकमे राखि चाभी घुरा देलक आ बाजल, “आर किछु नै पुछब?” शीला उदास मोनसँ दरबज्जापर ठाढ़ि छल, भीतर चलि गेलि। “अहाँ सभ तँ एना गुम्म छी जेना कोनो बिपति आबि गेल”, राजू हँसैत माँक पाछाँ भीतर चलि गेल। “कनियाँ एहेन जे लाखमे एक। माँ अहाँ चिन्ता नै करू। सभ किछु करत ओ जे संजय बाजैत छल। हाथ-पएर जाँतत, मुँह दबाएत, बर्तन माँजत, बाढ़नि लगाएत, खेनाइ बनाएत, जे जे चाहत से सभ किछु करत। कनी अमेरिकासँ घुरिकऽ आबऽ तँ दियौ। अखन हनीमूनपर जा रहल अछि दार्जिलिंग, ओतएसँ दमदम हवाइ अड्डा, फेर ओतएसँ अमेरिका। बचि गेलौं अहाँ, जँ गेल रहितिऐ तँ मुँह देखाइ देबऽ पड़ितिऐ। ई लिअ, अहाँले फोटो पठेलक अछि स्वागत समारोहक…।” राजू नै जानि की-की बजैत रहल, ओ सुनितो रहल, नहियो सुनैत रहल। दुनू गोटेक फोटो ओतए पड़ल रहल जतऽ ओ बैसल छल। एकटा मन कहि रहल छल, “देखी”, दोसर कहि रहल छल, “छोड़ू, जाए दियौ”। सभटा सख धरले रहि गेल। राति भऽ गेल छल। गाममे सनाटा पसरि गेल छल। एक दिन पहिनहिये खूब बरखा बुन्नी भेल छल। हरियरी पसरि गेल छल। झिंगुरक अबाज गामकेँ गनगनेने छल। मेघ घटाटोप केने छल। दूर अकाशमे बिजलौका लौकै छल। ओम्हर कतौ पानि पड़ल हेतै, एम्हर नै भेल। रघुनाथक घर दुआर गामक बाहरी इलाकामे छल। घरक अगुलका हिस्सा दुआर पछुलका घर। दुआरक माने दलान आ बरण्डा। ऐ बरण्डामे सुतै छल रघुनाथ आ राजू। राजूक सुतलाक बाद रघुनाथ आध रातिमे नुका कऽ भीतर गेल, ढिबरी लेसलक आ सन्दूकसँ ब्रीफकेश निकाललक। जखन ओ ढिबरी आ ब्रीफकेश लऽ कऽ शीलाक बगलबला कोठली गेल तँ ओकरा मोन पड़लै जे ब्रीफकेशक चाभी तँ राजू देबे नै केलक। ओ रकमसँ राजूकेँ जगेलक। राजू बतेलक जे ब्रीफकेश चाभीसँ नै नम्बरसँ खुजत, ऐ नम्बरसँ। आ बड़-बड़ करैत ब्रीफकेश खुजि गेल। रघुनाथ ब्रीफकेशकेँ खोललक तँ भाव-विभोर। बेटा संजयकेँ लऽ कऽ जत्ते तामस रहै सभ टा बिला गेलै। टाकाक एतेक गड्डी अपन आँखिक सोझाँ एकटा ब्रीफकेशमे ओ पहिल बेर देखि रहल छल। आ ई कोनो सिनेमा नै वास्तविकता छलै। गामक लोक रघुनाथकेँ झगड़ा-झंझटिसँ दूर रहैबला मुदा कंजूसक श्रेणीमे गनती करै छल जे टाकामे अठन्नी भजबैत अछि। लोक ईहो कहै छल जे बड्ड लोभ नै केने रहितिऐ तँ ई दिन नै देखऽ पड़ितिऐ। रघुनाथ ब्रिन्चकेँ अपना दिस घिचलक। पहिने सए-सएक गड्डी गननाइ शुरू केलक। ओ एक-एक बण्डलक संख्या सेहो लिखि रहल छल। फेर ओ पाँच-पाँच सएक नोटक गड्डी उठा कऽ गनब आ लिखब शुरू केलक। गनैत-गनैत राति बेशी भऽ गेल आ सभटा रुपैयाक जोड़ भेल चारि लाख साठि हजार। हुनकर हअदय काँपल, जँ गनैयोमे गलती भेल हएत तँ एतेक टाका कोना? ओ उठि गेल आ सन्दूकमे झोंकि फेर आनि लेलक। घुरतीमे भंसाघरसँ कटोरामे पानि लऽ रहल छल तँ शीला जागि गेल। अंगुर भिजा-भिजा कऽ फेरसँ टका गनलक मुदा फेर वएह चारि आ साठि। ओ माथ पकड़ि बैसि गेल। “कोन गप अछि?”, शीला पुछलक। “पाँच लाखमे कम अछि चालीस हजार, कियो सन्दूक तँ नै खोलने छल?” “चाभी तँ अहीं लग छल, खोलत के?” “कियो आर तँ नै आएल छल घरमे?” “अहाँ आ राजू आएल छलौं, आर तँ कियो नै।” कनी कालक बाद ओ नै जानि की सोचि कऽ उठल आ राजूकेँ जगा कऽ लऽ अनलक। राजू आँखि मिड़ैत आएल। “ब्रीफकेश के देने छल अहाँकेँ, संजू आकि सक्सेना?” “किए? की गप अछि?” “बताउ, कम अछि पाँच लाखमे?” राजू हँसल, “मंगनीक बाछीक दाँत नै गानल जाइ छै। संतोष करू, जत्ते भेटि गेल से मंगनीमे, सएह बुझू।” ओ एकटक राजूकेँ देखैत रहल, “अहाँ तँ किछु एम्हर-ओम्हर नै केने छी?” “हम जनै छलौं जे यएह शक करब अहाँ, अहाँ स्वभावेसँ शक्की छी।” “चुप्प”, शीला बाजलि, “अहिना बापसँ गप्प कएल जाइ छै?” “बुझि गेलौं, यएह चोरेलक अछि। बतेलक नै।” “पहिने बुझि जेबाक चाही। चोरा कतौ बतबै छै जे चोरि वएह केने अछि”, राजू बाजल। रघुनाथ आश्चर्यसँ देखलक ओकरादिस, “की भऽ गेल छै ऐ छौड़ाकेँ। एकर भाए कम्प्यूटर अभियन्ता। ओ ऐ तरहेँ कहियो गप नै केने अछि बापसँ।” “गप्प नै केलक, तेँ अस्थिरेसँ चुपचाप बियाह कऽ लेलक आ बापकेँ खबरि धरि नै केलक।” झनझना उठल गुस्सा सं रघुनाथ। मन भेल-ओकरा घर सं निकलि जायैक कहियै मुदा नै जानि की सोचहि के ओतय सं उठल आ आंगन मे आबि गेल। कोना मे बंसखट पड़ल छल, ओहि पर बैसि गेल। ओ भगवानक लेल माथ उठैलक आसमान दिस। 'देखू मां, हम डेढ़ बरख सं कहि रहल छलहुं हिनका सं जे मोटरबाइक दऽ दियौ। घरानाक सभ छौड़ा लग अछि, एकटा हमहीं छी जकरा लग नै अछि। हिनकर कहब छल जे हाथ-पाइर तोड़बाक अछि की? माथ फोड़बाक अछि की? चोरी-चकारी आ लफंगई करबाक अछि की? डाका डलबाक अछि की? केकर हाथ-पइर टूटल अछि, कहू ते? ते संजू हमरा सं पुछलक-'अहां के की चाहि? जखैन हम ओतय सं घुरहि लागलहुं। हम कहलहुं-'हां, मोटरबाइक। ओ हमरा टका थमा देलक। ओ ब्राीफकेस मे सं देलक या कतय सं देलक हमरा नै पता।" 'सरासर झूठ। ई जानैत अछि जे संजय आब नै आबय बला अछि। हम नै पूछि सकब ओकरा सं।" रघुनाथ के ई झूठ बर्दाश्त नै भेल। शीला ठाढ़-ठाढ़ डिबरीक मद्धिम रोशनी मे कानि रहल छलि। ओ अप्पन बेटाक अहि रूप सं अनजान छलि। 'आैर कहू। हमर बापजानक दूटा बेटा-संजू आ हम। ई एक्को आंखि सं हमरा देखलक तक नै। सभटा मेहनत आ सभटा पाय ई ओकरे पर खर्च करलखिन। पढ़ैलक, लिखैलक, कंप्यूटर इंजीनियर बनैलक आ हमरा लेल। कामर्स पढ़ू। जकरा पढ़हि मे नै ते मदद कऽ सकैत छल, नै हमरा मन लागैत छल। कोनो तरहे बीकाम करलहुं ते कोचिंग करू, ई टेस्ट दियौ, ओ टेस्ट दियौ। हम थाकि गेल छी टेस्ट दैत-दैत। हिनका सं कहियौ, ई टका कत्तौ इमढ़-उमढ़ खर्च नै करैथ, डोनेशन लेल राख्ौथ। बिना डोनेशन कत्तौ एडमिशन नै हय बला छै। परछा के बता दैत छी।" 'जौं डोनेशनक टका नै देब तऽ?" 'ते कहियौ नै पूछब जे ई की कऽ रहल छी?"'कियअ कऽ रहल छी?" 'की करब? डाका डालब? तस्करी करब? गांजा हेरोइन बेचब? कत्ल करब?" की बक-बक कऽ रहल छी अहां? फालतू? झमाइर के शीला बाजल, 'आओर अहां चुप रहू। अनाप-शनाप कहि रहल छी बाप सें।" राजू कमरा सं बाहर निकलैत पिता सं बाजल, 'बस कहि देलहुं।" 'सुनू-सुनू। भागू नै। अपना लऽ कऽ सोचैत छी आ कहियौ अप्पन बहिन कऽ लऽ कऽ सोचने छी? जखैन होयत अछि तखन जाइत छी हजार पांच सौ मारि के आबि जायत छी ओकरा सं? ओकर ब्याह कऽ लऽ कऽ कखनो सोचैत छी?" 'देखि रहल छी हिनकर?" ओ मां दिस मुड़ल, 'जकरा सं कहबाक छल, ओकरा सं नै कहलल, कहि हमरा सं रहल अछि, जे एखन पढ़ि रहल अछि। डोनेशनक गप आयल ते दीदीक ख्याल आबि रहल अछि। पहिले हिनका सं कहियौक जे कंजूसी आ दरिद्रता छोड़ैक आब। हंसी उड़ाबैत अछि लोक। ई ढिबरी आ लालटेन छोड़य आ आन जना तार खींचवांके-कम से कम आंगन आ दरवाजा पर लट्टू ते लगवाय लियै। इजोत हुयै घर मे। एकर संगे फोन लगा रहल अछि लोक। घर मे फोन होयत ते संजू जखन चाहत, गप कऽ लेत। अहां सरला दीदी सं गप कऽ लेब। दीदी से टा किया भौजी सं सेहो।" माथा फोड़ैत फेर सं बैस गेल रघुनाथ-'यहि छी भाग्य। जकरा लेल कंजूसी करलहुं, ैओकरे मुंह से ई सुनबाक छल।" 'आओर एकटा गप कहि दैत छी अहां से आओर हिनको सं। फेर एहन बेवकूफी नै करैथ जेहन संजूक काल मे कइलय अछि। दीदी से परछा के गप कऽ लहुं चे ओ हिनकर तय करल सं ब्याह करत या नै। ई ते दौड़-भाग कऽ कत्तौ तय कऽ अइथिन आ ओ कहि दियै जे हमरा ब्याह नै करबाक अछि। फेर भद पिटत हिनकर।" 'ई अहां कोनो कहि सकैत छी।" 'कियैकि हम एकटा आदमी के अकसर हुनका संग देखनी छी। के छी ओ, नै जानैत छी।" 'देखलियै नै? एकरा शरम धरि टा नै अछि बहिन कऽ लऽ के अहि तरहे गप करैत?" रघुनाथ दांत पीसैत ओतय सं बाजल। ** सरला दुविधा मे छल-ब्याह करि आ नै करि? पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नै करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत। कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे! आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नै छूटहि छल। अहिना मे नै जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल। कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नै युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नै छल। नै कोनो खतरा, नै कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नै छल। कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नै सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ। सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नै। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नै छल, जतय हुनका कियो नै जानैत हुयै। निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ। प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नै अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन! सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो। जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नै सकल नीक सं। नींद नै आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नै बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि... एखन नै जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नै, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल? कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नै, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नै, विद्वान अछि। कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नै हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नै बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नै हुयै ओहि दिन! अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नै, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नै! मनु श्रद्धा सं देखलक! श्रद्धा मनु के देखलक! दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नै, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल। ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।" स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी! ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नै!" ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल। अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक। चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!" कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक! 'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे! * सरला चलि गेलि, मुदा रघुनाथक सुख-शान्ति लऽ गेलि। रघुनाथ कतेक राति सुति नै सकल। हुनका नीन नै आबि रहल छल। कोन जन्मक पाप छल जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। बच्चा सभकेँ एहन संस्कार कतऽसँ भेटल छलै जे ओ ऐ जन्ममे भोगि रहल छल। संजयकेँ कियो नै भेटलै- नहिये ठाकुर, नहिये बाभन, नहिये भूमिहार; भेटलै तँ लालाक लड़की। तकर बादो ओ ओइ लाएक छल जे मुँह देखा सकए, मुदा ई सरला। ओ ककरा मुँह देखाएत। कतऽ मुँह देखाएत। लड़कीक अप्पन तर्क छलै, जे ओ जाइत-जाइत सुना गेल छल। जे भी गलत काज करैए, ओ ओकर पक्षमे तर्क गढ़ि लैए। उहो ई तर्क गढ़ले छल- अहाँ दोसराक शर्तपर बियाह कऽ रहल छी, एतऽ हम बियाह करब मुदा अप्पन शर्तपर, अहाँ हमर स्वाधीनता दोसराक हाथमे बेचि रहल छी, एतऽ हमर स्वाधीनता सुरक्षित अछि, अहाँ अतीत आ वर्तमानसँ आगू नै देखि रहल छी, हँ, हम भविष्य देखि रहल छी, जतऽ स्पेसे-स्पेस अछि। स्पेसे-स्पेस, ऊहूँ। स्पेस माने की। आरक्षण आ कोटाक अलाबे एकर कोनो मतलब अछि? एतबे नै, आरक्षण नै हेतियै तऽ भारती केकरो ने केकरो दुआरि जाइत हेतियै आ पढ़य-लिखय कऽ बादो नग्रमे रिक्शा खींचैत हेतियै। अहीं कहैत रही जे एकदम गधा अछि, किछु नै बुझैत अछि। आइ पी.सी.एस. भऽ गेल तँ ओकरा जेहन कियो नै। ओ अप्पन मनक बोझ निकाललाक बाद हल्लुक अनुभव कऽ रहल छल कि पाछाँसँ कोनो हल्ला सुनाइ देलकै- यौ मास्टर साहेब। जमायक की हाल अछि? आ कनी-कनी हुनका लागै छल जे ई हल्ला पाछाँ टा सँ नै, आगूसँ सेहो- बाम-दहिनसँ सेहो, ऊपर-नीचाँसँ सेहो आबि रहल छलै। चारू दिससँ। गाम-घर, आस-पड़ोस, जान-पहिचानक सभ कियो हुनकर जमायकेँ लऽ कऽ चिंतित छलनि मुदा हुनकासँ हँसी कऽ रहल छलनि। ऐ बीच नै जानि किम्हरसँ कोनो बच्चाक किलकारी सुना पड़ल आ ओ हुमचैत हुनका दिस अप्पन नान्हि-नान्हि बाँहि पसारि देलक- नाना, ई देखू की अछि। ओ ओकर हाथसँ एकटा कागज लेलथि, जे हुनकर परोक्षमे चमटोलसँ झूरी देने गेल छल। ई निमंत्रण पत्र छल झूरीक पोतीक। तँ आब यएह हुनकर दियाद आ लगीचक अछि। नोत-हकार आ खानपीन आब हुनके संग हेबाक अछि, गेल अप्पन दियादबाद। रघुनाथ निश्चय केलक जे आब ओ वालण्टरी रिटायरमेंट लऽ लेत। ओ शीलासँ अप्पन ई इच्छा बतौलक जे आब ओकरा नोकरीक जरूरत नै छै। ई नै बतौलक जे ओकरा वी.आर.एस. आ सस्पेंशनमे सँ एकटा चुनबाक छै आ ऐमे यएह ठीक छै जे ओ करबाक लेल सोचि रहल अछि। चन्द्रमाक रोशनी पसरल छल, अगहनक। अकास साफ छल। आध आंगैन इजोरिया छल, आधमे छाह। चन्द्रमा सोझे रघुनाथक चेहरा देखि-देखि मुस्करा रहल छल। ओ ओकर जल्दीसँ हटबाक आसमे छल मुदा ओ अप्पन ठामसँ हटबाक नाम नै लऽ रहल छल। ओ हुनका नजरि गारि कऽ देखैत रहल आ हुनका लागऽ लगलनि-जेना चांद ऐना अछि आ ओकरामे लखाह पड़ऽ बला दाग हुनकर मुँहक झाइ। गामक सिमानक पारसँ शुरू भऽ जाइत अछि कुसियार आ राहरिक खेत, जतऽसँ नरहिया एक्के संग हुआँ-हुआँ शुरू केलक। गामसँ कुकुड़ सेहो ओही भावसँ उतारा देलक आ जना देलक जे ओ सभ सेहो सुतल नै अछि। शीलाक खाट रघुनाथक कातेमे छलै आ ओ सुतलि छलि। पछिला कतेक दिनसँ रातिमे यएह भऽ रहल छल। रघुनाथ रतजग्गा कऽ रहल छल आ शीला गप करैत सुति जाइत छलि। रघुनाथ उठि कऽ बैस गेल। इजोरियामे ओकर मुँह देखलक। भरल-भरल गोल गोर चेहरा आ नाकक लोलपर चमकैत चन्द्रमाक किरिण। एकरासँ पहिने ओ हुनका सदिखन पटायल देखने छल, सुतल नै। ओ एकटकसँ निहारैत रहल हुनका। ओ करौट लेने छल आ ओकर चेहरा रघुनाथे दिस छल। ओकरासँ सात बरख छोट, मुदा उमेर ओकरो नै छोड़ने छल। ओकरा भीतर प्रेम घुमरऽ लागल- हँ, आबो सुन्नरि छल हुनकर स्त्री। ओकरा लागल, ओ कहियो ठीकसँ प्रेम नै केलक हुनका। ओ हाथ बढ़ा कऽ हुनकर ब्लाउजक एकटा बटन खोलि देलक, चुप्पे दोसर, फेर तेसर। सुतल छाती जेहन नीनसँ जागि गेल, कुनमुनेलक आ फेर घुरऽ लागल। बिछौनपर झुकल-झुकल। ओइमे जान बाकी छल। ओ उठल आ हुनकर बगलमे पटा रहल। शीला ठाम बनौलक हुनका लेल आ आँखि बन्द केले-केले अपनाकेँ हुनकर आश्रित कऽ देलक। आँखिकेँ खोलबाक प्रयोजन नै छलै, हुनकर ओंगरी देहक सभटा कोन-अंतरासँ परिचित छल। ओ बड़ काल धरि एक-दोसराक देहक भीतर ओइ चीजकेँ ताकैत रहल, जे नै जानि कहिया अप्पन ठाम छोड़ि कऽ चलि गेल छल। रघुनाथकेँ लागि रहल छल- नै, कत्तौ नै अछि, कत्तौ ने कत्तौ ऐ बा ओइ देहमे अछि सत्ते मुदा जौँ सच्चे हेतिऐ तँ कतऽ जैतिऐ। परेशान भऽ थाकि-हारिे ओ अप्पन मुँह शीलाक छातीक बीचमे धँसा देलक आ शांत पड़ि गेल। मन नै कऽ रहल अछि, तँ छोड़ू।- शील आस्तेसँ बाजल। कनी काल धरि रघुनाथ किछु नै बाजल, फेर एक बेर हिचकी लेलक। शीलाकेँ लगलै जे ओकर छातीक बाम दिससँ जे गरम चीज बिछौनपर टघरि रहल अछि, ओ नोर थिक। रघुनाथक नोर। ओ हुनकर उघारल पीठ ससारलक- आस्तेसँ। मन तँ कऽ रहल अछि, देहे संग नै दऽ रहल अछि।- टूटल सांसे रघुनाथ बाजल। -तँ ऐमे दुखी हेबाक की गप अछि? होइत छै एना कखनो-कखनो। -नै, ई आब कखनो कालक गप नै लागि रहल अछि, शीला। -बड़ तनावमे रहि रहल रही ऐ बीच। तइसँ एना अछि। -नै, नै, फुसिये मोन नै बहटारू। हम ओइ लीखकेँ चीन्हि गेलौं, जइ बाटे चलि कऽ ई देहमे पैसैत अछि। -के ऊ। -बुढ़ापा। रघुनाथ बाजल आ कूही भऽ कानऽ लागल। शीला ओकरा पकड़िकेँ बैसौलक आ सांत्वना दैत बाजलि- एहन किछु नै अछि। दिमागी भूत खाली। बिना काजक सोचैत रहै छी, राति-दिन। हम कोनो शिकाइत केने छी कहियो? आर की चाहै छी। सदिखन जवाने रहब की? ओना, ई सभ बेटी-बेटा लेल छोड़ि दियौ। हमर-अहाँक उमेर थोड़े अछि ई सभ करबाक। अगला चारिम आ पाँचम दिन साँझमे जखन रघुनाथ कॉलेजसँ घुरल तँ शीला ओकरा खबरि केलक जे टेस्ट दऽ कऽ धनंजय आबि गेल अछि। ओना जौं ओ खबरि नै करितिऐ तखनो ओसारपर बाइकेँ ठाढ़ देखि कऽ ओ बुझि गेल छल। कपड़ा बदलि कऽ जखन ओ बाहर आएल तँ धनंजयकेँ देखलक। पुछलक- ऐबेर केहन भेल पर्चा। -बड़ नीक। निकालि लेब ऐबेर। -पाँच बरखसँ यएह गप सुनि रहल छी। सभ बेर निकालि लै छी। -एस.सी., एस.टी. कोटा आ घटल सीटपर हमर सक नै अछि। ओकरा लेल हम की करी? रघुनाथ ओकर कोना उतारा नै देलक। ऐ बीच शीला बाप-बेटा लेल चाह लऽ कऽ आएल। चुपचाप चाह पिबैत रहल। चुप्पी राजू तोड़लक- सुनने छी, अहाँ समएसँ पहिने रिटायरमेंट लैबला छी। -लैबला नै, लऽ लेने छी। आइ चिट्ठी देलौं। -एना किए केलौं अहाँ। -ई हमरासँ नै, अप्पन भाइ संजयसँ पुछू। शीला दिस देखैत रघुनाथ बाजल। -संजय तँ अछि नै, हम छी। कोनो निर्णय लेबासँ पहिने अहाँकेँ हमरा बताबैक तँ चाही छल। -बतैतिऐ तँ अहाँ की करतिऐ। हुनकर चेहरा कनी काललेल खिचा गेल, एक केर हँ देखलौं, दोसर केर नै, नै सुनऽ चाहैत रही। आ अखन ओ दिन नै आएल अछि जे हम अहाँ सलाह पर चली। धनंजय हुनका दैखैत रहल। फेर माँ दिस देखलक। शीला माथ झुकेने बैसल रहल, किछु नै बाजल। -अहाँकेँ निर्णय लैत काल हमरा लऽ कऽ सोचबाक चाही। अखन अनिश्चिते अछि हमर भविष्य। -ई सोचैत-सोचैत हम बूढ़ भऽ गेल छी। अहाँ बालिग छी आब। अप्पन अपने देखू।- रघुनाथ खिसियाइत बाजल। ऐ उत्तरसँ धनंजय मसोसि कऽ रहि गेल। ओ आससँ माँ दिस देखलक जे ओ किछु बाजए। -अहाँकेँ ई बुधि दीदी आ संजयक कालमे किए नै आएल छल, हमरे कालमे किए आबि रहल अछि। शीलाकेँ खराब लगलै। ओ टोकलक- चुप रह राजू, कखैन की बाजबाक चाही, बुझैत नै छिहीं की। -सभ बुझै छी माँ, एत्ते बुरबक नै छी। पता नै किए, हमरोसँ ईर्ष्या करै छथिन ई। अहाँ तँ बुझिते छी जे टेस्टक कोनो भरोस नै अछि, यएह सोचि हम नोएडाक एकटा मैनेजमेंट इंस्टीट्यूटक पता केने छी। इंस्टटीट्यूट तँ आरो छै, मुदा रेट बड्ड छै। यएह छै जे नीक अछि आ अप्पन सीमाक सेहो। दोसरासँ डोनेशन तीन लाख मुदा हमरासँ अढ़ाइ लाख लऽ रहल अछि। सभटा मिला कऽ एक बरखक खर्च छह लाख टका पड़ि रहल अछि। आ आब। जखन हमर बेर आएल तँ ई रिटायर भऽ कऽ घर बैसि गेल छथि। अपनाकेँ हमर ठामपर राखि कऽ सोचियौ ने। रघुनाथ सुनैत चुपचाप बैसल रहल। शीला हुनका देखलक आ ओ शीलाकेँ। कियो ककरोसँ नै बाजल। रघुनाथ उठि कऽ भीतर गेल आ कनी कालक बाद नोटक गड्डी संग आएल। -ई लिअ साढ़े चारि लाख। बाकी बचल छऽ मासमे लऽ जाएब। ओ गड्डी ओकर आगू फेक देलक आ ओतऽसँ हटि गेल। * बड़ समए लागि गेलै रघुनाथकेँ घरपर रहबाक आदति पकड़ैमे। ओ रहल तँ गाममे मुदा गामक नै रहल। गाममे ओ नै रहल तँ ओ गाममे की करितिऐ। पहाड़पुर जाए लऽ चाहैत छल, अप्पन गाछी, बसबिट्टी आ पाखैरक कारण- जतऽ चिड़ैक बोली आ गाय-महीसक डिरिएनाइ आ बड़दक घंटीक टनटनसँ गाम गनगनाइत छल, मुदा आब गाछ कटि गेल छल। बसबिट्टी साफ भऽ गेल छल आ पोखरि धानक खेत बनि गेल छल। गाछीक बीचसँ एकटा नहरि गेल छल, जकर कातमे प्राइमरी स्कूल खुजि गेल छल। ओकरे बगलमे दवाइक दोकानक लेल जमीन घेर लेल गेल छल। आम्बेडकरक गाम भेलाक बाद पहाड़पुर तेजीसँ बदलि रहल छल। गाममे बिजली आबि गेल। केबलक लाइन बिछा गेल छल। अखबार लऽ कऽ हॉकर आबऽ लागल छल। किछु घरमे टीवी, पंखा आ फोन लागि गेल छल। सड़कपर खडंजा बिछा गेल छल। खपरैलक किछु मकान रहि गेल छल, बाकी सभ पक्का छल। जे पक्का नै छल, तकर आगू ईंटा खसल नजरि आबि रहल छल। रघुनाथ अपनाकेँ टी.वी. आ अखबारमे व्यस्त राखऽ लागल। शौक तँ उपन्यास पढ़ैक छलै मुदा उपन्यास कॉलेजक पुस्तकालयमे छलै जतऽ जाएब ओ बंद कऽ देने छल। हँ, ओ वएह उपन्यास दोबारा पढ़ि रहल छल, जकरा कहियो ओ पढ़ि गेल छल। मासमे एकाध बेर नगरक पेंशन ऑफिसक चक्कर ओ जरूर लगा लै छल। गाममे ओ नहिये ककरो कतय जाइ छल, नहिये हुनका कतय कियो आबै छल। ओ लड़का-बच्चाक लिखाइ-पढ़ाइकेँ काज बुझै छल, बाकी काज तँ फालतुए। सम्मान सभ करै छलै, छोट-पैघ सभ, मुदा अगुआएल वर्गसँ बेसी पिछड़ल आ दलित। तइसँ रघुनाथ हुनकर किताब-कॉपीसँ लऽ कऽ नाम लिखेबाक फीस आ फीसक माफी लेल जे कऽ सकै छल, करै छल। ओ गामक प्रपंच आ राजनीतिसँ निर्लिप्त बड़ सोझ-सरल आ सज्जन लोकक रूपमे सबहक प्रिय छल। मुदा ओ सबहक प्रिय नै छल। ठकुरानक, जकरा ओ अप्पन दियाद-बाद कहै छल, ओकर लड़का ओकरा पसंद नै करै छल आ तकर कारण छलै एक तँ जखन मंडल आयोग लागू कएल गेल तँ तकर स्वागत करैबलामे कॉलेजमे असगरे अगुआएल वर्गक अध्यापक रघुनाथ छल। दोसर जखन-तखन चमटोलक हरवाह हड़तालक धमकी दै छल, ओ मानै छल जे से वाजिब अछि आ हुनकर सभक हक अछि। -उपाए की अछि, से तँ बताउ? -उपाए अछि। चाहे तँ हुनकर मांगपर सहानुभूति संग विचार करू बा फेर एकटा ट्रैक्टर कीनू। आ किएक तँ अपनामे सँ कियो ऐ औकातिक नै छी, जे असगरे कीन सकी, तइ दुआरे हरक पाछाँ दाम बान्हि दियौ, जे सभ लोक मिल कऽ कीनी। ई गप्प भेल छल बब्बन कक्काक दरवाजा पर जखन दियाद-बादक सभ बड़-छोट जुमल छल। चलाएत के? ड्राइवरक संग हेल्पर चाही, खलासी चाही। अप्पन ई छौड़ा सभ जे पछिला सात-आठ बरखसँ कंपीटिशनक नामपर गामसँ नग्र आ नग्रसँ गाम मोटरसाइकिलपर घूम-फीर कऽ रहल अछि, जखन नोकरीक कोनो आस नै तँ यएह करए। रघुनाथ बाजि तँ गेल मुदा ओकरा लगले लगलै जे गलती भऽ गेलै। छौड़ा सभ बिख-सबिख भऽ गेलै, आँखि लाल भऽ गेलै। मुदा आगू बुढ़-पुरान छलै, से मसोसि कऽ रहि जाइ गेल। ओइमे सँ किछु रिसर्च कऽ रहल छल, किछु कोचिंग कऽ रहल छल, किछु केर अंतिम चांस छलै कंपीटिशनक, किछु कंपीटिशनक इंटरव्यूक तैयारी करै जाइ छल आ ओइ बीचमे कोनो तरहक बाधा नै चाहै छल। एहन तरहक प्रस्ताव अपमानजनक छलै ओकरा लेल। ई तँ कियो नै जानै छल जे ककर भाग्यमे की लिखल छै? आ की कहतै लोक, यएह जे ट्रैक्टर चलाबैक लेल केने छल एम.ए., एम.एस.सी. आ पी.एच.डी.। ओकरा सभकेँ जे कहतै से तँ कहबे करतै- अहाँ की कहबै? अहाँ तँ बाप छी। सभटा लाज-धाख घोरि कऽ पी गेल छी की? मुदा ओकरामेसँ कियो बाजितिऐ, ओकरासँ पहिने आहत स्वरमे बब्बन कक्का बाजल- रग्घू। जाए दियौ। की कहियौ तोरासँ? तोहर बेटा एकर हालत मे हेतिऐ तँ आइ एना नै बाजितिऐ। रघुनाथ उठि कऽ घर घुरि आएल, चुपचाप। ओकरा दुख छलै जे ओ ओतऽ जे गप कहने छल, ओइ छौड़ा सबहक बाप ओकरा सभसँ कहै छल-कोढ़िया, अबारा। ई गप केकरोसँ नुकाएल नै अछि जे कोचिंग, फार्म, टेस्ट ओकरामे सँ कतेक लेल नग्रक दोस्तसँ मिलै-जुलैक बहन्ना छलै। ई रघुनाथे टा नै, ओकर सभक गार्जियन सेहो बुझै छलै जे ओकरा सभ लेल कोटा बा आरक्षण एकटा सहज कवच बनि गेल छै, जकर प्रयोग ओ सभ अप्पन असफलताकेँ नुकेबा लेल करैत अछि। मुदा ऐ समस्याक जे हल सुझौलक तइसँ बेटे सभ टा नै बाप सभ सेहो खराब मानि गेलै। एकर बादसँ नहिये कहियो कियो रघुनाथकेँ बजौलकै, नहिये ओकरासँ पुछलकै आ नहिये ओ कोनो सलाह देलक। हँ, ओकरा कतय एकमात्र आबऽ बला रहि गेल छलै छब्बू पहलवान। ओ किए आबै छलै आ सेहो शुरूहेसँ- तकर उत्तर नहिये छब्बू लग छलै, नहिये रघुनाथ लग। ककरो पुछलापर एतबे टा कहतिऐ- नीक लागैए। शांति भेटैए। ओ जखन आबै छल तँ गाँजा, भीजल साफी, चिलम, डोरक टुकड़ा आ सलाइ-काठी संग आबै छल। असगरे निश्चिंतीसँ दम लगैतिऐ। आ खाटपर पटा रहै छल। एम्हर किछु सधुआ गेल छल। जखन-तखन बाजि उठतिऐ- मास्टर कक्का, पता नै किए आब जीयैक मन नै करैए। एक बेर हुनका चुप आ उदास देखि कऽ रघुनाथ पुछलक- की गप अछि छब्बू। ऐ तरहे किए पटायल छी? छब्बू आँखिकेँ बंद कऽ बाजल- कक्का, आइ भोरमे बजरंग बलीक सपना आएल छल। बाजल, छब्बू। अहाँ जे पाप कऽ रहल छी, ओकर प्रायश्चित सेहो अहींकेँ करऽ पड़त, दोसराकेँ नै। -जखन अहाँ जानै छी जे पाप अछि, तँ किए करै छी? -हम देखिते बेबस भऽ जाइ छी मास्टर कक्का, की बताबी अहाँसँ? रघुनाथ दिसा-फरागत लेल जैबाक तैयारी कऽ रहल छल, बाजल- मुदा छब्बू, हम एकटा गप अहाँसँ कहि रहल छी, ख्याल राखब। जखैन धरि हुनकर हड़ताल चलि रहल अछि, ताधरि बिसैरियो कऽ चमटोल दिस पएर नै राखब। कोनो भरोस नै अछि ककरो। -गप तँ ठीके कहि रहल छी कक्का, मुदा एकटा हमर गप अहूँ सुनि लिअ। जौं ढोल बजाएत, तँ पाथर पड़ै बा बज्जर खसए, हम नै सुनब, नहिये देखब- चलि देब। जखन अहाँकेँ ककरो गप मानबाके नै अछि, तँ जे इच्छा अछि, से करू। रघुनाथ बड़बड़ाइत सिमान दिस चलि गेल, जिम्हर बब्बन सिंहक पंपिंग सेट छल। ई हड़तालक सातम दिन छल। अषाढ़ शुरू भऽ गेल छल आ ऐबेर पानि खूब बरिसल छल। हरवाहा एहन कालमे हड़ताल केने छल- खेतक जोत, बोनि आ केराकेँ लऽ कऽ। हरवाही आ खेतकेँ लऽ कऽ। बाबा आदमक जमानासँ चलि आबैत रेटपर काज करबासँ मना कऽ देने छल हरवाहा सभ। बीच-बीचमे हड़ताल केने छल ओ सभ, मुदा ठाकुर सभ बोनि कनी बेसी बढ़ा देने छलै आ ओकरा सभकेँ बुझा-सुझा कऽ ठीक कऽ देने छलै। मुदा ऐबेर आर-पारक लड़ाइ छल। ऐमे गोबर पाथैबाली ओकर छौंड़ी आ स्त्री सभ सेहो छलै। परिणाम ई भेलै जे खेतमे लागल पानि सुखाए लागल छल, चरनीपर बान्हल माल-जाल लगही-गोबरमे उठि-बैस रहल छल आ पूरा ठकुरपट्टी गंदगीसँ भरि गेल छल। ऐबेर हड़ताल बुझैमे ठाकुर सभ चूकि गेल छल। हरवाहा थाकि-हार कऽ नै आएल आ नहिये खेखनिया केलक, नहिये ओकर चूल्हि मिझेलै। जरूरी पड़लै तँ अहिरपट्टी गेल, एम्हर नै आएल। पूरा इलाकाक चमटोलीक भविष्य पहाड़पुरक हड़तालपर आश्रित छलै- ओ सभ से बुझि जाइ गेल छल। ठाकुर सभ राति भरि बब्बन सिंहक द्वारपर पंचायत करैत छल आ मुंसफ, जज, मजिस्ट्रेट, कलक्टर, एस.पी., इंजीनियर, डॉक्टर नै भऽ सकैबला हुनकर छौड़ा सभ हुनकर पंपिंग सेटपर बैसकी। ओ सभ दिन साँझ आठ बजे धरि ओतऽ जुमै छल, कहियो गाँजाक दम लगाबैत छल, कहियो दारूक बोतल खोलैत छल आ चमटोलीकेँ सदिखन सैंतबाक योजना बनाबैत छल। कोना सैंतल जाए, कखैन सैंतल जाए, सैंतबाक लेल तरीका की हुअए- ई सभटा समस्या छलै जइ लऽ कऽ ओ सभ गंभीरतासँ विचार करतिऐ आ तेसर गिलास धरि पहुँचैत ओ सभ कोरस गाबऽ लागै छल। गाबैत चलू, गाबैत चलू, एक दिन अहूँक जमाना आएत। जहिना ई खत्म हेतिऐ तहिना इंटरनेशनल लुक भऽ जाइ जाइत छलै- मनमे अछि विश्वास। हो हो मनमे अछि विश्वास हम हएब कामयाब, एक दिन। ओइ काल रामभरोस दुबे, जे पड़ोसी गामक छल आ भंगेड़ी छल आ ओकरा छोड़ि ऐ मंडलीक निअमित सदस्य बनि गेल छल- पतरा खोलि कऽ दिन देखैत रहतिऐ जे सैंतबाक तिथि कोन हुअए? ओ मुहुर्त तँ बता देने छल- कृष्णपक्षक अमावस्याक राति, मुदा कोन मासक अमावस्या हुअए, ऐ लऽ कऽ आश्वस्त नै भऽ पाबि रहल छल। ओम्हर हड़ताल खिचैत जा रहल छल आ गद्दरि फसिलक आस खतम भऽ रहल छलै। ओइ काल एक दिन नहरक रस्ते एकटा ट्रैक्टर धड़-धड़ करैत आएल छल आ अहिरपट्टीमे दशरथ राउतक दरबज्जापर ठाढ़ भऽ गेल। ओकरा लऽ कऽ आबऽबला आन कियो नै जसवंत छल- दशरथक बेटा। दशरथकेँ चारि टा बेटा छल- दूटा गाममे आ दूटा मध्यप्रदेशक कोरबामे। गामबला दूध आ खोआक व्यवसाय करैत छल आ कोरबाबला बलवंत कोलियरीमे ठेकापर लेबर सप्लाइ करैत छल। आ जसवंत देसी दारूक भट्टी चलाबैत छल। जसवंत जाधरि गामपर छल लुच्चा, लफंगा आ लतखोर मानल जाइ छल। भागलो छल तँ बापसँ मारापीटी केलाक बाद। शुरू-शुरूमे मध्यप्रदेशसँ पुलिस आएल छल, एक-दू बेर तकैत, मुदा बादमे सुधरि गेल कनी-मनी। एम्हर जखैन गाम आबै छल- भैया, बाबू, कक्कासँ नीचाँ ककरो नै कहै छल। कहै छल जे परदेसमे सभ किछु अछि, इज्जत नै अछि। चाही जतेक कमा लिअ, रहब दूइये नंबरक आदमी। दू नंबर माने दू कौड़ी। आब ओ सभ किछु छोड़ि-छाड़ि कऽ गाम-जबारक सेवा करऽ चाहै छल। संजोगे छलै जे ओ पछिला एक-दू बेर जखन-जखन गाम आएल, गाम हड़तालक चपेटमे छल। ओ नै एम्हर छल, नै ओम्हर। ओकर उठब-बैसब दुनू दिस छल-ठाकुर दिस सेहो, हरवाहा सभ दिस सेहो। ओ अप्पन दिससँ दुनूक बीच सुलह-समझौताक पूरा कोशिश केलक, मुदा नजदीक एबाक बदला दुनू एक-दोसराक आर विरुद्ध होइत गेल। जयवंत ओइ दुनूकेँ जवाब देलक ट्रैक्टर आनि कऽ, जे सभ किचकिचबैत रहैत छलै जे अहीरक बुधि ओकर ठेहुनमे होइत अछि (तइसँ कारण ओ सभ ठेहुनक बीच बाल्टी दबा कऽ गाय आ महीस दुहैत अछि)। ट्रैक्टर खेतमे ठाढ़ छल- ट्रॉली, कल्टिवेटर, हार्वेस्टर आ थ्रेशरक संग, गेंदाक माला पहिरने। ओकर कातमे खाट पर डंटा लऽ कऽ दशरथ बैसल छल। गामक नेना सभ ओकरा घेरने छल- कियो छू कऽ देखऽ चाहै छल, किछु ट्रॉलीपर चढ़ऽ चाहैत छल। दशरथ तमसा रहल छल आ डंटा पटकि कऽ ओकरा सभकेँ भगा रहल छल। जाधरि कथा आ हवन नै भऽ जाइ छल ताधरि लोकक नजरिसँ बचा कऽ राखैक छलै ओकरा। भगवंत उर्फ भग्गूक जिम्मा दोसर काज छलै। ओ कॉपी आ कलमक संग इम्हरसँ उम्हर भाग-दौड़ कऽ रहल छल। किसानक लेल सभसँ मुश्किल आ परेशानीक छल ई मास। अगहनक खेत तैयार छल, खेती पछता भऽ रहल छल, जल्दीसँ जल्दी जोताइ आ रोपनी करबाक छलै, तकर बाद रबीक नंबर छल। बड़ मौकापर आएल छलै ट्रैक्टर। तारीख लेल लूटि मचल छलै, भाड़ा चाहे जे लिअ, बीघाक हिसाबे। आर भाड़ा सेहो की लेबाक छलै-वएह जे रेट बान्हि देने छल, दू कोस दूरक इकबालपुरक काशी सिंह अप्पन ट्रैक्टरक। कथा लेल अखन तीन दिन बाकी छलै आ इम्हर अगिला तीन मासक सभटा तारीख बुक। दशरथ जकरा ककरो पुछै छल, तकर तँ बुझू भाग्ये। हुनका पुछैबला वएह छल जे नव घर-दुआर बनबा रहल छल, माटि आ खपरैलक घर खसा कऽ। जखन बिजली आबि गेल छल तँ ओइ स्टैंडरक घर चाही। दीया बाती आ लालटेन बला नै। एहन लोकसभ पहाड़पुरेटा मे नै, पास-पड़ोसमे सेहो छल। ककरो पजेबा चाही, ककरो सीमेंट, ककरो बालु, ककरो गिट्टी, ककरो लोहा-लक्कड़। केतारी सेहो तैयार भऽ रहल छल, सुगर मिलक लेल। जखन ट्रॉली छल, तखन सौ टा काज। दशरथ सबहक सुनतिऐ आ धैर्य राखैक लेल कहैत छल- सभ भऽ जाएत। कनी-कनी हएत। मुदा सबहक काज हएत। ठाकुर सभ सर्द छल। ओ सभ ओकरा सभकेँ सदिखन अपनासँ नीचाँ बुझैत छल मुदा आब हुनकर सभक चिरौरीक दिन आबि गेल। हुनका सभकेँ आब अफसोच भऽ रहल छलनि जे ई गप जखन रघुनाथ कहले छल तँ हुनकर किऐ नै सुनलौं। * राति भऽ गेल छलै। गाममे शान्ति पसरल छलै। कनी-कनी झिस्सी पड़ि रहल छलै। ढाबुस बेंगक टर्र-टर्र आ सनकिरबाक झन्न-झन्नसँ दिगंत गूंजि रहल छल। ट्रैक्टरक काज शुरू कऽ देलाक बादो ठाकुर हारल सन अनुभव कऽ रहल छल किएकि चमटोलमे कोनो तरहक बेचैनी नै छलै। अन्तर एतबे टा आएल छलै जे हरवाहा सभ आब गाममे आ गामक रस्तासँ आबऽ-जाए लागल छल- मूड़ी झुकैले, आरामसँ, बिना बाजले बा दुआ-सलाम केले। ठाकुर सभकेँ लागैत छलै जे ओ छाती उतानि कऽ हुनका सभपर हँसैत आबि रहल अछि- जा रहल अछि। रघुनाथ सुतएसँ पहिने बत्ती मिझाबैले जा रहल छल आकि माथपर बोरा राखने पानिमे भिजैत गनपत बरण्डापर आएल। गनपत हुनकर हरवाहा छल, हरवाहीक अलाबे घर-दुआरक काज सेहो देखैत छल। रघुनाथ ओकर बेटाकेँ अप्पन कॉलेजसँ बी.ए. करौने छल, ओकर बाद ओकरासँ एकटा फार्म भरबौने छल, जइ कारणसँ ओ बटिखरा-नाप इंस्पेक्टर बनल छल। ऐ अनुभवकेँ गनपत कहियो नै बिसरल। ऐ काल हुनकर ओ बेटा एम. राम मिर्जापुरमे पोस्टेड छल। -ऐँ गनपत, तूँ? कियो देखलकौ तँ नै? -नै मास्टर साहेब। ओ बोरा खाम लग राखि मचिया खिचलक। -एकटा गप बता दी। हम अहाँकेँ नै छोड़ब, भले अहाँ छोड़ि दियौ। हँ, ई काल कनी खराप अछि। -जानै छी। अइलौं कोना, से कहू। -गेल छलौं मगरूरक हिंया मिर्जापुर। सोमारू सेहो ओत्ते छै ने। मगरू ओकरा आटा-चक्कीपर ओतऽ काज पकड़ा देने छै आ ओ पक्का भऽ गेल अछि ओइ काज मे। -तँ? -तँ मगरू कहलक जे जाँत, ओखली, मूसरा, ढेकी, चक्की तँ कियो चलाबैत नै अछि आइ-काल्हि आ आटा पिसाबै लेल जाइ छै लोक एक-डेढ़ कोस दूर- डेढ़गावां बा कमालपुर। एनामे जौं गामपर आटा-चक्की बैसाइल जाए तँ केहन रहत? सोमारू सम्हारै लेल काफी अछि। -बैसेबै कतऽ? -सरकार, चमटोल आ गामक बीचमे जे ऊपर जमीन छै, ओइपर। आन कोनो काजक तँ ओ छै नै। रघुनाथ किछु काल धरि सोचैत रहल। -पुछबाक ईहो छल जे ठाकुरे लेल धुत्… रोटी आ भात छै, आटा आ चाउर तँ नै छै। रघुनाथ हँसल- ई सभ नै सोचू। शुरूमे भले अनसोहाँत सन करत, देर-सबेर सभ जाएत आ पिसाएत। एतबे टा नै, आस-पड़ोसक गामसँ सेहो आएत। जखन चक्की गाममे रहत तँ ओत्ते दूर के जाएत? बस देर नै करू। आर बताउ, कत्ते दिन रहलौं मिर्जापुरमे। -रहलिऐ दस दिन। एक दिन तँ पुछैत-पाछैत गुड़िया बेटीक इस्कूल चलि गेलिऐ। बड़ खुशी भेल। घर लऽ गेल। अप्पन हाथसँ खाना पकेलक, खुएलक, अहाँक आ मलकाइनक हाल-चाल पुछलक। चलऽ लागलौं तँ बीस टा टका जबर्दस्ती पकड़ा देलक। एक्को रत्ती नै बदलल छै। -ढेर दिन रहि गेलौं मगरू लग। -नै मास्टर साहेब, सभ दिन ओतऽ नै रहलौं। तीन दिन तँ पीसीक हियाँ रहलौं। पीसीक जँ सभसँ छोट बेटा अछि, ओ उहाँक डिप्टी मजिस्टे्रट छै- यसडीयम। बड़ पैघ कोठी छै, ओकर आगू कलम सेहो बड़ पैघ छै। जीप छै, पुलिस छै, ड्राइवर छै, नोकर-चाकर छै। ऊ साधारण लोक थोड़े छै। इजलास लागै छै। सभ कियो भेंट नै कऽ सकै छै। पीसीसँ कतेक-कतेक दिन भेंट नै होइ छै। हम तँ देखबे नै केने छलौं ओत्ते पैघ लोक। ओत्ते रहि गेलौं तीन दिन। पीसी रोकि लेलक। रघुनाथ कनी गंभीर भऽ गेल- नाम की छै ओकर। -हम सभ तँ सिद्धू-सिद्धू बाजै छी मुदा नाम छै सुदेश भारती। राम नै लिखैत अछि। रघुनाथकेँ काटू तँ खून नै। ई वएह सुदेश भारत छल जेकर जिक्र सरला केने छल। ओकरासँ ओ बियाहक गप केने छल। जौं ओ सच्चेमे कअ लेतिऐ तँ गनपत जे हर जोतैत छल आ ओकर आगू ठाढ़ रहैत छल आ मचियापर बैसैत छल, ओकर रिश्तेदार हेतिऐ। खरपत जे गनपतक बाप अछि, हुनकर समधी हेतिऐ आ गर मिलतिऐ। हुनकर संग खाटपर बैसतिऐ आ जमायक बापक हैसियतसँ ऊँच हेतिऐ हुनकासँ। हुनकर मन भेल जे शीलाकेँ अबाज दऽ कऽ बजाबै आ कहै जे सुनू, गनपत की कहि रहल अछि। -बाकी सबहक अप्पन दुख छै मास्टर साहेब। ओकर बियाह नेन्नेमे भऽ गेल छलै। ओ अप्पन मेहरकेँ छोड़ि देने अछि। ओकर झमेला चलि रहल छै आइ-काल्हि एकटा मास्टरनीसँ। ओ ऊँच जाइतक छै। कहियो कहै छै जे बियाह करब अहींसँ, कहियो कहै छै- नै करब। माँ-बाप नै चाहैए। ऐसँ ओकरा लटकेने चलि रहल छै। पीसा बड़ दुखमे रहै छै। -तूँ जो, देर भऽ रहल छौ। ऊ मास्टरनीक संग इहाँ-उहाँ जाइ छै, होटल सेहो जाइ छै, दोसर शहर सेहो घूमै छै, खूब मौज करै छै, मुदा पीसीसँ नै मिलाबै छै। पीसी बाजल जे हमरा देखा दे, एक बेर हम बतेबे ओकरा जे किए नै कऽ रहल छी बियाह। मुदा, भेँट कराएब तखैन ने। -कहलियौ ने, नीन आबि रहल अछि। ओ बत्ती बुझा दहीं। -अच्छा साहेब। गनपत ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा साहेब, एक बेर बुझा देतिऐ जे मेहरकेँ छोड़ि कऽ किए एना कऽ रहल छी। मेहरिया तँ कत्तौ चलि जाएत आ ककरो ने ककरो राखि लेत, मुदा बदनामी ककर हएत। ओकरे ने। -तूँ जेमे कि नै, दिमाग नै चाट। -अहाँ नै जाएले चाहब तँ कहियो कोनो काजक बहाना कऽ हमहीं ओकरा आनि लेब। रघुनाथ तमसा कऽ थरथराए लागल। ओ उठि कऽ झमारि कऽ बत्ती मिझा देलक। ओ ओकरा ठेल कऽ बाहर कऽ देलक। गनपत माथपर बोरा राखि कऽ बाजल- साहेब, जे कहै लेल आएल रहि, से तँ बिसरिए गेलौं। एकबैग ओकर अबाज फुसफुसाहटिमे बदलि गेलै, देखिये रहल छी हवा खराब छै। नै, एकटा गप कहि रहल रही। एहन कोनो गप नै अछि मुदा पहलमानकेँ बुझा देबै जे जखन धरि हवा खराब छै, चमटोल दिस नै देखए। आ देखत की, उम्हर नै जाए। रघुनाथक ध्यान नै छल ओकर फुसफुसाहटि दिस। ओकर चिंता आ बेचैनीक कारण दोसर छल- कि कत्तौ एकरा सरला आ भारतीक संबंधक जानकारी नै हुअए। जखन संबंधी अछि तँ कहियो ने कहियो मगरू जरूर भेंट करैत हएत, भऽ सकैत अछि जे भारती सेहो चर्चा केने हएत। आ नै हुअए तँ मगरू दुनूकेँ कहियो संगमे देखने हएत। जखन एक्के नग्रमे अछि तँ कोना संभव अछि जे ओकरा पता नै चलल हेतै अखन धरि। -शीला। आखिर ओकरा रहल नै गेलै आ ओ दोसर बेर शोर पाड़लक- तामसेमे। * पहलमान माने छब्बू पहलमान। पहाड़पुरक दक्खिन हिस्सामे घर छल बजरंगी सिंहक। ओ इलाकामे छब्बू पहलवानक नामे जानल जाइ छल। गामक नाम दूर-दूर धरि पसारने छल। दंगलमे जतऽ–जतऽ गेल, जीत कऽ घुरल इनामक संग। टंगड़ी आ धोबियापाट ओकर प्रिय दांव छल। लंबाइ कम नै, जुलुम तागति आ फुर्ती छलै ओकरामे। ककरो पकड़ि लिअए तँ छोड़ाएब मुश्किल, दाबि दिअए तँ उठब मुश्किल, पट पड़ि कऽ माटि पकड़ि लिअए तँ चित्त करब मुश्किल। भैंसक केहुनीसँ मारि दिअए तँ पसरि जाए आ उठि नै सकए। मुदा हुनकर पैघ भाए- जकर चलिते ओ पहलवानी करै छल, जखन असमय एकाएक गुजरि गेल तँ ओ लंगोट खुट्टापर टांगि देलक आ घरक जिम्मेदारी संभालि लेलक। छब्बूक बियाह नै भेल छलै। जखन उमेर छलै तखन केलक नै अखाड़ाक जोशमे आ जखन करए चाहलक तँ उमेर नै रहलै। कियो अइबो नै केलै। ऐ तरहेँ परिवारक नामपर हुनकर दस बरखक भातिज छल आ मसोमात भौजी। भौजी दिन-राति पूजा-पाठ आ धरम-करममे लागल रहै छलि आ भातिज स्कूल जाइ छल। खेती-बारी छब्बू सम्हारै छल आ सम्हारत की- झूरी हरवाहाक जिम्मा छोड़ि कऽ निश्चिंत रहै छल। मुदा ई निश्चिन्ती ओकर भाग्यमे नै छलै। एक दिन ओकर नजरि पड़ि गेलै झूरीक स्त्री ठोलापर। दू बच्चाक माए मुदा कहैक लेल। ऊ कलवा लऽ कऽ आएल छली, अप्पन मरदक लेल। छब्बू ओकरा पहिनो देखले छल-नै जानि कतेक बेर। मुदा ऐबेर नजरि नै पड़लै, गड़ि गेलै। ओ ओकरा आबैत देखलक, बैसैत देखलक, चलैत देखलक- की छड़ी सन शरीर, की लचक, की गस्सल बाँहि। गड़ि गेल आँखिमे। कतऽ ई अक्खर झूरी आ कतऽ ई गांजाक कली। बस सुट्टा लगि जाए तँ उड़ि जाउ आसमानमे आ फेर उड़ैत रहू। जमीनपर घुरैक नौबति नै आबए। आर फेर तकर बाद शुरू भेल छब्बू पहलमानक सुट्टा मारैक खिस्सा। मुदा खिस्सा रफ्तार पकड़तिऐ एकरासँ पहिने भौजीकेँ अंदाजा भऽ गेलै। भातिज मुन्ना माँकेँ बतेलक जे ओ कक्का आ ठोलाक दलानमे ओकरा नुक्का-छुप्पी खेलैत देखने छल। भौजी कानए लागल। ओ छब्बूसँ बाजल- छब्बू, हमर एकटा विनती अछि। भैया तँ रोकै-टोकैक लेल नै अछि, अहाँ करब अप्पन मनक। मुदा चाहे जे करी, करू घरसँ बाहर। एकरा साफ-सुथरा रहऽ दियौ। इशारा बुझि गेल छब्बू। एकर बादसँ छब्बूक चमटोलीमे आवाजाही बढ़ल। हरवाहा लेल हुअए बा रोपनी-कटिया लेल बजेबाक लेल। चमटोलीमे जाएब ठाकुर अप्पन बेइज्जती बुझै छल। जरूरी काज भेल तँ ओ बच्चा सभकेँ पठबै छल। मुदा छब्बू एहन मान-सम्मानसँ दूरे छल। जँ ओ गाममे लखाह नै दैतिऐ, कलम बा नहरपर सेहो नै लखाह दैतिऐ, आरि-खेतपर सेहो नै लखाह दैतिऐ तँ लोक ई मानि लै छल जे ओ चमटोल गेल हएत, ठोलाक संग। ई चमटोल सेहो जानैत छल आ गाम सेहो। तमसाह एत्ते जे ओकरासँ सोझाँ-सोंझी कहैक हिम्मत ककरो नै छलै। सभ अगुएलहा बेर-बेर मिल कऽ घरेनक सभसँ प्रतिष्ठित बब्बन कक्कापर दवाब बनेलक जे ओ अप्पन सकसँ जे किछु कऽ सकए, करए। बुझाबियौ बा धमकाबियौ बा जातिसँ बाहर करू। एहन कहएबला अगल-बगलक गामक लोक सेहो छल। शिकाइतसँ तंग आबि कऽ कक्का छब्बूकेँ बजैले छल। छब्बू हुनकर गप बड़ ध्यानसँ सुनलक आ अंतमे बाजल- गप तँ ई ठीक अछि कक्का मुदा ककरा-ककरा जातिसँ बाड़ब। ककरो-ककरो झाँपल अछि आ ककरो-ककरो उघार। मुदा बचल तँ कियो नै अछि हमर नजरिमे। रहल गप हमर तँ अहाँसँ नै नुकाएब। हम सभ किछु करै छी मुदा मुँहसँ मुँह नै सटबै छी। अप्पन धरम आ जातिकेँ नै बिसरै छी। कक्का माथ झुका कऽ बैसल रहल, किछु नै बाजल। छब्बू कनी काल बाद उठि कऽ चलि गेल। लोक मजाकमे कहै छल जे चऽरमे झूरी पहलमानक खेत जोतैत अछि आ पहलमान चमटोलमे ओकर खेत। हिसाब बराबर। आ झूरीकेँ ई छलै जे जखन ओ खेत जोति कऽ घुरै छल तँ छब्बू घरमे रोपनी कऽ कए आबैत छल। जखन छब्बू घरमे बजारसँ घुरतिऐ तखन छब्बू घरमे। ओ ओकर हेबाक आहट भेटिते तुरत्ते आपस भऽ जाइ छल। ओ एक बेर हिम्मत केने छल। हाथ जोड़ि कऽ कहलक- मालिक, हमर नै तँ कमसँ कम अप्पन इज्जतक ख्याल करू। लोक की-की कहैत अछि अहाँकेँ लऽ कऽ। एकर नतीजा ई भेलै जे ओ चौदह दिन भरि देह हरैद-प्याज देहपर पाति कऽ घरमे पड़ल रहल। असहाय ठोला। जीअब कठिन भऽ गेलै। नरक भऽ गेलै ओकर जिनगी। राति भरि झूरीकेँ छातीसँ लगा कऽ कानैत रहल आ तामससँ फनफनाइत रहल। सभसँ पैघ गप ई छल जे ग्राम सेवक चमटोलक, ओकरे जाइतक, पहलमानक संग गांजाक सुट्टा लगाबैत छल आ जखन कहियो कहतिऐ- कलेजा कड़ा राखू, खाली कनी बाट ताकू। -कहिया धरि बाट ताकू। सावन शुरू भऽ गेलै। ऐ मासमे पचैयां (नागपंचमी) पड़ैत छल। पहाड़पुरमे पचैयां छब्बू पहलमानक पर्व छल। ओइ दिन तीनटा बाल्टीमे भीजल चना आनल जाइ छल, परात भरि मिठाइ आबैत छल, बताशा आबैत छल, बजरंग बलीक पूजा कएल जाइत छल, छब्बू पहलमान लंगोट पहिर कऽ अखाड़ाक मोहारपर बैसैत छल आ अप्पन चेलाक गट्टापर रक्षा बान्हैत छल। ओ सभ उस्तादक आशीर्वाद संगे अखाड़ामे उतरैत छल। ओकर सभक कतेक जोड़ी होइत छल आ दुपहरिया बाद धरि पट्ठा सभ अखाड़ामे जोर-आजमाइश करैत रहतिऐ। सभसँ आखिरीमे छब्बू उतरितिऐ- पैघक पएर छुबि कऽ आ छोट सबहक हाथ जोड़ि कऽ। ई प्रदर्शनी-कुश्ती होइ छल। ओ अप्पन दांव आ करतब देखाबै छल- पहलमानी छोड़ि देलाक बादो। ऐ काल चमटोलसँ डफली आ नगाड़ाबला सेहो आबै छल आ झूमि कऽ बजाबै छल। अहिरटोलीक बनेठीबला सेहो रहैत छल आ एक-दोसरासँ खेलाइत पसीना-पसीना भऽ जाइ छल। दोसर गाममे पचैंया पर्व रहि गेल मुदा पहाड़पुरमे ई अखनो चलि रहल छल- चलनिक रूपमे सएह। मुदा ई गप सभ जानैत छल जे ई तहिये धरि अछि जाधरि छब्बू अछि। कोनो ठाकुरक नव पीढ़ीक लेल देह बनाएब, कशरत आ अभ्यास करब, कुश्ती लड़ब फालतू चीज छल। एकदम मूर्खताइ। बन्दूकक आगू मजगूतसँ मजगूत शरीरक की मतलब? तइसँ ओकर चेलामे बंसी अहीर,कहार, लोहार, गड़ेरिया छल, ठाकुर बाभन नै। मुदा ऐबेर खराप छल पचैयांक। पानि भोरसँ पड़ि रहल छलै- कहियो मद्धिम, कहियो तेज। अखाड़ा एक दिन पहिने तैयार केने छल अपनेसँ छब्बू। ई काज चेलामे सँ ककरो नै करऽ देने छल। मुदा ऊ थालम थाल भऽ गेल छल- धानक खेत सन। मिठाइ आ बताशा आबि गेल छल। बदाम फुलि कऽ अँखुआ गेल छल। इंतजारी छल बरखा थम्हैक। छब्बू कहि गेल छल जे अहाँ सभ तैयारी राखब, जहिना मौसम ठीक हएत, हम आबि जाएब। मुदा नहिये मौसम ठीक भेल, नहिये छब्बू आएल। पानि तखने थमकल जखन साँझ झलफलाएल। अकास साफ भेल आ जतऽ–ततऽ एकाधटा तारा नजरि आबऽ लागल। ओइ काल पुलिसक जीप आएल गाममे आ पता चलल जे छब्बूक हत्या भऽ गेल अछि। जनपदक सभसँ करेजाबला आ दमगर लोकक हत्या। ई खबर नै, बिजली छल, जे बदरी छटलाक बाद तरतड़ा कऽ ठाकुर टोलपर आबि खसल छल। ओ चाहे जे छल, जेहन छल- ठाकुर छल। आ ओकरा रहिते ककरोमे ऐ टोल दिस आँखि उठा कऽ देखबाक तागति नै छलै। आ आब? आब, चमटोलक बाहरी हिस्सामे, एकटा झोपड़ीक आगू थालमे चितंग पड़ल छल। मरल। उघार अकासक नीचाँ। एकटा लालटेन ओकर माथ लग छल, दोसर पएर दिस, दुनू ईंटापर। जेना लाशपर नजरि राखल जा सकए। लाश सेहो थाल आ माटिमे लेभराएल पड़ल छल। पएर ऐ तरहेँ छितराएल पड़़ल छल जेना बीचसँ चीर देल गेल छल। जननांग काटि देल गेल छल आ ओइ ठाम खूनक थक्का छलै, जइपर माछी झबरल छलै, उड़ि आ भिनभिना रहल छल। पुलिस परेशान छल, ओइ जननांगक लेल। कटल तँ गेल कतए? ऐ लाश लग कत्तौ नै छल। ओ लालटेन आ टॉर्चक रोशनीमे ओकरा ताकि रहल छल। जमीन समरस नै छलै- खधाइ बहुते छलै आ सभमे पानि भरल छल। ओकरा जतऽ कत्तौ संदेह होइ छलै, लाठीसँ हूड़ि कऽ देखि लै छल, भले ओ माटिक ढेला हुअए। एक डर सेहो छल कत्तौ भीतर, जे एहन नै हुअए जे कुक्कुर आएल हुअए आ मांसक लोथ बुझि कोनो दोसर ठाम लऽ गेल हुअए बा खा गेल हुअए। ई खोज देर राति धरि चलैत रहल। पुलिस अप्पन दिससँ सभटा तैयारीक संग आएल छल मुदा जइ आशंकाक संग आएल छल, ओहेन किछु नै भेलै- नहिये कोनो दंगा भेलै, नहिये चमटोल फूकल गेल, नहिये बदलाक कार्रवाई भेल। झूरीक झोपड़ीक बाहर ताला लटकि रहल छलै आ चमटोलमे सुन-सन्नाटा छल। एक्कोटा मर्द नै। सभटा मर्द बस्ती छोड़ि कऽ नै जानि कतऽ चलि गेल छल। पुलिस एबासँ पहिलेसँ। मौगी आ नेना छल, ओ सभ अप्पन घरमे बंद छल। हत्या एकटा एहन लोकक भेल छलै जकर घरमे कियो एफ.आई.आर. दर्ज करैबला नै छलै। हत्या के करलक, कखैन करलक, कोना करलक, किऐ करलक- एकर कोनो गवाह नै छलै। अंदाज जरूर लगाएल जा रहल छल मुदा ओ अंदाजे भरि छल जे छब्बू भोरे-भोरे अप्पन देहक आगि मिझाबै लेल झूरीक घर पहुँचल। आहट लागिते झूरी दोसर कोठरीमे नुका गेल। दोसर ढोला चांचर खोलि कऽ ओकरा भीतर लऽ गेल। अनधैर्य छब्बू लुंगी खोलि कऽ जहिना ओकरा संग सुतै लेल भेल आकि ओ ओकर फोता पकड़िये कऽ झुलि गेल। ओ ओकरा मारैत-पीटैत चिचियाबैत बेहोश भऽ कऽ खसि पड़ल। ओइ काल झूरी हसुआ लऽ कऽ आएल आ ओकर जननांग काटि कऽ फेक देलक। दुनू बाहर आबि गेल कोठरी बंद कऽ कए आ ओकरा तड़पैत, छटपटाइत आ मरबाक इंतजार करैत छोड़ि कऽ। बादमे दुनू घिसिया कऽ ओकरा बाहर कऽ देलक। आकि ओ धानक बीआ छीटऽ बीअड़िमे गेल छल ओइ दुनूक संग। मारलक ओतहिये, मुदा बलात्कारक केस बनाबै लेल ओकरा दरबज्जाक आगू आनि कऽ पटकलक। आकि नि:शस्त्र भेलाक बादो पहलमान दू-चारि टा केँ तँ काँचे चबा जाइत। दू-चारि मनक नै छल ओ। चमटोलकेँ पता छलै जे ओ किम्हर दिसा-फरागत हैक लेल जाइत अछि। पूरा चमटोल उम्हरे घेर कऽ राहरिक खेतमे मारलक जेना ओ सुग्गरकेँ चारू दिससँ घेर कऽ मारैत अछि आ झूरीक घरक आगू आनि कऽ फेंकि देलक। चऽरमे कतबो चिचिऐब तइयो केकरा सुना पड़त मेघक गड़गड़ाहटिमे। ऐ तरहक चर्चा छल। अलग-अलग अंदाज, अलग-अलग लोकक। सच गप केकरो नै पता। लाश लग कियो एबे नै कएल तँ कोना पता लागितिऐ? पुलिस ककरो आबैए नै देलक। मुदा एकटा गप कनी-कनी साफ भेल जे, जे किछु भेल, अचानक आ संजोगे नै भेल छल। एकर पाछाँ मास भरिसँ तैयारी छल। ऐ तैयारीमे असगरे पहाड़पुर चमटोल नै, आस-पड़ोसक बीस-पच्चीस गामक चमटोल मिलल छल। पहिने आ बादमे खर्चे-खर्च छल- थानाक सीओकेँ चाही, मुंशीकेँ चाही, पोस्टमार्टम बला डॉक्टरकेँ चाही, पैरवीकारकेँ चाही, वकीलकेँ सभ तारीखपर चाही, गवाहकेँ चाही- ढेर रास खर्च। ई कतऽ सँ करत झूरी? तइसँ सभ चमटोलक हरवाहा चंदा जुटैलक। दोसर, हुनका सभकेँ इंतजार छल अप्पन जाइतक कोनो पुलिस अधिकारीक, जे धानापुर थाना सम्हारए आ से आबि गेल छल, दू मास पहिने। भगेलू माने बी.राम। संगे अक्टूबरमे चुनाव छल विधानसभाक आ कोनो एहन पार्टी नै जकरा अनुसूचित जातिक वोटक दरकार नै हुअए। तेसर, चमटोल जानै छल जे छब्बूक मामिलामे ठाकुर घरेन बँटि जाएत, कहियो एक नै हएत। आ जल्दिये ई साबित भऽ गेल। * छब्बूक मारल जेबाक आदंक जकरा सभसँ बेसी छल ओ रघुनाथ छल। नै जानि की छल जे छब्बू जहिया कहियो कलम दिस औतिऐ, नहर आ अखाड़ा दिस औतिऐ आ अप्पन महीसक संग उत्तर दिसक चऽरमे औतिऐ -रघुनाथक दुआरकेँ जरूर देखतिऐ- मास्टर साहेब अछि कि नै। अछि तँ खाली बैसल अछि बा काज कऽ रहल अछि। जौँ रघुनाथ खाली रहै छल तँ छब्बू आबि कऽ बैस जाइ छल। बाजैत किछु नै, बस बैसल रहतिऐ। पुछलेपर बाजै छल जे कोनो काज नै, बस अहाँ लग किछु काल रहब नीक लागैए हमरा। नीक लोकक संगति भेटैत कहाँ अछि। ओ जाइ छल सभ ठाम मुदा बैसै नै छल। ओ रघुनाथक कहले बिना हुनकर हित-अहितक अपने आप ध्यान राखै छल। ई हुनकर भावना छल जकर पाछाँ कोनो कारण नै छल। ई गप रघुनाथ दोसरासँ सुनै छल, छब्बूसँ नै। अखन साल भरि पहिलुक्का गप अछि- रघुनाथक पछुआरमे हुनकर पितयौत भाइक घर-दुआर अछि जकर आगू तीन बिगहाक करीब हुनकर जमीन अछि। हुनकर माने रघुनाथक। भाइ धरि तँ ठीक छल। ओ बाँट-बखराक सम्मान करै छल मुदा भातिज सबहक नेत खराब हुअए लागल। हुनकर घरक आगू दोसराक जमीन। ओ सभ चारि भाँय छल आ सभ समर्थ। पैघकेँ रघुनाथ पढ़ेने छल आ बिजली विभागमे नोकरी दिएने छल। ओ समए-समएपर कब्जा करैक तरकीब आ बहन्ना खोजैत रहै छल। ओ एक बेर राति भरिमे रघुनाथक पछुआरमे एकटा ईंटाक देवाल ठाढ़ कऽ देलक आ हुनकर बाट बंद कऽ देलक। रघुनाथकेँ तखैन पता चललै जखन हो-हल्ला सुना पड़लै। ओ पहुँचल तँ देखलक जे छब्बू लाठी लऽ कऽ देवाल खसा रहल छल आ धुरझाड़ गारि पढ़ैत नरेशकेँ ललकारा दऽ रहल छल- घरघुस्सा, बाहर निकल आ हिम्मत होउ तँ ठाढ़ कर देवाल। हमहूँ देखिऐ। मास्टरकेँ असगर बुझले छीहीं की? खसरा-खतौनी कोनो चीज अछि कि नै? नरेश आ ओकर भाइ घरमे घुसल रहल। ओकरामे सँ ककरो हिम्मत नै भेलै जे बाहर आबए आ छब्बूसँ भिड़ए। सत्य गप तँ ई छलै जे रघुनाथकेँ नोकरी जाइक जते दुख छलै, ओइसँ एक्कोरत्ती कम छब्बूक जाइक नै छलै। किएकि छब्बू छल तँ रघुनाथ सेहो छल आ हुनका लेल पहाड़पुर सेहो। आब ककरा बुत्ते ओ रहत। छब्बूक मारल जेबासँ पहिने गनपत रघुनाथकेँ इशारामे बता देने छल जे पहलमान जँ अहाँ कतऽ आबए तँ बुझा देबै- चमटोलसँ दूर रहए। ई हमरा दुनूक गप तेसराकेँ पता नै चलए। खाली दूर रहए। रघुनाथ एकटा बहन्ना ताकि कहलो छल जे छब्बू, आब बहुत भऽ गेल, जाए दिऔ। छब्बू बाजल छल- मास्टर साहेब। छोड़ि तँ दिऐ, मुदा जाउ कतऽ? गाममे तँ सभ बेटी अछि, पुतोहु अछि। आर कतऽ जाएब। रघुनाथ ओकरा तरह-तरहसँ बुझाबैक प्रयास केलक, मुदा सभ बेकार। ओनाहूँ ओ सोचले छल जे बेसीसँ बेसी की हएत- यएह ने जे छब्बू बेइज्जत कएल जाएत आ झूरी ढोलाक संबंध सभ दिन लेल खत्म भऽ जाएत। मुदा ई तँ छब्बूक दुश्मन सेहो नै जानै छल जे एहन हएत। ओ ई कहैत घुमैत रहल जे ई एकटा ठाकुरक हत्या नै, पूरा दियादक समर्थाइकेँ चुनौती अछि, ओकरा ललकारा देल गेल अछि- मुदा ऐ घटनाकेँ बिसरब आ एकर चर्चा नै करब नीक बुझलक सभ। कनी काल लागल ठाकुर टोलाकेँ बदलैत समएकेँ बुझबामे आ ओकर हिसाबसँ अपनाकेँ ढालबामे। कतेक दिन धरि दुआर कूड़ा आ कचराक ढेर बनल रहल, कतेक दिन धरि लादिक लग गोबर बजबजाइत रहल, कतेक दिन धरि बड़द खुट्टासँ बान्हल उठैत-बैसैत रहल, गाइ-महीस डिरियाइ छल आ पगुराइत रहल। पटायल-पटायल खटिया तौड़ैबला ठाकुर कखनो कोन भरे पड़ल कोदारि दिस ताकितिऐ, कखनो फरसा दिस, कखनो बाढ़नि दिस आ थाकि कऽ अंतमे ओइ छाउर दिस जिम्हरसँ हरवाह आबैत छल। मुदा हरवाहा जे चमटोलसँ भागल, से नै घुरल। एक हफ्ता बीतल। फेर दोसर हफ्ता बीतल। फेर तेसर हफ्ता बीतल। ओकर जेबाक बाद ठाकुर जतेक परेशान छल, दशरथ यादव ततेक खुश। ओकर बेटा जसवंत ऐ कालमे ठाकुरकेँ सम्हारि लेने छल। ओ हुनका सभकेँ हरवाहाक कमी नै हुअए देलक। ओ सबहक खेत भाड़ापर जोतलक। एक्को दिन ओकर ट्रैक्टर नै बैसल। सभक हर कामै रहि गेल। ओ सभकेँ बुझा देलक जे बड़द मथदुक्खी आ बोझ अछि, फालतू अछि। दुआर गंदा करैत अछि, ओकरा हटाउ। ओकर गोबर कोन काजक? ओकरासँ उपजाउ तँ यूरिया अछि। किछु गप बादमे पता चलल, ओइ काल नै। जेना ओ जइ तरहेँ ठाकुरकेँ सम्हारलक, तहिना ओ चमटोलकेँ सेहो सम्हारलक। किछु हरवाहा तँ शहर चलि गेल- रिक्शा चलेबा लेल सोचिए कऽ बा बोनिपर काज करै लेल मुदा बर रास लोक कोरबा गेल- जसवंतक छोट भाइ बलवंत लग, जे बोनि मजूरक ठिकेदार छल। ओ सभकेँ खदानमे काज दिएलक। आर ईहो जे गामक घर होइसँ ओ दोसरासँ जतेक लै छल, ओइसँ कम लेलक। एतबे टा नै, जसवंत ओकरो मदद केलक जे चमटोलमे रहि गेल छल, खास कऽ मौगी सबहक। राशन-पाइनक गरजसँ अनाजक लेल ओ ठकुरटोलीमे जाएब बंद कऽ देलक आ सूदपर जसवंतसँ या अहिरटोलीसँ टका लिअए लागल। ओ आब सोझे गज्जन साव केर दोकानपर जाइ छल। नगद पाइ दै छल आ किराना समान लै छल। गाम कनी-कनी पहिलुक्के जकाँ घुरए लागल छल- नव बदलाव आ नव व्यवस्थाक संग। अन्तर एतबे टा आएल जे हरवाहा बाहर नोकरी करै छल। आ ओ जखन गाम घुरै छल तँ ठकुरटोलीमे नै जा कऽ अहिरटोलीमे जाएब, उठब-बैसब बेसी पसीन करै छल। शाइत हुनका ओतऽ बराबरीक अनुभव होइ छल। रिटायरमेंटक बाद लोकक देखा-देखी रघुनाथ सेहो अप्पन खेत-बारीक दोसर व्यवस्था केलक। ओ अप्पन खेत सनेहीकेँ अधियापर दऽ देलक। सनेही हुनकर कॉलेजक चपरासी छल आ सात मील दूर अप्पन गामसँ कॉलेज आबै जाइ छल। जाइतक कोइरी। ओकर समस्या ओकर औरत आ बाल-बच्चा छल। रघुनाथ ओकर परिवारक लेल ओसारक एकटा हिस्सा आ बाहरक खोपड़ी दऽ देलक। ऐ तरहेँ ओ खेतीक झंझटसँ निश्चिन्त भऽ कऽ कत्तौ आबै जाइ जोग भऽ गेल। आर कत्तऽ आएत-जाएत, मैनेजर आ प्रिंसिपल पेंशन लटकेने छल आ ओ अहीमे लागल छल। ओ ओइ चक्करमे दू-तीन दिन लेल नग्र गेल छल तखने हुनकर भातिज नरेश घरक पछुआरक जमीन दोबारा घेर लेलक- ऐ बेर काँट बला तारसँ। एतबे टा नै, नरेश पुरना लादि ओइ जमीनपर गाड़लक आ महीस बान्हि देलक। चारू दिस गोबर आ गोइठा फेकबा देलक, जतऽ-ततऽ सण्ठी आ पुआरक बोझ रखबा कऽ ई सिद्ध करैक प्रयास केलक जे पछिला कएक बरखसँ ई ओकरे कब्जामे अछि। गाममे घुसैत रघुनाथ एकरा देखलक आ सोझे ओतऽ पहुँचल जतऽ नरेश महीसकेँ सानी दऽ रहल छल। ओ हाथ पोछि कऽ कक्काक पएर छूलक। ई सभ की छै? नरेश हुनका आश्चर्यसँ देखलक- किछु तँ नै, की अछि? तामस मे थरथरा उठल रघुनाथ- बदमाशी करै छी आ सेहो अप्पन कक्कासँ। -कनियो टा लाज नै एलौ तोरा? हटा ई सभ खुट्टा-तुट्टा, तार-फार। नरेशक तीन भाइ सेहो घरक भीतरसँ बाहर आबि गेल। पड़ोसीमे कियो नै आएल। सभ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल सुनि रहल छल। -ई तँ नै हटत कक्का। हमर घर-दुआरिक आगूक जमीन साबिकक अछि आम जमीन आ फालतूमे अहाँ फँसेने छी। अहाँक ई छेबे नै करी, ई तँ गाम-समाजक अछि। एतबै सुनैक छल आकि रघुनाथक देहमे जना आगि लागि गेल। ओ फनफना उठल आ एक लात मारलक लादिपर। तोहर साती कऽ, आ गाम समाजक। अखन माटि काँच छल लाइदक, ओ एक दिस भसकि गेल। ऐ बीच तामससँ आगि-पानि होइत आ गारि पढ़ैत नरेशक छोट भाइ देवेश दौगल आ धक्का दऽ कऽ रघुनाथकेँ खसा देलक। ओ सम्हरितिऐ, तइसँ पहिले ओ हुनकर छातीपर बैस कऽ गरजल- साढ़ बुढ़बा, गरदनि पकड़ि कऽ अखने दबा दिऐ तँ मरिए जाएत। हम जतेक नीक लोक जकाँ गप कऽ रहल छी, ओतेक शेर बनि रहल अछि। जा, जे करैक अछि, कऽ लिअ। उठैत ओ हुनकर डाँरपर एड़ी मारलक- साढ़ बुढ़बा हरमजदा। रघुनाथ उठबाक प्रयास केलक मुदा उठि नै सकल। लाइदक कातमे पड़ल-पड़ल ओ चारू दिस ताकलक। दियाद-बाद देखि रहल छलै आ अप्पन-अप्पन दरबज्जापर बैसल छलै। कनी कालक बाद नरेश ओकरा ठाढ़ केलक आ घर दिस ठेल देलक। पीस कऽ लगाबै लेल हरदि-पियाज नै हुअए तँ पठबा देब।- देवेश चिकड़ल। -की भऽ गेल अछि गाम केँ? -एतऽ जनम लेलौं, पोसेलौं, बढ़लौं, पढ़ेलौं, सबहक मदति केलौं- कखनो किताब-कॉपीसँ, कखनो फीस माफीसँ, कखनो टका-पैसासँ, कतेक सर-संबंधी अछि आ रहत। आइ-काल्हि की भऽ गेल अछि गामकेँ? की अहीसँ जे ओ दियाद-बादक ऐ बा ओइ पार्टीमे नै अछि? की अहीसँ जे ओ रिटायर भऽ गेल आ कोनो काजक नै रहल? की अहीसँ जे ओ कहियो कोनो झगड़ा बा झमेलामे नै पड़ल? की अहीसँ जे ओ बेटा जातिक बियाह बाहर केलक? की अहीसँ जे ओकर बेटा अमेरिका मे डॉलर कमा रहल अछि? की अहीसँ जे ओकर दोसर बेटा सेहो नोएडामे एम.बी.ए. कऽ रहल अछि? की अहीसँ जे ओ बटाइपर खेती सनेहीकेँ देलक- बाहरी लोककेँ, हिनका सभकेँ नै? की भऽ गेल अप्पन दियाद-बादकेँ? रघुनाथ बुझबामे असमर्थ रहल। * रघुनाथ दलानपर करट भऽ कऽ पटायल छल। नै, नै करैक बादो शीला डाँड़पर फुलल हड्डी लग हरैद, पियाउज आ चूनक घोर लगा रहल छलि। आ मुँहक भितरे-भीतर किछु बड़बड़ कऽ रहल छलि, नाककेँ सुड़कैत। दू-दू टा मुस्टंड बेटा मुदा दुनू परदेशमे। एक्को टा एतऽ नै जे बापक बगलमे ठाढ़ हेतिऐ। रघुनाथ जइ अंडाकेँ पैघ केलक, ओ कोइलीक नै कौआक छल। आ ओ अपने कौआ छल, नै तँ ई गप बुझिये गेल हेतिऐ। ओ आइ धरि घरमे रहैत आएल छल, जे खपरैलक छल, माइटक मोट-मोट देवारक। साबिकी घर। पाछाँबला जमीन जानि-बूझि कऽ बँटवारामे लेने छल ओ, कि जखन पाइ आ समए हएत तँ पक्काक घर बनाएब-छोट सन। ई जरूरी छल- हुनका लेल नै, बेटा लेल। घरे नै रहत तँ ओ आएत किए? आएत तँ रहत कतऽ? आ जखन एबे नै करत, रहबे नै करत तँ गाम-घरकेँ बूझत-गमत की? फेर बाप-दादाक जमीन-जत्थाक की हएत? के देखत जा कऽ? खपरैलक घर तँ ढहि रहल अछि। कखन बैसि जाएत, कियो नै जानैत अछि? तेँ किछु दिन पहिने जखन प्राविडेण्ट फंडक पाइ भेटल तखने नव घरमे हाथ लगाबैक फैसला कऽ लेने छल। आब ई नव आफत। हुनका छब्बूक कमीक अनुभव भऽ रहल छल- लगातार। ई नव खाढ़ी पैदा भेल छल गाममे- तहियासँ जखनसँ गाममे बिजलीक खाम, केबुल, ट्यूबवेल, पम्पिंग सेट आ दवाइ दोकान आएल छल। जातिक पार्टी आएल छल, हराहरी तेसर घरसँ फौजमे कियो ने कियो भर्ती भेल छल। सवर्णमे एकटा वर्ग रिसर्च आ कोचिंग करैबला छौड़ा सबहक छल, जे शहरसँ बा कोनो फौजीक घरसँ बोतल लै छल आ राति पम्पिंग सेटपर बिताबैत छल। दोसर वर्ग नरेश आ ओकर भाइक छल। नरेश बिजली मैकेनिक छल। सरकारी कर्मचारी छल। मुदा खुट्टासँ तार खीच कऽ घरमे अवैध कनेक्शन दै छल आ चिक्कन कमाइ छलै। ओकर तीनू भाँइकेँ पॉलिटिक्समे मोन लागै छलै। देवेश सपा केर कार्यकर्ता छल, रमेश बसपा केर आ महेश भाजपा केर। ई पार्टी पछिला बीस बरखसँ सत्तामे आबि-जा रहल छल आ क्षेत्रक विधायक आ सांसद सेहो अही पार्टीक भऽ रहल छल। तीनू बड़ बुधियारीसँ कोनो ने कोनो नेताकेँ पकड़ने छल। ओ अप्पन-अप्पन नेताक संग रहितिऐ, घुमितिऐ, खेतिऐ-पितिऐ आ जनताक सेवा करैतिऐ- माने ट्रांसफर करबाबैक आ रोकबाबैक काज। छोट-मोट नोकरीसँ ई पैघ आ सम्मानजनक धंधा छल। लोकपर रोबदाब सेहो रहै छलै आ रुआब सेहो। हुनकर सभक मंत्री संग उठबाक-बैसबाक आ खाइ-पीयैक खिस्सा रहै छल। ओ जहिया कहियो चारि-पाँच दिनक लेल गामसँ निपत्ता रहतिऐ तँ सोझे लखनऊसँ या कोनो महारैलीसँ या हल्ला-बोलसँ आबैत छल। ई भाइ सबहक पहुँच आ पाइ केर तागतिक बोध रघुनाथकेँ तहिया भेलै जहिया हुनका दस-बारह दिन दौड़ऽ पड़लै- कखनो लेखपाल लग, कखनो थानापर, कखनो एस.डी.एम.क ऑफिसमे। कुर्सी सभ देलक, सम्मान सभ केलक, ध्यानसँ सुनलक हुनकर गप आ अंतमे बाजल- मास्साब। अहाँ विद्वान छी, शरीफ छी, अहाँक सभटा गप सत्य अछि मुदा कोन झमेलामे अपनाकेँ दऽ रहल छी? ओ सभ नीक लोक अछि की? मुँह फोड़ि कऽ किछु नै कहलक, इशारासँ जरूर बुझा देलक जे कऽ सकैत अछि तँ किछु नै, मुदा खाली गपे कऽ सकैत अछि। ओइ काल हुनका ईहो पता चलल जे दियाद-बादक आठो परिवारमे सँ सभ परिवारकेँ चुप रहै लेल नरेश दू-दू हजार टका देने छल। रघुनाथ दौड़ैत-दौड़ैत थाकि गेल। ई उमर सेहो एहन काज लेल नै रहि गेल छल। आब पहिलुक जेहन शक्ति सेहो नै रहि गेल छलै। ठेहुनमे दर्द रहै छलै आ गरदनिमे सेहो। शीला अलगे मरीज छल दमाक आ गैसक। जखैन रघुनाथ लग आबैत छल, डकार लेने आबैत छल। आ पछिला दिनक घटना आ पतिक परेशानी ओकरा आरो नर्वस आ निराश कऽ देने छल। रघुनाथ दुपहरियाक खेनाइक बाद नीमक नीचाँ पटायल छल आ सोचिये रहल छल जे आब की करी। एकमात्र रस्ता हुनका लखाह दऽ रहल छल- कचहरी। मुदा ओ रस्ता बड़ नम्हर छल। ओ जानै छलि जे तारीखपर तारीख पड़ैत जाएत। ऐ तरहेँ एक दिन आइत-जाइत मरि जाएब आ फैसला नै हएत। ऐ बीच शीला आएल। ओ बाजल- अजीब लोक छी अहाँ। असगरे चिंतामे मरल जा रहल छी, जकरा ई सभटा सम्हारैक अछि, ओकरासँ सलाह किए नै लऽ रहल छी? पुछियौ तँ ओकरासँ। -ककरासँ- बेटासँ। -हँ, मानलौं जे एकटा दूर अछि, मुदा दोसर तँ लग अछि। -एकदम सत्य कहि रहल छी अहाँ। ओ निसाँस लेलक- कहू तँ! ऐ दिस तँ हमर ध्यान गेबे नै कएल। ओ उठल आ शीलाक संग फोनमे भिड़ि गेल। शीला हुनका बेर-बेर बुझबैत रहल जे बल-धकेलक, पटकैक, मारि-पीटक गपक चर्च नै करबाक अछि नै तँ ओ परेशान भऽ जाएत आ पढ़ब छोड़ि कऽ बीचेमे चलि देत। लाइन भेटल रातिक दस बजेक बाद। स्वरपर संयम राखैत रघुनाथ विस्तारसँ सभटा गप कहैत हुनकासँ विचार पुछलक। ईहो बाजल जे एतऽसँ कैलिफोर्नियाक लाइन नै लागै छै, संजूसँ सेहो सलाह लऽ कऽ बताएब। राजू बीचमे टोकलक- किए मरल जा रहल छी जमीन लऽ कऽ। छोड़ू ओकरा आ सुनू, भौजी बनारस आबि गेल अछि अशोक विहारमे। ज्वाइन कऽ लेने अछि यूनिवर्सिटीमे। अहाँ माँकेँ लऽ कऽ चलि जाउ आ ओत्ते रहू आ सुनू। सुनैसँ पहिने फोन राखि देलक रघुनाथ। ओ माथ पकड़ि कऽ बैसि गेल। -की-की भेल? -शीला पुछलक। -भेल की? आब सम्हारू ओकरा। उड़ि कऽ आबि रहल अछि हवाइ-जहाजसँ। आबैते गोली मारि देत नरेशकेँ। ओ सभ बर्दाश्त कऽ लेत, बापक बेइज्जती बर्दाश्त नै करत। -अरे रोकू, रोकू ओकरा। -ओकरा तँ रोकि देब, संजयकेँ कोना रोकब? ओ तँ ओतऽसँ मिसाइलसँ सोझे घरमे आएत। शीलाकेँ संदेह भेलै अप्पन बुधिपर आ ओ चुप भऽ कऽ हुनका देखऽ लागल। -साढ़। कहैत-कहैत ओ माथ उठा कऽ शीलाकेँ देखलक। -हमरा डर छल ताइसँ हम गप नै कऽ रहल रही, मुदा अहाँक कहलासँ केलौं। हम एत्ते बुरबक नै छी जे हमर दिमाग मे नै आएल। मुदा अहाँक जिदपर केलौं। नै जानि कतऽसँ एहेन बेकाजक आ कोढ़िया छौड़ा जनम लऽ लेलक- साढ़। पछिला जन्मक पाप। हम तीस-पैंतीस बरख नोकरी केलौं, लाखक लाख कमाइ केलौं आ हाथमे एकटा पाइ नै। ऐ हाथ आएल, ओइ हाथ गेल। पुछू तँ कतऽ गेल, से बता नै सकब। आ ई जमीन। आइयो ओतै कऽ ओतै छी। मिसियो भरि टससँ मस नै भेल अप्पन ठामसँ। ई अहाँक दादा-परदादा-बापकेँ खुएलक, अहाँकेँ खुएलक, एतबे टा नै बेटा आ नाती-पोताकेँ खुआएत। अहाँ करोड़ो कमाएब मुदा टका आ डॉलर नै खाएब। भगवान ने करए जे ओ दिन आबए जखन बैंक चाउर-दालिक दाना बाँटत। ओ जांघपर मुक्का मारलक आ शीला दिस ताकैत बाजल- साढ़, तूँ सभ पैघ भलहि भेल हुँअए अप्पन माँक दूध पी कऽ, मुदा तोहर माँक माए अछि ई जमीन। चाउर, दालि, गहूम, तेल, पानि, नून यएह जमीन देने अछि। आ बाजै छी जे हटाबू ओकरा। -छोड़ू ओकरा। तामसमे रघुनाथ की सभ बाजैत रहल, हुनका अपनो नै पता। कोन तरहे शीला हुनका सम्हारैत पकड़ि कऽ आंगनमे लऽ गेल- जाउ, सूति जाउ। सोचू नै। * ऐ काल रघुनाथकेँ एकटा बोध भेलै। ई जे नीक लोकक मतलब अछि निरर्थक लोक, आ भला आदमीक अर्थ अछि डरपोक लोक। जखन कियो अहाँकेँ विद्वान कहए तँ ओकर अर्थ मूर्ख बुझू आ जखन कियो सम्मानित कहए तँ तकर अर्थ दयनीय बुझू। हुनका सभ ठाम यएह कहल गेल आ हुनकर कोनो काज नै कएल गेल। हुनका सभ ठाम हट-हट आ दुर-दुर कएल गेल। ओ ओइ बकरी आ गाए जेना अछि जे में-में आ बाँ-बाँ कऽ सकैत अछि, मारि नै सकैत अछि। यएह ओकर छवि, सबहक आगू मिमियाबै आ घिसियारी काटैबला मास्टरक। ई हुनकर छवि नै अछि, यएह छथिन ओ। ओ ओइ छविकेँ तोड़ै लेल सोचि रहल छल, बब्बन सिंह ओ अवसर दऽ देलक। ओइ काल रघुनाथ अपन खेतमे छल। ओ मचियापर बैसल छल आ आगू सनेही अप्पन आ हुनकर हिस्साक गहूम नपबा रहल छल। बगलसँ जा रहल बब्बन ठाढ़ भऽ गेल। गामक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला। गामे टा नै, पास-पड़ोसमे कत्तौ विवाद होइ छल तँ एक पंचक रूपमे कोनो ने कोनो पार्टी दिससँ ओ सेहो रहै छल। ई अलग गप अछि जे ओ मामला सुलझाबैक बदला आर ओझरा दै छल। ई हुनका नीक नै लागै छल जे रघुनाथ नै जानि कतऽ–कतऽ दौड़ल, हुनका लग नै आएल। रघुनाथ हुनका देखलक मुदा कोनो भाव नै देलक। -मास्टर।- ओ शोर पाड़लक। रघुनाथ लग गेल आ गोर लागलक। -जमीन अहाँक अछि, गाम-समाज या नरेशकेँ ओकरासँ की लेब-देब? दोसर कियो कोना कब्जा कऽ लेत? -एतबे टा हमहूँ जानै छी। -जानै छी तँ विधायकजी सँ किए ने भेँट करै छी? -कोन विधायकसँ? -अरे वएह, अप्पन कॉलेजक मैनेजर। माथ ठनकलै रघुनाथक। एकर मतलब जे ऐ पूरा मामिलाक तार ओत्तेसँ जुड़ल अछि। संजयक बियाहसँ। ओकरा हुनका रिटायर करबेलेसँ आ पेंशन रोकबेलेटा सँ संतोष नै भेलै- आ ई अछि दियाद-बादक सभसँ बूढ़-पुरान आ मर्जादबला लोक, जे नरेशकेँ नै बुझा कऽ हमरा बुझा रहल छल। आ बुझा की रहल छल, ओइमे रस लऽ रहल छल। ओइ काल रघुनाथक दिमागमे एकटा खुराफाती विचार आएल। -कक्का।- ओ बब्बनक हाथ पकड़ि कऽ कनी फराक लऽ गेल। अहाँसँ एकटा विचार लैक चाहैत रही, कतेक दिनसँ। जखन अहाँ भेटिये गेलिऐ तँ कहू तँ एत्ते पूछि लै छी। -बाजू, बाजू। मन तँ नै बनेने छी मुदा कखनो-कखनो सोचै छी जे ओइ जमीनकेँ बेच दी। बब्बन हुनका आश्चर्यसँ देखैत रहल। -अहाँकेँ पता अछि, कतेक महंग अछि ओ जमीन। आबादीक भीतर। कतेक काजक अछि। ओकरा बेचब सोना बेचै सन अछि। आ बेचब किए? -मथदुक्खी राखैसँ की फाएदा? -यएह तँ चाहै अछि नरेश। मुदा ओकरा नै बेचबाक अछि। ओ जे केलक, तकरा कोना बिसरि सकै छी? -तँ फेर? -फेर की? अखन तँ यएह सोचने छी जे ओकरा नै देबाक अछि, बाकी तँ घर अछि, गाम अछि, अहाँ चाहब तँ अहीं छी। देखल जाएत, कोनो जल्दी थोड़े अछि। बब्बन कनी गंभीर भेल- आ ओकर कब्जाक की करब? -कब्जाक की, खुट्टा अछि। आर किछु नै तँ जे उखाड़ि कऽ फेक देत ओकरो दऽ सकै छी। मैनेजर साहब सेहो खोलऽ चाहैए बच्चा सबहक अंग्रेजी स्कूल ऐ इलाकामे कत्तौ। एतऽ खोलि लिअए। -अरे गामक लोक मरि गेल अछि जे बाहरी लोककेँ देब? -नै, एकटा गप कहि रहल छी। अखन किछु तय-तफसिला थोड़े अछि। रघुनाथ धीरेसँ बाजल- हम दान तँ नै दऽ रहल छी ककरो। जखन वाजिब आ सही भेटत तखने ने। -अहाँ तँ गाममे फौजदारी करा देब मास्टर।- चिंतित भेल बब्बन बाजल। -हम की करब? जखन ओ अपने करैपर बिर्त अछि तँ कियो की कऽ सकैत अछि। रघुनाथ हुनकर कान लग मुँह लऽ जा कऽ बाजल- मुदा ई गप अपने धरि राखब। दुनिया भरिक लोक आबैत रहैत अछि अहाँ लग। की फाएदा कहएसँ? छै कि नै? तँ चली। रघुनाथ खेत दिस घुरि गेल। सनेही दोसर बेर पुछने छल जे गहूमकेँ बखारीमे आइये राखि दिऐ या काल्हि लेल छोड़ि दिऐ। शीलाक कहब छल जे राहैर आ तोड़ी सेहो बँटि जाए तँ सभकेँ बेरा-बेरी राखि देल जाए। रघुनाथ ई निर्णय शीलापर छोड़लक आ ओसारपर आबि कऽ बैसि गेल। शीला सेहो पाछाँ-पाछाँ आएल। -किए भरि-ठेहुन भरि-छाबा कऽ रहल रही हुनकासँ? सभटा खुराफातक जड़ि तँ वएह छथि। -अहाँ चुप रहि कऽ तमाशा देखू। हम बड़ रास मसाला दಽ देलौं हुनका। आब काल्हिसँ एतऽ बैसकी लगाएब शुरू कऽ देत लोक। रघुनाथक चेहरापर राहत आ संतोषक चमक छल। शीला उखड़ल मनसँ पुछलक- अहाँ जमीन बेचैक गप कऽ रहल रही हुनकासँ? रघुनाथ हँसल- गपे तँ कऽ रहल रही, बेच नै रहल रही। बेचबाक नै अछि हमरा। हमर अप्पन कमाएल चीज छेबो नै करए जे हम बेची। बाप-दादा लग हुनकर पुरखासँ कोना आएल हएत, वएह जानैत हएत। मुदा ई लोक नहिये अपने चैनसँ रहत, नहिये रहऽ चाहैए, नहिये रहैले देत। आब यएह देखू, हमर दोष कतऽ अछि? संजय बियाह केलक। ओतऽ केलक जतऽ चाहलक, जतऽ ओकरा अप्पन हित देखा पड़लै। भविष्य देखलक। हमरो नीक नै लागल मुदा ओकर अप्पन पसीन आ जिनगी रहै। हम की कऽ सकैत रही? मुदा तकर सजा मैनेजर हमरा देलक। फालतूमे। हमहूँ कहलौं- ठीक अछि। गामपर रहब- सुख आ शांतिसँ। नहिये ऊधोक लेब, नहिये माधोकेँ देब। एक समए छल जखन खेत-पथारक अतिरिक्त किछु नै छल एतऽ- नहिये अखबार छल, नहिये बिजली छल, नहिये फोन, नहिये टीवी छल। आइ सभटा अछि आ फसिल एतेक जे हम दूटा लोक लेल ककरो आगू हाथ नै पसारै जरूरति। रहल गप्प दोसर जरूरतक लेल तँ आइ ने काल्हि पेंशन भेटबे करत। फेर कोन गप्पक चिन्ता। की। रघुनाथ मुसकुराबैत शीला दिस देखलक। आ सभ सुख-दुखमे सदिखन संग दैबाली स्त्री अखन जीवित छलि। ओ हुनका खिचलक आ अपना लग बैसा लेलक। ओ लजाइत हुनका लग बैसल रहलि आ ओ हुनका एकटकसँ देखैत रहल। -शील, ऐ सभ चीजक सहारे जिनगी तँ काटल जा सकैत अछि, जिअल नै जा सकैत अछि। एकाएक हुनकर आवाज भारी आ उदास भऽ गेल। -शीला। अप्पन तीनटा बच्चा अछि, मुदा पता नै किए, कखनो-कखनो हमर भीतर एहन हूक उठैत अछि जेना लागैत अछि- हमर स्त्री बाँझ अछि आ हम निपुत्तर छी। माँ आ बाप होइक सुख नै जानलौं हम। हम सभ नहिये बेटाक बियाह देखलौं, नहिये बेटीक। नहिये पुतोहु देखलौं, नहिये होएबला जमाएकेँ। हम एहन अभागल माँ-बाप छी जकरा ओकर बेटा अप्पन बियाहक सूचना दैत अछि आ बेटी कहैत अछि जे जँ अनुमति नै देब तँ नोत नै देब। आ आब अहाँक नजरि अछि राजूपर जे ओ सभ साध पूर कऽ देत। -नेहाल कऽ देत अहाँकेँ, एहन भ्रम हुअए तँ निकालि दियौ अप्पन दिमागसँ। हमरा पता अछि जे ओ एकरोसँ आगू जा रहल छै। ओ एकटा एहन विधवा लड़कीकेँ ताकि लेने अछि जकरा दू बरखाक बच्चा छै। एतबे नै, ओ कोनो नीक सर्विस सेहो करै छै। ओकर पाइसँ ओ दिल्लीमे मौज कऽ रहल अछि। मोटरबाइक लऽ गेल अछि मस्ती करबाक लेल। बच्चा पोसब आ मौज करब दू टा काज अछि ओकर। गेल छल डोनेशनक पाइ लऽ कऽ, आइ धरि पता नै चलल जे एडमिशन लेलक आकि नै। -अहाँ एतेक गप जानैत रही तँ कहियो बतौलिऐ किए नै। -की कऽ लेती अहाँ? की करितिऐ बता कऽ। शीला, हम जानै छी ओकरा। पढ़ैमे कहियो रुचि नै रहलै ओकरा। अप्पन बापसँ कोन स्वरमे गप करैत अछि। एकरा अहाँ देखने छी। ओ शॉर्टकर्टसँ पैघ लोक बनैले चाहैत अछि। ओकरा लेल पैघ लोकक मतलब अछि धनी लोक। आ सेहो खून-पसीन बहा, बिन मेहनतिक। ओ महत्वाकांक्षी लड़का अछि मुदा लालच आ महत्वाकांक्षा बुझैत अछि। ओ बड़ रास चीज हासिल करए चाहैत अछि- अनचोक्के बिना पढ़ले-लिखले, बिना नीक नंबर आनले डिवीजन आनलक, बिन प्रतियोगिता देले, बिना खटले आ नौकरी करले। हमरा नै पता जे ओ लड़की ओकरा कोना भेटल। कतऽसँ भेटल। भऽ सकैत अछि जे ओकरा कोनो मर्दक खोज हुअए। एतबै जरूर अछि जे डेढ़ बरख पहिने कोनो सड़क दुर्घटनामे ओकर पति मरि गेल। ओइ लड़कीक अप्पन फ्लैट अछि, कार अछि, ऑफिसक काजसँ सिंगापुर, बैंकाक आबैत-जाइत रहैत अछि आ ई ओकर बच्चा सम्हारैत अछि आ घर जोगैत अछि। जेना हम नै जानै छी, तहिना ओ नै जानै छै जे ओकर मनमे की छै, की विचार छै। -अहाँ ई सभ कोना जानलिऐ। -ई नै पुछू। नोएडामे हमरो लोक अछि, जे आबैत-जाइत रहैत अछि। शीला चिंतित भऽ उठल- सभटा दुख अही बुढ़ापामे देखब लिखल छल की? एकटा बेटा परदेसमे, पता नै कहिया आएत। दोसर एतऽ मुदा ओकरो वएह हाल। मुदा ओकरोसँ खराप। आ इम्हर बापक दोसर मुसीबत। गाम छोड़ब तँ जानि जाएत, नै तँ मारल जाएब। नहिये कियो देखएबला अछि, नहिये सुनएबला, नै जानि ककर नजरि लागि गेल अछि घरकेँ। रघुनाथकेँ ओतಽ असगरे छोड़ि कऽ चुपचाप ओ अंदर गेल आ पटा रहल। * घरमे फोन आब जीक जंजाल भऽ गेल छल। जखन रघुनाथ कनेक्शन लेने छल तँ राजूक जिदपर जे संजू अमेरिकासँ जखन गप करऽ चाहत तँ केना करत। कोनो संदेश देबाक हुअए तँ। भौजीकेँ जौं मम्मीसँ किछु बाजबाक बा पुछबाक हुअए तखन। हमरे कोनो सलाह लेबाक हुअए तखन। चिट्ठी-पत्री आब के लिखैत अछि, ककरा लग एत्ते समए अछि। आ सरला दीदी सेहो तँ अछि शहरमे, हुनकासँ गप नै करबाक अछि की अहाँकेँ आ मम्मीकेँ। तँ कोनो हालमे जरूरी अछि ई। गाममे सेहो बेमतलब थोड़ लेने अछि लोक। फोन लागल तँ राजूक लेल। जखन कखनो घरमे रहैत छल, लागल रहैत छल ओइपर, कखनो ऐ दोस्तक, कखनो ओइ दोस्तक। संजूकेँ तँ लाइने नै भेटै छलै। हँ, कखनो-कखनो सरला जरूर भेट जाइ छल। आब जखन राजू बाहर अछि तँ फोन ओहिना बेकार पड़ल रहै छै जना नादि आ खुट्टा बा हर आ ठेंगा। तइसँ रातिमे जखन फोनक घंटी बाजल तँ रघुनाथ आ शीला डरि कऽ एक-दोसराकेँ ताकलक। घंटी बजब तँ बन्न भऽ गेल, ओइमे सँ कियो उत्साह नै देखेलक। जखन दोसर बेर बाजल तँ रघुनाथ उठल आ रिसीवर उठेलक। -हैलो। दोसर दिससँ आवाज आएल। चिन्हलक ओकरा। देर धरि सुनैत रहल, फेर शीलाकेँ रिसीवर पकड़ा देलक। आ माथपर हाथ राखि चुपचाप बैस गेल। कनी काल बाद दोसरದೊ दिससँ कानैक आवाज सुना पड़ल। ओ उठल आ अप्पन बिछौनपर आबि गेल। रिसीवर राखि कऽ शीला सेहो आएल आ अप्पन बिछौनपर बैसि गेल। ओ काल्हि आबि रहल छथि अपना सभकेँ लऽ जाइ लेल। -अहाँकेँ जेबाक अछि तँ जाउ, हमरा नै जेबाक अछि। बड़ कानि रहल छल। पुछि रहल छल जे हमर कोन एहन गलती अछि जे देखै लेल तँ दूर, अहाँ सभ फोन धरि नै केलौं। ओ केलक कहियो फोन। हम सपना देखि रहल रही जे महारानी घुरि आएल अछि अप्पन देश। आकाशवाणी भेल छल हुनकर आगमनक लेल। -ई तँ नै बाजू। राजू बतौले छल। -हम कोनो राजू-ताजूकेँ नै जानै छी। ओ किए नै कहलक। बापकेँ कऽ सकैत छल ससुरक संगे। ओकरा बजौलक, ज्वाइन करौलक, अशोक विहार आएल। एत्ते दिनसँ रहि रहल छथि, बीचमे पापा-मम्मी मोन नै पड़लै, आइ मोन पड़लै। ओहिना तँ मोन नै पड़ल हेतै, आएल हएत, कोनो गप हएत जरूर। कानि-कानि कऽ कहि रहल छल जे हम मम्मी-पापाक बिना नै रहि सकैत छी। -झूठ बाजैए। बहटरा रहल छल अहाँकेँ। जानैए कत्ते अपना सभकेँ। नहिये कहियो देखने अछि, नहिये भेंट अछि तँ ओ किजाने गेलए पापा-मम्मीकेँ। हम तँ जानै नै छी जे हमरो कोनो पुतोहु अछि। -पूतोहु नै सही, बेटा तँ अछि। नै जानि की सोचत। -कोन मतलब अछि बेटा-बेटी बहु दुनिया। सबहक चिंता करै लेल हमहीं छी। रघुनाथ तमसा गेल। ओकरा तँ चिंता छै जे लोक की कहतै। सासु-ससुर गाममे पड़ल अछि आ पुतोहु नग्रमे मजा कऽ रहल छै। -ई अहाँ कहि रहल छी, अप्पन मोनसँ। बुझलिऐ। किछु बजाउ नै हमरासँ। रघुनाथ उठल आ आंगनमे टहलऽ लागल। नीन भागि गेल छल हुनकर। ओ कोनो निर्णय नै कऽ पाबि रहल छल। ओ गामसँ सेहो तंग भऽ गेल छल मुदा ओकरा छोड़ऽ नै चाहै छल। मन नग्र आ कॉलोनी दिस लागल छलै- जीवनक नव दिस, नव जिनगी दिस, साफ-सुन्दर पक्का मकान आ अलकतरा छारल सड़क दिस, गंगाक घाट दिस, अनचिन्हार नव संबंध दिस। ई आकर्षण छल मनक मुदा उम्हर जाइमे भऽ रहल छलै जे कत्तौ एना नै हुअए जे पछुआरक जमीन हाथसँ निकलि जाए, बिन देख-रेखक मकान ढहि जाए, सनेही चोरी आ बेइमानी शुरू नै कऽ दिऐ, कत्तौ लोक सदा लेल गामसँ गेल नै मानि लिअए। आ एहन कहएबला तँ कम नै हएत जे गाम छोड़ि कऽ भागि गेल। एकरासँ पैघ जगहंसाइ आर की भऽ सकैत अछि। ओ आंगनक चक्कर काटैत ओतऽसँ ठाढ़ भऽ गेल जतऽसँ खपरैलसँ ऊपर उठैत चन्द्रमा लखाह दऽ रहल छल। ओ ओकरा देखऽ लागल जेना गाम छोड़लापर फेर नै लखाह देत- बा ओकरेसँ पुछि रहल अछि- आ तखन की करबाक चाही। ई चैत मासक राति छल। दशरथ यादव अप्पन दरवाजाक आगू नव शिव मंदिर बनौने छल। पछिला दस घंटासँ ओतऽ अखंड हरिकीर्तन चलि रहल छल। कीर्तनिया मंदिरक बगलमे ठाढ़ नीमक गाछपर लाउडस्पीकर बान्हि देने छल आ समूचा गाम हरे राम, हरे राम सँ दलमलित छल। ई एकरस गूंज ओकर मनकेँ भारी कऽ रहल छलै। -अहाँ जाउ, हम एतऽ रहब, अप्पन घरमे। सुनलिऐ। ओ ऊँच आवाजमे शीलासँ बाजल। -अहाँकेँ असगरे छोड़ि कऽ। नै बाबा नै, पता नै की भऽ जइतए। शीला ओतऽसँ बाजल- आ ऊ घर तँ सेहो अहाँक छी। संजू की कहैत छल। हम चाहैत छी जे मम्मी-पापाक अंतिम दिन काशीमे बितए। चैनसँ बितए। जखन समए आएल अछि तँ ना-नुकुर कऽ रहल छी। सोनल दोसर नै अछि, पुतोहु अछि अपन। -अहाँ, बुझै किए नै छी। सोनल पुतोहु अछि, घर पुतोहुक अछि, अपन नै। कोन औकातिसँ जाएब हम। पाहुन बनि कऽ। किराएदार बनि कऽ। कोन औकातिसँ। ओइ दिस ध्यान नै गेलै शीलाक। ओ कनी काल अचकचाएल, फेर बाजल- ठीक अछि, हुनकर घर तँ अछि मुदा संजू तँ अछि नै। ओ हम्मर बेटा अछि। देर-सबेर तँ आबए पड़त ओकरा। राजूकेँ वएह नै कहै छल जे पापा-मम्मीकेँ पठा दियौ। आ सोचू जे पुतोहुक घर की हमर नै अछि? रघुनाथ चुप रहल। किछु नै बाजल। -देखू, अपना सभ चलू। एहन नै जे घरकेँ छोड़ि कऽ जा रहल छी। कहियो घुरि आएब ऐमे। जखन परेशानी हएत तँ आबि जाएब। खेतीक जिम्मा तँ स्नेहीकेँ देने छी। रहि गेल घर तँ दस बिस्सा खेत आर दऽ दै छी गनपतकेँ। कमरा बंद कऽ दरवाजाक ताला ओकरा दऽ दियौ। साफ-सफैयत आ देखभाल करैत रहत। शीलाक गपमे दम लखाह देलक रघुनाथकेँ। हुनका चारि दिन बाद जेबाक छल पेंशनक काजसँ। दिक्कत केवल ई छल जे गनपत मिर्जापुर गेल छल अपन बेटा लग। तँ एहन करू शीला, अहाँ तँ सोनल लग काल्हि चलि जाउ। हम एतुक्का व्यवस्था कऽ पाँचम दिन पहुँचब। पेंशन ऑफिसमे अप्पन काज निंघटा कऽ सोझे अशोक नगर आबि जाएत। कोनो जरूरी गप हुअए तँ फोनपर खबर कऽ देब। अरे हँ, फोनक कनेक्शन सेहो तँ कटाबए पड़त। छोड़ू, अहाँ अपन तैयार करू, गहूम, चाउर, दालि, घी, अचार। कनी-बेसी जे लऽ जा सकब, लऽ लेब। * रघुनाथ बाजल पाँच दिन मुदा लागि गेल पचास दिन। ओइमे ओकर कोनो दोष नै छल। सोचने छल जे जखैन जेबाके अछि तँ एतुक्का सभटा समस्या सुनझा कऽ गेल जाए, ई नै हुअए जे रही ओतऽ आ मन लागल रहए एतए। बड़ रास सोचि-विचार कऽ ओ फैसला लेलक जे रूकल पेंशन हुअए बा आबादीक जमीन, जखन अही दुनूक जड़िमे मैनेजर अछि तँ हुनकासँ एक बेर भेँट कऽ लैमे की हर्ज अछि। जौँ एतबे टा सँ हुनकर ईगो तुष्ट हएत तँ कहएमे की खरापी अछि। आइ जे किछु छी, अहींक कारण छी, नोकरी नै देने हेतिऐ तँ जानि कतऽ हेतिऐ। जखन बनैले छिऐ तँ बिगाड़ि नै करियौ। आब स्थिति सेहो बदलि गेल छल। मैनेजरक बेटाक बियाह भऽ गेल छल वनमंत्रीक ठिकेदारक बेटासँ। ओ पड़़ोसी जिलाक छल। मैनेजरसँ ऊँच स्टेटसबला। आब रघुनाथसँ शिकाइतक कोनो कारण सेहो नै रहि गेल छल। ओ मिठाइक पैकेट आ सेब, संतोला आ अंगूरक संग पहुँचल तँ मैनेजर, जकरा लोक सरकार बाजैत छल, नीक मूडमे छल। रघुनाथकेँ देखैत ओ चुहुल करैत बाजल- मास्टर। अहाँक स्वास्थ्य देखि कऽ लागैत अछि, जे शुरूसँ दरमाहा नै लऽ कऽ पेंशन लेबाक चाही छल। जवानी तँ आब आएल अछि अहाँपर। -सरकार।- रघुनाथक मुँहसँ निकलल आ ओ कानऽ लागलखिन। -की। की भेल? आइ धरि नो-ड्यूज क्लियर तक नै भेल की? मैनेजर चौंकि कऽ पुछलक आ प्रिंसिपलकेँ फोन केलक। फेर बाजल- जाउ, चिंता नै करू। भऽ जाएत। आर किछु? रघुनाथ नरेश आ बब्बन सिंहक सभटा किस्सा बतौलक। ओ चुपचाप सुनैत रहल। कनी काल बाद ओ बाजल- जखन ई अहाँक घरक छल तँ बटाइ किए देलिऐ। गलती तँ अहूँक अछि। रघुनाथ किछु नै बाजल। हुनका ई बताएब ठीक नै लागल जे बाहरक लोककेँ तँ कखनो हटाएल बा भगाएल जा सकैत अछि मुदा हुनका मुश्किल हएत। ओ एतबे टा बाजल- हँ, गलती तँ भऽ गेल। आब किछु केलो नै जा सकैत अछि। -अहाँ समस्या ठाढ़ करैत रहू आ हम निपटारा करैत रही, यएह ने। मैनेजर एस.डी.एम.केँ फोन केलक आ इशारासँ किछु बुझेलक। रघुनाथ ओइ काल माथ झुकेने बैसल रहल। -आब कोन सोचमे छी। जाउ आ बब्बन सिंहकेँ पठा देब। ओ उठल आ बाथरूममे चलि गेल। जाइत-जाइत कहलक- भऽ सकैत अछि एस.डी.एम. ऑफिस दौड़ए पड़ए एकाध बेर। दौड़ाएब आ अहाँसँ किछु बाजए तँ हुनका आगू बड़ सिद्धांतवादी बनैक जरूरत नै अछि। सबहक किछु ने किछु मजबूरी होइत अछि। ठीक। बीस-पच्चीस दिनक दौड़-धूपक बाद एक दिन एस.डी.एम. दूटा सिपाही आ लेखपालक संग आएल- जरीब आ गामक नक्शा लऽ कऽ आ सबहक आगू जमीनक पैमाइश केलक। ऐबेर जमीनक ओ हिस्सा सेहो रघुनाथक हकमे निकलल जे नरेशक घर-दुआर छल। एकर मतलब ई भेल जे रघुनाथ चाहए तँ नरेशक घर-दुआर गिरा दिअए बा रहए दिअए आ ओत्ते जमीनक दाम वसूलि लिअ। ओकरा रघुनाथक भलमनसाहत पर छोड़ि देल गेल। ई हुनकर बड़ पैघ सफलता छल- निश्चिंती सेहो। पापड़ तँ बड़ बेलने छल मुदा सम्मान घुरि एलै। आब ओ बनारस जा सकैत छल मास- दू मासक लेल। मुदा जौँ मन लागि गेलै तँ संदेश आ फोना-फोनीसँ काज चलि जेतै। ओ जाइक तैयारी शुरू कऽ देलक आ तैयारी की करबाक छल। राशन लेलक। दू टा छोट-छोट बोरामे अलग-अलग अल्लू आ पियाजु छलै। चारि बजेक बस लेल तैयारी कऽ रहल छल जखन बाहरमे डाँट डपटिक आवाज सुनाइ देलकै। निकलल तँ देखलक- जयनारायण माने जग्गन। बड़ उखड़ल छल आ रूसल। हुनकर एक हाथमे कल्लूक कान छल आ दोसरमे दू टा अधपक्कू आम। डरल कल्लूकेँ पकड़ि कऽ सनेहीक झोपड़ाक आगू ठाढ़ छल- सनेही, सनेहिया रे। भीतरसँ सनेहीक स्त्री निकलल- की अछि मालिक? ओ झपटि कऽ कल्लूकेँ खिंचलक, दू थापड़ फेर मुक्का मारैत आ धकियाबैत भीतर ठेल देलक। ओ कानैत भीतर चलि गेल। मामला बुझैत देर नै लगलै रघुनाथकेँ। घरेनमे सबहक दरवाजाक आगू नीमक गाछ अछि, असगरे वएह टा अछि जकर दरवाजाक आगू आमक गाछ अछि। टिकुला लागैसँ लऽ कऽ ओकरा पाकै धरि, जकर नौबति शाइते कहियो आबैत छल। घरानाक छौड़ा सभ हाथमे ढेला नुका ओकर चरू दिस घुमैत रहै छल आ जग्गन ताधरि ओकर नीचाँ खाट राखि कऽ पड़ल रहैत छल जाधरि गर्मी बर्दाश्त होइ जोग रहैत छल। दर-दियाद भरि केँ कऽ चटनी, अचारक काज हुनकर लाख प्रयासक बादो ओकरेसँ चलैत छल। इन्हरसँ ढेला चलैत छल, उम्हर जग्गन पकड़ैक घातमे रहैत छल। एक कऽ पकड़ैत अछि, तीन टाक मौका भेट जाइत अछि। हुनकर आ छौड़ा सबहक व्यस्तता कहियो-कहियो डेढ़-दू मास धरि चलि जाइ छल। -आउ, आउ जगन। हमरासँ कहू की गप अछि। -काकी अछि आकि नै, आबए तँ आबी अहाँ कतए। -आउ, बैसू तँ सही। ओ जग्गनक आगू खटियापर बैसै लेल इशारा केलक आ शोर पाड़लक झोपड़ीक आगू ठाढ़ सनेहीक स्त्रीकेँ। -जग्गनकेँ सतुए घोरि कऽ पियाबियौ। सुराहीक पानिमे बनाएब। जग्गन कनी स्थिर भेल आ बैसि गेल। फेर अप्पन लुंगीक फाँड़सँ तमाकुलक डिब्बा बहार केलक आ मिड़ए लागल। बाजल- मास्टर कक्का, अहाँ ई बड़ पैघ गलती कऽ देलौं। कोइरी-कहारकेँ अप्पन बीचमे बसा कऽ अहाँ बड़ पैघ गलती केलौं। -ऐमे गलती की अछि? -अरे, अहाँकेँ लखाह नै दैत अछि। अही बाट देने हम दिन-राति आबै-जाइ छी। ई बैसल तँ बैसल अछि, पटायल अछि तँ पटायल अछि। पैघ लोगक बीच रहैक सउर नै छै। आ हिनकर बेटा। बीचे मे रघुनाथ टोकि देलक- देखू जग्गन, फालतूक गप अछि ई। समै-काल बड़ बदलि गेल अछि। आइ मानसिक रूपसँ विकलांगे एहन गप करैत अछि। कोन गपक पैघ छी अहाँ। पुरखा, जमीन आ जातिक भरोस। छब्बूक हत्याक बादो ई भ्रम अछि तँ राखने रहू। पछिला दिन अहूँ अप्पन खेत बेचलिऐ। ठाकुरमे सँ कियो किए नै किनलक। किनलक तँ आखिर जसवंते। आइयो हम्मर अहाँक खेती ओकरे भरोसे होइत अछि, ट्रैक्टर ओकरे लग अछि, टका ओकरे लग अछि। विधायक ओकरे अछि, सांसद ओकरे अछि, सरकार ओकरे अछि, ओकाइतो ओकरे लग अछि, कोनो काजक लेल पैरवी करबाक होइत अछि तँ अहाँ ओकरे लग जाइ छी, तकर बादो पैघ लोक छी अहाँ। एहन गलतफहमी पोसबाक अछि तँ पोसने रहू। हँ, ई जरूर अछि जे ओ दोसर गामक अछि, पराया अछि, अधिया देबाके अछि तँ ओकर बदला कोनो अप्पनकेँ देबाक चाही छल। आब अहीं बताबियौ, के अप्पन अछि जकरा दैतिऐ। जग्गन गुम्म रहि गेल। रघुनाथ सभसँ लगक पड़ोसी छल। नरेश ओकरे भाइक बेटा, जकर नजरि बराबर पछुआरबला जमीनपर छलै। कनी काल इंतजारीक बाद रघुनाथ बाजल- देखू जगन, परायामे अप्पन भेट जाइत अछि मुदा अप्पनमे अप्पन नै भेटैए। एहन नै छल जे अप्पन नै छल। छल मुदा तखैन जखैन समाज छल, परिवार छल, सर-समाज छल, जखन भावना छल। भावना यएह छल जे ई भाइ छी, ई भातिज छी, भतीजी छी, ई कक्का छी, ई काकी छी, ई पीसी छी, भौजी छी। भावनामे कमी होइ छल तँ ओकरा पूरा कऽ दैत छल लोक लाजक कारणे। नै तँ एनामे लोक की कहत। मात्र भावना छल, गणित नै, लेन-देन नै। ऐबीच सत्तूक घोर दऽ कऽ गेल सनेहीक स्त्री, रघुनाथ चुप भऽ गेल। ओकर गेलाक बाद फेर शुरू केलक- आब अहीं कहू, नरेशसँ बेसी के अप्पन छल। सोचने छल, ओकरा दऽ कऽ निश्चिंत भऽ जाएब। मुदा ओकर नेतपर शक छल, बड़ी काल पहिनेसँ। आ ओकरा नै दऽ कऽ नीक करलिऐ। नै तँ से दिन सेहो अइतिऐ जखन अप्पन खेत की, गाममे ओ घुसै नै दैतिऐ। आ कहैक जरूरत नै जे ओइ काल अहूँ हमर नै, ओकर संग दैतिऐ। हँ, सनेहीकेँ हम जानै छी। ओ अप्पन काजसँ काज राखएबला लोक अछि। अहाँ आर ककरो शिकाइत हुअए तँ बताएब। मौके नै देत, बताएब की? * ओ घर, जकरा राँचीक प्रोफेसर राजीव सक्सेना रिटायर भेलाक बाद अपना रहै लेल बनारसमे बनबैने छल आ जकरा अप्पन बेटी सोनलक नाम कऽ देने छल, ओ अशोक विहारमे छल। बनारसमे मोहल्ला छल, विहार आ कॉलोनी नै। एकर निर्माण शुरू भेल १९८०-९० क आसपास जखैन पूर्वांचल आ बिहारक भू-माफिया आ बाहुबलीक उदय भेल। ओ नग्रक दक्खिन, पच्छिम आ उत्तर दिस बसल गामकेँ किनलक आ ओकर प्लाटिंग कऽ बेचब शुरू कऽ देलक। देखैत-देखैत १५-२० बरखक भीतर गामक अस्तित्व खतम भऽ गेल आ ओइ ठाम नव-नव नामक संग नगर, कॉलोनी आ विहार बसि गेल। ई नव बनारस छल- महानगर सन। मोहल्लामे रहएबला मोहल्लेमे रहल। अप्पन पुरखाक काज-धंधा, दोकान, रोजगार आ घाटक संग। मुदा ऐ कॉलोनीमे बसऽबला बेसी लोक नव नागरिक छल। ओ बाहरसँ आएल छल। अगल-बगलक जिलासँ। सौ-पचास कि.मी. दूरसँ। हुनकर लगेमे गाम छल, थोड़-बेस जमीन छल, खेती-बारी छल। हुनका समए-समएपर बनारस आबऽ पड़ैत छल-कहियो कोर्ट कचहरीक काजसँ, कहियो अस्पतालक काजसँ, कहियो तीर्थ-बर्त लेल, कहियो शादी-बियाहक खरीदारी लेल, कहियो नेना सबहक एडमिशन आ पढ़ाइ करैक लेल। बेर-बेर आबि कऽ घुरएसँ नीक छल जे एतऽ ठहरैक आ रुकैक एकटा स्थाई ठाम हुअए, एकटा डेरा हुअए। मुदा ई ओकरा सभ लेल संभव छल जकरा लग अप्पन कोनो छोट-मोट नोकरी अछि, आ ओकरा लेल जकर बेटा सभमे सँ कमसँ कम एकटा बाहर कमा रहल हुअए। जकर नेना सभ गाममे बोर होइत हुअए आ ओतऽ नै रहए चाहैत हुअए, नग्रक आदति लागि गेल होइ आ अप्पन हित उम्हरे देखऽ चाहैत हुअए। मुदा गाममे ओइमे सँ किछु पहुँचि रहल छल कनी-कनी, जे नग्रमे छल- बिजली सेहो, नल सेहो, फ्रिज सेहो, फोन सेहो, टीवी सेहो, अखबार सेहो। मुदा ओ मजा नै छल जे नग्रमे छल। मजा छल तँ ओकरा लेल जकरा लग ट्रैक्टर छल, थ्रेशर छल, पंपिंग सेट छल, बोलेरो आ सफारी छल, जे खेतीक पेटक लेल नै, व्यवसाय लेल कऽ रहल छल, जे एक नै, एक्के संग सभ राजनीतिक पार्टीक हितैशी आ मदति केनहार छल। एहन लोकक कॉलोनी सेहो दोसर छल- नम्हर-चौड़गर प्लाटबला। मुदा अशोक विहार हुनकर कॉलोनी छल जे अध्यापक छल, बाबू छल, दोसर श्रेणीक सरकारी, गैर-सरकारी कर्मचारी छल आ एकरोसँ खास गप ई छलै जे या तँ रिटायर भऽ चुकल छल या निकट भविष्यमे रिटायर होइबला छल। नै तँ अखबारमे कोनो विज्ञापन, नै कोनो चौकपर ऐ लऽ कऽ कोनो होर्डिंग जे ऐ कॉलोनीक प्लाट हुनके बेचल जाएत जे पचास-पचपनक ऊपर हएत आ जल्दिये रिटायर हएत। मुदा जानि ने कोना भेल जे जखन कॉलोनी तैयार भेल तँ भेल जे ई बूढ़क कॉलोनी छी। एहन बूढ़-बूढ़ीक जिनकर बेटा-बेटी अप्पन स्त्री आ नेना सबहक संग परदेसमे नोकरी कऽ रहल अछि-कियो कोलकातामे अछि, तँ कियो दिल्ली, कियो मुंबई तँ कियो बेंगलौर तँ कतेक रास तँ विदेशमे। हुनकर दुख अपरम्पार छल। ओ बेटा-बेटी लेल अप्पन गाम छोड़ि देने छल, अप्पन जन्मभूमिकेँ। ई अपना लेल तँ ठीक, चाहे जना रहि लिअए, मुदा हुनका लेल नै। नहिये बिजली, नहिये पानि, नहिये लिखाइ-पढ़ाइ, नहिये आबै-जाइक सुविधा। घर हुअए तँ एहन ठाम जतऽसँ खेती-बारीपर सेहो नजरि राखल जा सकए आ बेटा-बेटीकेँ सेहो असुविधा नै हुअए। ओ अप्पन ठाम जमीन, संबंध, संगी-साथी, बाग-बगेचा, ड्बरा-पोखरि छोड़ि कऽ जइ संतान लेल आएल, वएह बाहर अछि। एतऽ धरि तँ ठीक छल, मुदा आब हलात ई अछि जे जतऽ सर्विस कऽ रहल अछि, ओ ओइ नग्रमे रमि गेल अछि आ ओतऽसँ घुरि कऽ एतऽ नै आबऽ चाहैत अछि। जौं ओ आबए चाहैत छल तँ हुनकर बच्चा सभ नै आबए चाहैत अछि। लिअ, ई नव आफत। जकरा लेल घर छोड़लौं ओकरे अप्पन अलग घर। ई नव आफत हुनका जिअ नै दऽ रहल अछि, नहिये मरैये दऽ रहल अछि। गामपर दादा-पुरखाक जमीन-जेदाद। बाप-दादाक धरोहर नै देखू तँ कखैन दोसर कब्जा कऽ लेत कहब मुश्किल। पुरखा सभ तँ एक-एक कौड़ी बचा कऽ, पेट काटि कऽ, जोड़ि-जोड़ि कऽ जेना-तेना जमीन बढ़ेने छल। चारि कऽ पाँच केने छल, तीन नै हुअए देलक आ तँए ई हाल अछि। कनीटा इम्हर-उम्हर भेल तँ आड़ि गाएब। महीना-दू महीनामे कमसँ कम एक बेर गामक चक्कर लगाबैत छल। देख लिअ लोक, जे नै अछि। ध्यान राखए। हाल चाल लैत छेम-कुशल-मंगल पुछैत। दुख-सुखमे जाइत, सभसँ बना कऽ राखू। अधिया या बँटाइपर खेती तखने करू। दियाबाती बा घर दुआरक देख-रेख लेल कोनो नौकर-चाकर राखू तखनो। हुनकर बेटाक नेनपन गाममे बीतल छल। नग्रमे पढ़ैत काल सेहो ओ आइत-जाइत रहल छल गाममे। ओ खेती भले नै केले हुअए मुदा हुनका ई पता छल जे हुनकर खेत-पथार कोन छै, धानक, गहूमक, दलिहनक। हुनका थोड़-बहुत जानकारी छल। खेला-धूपी बा कौतुहुलमे बाप-कक्का संग रहि कऽ ओ अगोर केने छल, रोपनी-कटौनी सेहो देखने छल। लोक सेहो जानैत छल जे ई फलानाक बेटा या भातिज अछि। गाम घरसँ माया-मोह लेल एतबे कम नै छल मुदा हुनकर बच्चा। ओ तँ दादा-दादीकेँ छोड़ि कऽ चिन्है ककरा छल? आ दादा-दादीकेँ सेहो चिन्है कतऽ छल। चिंता ओकरा होइ छै जकरासँ मोह होइ छै, प्रेम होइ छै। परिचए आ संबंध नै तकर की चिंता। खेत सेहो ओकरे चिन्हैत अछि जे ओकरा संग जियैत-मरैत अछि। ओ खेतकेँ की चिन्हत, खेते हुनका चिन्हएसँ मना कऽ दैत अछि। ई सभटा गप बेटा सबहक नजरिमे बूढ़क भाँसब छल। अहाँ माटिमे पैदा भेलौं आ एक दिन ओइ माटिमे मिलि जाएब। कहियो ओइसँ छूटैक बा ऊपर उठैक बा आगू बढ़ैक गप अहाँक दिमागमे नै आएल, किएकि ओइमे गोबर नै माटि छल। की कऽ लेलौं खेती कऽ कए अहाँ। कोन युद्ध जीत लेलौं। खाद महग, बीज महग, नहरमे पानि नै, मौसमक भरोस नै, बड़द नै रहल, भाड़ापर ट्रैक्टर समएपर भेटए नै। हरवाह आ मजूर रहल नै। ककर भरोसे खेती करू आ खेती सेहो तखन करू जखन हाथमे बाहरसँ चारि पइसा आबए। की फाएदा एहन खेतीसँ। असल चीज पइसा अछि। जौँ हाथमे पइसा हुअए तँ ओ सभटा जिन्स बिना किछु केने बजारमे भेट जाइत अछि, जकरा लेल अहाँ राति-दिन खून-पसीना एक करैत छी। बिना किछु केले, बिना किछु करेले। सभटा गप आ सभटा झगड़ा बेटासँ चलि रहल छल, गामकेँ लऽ कऽ। मुदा आब नव आफत। अशोक विहारक मकानक की हएत। ओ जतऽ अछि, ओतऽसँ आबऽ नै चाहैत अछि। अछि तँ ई जे हुनकासँ गाम तँ छूटिये रहल अछि, अशोक विहार सेहो ने छूटि जाए। * अशोक विहारक लेन नंबर ४ क डी.१ मे अमेरिकासँ आएल सोनल सक्सेना रघुवंशी, तीन बरख बाद। हुनकर डैडी आएल छल सोनलकेँ सैंट्रोसँ पहुँचाबै आ विश्वविद्यालय ज्वाइन कराबै लेल। एतबे टा नै, हफ्ता भरि रहि कऽ सभ चीज ठीक-ठाक केलक, ओकरा सजेलक-धजेलक, भोर-साँझ बेटीकेँ चाह पिएलक, ओकर दिनचर्या निर्धारित केलक आ विदा होइसँ पहिने ओकरा सलाह देलक। संजूक मम्मी-पापाकेँ बजा लिअ, ओ काज आएत। घर सेहो देखत आ अहाँकेँ मदति सेहो करत। यएह बाजल छल संजय सेहो अमेरिकासँ विदा करैत काल। -हम दुनू भाँय बाहरे छी, मम्मी-पापा गाममे असगरे अछि। ऐ उमेरमे हुनका सहाराक जरूरत अछि, हुनका संगे राखब। ई पहिलुक राति छल जखन ओ घरमे असगरे छल। देर राति धरि घर आ अप्पन बेडरूममे संगीत सुनैत रहल। एक कैसेटक बाद दोसर कैसेट। शास्त्रीयसँ मोन भरितिऐ तँ अर्धशास्त्रीय, ओइसँ मोन भरितिऐ तँ फिल्मी गाना। पढ़ैत रहितिऐ, सुनैत रहतिऐ। बत्ती मिझा कऽ सुतबाक आदति छलै। बेडरूमकेँ छोड़ि कऽ आन कोठलीक बत्ती बरैत छोड़ि देलक आ पटा गेल। सुन-सन्नाटाक सेहो आवाज होइत अछि आ से नीक कम, भयौन बेसी होइत अछि। एतबे टा नै। ई आवाज सुनाइये टा नै, लखाह सेहो दऽ रहल छल। हुनकर घरक आगू पार्क छल- बड़ पैघ। पूरा मोहल्ला या कहियौ कॉलोनीक। जखनसँ आएल छल, तखनेसँ भोर-साँझ देखि रहल छल। ओ तीन बरखसँ एहन दुनियामे रहि कऽ आएल छल जतऽ अन्हार नै होइ छल। जतऽ बूढ़ नै रहै छल। जतऽ सभटा चीज दौड़ैत-भागैत उछलैत-कूदैत नजरि आबैत छल। जइमे पानि छलै, तेजी छलै। जतऽ जवान आ जवानी आ तरह-तरहक रंग छलै। जतऽ कोनो चीज अप्पन ठाम ठाढ़ आ स्थिर नै लखाह दै छल- आ आब ई पार्क आ ई कॉलोनी। बूढ़, अपंग आ विकलांग ई विहार। फरवरीक ऐ मासमे खिड़की आ दरवाजापर थाप दैत बसंती हवा आ पार्कमे घिसियाइत, उड़ैत सूखल, झड़ल मृत सन पातक चरमर शब्द। मानि लियौ ककरो घरमे कोनो चोर पैसि जाए। ककरो की, हमरे घरमे चोर पैसि आबए आ सेहो असगरे। बिना कोनो संगीक, औजारक, डाकू पैसि आबए बिना राइफल-बंदूकक असगरे। राति-बिराति तँ छोड़ू, बीच दुपहरियामे। कोनो बलात्कारी पैसि आबए दिनेमे आ हमरा उठा कऽ चलि जाए पार्कमे, आ हम चिकड़ी जे बचाउ-बचाउ तँ के सुनत (बेसी बूढ़ या तँ बहीर अछि या ऊँच सुनैत अछि)। के दौड़त (बेसी बूढ़ ठेहुन या जोड़क दर्दसँ परेशान अछि)। के देखत (बेसी बूढ़ तँ मोतियाबंदक आपरेशन करा कऽ आँखिपर हरियर पट्टी बान्हले छल), ई सभ नै कऽ सकए तँ ठाढ़ भऽ कऽ चिकरए तँ सही (बेसी कऽ डाँड़ झुकल अछि आ मुँहमे दाँत नै, ओ घिघिआ तँ सकैत अछि, मुदा चिकड़ि नै सकैत अछि)। ऐ सोचसँ सोनलक भोँआ ठाढ़ भऽ गेलै। ओ कोनो अनजान डरसँ सिहरि उठल। फेर एकाएक ध्यान गेलै कुक्कुर दिस। कुक्कुर बड़ रास छल कॉलोनीमे- सभ सड़कपर, सभ गेटक बाहर बैसल या घुमैत लखाह दैत छल मुदा एतऽ एक्के टा ‘मुदा’ छल। एत्ते दिनसँ ओ ककरो भूकैत नै सुनले छल। ओकरे मकान डी-१ क गेटपर एकटा भूरा बैसल रहैत छल मुदा जखन जाउ, कत्तौसँ जाउ- गेटसँ चुपचाप हटि जाइ छल आ दोसर ठाम कनी हटि कऽ बैसि जाइ छल। कॉलोनीक बशिंदाक अलाबे किराएदार सेहो अछि- सभ घरमे। नीचाँ मालिक, ऊपर किराएदार। किछुमे देसी, किछुमे विदेशी- ओइमे बेसी जापानी, कोरियाई बा थाई। विद्यार्थी बा टूरिस्ट अप्पन काजसँ काज राखैत छल। ओकर अलाबे ओ कर्मचारी अछि जकर कोनो समए बदली भऽ सकैत अछि। यानी ओ जिनकर दिमागमे मकान कब्जा करबाक गप नै आबए। एहन लोकक मोहल्ला, लोकसँ की लेब-देब, हुनका सभकेँ अपनेसँ फुर्सत नै छनि। एहन तरहक जे ओकरे घर की, कॉलोनीक कोनो घर- एतए धरि जे कॉलोनीक कॉलोनी दिनमे लूटि कऽ लऽ जाए, रोकै-टोकैबला कियो नै भेटत। सोचैत-सोचैत लागल जे ई खाली एकटा सोच नै अछि- एकटा हॉरर फिल्म अछि, जे ओकर आँखि देखि रहल अछि। ओ पार्कमे फाटैत, चिर्री-चोथ होइत जा रहल साड़ी-ब्लाउजमे इम्हर-उम्हर भागि रहल रहए- जोरसँ गरजि रहल रहए, मुदा कियो अप्पन घरसँ निकलिये नै रहल अछि। ककरो सुनाइ नै दऽ रहल अछि तँ निकलत कतऽसँ। उठि कऽ झटकि कऽ ओ बत्ती जरेलक आ फिल्म खत्म। साँसमे साँस एलै। कैसेट लगेलक। दुर्भाग्यसँ कैसेट तेहेन निकललै जकरा ओ नै सुनऽ चाहैत छल, नै सुनने रहऽ चाहैत छल- वक्त ने किया, क्या हँसी सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम। ई कैसेट सोनलकेँ समीर देने छल- तीन बरख पहिने, बियाहक रिसेप्शनक दिन। तखैन ओकरा नै तँ एकरा देखैक खगता भेलै आ नहिये सुनैक। ओकरा सदिखन अपना लग राखलक मुदा कहियो नै सुनलक। आइ ई सुनैत ओकरा लागि रहल छलै जे कत्ते बदलि गेल ओइ गीतक अर्थ आइ। ओ संजयक कोनो चर्चा नै केलक अप्पन डैडीसँ, जानि-बूझि कऽ। ओ हृदएक मरीज अछि, हुनका ठेस लागितिऐ। जौँ विश्वविद्यालयक सर्विस नै भेटल हेतिऐ आ ओ अमेरिकामे रहि गेल हेतिऐ तँ की हेतिऐ। गलती कतऽ भेल आ ककरासँ भेल- ओ बुझि नै सकल। आरती गुर्जर ओकर लैंडलार्डक बेटी। ओइ कॉल सेंटरमे काज करैत छल जइमे संजय करैत छल। संग आएब-जाएब ओकरे कारसँ होइ छलै। दिन-रातिक संग। आश्चर्य ई छल जे आरतीक माए-बाप हुनका एक-दोसराक करीब आबैत देखि रहल छल, तकर बादो चुपचाप छल। आश्चर्य ई छल जे ओकर सभक आँखिक आगू ओ हँसी करैत छल- निर्लज्जताक सीमा धरि आ टोकलापर हँसऽ लागैत छल। आ एकरोसँ पैघ आश्चर्य ई छल जे आरतीक पति जखन कहियो न्यूयार्कसँ आबै छल तँ ओ अप्पन पतिसँ ओकर ब्वायफ्रेंडकेँ लऽ कऽ गप करैत छल आ ओकरा डिनरपर लऽ जाइ छल। जाए तँ संगमे ओ सेहो, मुदा ओकरा सदिखन लागैत छलै जे नै जइतिऐ तँ बेसी नीक रहतिऐ। ओ एकटा एहन समाजमे आबि गेल छल जइमे डॉलरकेँ छोड़ि कऽ कोनो आन चीज जना प्रेमक लेल ईर्ष्या करब पछुएबाक निशानी छल। ओ जखन संजयसँ ओकर किरदानीक शिकाइत करै छल, ओ तमसा जाइ छल। -अहाँ देश आ कालक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैलऽ सीखू, चलैलऽ सीखू। नै चलि सकी तँ चुपचाप बैसल रहू बा घुरि जाउ। -घुरब तँ असगरे किए? अहाँकेँ संग लऽ कऽ। -हम तँ डिअर परदेसकेँ अप्पन देस बनाबैक सोचि रहल छी। मुस्कुराइत ओ आँखि मारि कऽ बाजल- अहाँ किए नै खोजि लै छी एकटा ब्वायफ्रेंड। -नीक लागैत अहाँकेँ? ओ सीधा संजयक आँखिमे देखलक। -नीक, की कहै छी। निश्चित भऽ जाएब सर्वदा लेल। हा, हा, हा। सोनल संजयक आँखिमे गौरसँ देखलक। ओ आँखि छल या दिल। ई गप ओ जबानसँ बाजल छल या दिलसँ। ओ कत्तौ सच्चेमे सोनलसँ मुक्ति तँ नै चाहैत छल। ओ देखि रहल छल जे अमेरिका एलाक बाद हुनकामे तेजीसँ अन्तर आएल छल। एक-दू बरखक भीतर। ई ओकर तेसर नौकरी छल। ओ एकटा शुरू करैत अछि, दोसराक खोजमे लागि जाइत अछि। पहिनेसँ नीक, पाइकेँ लऽ कऽ। हुनकामे इन्तजारी नामक चीज नै अछि। ओ जल्दीसँ जल्दी ऊँचसँ ऊँच स्थान छुअ चाहैत छल। जहिना एकटा ऊँच स्थानपर पहुँचै छल, कनी दिनमे से नीचाँ लागऽ लागै छल। एकरा ओ महत्वाकांक्षा कहै छल। जँ ई महत्वाकांक्षा अछि तँ फेर लालच की अछि। लालच। आरती गुर्जरक संग संजयक दोस्तीक पाछाँ खाली आरती गुर्जर अछि बा ओकर एन.आर.आइ. माए-बाप, जकर गुजराती हस्तशिल्पक चमकैत व्यवसाय अछि। जकर ओ एकमात्र संतान अछि। आरतीसँ संजयक सम्बन्ध ओकरा बुधिसँ बाहर छल। एतऽ रहि कऽ सोनल सेहो कमा सकैत छल। कोना विश्वविद्यालयमे, कॉलेजमे, लाइब्रेरीमे, कत्तौ सेहो। कंप्यूटरमे सेहो नीक गति छल। मुदा संजय जखैन सोचलक, अपना लऽ कऽ सोचलक। सोनलकेँ लऽ कऽ सोचैक फुरसति नै छलै। ओ सोनलकेँ हाउस वाइफसँ बेसी हइले नै देलक आ ओ सेहो बनारसक इंतजारीमे आइ-काल्हि-परसू करैत रहि गेल। सोनलक आँखि भरि गेलै। ओइ काल ओ निर्णय लेलक जे ओ आब एतऽ नै रूकत। ओ बहन्ना ताकि रहल छल जे राँचीसँ पापाक ई-मेल आएल जे तुरंत आबि जाउ। १५ केँ अहाँक इंटरव्यू अछि। ओकर खुशीक सीमा नै रहलै। ई ओकर आत्माक पुकार छल जे विश्वविद्यालय धरि पहुंचल छल। आइ भोरक प्रकाशमे खिड़कीसँ फेर गरजि रहल छल सोनलक आत्मा। -संजयकेँ नै, समीरकेँ सुनू आ चलि आउ। * बेसी नै, हफ्ता-दस दिन लगलै सोनलकेँ ऐ घरक एकांत आ सुन-सन्नाटक हिसाबसँ अपनाकेँ उतारऽ मे। आ जखन उतरि गेल तखन मजा आबऽ लगलै। अप्पन ‘असगरे’ केँ इंज्वाय करऽ लागल। ओ डेढ़-दू बिसवाक रियासतक रानी छल- मालकिन। जखन चाहे सुतु, जखन चाहे उठू, जतऽ चाहे बैसू, जना चाहे ओहिना घरमे रहू। ब्रा बा गंजीमे, लुंगीमे, गाउनमे। नंगटे नहाबी, कूदी-फांगी। नै कियो देखैबला नै कियो सुनएबला। जखन चाही, जेहन चाही खेनाइ रान्ही। नै रान्ही, उपास करी, ओकर मोन। जौं संगमे ई सासु-ससुर हुअए तँ ई करू, ऊ करू, एना करू, ओना नै करू। दुनिया भरिक झमेला, टोका-टाकी। टेपरेकॉर्डर छै, टी.वी. छै, कंप्यूटर छै, मोबाइल छै, फोन छै जइसँ अपनाकेँ व्यस्त रखबाक चाही। एकर अलाबे किताब छै, क्लासक तैयारी छै, कार छै। बेसी नै, साँझकेँ फ्रेश भेलाक बाद आध घंटाक ड्राइवपर बहरा जाउ आ घुरि कऽ बीअरक एकटा पैग आ सिगरेट (ई कैलिफोर्नियाक आदति छल जकरा देर-सबेर छोड़ैये पड़तै, ऐ सड़ल-गलल नग्रमे से ओ जानैत छल)। -मुदा समीर कतऽ अछि। ओ पापाकेँ फोन केलक। कोनो खास गप लेल नै, बस ओहिने। जखन ओ रिसर्च कऽ रहल छल इतिहासमे, तखने समीरसँ परिचए भेल छलै। एकटा तेज आकर्षक युवक छल। नीक खाइत-पिबैत घरक। ओकरासँ दू बरख सीनियर आ राजनीतिमे पी.एच.डी.। नौकरी भेटि रहल छल मुदा ओ अप्पन हितकेँ नै देखि कऽ किसान-मजदूरक हितकेँ देखलक। ओकरामे देश आ दुनिया आ समाजक सभटा मुद्दापर नम्हर बहस करबाक आ विश्लेषण करबाक दक्षता छलै। ओकरा राजनीतिक ऐक्टिविस्ट हएब पसीन छल। ओइ समएमे बिहारमे एहन कतेक ग्रुप छल आ ओ ओइमे सँ एकटा ग्रुपसँ जुड़ि गेल आ सक्रिय भऽ गेल। ओ हफ्तामे एक बेर पटना आबैत छल आ पूरा दिन सोनल संग बिताबै छल। ओकर सपना छल जे बियाह करब आ अप्पन जीवन किसानक खुशहालीक लेल समर्पित कऽ देब संगे-संग। सोनल जखन डैडीकेँ बतौलक तँ ओ बुझाबैत बाजल जे ई आतुर दिमागक सोच अछि। कनियाँक कमाइ आ नोकरिहाराक चंदापर क्रांति करऽबला एहन युवकक कमी नै अछि बिहारमे। ओ जल्दीसँ जलखै आ चाह-पानिक लेल दोसराकेँ ताकैत सड़कपर लखाह पड़ैत रहैत अछि। एहन सनकीमे नै आबू। आ हुनके समझेला-बुझेलापर ओ संजयसँ बियाह तँ कऽ लेलक मुदा समीरकेँ हृदएसँ नै निकालि सकल। एतऽ धरि जे अमेरिकामे जखन संजय ओकरासँ ब्वायफ्रेंडक गप केलक तँ ओ डरि गेल जे कत्तौ ओकरा समीरक दोस्तीक खबरि तँ नै अछि। हुनका समीरक बड़ सोच लागल छन्हि, ओकरा एतऽ एलाक बादसँ। ओ भोर कऽ छतपर टहलि रहल छल जे डी-४ क आगू सड़कपर पुलिस वैन लखाह देलकै। ओकर नजरि जाइसँ पहिनेसँ ठाढ़ छलै ओ वैन। किछु लोक छल जे भीतर-बाहर आबि जा रहल छल। लेनक एकटा कोनपर ओकर डी-१ आ दोसर कोनपर डी-४। ओकर दुइये मकानक बाद। बरतन माँजै आ झाडू पोछा करैबाली दाइ ओइ कॉलोनीक छल। जहिना ओ आएल, ओ पुछलक। दाइ गीता जे किछु बतौलक से भयौन छल। ई ओइ कॉलोनीक तेसर घटना छल। ऐ बरखक तेसर। डी-४ राय साहबक बंगला छल। राय साहब बागवानीक खूब शौकीन। हुनकर लॉनमे मखमल सन घास छल, जेना हरियर रंगक गद्दा। ओइमे जुत्ता-चप्पल पहीर कऽ ने ओ अपने जाइ छल, नहिये दोसराकेँ जाए दै छल। घासक गद्दाक चारू दिस फूल आ रंग-बिरंगक पातबला गमला छल। ओ दिन भरि कैंची संग लॉनमे नजरि आबैत छल- काटैत-छाँटैत। हरियर रंगक पाछाँ एहन बताह जे बंगलापर सेहो हरके डिस्टेंपर। एतऽ हरियरी हुनकर झुर्रीबला मुँहपर रहै छलै सदिखन। एक दिन एकटा फोन एलै राय साहेबक नामे। -एत्ते जल्दी की अछि मकान बेचबाक। कनी रुकि जैतिऐ। राय साहेब हेलो, हेलो करैत रहि गेल, मुदा फोन कटि गेल छलै। ओइ दिन हुनका आश्चर्य भेलै, हँसी सेहो एलै। फेर सभ तेसर-चारिम दिन रोज या तँ कोनो ने कोन फोन आबै छलै या कियो ने कियो मकानकेँ लऽ कऽ जानकारी करैक लेल आबै छलै। फोन करऽबला की अछि, कतऽसँ कऽ रहल अछि, मकान बिकेबाक गप के बतौलक, राय साहेबकेँ किछु पता नै चलि सकलै। आबऽबला केँ ओ बिगड़ि कऽ भगा दै छला, फाटकक भीतर पैसऽ लेल नै दै छला। ओ कहैत-कहैत थाकि गेला जे ई खबर गलत अछि, हुनका बेचबाक नै अछि। तकर बादो ई खेरहा खतम नै भेल। ओ परेशान भऽ गेल। लागैत रहए जे ओ पागल भऽ जाएत। ओ सुतै लेल छटपटा कऽ रहि जाइ छल आ नीन नै आबैत छलै। दोस्त मित्रक सलाहपर ओ पुलिसकेँ रिपोर्ट केलक जे हुनका लग केहन-केहन फोन आबैत अछि, केहन-केहन लफंगा आबैत अछि, आ केहन-केहन गप करैत अछि। चारिम दिन जे लोक मकानकेँ लऽ कऽ पुछैले एलै, तकर गपसँ राय साहेबकेँ लागि गेलै जे पुलिस रिपोर्टक जानकारी हुनका अछि मुदा एकर नहिये डर छै, नहिये आदंक। जइ मानसिक तनाव आ बेचैनीसँ ओ जीबि रहल छल, ओइसँ हुनका ओइ दिन मुक्ति भेटल जइ दिन एकाएक हुनकर नेनाक मित्र राजराम पांडे उर्फ भुटले गुरु आएल। भुटले गुरु आब तँ नगरक प्रसिद्ध रईस छल मुदा छल हुनकर पड़ोसी गामक। हाईस्कूल धरि हुनकर संग गाममे पढ़ि चुकल छल। कतेक मोहल्लामे कतेक रास मकान छलै। ओ इम्हरसँ जा रहल छल तँ हुनका राय साहेब मोन पड़ल आ पुछैत-पाछैत डी-४ मे चलि आएल। -भजार। बड़ नीक घर अछि सुरेश। ओ गेटमे पैसैत बाजल। राय साहब बड़ उत्साहसँ हुनका घर देखेलक। ओ पहिल बेर आएल छल। ओ घर-आंगनक प्रशंसा करैत बतेलक जे ओइ समएमे भले ने भेंट भेल हुअए, दुनू बेटीक बियाह आ भाभीक स्वर्गवासक खबरि हुनका भेटल छल। ड्राइंग रूममे पैसैत हुनका पुछलक। -सुरेश। अहाँक बेटा कतऽ अछि आइ-काल्हि जकर इलाज करा रहल छलौं। भुटले गुरु सोफापर बैसल, राय साहेब हुनका आगू बैसि कऽ कूही भऽ कानऽ लागल। भुटले गुरु सेहो सोफासँ नीचाँ आबि गेल आ सुरेश रायकेँ बाँहिमे भरि आगू दीवान दिस ताकैत रहल। दीवानपर मोटरी जकाँ एकटा छौड़ा पटायल छल। ओ टुकुर-टुकुर उत्सुक भऽ हुनका ताकि रहल छल। दाढ़ी-मोंछ बेहिसाब बढ़ल छलै। खाली मुँह खुजल छलै। देह झाँपल छलै। एकटा सुखाएल लकड़ी सन बिछौनपर पड़ल छल। लागै नै छलै जे डाँड़क नीचाँ किछु छै। ई बाजैत तँ तहियो नै छल। मुदा ई ख्याल नै जे किछु बुझैत अछि बा नै। भुटले गुरु पुछलक। राय साहेब बिना किछु बाजले हिचकी लिअए लागल। भुटले गुरु सांत्वना दैत हुनका उठैलक आ सोफापर अप्पन बगलमे बैसेलक। कनी काल बाद राय साहेब आएल आ अंदर चलि गेल। जखन ओ चाहक संग घुरल तँ सामान्य छल। चाह पीयैत ओ बतौलखिन जे कोना पेट काटि कऽ, गामक जमीन बेचि कऽ, बैंकसँ कर्ज लऽ कऽ कोन तरहेँ ई घर ठाढ़ केलक, दू बरख पहिने रिटायर भेलाक बाद ओइमे आएल। हम कहियो नै सोचलौं जे केकरा लेल घर। बस ई छल जे अपना लेल एकटा घर हुअए। एकरा ठाढ़ हेते-हेते स्त्री सेहो चलि गेल। मुदा लागल रहलौं बिना सोचले-बुझले जे घर हुअए तँ केकरा लेल। देखि रहल छी ऐ बेटाकेँ। नै चलि सकैत अछि, नहिये सुनि सकैत अछि, नहिये बाजि सकैत अछि। की हएत एकर जखन हम नै रहब। नै जानि कोन जन्मक पापक सजा दऽ रहल अछि भगवान। -हम छी ने, चिंता किए करै छी? -भुटले गुरु हुनकर कान्हपर हाथ राखलक। -चिंता तँ ई अछि भुटले गुरु जे छऽ-सात माससँ सुतल नै छी। नै जानि कतऽसँ केहन-केहन लोकक राति-बिराति फोन आबैत रहैत अछि, धमकी दैत। पता नै के उड़ा देलक जे सुरेश राय अप्पन घर बेचि रहल अछि। परिणाम र्ई अछि जे गुंडा-बदमाश धरि घरक भीतर घुसल चलि आबैत अछि आ सलाह दऽ रहल अछि, जे जतेकमे बेचब ओतबेमे दू टा कमराक फ्लैट आबि सकैत अछि आ बाकी सूदसँ बीस-पच्चीस बरख निश्चिन्तीसँ काटि लेब। पुछलौं जे अहाँ के? तँ बाजैत अछि- प्रापर्टी डीलर, प्रापर्टी डील अहाँ कऽ रहल छी, बिना पुछले जे अहाँ बेच रहल छी आकि नै? दलाल साढ़। हिम्मत तँ देखू ओकर। जौँ आइ नरेश नीक रहितिऐ तँ ई नौबति नै ऐतिऐ। भुटले गुरु गंभीरतासँ ई सभ किछु सुनैत रहल आ सोचै-विचारैक बाद बाजल। -एना अछि सुरेश। हम दू-तीन दिनमे एकटा दरबान बा लोककेँ भेज देब। बड़ भरोसक लोक। ओ अहाँक सभटा समस्या दूर कऽ देत। ठीक। तेसर दिन सत्तेमे एक लोक आएल आ राय साहेबक फिकिर खतम भऽ गेल। नहिये कहियो फोन आएल, नहिये गुंडा-बदमाश सभकेँ साहस भेलै जे लगमे कत्तौ लखाह दैतिऐ। मुदा जे हेबाक छल, भऽ कऽ रहल। तीन मास बाद। राति दिन पूरा घरक देखभाल करैबला दरबान राति भरक छुट्टी लऽ कऽ भतीजीक बियाहमे अप्पन गाम गेल छल आ इम्हर ओइ राति ई दुर्घटना भऽ गेल। ओइ पलंगपर पटायल राय साहेबक बेटा टुकुर-टुकुर ताकैत रहल आ ओकर हत्या भऽ गेलै। भुटले गुरु ऐ दुर्घटनाक दू दिन पहिनेसँ अस्पतालमे छल। रूटीन चेकअप लेल। दरबान हुनका ई खबरि देलक। ओ अस्पतालसँ सोझे अप्पन गाड़ीमे आएल। दरबज्जापर ठाढ़ भीड़केँ ओतऽसँ हटैलक, बढ़ैलक, डाँटलक, डपटलक आ भीतर जा कऽ पुलिससँ जनतब लेलक। फेर ओइ कमरामे गेल जतऽ बिछौनपर राय साहेब पटायल छल। ओतऽ बगलमे एकटा तख्तापर हुनकर बेटा सेहो छल, जे निश्चल पड़ल छल। मूकदर्शक। दुर्घटनाकेँ आँखिसँ देखैबला गवाह। ओ पुलिसक संग भीतर गेल, ओकरे संग घुरि आएल। बाहर अंदाजी गप आ कनफुसकी चलि रहल छल- या तँ मुँह या नाकपर गेरुआ दबा कऽ मारल गेल या गला दबा कऽ। देहपर कत्तौ चोटक चिन्हासी नै छल। हाथ उठेबाक कोनो चिन्हासी नै। बिछौन मोचड़ाएल नै। गेरुआपर शोनितक छोट-मोट चिन्हासी छल जेना ओ मुँहसँ निकलल हुअए। लहाश जखन पोस्टमार्टम लेल आनल जा रहल छल, सोनल अप्पन गेटपर ठाढ छल। सोनल अप्पन गेठपर ठाढ़ ओकरा जाइत देखि रहल छल। कॉलोनीमे मकान कब्जा करैक तेसर घटना छल। घरमे ओ सेहो असगरे छल। विश्वविद्यालय आबै-जाइक समए अनिश्चित। कोनो दिन दुपहरियासँ पहिने क्लास, कोनो दिन दुपहरियाक बाद। घरमे कियो नै। दिनमे तँ चोरी भऽ सकैत अछि मुदा रातिमे तँ हत्या धरि संभव अछि। ऐ कल्पनासँ ओकरा थरथरी छूटि गेलै। आँखिमे उतरैबला सिहरी सगरे देहमे पसरि गेलै। ओ ऐ गुनधुनीमे पूरा दिन पड़ल रहल। नोकर नै भेटि रहल छलै, नहिये नोकर राखब मुनासिब छल। नोकरनी झाड़ू-पोछासँ आगू लेल तैयार नै छल। बेर-बेर ओकर ध्यान जा रहल छल सासुरपर। रातिमे ओ पहाड़पुरक कोड खोजलक आ फोन केलक- पापा, हम सोनल। आबि रहल छी काल्हि, अहाँ दुनूकेँ लैक लेल। तैयार रहऽ। नै, किछु नै सुनब। मम्मीकेँ फोन दियौ..। * शीलाकेँ सोनल ओ मान-सम्मान देलक जे कोनो पुतोहु की देत अप्पन सासुकेँ। भोर-साँझ मम्मी, बीच राति मम्मी, घरमे मम्मी, बाहर मम्मी- बस सभ दिस मम्मीये मम्मी। जखन कि शीला सोनलक संग आएल लोक लाजक कारण, तइसँ जे नै जाएब तँ बेटा की सोचत हुनका लऽ कऽ। की जे बेटाक सहारा बुढ़ापा काटै लेल अछि तँ ओकर स्त्रीक कोना नै सुनी? ओ नै सुनत तँ ओ हुनकर किए सुनत? लोक अप्पन बच्चाक भविष्य किए सिटैत अछि। तइसँ किएकि हुनकर भविष्यमे हुनका अप्पन भविष्य लखाह दैत अछि। काएदासँ देखल जाए तँ ओ हुनकर नै, अप्पन भविष्य सिटैत अछि। ऐ सीटल भविष्यमे डेग राखने छल शीला आ प्रसन्न छल। जइ लड़कीसँ कोनो पूर्व परिचय नै, कोनो सम्बन्ध नै, एतऽ धरि जे नहिये अप्पन जातिक, नहिये अप्पन कुलक। नहिये संस्कार। ओ शीलाक पाछाँ मरल जा रहल छल- मम्मी, चाह पीब। मम्मी जलखै करब, मम्मी नहा लेलखिन। मम्मी खाना खा लेलखिन, मम्मी कोनो जरूरति। एत्ते खयाल तँ हुनकर बेटी सरला सेहो नै राखैत छल। सोनल पहिने हुनका घर देखैलक- ड्राइंग रूम, ओइसँ सटल कोठली, आंगन, फेर ओ कोठली जइमे मम्मी-पापा रहत, फेर किचेन आ स्टोर, फेर पछुआरक हीस जइमे नोकर-चाकर लेल टीनक खुजल शेडबला कोठली। फेर ओ ऊपर लऽ गेल, छतपर आ देर धरि मम्मीकेँ टहलाबैत रहल जे लोक देखए आ जानए जे ओ घरमे असगरे नै रहैत अछि। ऐ घरमे ओ सभ किछु छल जकरा लऽ कऽ शीला सोचलो नै छल। हुनका राति भरि नीन नै आएल- कारण जे हुअए। कारण नव ठाम सेहो भऽ सकैत अछि, चौड़गर डबल बेड सेहो, गदगर बिछौन सेहो। आ सुख छल जे अनचोक्के हुनकर जीवनमे आबि गेल छल। ओ घरमे आएल नै छल, गृह प्रवेश केने छल। यएह कहने छल सोनल आ नीकसँ नीक डिश बना कऽ खुएले छल। शीलाक खुशी बेर-बेर ओकर आँखिमे नोरा रहल छल। आ ई नोर आर किछु नै, पहाड़पुरक खपरैलबला घर छल, हुनकर बेटा-बेटी छल आ दुख छल जे ओ अप्पन जीवनक भरि सहल छल। एकाएक हुनका मोन पड़ल संजयकेँ लऽ कऽ, नहिये ओ किछु पुछलक, नहिये सोनल अपनासँ किछु बतौलक। दोसर-दोसर गप होइत रहल आइ धरि। अगला दू-तीन दिनसँ शीला अप्पन दिनचर्या निश्चित कऽ देने छल। खाना बनाबैवाली महाराजिन आइ धरि नै भेटल छल आ ओ बैसल-बैसल की करितिऐ दिन भरि। भोर कऽ चाह, आ बीच रातिक खेनाइ ओ अप्पन जिम्मा लऽ लेलक। कष्ट मात्र एतबे छलै जे गप करैबला अखन धरि कियो नै भेटल छलै। डी-पॉकेटक घटनासँ सभ कॉलोनीबला अपनाकेँ घरमे रोकि राखने छल। ओ सभ डरल छल जे कत्तौ एहन नै हुअए जे ओ मकान छोड़ए आ घरमे घुसब मुश्किल भऽ जाए। ऐसँ पार्क सेहो खाली पड़ल छल- नहिये कोनो औरत, नहिये कोनो मर्द। तीन-चारि दिन धरि कियो अप्पन घरसँ बाहर नै निकलल- सर्विस करैबलाकेँ छोड़ि कऽ। शीला झाड़ू-पोछा करैवालीक पाछाँ-पाछाँ घुमैत रहैत छल आ गप करैत रहैत छल जे कएटा छौड़ा छै, कएटा छौड़ी छै। कतऽ बियाह भेलै। जमाए की करैत अछि। कएटा पुतोहु अछि। ककरा संग रहै छी। स्वभाव केहन अछि। सेवा करैत अछि आकि नै। बेटा ध्यान दैत अछि कि नै। अखन कोनो पोता-पोती अछि कि नै। किछु सुनैत, किछु अप्पन सुनाबैत छलि। ओइ काल सोनल अप्पन काज करितिऐ, पढ़ितिऐ, लिखितिऐ आ नै तँ कंप्यूटर माउससँ खेलैतिऐ या टाइप करितिऐ। ऐ बीच शीला दू बेर पुतोहुसँ दुखी भेल छल। ओ भोरमे चारि बजे जागि जाइ छल आ सोनल सुतल रहै छल आठ बजे भोर धरि। ओ ओकरा जगबैक एकटा तरीका निकालक। ओ भोर चारि बजे चाह तैयार करलक आ हुनका जगेलक। सोनल सुतल रहल आ उठलापर चाह सिंकमे फेंक देलक। फेर अप्पन अलगसँ नेबोक चाह बनेलक। शीला देखैत रहल। दोसर दिन ओ नेबोक चाह बनेलक कनी देरीसँ। माने सात बजे। ओइ दिन सेहो यएह भेल। सोनल बाजल- मम्मी, हमर चाह रहऽ देल करथिन अहाँ। जखन उठब, तखन बना लेब। हुनका नीक नै लागल। अप्पन आदतिक अलग ओ कोनो तरहे चुप रहि गेल। एतऽ धरि तँ चलि जैतिऐ मुदा एक दोसर प्रसंगमे तँ जेना हुनकर मन उचटि गेल। होइत ई छल जे शीला भोरमे रातिक बचल रोटी बा परोठा आ सब्जी जलखै कऽ लैत रहथिन। सोनल देखलक तँ बिगड़ल- नै मम्मी, ई नै चलत। अहाँ ऊ खायब जे हम खाएब। टोस्ट बटर, दलिया, दूध, फल। ऊ सभ नै। ठीक। शीलाक दिमागमे सवाल उठल जे रोज-रोज जे बैसका रोटी या परोठा बचि जाइत अछि, ओकर की हएत। ओकरा दाइ गीताक ख्याल आएल। ओ सेहो आबैत शीलाकेँ माताजी-माताजी कहैत छलि। काज-धंधा खतम कऽ जखन गीता जाइ छल तँ ओकरा रोकि कऽ खुआ दैत छल। तरकारी नै रहलै मुदा नै रहलापर कखनो चाह दैत छल, कखनो अचार। सोनलकेँ पता चलल। पता की चलल ओ गीताकेँ एक कोनमे बैसल खाइत देखि लेलक। -मम्मी। -गीताकेँ जाइक बाद सोनल बाजल। -अहाँ किए ओकर आदति बिगाड़ि रहल छी मम्मी। शीला बुझैक ख्यालसँ पुतोहु दिस ताकलक। -ओकर नोकरीक शर्तमे चाह-नाश्ता नै छल। पाँच सौ महीना आ सालमे दू बेर साड़ी, बस। -मुदा, हम चाह-नाश्ता कतऽ दै छी। जे किछु बचल-खुचल रहै छै, सधा दै छी। -फेकैसँ बा कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआबैसँ नीक अछि जे ककरो स्वार्थ सिद्ध होइ। -यएह तँ। कुक्कुर-बिलाइकेँ भले खुआ देथिन, ओकरा नै देथिन- यएह कहब अछि हमर। -आँए। ई केहन गप कऽ रहल छी अहाँ। फाटल आँखिसँ पुतोहु दिस ताकलक शीला। -नै, खराप नै मानब। एकरा एना बुझथिन। मानि लिअ काल्हि अहाँ कत्तौ चलि जाइ छी बा एतऽ नै रहब। ओ हमरोसँ आशा करत आ हम नै दऽ सकब तँ खराप लागत, ठीकसँ काज नै करत। छै कि नै। -सभ ठीक। मुदा ई गप हमर गरामे नै उतरि रहल अछि जे कुक्कुर-बिलाइकेँ खुआ देब, मुदा ओकरा नै खुआएब। -मम्मी, ओ अहाँक परजा नै अछि, नोकरनी अछि- प्रोफेशनल। ओकर पेट रोटी-परोठासँ नै, पैसासँ भरत। एतबेटा नै, अहाँ ओकरासँ गप करब आ ओ अहाँक माथ चढ़ि जाएत। -काल्हि जखन कोनो गपपर ओकरा टोकब तँ ओ लड़ऽ लागत। ओकरा अहाँ वएह रहए दियौ जे ओ छी। आबए, अपन काज करए आ बाट नापए। शीला माथ झुका कऽ चुपचाप सुनैत रहल आ ठाढ़ भऽ गेल। -मुदा हम अन्नक अपमान नै हुअए देब। ओकरा नै खुआएब तँ अपने खाएब। -अहाँ अधला मानि गेलौं। नै बुझलौं हमर गप। -बुझि गेलौं, कोनो अनपढ़ नै छी। हमहूँ बी.ए. छी अप्पन कालक। -ठीक अछि। मुदा हम तँ हिनका बैस कऽ खाए लेल नै देब। काल्हि ई कहथिन जे हमरा बैसा कऽ खुआबए छल। -तँ हमरो सुनि लिअ, हम अन्नकेँ एना फेकै लेल नै देब। ई बहस तखने खतम भऽ सकैत छल जखन ओइ दुनूमे सँ कियो चुप भऽ जाए आ ओतऽ सँ हटि जाए। आखिरीमे सोनल कोनो काजक बहन्ने ओतऽसँ चलि गेल। शीला किछु काल धरि बैसल रहल। ओकरा लागल जे बहू नकचढ़ीये टा नै, मथचढ़ी सेहो अछि। पैदा करितिऐ तखन ने अनाजक मोल पता चलितिऐ। माँ-बापक एकेटा औलादि, जातिक लाला- खेत-पथारसँ मतलब नै, ओकरा की बुझल छै अप्पन फसलक सुख-दुख। ओ घरक पछुआरमे गेल जतऽ रघुनाथ बाहरसँ घुमि कऽ आएल छल आ नहाइ लेल जा रहल छल। ओ जहिना शुरू केलक तहिना रघुनाथ टोकलक- सही बाजलक ओ। पुतोहुकेँ सुनै आ हुनका संग रहैक आदत डालू। -की? अहाँक ई सभ कहब अछि। -नै। हमर ई कहब नै अछि। हमरा ई कहब अछि जे जकर घरमे रहै छी, खाइ छी, पहिरै छी, ओकर गपपर कान-बात दियौ। वएह करू, जे ओ चाहैत अछि। -राशन हम आनलौं, चाह-नाश्ता हम बनबै छी, खाना हम पकाबै छी। जे कियो आबैत अछि, हुनका उठाबैत-बैसाबैत छी- आ हमर कोनो पूछि नै। -अच्छा जाउ अहाँ एतऽसँ। जे करबाक अछि करू। खिसिया कऽ रघुनाथ बाजल आ बाथरूममे चलि गेल। -हम नै रहब एतऽ। हमरा गाम पहुँचा दिअ आ नै पहुँचाएब तँ अपने चलि जाएब। बाथरूमक भीतर रघुनाथ हँसैत बाजल- अरे। पुतोहुसँ तँ पुछि लियौ। अपने सँ नै एलौं अछि अहाँ, वएह आनले अछि। कोना अछि ओ गीत। ओ नल खोलि देलक आ गाएब शुरू केलक- अभी न जाओ छोड़ कर, कि दिल अभी भरा नहीं। अभी अभी तो आई हो, बहार बन के छाई हो अभी जरा नहा तो लूँ, अभी जरा ... न... नम... न... नू... साँझक चारि बजेक आसपास सरलाक फोन आएल- बड़ दिन बाद। बड़ दुखी आ शिकाइतक स्वरमे। उठैलक शीला। सोनल कॉलेज गेल छल, घरपर वएह छल। एकरासँ पहिने दू-तीन बेर ओ गामपर फोन केने छल। ओकर खराप भाग्य जे रिसीवर उठैने छल रघुनाथ आ ओकर नाम बिन सुनले, बिन पुछले आ बिन बाजले फोन राखि देने छल। एकर चर्चा सेहो शीलासँ नै केले छल। -माँ आब तँ आबि सकैत छी हमरा कतए। -एना किए बाजि रहल छी सरला। शीला कननमुँह भऽ उठल। -हम बियाह नै केने छी माँ, पापाकेँ कहि देब। चाहे तँ उहो आबि सकैत अछि। -हुनकर हम नै जानैत छी मुदा हम तँ तैयारे छी। जखन कही तखन आबि जाएब। -ठीक अछि, अगला पंद्रह दिनक भीतर कोनो व्यवस्था करैत छी। -मुदा अहाँ बियाह किए नै करलौं। हम तँ मानि लेने छलौं जे भऽ गेल हएत। -माँ, हम सोचि लेने छी। भगवान आ बियाहक बिना जिअल जा सकैत अछि, रहल जा सकैत अछि। कोनो गपक फिकिर नै करब। ठीक। सरला रिसीवर राखि देने छल। शीला जतऽ छल तत्तै ठाढ़ रहल। ओकरा बुझैमे नै एलै जे ई नीक भेल कि अधला। ओ रघुनाथकेँ बतौलक। रघुनाथ मात्र एतबे टा कहलक जे ऐसँ नीक हेतिऐ जे ओ बियाह कऽ लेतिऐ। * शीला सोनलक आग्रहपर ताधरि रुकल रहल जाधरि खेनाइ बनाबैवाली दाइक व्यवस्था नै भऽ गेलै। जइ दिन शीला गेल, ओइ दिन सोनल गेट आ घरक चाबीक डुप्लिेकेट बनबैलक आ ओकरा रघुनाथकेँ दऽ देलक। दुपहरियाक एक-डेढ़ घंटा छोड़ि कऽ ओ जखैन चाहे तखन, जतऽ चाहे ओतऽ आ-जा सकैत छल, घूमि सकैत छल, भेँट-घाँट कऽ सकैत छल, कियो पूछै-ताकैबला नै छलै। ओहिनो रघुनाथ घरमे रहैत एक तरहेँ घरक बाहर छल। पछुआरक बाउंडरीवालसँ लागल एक ईंटाक दूटा देवाल छल, जइपर अस्बस्टर पड़ल छल। सोचल गेल छल जे जौँ नोकर-चाकर बा ड्राइवर भेल तँ ओइमे रहत। रघुनाथक व्यवस्था शीलाक संग ओइ कोठलीमे छलै। ऐसँ बेसी ओ अपन कनियाँ संग सुतलो नै छल। आबै कऽ दिनसँ हुनका ई ठाम जँचि गेल छल। ओकर बगलमे नल सेहो छल आ शौचालय सेहो। आर की चाही। नाश्ता-खाना घरमे, बाकी सभ बाहर। शीला संग रघुनाथक संबंध दाम्पत्यक रहलै मुदा प्रेमक नै भऽ सकलै। ईहो कहि सकै छी जे ओ शीला संग सुति जाइ छल मुदा प्रेम नै करै छल। आ मानै छल जे ऐलेल शीला जिम्मेदार छथि। ओ एहन स्त्री छल जकरा सभ दिन प्रेमक प्रमाण चाही। एतबे टा नै, एक बेर या दू बेर या तीन बेर अहाँ हुनका आश्वस्त कऽ देलौं जे अहूँ ककरो आनसँ नै हुनकेसँ प्रेम करै छी तँ ओ मानि जाएत। फेर ओ अगिला दिन परीक्षा लैले चाहत जे ओ कोनो ओहिना तँ नै छल। एतबे टा नै, ओ अप्पन प्रेमकेँ लऽ कऽ मात्र शिकाइत कऽ सकै छल। एकर अतिरिक्त ओकरा लग कोनो आन भाषा नै छलै। ई सभ स्थिति रघुनाथमे मात्र खिसियैनी टा नै आनलक, ओकरा दिससँ अवहेलना सेहो आनलक। शीला कहियो हुनकर रुचि आ पसीनक हिसाबसँ अपनाकेँ बदलैक प्रयत्न नै केलक। जेना शीला चाहै छलि जे घरमे कोनो गप हुअए जइसँ ओ खुश हुअए, उल्लसित हुअए, ओकरामे उत्साह आ जोश लखाह दिअए, हँसए, गाबए, आर किछु करए। मुदा तैयो हुनकर चेहरापर कोनो तरहक कोमल भाव नै आबै छल। एतऽ धरि जे रघुनाथ जखन खुशीसँ मारे कूद-फान करए आ बेचैन हुअए लागैत छल तखनो ओ हुनकर उपहास करैत निर्विकार ठाढ़ रहैत छलि। खुशी हुनकर चेहरापर अबैत छल तँ जबरदस्तीक दाग सन फेर गाएब भऽ जाइ छल। एकर अलाबे हुनकामे खूबीये खूबी छल। ओ अपन पति आ बेटाक पद आ प्रतिष्ठाकेँ हरदम फराक राखै छलि। दोसरा लग बड़ रास एहन बौस्तु होइ छल जे हुनका लग नै छल मुदा हुनकामे कखनो ईर्ष्या नै होइ छल। समभाव हुनकर स्वभाव छल। ओ तखने विचलित होइ छल जखन ओ कोनो गरीब गुरबाकेँ लल्ल आ विवश देखै छलि। ओ सभ किछु सहि सकैत छलि मुदा ककरो जबर्दस्ती नै। शीलाक गेलाक बाद रघुनाथ निसाँस लेलक। ओ हुनकासँ पुतोहु लऽ कऽ किछु नै बाजै छलि, मुदा एकर बादो ओ तनावमे रहैत छल। ऐ तनावसँ ओ आब मुक्त भऽ गेल छलि। शुरू-शुरूमे रघुनाथकेँ अशोक विहार पसीन नै एलै। ओ ततबे उजाड़ आ उदास इलाका देखने नै छल। देखब तँ दूर, सोचलो नै छल। हुनका कियो बतौने छल जे ई पूरा इलाका कहियो पूरा श्मशान होइ छल। यएह ओजह भऽ सकैए जे हुनका सभ गली आ सभ मकानक सभटा खिड़कीसँ आबैबला हवा मृत्युगंध फेंटल लागै छल। मने इम्हरसँ जाउ या उम्हरसँ जाउ नाक दबा कऽ या फेर ओइपर रुमाल राखि कऽ। आँखि बन्द कऽ देखू तँ पूरा बस्ती ओइ बंदरगाहक सन छल जतऽ सभटा यात्री महाप्रयाण पर निकलै या ओइ पार जाइक तैयारीमे लागल छल। मुदा एक भोर- एहन भोर रोज आबै छल- आ ऐ आँखिसँ रघुनाथ देखै छल। ओइ भोर ध्यान गेलै पार्क दिसनसँ आबैत एकटा बुढ़ दिस- लकवा मारल, मुँह टेढ़, गरदनि झुलैत, वाम हाथ झुलैत, घिसिआइत असक्क पएर, दोसर गलीसँ निकलल एकटा दोसर बूढ जकर एकटा आँखि खुजल छलै आ दोसरपर हरियरका पट्टी छलै, आ तकर पाछाँ एकटा दोसर बूढ़ जकर गरमे कालर माने स्पांडिलाइटिसक पट्टा छलै। तेसर गलीसँ सेहो एकटा बूढ़ आबि रहल छल, पार्कक गेटक दिस आस्ते-आस्ते। हुनकर एकटा हाथमे बोतल छल आ ट्यूब लुंगीक भीतर। सूर्य जना-जना ऊपर उठल जाइ छल, ओना-ओना सभटा कोनासँ खराम खटखटबैत आबैबला एहन बूढ़क संख्या बढ़ैत जाइत छल। रघुनाथकेँ लागल जे ई बूढ़ नै अछि- जिनगीक भूख अछि, जीवनक प्यास अछि, स्वयं जीवन अछि- जे ठोपे-ठोपे एकटा खधाइमे जमा भऽ रहल अछि ओहिना जेना कोनो पहाड़ीक कतेक रास दरारिसँ पानिक एकटा डरीड़ चलैत अछि आ कोनो आन स्रोतसँ मिलिकऽ कहियो नै सूखैबला, मील धरि फूही उड़ाबै बला, शोर मचाबै बला अजस्र धार बनि जाइत अछि। जीवनक झरना सभ भोर रघुनाथकेँ अपना दिस खीचैत अछि- रग्घू, आबू, सुनू, भीजू। मुदा रघुनाथ फुहीमे भीजैसँ बराबर बचैत अछि। किए बचैत अछि रघुनाथ- ओकरा ओ बुझि नै सकल छल। जखन सभ बूढ़ अप्पन मुत्युक विरोधमे बड़ मन आ जतनसँ बाबा रामदेव बनैत अछि, रघुनाथ मूड़ी निहुरेने चुपचाप पार्कसँ बहरा जाइत अछि। हुनकर पसीनक ठाम ई नै, नहरि छल। अशोक विहारसँ डेढ़ किलोमीटर दूर। नहरक पार ओकरासँ सटल बगेचा छल आ तकर आगू संजय कॉलोनी। ई कहियो घनगर छल, जइमे छल-धातरीम, बेल आ लतामक गाछ। रघुनाथ नहरक पुलपर ताधरि बैसल रहैत छल जाधरि रौद सहि सकै जोग रहै छल ओकर गाछीमे। ऐ पुलपर हुनकर भेँट भेल छल एल. एन. बापटसँ। बापट बनारसक महाराष्ट्रीयन छल। एतऽ पढ़लक लिखलक, एतैसँ नोकरी शुरू केलक आ जौनपुरसँ डिप्टी जेलर भऽ रिटायर भेल। बड़ मस्तमौला आदमी छल- पुरना फिल्मी गानाक शौकीन। हुनकर दूटा शौक छल- पीअब आ गीत गायब। गाबै तखने टा छल जखन पीबै लेल बैसै छल। हुनका कोनो संतान नै छलन्हि- नहिये बेटा, नहिये बेटी। स्त्री छल जकरा सभ बुढ़िया कहै जाइ छल। ओ संजयनगरमे एकटा छोट सन फ्लैट लेने छल आ जइमे कहियो-कहियो जबर्दस्ती रघुनाथकेँ लऽ जाइ छल। आ जखैन लऽ जाइ छल, किताबी कीड़ा ऐ मास्टरकेँ गरियाबैत कनी टा चिखा दै छल। सूर्य हुनकर शत्रु छल। ओ निअमसँ पाँच बजे साँझ कऽ पुलापर आबि जाइ छल आ हुनका गारि देब शुरू करैत छल- रघुनाथ, कनी देखू साढ़केँ। जानि-बूझि कऽ अबेर कऽ रहल अछि। ओ साँझ हैक संग बेचैन हुअए लागैत छल आ घर दिस एना भागैत छल जेना पुलिसक चांगुरसँ छुटैत चोर। हफ्तासँ ऊपर भऽ गेल छल जखन बापट रघुनाथसँ भेंट नै केने छल- नहिये पुलपर, नहिये ओइ गाछीमे। ओ सभ दिन जाइ छल आ घुरि आबै छल। ओ ओइ दिन जल्दी घुरि आएल छल किएकि गुमार बड़ छल आ पानि बरसैक आस छल। कालोनीक मुहथरिपर मकान छल मन्ना सरदारक। बिन पलस्तरक, ईंटाक। पैघ दरबज्जा, जइमे एक दिस नम्हर सन खटाल, ओतऽ बान्हल चारिटा महीस, तीनटा गाए। एतऽ भोर आ साँझ दूधक बर्तनक क्यू लगाबै छल बूढ़। ई कारोबार मन्ना सरदारक नैत देखै छल, हुनकासँ एकर कोनो मतलब नै छल। कहैत अछि जे ई कालोनी हुनकर जमीनपर बसल अछि। पचहत्तर-अस्सी बरखक मन्ना सरदार अप्पन जमानाक पहलमान। कारि, मोट, गस्सल शरीर। पेट कनी निकलल। आइयो लाल लंगोट आ छीटबला गमछामे उघार देह रहैत अछि आ निअमसँ पच्छिम मुँह कऽ कए पचास डंड-बैसकी करैत अछि। हुनका बस एक्केटा शौक अछि आ एक्के टा रोग। शौक अपन हाथसँ भांग घोटब, गोला जमाएब, ऊपरसँ मलाइ-रबड़ी खाएब आ रोग- गठिया। हुनकासँ डॉक्टर बाजल छल जे जौं चाहै छी गठिया ठीक हुअए तँ भांग छोड़ि दिअ। ओ जवाब देने छल- औ डॉक्टर साहेब, अहाँ कहब तँ दुनिया छोड़ि देब, बाकी भांग नै। ओ जवानी धरि शहर जाइ छल आ जे कियो पकड़िमे आबि जाइ छल ओकरा ओइ दिनक खिस्सा सुनाबै छल। रघुनाथ हुनकर पहुँचिमे आबि गेल छल ओइ दिन। ओ जहिना मुड़ल, तहिना सरदार पुछलक- जै रामजी मास्टर साहेब। कुम्हर कऽ रहै बला छी अहाँ। की बतौने छलौं ओइ दिन। -धानापुर साइडक। -अरे, अहाँ बतैलिऐ किए नै, ओइ साइडक तँ गुरु छल। -गुरु के? -छक्कन गुरु। अहाँ केना नै हुनका चिन्है छी? ई तँ आश्चर्यक गप अछि। आबू, बैसू तँ। पानि नै बरसत, चिन्ता नै करू। देखू पुरबा शुरू भऽ गेल अछि। पीताम्बरी आ खड़ाम- बस यएह धुआ-धजा छल हुनकर, चाहे जतऽ रहए। की नम्हर छलथि, की छुरी सन देह। परबा पोसने छल ओ। बस एकटा परबा- सेहो सोन सन। ओ अप्पन हाथसँ किसमिस, बदाम, छोहाड़ा खुआबै छल। एक बेर ओ गाएब भेल छल, हफ्ता भरि लेल। गुरु चिंतित। साढ़ बिना बतेले कतऽ चलि गेल। आठम दिन घुरल तँ लोल एकदम लाल। हाँफि रहल छल। गुरु बाजल- सूर्य देवताकेँ ठोर मारि कऽ आएल अछि, जीह आ लोल जरि रहल अछि ओकर, लखाह नै दैत अछि। पहिने पानि पिआ। तँ एहन छल गुरु। एक बेर साँझ कऽ भांग घोटि कऽ ओइ पार गेल, साफा पानि देलक, चंदनक तिलकपर ठोप लगैलक, गट्टापर गजरा लपेटलक आ दालिक मंडी दालमंडीमे पैसल। मुन्नी बाइ अप्पन घरसँ देखि रहल छल जे गुरु आबि रहल अछि। जहिना गुरु ओकर कोठा लग पहुँचल ओ अपनाकेँ सम्हारि नै सकल। वाह रे गुरु। गुरु ओकरा अपन कन्हा आ कोहनीक बीचक ठामपर रोकि लेलक। गुरु बाजल- मुन्नी, आइ ऐपर मुजरा होइतए मुदा ऐ गलीमे नै, चौकपर। असगरे हम टा नै, सगर नग्र देखत। आ गुरु ओकरा ठीके चौकपर आनि लेलक। आ फेर जे मुजरा भेल से नै पूछू तँ सएह नीक। आ अहाँकेँ पते नै जे गुरु के छल? जखन ओ उठल तँ अकास साफ भऽ गेल छल आ जतऽ–ततऽ छिरिआएल तारा लखाह पड़ि रहल छल। * रघुनाथ जखैन साँझमे घूमै, टहलै लऽ या मिलै-जुलैलऽ बाहर जाइ छल, तँ कोशिश करै छल जे नौ बजे धरि घुरि आबए। रातिक खाना ओ सदिखन सोनल संग खाइ छल। ई सोनलक जिद छल। दुपहरियाकऽ एना तखने संभव भऽ सकै छल जहिया ओकर छुट्टी रहए। नै तँ दाइ खाना पका कऽ चलि जाइ छलि आ ओ अपनेसँ खाना निकालि कऽ खा लै छल। नाश्ता हिनकर अलग छल आ सोनलक अलग। हिनका अँखुआएल बदाम आ दूधसँ खाली मतलब छल। शीलाक गलतीसँ ओ बड़ रास गप सिखने छल। ओ अप्पन हिसाबसँ हुनका नै चलबै छल, हुनकर हिसाबसँ ओ अपने चलैत छल। हुनका ससुर बनैक बदला बाप बनि कऽ चलब बेसी सुविधाजनक लागै छल। आ तामसक कोनो गप नै हुऐलऽ दियौ आ हेबो करए तँ बर्दास्त कऽ लिअ आ टारि दियौ। दुनू साँझक खेनाइ आ सुतबासँ मतलब छल- बाकी अहाँ जानू, अहाँक काज जानए। खर्ची गामसँ, तर-तरकारी पेंशनसँ। आ पेंशन एतबे भेट जाइ छल जे अपनेटा नै, दोसरोक छोट-मोट जरूरत पूरा भऽ जाए। बेटा पुतोहुक संग जीयैक यएह तरीका हेबाक चाही जे सभकेँ एक-दोसराक दोस्त बना देले छल। भऽ सकैए जे एकर पाछाँ कत्तौ ने कत्तौ हुनकर अप्पन असगरुआ प्रवृत्ति हुअए बा हुनकर अकछाएब। जखन सोनलक आग्रहपर पहिल बेर सरला आएल छल अशोक विहार तँ ओ सोनलक दीदीक संग ननदि सेहो छल। विदा करै काल ओ सोनाक चेन आ अउँठी संग दूटा साड़ी हुनका लेल आ दूटा मम्मी लेल देने छल। तकरा बादो सरला कतेक बेर आएल आ सभ घड़ी सोनल जे कऽ सकै छल, करैत रहल- माने घरक जे चीज सरलाकेँ पसिन्न आबै ओ सरलाक। ई कहियो नै सोचने छल जे सरला पैघ अछि- दैक कर्तव्य ओकर छै। शीलाकेँ सेहो अप्पन गलतीक अनुभव भऽ गेल छलै जे ओ अप्पन पुतोहुकेँ बुझैयेमे गलती केने छल। एतबे टा नै, सोनल अपना दिससँ बाप आ बेटा- रघुनाथ आ धनंजय- क बीचक दूरी सेहो कम करैक कोशिश केलक। ई अलग गप अछि जे दूरी घटैक बदला बढ़ैत गेल- मुदा ऐमे ओकर दोष कतऽ छल। ओ धनंजयकेँ फोन कऽ कहलक जे भैया, अहाँ तँ जुलुम करै छी। अमेरिकासँ पैसा मंगाबैक होइ छल तँ की-की नै बाजै छलौं। कतेक रास गप करै छलौं जे ई जरूरत अछि, ऊ जरूरत अछि। आ एतऽ एतेक दिनसँ हम आएल छी आ एक बेर देखैले नै एलौं जे भौजी कोना अछि। पापाकेँ सेहो ठीकसँ नै मालूम अछि जे अहाँ एम.बी.ए. केलौं कि नै आ कऽ लेलौं तँ आब की कऽ रहल छी। अहाँक बियाह लेल लोक आबि रहल अछि। पापा मम्मी परेशान अछि। की चाहै छी, बताउ तँ? एक दू दिनक लेले सही, आबि तँ जाउ। ऐ फोनक नतीजा छल जे ओ आएल मुदा रूकल घरमे नै, डायमंड होटलमे। तइसँ जे ओ असगरे नै छल, संगमे एकटा महिला छल अप्पन टिटहरबीक संग। सोनल हुनका सभकेँ रातिमे खेनाइक नोत देने छल। जखन रघुनाथकेँ ई खबर भेटल छल तँ ओ उठल आ चुप्पे पहाड़पुर चलि गेल। धनंजयकेँ आबैमे कनी देर भऽ गेल छल। ओ टैक्सीसँ आएल छल। संगमे आबैवाली स्त्री नै, लड़की छल- के. विजया। सोनलक उमेर की छल। नाकमे हीराक चमकैत कील, कानमे झूलैत रिंग, जूड़ामे बेलक फूल। एकदम दक्षिण भारतीय मुदा गोर आ सुन्नर। गपसँ पता चलल जे ओ दक्खिन दिल्लीमे कोनो कारपोरेट कंपनीमे नोकरी करैत अछि। ओइ कंपनीमे ओकर पति सेहो काज करैत छल, पहिनेसँ। ओकरासँ नीक पद आ वेतन छल। ओ बिन-बियाहल छल। दुनू बियाह केलक आ नोएडामे डूप्लेक्स फ्लैट लेने छल। बच्चीक पैदा हैक किछु दिन बाद एकटा सड़क दुर्घटनामे हुनकर मृत्यु भऽ गेल छल। घर, गाड़ी, नोकरी, बचिया, सभ किछु मुदा छल बेसहारा। भावनात्मक रूपसँ टूटि चुकल छल ओ। एनामे धनंजयसँ भेंट भेल छलै। बच्चीक नाम रत्ना डी. छल। ओ धनंजयकेँ पापा कहैत छल। सोनल सुनि कऽ असमंजसमे पड़ल रहल, किछु काल धरि। फेर एतबे बाजल- अहाँ सभकेँ सोझे घर एबाक चाही। धनंजय बहन्ना केलक जे विजयकेँ समए नै छलै। ओकरा बाबा विश्वनाथक दर्शन करैक छल, गंगा नहाबैक छलै, घाट देखबाक छलै, सारनाथ जेबाक छलै- समए कतऽ अछि। जइ काल अमेरिकाक अलबम देखै-देखाबैक कार्यक्रम चलि रहल छल, ओइ काल डिनरक तैयारीक बहन्ने सोनल किचेनमे आएल आ सहायता लेल धनंजयकेँ बजेलक। -राजू, एतेक पैघ गप। ने अहाँ पापाकेँ बतेलिऐ, ने मम्मीकेँ आ नहिये हमरा। ई की देखि रहल छी? -कोन गप? -ऐँ, यएह जे अहाँ बियाह कऽ लेलौं आ ककरो खबरि धरि नै देलौं। -के बाजल जे हम बियाह कऽ लेलौं। सोनल आश्चर्यसँ धनंजय दिस ताकलक- अहाँ दुनू एक्के छतक नीचाँ रहि रहल छी नै जानि कहियासँ, आ बच्ची पापा कहि रहल छी अहाँकेँ आ बियाह सेहो नै? मामिला की अछि? धनंजय मुस्किएलक- भौजी, मामिला किछु नै अछि। गप एतबे टा अछि जे ओकरा हमर जरूरत अछि आ हमरा ओकर- जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -की ओकरा ऐ गपक आभास अछि जे ओ ओकरा संग ताधरि अछि जाधरि जॉब नै भेट जाइत अछि। -ई हम नै जानैत छी। -अहाँ ओकरा संग रहि रहल छी, ओकर खा रहल छी, पी रहल छी, पहीर रहल छी, ओकर गाड़़ी आ पेट्रोलसँ घूमि रहल छी, ओकर बचिया अहाँकेँ पापा मानैत अछि, अहाँक भरोसे घर आ बच्चीकेँ छोड़ि़ नोकरी करैत अछि। अहाँ ओकर संबंधी बा नोकर सेहो नै छी- फेर कोन संबंध अछि अहाँ आ ओकर बीच। अपरतीब भऽ धनंजय बाजल- भौजी, छोड़ियौ ई सभ। चलू खाइ छी। -ऐँ, एना कोना छोड़ि देब। अहाँ ओकरा धोखा दऽ रहल छी आ बेवकूफ बना रहल छी। आकि फेर हमरासँ झूठि बाजि रहल छी बा नुका रहल छी। -दिल्लीक लड़कीकेँ नै जानै छी अहाँ। भऽ सकैत अछि, काल्हि बच्ची स्कूल जाए लागए तँ कान पकड़ि कऽ बाहर कऽ दिअए। -एकदम कऽ देबाक चाही, अहाँक चालि देखि कऽ। सोनल ओकर टोह लैत पुछलक- एकटा गप कहू, अहाँक नजरि ओकर घर-घरारी आ सुख-सुविधा पर तँ नै अछि? -अच्छा, रहऽ दियौ। अहूँ हद करै छी। -हम ऐ द्वारे कहि रहल छी, जौं हुअए, अहाँकेँ कऽ लेबाक चाही। सुन्दर अछि, बुझनुक अछि, जॉबमे अछि, अहाँकेँ जॉब नै भेटए तखनो कोनो हर्ज नै। हम संग छी अहाँक। बुझलौं। चलू आब। सोनल विजयकेँ आवाज देलक। सभटा किचेनसँ कटोरी, प्लेट आ थाड़ी डाइनिंग रूममे लऽ गेल, एक-एक कऽ कए। सोनल रत्ना डी. केँ कोरामे बैसेलक, खैलक आ खुअएलक आ साढ़े एगारह बजे विदा केलक। विदा होइसँ पहिने धनंजय भौजीकेँ असगरे लऽ गेल। -भौजी, की ई सत्य अछि जे भैया ओतऽ बियाह केले अछि? सोनल ओकर मुँह देखऽ लागल। -आरती कऽ कए कोनो छौड़ी अछि की ओतऽ? सोनल बिना हुनका सभकेँ विदा केने घर भागि गेल। * रघुनाथ गामसँ घुरल मुदा स्वार्थी आ कृतघ्न बेटाक जाइक बाद। ई हुनकर विचार छल, अप्पन छोट बेटा धनंजयकेँ लऽ कऽ। ओकरा पता छलै जे ऐ नगरक अशोक विहारमे ओकर भौजीक संग बाप सेहो रहैत अछि, मुदा ठहरल होटलमे। मानलिऐ जे औरत संग छलै- काशी दर्शन लेल आएल छल जे ई लड़काक घर अछि, आसान हएत। करबाक ई चाही जे हुनका होटलमे ठहरा कऽ अहाँ अप्पन घर आबि जैतिऐ, एतऽ रुकतिऐ मुदा नै। रघुनाथ नाराज हुअए, हुनका दुख सेहो भेल। ई गप ओ पुतोहुसँ नै कहि सकैत छल। दोसर गप छल बापक ईगो। देखऽ चाहै छल जे जे बेटा दिल्लीसँ बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेँट करै लेल बनारस आबि सकैत अछि, ओ बापसँ भेंट करै लेल बनारससँ डेढ़ दू घंटा दूर पहाड़पुर आबि सकैत अछि बा नै। शिकाइत तँ हुनका अप्पन बड़ बेटा संजयसँ सेहो छल मुदा परदेसक दूरी आ ओकर असगरे पड़ि जाइक कल्पना हुनकर कड़ापनकेँ कम कऽ कए राखने छल। ओ एहन देशमे छल जतऽ माँ नै, बाप नै, स्त्री नै। ओकर ओतऽ की हालत होइत हेतै, एनामे जखन ओकरा लेल हुक उठैत छल। ओ बिसुरल नै छल जे अप्पन बियाह करबाक बादो ओ अप्पन पिताक जरूरतक ध्यान राखलक। एतबे टा नै, ओ जे डी-१ अशोक विहारमे एत्ते दिनसँ निस्फिकिर अछि आ खाट तोड़ि रहल अछि- ओकरे चलते। हुनका ओकर एक आ एकमात्र इच्छाक जानकारी अछि- एक तरहे पिताक अंतिम इच्छा जे ओ अप्पन अन्तिम साँस पहाड़पुरमे बनल नव घरमे छोड़ए। ओ गामक पी.सी.ओ. सँ शुरूमे दू-चारि फोन कऽ मोन सेहो पाड़ने छल जे किछु भेजू, जतबे बनि सकए ओतबिये टा, कमसँ कम ढाँचा तँ अपना रहिते ठाढ़ कऽ दैतिऐ। ओ शुरूमे उत्साह देखेबो केलक मुदा आखिरीमे ओ खौंझा कऽ कहलक जे टका किए बरबाद करैपर लागल छी, ओकर सदुपयोग करबा लेल सोचू। एकर बादसँ रघुनाथ रूसि गेल छल। नहिये ओ फेर फोन केलक, नहिये ओ गप्पे केलक। सोनल जरूर गप करैत छल-कंप्यूटरक आगू बैसि कऽ, कानमे ईयर फोन लगा कऽ। मासमे कहियो एक बेर, कहियो दू बेर। रघुनाथसँ कहैत छल जे पापा, आबि जैतिऐ। अहाँ गप कऽ लियौ। मुदा संजय नै कहैत छल तेँ सोनलकेँ कहै आ चाहैसँ की। ऐ तरहेँ हुनकर रूसब चलैत रहल- वएह बापक ईगो। एतबै जरूर छल जे जखन कखनो फोन आबैत छल, ओ अपनाकेँ बजाबैक इंतजार करैत छल, जे कहियो नै भेल। संजय एक बेर बाजि गेल- अनचोक्के। तखन ओकर भाइ ओकरा संग छल। ओ राँचीमे पढ़ि रहल छल ओइ काल। रघुनाथ मास्टर- आदमी कोनो प्रसंगमे कृतज्ञताक मतलब बुझि रहल छल जे कियो अहाँ लेल कनियो टा किछु करैत अछि तँ ओकरा बिसुरी नै, मोन राखू आ मौका भेटए तँ जे किछु कऽ सकैत छी, करू। ऐ जन्ममे उऋण भऽ जाउ। एकरासँ पैघ सुख दोसर नै। जखन रघुनाथ चुप भऽ गेल तँ संजय बाजल- पापा, एकर मतलब तँ अहाँ जतऽ रहू, ओतै ठाढ़ रहू। बेर-बेर घुरि कऽ देखब तँ आगू कहिया बढ़ब। अहाँ कृतज्ञ हइ लेल कहि रहल छी आकि पएरमे बेड़ी पहिरै लेल। ई गप ऐल-गेल मुदा रघुनाथक दिमागसँ गेल नै छल। रघुनाथ सेहो चाहै छल जे बेटा आगू बढ़ए। ओ खेत आ मकान नै अछि जे अप्पन ठाम नै छोड़ए। मुदा ईहो चाहै छल जे एहनो मौका आबए जखन सभ कियो एक संग हुअए, एक ठाम हुअए। अपनामे हँसैए, गाबैए, लड़ैए, झगड़ा करैए, हा-हा खी-खी करैए, खाइए पिबैए, घरक सुन-सन्नाटा टूटैए। मुदा कतेक बरख भऽ रहल अछि- कियो कत्तौ अछि, कियो कत्तौ। आ बेटा आगू बढ़ैत एत्ते आगू बढ़ि गेल छल जे ओतऽ सँ पाछाँ देखए तँ नहिये बाप नजरि आबै नहिये माँ। कखनो कखनो हुनका लागै छल जे ओ बापट जना बिनु सन्तान हेतिऐ तँ बेसी नीक होइतए। ओ सेहो हुनके सन दारू छानि कऽ गओतिऐ आ मस्त रहतिऐ। गामसँ घुरलाक बाद ओ अप्पन पुतोहुसँ घनंजयकेँ लऽ कऽ किछु नै पुछलक। पुतोहु अपने उदास आ बेमार लागि रहल छल। ई सोचि कऽ जे औरतकेँ बहुत रास एहन बीमारी होइत अछि जइ लऽ कऽ पूछब ठीक नै। ओ चुप्पा लगा गेल। हुनकर बीच गप होइत छल रातिमे, खेनाइक टेबलपर। रघुनाथ गामक सोचमे जीयैत रहैत छल, ओ वएह गप करैत छल, पुतोहुक विश्वविद्यालयक, अप्पन विभागक, लड़का-लड़कीक, प्रशासनक। हुनका अनमुनाह सन देखि कऽ रघुनाथ शुरू केलक, पहाड़पुरमे हइबला ग्रामसभा चुनाव कऽ लऽ कऽ- बुझू, एहन कालपर गेल छी जखन चुनावक माहौल छै। पहाड़पुरक ग्रामसभा अछि आरक्षित कोटाक। लड़ैत अछि दलित आ निर्णायक होइत अछि ठाकुर वोट, जकर संख्या अछि साठि। ई साठि वोट जकरा चाहे सभापति बना दिअए आ जकरा चाहे प्रधान बना दिअए। ठाढ़ अछि सोमारू राम आ मगरू राम- हम जइ दिन पहुँचलौं, ओइ दिन साँझकेँ ठाकुरक सभक बैठकी छल बब्बन काका कतय। तय भेल जे यएह मौका अछि जखन ओ पकड़िमे आएल आ यएह मौका अछि बदला लेबाक। जेतबा ऐंठैक अछि, ऐंठ लिअ, नै तँ फेर हाथ नै आबएबला। विचार भेल जे दुनिया आ देश एक्कैसम शताब्दीमे चलि गेल अछि आ पहाड़पुरमे मंदिर नै, जल चढ़ाबै लेल खाली महादेव स्थान अछि। कहल जाए तँ जे एक लाख देत, वोट ओकरे देल जाएत। जौं एकरा लेल दुनू तैयार भऽ जाए, तखन? कियो बीचेमे टोकलक। ऐपर दू टा विचार आगू आएल। एक ग्रुपक कहब छल जे एहन हालतमे बोली बढ़ाबैत रहू। एक कऽ डेढ़, डेढ़ कऽ दू- एना। जे बेसी दिअए, वोट ओकरे देल जाए। दोसर ग्रुपक कहब छल जे नै, ई मोल भाव अछि, नीलामी सन चीज अछि, अप्पन जबानसँ पलटब अप्पन प्रतिष्ठाक आ मर्यादाक अनुकूल नै अछि। दुनूसँ एक-एक लाख लऽ लेल जाए आ वोट आध-आध बाँटि लेल जाए। तीस एक कऽ, तीस दोसर कऽ। बताएल दुनूकेँ नै जाए। ओ मानि कऽ चलए जे साठियो हमरे जा रहल अछि। नव पीढ़ी ऐ दुनूसँ असहमत छल। हुनकर कहब छल जे अहाँ सभ अप्पन मंदिर आ महादेवकेँ लऽ कऽ चाटू, हमरा हमर दारू आ मुर्गा चाही। रघुनाथकेँ ई सभ सुनाबैत मजा आबि रहल छलै मुदा ओ देखि रहल छल जे सोनल नहिये सुनि रहल छल आ नहिये रस लऽ रहल छल। हुनकर मन कत्तौ आन ठाम छल। खाना खाइ लेलाक बाद जखन ओ हाथ धोइले आएल तँ देखलक जे सोनल अप्पन बिछौनपर चितांग पड़ल छल आ कानि रहल छल। रघुनाथ हुनकर कोठलीमे ठाढ़ भऽ कऽ किछु काल धरि बुझाबैक कोशिश करैत रहल- बेटा सोनल, की गप अछि? सोनल आर कानऽ लागल। -बेटा, बाज तँ की गप अछि। रघुनाथ अपनाकेँ सम्हारैत पुछलक। -संजय दोसर बियाह कऽ लेलक। सोनल हिचकीक संग बाजल- हम काल्हि फोनपर गप केलौं। तखन बाजल- कमसँ कम हमरासँ पूछि तँ लैतिऐ। * भ्रम आ भरोस- यएह अछि जिनगीक स्रोत। ऐ स्रोतसँ फूटैत अछि जिनगी आ फेर बहैत निकलैत अछि- निर्मल-कलकल। कखनो-कखनो लागैत छल जे ई अलग-अलग चीज होइत अछि। स्रोत एक्के होइत अछि-ओकरा भ्रम कहू आकि भरोस। ई नै हुअए तँ जीअब सेहो नै हुअए। यएह स्रोत रघुनाथक जिनगी छल। जखन अमेरिकासँ घुरलाक बाद सोनल बाजल छल जे पापा, हमरा लागि रहल अछि जे संजय ओतऽ बसि जाए चाहैत अछि। इंडिया आएत जरूर मुदा रहै लेल नै, विजिट करै लेल। तँ रघुनाथ हुनकापर व्यंग्यसँ मुस्की देने छल- कतेक जानै छी संजयकेँ। बाप एतऽ, माँ एतऽ, भाए एतऽ, बहिन एतऽ। आर तँ आर स्त्री सेहो एतऽ। ओ कहलक किछु नै, खाली मुस्की देने छल जे ओ अप्पन बापक दीनता आ दरिद्रता देखने अछि। ओ दुखी आ परेशान भऽ कऽ कहियो-कहियो बाजै छल जे चिंता नै करू, एतबे कमाएब-एतबे कमाएब जे घरमे राखैक जगह नै हएत। मुदा कमाबैक ई रहस्य नहिये ओ बुझि सकल आ नहिये सक्सेना। आइ हुनका लागै छल जे ओ सोनलसँ बियाह सोनल लेल नै, अमेरिका जाइ लेल केने छल। रघुनाथ, तँ जिनगी अहाँकेँ जे जियैक छल, ओ जी चुकलौं। आब अहाँ अप्पन बेइज्जती लेल जीबि रहल छी। ई कियो नै कहि रहल छल मुदा हुनकर कान सुनि रहल छल आ ई मूक स्वर हुनकर हृदए धरि पहुँचि रहल छल। ओइ साँझ ओ भोजन केलाक बाद घरक पछुआरमे अप्पन डेरा नै गेल। ड्राइंग रूममे बैसल रहि गेल। ओ पूरा राति ओहिना काटि देलक- बैसल-बैसल। नीन नै एलै। तरह-तरहक आशंका आबि-जा रहल छलै जइमे सभसँ प्रबल छल जे कत्तौ ई लड़की आवेशमे आबि कऽ किछु कऽ नै लिअए। ई कहैक जरूरत नै आ एकरामे दू राय नै जे ऐ समाचारसँ हुनका एक तरहे खाली सुख भेटल छल जे ओकरासँ बियाह करैक पहिने की ओ हमरासँ पुछने छल। अहाँक बाप तँ गप करबाक जरूरतो नै बुझलक। एतऽ धरि जे नोत सेहो ऊपर मोने देने छल। आब बुझू। जे केलौं तकर दंड भेटल। आब कानि किए रहल छी। हम आकि कियो आन की करत। मुदा ई सुख कनी काल धरिक छल। एना सोचब ओकर निष्ठुरता आ अमानवीयता हेतिऐ। ओइ हालतमे तँ आरो जखन ओ अप्पन व्यवहारसँ हुनकर हृदए जीत लेने छल। एहन विचार अपनामे निचताइ अछि। एहन कालमे सहृदएता आ प्रेम चाही। बिजली ड्राइंग रूम सेहो जरि रहल छल आ सोनलक कमरा सेहो। रघुनाथकेँ कनियो टा आहटि भेटै तँ आस्तेसँ जाइ छल आ ओकर कोठलीमे हुलकी दै छल जे सभ किछु ठीक-ठाक तँ अछि। रातिक डेढ़-दू बजेक आसपास सोनल हँसैत ड्राइंग रूममे आएल- पापा, आत्महत्या नै करब, निश्चिंत रहू। जाउ, सुति जाउ। मम्मीक कोठलीमे बा डेरामे। रघुनाथ लजा गेलथि। हम ऐ डरसँ थोड़े बैसल छी भाइ। हमरा नीन नै आबि रहल अछि। सोनलक ध्यान ड्राइंग रूमक ओइ पैघ फोटोपर गेल जे ओकर बियाहक छल। शाइत रिसेप्शनक छल। संजय-सोनल दूटा ऊँच मखमलक फूलसँ सजल कुर्सीपर बैसल छल आ दुनूक माथपर हाथ राखने सक्सेना साहेब पाछाँ ठाढ़ छल। -पापा एकटा प्रार्थना अहाँसँ। -कहू। -ई गप घरमे रहए। अहाँ, मम्मी आ सरला दीदीक बीच। हमर पापाकेँ नै पता चलए। -किए? -ओ बर्दाश्त नै कऽ सकथिन। दू बेर अटैक भऽ चुकल छन्हि। रघुनाथ किछु कहऽ चाहैत छल मुदा चुप भऽ गेल। ओ सोनलकेँ बाजऽ दै चाहै छल जइसँ जे ओकर मनमे अछि, निकालि कऽ हल्लुक भऽ जाए। ई नीक अछि जे ओ खाली सुनए। -पापा हम चाही तँ हुनका कोर्टमे नमाड़ि सकै छी, पेमाल होइत रहता। हम भागि कऽ नै आएल छी, हुनक छोड़ि कऽ नै आएल छी। आएल छी लियौन भऽ कऽ। हमही टा नै, ओ सेहो चाहैत रहथिन जे हम हाउस वाइफ बनि कऽ नै रही। नोकरी करी आ सेहो अप्पन देशमे। आर एतऽ एलाक बादो अहाँ मीठ-मीठ गप करैत रही। एक बेर नै बतौलखिन जे हुनकर मनमे की अछि? एहनो नै जे हमरा बजौलखिन नै आ हम आबऽ सँ मना कऽ देने होइ। -जुलुम अछि। सोनल बिख-सबिख होइत बाजल। -अहां की बुझै छी हमरा। ऐँ, अहाँ डायवोर्सक लेल पुछले तँ रहितिऐ हमरा, हँ कऽ दैतिऐ। अहाँ नै दैतिऐ, कहतिऐ तँ हम दऽ दैतिऐ। पुछबो टा नै केलक, इशारा सेहो नै केलक। बिना डाइवोर्स बियाह कऽ रहल छी। अपमानित कऽ कए। बिना कोनो गलतीक, कसूरक। आ निर्लज्जता ई अछि जे पुछलापर मुस्कुराबैत कहै छी जे हँ भाइ, कऽ लेलौं। करऽ पड़ल। मूर्ख बुझै छी हमरा। जेना हम अहाँकेँ जानिते नै छी। जेना हमरा अहाँक किरदानी नै बुझल अछि। हम तँ बाबू अहाँक खाट ठाढ़ कऽ दैतौं, मुदा की बताबी। लोक यएह बुझत जे हम ई सभ गुजार लेल कऽ रहल छी, जखैन कि हम थूक फेकै छी अहाँक कमाइपर। की समय भऽ रहल अछि पापा। चारि, साढ़े चारि। रूकू, अहाँकेँ चाह पियाबै छी। ओ उठल आ किचेनमे चलि गेल। ठंडी बेसी छल। रघुनाथ पएरकेँ सीरकमे लपेट कऽ सोफापर पड़ल छल। हुनका नीक लागि रहल छलनि जे सोनलक मूड बदलि गेल छै। मुदा ई नीक नै लागि रहल छलनि जे ओ हुनकासँ ओना गप करए जेना ओ संजय अछि। गलती हुनकर बेटा केने छल मुदा अपराधबोधसँ ग्रस्त ओ छल। ओ भीतरसँ डरल आ घबराएल छल। ओ कहै तँ ककरोसँ नै छल मुदा गाम हुनका लेल सुरक्षित नै रहि गेल छलनि। बेटा सभकेँ गाम गेना कतेक बरख भऽ गेल छल। हुनका कोनो सरोकार नै रहि गेल छलनि गामसँ। घरेनक लोक सनेहीकेँ ठीकसँ काज नै करऽ दै छल। तारीक पहिने बुक करलाक बादो जसवंत हुनकर खेत तखैन जोतै छल जखन सबहक जोताइ भऽ जाइ छल आ रोकलाक बादो हुनकर नाली बंद कऽ पानि पहिने अप्पन खेतमे लऽ जाइ छल लोक सभ। बाहरी लोक सभसँ झगड़ा मोल लऽ कऽ एक दिन टिकब मुश्किल छल। रघुनाथ अपने कहै छल- सभ बेर चुप भऽ जाउ, सहि लिअ, मुदा झंझटि नै करू। दियादक नजरि हुनकर खेतपर लागल रहैत छल- ई गप ककरोसँ नुकाएल नै अछि। गाम गेलापर हुनकर सम्मान सभ कियो करै छल मुदा ई सम्मान हुनका रहस्यपूर्ण लागैत छल। नरेश अप्पन घरक आगू हुनकर जमीनपर खुट्टा गाड़ि कऽ महींस बान्हब फेर शुरू कऽ देने छल। रघुनाथ देखियो कऽ अनठा कऽ चलि दै छल। के रोज-रोज किचकिच करए। ऐ बेर तँ सनेही जे सूचना देने छल, ओइसँ ओ आरो हदैस गेल रहथिन। एक दिन हुनकर गाम जाइसँ तीन दिन पहिलुका गप अछि जे मोटरसाइकिलसँ दूटा छौड़ा आएल छल हुनकर दरबज्जापर। पैंट-शर्टमे। ओ उतरल आ बरण्डापर पड़ल खाटपर पटा रहल। सनेहीकेँ बजौलक, पुछलक जे मास्टर साहबक यएह घर छिऐ? फेर पुछलक जे ओ कहिया-कहिया आबै छथिन। कतेक दिन रहै छथिन। कहिया जाइ छथिन। शहरमे कतऽ बसोबास छनि- तरह तरहक प्रश्न। जाइत-जाइत ईहो बाजल जे हुनकर दिमाग ठेकानमे तँ अछि आकि नै। सनेही बाजल जे ओ नीक छौड़ा सभ नै अछि। कोनो भरोस नै अछि एहन छौड़ा सबहक। जखन दिनोमे एतऽ आबि सकैत अछि तँ नग्र बनारस कते दूरे अछि। एकरासँ पहिने कहियो देखने नै छल ओकरा। जे चुपचाप पटायल छल ओकर शर्टक नीचाँ पेस्तौल बा रिवाल्वर जेहन चीज छल। सनेहीक रिपोर्टक असर ई भेल जे ओ झलफल होइते घरसँ बाहर निकलब बन्न कऽ देने छल। ओ कारण बुझैक कोशिश करै छल मुदा किछु बुझि नै सकल। शीले सन रघुनाथक सेहो अजीब स्थिति छल। ओ एतऽ रहितिऐ तँ गामक लेल चिंतित रहै छल, ओतुक्का गप करै छल आ घुरैक बहन्ना खोजैत रहै छल मुदा ऐबेर जेहन संकेत भेट रहल छलै से ओतऽ घुरैक सोचेमे डर लागै छलै। ऐबेर ओ तय कऽ लेने छल जे बेसी जरूरी हुअए तँ दोसर गप अछि, मुदा अशोक विहारक डेरा अछिये। ओ बनल रहए, हुनका आर किछु नै चाही। मुदा एतऽ? एतऽ संजय हुनका आगू दोसर समस्या ठाढ़ कऽ देने छल। आब ओ पूर्ण रूपसँ सोनलक मर्जीपर छल। ओ चाहे तँ रहऽ दिअए, चाहे तँ निकालि कऽ बाहर कऽ दिअए। भाइ, अहाँ ताधरि हमर ससुर छी जाधरि अहाँक बेटा हमर साँए छल। जखन ओ पति नै, तँ अहाँ ससुर केहन, कोन गपक? ई कोनो सराय आ धर्मशाला अछि नै जे पड़ल-पड़ल रोटी तोड़ि रहल छी, मुफ्तियाक। चलू एतऽसँ, अप्पन बाट नापू। हुनका नीक गप यएह लागि रहल छलनि जे ओ किछु कहए, ओइसँ पहिने ओ कहि दिअए, बेटी, बड्ड भऽ गेल, आब आज्ञा दिअ। (ई ओ बुझै छल जे ई कहैसँ लाभ हुनका भेटत। भऽ सकैए ओ पघिल जाए आ मना कऽ दिअए।) सोनल चाह लऽ कऽ आबि गेल- दूटा पैघ मगमे। एकटा मग हुनकर आगू राखैत बाजल-पापा, अहाँ एहन बेटा किए जनमेलौं। जे ओ नै देखै छल जे ओकरा लग छै, सदिखन उम्हरे देखैए, जे दोसराक लग छै- लेर चुअबैत। पता अछि, ओ आरती गुर्जरसँ बियाह केने अछि। रघुनाथ चाह सुड़कलक। ओ कोनो सोचमे डूमल छल। -ऐ दुआरे जे ओ असगर संतान अछि- करोड़पति एन.आर.आइ. व्यवसायीक। एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी आरती इंटरप्राइजेजक मालिकक। -बेटा, हम सभ ई नै सुनऽ चाहै छी। हम खाली एतबे चाहै छी जे अप्पन पापाकेँ जा कहियौ आ आब हमर छुट्टी करू। -की। की कहलौं अहाँ? कनी फेर तँ सुनी। सोनलक अबाज अनचोक्के ऊँच भऽ गेलै। रघुनाथ बिना ओकरा दिस ताकने चाह सुड़कैत रहल। सोनल हुनकर हाथसँ मग छीन लेलक। -एकदम्म नै। कान पकड़ू आ कहू जे एहन गप फेर नै करब। रघुनाथ असहाय आ निराश आँखिसँ हुनका ताकलक। ओ कानैत रघुनाथक कोरामे गुरकि गेल- पापा, संजय छोड़ि देलक, कोनो गप नै, अहाँ तँ हमरा नै छोड़ू। * रघुनाथ अप्पन जिनगीक समए नापैत छल, अप्पन पएरसँ, ओकर चालि आ तागतिसँ, फेफड़ासँ आबैत जाइत साँससँ। एक समए छल जखन ओ पंद्रह सोलह मील जाइ छल मामागाम। रौदमे। बिन थाकल, बिन कत्तौ बैसल- आ प्रसन्न रहै छल। फेर ई समए घटब शुरू भेल- आठ मील, फेर छऽ मील, फेर चारि मील, फेर एक मील। आ ओ आब डेरामे आबि कऽ घोकचि गेल छल। जौँ कत्तौ निकलबाक होइत अछि तँ आब दूटा पएर बेसी नै होइ छै, एकटा तेसर पएर सेहो लगाबऽ पड़ैत अछि आ ओ तेसर पएर छल- छड़ी। आब ओ तिपहिया मनुख छल। संतोष ई छलै जे हुनकर सन चौपाया मनुखसँ कॉलोनी भरल छल। जीयैक आस यएह छलै जे ओ असगरे नै अछि। हुनकर सन बड़ रास लोक अछि। कतेक लोक तँ हुनकोसँ खराप स्थितिमे अछि। जे हिस्सा ओ किरायापर देने अछि आ अपना रहै लेल एकमहला चुनने अछि, ओ ओतै अटकल रहैत अछि। कोनो तरहे बालकनीमे आबैत अछि आ ओतऽ बैसल-बैसल पूरा दिन लोककेँ आबैत-जाइत देखि कऽ अप्पन जीवित होइक अहसास करैत अछि। रघुनाथ कोनो तरहेँ पार्क आ नहर तक आबि जाइ छल, गाम नै जा सकै छल। एतऽसँ थ्री-व्हीलर बा टेम्पो लेब, बस अड्डा जाएब, बसमे धक्का-मुक्कीक बीच चारि घंटा बैसल रहब, नहरपर उतरब, फेर ओतऽसँ पाँव-पैदल डेढ़-दू किलोमीटर गाम जाएब मुश्किल भऽ जाइ छल। जोड़मे दर्द सेहो रहऽ लागल छल। मुदा जेना-जेना गाम जाएब कम होइत गेल, तेना-तेना ओतुक्का जमीन-जालक चिंता बढ़ल गेल। सोनल हुनका डेरासँ हटा कऽ घरक गेस्ट-रूममे राखि देने छल। ओ ठंडीसँ बचि गेल छल मुदा खिड़की लग बैस कऽ राति भरि अप्पन गाम आ खेतमे घुमैत रहैत छल आ सलाह दैत रहै छल। थाकि जाइ छल तँ बाकी समए ऐ सोचमे लगाबै छल जे सोनल हुनकर के अछि। ने पुतोहु, ने बेटी- की ओ ओकर घरमे बैसल अछि? जे हुनकर अछि, ओ नै जानि कतऽ–कतऽ अछि। हुनका तँ फिकिरे नै छनि। पूरा दियाद-बाद- जकर एक-एकटा पजेबा ओ जोड़ने छल- छिड़िया गेल छल। एतऽ धरि जे शीलाकेँ सेहो अप्पन बेटीक घर बैस कऽ बाढ़नि लगाएब आ खेनाइ बनाएब स्वीकार छल, मुदा पुतोहु कतऽ रहब स्वीकार नै। आ आब तँ पुतोहु सेहो कहाँ रहि गेल अछि। शीला या जकरा ककरो पता चलत, दस बात हुनके सुनाएत, उन्टे जे कोन सरोकारसँ ओतऽ छी अहाँ। ई हलदली एक भोर हुनका कॉलोनीक शर्मा पी.सी.ओ. धरि लऽ गेल। हुनका सर्दी-बोखार छलनि। कतेक दिनसँ बाहर नै निकलि रहल छल। सोनल नै निकलऽ दै छल। मुदा अप्पन दुनू बेटासँ फाइनल गप करैक उद्देश्यसँ ससरि आएल- चुपचाप। सभसँ पहिने संजयकेँ फोन केलक- यएह साढ़े आठ बजेक समए होइत अछि, जखन सोनल कंप्यूटरपर बैसै छल। -हलो, हम बनारससँ रघुनाथ। -संजय। अपना लग राखू ई चरण-स्पर्श। लाज आबैए अपनाकेँ अहाँक बाप कहैत हमरा। जे नीचता अहाँ देखेने छी अहाँ, ओइसँ हमरा गप नै करबाक चाही, मुदा... -अनर्गल गप बंद करू। -सुनू, हम अशक्त भऽ गेल छी। जिनगीक कोनो ठेकान नै, कखैन की हुअए। आब खेती नै हएत हमरासँ। या तँ आबि कऽ सम्हारू या बताउ की करी। गामक जमीन-जालक। संजय। धनंजयसँ तँ पुछबे करब, मुदा अहाँ पैघ छी। मालिक छी। अहाँ की कहै छी? संजय-०००० -नै, नै, हम वएह सभ करब जे अहाँ कहब। कहियौ तँ। विचार दिअ अपन। -संजय-०००० -हँ। तँ सभ बेचि दिऐ। ओइ पाइसँ एक-डेढ़ कोठलीक बनारसमे फ्लैट लऽ लिऐ। बाकी जमा कऽ दिऐ आ ओकर सूदसँ दुनू परानी जीबी-खाइ। -संजय-०००० -हँ, हँ। पेंशन तँ रहबे करत। मुदा सुनू, ई काज अप्पन माँ-बापक लेल अहीं करू। ई हमरासँ नै हएत। -संजय-०००० -ऐ दुआरे जे ई पाप अपना हाथसँ नै करब। ऐ दुआरे जे ओ पुरखा सबहक चीज छी, हुनकर धरोहर छी। दोसराक चीज बेचबाक अधिकार हमरा नै अछि। -संजय-०००० -नै, हम एकदम्मे भावुक नै छी। मुदा हमर खेत नै छी। एकरा हम जिन्स आकि माल मानै लेल तैयार नै छी। आ सुनू, अप्पन सलाह अपना लग राखू। साढ़। नमकहराम। ओ फोन राखि देलक। किछु काल धरि सोचैत रहल जे फोन करी आकि नै करी। आखिरमे लगा देलक नंबर। -हलो, धनंजय अछि की? -महिला स्वर-०००० -हम रघुनाथ। हुनकर पिता। -धनंजय-०००० -हलो राजू। अहाँ बनारस एलौं मुदा गाम नै एलौं। हम इंतजार करैत रहि गेलौं। -धनंजय-०००० मौका नै भेटल तँ नै भेटल। जाए दियौ। एहन अछि बेटा जे हम आब कोनो काजक लेल नै रहलौं। काज-धाज नै होइए। समस्या अछि खेतक। ओकर की करी? -धनंजय-०००० -नै, ओ तँ ठीक अछि मुदा सनेही कहिया धरि देखत। ओकरा लोक करैएले नै दैत अछि। ओकर सबहक आँखि लागल अछि अप्पन खेतपर। -धनंजय-०००० -तँ अखैन रूकि जाइ छी। मानि लिअ रूकि जाइ। मुदा ओकरासँ पहिने हम चलि जाइ तँ। संजय सेहो बाहर, अहूँ बाहर। फेर के? -धनंजय-०००० -ठीक अछि, बेच दै छी मुदा ओतबे पाइक किछु करए पड़त ने। की करी ओकर? -धनंजय-०००० -आध-आध बाँटि देब अहाँ दुनू भाइमे। फेर हमर आ अहाँक माँक की हएत? हम की खाएब? अच्छा सुनू, ई बताउ जे अहाँ की कऽ रहल छी आइ-काल्हि। -धनंजय-०००० -आइ धरि नै भेटल अछि नोकरी। कतेक दिन लागत अखन। अहीं किए नै आबि जाइ छी। मैनेजमेंटक ज्ञानक उपयोग खेतीक बिजनेसमे नै भऽ सकैत अछि? धनंजय फोन काटि देलक। -हरामखोर। रघुनाथ पी.सी.ओ.सँ बाहर आबि गेल। साढ़, डोनेशनसँ पढ़ब तँ पूछत के? ने काबिलती अछि नहिये पैरवी- चलल अछि मैनेजर बनै लऽ। ओ घर नै जा कऽ सोझे पार्क गेल आ लकड़ीक बैंचपर बैसि गेल। पार्कक बगलबला लेनमे घर छल पारसनाथ शर्माक आ तीन-चारिटा दाइ हुनकासँ झगड़ा कऽ रहल छल। हफ्तामे एक-दू बेर कालोनीक कोनो ने कोनो घरक आगू एहन सीन भऽ जाइ छल। किए होइ छल एहन सीन, एकरा सभ कियो जानै छल तइसँ महत्व नै दै छल। -छल ई जे सभ घरमे बांग्लादेशी दाइ छल। सोलह-सत्रहक उमेरसँ पैंतीस-चालीस सालक। बूढ़मे सँ ककरो ने ककरो बुढ़िया अप्पन बेटा-पुतोहु लग बाहर चलि जाइ छल किछु मासक लेल। रहै छल तँ राग-द्वेषसँ मुक्त भऽ आ बुढ़बाकेँ एतबे छूट देने। बूढ़मे शाइते कोनो बूढ़ छल जकरा अप्पन जवान हेबाक भ्रम नै हएत आ ओ समए-समएपर परीक्षण नै करऽ चाहैत जे हुनकामे किछु बचल अछि आकि नै। तृष्णाक मारल सभ बूढ़ प्रेम, दुलारक नामपर एहन छूट लऽ लै छल आ दाइ सभ सेहो साबुन, तेल, नेलपॉलिश, लिपिस्टिक बा पंद्रह-बीस टका बख्शीस पाबि संतोष कऽ लै छल। ओ हुनका कतऽ काज करैत सुरक्षित अनुभव करैत छल। समस्या ओतऽ ठाढ़ होइ छल जतऽ बूढ़ अप्पन दाइकेँ सेवाक मुताबिक बख्शीस दैमे ना-नुकुड़ करै छल। ई प्रणय कलह जेहन मामला होइत छल जइमे तेसराक दखल दैक जरूरत नै पड़ैत छल। (बेसी जानकारी लेल पत्रकार सुशील त्रिपाठीक स्टोरी पढ़ू- आखिर अशोक विहारक प्रवेश-द्वारपर मर्दाना कमजोरी आ सिसनोत्थानक समस्याक निवारणक जड़ी-बूटी वनौषधिसँ शर्तिया इलाजक पीअर तम्बू साल भरि किए तनल रहैत अछि।) ऐ कलह-कोलाहलसँ निरपेक्ष रघुनाथ बेंचपर धूप सेवन कऽ रहल छल तखने हुनका ताकैत पुरना मित्र जीवनाथ वर्मा पहुँचल। ओ हुनके संग रिटायर भेल छल आ रसायन शास्त्रक अध्यापक छल। नग्रमे बेटा-पुतोहुक संग साकेत विहारमे रहैत छल। कार्यकालक दिनमे किछु लोक हुनका पागल बुझै छल आ किछु जीनियस। चना-चबेनापर जीवित रहैवाली भारतक अस्सी प्रतिशत जनता हुनकर चिंताक विषय छल। ओ सेहो शौकीन छल भूजाक (भुजनाठीसँ भुजल चना, मटर, लाइ, चूड़ा, बालि) क। भारी मोश्किल छल सामान्य लोकक। कड़ाही जुटाउ, बालु आ नीमकक बंदोबस्त करू, चुल्हा जराउ, ओकर गरम होइक आ धधकैक इंतजार करू, तखन जा कऽ भुज्जा तैयार होइत अछि। एहन नै भऽ सकैत अछि जे ई सभ झंझटि नै पोसऽ पड़ए। कतेक रास बरखक चिंतन मननक बाद ओ एकटा प्रयोग केने छल। किएक तँ ई राष्ट्रीय स्तरक समस्या छल जकर समाधान खोजि कऽ निकालने छल तइसँ हुनकर हार्दिक इच्छा छल जे एकर उद्घाटन वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम करथि। मुदा झिटुकी लगेने छल रघुनाथे। ओ कहने छल जे प्रयोग अखन प्रक्रियामे अछि तइसँ आयोजन स्थानीय स्तरपर हुअए। बड़ खर्च केने छल वर्मा। घरक आगू तम्बू लगेलक, तीस अध्यापक लेल कुर्सी मंगबैले छल, कैटररसँ चालीसटा थारी मंगबैलक, माइक लगबैलक। सभ अध्यापकक थारीमे चारिटा चना राखलक आ प्रिंसिपल, जकरा उद्घाटन करबाक छलै, हुनकर थारीमे पाँचटा। थपड़ीक गड़गड़ाहटिक बीच प्रिंसिपल मुँहमे पाँचो दाना खसेलक आ दकड़ैत थुकड़ि देलक। माइकपर एक वाक्य बाजल- ई चना लोहाक अछि आ जहर अछि। सभ अध्यापक चिखने बिना प्लेट फेक देलक आ चलि गेल। हुनका मोताबिक वर्मा हुनकर अपमान केलक आ वर्माक मोताबिक ओ वर्माक। प्रयोग ओना तँ गोपनीय छल, ओकरा लऽ कऽ बताओल सेहो नै जा सकै छल मुदा रघुनाथकेँ जे जानकारी छलै से ई जे वर्मा झाड़ि पोछि कऽ जमीनपर एक किलो चना पसारलक, ओइपर स्पिरिट छिड़कलक,काठी जरैलक, धधरा उठल आ चना भुजा गेल। (खोंइचा जड़ि गेल, गुद्दा ओहिना काँचे रहि गेल।) यएह भुज्जा फेमबला वर्मा किछु काल हुनका देखैत रहल आ आस्तेसँ कहलक- रघुनाथ। रघुनाथ जखन माथ उठेलक तँ ओ लपकल-ऐँ। ई सत्ये अहीं छिऐ। भजार, की भऽ गेल अहाँकेँ। कल्ला बैसि गेल छै, गाल धँसि गेल छै, दाँत झड़ि गेल छै, आँखि भीतर चलि गेल छै- एना केना भऽ गेल। चिन्हैमे नै आबि रहल छी अहाँ। रघुनाथ हँसल, ठाढ़ भेल, हुनका बाँहिमे लेलक आ अपना संग बैसाबैत बाजल- कनी इम्हर। किछु नै भजार, गेल छलौं काल्हि पेंशन ऑफिस। जखन घुरऽ लगलौं तँ बड़ा बाबू पुछलक- रघुनाथ जिबिते अछि आकि गुजरि गेल। हम पुछलौं- एना केना बाजि रहल छी। ओ कहलक- फाइल बंद पड़ल अछि हुनकर। मइसँ पेंशन नै चढ़ल अछि। किए? ओ बाजल जे लाइव सर्टिफिकेट नै देने अछि। तँ हम यदि देखैये लेल एलौं जे मामिला की अछि? -बड़ नीक केलौं, ऐ बहन्ने अहाँसँ भेंट भऽ गेल। ओकरामे किछु करबाक तँ अछि नै। फारम भरि कऽ रजिस्ट्रारकेँ देबाक अछि। ओ दस टका लेत आ प्रमाणित कऽ देत। फेर बरख भरिक चिन्ता खत्म। रघुनाथ बड़ मिझाएल मोनसँ बाजल- जीवनाथ। हमरा चौअनिया जीवनमे कोनो रुचि नै अछि। वर्मा बड़ दुखी भऽ कऽ रघुनाथकेँ देखलक- भजार, की बात अछि। अहाँ एहन तँ नै रहिऐ। चलू घर। जाइक हुअए तँ साँझकेँ जाएब। रघुनाथ एकटा हाथमे लाठी आ दोसरमे वर्माक कन्हा धेने घुरल। * जीवनाथ वर्मा जाइत-जाइत एकटा नव आफत ठाढ़ कऽ कए गेल छल, ई कहैत जे अपना सबहक लेल बडु जीलौं रग्घू मुदा अपना लेल जीबू। यएह ओ गप छल जे कहियो हुनका अप्पन दिमागमे नै आएल। अपनासँ अलग सेहो किछु होइत अछि की? की बेटा अप्पन नै छल? बेटी अप्पन नै छल। स्त्री अप्पन नै छल। खेत-खलिहान अप्पन नै छल। ई जरूर अछि जे सभ कियो अपना लेल जीवन चाहै छल। ककरो ऐ गपक चिन्ता नै छलै जे ओ जी रहल अछि आकि मरि रहल अछि। ओकर अप्पन खगता सभसँ बेसी रहै छलै आ ओ नै चाहै छल जे कियो ओकरापर कोनो सवाल उठाबै। अहाँ ओकरा अप्पन बाट जाए दियौ आ जाए दइमे मदति करू तँ अहाँसँ नीक कियो नै। मुदा की हुनकर जिनगी रघुनाथक जिनगी छल। नै, हेबाक चाही छलै अप्पन अलगसँ। जे भेलै नै। आ जीवनाथ वर्मा ई सभ तखैन कहि रहल छल जखन कान सुनि नै सकैत छल, आँखि देखि नै सकैत छल। कल्ला चबा नै सकै छलै, डाँड़ सोझ नै भऽ सकै छलै। आ ई सभ किछो अपन प्रति आ पतिक कर्तव्यक भेँट चढ़ि गेलै। ओ ई मानै लेल एकदम्मे तैयार नै छल जे अप्पनक भेषमे ओ दोसर छल। ओ कत्तौसँ खसल नै छल, अनेरुआ नै छल। रघुनाथ स्वयं कृतज्ञ भावसँ शीलाकेँ दोसराक घरसँ आनले छल, यएह हुनकर हुनका सभपर उपकार छल जे हुनका नै जानैत-पहचानैत हुनका संग आएल छल आ एक नव दुनिया रचएमे हुनकर संग देने छल। आखिर कोन उम्मेदसँ रघुनाथ शीलासँ मिलि कऽ रचने छल ई दुनियाँ। ओ एतबे नि:स्पृह आ निस्वार्थ तँ नै छल आ हुनकर आशा सेहो हुनकासँ अलग नै छल, जे गाम-घरक छल। की जे ओ अशक्त भऽ जाए तँ बच्चे हुनकर आँखि बनत, हुनकर हाथ-पएर बनत। ओ दुखित हएत तँ यएह बच्चा हुनकर सेवा करत, दवा-दारू करत, अस्पतालमे भर्ती कराएत। मरऽ लागत तँ मुँहमे गंगाजल-तुलसी देत, अर्थी सजाएत, श्मशान लऽ जाएत, क्रिया-कर्म करत। मुदा देखू तँ एकरासँ बेसी मूर्खता की भऽ सकैत अछि। अरे, मरलाक बाद सड़य-गलय, कौआ-चील खाए बा कुकुर- की फर्क पड़ै छै। मुदा यदि दुनियाक आ दुनियाक चलैत रहैक कायदा ई रहैत अछि कि की पैदा हुअए बा जिअए। जीअब अहाँक कर्तव्य अछि। कर्तव्य माने की? अशक्क। कियो ई नै पुछलक अपनासँ- ककरा लेल जी रहल छी? ओ जन्मैक बाद जाधरि जी रहल अछि, जी रहल अछि। मरय कऽ दिन धरि। मरय कऽ दिन बाप-बेटाक हाथ ओ सभ किछु सौंपि कऽ जाइत अछि जे ओकरा संग रहैत अछि। लिअ, सम्हारू आब। हम चललौं। रघुनाथ लग गामक जमीनक अलाबे किछु नै छल आ ओइ जमीनकेँ ओ अनमोल बुझैत छल। बेटा हुनका कैशमे भजोखा देखैत छल आ कहि रहल छल जे एकरासँ बेसी तँ हमर एक मासक इनकम अछि। संजयक टिप्पणी रघुनाथक भीतरक सभटा जीवनक रस चूसि लेने छल। ओ अप्पन कोठलीक खिड़की लग बैसल कदम्बक पातक पार आसमान देखि रहल छल जे सूर्यास्तक बाद मलिछौंह छल। ओतऽ हुनकर आँखिक आगू एकटा मद्धिम तारा छल जे हिलैत पातक अढ़मे कखनो नुका जाइ छल, कखनो हुलकऽ लागै छल। ई तारा नै छल। हुनकर पिता छल जे हुनकापर हँसैत छल आ नुका जाइ छल। -हौ जीवनाथ सुनह। अप्पन दिन तँ बचल नै जीबाक लेल मुदा जीअल छी अपना लेल। ओ अचानके चिकड़ि उठल जेना जीवनाथ सद्यः गेटक बाहर ठाढ़ अछि। ताराक तुकमिलानी लारा। तारा हुनका लाराक मोन पाड़ि देने छल, ओइ लाराक जे हुनकर नितांत अप्पन जिनगीक गुप्त हीस छल। जइ दिन रघुनाथ अप्पन किशोरावस्था पार कऽ रहल छल ओइ काल हुनकासँ टक्कर लेने छल लारा चड्ढा। एकटा अल्हड़ आ सोझ सन लड़की। अंडाकार मुँहवाली सुन्दर लड़की। सपनाएल आँखि। नाकक नोकपर बदमासी। ठोढ़क कोनपर हँसी। छड़ीसन देह जना हवामे थरथराइत बुलबुल्ला। कमी छल तँ बस दूटा पाँखिक, जकर सहायतासँ ओ जखैन चाहए तखन उड़ि सकए। रघुनाथ मामक घर रहि कऽ पढ़ाइ केने छल आ ओ आगू रहै छल बंगलामे। पैघ बहिन हॉस्टलमे छल आ ओ माँ-बापक संग। रघुनाथसँ एक क्लास ऊपर छल। ओ जखैन-तखैन साँझक बल्बक रोशनीमे पापाक संग बैडमिंटन खेलाइ छल तँ रघुनाथ अप्पन दरवाजापर ठाढ़ भऽ कऽ देखैत छल। एक दिन जखन लाराक माए-बाप कोनो समारोहमे बाहर गेल छल, ओ इशारासँ रघुनाथकेँ बजैले छल। ओ घरक ड्रेसमे छल- स्कर्ट आ ब्लाउजमे। ओ रघुनाथक संग कैरम खेलाइ लेल बैस गेल आ किछु काल धरि खेलाइत रहल। फेर अचानके उठल, दौड़ कऽ लॉनमे गेल, पीअर गुलाबक फूल संग घुरल आ केसमे लगा कऽ ठाढ़ भऽ गेल- आब कहू, केहन लागै छी। अपरतीब भऽ रघुनाथ देखैत रहल आ आस्तेसँ बाजल- नीक। -ऐँ, खाली नीके? लाराक आँखि फाटल रहि गेलै। रघुनाथकेँ बुझैमे नै एलै जे आगू की बाजी। लारा पएरसँ ठेल कऽ बोर्डकेँ एक दिस केलक आ हाथ पकड़ि कऽ ठाढ़ कऽ देलक रघुनाथकेँ। ओकर आँखि नोरा गेलै, बाजल- गोबर। मोनेमोन चाहै छी जे नीके-नीक बाजी, अहाँक आँखि ठोढ़, आंगुर, बाँहि, आ पूरा देह नीक बाजी। आ... ओ एक-एक कऽ ओकर अंगा आ पैंट खोलैत गेल। -अप्पन सेहो हम खोली आकि अहूँ किछु करब। ओ लजाइत कनफुसकी केलक। जना-जना वस्त्र ओकर देहसँ अलग होइत गेल, ओना-ओना एकटा अज्ञात, अनदेखल, अकल्पित दुनियाँ खुजैत गेलै ओकर आगाँ कनी-कनी। मुदा ई कनी-कनी असह्य भऽ गेलै रघुनाथ लेल। ओ बेसब्र आ जंगली भऽ उठल। ओ लाराक संयमपर चकित सेहो छल आ मुग्ध सेहो। ओ हुनका आस्तेसँ बैसैलक आ हुनकेपर नमड़ि गेल- फूलसँ बनल गाछ सन। हुनका भीतर लैसँ पहिने हुनकर कानमे फुसफुसैलक- बुद्धूराम। कहियो मेटाएब नै। आ हुनकर झाँपल जीहक नोकसँ दहिना दिस लिखलक- एल.ए.। जखन बाम छातीपर आर. लिख रहल छल ओइ काल कॉलबेल बाजल। ओ तरपि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। बाजल- पहिरू आ भागू पाछाँसँ। फेर तँ मास भरिक बादे चड्ढा साहेबक बदली भऽ गेल आ ओ चलि गेल। ऐ गपकेँ या तँ रघुनाथ जानैत छल या लारा- तेसर कियो नै। एहन बहुत रास गप अछि हुनकर जिनगीमे जे वएह टा जानैत अछि। की ई नै छल अपना लेल जिअब। ककरो नै पता जे शुरूसँ रघुनाथ एकटा चोरक जिनगी जिअल अछि जे हुनका नजरि आबैबला जिनगीसँ बेसी असली आ अप्पन रहल अछि। नहिये माँ-बापकेँ पता, नहिये स्त्रीकेँ, नहिये बेटा-बेटीकेँ। ऐ जिनगीक भीतर एकटा दोसर जिनगी। जकरा लोक देखैत छल आ बुझैत छल ओ दोसराक लेल आ दोसराक काजक लेल भले रहल हुअए- हुनकर अप्पन जिनगी नै छल। मजा आ झमेला ऐ जिनगीमे छलै जे हुनकर निजी छल आ जे प्रेमक खोजमे गुजरि गेल। जमानासँ बचा कऽ, लोकक आँखिसँ चोरा कऽ, अपना आँखिमे गर्दा झोंकि कऽ, हुनका धोखा दऽ कऽ। जे हुनकर अलाबे, ओकरा पता छलै, ऐ गपक भनक भले भेटल होइ ककरो, पूर्ण जानकारी ककरो नै। पूरा जानकारी तँ अहाँक बदमाशीक सेहो नै अछि ककरो रघुनाथ। ओहो चोरीक जीवन छल अहाँक। अहाँ हॉस्टलमे छलौं ओइ काल। अहाँक भजार श्रीराम तिवारी, भेँट करए लेल आएल छल अहाँसँ। आएल छल तँ अस्पताल अप्पन माँकेँ लऽ कऽ, हुनकर हालत सीरियस छल। माँकेँ अप्पन भाइक जिम्मा छोड़ि कऽ अहाँसँ भेँट करऽ लेल आएल छल। जखन ओ जाए लागल तँ ओकर जेबीसँ खसल तागसँ बान्हल नोट अहाँ देखने छलौं आ चुप रहलौं। बादमे गानलौं तँ एक सए तीन टका छल। माँकेँ देखा कऽ घंटा भरि बाद फेर आएल- चिन्तित, परेशान आ घबड़ाएल। अइते ओ जतऽ बैसल छल ओतऽ फेर चौकीक नीचाँ टेबुलपर आ ओकर नीचाँ कोठलीमे चारू दिस देखैत रहल। बुझलाक बादो अहाँ ओकरा पुछले छलौं- की गप अछि? किछु टका छलै दवाइ लेल, भेट नै रहल अछि। आन ठाम कत्तौ तँ गेलौं नै। अहाँ देखलौं तँ नै। आ अहाँ उत्तर की देलौं- अस्पतालक भीड़-भाड़मे कनी सम्हरि कऽ रहबाक छल। ओतऽ जतेक पेशेण्ट आबैत अछि ओत्ते चोर आ पाकिटमार सेहो। ई सभक शिकाइत अछि। नै भजार। आर कत्तौ गेले नै छी। खसल हएत तँ एत्ते कत्तौ, जेबी कटबाक तँ सवाले नै अछि। -तँ देखू ने, कतऽ अछि एतऽ। अछि कत्तौ? -तँ रघुनाथ ईहो अहीं छलौं। वएह अहाँक निजी जिनगी। जौं ई जिनगी लोककेँ पता चलल हेतिऐ तँ अहाँ की एतेक आदरणीय आ गण्यमान रहि गेल हेतिऐ या नै, अपने सोचू। रघुनाथ सोचलक आ वर्माकेँ अपना लेल जिबूबला सलाहपर अविचलित रहल। ऐ दगाबाज आदर आ प्रतिष्ठाक बदला आत्माक ई नंगटपनी बेसी नीक छल। अपना लेल सेहो आ समाज लेल सेहो। ई आदमी टाक नै समाजक विसंगतिक सेहो चेहरा अछि, जे झाँपल-मुनाएल अछि। समाज जानए जे जँ हम बदमाश छी तँ ऐ बदमाशीक कारण असगरे हम नै छी, ओ सेहो अछि। आ सही कहियौ तँ ओकरे कारण हम एहन छी। -पापा। सोनल दरवाजासँ आवाज देलक। -अहाँ अखैन धरि अन्हारमे पटायल छी। ओ स्विच ऑन केलक आ कमरामे रोशनी भऽ गेल। रघुनाथक आँखि चोन्हैल, फेर पसरि गेल। पहिल बेर सोनलक संग एकटा युवा। नम्हर, सुन्दर, आँखिपर नै माथपर चश्मा, कन्हापर झोरा, खादीक कुर्ता आ जीन्सक पैंट। एक हाथमे लपेटल अखबार। रघुनाथ उठि कऽ बिछौनपर आएल। -पापा। यएह अछि समीर। दैनिक भारतक उप-संपादक। रघुनाथक पएर छुलक समीर। -हमर कजिन अछि। हम बतौले रही। ई बिसरि गेल हेथिन। जइ काल हम पटनामे रिसर्च कऽ रहल रही, ओइ काल ई सेहो ओत्तै छल। आइ अचानक सेमिनारमे भेट गेल। लऽ कऽ आबि गेलौं अपना संग। -कतऽ रहै छी बेटा। -एत्तै, लगेमे। संजय नगरमे। -ऐँ। ओतऽ तँ हम गेल छी। अप्पन दोस्त बापट कतय। -हम हुनके फ्लैटक नीचाँ रहै छी। आब तँ हुनकर फ्लैटमे हुनकर बेटा आबि गेल अछि, स्त्री बच्चाक संग। चौंकल रघुनाथ- हुनकर बेटा? बेटा कहाँ छल हुनका। समीर सोनलकेँ ताकलक। सोनल बतैलक जे ओइ काल अहाँ गाम गेल छलौं। हुनका किछु नै पता। समीर बाजल- पापा। की अहाँकेँ खबर अछि जे बापटक मर्डर भऽ गेल अछि पछिला दिन। नहरमे हुनकर लाश भेटल छल। आ अहाँ आश्चर्य करब जे एफ.आइ.आर. अही बेटाक नामे अछि। पेपरमे आएल छल ई समाचार। अही बेटाकेँ ओ अनाथालयसँ अडाप्ट केने छल, जखन ओ बच्चा छल। पढ़ैलक, लिखैलक, कोनो नोकरी सेहो दिआ देने छल ओकरा। चालि-चलन नीक नै छलै तइसँ निकालि देने छल ओकरा घरसँ। ई चाहै छल जे अपना रहिते फ्लैट ओकर नाम लिखि दिअए। शायद लिखबाइओ लेने छल ओ, ऐ शर्तपर जे ओ ऐमे तहिये आएत जखन ओ नै रहत। कहब मुश्किल अछि जे की कोना भेल। रघुनाथ काठ सन बैसल रहल- बिना हिल-डुल। कनी कालमे चश्मा उतारलक, गरमे लपेटल मफलरसँ पोछलक, फेर लगा लेलक। जना ओ बापटकेँ देखऽ चाहै छल। ऐ नगरमे एलाक बाद जे लोक असगरे हुनकर दोस्त हैत छल हुनकर ओ बापट छल। हुनकर मुँहसँ आश्चर्य सन नै, एकटा आह सन निकलल ई वाक्य- ई की हैत जा रहल अछि लोककेँ। ई केहन हैत जा रहल अछि दुनियाँ। हम बड़ नीक नै रही मुदा एत्ते खराब सेहो नै छलौं। -पापा, समीरसँ कहि रहल छी जे ऐ नगरमे जखन अप्पन घर अछि तँ ओत्तऽ किए। उपरो तँ एकटा कमरा खाली पड़ल अछि। रघुनाथ कातर भऽ कऽ हाथ जोड़लक- जे करबाक अछि करू, हमरा असगरे छोड़ि दिअ। प्लीज। रघुनाथ बिना खेले-पिले राति गुजारि देलक। नीन नै एलै। ओ कोठलीमे बत्ती मिझा कऽ सुतैत छल मुदा आइ जड़ैत छोड़ि देलक। एक बजे राति हुनकर आँखिक आगू बापटक चेहरा घुमैत रहल आ कानमे ओकर गीत- हाए हाए ये जालिम जमाना। मुदा एकर बाद हुनकर हृदएक अबाज कानमे धक-धकक बदला मारलक-मारलक कहि धड़कब शुरू कऽ देलक। रोशनीक रंग पीअरसँ लाल हुअए लागल। फेर तँ ओ जिम्हर नजरि घुमाबै छल, उम्हरसँ कोदारि, कुड़हरि, हाँसू, चक्कू, पघरिया, ईंटा, पाथर, पेस्तौल कूदैत-फांगैत ललकारा दैत लखाह दै छल। कनी कालमे रोशनी नै, जना शोनितक फूही उड़ए लागल आ चारू दिस दीवार लाल भऽ गेल। ओ उठि कऽ बैस गेल आ अपनासँ बाजल- ऐ दुनियाँमे कहियो हरियरका रंग होइत छलै भाइ, ओ कतऽ गेलै? * जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब। साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा छल दुपहरिया। कनी काल पहिने रौद छल। ओ खाना खैले छल आ खा कऽ अखन अपना कोठलीमे पटायल छल, आकि अन्हर-बिहाड़ि। घरक सभटा खिड़की दरबज्जा भड़-भड़ करैत अपने-आप बन्द-खुलय लागल। छिटकिन्ने छिड़िया कऽ कत्तौ खसल, सभ बौस्त उघड़ा-भाँड़ हुअए लागल, जेना धरती हिलि गेल हुअए। देवार थरथराए लागल। अकास कारी भऽ गेल आ चारू दिस घोर अन्हार। ओ उठि कऽ बैसि गेल। आंगन आ लॉन पैघ-पैघ बर्फक पाथरक पथार लागि गेल आ रेलिंग टूटि कऽ खसल-धड़ाम। ओकर बाद जे मूसलाधार बर्खा शुरू भेल तँ ओ पानिक ठोप नै छल, लागल जेना ओ पानिक रस्सी हुअए जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहे तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतएसँ ई छोड़ल बा खसाएल जा रहल अछि। मेघ लगातार गड़गड़ा रहल छल- दूर नै, माथपर बिजली कड़कि रहल छल, दूर नै खिड़कीसँ भीतर आँखिमे। एकहत्तरि बरखक बूढ़ रघुनाथ आश्चर्यचकित। ई अचानके की भऽ गेल। किए भऽ रहल अछि। ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, शरीरसँ सीरक अलग केलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल। खिड़कीक दुनू पल्ला गिट्टीक मदतिसँ खुजल छल आ ओ बाहर देखि रहल छल। घरक बाहर कदम्बक बड़ पैघ गाछ छल मुदा ओकरा पता नै चलि रहल छलै ऐ अन्हारक कारण, घनघोर बर्खाक कारण। छतक डाउन पाइपसँ जलधारा खसि रहल छल आ ओकर अबाज अलगसँ सुनाइ पड़ि रहल छल। एहन मौसम, एहन बर्खा आ एहन हवा ओ देखने नै छल। दिमागपर जोर देलाक बाद मोन पड़लै-साठि-बासठि बरख पहिने। ओ स्कूल जाए लागल छल- गामसँ दू मील दूर। मौसम खराब देखि कऽ मास्टर साहेब समएसँ पहिने छुट्टी देने छल। ओ सभटा बच्चा संग गाछीमे पहुँचले छल आकि बिहारि, बर्खा आ अन्हार। सभ आमक गाछक अढ़ लैले चाहलक मुदा बिर्रो हुनका घास सन उड़ेलक आ गाछीसँ बाहर धानक खेतमे जा कऽ पटकि देलक। ककरो झोरा-झपटा आ किताब-कापीक पता नै। बर्खाक बुन्नी हुनकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छल, ओ कानऽ बाजऽ लागल। बिर्रो थमलाक बाद जखन बर्खा कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ टॉर्च लऽ कऽ निकलल छल खोज लेल। ई एकटा दुर्घटना छल आ दुर्घटना नै हुअए तँ जिनगी की? आ ईहो एकटा दुर्घटने छल जे बाहर एहन मौसम अछि आ ओ कोठलीमे अछि। कतेक दिन भऽ गेलै बर्खामे भिजला। कतेक दिन भऽ गेलै लू केर झोकसी झोकेला। कतेक दिन भऽ गेलै जेठक घाममे डुमना। कतेक दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे घुमना। कतेक दिन भऽ गेलै जाड़मे ठिठुरना, दाँत कटकटेना। की ई तइसँ होइए जे हम एकरासँ बचल रही। बचि कऽ चली। या तइसँ जे एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्ती करी, गप करी, माथपर बैसाबी। हम एकरासँ ओना व्यवहार करै छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए करै छी एना। इम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लागै छल जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य- ई मेघ, रौद, गाछ-बृच्छ, फसिल, धार-नाला, कछार, जंगल-पहाड़ आ ई सभ किछु एत्तै छूटि जाएत। ओ सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैलऽ चाहै छल जेना ओ भले चलि जाएत, आँखि रहि जेतै, चामपर सभ चीजक थाप सोखऽ चाहैए जेना चाम केचुली सन एतऽ छूटि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका धरि पहुँचैत रहत। हुनका लागै छल जे बेसी दिन नै बचल अछि हुनका जाइमे। सम्भव अछि जे ओ दिन काल्हि हुअए जखन हुनका लेल सूर्य नै उगए। उगत जरूर, मुदा ओकरा दोसर देखत- ओ नै। की ई संभव अछि जे ओ सूरजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए- नहिये ओ रहए, नहिये उगए आ नहिये देखए। मुदा एकटा सूरज पूरा धरती तँ नै, ओ कोन-कोन चीजकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखैसँ रोकत। हुनकर बाँहि एतेक नम्हर भऽ जाइए जे ओ ओइमे पूरा धरती समेट लिअए आ मरए बा जिअए तँ सभक संग। मुदा एकटा कचोट आर छलै रघुनाथकेँ जे ओकरा कचोटि रहल छलै, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम। धरतीसँ प्रेमक। ई व्यग्रता। काल्हि सेहो ई धरती छल। ई मेघ, अकास, तारा, सूर्य आ चन्द्रमा। धार, झरना, सागर, जंगल, पहाड़। ई गली, मकान, चौबटिया। कतऽ छल ई उद्वेग। फुर्सति नै छलै एकरा सभकेँ देखबाक। आइ जखन मृत्यु बिलाइ जना आस्तेसँ कोठलीमे आबि रहल अछि तँ बाहरक जिनगी सुनाइ दऽ रहल अछि। -सत सत बताउ रघुनाथ, अहाँकेँ भेटल जकरा लऽ कऽ कहियो सोचने छलौं। कहियो सोचने छलौं जे एकटा छोट गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब। पीढ्चीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नीमक खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैस कऽ लंच आ डिनर करब। मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अवाज बाहरक गड़गड़ाहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अपना वशमे नै छल। हुनकर नजरि गेल कोनमे ठाढ़ लाठी आ छत्ता दिस। जाड़क ठंढी ओहिनो भयानक छल ऊपरसँ पाथर आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। खोललक की, ओ ओत्तै ठाढ़ छल आ अपने-आप खुजि गेलै। भीजल हवा सनसनाइत अंदर आएल आ ओ डरि कऽ पाछाँ हटि गेल। फेर साहस केलक आ बाहर निकलैक तैयारी शुरू केलक। पूरा बाँहिमे थर्मोकोट पहिरलक, ओइपर सूती अंगा, फेर ओइपर स्वेटर, ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट पहिने पहीर लेने छल। ई जाड़क भोरमे पहिर कऽ टहलैक कपड़ा छलै। छलै तँ मफलर सेहो मुदा ओकरासँ बेसी जरूरी छलै- गमछा। बर्खाकेँ देखैत। जना-जना कपड़ा भिजतै, ओ एक-एक कऽ उतारैत आ फेकैत जाएत आ अंतमे रहि जेतै ई गमछा। ओ अप्पन साज-बाजक संग अखनो पूरा आश्वस्त नै छल। उघार, बिना केसक माथकेँ लऽ कऽ ओ दुविधामे छल- कनटोप ठीक रहत बा गमछा बान्हि लिअए। पाथर जे खसबाक छल, शुरूहेमे खसि गेल छल आ आब ओकरा कोनो अंदेशा सेहो नै छलै। ओ गमछाकेँ गरमे चारू दिससँ लपेटलक आ उघारे माथे बाहर आबि गेल। आब नहिये कियो रोकैबला आ नहिये टोकैबला। ओ बाजल- हे मन। चलू। घुरि कऽ एलौं तँ वाह-वाह। नै एलौं तँ वाह-वाह। पाथरबला बर्खाक अन्हार सुरंगमे उतरैसँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भारक संग एक ठेग बढ़ब हुनका लेल मुश्किल हएत। ओ अप्पन कमरासँ निकलि आएल मुदा गेटक बाहर नै जा सकल। छत्त खुजैसँ पहिने जे पहिलुक ठोप ओकर उघार, खल्वाट माथपर खसल, ओ एतेक पलखति नै देलक जे ओ बुझि सकए जे ई बिजली कड़कल अछि आकि लोहाक किल्ली अछि जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतरे तड़बा धरि पैसि गेल अछि। ओकर पूरा शरीर झनझना उठल। ओ निराउ बर्खामे बैस गेल मुदा भीजैसँ नै बचि सकल। जखन धरि छत्ता खुजल, ताधरि ओ पूरा भीज गेल छल। आब ओ फँसि गेल छल- बर्फबला हवा आ बर्खाक बीच। हवा घास सन ओकरा ऊपर उड़ा रहल छलै आ बर्खा जमीनपर पटकि रहल छलै। भीजल कपड़ाक भार उड़ऽ नै दऽ रहल छलै आ हवा घिसियेने जा रहल छलै। हुनका एतबे टा मोन छलनि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसल आ ई तखन धरि चलल जखन छत्ताक कमानी टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बाहर गाएब भऽ गेल। आब हुनका एहन लागि रहल छल जे हवा ठाम-ठामसँ नोचि रहल अछि आ पानि दागि रहल अछि- जरैत छोलनीसँ। अचेत हैकऽ खसैसँ पहिने हुनकर दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे आएल- हुनकर मित्र। ओ दू बेर आत्महत्या करैक प्रयास केने छल- पहिलुक बेर लोहता स्टेशनक लग रेल पटरीपर नग्रसँ दूर निर्जन स्थलपर, जतऽ ककरो आएब-जाएब नै छल। समय ओ पैसेंजर बा मालगाड़ीक नै, एक्सप्रेस आकि मेलक चुनने छल। जे हैक अछि खटसँ हुअए, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल जे मेल आबैत देखलक। जाने की, ओहि सं जीवनक मोह पैदा भेल आ उठि केर भागहि मे भेल जे घुटनाक लग पइर खचाक। ई मरहि से बेसी खराब भेल। बैसाखीक सहारा आ घर बला केर गाइर अ दुत्कार। एक बेर फेर आत्महत्याक जुनून सवार भेल ओहि पर। अहि बेर सिवानक इनार। ओ बैसाखी फेंक छलांग लगैलक आ पइन मे छपाक कि बरोह पकड़ि मे आबि गेल। तीन दिन बिना खायल पियल भूखल चिल्लाबैत रहल इनार मे-आओर निकलल ते दोसर टूटल पइरक संग। आइ वएह ज्ञानदत्त बिना पएरक ज्ञानदत्त चौराहापर भीख मांगैए। मरैक आस ओकरा कतौकऽ नै छोड़लकै। मुदा ई साढ़ ज्ञानदत्त ओकर दिमागमे किए नै आएल। ओ मरै लेल निकलल नै छल। निकलल छल बुन्नी लेल, पाथर लेल, हवा लेल। ओ परिणाम निकाललक जे जीवनक अनुभवसँ जीवन पैघ अछि। जखन जीवने नै, तँ अनुभव ककरा लेल। * रघुनाथकेँ किछु पता नै जे ओ अप्पन कोठलीमे केना पहुँचल। के लऽ गेल। कखैन लऽ गेल। केना लऽ गेल। कपड़ा के उतारलक? देह के पोछलक आ तीस बरखक पुरना खादी आश्रमबला ओ गाउन आ ओवरकोट के पहिरलक जकर रोइयाँ झड़ि गेल छल आ जे जलफाँफीटा रहि गेल छल। ओ नीचाँसँ उघार छल आ गर्भमे पड़ल नेना सन बुक्की मारने बिछौनपर पड़ल छल। हुनका ऊपर कंबलक संग सीरक पड़ल छल जकर नीचाँ ओ दबल छल। हीटरसँ कमराकेँ गर्म कऽ देल गेल छल। हुनकर पएरक तरबामे समीर तेल रगड़ि रहल छल आ दोसर तरबामे सोनल। गरम तेलसँ अजमाइनक गंध आबि रहल छल। रघुनाथक गरसँ निकलैबला फोंफ बता रहल छल जे चिंताक कोनो गप नै अछि। ओ बेहोशीमे लागि रहल छल- नीनमे बेसी, जागलमे कम। परिस्थितिकेँ बुझबाक लेल सोनल हुनका दू-तीन बेर अवाज देलक। देहमे कनी हिलडोल भेल मुदा आँखि नै खोललक। राति आधसँ बेसी बीत गेल छल। बत्ती मिझा दिअ?- समीर पुछलक। सोनल बाजल- मिझा दियौ। रघुनाथक मनमे भेल जे मना कऽ दिऐ। तरबा लग बैसैत समीर पुछलक- काल्हि कए बजे अछि अहाँक क्लास। -काल्हि नै, आइ कहू। नऽ बजेसँ। मुदा छुट्टी लिअ पड़ि सकैत अछि। -अरे नै, नीक भऽ जाएत भोर धरि। टनाटन। ठार लागि गेल अछि। ओ तँ कहू जे हम समएसँ पहुँचि गेलौं। जेना गेट लग किछु खसैक आवाज भेल, हम दौड़लौं आ देखलौं तँ पापा। (देखू ई झुट्ठाकेँ। कत्तौ नै दौड़ल। पोर्टिकोसँ डंटा कोंचि-कोंचि कऽ देखलक। अपने डरल छल जे नै जानि की भेल। कुकुड़, बिलाइ जानि कऽ।) ओइ दुनूक अवाज रतजग्गी सन छल- खस-खस आ फुस-फुस। ओ आस्तेसँ फुसफुसा रहल छल, तइसँ रघुनाथक नीन उचटै नै। ओ अपन नीचाँ कंबल ओछा कऽ राखने छल आ शाल ओढ़ने छल। -एक गप कहू जे पापा शुरूसँ एहन लोक छल? झक्की आ जिद्दी। अपना मोनक।- समीर बाजल। -पहने ई हाथ हटाउ। -केहन हाथ। -यार, सेंसेशन भऽ रहल अछि। गुदगुदी। बुझै नै छी की? -बगलमे बैसै छी तँ कखनो सुनै छी हमर। (रघुनाथकेँ बत्ती मिझाबैक रहस्य आब बुझैमे आएल। ओ सीरकक भीतर घोकचि बंद आँखिये सभ किछु देखि-सुनि रहल छल आ मारे लाजक नहिये करौट लिअ सकैत छल, नहिये हिलि रहल छल।) -सोचै छी मम्मी आ दीदीकेँ खबर दऽ दी। -जेहन अहाँ चाही, ओना जरूरत नै अछि एकर। -सोचू जौँ अहाँ नै हेतिऐ तँ की हेतिऐ? असगरे की करतिऐ हम? एइयू! अनचोक्के चिहुँकि उठल ओ। की करै छी ई? धैर्य नै अछि? -केना हएत? ठंढी तँ देखू। समीर ओकरा आर लग-आरो लग आबैत कानमे बाजल-रोकबाक अछि तँ मौसमकेँ रोकू। सुनि रहल छी- फेर टिप टिप। ई बुन्नी किछु कहि रहल छल। की कहि रहल छल? आवाज समीरक गरमे कत्तौ फँसि गेल छल आ टूटि रहल छल। -सम्मी। प्लीज।- सोनल बेचैनीमे अप्पन माथ रघुनाथक ओइ पएरपर राखलक जकर तरबा ओकर तरहत्थीपर छलै। ओकर गर्म साँस हुनकर आंगुरपर हवा कऽ रहल छल। -दोस। उठू तँ। पापा सुति गेल अछि, हुनका सुतऽ दियौ। समीर जना गिड़गिड़ाइत बाजल। सोनल ठेहुन भरे बैसल रहल आ रघुनाथक तरबापर माथ रखने सोनल बीच-बीचमे सिहरि उठए। ओ भारी टूटैत अबाजमे कहलक- बुझै किए नै छी? ऐ हालमे कोना छोड़ि दिअ हिनका? कखैन केकर जरूरत पड़ि जाए। मुदा ओकर एक नै सुनलक समीर। ओ बैसल सोनलकेँ लगभग अप्पन कोरामे उठैलक आ लेने-देने कोठलीसँ बाहर भऽ गेल। रघुनाथकेँ खराप नै लगलै। ओकर तरबामे पड़ल ओकर माथ जेना पहिने क्षमा मांगि लेने छल। अखन उमेर छेबे की करए। रघुनाथ मन बनैलक जे जौं ओ समीरकेँ प्रेम करैए आ ओकरा संग घर बसाबऽ चाहैए तँ ओ पापाक हैसियतसँ कन्यादान करबामे पाछू नै हटत। रघुनाथकेँ पूरा तरहे स्वस्थ हेबामे एक सप्ताह लागि गेलै। ओ सीरक ओछा कऽ लॉनमे पटा कऽ रौद सेकि रहल छल- दुपहरियामे। सोनल आ समीर अप्पन काजपर चलि गेल छल। सभ दिन सन अपनामे हँसी मजाक करैत। गाड़ीमे सोनलक बगलमे बैसैत समीर हाथ हिलेलक-बाइ-बाइ पापा, हैव अ गुड डे। जवाबमे रघुनाथ सेहो हाथ हिलैलक- पटायल-पटायल। के जानए, हाथ हिलल बा नै। घंटा भरि बाद हुनकर आँखि मिचमिचाएल, आकास दिस देखलक आ उठि बैसल। बैसल एहन लागि रहल छल जना लॉनमे कोनो सुखाएल बोन्साइ हुअए। आब खाली देवार छल आ ओ छल आ रौद छल। कनी काल लागल हुनका सामान्य होइमे। -गुड डे।- ओ आस्तेसँ बाजल। -गुड डे।- ओ मुस्की देलक। -गुड्डे।- हुनकर आँखि नोरा गेल। ओ चौंकि कऽ झटपट आँखि पोछलक आ खुशीसँ हँसल। आब ओ पूर्ण रूपेँ सुस्थिर चित्त छल। मुदा के कहए पूरा तरहेँ। किएकि मास भऽ गेल छल आ कत्तौसँ कोनो खबरि नै छल- नहिये मिर्जापुरसँ, नहिये नोएडासँ, नहिये अमेरिकासँ, नहिये पहाड़पुरसँ। शाइत सभकेँ बूझल भऽ गेल छलै जे रघुनाथ हुनका सदा लेल बिसुरि गेल अछि, बिसुरि नै गेल, मरल मानि लेने अछि। माया-मोह त्यागि कऽ। कॉलोनी ओहिना निर्जन आ उदास अप्पन घरमे पैसल छल। अहिनामे हुनकर दरवाजापर एकटा बोलेरो जीप ठाढ़ भऽ गेल आ ओइसँ दूटा युवा बहार भेल। ओ वएह छल जकर चर्चा केने छल गामक सनेही। अखने किछु दिन पहिने। ओ पएर छूबि कऽ हुनकर अगल-बगलमे बैस गेल। रघुनाथ ध्यानसँ देखलक- ओ विश्वविद्यालयक लड़का सन जीन्स आ स्वेटर पहिरने छल। एकदम टीप-टॉप। भला आ सभ्य घरक। पुछलापर नाम नै बतौलक ओ। ओ सभ चौकन्ना छल आ हड़बड़ीमे लागि रहल छल। रघुनाथ चाह पानि लेल पुछलक मुदा ओकरा सभकेँ एत्ते फुर्सति नै छलै। -सर, ऐपर सिग्नेचर कऽ दियौ। एक गोटे एकटा कागज बढ़ौलक जइपर पहिनेसँ किछु लिखल छल। रघुनाथ चश्मा लगा कऽ पढ़ब शुरू केने छल जे दोसर छीन लेलक- हमरासँ पूछू ने। हम बता दै छी। पहिने सिग्नेचर करू। रघुनाथ ओकरा नीक जकाँ देखलक। ओ रिवाल्वर निकालि कऽ दरीपर हुनकर आगू राखि देलक। -कतेक देने अछि नरेश। अस्सी हजार। एक लाख। ऐसँ बेसी दाम तँ नै अछि जमीनक।- पुछलक रघुनाथ। -सिग्नेचर करै छी आकि नै। -ओ तँ कऽ देब मुदा हम दू लाख दिआए दी तँ? -दू लाख? कतऽसँ दिआएब? -एकरासँ अहाँकेँ मतलब। दिआए दी तँ? दुनू एक-दोसरा दिस ताकलक- तँ जे कही से कऽ देब। -मारि देब नरेशकेँ? -सेहो कऽ देब। -मुदा हम ओकरा मारै लेल नै कहब। काज वएह करी जइमे खतरा कम हुअए, पाइ भेटए। जतेक मामूली रकम लेल अहाँ दौड़ल आएल छी ओतेपर तँ लगही करैत अछि हमर एकटा बेटा। -तइसँ एतेक गन्ध मारि रहल छी, ओइमे नहाबै छी की। नम्हरबला लड़का हँसी केलक। -की कहलौं? रघुनाथ अप्पन हाथ कानपर लऽ गेल-कनी ऊँच बाजू। -किछु नै, बताउ तँ की करबाक अछि? पहिने पेस्तौल जेबीमे राखू आ ओ कागज हमरा दिअ बा फाड़ि दिअ। -हँ, कहू।- रिवाल्वर जेबीमे राखैत दोसर बाजल। -हमरा लेने चलू। अपहरण करू हमर आ मांगू दू लाख। -के देत अहाँ सन सड़ल-गलल बुढ़बाकेँ दू लाख। -खाली दू लाख, तइसँ जे ई पाइ दैमे कनियो नै अखरतै। भेट जाएत आ हत्यासँ सेहो बचि जाएब। -अरे के देत ऐ सड़ल-गलल केर। -सड़ल गलल छी अहाँ लेल, बेटा लेल तँ नै, बेटी लेल तँ नै। -मानि लिअ एकरामे सँ किओ पाइ दै लेल नै आएत, तखन? -से देखबाक अछि जे कियो आबैए की नै? -हमहूँ तँ सैह कहि रहल छी जे कियो नै आबए तखन? रघुनाथ क्षण भरि सोचलक- तैयो चिंता नै। एतेक गेल-गुजरल हम नै छी। एतेक तँ हमरा लग अछि जे अपनाकेँ छोड़ा लेब। -बैसल रहू हिलब नै। दुनू उठल, कनी दूर जा कऽ आपसमे खुसुर-फुसुर केलक, फेर ओत्तैसँ आवाज देलक- ठीक अछि चलू। -तँ आउ, समेटू सीरक। रघुनाथ ठेहुनपर हाथ राखि कऽ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। दुनू चकित भऽ देखलक- सीरकक की करब? -ओढ़ब, ओछाएब, सिरमा बनाएब- जरूरत पड़त तँ लुंगी बना लेब आर की? रिवाल्वरबला लड़का सीरक समेटैत पुछलक- किछु खास अछि ऐ सीरकमे? -अछि ने। बेटा पठेने अछि कैलिफोर्नियासँ। मुदा ई सीरक सन तँ नै लागैए।- दोसर संदेह केलक। -लागए नै लागए, हम तँ से कहै छी।- कहैत रघुनाथ बिदा भेल। -रौ बूढ़, जाए कतऽ छी? कमसँ कम पैसा तँ राखि लिअ। दस दिनक फोन-फान, राशन-पानी, पेट्रोल सभक। खाएब की? -सभ हमहीं करब तँ अहाँ सभ की करब? बैस कऽ नोट गानब की? रघुनाथक भौंह तनि गेलै। हुनकर भीतरक मास्टर फनफना उठल- आ सुनू, अहाँ सन लौंडाकेँ पढ़ाबैत उमर गुजरल अछि हमर, तइसँ आदरसँ गप करू। हमर जरूरत अहाँकेँ अछि, हमरा कोनो जरूरत नै अछि अहाँक। बुझलौं। रिवाल्वरबला लड़का आस्तेसँ बाजल- आस्तेसँ-चलू तँ पहिने। ओत्तै बतबै छी जे ककरा ककर जरूरत छै। -किछु कहलौं?- रघुनाथ थकमका गेल। -किछु नै, चलू। रघुनाथ जखन डंटाक सहारे बाहर आएल तखन ओकर मुँह बानरटोपीक भीतर छल आ सीरक लड़काक कन्हापर। ओ आगू जा रहल छल, दूनू अपहर्ता लड़का पाछाँ-पाछाँ- जेना ओ बेटाक संग मगन तीर्थपर जा रहल छल। गीतेश शर्मा- भारतीय मुसलमान आ भारतीयता (हिन्दी आलेख) गीतेश शर्मा भारतीय मुसलमान आ भारतीयता (मूल हिन्दी आलेख केर मैथिली अनुवाद- उमेश मण्डल) भारतीय मुसलमानक किछु एहेन खुबी रहल अछि जइ कारणेँ हुनका सभकेँ ‘मुसलमान नहि कहि ‘भारतीय मुसलमान’ कहब बेसी नीक होएत। दुनियॉंक कोनो देशक मुसलमान-समाजसँ हिनकर तुलना नहि कएल जा सकैत अछि। भारतक माटि-पानिमे रचल-बसल ऐ समाजक दैनंदिनक जीवन, आचार-बेवहारक इस्लामसँ दूरोक सम्बन्ध नहि, परन्तु दिक्कत तखन होइत अछिजखन इस्लामक केन्द्र सऊदी अरबकेँ ई लोकैन अपन सोचक केन्द्र मानि लइ छैथ आ ओतए-सँ आबि रहल हवाक सुगन्धकेँ महसूस करैक दाबी करै छैथ, जखन कि सच्चाइसँ एकर कोनो सरोकार नहि होइत। जेना किकहल गेल अछि, ई अपन रोजमर्राक जिनगी आ बेवहारमे इस्लामक ऐसी-तैसी करै छैथ, मुदा जँ कियो अन्तिम पोथी- ‘कुरान-ए-पाक’आ अन्तिम पैगम्बर ‘हजरत मुहम्मद’केँलऽ कऽ कियो सबाल उठबए तँ मरै-मारैले उताहुल भऽ जाइ छैथ। मजगर बात ई अछि जे ई सभ भारतमे जे करि लइ छैथ, यएह जँ सऊदी अरब मक्का-मदीनामे करैथ तँ या तँ हिनका सजा-ए-मौत मिलतैन वा बिना कोनो हीले-हवालेक हिनका ओतएसँ निकालि कऽ बाहर करि देल जेतैन। ई कहैमे कनिक्को परहेज नहिजे ऐ समाजक लोक निरपवाद रूपमे ओ सभ सभ काज करै छैथजेकर कुरान-ए-पाकमे सख्त मनाही(मुमानियत)कएल गेल अछि, संगे अल्लाह आ हजरत मुहम्मद सेहो जैपर सख्त पाबन्दी लगौने छला। ऐ मुद्दाकेँ आगू बढ़ेलासँ पहिने हम एकटा छोट-छीन उदाहरण देबए चाहब, हमर एक शुभेच्छु मित, जे जनै छैथ जे हम साए प्रतिशत नास्तिक छी, एक दिन साँझू पहर हमरासँ भिड़ गेला आ इस्लामकेँ लऽ कऽ बहस करए लगला। मौका पाबि हम लगे-हाथ कहलयैन- “अहॉंक मुहसँ इस्लामक बात शोभा नइ दैत अछि, किएक तँ नियमसँ अहॉं मुसलमान छीहे नहि!” हुनकर ऑंखि लाल भऽ गेलैन। ओ तमसाकऽ बजला- “ई कहबाक अहॉंक हिम्मत केना भेल?” हम कहलयैन- “दोस (मियां), हमरा बजैक मौका तँ दीअ आर ताबेतक अपन तामसपर कंट्रोल राखू।” हम सबालक ढेप बरिसबैत पुछलिऐ- “अहॉं शराब पीने छी?” निच्चॉं नजैर केने ओ धीरेसँ बाजल- “हँ।” हमर दोसर सबाल छल- “अहॉं पथिया लगबै छी। माने फुटपाथिया दोकान। भिनसर-सँ-साँझ धरि गहिंकीसँ मात्र झूठे नहि बजै छी, बल्कि सप्पत खा-खा कऽ झूठ बजै छी। मुदा जखन सौदा नइ पटैए तँ अधलाह जबानसँ ओकरा अधलाह गारि सेहो दइ छिऐ,की ई छी अहॉंक इस्लाम?” ऐठाम ई साफ करि दिअ चाहै छी जे ई बात हिंदुओ भाय लोकैनपर लागू होइते अछि। खास कऽ ओइ हिन्दूपर जे अपने-आपकेँ धर्मक ठीकेदार मानै छैथ। हम अपन मुस्लिम मितकेँ कहै छिऐन जे अहॉं अपना-आपकेँ भारतक माटिमे तइ तरहेँ रचा-बसा नेने छी जे ऍंड़ी-सँ टिकासन तक अहॉं सुच्चा भारतीय छी, मात्र देखाबाक लेल अहॉं इस्लामी मुखौटा लगबै छी, जइसँ हिंदु आ मुसलमानक बीच ऐ तरहेँ दूरीक जन्म होइए जइसँ रोटी-बेटीक रिश्ता-नाता तँ दूर जे एक थारीमे बैसकऽ खेना-पीनाइ तक असान नहि, जखन कि सच्चाइ ई अछि जे भारतक तहजीबक नीक-बेजाए कोनो एहेन पहलू नइ अछि जेकरा अहॉं अपनेने नहि होइ, बल्कि कतेको मामलामे तँ अहॉंकेँ महारत हॉंसिल अछि। आउ किछु बिन्दूपर खुलिकऽ चर्च करी। इस्लाममे जाति-पाति नहि अछि, परन्तु भारतीय मुसलमानमे तँ अछिआ सेअइछे नहि, बहुत बेसी तर तक अछि। आपसमे बेटीक बिआह नइ होइए। शेख सैयद, खान-पठान ऊँच जातिक, कुंजरा-जुलाहा-अंसारी नीच जातिक मानल जाइ छैथ। शादी-बिआहक रस्म-रेबाज मजहबी दूरीक बावजूद हिंदु आ मुसलमानमे ऐ तरहेँ मिलल-जुलल अछि जे ई कहब बहुत कठिन, जे ई रेबाज केकरासँ के लेलक। किएक तँ ‘वेद’ आ ‘कुरान-ए-पाक’मे ऐ रेबाजक केत्तौ कोनो जिकिर नहि। शेरवानी पहिरब, सेहरा लगाएब, चुहलबाजी करब, मेहदी-उबटन लगाएब, जुआ खेलब इत्यादि-इत्यादि सभ रेबाज अहीठामक छी, कोनो सऊदी-अरब, ईरान-इराकसँ थोड़े आएल अछि। नाच-गान, ऐक्टिंग करब, पेंटिंग करब, एतए तक कि शास्त्रीय संगीत आ भजन गायनमे मुसलमान अव्वल दर्जापर अछि। फिल्म हुअए कि नाटक आकि चित्रकला, एतए तक कि मूर्ति बनाएब ऐ सभ क्षेत्रमे मुस्लिम कलाकार आ कारीगर माहिर रहल अछि। जखन कि ऐ सबहक ‘कुरान-ए-पाक’मे सख्त मनाही कएल गेल अछि। अधिकतर मुस्लिम देशमे ऐ सभपर सख्त पाबंदी अछि। उदाहरणक तौरपर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां लिअ, की बिस्मिल्लाह खां सऊदी अरबमे शहनाइ बजा सकै छला? फ़िदा हुसैन अगर मक्का मदीनामे चित्रकारी करितैथ तँ हुनका ता-उम्र जेलमे बितबए पड़ितैन। मुदा ऐ कलाकार सभपर भारतकेँआत्म-सम्मानक भान भेलै आ हुनका सभकेँ पैघ-पैघ इनामसँ नवाज़ल गेलैन। भजन गायन? तौबा-तौबा। गबैबला मुसलमान, भजन लिखलैन मुसलमान, मौसीकार मुसलमान, पर्दापर गबैबला मुसलमान आ ऐ सभकेँ पेश करैबला प्रोड्यूसर सेहो मुसलमान। आइयो जखन ओइ भजनकेँ कियो सुनैए, तँ आस्तिक होथि वा नास्तिक भक्ति रसमे डुमि जाइए। केतेक नाओं गिनाबी कलाकार सबहक, समुच्चा पोथी लिखए पड़त। मुदा तैयो किछु कलाकारक नाओंकेँ जिक्र करब जरूरी अछि जेना- ‘गुलाम अली खां, अलाउद्दीन खां, उस्ताद अमीर खां, बेगम अख्तर, बिस्मिल्लाह खां, उस्ताद अल्ला रखा, आगा हश्र कश्मीरी, नौशाद, मुहम्मद रफ़ी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, सुरैया आदि। लेखन जगतमे ‘अमीर खुसरो’, पहिलहिन्दीमे लेखक छला, जिनकर लिखल गीत आइयो हिंदुक शादी-बिआहमे गाएल जाइत अछि। मलिक मुहम्मद जायसी नइ होइतैथ तँ कि रानी पद्मावती होइतैथ? रहीमक दोहा सभसँ के परिचित नइ छैथ? श्रीकृष्णपर रसखानक लिखल गीतक आइयो कियो बराबरी नहि। कबीर रहीम गोस्वामी तुलसीदासक समकालीन छला। तुलसीदास जखन रामचरित मानस लिख लेलैन तँ पोथीक पहिल प्रति कवि रहीमकेँ भेँट केलैन आ हुनक राय मंगलखिन। पोथी पढ़ि रहीम जे टिप्पणी केलैन, पाठककेँ जनतब हेतु ओकरा हम एतए छापि रहल छी- “रामचरित मानस बिमल सेतन जीवन प्राण हिंदुआन को वेद सम जमनहिं प्रकट कुरान।” (अब्दुर्र रहीम खानखाना) सैयद महफ़ूज़ हसन रिज़वी ‘पुण्डरीक’हमर करीबी मीत तँ नहि मुदा मीत छला। हमर हुनकासँ मित्रता ग़ज़लकार जितेन्द्र धीरक ओजहसँ भेल। नास्तिक होइतो रामचरित मानसपर हम अनेको प्रवचन सुनलौं। हमरा नजैरमे पुण्डरीक सभसँ अव्वल रहला। रामचरित मानसपर जखन ओ बजै छला तँ लोक सभ सम्मोहित भऽ कऽ हुनक व्याख्यान सुनैत छल। लगबे ने करै छल जे कोनो मुसलमान रामचरित मानसपर बाजि रहल छैथ। ओ निखालिस भारतीय मुसलमान छला आ भारत वर्षक तहज़ीबकेँ ओ आत्मसात कऽ नेने छला। ई बहुत कम लोक जनै छैथ जे उर्दूमे मोहब्बत आ मुल्क परस्तीकेँ लऽ कऽ बहुत बेसी गजल-शायरी लिखल गेल,आन-आन जबानक तुलनामे। मुस्लिम कारीगर अगर तीन मासक अवकाश लऽ लैथ तँ महल-झोंपड़ी, मन्दिर-मस्जिद बनब बन्द भऽ जाएत। जेवरात बनबैसँ लऽ कऽ हीरा तराशब, जड़ी-बुटीक कारीगरी, दर्जीगिरीक क्षेत्रमे सत्तर प्रतिशतसँ बेसी कारीगर भारतीय मुसलमान छैथ और हुनकर कारीगरीक बेपार करैबला हिंदू। मध्यपूर्वक देशमे लाखो मुसलमान कारीगर काज करैले जाइ छैथ आओर अपन कमाएल कमाइक निवेश भारतमे करै छैथ न कि यूरोप, अमेरिकाक बैंकमे। भारतीय मुसलमानक त्रासदी ई अछि जे ओ जनबे ने करै छैथ, भारतीय तहज़ीबमे सोल्होअना रंगल भारतीयताक स्वतंत्र देन रहल अछि। ओइ कौमक लोकक भारतीय तहज़ीबकेँ बेइन्तहा देन रहल अछि। जइ दिन ओ ऐ सच्चाइसँ बावस्ता भऽ जेता आ ऐपर फक्र करए लगता, हिन्दू मुसलमानक बीचक दूरी बहुत हद तक मेटा जाएत। कवि नज़रूल इस्लामकेँ लेल जाए, ओ अपन लेख आ कविताक माध्यमसँ ‘सनातन धर्म’ आओर ‘इस्लाम’पर हथौरीसँ चोट केलैन। ओ लिखलैन- दंगाक दौरान मन्दिर और मस्जिद तोड़ि देल जाइत अछि। मनुखक जान लऽ लेल जाइत अछि, ईश्वर आओर अल्लाह चुपचाप ई दृश्य देखैत रहि जाइ छैथ। मन्दिर-मस्जिद तँ फेर बनि जाएत, मुदा मनुखक जान आपस भऽ सकत? मुसलमनक सभसँ पैघ मसला ई अछि जे हुनकामे सही लीडरशिप नइ अछि। पढ़ल आ अनपढ़ल मौलवी-मुल्ला मजहबक नाओंपर हुनका भड़काबै आ भटकाबै छैन। हालक किछु वर्षमे ई देखल जा रहल अछि, हिंदू लीडारशिपक एक पैध तबका ऐ बदगुमानीक शिकार भऽ मुल्ला-मौलवीक रस्तापर चलि पड़ला अछि। दुनूक जुआन एक अछि, भड़काबै आओर भटकाबैक तरीका सेहो एक अछि, मुदा हुनकर बदकिस्मतीसँ हिंदूमे अखनो मुस्लिम कौम जकॉं कट्टरता नइ आएल अछि। ‘हिंदू धर्म’केँ लऽ कऽ बहुत हद तक खुलि कऽ चर्चाक गुंजाइश बँचल पड़ल अछि। मुस्लिम कौमक तँ ई हाल अछि जे कुरान शरीफ आओर हजरत मुहम्मदकेँ लऽ कऽ, अल्लाहकेँ लऽ कऽ नुक्ताचीनी तँ दूरक बात जे कोनो सबाल तक उठबैक इजाजत नइ अछि। मुसलमानक की प्राथमिकता तालीम, सेहत, गरीबी नहि बल्कि मस्जिद अछि। कुरान शरीफकेँ कंठस्थ करैबलाकेँ हाफ़िज मानल जाइए आओर इज्जतक नजैरसँ देखल जाइए। मात्र कंठस्त करि कऽ ‘कुरान-ए-पाक’केँ बिना समझने-बुझने..! छै ने कमाल..! मुसलमानक एक त्रासदी आओर अछि जे ओ जखन नमाज पढ़ै छैथ तँ मक्का-मदीना माने सऊदी अरब दिस मुँह घुमा कऽ, जखन कि सऊदी अरब कोनो कीमतपर हिनका अपनबै आ नागरिकता दइक लेल तैयार नहि। रहल अल्लाह केर प्रश्न, अगर ओ छैथ तँ सभ जगह छैथ। शहर कलकत्ताक एक इलाका खिदिरपुर आओर मटियाबुर्ज अछि, जेतए अस्सी प्रतिशत आबादी मुसलमानक अछि। ओतए लमसम साएसँ बेसी मस्जिद अछि, जइमे पनरहसँ बेसी मस्जिद पूर्णत: एयरकंडीशनसँ लैश अछि। करोड़ो रूपैआ लगा कऽ ओकर रौनकमे निखार आनल गेल मुदा समुच्चा इलाकामे एक्कोटा नीक स्कूल, एक्कोटा नीक कौलेज आकि नीक अस्पताल नहि अछि। मुसलमान सबहक पिछड़ापनक लेल केवल सरकारपर तोहमत लगाएल जाए आकि मुस्लिम कौमकेँ सेहो एकरा लेल जिम्मेदार ठहराएल जाए? भारतीय मुसलमान जखन अपन भारतीय सोचक जगह ‘मजहब परस्ती’केँ अन्हार-कूपमे रहब पसिन करता तँ अल्लाह सेहो हुनका ऐ सभ समस्यासँ छुटकारा नइ दिआ पौतैन। हिंदू समाजक ई खासियत अछि, विशेषता अछि जे केतेको सदिसँ एक-पर-एक केतेको समाज सुधार आन्दोलन भेल, एतए तक कि स्वामी दयानन्द सरस्वती मूर्तिपूजा (बुतपरस्ती) केँ ई कहि मुखालफ़त केलैन जे ई रेबाज वैदिक युगक पछातिक विकृति छी। ओ अपन पोथी- ‘सत्यार्थ प्रकाश’मे राम कृष्णकेँ एहेन ऐसी-क-तैसी केलैन अछि। राजा राममोहन राय, विद्यासागरआदि बाल-बिआहक विरोध आओर विधबा-बिआहक समर्थन केलैन। एतए तक कि सती-प्रथाक सेहो डटि कऽ विरोध केलैन। एकटा कानून ‘शारदा एक्ट’क तहत बाल-बिआहपर कानूनन रोक लगौल गेल। कट्टरपंथी सबहक विरोधक बादो ई कानून अमलमे लाओल गेल। ऐ मुहिमकेँ आगू बढ़ौलैन बामपंथी आ प्रगतिशील चिंतक-विचारक। मुसलमानक तुलमामे हिंदूमे जे बदलाव आएल, भलेँ सीमिते तौरपर, मुदा ओकर असर समाजपर पड़ल आ समाजकेँ ओइसँ नोकसान नहि भेल बल्कि लाभे भेल। मुदा विगत किछु बर्खसँ हिंदू कौमक चक्का उल्टा घूमि रहल अछि। रूढ़िवादी पुरातनपंथी तत्त्वक सोझहामे ई घुटना टेकने जा रहल अछि, जेकर सभसँ बेसी लाभ ओकरा भऽ रहल अछि, जे इस्लाम आ पश्चिमसँ आबि रहल खतराक नाओपर समुच्चा कौमकेँ अतीतोन्मुखी बनबैमे सफल भऽ रहल छैथ। मजगर बात तँ ई अछि जे हिंदुत्ववादी विचार पैघ-पैघसँ तायदादमे ओइ पख्श्चिममे जा कऽ बसि रहल छैथ, जिनका एतए राति-दिन कोसल जाइए। मुस्लिम कौमक नेता सभ जकॉं हिंदुत्ववादी नेता सेहो ‘हिंदू धर्म खतरामे’ अछि, ऐ नाओंपर समुच्चा कौमकेँ गुमराह कऽ रहल छैथ आओर बहुत हद तक हुनका कामयाबी सेहो भेटलैन अछि। लगैए, ईश्वर-अल्लाह एतेक कमजोर पड़ि गेल अछि कि हुनकर शख्सियतकेँ बँचबैक कोशिशमे दुनू कौमक लोक मिलिकऽ एक-दोसरक विरोधमे मोर्चा सम्हारि नेने छैथ। फलाफल ई भेल अछि जे दुनू कौमक लोक अपन बुनियादी हक- रोजी, रोटी, शिक्षा, चिकित्सा, गरीबी इत्यादि अनेको अमानवीय बेवहारक कीमतपर मजहबी जुनून पैदा करि कऽ घृणाक आगि सुनगा रहल छैथ। सुकेश साहनी- ठ'रल सीरक (हिन्दी बीहनि कथा) सुकेश साहनी (प्रख्यात हिन्दी लघुकथाकार श्री सुकेश साहनीक चर्चित आ पुरस्कृत लघुकथा "ठंढी रजाइ" क मैथिली रूपान्तरण- मुन्ना जी द्वारा) बीहनि कथा- ठ'रल सीरक " के छल ?" ओ आगि दिस हाथ पसारि तपैत पुछलक . " वएह. सोझाँ बालीक ओतए सँ , " कनिञाँ चिढ़ैत सुशीलाक नकल उतारलक. " बहीन, तुराय दीयय, हुनकर संगी एलनि हें ." फेर सीरक ओढति बडबडएल. " हिनका सब दिन सीरक मँगैत लाज नै होइ छनि ! हम त' साफ मना क' देलियै, कहि देलियै-" आइ हमरो ओत' कोइ अबै बला ऐछ." " नीक केलौं " ओहो सीरक मे नुकाइत बाजल ," ओकरा सबहक इएह इलाज ऐछ . " " बहुत ठंढी ऐछ !" ओ बड़बडएल . " हमर अपने हाथ - पएर सुन्न भेल जा रहल ऐछ.कनिञाँ अपन खटिया के धधकैत आगि ल'ग घीचैत बाजल." " सीरक त' जेना पुरे बर्फ भ' रहल ऐछ, नीन्न आओत कोना !" ओ करोट फेरैत बाजल. " नीन्न के त' जेना कोनो पते नै ऐछ." ऐ सरदी मे भरल सीरक सेहो बेअसर सन भ' गेल ऐछ." " एक बात कहू, खराप नै मानब ?" घ'रबला कहलक. " केहेन गप्प करै छी ?" " आइ खुब ठंढी छै , सोझाँ बला के ओतए कुटुमो आयल छै, तेहेन मे सीरक बिना बेशी कष्ट होइत हेतै." " हँ त',!" ओ आस लगा घ'रबला दिस तकलक . " हम सोइच रहल रही...हमर..मतलब इ छल जे..अपना ओतए एक टा सीरक त' फाजिले पड़ल ऐछ." " अहाँ त' हमर मोनक बात कहि देलौं, एक दिन ओढला सँ सीरक पतरा थोड़े ने जेतै, ओ चमकि के ठाढ़ भ' गेल, हम एखने सुशीला के सीरक द' के अबै छीयै." जहन ओ सुशीला के सीरक द' घुरल त' हरान छल ओ ओही ठ'रल सीरक मे निसभेड़ भ' सुतल छल. " ओहो अपन सीरक मे आबि घोसिया गेल. ओकरा सुखद आश्चर्य भेलै , सीरक खुब गरमएल छलै. वन्दना अवस्थी दुबे- दायित्व (हिन्दी लघुकथा) वन्दना अवस्थी दुबे (वन्दना अवस्थी दुबेजीक हिन्दी कथा- अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) -प्रस्तुत अछि वन्दना अवस्थी दुबेजीक कथा केर अनुवाद। ई कथा एकटा एहन विषय-वस्तुपर अछि जे कि प्रायः छूअल नै गेल। तँइ ई कथा अहाँक अपन कथा लागत। हमरा हिसाबें ई कथा पुरुष दृष्टिकोणसँ लिखल गेल अछि मुदा खिड़की स्त्रीक दिशामे खुलैत छै। तँ पढ़ू ई कथा-- वन्दना अवस्थी दुबे-- कथा -- दायित्व "रमणीक जी गुजरि गेलाह"................ ई समाद अखबारक पहिले पन्नापर छल। ओह, ई समाद पढ़िते आभा उदास भऽ उठल आ बजा गेलै "आब की हेतै"। फेर अपने कहलक की हेतै तकर कोनो मतलब नै। सभकेँ मरहे के छै। अट्ठासी बर्खमे मरला। कम उमर नै छलनि। अभय सेहो कोनो नार्मल समाद सन एकरा लेलक। नार्मल रूपें तँ आभा सेहो लेने छल मुदा आब ओकरा चिंता आब रमणीकजीक परिवारकेँ छलै जकर संचालन अपने रमणीकजी करैत छलाह। अट्ठासी बर्खक उम्रमे सेहो जबाने सन फुर्ती छलनि। मजाल जे कोनो बात बिसरि जाथि। दू-दू टा दोकान छलनि मुदा दूनूकेँ अपने सम्हारने। बेटा सभ सेहो साठिक उम्र धरि पहुँचल मुदा एखनो बापक देल खर्चापर निर्भर। घरक सभ काज रमणीकजीक फैसलासँ होइत छल चाहे ओ अपन कनियाँक एनाइ-गेनाइ हो कि पुतहुअक या बेटा बेटीक। हँ खर्चा दै छलखिन तँ हिसाबो सेहो पूरा लै छलखिन। हिसाबमे गड़बड़ी हुनका पसंद नै छलनि। कहियो-कहियो आभाकेँ रमणीकजीक पुतहु-बेटासँ बड़ ईर्खा होइत छलै। होइत छलै जे ओकरे जकाँ बिना जिम्मेदारीक जीवन रहितै तँ कते नीक।ने घरक चिंता ने बाहरक। ओकरा सभकेँ पहिने खर्चा भेटि जाइ छै आ हमरा खर्चा देबऽ पड़ैत अछि। आभाकेँ अपन ससुरपर तामस आबऽ लागै छै। ओकर बियाहक एकै सालक बाद अभयकेँ कहि देल गेलै अपन खर्चा अपने चलबए लेल। आभा फेर सोचैए एकटा हमर ससुर छलाह आ एकटा छलाह रमणीकजी जे मरितो धरि बेटा पुतहुकेँ कोनो दिक्कत नै देलथि। एकटा प्रतिष्ठित कपड़ा बेपारी छलाह रमणीकजी। ग्राहकक सभहँक एहन विश्वास जे हिनकेसँ सभ कपड़ा कीनए। रमणीकजीक टा टा बेटा छल। जाहिमेसँ दू टा साठि पास कऽ चुकल छथि। आ तेसर पार करहे बला छथि। रमणीकजी अपन तीनू बेटा लेल एक नम्बरक घर बनबेने छलाह। घरो एकै छलनि आ सोफा-कोठा सभ एकै रंगक। आभाक सहेली छलै हर्षा, रमणीकजीक बड़की पुतहु। से जखन आभा हर्षाक घर गेल सोफा सभ देखाबए तँ से देखि आभाकेँ कतेको दिन निंद नै भेलै। आ अपन ससुरपर फेरो तामस एलै। अपन बर अभयपर सेहो जे पने पाइसँ घर खरिदबाक सपना देखैए। पता नै कहिया हेतै ओकर अपन घर। मुदा पता नै किए आभाकेँ लगै छलै जे रमणीकजीक बेटा सभ खुश नै छल। आ खुश केना रहितनि। पुतहुए सभ नाखुश छलनि। जखन-जखन हर्षा आभा लग अबैत छल। शिकाइतक मोटरी सेहो नेने अबैत छल। "कमनियाँ (कामना) नैहर गेलै तँ बाबूजी बीस हजार देलखिन आ हमरा बेरमे दसे। हम तँ कहि देलियनि जे हम नै जाएब नैहर। दस हजारमे की सभ हेतै। बुझिते नै छथिन।" शिकाइत करैत-करैत हर्षाक मूह लाल भऽ जाइत छलै। आभाकेँ आश्चर्य लगैत छलै आ कहैत छलै- "लेकिन दस हजारमे पूरा महिनका खर्च पूरा कोना हेतै" "नइ से नइ, खेनाइ-पिनाइ, बिजली,स्कूलक फीस, नौकर-चाकर सभ बाबुएजी दै छथिन" हर्षा ई लिस्ट गनबैत जाइत छलै आ आभाकेँ छगुन्ता लगैत रहलै जे सभ किछु जखन बाबुएजी करै छथिन तखन इम्हर-उम्हरकेँ खर्च लेल दस हजार कम कोना पड़ि जाइत छै। हमरा तँ दस हजारमे पूरा घर चलबऽ पड़ैए। देखियौ कतेक निश्चिंती जीबन छै एकर सभहँक तैयो खुश कहाँ छै ई सभ। आभा एखनो चिंतामे छल जे आब की हेतै? रमणीकजीक बेटा सभ हुनका जिबितेमे अलग हेबाक लेल जे फरफर करै छल से तँ अजाद भैए गेलै। अइ घटनाकेँ एक मास भऽ गेल रहै मुदा काजे सभ एहन अबैत गेलै जे आभा आ हर्षाक भेंट नै भेल रहै। मुदा ओहि दिन आभा हर्षाकेँ हाटमे देखलकै तँ चिन्हबामे धोखा भऽ गेलै। "की भेल, तबीयत खराप अछि की?" "तबीयत तँ ठीक अछि मुदा भागे खराप अछि। बड़का दोकान मझला देखै छलखिन आ छोटकाकेँ दुन्नू भाए। से मझला आब ओइ दोकानपर कब्जा जमा लेलखिन। ओइ दोकानक एकौ पाइ देबा लेल तैयार नै छथि। आब एक दोकानमे ई दू परिवार कोना चलत। घरक खर्च कते छै से आब बुझा रहल अछि?" हाटेमे हर्षा अपन दुख कहऽ लगलै। आब आभाकेँ बुझा गेल रहै हर्षाक चेहरा एना किए भेलै। "बाबूजी सभ राज-काज अपने देखै छलखिन से अइ दुन्नू भाए पते नै कोना काज होइ छै। सभ दिन बाबुएजीक कहलपर काज केला अपना मोने तँ किछु केबे नै केला" ई सभ कहैत-कहैत हर्षा हकमए लागल छल। से सच छैहे जे नौकर जकाँ खटब आ मालिक जकाँ काज सम्हारब दुन्नूमे भारी फरक छै। आभाकेँ ई एखनो नै बुझएमे आबि रहल छलै जे रमणीकजीक नीक केला की खराप। बेटा सभकेँ काजसँ दूर रखला आ ओकरा सभकेँ अपन पएरपर ठाढ़ नै होमए देलाह। साठि सालसँ बापपर निर्भर रहए बला बेटा सभ दोकानक नौकरपर निर्भर छल। आपना बच्चामे अपनो काज करबाक बुद्धि नै।एना किए केलखिन रमणीकजी। अपन बेटा सभकेँ अपने बकलेल बना देलखिन। लोथ सन बना देलखिन। आभाकेँ लगलै आब ओ कते सुखी अछि अपन छोट परिवार, अपन कम पाइमे। पहिल बेर आभा अपन ससुरक फोटोकेँ नीक जकाँ देखलक, बहुत देर धरि देखिते रहल। (मूल शीर्षक-- रमणीक भाई नहीं रहे) अंजू खरबंदा- मुखिया (हिन्दी बीहनि कथा) चित्र: श्वेता झा चौधरी अंजू खरबंदा (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) मुखिया रीता चौखटिए पर सँ दगलक प्रश्न - "ओ" टूर सँ आपिस आबि गेलथुन्ह? नहुँए सँ सुलभा उतारा देलकै - "नै गे! अखन धरि तँ नहि।" रीता कुर्सी घीचैत सशंकित भ' पुछलकै - "लाथी नहितन! तँ बाहर गैलरीमे किनकर पुरखाहा कपड़ा सभ सुखाइ छौ?" -आन लोकक नजरि सँ सुरक्षित रही तैं हुनक कपड़ा केँ गैलरीमे टांगि दैत छियै। -से किए? -एहि सँ दोसरा केँ लगै जे पुरुख घरे पर छथि। -तकर माने की? -नहि तँ ओ सभ सोचत जे असगरुआ जनिजाति... नेना-भूटका संग हमर बिगाड़िए की लेत!" रवि प्रभाकर- अदकल जीह (हिन्दी बीहनि कथा) रवि प्रभाकर (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) अदकल जीह ओ बिधव अनुनय-विनय करैत अछि अपन पड़ोसिन सँ - "दीदी, जतय हम काज करै छियै ने ततय सँ जे घुरबै तँ मुंहारि सांझ बीति गेल रहतै। तैं अपन मुन्नी केँ हिनका लग छोड़ने जाइ छियन्हि। रखथिन्ह ने?" - हमरा परीक्षा लैत छी अहाँ?आब तँ अहाँक गाम सँ दियोर आबि रहैत छथि तखन...? - यैह तँ बात छै, तैं हिनका लग छोड़ने जाइ छियन्हि। सतीश खनगवाल- घुरपेंच (हिन्दी बीहनि कथा) सतीश खनगवाल (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) घुरपेंच मंत्रीजी हारल नटुआ जकाँ बड़बड़ाइत छलाह - "आब कोन घुरपेंच बाँचल? सबटा तँ लगाओल- राष्ट्रवाद, राष्ट्रद्रोह, आतंकवाद आ साम्प्रदायिकताक उधबा उठा क' सेहो देखि लेलहुँ। इहो पर्यन्त कयल जे आंदोलन केँ हिंसाक फुलपैंट पहिरा देलियै मुदा वैह स्थिति यथावत।" एतबा सुनतहि सैक्रेटरी टुसलक - तँ एहि बेरि सरकार पाछु घुसकि जेतै की? सरकारक पिट्ठू केँ जेना लेसि देने हो, तरंगति कहलकै - "केहन बात करैत छी यौ! अहाँ एकटा काज करु। पुलिस, सीबीआई, ईडी केँ कहियौ जे आंदोलनी नेता सभक तार विदेश सँ जोड़ि, जाँच करय। शेष काज तँ हमर मीडिया कैए देत।" ई सुनि सैक्रेटरी हिचकिचायल - "जँ अहू सँ बात नहि सुढिएल तखन? "तखन?तखन तँ आंदोलन केँ जतेक नमरा सकै, नमराब' दियौ। आम जनता आ लोकल लोक जतेक फिरसान हेतैक ओतेक सरकारक लेल नीक हेतै। एकदिन यैह जनता आंदोलनक खिलाफ उठि ठाढ़ हेतैक।" विजय 'विभोर'- अन्नदाता (हिन्दी बीहनि कथा) विजय 'विभोर' (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) अन्नदाता पीपरक गाछ तर खटियापर बैसल मालिक पुछलथिन - "रौ रमुआ! एहि बेर किनका भोट देबहुन?" रमुआ पटौनीकढेकुल थिर करैत उतारा देलकै - "मालिक! हमर भोट तँ हुनके पड़तै जे हमर अन्नदाता छथि।" मालिक पीत सँ अन्हराइत, ठाढ़ होइत कहलथिन्ह - "आयं रौ स्सार, हरामी! एकर माने तों हमरा भोट नहि देबें।" योगराज प्रभाकर- थाल आ कमल (हिन्दी बीहनि कथा) योगराज प्रभाकर (मूल हिन्दी सं मैथिली रूपान्तर- श्री घनश्याम घनेरो) थाल आ कमल -एह! एहि बेर इंद्र महाराज थहि-थहि क' देलथिन यौ मालिक, कैक साल बाद एहन थाल-कीच देखबामे एलैए। खेत सभ जल -मगन! -हँ, से तँ ठीक्के छैक मुदा एकरे कारण हमर पोखरि भथाएल जा रहल अछि। गंगेजल किए नहि बरखो ताहि सँ की, सभक माटिक कटान तँ पोखरिएक पेटमे समाइ छैक ने। थाल तँ थाले ने कहौतै। -बरखामे जे होइत छैक से तँ ऊपरवाला करबै छथिन, एहिमे आम जनताक कोन दोख? -पोखरिक स्थिति देखि लोक नाक बन्न करैत जाइत अछि। नीक-बेजाय के सुनाए? अच्छा! एकरा भरबाए दैत छिऐक। -नै यौ मालिक, लोकक बात केँ माइन नहि राखु। -तँ की कहैत छह जे हम क' सकी? -थोड़ धैरज राखू। हम सभ एहि पोखरि केँ नीक सँ देख-रेख करबै, मेहनति करबै। अहाँ एक दिन देखबै मालिक जे यैह थालमे कमल फूलेतैक आ सभक मुँहपर सपटी लागि जेतैक। सदानन्द कविश्वर- नाङरि हिलेबाक फयदा (हिन्दी बीहनि कथा) सदानन्द कविश्वर, 39- बी, पॉकेट ए-11, कालकाजी एक्सटेंशन, नई दिल्ली- 110019 (हिन्दीसं मैथिली भाषान्तर- मुन्ना जी) नाङरि हिलेबाक फयदा हाउसिंग सोसाइटीक पार्क मे पोसुआ आ अनेरूआ कुकुर संगे खेलाइत आ बतियाइत छल. वर्मा जीक पोसुआ भूरा कुकुर सं अनेरूआ कुकुर पूछलक- भूरा, तोरा हरदम नाङरि हिलबैत आ मालिकक तरबा चटैत देखै छियौ.से किए? हा... हा... हा! " भाटिया जीक प्रोमोशन अहू बेर नै भेल आ गुप्ता जीक चारि बरखमें दोसर प्रोमोशन भ' गेल."- मालिक, मालकिन कें सुनबै छलखिन. आंइ एना किए, ओ जातात' काजो नै नीक सं करै छथि? मालिक कहलनि- काज अबै कि नै, ओकरा नाङरि हिलाब' आ तरबा चटबाक लूरि नीक छै. " हम सुनि गद् गद् भ' गेलौं!आ तहिये सं हमहूं....! वर्मा जीक बेटाक स्वर बहरएल- भूरा? " भूरा, कालू दोस के छोड़ि नाङरि हिलबैत दौगल....! डा पुष्करराज भट्ट- बहिष्करण (नेपाली बीहनि कथा) चित्र: श्वेता झा चौधरी डा पुष्करराज भट्ट (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) बहिष्करण पछिला चौध, पन्ध्र दिन चिन्तेमे बितल । नइँ बितैत सेहो कोना ? कोरोना महामारीक कारण मोन ओहिना बिचलित होइत रहल। “ई रोग लगलहबा बहुतोगोटे ठीक भऽ गेलैक।हमसभ ठीक कोना नइँ हेबै!" चित्त बुझेबाक एकटा इहो नीक उपाय रहैक। बेस सावधानीसंग ई दिन कटलहुँ।एकरबादक दिनसभ केहन हेतै की पता<लोक कोन रुपमे एकरा लेतैक<इएह बिचारसभ मोनभरि अनवरत अबैत रहल। “ओना त अहाँक रिपोर्ट हिसाबे अहाँक बिमारी ठीक भऽ गेल।तथापी किछु दिन आओर घर-परिवारसँ दूरे रहु।” अस्पतालसँ घर पुहुँचलाक किछुए देरमे भाइजी कहल्खिन। घरमे बैसल-बैसल मोन पीडागेल।चौकदिससँ घुरि अएबाक सोचलहुँ कि बाटमे आशिष भेटि गेल। “तोरा कोरोना लागल बात सुनने रहियौ।एखन केना की छौ?" ओ पुछलक। “एखन ठीक छी।समान्य अवस्था छैक।" हम कहलियै।" किछु दिन तोरासंग हमरालोकनिके नजिक नइँ हेबाक चाही।भौतिक दुरी राख' पडतै।" आशिष हमरासँ दूर होइत बाजल। हम किछु कहब उचित नइँ बुझलियै। सोचलहुँ, “यी बिमारी हमरा मात्र लागिक' दोसरकियो स्वस्थ-तन्द्रुस्त रहतै से जरुरी त नइँ छै<" हम किछुदेर चौकमे अलमलाक' घरदिस घुरि देखैत रहौं,पडोसिया काका कहलनि," तो त मज्जासँ घुमिरहल छे।कोरोना लागल बात सुनने छलियौ।एना नइँ घुम बाबू रे!हमरालोकनिके बचबाक अछि।" “हमरा नीक भऽ गेल अछि।हम स्वस्थ छी।कोरोना कोनहु कारणे सरि सकैत छै।हम कोरोना बोकिक' थोडे चलैत छी।" एतबे बात जोडसँ कहलियै कि ओतुका सब लोक हमरे टक्क लगा' देख' लागल। रोग लागल व्यक्ती किछु दिनक बाद अवस्से स्वस्थ होइत छैक।स्वस्थ व्यक्तीकें बहिष्करण करबाक चेष्टा केनिहारसभकसंग लडबाक लेल आब हमरालग आवाजटा मात्र बाँकी अछि। (पुष्करराज भट्ट नेपाली साहित्य लेखन तथा अनुसन्धानक क्षेत्रमेँ सक्रिय छथि। नेपाली लघुकथामेँ पहिल एमफिल एवम् विद्यावारिधि करबाक सौभाग्य हिनका प्राप्त छनि। तीन एकल तथा एक संयुक्त लघुकथा कृतिक लेखक छथि । पाँच साझा संकलनके सम्पादक छथि । नेपाली लघुकथामेँ पुरस्कारक संस्थापक सेहो छथि। लघुकथा समाजसँ आबद्ध छथि। एकर अतिरिक्त गोरखापत्र संस्थानमेँ डोटेली भाषा पृष्ठ संयोजक, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक आख्यानमूलक पत्रिका समकालीन साहित्यके सम्पादक सेहो छथि।अइ तरहे लेखन, सम्पादन, साहित्यिक संगठन परिचालन, फेसबुक समूह सञ्चालन आदिक माध्यमसँ साहित्य क्षेत्रमेँ क्रियाशील । पत्रकार ओ साहित्यकर्मी छथि।) प्रा. डा. कपिल लामिछाने- सौन्दर्य आ समानता (नेपाली बीहनि कथा) प्रा. डा. कपिल लामिछाने (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) सौन्दर्य आ समानता मूलुकमे समानताक गप्प-सप्प खूब चलैत रहे।जइमे लैङ्गिक समानता सेहो एक रहैक।हरेक गप्पमे समानताक बात उठे।एहन प्रश्न उठब समाज-विकासक दृष्टिसँ स्वागतयोग्य बात छैक। चिकित्सकलोकनि एकर परीक्षण करबाक निर्णय कएलनि। ओ सभ छोट बालबच्चासभकें स्वतन्त्र रुपमे खेल' लेल छोडि देलक। लडकी कनियां बनल,लडका वर बनल।लडका समान जुटौलक,लडकी खाना पकेलक।पहिने लडका खेलक,बादमे लडकि खा'क भाडावर्तन धोएलक।खेल चलैत रहल। तकराबाद ओसभ समान उमेर आ तौलक छौडा-छौडीसबकें छनलक।ओकरासभकें समान तौलक भारी बोकिक' निश्चित स्थानपर पहुँचाब लेल कहलक।दुनू एक्के समयमे भारी बोकिक पहुँचल। – गुड चिकित्सकसभ प्रसन्न भेलनि। आ ओसभ समान उमेर आ तौल रहल युवा-युवतीके समान दुरीधरि खाली हाथ दौगबाक लेल कहलनि।दुनू दौग लागल।युवतीकें हिल चप्पल अल्झेलक।ओ जुत्ता लगेलनि।फेर दौग लागल।सारी अल्झेलक।ओ कुर्ता-सुरवाल लगेलक।आ फेर दौग लागल।चुन्नी अल्झेलक।ओ युवकेजकाँ पैन्ट आ टिसर्ट लगेलक।आब त तोरा अल्झाब' बला किछु नइँ छौ ने?<- युवक पुछलक। आब नइँ अछि।- युवती बाजल। तहन आब दौगबै त हेतै? - हेतै। ओसभ दुनू सिट्टीक संकेत अनुसार पुन: एक्कसंग दौग' लागल। कनिए देरबाद लडकी थाक लगली।पाछू होब लगली।लडका रुकल। ओ बाजल– आब की ओझरेलक लडकी बजली– हिलबला चप्पलले ओझरेलक,ओकरा फेकली।आङी ओझरेलक ओकरो फेकली।कुर्ता–सुरुवालले ओझरेलक।ओकरा सेहो हटेली मुदा... की मुदा –लडका बीच्चेमे पुछलक लडकी कने लजाइत बजली– सबकिछु त फेकब नइँ मिलैछै ने!... चिकित्सकलोकनि खुल्ला कारमे बसिक' फ्लो करैत रहए। ओसभ कहलनि– अच्छा त आब निष्कर्ष इएह निक दृष्टिकोण हरिप्रसाद भण्डारी- दू टा बीहनि कथा (नेपाली बीहनि कथा) हरिप्रसाद भण्डारी क दू टा बीहनि कथा (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) अख्तियार सौझका झोलफल चारुदिस रमणगर रहए।टोलक बौवा-बुच्चीसब खुल्ला मैदानमे जम्मा भऽ कऽ खेलैत रहए।चराचुरुङ्गीसब बास बसबाक तरखरमे रहए।एहिबीच प्रहरीक भ्यान आएल,घनश्यामक घर आगु रोकलक आ घरमे बैसल घनश्यामकें गाडीमे राखिक' लऽ गेल। यी सब देखिक' छिमेकीसब प्रतिकृया देलनि- - नेता छी कहैत छलथि, कोनो नइँ नीक काज केलकै कि - तस्करी करैत छी कहैत छलथि, कोनो केशमे फसिगेलै कि - सरकारी ओ सार्वजनिक सम्पति हड्पने छै कहैत छलै, अख्तियार पकैर लेलकै कि - एकर सान देखलाक बाद चालि-चलन ठीक नइँ छै से लागल रहे हमरा....छिमेकीसब मनेमन घृणा व्यक्त कएलनि। साँझुक पहर सञ्चार माध्यमसँ मन्त्रिमण्डल पुनर्गठन भेल आ घनश्याम मन्त्री भेल खबर प्रशारण भेल। तकराबाद बधाई देबाक लेल ओएह पडोसीसब घनश्यामकें घरमे छोर लागि गेल।ललै कि सबकिछुमे समानता खोजब प्रकृतिसम्मत नइँ छैक।ओकर एकटा सीमा होइत छै। सबगोटे स्वीकृतिमे गर्दन हिलेलक। दृष्टिकोण सौझका झोलफल चारुदिस रमणगर रहए।टोलक बौवा-बुच्चीसब खुल्ला मैदानमे जम्मा भऽ कऽ खेलैत रहए।चराचुरुङ्गीसब बास बसबाक तरखरमे रहए।एहिबीच प्रहरीक भ्यान आएल,घनश्यामक घर आगु रोकलक आ घरमे बैसल घनश्यामकें गाडीमे राखिक' लऽ गेल। यी सब देखिक' छिमेकीसब प्रतिकृया देलनि- - नेता छी कहैत छलथि, कोनो नइँ नीक काज केलकै कि< - तस्करी करैत छी कहैत छलथि, कोनो केशमे फसिगेलै कि< - सरकारी ओ सार्वजनिक सम्पति हड्पने छै कहैत छलै, अख्तियार पकैर लेलकै कि - एकर सान देखलाक बाद चालि-चलन ठीक नइँ छै से लागल रहे हमरा.... छिमेकीसब मनेमन घृणा व्यक्त कएलनि। साँझुक पहर सञ्चार माध्यमसँ मन्त्रिमण्डल पुनर्गठन भेल आ घनश्याम मन्त्री भेल खबर प्रशारण भेल। तकराबाद बधाई देबाक लेल ओएह पडोसीसब घनश्यामकें घरमे छोर लागि गेल। तारा केसी- अपन परिचय (नेपाली बीहनि कथा) तारा केसी (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) अपन परिचय भोरे उठिते मातर भन्सा घरमे पडोसनी काकी बाबू-माएके कहैत बात सुनि लेलहुँ।काकी कहैत रहथिन्,"हमर दीपशीखाक लेल नीक घरसँ बात आएल छैक।खन्दानी परिवार।काठमाण्डौमे तीनटा घर छै।दू टा भाडामे लागल छै।भाडा मात्रे तीन लाख अबैत छै।बात चलैतियै त होइतै ने श्याम भैया?? काकीक बातमे समर्थन दैत बाबुजी कहल्खिन्-" नीक घर,वर छै त बात चलाएब उचिते कि! आखिर दीपशिखाक उमेर सेहो विवाह करबाक योग्य भऽ गेलनि।" प्रात भेने भोरे माए हमर घरक टेबुलपर चाह रखैत बजली-" बेटी उठिक' तयार भऽ जाउ कि! आजु अहाँक देखबाक लेल लडका अबैए।की करु बाउ सबदिन अपनेसंगे रखबाक मोन छल मुदा दोसरकें घर जाइ बला जाति राखब असम्भव अछि।" नैनमे नोर भरने माए कहली। माएक बात सुनि हमर मोन द्रवित भऽ गेल।तीनटा कार हमरे घर लग आबिक' रुकलै।पडोसनी काकी हमर गेटदिसँ पैसबाक इसारा केलनि। "ओएह लील रङ्गबला शूट लगेने हेबाक चाही लडका,देखएमे त सुन्दरे छै नइँ दिपशिखा।" दिदी कहलनि। हम किछु नइँ बजलहुँ।लडका पक्षसँ बातचितक शुरुवात भेला उपरान्त दिदी हमरा आओर सुन्दर बनाक' ओकरासभक आगु लएलनि।हम लगाम लगाएल घोडाजकाँ ओ सब जे जे कहलनि से से करैत गेलहुँ।हमर शिरसँ पाउ तक एक नजरि देखलाक उपरान्त 'ओके' कहल्खिन लडका पक्ष। "लडकाक पढाइ,लिखाइ,इलम की छै?" बाबुजी पुछल्खिन। बाबुजीक प्रश्नक उत्तर दैत लडका पक्षबला उत्तर देलनि,"नोकरी करब,पैसा कमाएब, ओहि लेल पढब,लिखब.. ओ सबकिछु छैक बाबू लगमे।पैसा ओ धनसम्पतिक कोनो कमी नइँ छैक।अपनेक बेटीकें रानी बनाक राखत।ओइसँ बेसी की चाही अपनेके? ओकरासबके बात सुनलाक बाद हमर अन्तरात्मामे दबाक' राखल बोलीसब विस्फोट भऽ गेल।हम पैसामे बिकाइ बला लडकि नइँ छी।पुर्ख्यौली सम्पति आइ छै,काल्हि नहियो भऽ सकैत छै।अपने कमाइ रहल, पढल-लिखल ओ समाजमे अपन अलग पहिचान बनाब मे सफल जीवनसाथी चाही हमरा।उनकामे कहाँ छै अपन परिचय, तें हमरा माफ कएल जाओ बाबुजी।हम विवाह नइँ कऽ सकैत छी। रचना शर्मा- चरित्र (नेपाली बीहनि कथा) रचना शर्मा (नेपाली बीहनि कथा- अनुवाद: विन्देश्वर ठाकुर) चरित्र ‘चरित्रबहादुर अष्टबक्र’नामक बेस चरित्रवान् शिक्षक । हमरहि घर लगिचकें क्षेत्रकुमारी मा.वि. कें प्रध्यापक।भारतक प्रसिद्ध उच्च महाविद्यालयसँ विज्ञान आ गणित विषयमे डिग्री हासिल केनिहार।हमर बौवाबुची सेहो ओएह विद्यालयमे अध्यनरत। एकदिन हम विद्यालयकें अतिरिक्त मिटिङ्गमे पुछलियै-“अष्टबक्र सर हमर बेटा विज्ञानमे बहुत बेसी कमजोर छै।कोना पास हेतै? अपने जऽ ट्युसन पढबैत छियै त काल्हिसँ बौवोकें पठादेबै, नइँ हेतै?”हमर बात सुनिक' ओ सम्झबैत हमरा कहलनि- “तेहन बात नइँ छै मैडम, बौवाकें पढाइ ततेक नइँ निमन कहाँ अछि से <नेनामे सबकियो एहने होइत छै,पैघ होइते सबकियो अपने लाइनपर आबि जाइत छै।हम्हूं कक्षा ७ मे फेल भेल विद्यार्थी छी। एखन हमरे उदाहरण लैत कतेको विद्यार्थी आगु बढि रहल छैक।ट्युसन नइँ पढाउ बौवाकें।बरु अपनेसँ पढबाक व्यवहारके विकास कराउ। आवश्यकता बुझाएत त मेसेन्जरपर सोधपुछ कएल करब।" वाह! सर जीक एतेक नीक सुझाब पाबि त हम प्रसन्न भऽ भेलहुँ।घरमे अबिते फेसबूक खोलिक' ‘चरित्रबहादुर अष्टबक्र’नाम सर्च केलहुँ। फ्रेन्ड रिक्वेस्ट पठेलहुँ। ४ घन्टा बाद नोटिफिकेशनमे ‘चरित्रबहादुर अष्टबक्र’ एसेप्ट योर फ्रेन्ड रिक्वेस्ट कहिक' सुचना आएल। सरकें प्रोफाईल पिक्चर देखलहुँ। बेस सुन्दर रहैक।मिलल दाँत देखबैत मनमोहक मुस्की! पिक्चर सँगसँग स्टाटस् सेहो। वाउ! Û शिक्षाक अन्तिम लक्ष्य चरित्र निर्माण होइत छैक। जतबे नीक व्यक्ति, ओतबे नीक स्टाटस । फोटो आ स्टाटस देखिक' मोन थाम्हि नइँ सकलहुँ आ ठोकि देलहुँ लभ रियाक्ट।साथमे कमेन्ट सेहो १०० प्रतिशत राईट सर,कहिक'। काल्हिखन बौवा स्कूलसँ बिधुवाएल मुंह ल' घर आएल। “मम्मी < एकटा स्याड न्युज छै । कहू?” ‘क'ह न बेटा की भेलह? ” हम पुछलियै। “दूर की कहूं, आब हमरासबके साईन्स सब्जेक्ट चरित्र सर नइँ पढबै छथिन्।आइसँ विचित्रप्रसाद अधिकारी सर पढाएब शुरु केल्खिन् ग । “ओहो की भेलै चरित्र सरकें से? नीक लोक आ चरित्रवान व्यक्तित्व त टिकबे नइँ करैछै। कतौ सरुवा भऽ गेलै हुनकर की?” “नइँ मम्मी ओ सर अपने स्कूलमे नौ कलासमे पढिरहल दिदीकें होम ट्युसन पढबैत छलै पता नै काल्हिखन की केलकै ओइ दिदीकें।बहुते प्यारेन्टस् आबिक' स्कुलमे मिटिङ्ग केलकै ।आ तकराबाद हेडसर माईकमे,आइसँ चरित्र सर अपन स्कूलसँ रेस्टिगेट भेल सुचना देल्खिन् ।” डॉ. प्रदीप कौड़ा- क्रांति (पंजाबी बीहनि कथा) चित्र: श्वेता झा चौधरी डॉ. प्रदीप कौड़ा (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषांतर-सांत्वना मिश्रा) क्रांति पहिल: अहाँ एना उदास कियाक बैसल छी? दोसर: हम उदास नहि छी, किछु सोचि रहल छी। पहिल: की सोचि रहल छी? दोसर: यैह कि अपन देशमे क्रांति कोना आबि सकैत अछि। पहिल: एहैंन अपने कहियासँ सोचए लगलहूँ? दोसर: पिछ्ला एक दशकसँ। पहिल:एक दशकसँ? दोसर: शायद अहियोसँ बेसी दिनसँ भ सकैत छैक। पहिल:अपने कृपा कऽ सोचनाइ बन्न क देल जाइ। दोसर: कियाक? पहिल : कियाक की अपने आब अहि देशमे क्रांति नहि ल पाएब! निरंजन बोहा- करूगर सत्य (पंजाबी बीहनि कथा) निरंजन बोहा (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) करूगर सत्य दुर्घटनासँ भेल हुंनकर मृत्युक आइ पाँच दिन बित चूकल छल। शोकसभामे जुड़ल लोक सभ हिनक इच्छाक संग हिनक नेना अा विधवा पत्नी लेल संवेदना व्यक्त क रहल छल। नीक लोकक खगता अहि लोक अा ओहियो लोकमे अछि। शोक सभा मे एकहि संग कतेको स्वर चहु दिस पसरल। अो सभ त ठीक छैक, परंच ए हैं न असमय मृत्यु केँ दुःख सहनाइ बहुत मुश्किल छैक। बात आगां बढ़ल। एहि अबोध नैनाक की होएत? तेसर स्वरमे सभक धियान नैना दिस पड़ल। राधेश्याम जखन आतंकवादिक हाथसँ मारल गेल छल त सरकार हुंनक पत्नीकेँ पाँच लाख टाका देने रहैंन,अा पुत्र केँ नौकरी। चारिम स्वरमे स्त्रीगण सभक बीच बैसल मृतककेँ पत्नी क स्वर सोचए पर विवश केलक, जाँ हम्मर भाग्य मे यैह लिखल छल त हमरो पतिक मृत्यु आतंकवादिक हाथें होइत!! जगदीश अरमानी- कथानक (पंजाबी बीहनि कथा) जगदीश अरमानी (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) कथानक भोरका समय छल,वर्षाक पश्चात ठरल- ठरल बयार बहि रहल छल। अपन कल्पनामे मग्न लेखक बस्तीसँ बहुतों दूर निकलल छल। अपन नव कथा लेल कथानककेँ तकै मे डुमल होइथि तहिना प्रतित भ रहल छल। एकाएक लेखककेँ चेहरा पर मुस्कि दौड़ गेल। आवेशमे आबि अपन औंठासँ चुटकी बजाबैत बजला, आहहा.... भेंट गेल कथानक किच्छे दूर पर अस्थिरे - अस्थिरे चलि रहल छला की गाड़िक पहिया कादोमे धसि गेल, दुनू स्त्री - पुरुष गाड़ीसँ उतरि कऽ प्रयास करै लागल , पहिया निकालैकेँ, अपना भुत्ते नहि भेल त गाड़ी बला कोनो मदतगारकेँ ताकै लागल। थोड़ बे दूर पर बाउलक टीहुल्बा पर लेखक देखाइ पड़ल। गाड़ी बला चैनकेँ स्वास लेलक,लेखक सँ जखने आंखि मिलल की लेखक उत्साहित करैत बजला । शाबाश! नवयुवक! शाबाश! आर जोड़ लगाऊ ,हम अहाँ पर कथा लिखब! जंगबहादुर सिंह घुम्मण- आचरण (पंजाबी बीहनि कथा) जंगबहादुर सिंह घुम्मण (पंजाबी मिन्नी कथा- हिन्दी योगराज प्रभाकर मैथिली भाषाण्तर-सांत्वना मिश्रा) आचरण थानाकेँ मुंशीसँ आतंकवादी मारल गेल। शिंगारा सिंहक मृत्युक प्रमाणपत्र हुंनकर अबोध पुत्र अा बुढ़ पिताक हाथ थमहाबैत अपना अा संग बैसल दु गोट सिपाही न्यायोचित अधिकार जमाबैत उपेक्षणिय स्वरमे कहल, बाबा आइ बड्ड ठंढि छै। नैना प्रश्नात्मक दृष्टिसँ अपन बाबाकेँ देखल,अो अपन चिप्पी लागल कुर्ताक जेबीमे मुद्दतसँ सम्महारि क राखल टाका,मुंशीकेँ द देल। थानासँ बाहर निकललाकेँ उपरांत नैना उत्सुकता व आश्चर्यसँ अपन बाबाक डबडबायल आँखिमे तकैत, व्याकुल स्वरमे पूछलक... बाबा यौ ई एक साय टाका हिंनका सभकेँ कियाक देलौं? बाबा बजला.... ई सभ हमर अनाथ भेलाकेँ उत्सव मनाबै चाहैत छथि! दीपक बुदकी- जन्नत (उर्दू बीहनि कथा) चित्र: श्वेता झा चौधरी दीपक बुदकी (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) जन्नत(स्वर्ग) स्वर्गक (जन्नतक ) दरबज्जा पर ओतुक्का दारोग़ा ओकरा रोकि लेलकै आ पुछलकै- “तों अपन जिनगी मे कोन एहन काज केने छें जे तोरा स्वर्गक भीतर प्रवेश भेटौ?” ”हुज़ूर, हम जन्नत पैबा लेल की नञि केलहुॅं?.तीस टा विधर्मीक(काफ़िरक) गर्दन उड़ाओल, ओकर कनियाॅं सभकेॅं विधवा आ धिया पुता केॅं अनाथ बनाओल। एहि तरहेॅं बाक़ी लोक सभ केॅं पता चलि गेल हेतै कि भगवानक आक्रोश (ख़ुदाक क़हर) केकरा कहल जाइ छैक। “सत्ते, तोॅं त' बड़ पैघ काज केलें । हम तोरा सभ सन लोकक लेल फराक सॅं एक टा ख़ास जगहक इंतज़ाम केने छियौ। तों सामने बला नदी पार कय सीधा ओम्हर चलि जो जत' स' धुआॉंक बादल उठि रहलैक अछि। ओत' तोरा एहने एकटा दरबज्जा भेटतौ। ओत' तोहर स्वागत लेल सिकंदर, हलाकू ,चंगेज़ ख़ान, तैमूर, हिटलर और मुसोलिनी सन सन पैघ सूरमा सभ बेचैनी स' बाट तकैत हेतौ (इंतज़ार क' रहल हेतौ)।. मुबश्शिर अली ज़ैदी- ईनाम (उर्दू बीहनि कथा) मुबश्शिर अली ज़ैदी (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) ईनाम हम जाहि सरकारी कार्यालय मे काज करै छी ओत' सपना कीनल जाइत छैक। किछु लोक अपन सपना कौड़ीक भाव बेचि दैत छथि, किछु केॅं सपनाक बदला अशर्फी देल जाइत छनि। पिछला सप्ताह एकटा युवक एकटा सपना सुनौलक,- “हम सपना मे देखलहुॅं जे ज़मींदार सभहक ज़मीन छीनिकय ग़रीब हलवाहा सभ मे बाँटि देल गेल।” एहि सपना केॅं सर्वश्रेष्ठ घोषित कयल गेल। काल्हि हम अपना अफ़सर सॅं पूछलियनि- “ओहि युवक केॅं की इनाम भेटलै?” अफ़सर बाजल- “पैघ-पैघ सपना देखनिहार केॅं इनाम मे नीक वेतन पर सरकारी नौकरी देल जाइत छैक। फेर ओ कहियो एहन सपना देखबा जोग रहिये नञि जाइ छैक । इब्न आसी- फेर मनुक्खक की भेलै? (उर्दू बीहनि कथा) इब्न आसी (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) फेर मनुक्खक की भेलै? जखन समुद्र पूरा दुनिया केॅं अपना चपेट मे ल'-लेलकै तखन चारू दिस भगदड़ मचि गेलै।सभ जीव-जन्तु अपन-अपन जान बचब' लेल कोनो ऊँच आ सुरक्षित जगह ताकि रहल छलाह कि तखनहिॅं अचानक घोषणा भेलै कि प्रत्येक जीवक एक-एक गोट जोड़ा अमुक पहाड़ पर स्थित नाव पर पहुँचि जाय।सभ ओम्हरे पड़ायल आ नाव देखितहिॅं जल्दी स' ओहि पर सवार भ' जाइ गेल। जखन नाव चलबा लेल उद्यत भेल तखन एकटा पुरुष आ एकटा महिला ओतय पहुँचलाह। दूनू नाव पर चढ़ैये बला छलाह कि नाव- चालक(नाविक) ई कहि हुनका बरजि देलक कि नाव मे कोनो मनुक्ख नञि बैसि सकै अछि। पुरुष आश्चर्यचकित होइत पुछलक- “कियैक?हज़रत नूहक नाव मे त' मनुक्खो सवारी केने छल। ” बरज' बला उत्तर देलक- “एत' न कियो नूह अछि आ न ई हुनक नाव छनि, तैं तों दूनू गोटे एहि मे बैसि नञि सकै छह।” “जॅं हम सभ एहि पर सवार नञि भेलियै तखन मनुक्खक वंश (नसल) कोना आगाॅं बढ़तै?एना' त' मनुक्ख दुनिया सॅं समाप्ते भ' जेतै।” बरज' बला कने हॅंसैत उत्तर देलक-, “अही द्वारे त' तोरा सभ केॅं नाव मे नञि बैसाओल जा रहल छह।” रतन सिंह- बिना शीर्षकक (उर्दू बीहनि कथा) रतन सिंह (उर्दू अफसानाक योगराज प्रभाकर जीक हिन्दी अनुवादक मैथिली भाषाण्तरण - डॉ. आभा झा) बिना शीर्षकक एकर शीर्षक उल्लू आ मनुक्ख भ' सकै छै। एक दिन पक्षी सभहक सभा मे उल्लू एक टा सुझाव देलक जे चिड़ियो सभ कें चाही कि ओ थोड़-बहुत भोजन भंडार क' क' राखथि, जाहि सॅं ख़राब मौसम मे हुनका कोनो तरहक दिक्कत नञि होनि। तोता जे पक्षी सभ मे सब स' बुद्धिमान मानल जाइत अछि, उल्लूक गप सुनिक' बाजल- “भाइ लोकनि! एहन मूर्खता कहियो नञि करिह'I” “एहि गप मे मूर्खता की छैक?” उल्लू पुछलकI “मूर्खता ई कि जहिया सॅं मनुक्ख अन्न, वस्त्र, जारनि- काठी, रुपया-पैसा आदिक भंडार करब शुरू केलनि, तहिया सॅं ज़रूरतिक चीज बौस्त किछु लोक ल'ग त' एतेक जमा भ' गेलै जे हुनका सूझि नञि पड़ै छनि ओ ओकर की करथि, दोसर दिस आन लोक सभ ग़रीबी, भुखमरी आ बिमारीक ग्रास बनि रहल छथि वा एहि कारण रोज़ मरि रहल छथि I” ई सुनिते उल्लू उल्लू होइतो अपन सुझाव तुरत वापस ल' लेलक I (रत्न सिंह अपन बीहनि कथाक क्रमांक लिखैत छलाह, शीर्षक नहि।) सच्चिदानन्द कर- तितली आ प्रेम (ओड़िया बीहनि कथा) चित्र: श्वेता झा चौधरी सच्चिदानन्द कर (ओड़िआ मिनी गल्प: मैथिली अनुवाद- सोनालिका महान्ति) नाम—सच्चिदानन्द कर , जन्म—26-06-1962, शिक्षा—एम.ए., पीएच.डी, वृत्ति—अध्यापन, प्रकाशित पुस्तक—16, विभिन्न सारस्वत संसथा द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित तितली आ प्रेम तितलीक पाछाँ दौड़ैत-दौड़ैत थाकि गेल छलि ओ छौंड़ी। “केओ पकड़ि दितए !”—सोचैत रहए ओ। “हे लिअ’।” एकटा छौंड़ा ओकर लग आबिक’ कहलकै। छौंड़ी हुलसि उठलि—बरिसकालक धार जकाँ। बाजलि—“कतेक ने दौड़लहुँ हम।” “हमरा दौड़’ नहि पड़ल।” छौंड़ा कहलकै। “बदमास तितली नहितन !” बाजलि छौंड़ी। बिदा भ’ गेल रहए छौंड़ा। छौंड़ी ओकरा पाछाँसँ सोर केलकै—“अहाँ कोना बुझलिऐ जे...?” “किछु गप नहिओ कहलासँ बुझा जाइ छै।” छौड़ा कहलकै। “एकर माने हम अहाँकेँ निश्चय नीक लगै छी?” छौड़ी बाजलि। मुस्किया उठल छौंड़ा। “लगैए जे अहाँ संग रहलासँ हमर मोनक गप बूझि की की ने धरा देब हमरा हाथमे अहाँ।” छौड़ी बाजलि। सम्बन्धक हाथ बढौलक छौंड़ी। मुस्किया उठलि छौंड़ी। प्रेम भेलै। फेर छौड़ीक हीआ हुलसि उठलै—बरिसकालक धार जकाँ। प्रज्ञा महान्ति- मेमोरीचिप्स (ओड़िया बीहनि कथा) प्रज्ञा महान्ति (ओड़िआ मिनी गल्प: मैथिली अनुवाद- सोनालिका महान्ति) नाम—प्रज्ञा महान्ति, शिक्षा—स्नातक, वृत्ति—गृहिणी, अनेक कथा आ कविता विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित मेमोरीचिप्स ई तँ क्लिअर एक्सीडेंटल केस छिऐ। तखन डाक्टर साहेब परीक्षाक उत्तरपुस्तिका जकाँ एतेक गओरसँ जाँच रिपोर्चमे की देखैत छथिन से जानि नहि ! पोस्टमार्टम हाउसमे ठाढ़ भेल भेल अगुता गेल हरि। “साँझ पड़ि गेलै...बॉडी लॉक क दिऔ।” कहलकनि हरि। “नहि...किछु काल आर ठहरह...। एतबा कहि ओ फेर लाश पर झुकि गेलाह। किछु काल धरि किछु देखलाक बाद हरिक हाथसँ तौलिआ ल’ हतास स्वरमे बजलाह, “एतेक बॉडीक पोस्टमार्टम क’ लेलहुँ, मुदा जे तकै छी से भेटि नहि पाबि रहल अछि। आश्चर्य !!” हरि किछु बूझि नहि पओने रहए एहि गपक अर्थ। खाली प्रश्न भरल आँखिएँ डाक्टरक मुह तकैत रहल। “तखन एहि मेद, मांस, रक्त, मज्जाक समष्टि मनुक्खक शरीरक भीतर कत’ नुकाए रहैत छै भाव, भावना, भय, प्रेमकेँ जोगाक’ राखैबाला ओ मेमोरी चिप। गहे-गहे एतेक तकलोपर भेटल ने किएक ? तँ की ठीके मृत्यु ओहि मेमोरी चिपकेँ अपन संग ल क चलि जाइत छै ?” चिन्ताग्रस्त डाक्टर साबेबक ई बेकल अवस्था देखि एकटा अज्ञात आशंकासँ काँपि गेल छल हरि। विनय कुमार दास- कर्मफल (ओड़िया बीहनि कथा) विनय कुमार दास (ओड़िआ मिनी गल्प: मैथिली अनुवाद- सोनालिका महान्ति) नाम—विनय कुमार दास, जन्म—06-11-1949, विविध विधावदी, बाल साहित्य रचनाकार, कवि, कथाकार, नाटककार, गीतकार ओ अनुवादक, विभिन्न संस्था द्वारा पुरस्कृत ओ सम्मानित, पता—अनामिका नीड़, अंगारगडिआ, बालेश्वर—756001, ओडिशा कर्मफल --बाबू --किएक बाम्बार तोँ हमर सपनामे आबि रहल छेँ ? --अहाँक हाल बुझबाक लेल। कहू कोना छी ? अच्छा नहि कहू, हमरा बूझल अछि...भ्रूणावस्थामे हमरा मारिक’ तीनटा बेटाकेँ पढ़ा-लिखाक’ योग्य बनौलहुँ। अहाँ सोचैत छलहुँ जे अन्तिम अवस्थामे ओ सब अहाँक सेवा करत। मुदा एखन ओ सब अपन-अपन परिवार ल’ विदेशमे अछि। माए सेहो अहाँकेँ छोड़िक’ परलोक चलि गेल। एखन अहाँ बड़ कष्टमे रहै छी। जँ हम बाँचल रहितहुँ तँ अहाँक देखरेख करितहुँ। --बेटासब चलि गेल तकर दुख नहि अछि। एखन तँ इएह नियम भ’ गेलैए। तोहर माए जे हमरा छोड़ि गेलीह हमरा लेल ततबे दुख...हम हुनका कहिओ दुख नहि देलिअनि...मुदा... --फूसि नहि बाजू बाबू। गर्भपात नहि करेबा लेल माए कतेक बेकल भ’ क’ अहाँकेँ मना क’ रहल छलि...अहाँ माइक दरेगकेँ नहि बूझलिऐ...ओहि पापक फल केओ आन थोड़े भोगतै ? गायत्री दास- बुझौअलि (ओड़िया बीहनि कथा) गायत्री दास (ओड़िआ मिनी गल्प- मैथिली अनुवाद—तन्मया तपस्विनी मुर्मू) नाम—गायत्री दास, जन्म—19-08-1978, सतत साहित्य चिन्तन। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे रचना प्रकाशित होएबाक कारणेँ पाठकीय स्वीकृति आ आदर पबैत रहलीह अछि।एकटा कविता-संग्रह यन्त्रस्थ। पता—पोपुलर स्टाल्स, दुर्गा विहार, अनुगुल, ओडिशा बुझौअलि युवककेँ भर्ती कएलाक बाद डाक्टर लगमे ठाढ़ भद्र व्यक्तिकेँ बजाक’पुछलथिन, “अहाँ एहि युवककअभिभावक छिअनि की ?” “जी, हम एकर पिता छिऐ।” भद्र व्यक्ति मूड़ी झुकौने हाथ जोड़ि कृतार्थ होएबाक भंगिमामे ठाढ़ छलाह। “अहाँक बेटा की करैत छथि?” पुछलथिन डाक्टर साहेब। “हमर बेटा नीक जकाँ पढ़ाइ क’ रहल अछि सर। पूरा पंचायतमे फस्ट आएल छल। तेँ धान, खेरही, उड़ीद बेचिक’ एकरा शहरमे पैघ कओलेजमे पढ़बैत छिऐ। आब एक सालक बाद इंजीनियर भ’ निकलत। एतेक संयमी बच्चाक देह किएक खराप भ’ गेलै सर?” “अहाँ बूझि लिअ...अहाँक बेटा ड्रग एडिक्ट अछि आ एहि लेल ई सिमेन बिक्री करैए... भद्र व्यक्ति ओड़िआमे बुझा देबाक लेल डाक्टरक नेहोरा कर’ लगलथिन। मिनती प्रधान- संगी (ओड़िया बीहनि कथा) मिनती प्रधान (ओड़िआ मिनी गल्प- मैथिली अनुवाद—तन्मया तपस्विनी मुर्मू) नाम—मिनती प्रधान, जन्म—30 अक्टूबर, शिक्षा—स्नातकोत्तर, कृति—समय (ओड़िआ कविता-संग्रह), A new dawn (English poems), Transformative Harmony (English features) पुरस्कार—इन्दुदेवी स्मृति सम्मान 2013, ओडिशा कथा सम्मान 2014, पता— A.301, Surabhi Apartments, Ranka colony road, Bangalore--76 संगी “मामुनि, सुनलिऐ जे रेणु पछिला सप्ताह गाम एलैए।” माए अबाज देलकै। “हँ, कोरोनाक कारणेँ सबटा कओलेज तँ बन्द छै, ककर क्लास लेतै ओ ?” मामुनि विरक्त भ’ बाजलि। “तोँ ओकरासँ भेट करबाक लेल नहि गेलहीँ आ ने ओएह अपना ओहिठाम एलौए। तोँ आएल छेँ से बूझल छै ने ओकरा ?” “दू दिन पहिने अजूक संग भेट भेल छल। कहलक—मामुनि, ओ दिल्लीक एमएनसीमे काज करै छै। ओकर उठब-बैसब पैघ-पैघ लोकसभक संग छै। हम की ओकरासँ भेट करबै ?” ई सुनिक’ माए छगुन्तामे पड़ि गेल। सोच लागल—ई दुनू अन्तरंग संगी नेनहिसँ सब काज संगे-संग करैत रहए। मुदानोकरी पकड़लाक बाद एखन दुनू संगीकेँ ईर्ष्या आ इगो पूरा-पूरी गछाड़ि लेने छै। गैस्पर अल्मीडा- एकटा आर रबि (अंग्रेजी लघुकथा) चित्र: श्वेता झा चौधरी मूल अँग्रेजी कथा : अनदर संडे कथाकार : गैस्पर अल्मीडा मैथिली रूपान्तरण : डॉ. शंभु कुमार सिंह एकटा आर रबि ओ अपन पड़ोसक पाथरसँ भरल फर्श वला हातामे जयबाक लेल जहिना दरबज्जा खोललक, भोरक शीतल हवा ओकर स्वागत केलकैक। ओतए केवल पाँचे टा घर छलैक जाहिमे रह’ वलाक अपन पुश्तैनी नाम छलैक, ओकर वार्ड केर पुश्तैनी नाम छलैक, अल्मीडा वाडो। दरबज्जाक बाहर पुरनका कल, जकरा बहुत पहिनहि नबका कल केर कारणेँ छोड़ि देल गेल छलैक, ताहिसँ नमगर नोकगर बरफ लटकल रहैक। ओकरासँ सटले इनार देख-रेख केर अभावमे सूखि गेल छलैक। तैयहुँ एहिपर एखनधरि बालु नहि जमल छलैक। रोल्डाओ ब्रेगेन्जा झुकल, आँगुरसँ ओकरा पकड़लक आ ओहि जमलका बरफकेँ एखनहि पूरब दिससँ आबि रहल सुरूजक किरण केर समक्ष उठौलक। ओहि बरफ पर प्रकाश केर किरण पड़ितहि इन्द्रधनुषी रंग जगमगा उठलैक। छोटगर-सन गेट, जाहिपर स्पष्ट रूपसँ ब्रेगेन्जा विला लिखल छलैक, अपन कब्जा पर झुलल चर्र-चर्र केर आवाज भेलैक, ई आवाज हाता केर जानवरकेँ सचेत क’ देलकैक। जे कि ओकर प्रतीक्षा क’ रहल छल, बुझनामे आयल जे ओ सभ कहि रहल हो, “चारा केर समय तँ कखनहि भ’ चुकल छैक? रोल्डाओ पाथरक बाट छोड़ि भूसासँ झाँपल धरती पर आएल आर पयरक नीचाँ नरम मौसममे बनल खुरसँ बनल उभर-खाभर बाट महसूस कएलक। पूबरिया देवालक इमारतकेँ पार क’ कए जखन ओ दरबाजा खोललक तँ ओकर स्वागत बाछाक आवाज आर परिचित जानवर सभक महक कएलक। उठलका कूड़ादानक मुँह खुजल आर देवालसँ लागि कए टनटनाएल, आर एकटा भुरा केश (फर) फहराएल, जेना जलखै क’ रहल मूस उछलि पड़ल हो। ओकरा ठोरपर छोट-सन अपभाषा एलैक आ ओ चारा नापै वला बरतनसँ मूसकेँ मारलक। आगूक एक घंटामे ओ बिना किछु बिसरने अपन दिनचर्या एक नियत गतिसँ पूर्ण कएलक। ओ अपन भोरक कएल गेल काजसँ आनन्द उठौलक आ परिचित दायित्व ओकरा आत्मसंतुष्टिक अनुभूति देलकैक। रोल्डाओ बहुत बेसी प्रेम व्यक्त कर’ वला व्यक्ति नहि छल, मुदा चारा देबा काल बाछा ओकर हाथ चाटैत रहैक आ बिलाइ ओकरा पयरसँ अपन पीठ नहु-नहु रगड़ैत छल, एहिसँ ओ बेसी आह्लादित भ’ रहल छल, जाहि भावकेँ ओ प्रायः छिपौने रहैत छल, ताकि लोक भाँपि नहि सकए। ओकर सब काज पूर्ण होइत-होइत सुरूज बगैचा आ आन गाछ-विरीछ पर पड़ल ओसकेँ मेटाबैत-जराबैत अपन छाँही छत आर बगैचाक अधखुला स्थान पर पसारने जाइत छल। भानसघरमे घुसतहिँ ओकरा एकटा सुखद अनुभूति भेलैक किएत तँ मद्धिम आँच पर सूगरक माउस शनैःशनैः सीझैत रहैक, जकर तेज महक ओकरा आह्लादित कएलक। अपना जेबीमे हाथ डालि ओ सलाय निकाललक जकरा ओ प्रायः एकटा चामक बौगलीमे राखैत रहैक, आ एक दिन पहिलुका पाईपकेँ भर’ आ सुनगाब’ क लेल ओ बढ़ल। ओकर ई काज ओकर स्थिर आ मन्द गति वला नियामकक अनुरूप छलैक। जेना-जेना प्रकाश अपन पयर पसारलक, मद्धिम लील रंगक मेघसँ हवा भरि गेलैक। स्टोवक लौ जहिना एकटा भभकारक संग कम-बेसी होइक तहिना ओकर ध्यान प्रतिदिनक चीज-बीत पर चलि जाइक। जाड़मे बाहर अएलाक बाद ओकरा भानसघरक गरमी दिवास्वप्न जकाँ बुझाइक। क्यो ओकरा आइ याद केने हेतैक, ओ सोचलक, मुदा नास्ता पर किछु बाजि नहि भेलैक.....कखनहुँ किछु बेसी नहि कहल गेलैक, कतेक समय बीत गेलैक एखन धरि? ओ साठिक अछि वा एकसठि केर? ओ स्मरण नहि क’ सकल। ठीक! ओ धीरे सँ बाजल, “जँ हम नहि याद क’ सकैत छी तँ क्यो आन किएक?” ओ अपन पयर पसारलक आ ठाढ़ भ’ गेल। दरबज्जा लग खूँटीसँ टाँगल कोट केँ पार करैत ओ अपन जैकैट पहिरलक ओ कोनमे राखल छड़ीकेँ हाथमे एना पकड़लक जेना ओ ओकर पुरान मीत होइक। रोल्डाओ दरबज्जासँ बाहर निकलि सड़क पार कएलक, चारू दिस गामक अवलोकन कएलक। कोना एहन एहि छोट-सन गाम ‘पारा’ मे सभ चीज बदैल गेलैक। वर्षक अवधिमे सभ किछु उसराह भ’ गेलैक, मुदा ओ जानैत छलैक जे धरतीक नीचाँ सूतल जीवन समयक जादूसँ फेर जागि उठतैक। ओ घुमल आ नापल-जोखल पयरेँ सड़कक नीचाँ दिस चलि पड़ल, एकटा छोटका बाट पर जतए एकटा करिया-झबड़ा कुकुर प्रतिदिन दौड़क प्रत्याशामे प्रतीक्षा करैत छल। कुकुर अपन उर्जाक पहिल स्फोटमे गाछ आ झुरमुट दिस दौड़ पड़ल, ओ विभिन्न प्रकारक गंधकेँ सूँघलक आ निरीक्षणक बाद नव आनन्दमे डूबि गेल। कुकुर ‘ब्लैकी’ रूकल, अपन कानकेँ ठाढ़ कए बुझू जेना हवामे अपन परिचित जूताक चालिक ध्वनिकेँ पकड़’ चाहैत हो। उर्जाक दोसरहि स्फोटमे ओ सक्रिय भ’ गेल, अपन मालिकक चालिक अनुसरण करए लागल, सड़कक कात-कात रोचक चीज सभकेँ ओ जाँच’ लागल। पयर उठाकए ओ अपन जागीरकेँ कुकुरक मुद्रामे निश्चिन्तताक संग चिह्नित कएलक। गलीक मोड़ पर रोल्डाओ अपन छड़ीकेँ एकटा प्लास्टिक बैग, जाहिपर—दुबई ड्यूटी फ्री—फ्लाई दुबई—स्पष्ट रूपसँ लिखल रहैक आ जकरा जारमे कोनो लापरवाह फेक देने छलैक, ताहिमे खोधबाक लेल रूकल। ओ सावधानीसँ एहि वस्तुकेँ उठाकए कूड़ेदानी दिस ल’ गेल, ई सोचैत जे ओ एना करबलाक बगैचामे फेकि देत। मोनमानी जेहन चीज ओकरा भीतर क्रोध उत्पन्न क’ दैत छलैक, ओ व्यवस्था ओ नियमक पक्षधर छल, सभ चीज-बीतक लेल एकटा नियत स्थान आ सब स्थानक चीज-बीत अपन स्थान पर। कोनो चीज खराब नहि होइत छलैक, तागक टुकड़ी सभ जमा कएल जाइत छलैक आ प्लास्टिक के पन्नी धरि तह लगा कए राखल जाइत छलैक। जकरा ओ व्यर्थ पदार्थ बुझैत छल ओकरा अपन पियरगर लाल रंगक टाइलसँ बनल घरक पिछुआड़मे उचित मौसम आ हवाकेँ देखिकए ओकरा जरा दैत छलैक। रोल्डाओ एक जागरूक व्यक्ति छल, भोरसँ ल’ कए साँझ धरि काज करबाक आदति ओ अपन उमिरक आरम्भिकहि अवस्थामे डालि नेने छल, माँटिसँ जीविका निकालबाक आ ओकरा संगहि अपन परिवारक जीवन-यापन चलएबाक लेल अपना-आपकेँ योग्य बनएबाक ओकरा गर्व छलैक। ओकरा अपना-आप पर गर्व हेबाक एकटा आर कारण छलैक ओ ई जे ओ ने तँ ककरहुँ सँ किछु माँगैत छल आ ने ओकरा पर ककरहुँ कोनो कर्ज छलैक। ओकरा भगवानसँ डर लागैत छलैक आ ओ ईश्वरीय तत्वकेर निर्भरतासँ अवगत छल, मुदा गामक चर्च-प्रशासन, संगहि पवित्र क्रॉस केर छोट पदाधिकृत छोट चैपल केर आलोचक सेहो छल। ओ ने केवल अपन विचार सबकेँ वा अपन कोनो जान’वलाकेँ सुनबैत छल, अपितु अपन भावनाकेँ अपन स्पष्ट मुखमुद्रासँ व्यक्त सेहो क’ दैत छल अथवा गप्पक काल विषयक उत्तर चुप्पीसँ द’ दैत छल। नमहर तंग सड़कसँ खेत धरि ओकर यात्रा आर एक छोट नदी पतझड़ केर पातसँ भारी भ’ गेल छल आ ओकरा पयर तर दबा गेल छलैक, कखनहुँ-कखनहुँ डारिकेँ टुटबाक आवाज केँ छोड़ि। कुकुर अपन नाँगरि आ मुँहक संग कखनहुँ-कखनहुँ कटनूर मूसक बिलक लग सूँघि लैत छल, जतय मूस भोरे-भोर अपन घरक विस्तार करबाक हेतु बहुत रास माटि बहार कएने छल, ओ ओकर ताजा गंध चिन्हैत छल। जहिना ओ गाछसँ बाहर आएल, रूकि गेल। कुकुर “ब्लैकी” फव्वारासँ जे कि सालो भरि बलबलाइत रहैत छलैक, पानि पी कए खद्धासँ बाहर आएल, माथ हिलाकए पानि झाड़लक आ एकटा चिपकल गुरचाकेँ निकालबाक लेल ओ अपन कान हिलबैत नीचाँ बैसि गेल। अपन प्रेक्षण स्थानसँ रोल्डाओ गाड़ीक बाट देख’ लागल, मानू गाम पर कोनो चोटकेर निसान छैक, शोरगुल करैत गाड़ी धुइयाँ निकालैत एना बुझाइक जेना कंकरीटक फीता पर चुट्टी चलि रहल हो। गामक शांतिक भीतर आत्मघातक जल्दीबाजीमे ओ गाड़ी सभ चुपचाप देख’ जायसँ अन्जान बढ़ल जाइत छल। रोल्डाओ बनाओल जा रहल सड़ककेँ ध्यानसँ देखलक, अमोल जमीनसँ हाथ धो लेबाक कारणेँ ओकरा दुख छलैक, मुदा ओकरा बदलामे देल गेल हरजानासँ ओ खुश छल। ओ माँटि खोध’ वला उपकरणसँ चकित छल, ओकर आकार आ काज करबाक क्षमतासँ ओ अभिभूत छल, अंततः परिणाम जे ओ आश्चर्यचकित छल किएकतँ जे किछु ओकरा देखा पड़ैत छल ओ ओकरा समझसँ दूर छलैक। अपना जवानीक दिनकेँ याद करैत ओ अपन साठि बरखक अवस्थासँ पाछू देखलक, जखन केवल खेत आ गाछ-बिरीछ, पड़ोसक गाम नगोआ, सेलिगाओ धरि देखल जा सकैत छल आर पहाड़क उपर मान्टे-डी-ग्यूरिम इसकूलक भवन..... जतय धरि ओकर दृष्टि जा सकैत छल। कैक तरहक परिवर्तन भेल छलैक मुदा रोल्डाओ स्पष्टतः एकरा स्वीकार नहि क’ सकल जे, जे किछु भेलैक से नीकेक लेल भेलैक। भिनसरबाक काजक लेल आवाज दैत चर्च केर घंटा हवामे स्पष्ट सुनबामे आएल, समय देखबाक लेल ओ दहिना हाथ सँ वास्कट वला जेबीसँ घड़ी निकाललक आ कैक बेर घुमा-फिरा कए देखलाक बाद ओकरा आपिस राखि देलक। फेर ओ पाइप भरबाक लेल अपना हाथ पर तमाकुल रगड़लक, अपन अभ्यस्त हाथक आँगुरसँ विधिवत पाइप भरलक आ आगिक सुलगा सोंटलक। आगू बढ़बासँ पूर्व ओ कैक बेर सोंट मारि धुइयाँ निकालि अपनाकेँ आश्वस्त कएलक जे तमाकू बरोबरि जड़ैत रहए। घरक बाहर लटकल धातुक बुरूश सँ ओ अपन जूत्तामे लागल माटि झारलक आ फेर बुरूश सँ गंदगी साफ कएलक। ओ भानसघरमे गेल जूता उतारलक आ दरबज्जा लग पुर्तगाली कुर्सी पर बैसि गेल, अपन पछिला जनमदिन पर भेटल पनही (चप्पल) अपन पयरमे पहिर लेलक। दुपरहक भोजन (डिनर) बारह बजे मेज पर राखल जाइत छलैक। आन चीज जकाँ भोजन सेहो नियत समय पर खा लेल जाइत छलैक, लंच शब्दक प्रयोग नहि होइत छलैक. दूध दूह’ आर चारा देलाक पश्चात् नाश्ता आठ बजे देल जाइत छलैक। बारह बजे डिनर, चारि बजे चाह आर दस बजे सपर (रातिक भोजन) । एहि तरहेँ सभ दिनक दिनचर्या नियत छलैक, ई क्रम तखनहि बदलैक जखन क्यो भेंट कर’ आबैक वा कोनो समाचार देब’ आबैक। मेज पर बैसैत ओहि रबिक भोजन करबाक हेतु ओ काँटा आ चक्कू उठौलक.....बदामी रंगक भाफ निकलैत सालनसँ झाँपल पुडिंग केर सुनहरा रंग पैघ टुकड़ा। एकर बाद ओकरा समक्षहि बीफ (सुगरक माउस) राखल रहैक, जकरा ओ अपन समक्ष राखल चक्कूकेँ स्टील पर धार तेज करैत निकाललक। ककरहुँ आन प्रकारक भोजन पसिन्न हेबाक स्थितिमे ओहो सभ भोज्य पदार्थ ओतए राखल रहैक, सामान्यतः रबिक भोजन ककरहुँ लेल पर्याप्त होइत छल। चाहक समय चारि बजे भलैक। चाह पीलाक पश्चात् ओ खिड़कीसँ आबैत रोशनीक दिस पीठ क’ कए बैसबाक लेल सामने वला घरमे गेल। अपन चश्मा लगौलक आ शेष दुनियाँक समाचार जानबाक लेल ओ रबि दिनका समाचार-पत्र उठौलक। ओ शीघ्रहि अलसा गेल, जहिना ओकरा पर निन्न सवार होमए लागलैक, ओ माथकेँ आरामसँ कुरसीक कुशन पर राखि देलक। घर मे लोकक आवाजसँ रोल्डाओ जागि गेल—दौड़बाक कारणेँ पयरक खड़बड़ाहटि आ दूई बच्चा द्वारा एक दोसराकेँ धकेलैत दरबाजा खोलबाक आवाज, ओहि दुनूकेँ ओकरा लग पहुँचि पार्सल देबाक जल्दी। ओ कुरसी पर चढ़ल ओकरा चुमलकै आर जन्मदिन केर बधाई देलकैक, ओ बड़ कुशलतासँ एक दोसराकेँ अपन बाहुपाशमे जकड़लक। पहिने ककर पार्सल खोलल जाय? एहि समस्याक समाधान ‘लेडीज फर्स्ट’ कहि कए समाधान कएल गेल। बालक बाजल, “दादा नीक चीजकेँ बादक लेल राखैत छथि”। जहिना टकराव केर स्थिति उत्पन्न भेलैक, ओ ओहि दुनूकेँ कपड़ा बदलबाक आ बाहर जा कए खेलबाक लेल कहलकैक। जेना ओकरा दुनूकेँ मोनमे आनन्दक अनुभूति भेलैक, ओकरा कानमे हँसी केर आवाज आबि टकराएल। भानसघरमे नओ बजबाक आवाज सुनबा धरि, दुपहरसँ साँझ धरि ओकर मीत, संबंधी लोकनिक बधाई ओ उपहार ल’ कए अएबाक क्रम चलितहि रहलैक। ओ रातिकेँ पहिर’ जाएवला पयजामा पहिरलक, खूट्टीसँ स्कार्फ खींचलक गरदनिमे लपेटलक आ जाड़क अनुसारेँ ओकरा नीक जकाँ बान्हलक, सभ दिनक रात्रिकालीन नियमक अनुसार लकड़ीक नमगर ‘अदाम्बो’ सँ मुख्य द्वार धरि खिड़की ओ दरबज्जाक छिटकिनी जाँचलक। खिड़की लग राखल एक बहुत महत्वपूर्ण चीज—छओ सेलवला बड़का टार्च उठौलक, ओकर प्रकाशमे अपन सभ सामान केर निरीक्षण कएलक। ओकरासँ कनेक आगू सदा ओकरा संग रह’वला ओकर कुकुर ब्लैकी ओकरा संगहि-संग घूमल। अकाशमे जगमग करैत तरेगण केर रातिमे जहिना ओ उपर देखलक, शीतल बसात ओकरा गाल पर थपेड़ा मारलकैक, एकटा मद्धिम प्रकाशक संग चान फार्म केर घरकेँ आलोकित करैत रहैक। आपस आबैत ओ सभ दरबाजाकेँ बंद कएलक आर ई सुनिश्चित कएलक जे सभ किछु सुरक्षित अछि कि नहि। तखन ओ उठिकए भानसघरमे राखल चमचम करैत कागदक टुकड़ा उठौलक। कागदक नीचाँ लिखल शब्द रहैक, “जन्मदिन मुबारक.....दिन मंगलमय हो ”। ओ लिखावट पर ध्यान देलक, शब्दकेँ धीरे-धीरे पढ़लक आर फेर मोनहि-मोन मुसकी देलक आ जोरसँ कहलक। “भगवानक सौगन्ध, हँ........ई एकटा नीक रबि रहल।” वसंत भगवंत सावंत- मृत्युकेँ टारब, नागपंचमी (कोंकणी लघुकथा) कोंकणी कथा : मर्णताळणी मूल कथाकार : वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह ओ श्री सेबी फर्नांडीस मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह मृत्युकेँ टारब “कनिष्ठ अभियंताक जीप आबि रहल अछि.....सभ केओ काज पर लागि जाउ।” गाछ पर चढ़ि मौध निकालबाक प्रयास क’ रहल फ्रांसिस पहाड़ीक बाटे हपसैत अबैत जीपकेँ देखि सभ मजदूरकेँ चेतएबाक स्वरमे चिकरल आ स्वयं सेहो शीघ्रहिं नीचाँ उतरि गेल। बीड़ी पीबाक बहन्ना सँ काम बन्न क’ कए गप्प कर’ वला आ लगपासमे बैसल सभटा मजदूर हाँइ–हाँइ उठि हाथमे दबिया ल’ क’ गाछ–बिरीछ काटए लागल। आइ भोरहि सँ मजदूर सभ मोन लगा कए काज नहि केने छल। हमरा सभकेँ दाणे पहाड़ दए चढ़िकए अबैत–अबैत साढ़े नओ बजि गेल रहय । आइ हम स्वयं ओकरा सभक समक्ष ठाढ़ भ’ कए काज नहि ल’ रहल छलहुँ एहिलेल ओहो सभ नहुएँ–नहुएँ काज क’ रहल छल। बिना काजक दिन खेपैत देखियो कए हम ओकरा सभ पर गोस्सा नहि क’ सकलहुँ। आइ हमर मोन नीक नहि रहय। भोरहिं सँ हम पहाड़क टिल्हा पर सातनक गाछक नीचाँ बैसल रही। हम जतए बैसल रही ओतए सँ नीचाँ सलावली नहरक काज चलैत रहैक, जे साफ झलकैत रहैक। बहुतो रास मशीनक हल्ला होइत रहैक। नहरक काज आधासँ बेसी भ’ चुकल छलैक। आगूक पाँच–छओ बरखक भीतरहिं काज पूर्ण भ’ जएबाक उमेद रहैक आर ओहि नहरक पानि पीबा आर आन प्रयोगक लेल एहि दाणे पहाड़ पर ट्रिटमेंन्ट प्लान्ट बन’ वला रहैक। हमरा एतुका कार्यभार भेटबासँ पूर्वहिं निरीक्षण भ’ गेल रहैक। यैह किछु दिनमे काजक ठीका (निविदा) निकालि ठिकेदारकेँ काज संपन्न करएबाक आदेश द’ देल गेल रहैक। अगिले सप्ताह मुख्यमंत्रीक हाथेँ शिलान्यास हेबाक रहैक। एहिलेल ओहि जमीनकेँ चिह्नित करबाक लेल कार्यपालक अभियंता साहेब एतेक मजदूरकेँ लगा कए एहि महत्वपूर्ण जमीनकेँ साफ करबाक लेल कहने छलैक। काल्हि आ परसू तँ मजदूर सभकेँ लड़ा–चड़ा कए हम नीक जकाँ काज करा लेने रही मुदा आइ हमर मोन काजमे नहि लागि रहल छल। कनिष्ठ अभियंताक जीप पहाड़ीक बाटे एम्हरे आबि रहल छलैक आ ओहिसँ आबए बला आवाजसँ हमर बेचैनी बढ़ल जा रहल छल। सभ मजदूर दौड़ि कए काज करबाक नाटकमे लागि गेल, मुदा हमरा उठि कए ठाढ़ होएबाक साधंस नहि भेल। हमरा बुझाइत छल जेना हमरा देहसँ प्राण निकलल जा रहल हो। काल्हि भोरहिंतँ कनिष्ठ अभियंता द्वारा कार्यस्थल केर निरीक्षण क’ लेल गेल छलैक तखन एखन दिनक बारह बजे ओ किएक आबि रहल छलैक? निश्चित रूपेँ ओ हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल’ कए आबि रहल हेताह, हमरा लागल। “आइ काज पर नहि जाउ” भोरहिसँ हमर घरक लोक सभ कहैत छलाह। बाबूजी कखन अपन अंतिम साँस लेताह भरोस नहि। ओछाओन पर पड़ल बाबूजीक हालति एकदम खराप भ’ गेल छलनि। मुदा दाणे पहाड़केँ साफ करएबाक काज हमरा भेटल रहय। जँ एहिकालमे कोनहुँ प्रकारक व्यवधान भेलैक तँ हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी कार्यपालक अभियंता पहिनहिं द’ देने रहय। हम कनिष्ठ अभियंताक व्यवहारसँ नीक जकाँ अवगत रही एहिलेल हम घरक लोकसभक कथनी नहि मानि डिब्बामे दूटा रोटी राखि काज पर चलि देलहुँ। हमरा दाणे जंक्शन धरि पहुँचतहि आठ बजि गेल छल। सभ मजदूर अपन–अपन दबिया आ डिब्बा ल’ कए हमर बाट देखैत छल। दाणे पहाड़ दिस जाएबला ट्रक सभक बाट नहि देखि हमसभ पयरे चलब आरंभ क’ देलहुँ जे जँ बाटमे कतहुँ ट्रक भेटि गेल तँ ओकरा हाथ द’ देबैक। मुदा कुर्डे पहुँच’ धरि हमरा सभकेँ एक्को टा गाड़ी नहि भेटल। ओतए सँ एकपेरिया बाटे अएबाक कारणेँ हमरा सभकेँ बड्ड विलम्ब भ’ गेल। मरणशय्या पर पड़ल हमर बाबूजीक चिन्ता आर पैदल चलिकए अएबाक थकानक कारणेँ हमर प्राण कंठ धरि आबि गेल छल। आ एखन हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल’ कए आब’ वला जीपकेँ देखिकए हमरा आँखिक सोझाँ तारा नाचए लागल। गाड़ी ऊपर आबि रहल छल। केहनो हृदयविदारक समाद हो हम ओकरा सुनबाक लेल अपना मोनकेँ एकाग्रचित्त केलहुँ आ आँखि मुनि लेलहुँ। हमरा आँखिक समक्ष चित्र सभ नाचय लागल – ‘आब ओ जीप ठहरत.....कनिष्ठ अभियंता जीपसँ उतरि जेताह.....काज करएवला मजदूर सभसँ “पर्यवेक्षक कतए छथि ?” पूछताह.....ओ लोकनि गाछ दिस आँगूर देखेतनि, अभियंता घुमिकए हमरा दिस उपर अओताह.....हमरा कान्ह पर हाथ राखि बजताह.....मिस्टर नायक......हमसभ एखन सांगे केर कार्यालय जाएब।’ हम चुप रहब। अहाँक लेल एकटा खबरि अछि....इट इज नॉट मच सिरियस.....(ओतेक चिंताजन नहि अछि.....) मुदा अहाँकेँ शीघ्रहिं घर बजाओल गेल अछि। हम जीप ल’ कए ओम्हरे जाएबला छी.....ओतहिसँ अहूँकेँ छोड़ि देब। कनिष्ठ अभियंता जानि-बूझिकए हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि नुका रहल अछि, ई हमरा पता लागत.....हमर करेज फाटि जाएत, हमरा आँखिमे नोर आबि जाएत। यू इडियट (बदमाश).....,एमहर आउ ! राजा जकाँ बैसल छथि....नॉनसेन्स (बेकूफ)। अहाँकेँ देल गेल काजक कोनो परवाहि नहि अछि? आब अहाँकेँ घरहिं पठा देब.....। सोचलहुँ की आ क्षणहिंमे भ’ गेल की, हमरो पता नहि चलि सकल। आँखि खोलिकए देखलहुँ तँ कनिष्ठ अभियंताक जीप ल’ कए आएल कार्यपालक अभियंता हमरा पर डाँट–फटकारक बरखा केने जा रहल छल। अपना समक्ष राक्षस सदृश ठाढ़ कार्यपालक अभियंताकेँ देखि हमर तँ हड्डी काँपि गेल। हे भगवान, एहि ब्रह्म बबाक चाँगुरसँ हमरा मुक्ति दिया दिअ। मोनहि–मोन भगवानसँ प्रार्थना करैत हम कार्यपालक अभियंताक समक्ष ठाढ़ रहलहुँ। अहाँक ओकादि एतेक बढ़ि गेल? मजदूर सभपर ध्यान नहि राखि, हमरा अबैत देखियहुकेँ ओतए साहूकार जकाँ बैसल रहलहुँ? ई सभटा काज चारि दिनक भीतरहिने संपन्न करएबाक लेल कहने रही , कमीना नहितन? एना तँ अहाँ हमरहु संकटमे द’ देब....ठहरू ! एखनहि हम अहाँकेँ सबक सिखबैत छी....हम एखनहि कार्यालय जा कए, अहाँक ‘टर्मिनेशन ऑर्डर’ निकालि दैत छी...। क्षण भरिक लेल हमरा एहन बुझाएल जेना एकटा अल्सेशियन कुकुर हमरा पर भूकैत एम्हरे आबि रहल अछि। हमरा मुँहसँ एक्कहुटा शब्द नहि नकलि सकल। साहेब, हिनक बाबूजी बहुत बेराम छनि....एहिलेल ओ कनेक कालक लेल बैसि गेल छलाह, एकटा मजदूर हमर पक्ष लैत कार्यपालक अभियंताकेँ समझएबाक प्रयास कएलक मुदा साहेब पर हुनक बातक कोनहुँ असरि नहि भेलनि। बेराम छथि तँ होमए दिऔक, जीवैत तँ छथि ने? एहि तरहक बहन्ना बना कए अहाँ काज परसँ बेसी नागा नहि रहल करू, नहि तँ सभदिनक लेल घरहिं बैसा देब। कार्यपालक अभियंता हमरा पर आओर भड़कि गेलाह। ओहि भरल दुपहरियामे हमरा आँखिक समक्ष तरेगन झिलमिलबए लागल। यूजलेस सुपरवाइजर....(बेकाम पर्यवेक्षक....) एतए आउ.....देखू ई सभटा गाछ–बिरीछ कटवा लेब। परसू धरि ई सभटा साफ भ’ जएबाक चाही। मंगल दिन सी.एम. (मुख्यमंत्री) अओताह, ओहिसँ पहिने कनिष्ठ अभियंताकेँ चिन्हित करबाक लेल ई जगह साफ–सुथरा भेटबाक चाही। जँ ठीक समय पर ई काज नहि भेल तँ हम अहाँकेँ देखि लेब। अहूँ सभ केओ सुनि लेलहुँ की नहि? सभ मजदूरकेँ सुनएबाक लेल ओ ओकरा दिस देखलक आ जा कए जीपमे बैसि गेल। पल भरिक लेल हमरा एहन लागल जेना ढ़लानसँ उतर’ वला ओहि जीपक पाछू हमरा डोरिसँ बान्हि घिसियाओल जा रहल अछि। हमरा आँखिमे नोर आबि गेल। नोकरीसँ निकालि देबाक धमकीसँ हमर सौंसे देह सुन्न भेल जा रहल अछि, हमरा एहन बुझाएल। एहि नोकरीसँ हाथ धो लेब हमरा बसक गप्प नहि छल। बी.कॉम. कएलाक बाद लगभग दू वर्ष धरि हम बेरोजगार रही। पछिले साल बाबूजीकेँ लकवाक प्रकोप भेल छलनि ओ तहिएसँ ओछाओन पकड़ि नेने छथि। बाबूजीक दवाइ, कॉलेजमे पढ़ए वला अपन छोट भाय आर मैट्रिकमे पढ़यवाली अपन छोटकी बहिनक सभटा दायित्व हमरहिं कन्हा पर छल। कतेकोक पयर पकड़लाक पश्चात् हमरा हिसाब-किताबक काज भेटल छल, मुदा डेढ़ दूइ सय टकासँ बेसी हमरा कहियो नहि भेटि सकल। कतेको पैरवीक केलाक पश्चात् हमरा बारह टकाक दैनिक मजदूरी पर सुपरवाइजर (पर्यवेक्षक)क ई काज भेटल छल। हमर दुब्बर-पातर कद-काठी देखि कनिष्ठ अभियंता हमरा सुपरवाइजरक नोकरी देबाक लेल किन्नहुँ राजी नहि छल, मुदा ओकरा लग ल’ जाएबला हमर शुभचिन्तक हमर विषम परिस्थिति आ लचारीक तेना ने बखान कएलनि जे नहियों चाहैत ओ हमरा ई नोकरी द’ देलक। हमर छोटो छिन गलती केँ ल’ कए ओ हमरा सदिखन उँच-नीच कहैत रहैत छल। पछिला तीन माससँ तीन-सवा तीन सय टकाक महिनवारी दरमाहासँ हम साधारण रूपेँ अपन जिनगी चला रहल छलहुँ। एहि सप्ताह बाबूजीक तबीयत बिगड़ि जेबाक कारणेँ हमरा लग जतेको पाइ छल, सभटा हुनक दबाइ आ डागदरक पाछू खर्च भ’ गेल। जँ बाबूजीक संग किछु भ’ गेलनि तँ हम कोना की करब, से सोचबाक साहस आब हमरामे नहि रहि गेल छल। हम अंतर्द्वन्द्व मे फँसि गेल रही। कार्यपालक अभियंता हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी द’ कए गेल छल। हमरा बुझाइत छल जेना हमर हड्डीक मज्झा जमल जा रहल अछि। कोनो मजदूर दौड़ि कए हमरा थाम्हि लेलक आ गैलन मे भरल पानिसँ हमरा आँखि पर छिट्टा देलक नहि तँ हम ओतहिं अचेत भ’ कए गिर जेतहुँ। खएलाक पश्चात् हम भारी मनसँ ओतए आबि ठाढ़ भ’ गेलहुँ जतए आन मजदूर सभ काज करैत रहथि। हमर नजरि घूमि-फिरि ओहि बाटक दिस जा रहल छल। बाबूजीक मरबाक खबरि ल’ कए जीप आब आएल तब आएल, यैह सोचैत-सोचैत हम आधा दिन बिता देलहुँ। हमर एहि स्थिति पर दया करैत मजदूर सभसँ जतेक संभव भ’ सकलैक ततेक काज क’ देलक। जँ मजदूर सभ एहने लगनसँ काज करैत रहल तँ ई काज काल्हि धरि पूरा भ’ जेतैक, हमरा बुझाएल। साँझुक पहर हम जल्दीए निकलि कए पहाड़ीक बाटे उतरैत नीचाँ आबि गेलहुँ। लकड़ी ल’ जाएबला ट्रक भेटि गेलाक कारणेँ हम राति हेबासँ पहिनहिं बजार पहुँचि गेलहुँ। झटकि कए चलि हम घरक बाट पकड़लहुँ। पिचरोड खतम भेलाक बाद गली वला माटिक सड़क पर हमर चालि कने मद्धिम भ’ गेल। एहि गलीक ओहि छज्जाकेँ पार कएलाक बाद हम अपन वार्डमे पहुँचि जेतहुँ। हम सोचए लागलहुँ जे हमरा आँगनमे हमर किछु पड़ोसी लोकनि हाथ पर हाथ ध’ ठाढ़ छथि। हमरा देखतहिं ओ लोकनि अपनामे गप्प करए लगलाह। हम जेना-जेना घरक दिस बढ़ैत रही तहिना-तहिना कानबाक शोर बढ़ैत जा रहल छल। जहिना हम अँगना पहुँचब, एकटा पड़ोसी आबि हमरा गल-बाँही द’ घर ल’ जैताह। घरमे बाबूजीक प्राणहीन लहास पड़ल रहतनि। एकटा कोनमे कानि-कानि कए बेदम भेल हमर माय आ बहिनकेँ सम्हारबाक लेल पड़ोसक औरत लोकनि बैसल हेतीह। हुनका सोझाँ सोडाक बोतल आ काटल पेयाजु राखल रहतनि। बाबूजीक लहासक समक्ष एकटा दीप राखल हेतनि। एक दिस तश्तरीमे अगरबत्ती राखल रहत। लगहिमे एकटा पात्रमे चीनी राखल रहत। ओहिमे लोक सभ द्वारा चुट्टासँ उठाओल गेल चीनीक चेन्ह होएत। हमहूँ ओहिमेसँ एक चुट्टा चीनी उठाएब आ बाबूजीक फूजलका मुँहमे ध’ देबनि आ “बाबा” कहि जोरसँ कानए लागब। जखन हम आँगन पहुँचलहुँ तँ हमरा केओ नहि देखना मे आएल। घरसँ ककरहुँ बाजबाक आवाज आबि रहल छलैक। हम जूता खोललहुँ आ नहुएँ-नहुएँ पयर राखैत भीतर चलि गेलहुँ। आउ बाउ! शायद अहींक खातिर हिनकर प्राण कंठ धरि आबिकए अटकि गेल छनि। आब हिनका एहि कष्टसँ मुक्तिए भटि जेबाक चाहियनि, हमरा भीतर अबैत देखि हमरा माय लग बैसलि एकटा औरत बाजलि। हम बाबूजीक ओछाओन दिस देखलहुँ। जाहि गतिएँ हुनक छाती उपर-नीचाँ होइत छलनि, हमरासँ देखल नहि जा रहल छल। मुँह सँ निकल’ वला शब्द सुन’ मे नहि आबि रहल छल। आँखि खुजले छलनि। बाबूजीक ई स्थिति देखि हमरा बुझा पड़ल जेना ओ सरिपहुँ हमरहिं बाट जोहि रहल छलाह। हमर छोटकी बहिन हमरा चाह देलनि। चाह पीबि हम अँगपोछासँ अपन मुँह झाँपि बाबूजीए लग बैसि गेलहुँ। देखा पर चाही, जँ आजुक राति ई काटि लैत छथि तँ..... नहि जँ आइ रातिए किछु भ’ गेलनि तँ एहना स्थितिमे एमहर-ओमहर दौड़ब नहि, काल्हि भोरहिं उठिकए संबंधी लोकनिकेँ समाद पठा देबनि, की ठीक ने? हमरा भरोस देबाक लेल एकटा पड़ोसिन कहलथि। अँगपोछासँ झाँपल अपन माथ डोला हम हँ कहलियनि। राति बढ़ल जा रहल छलैक मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हम ओतहि बैसल रहलहुँ। रातिक बारह बाजि गेल रहैक मुदा बाबूजीक घर्र-घर्र केर आवाज एखनहुँ नहि कम भेल रहनि। घरक आन सभ सदस्य एमहर-ओमहर कोनमे सूति रहल छलाह। राति तीन बजे धरि बाबूजीक हालतिमे कोनहुँ सुधार नहि भेलनि। मुदा भोर होइतहिं हम द्वन्द्वक स्थितिमे आबि गेलहुँ। आब की करी? नोकरी पर जाइ, वा नहि? काज एकदम अनिवार्य रहैक आ जँ हम नहि गेलहुँ तँ कार्यपालक अभियंता हमरा छोड़त नहि। जँ कार्यपालक अभियंताक डरे नोकरी पर चलियो गेलहुँ आ एमहर बाबूजीक संग किछु खराप भ’ गेलनि तखन की हैत? माए.... हम नोकरी पर चलि जाउ? हम साहस क’ कए माए सँ पूछलहुँ। माए तँ किछु नहि बाजलीह मुदा एखनहि हमरा घर आयल हमर किछु पड़ोसी सभ हमरा पर अपन गोस्सा निकालए लगलाह। साँचे अहाँक दिमाग ठौर पर अछि कि नहि? एतए अहाँक बाबूजी मरण-शय्या पर पड़ल छथि आ अहाँकेँ नोकरी सूझैत अछि? नहि, नहि हमर कार्यपालक अभियंता बड्ड खरूस छथि। ओ शैतान छथि की? नीक-बेजाए केर ओकरा ज्ञान नहि छनि? हम चुप भ’ गेलहुँ। दुपहर होइत-होइत घर्राहटि आर बढ़िते गेलनि। चलू नीके छैक.... आइ बृहस्पति दिन छैक, प्राण छोड़बाक लेल आजुक दिन उत्तम अछि। हमर बूढ़ पड़ोसिन बाजलथि। एतबा सुनतहि हमर माए आर जोर-जोर सँ कानए लगलीह। साँझ होइत-होइत हमरा मोनमे आर डर समा गेल। जँ आइयो बाबूजी प्राण नहि निकललनि आ हुनक मृत्यु नहि भेलनि तँ ‘काल्हि काज पर किएक नहि आएल छलहुँ?’ एकर स्पष्टीकरण हम कनिष्ठ अभियंता केँ कोना देबनि? बाबूजी मरि गेलाह तकर पहिलुक दिन अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ? एहि तरहक प्रश्न सभ पूछि-पूछि ओ हमर पिंड नहि छोड़ताह.....जँ हम नोकरी पर नहि गेलहुँ आ मजदूर लोकनि काजकेँ आर बेसी घिच लैक तखन.......? आ एहि गोस्साक कारणेँ जँ ओ हमर ‘टर्मिनेशन आर्डर’ निकालि देलक तखन.....? कार्यपालक अभियंताक काल्हुक पल-पल केर दृश्य हमरा आँखिक सोझाँ नाचय लागल। दू बजेक पश्चात् खराप नक्षत्र आरंभ होइ बला रहैक, ओहिसँ पहिनहि हुनका मुक्ति भेटि जयबाक चाहियनि.....! केओ एहन बाजलथि। मुदा हमरा बुझाएल दू बजे नहि बारह बज’ सँ पहिनहि हुनक प्राण जयबाक चाहियनि, ताकि बाबूजीक मृत्यु बृहस्पतिए दिन भ’ गेल छलनि, कार्यपालक अभियंताकेँ बतएबामे हमरा सुविधा होएत। राति आठ बजे हम एक बाटी मरगिल्ला खा बाबूजी लग बैसि गेलहुँ। काल्हि राति भरिक जगरनाक कारणेँ हमरहुँ आँखि निन्नक बाट जोहि रहल छल। एखन हमर आँखि लागलहि छल कि केओ हमरा हाथ लगा उठा देलक। घरमे सात-आठ पड़ोसी लोकनि ठाढ़ छलाह। हुनका सभक आँखि बाबूजी पर स्थिर भ’ गेल छलनि। बाबूजीक मुँहसँ होमए वला घर्र-घर्र केर आवाज आर बेसी भ’ रहल छलनि। हम जल्दीसँ उठिकए बैसि गेलहुँ। बाबूजीक आवाज आर बढ़ि गेलनि। क्षण भरिक लेल हुनक सौंसे देह हिललनि आ अचानक सभ किछु शांत भ’ गेल। कतेक बाजि रहल छैक, कने ध्यानसँ देखियौक केओ? केओ बजलाह। केओ आगू बढ़ि पलंग सँ लटकल बाबूजीक हाथ सीधा क’ कए हुनक फुजल आँखि बन्न क’ देलकनि। हमर माए आ बहिन एक्कहि सँग जोर सँ चिकरैत बाबूजीक लहास पर हाथ राखि कानब शुरू क’ देलथि। एखन धरि ठाढ़ भए हमरा बाबूजीकेँ देख’वला हमर भाए झुकिकए गिरहि वला छल कि तखनहि केओ हुनका पकड़ि लेलकनि आर ओकरा मुँह पर पानिक छिट्टा देलकनि। मुदा हमरा तँ नीक लागल। हम एकटा दीर्घ निसाँस लेलहुँ आर देखलहुँ.....हमर बाबूजी.....हमर खून, हमरहि सोझाँ मरल पड़ल छथि.....,हमर साक्षात् बाबूजी हमरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेल छलाह। हम ई देखतहिं रहि गेलहुँ। ने जानि कोन-सन अनुभूति हमरा करेज सँ बाहर आबि गेल, बाबूजीकक लहास पकड़ि हम फूटि-फूटि कए कानब शुरू क’ देलहुँ..... हम्मर बाबूजी.........। मूल कोंकणी कथा : नागपंचम लेखक: वसंत भगवंत सावंत हिन्दी अनुवाद: सेबी फर्नानडीस मैथिली अनुवाद: डॉ. शंभु कुमार सिंह वसंत भगवंत सावंत सेबी फर्नानडीस डॉ. शंभु कुमार सिंह नागपंचमी अश्लेशा नक्षत्रहि सँ बरखा झमाझम होमए लागलैक। गत सात दिनसँ बरखा होइत छलैक। साओन मे तँ बरखा बन्न भ’ जएबाक चाही, मुदा ओ तँ बन्न हेबाक नामहि नहि ल’ रहल छलैक। बोलकर्णें केर द्वीप पानिसँ दहाबोह भ’ गेलैक। गामक खेतक फाटक सहित दहोदिस पानि मे डूबि गेलैक। मल्लिकार्जून मंदिरक दूइ सीढ़ी धरि बरखाक पानि छूबि लेलकैक, मुदा ठेह पर रह बलाक लेल कोनो असौकर्य नहि रहैक। मजूरी आ रोजीमे व्यवधान हेबाक कारणेँ लोक सभ हकोबको भ’ गेल छल। साँच त’ ई थिक जे खेती-बारीक काज साओन धरि भ’ गेलाक पश्चात् लोक गोबरछत्ताक धंधामे लागि जाइत छल। बहुतों जंगलक खाक छानलाक पश्चात् लोक गोबरछत्ता जमा कए लगीच वला साकोड्डें नामक गाममे बेचि दैत छल। ओहुना ओ सभ ककड़ी ओ गैता फोंडाक बजारमे बेचैत छल। जँ पैघ-सन माछ हाथ आबि गेलनि तँ ओकरा देसाई परिवारमे बेचि 10-20 टका कमा लैत छल। मुदा एहि बेर बरखा बेसी हेबाक कारणेँ भरि साल रोजगार बाधित भ’ गेलैक। नाह चलाब’ वला मलाह सभ तँ कखने अपन-अपन नाहकेँ उपर आनि राखि देने छल। ओकरा नीक जकाँ लकड़ीक गुटखासँ अटका देल गेल छलैक। ओकरा उपर नारियरक पातक छतरी सेहो बनाओल गेल छलैक जकर सुरक्षाक लेल ओकरा नारियरक गाछसँ बान्हि देल गेल छलैक। हरि भगत अपन बरण्डामे एकटा सोंगरक सहारे अपन पीठ अटका कए बैसल छल, बेर-बेर नदीमे आयल बाढ़ि के देखैत छल। घनघोर बरखाक कारणेँ ओ नदीक दोसर दिसक गाम साकोर्डें केँ सेहो नहि देख सकैत छल। ओहि क्षण ओ सपनहिमे अपन भविष्यक सोच केँ मूर्त रूप देमए लागल। आड़िक बाटे जेबाक बजाए ओ बिसू भट्टजीक गाछी बाटे रस्तासँ निकलि गेल। वेगसँ बहैत नलीकेँ पार क’ कए पनशी पहुँच गेल आ गाड़ीक प्रतीक्षा करए लागल। बरखाक कारणेँ गाड़ीक आवाजाही बहुत कम भ’ गेल छलैक। मोलें सँ एकटा टेंपू आबैत रहैक। मोलें साकोर्डें सँ लोक ससत दाम पर गोबरछत्ता कीनए गेल छलैक आ आब ओकरा मडगांवक बजारमे बेचबाक लेल जाइत रहैक। हरि ओहि टेंपू सँ लिफ्ट ल’ कए तिस्क्यार आबि गेल। डॉक्टर सँ मिलिकए बेमार नेनाक लेल औषधि लेलक आ दूधक सोसोइटीमे सभ दिन दूध लेबाक लेल आबय वला टेंपू पर बैसि ओ सांकोर्डें आबि गेल। नदीक कछेर आबितहि ओकर पयर काँप’ लागलैक। नदी पानिसँ लबालब रहैक आ दुनू दिस बस पानिए पानि देख’ मे आबि रहल छलैक। ओकर रूप वीरभद्र (रौद्र) जकाँ बुझाइत रहैक। ओहि काल ओकरा नजरिक समक्ष ओकर बेमार नेनाक सूरति आबि गेलैक। ने जानि ओकरा देहमे तखन कतए सँ उर्जा आबि गेलैक, ओ आव ने देखलक ताव झटसँ ओहि भयानक नदीमे कूदि गेल। ओकरा समक्ष केवल मृत्युये देखार दैत छलैक, मुदा ओ कोहुना हेलैत नदी पार क’ गेल। ओकर सौंसे देह पानिमे भीज गेल रहैक। ओ अपन सौंसे देहकेँ टटोललक त’ देखलक जे ओकर सभटा पीब’ वला औषधि आ गोटी भीज गेल छलैक। * * * खाइक लगा दी.....खाएब ने? पत्नीक टोकलाक पश्चात् ओ होशमे आयल। सपनासँ जागल लोक जकाँ ओ एमहर-ओमहर देखलक। कन्हा पर राखल गमछासँ ओ अपन मुँह पोछलक आ किछु कालक लेल आँखि मुनि एकटा नमहर साँस लेलक। खाइक लगा दिऔक, हरि बाजल। पत्नी खाइक लगा देलकैक। स्नानघर जा कए ओ हाथ-पयर धोलक। चिलका कखन सुतल? एखनहि सुतल छैक.....पत्नी नहुएँ बाजलीह। बोखार उतरलैक? “........” ओकरा गोटी खोआ देलियैक? हँ जे बाँचल छलैक ओ द’ देलिऐक। आब कोन दबाइ दियैक किछु बुझनामे नहि आबि रहल अछि। बुझाइत अछि जेना ई अपन जन्महिसँ मुँहमे दबाइक चम्मच ल’ कए आएल अछि। देखियौक ने काल्हि नागपंचमी छियैक हम बूट फूलबा लेल द’ देने छिऐक, भगवती करैथ चिलकाक बोखार कने कम भ’ जाइक। हँ, साँचे काल्हि तँ नागपंचमी छैक। ई तेसर खेप छियैक...... ओ एकटा गहिरगर साँस लेलक। बुझाइत अछि एहु साल हमरा सभक लेल अपशकुने अछि, ओ बहुत आर्त स्वरमे बाजल। भगवतीक ईच्छा.......। ई कहि ओकर पत्नी ओकरा मुँह पर अपन हाथ राखि देलकैक आ ओकरा आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लागलैक। तकर बाद दुनूक मूँहमे एक्कोटा दाना नहि गेलैक। गामक सभटा नेना-बूढ़ राणू भगत (हरिक बाबूजी) केँ भ्रष्टाचारी भगत केर नामसँ चिढ़बैत छलैक। राणू भगत समूचा गाममे धार्मिक ओ आन अनुष्ठान करबैत छल। गामक गरीब लोककेँ भगवानक नाम पर फँसयबामे ओ ततेक माहिर छल जे तकर कोनो सीमा नहि। खेती-बारी सहित आन सभटा जिम्मेदारी ओ हरिक कान्ह पर लादि देने छल आ स्वयं आरामक बंसी बजबैत छल। हरिकेँ अपन बाबूजी एक्कोटा आदति पसिन्न नहि छलैक, मुदा राणू भगत कहियो हरिक बात नहि बुझलकैक। ओतहि राणू सदति हरि आ ओकर पत्नी केँ अधलाहे बात कहैत रहैक। हरिक बियाहक तीन मास भ’ गेल रहैक आ ओहि काल एकदिन राणू नेनपन जकाँ मजाक करबाक लेल नारियरक गाछ पर चढ़ि गेलैक आ ओतए सँ जे गिरलैक तँ अपन डाँड़ तोड़ि खाट पकड़ि लेलक। राणूक खाट पकड़ि लेलासँ हरिक जिम्मेदारी दुगूना भ’ गलैक। “एहि हराशंखिनीक कारणेँ हमरा घरक सभटा खुशी पानि भ’ गेल अछि” राणू सदैव हरिक पत्नीकेँ कहैत रहैक। एतेक सुनलाक पश्चातो हरिक पत्नी ओकर देखभालमे कोनो कसरि नहि छोड़ैक। दिन पर दिन बीतल गेलैक, राणू चढ़िते अखाढ़ परलोक सिधारि गेलाह आ एहि कारणेँ हरिक पत्नीकेँ तीन मासक लेल घर छोड़ए पड़लैक। बाबूजीक मृत्युक कारणेँ ओ ओहि बरख नागपंचमी नहि मना सकल। दोसरहि बरख हरिक पत्नी एकटा नेनाकेँ जन्म देलकैक आ सोइरी हेबाक कारणेँ ओ ओहू बरख नाग देवताक पूजा नहि क’ सकल। एहि बेर एक बरखक चिलका बोखारसँ जूझैत रहैक.....। जेना-जेना समय बीतैत छलैक, चिलकाक हालति आर बिगड़ले जाइत छलैक। आयुर्वेदिक औषधिक सेहो कोनो असरि नहि भ’ रहल छलैक। दोसर दिस नदीक पानि बढ़िते जाइत छलैक आ चिलकाकेँ ल’ कए नदी पार करब संभव नहि छलैक। हरि अपन गाछीक मोड़ पर ठाढ़ छल। जँ हमर चिलका नीक भ’ जाएत तँ हम एहि बेर भगवान, कुलदेवता, ग्रामदेवता आदिकेँ छागर बलि देबैक। ओकर मनौन सुनि कए ओकर पत्नी अबाके रहि गेलीह। जाधरि ओ ओकरा देखैत ताधरि ओ नदी पार क’ कए हाथमे पूजाक समान ल’ कए मंदिर पहुँचि गेल। * * * अहाँ हिम्मति नहि हारब बाउ! बोखार उतरि जेतैक, एकटा पड़ोसनी ओकरा सांत्वना देलकैक। तखनहि मंदिरक घंटा बाजि उठलैक आ दुनू गोटे हाथ जोड़ि लेलक। ई हम एकदम साँच कहि रहल छी, ई कहि ओ चिलकाक माथ पर हाथ राखि देलक। देखियौक बोखार उतरि रहल छैक। पसेना चलि रहल छैक। हरि मंदिरसँ आनल भेभूत चिलकाक माथ पर लगा देलकैक। ओकर पत्नी बड़ भक्ति-भावसँ ओ भेभूत चिलकाक सौंसे देहमे मलि देलकैक। चिलकाक बोखार उतरैत देखि ओ दुनू परानी बेस खुश भेल। हरिक पत्नी भीजल बूटकेँ देखबाक लेल गेलैक आ हरि जंगल सँ आनल माटिसँ देबाल पर नागक आकृति बनब’ लागलैक। ओहि पर कुंकुम सँ ओकर रेखांकन कएलक आ कोयलासँ ओकरा पर “ओउम” बना देलकैक। हाथ धोलाक पश्चात् हरि फेर दरबज्जा पर आबि ठाढ़ भ’ गेलैक आ नदीक बहैत पानि दिस देख’ लागल। खेतमे एकनहुँ पानि भरले रहैक, मुदा बीच-बीचमे छोट-छोट गाछ सभ लखा दैत छलैक। हरि घुमबाक लेल नकलि गेल आ ताहि समय चिलकाक कानब-कुहरब सुरह भ’ गेलैक। हरिक पत्नी ओकरा छातीसँ सटा दूध पियौलकैक। चिलका एक मिनटक लेल तँ चुप भेलैक मुदा चोट्टहिं जोर-जोरसँ कानए लागल। चिलका एकबेर ओछरलक आ सभटा दूध बाहर आबि गेलैक। चिलकाकेँ अचानक एकटा चक्कर लागलैक आ ओ काठ जकाँ कठोर भ’ गेलैक। हरि केँ ई समाद कोनो आन नेनाक माध्यमे भेटलैक। हरिक हाथमे दू टा नारियर छलैक, ओ ओकरा ओत्तहि फेकलक आ हकासल घर दिस भागल। घरमे पड़ोसियाक भीड़ लागल रहैक। ओकर पत्नी जोर-जोरसँ कानैत रहैक आ ओकरा दू टा पड़ोसिया सभ सम्हारबाक प्रयासमे लागल रहैक। चिलकाक आँखि बन्न क’ रहल छलैक। एकटा पड़ोसिन किछु औषधिय पातक चूर्ण बना क’ ओकरा नाक लग राखि देलकैक। चिलकाक केवल साँसे टा चलैत रहैक। हरिक लेल ओतए बिलमब मोसकिल भ’ गेलैक, ओ बाहर आबि बरण्डा पर अपन दुनू हाथेँ माथ पकड़ि बैसि रहल। करिया मेघमे छिपल सूरूज,पछिम दिस डूबहि बला छल। आब हरिक जिनगीमे एकटा आर आफत आबहि बला छल आ नागपंचमीक पाबनि ओहि आफतमे शरीक होम’ बला रहैक। सभटा मनौती आ प्रार्थना बाढ़िक पानिमे भासि गेलैक। चिलका एखन धरि आँखि नहि खोलने छलैक। लोहारक भट्ठी जकाँ हरिक छाती धड़कैत रहैक। चिलकाकेँ देखबाक लेल आएल लोक सभ अपन-अपन घर आपस जा रहल छल। पड़ोसी सभक शब्द हरिक हृदयमे तीर जकाँ लागैत रहैक ओ घवाह भ’ रहल छल। शाबा! चिलका आइ राति नहि काटि सकतैक, एकटा स्त्री बाजल। हमरा तँ बेचारा हरि पर दया आबि रहल अछि, दोसर बाजल। भगवाने जानथि ई कोन बेमारी चलल छैक, तेसर बाजल। एक-एक करि कए बहुत भयानक बेमारी पसरि गेलैक अछि। किछु दिन पहिलुके बात थिक, मालूक पोता, जे मात्र डेढ़ बरखक रहैक, ओकरो एहने चक्कर ऐलैक आ छओ घंटाक भीतरे मरि गेलैक। ई गाम ककरो लेल शुभ नहि अछि। चारू दिस पानिए पानि। एहनामे डॉक्टरो-बैद केँ कि क्यो आसानीसँ बजा आनि सकैत अछि? साँच पूछू तँ हम एकटा बात कही, हरिक भक्तिमे निश्चये कोनो-ने-कोनो खोट हेतैक यैह कारण छैक जे ओ आइ तेसर बेर नागपंचमी नहि मना सकत। हँ सत्ते ..... काल्हि तँ नागपंचमी छैक? माटिकेँ तँ हाथो नहि लगा सकैत छी, आ एहनामे जँ चिलका मरि गेलैक तँ ओकरा गाड़तैक कोना? हरिकेँ किछुओ नहि सुझैक। काल्हि नागपंचमी छैक आ माटिकेँ घवाह नहि करबाक चाही। जँ चिलका भोरहि मरि गेल तँ शव अंतिम संस्कारक बिना भरि दिन आर भरि राति घरहिमे पड़ल रहत.....आर...... ओ आर किछु नहि सोचि सकल...... उठल आ घरक कोनमे पड़ल कोदारि आ गैंता ल’ क’ घरक बाहर निकलि गेल अन्हारेमे। ओ खाधि खुनब सुरह क’ देलक..... काल्हि मर’ वला चिलकाकेँ गाड़बाक लेल.......! सेबी फर्नानडीस- सोंगर (कोंकणी लघुकथा) सेबी फर्नानडीस- सोंगर (कोंकणी लघुकथा) सोंगर सेबी फर्नानडीस डॉ. चन्द्रलेखा डिसौजा डॉ. शंभु कुमार सिंह मूल कोंकणी कथा : खपच्ची लेखक : सेबी फर्नानडीस हिन्दी अनुवाद : डॉ. चन्द्रलेखा डिसौजा मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह 13 सितम्बर, दिन मंगल। भोरे-भोर मोबाइल खनकल। हमरा ओछाओनक लगहिमे मोबाइलक प्रकाश एना झिलमिलाइत छल जेना भिनसरे कोनो अस्पतालक ‘वैन’ रोगी केँ ल’ क’ निकलल हो। हम अपन आँखि मलैत मोबाइल उठौलहुँ...देखलहुँ तँ नम्बर चिर-परिचित छल। शैली केर। शैली माने हमर मिता, जे हमरे ऑफिस मे काज करैत अछि। बहुत नीक आ जिम्मेवारीक पद पर ओकर नियुक्ति भेल छैक। ओना देखल जाय तँ अपन स्वभाव सँ ओ एकदम सरल आ अपन काजसँ मतलब राखय वाली। नरम-नरम घोंघा-सन। जँ क्यो किछु कहि देलक तँ चुपचाप सुनि लए वाली। साँच पुछू तँ ओ हमरो बड़ नीक लागैत अछि। हमरा बुझने सभ कन्याकेँ शैलीए-सन हेबाक चाही। हम अपन मोनक बात कैक बेर ओकरा बतएनहुँ छी मुदा ओ ओकरा अनसुना करि दैत अछि। हम सभ एक दोसराकेँ लगधक सात बरखसँ जानैत छी। हमरा सभक दोस्ती विश्वविद्यालयमे पढ़बाकाल भेल छल। शैलीक हँसबाक अंदाज आ ओकर सरल स्वाभाव दुनू हमरा अतीव पसिन्न अछि। संभवतः यैह कारण रहल हेतैक जे हम ओकरा दिस झुकल चलि गेलहुँ। आइ तँ जेना ओ हमर मिता नहि अपितु हमर छाँह हो तहिना बुझाइत अछि। आइ ओ हमरा लेल हमर सभसँ करीबी बनि गेल अछि। हेलो..... हम मोबाइल उठबैत कहलहुँ। “शागू हम शैली बाजि रहल छी.... हम एखनहि अहाँसँ भेंट कर’ चाहै छी।” शैलीक ई जबाब तँ जेना हमरा आँखिक निन्ने उड़ा देलक। “मुदा बाद की थिक? से तँ साफ-साफ बताउ.......” “बताएब, सभ किछु बताएब। मुदा अहाँ भेंट त’ दिअ।” ठीक छैक भेंट क’ रहल छी... ऑफिस मे... 9:30 बजे। “नहि, नहि एखनहि मिलबाक अछि।” शैली बाजलि। “मुदा एखन...” “नहि, नहि हम किछु नहि सुन’ चाहैत छी।” कहितहि ओकर बोली जेना काँप’ लागलैक। “देखू शैली कानू नहि प्लीज.....” “हम की करी शागू! हमरा समझमे किछु नहि आबि रहल अछि।” ओ बाजलि। हमरा शैली पर दया आबि गेल। “ठीक छैक, हम एखनहि अहाँक ओतए आबि रहल छी। साढ़े आठ बजे धरि हम आबि जाएब, अहाँ घबराउ जुनि।” ओकर साहस बढ़बैत हम कहलिऐक। “ठीक छैक, हम अहाँक बाट देखि रहल छी।” कहैत शैली मोबाइल बन्न क’ देलक। हे भगवान ! की भेल हेतैक ? ई सोचैत-सोचैत हम हाँइ-हाँइ केँ मुँह धोलहुँ, कल्हुके पहिरलाहा अंगा-पेंट पहिर निकलि गेलहुँ। घरसँ निकलतहि हमरा मोनमे कैक प्रकारक शंका-कुशंका केर चक्र चल’ लागल। आखिर की भेल हेतैक शैलीकेँ? की ओकर मोन खराब भ’ गेलैक? वा अचानक टकाक कोनो बेगरता पड़ि गेलैक? हम आर झटकि कए चल’ लागलहुँ। पौने आठहिं बजे हम शैलीक घर पहुँच गेलहुँ। पछिला बेर जे शैली अपन घर गेल छलीह तँ ओ “वाल” (एक प्रकारक तरकारी) क लत्ती आनने छलीह। आब ओ लत्ती नरम-मोलायम पातक संग सोंगरक सहारे उपर दिस बढ़ि रहल छल, संगहि ओ अपन जड़ि जमएबाक जतन क’ रहल छल। दरबज्जा खटखटएलासँ पूर्वहिं शैली दरबज्जा खोललक। ओ शायत हमर पयरक आहटि सुनि नेने छल। जहिना हम घरमे प्रवेश कएलहुँ, शैली दरबज्जा बन्न क’ हमरासँ लिपटि गेल। शैलीक ई व्यवहार हमरा लेल एकदम अप्रत्याशित छल। “शैलीक व्यवहार एहन किएक भ’ गेलैक?” हम मोने-मोन सोचलहुँ। जरूर किछु विशेष भेल छैक, तखनहि तँ ओ हमरा अपन हितचिंतक बुझि एना क’ रहल अछि? हम नहुँए-नहुँए ओकर पीठ सहलाबैत रहिलऐक। “की भेल शैली? ऐना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छी? किछु बाजबो तँ करू?” ओ शनैः-शनैः अपनाकेँ हमरासँ अलग कएलक आ हमरा मुँह दिस निहार’ लागलीह। हमरा बुझा रहल छल जे जरूर शैलीक संगे किछु अनिष्ट भेल छैक? ओकरा आँखिसँ नोर तेना बहैत रहैक जेना भदवारिक इनारसँ पानि बहराबैत छैक। हमरा मोन पड़ल अपन गामक “सेजांव” उत्सव जाहिमे लोक इनारमे कूदि जाइत छैक आ छपाक होइतहि पानिक छींटा एमहर-ओमहर पसरि जाइत छैक। शैलीक आँखिक पानि फेर उफन’ लागलैक। ओ फेर हमरासँ लिपटि गेल। एहिबेर ततेक नोर बहलैक जे हमर अँगा भीज गेल। ओकर शीतलता मानू हमरा हृदयकेँ सेहो भीजा देलक। हमहूँ बरफ जकाँ पिघल’ लागलहुँ। हमरा जीवनमे सदैव एकटा दृढ़ गाछक सदृश ठाढ़ रहएवाली शैली आइ सिगरेटक पुत्ती जकाँ ढ़हि रहल छलीह। “शैली आखिर किछु बताउ त’! आब तँ हम अहाँक समक्ष छी।” ई सुनतहि शैली आर फफकि-फफकि कए कानए लागलीह। “देखू शैली, एना कानने कलपने सँ काज नहि चलत, जाधरि अहाँ किछु बताएब नहि हम कोना बुझू?” “हम लूटि गेलहुँ शागू.... हम तबाह भ’ गेलहुँ.....फँसि गेलहुँ....हमर इज्जति पानि भ’ गेल.... हमरा लूटि लेल गेल.....।” “अरे.....अरे.....शैली, ई अहाँ की बाजि रहल छी? बाज’ सँ पहिने अपन शब्दकेँ नापि-जोखि लेल करू।” हमरा लेल ओकर ई बात बहुत दुखदायी छल। आइ शैली एना बताहि जकाँ किएक क’ रहल छलीह? एहिसँ पहिने तँ ओ हमरा संगे शब्दक एहन खेल नहि खेलने छलीह? “बाजू शैली, की भेल...” “हमर कपारे मे आगि लागि गेल अछि....। हमर महीनवारीक दिन बीत गेल अछि, आ....। काल्हि हम डॉक्टरसँ चेकअप करौलहुँ त’...।” ओ ई बात! तँ शैलीक परेशानीक ई कारण छैक। हम मोने-मोन सोचलहुँ। “पछिला महीनवारीक कोन तारीख छल? हम पुछलिऐक।” “दुइ अगस्त।” ओ बाजलि। हम मोनहि-मोन गिनती लगएलहुँ....कैक दिन निकलि चुकल छलैक। हमरा किछु बाज’ सँ पूर्वहि शैली बाजल—सात दिन धरि हम बाट देखैत रहलहुँ काल्हिए डॉक्टरसँ देखएलहुँ, रिपोर्ट + + आएल छैक। + + केर माने भेलैक जे शैलीक कोखिमे नव ‘जीव’ अस्तित्वमे आबि गेल छैक। हमरा मिताकेँ बियाहसँ पहिनहि कल्याणक योग भ’ गेलैक। हम ई की सुनि रहल छी? कोना भ’ गेलैक ई सभ? हमरा माथ घूम’ लागल... कैक प्रकारक सवालसँ हमर माथ फाटल जा रहल छल। ओमहर शैली अनवरत रूपेँ कानि रहल छलीह। हे भगवान! शैलीक घरक लोककेँ जखन एहि बातक आभास हेतैक तखन की हेतैक? एखन शायत शैलीकेँ सान्त्वनाक आवश्यकता छलैक। शैलीक कपार पर विपतिक पहाड़ टूटल रहैक आ हम पत्ता जकाँ काँपि रहल छलहुँ। जेना जाड़क दिनमे शीशीक तेल जमि जाइत छैक तहिना हमहुँ जड़वत भेल जा रहल छलहुँ। के छी जे शैलीकेँ एहि दशामे आनि देलक? ई जानब हमरा लेल आवश्यक भ’ गेल छल मुदा ताहिसँ पहिने ई जानब जे, जे किछु शैली कहि रहल छलीह से साँचे थिक वा...। “शैली भ’ सकैछ अहाँक अंदाज गलत भ’ गेल हो..। भ’ सकैछ डॉक्टरक रिपोर्ट गलत हो....। अहाँ घबराउ जुनि। हम हरदम अहाँक संग छी, दुखमे, सुखमे सभमे।” हमरा बातसँ शैलीक मोन कने हल्लुक भेलैक। आइ धरि जे बात हम शैलीकेँ नहि कहबाक साहस केने रही से आइ एतेक आसानी सँ कहा गेल। शैली एकर माने की निकालने हेतैक से भगवाने जानथि। ओना शैली एखन जाहि मानसिक स्थितिसँ गुजरि रहल छलीह एहनमे हुनकासँ एहन सभ बात पर उमेदो करब उचित नहि छलैक। “शैली अहाँ जे कहि रहल छी से गलतो तँ भ’ सकैछ? पहिने डॉक्टरसँ नीक जकाँ पूछि त’ लिअ।” “आ जँ डॉक्टर फेर वैह बात कहलक तखन?” शैली बाजलि। “ओ बादमे देखल जेतैक।” हम कहलिऐक। “हम अपन जान द’ देब। मरि जाएब। हम आब जीब’ नहि चाहैत छी।” कानैत-कानैत ओ बाजलि। “हमसभ आइए डॉक्टर लग जाएब।” हम कहलिऐक। “कखन?” शैली तपाकसँ बाजलि। “ऑफिसक बाद, छओ बजेक लगधक। आइ हमहुँ अपन ऑफिसक काज जल्दीए जल्दी निपटा लेब।” ई कहैत हम ओकरा सांत्वना देबाक प्रयास कएलहुँ। शैली हमरा मुँह दिस देखैत रहलीह। हम ऑफिससँ जल्दी निकल’ वला नहि छी से शैली नीक जकाँ जानैत छलीह। ओ सोचि रहल हेतीह जे “शायत हम हुनका समय द’ कए मुकरि जाएब।” “अरे हम अहाँसँ प्रॉमिस क’ रहल छी हम अवश्य आएब। चाहे कतेको काज किएक नहि हो।” शैली किछु पल केर लेल अपन आँखि बन्न क’ लेलक। जेना ओ सोचि रहल हो जे जँ हम नहि आएब तखन की हैत? “शैली अहाँ जल्दी-जल्दी तैयार भ’ जाउ। हम बाहर अहाँक बाट जोहि रहल छी। कहैत हम ओकरा गाल पर हाथ फेरलहुँ आ ओकर आँखिक नोर पोछलहुँ।” “अहाँ डरब नहि चलू देखैत छी जे आइ साँझ केँ डॉक्टर की कहैत छथि”—कहैत हम ओकर देहरी पार कएलहुँ। शैली शीघ्रहि अपन कपड़ा बदललक आ हम दुनू बाहर निकलि गेलहुँ। अहाँ नाश्ता कएलहुँ की नहि? ई पूछब हम उचित नहि बुझलहुँ, तथापि पुछलहुँ--- “ऑफिसेक कैंटीन मे क’ लेब” ओ बाजलि। ओहि दिन भरि रस्ता शैलीक पयर नहुँए-नहुँए आगू बढैत रहल। ओकर मोन जे टूटि गेल रहैक! हम ओकर ओहि मोनक टुटलका तागकेँ जोड़बाक प्रयास क’ रहल छलहुँ। हमरा मोनमे एक पल केर लेल भेल जे हम शैलीक हाथ अपन हाथमे थामि ली, मुदा बाट चलति एहि तरहक व्यवहार हमरा शोभा नहि देत, ई जानि हम अपन विचार दमित क’ देलहुँ। गुमसुम शैली अपनहि विषयमे किछु सोचि रहल छलीह ई जानि हम ओकरा टोकलिऐक---- हाँ.....25। शैली उत्तर छल। “की भेल?” हम पुछलिऐक। शैली मौन रहलीह। हम फेर पुछलहुँ। शैली मौन। हमरा मोनमे भेल जे शायत शैली सीढ़ी चढ़ैत काल अपन उमिरक संबंधमे सोचि रहल छलीह। हम पाछू मूड़ि कए सीढ़ीक गिनती कएलहुँ ओ ठीक पच्चीसे छल। पच्चीस सीढ़ी आ पच्चीस साल, मेल बड़ नीक छलैक। पच्चीस सीढ़ी चढ़लाक पश्चात् ऑफिसमे प्रवेश आ पच्चीस सालक पश्चात् माय बनब......कुमारि माय? शायत एहि लेल ई क्षण ओकरा लेल सुखदायी नहि छलैक। कैंटीनमे हमरा दुनूक नास्ता-पानि भेल आ साँझमे मिलबाक बात क’ हम दुनू अपन-अपन ऑफिस चलि गेलहुँ। पूरा दिन काज करैत हम शैलीएक संबधमे सोचैत रहलहुँ। बीचहिमे हम एकबेर ओकरा इंटरकॉम नम्बर सँ फोन केलिऐक। शैली, केनह छी अहाँ? देखू धैर्य राखब, हम अवश्य आएब....कहैत हम फोन राखि देलहुँ। दूपहरमे एकबेर फेर हमसभ लंचक समय मे मिललहुँ। ओ भोजन करबासँ मना करैत छलीह। हमहुँ उपासे करब। ऐहने नाजुक समयमे तँ मितकेँ मितक आवश्यकता होइत छैक। हम ओकरा सहारा द’ रहल छलिऐक ई सोचि हमरा खुशी भ’ रहल छल। एखन घड़ीमे पाँच बजैत रहैक। ठीक ओहि काल शैली हमरा मोबाइल पर ‘मिसकॉल’ द’ क’ समयक संबंधमे आगाह कएलक। साढ़े पाँच बज’ सँ पूर्वहि हम ऑफिससँ बाहर आबि गेलहुँ। शैलीओ केँ झटकि कए आबैत देखलिऐक। “चली?” हमर प्रश्न सुन’ सँ पहिनहि शैलीक पयर बढ़ि चुकल छलैक। हमसभ अस्पताल पहुँचलहुँ। हमरा आभासो नहि भ’ सकल जे कखन शैली हमर हाथ कसि कए पकड़ि नेने छलीह। ओ डरि रहल छलीह। ओकर हाथ काँपैत छलैक। “डॉक्टर छथि?” हम स्वागत कक्षमे पुछलिऐक। “हँ, हँ छथि” कहैत ओ स्वागत अधिकारी हमरा बगल कुर्सी पर बैसबाक इशारा कएलथि। हम दुनू जा कए कुर्सी पर बैसि गेलहुँ। हम डॉक्टरक कक्षमे हुलकी मारलहुँ, आ सामने नामपट्ट पर सेहो, लिखल रहैक—डॉ. गीता। हम बुझि गेलहुँ जे यैह डॉ. थिकीह। देख’ मे एकदम सुन्नरि, सौम्य। हम मोने मोन सोचलहुँ जे शायत डॉ. गीता कहतीह—“शैली अहाँ एकदम नार्मल छी” आ हुनक ई वाक्य शायद हमरा सभक मोनक भ्रम तोड़ि देत। एतबहिमे नर्स आवाज देलक—“अहाँ सभ अन्दर जाउ।” डॉ. गीता एकदम मधुर आवाजमे पुछलथि—“कहू की तकलीफ अछि।” डॉक्टरक पश्न सुनि हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल। डॉ. केर प्रश्न एखन चलिए रहल छलैक। हम हुनका दिस देखलिएनि की ओ हमरा कहलथि—“कनेक कालक लेल अहाँ बाहर जाउ” हम ओतए सँ उठि बाहर ओहि कुर्सी पर जा बैसलहुँ जतय पहिने बैसल रही। नर्स दरबज्जा बन्न क’ दैलकैक। हमरा मोनमे तखन कतेको प्रकारक प्रश्न सभ उठि रहल छल। थोड़बे कालक बाद डॉ. दरबज्जा खोललक। हमरा फेर बजाओल गेल। हमरा ओत’ पहुँच’ सँ पहिने शैली डॉ. केँ किछु बता रहल छलीह। डॉ. हमर नाम पुछलथि--- “शागू गांवकर।” हम जवाब देलियनि। डॉ. हमर नाम पुरजा पर लिख लेलथि। हम देखतहि रहि गेलहुँ। हमरा अपनहि आँखि पर विश्वास नहि भ’ रहल छल। हम अपन आँखि आर कने बिदोड़ि कए देखलहुँ—हँ! ई शालीए रहैक। शैली, शाली कहिया भ’ गेलैक? “हँ तँ अहाँ सभकेँ बच्चा एखन नहि चाही, यैह ने?” डॉ. हमरा दुनूसँ पूछलक। “जी नहि। हमरा सभक आर्थिक परिस्थिति एखन बच्चा जन्म देबाक इजाजत नहि द’ रहल अछि।” शैली उर्फ शाली चोट्टहि बाजलि। हम ओकरा दिस साश्चर्य देखतहि रहि गेलहुँ। “तँ ई निर्णय अहाँ दुनूक छी ने?” “जी हँ, डॉक्टर! हमरा दुनूक यैह सम्मति अछि।” शैली बाजलि। शैलीक जवाब मानू हमरा अंतर्मनकेँ झकझोरि कए राखि देलक। बच्चा ककरहुँ हो मुदा ओकरा प्रति कने ममता तँ हेबाक चाही? डॉ. ओहि पुरजा पर आर किछु लिखलक आ हमरा दुनूसँ हस्ताक्षर करबा लेलक। शैली, शाली गांवकर नामसँ हस्ताक्षर केने छल जे पूर्ण रूपसँ जाली छलैक। अपन हस्ताक्षर केलाक पश्चात् ओ कलम हमरा हाथमे थमा देलक। हम की करी, की नहि एहि अंदर्द्वन्द्वमे रही। शैली एकबेर हमरा दिस देखलक---हम बात बुझि गेलिऐक, हमहुँ हस्ताक्षर क’ देलिऐक। डॉ. अपन अलमारीसँ किछु दबाइक गोली आ एकटा करिया-सन शीशीमे दबाइ शैलीकेँ थमा देलकैक। शैली अपना पर्ससँ आठ सय टका निकाललक आ तीन सय हमरासँ माँगलक। हम ततेक ने नर्वस भ’ गेल रही जे शैलीए हमरा जेबीसँ ओ टका निकालि डॉ. केँ देलकैक। शैलीक ई व्यवहार देख डॉ. केँ हँसी लागि गेलैक। “साँचे अहाँ दुनूक प्रेम बेजोड़ अछि।” हमरा दुनूक बीच पति-पत्नीक संबंध अछि, ई विश्वास डॉ. केँ दिएबाक लेल शैलीक ई नाटक एकदम ‘परफेक्ट’ साबित भेलैक। “मि. शागू! अपन पत्नीक ध्यान राखब, हिनका एहि समय अहाँक सख्त आवश्यकता छैक।” ई कहैत डॉ. गीता हमरा सभकेँ बिदा कएलथि। हम आ शैली बाहर एलहुँ। पेशेंट सभकेँ स्ट्रेचर पर ल’ जएबाक जे पथ होइत अछि ओहि बाटे हम सभ अबैत रही हमरा बुझाएल जे जेना हमर अपन संतुलन बिगड़ि रहल अछि। हम शायत अपनहि सँ उलझि गेल छलहुँ। किछु आगू चललाक पश्चात् शैली दबाइक दोकान पर पुरजा दैत किछु आर दबाइ किनलक। हमरा मोनमे एकटा जबरदस्त जद्दोजहद भ’ रहल छल। “हम पापी छी, हत्यारा छी, हमरहि कारणेँ आइ एकटा ओहन शिशुक हत्या भ’ रहल छैक जे एखन धरि दुनियाँ मे आएलो नहि छैक” कोनहुँ बच्चाक लेल संसारक सभसँ सुरक्षित स्थान होइत अछि ओकर माइक कोखि, हम ओहि कोखिक लेल मृत्युक सौदागर बनि गेल रही। दबाइ सभ गर्भनाड़ीकेँ बन्न क’ नेना भ्रूणकेँ समाप्त करबाक प्रक्रिया भ’ रहल छलैक। हमरा लागल आइ हम एहन अपराध केने छी जकरा लेल भगवान हमरा कहियो माफ नहि करताह। मुदा जँ हम एहन नहि करितहुँ तँ शैलीओ तँ आत्महत्या क’ लेतिऐक? यैह सभ सोचैत हम बहुत कालक लेल एकदम गुम्म भ’ गेल रही। जखन हम कॉलेजमे पढ़ैत रही आ परीक्षामे कम अंक आबए तखन मैडम पापा केँ बजा कए आनए कहैत छलीह। तखन हम गलीक नुक्कुड़ पर जा कए “साइकिल पायलट”केँ दस-बीस टका द’ कए किछु कालक लेल भाड़ाक पप्पा बना कए ल’ जाइत छलहुँ। परीक्षाक अपन गलती छुपएबाक लेल भाड़ाक पप्पासँ नाटक करबैत छलहुँ....। आइ हम अपनहि नाटक करैत रही। शैली केँ बचएबाक नाटक। बातो तँ साँचे रहैक, घौर बला केलाक गाछमे जेना संतुलन बनएबाक लेल ‘सोंगर’ लगाओल जाइत अछि, तहिना आइ हम शैलीक संतुलन ठीक रखबाक लेल सोंगरक काज क’ रहल छलहुँ। “चलू चलैत छी।” दबाइ ल’ कए घूरि आएल शैली बाजलि आ हम अपन विचारसँ बाहर निकलबाक प्रयास कएलहुँ। ओहि दबाइमे ओहि छोटका “जीब”क लेल “जहर” छलैक। हम शैलीकेँ ओकरा घर धरि पहुँचा देलिऐक। शैली हमरा बैसबाक लेल कहलक। शायत ओ बुझैत छलीह जे आइ जे किछु भेल छैक तकर परिणामस्वरूप हमरा मोनमे की भ’ रहल हैत। आइ भोरसँ जे किछु भ’ रहल छैक तकर जड़ि केर संबंधमे हम ओकरासँ पुछबैक। मुदा काल्हि भेंट करब, ई कहि हम ओकर मोन हल्लुक क’ देलिऐक। “गुड नाइट” कहि हम चलि देलहुँ। राति शनैः-शनैः भीजल जाइत छलैक आ ओकरा संगहि हमर चिंतन सेहो गंभीर भेल जा रहल छल। हमर एकटा मोन हमरा लांछित करैत छल आ दोसर मोन मजगूत क’ रहल छल। एहि अनजान शहरमे हमरा सिवाय शैलीक क्यो नहि छलैक। जँ हम आइ ओकरा सहारा नहि देतिऐक तँ ओ अपन इहलीला समाप्त क’ लेतिहैक। हे भगवान! हमरा माफ करब! जाहि भ्रूणकेँ अहाँ जनम देब’ चाहैत छलहुँ हम ओकरहि विनाश करबाक लेल शैलीक संग देलहुँ। कतेक पैघ गद्दार छी हम! दोसर दिन शैली ऑफिस नहि अएलीह। हमहुँ ओकरा सँ मिलबाक साहस नहि जुटा पएलहुँ। एहिना कैक दिन बीति गेल। एक दिन अकस्मातहि हमरा शैली सँ ऑफिस मे भेंट भ’ गेल। “शागू हम घर जा रहल छी।” शैलीक बात सुनि हम छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ। “मुदा एना अचानक?” “काल्हि भेंट करब” ई कहैत ओ ऑफिस चलि गेलीह। काल्हि शनि रहैक, से हम शैलीक घर जयबाक सोचलहुँ। आइ शुक्र दिन देर धरि ऑफिसक काज करैत रहलहुँ। दोसर दिन हम शैलीक घर पहुँचलहुँ तँ देखैत छी जे ओकरा घरमे ताला लागल छल। तालाक भूरमे एकटा पर्ची खोंसल रहैक। ओ संभवतः हमरे लेल हैत से जानि हम ओकरा खोललहुँ। हमरे चिट्ठी छल। प्रिय शागू, हम घर जा रहल छी। घरक लोक सभ हमर बियाह तय क’ देने छथि। अहाँक कएल गेल उपकारकेँ हम जिनगी भरि नहि बिसरब। हमरा जीवनक लेल अहाँ बहुत महत्वपूर्ण छी। हम बुझैत छी जे हमरा बिसरि जाएब अहाँक लेल एकदम असंभव हैत। मुदा हम आइसँ अहाँकेँ बिसरैत छी, संभव भ’ सकय तँ अहूँ हमरा बिसरि जाउ। शैली चिट्ठी पढ़ि हमरा लागल जेना एकटा जोरगर समुद्रक लहरि आएल आ हमरा पयरक निचलका सभटा बालु बहा कए ल’ गेल। हमरा आँखिसँ नोरक दूइटा बुन्न कखन ओहि चिट्ठी पर पड़ि पसरि गेल के हम नहि बुझि सकलहुँ। “काल्हि भेंट करब” कहएवाली शैलीकेँ काल्हि आ आजुक बीचक अंतर किएक नहि बुझि मे एलैक? शैली हमरा एहि तरहेँ किएक फँसौलक? शायत ओ सोचने हेतीह जे हम ओकरा बियाह करबा सँ मना क’ देबैक। जखन हम ओकरा गर्भपात करबैत काल नहि रोकलिऐक तँ एखन किएक रोकि देतिऐक? शैली आब पहिनुक शैली नहि रहल। ओ आब बहुत समझदार भ’ गेल छलीह। आब समाजक सामना करबाक साहस ओकरामे भ’ गेल छलैक। शैली शुक्र दिनक रातिएमे रेल सँ चलि गेलीह आ छोड़ि गेलीह हमरा लेल कैकटा अनुत्तरित प्रश्न सभ। ओहि दरबज्जाक आगू हमर ध्यान गेल जतय शैली कहियो “वाल” केर लत्ती लगौने छलीह। ओ लत्ती आब खूब पैघ भ’ गेल रहैक। ओकर जड़ि चतरि गेल छलैक आ ओहि लत्ती पर आब कैकटा फूल-फल लागि गेल छलैक। एहि “आल” केर फूल-फल आ ओकर पातक तरकारी खएबाक लेल शैली एतए नहि छलीह। शैली बियाहक लग्न मंडपमे छलीह। ई सभ सोचैत हम देबालक कोनसँ सटि गेलहुँ एकदम “सोंगर” जकाँ। अनूदित पद्य-खण्ड इप्सिता सारंगी- गप, हिलकोर (ओड़िया कविता) इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता- गप, हिलकोर- ओड़ियासँ इंग्लिश इप्सिता सारंगी द्वारा स्वयं, इंग्लिशसँँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा इप्सिता सारंगी (१९७५- )क दूटा ओड़िया कविता संग्रह पक्षी फेरिनी आ फेरिबा कथा प्रकाशित छन्हि। गप नहरिक थरथड़ाइत पाइनसँ एकटा नान्हि सन बुच्ची बहराइए थलथल कजरी सन। धरातलपर सूर्य अदहा झाँपल किरिणक बीच सुखाइए कजरी छोट कोट सन भऽ जाइए; स्वप्न- एकटा छोट राजकुमार अबैए एकटङा छरपान दैत हर्षित लैत ओकर हाथ अपन हाथमे खाली ओइ कोट लेल। ओ औंठा आकारक छोट राजकुमारी खोलैए अपन छोट बाकस, ओइ बुच्चीक ठोढ़पर प्रेमपूर्ण मुस्की दैत बिलाइए ओ। एकबेर ओ छोटकी बुच्ची खसैए नहरिमे भीजल फराक आँखि- भरल नोरसँ घोकचल; सीढ़ीसँ ओइ बुच्चीक पनिसोखा सन नोर बहार भेल औंठा आकारक छोट राजकुमार अपन मोलायम तरहत्थीक संग ओकर गाल आस्ते-आस्ते मीड़ैत अछि। ओकर नोरक रंगल बुलबुल्ला बिछि लैत आंगुर सभमे। .सूर्य ओकरा सभकेँ उधियाबैत; ओइ रंग सभकेँ राइतमे पसारैत ई रहए पिरौंछ भोरमे। ओ छोट बुच्ची अगिला भोर देखलक ओ नहरि- सुखा गेल, मुदा कजरी- अखनो अछि जिबैत ओइ छोटकी बुच्चीक बाट तकैत, आकि ओइ राजकुमारक? जिबैत टटका स्वप्न जकाँ तुरत्ते बहार होइत पिपनीसँ। हिलकोर कियो नै सिखेलक कहियो एक ठोप माहिर देनाइ बासनमे निर्दोख सरलताक। हम पूर्ण रूपेँ हारि गेलौं। फूसिक मरैत पानि सुच्चा सत्यमे- वा दोसर, जीवन नै अछि जीवन, किंशाइत। हम हेरा गेलौं। कोन माहुर विश्वासकेँ संक्रमित केलक, जे लागल सदिखन मात्र टुकड़ी-टुकड़ी हेबा लेल। अकाशक टुकड़ी चिड़ैक दहाइत पाँखिमे; नहिये अकाश नहिये छाह छल एकर चांगुरमे। विश्वास, जेना पूर्णिमाँक रातिक समुद्र जे घुरबैए सभटा लेल बौस्त जखन ओ घुरबैए हिलकोर। की हिलकोर घुरैए विश्वासक आरि छोट हाथसँ बालुपर बनल? की हिलकोर घुरा सकैए एकान्त जिनगीमे निराउ बर्खा? पनिसोखाक द्वीपसँ स्वप्न आवेशसँ छोट कागचक नाहमे? आ, जीबाक स्थितप्रज्ञ अभिलाषा समयसँ ध्यान हटा कऽ? की हिलकोर घुरा सकैए- पराजय? आ, हेरा गेनाइ? (इप्सिता सारंगीक ओड़िया कविता "धेउ कान") अन्नावरन देवेन्दर (अंतिम शब्द; पानि अछि, मात्र आँखिक नोर)-दू टा तेलुगु कविता मूल तेलुगु पद्य- अन्नावरन देवेन्दर-अंग्रेजी अनुवाद पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर कवि अन्नावरम् देवेन्दर आन्ध्र प्रदेशक करीमनगर जिलासँ छथि आ तेलुगु भाषाक तेलंगाना बोलीमे तेलंगाना राज्यक संवेदना आ संस्कृति आ ओकर अलग राज्यक लेल संघर्षकेँ स्वर दैत छथि। हुनकर छह टा कविताक संग्रह छपल छन्हि। महात्मा जोतिबा फुले फेलोशिप २००१, रंजनी कुन्दुरती कविता पुरस्कारम् २००६, डॉ. मलयश्री साहिति पुरस्कारम् २००६, रांगिनेनी येनम्मा साहित्य पुरस्कारम् २००७ पुरस्कारसँ सम्मानित। ओ जिला परिषद, करीमनगरक पंचायती राज विभागमे सीनियर असिस्टेन्ट छथि। पी.जयलक्ष्मी, ओस्मानिया विश्वविद्यालयक , निजाम कॉलेज हैदराबादमे अंग्रेजी विभागमे एसोसिएट प्रोफेसर छथि। विगत ३० बरखसँ अंग्रेजीक अध्यापन। हुनकर विशेषज्ञता अंग्रेजीमे भारतीय कविता, अनुवाद आ अनुवादशास्त्र अछि।२००३ मे भार्गवी रावक संग मिलि कऽ शीला सुभद्रा देवीक सितम्बर ११ आ ओकर परिणामपर तेलुगु काव्यक अंग्रेजीमे वार अ हर्ट्स रैवेज नामसँ अनुवाद। २००७ मे गोपीक ननीलू केर अंग्रेजी अनुवाद। स्प्रिन्ग नामसँ अन्नावरम् देवेन्दरक कविताक अंग्रेजी अनुवाद प्रेसमे अछि। (तेलुगु कविता: तेलुगुसँ अंग्रेजी पी.जयलक्ष्मी द्वारा, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) अंतिम शब्द (तेलंगानाक किसान द्वारा आत्महत्यासँ पहिने पत्नीसँ कहल) “लछम्मा, प्रिय! हम छोड़ि कऽ जा रहल छी हमर शिक्षा मोन राखू...अपन बच्चाक नीक पालन करब ई हमरा सकमे नहि अछि- जीब कर्ज देनिहार सभ बनि गेल छथि यम। आइ काल्हिक समए नहि अछि किसानक लेल हम छोड़ि कऽ जा रहल छी ओ सभ हमरा नहि छोड़ताह जीवित हम कतबो चाही ई जिनगी कोन तरहक जतए अन्न नहि अछि खएबाक लेल महाजन सभ तीरि रहल छथि कर्जदाता हमर सम्मानकेँ लज्जित कऽ रहल छथि हम नहि जीबि सकब लछमी, नहि, नहि आब आर! एकटा बीस वा चालीस हजार हमरापर कर्ज छै समाजक- सुनै सएह छी आर पचासेक देबाक अछि साहूकारकेँ आ एकर अलाबे, सुनू! ऋण मारिते रास एत्तऽ आ ओत्तऽ अपनासँ घृणाक अनुभूति एहि जिनगीकेँ जीबाक विचार मात्रसँ छी लज्जित। एहि ऋण सभकेँ प्लेग जेकाँ बढ़ैत देखि! ऋण देनिहार सभ आबए लागल छथि घर सेहो रोकए लागल छथि बाटे-घाटे पछोड़ धऽ लैत छथि जखने तखने अपन जिनगीक बाद जतए कतहु हम जाएब जिबैत अपन मुख, बार्लिस सन पातर की हम करब आ कोना हम जीब? ई समए नहि अछि छोड़ि कऽ एहि जगकेँ जएबाक कतहु पानि नहि मुदा नोर बहैत हुहुआइत पोखरि कहियासँ ने सुखाएल इनारमे हरियरी देखाइत बोरवेल सँ पाइ मात्र जाइत खुनैत सए फीटसँ बेशी, पाताल धरि कोनो टा मे मुदा पानि नहि हम पिटैत हाथसँ कपार खुनल माटिक पहाड़ देखैत हँसीक उद्गम सभक लेल! बोरवेल लेल एकड़क-एकड़ बेचैत जे एना अछि तँ कतए अछि कटही गाड़ी आ कतए अछि खेती आ कोना जिबै अछि बच्चा सभ? आउ आब! बरखा नहि हएत नहिये जाएत अकाल आकि भुखमरी पानि नहि बहत नहिये जाएत अपन नोर खेत सभ तपि कऽ सुखाएल समए सेहो उनटि अछि गेल बरखा जाहिसँ नहि खसै अछि एक्कोटा बुँद बीया बाओग करैत काल सएह बहैत अछि मोनसँ कटनीक समएमे जे एकाध टा दाना रहए बचल बहि गेल बाढ़िक पनिमे जे दाना जाइत कंठमे से बहि गेल नालामे कपासक खेती सेहो तेहने कीड़ा..सभटा कीड़ा, खतम भेल दहोदिश बीयासँ रसायन धरि धोखा...धोखा..बेइमानी चारू दिश बेइमानी बोनिहारसँ सभटा क्षति, जेम्हरे देखू तेम्हरे हानि..आ ओहूसँ बड़का हानि ओकरा दबेबा लेल बिन प्रयोजन कतबो बरिखसँ करैत होइ खेती बिनु प्रयोजन हमर बच्चा सभ अछि पैघ भऽ रहल किसान सभ अछि मरि रहल हमरा ई कहए दिअ, हम सेहो छी मरि रहल हम नहि जीबि सकब आर अधिक काल हे लच्छैय्या! छी हम जा रहल! हाल-फिलहालक पाइ के अछि मँगने? की ओ सभ चाहै छथि जे किसान बन्न कऽ देअए खेती? जकरा चाही दरमाहा जीबाक लेल? कोना जीब आ कोना मरब.. कोना कऽ भरब कर्जक अम्बार.. अपनो बेचि कऽ की चुका सकब? की अपन खेतिहर भूमि सेहो बेचि दी? मुदा से एहि अकालमे कीनत के? जे हमर जीवन-संघर्ष तेहेन अछि सुनलहुँ धनिक लोक सभक ओहेन शब्द-सभ? “मरैत अपच होइत जे ओ सभ लेने छथि”। हमर बाउ! कतएसँ आनै छी ओ सभ दाना जे अहाँ खाइ छी? एक बेर फेर, ई अछि हिस्टीरिया रोग! जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि रोगमे? जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि जुआमे? आ बढ़ा लेलन्हि अपन धोधि? की अहाँ नहि देखि पाबि रहल छी किसानक अँकड़ल पेट? की अन्न देनिहार भऽ गेल रोगी? नहि एकटा चातकक माउस ओकरा देहमे, हमर बाउ! धानक खेतीसँ पोसल ई देश आ आब हमरा दाना देबासँ मना कऽ देलहुँ अहाँ, नञि की? ओ कहै छथि हम मरि रहल छी अनुकम्पा राशि लेबाक लेल ओ कोना ई कहि सकै छथि...एहन शब्द सभ? की अहाँ देखने छी, हमर लच्छैय्या? ई शब्द सभ दाह उत्पन्न करैत अछि हमरा देहमे, अहाँक पाइक खगता? ककरा छै ई खगता? हम सभ गाए जेकाँ छी पवित्र, अहाँ से कहै छी? अहाँ सभ मरब हमरा सभक शाप माथपर लेने हम सभ नहि छी ऋणखौक हृदए राखू..हम सभ छी स्वाभिमानी मनुक्ख मरि जाएब से एतए फेर लेब जन्म एतए अपन जिनगी काटल गंगासन पवित्रतासँ हम सभ छी ऋणमे डूमल आ ऋणदाता सभ बनि गेल छथि यम, प्रिय हम आब नञि..हम आब नञि.. छी जा रहल ............................. लच्छय्या! लच्छय्या! अहाँ एना किएक छी कलपि रहल? ई अछि लिखल अपना सभक भाग्यमे ततेक दिन जीब जतेक दिन अछि लिखल हम जा रहल छी जहिया हमरा जेबाक छल ......................... हमर दिनक गणती शुरु अछि भऽ गेल नहि स्वीकार करब लच्छैय्या, अनुकम्पा राशि हमरा गेलाक बाद सरकार ई देबाक गप करत ओ नहि कहैत अछि जे, हम जे छी मरि रहल से, जे खेलहुँ तकर अपच भेलासँ छी मरि रहल? ओकरा लऽ जाए दियौ ओ पाइ अपना सारामे? धिक् ओहि घरकेँ। हम जा रहल छी... अहाँकेँ हानिमे दैत, लच्छा! बच्चा सभक लेल नहि कियो आर हम जा रहल छी..जा रहल छी ऋण देनिहार सभक द्वारे” (मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ “आखरी माता”) मूल तेलुगु पद्य- अन्नावरन देवेन्दर-अंग्रेजी अनुवाद- पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर (तेलुगु कविता: तेलुगुसँ अंग्रेजी पी.जयलक्ष्मी द्वारा, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा) पानि अछि, मात्र आँखिक नोर ठोप, ठोपे टा मे टपटप खसैत पानि ठोपे-ठोपे, हम नहि कऽ सकैत छी वर्णित, पानि नहि बहैत अछि निरावरोध, सुबर्ना नहि अछि भरैत कखनो। कलसँ भनसाघर धरि, भनसाघरसँ सोझाँक बारी धरि भागैत एतएसँ ओत्तऽ एम्हर-ओम्हर करघाक नमरैत ताग सन वस्त्रक संरचना सन एक्के घुमानमे हम जाइ छी घूमि। कनैत बाल, पानि भरबाक अछि काल दूधक झोँक आ हमर रजस्वला एकान्त हुँह ! सभटा एक्के बेर ! पानि मात्र सप्ताहमे दू दिन, छौँकी आ झगड़ा कलपर तैयो छी हम सभ स्त्री जे रहैत छी मिलि कऽ बेकाल मे दैत प्राणोक उत्सर्ग। ई सभटा झंझवात पानिये टा लेल नहि कहि सकैत छी अहाँकेँ अपन पानिक समस्या- सम्पूर्ण भोर खतम होइत अछि एहि १५ मिनटक कार्यक लेल कनेक काल भातक बिनु बिसरियो सकैत छी मुदा बिनु पानिक जीवन चलत? एकत्रित भेल जे नहि अछि हमर बेटोक लेल पर्याप्त ताहि लेल, रस्सा भरि नमगर पाँति। के अकानैत अछि संघर्ष? घर भरल लोक गाछ जेकाँ ठाढ़ आकि कुरसी जेकाँ बैसल तमसाइत हमरापर जे हम छी पछुआएल दौगैत छी बिनु लक्ष्यक। मुदा नहि हिलबैत छथि आँगुरो हमरा सहायतार्थ हमर हाथ ओहि बोरिंगकेँ ठीक करैत भेल जे चोटिल। ओहि पम्पकेँ पीटैत निकलैत अछि मात्र छुच्छ ध्वनि हमर प्राण बहार भऽ जाइत अछि ओतए काज करैत कर्र कर्र कर्र कर्र हमर बाँहिक दर्द आ छातीक पीड़ा पाताल धरि पानि बिला जाइत अछि कतहु गहींर नीचाँ मुदा तैयो नहि बकसैत जे हम काज करैत छी खतम करबाक लेल चम्मच भरि पानिक बुन्द सेहो गन्हाइत। कान्ह भेल भोथ ठेला परल सुवर्णा उघैत ब्लाउज फाटल एकटा अल्प जीवनक बाद हमरामे नहि अछि एकर जोड़-तोड़ करबाक सक्क हम की कऽ सकैत छी बहिन? पानिक चरचे मात्र मृत्युक डरकेँ अछि खोंचारैत पानि अछि, आँखिक नोर मात्र... “नीलान्टे कन्नीले...” मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ हेमांग आश्विनकुमार देसाइ- समीकरण (गुजराती कविता) हेमांग आश्विनकुमार देसाइ मूल गुजराती पद्य आ तकर अंग्रेजी अनुवाद- हेमांग आश्विनकुमार देसाइ मैथिली अनुवाद-गजेन्द्र ठाकुर समीकरण दू टा अर्धवृत्त जन्मैत समानान्तर, समानान्तर रेलगाड़ीक पटरी। हाथ भरि नमगर लिबल घास, झुकैत भीतर, बिना डोरीक धनुष सन। सुनबैत खिस्सा भरिगर हबाक, रातिभरि जन्मैत अस्पष्ट पीठ वेताल सन, जे उड़ि जाइत अछि बोर भेने। आ एतबे आकि कनेक बेशी झुकल बुढ़िया जे अहाँकेँ मोन पाड़त हाँसू। झुकल निश्चल प्रथम श्रेणीक कम्पार्टमेन्टमे, कातमे ठाढ़ कएल गेल ट्रेन अहाँक अपन आँखिसँ कएल प्रतीक्षा बिन कात भेल। एकटा छोटो आहटि एकटा त्वरित चमक कमसँ कम आब, हँ आब ई हमर अधिकार अछि, सत्ते हैए जाइत अछि। दूटा उर्ध्वाधर पटरी टेढ़ कएल बीचमे दू टा तोरण जमल मृत्यु एकटा तीक्ष्ण गुमारबला दुपहरिया आ अहाँ बनबैत छी एकटा अद्भुत समीकरण। आश्चर्यिय छी अहाँ कष्ट उठबैत छी सोझ बैसबा लेल आ जे हाँसू गीरि गेलहुँ कताक समय पहिने तोऐत अहाँकेँ खण्डमे अजय सरवैया- अहाँक तामस हमर स्वागतपथ (गुजराती कविता) अजय सरवैया, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। अहाँक तामस हमर स्वागतपथ “अहाँ आवेष्टित छी प्रतिध्वनि आ मोहक स्वरसँ”. पाब्लो नेरुदा चक्रधर आ पीयुषक लेल “कहिया धरि हम खिचैत रहब एना”? ओ पूछत आद्र मुखसँ हेराएल आँखिसँ हम राखब सोझाँ शब्दकेँ, ओ रखतीह नियमावली हम करब सोझाँ अपन इच्छा, ओ भ्रमकेँ हम देबन्हि मेघ, ओ चक्र हम आनब प्रश्न, ओ पलायन हम प्रतिभाक प्रेमी, ओ बन्धनक हम स्वप्नक आकांक्षी, ओ निर्जनताक कहिया धरि? हम बुझलहुँ नीक जकाँ हमर भाग्य रहए फराक हमरा सभक दिन राति सेहो ऋतु आ पाबनि तिहार जकाँ समय काल हमरा सभक अन्तर हमरा सभक विभिन्नता रहए विभिन्न हमरा सभ प्रेम करैत रही कतेक दिन धरि? राजेन्द्र पटेल- बिनु शीर्षकक (गुजराती कविता) राजेन्द्र पटेल, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। बिनु शीर्षकक हम किएक कऽ रहल छी अनुभव धरा बिन शाखक बिना एहि हाथक? पसारैत दूर आ विस्तृत जीवित साँपक ताकिमे ई सभ हाथ एक दोसरमे ओझराएल आ समाप्त होइत मात्र नहक वृद्धिमे। बाबाक छड़ीक पकड़िसँ बसक ठाढ़ होएबला लटकल चक्र मुट्ठी अनैत अछि वैह अविचल शून्याकाश। ओकर कए अनुभूति ई सभ खेंचल कार कौआक हाथ घुमि जाएत आकाश दिस सभटा खेत अंकुरित प्रफुल्लित पृथ्वीक गत्र-गत्रक पाँजर खेतमे औंगठल बाँहि जकाँ। सभटा हरक फारक चेन्ह भाग्य रेखा हाथक। पंक्ति जोखि सकैए मात्र हाथक लम्बाई नहि एकर जड़ि पहिने हम कए सकी एकर निदान हाथक आक्रमण जड़िपर श्वेत धरापर रोशनाईसँ पसरल अपन नव अंकुरित आँखिए उड़ि गेल नव-जनमल पाँखिए ओहि धूसरित गगनक पार आब सभटा मस्तिष्क कोशिकामे हाथ रहैछ अहर्निश प्रवेश कए रहल गँहीर आर गँहीर जड़िमे पीयूष ठक्कर- सांध्य बेला (गुजराती कविता) पीयूष ठक्कर, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। सांध्य बेला साँझ होइते शिशिर आह पर्वतक आच्छादित कएल अकाश अविलम्ब पड़त सम्पूर्ण आकाश फाँसमे एहि पर्वतक छाहक पर्वतकेँ भेटत अकाश प्रकाशकेँ छाह शरीर सुतत हृदय दुखित ओहिना जेना ईश्वरकेँ भेटल मनुक्ख पन्ना त्रिवेदी- आमद (गुजराती कविता) पन्ना त्रिवेदी, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। आमद हे विदेशी! देखाऊ हमरा एहन दृश्य यदि अछि कोनो एहन बिनु प्रकाश बिनु गद्दक ओछाओन बिनु छाह जतए नहिए अछि चुप्पीक अंश व्यथित हृदयक ध्वनि नहिए ध्वनिक आँगुरक नोकक स्पर्श देखाऊ हमरा ओ दृश्य यदि अछि कोनो एहन हौ विदेशी! जतए क्यो नहि करैछ एकत्रित स्वासक मालगुजारि। बाबू सुथार- गृहमोह (गुजराती कविता) बाबू सुथार, गुजराती कवि गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई द्वारा। अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा। गृहमोह गंध पहिल बुन्नीक आ हम बैसि आ पसारी एक-दोसराक दिस भेदित पड़पड़ाइत बुन्नीक बुन्द बलुआही माटि भेल यथार्थ छननी अएल प्रखर रौदक फोका पाथरक चामपर अविलम्ब झझायत छातक खपराक भूर धारक संग उगडुम करत नवतुरिआ बरद कछेरपर नाचत। सभटा गलीमे बरद सभ आनत पानि सोलह टा पालो बान्हि गरदनिमे सभ घरमे धरनि सभ नहाएत जी भरि देबालपर गाछक छातीपर स्मृतिक शिलालेखपर हदसैत पानि खोलत हस्ताक्षर भगवानक पूर्वजक। बराखक संगे चमकैत आकाश माएक कोमल तरहत्थी। सूर्य करत आच्छादित वृक्षक शाखक पातक पँखुडिक। टाँगल पक्षिक आवास सभ गृहक बाहर मयूर सभ करत नृत्य। जेना प्रिय नव वधु मयूरीक माथपरक जलक घट गामक दोगहीसँ निकलत अनबा लए पानि छिटैत नहक आकारक झील वैतरणी डुमाएत रीढ़युक्त नागफनीक पात। संग जीव आ शिव करत अष्टमी आ एकादशी चन्द्रमा उगत चुट्टीक कटगर पीठपर आ चाली सभ बहराएत आडम्बरसँ राजसी मुकुट धेने सत्ये किछु अकठ अछि हमरा सभक भाग्यमे आइ आइ गंध पहिल अछारक आ हम बैसि आ पसरैत एक दोसरामे। वासुदेव सुनानी- फूसि, अनुमति (दू टा ओड़िया कविता) वासुदेव सुनानी:ओड़ियाक प्रमुख दलित कवि, तत्कालीन कालाहाण्डी (आब नुआपाडा) जिलाक मुनिगुडा गाममे जन्म। कविताक चारिटा पोथी प्रकाशित। "महानदी बेसिनक दलितक सांस्कृतिक इतिहास" आ जोतिबा फुलेक जन्मचरित लिखबामे आइ काल्हि लागल छथि। ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा फूसि जखन कखनो हमरा भेंट होइ छथि शबनम भौजी हमरा प्रसन्न मुखक आशीष भेटैए ईदक चानसन दीप्त आ ओइ प्रसन्नताक बाद एकटा रहस्योद्घाटन- “तूँ आब बड्ड पैघ भऽ गेल छेँ।” फूसि! पाँच फीट पाँच इन्चक मात्र अि वासुदेव, पएरसँ पहुँचा धरि अखनो हुनकर चौखटिक उपरका भाग नै छूबि सकै अछि! कहियासँ ई भऽ गेल पैघ? पुछू ककरोसँ... सभ कहत कि वासुदेव अछि एकटा मामूली अभागल बाट-बटोही इन्तजारीमे एकटा बिसरल बस अड्डापर। अनुग्रहपर कएलापर कने काल लेल बिलमै अछि एकटा बस ओतए मुदा जखन ओ चढ़ैबला रहैए, ओकरा छोड़ि कऽ चल जाइए बस। शबनम भौजी एकटा फूसि बाजैवाली यक्षिणी छथि, आ ओ फुइस एहन बजै छथि जकर नै रहैए कोनो ओरे आकि छोरे। जे कियो एतए अपनाकेँ बुझि रहल छी खैरात बँटनिहार, कृपा कऽ रोकू एकटा बस। वासुदेव एकर प्रतीक्षा कऽ रहल बड़ी कालसँ, मड़राइत आत्मविश्वासक पगहाक अन्तिम छोरपर। वासुदेव सुनानी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा अनुमति हमरा अनुमति अछि श्रीमान! हम कए ली विश्राम कनेक काल? अहाँक आदेशानुसार छाह केँ देने अछि बहारि, बत्तू केँ देने छी खोआए, अहाँक नालाकेँ कए देने छी साफ, नहि रहत कोनो दुर्गन्ध आब। हमर अछि ढोल बजबए बला मधुमाछी युगसँ अहाँक मनोरंजनार्थ आ हमर आँगुर स्थिरताक राखए आश हम करी विश्राम थोड़बे काल? हम करैत छी अनुभव पुरखाक स्वेद हमर देव, हमर मृतात्मा। ताहि लेल प्रिय श्रीमान् घंटा भरिक विश्राम मात्र अभिवादन जकाँ किएक तँ हमर दुर्गन्ध, स्वेदक आ किछु आन वस्तुक। हम करए छी प्रतीक्षा अहाँक नीक समय तृप्तिक संगहि अपन कीट-संक्रमित जिनगीक समाप्तिक संकेतक। प्रतीक्षा सेहि भरि दैत अछि थकान, श्रीमान् प्रियवर विशेषकए लाख बरखक जहुँ ई होए। से हम करए छी विश्राम थोड़ेक काल, श्रीमान्? कारण हमरो सन् तुच्छकेँ बुझल छैक छोट-मोट विद्रोहक कला। भरत माँझी- हमर घुरलाक बाद (ओड़िया कविता) भरत माँझी, ओड़िया कवि ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा हमर घुरलाक बाद हमर घुरलाक बादो ओहि स्थानके नहि छोडू रिक्त पकड़ने रहू ओकरा। फूल सभकेँ नहि फेकू की कोनो महत्व अछि एकर जे ओ टटका फुलाएल अछि आकि अछि मौलाएल? खोलू हमर सभटा नुकाएल भोथियाएल स्वप्न, ओकरा अलंकृत कए। उनटि दिअ सभ ठामक लैम्पकेँ, आ रोकि दिअ अन्हारक प्रति घृणा बिना घबरेने देखू समुद्र आ तखनो नहि करू घृणा अकाससँ। नेहोरा अछि!!! पृथ्वीकेँ बुझू एकटा सममिश्रित स्थान प्रयास करू आ ठाढ़ रहू ओतए। कृपया बाट ताकू अपन आ से करए काल, रहू जागल! मोन राखू, हम घुरब एहि पृथ्वीपर जे एहन एकेटा अछि राखू मोन कि हम घुरब हम बाउग केने छी पथकेँ सरिसवक बीआसँ, मोन राखू ओ पथ शीला सुभद्रा देवी- पसीझक काँट (तेलुगु कविता) शीला सुभद्रा देवी (१९४९- ) कैकटा तेलुगु पद्य संग्रह प्रकाशित। १९९७ ई. मे तेलुगु विश्वविद्यालयसँ उत्तम लेखकक पुरस्कार प्राप्त। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। पसीझक काँट बाड़ीमे लगाओल पसीझक काँट गहना लेल केना ओऽ सभ पसरैतत अछि सोहड़ैत! चुपचाप बुनैत रस्ता आच्छादित करैत स्थान। भीड़-भाड़ सभठाम सभ कोणमे काँटबला पसीझक झाड़ सभ, सभ रोकैत स्नेहक अनवरुद्ध प्रवाह चिन्तन विखण्डित पड़ि काँटक मध्य वाणी अवरुद्ध फँसि कोनो झाड़ मस्तिष्क उर्ध्वपतित चुपचाप हृदय बनैछ मात्र एकटा अंग आऽ मौन करैत राज यांत्रिक रूपे॥ मुनैत, बहत नहि हवा एकताक तेनाकेँ ठुसैत सभक आश कोनहुना निकसी आकाश। मुदा की अछि विस्तृत खेत मध्य? कतए गेल फूलक क्यारी फुनगैत मित्रताक हिलबैत अपन माथ आमंत्रणमे? कतए गेल ओ चाली सभ अपन तन्तुसँ बढ़ैत? सभकेँ समेटैत ओ लता-कुञ्जक मंडप कतए गेल छोड़ि मात्र अशोक आऽ साखुक वृक्ष जे पसारि रहल आकाश मध्य अपन हाथ नीचाँ देखैत विश्वकेँ घासक पात सन तुच्छ? यदि हम मोड़ी आऽ घुमी घोरैत अपनाकेँ नोरमे वेधए बला मोथा नहि भोकैत अछि मात्र पएर वरन् आँखि सेहो। सभठाम लोक उन्मुक्त ठाममे मानवीय सम्पर्कसँ घृणा करैत परिवर्तित कएलक नगरकेँ सेहो बोनमे। पसारैत काँट सभ ठाम परिवर्तित भेल पसीझक झाड़मे साँसक फुलब पसरैत चारू दिश दोसराक संवेदना नहि आबए दैछ विचार जिनगी भेल उसनाइत खेत सन। इच्छा भागबाक पएर केने आगाँ। आश्चर्य, मथि नहि सकैत छी, औँठा धरि। देखि सकी जौँ अपनेकेँ मात्र भीतरसँ बाहर पसीझक काँट मात्र। एन. अरुणा- ई सेहो अछि प्रवास (तेलुगु कविता) एन. अरुणाक जन्म निजामाबाद लग एकटा गाममे १९४९ ई.मे देलन्हि। तेलुगुमे पाँचटा कविता संग्रह प्रकाशित। जयलक्ष्मी पोपुरी, निजाम कॉलेज, ओस्मानिया विश्वविद्यालयमे अध्यापन। तेलुगुसँ अंग्रेजी अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर (अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद)। ई सेहो अछि प्रवास अहाँ नहि छी मानैत मोटा-मोटी ईहो छी प्रवास एकर गुण षडयन्त्र जेकाँ मूल जन्मकालेसँ “तैयो अछि तँ बेटीये” अछि ने ई? कोनो पुरुषक हाथमे तँ जएबाके छैक ने एक दिन प्रवास मात्र अमेरिके टा प्रवासक नहिक नहि नारी सेहो अछि एकटा ई। अहाँ एकर अवहेलना कए सकैत छी सुविधासँ। तैयो कतेक कठिन छोड़ब जिनगी भरिक लेल अपन जन्मस्थान पाएब एकटा अनचिन्हारक आँगुर? अहाँ घुरि सकैत छी कखनो काल मुदा बनि मात्र पाहुन। जखने हम पएर राखब कतेक काल धरि अहाँ रहब पुछब हमर लोककेँ। “जाऽ धरि हम चाही” इच्छा अछि कहबाक मुदा श्रृंखला ससरल हमर इच्छापर बहुत पहिनहि। प्रवास नहि अछि हर्खक वस्तु। छोड़ि ई मात्र जे समय बितने बढ़ैत अछि ई बनैत अछि अभ्यास। भिखारी ठाकुर- वृद्धाश्रमक पक्षमे- बिरहा १-२ (भोजपुरी पद्य) भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१)- लोकलाकार, छपरा जिला (बिहार)मे जन्म। प्रारम्भक रचना सभ मौखिक मुदा बादमे कैथी लिपिमे सेहो हिनकर हस्तलिखित भोजपुरी रचना प्राप्त भेल। भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद मूल भोजपुरी- भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१), मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर (१९७१- ) वृद्धाश्रमक पक्षमे बिरहा १ कुतुबपुर अछि गाम, भिखारी ठाकुर अछि नाम। बाबू सभ गोटेकेँ करै छी प्रणाम॥ सभ गोटेकेँ करै छी प्रणाम हे राजा। उपरेसँ चिक्कन अछि चामक ओहरन॥ तीन दिनक सेखीमे, उड़बै छी मज्जा। बूढ़ा-बूढ़ीकेँ दुख भेल छनि, लगैए नै लाज॥ बाबू-भइया एकमत भऽ कऽ सभ मिलिये कऽ समाज। एक अरजीपर मोन आनू, मोनकेँ करू ताजा॥ महाबीरक नाम सुमरि लिअ, जइसँ बाजत बाजा। वृद्धाश्रम बनबाउ नै तँ हएत अकाज॥ सभ बाबूक पएर पड़ै छी, भिखारी ठाकुर नाम छी बिरहा २ हिन्दू-मुसलमान, सभ हमर कहलपर दियौ कान। नै तँ होइए बूढ़क अपमान॥ होइए बूढ़क अपमान हमर भाइ। नेनपनेसँ जकरा तूँ कहैत एलेँहेँ माय॥ तकराले किए भऽ गेल छेँ तूँ कसाइ। बड़का हाकिम लग जखन जेमेँ तँ पुछल जेतौ हिसाब-किताब॥ जल्दीसँ बता हमरा की केलेँ तूँ कमाइ। नह जखन झारतौ तखन ओइ काल की करमे उपाय। आँखिसँ नोर खसतौ किछु ने हेतौ बाजल। कहैए भिखारी अखने दे तूँ वृद्धाश्रम बनबाय।। नै तँ होइए बूढ़क अपमान॥ परिचय दास- बेसीकाल शब्द जखन (भोजपुरी पद्य) परिचय दास- मूल भोजपुरीसँ मैथिली अनुवाद विनीत उत्पल द्वारा बेसीकाल शब्द जखन हम विश्वविद्यालयक प्रेक्षागृह मे बैसल रही, आयल छल अज्ञेय जी, ओ करूणामय बुद्धक निवेदित अप्पन कविता केँ केलखिन पाठ हम्मर बगल मे बैसल सज्जन हमरासँ कहलक- वात्सायनजी केँ सुनि कऽ एहन लागैत अछि, जेना मौन शब्द बनल गेल अछि वात्सायन जीक मौन नामी छल। साहित्य अकादमी मे भेल छल व्याख्यान विषय छल-संगीत आ विचार संगीतक संबद्ध जेहन राग आ छंद से अछि ओहिना अछि मौन सँ, वात्सायनजीक मौन ओ सेहो चर्चाक केंद्र मे उपस्थित छल मौन कोनो निठल्लाक इतिश्री नहि अछि- ओ सकारात्मक क्रियाक सहज पूर्व भूमिका अछि। बहुधा शब्द जखन अप्पन गति बिसुरि जाइत अछि तखन मौन आगू अबैत अछि। खाली शब्द केँ हम सभ कियो विचारक अभिव्यक्ति दऽ कऽ देखियौ तँ भावमुद्र शब्दसँ बेसी बलवती आ वेगवती होइत अछि। बिहारीक नायिका 'भरे भौन मे नैनन ही सौं बात' करैत अछि। कहैक अंदाज देखू- कहत नयन रीझत-खिझत भरल भौन मे करैत अछि नैनन ही सौं गप, सन्नाटाक एकटा छंद होइत अछि, एकटा छंद मौनक, मौन मे अपंगता नहि होइत अछि- यानी समर्थ केँ मौन नीक लगैत अछि बिलकुल चुपचाप घाघराक तट पर सांझक बेला मे पीब लियो शब्दहीन हम चहलकदमी कऽ रहल छलहुँ ओतय की कोनो छौड़ा (बहलगंज चाहे दोहरी घाट मे कत्तौ हएत) विरह मे छल- बालू आ रेत पर डेग कोना चलब बालूक रेत भगवान भास्करक रश्मिसँ तरेगन जेहन चमकि रहल छल। मिनट-दू-मिनट बाद सूर्य देवता भारतसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि क यात्रा पर चलि जाएत। हम अपलक देखि रहल छी- एतबा सोना! रश्मि स्वर्ण!! बजारमे सोनाक दाम जेत्ते हुअए ई सोना तँ अमूल्य अछि! आजुक पेशेवर विचारक बहुमूल्य विचार दैत अछि मुदा अमूल्य नहि! मुदा विचारे टा सँ की हएत समकालीन दुनियाक संकट ई अछि जे विचार आ कर्मक सामंजस्य नहि अछि। शुभ आ लाभक समन्वय नहि अछि अहिसँ किताब पुस्तकालयमे राखल कुहरि रहल अछि आ विचार कर्महीनताक चक्रव्यूहमे। पैघ-बुजुर्ग कहैत रहथिन सिद्धजन बड़ नीक नहि देलक भाषण, ओ जे कहलखिन नीक करबाक केलक प्रयास अहिसँ हुनकर शब्द ब्रह्म बनल ब्रह्म कोनो वायवी अवधारणा तऽ नहि अछि। ओ तँ अपना सभक आत्मीय जरूरत अछि जेहन शब्द, तेहन मौन। अहि संसार मे जखन किछु मंगल आ शुभ होइत अछि ओकर एकटा छन्द होइत अछि माघक कुहासा छेक लेलक बाट हम ओकर पार करबाक प्रयास केलहुँ! राति मे बैसलहुं तँ बुढ़िया माय साग-भात देलक खाइ लेल। हम ओकर चुल्ही पर गरम करैले कहलहुं हम कोनटा लग बैसि गेलहुं। तखैन घर भरन आयल आबैत किछु कहलखिन हम जानि लेलहुँ जे ओ गाम भरि क गपक खबर राखैत अछि किछु लोक हुनका नारदो कहैत अछि। ओ कहैत अछि- 'ऐँ यौ, बाबू सुनि लियौ जे परमुआँक घर मे 'हुड़ार" आयल छल," ओकर 'हुड़ार" शब्द पर जोर दैत हम बुझि गेलहुं जे मामला किछु आओर अछि, हम मौन रहलहुं, ओ फेर कहब शुरू केलक- देखू नहि, गाम मे यएह आइ-कालि भऽ रहल अछि, आब अप्प्न सभक कोना इच्जत बचत। दोसर दिन कियो हमरा कहलक जे अपने घरभरना परमुआंक घर मे घुसल छल। हम सोचलहुं: शब्द सं धोखेबाजी अहिने कएल जाइत अछि। हम जौँ नाम लऽ लैत छी तैँ भऽ जाइत छी बदनाम, ओ कत्ल कऽ दैत अछि तेँ चर्चा नहि होइत अछि। मारीच सेहो लेने छल शब्दक सहारा अश्वत्थामाक केस मे सेहो लेल गेल छल, जौ एहि के आश्रय नहि लेल गेल हएत तखन गप ई नहि कहल जाएत 'कारण कवन नाथ मोहि मारा, मैं बैरी, सुग्रीव पियारा।" --------------------------- ई कहि कऽ हम मारीच चाहे बालि कऽ वकालतनामा नै प्रस्तुत करै जाएत. ओना माइकेल मधुसूदन दत्त मेघनाद केँ पक्ष लेने रहथि. हम तँ मात्र शब्दक आचार-विचारक प्रश्न खा कऽ रहल रही हमरा सभक उपस्थिति शब्दक बाहरी आवरणक लेल खाली नै हेबाक चाही. हमरा सभकेँ ओकर न्यूक्लियस चिन्हबाक चाही. शब्दक छलना-वर्जनाक एगो सात्विक प्रतिक्रिया देबाक चाही. सभ सँ नीक अछि : मोनकेँ मधु बना लेलक - मौन मधु भऽ जाए। गप आ अपन बीच क तटस्थता जरूरी अछि. वात्स्यायन जी अपना आ देवताक बीचमे दूरी राखैक गप कहने रहथि। आइ देवता सभक प्रति नव दृष्टि बनि रहल अछि। उपिनषद् मे एक ठाम तर्क केँ गुरु मानल गेल अछि। आधुनिक युगक नव देवता क भूमिकामे चिरंतन दृष्टिए भऽ सकैए शमशेर बहादु सिंहक शब्द लेल जाए - बात बाजी, हम नै भेद खोलत बाते। हम शब्द आ मौनक द्वन्द्वमे पड़ि कऽ सैकत भूमि पर नै जानि निकलि गेलौं कतऽ ! किछु गोटे कहि सकैए कि जतऽ नै पहुँचैए रवि ओतऽ पहुँचैए कवि.... किन्तु हम तँ एहेन ठाम देखने छी जतऽ नहिये कवि पहुँचैए नहिये रवि ! सरयूक तटपर बनल मलाह आ पंडाक घर देखै छी ... सिमसिमाएल .... नै ऐठाँ कहियो कवि पहुँचल नहिये रवि. बालूक चमकैत कण-राशि हुनके आमंत्रण देलौ. निराला- देह विदेह (१-४) (हिन्दी कविता) रवि भूषण पाठक निरालाःदेह विदेह (१-४) हिन्दी भाषा आ साहित्य क केन्द्रीयता स्वातंत्रयोत्तर भारतक एकटा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना ।एकर मूल कारण राजनीतिक आ वाणिज्यिक रहितहु परिणाम बहुआयामी अछि ।हिंदी साहित्यक आ विशेषतः कविता के सौंदर्यात्मक ,वैचारिक आ शैल्पिक वैविध्य सँ पूर्ण करबा मे कवि निराला क योगदान अप्रतिम ।ने केवल कविता बल्कि ईमानदारी मे सेहो निराला क व्यक्तित्व क चर्चा क सेहो कतिपय आयाम । आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व मे निराला अग्रणी छथि ,जनिकर व्यक्तित्व आ कृतित्व क हरेक अंश सँ ईमानदारी,रचनात्मकता,आलोचना आ अफवाहक मार्ग प्रशस्त होइत अछि ।निराला काव्य क अनुवादक महत्व विभिन्न प्रसंग आ संदर्भ सँ अछि ।प्राचीन संस्कार आ आधुनिकता क आंदोलनमयी धारा कें आत्मसात करबाक जतेक सामर्थ्य निराला साहित्य मे अछि ,ओतेक अन्यत्र नइ ।दोसर बात ई जे निराला काव्य क माध्यम सँ हिन्दी साहित्य मैथिली आ बांग्ला सँ जुड़ैत अछि ।निराला पर विद्यापति आ रवीन्द्रनाथक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट अछि ।हिंदी आलोचक निराला पर विद्यापतिक प्रभाव पर बहुत नइ लिखने छथि ,मुदा ई प्रभाव देखबा क हो तखन ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे‘ क तुलना विद्यापति लिखित वसंत गीत ‘नव नव विकसित फूल ‘सँ करू । शब्दार्थचिंतामणिकार अनुवादक दू टा अर्थ लिखैत छथिन्ह ।प्रथम ‘प्राप्तस्य पुनःकथने ’आ दोसर ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने ‘ एकर अर्थ भेल पहिले कहल गेल कथन के फेर सँ कहनए आ ज्ञात अर्थ के प्रतिपादित केनए ।प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक रोमन याकोबसन एकरा ‘एक भाषा के शाब्दिक प्रतीक के अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीक के द्वारा व्याख्या‘ मानैत छथिन्ह ।नाइडा आ टेबर कनेक विस्तृत करैत कहैत छथिन्ह कि ई मूल भाषा क संदेशक समतूल्य संदेश के लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत करबा क क्रिया अछि जाहि मे संदेशक सममूल्यता पहिले अर्थ आ फेर शैली क दृष्टिकोण सँ निकटतम आ स्वाभाविक होइत अछि । भाषिक प्रक्रिया होएबा क कारणें अनुवाद क सम्बन्ध भाषेटा सँ नइ बल्कि भाषाविज्ञानो सँ अछि ।ध्वनि ,शब्द,रूप,वाक्य आदि विभिन्न स्तर मिलि के अर्थक संसार रचैत अछि ,ताहि दुआरे ऐ सब स्तर क प्रति सजगता अनिवार्य अछि ।प्रत्येक भाषाक अपन विशिष्ट ध्वनि ,शब्द भंडार आ रूप व्यवस्था होइत अछि ,ताहि दुआरे ऐ स्तर मे निहित अंतर के कारणें समान लागए वला प्रसंग सेहो वास्तविक अर्थ मे अर्थान्तर क संभावना सँ युक्त होइत अछि । ऐ ठाम ई तथ्य उल्लेखनीय अछि कि मैथिली आ खड़ीबोली हिन्दी कोनो दू ध्रुवीय भाषा नइ अछि ।दूनू दू टा प्रादेशिक अपभ्रंशक संतान आ ताहि दुआरे संस्कृत ,पालि आ प्राकृतिक विरासत पर समान रूप सँ अधिकारिणी अछि ।ध्वनि ,शब्द आ रूप क स्तर पर अनगिन साम्य अछि ।संस्कृत क रात्रि मैथिलीए टा मे नइ अवधी,ब्रजभाषा,भोजपुरी सहित कतेको उत्तर भारतीय भाषा मे ‘राति‘ अछि आ ‘दिन‘ त‘ सर्वत्र ‘दिन‘े अछि ।तहिना भोर आ दुपहर अपन विभिन्न ध्वनिभेद क संग विद्यमान अछि ।उदाहरण केवल एक या दू शब्दक नइ अछि ,सुधी पाठक ऐ उभयनिष्ठ आधारक जटिल उपस्थिति सँ परिचित छथि । ई उभयनिष्ठ आधार अनुवाद मे सुविधा लऽ के आबैत अछि,मुदा ऐ ठाम आलस्य आ अनुकरण क खतरा मौलिक अनुवाद के समक्ष चुनौती दैत अछि ।सबसँ बेशी शब्द तद्भव के आ ओहि पर सब भाषा क तेहनें अधिकार तखन ई नबका शब्द कत‘ सँ आनी ,देशज शब्दक प्रयोग प्रचलन आ स्वीकृति क आधारे पर स्वीकार्य होयत ।मिथिला क व्यापक भूभाग मे पजेबा सँ बेशी स्वीकृत शब्द ईंटा अछि तखन ककर व्यवहार करी आ ककर नइ करी ? वैज्ञानिक तथ्य वा गद्यात्मक सूचना क प्रस्थापन अभिधात्मक भाषा मे सुगमता मे संभव अछि ,मुदा भावप्रधान रचना मे अर्थ क अनेक स्तर आ कथनक बहुविधि व्यंजना होइछ,परिणामतः प्रत्यक्ष भाषिक प्रतिस्थापन संभव नइ, ताहि दुआरे अनुवादक के परकाय प्रवेश करऽ पड़ैत अछि ।अनुवादक मूल कृति आ रचनाकार क मनोजगत मे घुसि के भाव आ ओकर अर्थच्छाया के समझैत अछि तथा फेर ओइ भाव के यथासंभव लक्ष्यकृति मे अभिव्यक्त करैत अछि ।कलाकृति के एहन समझ आ फेर ओकर कलात्मक संप्रेषण क लेल सर्जनात्मक प्रज्ञा क विद्यमानता अनिवार्य अछि ।ई प्रज्ञा सर्वत्र एकरूप मे उपस्थित नइ अछि ,ई देखबा क अछि तखन उमर खय्याम क रूबाई क अनुवाद क्रमशः फिट्जराल्ड (अंग्रेजी) आ मैथिली शरण गुप्त, बच्चन जी ,केशव प्रसाद पाठक आ सुमित्रा नंदन पंत(सब हिंदी)क अनुवाद मे निहित भावभंगिमा आ गुणवत्ता क अंतर देखि सकैत छी ।गीतांजलि क अनुवाद मैथिली मे सुमन जी केने छथि आ हिंदी मे अज्ञेय आ अन्य कतेको विद्वान मुदा बांग्ला विद्वानजन सुमन जी द्वारा अनुदित ‘अनुगीतांजलि‘ के ह्रदय खोलि के प्रशंसा केने छथि । ऐ ठाम हम परकायप्रवेशक वांछित योग्यता क साथ उपस्थित नइ छी ।हम निराला काव्य मे निहित व्यंजना क महान शक्ति के स्वीकार करैत छी आ निराला काव्य मे ,ओकर शब्द आ शब्द योजना मे निहित उदात्त के मानैत छी ।ई उदात्त किछ किछ संस्कृतक तत्सम शब्द,सघन वर्णमैत्री,वर्णक ध्वन्यात्मकता मे निहित अछि ,ताहि दुआरे मैथिली पाठक के हम शब्द आ अर्थक अइ स्वर्गिक संसार सँ वंचित नइ करऽ चाहैत छी ।हम अपन अनुवादक सीमा के सहज स्वीकारैत छी अनुवादक एकाधिक रूप मे प्रचलित अछि ।शब्दानुवाद(लिटरल) या मूलनिष्ठ अनुवाद सामान्यतः अभिधात्मक होइत अछि ,ऐ अनुवाद मे श्रोत भाषाक प्रत्येक शब्द आ अभिव्यक्ति क प्रतिस्थापन लक्ष्यकृति क शब्दावली,अभिव्यक्ति तथा संरचना मे होइछ । भावानुवाद मे मूल भाषा क अभिव्यक्ति क स्थान पर ओइ मे निहित आशय के स्पष्ट कएल जाइत अछि ।ई मूलकृति क ढ़ाँचा सँ स्वतंत्र होइत अछि,ताहि दुआरे लक्ष्यकृति क दृष्टि सँ ई बेशी सहज आ स्वाभाविक होइत अछि ।सुरेन्द्र झा सुमन द्वारा ‘गीतांजलि‘ क अनुवाद ‘अनुगीतांजलि‘ भावानुवादक श्रेष्ठ उदाहरण अछि । रूपांतरण कथा साहित्य क क्षेत्र मे लोकप्रिय अछि ।अइ मे अनुवादक मूलकृति क परिवेश ,चरित्र ,आदि के देश-कालानुसार परिवर्तित करैत अछि ।शेक्सपीयर रचित ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ क हिंदी अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम सँ केलाह ।एइ मे एंटोनियो क नाम अनंत ,बसानियो क नाम वसंत आ शायलॉक क नाम शैलाक्ष अछि ।घटना वेनिस नगरक स्थान पर काशी(भारत) मे घटैत अछि । ‘छायानुवाद‘रूपांतरणक एकटा प्रकार अछि ,अइ मे मूलकृति क आधार पर मूल कथ्य के संप्रेषित करबा क लेल स्वतंत्र कृति क निर्माण संपन्न होइत अछि ।अइ मे बिंब विधान ,प्रस्तुतिकरण आदि मूलकृति क प्रतिबिंब होइत अछि ।भगवती चरण वर्मा क उपन्यास चित्रलेखा अनातोले फ्रांस क उपन्यास ‘थाया‘ पर आधारित अछि ।विदेशी फिल्म आ साहित्य क अनधिकृत अनुवाद आ रूपांतरणक लेल अइ विधि क बहुत प्रयोग होइत अछि । ‘सारानुवाद‘ मे मूलकृति क सार लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत कयल जायत अछि ।संप्रेषण केंद्रित अनुवाद क्लासिकी रचना के बच्चा आ किशोर सब के पढ़बा क लेल रूपांतरण मे सहयोगी होइत अछि ।जेना महाभारत वा रामायण पर आधारित संक्षिप्त कथा । ‘टीकापरक अनुवाद‘ मे अनुवाद क साथ ओकर व्याख्या रहैत अछि ।गीताप्रेस क किताब मे एहन अनुवाद प्रचूर मात्रा मे उपलब्ध अछि ।किछु दिन पहिले विद्यापति पदावली क किछु पदक अनुवाद यात्री जी द्वारा कयल गेल दिल्ली विश्वविद्यालयक प्रोफेसर प्रभात रंजन जी क ब्लॉग पर उपलब्ध छल । अंत मे फेर काव्यानुवाद पर आबी ।कविता क अनुवाद नमहर चुनौती अइ दुआरे छैक कि कविता मात्र शब्दार्थ तक नइ सीमित छैक ।ई शब्द सँ आगू वाक्यगठन,लय,छंद,बिंब,प्रतीक,अलंकारयोजना,शैली आदि क मिल जुलल परिणामी काव्यात्मक पर्यावरण पर आधारित अछि ।ताहि दुआरे दाँते आ सर फिलीप सिडनी सन विद्वान काव्यानुवाद के असंभव मानैत छथिन्ह ।कविता क समग्र प्रभाव वा व्यंग्यार्थ ध्वनि ,लय ,बलाघात आ बिंब योजना के माध्यम सँ अभिव्यक्त होइत अछि ।ताहि दुआरे निराला क शब्द चयन ‘विजन-वन वल्लरी‘‘पुलिन पर प्रियतमा‘मैथिली मे यथावत अछि । कविता क दृश्य आ श्रव्य बिंब बहुधा शब्द क नादात्मकता सँ नियंत्रित होइत अछि ।एहिना शब्दालंकार आ अर्थालंकार क विकल्प लक्ष्यभाषा मे सृजित कएनए कठिन अछि ।काव्यानुवाद क सबसँ नमहर समस्या छंद आ लय अछि ।मूल रचना क लेल प्रभावी छंद आ लय के खोजनए अनुवादक लेल सबसँ पैघ समस्या अछि ।यदि कविता क अनुवाद गद्य मे आबैत अछि तखन अनुवाद मात्र शब्दार्थ तक सीमित रहत आ अइ मे कविता क पूरा अर्थ निकलि के बाहर नइ आयत ।अनुवाद सम्बन्धी अइ अवधारणा क लेल हम सर्वश्री/सुश्री रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,कृष्ण कुमार गोस्वामी ,कुसुम बांठिया ,गजेन्द्र ठाकुर ,रवीन्द्र कुमार दास जी क आभारी छी । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-१ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) मैथिलीःदेह-विदेह क अइ पहिल किश्त मे निराला जी क दू टा लोकप्रिय कविता क अनुवाद प्रस्तुत क‘ रहल छी ।सहज सँ जटिल आ जटिल सँ जटिलतर दिश ‘‘क्रम क्रम सँ भेल पार राघवक पंचदिवस चक्र सँ चक्र चढ़ि गेेल भेल उर्ध्व निरलस ‘‘(रामक शक्ति पूजा) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्धु (बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु!) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्ध पूछतओ पूरा गाम बन्धु ई घाट छलए जइ पर हँसि के ओ रहए नहाबति रे! धसि के रहि जाइत छलए आँखि फसि के कांपैत रहए दूनू पैर बन्धु ! ओ हँसी बहुत किछु कहए छलए तैयो अपने मे रहए छलए सबके सुनैत सबके सहैत दैत ओ सबके दाँव बन्धु । हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि (किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं ।) हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि दिखाबे टा दर्शन देेेने जा रहल छथि जुड़ल छल सुहागिन केर मोती क दाना ओएह सूत तोड़ने लेने जा रहल छथि छिपल चोट के बात पूछलउं त बजलीह निराशा क डोरी सीने जा रहल छथि ई दुनिया के चक्कर मे केहन अन्हर मरल जा रहल छथि जियल जा रहल छथि खुलल भेद एहि ठां ,जे विजयी कहायल। ओ खूं दोसरा के ,पीने जा रहल छथि । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-२ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) स्नेह निर्झर बहि गेलइ (स्नेह निर्झर बह गया है) स्नेह निर्झर बहि गेलइ देह बाउल सन रहि गेलइ डारि आमक ई जे सूखल दिखल कहि रहल“ने आब छइ ,कोनो कोयल के आयत ,ई पांति मे हमही कहल अर्थ नइ छइ एकर- जीवन जरि गेलइ” “देने छी हम जगत के ,जे फूल फल केने छी अपन प्रभा सँ,चकित-पल छल अनश्वर सकल पल्लवित पल- जीवनक ऐश्वर्य सब ढहि गेलइ ” आब नइ आबइ पुलिन पर प्रियतमा श्यामतृण पर बैसबा ले निरूपमा बहि रहल अछि हृदय पर केवल अमा हम अलक्षित छी ,इएह कवि कहि गेलइ ” 2 हम अकेला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। सूखल पाकल ,आधछिद ई केश हम्मर भेल निष्प्रभ गाल हम्मर मन्द भेलइ चालि हम्मर हटि रहल मेला नदी झरना जानि रहलहुँ छल जे बाँकी पार केनए क‘ चुकल ई देखि हँसलहुँ नाव ल‘ केओ ने एला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-३ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) रंगि गेल धरा ,भेल धन्य धरा जगमग ई जग भेल मनोहरा धरि रंग सुगन्ध भरि मौध मकरन्द गाछक लाली भऽ गेल गाढ़ फुजि पत्रपुष्प केर राग ठाढ़ भेल डेग डेग हरियर पूरा। रंगि.......... ग्ुंाजल कोयली केर पंचम स्वर कुचरइ कौआ मैना मृदुतर सुख सँ कँपैत रमि प्रणय केरि वनश्री चारूतरा । रंगि.......... 2 सखि वसन्त आयल भरल सिनेह जंगल केर मन मे नवोत्थान पसरल । पल्लव पहिरि कोंपरक लत्ती मिलल मधुर प्रिय गाछक पत्ती भंउरा गावइ कोयली सिहकइ नव नव स्वर भावल । कोंपर कल्ली हार बनल हन मद्धिम मद्धिम बहथि पवन सन जागि गेल प्रियवर के नयन मे मधुर प्रकृति अभरल । फैलल गोट पीयर कमलदल तहिना पसरल केशर कलकल खेत पथार सोना सन सुन्दर धरती पर फैलल । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-४ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) छाड़ल कारी कारी बादर एला नइ वीर जवाहर लाल केहन केहन नाचए अधसर नइ एला वीर जवाहर लाल चमकल बिजुरी फन पसारि के नइ एला वीर जवाहर लाल सोझ करू उलटल माथ के ससरैत फूफू करए माथ पर नइ एला वीर जवाहर लाल पूरबा अलगे फूफकारइ छइ प्रतिक्षण विष बकुटि बरसाबइ छुपल कोन गुफा मे हम सब नइ एला वीर जवाहर लाल मंहगाई के बाढ़ि बढ़ल अछि सबके संचित निधि लुटल अछि भुक्खल नॉंगर ठाढ़ लजाबथि नइ एला वीर जवाहर लाल कोना बचउँ बिन भाला लाठी बहल भसल सभ मित्र मंडली राह देखइ छी ,किछु नइ बुझइ छी नइ एला वीर जवाहर लाल पंकज चतुर्वेदी-डायरी खण्ड आ कविता खंड (हिन्दी रचना) पंकज चतुर्वेदी [पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक किछु कविता (अनुवाद-भावानुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा)] प्रस्तुत अछि पंकज चतुर्वेदीजीक किछु डायरी आ हुनक कविताक अनुवाद-भावानुवाद। एहन समय जखन कि अधिकांश वर्तमान कविता नमहर, रसहीन ओ रीढ़हीन भेल जा रहल अछि ओतहि पंकज जीक मात्र किछु शब्दक कविता लीखि चमत्कार आनि दै छथि। एकटा पाठकक दृष्टिसँ देखी तँ कम शब्दक कविता नमहर कविताक अपेक्षा बेसी प्रभावकारी रहैत छै। तँइ पुरान आचार्य सभ महाकाव्यमे दोहा, सोरठा ओ अन्य छोट छंदक प्रधानता दैत छलाह जाहिसँ विविधता अबै छलै आ पाठक बान्हल रहैत छल। पंकजजीक कविता प्रकरांतरसँ मुक्त छंदमे रहितों कथित मुक्त छंदक कवितासँ बेसी लयबद्ध ओ समयबद्ध दूनू अछि। विदेहक पाठककेँ अनिवार्य रूपसँ एहन कविता सभ पढ़बाक चाही तँइ ई अनुवाद हम अनलहुँ। पहिने हिनक डायरीक अनुवाद दऽ रहल छी आ तकर बाद कविताक एनासँ कविताक प्रभाव दुगुन्ना भऽ जाएत से हमरा विश्वास अछि कारण पंकजजीक डायरी सभ आत्मकथ्य सन अछि आ पाठक ओकरे सहारे कविताक मर्म धरि पहुँचताह से हमरा उम्मेद अछि (आशीष अनचिन्हार) डायरी खंड डायरी--1 रचनाकारकेँ आलोचना आ भूमिगत आलोचना दुन्नूक सामना करबाक चाही। डायरी--2 सार्थक कविकेँ कोनो आन कवि या गुटसँ नै खाली अपने कवितासँ खतरा होइत छै। डायरी--3 आलोचनामे अनिवार्य रूपसँ धार हेबाक चाही। मिरचाइ जँ कड़ुगर नै हो तँ लगै छै जेना दूभि चिबा रहल होइ। डायरी--4 जँ जिम्मेदारी हो तँ आलोचना कठिन काज थिक आ जँ जिम्मेदारी नै हो तँ आलोचनासँ हल्लुक काज कोनो नै। डायरी--5 कोनो समाद जँ बेसी मिठगर हो तँ बूझि लिअ जे कोनो सचकेँ झाँपि देल गेल अछि। डायरी--6 तर्कसँ संचालित प्रशंसा आलोचना थिक। डायरी--7 समर्थ आलोचक अपन रचनाकार ताकि लै छै मुदा असमर्थ आलोचक रचनाकारक भीड़मे फँसि जाइत छै। डायरी--8 मारए बलाकेँ मोनमे कोनो लाज-संकोच नै होइ छै। ने मारए काल ने ओहन परिस्थिति तैयार करबा काल। डायरी--9 अहाँक खिद्धांससँ कियो छोट नै भऽ सकैए हँ कनी काल लेल अहाँक विशालताक लग ओ छोट बुझा सकैए। डायरी--10 साहित्यमे कहियो देरी नै होइ छै मने जे अहाँ कोनो समय साहित्यक कोनो बिंदुपर पहुँचि सकै छी। डायरी--11 यांत्रिक मार्क्सवादक प्रतिक्रियामे जन्मल उत्तर यांत्रिक मार्क्सवाद बेसी खतरनाक अछि। कविता खंड 1 इच्छा संबंधक साँझमे ओहने इजोत रहए जेहन छल संबंधक भोरमे (मूल शीर्षक-हसरत) 2 इमरजेंसी आबिए जाइ छै इमरजेंसी आ कहै छै हम ओहन नै छी जे केने रहै बदमाशी केने रहै जीवनक चक्का जाम आबि गेलहुँ हम अइ बेर अहाँक संगे प्रेम करबाक लेल (मूल शीर्षक-इमरजेंसी) 3 दुख असहमति नै भेटए कतहुँ से चाहै छै सत्ता देशकेँ दुख होइ छै किए अपनाकेँ सौंपि देलहुँ एहन लोक लग (मूल शीर्षक-अफ़सोस) 4 मतलब जखन कोनो अपराधी कहै छै जे ओकरा मोनमे देशक कानून, संविधान लेल आदर छै तखन बुझू जे ओ साफ-साफ कहैए जे कानून ओकरा छोड़ेबामे मदतिए नै करतै छोडियो देतै (मूल शीर्षक-आशय) 5 इशारा प्रजा पुछलकै- अहाँ की सभ देब हमरा राजा उत्तर देलकै- हमर मानब अछि जे छीनिए कऽ देल जा सकैए किछु हम तोहर खेत छीनि कऽ कारखाना बलाकेँ दऽ देलियै तेनाहिते तोरा लेल हम बगल बला देशसँ छीनि कऽ देबौ ओना ई युद्धक इशारा छल मुदा प्रजा ई जानि राजाक जैकार केलक जे राजा प्रतापी थिकाह युद्धसँ हमरे भलाइ करता (मूल शीर्षक-इशारा) 6 उदारवादी राजाकेँ अपन राज्यक खराप व्यवस्थाक ओतेक चिंता नै छलै जतेक ऐ बातक छलै जे प्रजा विरोध करैए अंतमे ओ घोषणा केलक हम उदारवादी छी हम सभहँक विरोधक स्वागत करै छी व्यवस्था ओहने रहि गेल (मूल शीर्षक-सदिच्छा) 7 पराक्रमी कलाकार लोकतंत्रमे शासन करबाक एकटा एहनो तरीका छै कि शासन आ शिकार करबामे कोनो फर्क नै रहए मने मारू आ नुका जाउ पापक भागी देखए बला ऐठाम मारब पराक्रम भेल आ नुका जाएब कला आ जे एहन कऽ सकथि से पराक्रमी कलाकार (मूल शीर्षक-तरीका) 8 कहियो-कहियो कहियो-कहियो विपक्ष सेहो सत्ताक लग-लगीचमे रहैत छै आ सत्ता विपक्षक उप मने जे लगीचमे तँ हो मुदा ठीक ओहने नै हो जेना नगरक लगीचमे उप-नगर प्रधानमंत्रीक लगीचमे उप-प्रधानमंत्री ओनाहिते उप-सत्ता सेहो रहैत छै आ उप-विपक्ष सेहो (मूल शीर्षक-इतिहास में कभी-कभी) 9 जाँचि लेब जँ सत्ता अहाँक स्वागत कि प्रशंसा करए तँ जाँचि लेब जे अहाँ ओ जनताक माँझ कतेक दूरी बढ़ि गेल अछि ओना हमरा बूझल अछि जे अहाँ लेल देश जनता नै कोनो भू-खंड अछि (मूल शीर्षक-देखना) 10 उम्मेद अहाँ हमर लिखलसँ सहमत हेबे करब तइ लेल नै लीखै छी हम ओहू दुआरे लीखै छी जे हमर लिखल चाँछैत चलि जाए जँ हमर लिखल आलोचनासँ अहाँकेँ दुख पहुँचल तँ हमरा लग ई उम्मेद अछि जे एखनो बचि सकैए सर-समाज (मूल शीर्षक-प्रत्याशा) 11 जन्मदिन जन्मदिनक खुशी अइ लेल होइ छै जे जतेक दिन जीबऽ देलक सएह बहुत (मूल शीर्षक-जन्मदिन) 12 विपत्ति सौंदर्य कि सौंदर्य-बोधक अभाव लेल प्रयास नै करऽ पड़ैत छै ई तँ अपना-आपमे एकटा विपत्ति छै जे चारू दिशा उनचासो पवन संग आबि जाइत छै (मूल शीर्षक-विपत्ति) 13 अमानुषिकताक संबंध जखन शासकक मूँहपर एकै संग देखै छी शांति आ चिंता तँ हम बुझै छी जे ओकर अमानुषिकताक संबंध धर्मशास्त्र ओ इतिहासक ओइ पोथी सभसँ छै जे किछु दिनक बाद लिखल जेतै (मूल शीर्षक-शासक का चेहरा) 14 माए गै माए बड़का-बड़का मुद्दासँ शुरू केने छलही अध्याय बीचमे चाह अंतमे गाए माए गै माए (मूल शीर्षक-हाय) 15 अपन प्रजा मचल छलै हाहाकार काहि काटि कऽ मरि रहल छल लोक तखनो मंत्री कहै छलै- "अपन प्रजा खुशहाल अछि" आब राजा खुश छल जे ई कननाइ ओइ प्रजाक अछि जे हमरा नै चुनलक (मूल शीर्षक- मुद्रा के अभाव में) संतोष कुमार चतुर्वेदी- गिट्ठऽ, मेघक दूभि (हिन्दी कविता) संतोष कुमार चतुर्वेदी (संतोष चतुर्वेदीक दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार द्वारा) गिट्ठऽ बेर-बेर एहन होइत छै की कोनो गाछक गिट्ठऽसँ फुटि जाइ छै नवका पल्लव आ तकरा संग शुरू होइ छै नव बाट अपन संघर्षसँ ओतहिंसँ रचा जाइ छै नव कविता अपन रससँ नदी-समुद्र केर सृजन करैत आ एक पल्लव कि बाट कि कविता केर बदला ठीक ओत्तहिं जनमि जाइ छै हजारक हजार जैठाम सोझ ठाढ़ि रहै छै तैठाम सृजनक कोनो उम्मीद नै (मूल हिंदी कविता "वहीं से फूटती हैं राहें" केर भावानुवाद) मेघक दूभि अकासक अगम-अथाह संसारमे अवारा जकाँ घुमनिहार हम मेघ, आ तों जमीनपर एकैठाम हिलैत-डोलैत रहए बाली हरियर-हरियर छोटकी दूभि बरखा बनि एबौ तोरा लग आ बना लेबौ हीत-मीत अपन इच्छामे भिजा कऽ रचि-बसि जेबौ तोहर हरियरीमे चुप-चाप हम रहबौ तोरा लग अनचिन्हार बनि कऽ जे कियो अलग नै कऽ सकए हमरा तोहर हरियरीसँ (मूल हिंदी कविता "बादल और दूब" केर भावानुवाद) वीरू सोनकर- उपलब्धि, नून, दिन (हिन्दी कविता) वीरू सोनकर (वीरू सोनकर केर तीन टा हिंदी कविताक मैथिली भावानुवाद। अनुवादक आशीष अनचिन्हार) उपलब्धि धार अपन सभसँ बेसी जरूरी जात्रा पूरा केलक आ ओ अराम नै छल जखन सभ गाछ-बिरिछ रुकबाक मोन बनेलक योग छलै पहाड़क सन्यासक बदला जे धरतीमे गँहीर धरि चलि गेल छलै आ निशिबद्ता रचि रहल छलै सर्व-श्रेष्ठ गीतक बदला जिवनक पहिल जन्मौटी हँसी लेल बसातमे उठल हाथ अकाशकेँ केने छल प्रणाम समुद्र चौंकि उठल पहिल डेगक अवाजपर आ मोन बना लेलक जे सभ दिन नव रहब आ तइ लेल ओ लहरिकेँ चमड़ा बना सभ दिन हटा दैए पुरान चमड़ाकेँ एतेक होइतो कविता लेल बाँचल रहल जगह आ कविता अबिते कहलक बचबैत रह, बचैत रह एकरा संग कविता ईहो कहैत रहल बेर-बेर कि हरेक समयमे विश्व-विजेता घर नै पहुँचि पाबै छै मोनक हरेक चोटक इलाज कविताक लग देखि धरती एखनो धरि खुशीसँ नाचि रहल अछि अपन अइ एकमात्र उपलब्धिपर नून हमर गेड़ुआ जे सोखने रहए नून से छीटल अछि पूरा धरतीपर आ हम अपन जुत्तासँ कहि रहल छी जे चलू ओ पूरा नून लाबए लेल बिना कोनो पहचानिक कोनो दुख नै रहत हमर खालपर आ जुत्तामे नुका कऽ आपस लऽ अनबै नूनकेँ आ रखबै ओहीमे घरमे जकर देबालपर हवा-बिहाड़िसँ टकराइत टाँगल अछि हमरे एकटा फोटो जकर रेखा साँपमे बदलि जाइत अछि आ पसरि जाइत अछि हमर ओछाएनपर कोनो एकटा बिंदुसँ शुरु फेर ओही बिंदुपर खत्म उदासीक संसारसँ अलग हम रचि रहल छी सात समुद्दरकेँ एकै डेगमे पार करबाक साहस दिन बर्खक सभसँ गर्म दिनक भोरमे समयमे अखबार आएल देरीसँ देरसँ आएल रंग-बिरही समाद-समाचार नौकरीक प्रचार बला पन्नामे हम अपन संभावना नै देखलहुँ बिन उत्साहक दिनमे हम रहलहुँ असगरे ओइ योजना विहीन दिनक शुरूएमे हमरा सोचबाक छल जे रातिधरि सभ काज कऽ लेबाक छै आ हम काज करबाक बदला दिनेकेँ बुझाबए लगलहुँ आ दिन हमर हरेक बातमे हँ-हँ करैत बीति गेल रातिक अंतिम पहर भीजल अछि पछिला सर्दीक सुगंधसँ मुदा तैयो ई गर्मीक एकटा बेकार राति छल जे अपन अंतिम समयमे किछु सुगंध पसारलक एतेक होइतो ओ दिन अबस्से आस आएत भोरक चाहमे सर्दीक राति बला सुगंध सेहो आएत अखबार सेहो आ दिनकेँ तखन बुझाबए नै पड़त गुड नाइट केर संग ओ कहत जे हम फेर आएब हमहूँ कहबै हँ मंगलेश डबराल- कमरा, बाहर, लिखल चलल जाइत छलहुं, उम्मीद, अप्पन अधिकार, पहाड़ छथिन, एहन काल, बेर-बेर कहैत छलौं हम, दिल्ली मे एकटा दिन, भोथिआएल, अभिनय, किछु कालक लेल, घर शांत अछि (हिन्दी कविता) मंगलेश डबराल- घर शांत अछि (हिन्दी कविता)- अनुवाद विनीत उत्पल कमरा अहि कमरामे सपना आबैत छै लोक पहुंच जाइत छै दस या बारह बरखक उम्रमे एतय फर्श पर बारिश गिरैत छै सुतल मेघ मंडराबैत छै रोज एकटा पहाड़ कनि-कनि अहि पर टुटैत छै एकटा जंगल एतय अप्पन पात खासबैत छै एकटा धार एतौका किछु सामान अपना संग बहा के लअ जाइत छै एतय देवता आ मनुख लखाह देत छै नांगर पइर फाटल कपड़ामे घुमैत संग-संग घर छोडैक सोचैत. (1989 मे रचित) बाहर हम दरवज्जा बन के देलहुं आ कविता लिखैक लेल बैसलहूं बाहर हवा बहि रहल छल हल्का इजोत छल बारिश मे एकटा साइकिल ठाड़ छल एकटा बच्चा घर घुरि रहल छल हम कविता लिखलहूं जाहि मे हवा नै छल इजोत नै छल साइकिल नै छल बच्चा नै छल. (1990 मे रचित) लिखल चलल जाइत छलहुं आखिर हम देखलहुं जे स्त्री कतेक यातना सहित अछि. नेना सब अनेरवा जेना घुमैत अछि. सखा-संबंधी सब हमरा सं गप करब बेकार बुझैत अछि. बाप बुझलक जे आब हम शायद कहियो हुनका चिट्टी नै लिखब. हमरा की छल एकर सबहक पता हम लिखल चलल जाइत छलहुं कविता. (1988) उम्मीद आंखिक इलाज करबैक लेल जायत बाप सं दस डेग आगू चलैत छी हम आंखिक इजोत घुरय के उम्मीदमे बापक आंखि चमकैत छै उम्मीदसं ओहि चमकमे हम हुनका लखाह दैत छी दस डेग आगू चलैत. (1989) अप्पन अधिकार जखन इजोत भेल छांह लखाह देलक अपनासं पैग लखाह देलक अप्पन अन्हार. (1991 मे रचित) पहाड़ छथिन ओ नीक पहाड़ छथिन पसरल निमग्न पहाड़ पर आबैत छै नीन. (1988 मे रचित) एहन काल जेकरा लखाह दैत नै ओकरा कोनो बाट नै लखाह दैत अछि जे नांगर अछि ओ कत्तो नै पहुंच सकैत अछि जे बहीर अछि ओ जीवनक धम्म नै सुनि सकैत अछि बेघर कोनो घर नै बनाबय अछि जे बताह अछि ओ नै जाइन सकैत अछि जे ओकरा की चाहि ई एहन काल अछि जे कियो भी भअ सकैत अछि आन्हर, नांगर बहीर बेघर बताह. (1992) बेर-बेर कहैत छलौं हम जोर सं नहि मुदा बेरे-बेर कहैत छलहुं हम अप्पन गप ओकर सभटा दुर्बलताक संग कोनो उम्मीद मे बताबैत छलहुं निराशा विश्वास व्यक्त करैत छलहुं बिना आत्मविश्वासक लिखैत आ काटैत जाइत छलहुं ई वाक्य जे चीज अप्पन सबसे खराब दौर सं गुजरि रहल अछि बिखरल कागज के संभारैत छलहुं धुरा पौछैत छलहुं उलटैक-पलटैत छलहुं किछु क्रिया के अहिने जेना भेल, होयत रहल ऐना हेबाक चाहि, भऽ सकैत छल हेतियै ते की हेतियै। (1994 मे रचित) दिल्ली मे एकटा दिन ओहि छोट सन शहर मे एकटा भोर वा सांझ वा कोनो छुट्टिक दिन हम देखलहुं गाछक जड़ मजबूत सं धरती के पकड़ल रहैत हवा छल जेकर चलहि सं आबो एकटा रहस्य बचल छल सुनसान सड़क पर एकाएक कियो प्रकट भऽ सकैत छल आबि सकैत छल कोनो दोस्तक आवाज कनि कालक बाद अहि छोट सन शहर मे आयलहुं शोर कालिख पसीना आ लालचक पैग शहर। (1994 मे रचित) भोथिआएल शहरक पेशाबघर आ आर जानल-चिन्हल ठाम मे ओ भोथिआएल लोकक तकै बला पोस्टर एखनो साटल लखाह दैत अछि जे कतेको बरख पहिने दस-बारह बरखक उम्र मे बिना बतेने घरसँ निकलि गेल छल पोस्टरक मुताबिक ओकर लम्बाइ मझौला छै रंग गोर नै पिण्डश्याम छै हवाइ चट्टी पहिरले छै चेहरा पर कोनो चोटक निशान छै आ ओकर माय ओकरा बिना कानैत रहैत छै पोस्टरक अंत मे ई आश्वासन सेहो रहैत छै जे हरायल केँ खबर दै बला केँ भेटत यथासंभव उचित इनाम तखनो ओ केकरो चिन्हऽ मे नै आबैत छै पोस्ट मे छपल झलफल फोटोसँ ओकर बगेबानी नै मिलैत छै ओकर शुरुबला उदासी पर आब कष्ट झेलब बला ताव छै शहरक मौसमक हिसाबसँ बदलैत गेल अछि ओकर चेहरा कम खाएत, कम सुतत/ कम बाजैत लगातार अप्पन ठाम बदलैत सरल आ कठिन दिवस केँ एक जना बिताबैत आब ओ एकटा दोसर दुनिया मे अछि किछु कुतूहलक संग अप्पन गुमशुदगीक पोस्टर देखैत जकरा ओकर माता-पिता अखन धरि छपवाबैत रहैत छै जइ मे आबो दस वा बारह लिखल रहैत अछि ओकर उम्र। रचनाकाल: 1993 अभिनय एकटा गहीर आत्मविश्वाससं भरि कऽ भोरे निकलि जाइत छी घरसँ जइसँ दिन भरि आश्वस्त रहि सकी एकटा लोक सँ भेंट करैत मुस्काइत छी ओ एकाएक देखि लैत अछि हमर मिज्झर मन एकटासँ चटसँ हाथ मिलाबैत छी ओ बुझि लैत अछि जे हम भीतरसँ छी मिज्झर एकटा सखाक आगू चुप बैसि जाइ छी ओ कहैत अछि जे अहां दुब्बर-रोगियाहा सन लखाह दऽ रहल छी जे हमरा कहियो घरमे नै देखने छल ओ कहैत अछि जे आइ अहाँकेँ टीवी पर देखने छलहुँ एकदिन बाजारमे घुमैत छी निश्शब्द डिब्बामे बंद भऽ रहल अछि पूरा देश सम्पूर्ण जीवन बिकाबैक लेल एकटा नब रंगीन पोथी अछि जे हमर कविताक विरोध मे आएल अछि जइमे छपल सुन्नर चेहरामे कोनो कष्ट नै ठाम-ठाम नृत्यक मुद्रा अछि विचारक बदलामे हेयौ एकटा पूरा फिल्म अछि लम्बा अहाँ कीन लिअ आ खूब आनंद उठाउ शेष जे किछु अछि अभिनयक चारू कात शोर आबि रहल अछि मेकअप बदलहिक काल नै अछि हत्यारा एकटा नेनाक कपडा पहिनि कऽ आबि गेल छल ओ जकरा अपना पर घमंड छल एकटा खुशामदक आवाज मे गिडगिडा रहल छल ट्रेजडी अछि संक्षिप्त नम्हर प्रहसन सभ चाहैत अछि कोन तरहे छीन ली सभसँ नीक अभिनेताक पुरस्कार । किछु कालक लेल किछु कालक लेल हम कवि छलहुं फाटल-पुरान कविताक मरम्मति करैत सोचैत कविताक जरूरत केकरा अछि किछु काल पहिने पिता छलहुं अप्पने नेना सबहक लेल बेसी सरल शब्द केँ खोजैत कखनो अपनो पिताक नकल छलहुं कखनो अप्पन पुरखाक परछार्इं किछु कालक लेल नौकर छलहुं सतर्क सहमैत बचल रहए रोजी-रोटी कहैत किछु काल हम अन्यायक विरोध केलहुं फेर ओकरा सहैक तागति जुटैलहुं हम सोचलहुं जे हम अहि शब्दकेँ नै लिखब जइ मे हमर आत्मा नै अछि जे आतताइक अछि आर जइ मे खून जेहन टपकैत अछि किछु काल मे एकटा छोट सन खधाइ मे खसलहुं ई हमर मानवीय पतन छल हम देखलहुं जे हम बचल छी आर सांस लऽ रहल छी आर हम क्रूरता नै करैत छी मुदा जे निर्भय भेल क्रूरता करैत जाइत अछि ओकर विरूद्ध हमर घृणा बचल अछि, यएह बड़का गप अछि बचल खुचल कालकेँ लऽ कऽ हमर विचार अछि मनुख केँ छह आ सात घंटा सुतैक चाही भोर हम जागलहुं तँ यएह एकटा जानल-चिन्हल भयानक दुनिया मे फेर सं जन्म लेबाक छल यएह सोचलहुं हम किछु काल धरि। रचनाकाल: १९९२ घर शांत अछि रौद भीत केँ रकमे-रकम तपा रहल अछि लगे मे एकटा मद्धिम आँच अछि बिछौना पर एकटा गेंद पड़ल अछि पोथी चुपचाप अछि मुदा ओकरामे कतेक रास बिपैत बंद अछि हम अधजागल छी आर अधसुतल छी अधसुतल छी आर अधजागल छी बाहरसँ आबै बला शोरमे केकरो कानैक शोर नै अछि केकरो धमकाबैक वा डरैक शोर नै अछि नै कियो प्रार्थना कऽ रहल अछि नै कियो भीख मांगि रहल अछि आ हमर भीतर कनियो टा मैल नै अछि मुदा एकटा परछायल ठाम अछि जतय कियो रहि सकैत अछि आ हम लाचार नै छी ऐ काल मुदा भरल छी एकटा जरूरी वेदनासँ आ हमरा मोन पड़ि रहल अछि नेना कालक घर जकर अंगनामे चितंग भऽ हम पीठ पर धूप तापैत रही हम दुनियासँ किछु नै मांगि रहल छी हम जी सकैत छी लुक्खी, गेंद वा घास सन कोनो जिनगी हमरा चिंता नै कहिया कियो झठहासँ हिलाकऽ ढाहि देतै ऐ शांत घरकेँ। (रचनाकाल : 1990) नित्यानंद गायेन- हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह, रौद पघलि रहल अछि (हिंदी कविता) नित्यानंद गायेन- हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह, रौद पघलि रहल अछि (हिंदी कविता)- अनुवाद- आशीष अनचिन्हार हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह हमरा अहाँक माँझ एहिना बनल रहए दूरी अम अपन सफाइ दए क नै करए चाहैत छी अपना उपर संदेह आ ने अहीँकेँ करए चाहैत छी बेइज्जत........ रौद पघलि रहल अछि मनुख सुखा रहल अछि जरि कए आ रौद पघलि रहल अछि------ राजा लूटि रहल मंत्री सूति रहल ओकील जागि रहल विपक्ष नाचि रहल कूकूर बाटपर भूकि रहल "हम" देखि रहल छी चुपचाप ई सभ। प्रो. चम्पा शर्मा- स्नेह-भरल सनेस (डोगरी कविता) प्रो. चम्पा शर्मा- स्नेह-भरल सनेस (डोगरी कविता) (प्रो. चम्पा शर्मा- अवकाश प्राप्त संस्थापक अध्यक्ष, स्नातकोत्तर डोगरी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू), हिन्दी अनुवाद : श्रीमती रजनी शर्मा, मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह स्नेह-भरल सनेस बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? रहबाक अहाँक नहि कोनो ठेकान, आइ ‘सियासी’ काल्हि ‘पुलगामा’ आँखिएमे अहाँ काटी राति, जड़कल्ला आकि हो बरसाति। पठाबी स्नेहक मनि-आडर, पूँछ’ ‘रजौरी’ ‘डोडा’, ‘पाडर’ अहाँ लिखि भेजू, कतए पठाबी, अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कनहा पर सभदिन बोझ उठौने, ठाम-कुठाम अहाँ डेग बढौने। गरम सीरकमे हमसभ सूती, अहाँ छातीसँ बन्दूक लगौने। एक बरोबरि दिन आ राति, की साँझ आ की परात। कतए करै छी अहाँ विश्राम? कोन ठाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? ‘सियाचीन’मे कोना रहै छी, बर्फ-बिछौना कोना सहै छी? सहैत हएब अहाँ बहुत ठंढ नहाएब तँ बुझू हैत दंड। नीक-सन एकटा पैटर्न चूनिकए, स्नेहक एकटा स्वीटर बुनिकए छी रखने, बाजू कतए पठाबी अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? उत्तरलाई आ जैसलमेर भेल अहाँक ड्यूटी कैक बेर। चलैत बलुआही तुफ़ान भेल हैब अहाँ केहन हरान? करैत अमावस-सन अन्हार, अपनहुँ चेहरा भेल अनचिन्हार। स्नेह भरल हम चान चढ़ाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जहाज उड़ाएब भ’ जाए सरल, सदिखन सीमान पर आँखि गरल। दुश्मन बैसल अछि ताकमे, नहि ओकर इरादा पाक अछि। छल-कपट करि ओ घेरए नहि, अहाँक मति ओ फेरए नहि। स्नेहक हम बरखा बरसाबी, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? कोच्चि, गोवा, विशाखापट्टनम् अंडमान आ चेन्नई दक्खिन। जल-सेना केर बेड़ा तारल, देशक दुश्मनकेँ अहाँ मारल। विश्व प्रशंसक अछि अहाँक, स्वयं वरूण छथि रक्षक अहाँक। एहिसँ बढ़िकए हम कहि की सकै छी? अहाँक नाम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? साहस ऊँच, जेना की ‘पीर’ कारगिल जाउ आकि कश्मीर। रक्षा अहाँक करताह महेश, गौरी-नन्दन श्रीगणेश। देश बचाएब, धरम निभाएब, ‘जोरावर’ सन यश अहाँ पाएब। आशीर्वचनक खाता फुजाबी अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? खाखी, चिट्टी, लीलहा वर्दी अछि सरिपहुँ हमरा हमदर्दी। माथ सँ ल’ कए पयर धरि, बुझू ईश्वर केर रूप अनेक। मिलत जखन वीरता केर तगमा, रचब एकटा सुन्नर-सन नगमा। तार मुबारक केर पठायब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? जखन सुनै छी अहाँके फोन, प्रमुदित भ’ उठैछ हमर मोन। चिन्तामुक्त भ’ हम सुतै छी, मुक्त गगनमे हम उड़ै छी। सभ कुछ लागए हमरा मीत। मोन करए लिखू कोनो गीत, अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? यौ विक्की, गुरदीप कि तारक, होमए अहाँकेँ जनम दिन मुबारक। समय भेटए तँ गौशाला जाएब, हरियर घास गायकेँ ओगारब। घूरि कए करब फोन जलंधर, दादी संग एखन जाइ छी मंदिर। अशेष स्नेह लेल धूप जरायब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? भूल्ली भैंसक दूधक घी, सेहो छी हम संजोगने । कुलदेवता केर पूजासँ पहिने, खा ने केओ सकता जे हो। श्री-पुलाव अहाँकेँ भाबए, ‘जल्दी बनाउ’ आबि कही ‘माए’! सभ इच्छा हम पूर करब खाइत छी किरिया हम? बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? बहुतो दिनसँ एकादशीक हम व्रत छी रखने, करब उद्यापन आएब अहाँ घूरि घर जखने, काज तँ आओरो.... छैक घर पर दिल खोलि हम ककरा देखाउ? हम्मर प्राण! बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? पागल-सन भेल अछि अहाँक बहिन, कुशल पूछैत छथि ओ सभ दिन। ‘राहड़ा’* करैत छथि अहाँके नामक, चर्च करैत छथि अहाँके काजक। वीर हमर युद्ध जीतकेँ औताह, कबुला करथि जा कए बाहवे। देवी माँ केँ भेंट चढौती अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? युद्ध जीत कए अहाँ जे आएब, करब यज्ञ आ भोज कराएब। ठाम-ठाम पर फूल बिछायब, रंगोलीसँ घर-द्वार सजायब। अमृतसर, बाहवे, सतवारी जाएब ओतए हम बेरा-बेरी। पीर-मज़ार पर रोट चढ़ाएब अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? देखि अहाँकेँ चान चढ़ए, केतनहुँ किएक नहि काज बढ़ए। देखी अहाँके सूरत कोमल, सदिखन रहए मोन अति हुलसल, चहुँ-दिस आबि जाएत बहार, बसात गबै अछि मेघ-मल्हार। गीत प्रीत केर गबै अछि कोयल अहाँक नाम। बाजू सैनिक! कोन ठाम? स्नेह-भरल सनेस पठाबी अहाँक नाम? *‘राहड़ा’ (जम्मू क्षेत्रमे मनाओल जाएवला भाय-बहिनक एकटा महत्वपूर्ण पर्व) कुमार संभव ‘भारद्वाज’- हमर भारत देश महान (हिन्दी कविता) कुमार संभव ‘भारद्वाज’- हमर भारत देश महान (हिन्दी कविता) (कुमार संभव ‘भारद्वाज’, ग्राम- लहुआर, पत्रालय तेलहर, अंचल-महिषी, जिला-सहरसा, बाबू चतुर्भुज सिंहक प्रथम पौत्र छथि। मूल रूपसँ हिन्दीमे लिखल गेल ‘मेरा भारत देश महान’ हिनक पहिल कविता छियनि।) अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह हमर भारत देश महान हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान विद्या केर भंडार एतय अछि कुरीति केर विनाशक अछि आन कलामे परिपूर्ण अछि व्यापक अछि ई अनुपम अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान कहल जाइछ एहि देशक आगू सब क्यो माथ झुकौने अछि आन नदी आ पर्वत सभ सेहो एकर गुणकेँ गौने अछि, एहि धरती पर गंगा-यमुना केर बहैत निर्मल धारा अछि, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान वीर पुरूषसँ भरल पड़ल ई हमर मुल्क हमर समाज ई कुँवर सिंह आ गाँधीजी केर यैह निवास स्थान अछि, एहि धरती पर जनम नेने छथि राम, कृष्ण ओ बुद्ध सेहो एहि धरती पर जनम नेने छथि सीता ओ सावित्री सेहो, हमर भारत देश महान जकर हम गाबी गुणगान। पसुपुलेटि गीता- दुमर्जा (तेलुगु कविता) मूल तेलुगु कविता:पसुपुलेटि गीता; तेलुगुसँ हिंदी अनुवाद: आर.शांता सुंदरी; हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद:विनीत उत्पल (दिल्लीक निर्भया बलात्कारक घटनापर) दुमर्जा देह भऽ गेल अछि एकटा इतिहास-दोख दूटा ठोढ़, दूटा गाल दूटा स्तन, दूटा जांघ जोड़ा चुहचुही दुइए युगमे एहन जेना जिनगी भऽ गेल खतम जिनगी एत्ते संकीर्ण भऽ गेल जे कनियो टा डोलू तँ उघड़ए लागैत अछि भीतक रहस्य बिनु खुजनहिये ग्राफिती भटरंग हुअए लागैत अछि काल्हि नै जानि केकर बेर अछि?
खराप नै मानब, लागए लागल अछि लगमे ठाढ़ सभटा पुरुख जेना जांघक बीच अप्पन भाला लऽ कऽ चलि रहल अछि समुद्र आ अकासकेँ मिला कऽ बुनलापर सेहो ऐ अदौक पाथर-युगक उघारकेँ झपबा लेल हाथ भरि लत्ता नै भेटैत अछि आँखि खुजलेपर तँ बुझाएत जे भोर भऽ गेल जइ अंगमे आँखिये नै ओकरा लेल आन्हरक-अन्हारे आनंद अछि अँतड़ीये टा नै हृदएकेँ सेहो उधेसैत देहमे अन्हार सोझे खन्ती बनैए धँसि जाइए खराप नै मानब, कीड़ीसँ कीड़ीक नाशक आशा करैत मृत्युसँ अमृत मांगैत मालजाल भऽ मालजालक बहिष्कार के करैत अछि? मानवताक भ्रमजालमे सिग्नल सभक बीच बड़का सड़क जखैन बनि जाइत अछि आक्रंदनक गुमकी कान फाड़ैबला प्रश्नक गोली जनमि रहल अछि तँ की भेल? विवेकपर लाठी बजरि रहल अछि फुसियाहींक भरोस, बिकट्ठ गारि नोर पोछि रहल अछि। प्रहरी-दलक पसार नोरबला गैसक मेघ बनि विश्वासपर आच्छादित भऽ रहल अछि। नग्र एकटा मृत्युक ओजार बनि गेल अछि अप्पन आ आस-पड़ोसक घर नव घा बनि औनाए लगैत अछि हमरा दूनू गोटेक अस्तित्व काएम रहबाक हुअए तँ अहाँकेँ हमरामे मनुष्यता बनि झहरऽ पड़त हमरा अहाँमे पैसि मातृत्व बनि बहए पड़त देहक दोखी भेलाक बाद प्राणक हिलकोर मिझा गेलाक बाद चण्ठमे अनूदित भेलाक बाद बालुक पानिक झिल्हरिक बाँझ स्थितिमे प्रवासी भऽ प्रवेश केलाक बाद... माँ सेहो अहाँ लेल एकटा गलत सम्बन्ध बनि कऽ रहि जाएत... खराप नै मानब, आब एतए मुर्दाघरक अलाबे सौरी-घरक कोनो खगता नै! रहमान राही- छाह सभ (कश्मीरी कविता) रहमान राही- छाह सभ (कश्मीरी कविता) ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह ६ नवम्बर २००८: संसदक लाइब्रेरीक बालयोगी ऑडिटोरियममे कश्मीरी कवि श्री रहमान राहीकेँ प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा प्रदान कएल जाएबला ४०म ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोहक आमंत्रण पाबि ओतए नियत समयसँ सायं छह बजे हम पहुँचलहुँ। अपन प्रतिष्ठाक अनुरूप प्रधानमंत्री निर्धारित समय ६.३० सायं पदार्पण केलन्हि। स्टेजपर श्री रवीन्द्र कालिया, निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, रहमान राही, डॉ. मनमोहन सिंह, सीताकान्त महापात्र, पुरस्कार चयन समितिक अध्यक्ष आऽ अखिलेश जैन, प्रबन्ध ट्रस्टी रहथि। दर्शकमे श्री टी.एन.चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, आलोक पी. जैन आऽ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी रहथि। ब्रजेन्द्रजी हमरा संग बैसल रहथि। स्व. साहू शान्ति प्रसाद जैन आऽ स्व. श्रीमति रमाजैन, एहि पुरस्कारक प्रारम्भ कएने रहथि आऽ हुनकर दुनू गोटेक फोटो पाछाँमे लागल रहन्हि। आइ काल्हि ४०म सालक महत्व एहि कारणसँ बढ़ि गेल अछि कारण ५०म वर्षगाँठक इन्तजारमे बहुत गोटे आयु बेशी भेने जीवित नहि रहैत छथि। सरला माहेश्वरी माइक पकड़ि कार्यक्रमक शुरुआतसँ पहिने अनिता जैनकेँ निराला रचित सरस्वती वन्दना गएबाक लेल अनुरोध कएलन्हि आऽ ओऽ मंचक दोसर भागमे महर्षि अगस्त्यक या कुन्देन्दुसँ शुरु कए निरालाक रचना शास्त्रीय पद्धतिमे गओलन्हि। फेर फूलसँ प्रधान मंत्रीक स्वागत प्रबन्ध न्यासी अखिलेश जैन द्वारा भेल, फेर रवीन्द्र कालिया फूलसँ रहमान राहीक स्वागत कएलन्हि। फेर श्री सीताकान्त महापात्र अंग्रेजीमे उद्गार व्यक्त करैत कहलन्हि जे राहीकेँ सम्मानित कए भारतीय ज्ञानपीठ अपनाकेँ सम्मानित कएलक अछि। फेर प्रधानमंत्री द्वारा राहीकेँ शॉल ओढ़ा कए आऽ १०३५ ई.क राजा भोजक सरस्वतीक प्रतिमाक कांस्य अनुकृति जाहिमे ज्ञानपीठ द्वारा प्रभामण्डल जोड़ल गेल (मूल प्रतिमा लंदनक ब्रिटिश म्यूजियममे अछि) आऽ प्रशस्ति पत्र आऽ ५ लाख टाकाक ड्राफ्ट दए सम्मानित कएल गेल। राही उद्गार व्यक्य कएलन्हि आऽ महान जवाहरलाल नेहरूक जाहि पदपर छलाह ओहि पदपर आसीन मनमोहन सिंहसँ पुरस्कार प्राप्त कए विशेष प्रसन्नता प्रकट कएलन्हि। फेर रवीन्द्र कालिया धन्यवाद ज्ञापन कएलन्हि। राहीक प्रतिनिधि कविताक ज्ञानपीठ द्वारा कएल हिन्दी अनुवाद राही द्वारा प्रधान मंत्रीकेँ देल गेल। अब्दुल रहमान राहीक जन्म ६ मई १९२५ ई.केँ भेल। हुनकर पहिल कविता संग्रहकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल। भारत सरकारक पद्म श्री आऽ मानव संसाधन विकास मंत्रालयक एमिरेट्स फेलोशिप हिनका भेटल छन्हि। हिनकर कविता संग्रहमे सनवुन्य साज, सुबहुक सोदा, कलाम-ए-राही प्रमुख अछि। हिनकर आलोचना आऽ निबन्धक पोथी अछि, कहवट आदि। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता (कश्मीरीसँ अंग्रेजी एस.एल.सन्धु, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर) छाह सभ अपन नियतिसँ वाद आऽ अमरताक आशा आब छोड़ि दिअ, यदि जुटा ली किछु क्षण, तँ भेर भऽ जाऊ ताहिमे। बस्तीक जाहि पथमे चलैत रहलहुँ, ओऽ धँसि गेल घनगर बोनमे, जेना हमर आस्थाक कवच भेल भेद्य केलक शंकासभ। आँखि खुजिते हमर स्वप्नकेँ लागल आँखि सभटा बासन्ती युवा छाती झरकि कए भऽ गेल सुनसान। देखू तँ देखायत आस-पड़ोसमे लावण्यमयी मेला, हाथमे आएत मात्र एकाध विचार, आऽ असगर एकटा कौआ उजाड़मे। कखनो हमर इच्छा रहए चान-तरेगन गढ़बाक, आब माथ भुका रहल छी अपन कोनो नामकरण तँ करी। सभटा विश्वास घाटीक मौलायल हरैयरी सन, सभटा चैतन्य खिसियायल साँप सन। सभटा देवता हमर अपन छाह छथि, सभटा दानव हमर अहं केर कनिया-पुतड़ा सन। सभा भवन भरल बुझू बानरक खोँ-खोँ सँ, सन्तक पहिरनक लेल ताकू बोने-बोन। केहन अछि नाओक खेबनाई, कतए तँ अछि किनार! देशांस भोथलेलक नाओकेँ अन्हारमे। हे रौ नटुआ, नाच निर्वस्त्र चारू कात ओकर, राही तँ आगि-खाएबला बताह अछि। समारोह एक घण्टामे खतम भेल आऽ घुरैत रही तँ एफ.एम.पर समाचार भेटल जे सचिन तेन्दुलकर अपन टेस्ट जीवनक ४०म शतक दिनमे पूर्ण कएलन्हि। भीमसेन जोशीकेँ भारत रत्न पुरस्कार देल गेल। आऽ चन्द्रायण-१ चन्द्रमाक १०० किलोमीटरक वृत्ताकार कक्षामे स्थापित भऽ गेल जतए ओ २ वर्ष धरि रहत। रजनी छाबड़ा (किछु हिन्दी कविता) रजनी छाबड़ा (हिन्दी कविता संग्रह ’पिघलते हिमखण्ड’ सँ मैथिली अनुवाद- अनुवादक डॉ. शिवकुमार प्रसाद) साँसक संग खनकै कंगना छनकै पायल ओझरल केश छितरल काजर। टुटल-फुटल साँसक हलचल धरतीक पियास मेघक तरपब। रौद सोहनगर कुनमुनाइत सन ओकर छुअब। एक आँचमे पघलए तन-मन। सपना बनि गेल सपनौती जीवन। साँस-साँस संग बहब बिनु कहने सभ कहब। चर्चा ओ संसार हमर नहि भऽ सकैत अछि जेतए अहाँक गमक नहि हो अहाँक स्मृति नहि हो, चर्चा नहि हो जेतए अहाँकेँ ओ सभा हमरा अनसोहाँत लगैए। दिगंतक नजीक दिगंतक नजीक करै छी हमर उमेद जेतए दू संसार मिलियो कऽ नहि मिलै छइ। अपूर्ण अछि आस अपूर्ण अछि मिलन केर आग्रह आब तँ फूल फुलाइयो कऽ नहि फुलैत छै फुलाएलो-फुलाएल नहि लगैए। केहेन उपराग लाल जागल आँखि पैछला रातिक करोट रात्रिक जागरण कहियो खतम नहि होमए बला सत्तैर। वियोगनिक यएह अमाबसक भाग्य छै किनकासँ शिकाइत केहेन उपराग..! सुख-दुख समय केर अन्हारसँ जुनि डेराउ हे मन। मेघक अन्तिम छोरपर चमकैत बिजुरिक अहाँ अन्दाजि कऽ करू अपन नाप-जोख। जखन निकसै छै गुनगुनाइत रौद ठरल बसातक पछाइत ओकर मृदुल-मृदुल स्पर्शसँ फुलवारीक कोण-कोण अबाद भऽ जाइ छइ। सुख आ दुखकेँ संगे-संग सहैमे जीवनक सहजता छै। काँटक नमहर बाट पारे कऽ कें ने गुलाब शानसँ महकै छइ। आन जाहि आँखिमे हिलैत रहै छल सपना आब ओहू आँखिमे बस बिराने-बीरान नजैर अबैए। देखै छी जखन पूर्वकालिक छबि हमरा अपनहिमे आन देखैत अछि। कारण ओ पुछै छथि चुप रहै छी किए ठोर गुम्मे रहल नोर छलैक जाइए। की दिऐ हम जवाब सबाल दुनियाँक सुनि जखन जिनगीए हमर सबाल बनि कऽ रहि गेल-ए। सतरंगा आनन्द सभ ऋृतुमे फुटपाथपर ठाढ़ ओ काँच उमेरक नेना बेचैत अछि सतरंगा बेलुन आ छिड़ियाबैत अछि आनन्द केर रंग। नन्हकिरबा सभ कुदैत अछि नान्हिटा हाथमे पकड़ने बेलुन। बेलुन ओकरो ललचाबै छै मुदा ओ कहियो अपनो लेल कीनि पौत? गरीबी अभिशाप छै सतरंगा सपनाकेँ चुरमचूर करए-बला। ओकरा बचेबाक छै एक-एक गोट कैंचा आनए लेल बेराम माइयक दबाइ। छोट भाइयक लेल एक कपटी दूध सभ दिन पुड़ेबाक छै अपनाकेँ तँ बस काममे खटेबाक छै। एहि सोचमे डुमल ओकरासँ किछु कीनि कऽ बेलुन पकड़ा दइ छिऐ ओकर नान्हिटा हाथमे ई छोट-छीन उपहार। ओकर बिमल मुँहपर चमकलै आनन्द हमरो दैत अछि ओ सतरंगा आनन्दक अभास। अहाँक थाती हम जोगा कऽ राखब अपन देशक खातिर पैरुखक थाती अहाँ जे हमरा नाम कऽ गेलौं। मुस्किया कऽ सहब सभ समय केर धाह देशभक्तिक मनसूबा ने कहियो हएत कम। बलिदानक फूल देलौं जे अहाँ आँचरमे ओकर गमकसँ गमकतै हमर बतन। हमहीं जीजाबाई हमहीं अमर सिंह राठौड़क छी माए लोरी केर बदला कहबै बेटाकेँ हम बलिदानक कथा। जँ फेर कोनो आफत एतै देशक मानिपर आ मंगतै जँ बलिदान देशक मानि लेल कऽ देबै हँसैत-हँसैत अपन दुलरुआ बलिदान। जे जान दइ छथि देशक लेल ओ छोड़ि जाइ छथि बलिदानक चिन्हासी जइपर चलि कऽ अक्षुण्ण रखै छथि नवतुरिया मुक्त राष्ट्र, मुक्त संसार। बिसबासक मूर्ति सभ शहरक सभ गलीमे किछ प्रार्थना-घर आ मण्डिल होइत छै जेतए लोक अपन-अपन बिसबासक मूर्ति बना दैत छथि, अपन-अपन बेवहार आ चलैनसँ ओकरा सजा लइ छथि। शेष संसारक धरम-करमसँ फेर ओ अजान भऽ जाइ छथि। नहुँ-नहुँ ओ एना हेरा लइ छथि सतही प्रार्थनामे, अपन धरमकेँ ओ अपन इमानसँ पटेबाक बदला रंगि दइ छथि हुनक लेहुसँ जे हुनक धरमसँ इतर छैन। बिसबासक मूर्ति बनबैत-बनबैत हुनका पतो ने चलै छैन कि ओ अपनहि कखन मूर्ति बनि जाइ छथि। ई केहेन नाता ई केहेन नाता अछि खुशी अहाँकेँ भेटैत अछि खोइछ हमर भरि जाइत अछि। करोट जखन अहाँ घुमै छी हमर सुख हेरा जाइत अछि। चोट अहाँकेँ लगए नोर हमर आँखिमे डबडबा जाइत अछि। अहाँक आँखिमे नोर छल-छलाइसँ पहिनहि अपन पिपनीमे समेटबाक मन होइत अछि। अट्टखेल करैत लहैरमे किएक अहाँक छवि अभरऽ लगैत अछि। चुपे-चाप मौसम गुनगुनाए लगैत अछि अहाँक स्मृति हमरामे बसि जाइत अछि। कानमे मिठगर घन्टी सन बाजए लगैत अछि जखन अहाँक बोलक जादू पसरैत अछि। जिनगीक आधा खाली जाम आधा भरल नजैर अबैत अछि। अनाम सम्बन्धकेँ नाम देबए-मे शब्दो भण्डार खाली भऽ जाइत अछि। अहीं कहू ने अहाँसँ ई केहेन नाता अछि? मनक पखेरू आकुल नैन व्याकुल बाट अलोपित होइत आड़ि-धूर, क्षितिजकेँ छुबाक आस अतृप्त पियास। तबधल रेगिस्तानमे सौनक बात नेहक मेघकेँ बरसब जिनगीक भीजब, छद्म सपना फुजल आँखिक छल। मनक पखेरू केर पाँखि कतरब यएह अछि यथार्थ केर धरातल। कचोट अधखड़ु जिनगीक चोट एना जिनगीमे सन्हिया रहल अछि, जेना करिया रातिक गाढ़ रोशनाइ नोरोसँ नहि धुआ रहल हो। स्मृति अहाँक गुम्मी अहाँक आँखिक जिह्वासँ अनकहलो बात कथा बनि जाइत अछि। नहुसँ छुबि कऽ बात फुला जाइत अछि अधफुलल कलिकाकेँ ओ छुअब जिनगीक मस्ती बनि जाइ छै। अहाँक गमक लऽ कऽ अबैत अछि वात ओ क्षण बनि जाइ छै जिनगीक स्मृति। आसक चिड़ै मन तँ आसक चिड़ै छै एकरा किए बान्है छी कैदी बनैले मनुषक देह की कम अछि? केहेन भटकब सगर धरणीक सभ कोण आइ ने काल्हि फुलेबे करतै तखन काँटबला बाटसँ किएक भटकब? सुनै छी काँटोमे छै फूल फुलेबाक चलैन। बेमन जिनगी अचानक जखन लागए लगए बेमन जिनगी, ठमैक जाय एकाएक उल्लास, तँ बुझि ली हम बनि रहल छी कथा। बीतल कथा बनैसँ नीक अछि इन्द्रधनुषक अन्तिम कोरसँ लाल रंग लऽ जिनगीकेँ पुनि आसक रंगमे रंगि आयास आ बिसबासक दीप बारि ली। हिमखंड पघलै छै बरफक पहाड़ ठिठुरलो सिनेहकेँ, मधुआएल बिसबासक रौद तँ दऽ कऽ देखियौ! ई केहन सत्तैर कखनहुँ तऽ नेहक दू बुन्न दऽ जाएत छै सिन्धु सन तोष। कखनहुँ समुद्रो पियास नहि मेटा पबैत छै। नै जानि पियासक ई केहन सत्तैर आ नाता छै! बन्न ठोर बन्नो ठोरक सेहेा अपन जिह्वा होइत छै गोट-गोट खिस्सा आँखिये कहि दैत छै। ई बुझि सकैत अछि एसगरे नेहसँ भरल हृदय सगर संसार एहि बातसँ अनभिज्ञ रहैत छै। केना बिसैर सकै छी? हम बिसैर सकै छी हुनका जे हमरा संग हमर सुखमे साझी भऽ ठहक्का लगौने छथि। मुदा हम किन्नहुँ बिसैर सकै छी हुनका जे हमर दुखक संग बिनु कहने नोर बहेने छथि? घरक पाग वृद्धजन छथि घरक पाग के नकारत एहि सत्यकेँ कोनो टा सभ्य समाज। ओ छथि घर-आँगनक बरक गाछ, सुकुमार लतासन भविषक खारही हुनकेसँ लटपटाइत पाबि सकैत अछि अधार बढ़ौने रहि सकैत छथि लिलसा। अनुभवक बोझ अतिभारी तहूसँ दोहरी भेल छैन डाँर। किछु कड़ू किछु खटगर मिठगर अनुभव दोहराबैत चुप भऽ सोनसन रौदमे लैत खुमारी। अनुभवक ओ खान संजोगने टकटकी लगा ताकि रहल छथि अपन हिस्सा केर विरानी। पुतोहु बेटा केर सभ किछु भेटैन घर-बाहर संग किट्टी-पाटी बच्चा पढ़ैले जाइ छैन पाठशाला वा होस्टलमे तैयो डर एकान्त बासमे बिगाड़ि देतैन ई दादा-दादी। घरक अन्हरिया कोणमे समेटल खाट-पलंग सन आकुल-व्याकुल मनक किनका सुनेता बेथा। संस्कार नहि घरक बात ई केना निकालता बाहर वृद्धाश्रमसं बाँचल छथि ओ बँचबैत घरक लाज। अपननहि घर अवहेलित आइ अछि घरक ऊँचका पाग। जेठ नागरिक दिवसपर बेटा-पुतोहुक संग पाबि मान केर मंच क्षण भरिक खुशी पाबि, पुनि सन्हिया जाइ छथि अपन हिस्साक कोणमे बनि बितलाहा काल्हि। बितलाहा काल्हि आ आजुक आइ जँ मिलि सकए एकसंग विकासक बाटपर बढ़ि सकैत अछि अपन समाज। खेलौना सन हे भगवान! सभ घरमे खेलौना सन बच्चा दियौ आ बच्चे सन खेलौना। सुखक नीन आ बिछौना सेहो दियौ नेहक छाँह तैसंग सुन्नर सपना दियौ। किल-किलाइत रहए खिल-खिलाइत रहए आँखिमे ने कहियो नोर भरए दियौ। घर आओर मकान जाहि नगरमे हमर घर हमरा जतए तेज आ दाना भेटल वएह हमरा लेल स्वर्ग सन असरा अछि। जाहि शहरमे हमर मकान आ जीबाक समान ओतहि जीबाक सुख आ एसगरुआ जिनगीक ठेकान अछि। एहेन कोन जीयब एहेन कोन जीयब कि जीयब एकटा लचारी लगए। किएक ने करी एहेन किछु काज कि हमरा मुइला पछाइत ई संसार हमरा बिनु अधखड़ू लगए। बहए दियौ जिनगीकेँ दर्शनक फेरिमे जुनि ओझराउ विचारकेँ शब्दक मकड़जालमे जुनि ओझराउ चालिकेँ। बहए दियौ जिनगीकेँ विमल अबाध धार सन कहए दियौ मनकेँ भाव सोझ सहज कविता सन। कुहेस उदासिक पड़ल पपड़ी-पर-पपड़ी कोनो कुहेस नहि जे छैट जेतए कोनो उज्जर भिनसरसँ। ओ तँ एना घोंसियाएल अछि हमर करेजमे जे जएत हमरे संग। साँचक धरातल सपनाक संसारमे जीबैत छेलौं हम नहि छल कोनो साँचक धरातल अपन। जिनगीक दहकैत दुपहरियामे नहि छल माथपर सिनेहक आँचर। सरापल तबधल मन लेने सौनक बात लेल तरसै छल मन बातोमे छण छण भीजल छल नैन फूलो गरैत छल काँटे समान, दुनियाँक मेलामे एसगर हकासल छल मन। अहाँक फेन घुमि आयब एतए सुनसान जिनगीमे हमर स्वर्ण किरिण निकसैत जेना छँटि गेल कुहेस गमकए लगल जिनगीमे चाननक सुवास। हमरा संग आब अछि हमर खुशीक आँगन पाँखि हम पसारी किए पबैले असमान। साँचक धरातल अछि आब हमर पहिचान। एहि प्रकारें समय केर सागरक बालुसँ मुट्ठीमे बटोरल किछु बालुक कण जे सटल अछि हमर तरहत्थीक मध्य ओही कणसँ सागरक अनुभूति संजोगि लइ छी। एहि प्रकारें जीबि लइ छी छिण-छिण केर जिनगी। नेनपनक घुमब ठहक्काक अहाँ झरना जे देलौं हमर आँगनमे, किलकारीक कुँजनसँ मुदित कएल घर-आँगन। आभारी छी हे परमेसर एहि नन्हकी देवदूतक लेल। नान्हिटा ई बिरबा जे लहलहैत अछि घर आँगनमे हमर बेटो केर नेन्हपन घुमि आएल आँगनमे। मेलामे एसगर दृष्टिक अन्तिम छोरि धैर जखन हमर आकुल आँखि अहाँकेँ हियाबैत अछि आ अहाँ जखन लगीचमे केतौ नहि अभरै छी तँ आरो भीषण भऽ जाइत अछि मेलामे एसगर भीड़ोमे भुतिएल हेबाक भान! हमहुँ जीबि रहल छी यै बसात यौ वसन्त हमरो हेबाक कने भान तँ कराऊ। साँस लऽ रहल छी हम मुदा जीबित रहबाक बिसबास नहि। जिनगीक बिरोधमे ई जघन्य अपराध नहि? छणेमे जीबि लेब भरि जनम, हरेक साँसमे सरगमक स्वर हरेक कम्पनमे पायलकेर झनक रेशमी आँचरकेँ नहुसँ सरसराएब, आँखिसँ आँखिमे सभ किछु कहि देब, बे पाँखिए अकासकेँ नापि लेब, पूर्णताक अभास तँ सपने भऽ गेल। खाली पल पल, खाली जिनगी, जिनगी तँ बनबासे भऽ गेल। सोन्हगर स्मृतिक फुलवारी कने फेनसँ महकाऊ यै बसात यौ वसन्त हमरो हेबाक कने भान त कराऊ। लहैर साँझक सघन धुइनमे सागर केर लहैर आ धक्का खाइत हमर देह आ मन। अहाँक संग रहैत, मन अभासैत छल सागरमे सागर सन विस्तृत, अनन्त सुख, भरल पुरल नेह। समय केर निष्ठुर बाटपर अहाँ आब छी जिनगीक सीमाकेर ओहिपार। साँझक तरेगनमे, अहाँक छबि देखै छी। वएह सागर तँ आइयो छै ओहिने साँझक कुहेसो सघन लहैरमे ने हलचल सतहो अचंचले सन। स्थिर समुद्र सन मनकेर गहनता खान अछि अशान्तिक वैचारिक सघनता। मनक बजार टुटि कऽ जुड़ियो जाइ तैयो दराइर देखाइत छै मनक बजारमे फेन नहि ओ बौस बिकाइ छै! जिनगीसँ की चाहै छी हम जिनगीसँ की चाहै छी हम अपनो किछु नहि जनै छी किछु करबाक लेने लिलसा मनमे अधखरुए लिलसे जीबै छी। हम जिनगीसँ...। होइए जखन मनमे लिलसा बाटसँ हटि किछु काम करी संस्कार नेह केर लोरीसँ ओहि लिलसोकेँ सुतबैत जाइ छी। हम जिनगीसँ...। सोन सन रौदसँ भरल अकास सोझहेमे अछि मनक बन्न अन्हरिया कोठलीमे तैयो हम सुटकल जाइ छी। हम जिनगीसँ...। चाहै छी विस्तार सिन्धु केर जिनगीमे सरिपहुँ कुँइयाँक बेंग सन जीने जाइ छी। हम जिनगीसँ...। चाहै छी नदी सन बेग हम जिनगीमे नोरोकेँ आँखिसँ नहि टघरए दइ छी। हम जिनगीसँ...। लिलसा अछि जीती जिनगीक खेल टेकठीक मदैतसँ चलैत जाइ छी। हम जिनगीसँ...। किछु नीक करबाक लिलसा लेने किछु नहि कऽ पेबाक कचोट लेने एहि अजब द्वन्द्व केर हालैतमे ओहिना जिनगी जीने जाइ छी। हम जिनगीसँ की चाहै छी हम अपनो किछु नहि जनै छी। आजुक नारी आजुक जनानी अबला नहि जे बिपैत पड़लापर टुटलाहा माला जकाँ छिड़िया जाइ छै। आजुक जनानी सबला अछि जकरा टुटियो कऽ जुड़ब आ जोड़बाक कला बूझल छै। हम केतए छेलौं हम जखन ओहिठाम रही तखनो ओतए नहि रही। अपनहि संसारक मेलामे हम हेरागेल रही नहि जानि केतए रही। पैघक गुणक नकल करैत छल हमर व्यक्तित्वक अपहरण, हमर निजत्व पपड़ी दर पपड़ी कब्बरमे झँपाएत रहए आ हम अपन छीण होइत स्वसँ फिरसान रही। काँच उमेड़मे कनहाक बेगरता रहै छै। अपन पैरपर ठाढ़ भेला पछाइत कनहा धऽ चलब अपन बेकूफी छैक। सोनजूही सन पुनकब अपन क्षमता रहितहुँ दोसराक बले चलब किए मानि लेने छल भाग्य हमर। निःशब्द बेथा आ नोरसँ धैरज रखनिहार जगतीक छाती पटा कऽ बरखो-बर्खक पछाइत हम अँकुरलौं अछि आब मनमे संजोगने पुनकबाक इच्छा । झौंखरा जकाँ नहि, हम चाहै छी नीर-निधि सन पसार। नहि जीबए चाहै छी गुड्डीक जिनगी, लेने अकासक पसार, जुड़ि कऽ साँचक धरासँ बनए चाहै छी अपन जिनगीक अपनहि अधार। बिसबास अहाँ अपनापर बिसबास राखू संसार अहाँपर बिसबास करत पकड़ने रहू आसाक डोरि अहाँक आस निरास नहि करत। रौदसँ सुनगैत होए जे आँगन कहियो ने कहियो इसरक किरपाक मेघ, छाँह बनि एबे करतै। कारी सियाह रातिकेँ छाती चिरबाक तागैत जइ दियारीमे छै ओइ दियारीकेँ अन्हरो निरास नहिएँ करतै। अन्हरकेँ मुकैबला जे कऽ लइ छै मलाह हुनका जिबाक ढंग अपने आबि जाइ छै। आस, बिसबास आ हिम्मतक जखन होइए छै मिलान तँ दुनियाँक कोनो कलेस नहि रहै छै कलेस। बिसरा जाइ छै पैछला झंझैटक समय। बैस जाइ छै फेनसँ खुशीक घर। जिनगी गाबए लगै छै राग आ मलार। मनक कनकौआ कनकौआ सन सौखीन मन लेने चुलबुलीक पहाड़ छूबए चाहैत अछि सौंसे अकासक बिस्तार। पहाड़, समुद्र, अटारिक बिस्तार सन सभ झंझैटकेँ अन्ठियाबैत आगुए आगू पएर बढ़बैत अछि। जिनगीक थकाबैटकेँ मेटेबा लेल चाही मनक कनकौआ आ सपनाक अकास जाहिमे मन भरि सकै निधोख सतरंगा उड़ान। मुदा किए दी दोसराक हाथमे अपन डोइर? छण छण लागल रहत शंकाक परेत कखन हम कटि जाय कखन हम लुटि जाय? चुलबुलाहैट, चपलता नेने देखए मन कल्पनाक एना, साँचक जमीनपर टिकल पएरे ने दइ छै जिनगीक अर्थ। घर सिनेह आ आतमीयता जखन देबालक चार बनि जाइ छै। वएह घर घर कहाइ छै। सुनसान जे छुटि जाइ छथि एहि जिनगीक जेहलसँ पाबि जाइ छथि एकटा नब जिनगी। बेजान तँ ओ रहै छथि जे ओकर बादो जिबैत छथि। ने रहै छै कोनो उत्साह ने उमंग रहि जाइ छै बस सुनसान, हरेक खुशीक छण सेहो कऽ जाइ छै उदास। अकास भरल छै अकास भरल छै दहों-दिस बेकल छै नहि जानि आइ प्राकृत कोन लीला करतै! बेसुध बेसुधिक हालैतमे अपनाकेँ हम ओहिना बजबै छी जेना अहीं बजाबैत होय हमरा। नहि जानि कहिया जएत ई पगलपन होश हएत कहिया। नारी जनानीकेँ मात्र जनानी किए नहि बुझल जाइ छै! समाज स्थापित कऽ देलकै ओकरा लेल जिनगीक किछु आदर्श किछु शर्त ओकरा जे निभौती ओ देबी कहौती। अपेक्षाक सिंघासनसँ उतरिते भऽ जेती पतिता। कखनो तँ देबी सन पूजलक कखनो पाएरक पनही बनौलक कखनो कठपुतरी सन मन माफिक नचौलक अपेक्षा एतेक ऊँच भऽ गेलइ जे जनानीक जिनगी ओछ भऽ गेलइ। किए नहि मानै छी सभ ओ मात्र जनानी छी! सहज सरस सरलमैत सम्वेदनाक जननी आ सृष्टिक सिरजनहारि। अपना मने जिबाक ओकरो अधिकार छै जनानी बस जनानी अछि। एकटा हेराएल जनानी शिकाइत की अनकासँ अपने सभ छीनि लेलक हमरासँ हमर पहिचान। बेटी पुतौह कनियाँ माए मे ओझराएल मेटा लेल हम अपनेसँ अपन पहिचान। बाटपर जाइत काल्हि सोर पाड़लक संगी नेन्हपनमे राखल छल जे हमर नाओं। खुजए लागल तखन हमर स्मृतिक झरोखा रौदक चालैनमे किरिणसँ निकसल धुँआएल-धुँआएल नाओं। हमहुँ कहियो हम छेलौं माए-बापक फुदकी चिड़ै हास विलाससँ भरल उड़ैत रही अँगना-घर गामक गलीसँ गामक सिमान धरि। हमर अजादीक खिस्सा पसैर गेल काँचक किरिच सन गरए लगलैन अड़ोस पड़ोस संग सर-सम्बन्धीकेँ हमर पसरल पाँखिक अजादी। नोचैले पाँखि अजादिक हमर सुन्नर सुन्नर बहन्नासँ करौल गेल बिआह नेनपनेमे हमर। पढ़ब-लिखब सपना भेल हमरा पोल्हाएल गेल घरेक सेवामे मेवा भेटै छै, जाबत सुतल छल अपन पहिचानक इच्छा ताबत किछु बर्ख धरि रहलौं गिरहस्थीमे लीन। बच्चा अपन जिनगी आ पुरुष अपन काज संग पलखैत ने हुनका हमरा लेल एको छण। पाकैत बाउल सन तपैए मन। धधकैत मरूभूमिमे ढन-ढनाइत घैल सन मन हमर खाली अछि जिनगिक मरीचिकामे तकै छी अपन पहिचान। फल्लाँक बेटी हम फल्लाँक बहुरिया फल्लाँक कनियाँ आ फल्लाँक माए बनि हम गेलौं हेराए। शिकाइत की अनकासँ अपने सभ छीनि लेलक हमरासँ हमर पहिचान। राजभाषा भुगतानक बेर बैंकमे कहल गेलइ नाओं राजभाषा नाओं देखि भेटल मनकेँ अराम। अहाँसँ तँ देशोकेँ बढ़ल अछि शान अहाँ बिनु रहने की होएत हिन्दुस्तानक पहिचान। भुगतान लेबए काल जखन लगौलनि ओ औंठा निशान झमान भऽ खसल मन भेलौं मृयमान। नाओं आ गुणक केतौ ने कोनो मेल बिधाता की केला केहन केला खेल। मनमे लेने ओकर पढ़ेबाक अभिलाषा माए-बाप रखने हेतए नाओं राष्ट्रभाषा। परिस्थितियो राजभाषासँ केलकै मजाक अक्षरोक बोधसँ ओकरा केलकै फराक। बिद्याक बाट गबरा, धापू, लिछमी आ रामी पैघ पैघ डेग बढ़बैत पाठशालाक बाटपर बढ़ि रहल अछि। आइ बहिनजी सिखेती हाँसिल-जोड़ जेकरा सिखला बुझला पछाइत बनियाँक चलाकी नहि चलतै। आखर ज्ञानसँ फैदे-फैदा बनियाँक जोर नहि चलतैन जादा। गबरा, धापू, लिछमी आ रामी आब तोरा सभसँ मनक बात कहियौ कहबौ किए ने गामक सभ जनानी पढ़ए चाहै छै हमहीं किए अनपढ़ रहब? चुलही पजारैत, दालि भात रान्हैत बिजलोका जकाँ मनमे लौकैत अछि धधकैत आगिकेँ निहारैत सुनगैत मन नेने चुल्हिसँ कचका कोयला निकालि देबालेपर ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ ‘घ’ लिखने जाइ छी। सेन्टरपर नहि जा पबैछ तँ की अपन बेटिये सभकेँ गुरू बनबैत धापली बिद्याक बाटपर बढ़ि रहल अछि। छौरमे सुनगैत चिनगी आहूत करैत शिक्षाक महायज्ञक हमरा गामक सभ जनाना महान यज्ञमे आहूति दैत बिद्याक ठेकान पाबि सुखद जीबनक बाटपर बढ़ि रहल अछि। बन्हकी हाथ जोड़ने माथ झुकौने सिकुड़ल समटल सन ठाढ़ छल ओ खिड़कीसँ झरैत किरिण लग अपन कलाकीर्तिक आगू चित्रपट देखबैत छेलइ क्षितिज छुवाक आसमे पेंग भरैत उन्मुक्त पाखी आर सोझामे बिनु पाँखिक चिड़ए सन आहैत भाव नेने ओ चित्रकार बन्हक राखि चुकल छल अपन अनुभूतिकेँ कल्पना सम्वेदना अपन कलाकेँ संरक्षक लग। की जानि छितराएल छै अकासमे ऊँन सन मेघक गोला की जानि आइ परमतमो कोन गुण धुनमे लागल छथि! परिचय अन्हारकेँ अपन छातीमे समेटने जेना दीप बनबै छै अपन दीपित परिचय। ओहिना अन्तरमे अपन नोर नुकेने संसारकेँ देमए पड़त मात्र अपन हँसी । अपन बेनाओं जिनगीकेँ देमए पड़त अहिना नव परिचय। हमर दियारी सेहन्ताक बातीसँ जरेलहुँ एकटा दियारी अहाँक नाओं। लाखक लाख दियारी अहाँक सिनेहक अपनहि झिलमिला गेलइ। मनक बन्न केबाड़ एहिसँ पहिने की अपन अधखरुआ कचोट अहाँकेँ चकनाचूर कऽ दिए सगर जिनगी हँसबासँ कऽ दिए नचार फोलि दियौ मनकेर केवाड़ आ निकालि दियौ अपन मनक विषाद। दरद तँ सभकेँ हृदयमे रहिते छै दरदकेँ पुरबे पुरुषासँ सभकेँ सम्बन्ध छै किछु अपनो कहू किछु हमरो सुनू दरदकेँ मिल जुलि सहू। एहिसँ पहिने कि ओ बहैत बहैत बनि जाए भोकन्नर सिनेहक मलहमसँ करू ओकरा फराक सिनेहक अमृत पटा सुख दुख लिअ बाँटि मनक संग जीवन सिनेहसँ करू पूर फोलि दियौ मनक बन्न केबार आ बिषाद करू दूर। घा मन आ आँखिक बीच बड़ गहींर नाता छै मनक घा आँखिक नोरे बनि ने बहै छै। बहुत अछि एक गोट सपना निस्तेज आँखिक लेल। एकटा सिसकी निःशब्द ठोरक लेल। एकटा चिप्पी फाटल छातीकेँ सिबाक लेल। बहुत छै एतेक समान हमरा जीबा लेल। बौआइत मन बौआइत मनकेँ जखन जिनगीक कोनो अनभुआर रस्तापर अपन मनक संगी मिल जाइ छै, तँ ओकर चाह रहै छै कहियो नहि रूकै ओ रस्ता एक एक क्षण बनि जाए जुग सन यात्रा अहिना चलैत रहए चलैत रहए जुग जुगान्तर धरि। अहाँ बिनु अहाँ बिनु हिरदे एना बेकल रहैत अछि जे दिन उगिते साँझ बितबाक बाट ताकए लगै छी। केकरा चिन्ता रहै छै केकरा चिन्ता रहै छै बिहाड़िक बड़का अन्हरक पछाइत। सभटा दुख छोट भऽ जाइ छै कोनो बड़का बिपैत एलाक पछाइत। सन्तोषमे ओ सुआद केतऽ! सन्तोषमे ओ केतऽ पाबी जे बेकलतामे सुआद छै सनकल बेकलतेसँ भेटए सदैत सफलता छै। सन्तोष जँ ठेकान तँ रस्ता बेकलता छै। मधुबन बुन्न बुन्न नेहक अमियसँ जिनगीक घैल भरै छै। स्मृतिक बसात आ नेहक फुहारसँ बनै छै जिनगीक मधुबन। बन्दगी भावना कखनो मरैत नहि छै भाव जीवित अछि तँ जिनगी अछि। समयक आँचरमे सहेजल छिन-छिन केर भाव ईश्वरक अरधना छै। उन्मुक्त झरनाक कलकल चिड़य केर चहकब उन्मुक्त उड़ब चानन सुवासित बसात सौनक झींसी यएह तँ अछि अहाँक हँसबाक चिन्हास। मोती जड़ित घर केर दुआर तँ खोलू ओढ़ल मुस्कीकेँ आबो तँ छोड़ू। ई सेहन्ता ई सेहन्ता अहाँकेँ हमर घर ओ हँसैत सपना अछि नीन हमर खुलए ने कहियो जँ ई बात साँच अछि नीन कखनो ने आबए। खाली अप्पन खुशीपर सदैत जुगक पहरा रहै छै दुखेटा मात्र अपन होइ छै जौं बहुत गहींर हो। 2 2
ISSN 2229-547X विदेह सदेह २८ विभिन्न भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य रचना (खण्ड-१) (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। गद्य पद्य भारती अनुवाद खण्ड-१ [विदेह सदेह २८] Gadhya Padhya Bharti Anuvad Khand-1 [Videha Sadeha 28]: Translated prose and poetry Part-2 from Videha eJournal (www.videha.co.in) Issues 1-350: Edited by Gajendra Thakur. Compiled by Preeti Thakur © 2022/ 2026 Preeti Thakur/ Gajendra Thakur. All rights reserved. Published by Videha (videha.co.in) · Delhi Videha: First Maithili Fortnightly eJournal · ISSN 2229-547X First edition: 2022 Second Edition: 2026 Editor: Gajendra Thakur Cover design: Aum Gajendra Thakur Typeset in Times New Roman and Georgia; Devanagari set in Noto Serif Devanagari. Editorial: editorial.staff.videha@zohomail.in Sales: sales.videha@gmail.com for the writers, readers, and listeners of Mithilā, who have kept the lamp of Maithilī burning through a thousand years of storms ………………………….. "The Parallel is not the marginal but the truthful, in long delay." Mānuṣīm iha saṃskṛtām मिथिलाक ओइ लेखक, पाठक आ श्रोता लोकनि लेल, जे सहस्र वर्षक झंझावात मे सेहो मैथिलीक दीप प्रज्वलित रखने छथि। समानांतर कात-करोट मे हएब नै अछि, वरन् ई अछि असल सत्य, जे अपन समय लेलक अछि। अनुक्रम अनूदित गद्य-खण्ड शेख मोहम्मद शरीफ प्रसिद्ध वेमपल्ली शरीफ- जुम्मा (तेलुगु लघुकथा) (पृ. २-९) डॉ. प्रभा खेतान- छिन्नमस्ता (हिन्दी उपन्यास) (पृ. १०-१३८) खलील जिब्रान- गोल्डन बेल्ट (अंग्रेजी सीड स्टोरी) (पृ. १३९-१४०) ग्रिगोरी गोरिन (रूसी नाटककार)- एकटा ईमानदार आदमी (पृ. १४१-१४३) बर्तोल्ट ब्रेख्त (जर्मन नाटककार)- गपशप, महाशय “क” जखन कोनो व्यक्तिसँ प्रेम करैत अछि (पृ. १४४-१४६) चन्दमामा (संस्कृत) (लोक बालबोधिनी कथा)- शरीरक मूल्य (पृ. १४७-१४९) देवब्रत बसु- सुख केँ मृगमरीचिका बुझू (संस्कृत बीहनि कथा) (पृ. १५०-१५१) डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र- वीरभोग्या वसुन्धरा, अति सर्वत्र वर्जयेत् (संस्कृत बीहनि कथा) (पृ.१५२-१५४) असगर वजाहत- हम हिन्दू छी (हिन्दी लघु कथा) (पृ.१५५-१६१) कुरानक पहिल अध्यायक सात टा आयत- अरबी-हिन्दी कुरान (पृ. १६२-१६३) तुकाराम रामा शेट- पाखलो (कोंकणी उपन्यास) (पृ. १६४-२२५) अशोक मनभुटकर- हर एक लोक आ माटिक कथा ‘पाखलो’ (कोंकणी समीक्षा) (पृ. २२६-२३१) हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग (हिन्दी बायोग्राफी) (पृ. २३२-३२१) उदय प्रकाश- मोहनदास (हिन्दी दीर्घकथा) (पृ. ३२२-३८५) काशीनाथ सिंह- रेहनपर रग्घू (हिन्दी उपन्यास) (पृ. ३८६-४६८) गीतेश शर्मा- भारतीय मुसलमान आ भारतीयता (हिन्दी आलेख) (पृ. ४६९-४७४) सुकेश साहनी- ठ'रल सीरक (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ. ४७५-४७७) वन्दना अवस्थी दुबे- दायित्व (हिन्दी लघुकथा) (पृ. ४७८-४८०) अंजू खरबंदा- मुखिया (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ. ४८१-४८३) रवि प्रभाकर- अदकल जीह (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ. ४८४-४८५) सतीश खनगवाल- घुरपेंच (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ.४८६-४८७) विजय 'विभोर'- अन्नदाता (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ. ४८८-४८९) योगराज प्रभाकर- थाल आ कमल (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ. ४९०-४९१) सदानन्द कविश्वर- नाङरि हिलेबाक फयदा (हिन्दी बीहनि कथा) (पृ. ४९२-४९३) डा पुष्करराज भट्ट- बहिष्करण (नेपाली बीहनि कथा) (पृ. ४९४-४९६) प्रा. डा. कपिल लामिछाने- सौन्दर्य आ समानता (नेपाली बीहनि कथा) (पृ. ४९७-४९९) हरिप्रसाद भण्डारी- दू टा बीहनि कथा (नेपाली बीहनि कथा) (पृ. ५००-५०२) तारा केसी- अपन परिचय (नेपाली बीहनि कथा) (पृ. ५०३-५०४) रचना शर्मा- चरित्र (नेपाली बीहनि कथा) (पृ. ५०५-५०७) डॉ. प्रदीप कौड़ा- क्रांति (पंजाबी बीहनि कथा) (पृ. ५०८-५०९) निरंजन बोहा- करूगर सत्य (पंजाबी बीहनि कथा) (पृ. ५१०-५११) जगदीश अरमानी- कथानक (पंजाबी बीहनि कथा) (पृ. ५१२-५१३) जंगबहादुर सिंह घुम्मण- आचरण (पंजाबी बीहनि कथा) (पृ. ५१४-५१५) दीपक बुदकी- जन्नत (उर्दू बीहनि कथा) (पृ. ५१६-५१८) मुबश्शिर अली ज़ैदी- ईनाम (उर्दू बीहनि कथा) (पृ. ५१९-५२०) इब्न आसी- फेर मनुक्खक की भेलै? (उर्दू बीहनि कथा) (पृ. ५२१-५२२) रतन सिंह- बिना शीर्षकक (उर्दू बीहनि कथा) (पृ. ५२३-५२४) सच्चिदानन्द कर- तितली आ प्रेम (ओड़िया बीहनि कथा) (पृ. ५२५-५२७) प्रज्ञा महान्ति- मेमोरीचिप्स (ओड़िया बीहनि कथा) (पृ. ५२८-५२९) विनय कुमार दास- कर्मफल (ओड़िया बीहनि कथा) (पृ. ५३०-५३१) गायत्री दास- बुझौअलि (ओड़िया बीहनि कथा) (पृ. ५३२-५३३) मिनती प्रधान- संगी (ओड़िया बीहनि कथा) (पृ. ५३४-५३५) गैस्पर अल्मीडा- एकटा आर रबि (अंग्रेजी लघुकथा) (पृ. ५३६-५४१) वसंत भगवंत सावंत- मृत्युकेँ टारब, नागपंचमी (कोंकणी लघुकथा) (पृ. ५४२-५५३) सेबी फर्नानडीस- सोंगर (कोंकणी लघुकथा) (पृ. ५५४-५६१) अनूदित पद्य-खण्ड इप्सिता सारंगी- गप, हिलकोर (ओड़िया कविता) (पृ. ५६३-५६८) अन्नावरन देवेन्दर (अंतिम शब्द; पानि अछि, मात्र आँखिक नोर)-दू टा तेलुगु कविता (पृ. ५६९-५७८) हेमांग आश्विनकुमार देसाइ- समीकरण (गुजराती कविता) (पृ. ५७९-५८१) अजय सरवैया- अहाँक तामस हमर स्वागतपथ (गुजराती कविता) (पृ. ५८२-५८४) राजेन्द्र पटेल- बिनु शीर्षकक (गुजराती कविता) (पृ. ५८५-५८७) पीयूष ठक्कर- सांध्य बेला (गुजराती कविता) (पृ. ५८८-५८९) पन्ना त्रिवेदी- आमद (गुजराती कविता) (पृ. ५९०-५९१) बाबू सुथार- गृहमोह (गुजराती कविता) (पृ. ५९२-५९५) वासुदेव सुनानी- फूसि, अनुमति (दू टा ओड़िया कविता) (पृ. ५९६-५९९) भरत माँझी- हमर घुरलाक बाद (ओड़िया कविता) (पृ. ६००-६०२) शीला सुभद्रा देवी- पसीझक काँट (तेलुगु कविता) (पृ. ६०३-६०६) एन. अरुणा- ई सेहो अछि प्रवास (तेलुगु कविता) (पृ. ६०७-६०९) भिखारी ठाकुर- वृद्धाश्रमक पक्षमे- बिरहा १-२ (भोजपुरी पद्य) (पृ. ६१०-११२) परिचय दास- बेसीकाल शब्द जखन (भोजपुरी पद्य) (पृ. ६१३-६२४) निराला- देह विदेह (१-४) (हिन्दी कविता) (पृ. ६२५-६३४) पंकज चतुर्वेदी-डायरी खण्ड आ कविता खंड (हिन्दी रचना) (पृ. ६३५-६४३) संतोष कुमार चतुर्वेदी- गिट्ठऽ, मेघक दूभि हिन्दी कविता) (पृ. ६४४-६४६) वीरू सोनकर- उपलब्धि, नून, दिन (हिन्दी कविता) (पृ. ६४७-६५१) मंगलेश डबराल- कमरा, बाहर, लिखल चलल जाइत छलहुं, उम्मीद, अप्पन अधिकार, पहाड़ छथिन, एहन काल, बेर-बेर कहैत छलौं हम, दिल्ली मे एकटा दिन, भोथिआएल, अभिनय, किछु कालक लेल, घर शांत अछि (हिन्दी कविता) (पृ. ६५२-६६३) नित्यानंद गायेन- हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह, रौद पघलि रहल अछि (हिंदी कविता) (पृ. ६६४-६६५) प्रो. चम्पा शर्मा- स्नेह-भरल सनेस (डोगरी कविता) (पृ. ६६६-६७३) कुमार संभव ‘भारद्वाज’- हमर भारत देश महान (हिन्दी कविता) (पृ. ६७४-६७६) पसुपुलेटि गीता- दुमर्जा (तेलुगु कविता) (पृ. ६७७-६८०) रहमान राही- छाह सभ (कश्मीरी कविता) (पृ. ६८१-६८४) रजनी छाबड़ा (किछु हिन्दी कविता) (पृ. ६८५-७३८)
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