SADEHA — 29

Publication: SADEHA · Issue: 29
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ISSN 2229-547X विदेह सदेह २९ रवि भूषण पाठक & डॉ. कैलाश कुमार मिश्र केर गद्य आ पद्य रचना (विदेह www.videha.co.in/ पेटार अंक १-३५० सँ) विदेह-सदेह शृंखला- मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ गद्य आ पद्यक एकटा समानान्तर संकलन विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। ऐ पोथी‍क सर्वाधि‍कार सुरक्षि‍त अछि‍। काॅपीराइट (©) धारकक लि‍खि‍त अनुमति‍क बि‍ना पोथीक कोनो अंशक छाया प्रति‍एवं रि‍कॉडिंग सहि‍त इलेक्‍ट्रॉनि‍क अथवा यांत्रि‍क, कोनो माध्‍यमसँ, अथवा ज्ञानक संग्रहण वा पुनर्प्रयोगक प्रणाली द्वारा कोनो रूपमे पुनरुत्‍पादि‍त अथवा संचारि‍त-प्रसारि‍त नै कएल जा सकैत अछि‍। (c) २०००- अद्यतन। सर्वाधिकार सुरक्षित। विदेहमे प्रकाशित सभटा रचना आ आर्काइवक सर्वाधिकार रचनाकार आ संग्रहकर्त्ताक लगमे छन्हि। भालसरिक गाछ जे सन २००० सँ याहूसिटीजपर छल http://www.geocities.com/.../bhalsarik_gachh.html , http://www.geocities.com/ggajendra आदि लिंकपर आ अखनो ५ जुलाइ २००४ क पोस्ट http://gajendrathakur.blogspot.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html (किछु दिन लेल http://videha.com/2004/07/bhalsarik-gachh.html लिंकपर, स्रोत wayback machine of https://web.archive.org/web/*/videha 258 capture(s) from 2004 to 2016- http://videha.com/ भालसरिक गाछ-प्रथम मैथिली ब्लॉग / मैथिली ब्लॉगक एग्रीगेटर) केर रूपमे इन्टरनेटपर मैथिलीक प्राचीनतम उपस्थितक रूपमे विद्यमान अछि। ई मैथिलीक पहिल इंटरनेट पत्रिका थिक जकर नाम बादमे १ जनवरी २००८ सँ "विदेह" पड़लै।इंटरनेटपर मैथिलीक प्रथम उपस्थितिक यात्रा विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका धरि पहुँचल अछि,जे http://www.videha.co.in/ पर ई प्रकाशित होइत अछि। आब “भालसरिक गाछ” जालवृत्त 'विदेह' ई-पत्रिकाक प्रवक्ताक संग मैथिली भाषाक जालवृत्तक एग्रीगेटरक रूपमे प्रयुक्त भऽ रहल अछि। विदेह ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA (c)२०००- अद्यतन। सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतऽ लेखकक नाम नै अछि ततऽ संपादकाधीन। संपादकाधीन। विदेह- प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका ISSN 2229-547X VIDEHA सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर। Editor: Gajendra Thakur. रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) editorial.staff.videha@gmail.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकै छथि। एतऽ प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक/संग्रहकर्त्ता लोकनिक लगमे रहतन्हि। सम्पादक 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका ऐ ई-पत्रिकामे ई-प्रकाशित/ प्रथम प्रकाशित रचनाक प्रिंट-वेब आर्काइवक/ आर्काइवक अनुवादक आ मूल आ अनूदित आर्काइवक ई-प्रकाशन/ प्रिंट-प्रकाशनक अधिकार रखैत छथि। (The Editor, Videha holds the right for print-web archive/ right to translate those archives and/ or e-publish/ print-publish the original/ translated archive). ऐ ई-पत्रिकामे कोनो रॊयल्टीक/ पारिश्रमिकक प्रावधान नै छै। तेँ रॉयल्टीक/ पारिश्रमिकक इच्छुक विदेहसँ नै जुड़थि, से आग्रह। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ मासक ०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि। ISSN: 2229-547X मूल्‍य : भा. रू. २०००/- संस्‍करण: २०२२ Videha Sadeha 29: A Collection of Maithili Prose and Verse by Rabi Bhushan Pathak & Dr. Kailash Kumar Mishra e-published in Videha e-journal issues 1-350 at www.videha.co.in ). अनुक्रम गद्य-खण्ड (पृ. १-७९२) रवि भूषण पाठक- रवि भूषण पाठक- घर १-३, औझका डायरी, विद्यापति, भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ, झमेलिया बिआह, आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन, एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू, गामक जिनगीक समीक्षा, निरालाःदेह विदेह (१-४), आचार्य भामहक चिंतन, दण्डी आ काव्यलक्षण, लघुकथा-बोधिसत्व, तीनटा बीहनि कथा, ओक्कर तोहर हम्मर सपना (दीर्घकथा), ओइ साल, घर, बाबूक चट्टी, दोस आ दोसक चालि प्रकृति बेमेय, लघु कथा (व्यंग्य)- दोस यौ दोस, फलनमा.. चिलनमा... ठेकनमा (व्यंग्य), फसाद आ आनंद (लघु कथा), दोस्तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य), नाटक ‘रिहर्सल’, टिल्लू जी (शिव कुमार झा) (पृ. २-१५९) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- लघुकथा- पण्डिताइन, बुरिराज (लघुकथा), फकड़ाक संग यात्रा करैत मैथिलानीक मनोदशाक: मानवशास्त्रीय विवेचना, नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग (यायावरी-१), नॉर्थ कछार हिल्स-२ (यायावरी-२), लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार (यायावरी-३), यायावरी: संगाईप्राऊ : नागा पूर्वजक स्‍मरणक धरोहर, यायावरी:उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात, यायावरी- भावमय, भोगमय, योगमय बृन्दावन, यायावरी- मलिक भाय केर फुटपाथी चिंतन, सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना, रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, हुनक रचना आ जनमानस केर उदासीनता, इंद्रधनुषी अकास, पोथी समीक्षा- गामक जिनगी- जगदीश प्रसाद मण्डल, जीवन संघर्ष (पोथी समीक्षा), मिथिला चित्रकला (पेटिंग): भूत, वर्त्तमान आ भविष्य, मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परिचय, लघुकथा- चन्दा, लघुकथा: प्रकृति सुन्दरि आ चूहर मिस्त्री, लघुकथा- सखी कुन्ती, मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसर चण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग, परित्यक्ता आ परिस्थिति: मिथिलाक सन्दर्भ मे (परिचर्चा), गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद्व?, लघुकथा- पुरुषक नहि विश्वासे, मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना, लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावणी – मानवशास्त्रीय विवेचन, मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव, तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति, मैथिलानी पर विमर्श क अधिकारी के?, महाराजा पंहिबा: मणिपुर केर ग़रीब नबाज़, दीर्घ कथा- परिस्थिति लेखिका, सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्य मे, मैथिली लोकगीतमे कौआ सम्बाहक, फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना, मैथिली संस्कृति केर अवयव, मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद, राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण, छागरक बलिप्रदानपर चिन्तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्य, मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास, सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथमे समानता-(लोक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे) [कुमार गगन ई-पत्र- डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ मे समानता] (पृ. १६०-७९२) पद्य-खण्ड (पृ. ७९३-९००) रवि भूषण पाठक- बाल कविता- 'क', बाल कविता- मानसून, बाल कविता- सुन वौआ सुन, बाल कविता- ब्‍लेक होल, श्री लक्ष्मी चौधरी,करियनक सम्मान मे, हजार-लाख मे, डहकन, खट्टा चूक्क, मीत्ता, हरियर, बहुत किछु विदा भ' गेल रहै, व्यर्थ प्रलापी, झाबाद, तीनटा कविता, फसली पद्य १-७, एहि बेर छठि मे, हमर मैथिली, होली, ई नामवरबा (हिंदी आलोचकक व्यथा), मरणोपरांत-१-४, बर्फ भोर, देश आ गेयर, पॉंच केबी, दोस महिम, गीत गाबैत श्लोक पढ़ैत, मनोज भाय क चिट्ठी, बियाह आ मोंछ, प्लेटो आ हमर कनिया, टिप्स फ्राम खट्टरकका, बर्फ पानि भाफ, बस तीने दिन, उत्थर लोक, चमारक ऋण, दीवाली क पहिले, धनतेरस राति, हम पुरहितिया, चालीसक बात, बामे गाम दहिने गाम १-६, छौड़ा अजगुत कंप्‍यूटर छै, महाकवि विद्यापति-१-२, हाइकू, कि भेलए एकरा (पृ. ७९४-८९८) डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- गामक कचोट (पृ. ८९९-९००) 2

गद्य खण्ड रवि भूषण पाठक (१९७३- ), गाम- समस्तीपुरक करियन आ नानीगाम भिड़हा। शिक्षा: करियन आ वैद्यनाथपुर गाममे आगाँ दरभंगा, समस्तीपुर, पटना आ दिल्ली। उत्तर प्रदेशक बाट-माप विभाग आ चकबंदी विभागमे चाकरी, फेर नेहरू मेमोरियल शिव नारायण दास स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बदायूँ (उत्तर प्रदेश) मे हिन्दी विभागमे व्याख्याता। घर १-३ घर (एक) डेली शुरू होय 'हमर बाबू एहन ,हमर भैया एहन ' । दुपहर तक बात पहुंच जाय ' हमर गाम मे एना ' । मुदा उपसंहार होय सांझ तक ' छोटका चौधरी एहन आ मैंझला चौधरी एहन ' । घर (दू) जे थारी आइंठकूठि रहै ,से कतौ गेंटल ,कतौ ओहिना राखल । खाए काल मे एगो दुगो मंजा जाए । बजार सं आनल तरकारी ओहिना झोरा मे नूरियैल । भनसाघर मे कतौ पियाज कऽ छिलका ,कतौ उसनल आलू कऽ छिलका । रौतुका मच्छरदानी केओ खोलनाहर नै । साफ़ आ पहिरल कपड़ालत्ता एके संग अराम करैत । दलान या अगिला रुमक कुनो कंसेप्ट नै ।एना मे जे केओ गेट ठकठकबै , तऽ पहिले ई विचारल जाय कि शायत दोसरक गेट बाजै छै ! दोसर तेसर बेर गेट बाजै ,तखन बाले बच्चे मिलि के अगिला घर कऽ सफाई शुरू भऽ जाइ । सफाई मने अगिला रुमक समान कें जेनातेना पाछू लऽ आननै रहै । ई काज बच्चोऽ सब आटोमेटिक शुरू कऽ दै । कहबासुनबा के जरुरी नै । मुदा सबसं आनंददायक चीज़ रहै कि केओ नै आबै ऐ ठाम ! ने कतौ जेनए ने ककरो एनए । थिर पृथ्वी ! अतिथि हीन ब्रह्माण्ड ! घर (तीन) आनंद जी लिस्ट बनेने छथिन । कनिया कहिया कहिया भानस बनबै छथिन , कहिया कहिया आनंद जी । कहिया कहिया होटल सं आबै छै आ कहिया कहिया मंत्रे सं काज चलै छै । स्थिति जेहन होय , मां के कहल यादि आबै छैन ।नेनपन मे मां कहैत रहथिन 'खा ले वौआ , एको टा दाना नै छोड़ ।जत्ते दाना धोनिधानि बनतौ ,ओत्ते दिन भुक्खे रहबहीं ' । औझका डायरी शुकुल जी जायसीक प्रशंसा करैत छथिन ।भाव ई छैक ‘मुसलमानो होइतो जायसी भारतीय कविता के एत्‍ते बूझैत छथिन ,मुसलमान होइतो जायसी हिंदू स्‍त्रीक जीवन ,प्रेम ,विरह कें एत्‍ते नीक जँका चिन्‍है छथिन ,मुसलमान होइतो जायसी अवधक लोकजीवन मे प्रवेश क’ पाबैत छथिन ...... जेना मुसलमान केओ होय त’ ऊ कविता नइ लिखै ,लिखबो करै त’ केवल अल्‍लाह आ कुरान पर या केवल ईरान ,तुर्किस्‍तान पर। (दिनांक07 -04-17) मैथिली के एकटा आलोचक चाही ,आलोचक नइ नव्‍यालोचक,नव्‍यालोचक नइ वज्रालोचक ।एहन आलोचक जे बज्‍जर सन सन बात कहै । काबिल सँ लिखबाबै , बेगारू सभ कें टरकाबै। एहन आलोचक जेकरा मे केवल बहुज्ञता नइ रसबोध सेहो होइ ,केवल रसबोधे नइ समै-सजगता सेहो । केवल फार्मे नइ कंटेंटक प्रति सेहो समझदारी होए । एहन आलोचक जेकरा मे समैक जिम्‍मेवारी उठाबैत साहित्‍य के आगू बरहेबाक ताकति होए । एहने सन जे मिथिला आ मैथिलीक परिवर्द्धित आ संवर्धित स्‍वरूपके बूझै आ ओकर रक्षा करै ।एहन आलोचक जेकरा मे मैथिलीक वर्तमान साहित्‍यक दिशा गमबाक हिम्‍मत होए आ ओकरा समकालीन भारतीय साहित्‍य के जनबाक जरूरति सेहो महसूस होए । (दिनांक 11 04 2017 ) ओकरा गाब’ दियौ ,गेबाक आनन्‍द लिय’ दियौ ,ओकरा पर अपन अपेक्षाक पहाड़ नइ लादियौ ,ओकरा पर उपराष्‍ट्रीयताक ठप्‍पा नइ लगाबियौ ,एहन अनेर नइ बाजियौ कि ऊ जीत जाए त’ मिथिला जीत गेलै आ ऊ हारि गेलै त’ मिथिला हारि गेलै । निश्चितरूपेण ओकरा मे आगू जेबाक हिम्‍मत आ ताकति छैक , मुदा ऐ चीजक लेल तैयार रहियौ कि ऊ जीत गेलै त’ ऊ राष्‍ट्रीय अपेक्षाक अनुसार अपना आप कें बदलि सकै ।ओकरा मत दियौ समर्थन दियौ आ ऐ चीजक आर्शीवाद कि ओ समग्र देशक लेल गाबि सकै ।जेना कुनो बोली राष्‍ट्रीय बनै छैक त’ ओ आनो बोलीक गुण आ सकारात्‍मक तत्‍व ग्रहण करैत छैक आ एक अर्थ मे ई ओइ बोलीक मृत्‍यु होइत छैक ,किएक त’ ओ पुरनका पंजर छोडि़ के नया रूप धारण करैत छैक ।तहिना ओ समुच्‍चा देसक लेल गाबै,ई शुभकामना । बात एहने सन होए कि गायन कला जीतै नइ कि मिथिला ,पंजाब ,महाराष्‍ट्र या गुजरात ,ओना मॉडर्न बनियौटी एकरा संघर्ष आ क्षेत्रक संघर्ष वला रूप देबाक प्रयास करत ,मुदा हम सब संयमित रही ।आ एतबे धरि नइ मिथिला मे सब तरहक गायनक मुकम्‍मल परंपरा फेर सँ प्रारंभ होए ,ई नेशान केवल अमता ,बहेड़ी ,दरभंगा आ विद्यापति समारोहे तक सीमित नइ रहै ।ओहुना मैथिली मंच पर राम चतुर मल्लिक कें हूट केनिहार आ दुमका-झुमका कें बढ़ाबा देनिहारक कमी नइ ...... दिनांक 13-04-2017 ऊ हम्‍मर कुटुम छथिन ,दियाद छथिन आ दोस छथिन।ऊ चौबीसो घंटा हेलमेट पहिरै छथिन ,केओ कुटुम देखि ने लए ,ऊ कखनो काल एकटा अंग के बेकाम क’ दए छथिन ,कहबेन त’ सुनता नइ ,ईशारा देबै त’ रूकता नइ ,अनुमान यदि लगा लेता त’ ह्रदयहीन भेने कुशल ।ऐ रस्‍ता बाटे नइ ,ऐ चौक पर बाटे नइ ,दस बजे के बदला मे एगारह बजे चलता आ पांच बजे के बदला मे सात बजे लौटता ।धीरे-धीरे .....केओ दे‍खि ने लए । हुनकर बदलबाक कुनो अंत नइ ,नाम ,गोत्र ,गाम ,शहर सब बदलि के अपन जेबी आ अपन स्टेटिक इनर्जी कें सेव करैत छथिन ।एहने केरेक्‍टर हमरे परिदृश्‍य मे नइ आहूं के वायुमंडल मे अछि ।ऊ आ हुनका सन कतेको कतेक अपन ओकादि बदलबाक प्रतीक्षा क’ रहल छैक । ओका‍दि बदलिते भाषा ,भंगिमा ,टोन ,बॉडी लैंग्‍वेज सब बदलि जाइत छैक ।कखनो-कखनो ओकादि आ भाषा साथ-साथ बदलैत छैक ,कखनो-कखनो ओकादि बदलबाक प्रत्‍याशा मे भाषा आ टोन समै सँ पहिले बदलि जाइत छैक आ ओकादि बाद मे बदलै छैक ।कखनो काल दुर्भाग्‍य सँ भाषा त’ बदलि जाइत छैक ,मुदा ओकादि बदलबाक प्रक्रिया मे ब्रेक लागि जाइत छैक (दिनांक 15-04-2017) विद्यापति विद्यापति आ मैथिली के ल‘ के हिन्दी मे आरम्भहि सँ एकटा अंतर्विरोध व्याप्त अछि ।एकर मूल विषय अछि मैथिली आ हिन्दी क सम्बन्ध क देशीभाषापरिवार मे निर्धारण ।मैथिली कंे हटेला सँ हुनकर समावेशी या सर्वलपेटू सिद्धांत प्रभावित होइत अछि ।मैथिली के राखला सँ मैथिली क प्राचीनता आ एकर गौरवशाली साहित्यिक परम्परा हुनकर चालू फार्मूला के अस्तव्यस्त करैत अछि । हिन्दी आलोचना एकर निदान तेहने चालू ढ़ंग सँ करैत अछि । ई निदान अछि - 1 मैथिली कें हिन्दी क बोली रूप मे परिकल्पना । 2 विद्यापति कें आदि काल क कवि रूप मे स्वीकृति । पहिल निदान क चर्चा कहियो आराम सँ, आइ दोसर निदान क चर्चा कनिक विस्तार सँ करैत छी ।विद्यापति काव्य क प्रति हिन्दी आलोचना क दृष्टि पर एहि निबन्ध मे विचार करैत छी । सर्वप्रथम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास ’(संवत1986)पर चर्चा कएल जाए ।एहि पुस्तक क वीरगाथाकालअध्याय मे विद्यापति क चर्चा मुख्यतः दू ठाम अछि । ‘अपभ्रंश काव्य‘ मे अपभ्रंश साहित्य मे प्रयुक्त छंद आ उदीयमान भाषा क वैशिष्टय क जानकारी अछि ।दोसर ठाम अछि ‘वीरगाथा काल‘ मे‘फुटकल रचनाऐं‘ मे अंकित टिप्पणी ।एहि ठाम आलोचक क प्रथम उददेश्य अछि मैथिली भाषा के अधीनस्थता क घोषणा ।ताहि दुआरे सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य क विस्तार मे मैथिली आ विद्यापति क सम्मिलित क लेल जाइत अछि ।तत्पश्चात विद्यापति काव्य क विषय मे लेखक तीन-चारि टा मोट बात कहैत छथिन्ह- 1 कवि क अधिकांश पद श्रृंगारिक अछि,जाहि मे नायक नायिका राधा-कृष्ण छथि । 2 एहि पद क रचना संभवतः जयदेव क गीत काव्य क अनुकरण पर कएल गेल अछि । 3 पदावली क मूल दृष्टि श्रृंगारिक अछि,एहि पर आध्यात्मिकता या भक्ति क आवरण देनए ठीक नहि । आचार्य शुक्ल क आलोचना क एहि एकांगिता क मुख्य कारण अछि,हुनकर प्रबन्ध क प्रति विशेष आग्रह । एहि आग्रह क निहितार्थ अछि तुलसी आ जायसी क बड़का कवि सिद्ध केनए ।संदर्भित कवि नमहर कवि छथि,मुदा आलोचक ककमजोरी विद्यापति आ कबीर के जबर्दस्ती कमतर करए मे स्पष्ट अछि । अपभंश काव्य आ विद्यापति पदावली के सम्बन्ध मे हुनकर कम जानकारी सेहो आलोचना के प्रभावित करैत अछि ।अंतिम कारण अछि अवधी आ ब्रजभाषा क काव्य क प्रति आलोचक क अतिरिक्त स्नेह आ आग्रह । शुक्ल जी ’लोकमंगल‘ क एकटा खास काव्य दृष्टि के प्रति आग्रही छथि । अतः हुनकर समस्त लेखन क एकटा खास रंग अछि । एहि लेखन मे विद्यापति आ कबीर क एकटा सीमित स्थान अछि । एहि लेखन क कमजोरी पर सबसँ धारदार आक्रमण आचार्य हजारी प्रसाद द्वारा भेल । द्विवेदी जी क लेखन पर शांति निकेतन आ गुरूदेव क विचार क विशेष प्रभाव अछि ,ताहि दुआरे हिनकर प्रारंभिक लेखन मे विद्यापति काव्य के समझए -बूझए क दिशा मे गंभीर प्रयास क चिह्न भेटाइत अछि । ’सूरसाहित्य‘ मे जयदेव, विद्यापति,चण्डीदास आ सूरदास क राधा क तुलना कएल गेल अछि । राधा क विलास-कलामयी,किशोरी,वयःसन्धिसुषमा,अर्द्धोद्भिन्न उरोज पर द्विवेदी जी मोहित होइत छथि ।मुदा ई लेखन विद्यापति पदावली क केन्द्रीय भाव क दिश कोनो संकेत नहि करैत छैक । लेखक क उद्देश्य अछि सूर साहित्य क महत्व क उद्घाटन ।प्रसंगवश लेखक किछु बांग्ला लेखक क चर्चा करैत छथि ।रवीन्द्र नाथ क एकटा महत्वपूर्ण उद्धरण अछि ”विद्यापति क राधा मे प्रेम क तुलना मे विलाश बेशी अछि,एहि मे गम्भीरता क अटल धैर्य नहि ।एहि मे मात्र नवानुराग क उद्भ्रान्त लीला आ चांचल्य अछि । विद्यापति क राधा नवीना छथि, नवक्स्फुटा छथि ।“ई राधा महिमा एकटा बांग्ला लेखक दीनेश बाबू सेहो गाबैत छथि ”विद्यापति वर्णित राधिका एकाधिक चित्रपट क समष्टि अछि । जयदेव क राधा सदृश एहि मे शरीर क भाग ज्यादा आ हृदय क भाग कम अछि ।---- विद्यापति क राधा अत्यन्त सरला अछि ,अत्यन्त अनभिज्ञा ।“ द्विवेदी जी क उपरोक्त लेखन शुक्ल जी क विद्यापति सम्बन्धी मान्यता मे कोनो परिवर्तन करबा क प्रयास नहि करैत अछि ।हिनकर परवर्ती लेखन शुक्लवादी मान्यता क पोषण करैत अछि ।कबीर आ इतिहास सम्बन्धी मान्यता क सम्बन्ध मे हिनकर जोश विद्यापति क सम्बन्ध मे अनुपस्थित अछि,यद्यपि ई विद्यापति क कविता आ व्यक्तित्व क बेहतर जानकार छथि ।इतिहास सम्बन्धी हिनकर पोथी ‘हिंदी साहित्य:उद्भव और विकास ‘ मे कीर्तिलता पर दू पृष्ठ अछि आ पदावली पर मात्र चारि पांति । ई स्पष्ट करैत अछि जे लेखक क मंतव्य की अछि ।सगुण भक्ति परंपरा क आख्यान क बीच मे विद्यापति क झूठफूसिया चर्चा सँ खानापूरी कएल गेल अछि ।लेखक विद्यापति कें सिद्धवाक् कवि कहैत छथिन्ह आ पदावली मे वर्णित अपूर्व कृष्णलीला क संकेत दैत छथिन्ह ।भाव क सांद्रता आ अभिव्यक्ति क प्रेषणीयता क स्वीकारैत लेखक ई टिप्पणी देनए आवश्यक बूझैत अछि कि एहि परंपरा क प्रभाव संभवतः ब्रजभाषा काव्य परंपरा पर किछु नहि पड़ल। एकटा बात विचारनीय अछि द्विवेदी जी सन कद्दावर आलोचक तक शुक्लवादी मान्यता क विरोध नहि क सकल । एकर की कारण ? द्विवेदी जी कतिपय प्रसंग मे शुक्ल जी सँ पंगा ल लेने छलाह,ताहि दुआरे ओ विद्यापति पदावली क सम्बन्ध मे यथेष्ठ ध्यान नहि देलाह।अवधी आ ब्रजभाषा काव्य परम्परा क प्रति तुलनात्मक स्नेह सेहो हिनका एहि दायित्व सँ वंचित कएलक । एहि बीच मे अन्य रचनाकार क टिप्पणी सब आबैत रहल । राम कुमार वर्मा क एकाक्षी दृष्टि मे विद्यापति काव्य मे आंतरिक सौंदर्य क अपेक्षा बाह्य सौंदर्य क प्रधानता अछि । स्वातंत्रयोत्तर परिदृश्य मे विद्यापति क सम्बन्ध मे बेहतर समझ विकसित भेल । राम विलास शर्मा विद्यापति काव्य के सम्बन्ध मे कम जानकारी क बावजूद ई बात बूझि सकलाह कि ओ नवजागरण क अग्रदूत छलाह । तहिना राम स्वरूप चतुर्वेदी अपन ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास ’ मे शुक्ल जी द्वारा प्रतिपादित लौकिक आ आध्यात्मिक फांस के काटि पाबैत छथि । ”आचार्य शुक्ल एहि ठाम ओहि अनुभव तक नहि पहुँचैत छथि कि पदावली अपन श्रृंगारिक भावना क साथ वास्तव मे ऐहिक अछि आ तन्मयता क गंभीर अनुभूति ओकरा आध्यात्मिक स्तर पर रूपांतरित करैत अछि .........काम भाव आ शरीर क सौंदर्य हुनका ओहि ठाम उत्सव रूप मे अछि। ताहि दुआरे ई चिर परिचित होइतहुॅ चिर नवीन अछि ।” ई चतुर्वेदी जी क ईमानदारी छल कि हुनका पदावली मे सद्यःनवीनता क गंध मिल ।मुदा लेखक अवांछित संक्षिप्तता मे अपन काज चलाबैत अछि । ई पुस्तक त मानि के चलैत छैक जे रचना काशी आ आलोचना प्रयाग मे होइत छैक । शिव प्रसाद सिंह हिंदी आलोचना क एहि एकांगिता के नीक जँका चिन्हैत छथि ।अपन पुस्तक ’विद्यापति ‘ मे ओ विद्यापति आ पदावली क सौन्दर्य के काव्यशास्त्रीय दृष्टिकोण सँ देखैत छथि ।ओ विद्यापति के अपरूप क कवि मानैत छथि । “सौन्दर्य हुनकर दर्शन अछि आ सौन्दर्य हुनकर जीवन दृष्टि ।एहि सौन्दर्य के ओ नानाविधि देखलाह ,आ कुशल मणिकार क तरह चुनलाह ,सजा के,सँवारि के आलोकित कएलथि ”एहि सौन्दर्य क विश्वव्यापी रूप क ओ परख करैत छथि आ जायसी क ग्रंथ ’पद्मावत‘ सँ पदावली क सौन्दर्य क तुलना करैत अछि ।पद्मावती क दिव्य स्पर्श सँ सभ वस्तु अभिनव सौन्दर्य धारण करैत अछि ।लेखक मानैत अछि कि विद्यापति क राधा क अपरूप सेहो ई पारस अछि ।हुनकर अभिमत अछि“आश्चर्य होइत अछि जे जायसी सँ सौ वर्ष पूर्व विद्यापति जाहि पारस रूप क चित्रण कएल,ओहि पर ककरो ध्यान नहि गेल ,एकरा विद्यापति क अभाग्य कहल जाए ” डॉ0 सिंह क अवलोकन विन्दु प्रशंसनीय अछि, मुदा ई अभाग्य त हिन्दी आलोचना क अछि ,विद्यापति क नहि । मैनेजर पांडेय अपन पोथी ’भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य ’ मे विद्यापति पर किछु चर्चा करैत छथि ।पुस्तक क शीर्षक सँ स्पष्ट अछि जे विद्यापति नाम क सीढ़ी क प्रयोग केवल सूरदास तक जएबा क लेल कएल गेल अछि ।तथापि एहि किताब मे गीतिकाव्य आ विद्यापति क सम्बन्ध मे किछु महत्वपूर्ण जानकारी अछि ।लेखक कहैत छथिन्ह “विद्यापति क पद मे सौंदर्य चेतना क आलोक भावानुभूति क तीव्रता घनत्व एवं व्यापकता आ लोकगीत तथा संगीत क आंतरिक सुसंगति अछि ” लेखक विद्यापति आ सूरदास दूनू के भक्ति कवि मानैत हुनका जन संस्कृति क रचनाकार मानैत छथि । विद्यापति आ हिन्दी आलोचना नामक ई निबन्ध एहि दृष्टि क मांग करैत अछि कि विद्यापति पर मौलिक दृष्टि सँ काज हो । ई प्रश्न हिन्दी आ मैथिली क नहि छैक,बल्कि समस्त भारतीय साहित्य क अछि ।विद्यापति सन मौलिक रचनाकार क जानबा-समझबा क लेल साधारण दृष्टि नहि आलोचना क तत्वान्वेषी दृष्टि चाही । २ बड़का रचना क लेल बड़का रचनात्मक साहस आ बड़का ईमानदारी क आवश्यकता होइत छैक । विद्यापति पदावली क विषय मे इएह साहस स्पष्ट ढ़ंग सँं उजागर होइत अछि ।‘दुखहि जनम भेल,दुखहि गमाओल ,सुख सपनहुॅं नहि भेल ’ ई पंक्तिविद्यापति पदावली मे निहित औदात्य क संकेत दैत अछि । संपूर्ण मध्यकालीन काव्य मे दुख क अबाध स्वीकृति आ सुख के सपना मे अएबा क दारूण रूपक अनुपस्थितअछि । हे आलोचकगण ! मध्यकालीन भारत क सामंती शासन आ समाज क वास्तविकरूप देखबा क साहस हो त विद्यापति पदावली फेर सँ पढ़बा क प्रयास करू ।ई सत्य अछि कि ओहि मे श्रृंगार रस क बेगवती धारा बहि रहल छैक । आ किछु आलोचक ओहि मे स्नानहि के जीवन बूझ‘ लागैत छथिन्ह ।हमरा श्रृंगार रस क तीव्रता ,गांभीर्य स्वीकार्य अछि ।श्रृंगार रस मे निहित एकाग्रता आ स्थायित्व अन्यत्र अनुपलब्ध अछि । हमरा कहबा क मतलब अछि कि विद्यापति अपन श्रृंगार रस क कविता कहबा क लेल मैथिली मे रचना नहि केलाह ।तथापि विद्यापति पदावली क कोनो आलोचक श्रृंगार मे भसबा आ फसबा सँ नहि बचलाह ।वयःसन्धि क नायिका क ई लावण्य देखि की कविकुलगुरू रवीन्द्रनाथ आ की आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी सभ गोटे मोहित छथि- सैसव जोबन दुहु मिलि गेल । स्रवनक पथ दुहु लोचन भेल ।। वचनक चातुरि लहु-लहु हास ।धरनिये चाँद कएल परगास ।। मुकुर हाथ लए करए सिंगार । सखि पूछए कइसे सुरत-बिहार ।। निरजन उरज हेरत कत बेरि। बिहुंसए अपन पयोधर हेरि ।। ताहि दुआरे गुरूदेव के विद्यापति क राधिका परमनवीना बूझाइत छन्हि। हे गुरूदेव हमर एहि भ्रांति के दूर करू कि ई राधिका पदावली क विस्तृत आकाश मे प्रगल्भे किएक रहि जाइत छैक,ओकरा मे प्रौढ़ता किएक ने आबैत छैक । अहाँ कहब जे प्रौढ़ राधा क रचना केनए कवि क लक्ष्य नहि छल या राधा क प्रौढ़ता क एक दू टा कविता सुना देब । हे गुरूदेव हमरा बताबू कि ओहि समय मे मिथिला यौवनोन्मत्त नारी सँ वंचित छल ?। विद्यापति त भरि जिनगी घूमिते रहलाह। कि नेपाल ,जौनपुर आ बंगाल तक मे हुनका प्रौढ़ दर्शन नहि भेल? ,ओ स्वयं भरपूर जिनगी आ भरि उमरि जीलाह । हुनका श्रृंगार क विविध रूप आ दशा के बतायत ?हमर एहि ठाम तुच्छ आग्रह अछि कि अपन तमाम योग्यता आ जीवनानुभव क बावजूद ओ श्रृंगार रस क क्षयोन्मुख प्रभाव के बूझलाह । ताहि दुआरे एहि अंतरंग रस क आनन्द लइतहुॅ,एकरा चरम लक्ष्य नहि बनेलाह । विद्यापति चौदहम-पंदरहम शताब्दी मे छलाह ।संस्कृत काव्यशास्त्र क सब प्रमुख आचार्य एहि समय मे लिखि लेने छलाह आ मम्मटाचार्य विभिन्न असहमति क बावजूद ‘साहित्यदर्पण’मे व्यापक सहमति बनएबा क प्रयास केलाह ।विद्यापति एहि प्रयास सँ अवगत छलाह । श्रृंगार रस क राजत्व के सम्बन्ध मे हुनका मन मे कोनो संशय नहि छल। मुदा तत्कालीन लेखन मे व्याप्त रीतिवाद आ कादो मे पड़नए ओ उचित नहि बूझलाह । हुनकर अवहट्ट आ मैथिली क दिश प्रयाण क सबसँ महत्वपूर्ण कारण छल जनोन्मुख भाषा आ टटकापन के स्वीकार केनए ।अपन समय क बंजरपन के लक्ष्य करैत कवि कीर्तिलता मे कहैत छथि- अक्खर रस बुज्झि निहार नहि कवि कुल भमि भिख्खरि भऊं । मतलब ई जे अक्षर रस क मर्मज्ञ केयो नहि बचल, कवि सब घूमि घूमि के भीखमंगा भए गेलाह ।मिथिला अंचल मे नवविकसित भाषा क प्रति विद्यापति क उत्सुकता आह्लादित आ चकित करैत अछि।कीर्तिलता मे एकटा आन स्थान पर ओ कहैत छथि- सक्कअ वाणी बुहअण भावइ पाइअ रस को मम्म न पावइ । देसिल बयणा सब जन मिट्ठा,तें तैसन जंपउ अवहट्टा ।। मतलब ई जे संस्कृत के पंडिते नीक जँका बूुझैत छथि,प्राकृत भाषा क रस केयो नहि पाबैत अछि । देशी बोली सब के नीक लागैत अछि ,ताहि दुआरे हम अवहट्ट बाजि रहल छी ।विद्यापति भाषा के संगहि समाज क नवीनता के सेहेा संकेत करैत छथिन्ह - हिन्दू तुलुक मितल वास, एकक धम्मे ओकाक हास । कतहु बाँग,कतहु वेद कतहु विसमिल कतहु छेद कतहु ओझा कतहु खोजा कतहु नकत कतहु रोजा कतहु तम्बारू कतहु कूजा कतहु नीमाज कतहु पूजा कतहु तुलुका बल कर बाट जाएते बेगार धर ।। कीर्तिलता मे अवहट्ट के संगे मैथिली क ई प्रयोग ओते आश्चर्य उत्पन्न नहि करैत अछि,जतेक आश्चर्य उत्पन्न करैत अछि विद्यापति क नवीन सामाजिक स्थिति क प्रति सजगता ।हिंदी विद्वान अंबा दत्त पंत आ मैथिली -हिंदी के शताधिक विद्वान विद्यापति काव्य मे श्रृंगार क विभिन्न दशा के खोजि-खोजि बूड़िया गेलाह ।विद्यापति काव्य क नायिका के वक्षाकार देखि देखि के आलोचक सभ मस्त छथि ।ओ बैर अर्थात वदरीफल सँ बेल क यात्रा मे निर्वाण क रहल छथि । पहिल बदरि कुच पुनरंग ।दिने दिने बाढय पिड़ए अनंग । से पुन भए गेल वीजक पीर ।अब कुच बाढ़ल सिरिफल जोर । माधव पेखल रमनि संधान ।घाटहि भेटल करत सिनान । सुखद अछि कि विद्यापतिकाव्य मे विद्वान लोकनि नारियल,टाभनेबो आ तरबूजा नहि खोजलाह,यदि ई सब फल हुनका मिलि जायत,तखन फेर आलोचक महोदय क आनन्द क कल्पना नहि कएल जा सकैत अछि ।मित्र गौरी शंकर चौधरी कहैत छथिन्ह फल आ तरकारी मे संकर(हाईब्रिड) क कल्पना केनए विद्वान लोकनि बिसरि गेलाह,नहि त विद्यापति काव्य क असफलता पर दू-चारि टा पी0एच0डी0 आउर संभव छल । कहबा क तात्पर्य ई जे श्रृंगारिक वर्णन मे ई सब परंपरा रूप मे आबि गेल ।उरोज,नितंब,कटि,जांघ,त्रिबली क दर्शन कतहु कतहु परिस्थितिवश आ कतहु सायास भ गेल अछि;मुदा विद्यापति क कवित्व क ई केन्द्रीय स्थल नहि अछि ।विद्यापति पर तत्कालीन काव्य परंपरा क प्रभाव अछि ।ई समय अछि संस्कृत साहित्य मे अमरूक कृत‘अमरूक शतक’,भर्तृहरि कृत‘श्रृंगारशतक’जयदेव कृत‘रतिमंजरी’ गोवर्द्धनाचार्यकृत’आर्यासप्तशती’‘श्रृंगारतिलक’(कालिदास)क अनुकरण क ।कवि लोकनि जी जान सँ शतक(सेंचुरी) बनएबा मे व्यस्त भ गेलाह ।ई समय छल काव्यरूप,छंद,भाव,भाषा सब क्षेत्र मे अनुकरण क। संस्कृत साहित्य मे ई रचनात्मकता क दृष्टि सँ उल्लेखनीय समय नहि छल ।विद्यापति क संस्कृत साहित्य पर सेहो ई प्रभाव देखल जाइत छैक ।कवि एहि सब प्रभाव क अतिक्रमण अपन अवहट्ट आ मैथिली रचना मे करैत अछि ।व्यक्ति के अपन नाम केहन नीक लागए छैक,मुदा कवि विद्यापतिअपन नाम सेहो लोकभाषा आ उच्चारण के तर्ज पर बदलि लैत छथि- बालचंद विज्जावइ भासा दुहु नहिं लग्गइ दुज्जन हासा । सो परमेसर सेहर सोहइ,इणिच्चइ णाअर मन मोहइ ।। उत्तर सामंतवादी भारत मे रहए वला विद्यापति अपन समय आ इतिहास क क्रूर गर्जन सँ व्यथित छलाह ।सामंती शासन के नजदीक सँ देखए वला विद्यापति तत्कालीन राजनीतिक नपुंसकता क बड्ड नीक जँका परखैत छथिन्ह ।राजदरबार मे रहए वला राजकवि राजा आ राजपरिवार क कमजोर नस पर कुशलतापूर्वक हाथ राखैत छथि ।हजारी प्रसाद द्विवेदी कीर्तिलता के विषय मे कहैत छथिन्ह “एहि मे इतिहास क कविदृष्ट जीवंत रूप अछि । एहि मे ने काव्य के प्रति पक्षपात अछि ने इतिहास क उपेक्षा । ” जाहि विद्वान के तुलसीकृत रामचरितमानस क उत्तर काण्ड मे कलियुग क प्रताप देखाइत छैक,ओ कृपा क के कीर्तिलता क चित्रण देखि लेथु । बिकाए आए राज मानुसकरी पीसि वर आगे आंग डगर आनक तिलक आनका लाग पात्रहूतह परóीक वलआ माँग। ब्राहमणक यज्ञोपवीत चांडाल का आ गल। वेश्याह्नि पयोधरे जतिहि क ह्रदय चूर । धन संचरे धोल हाथि हति बापर चूरि जाथि । आवर्त्त विवर्त्त रोलहो नगर नहि नर समुद्दओ ।। यद्यपि ई जौनपुर नगर क वर्णन अछि, मुदा ऐतिहासिक प्रमाण अछि कि मिथिला क स्थिति सेहो एहने छल ।एक अन्य स्थान पर विद्यापति जाति व्यवस्था मे विघटन क चिह्न देखि रहल छथिन्हजति अजाति विवाह अधम उत्तम का पाँरकपरिवर्तन के एते नजदीक सँ देखए वला धर्म आ दर्शन क स्थायित्व मे कते विश्वास करत ! मुदा,विद्यापति क पदावली मे धर्म क उच्च कोटि क दर्शन होइत अछि ।किछु विद्वान विद्यापति रचनावली मे धर्म आ अध्यात्म खोजए वला क दिश लाठी ल के दौड़ए छथि ।आचार्य शुक्ल पदावली मे श्रृंगारिकता पर बल दैत,एकरा अनिवार्यतः ऐहिक घोषित करैत छथि ।ओ व्यंग्य करैत कहैत छथि “आइ-काल्हि आध्यात्मिकता क चश्मा सस्ता भ गेल छैक ।ओ पहिन के किछु लोग ’गीतगोविन्द‘ के साथहि पदावली मे आध्यात्मिक संकेत देखैत छथि ” शुक्ल जी पदावली के श्रृंगारिक साबित करए पर तूलि गेलाह । मुदा परवर्ती आलोचना मे ई कहल गेल कि श्रृंगार भावना मे तन्मयता क गंभीर अनुभूति आध्यात्मिकता मे रूपांतरित भ जाइत छैक । एहि सहमति क बावजूद किछु लोग शुक्लजी क निष्कर्ष के नहि मानबा मे पाप बूझैत छथि । एहने एकटा विद्वान छथि आदरनीय खगेन्द्र ठाकुर जी। एक टा आलेख मे ओ कहैत छथिन्ह जे भक्ति भावना होइतहु ओ भक्ति आंदोलन के अंग नहि छथि । हमरा ओहि तथाकथित आंदोलन सँ विद्यापति के जोड़बा मे कोनो रूचि नहि । मुदा एकटा बात स्पष्ट अछि पदावली मे भक्ति भाव क अद्वितीय स्थल अछि ।विद्यापति क धार्मिकता एहि माने मे अद्भुत अछि कि ओ कोनो संस्थान क लेखक नहि छथि । एहि दृष्टि सँ हुनकर भक्ति भाव कोनो मठ क ध्वजा लके नहि चलैत अछि ।साम्प्रदायिकता क एहि अनुपस्थिति पर ध्यान नहि देल गेल । राधा-कृष्ण के साथहि भगवान शंकर,पार्वती,गंगा आ भैरवी क ओ स्तुति करैत छथि ।ई धार्मिकता सब के साथ ल के चलए वला धार्मिक भावना अछि ।ई धार्मिकता धन-संपत्ति आ यश क लेल नहि छैक । एकर मूल उद्देश्य अछि दुनिया सँ आसुरी वृत्ति क नाश- जय -जय भैरवि असुर भयाओनि,पशुपति भामिनि माया । एहि कविता के आलोचक गण निराला क प्रसिद्ध कविता ’राम की शक्ति पूजा ‘ क ओहि अंश सँ तुलना करथि,जाहि मे भगवान राम क शक्ति पूजा सँ प्रसन्न भगवती क उदय होइत अछि ।विद्यापति क कविता धर्म के खाल जँका नहि ओढ़ैत अछि,ई भारतीय धर्म भावना के उच्च आदर्श के अनुकूल अछि ।हिन्दी क रीतिकालीन कविता जँका एकरा मे कोनो द्वयर्थकता नहि अछि ।रीति कविता क धार्मिकता क मूल मे अछि कवि क विलास भावना मे छिपल अपराध भाव । एहि डर सँ ओ भगवान क नाम लैत छथि । एकटा कवि कहैत छथिन्ह यदि सूतरि जायत त कविता बूझब नहि त राधा कृष्ण क स्मरण एकटा बहाना अछि ।विद्यापति पदावली मे एहि द्वैधता क लेल कोनो स्थान नहि ।एहि मे भक्त क कातरता, ओकर दैन्य, आत्मसमर्पण आ अनन्य निष्ठा निहित अछि । विद्यापति भक्ति या श्रृंगार दूनू भावना के प्रकृति के मुक्ताकाश मे देखैत छथिन्ह ,ताहि दुआरे एहि मे मिथिला क प्राकृतिक सुषमा क अद्भुत दर्शन होइत अछि ।एहि अन्हार पीबए वला सूर्य क तेज सँ अन्यत्र परिचय नहि भेटत- ए री मानिनि पलटि निहार ।अरून पिबए लागल अन्हार । प्रेम आ माधुर्य मे डूबल प्रकृति कतहु सादृश्यमूलक अलंकार के रूप मे प्रकट होइत अछि -पहिल बदरि सम पुन नवरंग । आ कतहु विम्ब क रूप मे जइसे डगमग नलिनि क नीर । तइसे डगमग धनि क शरीर ।ं। वसंत गीत क सौन्दर्य त कोनो भारतीय भाषा मे नहि मिलत । “नवल वसंत नवल मलयानिल मातल नव अलि कूल ” एहि कविता क तुलना निराला क सरस्वती वन्दना सँ करब तखन महाकवि विद्यापति क मौलिकता क पता चलत । पता नहि कोन आलोचक विद्यापति के अभिनव जयदेव कहने छल । एहि सँ अधलाह उपमा आ उपनाम साहित्य जगत मे दोसर कोनो नहि देल गेल ।गीतगोविन्द मे जयदेव कहैत छथिन्ह- यदि हरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम् ! मधुरकोमलकान्तपदावलीं श्रृणु तदा जयदेवसरस्वतीम् । अर्थात यदि हरि स्मरण मे मन सरस हो,यदि विलास-कला मे कुतूहल हो,तखन जयदेव क मधुर कोमल,कान्त पदावली के सुनु । विद्यापति त अपन पदावली के सम्बन्ध मे कोनो एकरस घोषणा नहि कएलथि, तैयो विद्यापति के केवल श्रृंगार सँ जोड़नए विद्यापति के कमतर करए के प्रयास अछि । विद्यापति के श्रृंगार आ भक्ति के कवि के रूप मे देखु, कोनो दिक्कत नहि,मुदा ओ साहित्य क वृहत्तर प्रयोजन के ल के चलैत छथिन्ह ।तखने विद्यापति क कविता मे छितराएल विशाल दर्द के अनुभव क सकब । राधा क प्रतीक्षा मिथिला के आम नारी वर्ग क प्रतीक्षा अछि । सामंतवाद पुरूष आ स्त्री के अलग -अलग संस्कार देलकए ।ओहि संस्कार मे नारी क लेल छलए अंतहीन प्रतीक्षा ।एहि प्रतीक्षारत नारी के कनैत-खीजैत आ स्वयं के मनाबए के कतेको चित्र सँ पदावली भरल अछि । कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ ! पद मे दुख क विशाल व्यंजना अछि ।जन्म सँ मृत्यु तक दुख क सागर मे रहबा क तर्क विद्यापति क नहि मिथिला के साधारण पुरूष क अछि । ’दुखहि जनम भेल,दुखहि गमाओल ‘क व्यंजना छह सौ साल बाद फेर एकटा कवि क सकल ,जकरा भारतीय साहित्य निराला नाम सँ जानैत अछि । ’दुख ही जीवन की कथा रही‘ पर लट्टू साहित्यिक वर्ग विद्यापति क अर्थगर्भित कविता के जेना सामान्य धार्मिक कोटि मे राखि बिसरि जाइत अछि ।ई एकटा सांस्कृतिक शर्म के विषय अछि । संस्कृत काव्यशास्त्र मानैत अछि जे महान रचना मे अर्थ क स्वाभाविक बहुस्तरीयता होइत छैक ।अतः रचना क शरीर सँ नहि ओकर आत्मा सँ केन्द्रीय संवेदना क पहचान होएबा क चाही । विद्यापति मे साहित्य आ शास्त्र क सब मान्यता एमहर ओमहर भ गेल अछि,एहि ठाम आलोचना क लोकतांत्रिकता देखाइत अछि ! जकरा जे मून हो लिख दे आ पी0एच0डी0 क डिग्री ल ले ! वाह रे विद्यापति !आ वाह रे विद्यापति क आलोचना ्! भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ साहित्यक प्रतिमान बदलैत रहैत अछि ,मुदा किछु तत्व क निरंतरता बनल रहैत अछि ।नाटक साहित्य मे दू तत्वक महत्व कमोबेश सब युग मे रहल अछि । प्रासंगिकता आ रंगमंचीयता एहने दू टा तत्व अछि ।पहिलक सम्बन्ध मोटामोटी विषयवस्तु आ दोसरक सम्बन्ध शिल्प सँ अछि ।विभा रानी लिखित ‘भाग रौ‘ क विश्लेषण ऐ दृष्टि सँ कएनए उचित अछि । विभा रानी द्वारा ऐ नाटक मे भीखमंगा बच्चाक जीवन आ समाजक क्रूर दृष्टि क चर्चा कएल गेल अछि ।लेखिका द्वारा चयनित विषय वस्तु मैथिलीए मे नइ बल्कि आनोआन भाषा मे विरल अछि ।भीखमंगा बच्चा सभ आपसी वार्ता मे समाज आ जिनगीक कतिपय क्रूर पक्ष सँ परिचय करबैत अछि ।समाज ,सरकारक साथेसाथ भगवानहुँ सँ उपेक्षित ई बच्चा भारतीय समाज आ राष्ट्रक महानता पर व्यंग्य करैत अछि । भीखमंगा बच्चा सभ अपन जिनगी क क्षतिपूर्ति गोविन्दा,रितिक रोशन,शाहरूख,अभिषेक आदि क चर्चा सँ करैत अछि आ अपन कथात्मक सन्दर्भ मे ई जेहन करूण साबित होइत अछि ,रंगमंचीय दृष्टि सँ ओहने कलात्मक ।यद्यपि विद्वान लोकनि कें हीरो हीरोइन क ई अतिचर्चा अनसोंहांत लागि सकैत छन्हि मुदा अपन संदर्भ क मध्य ई रूचिगर आ प्रासंगिक बुझाइत अछि । ‘दानापुर माने दाना स‘ पूरम पूरा ‘ भाग रौ नाटकक कथा प्रसंग देशक एहने दाना दाना चुगए वला सबसँ वंचित आ कर्मठ वर्ग क कथा छैक । एहि वर्गक सबसँ अभीप्सित भूख,चाह आ गंध थिकए,रोटी क गंध ।पेट मे ‘मरल सनकिरबो‘क थाह नइ मिललइ ;देशक नीतिनिर्माता आ प्रभुवर्ग पर प्रचण्ड प्रहार अछि ।भूखल बच्चा ऐ समाज मे अपन स्तर आ महत्व सँ परिचित अछि,ताहि दुआरे बच्चा1 कहैत अछि ‘प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त‘ देसक काजधंधा थम्हि जेतै । नाटकक भाषा विषयवस्तुक अनुरूप करू आ मारक अछि ।तद्भव आ देशज शब्द क बाहुल्य नाटक के रूचिगर आ रंगमंचीय बनेने रहैत अछि । ‘सिटी स‘ साहेब भ‘ गेलै त‘ हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की?‘ उपरोक्त वाक्यक प्रश्नवाचकता आ कथनगत असंभाव्यता एकटा तनाव के जन्म दैत अछि । भीखमंगा सभ आपसी गपशप मे दूटा महिला राजनीतिज्ञ क चर्चा सेहो करैत अछि आ विडंबना ई जे दूनू महिला परिवारवाद आ भारतीय राजनीति क अनुर्वरता क पोषक छथि ।बच्चा सभ कहैत अछि जे पढि के की बनब?ई या ई ,दुर्भाग्य देखु जे दूनू महिला अपन विद्वता आ नैतिक शक्ति सँ जनमन क नेतृत्व नइ कइलक । एहन समाज आ राजनीति एकटा खास तरहक भाषा क इस्तेमाल करैत अछि ।ई भाषा प्रथमदृष्टया अश्लील आ मूलतः असंवेदनशील होइत अछि । ‘ई डंडा एमहर स‘ घुसतौ त‘ मुंह दने निकलतौ ‘ वर्चस्व ,आक्रमण आ यौनविद्वेष सँ भरल ई भाषा एकटा खास सामंती आ मर्दवादी समाजक मानसिकता के पोषित करैत अछि । ऐ समाजक बुद्धिजीवी एहन भाषाक उपयोग नै करैत अछि ,मुदा अपन अनुर्वरता मे इहो तेहने अछि । दू टा पत्रकार - युवक आ युवती अपन शिक्षा आ संस्कार मे किछु अलग अछि ,मुदा इहो वर्ग सृजनशीलता आ नवोन्मेष सँ पूर्णतः रहित अछि ।युवती मे किछु नया करबाक संभावना अछि ,मुदा अंधकारक विराट आकाश मे ई संभव नै भेल । ऐे वर्ग क भाषा मे एकटा खास किस्मक नफासत अछि । तत्सम बहुलता आ अंग्रेजी शब्द आ वाक्य क बाहुल्य सँ ई वर्ग अपन विशिष्ट अस्तित्व आ रूचि पर बल दैत अछि । ‘नॉट ए बैड आइडिया ‘ ही इज डफर ,बी पेशेंट सनक चालू वाक्य रंगमंचीय अछि । रंगमंचीय उपकरण क रूप मे किछु नव प्रयोग सेहो अछि ।नाटक मे समवेत स्वर मे गान या बलाघात सँ किछु खास कहबा क प्रयास कएल गेल अछि । ‘हम सब किछु नय क सकैत छी‘ आ हमसब.......मात्र पुतली भरि ई सब अपन संदर्भ मे बहुत अर्थवान अछि ,मुदा ऐ ठाम रंगमंचीय कौशल सेहो अपेक्षित अछि ,अन्यथा अंतिम प्रभाव उड़ियएबा क संभावना अछि । भाग रौ नाटकक असफलता सेहो स्पष्ट अछि । दोसर अंकक पहिल दृश्य मे मंगतू एक पृष्ठक स्वगत बाजैत अछि । ऐ दृश्यक उद्देश्य स्पष्ट रहितहुँ रंगमंचीयता संदिग्ध अछि ।दोसर अंक मे लेखिका क नियंत्रण नाटक पर कम अछि । भीखमंगा वला संदर्भ जतेक जीवंत अछि ,ओतेक पत्रकार आ प्रेस वला नै ।मध्यांतर क बाद ऐ गुरूत्वाकर्षण क कमी एकदम स्पष्ट अछि । नाटकक अंत एकटा कविता सँ होइत अछि ।संयोगवश ऐ कविताक समानता आ समरूपता हिन्दी कवि शमशेर बहादुर सिंह क कविता ‘काल, तुझसे होड़ है मेरी ‘सँ बहुत ज्यादा अछि । शमशेर- काल, तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू - विभा -ओ काल... अहीं स‘ हँ,अहीं स‘ अछि टक्कर हमर शमशेर-भाव,भावोपरि सुख,आनंदोपरि सत्य,सत्यासत्योपरि विभा-जे अछि सत्यो स‘ बढ़ि क‘ सत्य शिवो स‘ बढ़ि क‘ शिव अमरो स‘ अमर सुंदरतो स‘ सुंदर..... ई कविता नाटक ‘भाग रौ ‘ क महत्वपूर्ण भाग नै अछि ।तें एकर शमशेर क कविता सँ समानता क कोनो खास महत्व नै अछि ।मैथिली नाटकक इतिहास मे विभारानी अपन ऐ नाटक क संग विशेष महत्व क उत्तराधिकारिणी छथि ।विषयवस्तु मे नवोन्मेष क संगेसंग ट्रीटमेंट क अभिनवता ‘भाग रौ ‘नाटक के उल्लेखनीय बनबैत अछि । झमेलि‍या बि‍आह जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक तेसर नाटक। ऐ सँ पहिले ‘मिथिलाक बेटी’ आ ‘कम्‍प्रोमाइज’। तीनू नाटक अपन औपन्‍यासिक विस्‍तार आ काव्‍यात्‍मक दृष्टिसँ परिपूर्ण। लेखक समकालीन विश्व आ गद्यक पारस्‍परिकतासँ नीक जकाँ परिचित छथि, तँए हिनकर संपूर्ण रचना-संसारमे समकालीनताक वैभव पसरल अछि, जत्ते वैचारिक, ओतबे रूपगत। समकालीनताक प्रति हिनकर झुकाव ‘झमेलिया बि‍आह’क एकटा विशेष स्‍वरूप दैत छैक। बारह सालक नेनाक बि‍आहक ओरियाओन करैत माए–बापक चित्र जत्ते हँसबै छैक, माएक बेमारी ओतबे सुन्न। लेखकक रचना संसारमे काल-देवताक लेल विशेष जग्‍गह, तँए ई नाटक प्रहसनक प्रारंभिक रूपगुण देखाबितो किछु आर अछि। पहिले दृश्‍यमे सुशीला कहैत छथिन ‘राजा दैवक कोन ठेकान..., अगर दुरभाखा पड़तै तँ सुभाखा किअए ने पड़ै छै...।’ आ राजा, दैवक कर्तव्‍यक प्रति ई उदासीनताक अनुभव समस्‍त आस्तिकता आ भाग्‍यवादिताकेँ खंडित करैत अछि। सभ नाटकमे भरत मुनिकेँ खोजनाइ जरूरी नइ, ओना उत्‍साही विवेचक अर्थ-प्रकृति, कार्यावस्‍था आ संधिक खोज करबे करता, आ कोनो तत्‍व नइ मिलतनि‍ तँ चिकडि़ उठता। यद्यपि लेखकक उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट अछि। शास्‍त्रीय रूढ़ि‍ जेना–नान्‍दी पाठ, मंगलाचरण, प्रस्‍तावना, भरतवाक्‍यक प्रति लेखक कोनो आकर्षण नइ देखबैत छथिन। एतबे नइ पाश्चात्‍य नाट्य सिद्धांतकेँ हूबहू (देकसी) खोजएबलाकेँ आलस सेहो लागतनि‍। तँए ‘झमेलिया बि‍आह’ नाटकमे स्‍टीरियोटाईप संघर्ष देखबाक ईच्‍छुक भाय लोकनि कनेक बचि बचा के चलब। विसंगति आ समस्‍या नाटकक फार्मूलाकेँ नाटकमे खोजएबलाकेँ सेहो झमेला बुझा सकैत छनि, किएक तँ लेखक कोनो फार्मूलाकेँ स्‍वीकारि के नइ लिखैत छथिन । सीधा-सीधी अंक-बि‍हीन ‘झमेलिया बि‍आह’ नओ गोट दृश्‍यमे बँटल अछि: अनेक दृश्‍यस्‍य एकांकी। ने बहुत छोट आ ने नमहर। तीन चारि घंटाक बिना झमेलाकेँ ‘झमेलिया बि‍आह’। एकेटा परदा या बॉक्‍स सेटपर मंचित होमए योग्‍य। मात्र घर वा दरबज्‍जाक साज-सज्‍जा। तेरहटा पुरुष आ चारिटा स्‍त्री पात्रक नाटक। छोट-छोट रसगर संवाद, संघर्ष आ उतार-चढ़ावक संभावनासँ युक्‍त। ने केतौ नमहर स्‍वगत ने नमहर संवाद। असंभव दृश्‍य, बाढि़, हाथी-घोड़ा, कार जीपक कोनो योजना नइ। संवादक द्वारा विभिन्‍न बरियाती या यात्राक कथासँ जिज्ञासा आ आद्यांत आकर्षण। क‍थामे चैता केर रमणीयता आ मर्यादा, तँए जोगीराक दिशाहीनता आ उद्दाम वेग नइ भेटत। गंभीर साहित्‍य सर्वदा अपन समैक अन्‍न, खून पसेनाक गंधसँ युक्‍त होइत अछि। आ ‘झमेलिया बि‍आह’ सेहो पावनि-तिहार, भनसा घरक फोड़न-छौंक, सोयरी, श्‍मशान आ पकमानक बहुवर्णी गंधसँ युक्‍त अछि, एकदम ओहिना जेना पाब्‍लो नेरूदा विभिन्न कोटिक गंधकेँ कवितामे खोजैत छथिन। ‘झमेलिया बि‍आह’क सामाजिक आ सांस्‍कृतिक आधारपर कनेक विचार करू। ई ओइ ठामक नाटक अछि, जतए कर्मपर जन्‍म, संयोग आ कालदेवताकेँ अंकुश छैक, जइठामक लोक मानैत छथिन जे कखनो मुँहसँ अवाच कथा नै निकाली। दुरभक्‍खो विषाइ छै। सामाजिक रूपेँ ओ वर्ग जेकर हँसी-खुशी माटिक तरमे तोपा गेल अछि। लैंगिक विचार हुनकर ई जे पुरुख आ स्‍त्रीगणक काज फुट-फुट अछि। आ विकासक उदाहरण ई कि जइठीन मथ-टनकीक एकटा गोटी नै भेटै छै तइठीन साल भरि पथ-पानिक संग दवाइ खाएब पार लागत? मुदा जगदीशजी केवल सातत्‍य आ निरंतरताक लेखक नइ छथिन, परिवर्तनक छोट-छोट यतिपर अपन कैमरासँ फ्लैश दैत रहैत छथिन। तँए यथास्थितिवादक लेल अभिशप्‍त होइतो यशोधर बुझैत छथिन जे मनुक्‍खक मनुखता गुणमे छिपल छै नै कि रंगमे। आ सुशीला सामाजिक स्थितिपर बिगड़ैत छथिन कि विधाताकेँ चूक भेलनि जे मनुक्‍खोकेँ सींघ नांगरि किअए ने देलखिन। आ ई नाटक कालदेवताक ओइ खंडसँ जुड़ैत अछि जतए पोता श्‍याम तेरह के थर्टिन आ तीन के थ्री कहैत छथिन। ऐठाम अखबार आबैत छैक आ राजदेव देशभक्तिक परिभाषाकेँ विस्‍तृत बनेबाक लेल कटिबद्ध छथिन। खेतमे पसीना चुबबैत खेतिहर, सड़कपर पत्‍थर फोड़ैत बोनिहार, धारमे नाव खेबैत‍ खेबनिहार सभ देश सेवा करैत अछि, आ राजदेव सभकेँ देशभक्‍त मानैत छथिन। ‘झमेलिया बि‍आह’क झमेला जिनगीक स्‍वाभाविक रंग परिवर्तनसँ उद्भूत अछि, तँए जीवनक सामान्‍य गतिविधिक चित्रण चलि रहल अछि कथाकेँ बिना नीरस बनेने। नाटकक कथा विकास बिना कोनो बिहाड़ि‍क आगू बढ़ैत अछि, मुदा लेखकीय कौशल सामान्‍य कथोपकथनकेँ विशिष्‍ट बनबैत अछि। पहिल दृश्‍यमे पति-पत्नीक बातचितमे हास्‍यक संग समए देवताक क्रूरता सानल बुझाइत अछि। दोसर दृश्‍यमे झमेलिया अपन स्‍वाभाविक कैशोर्यसँ समैकेँ द्वारा तोपल खुशीकेँ खुनबाक प्रयास करैत अछि। पहिल दृश्‍यमे व्‍यक्ति परिस्थितिकेँ समक्ष मूक बनल अछि, आ दोसर दृश्‍यमे व्‍यक्तित्‍व आ समैक संघर्ष कथाकेँ आगू बढ़बैत‍ कथा आ जिनगीकेँ दिशा निर्धारित करैत अछि। तेसर दृश्‍य देशभक्ति आ विधवा विवाहक प्रश्नकेँ अर्थ विस्‍तार दैत अछि, आ ई नाटकक गतिसँ बेशी जिनगीकेँ गतिशील करबाक लेल अनुप्राणित अछि । चारिम दृश्‍यमे राधेश्‍याम कहैत छथिन जे कमसँ कम तीनक मिलानी अबस हेबाक चाही। आ, लेखक अत्‍यंत चुंबकीयतासँ नाटकीय कथामे ओइ जिज्ञासाकेँ समाविष्‍ट कऽ दैत छथिन कि पता नइ मिलान भऽ पेतै आ कि‍ नइ। ई जिज्ञासा बरियाती-सरियातीक मारिपीट आ समाजक कुकुड़ चालिसँ निरंतर बनल रहैत छैक। आ पांचम दृश्‍यमे मिथिलाक ओ सनातन ‘खोटिकरमा’ पुराण। दहेज, बेटी, बि‍आह आ घटकक चक्रव्‍यूह! आ लेखकक कटुक्ति जे ने केवल मैथिल समाज बल्कि समकालीन बुद्धिजीवी आ आलोचनाक लेल सेहो अकाट्य अछि: कतए नै दलाली अछि। एक्‍के शब्‍दकेँ जगह-जगह बदलि-बदलि सभ अपन-अपन हाथ सुतारैए । आ घटकभायकेँ देखिअनु। समैकेँ भागबा आ समैमे आगि लगबाक स्‍पष्‍ट दृश्‍य हुनके देखाइ छनि। अपन नीच चेष्‍टाकेँ छुपबैत बालगोविन्‍दकेँ एक छिट्टा आर्शीवाद दैत छथिन। बालगोविन्‍दकेँ जाइते हुनकर आस्तिकताक रूपांतरण ऐ बि‍न्‍दुपर होइत अछि ‘भगवान बड़ीटा छथिन। जँ से नै रहितथि तँ पहाड़क खोहमे रहैबला केना जीबैए। अजगरकेँ अहार कतए सँ अबै छै। घास-पातमे फूल-फड़ केना लगै छै.......’ बातचितक क्रममे ओ बेर-बेर बुझबैक आ फरिछाबैक काज करैत छथि। मैथिल समाजक अगिलगओना। महत्‍व देबै तँ काजो कऽ देत नइ तँ आगि लगा कऽ छोड़त !!!!! छठम दृश्‍यमे बाबा आ पोतीक बातचित आ बरियाती जएबा आ नइ जएबाक औचित्‍यपर मंथन। बाबा राजदेव निर्णय नइ लऽ पाबै छथिन। बरियाती जएबाक अनिवार्यतापर ओ बिच-बिचहामे छथिन ‘छइहो आ नहियो छै। समाजमे दुनू चलै छै। हमरे बि‍आह मे मामेटा बरियाती गेल रहथि। ‘मुदा खाए, पचबै आ दुइर होइक कोनो समुचित निदान नइ भेटैत छैक। बरियाती-सरियातीक व्‍यवहार शास्‍त्र बनबैत राजदेव आ कृष्‍णानंद कथे-बि‍हनिमे ओझरा कऽ रहि जाइत छथि। दस बरिखक बच्‍चाकेँ श्राद्धमे रसगुल्‍ला मांगि-मांगि कऽ खाइबला हमर समाज बि‍आहमे किएक ने खाएत? तँए कामेसर भाय निशाँमे अढ़ाय-तीन सए रसगुल्‍ला आ किलो चारिएक माछ पचा गेलखिन आ रसगुल्‍लो सरबा एतए ओतए नइ आंतेमे जा नुका रहल !!! सातम दृश्‍य सभसँ नमहर अछि, मुदा बि‍आह पूर्व वर आ कन्‍यागतक झीका-तीरी आ घटकभाय द्वारा बरियाती गमनक विभिन्‍न रसगर प्रसंगसँ नाटक बोझिल नइ होइत छैक। आ घटक भायपर धि‍यान देबै, पूरा नाटकमे सभसँ बेशी मुहावरा, लोकोक्ति, कहबैकाक प्रयोग ओएह करैत छथिन। मात्र सातमे दृश्‍यकेँ देखल जाए खरमास (बैसाख जेठ) मे आगि-छाइक डर रहै छै (अनुभव के बहाने बात मनेनइ)..... पुरूष नारीक संयोगसँ सृष्टिक निर्माण होइए (सिद्धांतक तरे धि‍यान मूलबि‍ंदुसँ हटेनइ)...... आगूक विचार बढ़बैसँ पहिने एक बेर चाह-पान भऽ जाए (भोगी आ लालुप समाजक प्रतिनिधि) ...... जइ काजमे हाथ दइ छी ओइ काजकेँ कइये कऽ छोड़ै छी (गर्वोक्ति)....... जिनगीमे पहिल बेर एहेन फेरा लागल (कथा कहबासँ पहिले धि‍यान आकर्षित करबाक सफल प्रयास).... खाइ पीबैक बेरो भऽ गेल आ देहो हाथ अकड़ि‍ गेल...... कुटुम नारायण तँ ठरलो खा कऽ पेट भरि लेताह मुदा हमरा तँ कोनो गंजन गृहणी नहिये रखतीह। (प्रकारांतरसँ अपन महत्‍व आ योगदान जनबैत ई ध्‍वनि जे हमरो कहू खाए लेल) आठमो दृश्‍यमे बालगोविन्‍द, यशोधर, भागेसर, घटकभाय बि‍आह आ बरियातीकेँ बुझौएल के निदान करबा हेतु प्रयासरत् छथि, आ लेखक घटकभायकेँ पूर्ण नांगट नइ बनबैत छथिन, मुदा ओकर मीठ-मीठ शब्‍दक निहितार्थकेँ नीक जकाँ खोलि दैत छथिन। ऐ दृश्‍यमे बाजल बात, मुहावरा, लोकोक्ति आ प्रसंग, उदाहरणक बले ओ अपन बात मनबाबए लेल कटिबद्ध छथिन। हुनकर कहबैकापर धि‍यान दिओ- जमात करए करामात..., जाबत बरतन ताबत बरतन....., नै पान तँ पानक डंटियेसँ....., सतरह घाटक सुआद......., अनजान सुनजान महाकल्‍याण। मुदा घटकभायकेँ ऐ सुभाषितानिक की निहितार्थ? ई अर्थ पढ़बाक लेल कोनो मेहनति‍ करबाक जरूरी नइ। ओ राधेश्‍यामकेँ कहै छथिन ‘जखन बरियाती पहुंचैए तखन शर्बत ठंडा गरम, चाह-पान, सिगरेट-गुटका चलैए। तइपर सँ पतोरा बान्‍हल जलपान, तइपर सँ पलाउओ आ भातो, पूड़ि‍ओ आ कचौडि़यो, तइपर सँ रंग-बि‍रंगक तरकारियो आ अचारो, तइपर सँ मिठाइयो आ माछो-मासु, तइपर द‍हियो, सकड़ौड़ि‍ओ आ पनीरो चलैए। नाटकक नओम आ अंतिम दृश्‍य। बाबा राजदेव आ पोती सुनीताक वार्तालाप, आखिर ऐ वार्तालापक की औचित्‍य? जगदीश जी सन सिद्धहस्‍त लेखक जानै छथिन जे बीसम आ एकैसम सदीक मिथिला पुरुषहीन भऽ चुकल छैक। यात्री जीक कवितापर विचार करैत कवयित्री अनामिका कहैत छथिन ‘बिहारक बेशी कनियाँ विस्‍थापित पतिगणक कनियाँ छथि। ‘सिंदूर तिलकित भाल’ ओइ ठाम सर्वदा चिंताक गहींर रेखाक पुंज रहल छैक। ....भूमंडलीकरणक बादो ई स्थिति अछि जे मिथिला, तिरहुत, वैशाली, सारण आ चंपारण यानी गंगा पारक बिहारी गाम सभ तरहेँ पुरुषबि‍हीन भऽ गेल छैक। ......सभ पिया परदेशी पिया छथि ओइठाम। गाममे बचल छथि वृद्धा, परित्‍यक्‍ता आ किशोरी सभ। एहन किशोरी, जेकर तुरते तुरत बि‍आह भेलै या फेर नइ भेल होए, भेलए ऐ दुआरे नइ जे दहेजक लेल पैसा नइ जुटल हेतैक।‘बि‍आह आ दहेजक ऐ समस्‍याक बीच सुनीताकेँ देखल जाए। एक तरहेँ ओ लेखकक पूर्ण वैचारिक प्रतिनिधि अछि। यद्यपि कखनो-कखनो राजदेव, कृष्‍णानंद आ यशोधर सेहो लेखकक विचार व्‍यक्‍त करैत छथिन। सुनीता, सुशीला आ राजदेव मिथिलाक स्‍थायी आबादी, आ घटकभाइक बीच रहबाक लेल अभिशप्‍त पीढ़ी। कृष्‍णानंद सन पढ़ल-लिखल युवकक स्‍थान मिथिलाक गाममे कोनो खास नइ। आ लेखक बिना कोनो हो-हल्‍ला केने नाटकमे ऐ दुष्‍प्रवृत्तिकेँ राखि देने छथि। जीवन आ नाटकक समांतरता ऐठाम समाप्‍त भऽ जाइत छैक आ दूटा अर्द्धवृत्‍त अपन चालि स्‍वभावकें गमैत जुड़ि पूर्णवृत्‍त भऽ जाइत अछि। आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन जगदीश प्रसाद मंडल जी क एहि उपन्यास मे आदर्श क प्रति एकटा खास दृष्टि अछि ।लेखकीय विजन मे आदर्श अछि ।ओ मानवीय स्वभाव क उच्चादर्श मे विश्वास करैत छथिन्ह ।मानवीय वृत्ति क नीक पक्ष पर ओ झूमैत ंछथिन्ह आ अधलाह पक्ष पर कानैत छथिन्ह ,मुदा एहि हर्ष आ विषाद क लेल आवश्यक संघर्ष उपन्यास मे समवितरित नहि अछि ।उपन्यास क प्रारम्भ गंगानन्द क कथा सँ होइत अछि आ प्रारम्भिक किछु पृष्ठ तक कथा क विकास ,चरित्र क विकास,मिथिला क्षेत्रक रंग आ मनोवैज्ञानिकता क चित्रण मे लेखक के अतीव सफलता भेटैत अछि ।लेखक क ई नियंत्रण संपूर्ण उपन्या स मे एके रंग नहि भेटत । जाहि ठाम लेखक कथा क अनियंत्रित जंगल मे भ्रमण कर‘ लागैत छथि,ओहि ठाम पाठकीयता प्रभावित होइत अछि ।तहिना लेखक चरित्र क विकास मे हस्तक्षेप करैत छथिन्ह आ पात्र कठपुतली जँका लेखक सँ नियंत्रित होइत अछि । गंगानन्द,विसेसर सनक सब प्रमुख पात्र एहि आदर्शवादी ढ़ंग आ रंग सँ निर्मित अछि । वास्तव मे ई कवि जगदीश प्रसाद मंडल क जीत अछि आ लेखक जगदीश प्रसाद मंडल क हारि ।पात्र क व्यक्तित्व क विकास मिथिला क तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक स्थिति सँ कम आ लेखक क आदर्शवाद सँ बेशी होइत अछि ।ताहि दुआरे जत‘ पाठक लाठी आ भाला चलबा क अनुमान लगबैत अछि,ओहि ठाम ह्रदय परिवर्तन सब काज क‘ दैेत छैक ।विसेसर कें खेत एकटा मामूली सिपाही सँ मिलि जाइत छैक ।वास्तविक जिन्दगी मे ई विरल घटना संभव अछि,मुदा ई समाजक प्रतिनिधि घटना नहि अछि ।विरल घटना सेहो साहित्य क अंग भ‘ सकैत अछि ,मुदा ओकर अंकन अनुभवक भट्टी सँ अनिवार्य अछि । ई उपन्यास स्वतंत्रता पूर्व क समय सँ सम्बन्धित अछि ।बीसम सदी क पूर्वार्द्ध क किछु घटना क उल्लेख उपन्यास मे अछि ।स्वाभाविक अछि जे उपन्यास क तुलना ‘बलचनमा‘ आ ‘मैला आँचल‘ सँ हो । उपन्यास मे ऐतिहासिकता क बलाघात क कतहु प्रयास नहि अछि । ताहि दुआरे अतीत क कालखण्ड क उपन्यास होएबा क बावजूद ई सामाजिक उपन्यास अछि । उपन्यास मे मिथिला क सामाजिक आ आर्थिक पिछड़ापन के विशेष चिह्नित कएल गेल अछि ।मिथिला क सर्वांगीन विकास लेखकक अभीष्ट अछि ।लेखकक ई लक्ष्य एतेक महत्वपूर्ण भ गेल छैक जे यथार्थ सँ आदर्श क पटरी बैसेनए अत्यंत कठिन भ गेल छैक । आधुनिक काल मे उपन्यास विधा एकटा खास उद्देश्य सँ साहित्य मे विकसित भेल आ क्रमशः प्रधान होइत चलि गेल ।सामंती युग आ समाज क उत्कृष्टता आ भव्यता सँ परिचय करेनए महाकाव्य विधा क काज छल । आधुनिक युगक वर्ग संरचना आ वर्गवृत्ति बदललए आ युगक उद्देश्य सेहो बदलि गेलए । एहि युग क वैशिष्ट्य के प्रकट करबा मे महाकाव्य विधा क कमजोरी प्रकट भेल,फलतः पद्य आ महाकाव्य क स्वीकार्यता कम भेल ।नवयुग के व्यक्त करबा क लेल गद्य,नाटक आ उपन्यास सनक विधा पर जोर पड़लए ।महाकाव्य क स्थान पर किछु खास मकसद सँ उपन्यास क आसन लाग‘ लागलए ।एहि विस्थापनक सबसँ मुख्य कारण छल उपन्यास विधाक सर्वसमावेशिता ।उपन्यास क प्रत्यास्थ शिल्प सबकिछु के अपना मे समाविष्ट क लेलक ।विद्वान लोकनि क बीच ऐ बात पर सर्वसम्मति भेल कि नवयुगक प्रवृत्ति के महाकाव्यात्मक गहराई सँ प्रकट करबा मे उपन्यास सक्षम अछि ।‘उत्थान-पतन‘ क लेखक उपन्यास विधाक महाकाव्यात्मक आयाम सँ परिचित छथि ।हम ई नहि कहि रहल छी जे ई महाकाव्यात्मक उपन्यास अछि ,मुदा जाहि भाषा मे महाकाव्यात्मक उपन्यास लिखल जाइत छैक,ओहि भाषा मे पहिले एहने सामाजिक उपन्यास सब मिलि के एकटा रचनात्मक वातावरण क निर्माण करैत अछि । ई हमर सौभाग्य अछि जे हमरा समय मे जगदीश प्रसाद मंडल सनक स्पष्ट सामाजिक बोध वला उपन्यासकार मैथिली मे छथि । ।‘उत्थान-पतन‘ क संरचना यदि भारतीय उपन्यास क संदर्भ मे कएल जाए तखन ओएह प्रेमचंदीय आ शरतचंद्रीय विजन क स्पर्श अछि । गाम पर आ गाम क लोक क प्रति प्रेमचंद सँ किछु बेसिए अपनत्व क भाव । ई व्यक्ति क स्वभाव सँ ल के घर क संरचना तक स्पष्ट अछि । ‘कँचके ईंटाक आ खढ़क छारल दरवज्जा ।नीक कारीगर क जोड़ल देबाल आ नीक छाड़निहार छाड़ने ,तें दरवज्जा सुन्दर ।दरवज्जा क ओसार मे एक भाग एकटा कोठली बनल ‘। प्रेमचंद क उपन्यास मे अहाँ के खोजला पर गाम क प्रति प्रशंसाक भाव नहि मिलत । हँ गाम क प्रति दया क भाव प्रेमचंद मे जरूर अछि ।गाम क दलित-शोषित जन क प्रति प्रेमचंद मे विशेष पक्षधरता क दृष्टि मिलत,मुदा गाम क प्रति एकटा नास्टेल्जिक भाव जे आंचलिक आंदोलनक विशेषता अछि से अनुपलब्ध अछि । ‘उत्थान-पतन‘क लेखकीय दृष्टि मे किछु किछु रेणु क गा्रम्य प्रेम अछि ।मुदा एहि ठाम रेणु वला विराट व्यंग्य अनुपलब्ध अछि । लेखकक दृष्टि क रूप मे एकटा खास प्रगतिशीलता उपन्यास मे व्याप्त अछि ।ई दृष्टि अछि पिछड़ल मनुष्य के आगू बढ़एबा क उपक्रम । एकठाम विसेसर कहैत छथिन्ह- ’हमरा तोरा सन जे पछुआइल परिवार आ लोक अछि,ओकरा मे किछु एहेन दुरगुन अछि जकरा सुधारने बिना अगुआइब कठिन अछि ‘ उत्थान-पतन क भाषा पर विचार कएल जाए एकर भाषा मे कतहु बिहाड़ि नहि भेंटत एकदम आत्मीय वार्तालाप क भाषा- ‘बीघा भरि मकइ ।पँच-पँच हाथक हरियर हरियर फुलायल गाछ।तीनि-तीनि,चारिटा बाइल गाछ मे झूमैत।जेना जुआन कनियाँ अपन जुआनी क गुण सँ झूमैत तहिना मकइ क गाछ झूमि झूमि एक दोसर सँ लट्टा पट्टी सेहो करैत ‘। यदि ‘उत्थान-पतन‘ क त्रुटि क बात करी,त किछु मुख्य दोष अछि- 1 संवाद मे स्फीति ।जखन विसेसर अपन सासुर मे अमृतलाल सँ घर बनएबा क आग्रह सुनैत छथिन्ह तखन विसेसर एकटा लम्बा अनुच्छेद मे कालदेवता क महात्म्य बताबैत छथिन्ह ।श्यामानंद बोरिंग खुनएबा क बाद विसेसर के सामने एकटा नमहर भाषण मे क्रियाशील पूंजी आ गतिहीन पूूंजी क चर्चा करैत छथिन्ह । 2उपदेश क भाव कतहु कतहु नाटकीयता आ रोचकता क भंग करैत अछि । एहि ठाम लेखक अपन विचार घुसएबा क लेल आदर्श क चाशनी सँ कतहु आवश्यक आ कतहु अनावश्यक विस्तार करैत छथि । पृष्ठ 41-42 मे ज्ञानचंद एकटा नमहर अनुच्छेद मे सामाजिकता पर बजैत छथि । 3उपन्यास मे एक साथ एकाधिक कथा विद्यमान अछि ।विसेसर क कथा, गंगानन्द तीनू भाए क कथा,डाक्टर नीलमणि क कथा ।मुदा एहि कथा क बीच मे कोनो गंभीर संपर्कसूत्र अनुपस्थित अछि ।कखनो कखनो लागैत अछि जे एक उपन्यास मे कतेको टा कहानी एक साथ चलि रहल अछि । पाश्चात्य विद्वान लोंजाइनस कहैत छथिन्ह जे महान रचना निर्दोष नहि होइत छैक ,निर्दोष रचना क फेरा मे क्षुद्रता बढ़बा क संभावना बढ़ि जाइत अछि ।‘उत्थान-पतन‘ क कतिपय दोष एहने दोष अछि जे विराट सामाजिकता क आवाहन क क्रम मे बाई-प्रोडक्ट जँका प्राप्त होइत अछि ।मैथिली क ऐ महान लेखक सँ हमरा आरो आर महान कृति क अपेक्षा आ आर्शीवाद चाही जे हमरा मे पढ़बा-गुनबाक सामर्थ्य विकसित हो । एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू ऐ आलेखक आरंभ सर्वप्रथम गाम करियनमे कविक छविसँ करैत छी। गाममे ई कविजीक रूपमे ख्यात रहलाह मुदा हिनकर उपेक्षाक कथा सेहो गामेसँ प्रारम्भ होइत अछि। प्रख्यात दार्शनिक उदयनाचार्यक भूमिमे जनमल ई कवि ने गाममे न्याय पओलक ने बाहर। गंभीर लेखनकेँ मान्यता नै भेटैत देखि कवि गामक व्याहमे अभिनंदन पत्र लेखनमे सेहो रूचि लिअ लागलाह। एहि काजसँ ने हुनका गाममे केओ रोकलक ने बाहर केओ ।सौभाग्य ई जे एहि हीन साहित्यिक वृत्तिमे रमलाक बादो कवि मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागतगान लिखलन्हि। प्रत्यक्षदर्शी कहैत छथि जे गाम वैद्यनाथपुरमे ऐ गानक समए कतेको मंचस्थ माननीय तिलमिला उठलाह। ई गान मिथिला सहित मैथिलीक दुर्दशाक व्यथागीत बनि गेल- उल्लासक गीत कतऽ सगरो करूणा क्रन्दन उपटि रहल विपटि रहल मैथिलीक नन्दन वन भ्रमरझुण्ड प्यासल छथि, वृहगवृन्द बड़ भूखल मुरूझल छथि आम-मऽहू, रऽसक सरिता सूखल बबुरे वन कवि कोकिल, लाजे मरै छी आउ आउ आउ सब के स्वागत करै छी कवि दोसर अनुच्छेदमे मैथिली मानुसक उत्सवप्रियतापर व्यंग्य करै छथि। हम सभ विद्यापति समारोह, हिन्दी दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयन्तीकेँ सत्यनारायण भगवानक कथाबला रीतिनिष्ठासँ मना लैत छिऐ आ समारोहक उच्च उद्देश्य ओहिना उपेक्षित रहि जाइत अछि । मात्र ई समारोही गोष्ठीसँ की हेतै? स्थिति जहिना तहिना, संवत एतै जेतै मुरदा जगाउ लाउ पैर पकड़ै अछि आउ आउ सब के स्वागत करै छी ई गान साहित्यक उद्देश्यपर सेहो विचार करैत अछि। कोनो खंडन मंडनक गुंजाइश नै छोड़ैत, ई स्पष्ट कहैत अछि- काव्यपाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी एक हाथ रसक श्रोत, दोसरमे खोरनाठी पुरना किछु त्यागि त्यागि, पकड़ू किछु नऽव ढ़ंग मोंछो पिजाउ बाउ श्रृंगारक संग संग अहाँ गीत गाउ मुदा हम हहरै छी रसश्रोतक संगे खोरनाठी लऽ कऽ चलएबला ई कविता साधारण नै अछि। पाश्चात्य काव्यशास्त्र ई मानैत अछि जे महान साहित्य कोनो एक भाव लऽ कऽ नै चलैत अछि। ई साहित्यमे विविध आ कखनो कखनो परस्पर विरोधी भावक संश्लेष करैत अछि। बूच बाबूक कवितामे विरूद्धक ई सामंजस्य हमरा चकित करैत अछि। हिंदी आलोचक राम चन्द्र शुक्ल विरूद्धक सामंजस्यकेँ एकटा बड़का काव्योपकरण मानैत छथिन्ह। बूच बाबूक एकटा आर कवितामे एकर दर्शन होइत अछि। ‘सोनदाय’ कविताकेँ ध्यानसँ पढ़ू।सर्वप्रथम एकरामे श्रृंगारिक लक्षण बुझाइत अछि। रहतौ ने हास बहि जेतौ विलास गय दुइ दिवसक जिनगीसँ हेवे निराश गय भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ मोहक उमंग बीच प्राण किएक पागल छौ चलि जेतौ सुनें कंठ लागल पियास गय दुइ........ कवितामे दू टा भाव स्पष्ट अछि। प्रथम प्रेम निवेदन आ दोसर विरागक स्वीकृति। आ दूनू मिलि कऽ विषादक विराट रूपकेँ जन्म दैत छैक। जे ऐ कवितामे कोनो एकटा भाव रहितै, तखन ई कोनो विलक्षण कविता नै बनि सकैत छल। एहि वैशिष्ट्यकेँ बूच बाबू कवितामे कोना आनैत छथि, ई बात बेस रूचिगर अछि। कवितामे विद्वान लक्षणा आ व्यंजनाकेँ पैघ बूझैत छथिन्ह मुदा कवि बूच अभिधापर निर्भर छथि। हुनकर कवितामे अलंकारक सेहो कतहु विशेष उपयोग नै अछि। तखन ऐ वैशिष्ट्यक श्रोत की अछि? एकर श्रोत अछि हुनकर विराट जीवनानुभव। अपन समृद्ध अनुभवक आधारपर ओ शब्दक नव जाल बूनैत छथि आ अपन रचनात्मक शक्तिकेँ यादि करैत ओकरा दृढ़ आ सुरेबगर बनबैत छथि। एकटा अध्यापकक घरमे जन्म लेनिहार ई कवि सौन्दर्यक विविध रूपक साक्षात्कार कएलक। कखनहु जेठक उद्धत नदी करेह एकर मोनकेँ मोहैत अछि- ई इन्होर पानि चमकै छौ मोर मोरपर भौरी दै छौ काटि काटि डीहक करेजकें तऽरे तऽरे समाइ छौ इएह कवि नागार्जुनक कविता ‘एक फांक आंख’ जकाँ नायिकाक ठोरक रस्तासँ अभिनव सौंदर्य देखैत अछि- कि जहिना कुरकुर पानक ठोर कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर लगौलह बातक पाथर चून सजौलह कऽथ कपोलक खून कि रहलह एक्के बातक चूक कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक? ई कवि भारतक ग्राम्य सुषमाक अनन्य प्रेमी अछि। महानगरीय कृत्रिमताक स्थानपर ई सहज सौंदर्यकेँ वरेण्य मानैत अछि- ईडेन गार्डेन सँ सुन्नर अछि कोशी कातक बोन गय इएह प्रेम एकटा प्रेमिकाक ह्रदयसँ निकलैत अछि- प्रियतम चलि आबू पटनासँ गाम ऐ प्रेमक ठोस आधार अछि। कवि नगरीय जीवन, शहरीकरण आ प्रशासनिक भ्रष्टाचारकेँ निशाना बनबैत अछि- घूसखोर मच्छर उड़ीस जकाँ जीवै छै शोनित तँ ओ अवशिष्ट पीवै छै हड्डी सुखायल अछि तैयो ओ अधिकारी खगले केर तीरै छै चाम कुत्ता जहिना हड्डी सँ मांस,खून आ रस खींचैत अछि, तहिना सरकारी अधिकारी वर्ग सेहो आम जनताक संग करैत अछि। कवि स्वयं बिहार सरकारक राज्य कर्मचारी छलाह, ताइ दुआरे ऐ अनुभवसँ ओ नित्य प्रति गुजरैत हेताह। मैथिली कवितामे हिंदी कविताक तुलनामे बेटीक ब्याह, दहेज आदिक बेशी चिंता रहलैक अछि। यद्यपि ई चिंता सीता, पार्वतीक ब्याहक रूपमे धार्मिक आयाम लैत अछि, तथापि एकर मूलाधार सामाजिक अछि। अन्य मैथिल कविक संगे हुनको गौरी आ सीताकेँ कुमारी रहबाक दर्द छन्हि- चामक सेज, कुगामक वासी खन कैलाश, खनेखन काशी लागथि बुत्त भुताह हे, गौरी रहथु कुमारी ! ई मिथिला अंचल मे व्याप्त दहेज आ समएसँ बेटीक व्याह नै हेबाक चिंता अछि। कवि सेहो ऐ चिंतासँ जूझैत अछि आ बेटीक लेल एकटा अद्भुत रूपक खोजैत अछि।‘फूलडाली‘ क रूपमे बेटीक कल्पना करैत कवि बेटीमे तमाम पवित्रता आ दैवत्वकेँ रूपांतरित करैत अछि- फूलडाली सन बेटी बनलै माथे परक पहाड़ एक कवितामे कवि कोनो बेटाक बापकेँ चारिटा बेटी होएबाक व्यंग्यात्मक कल्पना करैत अछि- तोरेा कुमारि चारि दाय हो मोन पड़ि जयतह नानी एक अन्य कवितामे वरक खानदानकेँ व्यापारी देखाओल गेल अछि- बबा दलाल बाप बड़दक व्यापारी, बेटा बछौड़ बीकि गेलै हजारी कविक ख्याति हास्य आ भक्ति कविक रूपमे रहल मुदा कविक फूलडालीमे सभ तरहक फूल छलए। फूल नाममात्रक नै काव्य उपवनक सभसँ मधुर, सुगंधित आ पवित्र फूल। कवि अपन दैन्य आ निराशाकेँे भक्ति गीतमे व्यक्त कएलक, ई गीत बहुत बेसी मात्रामे अछि मुदा मात्र एक गीतक चर्चा हम करैत छी, लागैत अछि जेेना विद्यापति पदावलीक कोनो पद होअए- जननि हय, जीवन हमर कठोर अध्यावधि सुख-शांति न भेटल पयलहँू विपति अघोर जननि हय जीवन हमर कठोर बूच बाबू अपन जिनगी आ कवितामे काव्यशास्त्रीय रूढ़िक पालन नै केलाह ने ओ कोनो काव्यात्मक आंदोलनसँ जुड़ि कुकुरमुतिया काव्यक रचना केलाह। ओ ह्रदएसँ कविता करैत छलाह, ताइ दुआरे हुनकर आलोचना सेहो ह्रदएसँ हेबाक चाही। बिझिआइल हाँसूसँ भरिगर गाछ नै कटत। बूच बाबूक काव्यक आलोचना सोचि समझि कऽ होएबाक चाही। यद्यपि ओ कोनो तत्कालीन आंदोलनमे रूचि नै लेलाह, परन्तु हुनकर कविता भाव आ शिल्प दुनू दृष्टिसँ रचनात्मक अछि। रचनात्मकता आ मौलिकताक औजारसँ हुनका परखल जाए तँ ओ मैथिली कविताक इतिहासमे किछु शीर्ष कविमे गणनीय छथि। मुदा हुनकर कविताक विषयमे बहुत भ्रांति अछि। कखनहु छपलाक दृष्टिसँ तँ कखनहु पुरस्कारक दृष्टिसँ हुनकर अवहेलना होइत चलि जाइत अछि। केओ आलोचक कविताक संख्याक दृष्टिसँ सेहो आपत्ति कऽ सकैत छथि! किएक तँ ई अभिनवगुप्त आ मम्मटक देश नै अछि। ई शतक आ सहस्रकम लिखएबलाक देश अछि! विडम्बना ई अछि जे कविक सुपुत्र श्री शिव कुमार झा सेहो मैथिली आलोचनासँ जुड़ल छथि आ अपन आलोचनामे ककरो निराला आ ककरो प्रसाद बनाबैत छथिन्ह मुदा मर्यादावश वा जे कारण हो पिताक रचनात्मकतापर ओ श्रद्धा तँ व्यक्त करैत छथिन्ह मुदा खुलि कऽ सोझाँ नै आबैत छथिन्ह। हम ऐठाम इएह कहब जे ओ निराला आ प्रसाद नै, ओ बूच छलाह, मैथिलीक बूच। हुनका मात्र ऐ रूपमे सम्मान दऽ हम मैथिली आलोचनाक तर्पण कऽ सकैत छी । कविक रचनात्मकताक दूटा संदर्भ आर अछि। कविक रचना ‘अकाल’ संभवतः नागार्जुनक हिंदी कविता ‘अकाल और उसके बाद’ क बाद भेलए। मुदा दुनूक दू संदर्भ आ दृश्य। नागार्जुन जाइ ठाम पशु पक्षी आ मानवक स्थितिक चित्र दऽ रहल छथि, ओइ ठाम बूच बाबूू गुजराती उपन्यासकार पन्नालाल पटेलक रचना ’मानभीनी भवाई’ जकाँ काल देवताक याद करैत छथि। ई अकाल नहि महाकाल अछि भूखक उक बान्हि नांगरिसँ चारेपर ठोकैत ताल अछि। .............................................. बीसहूँ आँखि ओनारि दसानन घुटुकि घुटुकि हिलबैत भाल अछि बूच बाबू अपन एक अन्य कविता ’राम प्रवासी’मे रामकेँ वनवासीक बदला प्रवासी कहैत छथि। मात्र ऐ शब्दक द्वारे ई कविता अपन पौराणिक केंचुलकेँ त्यागि आधुनिकता दिस संक्रमित होइत अछि। धिक धिक जीवन दीन अहाँ बिनु बीतल बरख मुदा जीवै छी जीर्ण-शीर्ण मोनक गुदड़ीकें स्वार्थक सुइ भोंकि सीबै छी निष्ठुर पिता पड़ल छथि घर मे कोमल पुत्र विकल वनवासी आउ हमर हे राम प्रवासी जीता जी हुनकर कोनो किताब नै छपल। मरलाक बाद हुनकर ९८ टा कविताक संग्रह श्रुति प्रकाशनसँ आबि रहल अछि। निन्नानबेक फेरमे हमरा जनैत कवि कहियो नै पड़लाह। जिनगीक ऐश्वर्य आ प्रेमकेँ कवि खूब नीक जकाँ भोगलाह। परन्तु ई सभ मृगतृष्णा बनि कविक जिनगीमे आबैत जाइत रहल- कयलहुँ जहिना किछु आलिंगन चुभि गेल अनेको वक्रशूल उड़ि गेल गगन दुर्लभ सुगंध झड़ि गेल धरा मकरंद प्रीत सौन्दर्यक भूमि मरूभूमि भेल रमणीय देवसरि सुखा गेल कवि जिनगीकेँ ऊँच-नीचक कविता जकाँ देखलखिन्ह अर्थात विभिन्न भाव आ रससँ परिपूर्ण। कोनो एक रस आ भावमे रमनाइ ओ नै सिखलन्हि। संभवतः काल देवता स्वयं हुनकर कीर्तिक सोझाँ आबि गेलाह अन्यथा हुनकासँ कम सामर्थ्यक कविगण बेशी यश, पुरस्कार आ सम्मानक भागीदार बनलाह। ई अभिशाप कविक कम आ मैथिली आ भारतीय साहित्य आ आलोचनाक बेसी अछि। गामक जिनगीक समीक्षा भैंटक फड़ देख बिहुसैत नर-नारी, बिसाँढ़क लेल पताल कोरैत मैथिलजन, चुन बनएबा आ बेचबाक कठिन उपक्रम करैत लोक आ बदलैत तकनीकीसँ तालमेल बैसबैत, उपार्जनक लेल गाम, राज्‍य छोड़ैत जनसमुद्र। संयुक्‍त परिवार, वर्णव्‍यवस्‍था आ गामक पारंपरिक अर्थव्‍यवस्‍थाकेँ छेदैत विभिन्‍न कोटिक परिवर्तन। कोनो ब्राहमण आ कुम्‍हारक ढहैत जजमानी। ताड़ी कीनए बेचए आ पीबैक अनंत अंर्तकथा। पोखरि, गाछी, खेत आ गाममे पसरल मिथिलाक अनंत आ दिव्‍य सौंदर्यक एकसाथ दर्शन। इतिहासक प्रश्‍न ‘गामक जिनगी’क पहिल तीनटा कथा ‘भैंटक लावा’, ‘बिसाँढ़’, ‘पीरारक फड़ ‘अकालक समैमे मिथिलावासीकेँ पेट भरबाक साधन रहैत अछि, आ ई बात लेखकक सजग दृष्टि आ सामाजिक प्रतिबद्धताकेँ स्‍पष्‍ट करैत अछि। पुस्‍तकक संग उपलब्‍ध संक्षिप्‍त टिप्‍पणीमे गजेन्‍द्र ठाकुर जगदीश जीक कथाक ऐतिहासिक भूमिकाकेँ रेखांकित करैत छथिन्‍ह। बात केवल विषय चयनक दृष्टिसँ नइ अछि, बल्कि समग्र पुस्‍तकमे मिथिलाक निम्‍न मध्‍यवर्गक जिनगीक जतेक गहराइसँ देखल गेल अछि, ओ अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। कथाकार मिथिलाक गाममे जइ गंभीरतासँ भ्रमण करैत छथिन्‍ह, ई साहित्‍येटाक लेल नै अपि‍तु इतिहास आ अर्थशास्‍त्रक लेल सेहो प्रामाणिक सामग्री उपलब्‍ध करैत अछि। नॉस्‍टेल्जियाक सच की जगदीशजी अतीत मोहसँ ग्रस्‍त छथि। प्रस्‍तुत संग्रहमे लेखक मिथिलाक ग्राम आ ग्राम्‍य जीवनक प्रति खास अनुराग व्‍यक्‍त करैत छथि। एतबे धरि नै ओ शहरीकरण, शहरमे प्रवास आदिक प्रति खास वितृष्‍णा व्‍यक्‍त करैत छथि। ‘भैयारी’ कथामे कुसुमलाल कोर्टमे नौकरी करैत छथि आ मधुबनीमे रहैत छथि। आ हुनकर पैघ भाय दीनानाथ गामेमे रहैत छथिन्‍ह। आ गामोमे रहैत दीनानाथ अपन जिनगीक गाड़ी नीक जकाँ चलबैत छथि, मुदा कुसुमलालक गाड़ी लसकि जाइत छैक। शराब पीबैत-पीबैत हुनकर लीवर गलि गेलै। सौंसे देहमे घाव भऽ गेलै। आ घरवाली सेवा करए केर बदला गरियाबै आ बड़का बेटा कहए- ‘पप्‍पा जी, महकता है’।’ निस्‍संदेह गामक सहजता, सरलताक प्रति लेखकमे एकटा खास किस्‍मक सि‍नेह अछि, ताहि‍ दुआरे ओ डेग-डेगपर गाममे रहनाइ, गामक धन्‍धा-पानिकेँ गौरवान्वित केनाइ नै बिसरैत छथिन्‍ह। क्‍लासिकी परम्‍पराक पृष्‍ठभूमि कोनो भाषाक प्रतिनिधि कथाकार भाषा, साहित्‍य आ समाजक वर्तमानक दबाव ग्रहण करितहुँ प्रतिकारक व्‍यक्तित्‍व राखैत अछि, आ ऐ प्रतिकारेमे मौलिकता छैक। वरिष्‍ठ कथाकार सुभाषचन्‍द्र यादव ‘गामक जिनगी’पर संक्षिप्‍त टिप्‍पणी करैत कहैत छथिन्‍ह- ‘हुनक कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। ‘आब प्रश्‍न ई अछि जे घटना बहुलता तँ कथाक नीक लक्षण नै मानल गेलइ तखन ऐ टिप्‍पणीक की मतलब? कहानी वा कथा जखन घटना केंद्रित संरचना त्‍यागि कऽ मनोवैज्ञानिकता वा मनोविश्‍लेषण दिस प्रस्‍थान केलक तखन ई मानल गेलइ जे कथाक पहिल चरण समाप्‍त भेलइ आ कथा विकासक दोसर सोपन दिस बढ़ल। मुदा ऐ विकासक साँचाकेँ जगदीशजी सँ जोड़नइ जगदीशजीक संग अन्‍याय होयत, कारण जे जगदीशजी घटना बहुलतापर निर्भर नै छथि। बहुतो कहानी लेखकक कवितामयी व्‍यक्तित्‍व, हुनकर गंभीर मनोविश्‍लेषण आ सक्‍कत विचारसँ लैश अछि ‘पिछला बाढ़ि‍ मोन पड़तहि देह भुटुकि जाइत अछि। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। बाढ़ि‍क विकराल दृश्‍य आँखिक आगू नाचए लगैत अछि। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बािढ़यो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुिढ़या। बुिढ़या रुप बना नृत्‍य करैत। ककरा कहू बड़की धार आ ककरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्‍ह-पह‍चिन्‍ह मेटा समुद्र जेकाँ बनि गेल। जेम्‍हर देखू तेम्‍हर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दछिन मँुहे दौगल जाइत। कतेक गाम-घर पजेबाक नहि रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग, चापाकल, पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल।’ ऐ प्रकृति दृश्‍यकेँ देखल जाओ, प्रकृतिक स्‍वाभाविक लीलादर्पणमे मानवक कठिन भविष्‍य देखाओल गेल अछि। कथामे आगू बाढ़ि‍जनित भुख आ दरिद्रताक मर्मस्‍पर्शी चित्रण अछि। निश्चित रूपेण जगदीशजी मैथिली कथाकेँ क्‍लासिकी परम्‍परा दिस बढ़बैत छथिन्‍ह आ मैथिली कथा एकटा गौरवशाली युगक दुआरिपर अछि। आंचलिकताक भ्रम कथा संग्रहमे ग्राम्‍य जीवनक विराट उपस्थिति ऐ भ्रमकेँ उत्‍पन्‍न करैत अछि, कि जगदीश जी आंचलिक शैलीक लेखक छथि। तद्भव आ देशज शब्‍दक बाहुल्‍य, एक खास वर्ग वा जातिक ग्राम्‍य जीवनक प्रसंगक बहुविधि चर्चा। ‘चुनवाली’मे चुन बनबएबला मिथिलाक एकटा जातिक संघर्षक चर्चा अछि। डाॅ. धीरेन्‍द्र वर्मा कहैत छथिन्‍ह- ‘आंचलिकताक सिद्धिक लेल स्‍थानीय दृश्‍य, प्रकृति, जलवायु, पाबनि, लोकगीत, बातचितक विशेष ढ़ंग, मुहावरा, लोकोक्ति, उच्‍चारणक विकृति, आमजनक स्‍वभावगत आ व्‍यवहारगत विशेषता, हुनकर अपन रोमांस, नैतिक मान्‍यता आदिक समावेश अत्‍यंत सतर्कता आ सावधानीसँ कएल जाइछ।’ यदि ऐ मानकपर देखी तखन गामक जिनगीक अधिकांश कथा आंचलिकता दिस झुकाव देखबैत अछि। मुदा ई बात सदिखन स्‍पष्‍ट रहबाके चाही कि मिथिलाक प्रति अनुरक्ति देखेबाक बावजूद ऐ संग्रहक कथा आंचलिक नै अछि। किएक तँ लेखक कोनो कथामे मिथिला अंचलक नायक नै बनेने छथि आ ई विशेषता हिनका किछु-किछु यात्री जीसँ जोड़ैत अछि आ रेणुसँ अलग करैत अछि। ई बात उल्‍लेखनीय अछि कि लेखक मिथिला क्षेत्रक परंपरा, लोकोक्ति, गीत-नाद, नाच –तमाशाक वर्णनक प्रति कोनो अतिरिक्‍त राग प्रदर्शित नै करैत छथि। अर्थात ई तत्‍व कथामे ओतबे अछि जते कि कोनो प्रगतिशील लेखकक कृतिमे होइछ। आंचलिकताक एकटा अन्‍य पहलू विचारनीय अछि। मिथिलाक निम्‍न आयवर्ग जीवनक जते प्रभावशाली चित्रण अइठाम अछि, ओ अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। आ ई चित्रण जत्‍ते पूर्ण अछि ततबे प्रामाणिक। ऐ दृष्टिसँ ‘चुनवाली’ ‘रिक्‍साबला’ हारि-जीत’क विश्‍लेषण आवश्‍यक अछि। जीवन संघर्षक कथाकार सुभाषचन्‍द्रजी जगदीशजीकेँ जनवादी आ प्रकृतिवादी कथाकार नै मानैत छथिन्‍ह, बल्कि जीवन-संघर्षक कथाकार मानैत छथिन्‍ह। ऐ विचारमे निहित जनवाद आ प्रकृतिवाद सन पारिभाषिक शब्‍दक विवेचनसँ बचैत ई कहब आवश्‍यक अछि जे जगदीश जीक यथार्थवाद कोनो सुपरिभाषित यथार्थवादक साँचामे सेट नै होइत छैक आ सेट करबाक प्रयासो नै करबाक चाही। भारतीय साहित्‍यमे यथार्थवादक एकाधिक मॉडल उपलब्‍ध अछि, आ जगदीश जी ककरो अनुकरण करबाक स्‍थानपर नव मार्ग बनेबाक लेल प्रयासरत छथि। ग्रामीण जीवनकेँ विषय बनेबाक लेल ‘पाथेर पांचाली’ ‘गणदेवता’आ ‘मैला आँचल ‘गोदान’ सन कतेको क्‍लासिक उपलब्‍ध अछि। ई स्‍पष्‍ट नै अछि कि ओ ऐ मे कोन पढ़ने छथि आ कोन नै, मुदा ई स्‍पष्‍ट अछि कि ओ अपन विशेष दृष्टिसँ स्‍वीकृतकेँ अतिक्रमणक लेल कटिबद्ध छथि। जगदीशजी दुखकेँ गौरवान्वित करबामे विश्‍वास नै करैत छथिन्‍ह, ओ अनंत दुख आ दुखमयी विश्‍वक धारणामे विश्‍वास नै करैत छथिन्‍ह। ओ प्रचण्‍ड आशावादक लेखक छथि, ताहि दुआरे बाढि़, सुखार, अकाल, महामारी आ विभिन्‍न व्‍यक्तिगत आपदाक बीच आदमी जीवैत आ जीतैत छथि। निरालाःदेह विदेह (१-४) हिन्दी भाषा आ साहित्य क केन्द्रीयता स्वातंत्रयोत्तर भारतक एकटा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना ।एकर मूल कारण राजनीतिक आ वाणिज्यिक रहितहु परिणाम बहुआयामी अछि ।हिंदी साहित्यक आ विशेषतः कविता के सौंदर्यात्मक ,वैचारिक आ शैल्पिक वैविध्य सँ पूर्ण करबा मे कवि निराला क योगदान अप्रतिम ।ने केवल कविता बल्कि ईमानदारी मे सेहो निराला क व्यक्तित्व क चर्चा क सेहो कतिपय आयाम । आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व मे निराला अग्रणी छथि ,जनिकर व्यक्तित्व आ कृतित्व क हरेक अंश सँ ईमानदारी,रचनात्मकता,आलोचना आ अफवाहक मार्ग प्रशस्त होइत अछि ।निराला काव्य क अनुवादक महत्व विभिन्न प्रसंग आ संदर्भ सँ अछि ।प्राचीन संस्कार आ आधुनिकता क आंदोलनमयी धारा कें आत्मसात करबाक जतेक सामर्थ्य निराला साहित्य मे अछि ,ओतेक अन्यत्र नइ ।दोसर बात ई जे निराला काव्य क माध्यम सँ हिन्दी साहित्य मैथिली आ बांग्ला सँ जुड़ैत अछि ।निराला पर विद्यापति आ रवीन्द्रनाथक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट अछि ।हिंदी आलोचक निराला पर विद्यापतिक प्रभाव पर बहुत नइ लिखने छथि ,मुदा ई प्रभाव देखबा क हो तखन ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे‘ क तुलना विद्यापति लिखित वसंत गीत ‘नव नव विकसित फूल ‘सँ करू । शब्दार्थचिंतामणिकार अनुवादक दू टा अर्थ लिखैत छथिन्ह ।प्रथम ‘प्राप्तस्य पुनःकथने ’आ दोसर ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने ‘ एकर अर्थ भेल पहिले कहल गेल कथन के फेर सँ कहनए आ ज्ञात अर्थ के प्रतिपादित केनए ।प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक रोमन याकोबसन एकरा ‘एक भाषा के शाब्दिक प्रतीक के अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीक के द्वारा व्याख्या‘ मानैत छथिन्ह ।नाइडा आ टेबर कनेक विस्तृत करैत कहैत छथिन्ह कि ई मूल भाषा क संदेशक समतूल्य संदेश के लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत करबा क क्रिया अछि जाहि मे संदेशक सममूल्यता पहिले अर्थ आ फेर शैली क दृष्टिकोण सँ निकटतम आ स्वाभाविक होइत अछि । भाषिक प्रक्रिया होएबा क कारणें अनुवाद क सम्बन्ध भाषेटा सँ नइ बल्कि भाषाविज्ञानो सँ अछि ।ध्वनि ,शब्द,रूप,वाक्य आदि विभिन्न स्तर मिलि के अर्थक संसार रचैत अछि ,ताहि दुआरे ऐ सब स्तर क प्रति सजगता अनिवार्य अछि ।प्रत्येक भाषाक अपन विशिष्ट ध्वनि ,शब्द भंडार आ रूप व्यवस्था होइत अछि ,ताहि दुआरे ऐ स्तर मे निहित अंतर के कारणें समान लागए वला प्रसंग सेहो वास्तविक अर्थ मे अर्थान्तर क संभावना सँ युक्त होइत अछि । ऐ ठाम ई तथ्य उल्लेखनीय अछि कि मैथिली आ खड़ीबोली हिन्दी कोनो दू ध्रुवीय भाषा नइ अछि ।दूनू दू टा प्रादेशिक अपभ्रंशक संतान आ ताहि दुआरे संस्कृत ,पालि आ प्राकृतिक विरासत पर समान रूप सँ अधिकारिणी अछि ।ध्वनि ,शब्द आ रूप क स्तर पर अनगिन साम्य अछि ।संस्कृत क रात्रि मैथिलीए टा मे नइ अवधी,ब्रजभाषा,भोजपुरी सहित कतेको उत्तर भारतीय भाषा मे ‘राति‘ अछि आ ‘दिन‘ त‘ सर्वत्र ‘दिन‘े अछि ।तहिना भोर आ दुपहर अपन विभिन्न ध्वनिभेद क संग विद्यमान अछि ।उदाहरण केवल एक या दू शब्दक नइ अछि ,सुधी पाठक ऐ उभयनिष्ठ आधारक जटिल उपस्थिति सँ परिचित छथि । ई उभयनिष्ठ आधार अनुवाद मे सुविधा लऽ के आबैत अछि,मुदा ऐ ठाम आलस्य आ अनुकरण क खतरा मौलिक अनुवाद के समक्ष चुनौती दैत अछि ।सबसँ बेशी शब्द तद्भव के आ ओहि पर सब भाषा क तेहनें अधिकार तखन ई नबका शब्द कत‘ सँ आनी ,देशज शब्दक प्रयोग प्रचलन आ स्वीकृति क आधारे पर स्वीकार्य होयत ।मिथिला क व्यापक भूभाग मे पजेबा सँ बेशी स्वीकृत शब्द ईंटा अछि तखन ककर व्यवहार करी आ ककर नइ करी ? वैज्ञानिक तथ्य वा गद्यात्मक सूचना क प्रस्थापन अभिधात्मक भाषा मे सुगमता मे संभव अछि ,मुदा भावप्रधान रचना मे अर्थ क अनेक स्तर आ कथनक बहुविधि व्यंजना होइछ,परिणामतः प्रत्यक्ष भाषिक प्रतिस्थापन संभव नइ, ताहि दुआरे अनुवादक के परकाय प्रवेश करऽ पड़ैत अछि ।अनुवादक मूल कृति आ रचनाकार क मनोजगत मे घुसि के भाव आ ओकर अर्थच्छाया के समझैत अछि तथा फेर ओइ भाव के यथासंभव लक्ष्यकृति मे अभिव्यक्त करैत अछि ।कलाकृति के एहन समझ आ फेर ओकर कलात्मक संप्रेषण क लेल सर्जनात्मक प्रज्ञा क विद्यमानता अनिवार्य अछि ।ई प्रज्ञा सर्वत्र एकरूप मे उपस्थित नइ अछि ,ई देखबा क अछि तखन उमर खय्याम क रूबाई क अनुवाद क्रमशः फिट्जराल्ड (अंग्रेजी) आ मैथिली शरण गुप्त, बच्चन जी ,केशव प्रसाद पाठक आ सुमित्रा नंदन पंत(सब हिंदी)क अनुवाद मे निहित भावभंगिमा आ गुणवत्ता क अंतर देखि सकैत छी ।गीतांजलि क अनुवाद मैथिली मे सुमन जी केने छथि आ हिंदी मे अज्ञेय आ अन्य कतेको विद्वान मुदा बांग्ला विद्वानजन सुमन जी द्वारा अनुदित ‘अनुगीतांजलि‘ के ह्रदय खोलि के प्रशंसा केने छथि । ऐ ठाम हम परकायप्रवेशक वांछित योग्यता क साथ उपस्थित नइ छी ।हम निराला काव्य मे निहित व्यंजना क महान शक्ति के स्वीकार करैत छी आ निराला काव्य मे ,ओकर शब्द आ शब्द योजना मे निहित उदात्त के मानैत छी ।ई उदात्त किछ किछ संस्कृतक तत्सम शब्द,सघन वर्णमैत्री,वर्णक ध्वन्यात्मकता मे निहित अछि ,ताहि दुआरे मैथिली पाठक के हम शब्द आ अर्थक अइ स्वर्गिक संसार सँ वंचित नइ करऽ चाहैत छी ।हम अपन अनुवादक सीमा के सहज स्वीकारैत छी अनुवादक एकाधिक रूप मे प्रचलित अछि ।शब्दानुवाद(लिटरल) या मूलनिष्ठ अनुवाद सामान्यतः अभिधात्मक होइत अछि ,ऐ अनुवाद मे श्रोत भाषाक प्रत्येक शब्द आ अभिव्यक्ति क प्रतिस्थापन लक्ष्यकृति क शब्दावली,अभिव्यक्ति तथा संरचना मे होइछ । भावानुवाद मे मूल भाषा क अभिव्यक्ति क स्थान पर ओइ मे निहित आशय के स्पष्ट कएल जाइत अछि ।ई मूलकृति क ढ़ाँचा सँ स्वतंत्र होइत अछि,ताहि दुआरे लक्ष्यकृति क दृष्टि सँ ई बेशी सहज आ स्वाभाविक होइत अछि ।सुरेन्द्र झा सुमन द्वारा ‘गीतांजलि‘ क अनुवाद ‘अनुगीतांजलि‘ भावानुवादक श्रेष्ठ उदाहरण अछि । रूपांतरण कथा साहित्य क क्षेत्र मे लोकप्रिय अछि ।अइ मे अनुवादक मूलकृति क परिवेश ,चरित्र ,आदि के देश-कालानुसार परिवर्तित करैत अछि ।शेक्सपीयर रचित ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ क हिंदी अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम सँ केलाह ।एइ मे एंटोनियो क नाम अनंत ,बसानियो क नाम वसंत आ शायलॉक क नाम शैलाक्ष अछि ।घटना वेनिस नगरक स्थान पर काशी(भारत) मे घटैत अछि । ‘छायानुवाद‘रूपांतरणक एकटा प्रकार अछि ,अइ मे मूलकृति क आधार पर मूल कथ्य के संप्रेषित करबा क लेल स्वतंत्र कृति क निर्माण संपन्न होइत अछि ।अइ मे बिंब विधान ,प्रस्तुतिकरण आदि मूलकृति क प्रतिबिंब होइत अछि ।भगवती चरण वर्मा क उपन्यास चित्रलेखा अनातोले फ्रांस क उपन्यास ‘थाया‘ पर आधारित अछि ।विदेशी फिल्म आ साहित्य क अनधिकृत अनुवाद आ रूपांतरणक लेल अइ विधि क बहुत प्रयोग होइत अछि । ‘सारानुवाद‘ मे मूलकृति क सार लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत कयल जायत अछि ।संप्रेषण केंद्रित अनुवाद क्लासिकी रचना के बच्चा आ किशोर सब के पढ़बा क लेल रूपांतरण मे सहयोगी होइत अछि ।जेना महाभारत वा रामायण पर आधारित संक्षिप्त कथा । ‘टीकापरक अनुवाद‘ मे अनुवाद क साथ ओकर व्याख्या रहैत अछि ।गीताप्रेस क किताब मे एहन अनुवाद प्रचूर मात्रा मे उपलब्ध अछि ।किछु दिन पहिले विद्यापति पदावली क किछु पदक अनुवाद यात्री जी द्वारा कयल गेल दिल्ली विश्वविद्यालयक प्रोफेसर प्रभात रंजन जी क ब्लॉग पर उपलब्ध छल । अंत मे फेर काव्यानुवाद पर आबी ।कविता क अनुवाद नमहर चुनौती अइ दुआरे छैक कि कविता मात्र शब्दार्थ तक नइ सीमित छैक ।ई शब्द सँ आगू वाक्यगठन,लय,छंद,बिंब,प्रतीक,अलंकारयोजना,शैली आदि क मिल जुलल परिणामी काव्यात्मक पर्यावरण पर आधारित अछि ।ताहि दुआरे दाँते आ सर फिलीप सिडनी सन विद्वान काव्यानुवाद के असंभव मानैत छथिन्ह ।कविता क समग्र प्रभाव वा व्यंग्यार्थ ध्वनि ,लय ,बलाघात आ बिंब योजना के माध्यम सँ अभिव्यक्त होइत अछि ।ताहि दुआरे निराला क शब्द चयन ‘विजन-वन वल्लरी‘‘पुलिन पर प्रियतमा‘मैथिली मे यथावत अछि । कविता क दृश्य आ श्रव्य बिंब बहुधा शब्द क नादात्मकता सँ नियंत्रित होइत अछि ।एहिना शब्दालंकार आ अर्थालंकार क विकल्प लक्ष्यभाषा मे सृजित कएनए कठिन अछि ।काव्यानुवाद क सबसँ नमहर समस्या छंद आ लय अछि ।मूल रचना क लेल प्रभावी छंद आ लय के खोजनए अनुवादक लेल सबसँ पैघ समस्या अछि ।यदि कविता क अनुवाद गद्य मे आबैत अछि तखन अनुवाद मात्र शब्दार्थ तक सीमित रहत आ अइ मे कविता क पूरा अर्थ निकलि के बाहर नइ आयत ।अनुवाद सम्बन्धी अइ अवधारणा क लेल हम सर्वश्री/सुश्री रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,कृष्ण कुमार गोस्वामी ,कुसुम बांठिया ,गजेन्द्र ठाकुर ,रवीन्द्र कुमार दास जी क आभारी छी । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-१ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) मैथिलीःदेह-विदेह क अइ पहिल किश्त मे निराला जी क दू टा लोकप्रिय कविता क अनुवाद प्रस्तुत क‘ रहल छी ।सहज सँ जटिल आ जटिल सँ जटिलतर दिश ‘‘क्रम क्रम सँ भेल पार राघवक पंचदिवस चक्र सँ चक्र चढ़ि गेेल भेल उर्ध्व निरलस ‘‘(रामक शक्ति पूजा) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्धु (बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु!) जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्ध पूछतओ पूरा गाम बन्धु ई घाट छलए जइ पर हँसि के ओ रहए नहाबति रे! धसि के रहि जाइत छलए आँखि फसि के कांपैत रहए दूनू पैर बन्धु ! ओ हँसी बहुत किछु कहए छलए तैयो अपने मे रहए छलए सबके सुनैत सबके सहैत दैत ओ सबके दाँव बन्धु । हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि (किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं ।) हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि दिखाबे टा दर्शन देेेने जा रहल छथि जुड़ल छल सुहागिन केर मोती क दाना ओएह सूत तोड़ने लेने जा रहल छथि छिपल चोट के बात पूछलउं त बजलीह निराशा क डोरी सीने जा रहल छथि ई दुनिया के चक्कर मे केहन अन्हर मरल जा रहल छथि जियल जा रहल छथि खुलल भेद एहि ठां ,जे विजयी कहायल। ओ खूं दोसरा के ,पीने जा रहल छथि । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-२ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) स्नेह निर्झर बहि गेलइ (स्नेह निर्झर बह गया है) स्नेह निर्झर बहि गेलइ देह बाउल सन रहि गेलइ डारि आमक ई जे सूखल दिखल कहि रहल“ने आब छइ ,कोनो कोयल के आयत ,ई पांति मे हमही कहल अर्थ नइ छइ एकर- जीवन जरि गेलइ” “देने छी हम जगत के ,जे फूल फल केने छी अपन प्रभा सँ,चकित-पल छल अनश्वर सकल पल्लवित पल- जीवनक ऐश्वर्य सब ढहि गेलइ ” आब नइ आबइ पुलिन पर प्रियतमा श्यामतृण पर बैसबा ले निरूपमा बहि रहल अछि हृदय पर केवल अमा हम अलक्षित छी ,इएह कवि कहि गेलइ ” 2 हम अकेला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। सूखल पाकल ,आधछिद ई केश हम्मर भेल निष्प्रभ गाल हम्मर मन्द भेलइ चालि हम्मर हटि रहल मेला नदी झरना जानि रहलहुँ छल जे बाँकी पार केनए क‘ चुकल ई देखि हँसलहुँ नाव ल‘ केओ ने एला देख रहलहुँ ,आबि रहलइ हमर दिनक ,ई सांध्य बेला। निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-३ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) रंगि गेल धरा ,भेल धन्य धरा जगमग ई जग भेल मनोहरा धरि रंग सुगन्ध भरि मौध मकरन्द गाछक लाली भऽ गेल गाढ़ फुजि पत्रपुष्प केर राग ठाढ़ भेल डेग डेग हरियर पूरा। रंगि.......... ग्ुंाजल कोयली केर पंचम स्वर कुचरइ कौआ मैना मृदुतर सुख सँ कँपैत रमि प्रणय केरि वनश्री चारूतरा । रंगि.......... 2 सखि वसन्त आयल भरल सिनेह जंगल केर मन मे नवोत्थान पसरल । पल्लव पहिरि कोंपरक लत्ती मिलल मधुर प्रिय गाछक पत्ती भंउरा गावइ कोयली सिहकइ नव नव स्वर भावल । कोंपर कल्ली हार बनल हन मद्धिम मद्धिम बहथि पवन सन जागि गेल प्रियवर के नयन मे मधुर प्रकृति अभरल । फैलल गोट पीयर कमलदल तहिना पसरल केशर कलकल खेत पथार सोना सन सुन्दर धरती पर फैलल । निरालाः मैथिलीःदेह-विदेह-४ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे) छाड़ल कारी कारी बादर एला नइ वीर जवाहर लाल केहन केहन नाचए अधसर नइ एला वीर जवाहर लाल चमकल बिजुरी फन पसारि के नइ एला वीर जवाहर लाल सोझ करू उलटल माथ के ससरैत फूफू करए माथ पर नइ एला वीर जवाहर लाल पूरबा अलगे फूफकारइ छइ प्रतिक्षण विष बकुटि बरसाबइ छुपल कोन गुफा मे हम सब नइ एला वीर जवाहर लाल मंहगाई के बाढ़ि बढ़ल अछि सबके संचित निधि लुटल अछि भुक्खल नॉंगर ठाढ़ लजाबथि नइ एला वीर जवाहर लाल कोना बचउँ बिन भाला लाठी बहल भसल सभ मित्र मंडली राह देखइ छी ,किछु नइ बुझइ छी नइ एला वीर जवाहर लाल आचार्य भामहक चिंतन भामह अलंकारवादी रहथि आ संस्‍कृत आलोचना क ऐ विवाद सॅं परिचित छलाह जे काव्‍यसौंदर्यक मूलाधार शब्‍दालंकार मे होइछ वा अर्थालंकार मे ।पहिल मानैत छलाह जे काव्‍य मे चमत्‍कार क सृष्टि शब्‍द सौंदर्ये सँ संभव अछि ।दोसर समुदाय मानैत छल जे उपमा ,रूपक आदि अर्थालंकारे सँ काव्‍य शोभा होइछ ।भामह अपना हिसाबें दूनू मे समन्‍वय करबा के प्रयास केलखिन्‍ह । ' शब्‍दार्थौ सहितौ काव्‍यम्' क द्वारा भामह शब्‍द आ अर्थ दूनू क महत्‍व पर बल दैत छथिन्‍ह ,अर्थात शब्‍द आ अर्थक सहभाव मे काव्‍यक सृष्टि होइत छैक ।य‍द्यपि भामहक चिंतन सँ ई विवाद आर गहिरायल कि काव्‍य कत' होइत छैक 1 शब्‍द मे2 अर्थ मे 3 या सहभाव मे ।ई विवाद एते प्रबल रहल कि शाहजहॉ कालीन विद्वान जगन्‍नाथ कहलखिन्‍ह 'रमणीय अर्थक प्रतिपादक शब्‍दे काव्‍य थिक ।आ वर्तमान मैथिली कविता के देखल जाइ तखन लागैत अछि जे फेर सॅ शब्‍द अपन जाल फैला रहल अछि । ओना आधुनिक मैथिली मे फतवा क कमी नइ छैक आ जइ कविता के प्राचीन सॅ प्राचीन आचार्य तक नवोन्‍मेष के कारणें स्‍वीकार क' सकैत छलखिन ओ कविता मैथिली मे एक झटका मे श्रीविहीन साबित क' देल जाइत अछि ,आ तहिना श्रीविहीन कविता के गौरवान्वित करए के सेहो ऐ ठाम सुदीर्घ परंपरा अछि । दण्‍डी आ काव्‍यलक्षण दण्‍डी नीरस शास्‍त्रकार नइ छथिन्‍ह ,प्रतापी कवि सेहो छथिन्‍ह । ''अलंकृतमसंक्षिप्‍तं रसभाव निरंतरम '' ।हुनकर स्‍पष्‍ट विचार अछि कि कविता ओइ पदसमूह क नाम छैक ,जे वांछित सरसता सँ युक्‍त हो ।ऐ ठाम कविप्रतिभा सुंदर पदावली सँ संयुक्‍त हेबाक चाही । ''शरीरंतावदिष्‍ठार्थ व्‍यवच्छिन्‍ना पदावली ''(काव्‍यादर्श) । इष्‍टार्थयुक्‍त पदावलीक एकटा अर्थ ई जे पद मे 'योग्‍यता' ,'आकांक्षा' आदि होयबाक चाही ।दंडी महाराजक मंतव्‍य ऐ ठाम ई अछि कि इष्‍ठार्थत्‍व क सौजन्‍ये सँ काव्‍यत्‍व क जन्‍म होइत छैक ।यद्यपि हुनक रसचेतना भावात्‍मक कम आ अलंकार केंद्रित बेशी अछि आ हुनका लेल समस्‍त अलंकारक उद्देश्‍य रससृष्टि मात्र छैक । हिनकर चिंतन मे 'इष्‍टार्थ'क स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या नइ छैक ,तैयो ई मानल जाइत अछि जे ऐ पदक संदर्भ भामहकालीन काव्‍यचिंतन सँ छैक ।भामहक लेल शब्‍दालंकार आ अर्थालंकार दूनू इष्‍ट छलइ ,मुदा दण्‍डी क लेल शब्‍द,अर्थ,रस सौंदर्य सँ युक्‍ते पदावली काव्‍य थिक ।दण्‍डी क सीमा ई अछि जे ओ ' 'इष्‍टार्थ'क चर्चा मात्र अर्थालंकारक लेल करैत छथिन्‍ह । दण्‍डी क सीमा स्‍पष्‍ट अछि ओ शब्‍दार्थ के काव्‍यक शरीर मानैत छथिन्‍ह आ अलंकार के आत्‍मा ।हुनकर विचार मे अलंकारविहीन पदावली साहित्‍य नइ भ' सकैत अछि । लघुकथा-बोधिसत्व ट्रेन तऽ धीरे -धीरे रूकलइ ,मुदा भुटटु झा औंघायल छलाह ,लागलेन माथ मे चोट ।माथ हँसोथि देख‘ लागला ,केओ देखलक तऽ नइ ?ई देखि के कि सब सूतल छलइ ,निश्चिंत भेलाह ।कुलिया सँ झगड़ि के सीट नेने छलाह ,खिड़की लग वला सीट । दूरक यात्रा मे ऐ सीट क दाम पचास टका बेशी छलइ ,मुदा भुटटु झा किएक देथिन पैसा ,ओ कहलखिन हमरा संग मे टिकट छैक ,हम पैसा नइ देबओ ।कुलिया हिनकर कालर धऽ लेलकइ ,ईहो ओकर माथा वला केश बकुट्टा सँ पकड़ि लेलखिन ,तखन यात्रीगण आ प्लेटफार्म पर ठाढ़ सिपाही बीचबचाव केलकइ आ भुट्टु झा के कोनो आश्चर्य नइ भेलेन ,जखन ओ सिपाही ओमहर जाके कुलिया सब संगे हंसि हंसि के बात कर‘ लागल ,ई दुनिया एहने छइ सौंसे क सौंसे कि करियन आ कि दिल्ली ।झोरा सँ घड़ी निकालला ,पाँच बाजइ मे दस मिनट बाँकी छलइ ।कोनो ठीक ठाक स्टेशन छलइ ,नाम देखइ ले मूड़ी बाहर केला ,कोनो बोर्ड नइ मिललेन्ह ,गेट दिसि आबि के देखऽ लागला ,एकटा चाय वला देखेलेन,हिंदी मे पूछलखिन तऽ बतेलकेन कि ई जौनपुर जंक्शन छियइ ।जौनपुर सुनिते हुनका लागलेन जे ऐ गामक नाम त‘ सुनने छियइ ,यादि करऽ लागला काकी ,भौजी क नैहर आ बहिन ,दीदी क सासुरक नाम । भीड़हा ,बलहा ,बल्लीपुर ,मुस्लिमपुर ,बहेड़ी ,मालीपुर ,एघु ,शासन ,रमभदरा पुर ,कापनि ,बलिया ...............मसानखोन आ आरो कतेको नाम ।धीरे धीरे ईहो नाम सब सठऽ लागलइ ,यादिए नइ पड़लेन्ह कि ई जौनपुर क नाम कहिया सुनने छलियइ आ ऐ ठामक के सऽर सम्बन्धी या मित्र दोस्त अछि ।भुट्टु झा हाफी कर‘ लागला ,फेर एमहर ओमहर देखि तमाकू निकालला ,चुनौटी खोजइ काल मे हुनकर हाथ पोलीथीन सँ टकरा गेलइ ,भुटटु झा निश्चिंत भेला ,हुनकर सर्टिफिकेट सुरक्षित अछि ।मैथिली सँ स्नातकोत्तर ,प्रथम श्रेणी ,विश्वविद्यालय मे दोसर स्थान ।पहिल स्थान बलवन्त झा क पुत्री कें ।पहिल स्थानक रिजल्ट लगभग निकलले छलइ ,बलवन्त बाबू विभागाध्यक्ष छलखिन आ बेटी क‘ लेल स्पेशली नोट्स बनेने छलखिन ,मुदा परीक्षा क बाद सिचुएशन बदलि गेलइ ,काँपी विश्वविद्यालय सँ बाहर चलि गेलइ ,बहुतो विद्यार्थी फेल भऽ गेला या पचपन प्रतिशन नइ आनि सकला ।मुदा प्रोफेसर साहेबक पैरवी दोसरो ठाम चलल आ गार्गी प्रथम मे प्रथम भेलीह ।आश्चर्य भेलइ जे भुट्टु कोना दोसर स्थान आनला ।ओइ प्रसंग क चर्चा कने नून तेल लगा के हास्टल सँ ल‘ के विश्वविद्यालयक कर्मचारी वर्ग तक मे फैल गेलइ ,सब कहैत छलाह कि बलवंत बाबू अपना बेटी क टॉप करेलखिन आ होमय वला जमाय के लग सटेलखिन ,मुदा ई बात सब बेशी दिन नइ चललइ । गार्गी पी0एच0डी0 सेहो केलखिन आ बापे संग नियुक्त भऽ गेलीह ।बात बहुत लम्बा छैक ,भुटटु झा की सब यादि करताह ,तमाकूल चूना ठोर मे दबा सूतबा क प्रयास करऽ लागला ,मुदा सरबा नीन्न बिसरियो के कथी ले आयत ।एगो मच्छड़ माथे पर काटि लेलकेन आ जाबत ओइ दर्द सँ मुक्त हेता ,ताबत केओ उपरे सँ पादि देलकइ ।के हेतइ गौतमानन्द आ भुटकुन छथि ? पता नइ के ? भुट्टु झा हँसऽ लागला ,ठाढ़ भऽ के बर्थ पर देखलखिन दूनू एक दोसर के गोरथारी मे सूतल ,गौतमानंद क पैर भुटकुन के माथ लग रहइ आ भुटकुन अपन पैर के गौतमानंदक करेज मे सटेने रहइ ।ई दृश्य कोनो नया नइ छलइ दिल्ली मे गामक बारह टा पुरूष एके रूम मे रहैत छलाह ।बारह सौ किराया छलइ ,कोना के एक दू टा आदमी देतइ ,सब मिलि के रहऽ लागला ।जमीन पर सूजनी बिछा के सब लोकनि राति मे सनपट्ट भऽ जाइत छला । केओ रिक्शा चलेनहार ,केओ सेठ के हवेली मे गेटकीपर ,केओ दुकान मे दूहजारी सेल्समेनक काम,केओ घूमि घूमि के खाना बनेने घुरइ ।सब एके ठाम रहइ ने जाति ने गुटबाजी ।कखनो बाभन खाना बनबइ तऽ कखनो दुसाध ,आ प्रशंसा केवल नीक खाना के होइत छलइ ,जाति दिसि तऽ ध्याने नइ जाइत छलइ ,जकरा जे मून हो कर,जे पहिरबे पहिर ,जे बाजबे बाज ।भुटटु अइ स्वतंत्रता के बिसरऽ नइ चाहैत छथिन ।गौतमानंद आ भुटकुन के ओ फेर सँ देखैत छथिन आ हुनका लागैत छन्हि कि जे बात ऐ ठाम अप्रासंगिक छैक ,सएह गाम मे हिमालय जँका ठाढ़ भऽ जाइत छैक । ’हिमालय‘शब्द दिमाग मे आबिते भुट्टु के कवि विद्यापति आ यात्री यादि आबैत छनि ,ओ स्पष्ट रूपे मानैत छथिन कि अइ दूनू कवि के रचना के आसपास मैथिली मे केओ नइ अछि । हुनकर ई मान्यता कतेको ठाम विवाद केने छैक ,तैयो ओ पूर्ववत छथि ।आब हुनका यादि पड़लेन कि जौनपुर सँ हुनकर की सम्बन्ध अछि? मिथिला क‘ राजा हुसैनशाही राजा सँ हारल छलाह आ कवि विद्यापति जौनपुर आयल छला ।भुट्टु झा फेर सोचऽ लागला कि मिथिला क‘ हजारो प्रोफेसर ,डॉक्टर ,इंजीनियर डेली दिल्ली ,पटना ,लखनउ ,लंदन घूमैत अछि ,लेकिन ओकरा मून मे किएक ने ओहन मौलिक विचार आबइ छैक ,जे कवि विद्यापति के जौनपुर मे एलेन ।मुदा जौनपुर आ विद्यापति के सोचि के की करताह भुट्टु झा ।प्रोफेसरी क नौकरी हिंदुस्तान मे शत प्रतिशत आरक्षित छैक । ई नौकरी प्राप्त करबा क‘ लेल प्रोफेसरक शुक्राणु वा अंडाणु सँ जनमनइ एकमात्र योग्यता छैक । भुट्टु झा के यादि एलेन कि बाबू हरिमोहन झा आ सुमन जी क सुपुत्र सेहो त प्रोफेसरे छथि ,फेर ओ अपने सोच पर राम राम करए लागला । हुनका लागलेन कि ई उदाहरण ठीक नइ अछि ।फेर तमाकू क डिब्बा खोजऽ लागला ,झोरा मे हाथ फेर सर्टिफिकेट सँ टकरा गेलइ ,आब तमाकुओ खेबा क मून उतरि गेलेन ।गार्ड हरियरका झंडी दिय‘ लागलइ ,ओहो निश्चिंत भेला ।झूठे मून व्याकूल अछि ,अनावश्यक चीज सब दिसि ध्यान लऽ जेबा क कोन फायदा ।उठऽ हओ भुटकुन ,उठऽ गौतमानंद ,आब त‘ दू घंटा मे बनारसो आबि जेतइ ,मुदा ओ दूनू बिना कोनो हरकत केने ओनाही सूतल रहलाा । भुट्टु झा सेहो सूति रहलाह ।ट्रेन धीरे धीरे बढ़ऽ लागल ।भुटटु झा के लागलेन कि ओ गाम पहुँचि गेल छलाह ,हुनका दलान पर अजीत झा बैसल रहए ,आ कोनो बात पर हुनकर गरदनि पकड़ि लेलकइ ।ओ कतबो प्रयास करथि ,गरदनि नइ छोड़ा पेलाह ,दलान पर बैसल किछु आर आदमी आबि के हिनकर गरदनि छोड़ब’ लागल ,मुदा ओ जत्ते छेाड़ाबथि ,अजीत क हाथ ओतबे मजबूत होइत गेलइ ।भुट्टु झा घिघियाब‘ लागला ,आब जान बचबा के कोनो संभावना नइ ।बचा........बू ...अओ ...लोक सब.......।जखन नीन टूटलेन त‘ गौतमानंद आ भुटकुन हुनका जगबैत आ हाथ पकड़़ने छलाह । की भेल भाइ?अहाँ सपना मे छलहुँ । कोनो खास नइ ,ओहिना....... भुट्टु झा फेर गामके नीक जँका यादि कर‘ लागला ।विभिन्न जातिए नइ मूल गोत्र गुट टोल आ रूचिक असंख्य कोटि मे बँटल मैथिल समाज ।सच के सच कहबा के लेल तैयार नइ ,जे बड़ प्रगतिशील से सच के अठारह आवरण मे सामने आनता।अजीत ,फूलो ,दिगम्बर सब त‘ लंठे लंठ अछि ,अकेले भुट्टु ककरा ककरा सँ लड़ता ,आ रिक्शा चलबइ वला आ राति के पहरेदारी करएवला भुट्टु के लोक जुत्ता सँ नइ मारतइ त‘ कि करतइ ,ओकरा तर्क आ विवेकक बात करबा क अधिकार के देलकइ?ओ की जान‘ गेलइ सोसाइटी आ पोलिटिक्स ,आ कविता आ उपन्यास के ऐ मैथिल समाज के की जरूरत? आब भुट्टु झा राखने रहथु अपन सर्टिफिकेट के माथ पर टाँगने ।दुनिया एहिना चलि रहल छैक ,जकरा चलबा के हो से चलइ चलू आ नइ त‘ ओहिना उंगरी करैत रहू यत्र तत्र सर्वत्र............. भुट्टु झा चाय पीलथि ,दू दू बेर तमाकू खेलथि ,एक बेर भुटकुन गरदनि के मटरो तोड़लकइ ,मुदा हुनकर चेहरा झुलसि गेलइ ,दसे मिनट मे लागलइ जे कोनो बड़का बीमारी हुनका दाबि देलकइ ।गामक भावी संघर्ष हुनका डराबऽ लागल ।अजीत झा ,फूलो झा ,दिगम्बर मिश्रक सौंझका दारूपीबा मंडली क विभिन्न रूप हुनका सामने आब‘ लागल ।पूजा क बहाने चंदा माँगबा क मासिक उपक्रम ,आ हिन्दू धर्म भरि साल व्यस्त बनेने रहबा क अवसर दैत रहल । ककरा ककरा सँ लड़ताह भुट्टु झा , के समर्थन मे आयत ,बेशी सँ बेशी केस करबा के ,गवाह बनबा के भरोसा । आ अहाँ शामिल भऽ जाउ हुनकर गेंग मे । गाड़ी स्पीड पकड़ि लेलकइ ,मौसम सेहो ठंडा गेलइ ,हवा बहिते झींसी पड़ऽ लागलइ ,भुट्टु झा के नीन लागि गेलेन ,भुटकुन माथ आ गौतमानंद पैर रगड़ऽ लागलइ ,भुट्टु झा फेर सपना देखऽ लागला ,मुदा अइ बेरि एकटा मुस्कुराहट हुनका ठोर पर छलइ ।अजीत भाला ल‘ के आ फूलो लाठी लेने हुनका तरफ दौड़लेन ,दिगम्बर सेहो कत्ता लेने छलइ ।मुदा ओ आब अकेले नइ छलखिन ,गामक सब सोलकन अपन हाँसू ,खुरपी ,कोदारि लेने ओकरा दिस बढ़ल ।भुट्टु झा स्पष्ट देखलखिन ,ओ कोनो साधारण सोलकन नइ छलइ ,ओ सब बुद्ध क विभिन्न अवतार छलाह ,कोनो बोधिसत्व ,कोनो अवलोकितेश्वर आ कोनो................।भुट्टु झा क मुस्कुराहट आर गहिर होइत गेलइ ।हुनकर ठोर देखिते भुटकुन आ गौतमानन्द सेहो मुस्कुरा उठला..................। तीनटा बीहनि कथा १ तीन-चारि सालक छौड़ी मुदा अलबत्‍ते चरफर ।बाजै भूकै ,चलै-फिरै ,दौड़ै-घूमै मे केकरो बूझि नइ पड़ै जे ई एत्‍ते छोट छैक आ माए कें हरदम सर्टिफिकेट दिय’ पड़ै ।छोट मोट टोहल होए ,दोकानक काज ,कंसार जेनए ,बथुआ तोरनए ,हकार देनए आ जनी-जाति सबक बीच मे बैसि के गीत-नाद मे पाछू पाछू सूर मिलेनइ.....अलबत्‍ते रहै राम सोहागक बेटी ।आ बुचिया के माए कहबो करै ...ई रहै त’ बेटे मुदा भगवान के नीन्‍न आबि गेलेन आ ई बेटी भ’ गेलै । आ जखन बोखार लागलै ,तखन पूरा दू महीना तक भूपेंद्र डॉक्‍टर आबिते जाइत रहलै ,कखनो ई दवाए त’ कखनो ऊ दवाए .....आब ई टॉनिक दियओ , आब छोटका गोट्टी शुरू करू आ जखन बेमारी कम हेबाक कोनो लक्षण नइ देखेलकए तखन कहलखिन जे एकरा दरभंगा मे फलां बाबू ओइ ठाम देखाबू ।आ फलां बाबू देखिते कहि देलखिन ,जे एकरा त’ बड़का बोखार अछि ,मुदा कहलखिन एना जे भूपेंद्रक प्रति मोन मे ककरो कोनो शंका नइ जनमै ......आखिर चेला त’ हुनके रहेन । आब बात एना फसलै जे ठीक हेतै त’ कते हेतै आ पैसा लागतै त’ कत्‍ते लागतै ......राम सोहागक ओकादि क’ पूरा मानचित्र डॉक्‍टर साहेब एक-दू दिन मे बना देलखिन ,आ पूरा दया देखबैत मात्र महीसे बेचेलखिन .......बेटी जाइत बला बात.....फलां बाबू जे अपन डिग्री क’ अंत मे एफ0आर0सी0एस0 लगबैत छथिन स्‍पष्‍टे कहलखिन जे यदि बेटा रहत तखन त’ हम आर किछु कहतौं ,मुदा ई त’ बेटिए अछि तें आब जत’ अछि कथा के ओतै समाप्‍त करू आ राम सोहाग अपन छोटकी बेटी के नेने गाम आबि गेला ।बेटी जे ने बाजि सकै छलै ,ने उठि-बैस सकै छलै ।सूतले सूतल खाए आ पैखाना करै ।टोल पड़ोसक लोक सब शुरू मे आबैत गेलै ,कुशल क्षेम आ भगवानक नाम.......राम सोहाग सेहो पंजाब चलि गेला....आब बचलै केवल बुचिया आ ओकर माए ......आ माए सेवा कर’ लागलै ,भगवान ,भाग के गारि-बात कहैत .......ओइ दिनक प्रतीक्षा कर’ लागलै जखन कि बुचिया क’ प्राण छूटतै आ बुचिया कें ऐ कष्‍ट सँ मुक्ति मिलतै........... २ भाय साहेब कार सँ मामा गाम जेबा के विचार बनेलखिन ।भौजी निच्‍चे आंखिए एना देखलखिन जेना ऐ यात्रा मे भाय साहेब सब किछु लुटा देता । फेर भौजी कें बौंसए क कम सँ कम पनरह साल पुरान तरीका अपनाबैत कहलखिन ‘चिन्‍ता नइ करू ।बहुत दिन बाद जा रहल छी ,खाली हाथ कोना आबए देता , आ माए सेहो कत्‍ते दिन बाद गेलै हन ।‘ भौजी क’ चिंता तैयो समाप्‍त नइ भेलेन ,तखन भाए साहेब बड़का बेटा के सेहो तैयार क देलखिन ।मानि लियओ जे जेना खरचा हेतइ त हेतइ विदाइयो त ऽ हेबे करतइ । आ विदाइ के समै बेटा के पांच सौ टका मामा देब ऽ लागलखिन त ऽ छौड़ा बाप दिस देख ऽ लागलए । भाए साहेब के पित्‍त चढ़ेन जे छौड़ा लै किएक नइ छइ आ वौआ बूझइ जे लेला क ऽ बाद पप्‍पा डांटि ने देथि । आ माए गुम्‍मे रहलखिन भाए कें पैसा खर्च होए के चिंता अलग आ वौआ गाड़ी सँ आयल से चिंता अलगे ३ एकात वला रस्‍ता दूनू कवि भोरूका टहलौनी मे एहन रस्‍ता खोजि लेलखिन ,जइ रस्‍ता मे केओ नइ देखाइ ।कखनो काल कोनो सर‍लहिया कुकुर ,कखनो कोनो कबाड़ी तेजी सँ आबादी दिस बढ़ैत ,बस यैह हलचल ।ने एक्‍कोटा अखबार वला कऽ सायकिल ने इसकुलिया बस क धूम-धक्‍कर ,कखनो-कखनो हनुमान मंदिर सँ भजन कऽ आवाज आबै ।भजनो नबका धुन पर ,कविगण ऐठाम निचेन सँ अपन पेट पर ढ़ोल बजा सकैत छला ,पेटे नइ ,पीठो दिस आ नीच्‍चों ,ऐठाम के देखए वला ।आ ऐठाम खूब नीक जँका विरोधी पर टिप्‍पणी कएल जा सकैत छलै आ रंगबिरही गारि सेहो । ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना (दीर्घकथा) नाम:सूर्यकांत उमेर :बयालिस वर्ष रंग:गोर लंबाई:पांच फीट नओ इंच वामा आंखिक ऊपर मे आ दहिना बांहि पर चोटक निशान समस्‍तीपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक ,करियन शाखा क’ एकटा खाता नम्‍मर (हम नम्‍मर सार्वजनिक नइ क’ रहल छी) पहिले पहिल मात्र यैह सूचना फैक्‍स क’ माध्‍यम सँ दिल्‍ली सँ राजीव झा जी भेजला ।राजीव झा दिल्‍ली पुलिस मे उपनिरीक्षक छथिन ,आ हुनका पता छलनि जे सूर्यकांत हमर पिसियौत भाय छथि ...........दिन छलै सोलह अगस्‍त दू हजार दस ।जखन हमरा बूझा गेल जे सूर्यकांते भाय ई डायरी लिखला तखन हम कहलियेन जे ई डायरी भेज दियअ । ई डायरी अजीब तरीका सँ लिखल गेल छैक ।जत्‍ते दिलचस्‍पी अपना प्रति ओतबे समाजक प्रति ।ओना डायरी क’ बहुत रास बात हमरा अनसोहांत लागल .........कखनो कखनो एत्‍ते कि सूर्यकांत अप्‍पन मर्यादा धोए देने हो..........मुदा ऐ विषय मे हम किछु नइ कहब किएक त’ गजेंद्र जी कहला कि डायरी के मूले रूप मे छापल जाय ,तें डायरी क’ कंटेंट पर हमरा किछु नइ कहबा के अछि .......ओहुना मरल आदमी के विषय मे की कहल जाए ? हमरा तऽ ईहो नइ बूझबा मे आबि रहल अछि कि ऐ डायरी मे किछु साहित्यिक तत्‍व अछि वा नइ ? कखनो डायरी तथ्‍य आ समै कऽ संदर्भ स्‍वीकारैत छैक आ कखनो नइ ,कखनो –कखनो तऽ डायरी अप्‍पन रूप के छोड़ैत संस्‍मरण ,कथा ,कविता दिसि भागऽ चाहैत अछि ।कखनो –कखनो सपना कऽ रूपक मे समाहित हेबऽ लागैत अछि ।डायरी लिखलो छैक मिथिलाक्षर मे आ हमर मिथिलाक्षर रहबो करए कमजोरे ,तें एकटा ईहो मेहनत बढि़ गेल । मुदा गजेंद्र जी कऽ ई कहतब छनि जे एगो –दूगो पृष्‍ठ के नित्‍यप्रति सुलेखित करैत भेजैत रहू । डायरी कें प्रस्‍तुत करैत सभ सँ पहिले हम राजीव बाबू कें धन्‍यवाद दैत छिएन जे ओ अप्‍पन व्‍यस्‍त दैनंदिनी कऽ बीच सूर्यकांत कऽ डायरी मे दिलचस्‍पी देखेलैथ आ एहियो सँ आगू बढि़ हेरायल डायरी कें खोजि निकालला । ई डायरी सूर्यकांत भायकऽ मकान मालिक राखि लेलकइ आ कोनो साहित्यिक वस्‍तु बूझि बेचबा के फिराक मे रहए ।ऐ डायरी कऽ तथ्‍य के प्रस्‍तुत करैत हम सूर्यकांत भाय कऽ आत्‍मा सँ क्षमा मांगैत छी ,किएक तऽ डायरी मे कतेको एहन चीज छैक ,जइ सँ विवाद उत्‍पन्‍न्‍ा होयत आ मृतात्‍मा कऽ संबंध मे भ्रांति उत्‍पन्‍न भऽ सकैत छैक । मुदा ऐ धन्‍यवाद आ क्षमाप्रार्थना कऽ प्रासंगिकता तखने ,जखन डायरी मे कोनो सत्‍व हो ।डायरी मे कतहु कतहु शीर्षक छैक आ कतहु नइ ।सबसॅं नमहर शीर्षक छैक ‘ओक्‍कर हम्‍मर तोहर सपना ‘ ।आ डायरी कऽ पहिल पृष्‍ठ पर एकटा छोट शीर्षक रहै ‘सोयरी आ सपना ‘।ऐ खेप मे ‘सोयरी आ सपना’ प्रस्‍तुत अछि । सोयरी आ सपना ई कोनो अद्भुत सपना नह रहै ।सभ लोक अपन अपन बच्‍चा क' लेल एहिना सपना देखै छैक ,आ ई ओकर पहिलो सपना नइ छलै ।पहिलो नइ ,दोसरो नइ ,तेसर ........ ,मुदा आइ सँ तीस-चालीस साल पहिने तीन टा बच्‍चा बहुत सधारण बात छलै ,से दम्‍पति अपन सपना के देखबा ,सपना के अगोरबा ,पोसबा के सब उपक्रम करैत गेल ।सपना मे पानि देनइ ,सपना के हवा लगेनइ ,सपना मे सँ आकुट बाकुट कें साफ केनए ,सपना के चोर-शैतान सँ बचाबैत ,लोक-वेद के कहैत गुणैत ।सपना के हाथ-पैर ,मुंह-कान सब बनलए ।ऐ मे लगभग नओ महीना लागि गेलइ ।आ ई नओ महीना कोना बीतलइ दम्‍पति के पते नइ चललै । एक दिन मिथिला क एकटा गाम मे सपना के धरती पर उतारबाक व्‍यवस्‍था प्रारंभ भेल । तीन -चारि टा जनानी ,एकटा चमैन ,आगि-पानि ,तेल-मौध,साबुन-कपड़ा आ गीत-नाद । आ वौआ रे अलगे समै छलै ,ओइ समै मे ,बच्‍चा जनमै काल एकटा खास भूमिका लेल किछु जनाना कें बजाओल जाइत छलै ,ऐ मे सबसँ प्रशिक्षित जनाना ओइ वर्ग सँ होइत छलखिन जे मिथिले नइ समस्‍त भारतवर्षक जाति-विचार मे अछोप मानल जाइत छलै ,मतलब सबसँ महत्‍वपूर्ण काज आ काज केनिहार क दरजा अछोपक ।ई सब बात बाद मे ,पहिले सपना कऽ स्‍पर्श ,गंध सँ मोन के भिजा तऽ लेल जाए । आ सपना कें जमीन पर उतारबा क जिम्‍मेवारी ओइ वर्ग के हाथ मे जेकरा सपना देखबा कऽ मनाही हो । मुदा ‘लैंडिंग ऑफ ड्रीम्‍स’ कऽ मजबूत पायलट सभ अपन-अपन अनुभव कऽ बलें अभियान कें सफल दिशा दैत रंगबिरही बात ,कखनो टोल पड़ोस कखनो धर्म पुराण कखनो शरीर विज्ञान आ यौन विज्ञान सेहो ...... जनी-जातिक मजाक स्‍वप्‍नागमन मे निहित वेदना के कम करैत । आ सपना के छोट छोट हाथ छलै ,छोट छोट पएर ....आंखि कान सब छोट छोट ।आब सपना स्‍वयं अपना लेल सपना देख सकैत छलै ................ मुदा सपना के नून नइ चटाएल गेलै , ई दम्‍पति कनि अलग रहै यैह बात नइ ,बच्‍चा ‘बच्‍चा’ रहै ,बच्‍ची नइ ।आ सपना एखन सीधा-सीधी बाट चलैत रहै ,भूख ,प्‍यास ,गरम-ठंड केवल सपना मे आबै ,आ ईहो कोनो सपना देखए के उमेर छलै...............जे बाप माए क’ सपना सएह बच्‍चा क’ । आ छोट-छोट सपना के पूरा करए लेल माए-बाप रहबे करथिन ,से अपन सुविधा के समेटैत वौआ कऽ आवश्‍यकता पर केंद्रित भऽ गेलै घर । एखन तक सपना मे सपना कऽ मथफुटौएल नइ भेलै । से किएक? त’ एखन छोटका सपना के हाथ पएर नइ भेल छलै ,ओकर आंखि नइ फुटलै छल एखन ,तें ओकरा देखाओल गेलै जे वौआ रे सपना एहिना देखबा कऽ चाही आ सपना मे मात्र यैह सब देखबा के चाही ।से तीन –चारि साल तक ककरो ई बात दिमागो मे नइ एलै जे ऐ परिवारक प्रत्‍येक सदस्‍य के कोन मात्रा मे सपना देखबा कऽ चाही ।एखन तक खाए-पीबए ,पहिरनइ-ओढ़नए ,गीत-गानक सीमित बाईस्‍कोप छलै ..... आ ओइ समै मे गाम मे बाईस्‍कोप देखबै वला आबैत छलै आ ओकर चकरका पेटी मे आठ-दस टा खिड़की रहैत छलै आ घूमैत फोटो कऽ साथ गीत सेहो सुनाइत छलै ।फोटो आ गीत मे सामंजस्‍य हेबाक चाही से वौआ के ओइ समै मे नइ बुझेलए । आ वौआ नइ चिन्‍हैत छलै तें एके सिनेमा मे मरलका पृथ्‍वी राजकपूर सँ लऽ के सरलका गोविन्‍द प्रधान तक के फोटो अजीबे आकर्षक लागै ।फोटो कऽ मुद्रा ,जइ मे मारनए-पीटनए ,हँसेनए ,दौड़ेनए तऽ रहबे करए छौड़ा-छौड़ी एक दोसर के पकड़ने सेहो रहै ।आ वौआ कें ओइ समै मे ई बूझऽ आबि गेल छलै जे वौआ अलग होइ छइ आ बुच्‍ची अलग .............. आ वौआ कऽ जखन नाम लिखेलइ तऽ वौआ एगो झोरा आ एगो बोरा नेने ईसकुल पहुंचि गेलइ । ईसकुलो मे वौआ अप्‍पन बोरा कें छौड़ा सभक बोरा मे सटा के राखए ।ईसकुल कऽ वातावरण वौआ के बेसी नइ नीक लागलै ।ऐ ठाम मरसैब सब हिंदी बाजैत छलखिन आ हाथ मे मोटका सटक्‍की राखैत छलखिन । वौआ के तऽ ईहो पता नइ रहै जे हिंदी कोनो भाषा होइत छैक ,हां ओ सब जे बाजैत छलखिन से गाम मे केओ नइ बाजैत रहै ...........मुदा नइ ऊ जे नीरस भैया आबै छथिन कहियो कहियो गाम ,आ ऊ जे कुमल भैया छथिन्‍ा ,ऊ दूनू गोटे गामो मे हिंदी बजैत छथिन ,तऽ की हिंदी बहरिया भाषा भेलै ,गाम परक नइ रोड परक ,ईसकुलक भाषा ।मुदा ओइ बात सभक लेल ओइ समै कोनो अवकाश नइ छलै ,ई कोनो सपना नइ छलै ,तें झोरा ईसकुल तक राखि बहुतो बच्‍चा मंदिर दिसि निकलि जाइ आ वौओ सएह करए ।मंदिर पर ,पोखरि दिसि ,गाछी मे ओ सभ समान मिलैत छलै ,जेकरा सपना मे देखल आ सोचल जा सकैत छैक । कनैलक फूल ,कक्‍का कऽ ललका लताम ,हुनकर बँसबीट्टी ,उत्‍तरबाय टोलक ईमली आ पवितरा आ डोमा कऽ तार आ तरकुल मे बहुत नशा छलै ।आ ईसकुलक सर्वमान्‍य मुद्रा पिनसिल छलै ,मतलब पिनसिलक कनी टा टुकड़ा मे तार कऽ कनी गो हिस्‍सा मिलबा कऽ गारंटी छलै । ओइ समै मे वौआ के बूझल नइ छलै जे पवितरा दुसाध छैक आ पवितरा के छुइ देला सँ हड्डी तक छुआ जाइत छैक ! ओइ समै ईहो नइ बूझल छलै जे डोमा डोम जाति कऽ बच्‍चा नइ कुम्‍हार छैक आ डोमा नाम राखि एगो जोगटोम कएल गेल रहै ,आ ईसकुल मे डोमा कऽ माए –बाप कें ई साबित करबए मे दम लगब’ पड़लै जे डोमा कऽ असली नाम सुकुमार छैक । मुदा वौआ रे हम्‍मर स्थिति किछु अलग रहै ,आइ तक घर मे हमरा केओ नइ सुनलकै हमरा जन्‍मक कहानी ।ने माए ने बाबू ने भाय-बहिन सब ।हम विशुद्ध पुरहिति‍या घर मे जनम लेलियइ ।घरक पूरा अर्थव्‍यवस्‍था बाबू के द्वारा सांझ मे आबइ वला सीदहा पर निर्भर रहै ,तें घरक पूरा राजनीति जजिमनिका पर केंद्रित छलै ।भोर मे बाबू नहा-सोना पूजा कऽ लेला के बाद सीधे भागथिन गयघट्टा ।आ ई गायघाट गाम हुनकर समस्‍त योग्‍यता आ विद्वता कऽ मंच छलै ।ऐ ठाम हुनका लेल कोनो कंपटिशन तऽ नइ रहै ,तें साबित करबा आ नइ करबा सन किछु नइ रहै मुदा ई जे निर्दन्‍द्व संभावना छलै से कतेको संभावना कें नून चटा के मारि देलकए ।एकर धरती एको डेग नइ छलै ने अकाश एको हाथ के तें वामन कें वामने रहि मरबा के छलै ,ऐ ठाम विष्‍णु मात्र सत्‍यनारयण कथे मे रहथिन ,हुनकर दस टा पचास टा रूप कहियो सपना मे आयल ,विराट रूपक बाते छोड़ू । ऐ ठामक विष्‍णु लक्ष्‍मी सहित आबैत रहथिन आ कहियो चौबन्‍नी ,कहियो अठन्‍नी ,कहियो सवा रूपैया आ कहियो ‘बाद मे दऽ देब’ कऽ पुनरूक्ति सुनाबैत गौलोक चलि जाइत छलखिन कांटी आ मरिया जजिमान आ पुरहितक सम्बन्ध पता नइ कोदारि आ बेंटक संबंध छैक वा कांटी आ मरिया क’ । बुझाइत तऽ एहिना छइ जे एगो मरिया हेतै त’ दोसर के कांटी बनय्यै पड़तै ।आ एहनो कोनो जोगाड़ नइ बैसै छैक जे कांटियो रहि के मरिया क’ मारि नइ खाए पड़ै । आ मरिया रहि के केओ ऋषि मुनि बनल रहए ,से हमरा जनैत तऽ असंभवे बूझू .....ओना हम पुरहित रहियइ आ हमर भरि दिन जजिमनिके मे बीतए ......वियाहे-श्राद्ध नइ ,मारि-पीट , गारि-उपराग ,टोना-मानी सभक हिस्सान ।हअर जोतनइ ,चौकी केनए ,बाउग केनइ ,कमौनी ,पानि देनए ,खाद छिटनइ ,जजात के घोघेनए ,दाना पुष्ट. भेनए ,कीड़ा लागनइ ,दवाइ के स्प्रे ,सूखनए ,काटनए ,दउनी वा झंटेनइ ,कखनो कखनो मशीन सँ दउनी..........अन-पानि सुखेनए आ कोठी अथवा बोरा मे राखनए .......ऐ सब प्रक्रिया मे हमर सक्रिय भागेदारी रहैत छलै आ हम दिने नइ गुनैत रहियइ ,कखनो कखनो सलाहक स्वकरूप समाजिक आ वैज्ञानिक सेहो भ’ जाइत रहै ।हम कोनो मार्क्स वादी बात नइ करैत छी ,ने हम ई मानैत छी जे उत्पा्दन प्रक्रिया मे हमर समान भागेदारी रहै .......ने विश्वाहस क’ स्तिर पर ने समाजक स्तीर पर । अपन भूमिका के अवमूल्य न नइ करितौं ई कहबा मे हमरा कोनो लाज नइ कि मिलै वला प्रतिफल असंतोषजनक ,असमान आ अमानवीय छलै ।कोठी आ खरिहान के भरै मे सांस्कृितिक सहयोगी आ मिलै छलै आसेर ,सेर भर अगऊं ।एगो दूगो बाबू सब छलखिन जे साल मे एक –दू बेर पसेरी भरि दाना दैत छलखिन ।आ ई हमर खानदानी कर्त्तूव्यब छलै कि जजिमानक समृद्धि क’ प्रति विरक्तिक भाव बनेने रहियइ ।भगवती अन्न पूर्णाक पूजा मे कतओ कमी छलै आ अन्निपूर्णों खूब तमाशा देखबैत रहथिन ........... आ जजिमानक पुरूखा सभक बरखी ,छाया ,एकोदिष्ट क’ तिथि हमरा मुंहजबानी यादि रहै ......यादि रहै यैह बात नइ ,यादि केनए परमावश्याक रहै ,महाकर्त्ताव्य ............शायदेसंयोग यदि कहियो बिसरि गेलियइ त’ ओइ दिन जजिमान महासामंत भऽ जाइत छलैखिन आ हम महादास......आ मृत्यु.दंड सँ कनिये छोट दंड रहै ई वाक्यन ‘हमरा अहांक कट्टमकट्टी ।हम आब फलां पंमडी जी सँ पूजायब’ ।आ जइ दिन बाबू के ई बात पता लागेन ,हमर देह ,हाथ ,माथ पर हुनकर खड़ाम आ लाठीक चेन्हू अहां गिन नइ पेतियइ .........ओना माए गानैत छलखिन आ कखनो बाबू आ कखनो दुनियो के ......कानबो करथिन आ गारियो देथिन......... एतबे नइ एकादशी ,त्रयोदशी ,चतुर्दशी ,पूर्णिमा अमावस्यान सब........जेना सूर्य आ चन्द्रनमा हमरे पूछि के डोलैत छथिन ।आ कोन एकादशी करियौ आ कोन छोडि़यौ ...ईहो बात विधिपूर्वक हेबाक चाही ।आ बात-बात पर महादेव पूजा ।पान सौ आ हजार त’ डेलीए पूजाथिन ,मुदा कहियो कहियो सवा लाख महादेव क’ बात सेहो होए ...आ ओइ दिन त’ एकटा उत्सकवक वातावरण बनि जाए ,ओइ दिन बाबू महंत जँका करथिन ,किएक त’ हजार दूहजार सभक घर मे बनए आ बाबूए हुनका सभ के दक्षिणा बांटथिन ।आ बाबू ईमानदारी पूर्वक दक्षिणा बांटथिन तें हुनका कहियो पंडितक अकाल नइ पड़लेन ।हरदम टोल-पड़ोसक पंडित सभ आगू-पाछू करैत रहए ।आ ई कोनो महादेव पूजे तक सीमित होए ,एहनो बात नइ रहै ,कहियो श्राद्ध कहियो बरखी कहियो उपनेन-वियाह........एहिना चलैत रहए ।आ बाबू चाहथिन छल तखन सभ दिन पारसे आबैत रहतै छल ,मुदा बाबू पारस लेबाक विरोधी छलखिन ।जत्तेि ब्राह्मण होए ,ओतबे क’ भाड़ा लियओ ,दुनिया क’ ठीकेदारी नइ...... वैदिक कर्म शुभक हो वा अशुभक ,जजिमान सभ एकटा खास नजरि सँ पुरहित कें देखैत छलखिन ।हुनका लेल आदर्श पुरहित ओ भेल जे मैल चिकाठि पहिरने हो ,चाहे धोती हो वा कुरता एक दरजन ठाम ओइ पर चिप्पी हो ।अहांक मोंछ-दारही बरहल हेबाक चाही ,अहां टुटलकी चप्पहल या बिना चप्पओले के यात्रा करैत हो ।यदि अहां साफ-सूतरा कपड़ा-लत्ताह पहिरने छी आ पएर मे जुत्तो. हो तखन त’ बूझू जे ने केवल अहांक धर्म भ्रष्टा अछि बल्कि जजिमनिका मे कनफुसकी क’ केंद्रविंदु सेहो अछि ।सब कहत ‘देखियौ ने कनेक जुत्ताम देखियौ ,बाप के खड़ाम खटखटबैत जिनगी गुजरि गेलेन आ बेटा ......’ आ फेर तखन बहुत रास खिस्सा एहनो जइ मे हुनकर बाप आ बाबा हमरा बाबू आ बाबा के खाली पएर देखि द्रवित भ’ गेलखिन आ प्लासस्टिक वला जुत्ताह वा चप्पबल वा खड़ाम दऽ देने हेथिन । आ भाय लोकनि ध्याटन देबै मैथिली मे एहन कहबी सबसँ बेशी छैक ,जइ मे अहांक तुलनात्मयक महत्ताल स्पएष्टब होइत अछि मतलब नीचा दिस ,खराब दिस ,जेना कि ‘बापक नाम लत्तील फत्तीा ,बेटाक नाम कदीमा ‘ ,’खाए लेल खेसारी आ .....पोछै लेल जिलेबी ‘ , ‘पूजी ....नइ चाभी क’ झब्बा ‘ , ‘नमहर नाग बैसल छथि आ ढ़ोरहाय मांगै पूजा ‘ आदि आदि ।आ ई सभ कहबी जत्तेज लौकिक अनुभव सँ भरल होए अहांक अपमानित करबा लेल पर्याप्तज रहै ।मुदा ई सुनला के बादो कोनो उत्त र नइ देबाक रहए ।एगो बात ईहो छलै जे जकरा कर्म करबाक रहै ,ओ चाहे किछो पहिरए ,खाए ,पीबए ,अहांक लेल खास ड्रेसकोड ।मतलब बाप मरै फलनमा के आ केश छिलाबैथ पंडित राम । सम्माान आ अपमानक एहन दुर्लभ संगति हमरा मूने कोनो सभ्य ता ,कोनो समाज मे असंभव अछि ।आ मैथिल ब्राह्मणक चरम लक्ष्य् सभ दिन चूड़े दही रहल ।हरिमोहन बाबूक दार्शनिक अंदाज जत्तेे ‘खट्टर कका क’ तरंग’ मे चूड़ा दही चीनी मे विस्ता र लैत अछि ,ओहियो सँ बेशी ।एकटा भोजन ......नइ भोजने मात्र नइ.....अलगे आकर्षण ......अलगे नशा ।एकटा सुस्तीओ ,संतोषक भाव ।त्रिगुण केवल सानै काल तक ,ओकरा बाद विषम भावक सह-अस्तित्वा ।दांत चूड़ा पर प्रहार करैत आ जीभ आ कंठ दही के ससारैत आ चीनी मुंहक सभ अंग सँ मेलजोल बरहाबैत ।अंत मे विषमता समाप्त आ सभ तत्वी अपन अपन वैशिष्ट्यअ के समाप्त करैत .......।आ चूड़ा दही एहन नै बुझियौ जे केवल खाइए वला मे सुस्तीस बरहाबैत हो ,खुएनहार मे सेहो तेहने आलस्यब बरहाबैत छैक । चूड़ा दही खुएबा मे अहांक करबा के की अछि ? चुड़ा कुटाएल बोरा मे राखल ,दही पौरल आ चीनी दोकान सँ खरीदल ,तखन त’ मात्र अंचारक सहारे सेहो अहांक ‘ए’ ग्रेड मिलि सकैत छैक .....हम धर्म ,पुण्यद आ पितरक बात अखन नइ क’ रहल छी ।जे होए चूड़ा दहीक नशा एहन रहै जे इसकुलक समै मे इसकुल कालेजक समै मे कालेज छोड़लियइ ।ने घअर दुआरि ने खेती बाड़ी ।कोन कुटुम कोन कुटमैती ।ने समाजक नौत-निमंत्रण ने पावनि तिहारि ।बस अर्जुन जँका ...संभवत: ओ मांसाहारी रहै तें माछक आंखि मे तीर मारलकए आ हम सर्वाहारी मैथिल ....चूड़ा दही क’ गंध दिस आंखि मूनने बरहैत आ हमर प्रेम चातको सँ बेशी ,हम्मरर धियान बगुलो सँ बेशी ,हमर क्रोध सिंहो सँ बेशी आ हमर भूख सांपो सँ बेशी आन्हहर।मुदा रूकू महराज हम किछु बेशीए बाजि गेलौं हमर भूख चाहे जेहन होए दुर्वासा आ भृगुक क्रोध किताबे तक सीमित रहलै ,हम अपन जिनगी मे त’ नइ देखलियै जे केओ जजिमान अहांक उचितो क्रोध कें सकारने हएत ।भृगु अपन क्रोध कें ने छिपेलखिन ने सम्हालरलखिन आ भगवान विष्णुक के धएले लाति करेजा पर मारि देलखिन आ भगवानो केहन त’ पूछलखिन ‘हे ब्राह्मण श्रेष्ठक चोट त’ नइ लागल ।हम्म र करेज त’ पाथरक अछि ,मुदा अहांक पएर त’ कमलोऽ सँ बेशी कोमल ‘ ।ई प्रसंग ब्राह्मणवादक संरक्षणक एकटा नमूना अछि कि कोना वैचारिक स्त र पर यथास्थितिवादक समर्थन कएल गेलै । फेर लक्ष्मीई क’ क्रोध आ पुन: भृगु कें क्रोधित भऽ कें भृगुसंहिता लिखनए आ लक्ष्मी के संबोधित ई गर्वोक्ति कि ‘जे ब्राह्मण ई पोथी परहत ,ओकरा लग तों दौड़ल जेबहीं ‘ । एकटा बात आर अहां अपन दैनंदिनी के चाहे जेना व्यावस्थित राखियौ ,एक चीज लेल हरदम तैयार रहियौ ।अहांक कखनो बुलाहट आबि सकैत अछि .......नइ नइ उपनेन वियाह त’ पहिले सँ निश्चित रहैत अछि ,मुदा सत्यननारायण कथा ,महादेव पूजा ,कोनो गुप्त् उद्देश्यछक लेल ब्राह्मण भोजन आ एहने सन बहुतो रास प्रसंग ,जइ ठाम अल्प्सूचना पर अहांक उपस्थिति अनिवार्य आ कखनो कखनो लठैत वला भाषा ‘यादि राखब पंडित जी समै खराब छैक छओ सँ सात नइ हेबाक चाही ‘ ।आ ग्याारह टा ब्राह्मणक निमंत्रण छैक त’ ग्याउरह टा हेबाक चाही ,औ जी साहेब आब गाम मे नइ छइ त’ नइ छइ ,हम कतऽ सँ लाबी ।सब गाम छोडि़ के दिल्ली ,पंजाब रहै छैक ।बहुतो लोक गामो मे छैक त’ अपन अपन काज धंधा मे व्यकस्तस ।ओ चूड़ा दही खेबा लेल तीन घंटा बेरबाद नइ करता ।ओना त’ काज चलिए जाए मुदा कहियो काल एहन स्थिति उत्पलन्ऩ होए कि लागै आइ नऽ छऽ भइए के रहत ।कोनो कोनो जजिमान कें होए कि कम ब्राह्मण हम पारस जमा करबा लेल आनलौं ।कखनो कखनो त’ हद भऽ जाए जजिमान सब नाओ गिनाबऽ लागता ,फलां पंबडित त’ गामे मे रहैत छथिन ,आ चिल्लांनक भतीजा सेहो ............. आ जजिमनिका क’ एकटा खास शिष्टा चार रहै ।प्रणाम त’ सब अहींके करैत छलथि ,मुदा अहां आर्शीवाद एकटा विशेष संबोधन के साथ दिअओ ।‘खुश रहियौ हाकिम’ ‘आनंद सँ रहियौ सरकार’ ‘जिमीन्दाकरक जय जय हो ‘ ‘राजा सदैव विजयी रहथि ‘ ।मतलब जजिमानक प्रणाम सूदि समेत लौटाबए क’ व्यावस्थाा रहै ।आ कोनो कोनो गुंडा टाईप के पंडित जी ऐ व्यरवस्था के दोसर रूप दऽ दैत रहथिन जेना ओ जजिमान के देखिते चिचियाथिन ‘जय जय बम बम’ , ‘जय हो जय हो ‘ आ पता नइ ऐ मे ककर जय आ ककर बम बम रहै ।मुदा ई व्यडवस्थाम विभिन्नू रूपांतरणक साथ आगू चलैत छलै ।आ दूनू तत्व यैह चाहथिन जे हम कांटी नइ मरिये रही ,मुदा ई केवल सोचबाक बात नइ रहै ........... आब कनेक पुरहितक दृष्टिकोण ।तमाम नीचता कें छुपबैत अपन क्षुद्रता कें गौरवान्वित करैत पुरहित चाहैत छलखिन जे संसारक तमाम सिंहासन हुनके लेल रहै ।कखनो सर्दी-बुखार ,कखनो जाड़क मारि आ कखनो अलसियाइत पं‍डी जी बिन नहेने ,तेल चानन लगा झुठौंआ फूसौंआ के कंपकंपाइत रहथिन कि हुनकर ख्यातति एहन पंडित क’ रूप मे होए जे अपन तपस्याे सँ हवा-बसात के जीति नेने होए ।आ अपन अल्पा संस्कृएत ज्ञान कें कखनो लय ,कखनो रटंतु विद्या सँ सुरक्षित करैत ऐ ठामक सब पंडित ई साबित करैत रहिथिन जे उदयनाचार्यक सब पोथी हुनका पास ।किछु लोकनि ऐ भ्रम के सेहो पोसैत छलखिन कि संभवत: लोक विश्वािस केने जा रहल अछि कि वास्तसव मे उदयनाचार्यक असली वारिस यैह छथि ........ ई पंडित जी छलखिन ,एहन तारनहार जे मंत्रच्यु त ,विचारविहीन आ तर्कशीलता सँ योजन भरि दूर ।अपन जन्मनक बल पर ,तीन-पांचक बल पर ,गाल बजेबाक कौशल आ ठोप-ठंकारक बलें ।मंत्र कतबो मूल्यनवान हो ,दू-चारि टा शब्द अपने गीलने ,दू-चारि टा कुल खानदानक नाम पर आ दू-चारिटा संभावित दक्षिणाक विचारमग्न ता सँ भ्रष्ट होइत.......धियान आबिते फेर सँ हाथ-आंखि हिलबैत भगवान के ठकैत आ जजिमान के भरोस दीबैत कि ‘हमरा सन शुद्ध पूजा केओ ने करा सकैत अछि ‘ । मुदा पुरहित आ जजिमान मे एकटा लिखित समझौता रहै ।भोजन कतबो विशिष्टत आ वैविध्यय सँ भरल होए जजिमान कहथिन ‘जे नून चूड़ा छैक ,आबियौ आ ग्रहण करियौ ।‘ आ भोजन कतबो सरल-गेन्हारयल होय पंडित जी कहथिन ‘ऐ सँ बढि़ के बाते होइत छैक ।‘ मुदा कखनो कखनो विजय बाबू सन मर्दराज सेहो छला जे ऐ लीक के अपन स्व भावे तोड़बाक प्रयास करैत छला ।ओ साफ कहथिन’पंडी जी चिंता नइ करियौ ,आराम सँ खाएल जाओ ।पर्याप्तक दही छैक ,नून चुड़ा वला कोनो बात नइ’ ,तैयो विजय बाबूक ई यथार्थवादी रूख कोनो स्थारयी प्रवृत्तिक रूप धारण नइ केलकै ।आ ई द्विपक्षीय समझौता संभवत: जजिमानी व्यीवस्थारक सर्वोच्चत तत्वइ रहै । यद्यपि पंडित लोकनि जखन एक-दोसरा सँ बात करथि त’ ओ प्राय: दक्षिणा संबंधी होए ।जजिमानक खिधांश ,जजिमनिकाक भोजनक निंदा ,नून ,मिरचाय तेज हेबाक चरचा ,दूध ,दही कम हेबाक बात हरदम सजनिये ,हरदम घिउड़े ,कखनो के सब दिन राम तोरय..........छि: छि: सोहारी मे घृतक नामोनिशान नइ ,आ खीर मे पानि एकदिस आ दूध एक दिस आ चाउर भोकारि पारि के कानैत ।बेलना टूटबाक बात आ मकई क’ रोटी ब्राह्मण के दैत जजिमान सब ।घोर कलियुग ,एहन एहन जजिमान के कत’ सँ पुण्यो हेतै ।संकल्पज आ दक्षिणा मे एकटका दूटका देबा ,कखनो ऊधारिये रहि जेबाक चिंता ।अपन कुटिल पांडित्ये आ दुनिया दारी सँ लोक कें ठकबा सम्बिन्धीद विस्तृनत विमर्श आ दोसर के फटकारि देबा आ चमत्कृडत करबाक कतेको कथा ।गलत-सलत मंत्र परहेबाक प्रसंग बत्तीरसी के खोलि के हँसबा के अवसर दैत आ अपने मूने त्रुटिरहित चलाकी ....... दोसर दिस जजिमानो सब अपन हकिमई ,जमिंदारी आ लंठई क’ चर्चा क’ संग ।विविध प्रसंग जइ मे पुरहितक गलती कें ओ पकडि़ नेने हो ,एहनो प्रकरण जइ मे पुरहित सब कें अपन दानशीलता सँ ओ मोहि नेने होथि ।कखनो कखनो त’ एहन बात कि पहिले त’ बिन जजिमनिका पेट कि पांजरो नइ भरैत रहेन ,मुदा आब कने मजगूत भ’ गेला ।आ ऐ पेट-पांजर क’ चर्चा प्राय: होइत छलै । जजिमान-पुरहितक ई कांटी-मरिया निरंतर ठोकाइत रहला के बादो हमरा ई कहबा मे कोनो हर्ज नइ कि जजिमनका मे कतेको आदमी एहनो छथिन ,जे ऐ जजिमान-पुरहितक संबंध सँ आगू छथिन ,आ ओ हमरा लेल कोनो बाप-पित्तीभ सँ कम नइ ।चाहे जानकी बाबू होथिन वा मकसूदन बाबू ,इंजीनियर साहेबक परिवार हो वा बैद्यनाथपुर मे शशि के आंगन मे ओ वृद्ध मसोमात ।ई सब लोक हमरा लेल हमरा खानदानक लेल पारिजात बनि के रहला आ हमर सब कष्टे हिनका लोकनि के छाया मे हेरायत चलि गेल ।नित्यरप्रति क’ भेंट आ हिनकर सभक दुलार कहियो वास्त विकता सँ परिचय नइ होम’ देलक ,नइ त’ पुरहितक जिनगी कोनो माली ,कोनो धानुक ,कोनो धोबी सँ कोन प्रकारे बेशी छैक ।ओहो सब अपन हिस्सार लैत छैक आ हमहूं । यदि फल महत्विपूर्ण छैक त’ एना सोचनए बहुत बेजाए त’ नहिये............................... जेठक पोखरि सभ प्राय: सूखि जाइत छैक ,मुदा एकदम सूखले बूझि यदि पोखरि कें पार कर’ लागब ,तखन पएर कनि कनि धस’ लागत आ एक क्षण रूकि कें अपन दू‍नू हाथ सँ एक कोबा माटि हटा के देखिअओ .....तुरत्‍ते जलक धार अपन उपस्थिति सँ अवगत करा देत..... भिजा के , गरमी सोखि के आ अहांक भ्रांत धारणा मे अपन विनम्र हस्‍तक्षेप करैत ,तें अओ बाबू भैया सत्‍य ओएह नइ थिकइ जे आंखिक समक्ष हो ....सत्‍य कने उद्योगक मांग सेहो करैत छैक ।तें हम अपन गामक परिचय कोना दी ,बड्ड अशौकर्य मे पड़ल छी । ई गाम मिथिलाक ,भारतक आ ब्रह्मांडक एकटा सधारण ग्राम .....अपन खेती-बाड़ी ,खान-पान ,गीत-नाद ,बोली-वाणी ,सामूहिकता क’ विभिन्‍न कसौटी पर ...एकटा सधारण ग्राम ।एकर चर्चा कोना शुरू कएल जाए , टोल सँ ,जाति सँ ,खेत-पथार सँ ,बड़का लोकक स्‍वघोषित महानता वा छोटका लोक पर आरोपित ओछपन सँ...... सब मिलाके एके बात छैक ।पहिले टोल सॅं शुरू कएल जाए ।चारू दिशा क’ नाम पर चारि टोल ,उत्‍तरवारी ,दक्षिणवारी ,पूवारी ,पछवारी अथवा डीह टोल ।दिशाधारित ऐ विभाजनक अलावे बभनटोली ,गुअरटोली ,चमरटोली ,दुसधटोली आ राजपूतक एकटा अलगे टोल ।दुसाधक तीनटा बिखरल बिखरल टोल ,तहिना चमार सभ सेहो दू ठाम समटल.....। विभिन्‍न टोलक प्रति आन टोलक नवीन नवीन रूख ,नवीन दृष्टि आ ओकर चर्चा मे एकटा अपमानजनक टोन ।जेना उत्‍तरवारी टोल अपना मूने सबसॅं बेशी सुसभ्‍य ,दक्षिणवारी टोल सबसँ बेशी लंठ ,पूवारी टोल सबसँ बेशी एडवांस आ डीह टोल सबसँ बेशी जेनुइन छलै ओ दोसर टोलक हिसाबें उत्‍तरवारी टोल मे सबसँ बेशी बतहपन ,दछिनवारी टोल मे मूर्खता ,पूवारी टोल मे दिखाबा आ डीह टोल मे उत्थरपन भरल रहै । आ एहिना मूल ,गोत्र आ बैसारी क’ हिसाबें सेहो अपना के नीक ,सभ्‍य आ दोसर के ओछ ,असभ्‍य मानबा के बहुत रास घटना ,कहबी ,वृतांत......आ जखन एक जाति मे एते बखरा तखन पूरा गाम मे कतेक .........ओना आपुसी गपशप मे पूरा गाम गामे छलै आ नीक-खराप दूनू साथे चलैत छलै....... उमा बाबू भूगोल पढ़ाथिन त’ टंगड़ी हिलबैत रहथिन आ मोटका करची क’ सटक्‍की सँ अपन तरवा पर हरदम चलाबैत रहथिन जेना कि केओ मजूर अपन हांसू के पिजबैत छैक ....ओ कहथिन जे आबादी बसै आ घरक समूहक गठन एकटा खास पैटर्न पर होए छैक आ विश्‍वक विभिन्‍न भागक लोक सब अलग-अलग पैटर्न पर अपन निवास बनबैत छैक ,उमा बाबू ईहो कहथिन जे यदि केवल भारते के देखल जाए त’ उत्‍तर भारत आ दक्षिण मे असंख्‍य पैटर्न ........गंगा ,गोदावरी ,रावी,गंडक ,कोशी सभक पेट मे अलग अलग श्रृंगार ।केवल मिथिले नइ मिथिलो मे समस्‍तीपुर के देखियौ उत्‍तर मे अलग आ दक्षिण मे अलग ।उत्‍तर मे घर पर घर आ सटल सटल टोल ,जखन कि दक्षिण मे हटल हटल घर ।विशाल खेत आ तखन एकटा दूटा घर ,खूब फैलल गाछी बिरछी तखन किछुए टा घर ।आ घरक अवस्थिति केहन त’ पोखरि ,रोड वा मंदिरक आस-पास ।अपने गामक विचार करियै त’ पूरा ब्राह्मणक आबादी नबकी पोखरि ,नौला आ बरी पोखरिक चारू कात वा फेर डीह पर कचहरी ,इसकूलक चारू कात आ रोसड़ा-बहेड़ी मार्ग पर । आ सबसँ उस्‍सर ,बंजर ,सक्‍कत जमीन पर चमार आ दुसाधक आबादी ,एकदम बबूर जँका ,कत्‍तउ जनमि जाइत हो ,खेतक आडि़ पर ,पोखरिक मोहार पर ,गाछीक खत्‍ता मे लोकपरिया पर ,पीचरोडक दूनू कात आ श्‍मशान मे सेहो........ने खाद देबाक काज आ ने पानि देबाक चिंता।मुदा सबसँ सक्‍कत , सूर्य भगवान आ सभ्‍यताक समस्‍त गरमी के सोखैत जहिना के तहिना ......एकदम हरियर पत्‍ती .......बाभनक दांत पर घुस्‍सा मारैत ,भोर सांझ.......आ जखन सभ हरियरका जजाति सूखि जाइत हो तखन बबूरक पत्‍ती आ ओकर फअर सभक जान बचाबैत........तहिना चमार आ दुसाध सेहो अपन छोट दुनिया मे एकदम मस्‍त आ हरियर । गामक सब सरल गेन्‍हायल पानि ,गनगी बरसा आ बिना बरसा के पूबरिया ढ़लान होयत चमरटोली दिस चलि जायत ।आ चमरटोली जे गामक पूबरिया सीमान पर बसाएल गेल छलै ,समस्‍त अग्राह्य सेवा क’ लेल ,जत’ के लोक सभ के ई कहबाक अधिकार नइ छलै जे अओ बाबू अपन देहक ,घरक ई दुर्गन्‍ध हमरा दिसि किएक बहा रहल छी \ ई आबादी जेकर पेट ,देह आ मोनक चर्चा तक अश्‍पृश्‍य छलै .....देहे नइ मोन तक छुआ जाए वला .....गंगा जल ,नइ गंगो जल नइ पवित्र करत ,हड्डी तक छुआए वला गनगी.........स्‍मृति आ वर्णगत विभिन्‍न श्‍लोक ,कहबी ,हवा-पानि ,भूत-प्रेत पर्यंत तक फैलल...... यद्यपि चमार सब पूरबिये सीमान पर समटि गेल छलै ,मुदा दुसाध सब जीयत रहै ,डीहक सक्‍कत जमीन पर ...आ जेकरा जीन मे घुसल रहै संकट निवारण लेल साहस ,उद्योग ,आ ओ सप्‍पत खेने रहै अपन राजा जी के .....राजा जी हुनकर कुल देवता नइ रहथिन ,ओकर अप्‍पन राजा जी ,हँ मिथिलाक आदिवासी दुसाधक राजा जी .....आ राजा जी पहिले महल ,गद्दी ,दरबार छोड़लखिन आ किताब ,पुरातत्‍व सँ सेहो हुनकर निशानी मिटि जाइत रहल.....मुदा राजा जी बसल रहलखिन दुसाध सभक करेज मे - कते घोड़ा तोहर राजा कते दुश्‍मनमा के धरती चलै अकाश हो........ आ राजा जी आ राजा जी क· घोड़ा दूनू अपन मूल स्‍वरूप के पानि जँका छोडि़ देने रहै आ राजा जी मने घोड़ा आ घोड़ा मने राजा जी ,तें घोड़ा चढ़एबा क पूजा बेशी धूमधाम सँ होइत छलै आ राजा जी वला उत्‍सव दुसाध सभ मे एकटा खास उत्‍साह,आत्‍मविश्‍वास जनमाबैत छलै ,मुदा राजा जीक मन्दिर कोन ठाम बनै,विद्यालय पर ,आचार्यक डीह पर वा दुसधटोली मे ......ई खिस्‍सा कनेक बाद......... अपन गामक चर्चा कोना करी ,खूब मीठ प्रशंसा सँ .....जेना कि केवल मीठे-मीठ अनुभव होए ।केवल मीठ अनुभव तखने संभव ,जखन कि एक-दू दिनक लेल पिकनिक पर आयल जाए ,मुदा जखन जिनगीए बिताबै के अछि तखन केवल मैथिली शरण गुप्‍त क भंगिमा ल· के कोना जीयब आ बात बात मे ग्रामीण जीवन ,भारतक प्राचीनता आ महानता क पाठ कोना कएल जाए .....आ मैथिली मे सेहो गुप्‍त जी नइ मैथिली शरण सभक कमी नइ ,जे बात बात मे मिथिलाक महानताक बखान करैत रहता ,हुनकर ग्रामीण जीवन क फॉर्मेट पहिले सँ सुनिश्चित रहै छैक ,केवल विवरण भरबाक काज......छोड़ू ऐ सब कें.......चलू हम अप्‍प्‍न डायरीक ई पाठ अहींक कविता सँ प्रारंभ करैत छी । (आगूक तीन-चारि टा पन्‍ना फाटल अछि) ओइ साल ओइ साल जे भेलै से कमाले-कमाल ।मार्च-अप्रील मे एते आलू उपजलै ,जे पूरा खेत-खरिहान आ घर सब महक' लागलै ।घर मे चौकी क' नीच्‍चा ,कोठी लग ,भनसा घर ,सौंसे बूझू जे आलूए-आलू ।एतबे नइ भानसक मेंजने बदलल ।भूजिये आ रसदारे नइ पापड़ ,तिलौरी सेहो आलूए क' आ एक दिन व्रत केलौं त' आलू मे दूध गूडि़ के भेटल ,रातियो मे आलू आ दहीक मिलल-जुलल भोजन । बाप रौ बाप गरमी पड़लै ,गजबे गरमी ।आदमी गाछ त'र ,दुरूखा आ पोखरि-गाछी जाए बूझू जे गंजी-अंगा घामे सँ भीजि जाए ।ईनार-कल सेहो पस्‍त आ पोखरि-नद्दी तक सुक्‍खल ,बगलक गाम मे एकटा ईनार रहै आ मनबोधन बाबू क' दिलदारी कि एक-एक डोल पानि सबकें दैत रहलखिन । आ बस महीना दिन बाद ओमहर बागमती आ ईमहर करेह तोडि़ देलकै ।हमर पीढ़ी त' बाढि़ देखबे नइ केने छलै ,से बड्ड व्‍याकुल भ' के पानि के स्‍वागत करबाक लेल शिवाजीनगर दिस विदा भ' गेल ।आ पानि रसे-रसे खत्‍ता,नाला सब कें भरैत रहै ,आवाजो मद्धिम ।एमहर गामक बूढ़-पुराण सब सड़सठ ईसवीक बाढि़क निशान ढ़ुरहैत र‍हथिन ,केओ कहथिन जे पानि एत' तक आयत ,त'केओ कहथिन जे पानि एत' तक ।केओ ई कहथिन जे पानि दस दिन त' केओ पनरह दिन तक रहबाक बात करथिन ।किछु गोटा त' घरे मे माछ मारबाक सपना देख' लागला ।मुदा पानि जखन एलै त' अपन गति अपन मात्रा संग आ पूरा गाम डूबि गेलै ,गाम मे एकेटा दूमहला आ डाक्‍टर साहेब अपन ईज्‍जत दूमहलाक छत पर बैसि बचेला ।रानीपरती ,सबहा ,बनडीहा आ जोगिया सन कतेको छोट टोल डीहटोलक पुरनका धीमका पर शरण लेलक ।आ पानि रहि गेलै दू महीना ।ई पानि नीक जमाए नइ छलै कि ससुरक जेबी आ चिनुआरक रंग पर रंग धरै ,ई रहै लंठ जमाए जे बेईज्‍जत करबै पर आतुर रहै ।पुरनका आ नबका सब स्‍टॉक विदा भ' गेलै ,गाम मे पैंच उधार बंद ।ने हरियरका तरकारी ने बजार वला कोनेा समान ।एत' तक कि नूनक अभाव सेहो भ' गेलै ।कि आदमी आ कि माल-जाल सबहक अहार अकाश मे ।जे सस्‍ता रहै ओ बस दूध किएक त' सब माल-जाल कनिकबे टा के ओइ डीह पर रहै आ दूध बाहर जेबाक कोनो रस्‍ता नइ । आ ओहिए साल हाकिम बाबूक पोती भागि गेलै ।भागबो केलै त' दोसर जातिक छौड़ा क' संग ।आ भागियो क' कुकरी जल्दिए सासुर आबि गेलै ,ई ने जे भागि के दिल्‍ली-पंजाब पड़ा जाए आ आबि गेलै आ अप्‍पन जाति आ गामक नाम हँसाब' लागै आ लागलै जे ओक्‍करे हँसीक संग आलू आ बागमतीक हँसी एक भ' गेलै ।ओ पहिल छौड़ी रहै जे अप्‍पन जाति के तियागि केकरो संग भागलै छल ,एकरा बाद त' बूझू लाईन लागि गेलै ,बोहिनी नीक भेल छलै । घर अजीबे घर रहै ,खाए त' सब खाइते रहै ,आ हकडक्‍कल जँका करै त' लाईन लगा के सब हकडक्‍कले जँका करै ।बेरा-बेरी नइ एके संग । प्रसन्‍न रहै त' सब प्रसन्‍ने रहै ,नइ कुनो बात तैयो प्रसन्‍न ।बिना मतलबे के बरसा-बुन्‍नी ,रौद-अकाश ,पानि-बिहाडि़ किछो ल' के प्रसन्‍न ।अहां घरक बतीसी अलगे सँ देखि सकैत छियै ।प्रसन्‍न रहैक मून होए त' पड़ोसीक घरक चोरी ,बगल वलाक बेटी भागनै ,पंडीजीक बेटा के कैंसर भेनए ,राम अवतारक मैट्रिक परीक्षा मे फेल भेनए ,ई सब खुशिएक कारण रहै । लड़ाई करबाक मून होए त' टी0वी0 क' रिमोटे लेल झगड़ा भ' जाए ।बापक अलग चैनल ,माएक अलग रहै आ तीनू बच्‍चो के अलग रहै ।कुनो समझौता त' भेल नइ रहै ,तें जेकरा जखन मून होए ,टी0वी0 खोलि दए ,जेकरा जखन मून होए ,चैनल बदल' लागए । आ आमदनी त' सीमिते रहै ,कमाए वला मात्र बापे ।मुदा खरचाक मद केओ निर्धारित क' सकै छलै ।आ वरीयता क्रमक लेल डेली झगड़ा-फसाद ।बाप कहए ई जरूरी ,बेटा कहै ई आ माए कहै पहिले ई किएक नइ। आ घर मे सबके दुख रहै ।फलनमा के चिलनमा से आ चिलनमा के फलनमा से ।सब केर उपेक्षा छलै आ सबक प्‍लान रहै घर छोड़़बा लेल ।सब ताकैत रहै एकटा नीक दिन ।साईतक खोज डेली चलैत रहै ,मुदा केकरो लेल एखन बेहतरक खोज संपन्‍न नइ भेल छलै । घर मे कपड़ा-लत्‍ता रहै ,रमायन-महाभारत रहै ,देवी-देवताक फोटो रहै ,संगहि-संग बहुत रास उपदेश आ कर्तव्‍यक शिक्षा रहै ।गृहवासी एक-दोसर कें बेरा-बेरी सँ दैत छलखिन आ सब गोटे समै साल पर सुनै के आ नइ सुनबाक बहन्‍ना ताकैत छला । ईहो घरे छलै आ एकर एकटा नंबर छलै जे सरकारक कार्ड आ वोटक रजिस्‍टर मे दर्ज छलै ।पता नइ घर मे कुन प्रकारक एकता छलै जे घर घर रहै ,आ सिमेंटक ,कर्तव्‍यक आ बाढि़ मे रक्षाक सरकारी विज्ञापन फराक-फराक बैनर मे फराक-फराक जग्‍गह पर विराजमान रहै । बाबूक चट्टी

ऐ बेर गाम मे एकटा आयोजन छल ,आ आयोजने बीच केओ चप्‍पल चोरा लेलक ।संभव छैक केकरो सँ बदला गेल होए ,मुदा एकाध घंटाक प्रयासोक बीच भेटल नइ ।गाम पर आबिते झोरा तैयार छल आ शहर जेबाक जल्‍दी ,तें बिना कुनो ना-नुकुरि केने माए द्वारा देल बाबूक पुरनका चप्‍पल पहिर बाहर आबि गेलौं ।चप्‍पल मे कतेको जगह सीयल जेबाक निशान रहै ,तैयो चप्‍पल मजगूत रहै ,आ गाम सँ चारि सौ किलोमीटर तक कुनो प्रकारक दिक्‍कत नइ भेल । ऐठाम एलाक बाद कनियां कनि जे मुंह -नाक बनेलथि ,चप्‍पल ऐठामक चप्‍पल सब मे मिलि गेलै ।ने चप्‍पल देखै सुनै मे खराप रहै ने तुरत्‍ते कुनो टुटबाक डर ,तें हम मौका-बेमौका पहिरैत रहलौं ,हां कहियो-काल कनियां के कहला पर जरूर बदलि दैत रहियै ।आ चप्‍पलो बिना कोना दाना पानि के हमरा दुआरि पर रह' लागल ।बस कनियां ओकरा स्‍थान बदलैत काल ,या बाढ़नि लगबै काल कने जोर सँ धक्‍का दैत छलखिन आ फेर ई बात कि 'बाप रे बाप ई चप्‍पल पहिरै वला छैक ' । एकदिन भोर मे घूमैत काल चप्‍पल टूटि गेल ।कुनो पुराने जोड़ पर टूटल रहै ,आ हम नंगराबैत-नंगराबैत कहुना गामपर पहुंचलौ ।हमरा नंगराबैत देखि कनियां कुनो अज्ञात संभावना सँ चिकडि़ उठली ।हम आश्‍वस्‍त केलिएन ,जे एहन कुनो बात नइ ,हम स्‍वस्‍थ छी ,बस चप्‍पल कनि डिस्‍टर्ब क' देलक ।आ हमरा बिनु पूछने ओ चप्‍पल उठा सामने वला मैदान मे फेकि देलखिन ।हम रोकबाक प्रयास केलियइ ,मुदा ओ किछु नइ सुनलखिन ।चप्‍पल फेका गेल छलै ,मुदा बेसी दूर नइ रहै ।ऐ ठाम सँ ओकर फीता ,डंटी आ पूरा देह देखाइत रहै ।अगिला दिन आर लोक सब मैदान मे कूड़ा फेक' लागलखिन आ चप्‍पल कनेक एकात मे भ' गेलै ,मुदा एखनो तक ओ ओहिना देखाइत रहै ।एक बेर मून भेल जे कनियां सँ चोरा के ओकरा घर ल' आनी ।कनियां सूतल रहथिन ,मुदा जें कि उठलौं ओ फेर उठि गेली आ पूछ' लागलखिन 'चाय त' नइ पीयब '। भोरका समै छलै आ कनियां नहेलाक बाद पूजाक तैयारी मे रहथिन ,हम एकाएक उ‍ठलियै आ मैदान दिसि विदा भ' गेलियै ।औखन केओ जागल नइ रहै ,बस एगो-दूगो कुकुर सब एमहर-ओमहर ताकैत रहै ।हमरा मैदान मे घूसिते बगल वला गोला कुकुर हमरा दिसि ताक' लागल ।एकबेर त' डर भेल ,फेर साहस क' के दूनू चप्‍पल उठा लेलौं ।चप्‍पल पर बहुत रास पन्‍नी आ पाकल आमक सड़लका छिल्‍का रहै ।जल्‍दी सँ ओकरा झटकैत सांस के बारने रोड पर वापस एलौं ।आब आबि के फेर एकबेर जोर सँ सांस लेलौं आ कूड़ाक ढ़ेर दिसि फेर सँ धियान गेल ।ऐ चप्‍पल के की कएल जाए । ऐ चप्‍पल के घर मे राखनै ठीक नइ ।कनियां त' जे बखेरा करती ओ करबे करती ।ई चप्‍पल एकटा बीतल युगक कैलिडोस्‍कोप नेने घर मे घूसि गेल रहै ,मुदा एकर ऑरिजनल जग्‍घ' त' कतै आर छलै ।ई चप्‍पल हमर पिताक प्रमुख अस्‍त्र छल ।जखन जखन ओ क्रोध मे आबै छलखिन ,थापड़ आ मुक्‍काक प्रहार नइ करै छलखिन ,बस निकालि के चप्‍पल हमरा आ हमरा सब भाई-बहिन के्............. ।तें ई बीतल युगक एकटा अस्‍त्र छलै ,जेकरा लेल जगहक गुंजाइश ऐ घर मे नइ रहै ।ई चप्‍पल आब बस सम्‍हारि के देखै-देखबै लेल जोगा के राखै क चीज रहै ।अफसोस हमरा पास एत्‍ते जगह नइ कि हम संग्रहालय बनाबी। दोस आ दोसक चालि प्रकृति बेमेय आ जे काज मिश्रा जी नइ केलखिन से झा जी क' देलखिन ।वाह रे झाजी ,एकदम नगाड़ा बजा देलियइ आ सिंह कैम्‍प मे एकदम नैराश्‍यक स्थिति ।मिश्राजी जे बाजियो के नइ केलखिन ,से झाजी बिन बाजने सुतारि देलखिन ।एकरा कहै छै आदमी क' मतलब आदमी ,मुंहक मतलब मुंह ,हाथक मतलब हाथ आ जे कैह देलियौ से क' देलियौ ।ई भेलै ने ....आ ईहो देखियौ जे आदमी लोकल नइ ,पचास किलोमीटर दूर दरभंगा के आ मधुबनीक किला पर फहिरा देलकै धूजा ।आ पूरा दरभंगामंडली पुलकित ,पुलकित ब्राह्मण वर्ग आ आशान्वित कलक्‍टरी क' खबरी-छिनरी सब ।आ रंग-रंगक खिस्‍सा कि झाजी कैह देलखिन 'केवल अाहीं टा कमायब' कि 'केवल आहींटा क' घर-परिवार' कि 'केवल आहीं के गानै मे मून लागैत अछि ' आ पता नइ की झाजी कहलखिन आ की सिंहजी सुनलखिन ।पता नइ दूनू मे की बात भेलै ,ओना दूनू आदमी अपन-अपन कैम्‍प बनेबाक प्रयास जरूर केलखिन ,मुदा बहुत सफलता नइ भेलेन ।जे सीरियस आदमी सब रहथिन ,ऊ परिणामक साफ-साफ अनुमान केलखिन आ बहुत दूर नजरि फेकैत साफ-साफ देखलकिखन कि दूनू मे संघर्षक कुनो संभावना नइ आ स्‍पष्‍ट बूझल गेलै कि किमहरो गेनै मतलब अपन पहचान डूबेनए आ एहन स्थिति मे गुटनिरपेक्षता सदैव काम्‍य होइत छैक आ वाह रे कलक्‍टरीक बुधियार इंस्‍पेक्‍टर आ कर्मचारी वर्ग ओ किमहरो नइ गेलै ,ओ किछुओ नइ सुनलकै ,ओ किछु नइ निर्णय लेलकै ।ओ सुनितो आगू निकलि गेलै........... आ बहुत जल्‍दी सिंह-झा संधिक अघोषित परिणामक लिस्‍ट बजार मे बिकाइत भेटलै ।तू ले कलुआही आ हम लइ छी जयनगर ,दूनू आदमी भरि मून चर ।अपन-अपन पेट आ अपन-अपन जीभक' रक्षा कर ।तू बाभन सब के पोट हम राजपूत के पोटैत छी ।बहुत जल्‍दी खुलबाक आवश्‍यकता नइ ,बहुत दोस्‍ती देखेबाक जरूरी नइ ,बहुत भेंट करबाक कोन प्रयोजन ।से अपना-अपना खुट्टा पर टीकल रह , अपना खुट्टा पर सँ खूब लथाडि़ मार ,खूब सिंह भांज ।एना के  सिंह भांज कि मालिको (हाकिम)तक डराइ ।आ यैह भेलै कि हाकिम तक डराइत रहलखिन कि यदि एकर सबक अधिकारक्षेत्र मे किछु परिवर्तन करबै त' कत्‍तओ सँ फोन आबि जायत । आ अहां झाजी सँ भेंट करियौ ,त' ओ आनी-मूनी स्‍टायल मे भांजता 'सिंह जी देखेबो केला' । अहां कहबै 'नइ' तखन फेर हफियाइत पूछता 'ओमहर गेल नइ रहियइ' । अहां यदि फेर कैह देलियइ 'नइ' तखन ओ आश्‍वस्‍त होइत कहता 'हां ठीके अछि अप्‍पन काज सँ मतलब रखबाक चाही ।' मतलब झाजीक साफ छैक 'अहां सब सिंहजी सँ नइ भेंट करियौ ,एकांत मे त' कखनो नइ ।आ नइ भेंट करबै त' बातचित नइ हैत ,बातचित नइ करबै तखन सेटिंग-गेटिंग नइ हैत आ ई सब झाजीक लेल खुशखबरी आ भेंट करबै त' झाजी क' एकटा स्‍टार कमि जेतै । भेंट करबै त' सिंह-झा -पालिटिक्‍स केर गोपनीयता संकट मे पड़तै ,ऐ राजनीति क' बौद्धिक पेटेंट खतम भ' जेतै ।' जेना सिंह जी तेहने झाजी जाति-जिला फैक्‍टरक प्रयोग करैत छथिन ,तें दूनू गोटेक बासन आ औजार अलग-अलग ।झाजी सेहो सिंहजी क' विरोध ऐ अंदाज मे करता कि समस्‍त ब्राह्मणक लेल सिंहजीक रहनै खतरनाक आ झाजी अपन किछु चलाकी ,किछु क्षुद्रता ,किछु बाताबाती कें एना प्रस्‍तुत करैत छथिन जेना ब्राह्मण जाति ,दरभंगा जिला ,बहेड़ी प्रखंड आ करेह नदीक उद्धार आब जल्दिए भ' जेतै ।बस अहां सब झाजी जिंदाबाद करैत रहियौ । झाजी अपना आप के बड़का विद्वान मानैत छथिन ।आ अपना सँ नमहर अपना भाय कें आ भाय सँ किछु बेशी अपना बाबा कें ।भाय एकटा विश्‍वविद्यालय मे प्रोफेसर छ‍थिन आ बाबा स्‍वतंत्रता सेनानी रहथिन ।बात कत्‍तौ सॅं उठलै ,आबि के गिरतै भैया पर ।वेद आ कुरानक लाईन सँ बात शुरू भेल होय ,मुदा खतम हेतै भैया झा पर ।आ ई खतम होय के पावर भैया झा के लिखल समान मे होय भाय नइ होय छोटका झा के ठोरठोरई मे जरूर छैक ।आ सिंह जी के कलुआही लूटबाक छेन ,से ओ बिना शर्त झाजीक बौद्धिकताक समर्थन करैत छथिन ।यदि केओ झाजीक बौद्धिकता पर निशान लगाओत त' सिंह जी ओकर भक्‍शी झोंकि देथिन ।सिंह जी चाहैत छथिन कि झाजी बौद्धिक बनबाक निशां मे मधुबनी छोडि़ के दरभंगा चलि जाए ,मुदा हाय रे सिंह जी झाजी एकदमे उनैस नइ छथिन ,हुनका कवि नइ बनबा के ,हुनका विद्वान नइ बनबा के ,हुनका अजर-अमर नइ बनबा के ,हुनका कालजयी नइ बनबा के ,आ यदि कालजयी के मतलब किछु होयत होए त' ऊ दू-चारि बिगहा अरजि के ,पटना-दरभंगा मे एक-दूटा घर बनाके हुुअ' चाहैत छ‍थिन ।कालजयी मतलब ई नइ कि अहां के एक-दूटा किताब छपि गेल आ दू-चारि टा लोक अहां पर लिख देलक ।कालजयी मतलब ई जे तीनमहला क' ऊपरका महल पर संगमरमर सँ लिखल फलां झा तीन-चारि पीरही तक जगजगार होयत रहै । आ ऐ ठाम सब अपना-अपना हिसाबें कालजयी भ' रहल अछि । सिंहजी क' दू टा प्‍लॉट पटना मे एकटा दरभंगा मे आ एकटा समस्‍तीपुर मे ।मधुबनी मे जइ मकान मे रहि रहल छथि से सारि क'नाम सँ ।दुनिया सारि आ सारिक प्‍लॉट ...दूनू के सिंहजीक मानैत अछि ,मुदा सिंहजी सन ईज्‍जतदार आदमी ....च्‍चचच..झाजी एकटा प्‍लॉट दरभंगा मे आ एकटा पटना मे आ जल्दिए सिंहजी कें पाछू क' देथिन ।नेबोलाल पटने मे नइ दिल्‍लीयो मे एकटा मकान खरीदने अछि ,आ ओकरा सन भाग्‍य आ बहीन त' भगवान सबके देथिन ।बहिनोय एक्‍साईज विभाग क' बड़का अधिकारी रहथिन आ जीता-जी पचास-साठि करोड़ कमा गेलखिन ।घर-परिवार,स'र-संबंधी ,सबहक नाम सँ बेेनामी संपत्ति ,आ भगवानक लीला ई कि एकदिन दूनू प्राणी मे झगड़ा भेलै आ दूनू प्राणी गोली सँ आत्‍महत्‍या क'लेलखिन ।आ सब स'र संबंधी चुप्‍पी मारि गेलै ,केओ नइ कहलकै कि फलां जी हमरा नामे ई खरीदने रहला ।आ रंजन जी जइ दूमहला कें अपन बाबूजी क' नाम सँ बताबै छथिन ,तइ पर रंजन जी कें होमलोन मिलल छैक ।आ ई सब खिस्‍सा गोपनीय छैक ,तावते तक जावत तक कि दोसर के पता नइ चलैत छैक ,आ फेर दोसर सँ तेसर आ तेसर सँ चारिम ।आ ई सब खिस्‍सा तावत तक गोपनीय रहतै ,जावत तक सिंह डरेतै झा से आ झा डरेतै नेबोलाल से ।आ यदि एक्‍को टा मटकूरी फूटलै ,तखन सब फूटतै .... आब त' नबका-नबका अधिकारी सब सेहो आबि रहल अछि जिला मे ।अइ मे एकटा सिंहजी क' परिचित छथिन ,ईहो सिंह ,हिनका जूनियर सिंहजी कहल जाए ।जेना सिंह जे बाजै मे भटभटिया ,तहिना जूनियर एकदम चुप्‍पा ।पहिले सब के बूझेलै जे जूनियर मितभाषी ,संकोची छैक ,बाद मे पता चललै कि जूनियर मुंह मे पान,तमाकू आ सुपारी ठूसने रहै छैक ,मुह मे ,गाल मे ,ठोर मे  ।बेशीकाल ईशारे से काज चलेला ,बेशी जरूरी होए वा नमहर एमाउंट होए । बेशी काल मुंह खोलै छथिन -तीस ,चालीस या थर्टी , फोर्टी कहबा क' लेल ।आ कखनो कखनो खोलै छथिन नमहरका मुंह -पचास ,प चा स ।जल्दिए जिला बूझि गेलै कि जूनियर किछु मायने मे सीनियरो क' कक्‍का ।जूनियर रहै सिंहजी क' परिचित ,तें भैया...भैया....कहिते रहै हरदम आ टेक्‍नीक मे सेहो भैया के नकल करैत ,मुदा ऐ अधपक्‍कू नकल पर हँसबा के नइ शांति सँ बूझबाक जरूरी छैक । जूनियर क' साथे एकटा आर चुप्‍पा आयल छैक ,एकर चुप्‍पी कनेक अभौतिक कनेक भौतिक छैक ।लेबा के, खूब लेबा के ,अहगर लेबाके ,बेर-बेर लेबाके ईच्‍छा एकरा मोन मे जागै छैक ,मुदा हाय रे ध्‍वनि तंत्र ,हाय रे बाजै वला सिस्‍टम सब ।मोन मे रहै छैक किछुआर ,निकलै छैक किछु आर ।मोन मे आबै छैक जल्‍दी लाऊ आ मुंह से निकलै छैक राखू ने बादे मे देब ।आ कखनो काल त' ईहो नइ निकलै छैक ।एकर ऊलझन सबसँ क्‍लासिक ।पइसा के सबसे बेशी जरूरी ,मुदा भ्रष्‍टाचारविरोधी आंदोलन दिस उन्‍मुखता ।अपनो हाल-चाल उजरल-उपटल ,मुदा दोशर कें फैदा पहुंचेबाक नीयत ,गरीब कें कष्‍ट नइ देबाक आदर्श ।वौआ दूनू चीज कोना साथ-साथ ल' के चलबहीं ।धनी-मनी सब देतौ नइ किछु आ गरीबहा के संग मे छइ नइ किछु ,त' बाज ने कोना काज चलतै ।जे देनिहार छैक ऊ नेता-मंत्री सब सँ फोन करा के काज करा लेतौ आ जे नइ देनिहार छैक से भुक्‍खल जिन्‍न जँका आफिसक बाउंडरी मे हँफिया रहल छैक ।ऊ बस हाथ-पैर जोड़तौ ,ऊ बस आर्शीवाद देतौ ,आ ऊ आर्शीवादो नइ देतौ ।आर्शीवाद देबाक प्रक्रिया मे एकटा हूनर छैक आ ई एत्‍ते गरीब ,एत्‍ते हियाक हारल छैक जे आर्शीवादो देबाक हूब एकरा देह मे नइ छैक ।आब बाज ने की करबीहीं । नया किछु नइ होय वला ,या त' बनही सिंहजी ,झाजी ,मिश्रा जी या फेर नेबोलाल ।सफलताक यैह सब किछु मॉडल छैक । सबहक अपन-अपन झूठ-सांच रहै ,सबहक नोकरी आ सबहक परिवार ।सिंह जी कहथिन जे हमर वियाह त' बालपने मे भ' गेल रहै ।माए नइ रहथिन आ सब जिम्‍मेवारी हमरे पर ।मिश्रा जी कहथिन जे हमर कनियां बूझू जे करीना कपूर ।करीना कपूरक चयन हुनकर ,हम्‍मर नइ आ यैह हीरोइनक नाम किए ओ लैत छथिन एक्‍कर सही-सही जबाब वैह देता ।झा जी कहथिन जे हम्‍मर कनियांक पिता बैंक मे उच्‍चाधिकारी छलखिन ने ,आ हम्‍मर कनियां कतेको बेर हवाई जहाजक यात्रा केने छथि ।दोसर सबहक पत्‍नीक व्‍यवहार पर प्रश्‍न करैत अप्‍प्‍न कनियांक व्‍यवहारक उपयुक्‍तता आ प्रौढ़ता पर दस से पनरह मिनट .....एहन सन कि अहां कि देखायब हमर कनियां दसे-बारह साल सँ सब किछु देखने छथि ।आ जखन ओ अपन कनियांक योग्‍यता एल0एल0बी0 ,बी0एड0 कहथिन त' हुनकर गरदनिक नस सब हरियर-हरियर होइत पूरा बलक साथ हुनकर समर्थन मे मोट भ' जाइत रहै ।नेबोलालजी क' समस्‍या किछु आर छलै ओ अपन कनियांक वणिक् पारिवारिक पृष्‍ठभूमि सँ बेसी परेशान रहथिन आ अप्‍पन ससुरक लेल विशेष पंचाक्षरी गारिक प्रयोग करैत रहथिन....मादर...केवल अपना बेटी के दोकान पर बैसेनए आ गल्‍ला सम्‍हारनए सिखेलकै ।तैयो अप्‍पन कनियांक गोर-नार चेहरा आ वयस्‍क-व्‍यवहार सँ बेस प्रसन्‍न रहथिन । सब अपना-अपना तरहें डपोरशंखी वृत्तिक प‍रिचय देथिन आ ऐ मे सबसँ आगू सिंहजी रहथिन ।पता नइ अपन परहाई-लिखाईक' समै मे की सब केलखिन ,मुदा हरदम बतेता कि चा‍रि बेर आई0ए0एस0 मे इंटरव्‍यू देलियै ,सात-आठ बेर बी0पी0एस0सी0 मे ,पता नइ किएक सेलेक्‍शन नइ भेल ।आ जावत अहां ऐ तथ्‍य पर विचार करबै ,तावत दू-चारिटा आई0ए0एस0 सबहक नाम गिना देता ,ओइ मे एगो-दूगो त' हिनकर नोटे सँ पास भेल रहै ,आ एगो-दूगो क' फोन एखनो आबै छैक ।आ यदि अहां एखनो ऐ भौकालीक प्रभाव मे नइ एलियै तखन तुरत्‍ते एगो-दूगो विधायक के फोन लगबैत होलीक शुभकामना डिस्‍पैच कर' लागत ।मिश्रा जी संस्‍कृतक दू-चारिटा कठिन श्‍लोक फेकैत ऐ तथ्‍य पर बल देता कि आब विश्‍वविद्यालय खरीद-फरोख्‍तक अड्डा बनि गेल अछि आ कतेको बेर बस पइसाक अभाव मे हुनकर नियुक्ति विश्‍वविद्यालय मे नइ भेलै ।आ झा जी जखन आफिस मे कहै छथिन जे हौ हमरो दूरक नइ बूझह' ,बस नदी पार करहक आ .....।ई गर्वोक्ति नव्‍यन्‍यायक नइ थिकै ,मुदा आफिसक वातावरण मे खास प्रभाव उत्‍पन्‍न करैत घूसक राशि मे अप‍ेक्षित वृद्धि करैत छैक ,यदि वृद्धि नहियो होइत छैक त' अगिला व्‍यवहारक लेल ई खास भय उत्‍पन्‍न्‍ करैत छैक कि झाजियो लोकले छथिन ।

                                    आ सिंह जीक लेबाक टेकनीक अलग ।पहिले खूब हल्‍ला करता ,हम त’ लइते नइ छी ,हम त’ लइते नइ छी ,फेर ओहियो सँ बेशी जोर सँ चिचियेता कि पागल छहीं की ,बिन देने काज हेतौ ।सिंह जी कहता ‘हम त’ दस-बीस हजार सँ कम नइ लै छियै आ जँखन लेबाक टाईम होइत छैक त’ अठन्नियो उठा लैत छथिन ।दोस सबक बीच मे कहता कि गरीब सँ नइ किछु लेबाक चाही आ गरीब यदि बीस हजार ल’ के आयल छैक आ हिनका पचीस चाही ,त’ ओकरा पचीस दइए के छैक ।आ सिंह जीक रेंज जोरगर ,ओ सब किछु ल’ लेता रूपया-पइसा ,गहना ,दही-दूध ,अनाज ,साड़ी ,आदि ।मुदा रेंजक प्रतियोगिता मे मिश्रा जी सेहो केकरो सँ कम नइ ।हिनकर गिफ्ट मे अन्‍न-तत्‍वक विशेष महिमा ।मिश्रा जी ओइ ठाम मकई ,मड़ुआ ,टमाटर ,सीम ,सामा-कौनी सब चलै छैक ।आ यदि रूपया देबाक अछि त’ बाहर मे गणेश-लक्ष्‍मीक मूर्ति राखल छैक ,ओकरा पर अर्पित क’ दियौ ।ऐ वृत्ति आ घटना कें खास आध्‍यात्मिक स्‍वरूप दैत मिश्राजी देनए-लेनए कें भगवाने पर छोड़ैत छथिन ।आ मानि लियौ जे केओ आबि गेलै सांझ मे आ ओकरा साईन करेबाक छैक त’ मिश्रा जी पेन बंद क’ लेथिन ,जावत तक आटा नइ पिसेतइ ओ पेन कोना खोलि सकैत छथिन ।तें आब ओइ व्‍यक्ति क’ राष्‍ट्रीय कर्तव्‍य भ’ गेल छैक कि ओ मिश्रा जी ओत’ दस-बीस किलो आटाक पैक आनि दए ,नइ त’ मिश्रा जी पूरा बजार बौएथिन आ ओकरा दस राति बजेथिन ।आ यदि ओ आदमी पुरान छैक ,मिश्रा जी कें जानै छैक आ मिश्राजी क’ शब्‍दजाल पर धेयान नइ दैत छैक त’ ओ बिना समै नष्‍ट केने आटा आनै ले चैल जेतै ।आ मिश्रा जी ओत’ के सब आबि रहल छैक ,मिश्रा जी ओइ ठाम कोन-कोन चीज आबि रहल छैक ,सबहक लिस्‍ट सिंहजी बना रहल छथिन ।मतलब घर भरा रहल छैक मिश्रा जी के आ लिस्‍ट भरा रहल छैक सिंह जी क’ ।आ जखन मिश्रा जी मीटिंग मे कहैत छथिन जे ई महीना त’ एकदम खालिए रहल ,सिंह जी आदमी आ लिफाफाक पूरा हूलिया दैत मिश्रा जी कें चित्‍त क’ दैत छथिन ।सिंह जी के ईहो पता छैन कि मिश्राजी के चिनुआर मे राखल घी बकेन गायक छैक ।मिश्रा जी सिंह जी कें ऐ जानकारी कें विशुद्ध षड्यंत्र कोटि मे राखैत छथिन आ हँसि के उड़ेबाक असफल प्रयास करैत छथिन ।

                                    रंजनजी क’ रेंज सेहो छोट नइ ,मुदा मृदु ,होयबाक नाते आ लोकल नय होयबाक नाते कनेक घाटा मे रहैत छथिन ,मुदा हिनकर चोट वैह जानैत छैक ,जे खेने होय ।गजब रंजन सर ,गजब ,एकदम बौद्धिक मारि .....,बम-फटक्‍काक अवाज नइ ,बस हृदय दरकबाक ध्‍वनि ।आ सबसँ तुच्‍छ ,क्षुद्र आ ठोर मे सँ छिनै वला आंखि केकरो देने होथिन भगवान त’ नेबोलाल के ।आ ल’ त’ लेत सब किछु ,मुदा देनिहार के वैह पंचाक्षरी गारि ,मतलब दियौ तखन आर्शीवाद रूप मे आ नइ दियौ तखन गारिक भंगिमा मे ,मुदा भेटत वैह ।जूनियरक गाड़ी जखन केकरो दलान पर लागि जाइ छैक त’ ओकर तीन पीरही तीन दिनक मूतान एडवांसे मे मूति दैक छैक ।से की कहौं खिस्‍सा...... आ सब गोटे अपने घर-परिवार त’ छैक ,तें  कहबा मे सेहो कोनो दोख नइ ।तें कहियो दैत छी त’ खराब नइ मानब ,किएक त’ अहां सँ की बॉंचल अछि ..... लघु कथा (व्यंग्य)- दोस यौ दोस 

ऑफिस मे हमर सबसँ प्रिय (हुनकर प्रिय हम नइ)मित्र रंजन जी के लेल धूस एकटा टेक्निकल मुद्दा छलै । आ घूस पर बतिआइत हुनका हम देखि अभिभूत भ' जाइत रहियै ।इतिहास सँ ल' के ,अर्थशास्‍त्र सँ ल' के ,समाजशास्‍त्र सँ ल' के आ भारतीय आयोजन तकक समस्‍त जानकारी के पता नइ कोन-कोन सूय्या -डोरा ल्‍ा’ के ओ सी दैत छथिन ,से पूछू नइ ।आ मिथिला के कथित रूप सँ सबसँ विद्वान जगह आ सबसँ नमहर माथ वला जगह सँ होयबाक नाते ओ बतहुत्‍थनो कम नइ करैत छथिन ।घूस क निशान ओ ऋग्‍वेद आ इलियड मे ढ़ूरहैत उत्‍तर आधुनिक सा‍हित्‍य तक आबि जेता ।चाणक्‍य ,अदम गोंडवी आ गुन्‍नार मिड्रल के उद्धृत करैत-करैत ओ एते भावुक भ' जेता कि अहां अपना-आपके घूस नइ लेबाक विभिन्‍न प्रसंग मे दोषी मान' लागबै । नहू-नहू बाजै वला रंजन जी खुरपी ,कोदारि ,हांसू सब राखै छथिन ।मात्र राखबे नइ करैत छथिन ,कत्‍त' कोन चीज चलाबी ,सेहो बखूबी जानैत छथिन ।केकरा लग जातिक संदर्भ ,केकरा लग क्षेत्रक ,कत्‍त' मिथिला वला संदर्भ राखी ,कत्‍त्‍ा’ सेक्‍युलर बनी आ कत्‍त'राष्‍ट्रवादी ,एकर सर्वोत्‍तम प्रयोग देखबाक लेल अहां के दस-पनरह दिन रंजन जीक साथ रहबाक चाही ।आ कखन की बाजी आ कोन मौसम मे केकरा संग रही ,ई अहां हुनके सँ सीखि सकै छी ।ईनकम टैक्‍स भरबाक समै मिश्राक संग ,भोरे घूमबाक लेल झाजी ,माछ किनबाक लेल यादव जी ,गाम जेबाक लेल कर्णजी साथ आ कुनो तिकड़म होए त' सिंह जीक संग । रंजन जीक संग मे एक सँ एक मशीन ।अहां केखनो भावुक भ' जाएब ,कखनो क्रोध सँ लाल-पीयर आ केखनो रंजन जीक लालित्‍य सँ अभिभूत ।मुदा रंजन जी ओहने छथिन ,बस काज भेलाक बाद ओ अपन मौलिक अवस्‍था मे विदा भ' जेता । आ रंजन जी कें पता छैन कि अहां सँ कोन चीज कोना उगलबएल जाए ।ओ नब्‍ज छूता आ अहां अपन बोखार आ दस्‍तक पुराण एक्‍के सांस मे बहार क' देबै ...... 2 रंजन जी क' सबसँ नजदीकी मित्र सिंह जी छथिन ।दू-चारि बेरक शीतयुद्ध छोडि़ दियौ ,दू-चारि प्रकरणक प्रतियोगिता कें बिस‍रि जाइयौ ,तीन-चारि टा हारजीतक संदर्भ पर धियान नइ दियौ ,तखन ई बात पूरा जिलाके पता छैक कि रंजन जी क' सबसँ प्रिय के आ सिंह जी क' सबसँ प्रिय के ।ई बात केकरो पता नइ छैक कि बेशी जरूरत केकरा छैक दोसर के ,ईहो पता नइ कि के केकरा सँ बेशी फैदा उठबैत छथिन ।ईहो पता नइ कि ऐ दोस्‍ती के बनेने रहबाक लेल के बेशी प्रयासरत छैक ,आ के एक सीमाक' बाद ऐ चीज कें इग्‍नोर करैत छैक ।मिला-जुला कें एकरा सामाजिक सहजीविता(सोशल सिम्‍बायोसिस) कहल जाए ,जीव विज्ञानक छात्र होयबा कें कारण हमरा दिमाग मे लाईकेन आबि रहल छैक ,पूर्णत: शैवाल आ कवक केर घालमेल ।केओ देह देने छैक त' केओ अपन हरियरी ।तहिना ऐ ठाम सेहो एकटाक दिमाग छैक आ दोसरक लंठई आ ऐ कंबिनेशनक परिणाम पूरा जिला भोगैत छैक । सिंहजीक लंठई छोट दिमाग मे नइ घूसि सकैत अछि ,किएक त' सिंह जी ओकील सँ ,किसान सँ आ परिवादक सँ ऐ हिसाब सँ मिलैत छथिन जे केकरो पता नइ चलत कि ऐ लंठक दिमाग मे की चलि रहल छैक ।परहल-लिखल संग परहल जँका आ मोटपसम लोक संग मोटपसम बात ।वाह रे सिंह जी ।बात लिय' त' विद्यापति सँ ल' के ज्ञानेंद्रपति तकक  कविताक मानचित्र सामने राखि देता ।इतिहासक बात करब त' ईसवी ,उद्धरण ,पृष्‍ठ संख्‍या आ स्‍टैंजाक बामा कात की दहिना कात सब बात कहि देता ।सौ -दूसौ टकाक कुनो बात होइ तखन अपन पर्स खोलि कें अहांके द' देता ।केकरो ओइ ठाम श्राद्ध होए ,बेटीक बियाह होए त' आदमी अप्‍पन गाड़ी क' के पहुंच जाए ,मुदा जेखन नमहर डीलिंगक कुनो बात होए तखन अपन पिताजीक पैरवी सेहो नइ सुनत ।एतबे नइ नियम-कानूनक अपन व्‍याख्‍या करैत ओ चाहता कि फाईलक क्रिया-कर्म भ' जाए । आ एहन विवादास्‍पद काज सब करबाक लेल बड़का करेजा केवल सिंहे जी मे भेटत ।आ सिंहजी क' करेजा मे कतेको आदमीक धमनी आ शिरा जुड़ल छैक ।डी0एम0 आफिसक चपरासी ,बाबू ,अधिवक्‍ता संघक अध्‍यक्ष्‍ा -मंत्री,अखबारक संवाददाता-उपसंपादक आदि,आदि ।ऐ सब गोटे कें पता छैन कि सिंह जी की करैत छथिन ,मुदा की कहबै कहियो ने कहियो ई सब सिंह जी सँ उपकृत भेल छथिन ।आ विभागीय अधिकारीक बाते छोड़ू ,सबक फिज मे सिंहजीक रसगुल्‍ला ,एतबे नइ फ्रिज तक सिंह जी क' खरीदल ।केकरो रेलवे क' टिकस ,केकरो इसकुलक फी ,केकरो डाक्‍टरीक पर्चा .....सब सिंहजी क' जेबी मे ।एतबे नइ ऊपरका नेता-अधिकारी तक पैरवी करबाक हो ,ट्रांसफर करेबा आ रोकेबाक हो ,सबक हिसाब सिंह जीक संग । विभागीय अधिकारीक पहिल चाय आ अंतिम चाय सिंहजी क' संग ।बाकी टाइम मे सिंह जी की करथिन ,एकरा सँ केकरो लेबा-देबाक नइ ।अहां सिंह जी कें अपना कुरसी पर नइ देखि सकैत छियै ।मोटा-मोटी जातिवाद सँ दूर ,मुदा एहनो नइ कि जातिवादक उपयोग नइ करी ।अप्‍पन जातिक अफसर मिलि जाइ त' दूहाथ जाति-जाति सेहो खेल ली ।आ अप्‍पन कुरसी के बचेबाक हो ,केकरो सँ किछु छिनबा क होए त' 'जाति-जाति' किएक ने खेली । आ सिंह जीक बियाह सेहो एहिए जिला मे भेल छलै ,से किसान आ ओकील कें ई बात बताबै मे सिंह जी कंजूसी नइ करथिन आ ओकील साहेब सब आ किसान भाय सब ऐ संकेत के बूझैत सिंह जी कें निराश नइ करैत छथिन ।अहां सिंह जी कें जातिवादी कैह सकैत छियेन ,मुदा हुनकर द्वार पर आंहू केर स्‍वागत अछि ।अहां क' लेल जाति जाति हैत,हुनका लेल जजाति छैक ,जेकरा मे जत्‍ते खाद-पानि देबै ,ओत्‍ते बम्‍फार फसल हैत ।मात्र खादे-पानि नइ ,सही समै पर कमौनी सेहो जरूरी ।कमौनीक सबसँ नीक समै भोर आ सांझ ।किछु बाजियौ आ किछु बजबाक मौका दियौ ,केखनो चाय-मिठायक संग केखनो खालियो हाथ.........सिंह जी जिंदाबाद ,राजपूत जाति जिंदाबाद ,मधुबनी जिला जिंदाबाद आ आनो जाति सब मुरदाबाद नइ ,बल्कि दम होए त’ करा ले अप्‍पन जिंदाबाद आ दम नइ हो त’ दम धर। 3 आ सिंहजी क' दहिना हाथ नेबो लाल ।दहिना नइ बामा ,किएक त' सिंहजीक सब घटिया काज नेबोलालक सलाह सँ ।दूनू गोटे एके पद पर आ नेबोलालक ऐ स्‍थान पर बहाली मे सिंहजीक विशेष योगदान ।कर्णजी क' बेज्‍जत क' के नेबोलाल कें आनबा मे सिंहजी क' पलानिंग सफल रहलै ।ओना कर्णजी के रहलो सँ सिंहजी क' आसन पर विशेष फर्क नइ रहै ,मुदा कर्ण जी कें बाजबाक बेमारी रहै ,कखनो -कखनो डरितो -डरितो मुंह सँ किछु निकलिए जाए आ तहिए समै मे जिला मे आगमन भेल रहै श्री श्री 108 नेबोलाल जी कें आ बहुत कम्‍मे दिन मे नबका विभाग आ स्‍थानक जानकारी .....जानकारी नइ रेकिंग करबा मे सफल रहला श्री नेबोलाल जी ।नेबोलाल जी क' जाति क' विषय मे विशष जिज्ञासा नइ करू ।नेबोलाल जी जातिक मध्‍य मे छथिन ,ने बेसी ऊपर ने बेसी नीचे ।एकदम मध्‍यविन्‍दु कहनै उचित नइ ,मुदा जातिव्‍यव्‍स्‍था क' एकदम संवेदनशील स्‍थान पर जरूर छथिन ।तें एकदम ऊपरक आ एकदम निचलका क' लेल अद्भुत पंचाक्षरी गारि क' बेशी काल प्रयोग करैत छथिन ।एहन राष्‍ट्रीय गारि जे कश्‍मीर सँ ल' के तमिलनाडु तक एहिना हनहनाइत छैक आ जेकर अर्थ बूझबा मे कतौ भाषाक कोनो झंझट नइ ।तें नेबोलाल जी ऐ गारि क' संग बेसी आत्‍मीय छथिन ।नेबोलाल जी जानै छथिन कि ई गारि जे0एन0यू0 आ आई0आई0टी0 कानपुर सँ ल' के बिसफी आ बीहट तक ओहिना उपलब्‍ध छैक ।की बाम की दक्षिण ,की साहेब आ की अर्दली ।एकर अर्थक गरिमा सँ सब पराजित ।मुदा ई केकरो नइ पता चललै कि नेबाेलालजी ऐ गारी क' कोन पराक्रम सँ लुबुधल छथिन । आ नेबोलालजी क' नियुक्ति मे हुनकर एकटा सद्य:जात झूठक विशेष योगदान रहलै कि हमरा बच्‍चा नइ ......बच्‍चा हेबाक लेल विशेष ओपरेशनक जरूरी ......ऐ ऑपरेशनक लेल सात-आठ लाखक जरूरी.......कनियाक बेडरेस्‍ट जरूरी......कनियाक हास्‍पीटल मे बेडरेस्‍ट जरूरी......।शताधिक बेर कहल ऐ वाक्‍य मे मात्र यैह टा सत्‍य छल कि हुनका एको टा बच्‍चा नइ रहेन आ एकर अतिरिक्‍त सब बात झूठ ।किएक त' बहालीक बाद नेबोलाल दू टा पुत्ररत्‍न कें जन्‍म देलखिन आ दोसर त' एकदम मधुबनिए मे भ' गेलै ।पहिलक लेल पटना प्रवासक एकटा सिचुएशन क्रिएट कैल गेल छलै ,मुदा दोसर बेर एकर जरूरी नइ बूझल गेलै ,किएक त' आब नेबोलालजी स्‍थापित भ' गेल रहथिन ।मुदा वौआ हम ने बिसरि जेबौ ,सिंह जी थोड़बे बिसरथुन ,हुनका सब किछु यादि छैन ,अपन गर्भ मे एनै सेहो आ एहियो सँ पहिले के बात सभ.......ऊ गिन-गिन के ,गाबि-गाबि के तोरा यादि करेथुन । नेबोलालजी साल दू साल तक सिंह जी क' प्रति कृतज्ञ रहलखिन ,एकर बाद हुनकर धियान न्‍याय दिस गेल । सिंह जी किएक एते कमेता आ हम किएक कम कमाएब ।हुनका किएक एते मान-सम्‍मान आ हम की केकरो सँ कम आदि आदि ।ऐ तर्क मे सबसँ बेशी ऐ तथ्‍य पर बल रहै कि हम किएक कम कमाए छी ।आ ऐ गणितक क्षतिपूर्ति लेल नेबोलाल जी ओकील सबक दारूपार्टी मे बैस' लागला ।स्‍टाफ सबक सेटिंग शुरूा भ' गेल ।किछु सिंहविरोधी स्‍टाफ सबकें जातिक कैप्‍सूल खुआयल गेलै ।पूरा सप्‍पत आ पूरा ठोस आश्‍वाशनक संग ।कमीशन आ हिसाबक स्‍पष्‍ट उद्घोषणाक संग । आ किछु दिनक लेल सही मे नम्‍बर एक इंस्‍पेक्‍टर भ' गेल नेबोलालजी ।मुदा जातिक काउंटररिएक्‍शन शुरू भ' गेलै नेबोलालजी ।ऐ राजपूत बहुुुुल क्षेत्र मे राजपूत विरोधी अभियान कत्‍ते दिन नेबोलालजी ।आ जातिवादक विरोध एकटा नया जातिवाद सँ ।वाह रे वाह नेबोलाल जी..... आ नेबोलाल जी लगभग दरजन बेरि मारि खेबा सँ बचल हेथिन आ ओतबे बेर ठोस शिकायतक संग ओकील साहेब लोग डी0एम0 ओइ ठाम प्रदर्शन केने हेथिन ।अंत मे नेबोलाल सिंहजीक लग सरेंडर केलखिन ।सरेंडरप्रस्‍ताव क' असली कॉपी हमरा लग नइ अछि ,नइ त' हम हूबहू बतेतौं छल ,मुदा जरूरी सवाल ओइ प्रस्‍तावक पाठन नइ ,ओइ आदमी क' चिन्‍हनइ छैक ।ओ आदमी कोन आदमी के नइ गरिएलकै ,कोन जाति के नइ ,मौका मिललै त' किछु क्षेत्र आ राज्‍य के सेहो ।एकरा लग ओकरा गरिएनए आ ओकरा लग दोसरा के ।ई पालिटिक्‍स नमहर नइ खिचाइ छैक दोस ।कतबो नेमारबए ,कतबो तीरा-तीरी करबै ,जल्दिए टूटि जायत आ टूटि के अपने मुंह मे लागत टूटलका रब्‍बर सन । नेबोलालजी कें गारि दैत देखनए एकटा नाटकीय अनुभव छल ।हुनका मुंह सँ रूपैयाक लेल ,नीक समानक लील ,जवान स्‍त्रीक लेल चूबैत ...।आ नेबोलालजी कोन स्‍त्री कें कल्‍पना मे नइ भोगलखिन ।कोन मर्द कें कल्‍पना मे ईज्‍ज्‍त नइ लेलखिन ।कोन दोस कें कल्‍पना मे भीख मांगैत नइ देखलखिन ।आ नेबोलालक जादू जल्दिए खतम भ' गेलै ।लागै छैक जे नेबोलालक जादूक रहस्‍य बच्‍चा-बच्‍चाक पता चलि गेल छलै ......सिंहविरोधी गीतनाद जल्दिए खतम भ' गेलै ।सिंहजीक परिचित अधिकारी पटना सँ आयल छ‍लखिन ।आपात मीटिंग भेलै आ आन बातक अलावे नेबोलालक रसगर गाम टांसफर भ' गेलै ।ऐ ट्रांसफरक प्रभाव नेबोलाल साल-दू साल बूझलखिन ....बूझै सँ पहिले नेबोलालक टांसफर कैमूर जिला भ' गेल छलै ।नेबोलाल कें प्रोत्‍साहित कैल गेल छलै कि जाऊ बाबू जाऊ आनंदे मे रहब.....जत्‍ते पच्छिम तत्‍ते माल.....मुदा ई एकटा आर कथा छलै । सिंह जी के बूझनै कनेक नइ खूब-खूब कठिन काज ।सिंह जी क’ रूटीन के बूझनै ओहियो सँ कठिन आ ऐ रूटीन सँ होमय वला फैदाक ब्‍यौरा तैयार केनए एकरो सँ कठिन ।सिंह जी पादितो छथिन पूरा रूटीन आ पूरा उद्देश्‍य सँ ।वास्‍तव मे ओ शतरंजक खेलाड़ी छथिन आ अपन अगिला आ चारि-पांच टा आगू वला स्‍टेप कें आगू –पाछू जोड़ैत चलै वला खेलाड़ी ।हुनकर कुनो स्‍टेप अहांके बेकुफ वला बुझा सकैत अछि ,मुदा ओकर अंतिम परिणाम की हेतै से बस सिंहे जी जानै छथिन ।सिंहजी क’ विस्‍तृत सर्किल कें देखि के अहां के आश्‍चर्य भ’ सकैत अछि या फेर अहां सिंह जी कें अत्‍यंत व्‍यर्थ घोषित क’ सकैत छियै ,मुदा एकर परिणाम कनेक देखियौ ।सिंह जी क’ विभाग मे पुलिसक कोनो काज नइ ,मुदा सिंह जी बहुत रास दरोगा सँ हित-मित बनेने ।आ दरोगा सँ काज केकरा नइ पड़ैत छैक ,से जखने कुनो पैरवी वला काज होए सिंह जी थाना पहुंचि जाथिन ।आ ई पैरवी उचित शुल्‍क आ उचित बेन-तिहारक संग होइत छलै ।सिंह जी कें ड्रग इंस्‍पेक्‍टर सँ दोस्‍ती आ सिंहजी क’ सासुरक दवाचोर ,मिलाबटखोर सब कें एकटा नीक सीरही मिलि गेलै ।आ पाहुन सिंहजी उचित दर सँ एकर निस्‍तारण शुरू क’ देलखिन ।एतबे नइ सिंह जी कें पंडित-ज्‍योतिषी सँ परिचय आ सिंह जी एकटा स्‍पेशल डेट कें गुप्‍त पूजा ठानि देलखिन ।ज्‍योतिषी कहने रहै जे ऐ तिथि क’ पता केवल हमरे टा ।

                                         सिंहजी भोर उठिते साहब ओत’ चलि जेता  आ भोजन सँ पहिले तक ओतै रहता ,फेर सांझ मे चाह क’ बेर सँ भोजनक समै तक ।ऐ रूटीनक प्रताप ई छलै जे साहेब ओतबे कहैत छलै आ ओतबे करैत छलै जत्‍ते कि सिंहजी ।साहेबक हरेक भूर आ साहेबक हरेक गुर पर सिंहजी के धियान ।तरकारी ,दूध आ ठंढ़ा क’ बहाने किचन तक पहुंच ।सिनेमाक टिकट ,मिठाई आ जन्‍मदिन ,विवाहदिन आदि क’ बहाने मैडम तक पहुंच ।चाकलेट ,बैडमिंटन आ कॉमिक्‍स क’ बहाने वौआ सेहो कब्‍जा मे ।आब की चाही ।दोसरक घर पर एतेक धियान देला पर की नइ मिलि सकैत छैक ,मुदा सिंह जी कें सब किछु नइ चाही ।हुनकर टारगेट निश्चित छैक ,बस ओ ओमहरे बरहैत छथिन ।एत्‍ते इंतजाम ,ई अनुशासन आ ई व्‍यवहार सब ओइ टारगेटक माध्‍यम बस।

4 आ सिंह जी कें जइ आदमी से सबसँ बेशी डर होइत छलेन से रहथिन मिश्रा जी ।जिला मे मिश्रा जी क' आगमन नया-नया भेल छलै आ संयोग देखियौ जे मिश्रा जी ठहरलखिन सिंहजीक डेरा पर ।आ शुरू-शुरू मे त' मिश्रा जी अपन बड़का भाय आ गुरू बना लेलखिन,आ जेना कि हरेक चलाक आदमी करैत छैक मिश्रा जी अपन माया फैलेनए शुरू क' देलखिन ।अपन मंचो‍चित अवाज आ थर्ड डिवीजन एम0ए0 मे रटल संस्‍कृत श्‍लोकक रस्‍ते जल्दिए एकटा मिश्रामित्रमंडली बनि गेलै ।आ देखियौ त' हाल जे कि जखन पूरा पटना -दिल्‍ली दलित-विमर्श आ स्‍त्री विमर्श सँ भरल रहै ,पूरा अखबार आ टी0वी0 चैनल भ्रष्‍टाचारविरोधी आंदोलन सँ भरल रहै ,मिश्रा जी हरेक बातक पक्ष मे आ विपक्ष मे एकटा संस्‍कृतक श्‍लोक राखि देथिन ।आ कखनो -कखनो त' राखनै क' अंदाज प्रवक्‍ता बला,वक्‍ता बला ,मेंटर वला ,दार्शनिक वला ,तीर्थकर वला आ पैगम्‍बर वला सेहो ।आ बुधियार लोक सब सुनलाक बाद या पाछू मे ऐ श्‍लोक श्रवण कें किछु अन्‍य क्रिया सँ -फेंकनए ,ठोकनए आदि सेहो कहै ।जे किछु नइ बूझै वला छलखिन अपन संस्‍कृत ज्ञानक आधार पर,अपन व्‍यस्‍तता आ थेथरई के दुआरे ओ लोकनि सेहो मु‍सकिया दैत छलखिन ,वाह-वाह क' दैत छलखिन आ कखनो काल मिश्रा जी कें विद्वान सेहो कहैत छलखिन ।आ मिश्रा जी ऐ सब कें भगवानक आर्शीवाद ,माया आदि कैह के आत्‍ममुग्‍ध होयबाक असफल प्रयास करैत छलखिन । मिश्राजीक ई मायावाद प्रारंभिक तौर पर सिंह जी कें नया चीज बूझेलेन ,शुरू-शुरू मे ऊहो रस लेबाक प्रयास केलखिन ।धीरे-धीर हुनका बुझेलेन जे ई मिसरबा त' हमरा उखाडि़ केे रहत ,आ जल्दिए हुनकर व्‍यक्तित्‍व मे एकटा आलोचनात्‍मक दृष्टि क' उभार भेलै आ मधुबनी कलक्‍टरीक विद्वान लोकनि ऐ उभार कें जल्दिए ब्राह्मण बनाम राजपूत आ नया बनाम पुरान कहबाक असफल प्रयास केलखिन ।किछु लोकनि जे बेशी बुधियार रहथिन जे शासन-सत्‍ता कें बीस-पचीस बरिस सँ देखने रहथिन ओ एकरा अस्‍थायी प्रवृत्ति कैह प्रतीक्षा कर' लागलखिन ।जेेे शासन आ भ्रष्‍टाचारक पारस्‍परिकता कें नीक जँका चिन्‍हैत रहथिन ,हुनका लागलेन जे ई कोनो प्रवृत्ति नइ थिकै ,मुदा कलक्‍टरी आ ऐ विभाग कें एकटा नया मसल्‍ला मिलि गेलै ।बात ई भेलै जे मिश्रा जी क' बजबा क' कला सँ किछु अधिकारी ,किछु प्रोफेसर ,किछु पत्रकार लोकनि बेशीए प्रभावित भ' गेलखिन आ जेना कि होइते छै जे मिथिला त' बजबा क' तेल सँ बरहै छैक तें मधुबनी जिला आ ऐ विभाग कें मिश्रा जी में बेशी विकास देखेलए ।वाह रे मिश्रा जी ,वाह रे कालिदास आ माघक श्‍लोक आ हाय रे सिंह जी के लंठई ,हे सिंहजी हेे सिंह तोहर लंठई एत्‍ते कमजोर कि ऐ मिसरबाक अशुद्ध श्‍लोके सँ पराजित भ' गेलै ।मुदा नइ नइ ,ऐ भ्रम मे नइ रहू ।अशुद्ध श्‍लोकक दुनिया जल्दिए बेरबाद भ' गेलै ,बरबाद नहियो भेलै त' दीप्ति घैट गेलै ।धीरे-धीरे श्‍लोकक प्रतिक्रिया ,प्रशंसा ,ताली-थोपड़ी ,मुसकी घटैत गेलै ।आ अशुद्ध श्‍लोक कें पराजित केलकै शुद्ध घी ,शुद्ध कमीशन रहित घूस आ पहिले सँ पसरल सिंहवाद ।जल्दिए ब्राह्मण अधिकारी ,किसान आ पत्रकार तक सिंहजीक नजदीकी भ' गेलखिन आ आब समै रहै मिश्रा जी कें बदलबा क' ,मिश्रा जी जल्दिए अपना आप के सिंह जी क' छोट भाय कें रूप मे देख' लागलखिन ।आ हवा पलटिते मधुबनी कलक्‍टरी क' पाया ,कुरसी ,सीरही ,अलमारी आ फाईल सब देख' लागलै सिंहजी क' मुंह । आ धीरे-धीरे मिश्रा जी अपना आपके छब्‍बीस जनवरी ,पनरह अगस्‍तक भाषण आ कर्मचारीक विदाय समारोह तक समेट लेलखिन (आफिस मे) फलनमा.. चिलनमा... ठेकनमा (व्यंग्य) ओकरा , ओकरा आ ओकरा आगू बरहा आ एकरा , एकरा आ एकर टांग खीच। ऊ देखही ने बरा नील-टीनोपाल झारने छौ , ओकरा दिस एक लौप कादो फेक , देखही ने कनियो ने कनियो लागबे करतए , नइ लागतै त' डरेबो त' करतौ आ डरा जेतओ त' कमसँ कम साइकिलक हेंडिल जरूरे खसकतै आ खसकतै त' ऊ गिरतौ। ओकरा दिस ई ढ़ेपा , ओकरा दिस ई छौंकी आ ओकरा दिस ई झूटकी फेक। देखही बस खपटिए फेकबाक चाही , डांगक युद्ध नइ थिकै ई , नाहक केकरो लागि गेलौ त' खूनक मोकदमा हेतौ। स्पष्ट प्रशंसा नइ स्पष्ट आलोचना नइ , बस मुसकियाइत रहियौ , बस....। ओकरा सटा लियौ त' ई सब फैदा , ओकरा बजाबियौ त' ओहो आयत। ओकरा हटेने रहू नइ त' ओ सब नराज भ' जेता। ओकरा साथ रखबाक अछि त' रातिक एकांतमे बजाबियौ , केओ देखै नइ , केओ अनुमान तक नइ लगा सकै। ई आदमी अहांके भविष्यमे काज देत, तें एकरा ईग्नोर नइ करियौ , कुनो ने कुनो लेईसँ सटेने रहू। ई बरा लराकू टाईपक अछि , एकरा आगू राखू , ई कलम आ कोदारिसँ साथ रहत आ ई लेखक जेंका त' अछि मुदा अछि बरा चुप्पा , एकरा एकदम पंजियेने रहू , मंच , पुरस्कार आ प्रकाशनक शताधिक अभियानमे एकरा सन खबास पूरा लेखक समुदायमे नइ भेटत। आ यदि फलनमा के धकियेबाक अछि त' चिलनमा के आगू राखू , हम जनै छी जे चिलनमा अहांक प्रिय नइ अछि , मुदा यदि अहां अपन प्रिय ठेकनमा के आगू करबै त' निश्चिते बूझू जे फलनमा आगू भ' जायत तें सब आदमी जोरसँ कहियौ श्रीचिलनमा झा जिंदाबाद। फसाद आ आनंद (लघु कथा) समै काटबा ,बितेबा लेल आदर्श जगह ।ई गाम जत्‍त’ भरि दिन केकरो सँ केकरो फसल रहै ,मारि नइ त’ मारिक भूमिका नइ त’ मारिक उपसंहार ।कतौ पंचैती ,कतौ उपराग ,नालिश ,कतौ गारागंजन ,कतौ निंदा रसक आनंद ,मुदा सबसँ बेशी आनंद रहै मारि-पीट ,मल्‍लयुद्ध या फेर दू पाटी क’ बीचक सामूहिक संघर्ष । यदि कतौ झगड़ा फसल होए त' किमहरो सँ हूलि जाउ ,केकरो पक्ष ' लियौ ,कुनो बात पर नराज भ' जाउ ,केकरो हां मे हां मिलबू ,मौका देखिके केकरो पर बिगडि़ जाउ,भीड़क आनंद लिय' ।अप्‍पन माथ-कपाड़ बचबैत केकरो पक्ष सँ लाठी चलबू या उपदेश दिय' मुदा सम्‍हरि के ,कहियो-कहियो जतरा खराब होइ छैक ,नइ सम्‍हरै त’भाग-पड़ाउ । फसाद पछिला दू दिन सँ सब ताक मे रहै ...कुनो मौका मिलै आ सधा ली... केओ एक बेर छीकै त' दोसर दू बेर ...कोहुना मारि शुरू भ' जाए..मोर्टन झा एक बेर राम कहलखिन त' सोहन मिसर कें भेलेन जे हमरा खौंझा रहल अछि तें ओ दू बेर राम राम कहलखिन ...यदि दशरथ कुनो भगवानक नाम रहतै छल त' मिश्रजी दशरथो-दशरथ जरूर कहथिन छल ,यदि रावण राम कें हरेने रहतै छल तखन मिश्रजी रावण-रावण जरूर कहथिन रहै ।मुदा राम-राम कहला सँ मोर्टन मिश्र पर कुनो प्रभाव नइ पड़लै ,ओ खौंझाबै लेल कहने छलखिन थोड़कें तें निराश दूनू गुट मारि करबा लेल दोसर बहन्‍ना बनब' लागलै फसाद-1 अल्‍फा मरसैब तामैत रहलखिन आ गारि सुनैत रहलखिन ।बीटा एक बेर गारि दै आ हहा के हँसि पड़ै ,मरसैब उत्‍तर तामैत रहथिन त' दक्खिन चलि जाथिन ,फेर बीटा दछिनबारी कात मे गडि़या आबै ,मरसैब पूबारी कात चलि जाथिन आ फेर बीटा ससरि के पूबारी कात चलि जाए ।ई परिक्रमा कतेको बेर चललै ,बीटा थाकि जाए त' गामा काज कर' लागै ।मरसैब कुनो तरहे चाहथिन जे आइ मारि नइ फँसै मुदा बीटा आ गामा दूनू भाइ पनपियाइ खेला के बादे आयल छलै ,ओ चाहै छलै जे आइ कोहुना मामला फरिया जाए ,किएक त' आइ मरसैब असगरे छलखिन ,आ मरसैबो आइ एकदम अड्डी गाड़ने छलखिन कि आइ किछ नइ होए ।ताबते मे मरसैबक बेटा प्रोटान बड़हल आबैत देखेलै ,मरसैब कें भेलेन जे आब किछु कएल जा सकैत अछि ,आ ऊ धोती कें कनेक सम्‍हारि कें बान्‍हनै शुरू केलखिन ।पूब दिस बान्‍ह पर एकटा हलचल देखेलेन ,आंखि पोछि के देखलखिन ,शायत बीटा क' बाप रहै ,मरसैब फेर सँ तामनै शुरू क' देलखिन... फसाद-2 ई कुनो मीटिंग रहै मंदिर पर ।सब टोलक आदमी जमा भेला ।सरकारी कर्मचारी ,ओकर दलाल ,गामक चौकीदार ,पोस्‍टमेन ,बैंक मनेजर आदि आदि सेहो रहथिन ।सरकार के पास रहै बहुत रास पैसा ,बहुत रास प्‍लानिंग ,बहुत रास झोल-झाल ।मीटिंगक अध्‍यक्ष कहलखिन ' हम पूछि रहल छी ,अहां सब बताबैत चलू ' अस्‍पताल कत' स्‍थापित होए? बभनटोली मे सर गौशाला किमहर रहतै? काइथटोली मे सर बैंक लेल कुन जगह? रजपूताना सर आ दूधसंग्रह केंद्र? भूमिहरटोली मे होए त' केहन रहतै ई सुनिते दुसधटोलीक लोक ,चमरटोलीक लोक सब धीरे-धीरे घूसक' लागलै । मुदा कुरमी टोली आ गुअरटोलीक लोक सब ओहिना मौजूद रहलै । सब के लागलै कि मीटिंग आब खतम भ' गेलै ।अध्‍यक्ष महोदय कार्यवृत्ति भर' लागलखिन आ कहलखिन सब आदमी साइन करू ,तखने गुअरटोलीक एकटा जवान कहलकै हाकिम सब संस्‍था ओमहरे ल' जेबै कि किछु हमरो आर दिसन रहतै ।अध्‍यक्ष महोदय कहलखिन बाजू ने जे सर्वसम्‍मति से अहां सब कहबै से कएल जेतै । तावते समवेत स्‍वर मे खुसूरपुसूर शुरू भ' गेलै ।ऐ स्‍वर मे जातिक नाम ,लाठीक नाम ,स्‍वतंत्रता ,विकास आदिक विभिन्‍न शब्‍द एक-दोसर पर बजर' लागलै ।एतबे मे के लाठी ,के मूसर ,के कुरसी ,के टेबुल ,के कोरो उठा के एक-दोसर पर चलब' लागलै एकर अलग-अलग लिस्‍ट छैक ।ई सब लिस्‍ट थानाक दरोगा संग मे छैक ।घायलक सूची ,मृतकक सूची अखबार मे छापल छैक आ घाव ,दर्द ,बेंडेजक संग पूरा गाम खूनोखून भेल छैक फसाद-3 दिनेश कहलखिन रै 'राजेश' ,मुदा राजेश के सुनेलए 'रए राइतेश' आ ई सुनिते कहैत छै 'हँ पादेश' । दिनेश- की कहलहीं? राजेेश- जे तू कहलहीं दिनेश-एना किएक बाजैत छें? राजेश-जेना तू बाजै छहीं दिनेश सोच' लागलै कि रजेशवा एना किएक बाजि रहल छैक ,तखने ओकरा हाथ सँ खुरपी बाल्‍टीन मे गिर गेलै ।खुरपी देखिते राजेश चिकरैत आबि गेलै दिनेशक सामने राजेश दूनू हाथ सँ दिनेशक गट्टा धेलकै ,दिनेश ओकरा धकियाबैत ,गट्टा छोड़ब' लागलै ।गट्टा छूटलै तखन राजेश डांड़ ध' लेलकै ,राजेश डांड़ छोड़बै आ दिनेश ओकरा नचाब' लागलै ।दिनेश एकटा बिट्ठू काटलकै त' राजेश एक्‍के बेर हाथ छोडि़ देलकै आ अपन दांत ओकरा पीठ मे गड़ा देलकै ।दांत गड़ाबिते दिनेशक देह एक्‍के बेर झनझना उठलै ,ऊ खुरपी उठेलकै आ उलटा क' के बेंट दिस सँ एक बेंट ओकरा पीठ पर देलकै ।बेंटक मारि खाइते राजेश पलटलै आ अप्‍पन दांत सँ दिनेशक करेजा मे लगा देलकै ।करेजा मे दांत घूसबैत माउस नोचैत बाहर निकललै आ थूकि के अप्‍प्‍न लाल मुंह दिनेश कें देखब' लागलै ।खून देखिते दिनेश कें बहुत तामस एलै ,ओ खुरपी छोडि़ अपन घर मे घूसि गेलै आ अन्‍दर सँ भाला निकालि लेलकै ।भाला देखिते गामक दर्शकवर्ग सक्रिय भेलै ।खुसुर-पुसूरक बाद एकाध आदमी आगू बरहलखिन ,तावते दिनेशक कनियां एकबाइग आबि के एक लाठी राजेशवा कें ध' देलकै आ ओमहर राजेशवाक कनियां काननै शुरू क' देलकै ,पता नइ किएक । दोस्‍तीक जिनगी मे झड़बैर काल (व्यंग्य) आ झड़बैर कालक दोस्‍ती बहुत किछ महुआक रंग नेने रहै ,रंगो सँ बेशी गंध ।खूब मादक गंध ,पूरा क' पूरा गाछी-बिरछी ओइ गंध सँ पुलकित ,मुदा ऐ गंधक आयु कत्‍ते दिन ,ऐ फलक आयु कत्‍ते दिन ,ऐ वसंतक आयु कत्‍ते दिन ,तहिना ऐ कालक दोस्‍ती सब रहै ।किछु दिनक लेल पूरा जगजगाड़ ,आ फेर जल्दिए बाइस भेनै आ किछुए घंटाक बाद मौलेनए ,मौलाईत-मौलाईत लाल भेनै आ फेर करियेनए ।मुदा चलाक लोक शरबत बना पी लैत रहथिन,बेशी चलाक लोग लट्टा बना के राखि दैत रहथिन आ जे जन्‍मी चलाक रहथिन से महुआ कें सड़बाक प्रतीक्षा करैत रहथिन ,महुआ सड़ै आ मधु मे बदलि जाए ।काबिल लोक सब ऐ दोस्‍ती कें सीसी मे राखि के अमर बना देलखिन ।तें ऐ काल मे जल्‍दी-जल्‍दी दोस्‍ती बनै आ टूटै ।बहुत किछु ‘ट्रायल एंड एरर’ तकनीक पर ।दोस्‍ती बहुत किछ तात्‍कालिक स्‍वार्थक आधार पर बनैत रहै ,आ ईहो पता नइ रहै कि ऐ दोस्‍ती सँ किछु भ' पेतए वा नइ आ किछु समै बितैत जखन पता चलै कि हे दोस्‍ती तोहर कोन दिशा ,तोहर कोन रंग ,तखन तुरत दोस्‍त सब बदलि जाए आ जे विशेषण ,समास आ मुसकियान अहांक लेल प्रयुक्‍त भेल रहै ,से दोसराक लेल खर्च भेनै शुरू भ' जाए ।कखनो काल दोस्‍त लोकनिक' स्‍वार्थ आमने-सामने आबि जाइ तखन दूनू एक-दोसर पर आरोप लगबैत अलग भ' जाइत रहथिन ।जे जत्‍ते बुधियार ,से तत्‍ते कम आरोप लगबै ।आ एहने समै मे एलखिन साव जी आ साव जी दूए दिन मे विदा भ' गेलखिन ,एहने समै मे एलखिन कमती जी ,ऊहो दुए दिन मे विदा भ' गेलखिन ........मुदा सभ एहने नइ रहै क्‍।किछु आयल छथिन कि पुरनका सब कें उखाडि़ के फेक देबै कत्‍त’ बागमती मे ,गंगा मे ,करेह मे..... ईहो एगो समै रहै ,मधुबनी जिला मे एक सँ एक इंस्‍पेक्‍टर भूमि विभाग मे । एगो सिंह जी रहथिन ,जिनकर पहुंच पटना तक ,मिश्रा जी रहथिन हरदम पटना-रांची बौआइत रहथिन आ झाजी दिल्‍ली -कोलकाता सँ कम कखनो नइ बतियाथिन ,एगो ईहो समै छैक सब झड़बैर सब पहुंच गेल छैक ।एगो छथिन विनय भूषण से हरदम सिंहजीक पाछू लागल रहै छथिन ,आ ऐ अागू-पाछू मे भोजन-जलपानक चिंता सँ मुक्‍त छथिन ,एतबे नइ सिंहजी कनेक पहुंच वला छथिन से एही बहाने कनेक बात-सात ,निंदा-प्रशंंसा ,पाद-फूस करैत नजदीकी बढि़ रहल छैक आ कनेक काजो ससरि रहल छैक ।विनय भूषण जी आ सिंह जी सहरसाक महिषी प्रखण्‍डक छथिन ।दूनूक दोस्‍ती एही ठामक अछि,मुदा दूनू आदमी एके साथ कहै छथिन भगवती तारादेवीक जय ।ऐ दोस्‍ती के झाजी कनेक वक्र आंखि सँ देखै छथिन ,किएक त' विनय भूषण छोट जाति सब मे सँ छथिन आ झाजी कें लागैत छैन जे विनय भूषण सिंहजी कें साथ मिलि एकटा नया समीकरण बना सकैत अछि ,मुदा सिंहजी एकरा एकटा संभावना कें रूप मे देखैत छथिन,मतलब एहन आदमी जे ब्राह्मण सबकें गरिया सकैत अछि ,बस एकटा चाय ,कनेक जलपान ,बासि-कुसि मिठाई आ ई सब नइ होए तैयो एकटा भविष्‍य आ एकटा संभावनाक मद्देनजर.... आ झड़बैरक दोसर फुल्‍ली जीवछ ठाकुर ।देह पिलपिल्‍ली मुदा अवाज भरिगर ।की चाही आ की बाजै छी ,ऐं यौ ठाकुर जी ,एना मे केना मिलत ओ सभ ,जे अहां चाहै छी आ जे कंठ पर आबैत आबैत रहि जाइत अछि ।मुदा कतबो कहियौ करता ओतबे ।आ एकटा चीजक गैरेंटी कि ओ सही चीज नइ बता सकैत छी ,पता नइ पर्सनेलेटी डिजोर्डर ,जेनेटिक समस्‍या वा कोनो खास मानसिकता ।अहां पूछबै नाम आ ओ पूर्ण शिष्‍टताक संग अपन शैक्षिक योग्‍यता बतेता ।नइ -नइ हुनकर कान ठीक छइ ,ओ बताहो नइ छथिन ,ओ अहां संग मजाको नइ करैत छथि,मुदा ई अल्‍लक बल्‍ल जे छैक ,सएह हुनकर शक्ति ।एही शक्तिएंक भरोसे ओ अपन रस्‍ता चलैत छथिन आ अहां अनुमान नइ लगा सकैत छियै कि ओ किमहर जेता ।आ ठाकुर जी सब दिस छथिन कनेक सिंह जी दिस ,कनेक झा दिस ,कनेक मिश्रा जी दिस ,कनेक रंजन दिस ,कनेक विनय भूषण दिस ,मुदा ओ गोजर नइ छथिन कि शतपादी होथि ,तें ओ किमहरो नइ घुसुकि पाबै छथिन ,ओ चालियो नइ छथिन कि ससरैत-ससरैत नमहर रस्‍ता पार क' सकैथ ,से ऊ भ' गेलखिन वृद्ध ऊंट जे अपन नमहर गर‍दनि उचका-उचका पात तोड़ैत हो आ ठाकुरो जी बस पाते तोड़ैत छथिन ,फल ,डांट छूबाक सामर्थ्‍य हुनका मे नइ ।जे ऊर्जा बचैत छैन से रेलवेक टाईम-टेबुल देखबा मे लगा दैत छथिन ,डेली सकरी जाइत छथिन ने ,तें आबि जेता दस मिनट पहिले आ आफिस सँ भागि जेता दू घंटा पहिले ।पीठ पर बैग टांगने ठाकुर जी एकटा निश्चित समै मे दरभंगा आ संकरी स्‍टेशन पर देखा सकैत छथिन आ ई मासिंक सीजनल टिकट हुनका कत्‍तौ के नइ छोड़लक । ने ओइ ग्रूपक भेलखिन ,ने अइ पटटी दिस ससरलखिन ।ओ अखंड यात्री रहलखिन आ पूरा मंडली जिला चरैत रहलै ......अधिकारी परेशान कि किछु कमा के नइ दैत अछि ,आ अधीनस्‍थ परेशान कि साहेब कमबा नइ रहल छथि ।मुदा एहने मे कतेको एहनो सूरमा सब छैक ,जे चाहैत छैक कि ठाकुर जी नइ आ‍बैथ मधुबनी ,ओ बैग ल’ के ,टिकट ल’ के ,मोटर साईकिल सँ ठाकुर जी कें विदा करैत छैक ,आ ठाकुर जी गाम जाइत छथिन ,मुदा गाम मे रहैत छथिन त’ धियान रहैत छैन मोबाईल पर ,हरदम चौंकैत रहता कि केकर फोन एलै ,केखनो कंपनी वला फोन केलकै ,त’ ऊचकि के देखता ,केखनो वौआ –बुच्‍ची सब सेहो गलती सँ रिंगटोन बजा देलकै त’ परेशान ठाकुर जी बच्‍चा सब कें डेंगा दैत छथिन ।केखनो डेरा के फोन बंद क’ दैत छथिन ,केखनो बैटरी निकालि दैत छथिन आ केखनो काल ओछैने पर मुसकियाइत बहन्‍ना सोचैत छथिन ।ई मुसकिएनै कतेको बेर कनियां के खराब लागलेन ,पहिले टोकैत रहथिन ,आब टोकनै छोडि़ देलखिन ,मुदा एखनो कहियो काल कनियां ताक’ लागैत छथिन ।हाय रे ठाकुर जी ,ठाकुर जी केकरो नइ भेलखिन ,ने कनियां आ बाल बच्‍चा के ,ने आफिस मे रहि के दू पैसा कमा पेलखिन ,ने अधिकारी वर्ग पर दू पइसा लुटा सकलखिन ,ने रोड पर शुद्ध मोन सँ खखसि कें भरि गाल पीक फेंकलखिन।ठाकुर जत्‍त’ रहलखिन परेशान रहलखिन आ सब हुनका सँ परेशाने रहलै । झड़बैर कालक तेसर सम्‍माननीय इंस्‍पेक्‍टर साहेब आत्‍मानंद छी छथिन ।अपने सिंहजीक बाल सखा छी आ अपनेक घर जिला सहरसा मे अछि ।अपने सिंह जीक साथे साथ पटना मे जवानी नष्‍ट कएल आ चापलूसी ,चमचै आ जासूसी मे निष्‍णात भेलौं ।पता नइ कोन सुखे मधुबनी मे च्वाइस देलौं आ ऐ ठाम सिंहजीक जूनियर इंस्‍पेक्‍टर के रूप मे ख्‍यात छी ।ई जूनियरिटी पदरूप मे नइ विशेषण आ क्रिया रूप मे छैक ।जइ समै आत्‍मानंद जी जिला ज्‍वाइन केलखिन ,जिला दू भाग मे बँटल रहै सिंह जी ,सहरसा आ सिंह जी समस्‍तीपुर मे ।आ आत्‍मानंद जी आबिते दूनू पाटी ओत' धुरझार घूम' लागलखिन ।लोक अनुमान लगबै ,कथी लेल आबै छौ आत्‍मानंद ,लोग शक करै ,विश्‍वास करै ,आरोप लगबै ,अपना आप के बचाबै ,मुदा आत्‍मानंद एबा-जेबा मे कोनो कमी नै केलखिन ,जेकरा जे बूझबा के होए से बूझहै ।आ आत्‍मानंद जी अपन काज अत्‍यंत मौन आ समर्पण के साथ क' रहल छथिन ।केओ कहै छै जे आत्‍मानंद दूनू गुट के एक करबा मे लागल छथिन ,दोसर तर्क ई छैक जे आत्‍मानंद भेला ब्राह्मण,ओ किएक एक करथिन ,ओ त' इएह चाहता कि सिंह जी कमजोर होए आ ओ एकर स्‍थान ,झोड़ा-झपटा आ कमंडल सहित सिंहासन ल' लैथ ।तेसर तर्क ई छैक जे ई आतमबा जासूसी क' रहल छौ ।सब ठाम अपन कैमरा आ टेप सेट केने रहै छौ आ जा के सिंह जी ओइ ठाम बोकरि दैत छैक आ ऐ बोकराए क' पइसा सिंहबा एकरा दैत छैक ।मुदा आत्‍मानंद जी की क' रहलखिन से मात्र आत्‍मानंदे टा जानैत छथिन ।आत्‍मानंद जी क’ अस्‍त्र छैक मौन ।जे जेकरा बाजै के छौ ,से बाजि ले ,ओइ पर कोनो प्रतिक्रिया नइ देता ,बस मुसकिएता ,आ मुसकीओ छोट-छीन ,अहां मुसकी बुझियौ या नया छी तखन ई अनुमान लगाबियौ कि आत्‍मानंद जी क’ मुह कहिया सँ टेढ़ छेन । आ बस नइ बजबा कें कारणे ई अनुमान लगेनए कठिन कि आत्‍मानंद किमहर छथिन आ बस एही कारणें ओ सब गुट ,टोल आ पट्टी मे स्‍वीकार्य छथिन ,बस स्‍वीकार्ये छथिन ,लोकप्रिय नइ ,िकएक त’ गुप्‍त योजना मे या त’ सिंह जी संग शामिल रहैत छथिन या फेर अधिकारी वर्ग सब संगे ।मुदा अहां ईहो नइ कहि सकैत छियै कि आत्‍मानंद जी कें बाज’ नइ आ‍बैत छनि या हुनका संग मे विषयक अभाव छैक ,यदि मौका मिलैत छैन त’ बीटल्‍स ,लांग मार्च ,ब्रह्मांड आ बिगबैंग पर अबाध रूप सँ घंटा-दू घंटा बाजि सकैत छथिन ।तें एक टा चीज नोट करू कि मितभाषित ,चुप्‍पी आ मौन हुनकर अस्‍त्रे टा अछि,आउर किछु नइ । आत्‍मानंदजी मे एकटा आर गुण छैक –भक्ति ।अधिकारी वर्ग मे ई भक्‍तक रूप मे ख्‍यात छथिन ।डेली जेनए ,बिना बजाओल जेनए आ बिना आज्ञा के नइ एनए ।फ्रिज साफ केनए ,तरकारी आननै ,‘तबियत ठीक अछि ने ‘ ई पूछनै ।दोहा क’ दोसर लाईन बाजनै।हँसी-खुशी क’ मौका होए त’ हँसनै आ कोनो दुख-विषादक बात होए त’ मुंह लटकेनए ।साहेब जेकरा पर प्रसन्‍न छथिन त’ प्रसन्‍न भेनए आ साहेब जेकरा पर नराज छथिन त’ आत्‍मानंद सेहो नराज भ’ जाइत छथिन ।आत्‍मानंद जी सूचनाक वाईर छथिन । के कत्‍त’ छैक ,के केकरा सँ भेंट केलकै ,केकरा केकरा सँ नइ पटैत छैक आ के केकरा मे सटेने छैक ई सब सूचना आत्‍मानंदजी यथा स्‍थान राखि दैत छथिन ।आ केखनो काल त’ शक होइत अछि कि आत्‍मानंद जी आदमी छथिन कि पेन ड्राईव ।आ एक दिन विनय भूषण सपना देखलकै कि आत्‍मानंद पर सिंहजी एकटा दवाई फेंक देलखिन आ आत्‍मानंद ओछैन बनि गेलै ,आ विनय भूषण दोसर दिन सपना देखलकै कि सिंह जी एकटाा मंत्र बाजलखिन आ आत्‍मानंद नटुआ जँका नाच’ लागलै ।तेसर दिन फेर विनय भूषण सपना देखलकै सिंह जी आंखि मूनि के किछु मंत्रे जँका परहलखिन,आत्‍मानंद कंडोम बनि के साहेबक जेबी मे चलि गेलै ।विनय भूषण कहैत छैक कि ई सपना नइ सत्‍त छैक ,हमर आंखिक देखल ,मुदा सिंह जी कहैत छथिन कि विनयबाक दिमाग बेशी भ’ गेल छैक,एकरा ईलाज चाही । नाटक ‘रिहर्सल’ ‘रिहर्सल’ नाटक मिथिला मे व्याप्त सांस्कृतिक संकट क’ एकटा छोट रूपक अछि ।मिथिला मे जाति बदलल मुदा जाति क’चालि नहि बदलल ।जाति अपन बदरंग भूमिका क’ साथ जीवित अछि । जाति ,धर्म,राजनीति आ साहित्य क’ कॉकटेल एकटा गेन्हायल आ कुत्सित दृश्य उपस्थित करैत अछि।’रिहर्सल’ नाटक एहि दृश्य के ने ग्लेमराइज करैत अछि ने रूपांतरित करैत छैक ।एहि ठाम टी एस एलियट क’ओहि विचार के महत्वपूर्ण नहि मानल गेल अछि कि भोक्ता आ रचयिता क’ बीच मे दूरी रचनात्मकता क’ लेल अनिवार्य अछि ।गाम मे मंचन क’ समय एहि विकट तथ्य सॅ अवगत भेलहूॅ कि नाटकीय अभिरूचि क’ परिष्कार एखनहु अपरिहार्य अछि ।गाम में नवतुरिया छौराछपाठी सॅ जे सहयोग भेटल ,ओ गदगद क’ देलक ।नाटक मे संशोधन-परिवर्धन क’ तमाम गुंजाइश के बावजूद ई अपन मूल रूप मे अछि ।उदयनाचार्य मिथिला पुस्तकालय क’ प्रथम वर्षाब्दी क’ अवसर पर आयोजित कार्यक्रम क’ लेल एकर लेखन दू-तीन दिन मे संपन्न भेल छल ।ई नाटक शुरूए सॅ कचकूह रहि गेल ।मुदा कचरस क’ अपन आनन्द होइत छैक । ई हमर लेखन सॅ बेशी अहॉ क’ धैर्य क’ परीक्षा छी ।मिथिला क’ रंग परम्परा क’शत-शत नमन।प्रथम मंचन क’सब कलाकार आ दर्शक के सहयोग क’ लेल धन्यवाद ।नाटक केर एकटा प्रतिभाशाली अभिनेता क’ अनुपस्थिति हरदम खलत ।ओ अपन पारिवारिक तनाव क’ चलते एहि दुनिया क’ रंगमंच सॅ विदा भ’गेलाह ।मात्र पचीस वर्ष क उम्र मे आत्महत्या क’चयन सॅ हुनकर मानसिक तनाव व व्यथा क’अनुमान लगायल जा सकैत अछि । नाटक मे जाति सब क नाम काल्पनिक लिखल गेल अछि । मुदा नाटक मे तथाकथित छोटका आ बड़का के संघर्ष सॅ समाज क’ संरचना आ प्रवृत्ति स्पष्ट अछि । प्रथम अंक प्रथम दृश्य ;एकता सम्भ्रंात व्यक्ति क’घर ।चारिटा कुरसी राखल ।बिछावन लागल ,दीवाल पर विद्यापति , रवीन्द्र नाथ ,निराला ,प्रसाद ,मोहन राकेश ,हरिमोहन झा आ यात्री क’ फोटो । चौकी पर एकटा सूतल व्यक्ति रेडियो सॅं भैरवी गीत क’ प्रसारण। व्यक्ति परमेश बैसि के झूमि रहल छथि । गीत बन्द आ केओ किवाड़ खट -खटा रहल अछि । परमेश हड़बड़ाइत छथि आ ओढ़ना ओढ़ि लैत छथि ) नेपथ्य सॅ आवाज -(हेमचन्द्र क आवाज ) परमेश बाबू छी अओ....... परमेश बाबू कत’ चलि गेलाह ....... परमेश बाबु छी अओ । केवाड़ मे धक्का मारैत छथि आ केवाड़ खुलि जाइत अछि। हेम चन्द्र - परमेश बाबू सूतल किएक छी ? परमेश - (मंॅुह पर सॅ ओढ़ना हटबैत) हमर तबियत खराब अछि, बुखार अछि । हेमचन्द्र - चलु डाक्टर सॅ देखवा लिय’। आइ सॉझ मे नाटक अछि, स्वस्थ नहि रहब त’ मंचन कोना हेतइ। परमेश - हम मंचन योग्य नहि छी, हमर भूमिका दोसर के द’ दियऊ। हेमचन्द्र - बहुत नीक ! आइ नाटक क’ दिन अहॉ ई बात कहि रहल छी ,बुझि पडै़छ बात दोसर अछि....... साफ साफ बाजू ने कि बात ? (खवास दू गिलास शरबत आ एक हत्था केरा क’ संग प्रवेश करैत अछि। परमेश पहिले केरा खाइत छथि फेर शरबत पी के ढ़करैत छथि । हेमचन्द्र - हद कएलहॅु परमेश बाबु । कहैत छी जी बुखार अछि आ एक हत्था केरा गीलि गेलहु । परमेश - देखू हेम चन्द्र बाबू हम अहॅा संग दस वरिस सॅ काज क’ रहल छी ‘‘रंग चेतना मंच ‘‘ क’ क्रिया कलाप में आब देख रहत छी जे आन लोक क’ भागीदारी बड्ड बेसी बढि गेल। पुरान लोक सब नेपथ्य मे जा रहल छथि आ चोर- चुहार सब के मलाईदार रोल मिलि रहल अछि । हेमचन्द्र - जे दस क’ संस्था अछि, ओहि मे एहिना कमी बेसी होइत छैक, एकरा मून सॅ निकालू परमेश बाबू। परमेश - कोना निकालू मोन सॅ, ई जे रामप्रवेश अछि से हमर बराबरी कर’ चाहैत अछि। विसार जाति के एतेक हिम्मत । ओ आब कालीदास आ विद्यापति क’ रोल करत। हेमचन्द्र - मतलब ? परमेश - देबा क’ छल त’ कोनो खबास वला रोल द’ देतिअइ । बड्ड बेसी त’ उगना क रोल द’ दियओ, एना जे लीड रोल राम प्रवेश के देबइ त हम ,,,,,,,,,,,,,,, हेमचन्द्र - औ परमेश बाबू । नाटक मे ई सब बात घुसेबए त’ कोना काज चलत। ठीक छैक हम देखैत छी ,,,,,,,,, (हेम चन्द जी जाइत छथि आ प्रकाश मद्ध्रिम होइत अछि। ) अंक - प्रथम दृश्य - द्वितीय (राम प्रवेश क’ घर ।दीवाल पर तुलसी, कबीर, मार्क्स, नागार्जुन क’ फोटो ।किछु राजनीतिक दल क’ पोस्टर सेहो एक टा कोन मे दू टा लाठी । जमीन पर दरी बिछाओल । राम प्रवेश आ हुनकर दू टा साथी हरमुनिया ढोलक झालि क’ संग उपस्थित ।कोनो धुन बाजि रहल अछि। (हेमचन्द्र क’ प्रवेश) हेमचन्द्र - राम प्रवेश जी छी अओ? बड्ड टॉसगर धुन बाजि रहल अछि । राम प्रवेश -- आबू कक्का जी बैसू । ओ नथिया वाली क प्रेम में नाक हमर कटि गेल........... (हेम चन्द्र जी । किछु कह’ चाहैत छथि ) हेमचन्द्र - राम प्रवेश जी आइए नाटक अछि । हम त’ बुझलहुॅ अहॉ संवाद यादि करति होएब । रामप्रवेश - आब त’ दस वरिस भ’ गेल इएह सब क’ रहल छी आबहु संवादे रटाएब ? हेमचन्द्र - संवाद रटनए कोनो कुकार्य त’ नहि अछि । रामप्रवेश - हम सब वरिष्ठ कलाकार भेलहुॅ। आब एते अनुभव त’ अछिए जे कतहु अटकब त मोनो सॅ जोड़ि़ सकैत छी । (पुनः गाबैत छथि ‘‘हमर नेता जी बड़ निम्मन लगै छथि कुरता आ टोपी सुरेबगर लगै अछि ‘‘) हेमचन्द्र अपन मूड़ी नीचा केने बैसल छथि रामप्रवेश - बात ई जे चुनाव नजदीक आबि गेल ।एहि बेर हम विधायक जी क’ तरफ सॅ प्रचार करब ।बूझू जे हम, महेन्द , देवनाथ आ बौआझा मतलब कि पूरा मंडली । (प्रसन्न मुद्रा़ मे गरदनि हिला हिला क’ बाजि रहल छथि ) ‘‘हमर नेता देवदूत ओ छथि मिथिला के पूत हमर नेता के ़़़़़़............. जिताबियौ ओ लोक सब जिताबियौ ओ लोक सब ........ (हेमचन्द्र क’ चेहरा पर क्रोध आबि रहल छन्हि) हेमचन्द्र - राम प्रवेश अहॉ हमरा बेइज्जत क’ रहल छी । हम अहॅा क’ दुआरि पर दू घंटा सॅ बैसल छी आ अहॅा तेसरे राग अलापने छी ।राति मे नाटक कोना हेतए एकर अहॅा के कोनो चिन्ता नहि । रामप्रवेश - हम चिन्ता क’ के कि करब ?जखन चिन्ता क’ के हम अप्पन ईच्छा पूरा नहि क’ सकइ छी त’ दोसर के चिन्ता क’ के कि द’ देबए । हेमचन्द्र - कि मतलब ? रामप्रवेश क’ साथी - गायक जी असंतुष्ट छथि । हिनका वौसिओन्ह । रामप्रवेश - अहॅा चुप रहू । देखियौ कक्का जी हमर व्यक्तिगत समस्या त’ व्यक्तिगते अछि ,ओहि क’ लेल हमरा ककरो सॅ शिकायत किएक रहत? मुदा, जहॉ तक नाटक क’ बात छैक ,,,,, (दू सेकेण्ड चुप भ’ के बाजैत छथि ) अहॉ त’ जानैत छी जे हमर की स्तर अछि आ’ परमेश क’ की ? ई गलती त देवता सॅ भेलेन्ह जे ओ हमरा बीकू जाति मे जन्म नहि देलाह ।धर्म आ समाज त’ पहिले गीलि गेलाह आब साहित्य आ नाटको के गीलि के बैसताह । सब प्रमुख भूमिका त’ बीकूए सब डकारि रहल अछि। प्रथम अंक दृश्य - तीन (हेमचन्द्र क’ घर, विद्यापति,शेक्सपीयर ,कालिदास ,जयशंकर प्रसाद, नार्गाजुन क’ फोटो दीवाल पर टांगल अछि । दीवाले पर किछु विशिष्ट पोशाक,मुखौटा सेहो राखल अछि । हेमचन्द्र माथ पर हाथ राखि बैसल छथि ) धीरेन्द्र क प्रवेश । धीरेन्द्र - कक्का गोड़ लगैत छी,बीस किलो राहड़ि क दालि भेजि देलहुॅ । खबास आनलक कि नहि? हेमचन्द्र -- दालि के मॉगने छल ? धीरेन्द्र -- मॅगबा क की प्रयोजन ?हमर घर अहॉ क’ घर । हेमचन्द्र -- घर त’ ठामे अछि । सत सत बाजू राहड़ि भेजलहुॅ ,कोनो रोल करवा क’ अछि की? धीरेन्द्र -- हें हे ह...... देतिअई त’ नीके छल । हेमचन्द्र - कोन रोल चाहैत छी ? धीरेन्द्र -- हें हे हें विद्यापति बला रहतए रे तखन........ हेमचन्द्र -- लाज धरम उठा क’ पी गेलऊॅ? अपन राहड़ि अपने संग राखू आ भागू एहि ठाम सॅ उठू़..... उठू । धीरेन्द्र -- (कनैत)- कक्का जी गोड़ पकड़ैत छी । एक बेर विद्यापति बला रोल द दिअओ । अहॉ क पुतहू के सेहो कहि देलिएन्ह। दरभंगा वाली त’ आइ राति मे देखवा क’ लेल अओतीह । हेमचन्द्र -- कनिया के कहि देलिएन्ह ,,,,,से ककरो सॅ पुछलिअइ? धीरेन्द्र --रातु क’ बात छलइ यौ कक्का जी । आब जे नहि देबइ रोल त नाक कटि जायत । (नेपथ्य सॅ महिला आवाज - हेमचन्द्र जी क पत्नी मानिनि) मानिनि -- धीरेन्द्र बाबू छथि । हुनका रोकब, एकटा सूइया लेवा क’ अछि । हेमचन्द्र --कोन सूइया क’ बात करैत छथि (धीरैन्द्र सॅ) धीरेन्द्र -- काल्हि माथ मे दर्द छलन्हि । एकटा सूइया त काल्हिए द’ देने छलियइ दोसर आइ देबइ । हेमचन्द्र -- ई सूया कहिया सॅ द’ रहल छी । धीरेन्द्र -- एक हपता भ’ गेल । काकीए सॅ बोहिनी कएलहुॅ । दिन मे दू-तीन टा सूइया ककरो ने ककरो जरुरे घोपि दैत छिअइ। हेमचन्द्र -- ( धीरेन्द्र के डेनियाबैत ) हमरा कनिया क तू सूइया भोकबहक त’ तोरा हम भाला भोकि देब’ । चल’ निकल’ एहि ठाम सॅ । (नेपथ्य सॅ - हेमचन्द जी छी अओ) हेमचन्द्र -- आबू - आबू महेश जी । महेश -- नाटक क’ व्यवस्था त’ सब भ’ गेल होयत । हेमचन्द्र -- औखन तक किछु नहि भेल अछि आ असंभव लागि रहल अछि जे किछु होयत । महेश -- चलू बाहर चलू सब व्यवस्था भ’ जेतइ । (दूनू प्रस्थान करैत छथि, रस्ता मे दिगम्बर सॅ भेंट भ’ जाइत छैक) हेमचन्द्र -- दिगम्बर जी हम आदमी के भेजि रहल छी तीन - चारि टा चौकी भेजि देबइ । दिगम्बर - एहि बेर चौकी नहि देब ।हमरा ओहि ठाम पाहुन आबि रहल छथि । हेमचन्द्र -- पाहुन त’ चारि दिन बाद अओताह। दिगम्बर - तैयो एहि बेर नहि देब । (पुनः आगू बढैत छटि) महेश - ई बिसार जति क’ आदमी सभ नाटक कि बूझत असभ्य !नीच !देखियौ कोनो बीकू जाति क’ आदमी भेटत आ काज भ’ जायत ।देखियौ पीताम्बर कक्का आबि रहल छथि (पीताम्बर सॅ ) कक्का सुनब..... ई - तीन टा छौरा -छपाठी जा रहल अछि चौकी द’ देबए । पीताम्बर - अओ बाबू । सभ चीज त’ बड्ड नीक मुदा चौकी टूिट जायत तखन ? । एहने नाटक करैत छी अहॉ सब । सब पात्र दुर्बासा आ विश्वामित्र जॅका कूदैत रहैत अछि । पछिला बेर चौकी क’ पच्चड़ टूटि गेल छल। ( हेमचन्द्र आ महेश प्रस्थान करैत छथि) हेमचन्द्र -- देखलिअइ बीकू जाति क’ क्रिया कर्म । चौकी नहि देताह । पच्चड़ टूटि गेलेन्ह... । राखह चौकी अपना,,,,, ओहि में । महेश -- लागैत अछि एहि बेर जात्रा खराब भ’ गेल । सुनु ने ,,,,, चलू हनुमान जी क’ प्रणाम क’ के पहिने चन्दा वला काज शुरु क’ दैत छी । ( दूनू प्रस्थान करैत छथि ) अंक - प्रथम दृश्य चारि मन्दिर क’ प्रॉगन। ओहि मे पॉच सात आदमी बैसि के तास खेला रहल छथि । चारि टा मुख्य खिलाड़ी आ प्रत्येक के पाछू मे तीन तीन आ चारि चारि टा आदमी बैसल अछि । भदेश एकता पत्ती दैत अछि एहि पर दू टा जोड़ सॅ हॅसि पड़ैत आछि ) भदेश - नहि नहि हम ई नहि दिय’ चाहैत छलहूॅ ,ई गलती सॅ गिर पड़ल । कलेश -- अहॅा बड्ड चालू छी । बीबी लागि गेल त’ गलती सॅ गिरि पड़ल ।(कुद्ध भ’ के ) एना पत्ता उठाएब त हाथ तोडि देब। भदेश -- रौ बहि !चुप रह, काल्हि तीन तीन बेर बीबी लगेने छलियउ।यादि छओ कि नहि ,आई फेर लगेबओ। ‘बीबी को लगाया जाएगा’ ।(सस्वर) कलेश -- ‘फॅासी पर चढाया जाएगा’ । (सस्वर ) भदेस-- बीबी को लगाया जाएगा । हेमचन्द्र -- कि अओ बाबू सब । एना जे एक दोसर बीबी लगबैत रहबए त’ शेष काज कोना हेतए। (कलेश भदेस क’ दिसि ताकैत छथि,दुनू बेशर्म जॅका मुसकिया दैत छैक ) कलेश -- अओ भदेस जी ताबत एक बेर चूने-तमाकू चल दिअओ । हेमचन्द्र जी सेहो अएलाह, कनेक हिनको बात सुनि लेल जाओ । महेश - आई नाटक अछि । आ बात ई जे रुपया के व्यवस्था एकदमे नहि अछि से हमसब सोचलहूॅ जे गाम सॅ किछु चन्दा चुटकी भ जाए । भदेश -- एखन त हमसब एतहि छी । खेल बड्ड क्रिटिकल स्टेज मे अछि । औखन नहि जाएब। कलेश जी के पानि छोड़एवा क’ अछि । सॉझ मे अहॉ सॅ भेट क’ लेब । कलेश - ई कि पनि छोड़एताह? । औखन त’ एके बेर लगेलिएन्ह ,,,,,,,,,,,बेस अहॉ हमरो साथी द’ दिअओ । नाटक क’ बाद हम मिलि लेब । हेमचन्द्र -- ठीक छैक अहॉ सॅ हम बाद मे ल’ लेब मुदा आओर व्यवस्था सब कोना हेतए । आई छोडू तास-वास । आउ चलू मंचे क’ पास । कलेस - हमसब सॉझ मे ओहि ठाम पहुॅच जायब । अॅहा सब चलै-चलू। ( ठोर मे तम्बाकू राखैत छी ) ( हेमचन्द्र आ महेश विदा होइत छथि । रास्ता मे एकटा शराबी - सुदर्शन सॅ भेंट होइत अछि, सुदर्शन लट पटा क बाजि रहल अछि। सुदर्शन -- हयौ हेमचन्द्र बाबू । चलि जाउ घर बैसू। आब के नाटक करत आ के नाटक देखत । जाउ चलि जाउ .......।सभ अपन अपन काज मे मगन अछि आ अहॉ नाटक लेल फिफिया रहल छी । जाउ चलि जाऊ। महेश - चलू कक्का जी चलू। हेमचन्द्र -- ओ एकदम सत्त कहि रहल अछि । (हेमचन्द्र आ महेश प्रस्थान करैत छथि । किछु आगॉ बढला पर दू टा युवक मजीत आ मदन मिलैत अछि । मजीत मुॅह लटकेने एकात भ’ गेल अछि आ मदन नजदीक भ’ जाइत अछि। मदन -- चचा बात ई जे मजीत कहलक जे हम रोल नही करब। हेमचन्द्र -- किएक ने करत ओ रोल ?। मदन -- ओ कहैत अछि जाबत एक बोतल क’ व्यवस्था नहि हेतइ । हमर कंसेंट्रेशन नहि बनत । हेमचन्द्र -- बनइ वा नहि बनए। बोतल त’ नहिए एतए। महेश -- अरे रुकू चचा जी । सुनह मदन ,एमहर आब’ । मजीत कें कहि दहक जे सॉझ मे व्यवस्था भ जेतइ। (हेमचन्द्र ओहि ठाम सॅ प्रस्थन करैत छथि ) महेश - आर कि दिक्कत छैक बताबह । मदन -- यदि दू टा बाई जी भ’ जेतइ तखन आर बेसी आनन्द...... । बेसी मजा..... अहॉ बूझिते छी । महेश -- बाई जी आब एहिखन कत’ सॅ आएत । मदन -- अहॉ पैसा दिअ हम आ मजीत बखरी चलि जाएब । चारि घंटा क’ अन्दर दू टा टंच बाइ जी क’ व्यवस्था भ’ जायत। महेश -- हमरा मून होइत अछि हमहॅू चली। मदन -- एकदम चलू । आहूॅ अपन पसन्द बताएब । (महेश,मदन आ मजीत जाइत छथि ) हेमचन्द्र(स्वगत)-ई कोन नाटक भ’ रहल अछि हमरा गाम मे । एहि नाटक सॅ दूरे-दूर रहल जाए ।क्षमा करथु विद्यापति आ उगना । आब स्थिति हमरा नियंत्रण मे नहि अछि । अंक - द्वितीय प्रथम दृश्य (बखरी बजार क’ रौनक । दू टा पान वला घूमि घूमि पान बेचि रहल अछि तीन टा शराबी बैसि के कानि रहल अछि।) दलाल -- कैसा चाहिए बताईए ? पंजाबी, सिन्धी ,बंगाली बिहारी, गुजराती ,यूपी वाली बताईए ,,,,बताईए ,,,,,,,शर्माइए नही । महेश -रौ बहि ई कि भ’ रहल छैक ? हमरा त’ डर भ’ रहल अछि । मदना -- डरबा क’ कोन बात । हम सॅंग छी ने, हम एहि ठाम चारि साल सॅ आबि रहल छी । महेश -- वाह भतीजा वाह । दलाल -- अरे बताब’ भइ । शरम काहे लें हो जेहन पैसा ओहन मजा । फुल मजा ,फ्री मजा । मदन -- चलू ने देखैत छिऐक । महेश -- तू जाह । हम एतइ छि । हमरा आबि कॅे बताबह। ( मदन अन्दर जाइत अछि आ महेश अन्दर दिस कान आ ऑखि गड़इबा क प्रयास करैत छथि) मदन -- आर केओ नहि अछि की? दलाल -- अरे इस पीक टाइम में जो मिल रहा है बस बुक कर लीजिए और फिर हमारी जानों में क्या कमी है। कमर देखिए....... देखिए (बाहर ई सुनि महेश उछलि पडै़त अछि) मदन -- अहॉ क’ नाम ? नर्तकी प्रथम -- मेमामालिनी । (बाहर महेश खूब प्रसन्न होइत छवि ) मदन -- अहॉ क’ की नाम ? नर्तकी द्वितीय -मेश्वर्या राय (बाहर मे महेश उछलि पडैत अछि) मदन -- अहॉ क नर्तकी तृतीय-- नीना कुमारी । मदन - अच्छा हम बाहर जा रहल छी । पूछि के बताएब । दलाल -- सुन’ एडवांस द’ के बाहर निकल’ नहि त’फेर हमर दोष नहि । मदन -- ठीक छैक ई लिय’ । (मदन बाहर आवैत अछि ) महेश -- ओ सभ कत’ रूकि गेलीह। मदन -- तैयार भ’ रहल छथि। महेश - आर सभ ठीक ने । मदन-मतलब ? महेश-मतलब ई जे -----(बजबा में लटपटाइत छथि ) मदन -- हॉ ठीके अछि । मुदा मेश्वर्या राय क’ ऑखि कने कमजोर छन्हि । मेमामालिनी के बच्चे मे लकवा मारि देलकन्हि, तेॅ ओ नाचि नहि पाबैत छथि । महेश -- आ नीना कुमारी ? मदन -- हुनका लेल स्पेशल रुमाल चाही । ओ बात -बात मे कान’ लागैत छथि । कानैत - कानैत पोटा बह’ लागैत छैक । महेश-जखन ई नाचवे नहि करतीह,तखन ओहिठाम कथी ल’ जेतीह । दलाल- अरे भाई । एतना देखिएगा तब तो हो गया । हमसेे कोपरेट करिए हम भी आपसे कोपरेेट करेंगे । जो चाहिएगा हम भी पीछे नही हटेंगें । (तीनू नर्तकी: एकटा हारमोनियम वला , एकटा ढोलक बला, बडकी पेटी क साथ बाहर निकलैत अछि) मेमामालिनी - ( महेश के कनखी मारैत ) न’ न’ नियौ।(नकियाबैत) सब का समान उठा लीजिए। (तीनू ग्रमीण तीनू नर्तकी क समान उठबैत अछि ) अंक -द्वितीय दृश्य-द्वितीय उद्घोषक -- आइ ‘चीनी क लड्ड’ू नाटक मंचित होमए वला छल। आइ लड्डू रसगुल्ला में बदलि गेल अछि । आशा अछि रस कनि कनि अहॉ सब के मुॅह मे जायत । मदन - कि नाटक भैरवी गीत सॅ शूरु कएल जाए? मजीत -- अरे आइ त’ तीन - तीन टा भैरवी आइल छथि । आइ भैरवी गीत क’ कोन काज । महेश -- एना करबहक त’ गाम क’ लोक सब बिगड़ि जएथुन्ह । तखन फेर चन्दा चुटकी कोना हेतए ? मदन -- ठीक छैक । धीरेन्द्र सॅ कहियौ जल्दी सॅ ओ भैरवी गीत समाप्त करए । ( धीरेन्द्र गावैत छथि । भैरवी गीत क’ बाद मेमामालिनी मेश्वर्या राय आ नीना कुमारी आबैत छथि आ बेतरतीब नाच आ गाना गाब’ लागैत छथि ।नाच मे अश्लील मुद्रा क’ खास विनियोग ।) हेमचन्द्र -- दैखियौ त’ महेश हमरा गाम मे केहन नर्तकी के उठा आनलक ।ताल -मात्रा सॅ एकरा कहियो भेंट नहि छैक । कलहेस -- एना नहि कहियौ हेमचन्द्र जी । मेमामालिनी क’ ऑखि क’ चंचलता बेजोड़ अछि । भदेस -- मेश्वर्या राय हमरा ह्रदय मे विक्षोभ उत्पन्न क’ रहल छथि। लागैत अछि जे ओ हमरे लेल नाचि रहल छथि, ओ हमरा बजा रहल छथि । मदन -- कि कक्का ? ठीक रहल नें ,खूब डोलि रहल छी । भदेस -- हॅ बौआ मस्त क देलहुॅ। मदन -- किछू ईनामो - बकसीस भ’ जाइ। भदेस -- ई लिय’ एक सौ एक । ( हेमचन्द्र तमतमा क’ उठि जाइत छथि ) डदृघोषक - एहन कुशल नृत्यांगना क नृत्य देखि कलेस जी भाव - विभोर भ’ गेल छथि आ भदेस जी आह्लाद सॅ बेहोश । बेहोशी सॅ पहिलेे ओ एक सौ एक टका द’ गेल छलाह । कलेस जी आ भदेस जी के नृत्यबोध क’ अभिनंदन - बन्दन । रंजिश करो जो हमसे भी गुलाब को ना मायूस करो हम उठते गिरते रहते हैं ये दो दिन में मुरझाते हैैं। (दर्शक में से एकटा उठि के नीना कुमारी क’ उठा के भाग’ चाहैत अछि । म्ंाच पर अव्यवस्था क’ माहौल । उद्घोषक -- दर्शक क’ उत्साह उफान पर अछि आ दर्शक सेंट परसेंट प्रतिक्रिया द’ रहल छथि । अर्थ ई जे गुलाब के मायूस हेबा क जरुरी नहि छैक । मीना कुमारी कें मंच पर सॅ बाहर ल’जाए वला उत्साही दर्शक क’ पहचान भ’ गेल अछि । घबराउ जूनि, नाटक एहिना चलति रहत । ) दलाल उद्धोषक सॅ - देखिए सर हमको कोपरेट करिए ,हम भी पूरा - पूरा करेंगें । आपको जो चाहिए हम पूरा देंगें । उद्घोषक -- हमरा अहॉ सॅ किछु नहि चाही । अहॉ अपन काज करु आ हम त कए रहल छी । (तावते मंच दिस तीन टा मोंट - डॉट युवक क प्रवेश । पीके ,खाके, जाके गाम क’ तीन टा उद्दण्ड युवक) मजीत -- कि माई ? पी के -- गॉव में ई नया -नया बात विचार सभ शुरु भ’ गेल आ हमरा जानकाारिये नहि । मजीत-- भाई अचानक वयवस्था भ’ गेल । खाके -- बन्द कर ई ताम -झाम आ उतार हरमजादी सब के। गॉव के रण्डी -खाना बना के राखि देलक। मजीत -- सुनु जाके भाई हिनका सभ के ल जाउ।काल्हि सब बात - व्यवस्था भ’ जेतई।हिनका सब के दू दिन राखल जेतइ (तीनू कान मे किछु बतियाइत अछि) (ओमहर सॅ धीरेन्द्र क’ प्रवेश) धीरेन्द्र--महेश जी वाह । बड्ड नीक व्यवस्था । हेमचन्द्र जी की करताह वयवस्था । अहॉ क व्यवस्था मे जे झंकार अछि से पहिले एहि गॉव क मंच पर कहियो नहि रहल। महेश-- अहॉ कोन रोल करब ? धीरेन्द्र -- जे खूब टॉसगर होइ सएह देब । अहॉ क’ भाबहु सेहो देख’ आएल छथि । आ दू किलो घी हम काल्हि भेज देब । उद्धोषक -- आब मंच पर रंग चेतना मंच क प्रसिद्ध गायक हरिशचन्द्र जी आबि रहल छथि । (हरिशचन्द्र जी गीत गाबि रहल छथि । हुनका सॅ मनीत ,महेश आ मदन धक्का-मुक्की करैत छथि । ) अंक- द्वितीय दृश्य-तृतीय ( नर्तकी सब के ठहराबए वला घर । अव्यवस्थित बिछावन सब । बिछावने पर हरमुनिया ढोलक राखल अछि । तीनू नर्तकी निकास क’ लेल जेबा क’ तैयार छथि । हुनका संग लोटा ल’के जेबा क’ लेल तीनू किशोर मे संघर्ष होइत छैक) अग्रेश -- हम पहिने लोटा पकड़लहुॅ तें हम ल’ जायब । धरमेश -- तीनू के हमरे पपा आनलाह तें हमही ल’ जायब । रत्नेश -- हमर बाबू सभ सॅ बेसी चन्दा देने छथि तें हमर सोलिड हक । दलाल - देखिये भाइयों आप लोग लड़िए मत एक - एक ठो तीनो के साथ चले जाइए । आखिर आप के मॉ के उमर की है तीनांे । तीनों एक साथ - कि बाजलें रे हरामखोर (दलाल दिसि झपटैत अछि ) तीनू नर्तकी तीनू किशोर क’ सामने आबि जाइत अछि आ गाल - केश पर हाथ दैत अछि । तीनू किशोर शांत भ जाइत छथि आ एक -एक टा लोटा उठा विदा भ’ जाइत छथि । ओहि ढाम महेश आवैत छथि आ व्यग्रता सॅ घूमि रहल छथि ) महेश -- कत’ चलि गेलीह। ( ओमहर सॅ मदन आ मजीत सेहो आवैत छथि ।) महेश -- अरे मदन अहॉ कि कर’ आयल छी । अहॉ हमर भतीजा भेलहुॅ । जाउ एत सॅ । जखन हम छी त अहॉ क’ कोन काज । मदन -- अहॉ क दू-तीन बेर देखलहुॅ अछि भतीजा -भतीजा करति । जी सम्हारि क’ बाजू। महेश -- अहॉ त व्यर्थे नाराज भ’ रहल छी रहल छी । अहॉ क बाबा हमर कक्का लागैत छथि । मंज्ीत - सुनु महेश जी ई कक्का -भतीजा फरियाएब: जखन मदन कें वियाह हेतेन्ह ।औखन हम सब पार्टनर छी , तीन - चारि दिन शांते रहू । एखन हम सभ एक छी । मदन -- बूझू त बखरी में कंठ सॅ बकार नहि खुलैत छलन्हि एत’ कक्का बनि बैसल छथि । मजीत -- अहुॅ चुप रहू मदन । ठीक छैक अहॉ केेेेेे जे बतियेबा क’ अछि से बतिया लिय’ महेश जी । हमसब दस मिनट बाद आबैत छी । (तीनू नर्तकी आ तीनू किशोर आवैत छथि । महेश जी मुसकियाबैत छथि । ) महेश -- ठीक रहलए ने । कोनो दिक नहि ने मेल । बौआ सब अहॉ सब जाउ । धरमेश-- आ अहॉ कि करब ? महेश --हमरा एकटा काज अछि । तीनू -- ठीक छैक अहॉ काज करु, हम बाद मे करब ।,,,,,,नहि नहि बाद मे आयब । ( तीनू जाइत छथि ) महेश -- सुनू हेमा जी । अहॉ के हमही आनने छी । अगिलो बेर आनब । ई मदनबा आ मजीत क बात मे नहि आयब ।,,,,, गॉव मे सबसे बेसी जमीन हमरे......तीन टा हाथी आ बारह टा घोड़ा अलगे..... ( नेपथ्य सॅ - रे महेशबा, रे महेशबा केवार खोल । पीके,खाके आ जाके क’ प्रवेश । तीनहूॅ आबिते महेश पर टूटि पड़ैत अछि,नर्तकी भगबा क’ प्रयास करैत अछि ) । खाके - हमरा सॅ बिना पूछने तू एहि ठाम किएक बैसल छें । पीके -- आजुक व्यवस्था जल्दी कर । जाके -- जल्दी सॅ भाग नहि त’ हड्डी तोडि देबओ । महेश -- भाई बिसरि गेलियइ ,हमहूॅ आही संगे बैद्यनाथपुर हाईस्कूल में पढ़ने छलियइ एक बेर ,,,, खाके -- चुप बेहूदा । बात सॅ तौं नहि मानवें । मेमामालिनी -- अच्छा महेश जी आप बाद में आइएगा। अंक-तृतीय प्रथम -दृश्य (राम प्रवेश क’ घर। ओहि ठाम हरिश्चन्द्र सेहो वैसल छथि ) राम प्रवेश - जखन बूझले छल जे लुच्चा - लफंगा सब रण्डी नचा रहल अछि तखन अहॉ क जेबा क चाही ? हरिश्चन्द्र -- अपन गॉव छल सोचलहुॅ जे हमरा के बजाओत। अपन घर छी ,अपन मंच छी । राम प्रवेश - किएक ने बिसार, हिमार, बकबल, समरल सब जाति क’ संघ बना के एकटा संस्था बनाओल जाए । हरिश्चन्द्र - संस्था कि करत ? राम प्रवेष -- ओ सब दुर्गा पुजा करैत छथि, किएक ने हमसब काली पूजा करी । हरिश्चन्द्र -- बीकू आ छीकू के एकदम छॉटि देबइ ? रामप्रवेश -- एखन बजेबइ ;तैयो नहि आयत ( नेपथ्य सॅ -- रामप्रवेश चा छी यौ ) राम प्रवेश -- हॅ हॅ मनोज आवह । मनोज -- गोड़ लागैत छी । पंजाब जा रहल छी, सोचलहुॅ जें भेट करैत जाउ । आब माए - बाबू कें देखनिहार आहीं सब ने छी राम प्रवेश -- ग्राम सॅ जा रहल छी । जाउ । जे धरती पेट भरए ओएह मॉ थिक । हमसब त’ सौचैत रही एकता संस्था बनबी जाहि में अहॉ क’ प्रमुख भूमिका रहए । मुदा अहॉ त जा रहल छी । ( मनोज प्रस्थान करैत अछि ) राम प्रवेश -- जनार क’ भजन आ कठघोड़वा नाच मे मनोजवा क’ जोड़क कलाकार एहि परोपट्टा मे नहि छैक । मनोज क’ बाद रामेसर क’ स्थान छैक । हरिचन्द्र -- रामेसर सेहो जा रहल छवि । रामप्रवेश -- हे मॉ मिथिले । अपन धिया- पुता के कहिया घरि बिलमाबैत रहब । हरिश्चन्द्र -- समस्या त’ अछिए । ( चारि - पॉच टा युवक क’ लाठी डंडा क’ साथ प्रवेश ) राम प्रवेश -- कि हौ मुक्खन , कथी क’ तैयारी छैक ? मुक्खन -- हमसब चाहैत छी जे अपन सब जाति मिलि के एकटा यूनियन बनाबी । हमसब काली पूजा करी जे हमरा काली जी दिसि देखत, ओकर ऑखि निकाल लेवए । राम प्रवेश -- हओ मुक्खन एखन ऑखि - कान निकलवा क’ जरुरी नहि छैक । (अन्य युवक सब मुक्खन जिन्दाबाद क’ नारा लगब’ लागैत अछि । रामप्रवेश अपन मॅुह नीचा क लैत छथि) मुक्खन -- दीपावली दिन हमसब शोले नाटक करब । हम पात्र क’ चुनाव क’ रहल छी । हरिश्चन्द्र -- शोले कोने नाटक भेल । विद्यापति नाटक राखू । मुक्खन -- विद्यापति खेलत बीकू सब । विद्यापति के हमसब नहि जानी । अंक-तृतीय दृश्य -द्वितीय ( मुक्खन क’ घर ओहि ठाम पात्र - परिचय आ रिहर्सल भ रहल अछि ) मुक्खन -- गब्बर सिह क’ रोल हिमेश तोरा दैत छियओ । रमेश -- हॅ हॅ बकवल जाति क’ लोक सब आब गबबर क’ रोल करत । हिमेश-- मॅुह सम्हारि क बाज । कि बिसारि जाति क औरत सब कलाकारे जनमाबैत अछि । ( रमेश आ हिमेश गुत्थमगुत्थी भ’ जाइत छथि । बड्ड मुश्किल सॅ हुनका हटाओल जाइत अछि ) परेश -- मुक्खन जी कक्का एकता चिट्ठी देने छथि । ( मुक्खन चिट्ठी पढ़ि रहल अछि ) मुक्खन -- तों कतें चन्दा देबहक ? परेश -- बाबू एक सौ एकावन देने छथि । मुक्खन -- तौं यदि दू सौ एक देबहक त’ हम तोरे गब्बर क’ रोल देब’ । ( धीरे सॅ कान मे ) परेश -- ठीक छैक हम द’ देब । मुक्खन -- रे मतरु , बसन्ती क’ रोल तू कर । रमेश -- हॅ हॅ हिमार जति क छोरा सब रण्डी क’ रोल में बड फिट बैसैत दैक । मतरु -- रइ रमेशबा मुॅह सम्हारि क’ बाज तूॅ त’ अपने गॉया छें । थियेटर क’ हरमुनिया मास्टर तोरा राखने रहओ । सब जनैत छैक ........ ( रमेश आ मतरु हाथम - हाथा क’ रहल छथि तखने धीरेन्द्र क’ प्रवेश ) धीरेन्द्र -- बीस किलो राहड़ि क’ दालि नेने आयल छी । नीचा मे राखल अछि ( मुक्खन क कान मे ) मुक्खन -- कोन रोल लेब ?। धीरेन्द्र -- हम जय बनब । मुक्खन -- जाउ जय बनू आ विजय करु । ( एकटा और व्यक्ति प्रवेश करैत छथि ।) ओ मुक्खन के ईशारा सॅ बजबैत अछि । समरेश -- कक्का कहलनि जे ठाकुर क’ रोल हमरा दिय’ । एकटा चिट्ठी भेजने छथि । ( मुक्खन चिट्ठी ल’ के पढ’ लागैत छथि ) प्रिय मुक्खन ! शुभाशीष । समरेश के भेजि रहल छी । आगॉ चुनाव आबि रहल अछि ओहि मे अहॉ क लेल समरेश खूब काज करताह । सब छीकू जाति क’ बोट अहीं के मिलत । छीकू हजारों साल सॅ युद्वप्रिय जाति रहल अछि । आशा अछि समरेश के व्यक्तित्व क’ अनुकूल रोल अहॉ देबइ । हमरा विचार सॅ ओ ठाकुर क’ रोल में फिट रहत । अहॉ कें धन्येश म्ुाक्खन -- ठीक अछि समरेश बाबू अहॉ के हम ठाकुर क’ रोल देलहॅु । (अन्य कलाकार सॅ) -- ठीक छैक रिहर्सल कएल जाओ । ( पहिने ठाकुर आ गब्बर आबैत छथि ) अपन - अपन संवाद यादि क’ लिय’ दूनू -- संवाद त’ यादे अछि । गब्बर -- हम बूझिते रही ,तों जरूर एबही.......तू कि तोहर बापो अइतओ । ठाकुर-तू बूझैत छें ने हम किएक आएल छी,हम तोरा बाप सॅ भेंट करेबओ । गब्बर -- फड़फड़ा जूनि ठाकुर । सब फरफरी एके लाति मे तोरा निकालि देबओ । ठाकुर -- रौ बहि ! समरल जाति क’ कलाकार हमर फरफरी निकालत । (दूनू एक - दोसर कें पकड़ि लैत छैक आ मुक्कम - मुक्की शुरु भ’ जाइत छैक ) मुख्खन -- कि भेल समरेश ?एना किस्क किएक क्रोध में आबि गेलहुॅ । समरेश -- ई हमरा स्कुले सॅ परेशान क’ रहल अछि । स्कूल मे कहैत छल फड़फड़ा जूनि ठाकुर । मुख्खन -- ठीक छैक रिहर्सल क’ कोनो काज नहि । हम पर्दा क’ पाछू सॅ बाजब आ अहॉ सब ओकर नकल करब । अंक -तृतीय दृश्य- तृतीय ( हेमचन्द्र क’ घर । ओहि ठाम परमेश वैसल छथि । तखने मदन आ महेश प्रवेश करैत छथि ) महेश -- कक्का गोड़ लगैत छी । हेमचन्द्र -- भगवान ़अॅहा के सदबुद्वि देहि । महेश -- कक्का सुनलियई कि नइ , काल्हि सब ओ सब मिलि के शोले खेलि रहल अछि । परमेश -- त’ कोन अनर्थ भेल ? मदन -- बूझू त’ एहि विद्वान क’ गाम मे जकरा जे मून होइत छैक से क’ रहल अछि । हेमचन्द्र -- अहॉ क’ रण्डी सब अनर्थ नइ केने छल ? महेश -- मुदा नाटक त’ विद्यापति भेल छलए ने । ओ त’ बीच बीच में कनेक मोन बहलेवा क’ लेल छल । परमेश -- दोसर लोक सब मून बहला रहल अछि त’ अहॅा किएक परेशान छी ( एहि बीच में खाके ,पीक,े जाके आवैत छथि ) खाके -- अहॉ सब चूड़ी पहिरने रहू ,मुदा हम ई नहि होमए देबए । परमेश -- कि करबए अहॉ ? जेके -- हम मंच के रक्त रंजित क देबए । हेमचन्द्र -- जकरा अहॉ रक्त रंजित करबए से अहॉ के छोड़त ? जाके -- चलू भाइ ओतइ चलू । देखैत छियइ के माई क’ लाल स्टेज गाड़ई क लेल आवैत अछि ( कलेश आ भदेस प्रवेश करैत छथि ) कलेश -- बूझलहूॅ हेमचन्द्र बाबू ई बकवल सब भरि राति नाच करत आ सेर - सेर भरि मूतत। भदेश -- बूझू जे जखन जखन पूवरिया हवा बहत ने, ई भरि अगहन तक महकैत रहत । हमरो इएह विचार जे नाटक नहि होई । प्रमेश -- अहॉ क’ कि विचार जे कसकव्ता सॅ रण्ड़ी आवए? कलेस -- हॅ नजदीको सॅ काज चलत । हेमचन्द्र -- चुप रहू । बारहो महीना ताश खेलि के पखेरी - पसेरी भरि भूतैत छी केओ टोकलक अहॉ के ? भदेश -- हओ ! कलेश जी चलू ई सब हारि मानि लेलाह । चलू जे भ’ रहल छैक ओहिए मे किछु जुगाड़ पानी कएल जाए। (कनि दूर हटला क’ बाद कलेश -भदेश बतियाति छैक ) कलेश -- चलू ने मुक्खने के कहबए । जे करब से कर , मुदा आन तीन-चारि टा भगजोगनी के । भदेेश -- आर की ? कम सॅ कम बखरी वला त’ निश्चिते आबए क’ चाही । अन्हरी ,बहिरी सब चलतय ।जतेक चन्दा चुटकी हेतए हम सब द’ देब । अंक -तृतीय दृश्य-चारि रामप्रवेश क’ घर । अकेले मे किछु गुनगुना रहल छथि । डूबल भॅवर मे नैया सम्हारु मॉ केओ नजर नहि आबए सम्हारु मॉ राति विकट अछि बाट न सूझए आबू दीप देखाबू सम्हारु मॉ,,,,,,,,,,, ( हेमचन्द्रक’ प्रवेश ) हेमचन्द्र - के सम्हारताह । जगत जननी त’ मिथिला के बिसरि गेलखिन्ह । गरीबी त’ पहिनहु छल मुदा एहन सांस्कृतिक हैजा कहियो नहि फैलल । रामप्रवेश -- कक्का क्षमा करु । ककरा पता छल जे कनि कनि टा बात एते विषबेल बनत । हेमचन्द्र अहॉ जागि गेलहुॅ, तखन हमरा के रोकत ? रामप्रवेश -- कक्का आब जे आदेश देबए से हम करब । (परमेश प्रवेश करैत छथि ) परमेश -- रामप्रवेश छी अओ ? रामप्रवेश ‘-- परमेश आबह । आइ चारि साल बाद तों हमरा दलान पर अइलह। तोरा देखि हम फेर जबान भ’ गेलहुॅ । परमेश -- पुरनका बात सब बिसरु । हमरो ध्यान नहि रहल आ अमुख्य चीज मुख्य बनइत चलि गेल हेमचन्द्र -- छोड़ू पछिला बात सब । आब ई बाजू जे कोन नाटक खेलल जाइ । रामप्रवेश -- ‘‘उदयनाचार्य’’ नाटक खेलल जाइ । हेमचन्द्र -- अहॉ कोन रोल लेब । रामप्रवेश -- हमरा जे देब से हम करब , ओना आचार्य क’ भूमिका मे परमेश फिट छथि, हमरा सारंग बला रोल द’ दिय । बड़ तेजस्वी बौद्ध भिक्षु अछि । परमेश -- आब हमरो रोल क मोह नहि अछि । सब सॅ बेसी महत्वपूर्ण अछि ओकरा जीनए । (रामप्रवेश उठि के परमेश के गला लगबैत छथि हेमचन्द्र उठि के दूनू मे मिलि जाइत छथि । ओमहर धीरेन्द्र हॉफैत आबैत छथि ।) धीरेन्द्र -- कक्का - कक्का मुक्खन आ खाके मे जबरदस्त मारिपीट भ रहल अछि । हेमचन्द्र-- होमए दियओ । रामप्रवेश -- मर’ दियओ सब के । परमेश-- धीरेन्द्र जी जनचेतना मंच फेरि जीवित भ गेल अछि । खूब तैयारी करु । धीरेन्द्र -- हमरो तैयारी पूरा अछि । एहि बेर राहडि खूब फरल अछि । एक मून राहड़ि भेज देब । (तीनू हॅसि दैत छथि । रामप्रवेश गीत गावैत छथि आ प्रकाश धीरे धीरे क्षीण होइत अछि।) टिल्‍लू जी (शिव कुमार झा) जन्‍मदिनक मधुर मंगलकामना टिल्‍लू जी ।बहुत दिन सँ अहॉं से बात नइ भ' रहल अछि आ हम प्रयासो केलहुं त' अहॉ व्‍यस्‍त रही ,कखनो टाटा ,कखनो भुवनेश्‍वर ।आइ अहॉक जन्‍मदिन अछि आ अहॉक सभ स्‍वप्‍न सभ प्रतिज्ञा सामने होयत ।भगवान सँ हमर सभक प्रार्थना कि अहॉंक सब कामना फलीभूत हो ।मैथिली भाषा क एकटा पाठक होयबाक नाते हमर ई कामना कि अहॉ सब तरहें मैथिली साहित्‍य के समृद्ध करी ।एकटा कविक पुत्र होयबा क नाते जे दायित्‍व अहॉ क छल से अहॉ लगभग पूरा क देलहुं ,मुदा एकटा लेखक होयबा क नाते अहॉके बहुत किछु करबा क अछि ,ने केवल मात्रा मे बल्कि गुणात्‍मकता मे सेहो । अहॉक कविता मे बूच भैया क कविता क छाया देखाइत अछि ,ई जत्‍ते स्‍वाभाविक छैक ,ओतबे अहॉ लेल अपरिहार्य अछि कि अहॉ अपन रस्‍ता बनाबी ।जे ओइ पीढ़ीक दुख छैक ,ई ओकरे छैक आ ओ पीढ़ी जे शिल्‍पक चयन केलकइ ,सेहो ओकरे रहतइ ,नवका पीढ़ी के बेशी नवोन्‍मेषी बनए पड़तए ,तखने ई ज्‍योतिरीश्‍वर आ विद्यापतिक भाषा अपन प्रासंगिकता बनेने रहतइ ।यद्यपि सभ भाषाक अपन अपन संस्‍कार होइत छैक आ ओकर रचनात्‍मकता सेहो इतिहासक कोखि सँ निकलि रहल छैक ,तैयो लोकल किछु नइ रहलइ ।

अहॉक आलोचना भाषा तथ्‍यात्‍मक आ निर्णयात्‍मक रहैत अछि ।तथ्‍यात्‍मकता यद्यपि प्रामाणिकताक अंग बनिके आबैत अछि ,तथापि कखनो कखनो ओ पाठ के बोझिल सेहो बनबैत अछि आ तथ्‍य क बोझ तखन आर बेशी भ' जाइत अछि ,जखन ओ केवल जानकारी क प्रदर्शनक लेल आबैत अछि ।जेना 'गामक जिनगी' पर लिखैत काल अहॉ खूब रास कहानीकारक नाम लिखैत छी । बात केवल अहींके नइ अछि ,प्राय: मैथिली मे नामक गोला चलैत छैक ,आ लेखकक भाषाक स्‍वभाव ,ओकर बनावट पर कम विचार होइत अछि ।तहिना तुलनात्‍मक आलोचनाक मतलब लेखक लोकनि दूटा किताब ,लेखक या उद्धरणांश सँ बूझैत छथिन्‍ह ,तुलनात्‍मक आलोचना के सही बाट देखयबाक जिम्‍मेवारी अहीं सन लेखक के अछि ।ऐतिहासिक आलोचना एखनो महत्‍वपूर्ण अछि ,किएक त' मैथिली साहित्‍यक इतिहास आ विभिन्‍न युग ,लेखक ,क्षेत्र आ प्रवृत्तिक कार्यभागक सही सही मानचित्र अखनो हमरा सभक समक्ष नइ अछि ।समाजशास्‍त्रीय आ उत्‍तर आधुनिक आलोचना क बाते छोड़ू ,एकर त' नामोनिशान अखन मैथिली मे नइ अछि ,मुदा अहॉ सन उद्योगी व्‍यक्ति हमरा समक्ष छथि ,तें आशान्वित छी ,आइ ने काल्हि सब चीज अनुकूल स्‍थान पर मानक रूप मे रहत । आइ बस एतबे ,जन्‍मदिनक फेर सॅ मंगलकामना ।अहॉ चिरायु हो । डॉ. कैलाश कुमार मिश्र (८ फरबरी १९६७- ) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., “मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक” पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आऽ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आऽ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आऽ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आऽ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर “फॉकलोर ऑफ इण्डिया” विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आऽ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आऽ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आऽ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आऽ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद। - डॉo कैलाश कुमार मिश्र कतेक प्रदेशमे मानवशास्त्रीय फील्डवर्कक क्रममे घूमल छथि। फॉक म्युजिक ऑफ मिथिलापर पी. एच.डी. छथि आ मिथिला चित्रकलापर हिनकर आलेख एहि विषयपर सभसँ नीक प्रबन्ध मानल जाइत अछि। लघुकथा- पण्डिताइन राघबक मोबाइल केर घंटी बाजि उठलनि। देखैत छथि जटा फ़ोन कऽ रहल छनि। फोन उठा हेलो कहलथिन। ओमहर सँ जोश मे मुदा एक अव्यक्त पीड़ा सँ भरल शब्द: “हर हर महादेब राघब जी। सब समाचार नीक ने?” राघब: “हर हर महादेब! कहल जाओ। जय महाकाल?” जटा: “सब किछु चलि रहल अछि। जिनगी जीब रहल छी। काल्हि हरे कृष्णक दोसर बरखी छनि। अहाँ सँ बहुत नेह रखैत छलीह। सोचल नौत दऽ दी।” राघब: “ओह! दू बरख भऽ गेलनि अनुराधा केँ अहि नश्वर काया केँ त्यागि अनश्वर जगत मे प्रवेश केना! समय कोना दौड़ल चलल जा रहल छैक?” जटा: “हाँ राघब जी। अहाँ केँ की कहू, अहाँ स्वयं विद्वान छी। सब बात बुझैत छियैक। आचार्य मदन सेहो सुतले रहि गेलाह! बिसरे सभी बारी-बारी!” राघब: “सही कहैत छी। यएह छैक संसार। लोक जनैत अछि जे ओकरा चलि जएबाक छैक तथापि झूठ-फ़रेब मे, अपन आन मे लागल रहैत अछि। छोड़ू इ बात सब। हम काल्हि अवश्य आबि जाएब।” इ कहैत राघब फोन काटि देलथिन। आब राघब जटा आ अनुराधाक दुनिया मे, ओहि छोट सन संसारक इतिहास मे चल गेलाह। समय जेना घूमए लगलनि..... जटाक जन्म प्रथम पुत्रक रूप मे एक महादरिद्र मैथिल ब्राह्मण परिवार मे भेलनि। नामक अतिरिक्त ओहि परिवार मे कोनो संस्कार ब्राह्मण बला नहि रहैक - ने माता पिताक शिक्षा, ने परिवारक संस्कार, ने गामक नाम आ ने कूलक विचार। जटाक पिता आ माताक बीच एकैस वरखक अंतर रहनि। जटाक पिता भोला प्रचण्ड मूर्ख आ भूमिहीन। लोकक महिस पोसिया रखैत छलाह। पैतीस बरखक भऽ गेल रहथि। सब बेर चानन काजर लगा ललका धोती आ कुरताक सँग पाग दोपट्टा धारण कय सौराठ सभागाछी जाइत छलाह। टुकटुकी लगेने रहैत छलाह जे कोनो कन्यागत ओकरा दिस देखतैक। मुदा सब बेकार। ऊपर सँ मुँह कान सेहो दैवक देल। बज्र कारी चाम, उचगर दाँत, तमाकुल आ पान सँ दाँत मे खईंठी पड़ल, आँखि धसल, रिछ सन पूरा देह मे केस, कान पर विशेष झमटगर ठाढ़ भेल रोआँ, चेड़ा जकाँ हाथ, हाथ मे खुरपी, हाँसू आ कोदारि चलबैत-चलबैत ठेला पड़ल, पैर मे बेमाय फाटल, लेढाएल मोटका धोती सँ महिसक गंध अबैत भोला कोनो रूप सँ ब्राह्मण नहि लगैत छलाह। गामक संस्कार ई जे बिना गारि केँ दू पुरुख निको बात नहि कऽ सकैत छल। भोला भला अपवाद कोना रहितथि खूब गारिक प्रयोग करैत छलाह। लगातार सात बरख सँ भोला तैयार भऽ सौराठ सभा शुद्धक समय मे जाइत छलाह आ टकटकी लगेने बैसल रहैत छलाह मुदा दुर्भाग्य ई जे बियाहक बात केँ पुछैत अछि हुनका दिस कोनो कन्यागत देखितो नहि छलनि। अंततः सभा समाप्त भेला पर भोला निराश मोन सँ वापस गाम आबि जाइत छलाह। एहिबेर भोलाक बूढ़ पिता ठानि लेलाह जे चाहे जेना होइक़ भोलाक बिआह अहि शुद्ध मे अवश्य करा देथिन्ह। कियोक कहि देलकनि जे नीरस झा बहुत नीक दलाल छथि। भोलो सँ अधलाह बरक बिआह करा चुकल छथि। मुदा नीरस झा बिना टका केँ कोनो काज नहि करैत छथि। एहिबेर सभा लागब सँ बीस दिन पहिने भोलाक पिता नीरस झा केँ अपन घर बजा अनलाह। बकाएन महिसक शुद्ध दूध मे चाह बना भोलाक माय एक फुलही गिलास मे नीरस केँ आ छोटकी बाटी मे भोलाक पिता केँ देलथिन। नीरस केँ आर की चाही। मोन प्रफुल्लित भऽ गेलैक। जाड़क समय मुँह सँ फूकि-फूकि चाह सुरकय लागल। नीरस केँ होइक़ जेना चाह नहि अमृत पिब रहल हो! ओमहर भोलाक पिता आ माय नीरस दिस एक लाचार याचक बनि अशाक किरण जगेने ताकि रहल छलथिन। जखन आधा चाह सुरका गेलैक तऽ नीरस बाजि उठल: नीरस : "हाँ बौकू काका! की कहऽ चाहैत रही?"। बौकू काका: "बौआ, पहिने चाह पिब लीय फेर गप्प करैत छी। अहाँ कोनो आन थोड़े ने छी!" नीरस चुपचाप चाह पीबय लागल। चाह सूरकला बाद नीरस फेरो बाजल: "हाँ बौका का, कहू की कहए चाहैत छी?" बौकू काका चुपे रहलनि। भोलाक माय आँखि सँ गरम-गरम नोर चुअबैत बजली: "बौआ नीरस, अहाँ सब सन दियामानी लोक केँ अछैते हमर भोलबा कुमारे रहि जाय!" नीरस: "की कहैत छी काकी, ई एहेन अपाटक अछि जे अपन नाम तक नहि बाजि पबैत अछि। ओहि दिन चौक पर एक घटक नाम पुछि देलकैक। ई बृजबोध चौधरी केँ --जीबोध चौधरी कहि देलकैक। ओतय सब आदमी हँसै लगलैक। एकर बिआह कनि झंझट बला चीज़ छैक।" बौकू काका: "हौ नीरस किछु करह। एकर बिआह हमरा जिबैत भऽ जएबाक चाही। सब किछु तऽ सुईद मे चलि गेल, आठ कट्ठा बँसबिट्टी आ कलम रहि गेल अछि। तकरे बेचि एकर बिआह करा देबैक। गरीबक मिहनती बेटा छैक। लोकक महिस पोसतैक, खेत बटाई करतैक आ अपन जीबन चला लेतैक।" बौकू काका केँ मुँह सँ ई बात सुनिते देरी नीरस मोने-मोन प्रसन्न भऽ गेल। ओकरा भऽ गेलैक जे आब ओकरा भोलाक बिआहक दलाली मे नीक पाई भेटि जेतैक। नीरस : "बौकू कक्का, किछु ने किछु तऽ करय पड़त। आहाँकेँ जमीन बिका जाएत तकर दुख हमरा की अहाँ सँ कम हएत। मुदा दोसर कोनो उपाय नहि। खैर! बेटा सँ संपत्ति भऽ जाइत छैक, संपति सँ बेटा नहि होइत छैक। की पता भोला केँ एहेन संतान विधाता दऽ देथिन जे पाँच दस बिघा जमीन किन दैक, पक्का मकान बना दैक, पैसा सँ घर भरि जाइक।" भोलाक माय आ पिता मुड़ी गोतने नीरस केर बात सुनैत रहलनि। जतेक अंतिम टुकड़ी जमीन बिका जएबाक दर्द नहि भेलनि ओहि सँ अधिक अहि बातक आश जगलनि जे भोलाक बिआह भऽ जएतैक आ ओकर घर बसि जएतैक। नीरस किछु सोचैत बाजल: "बौकू काका, एक तऽ भोला केँ कहि दियौक जे ई लोककेँ अपन नाम बृजवोध चैधरी केँ बदला भोला चौधरी कहैक। ई शब्द सहज छैक। एहि मे बात नहि लगतैक। आ पाँच सात दिनक भीतर हमरा लेल किछु टका केँ ब्योत कऽ दिय जे हम बगलक गामक छेदी झा केँ जाकऽ पहिने सँ दऽ अएबैक। छेदी झा अगर हाँ कहि देलक तऽ बात पक्का। ओ एहन लोक अछि जे ब्रह्माक लिखल लेख मेटा सकैत अछि।" ओ कहैत नीरस अपन घर दिस बिदा भेल। बौकू का, भोलाक माए आ भोला केँ बिआहक आश जगलैकछ कोउ काहू मगन कोउ काहू मगन। भोलाक परिवार अहिमे मगन जे भोलाक बिआह भऽ जेतैक। जमीन तऽ हाथक मैल छैक। नीरस अहि मे मगन जे भोलाक बिआह मे ओकरा नीक दलाली भेट जेतैक। बौकू काका दोसरे दिन गामक महाजन सँ दू सए टाका अपन कलम केँ नाम पर अगता लए नीरस केँ दऽ देलथिन। नीरस ओहि मे सँ एक सए अपने राखि लेलक आ एक सए छेदी झा केँ दऽ अएलैक। छेदी झा जोगार मे लागि गेल। तकैत-तकैत छेदी झा केँ एक कन्यागत एहन भेट गेलैक जकर तेरह बरखक बेटी रहैक। छेदी आ नीरस ओहि कन्यागत केँ समझा बुझा भोला सँ बिआह लेल मना लेलक। ओना पहिने तऽ भोलाक बगै देख कन्यागत कनि बिदकि गेलैक मुदा छेदी आ नीरस अपन रचल मायाजाल मे ओकरा फँसा लेलकैक। अहि तरहे पैतीस बरखक भोलाक बिआह सभा गाछी मे पहिने दिन फाइनल भऽ गेलैक। भोलाक कनिया गोदा गोर अततह मुदा मरगिल्ली जकाँ खियाएल। देह अन्नक मारल रहैक। घर मे भरि पोख अन्न केँ पुछैत अछि कुअन्न तक नहि भेटैक। सोझे साले दुरागमन भेलैक। भोलाक माय अपन मरगिल्ली पुतहु लेल बहुत उदार। दरबज्जा पर पोसिये सही चारि-चारि लगहैर महिस रहैक। दूध दही केर कोनो कमी नहि। गोदाक पूरा नाम रहैक गोदावरी मुदा लोक प्यार सँ गोदा जे कहनाइ शुरू केलकैक से गोदा रहि गेलैक। से जे हो। गोदा सासुर मे भरि पेट भोजन करैत छलि। सासू कहियो कोनो तरहक कमी नहि देलूथिन। सोझे साले गोदाक देह चिक्कन भऽ गेलैक। चाम चमकि उठलैक। बेर सन पयोधरि नीक भोजन आ भोलाक नेहक उत्पात सँ समतोलो सँ नमहर भऽ गेलैक। अचानक अतेक परिवर्तन आबि गेलैक गोदाक शरीर मे जकर कियोक कल्पनो नहि कऽ सकैत छल। गोदा भोलाक दुनिया बदलि देलकैक। बोलीक मधुर तऽ गोदा नैहरे सँ छलि। घर मे खूब काज धंधा करथि। सास ससुरक सेवा मे कोनो कमी नहि। भोलाक माए दरबज्जाक काज जेना गोबर सँ चिपड़ी पारब, दरबज्जा निपब, महिसक थान साफ़ करब, अन्न सब फटकब, सुखाएब आदि करथि आ गोदा घर आंगन साफ़ करब, निपब, भानस करब, सासु सँग धान कुटब, दालि दरडब आ पूजा पाठ करथि। दुनू मे कहियो कोनो तरहक फसाद नहि भेलनि। भोला तऽ अपन गोदा केँ सदैव माथ पर रखैत छलाह। समयक चक्की चलैत रहलैक। गोदा सोलहम चढ़ैत गर्भवती भऽ गेलीह। नौ मासक बाद एक बेटा भेलनि। भोलाक बेटाक मुँह कान नाक तऽ नीक रहैक मुदा चामक रंग भोलो सँ सियाह। मुँह आयताकार। मुदा भोला, गोदा, भोलाक माता पिता ख़ुशी सँ बताह। एक महिला जतले जिभे बाजि देलकैक “बच्चा कनि कारी छैक”। भोलाक माय झट दनि कहि देलथिन: “रह दियौक, बेटा छैक ने। मुँह कान सोझ छैक ने। घीबक लडडू टेढो नीक। हमर वंश बचि गेल। महादेब खूब कऽ औरदा देथिन आ काया निरोग रहैक। आर की चाही। बच्चा चूँकि भोलाक माय कलना बाबा सँ मंगने छलीह ताहि ओकर नाम राखल गेलैक मंगेश चौधरी। मंगेश केँ घुरमल घुरमल जटा बला केश रहैक ताहिं गाम घरक लोक जटा कहि सम्बोधित करए लगलैक। मंगेश कतौ बिला गेलैक आ जटा नाम जगजियार भऽ गेलैक। भोला परिश्रम करैत रहलाह। जटा केँ दबाई बीरो लेल नगद टाका के दरकार भेलैक। लोक सब सँ पैंच उधार शुरू भेलैक। आठे मासक बाद गोदाकेँ पुनः गर्भ ठहरि गेलैक। फेरो बेटा भेलैक। हालाँकि तकर छह बरख धरि गोदा केँ कोनो सँतान नहि भेलनि। अहि बीच भोलाक पिता अर्थात् बौकू काकाक निधन भऽ गेलनि। भोला पर कर्जा आरो बढि गेलनि। दूनू बेटा जटा आ सत्यव्रत सरकारी बेसिक स्कूल मे जाईत रहल। नहुँ-नहुँ अन्न पानिक दिक्कत शुरू भेलैक कारण भोला लोकक कर्ज अन्न बेचि सधेबाक जोगर लगेने छलाह। अही बीच ककरो सँ पता चललैक जे महर्षि रमेश योगी कानपुर मे तीन बरख लेल अखण्ड यज्ञ करताह। ताहि लेल ब्राह्मण कुमार चाही। बच्चा सभकेँ रहनाइ खेनाइ मुफ़्त उपर सँ गुरुकुल मे नामो लिखा देल जेतैक। किछु टाका सेहो भेटतै। गोदा भले दरिद्र परिवार सँ छलीह मुदा शिक्षाक प्रति साकांक्ष छलीह। भोला केँ कहलथिन: “बुझलौं, अपने सब दिक्कत मे छी। दुनू भाई केँ भरि पेट अन्नो ठीक सँ नहि दऽ पबैत छी वस्त्र पोथीक चरचे छोड़ि दियौक। बढियाँ रहत जे दुनूकेँ कानपुर रमेश जोगी केँ आश्रम पठा देबैक। भरि पेट भोजन, देह झाँपक वस्त्र आ पढ़बाक जोगार तऽ भऽ जेतैक। अपन सभक जीवन कटैत रहत।” भोला बात गंभीर भेल सुनैत रहला आ अंतिम निर्णय इ लेलनि जे जटा आ सत्यव्रत केँ दिल्ली पठा देथिन। सएह भेलैक। जटा आ सत्यव्रत दुनू भाई महर्षि रमेश योगीक आश्रम कानपुर आबि गेल। पहिल बेर शेब देखलक। पहिल बेर पनीर ककरा कहैत छैक से बुझलक। गेरुआ शुभ्र वस्त्र भेटलैक। भोरे स्नान पूजा, वैदिक मन्त्रक समवेत पाठ आ तकर बाद फल आ भरि गिलास छालीयुक्त दूध। दिनमे रोटी, भात, दालि, तरकारी, सलाद, आचार, दही, मिठाई; राति कऽ रोटी, दालि तरकारी। सुतए सँ पहिने दूध। सँस्कृत व्याकरण, वेद पाठ, कर्मकाण्डक शिक्षा विख्यात गुरूक देखरेख मे। दू हजार विद्यार्थी मे दुनू भाई जेना घुलि मिल गेल। वेद पाठ सँ कंठ खुजि गेलैक। व्याकरणक सूत्र जिह्वा पर चढ़ि गेलैक। जखन एक बरख मे गाम गेल तऽ गोदा अपन दुनू ब्राह्मण कुमारक मुखाकृत देखि अचम्भित भऽ गेलीह। सासु तुरत हिंग, सौंस मिरचाई आ नोन झड़का दुनू पौत्रक नजरि उतारि लेलनि। डर इ रहनि जे कखनोकल अपनो लोकक नजरि लागि जाइत छैक! नित्य वेद पाठ केलाह सँ दुनू भाई केर कंठ फूटि गेलैक। स्वरक सन्धान नीक भऽ गेलैक। गेयता प्रखर भऽ गेलैक। दु बरख मे जेना परिपक्व भऽ गेल होइक। दुनू भाई आब क्रमशः बारह आ दस बरखक भऽ गेल। सब किछु नीक रहैक। इमहर गोदा केँ फेरो एक बेटा आ एक बेटी भऽ गेलनि। एकाएक रमेश योगीक आश्रम मे यज्ञ आ पढ़ाई बन्द भऽ गेलैक। आब की हो? ओहि मे अधिकांश विद्यार्थी मिथिला आ उत्तराखंड सँ अति निर्धन परिवार सँ रहैक। माता पिता लग कोनो उपाय नहि। कियोक कोनो फैक्ट्री तऽ कियोक कोनो आन मजदूरी शुरू केलक। किछु नीक विद्यार्थी सबहक नामांकन कानपुर आ अगल बगल केर सँस्कृत विद्यालय (महाविद्यालय) मे भऽ गेलैक। ओहने विद्यार्थीक हेंज मे जटा आ सत्यव्रत छ्ल। मिथिलेक एक गुरुजी अपन प्रभुत्व सँ दुनूक नामांकन एक सँस्कृत विद्यालय मे करा देलथिन। ओहि विद्यालय मे छात्र सभकेँ दुनू साँझ भरि पेट रोटी दालि भोजन भेटैक। खोराकी अगल बगल केँ सेठ साहूकार सब धर्मक नाम पर दान मे दैक। कहियो काल तरकारी आ खीर मिठाई सेहो विशेष लोकक कृपा सँ भेट जाइक। लोक सभ विद्यालय केँ छात्र सभकेँ ब्राह्मण भोजन, पूजा पाठ लेल सेहो बजबैक। अहि मे नीक निकुत भोजनक अलावा वस्त्र, वर्तन आ नगद सेहो हासिल भऽ जाइक। ई दुनू भाई अपन पैसा बचा माय केँ पठाबय लागल। कर्जा सँ कनि आफ़ियत होमय लगलैक। दुनू भाई पढ़ैत रहल। पढ़ाई मे नीक करैत रहल। जटा कनि मुँहक जोर छ्ल आ सत्यव्रत कनि मृदुभाषी मुदा गम्भीर आ चुस्त चालाक लोक। देखैत-देखैत जटा अठारह बरखक भऽ गेलैक। ओकर दाई अर्थात भोलाक माय जिबैत छलथिन। एकदिन भोला सँ अरि गेलथिन: "हौ बौआ, बाप तऽ पोता सबहक उपनैनो नहि देख सकलथुन, हमरा कम सँ कम जटा केँ बिआह करा ओकर कनिया देखा दएह! मरलाउत्तर तोहर पिता भेटता तऽ कहि देबनि जे एहन अछि अहाँक पोताक कनिया!" ई कहैत ओहि बूढ़ीक धसल आँखि सँ नोर माटि पर टप-टप खसए लगलैक। भोला तुरत अनमोल मास्टर लग अंतर्देशी लेने पहुँच गेलाह। बजलाह, "माहटर साहेब, हमर माय आई एक कचोटक बात बाजि देलक। ऊपर सँ ओकर नोर थमहक नामे नहि लऽ रहल अछि। कहैत अछि जे आब बहुत दिन नहि जीत। मरए सँ पहिने जटाक कनिया देखऽ चाहैत अछि। कनि अहाँ एक चिट्ठी मे सब बात जटा केँ लिख ओकरा जनतब दऽ दियौक। " भोलाक हाथ सँ अंतर्देशी अपन हाथ मे लैत अनमोल मास्टर सब बात चिट्ठी मे जटा लेल लिख देलथिन। चिट्ठी भेटला पर जटा बिआह लेल तैयार भऽ गेलैक। तीन मासक भीतर जटाक बिआह अपना सँ दू बरख छोट लड़की सँ भऽ गेलैक। सोझे साले दुरागमन सेहो भऽ गेलैक। जटाक कनियाक नाम रहैक अनुराधा। लंबाई मे जटा सँ लगभग बराबर। रंग सामरि, देह गदरायल। नागिन सन लट, डोका जकाँ आँखि, छरगर नोकगर पतरगर नाक, गस्सल-गस्सल छोट-छोट दूध जकाँ चमकैत दाँत, वक्षक वयस ज्ञाने कनिक अधिके उभार, नारिकेर तेल सँ गूथल जुड़ा, रंग बिरंगी नुआ मे अधकटी आंगी आ कखनोकाल पारदर्शी आंगी सँ छटकैत ओकर कसल पयोधरि देखार लगैक एना जेना सब बंधन तोड़ि बाहर आबि जेतैक! जटा तऽ अपन रसगर कनियाक काया केर प्रेम आ ओकर नेह मे बताह भऽ गेल। कखनो ओ अनुराधा केँ छोड़ि कतौ जएबाक नामे नहि लैत छ्ल। मासे दिन पर कानपुर सँ गाम आबि जाइत छ्ल। अनुराधा एक नंबर के खेलाड़ि। रंग रभसक बात आ विधान जटा सँ अधिक बुझैत छलि। कतेक क्रिया प्रतिक्रिया आ खेलक गूढ़ नियम आ प्रयोग बुझल रहैक अनुराधा केँ। बिआहक बाद ओहि मे उत्तरोत्तर वृद्धि होइत गेलैक। परिणाम ई भेलैक जे अनुराधा बिना जटा केँ कानपुर मे मोने नहि लगैक। जटा आचार्यक अंतिम परीक्षाक बाद अनुराधा केँ कानपुर अनबाक उपक्रम करए लागल। पंडिताई सँ नीक कमाई भऽ जाइत रहैक। तांहि ई चिंता नहि रहैक जे अनुराधा केँ कोना रखते की खेतैक, की खुएतैक। अनुराधा ओना तऽ कनिया बनि आयलि छलि मुदा जेठ आ कमौआ बेटाक पत्नीक होबाक़ कारणे लजवन्ती सासु गोदाक लेल सासुओ सँ पैघ बनि गेल छलि। सबदिन जटा एक चिट्ठी अनुराधा केँ लिखैक आ सबराति अनुराधा ओकर उत्तर लिखैक। बेचारा भोला सबदिन डाकघर चिट्ठी ख़सेबा लेल अनुराधाक चरबाह जकाँ जाइत छलाह आ डाकिया हुनका जटाक चिट्ठी थमहा दैत रहनि। अहि बेर पितृपक्ष मे जे जटा गाम अएलैक से अनुराधा केँ गर्भ ठहरि गेलैक। जखन जटा कानपुर गेल तऽ डेढ़ मासक बाद ओकरा अनुराधाक चिट्ठी सँ ई जानकारी भेटलैक। अनुराधा चाहैत छलि जे ओकर बच्चा कानपुर मे होइक़ आ जखन बच्चा होइक़ तऽ जटा ओकरा बगल मे रहैक। मुदा विधनाक विधान किछु आरे लिखल रहैक। एक दिन घनघोर अन्हरिया राति मे कोनो उपद्रवी लोक एक विद्यार्थीक हत्या कऽ देलकैक। आब की हो? पुलिस पर दबाब पड़लैक जे कोनो घराने खुनिया अपराधी केँ चौबीस घंटाक भीतर जेहेल मे डालि देबाक छैक। जटाक मुँहजोर भेनाइ काल भऽ गेलैक। ऊपर सँ विद्यालय मे गुरुजी सब मे गुटबाजी चलैत रहैक। जटा जाहि गुरुक गुट मे छल से गुरुजी कतौ बाहर गेल छलाह आ हुनकर प्रतिद्वंद्वी अहि बातक लाभ उठबैत जटाक नाम पुलिस मे लिखा देलकैक। फेर की अर्ध रात्रि मे पुलिस जटा केँ हिरासत मे लऽ लेलकैक। भरि राति थाना मे यातना दैत रहलैक। लाठी, बन्दूकक कुंडा आ घुसा सँ पीटैत रहलैक। नाना तरहक यातना। थर्ड डिग्रीक सब यातनाक प्रयोग पुलिस जटा पर तेना केलकैक जेना जटा बहुत कुख्यात आतंकवादी अथवा क्रिमिनल हो। जटा दैहिक आ मानशिक यातना सं टूटी गेल। अहि यातना सँ मृत्युदण्ड नीक इ सोचैत अंततः जटा अपन जानक चिन्ता मे ई गछि लेलकैक जे वएह खूनी छैक। वएह ओहि विद्यार्थी केँ मारलकैक। सब ओकरे प्लोटिंग रहैक। पुलिस केँ भेलैक जे ओकरा बहुत पैघ कामयावी हाथ लागि गेलैक। सब बात कागत पर लिखा भोला सँ हस्ताक्षर लऽ लेलकैक। दोसरे दिन पुलिस ओकरा हाजत मे लऽ गेलैक। मजिस्ट्रेट लग सेहो भोला पुलिस केर भय सँ अपन गुनाह स्वीकार कऽ लेलकैक। प्रजातंत्रक अमानवीय तंत्र मे एक निर्दोष दोषी बनि गेलैक आ दोषी खुल्ला सांढ जकाँ घुमैत रहलैक! जखन अनुराधा केँ पता लगलैक तऽ बेचारी बेहोश भऽ गेलि। घर मे मातम वातावरण भऽ गेलैक। अनुराधा छलि पुरखाहि। हिम्मत रखलक। क़मर कसि लेलक। निर्णय लेलक जे कानपुर जा अपन पति केँ निर्दोष साबित करत। लोक मनो केलकैक मुदा अपन निर्णय पर रणचण्डी जकाँ ओ दृढ़ छलि। दोसरे दिन बिना कोनो आरक्षण केँ जनरल टिकट सँ अनुराधा अपन एक पन्द्रह वर्षीय देओर सँग कानपुर लेल रेलगाड़ी मे बैस रहलि। अनुराधाक माथ पर एक दैविक आभा छलकि रहल छलैक। अनुराधा कानपुर आबि अपन देओर सत्यव्रत सँग जटाक निर्दोष होमाक लड़ाई लड़ऽ लागलि। ई दुनू देओर भाउज लेल महाभारतक धर्म युद्ध सँ कम नहि छलैक। छह मास जेहेल मे रहलाक बाद जटा जमानत पर बाहर आबि गेल। अहि बीच कानपुर मे अनुराधा एक सुन्दर सन पुत्रीक जन्म देलकैक। जटा जेहेल सँ बाहर अबिते मातर बताह जकाँ करऽ लागल। अनुराधा यद्यपि विचलित नहि भेलि। लागलि रहल। सत्यव्रत पढ़ाई आ धनार्जन एकै सङ्गे करैत रहल। समयक सुई घुमैत रहलैक। जेना अन्हारक बाद इजोत होइत छैक तहिना एहन समय एलैक जे असली खूनी पकड़ा गेलैक आ जटा सकुशल अहि केश सँ मुक्त भऽ गेल। मुक्त भेलाक़ बाद आचार्यक परीक्षा पास केलक। एक दिन एक नव मंदिर केर भगवानक प्राण प्रतिष्ठा मे एक गुरुजी सँग जटा सहायक पण्डित बनि कर्मकाण्ड करबा हेतु गेल। मनोयोगपूर्वक सब काजक सँचालन मे गुरुजी केँ मदति केलकनि। गुरुजी बहुत प्रभावित भेलाह। बाद मे जटा केँ ओही मन्दिरक मुख्य पुजारी बना देलथिन। जटा मंदिर मे पूजा पाठ मे लीन भऽ गेल। एकबेर उज्जैनक महाकाल मंदिर गेल छल जटा। ओतय केर छटा, भस्म आरती, पूजाक पद्धति जेना ओकर मोन मे बसि गेलैक। महाकालक अनन्य भक्त भऽ गेल जटा। अनन्त बेर अपन यजमान सबहक पूजा पाठ आ अन्य तरहक सँकल्प ओहि प्रांगण मे करोलक। नितहिं जटा साँझ मे भाँगक गोला खाइत छल। अपन मन्दिर केर प्रस्तर मूर्ति केँ नीक सँ सजबैत छल। नीक करैत छ्ल। मन्दिरक गर्भगृह मे बेरु पहर शिवलिंग लग कतेक काल सुतल रहैत छ्ल। शिवलिंग सँग एना लगैत छलैक जेना जटा जीवित मनुख सँग वार्तालाप करैत हो! लोक केँ आस्था नहुँ नहुँ जटा दिस बढ़ल गेलैक। अहि मंदिर पर अबैत देरी जटा नामक व्यक्ति समाप्त भऽ गेल आ महाकाल पण्डित शाश्वत भऽ गेल। समस्त क्षेत्र मे लोक ओकरा महाकाल पण्डित जी कहि सँबोधित करैक। ई क्षेत्र बनिया लोकक रहैक तांहि जटाक भाव कनि अधिक भऽ गेलैक। महिला सबमे जटाक क्रेज कनिक अधिके रहैक। एक महिला तऽ अतेक प्रभावित भऽ गेलैक जे जटाक पत्नी अनुराधा केँ ई शंका होमय लगलैक जे जटा आ ओहि महिलाक बीच किछु ने किछु बात जरूर छैक। किछु लोकक जे अपना आपकेँ प्रत्यक्षदर्शी बैतबैत छ्ल केर दावा रहैक जे मंदिर के भीतर पाछा बला घर मे अन्हार मे ओहि महिला सँग जटा किछु करैत रहैक। सत्य की रहैक से रामहि जानथि मुदा एहि सब बात सँ अनुराधा कनि अधिके साकांक्ष भऽ गेलि। जटा पर चौकसी बढ़ि गेलैक। जटाक भाई आब मुम्बई चलि गेलैक। ओहो मुहगर लोक रहैक। वेदक उच्चारण बढियाँ रहैक। एक मंदिर अपने सँ बना ओकर मठाधीश भऽ गेल। यजमान सेहो नीक सँख्या मे बना लेलक। जीवन चलैत रहलैक। जटा जखने खुनिया केश सँ बरी भऽ गेल सत्यव्र्यक विवाह सेहो भोला अर्थात ओकर पिता करा देलथिन। अंतिम निर्णय यद्यपि एहिबेर जटाक रहैक। अनुराधा आब दोपहर मे जटा लग बैसय लागलि। ओ महिला जे जटा पर लाइन मारय सेहो आब कनि डरे मे रहैक। जटा पाँच भाई भऽ गेल। जटाक अंतिम भाई ओकर बेटी आ बड़का बेटा सँ सेहो छोट रहैक। अहि बात सँ अनुराधा अपन सासु ससुर सँ तमसाएल रहैत छलि मुदा की कऽ सकैत छलि? सत्यव्रत छोड़ि सब भाई जटा लग आबि गेलैक। एक बहिनक बिआह सेहो भऽ गेलैक। गाम पर जटा आ सत्यव्रत दुनू भाई मिल कऽ पक्का घर बना लेलक, पाँच छह बीघा जमीन किन लेलक। आर्थिक स्थिति नीक भऽ गेलैक। कानपुर मे एक बिक़ट समस्या - अतय पंडिताई वृत्ति मे लागल मैथिल ब्राह्मण सब यजमानक डरे या तऽ माछ माउस नहि खाइत छथि अथवा चोरा नुका कऽ खाइत छथि। कानपुरक लोक, विशेष रूप सँ बनिया, माड़वारी, पंजाबी आदि यएह सोचैत अछि जे पण्डित कहीं मांसाहारी भेलैक अछि! पण्डित छथि तऽ शाकाहारी हेबे करताह। आ अहि सोच मे मारल जाइत छथि पण्डित कर्म मे सँलग्न मिथिलाक कर्मकाण्डी। बेचारा जटा आ ओकर कनिया दुनू प्राणी एक नंबर केर माछगिद्ध मुदा अपना घर मे नहि खा सकैत छ्ल आ ने बना सकैत छ्ल। जोगार ई रहैक जे एक आदमी जे ओकर दूरक सँबंधी रहैक ओ अपन घर मे बनाबैक आ दस बजे राति केँ बाद जटाक घर पर दऽ अबैक। जखन सब सूति रहैक तखन जटाक पूरा परिवार चुपचाप माछ खेलाक बाद रातिये मे कांट कुस बाहर फेंक आबय, घर मे सेंट, अगरबत्ती जड़ा सब गंध (मैथिल सुगन्ध पढ़थि!) समाप्त कऽ दैक। ई कनि झंझट बला काज रहैक ताहिं मास दिन मे मुश्किल सँ एक या दू दिन अहि तरहक ब्योत करबैत छल जटा। अनुराधा छलि ओहि परिवार सँ जतय पुरुख, ताहू मे कमौआ पुरुख केँ बहुत सम्मान भेटैत छैक। सम्मानक परिकल्पना उटपटांग जकाँ रहैत छैक। पुरुखक भोजन सामान्य सदस्य सँ विशिष्ट रहैत छैक। ओकर पहिरब, ओढब, चलब, ओकर ओछायन बिछायन सब किछु मे अंतर। जटा लेल सेहो एहने व्यवस्था अनुराधा केने छलि। घर मे सब लोक लेल रोटी तरकारी अथवा भात दालि एक सामान्य तरकारी बनैक। जटा लेल एक अलग सँ तरकारी अथवा भुजिया अथवा चटनी बनैक। छलिगर दूधक दही अनिवार्य रहैक। जटाक वस्त्र प्रतिदिन धोल जाइक, आयरन होइक़। सब तरहेँ जटा केँ देखला सँ घर मे ओकर विशिष्ट होबाक़ बात स्पष्ट भऽ जाइक। अनुराधा बुधियारि बड्ड। सब दिन जटाक भोजन केलाक बाद जटा बला थाड़ी मे भोजन करैत छलि। जटा अनुराधा लेल सब समान छोड़ि दैत छलैक। बासन मे जे कनि मनि बाँचल रहैत छलैक सेहो अनुराधा अंत मे खा लैत छलि। अनुराधा केँ एक बातक बहुत तामस रहैक। ओकरा ओहि ठामक लोक - बाल, वृद्ध, स्त्रिगण, पुरुख सब कियोक पंडिताइन कहि सम्बोधित करैक। अहि बात पर अनुराधाक सृंग चढ़ि जाइक। मुदा छलि लाचार। अनुराधा ओना बहुत रोमांटिक प्रकृति केँ महिला छलि। आरो अनेक बात रहैक जाहि पर अनुराधा केँ तामस चढ़ैक। एक बेर पितृपक्षक समय मे एक आदमी एलैक आ बहुत समान अपन मृत पिताक नाम पर ओहि तिथि कऽ दान केलकैक। समान सँग पैसा सेहो दान केलकैक। अंत मे ओ आदमी अपन झोड़ा सँ बीड़ीक दू गठरी निकालि जटा दिस बढ़ैत बजलैक: "महाकाल पंडितजी, हमर पिता बीड़ी पिबैत छलाह। हम प्रतिवर्ष हुनक नाम पर पितृपक्ष मे अन्य सामग्री सँग बीड़ी सेहो दान करैत छी।" ओकर बात पर जटा हर-हर महादेब कहैत बीड़ी ओकर हाथ सँ लऽ लैत छलैक मुदा अनुराधा तामसे भेर भऽ जाइक। एकबेर अनुराधा राघब सँ मजाक मे कहलकन्हि: "कहू राघब जी, ई कोनो बात भेलैक जे लोक सब माता पिताक नाम पर पितृपक्ष मे बीड़ी सिगरेट दान करैत अछि। ऊपर सँ तर्क अनमोल। कहत, हमर पिता पीबैत छलाह ताहिं चढ़ा रहल छी। भाई पिता दारू पिबैत छलाह तऽ अहाँ दारू दान करब? पिता लड़की सँग सुतैत छलाह तऽ अहाँ लड़की दान करब? बजरखसुआ नहितन! अनेड़े केँ चोचला ठाढ़ केने अछि! तँग आबि चुकल छी!" राघब चुस्की लैत कहथिन: "चलू ने, अहि सँ तऽ फायदा अछि ने आहाँकेँ! आ लड़की दान केलकैक तऽ अहाँक पण्डित जी केँ!” अनुराधा: "कपार फायदा! लोक हँसैत रहैत अछि। ककरा लग बेच जाउ? लोक हंसत। सब बीड़ी सिगरेट केँ फेंकि दैत छी। रहल लड़की बला बात तऽ पण्डित जी खूब आनंदित हेताह। एकरंगाह चीज़ सँ नव चीजक रस भेटतनि। मुदा से हम थोड़े ने होमऽ देबनि!” जीवन चलि रहल छलैक। जटा आ अनुराधा केँ एक बेटी आ दू बेटा रहैक। दोसर बेटा भेलाक़ बाद अनुराधा नशबंदी केँ ऑपेरशन करा लेलनि। अपन सौन्दर्यक प्रदर्शन मे अनुराधा बहुत साकांक्ष रहैत छलि। हमेशा चमक दमक मे मातलि। देह कहियो झुर नहिं भेलैक। कसल-कसल आंगी, नागिन जकाँ जुड़ा आ चलबाक अंदाज अनुराधा केँ गजगामिनी बनेने रहैक। अगर पंडिताइन केँ तगमा नहिं भेटल रहितैक तऽ कतेक आदमी लाइन मारैत रहितैक! मारऽ बला एखनो की रुकैक! ताहि पर सँ कातिल बनि बड़का-बड़का आँखि सँ ताकब एहेन चीज़ रहैक अनुराधा केँ जे बूढों लोक केँ जुआन बना दैक। अनुराधा नख शिख सिंगार करैक। ओकरा बुझल रहैक जे जीवन मे स्त्री पुरुख केँ सब सुख करक चाही। अनुराधा बुझैक जे केलि पुरुख केँ बान्हि कऽ रखबाक सर्वोत्तम यन्त्र छैक। ओकरा बूझल रहैक जे उदासीन पुरुख केँ सेहो एक चतुर महिला अपन सौंदर्य, उभार आ उत्तेजना सँ प्राण आनि सकैत अछि। ओकरा बुझल रहैक जे अगर पुरुखक मोन नहियो छैक तऽ सयानि आ खेललि नारी अपन कन्त केँ शरीर मे काम ज्वालाक आगि फूँकि सकैत अछि। ओकरा काम क्रिया मे लीन कऽ सकैत अछि। अनुराधा केलि क्रिया केँ खेलब कहैक। पता नहि ई सोनहाएल देसी खांटी शब्द अनुराधा कतऽ सँ सीखने छलि? अपन किछु खाश महिला सँग जखन बात करैत छलि तऽ खेल शब्दक प्रयोग करैत छलि अनुराधा। एकबेर एक नव स्त्री केँ जे अनुराधा केँ दूरक सम्बन्ध मे ननदि लगतैक अनुराधा पुछि देलकैक: " अहाँक तऽ टटका बिआह भेल अछि। कतेक बेर खेल करैत छी?" बेचारी नव व्याहलि नारि, कानपुर मे रहलि, कानपुर मे पढ़लि, नहि बुझि सकलैक अनुराधाक बातक अर्थ। मुँह भकुएने ठाढ़ रहलैक। जखन अनुराधा केँ लगलैक जे ओकर बातक आसय ओ लड़की नहि बुईझ सकलैक तऽ अपन बत्तीसी देखबैत बाजलि: "दूर अलूरि नहितन! एकरो माने नहि बुझलौ अहाँ! हम आब खोइल कऽ कहि दैत छी। हम पुछैत रही जे घरबला सँग कतेक बेर "ओ" करैत छी?" अनुराधाक बात पर लाजे लाल भेल नायिका मुँह झपैत घर दिस भागि गेलैक। अनुराधा दाँत देखबैत नितराइत फेरो ओकरा पाछा-पाछा जाइत पकड़ि लैक आ कहैक: "अरे, अहि मे लाजक कोन बात! हम की कोनो कतौ बाजब? हम तऽ ई जानय चाहैत छी जे अहाँ सब एक दोसर केँ कतेक चाहैत छी, कतेक सँतुष्ट करैत छी। आखिर ई काज तऽ भगवानक देन छनि। केँ नहि खेल करैत अछि से कहू? अहि सँसारक वृद्धि स्त्री पुरुखक खेले सँ होइत छैक।" अनुराधाक बातक स्पष्टीकरण सँ ओहि नवब्याहता केँ हिम्मत बढलैक। लज्जा भाव कनि तिरोहित भेलैक। उमंग कनि जगलैक। स्त्री पुरुखक केलि पर कनि जिज्ञासा बढ़ि गेलैक। अनुराधा केँ सँबोधित करैत बजलैक: "हमर छोड़ू। पहिने अपन कहू जे अहाँ सब जखन बिआह भेल तखन कतेक बेर खेल करैत रही?" अनुराधा पकठोस भेल खुजल कामायनी बनैत बाजलि: "हम सब तऽ ओही मे मगन भऽ गेल रही। की दिन आ की राति। सदैव ओकरे जोगार, ओकरे प्रयोजन। कतेक बेर होइक़ तकर कोनो गिनती नहि। कखनो अपन मोन नहि रहैत छ्ल तऽ पति महोदय केँ मोनक रक्षार्थ ओहि प्रक्रिया मे लागि जाइत रही। से जे होइक़ मुदा एहि आनंदक कोनो बरनेका नहि।" आब नवब्याहता कनि सलज्ज बनल उत्तर देलकैक: "हमरो सबहक स्थिति अहिंक सन अछि। कखन दिन आ राति पते नहि चलैत अछि। कतेक राति एहि चक्कर मे भोजनों नहि बना पबैत छी।" अनुराधा: "बाह, ई भेल ने बात!" नायिका: "लेकिन हमरा सँ अधिक हमर पतिदेवक ध्यान अहि दिस रहैत छनि। कतेक बेर हम हारि मानि लैत छी। कतेक बेर थाकि जाइत छी।" समय चलैत रहलैक। बच्चा सब बढ़ैत रहलैक मुदा अनुराधा आ जटाक प्रेम नित नूतन होइत रहलैक। जँ-जँ बयस बढ़ल गेलैक दुनूक़ मध्य प्रेमक सघनता बढ़ल गेलैक। एक बात कनि गड़बड़ भऽ गेलैक। जखन जटा मर्डर केश मे फ़सलैक तांहि क्षण अनुराधा गर्भवती रहैक। ओहि समाचार सँ अनेक तरहक शंका, भय आदि सँ ओकर मोन चिन्तित रहैक। तकर असर ई पड़लैक जे दुनूक पहिल सँतान बेटी कनि मंद भऽ गेलैक। जखन बेटी अठारह बरखक भेलैक जटा ओकर बिआह करा देलकैक। बिआह मे नीक जकाँ ठका गेलैक। ख़ैर, बिआह भेलैक तऽ बच्चो भऽ गेलैक। बेटा रहैक। जटा आ अनुराधा नाना नानी बनि गेल। समय कट लगलैक। नाति सदैव नाना नानी लग रहैक। जटा क बेटी किछु कोर्स शुरू केलकैक जाहि सँ अपन पैर पर ठाढ़ होइक़। दोसर बच्चा नहि करतैक तकरो निर्णय लऽ लेलकैक। जटाक दुनू बेटा पढ़य मे ठीक नहि रहलैक। बड़का कहुना बारहवीं केलाक बाद कोनो कंपनी में छोट मोट नौकरी शुरू केलकैक। छोटका प्राइवेट कॉलेज सँ इंजीनियरिंग केलाक बाद बैसल रहैक। ओना कानपुर मे दुनु बेटा लेल मकान, नीक सम्पति किन देलकैक जटा। अहि बीच एकाएक एक चमत्कार भेलैक। एक बेर भागवत कथा सुनि ततेक ने विभोर भेलैक अनुराधा जे शुद्ध शाकाहारी भऽ गेलैक। गला मे तुलसीक माला धारण कऽ लेलकैक। सदैव हरे कृष्ण हरे कृष्ण भजैक। ओकरा भगवान मे, भगवत भजन मे चित लागि गेलैक। प्याज, लहसुन सब किछु सहर्ष त्यागि देलकैक। जटा अपने तऽ शाकाहारी नहि भेल मुदा अनुराधा लेल कोनो व्यवधान नहि ठाढ़ केलकैक। समय चलैत रहलैक। अनुराधा लेल जटा एक कार सेहो किन देलकैक। एकदिन कार सँ जटा आ अनुराधा हरिद्वार जाइत छ्ल। नाति सेहो सँग रहैक। मध्य रास्ता मे कारक बैलेंस गड़बड़ा गेलैक। कार एक बेर उलटि कऽ फेरो ठीक भऽ गेलैक। कार पर सँ अनुराधा आ ओकर नाति खसि पड़लैक। अनुराधाक कपार फुइट गेलैक। नाति ओतहिं दम तोड़ि देलकैक। महा अनर्थ भऽ गेलैक। लोकक सहायता सँ जटा अपन पत्नी अनुराधा केँ एक अस्पताल लऽ गेलैक। बहुत खून चढलैक। ऑपरेशन भेलैक। घाव ठीक भऽ गेलैक मुदा वाक बंद भऽ गेलैक। अनुराधा अपन मुँह सँ खेनाइ बन्द कऽ देलकैक। नली लगा लिक्विड वस्तु देल जाइक। जटा अपन सब किछु छोड़ि अनुराधाक सेवा मे लागल रहल। छह मासक बाद अनुराधा उठइ बैसय लगलैक। मुदा याददाश्त वापस नहि एलैक। वाक सेहो बंदे रहलैक। ककरो नहिं चिन्हैक। कोनो उचाबच नहि। कोनो सुधि नहि। सब कर्म होइक़ मुदा पता नहि चलैक। अंत मे जटा जेठ बेटाक बिआह करा लेलक। पुतहु आबि गेलैक मुदा अनुराधा केँ कोनो प्रगति नहिं भेलैक। इमहर अपन पुतहु केँ समस्या सँ द्रवित भेल भोला अन्न पानि छोड़ि देलनि। एक बरखक बाद भोला बिरासी बरखक अवस्था मे अहि सँसार केँ छोड़ि देलाह। भोलाक श्राद्ध कर्म भेलाक़ दस दिनक बाद एक दिन अनुराधाक हालत देखि जटा छोट नैना जकाँ ठोहि पारि काने लागल। एकाएक बाजि उठल: "हे महाकाल, हे केशब! कतेक परीक्षा लऽ रहल छी! हरे कृष्ण आब लाचार छथि। हिनका मुक्ति दियौन!" ई कहैत जटा अपना हाथे एक मंत्रक जाप करैत गंगाजलक चारि बून्द अनुराधा केँ मुँह मे डालि देलकैक। राति केँ ठीक एगारह बजे एक हिचकी उठलैक आ अनुराधा गोलोक लेल बिदा भऽ गेलि। जटा अंतिम नोर ख़सा बेटा केँ कर्मक तैयारी मे लगा देलकैक। एक अध्याय समाप्त भऽ गेलैक। महाकालक आराधना मे एखनो लागल अछि जटा। शायद जिनगी मे फेरो हेतैक कोनो करामाती घटना। हर-हर महादेबक स्वर सँ अनघोल भेल रहैत छैक मन्दिरक प्रांगण। ओहि निनाद मे जेना अबैत रहैत छैक अनुराधाक स्वर - ओकर गीत, भजन, हरे कृष्णक नाम, ओकर प्रेमक अलाप, ओकर चूड़ीक खनखन, ओकर पाजेबक रुनझुन, ओकर प्राती आ साँझक भक्तिमय गान, ओकर बटगमनीक हुल्लसित तान। ओह, कतऽ छी भगबान! बुरिराज (लघुकथा) राघब विश्वविद्यालय केर छात्रावासमे रहैत पीएचडी करैत छलाह। सँयोगसँ राघबक ममियौत भाईक लड़का मुदा उमेरमे मित्रवत सोहन राघब लग कॉम्पिटिटिव परीक्षा सबहक तैयारी लेल आयल छलनि। चारिए वर्षक अंतर होबाक कारणे दूनूक बीच काका-भातिजक कम आ सँगतुरिया वर्ताव अधिक छलनि। सोहन राघबक होस्टलमे पाइल ऑन गेस्टक रूपमे रहैत छलाह। सोहन यूनिवर्सिटीमे टुटपुंजिया नेता सब सँग घुमय लगलाह। राघबक भतीजा बुईझ लोक कनि भाव जरूर दैत छलनि। एकदिन सोहन सङ्गे निर्भय राघब लग एलाह। निर्भय बिहारक कोनो यूनिवर्सिटीसँ इतिहासमे बी ए केलाक बाद राघबक यूनिवर्सिटीमे प्राचीन इतिहाससँ एम ए’मे नामांकन लेने छलाह। निर्भय राघब लग विनम्रतासँ बैसलाह। निर्भय बीच-बीचमे राघब लग अबैत रहलनि। निर्भय यूनिवर्सिटी केर एम ए प्रीवियस केर परीक्षामे बहुत खराप अंक अनलाह। हिनक माता-पिता दूनू कोनो यूनिवर्सिटीमे प्रोफेसर छलथिन। तकर फायदा उठबैत निर्भय ओहि यूनिवर्सिटीसँ प्राचीन इतिहाससँ एम ए कऽ लेलाह। मुम्बईमे कोना ने कोना निर्भय एक सँस्थानमे कला इतिहास सँ एम ए’मे नामांकन लऽ लेलाह। दू वर्षक कोर्स निर्भय पाँच वर्षमे पूरा कएलाह। निर्भय छलाह भाग्यक सांढ़। माता पिताक असगरुआ बेटा। दू बहिन पर एक भाई। जखन हिनक एम ए केर रिजल्ट निकलए बला छलनि ताहि समय एक कला संस्थानमे एक लाला जी लोचन लाल दासकेँ पकड़लाह। दासजी हिनके शहरक छलथिन जिनका निर्भयक माय राखी बनहैत छलथिन। निर्भय दास जीकेँ मामा कहैत हुनकर शरणमे नतमस्तक छलाह। दास जी धुरफन्दी लगा निर्भय केँ कला संस्थानकक अभिलेखागारमे नौकरी लगा देलथिन। एक वर्षमे राघब सेहो कला संसथानमे आबि गेलाह। सँयोग एहेन जे निर्भय आ राघबक विवाह एकै साल, एकै मास आ एकै दिन भेलनि। अंतर अतबे जे राघबक विवाह माता-पिता द्वारे निर्धारित आ निर्भयक विवाह प्रेम नामक रोगक अंतिम परिणाम जाहिमे अनेक भाभट, नाटक आदिक भूमिका प्रबल। निर्भय केर जेठ बहिनक ननदि हेमा निर्भयसँ नौ वरखक छोट मुदा पोखगर छलीह। हेमा दूधिया गोड़ाईसँ गज्जब सुन्नरि लगैत छलीह। दुबर पातर चमकैत चेहरा छलनि हेमाक। बड़की- बड़की आँखि, तेहने सुन्दर ठोड़, घुरमल-घुरमल केश, छोट मुदा गस्सल-गस्सल विकसित आ प्रस्फुटित होइत वक्ष। नितम्ब यद्यपि ओतेक विकसित नहि छलनि। नितम्बक विकसित नहि भेनाईक अर्थ ई नहिं जे हेमा आकर्षण, सौन्दर्यमे कोनो तरहेँ कम छलीह। हेमा सत पूछी तऽ निर्भय लग खिच्चा छलीह। ताहिसँ की, सँबंधमे हेमा निर्भयकेँ बहिनक ननदि छलीह से निर्भयकेँ परिहासक अवसर दैत छलनि। एकबेर हेमा इंटरमीडिएट केर परीक्षा देमय निर्भय ओतय एलीह। निर्भय हेमाक समीप आबय लगलाह। सामान्य हास-परिहास नहुँ-नहुँ प्रेममे परिवर्तित होमय लगलनि। बातक प्रेम आब आँखि, भंगिमा आ मुद्रासँ होमय लगलनि। शुरूमे हेमा ओतेक गम्भीर नहिं छलीह लेकिन निर्भय हुनको गम्भीर बना देलथिन। प्रेम शब्दक बाटसँ देहक सीमा पर आबि गेल छल। दूनूकेँ बयसक अंतर समाप्त भऽ गेलनि। जाड़क मासमे अपन सीरकमे घुसल हेमा पोथीक सामीप्य कम आ निर्भयक हाथ, मुँह आ ने जानि कोन-कोन अंगक सामीप्य अधिक करय लगलीह। दूनूक जीवनमे एक अपूर्व रस भेटनाई शुरू भेलनि। किताबक पथ हेमाक सँग छोड़ि देलक आ आब प्रेमक बाट हिनका दूनूकेँ अपना लग बजा लेने छ्ल। एक दिन जखन हेमा अपन सीरकमे घुसल छलीह आ निर्भयक हाथ हुनक अंगक विशेष भाग दिस हलचल कऽ रहल छल तखन हेमा प्रेमक रसमे डुबकी लगबैत कनि अपन प्रेमक प्रति साकांक्ष होइत बजलीह: "यौ निर्भय ! अहाँ जे अतेक आगा बढ़ल जा रहल छी हमरा सङ्गे से एक बात बुझल अछि?" निर्भयक हाथ एकाएक चहलकदमी छोड़ि देलक। कनि चिन्तित होइत बजलाह: "से की?" हेमा: "यएह जे अहाँ अतेक आगा बढ़ल जा रहल छी। अहाँक माता-पिता आ ओहूसँ आगा हमर भैया-भौजी अहाँ आ हमर विवाह लेल तैयार हेताह?" निर्भय : "एक बात कहु।" हेमा: "पुछू"। निर्भय : "देखु हेमा, अगर अहाँ तैयार छी तऽ बाँकी काज हमरा पर छोड़ि दिय। हम सबकेँ सम्हारि लेब। हमरा बुझल अछि जे एकर सबसँ पैघ विरोध हमर बहिन आर्थत अहाँक बड़की भौजी करतीह। लेकिन देखल जएतैक। हम अपन छोटकी बहिन आरती एवम बहिनोईकेँ मना लेब अपना दिस। ओकरे सबहक सहयोगसँ माय सेहो मानि जेतीह। एक बेर मायक हृदय पसिज गेलनि तऽ ओ हमर पिताकेँ सेहो तैयार कऽ लेतीह। हम अहाँकेँ कोनो अवस्था मे असगर नहि छोड़ि सकैत छी।" निर्भयक हाथ बात करैत-करैत फेरो हेमाक सीरक दिस घुइस गेलनि आ अपन काज शुरू कऽ देलक। हेमाक शरीर आनंदक स्पर्शसँ सिहरय लगलनि। प्रेमक ताप केहेन होइत छैक तकर अनुभव हेमा आ निर्भयसँ बढियाँ के बुईझ सकैत छल? निर्भयक हाथ चलैत रहल। कखनो जोर तऽ कखनो कनि हल्लुक मुदा अनवरत। हेमाक पोर-पोर प्रफ़ुल्लित। बिना कोनो व्यवधान केने हेमा बाजि उठलीह: "जनैत छी, हमर भैया चूंकि हमर बेमातर भाय छथि, तांहि कारणे सेहो ओ आ हमर भौजी हमर अहाँक विवाह लेल तैयार नहिं हेतनि। ओना हम अपन मायकेँ मना सकैत छी।" निर्भय अपन हाथकेँ गतिमान रखैत बजलाह: "देखू हेमा! अहाँक भैया अहाँक ने बेमातर छथि, हमर तऽ अपन बहिनक पति छथि। हम जनैत छी कोना हुनका सबकेँ मनाबी। अहाँ चिंता नहिं करु।" आब निर्भय हेमाक सीरकमे पूरा घुइस गेलाह। दूनू ओहि यात्रामे तल्लीन भऽ गेलनि जाहिमे पति-पत्नी भऽ जाइत अछि। एहि तरहे एहि तइस दिनक प्रवासक अवधिमे हेमा आ निर्भय एक दोसरक देहक आ मोनक प्रीत आ प्रेमक धारमे कतेक बेर डुबकी लगेलनि तकर कोनो हिसाबे नहिं। उचितो यएह। प्रेमक कही मात्रा, सँख्या अथवा घनत्व देखल गेल अछि? जखन हेमा निर्भयक शहरसँ वापस अपन गाम चलि गेलीह तऽ निर्भयकेँ राति काटब मुश्किल। हेमाकेँ सेहो निर्भय बिना अपन जीवन पहाड़ बुझना जाइन। अन्ततः निर्भय हिम्मत करैत अपन छोट बहिन आ बहिनोईसँ बात कएलाह। हुनकर छोटकी बहिन तैयार भेलीह। मायकेँ बहुत प्रेमसँ बतेलनि। माय मना कऽ देलथिन तऽ आरती बजलीह: "अहाँ नहि तैयार हएब तऽ भाईजी किछु कऽ सकैत छथि। घर त्यागि सकैत छथि।" निर्भयकेँ माय आब तैयार भऽ गेलीह। अतबे नहि ओ अपन पतिकेँ सेहो मना लेलनि। निर्भयक पिता एहि लेल मानि गेलाह जे निर्भयसँ एक पैघ भाय सतरह बरखक भेलाक बाद मरि गेल छलथिन। कोनो माता पिताक लेल अहिसँ पैघ दुर्भाग्य की भऽ सकैत छलनि? निर्भयकेँ माता-पिता जखन अपन बेटी जमायसँ एहि बारे मे गप्प कएलाह तऽ ओ दूनू अग्निश्च वायुश्च। कतबो माय, छोटकी बहिन बहिनोई आ पिता मनेलथिन, ओ दूनू नहिए तैयार भेलाह। आब की हो? कोना कऽ मिलन विधना दूनूक़ करतै रे की? निर्भयकेँ जखन कोनो उपाय नहिं भेटलनि तऽ झटदनि मूसक दबाई आनि लेलाह। ओकरा घोरि पी गेलाह। सौभाग्यसँ छोट बहिनोई देख लेलथिन। घरमे कोहराम मचि गेलनि। तुरत डॉक्टर लग लऽ गेलनि। बहुत उपायसँ निर्भयक प्राण बचाओल गेल। जखन निर्भय ठीक भऽ गेलाह तऽ जेठ बहिन आ बहिनोई हुनका लग अबैत नोरायल मुँहै कहि देलथिन: "अहाँक प्रेम जीतल। हमर जिद हारि गेल।" हेमाकेँ सेहो निर्भयकेँ देखबा लेल गामसँ शहर बजाएल गेल छल। हेमाक आँखि कनैत-कनैत लाल भऽ गेल रहनि। निर्भय केर माता पिताक चर्च नहि हो तऽ नीक। मुदा आब सब कल्याणक पथ पर आबि गेल छलाह। अहि तरहेँ निर्भय आ हेमाक विवाह सामान्य तरहेँ बिना कोनो दहेजक भेलनि। दूनू एक सँग जीवन जीबाक हेतु तैयार भेलाह। विवाहक किछुए दिनक बाद निर्भयकेँ नौकरी लागि गेलनि। घर पर कोनो कमी छलनि नहि – माता-पिता दूनू प्रोफेसर। निर्भय अपन जीवन जिब रहल छलाह। सब तरहें सम्पन्न। निर्भय केर एक कमी छलनि। हिनक अंग्रेजी बहुत अधलाह। हिंदी यद्यपि बहुत नीक बजैत छलाह। लिखियो नीक लैत छलाह। मुदा एक कुंठा पोसि लेने छलाह। कुंठा इ जे जँ हिंदीमे लिखता तऽ लोक इलीट, ज्ञानी, मॉडर्न नहि बुझतिन। एहि कुंठाक कोन उत्तर? एक बात आरो, निर्भय अंग्रेजी सिखबाक यत्न कहियो नहि केलनि। ओना विद्वान लोक बुझय ताहि लेल बहुत साकांक्ष रहैत छलाह। नाना तरहक स्वांग रचैत रहैत छलाह। बहुत तरहक पोथी जे कला, इतिहास, हेरिटेज, साहित्य, पुरातत्व, मीमांशा, नाटक, आदि पर होइत छलैक तकर जोगार करैत छलाह आ अपन घर आ ऑफिसक रैकमे सजेने रहैत छलाह। लोक बुझ जे निर्भय विद्वान छथि। ओहिमेसँ अधिकांश पोथीक पाँचो पन्ना ओ कहियो नहि पढलाह। पोथीक जोगार निर्भय तीन तरहें करैत छलाह; पहिल, किताबक दोकान अथवा पुस्तक मेलासँ कीनकऽ, दोसर, मित्र अथवा ककरो लग गेलाह तऽ पढबाक लाथे मांगि कऽ, जे कहियो वापस नहि करैत छलाह, आ तेसर, चोराकऽ। निर्भय पोथी चोरीकेँ कोनो पाप अथवा दुष्कर्म नहि बुझैत छलाह। हुनका कियोक कहि देने छलनि जे दिल्ली यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी आ कोलकाता यूनिवर्सिटी केर प्रोफेसर सब सेहो पोथी कखनो झोरामे, कखनो छत्तामे तऽ कखनो कोनो आन चीज़मे चुपे चाप राखि पुस्तकालय अथवा सार्वजानिक स्थानसँ लऽ जाइत छलाह। फेर की निर्भय एकरा अपन मौलिक अधिकार मानि लेलनि। पोथी चोरी कतौ चोरी भेलैक अछि! किन्न्हुँ नहि। निर्भय अहि तीन युक्तिसँ बिपुल पोथीक स्वामी भेल जा रहल छलाह। निर्भय लग कियोक पहिल बेर अबैत छल तऽ ओकरा लगैत छलैक जे कतेक महान पढ़ाकू आ विद्वान लग आबि गेल अछि! निर्भयकेँ कपड़ा पहिरक कोनो ज्ञान नहि छलनि। छलाह लेकिन कला संस्थानमे ताई रंग-विरंगक विचित्र परिधान पहिरैत रहैत छलाह। कहियो हदसँ अधिक पैघ कुरता आ पायजामा, तऽ कखनो किछु। आर जे हो लंगोटक बड़ जोरगर छलाह निर्भय। जखन कला इतिहाससँ एम ए करैत छलाह तऽ एक बेर गोवा, मुंबई, एलोरा, एलीफैंटा आदि स्थान पर समस्त विद्यार्थिक टोली सँग गेल छलाह। हिनक विषय एहेन छल जाहिमे तथाकथित मॉडर्न, इलीट आ नव धनाढ्यक बेटी, पत्नी आदि समय जियान करबा लेल नामाकन लऽ लैत छलीह। हुनका सबलेल शारीरिक अथवा यौन सुख बस ओहिना समय काटक एक युक्ति मात्र छलनि। अगर विवाहसँ पूर्व कोनो लड़की अथवा विवाहित नायिका कोनो पर पुरुख सँग यौन सुखक प्राप्ति कऽ लेलक तऽ एहिकेँ पाप पुन्यसँ जोरिक देखब हिनका सबलेल पाप छलनि। इ क्षणिक सुख छैक। भेल, क्षणिक सुखक आनंद भेटल। दूनू प्रेमक रससँ रसप्लावित भेलनि। बात खत्म। एकरा खिचनाई अथवा एकर इतिहासमे घुसनाई व्यर्थ। एहेन धुरंधर विचारक महिला आ नायिका निर्भय सँग एम ए शिक्षा लैत छलीह। ओहि महिला मण्डलमेसँ एक महिला सौम्या जे सांवरि, सुंदरि छलीह। अति मॉडर्न छलीह। चिकित्सक माता-पिताक बेटी छलीह। कोनो तरहक फ्रेम अथवा वन्धनसँ मुक्त छलीह। सौम्याक उरोज भरल सुराहीसँ एकौ रत्ती कम नहि छलनि। गाल भरल-भरल, केश ओतेक पैघ नहि किन्तु झमटगर, खूब कारी, कमर बहुत पातर, नितम्ब सुडौल, अतेक कलात्मक जे बुढो प्रोफेसर सब एक बेर ओहि पर आँखि अवश्य गड़ा दैत छलनि। लोक सौम्याकेँ देखिते सपनाक अलौकिक सँसारमे भेर भऽ जाइत छल। नाना तरहक सोच उफान मारए लगैत छलैक। मुदा तुरते अपन अवस्था, पद, प्रतिष्ठाक भान होइते ओ वापस अपन विज्ञक सँसारमे आबि जाइत छलाह। सौम्याक सबसँ पैघ बात हुनकर सांवरि रंग आ वस्त्रसँ अपना आपकेँ सजेबाक कला छल। सौम्याकेँ देखलासँ सांवरि नारी कतेक सुन्दरि, कामुक, उत्तेजक भऽ सकैत अछि; कोना दुग्ध धवल नायिकाकेँ अपन सौन्दर्य, वस्त्र विन्यास, कनखी-मटकी, आ चामक पानि सँ पछारि सकैत अछि, तकर जिवंत प्रमाण भेटैत छल। खैर निर्भय अपन ग्रुपक लोक सबहक खूब ध्यान रखैत छलाह। हुनकर एहि गुणक ग्राहक सब छल। एक राति लड़का-लड़की सब बोन फायर केलक। सालक अंतिम दिन आ नव वर्षक प्रथम दिन सबकेँ एक संग मनेबाक अवसर भेटलैक। की सब नहि एलैक। मांस-मदिरा-नृत्य-गीत-मस्ती-भयमुक्त वातावरण। ने घरक लोकक धाख ने यूनिवर्सिटी केर प्रोफेसरक चिंता – सर्वतन्त्र स्वतन्त्र। एक मालिनी मात्र जे ओना तऽ बहुत सुन्दर छलीह मुदा बहुत सौम्य आ शालीन बनबाक अभिनय करैत छलीह। प्रेमक बात तऽ सुनैत छलीह मुदा लज्जा भावक अभिनयमे हिनक उत्तर नहि। एकबेर भरत मोगा नामक स्मार्ट, सुंदर आ वैभवशाली युवक हिनक सौन्दर्यसँ आकर्षित भेल हिनका दिस मित्रताक हाथ बढ़बैत कहि देलथिन: “हेलो! यू आर सो एंटरक्टिव एंड ब्यूटीफुल गर्ल!” मालिनी मोने-मोने प्रसन्न भेलीह मुदा भेलनि एकाएक कोना हाँ कहि देथिन। झटदनि उत्तर देलथिन: “हमरा एहि तरहक मजाक नहि पसिन अछि। हम कनि दोसरे तरहक लोक छी।” तावेत धरि भरत एक पेग ढारि नेने छलाह। केजुअल भेल बजलाह: “कम ऑन मालिनी! ज़माना कतऽसँ कतऽ चलि गेल आ अहाँ एखनो पंद्रहवीं शदीक भारतक मानशिकतामे जीब रहलि छी। हमरालोकनि कला जगत केर लोक छी। अतए उन्मुक्तता छैक। लोकक विचार आ व्यवहार ग्लोबल छैक। लिवइन रिलेशनशिप आम बात छैक। आ अहाँ एहेन बात कहैत छी!” इ कहैत भरत बहुत प्रेमसँ अपन हाथ मालिनीक कान्ह पर राखि देलाह। मालिनी झटदनि हुनक हाथ हटबैत बजलीह: “माइंड योर बिज़नस भरत! हम सड़कछाप लड़की नहि छी। जे केलहुँ से केलहुँ। भविष्यमे एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हो से ध्यान राखब।” भरत बुइझ गेलाह जे मालिनी दोसरे होपलेस स्टफ छथि। इ मिथ्याक अहंकारमे जीबी रहलि छथि। मोगा कोनो दोसर लड़की जे मस्त भेल नृत्य करैत छलीह लग चल गेलाह। सौम्या टाइट जीन्स आ शर्ट पहिरने छलीह। उत्तेजक-आकर्षक-मादक! ओहिराति निर्भय बहुत उत्साहित छलाह। मुदा ओहि ग्रुपमे दू मनुखझर छल: स्त्रीगनमे मालिनी आ पुरुखमे निर्भय। निर्भय आ मालिनी दूनूमे कियोक मदिरापान नहि करैत छलनि। मालिनी चारि डेग आगा छलीह – मांस भक्षण सेहो नहि करैत छलीह। वेचारा निर्भय शीतल पेय केर दस बोतलक जोगार केने छलाह। जखन लोक हाथमे मदिराक गिलास लेने जाम हेरा रहल छल, निर्भय ओकरे सबहक तालमे ताल शीतल पेय केर गिलाससँ कऽ रहल छलाह। हुनकोसँ अलग सिंगल पीस बनलि मालिनी एक कोनमे दोसरे दुनियाँमे विचरण करैत शीतल पेयक चुसकी आधे मोने लऽ रहलि छलीह। कार्यक्रम चलैत रहलैक। बिना पीने लोक सबकेँ पिबैत आ झुमैत-गबैत देख निर्भयकेँ शीतल पेयसँ रमक नशा आबए लागि गेलनि। निर्भय मस्त भेल गेलाह। जेना-जेना राति भेल जाइक तेना-तेना लोक स्वतंत्र-उच्चश्रृंखल भेल गेल। स्त्री-पुरुख, छोट-पैघक, स्थानीयता आदिक दूरी खत्म भेल गेलैक। सौम्या बहुत कम चीज़क उपयोग अपन मूँह कानकेँ सुन्दर बनेबाक लेल करैत छलीह। लेकिन काजर, मस्करा, बिंदी, साड़ी, सूट, शर्ट आदिक रँगक अनुकूल अथवा कंट्रास्टक झुमका अवश्य धारण करैत छलीह जे हुनका विशेष सेक्सी आ आकर्षक बनबैत छलनि। हिनक देखब आ ककरो निहाराब बहुत मारुक छल। ऊपरसँ मुक्तांगी आ मस्त छलीह सौम्या । सौम्याकेँ देख निर्भय सेहो मादक आ उत्तेजित भऽ गेलाह। सौम्या कनि बेसी मूडमे छलीह। दोसर पैगकेँ बाद सौम्या जेना संतुलन समाप्त करए लगलीह। देह काँपय लगलनि। ठोड़ लड़खड़ा गेलनि। माथ भारी भऽ गेलनि। कखनो की बाजथि तऽ कखनो किछु आरो। उन्मुक्तता सेहो अपन रँग देखाबय लागल। सौम्याक मस्ती बढ़ल गेलनि। भाषाक व्यर्थ अनुशासनसँ ऊपर उठए लगलीह। बहुत बात सब जे नारी होबाक कारण आ सामाजिक मर्यादाकेँ कारण अपना पेटमे, आंतमे, माथमे, करेजमे दबेने रहैत छलीह से जोर-जोरसँ भयमुक्त वातावरणमे बाजय लगलीह। सब यएह सोचैत रहल जे सौम्या अपन सम्हारमे नहि छथि, नशामे भेर छथि तांहि जे मोनमे अबैत छथि से सब बजने जा रहलि छथि। ताहि राति सौम्या केँ सात खून माफ़ छलनि। बीच-बीचमे सौम्या साकांक्ष भऽ जाथि। होनि, ई की कऽ रहलि छथि! कनिकबेकालमे फेरो मत्त। पेग लेकिन नहि थमलनि। जखन पांच भऽ गेलनि तऽ रंग विरंगक विभत्स गारि बजनाई शुरू केलीह। आब हुनका लोक कहि देकलन्हि जे बोतल खाली भऽ गेल छैक। राति बहुत भऽ गेल छैक। आब मदिराक सब दोकान बन्द भऽ गेल छैक। ई बात सुनि तामसे भेर भेलि सौम्या आयोजककेँ माए-बहिन लगा गारि पढ़ैत रहली। लोक सब मनहि मोन हँसैत रहल। एहि बातसँ एक बात स्पष्ट होइत अछि जे हम सब समाजक ठेकेदार बनि रहल छी। नारी स्वतंत्रता एखनो दूरसँ भले जे लगैत हो, यथार्थमे अग्गब सपना जकाँ अछि। सौम्या सन नारी जखन उन्मुक्त नहि तऽ ककरा कहि स्वतंत्रताक अधिकारी। नारी मोन शिक्षा सँग अधिकार मनैत अछि, स्थान मङ्गैत अछि, ओकरो बात पर लोक अमल करैकसे व्यवस्था मङ्गैत अछि, पुरुखक सँग आ समकक्ष चलए चाहैत अछि। सब तरहेँ स्वच्छन्द रहए चाहैत अछि। जहिना पुरुख कतऽ जा रहल अछि, की कऽ रहल अछि, कखन खाइत अछि, कतए आ कखन सुतैत अछि से कियोक पुछनाहर नहि, तहिना तऽ स्त्रीकेँ सेहो अपन जीवनक संचालित करबाक सुविधा, स्वतन्त्रता भेटक चाही ने! से नहि भेटलैक तऽ केहेन स्वतंत्रता? तांहि तऽ मदिराक नशासँ मातलि सौम्या चिचिया कऽ कहैत छथि, "फक यू मेन! यू आर बुलशिट! डोंट चीट मी। केवल पाई देनाइ, नीक स्कूलक शिक्षा, सुविधासँ स्वतंत्रता नहि भेटैत छैक। असली स्वतंत्रता अहाँक दिमागमे नुकाएल रहैत अछि। अहाँ कायर छी। घटिया छी। अहाँ डरपोक छी। अगर एक पुरुख कोनो स्त्री संग देह बांटि सकैत अछि तऽ फेर स्त्री कियैक नहि? इ पाप पुण्य सब पुरुखक ढ़कोसला अछि। कोनो महिला कियैक नहि अपन मोनक आनंद अपन मोनक पुरुखक संग उठा सकैत अछि? चुतिया...” सौम्या अतहिं नहि थमहली। बहुत बात बजैत रहलनि। बहुत बात लिखब तऽ मर्यादा चकनाचूर भऽ जाएत। सौम्या भोजन मोनसँ नहिं केलीह। थोड़ेक कालमे निर्भय सौम्या केर हाथ पकड़ि हुनक घर दिस लऽ गेलाह। सौम्या घर पहुंच गेलीह। निर्भय सौम्याकेँ हाथसँ पकड़ि हुनक बेड पर सुतेबाक प्रयत्न करए लगलाह। एहि प्रक्रियामे कतेक बेर निर्भयक हाथ सौम्याक उंन्नत भरल पयोधरिसँ टकराएल। जतेक बेर स्पर्श होइक़ ततेक नीक लगैक। निर्भयकेँ आब सेहो नशा लागि गेल छलैक। ई नशा मदिराक नशा नहि, सौम्याक सौन्दर्यक नशा, सौम्याक सेक्सी शरीरक स्पर्शक नशा छलनि। पुरुखक मोन, निर्भय एक आध बेर नशामे धुत भेल सौम्याकेँ सम्हारबाक बहाने जकड़ि कऽ धेलाह। लेकिन अपन नीक लोकक छविक रक्षा करक जोगारमे निर्भय किछु नहि कऽ पेलाह। आब कनि सौम्या साकांक्ष भेलीह। निर्भय केर शरीरक ठोस बनावट हुनका नीक लगलनि। एक क्षण लेल भेलनि, अगर अहि पुरुखक सँग एखन अभिसार होइत अछि तऽ मोन आ तन, आत्मा आ देह दूनू तिरपित-तिरपित भऽ सकैत अछि। एकर बाँहिक जकड़न हमरा बैकुण्ठक आनंद दऽ सकैत अछि! यैह सोचैत तुरत एक्ट केर मूडमे आबि गेलीह सौम्या । सौम्या निर्भय केर झमटगर केश हाथमे बकुटैत बजली: "निर्भय! साले एक बात बताओ?" निर्भय: "की?" सौम्या : "अहाँ हमरा ताड़ि रहल रही ने? जानि बुईझ कऽ अपन हाथ हमर ब्रा लग अनैत रही ने?" निर्भय: "बकबास"। सौम्या : "सार तोरा हम देह तोड़ि देब। सबहक समक्ष चुम्मा लऽ लेब। चुपचाप सत्य स्वीकार करु।" सौम्या बजैत रहली। निर्भय चुपचाप सुनैत रहला। सौम्या : "कम ऑन निर्भय! अहाँ जुआन छी। हम जुआन छी। अगर अहाँक मोन हमरा पर आबि गेल तऽ अहिमे की खरापी?" निर्भय: "सौम्या माइंड योर लैंग्वेज! की अँट शंट बजेने जा रहलि छी अहाँ? ई सब बात छोड़ू आ चुपचाप आब आँखि मुईन सुइत रहू।" सौम्या : "एकर मतलब की भेल? अगर हमर अधखुला वक्ष देखि अहाँक मोन नहिं केलक एकर अर्थ ई भेल जे अहाँ नामर्द छी!" "स्टॉप दिस नॉनसेंस!", निर्भय चिचिया उठलाह। मुदा सौम्या लेल धन सन। सौम्या निर्भयकेँ अंगाक कॉलर पकड़ि अपना दिस घिचलनि। आब निर्भय मूडमे आबि गेल छलाह। ताबर तोर चुमाक प्रहार करए लगलाह। कखनो अपना दिस खिंच लेथि तऽ कखनो सौम्याक गर्दनि पकड़ि सौम्याक दूनू ठोरक मध्य अपन जीभ डालि सौम्याक जीभक मधु स्पर्श आ स्वादसँ आनंदित होइत रहलनि। सौम्या सेहो विरोधक बदले और सहयोगे करैत गेलथिन। सौम्याक दैहसँ मदिरा, सेंट, आ प्रकृतिक स्त्रिजन्य सुगन्ध आबि रहल छलनि। ओहि सुगंधक सब कतरा निर्भयकेँ मादक बनेने जा रहल छलनि। निर्भय आवेगक अतिरेकमे सौम्याक सब वस्त्र हटा देलथिन। सौम्या कनि संकोच तऽ केलनि कारण संकोच आ नारी एक दोसरक पूरक होइत अछि। मुदा सौम्याक मोनमे निर्भय सँग देह बाटक ततेक उग्र ज्वाला धधकि रहल छलनि जे कनिकबे कालमे अपना आपकेँ निर्भय लग समर्पित कऽ देलीह। जखन सौम्या निर्वस्त्र भऽ गेलीह तऽ निर्भय केर वस्त्र अपने हाथे खोलय लगलीह। निर्भय केर उत्तेजना आ सौम्याक सँग देह बाँटब केर अभिलाषा सेहो उग्र भेल गेलनि। सौम्या निर्भयक अंतिम वस्त्र हटा रहल छलीह तऽ एकाएक निर्भय केर जेंटलमैन बला चरित्र जागि उठलनि। निर्भय सौम्याकेँ झकझोड़ि देलाह। सौम्याकेँ पते नहि चलि पेलनि कि निर्भय अचानक एहेन बेवहार कथिलेल केलनि। कामक ज्वरसँ धू-धू जड़ि रहलि छलीह सौम्या । तामस तऽ अतेक भेलनि जे निर्भय केर खून कऽ देतीह। इमहर निर्भय बिना किछु कहने सौम्याक शरीर पर वस्त्र राखि देलथिन। निर्भयक मर्यादा, लज्जाभाव एकाएक जाग्रत भऽ गेलनि। कहि देलथिन: "नहि सौम्या, हमरासँ ई संभव नहि अछि। ई चरित्र लंघन हम नहि कऽ सकब। स्टॉप इट। आई एम सॉरी। हम अपन मर्यादा बिसरि गेल रही।" कामक अग्निसँ जड़ैत सौम्या एकबेर शेरनी जकाँ निर्भय पर गरजैत बजली: "तखन कथिलेल अतेक आगा बढ़लहुँ? अहाँ मर्द नहिं छक्का छी। बहाँ...द एहिसँ पहिने जे हम तोरा गां----- पर लात मारि भगा दी तों अपने तुरत हमर घरसँ भाग ।" निर्भय देह झारैत भागि गेलाह। राति भरि कोना समय सौम्या व्यतीत केलनि से वैह बुईझ सकैत छलीह। वैह निर्भय अपन पत्नी हेमा सँग बहुत रोमांटिक छलाह। कामकलाक अनेक आसनक प्रयोग करैत छलाह। कखनो प्रयोगक नाम पर स्थापित सीमाक अतिक्रमण सेहो करैत छलाह। निर्भयकेँ दू बेटा भेलनि। दुनुक मध्य अंतर मात्र सवा बरखक। एक बेर राघबकेँ पता लगलनि जे निर्भय केर कनिया हेमा विमार चलि रहल छथिन। हुनकर डाँरमे दर्द छनि। गम्भीर इलाज चलि रहल छनि। बादमे निर्भय केर दोसर मित्र जे राघबक मित्र सेहो छलथिन आ निर्भय सँग हुनकेँ सोसाइटीमे रहैत छलाह, राघबकेँ बतेलखिन जे निर्भय केर पत्नी हेमा हुनकर पत्नीसँ कहलथिन जे निर्भय पृष्ठभागसँ संभोग करबाक जिद ठानि देलथिन। ओहिक क्रममे नश चढ़ि गेलनि। खैर! ई निर्भय केर निजी मामला छलनि। निर्भय हमेशा कोनो नीक पढ़य बला केर संगतिमे रहबाक यत्न करैत छलाह। हुनकर एक मित्र कोनो जोशी नामक छलथिन । बहुत तेज, सुन्दर। मुदा सबकर्मी आ एक नंबर केर फ्रॉड। चोरीक कलामे प्रवीण। एकबेर जोशी महोदयकेँ लकऽ निर्भय राघब केर होस्टलमे आबि गेल छलाह। राघबकेँ कतौ जेबाक रहनि। निर्भयकेँ अपन घरक चाभी राघब दऽ देलथिन। बादमे जखन राघब अएलाह तऽ पता चललनि जे जोशी जी राघबक अनेक वस्त्र, पोथी आदि चोराकऽ चलि गेल छलाह। हेमा, अर्थात निर्भय केर पत्नी बहुत सांस्कृतिक आ श्रृंगारिक स्वभावक छलीह। अधिक काल नुआ ब्लाऊज पहिरैत छलीह। दूधिया गोड़ाई। एक तऽ निर्भयसँ नौ वरखक छोट ऊपरसँ बहुत छरहरि, दूभर पातर। कतेक समय तऽ निर्भय आ हेमाक जोड़ी विपरीत अर्थात पिता पुत्री सँग लगैत छल। हेमा भोजन, संगीत, मिथिला चित्रकला, योग, नृत्य सबमे प्रयोग करए चाहैत छलीह। ओ जीवनक संगीत देखय चाहैत छलीह। वस्त्रकला केर नीक ज्ञान छलनि हिनका। ब्यूटी पार्लर केर ज्ञानमे पारंगत छलीह हेमा। एक आध बेर हेमा नौकरी करबाक यत्न केलीह मुदा निर्भय तकर अनुमति नहि देलथिन। हेमा ओना ई मनैत छलीह जे निर्भय बहुत प्रवुद्ध लोक छथि। जाहियासँ राघब कला कला संसथान जॉइन कएलाह निर्भय लेल वरदान भऽ गेलनि। अपन सङ्गी सबकेँ पीएचडी उपाधिसँ निर्भय बहुत उत्प्रेरित भेलाह आ पीएचडी लेल कोनो यूनिवर्सिटीसँ पंजीयन लऽ लेलाह। समस्या ई छलनि जे कोना लिखताह? अपने कोनो स्थितिमे नहि लिखताह से बुझल छलनि। कतेक बेर राघबसँ प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूपमे कहि देलथिन मुदा राघब टालैत रहलथिन। संयोगसँ निर्भयकेँ माता पिता राघबसँ परिचित छलथिन। एकबेर कोनो प्रयोजनसँ राघब हुनका लग गेलाह। रातिमे ओतए रुकलाह। रातिमे भोजनक बाद निर्भयक पिता राघब लग दूनू हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ गेलथिन्ह। राघब घोर आश्चर्यमे परि गेलाह। तखन निर्भयकेँ पिता कहलथिन: "राघब, अहाँ हमर पुत्रतुल्य छी। हम आ निर्भयक माए अहाँमे अपन पुत्र देखैत छी। हम नौकरीसँ सेवानिवृत भऽ चुकल छी। हृदय रोगक रोगी छी। जीवनक की भरोसा? ई निर्भय नालायक अछि। एकरा बूते पीएचडी एहि जन्म के कहैत अछि, सात जन्ममे नहि हेतैक। अहाँ हमरा सबपर एक उपकार करु आ एकर पीएचडी लिख दियौक। अहाँक अहि योगदानकेँ हम जीवन पर्यंत नहि बिसरब। " निर्भयक माय सेहो मौन भेल अपन आँखिसँ बहुत किछु कहि देने छलथिन। राघब उठि गेलाह। निर्भयक पिताक हाथ अपना हाथमे लैत बजलाह: "हमहुँ अहाँ सबमे अपन माता-पिताक छवि देखैत छी। ओना ई बहुत दुष्कर कार्य अछि। निर्भय किछु तऽ करत नहि, सब काज हमरे करय पड़त। लेकिन हम तीन मासमे पीएचडी थीसिस लिख दैत छी।" ई बात सुनि निर्भयक माता-पिताक नेत्र एक दोसरे आभासँ चमकि उठलनि। राघब एक भारसँ दबि गेल छलाह। राघब कलाकेन्द्र आबि गेलाह। निर्भयकेँ बजा सब सामग्री अपना लग मंगा लेलाह। पीएचडी थीसिस लिखनाई राति-दिन शुरू केलनि। अहि तरहेँ राघब तीन मासमे निर्भय लेल पीएचडी लिख निर्भय केर माता-पिताक भावनात्मक ऋणसँ उऋण भेलाह। निर्भय पुरा थीसिसमे पूर्ण विराम के कहैत अछि अर्ध विराम तक नहिं लिखलनि। ऊपरसँ निर्भयकेँ राघब कहलथिन जे अपन धन्यवाद ज्ञापन लिख लेथि। निर्भय ओहू लेल तैयार नहिं भेलाह। राघबक आगा अस्त्र राखि देलनि। लाचार अपन माथक केश नोचैत राघब निर्भय केर धन्यवाद ज्ञापन सेहो लिखलनि। ओहिमे राघब जानि बुईझ कऽ अपन नाम नहिं लिखलाह। विश्वास छलनि जे निर्भय या तऽ स्वयं लिख लेताह अन्यथा राघबकेँ कहथिन जे अहाँ अपन नाम लिख लीय। मुदा निर्भय कृतघ्न प्राणी छलाह। राघबक योगदान हुनका लेल अतबे महत्वपूर्ण लगलनि जतेक योगदान एक हरबाहक कृषिकार्यक संपादन मे। बल्कि ओहू सँ कम। कारण हरबाहकेँ काजक बदला ओकर बोइन भेटैत छैक। लेकिन निर्भय अतबो जरूरी नहि बुझलनि जे राघबक प्रति कृतज्ञता अर्पित करथि। ऊपरसँ अपन पत्नी मेधा, आ हित मित्र लग अपन प्रशंसक पुल बनहैत रहला निर्भय। संयोगसँ कनिकबे दिनक बाद निर्भयक माता पिता निर्भयसँ भेट करक हेतु दिल्ली एलथिन। राघबकेँ जखन पता लगलनि तऽ राघब भेट करऽ गेलाह। भेट होइतहिं निर्भयक पिता बाजि उठलनि: "कतेक आशीर्वाद दिय अहाँकेँ राघबजी! अगर अहाँ नहि लिखबा लेल तैयार भेल राहितौं तऽ सातो जन्ममे निर्भय बूते पीएचडी थीसिस लिखल नहि होयतैक।" राघब विनम्रतासँ सब बात सुनैत रहला। फेर निर्भयकेँ पिता बजलाह: "लेकिन अहाँक नाम कतौ धन्यवादमे नहिं अछि राघबजी?" राघब: "पता नहि, शायद निर्भय बिसरि गेल हेताह।" निर्भयक पिता: "ई कोना भऽ सकैत अछि? हमरा बुझल अछि जे सम्पूर्ण थीसिसमे निर्भयक नाम सेहो राघबजी लिखने छथि। फेर निर्भय नाम कथिलेल नहि देलाह?" निर्भय सकपकाईत बजलाह: "हम पूछने रही। राघब जी नहि लिखलाह।" निर्भयक पिता कहलथिन: “अहाँ अपन अकर्मण्यता अहूमे प्रदर्शित केलहुँ। अहाँक हम पिता छी हमरा अहि बातक घोर दुःख अछि।” निर्भय मुड़ी गोतने बात सुनैत रहला। किछु मासक बाद निर्भय केर पीएचडी पूर्ण भऽ गेलनि। अवार्ड भेटि गेलनि। निर्भय आब डॉ निर्भय भऽ गेल छलाह। एकबेर हेमासँ कोनो बात पर गप्प भेलनि तऽ राघबक पत्नी कहि देलथिन जे राघब निर्भय केर पीएचडी थीसिस लिखने छलाह। हेमा निर्भयसँ पुछ्लनि। निर्भय चुप भऽ गेलाह। हेमा मुरझा गेलीह। पहिल बेर हेमाकेँ निर्भयक पत्नी बनबा पर ग्लानि भऽ रहल छलनि। “अहाँ हमरा एखन असगर छोड़ि दिय! बस।” अतेक कहैत हेमा अपन हाथ कपार पर धऽ लेलनि। निर्भय निरर्थक गंभीर बनल ओतएसँ दूर भऽ गेलाह। दोसर दिन निर्भय एकबेर पुनः राघबसँ पुछि देलथिन: “राघब! अहाँ अपन पत्नीकेँ बता देने छलयनि जे अहाँ हमर पीएचडी थेसिस लिखने रही?” राघबकेँ इ प्रश्न जेना तामस चढ़ा देलकन्हि –“अहाँ की बुझैत छी! ओ हमर पत्नी छथि हम हुनका नहि सूचित करबनि तऽ ककरा कहबै? अहाँ अतेक निर्लज्ज छी जे हमर नामक कतौ उल्लेख तक नहि केलहुँ। अपन पत्नी हेमा लग अपन वैदुश्यक बखान करैत छी। आ हम ओतेक मदति केलाक बादो चोर जकाँ रही! एहने बात छल तऽ अपनेसँ लिख लितहुँ।” एकर बाद दूनू चुप भऽ गेलाह। खैर, किछु दिनक बाद राघब नौकरीसँ त्यागपत्र दऽ देलाह। निर्भयसँ मुक्ति भेट गेलनि। समय चलैत रहलैक। पाँच मासक भीतर एकदिन निर्भय दस बजे रातिमे कनैत फोनसँ सूचित केलथिन जे निर्भयक पिताक निधन एकाएक हृदयगति थम्हि गेलासँ भऽ गेलनि। राघब बहुत दुखी भेलाह। जतबे दुःख अपन पिताक मृत्यु पर भेल छलनि ओतबे दर्द तखनो भेलनि। एक बातक संतोष जरुर भेलनि – नीक भेल निर्भय केर पीएचडी भऽ गेलनि अन्यथा हुनक पिताक आत्मा भटकैत रहितनि जे हुनक पुत्र कुमार निर्भयसँ डॉ निर्भय नहि भऽ सकलाह! समयक चक्र चलैत रहलैक। किछु व्यक्तिगत विवशतासँ राघब नौकरीसँ त्यागपत्र दऽ देलनि। निर्भय संस्थाँकेँ धेने रहलाह। सरकारी तंत्रमे जेना होइत छैक, होइत रहलैक। निर्भयक तरक्की हुनक पीएचडीक कारण होइत रहलनि। कुरता-जीन्स पहिरने निर्भय अपन देहक आ वस्त्रक सम्प्रेषणसँ विद्वान भेल रहैत छथि। भीतरक निर्भयकेँ के देखैत अछि? ककरा लग समय छैक? नोट: इ कथा पुर्णतः काल्पनिक अछि। एकर सम्बन्ध कोनो जीवित अथवा मृत व्यक्ति या संस्थानसँ नहि छैक। फकड़ाक संग यात्रा करैत मैथिलानीक मनोदशाक: मानवशास्त्रीय विवेचना लोकक सँसार अनंत महासागर जकाँ अछि। लोक जखन मिथिलाक लोक हो अथवा मैथिलिक लोक हो तऽ एकर विस्तार कल्पना सँ बाहर भऽ जाइत छैक। मिथिलाक लोकक जड़ि छथि मैथिलानी। हुनक जीवन आइओ लोक सँ छनि, लोक सँगे छनि। आजुक भौतिक आ वैश्विक समाज मे सेहो मैथिलानी लोक केँ धेने छथि: लोक मैथिलानी सँ बढैत अछि, मैथिलानी लोकक गति सँग गतिमान छथि। गति मुदा दिशाहीन नहि अछि। गति एहेन अछि जे जड़ि सँ जुड़ल अछि। ओकरा उड़ब, घुमब, दौड़ब, बाहर-भीतर करब नीक लगैत छैक मुदा ओ अन्ततः अपन जड़ि लग बेर-बेर आबि जाइत अछि। ठीक ओहिना जेना प्रवासी चिरै एक वर्ष मे 40,000 किलोमीटर अपन पारिस्थितिकी सँ दूर उड़ला, घुमला आ प्रवास केलाक बाद पुनः अपन भूमि अर्थात मूल पारिस्थितिकी मे आबि जाइत अछि। ओहिना जेना सूरदास (1478 – 1573) केर जहाजक चिरै बेर-बेर उड़लाक बाद जहाज पर अबैत रहैत अछि: “जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आबै” मिथिलाक अथवा आजुक वैश्विक युग मे मैथिलक लोकक प्रथा, परम्परा, खान-पान, बिध-बेबहार, गीत-नाद, अनुष्ठान, पूजा-पाठ, व्रत-पाबनि, खिस्सा-पिहानी, फकड़ा, सब किछु अधिकांशतया मैथिलानी बचा कऽ रखने छथि। ताहू समय मे जहिया हुनका पढबाक स्वतंत्रता पुरुष जकाँ नहि छलनि अथवा नाम मात्र महिला केँ छलनि तहियो इ सब लोक परम्परा केँ अपन भावना – प्रेम, विरह, वेदना, कष्ट, यातना, ज्ञान, उद्वेग, शोषण, दोहन, आर्थिक बिपन्नता, पुरुषक उत्पात, आदि – व्यक्त करबाक पब्लिक स्पेस केर रूप मे व्यवहार करैत छलीह। ओ स्पेस एहेन स्पेस छल जाहि मे हिनकालोकनि केँ अपन कथ्य व्यक्त करबाक स्वछंदता छलनि, बल्कि एखनो छनि। पुरुषक कोनो दखलन्दाज़ी ओहि स्पेस पर नहि छलैक आ ने आइओ छैक। इ बात कनि गंभीर लिखा गेल आ मानवाधिकार सँ शुरू होइत नारी स्वतंत्रता, नारीवाद आ स्त्री विषयक अध्ययन, विवेचन दिस टघरि गेल। बात अनेड़े बहुत पैघ स्वरुप लऽ सकैत अछि। ओना एहि बात पर मंथन आ घमर्थन केर जरुरत अपन मैथिल समाज मे अछि लेकिन ताहिलेल इ प्लेटफार्म हमरा उचित नहि लागि रहल अछि। तखन की हो? किछु नहि, बात केँ लोकक जाग्रत मनःस्थिति मे राखि आगा बढ़ि जाइ। जखन अर्धजाग्रति सँ पूर्ण जाग्रति दिस ध्यान जेतनि तऽ अहि पर विचार शुरू हएत। विचारक घमर्थन असगरे नारी नहि करती, पुरुष सेहो ओहि भाव, इतिहास, पितृसत्तात्मक समाजक सँरचना आ ओहि सँरचना मे कालक अनुरूप परिवर्तन आदि लेल उदार हेताह आ स्त्री-पुरुख दूनू मिलि जीवनक गाड़ीक दू पहिया बनि एकर सम्यक निदान दिस अग्रसर हेताह। बात पर अबैत छी जे कोना लोकक एक विधा फकड़ाक माध्यम सँ मैथिलानी अपन सब तरहक मनोभाव केँ अदौ सँ व्यक्त करैत आबि रहल छथि। फकड़ा केँ ‘कहबी’, ‘लोकोक्ति’ सेहो कहल जाइत छैक। सबसँ पहिने इहो जानब आवश्यक जे फकड़ा’क अर्थ की भेल? एकर कोनो सर्वमान्य परिभाषा सेहो भऽ सकैत अछि की? सर्वमान्य परिभाषा अछि तऽ मैथिली लोक सँसारक फकड़ा ओहि वैश्विक परिभाषा सँग कतऽ धरि चलि पेबा मे सक्षम अछि? फकड़ा खांटी लोकक वस्तु थिक – लोकक उक्ति अर्थात “लोकोक्ति”। लोकक कहब अर्थात “कहबी”। लोक पुरान फकड़ा केँ सहेजने रहैत अछि आ नवक निर्माण करैत ओकरा ठोसगर आधार दैत रहैत अछि जाहि सँ आजुक गढ़ल फकड़ा भविष्य मे सार्वभौमिक बनि सकय। सँस्कृत मे “लोकोक्ति” अलंकारक एक भेद सेहो मानल गेल अछि। अंग्रेजी मे फकड़ा अथवा लोकोक्ति केँ Proverb कहल जाइत छैक। ताहि ज्ञाने अंग्रजी Proverb केर परिभाषा किछु अहि तरहें करैत अछि: “A proverb is a saying without an author.” एकर अर्थ भेल फकड़ा एहेन उक्ति अछि जकर कोनो रचनाकार नहि होइत छथि। मैथिली लोक मे व्याप्त फकड़ा केँ देखला सँ इ ज्ञात होइत अछि जे मैथिलिक फकड़ा अपन स्वरुप मे एहि सँ अधिक व्यापक अछि। हमरालोकनि अनेक एहनो फकड़ाक प्रयोग करैत छी जकर रचनाकारक नाम हमरा सबकेँ ज्ञात रहैत अछि: गोनू झा, विद्यापति (1352-1448), तुलसीदास (1511-1623), मीराबाई (1498-1557), कबीरदास (1398- ?) आदि। रामचरितमानस सँ अनेक दोहा कें मिथिला आ मिथिला सँ बाहर फकड़ा’क रूप मे व्यवहार होइत अछि। जेना कि “यहाँ न लागै राउर माया” अथवा “लंका निसिचर निकर निवासा यहाँ कहाँ सज्जन केर बासा” इ दूनू तुलसीदासक रामचरितमानस सँ लेल गेल अछि। अहि तरहें “पुरुखक नहि विश्वासे” “एकसर तारा कियो नहि देख लिखल कुमास अमंगल लेख” “भनहि विद्यापति सुनू हे सुनयना सब बेटी सासुर जाथि” महाकवि विद्यापतिक रचित पद सँ लेल गेल अछि। किछु फकड़ा गाम विशेष आ स्थान विशेष मे प्रचलित होइत अछि। ओहि फकड़ाक निर्माण मे गामक कोनो विशेष घटना अथवा ओहि घटना सँग व्यक्ति विशेषक नाम जुड़ल रहैत अछि। उदाहरण लेल मधुबनी जिलाक अरेड़ गाम मे 55 वर्ष पहिने नाथ बाबू नामक एक आशु कवि आ सभालोचन भेलाह। ओ अपन प्रत्युत्पन्नमति लेल विख्यात छलाह। ओ किछु-किछु एहेन पदक रचना केलनि जे फकड़ा बनि गेल। सब फकड़ा हुनक नाम सँ जानल जाइत अछि। नाथ बाबू केँ तीन बीघा खेत छलनि। एकबेर ओ अपना खेत मे मौथा घास उखाड़ैत छलाह। बाट चलैत गामक लोक पुछि देलकन्हि: गामक लोक: “नाथ! की करैत छी?” नाथ: “नाथ बाबू छथि काल गिरहस्त तीन बीघा केर जोता सबहक खेत मे धान उपजैत अछि नाथक खेत मे मौथा” तहिया सँ इ फकड़ा प्रसिद्ध भऽ गेल: “सबहक खेत मे धान उपजैत अछि नाथक खेत मे मौथा” अहि तरहें मिथिलाक अधिकांश गाम मे किछु ने किछु लोक भेल छथि जे फकड़ा निर्माण केने छथि आ ओ फकड़ा गाम मे प्रचलितं अछि। ओहि फकड़ा सँग ओकर निर्माता सेहो गामक लोकक कंठ मे रचल बसल छथि। उदाहरण हमरा लग अनंत अछि मुदा विषय सँ विषयांतर नहि होई ताहिं आगा बढब जरुरी। वृहद् हिंदी कोश मे लोकोक्ति केर परिभाषा कनि विस्तार सँ भेटैत अछि: “विभिन्न प्रकार के अनुभवों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं कथाओं, प्राकृतिक नियमों और लोक विश्वासों आदि पर आधारित चुटीली, सारगर्भित, सँक्षिप्त, लोकप्रचलित ऐसी उक्तियों को लोकोक्ति कहते हैं, जिनका प्रयोग किसी बात कि पुष्टि, विरोध, सीख तथा भविष्य-कथन आदि के लिए किया जाता है।” एहि सँ एक बात दिस स्पष्ट सँकेत इ भेटैत अछि जे हमरा लोकनि अपन मिथिला मे उपलब्ध फकड़ा के देखैत एक स्थानीय अथवा काजक परिभाषा बना ली। इ परिभाषा हम अपन ज्ञान, मानवशास्त्र, लोकविद्या (फोकलोर) मे प्रशिक्षण आ मिथिला सँ प्राप्त फकड़ाक सँचयन आ ओकर सँरचना के आधार पर गढ़बाक यत्न कऽ रहल छी: “मैथिली फकड़ा जकरा लोकोक्ति सेहो कहल जा सकैत अछि, लोकक द्वारा प्रचलित एहेन कथन अछि जे पौराणिक कथा, ग्रन्थ, धर्मशास्त्रक दृष्टान्त, घटना विशेष सँ विकसित शिक्षा, हास, परिहास, मनोभाव, दुःख-दर्द, प्रेम, अपनत्व, लिंग भेद, जातीय अथवा सामुदायिक स्वाभाव आ गुण, छोभ, वैराग्य, उदासी भाव, प्रकृति सँ तारतम्य, जड़ि सँ जुड़ाव, पूर्वज सँ सिनेह, ज्ञानक सँचरण, आदि भाव व्यक्त कएल जाइत अछि।” फकड़ा केँ स्वरुप केँ अगर गंभीर बनि देखी तऽ स्पष्ट हएत जे फकड़ा’क उद्धरण देमय बला लोक ओहि सँग व्यक्ति अथवा परिस्थिति केँ ओहिना सीब लैत अछि जेना कोनो महिला सुई मे ताग घुसा ओहि सँ कोनो वस्तु अथवा कलाक निर्माण करैत अछि। तीनू – सुई, ताग आ वस्त्र – आपस मे एना गुथा जाइत अछि जे तीनूक अलग-अलग अस्तित्व ताकब दुष्कर। तीनूक समग्र अस्तित्व सँ कला बनैत छैक। सएह भेल फकड़ा। फकड़ा कें एकाएक उमडल मनोदशाक सम्प्रेषण सेहो कहल जा सकैत अछि जाहि मे सम्प्रेषण केँ अधिक प्रमाणिक आ प्रभावोत्पादक बनेबा लेल उद्धरणक मदति लेल जाइत छैक। कनि फकड़ा केर स्वरुप आ ओकर अनेक रूप पर विचार सेहो करक चाही। मिथिला मे व्याप्त फकड़ा केँ स्वरुप आ उपलब्धता देखैत कहल जा सकैत अछि जे फकड़ा केँ चारि भाग मे विभक्त कएल जा सकैत अछि: (क) वैश्विक फकड़ा (ख) अखिल भारतीय स्वरुपक फकड़ा (ग) मिथिलाक फकड़ा (घ) स्थानीय फकड़ा आब कनि उपर्वर्णित फकड़ाक स्वरुप पर विचार करैत छी। (क) वैश्विक फकड़ा वैश्विक फकड़ा, जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, एहेन फकड़ा भेल जे समस्त विश्व मे प्रचलित अछि। अहि तरहक फकड़ाक प्रयोग मैथिली मे मूल फकड़ा केँ अनुवाद कए होइत अछि। उदाहरण हेतु: Rome was not built in a day। -“रोमक निर्माण एक दिन मे नहि भेल” Child is the father of a man। - बच्चा पैघ लोकक पिता होइत अछि Necessity is the mother of invention। - “आवश्यकता अविष्कारक जननी होइत अछि”। वैश्विक फकड़ा अपन वैश्विक स्वभावक कारणे आ सांस्कृतिक आदान-प्रदानक कारणे मैथिली आ आन भाषा आ सँस्कृति मे सदैव प्रयुक्त होइत रहल अछि। लोकक विभिन्न देश मे भ्रमण, दोसर देश आ सँस्कृतिक मध्य आदान-प्रदान, साहित्य आ भाषाक अध्ययन आदि एकर फैलाव आ व्यवहारक कारण बनैत छैक। (ख) अखिल भारतीय स्वरुपक फकड़ा अहि तरहक फकड़ा समस्त भारत आ ताहू मे हिंदी बहुल क्षेत्र मे प्रयुक्त होइत अछि। मिथिला मे सेहो ओकर मूल रूप मे एकर प्रयोग होइत अछि। कखनोकल भाषाक अनुवाद सेहो कऽ देल जाइत छैक। किछु उदाहरण देखैत छी आ ओकर विवेचना करैत छी: ना राधा को नौ मन घी होगा ना राधा नाचेगी – नहि राधा के नौ मोन घी हेतनि ने राधा नचती। ऊंट के मुँह मे जीरा – “ऊंटक मुँह मे जीरक फोड़न” ऊपर के उदाहरण मे मूल हिंदी फकड़ा के मैथिली मे अनुदित कए कहल गेल अछि। आब दोसर देखू: “लेना देना कुछ नही मुहब्बत एक चीज़ है।” “का वर्षा जब नदी सुखाने/ समय चुक पुनि क्या पछताने” “कबिरा खरा बाजार मे लिए लुकाठी हाथ/ जो घर ज़ारे आपना चले हमारे साथ” “ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय” “बड़े मिया तो बड़े मिया/ छोटे मिया सुभानअल्लाह” “मिया की जुत्ती मिया का सर” उपरोक्त सब फकड़ा अपन भाषा आ ओकर सँस्कार सँग मिथिला मे अबैत अछि। मैथिली भाषी एकर प्रयोग अपन भाषा आ व्यवहार मे एकर मूल रूप मे बिना कोनो जोड़-तोर केने, बिना कोनो अनुवाद केँ करैत छथि आ एकर भाव सेहो बिना कोनो झंझट केँ स्पष्ट होइत जाइत छैक। अखिल भारतीय फकड़ा मे कोनो भाषा जेना मगही, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली, अवधी, उर्दू आदिक फकड़ा आबि सकैत अछि। अखिल भारतीय कहक अर्थ हिंदी मात्र नहि लागक चाही। (ग) मिथिलाक फकड़ा मिथिलाक फकड़ा कहब केँ तात्पर्य भेल जे कोनो फकड़ा जे समस्त मिथिला क्षेत्र मे बाजल जाइत अछि (ओ देवघर, सँथाल परगना, दुमका, भागलपुर, मुंगेर सँ लऽ कऽ नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्र धरि पसरल लोकक फकड़ा), व्यवहरित होइत अछि से फकड़ा। इ फकड़ा सब कमोवेश एक स्वरुपक अछि। अहिमे यद्यपि एक बातक सम्भावना भऽ सकैत अछि जे किछु फकड़ा जे अखिल मिथिलाक स्वभावक अथवा प्रकृति केँ अछि तकर सँचयन सब मैथिली भाषी क्षेत्र सँ लोक परम्परा सँ लिखित परम्परा मे नहि भेल हो। अगर से नहि भेल अछि तऽ मैथिली साहित्य आ सँस्कृति के शोधकर्मी एवं साहित्यजीवी लोकनि एहि बात केँ गंभीरता सँ लेथि आ समस्त मिथिला क्षेत्र सँ लोक परम्परा मे व्याप्त फकड़ा सबहक सँचयन कए ओकर सँरचना आ व्यवहार पर शोध करथि। (घ) स्थानीय फकड़ा स्थानीय फकड़ा ओ फकड़ा भेल जे कोनो विशेष गाम अथवा ओकर अगल-बगल मे कोनो घटना विशेष, अथवा कोनो व्यक्ति विशेष द्वारा रचल गेल हो आ ओहि परोपट्टा मे लोक व्यवहार मे प्रचलित हो। स्थानीय फकड़ा के सम्बन्ध मे एक बात कहब अनिवार्य जे कालक यात्रा सँग नहु-नहु महत्वपूर्ण फकड़ा किछु समयक बाद अखिल मिथिला आ बाद मे अखिल भारतीय आ कखनो काल अंतिम डेग फानैत वैश्विक फकड़ा सेहो बनि जाइत अछि। स्थानीय फकड़ा केर उदाहरण शुरू मे देल गेल अछि ताहि एकरा फेरो सँ देमाक दरकार नहि अछि। अहि तरहें दू बात एक सामान्य पाठक लेल स्पष्ट भऽ गेल: • पहिल, फकड़ा की अछि, एकर परिभाषा विशेषरूप सँ मैथिली भाषा आ सँस्कृतिक सन्दर्भ मे की होबक चाही। • दोसर, मैथिली सँस्कृति मे प्रचलित फकड़ा के कतेक श्रेणी मे बांटी देखल जा सकैत अछि। आब अहि प्रारम्भिक जानकारीक बाद अहि लेख केँ आत्मा अर्थात फकड़ा द्वारा मानवी या मैथिलानी के मनोदशाक सम्प्रेषण कोना होइत अछि। कोना ओ सब अपन मोनक भाव, उतार-चढ़ाव, नीक-अधलाह, प्रेम, वेदना, विरह, सामाजिक स्थिति, उमंग, दुःख, आर्थिक बिपन्नता, आदि कें व्यक्त करैत छथि। व्यक्त करब एक बात भेल आ ओहि अभिव्यक्ति कें बुझब आ ओकरा सँग आत्मसात करब दोसर बात। इ दूनू बात अगर मैथिली फकड़ा आ नारी मनोदशा के देखब तऽ भेटत। भाव अधिकांश अवस्था मे एकक अथवा व्यक्ति विशेषक नहि अपितु समस्त नारी समाज लेल, तऽ कखनोकाल एक वर्ग विशेषक नारी समाज लेल होइत अछि। समाजक सँरचना जे आइ तीव्र गति सँ बदलि रहल अछि ताहि मे सामाजिक-सांस्कृतिक-इतिहासिक आ जेंडर डिस्कोर्स केँ ध्यान मे रखैत अहि विषय पर गहन शोधक दरकार अछि। हम अपन सीमित ज्ञान आ साधन केँ हिसाब सँ अहि पर किछु लिखबाक यत्न कऽ रहल छी। लिखबा सँ पहिने इ स्पष्ट कऽ देनाइ आवश्यक जे समाज बदलि रहल अछि। परिवर्तन अपन गति पकड़ि रहल अछि। परिवर्तन सँग मैथिल मानशिकता सेहो बदलि रहल अछि। लोक बेटा बेटीक विभेद कम कऽ रहल छथि। सब क्षेत्र मे आन समाज जकाँ मिथिलाक धिया सेहो प्रगतिक पथ पर साधल डेग दऽ रहलि छथि। हालहि मे मिथिलाक एक बेटी भारतीय वायु सेना मे पायलट केँ रूप मे चयनित भेलीह अछि। हुनकर चयन पर समस्त मैथिल समाज अपना आपकेँ गर्वान्वित अनुभव कऽ रहल अछि। ओहि धिया केँ चारू दिस सँ शुभकामना भेटि रहल छनि। इ घटना बदलैत मनःस्थितिक परिचायक अछि। एकर अर्थ इहो नहि जे सब किछु ठीक भऽ गेल अछि। विश्व समुदायक बाते छोड़ी दी, भारतवर्ष मे सेहो हम सब बहुत समुदाय, समाज, वर्ग आ राज्य सँ नारी सँचेतना, विकास मे एखनो बहुत पछुआएल छी। समाजक सँरचना देखला सँ एहेन सन लगैत अछि जे समाज मात्र बेटा लेल बनल अछि। ककरो अनेक बेटा भेलैक तऽ ओ भागवंत आ एकर बिपरीत किनको अनेक बेटी भेलनि तऽ बड्ड अधलाह। अहि स्थिति मे समाज ओहि बेटी सभक तुलना पिलुआ सँ करैत कहैत अछि जे फलां स्त्रिगन अथवा पुरुख केँ “खद-खद बेटी” छनि। स्मरणीय तथ्य इ अछि जे खद-खद शब्द पिलुआ लेल कएल जाइत अछि। बातक अंत अतए नहि होइत अछि। सम्मर गीत जे बेटीक बिआह सँ पहिने गाएल जाइत अछि मे माय अपन व्यथा बतबैत कहैत छथि, ‘बहुत भऽ गेल कोनो ढंगक बर नहि भेट रहल अछि। बेटीक जन्म पहाड़ भऽ गेल! की करी कि नहि?’ बेटी मायक दुःख सँ द्रवित होइत अपन नारी होबाक अवस्था सँ पश्चाताप करैत गीत आ फकड़ा केँ मादे कहैत छथि ‘माय, अनेड़े हमरा जन्म कथिलेल देलहुँ? अहि सँ बढियाँ तऽ इ रहैत जे हमरा अर्थात बेटीक जन्म सँ पहिने चालीस पचास मरीच बुकि कऽ खा लितहुँ जकर झांस सँ बेटी गर्भहि मे तुबि जाइत आ जिनगी भरि लेल धियाक सँताप सँ मुक्ति अहाँकेँ भेट जाइत! “कथि लए आहे अम्मा धियाक जनम देल खैतहुँ मरिच पचास मरिचक झाँस सँ धिया दूरि जैतय छुटि जाइत धियाक सँताप” समाज एहि मानशिकता मे जीबैत अछि जे बेटी घर मे अधिक भेलाक अर्थ भेल धनक क्षय आ लक्ष्मीक प्रस्थान। एक फकड़ा मे अहि बातक स्पष्ट प्रमाण भेटैत अछि: “विप्र टहलुआ मेष धन या बेटीके बाढ़ी ताहू सँ धन नहि घटए करू पैघ सँ राडि” इ फकड़ा प्रमाणक सँग डंकाक चोट पर कहैत अछि जे ब्राम्हणक बालक केँ नौकर टहल टिकोरा करक हेतु राखब सँ, छागर-बकरी पोसला सँ आ बेटीक सँख्या बढ़ला सँ धनक क्षति होइत अछि; तकर बादो अगर सम्पति बांचि गेल तऽ अपना सँ पैघ हैसियत केर लोक सँ लड़ाई ठानि लिय, सम्पति बरबाद भऽ जेबे टा करत। फकड़ाक विवेचना सँ लगैत अछि जे बेटी केँ लोक सिनेह करैत अछि, मुदा बेटी कोखि मे अबैक तकर कामना नहि करैत अछि। भले बेटीक सुरक्षा घिबही घैल जकाँ कएल गेल होइक मुदा ओकर प्यार आ दुलार बेटा जकाँ केल जाइत छैक। अर्थ भेल, बेटा अधिक महत्वपूर्ण। अन्यथा, बेटी केँ बेटी जकाँ दुलार किएक नहि? “घीबक घैला जकाँ पोसलहु गे बेटी बेटा जकाँ कएल दुलार” मिथिला मे कोनो महिला लेल बेटाक कामना अतेक प्रबल होइत छैक, तकर उत्तर देब कठिन। एक चिरै बहुत कारुणिक स्वर उत्पन्न करैत रहैत अछि। ओहि चिरै केँ सम्बन्ध मे प्रचलित मान्यता इ छैक जे कोनो जन्म मे ओ चिरै एक मानवी छलि। ओकरा अनेक बेटा होइत गेलैक आ सब मरल गेलैक जखन कि जतेक बेटी भेलैक सब जिल गेलैक। जखन ओ महिला मरलि तऽ बहुत दिन धरि ओकर आत्मा बेटा लेल भटकैत रहलैक बाद मे ओकर स्वरुप बदलि गेलैक आ ओ चिरै बनि जनम लेलक। एखनो ओकरा पूर्व जन्मक बात सब स्मरण छैक ताहिं ओ कारुणिक स्वर मे अपन व्यथा कथा कहैत रहैत अछि: “टी टी टी तिसी तेल बेटा भेल मरि मरि गेल बेटी भेल जीब जीब गेल” अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ उपलब्ध फकड़ा सबहक विवेचन कएल जाय तऽ पता चलैत अछि जे फकड़ा तत्कालीन समाजक दर्पण अछि; समाजक ऐतिहासिक दस्तावेज अछि। अहिबातक पुष्टि निम्नलिखित फकड़ा सँ होइत अछि: “जनक नगर सँ चलली हे सीता अम्मा देलनि रोदना पसार के मोरा सीता लए बसिया जोगेतै के मुख करत दुलार” इ फकड़ा जेना भक्क सँ लोकक आँखि खोलैत हो! इ कहैत अछि जे ताज़ा, तप्पत भोजन खेबाक अधिकारी बेटा अछि, आँठि, बसिया भोजन बेटीक भाग मे लिखल रहैत अछि। बेटी जखन बिआह केँ बाद सासुर जा रहलि अछि तऽ माय कनैत सोचैत छथि, ‘आब सासुर मे हमर बेटी लेल इ बसियो अन्न केँ जोगा’क राखत आ के एकर गाल पकड़ि दुलार करतैक?’ इ फकड़ा बहुत पैघ यात्रा लेल चलि पड़ैत अछि। लड़की मायक चिंता एहि फकड़ा मादे देखू। ओ कहैत छथि जे आब हुनका बेटी लेल इ बसियो भोजन ओकर सासुर मे केँ रखतैक? केँ ओकरा सँ प्रेम सँ बजतैक? यएह सब सोचि-सोचि मायक छाती बेर-बेर फाटि रहल छनि। इ फकड़ा बतबैत अछि जे कोना लड़की सासुर जाइते देरी उत्तरदायित्वक भार सँ दबा जाइत अछि। इ फकड़ा देखन मे छोटन लगे/ घाव करे गंभीर जकाँ अछि। एक आर फकड़ा ऊपर वर्णित फकड़ाक अर्थ स्पस्ट करैत अछि आ बेटीक बिआह भेलाक बाद सासुर गेला पर की स्थिति होइत छैक तकर खाका खीचैत छैक: “जब डारि चलल ससुर घर देस घरक चालनि होयबो हे” अर्थ इ भेल जे आइ धरि जे धिया नैहर मे सुकुमारि छलीह से आब दोसर देस दोसर लोक मे जा रहलि छथि, ओतय हिनकर की गति हएत! काज करैत-करैत आ लोकक बात सुनैत-सुनैत अपसियात रहतीह। मोन चालनि जकाँ अनेक खंड मे विखन्डित भऽ जेतनि। मतलब, इ फकड़ा भविष्यक यातना दिस इशारा करैत अछि। मिथिलाक नारी एक विचित्र मनोदशा आ परिवेश मे जीबैत छलीह। किछुके जीवन मे परिवर्तन आबि रहल छनि अधिकांश एखनो पिता, ज्येष्ठ भ्राता, श्रेष्ठ एवं अभिभावक पर आश्रित छथि अथवा हुनक निर्णय केँ बलधकेल स्वीकार करबा लेल विवश छथि। आश्चर्यक बात इ छैक जे लड़की केँ कहेन लड़का चाही आ ओकरा मोन मे की बात घुमि रहल छैक तकर वर्णन सेहो गीतगाइन सब अपन गीत आ फकड़ाक माध्यम सँ बजैत छथि: “जखन चलला बाबा वर ताकय आगा भए रुक्मिणी ठारि हे कर जोड़ि मिनती करै छी यौ बाबा सुनू बाबा मिनती हमार यौ जुनि बाबा ताकब चोर चंडाल के जुनि आनब तपसी भिखारि यौ” नायिका अपना लेल अपन श्रेष्ठ सँ एक सामान्य बर जे सिनेहक अर्थ जनैत होथि केँ आकांक्षा रखैत छथि। हुनका चोर, चंडाल, लुच्चा- लफंगा अथवा कोनो नंग धरंग साधू सन्यासी नहि चाहियनि। इ फकड़ा एक महिलाक दासताक जीबैत साक्षी अछि। फकड़ा पढ़ैत चलू आ समाजक गढ़नि देखैत चलू। फकड़ा एक-एक तह खोलैत चलत। स्थिति इ भऽ जाइत अछि जे कोनो महिला अगिला जनम मे फेरो महिला नहि बनए चाहैत छथि। दिनकर दीनानाथ सँ निहोरा करैत कहैत छथि जे आब कहियो हुनका तिरिया अर्थात नारी रूप मे जन्म नहि देथि: “बेर-बेर अरजलौं हे दीनानाथ दीनानाथ तिरिया जनम जुनि देहु” पित्रसत्तात्मक समाज अपन मायाजाल मे तेना ने स्त्रिगन केँ फंसा लेने अछि जे ओ सब छरपट- छरपट तऽ करैत रहैत छथि, मुदा ओहि मायाजाल के तोड़ि कहाँ पबैत छथि! समाज सुग्गा जकाँ रटा देने छनि, रटि लेने छथि: “बेटी ससुरे नीक की सरगे नीक” फेर की सब मैथिलानी इ मानि लैत छथि जे कोनो विषम परिस्थिति हो, प्रताड़ना हो, शोषण हो, पति सौतिन लऽ अबैथ, भोजन सम्मान भले ने भेटए, कोनो स्थिति मे सासुर नहि छोड़ी आ नैहर के तऽ चर्चे बेकार! बेटीक डाला नैहर सँ सासुर लेल उठैत अछि आ सासुर सँ बेटीक लाशक डोली उठक चाही। फेरो एकरा समाजिक सँरचना सँगे जोड़ि देल जाइत अछि। बिआह होइते देरी नैहर मे बेटीक अधिकार समाप्त आ भाउजक वर्चस्व प्रारम्भ। अगर बिआहलि आ सासुर बसैत बेटी नैहर मे किछु दखल देलनि तऽ इ अमान्य। फकड़ा एकरा एहि तरहें प्रमाणित करैत अछि: “घर आँगन भौजी के छल छल करथि ननदो” अर्थ स्पष्ट भेल आब जे बेटी बिआह सँ पूर्व पिताक घर पर अपन अधिकार बुझैत रहैत छलीह से हुनकर नहि अपितु हुनक भाउजक भऽ चुकल छनि। ओ अधिकारहीन भऽ चुकलि छथि। कोनो पुरुख ज अहि बातक अनुभव करए चाहैत छथि तऽ एकबेर इ कल्पना मात्र कऽ लेथि जे बिआहक बाद एकाएक हुनका सम्पति सँ बेदखली कऽ देल जाइत छनि, सामाजिक व्यवहार मे ओ निष्कासित भऽ जाइत छथि। फेर कहेन अवस्था मे रहि सकैत छथि। इ कल्पना मात्र हमरा सबके कष्टकारी लगैत अछि आ तकरा एखनो धरि मैथिलानी जीब रहलि छथि से कतेक दुखक बात! आ अहि बातक भान फकड़ा कोना खोलिकऽ स्पष्ट करैत कहैत अछि। एक अवस्था एहेन होइत छैक जखन एक महिला अपना आपकेँ असहाय पबैत अछि आ लगैत छैक जे सब सँस्था, सामाजिक मर्यादा, बिआह-दान, कुल-पलिवार सब किछु बेकार छैक! लोक अनेड़े मायाक बंधन मे बन्हा जाइत अछि! इ सोच कखन होइत छैक? तखन जखन ओ प्रसवक वेदना सँ लहालोट भेल इमहर-ओम्हर ओंघरिया मारैत रहैत अछि। तखन ओकरा लगैत छैक जे अहि सँ बढियाँ ओ बिआह नहि केने रहैत आ पिता-पितामाहक घर मे जीवन भरि कुमारि बनल रहैत: “कथिलेल बाबा बियाहलनि देलनि ससुर घर रे ललना रे रहितहुँ बारी कुमारि दरद नहि जनितौं रे” अनेड़े बाबा हमर बिआह करा ससुर घर भेज देलनि। नीक रहैत जे कुमारि भेल नैहर मे रहितहुँ। कम सँ कम अहि प्रचण्ड दर्द सँ बंचि तऽ जैतहुँ! मिथिलाक सब स्त्रिगन अपना आपमें सीता देखैत छथि। हुनका सबके लगैत छनि जे सीता सँगे रामक व्यवहार उचित नहि रहलनि। अतेक कोमल सीता केँ कोना कठोर भेल राम नाना तरहक यातना देलाह! एहेन राम सँग बिआहक की लाभ? जिनगी भरि सीता केँ सुख कहाँ भेटलनि: “राम बियाहने कोन फल भेल सीता जन्म अकारथ गेल” आ अन्ततः सीता केँ राम धोबी केँ कहला पर तखन घर सँ भगा देलथिन जखन सीता रघुकुलक कुल दीपक केँ जन्म देबा लेल गर्भ सँ छलीह! एहनो कहीं कतौ भेलैक अछि: “राम बियाहने कोन फल भेल सीताक जन्म बियोगे गेल” बात अतए समाप्त नहि होइत अछि। कहल जाइत अछि जे जखन सीता वेदनाक अधिकता सँ भरि गेलीह आ राम हुनका बाल्मीकि आश्रम सँ लव कुशक सँग अयोध्या चलबा लेल जिद ठानि देलथिन तऽ सीता पुछि देलथिन: “हमर अयोध्या मे आब कि प्रयोजन, हमरा तऽ अहाँ निकालि देने छी?” एहि बात पर राम उत्तर दैत छथिन: “अहाँक बिना हमर अश्वमेध यज्ञ सँभव नहि अछि।” सीता: “फेर एखन धरि अहाँ कोना करैत रही अश्वमेध यज्ञ?” राम: “अहाँक कोनो उदेस हमरा लग नहि छल। हम मानि लेने रही जे अहाँक निधन भऽ चुकल अछि। एहेन अवस्था मे शास्त्र इ विधान दैत अछि जे यजमान सोनाक पत्नी बना यज्ञ पर बैस सकैत अछि। हम सएह कएल। सोनाक सीता बना अश्वमेध यज्ञक वेदी पर बैसल रही।” रामक इ बात सुनितहि सीताक करेज फाटि गेलनि। आँखी नोरा गेलनि। भेलनि, ‘रामो सन पति अतेक मतलबी भऽ सकैत छथि!’ भावावेश मे अबैत सीता बाजि उठलीह: “एकर मतलब इ भेल जे अहाँ हमरा अपन यज्ञक लोभे अयोध्या लऽ जेबा चाहैत छी?” राम चुप रहला। सीता फेरो बजलीह: “एकर अर्थ तखन इ भेल जे अहाँक यज्ञ मे हमही वाधक छी?” राम एखनो चुपे छलाह। आब सीता निर्णय दैत बजलीह: “ठीक छैक, हम अहाँक समस्याक तुरत समाधान करैत छी।” राम कनि गंभीर तऽ भेलाह मुदा मौन भेल रहलाह। सीता धरती माता दिस हाथ जोड़ि बैस गेलीह आ निवेदन केलनि: “हे धरती माँ! अहिंक कोखि सँ हमर जन्म भेल अछि। हम आब अधिक वेदना नहि बरदाश्त कऽ सकैत छी। अहाँ आब हमर उपाय तत्क्षण करू। फाटू! एखन फाटू! अतए फाटू! हमरा अपन कोरा मे सुता लिय। आब हम अहि लोक सँ उबि गेल छी!” वनदेवी सीताक गोहार धरती माता तुरत स्वीकार केलनि। धरती मे तुरत दरार परि गेलैक। जाबेत राम सीता केँ रोकैथ तावेत सीता धरती मे प्रवेश कऽ गेलीह। धरतीक पुत्री धरती मे विलीन भऽ गेलीह। धरती पुनः यथावत भऽ गेलीह। एखनो जखन कोनो मैथिलानी कष्ट सँ भरि जाइत छथि तऽ एकाएक हुनका मुँह सँ निकलि पड़ैत छनि: “फाटू हे धरती”। से कहिते ओ सीताक मिनिएचर भऽ जाइत छथि। फकड़ा प्रकृति सँ उद्धरित सेहो होइत अछि। कखनोकाल जखन स्त्रिगन अपन सँतान आ पति सँ तंग भऽ जाइत छथि तऽ अपन तुलना काकोर सँ करैत छथि। तहिना जेना अनेक बच्चा सबके जन्म दैत काल काकोर अपन जान गमा दैत अछि तहिना मैथिलानी सब बाल-बच्चा, पति आ परिवार लेल अपन शरीर आ इच्छा केँ गला लैत छथि। दुखक भार बढ़ला पर बाजि उठैत छथि: “क़कोरबा बियान क़कोरबै खाय” महिला मनक मनोदशा नहुँ-नहुँ अनेक तरहेँ फकड़ा मादें प्रवाहित होइत रहैत अछि। दुख मे, सुख मे, आनंदातिरेक मे, वेदनाक सघनता मे मैथिलानी स्वतःस्फूर्त होइत अपन परिस्थिति केँ कोनो ने कोनो फकड़ा सँ जोड़ि लैत छथि। तथाकथित निम्न जाति अथवा समुदायक लोक सँ ओना तऽ तथाकथित उच्च वर्गक लोक सामाजिक मेल मिलापक दूरी रखैत छथि अथवा सीमित अवस्था मे करैत छथि लेकिन जखन प्रहसन अथवा मजाक प्रदर्शित करबाक होइत छनि तऽ ओहि समाजक स्त्री सँ साम्पियक आकांक्षा रखैत छथि आ मर्यादाक अतिक्रमण करबा मे सेहो सँकोच नहि करैत छथि। महिला सेहो बुईझ लैत छथि जे पुरुखक इच्छा आ आकांक्षा की छनि। जखन पुरुख मर्यादा केँ त्याग करैत छथि तऽ हुनका इहो भान नहि रहैत छनि जे ओ महिला हिनका गाम अथवा समाजक प्रचलित मानदण्ड पर भाउज, भावहु, पुतोहु अथवा की हेतनि! अहि क्षण ओ स्त्रिगण हुनका भाऊज सन लगैत छनि जकर बहुत मुंहतोड़ जवाब फकड़ा दैत अछि: 'रारक बहु सबहक भौजी" अहि दशा केँ देखैत विद्यापतिक एक पद श्मरण अबैत अछि जाहि मे अस्पृश्य सुन्नरि युवतीक पति बिदेस गेल छैक, सासु बहिर तऽ छैके, ओकर आँखि मे रतौंधी सेहो भेल छैक। ओना तऽ समाजक उच्च जातिक उच्च लोक, पुरुख ओकर देह सँ सटब पाप बुझैत छथि लेकिन राति मे वएह पुरुख ओहि कामिनी सँग अपन काम पिपासा शान्त करबा लेल उताहुल छथि, ओहि क्षण लेल ओ महिला हुनक सजाति भऽ जाइत छनि: "अधियन कर अपराधहुँ साति पुरुख महते सब हमर सजाति" महाकवि विद्यापति आगा बढ़ैत कहैत छथि: "भनहि विद्यपति एहि रस गाब उकितहुँ अबला भाव जगाब" विद्यापति तऽ अतेक आगा बढ़ैत ई तक बाजि लैत छथि जे लोक अनेड़े हुनका रसिक कवि कहैत छनि, प्रेमक-श्रृंगार, मिलन-अभिसार आ रतिक्रिया केँ कवि कहैत छनि; असली रस तऽ ओ शोषित आ अर्थहीन युवतीक दुखक बयान करब छनि। ओ अबलाक भाव केँ प्रदर्शित करए बला कवि छथि: "भनहि विद्यापति एहि रस गाब उकितहुँ अबला भाव जगाब" कखनोकाल स्थिति एहेन भऽ जाइत अछि जे दर्द आ भावनात्मक शोषण आ दोहन सँ जखन मैथिलानी भरि जाइत छथि, हिम्मत जखन जवाब देमय लगैत छनि, माथ जखन भिन्नाय लगैत छनि, तखन ओ अपन भड़ास निकलैत बजैत छथि: "नहुँ नहुँ मुती तऽ सन्न-सन्न उठय" उपरोक्त फकड़ा प्रदर्शित करैत अछि जे जखन चारु दिस सँ मोनमे नाना तरहक द्वन्द चलैत रहैत छनि, शोषणक अधिकता एकठाम ढ़ेर भेल जाइत छनि, एक निश्चित अवधिक बाद ओ अपन भड़ास निकालि लैत छथि। ओ कतऽ करतीह। लोकपटल पर लोक धारणाक हेतु। सएह करैत छथि। एक अवस्था एहेन होइत अछि जखन कियोक अपन बैभव केँ बारे मे अनेड़े बखान करैत छथि, ताहि क्षण किछु घोर सत्यवादी महिला केँ अनेड़े फुइसक बड़ाई अथवा पदबड़ाई अनसोहाँत लगैत छनि। बात जखन बहुत आगा बढ़ि जाइत छैक तऽ बाजि उठैत छथि: "गाँरी कहलक पटोर पहिरने रही आँखि कहलक सङ्गे रही" उपरोक्त फकड़ा यथार्थ आ फेकब मे अंतर स्पष्ट करैत अछि। नारी मानशिकताक यथार्थ आ कल्पित मानशिकता केर द्वन्द स्पष्ट करैत अछि। एक सँ दोसरक परिस्पर्धाक विवेचन करैत अछि, समाजक मानशिकता देखबैत अछि। कोनो महिला (अथवा विशेष अवस्था मे पुरूष) जखन व्यर्थक शोर आ अनघोल करैत छथि, अपन कृत्य (अथवा कुकृत्य) केँ झपबाक यत्न मे नीक अथवा भद्र महिला केँ दोख तकैत छथि तऽ उचितवक्ता स्वभावक मैथिलानी हुनका पर तंज कसैत बाजि उठैत छथि: "बट हगनी ने लजाय उपराग देमय जाय" गुनमंती मैथिलानी नारीक महत्व नीक जकाँ बुझैत छथि। हुनका ज्ञात छनि जे मायक भूमिका मात्र माय निभा सकैत छथि। पिता अर्थात पुरुष तऽ मतलबी होइत अछि, भमरा होइत अछि। पुरुख केँ सँतति सँग पत्नी सेहो चाही। महिला केँ सँतति आगा किछु नहि। कोनो तरहक बात भेला पर पुरुख लेल निम्नलिखित फकड़ा पढ़ल जाइत अछि: "माय मुइने बाप पितिया" अर्थ भेल मायक मरैत मातर पिताक व्यवहार सँतानक प्रति बदलि जाइत छनि। पिता दोसर पत्नी केर जोगार मे लागि जाइत छथि। पिता कतबो करुणाशील होथि मायक स्थान लेब असँभव छनि। एक फकड़ा देखु तऽ अर्थ स्पष्ट भऽ जायत: "जे मायक दूध सँ नहि हएत से बापक आंड़ चटने कतऽ हएत" ई फकड़ा जखन कखनो सुनैत छी तऽ हिंदी सिनेमाक एक गीत स्वतः श्मरण आबि जाइत अछि: "बाप का जगह माँ ले सकती है माँ की जगह बाप ले नही सकता लोरी दे नहीं सकता सो जा सो जा" बेटी सामान्यतया मायक गुण आ बेटा पिताक गुण आ स्वभाव किछु ने किछु स्वतः ग्रहण करैत अछि। एकर प्रमाण निम्नलिखित फकड़ा सँ भेटैत अछि: "माय गुण धी पिता गुण घोर नहि किछुओ तऽ थोड़बो थोड़" दोसर फकड़ा माय आ बेटीक बात करैत कहैत अछि जे मायक गुण बेटी सहजे ग्रहण करैत अछि: "भनहि विद्यापति बाँसक टोटी जकर जेहन माय तकर तेहेन बेटी" आब पुरुखक बारी अबैत अछि आ फकड़ा कहैत अछि जे जहिना मायक गुण बेटी करैत छथि तहिना बापक गुण बेटा ग्रहण करैत छथि: "भनहि विद्यापति बाँसक टोटा जकर जेहन बाप तकर तेहेन बेटा" महिलाक़ेँ जतेक अधिकार अपन पति पर रहैत छनि ततेक पुत्र अथवा पुत्री पर नहि। पतिक सम्पति आ टाका पर हुनका पूर्ण अधिकार, सर्वत्र स्वतंत्रता रहैत छनि, ने रोक ने टोक। लेकिन बेटाक सम्पति आ राशि पर मायक अधिकार एकाएक जेना सीमित भऽ जाइत छनि। अहि बातक पुष्टि निम्नलिखित फकड़ा सँ होइत अछि: "सइयां राज अरु राज बेटा राज मुहतककी" पितृसत्तात्मक समाजक सँरचना लोकक मोन मे ई धारणा स्थापित कऽ देने अछि जे बेटी आ बेटीक लोक -पति आ पुत्र - आन होइत अछि, अपन नहि। यएह बात फकड़ा सेहो स्थापित करैत अछि। निम्नलिखित फकड़ा देखला सँ ई बात नीक जकाँ फ़रिछा जाइत अछि: "धी, जमैय्या भगिना ई तीनू ने अपना" मैथिलानी सेहो सहज मोन सँ एकरा स्वीकार कऽ लैत छथि। वैधवयक जीवन बहुत दुःखद होइत रहल अछि। महादेब बर, भंगिया भिखारी प्रवृत्तिक वर सदैव मैथिलानी केँ विशेष रूप सँ ब्राह्मण बालिका केँ भेटैत रहलथिन्ह अछि। बेमेल बिआह एखनो कतौ-कतौ दृष्टिगोचर होइत अछि। हालहि मे हम एक विवाह मे गेल रही। लड़की बहुत सुन्दरि, देहगरि, कटगर, देखनूत रहैक। लड़का कनि दब। ऊपर सँ एक हाथ मे कनि समस्या। राति भरि कतेक बेर स्त्रिगण सब चारि पंक्ति केर गीत गबैत रहली आ पश्चाताप करैत रहलनि। गीतक दू पंक्ति हमरा जीवन भरि लेल स्मरण भऽ गेल जे फकड़ा जकाँ व्यवहरित होइत रहैक: "लोहा मे जड़ि गेल सोना हम जिबै कोना" ज्ञातव्य इ जे अतए लोहा बर आ सोना कनिया छैक। प्रसँग विधवाक छल। चलू अहि दिशा मे चर्च करैत छी। वैधव्यक स्थिति बहुत खराप होइत छल। अगर इ घटना ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ अथवा आन उच्च वर्ग मे होइत छल तऽ स्थिति भयावह भऽ जाइत छल। बारह, तेरह, पन्द्रह वर्षक लड़की विधवा कतेक ठाम भऽ जाइत छलि। विधवा होइतहि पुनर्विवाहक तऽ कल्पनो नहि कएल जा सकैत छल, उपर सँ ओहि लड़कीक सब सुख-सिंगार, नीक भोजन आदि छीना जाइत छलैक। कतेक ठाम तऽ विधवा केँ अंग्रेजी दबाई तक ग्रहण करबाक आज़ादी नहि छलैक। ओकरा सुगधित तेल, साबुन, आदिक व्यवहार करब पर प्रतिबंध लागि जाइत छैक। ओ केश विन्यास नहि कऽ सकैत अछि, नव व्याहल बर कनियाक चुमान करब तऽ दूर, ओकरा लग ठाढ़ तक नहि भऽ सकैत अछि। जेहिना प्रथम सांझ मे असगर तारा देखब अशुभक लक्ष्ण अछि तहिना तऽ विधवा सेहो आब असगर तारा बनि गेल छथि! समस्त हाहाकार मचल अछि। यएह स्थिति केँ देखैत विद्यापति लिखैत छथि: “असगर तारा केओ नहि देख अमंगल लेख” विधबा पर प्रतिबंधक झड़ी लागि जाइत छनि। प्याज-लहसुन, माछ-मांस के पुछैत अछि गरिष्ट भोजन तक करबाक आज़ादी नहि रहैत छनि। हुनक जीवनक ऋतुचक्र जेना एक रंगाह भऽ जाइत छनि जाहि मे सब ठाम दुखक डंका बजैत रहैत छैक! निम्नलिखित फकड़ा के देखला सँ स्थिति स्पष्ट भऽ जाइत छैक: “विधवा घर मे सभ दिन भादब निरधन घर मे कातिक राजा घर मे सभदिन अगहन फागुन घर अहिबातिक” अहि तरहक विपत्तिक सामना करैत विधवाक करेज कराहि उठैत छैक। कुहेस फाटि कानए लगैत अछि। आ भगवान सँ कहैत छनि कोन पापक कष्ट ओ भोगि रहल अछि? ओ अपन वेदना ककरा कहतैक: “हे भगवान कोन कसूर विधना भेल बाम कहब दुःख ककरा सँ” एकर विपरीत पुरुख लेल कोनो प्रतिबंध नहि। पत्नीक निधन भेलाक बाद ओ सब किछु खा सकैत अछि। फेरो बिआह कऽ सकैत अछि। पत्नी मरलैक तऽ की भेलैक! फेर दोसर बिआह भऽ जेतैक। दोसरो पत्नी मरि गेलैक तऽ चिंताक कोनो प्रयोजन नहि, फेरो बिआह भऽ जेतैक! पत्नीक स्थिति अखरा नोनक ढेप सन होइत छैक – खसि पड़ल तऽ उठा लिय: “नोनक ढेप खसल उठा लेब” अति वृष्टि आ अनावृष्टि सँ मिथिला अदौ सँ परेशान रहैत आबि रहल अछि। लोक भूखे रहैत छल। स्त्रिगणक दशा तऽ आरो दयनीय छलनि। ओ बाहर जा नहि सकैत छलीह। भीख कोना मंगती? कखनो कुअन्न, कखनो साग पात, कतेक सांझ उपास करैत जीवन चलबैत छलीह। अहि तरहक स्थितिक विभत्सता दर्शा रहल अछि निम्नलिखित फकड़ा: “बिपत्ति जानि के आनल बजाय अरिपन के चाउर गेली चिबाय” स्थितिक गंभीरता देखू। घर मे स्त्रिगन नाना तरहक कष्ट सहैत रहैत छथि। अतेक खाराप स्थिति भऽ जाइत छनि जे अरिपन लेल जे चाउर राखल छनि सेहो चिबा जाइत छथि। कोनो महिला केँ अगर कियोक अनेड़े मजाक अथवा तंग करैत छनि आ हुनका लग काजक, मूलरूप सँ गृहकार्यक तऽ ओ बाजि उठैत छथि: “घरबला सँ फुरसत ने देओर माँगए चुम्मा” बाल विवाह एक समय मे बहुत पैघ समस्या बनि गेलैक। बेमेल विवाह जेना पसरि रहल छलैक। तकर विवरण कोना फकड़ा दैत अछि से देखू: “तिरिया तेरह, मरद अठारह कन्याक चमकए आँखि, बिआह होअय तमाम छौड़ी बेर-बेर देखए अएना” एक फकड़ा इ इंगित करैत अछि जे कोना महिला कुअन्न खा अपन प्राणक रक्षा करैत छथि आ कोना बूढ़ सँ बिआह कए बिआहक पतिया छोड़ा लैत छथि: “गुडा-खुद्दी खेलौं उपास भंग भेल बूढ़ बिआहलक कुमारि पद गेल” बेमेल विवाहक परिणिति नीक नहि होइत छैक। स्त्रिगन जीवन पर्यन्त ओहि वेदना आ सामाजिक उपहासक पात्र भऽ जाइत छथि। अनेड़े हुनका सँ पैघ उमेरि केँ लोक- स्त्री आ पुरुख सब हुनका जेठ कहि अपमानित करैत छनि। एहने मनोदशाक चित्रण निम्नलिखित फकड़ा मे देखाएल गेल अछि: “हम नहि बूढि गे हम नहि बूढि बूढबा बिआहलक तें हम बूढि” अर्थ स्पष्ट अछि, ओ महिला बूढि नहि छथि, परिस्थिति जाहि करणे हुनक विवाह बुढ़बा सँ भऽ गेल छनि ताहिं ओ बूढि छथि। उपरोक्त फकड़ा नारी मनोदशाक ओहि विशेष अवस्थाक गूढ़ मनोवैज्ञानिक सम्प्रेषण छैक। नारी मनोदशाक अनेक परत होइत छैक। अपन कष्टक सम्प्रेषण एक महिला लोक मात्र मे लोक व्यवहार मात्र सँ कऽ सकैत छलीह। लोक व्यवहार हुनका लेल ब्लैकबोर्ड छलनि। ओ मात्र हुनक स्पेस छलनि। महिला लोक आ किछु पुरुष बच्चा मात्र हुनक श्रोता। वेदनाक अधिकता सँ जखन करेजक कुहेस फाटैत छनि तऽ स्त्रीक दग्धल छाती सँ श्राप निकलैत छनि: “जे मोरा खेलनि खीरिया पुरिया तिनको होइहनु नाश” आर ओ की कऽ सकैत छलीह। हुनका लगैत छनि जे पुरुखक एहने कुकृत्य, अहँकार, निरंकुश व्यवहार सँ संसार मे अकाल, महामारी आदि भऽ रहल अछि। इ बात लोक सँ कखनोकाल मैथिली साहित्य मे सेहो अपन स्थान बना लैत अछि। बैद्यनाथ मिश्र “यात्री” आ काशीकांत मिश्र “मधुप”क रचना मे लोक जेना चढ़ि कऽ बजैत हो! लोक भाव साहित्यक प्रबल पक्ष बनि उठैत अछि। यात्रीक कलम नोर आ शोणितक धार बहबए लगैत अछि। नारी आ विधवा मनोदशा मे जेना ओ तह धरि घुइस जाइत छथि। एक-दू-सौ-सैकड़ा केँ पुछैत अछि, हजारक हज़ार विधवा हुनक माथ पर अपन व्यथा लेने सवार भऽ जाइत छनि। “बिलाप” कविता मे यात्री सत्यक अन्वेषण करैत कविता लिखैत छथि। यथार्थ चार चढ़ि बाजय लगैत अछि। केँ नहि कनैत अछि! पाठक, समाज आ कवि सब बहाबैत अछि नोरक धार: “विधवा हमरे सन हज़ारक हज़ार बहौने जा रहलि अछि नोरक धार ओहि मे ई मुलुक डूबि बरु जाय ओहिमे लोक-वेद भसिया बरु जाय अगड़ाही लगौ बरु बज्र खसौ एहेन जाति पर बरु धसना धसौ भूकम्प हौक बरु फटो धरती माँ मिथिले रहिये क’ की करती!” यात्री नहि रुकैत छथि दोसर-तेसर-चारिम विवाह करयबला बूढ़बा बर सब पर कलम उठा लैत छथि। अग्गब सामाजिक कुरीति पर प्रहार करैत रहैत छथि। नारी शोषण केँ पाठक हेतु पढबाक सामग्री बनबैत छथि। हुनक दोसर कविता “बूढा वर” सेहो एकर प्रमाण अछि। मुदा स्त्रिगन अपन बात ताबेत धरि लोक पटल मात्र पर करैत रहलनि। जमिन्दारक शोषण सँ तंग भेल बुचनीक प्रतिनिधि बनि अपन अमर रचना “घसल अठन्नी” मे मधुप बुचनीक मुँह सँ कहा लैत छथि जे शोषण आ अन्याय केँ चलते जगत मे भऽ रहल अछि अकाल। इ लोकक अभिव्यक्ति नहि तऽ की भेल? घसल अठन्नी केर बुचनी डरल जरुर रहैत छैक लेकिन अपन बात आ श्राप दुनू व्यक्त करैत अछि: आहा! देह तोड़ि क’ कएल काज सुपथो न बोनि अछि भेटी रहल तें जगमे ई पड़लै अकाल उठबितहिं डेग लागए अन्हार मरि जाएब एतइ ककरा कहबै? हित क्यो ने हमर अनुचितों पैघ जनके शोभा भगवान आह!” मधुप नारी शोषण केँ देखैत छथि, अनुभव करैत छथि, अपन ह्रदय मे ओहि परिस्थिति केँ आत्मसात करैत छथि, आ कलम हुनका स्त्रिगणक स्पोकपर्सन बना दैत छनि। कविता बनि पड़ैत अछि। मैथिली लोक परम्परा मे फकड़ा अनंत अछि – विपुल निधि जकाँ। कतबो ताकि लेब तैओ बहुत रहिये जाएत। लेकिन लोक व्यवहार मे ताकब तऽ कोनो निरर्थक नहि लागत। इ भेल फकड़ाक प्रयोजन आ उपयोगिता। जखन महिला कोनो वेदना सँ द्रवित होइत छथि आ हुनक बात कियोक नहि बुझैत छनि तऽ अनायास बाजि उठैत छथि: “गुड़क मारि धोकड़े बुझैत अछि” इ फकड़ा कतेक सार्थक छैक तकर अनुभूति या तऽ महिला कऽ सकैत छथि अन्यथा ओ जे नजदीक सँ ओहि वेदनाक प्रत्यक्षदर्शी रहल अछि। किछु एहि तरहक भाव निम्नलिखित फकड़ा मे कहल गेल छैक: “समाठक माइर उखैरे बुझैत छै” स्मरण इहो राखब जरुरी जे सब भाव अधलाहे नहि होइत छैक। मनोदशा प्रेमक सेहो होइत छैक। लोक जखन अधिक उधियाइत अछि तऽ कहल जाइत छैक: “टिटही टेकल पहाड़” अर्थ भेल अपन औकात सँ अधिक ने बाजी ने करी। कतेकबेर पति पत्नी अथवा कियोक आर अपन स्वयम केँ जीवन आ प्रेम अथवा व्यवस्था मे अतेक लीन भऽ जाइत छथि जे हुनका दोसरक जीवन अथवा सामाजिक मर्यादा केर भान खत्म भऽ जाइत छनि। एहन लोक लेल निम्न फकड़ा कतेक सटीक होइत छैक: “हम सुनरी की पिया सुनरी गामक लोक बनरा बनरी” उदाहरण अनेक अछि – बहुत अज्ञात आ कतेको ज्ञात। सबहक समावेश केनाइ पहाड़ सन लगैत अछि। एहि पर गंभीर काज करक दरकार छैक। इ विषय अनंत महासागर जकाँ अछि। अहि पर साहित्यक अतिरिक्त समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, नारीवाद विज्ञानं, मानवाधिकार, मानवशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास आदिक शोधकर्मी के विभिन्न उदेश्य आ परिकल्पना संग काज करक चाही। इ एक अलग संसारक रचना कऽ सकैत अछि। हमर आलेख केँ अनंत महासागर मे खसल किछु बुंद मात्र मानल जा सकैत अछि जकर समय पड़ला पर अपन उपयोग भऽ सकैत अछि। सन्दर्भ: मिश्र, कैलाश कुमार (2017). “मैथिली लोकगीतमे नारी-दुर्दशाक चित्रण”, घर-बाहर, वर्ष 17, अंक 61, जुलाइ-सितम्बर: 11-17. मिश्र, कैलाश कुमार (2018). “मिथिलाम अर्थात लोक सँस्कृति: एक परिचय” तीरभुक्ति, वर्ष 1, अंक 1, जुलाइ-सितम्बर: 29-35। मिश्र, पंचानन (2017). “मैथिली लोकोक्तिमे स्त्री-जीवन”, घर-बाहर, वर्ष 17, अंक 61, जुलाइ-सितम्बर: 18-20. वर्मा, रामचन्द्र (2009). लोकभारती बृहत् प्रामाणिक हिन्दी कोश. दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन. यात्री, बैद्यनाथ मिश्र (--). “बिलाप”, कविता कोश: kavitakosh.org यात्री, बैद्यनाथ मिश्र (--). “बूढ़ा वर”, कविता कोश: kavitakosh.org मधुप, काशीकांत मिश्र (---) “घसल अठन्नी”: गजेन्द्र ठाकुरक सँ कविता भेटल नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग (यायावरी-१) “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलाश जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल ई यायावरी स्तंभ दीर्घ काल तक स्थायी रहत ताहि कामनाक संग प्रस्तुत अछि अहाँ लोकनिक समक्ष ई पहिल खेप। यायावरी नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग -हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आऽ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आऽ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि। एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आ वर्णनकेँ पढ़थि आ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि। यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आऽ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी। अपन संस्था – इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आऽ विरासत केर रक्षा कएल जाऽ सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल। लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आऽ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आऽ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक। असम केर अधिकांश ऑफिस आऽ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी। स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक। शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आऽ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जाऽ सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आऽ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आऽ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। हमेशा ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि। गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आऽ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आऽ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जाऽ सकैत अछि: १.अपर असम २.लोअर असम ३.बराक घाटी ४.नॉर्थ कछार घाटी शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आऽ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी। शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब। गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आऽ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह। गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आऽ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह। समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आऽ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक। खैर! शर्माजीक प्रयास आऽ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जाऽ सकैत अछि। हमर कमरा काफी पैघ आऽ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आऽ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आऽ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आऽ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”। हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”। हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”। एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ। अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल। किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आऽ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आऽ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ। स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आऽ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। “हाफलाऊ” शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)। हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आऽ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक। अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आऽ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक। नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक लोक रहैत छथि: १.दीमासा (Dimasa or Cachari) २.ह्मार (Hmar) ३.जेमि नागा (Zeme Naga) ४.कुकी (Kuki) ५.बंइते (Baite) ६.कार्बी (Karbi) ७.खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar) ८.ह्रांगखल (Hrangkhals) ९.वइफी (Vaiphies) १०.खेलमा (Khelma) ११.रोंगमई (Rongmei) एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आऽ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आऽ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि। अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक। रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आऽ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आऽ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए। उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक। १८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक। नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आऽ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक। नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आऽ मइबांग)मे विभक्त अछि। अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आऽ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आऽ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर) ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आऽ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आऽ गाम सेहो चलब”। गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छञि? आऽ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ। जटींगा पहाड़ी आऽ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आऽ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक। अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आऽ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक। अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आऽ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक। आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आऽ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक। जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कहिं कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए। १९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आऽ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक। स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:. घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह। सभ कियो हमरा माध्यमसँ आऽ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आऽ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आऽ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आऽ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”। लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक। जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी: A harmonious game of hide and seek Behind the bushes, marshy meadow Under shadow with clouds view, Ever ready for worthwhile, cherish at dawn, The blues make enchanting heart of lovers Midst of covers white Changing scene that lively for romance Beauty and bounty of brooks that flow. Moments of joy, love to cherish Insight the harmony game of hide and seek Behind thick trespasses of white and blue With narrow path of zig-zag. The beauty of hills under cover Orchids, white fall, violet at hills Every moment thrilled with behalf Nature disposal at North Cachar Hills. नॉर्थ कछार हिल्स-२ (यायावरी-२) डॉ कैलाश कुमार मिश्र, इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे कार्यरत छथि। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलाश जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल यायावरीक प्रस्तुत अछि ई दोसर खेप। हमर एक बंगाली मानवशास्त्री मित्र छथि। हुनकर नाम छन्हि डॉ अभिक घोष। बहुत समर्पित लोक। अपन विषय मानव-विज्ञानक प्रति घोष साहेबकेँ अगाध प्रेम छन्हि। आइ-काल्हि पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़मे मानव-विज्ञान पढ़ा रहल छथि। झारखण्डक मुण्डा जनजातिपर पी.एच.डी. केने छथि। हालहिमे घोष साहेब हमरा लग हमर पुत्र शशांककेँ देखबाक हेतु दिल्ली आएल छलाह। हुनकासँ हम अपन नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक सम्बन्धमे चर्चा केलहुँ। ओऽ बहुत प्रसन्न भेलाह। कहलन्हि “कैलाशजी, हमर पत्नी उत्तर-पूर्व भारतक छथि। ओऽ हमेशा हॉफलोंग केर प्रशंसा करैत रहैत छथि। हालहिमे हम एक संगोष्ठीमे भाग लेबाक हेतु कलकत्ता गेल रही। ओतए सेहो हॉफलोंग केर प्रसंग चललैक। कलकत्तामे बंगालक एक प्रसिद्ध पत्रकार अमिताभ चक्रवर्ती हमरा कहलन्हि जे नॉर्थ कछार हिल्स भारतक स्वीटजरलैण्ड थीक”। डॉ अभिक घोषक एहि बातपर हम कहलियन्हि “अभिकजी, हमरा अइ बातक जानकारी दियऽ, की अमिताभ चक्रवर्ती अरुणाचल प्रदेशक तवांग गेल छलाह”? “हँ हँ, अनेको बेर”। अभिक फटाकसँ बहुत आत्मविश्वासक संग हमर प्रश्नक उत्तर देलन्हि। फेर ओऽ एहि बातकेँ स्पष्ट करए लगलाह, “देखू। दुनू स्थानक अपन-अपन महत्व छैक। तहिँ तुलना करब उचित नहि। पुनःश्च हम तवांग गेल छी, परन्तु नॉर्थ कछार हिल्स जयबाक अवसरसँ एखन धरि वंचित छी। ताहिँ एहि सम्बन्धमे कुनो टिप्पणी करब यथोचित नहि”। हमरा दिस मुँह कय आँखिक भंगिमाकेँ हमरापर सत-प्रतिशत केन्द्रित करैत डॉ अभिक घोष हमर ध्यानकेँ अपन कथ्यपर आकर्षित करैत कहलाह, “कैलाशजी, अहाँ एहि विषयपर सोचबाक लेल एवं निर्णय लेबाक लेल सही आदमी छी। कारण अहाँ दुनू स्थान-तवांग आऽ नॉर्थ कछार हिल्स- केर चप्पा-चप्पा घुमल छी”। हम डॉ अभिक घोषक बातपर अपन मूरी हिला देल। कनिक कालक बाद हम नॉर्थ कछार हिल्सक परिवेशमे एक बेर पुनः मानसिक रूपसँ पहुँचि गेलहुँ। जुआएल, पाकल, सुखाएल, कुम्हलाएल, अधपाकल, खिच्चा, कोमल, हरियर, गाँठसँ भरल झुण्डक-झुण्ड बाँसक बीट हमरा मोनमे स्मरण आबए लागल। कल-कल करैत टेढ़-टाढ़ नदी, सुन्दर हरियर पहाड़ी, नव बालक-बालिका, युवक, युवती एवं वृद्ध अपन परम्परागत बहुरंगी वस्त्रमे नचैत-गबैत विभोर भेल हमर मानस पटलपर रंगमंचक अद्वितीय नायक एवं नायिका जकाँ स्मरण होमय लागल; लागल जेना सरिपहुँ हम सेकेण्डोमे दिल्लीक शोरगुलसँ हजारो किलोमीटर दूर असम राज्य केर नॉर्थ-कछार हिल्समे पहुँचि गेलहुँ। की धरती, की पहाड़, की संस्कृति आऽ केहेन आत्मीय आऽ रमनगर लोक! जतेक प्रशंसा करी कम। अनुभूतिकेँ याद करैत आत्मिक प्रसन्नता होइत अछि। यायावरीकेँ आगाँ बढ़बैत पुनः नॉर्थ कछार हिल्स चली। बात बांसक करैत रही। साधारणतया ५०-६० वर्षक अन्तरालमे बांसमे एकाएक फूल आबय लगैत छैक। फूल केहेन तँ धानक धानक सीस जकाँ। दाना सेहो धाने जकाँ। फूल पकलाक बाद नीचाँ खसय लगैत छैक। मूस सभ ओहि फूलकेँ धान बुझि झुण्डक-झुण्डमे आबि ओकरा कुतरनाई प्रारम्भ कऽ दैत छैक। मूसक संख्या आवश्यकतासँ अधिक भऽ जाइत छैक। फलस्वरूप जखन धानक खेतीक समय होइत छैक, तखन जतेक धान लोक सभ बीयाक रूपमे बाऊग करैत अछि, मूस सभ एक-एकटा धानक बीयाकेँ खाऽ जाइत छैक। लाख प्रयासक बादो लोक धान उगेबामे असमर्थ भऽ जाइत अछि। परिणाम ई होइत छैक जे घोर अन्नक आपदा समस्त क्षेत्रमे व्याप्त भऽ जाइत छैक। एहि आपदासँ अरुणाचल प्रदेश आऽ सिक्किमकेँ छोड़ि लगभग समस्त उत्तर-पूर्व भारतक भू-भाग कहियो ने कहियो तवाह होइते टा अछि। हालांकि आइ काल्हि सरकारी मदति भेटैत छैक। कृषक सभ सेहो जागरुक भेल जाऽ रहल छथि; समय रहिते मूस मारबाक एवं मूसकेँ भगेबाक पूर्ण इन्तजाम कएल जाइत छैक। आब कल्पना कऽ सकैत छी जे एहेन विभिषिकासँ हानि कम हेतैक। बांसक फुलेनाइक चर्चा करैत छी तँ अरुणाचल प्रदेशक चर्चा केनाई अनिवार्य। जेना कि बता चुकल छी जे एहि प्रदेशक लोक एहि विभिषिकासँ नहि प्रभावित होइत छथि। एकर कारण ई जे अरुणाचल प्रदेशक तमाम भू-भागक आदिवासी लोकनि मूस पकरबामे निपुण होइत छथि। एतबहि नहि मूस हिनका लोकनिक बहुत रुचिगर भोजन छन्हि। जखन हम लोअर दिवांग घाटी आऽ लोहित जिलामे भ्रमण करैत रही तँ लोक सभकेँ (विशेषण रूपेण इदू मिसमी, दिगारु मिसमी, मिजो-मिसमी तथा खामती जनजाति) मूसक शिकार करैत आऽ ओकर मांस खाइत देखलहुँ। एहि परम्पराक नीक परिणाम ई होइत छैक जे बांस फुलेलाक उपरान्तो मूसक जनसंख्यापर नियन्त्रण बनल रहैत छैक, आऽ एतय केर लोक बांस फुलेला उपरान्त होमय बला विभीषिकासँ बचल रहैत छथि। हमरा लोकनि नॉर्थ कछार हिल्स केर तमाम जनजातिक स्त्रीगण सभकेँ जिलाक तमाम क्षेत्रसँ बजा समाजक विकास एवं सांस्कृतिक उन्नतिमे नारीक योगदानपर अलग-अलग जनजातिक महिलाकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ अलग-अलग समूहमे राखि हुनका लोकनिकेँ विचारसँ अपना-आपकेँ अवगत कराबय चाहैत रही। स्पष्ट कऽ दी जे ई एकमात्र कार्यक्रम नहि छल। अनेक कार्यक्रममे ईहो एकटा महत्वपूर्ण कार्यक्रम छल। एकर परिणामसँ हम गदगद भेल रही। ई कार्यक्रम पाँच दिन चलल। पाँचो दिन महिला लोकनि हमरा लोकनि केर अनुमानसँ ज्यादेक संख्यामे उपस्थित छलीह। सभ दिन अपन परम्परागत वस्त्र, आभूषण एवं दैनिक जीवनक रूपरेखा प्रस्तुत करैत। भेल जे श्रृंगारक जंगलमे छी। एहेन जंगल जकर कल्पना मात्र कैल जाऽ सकैत अछि। वास्तवमे एहेन रंगमंच- उत्साहमय आऽ जीवन्त जीवनक आऽ संस्कृतिक निर्माण असंभव। परन्तु छल तँ सत्य आऽ संभव भेल अनुपम दृश्य! हरेक महिला समूहमे हमरा लोकनिक तीन-चारि कार्यकर्ता साक्षात्कार करबाक हेतु तथा अधिकसँ अधिक जानकारी प्राप्त करबाक हेतु तत्पर छलाह। एहि कार्यकर्ता लोकनि केर चुनाव हमरा लोकनि अपन सहयोगी-संस्था- श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सहयोगसँ केने रही। तमाम कार्यकर्ता स्थानीय छलाह एवं हॉफलोंग हिन्दी, अंग्रेजी आऽ असमिया भाषाकेँ झूरझार बाजैत आऽ लिखैत छलाह। कार्यकर्तामे आधासँ अधिक लड़की सभ छलीह। हम प्रतिदिन प्रातः सभ समूहकेँ मुख्य हॉलमे बैसा अपन कार्यशालाक उद्देश्यक जानकारी सहभागी लोकनिकेँ दैत छलियन्हि। अगर किनको कुनो तरहक संशय रहल तँ तकरो निराकरण करबाक प्रयास करैत छलहुँ। अपन संस्कृति, संस्कार एवं संस्कारक नीक चीज एवं परम्पराक रक्षा आधुनिकताकेँ स्वीकारैत केना करी ताहिपर हम प्रभावपूर्ण ढंगसँ जोर दैत छलहुँ। हमरा एना बुझना जाइत छल जेना सहभागी महिला लोकनि एवं स्थानीय पत्रकार सभ हमरासँ प्रभावित छलाह। स्थानीय अखबारमे एवं टेलीविजनपर नित्य समाचार अबैत छल। प्रति दिन सांझमे सांस्कृतिक कार्यक्रम होइत छलैक, आऽ अन्ततः भोजन (रात्रिक भोजन)सँ पहिने कार्यकर्ता लोकनि हमरा दिन भरिक क्रिया-कलापक सम्बन्धमे संक्षिप्त जानकारी दैत छलाह। ओहि जानकारीक आधारपर हम अगिला दिन की करी तकर निर्देश दैत छलियन्हि। कार्यक्रम अपन पूर्ण गतिसँ चलि रहल छल। एक दिन साँझमे हम चाह पिबैत रही। ओतए दिमासा जनजातिक किछु महिला हमरा लग आबि निवेदन केलन्हि, “श्रीमान्! कनी हमरा लोकनिक कार्यशालामे चलब?” हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य जाएब”। आऽ चाहक प्याला हाथमे लेने विदा भऽ गेलहुँ। हमर एहि व्यवहारसँ ओऽ सभ गदगद भऽ गेलीह। जखन हम पहुँचलहुँ तँ ओतए केर माहौल दोसरे जकाँ रहैक। तीन स्थानीय पत्रकार अपन कैमरा संग आऽ एक टी.वी.पत्रकार गुवाहाटीसँ आयल छलाह। ई महिला लोकनि हमरा पत्रकारक समक्ष अपन परम्परामे हाथक बनाओल कलात्मक चद्दरिसँ स्वागत करक हेतु बजेने छलीह। हम एहि बातकेँ सुनि कनी घबरेलहुँ। कारण एहि तरहक परम्परामे हमरा नेतागिरी केर दुर्गन्ध बुझना जाइत अछि। परन्तु दिमासा महिला लोकनिक स्नेहकेँ अपमानित हम नहि करय चाहैत रही। ताहिं चद्दरिकेँ स्वीकार कएल। एकर बाद देखैत छी जे तमाम जनजाति समूहसँ दू-तीन महिला चद्दरि, गमछा आदि लय हमर स्वागत हेतु आयल छथि। लोकक स्नेह देखि मोन भरि आएल। सभसँ भेँट स्वीकार कएल। फेर सोचए लगलहुँ: “जखन ई सभ एतेक नीक छथि तँ आतंकवादी गति-विधि, खून-खरापा किएक? की समस्याक समाधान लोक सभसँ मिलि कऽ नहि भऽ सकैत अछि”? ई बात सोचए लगलहुँ। लोकक प्रेममे आकंठ भऽ गेलहुँ। अतबेमे कार्बी जनजाति समूहक तीन महिला अयलीह। ओऽ सभ कहलन्हि: “श्रीमान्, कनी हमरा सबहक कार्यशालामे पाँच मिनट हेतु चलबैक”? हम बिना किछु कहने अपन मूरीकेँ स्वीकारात्मक अवस्थामे हिलबैत कार्बी महिला सबहक कार्यशाला दिस प्रस्थान केलहुँ”। ओतए गेलाऽ पर दलक महिला लोकनि कहय लगलीह: “श्रीमान्, अहाँ लोकनि प्रथम बेर हमरा सभकेँ ई अवसर देलहुँ अछि जे हम सभ अपन समाज, अपन संस्कृति, अपन परम्परा दिस ताकी। परम्पराक ताकतिकेँ आँकी। एतए तँ इसाईयत, आधुनिकता, शिक्षा एवं आतंकवादक कारणेँ लोक सभ परम्परा बिसरल जाऽ रहल अछि। अपन जनजातिक ढंगसँ रहनाई, व्यवहार केनाई, खेनाई-पिनाई, गीत-नृत्य आदि तँ आजुक युगमे पिछड़ापनक निशानी छैक। किछु जनजातिक लोक जे इसाईयतकेँ अपन धर्म स्वीकार कऽ लेलन्हि अछि, तनिका लोकनिकेँ विवाह आदिक तमाम रीति क्रिश्चियन रीतिक अनुरूप करए पड़ैत छन्हि। गिरजाघरमे विवाह केनाई, आधुनिक वस्त्र अर्थात् पेन्ट-शर्ट पहिर कऽ विवाह केनाई। ओऽ लोकनि चाहैतो अपन जनजातिक सनातनीक परम्परासँ विवाह, जन्म-संस्कार एवं मृत्यु संस्कार नहि कऽ सकैत छथि। लेकिन अहाँक कार्यशालाक बाद हमरा लोकनि एहि तथ्यपर गंभीरतासँ विचार कऽ रहल छी। धर्म कुनो भऽ सकैत अछि, परन्तु स्थानीय परम्पराक पालन अवश्य हेबाक चाही। स्थानीय परम्परा धरती, एतए केर वातावरण, पानि, पहाड़, परिस्थिति जे अटूट रूपेँ जुड़ल छैक। ई सभ बात हमरा लोकनि अहीँ सबहक कारणेँ एहि कार्यशालाक माध्यमसँ बुझि सकलहुँ अछि”। हम मोनहि मोन प्रसन्न भेलहुँ आऽ अपन संस्थाक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीक दूरदर्शितापर आश्चर्य होमए लागल हमरा। जखन-कखनो ओऽ हमरा एहि तरहेँ अनेक चीज संगे करय कहैत छथि, तखन हमरा बुझाइत छल जे ई हमरा मनुक्ख नहि सर्वशक्तिमान भगवान बनबय चाहैत छथि, जे कहियो सम्भव नहि थीक। एतेक चीज कहीं एक संगे संभव छैक? परन्तु आइ पता चलि गेल जे अगर नीक भावनासँ सही ढंगसँ कार्य कएल जाय तँ सभ किछु संभव छैक। ओहो मनुक्ख द्वारा। एहि हेतु भगवान बनक कुनो प्रयोजन नहि। हम ई बात सोचि रहल छलहुँ। एकाएक एक परम्परागत परिधानमे सजल कार्बी महिला हमरा लग अयलीह आऽ कहलन्हि: “मिश्रा साहेब, एक बात कही”? हम कहलियन्हि: “हँ, हँ। अवश्य कहू”? ओऽ महिला बजलीह: “ अहाँ जखन संस्कृति इत्यादिक सम्बन्धमे हमरा लोकनिसँ बात करैत छी तँ बड्ड नीक लगैत अछि। आब हम सभ विचार केलहुँ अछि जे सप्ताहमे कमसँ कम एक दिन अपन परम्परागत वस्त्र एवं गहनामे अवश्य रहब। लेकिन एक चीज हमरा सभकेँ पहिले दिनसँ परेशान कऽ रहल अछि। अहाँ मिथिलासँ छी। पढ़ल-लिखल छी। समस्त भारतक परम्पराकेँ जनैत छी। परम्पराक नीक चीजकेँ पालन हो आऽ ओऽ चीज शाश्वत रहय ताहि लेल प्रयासरत छी। परन्तु अहाँ कहियो अपन परम्पराक वस्त्रमे हमरा सभ लग नहि अएलहुँ। हमरा सभकेँ एहि चीजसँ आश्चर्य भऽ रहल अछि। हमरा लोकनि एहि विषयपर काफी विचार-विमर्श कएल आऽ अन्ततः एहि निष्कर्षपर पहुँचलहुँ जे अहाँसँ एहि सम्बन्धमे बात करी। आशा अछि अहाँ हमरा लोकनिक भावनाकेँ सही अर्थमे लेब। एकरा अन्यथा नहि मानब”। हम बिना कोनो देर केने अपन गलतीकेँ स्वीकार कऽ लेलहुँ। हम ओहि कार्बी महिलाकेँ कहलियन्हि: “ई हमर घोर गलती थीक। शायद दिल्ली शहरक जीवन चक्रमे फँसि हम अपन परम्परासँ दूर भऽ गेल छी। हमरा अहाँक विचार उत्तम लागल। अहाँ हमरा अपन मोनमे अपन मैथिली परम्परा आऽ संस्कारक प्रति घोर आस्था जाग्रत केलहुँ, ताहि लेल हम अहाँक प्रति हृदयसँ आभार व्यक्त करैत छी। अहाँ बातकेँ अन्यथा भला केना लऽ सकैत छी? हम अहाँकेँ वचन दैत छी, जे हम आब जतए कतहु जाएब एक जोड़ धोती-कुर्ता अवश्य लऽ जाएब आऽ कमसँ कम एक दिन अपन मिथिलाक परम्परागत परिधानमे अवश्य रहब”। हमर एहि बातसँ ओऽ कार्बी महिला बड्ड प्रसन्न भेलीह। एकर बाद हम कार्बी कार्यशालासँ दिमासा जनजातिक कार्यशाला दिस गेलहुँ। दिमासा जनजातिक महिला लोकनिक कार्यशालामे एहि बातपर चर्चा चलैत रहैक जे शहर (अर्थात् हॉफलोंग) केँ साफ एवं स्वच्छ रखबाक लेल महिला सभकेँ की करक चाही। हम पुछलियन्हि: “अहाँ सभ एकटा बातक उत्तर दिअ। की एहि हॉफलौंग शहरमे गन्दगी नहि फैलैक, एतय मच्छड़ आदिक प्रकोप नहि हो, ट्रैफिक निअमक पालन होइक, ई कर्तव्य ककर छैक? सरकारक? प्रशासनक? पुरुषक? नेताक? आकि आनो ककरो? अहूँ लोकनिक अर्थात् एतय केर सजग महिला सभक सेहो”? हमर एहि प्रश्नक उत्तर देमाक हेतु एक अधेर महिला अयलीह। ओऽ कहलन्हि: “श्रीमान् शहर तँ सबहक छैक। की महिला आऽ की पुरुष! एकटा उदाहरण हम एहि सम्बन्धमे देमय चाहैत छी। किछु दिन पूर्व हॉफलोंग शहरमे मलेरियाक भयंकर प्रकोप भेलैक। चारु कात गन्दगी पसरल रहैक। सड़कपर सफाई नहि। ककरो एहि बातक चिन्ता नहि। नॉर्थ कछार ऑटोनोमस काउन्सिलक अधिकारीगण एवं नेता लोकनिसँ दिमासा महिला एसोसिएशन केर सदस्य सभ बात केलन्हि तँ ओऽ लोकनि आश्वसन देलाह परन्तु ओहि आश्वासनपर कोनो कार्यवाही नहि केलन्हि। मलेरियाक कारणेँ स्त्रीगणक जीवन नर्क बनल छलैक। बच्चा सभ ज्यादे परेशान। बच्चाक कारणेँ मायो परेशान। की करु की नहि। अन्ततः हमरा लोकनि शहरक सफाई करक बीड़ा स्वयं अपना हाथमे लेल। करीब पचास महिला एकत्रित भेलहुँ। पच्चास टा बाढ़नि, पच्चास पथिया, पाँच कोदारि कीनल आऽ सफाई केर अभियानमे लागि गेलहुँ। सर्वप्रथम जिलाधिकारीक ऑफिसक बाहरक गन्दगीकेँ साफ करए लगलहुँ, फेर ऑटोनोमस काउन्सिलक दफ्तर, फेर शहरक रोड। सामान्य जनता सँ गीत गाबि-गाबि एवं अपन सफाई अभियानसँ शहरकेँ साफ रखबामे मदति करबाक निवेदन करय लगलहुँ। एक दिन तँ लोक सभ हमरा सभपर ध्यान नहि देलाह। परन्तु दोसर दिन पत्रकार सभ एहि बातकेँ उजागर केलन्हि आऽ सरकार, प्रशासन एवं नेताक अकर्मण्यताक बारेमे लिखय लगलाह। आब लोक सभकेँ एहसास भेलन्हि जे गलती भेल। तेसर दिन एकाएक समस्त प्रशासन साकांक्ष भऽ गेल आऽ चप्पा-चप्पामे सफाई होमए लगलैक। हमहूँ सभ जनता लोकनिसँ साफ एवं स्वच्छ रहबाक निवेदन करैत रहलहुँ। शहर हमर अछि तँ एकर ध्यानो हमरे सभकेँ राखए पड़त”। दिमासा महिलाक एहि जवाबसँ लागल जे नीक चीजक श्रीगणेश संसारक छोटसँ छोट कोनसँ भऽ सकैत अछि। समाजमे जागृति लेबाक लेल महिला वर्गक योगदान अतुलनीय भऽ सकैत अछि। दिमासा महिला हमरा कहलन्हि: “श्रीमान्, हमरा लोकनिक आनो अनेक तरहक समाजक समस्या छैक जाहिपर एकजुट भए कार्य करए चाहैत छी। पुरुषक शराब पीनाई, एकसँ अधिक पत्नी रखनाई आदि किछु एहन विषय छैक जाहिपर हमरा लोकनि गम्भीरतासँ सोचि रहल छी”। हम जवाब देलियन्हि: “अहाँ लोकनिक प्रयास प्रशंसनीय अछि। अहाँक प्रयोग प्रभावकारी अछि। एहि तरहक प्रयोग सूतल प्रशासन एवं अधिकारी सबहक निन्द खोलबाक नीक औषधि थीक। हमरासँ जतेक मदति संभव भऽ सकत से हम करब”। ओऽ महिला कहलीह: “दिमासा महिला उत्थान समिति नामक एक संस्थाक गठन हमरा लोकनि केलहुँ अछि। एकरा हमरा लोकनि दिल्लीसँ अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे रजिस्ट्रेशन करबय चाहैत छी। एहि पंजीकरणमे अहाँक सहायता चाही। अगर पंजीकरण भऽ गेल तँ हमरा लोकनि अनेक तरहक कार्य करब”। हम उत्तर देलियन्हि: “अहाँ लोकनि जखन चाही दिल्ली आबि जाऊ। हम दू-तीन दिनक भीतर अहाँ संस्थाक पंजीकरण अखिल भारतीय संस्थाक रूपमे पंजाब रेगुलेशन एक्ट केर अन्तर्गत सोसाइटीक रूपमे करबा देब। एहिमे कोनो तरहक पैसा इत्यादि नहि लागत”। दिमासाक बाद हम जेमि नागा महिला समूह द्वारा आयोजित कार्यशाला दिस बढ़लहुँ। जेमि नागाक सम्बन्धमे ई जानकारी देनाई उचित जे ई नागा मात्र असम टा मे रहि गेल अछि। आन राज्यमे तीन नागा मिलि एक जिलियांगरोंग (zeliangrong) बनि जाइत अछि। तहिँ नागा बहुल प्रदेश नागालैण्ड आऽ मणीपुरमे एकर स्वतंत्र अस्तित्व नहि रहि जाइत छैक। सच पूछी तँ जेमि जनजातिक महिला सबहिक आभूषण एवं वस्त्र सभसँ आकर्षक आऽ मनोहारी लागल। जेमि महिला लोकनि कहलीह जे हुनकर सबहक अपन महिलाक संस्था छन्हि। संस्थाक उद्देश्य जेमि नागा समुदायमे अपन संस्कृति आऽ परम्पराक रक्षा केनाई छैक। एक उद्देश्य इहो जे एहि समुदायक लोक इसाईयतकेँ नहि स्वीकार कय अपन मूल जनजातीय धार्मिक मान्यता आऽ आस्थासँ जुड़ल रहथि। नागालैण्डमे लगभग ९५ प्रतिशत नागा समुदाय केर लोक इसाई भऽ चुकल छथि, स्थिति कमो-बेश मणीपुरक नागा समुदायक सेहो यैह छन्हि। परन्तु सौभाग्यसँ नॉर्थ कछार हिल्स केर जेमि नागाक अधिकांश परिवार एखनहुँ धरि अपन मूल मान्यता, धर्म, देवी-देवता, पूजा-पद्धति आदिसँ जुड़ल छथि। जिमि नागा महिला समूहमे एकटा २७ वर्षीय अविवाहित युवती भेटलीह। हुनकासँ पताचलल जे जिमि नागाक महिला सभ अपन संस्कृतिक रक्षाक प्रति बड्ड सचेत छथि। ओऽ २७ वर्षीय नागा नायिका हमरा ईहो बतेलीह जे ओऽ तीन वर्ष धरि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर मुख्यालय नागपुरसँ प्रशिक्षण लय आयलि छथि। हम कहलियन्हि: “अहाँकेँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केर वातावरण केहन लागल? ओतए केर लोक सभ हिन्दू धर्मक प्रति अनेरे निष्ठा तँ नहि जगेबाक प्रयास कयलन्हि? एहि सभ कारणेँ अहाँकेँ अपन जनजातीय धार्मिक विश्वास आऽ रीति-रिवाजपर कोनो आघात तँ नहि पड़ल”? हमर प्रश्नक उत्तर दैत नागा नायिका कहलन्हि: “की कहि रहल छी श्रीमान्! ओऽ लोकनि तँ हमरा सभकेँ हमेशा यैह कहलन्हि जे अपन मान्यता, धर्म, परम्परा आदिक त्याग नहि करू। अगर परम्परामे कोनो अन्ध-विश्वास अथवा विनाशकारी तत्व अछि तँ ओकर निदान अवश्य करू। जेना हमरा लोकनि परम्परासँ जानवर आदिक बलि चढ़बैत छी। ओऽ सभ कहैत छथिकि अगर संभव भऽ सकय तँ कमसँ कम मिथुन, साँढ़ या भैंसाक बलि दिअ। जिमि नागा समुदायमे बियाहल स्त्रीगण सिन्नूर नहि लगबैत छथि। फेर कोनो लड़कीकेँ देखि ई पता कोना लगाएल जाऽ सकैत अछि कि ई लड़की कुमारि अछि आकि व्याहता? परम्परागत संस्कृतिकेँ अगर पालन करी तँ ई बात सहजतासँ पता चलि जाइत अछि। परम्परा तँ ई छैक जे कुमारि कन्या विवाहसँ पहिने कपारक आगाँ किछु केशकेँ आधा कटा ओकरा कपारपर लटकबइत अछि। संगहि कनपटीपर केश विन्यास करैत अछि। एहिसँ सहजतासँ पता चलि जाइत छैक कि फलाँ-ने-फलाँ लड़की कुमारि थीकि”। हम ओहि नागा नायिकासँ प्रश्न केलियन्हि: “अहाँ ई बताऊ जे व्याहता महिला केर पहचान फेर कोना होइत छन्हि”? हमर प्रश्नक जवाब दैत ओऽ नागा नायिका कहय लगलीह: “विवाह होइते नागा महिला कपार परक केसकेँ कटेनाई बन्द कऽ दैत छथि आऽ केसकेँ कपारपर नहि लटका माथक सीथ दिस ऊपर कय बान्हय छथि। संगहि विवाह होइते मातरि नागा महिला कनपट्टी बला किछु लट दुनू कात कटा लैत छथि। एहिसँ कियोक सहजतासँ पता लगा सकैत अछि कि फलाँ ने फलाँ स्त्रीगण व्याहता थीकि”। नागा नायिका फेर हमरा कहय लगलीह जे प्रतिवर्ष समस्त बराक घाटी आऽ नॉर्थ कछार पहाड़ी केर जेमि नागा लोकनिक महिला सभ जनवरी-फरवरी मासमे कोनो दिन कोनो-ने-कोनो जिमि नागा गाँवमे जुटान करैत छथि। मर्दक कोनो प्रयोजन नहि। प्रत्येक जिमि नागा गामक महिला सभमे एक प्रधान, एक सहायक तथा एक ट्रेजरार होइत छथि। मर्दक कार्य केवल एतेक जे शामियाना लाबथि, स्टेज बनाबय इत्यादिमे महिला लोकनिकेँ मदत करथि। हजारक संख्यामे स्त्रीगण सभ अबैत छथि। हुनका लोकनिकेँ रहबाक एवं खेबाक इन्तजाम गामक महिला सभ करैत छथि। प्रत्येक घरमे तीन-चारि या सामर्थ्यक हिसाबे कम-ज्यादे महिला सभ रहि जाइत छथि, जाय कालमे अतिथि गामक महिला सभकेँ अपना संगे आनल चाऊर, किछु पाई, हरियर तरकारी आदिक संग किछु पाई दऽ दैत छथिन्ह। एहिसँ ककरोपर कोनो अनेर भार नहि पड़ैत छैक। प्रत्येक वर्ष नव पदाधिकारीक चुनाव होइत छैक, एवं अगिला वर्षक जुटान कोन गाममे हैत तकर निर्णय सेहो लेल जाइत छैक। एहि महिला सभाक उद्देश्य मूल रूपेण परम्परागत जिमि नागा जनजातिक परम्पराकेँ महिला लोकनिक माध्यमसँ बचेबाक थीक। ई सभा एक सांस्कृतिक जनचेतना थीक। एकर सूत्रधार छलीह महान स्वतंत्रता सेनानी आऽ परम गम्भीर, चतुर्मुख प्रतिभासँ सम्पन्न जेलियांगरोंग नागा समुदायक रानी गैदीन्लयू (Gaidinliu)। गैदीन्ल्यूक जन्म आजुक मणीपुर प्रान्तमे २६ जनवरी १९१५ ई. मे भेल छ्लन्हि। हुनकर गाम तामेंगलोंग जिला अन्तर्गत तौसेम सब-डिवीजनमे छन्हि। गामक नाम लोंगकाओ छैक। कहल जाइत छैक कि प्रारम्भहिसँ गैदीन्ल्यू जिनका कि स्थानीय लोक सभ रानी माँ कहैत छन्हि, बहुत प्रतिभासम्पन्न आओर साहसी छलीह। ब्रिटिश सरकारक सामाजिक आर राजनैतिक क्रिया-कलाप देखि तेरह वर्षक छोट अवस्थामे रानी माँ विचलित भऽ गेलीह आऽ एकरा विरुद्ध संघर्षक बिगुल बजेबाक प्लान करए लगलीह। किंवदन्ती तँ ई छैक जे छोटे उमरिमे रानी माँ मे दैविक शक्ति प्रवेश कऽ गेलन्हि। हुनकर एहि आश्चर्यजनक शक्तिक भान सर्वप्रथम हुनक पिताकेँ भेलन्हि। रानी माँ के तेरहम अवस्थामे पहुँचैत एहि बातक अनुभूति होमय लगलन्हि जे अंग्रेज सभ प्रशासनके मादे आऽ पुनः क्रिश्चियन मिशिनरी केर माध्यमसँ आजुक तीन उत्तरपूर्वी राज्य- असम, नागालैण्ड आऽ मणीपुर- केर नागा जनजातिक तमाम उपजाति सबहक संस्कृति, संस्कार आऽ परम्पराक नाश कऽ रहल अछि। ठीक ओही क्षण रानी माँ हैपु जदोनांग नामक नागा विद्रोहीसँ भेँट केलन्हि। जदोनांग रानी माँ केँ बतेलखिन्ह जे केना क्रिश्चियन मिशिनरीक लोक सभ स्थानीय संस्कृति आऽ संस्कारक सर्वनाश कऽ रहल अछि। जदोनांग महोदयक दर्शनसँ प्रभावती भय रानी माँ हुनकर परम अनुयायी भऽ गेलीह। फेर की छल १९२७ ई. मे एकाएक लोक सभ आन्दोलन प्रारम्भ कऽ देलक। रानी माँ ओहि आन्दोलन केर प्रमुख सूत्रधारमे एक छलीह। लोक सभ एकाएक अंग्रेजक शुल्क आऽ बलपूर्वक बेगारीक प्रथाक विरोध करय लागल। सबतरि हड़ताल पडि गेलैक। धीरे-धीरे चारि-पांच वर्षमे आन्दोलन अपन पराकाष्ठापर चढ़ि गेल। दुर्भाग्यसँ ओहि समय हैपू जदोनांगकेँ अंग्रेज सभ छलसँ कैद कऽ लेलकन्हि आऽ कनिकबे दिनक बाद २९ अगस्त १९३१ ई. मे आजुक मणीपुर राज्यक राजधानी इम्फालमे फाँसीपर निर्दयतापूर्ण ढंगसँ चढ़ा देलकन्हि। एहि घटनासँ रानी माँ बड्ड दुखी भेलीह, परन्तु अपन निश्चय पर चट्टान जकाँ ठाढ़ि छलीह। आब आन्दोलन केर समस्त कमान रानी माँ के हाथमे आबि गेलन्हि। कतेक ठाम हुनकर गुरिल्लानुमा अनुयायी सभ अंग्रेज सभकेँ पश्त कएलक। अंग्रेज सिपाही सभ रानी माँ के युद्ध कौशलसँ त्राहि-त्राहि करय लागल। अही नॉर्थ कछार धरतीक हंगरुम नामक गाममेअंग्रेज सिपाही आऽ रानी माँक समर्थकक बीच भयानक संघर्ष भेलैक। बादमे घोर तामसमे आबि अंग्रेज सभ समस्त गामकेँ आगिमे झोँकि देलकैक। जान-मालक बड्ड क्षति पहुँचलैक। एतबहि नहि अंग्रेज अधिकारी लोकनि एक गुप्त मीटिंग केलन्हि जाहिमे ई निर्णय लेल गेलैक जे कियोक रानी माँक हुलिया बताओत तकरा प्रशासन दिससँ पाँच सय टका इनाम देल जेतैक। परन्तु रानी माँक प्रति कछार हिल्स, मणीपुर तथा नागालैण्डक लोककेँ बड्ड श्रद्धा छलैक। दुर्भाग्यसँ वर्तमान नागालैण्ड प्रान्तक पोइलवा गाम सँ १७ अक्टूबर १९३२ ई. मे अंग्रेज सैनिक रानी माँ केँ बन्दी बना लेलकन्हि। एहि सैन्य टुकड़ीक संचालन कैप्टन मैकडोनाल्ड करैत छलाह। रानी माँक दुनू हाथ बान्हि देल गेलन्हि। रौदमे बान्हल हाथ उठेने ठाढ़ छलीह। एक रस्ता चलैत बूढ़केँ नीक नहि लगलन्हि। तमसा कऽ बाजि उठलाह: “सर्वनाश हो अहाँ लोकनिकें। लाजे मरि नहि होइत अछि। एक महिलाक दुनू हाथ बान्हि ऊपर उठेने छी। मर्द छी तँ हाथ खोलि दियौक”? ताहिपर अंग्रेज सिपाही बूढ़ापर चिचिआए लगलन्हि। बूढ़ो आव देखलाह ने ताव। उठेलन्हि एकटा पाथर आऽ प्रहार कऽ देलन्हि। संयोगसँ अंग्रेज सिपाही बचि गेल। तुरतहि बूढ़ाकेँ कैद कऽ लेलकन्हि। तीन मासक बाद बूढ़ाक उम्रकेँ ध्यानमे रखैत हुनका जेहलसँ रिहा कऽ देल गेलन्हि। रानी माँ इम्फाल, तूरा, कोहिमा आऽ शिलांगक जेहलमे अपन समय बिताबय लगलीह। १९३७ ई. मे पण्डित जवाहर लाल नेहरू रानी माँ सँ शिलांगक जेहेलमे भेंट केलथिन्ह आऽ हुनका प्रति अपन सम्वेदना व्यक्त केलाह। हुनका जेहलसँ बाहर निकालबाक प्रयास सेहो पण्डितजी करय लगलाह। नेहरू जी रानी माँकेँ पहाड़ीक बेटीक संज्ञा देलथिन्ह आऽ हुनकर नामक संग सर्वप्रथम रानी जोड़ि देलथिन्ह। नेहरू जी रानी माँक तुलना जॉन ऑफ आर्क आऽ रानी लक्ष्मीबाई सँ केलथिन्ह। हालांकि रानी माँ केँ छोड़ेबामे नेहरूजी असमर्थ रहलाह। अन्ततः भारतक आजादी भेटलाक उपरान्त १४ अक्टूबर १९४७ ई. मे लगभग १५ वर्ष विभिन्न जेलमे रहलाक बाद रानीमाँ आजाद भेलीह। हालांकि किछु वर्षक बाद रानी माँ अपन जनजातीय धर्म एवं संस्कारपर क्रिश्चियन संस्था द्वारा आघात बर्दाश्त नहि केलन्हि आऽ पुनः अण्डरग्राउण्ड भय संघर्ष करय लगलीह। १९६० ई मे सेहो हुनकर लगभग ३०० समर्थकक जान चलि गेलन्हि। बादमे रानी माँकेँ १९७२ ई. मे ताम्रपत्र स्वतन्त्रता सेनानी अवार्ड, १९८१ मे पद्म भूषण आर १९८३ मे विवेकानन्द सेवा अवार्ड देल गेलन्हि। अन्ततः १७ फरबरी १९९३ केँ लगभग ७८ वर्षक अवस्थामे रानी माँ पंच तत्वमे विलीन भऽ गेलीह। एखनहुँ धरि स्त्रीगण सभ (विशेष तौरपर नॉर्थ कछार हिल्स केर जिमि नागा जनजातिक स्त्रीगण) सभ रानी माँ केँ सामाजिक आऽ राजनैतिक चेतनाक मन्त्रकेँ स्मरण करैत अपन संस्कृति आऽ सभ्यताक रक्षामे लागलि छथि। नॉर्थ कछार हिल्समे अनेको तरहक प्रयोग हमरा लोकनि कएल। आन प्रयोग सभ पूर्णतः शैक्षणिक आऽ दार्शनिक छल। तँहि पाठकसँ ओहि विषय सभपर चर्चा कय हम अनेरे बोर नहि करय चाहैत छियन्हि। नॉर्थ कछार हिल्स केर यात्राक यायावरीकेँ एतय अन्त कऽ रहल छी। लोअर दिवांग घाटी: इदु-मिसमी जनजातिक अनुपम संसार (यायावरी-३) डॉ कैलाश कुमार मिश्र, इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे कार्यरत छथि। “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलाश जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल यायावरीक प्रस्तुत अछि ई तेसर खेप। क्षेत्रफलक दृष्टिकोणसँ अरुणाचल प्रदेश सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व भारतमे सबसँ पैघ राज्य थीक। हालाँकि जनसंख्याक घनत्व एतए सबसँ कम छैक। समस्त राज्य हरियर जंगल, पहाड़सँ भरल; रम्य आ आकर्षक। एहि राज्यमे २६ मूल जनजाति अनेक उपजातिक संग रहि रहल अछि। अरुणाचलक अधिकांश क्षेत्रमे पहुँचनाई आइयो बहुत कठिन कार्य छैक। एक ठाम पहुँचबाक हेतु कतेको बेर नदी पार केनाइ, कतहु पक्का सड़कक नहि भेनाइ, कतहुँ जमीन धसि जेबाक कारणेँ रस्ता अवरुद्ध भऽ गेनाइ इत्यादि सामान्य बात छैक। एहि कठिन परिस्थितिक कारण एतय केर जनजाति सब एखनो धरि अपन मूल परम्परा, खान-पान, आभूषण, वस्त्र-विन्यास, रीति-रिवाजकेँ सहेजने छथि। अनेक दिस चीन एवं आन अन्तर्राष्ट्रीय सीमासँ सटल भारतक ई नैसर्गिक प्रदेश सौन्दर्यक दृष्टिसँ भारतवर्षक श्रृंगार थीक। एकर प्राकृतिक स्वरूपक जतेक प्रशंसा कएल जाय से कमे होयत। अरुणाचलक नाम लैते मात्र तवांग, ईटानगर (प्रदेशक राजधानी), बोमडिला, बन्दरदेवा, रोईंग, जीरो, तिराप, सुबंसरी, नामसाई आ अनेक रम्य स्थान हमरा मानस पटलमे घुमय लगैत अछि।, आ घुमय लगैत अछि रंग-विरंगक परम्परागत परिधानसँ सजल अरुणाचल प्रदेशक जनजाति- सेड्रोपेन, खामती, आदी, इदू-मिसमी, दिगारु-मिसमी, मिजो-मिसमी, आपातानी इत्यादिक झुण्डक-झुण्ड अपन सहजतामे हँसैत आ आबय बला प्रत्येक अतिथिकेँ अपन स्वभाविक आ स्वीकारात्मक मुस्कानसँ स्वागत करैत। बिना कहने सब किछु कहैत। ताहिँ यायावरीक एहि अंकमे हम अपन लोअर दिवांग घाटी जिलाक यात्रा वृत्तान्तक चरचा कऽ रहल छी। प्रदेशक दिवांग घाटी दू भाग- अपर दिवांग घाटी आ लोअर दिवांग घाटीमे बाँटल छैक। हम अपन यात्रा अपन संस्थाक एक सहयोगी डॉ. ऋचा नेगीक संग दिसम्बर २००७मे केने रही। लोअर दिवांग घाटी तँ ठीक रहैक परन्तु अपर दिवांग घाटी जनपदमे अति बर्फ खसलाक कारणेँ बिल्कुल अवरुद्ध छलैक। ताहिँ हमरा लोकनि ई निर्णय लेलहुँ जे अपना आपकेँ सिर्फ लोअर दिवांग घाटी जनपद तक सीमित राखब आ ओतय केर इदु-मिसमी जनजातिपर कार्य करब। कार्यक मतलब ई जे इदु-मिसमीक जीवन-चक्र, गृह-निर्माण, पावनि-तिहार, वस्त्र-विन्यास, श्रृंगार-प्रसाधन, गहना, विवाह, कृषि-कार्य, स्त्री-पुरुषक सम्बन्ध, परम्परागत क्रीड़ा आदिक विस्तारसँ प्रलेखन आ डाक्युमेन्टेशन केनाइ। इदु-मिसमीक भाषा, संस्कृतिसँ अपना-आपकेँ अवगत करेनाइ। डॉ. ऋचा नेगी एक प्रतिष्ठित आ वरिष्ठ मानवशास्त्री प्रोफेसर रघुनाथ सिंह नेगीक पुत्री छथि। ओना तँ हिनकर शिक्षा अंग्रेजीमे एम.ए. एवं अंग्रेजीयेमे लोक नाट्यपर छन्हि, परन्तु भ्रमणमे खूब मोन लगैत छन्हि। ई अलग बात छैक जे ओ एको आखर लिखयसँ सदरिकाल बचबाक बहाना बनबयमे माहिर छथि। ऋचाजीकेँ समस्त अऋणाचल प्रदेशसँ अथाह प्रेम छन्हि। हमरासँ ज्यादे ओ अरुणाचल प्रदेशमे रहैत छथि। जखन-कखनहु हमरा लोकनि उत्तर-पूर्व भारतक यात्रा करैत छी तँ गोवाहाटी जाइते मात्र ऋचाजी कोनो-ने-कोनो बहाना बनाय अरुणाचलक हेतु प्रस्थान कऽ जाइत छथि। पुनः दिल्ली वापस अयबाक नियत तिथिसँ एक-दू दिन पहिने गोवाहाटी आबि जाइत छथि। कद-काठी, उजरी गोराइ एहेन छन्हि जे सहजतासँ अरुणाचलमे खइप जाइत छथि। लम्बाई पाँच फुटसँ ज्यादे नहि हेतन्हि। एहि सब कारणेँ अरुणाचलमे लोक ऋचाजीकेँ स्थानीय बुझैत छन्हि। एहि बातपर ओ बड्ड प्रसन्न रहैत छथि। बात लोअर दिबांग घाटी जनपद केर यात्राक सम्बन्धमे करैत रही। ई हमर प्रथम यात्रा छल, परन्तु ऋचाजी एकबेर पहिने आबि एहि जनपद केर डिस्ट्रिक्ट रिसर्च ऑफिसर, भाषा अधिकारी, जिला कला आओर संस्कृति अधिकारी एवं किछु स्थानीय लोक सभसँ बातचीत कय कार्यक्रम केर रूपरेखा बना कऽ गेल छलीह। ताहि परियोजनाक कार्यान्वयनमे हमरा लोकनिकेँ कोनो तरहक दिक्कत नहि भेल। लोअर दिबांग घाटी जनपद केर मुख्यालय केर नाम रोईंग छैक। रोईंग ओना तँ जनपद केर मुख्यालय थीक परन्तु जनसंख्या आदिक दृष्टिएँ एना लागत जेना कोनो प्रखण्ड-स्तर केर कस्बा हो। ताइमे रोईंग पहुँचनाइ बहुत दुश्कर। हमरा लोकनि दिल्लीसँ हवाई जहाजसँ असम राज्य डिब्रूगढ़ अयलहुँ। डिब्रूगढ़सँ दू टाटा सूमो टेक्सी लेल। एक टेक्सीमे हम आ डॉ. ऋचा नेगी आ दोसर टेक्सीमे हमरा लोकनिक विडियो कैमराक सदस्य लोकनि अपन असला-खसला लय सवार भऽ गेलाह। डिब्रूगढ़ हवाई अड्डासँ हमरा लोकनि तीनसुकिया अयलहुँ। ओतय जरूरीक किछु समान जेना कि टॉर्च, रेनकोट, छत्ता, खयबाक हेतु नमकीन आदि कीन रोईंग लेल प्रस्थान कएल। तीनसुकियासँ रोईंग कोनो बड्ड दूर नहि छैक। लगभग ७५-८० किलोमीटर हेतैक मुदा पहुँचनाइ दुष्कर। सर्वप्रथम हमरा लोकनि सदियाघाट नामक स्थान जे कि ब्रह्मपुत्र नदीक कछेरपर छैक, पर पहुँचलहुँ। ओतयसँ एक प्राइवेट फेरीवलासँ बात कय अपन दुनू टेक्सीक संग ब्रह्मपुत्र पार करबाक हेतु मोटरबला नावमे सवार भेलहुँ। सवार होमाक प्रक्रिया मात्रमे लगभग सवा घन्टा लागि गेल। आब हमरा लोकनिक नाव ब्रह्मपुत्रक दोसर कछेरक यात्राक हेतु प्रस्थान कऽ चुकल। नावकेँ चलिते एना बुझायल जेना कोनो समुद्रक बीच आबि गेलहुँ। चारू दिस जलमग्न। ऊपरसँ साँझ से भऽ गेल रहैक। ब्रह्मपुत्रक शान्त स्वभाव आ नावक मोटरक पानि काटक प्रक्रियाक कारणेँ एक अलग किस्म केर बनैत पानिक स्वरूप, वर्षाक कारणेँ मटियाएल पानि, हमरा नीक लगैत छल। नाव बला सभ कहलक जे सदियाघाटसँ दोसर दीयरा दिस जायमे लगभग सवा घंटा लागत। लगभग १० मिनट पानिमे चललाक बाद नावक मलाह अपन खोलीसँ एक छोट छिन्ह बोतल निकाललक। बोतल पौआ देशी दारुक रहैक। आधा भरल। दू आरमी बिना पानि मिलेने आधा-आधा घटकि लेलक आ जय कमला मइया कहैत खाली बोतलकेँ ब्रह्मपुत्रमे फेंकि देलकैक। पुनः ओ सब आपसमे मैथिलीमे वार्तालाप प्रारम्भ केलक। हम पुछलियैक: “अहाँ लोकनि कतय केर छी”? हम सब बिहारक छी”। ओ सब उत्तर देलक। हम पुनः पुछलियैक:”बिहारक छी से तँ हम बुझि गेलहुँ, बिहारक कोन जिलामे अहाँ लोकनिक घर थीक?” ताहिपर ओ जवाब देलक- “हमरा लोकनि पूर्णियाँ जिलासँ छी”। एहिपर हम कहलियैक- “हम मधुबनीसँ छी”। एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरु कऽ देल। मलाह हमर दिस इंगित भय कहलक- “सरकार अहाँ लोकनि कतयसँ आयल छी”। एहिपर हम कहलियैक, “हम मधुबनीसँ छी”। एकर बाद हमरा लोकनि अपन वार्तालाप मैथिलीमे शुरू कऽ देल। मलाह हमरा दिस इंगित भय कहलक: “सरकार अहाँ लोकनि कतयसँ आयल छी”? हम जवाब देलियैक: “दिल्लीसँ। हमरा लोकनि भारत सरकारक अधीनस्थ कर्मचारी छथि। लोअर दिबांग घाटी जिलामे ओतय केर लोकक विशेषतः इदु-मिसमी जनजातिक संस्कृतिकेँ बुझबाक हेतु एवं ओहि संस्कृतिपर कार्य करबाक हेतु आयल छी”। हमर जवाब सुनि मलहबा भैया पुछलक: “सरकार, अहाँ सब कहियासँ कहिया धरि लोअर दिबांग घाटीमे रहब? लोअर दिबांग घाटीक मुख्यालय रोईंग छैक। रोईंगमे कतय रहब”? हम कहलियैक: “भाई, हम सब दिन भरि तँ भिन्न-भिन्न गाम सबमे कार्य करब आऽ रातुक विश्राम रोईंग केर कोनो होटलमे करब। रोईंगक ई हमर प्रथम यात्रा थीक ताहिँ होटल आदिक नाम हमरा बुझल नहि अछि। हँ ओतय केर जिला शोध अधिकारी श्री श्रुतिकर हमर पूर्व परिचित लोक छथि। हमर जे महिला सखी छथि (डॉ. ऋचा नेगी) सेहो रोईंग एवं आस-पास केर इलाकासँ पूर्व परिचित छथि। श्री श्रुतिकर एवं डॉ. ऋचा नेगी दुनू गोटे मिलि सम्भवतः नीक जगहमे हमरा लोकनिक रात्रि-विश्रामक व्यवस्था करतीह ई विश्वास अछि। जहाँ तक कार्य करबाक बात छैक तँ हमरा लोकनि २४ फरबरीसँ १ फरबरी २००८ धरि सम्पूर्ण लोअर दिबांग घाटीमे कार्य करबाक योजना बना कऽ आयल छी। आगाँ भगवानक मर्जी”। हमरा लोकनि बात करिते रही, ओहि बीच एकाएक बरखाक एक-आध बुन्द खसय लगलैक। हम डरि गेलहुँ। भेल कहीं बीच ब्रह्मपुत्र धारमे नहि फँसि जाइ। डरैत पुछलियैक : “कहीं जोरसँ बरखा तँ नहि हेतैक? आ भेलैक तऽ हमरा लोकनि केर की गति हैत”? हमर अकुलायल प्रश्नसँ परेशान होइत मलहबा भाइ हँसैत एवं निर्भीक स्वरमे बाजल- “सरकार, अनेरे किएक परेशान भऽ रहल छी? ई बरखा ओना तँ हैत नहि आ किनसाइत भइयो गेल तँ चिन्ताक कोनो बात नहि। हमसब जलकर केर सन्तान छी। महाराज कोइलाबीरक पुजारी छी। कोशी माइ केर कोरामे बढ़ल छी। कहू मालिक! कोसीसँ खतरनाक भला कोनो धार दुनियाँमे भला भऽ सकैत अछि? कमलेसरी मैयाक कृपा हमरा सब पर छन्हि। लगभग १५ बरखसँ नाव चला रहल छी, आइ तक कोनो दुर्घटना नहि घटित भेल। बिना कमलेसरी आ कोइलाबीरक सुमिरन केने घरसँ नहि निकलैत छी”। मलहबा भाइ केर ढ़ाढ़ससँ मोन कनि चैन भेल। वार्तालापक कड़ी टूटल नहि। हम पुछलियैक: “अहाँ सब हमरा ई कहू जे पुरनियाँसँ सरिमाघाट कोना अयलहुँ। मलहबा भैया कहलक : “सरकार, पेट अनलक। गाममे बड्ड गरीबी छल। एकटा बाभनसँ हमर बाबू तीन सय टाका हमर बहिनक बियाह लेल सूदिपर लेलकैक। एहि आशामे जे धान-पानि नीक जकाँ हैत तँ धान बेचि एवं मखानक खेतीक पाइसँ कर्जा सधा देबैक। दुर्भाग्यसँ लगातार तीन बरख कोसीमे बाढ़ि अबैत रहलैक आ बभनाक पाइ सधेनाइ तँ दूर हम सब अपन पेट भरक लेल धान आ अन्न सेहो डेढ़ापर लय लेलियैक। सब टा चीज बढ़ैत गेलैक। अन्ततः पाँच बरखक बाद डकूबा बभना सब टा जोरि-जारि चालिस हजार टका बना देलकैक। गाममे पंचैती बैसलैक। हमर बूढ़ बाबूकेँ बभनाक बेटा सभ बान्हि कऽ मारलकैक। हमरा सबहिक तीन बीघा जमीन बलजोरी लिखा लेलक”। “मालिक! मरता क्या नहीं करता! एक दिन साँझ खन हमर बाबू हमरा दुनू भाइकेँ बजौलक आ कनैत कहलक। ’बौआ! हम तँ बीट-बीट धरतीकेँ बेचि देलियौ। आब तोँ सब धरतीहीन छैं। जो कलकत्ता-असम कतहुँ कमा आ पाइ भेज जाहिसँ गुजर चलौक ’। एकर बाद बाबू हमरा दुनू भाइकेँ पकड़ि जोर-जोरसँ कानय लागल”। “बाबूक बात तँ सत्य छलैक। हमर दुनू भाइ गामसँ कनियाक गहना बन्हक राखि कलकत्ता आबि गेलहुँ। कलकत्तामे मोहियाबुर्ज नामक स्थानपर रिक्शा चलाबय लगलहुँ। शुरूमे तँ बड्ड थकान भेल परन्तु धीरे-धीरे मोन लागि गेल। बाबू आ बच्चा सबहक बड्ड ध्यान अबैत छल। एक दिन साँझमे टेलिग्राम आयल जे “बाबू मरि गेल”। देखियौ सरकार, हमर बाबूक दुर्भाग्य, मरऽ काल हम दुनू भाइ बाबू लग नहि रहियैक। हमर पितियौत आगि देलकैक”। “बाबू श्राद्धमे गाम गेलहुँ तँ किछु लोक कुटमैतीक नोत पूरक हेतु अयलाह। ओ सब कहलनि असम चलू। हम सब असम आबि गेलहुँ। तहियेसँ सदिया घाटमे छी। बाबू तँ हमर जमीनक शोकमे मरि गेल, मुदा हम सब १५ बरखमे पाँच बीघासँ ऊपर जमीन लेलहुँ। माय एखनहु जीबैत अछि। माय हमेशा कहैत अछि। ’रे रामओतार! तोहर बाऊ तोरा स्वर्गसँ आशीर्वाद दैत छौह। बभनाकेँ देख, कुष्ट फुटि गेल छैक। बेटासभ लगो नहि अबैत छैक। घरबाली मरि गेलैक। अपने असगरे टाहिं-टाहिं करैत अछि’। सरकार हमरा सबकेँ होइत अछि जे स्वर्ग-नरक सब एहि धरतीमे छैक”। हम रामओतारकेँ कहलियैक- “हमरा बड्ड प्रसन्नता भेल जे तोँ सब एतय इमानदारीसँ मएहनति कय सम्पत्ति अर्जन करैत छह। नीक चीजक परिणाम नीके होइत छैक”। संयोग नीक छल। कनीक बुन्दी-बान्दी भय आकाश स्वच्छ भऽ गेलैक। बरखा नहि भेलैक। मोन खरहर भऽ गेल। ओना जनवरी-फरवरी महिना प्रचण्ड जाड़, बरखा आ बर्फ खसबाक समय छैक लोअर दिबांग घाटीमे। अपर दिबांग घाटी तँ एहि मासमे आबाजाही साफे बन्द भऽ जाइत छैक। समस्त इलाका बर्फ आऽ पानिसँ भरल। रस्ता सबपर बर्फक परत दर परत जमल रहैत छैक। स्थानीय लोक सब दू तीन मास पहिने जरूरी समान जेना कि नोन, तेल, मसल्ला, दवाइ, वस्त्र, इन्धन, अन्न आदिक भण्डारण कऽ कए राखि लैत अछि। खैर! थोरेक कालक बाद घाटक दोसर कछेरपर हमरा लोकनि पहुँचि गेलहुँ। आब राति भऽ गेल छल। पता चलल जे ओतयसँ रोईंग शहर लगभग ५५ किलोमीटर केर दूरीपर अवस्थित छैक। ५५ किलोमीटरमे लगभग १५ किलोमीटर दियारा अर्थात् बालु आ कादोसँ भरल कच्चा रस्ता। पहिने गेल गाड़ीक लीकपर चलैत रही। खूब सावधानीक संग। ड्राइवरक गति आ दिमाग दुनू चीजक आश्चर्यजनक सामंजस्यक संग चलबाक जरूरत। से नहि भेल तँ कतहुँ फँसि जाएब। हमरा लोकनिक गाड़ी टाटा-सूमो छल। गाड़ीक ड्राइवर धर्मा बड़ा तेज आ बातूनी। ऋचा नेगीकेँ हाँ मे हाँ मिला कऽ बेबकूफ बनेबामे माहिर। ओना ड्राइवरीमे ओतेक निपुण नहि जतेक बात बनेबामे। हम सब अन्हरिया रातिमे ओहि सुन-सान दियारामे जाइत रही। एकाएक गाड़ीक पछिला चक्का थालमे फँसि गेलैक। हम सब कियो बाहर निकललहुँ। किछु कारणवश ऋचाजी सँ बाताबाती भऽ गेल रहए ताहिँ वार्तालाप नहि चलैत छल। ऋचाजी अपन शेखी बखारय लगलीह। तुरत अपन भायक दोस्त जे कि गोरखा रेजीमेन्टमे छलन्हि तकरा फोन करय लगलीह। एम्हर हमरा लोकनि डण्टा आऽ खन्तीसँ पछिलका चक्का आ मडगार्ड लग जमल माटिकेँ हटाबय लगलहुँ। लगभग आधा घण्टा धरि ऋचाजीकेँ फोनो नहि लगलन्हि। जखन लगलन्हि तँ गोरखा रेजीमेन्ट केर ऑफिसर सब कहलकन्हि जे आबयमे ओकरा सबकेँ थोरेक देर लगतैक कारण ओऽ सब कोनो दोसर ठाम फँसल गाड़ीकेँ निकालबाक हेतु पहिनेसँ कतहु गेल छैक। खैर! हमरा लोकनि अपन प्रयासमे लागल रही। हमरा लोकनिक मणीपुरी कैमरामेन या विडियोग्राफर रोनेल हाओबाम आ जेम्स बड़ा उत्साही युवक छलाह। ओ सभ पूर्ण तन्मयताक संगे कादो निकालयमे लागल रहलाह। हुनका लोकनिक साहसकेँ देखैत हमहू सेतु बान्हक लुक्खी जकाँ कनी-कनी माँटि निकालैत रहलहुँ। हमरा सभ लग दुर्भाग्यसँ टॉर्च आदि सेहो नहि छल। ओहि बीचमे धर्मा ड्राइवर बाजल जे एहि रस्तामे चलबाक हेतु जरूरी छैक जे गाड़ीमे एक कोदारि, एक खन्ती, एक टॉर्च आदि लऽ कऽ चलए”। धर्मा पहिनहुँ ऋचाजीक संग लोअर दिबांग घाटीमे आबि चुकल छल। हम आब ओकरापर कनी तमसेलहुँ- “तोँ पहिने किएक नहि खन्ती, कोदारि, टॉर्च आदि नहि अनलैंह? जखन रस्ताक बारेमे बूझल छलौक तँ एना केयरलेस किएक”? ऋचाजी धर्माकेँ बचेबाक मुद्रामे हमरा लग अयलीह। एहिसँ पहिने जे ओऽ किछु बजितथि, हम कहलियैन- “अहाँ लेल नीक हैत जे अहाँ एकौ शब्द नहि निकालू। हम एखन घोर तामसमे छी! अहाँ सभ पहिने की एतय पिकनिक मनेबाक हेतु आयल छी”? ऋचाजी हमर तामससँ पूर्व परिचित छलीह। ओऽ चुपे रहबामे अपन कल्याण बुझलनि आ किछु बातक जवाब नहि देलीह। ओना रोनल आऽ जेम्स केर जतेक प्रशंसा करी से कम। दुनू बिना एकौ मिनट केर आरामक कादो हटबैत रहलाह। हमहूँ तमसाइत, चिचियाइत रहलहुँ मुदा कादो हटेबाक कार्यकेँ रुकय नहि देलियैक। अन्ततः हमरा लोकनि अपन उद्देश्यमे सफलता प्राप्त कएल। गाड़ी कादोसँ बाहर भेल। आब रातिमे बौआइत डेराइत हमरा लोकनि अपन गन्तव्य दिस बढ़य लगलहुँ। लगभग १५ किलोमीटर आगाँ बढ़लाक बाद गोरखा रेजीमेन्ट बला सब एक जीप आऽ एक ट्रकक संग हमरा लोकनि लग आयल। धर्मा ड्राइवर ओकरासभकेँ बता देलकैक जे हमरा लोकनिक टाटा सूमो स्वतः हमरा लोकनिक प्रयाससँ ठीक भऽ गेल। मुदा ऋचाजी कतय मानयबाली। सेना जीपकेँ रोकबाक इशारा करैत स्वयं गाड़ीसँ बाहर अयलीह। हाथ मिलेलन्हि। मुद्रा एहेन बनेली जेना भारतक तीनू सेनाक सर्वोत्कृष्ट अधिकारी होथि। हम तामसे भेर रही। खैर लगभग साढ़े दस बजे रातिमे हमरा लोकनि रोईंग आबि एक स्थानीय होटलमे अयलहुँ। आब पानि खूब जोरसँ होबय लगलैक। होटलक मैनेजर एक बंगाली भद्रलोक छलाह। कनीक फुचफुचाएल। लगभग ६२ वर्षक श्यामवर्ण। मोटुका चश्मा धारण केने। हम सभ जखन होटल अयलहुँ तँ पता चलल जे जिला शोध अधिकारी डॉ. पी.के.श्रुतिकर एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमि पुलू महोदय हमरा लोकनिक रहय केर व्यवस्था डॉ. ऋचा नेगीसँ दूरभाषसँ भेल बातचीतक आधारपर पूर्वहिँ एहि होटलमे केने छलाह। डॉ. श्रुतिकर स्वयं कतहु व्यस्त छलाह ताहिँ लोअर दिवांग घाटीक जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि एवं जिला भाषाधिकारी श्री जेमिपुलूकेँ हमरा लोकनिक स्वागत एवं दिशा निर्देशन हेतु होटलमे पठा देने रहथि। जार प्रचण्ड रहैक। थर-थर कँपैत आ ऊपरसँ पानिमे भिजैत कोनो तरहेँ हमरा लोकनि होटलक प्रांगणमे प्रवेश केलहुँ। होटलक स्वागत कक्षमे प्रवेश करिते मात्र बिजली गुम भऽ गेलैक। अन्हार गुप्प!!! होटल केर मैनेजर साहेब तुरत एकटा १३-१४ वर्षीय बच्चाकेँ बजौलाह। ओऽ बच्चा सेहो मोतीहारी जिलाक रहैक। बच्चाकेँ डटैत मोमबत्ती लयबाक निर्देश देलथिन्ह। हम कहलियन्हि- “एतय जेनेरेटर केर व्यवस्था नहि छैक की”? ताहिपर गोगोई लींगि महोदय कहलाह- “एतय ई सभ सुविधा कोना भेटत? एतय केर सभसँ नीक होटल यैह छैक। समय कोहुना बिताबय पड़त। एहिसँ नीक समस्त रोईंग शहरमे कोनो स्थान नहि छैक”। कनीक कालक बाद ओ बच्चा (होटल केर नौकर) तीन टा मोमबत्ती लय हमरा लोकनि लग एक आरो नौकरक संग आयल। पता चलल जे हमरा लोकनिक व्यवस्था होटल केर तेसर तल्लापर अछि। जखन तेसर तल्लापर पहुँचलहुँ तँ घोर पश्चाताप भेल। तमाम कमरासभ दुर्गन्धसँ भरल। कोनो कमरामे लैट्रिन-बाथरूम संलग्न नहि, मूस सभ एम्हर-ओम्हर दौड़ैत; ओछाओन सभ मैल, मसुआएल आ दुर्गन्धसँ भरल। भेल, हे भगवान। कतय आबि गेलहुँ। अन्ततः एक कमरा कनीक नीक लागल। हम अपन लैपटॉप बला बैग लय ओहि कमरा दिस आगाँ बढ़ि कहलियैक जे- “हमर समान एतय राखू”। बीचहिमे जिला कला एवं संस्कृति अधिकारी श्री गोगोई लींगि महोदय झटाक दऽ बाजि उठलाह- “नहिँ, नहिँ। एहि कमरामे अहाँ नहि रहि सकैत छी। कोनो आन कमरा पसन्द कऽ लिअ। ई कमरा हमरा लोकनि डायरेक्टर महोदया लेल सुरक्षित रखने छी”। ई कहि गोगोई लींगि ऋचाजीक बैग लय ओहि कमरामे आबि गेलाह। फेर होटलक नौकरकेँ निर्देश देलथिन्ह: “एहि कमराकेँ ठीकसँ साफ कय डॉ. ऋचा नेगी लेल तैयार करह”। हम तामसे भेर भऽ गेलहुँ। तामससँ काँपैत कहलियैक: “कियोक डायरेक्टर नहि अछि एतय। जैह ऋचा नेगी छथि, सैह हमहुँ छी। दू तरहक कमराक निर्देश अहाँ लोकनिकेँ के देलक”? तावत ऋचाजी ओतय आबि गेल छलीह। ओऽ तुरतहि अपन गलतीकेँ ठीक करऽ लगलीह। गोगोई लींगिसँ हमर परिचय करओलन्हि: “ई डॉ. कैलाश कुमार मिश्र छथि। हम सभ दुनू गोटे शोध अधिकारी छी। ई ज्यादे काल असम, मणीपुर, मेघालय, नागालैण्ड, त्रिपुरा आदिमे व्यस्त रहैत छथि। अरुणाचल मूलतः हमहीँ अबैत छी। हिनका यैह कमरा देल जाय”। हम ऋचाजीकेँ किछु नहि कहलियन्हि। अपन समान ओही कमरामे राखि लेल। गोगोई लींगि महोदय एवं भाषाधिकारी जीमि पुलू महोदयसँ हाथ मिला अपन समान सभ ठीक करय लगलहुँ। ओऽ सभ ऋचाजी एवं हमर टीमक आन सदस्य सभ लेल कमराक व्यवस्थामे लागि गेलाह। आब बिजली सेहो आबि गेल छलैक। हम मुँह हाथ धोबय चाहैत रही। मुदा पानि सर्द एतेक जेना बर्फ हो। की करू? घंटी बजाय मैनेजर साहेबकेँ बजाओल आ निर्देश देलोयन्हि जे तुरत गरम पानिक व्यवस्था करओल जाय। पन्द्रह मिनटक बाद एक लड़का एक बाल्टीन पानि लए प्रवेश कएलक। आब हम कपड़ा बदलि मुँह हाथ धोलहुँ। हाथमे थाल इत्यादि लागल छल। तकरा नीक जकाँ साफ कयल। कनीक कालक बाद रात्रिक भोजन केर व्यवस्था भेल, मोटका चाउरक भात, हरियर तरकारी, स्थानीय साग, मुर्गाक मांस, मसुरिक दालि, टमाटर, पियाज, मुरइ, हरियर मिरचाई इत्यादि केर सलाद। रोटीक कल्पना केनाई मूर्खता। ताहिँ भोजन करय लगलहुँ। मुदा भोजनमे कोनो स्वाद नहि। भूख हदसँ ज्यादा, मुदा स्वादहीन भोजन खाऊ तँ कोना! तावतमे कैमरामेन रोनल आ जेम्स हमरा लग आबि गेलाह। कहलन्हि- “सर, ई भोजन अहाँ नहि खाऽ सकैत छी। स्थानीय मसाला आऽ बिना तेलक बनल छैक। हमरा लोकनि बड्ड भुखायल छी। एतय एक सप्ताह रहबाक सेहो अछि। अहाँ दू पैग रमक लऽ लिअ। जाड़ सेहो ठीक भऽ जाएत। एक आज्ञाकारी शिष्य जकाँ हम बिना कोनो तर्क केने रोनल आ जेम्सक बात मानि लेलहुँ। जेम्स एक स्टील बला ग्लासमे एकै बेर दू पैग रम ढारि पानिसँ भरि हमरा लग अनलन्हि। हम धीरे-धीरे पी लेलहुँ। आ नीक जकाँ भोजन कय डायरी लीखय लगलहुँ। कनीक कालक बाद ऋचाजी अयलीह। कहलन्हि: “हम अहाँसँ किछु बात करय चाहैत छी”। हम कहलियन्हि: “हम एखन बात करबाक मूडमे नहि छी। काफी थाकल छी। अपसेट सेहो छी। अहाँ हमरासँ भोरमे बात करू। ऋचाजी फेर कहलन्हि- “हमरा बुझा रहल अछि जे गोगोई लींगिक बातसँ अहाँकेँ हमरा प्रति किछु गलतफहमी भऽ गेल अछि। हम ओकरा दूर करए चाहैत छी। हमरा मात्र ५-१० मिनट समय दिअ। हम फेर चलि जाएब”। हम साफ मना कऽ देलियन्हि। “देखू ऋचाजी। हम एखन बहुत डिस्टर्ब आऽ थाकल छी। अहाँसँ हम कोनो तरहक वार्तालापक मूडमे नहि छी। जतेक गलतफहमी अछि तकरा भोरमे ठीक करब। एखन हम असगर रहए चाहैत छी। चिन्तन करए चाहैत छी। आऽ पुनः सुतए चाहैत छी। अहूँ थाकल छी, जाउ आऽ सुति रहू”। ऋचाजी बुझि गेलीह जे हम नाराज छियन्हि, मुदा वार्तालाप सेहो सम्भव नहि। कनिक उदास भय नहुँ-नहुँ हमरा कमरासँ बाहर भऽ गेलीह। जाइत-जाइत शुभ-रात्रि कहलन्हि, मुदा हम कोनो उत्तर नहि देलियन्हि। कनिक काल तक हम तमाम परियोजनापर सोचैत रहलहुँ। रोईंगक एहि विकट होटलमे अपन पुत्र शशांकक याद बेर-बेर अबैत छल। सोचि रहल रही जे पूनम (हमर कनियाँ) बड्ड परेशान हेतीह। बात करय चाहैत रही। परन्तु नेटवर्क साफे इंगित नहि भऽ रहल छल। काफी कचोट भेल। अन्ततः सुति रहलहुँ। यायावरी: संगाईप्राऊ : नागा पूर्वजक स्‍मरणक धरोहर उत्तर-पूर्व भारतक तमाम प्रदेश हमरा नीक लगैत अछि‍। नीक लगैत अछि‍ ओतए केर पहाड़, पठार, जंगल, गाछ, बृक्ष, फल, फूल, खेत, खरि‍हान, सुरम्‍य झरना, जीव-जन्‍तु आ ओइ परि‍वेशमे बसल भांति‍-भांति‍क लोक जे अपन बहुरंगी संस्‍कृति‍क संग जीब रहल अछि‍। तखन जखन हमर मणीपुर केर राजधानीसँ लगभग 7 कि‍लोमीटर केर दूरीपर समतल भूमि‍मे बसल कबुई नागा जनजाति‍ बहुल गाममे जएबाक निमंत्रण शोधक कारणे भेटल तँ मोन गद-गद भऽ गेल। ई समए थीक सि‍तम्‍बर 2010 केर मध्‍य। हमरा लग हवाई जहाजक टीकट यात्रा करक पाँच दि‍न पहि‍ने आबि‍ गेल छल। इहो निर्णय भऽ गेल छल जे शोध कार्यमे हमरा एकटा कबुई बाला - बीजू जे कि‍ ओही गामसँ थीकीह से मदति‍ करतीह। बीजू समाजशास्‍त्रमे पूणे वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ एम.ए. केलाक बाद आइ-काल्हि‍ असम सेन्‍ट्रल वि‍श्‍ववि‍द्यालय सि‍लचरसँ पी.एच.डी. कऽ रहलि‍ छथि‍। बीजुक आयु लगभग 26 वर्षक हेतन्‍हि‍। मोट मुदा मजगुतगर देह हष्‍टि‍। थुलथुन नहि, आकर्षक। नाक कनी पीचल, आँखि‍ कनी धसल मुदा सोहनगर। गसल-गसल बाहि, भरल गाल, उन्नत वक्ष आ मध्‍यम कद-करीब 5फीट 2 ईच, गौर वर्ण, गसल-गसल दुधि‍या दाँत  चमचम  करैत। हँसैत मुँह, लज्‍जाभावसँ भरल, अति‍थि‍ सेवा-सत्‍कारमे सदति‍काल तैय्यार। अंग्रेजी बीजू मातृभाषा जकाँ बजैत छथि‍ तँए हमरा हुनका संगे सम्‍प्रेषणमे कुनो तरहक दि‍क्कत नै भेल। ओना हमर परि‍योजनाक सम्बन्ध महि‍ला वि‍कास, इन्‍फॉरमेशन टेक्‍नोलॉजी, आ संस्‍कृति‍सँ रहैत अछि‍ आ बीजू सोसल वर्कमे शोध कार्य करैत छलीह। मुदा हुनकर फोकस उत्तर-पूर्व भारत केर जनजातीय महि‍ला समुदायमे एड्स एवं अही तरहक वि‍मारी (अथवा महामारी)क प्रकोपपर छलन्‍हि‍। सोचल, नारी चेतना दि‍स तँ कार्य करि‍ते छथि‍, कि‍छु ट्रेनिंग आ उत्‍साह सम्‍बर्धन केर पश्‍चात हमरो संगे काज कऽ लेतीह . यएह सोचैत बीजूकेँ हम अपन परि‍योजनामे राखि‍ लेलयन्‍हि‍। जखन पहि‍ल बेर मणि‍पुरक राजधानी इम्‍फालसँ संगाइप्राऊ गाम दि‍स गामक चारि‍ युवक आ Read Global संस्‍थाक एगो सहयोगी नाहि‍द जुबेरक संग हमरा लोकनि‍ वि‍दा भेलहुँ तँ लागल जे युवक सभ उत्‍साही छथि‍ आ हि‍नका लोकनि‍क मदति‍ से हमरा एतऽ कार्य करैमे सुवि‍धा हएत। संगाइप्राऊ एक साफ आ सुन्‍दर गाम थीक जे कि‍ पश्‍चि‍मी इम्‍फाल जि‍लाक अन्‍तर्गत लमजाओतोंगबा ग्राम पंचायतमे अबैत अछि‍। अगर इम्‍फाल शहरसँ हवाई अड्डा दि‍स प्रारंभ करब तँ शहरसँ लगभग 7 कि‍लो मीटर चललाक बाद दूटा राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या 53 और 150 केर मध्‍य ई गाम बसल अछि‍। संगाईप्राऊ नाम मणि‍पुर राज्‍यक माइथोलाॅजीसँ लेल गेल छैक। तै मीथक अनुसारे संगाईप्राऊ संगाई जे कि‍ राज्‍यक जानबर छैक केर आवास स्‍थान मानल जाइत छैक। ओइ गाममे अधि‍कांश लोक सभ कबुई नागा समुदायसँ छथि‍। कबुई नागाकेँ रोंगमेई नामसँ सेहो जानल जाइत छैक। गाममे प्रवेश करि‍ते हमरा बीजू भेँट भेलीह। हम बीजूकेँ कहलि‍एनि‍ जे हम अतए केर कि‍छु बुढ़-पुरान, कि‍छु महि‍ला, कि‍छु युवक  आदि सँ भेँट करए चाहैत छी आ हुनका लोकनि‍सँ ऐ गाम, एकर लोक इति‍हास, एतुक्का परम्‍परा, आर्थिक-सामाजि‍क परि‍वेश इत्‍यादि‍ पर अपन जानकारी बढ़बए चाहैत छी जैसँ रि‍पोर्ट लीखबामे सुवि‍धा रहत। हमरा बातकेँ सुनि‍ते बीजू हमरा गामक सभसँ बुढ़ आ जातीय प्रधान लग लऽ गेलीह। बुढ़ 86 वर्षक छलाह। सातमा पास केलाक बाद सरकारी स्‍कूलमे मास्‍टर भऽ गेलाह। बेटा-बेटी सभकेँ नीक शि‍क्षा देलन्‍हि‍। हुनकासँ ज्ञात भेल जे हुनकर पूर्वज कि‍छु आरो लोक सबहक संगे पहाड़सँ उत्तरि‍ ऐ गाममे लगभग 1780 ई.मे बसलाह। यद्यपि‍ हुनका लग ऐ बातक ऐति‍हासि‍कताक कुनो लि‍खि‍त प्रमाण नै छलन्‍हि‍। हुनका हि‍साबे प्रारम्‍भमे मात्र ग्‍यारह परि‍वार ऐ गाममे बसल। ऐ ग्‍यारह परि‍वारकेँ मुखि‍याक नाम  आइयो गामक बूढ़-पुरान सबहक मँुहमे छै। ई ग्‍यारह व्‍यक्‍ति‍ छलाह- 1. गोन्‍बी 2. थोम्‍बुई 3. बोंकमलाक 4. सचाऊ 5. लंगखोंग्‍टबा 6. गंगबी 7. ममुईबा 8. गंगथवांगम 9. मईपाक 10. तरांगबोन्नांग 11. कपजीलुपूई (महि‍ला) अगर दन्‍तकथाकेँ मानी तँ ई लोकनि‍ बड्ड उद्यमी छलाह। स्‍थानीय राजा हि‍नकर उद्यमि‍तासँ प्रसन्न भऽ हि‍नका लोकनि‍केँ अगल-बगल केर पनि‍गर खेत सभमे धान उपजेबाक लेल कहलखि‍न। ई सभ बड़ा साहसी आ दबंग सेहो छलाह। तै दि‍नमे हि‍नका लोकनि‍केँ गुण्‍डा आ अपराधी तत्‍वकेँ पकरबाक तथा सजा देबाक अधि‍कार सेहो दऽ देलखि‍न। ई ग्‍यारह पूर्वज संगाईप्राऊ बच्‍चा संगे बसि‍ अवश्‍य गेलाह मुदा अपन-अपन मूलग्रामसँ सम्‍बन्‍ध सेहो बनौने रहलन्‍हि‍। ओतए अर्थात पहारक घर इत्‍यादि‍केँ नै छोड़लाह। जाइत-अबैत रहलाह। जखन द्वि‍तीय वि‍श्‍वयुद्ध चलि‍ रहल छल, तै क्षण नेताजी सुभाषचन्‍द्र बोस अपन आजाद हि‍ंद फौजक संग जापानक सहयोगसँ अही रस्‍ते  ताहि समएक वर्मा (आ आजुक म्‍यंमार)सँ सम्‍पर्क रखने छलाह। मणि‍पुर म्‍यंमारक  सीमा सं  सटल अछि‍। फलत: अतए केर लोकके भयंकर बमबारीक समाना करए पड़लैक। पहाड़ीपर रहैबला लोकक जीवन लगातार, बमबारीसँ परेशान भऽ कखनहुँ झाड़-झंखाड़ दि‍स तँ कखनहुँ मैदानी भाग दि‍स दहशतसँ प्राणरक्षाक लेल भागए लागल। ओहुकाल पहाड़ीपर बसल गामसँ कि‍छु कबुई नागा लोकनि संगाईप्राऊ गाममे आबि‍ बसि‍ गेलाह। तँ बात करैत रही गामक सभसँ बुढ़ पुरूषक। ओ परम्‍परागत रूपसँ कबुई समाजक प्रधान छथि‍। ओ कहलनि‍ जे आब ऐ गामक लगभग 35 प्रति‍शत नागा लोकनि‍ ईसाई भऽ गेलाह अछि‍। एकर बादो आपसमे कुनो वैमनस्‍य नै लोक सभ परम्‍परागत पाबनि‍-ति‍हार, नाच-गान, सभ एक्के संग अखनहुँ बड़ उत्‍साहसँ मनबैत छथि‍। अखनहुँ ई लोकनि‍ अपन पूर्वजकेँ देवतासँ बेसि‍ए सम्‍मान दैत छथि‍। अखनहुँ अपने-आपकेँ कुनो धर्म आ संस्‍कृति‍सँ ऊपर उठि‍ नागा बुझएमे गर्वक अनुभूति‍ करैत छथि‍। पि‍तृक प्रति‍ अतेक सि‍नेह कतहुँ नै देखल हम अपन आइ धरि‍क यायावरीक प्रवृत्ति‍मे। पि‍तृक प्रति‍ अतेक समर्पण जे कबुई नागामे देखलहुँ से एकाएक हमरा अपने-आपकेँ अपन पि‍तृक प्रति‍ सचेत कऽ देलक। पि‍तृक प्रति‍ अतेक इमानदारी जे गामक एक नागा चि‍त्रकार प्रथम ग्‍यारह पूर्वजक चि‍त्र बनाए गामक ि‍नर्माणक  एक भव्‍य पेन्‍टि‍ंग बनौलनि‍। पेन्‍टि‍ंग भव्‍य आ पैघ। आकर्षक आ रंग तथा तुलि‍काक समायोजन केर सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण। केनवासमे एक-एक रत्ती जगह भरक असाधारण प्रयास। बाह रे कलाकार! बाह रे कला!  बह रे पित्रिक प्रति समर्पण!  हम पूरा आत्‍मवि‍श्‍वासक संग कहि‍ सकैत छी जे अतेक सि‍नेह हमर पि‍ताक अलावे आर कि‍योक आन पुरूष हमरा नै दऽ सकैत छल। परम्‍परागत कबुई नागा धर्मकेँ मानैबला प्रकृति‍क समि‍प छथि‍। ओ एकटा सर्वशक्‍ति‍मान भगवान अर्थात् तींगकाओ रगवांग' केँ मानैत छथि‍, एकर अति‍रि‍क्‍त अनेक तरहक देवी-देवताक अराधना आ पूजा-उपचार सेहो करैत छथि‍। परम्‍परागत कबुई नागाकेँ बीच ई वि‍श्‍वास अखनहुँ छन्‍हि‍ जे मनुक्‍ख तखने वि‍मार पड़ैत अछि‍ जखन ओकरा कुनो भूत-प्रेत परेशान करैत छैक आ ओकरापर सवार भऽ जाइत छैक। कखनो काल डाइन-जोगि‍न सभ सेहो जादू-टोनासँ लोककेँ परेशान करैत छैक। भूत-प्रेत या शैतानी आत्‍मासँ मुक्‍त करबाक लेल वि‍मार व्‍यक्‍ति‍क सामने गामक ओझा हरि‍यर तरकारी, फल, फूल, मुर्गीक बच्‍चाक शोणि‍त, चाउर, देशी दारू आदि‍सं अपन ईष्‍ट देव पि‍तृ इत्‍यादि‍केँ अर्पित करैत अछि‍ आ निष्ठापूर्वक पूजा करैत अछि‍। वि‍श्‍वास ई कएल जाइत अछि‍ जे  एहि प्रक्रि‍या आ आराधनासँ लोकक कष्‍टक समाधान भऽ जएतैक। संगाईप्राऊ गामक कबुई नागा मूलत: छः गोत्रक छथि‍। ई 6 गोत्र गामक बुजुर्ग लोकनि‍क कथनानुसार नि‍म्नलि‍खि‍त अछि‍- क. कामेई             27 घर ख. पालमेई          09 घर ग. गोलमेई          11 घर घ. गंगमेई            08 घर च. मारि‍ंगमेई   08 घर छ. न्‍यूमेई            01 घर इसाइयक प्रभाव तेजीसँ बढ़ि‍ रहल छैक। गाममे एकता  मध्यम आकृति केर गि‍रि‍जाघर आ एकटा एक्‍टीभीटी केन्‍द्र इसाइ मि‍शनबला बना देने छैक। गामक लोक सभ, मुख्‍यरूपेण महि‍ला लोकनि‍ बड़ा कलात्‍मक आ रचनात्‍मक प्रवृति‍क छथि‍। Read- Global संस्‍थाक सहयोगसँ पच्‍चास प्रति‍शत साझेदारीकेँ स्‍वीकारैत ऐ गामक स्‍त्री-पुरूष गामक गैरमजरूआ भूमि‍पर सार्वजनि‍क प्रयोगक हेतु एगो पुस्‍तकालय, कम्‍प्‍यूटर प्रशि‍क्षण केन्‍द्र, महि‍ला वर्गक लेल आर्थिक उपार्जन हेतु व्‍यवसायि‍क प्रशि‍क्षण केन्‍द्र बना रहल छथि‍। ऐ प्रांगणाक नाम तजाई राखल गेल छै। पूछलापर पता चलल जे स्‍थानीय भाषामे तजाई केर अर्थ होइत छै पहाड़ी जंगलमे एहेन पोखरि‍ जतए नूनगर पानि‍ उपलब्‍ध होइत छै। आ सभ तरहक जानवर ओइ पानि‍क स्‍वाद स्‍वतंत्र भावसँ अतए लैत अछि‍। तहि‍ना तजाई प्रांगण अगल-बगलक तमाम लोकक हेतु चाहे वो स्‍त्री-पुरूष, बच्‍चा-बुढ़, नव-पुरान, जनजाि‍त-सामान्‍य जाति‍क कि‍एक नै हो, सबहक लेल छै। सभ कि‍यो अतऽ आबि‍ ऐठाम उपलब्‍ध सुवि‍धाक लाभ उठा सकैत अछि‍। आब बुझैमे कुनो भांगठ नै अछि‍ जे आपसी सौहार्दक बीच कोना कऽ कबुई नागामे व्‍याप्‍त अछि‍। ई रहस्‍य अखनो धरि‍ पता नै चलल जे बीजू कि‍एक बहुत रास अगरबत्ती जरेने छलीह। हलांकि‍ कुनो वि‍शेष तरहक दुरगन्‍धक अनुभूति‍ अवश्‍य भऽ रहल छल। जखन ओइ गामसँ सम्‍बन्‍धि‍त नाना तरहक जानकारी लऽ लेलहुँ तँ ओइ बुजुर्गकेँ कहलि‍एनि‍- “बीजू हमरा लेल जानकारी इकत्रि‍त कऽ रहलि‍ छथि‍। अहाँ लोकनि‍ लग बेर-बेर एतीह आ वि‍भि‍न्न तरहक प्रश्‍न करतीह। नि‍वेदन जे ऐ गामक नागा समाजक प्रधान होमाक नाते, सभसँ बुजुर्ग होबाक नाते, अनुभवी होबाक नाते अहाँ हि‍नका यथासंभव मदति‍ करबन्‍हि‍ ; गामक लोक सभसँ सेहो आग्रह करबनि‍ जे ई लोकनि‍ बीजूकेँ सहयोग करथि‍।‍” बुढ़ बजलाह- “कुनो बात नै। बीजू तँ गामक बेटी थीकीह। आर अहाँ लोकनि‍ तँ हमरे सभ लेल कार्य कऽ रहल छी। फेर सहयोग तँ करबे करबनि‍।” एकर बाद हुनका नमस्‍कार कए एक महि‍ला लग  विदा भेलहुँ। रास्‍तामे बीजू कहलनि‍- “श्रीमान्, ऐ घरक  बारी मे एकटा तीन दि‍न पूर्व मरल बरदक मांस नि‍कालल जाइत छलैक तथा खालकेँ अलग करैत छलीह घरक महि‍ला लोकनि‍। तकरे दुर्गन्‍ध आबि‍ रहल छल। दुरगन्‍ध कनि‍ कम भऽ जाए तँए तीन-चारि‍ मुट्ठी अगरबत्ती जरा देने रही।‍” आब हमरा लोकनि‍ गामक एक 64 वर्षीए नागा महि‍ला श्रीमती एथेनाक घर पहुँचलौं बड्ड साफ-स्‍वच्‍छ आ कलात्‍मक घर। चारू कात फूल आ हरि‍यरीसँ भरल। घरक भीतरसँ एक युवक बाहर एलाह। हमरा लोकनि‍केँ बैसवाक लेल कहलनि‍। कनी कालक बाद श्रीमती एथेना कमरमे फनेक लपेटने तथा ब्‍लाऊज पहि‍रने एलीह। सहज आ सुन्‍दर स्‍वरूप। नि‍श्‍छल मोन। शांत स्‍वरूप। बात होमए लागल। कहलनि‍- “हम्‍मर माता-पि‍ता कहि‍ नै कि‍एक इसाइ भऽ गेलाह। मुदा हमरा लोकनि‍ नागा परम्‍पराकेँ धेने रहलहुँ। पि‍ताजी हमरा एदति‍काल बेटे जकाँ सि‍नेह देलनि‍। अन्‍तत: 1969 ई.मे गुवाहाटी वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ राजनीति‍ शास्‍त्रमे एम.ए. केलहुँ। हम पहि‍ल कबुइ नागाक महि‍ला छी जे एम.ए. केलहुँ तकरबाद हमर वि‍वाह भऽ गेल। हमर पति‍ इन्‍जि‍नीयर छलाह। ओ हमरा कहलनि‍ जे अहाँ चाही तँ नौकरी कऽ सकैत छी। फेर की छल। भारतीय डाक वि‍भागमे भेकेन्‍सी एलैक हम अपन आवेदन पत्र जमा केलौं आ हमरा नौकरी भेट गेल। आब अवकाश प्राप्‍त कए अपन गाममे रहि‍ रहल छी। बेटा अपन मकान गौहाटीमे बनौने अछि‍ आ बेटी ि‍दल्‍लीमे। दुनू कहैत अछि‍ गौहाटी कि‍ंवा दि‍ल्‍ली आबि‍ जाऊ। अतए तमाम सुवि‍धा उपलब्‍ध छै। मुदा हम कतौ नै जाए चाहैत छी। हमर पति‍ केन्‍सरसँ मरि‍ गेलाह। हम देखैत छी जे गामक बच्‍चा सभ दि‍शाहि‍न भऽ रहल अछि‍। युवक सभ बेरोजगार आ सड़कछाप छथि‍। महि‍ला लोकनि‍ शोषि‍त जीवन जीबाक लेल बाध्‍य छथि‍। लोकमे देशी दारू बनेबाक आ पीबाक जबरदस्‍ती रोग भऽ गेल छै। बच्‍चासभ लेल कुनो एहेन सार्वजनि‍क स्‍थल नै छै जतए ओ सभ खेल-कुदि‍ सकए, कला आ रचनात्‍मक प्रवृत्ति‍केँ आगाँ बढ़ा सकै, महि‍ला एवं युवा वर्ग सभ लेल कुनो आमदनीक जरि‍या नै छै। सोचैत छी गामेमे रहि‍ ऐ दि‍शामे कार्य करब। आब Read Global संग कार्य प्रारंभ भेल अछि‍। कि‍छु-ने-कि‍छु अवश्‍य भऽ जएतैक।‍” एथेनाकसँ इहो पता चलल जे गामक अनेको युवक दारू पीब समएसँ पहि‍ने काल-कवलि‍त भऽ गेलाह। हुनका लोकनि‍क विधवा सभ बड़ा कष्‍टक जीवन जीवाक लेल बाध्‍य छथि‍। संगाईप्राऊ गामक अधि‍कांश महि‍ला लोकनि‍ स्‍थानीय दारू भातसँ बनबैत छथि‍। शहरक लोक सभ घरे-घरे आबि‍ दारू पीबैत अछि‍। पच्‍चास टकामे एक मग दारू आ ओकरा संगे सुगरक मांस, कनि‍क सलाद सेहो भेटैत छै। एक ग्राहक  सँ लगभग 20-25 टकाक आमदनी भऽ जाइत छै। अगर एक घरमे एक दि‍नमे पाँचोटा ग्राहक आबि‍ गेलैक तँ औसतन 125 टकाक आमदनी। मुदा एकर वि‍परीत प्रभाव स्‍पष्‍ट छै। दारू पीऐबला सभ महि‍ला सभकेँ कुदृष्‍टि‍सँ देखैत अछि‍। आर्थिक वि‍वशता तथा पैसाक लोभें कि‍छु नागा महि‍ला देह व्‍यापारमे लागलि‍ छथि‍। घरमे दारू सदरि‍काल उपलब्‍ध रहबाक कारणे पुरूष सभ बच्‍चेसँ दारूक सेवन प्रारम्‍भ कऽ लैत अछि‍। महि‍ला सभकेँ अगर अवसर भेटनि‍ तँ ऐ धंधा छोड़ि‍ अर्थोपार्जन केर कुनो आन ब्‍यौंत करतीह। ई बड़ा आशचर्यक वि‍षए थि‍क। मणीपुर राज्‍य दू प्रकारक लोकमे बाटल अछि‍। समतल भू-भागमे रहएबला मैतेई आबादी जे मूलत: वैष्‍णव छथि‍, कृषि‍क कार्यमे दक्ष छथि‍, आ राज्‍यक जनसंख्‍याक पैघ प्रति‍शत छथि‍, आ दोसर दि‍स पहारी क्षेत्रमे बसनि‍हार 31 जनजातीय समुदाय। मैतई महि‍ला लोकनि‍ बड्ड उद्यमी छथि‍। मणि‍पुर केर प्रत्‍येक जि‍ला तथा ब्‍लॉक स्‍तरपर आमा मार्केट अर्थात मातृ-बाजार लगैत छै। ऐ तरहक अमां-मार्केटमे केवल स्‍त्रीगणें सभ  दोकान लऽ सकैत छथि‍। आश्‍चर्यक बात ई जे समस्‍त मणि‍पुरमे अमां-मार्केटमे एकौटा दोकान आदि‍वासी महि‍ला लोकनि‍ नै लेलनि‍ अछि‍। आर-त-आर संगाईप्रऊ गाममे जे तरकारी बेचैवाली महि‍ला सभ छलीह सेहो सभ मैतेई महि‍ला छलीह। एकर एगो कारण इहो बुझना गेल जे मैतेई पुरूष बड़ा उद्यमी होइत छथि‍। महि‍ला लोकनि‍ कपड़ा बुनि‍, खेत-पथारमे कार्य कऽ कि‍छु तरकारी इत्‍यादि‍ बेच, कि‍छु समानकेेँ बाजारमे बेच आ नेरेगाक कार्यक्रममे कि‍छु दि‍न कार्य  के अपन-अपन घरक हेतु कि‍छु अति‍रि‍क्‍त आमदनीक ब्‍यौंत कऽ लैत छथि‍। ऐ तरहेँ गृहस्‍थीमे स्‍त्री-पुरूषक सौहार्दपूर्ण सहभागि‍ता देखल जा सकैत अछि‍। हलांकि‍ एथेना आ संगाइप्राऊ गामक अन्‍य उत्‍साही महि‍ला लोकनि‍ हमरा कहलनि‍ जे अगर महि‍ला लोकनि‍केँ तकनीकि‍ ज्ञानक शि‍क्षा, उद्यमि‍ताक प्रशि‍क्षण आ इन्‍टरीप्रेन्‍युअर केर ज्ञान वैज्ञानि‍क ढंगसँ देल जानि‍ तँ ई लोकनि‍ वस्‍त्रक बुनकरी, सुगर-आ अन्‍य मांसक आचार आदि‍ प्रोसेसि‍ंग आ पेकेजि‍ंग, नेबो, हरि‍यर मि‍रचाइ, बांसक कोपर इत्‍यादि‍ अचार बना बजारमे बेच सकैत छथि‍। आ एथेना ऐ दिशा मे प्रयासरत छथि‍। अगर सांस्‍कृति‍क पक्षकेँ देखल जाए तँ ऐ गामक कबुई नागा अपन संस्‍कार, लोक रीति‍-रि‍वाज, वस्‍त्र-वि‍न्‍यास, श्रृंगार, परम्‍परासँ अखनो जुरल छथि‍। बुजुर्गक सम्‍मान सर्वोपरि‍ अछि‍। युवक आइयो बि‍ना बुजुर्गक आज्ञा लेने कुनो वि‍शेष किंवा  महत्‍वपूर्ण निर्णय  नै लैत अछि‍। बहुरंगी वस्‍त्र आ आकर्षक युवती-युवककेँ नचैत-गबैत देखब तँ देखि‍ते रहि‍ जाएब। सौन्‍दर्य जेना हि‍नका लोकनि‍क बीच कैद भऽ गेल हो। बाह रे देह सौष्‍ठव। बाह रे सुन्‍दरता!  बाह रे श्रृंगार! बाह रे युवक आ युवतीक मध्‍य नैसर्गिक प्‍यार! कबुई नागाक प्रत्‍येक घरमे पूर्वजक फोटो टांगल देखलहुँ। फोटोमे नागा जनजाति‍क लोकक पहाड़, या प्रकृति‍सँ सम्‍बन्‍ध सेहो सम्‍मि‍लि‍त रहैक। अपन घर आ दैनि‍क जीवनसँ सम्‍बन्‍धि‍त उपयोगक तमाम वस्‍तुकेँ कलाकृति‍सँ मण्‍डि‍त कए  जीबाक कला सीखबाक हो, स्‍वच्‍छ केना रही से जनबाक हो, पि‍तृ केँ सदति‍काल केना याद रखी से शि‍क्षा लेबाक हो, गरीबी जीवनमे रहि‍यो अपन मांटि‍-आ संस्‍कारसँ सि‍नेह देखबाक हो, सदति‍काल चौअन्नी मुस्‍कान बला चेहरा बनेवाक हो तँ कुनो नागा समाजमे जा कऽ कि‍छु दि‍न रहू। पता लागि‍ जाएत। यायावरी:उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात गाम बद्द याद अबैत अछि दिल्ली में हमरा मुदा गाम अत्बो नजदीक त  नहि अछि जे चट दनी बिदा भ जाएब! ताहि जखन कखनहु दिल्ली स मों औने लागैत अछि त हम ऋषिकेश चलि जीत छी। एक दू दिन गंगाक कट में आनंद स रही फेर दिल्ली में कर्म धुन चैल अबैत छी। हिमालय केर विभिन्न भाग में जेबक आ कार्य करबाक अवसर भेटल अछि- कखनो सिक्किम में जा कन्चंजनघक दर्शन, भूटिया आ लेपचा जनजातिक जीबंक अध्ययन एवं सांस्कृतिक विश्लेषण त कखनहु अरुणाचल प्रदेशक तवांग में जा ओते केर परम्परक अवलोकन। अनुभव हमेश उत्तम। हिमालय दर्शन केर क्रम में काटको बेर हिमाचल प्रदेश, कश्मीर आ उत्तराखंड सेहो गेल छी. अह्ने साल छल 2005 जखन हम उत्तराखंड गेल रही। ओतए स वापस एलक बाद  2005 ई. मे हम नन्‍दा-राजजातपर एकटा लेख हि‍न्‍दीमे अपन मानवशास्‍त्रीय सर्वेक्षण केर आधारपर लीखने रही। ओ लेख इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर वेवसाइटपर प्रकाशि‍त भेलैक। कि‍छु दि‍नक बाद हमरा उतराखण्‍डसँ बहुत लोक सभ लेख लीखबाक हेतु साधुवाद देअए लगलाह। कतेको लोकनि‍ ओइ लेखक लि‍ंककेँ अपन ब्‍लॉगसँ जोड़लनि‍। हालहि‍ंमे एक उतराखण्‍डक नवयुक अपन माटि‍ आ पहाड़सँ सि‍नेह देखबैत एकटा पद्यमय पत्र लि‍खलनि‍। पत्र कि‍छु एना लीखल छल- “‍आँखो के आगे वनश्री के खुलते पट न्‍यारे-न्‍यारे हैं, छोटे-छोटे खेत और आड़ू सेबों के बगीचे, देवदार वन, जो नभ तक अपनी छवि‍ जाल पसारे हैं। मुझको तो हि‍म से भड़े अपने पहाड़ ही प्‍यारे हैं।‍” ऐ कवि‍तामय चि‍ट्ठीकेँ पढ़लाक बाद मोन भेल जे उत्तराखण्‍डक नन्‍दा राजजातके मैथि‍ली पाठक लोकनि‍ केर लेल मैथि‍लीमे सेहो अपन यायावरीक माध्‍यमसँ लीख ली। नन्‍दाराज-जातक अर्थ भेल नन्‍दादेवीक यात्रा। लोक इति‍हासमे जाइ आ ि‍स्‍थति‍केँ अध्‍ययन करी तँ पता लगैत अछि जे नन्‍दा गढ़वालक राजा लोकनि‍क संग-संग कुँमाऊ केर कत्‍युरी राजवंशक ईस्‍टदेवी छलीह। ईष्‍टदेवी हेबाक कारणें नन्‍दादेवीकेँ राजराजेश्‍वरीकेँ रूपमे सेहो सम्‍बोधि‍त कएल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ लोक ओना पार्वतीक बहि‍न सेहो मानैत छथि‍। समस्‍त उत्तराखण्‍डमे समान रूपें पूजि‍त हेबाक कारणे नन्‍दादेवी समस्‍त प्रदेशमे धार्मिक एकता केर सूत्र सांस्‍कृति‍क रूपसँ मानल जाइत छथि‍। अर्थात हि‍नकासँ समस्‍त प्रदेश एक सूत्रमे जेना बन्‍हा जाइत हो! स्‍थानीय दंतकथा तँ ई कहैत अछि‍ जे नन्‍दादेवी दक्ष प्रजापति‍ केर सात कन्‍यामे सँ एक छलीह। एहेन मानल जाइत अछि‍ जे हि‍नकर वि‍आह भगवान महादेवसँ भेल रहनि‍। भगवान महादेवक संग ऊँच आ हि‍मसँ आच्‍छादि‍त पहाड़पर नन्‍दा देवी रहैत छथि‍। पति‍सँ एहेन सि‍नेह जकर वर्णन असंभव! पति‍ जखन संग रहैत छथि‍न तँ सुखक बदलामे धोरसँ धोर कष्‍टकेँ नन्‍दा दाइ सहि‍ लैत छथि‍। कुनो-कुनोठाम तँ नन्‍दादेवीकेँ पार्वतीक साक्षात् रूप मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ बहुत नामसँ जानल जाइत छन्‍हि‍- शि‍वा, सुनन्‍दा, शुभानन्‍दा, नन्‍दि‍नी इत्‍यादि‍। उतराखण्‍डमे देवी-देवताक स्‍तुति‍ या स्‍मरणमे दि‍न-राति‍ जागि‍ कऽ गाबैबला गीत अथवा कीर्तनकेँ जागर कहल जाइत छै। तहि‍ना जेना अपना मि‍थि‍लामे अष्‍टयाम होइत अछि‍। नन्‍दा देवीक बारेमे अनेक जागरक अनुसार भांति‍-भाति‍क दन्‍तकथा भेटैत छै। एहने एक कथामे नन्‍दा दाइकेँ नन्‍द महराजक बेटी मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍द महराजक ई बेटी भगवान श्री कृष्‍णक जन्‍मसँ पहि‍ने कंसक हाथसँ छहरि‍ कऽ आकाशमे उड़ैत नागाधि‍राज हि‍मवंतक पत्नी मैनाक कोरामे पहुँच गेलीह। एक दोसर जागरमे नन्‍दा दाइकेँ चान्‍दपुर गढ़केँ राजा भानुप्रतापक पुत्री कहल जाइत छन्‍हि‍। एक जागरमे लोक सभसँ पता चलल जे नन्‍दा देवीक जन्‍म ऋृषि‍ हि‍मवंत आओर हुनकर पत्नी मैनाक घरपर भेल छलनि‍। मुदा तमाम तरहक अलग-अलग धारणा भेलाक बादो पर्वतीय अंचलमे रहनि‍हार लोकनि‍ नन्‍दादेवीकेँ लोक मानस केर एक दृढ़ आस्‍थाक प्रतीक मानैत छन्‍हि‍। संगहि‍ नन्‍दा राजजातकेँ परम्‍परा केर अभि‍न्न हि‍स्‍सा मानैत प्रत्‍येक बारह बर्षमे राजजातक भव्‍य आयोजन करैत छथि‍। राजजात किंवा नन्‍दाजातक अर्थ भेल राज राजेश्‍वरी नन्‍दादेवीक यात्रा। गढ़वाल क्षेत्रमे देवी-देवताक जात अथवा यात्रा खूब धूमधामसँ मनाएल जाइत छै। अर्थात एतऽ ऐ क्षेत्रक लोकक दृष्‍टि‍मे जातक अर्थ भेल देवयात्रा। लोक वि‍श्‍वास इहो छै जे नन्‍दा देवी भादवक अन्‍हरि‍या पक्षमे अपन नैहर अबैत छथि‍। कि‍छु दि‍नक बाद अष्‍टमी दि‍न हुनका नैहरसँ सासुर वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍। राजजात या नन्‍दाजात नन्‍दा दाइकेँ अपन नैहरसँ एक बनल-ठनल, वस्‍त्र आ गहनासँ सुसज्‍जि‍त नव व्‍याहि‍ता कनि‍याँ जकाँ सासुर जेबाक यात्रा छन्‍हि‍। सासुर के स्‍थानीय भाषामे सौरास कहल जाइत छै। ऐ अवसर पर नन्‍दादेवीकेँ सजा कऽ बना ठना कऽ महफामे बैसा तथा वस्‍त्र, आभूषण, खाद्यान्न, पैसा, मि‍ठाइ इत्‍यादि‍ सनेस दऽ गढ़वालक परम्‍पराक अनुसारे वि‍दा कराएल जाइत छन्‍हि‍। ओना तँ हरेक साल नन्‍दाजात आयोजन करबाक प्रथा छै परन्‍तु बारह वर्षमे भव्‍य आओर मनोरंजक राजजातक आयोजन कएल जाइत छै। आयोजन एहेन जकरा शब्‍दमे नै कहल जा सकैत अछि‍। केबल अनुभव कएल जा सकैत अछि‍। नन्‍दाजात प्रति‍ वर्ष इजोरि‍या पक्षक अष्‍ठमीक दि‍न मनाएल जाइत अि‍छ। तही दि‍न नन्‍दा दाइकेँ महफामे बैसा कऽ वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍। नैनीताल, बैजानाथ आ अल्‍मोड़ामे वि‍शेष धूमधामसँ ऐ महापावनि‍केँ मनाएल जाइत अछि‍। नैनीतालमे प्रति‍वर्ष नन्‍दा-सुनन्‍दा मेलाक आयोजन कएल जाइत छै। ऐ अवसरपर नन्‍दा आओर सुनन्‍दा दुनू बहि‍नकेँ वि‍शि‍ष्‍ट रूपेँ केराक गाछसँ बनल मूर्तिकेँ महफामे बैसा चारू तरफ घुमाएल जाइत छन्‍हि‍। केराक एहेन आकर्षक मूर्ति कुमाऊँकेँ अति‍रि‍क्‍त अन्‍यत्र नै बनाएल जाइत छै। आ सभसँ अन्‍तमे मूर्तिक वि‍सर्जन नैनी झीलमे कऽ देल जाइत छै। कुमाऊँ क्षेत्रक बात भऽ रहल अछि‍ तँ एक बात आरो स्‍पष्‍ट कऽ दी। कुमाऊँमे नन्‍दाक एक वि‍शेष बात ई छन्‍हि‍ जे गरूड़केँ कोट भ्रामरी मन्‍दि‍रमे नन्‍दादेवीक अवतार एक पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍ जखन कि‍ उतराखण्‍डक अन्‍य क्षेत्रमे देवीक अवतार स्‍त्रीक शरीरमे आ देवता लोकनि‍क अवतार पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍। प्रसि‍द्ध इति‍हासकार एटकि‍ंसन महोदय हि‍मालयन गजेटि‍यरमे प्रत्‍येक बारह बर्षपर नन्‍दा राजजात मनेबाक वि‍स्‍तृत वर्णन करैत छथि‍। ऐ यात्रामे करीब 250 कि‍लोमीटर दूरी- नौटीसँ होमकुण्‍ड धरि‍ पैदल करए पड़ैत छै। ऐ यात्राक मध्‍य धनधोर जंगल, दुर्गम चोटी आ बर्फसँ झाँपल पहाड़केँ पार करए पड़ैत छै। यात्राक कठि‍नता आ दुरूहताक कल्‍पना अहाँ ऐ बातसँ लागालीय बाण गांवसँ आगाँ रि‍णकीधारसँ यात्री सभकेँ पएरे- बि‍ना जूत्ता-चप्‍पलकेँ ज्‍यूगरालीदार देसी करीब 18000 फीटक ऊँचाइ पार करए पड़ैत छै। यात्रा जखन रि‍णकीधारसँ आगाँ बढ़ैत छै तँ नाना तरहक प्रति‍बन्‍धक पालन केनाइ अनि‍वार्य भऽ जाइत छै जेना स्‍त्रीगण, बच्‍चा, अभक्ष्‍य ग्रहण करैबला जाति‍क लोक चामक बनल वस्‍तु- गाजा बाजा इत्‍यादि‍ नि‍षि‍द्ध भऽ जाइत छै। सम्‍भवत: ई यात्रा संसारक सभसँ पैघ, दुर्गम आ कठि‍न धर्मयात्रा थीक। ऐ यात्राकेँ केबल समर्पित तथा नि‍ष्‍ठावान भक्‍त लोकनि‍केँ सकैत छथि‍। हजारोक संख्‍यामे श्रद्धालु लोकनि‍, धर्म तथा परम्‍परामे वि‍श्‍वास करैबला आइयो केर धोर कलि‍युगमे ऐ यात्राकेँ श्रद्धापूर्वक पूरा करैत छथि‍। यायावरी- भावमय, भोगमय, योगमय बृन्‍दावन “‍बृन्‍दावन सन वन नहीं नन्‍दग्राम सन ग्राम बंशीवट सन बट नहीं रामनाम सन नाम”. जखन बच्‍चे रही तँ हमर धर्मार्थी नानी हमरा संस्‍कृतक कि‍छु श्‍लोकि‍आदि‍क संगे उपरोक्‍त दोहा सुग्‍गा जकाँ रटा देने रहथि‍। सूरदास, विद्यापति, रसखान आदि‍ कवि‍ लोकनि‍केँ रचना पढ़लाक बाद बृन्‍दावनक बारेमे सदति‍काल कल्‍पना करैत रही। यमुनाक जल हरि‍यर कचोर आ स्‍वच्‍छ कल-कल करैत होइ छैक। ई कहब छलन्‍हि‍ हमर नानीक। अपनो मोनमे अबैत छल, ताहि‍ं तँ गोपी सभ ऐ यमुनामे कखनो स्‍नान तँ कखनो पनघट लए धधरा चुनरी पहि‍रने, पएरमे पाजेब पहि‍र झुमैत-गबैत अबैत छल हेतीह। केतेक नैशर्गिक दृश्‍य होइत हेतैक यमुनाक कछेरमे! कदम्‍बक गाछ, गामक ग्‍वाल-बाल सबहक मधुर स्‍वर, मुरलीक तान, गोपीक गान, साधु- संतक शंखनाद, हरे-कृष्‍ण राधे-राधेक नाओंसँ उच्‍चारि‍त आ मुग्‍धमय वातावरण, पण्‍डि‍त, पण्‍डा आ वि‍द्वान लोकनि‍क भगवद् चर्चा एवं राधा-कृष्‍णक प्रसंगपर वाद-वि‍वाद, मस्‍त वातावरण। कृष्‍णमय बृन्‍दावन। राधामय बरसाना। नन्‍दमय नन्‍दग्राम। कान्‍हाक मथुरा। भगवानक कगुरि‍यापर उठल 18 कि‍लोमीटर केर परि‍धि‍मे पसरल गोवर्धन पहार। दूध-दही, मक्‍खन, रबड़ीसँ रेलम-पेल भेल समस्‍त चौरासी कोस। सफ-स्‍वच्‍छ वेगवान हरि‍यर कचोर जलसँ अप्‍लावि‍त आ कल-कल करैत यमुना। कातमे रंग-वि‍रंगक गाछ-कदम्‍ब, जामुन, आम, नीम, बैर इत्‍यादि‍। नाना तरहक हरि‍यरी। काते-काते मस्‍त भावसँ चरैत गाए-बाछा-बाछी। होइत छल एहने कि‍छु दृश्‍य हेतैक समस्‍त ब्रजक्षेत्रक। माए ऊपरसँ हमरा हमेशा कहैत छलीह: समस्‍त ब्रजक धरतीमे कि‍छु देवत्वक भाव छैक। आकर्षक छैक। आइयो ऐ धरतीक छटा कि‍दु अलगे छैक। एकबेर जाएब तँ आबक मोने ने करत। हएत ओतै रहि‍ जाइ। सुग्‍गा सभ चौंचसँ चौंच मि‍लबैत, गाए-बछरा सभ आनन्‍दक उन्‍मादमे चरैत। खेत खरि‍हानमे मोर धुमैत, एहने छटा छैक बृन्‍दावन केर। माएक बातकेँ नै मनबाक प्रश्‍ने कहाँ छल। रसखान स्‍मरण अबैत छलाह : मानस हो तो वही रसखान। बसहु ब्रज गोकुल गॉव केर ग्‍वारन। जौं पसु हो तो कहा वसु मेरो। चरौ नि‍त नन्‍दक चेन्‍ु मन्‍जारन। आर तँ आर रसखान तँ ओहि कौआ केर भागकेँ नीक बुझै छथि‍ जकर जन्‍म ब्रजभूमि‍मे भेल छैक। भगवान जँ पाथरो बनाबथि‍ आ ब्रजभूमि‍मे रही तँ जीवन कृत-कृत। ई मान्‍यता छलन्‍हि‍ रसखानक। दि‍ल्‍लीमे पढ़ैकाल किछु लोक सभ मथुरा बृन्‍दावनक चर्च करैत छलाह मुदा कहि‍ नै कि‍एक कहि‍यो ओतए जएबाक योजना नै बनल। बादमे जखन 1997 ईं.मे हम इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्रमे शोधकर्मीक रूपमे नौकरी प्रारम्‍भ केलौं तँ हमर वि‍भाग जनपद-सम्‍पदा केर वि‍भागाध्‍यक्ष प्रोफेसर बैधनाथ सरस्‍वती हमरा मुख्‍यरूपेँ दू कार्यपर केन्‍द्रि‍त करबाक निर्देश देलन्हि‍। पहि‍ल, UNESCO, UNDP केर ग्रामीण भारत परि‍योजनापर कार्य करब आ दोसर, वि‍भागक क्षेत्र सम्‍पदा कार्यक्रम केर अन्‍दर ब्रज प्रकल्‍प परि‍योजनाकेँ देखबाक छल। क्षेत्रसम्‍पदा केर अन्‍तर्गत ई वि‍भाग कुनो वि‍ख्‍यात सास्‍कृतक क्षेत्र लय ओहि‍ क्षेत्रक सांस्‍कृति‍क निधिक सर्वांग अध्‍ययन करैत छलैक। सर्वांगसँ तात्‍पर्य ओइ सांस्‍कृति‍क क्षेत्रक सम्‍बन्‍धमे उपलब्‍ध रचना, ओतए केर लोकक मान्‍यता, ओतय केर इति‍हास, पुरातत्व, वास्‍तु निर्माण कला, मूर्तिकला, लोक गीत, संगीत, वाह्य, वाह्ययंत्र, कृषि‍-कार्य पद्धति केर दक्षता, वेश-भूषा, गहना, वस्‍त्र वि‍न्‍यास, श्रृंगार आर नै जानी की की सबहक समग्रता में अध्‍ययन, ओकर ज्ञानक प्रकाशन केनाइ, ओइपर चर्चा, परि‍चर्चा, सम्‍बाद, संगोष्‍ठी, कार्यशाला आदि‍क आयोजनसँ छलैक। ओइ समएमे क्षेत्र परम्‍परा केर अन्‍तर्गत दू क्षेत्रपर कार्य चलैत रहैक- दक्षि‍ण भारतमे बृहदेश्वर मन्‍दि‍र तथा उत्तर भारतमे ब्रज प्रकल्‍प। ब्रज प्रकल्‍पमे ओना तँ बहुत रास वि‍द्वान आ अन्‍य वि‍षयक वि‍शेषज्ञ सभ छलाह परन्‍तु हमरा जे सर्वाधि‍क प्रभावित केलाह से छलाह श्रीवत्‍स गोस्‍वामी। श्री वत्‍स गोस्‍वामी बृन्‍दावनसँ छथि‍। हि‍नकर पूरखा पश्‍चि‍म बंगालसँ आबि‍ बृन्‍दावनक खोज केलन्‍हि‍ आ ततय केर मुख्‍य पुजारी भेलाह। अखनो बृन्‍दावन केर बाके बि‍हारी मन्‍दि‍र केर मुख्‍य पुजारी हि‍नके पि‍तऔत छथि‍न्‍ह। ई लोकनि‍ एक अपन संस्‍था बनौने छथि‍- बृन्‍दावन शोध-संस्‍थान। ई संस्‍था बृन्‍दावन केर इति‍हास, प्रेम, परम्‍परा इत्‍यादि‍पर शोध करैत अछि‍। हि‍नकर छोट भाए भागवत कथा करैत छथि‍। श्रीवत्‍स गोस्‍वामी बि‍ना सील वस्‍त्र पहि‍रैत छथि‍। केवल धोती आ शरीरपर चद्दरि‍। धोती आ चद्दरि‍ दुनू पीताम्‍बरी। महग आ शुद्ध टवीस्‍टेड रेशमसँ बनल। बहुत छोट-छोट केस। बि‍ना मोछ दाढ़ीक चि‍क्कन मुँह आ गाल। नमहर-नमहर पनि‍गर डोका जकाँ आखि‍ आभासँ चमकैत कपार, गोर वर्ण, करीब साठि‍क उमेरि‍, पाथरक आकर्षक मूर्ति जकाँ तरासल सनक मुँह, नाक, कान, आँखि‍, गोखूर जकाँ टीकी, कपारपर कुमकुम चानन केर टीका, छह फूटा काया, छरहर शरीर, सुडोल पेट, धोधि‍ केर नामो-नि‍शान नै, सीटल-टोटल स्‍मार्ट। तइपर सँ संस्‍कृत, ब्रजबोली, हि‍न्‍दी, बंग्‍ला, अंग्रेजी, फ्रेन्‍च आ जर्मन, अतेक भाषा धारा प्रवाह बजैत-लि‍खैत। के नै मन्‍त्र-मुग्‍ध भ' जेता अहेन व्‍यक्‍तत्‍वसँ? हमहुँ भेलौं तँ कून आश्‍चर्य। त भेलै ई जे एक दि‍न श्रीवत्‍स गोस्‍वामी एक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठीमे बृन्‍दावन केर बांके बि‍हारी मन्‍दि‍रमे छप्‍पन भोगपर अपन एक आलेख पढ़लनि‍। रसगर वि‍न्‍यास, सोहनगर सामग्री, मधु टपकैत भाषा आ तइपर पॉवर प्‍वाईन्‍ट प्रजेन्‍टेशन। हुनकर ऐ प्रजेन्‍टेशनकेँ सुनला आ देखलाक बाद सभागारमे उपस्‍थि‍त तमाम देशी-वि‍देशी वि‍द्वान लोकनि‍ मन्‍त्रमुग्‍ध भ' गेलाह। हमहुँ भेलौं। हुनकर प्रजेन्‍टेशनसँ ऐ बातक जानकरी भेल जे प्रति‍ दि‍न बृन्‍दावन केर बांके बि‍हारी जीक मन्‍दि‍रमे मन्‍दि‍रक मुख्‍य देवता (प्रस्‍तर प्रति‍मा) राधा-कृष्‍णकेँ कमसँ कम छप्‍पन-पच्‍चास आओर छ-छप्‍पन भोज्‍य सामग्रीसँ भोग लगैत छन्‍हि‍। लोक सभ एवं स्‍थानीय पण्‍डा लोकनि‍ अपन-अपन धरक चि‍नवारसँ अति‍ सूचि‍ताक संग बि‍ना पीयाज, लहसून एवं कुनो वर्जित आ अखाद्य वस्‍तुकेँ देने बनल व्‍यंजन लबै छथि‍। नि‍यम तँ ई छै जे छप्‍पन व्‍यंजन हेबाक चाही मुदा सामान्‍यता ई संख्‍या दू गुना बढ़ि‍ जाइत छैक। श्रीवत्‍स गोस्‍वामी केर स्‍लाइड ततेक नीक रहैक तकर वर्णन शब्‍दसँ नै कएल जा सकैत अछि‍। व्‍यंजनक आकर्षन आ मनमोहक सौन्‍दर्य। वनेवा स ल' क' सजेबा धरि‍ केर बि‍हंगम दृश्‍य। सौन्‍दर्य, संयोजन आ समर्पण केर बेजोड़ उदाहरण। एकाएक बुझाएल जेना व्‍यंजन बनेबा आ सचार लगेबासँ पैघ कुनो कला नै भ' सकैत अछि‍। गाम स्‍मरण आबए लागल। जखन कखनो हमर बहि‍नक ससुर हमरा ओतए अबैत छलाह तँ हमर माए नाना तरहक व्‍यंजन आ तरकाी, तरूआ, पापर, अचार, चटनी, सलाद, सम्‍दास, बर, बड़ी आ नै जाने की की बनबैत छलीह। घरमे पावनि‍-ति‍हारबला उत्‍साह भ' जाइत छल। अलग- बगल केर महि‍ला सभ सेहो माएकेँ मदति‍ करबाक लेल आबि‍ जाइत छलथि‍न्‍ह। भोजन बनलाक बाद गाएक गोबरसँ ठॉव नीपल जाइत छल। बड़का कांसक थारी (बल्कि थार कहु) मे कमसँ कम एक सेर अरबा चाउरक गम-गम करैत छरहर भात सजाएल, थारी दि‍ससँ अर्धचन्‍द्राकारक स्‍वरूपमे पैघ आ छोट वि‍भि‍न्न प्रकारक बाटी सजाएल ओइ सभमे दालि‍, घृत, तरकारी, अचार, सन्ना, चटनी इत्‍यादि‍ राखल एकटा मध्‍यम आकारक छि‍पलीमे तरूआ इत्‍यादि‍ सजाएल पापर हमर माए जानि‍-बुझि‍ क' भटक ढेर पर राखैत छलीह । कलपरसँ टटका पानि‍ लाबक जि‍म्‍मेदारी हमर होइत छल। लोटाक संग एकटा फुलही गीलास सेहो होइत छलैक। जखन माए केर ई सभ तैय्यारी पूर्ण भ' जाइत छलन्‍हि‍ तँ हमरा कहैत छलीह- “जाऊ दरब्‍ज्‍जापर दद्दा (हमर पि‍ताक बेमातर जे हमर पि‍तासँ करीब 20 वर्षक पैघ छलाह। हम हुनका पि‍तामह तुल्‍य मानैत छलअनि‍। आ सि‍नेहसँ दादा कहैत छलयनि‍। ) के कहि‍औन्‍ह जे भोजनक सचार लगि‍ गेल अछि‍। समधि‍केँ भोजन करा देथुन्‍ह।‍” हम माएक सम्‍वाद ल' चट्ट दनी दरबज्‍जापर चलि‍ जाइ छलौं आ दादाकेँ कातमे बजा माएक सम्‍वाद नहु-नहु बता दै छलयन्‍हि‍। दादा साकांक्ष होइत बहि‍नक ससुरकेँ बड़ा वि‍नम्रतापूर्वक कहैत छलथि‍न्‍ह- “समधि‍, भोजन तैयार अछि‍। हाथ-पएर धोल जाओ। चलू भोजनक हेतु।‍” आ पाहून महोदय बड़ा विनम्रता स दादाक आग्रहकेँ स्‍वीकार करैत ओछायनपर सँ उठि‍ खराम पहीर- हाथ-पएर धो दादाक संग भोजनक हेतु वि‍दा होइत छलाह। आगाँ-आगाँ हम आ पाछाँ-पाछाँ ओ सभ। बड्ड प्रेमसँ भोजन करैत छलाह। अन्‍तमे माए बड़का बट्टामे छालीसँ भरल गरम दूध आ सभसँ अन्‍तमे दही भेजबैत छलथि‍न्‍ह। पाहुन महोदय थारीक परोसल ब्‍यंजन एवं तमाम वस्‍तुक लगभग 75 प्रति‍शत हि‍स्‍सा बड़ा मनोयोग पूर्वक ग्रहण क' लैत छलाह। एक-आध-बेर भोजनक प्रशंसा सेहो मुक्‍त कंठसँ करैत छलाह। कि‍छु हँसी-मजाक आ कटाक्ष: सेहो चलैत छलैक। दादा हुनका सामनेमे एक छोट पीढ़ीपर बैसल, बेंत पकरने हुनकर आव-भगतमे लागल रहैत छलाह। ओह!!!! कतए भटकि‍ गेलौं हम छप्‍पन भोगक चर्चामे!!! श्री वत्‍स गोस्‍वामी हमरा मोनमे एक हि‍साबें ब्रजप्रकल्‍पक खूब नीकसँ जनबाक जि‍ज्ञासा उत्‍पन्न क' देलन्‍हि‍। बीच-बीचमे कि‍छु सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे ब्रजभूमि‍सँ कलाकार आ कथावाचक सभ अबैत छलाह। गीतमे आ कथा वाचनाक क्रममे ई लोकनि‍ ब्रजभाषाक कि‍छु खांटी शब्‍दक प्रयोग करैत छलाह। ओ शब्‍द एहेन जे एकाएक प्रेमक नशामे मनुक्‍ख धूत्त भ' जाए। फेर की छल हम अपन संस्‍थाक ब्रज-प्रकल्‍प परि‍योजनामे लागि‍ गेलौं। मुदा एकाएक आरो परि‍योजना सभ आबि‍ गेलै आ हमरा ब्रज-प्रकल्‍प छोड़ए पड़ल। मोन हमेशा कचोट करैत रहल मुदा की कएल जा सकैत छल। 2007 ईंमे गामसँ हमर माता-पि‍ता दि‍ल्‍ली ऐलाह। माए मथुरा वृन्‍दावन जेबाक इच्‍छा व्‍यक्‍त केलनि‍। हम तुरंत तैय्यार भ' गेलौं। मुदा समयाभाव छल। हमरा लग समएक कमी रहैत अछि‍ ऐ बातसँ पि‍ताजी नीक जकाँ अवगत छलाह। ओ कहलनि‍- “ठीक छै। हमरा लोकनि‍ दि‍ल्‍लीसँ तीन बजे प्रात: बृन्‍दावनक हेतु प्रस्‍थान करब। बांके बि‍हारी, रंगनाथ इस्‍कॉन मन्‍दि‍र आ कि‍छु अन्‍य प्रसि‍द्ध मन्‍दि‍रक दर्शन करैत सीधे मथुरा चलि‍ पड़ब। मथुरामे द्वारकाधीशक पूजा कए आ भगवान श्रीकृष्‍णक जन्‍मस्‍थली (गर्भ गृह) देखलाक बाद भोजन- तत्‍पश्चात गोबरधनक परि‍क्रमा (कारेसँ) आ अन्‍तत: बरसाना जाय राधा-रानी या लाड़लीजीकेँ दर्शन करैत देर-सवेर ओही दि‍न दि‍ल्‍ली वापस आबि‍ जाएब।” पि‍ताजीक ऐ योजनासँ हम प्रसन्न भेलौं।‍ भेल जे सभ कार्य एके दि‍न (रवि‍ दि‍न) मे भ' जाएत। इहो भेल जे पि‍ताजी ब्रजक्षेत्रसँ नीक जकाँ वाकि‍फ छथि‍। माए सेहो पि‍ताजी केर योजनाकेँ सहर्ष स्‍वीकारि‍ लेलनि‍। दोसर दि‍न प्रात: हमरा लोकनि‍ स्‍नान-ध्‍यान कए ठीक तीन बजे बृन्‍दावन यात्राक हेतु दिल्ली सँ नि‍कलि‍ गेलौं। रस्‍ता साफ आ भीड़क नामो नि‍शान नै। गाड़ीक चालक साकांक्ष। बहुत वेगसँ मुदा सधल गाड़ी हँकैत। ठीक- दू घंटामे बृन्‍दावन पहुँच गेलौं। सभसँ पहि‍ने इस्‍कान मन्‍दि‍र, फेर रंगनाथ मन्‍दि‍र कि‍छु- छोट-मोट आनो मन्‍दि‍र आ अन्‍तत: बांके बि‍हारीक मन्‍दि‍र जा ओतए राधा-कृष्‍णक दर्शन केलौं। सभ कर्म शीघ्रतामे आ अन्‍हारेमे। ओतएसँ सीधे मथुराक हेतु, प्रस्‍थान केलौं। होइत छल शीघ्र द्वारकाधीशक दर्शन भ' जाएत तँ माए-बाबूजी अन्नजल ग्रहण करताह। द्वारकाधीशक दर्शन कए कृष्‍ण जन्‍मस्‍थलीक दर्शन केलौं। पुन: एक होटलमे भोजन कए बि‍ना समए गमौने हमरा लोकनि‍ गोबर्धन पर्बत दि‍स बि‍दा भेलौं। आब सुरूज पूरा उगि‍ गेल छलाह। जाड़ कम भ' रहल छल। गोबर्धन कोनो दृष्‍टि‍कोणे पहाड़ नै लागि‍ रहल छल। मुदा माए कहलनि‍- “बाऊ, भाव देखि‍ओ स्‍वरूप नै। कलयुग केर मनुक्‍खक दुष्‍कर्म आ पापसँ गाेबर्धन नीचा भ' गेल छैक। अहाँ पढ़ल-लीखल छी। कनी सोचू : भगवान कृष्‍ण जै गोबर्धनकेँ अपना आंगुरपर उठेने हेताह से की सामान्‍य पहार छल हेतैक? कि‍न्नौ नै।‍” माएक बातकेँ हम बि‍ना कुनो तर्क केने सुनि‍ लेलौं। एक बात ई नीक लागल जे गोबर्धन साफ-सुथड़ा छलैक। बीच-बीचमे अगल-बगल केर गामक महि‍ला सभ गोबरक चि‍पड़ी आ गोईठा पथैथ। कतौ-कतौ गाए-बाछी (आ बाछा) चड़ैत। चहुओर हरि‍यरी। रस्‍तामे झुण्‍डक-झुण्‍ड महि‍ला आ पुरूष लोकनि‍ बि‍ना जूता-चप्‍पल पहि‍रने गोबर्धनक परि‍क्रमा करैत। राधे-कृष्‍ण, राधे-कृष्‍णक रट लगबैत। मुरलीधर की जाय। श्रीकृष्‍ण की जय। करैत। आ कि‍छु लोक सभ गीत गबैत प्रेमक उन्‍मादमे वि‍भोर भेल चलल जाइत। एक ठामक ई दृश्‍य देख माए भावुक भ' गेलीह। कहलनि‍- “बाऊ, 10-१५ मि‍नट लेल हमरा कारपर सँ उतारि‍ दीअ। कमसँ कम 1008 डेग पएरे तँ चलि‍ ली ऐ भूमि‍पर! ई माटि‍ जौं पएरमे लागि‍ जएत तँ जीवन धन्‍य भ' जएत।” हम गाड़ी रोकि‍ माए केर संग लगभग दू कि‍लोमीटर पैदल चलैत रहलौं। माए बड़ प्रसन्न भेलीह। मुदा ई कचोट रहि‍ये गेलन्‍हि‍ जे शायद पूरा गोबर्धनक परि‍क्रमा पएरे-पएरे करि‍तौं। बादमे हमरा लोकनि‍ कारपर बैस गेलौं। गोबर्धनसँ हमरा लोकनि‍ बरसानाक हेतु वि‍दा भेलौं। बरसाना पहुँच क' राधा-रानीक मन्‍दि‍र जेबाक छल। ओतए गेलाक बाद ज्ञात भेल जे मन्‍दि‍र तँ पहाड़ीपर छैक जै लेल लगभग चारि‍ सए सीढ़ीक पैदानपर चढ़ह पड़तैक। धर्मसँ ओतप्रोत भेल माए बड़ा सहजतासँ सीढ़ी चढ़ए लगलीह। पि‍ताजी घुटनाक दर्दसँ ग्रसि‍त छलाह तथापि‍ नहु-नहु ओहो सीढ़ी चढ़ैत रहलन्‍हि‍। बीच-बीचमे सुसताइत आ आगू बढ़थि‍। अन्‍तत: हमरा लोकनि‍ मन्‍दि‍रक प्रांगणमे प्रवेश केलौं। मुदा प्रवेश केलाक बाद पता चलल जे मन्‍दि‍रक पट बन्‍द छैक। तइकाल दू बजैत रहैक। लोक सभ कहलक जे मन्‍दि‍रक पट साढ़े चारि‍ बजे सांझमे खुजतैक। थाकल तँ रहबे करी। एकठाम भुईयेमे ओछाइन ओछा, जाजीम बीछा हमरालोकनि‍ बैस गेलौं। कनीकालक बाद दूटा 8-10 बर्खक लड़का आ दू टा बालिका सभ स्‍थानीय, हमरा सभ लग पहुँचल। कहए लगल- “बाबू जी, राधा-रानी की गीत सुनाऊँ?‍” कहि‍ नै कि‍याएक हम तुरत कहि‍ देलि‍ऐक- “ठीक है सुनाओ।‍” आ ओ सभ गीत गाबए लागल: “राधा रानी की जय। महरानी की जय......।‍” सभ आखर सुन्‍दर बोली मनमोहक। स्‍वर खांटी लोकल आ सुअदगर। गीतक बाद गीत। ओ सभ गबैत रहल। ब्रजबोलीमे समस्‍त वातावरण राधामय। माए भाव-वि‍भोर भ' हाथ जोड़ने राधा-रानी की जाय, माहरानी की जय, राधे-कृष्‍ण, राधे-कृष्‍ण बजैत रहलीह। गीत सुनैत रहलीह। तीर्थक इच्‍छाक पूर्ति भेलनि‍ तै सुखसँ उह्लादि‍त भ' गर्म-गर्म नोर खसैत रहलन्‍हि‍। जेना-जेना माए केर आँखि‍सँ नोर खसन्‍हि‍ तेना-तेना हुनकहि‍ आँखि‍ आ मुँह सुन्नर भेल गेलन्‍हि‍। पि‍ताजी सेहो प्रसन्न छलाह। ठीक साढ़े चारि‍ बजे मन्‍दि‍रक पट खुजलैक। लोक सभ जोरसँ राधा- रानी की जय केर धोष केलक आ मन्‍दि‍रमे प्रवेश केलक। दर्शन केर बाद हमरा लोकनि किछु ‍ काल आरो ओतए रहलौं। जखन अन्‍हार होमए लगलैक तँ पहाड़ीपर सँ नीचाँ उतरए लगलौं। नीचाँ उतरि‍ चाह-नाश्‍ता क' एकबेर पुन: भगवान श्रीकृष्‍ण आ राधा रानी केर जयकार करैत दि‍ल्‍लीक हेतु प्रस्‍थान केलहुँ। दि‍न भरि‍क थाकल आ भोरे ऑफि‍स जेबाक बोझ तँए सूति‍ रहलौं। मुदा मोनमे ई भावना प्रबल भ' गेल जे एकबेर चैनसँ ब्रजक्षेत्र घूमब। यमुनाकेँ देखक इच्‍छा आ बरसानेक सौन्‍दर्यक अवलोकन सदरि‍काल मोनमे औढ़ मारैत रहल। जनवरी 2011मे हमर सासु बृन्‍दावन जेबाक इच्‍छा हमरासँ व्‍यक्‍त केलनि‍। ओ हमर स्‍वर्गीय स्‍वसुर पण्‍डि‍त कालीनाथ झा केर प्रथम पुण्‍यति‍थि‍सँ पूर्व एकबेर यमुनामे स्‍नान एवं अपन गौरक विसर्जन करए चाहैत छलीह। हम तुरत अपन संगी श्री वि‍रेन्‍द्र कुण्‍डुसँ बात कए जनवरी मासक अन्‍ति‍म रवि‍ दि‍न अप्‍पन सासुक संग वि‍रेन्‍द्रक कारसँ बृन्‍दावन जेबाक योजना बना लेलौं.......। बृन्‍दावन केर हमर एक विद्यार्थी वि‍भु शर्मा कहलक जे ओर अनुज प्राण्‍जल हमरा लोकनि‍केँ तमाम स्‍थानीय सहायताक व्‍यवस्‍था करता दि‍ल्‍लीसँ स्‍नान-धि‍यान कए हमरा लोकनि‍ 5 बजे भोरे वि‍दा भेलौं। सीधे वृन्‍दावन पहुँलौं। ओतए इस्‍काँन मन्‍दि‍र लग प्रान्‍जल शार्मा हमरा लोकनि‍क पथ हेर रहल छल। प्रान्‍जल संग प्रवीण शर्मा नामक एक स्‍थानीय गाइड छलैक। प्रान्‍जल हमरा कहलक जे ई आहाँकेँ सभ कछु देखोताह। हमर सासु केर इच्‍छा सर्व प्रथम यमुनामे स्‍नान आर गौर वि‍सर्जनक छलन्‍हि‍। प्रवीण कहलक जे बृन्‍दावनक केशी घाट सर्वोत्तम छैक। केशी भगवान श्रीकृष्‍णक घोड़ाक नाम छलन्‍हि‍। ओ बड़ा प्रतापी तथा पूण्‍यात्‍मा घोड़ा छलै। प्रवीण स्‍थानीय होमाक कारण बृन्‍दावन केर एक-एक गलीसँ परि‍चि‍त छल। रमणरेती दि‍ससँ ल' क' जाय लागल। कहलक- “यएह छी रमणरेती।‍” देखैत छी चारू दि‍स गली, मकान, मन्‍दि‍र, मर्धशाला इत्‍यादि‍। एको ईंच धरती खाली नै। एको चम्‍मच रेतक माने बाउलक नामो नि‍शान नै। चहुँ दि‍स तंगी, आ गन्‍दगी। भेल यएह थीक रमणरेती? खाइर! गली-कुच्‍ची होइत अंतत: हमरालोकनि‍ केशी घाट पहुँचलौं। यमुनामे जल कुनो वि‍शेष नै। 15टा नाह कछेरपर लागल। पाँच-सात तीर्थायात्री स्‍नान करैत। मोनमे भेल- चलु चैनसँ स्‍नान करब। यमुनामे गाड़ीसँ उतरि‍ कछेरपर एलौं। कछेरपर अबि‍ते पानि‍सँ दुुर्गन्‍ध आबए लगल। कारीसीयाह पानि‍। तीनठामसँ पूरा शहरक गन्‍ध-भरल पानि‍ यमुनामे हड़ा-हड़ा क' खसैत। मोन धृणासँ भरि‍ गेल। नहेबाक इच्‍छा समाप्‍त भ' गेल। यमुनाक तमाम कल्‍पना आ वर्णन बि‍सरि‍ गेलौं। एकाएक एना बुझना गेल जेना हम दुनि‍याँक सभसँ पैघ गन्‍दा नालामे आबि‍ गेल छी। कृष्‍ण-राधा-गोपी कदम्‍बक गाछ यमुना....। सभ कि‍छु खतम!!! नावबला सभ कहलक- “श्रीमान्, नाहपर चढ़ा, हम यमुनाक ओइपार लए जाइत छी। ओतए नीक जल छै।‍” हमरालोकनि‍ नाहपर चढ़ गेलौं। जलसँ दुर्गन्‍ध अबैत छल। मोन घोर छल। ओइकात जा बालुपर सभ समान रखलौं। एक आंजुर जल उठेलौं। कारी-भीस आ दुर्गन्‍धसँ भरल। दय स्‍नान करैसँ साफ मना क' देलक। मुदा हमर सासु जि‍द्द ठानि‍ देलन्‍हि‍। ओ यमुनाक ओइ जलमे ग्‍यारह डुब्‍बी मारलनि‍। सबहक हेतु आ अपनो लेल। हम कहलि‍यनि‍- “एक डुब्‍बी हमरो लेल मारि‍ लेथि‍।‍” हमरा लग चन्‍दन केर पेस्‍ट छल। हम हुनक माथ एवं हाथमे रगड़लौं आ फेर बृन्‍दावन केर मन्‍दि‍र दि‍स प्रस्‍थान केलाैं। सभसँ पहि‍ने रंगनायक मन्‍दि‍र, तकरबाद एक आर मन्‍दि‍र- जइमे कृष्‍ण जीक बालवस्‍थाक मूर्ति कि‍शोरी जीक संग छलन्‍हि‍। तइमे अएलौं। पण्‍डा सभ नाना तरीकासँ वि‍धबा, कल्‍याण, अनाथ आश्रम, गौसेवा- लोक सभसँ पैसा ऐंठबामे माहि‍र। गली सभ गंदगीसँ भरल। समए बीतल जाइत छल। हम प्रवीणकेँ कहलि‍ऐक- “सीधे हमरा लोकनि‍केँ बांके बि‍हारी जीक मन्‍दि‍र ल' चलु।‍” करण हुनकर दर्शन बि‍ना हमर सासु अन्न-जल ग्रहण नै क' सकै छलीह। प्रवीण संग हमरालोकनि‍ बांके-बि‍हारी मन्‍दि‍र केर प्रांगण दि‍स बढ़लौं। पूरा गलीमे बड्ड भीड़। मनुक्‍ख चुट्टीक धारी जकाँ ससरैत। हरे-कृष्‍ण, राधे-राधेक उच्‍चारणसँ वातावरण गनगनाइत। चारू दि‍स गली सभमे गंदगी। कतौ-वि‍धबा सभ भीख मंगैत तँ कतौ भगवा वस्‍त्रमे साधु! मोन खि‍न्न-खि‍न्न! भेल। कतए आबि‍ गेलौं। प्रवीण स्‍थानीय होबाक कारणे एकटा नुकौका गलीसँ हमरा लोकनि‍केँ मन्‍दि‍रक प्रांगणमे घुसेलन्‍हि‍। मनुक्‍खपर मनुक्‍ख चढ़ैत। हमरा लोकनि‍ कोहुना-कहुना बांके-बि‍हारी जीकेँ एक झलक देख पेलौं। आब मोनमे आबए लगल जे कखन बाहर नि‍कली। जखन वापस अबैत रही तँ कातमे एक भव्‍य साधु जे करीब 65 वर्षक छल के कनैत आ भाव-वि‍भोर होइत देखलऐक। हम कहलऐक‍- “क्‍यो रो रहे हो बाबा?‍” जबाब देलाह- “आज ठाकुर जी का ब्‍याला है।‍” हम ब्‍यालाक अर्थ नै बुझलौं पुछलयनि‍- “ब्‍याला क्‍या होता है?‍” साधु- “जब कि‍सी का मन्नत पूरा हो जाता है तो ठाकुर जीका ब्‍याला करबाता है। ब्‍याला अर्थात् वि‍वाह। इसमे तीन लाख रूपये का खर्च है। फूलों से पूरे मन्‍दि‍र को सजाया जाता है। बरात का आयोजन, पालकी मे बैठाकर ठाकुर जी एवं कि‍शोरी जी को पूरे बृन्‍दावन मे घुमाया जाता है। पालकी पुन: बरसाना ले जाया जाता है और वहाँ से वापस बृन्‍दावन।” हमरा मुँहसँ नि‍कलल- “ठीक है। अच्‍छा है। ये तो उत्‍सव का माहौल है। फि‍र रो क्‍यों रहे हो?‍” साधु- “रोने का ही तो समय है। राधे-राधे इसलि‍ऐ रो रहा हूँ कि‍ राधा मेरी बहन है।‍ अब ठाकुर जी से उसका ब्‍याहला हो रहा है। इसके बाद वह हमसे बि‍छुड़ जाएगी। मैं नहीं रोऊँगा तो कौन रोएगा।” ई कहि‍ ओ भोकासी पारि‍ पुन: कानए लगल। ओकर कानब वास्‍तवि‍क। कुनो माटकि‍एता नै। सहज आ नि‍श्‍छल। ओहि‍ना जेना एक सहोदर भाय अपन वहि‍नक दुरागमनक काल कनैत अछि‍। वहि‍नसँ बि‍छुड़बाक वएह टीस। वएह भावनात्‍मक लगाव। हमर मोन ओकरा प्रति‍ श्रद्धासँ भरि‍ गेल। बृन्‍दावनसँ सि‍नेह बढ़ए लागल। धृणा समाप्‍त होमए लागल। एकाएक नजरि‍ एक लगभग 45 वर्षक युवकपर गेल। फुलपेन्‍ट-शर्ट पहि‍रने, माथामे चानन मुदा त्रि‍पुण्‍ड नै। धरगर-पतरगर। गरदनि‍मे तुलसीक माला लपेटने-बि‍ल्‍कुल गरदनि‍मे सटल आ लपटाएल। ओ बांके-बि‍हारी जीक सामने ठाढ़ भ' कि‍छु बड़बड़ाइत छल। हम अनायास ओकरा लग बढ़लौं। सुनैत छी ओ कि‍छु एना बाजि‍ रहल अछि‍- “बड़ो जीजा जी। क्‍या लीला करते हो। बड़ो-बड़ो को नचाते हो। मैं मस्‍त हो गया। धन्‍य हो गई मेरी बहना। मुझे और क्‍या चाहि‍ए। अगर मेरी बहन और जीजा प्रसन्न तो मैं भी प्रसन्न। लग रहो।‍” हमरा बुझना गेल ई की बाजि‍ रहल अछि‍। हम टोकैत कहलि‍यनि‍- “कि‍ससे बात कर रहे हैं आप?‍” युवक- “बांके-बि‍हारी जी से और कि‍ससे।‍” हम- “फि‍र जीजा जी कि‍से कह रहे थे?‍” युवक- “बि‍हारी जी को।‍” हम- “बि‍हारी जी को?‍” युवक- “जी। मैंने अपने गुरूजी के आदेश से बि‍हारी जी को अपना जीजा बनाया है। इस तरह राधा जी मेरी बहन हुई। मैं अाप लोगों की तरह इनसे कुछ मांगने नहीं आता। भाइ भला अपने जीजा और बहन से क्‍या मांगेगा। वो ताे देगा ना। मैं तो देने आता हूँ। इनके लीला को देखने आता हूँ।‍” हम आश्‍चर्यित होइत‍ बजलौं- “आपका क्‍या नाम है?‍” युवक- “मेरा नाम चोलेश शर्मा है। मैं दि‍ल्‍ली से हूँ। प्रति‍ सप्‍ताह रवि‍वार को यहाँ आता हूँ।‍” हम- “अब यहाँ से कहाँ जाऐंगे?‍” युवक- “आज मथुरा नहीं जाऊँगा। यहाँ से सीधे बरसाने जाऊँगा। अपनी लाडली राधा से मि‍लकर वापस दि‍ल्‍ली चला जाऊँगा।‍” हम- “क्‍या हमलोग भी आपके साथ चल सकते हैं।‍” युवक- “क्‍यों नहीं। आप भी चले। हमारी गाड़ी के साथ-साथ।‍” चोलेश शर्माक भावमे सेहो हमरा सहजता आ समर्पण बुझना गेल। हमरा लोकनि‍ मथुराक यात्रा कुनो आन बेर लेल छोड़ि‍ वरसाना दि‍स वि‍दा भेलौं। बृन्‍दावन केर कि‍छु नगद राशि‍ आ धन्‍यवाद दैत चोलेश शर्माक संग हमरा लोकनि‍ आगाँ बढ़लौं। हम अपन एक आदमीकेँ चोलेश शर्मा गाड़ीमे बैस चोलेश राधा-कृष्णक कथा आर एक-एक स्‍थानक गुणगान करैत रहल। समस्‍त बृन्‍दावन एक भव्‍य लाग'-लागल। अन्‍तत: दू बजे दि‍नमे बरसाने पहुँचलौं। पहाड़पर चढ़ि‍ राधा-रानीक मन्‍दि‍रमे प्रवेश केलाैं। करीब 25मि‍नट चढ़ैमे लागल। पता चलल जे मन्‍दि‍रक पट बन्न छै। साढ़े चारि‍ बजे सांझमे खुजतैक। चोलेशक संग मन्‍दि‍रक बाहरी हि‍स्‍साक आवरणक नि‍रक्षण करए लगलौं। बस्‍सानेकेँ मध्‍यमे ई पहाड़ी बरसानाकेँ माथपर मनटीका जकाँ लागल। एे मन्‍दि‍रकेँ लाड़लीजीक मन्‍दि‍र कहल जाइत छैक। मन्‍दि‍रक ि‍नर्माण राजस्‍थानक राजा वीर सि‍ंह 1675ईं.मे करोलन्‍हि‍। मन्‍दि‍रक स्‍थाप्‍य दक्षि‍ण आर उत्तर भारतक सोहनगर मि‍श्रण केर अनुपन उदाहरण बुझना गेल। मन्‍दि‍र 90फीटक छैक। शि‍खर उजर, नीला ग्रेनाईट पाथर तथा सोनासँ बनल छैक। मन्‍दि‍रक कलाकृति‍क ि‍नर्माण दक्षि‍ण भारतक 15कलाकार केर सहायतासँ कएल गेल छै। मन्‍दि‍रक प्रांगणक चारूकात राजस्‍थान शैलीक पेन्‍टि‍ंगसँ सजाएल। कतौ कृष्‍ण गोपीक चीर हरण करैत, कतौ मत्‍स्‍यावतारक चि‍त्रण, कतौ नटखट कन्‍हैयाकेँ यसोदाजी उखड़ि‍मे बन्‍हने, कतौ कलि‍या नागकेँ नथैत कृष्ण, कतौ कदम्‍बक गाछपर बैस बासुरी हेरैत कृष्‍ण, कतौ गोवर्धन पहाड़केँ आंगुरपर उठेने कृष्‍ण, कतौ यमुनासँ जल भरैत गोपी, कतौ ऐ मंदि‍रक रचनाक उल्‍लेख-चि‍त्रकलाक उत्तम प्रस्‍तुि‍त। चोलेश शर्मा एक स्‍थानीय साधु श्री भोलालाल दासक सहायतासँ एक-एक चीजक दर्शन हमरा लोकनि‍केँ करौलन्‍हि‍। मुख्‍य पट खुजबामे अखनो समए छल। हमरा लोकनि‍ मन्‍दि‍रक पाछाँमे बनल एक छोट करी दि‍स बढ़लौं। एक साधु भेटलाह। चालेश ओइ साधुसँ बात करए लगलाह। बीच-बीच झुण्‍डक-झुण्‍ड स्‍थानीय महि‍ला सभ धधरा-चुनरी पहि‍रने राधा-कृष्‍णक लोकगीत गबैत अबैत रहल। मोन, प्रसन्न भेल। साढ़े चारि‍ बजे पट खुजि‍ गेलैक। राधा-कृष्‍णक बड़ा नि‍श्‍चि‍न्‍ततासँ दर्शन भेल। आब हमरा लोकनि‍ दि‍ल्‍लीक हेतु प्रस्‍थान केलौं। जतए-कतौ खाली स्‍थान रहैक ततय राधे-राधे लीखल। हमहूँ राधे-राधेमे मग्‍न भ' गेलौं। इहो पता चलल जे बरसानाक पूर्व नाम ब्रम्‍हसरीन छैक। दंतकथा ई छैक जे एक बेर ब्रम्‍हाजी भगवान श्रीकृष्‍णसँ धरतीपर ि‍कछु दि‍न रहबाक नि‍वेदन केलथि‍न्‍ह। कृष्‍ण कहलथि‍न्‍ह ब्रम्‍हाजीसँ- “ठीक छैक अहाँ एकटा पहाड़ीमे अपने-आपकेँ परि‍वर्तित करू। ब्रम्‍ह तुस्‍त पहारी भ' गेलाह। तै बरसाने केर चारि‍ पहारी ब्रम्‍हाजीक चारि‍ मस्‍ति‍क या सि‍र मानल जाइत अछि‍। तै ब्रम्‍हाकसि‍रसँ ब्रम्‍हसरीन भेल या ब्रम्‍हसरीन कालान्‍तरमे बरसाने भ' गेल।‍” यायावरी- मलि‍क भाय केर फुटपाथी चिंतन मलि‍क भाय हमरा बड्ड प्रि‍य छथि‍। पि‍ण्‍डश्‍याम वर्ण, लगभग 48-50 केर आयु, मोट नाक मुदा नीक आ सुडौल काया। सदरिकाल गंभीर बनल। कपड़ा-जूत्ता पहि‍रबाक नीक शैली। खानदानी मुसलमान छथि‍। हि‍नकर पि‍ताजी अलीगढ़ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालयमे इति‍हासक प्रख्‍यात प्रोफेसर छलथि‍न्‍ह। आब अवकाश प्राप्‍त जीवन जीबैत छथि‍न्‍ह। मलि‍क भायक नाम मुर्त्तज़ा मलिक ‍छन्‍हि‍। हि‍नकर परि‍वार शि‍क्षि‍त आ उदारवादी परि‍वार छन्‍हि‍। मलि‍क भाय डाक्‍यूमेन्‍टरी फि‍ल्‍म बनबैत छथि‍। पहि‍ने बहुत दि‍न धरि‍ रंगमंचसँ जुड़ल छलाह। हबीब तनवीर केर संग नाटक केलन्‍हि‍। नौटंकीमे नीक अभि‍रूचि‍ छन्‍हि‍। वि‍शेष रूपसँ कानपुर, हाथरस आ मथुराक नौटंकी परम्‍पराक प्रति‍ हि‍नकर लगाव अद्भुत छन्‍हि‍। ओहि‍ शैलीकेँ पुर्नजीवि‍त करबाक लेल सदरिकाल तत्‍पर रहैत छथि‍। मुसलमान समाजक बुद्धि‍जीवि‍, आइ.ए.एस., आइ.एफ.एस., आइ.पी.एस., रंगकर्मी, साहि‍त्‍यकार, महि‍ला इन्‍टर प्रेन्‍युअर इत्‍यादि‍क बीच ई अपन ठोस पकड़ बनौने छथि‍। मुसलमान राजनेता चाहे कुनो पार्टीक कि‍एक ने होथि‍, मलीक भायकेँ सम्‍मान करैत छथि‍न्‍ह। जखन अब्‍दुल कलाम राष्‍ट्रपति‍ छलाह तँ मलि‍क भाय सदरिकाल राष्‍ट्रपति‍ भवन केर चक्कर लगबैत रहैत छलाह। मुदा बि‍ना बजौने कहि‍यो नहि‍ गेलन्‍हि‍। तखने जाइत छलन्‍हि‍ जखन बजाहट अबैत छलन्‍हि‍। वर्तमान उपराष्‍ट्रपति‍ डॉ. अंसारी लग सेहो हि‍नकर बड्ड नीक पहुँच छन्‍हि‍। अंसारी महोदयकेँ बड्ड करीबी मानल जाइत छथि‍ मलि‍क भाय। एन.डी.ए. केर शासन कालमे मलि‍क भाय राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ, भारतीय जनतापार्टी एवं एन.डी.ए. केर घटक दलक नेता सभसँ बड्ड समि‍पक नाता रखैत छलाह। मलि‍क भायसँ प्रथम परि‍चए हमरा एन.डी.ए. केर शासन कालमे नेशनल म्‍युजि‍यम संस्‍थान केर एक होनहार शोधार्थी श्री आनन्‍दवर्धन जे आइ-काल्हि‍ Delhi Institute of Heritage and Research Managemenet मे सि‍नि‍यर लेक्‍चरॉर छथि‍, भारतीय जनतापार्टी केर मुख्‍यालयमे करोलन्‍हि‍। अहि‍ बातकेँ लगभग नौ वर्ष भऽ गेल। आनन्‍दवर्धन हमरा कहलन्‍हि‍- “‍भैया, ई छथि‍ मलि‍क भाय। बड्ड नीक लोक। Documentary film बनबैत छथि‍। राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ आ संस्‍कार भारती सं बड्ड नीक सम्‍बन्‍ध छन्‍हि‍। भारतीय परम्‍परासँ सि‍नेह छन्‍हि‍। भारतीय परम्‍परा केर संरक्षण आ सम्‍बर्धनमे सदरिकाल लागल रहैत छथि‍। उदारवादी प्रवृति‍ केर मुसलमान छथि‍। अयोध्‍यामे राम मन्‍दि‍र बनए, तकर पक्षधर छथि‍। पाकि‍स्‍तानक घोर वि‍रोधी छथि‍। हि‍न्‍दु-मुसलमान एकताक समर्थक छथि‍...।" इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। आनन्‍दवर्धन केर अहि‍ परि‍चएपर मलि‍क भाय बि‍ना कि‍छु बजने आँखि‍मे धूपबला कीमती चश्‍मा लगौने बड़ा गम्‍भीर अहँकार-हीन भावना सं हमरा लग आबि‍ गर्मजोशी सँ हमरासँ हाथ मि‍लौलन्‍हि‍। आनन्‍दवर्धनजी मलि‍क भायकेँ सेहो हमर बड़ा वि‍स्‍तारपूर्वक परि‍चए देलथि‍न्‍ह। नहि‍ तँ आनन्‍दवर्धनजी हमरा मलि‍क भायक पूर्ण नाम बतौलन्‍हि‍। आ नहि‍ये हम जनबाक प्रयास केलहुँ। मुदा तकरबाद मलि‍क भायसँ दि‍न-प्रति‍दि‍न सम्‍बन्‍धक प्रगाढ़ता बढ़ैत गेल। मलि‍क भायसँ जतेक नजदि‍की अबैत गलहुँ ततेक हि‍नका प्रति‍ हमर सि‍नेह आ सम्‍मान बढ़ैत गेल। एक दि‍न मोनमे आएल- आहि‍ रे बा! मलि‍क भाय केर नाम तँ हमरा पते नहि‍ अछि‍। कहीं कहि‍यो कि‍यो पूछलक जे मलि‍क भाय अर्थात के, तँ की उत्तर देबैक? मुदा प्रगाढ़ता अतेक बढ़ि‍ गेल छल जे हमरा मलि‍क भायसँ हुनकर नाम पुछबाक हि‍म्‍मत नहि‍ भेल। जखन आनन्‍दजी भेँट भेलाह तँ पुछलि‍एनि‍- “मलि‍क भाय केर नाम की छन्‍हि‍?‍” आनन्‍द जवाब देलन्‍हि‍- “हमरो ज्ञात नहि‍ अछि‍। हमहूँ हि‍नका मलि‍क भाय केर नामसँ जनैत छयन्‍हि‍।‍” एक दि‍न मलि‍क भाय हमरा इमेल भेजलन्‍हि‍। ओहि‍ इमेल आइ.डी.मे इमेल भेजएबलाक नाम मुर्त्तज़ा मलि‍क रहैक। एकहि‍ क्षणमे ई इमेल हमर समस्‍याक समाधान कऽ देलक। जखन राम जन्‍मभूमि‍ आ बाबरी मस्‍जि‍द केर बि‍बादपर इलाहावाद हाइकोर्ट (लखनऊ बेन्‍च)क निर्णय अएलैक तँ झट दनि‍ मलि‍क भाय हमरा ई एस.एम.एस. केलन्‍हि‍- “Congrats now me can build temple‍” कनिकालक बाद मलि‍क भाय फोन सेहो केलन्‍हि‍। कहए लगलाह- “कैलाश भाय, भारतक मुसलमान आब शान्‍ति‍ चाहैत अछि‍। हमरा लोकनि‍ हि‍न्‍दु-समाजक संग मिलि कऽ रहए चाहैत छी। आब अतए केर मुसलमान कुनो नेता आ मुल्‍लाक मायाजालमे नहि‍ ओझराए चाहैत अछि‍। मुसलमान समाजक युवावर्ग आब वि‍कासमुखी भऽ गेल अछि‍। आब एहि‍ तरहक बात लऽ कऽ हमरा लोकनि‍ खून खराबा नहि‍ कऽ सकैत छी। बहुत भेल आब कुनो नेता किंवा कठमुल्‍लाक झपासामे देशक मुसलमान नहि‍ आबएबला अछि‍। हमरा लोकनि‍ तँ बल्कि ई सोचि‍ रहल छी जे देशक मुसलमान सभकेँ वि‍भन्न भौगोलि‍क क्षेत्रसँ बजा अयोध्‍या लऽ जाइ आ हि‍न्‍दु लोकनि‍क संग मि‍ल कऽ एक भव्‍य आ पैघ राम-मन्‍दि‍र केर निर्माणक कार्य प्रारम्‍भ करी। अगर एहेन भऽ गेल तँ समस्‍त वि‍श्‍वमे एकटा बात पहुँचत जे भारत सरि‍पहुँमे अनेकतामे एकता, आपसी सामंजस्‍य तथा वैवि‍ध्‍य संस्‍कृति‍क समागम स्‍थल अछि‍। एहेन प्रमाण अन्‍यत्र संभव नहि‍।‍” मलि‍क भाय केर एहि‍ तरहक वि‍चार सुनि‍ मोनमे एक बेर फेर हुनका प्रति‍ अपार सि‍नेह आ सम्मान जागि‍ गेल। मोन भेल जे मलि‍क भायकेँ हृदएसँ लगा ली। तैय्यार सेहो भेलहुँ। मुदा कहि‍ नहि‍ कि‍एक एकै झटकामे अपने-आपकेँ रोकि लेलहुँ। भेल मलि‍क भाय सोचताह- “राम-मन्‍दि‍र लेल कैलाश भाय अतेक चि‍न्‍ति‍त छथि‍ मुदा मुसलमानक भावना केर चि‍न्‍ता कहाँ छनि‍। कैलाश भाय कते मतलबी लोक छथि‍!” करीब दू बरख पूर्व मलि‍क भाय पुनीता शर्मा नामक एक पि‍ण्‍डश्‍याम मुदा आकर्षक नाक-नक्‍शावाली बालाक संग हमरा लग अएलाह। पुनीता शर्माक सम्‍बन्‍धमे मलि‍क भायसँ हमरा ई ज्ञात भेल जे पुनीता शर्मा कत्‍थक नृत्‍यांगना छथि‍। ओ अपन संस्‍थाक माध्‍यमसँ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक आयोजन करैत रहथि‍ छथि‍। पुनीता शर्मा बि‍हारसँ थिकीह। नृत्‍य संग-संग नृत्‍य-नाटि‍काक सेहो मंचन एक उभरैत कलाकारक रूपमे करैत छथि‍। पुनीता शर्माक संग एक आरो श्‍यामे वर्ण, छटगर मुदा आकर्षक आ मुँहक पानि‍मे पुनीता शर्मासँ कनी अठारह, एक नायि‍का हमरा लग आएल छलीह। एहि‍ नायि‍का केर नाम छलन्‍हि‍ अनु चौधरी। बार्तालापक क्रममे पता चलल जे अनु चौधरी मुलत: मि‍थि‍लासँ छथि‍। हि‍नकर पि‍ता कुनो संस्‍कृत वि‍द्यालयमे गणि‍त केर शि‍क्षक छथि‍न्‍ह आ दि‍ल्‍ली महानगरीक पश्‍चि‍मी कछेरमे बसल नजफगढ़मे अपन घर-द्वार बना रहि‍ रहल छथि‍। अनुक जन्‍म, पालन-पोषण एवं शि‍क्षा इत्‍यादि‍ सेहो दि‍ल्‍लीए मे भेल छन्‍हि‍। अनु हि‍न्‍दीसँ एम.ए. केलाक बाद दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालयसँ पी.एच.डी. कऽ रहलि‍ छलीह। आब पी.एच.डी. लगभग लगि‍चाए गेल छन्‍हि‍। मुदा अनु पुनीताक तुलनामे कनी गंभीर बुझना गेलीह। जखन अनुकेँ हमरा बारेमे ज्ञात भेलन्‍हि‍ जे हम मैथि‍ल छी तँ ओ हमरासँ हि‍ल-मि‍ल गेलीह आ खाँटी मैथि‍लीमे वार्तालाप करए लगलीह। “राग-वि‍राग‍” संस्‍थासँ अनु सेहो जुड़ल छलीह। पुनीता शर्मा आ अनु चौधरी दुनूकेँ बि‍हारक संस्‍कृति‍ आ संस्‍कारसँ घोर लगाव बुझना गेल हमरा। ई दुनू मि‍ल अपन संस्‍था- राग-बि‍रागक माध्‍यमसँ हम्‍मर ताहि‍ समएक संस्‍था- इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर प्रांगणमे “बि‍हार उत्‍सव‍” मनबए चाहैत छलीह। ओहि‍ सांस्‍कृति‍क कार्यक्रममे प्रदर्शनी, लोक तथा शास्‍त्रीय नृत्‍य आ संगीतक मंचन, बि‍हारक सांस्‍कृति‍क वि‍रासत तथा बि‍हारमे वि‍कासक संभावनापर एक दू-दि‍नक संगोष्‍ठी इत्‍यादि‍ करबाक वि‍चार छलन्‍हि‍। यद्यपि‍ बि‍हारक प्रति‍ हुनका हृदएमे अगाध प्रेम छन्‍हि‍। जखन ई दुनू नायि‍का मलि‍क भायसँ बि‍हार उत्‍सव करबाक इच्‍छा व्‍यक्‍त केलखि‍न तँ मलि‍क भाय हुनका लोकनि‍क संग मि‍ल एहि‍ सपनाकेँ साकार करवाक लेल लागि‍ गेलाह। मुदा स्‍पॉन्‍सर भेटबाक लेल एक परि‍योजना तथा एकटा आधार लेख जरूरी। ओही परि‍योजना तथा आधारक निर्माण, संगहि‍-संग इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर प्रांगणमे कार्यक्रम करबाक अनुमति‍ केर लेल मलि‍क भाय एहि‍ दुनू नायि‍काकेँ लए हमरा लग आबि‍ गेलाह। हम मलि‍क भाय केर बि‍हारक प्रति‍ प्रेम एवं पुनीता तथा अनुक इच्‍छाकेँ सम्‍मान करैत परि‍योजना तैय्यार कऽ देलयन्‍हि‍। संगहि‍ अपन तात्‍कालीन सदस्‍य सचि‍व डॉ. कल्‍याण कुमार चक्रवर्तीसँ नि‍वेदन कए पूरा कला केन्‍द्रक प्रांगण हि‍नका लोकनि‍केँ बि‍हार उत्‍सव केर आयोजन करबाक हेतु दि‍या देलयन्‍हि‍। आब मलि‍क भाय प्रसन्न भऽ पुनीता आ अनुक संग बि‍हार उत्‍सव केर तैय्यारीमे जमि‍ कऽ लागि‍ गेलाह। स्‍पॉन्‍शरशीप केर लेल सेहो जतय-जतय दौड़-धूप करए लगलाह। हमहुँ उत्‍साहि‍त रही। मुदा एकाएक कोसी अपन बि‍कराल रूपसँ सहरसा, पुरणि‍यामे सर्वनाश कऽ देलक। जान-मालक जबरदस्‍त हानि‍ भेलैक। समस्‍त देश कोसीक वि‍भि‍षि‍कासँ काँपि‍ गेल। अहि‍ बि‍करालताकेँ देखैत हमरा लोकनि‍ ई निर्णय सर्वसम्‍मति‍सँ लेलहुँ जे कार्यक्रमकेँ कि‍छु दि‍न लेल स्‍थगि‍त कऽ देल जाए। एहि‍ घटनाक एक प्रभाव ई भेल जे हम मलि‍क भायकेँ आरो समीप आबि‍ गेलहुँ। जतेक बेर भेटथि‍ मलि‍क भाय ततेक नजदि‍क अबैत गेलहुँ हम हुनका संग। हालहि‍मे एक दिन हम मलि‍क भायसँ नौटंकी परम्‍पराक सम्‍बन्‍धमे एक शोध परि‍योजनापर दि‍ल्‍लीक मंडी हाउसमे श्रीराम सेन्‍टर केर केफेटेरि‍यामे बैसल गप्‍प-सप्‍प करैत रही। मलि‍क भाय नौटंकी परम्‍पराकेँ पुन: प्रति‍ष्‍ठापि‍त करबाक लेल बड्ड चिंतित बुझना गेलाह। जखन ओ नौटंकी केर बात करैत छथि‍ तँ हुनकर भाव-भंगि‍मासँ एना लागत जेना कलाकारक टीस बाहर भऽ रहल हो आ एक शोधर्थी केर उत्‍कंठा। बहुत तरहक आ नौटंकीक वि‍वि‍ध आयामपर मलि‍क भाय केर सोच देख मोन हरि‍यर भऽ जाइत अछि‍। वि‍चार-पर-वि‍चार होइत गेल। सोचक श्रंृखला बढ़ैत गेल। मलि‍क भय कॉफी पीबाक एक तरहसँ एडि‍क्‍ट छथि‍। ओना हमरा कॉफीसँ कुनो सि‍नेह नहि‍ अछि‍ मुदा एकरसता समाप्‍त करबाक लेल तथा वि‍चारधारामे नव-नव बुलबुला अनबाक लेल हमहुँ कॉफी-पर-काॅफी पीबैत रहलहुँ। मलि‍क भायक साथ दैत रहलि‍एनि‍। बात खि‍चाइत रहल सोच बढ़ैत रहल। परि‍योजना अपन स्‍वरूप पकड़ने गेल। लगभग परि‍योजनाक बाहरी आवरण बनि‍ गेल छल। एकाएक मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, हमरा लोकनि‍ तीन घंटासँ नौटंकीपर चर्चा कऽ रहल छी। बि‍ना कुनो अवरोधक। बि‍ना कुनो वि‍रामक। कनी काल आब‍ हमरा लोकनि‍केँ मोन फ्रेश करक चाही। चलू धूमि‍ कऽ 15-20 मि‍नटमे वापस आबि‍ पुन: नौटंकीबला कार्यकेँ समाप्‍त करब।” ई कहि‍ मलि‍क भाय उठि‍ गेलाह। हम्‍मर हाथ पकड़ि‍ केफेटेरि‍यासँ बाहर वि‍दा भेलाह। हमहुँ एक आज्ञाकारी शि‍ष्‍य जकाँ मलि‍क भाय संग बाहर धुमबाक हेतु वि‍दा भेलहुँ। मोनमे भेल- चलू कनी मोनमे नव संचार उत्‍पन्न कऽ ली। जखन बाहरमे घुमैत रही तँ एकाएक राजनीति‍, राजनीि‍तमे भ्रष्‍टाचार आदि‍ वि‍षएपर गप्‍प होमए लागल। गप्‍प ए.राजा आ 2जी. स्पेक्ट्रुम केर भयंकर धोटालासँ प्रारंभ होइत नीतीश कुमार केर डेबलपमेन्‍ट प्‍लान आ जीत आ पुन: गुजरातक मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदीक वि‍चारधारा धरि‍ होइत रहल। हम उपनि‍षदक अज्ञानी चेला जकाँ अपन जि‍ज्ञासा एक-दू वाक्‍यमे रखैत गेलहुँ, आ मलि‍क भाय उपनि‍षद केर धोर तपस्‍वी आ मर्मज्ञ जकाँ हमर जि‍ज्ञासाक समाधान वि‍स्‍तारसँ करैत गेलाह। मलि‍क भाय जेना हम्‍मर उधेर-बुनकेँ बि‍ना पुछने बुझि‍ लेने होथि‍। ओ बजैत गेलाह बेवाक। कुनो मर्मज्ञ राजनैति‍क वि‍श्‍लेषक जकाँ। 15मि‍नट समए कोना डेढ़ घंटामे बदलि‍ गेल से पते नहि‍ चलल। भ्रष्‍टाचार आ धोटालापर मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, भ्रष्‍टाचार आ घोटाला नेता नहि‍ बड़का बाबू अर्थात् आइ.ए.एस. ऑफि‍सर सबहक लॉबी करैत अछि‍। ओ सभ नेता आ मि‍नि‍स्‍टर सभकेँ अपना हाथक खेलौना बनेने रहैत अछि‍। कार्य ओ सभ अतेक दक्षताक संग करैत अछि‍ जे अपने तँ कहि‍यो नहि‍ फॅसत मुदा बदनाम नेता कि‍ंवा मंत्री भऽ जएत। I.A.S. केर अर्थ होइत छैक- Im Always Safe . मंत्रीके बड़का बाबू एक तरहेँ वि‍वश कऽ दैत छैक जे ओ जाहि ‍ कागतपर कहै ताहि‍पर हस्‍ताक्षर लऽ लै।‍” मलि‍क भाय बजैत रहलाह आ हम जि‍ज्ञासासँ आँखि‍ फाड़ने आ कान खोलने हुनकर बातकेँ सुनैत गेलहुँ। मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “जनै छी कैलाश भाय, एहि‍ पौने दू लाख‍ हजार कड़ोरक घोटालामे चारि‍ओ अना हि‍स्‍सा ए राजा के नहि‍ भेटल हेतैक। दससँ बारह अना हि‍स्‍सा तँ बड़का बाबू सभ गट दनि‍ पचा लेने हेतैक आ छौसँ चारि‍ अनामे अपना पार्टिक मुखि‍या, देशक सभसँ पैघ पार्टीक मुखि‍या आ अन्‍तत: अपन लगुआ-भगुआ सभमे बाटए परल हेतैक। मुदा बड़का बाबू सभ कागजकेँ तेना ओझरेने हेतैक जे तमाम प्रक्रि‍यासँ लऽ लऽ सी.बी.आइ. केर जाँच धरि‍ अगर कि‍यो फॅसत तँ मंत्री। पत्रकार सेहो बड़का बाबूपर चुप रहत आ नेता आ मंत्रीकेँ देषी बनेवामे अपन दि‍माग आ खोजी पत्रकारि‍ताक तमाम टीप्‍सकेँ लगौने रहत। मंत्रीक स्‍वरूप कि‍छुए दि‍नमे नायकसँ खलनायक बनि‍ आओत।” हम मलि‍क भायकेँ पुछलएनि‍- “अहाँक जनैत की कारण छैक जे अहि‍ बेरक बि‍हार वि‍धानसभा केर चुनावमे काँग्रेस, लालू यादव आ रामवि‍लास पासवान, तीनूकेँ नीतीश कुमार खड़ड़ा लऽ कऽ खड़ड़ि‍ देलन्‍हि‍। एहेन कि‍एक भेलैक?‍” मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “‍देखू, लोक आब नेहरू-गान्‍धी परि‍वारक वंशनुगत राजनीति‍सँ तंग आबि‍ गेल अछि‍। लालू यादवक जाति‍क राजनीति‍ प्रारम्‍भमे छोटका जाति‍ सभकेँ नीक लगलैक, कि‍एक तँ पहि‍ल बेर ओ सभ चुनावमे हि‍स्‍सा लेलक, अप्‍पन बातकेँ बि‍ना कुनो डर आ आतंककेँ बाजल। लोककेँ बुझेलैक जे प्रजातंत्रो कुन चीज होइ छैक। मुसलमानकेँ कॉग्रेजसँ मोह भंग होमए लगलैक। 1991 केर बाबरी मस्‍जि‍द ध्‍वस्‍त भेलाक बाद मुसलमान सभ बुझि‍ गेल जे काँग्रेस आ भारतीय जनता पार्टीमे कुनो विशेष अन्‍तर नहि‍ अछि‍। बि‍हारमे मुसलमान सभकेँ सभसँ ज्‍यादे भय गुआर सं रहलै। कखनहुँ कुनो सम्‍प्रदायि‍क उन्‍माद होइक तँ मुसलमान सबहि‍क जानमालक छति‍ सभसँ ज्‍यादे गुआरे सभ करैक। ताहि‍ मुसलमान विकल्पहीन भऽ गेल। मुसलमान सभ लाचार भऽ लालू यादव केर साथ भऽ गेल। मुदा बादमे मुसलमानो सभकेँ ई बुझएमे आबि‍ गेलैक जे लालू यादव केवल बातक धनीक छथि‍ आ कर्मक छोट। जखन कि‍ ठीक एकर वि‍परीत नीतीश कुमारजी एक मात्र वि‍कासक अपन आधार बनौलन्‍हि‍। बि‍ना कुनो कन्‍ट्रोवर्सीमे गेने वि‍कासक कार्य करैत रहलाह। महि‍ला सभकेँ नौकरी भेटलैक शि‍क्षामि‍त्र बनल, ग्राम पंचायतसँ जि‍ला पंचायत धरि‍ साझेदारी बढ़लैक, बहुत महि‍ला सभ शि‍क्षि‍का बनलि‍, ए.एन.एम. बनलि‍, बालि‍का सभकेँ स्‍कूली वर्दी, मुफ्त साइकिल, वि‍द्यालयमे भोजन भेटलैक। फेर की छल- की छोट आ की पैघ- सभ कि‍यो अपन लड़की सभकेँ इसकूल भेजनाइ प्रारंभ केलक। लालू जी समएक तमाक गुण्‍डा आ लफन्‍दर सभ जे कि‍ डाका डालैत छल, लोककेँ अपहरण करैत छल, छीना-छपटी करैत छल आतंकक माहौल बना समस्‍त भारतमे बि‍हारकेँ बदनाम बनौने छल, तकरा सभकेँ पकड़ि‍-पकड़ि‍ नीति‍शजी जहलमे ध देलन्‍हि‍। मातहत पुलि‍स सभकेँ स्‍पष्‍टीि‍नर्देष देलखि‍न्‍हि‍ जे एहि‍ उपद्रवी तत्‍वकेँ एहेन इलाज करए जाए जे फेरो जीवनमे ई सभ एहेन कार्य करब तँ दूर सोचबो नहि‍ करए। एकर प्रभाव बड्ड नीक रहलैक। शनै: शनै: लेाक भय-मुक्‍त होमय लागल।” मलि‍क भाय बजैत रहलाह- “नीति‍शजी इहो बुझलन्‍हि‍ जे बि‍हारक सड़क कंडम भऽ गेल अि‍छ। ताहि‍ सड़ककेँ मरम्‍मत तथा नव सड़कक ि‍नर्माणक कार्यकेँ तीब्रताक संग-संग दक्षतासँ करबाक ि‍नर्देश देलथि‍न्‍ह। हुनका पता चललन्‍हि‍ जे ठेकेदार सभ कनी-मनी कार्य कय सभटा पाइ पंत्री, आॅफीसर आ अपने-अापमे बाँटि‍ लैत अछि‍। फेर की छल। नीतीशजी इहो ि‍नर्देश देलथि‍न्‍ह, कि‍ जे कि‍यो ठेकेदार सड़कक जीर्णोद्धार या ि‍नर्माणक ठिका लेत सएह एक ि‍नश्‍चि‍त अवधि‍ माने पाँच या दस वर्ष धरि‍ ओहि‍ सड़कक रखरखाव सेहो करत। अगर कुनो तरहक कमी भेलैक तँ ठेकेदारक जि‍म्मेदारी हेतैक आ आेकरा ठीक कराबए पड़तैक। एहि‍ ि‍नर्देशक बड्ड उत्तम प्रभाव परलैक। बि‍हारक जनता सड़क बनबासँ आ सड़कक उद्धार होमासँ गद-गद भऽ गेल। मुदा सामान्‍य जनताक बीच एखनहुँ लालू जीक गुण्‍डा सबहक डर छलैक जकरासँ ओ मुक्‍ति‍ पाबए चाहैत छल। आ ई मुक्‍ति‍ चुनावमे लालू जीक पार्टीकेँ हरा कऽ देल जा सकैत छल।‍” “रामवि‍लास पासवान अपन इमेज एकटा अवसरवादी नेताक रूपमे बना लेने छथि‍ पहि‍ने एन.डी.ए. मे मंत्री रहलन्‍हि‍, फेर एन.डी.ए. छोड़ि‍ उ. प अ. में आबि‍ झट दनि‍ मंत्रीक कुर्सीपर बैस रहलाह। हमेशा लालू यादवक धाेर वि‍रोध केलन्‍हि‍ मुदा अवसरवादि‍तासँ अतेक ग्रसि‍त भऽ गेलाह जे हुनके संगे राजनैति‍क गठबन्‍धन क‍ऽ लेलन्‍हि‍। बि‍हारक अति‍ पि‍छड़ा वर्ग, वि‍शेष रूपेँ हरि‍जन सभपर अपन अधि‍कार बुझए लगलन्‍हि‍। नीतीशजी सर्वप्रथम दलि‍तकेँ दू भाग- दलि‍त आ महा-दलि‍तमे बॉटि‍ रामवि‍लास पासवानक आधारकेँ शनै: शनै: अतेक तोड़ि‍ देलथि‍न्‍ह जे गि‍नि‍ज बूक ऑफ बर्ल्‍ड रि‍कॉर्डमे सभसँ ज्‍यादा मत लए जीतक रेकॉर्ड बनबएबला रामवि‍लास पासवान स्‍वयं एम.पी. केर चुनाव हाि‍र गेलाह। धन्‍यवाद दी लालू यादवकेँ जे हि‍नका राज्‍यसभामे आि‍न देलथि‍न्‍ह। अन्‍यथा आइ सड़कपर रहि‍तथि‍। इमहर कुर्मी, कोइरी, धानूक मल्‍लाह, मुसहर आदि‍ लालू यादवसँ अलग आबि‍ अपना-अपने-आपकेँ नीतीश लग सुरक्षि‍त बुझए लगलाह।” मलि‍क भाय हमरा दि‍स देखलन्‍हि‍। हमर जि‍ज्ञासा भावकेँ बि‍ना कहने बुझि‍ गेलाह आ अपन कथ्‍यकेँ आगाँ बढ़बैत बजलाह- “रहल बात मुसलमानक। तँ नीतीशजी एहि‍ बन्‍दुपर अपन कौटि‍ल्‍य नीति‍ केर सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्‍तुत केलन्‍हि‍। एक दि‍स तँ भारतीय जनता पार्टीक अपन घटक दल बनौने रहलाह मुदा दोसर दि‍स कॉमन मि‍नि‍मम प्रोग्रामक धोषणा केलन्‍हि‍ जाहि‍मे मंदि‍र बनेबाक इशू शामील नहि‍ रहैक। संगहि‍ गुजरातक मुख्‍यमंत्री मुख्‍यमंत्री नरेन्द्र मोदीकेँ अपन कुनो कार्यक्रममे जानि‍-बुझि‍ कऽ नहि‍ आबए देलथि‍न्‍ह। नीतीश कुमारक एहि‍ ि‍नर्णएसँ भारतीय जनता पार्टीक नेता सभ बि‍फरि‍ गेलाह। मुदा नीतीशजी अपन ि‍नर्णएसँ टससँ मस नहि‍ भेलाह । आर-तँ-आर ओ बी.जे.पी.केँ साफ कहि‍ देलथि‍न्‍ह जे नरेन्द्र मोदी बि‍हार-वि‍धान सभा २०१० केर आम चुनावमे पार्टीक प्रचारक हेतु बि‍हार नहि‍ अबथि‍। ई ि‍नर्णए भारतीय जनता पार्टीक लेल बड्ड पैघ धक्का छलैक। मुदा गठबंधन केर धर्मकेँ स्‍वीकारैत तथा नीतीश जीक बढ़ैत कदकेँ देखैत बी.जे.पी.केर श्रेष्‍ठ नेता सभ चुप्‍प रहि‍ ि‍नर्णए स्‍वीकारि‍ लेलन्‍हि‍। बेगर Beggar cannot be chooser.” हम अहि‍पर मलि‍क भायकेँ वि‍चारक श्रंखला तोड़ैत कहलि‍यन्‍हि‍- “मलि‍क भाय, अगर मोदी अतेक खराव छथि‍ आ मि‍डि‍यासँ लए कऽ तमाम वि‍पक्षी दल हुनकर धोर वि‍रोध कऽ रहल अछि‍ तँ फेर बेर-बेर गुजरात सनहक पैघ राज्‍यमे ओ जीतैत कि‍एक छथि‍?‍” मलि‍क भाय कहलन्‍हि‍- “देखू कैलाश भाय, मोदी हि‍न्‍दु वि‍चारधाराक बदौलक ि‍कंवा गोधरा आ आन ठमहक नरसंहारक कारणे नहि‍ जीतैत छथि‍। मोदी जीतमे हीरा जवाहरातक कारोबार करएबला व्‍यापारीक हाथ छैक। पहि‍ने एहि‍ कार्यमे चाहे कीमती पत्‍थरकेँ कटाइ-छटाइ हो, पॉलीसींग हो, धसाइ हो या खानसँ उपलब्‍धता या पुन: आयात-ि‍नर्यात, तमाम प्रक्रि‍यामे मुसलमान सभ डोमि‍नेट करैत छल। एकाएक वि‍श्‍व-बाजारमे जखन कीमती पत्‍थर तथा हीरा जवाहरात दि‍स इजराइल केर यहुदी व्‍यापारीक हष्‍टि‍ गेलैक तँ शनै:-शनै: ओ सभ अहि‍ धंधामे एकाधि‍कार स्‍थापि‍त कए लेलक। फेर गुजरातक हि‍न्‍दु-व्‍यापारी सभकेँ सेहो अपना दि‍स आकर्षित कए मुसलमान सभसँ पृथक करक प्रयास करए लागल। स्‍थानि‍य आ अप्रत्‍याशि‍त लाभकेँ ध्‍यानमे रखैत गुजरातक हि‍न्‍दु व्‍यापारी सभ हीरा-जवाहरात तथा तमाम वेश कीमती पत्‍थरपर अपन आधि‍पत्‍य बनेबाक युक्‍ति‍पर वि‍चार करए लागल। आ एहि‍ तरहक एकाधि‍पत्‍य बि‍ना राजनैति‍क सहयोग एवं हस्‍तक्षेपसँ संभव नहि‍ अछि‍। अहि‍ तरहक सहयोग जखन मोदी प्रथम बेर मुख्‍यमंत्री भेलाह तँ देनाइ प्रारम्‍भ कऽ देलथि‍न्‍ह। फेर की छल हि‍न्‍दु व्‍यापारी सभ हुनका समर्थन करए लगलन्‍हि‍ आ हुनकर चुनावमे आर्थिक एवं अन्‍य तरहक मदति‍ करए लगलन्‍हि‍। अन्‍तरराष्‍ट्रीय स्‍तरपर इजरायल तँ मदति‍ कैयो रहल छन्‍हि‍। संगहि‍ गुजरातक आदि‍वासी तथा कहरपंथी हि‍न्‍दु वर्ग हि‍न्‍दु अस्‍मिताक नामपर हि‍नकर संग छन्‍हि‍।‍” मलि‍क भाय गंभीर रहलाह आ बजैत रहलाह- “गुजरातमे मुसलमान समुदाय केर साथ खून-खरापा उच्‍च वर्ग हि‍न्‍दु अथवा व्‍यापारी इत्‍यादि‍ नहि‍ केलक। एहि‍ लेल ठेकेदार सभ आदि‍वासी लोकनि‍केँ पटोलक . ओकरा सबहक मोनमे मुसलमान समुदायक प्रति‍ धृणा आ वैमनस्‍य उत्‍पन्न केलक। आहाँकेँ की कहु कैलाश भाय, हालहि‍मे हम गुजरातक कि‍छु आदि‍वासी बहुल क्षेत्रमे पत्रकारक टीम संगे यात्रा केने रही। जखन एक आदि‍वासी गाममे गेलहुँ आ पुछलि‍ऐक जे बगलबला गाँव जाहि‍मे मुसलमान सभ रहैत अछि‍ तकर सबहक की हालत छैक? हमर जि‍ज्ञासापर आदि‍वासी सभ तमतमाइत कहलक- श्रीमान्, अहाँ मुसलमान सबहक बात नहि‍ करू। ओ सभ गद्दार अछि‍। ओ सभ कि‍छु अंट-संट जारि‍ सेहो बाजल आ अन्‍तमे कहलक- जनैत छी, हमरा लोकनि‍ गुजरातक दंगाक समएमे मुसलमान सभकेँ खुब मारलहुँ। सभटा बदला लऽ लेलऐक। पूरा देशमे जे भारतीय जनता पार्टी 2004केर चुनाव हारल तकर कारण कुतुबुहीन अन्‍सारीक बान्‍हल आ वि‍वशतामे हाथ जोड़ैत फोटो। ओ भीड़क उन्‍मादमे मातल लोक सभसँ हाथ जोड़ने अपन प्राणक भीख मांगैत छल। ई फोटो मात्र समस्‍त भारतमे भारतीय जनता पार्टीक प्रति‍ लोकक मोनमे घृणा अत्‍पन्न कऽ देलकैक आ एहि‍ बातकेँ बी.जे.पी.केर नेता नहि‍ बुझि‍ सकलाह। परि‍णाम बहुत नीक जकाँ सरकार चलेबाक बादो भारतीय जनता पार्टी एवं घटक दल सत्तामे नहि‍ आबि‍ सकल। आ सम्‍पूर्ण परि‍पेक्ष्‍यमे नरेन्‍द्र मोदीकेँ एकर सूत्रधार मानल गेलैक। एका-एक पूरा देशक मुसलमान मोदी वि‍रोधी भऽ गेल। मुसलमान डरे हरकम्‍प काँपए लागल। अपने-आपकेँ घोर असुरक्षि‍त बुझए लागल। जानैत छी कैलाश भाय, हम तँ मुसलमान समाज आ ि‍वशेष रूपसँ बुद्धि‍जीवी सभ लग बैसैत छी। मुसलमान समाजमे ई चर्चा भऽ रहल छैक जे घोर राष्‍ट्रवादक नामपर भारतमे मुसलमान सभकेँ जान-मालक अपार छथि‍ हेतैक। कि‍छु वर्ष अर्थात 30-40 वर्षक बाद मुसलमान सभ अपन नाम हि‍न्‍दु नाममे परि‍वर्तित कऽ लेत। इजरायल अपन प्रभुत्‍व भारतमे घोर राष्‍ट्रवादी संग मि‍ल मुसलमानकेँ परेश्‍‍ाान कऽ कऽ देखाओत। भारतक अगल-बगल केर छोट-छीन देश सभ भारतमे मि‍ल जएत। मुदा मुसलमान सभ इहो सोचैत अछि‍ जे चीन जाहि‍ तरहसँ अपने-आपकेँ हर दृष्‍टकोणसँ मजबूत कऽ रहल अछि‍- एक दि‍न लगभग डेढ़-दू साए वर्षक बाद ई स्‍थि‍ति‍ हेतैक जे चीन भारतकेँ छि‍न्न-भि‍न्न करएमे सफल भऽ जाए। हलांकि‍ चीनक लेल चि‍न्‍ताक वि‍षए छैक तीब्र गति‍सँ ओतए केर जनताकेँ इसाइ धर्ममे परि‍वार्तन।” एकरा बाद पुन: मलि‍क भाय बि‍हारक सन्‍दर्भमे बाजए लगलाह कहलन्‍हि‍- “बि‍हारक मुसलमान नीतीश जीक अहि‍ ि‍नर्णएसँ संतुष्‍ट छल जे चलू ओ नरेन्‍द्र मोदीकेँ बिहार नहि‍ आबए देलाह। उच्‍च वर्ग सभ पहि‍ल बेर एक भेल आ अपन मत नीतीश कुमारक पार्टी एवं भारतीय जनता पार्टीक उम्‍मीदवार सभकेँ आँखि‍ मूनि‍ कऽ देलक। अहि‍ तरहेँ नीतीशकेँ महा-दलि‍त आ दलि‍त, मुसलमान, महि‍ला, युवक, बेरोजगार आ वि‍कास पसि‍न्न करएबला जनताक आधार भेटलन्‍हि‍। लालू जीक पक्षमे यादव एवं अन्‍य हुनकर परम्‍परागत लोक सभ एखनहुँ छल। मुदा सेन लगलन्‍हि‍ तँ मुसलमान, उच्‍चवर्ग एवं दलि‍त समुदायमे जकरा कारणे ओ भयंकर हार देखलन्‍हि‍। रामवि‍लास मांटि‍मे सेंहि‍या गेलाह। काँग्रेस ध्‍वस्‍त भऽ गेल। राहुल गान्‍धी सोनीया गान्‍धी आ प्रधानमंत्री जीक दौरा बि‍हारक जनताकेँ नहि‍ पसि‍न्न कऽ सकल। नीतीशजी बि‍जयी भेलाह। आब वि‍कास पुरूषक मोहर लागि‍ गेल छन्‍हि‍। आगाँ आरो आत्‍म वि‍श्‍वाससँ कार्य करताह। बि‍हार आब शीघ्रहि‍ एक आदर्श राज्‍यक दर्जा प्राप्‍त करत।” एकर बाद घड़ी देखैत मलि‍क भाय हमरा कहलन्‍हि‍- “कैलाश भाय, हमरा लोकनि‍ 15मि‍नटक लेल बाहर नि‍कलल रही आब डेढ़ घन्‍टा भऽ गेल। चलु अपन नौटंकीक परि‍योजनापर चर्चा करी।‍” हम एक आज्ञाकारी शि‍ष्‍य जकाँ हुनका संग एक बेर पुन: श्रीराम सेन्‍टर केर केफेटेरि‍यामे नौटंकीपर वि‍मर्शमे व्‍यस्‍त भऽ गेलहुँ। आब सोचैत छी, मलि‍क भाय केर फुटपाथी गप्‍प कहीं यथार्थक वर्णन तँ नहि‍ अछि‍! सोचल एहि‍ बातकेँ बि‍ना कुनो भेद-भावकेँ पाठक संग यायावरीक माध्‍यमसँ बाँटी। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथा संग्रह -बनैत-बिगड़ैत- विवेचना श्री सुभाषचन्‍द्र यादव केर कथा संकलन आद्योपान्‍त पढ़लहुँ। लेखक महोदय अपन भावनाकेँ वेवाक रूपेँ प्रस्‍तुत कएने छथि। कथा पढ़ब तँ लागत जे केना एकटा निम्‍न-मध्‍यम-वर्गीय परिवारमे बढ़ल-पलल एक पढ़ल-लिखल मनुक्‍ख अपन जीवनक घटना, अनुभव आ सम्‍वेदनाक वर्णन अक्षरश: कऽ रहल अछि। परम्पराक नीक चीजसँ लेखक अपना-आपकें जोड़ने छथि आ परम्‍पराक पाखण्‍डक विद्रोह करबामे कख़नो नहि हिचकिचाइत छथि। गाम, घर, परम्‍परा, परिवेश, खेत, खरिहान, गामघरक आपसी कलह, समन्‍वय, कोसी नदीक कहर, सौन्‍दर्य, यात्रा वृतान्‍त आदिक वर्णन सोहनगर लगैत अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रहकेँ हमरा जनैत दू दृष्टिकोण सँ विवेचित कएल जा सकैत अछि: (क) भाषा विन्‍यास आ शब्‍दावलीक दृष्टिकोण सँ , (ख) कथा-वस्‍तुक दृष्टिकोण सँ। आब उपरलिखित दृष्टिकोण पर विचार करी: भाषा विन्‍यास आ शब्‍दावलीक दृष्टिकोण सँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कए एक नीक परम्‍पराक प्रारम्‍भ केलन्हि अछि। मैथिली भाषाक सब सँ पैघ समस्‍या, हमरा एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते, ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्‍कृतनिष्‍ठ ब्राह्मण एवं कायस्‍थ लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृतक शब्‍दकेँ घुसा-घुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति, एवं सर्वहाराक शब्‍द, विन्‍यास, व्‍यवहार आदि केँ नजरअंदाज कऽ देल जाइत छैक। सही अर्थमे भाषा माटिक सुगन्‍ध आ लोक परम्‍परासँ दूर भऽ जाइत अछि। सर्वहारा वर्गसँ कटि जाइत अछि। एहिना स्थितिमे छोट जाति, स्‍त्रीगण आदि अपना-आप केँ भाषाक तागसँ बान्‍हल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब धरि तँ ठीक परन्‍तु पढ़ब आ लिखब परमपरासँ ई लोकनि अपन नाता समाप्‍त कऽ लैत छथि। मैथिली भाषाक समस्‍या केवल जाति अथवा समुदाय मात्रसँ नहि छैक। विभिन्‍न सांस्‍कृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषाकेँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक चारु दिशामे पाँच कोस धरिमे उच्‍च वर्गक लोकक द्वारा प्रयुक्‍त मैथिलीकेँ सर्वाधिक नीक मैथिली , पुन: समस्‍तीपुर सँ कनीक दक्षिण दिस आगू गेलाक बाद प्रयुक्‍त मैथिलीकेँ निम्‍न श्रेणीक मैथिली बुझल जाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि, तकरा पंचकोसिला लोकनि दछिनाहा , पूबमे व्‍यवहरित मैथिलीकेँ पुवहा एवं पच्छिम, विशेष रूपसँ सीतामढ़ीमे प्रयुक्त मैथिलीकेँ पछिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि। एहि सभ कारणसँ कुजरा मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोइरी, धानुख आदि अपना आपकेँ मैथिली भाषाक बाजय वला नहि बुझैत छथि। दक्षिण, पच्छिम केर लोककेँ एहन बुझाइ छनि जेना ई लोकनि भाषाक मुख्‍यधारासँ अलग-थलग होथि। लोकविद्या अथवा फॉकलोर एतेक सम्‍पन्‍नो होइतो एहि क्षेत्रमे बहुत नीक स्‍थान बनाबयमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि। नामकरणक उदाहरण जे ली तँ बुझायत जेना ब्राह्मण एवं कायस्‍थ लोकनि संस्‍कृतनिष्‍ठ नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जरवन कि पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्‍टा अछि। पंजाबी भाषामे नाम आदि, लोक एवं सामान्‍य जनमानस केर हिसाबसँ निर्धारित होइत अछि। गुरु ग्रन्‍थसाहेबकेँ एखनहुँ धरि गुरग्रन्‍थ साहेब, कहल जाइत अछि। स्‍मरण आइयो सिमरन थीक। फॉकलोर जाग्रत छैक। एकर परिणाम ई होइत छैक जे की स्‍त्री, की पुरुष, की छोट, की पैघ सभ जातिक लोक अपना आपकेँ भाषा, संस्‍कार आ संस्‍कृतिसँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि। अतेक सम्‍पन्‍न फॉकलोर रहितहुँ, मिथिलाक फॉकलोरपर किछु विशेष कार्य नहि भऽ सकल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एक उल्‍लेखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाष जी पंचकोसिया नहि छथि आ दोसर ओ ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ सेहो नहि छथि। से अपन परिवेशक प्रयुक्‍त शब्‍द, वाक्‍य, परम्‍परा, नाम आदिक वेवाक वर्णन कयलन्हि अछि। किताबक सब पन्‍ना पढ़ि लेलाक बाद अपन ठेठ गाम, गामक परम्‍परा, लोक परिवेश इत्‍यादि स्‍मरण होबय लागत। लोकमे प्रयुक्‍त खांटी देसी नाम जेना कि मुनिया, कुसेसर, उपिया, बिहारी, बौकू, सिबननन, रामसरन, रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजनाथ, सकुन आदि पाठककेँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूपसँ लऽ जाइत अछि। भाषा सेहो अग्‍गब देसी। कुनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि। एहि तरहक यथार्थवादी परम्‍पराक प्रारम्‍भ केलासँ मैथिली साहित्‍य सम्‍पन्‍न हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक संख्‍या बढ़त। अनेरे संस्‍कृतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीक पाठकक संख्‍या लगभग शून्‍य जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्‍वयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियोक पढ़यबला नहि। वेबवर्ल्‍डक विकास हेमाक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिलासँ बाहर रहनिहार मैथिल आब आइ काल्हि किछु सामग्रीकेँ सर्फ कय देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सब सामग्री मैथिलीमे लिखल पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन कथ्य अंग्रेजीमे व्‍यक्त करैत छथि। सुभाषजी जकाँ अगर आरो लेखक, कवि इत्‍यादि आगाँ आबथि तँ यथार्थवादी परम्‍परा समृद्ध हैत। मैथिलीमे नव-नव शब्‍दावली विकसित हैत। सब क्षेत्र, सम्‍प्रदाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक, बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष केर हाथक खेलौनासँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत। आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्‍तु पर कनी विचार करब जरूरी। कथा-वस्‍तुक दृष्टियें सेहो लेखक अपन परिवेशसँ बान्‍हल छथि। कथा सभमे लेखककेँ परम्‍पराक नीक तत्वक प्रति सिनेह, पाखण्‍डक प्रति विद्रोह, एक निम्‍न-मध्‍यम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर फ्रर्स्‍टेशन, एक युवकक सुन्‍दर नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समस्‍या, यात्रा-वृतान्‍त, मोनक अन्‍तःद्वन्द, सुन्‍दरता आ सुन्‍दरताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत। ‘‘बनैत बिगड़ैत’’ कथामे माए-बापक मनोदशा, जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक वर्णन कएल गेल छैक। कथाक मुख्‍यपात्र माला टाँहि-टाहि करैत कौवाक आवाजसँ डरैत अछि। ओकरा हकार दैत उड़बै चाहैत छैक। लेकिन ‘‘टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — “बज्‍जर खसौ, भागबो ने करै छै”। परदेसमे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु ऐना लिखैत छथि: कौका कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै। “हे भगवान, तूही रच्‍छा करिहबु। हाह। हाह।”— माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै।” आ मालाक बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्‍यमसँ अपन विस्‍मय व्‍यक्‍त करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्‍न करैत छथि: माला सब बेर अहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तै सन्‍तों नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खूनमे मिल गेल छै। संस्‍कार बनि गेल छै। सन्‍तोकेँ छगुन्‍ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा–पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय । रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्‍चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।” अही तरहें अपन खिस्‍सा ‘कनियाँ-पुतरा’ मे लेखक ट्रेनमे ठाढि़ एक बारह बर्षक लड़की आ लड़कीक निश्छल व्‍यवहारसँ आत्मविभोर भय, लड़की सँ एहन सम्‍बन्‍ध बना लैत छथि जेना जो लड़कीक भाय अथवा पिता होथि। ट्रेनक व भीर भरल बोगीमे ठाढि़ लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत छैक तँ लड़कीक निर्विकार मुद्रासँ एना बुझना जाइत छैक जेना ‘ ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सँ सटल हो।’ लड़कीक भविष्यपर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्‍यमसँ सोचय लगैत छथि : “ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्‍पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका धेरने जा रहल ऐछ।” ‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्‍नवर्गीय दब्‍बूपनीक मनोदशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक ऐँठ पात्र नवीनकेँ थमाबय चाहैत छैक, तँ सूत्रधार बाजि उठैत अछि: “सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि के ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ धृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै — ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक खौंझ हुअए लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहिं कहि सकलै -हाउ डिड यू डेयर?’ तोहर ई मजाल ! मुदा ओ कहि नहिं सकलै। साइत निम्नवर्गीय दब्‍बूपनी आ संस्‍कार ओकरा रोकि लेलक” रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा: एक विवेचना कोलकाता मिथिलासँ बाहर बहुत झमटगर सृजन भूमि रहल अछि मैथिली डायस्पोरा लेल। एकर स्पष्ट कारण शायद ई रहल अछि जे लोक कोलकाता तँ जरूर जाइत छलाह काजक तलाशमे मुदा आत्मासँ गामे रहैत छलाह। ऊपरसँ ओहि भूमिमे भेंट जाइत छलथिन गामक लोक, दोसर गामक सम्बंधी, हित-मित्र, जानकार आ कियोक नहि तँ मैथिली भाषा बजनिहार। बस भऽ जाइत छलनि आप्त प्रेम, सरोकार,परदेसमे अपन देसक लोक आ बात विचार। फेर बनि जाइत छल अड्डा नौकरीकेँ बादक नौकरी तकबाक भऽ जाइत छल ओ स्थान रोजगार कार्यालय। सब पुरान लोक लागि जाइत छलाह अपन-अपन तरीकासँ नौकरीकेँ जोगारमे। आ शुरू भऽ जाइत छल कविता साहित्य, नाटक, आदिक निर्माण । ई सब एहि लेल होइत छल जे लोक अपन गामक कमीक अनुभव नहि करथि। ओहुनासँस्कृति स्वभावसँ नॉस्टैल्जिक होइत अछि। नोस्टाल्जिया तखन अपन प्रभाव देखेतैक जखन लोक अपन जड़िसँ फुनगी दिस बढ़तैक। कोलकातामे सएह भेलैक। रामलोचन ठाकुर ओहिपरदेसमे देसक खोज करैत छलाह। मैथिली जेना हुनका भंगिया देने होनि! लगातार रचना आ बादमे पत्रिका केरसँपादन आ देखरेखमे व्यस्त रहला। की-की कएलनि से किनकोसँ छुपल नहि अछि। आब अबैत छी रामलोचन ठाकुरक एक पोथीपर। पोथीक नाम छैक "मैथिली लोककथा"। नामे ज्ञाने ई कथा नेनपनसँ लेखककेँ सुनल कथा केर स्मरण करैत लिपिबद्ध करबाक यत्न कएल गेल छैक। निश्चित रूपसँ ई उत्तम प्रयोग आ पोथी छैक। कथा लोकक छैक। लोककंठसँ सुनल छैक तँ स्वाभाविक छैक जे कथापर लोकक अधिकार छैक। अहि पोथीमे कुल जमा 36 कथाकसँचयन छैक: 1. हिरामनि सुग्गा 2. अबकी बेर फतंग 3. महाराज बिक्रमादित्य4. गदहा खेने कोनो ने दोष 5. एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया 6. काजरि7. सदबा-बदबा 8. एकटा बुढ़िया रहय 9. एकटा गरीब बाभन रहथि 10. नारदमुनि आ सांप 11. लाल बुझक्कर 12. जामुन अन्त न पाबेउ 13. राभणो नतु रावण 14. मीतारे 15. ठठपाल 16. एकटा रहथि राजा 17. एकटा गरीब बाभन रहथि18. महाकाली19. पतिबरता 20. एगो रहथि राजा 21. चिन्ता रोग 22. हम देवी चंडिके23. एगो रहए जोलहा 24. चतुर भागिन 25. चिल्हो सियारो 26. शीत-बसंत 27. हंसराज-वंशराज28. झोड़ाकपरताप 29. मोहन बरही 30. पड़ोसियाक दुनू 31. चारबाह राजा 32. अहदी 33. कुल्टा34. दिलजान साहु35. गल हस्तेन धोधरः 36. लिखलाहालोक बहुत सहज आ बहुत जटिल शब्द छैक। एकरा सब कियोक बुझैत छी आ सब कियोक भ्रममे रहैत छी। एहेने भ्रमक स्थिति रामलोचन ठाकुरकेँ छनि। ओ पहिने शास्त्रीय, प्रमाण, हिंदी साहित्यक प्रमाण आ वैश्विक प्रमाणसँ लोक शब्दक व्याख्या सन्दर्भ-कथामे (अथवा भूमिका) करैत छथि। वृहद्विष्णुपुराणसँ शुरू करैत, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति होइत हज़ारीप्रसाद द्विवेदीसँग मैक्सिम गोर्की तक केर भाव स्पष्ट करैत हुनकर लोकक भावसँ पाठककेँ अवगत करेबाक लघु किन्तु गंभीर प्रयास करैत छथि. मुदा एक बात, हमरा बेर-बेर एना बुझना गेल जेना ओ लोकक अर्थ ओहेन जन सामान्यसँ बूइझ रहल होथि जे बहुत शिक्षित आ विकसित नहि होथि। ई लोकसँग साहित्य आ तथाकथित एडवांस विषय अथवा शास्त्रीय विचारधारा केर विद्वानक वायरस जकाँ अछि। लोक, लोककथा, लोकविद्या अलग-अलग बात भेल। लोकविद्या ओ विधा भेल जाहिमे लोक ज्ञान, लोक ज्योतिष, लोक चिकित्सा, लोककृषि, लोकगीत, लोकसँगीत, लोककथा, जेंडर स्टडीज, नूतन प्रयोग, श्रृंगार, समाज आदिक बातपर विचार होइत अछि। जकरा ई लोक कहैत छथि तकरा पश्चिमक लोक पोपुलर कहैत अछि। तखन लोक की भेल? लोक भेल एक निश्चित भूभागमे रहय बला मानव समुदाय जे अपन भाषा,सँस्कृति, प्रकृति, स्थानीय ज्ञान, परंपरासँग रहैत अछि जाहिमे स्त्री, पुरुख, बच्चा, बुढ़, सब कियोक अबैत छथि। जाहिमे माटिक लोक आ माटिसँ बाहर रहनिहार प्रवासी सेहो अबैत छथि। आजुक युगमे लोक एक प्रजातान्त्रिक समूह छैक। आजुक युगमे एक व्यक्ति लोक छथि आ वैह मॉडर्न अथवा शास्त्रीय सेहो छथि। तखन लोक भेल की? लोकक मादे ई प्रश्न एखनो ठाढ़े अछि। लोक कहीं ओ तँ नहि जे लिखल नहि हो? आ शास्त्र ओ जे लिखल हो? नहि, ईहो बात नहि अछि। उपलब्ध ज्ञान आ डाटाबेस कहैत अछि जे मौखिकपरम्परा आ लोक अलग-अलग बात अछि। कतेक मौखिकपरम्परा एहेन अछि जे लोक नहि अछि, आ कतेक लिखितपरम्परा एहेन अछि जे लोक अछि। उदहारण स्वरुप वेद, उपनिषद तँ श्रुतिपरम्परा अछि मुदा लोक नहि अछि। सुकरात कहियो अपन बात नहि लिखलनि। ओ बजैत रहला आ हुनक शिष्य सब सुनैत रहल। ओ कहैत छलाह जे लिखलासँ ओहि बातक उपयोगिता खत्म भले नहि होइक लघु अवश्य भऽ जाइत छैक। ओ लिखित ज्ञानकेँसँग्रहालयमे राखल मृत वस्तुसँ तुलना करैत छथि। आर-त-आर रामलोचन ठाकुर जीक अहि पोथीक अंतिम कथाक नाम छनि "लिखलाहा"। लिखब केर अर्थ भेल ठोस प्रमाण; अंतिम सत्य; शब्द ब्रम्ह; अथवा तुलसीदासक रामचरितमानसक प्रसंगसँ बात करी तँ सत्यम शिवम् सुन्दरम। मुदा लिखब सेहो लोक भेल। विद्यापति अपन गीत अवश्य लिखने हेताह। बादमे ओकर महत्ता देखैत लोक ओकरा अपन कंठक चिपमे सदा सर्वदा हेतु सेव कऽ लेने हयत। ई भ्रम ओना तँ बहुत ठाम अछि मुदा भारत आ विशेष रूपसँ मिथिलामे अधिक अछि कारण जे लोकपर फोकलोर, एथनोग्राफी, मानवविज्ञान आदिक विद्वान सब काज नहि कऽ रहल छथि। अतेक स्पष्टीकरण देने बिना हम अपन बात कें आगा नहि कहि सकैत छी। ताहि कनि चर्च कएल। आब पुनः पोथी दिस बढैत छी। कथा लिखित हो अथवा श्रौत जखन लोकमे अबैत छैक तँ लोक ओहि कथाक मूलकेँ रखैत अछि आ अपन ज्ञान, शब्दावली, भाव, भंगिमासँ ओकरा अपन अंदाजमे प्रस्तुत करैत अछि लोकक मादे मौखिक कथा सब दिन सब ठाम, नव शब्द सबसँ नित नूतन स्वरुप ग्रहण करैत छैक यद्यपि कथाक मूल भाव शास्वत रहैत छैक। लोककथा (वाचन कथा या कथा वाचन) मूलतः तीन ढंगसँ लिपिबद्ध होइत अछि:पहिल, ओहि समाजसँ कोनो बाहर केर व्यक्ति द्वारे। ई काज मानवविज्ञान, फोकलोर अथवा एथनोग्राफी केर लोक करैत छथि। हुनका एहेन ट्रेनिंग रहैत छनि जे जाहि तरहे कथा वाचक हुनका सुना रहल छथिन तहिना ओ लिखथि। ओहिमे कोनो तरहक सुधार अथवा अपना दिससँ किछु नहि जोड़ैथ।सँभव हो तँ एक कथा अलग-अलग व्यक्तिसँ सुनिक लिखथि। दोसर, कतेक स्थिति एहेन होइत छैक जखन लोक अपन समाजमे काज करैत छथि। मुदा हुनकासँ आशा ई रहैत अछि जे ओ ई बिसरि जाथि जे ओ ओहि समाजक हिस्सा थिकाह। आ गंभीरतासँ ओतबे लिखथि जे कथा वाचक अथवा वाचिका कहि रहल होथि। ई कनि सहज काज नहि छैक। लोक नहियो चाहैत पूर्वाग्रही भऽ सकैत छथि। एहि तरहक काज करेबला लोककेँ ऑटो- अन्थ्रोपोलोजिस्ट कहल जाईत छनि। चंदा झा आदि विद्यापति गीत लोकसँ सुनबाक क्रममे अहि धरमक पालन नहि कऽ सकल छलाह। मुदा तकर प्रयोजन अते नहि अछि. अहिपर विस्तारसँ कहियो लिखब. तेसर, एहेन जे जखन लोक अपन समाजमे प्रचलित सुनल कथाकेँ बहुत दिनक बाद अपन स्मरणसँ लिखैत अछि। रामलोचन ठाकुर तेसर श्रेणीक लोक छथि। हिनको कथावाचक कहल जा सकैत अछि। कहल की जा सकैत अछि, ई छथिए। जेना कोनो कथा वाचक कथाकेँ अपन भाव, भंगिमा, आ शब्दावलीसँ मनोरंजक आ प्रभावी बना सुनबैत अछि तहिना ई कथा सबकें अपन श्बवालीसँ सजेने छथि। ओहिमे व्याकरण, आ श्ब्द्संयोजनासँ आकर्षण उत्पन्न केने छथि। ताहिं हिनक कथा मूल कथा बुझल जाए। उपरसँ अपन दाई पितियाइनसँ सुनने छथि से ई स्पष्ट करैत अछि जे कथापरम्परासँ एक पुस्तसँ दोसर पुस्त दने चलैत हिनका लग आबि गेल छनि। आब ई कथाकेँ कहि कऽ नहि लिख कऽ अपना पीढ़ी आ आबय बला पीढ़ीकेँ शास्वत प्रमाण केर रूपमे हस्तांतरित कऽ रहल छथि - चरैवेति- चरैवेतिक निनादसँ कथा बढ़ि रहल अछि।कहैत चली जे रामलोचन ठाकुर बहुत साकांक्ष भेल कथा लिख रहल छथि। कोनो कथा एहेन नहि भेटत जाहिमे ठोस आ ठेस मैथिली केर शब्दावली नहि भेटत। नीक तँ ई हएत जे आलेख केर अंत मे हिनका द्वारे व्यवहृत ठेठ शब्दक एक ग्लोसरी बना दी। मुदा ताहि अवस्थामे अएबाक हेतु अहि पोथीपर कमसँ कम तीन खेप लिखनाई जरुरी अछि। प्रमाणक रुपमे किछु शब्द कें देखल जा सकैत अछि:“पातर, ओजीर, भोजन-साजन, हेट, दिवड़ा भीड़, पएर दाबि, पहरुआ, दू टूक, करमान, कौआ टाहि, ईतस्ततः, फुरफुरा क उठल, यार कें बाझ,हरलनि ने फुरलनि, टहाटही, मन मेछंत, चौर-चाचर, लहालोट, अहर बीतल, पहर बीतल,ठकमुरी,घेंट,चिड़ै मड़ा कें,डिगडिगिया,हरबिड़रो,सीधा सम्मर,नग्र,बिसनाइत,पहरू सभ,फूलें-फलें माति उठल,गाजु,पोखरिक भीड़,ले बलैया,खा लौक,कन-साग,गदहा बौरि गेल,मिस पड़ै छल,गदहा डोभ चरन्त, झी-चाकर,बोरसी,धुरखुर,बरबरना,लगे दाढ़ी पड़ोसे छूरा,कपारपर टिटही मरडाइ छइ,उफांट,पतिया-पराछुत,किछु मुनियां,चीन,फूजल ऊक,खलोदर,दरेग,अगहरी पात,मन मेछंत,तरबाक लहरि टिकासन,ठेसी,मकुनीहाथी,डांरथि,चुट्टीक धारी, सितुआ चोख”एखन अतबे अहि पोथीपर लिखब सहज बात नहि अछि। एकर अनेक बिंदु, कहबाक शैली, बातक प्रमाणिकता, आ लेखक महोदय केर निष्ठा किछु एहेन बात अछि जाहिपर गंभीर भेने नहि लिखल जा सकैत अछि। आब कथा दिस फेरो बढ़ी। जेना-जेना हिनकरसँकलित आ हिनक मस्तिष्क केर मेमोरीसँ निकसल कथा सभ पढ़ने जायब, एक पाठकक रूपमे लोक सङ्ग लोक भेल जायब। जेना लोकमे होइत छैक तहिना हिनको कथा सभमे प्रकृति अर्थात चिड़ै चुनमुन, जानवर सब बजैत छैक। बाजब प्रमाण छैक। अतेक ठोस प्रमाण जे प्रकृति केर मानवीकरण कखनो अहाँकेँ बनाबटी अथवा अनसोहात सन नहि लागत। लोककथामे नदीक प्रवाह, बटोहीक चलब, फुलवारी, सब किछु अबैत छैक। धोबिया घाट, ब्राह्मणक दरिद्रता, जोलहाक चतुराई, सब किछु अबैत छैक। लोककथा लोककेँ कथा सङ्ग जोड़ैत छैक। रसद सङ्ग चलैत बैलगाड़ी बनिया आदि सेहो अपन भूमिका सङ्ग रहैत छैक। लोककथा यथार्थक कल्पनाशीलता छैक। अहु बातक भान कथा सङ्ग एक गंभीर पाठक केर रूपमे अहाँ अवश्ये देख सकैत छी। लोककथा अपन भावकसँवेदना अनेक भाषा आ भाषाक प्रसंग जेना की फकड़ा , गीत, दोहा आदिक मादे प्रयुक्त होइत छैक। लोककथा अहि तरहें मोनोलॉग नहि मल्टी डायमेंशनल डायलाग होइत छैक। लोककथा एकरंगी विधवा परिधान नहि अपितु बहुरंगी चुनरी होइत छैक। अतय कनि कम साकांक्ष छथि रामलोचन ठाकुर जी। ओ गद्य जखन लिखैत छथि ताहि काल ओ अपन भाषासँ अलग लोकक आत्मामे नहि जा पबैत छथि। एकरा एना बुझु: कहियो कखनो मधुश्रावणी कथा सुनने हएब, अथवा गाम घरमे ककरो कथा सुनने हएब। ताहिमे अगर बनिया छैक तँ दोसर भाषा बजतैक। अगर पात्र दोसर भूमिकेँ छैक तँ कथा वाचक (अथवा वाचिका) ओकरा लेल अलग भषा केर प्रयोग करतैक। कथा वाचिक बात कहतैक, भंगिमा प्रदर्शित करतैक। ओ नाटकीयता कनि खटकि रहल छैक। मुदा रामलोचन ठाकुर एकरा लोकक एक ओहेन श्रेणी जे वाचिककेँ लिखितपरम्परामे बदलैत छथि, मूल कें यथावत रखने ओकर विन्यास आ सौंदर्यमे परिवर्तन करैत छथि तँ ईहो स्वीकार होबाक चाही। मुदा जखने प्रसंग पद्यक अबैत छैक तँ लोकक निश्छल स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होमय लगैत छैक। उदाहरण स्वरूप "अबकी बेर फतंग" कथाकेँ देखू। ई कथा अपन शब्द शैलीमे स्मरणक पिटारासँ लिख रहल छथि लेखक । जहाँ की पद्य अबैत छैक लोक जेना जागि जाइत छैक:"थप्पा गनि-गनि रोटी पकओलनि गदहा ढोभ चरन्तघोड़ा बांस फसन्त निनिआ कहैत जे नेनिआ आएलिघर-पछुआर मे भुस्सा तइ मे ल गेल मुस्सा अबकी बेर फतंग" (पृ. 25 ) एहने सन भाव "गदहा खेने कोनो ने दोष" मे भेटैत छैक। ई एकर किछु मात्रक शब्दक दू आखर पूरा कथाक सीख बनि जाइत छैक। अंतिममे जखन ई कहैत छैक:"तीन राड़ एकसँतोष गदहा खेने कोनो ने दोष" एकर आशय भेल जे तीन बुरीलेल (मुरखक बाहुल्य) अपन बेबकूफीसँ गलत काज करैत अछि तँ ओहिमे केहेन आश्चर्य! एकरसँदर्भसँ बुझक दरकार होइत छैक। लोककथा गतिमान होइत छैक। कथा कहनहार आ सूनयबला दुनू गतिशील होइत छैक। गति सङ्ग जेना ट्रेन अथवा बसक सवारीमे खिड़की लगसँ नदी, पहाड़, झरना, धरतीक वैविध्य अबैत जाइत रहैत छैक आ यात्री गतिशील भेल रहैत अछि तहिना लोककथा केर कथानक पाठककेँ गतिशील बनने रहैत छैक। ई गतिशीलता कनि आरो डायनामिक भऽ जाई ताहि लेल गद्यमे पद्यक प्रवेश होइत छैक। रामलोचन जी बहुत गंभीरतासँ ई बात बुईझ पबैत छथि आ ओ पद्य सब हेरि अनैत छथि। एक उदाहरण "एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया"सँ देखल जाओ: "बरदबला भाइ !परबत पहाड़पर खोंता रे खोंताभूखे मरै छै बच्चा एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइयातइलए पकड़ने जाइए "। उपरोक्त पद पूरा कथाक आत्मा छैक आ पारिस्थिकीसँतुलन केर वेद मंत्र जेना काज क रहल छैक। कथाक पात्र मुनिया ई पद्य घोड़हिया, हाथीबला, आ खुद्दीबला सबसँ कहैत छैक आ ओकर समस्या केर समाधान भऽ जाइत छैक। एक स्पष्ट उदाहरण देखू जाहिमे भावकसँवेदना आ कथ्यक गंभीरताकेँ डायनामिक बना भाषा केर देबार कोना तोड़ैत छैक श्रुतिकथा। ई पद्य "लालबुझक्कर" कथामे भेटत:"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पएर मे उखड़ि बान्हि कें हरिन चरक्का होइ।।" कथा आगा बढ़ैत छैक। फेरो उपरोक्त पदक प्रथम पंक्ति केर बेस बनबैत दोसर पंक्ति केर मादे बात स्पष्ट होइत छैक :"लालबुझक्कर बुइझ गिया कि आर न बुझा कोइ।पहुँचे लगसँ काइट दो कि अपने बाहिर होइ।।" आ अंततः कथा अपन यात्राक अंतिम पड़ाव दिस अबैत छैक:"लालबुझक्कर देखितहि बूझकि हो हाथी की अमरूद।" बात बायोडायवर्सिटी केर लोककथा के मादेसँरक्षण केर बात करैत रही। एकर प्रमाण भेटैत अछि "जामुन अन्त न पाबेउ" नामक कथा मे। ई कथा अपन नामकरणसँ शुरू होइतसँस्कार धरि समस्त स्वरूपमे बायोडायवर्सिटीकेँ हारमनी प्रदर्शित करैत छैक। कोना लोक शास्त्रपर कखनोकाल बीस पड़ैत छैक आ कोना अपन पारिस्थितिकी ज्ञानसँ अब्बल होइत छैक तकर प्रमाण छैक ई कथा। जखन चारि दोस्त सामान्य वेश भूषामे राजा लग अबैत छैक त शास्त्रीय विद्वान लोकनि ओकरापर हँसैत छथिन। मुदा जखन ओ चारु लोकज्ञानी एक चारि पंक्ति केर पद्य मिल कऽ सुनबैत छैक त सभक होश उड़ि जाइत छैक। पद्य छैक:"जामुन अन्त न पाबेउ पीपर आनेउ नार उमर कटंती जानि क वर तर ठानेउ राड़।" आब कोना एकरा चारि मित्र कहैत छैक से देखल जाओ:"चारु दोस्त उठि क ठाढ़ भेल।पहिल कहलकै --- जामुन अन्त न पाबेउ दोसर कहलकै -- पीपर आनेउ नार तेसर कहलकै -- उमर कटंती जानि कचारिम कहलकै -- वर तर ठानेउ राड़।“ हमरा लगैत अछि ई कथा कनि विस्तृत विवरण आ विवेचना मँगैत छैक। से केना? एना जे किछु लोक जे अनेड़े लोकपर शास्त्र थोपने रहैत छथि आ अपना कें सर्वक्षेष्ठ स्थापित करैत छथि, एहेन लोकपर ई कथा निर्मम प्रहार छैक। ई कथा बतबैत छैक "सावधान भऽ जाऊ! लोक अहाँकेँ विद्याक सम्मान करैत अछि मुदा लोकक ज्ञान अगाध छैक। एकर विशालताकेँ अहूँ सम्मान करू। से नहि करब त लोक कखनो अहूँकेँ धोबिया पाट दऽ देत!"ई पोथी अनेक तरहें उपयोगी छैक। मैथिली साहित्य अनुरागी सब एकरा अधिकसँ अधिक पढ़थि। एकर अनेक पक्षपर बहुत गंभीरतासँ फैलसँ लिखबाक दरकार छैक। एहि पोथीपर एक अखिल भारतीय स्तरक सेमिनार आयोजित कएल जा सकैत अछि। एकर अनुवाद अनेक भाषामे होबाक चाही। हिंदी आ अंग्रेजीमे तुरत होबाक चाही। अहिपर बात होइत रहक चाही। एकर पट दरपरत खुजिते रहक चाही। एक एहेन मैथिली केर साधक रामलोचन ठाकुर जे एकरा अपनसँस्मरणसँ शब्द देलनि तिनका प्रतिसँवेदनशील भेनाइ हमर सभक सम्मिलित जवाबदेही अछि। एहि पोथीपर हम तँ लिखते रहब आरो लोक सब लिखथि। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, हुनक रचना आ जनमानस केर उदासीनता हमरा लोकनि अपन मानवीय धरोहरक सम्मान आ सत्कारमे कने कंजूस रहल छी। ई संस्कार आजुक नहि अछि, अदौसँ मानवीय धरोहर केर प्रति निष्क्रियताक स्थानीय धरोहर अथवा संस्कारक रूपमे आबि रहल अछि। आब मैथिल समुदाय बहुत पोखगर अनुपातमे प्रवास आ अपन योगदानक कारणे वैश्विक भऽ रहल अछि। हम सब वैश्विक सोच आ शारीरिक उपस्थिति दुनू रूपमे भऽ रहल छी। वैश्विक भऽ रहल छी तँ हमर सबहक ई दायित्व बनैत अछि जे हमरा लोकनि वैश्विक संस्कृतिक नीक बात, प्रथा, परम्परा आ संस्कारकेँ अंगीकार करी। ई कहब सहज छैक जे हमर संस्कृति, संस्कार, लोक व्यवहार सर्वोत्तम अछि, मुदा ओहूसँ पैघ बात अपन संस्कृतिमे जे घाव अछि तकरा ठीक करब। कायाकेँ निरोग रखबा लेल रुग्ण अंगक समुचित चिकित्सा आ जरुरी पड़ला पर शल्यचिकित्सा सेहो आवश्यक। अहिसँ भले प्रारम्भमे कने कष्टक अनुभूति हो, बादमे जीवन सुखद भऽ जाइत छैक। रवीन्द्रनाथ ठाकुर दीर्घ आयु जिबैत मृत्युलोकसँ अनन्तक यात्रा हेतु प्रस्थान कऽ गेलाह। आब ओ हमर सबहक नित्य स्मरणीय पितर छथि। हुनक रचना पर किछु लिखब नब नहि हएत। एक बात अवश्य जे ओ जन-जनमे व्याप्त गीतकार छथि। हुनकर रचना लोक पढ़ि कऽ कम आ सुनि कऽ, दोहरा कऽ, गुनगुना कऽ, अनुकरण, अनुशरण करैत सीख लैत अछि। अगर बिना पोथी देखने हुनकर रचनाक संकलन करबाक हो तँ 45 आ 80 बरखक बीच केर करीब एक सए स्त्री पुरुष लग चर्च करू, सब मिलि हुनक सब गीत लिखा देताह। अगर ओहूमे आलस्य भऽ रहल अछि तँ सोशल साइट पर लोक सबसँ निवेदन करू, किछुए दिनमे अहाँक संकलन तैयार। लोक कंठमे अहि तरहक कमोवेश मिथिला भूमि – अहि पार, ओहि पार आ तमाम भौगोलिक उपक्षेत्र अथवा पॉकेटमे लिंगभेद ओ जातिक आरि तोड़बाक मोनोपोली महाकवि विद्यापतिक बाद अगर ककरो भेटल अछि तँ ओ छथि रवीन्द्रनाथ ठाकुर। हुनक गीत जखन महेन्द्र जीक गलाक चिपमे सेट भऽ जाईत छल तँ ओकर भाव देसी राहरिक दालिमे घी संग तेजपत, जीरक फोरन जकाँ भऽ जाइत छल। मिथिलामे जन सरोकारक गीत काशीकांत मिश्र “मधुप”, स्नेहलता (कपिल देव ठाकुर), मैथिलीपुत्र प्रदीप आदि लिखलनि। सभक रचना अपना आपमे अपूर्व छल। मधुप स्वयं गबैत नहि छलाह। गीतक वेरिएशन सीमित छलनि; स्नेहलता राधा-कृष्ण आ सीता-राम भक्तिमे एकनिष्ठ योगी जकाँ केन्द्रित रहला; प्रदीप किछु गीत समाजिक व्यवस्थापर केन्द्रित करैत अन्ततः सीता-राम, जगदम्बा आ भगवान भजनमे सन्तक डेगसँ लिखैत रहला। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की नहि लिखलनि? हिनक रचनामे नायक –नायिकाक प्रेम, तरुणक प्रेमक उद्वेग, मिथिला भूमिक कण-कण केर गान, सीताक बेदनाक चित्रण, ओकर ओहि पर सोच, चिंतन, मनन, राम संग लड़बाक हिम्मत, पुरुख मोनमे नारी भावक व्यवस्थापन, बाल गीतमे नेना मोनक अबैत जाइत मनोवैज्ञानिक भावक छोट-छोट खाटी शब्द आ कवित्तसँ प्रस्तुतिकरण भेटत। हिनक गीतमे नाटक भेटत, स्त्री-पुरुषक प्रेम, नोक-झोक भेटत। हिनक गीतमे परदेसिया मैथिलक दर्द, माता पिताक समस्या, जनरेशन गैप, संगतुरिया मस्ती, पर्यटन, यायावरी प्रवृति, गामक लोकक शहर अथवा नगर केर जीवनक अनुभव, ओकर विवेचन, गाम आ नगरमे तुलनात्मक विवेचन सब किछु भेटत । हिनकर गीतमे अतिवादी सेहो लोकवादी बनल अल्हड़ बनल भेटता। हिनक गीतमे की मधुबनी, की पुरनिया, बेगुसराय, सीतामढ़ी, दड़िभंगा आ नेपालक मिथिला सब एकाकार भेटत। रवीन्द्रनाथ जी शब्दक जादूगर छलाह। भावक आ गीत आ छंदक पेटार छलाह। चूँकि स्वयं स्टेज पर गीत गबैत छलाह तँ उतार-चढ़ाव सब बात बुझैत छलाह। श्रोता संग आँखि आ बॉडी लैंग्वेजसँ वार्तालाप करैत तदनुकूल रचना करैत छलाह। हुनक गीतक कुनो एक उदाहरणसँ हम अतए स्थानकेँ अनेरे नहि छेकए चाहैत छी। ताहि हम बिना उदाहरणकेँ अपन बात लिखैत छी। पढ़ैत रहू। रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी केर गीत संग मिथिलाक हवा, पानि, पोखरि, इनार, नदी, खेत , पथार, चिड़इ-चुनमुन सब मस्त छैक। सब हँसै छै। सब पात्र छैक। सभक अभिनय छैक। एक लड़की जे सासुरसँ नैहर जा रहल छैक, आ नदी उमटाम भरल छैक, तकरा लेल मलाह मात्र मल्लाह नहि भैया छैक। वएह धार पार करेतैक। परदेशी मिथिला चलैत मस्त हवासँ वार्तालाप करैत छैक। तप, जप, काम सब किछु छैक। की नहि छैक। अगर किछु नहि छैक तँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल उचित सम्मान। से कियैक ? रवीन्द्रनाथ ठाकुर केर तुलना हमर बउआइत मोन असमिया गीत लेखक आ गायक भूपेन हजारिकासँ करैत अछि। संयोग देखू जे दूनु गोटे समकालीन छलाह। मिथिला अनेक प्राकृतिक आ सांस्कृतिक वैविध्य केर आधारपर असमसँ बहुत लगीच अछि। मल्लाह, हवा, धार, जन मानस, स्थानीय प्रेम आ खाँटी देशी शब्द भूपेन हजारिका आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर दुनुक रहल छनि। दूनू अपन-अपन मातृभाषा क्रमशः असमिया आ मैथिलीसँ बहुत सिनेह करैत छलाह। दूनुक रचना काल एक रहल छनि। ओना भूपेन हजारिका रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ दस बरख पैघ छलाह। दस बरख पैघ छलाह तँ हुनक मृत्यु सेहो रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ लगभग दस वर्ष पहिने 2011मे भेलनि। मुदा दुनूमे आसमान जमीनक स्पष्ट अंतर छनि। की? भूपेन हजारिका स्टार नहि सुपर आमेगा स्टार छथि। हुनका फालके पुरस्कार भेटल छनि। ओ देशरत्न थिकाह। असम केर लोक भूपेन हजारिकामे भगवान देखैत छल। एखनो देखैत अछि । भूपेन हजारिका केर मृत्यु केर बाद हुनका पद्मविभूषण, आ भारतरत्न भेटलनि। भारतरत्न तँ मृत्यक 8 वर्ष बाद भेटलनि। ई सब बात हुनका अलग व्यक्तित्व प्रदान करैत छनि। चाहे असमिया कुनो जाति, सम्प्रदाय, वर्ग, क्षेत्रक हो, भूपेन हजारिका सबहक पूज्य छथि, असमिया संस्कृति केर नायक छथि। कनेक्टिंग फैक्टर छथि। ई बात ई प्रमाणित करैत अछि जे असम केर लोक अपन मानवीय धरोहर केर सम्मान करब जनैत अछि। हमरा लोकनि अर्थात मैथिल रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ जिबैतमे सेहो दूर धकेलने रहलहुँ अछि। मानवीय धरोहर केर सम्मान कोना करी ई कला हमरा सभकेँ मराठीसँ सिखबाक चाही। ध्यानचंद, कपिलदेव, अमिताभ बच्चन सन धुरंधर लाइनमे लागल रहलनि आ अपन एकता आ मुखर प्रवृति केर बलपर मराठी सब सचिन तेंदुलकरकेँ भारतरत्न दिया लेलक। सचिन केर कंटेम्पररी धोनी मुँह देखैत रहि गेलाह। एकरा कहैत छैक मराठी मानुष केर संस्कार। अपनामे भले लड़ब मुदा अपन आइकॉन लेल, अपन संस्कृति संरक्षण लेल एक रहब। किन्सियाइत ई गुण मैथिल मानुषमे आबि गेल रहैत ! ठीक छैक, मैथिल साहित्यकार केर लॉबी रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ वंचित रखने रहलनि। साहित्यकार लोकनि हुनक प्रयोग जे ओ साहित्यमे गीत लेखनकेँ छोड़ि आन दिशा जेना गद्य लेखन, कविता आदिमे केलनि तकरा संज्ञानमे नहि लेलनि। बहुत रास बात भेल। मुदा ताहि लेल जनताक आक्रोश कहाँ भेटल? मिथिला, पटना आ दिल्लीमे कार्यरत असंख्य संस्था कहाँ कोनो उचावच केलक हिनका लेल! सब सुतल रहल। जनता आ दरभंगा, पटना, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि नगर आ महानगरक संस्थाक सभक सहयोगसँ, निष्ठा आ आन्दोलनसँ राजनीतिक दबाबसँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल पद्मश्री आ पद्मभूषण बहुत छोट चीज छल। मुदा, हाय रे मिथिलाक दुर्भाग्य! अहि लेल संस्था सब सोचबो ने केलक। अपना आपके समाजक प्रतिनिधित्व कहय बला संस्था आ संगठन घोड़ा बेचि सुतल रहल। रवीन्द्रनाथ ठाकुर जेना महेन्द्र जी संग अपन स्टेजकेँ जोड़ी बनेलाह तहिना किछु जोड़ी स्त्री-पुरुष केर तैयार कएल जा सकैत छल। स्त्री पुरुष केर जोड़ी बनलासँ गीत सभहक प्रस्तुति आरो नीक भऽ सकैत छल। यद्यपि 1970 आ 80 केर दशकमे अनेक ठाम पुरूखक जोड़ी बनल मुदा कूनो शाश्वत जोड़ी नहि बनि सकल। बेर-बेर ईमानदारीसँ कहि रहल छी जे हमरा लोकनिकेँ अपन मानवीय धरोहर केर प्रति कनि साकांक्ष होबाक दरकार अछि। साकांक्ष होबा लेल समस्त समाजमे अपन संस्कृति संरक्षण हेतु सामूहिक सिनेह उत्पन्न भेनाइ आवश्यक। कतेक उदाहरण देखैत छी जाहिमे हम सब विध पुरौआ काज करैत लोककेँ, समाजकेँ आ अपना आपकेँ ओहिना मनबैत छी जेना कोनो माता अपन छोट नेनाकेँ पानिसँ भरल थारीमे चान केर प्रतिबिम्ब देखा ओकरा मना दैत छथि जे चान थारीमे आबि चुकल अछि। बहुत दुखद स्थिति अछि। हम सब एखनो धरि चंदा झा (कवि चन्द्र), यात्री, प्रदीप आ रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेल किछु नहि कऽ पाबि रहल छी। तीन महिना जखन मृत्युकेँ भऽ जाइत छनि तखन अपना आपके पैघ कहए बला संस्था लिली रे केर स्मृतिमे शोक सभा बजबैत अछि। कतेक संस्था सब तँ facebook आ सोशल साइट्स पर लिख काज चला लैत अछि। हम एक प्रयोजनसँ किछु दिन लेल अप्रैलमे पटना गेल रही। ओतय कियोक सूचना देलाह जे दिल्ली आ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रक तमाम मिथिला मैथिली लेल कार्यरत संस्था श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर केर सम्मानमे बहुत पैघ कार्यक्रम केर आयोजन नॉएडामे कऽ रहल अछि। ई बात सुनि आनंदित भेल रही। बादमे पता चलल जे ओ कार्यकर्म अति सामान्य रहैक। सब कियोक रुग्ण भेल रवीन्द्रनाथ ठाकुर संग फोटो घिचा अपन व्यक्तिगत आ संस्थागत आर्काइव्जमे संचित कऽ लेलाह। जखन ओ आब नहि छथि तँ सब कियोक हुनकर छवि संग अपन छवि बला फोटोकेँ साथ शोक सन्देश प्रेषित कएलनि। दिल्ली आ राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्रमे लगभग 100 जाग्रत संस्था अछि। सब कियोक सांस्कृतिक कार्यक्रम करैत रहैत छथि। दिल्लीमे मैथिली भोजपुरी अकादमी सनक दिल्ली सरकार केर संस्था अछि। अहि संस्था केर उपाध्यक्ष संजीव झा मैथिल छथि, तीन बेरसँ विधायक छथि, आ दिल्ली सरकारमे हिनक बहुत नीक प्रतिष्ठा छनि। मैथिली-भोजपुरी अकादमी लेल अगर हुनकासँ सब संस्थाक कर्ता-धर्ता लोकनि वार्तालाप केने रहितथि तँ असगरे मैथिली भोजपुरी अकादमी पचास लाख टका आसानीसँ अहि कार्यक्रममे खर्च कऽ सकैत छल। सब संस्था अगर एक-एक लाख खर्च करैत तँ एक करोड़ सहजतासँ भऽ सकैत छल। दिल्ली केर मैथिल उद्योगपति, एवं जन मानस सेहो यथाशक्ति अपन सहयोग दऽ सकैत छलाह। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा उपराष्ट्रपतिकेँ अहि आयोजन केर मुख्य अतिथि बनाओल जा सकैत छल। मुंबईसँ उदित नारायण, दिल्लीसँ मैथिली ठाकुर, बिहारसँ शारदा सिन्हा आदिकेँ आमंत्रित कएल जा सकैत छल। अहिसँ दिल्लीक लोक आन भाषा भाषी, मीडिया, नेता, सभ कियोक बुझैत जे एहेन मैथिल आइकॉन छथि रवीन्द्रनाथ ठाकुर। अतबे मात्र केलासँ हुनका लेल पद्मश्री आसानीसँ भेट सकैत छल। कनिक तत्परता, कने सिनेह, कने समर्पण बहुत किछु कऽ सकैत छल। मुदा भेल की! हुनकर कदकेँ आरो छोट कऽ देल गेल। मुदा दोष आयोजक केर नहि, दोष तँ हमरा लोकनिक सोचक अछि। भऽ सकैत अछि बहुत लोक हमर अहि बातसँ बिलबिला उठथि आ हमरे पर नाना तरहक प्रश्न चिन्ह ठाढ़ करथि। मुदा ताहिसँ स्थिति थोड़े ने बदलि जायत? मैथिल समुदाय चाहे मिथिला भूमि केर होथि अथवा प्रवासी होथि,मे विद्वान, समाजिक संस्था, युवा संगठन आ विद्यार्थी संगठन अथवा यूनियन केर मध्य सामन्जस्य नहि भेटैत अछि। ई बात आजुक नहि ऐतिहासिक अछि। भोगेन्द्र जीमे सब गुण छलनि मुदा ओ विद्वान सभ कें दिल्ली केर अखिल भारतीय मिथिला संघ केर कोर समितिमे बहुत सघन भूमिकामे नहि आबय देलथिन्ह। भोगेन्द्र जी ओना तँ अखिल भारतीय मिथिला संघ केर पदाधिकारी नहि छलाह मुदा सही अर्थमे वएह सर्वेसर्वा छलाह। ई प्रसंग लिखबाक प्रयोजन ई जे एखनो हमरा लोकनि अहि सब बात पर गंभीर होइ आ सब तरहक समायोजन करी। एखनो हम सब अपन रत्न: लिली रे, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, फणीश्वर नाथ “रेनू”, यात्री, स्नेहलता, प्रदीप लेल बहुत किछु कऽ सकैत छी। कोआर्डिनेशन ताहि लेल बहुत आवश्यक। बहुत बात लिखा गेल। लेकिन सोचब तँ हमरा बातमे कोनो ने कोनो समाधान भेटत। स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ ठाकुर मिथिलाक अनुपम रत्न छथि। ओ सदैव अपना रचनाक संग जनमानस केर ह्रदयमे जीवंत रहताह। इंद्रधनुषी अकास हम मानव वि‍ज्ञान एवं कलाक शोध छात्र छी। शोध छात्रक भाषा तँ प्राणहीन होइत छैक। उपमा, अलंकार, सौन्दनर्य, स्वलप्न आदि‍ शोधछात्रक हेतु जेना कुनो बाहरी परि‍वेशक वस्तुभ होइक। मुदा छी हम घोर आशावादी आ पॉजीटीव। शायद अपन अही पॉजि‍टीव सोच आ दृष्टि ‍कोणक कारणे हम परमादरनीय जगदीश प्रसाद मण्ड ल केर कवि‍ता संग्रह इंद्रधनुषी अकास केर आमुख लि‍खबाक जि‍म्माह लऽ लेलहुँ। मण्डडलजी वि‍चारसँ प्रगति‍शील आ सभ तरहक लोक-वि‍चारधारा, परिस्थिख‍ति‍ आ परि‍वेशमे सामंजस्यल स्था पि‍त करएबला साहि‍त्याकार छथि‍। अल्ट रनेटि‍व डेवलपमेन्टष आ इकोलॉजि‍कल कन्सेतप्ट्केँ स्थाेनीयताक दृष्टि्‍कोणमे बुझबाक आ अपन ज्ञान गंगाकेँ कथा, उपन्या्स, नाटक एवं कवि‍ताक रूपमे बहेबाक असाधारण क्षमता छन्हिे‍ मण्डटलजीमे। हि‍नकर रचना पढ़ैत जाऊ आ ब्योंपत-पर ब्यौं त सुनैत जाऊ! हि‍नकर बात आ ब्यों त सभ सहज, चमत्का री मुदा वि‍श्वशनीय लागत। आब बात करी रचनापर। हि‍नक रचना इंद्रधनुषी अकास सरि‍पहुँ कवि‍ताक प्रकार, छोट-पैघक हि‍साबे, भावनाक प्रवाहक हि‍साबे, अनेक वि‍षयमे होबाक कारणे बहुरंगी चुनरी अछि‍। अतेक वि‍स्तृैत वि‍धा आ वि‍षयकेँ समेटबाक कारणे ऐ संकलनक नामकरण अहि‍सँ उत्तम नै भऽ सकैत अछि‍ : वैवि‍ध्य सँ भरल, मनोरंजक, रंगारंग, दीवास्वकप्न, सोहनगर-मनोरंजक आ मनोहारी अकास। ऐमे जीवनक यर्थाथ अछि‍, कवि‍क कल्पंनाक संसार अछि‍, उपमा आ अलंकार अछि‍, जीवनक दर्शन अछि‍, माटि‍सँ सि‍नेहक उद्गार अछि‍, गीत अछि‍, भाव अछि‍, अर्थ वि‍न्या‍स अछि‍, प्रेमक अनुभवजन्यऐ परि‍भाषा आ प्रवाह अछि‍, प्रकृति‍क अनुराग अछि‍, ग्राम्यप-जीवनक झांकी अछि‍ चीर प्राचीन आ चीर नवीन वि‍चार अछि‍। “इंद्रधनुषी अकास” नामसँ अपन लि‍खल एकटा छोट कवि‍ता स्मदरण अबैत अछि‍, आ स्म रण अबैत अछि‍ ओ परि‍स्थिक‍ति‍ जइसँ प्रेरि‍त भऽ पाँच वर्ष पहि‍ने इंन्द्रसधनुषपर एक छोट कवि‍ताक ि‍नर्माण केने रही। परि‍स्थि‍‍ति‍ ई छल जे हमर पाँच वर्षीय पुत्र शशांक हमरासँ जि‍द्द करय लागल जे ‘हमरा इन्द्र धनुष देखाउ।’ मुदा देखाऊ कोना! घोर समस्यार। कि‍छु काल सोचमे पड़ि‍ गेलौं। अन्तँत: कम्युरस् टर खोलि‍ इन्ट‍रनेट चालू कय ओकरा इन्द्रहधनुषक अनेको फोटो देखा देलि‍ऐक। शशांकक बालशुलभ मोन प्रसन्न भऽ गेलैक। राति‍मे सुतबासँ पहि‍ने मोनमे आएल जे ऐपर कि‍छु लीखी। पेन आ कागत लऽ लि‍खए लेल बैसि गेलौं। सोचल कवि‍ता लि‍खल जाए। कवि‍ताक शीर्षक सेहो फुरा गेल- ‘इन्द्र धनुषक वि‍न्याास’ कवि‍ता स्वोत: प्रारम्भट भऽ गेल-

“सुरुजक इजोतसँ भरल आकास दग्धल कतेक अछि‍ गर्मीक धाहसँ मोन वि‍दग्धी कतेक अछि‍ कोना करी एहि‍ प्रचण्डध गीर्मीमे शीतलताक आभाष कोना करी टहटहाइत इजोतमे इन्द्रड धनुषक वि‍न्याभस? मुदा हारि‍ मानब हमर प्रकृति‍मे कतअ अछि‍ एकाएक बुझाएल जेना इन्द्र धनुष अतअ अछि‍। मोन हरि‍याएल ब्यों्त फुराएल इन्द्र धनुषक ि‍नर्माण हेतु कल्पहनाकेँ सकार कय इन्द्रल-धनुषक रचना हेतु सोचल कोना नै हैत इन्द्र –धनुषक वि‍न्याधस? टहटहाइत सुरुजदेवकेँ ऊपर आँजूरसँ पोखरि‍क पानि‍ छीटि‍, सुखल धरतीकेँ अरि‍यर करबाक हेतु कऽ लेब एकता छोट मुदा यथार्थक इन्द्र धनुषक वि‍न्यालस। फेर की सभ भऽ जाएत सोहनगर, की धरती आ की अकास।”

आब बि‍ना इमहर-ओमहर भटकने जगदीश प्रसाद मण्ड‍ल जीक कवि‍ता संग्रहकेँ देखी। 110 कवि‍ताक समेटि‍ने 146 पन्नाक ई पोथी मैथि‍ली साहि‍त्यस केर एकटा अवि‍श्मरणीय धरोहर अछि‍। हरेक छोट आ पैघ कवि‍तामे कि‍छु संदेश, कि‍छु संस्कािर आ कि‍छु नव वि‍चार प्रस्फुेटि‍त होइत छैक। लोक मि‍थि‍लासँ बाहर पलायन करैत छथि‍ तँ मण्डसलजीकेँ कचोट होइत छन्हिन‍। मुदा जखन लोक मि‍थि‍लासँ साफे रि‍श्तात समाप्त कऽ आनठाम बैस जाइत छथि‍ तँ मण्डनलजीक हृदए जेना भोकासि‍ पाड़ि‍-पाड़ि‍ कानय लगैत छन्हिक‍। ऐ बातक सहज अनुभूति‍ उड़ि‍आएल चि‍ड़ैमे परि‍लक्षि‍त होइत अछि‍ : “उड़ि‍आएल चि‍ड़ैक ठेकाने कोन उड़ि‍ कतऽ जा बास करत। भरि‍ पोख घोघ भरतै जतऽ दि‍न-राति‍ जा रास करत। ओहन चि‍ड़ैक आशे कोन जे बि‍सरि‍ जाएत डीहो-डावर।”

देख! देस परदेस कतहु जाऊ मुदा अपन माटि‍ आ अपन संस्कृआति‍सँ अपनाकेँ बि‍मुख नै करू। शायद यएह बात थीक ऐ कवि‍ताक मूल। अगर आँखि‍ मूनि‍ पलायन करैत रहब आ अवसर एवं सफलता मात्र पेबाक कारणे अपन डीह-डाबर सदाक लेल त्या गि‍ लेब तँ भला अहाँ केहेन मनुक्ख ! अहाँक केहेन संस्काार? छोट कवि‍ताक माध्यासँ कतेक मर्मक बात बजैत अछि‍ जगदीश प्रसाद मण्डकल केर कवि‍ मोन! एक आर कवि‍ता- “चल रे जीवन” अहाँकेँ रोकि‍ लेत। कवि‍ता पढ़ु, ओकर शब्द क युग्म केँ देखू आ कवि‍ताक संग अपना-अापकेँ गति‍मान बना लीअ। ने कवि‍ता रूकत आ ने अहाँ। बाह रे बाह! एहेन आसाधारन सम्बतन्ध- कवि‍ता आ पाठकक बीच जीवन गति‍शील थि‍क। ई बात अनेको कवि‍ अनेको भाषा आ कालमे अपन-अपन ढंगसँ कवि‍ताक माध्यपमसँ कहने छथि‍। मुदा अही बातकेँ सर्वहाराक शब्दािवलीसँ कहब। कहब की चलैत पहि‍यापर एना बैसाएब कि‍ पाठककेँ जोश आबि‍ जाइक। ई कला मण्डशल जीमे छन्हिह‍। कवि‍ताक कि‍छु अंश देखू- “कि‍छु दैतो चल कि‍छु लैतो चल कि‍छु कहि‍तो चल कि‍छु सुनि‍तो चल कि‍छु समेटतो चल कि‍छु बटि‍तो चल कि‍छु रखि‍तो चल कि‍छु फेकि‍तो चल बि‍चो-बीच तँू चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल। समए संग चल ऋृतु संग चल गति‍ संग चल मति‍ संग चल। गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल। चल रे जीवन चलि‍ते चल।” हँ, कवि‍ केवल गति‍मान होमाक प्रेरणा टा नै दैत छथि‍। ओ कहैत छथि‍ जे जोश संगे होशमे रहू : गति‍ संग चल/ मति‍ संग चल/ गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल।

‘सासु-पुतोहु वार्ता’ कवि‍तामे जेनरेशन गैप आ मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्लेषण भेटत। जखन कवि‍ता पढ़ब तँ लागत मनोरंजक अछि‍। जखन सोचब तँ लागत एकटा अनुभवजन्या वि‍श्लेमषण अछि‍। एक-एक शब्द।क चयन कवि‍ताकेँ समाजसँ सीधे जोड़बामे प्रभावकारी अछि‍। “अपनेपर हँसै छी” शि‍क्षाक घटैत स्तेर, चाेरी, घूस दय नौकरी प्राप्तज करबाक तरीका, अवसरवादी नेता लोकनि‍क पाॅपुलि‍जम आ शि‍क्षा मि‍त्र इत्या दि‍ केर माध्ययमसँ कि‍छु पाइक मासि‍क भत्तामे राखब, ओइ लेल मुखि‍यासँ नेता आ अधि‍कारी धरि‍ घूसक प्रचलन आदि‍ प्रथापर सोझे-सोझ प्रहार अछि‍। जकरा फबलै से बि‍ना पढ़ने नकल कऽ परीक्षा पास कए डि‍ग्री हासि‍ल कय कोनहुना लाख-डेढ़ लाख टकाक ब्यौंअत कऽ नोकरी हथि‍या लेलक। भाँरमे जाउ शि‍क्षा बेवस्था‍ या चौपट्ट होथि‍ वि‍द्यार्थी! शि‍क्षामि‍त्र लोकनि‍केँ ऐ सँ की मतलब???

“बाट” कवि‍ता कवि‍ रवीन्द्र नाथ ठाकुरक कवि‍ता यदि‍ तोर डाक शुने केऊ न आसे/ तबे एकला चलो रे/ केर स्मथरण करबैत अछि‍। संगहि‍-संग गीताक मूल मंत्र “कर्मण्ये-वाधि‍कारस्तेत माँ फलेषु कदाचन,” अर्थात अहाँक अधि‍कार कर्म तक सीमि‍त अछि‍। तँए अहाँ कर्म करैत जाऊ, फलक इच्छा् नै करू... केर सेहो पुनर्स्था?पि‍त करए चाहैत छथि‍। कवि‍ भावुक सेहो छथि‍। होबाको चाही। भावुक नै भेल तँ कवि‍ताक कोना रचना करत कवि‍! कवि‍क भावुक मोन गीतमे बहय लगैत छैक। “गीत-2”मे कि‍छु एहने दशाक वर्णन थि‍क। भावनासँ द्रवि‍त मोन बाजत तँ कोना? बोल कुना फुटतै? : मुँहसँ बोल कन्ना कऽ फुटतै दरदसँ दुखाइ छै टीससँ टि‍सकै छै छाती लहि‍-लहि‍ लटुआएल छै मुँहसँ बोल कन्नाल.....। आशाक सभ मेटेलै बाटे सभ घेराएल छै ककरो कहने कि‍छु ने भेटत अपने बेथे बेथाएल छै मुँहसँ बोल कन्ना ... चोटसँ चोटाएल छै मन ढहि‍-ढहि‍ कऽ ढनमनाइ छै तैयो हँसि‍-हँसि‍ नाचय गाबए राति‍-दि‍न बड़बड़ाइ छै मुँहसँ बोल कन्नाद...। अही तरहेँ जाल आ गालक उपमा लऽ कवि‍ लोककेँ अगाह करै छथि‍ : जहि‍ना जाल सभ तरहक मांछकेँ पकड़ैत अछि‍, परन्तु. अगर मल्ला ह जालकेँ ठीकसँ नै ओछेलक आ काबूमे नै केलक तँ जाल फाटि‍ जाइत छैक, माछ भागि‍यो जाइत छैक। तहि‍ना मनुष्याकेँ अपन बोलीपर संयम करक चाही : शब्दैजाल छी महाजाल जइमे समटल महाकाल देखैमे जहि‍ना वि‍कराल तहि‍ना अछि‍यो महाकाल। सभ कि‍छु भेटत आँखि‍येमे सभ लटकल अछि‍ जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे। जे जेहन अछि‍ जलवाह से तेहन फेक फेकैए। गैंची ने गैंचि‍या जाइए रोहु, भाकुर तँ फँसि‍तेए। सभ कि‍छु भेटत जालेमे सभ कि‍छु छै गालेमे। गाल बजबैमे जे जेहन से तेहन जाल फेकैए। इचना-कोतरीकेँ के कहए डोका-काँकोर धरि‍ फॅसैए। सभ कि‍छु छै गालेमे सभ फॅसल अछि‍ जालेमे...।”

ि‍वचार तँ वि‍स्ता रपूर्वक अनेकाे कवि‍तापर लि‍खल जा सकैत अछि‍। हि‍नकर ई कवि‍ता संग्रह हाथक आंगुर जकाँ थि‍क। सभ आंगुर स्वेतन्त्रन अछि‍, मुदा सभ जुड़ल अछि‍ तरहत्थीजसँ। तहि‍ना हि‍नकर रचना “इंद्रधनुषी अकास” नामक मालामे गांथल एक सय दस कवि‍ता स्वितंत्र अछि‍- वि‍षय, भाव, शब्द‍–चयन, प्रेम, उपमा आदि‍क स्वाभावसँ परन्तुस अन्तनत: सभ कवि‍ता एक तागसँ गांथल अछि‍ ओ ताग थि‍क जगदीश प्रसाद मण्ड लक व्यकक्तिन‍त्वे आ सोच। सभ कवि‍ता एक-सँ-बढ़ि‍ कऽ एक अछि‍। “माटि‍क फूल, गोधन पूजा, झगड़ा, नजरि‍, भभूत, पुरुषार्थ, अगहन, केना मेटत गरीबी, बाढ़ि‍क सनेस, बेरोजगारी, पू-भर, बेथा, एकैसमी शदीक देश, आदि‍ कि‍छु एहन कवि‍ता अछि‍ जकरा पाठक बेर-बेर पढ़ताह। पोथी समीक्षा- गामक जि‍नगी- जगदीश प्रसाद मण्‍डल समाजमे परि‍वर्तन किंवा परि‍स्‍थि‍ति‍क अनुसार कुनो अल्‍टरनेटि‍व उपायक ब्‍यौंत करक हेतु हमेशा कुनो अवतार, पैगम्‍बर, महान पुरूष, वि‍द्वान, राजा राममोहन राय अथवा महात्‍मा गान्‍धीक जरूरत नै। अनेको परि‍स्‍थि‍ति‍मे ऐ तरहक कार्य कि‍योक- गामक सामान्य एवं नि‍रक्षर महि‍ला, रि‍क्‍शा चलबैबला, बारह बर्खक बालि‍का, चाह बेचैबला युवक, गामक लोककेँ बेर वि‍पत्ति आ पावनि‍-ति‍हारमे कार्य आबए वाली वृद्ध महि‍ला, पोखरि‍मे माछक धंधा करैबला मल्‍लाह कऽ सकैत अछि‍। प्रकृति‍ आ संस्‍कृति‍मे सामंजस्‍य कए कऽ मनुष्‍य रहि‍ सकैत अछि‍। जापानमे बेर-बेर भुकम्‍प होइत छैक। तकर मतलब तँ ई नै जे जापानक लोक जापाने छोड़ि‍ दि‍अए! जापानक लोक अपना देशसँ बड्ड सि‍नेह रखैत छथि‍। ओइ भूमि‍क रचना आ भुकम्‍पकेँ देखैत घरक रचना एवं संस्‍कृति‍क वि‍कास करैत छथि‍। जापान वि‍श्‍वमे एक चमकैत आ उदीयमान नक्षत्र अछि‍। तहि‍ना अपन 19 गोट कथाक माध्‍यमसँ जगदीश प्रसाद मण्‍डल कहए चाहैत छथि‍ जे बाढ़ि‍, रौदी एवं अन्‍य प्राकृति‍क वि‍पदाकेँ समाधान अगर मि‍थि‍लाक लोक चाहथि‍ आ लगनसँ कार्य करथि‍ तँ स्‍थानि‍य तौरपर कएल जा सकैत अछि‍। लोकक जत्‍थाक-जत्‍था पड़ाइनकेँ रोकल जा सकैत अछि‍। कथामे गामक परि‍वेश आ परि‍स्‍थि‍ति‍केँ सटीक वर्णन कएल गेल अछि‍। अपन छोट-छोट कथासँ लेखक पाठकेँ सोचबाक लेल वि‍वश कऽ दैत छथि‍। ऐ कथा-संग्रहक नाम थीक- गामक जि‍नगी। गामक जीवनक लगभग प्रत्‍येक परि‍स्‍थि‍ति‍क चर्चा अलग-अलग रूपेँ अलग-अलग कथाक माध्‍यमसँ कएल गेल अछि‍। पहि‍ल कथा थीक भैंटक लावा। ऐ कथाक तुलना कुनो भाषाक कुनो कालजयी लेखक केर कथासँ कएल जा सकैत अछि‍। भयंकर बाढ़ि आ बाढ़ि‍क वि‍भाषि‍का संगहि‍-संग बाढ़ि‍क बाद जे लोककेँ समस्‍याक समना करए पड़ैत छै तकर बेजोड़ वर्णन। एहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे सामान्‍यतया साहि‍त्‍यकार लोकनि‍ जखन कुनो जमि‍न्‍दारक चरि‍त्रक वर्णन करैत छथि‍ तँ ओकरा क्रूर, नृशंस, हृदएहीन बना मात्र ओकर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक गलत पक्षक वर्णन करैत छथि‍। लेकिन मंडलजी त सामंजस्य स्थापित करबा में माहिर छथि। एहि कथा में महाजनों ओतबे परेशां अछि जतेक कुनो आन ग्रामीण.। बल्कि महाजन ज्यादे परशान अछि- कोना अपन इज्जत आ कोना गामक लोक सबहक भारपन राखत? कथा में माहाजन श्रीकान्‍त परेशान जे बाढ़ि‍सँ धानक फसलि‍ सुड्डाह। “एक्को धुर धान नहि‍ बंचल अछि जे अगहनोक आशा होइत। जे सभ दि‍न कीनि‍-बेसाहि‍ कऽ खाइत अछि‍ ओकरा तँ कोनो नै मुदा हमरा लोक की कहत? चाह-पीबि‍ते-पीबि‍ते श्रीकान्‍तकेँ चौन्‍ह आबए लगलन्‍हि‍। मन पड़लनि‍ जे बाबा कहने रहथि‍ जे दरबज्‍जापर जँ क्‍‍यो दू-सेर वा दू-टाका मांगए लेल आबए तँ ओकरा ओहि‍ना नहि‍ घुमबि‍हक। ओहि‍सँ लक्ष्‍मी पड़ाइ छथि‍।‍” लेखक माहाजनक वेदनाकेँ सेहो उजागर करैमे सफल छथि‍। समान्‍यतया अन्‍य लेखक लोकनि‍ ऐ तरहक भावनाकेँ नै व्‍यक्‍त कऽ सकैत छथि‍। श्रीकान्त बजै छथि‍- “जहि‍ना सभ कि‍छु बाढ़ि‍मे दहा गेल तहि‍ना जँ अपनो सभ तुर भसि‍ जइतहुँ, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू तँ दुख नहि‍ काटय पड़ैत।‍” भैंटक लावा कथाक दोसर आ मुख्य आधार या वि‍शेषता एक नि‍रक्षर महि‍ला- मलाहि‍न द्वारा भैंटक खोज अनाजक रूपमे करब थीक। कोना भैंटि‍क दानाकेँ जमा करब, कुटब, छाँटब आ लावा भुजबक प्रक्रि‍या जे जीबछी मलाहि‍न करैत अछि‍ से पाठककेँ एको क्षण कथासँ भटकऽ नै दैत अछि‍। भैंटक दानाक लावा गामक लोककेँ जीबाक एक पैघ सामग्री बनि‍ जाइत अछि‍ आ ओकर श्रेय जीबछीकेँ जाइत छै। जीबछीक लावाकेँ चीखैत श्रीकान्‍त पत्नीसँ कहैत छथि‍- “एत्ते सुन्नर वस्‍तुकेँ एखन धरि‍ जनि‍तहुँ नहि‍ छलहुँ। धन्‍य अछि‍ जीबछीक ज्ञान आ लूरि‍ जे एहेन सुन्नर हराएल वस्‍तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात देवी छी जीबछी। जाउ, सन्‍दुकमे सँ एक जोड़ी‍ साड़ी आ आंगी नि‍कालने आउ। जीबछीकेँ अपना ऐठामसँ पहि‍रा कऽ वि‍दा करब। गरीब-दुखि‍याक देवी छी जीबछी।” ऐसँ ई पता चलैत अछि‍ जे लेखक समाजक सभ वर्गक लोककेँ ध्‍यानमे रखैत अपन रचनाकेँ आगा बढ़बैत छथि‍। जीबछीक ज्ञानक सम्मान होइएत अछि आ जीब्ची एकता क्रांति लाबैत अछ। आहें क्रांति जे समाज में एकटा जीवन जीबाक आधार देत अछि । नारी ज्ञान आ बि‍पत्ति‍क क्षणमे नारीक सुझाएल ओरि‍यात जइसँ रौदीकेँ, वि‍भि‍षि‍काकेँ सामाना कएल जा सकैत अछि‍ केर ज्ञान बि‍साँढ़ कथाक माध्‍यमसँ होइत अछि‍। कथाक पात्र डोमन केर पत्नी सुगि‍या द्वारा ई कहब जे, “जकरा खाइ-पीबैक ओि‍रयान करैक लूरि‍ बुझल छैक ओ कथीक चि‍न्ता करत?‍” ऐ बातक प्रमाण अछि‍। लगातार तीन-चारि‍ वर्ष रौदी हेबाक कारणे गामक गाम लोक खाली कऽ परदेश भागि‍ गेल। मुदा सुगि‍याक सोझाएल ओि‍रयाॅनसँ ओकर पति‍ डोमनकेँ जखन ऐ बातक भान होइत छैक जे पुरैनि‍क जड़ि‍मे बि‍साँढ़ फड़ैत छैक। अल्हुए जकाँ। आ ओ अपन कार्यमे लागि‍ जाइत अछि‍। कोदारि‍ चलाबैमे जखन परेशानी होइत छै तँ डोमनकेँ सुगि‍या ई कहि‍ कार्य करबाक प्रति‍ जोश उत्पन्न करैत छैक- “हमर चूड़ी-साड़ी पहीर लि‍अ आ हमरा धोती ि‍दअ। तखन कोदारि‍ पाड़ि‍ कऽ देखा दै छी।‍” पुरुषक दंभ ओकरा गतिमान बना देत छैक फेर जोशमे आबि‍ डोमन कोदारि‍ भांजय लगैत अछि‍। तकर परि‍णाम ई जे बि‍साँढ़क जड़ि‍ भेटलैक। बि‍साँढ़क वर्णन जे लेखक करैत छथि‍ तँ यात्रीक कटहरक वर्णनक स्‍मरण होमय लगैत अछि‍! बि‍साँढ़क वर्णन ने देखू- “उज्‍जर-उज्‍जर। नाम-नाम। लठि‍आहा बाँस जेकाँ। गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जेकाँ चि‍क्कन, बीत भरि‍सँ हाथ भरि‍क। पाव भरि‍सँ आध सेर धरि‍क।‍” लागत एना जेना बि‍साँढ़क जड़ि‍सँ उत्म खाद्य पदार्थ दुनि‍यामे कुनो नै! बातो सैह अगर लोक के किछु खेबाक लेल नहि उपलब्ध हेतैक त किछु त चाही जाही स प्राणरक्षा भा सके। ओहो खोज एहेन जे लोकक दोसर ठाम जेनइए रोकि दे । ‍बि‍साँढ़ एक उत्तम उपाय अथवा व्योंत बनि जाएत अछि। पीरारक फड़ कथामे मण्‍डलजी एक पात्र धनि‍याक माध्‍यमसँ पीरारक फड़'क वि‍शेषताक वर्णन करैत छथि‍। कोना धनि‍या अपन पति‍ पि‍चकुन केर सहायतासँ पीरारक फड़ तोरि‍-तोरि‍ हाटे-हाटे गामे-गामे बेचैत अछि‍ आ पि‍चकुन अनेरूआ माछ मारि‍ बेचबो करैत अछि‍ आ खाइतो अछि‍। धनि‍या अपन युक्ति‍सँ पीरारक फड़ आ अनेरूआ माछसँ अपन आर्थिक तंगीकेँ दूर करैत अछि‍ आ जीवनमे सभ कि‍छु जोड़बाक प्रयास। अगर मनुष्य लगन स कार्य करे त सब किछु संभव छैक । अनेरे गाम या मिथिला स पड़ा गेने समस्याक समाधान नहि भा सकैत अछि । अनेरूआ बेटा एक एहेन गरीब गृहस्‍तक थीक जे लगभग पचासक बयसमे अएलाक बादो संतानहीन छल गंगाराम। हाटसँ आबएकाल जखन एकटा जनमौटी अनेरूआ बच्‍चाकेँ कोरामे लऽ कऽ गंगाराम घर अबैत अछि आ घरवालीकेँ कहैत छैक- “आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि‍।‍” दुनू परानी प्रसन्न भऽ ओइ बेटाकेँ पोसए लागल। गंगाराम आ विशेष रूप स ओकर पत्नीक ओही अनेरुआ शिशुक प्रति प्रेमक अपूर्व सोहनगर दृश्य उत्पन्न करैत अछि ई कथा। शरीरसँ खि‍न्न होमाक कारने गंगाराम कि‍छु उपार्जन करबा जोकरक नै रहल। बेटा मंगल कि‍छु पढलक बाद आर्थिक वि‍पन्नताक कारणे पढ़ाइ छोड़ि‍ चाहक दोकान खाेि‍ल लैत छै। मंगल अपन पढ़ाइ चाहक दोकानोमे रहि‍ करैत अछि‍। मरै काल गंगाराम मंगलकेँ ओकर जन्‍मक कथा बता देने रहैक। मंगल कि‍ताबक संग-संग समाजक बेबहारक अध्‍ययन सेहो करैत अछि‍। मंगलक कथा एकटा पत्रकार सुनैत छथि‍ आ ओकरा छापि‍ दैत छथि‍न्‍ह। मंगलक एहने कथा पढ़ि‍ सुनयना नामक एक पढ़लि‍ नायि‍का मंगल लग अबैत छथि‍ आ मंगलक प्रति‍भासँ प्रभावि‍त भऽ सुनयना अपन वकील पि‍तासँ दलि‍ल दऽ मंगलसँ वि‍वाह करए लेल पि‍ताकेँ तैय्यार कऽ लैत छथि‍। आ अंततः मंगल आ सुनयनाक वि‍वाह भऽ जाइत छैक। बिम्बक दृष्टिकोने ई कथा उत्तम संगही अहि कथा केर मध्यम स लेखक समाजक दू वर्गके जोडबक प्रयास केलन्हि अछि। परिवेशक वर्णन यथार्थ आ उत्तम बुझना जायत। एहनो बात नहि जे एहि तरहक कथा पूर्व में नहि लिखल गेल हो मुदा ए कथा एकटा नव परिव्षक जन्म देत अछि, चीज के लिखबाक एकटा सहज आ सुन्दर शैली प्रस्तुत करैत अछि। दूटा पाइ कथा ओइ तरहक नवयुवकपर कटाक्ष करैत अछि‍ जे दि‍ल्‍ली, मुम्‍बई जा कऽ ओतए केर चकाचौंधमे अपन जड़ि‍केँ बि‍सरि‍ जाइत अछि‍। मुदा माइयक ममत्‍व तँ अथाह समुद्र होइत छैक। फेकुआ अपन कमाइकेँ वस्‍त्र आ फैशनमे बरबाद कऽ लैत अछि‍। बि‍सरि‍ जाइत अछि‍ जे ओकर वि‍धवा माए गाम में कोना जीबैत हेतैक। माए बेटा परदेश गेल अछि‍ आ वापस आएत तँ कमा कऽ ढौआ लाओत तकर ख्‍याली पोलाव बनबैत छैक। परन्‍तु जखन ओकरा बेटाकेँ यर्थाथक पता चलैत छैक तखनो ओ अर्थात माए अपन महानताक परि‍चए देबए मे बाज नै अबैत छैक। माए बेटाकेँ कहैत छैक- तों वापस गाम आबि‍ जो। हमरा तोहर कमाइक जरूरत नहि‍ अछि‍। भाड़ा नहि‍ छौक तँ ककरोसँ पैंच लऽ ले, अतय अएलापर दऽ देबै। बोनि‍हारि‍न मरनी कथा मार्मिक ढंगे लि‍खल गेल अछि‍। बरबस सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला क स्मरण हरियर भा जेट अछि: वह तोडती पत्तथर इलाहाबाद के पथ पर/ कथाक एक-एक पांति‍ अर्थपूर्ण लागत बिना कुनो बनबत के यथार्थ के जोड़ैत सत्य के बाचैत। कथाक मुख्‍य पात्र पचास वर्षक मरनीक पति‍, बेटा आ पुतोहू तीनू बज्र खसलासँ गाछक तरमे खून बोकरि‍ कऽ मरि‍ जाइत छै। असहाय अबला लाचार भऽ पाँच वर्षक पोता आ आठ वर्षक पोतीक आशाक संग जीब रहल अछि‍। मरनीक देह आ जीबनक वि‍वरण देबामे लेखकक जवाब नै- “कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुरपर बनाओल चि‍ड़ैक खोंता जेकाँ केश, आंगुर भरि‍-भरि‍क पीअर दाँत, फुटल घैलक कनखा जेकाँ नाक, गाइयक आँखि‍ जेकाँ बड़का-बड़का आँखि‍, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरंगमनि‍या आंगी फटलाक बाद कहि‍यो देहमे आंगीक नसीब नहि‍ भेल। बि‍ना साया-डेढ़ि‍याक साड़ी पहि‍रने। यएह छी मरनी।‍” राष्‍ट्रीय राजमार्गक पक्की सड़कक ि‍नर्माणमे जखन मरनीकेँ गि‍ट्टी फोड़ैक कार्य भेटैत छै तँ अपन थाकल आ जीर्न शरीर लऽ सेहो अपन छोट-छोट बच्‍चा सभ लेल ओ ओइमे तल्‍लीन भऽ जाइत अछि‍। लेखक गि‍ट्टी फोड़ैत मरनीक बड़ा सजीब आ कारूणि‍क वर्णन करैत छथि‍ : “पचास वर्खक मरनी जे देखैमे झुनकुट बूढ़ि‍ बूझि‍ पड़ैत। सौंसे देहक हड्डी झक-झक करैत। खपटा जेकाँ मुँह। खैनी खाइत-खाइत अगि‍ला चारू दाँत टूटल। गंगी-जमुनी केश हवामे फहराइत। तहूमे सड़कक गरदासँ सभ दि‍न नहाइत। मुदा तैयो मरनी अपन आँखि‍ बचेने रहैत। जखन पुरबा हवा बहै तँ पछि‍म मुँहे घुरि‍ कऽ गि‍ट्टी फोड़ए लगैत आ जखन पछवा बहए लगैत तँ पूब मुँहे घुरि‍ जाइत। बीच-बीचमे सुसताइयो लैत आ खैनि‍यो खा लैत। मुदा तैयो ओकर मुँह कखनो मलि‍न नै होइ। कि‍एक तँ हृदएमे अदम्‍य साहस आ मनमे असीम वि‍श्‍वास सदि‍खन बनल रहैत। तेँ सदि‍खन हँसि‍ते रहए।‍” मुदा मरनीमे आत्‍मबल छैक। जखन ठीकेदार मरनीसँ बात करैत छैक तँ अाेकर मन कानय लगैत छैक। ई लेखकक महानता कहल जा सकैत अछि‍। ठीकेदार की सोचैत अछि‍ से देखू- “एत्ते भारी काज केनि‍हारक देहपर कारी खट-खट कपड़ा छै, तहूमे सइयो चेफड़ी लागल छै, काज करै जोकर उमेर नै छै, तैपर एते भारी हथौरी पजेबापर पटकैत अछि‍। ठी‍केदारक मन दहलि‍ गेलै।‍” फेर लेखक द्वारा ठीकेदार मनोदशाक चि‍त्रण देखू : “जहि‍ना आकास आ पृथ्‍वीक बीच क्षि‍ति‍ज अछि‍, जाहि‍ठाम जा चि‍ड़ै-चुनमुन्नी लसकि‍ जाइत अछि‍, तहि‍ना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसकि‍ गेल। जेना सब कुछ मनक हरा गेलै। शून्न भऽ गेलै। ने आगूक बाट सूझै आ ने पाछुक। मरनीसँ आगू की पूछब से मनमे रहबे ने केलै। साहस बटोरि‍ पुछलक- भरि‍ दि‍नमे कते रूपैया कमाइ छी?‍” ठीकेदारक प्रश्‍न सुनि‍ मरनीक मोनमे झड़क उठलै। बाजलि‍- “कते कमाएब! जेहने बैमान सरकार अछि‍ तेहने ओकर मनसी छै। चारि‍ दि‍न एकटा पजेबाक ढेरी फोड़ै छी तँ तीन-बीस रूपैया दैए। आइसँ तीन तूरक पेट भरत? भरि‍ दि‍न ईंटा फोड़ैत-फोड़ैत देह-हाथ दुखाइत रहैए मुदा एकटा गोटि‍यो कीनब से पाइ नै बॅचैए।‍” लेखक कथाक नि‍ष्‍कर्ष बड्ड संक्षेपमे करैत छथि‍ : ठीकेदारक आँखि‍मे नोर आबि‍ गेलै। मनुष्‍यता जागि‍ गेलै। मुदा ई मनुष्‍यता कते काल जि‍नगीमे अँटकतै? जि‍नगी तँ उनटल छै। जाहि‍मे मनुष्‍यता नामक कोनो दरस नहि‍ छैक। हारि‍-जीत कथा Internal innovation केर संदेश दैत अछि‍। एकटा कुम्‍हारक परि‍वार जकर गाम कोसीक बाढ़ि‍सँ कोसीमे धँसि‍ जाइत छैक। अपन जरूरी समान लऽ अन्‍तहीन दि‍शा ि‍दस बढ़ैत अछि‍। रस्‍तामे लछमीपुरक एक बटोही भेट जाइत छै। लछमीपुरमे कुम्‍हार नै रहैत छैक। सोमन ओही गाममे बैस जाइत अछि‍ धंधा चलि‍ पड़ैत छैक। लेखककेँ वि‍शेषता ई जे कुम्‍हारक चाकसँ सम्‍बन्‍धि‍त तमाम प्रक्रि‍याक बनाएल समाग्रीक सेहो पैघ फेररि‍हत प्रस्‍तुत करैत छथि‍। लागत जेना कुनो कुम्‍हार अपन वि‍वरण प्रस्‍तुत कऽ रहल अछि‍। खएर : कथा आगाँ बढ़ैत छैक कुम्‍हारक एक छोट बेटा मेलामे हेरा जाइत छैक। बादमे नै भेटैत छैक। स्‍टील आ आन तरहक वर्त्तन अएलाक कारणे परम्‍परागत वर्तन केर मांग खत्‍म भऽ जाइत छैक। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे दुनू प्राणी इहो गाम छोड़बाक प्रण करैत अछि‍। सभ ब्‍यौंत कऽ लैत अछि‍। ठीक ओही समएमे बि‍छुरल बेटा जवान भऽ आबि‍ जाइत छैक। समएक अनुसारे ओ नव-नव चीज बनाएब सीख आएल छैक। तँए पुन: कुम्‍हारक धंधा चलि‍ जाइत छैक। लेखक कथाक अन्‍तमे शायद ई कहबाक प्रयास केलन्‍हि‍ अछि‍ जे परम्‍पराकेँ नूतन परि‍प्रेक्ष्‍यमे अपने-आपकेँ मि‍लान कऽ कऽ चलक चाही। अगर समय अनुसरे परंपरा में परिवर्तन आनब त परंपरा कहिओ नहि मरत। कुनो बस्तुक उपाय जरुरी भागने कही कल्याण संभव छैक? ठेलाबला कथा एक सिद्धान्‍तक जन्‍म दैत अछि‍। भोला नौकरीक तलाशमे कलकत्ता जाइत अछि‍। ओतय ठेला चलबए लगैत अछि‍। दूटा बेटा गामपर छैक तकरा कष्टों काटि‍ पढ़बैत अछि‍। मैट्रि‍क पास केलाक बाद दुनू भाँइ के अपन पीटक पारिस्थितिक आभाष होइत छैक। पैसाक तंगीक कारण आगाँ नै पढ़ि‍ पबैत छैक, परन्‍तु गामक स्‍कूलमे शि‍क्षा-मि‍त्रक नौकरी दुनू भाँइकेँ लागि‍ जाइत छैक। जखन भोलाकेँ दुनू पुत्र हुनका पत्र लीख कऽ कहैत छन्‍हि‍ जे आब गाम आबि‍ जाऊ तँ भोला गाम आबि‍ जाइत छथि‍। बेटाक पत्र पढ़लाक बाद भोलाक मनोदशाक चि‍त्रण बड्ड मार्मिक लगैत अछि‍ : “समाजसँ नि‍कलि‍ छातीपर ठेला घीचि‍, दूटा शि‍क्षक समाजकेँ देलि‍ऐक, की ओहि‍ समाजक आरो ऋृण बाकी छैक?” ए कथ्य अपना आप में अभूत किछु छैक! जीवि‍का कथाक माध्‍यमसँ परम्‍परासँ जुड़ल मानक परि‍वेशसँ सि‍नेह, परि‍वारक दायि‍त्‍वक ि‍नर्वाह करक संदेश देल गेल अछि‍। लोक शहरीकरणक नकलमे अपन अहि‍तत्‍वक आ संस्‍कार कोना समाप्‍त कऽ लैत अछि‍, तकर चि‍त्रण कएल गेल अछि‍। माता-पि‍ताक प्रति‍ दायि‍त्‍वक ि‍नर्वाह केने कोन लाभ भऽ सकैत अछि‍ तकर वर्णन। रि‍क्‍साबला कथा ई संदेश दैत अछि‍ जे सम्‍पति‍ अथवा पैसा आ भोग-वि‍लासक वस्‍तुसँ लोक प्रसन्न नै रहि‍ सकैत अछि‍। प्रसन्न रहबाक लेल आत्‍मसंतोष भेनाइ जरूरी। कथाक रचना प्रभावकारी आ उद्देश्‍यपूर्ण। पात्रकेँ कथा आदि‍सँ अंत धरि‍ अपनामे सराबोर केने रहैत अछि‍। मि‍थि‍लामे डोका, सि‍तुआ कि‍ंवा खूरचन आदि‍सँ चून बनेबाक प्रथा प्राचीन छल। ऐ कार्यक सम्‍पादन करैत छलीह मल्‍लाह वर्गक महि‍ला लोकनि‍ आब लगभग ई प्रथा समाप्‍त भऽ गेल। ओकरा बदला लोक आब एक्केठाम बजारसँ चून कीन कऽ लऽ अबैत अछि‍। सुखल चून। जकरा सहजतासँ गील कय वएह मलाह सभ बजारे-बजारे आ घरे-घरे बेचैत अछि‍। एे कथाकेँ पढ़लासँ समाप्‍त प्राय परम्‍परापर दृष्‍टि‍ देबाक एक प्रयास कएल गेल अछि‍। शि‍क्षा आ संस्‍कार अलग-अलग चीज थीक। गामसँ पढ़ इन्‍जि‍ीनीयर बनि‍ गलत-सलत पैसा कमा जतय गामक दू पि‍तयौत भाय अवकाश प्राप्‍त करबाक बाद गाममे रहि‍ फइलसँ मकान बनबए लेल सीमि‍त घरारीमे सँ धुरफन्‍दी कय 10 धूर जमीन ज्‍यादे लेबाक ब्‍यौंतमे लागल छथि‍। डिहक बटबारा कथामे गामक लोक हुनका दुनूकेँ ऐ गलत मंसाकेँ बुझि‍ जाइत अछि‍ आ दुनूसँ पैसा ठकि‍ लैत अछि‍। अंन्‍तत: जमीन दुनूमे बहि‍स्‍सा बराबर बॅटैत अछि‍। ने ककरो कम आ ने ककरो बेसी। गामक लोकक दृष्‍टि‍मे पढ़ला-लि‍खलाक बादो दुनू इन्‍जि‍नीयर चरि‍त्रहीन आ गामक वातावरणकेँ प्रदुषि‍त केनि‍हार मानल जाइत छथि‍। लेखक ऐ परम्‍पराकेँ मर्मज्ञतासँ उजागर करैत छथि‍। भैयारी कथा शहरी जीवनक चकाचौंधसँ लोककेँ सावधान करैत अछि‍। जे ऐ बातकेँ नहि बुझैत छथि‍ आ अपन परम्परा आ संस्‍कारकेँ नै ध्यान में राकेट गामक जमीन जत्‍था बेच, गामक जड़ि‍ के समाप्त कए जे शहरमे बैस जाइत अछि‍ तकर परि‍णाम नीक नै होइत अछि‍। ई कथा लेखक केर आत्‍मासँ नजदि‍क छन्‍हि‍। बहीन कथाक माध्‍यमसँ मण्‍डलजी कहए चाहैत छथि‍ जे केबल माइयक कोरासँ जन्‍म लेने बहि‍न या माए नै भऽ सकैत अछि‍। एक दि‍स जतऽ अपन बेटी अपना कार्यमे अतेक लीन अछि‍ जे मरनासन्न माएकेँ देखबाले समए नै नि‍कालि‍ पाबि‍ रहल अछि‍ अोतहि‍ दोसरठाम माइयक एक मुसलमान सखी हल्‍ला-फंसाद रहि‍तहुँ राति‍मे चोरा कऽ माएकेँ देखए अबैत अछि‍। ई कथा हि‍न्‍दु-मुसलमानक संग आपसी प्रेमक गंगा-जमुनी प्रवाह कहल जा सकैत अछि‍। मैथि‍लीमे ऐ तरहक कथाक रचना हेवाक चाही। मण्‍डल जीक रचनाक एक वि‍शेषता हमरा जनैत पात्रक नामकरण छन्‍हि‍। हरेक नामक प्रति‍ साकांक्ष रहै छथि‍ आ उद्देश्‍यपूर्ण ढंगसँ नाम रखैत छथि‍। एकर उत्तम उदाहरण थीक एक कथा पीहुआ। पात्रक नाओं पीहुआ कि‍एक पड़लैक तकर वि‍वरण सुनू : “छठि‍यार राति‍, दाइ-माइ पुहुपलाल नामकरण केलखि‍न। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाधमे फानी लगबए लागल। गहींर खेत सभमे सि‍ल्‍लि‍यो आ पीहुओ आबि‍-आबि‍ धान चभैत। जकरा ओ फानी लगा-लगा फॅसबैत। अपनो खाइत आ बेचबो करैत। कि‍छु दि‍नक बाद स्‍त्रीगण सभ पीहुआबला कहए लगलैक। फेर कि‍छु दि‍नक पछाति‍ भौजाइ सभ पीहुआ कहए लगलैक। तँए पुहुपलाल बदलि‍ पीहुआ भऽ गेल।‍” पछताबा एक एहेन कथा थीक जकरा माध्‍यमसँ ई कहक प्रयास कएल गेल अछि‍ जे आधुनि‍क आ तकनीकि‍ शि‍क्षा प्राप्‍त कए लोक बाहर भागि‍ जाइत अछि‍। बाहर जाए जीवन मशीन भऽ जाइत छैक। रघुनाथ कि‍छु एहने कार्य केलन्‍हि‍। चलि‍ गेलाह अमेरि‍का। मुदा अन्‍तमे अपन गलतीक अनुभव भेलन्‍हि‍ आ अपने-आपकेँ बोनि‍हार-मजदुरसँ नि‍षि‍ह मानए लेल तैय्यार भेलाह- “हमरासँ सइयो गुना ओ नीक छथि‍ जे अपना माथापर घैल उठा मातृभूमि‍क फुलवाड़ीक फूलक गाछ सींचि‍ रहल अछि‍। अपन माए-बाप समाजक संग जि‍नगी बि‍ता रहल छथि‍। आइ जे दुनि‍याँक रूप-रेखा बनि‍ गेल अछि‍ ओ कि‍छु गनल-गूथल लोकक बनि‍ गेल अछि‍। जि‍नगीक अन्‍ति‍म पड़ावमे पहुँचि‍ आइ बुझि‍ रहल छी जे ने हमरा अपन परि‍वार चि‍न्‍हैक बुद्धि‍ भेल आ ने गाम समाजकेँ।‍” डॉ. हेमन्‍त प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करैत छथि‍ ओइ तमाम डाक्‍टर समुदायकेँ जे अपन वि‍धाकेँ मर्यादा बि‍सरि‍ शहरी जीवन जीबैत अछि‍, पैसा कमाइत अछि‍, गाम-घर कि‍ंवा दुर्गम स्‍थानमे जेनाइ जहल जेनाइ कि‍ंवा कालापानीक सजा बुझैत अछि‍। जखन डाॅ. हेमन्त कोसि‍कन्‍हामे बसल बाढ़ि‍सँ प्रभावि‍त गाम जाइत छथि‍ तँ एक बारह वर्षक कि‍शोरी सुलोचना अपन व्‍यवहार आ गामक लोकक सि‍नेह पाबि‍ ओ कृत-कृत भऽ जाइत छथि‍। अभावक सि‍नेह कतेक रमनगर आ सुअदगर भऽ सकैत अछि‍। सुलोचनाक मुँहसँ गाम आ शहरी जीवनक तुलना मि‍रचाइ आ चीनीक कीड़ासँ कए लेखक कहानीमे नव बि‍म्‍वक रचना करैमे सफल होइत छथि‍। कथामे सुलोचना डॉ. हेमन्‍तकेँ कहैत छन्‍हि‍- “हम तँ बच्‍चा छी डाॅक्‍टर सहाएब तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तइयो एकटा बात कहै छी। जहि‍ना चीनी मीठ होइत अछि‍ आ मि‍रचाइ कड़ू। दुनूमे कीड़ा फड़ै छै आ ओइमे जीवन-यापन करैत अछि‍। मुदा चीनीक कीड़ीकेँ जँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाइए तँ एको क्षण नै जीबि‍त रहल। उि‍चतो भेलै। मुदा की मि‍रचाइक कीड़ाकेँ चीनीमे देलाक बाद जीबि‍त रहत? एकदम नहि‍ रहत। तहि‍ना गाम आ बाजारक जि‍नगी होइत।‍” बाबी कथाक माध्‍यमसँ लेखक एक एहेन सामाजि‍क महि‍लासँ परि‍चए करबैत छथि‍ जे ओना तँ अपन नाओं लि‍खऽ नै जनैत छथि‍ परन्‍तु व्‍यवहार आ बुद्धि‍सँ समास्‍त गाममे पूज्या थीकी। गामक लोक कुनो कार्य हुनका पुछने बि‍ना नै करैत अछि‍। बाबी सबहक लेल छथि‍ आ सभ बाबी लेल तत्‍पर। कथाक प्रारम्‍भमे एकटा उपमा खाटी देसी आ औरि‍जनल लगैत अछि‍ काति‍क मासक वर्णन करैत बाबी कहैत छथि‍ जे ई एहेन मास थि‍क जैमे लुंगि‍या मि‍रचाइक घौंदा जकाँ पावनि‍क घौंदा अछि‍। एहेन उपमा हमरा अन्‍यत्र नै भेटल अछि‍। अही कथामे “‍पथि‍यामे दूटा नारि‍यल, पान छीमी केरा, दूटा टाभ नेबो, दूटा दारीम, दूटा ओल, दूटा अड़ुआ, दूटा टौकुना, दूटा सजमनि‍, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक माए आंगन पहुँचि‍ बाबीक आगूमे रखि‍ बाजलि‍- बाबी अपनो डालीले आ हि‍नकोले नेने एलि‍एनि‍हेँ।” ई कथा हि‍न्‍दु-मुसलमानक बीच प्रेम आ सांस्‍कृति‍क एकताक कड़ी थीक। अपन बेटा रहमत जे कि‍ बच्‍चामे बीमार भऽ गेलैक आ बाबी ओकरो लेल छठि‍ मइयासँ कबुला कऽ देलथि‍न्‍ह, तँए ओकर माए बाबीक माध्‍यमसँ पाँच वर्ष धरि‍ नि‍ष्‍ठाक संग छठि‍ मनबैत अछि‍। ओहि‍ना उपास, सभ चीजक पालन, छठि‍क प्रति‍ आस्‍था। बाबी जखन खरनाक खीरक प्रसाद रहमतक माएकेँ दैत छथि‍न्‍ह तँ ओ खुशीसँ नाचि‍ उठैत अछि‍। छठि‍ इमयाकेँ गोर लगैत छन्‍हि‍ आ बेटाकेँ ि‍नरोग जि‍नगी जीबैक आशा सेहो लगा लैत अछि‍। कामि‍नी कथामे कामि‍नीक पि‍ता भैयाकाका कामि‍नीक वि‍वाहमे पाँच लाख टाका खर्च केलाक बादो ऐ बातकेँ स्‍वीकारैत छथि‍ जे ओ कंंजुसाइ केलन्‍हि‍। कि‍एक? तँ हुनका दस बीघा जमीन आ अन्‍य सम्‍पति‍। कामि‍नी तीन भाए-बहि‍न माने दू भाँइ आ एक बहिन। खेतक मात्र कीमत अस्‍सी लाख! तै हि‍साबे कामि‍नीक हि‍स्‍सा 25 लाख टाकासँ बेसी होमाक चाही मुदा खर्च भेलन्‍हि‍ पाँच लाख। ओ इहो मानैत छथि‍ जे हि‍नका लेल जेहने बेटा तेहने बेटी। तँए जखन कामि‍नीक पति‍ दोसर पत्नी आनि‍ लैत छथि‍ आ कामि‍नीक प्रति‍ हुनकर सौति‍न आ पति‍ कि‍छु प्‍लान बनबए लगैत छथि‍ तँ कामि‍नी अप्‍पन दूटा बच्‍चाकेँ लऽ सोझे गाम आबि‍ जाइत छथि‍। सभ कथा प्रभावोत्‍पादक आ शि‍क्षाप्रद लागत। मण्‍डल जी लोक वि‍धा अथवा फाॅकलाेर केर नीक ज्ञाता छथि‍। गाम-घरक परि‍वेशक ठेठ उदाहरण, उपमा, कहावत, इत्‍यादि‍क समावेश देखब तँ मोन तीरपीत-तीरपीत भऽ जाएत। रौदीक वर्णन देखू : “जे मूस अगहनमे अंग्रेजी बाजा बजा-बजा सत-सतटा वि‍आह करैत छल ओ या तँ बि‍लमे मरि‍ गेल वा कतऽ पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि‍।‍” “डोमनक मनमे आशा रहए जे जहि‍ना लुल्हि‍यो कनि‍याँ बेटा जनमा कऽ गि‍रथाइन बनि‍ जाइत, तहि‍ना तँ पानि‍ भेने परति‍यो खेत हएत कि‍ने।‍” पीरारक फड़क वर्णन करैत मण्‍डलजी लीखै छथि‍- सहतक कोथी जेकाँ चोखगर काँट, डारि‍ रूपी पहरूदारकेँ सजौने। छड़गर-छड़गर डाि‍रमे चौरगर-चौरगर पात जेना इन्‍द्रकमल वा तगड़ फूलक होइत। तहि‍ना फूलो। आन उदाहरण जेना “अनकर पहीरि‍ कऽ साज-बाज छीनि‍ लेलक तँ बड़ लाज।‍” “‍गांगाी-जमुनी केश हवामे फहराइत।” “मेघनक दुआरे सतभैंयाँ झँपाएल। जेम्‍हर साफ मेघ रहए ओन्‍हुरका तरेगन हँसैत मुदा जेम्‍हर मेघौन रहए ओम्‍हुरका मलि‍न।‍” सुभाष चन्‍द्र यादव मण्‍डल जीक कथाक बारेमे लि‍खैत छथि‍ : “हुनक कथाक सन्‍दर्भमे जे सर्वाधि‍क उल्‍लेखनीय बात अछि‍ से ई जे हुनक सभ कथामे औपन्‍यासि‍क वि‍स्‍तार अछि‍।‍” परन्तु हमर तँ मानब ई अछि‍ जे हि‍नक कथा अपने-आपमे सम्‍पूर्ण अछि‍ आ अपन सम्‍बाद या नि‍चाेरक सहजतासँ कहि‍ दैत अछि‍। हलांकि‍ पोथीमे कतहुँ-कतहुँ छपबामे गलती सभ भेल अछि‍। जेना कि‍ डाक्‍टर हेमन्‍त कथामे हेमन्‍त केर स्‍थानपर हमन्‍त भऽ गेल अछि‍। मुदा पूरा पाथी अपने-आपमे एकटा उत्तम आ संग्रह योग्‍य वस्‍तु थीक। मैथि‍ली पाठककेँ ऐ तरहक कथाकेँ पढ़बाक आदति‍ लगेबाक चाहि‍एनि। जीवन संघर्ष (पोथी समीक्षा) श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक उपन्‍यास ‍जीवन संघर्ष एक नीक रचना थीक। एहेन रचना अगर मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगातार हो आ अहि‍ तरहक रचनाक प्रचार-प्रसार नीकसँ कुनो जाति-पाति‍, वर्ग, सम्‍प्रदाय, स्‍थानीयता आदि‍क दुर्भावनासँ दूर भऽ कएल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍य महि‍मा-मण्‍डि‍त भऽ एक गौरवशाली परम्‍पराकेँ प्रारम्‍भ कऽ सकैत अछि‍। हम शि‍क्षा, व्‍यवसाय आ स्‍वभावसँ मंथरगति‍क पाठक छी। नीकसँ नीक पोथी चाहे ओ कोनो वि‍षएसँ सम्‍बन्‍धि‍त कि‍याएक नहि‍ हो, हम एक बैसारमे पच्‍चीस पन्नासँ अधि‍क नहि पढ़ि‍ सकैत छी। एक दि‍न अनायास कमप्‍युटरपर बैसबासँ पूर्व इच्‍छा भेल जे जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक अहि‍ रचनाकेँ ऊपर-झापर देखि‍ ली। यएह सोचि‍ पढ़ए लगलहुँ। आ जखन पढ़ए लगलहुँ तँ अतेक मग्‍न भऽ गेलहुँ जे एकहि‍ बैसारमे १०९ पन्नाक एहि‍ पोथीकेँ आदि‍सँ अन्‍त तक पढ़ि‍ गेलहुँ। बुझना गेल जेना कुनो समाजशास्‍त्र किंवा मानवशास्‍त्रक घोर अवलोकनार्थी अपन वि‍धाक ट्रेनिंग लए एक समाजमे रहि‍ सघन सहभागी अवलोकन करैत ओहि‍ समाजक एथनोग्रॉफी लि‍ख रहल होथि‍। अतवे नहि‍ ओ स्‍वयं समाजक सदस्‍य होमाक मादे अगर कुनो समस्‍याकेँ उजागर करैत छथि‍ तँ ओकर समाधानक हेतु इन्‍टरवेन्‍सन सेहो करैमे नहि‍ सकुचाइत छथि‍। आब जखन कि‍ जीवन संघर्ष पोथीकेँ अद्योपान्‍त पढ़ि‍ चूकल छी तँ अनेक तरहक वि‍चार मोनमे हिलोड़ लऽ रहल अछि‍। होइत अछि‍ अगर कुनो कुशार्ग-बुद्धि‍बला शोध वि‍द्याथी भेटत तँ ओकरा उत्‍साहि‍त करबैक जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ रचनाशैली, जीवन-क्रम आ व्‍यक्‍ति‍गत इति‍हास तीनूकेँ समेटैत मैथि‍ली समाजक सन्‍दर्भमे एक समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन करए। हम अहि‍ बातकेँ नीक जकाँ बुझैत छी जे हमर एहि‍ तरहक टि‍प्‍पणीसँ कि‍छु आलोचक आ मैथि‍ली साहि‍त्‍य केर सुयोग्‍य वि‍द्वान लोकनि‍ वि‍फरि‍ जेताह आ हम्‍मरा इम्‍मेचीओर आ कि‍छु आनो तरहक उपमासँ बजेताह। मुदा हम ई बात बि‍ना कारणे नहि‍ कहि‍ रहल छी। मण्‍डलजी अहि‍ उपन्‍यासक प्रारंभ बँसपुरा गामक परि‍प्रेक्ष्‍यसँ करैत छथि‍। बॅसपुरा गामक एक नव वि‍आहल अट्ठारह-बीस बर्खक लड़की जे मात्र तीनि‍ये मास सासुरसँ बसल छलि‍ गामसँ एक कोस दूर बसल सि‍सौनीमे दुर्गापूजाक मेला देखए गेल छलि‍। ओतए ओहि‍ लड़कीकेँ पूजा कमि‍टीक तीन गोटे फुसला कऽ भंडार घर लऽ गेल। मेला- गनगनाइत। नाच-तमाशाक लाउड-स्‍पीकर चरि‍ कोसीक नीन उड़ौने। तीनू गोटे ओहि‍ लड़कीक संग दुरबेवहार केलक। बेवस भऽ ओ लड़की सभ कि‍छु बरदास केलक। चारि‍ बजे भोर ओकरा सभ छोड़ि‍ देलक। मेला भरि‍ ओ कि‍छु नहि‍ बाजलि‍। मुँह-कान झाँपि‍ मेलासँ नि‍कलि‍ सोझे गामक रस्‍ता धेलक। गामक सीमापर पहुँचतहि‍ छाती चहकि‍ गेलइ। छाती चहकि‍तहि‍ हबो-ढकार भऽ कानए लागलि‍। भि‍नसुरका कानब सुनि‍ एक्के-दुइये गामक लोक घर-आंगनसँ नि‍कलि‍ रास्‍तापर आबि‍-आबि‍ देखए लगल। टोल प्रवेश करि‍तहि‍ एका-एकी लोक पूछए लगलै। कानि‍-कानि‍ अपन बीतल घटना सुनबए लागलि‍। बि‍ना कि‍छु पुछनहि‍ माए, बेटीकेँ कनैत देखि‍, छाती पीटि‍-पीटि‍ कनवो करए आ दुनू हाथे पँजि‍या कऽ पुछलक- “की भेलौ, हम माए छि‍यौ, हमरा ने कहमे ते केकरा कहवीही।‍” जेना-जेना माए बेटीक मुँहक बात सुनैत तेना-तेना देहमे आगि‍ सुनगए लगलै। सुनैत-सुनैत बमकि‍ कऽ पति‍केँ कहलक - “जहि‍ना हमर बेटीक इज्‍जत सि‍सौनीबला लुटलक तहि‍ना सि‍सौनीक दुर्गास्‍थानमे मनुक्‍खक बलि‍ पड़त।‍” फेर की छल! समस्‍त बॅसपुराक लोकमे प्रति‍शोधक ज्‍वाला धधकए लागल। सि‍सौनी गाममे आक्रमण कए कचरमवद्ध करबाक प्‍लान बनए लागल। मुदा उपन्‍यासकारक सोझरल मोन देखू। जखन समस्‍त गामक लोक कचरमबध करबाक योजनाकेँ लगभग ध्‍वनि‍मतसँ स्‍वीकृति‍ दऽ देने छल ताहि‍ काल गाममे एक-आध एहेन व्‍यक्‍ति‍क प्रवेश होइत अछि‍ जे दुनू गामक बीच सामंजस्‍य स्‍थापि‍त करैत छथि‍। गामक सभसँ बुजुर्ग- मनधन बाबाक प्रवेश लोकक भीड़केँ एक दोसर दि‍शामे लऽ जाइत छैक। परम्‍परागत मि‍थि‍ला समाजमे आइयोक समएमे बुढ़-पुरान आ अनुभवी लोकक बड्ड सम्‍मान छैक। एकर प्रमाण अहि‍ सन्‍दर्भसँ भेटैत अछि‍ जे जखन मनधन बाबा लोककेँ दुनू गाममे झगड़ा नहि‍ करबाक अपन वि‍चार दैत छथि‍न्‍ह ताहि‍खन बेटीक इज्‍जतक बदला लेबाक लेल बदलाक आगि‍मे जड़ैत ओहि‍ लड़कीक माए पवि‍त्री सेहो मानि‍ जाइत अछि‍। पवि‍त्री बोम फाड़ि‍ कानैत कहैत छैक- “बाबा, ई तँ गामक मेह छथि‍न तँए हि‍नकर बात मानि‍ लेलि‍एनि‍। नै तँ आइ सि‍सौनीमे आगि‍ लगौने बि‍ना छोड़ि‍ति‍ऐ। जखैनसँ बेटी आइलि‍ तखैनसँ एक्को बेरि‍ मुँह उठा नइ तकैए। कनैत-कनैत दुनू आँखि‍ डोका जकाँ भऽ गेलै। सदि‍खन एक्केटा रट लगौने अछि‍ जे जीवि‍ये कऽ की हएत? जखन इज्‍जत चलि‍ये गेल तखैन कोन मुँह समाजकेँ देखाएब।‍” कल्‍पना करू एक माए केर आवेश आ वेदनाकेँ ! आ ओहि‍ समाज आ गामकेँ जकर ब्‍याहल जवान लड़कीक इज्‍जतक संग कुनो पड़ोसी गामक लफन्‍दर सभ मि‍लि‍ खेलबार केने होइक!! सभ लड़-मरऽक लेल अमादा!! मुदा एक अनुभवी बुजुर्गक प्रति‍ गामक लोकक आश्‍चर्यजनक सम्‍मान। जकरा कारण अपन खूनक घूँघट पीबि‍ सभ शान्‍त भऽ जाइत अछि‍। एक नव वातावरणक संचार होमए लगैत अछि‍। लेखक अहि‍ कार्यकेँ एक मांजल साहि‍त्‍यकार जकाँ उत्तम ढंगसँ करैत छथि‍। उपन्‍यासक समस्‍त क्रि‍या-कलाप बॅसपुरा गामक इर्द-गीर्द घुमैत समस्‍त मि‍थि‍ला समाजक समस्‍याक चि‍त्रण करए लगैत अछि‍- लोकक पलायण केर समस्‍या, सरकारी मदति‍ आ कार्यक्रमकेँ ठीकसँ नहि‍ पहुँचबाक समस्‍या, मल्‍लाह-पोखरि‍ (जलकर) आ सोसाइटीक समस्‍या, कि‍सान बोनि‍हारक समस्‍या, कोशीक कहरक समस्‍या, एक वि‍धवा जकर पति‍ कमे वएसमे मरि‍ जाइत छैक, बेटी ब्‍याहलि‍ छैक आ बेटा नौकरी करए लेल जे प्रदेश गेलै से तीन बरख धरि‍ गाम नहि‍ अएलैक, तकर समस्‍या, मि‍थि‍लाक वि‍धवा सबहि‍क समस्‍या आ वि‍धवा सबहि‍क सामाजि‍क वैज्ञानि‍क जकाँ वि‍भि‍न्न श्रेणीमे वि‍भक्‍त कए ओहि‍ श्रेणी सबहक समस्‍या, कोशी नदीकेँ कटाब कोना बॅसपुरा गामक लोककेँ मातृभूमि‍ केर परि‍भाषासँ दूर करैत अछि‍ तकर समस्‍या, एक कुमहार आ ओकर सपनाकेँ सही अर्थमे साकार करबाक समस्‍या, दू-गामक लोकक बीच उपद्रवी तत्‍व द्वारा समस्‍या उत्‍पन्न करब आ गामक समझदार लेल अथक प्रयास करबाक समस्‍या, आदि‍-आदि‍। एना बुझाएत जे बॅसपुरा गाम उपन्‍यासकार, जगदीश प्रसाद मण्‍डल जीक प्रयास द्वारा एकटा मि‍नि‍एचर मि‍थि‍ला बनि‍ गेल अछि‍। पोथीक एक-एक पांति‍-पोथि‍क नामकरण – जीबन संघर्ष – केँ सटीक प्रमाणि‍त करैत आगाँ बढ़ैत अछि‍। पाठक उपन्‍यासक संग जीवनसँ संघर्ष करए लागैत अछि‍ : हँसैत, बाजैत, जुझैत, कानैत आ फेर उपन्‍यासकारक प्रयाससँ नव उत्‍साह आ नव चेतना पाबि‍ जीवनकेँ पुन: सार्थक सि‍द्ध करबाक योजनामे संलग्‍न होमऽ लगैत अछि‍। मण्‍डलजी भेरचाल चलऽ बला उपन्‍यासकार आ साहि‍त्‍यकारसँ हटि‍ अपन स्‍वतन्‍त्र अस्‍ति‍त्‍व बनबैत एक दि‍स तँ समस्‍याक वर्णन करैत छथि‍ आ दोसर दि‍स समस्‍यासँ घबराइत नहि‍ छथि‍। कुनो वैमनस्‍यता किंवा बदलाक भावनासँ ग्रसि‍त नहि‍ छथि‍। समस्‍याक नि‍दान जे कि‍ यथार्थवादी नि‍दान सेहो प्रस्‍तुत करैत छथि‍। आ उपन्‍यास बि‍ना कुनो अवरोधकेँ आगाँ बढ़ल जाइत अछि‍। रमेसरा दि‍ल्‍लीसँ वापस आबि‍ आब गामेमे अनेक तरहक समानक दोकान खोलने अछि‍। समानमे लोहा आ लकड़ी दुनू वस्‍तु छैक : “‍हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्कू, सरौत, छोलनीक संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम.......।” दि‍ल्‍लीमे जे लोक जत्‍थाक जत्‍थामे मजदूरी करए अबैत अछि‍ तकरा बारेमे ओकर वि‍चार बड़ा सटीक छैक : “‍ि‍दल्‍ली सेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेडि‍यो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछाही कटए लगल। गामपर ककरो कहवो ने केलि‍ऐ आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क-बरही ऐठाम नौकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपया महि‍ना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटी तँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ एलौं। जहि‍या सुनलि‍ऐ जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पाँच हजारक समान अछि‍। कोनो की सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझि‍ पड़ै छौ जे दि‍ल्‍लीमे हुन्‍डी गारल अछि‍। हम एक्के मासमे बुझि‍ गेलि‍ऐ। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछि‍ तखन अनकर तबेदारी कि‍अए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ कि‍अए ने रहब। तू सभ ने अनेक कोठा आ सम्‍पत्ति‍केँ अपन बुझै छीही। मुदा ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लुटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।” माटि‍सँ जुड़ल उपन्‍यासकार मण्‍डलजी रमेसराक माध्‍यमसँ मि‍थि‍लासँ पलायन करैत लोककेँ मि‍थि‍लेमे रहि‍ अल्‍टरनेटि‍व धन्‍धाक उक्ति‍ बता रहल छथि‍। उपन्‍यास आगाँ बढ़ैत अछि‍। डोमक धंधा आ ओकर क्रि‍या-कलापक सजीव वर्णन एहेन जे सोझे गाम चलि‍ जएब। बि‍ना कोनो नोन-मि‍रचाइ लगौने, सहज आ स्‍वभावि‍क। मण्‍डलजी जनसामान्‍यक बात आ परि‍स्‍थि‍ति‍क वर्णन जनवाणीमे करैत छथि‍। समस्‍त उपन्‍यासमे कुनो एहेन शब्‍द नहि‍ भेटत जकर अर्थ एक साक्षर मात्रोकेँ बुझएमे दि‍क्कत हो। एक दि‍स यात्रीजी मि‍थि‍लाक परि‍स्‍थि‍ति‍सँ परेशान होइत जतऽ दि‍ल्‍ली अथवा आनठाम पलायन करबाक वि‍चार दैत स्‍वयं दि‍ल्‍ली चलि‍ जाइत छथि‍ : “आब जँ तू अतए रहवैं/ कहतौ लोक बताह/ तँए हम्‍मर बात मान आ सोझे दि‍ल्‍ली जाह/” कहै छथि‍ ठीक एकर वि‍परीत मण्‍डलजी परि‍स्‍थि‍ति‍सँ सामना करबाक लेल अपन पात्रककेँ ब्‍यौंत बुझबै छथि‍। चाहे ओ मि‍ठाइ बनाबैबला हो, लोहार हो, कुम्‍हार हो, अथवा कि‍यो आर हो। मण्‍डलजी कथनी आ करनीमे सामंजस्‍य रखै छथि‍ आ स्‍वयं गामेपर रहै छथि‍। कहि‍यो चाकरीक खोजमे मि‍थि‍लासँ बाहर नहि‍ गेलाह। उपन्‍यास आगाँ बढ़ैत अछि‍। भगता जहल कि‍एक गेल रहै तकर वर्णन शायद समाजक अन्‍ध व्‍यवस्‍थापर प्रहार थीक। केना ओ एकटा कलकतामे नोकरी करनि‍हारक घरबालीक संग मध्यरात्रिमे गलत कार्य करबाक कोशि‍श केलक आ भण्‍डा-फोरी भऽ गेलै, तकर नीक वर्णन पोथीमे भेटैत अछि‍। पोथीमे जखन जोगि‍नदर अपन ग्रह ठीक करबाक लेल वि‍वि‍ध रूपेँ दान पूण्‍य करबाक वि‍चार करैत अछि‍ तँ मंगलसँ बात करैत मसोमात सभकेँ मदति‍ करबाक हेतु तैयार भऽ जाइत अछि‍। अतय सेहो मण्‍डलजी सरकारी सुवि‍धा आ मसोमातपर मंगलक मुँहसँ समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍पर प्रहार करैत लि‍खैत छथि‍- “अपना ऐठाम दू तरहक मसोमात अछि‍, एक तरहक सरकारी अछि‍ आ दोसर तरहक समाजक अछि‍। सरकारी मसोमात ओ छी जे सरकारक देल सभ सुवि‍धा पबैत अछि‍। आ समाजि‍क वि‍धवा ओ छी जेकरा ने सरकार जनै छै आ ने ओ सरकारकेँ जनैत अछि‍। कि‍छु गनल सरकारी मसोमात अछि‍ जे ओकर पोसुआ छी। जे कोनो सरकारी सुवि‍धा मसोमात सबहक लेल औत ओ ओकरे भेटतैक। अजीब खेल सरकारो आ मसोमातोक अछि‍। ओहि‍ पोसुआ मसोमातकेँ इन्‍दि‍रो आवासक घरो छै आ बाढ़ि‍-बरखामे घरखस्‍सीक रूपैआ सेहो भेटतै आ बाढ़ि‍सँ क्षति‍ फसलक क्षति‍पूर्तिक रूपैआ सेहो ओकरे भेटतै। ततबे नहि‍, वृद्धावस्‍था पेंशन सेहो ओकरे भेटतै आ रोजगार चलबैक नामपर सबसीडी सेहो भेटतै। तेँ सरकारी मसोमात छोड़ि‍ जे नि‍रीह समाजक मसोमात अछि‍, जँ ओकरा जीबैक उपाए भऽ जाए तँ उपाय केनि‍हारकेँ अइसँ बेसी दान-पुनक फल कतऽ भेटतै। धन्‍यवाद ओहि‍ माए-दादीकेँ दी जे सत्तर-अस्‍सी बर्खक बि‍तौलाक बादो जेठक दुपहरि‍या, भादवक झाँट आ माघक शीतलहरीमे, जी-जानसँ मेहनत करैत अछि‍। धन्‍यवाद ओहि‍ अस्‍सी बर्खक मैयाकें दी जे माथपर धान, गहूम, मकैक बोझ लऽ कऽ दुलकी चालि‍मे गीत गुनगुनाइत खेतसँ खरि‍हान अबैत छथि‍।..... तँए पहि‍ने जा कऽ ओहि‍ मैया सभकेँ गोड़ लागि‍ कहि‍हक बाबी, समाजरूपी परि‍वारक अहूँ छी आ हमहूँ छी, तँए कमाइबलाक ई दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍ जे परि‍वारमे बृद्ध आ बच्‍चाक सेवा इमानदारीसँ होय। हम अहाँकेँ मदति‍ सेवाक रूपमे दऽ रहल छी। तखन ओ वेचारी हँसि‍ कऽ असि‍रवाद देथुन।‍” साहि‍त्‍यकेँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍। दर्पण तखन जखन साहि‍त्‍यकार पारखी होथि‍। समाजक संग चलथि‍। सामाजि‍क व्‍यवस्‍थाकेँ समएक संग वि‍वेचना करैथ। साहि‍त्‍य सृजनक धर्मकेँ बुझथि‍। मण्‍डलजी एहि‍ कार्यकेँ इमानदारीपूर्वक केलन्‍हि‍ अछि‍। एहि‍ उपन्‍यासकेँ हि‍न्‍दी, अंग्रेजी इत्‍यादि‍ भाषामे अनुवादि‍त कए प्रचार-प्रसार होमाक चाही। ई रचना समाजक दर्पण अछि‍। एक नि‍श्‍चल आ आशावान वि‍चारधाराकेँ प्रतिपादित करैत अछि‍। जगदीश प्रसाद मण्‍डल अपन कृति‍मे Native intelligence केर अभूतपूर्व प्रमाण दैत छथि‍। पुस्‍तक केर साज सज्‍जा, आवरण इत्‍यादि‍ नीक अछि‍। प्रकाशक सेहो धन्‍यवादक पात्र छथि‍। मिथिला चित्रकला (पेटिंग): भूत, वर्त्तमान आ भविष्य परिचय ५००० वर्ष पुरान भारतीय संस्कृति अपन आगामी पीढ़ी के परंपरा, आधुनिकता आ मूल्य प्रणालीक संयोजन सँ युक्‍त दिव्य मस्तिष्क देलक, जे समयक गति , बेर बेर भेल विदेशी हमला आ जनसंख्या मे पैघ वृद्धिक बावजूदो नीक सँ राखल गेल अछि । ई हुनका लोकनि कें विशिष्ट व्यक्‍तित्व देलक । २० वीं सदी अनेको क्षेत्र मे महत्वपूर्ण रहल आ एहि संबंध मे कलाक उल्लेख सेहो कएल जा सकैछ । २०वीं सदी मे बनल गीत, नाचक रूप, साहित्यिक काज आ कलाक काज मे नव अभिव्यक्ति आयल आ ई बात साबित भऽ गेल जे ई सदी नहि केवल मानवक इतिहास मे महान रहल वरन नव आविष्कार आ तेज नवीकरणक अवधि सेहो रहल । जहन कि कलाक सभ रूप पर्याप्त उपलब्धि प्रदर्शित कयलक, सिनेमा, पॉप म्यूजिक आर टेलीविजन वृत - चित्र एहेन नव कला रूप सेहो आविष्कृत आ लोक- प्रिय भेल । मिथिला चित्रकला (पेंटिंग ) जे मधुबनी चित्रकला (पेंटिंग) क रूप मे सेहो जानल जाईत अछि । मूल रूप सँ एहि क्षेत्रक सभ जाति आ समुदायक महिला द्वारा बनाओय जाइत अछि । एहि देशक महिला अति प्राचीन समय सँ विभिन्न रूपक रचनात्मकता मे स्वयं के संलग्न रखलनि । हुनक रचनात्मकताक सभ सँ नीक चीज प्रकृति, संस्कृति आ मानव मनोवृतिक बीच सम्बंध आछि । ओ ओही सामग्रीक उपयोग केलनि जे हुनका लग पास मे पर्याप्त मात्रा मे उपलब्ध छल । लोक चित्रकला आ कलाक आन रूपक माध्यम सँ ओ अपन इच्छा, सपना, आकांक्षा के व्यक्‍त कलनि आ अपन मनोरंजन सेहो केलनि । इ समानान्तर साक्षरता थिक, जेकरा द्वारा ओ लोकनि अपन सौंदर्यविषयक अभिव्यक्ति के व्यक्त केलनि । हुनक रचनात्मक कला स्वयं मे लिखनाईक शैली मानल जा सकैत अछि, जेकरा द्वारा हुनक भावना, आकांक्षा, वैचारिक स्वतंत्रता आदिक अभिव्यक्ति होइत अछि । हुनक पृष्ठभूमि, प्रेरणा, आशा, सौंदर्य विषयक सजगता, संस्कृति ज्ञान आदि हुनक सभ संभव कला मे व्यक्‍त भेल । हुनक कलाक विषय मे लिखबा आ गप्प करबा सँ पहिने हुनक आंतरिक संस्कृतिक स्तर आ सिखबाक तरीकाक विषय मे जानब आवश्‍यक अछि । ई आलेख महिला के केन्द्र बिन्दु मे राखि कें लिखल गेल अछि । एहि देशक कोनो क्षेत्र महिला रचनात्मकता सँ फ़राक नहि अछि । हम पंजाब मे फ़ुलकारी, गुजरात मे वारली, लखनऊ मे चिकन कशीदाकारी, उत्तर मे बुनाई, बंगाल मे कंथा, राजस्थान मे लघु चित्रकला, बिहारक मिथिला क्षेत्र मे सुजनी आ केथरीक रूप मे मिथिला चित्रकला (पेंटिंग) क उदाहरण देखैत छी । मिथिला पेंटिंग एहि क्षेत्रक महिला लोकनिक जीवंत रचनात्मक काज अछि । ई मुख्यत: मिथिलाक ग्रामीण महिला द्वारा कागज, कपड़ा, बन- बनायल पोशाक आदि पर चित्रित कएल गेल प्रसिद्ध लोकचित्र अछि । मूलत: ई मुसलमान सहित सभ जाति आ समुदायक महिला द्वारा प्राकृतिक रंग सँ देबार आ सतह पर बनाओल गेल लोकचित्र थिक । बाद मे किछ लोक एहि मे रूचि लेलनि आ महिला लोकनि के अपना कला कें देबार आ सतहक अलावा कैनवास पर उतारबाक प्रेरणा देलनि आ एहि रूप मे एहि कला कें कला जगत मे आ बाजार मे पहचान भेटलैक । एहि लोक कलाक अपन इतिहास, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, महिलाक एकाधिकार आ विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान अछि । मिथिला कतय अछि ? एहि भूमिक सांस्कृतिक अ ऐतिहासिक महत्व की अछि ? इ कला मिथिला मे विशेष रूपें किएक अछि ? एहि कला रूपक विषय मे किछु लिखबा सँ पहिने एहि प्रश्‍न समक उत्तर अपेक्षित अछि । भारतक पैघ शहर आ आधुनिक दुनिया सँ दूर एक सुंदर क्षेत्र अछि जे कहियो मिथिलाक रूप मे जानल जाईत छल । ई पूर्वी भारत मे स्थापित पहिल राज्य छल । ई क्षेत्र उत्तर मे नेपाल, दक्षिण मे गंगा, पश्‍चिम मे गंडक आ पूब मे बंगाल धरि पसरल मैदानी भाग अछि । वर्तमान बिहारक चंपारण, सहरसा मुजफ़्फ़रपुर, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सुपौल, समस्तीपुर, मुँगेर, बेगूसराय, भागलपुर आ पूर्णियाँ जिलाक भाग मिथिला अछि । ई पूर्णत: समतल अछि । एकर माटि दोमट अछि जे गंगा नदी द्वारा आनल गेल अछि । यदि मानसून मे विलंब भेल या कम वर्षा भेल तँ फ़सल मे रूकावट अबैत अछि । लेकिन यदि पानिक देवताक कृपा भेल तँ पूरा मैदन हरियरे हरियर रहैत अछि । मधुबनी पेंटिंगक हृदय स्थली अछि । एहि क्षेत्रक सघन हरियाली प्राचीन दर्शक लोकनि कें ततेक आकर्षित कयलक जे ओ एहि क्षेत्र के मधुबनी (मधुक जंगल ) कहलनि । आब इ जिला पेंटिंगक लेल सब सँ बेसी जानल जाइत अछि । एहि पौराणिक क्षेत्र मे राम (अयोध्याक राजकुमार आ विष्णुक अवतार) सीता सँ वियाह केलनि । सीताक जन्म हुनक पिता जनक द्वारा हर (हल) जोतबाक समय भेल । मिथिला ओ पवित्र भूमि अछि जतय बौद्ध धर्म आ जैन धर्मक संस्थापक आ संस्कृत शिक्षाक छह परंपरागत शाखाक विद्वान जेना कि याज्ञवल्क्य, वृद्ध वाचस्पति, अयाची मिश्र, शंकर मिश्र, गौतम, कपिल, सचल मिश्र, कुारिल भट्ट आ मंडन मिश्रक जन्म भेलनि । १४ वीं सदीक वैष्णव कवि विद्यापतिक जन्म मिथिला मे भेल जे अपन पदावलीक माध्यम सँ एहि क्षेत्र मे राधा आ कृष्णक बीचक संबंधक व्याख्या करैत प्रेम गीतक नव रूप के अमर बना देलनि । इएह कारण अछि जे लोक हुनका जयदेवक पुनर्जन्म रूप मे (अभिनव जयदेव ) स्मरण रखलक । कर्णप्योर (बंगालक एकटा शास्त्रीय संस्कृत कवि) अपन प्रसिद्ध भक्‍तिमय महाकाव्य "पारिजात हरण" मे मिथिलाक लोकक विद्वताक चित्रण केलनि । कृष्ण अमरावती सँ द्वारका जेबाक मार्ग मे एहि भूमिक ऊपर सँ उड़ैत काल सत्यभामा सँ कहलनि, "कमलनयनी ! देखू ई मिथिला थिक, जतय सीताक जन्म भेल । एतय विद्वान लोकनिक जीह पर सरस्वती सगर्व नचैत छथि (मिश्र, कैलाश कुमार २००० ) " । मिथिला एकटा अद्‍भुत क्षेत्र अछि जतए कला आ विद्वता, लौकिक आ वैदिक व्यवहार दुनू पूर्ण सौहार्द्र सहित संग संग चलैत अछि । पृष्ठभूमि भारतक विविधता जेकाँ एकर लोक कला एहि देशक बहुविध संस्कृति के विभिन्न रंग द्वारा प्रदर्शित करैत अछि । ई कला (पेंटिंग) लोक कलाक समुद्रक रूप मे मानल जाइत अछि, जाहि मे प्राचीने समय सँ लोकप्रिय कला रचना भारतीय उपमहाद्वीपक हर भाग सँ अबैत रहल । भारतक कला मध्य मिथिला पेंटिंगक अपन महत्वपूर्ण स्थान अछि । मिथिला मे महिला देबार, सतह, चलायमान वस्तु आ कैन्वस पर पेंटिंग करैत छथि, माटि सँ देवता, देवी] जानवर आ पौराणिक पात्रक प्रतिमा बनबैत छथि; सिक्‍की घास सँ टोकरी, छोट- छोट वरतन और खिलौना बनबैत छथि, केथरी आ सुजनी बनेबाक रूप मे कशीदाक काज करैत छथि, वभिन्न तरहक धार्मिक आ काजक चीज बनबैत छथि । ई कलाक काज महिला द्वारा दैनिक काजक रूप मे कएल जाइत अछि, जे हुनका पूर्ण रचनात्मक व्यक्ति, एकटा गायक, मूर्तिकार, चित्रकार , कशीदाकार आ सभ किछु बनबैत अछि । पीढ़ी दर पीढ़ी मिथिलाक महिला विभिन्न विशिष्ट पेंटिंग बनेलनि अछि । चर्चा मिथिला मे सामान्यतया पेंटिंग महिला द्वारा तीन रूप मे कएल जाइत अछि : सतह पर पेंटिंग, देबार पर पेंटिंग आ चलायमान वस्तु पर पेंटिंग । प्रथम श्रेणी मे अरिपन अबैत अछि जे सतह पर अरबा चाऊर (कच्चा चावल) क लई सँ बनायल जाईत अछि । सतहक अलावा एकरा केरा आ मैना पात आ पीढ़ी पर सेहो बनाओल जाइत अछि । एकरा दहिना हाथक आँगुरक प्रयोग सँ बनाओल जाइत अछि । तुसारी पूजा (कुमारि लडकी द्वारा नीक पतिक कामना सँ शिव और गौरी के प्रसन्न करबाक लेल त्योहार) क अरियन उज्जर, पीयर आ लाल रंगक चाऊरक चूर्ण सँ बनाओल जाइत अछि । विभिन्न अवसरक लेल विभिन्न तरह क अरिपन होईत अछि । अष्टदल, सर्वतोभद्र दशयत आ स्वास्तिक एकर मुख्य प्रकार अछि । देबार परहक पेंटिग अनेको रंगक होईत अछि । एहि मे मुख्यत: तीन सँ चारि रंगक प्रयोग होईत अछि । एहि मे नयना जोगिन, पुरैन, माँछक भार, दही, कटहर, आम, अनार आदिक गाछ आ चिड़ै जेना सुग्गाक चित्र बनाओल जाइछ । चलायमान वस्तु पर पेंटिंग मे शामिल अछि माटिक बरतन, हाथी, साभा- चकेबा, राजा सलहेस, बाँसक आकृति, चटाई, पंखा आ सिक्‍की सँ बनल वस्तु । एहि मे सँ कतेक पेंटिंग तांत्रिक महत्वक अछि । विवाह समारोहक दौरान किछु अवैदिक प्रथाक सेहो पालन सिर्फ़ महिला द्वारा कएल जाइत अछि जेना ठक- बक, नयना- जोगिन आदि, जे मिथिला तंत्र सँ संबंधित अछि । देवार परहक पेंटिंग आ सतह परहक पेंटिंग जे घर के सुन्दर बनेबाक लेल आ धार्मिक उद्देश्‍य सँ कएल जाईत अछि, महाकाव्य युग सँ चलि रहल अछि । तुलसीदास अपन महान काव्य रामचरितमानस मे सीता आ रामक वियाहक अवसर पर कएल गेल मिथिला पेंटिंंगक वर्णन केलनि अछि । राम आ सीतक सुंदर जोड़ी सँ प्रभावित भऽ कऽ गौरी वियाहक समारोह मे भाग लेलनि आ कोहबरक चित्रण करय चाहलनि जतय सुमंगलीक कें एहि आदर्श जोड़ीक लेल गीत आ संबंधित विध व्यवहार करक छलनि । एहि चित्रण मे परंपरागत चित्र, हिन्दू देवी- देवताक चित्र आ स्थानीय जीव-जन्तु आ वनस्पतिक चित्र बनाओल जाइत अछि । महिला कलाकार एहि कलाक एकमात्र अभिरक्षक छथि, जे ई चित्रण करैत छथि आ पीढ़ी दर पीढ़ी ई माय सँ बेटी के हस्तांतरित भऽ जाइत अछि । ओ एहि कला रूप कें प्राचीन समय सँ बचा कें रखने छथि । लड़की ब्रश आ रंग सँ नेने सँ काज करब शुरू करैत छथि जेकर पराकाष्ठा कोहवर में देखल जा सकैछ । वियाह सँ संबंधित सभ धार्मिक समारोह कोहबर मे होइत अछि । अहिवातक पातिल के चारि दिन लगातार जरा कऽ राखल जाइत अछि । मिथिला पेंटिंग (मधुबनी पेंटिंग) क वर्तमान रूप देबार पेंटिंग, सतह पेंटिंग केर कागज आ कैंपस पर रूपांतरण थिक । ई प्रयोग बहुत पुरान नहि अछि । २०वीं सदीक साठिक दशक मे भयंकर अकालक चुनौती कें सामना करक लेल महिलाक लेल काजक अवसर निमित्त किछु महिला लोकनि देबार आ सतह परहक अपन कला कें कागज या कैनवस पर उतारब शुरू केलनि । प्रारंभ मे एकरा देखवला कम लोक छल परन्तु बाद मे एहि मे वृद्धि भेल । एहि काज मे महिला लोकनि कें खूब सफ़लता भेटल आ व्यवसायक एकटा नव मार्ग खूजल । ताहि समय सँ पेंटिंग मे विविधता आएल अछि । देबार पेंटिंग के हाथ सँ बनल कागज पर हस्तांतरित कएल गेल आ धीरे- धीरे ई आन स्थान यथा ग्रीटिंग कार्ड, ड्रेस, सनमाइका आदि पर सेहो उतरल । नीक चित्रांकन, चमकदार स्वदेशी रंग, सभ संभव स्वदेशी प्रयोग आदि सँ पूरा दुनियाक दर्शक आकर्षित भेलाह । प्रारंभ मे किछु ब्राह्मण महिला कें एहि कला कर्मक अवसर देल गेल परन्तु १० वर्षक बाद किछु कार्यस्थ महिला एक नव रीतिक संग एहि क्षेत्र मे एलीह । एखन धरि हरिजन महिला एहि क्षेत्र मे नहि आयल छलीह । सीता देवी मिथिला पेंटिंगक ब्राहमण स्टाइल कें आगाँ बढ़ेलीह । एहि मे मुख्यत: कोहबर और देवी देवताक चित्र छल । बौआ देवी आ हुनक बेटी सरिता सेहो एहि क्षेत्र मे अपन पर्याप्त योगदान देलनि । कायस्थ महिला एहि क्षेत्र मे सेहो आगाँ अएलीह आ सतरिक दशक मे हुनक पहचान बनल । ओ लोकनि गाम आ धार्मिक दृश्‍य के पेंटिंग मे स्थान देलनि । गंगा देवी, पुष्पा कुमारी, कर्पूरी देवी, महासुन्दरी देवी आ गोदावरी दत्त प्रमुख कायस्थ महिला कलाकार छलीह । एहि दुनू वर्गक महिला कलाकार लोकनिक प्रयास सँ मिथिला कला कें मूर्त रूप भेटल । तेसर समूह हरिजन महिला १९८० क दशक मे आगाँ अयलीह । दुसाध आ चमार जातिक महिला लोकनि परंपरागत पेंटिंग क प्रयोग अपन धार्मिक काज आ घर-वार सजेबाक लेल करैत छलीह । ओ लोकनि गोदना आ अन्य चमकदार रंगक प्रयोग अपन पेंटिंग मे करय लगलीह । बाद मे एहि मे लाईन, तरंग, वृत आदि सेहो जुड़ि गेल। जमुना देवी आ ललिता देवी प्रसिद्ध हरिजन कलाकार भेलीह । ओ लोकनि पेंटिंग मे दैनिक जीवनक वस्तु जातक सेहो चित्रण करय यगलीह । आब तँ सभ जातिक लोक एहि कलाक उपयोग जीविका अर्जन निमित्त करैत छथि । सभ कलाकर लोकनि रंगक लेल मुखयतया प्रकृति पर निर्भर करैत छथि । ओ लोकनि माटि, छाल, फ़ूल , जामुन सँ कतेको प्राकृतिक रंग निकालैत छथि । रंग मुख्यत: लाल, नीला, हरिहर, कारी, हल्कापीयर, गुलाबी आदि होईत अछि । प्रारंभ मे घर मे बनाओल गेल रंग सँ काज चलैत रहल तथापि एहि विद्य सँ प्राप्त रंगक मात्रा कम होईत छल आ तें महिला लोकनि बाजार मे उपलब्ध रंगक प्रयोग करब सेहो शुरू केलनि । कोहबरक चित्रांकन पौराणिक , लोकगाथा आ तांत्रिक प्रतीक पर आधारित अछि । कोहबरक चित्रण नव जोड़ाक कें आशीषक निमित्त कएल जाईछ । एहि पेंटिंग मे सीताक वियाह या राधा कृष्णक चित्रांकन अछि । शक्‍ति भूमि हेबाक कारणें मिथिला पेंटिंग मे शिव, शक्‍ति, काली, दुर्गा, हनुमान , रावण आदिक चित्रण सेहो भेटैत अछि । उर्वरता आ संपन्नता प्रतीक यथा माछ, सुग्गा, हाथी, काछु, सूरज, चन्द्रमा, बाँस, कमल आदिक चित्रांकन प्रमुखता सँ होइत अछि । एहि पेंटिंग मे देवताक स्थान बीच मे आ हुनक प्रतीक, वनस्पति आदिक स्थान पृष्ठभूमि मे रहैत अछि । वाणिज्यीकरण सँ एहि कला कें नोकसान पहुँचल अछि । महिला आ पुरूष एहि कला के शहर आ नगरक बाजार सँ सीखि रहल छथि । प्रशिक्षण देनिहार स्वयं एहि कलाक तत्व आ सौंदर्य सँ अनभिज्ञ छथि । किछु गोटा तँ रंगक संयोजीकरण, प्रकृति सँ एकर प्राप्ति, पृष्ठभूमिक निर्माण, लय, रंग, गीत, विधि, नृत्य सँ एकर संबंध आ पेंटिंगक ढ़ंग सँ सेहो अपरिचित छथि । पेंटिंगक विषय बा डिजाइन आब अधिकांश मामिला मे खरीददार द्वारा निर्णीत होइत अछि । खरीददार केन्द्रित पहल एहि महान कला रूपक रंग, डिजाइन, मूल, संवेदना आदि पर खतरा अछि । हम देखैत छी जे तांत्रिक पेंटिंगक नाम पर महिला मिथिलाक परंपरा सँ बहुत अलग किछु बनवैत छथि । वाणिज्यिकरण सँ बहुतो पुरूष कलाकार सेहो एहि मे रुचि लेब शुरू केलनि अछि । ओ एहि मे महिलाक महत्व कें बुझने बिना पेंटिंग करैत छथि । ओ मिथिला पेंटिंगक नाम पर खरीदनाहारक जरूरतिक मोताबिक किच्छो पेंटिंग करक लेल तैयार रहैत छथि । लेकिन जहन हम लोक आ परंपरागत पेंटिंगक रूप मे मिथिला पेंटिंगक गप करैत छी , जे धार्मिक अवसर पर बनाओल जाइछ या भारतक कोनो धार्मिक पेंटिंगक गप करैत छी तँ हम देखैत छी जे एहि मे कतेको कार्यकलाप जूड़ल अछि । ई संयोजन वस्तुत: कला कें विशेष महत्व दैत अछि । अवधारणा आ अनुभवक आधार पर देखला सँ सभ स्थानीय, क्षेत्रीय, अखिल भारतीय आ भारत सँ बाहर कलाक अभिव्यक्ति आंतरिक मन सँ उभरैत देखाइत अछि आ जीवनक एकटा अभिन्न अंग अछि । पेंटिंग, गीत, नृत्य, कविता आ आन कार्यात्मक चीज कें पौराणिक कथा, धार्मिक रीति, त्योहार आ संस्कार सँ अलग कऽ कऽ नहि देखल जा सकैत अछि । जहन एकटा पेंटर देबार या सतह कें पेंट करैत रहैत छथि तँ अन्य महिला लोकनि गीत गाबि कऽ हुनका मददि करैत छथिन । लोक कथा सँ लेल गेल ज्ञान सेहो हुनका पेंटिंगक लेल विषय प्रदान करैत अछि । तांत्रिक पेंटिंग वस्तुत: मधुश्रावणीक कथा पर आधारित अछि । आ एहिना पेंटिंग आ आन कलाक संबंध कतेको लोक कला सँ अछि । एकटा महिला जहन देबाल पर चित्रांकन करैत छथि तँ ओ कतहु सँ आर्थिक लाभक आशा नहि करैत छथि । तथापि जहन ओ अपन पेंटिंग के बेचबाक लेल बनबैत छथि तँ हुनक पूरा ध्यान संस्कृति सँ ग्राहक दिस चलि जाईत अछि । तहन ओ परंपरा के जीवित रखबाक लेल पेंटिंग नहि करैत छथि, वरन जीविकाक लेल पेंटिंग करैत छथि । मिथिला सँ जीविकाक निमित्त सतत पलायन सेहो एहि पेंटिंग के बाहर अनलक अछि आ बाजार मे एकरा नव खरीददार भेटलैक अछि । किछु चित्रकार अर्थात कर्पूरी देवी, गंगा देवी आ जमुना देवी अपन खरिददारक जरूरतक अनुसार पहल केलनि अछि । गंगा देवी अपन पेंटिंग मे रामायण चित्र के उतार लनि अछि । गंगा देवी मधुबनी सँ अपन यात्रा शुरू केलनि । ओ इलाजक निमित्त दिल्ली एलीह । ओ अपन पेंटिंग मे रेलगाड़ी, डॉक्टर, अस्पताल, सीरिंज, मेडिकल वार्ड सभ किछुक चित्रांकन केलनि । हुनक पहल अनेको तरह सँ विशिष्ट छल । किछु लोक हुनक आलोचना केलनि जे एहि सँ मिथिलाक लोक चित्रांकन के हानि होएत, तठापि बहुतो लोक हुनक समर्थन केलनि । जमुना देवी आ हुनक भाई मितर राम चमकीला रंगक स्टाइलक विकास केलनि, जेकर बराबरी मिथिला कला मे नहि अछि । ओ स्वयंभू कलाकार छथि आ जानवर जेना कि गाय आदिक चित्रण सँ आनंदित होईत छथि । हुनक चित्रण परिपाटी सँ स्वतंत्र अछि । तठापि ओ रंगक प्राप्ति, कैनवासक पृष्ठभूमिक निर्माण, सजीव चित्रांकन आदि मे परंपराक पालनक प्रति दृढ़ छथि । इ चित्रकार लोकनि भूकंप, नदी आ आन कोनो वस्तुक चित्रांकन करैत छथि, जे ग्राहक हुनका सँ चाहैत छथि । जितवारपुर आ राँटी गाम मे मिथिला पेंटिंग वाणिज्यिक कार्यकलापक रूप मे उभरल अछि । जहन हम हाले मे जितवारपुर गेलहुँ तँ देखलहुँ जे जमुना देवी १५ सँ बेसी छात्र के, जे हरिजन सँ लऽ कऽ ब्राह्मण परिवार सँ छल, पढ़बैत छलीह । पुछला पर ओ उत्तर देलनि, "हम एकरा सभ के माय जेना पढ़बैत छियैक । ई सभ एहिठाम अपन घर जेकाँ अनुभव करैत अछि । हम एकरा सभ सँ कोनो फीस नहि लैत छियैक । अगर हम फीस लेबैक तँ हमर कला गंदा भऽ जायत । सब सँ उत्तम पुरस्कार हमरा लेल इ अछि जे जहन कोनो ब्राह्मण लड़की अपन प्रशिक्षण पूरा केलाक बान हमर पयर छुबैत अछि तँ हम ओकरा हृदय सँ आशीष दैत छियै आ एकटा प्रमाणपत्र सेहो दैत छियैक।" मिथिला पेंटिंग कला सँ उपर अछि । एहि रचनात्मक क्षमता सँ महिलाक एक समूह अपन इच्छा, सपना, आकांक्षा, आशा आदि कें व्यक्त करैत छथि । यदि अहाँ हुनका सँ पुछबनि जे की कऽ रहल छी तँ उत्तर भेटत "गहबर या कोहबर लीखि रहल छी"। हुनका लोकनिक लेल हुनक स्टाइल एक तरहक लिपि थिक, जेकरा माध्यम सँ ओ पुरुष समुदाय या दुनियाक बाँकी लोक सँ संवाद करैत छथि । ओ कलात्मक लेखक छथि जे अपन भावना के पेंटिंगक माध्यम सँ लिखैत छथि । वस्तुत: ओ सृजनकर्ता आ ईश्वरक समीप छथि । आर्थिक युगक कारणें यद्यपि किछु पुरुष-पात सेहो एहि क्षेत्र मे उतरलह अछि, परंतु मूलत: आईयो ई महिलाक रचना थिक । निष्कर्ष यदि भरत नाट्यम, मनिपुरी, कुचीपुड़ी, ओडिसी आ सतरिया नृत्य के मूल रूप मे रखैत दिनानुदिन लोकप्रिय कएय जा स्कैत अछि, तँ एहि महान लोक चित्रकला के मूल रूप मे किएक ने राखय जा सकैत अछि? कला वस्तु के बेचनाई खराब नहि थिक, तथापि खरीददारक समक्ष कलाक संपूर्ण परंपरागत रचनात्मकता आ मूल्यक समर्पण ठीक नहि थिक । मिथिला पेंटिंगक मूल रूप मे बचा दऽ रखबाक लेल गभीर चिन्तनक आवश्यकता अछि । अन्वेषणकर्ता, गैर सरकारी संगठन पेशेवर, लोक कलाकार आ संबंधित व्यक्ति के एहि कलाक मौलिकता बचेबाक लेल एकजुट भऽ जेबाक चाही। मेवाड़ आ मालवाक सांझी लोककला : एक परि‍चय महि‍ला संस्कृति रक्षण केर संवाहि‍का छथि‍। ई परम्परा सनातनसँ शाश्वत अछि‍। संस्कृति अगर लोक संस्कृति हो तँ महि‍ला लोकनि‍केँ लगभग एकाधि‍कार भऽ जाइत छन्हि‍। जइ कार्य, संस्कार, रीति‍ इत्यादि‍केँ शास्त्रीय परम्परा द्वारा महि‍ला लोकनि‍ नै कऽ पबैत छथि‍ तकरा लोकपरम्परा आ लोक वि‍धान द्वारा विस्तारसँ करैत छथि‍। मि‍थि‍ला संस्कृति ‍मे तुसारी, मधुश्रावणी, आम-महु बि‍आह, जटा-जटि‍न, बि‍आहक पश्चात् कोहबर घरमे सम्पादित अनेक दि‍नक वि‍धि‍-बेवहार एकर उदाहरण अछि‍। लोक परम्परा समन्वित परम्परा होइत अछि‍। एक वि‍धि‍क संग अनेक क्रि‍या-कलाप आ रचनात्मकता संलग्न रहैत अछि‍- पूजा पाठ, तंत्र-मंत्र, पि‍तृ आराधना, गीत-संगीत, जादू-टोना, वस्‍त्र वि‍न्‍यास, वि‍भि‍न्न कलाक प्रदर्शन इत्‍यादि‍। सभ आपसमे ताना बाना जकाँ जुटल। एक-दोसरक प्रति‍ समर्पित। एककेँ बि‍ना दोसरक सम्‍पादन असंभव। 15 दि‍नक पि‍तृपक्ष एखने अर्थात् 15 अक्‍टुबर 2012क समाप्‍त भेल अछि‍। ऐ पन्‍द्रह दि‍नमे हमरा लोकनि‍ अपन समस्‍त स्‍वर्गवासी पि‍तृ एवं मातृकेँ स्‍मरण करैत हुनका लोकनि‍केँ तील-जलसँ तृप्‍त करैत छी। आवाह्न तर्पन आ पुन: जयबाक ि‍नवेदन : “ऊँ आगच्‍छन्‍तुमे पि‍त्र इमम् ग्रहनन्‍तु जलाजलि‍म्।।” "हे पि‍त्र (मातृ) आऊ आ जलकेँ स्‍वीकार करू। आब अहाँ देवलोकमे छी। तँए हमरा लोकनि‍क कल्‍याण करू।" ) पि‍तृ पक्षमे लगातार पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ राजस्‍थानक मेवाड़ (अर्थात् उदयपुर, महासमद) आ मध्यप्रदेशक मालवा (उज्‍जैन, इन्‍दौर ग्‍वालि‍यर आदि‍))))) ) मे कुमारि‍ कन्‍या सभ सांझी पूजैत छथि‍। सांझीमे अनेक तरहक चि‍त्रकलाक आ वि‍म्‍बक ि‍नर्माण करैत छथि‍, गीत गबैत छथि‍ आ अन्‍तत: सांझीकेँ जलकरमे भसा दैत छथि‍। सांझीक पूजा स्‍वर्गीया मातृ लोकनि‍क, आवाह्न आ कृतज्ञताक अर्पन मानल जा सकैत अछि‍। सांझीक पूजा आ प्रचलन ओना तँ राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, पश्चि‍मी उत्तर प्रदेश, उतराखण्‍ड , उड़ीसा आ अपन मि‍थि‍लोमे कुनो ने कुनो रूपमे व्‍याप्‍त अछि‍। हरि‍याणामे ई सेहो बहुत उत्‍कृष्‍ठतासँ मनाएल जाइत अछि‍। सांझी केर अनेक नाम यथा- सांझी, सांजी, संझ्या, संध्‍या, संधा, हांजी, हज्‍जा इत्‍यादिसँ जानल जाइत अछि‍। पि‍तृपक्षमे पन्‍द्रह दि‍न धरि‍ मेवाड़ आ मालवाक कुमारि‍ कन्‍या लोकनि‍ घरक बाहरी देबालपर गाएक गोबरसँ आ माटि स मोटगर लेप बना एक तरहक वर्गाकार आकृति‍ कऽ ओइपर वि‍भि‍न्न तरहक चि‍त्रांकनक ि‍नर्माण करैत छथि‍। संगे अनुष्‍ठान, गीत-नाद, पूजा-पाठ सेहो चलैत रहैत छैक। ओइ समैमे अगर उज्जैन शहरक सि‍ंहपुरा आदि‍ क्षेत्रमे जएब तँ लागत जेना कुनो कला ि‍दर्घाक वीथिका मे आबि‍ गेल छी। कलाकृति‍केँ देखि‍ भाव-वि‍भोर भेने बि‍ना नै रहब। तेरहम दि‍न कि‍ला-कोटक ि‍नर्माण होइत छैक। कि‍ला कोटक अर्थ भेल कलाकेँ चारुदिस सँ राजमहलक कि‍ला जकाँ गढ़ बना देनाइ। अन्‍तत: पन्‍द्रहम दि‍न सांझीक पूरा रूप प्रसस्‍त भऽ जाइत छैक। पन्‍द्रहमे दि‍नक सांझमे तमाम चि‍त्रकेँ खुरेचि‍ कुमारि‍ कन्‍या, नव ब्‍याहल लड़की (जे बि‍आहक प्रथम वर्षमे सांझी देवीक उद्यापन करैत छथि‍।) समस्‍त खुरचल सामग्रीकेँ लऽ पोखरि‍ धार, नदी आदि‍मे वि‍सर्जन कऽ दैत छथि‍। वि‍सर्जनक दृश्‍य बड्ड भावमय होइत छैक। लड़की सभ गबैत, नचैत नव वस्‍त्रसँ सजल माधुर्यक वातावरण बनेने रहैत छथि‍। सांझीमे प्रयुक्त वि‍म्‍ब आ रूप सांझी लोककथाक आधारपर होइत छैक। गोबरसँ नीप बेस बना ओइपर फुलक पंखुरी, चमकम कागत आदि‍सँ चि‍त्र बनाएल जाइत छैक। सांक्षी देवीक गीत गएल जाइत छैक। कि‍छु चि‍त्र एहनो होइत छैक जे नव ब्‍याहताकेँ पारि‍वारि‍क जीवनक आवश्‍यकताकेँ सूचि‍त अथबा प्रदर्शित करैत छैक। ओइ श्रेणीमे टी.वी., फ्रीज, मोटर बाईक, गैसक चुल्हा आ सि‍लि‍ण्‍डर इत्‍यादि‍ सेहो मनोहारी ढंगसँ चि‍त्रि‍त कएल भेट जाएत। सांझी के छलीह? ऐ सम्‍बन्‍धमे अनेक तरहक दंत कथा छैक। जेना कि‍ सांझी दुर्गाक एक रूप छथि‍; ब्रह्माक पुत्री छथि‍; सांझी पार्वती अर्थात शि‍वक अर्धांगि‍नी छथि‍; सांझी वैदि‍क देवी छथि‍ जि‍नकर उपासना संध्‍या अर्थात् सांझमे कएल जाइत अछि‍; सांझी लक्ष्‍मी नारायणक प्रति‍रूप छथि‍; सांझी नवदुर्गाक प्रति‍मूर्ति छथि‍; सांझी बृन्दावन धामक देवी छथि‍; सांझी राजस्‍थानक संगानेरक कन्‍याक छथि‍ जि‍नकर बि‍आह अजमेर छलन्‍हि‍; सांझी कुमारि‍ कन्‍या–सबहक अराध्‍य आ प्रीय देवी छथि‍, सांझी राजस्‍थानक बगड़ावत क्षेत्रमे लोक आख्‍यायनमे प्रशंसि‍त देवी थीकीह आ अन्‍तत: सांझी सूर्य देवक अर्धांगि‍नीक रूपमे सेहो जानल जाइत छथि‍। चि‍त्रि‍त चि‍त्रांकन आ मनुक्‍खक आकृति‍सँ एना ज्ञात होइत अछि‍ जे सांझी एक ब्‍याहल कन्‍या छलीह। जिनकर वैवाहक जीवन सफल नै रहलनि‍। अनमेल बि‍आह छलन्‍हि‍। पति‍, सासु, समाज सभ शोषण केलकन्‍हि‍। कुमारि कन्‍या सभ भोरे उठि‍ ताजा गोबर चूनि‍ फूल, पत्तीक बेवस्‍था कऽ सांझी कलाक निर्माण मे लागि‍ जाइत छथि‍। देबाल एक क्षेत्रकेँ वर्गाकार आकृति‍केँ गोबरक आ माटिक लेपसँ भरल जाइत अछि‍। परम्‍परा आ व रूचि‍केँ मि‍श्रण कऽ मोटीफ केर निर्माण होइत अछि‍। हरेक कन्‍याक कल्‍पनाशीलता भि‍न्न होइत छन्‍हि‍। माय, पि‍ति‍याइन सभ सेहो मदति‍ करैत छन्‍हि‍ जइसँ सांझी रमणगर आ सौन्‍दर्यसँ परि‍पूर्ण भऽ जाइक। बनेबाक सामग्रीक रूपमे गोबर, फूल, पात, धास, मक्कैक बालि‍, रंगारंग कागज, टीन फ्वाइल, कौड़ी, बांसक -बत्ती, सि‍न्‍दुर कुमकुम इत्‍यादि‍क प्रयोग सबतरि‍ भेटत। मालवा अर्थात उज्‍जैन दि‍स गुल-तेवारी, गेन्‍दा लाल, चमेली, बरमासा फूल जेकरा सदा सुहागन सेहो कहल जाइत छैक केर प्रयोग होइत छैक। गुलाबी, उज्‍जर, पीकीस ब्राउन, आदि‍ रंगक वि‍शेष स्‍थान होइत छैक। सर्वप्रथम आंगुरसँ प्रथम परतक निर्माण कैल जाइत छैक। जकरा गोहाली कहल जाइत छैक। ऐमे वर्गाकार क्षेत्र अथवा अष्‍टकारक निर्माण गोबर आ माटि‍क मोट लेपसँ देबालपर कएल जाइत छैक। प्रथम तीन आंगुरक सहायतासँ फीगरक निर्माण केलाक बाद फुल, पात, घास, आदि‍सँ साटि‍ फीगरकेँ सजाएल जाइत छैक। प्रथम दिनक डि‍जाइनकेँ दोसर दि‍न उखाड़ि‍ देल जाइत छैक। प्रत्‍येक ति‍थि‍क अनुसारे मोटीफक निर्माण कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक एक गाममे प्रयुक्त तेरह दि‍नक सांझी चि‍त्रण हमरा एना भेटल- एकम (पहि‍ल)- वन्‍दरावल बीज (दोसर)- बीजना (पंखा) तीज (तेसर दि‍न)- तीन, ति‍वाड़ी (तीन खि‍ड़की) चौठ (चारि‍म दि‍न)- चौपड़ पंचम (पॉचम दि‍न)- पांच कुवारे (पाँच कुमार बालक) छठम (छठम दि‍न)- फूल छड़ी (फूलक डंडा) सातम (सातम दि‍न)- साति‍या (स्‍वास्‍ति‍क) आठम (आठम दि‍न)- अष्‍टकोणी बाजोट (बैसैबला टूल) नम (नवम दि‍न)- डोकरा-डोकरी (बुढ़आ बुढ़ी) दशम (दसम दि‍न)- दस पकवान (दस तरहक ब्‍यंजन) ग्‍यारस (ग्‍यारहम दि‍न)- जनेऊ बारस (बारहम दि‍न)- सीड़ी (सीढ़ी) तेरस (तेरहम दि‍न)- कोंट (ऐ दि‍नक सांझीमे सभ दि‍नमे युक्‍त चि‍त्रक ि‍नर्माण कएल जाइत छैक। एकरा अलाबे आरो बहुत रास बि‍म्‍वक निर्माण होइत छैक।) सांझी कलाक रूप आ ओकर अर्थ लोक कलामे आश्चर्यजनक ज्ञान आ परम्‍पराक समावेश होइत छैक। कुनो चीज निरर्थक नै भेटत। जेना कि‍ कतौ-कतौ सातम दि‍न हत्‍यारी-हतम केर रूपक वि‍न्‍यास करबाक परम्‍परा छैक। तइ दि‍न ओइ आत्माक स्‍मरणमे रूपकेँ गढ़ल जाइत छैक जि‍नकर या तँ हत्‍या भऽ गेलन्‍हि‍ या ओ स्‍वयं आत्‍महत्‍या कऽ लेलन्‍हि‍। नवम दि‍नमे डाकरि‍या नम बनैत छैक। ओइ दि‍न बुढ़ आ बुढीक चि‍त्रण होइत छैक जे नवमी तिथि में अई जीवनकेँ ति‍याग केलन्‍हि‍। बीजना या बीजनी खजुर पंखाकेँ कहल जाइत छैक। तेसर दि‍न ति‍वाड़ी अर्थात तीनटा खि‍ड़कीक निर्माण कएल जाइत छैक। चौपड़ खेलक चि‍त्रण चारि‍म दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ छठम ति‍थमे फूल छाबरी अर्थात् फुलडालीक निर्माण करबाक परम्‍परा भेटत। सति‍या अथवा हति‍या स्‍वास्‍ति‍ककेँ कहल जाइत छैक। एकर निर्माण सामान्‍यतया सातम दि‍न कएल जाइत दैक। अठकली फूलक निर्माण आठम दि‍न कएल जाइत छैक। कतौ-कतौ नवम ति‍थि‍मे नंगटा-नंगटी (वाद्य यंत्र) रचना सेहो कएल जाइत छैक। लोक परम्‍परा शास्‍त्रीय परम्‍परामे सेहो प्रयुक्‍त कएल जाइत छैक। राजस्‍थानक श्रीनाथ जीक मंदि‍रमे मुर्तिक पाछाँ पि‍छवाइ कला आ केराक पातपर सांझी बनैत छैक। एकर दोसर ठाम जलमे सांझी बनैत ैछक। वृन्‍दावनमे फर्शपर रंगोलीक रूपमे अनेक तरहक रंग आ चाउरक आंटाक प्रयोगसँ कलात्‍मक सांझी राधा आ कृष्‍णक प्रेमकथा आ भक्‍ति‍केँ स्‍मरण करबाक अप्रतीम कलाक रूपमे बनाएल जाइत छैक। बहुत तँ जानकारी नै अछि‍ परन्‍तु बुझना एना जाइत अछि‍ जे मि‍थि‍लामे सांझ पूजक परम्‍परा आ कुमारि‍ कन्‍या सभ द्वारे तुसारी पूजन सांझीक परम्‍पराक एक रूप अछि‍। नेपाल आ उत्तराखण्‍डमे सेहो कि‍छु एहन परम्‍पराक वि‍धान छैक। एक दि‍न राजस्‍थानक उदयपुरसँ हल्‍दी धाटी घूमए लेल गेल रही। ओतए केर सांझी स्‍थानीय फूलक सहायतासँ बनाएल जाइत छैक। आ ओइमे राधा-कृष्‍णक प्रेमक प्रबलता दृष्‍टि‍गोचर भक्‍ति‍-भावसँ कलात्‍मक रूपे होइत छैक। फूलक एहेन वि‍न्‍यास अन्‍यत्र असंभव। ओना लोककलामे कून नीक आ कोन खराप ई कहब असंभव मुदा मालवा अबि‍ते मातर सांझीक कलासँ कुनो बटोही मंत्र मुग्‍ध भऽ जाइत अछि‍। ओतए केर नायि‍का केर आँखि‍ अतेक कतरगर जे मोन करत दखि‍ते रही। जेहने कि‍शोरी तहने चि‍त्रकला। मोन करत केकर प्रशंसा करी चि‍त्रक अथवा चि‍त्र बनेनि‍हारि‍केँ? राजस्‍थानमे एक कथा पता लागल। संझा छलीह सांवरि‍ आ सामान्‍य गरीब घरक कन्‍या। हुनकर बि‍आह कि‍छु खाश परि‍स्‍थि‍ति‍मे एकटा नांगर ब्रह्मण जेकर नाम खोड़या ब्राह्मण रहैक- करा देल गेलन्‍हि‍। बेचारी संझाकेँ सासुरमे बड्ड कष्‍ट भेलन्‍हि‍। पति‍ कहि‍यो हुनकर भावनाकेँ सम्‍मान नै देलकन्‍हि‍। नैहरमे जनम हेबाक तुरंत बाद माय मरि‍ गेलथि‍न्‍ह। कष्‍टेमे जनम भेलनि‍, वि‍कट स्‍थि‍ति‍मे बि‍आह भेलन्‍हि‍ आ कष्‍टेमे मरि‍ गेलीह सांझा। हुनका मरला उत्तर दैव लोकमे स्‍थान भेटलनि‍। आ जे कुमारि‍ कन्‍या श्राद्ध पक्षमे हुनकर तेरहसँ पन्‍द्रह दि‍न अराधना करतीह ति‍नकर वैवाहि‍क जीवन सफल रहतैक। अही तरहक लोक मान्‍यता ओइ क्षेत्रमे छैक। मि‍थि‍लाक सामा-चकेबा पाबनि‍ जकाँ मालवामे सांझीक भाइ-बहि‍नक सम्‍बन्‍धकेँ मधुर बनेबैबला लोक-उत्‍सव मानल जाइत छैक। लड़की सभ अपन बीराजी (भैय्या)क लेल मंगल कामना करैत छथि‍। जे चीज नै भेटैत छन्‍हि‍ तइ लेल भायसँ नि‍वेदन कऽ ओइ चीजकेँ मंगा संझाक नीक जकाँ निर्माण , पूजा-पाठ करैत छथि‍। अन्‍तत: यएह कहल जा सकैत अछि‍ जे सांझी लोक परम्‍पराक एक अनुपम उदाहरण अछि‍. अहेन उदाहरण जइमे चि‍त्रकला, नृत्‍यकला, संगीतकला, वस्‍तुकला आदि‍क सम्‍न्‍वि‍त समावेश भेटत। ऐ तरहक अनुपम लोक कलाक रक्षण भेनाइ अनि‍वार्य। लघुकथा- चन्‍दा राघवकेँ चन्‍दाक संगति‍ सोहनगर लगैत छलन्‍हि‍। राघव आ चन्‍दा समवयस्‍क रहथि‍- लगभग पंद्रह बर्खक। दू-चारि‍ मासक दुनूमे कि‍यो छोट तँ कि‍यो पैघ। चन्‍दा छलीह सांवरि‍, सुन्‍दरि‍। शरीरसँ पुष्‍ट मुदा लोथगर नै। सांमरि‍ चाम मुदा चमकैत। आँखि‍ मध्‍यम कदक मुदा रसगर। ठोर मोट मुदा चहटगर। नाक पातर आ नोक लेने। शायद राघव केर दृष्‍टि‍मे सुन्‍दरताक नीक वि‍वरण यएह छलन्‍हि‍। चन्‍दा छलीह चंचल, कनीक ठसकसँ भरल आ ऐ गुमानमे तनल जे ओ दबंग पि‍ता एवं दबंग परि‍वारसँ छथि‍! चन्‍दाकेँ केवल दू बहि‍न आरो छलथि‍न्‍ह। एक्को भाइ नै। ताहि‍ चन्‍दा अपने-आपकेँ बेटा बुझैत छलीह। पन्‍द्रहम वयसि‍मे अएलाक उपरान्‍तो चन्‍दा अपन उन्नत वक्षकेँ नै झपैत छलीह। ऐमे हुनक उदेस अपने-आपकेँ कामुक बनेबाक नै छलन्‍हि‍ बल्‍कि‍ बेटा जकाँ बेटी छथि‍ तइ बातक गुमान! मुदा जुआनीक दरबज्‍जा खटखटबैत वक्ष, नाक, आँखि‍क गुमानसँ की मतलब! चन्‍दाक गुमानमे हुनकर शारीरि‍क अंग अपन कामुकताक भावकेँ अनेने प्रदर्शन करए लगैत छलन्‍हि‍। आर-तँ-आर चन्‍दा राघव एवं अन्‍य समवयस्‍की छौड़ा सभ संगे कखनो कबड्डी तँ चोरा-नुक्की खेलाए लगैत छलीह। जखन कबड्डी खेलाइत छलीह तँ चेतऽकऽबऽड्डी..... डी...डी...डी... करैत हुनकर वक्ष सेहो शब्‍दक लयक संग संगीतक धूनमे मस्‍त भऽ ऊपर-नीचा होमए लगैत छलन्‍हि‍। कतेको बेर जखन चन्‍दा कबड्डी पढ़ैत राघव दि‍स अबैत छलीह, राघवकेँ मारबाक हेतु तँ राघव चन्‍दाकेँ पकड़बाक प्रयास करैत छलाह। प्रयास ई जे चन्‍दाक सांस टूटि‍ जाइन्‍हि‍। मुदा चन्‍दा ऐ प्रयासमे जे बि‍ना सांस तोड़ने राघवकेँ छू ली, आ बि‍ना राघवक चंगुलमे कबड्डी पढ़ैत अपना दि‍सि‍ आपस भऽ जाइ। एक-आध बेर चन्‍दा अपन रणनीति‍मे सफलो भेलीह। मुदा अन्‍तत: छलीह लड़की। केना सकतथि, राघवक ठोस, बलीष्‍ठ कद-काठीक समक्ष? अधि‍कतर समैमे राघव चन्‍दाकेँ पकड़ि‍ लैत छलथि‍न्‍ह। आब चन्‍दा राघवसँ अपने-आपकेँ छोड़ेबाक हेतु पूरा प्रयास करैत छलीह। राघव सेहो अपने-आपकेँ एे प्रयासमे लगा लैत छलाह जे बि‍ना सांस टुटने चंन्‍दा नै छुटथि‍। ऐ नोक-झोकमे बि‍ना कुनो गलत भावनाकेँ कतेको बेर छीना-झपटी करैत राघव केर हाथ अनायास चन्‍दाक वक्षपर लागि‍ जाइत छलन्‍हि‍। चन्‍दा बुझैत छलीह जे राघव कुनो दोसर वि‍चारसँ ई सभ नै कऽ रहलाह अछि‍। तँए चन्‍दाक मुँहपर कुनो तामस, लज्‍जाक भाव, प्रति‍कार, घृणा आदि‍क भाव नै अबैत छलन्‍हि‍। बि‍ल्‍कुल स्‍वभावि‍क रहैत छलीह। मुदा कहि‍ नै कि‍एक राघवक कठाेर हाथक स्‍पर्शकेँ अनुभव करैत छलीह। हुनका कि‍छु-कि‍छु होमय लगैत छलन्‍हि‍। आँखि‍ अनेरे आनन्‍दाति‍रेकमे मुदा जाइत छलन्‍हि‍। की होइत छलहि‍ तकरा ओ शायद केवल अनुभव कऽ सकैत छलीह, ओकर बखान शब्‍दक माध्‍यमसँ संभव नै। एहने हालति‍ राघवोकेँ होइत छलन्‍हि‍। नहुु-नहु राघवकेँ एना लागए लगलन्‍हि‍ जेना चन्‍दाक वगैर जीवन अर्थहीन हुअए। चन्‍दासँ जइ दि‍न राघव भेँट नै करथि‍ तइ दि‍न मोन खि‍न्न भऽ जान्‍हि‍। चन्‍दा सेहो राघवसँ ओतबे सि‍नेह करैत छलीह। मुदा राघव आर चन्‍दाक सि‍नेह छल नि‍श्‍छल! राघव छलाह आर्थिक रूपसँ वि‍पन्न ब्राह्मण कूलक बालक। एकर ठीक वि‍परीत चन्‍दा छलीह एक सुभस्‍य ब्राह्मण कन्‍या। चन्‍दाक पि‍ताकेँ तेरह बीघा ठोस खेतीहर जमीन आ खूब नीक लगानी केर कार्य चलैत छलन्‍हि‍। चन्‍दाक पि‍ताक नाओं छलन्‍हि‍ बुलेसर। बुलेसर बलंठ छलाह। छह फूट्टा मर्द, पहलवान, केवल अपन नाओं आ संख्‍याक ज्ञान छलन्‍हि‍। लगानीक ललका बहीकेँ कऽ टऽ कऽ लि‍खैत-पढ़ैत छलाह। गरीब लोक सभकेँ सूदि‍पर टाका दैत छलथि‍न्‍ह‍। बन्‍धकमे गहना, वर्तन, जमीनक कागत इत्‍यादि‍ राखि‍ लैत छलथि‍न्‍ह। सूदि‍क दरसूदि‍ जखन गरीब लोक सभ आसीन-काति‍क मासमे भूखे मरय लगैत छल तँ बुलेसर बाबू ओतए सबैया-डेओढ़ापर धान अथवा आन अन्न लेमय जाइत छल। बुलेसर बाबू अपने हाथे अन्न जोखैत छलाह। एक मोनक बदला हमेसा 38 सेर दैत छलथि‍न्‍ह। ओहूमे अनाजमे धूल-माटि‍ मि‍लल। छाँटल पखरा अथवा आन कुनो मोटका धान। आ लेबय काल एक मोनक बदला 41 सेरक आसपास लैत छलाह। कतेको लोक पाइ दैयो दैत छलन्‍हि‍ तैयो अपन लगानीक ललाक बहीसँ नाओं कटैत छलथि‍न्‍ह। चारि‍-पाँच बर्ख चुप भऽ जाइत छलाह। फेर एकाएक एक दि‍न बही लऽ कऽ ओइ व्‍यक्‍ति‍क घरपर महाजन बनि‍ पहुँचि‍ जाइत छलाह, तगेदा हेतु। बेचारा परेशान! मुदा अपन बलंठीसँ चूर बुलेसर बाबू ओइ व्‍यक्‍ति‍केँ गरदनि‍ अपन गमछासँ जकड़ि‍ लैत छलाह। फेर ओकरा लाचार कऽ दैत छलथि‍न्‍ह पंचैती बैसेबाक लेल। पंच की तँ छह-सात चमचाक दल। सभ बुलेसर बाबूकेँ हँ-मे-हँ मि‍लबैबला। सभ हुनके सबहक बात कहएबला। बेचारा असहायक बातकेँ सुनैत अछि‍? लाचार कऽ ओइ व्‍यक्‍ति‍सँ ओकर जमीन आर गहना इत्‍यादि‍ हथि‍या लैत छलाह। अही प्रक्रि‍यासँ चारि‍ बीघासँ तेरह बीघा जमीन भऽ गेल छलन्‍हि‍ बुलेसर बाबूकेँ। एकबेर तँ बुलेसर बाबू एहेन काज केलन्‍हि‍ जेकरा लोक अखनो धरि‍ नै बि‍सरल अछि‍- नृशंसकारी, जघन्‍य, हत्‍या समान, बल्‍कि‍ साक्षात हत्‍या! एना भेलैक जे टुनटुनमा मलाह बुलेसर बाबूसँ अपन पत्नीक इलाजक हेतु तीन सए टाका सूदि‍पर लेलकन्‍हि‍। ई कहि‍ जे छह मासमे सूदि‍क संग आपस कऽ देतन्‍हि‍। मुदा कि‍छु कारणवश एक बर्ख धरि‍ आपस नै कऽ सकलन्‍हि‍। एक दि‍न प्रचण्‍ड जाड़सँ कपैत टुनटुनमा राघवक दरबज्‍जापर आबि‍ राघवकेँ पि‍तामह संगे घूर तापि‍ रहल छल। तमाकूल चुना राघवक पि‍तामहकेँ देलकन्‍हि‍ आ अपनो खेलक। कि‍छु कालक बाद अपन एक लठैतक संग बुलेसर बाबू सेहो राघव केर दरबज्‍जापर घूर तापअ आबि‍ गेलाह। टुनटुनमाकेँ देखैत मातर हुनका तामस चढ़ि‍ गेलन्‍हि‍। वि‍भत्‍स गारि‍ देमय लगलथि‍न्‍ह ओकर- “रौ बहान ...ोद! तूँ एखन धरि पाइ आपस नै केलयँ?” टुनटुनमा कहए लगलन्‍हि‍- “मालि‍क! हमर हाथ तंग अछि‍। बेटा कलकत्तासँ आबैबला अछि‍। अबि‍ते मातर दऽ देब, बि‍थुत नै करब।” मुदा बुलेसर बाबूक तामसे दुर्वाक्षा बनल छलाह। आरो गारि‍ पढ़ैत गमछा टुनटुनमाकेँ गरदनि‍मे फँसा उठा लेलथि‍न्‍ह। टुनटुनमा लाचार भऽ घेँघयाए लगल। बुलेसर बाबू सोहाइ चमेटा ओकरा ओकरा कानक जाड़ि‍मे मारलथि‍न्‍ह। हे भगवान! जाड़क मास बुढ़ शरीर, भुखाएल पेट, जीने काया, बेचारा टुनटुनमाक कानसँ खून बहए लगलैक। मुदा तखनो बुलेसर बाबूकेँ संतोष नै भेलन्‍हि‍। गमछासँ टुनटुनमाकेँ घि‍सि‍याबए लगलाह। ई देखि‍ राघवकेँ पि‍तामहकेँ भेलन्‍ह जे कहीं टुनटुनमा हुनके दरबज्‍जापर नै मरि‍ जान्‍हि‍। ओ बीचमे आबि‍ गेलाह आ कहखि‍न्‍ह- “हौ बुलेसर! ई हमरा दरबज्‍जापर आएल अछि‍। मरि‍ जएतैक। अतए कि‍छु नै करहक।” ऐ बातपर बुलेसर बाबू कहलखि‍न्‍ह- “ठीक छै कारी कक्का, हम ऐ सार मलहाकेँ धोबि‍या गाछी लऽ जाइ छी।” ई कहि‍ टुनटुनमाक गरदनि‍मे फँसाओल गमछा घि‍चैत धोबि‍यो गाछी दि‍सि लऽ गेलन्‍हि‍। ‘मरता क्‍या नहीं करता, बेचारा टुनटुनमा जेना कसाइ लग गाए जाइत अछि‍ तहि‍ना बुलेसर बाबूक संग वि‍दा भेल।‍ आ बुलेसर बाबू जखन धोबि‍या गाछी गेलाह तँ एक लात मारि‍ टुनटुनमाकेँ धरतीपर पाड़ि‍ पुन: एक ऐँर मारलखि‍न्‍ह। फेर अपन ठेंगा ओकर नि‍कासमार्ग -गुदामार्ग-मे घुसा देलथि‍न्‍ह। खूनक फुचुक्का नि‍कलि‍ पड़लैक। बेचारा ओतहि‍ कनैत बेहोश भऽ गेल। मुदा बुलेसर बाबूक चेहरापर अफसोस पसरि‍ गेलनि‍ आ मुँहसँ नि‍कलन्‍हि‍- “ठेंगो अपवि‍त्र भऽ गेल!” टुनटुनमाकेँ ओतहि‍ ओही हालति‍मे छोड़ि‍ अपन घर दि‍सि‍ वि‍दा भऽ गेलाह। लगभग आधा घंटाक पछाति‍ ऐ घटनाक जानकारी टुनटुनमाक बेटाकेँ पता लगलैक। जो ओकरा उठा कऽ घर लऽ गेलैक। पैसा नै रहैक तँए देसी दबाइ प्रारम्‍भ केलकैक। भरि‍ पेट खेबाक सेहो सामर्थ्‍य नै, तइ मनुक्‍खपर एहेन अत्‍याचार! बेचारा टुनटुनमा 10 दि‍नक भीतर कराहि‍-कराहि‍ कऽ मरि‍ गेल। मनुक्‍खपर मनुक्‍ख द्वारा एहेन अत्‍याचार! हे भगवान कि‍एक नै देखैत छी एहेन लोक सभकेँ। कि‍छु अही तरहक वि‍चार राघव केर लोक कि‍शोर मनमे अएलन्‍हि‍ जखन टुनटुनमाक सम्‍बन्‍धमे पता लगलन्‍हि‍। मुदा बुलेसर बाबूक हृदैपर कुनो प्रभाव नै पड़लन्‍हि‍। ओ अपन बलंठगरीरीमे लागल रहलाह। बुलेसर बाबूक दू व्‍यक्‍ति‍त्‍व छलन्‍हि‍। लहनाक मामलामे ओ बलंठ, हृदैहीन, कसाइ आ कईंया छलाह। ठीक एकर वि‍परीत पि‍ताक रूपमे स्‍नेहशील, उदार आ अनुरागी। राघवकेँ चन्‍दाक नेनपनक दृश्‍य यादि‍ आबए लगलन्‍हि‍। जखन चन्‍दा चारि‍-पाँच बर्खक छलीह तँ बुलेसर बाबू सदि‍काल चन्‍दाकेँ अपना कन्‍हापर चढ़ेने रहैत छलाह। दुलारक अन्‍त नै। चन्‍दाकेँ सदि‍काल चन्‍दा बेटा कहि‍ सम्‍बोधि‍त करैत छलाह। चन्‍दा अगर कुनो कारणे रूसि‍ जाइत छलीह कि‍ंवा कनैत छलीह तँ बुलेसर बाबू चन्‍दाकेँ कोरामे उठा गीत गाबि‍-गाबि‍ बौसैक प्रयास करैत छलाह। गीतक आखरि‍ कि‍छु ऐ प्रकारक होइत छलैक- “चन्‍दा तोरे देबौ गे सभ धन तोरे देबौ गे तेरह बीघा के जोता चन्‍दा तोरे देबौ गे गहना तोरे देबौ गे सोना-रूपा तोरे देबौ गे....।” आ गुमानसँ तनल चन्‍दा शनै: शनै: कानब बन्न कए अपन पि‍ताक चौरगर छातीसँ चीपकि जाइत छलीह। पि‍ता-पुत्रीक अगाध प्रेम। एहेन प्रेम जइमे प्रेमाधि‍क्‍य आ सि‍नेहक धार सदि‍खन बहैत रहैत छल। राघवक कि‍शोर मनमे बुलेसर बाबूक प्रति‍ धोर घृणा उत्पन्न होमय लगलन्‍हि‍। मन होन्‍हि‍ जे ‘बुलेसराकेँ उठा कऽ पटकि‍ दी बीच चौबट्टि‍यापर। लाते-लाते खनि‍ दी।’ मुदा ई हुनका नीक जकाँ ज्ञात छलन्‍हि‍ जे बुलेसर बाबूक समक्ष्‍ज्ञ हुनकर परि‍वारक अस्‍ति‍त्‍व शुन्‍य छन्‍हि‍। आर-तँ-आर राघव केर पि‍ता सेहो बुलेसर बाबूसँ ऋृण लेने छलथि‍न्‍ह। फेर राघवकेँ वि‍चार अएलन्‍हि‍ जे कि‍एक नै चन्‍दासँ बात कएल जाए? मुदा फेर ओ अपना-आपकेँ चेतलाह। चन्‍दा तँ थीकीह अन्‍तत: बुलेसरेक बेटी ने। साँपक गर्भसँ कुनो हंस जन्‍म लेलकैक अछि‍। साँपक नेना साँपे जकाँ डॅसबे करतै। चन्‍दाकेँ कहने की लाभ? ऊपरसँ अगर चन्‍दा अपन पि‍तासँ शि‍काइत करतीह तँ हमरो घरमे वि‍पत्ति‍क भूकम्‍प आबि‍ जाए! ...ई सोचैत राघव चुप्‍पी साधि‍ लेलन्‍हि‍। मुदा जखन-जखन टुनटुनमा बेटाकेँ बापक कर्म करैत देखैत छलाह तखन-तखन घृणा आ पश्चातापक ज्‍वारि‍मे जरए लगैत छलाह। मुदा छलाह बेवश! लचार!! मरता क्‍या नहीं करता!!! कहि‍ नै कि‍एक चन्‍दा राघवकेँ बि‍ना अपने-अापकेँ अनेरे बेचैन अनुभव करए लगलन्‍हि‍। एकबेर राघव आठ दि‍नक हेतु मातृक गेलाह। चन्‍दाकेँ बि‍ना कहने। चन्‍दा राघव केर घर लगका पोखरि‍मे नहाए अएलीह। जखन राघवकेँ नै देखलन्‍हि‍ तँ मनमे ई भेलन्‍हि‍ जे राघव कतौ इम्‍हर-उम्‍हर चलि‍ गेल छथि‍ कि‍छु क्षणक हेतु। मन तँ नै लगलन्‍हि‍। चुप-चाप जल्‍दी-जल्‍दी स्‍त्रगनाही घाटपर जाए पोखरि‍मे हम डुम देलीह। एक लोटा अछिंजल लए ओतुक्के पंचमुखी महादेवपर आधा मनसँ जल ढारलन्‍हि‍। राघवसँ भेँट नै भेलन्‍हि‍ ऐ बातक कचोट करैत घर चलि‍ गेलीह। घर जाए आधा मनसँ आधा-छीधा अन्न खेलीह आ सोझे आमक गाछी आम ओगरए लेल चलि‍ अएलीह। आमोक गाछीमे चन्‍दाकेँ मन नै लगलन्‍हि‍। चन्‍दा मोने-मन भगवानसँ प्रार्थना करए लगलीह- “हे भगवान! जल्‍दी-जल्‍दी राति‍ करू। सूति‍ रही। जल्‍दी-जल्‍दी भोर करू जे राघव भेट जाए।” मुदा राघव तँ आठ दि‍नक हेतु गामेसँ बाहर भऽ गेल छलाह। खैर! चन्‍दा मुन्‍हारि‍ साँझक बाद घर अएलीह। माय पुछलखि‍न्‍ह- “चन्‍दा, अतेक देरीसँ कि‍अए अएलेँह?” चन्‍दा बजलीह- “चोरा सभ आम तोरबाक फि‍राकमे छल। सोचलौं जखन मखना रखबार आबि‍ जाएत तखने कलम छोड़ब।” चन्‍दाक ऐ जबाबसँ प्रसन्न भऽ बुलेसर बाबू अपन सीना चौड़ा करैत पत्नीकेँ कहलखि‍न्‍ह- “बुझलि‍ऐक, कतेक ज्ञानी आ बुझनुक अछि‍ अप्‍पन चन्‍दा? चन्‍दा सन भगवान अगर बेटी देथि‍ तँ बेटाक कुन प्रयोजन?” तइपर चन्‍दाक माय कहलखि‍न्‍ह- “अहाँ अनेरे बजैत छी। लड़कीकेँ कुनो हालति‍मे साँझ भेला उत्तर घरसँ बाहर नै रहबाक चाही। समए-साल खराप चलि‍ रहल छैक। कुनो ऊँच-नीच भऽ गेलैक तँ की हेतैक।” मुदा बुलेसर बाबू कतए चुप हुअएबला छलाह। कहलखि‍न्‍ह- “की बाजि‍ रहल छी? केकरा हि‍म्मति‍ छैक जे हमर चन्‍दा संग कनीकबो बद्तमीजी करए। जे सोचबो करत तकर आँखि‍ नि‍कालि‍ लेबैक।” मुदा चन्‍दा अपन माता-पि‍ताक वाक्-युद्धमे हि‍स्‍सा नै लेलन्‍हि‍। बि‍ना कुनो हर्ष-वि‍षादक चुपचाप ठाढ़ि‍ रहलीह। चन्‍दा मोने-मन प्रसन्न भेलीह- “चलू, बाबूजी हमरा अतेक सि‍नेह करैत छथि‍। हे भवाबान! जन्‍म-जन्‍म भरि‍ एहने पि‍ता देब। ओना माइयो कुनो अधलाह नै कहलनि‍। अतेक सांझ धरि‍ आमक गाछीमे हमरा नै रहबाक चाही।” मुदा माता-पि‍ताक प्रसंगसँ चन्‍दाकेँ एक लाभ ई भेलनि‍ जे चन्‍दा राघवक कमीकेँ कि‍छु क्षणक हेतु बि‍सरि‍ गेलीह। भोजन-भात करैत राति‍क आठ बाजि‍ गेलैक। चन्‍दा अपन दू छोट बहि‍न सबहि‍क संग सूति‍ रहलीह। कनीकाल राघवकेँ स्‍मरण एलन्‍हि‍। तामसो चढ़लन्‍हि‍- “कतए चलि‍ गेलाह राघव! भेँट नै भेलाह।” फेर भेलन्‍हि‍, “भऽ सकैत अछि‍ कुनो प्रयोजनसँ कतौ गेल होथि‍। काल्‍हि‍ तँ भेँट भइये जाएत। मोन भेलन्‍हि‍, राघवकेँ पुछबनि‍ जे कतए गेल रही। मुदा लोक अगर सुनत तँ की कहत। राघव सेहो की सोचताह! फेर वि‍चारलन्‍हि‍, कि‍छु नै कहबन्‍हि‍।” अही तरहक अनेक वि‍चारक श्रृंखलामे चन्‍दा तल्लीन भऽ गेलीह। पता नै सोचैत-सोचैत कखन नि‍सभेर भऽ गेलीह। भोरे उठि‍ चन्‍दा नवका पोखरि‍ दि‍स स्‍नान करक हेतु वि‍दा भेलीह। सोमक दि‍न रहैक। माय कहलथि‍न्‍ह- “चन्‍दा, पंचमुखी महादेवकेँ आइसँ हरेक सोम एगारह लोटा अछि‍ंजल चढ़ाउ। गंगेश पण्‍डि‍त कहलन्‍हि‍ अछि‍ जे ऐसँ अहाँक कल्‍याण हएत।” बुलेसर बाबू पत्नीसँ पुछलखि‍न्‍ह- “गंगेश पण्‍डि‍तजी कल्‍याणक अर्थ की कहलन्‍हि‍?” चन्‍दाक माय- “कल्‍याणक अर्थ ई भेल जे चन्‍दाकेँ योग्‍य घर-वर भेटतनि‍। सोम दि‍न महादेव आ पार्वतीक दि‍न छन्‍हि‍। सोमक जल ढारक बड्ड महत छैक। ताहि‍सँ सोलचौं, गंगेश पण्‍डि‍त जीक उक्‍ति‍सँ चन्‍दाकेँ अवगत करा दि‍यन्‍हि‍।” बुलेसर बाबू पत्नीक बातकेँ स्‍वीकृति‍ गर्दनि‍ हि‍ला देलखि‍न्‍हि‍। कि‍छु बजलाह नै। मोने-मन भोलानाथसँ व्‍याहुत बेटी लेल नीक वरक वरदान अवश्‍य मंगलन्‍हि‍। सभकेँ ठसकसँ लगानीपर द्रव्‍य आ वस्‍तु देनि‍हारक हाथ आइ भगवान भोलानाथ लग आर्त-भावसँ लेबाक लेल पसरल छलन्‍हि‍। कनीक क्षण लेल अनुभव भेलन्‍हि‍ जे बेटीक बाप भेनाइ केकरा कहैत छैक!! खैर! चन्‍दा फुलडाली, फुलही लोटा, वस्‍त्र, बांसक कर्चीक दतमनि‍ लऽ नवका पोखरि‍ दि‍स वि‍दा भेलीह। एकपेरि‍या रस्‍तामे चलैत मोने-मन उमंगमे डूमल जे आ राघवसँ भेँट हएत। उल्‍लसि‍त मोनसँ चलैत नायि‍का सेहो एकपेरि‍या रस्‍तापर अपन शरीर आ सोचक संग एक अनुपम सामंजस्‍य स्‍थापि‍त कऽ लैत अछि‍। मोन जेना-जेना अपन सोचमे उतार-चढ़ाव, गति‍, उद्वेग, तरंग अनैत छैक, तहि‍ना शरीरक अंग सभ प्रदर्शन कए मोनक भावनाकेँ व्‍यक्‍त करैत छैक। चन्‍दो संग सएह भेलन्‍हि‍। भरि‍ रस्‍ता चन्‍दा कखनो राघव तँ कखनो अपन माइक कहल आदेशक सम्‍वन्‍धमे सोचैत रहली। राघवपर चन्‍दाकेँ तामस आ सि‍नेहक भाव एक्के संग आबए लगलन्‍हि‍। तामस ऐ हेतु जे राघव कतए गेला बि‍ना कहने।” सि‍नेह ऐ दुआरे जे राघव बड्ड नीक लोक अछि‍। सोचलन्‍हि‍- गरीब तँ छथि‍ राघव, मुदा छथि‍ व्‍यवहार आ वि‍चारसँ नीक। चन्‍दाकेँ एक क्षण लेल पहि‍ल बेर ई एहसास भेलन्‍हि‍ जे शायद राघव हुनका जीवनमे बहुत पैघ स्‍थान रखैत छथि‍न्‍ह। चन्‍दाकेँ यादि‍ आबए लगलन्‍हि‍ कबड्डी आ नूका-चोरी। चन्‍दाकेँ यादि‍ एलन्‍हि‍ तीन-चारि‍ वर्षक पूर्वक एक घटना जखन चन्‍दा कि‍छु आर लड़का-लड़की संगे मि‍लि‍ कऽ कनि‍या-पुतराक खेल खेलाइत छलीह। राघव सेहो आइ खेलक पात्र छलाह। राघवकेँ घरमे कि‍यो नै रहन्‍हि‍। दुपहरि‍याक समए छलैक। पाँच-छह नेना सभ कनि‍या-पुतरा खेलाए लागल। भेलैक ई जे ऐ खेलमे एक बर आ एक कनि‍या हेतैक। कनि‍याक पि‍ता आ माता हेतैक। बर आ कनि‍याक बि‍आह हेतैक। गीत-नाद आ वि‍धि‍ बेवहार हेतैक। चन्‍दा बनलनि‍ कनि‍या आ राघव बर। दुनुक बि‍आह भेलन्‍हि‍। गीत-नाद भेलैक। चतुर्थी भेलन्‍हि‍। कोहबर बनलै। कोहबर घरमे चन्‍दा आ राघव बर कनि‍या बनि‍ आराम करए गेलाह। कोहबर घर की तँ राघवकेँ पि‍ताक मच्‍छरदानी टांगि‍ ओकर चारू कात नूआसँ झांपि‍ देल गेलैक। राघव आ चन्‍दाकेँ कोहबर घरमे राखि‍ सभ बच्‍चा सभ थोड़ेक कालक हेतु बाहर चलि‍ गेल। राघव आ चन्‍दा अपना-आपकेँ ठीकेमे बर-बनि‍या मानि‍ एक दोसरकेँ पकड़ि‍ सूति‍ रहलनि‍। कनीक-कालक बाद बच्‍चा सभ आबि‍ गेलैक। चन्‍दा यएह सभ सोचैत-सोचैत नवका पोखरि‍ दि‍स जाइत छलीह। कखनो कमर लचकन्‍हि‍ तँ कखनो वक्ष हि‍लय लगन्‍हि‍। कखनो नि‍तम्‍ब डग-मग करए लगन्‍हि‍ तँ कखनो आनंदाति‍रेकमे अवते चलबाक गति‍ तेज भऽ जाइन्‍हि‍। जखन तेज चलथि‍ तँ वक्ष आ जखन नहु-नहु आनन्‍दि‍त होइत चलैत तँ नि‍तम्‍ब डोलए लागन्‍हि‍। दुनू अवस्‍थामे चन्‍दा लगैत छलीह सुन्‍दरि‍, आकर्षक......। फेर चन्‍दाकेँ भेलन्‍हि‍ जे राघव तँ हमर कुनो मूलो-गोत्रक नै छथि‍। तखन की चन्‍दा आ राघवकेँ बि‍आह भऽ सकैत छन्‍हि‍? फेर सोचलन्‍हि‍, केना हेतैक? एक्के टोलमे जे छी। आर राघव तँ गरीब घरसँ छथि‍। हमर पि‍ता कखनो ऐ लेल तैयार नै हेताह। ई सोचैत चन्‍दाक चालि‍ मध्‍यम भऽ जाइन्‍ह। माथपर पसीना आबए लगलन्‍हि‍। चेहरा उदास भऽ गेलन्‍हि‍। मुदा सुन्‍दरता अपन दोसर रूपमे प्रस्‍फुटि‍त होइत रहलन्‍हि‍। नि‍तम्‍ब नहु-नहु उभारक प्रदर्शित करए लगलन्‍हि‍। आब चन्‍दा अपन बि‍आहक संबंधमे सेचए लगलीह। केकरासँ बि‍अाह हएत? ओ लड़का केहेन हेतैक! हमरा संग ठीक बेवहार करत की नै? छोटकी बहि‍न सभकेँ जि‍म्‍मेवारी माय असगरि‍ केना सम्‍हारतीह। आदि‍-आदि‍। फेर चन्‍दा अपना-आपकेँ भगवान भोलानाथपर छोड़ि‍ देलन्‍हि‍। मोने-मन गाबए लगलीह- “पूजाक हेतु शंकर, आएल छी हम भीखारी।” यएह सोचैत-सोचैत चन्‍दा आबि‍ गेलीह नवका पोखरि‍ लग। पोखरि‍सँ ठीक पहि‍ने राघव केर दलान। दलानपर राघवकेँ पुन: नै देखलखि‍न्‍ह। मोन रोष आ अव्‍यक्‍त वि‍रहसँ वि‍दग्‍ध भऽ गेलन्‍हि‍। चारू कात देखलनि‍। मुदा राघव कतौ नै। चन्‍दाक मुँह ओइ फूल जकाँ मुरझा गेलन्‍हि‍ जकरा तोड़ि‍ लोक जेठक प्रचण्‍ड रौदमे छोड़ि‍ दैत छैक। नि‍ष्‍ठुर राघव कि‍एक कतौ बि‍ना कहने चलि‍ गेलैक। खैर! चन्‍दा चारू कात राघवकेँ तकलन्‍हि‍। मुदा राघव जखन घरपर रहतथि‍ तखन ने चन्‍दाकेँ भेट होइतन्‍हि‍। अन्‍तमे चन्‍दा मन्‍दि‍रक पाछाँ फुलवारीमे फूल लोढ़ए गेलीह। चम्‍पाक गाछमे पीअर-पीअर रमनगर आ सुगन्‍धि‍त चम्‍पा फुलाएल रहैक। रहैक मुदा बड़ ऊँचका ठाढ़ि‍पर फुलाएल। चंदा सोचलीह चलू अही बहाने राघवक घर जाइत छी। ई सोचैत चंदा राघवक घरपर आबि‍ गेलीह। राघवक मायकेँ पुछलखि‍न्‍ह- “काकी, हमरा चम्‍पा-फूल पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक अछि‍। मुदा फूल तँ बड्ड ऊँचका डारि‍पर फड़ल छैक। हम नै पबैत छी। कनी राघवकेँ कहबनि‍ जे कि‍छु फूल तोड़ि‍ देताह?” राघवक माय कहलखि‍न्‍ह- “बुच्‍ची, राघव तँ मातृक काल्‍हि‍ भाेरे गेल। कलकत्तासँ ओकर छोटका मामा-मामी सपरि‍वार आएल छथि‍न्‍ह। कहि‍ कऽ गेल अछि‍ जे सात-आठ दि‍नक बाद आओत। आब अहीं कहू जे केना फूल टुटत?” फेर कि‍छु देर सोचैत राघव केर माय अंगनासँ एक गोट पाहुनकेँ बजेलखन्‍हि‍। जे जरैलसँ अपन बहि‍न लग आएल छलाह। ओइ पाहुनकेँ कहलखि‍न्‍ह- “यौ पाहुन, ई थीकीह चन्‍दा, हम्‍मर गामक बेटी। हि‍नकर पि‍ता बड्ड कलामा। ई भगवान पंचमुखी महादेवकेँ चढ़ेबाक लेल कि‍छु चम्‍पा फूल तोड़ए चाहैत छथि‍। मुदा फूल गाछक फुनगीपर लागल छैक। कनी अहाँ हि‍नका फूल तोड़ि‍ दि‍यौन्‍ह। फूल तोड़ैबला सेहो फूल चढ़बैबला अतेक धर्म होइ छैक। राघव रहैत तँ कुनो बाते नै। ओ मातृक गेल अछि‍। कनी, अहीं फूल तोड़ि‍ दि‍यौन्‍ह चन्‍दाकेँ।” पाहुन हाथमे लग्‍गी लऽ बि‍ना कि‍छु कहने चम्‍पा फूल तोड़ए लेल चन्‍दा संग बि‍दा भेलाह। चन्‍दाक मुँह जेना लटकि‍ गेलन्‍हि‍। गाल जेना सि‍याह भऽ गेलन्‍हि‍। आँखि‍ नोराह भऽ गेलन्‍हि‍। ठोर सुखाए लगलन्‍हि‍। छाती धरकए लगलन्‍हि‍। मुदा जवानी केर दरबज्‍जापर आबि‍ गेल चन्‍दा सोचल्‍नि‍ जे कनि‍या काकी अर्थात् राघवक मायकेँ धन्‍यवाद अवश्‍य देल जाए। जाइत-जाइत कहनखि‍न्‍ह- “कनि‍याँ काकी, पाहुन खराप तँ नै सोचताह?” राघवक माय झट दऽ उत्तर देलखि‍न्‍ह- “की सोचै छी बुच्‍ची? पाहुन आन कि‍योक ने छथि‍। जरैलवाली कनि‍याँक भाय छथि‍न। बहि‍नक ननदि‍ लेल फूल कनी तोरि‍ देलखि‍न्‍ह तँ की भऽ जेतन्‍हि‍। अहाँ नि‍श्चि‍न्‍तसँ जाऊ।” चम्‍पा फूल अपन फुलडालीमे राखि‍ चंदा स्‍त्रीगनाही घाटमे स्‍नान केलनि‍। माइक आज्ञाकेँ मानै डोले-डोले अछि‍ंजल लऽ एगारह लोटा जल पंचमुखी महादेवक ऊपर ढाड़लनि‍। लगभग 15 मि‍नट घर महेशवानी, नचारी इत्‍यादि‍ सेहो गेलीह। आ अन्‍तत: घर दि‍स बि‍दा भेलीह। घरपर माय पुछलखि‍न्‍ह- “चन्‍दा, पंचमुखी महादेवकेँ जल चढ़ेलौं बेटी?” चन्‍दा बि‍ना कि‍छु कहने गर्दनि‍ हि‍लबैत हँ कहि‍ देलखि‍न्‍ह। माइक मोन तीरपीत। जल्‍दीसँ चन्‍दाक आगूमे भोजन परसि‍ देलखि‍न्‍ह। मुदा चन्‍दा मोनसँ नै खेलीह। राघवकेँ यादि‍मे डुमल रहलीह। केकरो लग नै बजलीह अपन वेदना। समए बीतए लगलैक। एक दि‍न बुलेसर बाबूक पत्नी अर्थात् चन्‍दाक माय बुलेसर बाबूकेँ कहलखि‍न्‍ह- “सुनै छी, चन्‍दा आब बि‍आह जोगरक भऽ गेल अछि‍। हमरा सभकेँ बेटा ई तीनू बेटि‍ये अछि‍। तँए नीक घर-बर ताकि‍ ऐ तीनूकेँ बि‍आह कऽ दि‍औक। सम्‍पति‍ राखि‍ की करब? जखन तीनू बेटीकेँ बि‍आह भऽ जाएत आ ओ सभ अपन-अपन सासुर बसए लागत तँ धराड़ी आ कि‍छु कलम छोड़ि‍ तमाम सम्‍पति‍ बेच, सभ पैसाकेँ बैंकमे राखि‍ अपने दुनू प्राणी काशी चलि‍ जाएब। बैंकक सूदि‍सँ जीवन चलत। नौमनी तीनू बहि‍नकेँ बना देबैक। मुदा ई सभ तखन सम्‍भव अछि‍ जखन अहाँ जीमन, लगानी, वस्‍तु, पैसा इत्‍यादि‍केँ बँटवारा कऽ लेब। कहि‍यनु कन्‍हाइ बाबूकेँ जे बाँटि‍ कऽ सभ वस्‍तु ब-हि‍स्‍सा बराबरि‍ कऽ कऽ दऽ देथि‍।” बुलेसर बाबू कहलखि‍न्‍ह- “हँ, हँ। कन्‍हैया कि‍एक नै देत। ओकरा तँ तरीकासँ हमरा जेठाँस देमाक चाही। बपौती सम्‍पति‍क अलाबे जे अर्जन भेल अछि‍ तइमे हम्‍मर योगदान कन्‍हैयासँ बहुत ज्‍यदा अछि‍। हम काल्हि‍ये कन्‍हैय्या लग ई प्रस्‍ताव राखैत छी।” बुलेसरकेँ पत्नी कहलखि‍न्‍ह- “जखन कन्‍हाइ बाबू दऽ देताह तखने कहब। कहि‍ नै कि‍एक हमर मोन बड्ड घबरा रहल अछि‍।” बुलेसर बाबू बजलाह- “अहाँ अनेरे घबराइ छी। स्‍त्री छी स्‍त्रीगन जकाँ रहू। जाउ भोजन-भात बनाउ गऽ। हम काल्हि‍ये कन्‍हैया लग ई प्रस्‍ताव राखब आ एक मासक भीतर सभ चीज बाँटि‍ लेब। फेर नीक जकाँ तीनू बेटीकेँ बि‍आह करब। आब ऐ केर अलाबा हमरा सभकेँ कार्ये की?” दोसर दि‍न दुपहरमे बुलेसर बाबू दरबज्‍जापर अपन छोट भाए कन्‍हाइ बाबू लग बैसल रहथि‍। कन्‍हाइ बाबू कनीक बुलेसर बाबूसँ ज्‍यादा पढ़ल छलाह। मुदा पाँचसँ ज्‍यादे नै। एक नम्‍बरक घुइयाँ आ कइयाँ। कन्‍हाइ बाबूकेँ चारि‍ बालक आ दू बालि‍का। बालक सभ पढ़ैमे भोथ मुदा कन्‍हाइ बाबू घरेमे मि‍डि‍ल स्‍कूल केर एक मास्‍टर साहेबकेँ रखैत छलाह। हुनका मुफ्तमे भोजन आ रहबाक व्‍यवस्‍था कऽ देने छलखि‍न्‍ह। कखनौं कालकेँ कि‍छु आर्थिक मदति‍ सेहो कऽ दैत छलखि‍न्‍ह। कृतज्ञ मास्‍टर नि‍यमि‍त रूपसँ कन्‍हाइ बाबूकेँ भोथ आ नालायक बेटा सभकेँ पढ़बैत रहैत छलाह। कन्‍हाइ बाबू चोरा-चोरा कऽ पैसा इत्‍यादि‍ अपन पत्नी तथा बेटा सबहक नामसँ गामक पोस्‍ट आॅफि‍स तथा अपन सासुरमे रखैत छलाह। ऐ बातक जानकारी बुलेसर बाबूकेँ नै छलन्‍हि‍। कन्‍हाइ बाबू मोने-मोने ई प्‍लान कऽ रहल छलाह जे बुलेसर बाबूकेँ बेटीक बि‍आह कुनो सामान्‍य परि‍वारमे करा बुलेसर बाबूक तमाम जमीन आ चल-अचल सम्‍पति‍केँ हथि‍या लेताह। बुलेसर बाबू कहलखि‍न्‍ह- “कन्‍हैया, हम आ तूँ दुनू भाँइ एके संग रहलौं। मि‍ल कऽ सम्‍पति‍ बनेलौं। तोरा भगवान चारि‍टा लड़का देने छथुन्‍ह। मुदा हमरा तीनटा बेटि‍ये अछि‍। ई तीनू बेटी हमरा लेल बेटासँ कम नै अछि‍। आब चन्‍दा बि‍आह जोगरक भऽ गेल अछि‍। आनो सभ उपरे-नीचा छैक। चन्‍दाक माय हमरा सदि‍खन एकर सबहि‍क बि‍आह करा देबक हेतु कहैत रहैत छथि‍। हम सोचैत छी, जे मरला उत्तर हम्‍मर सम्‍पति‍केँ हकदार यएह सभ हएत। फेर हम अपन जीबैत सम्‍पति‍ बेचि‍ एकर सभकेँ नीक घरमे कएक नै बि‍आह करा दि‍ऐक? मुदा हमरा तँ अधि‍कार केवल अपन हि‍स्‍सापर अछि‍। सझि‍या-साझपर नै। तँए दुनू भाँइ अपन तमाम सम्‍पति‍क बँटवारा कऽ लैत छी। तोहर की वि‍चार करतौक। तों अनेरे चि‍न्‍ता नै कर।” ई बात होइते रहैक ताबतेमे चन्‍दाक माय आंगनसँ दरबज्‍जापर आबि‍ गेलीह। कहए लगलखि‍न्‍ह- “सभ चीज ठीक छै कन्‍हाइ बाबू। मुदा बँटवारा तँ भऽ जेबाक चाही। सझि‍या-साझमे हमरा समस्‍या अछि‍ कुनो चीज करहौक मन हएत तँ मोन मसौसि‍ कऽ रहए पड़त। बि‍आह-दानक बाद जे सम्‍पति‍ रहतैक से अहुना अहि‍ंक बच्‍चा सभकेँ रहत। अहाँ हमरा सभकेँ सभ सम्‍पति‍ बाँटि‍ दि‍अ।” कन्‍हाइ बाबू ऐ बातपर चि‍चि‍आइत बजलाह- “भौजी! अहाँ आंगन जाउ। हमरा दुनू भैयारीमे अहाँ नै बाजू। हमरा सभकेँ जेना हएत तेना करब। अहाँ जाउ। लप्‍प दनी दरबज्‍जापर आबि‍ जाइत छी। जएब की नै?” बुलेसर बाबू बीचेमे अपन पत्नीक बातक समर्थन करैत बाजि‍ उठलाह- “कन्‍हैया, भौजी तँ वएह बात कहै छथुन्‍ह जे हम कहि‍ रहल छि‍अह। तों तामस नै कर आ सम्‍पति‍ बाँटि‍ ले। सभटा लहनाकेँ बही, द्रव्‍य-जात, पैसा इत्‍यादि‍ एकठाम कर आ बाँट।” कन्‍हैया तामसे घोर भऽ गेलाह। कहए लगलखि‍न्‍ह- “भैया, लगानीमे बारह अना हम्‍मर अछि‍ केवल चारि‍ अना तोहर। तों घरमे जोखैत छेँ, खेती करैत छेँ।” हम चारू बापुते गामे-गामे, घरे-घरे जा कऽ तगादा करैत छी आ डुमल पाइ वापस लबैत छी।” बुलेसर बाबूकेँ आँखि‍क आगु अन्‍हार भऽ गेलन्‍हि‍। बजलाह- “हम की नै केलौं। कर्म-कुकर्म सभ। राति‍-दि‍न तोहर संग देलयौक। लोक सभसँ झगरा-फसाद केलौं। आब कहैत छेँ जे द्रव्‍य-जात एवं पैसापर हम्‍मर हक केवल चारि‍ आना? हे भगवानक डांगसँ डर कन्‍हैया!!! चल पाँचटा पंच बैसबैत छी। काल्हि‍ये ऐ बातक नि‍बटारा भऽ जेबाक चाही।” कन्‍हैया कहलखि‍न्‍ह- “नि‍वटारा की हेतैक भैया, नि‍बटारा भेले बूझ। तोरा चारि‍ आना हि‍स्‍सा भेटतै द्रव्‍य-जात अा लटनामे।” ई कहि‍ कन्‍हैया अपन बरका बेटाकेँ लगानी बला सन्‍दूर चाभी देमए लगलाह।” ई चीज बुलेसर बाबूकेँ बरर्दास्‍त नै भेलन्‍हि‍। तुरत झपटि‍ कऽ चाभी छन्‍हि‍ लेलन्‍हि‍ आ बाजय लगलाह- “रे ककर मजाल छैक जे हमर आधा हि‍स्‍सा रोकि‍ लेत। तकरा कुट्टी-कुट्टी काटि‍ देबैक।” बुलेसर बाबू सन्‍दुक चाभी छीनि‍ घर दि‍स बि‍दा भेलाह। पाछाँसँ कन्‍हाइ बाबू हुनका भरि‍-पाज कऽ पकरलन्‍हि‍ आ हुनकर हाथसँ चाभी छीनए लगलाह। बुलेसर बाबू छलाह बलि‍स्‍ठ। एकै बेरमे कन्‍हाइकेँ उठा कऽ पटकि‍ हुनकर छातीपर चढ़ि‍ गेलाह। मुदा पाछाँसँ कन्‍हाइ केर ई बालक लाठी लऽ ताबर-तोर बुलेसर बाबूपर प्रहारक देलकन्‍हि‍। कपार फूटि‍ गेलन्‍हि‍। माथक शोनि‍त पोछए लगलाह। अतबेमे कन्‍हाइ बाबू हुनकर हाथसँ चाभी छीनए लगलथि‍न्‍ह। मुदा बुलेसर बाबू चाभी नै देलखि‍न्‍हि‍। आब कन्‍हाइ बाबू तीनू-बाप बेटा मि‍ल बुलेसर बाबूपर प्रहार करए लगलखि‍न्‍ह। हत्‍थम, लत्तम, श्रुत्तम आ लाठीक प्रहार। असगर बुलेसर बाबू की करि‍तथि‍? देह चूर-चूर भऽ गेलन्‍हि‍। चाभी सेहो छि‍ना गेलन्‍हि‍। बेचारी पत्नी लाचार भऽ अपन देअर आ देअरक बेटा सभकेँ गारि‍ दैत रहलीह। सरापैत रहतीह। “नि‍पुत्रीपर हाथ उठेलक अछि‍। सर्वनाश भऽ जएतैक। तड़पि‍-तड़पि‍ कऽ मरत कन्‍हैया सरधुआ! कुस्‍टी फुटतैक। वाक् बन्‍द भऽ जएतैक। देहसँ गन्‍ध नि‍कलतैक। अपन संतान आ घरवाली तक काज नै अएतैक।” बुलेसर बाबूक पत्नी गारि‍ पढ़ैत रहलीह आ अपन ढेर भेल पति‍केँ मरहम पट्टी करैत रहलीह। कनीक कालक बाद चौकसँ जीतू कम्‍पाउण्‍डर अएलाह आ बुलेसर बाबूकेँ मल्हम-पट्टी केलन्‍हि‍। दर्द बड्ड रहन्‍हि तकर नि‍वारण हेतु दूटा सूई आ बहुत रास दबाइ सेहो देलकन्‍हि‍। बुलेसर बाबू कराहैत रहलाह। छटपटाइत रहलाह। चंदा पाथर भेल ठाढ़ छलीह। आँखि‍सँ नोर दहो-बहो खसैत रहलन्‍हि‍। गुमान जेना धरासाइ भऽ गेलन्‍हि‍। जखन ऐ घटनाक जानकारी राघवकेँ भेटलन्‍हि‍ तँ राघव मोने-मोन बड़ प्रसन्न भेलाह। राघवकेँ भेलन्‍हि‍ जे आइ गुलेसर मलाहक अपमान आ ओकरा सतेबाक बदला बुलेसरकेँ नीक जकाँ भेटलन्‍हि‍। हलांकि‍ भोरे-भोर जखन पोखरि‍क कछेरपर चन्‍दाक मुँहकेँ देखलनि‍ तँ कनीक कष्‍ट जरूर भेलन्‍हि‍। सदति‍काल गुमान आ ठसकसँ चूर चन्‍दा आइ ग्‍लानि‍ आ बेदनाक मूद्रामे छलीह खीन्न आ शान्‍त। शायद असहाय सेहो। फेर यादि‍ अएलन्‍हि‍ बेचारा लाचार मल्‍लाहक दशा- आइ गाय जकाँ जे ई जनैत अछि‍ जे ओ कसाइ लग बाध्‍य हेबाक लेल जा रहल अछि‍। तथापि‍ ओ लाचार भऽ डंटाक भयसँ जाइत अछि‍ कसाइखानामे। तहि‍ना अपन फँसल गर्दनि‍क संग असहाय भय गुलेसरा बुलेसर बाबू संगे अखाड़ा गाछी गेल छल। आ ओतय एहन यातना भेटलैक जे ओही बेथे तड़पि‍-तड़पि‍ कऽ प्राण ति‍यागि‍ देलक। जखन राघवकेँ ई बात सभ स्‍मरण अएलन्‍हि‍ तँ फेर मोन प्रसन्न भेलन्‍हि‍। सोचलाह। नीक भेल सार बुसेराकेँ! कसाई बनैत छल। अपन तागत आ सम्‍पति‍क नाशामे बतहा कुकुड़ बनल छल। आब बुझह। मुदा राघव चन्‍दाक प्रति‍ प्रेमक भाव रखैत छलाह। कहि‍ नै कि‍एक राघवो चन्‍दाकेँ चन्‍दासँ कम सि‍नेह नै करैत छलाह। ऐ घटनाक तीन दि‍नक बाद चन्‍दा दुपहरमे नवका पोखरि‍पर आबि‍ पंचमुखी महादेवक मन्‍दि‍र केर पाछाँ फुलवारीमे अएलीह। राघव ओतय पहि‍नेसँ छलाह। आर कि‍योक नै छलैक। राघवकेँ देखैत चन्‍दा कहलखि‍न्‍ह- “राघव, अहाँकेँ एगो बात बूझल अछि‍?” राघव बजलाह- “की?” चन्‍दा कहलखि‍न्‍ह- “कन्‍हाइ काका हम्‍मर पि‍ताकेँ बड्ड मारलखि‍न्‍ह अछि‍। हमर पि‍ता छलाह असगर आ कन्‍हाइ काका तीन बापुते। गलती हमर पि‍ताकेँ केवल एतेक जे ओ कहलखि‍न्‍ह जे तमाम सम्‍पति‍क बॅटबारा कऽ लि‍अ। ओ सभ जानवर जकाँ मारलकन्‍हि‍। कपार फोर देलकन्‍हि‍। शरीरमे कम-सँ-कम 25 लाठी लागल छन्‍हि‍। पपि‍याहा चण्‍डेश्वर पंच जे अपनाकेँ सरकार बुझैत अछि‍ हमर पि‍ताकेँ थाना नै जाय देलकन्‍हि‍। कहलकन्‍हि‍ जे ऐसँ कन्‍यादानमे व्‍यवधान हएत। की ई हेबाक चाही?” राघव बजलाह- “हँ चन्‍दा, हमरा सभ बात काल्हि‍ जखन हम मातृकसँ एलौं तँ ज्ञात भेल।” एकाएक राघव केर धि‍यान चन्‍दा दि‍स गेलन्‍हि‍ तँ देखैत छथि‍ चन्‍दाक आँखिसँ नोर खसि‍ रहल छन्‍हि‍। राघव केर मोनमे चन्‍दाक प्रति‍ दयाक भाव उमरि‍ गेलन्‍हि‍। चन्‍दा लग गेलाह आ अपन गमछासँ चन्‍दाक नोर पोछए लगलाह। फुलवारीमे राघव आ चन्‍दाक अलाबे आर कि‍योक नै छलैक। चन्‍दो राघवकेँ पकडि‍ कानय लगलीह। राघव चन्‍दाकेँ भरि‍ पाँज कऽ पकड़ि‍ लेलन्‍हि‍। राघवकँ चन्‍दाक हृदैक धरकन स्‍पष्‍ट सुनाइत छलन्‍हि‍। बुझेलनि‍ जेना चन्‍दा आ राघव हमेशाक लेल एक भऽ गेल छथि‍। चन्‍दा सेहो राघवकेँ बाहि‍सँ ग्रसि‍त भऽ अपना-आपकेँ सुरक्षि‍त बुझैत छलीह। मुदा कनीकबे कालक बाद दुनू अलग भऽ गेलाह। भलन्‍हि‍ लोक देखत तँ की कहत??? कन्‍हाइ बाबू पंच लोकनि‍केँ कहलखि‍न्‍ह– “अहाँ सभ चारि‍म दि‍न बैसारमे आऊ। हम आब बुलेसर भैय्यासँ बॅटबारा कऽ लेब।” इम्‍हर कन्‍हाइ बाबूक बेटा आ पत्नी सभ मि‍लि‍ कऽ दलाल रूपी लोभी पंच सभकेँ कि‍छु-कि‍छु प्रलोभन दऽ सभकेँ अपना पक्षमे कऽ लेलन्‍हि‍। ऐ तमाम प्‍लॉटसँ बुलेसर बाबू अनजान छलाह। ि‍नर्धारि‍त दि‍न आ समैपर पंच सभ अएलाह। पंचायत शुरू भेलैक। पंच सभ काचें गाए खेलाह। केवल 30 प्रति‍षत लहना आ नगदी हि‍स्‍सा बुलेसर बाबूकेँ भेटलन्‍हि‍। खेत-पथार-घड़ारी इत्‍यादि‍मे आधा हि‍स्‍सा जरूर भेटलन्‍हि‍। चन्‍दाक माय भरि‍ इच्‍छे पंच सभकेँ गारि‍ पढ़लन्‍हि‍- “एक कप चाह, एक सेर तेल, पाँच सेर धानमे अपन इमान बेचैत अछि‍ सरधुआ पंच। आ ई चन्‍द्रशेखर सरकार। ई तँ साक्षात यमराज अछि‍। बहुखौका! जवानीमे घरवालीकेँ खा गेल। दि‍न भरि‍ चौकपर चाहक जोगारमे लागल रहैत अछि‍। बेटा कचरी-मुरही आ चाह बेचैत छैक। ओहीसँ गुजर चलैत छैक। सरधुआ के जरूर कन्‍हैयाक बहु सए-सैकड़ाक प्रलोभन देने हेतैक। अगर भगवान कतौ हेताह तँ गुँह गीज कऽ मरत सरधुआ सरकार!!” बॅटबाराक बाद बुलेसर बाबूक पहि‍ल उद्देश्‍य छलन्‍हि‍ चन्‍दाक बि‍आह। एक दि‍न ओलारपर बैसल छलाह बुलेसर बाबू तँ बाध दि‍ससँ लूटन एलखि‍न्‍ह‍ आ कहलखि‍न्‍ह- “बुलेसर भाय, अहाँ कन्‍हाइ लेल की नै केलौं। से कन्‍हाइ सम्‍बन्‍धक मर्यादाकेँ िबसरि‍ गेल। अपने तँ मारबे केलक बेटा सभसँ सेहो मरबेलक अहाँकेँ। एहेन जधन्‍य कृत्‍य! फाटू हे धरती!” बुलेसर बाबू कनैत बाजए लगलाह- “की कहूँ लूटन भाय, ई भाए नै कसाइ थि‍क। हम साँपक पोवाकेँ पोसलौं। कून-कून कर्म नै कएल कन्‍हैया लेल। सभ बि‍सरि‍ गेल। हे महादेव जनि‍हेँ तुहीं। जहि‍ना हमरा कना रहल अछि‍ तहि‍ना ओहो कानत।” लूटन बाबू बजलाह- “भाय, एक बात कहूँ?” जटैतकेँ बंगट पहलमानक दोसर बेटाकेँ पहि‍ल कनि‍याँ मरि‍ गेल छैक। प्रथम पत्नीसँ मात्र एक पूत्र दैक अपार संपति‍ तँ छैक। लाठी केर जोरगर ओ सभ सेहो अछि‍ अगर अहाँ कही तँ चन्‍दाक बि‍आहक चर्चा करी। अगर ई काज भऽ गेल तँ कन्‍हाइ औकातमे आबि‍ जएताह। अहाँ ताकतवर भऽ जाएब। चन्‍दा आ लड़कामे करीब चौदह बर्खक अन्‍तर छैक। ताहि‍ लेल कुनो बात नै। पहलमान छै, अपना उमेरसँ दस बर्ख कम्‍मे लगैत ैछक। आ चन्‍दो तँ ऊँचाइमे ठीक अछि‍। लूटन केर प्रस्‍ताव बुलेसर बाबूकेँ नीक लगलन्‍हि‍। बजलाह- “कन्‍हैयाकेँ औकात देखेनाइ जरूरी।” फेर कहलखि‍न्‍ह- “लूटन भाय, ई कार्य हमरा पसन्‍द अछि‍। चन्‍दा सभ तरहेँ ओइ घरमे राज करत। नौकर-चाकर सभ छैक। कुनो वस्‍तुक कमी नै छैक। लड़काकेँ पहि‍ल पत्नीसँ एक बेटा छैक तँ की भेलै? मुदा हमरा ऐ सम्‍बन्‍धमे कनि‍क चन्‍दाक मायसँ वि‍मर्श करबाक अछि‍। हमरा वि‍श्वास अछि‍ ओ मना नै करतीह। काल्हि‍ हम अहाँकेँ नीचाेड़ बता देब।” घर जाइते मातर बुलेसर बाबू चन्‍दाक मायसँ जरैलक बंगट पहलमानक बेटाक सम्‍बन्‍धमे बात केलन्‍हि‍। दोती बर छैक ई जानि‍ चन्‍दाक माय कनी दुखी भेलीह परन्‍तु जखन आरो बातक जानकरी भेलन्‍हि‍ तँ मानि‍ गेलखि‍न्‍ह। फेर की छल, 15 दि‍नक अन्‍दर चन्‍दाक बि‍आह भऽ गेलन्‍हि‍। जहि‍या बि‍आह रहन्‍हि‍ चन्‍दाकेँ तहि‍या राघव सेहो सरि‍याती दि‍ससँ छलाह। जखन राघव चन्‍दाक वरकेँ देखलखि‍न्‍ह तँ मोन दग्‍ध भऽ गेलन्‍हि‍। 17 बर्खक चन्‍दाकेँ 31 बर्खक वर। बाहि‍ं सभपर गांठ पड़ल। चौरगर हाथ। माथपर तलबार आ कह्टाक चारि‍ नीशान! हे भगवान! चन्‍दा तँ बानरक हाथमे नारि‍केर भऽ गेलीह। खैर! पीअर परि‍धानमे सजलि‍ चन्‍दा बड्ड आकर्षक लगैत छलीह। बि‍आहमे बुलेसर बाबू तीन बीघा खेत बेचलाह। छह मासक बाद चन्‍दा सासुर गेलीह। इम्‍हर राघव दि‍ल्‍ली आबि‍ गेलाह। राघव जखन चारि‍-पाँच बर्खक बाद गाम गेलाह तँ संयोगसँ चन्‍दा सेहो आएल छलीह। हलि‍ कऽ काँट-काँट भेल! लोक सभकेँ पुछलखि‍न्‍ह तँ पता चललन्‍हि‍ जे चन्‍दाकेँ कुनो असाध्‍य बि‍मारी भऽ गेल छन्‍हि‍ जकर इलाज संभव नै छैक। चन्‍दा श्रीहीन भऽ गेल छलीह। अधि‍कांश समए नैहरमे बि‍तबैत छलीह। चन्‍दाक छोट बहि‍नक बि‍आह सेहो भऽ गेल छलन्‍हि‍। छह मासक बाद चन्‍दा मरि‍ गेलीह। चन्‍दाकेँ कुनो संतान नै भेलन्‍हि‍। चन्‍दाक मृत्‍युक समाचार सुनि‍ बुलेसर बाबू ओछाइन पकड़ि‍ लेलन्‍हि‍। लुटन बाबू एक बेर फेरो चन्‍दाक माय लग आबि‍ कहलखि‍न्‍ह जे चन्‍देक वरसँ चन्‍दाक सभसँ छोट बहि‍नक बि‍आह करा देल जाए। चन्‍दाक माय मानि‍ गेलीह। बुलेसर बाबू सुधि‍हीन भऽ गेलाह। चन्‍दाक छोट बहि‍नक बि‍आह चन्‍दाक दोती वरसँ भऽ गेलन्‍हि‍ जे चन्‍दाक बहि‍न लेल तृती वर छलखि‍न्‍ह। बि‍आहक सोल्हमे दि‍न द्वि‍रागमन भऽ गेलैक। द्वि‍रागमनक दस दि‍नक भीतर बुलेसर बाबू प्राण त्‍यागि‍ देलाह। चन्‍दाक माय नीकसँ श्राद्ध-शुरू केलथि‍न्‍ह। आब लगभग चारि‍ बीघा जमीन आ घराड़ी शेष छलन्‍हि‍। चन्‍दाक माय सभ बेचि‍ दरि‍भंगामे एक कमरा भाड़ा लऽ चलि‍ गेलीह। पैसा बैंकमे राखि‍ देलथि‍न्‍ह। ओही पैसाक सूदि‍सँ गुजर चलए लगलन्‍हि‍। इम्‍हर कन्‍हाइ बाबूकेँ कंठमे घाव भऽ गेलन्‍हि‍। पैघ ऑपरेशन कराबए पड़लन्‍हि‍। जखन ऑपरेशन भऽ गेलन्‍हि‍ तँ पता चललैक जे कैंसर छन्‍हि‍। धीरे-धीरे आबाज समाप्‍त भऽ गेलन्‍हि‍। गर्दनि‍सँ सदरि‍काल पीज चूबए लगलन्‍हि‍। मुँह आ गर्दनि‍सँ दुर्गन्‍ध गन्‍हाए लगलन्‍हि‍। बड़ बेटा-पुतोहु कि‍योक आगाँ लग नै आबन्‍हि‍। धन्‍य कहीं एक बेरोजगार नाति‍केँ जे नानाक कि‍छु-कि‍छु सेवा करन्‍हि‍। वाकहीन कन्‍हाइ बाबू सन्‍दूकसँ चोरा कऽ अपन पाइमे सँ लाख टका अपन नाति‍केँ दऽ देलथि‍न्‍ह। बहुत कि‍छु बाजए चाहैत छलाह कन्‍हाइ बाबू मुदा वाक् बन्‍द भऽ गेल छलन्‍हि‍। घावमे पि‍लुआ सेहो फरि‍ गेल छलन्‍हि‍। शायद ओ मोनहि‍ मोन अपन कर्मपर पश्चाताप करैत छलाह। ऐ घोर कष्‍टमे सेहो कन्‍हाइ बाबू नौ मास छटपटाइत रहलाह आ जीलाह। अन्‍तत: एक दि‍न कन्‍हाइ बाबू अपन शरीरक त्‍याग केलन्‍हि‍। शरीरसँ अतेक गन्‍ध अबैत छलन्‍हि‍ जे एग्‍यारह आदमी कठि‍यारीमे जएबाक लेल तैय्यार नै। राघव संयोगसँ गाम आएल छलाह। माय कहलथि‍न्‍ह- “राघव, अहाँ जाउ। हमरा लोकनि‍ ऐ समाजमे रहैत छी। अहूँ नै जएबैक तँ अहूँक माता-पि‍ता बेरमे कि‍योक नै आएत।” राघव माइक आज्ञाकेँ सम्‍मान करैत कन्‍हाइ बाबूक दाह संस्‍कारमे गेलाह। जखन मृतक केर शरीरमे आगि‍क ज्‍वाला बढ़लैक तँ राघवकेँ लगलन्‍हि‍ जेना ओतए ओइ मृत्‍युपर गुलेसरा मल्‍लाह, बुलेसर बाबू आ चन्‍दा जेना समवेत रूपसँ जश्न मना रहल छथि‍। गुलेसरा मल्‍लाह जेना डंटा उठा बुलेसर बाबू आ कन्‍हाइ बाबूकेँ डांग मारि‍-मारि‍ अपन बदला लऽ रहल हो। आ चन्‍दा गुलेसरा मल्‍लाहसँ अपन पि‍ताक रक्षाक नि‍वेदन करैत छलीह। अही प्रक्रि‍यामे कन्‍हाइ बाबूक शरीर खाक् मे वि‍लि‍न भऽ गेलन्‍हि‍। सबहक संग राघव सेहो कठि‍यारीसँ आपस आबि‍ गेलाह। मोने-मोन सोचए लगलाह राघव- स्‍वर्ग नर्क तँ अतहि‍ अछि‍। जे जेहेन करत से तेहेन पाऔत। लघुकथा: प्रकृति‍ सुन्‍दरि‍ आ चूहर मि‍स्‍त्री छोटानागपुर अर्थात आजुक झारखण्ड केर धरती, पहाड़, झरना, जंगल, नदी वन्‍यजीव आ अन्‍तत: नि‍श्छल नि‍ष्‍कपट जनजाति‍सँ हम जेना नेनपनेसँ एक अटूट सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त कऽ लेने रही। हरदम अपना-आपकेँ जनजातीय वर्गक बच्‍चा एवं उमरगर लोक सभ लग हम सुरक्षि‍त अनुभव करैत रही। कुनो संशय अथवा भय कहि‍यो नै भेल। मुदा जखन-जखन माए हमरा सभ लग सेन्‍हा रहय लेल अबैत छलीह तँ अनेरे परेशान भऽ जाइत छलीह। हम्‍मर माएकेँ अगल-बगलक स्‍त्रीगण सभ कहलकनि‍ जे अतए केर आदि‍वासी, वि‍शेष रूपेँ उराँव धानक बीया छीटैसँ पहि‍ने ग्राम्‍य देवता, स्‍थान देवता, कृषि‍ देवता एवं कुल देवताकेँ प्रसन्न करबाक लेल प्रथम सात बाकुट धानकेँ मुर्गा, कुनो आरो चि‍ड़ै, चाऊरसँ निर्मित स्‍थानीय शराब - हंड़ि‍या आ अन्‍तत: मनुक्‍खक शोनि‍तसँ सानि‍ ओइकेँ अभि‍मंत्रि‍त कए ओकरा सर्वप्रथम गामक प्रधानक हाथसँ खेतमे बाउग करैत अछि‍। मनुक्‍खोमे बच्‍चा सभकेँ खूनक प्रयोगक उत्तम मानल जाइत छैक। ऐ लेल चोरा कऽ कुनो बच्‍चाकेँ पकड़ि‍ ओकर घेटक टेटुआकेँ तेजगर चक्कूसँ काटि‍ ओकर रक्‍तकेँ बांसक फोफीमे निकालि‍ ओइ रक्‍तसँ पूजा कएल जाइ छै। ऐ प्रक्रि‍यामे जै बच्‍चाकेँ गर्दनि‍केँ टेटुआकेँ काटल जाइ छै तकर मृत्‍यु ओतहि‍ भऽ जाइ छै। टेटुआकेँ पूजामे प्रयुक्‍त होबाक हेतु काटक परम्‍पराकेँ स्‍थानीय भाषामे ओरका कहल जाइ छै। हलांकि‍ अप्‍पन जीवनक 23 वर्ष धरि‍ हम कहि‍यो कुनो घटना अपना आँखि‍सँ नै देखलि‍ऐक। लोक-सबहक मुँहेँ ऐ वि‍षयमे चर्चा करैत अनेको बेर सुनने अवश्‍य रही। हम्‍मर कारी भेनाइ शाइद हमरा लेल एकटा वरदान छल। छोटानागपुरक आदि‍वासी सभ हमरा कारी होबाक तथा घुरमल-घुरमल केस होबाक कारणे अपने समुदायक सदस्‍य बुझैत छल। उपरसँ सेन्‍हा तथा सेन्‍हाक अगल-बगलक लगभग 15 गाममे आदि‍वासी महि‍ला सभ चर्खा चलबैत छलीह। पि‍ताजी खादी भंडारक व्‍यवस्‍थापक छलाह, तै कारणे सेहो आदि‍वासी-महि‍ला-पुरूष हमरा बड्ड सि‍नेह करैत छल। हम सदति‍काल कोनो-ने-कोनो बहाना बना गामे-गाम घुमैत छलहूँ। कखनो-काल माए सेहो कहैत छलीह- “जो राधव, बगलक आदि‍वासी गामसँ खेतक टटका हरि‍यर तरकारी लऽ आ।‍” आ हम अही सभ चीजक फि‍राकमे रहि‍ते छलौं चटदनि‍ कुनो आदि‍वाी गाम दि‍स वि‍दा भऽ जाइत रही। केवल धनरोपनीक समैमे हमर माए साकांक्ष भऽ जाइत छलीह। साफे मना कऽ दै छलीह- “देख राघव, कुनो परि‍स्‍थि‍ति‍मे भरि‍ रोपनी तों कुनो गाम दि‍स नै जएबैं। हमरा कतेको लोक सभ कहलक अछि‍ जे अही समैमे आदि‍वासी सभ ओड़का पूजै छै। हम तोरा पि‍ताजीकेँ सेहो बुझा देने छि‍यनि‍ जे ऐ एक-डेढ़ मास धरि‍ तोरा कतौ असगरे नै भेजथुन्‍ह।‍” हम्‍मर परि‍वारमे माइक आज्ञाक अवहेलना करबाक हि‍म्‍मत हमर कुनो भाए-बहि‍नकेँ नै छल। पि‍ताजी सेहो हरदम माइक बातकेँ सर्वोपरि‍ मानैत छलथि‍न। हमरा लेल तँए ओ एक-डेढ़ मास बड्ड बेकार होइत छल। हम रोपनीक समैमे अपना-आपकेँ जहलमे कैद, लाचार अपराधी मानै छलौं। मुदा दोसर कुनो उपायो तँ नै छल। आदि‍वासी महि‍ला सभ चर्खा हमर पि‍ताजीक अथक प्रयासक कारणे कटनाइ प्रारम्‍भ केलनि‍। हुनका सभकेँ हरेक पनरह दि‍नपर सेन्हा खादी भण्‍डारपर बजा कऽ बीट करा कऽ तूरक पोला देल जाइत छलनि‍। पोला जोखि‍ कऽ देल जाइत छलैक। जखन महि‍ला सभ ओइ पोलाकेँ चरखापर चढ़ा ताग बना लैत छलीह तँ हरेक 15 दि‍नपर ओइ तागकेँ जोखि‍ कऽ खादी भण्‍डारमे लऽ लेल जाइत छलैक। मि‍हनताना तागक एकबद्धता तथा सूक्ष्‍मताक आधारपर देल जाइत छलैक। सूक्ष्‍मताक माप 40 अंकसँ प्रारंभ भऽ 160 अंक धरि‍ चलैत छलैक। जतेक कम अंक भेटतैक ततेक मोट आ उखरल सूत मानल जेतैक। कि‍छु एहेन बेबस्‍था छलैक। आ जतेक पातर आ समरस हेतैक ततेक बेसी नम्‍बर भेटतैक अर्थात् ई जे कम नंबर वालीकेँ कम मि‍हनताना जा ज्‍यादे पातर या सूक्ष्‍म ताग तैयार करैवालीकेँ ज्‍यादे मि‍हनताना। चर्खाक मरम्‍मत, रखरखाव, लोक सभकेँ सेन्हा मुख्‍य खादी भण्‍डार तथा गाम-गाम जाइक जानकारी देबाक जि‍म्‍मेवारी खादी भण्‍डारक छलैक। खादी भण्‍डारमे ई कार्य एकटा कार्यकर्ता श्री मंगनू ठाकुर करैत छलैक। मंगनू ठाकुरक अवस्‍था ओइ समए करीब 52 वर्ष छलैक। ओ जाति‍केँ बढ़इ तथा समस्‍तीपुरक कुनो गामक छल। दुबर-पातर चेरा सन शरीर आ श्‍याम बरण केर छल ंगनू ठाकुर। नशामे केवल तम्‍बाकू चुसै छल। महा कंजुस। सदति‍काल पैसा बचेबाक प्रवृत्ति‍मे मग्‍न रहैत छल। ओकर जेठ बेटाक वि‍याह-दान भऽ गेल रहैक। खादी भण्‍डारक तमाम चर्खा तथा ओकर कल-पूर्जाक बड्ड नीक जानकारी छलैक मंगनू ठाकुरकेँ। अपन धंधा अर्थात चर्खा वि‍शेष रूपसँ अम्‍बर तथा पेटी चर्खाक महारथी छल ओ। यएह कारण छलैक जे हमर पि‍ता ओकरा दोसर ठामसँ स्‍थानान्‍तरण करा अपना लग सेन्‍हा अनने छलथि‍न। इम्‍हर पाँच वर्षमे दू बेर मंगनूकेँ स्‍थानान्‍तरणक आदेश प्रधान कार्यालय, छोटानागपुर खादी ग्रामोद्योग संस्‍थान, तिरील, राँचीसँ अएलैक मुदा दुनू बेर हमर पि‍ताजी अपन प्रभुत्‍वक बलपर ओकरा सेन्‍हासँ कतौ आनठाम नै जाए दलथि‍न। जनजातीय समुदायसँ हमर आत्‍मीयता बढ़ाबैमे मंगनू ठाकुर केर भूमि‍का बड्ड पैघ रहल छैक। ओ अनेको जनजातीय गाम सभमे जखन चर्खा निरीक्षण मे जाइत छल तँ हमरा कहैत छल- “बउओ, अहूँ चलब?‍” आ हम अपन माए लग नि‍वेदन करए लगैत छलौं। मंगनू दरवारी प्रवृति‍क आरमी छल। ओकरा बूझल रहैक जे अगर मैडम (हमर माए) प्रसन्न रहती तँ मैनेजर साहेबसँ कुनो कार्य आसानीसँ भऽ जाएतेक। आ माएकेँ प्रसन्न करबाक लेल हमरासँ पैघ कुनो हथि‍यार नै भऽ सकैत छलैक ओकरा लेल। ओ माए लग आबि‍ कहए लागैत छलैक- “जाय दि‍यौक बउओकेँ मैडम!‍ कुनो दि‍क्कत नै हेतैक। हम अपना संगे साइकिलपर बैसा कऽ लऽ जाइत छि‍यैक आ अपने संगे तीन-चारि‍ घंटाक भीतर वापस लेने अएबैक। अतए ओहुना तँ बच्‍चा सभसँ मारि‍-पीट करैत रहैत अछि‍। ओतए लोक सभ लग एकर मोनो बठा जेतैक।” अन्‍तत: हमर माए कि‍छु ना-नुकुर केलाक बाद मंगनू हमरा लऽ जेबाक हेतु अनुमति‍ दऽ दैत छलथि‍न। पि‍ताजीसँ आज्ञा लेबाक कहि‍यो प्रयोजन नै परल। ओ हमरा प्रति‍ हरदम लि‍बरल रहैत छलाह। आ ऐ तरहेँ हम अनेको बेर सेन्‍हाकेँ अगल-बगलमे बसल जनजातीय गाम सबहि‍क भ्रमण मंगनू ठाकुर संग करैत रही। साइकि‍लक पाछाँमे बैस कऽ पहाड़ी इलाकामे भ्रमण करबाक एक अलग तरहक आनन्‍द अबैत छैक- परमानन्‍द! उबर-खाबर पगडंडी, ऊँच-नीच रस्‍ता। कतेको ठाम मंगनू ठाकुर साइकिल चलबैत-चलबैत हॉफय लगैत छल। कतेकोठाम ओकरा इंच चढ़ाइपर डबल लोडमे साइकिल नै हॉकल होइत छलैक। ऐ स्‍थि‍ति‍मे साइकिलपर सँ अपनो उतरि‍ जाइत छल आ हमरोसँ पैघ आत्‍मीय ढंगसँ कहैत छल- “बौआ, उतरि‍ जो। आगाँ बड्ड चढ़ाइ छैक। जखने चढ़ाइ समाप्‍त भऽ जेतैक तखने पुन: साइकिलपर हमरा लोकनि‍ चढ़ि‍ जाएब।‍” हमर चंचल मोन मंगनू ठाकुरकेँ ऐ तरहक प्रस्‍ताव बि‍ना कुनो प्रश्‍न आ उत्तरक मानि‍ जाइ छल। हम तुरन्‍ते साइकिलपर सँ उतरि‍ जाइत रही। आ जखने चढ़ाइ समाप्‍त होइत छलैक तँ हमरा साइकिलकेँ पाछाँमे बैसा ढलानपर मंगनू मस्‍तीमे एक-आध पैडल मारि‍ साइकिलपर झुमैत हर-हराएल चलल जाइत छल। मुदा एहेन रास्‍ताक लेल साइकिलकेँ पछुलका आ अगुलका दुनू ब्रेककेँ बि‍ल्‍कुल फीट आ टंच भेनाइ जरूरी, जैसँ कुनो बेलैंस बि‍गड़लापर अथवा रस्‍तामे कुनो तरहक बाधा अक्‍समात अएलापर साइकिल सवार ब्रेक मारि‍ अपन तथा अन्‍य लोकक सुरक्षा कऽ सकए। एक बेर तँ हम कालक गालमे जाइत-जाइत बचि‍ गेल रही। भेलै ई जे हम्‍मर साइकिलकेँ दुनू ब्रेक ढील भऽ गेल रहए। हम एकटा बि‍ल्‍कुल नीचा दि‍स ढलकैत सड़कपर अपन साइकिल चलेने तीव्र गति‍सँ जाइत रही। साइकिलकेँ आरो तेज करबाक रोमांसमे रोमांचि‍त होइत हम आरो जोर-जोरसँ पैडलकेँ अपन पएरसँ चलाबए लगलौं। लगैत छल साइकिलकेँ बदला कुनो फटफटि‍या चला रहल छी। एकाएक नीचामे टी प्‍वाईंट-क्रॉस सेक्‍सन-पर एकटा ट्रक तेजीसँ जाइत रहैक। हम ट्रकक बि‍ल्‍कुल लग आबि‍ गेल रही। झटाक दऽ ब्रेक मारि‍ साइकिलकेँ काबूमे करबाक प्रयास केलौं। मुदा बेकार। ब्रेक कार्य नै केलक। आब लागल जे मृत्‍यु अवि‍श्‍यम्‍भावी अछि‍। मुदा के नै अपन प्राणक रक्षा करए चाहैत अछि‍? हमहूँ बि‍ना एकौ क्षण बरबाद केने टांग-हाथ, मुँह-कान टुटबाक चि‍न्‍ता केने चलैत साइकिलपर सँ कुदि‍ गेलौं। साइकिलकेँ एना धक्का देलि‍यैक जैसँ ओ कातक खत्तामे खसि‍ गेलैक। हम स्‍वयं सड़कक कछेरमे खसलौं। पाँच मि‍नट धरि‍ कि‍छु पते नै चलल। जखन होश आएल तँ देखलौं जे हमर पि‍ताक एक मि‍त्र हमरा लग बड़ा चि‍न्‍ति‍त अवस्‍थामे ठाढ़ छथि‍। हुनकर चेहरापर क्रोध स्‍पष्‍ट परि‍लक्षि‍त छलनि‍। हमरा लागल जे आब ई हमरा नीक जकाँ बेइज्‍जत करताह। मुदा से नै भेल। ओ केवल अतवे कहलनि‍- “राघव, आइ अहाँ कालक गालसँ बचि‍ गेलौं। बच्‍चा छी बच्‍चा जकाँ साइकिल चलाउ।‍” हम पश्चातापक स्‍वरमे कहलि‍यनि‍- “की कहु काकाजी, एकाएक ब्रेक कार्य केनाइ बन्‍द कऽ देलक। साइकिलमे दुनू ब्रेक ढील भऽ गेल रहैक तकर जानकारी हमरा नै छल। आब जि‍न्‍दगीमे एहेन गलती नै करब।‍” ओ कहलनि‍- “कुनो बात नै। पहि‍ने उठि‍ कऽ ठाढ़ होउ। देखू कतौ चोट तँ नै आएल अछि?‍” ई कहैत ओ हमरा उठबए लगलाह। मुदा हम अपने फुरफरा कऽ उठलौं। खास चोट नै लागल छल। केवल ठेहुन आ कौहनी कनी छि‍ला गेल रहए। साइकिल उठेलौं तँ ओकर हैंडल कनी टेढ़ भऽ गेल रहैक। काकाजी साइकिलकेँ ठीक करैमे मदति‍ केलनि‍ मुदा कहलनि‍- “राघव, पहि‍ने अहाँ साइकिलक ब्रेक ठीक कराउ तखने ऐपर चढ़ब।‍” हम अपन गर्दनि‍ हि‍ला हुनकर आज्ञा मानबाक स्‍वीकृति‍ दैत साइकिल गुड़कबैत लऽ गेलौं। चली आब कथाक प्रसंग दि‍स। मंगनू मि‍स्‍त्री हमरा बच्‍चा सभ लग छोड़ि‍ स्‍वयं घरे-घरे लोकक चर्खाकेँ मरमम्‍ति‍ करए लगैत छल। लोक सभ हमरा बड्ड सि‍नेह करैत छल। हमर घरक नीपा-पोता तथा बरतन-बासन धोइवाली चेरी जकरा झारखण्‍डमे लोक दाई' कहै छैक, एक उराँव महि‍ला छलि‍। ओकर बेटा-बेटी हमरा संगे खेलाइत छलैक। दाइ सेहो हमरा माइये जकाँ सि‍नेह करैत छलि‍ आ हमर धि‍यान रखैत छलि‍। ओकरा सबहि‍क संगति‍मे हम उराँव भाषा धाराप्रवाह बाजब सीख गेल रही। तँए कुनो उराँव बहुल गाम अथवा इलाकामे हमरा सम्‍प्रेषणमे कुनो तरहक समस्‍या नै छल। बीच-बीचमे मंगनू ठाकुर हमर खोज-खबरि‍ लैत रहै छल। वापस जाइकाल हमरा लोकनि‍ अपना संगे बहुत रास हरि‍यर तरकारी, फल इत्‍यादि‍ लऽ जाइत रही। जे महि‍ला सभ चर्खा कटैत छथि‍, तनि‍का लोकनि‍केँ खादी भण्‍डारक शब्‍दवलीमे कति‍न' कहल जाइत छलैक। ओ सभ हरेक पन्‍द्रह दि‍नपर अपन काटल सूत-ताग-लऽ सेन्‍हा अबैत छलि‍। बीटमे सूतक नम्‍बरक आधारपर ओकरा सभकेँ मेहनताना देल जाइत छलैक। कुल आयमे सँ बांगक पैसा काटि‍ लेल जाइत छलैक आ बचल आमदनीकेँ चारि‍ अना हि‍स्‍साक खादी भण्‍डारमे जमा कऽ लेल जाइत छलैक, जकरा एवजमे ओ सभ साल भरि‍क भीतर कखनो कुनो खादीक वस्‍त्र यथा चद्दरि‍, कम्‍बल, धोती, कुर्ता, लुंगी, ओछाइन इत्‍यादि‍ किंवा वस्‍तु जेना कि‍ सरि‍सबक तेल, मधु, साबुन, अगरबत्ती आदि‍ लऽ सकैत छलि‍। बाद बाकि‍ बारह अना हि‍स्‍साक पैसा तुरत भुगतान हमर पि‍ताजी अपना सामने करबा दैत छलथि‍न। ओइ कति‍न सभमे एक कति‍न छलैक- राजकुमारी। ओ सेन्‍हासँ करीब 8 कि‍लोमीटर दूरक गामसँ पन्‍द्रह दि‍नपर पैदल आबैत रहैक मुदा ओकर वि‍याह नै भेल रहैक। बाइस वर्खक अवस्‍थामे ओकरा वि‍याह नै भेल रहैक से कुनो आश्चर्यक बात नै रहैक। कारण ई जे उराँव जनजाति‍क लोक पूरा वएस भेलाक बादे अपन लड़का अथवा लड़कीक वि‍याह करैत अछि‍। राजकुमारी बड़ा शांत आ गंभीर स्‍वभावक महि‍ला छलि‍। चेहरामे हरदम एक प्रकिर्तिक हंसिक भाव लेने तथा चुपचाप अपन काजमे मग्‍न। यएह छलैक राजकुमारीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व। ओ सांवरि‍ छलि‍। नाक कनि‍ पीचकल, चाम अन्‍य आदि‍वासी वालाक तुलनामे कनी साफ, कनी चमकगर, कनी रमनगर। वस्‍त्र ओ बड़ा तल्‍लीनतासँ धारण करैत छलि‍। कहि‍यो ओकरा उटपटांग वस्‍त्र पहि‍रने तथा अपन शरीक कुनो अंगकेँ देखार केने नै देखलि‍ऐक। राजकुमारी स्‍वभावसँ अतेक शांत छलि‍ जे अगर ओकरा संगे वार्तालाप केनि‍हार दस आखरि‍ बजैत तँ राजकुमारी एक आखरि‍। मुदा ओ अपन उपस्‍थि‍ति‍सँ लोककेँ अवश्‍य प्रभावि‍त करैत छलि‍। राजकुमारी सेन्हा मि‍डि‍ल स्‍कूलसँ सातवी धरि‍ पढ़लि‍ छलि‍। आगा शायद आर्थिक तंगी आ अगल-बगलमे हाइ स्‍कूल नै हेबाक कारणे नै पढ़ि‍ सकलि‍। हमरा आश्चर्य हरदम ऐ बातक होइ छल जे ओकर नाम राजकुमारी कियाक छलैक। एक दि‍न यएह प्रश्न हम अपन पि‍तासँ पुछलि‍यनि‍। हमर पि‍ता कहलाह- “राजकुमारीक माता-‍पि‍ता कुनो वि‍शेष कारणसँ एकर नाम राजकुमारी राखि‍ देने हेथि‍न।” मुदा अपन पि‍ताक जवाबसँ हम संतुष्‍ट नै भेलौं। हमर पि‍ता सेहो बुझि‍ गेलनि‍ जे राघव ऐ उत्तरसँ संतुष्‍ट नै अछि‍। हमर पि‍ता हमरा लोकनि‍क प्रसन्नतासँ आनन्‍दि‍त आ हमरा लोकनि‍क कष्‍टसँ दुखी होइत छलाह। ओ झटदनि‍ कहलनि‍- “ठीक छै राघव। अहाँ चि‍न्‍ता नै करू। ई प्रश् हम राजकुमारीक पि‍ता करमा उराँवसँ पुछबैक। फेर अहाँकेँ बताएब।‍” एक दि‍न जखन राजकुमारी अपन पि‍ताक संग खादी भण्‍डार आयलि तँ हम दौगल अपन पि‍ताजी लग गेलौं। हमरा देखते पि‍ता जीकेँ याद एलनि‍। ओ हमरा दि‍स देखैत हँसए लगलाह आ करमा उराँवकेँ पुछलखि‍न- “करमा उराँवजी, अहाँ अपन बेटीक नाओं राजकुमारी कि‍एक रखलौं?‍” करमा उराँव कहलकनि‍- “श्रीमान, हमरा सेन्‍हा स्‍कूलक हेड मास्‍टर एकटा बड्ड सुन्‍दर कथा सुनौलनि‍। ओइ कथाक मुख्‍य पात्र एक गंभीर आ सुन्‍दरि‍ कन्‍या छलैक। ओइ पात्रक नाओं छलैक राजकुमारी। ई नाम जेना हमरा हृदेमे रचि‍-बसि‍ गेल। ओइ कथाक दू वर्षक वाद जखन भगवान हमरा बेटी देलनि‍ तँ हम झटदनि‍ एकर नाओं राजकुमारी राखि‍ देल। श्रीमान, नामे अनुसार एकर व्‍यक्‍तत्‍व भऽ गेल छैक। बड्ड गंभीर, बुझनुक आ‍ मि‍लनसार अछि‍ हमर राजकुमारी। बेटा नालायक भऽ गेल अछि‍। सदति‍काल नशामे धूत्‍त रहैत अछि‍। मुदा हमर ई बेटी बेटोक भूमि‍का करैत अछि‍ हमरा सभ लेल। ऐ सभ कारणे एकर वि‍याह एखन धरि‍ टालि‍ रहल छी। अनेको रि‍श्‍ता लड़काबलासँ आबि‍ रहल अछि‍। मुदा डर भऽ रहल अछि‍ जे कहीं ई चलि‍ गेल तँ हमर सभकेँ की हाल हएत? इहो कहैत अछि‍, बाबा! हमरा ि‍वयाह नै करक अछि‍। हम अहाँ सबहक सेवा करए चाहै छी। मुदा श्रीमान एना कहीं भेलैक अछि‍? ि‍वयाह तँ करेबे करबै। राजकुमारीक माए हमरा आब सदति‍काल खोचारैत रहैत छथि‍ : कहै छथि‍ कि‍यो बेटीकेँ भला अपना सुख लेल बि‍ना ब्‍याहने अपना लग जि‍नगी भरि‍ रखै छै? लोक की कहत? राजकुमारी नेनमति‍मे ई बात कहि‍ रहलि‍ अछि‍ जे वि‍याह नै करब। हमरा अहाँकेँ मृत्‍युक पश्चात एकराकेँ देखतैक? आ श्रीमान हमरा राजकुमारीक मायकेँ बात कुनो अनरगलो नै लगैत अछि‍। हम तँ राघवजीक माएसँ सेहो निवेदन केलि‍यनि‍ अछि‍ जे ओ राजकुमारी के वि‍याह लेल मनाबथि‍। राजकुमारी अहाँ लोकनि‍केँ बात मानैत अछि‍।” पि‍ताजी राजकुमारीक पि‍तासँ वार्तालाप चलि‍ रहल छलनि‍। आब हमरा राजकुमारीक नामक रहस्‍यक पता चलि‍ गेल छल। राजकुमारी एहेन संस्‍कारी बेटी अछि‍ जे अपना माता-पि‍ताक कारण वियाहो नै करय चहैत अछि‍, ई जानि‍ राजकुमारीकेँ प्रति‍ हम्‍मर श्रद्धा बढ़ि‍ गेल। हमर पि‍ता सेहो राजकुमारी आ ओकर व्‍यक्ति‍वसँ बड्ड प्रभावि‍त भेलाह। क्रम अहि‍ना चलैत रहलै। कि‍छु दि‍नक बाद हम एक दि‍न ई अनुभव केलौं जे मंगनू मि‍स्‍त्री राजकुमारी दि‍स किछु बेसी आकर्षित भऽ रहल छल। ठीक एकर वि‍परीत राजकुमारी ओकरासँ दूर हेबाक प्रयास। जखन हमरा मंगनू मि‍स्‍त्री देखलक तँ ओकरा अपन गलतिक अनुभूति‍ भेलैक। कहलक- “बौओ। अहाँकेँ मैनेजर साहेब ताकि‍ रहल छलाह। हमरो पुछैत छलाह कि‍ राघव कतए गेल अछि‍? अहाँ जल्‍दीसँ हुनका लग जाउ। शायद कि‍छु अत्‍यावश्‍यक कार्य छन्हि‍। जाउ बउओ जल्‍दी जाउ। " हमरा भेल जे पि‍ताजी हमरा तकने हेताह। आ हम तुरत पि‍ताजी लग वि‍दा भेलौं। हम जखने पि‍ताजी लग जाए लग्लौं तँ मंगनू मि‍स्‍त्रीक मोन प्रसन्न भऽ गेलैक आ राजकुमारी कि‍छु परेशान आ वि‍वश बुझना गेल। तथापि‍ हम पि‍ताजी लग चलि‍ गेलौं। आब चर्खाक कार्यशाला मे राजकुमारी आ मंगनू मि‍स्‍त्रीकेँ अलावे कि‍योक नै छलैक‍! राजकुमारीक व्‍यक्‍ति‍वमे कि‍छु वि‍शेष अवश्‍य छलैक। ओ हमेशा बड्ड साफ-स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण केने रहैत छलि‍। ओकर केश बड्ड नमहर आ झमटगर रहैक। आँखि‍ छोट मुदा पनि‍गर, दाँत दूध जकाँ उज्‍जर सफेद, गसल-गसल, शरीर ने मोटे आ ने पतरे, कद करीब पाँच फीट-पाँच ईंच। कनीक शि‍क्षा प्राप्‍त करबाक कारणे राजकुमारी स्‍नो-पोडर इत्‍यादि‍ लगबैत छलि‍। ओ आन आदि‍वासी लड़की सभ जकाँ अपन शरीरमे कतौं गोदना नै गोदेने छलि‍। ओकर हाथ, गर्दनि‍, छाति‍क कि‍छु भाग, नाभि‍ प्रदेशक ि‍कछु भाग आदि‍ देखलासँ एना बुझना जाइ छलैक जेना ओकर समस्‍त शरीरमे कुनो दाग वा धब्‍बाक नामो नि‍शान नै छैक- Spotless beauty!!! ओ हमरा हरदम अप्‍पन छोट भाए जकाँ सि‍नेह करैत छलि‍। यदा-कदा हमराले अपन गामसँ मधु, आम, खीरा, ककरी, नेबो एवं अन्‍य चीज अवश्‍य आनैत छलि‍। एक दि‍न मंगनू मि‍स्‍त्रीक संगे हम पुन: साइकिलपर चढ़ि‍ राजकुमारीक गाम घुमए गेलौं। मंगनू मि‍स्‍त्री हमरा गामक मध्‍यमे बच्‍चा सभ लग छोड़ि‍ देलक। हमहुँ ओइ बच्‍चा सभ संगे पाकल-पाकल बीजू आम तोरए लगलौं। एक कतीन बड्ड सि‍नेहसँ अप्‍पन बारीसँ कुन्‍दरी देलक आ कहलक- “राघव, अहाँ ई कुन्‍दरी मैनेजर साहेबले लेने जाउ। हुनका नीक लगै छन्‍हि‍।” हम कुन्‍दरीबला झोरा उठा लेलौं। पता चलल जे मंगनू राजकुमारीक घर गेल अछि‍ ओकर चरखा ठीक करक हेतु। हमहुँ एक हम-व्‍यस्‍क आदि‍वासी कि‍शोर संगे राजकुमारीक घर दि‍स वि‍दा भेलौं। हमरा लोकनि‍केँ रस्‍तामे राजकुमारीक पि‍ता करमा उराँव भेटल। ओ कहलक- राघवजी, हम तँ जंगल दि‍स जाड़नि‍ लाबए जा रहल छी। मि‍स्‍त्री साहेब हमरे घरमे राजकुमारीकेँ चरखाक भाङठी कऽ रहल छथि‍। अहूँ सभ ओतए जाउ। करमा उराँव अप्‍पन हाथमे तेजगर आ भरि‍गर कुरहरि‍ लेने छल। ओकर पत्नी चारि‍टा रस्‍सी लेने ओकरे संगे जंगल जाए रहल छलैक।‍ खाइर, हम मस्‍तीमे चलैत राजकुमारीक अंगना लग एलौं। अंगनामे अबैत मातर बहुत वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍क सामना करए पड़ल। एहेन स्‍थि‍ति‍ जकर कल्‍पनो नै केने रही। अंगनामे अबैत मातर देखै छी जे राजकुमारीक घरक दरबज्‍जा आधा ओटाएल आ आधा खुजल। राजकुमारीकेँ कानक आवाज आबि‍ रहल छलैक। हमरा लोकनि‍ जखन ओतए गेलौं तँ देखलौं जे मंगनू मि‍स्‍त्री राजकुमारीक संग बलजोरी शारीरि‍क सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त कऽ रहल अछि‍। राजकुमारीकेँ अपना बांहपाशमे दबेने!! वि‍ल्‍कुल हिंस पशु जकाँ! अचानक राजकुमारीक धि‍यान हमरा दि‍स गेलैक। हम अपन गर्दनि‍ मोड़ि‍ वापस जाए लगलौं। राजकुमारी बहुत जोरसँ धक्का मारि‍ मंगनू मि‍स्‍त्रीकेँ अपनासँ अलग केलक। मंगनू मि‍स्‍त्री पुर्णत: वस्‍त्रहीन छल। अतबा काल धरि‍ हम आ आदि‍वासी कि‍शोर राजकुमारीक अंगनासँ बाहर चलि‍ आएल रही। लगभग 10 मि‍नटक बाद मंगनू मि‍स्‍त्री हमरा लग आएल। साइकिल नि‍कालैत कहलक- “चलू बउओ, आब वापस सेन्‍हा चलै छी। नै तँ अन्‍हारमे अनेरे परेशानी हएत। जंगल दने रस्‍ता छै। लोक सभ कहैत छल जे कखनो काल बाध-भालू, हाथी आदि‍ रस्‍तापर आबि‍ जाइ छै।‍” हम बि‍ना कि‍छु कहने ओकर साइकिलक पाछाँ बैस रहलौं। आनबेर राजकुमारी जाइकाल हमरा भेँट करए अबै छलि‍। ओइ दि‍न नै आएलि‍। हमहुँ भगवानसँ यएह मनबैत रहलौं जे 'हे भगवान आइ हमरा राजकुमारीसँ दर्शन नै हो तँ बड्ड उत्तम।' मंगनू मि‍स्‍त्रीक साइकिलपर पाछाँ बैसल हम चुपचाप ओकरा संगे सेन्‍हा आबि‍ रहल रही। रास्‍तामे कुनो तरहक वार्तालाप नै भेल। हमरा मोनमे मंगनू मि‍स्‍त्रीक प्रति‍ घोर घृणा उत्‍पन्न भऽ गेल छल। ओ हमरा मनुक्‍ख कम राक्षस बेसी लगैत छल। मोन होइ छल ऐ पापीकेँ घेंट दबा दी आ एकर जीवनक अन्‍त कऽ दी। मोनमे राजकुमारीक प्रति‍ दयाक भाव सेहो आबि‍ रहल छल। ओकर वि‍वशता आ लाचारीपर चिंतित छलौं। होइ छल केना कऽ राजकुमारी अप्‍पन चेहरा हमरा देखाओत आ केना कऽ हम ओकरासँ बात करब!! मोनमे घृणा, आक्रोश, लाचारी, वि‍वशता-तमाम भाव एक संगे आबि‍ रहल छल। एकाएक मंगनू मि‍स्‍त्री साइकिल रोकि‍ उतरि‍ गेल। हमरा कहलक- “बौओ, कनी नीचा उतरू।‍” हम उतरि‍ गेलौं मंगनू हमरा कनीक डेराएल लागल। परेशान चेहरा, घामसँ तर-बतर, आँखि‍ लाल-लाल, समस्‍त मुखाकृति‍पर पश्चातापक भाव। ओ हमर हाथ पकड़ि‍ बड़ा आत्‍मीय भावसँ जोरसँ दबेलक आ छोट बच्‍चा जकाँ कानए लगल। दुनू आँखि‍सँ दहो-बहो नोर झहड़ए आ मुँहसँ नि‍कलए लगलैक- “बउओ, अहाँ तँ हम्मर दुनू बेटासँ छोट छी। हमरासँ गलती भऽ गेल। माफ कऽ दि‍अ। हम अहाँकेँ पएर पकड़ै छी। राजकुमारी सेहो अप्‍पन माथ-कपार पीट रहलि‍ छलि‍। बउओ, अगर अहाँ ई बात अप्‍पन माए-बाबूजीसँ कहबनि‍ तँ हम आत्‍महत्‍या कऽ लेब। राजकुमारी सेहो अप्‍पन जीवनक अन्‍त कऽ लेत।‍” हम कहलि‍यनि‍- “अहाँ एहेन काज कि‍एक केलौं?‍” तैपर मंगनू कहए लागल- “बउओ, गलती भऽ गेल। ई हम्‍मर जीवनक प्रथम आ अन्‍ति‍म गलती थि‍क। भवि‍ष्‍यमे आब कहि‍यो नै हएत। अहाँ अप्‍पन माए-बाबूजीसँ ऐ बातक चर्चा नै करबनि‍। हम आहाँक पएर पकड़ै छी।‍” हमरा मंगनू मि‍स्‍त्रीपर दया आबि‍ गेल। हम कहलि‍यनि‍- “ठीक छै, हम अप्‍पन माए-बाबूजीसँ ऐ सम्‍बन्‍धमे कुनो चर्चा नै करबनि‍।‍” हमर ऐ अश्वासनपर मंगनूकेँ जान-मे-जान एलेक। ओ हमरा नीक जकाँ जनैत छल : जे हम एकबेर जे बाजि‍ देलौं से ब्रह्मलकीर होइत छै। एकर बाद हमरा लोकनि‍ सेन्‍हा आबि‍ गेलौं। मंगनूक प्रति‍ हमर मोनक घृणा आइयो धरि‍ नै कम भेल अछि‍। ऐ घटनाक बाद हम दू मास धरि‍ राजकुमारीक गाम नै गेलौं। घटनाक बादक 15मा दि‍नक बीटमे राजकुमारी नै अएलै। सूत लए बीट करक हेतु ओकर पि‍ता : करमा उराँव असगरे अएलै। करमा पि‍ताजीकेँ कहलकनि‍ जे राजकुमारी केर तबि‍यत ठीक नै छै। कि‍छु दि‍नक बाद हम एक वर्ष लेल अपन गाम आबि‍ गेलौं गामे केर स्‍कूलमे भैया नाओं लि‍खा देलनि‍। पुन: एक वर्षक पश्चात सेन्‍हा गेलौं तँ पता चलल जे राजकुमारीक वि‍याह भऽ गलैक आ ओ आब अपन पति‍क संगे अप्‍पन सासुरमे रहैत अछि‍। चरखा ओ सासुरोमे कटैत छलि‍। सामान्‍यतया ओकर पति‍ बीटक दि‍न कऽ सूत लऽ कऽ आबि‍ जाइ छलैक। एक दि‍न एक महि‍ला पाछाँसँ हमरा टोकलक- “राघवजी‍”! हम पाछाँ तकलौं तँ राजकुमारी छलि‍। एकदम पातर, रोगी जकाँ शरीर, आँखि‍क पानि‍ गाएब, चेहराक लालिमा समाप्‍त, केश ओझराएल, फाटल मैल सनक नुआ पहि‍रने.....। पहि‍ने तँ चि‍न्‍हेमे नै आएलि‍। फेर ओ स्‍वयं कहए लागलि‍- “वि‍मार पड़ल छी। डाक्‍टर कहैत अछि‍ टी.वी. भऽ गेल अछि‍। बड्ड महग इलाज छै। कौहुना चला रहल छी। राघवजी, अहाँ कोना छी?‍” राजकुमारीक बगे देख हमर मोन खि‍न्न भऽ गेल। भेल एक लहलहाइत फूल असमैमे केना मुरझा गेलै? भगवान एकरा की केलथि‍न? अतबे कहलि‍ऐक- “हम ठीक छी। कहि‍यो अहाँक सासुर अवश्‍य आएब। जल्‍दीये आएब कि‍एक तँ पि‍ताजीकेँ तबादला होबएबला छन्‍हि‍।‍” ई कहि‍ हम अप्‍पन संगी सभ लग खेलाइले चलि‍ गेलौं। तकर बाद करीब चारि‍ मास धरि‍ हम सेन्‍हा रहलौं। मुदा हम कहि‍यो राजकुमारी लग नै गेलौं आब हम राजकुमारी ओइ मुरझाएल, वि‍मार आ आभाहीन मुखमण्‍डलकेँ नै देखए चाहै छी। एक दि‍न भोरे-भोर करमा उराँव हमर माए लग आबि‍ कानए लागल। ओकर बूढ़ शरीर हीलए लगलैक। माए पुछलथि‍न- “की भेल?‍” तँ करमा उराँव आरो जोरसँ ठोहि‍पाड़ि‍ कानए लागल। बड़ी-कालक बाद टुटैत स्‍वरमे कहलकनि‍- “की कहू मालकि‍न, हमर राजकुमारीकेँ दुनि‍याँ उजड़ि‍ गेल। ओकर सर्वनाश भऽ गेलैक।” हमरा माएकेँ भेलनि‍, शाइद राजकुमारीक पति‍क देहान्‍त भऽ गेलैक। चिंतित एवं व्‍यग्र होइत पुछलथि‍न- “साफ-‍साफ बाजू ने की भेलै राजकुमारीकेँ? अहाँ जमाएकेँ तँ ने कि‍छु भेल?”‍ तैपर करमा उराँव कहलकनि‍- “ओइ कसइयाकेँ कि‍ए कि‍छु हेतै मालकि‍न। पहि‍ने तँ हमरा बेटीकेँ दुखि‍त कऽ देलक। फेर अवहेलना। तकर बाद दोसर वि‍याह कऽ लेलक। आब हम्‍मर जमाए आ ओकर सगही बहु, दुनू मि‍ल कऽ राजकुमारीकेँ अपना घरसँ मारि‍-पीट कऽ भगा देलकै।‍” हम्‍मर माता-पि‍ता एवं हम स्‍वयं करमा उराँवकेँ ऐ व्‍यथासँ बड्ड द्रवि‍त भेलौं। मुदा की कऽ सकै छलि‍ऐक। कनी-कालक बाद भोजन बनलै। माए ओकरा बलजोरी भोजन करा देलथि‍न। एकटा नव नुआ, ब्‍लाउज, साया तथा तीन खण्‍ड पुरान नुआ राजकुमारीकेँ पहि‍रैले देलखि‍न। पि‍ताजी कि‍छु नगद सेहो देलखि‍न। एक मासक बाद पि‍ताजीक स्‍थानान्‍तरण सेन्‍हासँ राँची भऽ गेलनि‍। हम सभ राँची आबि‍ गेलौं। करीब एक वर्ष बीत गेलै। एक दि‍न राँची कि‍छु समान लेबाक लेल मंगनू मि‍स्‍त्री अएलैक। ओ हम्‍मर माएसँ भेँट करए अएलनि‍। अनेक तरहक बात भेलैक। अन्‍तत: माए पुछलखि‍न- “राजकुमारीक की हाल? दोसर वि‍याह केलकै की नै?‍” मंगनू मि‍स्‍त्री कहलकनि‍- “वि‍याह की करत बेचारी। ओ तँ ऐ दुनि‍येसँ वि‍दा भऽ गेल। राजकुमारीक मरला करीब पाँच साम भऽ गेलैक। पहि‍ने बाप मरलै बादमे अपने दवाइ दारूक बेतरे कहरि‍ कऽ मरि‍ गेल।‍” ई बात सुनि‍ हम्‍मर माए बड्ड दुखी भेलीह। हमरा भेल- 'चलू नीक भेलै, बेचारीकेँ कष्‍टसँ मुक्‍ति‍ भेट गेलै।' हँ मंगनूपर धोर तामस होइत छल। भेल ई आदमी 10 बरि‍ससँ टी.बी.सँ ग्रसि‍त अछि‍। मुदा नीक वस्‍तु सभ खा पी कऽ दवाइ लऽ कऽ सामान्‍य जीवन जीब रहल अछि‍। ई नीच, चरि‍त्रहि‍न आ चूहर मिस्त्री अप्‍पन वीमारी राजकुमारीकेँ पटा देलकैक। एक्के संग ओकर परि‍वारक सर्वनाश कऽ देलकैक। भगवान एकरा कि‍एक नै कुनो दण्‍ड दैत छथि‍न!!! राति‍मे हम असगरमे बड्ड कनलौं। मुदा अन्‍तत: ऐ बातक चैन जरूर छल जे आब बेचारी राजकुमारी संसारि‍क कष्‍ट आ यातनासँ आजाद भऽ गेल। पुनर्जन्‍मक बारेमे हमरा कि‍छु नै बूझल अछि‍। अगर पुनर्जन्‍म होइ छै तँ हम भगवानसँ यएह प्रार्थना करबनि‍ जे हे भगवान राजकुमारीकेँ अगि‍ला जनममे कुनो राजाक घरमे सत्तेमे राजकुमारी बना देबैक आ अगर संभव हो तँ ओकर बाप करमा उराँवकेँ राजा बना देबैक आ तकरे बेटी राजकुमारीकेँ बनेबैक। हे भगवान अगर राजकुमारीकेँ राजा घर नहि‍यो जन्‍म देबैक तँ ठीक मुदा ओकरा चूहर मंगनू मि‍स्‍त्री सनक घटि‍या आदमीसँ दूर रखबैक। लघुकथा- सखी कुन्ती हम करीब तेरह वर्षक भऽ गेल रही। रही बड्ड खुर्लच्ची आ अगाध बदमास। कहियो एहेन नहि होइत छल जहिया ककरोसँ झंझट नहि होइत हो। माय हम्मर लोकक उपरागसँ तंग आबि गेल छलीह। सब उपाय केलन्हि; डांटब, बुझाएब, मारब। मुदा बेकार हम अपन खुर्लुच्ची स्वभावकेँ नहि त्यागलहुँ। एहनो बात नहि छल जे हमरा अपना मोनमे अपन कर्मक प्रति घमण्ड हो। प्रति दिन सूतबा काल ई निर्णय लैत रही जे आब लोक सभसँ झगड़ा–फसाद नहि करब। खूब मोन लगाकऽ पढ़ब। लोक आब माय लग ई कहय अयतन्हि जे आहाँक बेटा अपन कक्षाक सबसँ नीक विद्यार्थी अछि। लोक सभसँ आपसी प्रेम बना रखैत अछि। आदि–आदि। “मुदा ई सब किछु क्षणक निर्णय होइत छल। भोर होइतहि हम अपन बदमासीक प्रवृत्तिमे पुनः संलग्न भऽ जाइत रही। माय सोचलन्हि; “आब ई बर्बाद भऽ जाएत”। तामससँ घोर होइत बाढ़नि उठा एक दिन कतेको बेर मारलन्हि। बीचमे हफैत रहली या कहैत रहलन्हि “राघव! तोरासँ नीक कुकुर! कमसँ कम अपन पोसनहारक बात तऽ मनैत अछि”। माएक हाथ चलैत रहलन्हि, आ हम मारि खाईत रहलहुँ। फेर ओ बजलीह; तूँ तँ बतहा कुकुर छै मारैत मारैत माए थाकि कऽ चूर भऽ गेलीह। ओना तँ कतेको दिन माएसँ मारि खाईत छलहुँ मुदा ओहि दिनक बात जीवनपर्यंत याद रहत। शरीर बेदनासँ कराहए लागल। माए केँ सेहो बुझेलन्हि जे आई ओ किछु ज्यादे मारि देलन्हि। हम बिना किछु कहने मण्डिल (मन्दिर)केँ पाछा जाए कानए लगलहुँ। आधा घंटाक बाद माए मालीमे करूक तेल लेने अयलन्हि। पाछासँ हमर झोटकेँ सहलाबए लगलन्हि। हमरा भेल फेर मारतीह। मुदा जखन हुनका दिस ध्यान गेल तऽ देखलहुँ आँखिसँ नोर चुबैत छलन्हि। कहए लगलन्हि; “चारिटा बाल बच्चा भगवान देलन्हि। तीनटासँ कहियो कुनो शिकायत नहि भेल। सबहक कसरि तो पूरा कऽ देलह राघव। माए कहैत रहलीह आ माथा सहलाबैत रहलीह। आब हमहुँ कानए लगलहुँ। कहलियिन्ह “माए! आब हम बदमासी नहि करब! हमरा आई आहाँ बड्ड मारलहुँ। पूरा शरीर गूड़ घाव जकाँ दर्द करैत अछि”। ई कहि हम माएकेँ पकड़ि हुनकर गरसँ लागि बड्ड जोरसँ कानए लगलहुँ। पूरा शरीरमे बाढ़निकेँ ओदरा परि गेल छल। माए ओकरा देखैत हमरे जकाँ जोरसँ कानए लगलीह। फेर तेल लगौलन्हि। स्नान केलहुँ आ भोजन केलहुँ। माए दिन भरि कनैत रहलीह। दिन भरि अन्न नहि खेलन्हि। लोक सब आग्रह केलकन्हि तँ कहलखिन्ह जे हम्मर प्रायश्चित यैह थीक जे हम 24 घंटा अन्न जल ग्रहण नहि करी”। जखन हमरा पता चलल हम दीदीकेँ हाथसँ चाह लए माए लग गेलहुँ। हमरा बुझल छल जे माए अन्न बेतरे तँ रहि सकैत छथि मुदा चाहकेँ बिना नहि। हम कहलियन्हि माए! अहाँ चाह पी लिअ। आब हम कहियो गलती नहि करब। लोक कहत ‘राघव केहेन नीक लड़का छैक’। माए हमरा दिस देखलन्हि आ बजलीह; चुपचाप चाह लऽ कऽ घर चलि जो। जाई हम किछु नहि खैब! रातियोमे माए नहि खेलीह। भोरे भईया दरभंगासँ अयलाह। आबिते मातर माए हुनका कहलथिन्ह; “पवनजी, राघब हमर जीनाई दुर्लभ कऽ देने अछि। लोकक उपरागसँ तंग आबि गेल छी। काल्हि जानवर जकाँ मारिलियैक। कचोट बादमे बड्ड भेल। ई महामुर्ख निकलि गेल। तेँ एकरा पिताजी लग सिमडेगा भेज दहक। रामनगर वाली बहिन कहैत छलीह जे रोहित चारि पाँच दिनक भीतर राँची जाए बला छथि। हुनके संगे पठा दहक। बाबूजीकेँ एकटा चिट्ठी लिख दहुन”। हम्मर घरमे माएक राज चलैत छलन्हि। भैया हुनकर आज्ञाकेँ स्वीकार केलन्हि। साँझमे भैया रोहित भाईकेँ लऽ कऽ अयलाह रोहित भाई माएकेँ कहलथिन्ह; कुनो बात नहि कनिया काकी, हम राघबकेँ सिमडेगा बला बसपर बैसा देबैक। सिमडेगामे बसे स्टेंड लग खादी भण्डार छैक। बसक कण्डक्टर राघबकेँ ककाजी लग पहुँचा देतैक”। माए हमर जएबाक तैयारी करए लगलीह। हमरा गामसँ सिमडेगा गेनाई नीक नहि लागि रहल छल, जे एकबेर जे कुनो बात माए मोनमे ठानि लेलन्हि तकरा दुनियाक कुनो ताकत नहि टारि सकैत अछि। ताहि बिना कुनो प्रतिकार केने हमहुँ सिमडेगा जेबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। अपन तीन चारिटा लंगौटिया यार सबकेँ कहि देलयैक; “हम आब सिमडेगा चललीयौक। तूँ सब रह अतय केर राजा”। चारि दिनक बाद हम रोहित भाई संग सिमडेगा लेल प्रस्थान केलहुँ। आबए काल माए बड्ड कनलीह। बड़ हृदयसँ लगौलन्हि। पहिल बेर पता चलल जे माए हमरा कतेक मानैत छलीह। कहलीह; “बाबूजी लग, मनुक्ख जकाँ रहबाक प्रयत्न करिहैं राघब। तंग नहि करियेन्ह। माए एकटा चिट्ठी सेहो बाबूजी केँ लिखलथिन्ह। चिट्ठी अंतिम भागमे लिखल रहैक; “राघब बड्ड बदमास अछि। प्रतिदिन लोकक उपरागसँ मोन आजिज भऽ गेल अछि। ताहिसँ एकरा अहाँ लग पठा रहल छी। शायद अहाँक डरसँ बदमासी कम करत। हम जनैत छी ई हमर कोर पछुआ अछि। तइयो एकर उत्तम भविष्य केर लेल अपन छातीपर पाथर राखि अहाँ लग दूर देशमे पठा रहल छी। एकरा डॉट फटकार अवश्य करबैक, मुदा अहाँकेँ हम्मर आ चारू धीया–पुताक सप्पत अछि, एकरा मारबै नहि”। माएक चिट्ठी हम सिमडेगा अयलाक आठ दिनक बाद पढ़लहुँ। माएक यादमे चुपचाप बड्ड कनलहुँ। लागल केहेन महान चीजक नाम छैक ‘माए’। स्वयं तँ मारैत छलीह, मुदा जखन बाबूजी लग भेजलन्हि अछि तँ बाबूजीकेँ सब तरहे बुझा रहल छथिन्ह जे राघबपर हाथ नहि उठेबैक। बाह रे माएक ममता! बाबूजी माएकेँ बड्ड मनैत छलथिन्ह। ओ हमरा बुझबैत छलाह; “राघब, अहाँ खूब मोनसँ पढ़ु। अहाँकेँ जे कुनो चीज चाही से लिअ जा पढ़ु। लोक सबसँ झगड़ा–दान नहि करू”। अगल–बगल केर चारि–पाँच लड़का–लड़की सबसँ बाबूजी हमर परिचय करा देलन्हि। हम अपनामे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन अनलहुँ आ लोक सबसँ लड़ाई–झगड़ा त्यागि देलहुँ। बाबूजी प्रसन्न छलाह, जे चलू राघबमे एहेन परिवर्त्तन अयलन्हि। हमरा लोकनिक घरक बगलमे एकटा तमाकुल बेचय बला बनिया छल। ओकर नाम रहैक सोहन साहु। सोहन साहु केर बेटी शीला छलैक। हलांकि शीला हमरासँ एक कक्षा जुनीयर छलि। शीलाक नाक नक्श बड़ सुन्दर, रंग कारी मुदा सोहनगर। शीला जवान भऽ रहलि छलि, से शरीरक अंगसँ स्पष्ट परिलक्षित होइत छलैक। पातर ठोर, डोका सनहक आँखि, मध्यम कद। कपड़ा–लत्ता सेहो ठीक पहिरैत छलि। शीलाक माए हमरा बड्ड मानैत छलीह। कहैत छलथिन्ह; “बेचारा राघब,! बिना माएकेँ सिमडेगामे रहैत अछि”। शीला सेहो हमरा बड्ड मानैत छलि। पिताजी हमर नाम सिमडेगाक सरकारी स्कूलमे लिखा देलन्हि। हमर स्कूलकेँ ठीक पाछा शीला कन्या विद्यालयमे पढ़ैत छलि। हलांकि शीला बरसमे हमरासँ डेढ़ वर्षक पैघ छलि, परंतु कक्षामे हमरासँ एक कक्षा पाछा। स्कूलक समय दूनू स्कूल एकै रहैक। हम प्रतिदिन स्कूल शीलेक संग जाइत रही। शीलाक संग शीलाक एक सहछात्रा सेहो हमरा लोकनिकेँ संग विद्यालय जाइत छलि। ओहि छात्राक नाम रहैक कुंती। कुंती मध्यम कदकेँ करीब पन्द्रह वर्षक स्वस्थ आ गोर लड़की छलि। नमहर कारी–कारी केश, सुन्दर नाक, कान। कनीक वरससँ ज्यादे बुझना जाइत छलि कुंती। शनैः शनैः कुंतीसँ हमर नीक बातचीत होमए लागल। पता नहि कियाएक कुंती हमरा शीलासँ ज्यादे नीक लगैत छलि। निश्छल, सहज आ सुन्दरि। ओकर आंखि दिस जखन–कखनो ध्यान जाइत छल तँ एना बुझाइत छल जेना ओ सहज भावसँ मोनक कुनो बात हमरासँ बांटए चाहैत अछि। बात क्रममे पता चलल जे कुंती मैथिल ब्राह्मणी थीकि। पूरा नाम रहैक कुंती झा। चुंकि हमरा लोकनि सभवयस्क आ संगीक रूपमे रहैत रही, आ उपर कुंती हमर सखी शीलाक अभिन्न संगी रहैक ताहिसँ हम सब ओकरासँ तूँ कहि कऽ बात करियैक। हलांकि एक दिन शीलाक माए हमरा कहलन्हि, राघव, अहाँ सब कुंतीकेँ तूँ नहि कहियौक”! हम पुछलियन्हि, “कियाएक काकीजी? कुंती आ शीला दूनू हमर संगी जकाँ थीकि। हम शीलोकेँ तूँ कहिकऽ बजबैत छियैक मुदा अहाँ कहियो मना नहि केलहुँ, परंतु कुंतीक लेल ई बात कियाएक कहि रहल छी”? शीलाक माए हमर प्रश्नक जवाब देमए लगलीह, यही बीचमे शीला आ शीलाक पिताजी हुनका रोकि देलथिन्ह। शीलाक पिताजी शीलाक माएसँ कहलथिन्ह; “अहाँ बच्चा सबकेँ बीचमे कियाएक टांग अरबै छी? “जखन कुंतीकेँ कुनो समस्या नहि छैक, तँ अहाँकेँ की समस्या अछि? राघबकेँ अनेरे अहाँ शिक्षा नहि दियौक”। शीला सेहो अपन माएकेँ भाषण देमए लागलि; “गे माए, ई तोहर बड़का समस्या छौक। अपना जे करक छौक से कर। जकरा जेना बजबै चाहैत छैं, बजा। हमरा सभहिक बीचमे नहि बाज। हम कुंती आ राघब ओहिना रहब जेना रहि रहल छी। हमरा सबकेँ व्यर्थमे नैतिकताक शिक्षा नहि दे माए”। हमरा बूझ’मे नहि आयल जे एकाएक बाप–बेटी मिलकेर बेचारी शुद्ध महिलाकेँ कियाएक बजबासँ रोकि देलकैक। ओना शीलाक माएक बातपर हमरा किछु विस्मय जकाँ सेहो लगैत छल। शीला हमरा दिस देखैत बाजलि; “राघब,! तों जेना चाहैत छैं तहिना कुंतीकेँ सम्बोधित कऽ सकैत छैं। जेना कियाएक, ओहिना जेना हमरा कहैत छैं। तहिना कह” कुंती कहैत रहलि। समय चलैत रहल। हम अपन माएक देल वचन पर थोड़ेक प्रतिबद्ध रहलहुँ। खूब मोनसँ पढ़ी। लोक सनसँ झगड़ा–फसाद लगभग छोड़ि देलकै। स्कूलक शिक्षक सब सेहो हमर व्यवहार आ कुनो चीज अथवा ज्ञानकेँ सीखबाक उत्कंठा या जिज्ञासासँ प्रसन्न छलाह। बाबूजी हमर प्रशंसा सुनि गद्–गद् भऽ गेलाह। झट दनि माएकेँ चिट्ठी लीखि देलथिन्ह। चिट्ठीक मजबून ई रहैक। राघबमे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन भेलैक अछि। गामसँ एकरा सिमडेगा ऐनाई करीब 7 मास भऽ गेलैक मुदा भाई धरि ककरो कुनो शिकायत राघबकेँ खिलाफ नहि भेटल अछि। शिक्षक सबसँ राघबकेँ सम्बन्धमे हमेशा जानकारी लैत रहैत छी। सब कियोक मुक्त कंठसँ राघव केर प्रशंसा करैत रहैत छथि। हमरा राघव कुनो तरहसँ परेशान नहि करैत अछि। राघब अतेक नीक भऽ जाएत तकर तँ हम कल्पनों नहि केने रही”। पिताजीक पत्र पढ़ि माँ बड्ड प्रसन्न भेलीह। तुरत निर्णय लऽ लेलन्हि जे कमसँ कम दुइयो मासक लेल सिमडेगा अयतीह आ हमरा सब संगे रहतीह। माँ पिताजीकेँ पत्र द्वारा सूचना देलथिन्ह जे धनकटनीक पश्चात् ओ सिमडेगा आबि रहल छथि। किछु दिनक बाद माए सिमडेगा आबि गेलीह। हम बड्ड प्रसन्न रही। माएक स्नेह, माए हाथक भोजन भेट रहल छल बाबूजी सेहो प्रसन्न छलाह। लगभग हमर झंझटसँ स्वतंत्र किछु दिन लेल भऽ गेल छलाह। माए अपन मिलनसार स्वभावक कारणे सिमडेगाक नीचे बजार मुहल्लामे प्रशंसाक पात्र भऽ गेलीह। स्त्रीगण सब अपन तमाम नीक कार्यमे हुनका बजबय लगलन्हि। हमरा सिमडेगा आयलाह आब लगभग एक वर्ष भऽ गेल छल। एहि बीचमे किछु अप्रत्याशित घटना घटित भेलैक। कुंती लगातार चारि–पाँच दिनसँ नहि आबि रहलि छलि। शीलासँ ज्ञात भेल जे कुंतीक घरमे किछु झंझटि चलि रहल छैक, ताहि कारणे ओ नहि तँ स्कूले आबि रहल छलि आ ने हमरा सब लग। लगभग दस दिनक बाद कुंती शीलाक घर आयलि। हम शीलेक घरमे रही। हमर माए सेहो ओतय छलीह। कुंतीक चेहरा उतरल रहैक। मुँह कारी स्याह। आँखिक उपर–नीचा फूलल। अहिसँ पहिने कि हम किछु ओकरासँ पुछितियैक, हमर माए आ शीलाक माए कुंतीकेँ आबितहि ओकरा भाषण देमय लगलन्हि। माए हमर बाजए लगलीह; “देखू कुंती! अहाँक ब्राह्मण कुलक स्त्रीमे जन्म भेल अछि। पति नीक, अधलाह जेहेन होइत छैक, स्त्रीगण हेतु भगवान होइत छैक। अहाँकेँ भोलाझा पति छथि। अहाँकेँ हुनकर आज्ञाकेँ अवश्य मानक चाही। बिना हुनकर आज्ञाकेँ कुनो कार्य केनाइ या कतहुँ जेनाइ उचित नहि। अहाँ अप्पन गलतीकेँ स्वीकार करू आ जीवनकेँ आनन्द पूर्वक जीबू”। हम माएक बातकेँ सुनलहुँ तँ आश्चर्यमे पड़ि गेलहुँ। पहिल बेर इ ज्ञात भेल जे कुंती कुमारि नहि अपितु ब्याहित महिला थिक। आब बुझना गेल जे शीलाक माए हमरा कियाएक कहैत छलीह जे कुंतीकेँ तूँ कहिक नहि बजेबाक हेतु! चिंताक अथाह सागरमे डुबि गेलहुँ। कतए 17 वर्षक कुंती आ कतए 52 वर्षीय भोला झा। केहेन अनमोल विवाह!!! हे भगवान, ई केहेन जोड़ी बना देलयैक! लोहामे सोना सटि गेल। भरल दुपहरियामे अन्हार!! एक क्षण लेल एना बुझना गेल जे कुंतीक आत्मा हमर शरीरमे प्रवेश कऽ गेल! हम अपना –आपकेँ कुंती बुझि मोनहि मोन कानए लगलहुँ, काँपए लगलहुँ। अपन पितयौत बहिनक विवाहक कालक स्त्रीगण सब हारा गाएल गीतक एक पांति बेर–बेर मोनमे हुमरय लागल; “लोहामे जड़ि गेल हम्मर सोना। हम जीबै कौना”!! मुदा कुंती पाथरक मूर्त्ति बनलि हम्मर माएक आ शीलाक माएक अनर्गल भाषण सुनैत रहलि। बिना कुनो उचाबच केने। कुंतीक माथ जमीन दिस रहैक। किछु कालक बाद देखलियैक जे धरतीपर नोरक बुन्द मारितै पड़ल छैक। मुदा ओ सब ठोप बेकार भऽ गेलैक। दकियानूशक परिवेशमे हमर माए ततेक रमलि छलीह जे हुनका कुंतीक नोर नहि देखेलन्हि। किछु कालक बाद कुंती मुँह ऊपर उठा अपन गालपर हाथक लाल निशान भोला झा चमेटाक निशान छलैक। माए अपन हाथसँ कुंतीक गालकेँ सहलाबए लगलथिन्ह। माएक ममत्वकेँ देखि कुंतीकेँ हृदय फारि गेलैक। कुहेस फारि कानए लागलि। हम्मर माए अपन छातीसँ लगा लेलथिन्ह। कहाथिन्ह; “अहाँ आब नीकसँ रहूँ। भोला झा गलत कार्य केलन्हि अछि। हम मैनेजर साहेब (हम्मर पिताजीकेँ बारेमे) कहबन्हि जे हुनका समझेथिन्ह। अहाँक जेठ बहिनसँ हुनकर छोट भाएकेँ बियाह भेल छन्हि आ अहाँक जेठकी भगिनी अहाँसँ एकै वर्षक छोट अछि। मुदा आगू नीकसँ रहूँ। केवल स्कूल जायकाल स्कर्ट आदि पहिरू। स्कूलसँ वापस अयलाक बाद सारी पहिरू, नीक जकाँ रहूँ। जतए–ततए नहि बौआऊ। छौरा सबसँ हसी–ठट्ठा नहि करू”। आ लाचार कुंती हम्मर माएक बातकेँ सुनैत रहलि। एना बुझना जाइत छल जेना ई सब माए–बेटी हो। अही बीचमे शीलाक माए चूराक भूजा आ कचरी बनाए सबकेँ खाए लेल देलथिन्ह। कुंतीक नहि लैत छलि मुदा हम्मर माए एवं शीला ओकरा बड्ड आग्रह केलथिन्ह तँ कुंती खाए लागलि। नोर मुदा एखनहुँ खसि रहल छलैक। ओहि दिन साँझमे शीला हमरा कुंतीक सम्बन्धमे तमाम जानकारी देलक। भेलैक ई जे कुंतीक जेठ बहिनक वियाह भोला झाक छोट भाएसँ भेल रहैक। कुंतीक बहिनकेँ दूइ लड़की आ दूइ लड़का छलैक। भोला झा समस्तीपुरक कुनो गामसँ कम्मे वरसमे सिमडेगा आबि गेल छलाह। अतय आबि गुजर–बसर करबाक लेल मुख्य सड़क केर कातमे एक लाइन होटल खोलि लेलन्हि। होटलकेँ बगलमे सिमडेगाक नामी पेट्रोल पंप रहैक। पेट्रोल पंपक अगल बगलमे गाड़ी–घोड़ा ठीक करबाक मारिते दुकान आ मेकेनिक सबहक भरमार। अहि सब कारणे पाँच–दस बस–ट्रक आ अन्य गाड़ी सदरिकाल ओतए लागल रहैत छलैक। आ गाड़ीक ड्राईवर, सहायक इत्यादि भोला झाक लाईन होटलमे सामान्यतया खाटपर बैसि भोजन करैत छलैक। लाईन होटल केर भोजन होइत छलैक अति स्वादिष्ट आ चहटगर। कहियो कालक हम्मर पिताजी ओहि होटलसँ तरकारी इत्यादि मंगबैत छलाह। तँ भेलैक ई जे भोला झा अपन परिवारकेँ ठीक करयमे लागल रहलाह। तीन कुमारि बहिनक विवाह, माए–बापक संस्कार, क्रिया कर्म, दूटा छोट भाएक रोजगारक तलाश आ वियाह दान करैत–करैत कहियो अपना बारेमे सोचबे नहि केलन्हि। अही बीच जखन कुंती करीब 14 वर्षक छलि तँ अपन जेठ–बहिन लग सिमडेगा आयलि। ओहि समयमे भोला झा 51 वर्षक छलाह। कुंतीक शरीर भरल रहैक। आ देखबामे 18–19 वर्षक लगैत छलि। भोला झाकेँ अचानक वियाह करबाक इच्छा भेलन्हि। अपन छोट भाए अर्थात् कुंतीक जेठ बहिनोईकेँ कहलथिन्ह जे ओ कुंतीसँ वियाह करैत छथि। तावेत धरि कुंतीक पिताक स्वर्गवाश भऽ गेल छलन्हि। विधवा माए ओहि जमानामे चारि हजार टकाक लोभसँ कुन्तीक वियाह भोला झासँ करा देलकैक। पहिने तँ कुंतीक नहि बुझि सकलि अहि सब चीजक परिणाम। मुदा नइ–नइ स्थिति स्पष्ट होमए लगलैक। हालहिमे भोला झा कुंतीकेँ रातिमे हवशकेँ शिकार बनबय चाहैत छलथिन्ह, जकर ओ प्रतिकार केलकन्हि तँ झोटा नोचि गालपर बड्डपर मारलखिन्ह। शीला ईहो कहलक जे भोला झा दिन भरि गाजा पीबैत रहैत छथि, राक्षस जकाँ मोछ रखैत छथि, मुँहसँ गंध अबैत रहैत छन्हि, ताहि सब कारणे कुंती हुनका लग जाएसँ बचय चाहैत अछि। खैर! अहि घटनाक बाद आ कुंतीक अतीत जनबाक कारणे हम्मर व्यवहार ओकर प्रति बदलि गेल। कुंती आन ठाम जेनाई बन्द कऽ देलक परंतु शीला आ हमरा लग एनाई नहि रूकलैक। हम आब ओकरा किछु सम्मानसँ बचबय लगलियैक तँ बाजि उठलि; “नहि राघब, ई ठीक बात नहि। तो हमर परम मित्र छैह! हमरा पूर्वे जकाँ कुंती कहि सम्बोधन कर तँ नीक लागत। हम एकबेर पुनः कुंतीक संग वैह पुरनका व्यवहार करए लगलहुँ। समयक चक्र चलैत रहलैक। एहि बीच हमरा लोकनि दसमी कक्षामे पहुँच गेलहुँ। हम्मर उम्र करीब सोलहकेँ भऽ गेल। कुंतीक लगभग अठारह वर्षक। एकाएक कुंतीक शरीरमे आश्चर्यजनक परिवर्त्तन आबए लगलैक। ओकर वक्ष एकाएक बड्ड भारी भऽ गेलैक, गाल मोट भऽ गेलैक। शरीरक वजन बढ़ि गेलैक। आँखि छोट भऽ गेलैक। हलांकि एहि तमाम परिवर्त्तनकेँ बादो कुंतीक सौन्दर्यमे कुनो कमीनहि भेलैक। एखनो हमरा कुंती अजीब सुन्दरि लगैत छलि। करीब आठ मास पहिने एकबेर पता नहि कियाएक कुंती हमरा भरि पांज पकड़ि अपन हृदयसँ सटा लेलक आ हम्मर माथा चूमि लेलक। हम सन्न रहि गेलहुँ। लाजे किछु नहि कहलियैक। मुदा तहियासँ सदरिकाल मोनमे यैह सपना आबए लागल, जे किनसियायत कुंती हमर जीवन संगिनी बनि जाईत। हलांकि हमरा ई नीक जकाँ बुझल छल जे ई संभव नहि अछि। एक दिन हम कौतुहलमे पुछलियैक, “कुंती तोरामे अतेक परिवर्त्तन कियाएक भऽ रहल छौक। तौं कियाएक अचानक मोट भऽ रहल छै”? हम्मर कौतुहल सुनि कुंती हँसय लागलि। केवल कहलक; “राघव, तौ नहि बुझबै!! से कहि कुंती चलि गेल। एहि घटनाक लगभग एक मास बाद कुंती स्कूलो गेनाई बन्द कऽ देलक। कुंती हमरा ई कियाएक कहलक जे “राघव, तौं नहि बुझबै”!! हमरा किछु नहि फुराइत छल। अंततः एक दिन जखन स्कूलसँ डेरा आबैत रही तँ बाटमे जेल लग शीला भेट भऽ गेल। शीलासँ कुंतीकेँ बारेमे जानकारी लेबए लगलहुँ तँ पता चलल जे कुंती गर्भवती थीकि। आब बूझऽ मे आएल जे कुंती कियाएक हँसलि आ कहलक जे तौं नहि बुझबै”!!! हम शीलाकेँ पुछलियैक; “आब कुंतीकेँ पढ़ाईकेँ की हेतैक”? शीला कहलक; “किछु नहि भोला झा कहलकैक अछि पढ़ाई छोड़ि देबाक हेतु। आब डेढ़ मासमे कुंती अपन बच्चाकेँ जन्म देत आ बच्चाल लालन पालनमे। पढ़ाईक अंत भऽ गेलैक। खैर, छोड़ राघब! हमरो पिताजी आब हमरा लेल लड़का ताकि रहल छथि। हमरा माए लग तीन लड़का ताकि रहल छथि। हमरा माए लग तीन लडकाक फोटो छैक। हम तोरा देखा देबौक”। मुदा हमरा कुनो लड़काक फोटोसँ कुन मतलब! खैर! करीब डेढ़ मासक बाद एक दिन शीलासँ ज्ञात भेल जे कुंती सरकारी अस्पतालमे एक लड़्काकेँ जन्म देलकैक अछि। दोसरे दिन भोला झा दू किलो मिठाई लऽ कऽ हमर पिताजीकेँ दऽ गेलथिन्ह। भोला झा खुशीसँ गद्–गद् छलाह। अहि घटनाक किछु दिनक बाद पिताजी स्थानांतरण सिमडेगासँ गिरिडीह भऽ गेलन्हि। पिताजी संग हमहुँ गिरिडीह आबि गेलहुँ। करीब चारि वर्षक बाद सिमडेगा गेलहुँ तँ शीला नहि भेटलि। शीलाक माए कहलन्हि जे शीलाक वियाह राऊरकेला भऽ गेलैक। लड़का चाऊरक व्यवसायी छैक। शीलाकेँ एक सालक एकटा लड़की छैक। शीला अपन पति आ बच्चा संगे बड्ड प्रसन्न अछि। हलांकि कुंतीसँ भेट नहि भऽ सकल मुदा शीलाक माए बतौलन्हि जे कुंतीकेँ एकटा लड़की सेहो छैक। आब ओकर पति भोला झा अपन माएसँ भिन्न भऽ गेल छथि। कुंती पूर्णरूपेण एक सफल गृहणी, पत्नी आ माए बनि गेल अछि। सदरिकाल अपन परिवार, बेटा, बेटी आ पतिक सेवामे लागलि रहैत अछि। शीला नहि छलि तँ हमरा कुंतीसँ भलाकेँ मिला सकैत छल। इच्छा रहितहुँ हम कुंतीसँ नहि भेंट कय सकलहुँ। इमहर करीब 20 वर्षक बाद कुनो प्रयोजने सिमडेगा गेल रही। राँचीसँ जखन सिमडेगा लेल बस पकड़लहुँ तँ कुनो विशेष परिवर्त्तन ओहि क्षेत्रमे नहि बुझना गेल। किछु मकान इत्यादि अवश्य बनि गेल रहैक। सिमडेगामे कुनो विकास नहि बुझना गेल। पिताजीक मित्र श्री देवचन्द्र मिश्रजीक ओतए हम ठहरलहुँ। पाँच दिन सिमडेगामे रहलहुँ। बहुत पुरान लोक सबसँ मुलाकात भेल। शीलाक छोट बहिनक विवाह सेहो भऽ गेल रहैक। ओकर माए एखनो ओहिना नीक स्वभावक स्वामिनी छलि। शीलाक छोटका भाई दीपू बड़ पैघ पीबाक भऽ गेल रहैक। हम्मर घरमे कार्य करए बला दाई असहाय जीवन जीबि रहल छलि। पति मरि गेलैक आ बेटा नालायक। चन्दन मिश्र वकील साहेबकेँ नक्शली सब हुनका बेटा संगे कुट्टी–कुट्टी काटि देलकन्हि। आ अंततः जखन कुंतीक सम्बन्धमे जनबाक प्रयत्न केलहुँ तँ पता चलल जे जाहि छोट भाए लेल भोला झा अतेक त्याग केलन्हि, अपन जवानी बर्बाद केलन्हि, बुढ़ापामे ब्याह केलन्हि, सैह छोट भाई हुनका संगे बेइमानी केलकन्हि। लाईन होटलसँ बेदखल कऽ देलकन्हि। भोला झाकेँ दम्मा भऽ गेलन्हि। पैसाक तंगीमे ठीकसँ इलाज नहि भऽ सकलन्हि। कुंती आब सिलाईकेँ कार्य कऽ रहल अछि। आ अपन बच्चा सबहिक पोषण कऽ रहल अछि। बच्चा सब की, तँ बेटी 10वीमे पढ़ैत छैक, आ बेटा एक नम्बरकेँ नालायक। देवचन्द्र मिश्रक पत्नी कहलन्हि; “राघव, अगर अहाँ चाही तँ साँझमे हम सभ कुंतीक दुकान जाएब”। मुदा हम मना कऽ देलयन्हि। हम ओहि कुंतीकेँ नहि देखए चाहैत छी जकर चेहरा पर वैधव्य होइक, श्रीहीन हो, कष्टसँ कनैत हो। हम जीर्ण–शीर्ण कुंतीकेँ नहि देख सकैत छलहुँ। तैं हम पुरनके कुंतीक यादमे जीबए चाहैत छलहुँ। मैथिली लोक गीत मे प्रोफेसर चण्डेश्वर झा केर सी. डी./डी. वी. केर प्रयोग जीवन मे किछु एहेन क्षण अबैत छैक जखन लोक अपना के अनेरे असहाय अनुभव करैत अछि सब किछु रहैत छैक आ किछु नहि रहैत छैक। एहने सन अवस्था एखन हमर भेल अछि। स्वर्गीयप्रोफेसरचण्डेश्वर झा के गीतक सी. डी. अथवा डी. वी. डी. पर तीन दिन सं लिखक प्रयास क रहल छी मुदा नहि क पाबि रहल छी। से कथी लेल? एहि लेल जे हुनकर सब किछु हुनके हाथक देल हमर व्यक्तिगत संकलन मे हमर पुस्तकालय केर एक कोण मे रहैत अछि। अचरज ई भ रहल अछि जे नहि त कुनो पोथी आ नहिये कुनो सी. डी./ डी. वी. डी. भेट रहल अछि। ऐना मे आशीष अनचिन्हार हमरा पर उपकार केलनि आ यू टयूब केर लिंक भेजलनि जाहि मे आ आरो लिंक सं तकला पर सब मिलाक प्रोफेसर चण्डेश्वर केर निम्नलिखित चारि गीत भेटल अछि: (क) जोगिया मोर जगत सुखदायक दुःख ककरो नहि देल https://youtu.be/buED_dpmsxg (ख) हे हरि हे हरि सुनिय श्रवण भरि अब ने बिलासक बेरा https://youtu.be/klSuYBZko4s (ग) सबहक सुधि अहाँ लै छी हे अम्बे हमरा कियैक बिसरै छी हे https://youtu.be/KpKbUeeLG-0 (घ) बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटुम्ब भए गेल https://youtu.be/mXPmW8I-Dgg एहि चारि गीतक माध्यम सं हुनका बारे मे किछु लिखब झुझुआन सन लगैतअछि मुदा दोसर कोनो उपाय नहि अछि। जे अछि तहिये मे संतोष करैत लिख मे भलाई। प्रोफेसर चण्डेश्वर झा अपन सहज स्वभाव, गीत-नाद आ नाट्यक प्रति समर्पण, मैथिली वांग्मय के प्रति सोच, शास्त्र के प्रति ध्यान आ लोकज्ञान के प्रति अभिमानक कारने हमर प्रिय, सम्मानित आ अभिभावक तुल्य विद्वान आ गायक रहल छथि। हुनका संग आत्मीय लगाव १९९२ ईस्वी सं जे शुरू भेल से ४ जनवरी २०११ अर्थात हुनकर देहावसान दिन तक शाश्वत रहल। नित प्रगाढ़ होइत रहल। लगाव भौतिक आ शास्त्रीय ज्ञान दूनू कारने दुनू स्तर पर छल। भौतिक अहि हेतु जे जखन कखनो दिल्ली सं गाम जाई त हुनका सं भेंट अनिवार्य छल। सब तरहक गप्प – पारिवारिक शास्त्रीय। शास्त्रीय मे साहित्य आ समाज; लोक आ शास्त्र दुनू के बीच परस्पर सामंजस्य, लेन-देन, आवाजाही। ओ एक के देह त दोसर के आत्मा बुझैत छला। भावुक होइत गप्प करैत छला। बीच-बीच मे किछु गाबय लगैत छला। अतेक विषय सं लगाव रहैत छलनि जे बिना कहने हमहू भावुक भ जैत छलहुं। प्रोफेसर चण्डेश्वर सं गप्प करैत ई अनुभूति होइत छल जेना ओ उपनिषद परंपरा केर ऋषि (गुरु) होथि आ हम घनघोर अज्ञानी शिष्य। हमर काज मात्र एक प्रश्न पुछब तक छल। ओ कनि गंभीर होइत शुरू भ जैत छला। उत्तर देथि। अपना आपके हमर मनोदशा मे आनि जे हमर जिज्ञसा अथवा शंका भ सकैत छल तकरा बुझि जाथि आ कहथि, “कैलाशजी, अहांके एकर बाद एहनो प्रश्न भ सकैत अछि?” हम मंत्रमुग्ध होइत गरदनि हिला हाँ कहि दैत रहियैनआ ओ प्रश्नों केने जाथि आ ओकर निराकरण सेहो। ओहमरमनोदशा के ऐना हृदयंगम क लैत छला जे हम भाव विह्वल भ हुनका घंटों सुनैत रही। अहु चिंता सं मुक्त रही जे कुनो प्रश्न अथवा जिज्ञासा करबाक अछि। एकौ मिसिया समयक बरबादी नहि। भले हम विवेकानन्द नहि रही मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर झा कम-सं-कम हमर मोनक जिगेसा हेतु रामकृष्ण परमहंस सं एकौ रत्ती कम नहि छला। हमेशा अपन शोध, नव राग मे अन्य रागक मिश्रण, निक गीतक रचना, फेर ओहि गीत के गेनाई, आदि विषय पर गप्प करैत छला। सेहो सहज आ निश्छल ह्रदय सं। एक बात जे हुनका संगे भेलनि आ शायद ओ बात हुनका दीर्घायु नहि होमय देलकनि ओ बात छल विश्वविद्यालयकेर प्रबंधन आशिक्षक समुदाय केर तुच्छ राजनीति।एहि कारने ओ बहुत दुखी रहैत छला। अगर दरभंगा छोडि कोनो आन ठाम रहितथि त पद्मश्री कोनो पैघ बात नहि। मुदा प्रोफेसर चण्डेश्वर त ललित नारायण मिथिलायूनिवर्सिटी मे बारिक पटुआ छला। लोक सभ जे शैक्षणिक कार्य मे घासलेट आ तुच्छ राजनीति आ बितंडावाद मे माहिर ओ सब हमेशा हिनकर संगीत साधना के वाधित करैत रहलथिन। कल्पना करू की जाहि यूनिवर्सिटी मे एक जॉइंट रजिस्ट्रार अनेरे एक विद्वान प्रोफेसर केर विद्या क्षेत्र मे बलगेंग करैक आ दोसर विद्वान सब इर्ष्या सं विद्वान के विपरीत जाथि ओत की भ सकैत अछि? सरस्वती भोकासी पारि कानती। सैह ने? सैह भेल। ओ मैथिली गीत, संगीत, लोक विद्या आदि पर बहु विषयक विद्वानक संग परियोजना करए चाहैत छला। कतेक बेर विश्विद्यालय अनुदान आयोग एवं अन्य संस्था सं अपन वैदुश्यक बल सं परियोजना हेतु धन सेहो आनि लैत छला मुदा विश्विद्यालय केर लोक सब हुनकर सब मनोरथ के अनेरे अड़ंगा लगा ध्वस्त क दैत छलनि.प्रश्न ई उठैत अछि जे एहेन संस्था के की हैत? परिणाम प्रत्यक्ष अछि।अकादमिक स्तर पर ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी के की हाल अछि से ककरो सं अज्ञात नहि अछि। चण्डेश्वर जी मिथिलाक गामे गामे घूमि क लोक सब सं १५०० गीतक अद्भुत संग्रह केने छथि,विभिन्न राग पर आधारित एक सए सं अधिक गीतक रचना केने छथि।एकर अतिरक्त निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण सी. डी./ डी. वी. डी. (केसेट) केर निर्माण हिनकर मधुर स्वर मे भेल छनि: (अ) दुर्गति दूर करू माँ (सी. डी. एवं केसेट्स निर्माण)– २००५ ईस्वी (आ)जागू गिरिजाजागू महेश (सी. डी. निर्माण) – २००६ ईस्वी (इ) चंदा झा रचित मैथिली रामायण केर सुन्दरकाण्ड (सी. डी. निर्माण) – २००७ ईस्वी मिथिला मे रागक बात करैत चण्डेश्वर कहैत छला जे मैथिली साहित्य मे धूर्त समागम पहिल रचना अछि जाहि मे रागोल्लेख भेटैत अछि। उदाहरणस्वरूपरचना मे राग एवं तालक विवरण प्रस्तुत अछि। प्रथम अंक मे - विभास रागे गीतं, सालंगी रागे – पणिताले गीतम, वराली रागे – एकताली ताले गीतम, ललित रागे – एक ताली ताले गीतम, मालव रागे – एक ताली ताले गीतम, नटरागे – यति ताले गीतम, कानल रागे – प्रति ताले गीतम, द्वितीय अंक मे – शालंगी रागे – यतिक त्रिताले गीतम, देशाख रागे – एकताली ताले गीतम, कोलाव रागे – परिमंठ ताले गीतम, धनछी रागे – एक ताली ताले गीतम अछि. एहि तरहें अगर प्रोफेसर चण्डेश्वर के मानी त मैथिली साहित्य मे राग परंपराक यात्रा ज्योतिरेश्वर ठाकुर के समय सं प्रारंभ होइत अछि। मुदा एक बात जे महत्वपूर्ण अछि ओ ई थिक जे एक तरह सं ओ स्वीकार करैत छथि जे मिथिला के इलीट या विशेष वर्ग मे शास्त्रीय गीत आ संगीत केर परंपरा बहुत पहिने आबि गेल परन्तु जखन ओ गीत गबैत छथि त लोक सं अपना आपके जोडि लैत छथि आ वैह संपर्क, वैह सरोकार, वैह परिवेश आ अंत मे आर त आर अपना आपके कतौं-कतौं नारी ह्रदय मे घुसा लैत छथि। एकर निवारण हुनकर चारि गीत के जौ गंभीरता सं देखल जाय त स्वतः भ जैत। आबएक-एक गीत पर कनि विचार करी: प्रथम गीत प्राती अर्थात भोरक गीत छैक जे विद्यापति रचित थिक: हे हरि हे हरि सुनिअ स्र्वन भरि, अब न बिलासक बेरा। गगन नखत छल से अबेकत भेल, कोकुल कुल कर फेरा। चकबा मोर सोर कए चुप भेल, उठिअ मलिन भेल चंद। नगरक धेनु डगर कए संचर, कुमुदनि बस मकरंदा। मुख केर पान सेहो रे मलिन भेल, अबसर भल नहि मंदा। विद्यापति भन एहो न उचित थिक, जग भरि होएत निंदा। ई गीत शृंगार आ भक्ति के सोन्हगर आंच मे पाकल प्राती थिक। एकर चुनाव बहुत गंभीरता सँ चण्डेश्वर जी केलनि अछि। अपन बोलक उतार चढ़ाव सँ भोरक भान करबैत छथि। पुरुष स्वर मे नारी मनोदशा के चित्रण केने छथि। से तखने संभव छैक जखन ओहि भाव आ संवेदना के आत्मसात कैल जाए। एक गायक के रुप मे ओ नारीक ह्रदय के तह मे प्रवेश क जाइत छथि। गीत पुरुष के बुझना जाइत मुदा अंतर्मन स्त्रीगण केँ। भोरक अनुभूति जखनो कखन एहि गीतके सुनब तखने हैत। गीत केवल ऑडियो छैक तकर लाभ श्रोता के ई भ सकैत छनि जे आँखि मुनि गीत सुनथि आ भाव के स्वप्नलोक मे भ्रमण करथि। सुरुज केर इजोत, कोइली के बोल,भोरक सुगंध, नव् ऊर्जा सब किछु त भेटबे करत ओकरा संगे प्रेम, सृंगार आ भक्ति के अनुपम समंजस्यक भान अलग। एहि गीत मे शास्त्रीय आ लोक दुनु केर मध्य आश्चर्यजनक मिश्रण भेटैत छैक। बुझना ऐना जाइत जेना ई गीत लिखले अछि प्रोफेसर चण्डेश्वर झा के गेबाक लेल। गीत सुनला बाद मोन मे बैकुंठक शान्ति भेटैत छैक। दोसर गीत: सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे। हमरा कियै बिसरय छी हे माताहमरा कियै बिसरय छी हे। छी हम पुत्र अहीं के जननीसे तऽ अहाँ जनय छी हे। एहेन निष्ठुर कियै अहाँ भेलौंकनिको दृष्टि नै दय छी हे। क्षण-क्षण पल-पल ध्यान करय छीनाम अहीं के जपय छी हे। रैन दिवस हम ठाढ रहय छीदरसन बिनु तरसय छी हे। छी जगदम्बा जग अवलम्बातारिणी तरणि बनय छी हे। हमरा बेरि कियै न तकय छीपापी जानि फेरय छी हे। सबहक सुधि अहाँ लय छी हे अम्बेहमरा कियै बिसरय छी हे।। उपरोक्त गीत मे जे की एक भक्ति गीत छैक जाहि मे एक भक्त आर्त भाव सं भक्ति मे लीन भेल भगबती सं अपन सम्बाद गीतक रूप मे क रहल छैक,मे एक नूतन प्रयोग ई छैक जे एहि मे कनि झटकारकेर गति छैक मुदा संतुलन यथावत छैक। गति एहेन जे गायक एकरा बटगमनी के बाट देखबैत आड़िये धुडिये जेना भक्ति मे लीन कुनो मंदिर दिश जा रहल होथि। भक्ति भावना मे कोनो कमी नहि। अहि गीतक एक अद्भुत अनुभूति जँ पहिल गीत जकाँ एकरो आँखि मुनि आ कान खोलि क सुनब त अनुभूति हैत जेना एक भक्त स्नान ध्यान सँ निबृत भ अपन हाथ मे अछिन्जल आ नाना तरहक फूल आ बेलपात सँ भरल फुलडाली लए भगबनाक ध्यान मे लीन भेल गीत गबैत कुनो मंदिर मे भगबती जगदंबा केर पूजा अर्चना के हेतु जा रहल हो। एकपेडिया रास्ता संगे शरीरक संग गीतक संतुलन बनएबाक हेतु गीत जेना कनि दौड़ैत हो। मुदा गति सँ गीत सुगीत बनैत छैक। एकर भाव आरो प्रबल भ जाइत छैक। भक्त केर आर्त भाव स्पष्ट होइत रहैत छैक। श्रोता अपना आपके गायक संगे ताल मे ताल मिला ई गीत सुनि आ गाबि सकैत अछि। बड़ अजगुत भेल गिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल। पहिरन मे शिव के पीताम्बर देल। सेहो छोड़ि शिवजी मृगछाला ओढ़ि लेल। कोबर मे शिब के जे तेल फुलेल देल। सेहो छोड़ि शिबजी जे भसम लोपि लेल। भोजन मे शिबके खीर पूरी देल। सेहो छोड़ि शिबजी जे भांग पिब लेल। बड़ अजगुत भेलगिरिवर के भंगिया कुटम्ब भ गेल।। ई लोककंठ मे बसल महेशबानी अछि। एहि विलक्षण महेशबानी के गेबाक हेतु चयन कैल गेल अछि। गीत सुनब त मोनक घबराहट, बेमेल विवाहक पीड़ाक सँग-सँग भक्तक भगबान सँ स्नेहाधिक्य केर स्वतः आवेगक अप्रतिम अनुभूति भेटत। भावक सँग शब्दक उतार-चढ़ावक सँग लय मे सेहो उतरब चढ़ब केर परंपरा मे चलि जैब। शास्त्रीय राग चलैत छैक लेकिन एखुल्ला नहि लोकक ताल आ व्यवहारक सँगे। भाव भक्तिक आह्लाद केर अनुभूति हैत, खिदांश नहि। हिनक स्वरक पक्ष अतेक प्रवल छनि जे तमाम भाव के पाछा छोड़ैत आगु बढ़ैत जाइत छैक। गीतक आखर-आखर मोन मे छपल जाइत छैक। शब्दक अर्थ छिलका जकाँ बाहर भेल जाइत छैक। तमाम अवगुणक सँग शिब प्रशंशनीय, वंदनीय, आ सहज स्वीकार्य छथि। शब्द कखनो काल भले भावना केर संप्रेषण मे कमजोर भ गेल हो परंतु चण्डेश्वर जीक स्वर, हुनक सतत संगीत साधना आ शोधक कारणे एक एक शब्द के कान मे जेना मिशरी के घोल जकाँ घुसा दैत हो। वाद्य यंत्र बोलक सहचर अछि, गीतक प्राबल्य छैक हुनकर सधल स्वर। अन्तिम गीत पुनः विद्यापतिक रचित एक महेशबानी छैक: आगे माई , जोगिया मोर जगत सुख दायक , दुख ककरो नहि देल। दुख ककरो नहीं देल महादेव, दुख ककरो नहि देल। एहि जोगिया के भांग भुलेलक, धतुर खोआए धन लेल। आगे माई, कातिक गणपति दुइजन बालक , जग भर क नहि जान। तिनका अभरन किछुओ न थिकईन, रतिएक सोन नहि कान। आगे माईसोना रूपा अनका सुत अभरनअपन रुद्रक माल। अपना सुत लए किछुओ ने जुरइनिअनका लए जंजाल। आगे माईछन मे हेरथि कोटि धन –बकसथि ताहि देबा नहि थोर। भनहि विद्यापतिसुनुहे मनाईनथिका दिगम्बर भोर।। अहु गीतक अन्तस मे प्रवेश क जैत छथि गायक-साधक चण्डेश्वर झा. स्वर साधना मे अतेक प्रवीन जे बिना कुनो अवरोध के गबैत रहैत छथि। गीत घुसकैत नहि दौरैत अछि।शब्दक अनुरूप आरोहन अवरोहन अवश्य होइत छैक मुदा भावना के सम्प्रेषण त बेजोड़ छैक। गायक गीत संगे न्याय करैत छथि, विद्यापति संगे न्याय करैत छथि, आ अंततः गीतक भाव संगे न्याय करैत छथि। स्पष्ट किनाई आवश्यक अछि जे हिनकर उपलब्ध सी. डी. अथवा डी. वी. डी. केर सम्बन्ध मे हम कुनो छंद, ताल, मात्रा, अथवा रागक व्याकरण आ गणित केर सूत्र के आधार पर नहि लिखने छी। अहेन नहि त हमर शिक्षा अछि आ नहिये हमर सामर्थ्य। हमर प्रयास गीत सुनि, बुझि जे गीतक कोग्निटिक आ बोल केर भाव आ गायन के प्रति सामान्य श्रोता केर भाव जैत छैक तकर सम्बन्ध मे वार्तालाप करब। सैह एहि मे कएल गेल अछि। परित्यक्ता आ परिस्थिति: मिथिलाक सन्दर्भ मे (परिचर्चा) वैधव्य अभिशाप अछि आ कोनो महिला केँ परित्यक्ता बनेनाइ महा-दुष्कर्म। ई दुष्कर्म पितृसत्तात्मक समाज निर्लज्जता सँ, क्रूरता सँ ऐतिहासिक समय सँ करैत आबि रहल अछि। स्त्री शोषणक एहि सँ घृणित उदाहरण भेटब दुर्लभ। आश्चर्य तखन होइत अछि जखन जाहि पुरुषक कारणे हुनक पत्नी  परित्यक्ता बनलथिन तिनका समाज हुनकर आर्थिक संपन्नता, सामाजिक गरिमा (नाम), उच्च शिक्षा आ ओहदा, व्यवसायकि सफलता आदिक कारणे सम्मानित करैत अछि, मर्यादाक चद्दरि ओढ़बैत अछि, वक्ता बनबैत अछि। सबसँ अधिक दुःख तखन होइत अछि जखन तथाकथित आधुनिक महिला जे पढ़ल-लिखल छथि, सब बात बुझैत छथि, नारी स्वतंत्रताक दम्भ भरैत छथि, नारिवादक झण्डा हाथ मे लेने कोनो ऑलयम्पिकक धाविका जकाँ सनसन करैत दौड़ैत रहैत छथि; लेकिन समय एला पर अपन व्यक्तिगत हितक कारणे शोषक पुरुषक सङ्ग देमए लगैत छथि। जखन रक्षके भक्षक भ' जाए त' ककर आश? एहि विषयकेँ बुझबाक लेल एकर तह मे घुस' पडत। इतिहास सँ वर्तमानक जे बहुत विशाल दूरी एकपेड़िया उबड़-खाबड़ बाट अछि ताहि पर यात्रा सहभागी अवलोकनार्थी बनि करए पड़त। यथार्थक नजदिक जयबा लेल लिङ्ग भेदक भावकेँ त्याग करए पड़त। कागद की लेखी आ आँखन की देखी दुनू साक्ष्य केँ बेर-बेर ख़रोंच मार' पड़त। जखन ई सब काज पूर्ण निष्ठा आ ईमानदारी सँ समय लगाक' क' लेब त' बातक गह मे पहुँच सकैत छी। नारी सँ सम्बन्धित ई विषय अछि ताहिं जौं कियोक गुनमति गम्भीर मैथिलानी एहि पर काज करथि त' सजातीयताक भाव एहि मे स्वतः आबि सकैत अछि। हम श्रीमती अपर्णा झाक जिज्ञासक निराकरण अथवा हुनका द्वारे ठाढ़ कएल समस्या पर विचार करबा लेल एहि विषय पर अपन कलम उठाओल अछि। अपर्णा पुछैत छथि "परित्यक्ता अथवा पथ बाट जोहैत स्त्री या प्रतीक्षारत स्त्री? अपर्णा झाक कहबाक शैली आ हुनका द्वारा उद्धरित कएल किछु लोकजीवनक घटित दृष्टान्त हमरा झकझोडि देलक। सबसँ पहिने ई स्थापित क' ली जे परित्यक्ता किनका कही? हमरा जनैत आ लोकजीवनक जीवन्त उदाहरण देखैत परित्यक्ता ओहेन स्त्री भेलीह जिनका विवाहक बाद कोनो-ने-कोनो कारणे हुनकर पति त्यागि देने छथिन। बहुत दृष्टान्त मे पति दोसर स्त्रीगण केँ घोषित आ अघोषित रूपेँ आनि लैत छथि। बाट जोहए बाली स्त्रीगण ओ होइत छथि जिनकर पति कतौ गेल छथिन मुदा हुनका नहि बूझल छनि जे कतए गेल छथि, की क' रहल छथि। सब बिदेसिया गीत एहेन स्त्री पर लिखल गेल अछि। “परदेसिया केँ चिट्ठी लिखै छै बहुरिया पड़लै अकाल पिया कटै छी अहुरिया”। या फेरो: “कियेक दुईए दिनक छुट्टी मे गाम एलयै भरि दिन घुमिते रहलियै ने आराम केलियै”।। एहि गीत सब मे प्रतीक्षा छैक। एहेन प्रतीक्षा जाकर अंत सुखांत हेतैक। ई एहेन बाट जोहब छैक जाहि मे सब किछु मधुर-मधुर हेतैक। मुदा ओहि महिलाक की हेतैक जकर पति ओकरा विवाहक बाद छोड़ि देलथिन, परित्यक्ता बना देलथिन? जकर श्रृंगार, टिकुली, काजर, पाउडर, गहना, वस्त्र, सब बेकार भ' गेलैक। जकरा पति त' छोड़िये देलकैक समाज सेहो नीक भाव सँ नहि देखैत छैक। ओकरा सँ नीक त' विधबा जकरा लेल समाज एक निश्चित बात, वस्त्र, खान-पान, व्यवहार आ आचरण तय करैत ओकरा समाजक मुख्यधारा मे किछु हद धरि जुड़बाक अवसर प्रदान करैत छैक। पित्रिसत्तात्म्क समाज समाजक संरचना मे बहुत चालाकी सँ परित्यक्ताक स्थान निर्धारित करैत अछि। विध-बेभार आ देवता पितर मे एहि प्रथा केँ जोड़ैत अछि। एकर उदेश्य कहीं ई त नहि जे स्त्रिग्न समाज मानशिक रूप सँ परित्यक्ता बनबा लेल तैयार भ’ जाथि? चलू लोक परम्परा मे चलैत छी। मधुश्रावणी कथा मे एक प्रसंग सन्ध्याक विवाहक अबैत छैक। सन्ध्या के छथि? सन्ध्या शिवानी गौरीक छोट बहिन छथि। अपन सुन्नरि सारि सन्ध्या सँ महादेब केँ प्रेम भ’ जाइत छनि। सन्ध्या सेहो अपन बहिनोई महादेब सँ प्रेमक आदान-प्रदान केनाई शुरू केलनि। परिणाम ई भेल जे जखन सन्ध्या विवाह योग्य भेलीह त’ महादेब गौरी सँ चोराक सन्ध्या सँ विवाह करबा लेल चल गेलाह। एम्हर गौरी महादेब केँ तकने फिरथि मुदा ओ कतहु नहि भेटथिन्ह। बहुत खोज कएला पर गौरी केँ महादेबक विषय मे जानकारी भेटि गेलनि जे महादेब सन्ध्या सँ विवाह करए गेल छथि। गौरी केँ बड़ दुःख भेलनि ओ कानय लगलीह। कनैत-कनैत देह सँ घाम चललनि आओर मैल छुटए लगलनि-गौरी मैल छोड़ा कए जमा कएलनि आओर ओकर एकटा साँप गढि कए बाट पर राखि देलथिन-महादेब जखन सन्ध्या केँ विवाह क’ ल’ अनलनि त’ गौरी केँ कनैत देखल संगहि बाट पर मैलक साँप सेहो। महादेब ओहि साँप मे प्राण दए देलाह ओ लह-लहाए लागल। महादेब आओर सन्ध्या केँ देखि गौरी कानए आओर गारि-शाप देमए लगलीह: “की ए हम आहे शिब चोरनी की चटनी की ए हम कोखिया विहूत की हम आहे शिब सेवा मे चुकलहुँ केलहुँ दोसर विवाह” तखन महादेब कहलथिन: “नहि अहाँ आहे गौरी चोरनी चटनी नहि अहाँ कोखिया विहूत नहि अहाँ आहे गौरी सेवा मे चुकलहुँ हमरा कर’ परल दोसर विवाह” तखन गौरी कहलनि: “मरिहौ गे सन्ध्या तोरो जेठ भइया होएबे मे कोखिया विहूत” तखन महादेब पुनः समझाबैत कहलनि: “जनु गारी दिअ गौरी अपनो जेठ भइया जनु कहिओ कोखिया विहूत तोरहि सन गौरी पातरि छितरि तोरहि सन सुकुमारी बतिसो दाँत बिजुली छिटकनि सन्ध्या हुनकर नाम” बहुत अधिक विनम्रता स सन्ध्या कहैत छथिन: “कार्तिक गणपति गोद खेलाएब होएब चेरिया तोहार” आब महादेब निष्कर्ष दैत बजला: “अहाँ अनेरे कानि रहल छी। अहाँकेँ ई साँप बेटी भ’ क’ जन्म लेने अछि। अही नन्हिकीरबी केँ खेलाएबा लए हम एकटा कनियाँ आनि देल अछि। कथा अतहिं अंत भ’ जाइत छैक। आश्चर्यक बात ई जे गौरीक एहि प्रश्न आ शंका पर कहियो कोनो स्वर नहि उठल। पुरुख कथिलेल उठेता? स्त्रीगन सब सेहो मौन छथि। परित्यक्ता एहि कथा मे गौरी आ सन्ध्या दुनू छथि – पार्टटाइम या आंशिक परित्यक्ता। पतिक 100 प्रतिशत प्रेम सँ गौरी आ सन्ध्या दुनू जेना वंचित भ’ जाइत छथि! परित्यक्ता शब्द सँ जेना दुनू विभूषित भ’ जाइत छथि। बात आगा बढ़बैत छी। हमरा लगैत अछि महर्षि गौतमक पत्नी अहिल्या मिथिलाक पहिल परित्यक्ता छथि। इन्द्र गौतमक अनुपस्थिति मे आबि गेला। हुनका लग चलि गेलीह। फेर ताहि लेल अतेक पैघ आ दुर्दान्तक दण्ड! अपने विवाह केलाक बादो तप, तपस्या। पत्नी लेल सभ बन्धन? कोना चलत काज? आ फेर ओहि बन्धन अथवा श्राप सँ मुक्त के करतनि हुनका? एकर निर्णय सेहो श्राप देमय बला पति रूपक पुरुष करताह। गौतम कहैत छथिन जे जखन राम त्रेता युग मे अतए अऒताह तखन शिला मे परिणत अहिल्या हुनक चरणक स्पर्श सँ फेरो मनुख-योनि मे वापस लौटती। दोसर परित्यक्ता सीता छथि। सीता अपन पत्नी धर्मक पालन करैत राम संगे कत’-कत’ नहि जाइत छथि। वैह राम गर्भवती सीता केँ असगरे जंगल भेज दैत छथि। मर्यादा उत्तम भ’ जैतनि अगर सीता संगे राम सेहो फेर सँ जंगल चल जैतथि? से कहाँ करैत छथि? आर त आर अश्वमेध यज्ञ काल सेहो हुनका सीता कहाँ स्मरण अबैत छथिन? सोनाक सीता बना यज्ञ-वेदी पर बैस जाइत छथि। जखन लव-कुश भेट जाइत छथिन तखन सीताक स्मरण अबैत छनि। वियोग आ दर्द सँ छटपटाइत सीता धरतीक कोखि मे विलीन हेबाक लेल निवेदन करैत छथिन – “फाटू हे धरती!” धरती अपन पुत्रीक बात सुनैत देरी फाटि जाइत छथि आ सीता ओहि मे विलीन भ’ जाइत छथि। मिथिलाक तेसर परित्यक्ता भामती छथि. उद्भट विद्वान आचार्य वाचस्पति अपन गहन ज्ञान, परिश्रमक क्षमता आ हठयोगक कारणे उत्तर सं दक्षिण धरि ख्याति अर्जित कएने रहथि। आचार्य प्रवर अनेक ग्रंथक रचना कएलनि ताहिमे प्रमुख अछि: (1) न्यायणिका, (2) ब्रह्मतत्व समीक्षा, (3) तत्व विन्दु, (4) न्यायवार्तिका तात्पर्य टीका, (5) न्यायसूची निबंध, (6) सांख्यतत्व कौमदी, (7) तत्ववैशारदी। एकरा अतिरिक्त तत्कालीन पाचम नवम शताब्दी मे शंकराचार्यक आग्रह पर “अठारह वर्ष स्वगृह मे साधनारत भए सांसारिक सुख त्यागि 6 भागमे मंडन मिश्रक ब्रह्मसूत्रक शंकरभाष्यक टीकाक रचना कएलनि। आ ताहि मे भामती मूक योगदान दैत रहलथिन। तैँ हेतु ताहि मूक अवदान केँ अमर करए लए टीकाक नाम भामती संज्ञा सँ जोड़ि देलनि। ई मूक अवदान बड्ड कठिन शब्द अछि। अगर वाचस्पति केँ साधने करक छलनि त’ विवाह कथिलेल केलाह? एहि लेल जे पत्नी रूप मे भामती बिना ढउआ केँ आ बिना भावनाक संचार केँ सेविका बनल रहथि? वाचास्पतिक विद्वताकेँ नमन मुदा भामतीक प्रति हुनक प्रयोग हुनका द्वारे जानि-बुझि क’ भामती केँ परित्यक्ता बनाएब थिक। मैथिली लोक व्यवहारक गीत मे अनेक गीत भेटत जाहि मे सौतिन शब्दक प्रयोग अछि। सौतिन लेल कुबजो, कुब्जा शब्दक प्रयोग अछि जे हमरा जानैत घृणा सूचक अछि। बात परित्यक्ताक क रहल छी त’ उदाहरण समाज स लेमए पड़त। समाज दिस आँखि उठाबय पड़त। समाज केँ निहारए पड़त। नारी मनोदशा आ दर्दक, टीसक अनुभूति करए पड़त। एक बहुत स्थापित साहित्यकार अपन इच्छा सँ बिपरीत माता-पिता केँ मन आ मान रखबाक चक्कर मे एहेन परम्परागत आ अति सामान्य लड़की सँ विवाह क’ लेलाह जे कोनो रूप सँ हुनका संग साम्य नहि रखैत छलि – नहि दैहिक सौन्दर्य मे आ ने विद्या मे। विद्वान आ दैहिक सौन्दर्य आ सौष्ठव सँ परिपूर्ण साहित्यकार मन बना लेलाह जे विवाह क’ लेताह मुदा ओहि लड़की सँ कोनो तरहक कोनो सम्बन्ध नहि रखता। सैह भेल। विवाह भ’ गेलनि। चतुर्थी धरि सासुर मे रहला। संपन्न सासुरक लोक पाहुनक स्वागत मे कोनो कमी नहि रखलक। उपर सँ बिधकरी अति चातुरि। नीत-नूतन बात कहनि। सृंगार, मनुहार, प्रेमक बात मे ओझराबए लगलथिन। दियासलाई आ काठी एक ठाम रहतैक त’ आगि लगबे करतैक। सैह भेलैक। जाहि पत्नी सँ कहियो कोनो सम्बन्ध नहि रखबाक उदेश्य सँ विवाह केने छलाह ओकर प्रेम मे फँसि गेलाह। मन भले नहि मिलल होनि देह मिल गेलनि। 15 दिन रहला। बहुत रंगक बात भेलनि। कतेक बेर केलि केला। 15 दिनक बाद घर आबि गेला। घर वापस अएला पर पुनः अपन वैदुश्य आ सौन्दर्य पर दंभ भेलनि। भेलनि, आहि रे बाप, विवाह त’ गलत परिवेश, गलत परिवार आ गलत लड़की सँ भ’ गेल। अविकसित, बैकवर्ड सँ भ’ गेल! आब की हो? नहि-नहि, एहेन लड़की संग जीवन कोना कटत? असंभव। महानगरक सभ्य समाज लग कोना रहब? मर्यादा आ इज्जत नीलाम भ’ जाएत। फेर की उपाय? यैह जे त्यागि दी। परित्याग करी। परित्यक्ता बना दी। परित्यक्ता कोना बनत? अपमान सँ, शोषण सँ, दैहिक-मानशिक उत्पीड़न देला सँ। से केँ देत? हम स्वयम देब। ई निर्णय अन्तिम? एकदम अन्तिम। बिना एकर दोसर कोन उपाय?” यैह सब सोचैत भविष्यक महान साहित्यकार आ कलामा नारी उत्पीड़नक ठीका ल’ लेलाह। एक दुखद, तर्कहीन, अनर्गल आ अमानवीय घटनाक बीया बाउग़ भ’ गेल छल। ओ अपन वीभत्स रूप लेल तैयार छल। एक विद्वान एक चांडाल बनि गेल छल। साहित्यकार महोदय केँ सासुर सँ अएबाक हेतु बेर-बेर समाद अबनि। ई एहेन निष्ठुर जे जेबे ने करथि। सासुरक लोक हिनक प्लाट सँ अनजान। अंत मे ससुर महोदय स्वयम हिनकर दरबज्जा पर आबि गेल्थिन। आब की करताह? कोनो उपाय नहि बचलनि। लाचार भय सासुर गेला। खूब मान-दान भेलनि। नाना तरहक सचार लागल। खूब मन सँ भोजन केलाह। राति मे पत्नी एल्थिन। आबिते कामिनी मानिनी बनैत कहलथिन: “जाऊ! कतेक निष्ठुर लोक छी अहाँ? नहि अएलहुँ आ ने चिट्ठियो भेजलहुँ? एहेन कतौं मनुख भेलैक अछि? हम रुसल छी अहाँ स।” से कहैत कनिया मुँह बिपरीत अवस्था मे करैत झुट्ठे सुतबाक भगल केलनि। विद्वान साहित्यकार चुप रहला। गंभीर रहला। किछु नहि बजला। की बजितथि? मन त कोनो धराने अपन व्याहत धर्मपत्नी सँ मुक्तिक कामना आ ब्योंत मे बाझल छलनि। पत्नी दिस देखबो ने केलनि। तुरते पत्नी केँ बुझा गेलनि जे किछु त’ गडबड अछि। झट दनि विचार केलनि: “आखिर ई किछु प्रतिक्रिया कियैक नहि देला? हे भगबती! किछु अनिष्ट बुझना जा रहल अछि हमरा। कहीं कोनो निर्दय मनुखक संग त’ हमर हाथ विधाता नहि लगा देलनि? की करी? ककरा पर मानिनी बनी हम? जे मनुहार करत से त’ कोनो ध्याने-बात नहि द’ रहल अछि। फेर की करी? अहिना सुति रही? से कोना हएत? भले बाबा बिद्यापति कहि गेला ‘पुरुखक नहि बिस्वासे’। कोनो स्थिति मे पुरुख पर विश्वास नहि करी। फेर की करी? एहि ह्रदयहिन पुरुख केँ ह्रदय-वान पुरुख बनाबी। से कोना? एकरा अपन प्रेमक जाल मे गछानी।” यैह सब सोचैत बेचारी नव ब्याहल कनिया अपन जीवनक नैया केँ डूबए सँ बचेबाक उक्ति सोचय लगलीह। करबट अपन पति महोदय दिस बदलैत बजलनि: “की बात पाहुन! रुसल छी की? किछु गलती भ’ गेल हमरा सँ की? अगर गलती भेल त’ कहू। हम माफ़ी मांगि लैत छी”। अतेक बात कनिया कहलथिन मुदा पाहुन पर कोनो प्रभाव नहि परलनि। गुम-सुम-गंभीर बनल रहलाह। कनिया केँ अशुभक अशंका भेलनि। हिनकर आँखि मे कनि बिकराल, बिकट स्वरुप देखली। कनि कसाई कनि निर्दयातक भाव लगलनि। कनि ज्ञानक व्यर्थ घमण्डक अनुभूति भेलनि। लेकिन दोसर कोन उपाय? पैघ जाति आ कुलक मर्यादा सँ छेकएल छी। दोसर विवाह त’ आब सपनो मे नहि देखल जा सकैत अछि। तखन की करक चाही? किछु नहि अतबे जे येन-केन-प्रभावेन हिनका मना ली। से कोना मनाबी? प्रेम सँ आ अपन मनुहार सँ। देखैत छी, भगबती सफलता दैत छथि की नहि? अहि तरहक अंतर्द्वंद सँ जुझैत कनियाँ पाहूनकेँ अपना छाती सँ जकरबाक यत्न शुरू केलनि। आहि रे बा! ई की? पाहुन त’ एक क्षण मे बज्र उग्र भ’ गेलाह। हाथ झकझोरि देलथिन। अपन बलक प्रदर्शन करैत कर्कश ध्वनि मे बजला: “खबरदार जे आई के बाद हमरा सँ कोनो तरहक सम्बन्ध रखलहुँ। हमरा अहाँ सँ कोनो तरहक सम्बन्ध नहि रखबाक अछि। हम आई सँ अहाँक शरीर नहि छुब। अहुँ अपन मर्यादा मे रहू। अगर से मर्यादा केँ तोरबाक चेष्टा करब त’ हमरा सन खराप लोक नहि भेटत”। कनिया आब पूर्ण साकांक्ष भ’ गेल छलीह। भेलनि साहित्यकारक नाम पर राक्षस सँ विवाह भ’ गेल। आब की करी? कनि दृढ़ भेलीह। कहलथिन: “देखू, हम अहाँक व्याहता छी। हमर सम्बन्ध मे हमर पिता अपनेक पिता सँ सब किछु स्पष्ट क’ देने छलाह। अहेन समस्या छल त’ नहि कहि दितहुँ? हम आब कत’ जा सकैत छी? अहीं कहू? आ फेर विवाहक यात्रा मे त’ अहाँ हमरा संग सब किछु कएल जे एक स्त्री-पुरुष करैत अछि?” अहि बात सँ बेफ़िक्र मद मे चूर साहित्यकार अपन राग अलापैत रहला: “हमरा से सब किछु ने बुझल अछि। हमरा अहाँ सन जाहिल स्त्री संग कोनो सम्बन्ध नहि राखक अछि। अहाँक रस्ता अलग, हमर रस्ता अलग। नदीक दू स्वतन्त्र कछेड़। ककरो सँ ककरो मिलन संभव नहि अछि। ख़बरदार जे हमर देह मे सटबो केलहुँ।” पत्नी पाछा कोना होइतथि? लागल रहली। किछु मनुहार, किछु क्रंदन, किछु नोरक धार चुएलनि। किछु अपन माता-पिताक विवशताक भान करेलनि। कनि गिदरभभकी सेहो देलथिन। मुदा साहित्यकार महोदय त’ अडिग रहला। अपना केँ लंठ-साहित्यकार मानैत छला। एहि पत्नी सँ कोनो सम्बन्ध नहि रखता से ब्रह्मवाक्य छलनि। तथापि पत्नी हिम्मत करैत अर्ध वस्त्र मे एकबेर साहित्यकार महोदय केँ अपन बाहुपाश मे लेबाक प्रयाश केली। एहि बेर क्रोध सँ बताह भेल साहित्यकार अपन पत्नी केँ उपर प्रहार क’ देलाह। बेचारी लाचार भेल मारि खाइत रहली। बंद घर मे विचित्र स्वर सुनि लड़कीक माए आ भाऊज जागि गेल्थिन। घर खोलबाक आदेश देलथिन। लड़की घर खोलैत माएकेँ गर लागि कानए लागली। कनैत रहली आ बजैत रहली: “सब अनर्थ भ’ गेल। हमर कपार फुटि गेल। मनुखक बदला हैवानक संग भ’ गेल।” माए आ भाऊज पुछैत रह्ल्थिन: “की भेल बुच्ची?” मुदा हिनकर मुँह सँ बकारे ने निकलनि। कतेक काल धरि कनैत रहली। लोक सब बोसैत रह्लनि। उम्हर साहित्यकार महोदय काल-नाग आ यमक अवतार बनल क्रोध मे मातल घर मे क्रोधक ज्वाला मे धू-धू जरि रहल छला। हुनका सँ लोक पुछनि: “पाहुन! की भेलैक? किछु बकझक भेलनि की?” पाहुन पहिने त’ चुप रहला। फेर कर्कश स्वर मे उत्तर देलाह: “हमरा की पुछैत छी? अपन बेटी के पुछू। ओ जे कहती हमहुँ सैह कहब।” बहुत देर धरि वातावरण शांत रहल। जखन कनियाँ भरि इच्छे कानि अपन मनक दर्द बहा लेलथि त' कहलनि: "हिनका हमरा सँ कोनो सिनेह नहि छनि। ई माता-पिताक इज्जत हेतु विवाहक स्वांग केने छथि। हिनका हमरा सन सामान्य नहि आधुनिका चाही जे हिनका सँग महानगर मे हाथ-मे-हाथ थामने स्वच्छन्द घुमि सकए। ई हमरा सँ कोनो तरहक सम्बन्ध नहि राखय चाहैत छथि। उलटे हमरा सँ जतेक जल्दी हो मुक्ति पाबै चाहैत छथि। वेदमंत्रक उच्चारण सँग जे पत्नी बनेलनि तकरा पालन करैत अपन अधिकारक भाव जगबैत हम किछुए क्षण पूर्व हिनका देह दिस जएबाक अनर्गल प्रयास कएल तकर परिणाम देखू।" ई कहैत अपन छातीक ओ हिस्सा देखा देलथिन जतए आदरणीय साहित्यकार अपन घुसाक निर्दय प्रहार केने छलाह। निलाह-स्याह ओहिना देखा रहल छलनि। एक क्षण मे साहित्यकार महोदयक असली रूप बाहर आबि गेल छलनि। ओतय उपस्थित महिला सभक हृदय काँपि गेलनि। अनर्थ भ' चुकल छ्ल। एकर कतेक बिकट रुप भ' सकैत अछि एहि पर कियोक निश्चित नहि छली। अंत मे कन्याक माए थोड़ेक गम्भीर होइत अपन जमाय लग नहुँ-नहुँ गेलिह। स्थिरे सँ कान लग फुसफुसा क' बाजय लगली: "पाहुन! सब किछु ठीक ने? ई छौरी कोनो गलत बात त' नहि कहि देलकन्हि? चारि भाई मे असगरि छैक ने, ताहिं कनि छिड़िया गेल छैक। ओना मनक बड़ शुद्ध छैक। जे रहल से मुहँ पर कहि दैत छैक।" साहित्यकार निराकार भेल सब बात सुनैत रहला। अंत मे सासु पुछलथिन: "अगर कोनो त्रुटि छनि त' बाजथि? हम सब हिनकर सब माँगक पूर्ति अपन हैसियत हिसाबे करक प्रयास करबनि।" गहीर सांस लैत साहित्यकार ठाईं-पठाईं बजला: "देखू! ई विवाह नहि चलत। हिनका सँग नहि हम खुश रहि सकैत छी आ ने यैह रहि सकैत छथि। हिनकर सोच आ हमर सोच मे कोनो साम्य नहि अछि"। सब बात जेना एकहिं सांस मे साहित्यकार महोदय बाजि गेलाह। सासु अपन मायक ममत्वक कारणे गुम सधने रहली। फेर बजनाई शुरू केलनि: "देखथु पाहुन! ई ब्राह्मणक बेटी छैक। एना कोना हेतनि? विवाह एक केँ कहैत अछि सात-सात जन्मक सम्बन्ध छैक। उठथु आ दुनू मिल क' रहथु।" बेटी दिस तकैत माए बजली: "सोना, एना नहि चलैत छैक जीवन। दुनू गोटे हिल-मिल रहू। सब चीज़ नीक रहत। जाउ घर।"  ई कहैत माय बलपूर्वक बेटी केँ पाहुन सङ्गे घर दिस ल' गेलिह। आब सब किछु सामान्य भ' चुकल छ्ल। घर मे आगि आ घी केर समिधा एकत्रित छ्ल। केवल होम करबाक मंत्र फुकक प्रयोजन छ्ल। ई प्रयोजन कन्याक माए पूरा केलनि। अग्नि सुगंधित भ' धू-धू पजरए लागल। दू देह एक भ' गेल। साहित्यकार महोदय केँ एहि व्याहता मे आधुनिका देखाय लगलनि। दुनू मस्त भ' गेलाह। ओहि दिन एक आर बात भेल। प्रेमक अग्नि ततेक प्रबल छलनि दुनूक जे ओही राति आ क्षण नायिका केँ गर्भ ठहरि गेलनि। विवाहक, अहि तरहेँ एक उद्देश्य पूरा भ' गेलनि। सोझे साल द्विरागमन भ' गेलनि। जहिया सँ नायिका अपन सासुर अएलिह तहिया सँ साहित्यकार फेरो अपन उग्र रूप मे आबि गेलाह। मारि-पिट शुरू भेल। कखनो डंडा सँ त कखनो बेल्ट सँ। कहियो-कहियों आनो चीज़ सँ प्रहार करैत रहला। संगति साफे बन्द। पूर्ण विराम। यातना अबाध गति सँ चलैत रहलनि। एक साहित्यकार अपन कुकृत्य सँ दोसर साहित्यकार लेल सामग्रीक ओरिओन करैत रहला। नारीक शोषण होइत रहल। शोषिताक गर्भ मे शोषितक बीज पनपैत रहल। विनाशक क्रिया मे निर्माणक प्रक्रिया अपन स्वरूप पकरैत रहल। कोनहुना अपन सासुर मे रहैत नायिका एक पुत्रीक जन्म देलीह। पति सँग स्थिति नर्क जकाँ भ' गेलनि। बहुत यत्न केलीह मुदा असफलता हाथ लगलनि। यातना सहैत-सहैत तन -मन जबाब द' देलकनि। सासुर सँ नैहर आबि गेलीह। केश चललैक। अहि बीच साहित्यकार अपना सँ 18 वर्षक छोट लड़की सँ चुपे-चाप विवाह क' लेलाह। ककरो कानो ने लागय देलाह। डर छलनि नौकरी चलि जेतनि। नाम बदनाम भ' जेतनि। बाद मे विधिवत तलाक भ' गेलनि। आर जे केला से केलाह। एक नीक काज जरूर केलनि जे अपन जन्मल बेटीक विवाह अपन अरजल पाई सँ नीक जकाँ करा देलथिन। हुनक पत्नी सेहो अपन जीवन अपने जकाँ जिबक कोशिश करैत छथि त’ लोक हुनका नीक-अधलाह कहैत छनि। यैह थिक सामाजिक मर्यादा। यैह थिक महानता। साहित्यकार महान भेल छथि। नारी चेतना, साहित्य आ सृंगार केर बात करैत छथि। एक दू आधुनिक आ तथाकथित विदुषि हुनकर सब कृत्य आ कुकृत्य बुझैतो हुनका हँ मे हँ मिलबैत छथि। वरिष्ठ साहित्यकार लोकनि क्षणिक लोभे हुनका सङ्गे घुमरैत रहैत छथि। हुनक यशक झंडा फहरबैत रहैत छथि। हालहिं मे एक नवोदित साहित्यकार केँ एहि तथाकथित महान साहित्यकारक पूर्व पत्नी जे आब तलाक शुदा आ परित्यक्ताक टैग सँ जानल जाइत छथि, भेटलथिन्ह। नवोदित साहित्यकार हुनका लग गेलाह। अपन परिचय एक साहित्यकारक रूप मे देलनि।  परित्यक्ताक दर्द साहित्यकारक प्रति घृणा बनि ज्वार-भटा जकाँ फुइट पड़लनि। अपन ब्लाउज खोलि एक-एक दागक प्रदर्शन करैत बजली: "कहीं एहेन साहित्यकार त' नहि छी अहुँ जे अपन पत्नी सँग जलाल जकाँ व्यवहार करैत छी।" जखन ज्वाला फ़ुटले रहनि त’ अनेक तरहक नीक अधलाह बात सेहो कहि देलथिन, जे कोनो नाजायज नहि रहैक। बात एतहुँ कहाँ समाप्त होइत अछि। साहित्यकार अपन दोसर पत्नी केँ सेहो यातना मे रखने रहैत छथि। मारैत-पीटैत छथि। आधुनिका सब सङ्गे घुमरैत छथि। खूब साहित्य लिखैत छथि, खूब भाषण करैत छथि। समाजक एक तबका एहि महापतित केँ आइकॉन बना रखने अछि। हुनक प्रथम पत्नी केँ परित्यक्ता आ कुलक्षणा कहैत अछि। एकरा की कही? ई बात पाठक पर छोड़ि दैत छी। परित्यक्ताक लिखल आ ऐतिहासिक स्वरूपक की बात करी, अपन आँखि सँ अनेक स्वरूप देखने छी। कतौ परित्यक्ता सम्बन्धी रहलि छथि त' कतौ परित्यक्ता बनबै बला। कतौ परित्यक्ता त' कतौ दुर्दैवक मारलि परित्यक्ता। एक उदाहरण विचित्र अछि जे समाजक मानशिकता केँ आईना देखबैत अछि। से की? ई कथा प्रारम्भ होइत अछि एक अति सामान्य परिवारक युवक सँ जे अपन माता-पिताक एसगर संतान छला। B. Com करैत देरी दक्षिण मे कतौ चाय बागान मे डेप्युटी मैनेजर'क नौकरी लागि गेलनि। हुनका गामक बगले केँ गामक एक कन्यागत जिनका 4 लड़की मात्र छलनि, नीक पैसा दहेज दए अपन जेठ बेटी सँ विवाह करा देलथिन। कन्यागत किछु नहि अपितु बहुत रास फुइस बाजल छला। लड़की पढ़लि नहिये जकाँ रहैक। साकांक्ष सेहो नहि, बल्कि कनि अकान जकाँ। देखबा सुनबा मे मुदा अपूर्व। रंग-विरंगक गहना, वस्त्र, प्रसाधन सँ सजलि। बर कानियाँ केँ देखैत दंग। चतुर्थी कोना बितलै से बुझबे नहि केलाह। चतुर्थी प्रात अपने सङ्गे कोयंबटूर हनीमून लेल बिदा भेला। जखन ओतए गेलाह त' ज्ञात भेलनि जे लड़की साफे साकांक्ष नहि छैक। नित्यकर्म तक करबाक नीक सँ चेष्टा नहि छैक। आब की हो? तेसरे दिन वापस आबि गेलाह। सासुर आबि सासु आ ससुर केँ सब खेरहा कहलथिन्ह। ससुर उत्तर देलथिन्ह: "अपने उदास नहि होउ पाहुन, अहाँक सासु सब बात बुझा देतीह।" ई कहैत ससुर दरबज्जा दिस चलि गेलाह। सासु लग अबैत नहुँ-नहुँ कहलथिन्ह: "पाहुन! ई मन छोट नहि करथु। हम सब हिनकर विवाह अपन दोसर बेटी सँ करा देबनि। दोसर एकरा सँ 2 बरखक छोट अछि। सर्वगुणसम्पन्न छनि हिनकर सारि। श्रीमान मैनेजर साहेबक चानी। दिने सँ सारि पाहुन लग आबि गेलिह। सब किछु नार्मल। बहिनोई सँग सब किछु करए लगलि जे एक पति-पत्नीक बीच बन्द घर मे अन्हार मे होइत छैक। अहि क्रम मे 7 मास बीत गेल। 7 मास मे सोझे साल द्विरागमन भेलनि। द्विरागमन मे सारि कोना अबितथिन? उपाय नहि छलनि। ताहिं पत्नी एलथिन। गाम अबिते देरी नव पुतोहुक असलियत सबकेँ लागि गेलैक। आब की हौक? परिवारे मे किनको सरबेटी गरीब मुदा अतीव सुन्नरि। तुरत लड़कीक पिता विवाहक निवेदन भेज देलथिन। श्रीमान मैनेजर साहेब बिसरि गेलाह जे ओ सात मास धरि अपन सारि सँग गुलछर्रा उड़ेने छला। सब वचन बिसरि गेला। सब मर्यादा धो-पोछिक चाटि गेलाह। अपन दुखड़ा गबैत रहला। माए-पितियाइन सब अतबे कहथिन्ह: "धन कही एकरा जे सात मास धरि एहि अकान आ बकलेल कानियाँ सँग कोना बितेलक! एकरा आब शीघ्र अहि जंजाल सँ मुक्ति भेटक चाही।" अपना प्रति एहि तरहक सहानुभूति पाबि श्रीमान मैनेजर साहेब मने-मन गदगद छलाह। विवाह तय भ' गेलनि। प्रथम पत्नीक सब सामान, वस्त्र, गहना, द्रव्य-जात राखि राते-राती मारि पीट क' सासु भगा देलथिन्ह। कानियाँ थोड़ेक निवेदन अवश्य केल्थिन जे हुनको रह' देल जानि। मुदा केँ सुनैत अछि? आब श्रीमान मैनेजर साहेबक दोसर पत्नी हुनका ई आदेश, निर्देश द' देलथिन्ह : "जाहि दिन अहाँ पहिल पत्नी केँ अपन घर घुसा लेब ताहिये दिन हम माहुर खा आत्महत्या क' लेब।" मैनेजर साहेब एकाएक एक परम पत्नीभक्त पति बनैत बजला: "राम-राम! अहाँ की बजैत छी? विवाह सँ आई धरि हम एकर शरीर नहि छूल। आब घर घुसेबाक कोन प्रयोजन?" मैनेजर साहेब केँ वंश वृक्ष दोसर पत्नीक संतान सँ होमय लगलनि। बेटी-बेटा-बेटी। सब हरेक छह मास पर गाम आबथि। गाम अबितहिं नहि जानि कोना प्रथम पत्नी जकरा अड़ोस-पड़ौसी सब बियहुती कहैक बुझि जाइक। राति क' आबि जाइक। मुदा, भोजन त दूर मैनेजर साहेब केर माय पितियाइन सब समान छीन मारि-पिट क' भगा दैत छलथिन्ह। बेचारी रस्ताक भिखमंगी बनल अछि। मुदा कियोक मैनेजर साहेब केँ इहो नहि कहि सकलनि जे ओकरा अपना घर पर कम सँ कम अन्न-वस्त्र दियौक। आसरा दियौक। ऊपर सँ बाप-संबंधी सब सेहो ओहि अभगली परित्यक्ता केँ मारैत पीटैत छैक। जीवन नर्क बनल छैक। एहि प्रकरणक जड़ि मे अगर चली त' एहि परित्यक्ता केँ परित्यक्ता बनेबै मे प्रथम दोख ओकर पिता केँ छनि।  जखन हुनका बुझल छलनि जे हमर बेटी एहेन अछि त’ विवाह कथिलेल करा देलथिन्ह? ओहि पैसा सँ ओकरा लेल कोनो रिहैबिलिटेशन सेन्टर अथवा किछु आरो क' सकैत छला। से नहि केलनि। जखन जमाय बेटी केँ छोड़ि देलथिन्ह त' ओकरा जीवन लेल कोनो इंतज़ाम करक छलनि। दोसर दोख मैनेजर साहेब केँ? अगर सारि सँ विवाह नहि करबाक छलनि त' संबंध कोन कारणे सात मास धरि रखला? पुनःश्च, अगर दोसर विवाह केलाह त' प्रथम पत्नीक सब किछु वापस कथिलेल नहि क' देलथिन्ह? एहि प्रकरण मे दुनू पक्षक समाज सेहो ओहिना पातकी अछि। अनुभवक कथा अनंत अछि। ककरा कही ककरा छोड़ी? कहब तखने बात फरिछायेत। बिना कहने कोना बुझबैक? एक दृष्टान्त हाले केँ अछि। से की? एक व्यक्ति विवाह केलाह। विवाहक एक वर्षक बाद कतौं नौकरी लेल गेलाह। जे गेलाह से 3 वर्ष धरि एबे नहि केलाह। सब उपाय भेल। जगह-जगह लोक पहुचल। थाना-पुलिस मे रपट लिखा देल गेल। मुदा किछु ने भेल। अंत मे ओहि युवक केँ माता-पिता हुनक पत्नीक विवाह ओहि युवक सँ छोट भाई सँ करा देलथिन। परिवार चलए लगलैक। स्त्री मानि लेलक जे हमर प्रथम पति आब एहि संसार मे नहि छथि, त देओर संग विवाह कर’ मे कोनो हर्ज नहि। पहिल पति सँ एक लड़की रहैक। दोसर पति सँ एक बालक। सब किछु पटरी पर निक सँ चलय लगलैक। करीब 9 वर्षक बाद एकाएक ओहि महिलाक जीवन मे भूचाल आबि गेलैक। पहिल पति कहि नहि कोना कतए सँ वापस घर आबि गेलैक। अपन पत्नी लग गेल। बाद मे पता चललैक जे ओकर अनुपस्थिति मे ओकर छोट भाई सँ विवाह भ’ गेल छैक पहिल पत्नी केँ। बेचारी महिला दू नाव मे कोना पैर रखत? बड़का समस्या। पहिल पति ओकरा पर अपन अधिकार जतबैक। दोसर पति कहैक जे हम त’ सब चीज़ अवधारि क’ विवाह केने रही। दुनू भाई मे द्वन्द चलैत रहलैक। अन्तिम निर्णय ई भेलैक जे महिलाक प्रथम पति दोसर कोनो लड़की सँ विवाह करथु। जखन से भ’ गेलैक त’ मामला सुलझि गेलैक। मिथिला मे एहनो विधान रहल अछि जे जाति-मूलक नाम पर एक आदमी 20-25 टा विवाह क’ लैत छलाह। एक दू छोडि अधिकांश पत्नी परित्यक्ताक जीवन जीबैत छली। परित्यक्ताक अर्थ केवल अन्न-वस्त्र-स्थानक तकलीफ अथवा सामाजिक मर्यादे नहि अपितु शारीरिक, मानशिक सुख स वंचित हएब सेहो भेल। जखन लाचार भेल अहि तरहक स्त्रिग्न किछु दोसर पुरुष दिस देखैत छथि त’ समाज हुनका कुलटा, निर्लज्ज, अपवित्र, भ्रष्ट, दुश्चरित्र आ ने जानि की-की कहैत आबि रहल अछि? किनको डाईन त’ किनको डाहि कहि टार्चर कैल जाइत छनि। समाज बौक बनल रहैत अछि। धनक इच्छाक पूर्ति भ’ सकैत अछि, तनक इच्छाक पूर्ति कोना हएत? खादी आ मिथिला/मधुबनी पेन्टिंग केर शुरुआत भेला सँ बहुत परित्यक्ता अपन आर्थिक मर्यादाक रक्षा करबा मे सफलं रहलि छथि। पेंटिंग मे पद्मश्री गंगा देवी, गोदावरी दत्ताक कथा सबके बूझल अछि। खादीक आगमन सँ कतेको परित्यक्ता अपन अन्न, वस्त्रक उपार्जन करबा मे सफल भेली। अपन सोच, अरमान, सपना, सृंगार सब किछु खादीक ताग मे देखनाई शुरू केलनि। कलात्मकता अपन पराकाष्टा पर पहुँच गेल। मिथिलाक सूती खादी देखैत-देखैत समस्त भारत मे अपन महिनी, कलाकारी आदि गुणक कारणे प्रसिद्द भ’ गेल। हम मानवशास्त्र, कला-इतिहास आ मानवाधिकारक छात्र रहल छी। आदिवासी आ ग्रामीण समाज मे काज करैत आबि रहल छी। आदिवासी समाज मे कोनो कारणे अगर पति-पत्नी मे नहि पट्लैक त’ पति-पत्नी दुनू केँ ई स्वतंत्रता छैक जे अपन जीवनसाथी केँ छोडि दोसर ताकि लए। एहि सँ परित्यक्ता प्रथा एहि तरहे ओहि समाज मे प्रभावी नहि छैक जाहि तरहे अपना समाज मे। एक बात आरो हमरा अचरज मे डालैत अछि। लोक जाहि मे स्त्रिग्न सेहो सम्मिलित छथि, सभ कियोक अहि तरहक विधानक परिचालन लेल पुरुख सँ अधिक दोष स्त्री केँ दैत छथि। जखन की सत्य ई अछि जे पितृसत्तात्मक समाज अपन जाल ऐना ने बिछेने अछि जाहि मे सामान्य केँ केँ पुछैत अछि आधुनिका आ पढलि महिला सेहो फंसि जाइत छथि। अंत मे अतबे कहब जे परित्यक्ता स्त्री समाजक समस्या नहि अछि। ई मानवक समस्या अछि। एहि पर गंभीर बनक जरूरत अछि। सबकेँ एक संग आबि संगोर करैत अहि समस्याक निदान निकलबाक अछि। अहि अभिशाप केँ समाप्त करक अछि। से भेल तखने हम सब गर्व सँ कहि सकैत छी जे हम सब प्रगतिक पथ पर बढ़ि रहल छी। गौरी चोरनी, गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर द्वंद्व? मधुश्रावणी कथा आ पाबनि मनुक्ख आ प्रकृति, लोक आ शास्त्र, स्त्री आ पुरुख,बूढ आ नव, प्रेम आ केलि, पारिस्थितिकी संतुलन केर सहज रुपे मिथिलाक अद्भुत परंपरा अछि। एकर जतेक चर्च हो से कम। एहि पाबनि के, एकर सब कथा, उपकथा, प्रसंग, उप-प्रसंग के नीक सं बुझनाई, कथा के मिथिलाक बिभिन्न क्षेत्र में उपलब्ध अंतर के संकलन, ओकर घमर्थन, समाजशास्त्रीय-मानवशास्त्रीय-मनोवैज्ञानिक विश्लेष्ण जरुरी अछि। दुर्भाग्य सं इतिहासकार, समाजशास्त्री, मानवशास्त्री, मनोवैज्ञानिक आर-त-आर साहित्यकार लोकनि सेहो एकर बहुत विवेचना नहि क सकलनि अछि। ई चिंताक विषय अछि।मानवशास्त्र में एक शब्द होइत छैक “enculturation” जकर अर्थ भेल जे लोक कुनो चीज, लूरि, ज्ञान, भाव, परंपरा आदि स्कूल अथवा क्लासरूम अथवा कुनो विशेष शिक्षक या शिक्षिका सं नहि बल्कि लोक व्यवहार के देखैत, ओकर अनुशरण करैत बिना बुझने आ प्रयत्न केने सिखने जैत अछि। नहि सिखबला/बाली के आ ने सिखाबय बला/बाली के एकर विशिष्ट भान होइत छैक मुदा ई सामाजिक ज्ञान के एक पीढ़ी सं दोसर पीढ़ी में हस्तांतरित निर्विघ्न रूप सं होइत रहैत छैक – चरैवेति-चरैवेति। अपन अल्पज्ञान सं मुदा मैथिली संस्कृति के सिनेह के कारण मधुश्रावणी पर हम किछु काज क रहल छी। प्रतिदिन नव बात ज्ञात होइत अछि। विवेचन नव दिशा दिस संकेत करैत अछि। इम्हर अपन माय लग पुनः तीन दिन धरि अहि कथा के बुझबाक प्रयत्न कैल। लागल, ई कथा आ पाबनि त पुरुख केर पूजाक एकाधिकार के सोझे-सोझ चुनौती द रहल अछि। कथा सुननिहारि महिला, कथा कहनिहारि महिला, कथा केर सामग्री, विध, विधान, सब किछु बताबय बाली महिला, पुरुख में मात्र अन्तिम दिन वर आ ओहो महिला के इसारा पर चलयबला यंत्रवत प्राणी! बाकि सब चीज़ में पुरुख के एन्ट्री बन्द। किछु लोक एक प्रश्नउठोलनि। ई जिज्ञासा पहिने बड़ प्रभावित नहि केलक सोचलहुँ, कथि लेल घमर्थन करु? लेकिन एखन भेल जे थोड़ेक सोची जे आख़िर ऐना कियैक छैक - गौरी आ छिनारि? एकरा कोना कही? जौं शास्त्र धेने रहब त एकर उत्तर असंभव। धर्माधिकारी सब आक्रमण करता। लोक सँ करब त समाधान के समिप आबि सकैत छी। लोक आ शास्त्र में एक अंतर स्पष्ट छैक - शास्त्र फ्रेम में बज्र गांठ सनक बान्हल छैक। ओहि फ्रेम सँ बाहर एबाक कल्पनो असंभव। ठीक एकर विपरीत लोक फ्रेम में रहैत अछि लेकिन आवश्यकता भेला पर फ्रेम सं बाहर एबामे में कनिकबो संकोच नहि होइत छैक। लोक प्रेम में भक्त आ भगवान मित्र जकाँ, नौकर मालिक जकाँ, प्रेमी-प्रेमिका जकाँ व्यवहार करैत अछि आ ओहि व्यवहार में शास्त्रक गुण, शिक्षा, संस्कार सम्मिलित रहैत छैक। लोक भगवान के आन नहि अपन बुझैत अछि। अपन नहि अपन परिवारक मनुख बुझैत अछि। सब निराकार सब गुणे साकार भ जाइत छैक। भगवान लोक में मनुखे जकाँ व्यवहार करैत छथि। ई बात शास्त्र में संभव नहि। लोक महादेब के “उगना” बना दैत अछि। सबरी लोक अछि जे अपन निश्छल प्रेम मे राम के आठि वैर खुआबय में संकोच नहि करैत अछि। सधना जाट भगवान के पहिने भोजन करबैत अछि तखने अपने खाइत अछि। लिंगायत समाज के एक महिला हमरा कहलक: "देखू, महादेब के ने माय ने पिता; ने भाई ने बहिन! बेचारे बाल रूप में हमरा लग हमर गाय केर बछड़ा बनि हमर गौशाला में खुटेसल रहैत छथि। अगर सर्दी भ गेलनि, नाक सँ पानि बहै लगतनि त के पोछतनि? के तेलक मालिश करतनि? चलु छोड़ू सब के हे बाऊ महादेब। आई सँ हम अहाँके अपन बेटा बना लैत छी। हम तेल-कुर क देब, नाक पोछि देब, काढ़ा पिया देब”। सब सँ पैघ बात ई जे ई महिला निर्विकार भाव सँ बजैत छलि। जे बजैत छलि सैह करबाक इच्छा सेहो छलैक। ई भेल लोक अथवा फोक के शक्ति। एहेन बात अथवा व्यवहार शास्त्र के ज्ञाता अथवा विद्वान/विदुषि नहि सोचि सकैत छथि। आब बात करी मधुश्रावणी पावनि आ कथा में ओ प्रसंग जाहि में गौरी लेल छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल अछि। कथा के अनेक स्वरूप अछि। लेकिन सब स्वरूप में छिनारि शब्द के प्रयोग कैल गेल छनि। मधुश्रावणी के प्रयोजन नव विवाहित लड़की के जीवन के सब किछु के व्यवहारिक ज्ञान देनाई अछि। व्यवहारिक ज्ञान में शास्त्रीय ज्ञान सम्मिलित छैक। अगर मधुश्रावणी के कथा के सब प्रसंग आ उपकथा के देखब आ गुनब त लागत जे किछु बाँचल नहि अछि। एक गृहणी के जतेक ज्ञान चाही सब किछु घोटि-घोटि एहि कथा के मादे सिखा देल जाइत छैक। गौरी देवी के भूमिका के छोड़ि एक आदर्श स्त्री के भूमिका में छथि जकरा सामान्य स्थिति में अनेक तरहक परिस्थिति के सामना कोना करक चाही तकर प्रैक्टिकल ज्ञान भेटैत छैक। अहि प्रसंग में गौरी के भूमिका एक एहेन शिक्षिका के रूप में छनि जे नारी मनक द्वंद के समाधान करैत छथि। महादेब के भूमिका एक एहेन पतिक रूप में छनि जे पत्नी के भ्रम के दूर करैत छथि, अपन पत्नी के सम्मान करैत छथि आ हुनक सम्मानक आ शब्दक रक्षा करैत छथि। संगहि महादेब गौरी के मर्यादा के भान सेहो करबै चाहैत छथि। एहि सम्पूर्ण उपकथा में स्त्री आ पुरुख एक दोसरक पूरक छैक। दुनू के एक दोसरक मर्यादा के चिंता छनि। गौरी तीन स्वरूप - डाईन, चोरनी आ छिनारि - में ई संवाद स्थापित करय चाहैत छथि जे शंका आ जिज्ञासा मनुखक प्राकृतिक गुण छैक। एकर प्रमाणिकता के परीक्षा करब अनिवार्य। दोसर दिस महादेब अपन कृत्य सँ ई प्रमाणित करय चाहैत छथि जे पति-पत्नीक संबंध विश्वास पर टिकल रहैत छैक। अहि विश्वास के सम्मान आ रक्षा करब दुनू के सामूहिक जिम्मेदारी होईत छैक। अविश्वास सँ संबंध टूटैत छैक। बात गौरी आ शिव के होईत छैक तांहि उपकथाक विषय वस्तु ओहने छैक। महादेब तंत्र के जनक छथि। तांहि बात डाईन के भ रहल छैक। गौरी डाईन बनय चाहैत छथि। महादेब ई कहैत छथिन जे ई कार्य सभक नहि छैक। गौरी के दक्षिण दिशा के गाम में जेबाक लेल मना करैत छथिन। गौरी कोना मानती? सिखनाई शुरू करैत छथि। बिना कहने महादेब साक्षी रहैत सब क्रिया के देखैत अपना कंट्रोल में लेने रहैत छथि। आ जखन गौरी चुपचाप डाईन केर सब मंत्र पढ़ि सिख जाइत छथि त गौरी अपन पुत्र गणेश आ कार्तिक के कोढ़ करेज देखै लगैत छथि। आब महादेब गौरी के पकड़ि लैत छथि आ कहैत छथिन: "हद भ गेल? हमरा मना केलाक बादो अहाँ गेलौं दक्षिण कोण में?”तामसे भेड़ महादेब कहैत छथिन जे पूरा तंत्र डाहि देथिन। तुरत गणेश एक-एक मंत्र लिखने जाइत छथि आ कार्तिक डाहने जाइत छथि। गौरी के होइत छनि जे तंत्र कम सँ कम मूल रूप में बचि जाइक। साबर मंत्र मात्र अढ़ाई आखर के होईत छैक जकरा कातिक सँ चुटकी में चोरा लैत छथि। चोरेबक उद्देश्य मंत्र अथवा परम्परा के रक्षण छैक आर किछु ने। हमरा एना बुझना जाइत अछि जे एहि प्रसंग के प्रासंगिकता एहि बात मे छैक जे एक सफल गृहणी के सब तरहे अपन घर आ गृहस्थी के रक्षा करक चाही। आब गौरी चोरनी छथि ताहि प्रकरण पर आबि। बहुत बेजोड़ प्रकरण अछि। आ एकर आधार सेहो गौरी तैय्यार करैत छथि। गौरी महादेब सँ आग्रह करैत छथि जे अगर कियोक चोरी करैत अछि, किम्बा छिनरपन करैत अछि त ओकरा शरीर मे किछु एहेन चिन्ह अंकित भ जैक जाहि सँ जन-सामान्य के ई सिख भेट जाइक जे एहेन काज नहि करी। महादेब ना-नुकूर करैत गौरी के निवेदन मानि लैत छथि। एक बेर पुनः गौरी मर्यादा के लाँघेत छथि आ महादेब के मना केलाक बाद एक गाम में भाटा चोरी करैत छथि। निशान के रुप मे जहिना-जहिना गौरी भाटा चोरबैत गेली तहिना-तहिना नागड़ि बढ़ैत गेलनि। जखन गौरी के भान होईत छनि त महादेब सँ निवेदन करैत पुनः ओकरा समाप्त करय कहैत छथि। फेर होईत छनि कनिक अवशेष चिन्हक रूप में रहक चाही। आ कहैत छथिन जे निशान मात्र ई जानवर में होबक चाही। सैह भेल। आब छिनारि बला प्रकरण में अबैत छी। एक बेर पुनः महादेब के मना केलाक बाद नहरि कात में गेलनि। महादेब माल्लाह बनला। नाव पर राश्ता कटैत काल माल्लाह गौरी के कखनो गाल छुबि लैन।कखनो चुट्टी काटि लैन। भाव उत्तेजक भेल गेलनि। जेना-जेना केलि भाव मे गौरी मगन भेली तहिना-तहिना हुनकर माथ पर सिंग बढ़ैत गेलनि। मल्लाह जाल खसेलक। गौरी माछ बिछलनि। एकर फायदा उठबैत मल्लाह गौरी सँग एमहर-ओमहर करैत केलि क्रिया के सेहो आनंद नहि-नहि करैत लैत रहल। केलि होइत गेलनि आ सिंघ बढ़ैत गेलनि। आब गौरी के होश एलनि : "हे भगवान! ई की भेल? आब की हैत?” यैह सोचैत गौरी अपन सिंघ के साड़ी सँ झपैत गेली। मुदा सिंघ बढ़िते गेलनि। अंततः महादेब सँ निवेदन केल्थिन: "गलती भ गेल हमरा सँ। ई मलहबा अपन सीमा नाघि गेल। छू-छाप हमर प्रतिशोध के बादो करिते रहल। एकरा केलि कहनाय उचित नहि। गलती सँ हम कहि देलौं जे चिन्ह द दियौक। एकर उपाय अहाँ बताऊ?" महादेब कहलथिन: "हे गौरा, हम त कहने रही अहाँके जे निशान के चक्कर मे नहि परु। मुदा अहीं जिद ठानि देलौं जे द दियौक। लेकिन अहाँ चिन्ता जूनि करु। ओ मलहबा कियोक आर नहि छल। हम रही। ताहिं अहाँ छिनारि नहि भेलौं”। महादेब बजिते रहलनि: "हमरा बुझा गेल जे अहाँ तथ्य के जानय चाहैत छी। हम सोचलहुँ, से त ठीक मुदा कहीं ऊंच-नीच भ गेल त की हैत? सैह सोचैत स्वयं मलहबा बनि अहाँ लग गेल रही। अहाँक चरित्र बाँचल अछि। अहाँ अनेरे चिंता जूनि करु”। गौरी के भेलनि जे ओ अनेरे महादेब पर शंका केलनि। कहलथिन गौरी: "हे महादेब! हमरा सँ गलती भेल। आब अहाँ एकर उपाय करु। सिंघ त कोनादन लागि रहल अछि”? गौरी दिस देखि हँसैत महादेब आब सिंघ के समाप्त करय लगला। गौरी कहलथिन :"एक काज करु, कनि नाममात्र सिंघ रहय दियौ जे मृतभुवन में जानवर के सिंगार बनत”। गौरी के बातक सम्मान करैत महादेब नाममात्र के सिंघ रहय देलथिन जे कथाक अनुसार आजुक जुग में जानवर सब में भेटैत अछि। लोक व्यवहार के अनुरूपे अगर कथा के विवेचना करब त लागत जे गौरी एक सामान्य हाड़-मासक महिला बनि शिक्षा दैत छथिन। गौरी कदाचित सब महिला के ई सिख दैत छथिन: "एखन धरि जे गलत-सलत केलौं से बिसरि जाउ। आब अपन दाम्पत्य जीवन मे संलग्न होउ। पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम, विश्वास बनल रहक चाही। इतिहास के छोड़ि वर्तमान आ भविष्य के चिंता होबक चाही”। शास्त्र केर गौरी भले एहेन बात सोचि नहि सकैत छथि, लोकक गौरी अपने समाजक महिला बनि समाज के जन सामान्य महिला के मानशिक अवस्था के देखबैत चोरनी, डाईन आ छिनारि बनि एक नव सिखक परम्परा स्थापित करैत छथि। एकर नाम जे द दी – यथार्थवाद(realism), लोक परंपरा केर शक्ति, व्यवहारिकता, पुरुख-प्रकृति के समावेश अथवा आरो किछु। समग्र रुपे ई अद्भुत परंपरा अछि। हाँ, मिथिला में मधुश्रावणी पाबनि केएक बात कनि कचोट करैत अछि आ एकर सार्वभौमिकता पर भले खिड़की दोगे कथिलेल नहि मुदा चैलेंज करैत अछि: “ई कुन कारण सं मिथिला के सब जाति में समाविष्ट नहि भ सकल आ ब्राह्मण मात्र में नुकायल रहि गेल?” भले ई प्रश्न छोट लगैत हो लेकिन एकर उत्तर देनाई अतेक सहज नहि अछि। उत्तर तकला सं एकर एक नव आयाम ठाढ़ भ सकैत अछि? पूरा कथा सुनलाक आ बेर-बेर मनन आ विवेचन केलाक बाद अहि निष्कर्ष तक यात्रा कैल. पाठक के भावक प्रतीक्षा रहत। आभार: अपन माता श्रीमती शिवदुलारी देवी के कहल कथा के आधार पर एहि प्रसंग पर चर्चा कएलहुँ अछि। लघुकथा- पुरुषक नहि विश्वासे आशुतोष गोड्डा सं छला आ सैनिक स्कूल तिलैया सं 12वीं पास केलाक बाद दिल्ली विश्विद्यालय मे बी एस सी मे नामांकन लेने छला। पढबा मे तेज आ अपना विषय के प्रति साकांक्ष छला। भाषा मे बहुत निक पकड़ छलनि जाहि कारने शिक्षक आ विद्यार्थी मे बहुत चर्चित छला।शब्द केर प्रयोग, ओकर उचाचरण, लालित्य सब किछु मे बेजोड़ छला आशुतोष।ई एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार सं छलाह। तीन भाई – एक पैघ एक छोट आ आशुतोष बीच मे।आशुतोष केर जेठ भाय हिनका सं तीन वर्ष केर पैघ आ ओहो सैनिक स्कूल तिलैया केर छात्र।हिनक पिता छोट छीन सड़क इत्यादि के मरम्मत के ठीकेदारीकरैत छलथिन आ घर इत्यादि सम्हारक काज आशुतोष केर माय जे की चतुर गृहणी छलथिन करैत छलथिन। कहि नहि कथिलेल आशुतोष के सैनिक अधिकारी बनबाक भुत नेने सं सवार छलनि। हुनकर जीवन केर एक मात्र उद्देश्य सैनिक अधिकारी बनब छलनि। अपन कक्षा केर एक लड़की चंद्रकला सं नहु-नहु आशुतोष केर सामिप्य भ रहल छलनि। ओना प्रारम्भ मे ई सामिप्य सहज आ पढबाक जिज्ञासा धरि सिमटल लेकिननित-नित आगा आ प्रगाढ़ होइत। आशुतोष जखन बी एस सी मे पढ़ैत छला ताहि क्षण अपन क्लास केर सब छात्र संग फील्ड वर्क लेल एक आत्मीय प्रोफेसर के संगे गुजरात गेल छलनि। ओतय मनोयोग सं काज केलनि। करीब 25 दिन रहला। हुनका संगे चंद्रकला सेहो छलथिन। चंद्रकला सावरि, सुनदरि छलि। अति संस्कारवती। चंद्रकला केर पिता इनकम टैक्स केर कमिश्नर छलथिन। दू भाई के बीच असगर बहिन। चंद्रकला बीच मे – एक भाय जेठ आ एक छोट। उपर सं जेठ भाय आई आ भाउज दुनू आई आर एस आ इनकम टैक्स विभाग मे पदाधिकारी। मुदा अहि बातक लेशो मात्र घमण्ड नहि छलनि। चंद्रकला सामान्य वस्त्र पहिरैत छली। मेक उप सेहो नाम मात्र। अपन पैघ-पैघ आंखि मे काजर जरुर लगबैत छली जे हुनका सौन्दर्य के कतेक गुणा बढ़ा दैत छल. चंद्रकला केर पहचान हुनकर सहजता, लज्जा भाव, आ पढ़ाई मे समर्पण छलनि। आशुतोष संग काज करैत-करैत नहि कहि कोना चंद्रकला आशुतोष संग प्रेम करे लगलनि। आशुतोष के सेहो एहि बातक भान जल्दी भ गेलनि। बिना बिलम्ब केने आशुतोष सेहो अपन ठोर मुसकियबैत चंद्रकला के अपन प्रेमक स्वीकृति द देलथिन। चंद्रकला के एकाएक भेलनि जे समस्त संसार केर ख़ुशी जेना हुनका तुरत भेट गेलनि। मोन भेलनि जे मस्त भ सरिसो के खेत सं भरल खेत मे नृत्य क सरिसबक पीयर फुल सं भरल खेत मे घुसबो केली। दुनू हाथ आसमान दिस उठेली आ सिनेमा केर गीत “चलती फिरूं उड़ती चलूं आज गगन मे” गेनाई शुरू केलनि। एकै आखर के बाद लज्जा आ हुनकर संस्कार जेना चंद्रकला के हाथ पकडि रोकि दनि? थमि गेली। भेलनि “ई की भेल?” यैह सब सोचैत-सोचैत नहु-नहु चलय लगलनि। करीब पांच डेग चलल हेती की कनि दूर सं आशुतोष केर हाकब सुनेलनि: “चंद्रकला, चंद्रकला? कत छी?” आब चंद्रकला आरो साकांक्ष होइत झट दनि सरिसबक खेत सं बाहर आबय लगली. लाज होम लगलनि, “कहीं आशुतोष हमरा हाथ ऊपर केने सरिसबक खेत मे गबैत आ नचैत त नहि देख लेलनि? हे भगबान! अगर देख लेला त की सोचता?” अहि तरहक भाव मोन मे बेर-बेर आबय लगलनि। डेग झटझारइत खेत सं बाहर आबय केर उपक्रम केली। अहि बीच आशुतोष आबि गेलाह अकचकाईत पुछलथिन: “की भेल चंद्रकला! अहाँ खेत मे की क रहल छी? हम अहाँ के बगल बला गाम मे किछु जानकारी लेबाक हेतु अपना संगे ल जाय चाहैत रही।" अकचकाइत अपन वस्त्र आ भाव-भंगिमा के ठीक करैत बाहर अबैत चंद्रकला बजली: “कुनो बात नहि। ओहिना सरिसब के फूल निक लागल त कनि भीतर खेत मे घुसि गेलौं। देखू ने कतेक सोभनगर लगैत छैक? दिल्ली मे की ई भेटत?” आशुतोष बिना किछु कहने अपन मुशकान सं हुनकर बात के हाँ कहलनि। आब चंद्रकला बजली: “चलू ने कुन गाम चलक अछि? हम तैयार छी. हमर रेकार्डर, पेन, नोटबुक सब किछु हमरा लगे अछि।” आशुतोष कनि रोमांटिक भ गेला। एहि क्षण चंद्रकला हुनका कनि अधिके सुन्नरि लगैत छलथिन। आगा बढैत चंद्रकला के हाथ अपन हाथ मे लैत कहलथिन: “हाँ, सरिसब के फूल त एहि खेत मे सत्ते बड्ड निक लगैत छैक। मोन त होइत अछि अहि खेत के बीच मे हमहु घुसी?” चंद्रकला लजाईत बजली: “ठीके घूस चाहैत छी अहाँ?” आशुतोष: “अहाँ मोने की झुट्ठे? बहुत मोन क रहल अछि।" चंद्रकला: “ठीक छैक। तखन घुसु ने सरिसबक खेत मे हमरा लग कैमरा अछि। हम फोटो खीचैत छी।" आशुतोष: “मुदा हमर एक शर्त अछि।" चंद्रकला: “की शर्त”? आशुतोष: “हमरा संगे अहुं चलू खेत मे। आ दुनू गोटे एक संगे फुलक सौन्दर्य, प्रकृति केर सजल रूप आ खेतक हरियर-पीयर स्वरुप के देखी, निहारी आ ओकरा संगे तारतम्य स्थापित करी”। चंद्रकला लजा गेली। फुसिये के अभिनय करैत बजली: “नहि-नहि अहाँ जाऊ। हम की करब जाक?” चंद्रकला के लज्जा भाव मे हाँ अथवा स्वीकारोक्ति केर अभिव्यक्ति स्पष्ट देखल जा सकैत छल। चंद्रकला के प्रेम मे मग्न भेल आशुतोष जेना चंद्रकला केर अंतर्मन केर भाषा बुझि गेला। बिना समय बरबाद केने चंद्रकला के हाथ पकरि खेत के भीतर जाय लगला। उन्मादित मोन सं नहि-नहि कहैत चंद्रकला आशुतोष संगे खेत मे बिदा भेली। आशुतोष केर पकड़ जोर भेल गेलनि। चंद्रकला आशुतोष केर हाथक दबाब सं आनंदित छली। तिल-तिल अनुराग बढ़ल जा रहल छलनि। आशुतोष सेहो गदगद छला। दुनू खेतक तह मे घुसि गेलनि। आशुतोष एकाएक चंद्रकला के अपन बाहुपास मे जकडि लेलनि। नहि-नहि कहैत चंद्रकला लाजवंती केर पात जकां समटल आशुतोष केर शरीरक अत्यधिक सामीप्य प्राप्त पाबि बैकुंठक सुख मे विलीन होमय लगली। बिना कुनो प्रतिकार केने अपना आपके आशुतोष के उपर न्योछावर भ गेली। एकरा कहैत छैक नैशर्गिक प्यार आ प्यार मे समर्पण। सघन खेत मे फेर दुनू के बीच सब किछु भेल जे स्थापित आ कमिटेड प्रेमी-प्रेमिका मे होइत छैक। हाँ, अपन मोन के सबल करबा लेल चंद्रकला आशुतोष के छाती सं सटैत,आशुतोष केर ह्रदय केर केश के जकरैत नहु-नहु कान मे अतेक जरुर कहलथिन: “आशु, अहाँ हमरा कहियो छोड़ब त नहि?” प्रेम मे – शरीर आ मोन दुनू – पागल आशुतोष झट दनि कनि ठसकल स्वर मे बजला: “की कहैत छी चंद्रकला? हम आ अहाँ आब कहियो कुनो स्थिति मे अलग नहि हैब। हाँ भ सकैत छी अगर अहाँ के हम पसीन नहि आबि आ कुनो अहाँ के पिता, भाई, आ परिवार के स्टेटस बला भेट जाय।" चंद्रकला आशुतोष के एहि बात सं तमसा गेली। कनि रुसैत उत्तर देलथिन: “की कहैत छी आशु? हमरा लेल अहाँ सबसँ उत्तम छी। अहाँ सफल रहि, असफल रही, हम अहाँ संगे आनंदित रहब। आई सं परिवार आ स्टेटस के बात नहि होबाक चाही।” अपन गलती के अनुभव करैत आशुतोष बिना किछु कहने अपन कान पकरैत चंद्रकला सं माफ़ी मांगि लेलनि। चंद्रकला सेहो फेर सं हुनक छाती सं सटि गेली। दू शरीर एक आत्मा बनि चुकल छल आ निश्छल प्रकृति केर कोरा मे बिहंसि रहल छल। ने कुनो छल ने प्रपंच। ने शहर केर कोलाहल ने थोपल स्टेटस केर मर्यादा। निष्कपट, प्रांजल, शुद्ध, आ नैशर्गिक प्रेम। आधा घंटा कोना बीत गेलनि से पते नहि चललनि। एक त निरजन मे खेत दोसर दुपहरिया के बेर। कियोक नहि एलेक। आधा घंटा के बाद आशुतोष चंद्रकला के माथ, आंखि, गाल, ठोर आ गरदनि मे चुम्मा लैत गदगद भेला। चंद्रकला कुनो प्रतिकार नहि केलथिन। अंत मे ओहो एक बेर आशुतोष के पकरि ठोर मे चुमि लेलथिन। फेर दुनू गोटे चकवा चकवी जकां हाथ मे हाथ देने खेत सं बाहर एलनि आ दोसर गाम दिस अपन फील्डवर्क लेल बिदा भेलनि। भरि रस्ता गप्प कम केला मुदा दुनू ख्वाब मे रह्लनि। किछु दिनक बाद दुनू – आशुतोष आ चंद्रकला फील्ड-ट्रिप सं वापस दिल्ली विश्विद्यालय आबि गेलनि। आब प्रति दिन चंद्रकला आशुतोष लेल किछु-ने-किछु जरुर लबैत छली। क्लास समाप्त होइते एक ठाम बैसनाई, सिनेमा देखनाई,निरुला मे किछु खेनाई, आर्ची गैलरी सं बिभिन्न तरहक कार्ड कीनब ओहि मे अपन मोनक अभिव्यक्ति करैत एक दोसर के देब, लेब करैत समय भागल जा रहल छलनि। चंद्रकला केर शरीर के दोसरे रंगक चुहचुही आबि गेल रहनि। मस्त अलमस्त, मुदा संयत भाव सं सुन्दर स्वाभाव आ संस्कार सं। अनुकरणीय, निक प्रेमक परिभाषा या दृष्टान्त एकरे कहल जा सकैत छल। समय अपन प्रवाह सं चलैत अछि। एकर गति पर ककरो नियंत्रण नहि। चंद्रकला आ आशुतोष बी.एस. सी. पास केलाक बाद एम. एस. सी. मे आबि गेलनि। आब चंद्रकला अपन अधिक सं अधिक क्षण आशुतोष संग बिताबय चाहैत चंद्रकला। अपन पिता आ यूनिवर्सिटी केर एक प्रोफेसर सं सिफारिस करा विमेस हॉस्टल मे आबि गेली। तर्क देलथिन जे रिसर्च लेल अपना आपके तैयार करती। पिता आ भाई कतेक बेर हिनका प्रशासनिक सेवा लेल प्रोत्साहित केलथिन मुदा चंद्रकला अपन धुन मे मगन रहली जे शोध करती आ यूनिवर्सिटी मे पढ़ेती। घरक लोक थाकि क छोडि देलथिन। आशुतोष कॉलेज के हॉस्टल सं यूनिवर्सिटी हॉस्टल मे राघब लग आबि गेला। आब 8 बजे राति धरि आशुतोष आ चंद्रकला एक दोसरक सामिप्य मे रहे लगलनि। प्रेम तिल-तिल बढ़ल गेलनि। विभाग केर सब छात्र आ बहुत शिक्षक सेहो बुझि गेल्थिन जे हिनक प्रेम सॉलिड रॉक छनि। एहि बीच आशुतोष केर ध्यान एकाएक भारतीय सेना के अधिकारी बला नोकरी दिस चलि गेलनि। अते चंद्रकला आ आशुतोष मे अंतर छलनि। चंद्रकला केर इच्छा सामान्य जीवन जिबाक रहनि। ओ चाहैत छली जे आशुतोष सेहो हुनके जकां शोध करथि आ यूनिवर्सिटी अथवा कुनो कॉलेज मे पढ़ाबथि। लेकिन आशुतोष अपन जिद पर डटल रहला। चंद्रकला आशुतोष केर भावना के सम्मान करैत चुप भ गेली। चंद्रकला कनि दब्बु प्रकृति के छली। कखनो काल आशुतोष हुनकर एहि स्वभाब के गलत फायदा उठबैत छलनि। आशुतोष केर किछु व्यवहार राघब के विचित्र लगैत छलनि। ओ हमेशा स्मार्ट बनि रहैत छला। ढंग सँ वस्र पहिरनाई,गर्दनि मे स्कार्फ़ केर प्रयोग, मोछ के ऊपर ऐंठब, छाती तानि क रहब, गर्दनि ऊंच आ सोझ केने चलब, हमेशा गंभीर रहब, अंग्रेजी केर उच्चारण आ शब्दाबली पर अधिक ध्यान राखब किछु एहेन गुण सँ युक्त छला आशुतोष। पढ़बा मे आशुतोष नीक छला। कुनो बातक वर्णन अथवा फील्ड वर्क केर रिपोर्ट साधल मानवशास्त्री जकाँ करथि। राघब के जूनियर रहितौं आशुतोष राघब केर भाषा एवं अन्य चीज़ सबके ठीक करैत छलथिन। आर त आर राघब केर एम फिल केर रिपोर्ट केर जखन अंतिम रूप बनि गेलनि त ओ आशुतोष के भाषा शुद्धिकरण एवं सिंगार लेल देलथिन। आशुतोष सेहो एहि काज के बहुत प्रोफेशनल ढंग सँ केलनि। 10 दिन मे पूरा रिपोर्ट के सुन्दर, सोभनगर आ व्यवस्थित क देलथिन। फाइनट्यून भेलाक बाद राघब ओकरा बाइंडिंग लेल द देलथिन। आशुतोष सेहो राघब के बहुत सम्मान करैत छलथिन। आशुतोष प्रतिदिन वर्जिस करैत छला। अपन कक्ष मे सद्दाम हुसैन केर फुल स्केल पोस्टर रखैत छला। पोस्टर के नीचा अपना हाथे लिखने रहथि - LET US IMBIBE HIM ई किछु एहेन बात रहैक राघब के कोनादन लगलनि। एक दिन राघब हुनका सँ जिज्ञासा केलथिन, "आशुतोष, ई सद्दाम केर पोस्टर आ ऊपर सँ अहाँक स्लोगन। एकर मतलब हमरा नहि लागल?" आशुतोष बिहँसैत बजला, "सर, सद्दाम केर दृढ़ इच्छाशक्ति, निर्णय आ हिम्मत हमरा प्रभावित करैत अछि। अमेरिका सनक देश के असगरे हिलेने अछि। सैनिक शाशक हो त सद्दाम सन। तांहि हम सद्दाम के पसिन करैत छी। देखू, हमेशा ई सैनिक केर वर्दी मे रहैत अछि। सब सँ पहिने अपने निर्णय लैत अछि । युद्ध भूमि मे सेहो आगा रहय बला नेता अछि एहि सँ एकर सेना मे जोश भरल रहैत छैक।“ राघब यद्यपि आशुतोष केर तर्क सँ बहुत प्रभावित त नहि भेला हुनकर जोश आ उमंग राघब के अवश्य प्रभावित केलकनि। एकदिन आशुतोष राघब के संबोधित करैत कहलथिन, "सर, हमरा जीवन मे मात्र एक नौकरी प्रभावित करैत अछि -सेनाक नौकरी। अगर रईसी आ गौरव के जीवन जीबाक हो त सेना मे अधिकारी के नौकरी जॉइन करु।" आशुतोष केर आँखि सँ साफ बुझना जा रहल छलनि जे हुनकर जीवन केर उद्देश्य की छनि। राघब केर दोसर प्रश्न छ्लनि: "आखिर की बात एहेन छैक एहि मे? अहाँ नीक विद्यार्थी छी, प्रशासनिक सेवा मे जा सकैत छी, आई पी एस बनू, किछु क सकैत छी। पुलिस मे सेहो कम सुविधा थोड़े ने छैक? अहाँ रिसर्च मे नीक क सकैत छी। बहुत उत्तम स्तर केर शिक्षक भ सकैत छी?" आशुतोष बजलनि, “सर, हम अपने सँ सेना के ऑफिसर्स केर ठाठ देख चुकल छी। भले पाई कतौ भेटय लेकिन जे सुविधा, मस्ती, रोब आदि सेनाक ऑफिसर होबा मे छैक से कतौ उपलब्ध नहि।“ आशुतोष के सैन्य अधिकारी बनबाक उच्च आकांक्षा देखि राघब अपना आप के मौन रखनाई उचैत बुझलनि। लेकिन मोने मोन थोड़ेक आशुतोष केर भविष्य के ल'क चिंतित जरूर भ गेला। एम एस सी प्रीवियस के नवम मास मे एकाएक एक दिन आशुतोष चंद्रकला के कहलथिन , "देखू, हम परीक्षा नहि देब। आब हम राति दिन सैनिक अधिकारी बला एंट्रेंस कर तैयारी करब।" चंद्रकला : "ई बात त ठीक। मुदा परीक्षा देब मे की हर्ज? कम सँ कम हॉस्टल मे रहबाक अधिकार त रहत?" आशुतोष: "से त ठीक मुदा हम दू नाव मे पैर नहि राखै चाहैत छी। सब समय आ ऊर्जा हम अपन प्रतिस्पर्धा बला परीक्षा मे लगबे चाहैत छी।" चंद्रकला के बुझा गेलनि जे आशुतोष के बुझेनाई असंभव अछि। चुपे रहब मे अपन आ आशुतोष दुनू के हित बुझना गेलनि। खैर, समय बितैत रहल आ आशुतोष अपन तैयारी मे संलग्न रहला। अंग्रेजी आ जनरल नॉलेज कर चिंता हुनका नहि छलनि। हां कनि फिजिकल फिटनेस मे डर रहनि। पहिल बेर मे लिखित परीक्षा नहि पास क पेलनि। निराश भेला। दू-तीन धरि मौन भ गेला। ने बाजब ने भूकब। भोजनो नीक सँ नहि करथि। हाँ, दू-तीन बेर राघब लग आबि अवश्य बाजथि, "ई नहि पचा पाबि रहल छी सर जे लिखित परीक्षा मे हमरा कथी लेल नहि भेल?" राघब सेहो दुखी छला। भरोश दैत कहलथिन, "कम ऑन आशुतोष! ई प्रतिस्पर्धा केर परीक्षा छ्ल कुनो यूनिवर्सिटी केर रूटीन परीक्षा नहि। रूटीन परीक्षा मे जतेक विद्यार्थी नीक लिखतै, सब पास भ जेतैक। एकर विपरीत कम्पटीशन केर परीक्षा मे निश्चित पद रहैत छैक आ अनन्त प्रवेशार्थी। तांहि बहुत गम्भीर छात्र सेहो छटा जाइत छथि। अहाँ मेधावी आ संस्कारी लोक छी। अपन कर्तव्य मे लागल रही। सफलता एक ने एक दिन अवश्य भेटत।" राघब के बात सँ जेना आशुतोष के प्राण मे प्राण एलनि। विस्वाश फेर जाग्रत भेलनि। कहलथिन, "ठीक कहैत छी सर। हमरा अनेरे भूतकाल केर असफलता पर पश्चाताप के छोड़ि फेर सँ पूर्ण मनोयोग सँ तैयारी करक चाही। आब हम सैह करब आ बाहरी दुनियां सँ थोड़ेक दूरी राखब।" एहि बीच चंद्रकलाकेर होस्टल मे एक ऋचा नामक लड़की एली। ऋचा के चंद्रकला सङ्गे रूम शेयर करक छलनि। थोड़ेक दिन मे दुनू मे प्रगाढ़ मित्रता भ गेलनि। ऋचा के चंद्रकला अपन आ आशुतोष केर सब बात बता देलथिन। आशुतोष सँ भेट सेहो करा देलथिन। ऋचा गोरधप-धप, नमहर कद काठी, मुहँ मे पानि, पैघ आँखि, आकर्षक शरीर,उंन्नत आ सुडौल कुच केर स्वामिनी छलि। जांघ तरासल, नितम्ब उठल आ गजगामिनी जकाँ चलैत छलि ऋचा। जेहने ऋचा देखबा मे सुन्नरि तेहने बजबा मे। ककरो पहिल बेर मे अपन तनक सुंदरता सँ आ वचनक चातुर्य सँ अपन गुलाम बना लैत छली। मुदा आशुतोष के ऋचा अपन जेठ भाय बना लेलनि। इम्हर परीक्षा मे नहि भाग लेबक करने आशुतोष के ऑफिशियली होस्टल खाली करय पड़लनि। यद्यपि राघब हुनका अपना रूम मे रखने रहलनि। एक समस्या भोजन के छलनि। आशुतोष बाहर सँ भोजन करे लगला। आशुतोष के घरक स्थिति बहुत नीक नहि छलनि। पिता रइस आ एक नंबर कर देहचोर। किछु ठीकेदारी आ किछु खेतीबाड़ी सँ जीवनक गुज़ाडा चलैत छलनि। ऊपर सँ आशुतोष तीन भाई। पहिल भाई सेहो सैनिक स्कूल तिलैया सँ पढ़ल। बाद मे आर्मी अफसर बनलथिन। मुदा थोड़ेक दिन मे नौकरी छोड़ि लखनऊ आबि टेलीकॉम जगत मे अपन व्यवसाय स्थापित केलनि। लखनऊ मे अपना सँ पांच वर्ष पैघ अपने व्यवसाय के क्षेत्र केर दिक्षीत ब्राम्हण कन्या सँ प्रेम विवाह क लेलनि। माता पिता आ भाई सब सँ कुनो संबंध नहि छलनि। लेकिन आशुतोष केर माय बहुत गुणमति स्त्रीगण छलि। ओ विपरीत परिस्थिति मे अपन दू छोट बालक के पढ़बैत छलि। आशुतोष एना स्थिति मे निर्णय लेलनि जे आब ओ ट्यूशन पढा अपन खर्च चलेता। ऋचा छलि मध्यप्रदेश केर सिन्धी। दू बहिन आ एक भाय। ऋचा सबसँ पैघ, तकर बाद भाय जे इंजीनियरिंग केर द्वितीय वर्ष केर छात्र आ सबसँ छोट बहिन आ ओहो इंजीनियरिंग केर प्रथम वर्ष केर छात्रा। आशुतोष सँग सैनिक स्कूल केर समय केर हुनक मित्र विजय सेहो छलथिन जे एम एस सी करैत छला। चूंकि विजय केर अंक बहुत नीक नहि छलनि तांहि ओ बाहर मे रहैत छला। ऋचा के भाई आ बहिन के सेहो होस्टल नहि भेटल छलनि। जखन हिनकर सभक संबंध प्रगाढ़ होमय लगलनि त सब मिलक मुखर्जी नगर मे एक फ्लैट शेयर मोड मे ल लेलनि। आशुतोष आब होस्टल छोड़ि देलनि। होस्टल मे राघब आ चंद्रकला रहि गेलनि। चंद्रकला के पिता आब चंद्रकला सँ विचार करैत लड़का तकनाई शुरू करय चाहैत छला। मुदा चंद्रकला एकै बात कहै छलथिन, "बिना पी एच डी आ नौकरी केने ओ व्याह नहि करती।" हालांकि ई त चंद्रकला के बहाना छलनि। हुनकर मोन मे रहनि जे एकबेर जखन आशुतोष आर्मी अफसर केर नौकरी मे चयनित भ जेता त हिनका अपन पिता आ जेठ भाई सँ भेट करा सब राज बता देथिन। एमहर आशुतोष लिखित परीक्षा मे दोसरो बेर असफल भ गेला। आब ओ बहुत तनाव मे आबि गेला। छेपक मे एहो बात बतेनाई जरूरी जे ऋचा मुक्त स्वभाब के।लड़की छलि। 11 विं क्लास सँ अनेक पुरुष मित्र सब सँग मानशिक आ दैहिक संबंध रखली। हुनका रति-रभस मे, चुम्बन मे आलिंगन मे आ काम कीड़ा मे बहुत आनंद अबैत छलनि। ओना त आशुतोष सँ भाई बहिन केर सम्बन्ध छलनि तथापि आशुतोष सँग सटिक रहब, हुनका भरि पांज क छेकब, हुनका सङ्गे आलिंगनबद्ध भय सुतब आदि सहज भाव सँ करैत छलि। आशुतोष सेहो अहि मे आनंदित होइत छला। जखन आशुतोष के दोसर बेर सफलता नहि भेलनि तखन ओ एकदिन चंद्रकला के कहलथिन, "चंद्रकला, आब अहाँ अपन पिता के पसिन केर कुनो योग्य लड़का सङ्गे विवाह क लिय। हमर जीवन अंधकार भेल जा रहल अछि।" चंद्रकला के आँखि मे नोर भरि गेलनि। बजली, "की कहैत छी आशुतोष? हम अहाँ सँ सिनेह केने छी। अहाँ जतय रहब हम ओतहि रहब आ खुश रहब। एहेन बात नहि बाजू अहाँ। अगर कही त आई हमर घर चलू। हम एखने अपन पिता आ भाई सँ अपन सबहक प्रेम आ विवाह के बात करैत छी। अगर कही त हम कोर्ट विवाह लेल सेहो तैयार छी।" आशुतोष कहलथिन : "हमर कहब अछि, अगर सफल नहि भेलौं त हमरा सङ्गे अहुँके जीवन बर्बाद भ जैत। अहाँक प्रति हमर प्यार ओतबे शाश्वत आ प्रांजल अछि जतेक अहाँक सिनेह हमरा प्रति।" ई कहैत आशुतोष चंद्रकला के अपन बाहुपाश मे ल लेलथिन। प्रेमाधिक्य मे चंद्रकला छोट नेना जकाँ कनैत रहलि। आब चंद्रकला पी एच डी करय लागली। बस्तर केर मुड़िया जनजाति केर जड़ी-बूटी केर ज्ञान, तंत्र-मंत्र आ चिकित्सा पद्धति पर हिनकर दिव्य काज चलि रहल छलनि। मुदा आशुतोष के प्रति प्यार एवं हुनक जीवन रूपी नैय्या के डगमग करैत चलब के कारणे चंद्रकला केर शोध कार्य जेना एक ठाम ठमकल पड़ल होनि! एहि बीच आशुतोष केर परिवार मे एक आरो घटना घटित भ गेलनि। हुनकर जेठ भाय आ भउजी मे तलाक केर स्थिति आबि गेलनि। बेचारी आशुतोष केर माय परेशान। करती त की करती? एकटा बेटा छलनि आशुतोष के जेठ भाय के। ओ बेचारा ककरा लग रहत? काज धाज से रुकल। जेठ बेटा घर मे बैसल। आशुतोष केर छोट भाय सेहो बी एस सी केलक बाद टेलीकम्यूनिकेशन केर क्षेत्र मे नौकरी केनाई शुरू केने छलाह। प्रारंभिक संघर्ष केर बाद स्थिति नीक भ गेल छलनि। गाम पर माता पिता के सहयोग करब शुरू क देलथिन। हुनकर नाम छलनि प्रकाश। ओ बीच बीच मे आशुतोष लग अबैत रहैत छलाह। हुनका ऋतु अपना प्रेमजाल मे फंसा लेली। पहिने हँसब, बाजब आ बाद मे सब किछु शुरू भ गेलनि। बाद मे ई जानकारी आशुतोष के सेहो चलि गेलनि। ऋतु आ प्रकाश घोषणा क देलथिन जे दुनू प्यार करैत छथि आ विवाह करती। विवाहक रोड़ा आशुतोष छलथि। मा कहलथिन, "जाबेत धरि आशुतोष सेटल नहि भ जेता आ विवाह नहि क लेता तावेत धरि प्रकाश केर विवाह कुनो हालत मे संभव नहि छनि।" आब की हो? सब चुप। एहि बीच आर्मी ऑफिसर केर एंट्रेंस मे आशुतोष असफल होइत रहला। अंत मे आयु सीमा सेहो खत्म भ गेलनि। पत्राचार केर माध्यम सँ प्रबंधन केर मास्टर डिग्री हासिल केलनि। आ अंततः एक सवयं सेवी संस्था मे छोट छीन नौकरी पकड़ि लेलनि। हुनक प्रेम मे मातलि दीपशिखा एखनो हुनका सँ विवाह करबा लेल तैयार। मुदा अपन हाव भाव सँ एवं अन्य श्रोत सँ आशुतोष चंद्रकला के ई सूचना द देलथिन जे हुनकर विवाह आब कुनो स्थिति मे संभव नहि छनि। चंद्रकला आब की क सकैत छलि। चंद्रकला संगे हुनका सँ एक साल जूनियर लड़की सौम्या सेहो बस्तर केर मुड़िया जनजाति पर शोध करैत छलि। ओहो निखिल नामक एक क्लासमेट सङ्गे प्यार करैत छलि। प्यार की त लिव इन रिलेशनशिप मे छलि। दुर्भाग्य सँ निखिल केर वकील पिता के ई संबंध नहि ठीक लगलनि। निखिल अलाइड सर्विस मे आबि गेला। बाद मे ई विवाह नहि भेलैक। हारि क सौम्या एक इंजीनियर सँग अरेंज्ड विवाह केली। ई अलग बात छैक की विवाह केर प्रथम दिन सँ हुनका अपन इंजीनियर पति सँ एडजस्ट होब मे दिक्कत शुरू भ गेलनि। एक बेर एक मास लेल चंद्रकला आ सौम्या अपन शोध केर प्रयोजन सँ बस्तर गेल छलि। जखन बस्तर सँ एली त सौम्या सँ चंद्रकला के पिता कहलथिन जे एक इंजीनियर टाटा कंसल्टेंसी मे काज करैत छैक। नीक परिवार छैक। लड़का के पिता आई आई टी दिल्ली मे प्रोफेसर, जेठ भाई सेहो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स मे छैक। छोट भाय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सँ एम बी बी एस क रहल छैक। लड़का सहज छैक आ देखबा सुतबा मे सुन्नर। अगर चंद्रकला के इच्छा होइक त एक बेर भेट क सकैत अछि। सौम्या चंद्रकला के ओहि लड़का के देख के हेतु उकसबय लागलि। चंद्रकला एक बेर फेरो आशुतोष लग गेली। आशुतोष अहि बेर साफ-साफ कहि देलथिन , "देखू, एहि स्थिति मे आब हमर आ अहाँक विवाह संभव नहि अछि।" चंद्रकला के आँखि सँ धाराप्रवाह नोर खसैत रहलनि। थोड़ेक काल मे वापस होस्टल मे आबि गेली। सब बात सौम्या के कहलथिन। सौम्या फेरो हुनका अपन दृष्टांत दैत एक बेर अपन पिता द्वारे चयनित लड़का सँ भेट करबा लेल मना लेलनि। दोसर दिन एक होटल मे चंद्रकला अनन्त अग्रवाल सँ भेट केलनि। अनन्त हुनका ठीक लगलथिन। अनंतों के चंद्रकला बड्ड नीक लगलथिन। दुनू अपन-अपन अभिभावक के विवाह करक स्वीकृति द देलथिन। एहि स्वीकृति केर 15 दिनक भीतर आशुतोष केर विवाह गोड्डा कॉलेज केर हिंदी केर प्रोफेसर केर बेटी सँ भ गेलनि। एक मासक बाद ऋचाक विवाह आशुतोष केर छोट भाई प्रकाश सँग भ गेलनि। आब चंद्रकला के सब बात बुझ मे आबि गेलनि। किछु त नहि बजली मुदा करेज भीतरे भीतर जेना दू फांक भ गेलनि। नहियो चाहैत ऋचा आ आशुतोष के श्राप दैत कहलथिन, "जाउ! हमर विश्वास, प्रेम आ समर्पण के अतेक खण्ड-खण्ड केलौं अछि अहाँ सब मिल क! कहियों नीक नहि हैत।" हां, ई श्राप ओ चुपचाप मुक्त अकास मे ठाढ़ भेल देने छलि। ओ बजली आ सृष्टि केर नियंता सुनलक। नीक जकां सुनलक। विवाह के स्वीकृति दैत देरी पांच दिनक भीतर चंद्रकला के दिल्ली मे एक यूनिवर्सिटी मे लेक्चरर केर नौकरी लागि गेलनि। हुनकर मंगेतर जे पुणे मे पोस्टेड छलथिन से एकाएक नोएडा मे आबि गेलथिन। शायद भगबानो के लागल होनि जे एकरा सङ्गे बहुत अन्याय भेलैक आब न्याय होबक चाही! ऋचा केर भाई एक मलयाली लड़की सँ प्रेम विवाह क सऊदी अरब चलि गेला । छोट बहिन सेहो प्रेम विवाह एक महाराष्ट्रीयन इंजीनियर सँ केलनि। विवाह के दोसरे साल चंद्रकला के एक बेटी भेलनि आ ऋचा के बेटा। सौम्या के सेहो एक बेटा रहैक। तीन साल के बाद चंद्रकला के बेटा आ ऋचा के बेटी भेलैक। बेटी भेलाक एक वर्ष के बाद ऋचा आ प्रकाश मे भयंकर लड़ाई शुरू भ गेलैक। स्थिति एहेन भ गेलैक जे दुनू आब संबंध ने विच्छेद क लेथि। मुदा प्रकाश केर मां आ ऋचा के सोचक कारणे फेरो दुनू मे समझौता भ गेलैक। आशुतोष आब दिल्ली छोड़ि पटना चलि गेला। पटना मे गुमनाम जिनगी जिबय लगलनि। दू बेटीक पिता। आमदनी सीमित। दुखक एकाकी जीवन। शायद एहि बातक अनुभव करैत जे सब किछु चंद्रकला सँग धोखा के कारण भेल अछि आ पता नहि भविष्य मे की-की हैत? चंद्रकला राघब के भैया कहैत छलि। किछु दिन पहिने भेट भेलनि दुनू के एक सेमिनार मे। एक कात मे आनि राघब लग चंद्रकला बजली: "भैया, ऋचा आ आशुतोष केर व्यवहार हमरा तबाह केने छ्ल। हमर रोम-रोम सिहरि गेल छल। हम अन्हार मे चलि गेल रही। तहिना ओहो सब खुश कहियों नहि रहत।" विजय गुरगांव मे एक ऐड एजेंसी मे काज करैत अछि। ओकर कनिया सेहो मैनेजमेट कंसलटेंट छैक। विवाह के 20 वर्ष भ गेलैक मुदा संतान एखन धरि नहि भेलैक अछि। सौम्या केर पति ओकर जीवन नर्क क देने छलैक। अंत मे बहुत मुश्किल सँ तलाक भेटलैक। आब दोसर विवाह केलनि अछि आ अपन पति आ बेटा संगे जीवन जीब रहलि छथि। यूनेस्को मे नौकरी सेहो लागि गेल छनि। चंद्रकला एक सफल पत्नी, पुतोहु, माँ, शिक्षिका केर भूमिका निभा रहलि छथि। जीवन मे आनंद आ परमानंद छनि। मुदा पुरुष जाति पर विश्वास नहि छनि। कोना रहतनि??? पुरुषक नहि विश्वासे। मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना राम जगतपुज्य छथि। राम के हिन्दू सब आराध्यदेव बुझि पूजा करैत छथि। मिथिला मे राम सर्वाधिक पूज्य छथि। पूज्य होबाक कारण रामक देवता भेनाई त अछिए ओ मिथिला केर दुलहा छथि ताहू लेल। कारण मिथिला मे जमाय के विष्णुक अवतार मानल जैत अछि। सर्वश्रेस्ट पाहून जमाय होइत छथि। हुनकर मान-दान, आतिथ्य, भोजनक सचार, रंग-रंगक बिध-बेभार, गीत-नाद आ सब किछु अपूर्व। मुदा मिथिला के लोक के अदौं सं ई होइत रह्लनि अछि जे सीता संग रामक व्यवहार उचित नहि रह्लनि। आइयो मैथिलानी बात-बात मे सीता के दुखक स्मरण करैत नोरायल आँखि सँ आ बझल कंठ सँ अनायास बाजि उठैत छथि: राम बियाहने कुन फल भेल। सीता जन्म अकारथ गेल। एकर अर्थ ई नहि जे राम मर्यादापुरुषोत्तम नहि रहला। एकर अर्थ इहो नहि जे मिथिलाक लोक अर्थात मैथिल विधर्मी भ गेलनि। ई त हिन्दू धर्म आ संस्कार के स्वभाव अछि जे जकरा लोक पसिन करैत अछि ओकर गलत निर्णय, अनुचित डेग, आदि पर ओकरा उपराग सेहो दैत अछि। यैह गुण सनातन धर्म के एखन धरि साश्वत रखने अछि। ताहि एहि लेख मे जे भाव अछि ओकरा एक मैथिल, मैथिल सं अधिक मैथिलानी के अपन किशोरी केर दुलहा रामक प्रति विभिन्न ग्रन्थ आ लोककथा केर मादे कैल गेल स्नेहपूर्ण उपराग बुझल जा सकैत अछि। कुनो विद्वेष नहि, घृणा नहि, धर्मक प्रति असंवेदनशीलता नहि। रामायण के प्रारंभ एखन धरि प्राप्त जानकारी के आधार पर महाकवि वाल्मीकि सँ होईत अछि। तकर बाद अनेक स्थानीय विद्वान, सन्त, भक्त, कवि एकर कुनो प्रसंग, अथवा सम्पूर्ण कथा पर शास्त्रीय आ स्थानीय मान्यता के आधार पर काव्यमय रचना करैत रहलनि। रचनाशीलता आइयो चलि रहल अछि। खंड अथवा संदर्भ विशेष मे अंतर कुनो बहुत पैघ बात नहि अछि। तुलसीदास त राम के अपन आराध्य देव मनैत राम के मर्यादापुरुषोत्तम बनबैत रामचरितमानस केर निर्माण करैत छथि। तुलसी के लेखनी अतेक प्रभावोत्पादक अछि जे समस्त उत्तर भारत, पूर्व भारत, उत्तर-पूर्व भारत, मध्य भारत धरि रामचरितमानस जन-जन के कण्ठहार बनि जाइत अछि। मिथिला मे सेहो एखन धरि हमर ज्ञात जानकारी के हिसाबे 4 प्रकार केर रामायण मैथिली मे लिखल जा चुकल अछि। मूल कथा के ध्यान मे रखैत महाकाव्य रचनाकार किछु प्रसंग स्थानीय मान्यताक सँग जोड़ि दैत छथि। एकर अतिरिक्त लोककथा मे, गीत मे,लोक व्यवहार मे सीता आ रामक भाँति-भाँति के चर्चा अबैत अछि। ई लेख रामायण के अतिरिक्त लोककथा, लोकमान्यता, गीत नाद आदि के आधार मानि लिखल गेल अछि। लोककथा सेहो साक्ष्य सँ कम नहि। आब चलु हमरा सङ्गे मिथिला आ रामकथा सँग रामक भाव के मैथिलानी आ सामान्य जनता के बीच मान्यता केर आधार पर, ग्रंथ आ लोककथा के आधार पर , गीत नाद पर शुद्ध मोन सँ सीताक प्रति रामक व्यवहार के समीक्षा करी। सिनेह राम सँ अछि त उपराग ककर? निश्चित रूप सँ रामक। मिथिलाक सब गाम, घर मे सीता छथि आ घरे-घरे राम सेहो छथि। जेना राम संग विवाहक बादो सीता दाई के सुख नहि भेटलनि तहिना आइओ सुख कहाँ छनि? दहेज़क उत्पीडन, बेटा आ बेटी मे अंतर, भ्रूणहत्या, शारीरक उत्पीडन, मानसिक दोहन इत्यादि अनंत समस्या स ग्रसित छथि घर-घर केर सीता। आ की नहि? कनि विचार करू ने? हेता राम प्रतापी राजा, महाबलशाली, समुद्र के सोखि लेबाक क्षमता बला, रावणक संहारक, आ की की! मुदा मिथिला मे आबि ओ दुल्हा राम भ जाथि छैथ। मिथिला के लोक हुनकर पूजा नहि हुनका सँ नेह लगबैत अछि। निधोख डहकन गाबि हुनका कखनो छगरा गोत्रक कहैत छनि त कखनो शंका करैत छनि जे राजा दशरथ गोर, कौशल्या गोर फेर राम आ भरत कारी कोना? मैथिलानी राम के विवाह के बाद सासुर मे रहबाक बेर-बेर निवेदन एहि लेल करैत छथिन जे सब भाई के आ विशेष रूप सँ राम आ भरत के रगड़ि-रगड़ि उबटन लगेती जाहि सँ हिनक श्यामवर्ण देह कनि सुन्नर लागै! भोजनक सिंगार, सचारक की कहब - अपूर्व । भाँति-भांति के सचार प्रेमक भाव सँ कतेक गुना बढ़ल। गान कला, नृत्यकला, वाद्यकला मे माहिर मैथिलानी सब गाबि क, वाद्ययन्त्र के बजा, सिनेहक प्रदर्शन सँ,अपन कोइली सन अनमोल बोल सँ दूल्हा राम के स्वागत आ हुनकर मनोरंजन करैत छथि। से राम अगर सीता के लंका सँ अबैत देरी अग्नि परीक्षा, गर्भ क समय मे ककरो कहला सँ सीता के पुनः असगर निट्ठुर भेल जंगल भेजि दैत छथि त मैथिलानी हाक्रोश त करबे ने करती??? बल्कि कहि सकैत छी जे नारीक स्थिति एखनो सीते दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर मे। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अछिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय मे राम के अगुआ दैत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि: बंदौ राम लखन बैदेही जे तुलसी के परम सनेही तुलसीदास रामचरितमानस मे 1443 बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ,दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र 147 पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि 325 – 147 बेर सीता, 69 बेर जानकी, 58 बेर बड़भागी आ 51 बेर बैदेही। अहू मे एक राजनीति ऐछ। सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ। ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब सीताक दुःख देखू: लंका मे राम रहला 111 दिन आ सीता रहली 435 दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन। डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वीक जीवन। देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप मे आबथि: माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।। राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम मे बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि। आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम। जखन समस्त मिथिला मे अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ मे एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहिये माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप मे आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल? सबहक मोन मे उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने! अगर राम नारायण के अवतार त सीता कुन कम? ओहो त श्री अथवा लक्ष्मी के अवतारे ने छथि? सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ मे लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम मे मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि मे डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स? सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन। यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया मे धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप मे ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला मे एकै पत्नी के नियम चलै छै”। राम चिंता मे आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।” सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत मे सीता के सौतिन नहि आनब।” राम बजलाह : "हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब।" फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप मे भ गेलनि। विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली। रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात मे सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली। मुदा सीता के शोषण वनवास के रस्ते शुरू भ गेलनि। मिथिला के लोक मे विशेष रूप सँ मैथिलीलानी सबहक बीच एक दंतकथा व्याप्त छैक। ई दंतकथा पुरुख समाज द्वारा स्त्रीगण के कोना संस्थागत संरचना के आड़ि मे शोषण कैल जाइत रहलैक अछि तकर बहुत सटीक व्यख्या करैत छैक। बात ई भेल रहैक जे जखन राम वनवास लेल सीता आ लक्ष्मण सङ्गे अयोध्या सँ विदा भ गेला त पुत्रशोक मे महाराज दशरथ अधीर भ गेलनि। खेनाइ पिनाई सब त्यागि देलनि। लोक कतेक बुझेबाक प्रयत्न केलकनि मुदा हुनकर हृदय प्रतिपल क्षीण भेल गेलनि। दुःख बढ़ल गेलनि। अंततः राम-राम कहैत राजा दशरथ अपन प्राण त्यागि देलनि। राम के जखन ई जानकारी भेटलनि त ओ बड़ दुखी भेला। फेर सब गोटे बिचारलनि जे गया पहुच फल्गु नदी के कात मे पितृ तर्पण करैत अपन पिता दशरथ सहित अन्य पित्र सबके पिण्डदान करता। कहल जाइत छैक जे ओहि समय मे पति सङ्ग पत्नी के सेहो ओतय जएबाक अनुमति रहैक। ताहिं राम आ लक्ष्मण सङ्ग सीता सेहो गया पहुँचली। स्नान ध्यान केलाक बाद राम किछु लेबाक हेतु बाहर गेलनि। सीता रामक बहिन सङ्ग असगरे रहि गेली। अहि बीच एकाएक राजा दशरथ केर आत्मा आबि गेलनि। आबि सीता के कहलथिन: "हम भूखल प्यासल छी। हमरा जल दीय, पिण्ड दीय।" सीता लजाईत बजली: "ई कोना उचित? राम आबि रहल छथि। अपने कनि इंतज़ार करु। ओ स्वयं अपना हाथे पिण्डदान करता। जल देता। आबिये रहल छथि।" मुदा दशरथ केर आत्मा रूकबा लेल तैय्यार नहि। झट दनि कहलथिन: "पुत्री सीता! अहाँ राम केर अर्द्धांगिनी छी। हमरा लेल जेहने राम तेहने अहाँ। हमर भूख आ प्यास प्रबल भेल जा रहल अछि। ताहिं अहाँ बिना कुनो बिलंब केने आ रामक पथ हेरने हमरा पिंडदान अर्पित करु। एकर शुभ फल राम आ अहाँ दुनू के सामान्य भाग मे भेटत।" अहि तरहक निर्देश पाबि सीता हृदय सँ प्रफुल्लित होईत झट दनि विधिवत कर्मकाण्ड के तैयारी केलनि। पिण्ड बनेली। आ अपन ननदि, फल्गु धार आ कामधेनु गाय के साक्षी मानि अपन ससुर अर्थात महाराजा दशरथ के आत्मा के पिण्ड अर्पित केलनि। राजा दशरथ केर आत्मा सीताक पिण्ड सँ संतुष्ट आ तृप्त होइत पिण्ड स्वीकार केलनि आ किछु क्षण मे ओतय सँ स्वर्गलोक लेल बिना राम आ लक्षमण के बाट तकने विदा भ गेला। किछु काल बाद राम वापस आबि गेला। पितर के दर्शन के अनेक प्रयत्न केलनि मुदा बेकार। दशरथ आकाश मार्ग सँ कहलथिन: "पुत्र हमरा अहाँक पत्नी पिण्डदान केली। आब अपनके कुनो प्रयोजन नहि।" एकर बाद राम चिंतित भ गेला। बहुत स्मरण केलनि मुदा दशरथ नहि एलथिन। सीता के पुछलथिन राम: "मैथिली! अहाँ पिण्डदान केलौं तकर की प्रमाण आ की साक्षी?" सीता उत्तर देलथिन: "हमर साक्षी अहाँक बहिन, कामधेनु गाय आ फल्गु नदी छथि।" आब राम फल्गु नदी, गाय आ सीता के ननदि सँ पुछलथिन। मुदा ओ तीनू साक्ष्य देमए मे असमर्थता व्यक्त केल्थिन। विग्धल सीता श्राप दैत बजली: "है हमर ननदि, अहाँ हमरा झुट्ठी बना रहल छी। अहाँ छुछुनर बनब आ अहाँ हमेशा छुछुआति रहब। अहिना अहाँक प्राण जैत। है गाय! अहाँक पवित्रता त यथावत रहत मुदा अहाँ झूठ बजलों अछि तांहि अहाँक मुह अपवित्र रहत आ विष्ठा धरि अहि मुह सँ अहाँ ग्रहण करब। आ हे फल्गु नदी, अहुँ झूठ बजलों। जाउ, अहाँक धार मे कखनो पानि बाहर रहबे नहि करत। ई हमर दग्धल मन के निश्छल श्राप अछि।" अहि सँ पता चलैत अछि जे सीता सँग अन्याय शुरू सँ भ चुकल छलनि। अनिष्ट हुनका अकारने भोग’ परतनि! जखन वैदेही के रावण छ्ल सँ हरण क ल जाइत अछि त जे राम समस्त चराचर के नियंता छथि, नियंत्रक छथि तथापि सीता के हरण के बाद जलचर,थलचर, कुंज लता, पक्षी सब किछु सँ बताह जकाँ सीताक वियोग सँ द्रवित पुछैत छथि: "अहाँ सब मे कियोक हमर मृगनयनी सीता के देखलौं अछि: जलचर, थलचर मधुकर श्रेणी। तुम देखी सीता मृगनयनी?" आ स्थिति विचित्र आ विभत्स त तखन भ जाइत छैक जखन रावणक संहार केलाक बाद जखन राम सीता के लंका सँ मुक्त करैत छथि त राम के सीता जे चरित्र पर शंका होईत छनि। इहो भ सकैत अछि जे जनमानस मे पत्नी के अपन पति के प्रति समर्पित भाव के उजागड़ अथवा स्थापित करबा लेल राम सीता दाई के अपन पवित्रता प्रमाणित करबा लेल कहैत छथि अन्यथा स्वीकार करबा सँ मना क दैत छथि। सीतो कुनो कम थोड़े ने छलि? साक्षात लक्ष्मी के अवतार। अपन पवित्र होमाक प्रमाण देबा हेतु सोझे अग्निकुण्ड मे कूदि गेली। सीताक सतित्व देखि अग्निदेवता दंग रहि जाइत छथि। सीता के कुशक क्लेश तक नहि होइत छनि। बिना एकौ रत्ती जरल के निशानी के सीता अग्निकुण्ड सँ वापस आबि जाइत छथि। आर त आर स्वर्ग लोक सँ देवता लोकनि सेहो सीताक निश्छल, आ पवित्र होबक प्रमाण दैत छथि तखन जाक राम पुनः सीता के स्वीकार करैत छथि। किछु लोक अहि मे ई तर्क (कुतर्क?) दैत कहैत छथि जे समाज मे उचित व्यवस्था आ आदर्श उत्पन्न करबा लेल राम एहेन कार्य केलनि। मुदा मैथिलानी के ई सोचब छनि जे राम सीता सङ्गे अन्याय केला आ समस्त स्त्री समाज पर बंधन थोपबाक एक अनर्गल परम्परा के प्रारंभ केलनि। की यैह छलनि रामक रघुकुल रीति? ओह!! कहब दुख ककरा सँ! अग्निपरीक्षा के संबंध मे किछु लोक कहबा लेल एहनो बात कहैत छथि जे जाहि सीता के रावण हरण केलक से सीता त सही अर्थ मे सीता छेबे कहाँ छलि। ओ त सीता के छाँह छलनि। असली सीता त अग्नि मे समाहित भ गेल रहथि आ निश्चिन्त सँ अग्नि मे चुपचाप बैसल। ताहिं छाँहक सीता के अग्निकुण्ड मे जाइते देरी असली सीता अग्नि सँ बाहर निकलली जिनका राम सहज रूप सँ अर्धांगनी के रूप मे स्वीकार करैत छथि। मुदा एक हाड़-मांस केर सामान्य मनुख होबाक नाते एकटा बात नहि पचा पबैत छी जे रामक ई दुरंगी चरित्र कोना देखी। जे राम ऋषि गौतम के पत्नी अहिल्या के उद्धार स्पर्श मात्र सँ करैत छथि वैह राम अपन पत्नी सीता लेल अतेक निरंकुश? जे राम बालि के एहि द्वारे बध करैत छथि जे ओ अपन छोट भाई सुग्रीव केर पत्नी के बलपूर्वक अपना लग रखने अछि। जखन बालि राम सँ पुछैत छनि: "मे बैरी सुग्रीवहिं प्यारा। कारण कबन नाथ मोहि मारा।।" त राम उत्तर दैत कहैत छथिन: "अनुजवधु भगिनी सुतनारी। सुन सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधे कछु दोष न होई।।" बालि के मृत्यु के बाद राम अपन सखा सुग्रीव के फेर सँ अपन पत्नी के स्वीकार करबा लेल प्रेरित करैत छथि जकरा सुग्रीवक जेठ भाय बालि बहुत दिन धरि अपन कब्जा मे रखने छ्ल। आ सैह राम सीताक मामला मे एहेन कठोर, हृदयहीन कोना??? जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल मे असगर भेज देलथिन। कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक? अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या मे एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ मे खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?” खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल मे असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम मे स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता मे प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या मे जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत, के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।” जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल। मुदा बीचे मे घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत मे राम एलाह त बाद मे सीता सेहो एलीह। सीता रामे के वंशक सन्तति के जंगल मे बहुत नीक जकाँ सब शिक्षा संस्कार मे पारंगत करा राम के औकात देखा देलनि। राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत मे राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।” सीता: “से कोना?” राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।” सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?” राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया मे नहि छी।” सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक ?” ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ि करुण स्वर मे विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा मे उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर मे स्थान द दीय! धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती मे सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती मे बिलुप्त भ गेलीह। धरती फटली आ धरतीपुत्री सीता धरती मे समा गेलनि। ताहि जखन मैथिलानी सबके कोनो कष्ट होईत छनि त अपना के सीता बुझैत अनायास बाजि उठैत छथि: “फाटू हे धरती”। ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला मे जरैत छथि। अपमानित होईत छथि। बेटी के बेटाक तुलना मे कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....” सनातन धर्म पूर्वजन्म के सिद्धान्त के मनैत अछि। मिथिला के लोक व्यवहार मे धोबी के कहला सँ राम द्वारे सीता के पुनः वन भेजबाक एक लोककथा अछि जे कर्म के सिद्धान्त पर टिकल अछि। कनि देखी एकरा: बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी मे भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से कम। झुला लागल प्रेमक डाली।i झुलथि सीता प्यारी ना।। सब सखी गबथि सिनेह देखाबथि। बिहुसथि जनकदुलारी ना।। सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर मे गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान मे मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ मे प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली। सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल मे आनि पिंजरा मे राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत! राजमहल मे अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी मे सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ी मनुखक आवाज़ मे मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी मे स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"। सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी मे स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा मे बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा मे देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली। ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरु हमर पत्नी के बदला मे अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा मे बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक। अपन पत्नी के प्रेम मे मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल मे आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन! बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट मे हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!" कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना मे मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल मे कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी। आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था मे घर स निकालि देता”। आब सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन। किछु लोक के मानब छनि जे रामक सीताक प्रति एहेन निष्ठुर व्यवहार सीता के व्यक्तित्व के सबल बनबैत छनि। मुदा ई केहेन व्यवहार। ककरो सबल बनेबाक हेतु, उदाहरण प्रस्तुत करबा हेतु अहाँ डेगे-डेगे प्रताड़ित करबैक? नहि-नहि, ई नहि उचित विचार। एक मैथिलानी हमरा कहली, "देखू, सीता एक प्रतापी राजा के बेटी आ दोसर प्रतापी राजा के पत्नी। हुनकर जखन ई हाल भेल त सामान्य महिला के की बात?" सीता मिथिला अपन नैहर आ पिता राजा जनक लग कियैक नहि एली? फेर स्मरण अबैत अछि : "बेटी सासुरे नीक की सर्गे नीक"। ताहिं सीता स्वर्गक रास्ता धेलनि। मोन मे एक बात होईत अछि, उमरैत रहैत अछि - अगर राम मर्यादापुरुषोत्तम छथि त फेर ओहि मर्यादा के धोती के तार-तार कथी लेल करैत छथि? वैदेही के दुःख सँ द्रवित होइत मिथिला के अनेक पुरुख आइयो कनि उत्थर भ जाइत छथि, अधीर भ जाइत छथि, जेना विद्रोहक स्वर रामक प्रति प्रचण्ड भ जाइत होनि! धीरेन्द्र प्रेमर्षि त अतेक तामसे भेर भ जाइत छथि की हुनकर लेखनी बुझू जे क्षण मात्र लेल सब मर्यादा के अतिक्रमण करैत अपन भड़ास निकलैत बाजि उठैत अछि: "दण्ड-भेदे करू कि अपनाउ साम-दाम हमर सीते जँ बोन, अहाँ सुथनीक राम?" जो रे मर्यादा आ पुरुख द्वारा स्त्रीगन के अदृश्यबेड़ी संजकड़ल पैर! बेचारीमैथिलानी से कोना कहती? ई सब त सीता के द्वारा स्थापित मापदंड के एखनो ओही मर्यादा के सँग अक्षर-अक्षर अनुशरण करैत छथि, निर्वहन करैत छथि। पाहुन राम सँ उपराग त ठीक मुदा हुनका लेल अवाच्य कथा - हे भगवान! कथमपि नहि। ऊपर सँ "हम नहि जियब बिनु राम" गाबि-गाबि पाहुन के दिन-राति स्मरण करैत रहैत छथि। अतेक भेला बादो राम के मिथिला के लोक अपन सब सँ सुन्नर पाहुन मनैत छथि। राम के प्रति जेहिना भक्तिभाव तहिना प्रेमभाव। एक भाव जे मैथिलानी लोकगीतक मादे गबैत छथि से जरूर मोन के द्रवित क दैत अछि आ सब मैथिलानी मे सीता आ सब मे सीताक व्यथा बुझना जाइत अछि: "हे भगवान! कुन कसूर विधना भेल बाम कहब दुख ककरा सँ?" लोक वेद आ व्यवहारक पाबनि मधुश्रावणी – मानवशास्त्रीय विवेचन एक बेर प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन एकाएक हमरा पुछलनि, "मिथिला मे कुन चीज़ थिक जे लोक आ शास्त्र, सब कला के एक सङ्गे जोड़ने अछि?" हमरा भेल की उत्तर देल जाय? संयोग सँ किछुए दिन पहिने मधुश्रावनी कथा माँ सँ सुनि रेकॉर्ड केने रही आ बाद मे ओकरा लिखने रही। भेल ई एक उत्तर भ सकैत छैक। हम झट दनि कहलियन्ह , "मधुश्रावणी पावनि”। हमर उत्तर सुनि प्रोफेसर जैन बहुत प्रसन्न भेला। कहलथि, "बिलकुल सत्य कहैत छी। यैह सही उत्तर अछि। अहाँक मिथिला मे ई गजब के पावनि अछि जे अनेक तरहक ज्ञान, शिक्षा, कला, के सिखबाक प्लेटफार्म नव व्याहल लड़की लेल तैयार करैत अछि। ई एक एहेन पावनि अछि जे लोक आ शास्त्र के जोड़ैत अछि। अहाँक जवाब सँ हम संतुष्ट छी।" बात पर हम अतेक गौर नहि केलौं। कतेक दिन सँ मधुश्रावणी पर किछु लिखबाक इच्छा अछि मुदा आलस आ किछु आन कारणे नहि लिख पाबि रहल छी। सविता झा खान केर एक प्रश्न ओहो अति लघु प्रश्न अनेक दिशा के दरबज्जा खोलि देने अछि। जबाब एक ठाम सँ भेटब असंभव। खेपे खेपे अनेक ठाम सँ आनय पड़त। सैह क रहल छी। अहि बात पर सविता जी कहलनि, "आब थोड़ेक मधुश्रावणी पर लिखू"। हुनका नहि कहबाक हिम्मत नहि भेल। माँ के कहल मधुश्रावणी कथा के फेर पढनाई शुरू केलौं। ओहि मे प्रोफेसर ज्योतिंद्र जैन केर जिज्ञासा (अथवा खोज) आ सविता झा खान के जिज्ञासा केर तत्त्व ताकय लगलौं। पहिल बेर मे लागल किछु छैक जरूर। फेर भेल, "कतेक छैक?" कतेक छैक आ कत-कत छैक ताहि बातक रहस्य तकबा लेल ओहि कथा के अनेक बेर पढ़लौं। एक मैथिल समाजक सदस्य के नाते पढ़लौं। एक मानव विज्ञान केर छात्र के रूप मे पढलौं। सब सँ पैघ बात ई जे एक जिज्ञासु के रूप मे पढलौं। हमरा जे भेटल सँ हमरा जनैत अपूर्व बात छैक। अपन ज्ञान आ समझ के हिसाब सँ ओकर संक्षिप्त व्याख्या क' रहल छी। मधुश्रावणी अपन मिथिला मे विवाहक पश्चात 13-15 दिन धरि के पाबनि छैक। जाहि मे नाना तरहक फूल, पात, फड़ लोढ्नाई, पूजा केनाई, गीत गेनाई,विध बेबहार के संपादन, नियम निष्ठा के पालन, आ प्रति दिन कथा केर एक अथवा अनेक प्रसंग के समूह मे बैस सुननाइ शामिल छैक। बरखा ऋतु मे भेलाक कारने एकर नाम मधुश्रावणी बहुत सार्थक लगैत छैक। अगर विस्तृत फलक पर उदार भाव सं देखबैक त कहि सकैत छी जे मधुश्रावणी अपन मिथिला मे मिथिला बला स्टाइल के हनीमून छैक। बरसातक मधुमास आ ताहि के मधुराति के जे आनंद मिथिला मे छैक से कहाँ – प्रेमानन्द, परमानन्द! मधुश्रावणी वस्तुतः एक सम्पूर्ण पाबनि छैक जाहि मे लोक आ शास्त्र, पुरुष आ प्रकृति, मनुख के प्रकृति केर अवयव जेना पानि, नदी, पोखरि, गाछ, झाड़-पात, लत्ती-फत्ती, फूल-फल; जीव-जंतु, सांप, कीड़ा; धरती-अकास, समतल आ पहाड़ आदि के बीच कोना साम्य बनबैत सबहक संगे कोना जीबी, कोना रही तकर शिक्षा, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा देल जैत छैक। कोना स्थानीयता के सम्मान करैत समग्रता के भाव के स्वीकार करी, से शिक्षा देल जैत छैक। शिक्षा क्लास रूम सं अधिक ओपेन थिएटर जकां परिवेश मे देल जैत छैक। जतय एक मांजल कथा वाचिका अपन कथा के ज्ञान सं आ अहु सं अधिक कथा कहबाक शैली सं नव व्यहिता के एक-एक कथा के खोइंछा छोड़ा-छोड़ा सुनबैत रहैत छथि। जखनओ कथा वाचिका कथा कहैत छथिन त ओ हरेक पात्र के अपना मे समाहित क लैत छथिन। कथा केर पात्र जकां हंसनाइ, गेनाई, नहु-नहु बजनाई, जोर सं चिचियेनाइ, नाना तरहक जीव जंतु केर आवाज निकालनाइ, कहबाक शैली मे उपर नीचा के भाव व्यक्त केनाई, सब किछु सर्वोत्तम। अभिनय केर पराकाष्ठा। ई एक एहेन स्टेज होइत छैक जाहि मे स्त्री, पुरुख, देवता, दानव, जीव-जंतु, सबहक भूमिका मात्र एक कलाकार के करय पड़ैत छैक – वैह एक्टर, वैह डायरेक्टर। बीच मे कुनो ब्रेक नहि। कतौं सं कुनो सहयोग नहि। मुदा बाह रे परंपरा मिथिला भूमि के आ बाह रे मैथिलानी! हरेक कथा वाचिका अपन दायित्व केर पालन बेजोड़ दंगे उत्कृष्ठता सं करैत छथि। अतेक प्रभावी ढंग सं जे, जे पूजैत छथि से त कथा सुनबाक हेतु बैसते छथि हुनका संगे आनो स्त्रीगन सब सुनैत रहैत छथि। जेहने कलाकार तेहने दर्शक – दुनू के बीच परफेक्ट हारमनी। आ कनिया के की कहब ओ चुपचाप एक गंभीर शिष्या जकां कथा वाचिका के हरेक शब्द के ज्ञानरूपी अमृत के एक एक बूंद मानि पिबैत रहैत छथि। एहि मे भूमि-चित्रण अर्थात अरिपन केर ज्ञान भेनाई सेहो आवश्यक छैक। मधुश्रावणी केर अरिपन मे वर्गाकार बॉर्डर के भीतर सुरुज, चान, कलश, पुरहर,पातिल, साठी (षष्टिका), मैना पात, नागक लटपटाएल जोड़ी, नवग्रह, नौमात्रिका आ कमल फुल के बिम्ब के रूप मे गौरी, कुसुमावती, पिंगला, लीली आ चनाई आदिक समावेश बहुत व्यवस्थित ढंग सं कैल जैत छैक। एक गोट नव डाबा पर माटि आ गोबर सं पांच टा साँप बना साटि देल जैत छैक। पांचो सांपक थुथुन मे दुभि खोईस देल जैत छैक। अरिपन काढब अथवा पारब मे सब बिम्ब के स्थान, दिशा, कोण, स्वरुप आदिक ज्ञान आ शैली मे निष्णात भेनाई अनिवार्य होइत छैक। चूँकि ई पाबनि अहिबात, वंश बृद्धि एवं वर आ कनिया के शुभ सँ जुड़ल छैक तांहि परफेक्शन मे कनिकबो कोताही के गुंजाइश नहि रहैत छैक। पूजा मे व्यवहरित सामग्री सं पता चलैत छैक जे बालिका के अहू बातक प्रशिक्षण देल जैत छनि जे ओ सब बस्तु के जानि लेथि। प्रतीकात्मक गौरी बनेबाक हेतु हरदि, कुसुमक फूल, सिंदुर, पान आ मेथी के पीसिक’ एक गोल आकृति केर प्रतिमा बना नव ढोरल सरबा मे ठाढ़ क देल जैत छैक। एकरा अलावे मैना पात,नेवो, नीम, दूध, केरा पात, फूल, काजर, अरबा चाउर, चुडा, चुडलाई, चीनी, लाबा, आम, कटहर, केरा, अंकुरी, दही, सुपारी, बड़की-छोटकी इलायची, जाफ़र,लौंग, बड़का छोटका हडरी, बहेड़ा, नीमक पात, अमतौआ अनार, पखुआ, कुश, धामिक पात आदि के प्रयोग होइत छैक। अहि मे अधिकांश बस्तु के एक नव वस्त्र मे राखि एक पोटरी बना देल जैत छैक जकरा बिनी कहल जैत छैक। एहि बिनी के गौरी आ बिषहरि के स्वरुप मानि भोर साँझ पूजा अनिवार्य रहैत छैक। मधुश्रावणी पूजा आ कथा नागपंचमी दिन सं प्रारंभ भ जैत छैक। प्रतिदिन पूजा भेल आ स्त्रीगन सब पूजा सं पहिने आ पूजाक बाद गीत गेलथि। पूजा मे संस्कृत आ मैथिली केर अद्भुत मिश्रण बला शब्द आ मन्त्र भेटैत छैक यद्यपि पण्डित जी के कुनो भूमिका एहि मे नहि रहैत छनि। एक अनुभवी महिला अन्य महिला केर सहयोग सं एहि कार्य के संपादन मे कनिया के निर्देशित करैत छथिन। सब चीज़ सटीक होइक तकर विशेष ध्यान रहैत छैक। गौरी पूजन केर एक मन्त्र देखू त संस्कृत आ लोक शब्दावली के सुखद जोग पर आनंदित हैब: “ऐ गौरी! महामाये, चानन डारि तोडैत एलहुं, सोहाग-भाग बटैत एलहुं, फूलक माला अहाँ लिअ, सोहाग-भाग हमरा दिअ, स्वामी-पुत्र सहित गौर्ये नमः।” फेर पूजा करक विधान आ ककर बाद ककर पूजा करी तकर विस्तृत व्याख्या आ रुपरेखा निर्धारित रहैत छैक। एहि क्रम मे गौरी केर पूजा के बाद कलश केर पूजा, बिषहरि केर पूजा, तकर बाद लगातार वैरसिक, चनाइ नाग, कुसुमावती, पिंगला, लीली नाग, शतभगिनी सहित गुसाउनि नाग, साठि आदिक पूजा होइत छैक। पूजा केर समाप्ति पर अनेक विनती जकरा बीनी कहल जैत छैक केर गायन महिला सब उच्च स्वर मे भक्तिभाव सं करैत छथि। पांच बीनी मे अन्तिम बीनी ई प्रमाणित करबा लेल तर्कसंगत छैक जे कोना एहि पाबनि मे सब वस्तु संगे सद्भाव आ संग रहबाक उक्ति व्याप्त छैक: दीप-दीप हरा जाथु घरा। मोती-मानिक भरथु घरा।। नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु। पांच बहिन बिषहरी बढ़थु।। बाल बसन्त भैया बढ़थु। डाढी-खोंढी मौसी बढ़थु।। आशावरी पीसी बढ़थु। बासुकी राजा नाग बढ़थु।। राही शब्द लए सुती। कांसा शब्द लए उठी।। होइत प्रात सोना कटोरा मे दूध-भात खाई।। साँझ सुती प्रात उठी पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी।। ब्रह्माक देल कोदारि विष्णुक चांछ्ल बाट।। भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा। ताहि बाट आओताह ईश्वर महादेब।। पडल गरुड़ केर ढाठ। आसतिक- आसतिक, गरुड़-गरुड़ .. आब एहि गीत संग मिथिला चलू। मिथिला मे बरसात के समय मे खेत-पथार, पोखरि इनार, कलम-गाछी सब किछु पानि सं भरि जैत अछि सावन-भादब मे। आब साँप आ नाना तरहक कीड़ा-मकोड़ा पानि के डर सं उचगर आ रुख स्थान दिस आबय लगैत अछि। मालक घर, मनुखक घर, चार, दरबज्जा आ कत-कत नहि आबि जैत अछि। अयबाक उद्देश्य कुनो ककरो छति पहुचेबक नहि अपितु पानि सं प्राण रक्षा आ भोजनक ब्योंत रहैत छैक। आ ठीक अही समय मे मधुश्रावणी पाबनि पूजल जैत छैक। एकर उद्देश्य छैक जे हे नाग आ आन कीड़ा-मकोरा सब जेना मनुखक वंश वृद्धि होइत छैक तहिना तोरो सबहक होब। मनुख आ तों एक संग दोसर के रक्षा करैत एहि पृथ्वी पर निवास करैत रह। तोरा खेबाक लेल वस्तु आ पीबाक हेतु हम दूध अर्पित करैत छी। हमरा, हमर पति के आ सगा-सम्बन्धी के तों क्षति नहि पहुचाबह. हे नाग आ कीड़ा मकोरा के स्वामी शिव, हम अहांके पूजा अर्चना करैत छी। हे तंत्र केर जन्मदाता, हम अहांके निवेदन करैत छी, अहाँक यशगान करैत छी जे सब संगे हमरो सबहक रक्षा करू। हे नाग अहाँ रक्षा करू, हे गरुड अहुं रक्षा करू। अहि गीत के अगर ध्यान सं सुनब त लागत जे ई गीत कम आ तंत्रक मन्त्र अधिक अछि। एकरा गेबाक अंदाज, स्वर सब किछु अलग छैक। महादेब संगे ब्रह्मा, विष्णु केर सेहो गोहरायल जैत छनि एहि गीत मे। गाय केर गोबर, दूध आदिक प्रयोग गाय केर उपयोगिता के देखबैत छैक ओतहि नाना तरहक वस्तु के प्रयोग सब मे सामंजस्य। पाबनि त मूलतः ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ मे होइत छैक मुदा एकर विधान आ सामग्री के जुटान मे अनेक जाति के सहभागिता होइत छैक। उदहारण के रूप मे सरबा, मङ्गल कलश कुम्हार सँ;डाला, बियनि, चंगेरा आदि डोम सँ; लहठी चूड़ी आ अन्य वस्तु लहेरनी सँ एवं अन्य सामग्री बज़ार सँ आनल जाइत छैक। ई सामंजस्य कथो मे अनेक ठाम अनेक प्रसंग आ उप-प्रसंग मे भेटैत छैक। कथा केर मूल नायक आ नायिका - बाला लखेंद्र आ बिहुला, बनिया अर्थात सौदागर समाज सँ छैक। तंत्र के ज्ञान, गूढ़ रहस्य जे बुझबैत छैक से धोबिन छैक, धामि केर चर्च सेहो होइत छैक जे छोट जाति केर छैक। कथा स्थानीयता के सीमा के सेहो तोरैत एकरा सार्वभौमिक बनबैत छैक। से कोना? ऐना जे चरित्र सब मिथिला सँ बाहर के सेहो छैक। कथा मे अनेक देवता, देवी, गण के भूमिका छैक। सब एक व्यवस्थित आ समन्वय के विधान के निर्माण करैत छैक। आब पूजा के विधिवत समाप्ति के बाद कथा प्रारंभ होइत छैक। एक अनुभवी महिला जिनकर स्मरण शक्ति, उच्चारण आ कहबाक शैली के संगे गीत आ फकरा सुनेबा मे महारत रहैत छनि से एहि कार्य के संपादन करैत छथि। कथा पांचो बहिनी बिषहरि सं शुरू होइत छैक। कोना एक बुढ़िया एक चिकनी पात मे लहलहाइत पांच सापक पोआ के देखैत अछि। आ बूढी के गाम आबि ओकर वृतान्त कहब सं पूजाक पद्धति प्रारम्भ होइत छैक। फेर बिषहरी के जन्म होइत छनि। दोसर दिन केर कथा एक नव मोड़ लैत छैक कारण एहि मे एकाएक मनसा के प्रवेश होइत छनि। मनसा के प्रवेश होइते मातर नाग आ तथाकथित पैघ देवता (ब्रम्हा, विष्णु एवं अन्य) के बीच आ दुनु के भक्त के बीच द्वन्द प्रारंभ होइत छैक। बिहुला आ चंदु सौदागर क्लासिक देवता के पूजक छथि जिनका मनसा जे मूल रूप सं नागक देवी छथि आ जिनका बारे मे इहो कहल जैत छैक जे ओ शिबक मानस पुत्री छथि, केर संग द्वन्द। चंदु सौदागर मनसा के अस्तित्त्व के स्वीकार नहि कर चाहैत अछि फलस्वरूप मनसा अपन नाग-नागिन सं ओकर सब संतान के डंसि क ख़तम केने जा रहल छैक। ओकर अन्तिम बालक केर नाम बाला लखेन्द्र छैक जकरा बारे मे ई छैक जे ओकर जाहि दिन विवाह हेतैक ओही दिन मनसा के साँप ओकरा डंसि लेतैक आ अहि तरहे चंदु सौदागर के वंश समाप्त। आब चंदु की करे ? धैर्य सं काज लैत अछि। चंदु के पता चलैत छैक जे बिहुला नामक एक लड़की छैक जकरा अखण्ड सोहागबती रहबाक वरदान छैक। चंदु अपन पुत्र बाला लखेन्द्र केर विवाह बिहुला सं कर दैत छैक। दुनू लेल एक शीशा के घर बनैत छैक। मुदा साँस लेबाक हेतु एकै रत्ती भूर छोडि दैत छैक। ओहि भूर सं अपन नाग के भेजि मनसा बाला लखेन्द्र के डंसि लैत छैक। आब की हो? बिहुला कहैत छैक, “एक केरा के थामक नाव बना जरुरी के सामान राखि हमरा बैसा दिय। हम अपन पति के माथ अपन कोरा मे ल नदी के प्रवाह संगे बहैत एकर कुनो समाधान करय चाहैत छी।” सैह व्यवस्था होइत छैक। बिहुला अपन पति के लाश लेने नदी मे चलल जा रहलि अछि। लाश आब गलनाई शुरू भ गेलैक मुदा बिहुला के हिम्मत एखनो दृढ़ छैक। जैत-जैत एक ठाम देखैत छैक जे एक धोबिन नदिक कछेर मे कपडा धो रहलि छैक। ओकर एक छोट बच्चा बेर-बेर ओकरा परेशान क रहल छैक। तंग आबि धोबिन अपन बच्चा के कंठ मचोडि दैत छैक। बच्चा मरि जैत छैक. आब धोबिन निश्चिन्त भ कपडा धोबैत अछि। बिहुला के बड़ आश्चर्य भेलैक! “कोना एक माय अपन संतान के छोट बात लेल जान मारि सकैत अछि?” बिहुला सोचैत छैक। बिहुला के होइत छैक जे जरुर अहि मे कुनो रहस्य छैक। आब ओ अपन नाव के कात लगा दूर सं धोबिन के निरिक्षण करैत छैक। जखन कपड़ा धोआ जैत छैक त धोबिन नदी सं अँजुर मे पानि ल मन्त्र पढ़ैत बच्चा पर फेकैत छैक. पानि परिते देरी बच्चा फुरफुरा क उठि जैत छैक। बिहुला बुझि जैत छैक जे ई धोबिन सामान्य महिला नहि अछि। ओकरा हांक लगबैत अपन व्यथा कहैत छैक। आब कहानी मे अते सं तंत्रक पूर्ण यात्रा शुरू होइत छैक। धोबिन के कहला पर बाला लखेन्द्र के लाश के ओतय छोडि दुनू गोटे शिव लोक मे जैत छैक। बीच मे अनेक कथा आ कथा केर उपकथा अबैत छैक। बिषहरी के कथा आ हुनकर बारह नाम – जगत गौरी, मनसा, जरत्कारू, वैष्णवी,सिध्ह्योगिनी, नागेश्वरी, शैवी, जरत्कारू-प्रिया, नाग-भगिनी, आसतिक माता, बिषहरी एवं महाज्ञानयुक्ता। कथा खेपे-खेपे चलैत रहैत छैक – मंगला-गौरीक कथा, पृथ्वीक उत्पति केर कथा, समुद्र-मंथन केर कथा, सतीक कथा, पतिव्रताक कथा, महादेब केर परिवारक कथा, गंगाक कथा, गौरीक जनम, गौरीक तपस्या, गौरीक विवाह, मैनाक मोह भांग, कार्तिक आ गणेश केर जन्म, संध्या केर विवाह आ लीली केर जन्म,पतिव्रता सुकन्याक कथा, बाल बसन्त केर कथा, गोसाउनिक कथा, श्रीकर राजा केर कथा, आ अंत मे गणेश भगबान द्वारा सोहाग माथब। अहि बीच बिहुला केर कथा चलैत रहैत छैक। कथा सब मे तंत्र छैक, बुझौअल, छैक, गीत छैक, सब किछु छैक। कथा मे हिन्दू धर्म के बहुत मूल तत्व के ज्ञान सेहो छैक। स्त्रीगन के व्यवहार, ओकरा समाज मे रहबाक लूरि, पति, संतान, श्रेष्ठ, देवता, पितर, आदिक सम्मान आदिक ज्ञान भेटैत छैक। ऊँच-छोट के भेद के कोना पाटिक जीवन के चलेबाक चाही तकर प्रशिक्षण देल जैत छैक। सब प्रमुख धार्मिक चरित्र आ आदर्श महिला के सम्बन्ध मे विवरण देल जैत छैक। अहि तरहे मधुश्रावणी केवल पाबनि नहि अपितु 13-15 दिनक कार्यशाला होइत छैक जाहि मे एक लड़की के ससुर जयबा सं पूर्व आ गृहस्थी सम्हारबा सं पहिने एक प्रशिक्षित महिला बना देल जैत छैक। ओ बच्ची सं दुलहिन आ फेर दुलहिन सं गुनमति नारि अथवा सम्पूर्ण मैथिलानी बनि जैत अछि। मधुश्रावणी मे नाग नागिन के मनुष्य स्वरुप मे कल्पना कैल जैत छैक आ तदनुसार हुनका लेल वस्त्र, श्रृंगार, आभुषण सब किछु सं मोन मे सुसज्जित के गीत गाबि स्मरण कैल जैत छैक। एक गीत देखू: पियरी अँचरी बिषहरी के नामी-नामी केस। घुमैत एली बिषहरी तिरहुत देस। तोहरो सिंगार बिषहरी लाबा आ दूध। हमरो सिंगार बिषहरी सिर के सिन्दूर। तोहरो सिंगार बिषहरी कोर भरि पूत। फल बीच गुअबा नवेद बीच पान। देवी बीच बिषहरी मैया दोसर नहि आन। मधुश्रावणी एक हिसाबे महिला के सत्ता के प्रतीक अछि. सब काज, विध, मन्त्र- पूजा महिला द्वारे प्रतिपादित होइत छैक। पुरुष केर कोनो भूमिका नहि। तंत्र के शक्ति एहेन जे छोट-पैघ सब एक ठाम आबि जैत अछि। सब तरहक देवता मे आपसी सौहार्द्य के सूचक अछि मधुश्रावणी। अंत मे सब ठाम होइत नदी केर कछेर केर धोबिन संगे बिहुला वापस अबैत अछि. बाला लखेन्द्र के लाश मे प्राण आबि जैत छनि। ओ आरो सुन्दर आ सोहनगर भ जैत छथि। चंदु सौदागर के सब बेटा आ सम्पति फेरो आबि जैत छैक। ओकर सब बेटा सेहो जिबित भ जैत छैक। चंदु आब आन देवता संगे अपन पुतहु के कहला पर बिषहरी आ मनसा के पूजा अर्चना शुरू क दैत अछि। सब किछु शुभ होमय लगैत छैक। एहि पाबनि आ कथा के जे ध्यान सँ सुनल जाय आ एकरा गुनल जाय त पता चलैत छैक जे शास्त्र पर लोक जेना कतौ-कतौ भारी पड़ैत हो! अंततः, चंदू सौदागर के भले अपन पुतहु आ बेटा के कारणे, मनसा देवी आ विषहरी के प्रभुत्व मानबाक हेतु बाध्य होमय पड़ैत छैक। एहि कथा मे एक बात स्पष्ट ई होइत छैक जे अगर बहुत बात शास्त्र मर्यादा के नाम पर बहुत बात अथवा क्रिया अथवा दृष्टान्त देबा लेल मना क दैत छैक मगर लोक ओही बात लेल ओकर व्यवहारिक पक्ष के देखैत उदार भ जाइत छैक। उदाहरण के रूप मे लोके मे ई हिम्मत भ सकैत छैक जे गौरी के छिनारि कहैंन; महा मर्यादित महादेव के मैथुन आ काम कर क्रिया मे लिप्त देखा देनि। यद्यपि उद्देश्य शिक्षा ग्रहण करक होइत छैक। एकर एक अर्थ एहो भ सकैत अछि जे नव व्याहता के ई बता दी जे काम अथवा यौन क्रिया शाश्वत प्रक्रिया छैक। एकरा मनुष्य आ जिव जंतु के बाते छोड़ि दी देवता, देवी सब स्वीकार करैत छथि सृष्टि के चलेबाक हेतु अहि मे संलग्न रहैत छथि। ई कदाचित सफल गृहस्थ जीवन जीबाक मूल मंत्र छैक। मधुश्रावणी पाबनि केर लिंक सूत्र छैक मनसा आ विषहरी केर आराधना। मनसा अर्थात नागक देवी। मनसा आर्थत ओहेन देवी जिनका शक्ति त छनि मुदा हुनकर सत्ता मानबाक लेल मुख्यधारा के देवी देवता केर भक्त सब सहज भाव सँ तैयार नहि अछि। मनसा एक एहेन देवी छथि जे अपन छोट स्वरुप अर्थात स्थानीय स्वरुप के विस्तार अखिल भारतीय स्वरुप मे करय चाहैत छथि। मनसा के इच्छा छनि जे हुनका सब वर्ग, जाति आ समाज के लोक पूजा करय, हिनकर गुणगान करय। मुदा ई काज ओतेक सहज नहि अछि। छोट जाति के लोक हिनकर सत्ता के स्वीकारि लेलक। स्त्रीगण सेहो ओही दिस बिदा भेली मुदा पुरुख कोना मानत? ई कनि पैघ प्रश्न अछि। मनसा हिमालय सँ चलैत छथि आ नेपाल, तराई बला मिथिला, भारत बला मिथिला, असम, बांग्लादेश, बंगाल, ओड़िसा, होइत फेरो मध्य आ उत्तर हिमालय धरि व्याप्त रहैत छथि - उत्तराखंड, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश धरि। मनसा संगे बिहुला केर कथा नेपाल, मिथिला, बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा धरि मूल कथा सँग डारि-झारि मे कनि-मनि फेर बदल सँग चलैत रहैत अछि। उत्तराखंड आ हिमाचल मे मनसा केर अनेक कथा प्रचलित अछि। साँप के प्रभाव आ भय के स्वीकार करैत लोक वर्ग, समुदाय, लिंग आ जातिक सीमा सँ उपर उठैत मनसा देवी के समक्ष नतमस्तक होइत छथि। यैह प्रभाव मिथिला मे सर्वहारा वर्ग मे आ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ केर स्त्रीगण मे भेटैत अछि। मुदा हमरा अगर हम समाजशास्त्रीय ढंग सं मधुश्रावणी केर विवेचन करैत छी त ऐना लगैत अछि जे पितृसत्तात्मक समाज किछु अनरगल प्रभाव एहि मे बिध आ पूजा के नाम पर घुसा देने छैक जाहि सं मानशिक स्तर पर महिला सब ओहि परम्परा के नाम पर अपना के स्वयम शोषित आ प्रतारित करैत रहैत छथि। अनेक ठाम सती केर महत्त्व के गुणगान कथा सब मे अनेक बेर अबैत छैक। धर्म, पूजा-पाठ, गिरहस्ती, प्रेम-अनुराग, तंत्र-मन्त्र, पितृ, देवता, प्रकृति, प्रकृति केर अवयव – फुल, पात, साँप, चिरै, धर्म ग्रन्थ केर सार; निक आ अधलाह मे अंतर करब, पुन्य आ पापक बीच अंतर आ निक मार्ग केर चुनाव, मानवधर्म केर पालन,स्त्री धर्म केर निर्वहन, आर ने जानि की की मुदा एहि पाबनि केर अन्तिम दिन जे कनिया के ठेहुन टेमी सं दगबक प्रथा अछि से बड़ अमानवीय। बल्कि ई कहि सकैत छी जे सती प्रथा के बांचल हिस्सा जकां अछि। सब महिला, माय, पितियाईन, दाई, सखी-बहिनपा एहि बात सं दुखी रहैत छथि जे कोना एहि जरैत टेमी के सेहो एक बेर नहि तीन-तीन बेर धाह केर घाव के वर्दाश्त करती! परन्तु परंपरा लाचार केने छनि। की क सकैत छथि? अगर निक सं फोका हेतनि त अचिर सोहागबती हेती। पति के सब किछु निक हेतनि। ताहि ओकर पालन हेबे करत। आब एकहि उपाय रहि जैत छनि जे सुरुज भगवान सं निवेदन कैल जाय जे ओ अपन रौशनी मे श्निग्धता आनथि, अग्नि कोमल भ जाथि, पानक पात ओना त शीतल होइत अछि मुदा ओ आरो शीतल भ जाय जाहि सं दागै काल बेटी शीतल के कम वेदना होनि,पाहून मधुर हाथ सं आंखि झापथि, गंगाजल आ आन जल खूब ठंढक प्रदान करय, टेमी के धाह मधुर-मधुर जरै, चानन केर लेप आरो शुशितल भ जै जाहि सं परम्परा के निर्वहन करैत कनिया के ठेहुन दागल जा सकै: शीतल बहथु समीर दहो दिश शीतल लथु उसासे। शीतल भानु लहुक लहु उगथु शीतल भरल अकासे। शीतल सजनी गीत पुनि शीतल शीतल बिध बेबहारे। शीतल मधुश्रावणी बिधि हो शीतल बसन सिंगारे। शीतल घृत शीतल वेरु बाती शीतल कामिनी अंगे। शीतल अगर सुशीतल चानन शीतल आबथु माँगे। शीतल कर लय नयन झँपाबह शीतल देलहुँ पाने। शीतल हो अहिबात कुमर सँग शीतल जल असनाने ।। गीत, बिध-बबहार सब किछु शीतल होबक चाही। वर अपन कोमल हाथ सँ आँखि झापथि, घी, बातिक सङ्गे टेमिक अग्निक सेहो शीतल भ जाय, पवन शीतल मंद भ बहै, वस्त्र आ सिंगारक सामग्री सेहो शीतल होइक जाहि सँ बेचारी नायिका अहि प्रथा के पालन करैत अपन ठेहुना के दगबा सकैथ। एक गीत मे त कनिया केर माय आ आन महिला सङ्गे हुनकर कुमर अर्थात वर सेहो अपन हाथ सँ ओना त नायिका के आँखि झाँपने रहैत छथि मुदा वेदना देखि द्रवित भ जाइत छथि। ह्रदय केर वेदना दुनू आँखि सँ नोर भ झहरै लगैत छनि: आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख कियै पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय किये कामिनी पल पल लैह उसासे। कुमर नयनसँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावणी विधि परम कठिन इहो रीते। मधुश्रावणी केर विध-बेभहार त सब के विध्वंसक आ स्त्रीगन के शारीरिक आ मानशिक शोषण केर एकटा वीभत्स परंपरा बुझना जा रहल छनि। धिया के दर्द हेतनि से बेचैनी सेहो छनि। बिधक पहिने आ विधक बादक दर्द हेतनि से जानि बहुत चिंतित रहैत छथि। मुदा विध के त्याग भला कोना सकैत छथि? एहि मे धिया के कल्याण छनि – अचिर सौहाग्यवती होबाक कल्याण, पुत्रवती होबाक कल्याण। अतेक सुन्नर पाबनि मे मात्र ई बिध कनि अन्कच्छ्ल लगैत अछि। एकरा समाप्त क देबाक चाही। समय बदलि रहल छैक। आबलड़की सब सेहो प्रतिकार करक अवस्था मे छथि। बाल विवाह मिथिला मे समाप्तप्राय अछि।ठेहुन दगबा के प्रतीक मे केवल टेमी धाह उपर सं देखा विध पूरा कैल जा सकैत अछि। अतेक निक पाबनि के मात्र ई छोट सन बिध जाहि मे धिया के सब उमंग आतंक मे बदलि जैत अछि, हमरा कोनादन लगैत अछि। अहि टेमी बला पर स्त्रीगन, पुरुष, संस्कृत के विद्वान मिल शीघ्र निर्णय लय एकरा समाप्त करथि अथवा प्रतीक मात्र राखथि। ओना कियोक भावुक कहि सकैत अछि, मुदा हमरा ऐना बुझना जैत अछि जेना बिना कुनो कसूर के सीता के अग्नि परीक्षा लेल जैत अछि। सीता के माँ, पितियाइन, जेठ बहिन, भौज सब मौन भेल तरपैत सीता के देखैत छथि! बड्ड भेल, एहि पर सोच आवश्यक। निक आ अधलाह त सब परंपरा मे रहैत छैक।जे हो मधुश्रावणी एक बहुत उत्तम पाबनि अछि। एकर निर्वहन होबाक चाही। ई अतेक पैघ विषय थिक जकरा पर पूरा पोथी लिख सब बात पर गंभीरता सं विचार राखल जा सकैत अछि। मुदा सब बात अगर एत लिखब त फेर पढ़नाइ दुर्लभ। ताहि अतय विराम दैत छी। मैथिली जोग गीत मे प्रेम आ तंत्र केर प्रभाव डॉ. सविता झा खान हालहिं मे ओ एक जिज्ञासा केने छली: “मैथिल विश्व-दृष्टि मे इरोटिका वा कामुकता मुख्यधारा मे अछि की सबवर्ज़न (सबवरज़न माने स्थापित मुल्य, सत्ता आ शक्ति के खिलाफ) के रुप मे”। हमर जे अपन शोधक अनुभव अछि ताहि के आधार पर कहि सकैत छी जे अगर मुख्यधारा के अर्थ लोक अथवा जन समुदाय अछि त कामुकता मुख्यधारा के चीज़ थिक आ ई मिथिला मे भारतक बहुत आन ठामक परंपरा जकां अदौं सं विद्यमान रहल अछि, मान्य रहल अछि। खास क विवाह के समय आ ओकर बादक बिध व्यवहार मे गीत आ आन माध्यम सं कामुकता के प्रदर्शन होइत अछि तकर जतेक वर्णन करी से थोड़। शायद बिध बेभारक माध्यम सं बर आ कनिया के काम के प्रति परिपक्व आ एक दोसरक समीप लेबाक ई उत्तम प्रक्रिया छैक। उदाहरण के लेल लाबा छीट’ काल लाबा जे छैक ओकरा अगर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करब त कनिया अथवा बर के मन मे उठैत रंग-विरंगक प्रेम, अभिसार केर तरंग छैक। काम इच्छा के भावक प्रतीक छैक। ऊपर सं गीतक शब्द जाहि मे महिला सब बर आ कनिया के झिझक वर के माता आ कनिया के पिता; वरक दाई आ कनिया के पितामह, वरक मामी आ कनिया केर माम आदि सम्बन्ध केर संग जोडि ओकरा आरो रमनगर आ दुनू लेल इजी गोइनिंग अथवा सहज बना दैत छैक। एक उदाहरण देखू: बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक बाबी कनियाक बाबा संगे सुताउ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक माय कनियाक बाबू संगे सुताउ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ बरक बहिनी कनियाक भैया संगे सुताउ दुनू घर गुजर चलाउ ........ बाबू लाबा छिडियाउ धिया बीछि-बीछि खाउ ओना त ऊपर वर्णित गीत सहज लगैत छैक। मुदा अपन गायकी आ लोकक समर्पण, बिधक उद्देश्य आ लाबा छिडियाएब केर क्रिया आ लड़की सब द्वारे ओकरा लेल छीना-झपटी सब नव बर आ कनिया के अभिसार हेतु सहज क दैत छैक। धोखेनाई केर बात समाप्त भ जैत छैक। अहि पूरा गीत मे बरक दाई, माय, आ बहिन सब आ कनिया केर पितामह, पिता, आ भाई सब पात्र भ जैत छैक जकरा बीच परिहास केर सम्बन्ध उचित आ समाज सम्मत मानल जैत छैक। अहिना एक विध पटिया समेटब आ ओछाएब के होइत छैक। अहु बिध केर उद्देश्य बर आ कनिया के अभिसार आ रति-रभस लेल तैयार करब, सम्बन्ध के प्रगाढ आ सहज करब थिक। एक छोट सन गीत देखब त एकरो अर्थ बुझबा मे कोनो भांगट नहि हैत। गीत देखू: सब रंग पटिया समटू सोहबे दुलहा सं ओछबाउ हे पटिया ओछयबामे कसमस करता मारब चाट घुमाय हे टेढ़-तूढ जुनि पटिया ओछाएब रूसि रहती सुकुमारि हे हँसी-ख़ुशी पटिया ओछाएब हँसती सिया सुकुमारि हे .. कतेक आनंद, उल्लास, रंग आ वैविध्य सं भरल ई छोट सनक गीत छैक! नाम लेल पटिया छैक मुदा छैक बहुरंगी। सखी सब गीतक मादे कनिया के केलि-कीड़ा केर प्रैक्टिकल ज्ञान देमक यत्न क रहलि छथि। बर के कोना सोसिअलाइज करी से युक्ति बता रहलि छथिन। पटिया ओछायबक हेतु बर के कहथिन से बता रहल छथिन। अगर त्रुटि होइत छनि त प्रेमक चाट मरबा लेल उकसबैत छथिन। प्रेमक चाट दुनू मे साम्पिय स्थापित करबा मे सहायक हेतनि तखन ने बात आगा बढ़तनि? रुसब-बौंसब केर कला केर ज्ञान द रहल छथिन हँसब-बाजब के गुण बता रहल छथिन। सब सं पैघ बात ई जे कोनो बात छुपल नहि, चोरैल नहि। सब स्त्रिगन – दाई, माय, पितियाइन, भौजी, जेठ बहिन सबहक समक्ष आ सबहक अनुमति सं। एक बात इहो, सब सखी सब ओहि पर पिहकारी मारैत प्रहसन के आरो अनुरंजक बनबैत रहैत छथि। एकर स्पष्टीकरण निम्लिखित गीत मे अछि: सबरंग पटिया समटू हे सोहबे दुलहा देता ओछाय टेढ़-टूढ जों पटिया ओछाओता रुसि रहब सुकुमारि हे हे कसार मसरने पटिया ओछोता मारबनि चाट घुमाए हे हँसी-खुशी सं पटिया ओछोता तखन हंसथि सुकुमारि हे आब गीतक एक-एक शब्द के देखब त लागत जे समाज कतेक उदार भाव सं इरोटिका के स्वीकृति द रहल अछि। लेकिन एहि इरोटिका मे यौनाचार अथवा यौन विकृति के सम्बाद अथवा प्रतीक नहि छैक। मर्यादित इरोटिका जकरा लोकक भाषा मे हँसब-ठेठायेब सेहो कहि सकैत छी। एहेन इरोटिका जे श्रृंगार, शब्द व्यंजना, भाव, विध-बेभार, आ संस्कार सं सुसज्जित अछि। जकरा मर्यादित स्वरुप मे समाज मान्यता प्रदान करैत छैक। मिथिला मे विवाह के संग एक क्रिया जोगक होइत छैक। जोग के प्यूरिस्ट सब योग कहि सकैत छथि। दुनू के अर्थ एक भेल – जुड़ब अथवा जोड़ब। बर के कनिया सं आ कनिया परिबार के बरक परिवार सं। लेकिन मुख्य रूप सं बर-कनिया के जुडब – मानशिक, शारीरिक आ सामाजिक स्तर के संग-संग मनोवैज्ञानिक स्तर पर सेहो महत्त्व रखैत छैक। जोग मे बर आ कनिया के गीत सं, बिध-बेभार सं, आ तांत्रिक क्रिया सं सेहो जोड़क परंपरा रहल छैक। तांत्रिक क्रिया मे परिहास आ गीतक चासनी लागल रहैत छैक। नैना जोगिन के बिध मे मानल जैत छैक जे बंगाल, अथवा हिमालय अथवा कामख्या सं एक हाँकल योगिन अबैत छैक। गीत मे कखनो काल गीतगाइन सब अपना आप के तिरहुत के एक नंबर के फेरल जोगिन प्रमाणित करैत छथि। जोगक एक उद्देश्य बरक ध्यान अपन माय-बहिन सं अधिक कनिया दिस आकर्षित करब सेहो छैक। जोग मे गीत गेबाक शैली पूरा तंत्रमय भ जैत छैक। कखनो काल क धरती, अकास, समुद्र,पहार सब चीज़ के बान्हब आ अधिन करब के चर्च होइत छैक। जोग द्वारे असंभव काज के संभव करक बात होइएत छैक। निम्नलिखित जोग गीत के देखू: माइ हे सात बहिन हम जोगिन नैनहु थिकी जेठ बहिन माइ हे तिनकहूँ सं जोग सिखल तिन भुवन जोग हाँकल माइ हे समुद्रहु बान्ह बन्हाओल तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे तरहथ दही जनमयलहूँ तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे सुखाएल गाछ पन्हगेलहु तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे बांझिक कोखि पलटलहूँ तैं हम जोगिन कहाओल माइ हे भनहि विद्यापति गाओल जोगिनिक अंत न पाओल .... एहि जोग गीत मे जोगिन अपन कला अथवा तंत्रक ज्ञानक महिमा मंडित क रहल छैक। एकरा जखन स्त्रीगन सब गबैत छथि त लागत जे अथर्ववेद वेद केर मन्त्र के कल्लोल भ रहल अछि। तंत्र सं केहनो असंभव काज भ सकैत अछि; धरती,अकास आ पाताल के हाँकल जा सकैत अछि, समुद्रके बान्हि सकैत छी, तरहत्थी मे दही जमा सकैत छी, सुखैल ठुठ गाछ मे प्राण आनि ओकरा हरियर कचोर क सकैत छी, केह्नो बाँझिन के कोखि मे संतान डालि सकैत छी। आ ई सब क सकैत छी ताहि त हमर सबहक नाम जोगिन अछि। विद्यापति कहैत छथि, “एहि जोगिन सब के अंत कियोक नहि पाबि सकैत अछि!” आई काल्हि लड़की सब रैंप पर उतरैत छथि, बिलाई के चालि चलैत छथि अर्थात कैट वाकिंगकरैत छथि। लटका मटका झारैत छथि। शरीर आ वस्त्र के कमोतेजक सौन्दर्य सं दर्शक के अपना दिस आकर्षित करैत छथि। करक चाही। एहि मे कोनो हर्ज नहि। ठीके त कहल जैत छैक, “सोच बदलबाक जरुरत छैक, वस्त्र नहि”। जोग गीत मे एहने भाव बल्कि अहू सं रमनगर, आ कामोत्तेजक भाव नव व्याहित कनिया द्वारा प्रदर्शित होइत छैक। स्त्रीगन सब गीत गबैत छथि कनिया कमर मटकबैत, नव वस्त्र सं झापल अपन देहक उभार के देखबैत, आभुषण सं पैर के छम-छम करैत, चूड़ी आ कंगना के खनखन करैत चलैत छथि आ पाहून के अपना दिस मोहित करैत रहैत छथि। पाहून के ध्यान कनिया छोडि ककरो लग नहि जाइन ताहि हेतु कनिया के माय पितियाइन तांत्रिक क्रिया क देने छथिन। पाहून के नोन पढि खुआ देल गेल छनि,हुनकर पाग के ताग निकालि ओकरा तांत्रिक क्रिया द्वारा खन्ती के तर मे गारि देल गेल छनि। आब ओ पूरा कनिया के अधिन छथि। कनि एक एहेन जोग गीत जे एहि तरहक बात कहैत अछि के देखैत छी: जोग जतिन हम जानल पहचानल गुनगर कैल जमाय अधिनक राखब रुनुकि-झुनुकि धिया चलतीह’ पहु देखताह’ पागक फेंच उघारि ह्रदय बीच राखल जखन धिया मोरी चलतीह’ पहु तकताह’ नागरि कैल जमाय अधिन क राखल हमर जोग नागर’ गुण आगर’ सात खण्ड नव दीप जोग अवतारल भनहि विद्यापति गाओल फल पाओल गुनगर कैल जमाय अधिन क राखब.... बाह रे प्रेम। तंत्र सँ बान्हल सिनेहक डोरी। गीत मे एक सँग कमनीयता, सौन्दर्य, दैहिक सौष्ठव, आ स्त्रीगनक अधिकार पुरुख पर देखार भ रहल अछि। धिया के चलब, धिया के देखब, पहु के ताकब, जोगिन के अधिकार सब एक संगे प्रबल बेग सँ प्रमाणित होइत। एक जोगक गीत मे त जोगिन ताल ठोकि कहैत छथि जे "आब अतेक क्रिया आ तंत्र सँ पहुँ के बाँधि देने छियैन्ह जे ओ कतहु जाथि, अंततः घुरि फिर क हमरे लग एता। जेता कत? माइ हे हमरहु जँ पहुँ तेजताह फल बुझताह माइ हे बान्हि देबनि बनिसार अधीन भय रहताह माइ हे चान सुरुज जकाँ उगताह उगि झपताह माइ हे नैन नैन जोड़ल सिनेह फलक नहि छोड़ताह माइ हे नाव डोरी जकाँ घुमताह घुमि अओताह माइ हे मकरी देबनि ऐंठि देहरि धेने रहताह माइ हे भनहि विद्यापति गाओल फल पाओल माइ हे गौरी के बढ़नु अहिबात सुन्दर बर पाओल।। कहक तात्पर्य भेल जे गीत जे गाबि रहलि छथि तिनका अपना तंत्र पर गुमान छनि। जेना सुरुज-चना आँखि मिचौनी करैत रहैत अछि; तहिना नायक आ नायिका के नैन सँ नैन मिल गेल छनि आ ओकरा तंत्रक मन्त्र सँ बान्हि देल गेल छैक। ककर मजाल जे ओहि डोरी के तोड़ि सकै? बर त कनिया सङ्गे नावक डोरी जकाँ जुड़ल छथि, कतहु जाथि अंततः वापस आबहे पड़तनि। आरो बहुत उपमा छैक जकरा बुझनाई कुनो मुश्किल नहि। अतेक तंत्र केर बात होइत अछि। किछु एहनो लोकक तंत्र पर काज होबाक चाही। बात बहुत किछु अछि। एखन एतबे।।। तमाकूल सं बरबाद होइत मैथिल आ मैथिली संस्कृति मिथिलाक संस्कृति केर दू अभिशाप अछि: तमाकूल आ भांग। पता नहि कोना ई दुनू इलम मैथिली संस्कृति सं जुडि गेल? दुनू के सेवन मिथिला मे नशा केर श्रेणी मे नहि अबैत अछि। तमाकूल त बाप सं बेटा, चरबाह, हरबाह सं गिरहत तक मांगि खैत छथि। तमाकूल के नाम सुनिते मैथिली के एक चर्चित गीत जकरा आइयो बहुत सुवाद सँ सुनल जाइत अछि स्मरण आबि जाइत अछि: मामा यौ कनि खैनी दीय अपनों खाऊ कनि हमरो दीय जौं नहि देब त कहि देबनि हम मामी के तमाकूल के खैनी, सुरती, तम्बाकू आदि नाम सं जानल जैत अछि। ई अपन समग्र अवस्था मिथिला के संस्कृति मे रचल बसल अछि। लोक त बारी-झारी मे खेबा जोग तमाकूल उपजा लैत छथि। फेर ओकर कटनी, छटनी करैत छथि। शीत-रौद देखबैत छथि आ अंत मे खर मे राखि साल भरि लेल जमा करैत छथि। तमाकूल के ऐंठी आ जूम मे सेहो कला देखि सकैत छी। कम्पनी सब के आबि गेलाक बाद सकरी कट आ आरो रंगक तमाकूल बाज़ार मे उपलब्ध अछि। कनि तेज लगबा लेल कम्पनी सब ओहि मे एसिड डालि दैत छैक। लोक कहता, “बड्ड चहट्गर अछि।” तमाकूल लोक सीधे चून लगा खाइत छथि, नोसि लेत छथि, बीड़ी मे, सिगरेट मे, चुरुट मे, सिगार मे, पाइप मे, गुटखा, गुड़ाखू, गूल आ नहि जानि कथी-कथी मे प्रयोग होइत अछि। आर त आर एकटा गूल केर कम्पनी "गुलाब गूल" नाम सँ अपन प्रोडक्ट बनबैत छ्ल। ओहि डिब्बा मे एक चहटगर स्लोगन रहैक - "गूल हमारा आविष्कार है"। आब कहु, कुनो जोड़ अछि एकर महत्त्व के? मुदा जे सबसँ खतरनाक तरीका तमाकूल खेबाक अछि से अपन मिथिला आ आसपास केर क्षेत्र मे देखल जाइत अछि - शुद्ध तमाकूल मे चून मिला आ चुनेटि क ठोर मे आँगुर सँ ठुसि लेनाइ। ई साक्षात् यम के नौत देबाक प्रथा अछि। ऊपर सँ ई लोक के असभ्य आ सुचिता के सिद्धान्त सँ दूर सेहो भगबैत अछि। लोक तमाकूल ठुसि यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकैत रहैत छथि। ई एहेन पपियाह लत अछि जे समाजवाद केर सिद्धांत पर अटकल अछि। समाजवाद, मार्क्सवाद,लेनिनवाद के जोड़ सँ पकड़ने अछि। की ब्राह्मण आ की हरिजन, की हिन्दू आ की मुस्लमान, ईसाई आ बहुत ठाम स्त्रीगण तक एकर स्वाद सँ झुमैत रहैत छथि। अतेक समाजवादी जे रिक्शा पर चढ़ल हाकिम रिक्शावाला सँ दांत निपोड़ैत बिना कुनो मान सम्मान के चिंता केने तमाकूल माँगि अपन ठोर मे ठुसि लैत छथि। रिक्शावाला सेहो जे कनिकबेकाल पहिने लघुशंका केने छ्ल आ पानि के अभाव अथवा आर कुनो कारणे हाथ नहि धोने छ्ल अपन ओहि पवित्र हाथ सँ खूब मोन सँ तमाकूल के चून सँ रगरैत अछि आ हाकिम के दैत छनि। बाह! की दृश्य - जेहिना हाकिम तहिना रिक्शावला दुनू मस्त। तमाकूल के सेवन केनिहार रंग-रंग के बहाना बनबैत छथि। कियोक एकरा B B C अर्थात बुद्धिवर्धक चूर्ण त कियोक आरो किछु कहि संबोधित करैत छथि आ भांति - भांति के महिमा के बखान करैत छथि। हमर एक सम्बन्धी एक घंटा मे 20 बेर तमाकूल ठोर तर दैत छथि। एयर फाॅर्स मे काज करैत छला। हवाई जहाज केर इंजन केर अभियंता रहथि। हुनका बारे मे एक बात प्रचलित छ्ल। जखन कखनो फाइटर हवाई जहाज केर इंजन मे कुनो खरापी होइक आ हुनका भांगट बुझ मे नहि आबनि त वरिष्ठ अधिकारी कहैंन, "भाई, हिनका चून तमाकूल दियौन, ई तुरत सब किछु ठीक क देताह।" फेर की लोक तुरंत तमाकूल तैयार करैत छल, हुनका दैत छलनि आ ओ बहुत गर्वित होइत तमाकूल के ठोर मे ठुसैत अपन काज मे मनोयोग सँ लागि जाइत छला। ई बात अलग अछि जे बाद मे दम्माक गहन रोगी भ गेला। हालाँकि तमाकूल केर लत एखन धरि नहि गेलनि अछि। हुनकर पत्नी ओना त तमाकूल खेबा लेल हुनका सँ झगरैत रहैत छली मुदा जखन यैह बात एक दिन हुनकर छोट भाई बुझाब' लागलथिन त पत्नी के भेलनि , "तमाकूल के इलम कुनो बड्ड कलंकक बात थोड़े ने भेल? खाइत छथि त कोन कुकर्म?" झट दनि पतिक सुरक्षा कवच बनैत अपन देवर के ऊंच नीच कहनाय शुरू केलनि: "अहाँके अतबो संस्कार नहि बचल जे जेठ भाय सँ कोना बाजी? कोना हिम्मत भेल हिनका भाषण देबके? तमाकूल खाइत छथि कुनो कुकर्म नहि।" बेचारा छोट भाय, काटू त खून नहि! आ तमाकूल ठूसा श्रीमान अपन पत्नी सँ गदगद भेल। जखन दिल्ली यूनिवर्सिटी केर हॉस्टल मे रहैत रही त अनेक बिहारी मित्र सब तमाकूल खैत छलाह आ एकरा बिहार आ मिथिला के सांस्कृतिक धरोहर जकाँ मनैत अपन लत पर नितराइत छला। यत्र-तत्र-सर्वत्र थुकबा के परंपरा के सेहो शाश्वत केने छला। एक मित्र त एहेन छला जे की कही। बहुत ज्ञानी, पढ़बा मे विलक्षण, कुशाग्रबुद्धि मुदा तमाकूल खेबाक घनघोर समर्थक। वाक्यपटु सेहो छला। अपना सङ्गे अनेक बिहारी आ बहुत रास आनो ठाम के लोक के तमाकूल ठुसबक लत मे निपुण केने छला - सिद्धस्त गुरु जकाँ। कहियों काल चिलम सेहो देख लैत छला। बाद मे आई पी एस अधिकारी भेला। मित्रता एखनो अछि मुदा नाम देखार नहि करब। हमर त किछु नहि करता कनि देखार भ जेताह। भारत के अनेक तथाकथित शैक्षणिक कौशल मे माहिर विश्वविद्यालय मे त तमाकूल सङ्गे बीड़ी के प्रचलन भ गेल। लोक बीड़ी के धुआं मे समाजवाद के संगीतक आनंद आ परमानन्द मे भेर होमय लगला। अनेक महिला सब सेहो एकरा समाजवाद, वर्ग बिभेद हटेबाक, आ स्त्री-पुरुख के समानता के इंडिकेटर के रूप मे देखैत छथि। सभा मे, रैली मे लोक बीड़ी पिबैत मस्त भेल मकुनी हाथी जकाँ चलैत रहैत छथि जेना बीड़ी केर हरेक कश सँ एक कुप्रथा के सर्वनाश क लेता, समाज सभ्य आ सम्यक भ जैत, माओ, नक्सल सब समस्या के चट सँ निदान। मुदा तमाकूल के आयुर्विज्ञान आ वैज्ञानिक शोध के तराजू पर जोखब त लागत जे ई दारु सँ अधिक हानिकारक अछि। कैंसर केर खतरा सब सँ अधिक तमाकूल सँ ओहू मे ठोर मे सीधे चुनेटल तमाकूल सँ अछि। विज्ञानक भाषा मे कही त तमाकूल के गाछ निकोटियाना प्रजाति के अछि जकर जड़ि भारत मे नहि अपितु दक्षिण अमेरिका मे छैक। दक्षिण अमेरिका सँ ई पुर्तगाल आ पुर्तगाल सँ भारत 1600 ईस्वी मे आनल गेल। आई विश्व के कुल उत्पाद के 7.8 प्रतिशत तमाकूल अपन देश भारत मे होइत अछि। जे अनकर छ्ल, हानिकारक छल, व्याधि के घर छ्ल से अपन भेल अछि? कहल ई जाइत छैक जे एक बेर पुर्तगाल स्थित फ़्रांसिसी राजदूत जॉन निकोट अपन देश के रानी लग तमाकूल के बिया भेजलनि आ अहि तरहेँ प्राचीन इतिहास मे तमाकूल नामक ई गाछ प्रचलित भ गेल जे आई समस्त विश्व लेल पैघ समस्या बनल अछि। निकोट महोदय केर नाम सं एकरा निकोटिन कहल गेल। एमहर हमरा किछु बूढ़ आ जानकार सब सूचना देलनि अछि जे जखन बीड़ी के कंपनी सब बीड़ी बनेलक त लोक ओकरा पीबे नहि करैक । जों नहि व्यवहार करतै त व्यापार कोना हेतैक? एकरा ध्यान मे रखैत कंपनी सब किछु कलाकार के एकत्रित केलक आ अनेक शहर, गाम, चौराहा पर लोक सबके लैला मजनू, सीरी फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि नाटक केर आयोजन कर लागल। लोक सब के बजा मंगनी मे नाटक देखबै आ बीच-बीच मे बीड़ी लुटबै। लोक नहु-नहु बीड़ी पिनाई शुरू केलक। नशा केर प्रयोग बढ़े लागल। बीड़ी सँ वर्ग केर रचना भेल। ब्राह्मण शुरू मे बीड़ी नहि पिलनि। सोइत ब्राह्मण - राम-राम कोना छोट लोकक चीज़ ग्रहण करितथि? लेकिन एकर स्वाद के चखबाक आकांक्षा सब के छलैक। फेर की समाधान? समाधान के रूप मे पहिने सँ चुनेटल तमाकूल त छले बाद मे सिगरेट आबि गेल। सिगरेट भेल त क्लास भ गेल। फेर की ब्राह्मण आ की जमींदार। बुझु जे सिगरेट त मॉडर्न आ पढ़ल लिखल ओहू मे आधुनिक आ अंग्रेजी शिक्षा केर मापदंड भ गेल। जे मिथिला आई सं ४०-५० वर्ष पूर्व टमाटर के सार्वजानिक भोज मे,आ आन व्यवहार मे अनबाक अनुमति नहि देने छल। चूँकि ई बिलायत सं आयल रहैक ताहि एकर बिलौती कहैत छल। तीमन-तरकारी मे टमाटर के बदला आमिल आ नेबो के प्रयोग करैत छल वैह समाज बिना कुनो मीन-मेख केने तमाकूल के कोना अपना लेलक? छैक ने गूढ़ बात! आर-त-आर, तमाकूल भ गेल शुद्ध, छुआछूत सं सेहो मुक्त। केह्नो उपास मे आरो किछु खाऊ-कि-नहि खाऊ तमाकूल चूसि सकैत छी। कर्मकाण्डी के एकरा ग्रहण करबा मे कुनो हर्ज नहि, शायद भगवान बैकुण्ठ सं अनुमति प्रदान केने छथिन। हमरा त लगैत अछि जे मिथिला आ मिथले कथिलेल समस्त बिहार मे दारू संग तमाकूल आ भांग पर बंदी करक अत्यंत आवश्यकता अछि। नीतिश कुमार जी कनि इम्हरो ध्यान दियौक। अते त एखनो तमाकूल के प्रोडक्ट बनबे बला कम्पनी सब खुजल उक बनल अछि। कुनो प्रतिबन्ध नहि। पश्चिमी देश विशेष रूपेँ अमेरिका मे तमाकूल इत्यादि के कारोबारीके अपन आमदनीक एक पुष्ट भाग 'कैंसर' आ दोसर असाध्य रोगक इलाजक हेतु लगब पड़ैत छनि किन्तु एहि तरहक नियम के बारे मे भारत मे सोचल तक नहि गेल अछि । ई अपना आप मे घनघोर चिंताक विषय अछि। तथाकाथित सोशलाइट, विद्वान आ प्रगतिशील लोक सब चुप छथि। कतेक त स्वयं तमाकूल चुन आ तमाकूल सं निर्मित अन्य वस्तु के उपयोग मे संलग्न छथि। जनसँख्या विष्फोट के कगार पर ठाढ़ भारत केर विद्वान लोकनि धर्म,मेजोरिटी, माइनॉरिटी, हरिजन, गिरिजन, आ व्यवस्था मे निक अधलाह के मीन-मेख निकलबा मे भेर छथि। जनसँख्या हुनका एसेट बुझना जैत छनि। कुनो अस्पताल के कैंसर, यक्ष्मा, आ ह्रदय विभाग मे जाऊ, स्थितिक भान भ जैत। दम्मा के मरिज केर सर्वेक्षण करू यथार्थ बुझि जैब। कम सँ कम तमाकूल के उत्पाद के पूर्णतः प्रतिबंधित करबाक नियम लागू कैल जा सकैत छैक जाहि सँ एकर प्रचार-प्रसार कम स कम हो और अंततः ई समाप्ति केर डेग दिश अग्रसर हो। तमाकूल सँ घटे-घाटा। तमाकूल मे मादकता अथवा उत्तेजना प्रदान कर’ वला मुख्य घटक निकोटीन (Nicotine) होइत छैक। यैह तत्व सबस अधिक मारुक सेहो होइत छैक। एकर अतिरिक्त तमाकूल मे अनेक तरहक कैंसर उत्पन्न कर’ वला तत्व पायल जाइत छैक। तमाकूल के सेवन सँ मुँह, घेंट, श्वांसनली आ फेफड़ा केर कैंसर (Mouth, throat and lung cancer)होबाक सम्भावना रहैत छैक। बिमारिक अंत अतै नहि होइत छैक एते धरि ह्रदय के बीमारी (Heart Disease),धमनी काठिन्यता, उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), पेटक अल्सर (Stomach Ulcer), अम्लपित (Acidity), अनिद्रा (insomnia) आदि रोगक सम्भावना तमाकूल केर उत्पाद केर सेवन सँ बढ़ि जाइत छैक। आदिवासी समाज मे सेहो बनिया सब स्त्री-पुरुख दुनू के तमाकूल आ एकरा सं निर्मित अनेक वस्तु के लति लगा देने छैक। तमाकूल केर सेवन एक पैघ समस्या अछि। मोन आ शरीर दुनू के सर्वनाश क रहल अछि। अहि पर सोचब जरुरी अछि। हम एहि कथ्य के माध्यम सं किनको ऊँच-नीच नहि कहि रहल छी। केवल यैह जे ई बहुत खराप इलम अछि, एकर त्याग करक चाही। मैथिलानी पर विमर्श क अधिकारी के? मैथिलानी अथवा मिथिला मे स्त्री केर स्थिति पर चर्चा करक अधिकारी के: स्त्री? पुरुष? अथवा दूनू? आजुक सन्दर्भ मे जखन स्त्री विमर्श पर महिला; दलितवर्ग पर दलित; कला पर कलाकार काज क रहल छथि, लिख रहल छथि; ओहेन स्थिति मे ई एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु बुझना जैत अछि। हमहु स्त्री पर आ कखनो काल मिथिलाक स्त्री पर हुनक जीवन के विभिन्न आयाम पर लिखैत रहैत छी।जे ओहि वर्ग सं छथि सैह लिखता अथवा व्यक्त करता किछु एहेन सन अवस्था अछि जे हमरा थोरेक परेशान करैत अछि। लगैत अछि “जेना हम दोसरक अधिकार क्षेत्र मे अधिक्रमण क रहल होई?” बातमे कनि उलझन छैक। मैथिलानी जं अपना पर नहि लिखती त आन के लिखतनि? जे अनुभव छैक तकर सटीक वर्णन आ व्यख्या वैह क सकैत छथि! लेकिन फेर एक दोसर बात मोन मे अबैत अछि। हमरा लोकनि नृतत्वशास्त्र आ समाजशास्त्र मे दोसरक संस्कृति (other cultures) के बारे मे पढैत छी। दोसरक संस्कृति पर काज करैत छी। अहू दुनु विधा मे स्थानीयया मूल (native) आ दोसर केर बीच द्वन्द छैक। एक के कहब छैक जे स्थानीय अथवा नेटिव चूँकि ओहि समाज आ संस्कृति केर हिस्सा छैक ताहि ओ ओकरा निक सं बुझैत छैक, ओहि मे जीबैत छैक आ ओकर अक्षरसः व्यख्या क सकैत छैक।एकर विपरीत दोसर संस्कृति पर आन द्वारा अध्ययन कर बला के ई मानब छनि जे वैश्विक बात त आने कहत। से कोना? कखनो काल जं बाहरी दुनिया के मापदण्ड नेटिव विद्वान के नहि बुझल होनि त ओ बहुत बात के चर्च करब छोडि देता। अपन शोध आ फिल्डवर्क केर एक सत्य उदाहरण दैत छी जे आंखि सं देखल आ कान सं सूनल अछि। हम मुसहर जाति पर एक विस्तृत परियोजना पर काज करैत रही। परियोजना केर उद्देश्य एहि समाजक लोक के शिक्षा, स्वास्थ, आर्थिक आ सामाजिक उन्नति के दिशा मे प्रयत्न रहैक. शिक्षा संग संग सांस्कृतिक धरोहर केर रक्षा सेहो मूल रहैक.विषय के गंभीरता के देखैत आ अपन पूर्व मे अहि समाज पर कुनो तरहक काजक अनुभव नहि होबाक कारने एक मुसहर समुदाय के पढ़ल युवक के साथ लय हम मुसहरटोलीमे गेलौं।स्थिति देखि द्रवित भेलौं. भेल, “आजुक जुग मे ई सब मुसहर जातिक लोक कतेक दुखक जीवन जी रहल अछि?ककरो घर दढ़ नहि. ककरो भरि देह वस्त्र नहि. भेल,फेर कुन तरहक विकास अपन देश अर्थात भारत क रहल अछि?सब के पुछ्लियैक: “अहाँ सब के की चाही?” झट दनि एक माईनजन उठला आ कहलनि: “हमरा सबके माटि काटक काज आ घर के मरम्मत भ जै त हम सब धन्य भ जैब।” हमर दोसर प्रश्न छल: “कतेक पाई मे घरक मरम्मत भ जैत?” हुनकर जवाब तहिना भेटल: “मालिक, हम सब फुसही झोपडी मे रहैत छी। २००० टाका भेट जेतैक त सब समस्याक समाधान।” आब देखू, ओ सब कियोक ढंग सं वस्त्र नहि पहिरने छल। सबहक पीठ उघार। मैल-फाटल धोती, ५-६ वर्ष केर बच्चा सब नंगटे। तथापि ओकर मांग मात्र २००० टका घर ठीक करेबाक हेतु आ माटि काटक काज नोन रोटी खेबाक लेल। नहि शिक्षा, नहि स्वास्थ, नहि आरो कोनो वस्तु केर अभिलाषा।ओहि समुदाय केर पढल युवक अर्थात हमर सहयोगी सेहो कुनो निक व्योंत बतेबा मे अपन असमर्थता व्यक्त केलनि।ओ कहलनि: “सर, हम सब भोजन, वस्त्र, आवास मात्र तीन वस्तु जनैत छी. अतेक भेट गेला सं सब मस्त. ने शिकबा ने शिकायत.” अहि तरहक बात आदिवासी आ अन्य समाज मे सेहो देखना जैत अछि।हम आब अपन विषय केर दोसर बात जे“सत्य वैह नहि होइत छैक जे लोक कहैत अछि, सत्य ओहो होइत छैक जे अहाँक आंखि देखैत अछि, आत्मा, आ विवेक कहैत अछि”, के मूल मानि अपन प्रतिवेदन लिखलौं. उपरोक्त उदाहरण देबाक तात्पर्य ई अछि जे जखन कुनो समुदाय अथवा वर्ग अपन समस्या तक व्यक्त करबा मे असमर्थ अछि त ओकरा समस्या के के बुझत? दोसर. तहिना मैथिलानी के समस्या मैथिलानी लिखथि से निक बात मुदा पुरुख सेहो लिखथि. समस्या के तह मे जाथि आ ओकर समाधान तकथि आ लिखथि. जखन महिला के बात करैत छी त अतेक जानब अनिवार्य भ जैत अछि जे महिला समाज पुरुष या पित्रसत्तात्मक व्यवस्था मे ऐना मिल गेल अछि जे ओकर अपन स्वरूप जेना हेरा गेल होइक? के स्त्री पुत्र जन्म देलाक बाद अपना के भगवंत नहि बुझैत छथि? कथी लेल सासु पुतहु झगरेतछथि? कथी लेल महिला अपन पुत्री के पुत्र जकां स्वतंत्रता नहि दैत छथि? मुदा एहि मे हुनक गलती नहि, पुरुष के बनाएल संरचना के गलती अछि।अपन गलती के भान पुरुष करथु। पुरुष जखन स्त्री विमर्श करथि त अपन अंतरात्मा मे एक स्त्री केर भाव आनथि। किछु एहेन भाव जे स्त्रिग्न नहि कहि सकैत छथि सेहो निर्विकार आ बिना कुनो अहम के बाजथि।ई समस्या अहि हेतु उत्पन्न भेल अछि जे एक के कम आ दोसर के अधिक महत्त्व देल जैएत अछि. प्रयोजन ई होबाक चाही जे मातृभाव आ पितृभाव बराबर हो. एकर सर्वोत्तम उदाहरण अफ्रिका के घाना देशक असन्ति (Ashanti) जनजातिक परिवार आ संस्कृति केर संकल्पना मे देखल जा सकैत अछि. असन्ति केर संस्कार मे परिवार आ माताक गोत्रबहुत पैघ स्थान रखैत छैक. एहेन मान्यता छैक जे शिशु अपन पिता सं आत्मा, प्राण आ साँस लैत अछि आ माता सं माँस (देह) आ शोनित. बच्चा ओना त दुनु पक्ष सं जुड़ल छैक परन्तु मातृपक्ष सं ओकर लगाव शोनितक लगाव, भावनाक लगाव, कहियो समाप्त नहि होबबला लगाव छैक. पूर्वोत्तर भारत केर मेघालय राज्य मे खासी जनजाति मे माता के सर्वोपरि मानबक परंपरा एखनो अछि. एकर तात्पर्य ई भेल जे संस्कृति मे संस्कार एहेन हो जे स्त्रीगन के सम्मान करय. कतेक लोक संस्कृति के रक्षा केर नाम पर नारी अधिकार, सम्मान, बराबरी, स्वतंत्रता आदि के विरोध करैत छथि. हुनका डर होइत छनि जे सब किछु समाप्त भ जैएत. मिथिलाक पतन भ जैत. लिंग आ वर्ग संघर्ष शुरू भ जैत. सम्मान, परम्पराक ह्रास भ जैत. एकर मतलब की जे स्त्री के घेंट दबाक मारि दी? स्त्री के विकासक सहगामिनी नहि बन दी? स्त्री के हुनक सुविधाक अनुसारक वस्त्र, गहना, पहिरक स्वतंत्रता नहि दी? हुनका आत्मसम्मान नहि दी? संस्कृति आ संस्कार बचेबाक लेल स्त्री मात्रक बध, ई कहेन बात? पुरुख बहुत दिन पहिने पेन्ट पहिर लेला, संस्कृति नहि मरल; स्त्री पेन्ट, सलवार पहिर लेती त संस्कार खत्म भ जैत! बेटी माता पिताके सम्पति के मांग करती त कोर्ट कचहरी शुरू भ जैत, आदि-आदि. ई सडल-गलल मानशिकता अछि. एकरा त्याग करक चाही. अगर भाई-भाई मे मुक़दमा चलैत अछि त समाज कहाँ समाप्त भ जैत अछि? अगर बेटा आ बेटी दूनू के पता लागि जेतनि जे माता –पिता केर सम्पति सं जवावदेही धरि हुनकर सामान अधिकार छनि त नहु-नहु ई अहं समाप्त भ जैत. मैथिलानी सेहो समग्रता मे पुरुष पर ओहिना लिखथि जेना पुरुष हुनका पर लिखैत छथि। महिला आ पुरुष सं पैघ बात ई जे समाज, ओकर परिवेश, ओकर संस्कृति, ओकर संस्कार, ओकर इतिहास, ओकर लोक व्यवहार पर जिनका रूचि होनि, जिनका जिज्ञासा होनि, जिनका किछु करबाक उत्साह होनि से लिखथि।मुदा सब सं पैघ बात ई जे पुरुख मैथिलानी के मनोदशा के बुझथि, ओहि पर मनन करथि आ तटस्थ भाव सं लिखथि. विकास लेल लिखथि. समानता के भाव लेल लिखथि. दिल्ली मे एक कार्यक्रम मे साहित्य अकादेमी पुरुस्कार सं सम्मानित तीन मैथिलानी: डॉ. नीरजा रेणु, डॉ. शेफालिका वर्मा आ डॉ. उषा किरण खान बजली जे अधिकांश लोकगीत केर रचना मैथिलानी केने छथि। हुनकर सबहक बात के सीधे कटबाक हिम्मत हमरा नहि अछि। ओ सब साहित्य केर हस्ताक्षर छथि। बहुत अनुभव, मनन के बाद एहि निष्कर्ष पर ऐल हेती। मुदा नारीवाद के घमर्थन जखन सामाजिक विज्ञान के शोध छात्रक रुपें करैत छी त किछु आरे बात सब बुझना जैत अछि।महिला त केवल गबैत छली। हुनका अपन बारे मे सोचबक स्वतंत्रता कहाँ छलनि? आ समय सेहो नहि।ओ त पुरुष रचित व्यवस्था मे मशीन जकां काज करैत छली। हमरा होइत अछि अधिकांश गीत पुरुष लिखलनि। मुदा जखन ओ गीत केर रचना कर’ लगला त अपन मोन, ह्रदय सब मे एक स्त्रिग्न के भाव आनि लेलनि। अतेक निक जे स्त्रिग्न सब ओहि भाव मे मस्त भ गेली। ओकरा अपन मानि लेलनि। पुरुष रचनाकार ओहि गीतक देवकी आ स्त्रिग्न सब ओकर यशोदा भ गेली। एक एहेन हरिजन स्त्री जकर पति अर्थोपार्जन लेल दूर देस गेल छैक, सासु, ससुर बुढ छैक आ सासु ससुर केर आंखि मे रतौंधी छैक, कान बहिर छैक। छैक त हरिजन, अछूत मुदा सुन्दरता के खान, कामायनी. वैह पुरुष जे छुआछूत केर बात, वर्ग विभेद केर बात, जाति-पातिक बात करैत छथि, सैह सब ओहि महिला के गसल देह, यौवन के सुख प्राप्त कर’ चाहैत छथि। आब ओ अछूत महिला अपन यौवन आ गसल देह के कारण पाण्डित्य कला मे निपुण पुरुष के सजाति बुझना जैत छनि। ओकरा अपन बाहुपाश मे लेबाक लेल उद्यत छथि। राति मे चोरी सं ओकर घर मे घुसि सब अक्षम्य काज आ कर्म कर’ लेल परेशान छथि. बेचारी महिला लाचार अछि। ओकर वेदना के सुनतै? मुदा एक पुरुष जे महाकवि विद्यापति छथि से सुनैत छथि आ द्रवित होइत अपन कलम उठा ओहि वेदना के लिखैत छथि: हम जुवती पति गेला बिदेस। लग नहि बसए पड़ोसिया देस।। सासु दोसर किछुओ नहि जान। आंखि रतौन्धी सुनए नहि कान।। जागह पथिक जाह जनु भोर। राति अन्हार गाम बड़ चोर।। भरमहु भोर ने देअ कोतबार। कहुक कियोक न करए विचार।। अधियन कर अपराधहु साति। पुरख महत सब हमर सजाति।। भनहि विद्यापति एहि रस गाब। उकुतिहि अबला भाव जनाब।। सब सं पैघ बात ई जे विद्यापति पीड़िता के दुःख सं केवल द्रवित नहि होइत छथि, ओकर मनःस्थिति के वर्णन आखर-आखर करैत छथि। नारी भाव के ऐना अपना भीतर आत्मसात क लैत छथि जे गीतक अंत मे ई तक घोषणा क दैत छथि जे हिनकर गीतक रस मात्र अबला के भाव के जगब’ बला रस छनि। ओ अपन गीत अही रस मे लिखैत छथि। विद्यापति के अनेको गीत नारी भाव, श्रृंगार, मनोदशा के अक्षरसः वर्णन अछि। अतेक निक जे मैथिलानी ओकरा अपन बना लैत छथि। गीत के कंठाग्र क लैत छथि। गीतक पोर-पोर सं कनेक्ट भ जैत छथि। किछु पुरुष गीत लिखनहार त एहेन छथि जे नारी भावना के तह तक घुसबा लेल समस्त नारी मनोदशा के संग-संग अपन नाम, व्यवहार तक नारी जकां क लैत छथि। एक बहुत प्रचलित भक्ति गीत जे मिथिला आ मैथिलानी द्वारा मिथिलाक गुणगान करैत अछि ओकर दू पांति देखी: साग पात खोंटि खोंटि दिवस गमेबै हे हम मिथिले मे रहबै। अपना किशोरीजी के टहल बजेबै हे हम मिथिले मे रहबै।। एहि गीतक रचैता छथि कपिलदेव ठाकुर। ई राम आ सीता सं आ कृष्ण आ राधा सं सम्बंधित मधुर भक्ति गीत रचैत छथि। विष्णु भक्ति मे ततेक तल्लीन भ जैत छथि जे अपन अस्तित्व महिलाक अस्तित्व मे परिणत क लैत छथि। अपन नाम तक बदलि लैत छथि। कपिलदेव ठाकुर सं स्नेहलता भ जैत छथि। नारी मनोदशा के लिखैत छथि आ ओही मनोदशा मे जीबैत छथि। हिनकर रचित अनेक गीत नारी भाव, भक्ति, श्रृंगार आ मनोदशा के व्यक्त करैत अछि। “पत्रहीन नग्नगाछ” मे जे नारी मनोदशा केर वर्णन यात्रीजी केलनि अछि तकर कुनो जवाब अछि? “पारो”, “घसल अठन्नी” आदि केर नायिका के बेदना मैथिलानी वर्दाश्त क सकैत छली मुदा ओकरा हु-बहु उकेरब बला काज त दोसर (other) अर्थात यात्री आ मधुप सनहक पुरुष नारी ह्रदय के अपना मे आनिक क’ सकैत छल! गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। तकर जे भाव यात्री व्यक्त केलनि से कुनो समान्य बात अछि? तीनू महिला विदुषी अर्थात डॉ. नीरजा रेणु, डॉ. उषाकिरण खान आ डॉ. शेफालिका वर्मा एक बात अंत मे बड्ड निक बजली: “साहित्यकार के सत्य लिखक चाही, मानव पर लिखक चाही, स्त्री-पुरुष केर बन्धन सं उठि क लिखक चाही। स्त्रिग्न केवल मैथिलानी पर नहि लिखथि पुरुषो पर लिखथि. तहिना पुरुष सेहो स्त्रीगण पर सेहो लिखथु। कुनो वाद अथवा लिंग केर बन्धन उचित नहि।” हमरा ई निचोड़ कथन बड्ड सोहनगर लागल। महाराजा पंहिबा: मणिपुर केर ग़रीब नबाज़ अजमेर केर हजरत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (1141-1236) के ग़ुरबतमे जीवन जिबैत लोकसँ आ जनसाधारणसँ अगाध प्रेमके कारण ग़रीब नबाज़ कहल जाइत छनि। मुग़ल बादशाह अकबर महान (1542-1605) के ग़रीब नबाज़ केर नामसँ जानल जाइत छैक। ओ प्रजावत्सल छला, ग़रीब, दुखी एवं असहाय के मदति करैत छला। "ग़रीब नबाज़" शब्द लोक कंठमे एना बैस गेलैक जे आर त आर महाकवि तुलसीदास (1497-1623) अपन अजेय कृतिरामचरितमानसमे भगवान राम लेल ग़रीब नबाज़ (गरीबनेबाजू) शब्दके प्रयोग करैत एक पद लिख लेला: गईबहोर गरीबनेबाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। बुधबर नहि हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निजबानी।। एकर अर्थ भेल, “प्रभु रघुनाथ हेरायल या हाथसँ चलि गेल वस्तुके फेरसँ आनि सकैत छथि, ग़रीबनबाज़ (दीनबन्धु) , सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमान आ सबहक स्वामी छथि। यैह बात बुझि गुणीजन ओहि श्रीहरि केर यशगानसँ अपनवाणीके पवित्र आ उत्तम फल देब' बला बनबैत छथि।” आश्चर्य तखन भेल जखन पूर्वोत्तर भारतके एकांतमे बसल राज्यमणिपुरमे अपन प्रवासक दौरान हमरा पता चलल जे मणिपुरके गौरवमय इतिहासमे सेहो एक प्रतापी, प्रजापालक, सम्यक, सहिष्णु राजा भेला जिनकर नाम ग़रीब नबाज़ छलनि। मणिपुर केर कुकी आदिवासी समुदायके डॉ. Leban Serto दिल्लीविश्विद्यालयमे हमर सहपाठी छला। काल्हि हुनकर एक मैसेज देखल जाहिमे ओ लिखने छथि जे दू आदिवासी समूह, नगा आ कुकीके बीच झगड़ाके चलते पूरा मणिपुर अस्त-व्यस्त भेल अछि। नेटवर्क या त बंद छैक अथवा कतौ कतौ बहुत मंथर गतिसँ चलि रहल छैक। लेबानके ई दुःख छनि जे अगर स्थिति अहिना रहलैक त क्रिसमस आ नववर्ष केर शुभकामना संदेश ओ अपन मित्रके नहि द पेताह। ताहि ओ 17 दिसम्बरक एडवांसमे सबके दुनु चीज़क शुभकामना द देलथि। दुर्भाग्यसँ हमरा लोकनि मणिपुर आ पूर्वोत्तर भारतके संबंधमे बहुत बातसँ बंचित छी। हम सब मीडिया द्वारे ई जरूर जनैत छी जे मणिपुरमे सेना आ सामान्य जनताके बीच सौहार्दय नहि छैक, आदिवासी आ गैर आदिवासीके बीच लड़ाई चलैत रहैत छैक, आदिवासी समाजक दू समहू, नगा आर कुकीके बीच युद्ध चलैत रहैत छैक, मारिकाट होइत रहैत छैक, सड़क जाम भ जाइत छैक, पेट्रोल 200 रुपया केर एक लीटर भ गेलैक, आदि-आदि। मुदा एहि राज्यके ऐतिहासिक , सांस्कृतिक, शैक्षणिक गौरव दिस ककर ध्यान जाइत अछि? हमरा लोकनि बिसरि जाइत छी जे यूनान आ चीनके मध्य मणिपुर सिल्करूटसँ जुडैत अछि। समस्त पूर्वोत्तर भारतमे मात्र दू राज्य अछि जतयसँ सिल्करूट जाइत छैक, जाहिमे एकटा राज्य मणिपुर सेहो अछि। ईराज्य 32 आदिवासी जे मूलतः नगा आ कुकी ग्रुपमे बॉटल अछि केर अतिरिक्त मैती समाजक गढ़ अछि। अतै केर तीन हिस्सा धरती पहाड़ आ एक हिस्सा मैदान छैक। अतै केर लोक अति प्राचीन समयसँ युद्धकला, संगीतकला, घुड़सवारी, मल्लयुद्ध, मार्शलआर्ट, नृत्य, नाटक, गायन, चित्रांकन आदिमे प्रबुद्ध रहल छथि। कहब त दंतककथा लागत मुदा ई शुद्ध ऐतिहासिक तथ्य छैक जे इसामसीहके जन्मसँ 33 वर्ष पूर्व मणिपुरके लिखीत इतिहास केर दस्तावेज उपलब्ध छैक। कहबाक तात्पर्य ई की जखन भारतके बहुत तथाकथित विकसित प्रान्त सबमे कुनो लिखित इतिहासके प्रथा नहि छल मणिपुरमे लिखित आ क्रमबद्ध लिखित इतिहास केर परंपरा रहल अछि। अतै बहुत राजा, राजकीय व्यवस्था, वंशावली आदि भेटत जे अहाँके मानय लेल बाध्य करत जे मणिपुर कुनो सामान्य राज्य नहि अछि। छोट छैक त की भेल, बहुत गौरवपूर्ण इतिहास आ परंपराके समेटने अछि। चलु बात करैत छी मणिपुर केर महाराजा ग़रीबनबाज़ केर सम्बन्धमे। ग़रीबनबाज़ के बात करैत छी त एक बात आरो स्मरण आबि गेल। एक संगोष्टीमे हम मणिपुर केर राजधानी इम्फालमे भाषण दैत रही। हमरा संगे पद्म श्री आर. के. जिलाजित सिंह बैसल छला। बिलकुल मैथिल पंडित जकाँ धोती कुर्ता पहिरने, कपारमे गोल ठोप लगेने, कान्हपर गमछा धारण केने। जखन हमर भाषण समाप्त भेल त ओ कहलनि: "अहाँ विद्यापति केर भूमिसँ छी। अहाँसँ नीक बात सुनबाक आकांक्षा छल। अहाँ आकांक्षाके पूरा केलौं। मणिपुर केर सेहो मिथिला जकाँ बौद्धिक, सांस्कृतिक गौरवपूर्ण इतिहास छैक। एकर सामरिक इतिहास, युद्धकौशल केर इतिहास बहुतों प्रदेशसँ उत्तम छैक। अतै एक राजा छला जिनका हमरा लोकनि ग़रीब नबाज़के नामसँ जनैत छी। अगर अहाँ संगे बैसब त निश्चिन्तसँ हुनकर सम्बन्धमे चर्चा करब।" अहि तरहेँ पद्मश्री जिलाजित सिंह हमरा मोनमे ई अद्भुत इतिहास जनबाक इच्छा जागृत क देलनि। बादमे कतेक दिन हुनकासँ आ आनो लोक सबसँ ग़रीब नबाज़पर चर्चा भेल। ई बात 2006 ईस्वीके अछि। सुनल इतिहासके जे बात सब स्मरण अछि तकरा आई यथावत लिखबाक प्रयास क रहल छी। हमर लेखनी संगे यात्रा करु बहुत आनंदित हैब। नव बात सुनब। भारतक संस्कृति केर एक क्षेत्र केर महानता सुनि समग्रतामे भारतपर गर्वक अनुभूति हैत। त इतिहासक एक कथा प्रारम्भ करैत छी।ग़रीब नबाज़ मणिपुरमे 1709 सँ 1748 ईस्वी धरि अर्थात क़रीब 4 दशक धरि राज केलनि। हिनकर पिताक नाम छलनि महाराजा चेराई सोंगबा। ग़रीबनबाज़ मणिपुरी नाम कुनो दृष्टिकोणसँ नहि बुझना जाइत अछि। लोक सब कहलक जे मणिपुरी सब हिनका पंहिबा कहैत छलनि। यद्यपि ई समस्त ग़रीब नबाज़के रूपमे ख्याति पौने छथि। ई पूर्णतः मुसलमानी नाम छैक जे कदाचित असममे मुस्लमानके आबि जेबाक कारणे मणिपुरमे एहि तरहक शब्द अपन वैशिष्यके कारण प्रचलनमे आबि गेल होइक। अहि बातपर सेहो इतिहास आ मानवशास्त्र केर विद्वान शोध क सकैत छथि। हालाँकि किछु विद्वानके मानव छनि जे सांस्कृतिक विस्तारवादके कारण भारतक लोक शायद हिनका ई नाम देलथिन जाहिसँ मणिपुरके सेहो भारतीय पुरातन आ समग्र परंपराके हिस्सा बुझल जा सकै। भइयो सकैत अछि जे मुग़ल अपन विस्तारवादी नीतिके कारण किछु एहेन केने हो। भ किछु सकैत अछि। पियाऊज केर छिलकाके परत त उखारब तखने पता चलत जे यथार्थ आखिर की छैक? खैर! अंगरेज सबके मानब छनि जे ग़रीब नबाज़ आदिवासी समाजसँ छला। लेकिन मणिपुरकेर अधिकांश लोक आ जिलाजित सिंहके मानव छनि जे गरीब नबाज़ ओतै केर राजाक पुत्र छला। से कोना? एहेन मान्यता छैक जे ई अर्थात ग़रीब नबाज़ राजा केर दोसर पत्नीके पुत्र छला। रानी हिनका जन्मिते एक आदिवासी परिवारमे गुप्त रूपसँ पठा देलथिन। ओतए हिनकर लालन पालन होमय लगलनि। ई बहुत तेज आ बलशाली नेनेसँ छला। कहल जाइत अछि जे जंगल केर बाघ, शेर आ तमाम हिंसक जानवर हिनका संगे खेल खेलैत छल। ई निर्भीक भावसँ सब संगे रहैत छला। तीरधनुष आ अन्य जंगली युद्धविद्यामे माहिर भ गेल रहथि। मुदा हिनक पिताके एहि सम्बन्धमे कोनो जानकारी नहि छलनि। महाराजा चेराई सोंगबाके पहिल रानीसँ कोनो संतान नहि छलनि। बल्कि हुनका हिसाबे कोनो रानीसँ हुनका पुत्र नहि छलनि। बूढ़ होब लागल छला। चिंतित छला जे हुनकर बाद राज सिंहासनपर के बैसतनि। एक दिन किछु सोचैत अपन सब रानीके बजेलनि आ कहलथिन: “देखु, हम आब बूढ़ भेल जा रहल छी। संतान होबाक उम्र समाप्त भ गेल। चिंता एहि बातक अछि जे हमरा बाद एहि राजगद्दीपर के बैसत। अगर अहाँ सबमे किनको पुत्र अछि जे हमरा ज्ञात नहि हो त हमरा सूचित करी अन्यथा हम अपन अधिकारी केर चुनाव आम जनतासँ कुनो पराक्रमी आ होनहार युवकके देखि करब।” महाराज चेराई सोंगबाके एहि बातपर सब रानी चुप रहली। मुदा कनि कालमे शांतिके भंग करैत दोसर महारानी बजली: “महाराज, हमरा माफ़ कैल जाओ। हमरा एक पुत्र भेल छल। ओहि समयमे हम नैहरमे रही। चूँकि परंपराके हिसाबे पहिल रानीके पुत्र राजगद्दीके सम्हारैत छैक से सोचि हम अपन पुत्रके एक आदिवासी लग गुप्त रूपेँ भेज देल। ओ ओतहि रहि रहल छथि। बली छथि। पराक्रमी छथि। शारीरिक सौष्ठवमे विलक्षण छथि। राजपुत्र छथि। चूँकि आब एहि वंशके वारिश चाही त हमरा हिसाबे आ यदि सब रानी आ अपनेक अनुमति हो त हम हुनका बजा दैत छी। ओ अहाँक प्राकृतिक उत्तराधिकारी छथि।” राजाक सँग सब रानी दोसर रानी केर एहि हर्षमय रहस्योद्घाटनसँ गदगद भ गेली। तुरंत आदमी भेजि ओहि पुत्रके राजमहलमे बजैल गेल। वैह युवक छला ग़रीब नबाज़। ग़रीब नबाज़ राजाके रूपमे समदर्शी छला। प्रजा पालक छला। आदिवासी आ मैतीके बीच नीक आ सहिष्णु छला। सर्वप्रिय छला।पहिने मणिपुरमे चंनामाई संस्कृति छलैक मुदा धीरे धीरे वैष्णव संस्कृतिके प्रचार होमय लगलैक। ओ सांस्कृतिक, धार्मिक एकतामे विस्वास राखैत छला। आर त आर पडोसी वर्माके राजा के सेहो जित लेलनि आ वर्मा (आजुक म्यंमार) मे अपन सुधारक कार्यक्रम चलौलनि। मणिपुरके सीमा विस्तार करैत रहला। एक दिस वर्मा त दोसर दिस असम धरि आबि गेला। ई बहुत मजबूत आ कुशल प्रशासक छला। एतबे नहि, महाराज ग़रीब नबाज़ बहुत तरहक चीज़ आ यंत्रके विकास केलनि। पहिल बेर टाइम मशीन केर निर्माण हिनका समयमे भेल। ई मशीन पानि आ किछु फेनेल केर एहेन युग्मसँ बनल छलैक जे सटीक टाइम देबामे सक्षम छलैक। ग़रीब नबाज़ केर दोसर खोज अथवा विकास छलनि अरामबाई। ई अरामबाई की भेल? ई बहुत खतरनाक आ प्रलयंकारी अस्त्र थिक। एकरा महाराजा ग़रीब नबाज़ बिना ककरो मदतिके अपने हाथे निर्माण केला। ओहि समय केर ई सबसँ खतरनाक अस्त्र छल। घोड़सवार एकरा अपना डाँर लग बहुत सावधानीसँ रक्षाकवचके रूपमे राखैत छल। हुनका समयमे मणिपुरके सैनिक आ योद्धा घोड़सवारी, घोडाके नियंत्रण, अश्वयुद्ध केर सञ्चालन, भाँति भाँतिके घोडाके पालन आ ओकर प्रशिक्षणमे माहिर छल। बतबैत चली जे पोलो खेलके जन्मदाता मणिपुर रहल अछि। पोलोके कतेक धुरंधर एहि धरापर भेल छथि। एखनो इम्फाल शहर केर पोलो ग्राउंड जेना अपन गौरवमय इतिहास केर गाथा गबैत हो। घोडापर चढ़ल घोड़सवार सैनिक रणकौशलमे अतेक माहिर छल जे घोडाके एकदिशामे अर्थात पांज लग आबि दौड़ैत अवस्थामे सेहो घोडापर चढ़ल एक हाथे घोडाके लगाम आ दोसर हाथे तीर धनुष अथवा आरो कुनो दुर्दांतक अस्त्रसँ दुश्मनके ध्वस्त क सकैत छल। ओ आगासँ, पाछासँ, कातसँ आ घोड़ाक पांजर लगसँ कतौसँ अपन सस्त्र चला सकैत छल। शत्रुके स्वाहा क सकैत छल। सबसँ प्रमुख बात ई जे राजा ग़रीब नबाज़ सब बात अपन नेतृत्वमे करैत छला। अरामबाई बहुत प्रलयंकारी आ कुनो सैनिक हेतु अमोघ अस्त्र छल। आर त आर अंग्रेज सब सेहो एहि अस्त्रसँ प्रभावित छल। आ एकरा सम्बन्धमे बहुत रास बात अपन डायरीमे लिखने छथि। कारण ओहि समयमे अंग्रेज लग अहि तरहक कुनो अस्त्र नहि छलैक। आई काल्हि अरामबाईके भारतीय राष्ट्रीय खेलमे शामिल क लेल गेल छैक। अहि तरहेँ महाराजा ग़रीब नबाज़ एक सर्वगुण संपन्न राजा छला। एक सफल राजा, सफल योद्धा, सफल सेनापति, अग्रचेति, दूरद्रष्टा, सफल प्रजापालक। मणिपुर केर सीमाके वर्माके ऊपरी भागसँ असमके सीमावर्ती क्षेत्र धरि विस्तार केलनि। मणिपुर केर लोक, ओतै केर वस्त्र विन्यास, महिला द्वारे वस्त्र बुनबाक परंपरा, ओतय केर नृत्य, प्राकृतिक छटा, खानपान, आ स्वर्णिम इतिहास अहाँके अपना दिस आकर्षित करत। कनि हमर बात मानि थोरेक दिन भ आउ ने मणिपुरसँ! दीर्घ कथा- परिस्‍थिति लेखिका राघव परेशान छला। सरिपहुँ दिल्‍लीसँ शोधक प्रक्रियामे दरिभंगा जेबाक छेलैन। दरिभंगा गेला। ओतए प्रोफेसर सुधाकर ठाकुरजीक निवासपर पहुँचला। सुधाकर पचास वर्षीय श्रोतीय ब्राह्मण छैथ, कारी भुजंग। डेढ़ आँखि। कुनो अफ्रिकन जकाँ बड़का बरी सन बिदरल ठोर। कँचियाएल नयन। तइमे बिना ढंगसँ धोल आ बिना आयरन कएल अंगा, अंगाक बाँहिक एक बटम टुटल। एक हाथमे अंगाकेँ मोड़ने आ दोसरमे बटम लगेने। पएरमे कोयला-मजदूर जकाँ गन्‍दगी सटल आ दुनू ऍंड़ीमे छँहोछित बेमाए फाटल। ऊपरसँ एकटा प्‍लाष्‍टिकबला चप्‍पल पहीरने। मुँहमे पान ठुसने। पानक दाग समस्‍त वस्‍त्रपर चकचकाइत...। राघवकेँ भेलैन, हे भगवान! कोन मनुख-लग आबि गेलौं!! मुदा करितैथ की। लचार छला राघव। आधा मनसँ राघव प्रोफेसर सुधाकरकेँ चरण-स्‍पर्श केलैन। सुधाकर बहुत प्रसन्नतासँ राघवकेँ आवभगत केलखिन। प्रोफेसर सुधाकरकेँ दरिभंगामे भव्‍य तीन मन्‍जिला मकान छैन। पैघ क्षेत्रमे बनल। मकानक आगूसँ पक्की-सड़क आ पाछूसँ पोखैर घेरल। प्रांगणमे प्रचुर खाली धरती, जइमे आम, जामुन आ लीचीक गाछ चतरल। घरक काते-कात गेना, गुलाब, अड़हुल इत्‍यादि फूलक अतिरिक्‍त तुलसी, पुदिना लागल। परिसरक मध्‍यमे झबड़ल नीमक गाछ जे छाहैरसँ परिपूर्ण छल। निच्‍चासँ दू मन्‍जिल मकानकेँ प्रोफेसर सुधाकर कुनो आवासीय विद्यालयक छात्रावासक हेतु दऽ देने छेलखिन। तेसर मन्‍जिलमे स्‍वयं पत्नी-नन्‍दिता, पुत्र- अमरेश आ विमल संग रहै छला। पत्नी छेलखिन पैंतीस बर्खक। जेठ पुत्र सोलह बर्खक आ छोट तेहर बर्खक। घरमे प्रवेश करैत राघवकेँ एना बुझेलैन जे नर्कमे आबि गेलौं। घर सभ धुरा-गर्दासँ भरल। बाथरूम गन्‍हाइत। भीजल कपड़ा सभ तीन-चारि दिनसँ जेना पड़ल हो। बाथरूमक बाहर चारि-पाँचटा आँठि थारी पड़ल। थारीमे भात,तीमन आदि आँठि गन्‍हाइत, माछी भिनकैत..! राघव एकटा कुर्सीमे बैसला। कनी कालमे प्रोफेसर सुधाकर जीक दुनू बालक आबि राघवकेँ पएर छूबि प्रणाम केलकैन। जेठ बालकक मुँह-कान कुनो रूपे एक सभ्‍य प्रोफेसर केर संतति नहि लगै छल। जेठ पुत्रक खिखिर जकाँ मुँह, ढाबूस बेंग सन पीअर-पीअर-छोट-छोट दाँत। शरीरक कांति हदसँ बेसी कमजोर। जेना यक्ष्‍मा रोगसँ ग्रसित होथि। फाटल हाफ पेन्‍ट आ नव अंगा पहीरने। गरदेन आ कनपट्टीपर मैल जमल। अपरोजकक नेता। छोट बालक मोट, मुदा मुँह-कान शोभनगर नहि। रीक्ष जकाँ झोंट। बुझाइत एना जेना कहियो कंगही आ तेलक भेँट नहि भेल होइ। दुनू भाँइमे एक अन्‍तर अबस्‍स बुझना गेलैन राघवकेँ- जेठ कनी सोझ, निश्छल तँ छोट कनी कईयाँ आ मतलबी। एकटा पनरह बर्खक बच्‍चिया सुधाकरजी ओतए घरक-काज करै छलि, जेकर छीनकाय काया। आँखिमे काँची पड़ल। नाकपर सुखाएल पोटाक मोट मुल्‍लमा मोती जकाँ लागल। आँगुरक नह-सभमे कारी-कारी मैल भरल। ओकर नाओं छिऐ बेबी। प्रोफेसर सुधाकर बेबीकेँ कहलखिन- “बेबी, कनी राघवजीकेँ एक गिलास सुसुम पानि पीआ। फेर नेबोबला चाह बना। वेचारे थाकल छैथ। जाबेत चाह पीता, स्‍नान-ध्‍यान करताह, ओतबा कालमे भोजनक व्‍यवस्‍था कर।” प्रोफेसर सुधाकर अपन छोट पुत्रकेँ कहलखिन- “बाऊ, कनी हम्‍मर पर्ससँ बीस टाका लऽ चौकपर सँ थोरेक खीरा, चुकुन्‍दर, मुरई, धनी पात आ हरिअर मिरचाइ लऽ आउ। नेबो घरेमे अछि।” थोरबे कालमे बेबी एक गिलास सुसुम पानि लेने राघव लग आबि गेलैन। राघव तँ गन्‍दगीसँ परेशान छला, मुदा हारि मानि नाक आ आँखि मुनि पानि पीब गेला। प्रोफेसर सुधाकर केर बाथरूम भारतीय रेलक जेनरल बोगीक बाथरूमसँ कुनो दृष्‍टिकोणे नीक नहि छेलैन। मुदा ‘मरता क्‍या नहीं करता’केँ स्‍मरण करैत राघव बिना कुनो प्रश्‍न केने बाथरूम दिस विदा भेला। स्‍नान एवं अन्‍य नित्‍य-क्रियाकेँ सम्‍पादित करबाक लेल यद्यपि राघव साबुन, सेम्‍पू, पेस्‍ट, अंगपोछा इत्‍यादि अपना अटैचीसँ निकालि ओतएसँ निकालला। स्‍नानादिसँ निवृत भऽ राघव बाहर एला तँ देखै छैथ जे प्रोफेसर सुधाकर केकरोसँ बात फोनपर कऽ रहल छैथ। कनी-कालक पछाइत बातकेँ विराम दैत सुधाकर कहलखिन- “राघवजी, अहाँक पत्नी सहजन्‍यासँ बात भऽ रहल छल। ओ कहै छेली जे राघव, बाहरक भोजन नहि पसिन करै छैथ आ कनी लजकोटर सेहो छैथ। भूखो लगल रहतैन तँ बजता नहि। तँए अपने हुनकर भोजनक बेवस्‍था शीर्घातिशीघ्र कऽ दियौन।” एतेक बात कहैत प्रोफेसर सुधाकर बेबीकेँ कहलखिन- “बेबी छेँ। राघवजी भूखल-पीआसल छैथ। एखनहि हिनक पत्नी- सहजन्‍यासँ फोनपर बात भेल छल। जल्‍दी-जल्‍दी भोजन तैयार कर।” ई कहैत प्रोफेसर सुधाकर अपन छोट पुत्रकेँ बजेलखिन- “विमलजी! जल्‍दी आउ आ सलादक सामग्री लेने आउ। कीचनक दछिनवरिया कोणमे तेजहा चक्कु अछि सेहो लेने आएब। जाबेत धरि बेबी भोजन तैयार करैत अछि ताबेत धरि हमरा लोकैन सलाद तैयार कऽ लैत छी।” विमल अपन पिताक आज्ञाकेँ पालन करैत सलादक सामग्रीकेँ एकटा सूपमे लऽ संगे चक्कू, थारी आदि सेहो लऽ अपन पिता लग आबि गेला। प्रोफेसर सुधाकर सलाद काटए लगला। ओना सलादक सामग्री नीकसँ धोल नहि छेलैन। राघवकेँ मने-मन अपन सहचरी सहजन्‍यापर धोर तामस उठए लगलैन। सोचलैन- “बेकारे ऐ प्रोफेसर सुधाकरकेँ ई किएक कहि देलखिन जे राघव घरक भोजन करता? कनी-मनी खा लितौं आ बादमे चुपचाप टावर केर कुनो भोजनालयमे भोजन कऽ अपन जीवन-रक्षा करितौं। मुदा सहजन्‍या तँ सभटा चौपट्ट कऽ देली! हे भगवान, आब की हएत? चण्‍डाल सोइत प्रोफेसर भाय अपना घरक अपवित्र आ गन्हाएल भोजनसँ हमर जान लऽ लेत! दुख- हरहु हारकानाथ शरण मैं तोरी।” आ देखते-देखते भोजन तैयार भेल। सचार लगलै। संगे-संगे राघव आ प्रोफेसर सुधाकर भोजन करबाक लेल बैसला। सुधाकर अपन जेठ पुत्र- अमरेशकेँ कहलखिन- “बाऊ, जल्‍दीसँ तीन-चारि तरहक अँचार लाऊ। राघवजी छब्बीस घण्‍टासँ भूखल छैथ।” खैर! राघव नहियोँ चाहैत भोजन केला। ओना, भोजन ओतबो अधला नहि जेहेन राघव सोचने रहैथ। हँ, सुचिताक अभाव अबस्‍स रहइ। तरकारी सभमे नोन कनी अधिक जरूर रहइ। भोजन केला पछाइत राघव प्रोफेसर सुधाकरकेँ संगे एक पैघ कमरामे गेला। कमरामे ओछाइन इत्‍यादि राखल रहइ। दुनू गोरे बैसला। थोड़बे कालमे एक महिला नीक वस्‍त्र पहीरने, खुजल केसक संग ओतए पहुँचली। सुधाकर उठि एक कुर्सीपर ओहि महिलाकेँ इशारासँ बैसबाक निवेदन केलखिन। महिला प्रोफेसर साहैबकेँ इशारासँ सम्‍मान करैत एक कुर्सीपर जा सहज भावसँ बैस गेली। आब सुधाकर राघव दिस मुखाकृत होइत बजला- “राघवजी, ई छैथ नन्‍दिता। हमर पत्नी। साहित्‍यमे अभिरूचि छैन। कविता, गल्‍प्‍, उपन्‍यास आदि लिखबो करै छैथ। समाजशास्‍त्रसँ एम.ए. छैथ। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयसँ समाजशास्‍त्र विभागसँ ‘नारी मनोदशा’ केर ऊपर पी.एच-डी कऽ रहली अछि। थेसिस लगभग तैयार छैन। सभ चीज ठीक रहलैन तँ दू मासक भीतर जमा भऽ जेतैन...।” महिला मुस्‍कियाइत रहली। नन्‍दिता आ राघव लगभग उमेरमे समवयस्‍की, मुदा राघव प्रोफेसर सुधाकरकेँ गुरु तुल्‍य मानैत सदिकाल हुनकर चरण-स्‍पर्श करैबला, तँए मर्यादाक पालन करैत नहियोँ चाहैत राघव उठि कऽ नन्‍दिताक पएर छूबि प्रणाम केलकैन। नन्‍दितो अदहे मनसँ अभिवादन-स्‍वीकार करैत राघवकेँ पीठ थपथपा असिरवाद दऽ अपन गुरु-पत्नी बनबाक भारसँ उरीन भेली। मुदा नन्‍दिता देखए-सुनएमे अद्भुत सुन्नैर। छरहर देह। कारी केस जे ठेहुनकेँ छुबैत...। नन्‍दिता सफेद रंगक साड़ीमे छेली। जइमे किछु डिजाइन बनल छेलैन। कम्‍प्‍युटराइज्‍ड पेर्टन, जे साड़ीकेँ आकर्षक आओर नन्‍दिताक सौन्‍दर्यकेँ बढ़ा रहल छेलैन। नन्‍दिताकेँ देख ई लगै छल जेना नन्‍दिता सोभाव आ संस्‍कारसँ आधुनिकी छैथ। कलरलेस लीपिस्‍टिक लगेने, आँखिमे सहनाज हूसेनक काजर, आ केस कुनो महग सेम्‍पूसँ धोने। केसक चमक ऐ बातक प्रमाण छेलैन। अधकटी बेलौजसँ नन्‍दिताक काँख देखाइत रहैन आ ओकरा अकारणे नहि झाँपए चाहैथ। राघवक धियान ओइ दिस चलिये गेलैन। समुन्नत वक्षकेँ तुरत बाद काँखक हस्‍यावलोकन कनी मनकेँ झंकृत करए बला लगलैन। नन्‍दिता कुनो युक्षिणीक मूर्तिसँ कम नहि छेली। कियो नइ कहि सकै छल जे पैंतीस बर्खक भऽ गेल छैथ आ दू गोट पुत्रक माता थीकीह। अपाद्मस्‍तक सुन्‍दरताक खान बुझाइत नन्‍दिता। बादमे प्रोफेसर सुधाकर नन्‍दिताकेँ राघवक परिचय दैत कहलखिन- “राघवजी, संस्‍कृत आ कलाक बहुत नीक विद्वान छैथ। संस्‍कृतक संग-संग हिन्‍दी, मैथिली आ अंग्रेजी साहित्‍यपर समान अधिकार छैन। समाजशास्‍त्र,नृतत्त्वशास्‍त्र, कला-इतिहास, संग्रहालय विज्ञान, पुरातत्व आ सौन्‍दर्यशास्‍त्रमे गहन अभिरूचि रखै छैथ राघवजी। बहुत नीक लिखैत छैथ आ बहुत नीक बजैत छैथ। UNESCO-UNDP आदि संस्‍थाक हेतु भारतीय संस्‍कृति केर अनेको विषयपर लिखै छैथ, डक्‍युमेन्‍टरी फिल्‍म बनबैत छैथ। कविता, गल्‍प आदि सेहो लिखैत छैथ। मैथिली संस्‍कृतिपर कार्य करबाक हेतु मिथिला आएल छैथ। UNESCO-UNDP परियोजना लेल भारत सरकारक सहयोगसँ काज कऽ रहला अछि। एतए बीस-पचीस दिन रहता। दिनमे मिथिलाक अनेक गाम जेना- सौराठ, सरिसब पाही, सतलखा, अन्‍धराठाढ़ी, पुनौराधाम आदिक भ्रमण करता आ अधिकांश दिनमे रातिक दरिभंगा अपने सभ लग रहए चलि औता। किछु-किछु गाममे हमहूँ हिनका संगे जाएब। बहुत किछु सीखबाक अछि राघवजी सँ आ भारतीय लोक संस्‍कृतिसँ।” नन्‍दिता राघव केर प्रशंसासँ बड्ड प्रभावित भेली। राघव दिस आनन्‍दक भावसँ देखलखिन। बजलैथ- “तखन तँ हमहूँ जखन-कखनो राघव उपलब्‍ध रहता तँ अपन साहित्‍य आ साहित्‍य-लेखन केर विधापर विस्‍तृत चर्चा हिनकासँ कऽ सकै छी?” आब राघव बजला- “किएक नहि मैडम! हम अहाँक साहित्‍य पढ़ि आ ओइपर चर्च कय अपना-आपकेँ धन्‍य बुझब! अहाँसँ बहुत किछु सिखबाक अवसर भेटत। शैली, उपमा,अलंकारक प्रयोग आ बिम्‍बक विधानक जानकारी भेटत। हम तँ सौखिया लेखन करै छी साहित्‍यमे। संस्‍कृति आ मानव विज्ञानसँ समय नहि निकालि पबैत छी। ओना ईहो बता दी जे हमरा सम्‍बन्‍धमे श्रीमान कनी अधिक बता देलाह। हम तँ कला-संस्‍कृति आ मानव विज्ञानक अति-समान्‍य छात्र मात्र छी।” “अहाँसँ भेँट भेल तँ हम अपना आपकेँ उत्‍साहित बुझै छी।” –स्‍वत: बजली नन्‍दिता। ई कहैत नन्‍दिता उठि कऽ अपन शयन कक्षमे गेली आ एकटा चानीक प्‍लेटमे लौंग, इलायची, सुपारी, सौंफ, नारिकेल इत्‍यादि लऽ कऽ पुन: लगमे आबि, प्‍लेट राघव दिस बढ़ा देलखिन आ पुन: अपन कुर्सीपर बैस रहली। राघव प्‍लेटकेँ प्रोफेसर सुधाकर दिस बढ़बैत बजला- “श्रीमान, पहिने अपने लेल जाओ।” प्रोफेसर साहैब हाथक इशारासँ राघवकेँ सिनेहक आदेश दैत पहिने लेबाक निर्देश देलखिन। सिनेहादेशक सम्‍मान करैत राघव प्‍लेटसँ दछिनी आ कनी सौंफ लऽ लेलैन। थोड़े कालक बाद नन्‍दिता पुन: अपना कक्ष दिस गेली। दस मिनट लगेलैन आ आपस हाथमे पान बनेबाक तमाम सामग्री लय अनलैथ। अपन कुर्सीपर आसन ग्रहण करैत पान लगबए लगली, निपुणताक संग। राघवकेँ पुछलखिन- “केहेन पान खाएब राघवजी? कुन जर्दा एवं अन्‍य चीज? कुट्टीबला सुपारी की सरौतासँ छल्‍ला बनल?” राघवकेँ नन्‍दिताक आवभगतक स्‍टाइल नीक लगलैन, बजला- “मैडम, हमरा क्षमा करू। हम कुनो तरहक पान नहि खाइ छी। श्रीमानकेँ दियौन आ स्‍वयं खाउ पान।” नन्‍दिता आब एक खिली पान लगा प्रो. सुधाकरकेँ दऽ देलखिन आ दोसर खिली स्‍वयं लऽ लेली। पानक डालीसँ प्रो. सुधाकर अपना हाथे कारी-पीअर रंगक जर्दा अपने इच्‍छे लऽ लेलैन। नन्‍दिता सेहो एकटा छोट खिल्‍ली अपना लेल बनेली आ बिना कथ के सुपारी एक नान्‍हिटा टुकड़ी दाँत तरमे ग्रहण केली। थोड़बे कालक पछाइत नन्‍दिता प्रो. सुधाकरकेँ कहलखिन- “बुझलौं की एगो बात?” प्रो. सुधाकर- “की? कहू ने?” नन्‍दिता- “ई पानक खिल्‍ली हमर जिनगीक अन्‍तिम, पानक खिल्‍ली थीक। आब हमहूँ पान नहि लेब। अगर राघवजी बिना पान खेने रहि सकै छैथ तँ हम किएक नहि?” ऐ बातपर राघव विनम्रता पूर्वक बजला- “नहि नहि। ऐमे कुनो महानताबला बात नहि छै, मैडम। ई तँ अपन पसिन आ ना पसिनपर निर्भर करै छै। हमरा पान नहि नीक लगैत अछि तँए नइ खाइ छी।” बिच्‍चेमे प्रो. साहैब बाजि उठला- “देखू नन्‍दिता! अगर अहाँ पानक तियाग करए चाहै छी तँ अबस्‍स करू। ई उत्तम निर्णय हएत। एहनो भऽ सकैत अछि जे किछु दिनक बाद हमहूँ पान तियागि दी।” आब राघव गद्-गद् भऽ गेला। गदगदाइत बजला- “श्रीमान आ मैडम, ओना अगर अहाँ लोकैन पान छोड़ि दी तँ नीक बात। सुपारी, जर्दा इत्‍यादिक कारणे पान आजुक युगमे माहुर बनि चुकल अछि। डाक्‍टर तँ एतेक तक कहै छैथ जे Oral Cancer केर प्रमुख कारणमे एक कारण पानो खाएब छी।” राघवक कथनकेँ स्‍वीकृति प्रोफेसर सुधाकर आ नन्‍दिता अपन-अपन गरदेन हिला देलखिन। राघवकेँ नीक लगलैन। एकाएक नन्‍दिता राघव दिस देखैत बजली- “राघवजी, एक बातक निवेदन करी?” राघव- “निवेदन की मैडम, आज्ञा करू?” नन्‍दिता- “कुनो आज्ञा नहि। सिर्फ छोट-छीन निवेदन।” राघव- “कहू ने मैडम।” नन्‍दिता- “हमरा अहाँ मेडम नहि कहू। कुनो आरो नामसँ सम्‍बोधित करू। नन्‍दिता कहि सकै छी।” राघव- “नाम लऽ कऽ केना बजाउ? अहाँ गुरुपत्नी छी।” प्रोफेसर सुधाकर निराकरण करैत बजला- “सुनू ने राघवजी। अहाँ तँ हमर छोट भाए जकाँ छी। तइ दृष्‍टिकोणसँ नन्‍दिता अहाँक भाउज भेली। अगर अहाँ चाही तँ हिनका नन्‍दिता भाभीक नामसँ सम्‍बोधित कऽ सकैत छिऐन। नन्‍दितोकेँ हमरा जनैत ई सम्‍बोधन नीक लगतैन।” नन्‍दिता- “हँ हँ। बिल्‍कुल ठीक शब्‍दक चयन भऽ गेल। राघवजी, आब अहाँ हमरा नन्‍दिता भाभी कहि सम्‍बोधित करू। हमरा बड्ड नीक लागत। मैडमकेँ भारसँ हम दबल जा रहल छी।” मन्‍द-मन्‍द मुस्‍कीसँ मुस्‍कियाइत राधव अपन सहमति देलखिन- “ठीक छै। नन्‍दिता भाभी अहाँ लोकैनकेँ जेहेन आज्ञा हुअए हमरा स्‍वीकार्य अछि।” हलाँकी ऐ शब्‍दाबलीसँ राघव सेहो मने-मन पुलकित छला। हुनका आब लागए लगलैन जे आब कनी नन्‍दिताक साहित्‍य बिना कुनो विशेष मर्यादाक बन्‍धनसँ उवैड़ जाएब। शायद ई एक नव रस्‍ता प्रशस्‍त कऽ रहल छल। नन्‍दिताक चेहरा सेहो चमैक रहल छेलैन। हलाँकी प्रोफेसर सुधाकर कहि नहि किए, कनी परेशान भऽ रहल छला। आब प्रोफेसर सुधाकर कहलखिन- “राघवजी अहाँ थाकल छी। पहिने कनी आराम कएल जाउ। साँझमे छह बजे धरि हमरा लोकैन बैसब आ आगाँ केना कार्य करबाक अछि। कुन गाम कहिया जेबाक अछि, किनकासँ भेँट करबाक अछि आदि विषयपर विस्‍तारसँ चर्चा कऽ सर्वेक्षण केर ब्‍लू प्रिण्‍ट तैयार कऽ लेब।” राघवजी सूति रहला...। साँझमे साढ़े तीन बजे राघव जागि गेला। कनी कालमे प्रो. सुधाकर केर छोट बालक विमलेश एलखिन। विमलेश राघवकेँ पुछलखिन- “ककाजी, जल लबैत छी?” राघव गरदेन हिला स्‍वीकृति दऽ देलखिन। विमलेश पानि अनला। राघव पानि पीब लेला। पानि पीबते मन हर्षित भेलैन। विमलेशसँ स्‍कूलक पढ़ाइ आदिपर विचार करए लगला। विमलेश एक-नम्‍बर-के गपोड़ी, बात करैमे माहिर, बूढ़ जकाँ सभ बातकेँ रचिया-रचिया सुनबए लगलैन। राघवोकेँ कुनो खराप नहियेँ लागि रहल छेलैन। पनरह मिनटक बाद अमरेश सेहो ट्यूशन पढ़ि कऽ आपस आबि गेला। विमलेश आ अमरेश अपन-अपन कथा सुना कऽ राघवकेँ समय बिता रहल छेलखिन। कनी कालक बाद प्रोफेसर सुधाकर आँखिकेँ हाथसँ पोछैत धड़फड़ाएल पहुँचला। कहलखिन- “राघवजी, उठि गेलौं? नीकसँ नीन भेल किने?” राघव- “हँ श्रीमान, खूब सुतलौं। तमाम थकाबट दूर भऽ गेल। आब तरोताजा भऽ गेल छी। अपनेक बालक सभ बड्ड नीक छैथ। बीस-पच्‍चीस मिनटसँ हिनका लोकैनसँ वार्तालाप कऽ रहल छी। नीक लागि रहल अछि।” आब चाह आबि गेल छेलैन। चाहक संगे-संग नन्‍दिता सेहो आबि गेली। कहि नइ किएक नन्‍दिताकेँ देखते-मातर राघवमे आश्‍चर्यजनक स्‍फूर्ति अबि गेलैन। सभ कियो चाह पीलाह। राघव प्रोफेसर सुधाकरजीक संगे Fieldwork केर Blie Print तैयार करए लगला। बीच-बीचमे नन्‍दिता दिस धियान चलि जाइन। ब्‍लू प्रिंट तैयार भऽ गेलैन। निर्णए लेलैन जे ऐगला दिन सात बजे भोरमे सौराठ गाम लेल प्रस्‍थान करता। आब राघवआ प्रो. सुधाकर बजार हेतु विदा भेला। दरिभंगामे सुधाकर राघवकेँ किछु प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार, इतिहासकार, संगीतकार आदि लग लऽ गेलखिन। राघवकेँ नीक लागि रहल छेलैन। जानकारी प्राप्‍त भऽ रहल छेलैन। साँझमे आबै काल जीबैत रेहु माछ कीनलाह। पैसा राघव देलखिन। माछक पाकमे नन्‍दिता सेहो संलग्‍न भेली। प्रो. सुधाकर सेहो लागल छला। माछक मसाला पीसबाक कार्य सेविका-बेबी कऽ रहलि छलि। राघव सेहो ओतै ठाढ़ भऽ गेला। पूरा पीकनिकक माहौल बनि गेल छेलइ। विमलेश चुपेचाप राघवकेँ कानमे कहलखिन- “जनै छिऐ काकाजी, आइ मॉं पहिल बेर कीचेनमे घुसली अछि। पापा आ माँ दुनू गोरे पाक विद्यामे केतेक नीक लागि रहल छैथ।” राघव केवल एक मिसिया हँसि कऽ बातकेँ ओतै समाप्‍त कऽ देला। भोजन तैयार भेलइ। सभ गोरे संगे भोजन करै गेला। रातिमे भोजनमे सुचिता आ सचारमे श्रृंगार बुझेलैन। भोजन करै काल प्रो. सुधाकर नन्‍दितासँ कहलखिन- “आमिल केतएसँ आएल छल?” नन्‍दिता आनन्‍दित स्‍वरमे बजली- “माँ भेजने छेली। पनरह दिन भऽ गेल। भेल जे राघवजीकेँ मिथिलामबला माछ बना कऽ खुएबैन। तँए ऐ माछमे पीऔज, लहसुन नहि देल अछि। टमाटरक बदला आमिल, पिऔज, लहसुनक बदला हींग, दही आ पुश्‍तादाना।” सुआद बिल्‍कुल अलग आ चहटगर। राघव भरि इच्‍छा भोजन केला। एहेन माछ खेबाक अवसर राघवकेँ जीवनमे पहिल बेर भेल रहैन। भोजन केला बाद राघव सूति रहला। दोसर दिन साढ़े छह बजे प्रात: नहा-धो कऽ राघव तैयार छला। राघव आ प्रो. सुधाकर चूरा-दही-चीनीक जलपान कए सौराठ लेल विदा भेला। सौराठक यात्रा सफल रहलैन। सौराठसँ साढ़े चारि बजे साँझमे दरिभंगाक लेल विदा भेला। दरिभंगा अबिते नन्‍दिता अपनेहाथे चाह बनेली। सभ कियो संगे चाह पीला। दोसर दिन सरिसब-पाही जेबाक छेलैन। प्रति-दिन भोरे सात बजेक यात्रा कुनो-ने-कुनो गाम लेल निश्चित रहैन। तेसर दिन प्रोफेसर सुधाकर केर एकाएक जानकारी प्राप्‍त भेलैन जे कॉपी-जाँच करबा लेल विश्वविद्यालय केर अन्‍य शैक्षणिक सहयोगी संगे हुनको बनारस हिन्‍दु विश्वविद्यालयमे पनरह दिन धरि सेन्‍ट्रलाइज्‍ड कॉपीक चेकिंगमे भाग लेबाक छैन। प्रो. सुधाकर किंकर्तव्‍यविमुढ छला। राघव सेहो परेशान छला। भेलैन, बिना प्रो. सुधाकरसँ काज केना हएत? मुदा अपन पनरह बर्खक अनुभवकेँ स्‍मरण केला पछाइत मनमे भेलैन- सभ किछु सम्‍भव छै। सोचलैन- आखिर हमहूँ तँ छी अही माटि-पानिक संतति। फेर चिन्‍ता कुन बातक? जे हेतै देखल जेतइ। हिम्‍मत देखबैत बजला- “श्रीमान् अपने अबस्‍स जाउ। हम्‍मर मार्ग प्रश्‍स्‍त भऽ गेल अछि। अहाँ सभटा दिशा-निर्देशन कऽ देने छी। हम कार्य कऽ लेब। हमरा जेबासँ चारि-पाँच दिन पहिने अपने आपस आबि जाएब। बँचल-खुचल डाटा दुनू गोरे मिल कऽ कऽ लेब।” प्रो. सुधाकर राघव केर ऐ तर्कसँ सहमत भेला आ बनारस जेबाक तैयारी करए लगलैन। ऐगला दिन भोरे सात बजे राघव कुनो गाम Fieldwork लेल गेला तँ एगारह बजे दिनमे प्रो. सुधाकर बनारस लेल दरिभंगा स्‍टेशनसँ रेल पकड़बाक लेल प्रस्‍थान केला। राघव साँझ छह बजे आपस एला। नन्‍दिता अपने हाथे चाह बनेली। एक लोटा आ एक गिलासमे जल अनलैन। राघव बिना कुनो प्रतिकारक भरि इच्‍छा जल पीला। फेर चाह पीबैले बैसला। नन्‍दिता चाह संगे भूजल चूरा तरल झींगा माछ लऽ अनलैन। थाकल राघवकेँ ई सत्‍कार गदगद कऽ देलकैन। बृहस्‍पैत दिन रहैक तँए नन्‍दिता पीअर साड़ी पहिरने छेली। ब्‍लौज सेहो पीअर मुदा ब्‍लौज केर गला बाहिं आ वक्ष लग कारी रहइ। पीअर आ कारीक मिलान रमनगर लगैत छेलैन। नन्‍दिता सोनाक एकटा बल्‍ला एक हाथमे आ दोसरमे घड़ी पहीरिने छेली। नन्‍दिताक हाथ-पैर आदि साफ छेलैन। नन्‍दिता आ प्रो. सुधाकर केर जोड़ी देखलापर ‘बानरक हाथमे नारिकेल’बला कहबी चरितार्थ होइ छल। चाह पीबै काल नन्‍दिता राघवसँ पुछलखिन- “राघवजी, अगर अहाँ लग समए हो तँ, आइ राति किछु काल अहाँसँ साहित्‍यक चर्चा कऽ सकै छी?” राघव बजला- “हँ-हँ नन्‍दिता भाभी, किएक नहि। हम सामान्‍यत: दिनेमे अपन लेखन कार्य सम्‍पन्न कऽ लैत छी। अपने परेशान जुनि हौउ। निश्चिन्‍तसँ कऽ सकै छी।” राघवक अश्वासनसँ नन्‍दिता बिहुँसि उठली। राघवो कुनो कम प्रफुल्‍लित नहि छला। चाह पीला पछाइत राघव पुन: किछु बाँचल कार्यकेँ सम्‍पादित कए स्‍नान केला। तेकर बाद प्रो. सुधाकर केर आवास लग एकटा सैलूनमे जा पूरा माथक मालिश, फेशियल इत्‍यादि करेलैन आ आपस आबि नन्‍दिता, अमरेश आ विमलेशक संग रात्रिक भोजन केला। रातुक भोजनमे नन्‍दिता अन्‍य भोज्‍य-पदार्थक अतिरिक्‍त काँच टमाटरकेँ आगिमे पका ओइमे पिऔज, लहसुन, आद, हरिअर मिरचाय आदि मिला चहटगर चटनी बनेने छेली। राघवकेँ चटनी बड्ड नीक लगलैन। भोजन करै काल विमलेश राघवकेँ कहलखिन- “चचाजी, टमाटरक चटनी केहेन लगल?” राघव जबाव देलखिन- “अपूर्व! मन होइए रोटी चटनीए संग खाइ। ऐ चटनीक आगू सभ व्‍यंजन बेकार।” राघवक ऐ जबावसँ नन्‍दिता प्रसन्न भेली आ गर्वान्‍वित स्‍वरूप निखैर उठली। राघवकेँ हुनकर स्‍वरूप बड्ड सोहनगर लगलैन। मुस्‍कियाइत रहला आ चहटगर चटनीक संग रोटी खाइत रहला। आब बिमलेश कहलखिन- “चचाजी, मम्‍मी अपने हाथे अहाँ लेल ऐ टमाटरक चटनी बनेली अछि।” राघव कृतज्ञताक स्‍वरमे बजला- “नन्‍दिता भाभी, अहाँ सभ हमरा लेल केतेक कष्‍ट लइ छी? ऐ कर्जकेँ हम सातो जनममे नइ सधा सकब। बड़ा अपूर्व आ चहटगर अछि चटनी।” नन्‍दिता- “अरे राघवजी! अहाँ एना किए सोचै छी। सुधाकर नहि छैथ। बनारस जाइसँ पहिनहि हमरा कहने छला जे राघवकेँ बाहरक भोजन पसिन्न नइ होइ छैन, तँए घरेमे किछु-ने-किछु अपने हाथे बना देबैन। बेबी-हाथमे सुआद नइ छै।’ तँए किछु बना देलौं। अहाँ तेतेक नीकसँ भोजन करै छी जे हमरो बनबैमे आन्‍नद अबैत अछि।” आब राघव चुप्‍पे भऽ गेला। भोजन केला। हाथ धोइते रहैथ कि सुधाकरक फोर एलैन- “की राघवजी, ठीक छी किने? आजुक यात्रा केहेन रहल? बुच्‍ची किछु नव चीज बनेली की? राघव बजला- “हँ श्रीमान्, अखने भोजन केलौं अछि। सभ वस्‍तु अपूर्व, मुदा काँच बिलौती केर चटनीक तँ जबाव नहि। मन तिरपीत भऽ गेल। कुनो दिक्कत नहि श्रीमान्। केवल अपनेक कमी खलि रहल अछि। फिल्डवर्क सेहो ठीक रहल। लोक सभ सहयोगी छला। बहुत रास जानकारी भेटल। अपने आएब तँ सभ डेटा आ आँकरापर वृहत चर्चा करब।” हलाँकि राघव जनै छला जे सभ बातमे एक बात झूठ बजला, बाजल छला जे प्रोफेसर सुधाकर केर कमी हुनका महसूस भऽ रहल छैन। राघव तँ प्रसन्न छला जे आब ओ नन्‍दितासँ मुक्त भावसँ वर्तालाप कऽ सकैत छला। राघवकेँ प्रो. सुधाकर आ नन्‍दिताक बिआहमे कुनो रहस्‍य बुझना जा रहल छेलैन। खैर, भोजन केला बाद राघव अपन कक्षमे गेला। कनी कालक बाद, भोजन केला बाद, बेबी अपन घर चलि गेलि। आब निच्‍चाँ जा नन्‍दिता मुख्‍य द्वार बन्‍द केलैन। जखन आपस एलीह तँ राघव पुछलखिन- “नन्‍दिता भाभी, की करए गेल रही?” नन्‍दिता जबाव देलखिन- “सुधाकर नहि रहै छैथ तखन कैम्‍पसक मुख्‍य-द्वार हमरे बन्‍द करए पड़ैत अछि। सएह करए गेल रही।” राघव बजला- “हमरा कहितौं? हम कऽ दितौं!” नन्‍दिता- “कुनो बात नहि। हमरा आदत पड़ि गेल अछि। अहाँ चिन्‍ता नहि करू।” पुन: नन्‍दिता अमरेश आ विमलेशकेँ आदेश करैत कहलखिन- “अहाँ सभकेँ स्‍कूल जाइसँ पहिने भोरे-भोर उठि कऽ पढ़ाइ करक अछि। जल्‍दी-जल्‍दी दूध पीब लीअ आ सूति रहू।हम साढ़े चारि बजे भोरक घण्‍टी लगा दइ छी। अपने मने उठि मुँह-हाथ धो पढ़नाइ प्रारम्‍भ कऽ लेब।” दुनू बालक माताक आज्ञाकेँ सम्‍मान करैत रसोइ-घर गेला। दूध गिलासमे राखल रहैन। दूध पीला आ सुतबा लेल चलि गेला। नन्‍दिता भीतर गेली। मच्‍छरदानी लगा देलखिन। लाइट ऑफ कऽ देलखिन। जीरो पावरक बल्‍ब ऑन कऽ देलखिन आ अपन दुनू छपल किताव, डायरी, किछु सादा पन्ना आ पेन लऽ राघव बला कक्षमे आबि गेली। राघव तैबीचमे एकटा अंग्रेजी उपन्‍यास पढ़ैत रहैथ। नन्‍दिताकेँ ऐबते-देरी राघव उपन्‍यासकेँ झाँपि लेला आ कातमे रखि देलखिन आ नन्‍दिताक स्‍वागतमे उठि कऽ बैसैत बजला- “आउ नन्‍दिता भाभी।” नन्‍दिता सामनेबला कुरसीपर बैसली। अपन दुनू पुस्‍तकमे ऑटोग्राफ लिखलैन- “सिनेही राघवजीकेँ, सिनेह आ सम्‍मानक संग -नन्‍दिता।” राघवकेँ नन्‍दिताक ऑटोग्राफ नीक लगलैन। दुनू पोथीक पन्नाकेँ उलैट कऽ देखलाह। ओइमे एकटा पोथी काव्‍यक संग्रह रहै आ दोसर गल्‍प संग्रह। दुनू पोथीक भाषा हिन्‍दी रहैक। तमाम कथाक मुख्‍य पात्र महिला। पुरुखक प्रति महिलाक क्रोध, आक्रोश, घृणा आदि स्‍पष्‍ट परिलक्षित होइत रहइ। एना बुझना गेलैन राघवकेँ जे नन्‍दिताक महिला चरित्र बागी आ विद्रोही तेबरमे ठाढ़़ छैन। हिंसक हेबामे सेहो महिला चरित्रकेँ कुनो दिक्कत नहि छै। आब नन्‍दिता राघवकेँ कहलखिन- “सुनू राघवजी, हम अहासँ साहित्‍यिक चर्चा करए चाहै छी। हम्‍मर पोथी बादमे अहाँ पढ़ि लेब। अखैन किछु चर्चा करी?” राघव बजला- “हँ-हँ अबस्‍स करू। अहाँक लेखनी हमरा प्रभावकारी लागि रहल अछि। पहिने अपन लिखल एक-आध मैथिली कविता सुनाउ।” नन्‍दिता राघव केर ऐ निवेदनसँ गद्-गद् भऽ गेली। अपन डायरीक पन्‍ना पलटनाइ प्रारम्‍भ करैत पुछलखिन- “प्रेम-कविता सुनाबी?” राघव कहलखिन- “कुनो सुना सकै छी। हम अहाँक शैली आ रचनासँ अपना-आपकेँ अवगत करए चाहै छी।” आब बिना कुनो प्‍लोट बैक-ग्राउण्‍ड तैयार केने नन्‍दिता नहुँ-नहुँ अपन कविताक पाठ करए लगली। प्रारम्‍भ लघु कवितासँ केलैन। कविताक संरचना ने बड्ड नीक आ ने बड्ड अधलाहे। हलाँकि प्रेममे सेहो नारीक फ्रस्‍ट्रेशन परिलक्षित बुझना गेलैन, राघवकेँ नन्‍दिताक कवितामे। ओना, नन्‍दिताक अवाज कोइली जकाँ मधुर आ चहकैत। कविता-पाठ करैत-करैत नन्‍दिताक भाव-भंगिमा भव्‍य लागि रहल छेलैन। एक कविता पढ़ैत रूकली नन्‍दिता। राघव झट दनि पूछि देलखिन- “नन्‍दिता भाभी,एक बात पुछी?” नन्‍दिता- “हँ-हँ पुछू ने!” राघव- “अहाँक साहित्‍यिक कृतिमे महिला पात्र रिबेलियन किएक होइत अछि? ओना लेखन शैली हमरा बड़ प्रभावित कऽ रहल अछि।” “यों ही कोई वेवफा नहीं होता” ई कहैत नन्‍दिता नमहर साँस भरलैन। फेर साँस छोड़लैन। फेर भरलैन। साँस भरब आ छोड़बक प्रक्रिया किछु काल धरि चलैत रहलैन। प्रत्‍येक साँसक संग नन्‍दिताक वक्ष ऊपर-निच्‍चाँ करैत रहल। राघव नन्‍दिताक पुष्‍ट-वक्ष गुच्‍छकेँ कन्‍हिया-कन्‍हिया निहारैत रहला। शायद ई सोचैत जे देखितो छैथ आ नन्‍दिता बुझियो नहि रहल छैथ। मुदा नन्‍दिता तँ छैथ स्‍मार्ट। भान लागि गेलैन जे राघव हुनकर यौवनकेँ तारि रहल छैन। नन्‍दिता सोचलैन : चलू राघवकेँ ऐ ख्‍वाबमे रहए दइ छिऐन जे हम किदु नइ बूझि रहल छी। फेर नन्‍दिता बजली- “हँ राघवजी। अहाँक अवलोकन सूक्ष्‍म आ सार्थक अछि। एकर इतिहास छै। हमर जीवनक बीतल किछु एहेन घटना जे हमर साहित्‍य-सर्जनाक महिला चरित्रकेँ किछु उग्र, व्‍याकुल, प्रतिशोधी, अहंकारी बना दइ छै। ओना, कखनो काल नहियोँ चाहैत हमर सृजनमे महिला पात्र ओहन भऽ जाइत अछि। ऐपर हम काल्‍हि रातिमे अहाँक संग विस्‍तारसँ चर्चा करब। आइ अपन किछु कविता आ गल्‍प अहाँकेँ सुनबए चाहै छी। शैली, कथानक, परिवेश, उपमा, अलंकार आदिक प्रयोगपर अहाँक विचार जानए चाहै छी।” राघव बजला- “हँ-हँ नन्‍दिता भाभीजी, अहाँ अपन किछु लघु कथा आ अन्‍य कविता सुनाउ। रातिमे हम निश्चिन्‍ततासँ अहाँक पोथीकेँ समाजिक परिदृश्‍यमे समाजशास्‍त्री जकाँ पढ़ए आ समझए चाहै छी। समाजशास्‍त्रक परिदृश्‍यमे विवेचन करए चाहै छी। नारी मनोदशा, मानवीय संवेदनाक पितृसत्तात्‍मक समाज केर संरचना आ पितृसत्तात्‍मक समाज द्वारा नारीक शोषणकेँ अहाँक लेखनीक ऐनासँ बुझए चाहै छी।” नन्‍दिताक मन प्रफुल्‍लित भऽ गेलैन। साहित्‍यकारकेँ साहित्‍यकेँ सुनैबला आ साहित्‍य समीक्षाक संग ओकर प्रशंसा करैबला भेट जाए तखन मन हर्षित तँ हेबे करै छै। नन्‍दिता अपन कविताक पोथीक पन्ना चश्‍मा पहीरि पलटए लगली। तीनटा पन्नाकेँ मोड़ि लेलैन। फेर अपन कुर्सीसँ उठली आ अपन शयन कक्ष दिस बढ़ैत बजली- “राघवजी! हम कनिकबे कालमे आबि रहल छी।” राघव सोचए लगला, आखिर कुन प्रयोजनसँ नन्‍दिता भाभी अपन शयन कक्ष गेली? कुनो-ने-कुनो प्रयोजन तँ अबस्‍स हेतैन। पनरह मिनटक भीतर नन्‍दिता पुन: राघवजीक कक्षमे हाथमे एक कलात्‍मक शीशाक ट्रेमे दूटा बाटीमे रसमलाइ लेने प्रवेश केलैन। नन्‍दिताक मन प्रसन्नचित आ संतुष्‍ट छेलैन। ट्रेकेँ टेबुलपर रखैत बजली- “राघवजी, काल्हि हमर छोट भाए राँचीसँ आएल छल। माँ ओकरे दिया ई मिठाइ भेजने छेली। छोटका रसमलाइ। एकरा रसभरी सेहो कहल जाइ छै। राँचीमे पंजाब स्‍वीट्स केर रसभरी बहुत विख्‍यात छै। बातेक क्रममे एकएक स्‍मरण आएल जे रसभरी तँ फ्रीजमे राखल अछि। सुधाकर मधुमेहक रोगी भऽ गेल छैथ ने, तँए ओ ई सभ नइ खाइ छैथ। अमरेश आ विमलेश दिनेमे खेने छला। केवल हम आ अहाँ नइ खेने रही। सोचलौं साहित्‍य सुनेबाक क्रियाकेँ आरो आगाँ बढ़ेबासँ पूर्व कनी मुँहकेँ नीक मीठाइसँ मीठ कऽ ली।” राघव मने-मन प्रसन्न भेला। नन्‍दिताक आदरमे आत्‍मिकताक भाव जगलैन। बिना किछु बजने अपना संकेता-भावसँ नन्‍दिताकेँ बहुत किछु कहि देलखिन। आब एक कटोरी राघव अपन बामा हाथमे लऽ दहिना हाथे चम्‍मचसँ रसभरी खाए लगला। बिना किछु कहने मशीन जकाँ नन्‍दिता सेहो राघवकेँ अनुशरण करैत दोसर कटोरी बला रसभरीकेँ ग्रहण करए लगली। मीठाइ खेलाक पश्‍चात् राघव अपन असलासँ दक्षिणी निकालि एक सौंस दाना नन्‍दिताकेँ आ एक स्‍वयं लेला। नन्‍दिताक हाथमे जखन राघव दक्षिणी देलखिन तँ राघवक हाथ नन्‍दिताक हाथसँ सटि गेलैन। राघवकेँ नन्‍दिताक कोमल हाथक स्‍पर्श नीक लगलैन। हाथ कनी काल सटले रहए देलखिन। कहि नइ किए, नन्‍दिता सेहो जेना चहैक उठली। चेहरापर किछु अलग तरहक उमंग नन्‍दिताकेँ राघवक स्‍पर्शसँ प्राप्‍त भेलैन। नन्‍दिता सेहो राघवकेँ हाथक स्‍पर्शक सानिघ्‍य किछु क्षण लेल आरो प्राप्‍त करए चाहै छेली। दुनू एक-दोसरक हाथक स्‍पर्शक मुद्रामे करीब दू मिनट धरि रहलैन। आब राघवकेँ एकाएक ई भान भेलैन जे नन्‍दिता तँ हमरा इशारा कऽ रहली अछि। नन्‍दिता सुन्‍नरि आ आकर्षक छैथ। हमरो नन्‍दिताक प्रति आकर्षन बढ़ि रहल अछि मुदा नन्‍दिता तँ छैथ गुरु-पत्नी समान। कहीं हमर डेग कुनो शास्‍त्र अथबा परम्‍परा विरोधी दिशामे तँ ने बढ़ि रहल अछि..? ..एक पैघ प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह राघवक कपारपर नाचए लगलैन। राघवकेँ स्‍थितिक भान भेलैन जे बात गलत भऽ रहल अछि। ऐ बातकेँ सोचैत राघव झट-दे नन्‍दिताक हाथसँ अपन हाथ हटा लेलैन। नन्‍दिता सेहो पुन: अपन पोथीक पन्ना उनटबए लगली। नन्‍दिता राघवकेँ पुछलखिन- “राघवजी, अगर अहाँ कही तँ दू-तीनटा छोट-छोट कविता सुनाबी आ तेकर बाद एक या दूटा कथा सुनाबी, अहाँकेँ?” राघव बजला- “हँ-हँ! सुनाउ ने। एकटा किए चारिटा कविता सुनाउ।” आब नन्‍दिता कविता पाठ करए लगली। जेतेक नन्‍दिताक तनक सुन्‍दरता तेतबे मनक सुन्‍दरता आ तइसँ बढ़ि कऽ बात करैक मीठाँस। राघव गद्-गद् भेल जा रहल छला। काव्‍य-पाठक क्रममे नन्‍दिताक नुआँक ऑंचर खसि पड़लैन। अधकटी आङीमे सहेजल नन्‍दिताक उन्नत वक्ष जेना कविताक धारक संग यात्रा करैत हो। उठैत-बैसैत। साँस संग नन्‍दिताक वक्ष जेना नृत्‍य करैत हो। कविताक संग-संग राघव दोग-दागमे नन्‍दिताक वक्षकेँ सेहो अवलोकन करए लगला। हुनका किछु-किछु होमए लगलैन। मन करैन जे नन्‍दिता भरि रातिअहिना आँचर खसेने वक्षक अवलोकन करबैत कविता-कथाक पाठ करैत रहथु। मुदा ई की कुनो सम्‍भव बात छल? नहि। कदापि नहि। कविताक पाठ आ गल्‍पक वर्णन चलैत रहलै। पता नइ केना रातिक डेढ़ बाजि गेल। आब नन्‍दिताक नजैर देबाल-घड़ीपर गेलैन। झट दनि अकचकेली- “राघवजी! रातिक डेढ़ बजि गेल। अहाँकेँ भोरे-भोर फिल्‍डवर्कमे जेबाक अछि। आब ऐगला चर्च काल्हि करब। अहाँक निन्नक पूर्ति केना हएत तइ बातक चिन्‍ता भऽ रहल अछि।” राघव- “कुनो बात नहि नन्‍दिता भाभी। हमरा लोकैन ऐ तरहक गति-विधिसँ अपना-आपकेँ आत्‍मसात कऽ नेने छी। केतेक दिन तँ चौबिसो घण्‍टा काज करए पड़ैत अछि। तँए अहाँ चिन्‍ता जुनि करू। अगर इच्‍छा हुअए तँ एकटा कथा आ दूटा कविता आरो सुनाउ। अहाँक लेखनीमे चुम्‍बकीय आकर्षण अछि। कथ्‍यकेँ सपाट आ अलग अन्‍दाजमे अहाँ लिखै छी। समाजक दृढ़ मान्‍यता आ पुरुख-समाज द्वारा बनाएल गेल जंजीरकेँ तोड़ैले अहाँक साहित्‍यक नारी पात्र उद्धत रहैत अछि। परिवेशक संग कथानक सम्‍बन्‍ध स्‍थापित कऽ लैत अछि।” राघवक ऐ बातसँ प्रभावित भऽ नन्‍दिता मने-मन आनन्‍दित भऽ पुन: कुर्सीपर बैस गेली। आ अपन पोथीक पन्ना उलटाबए लगली। राघव बजला- “ओना, आब अहाँकेँ नीन आबि गेल हएत।बच्‍चा सभ सेहो असगरे सूतल छैथ। अगर चाही तँ अहाँ जा सकै छी।” नन्‍दिता झट-दे बजली- “हमरो लेल जगनाइ कुनो समस्‍या नै अछि। लेखनक कार्य अधिकांशत: हम रातियेमे करै छी। हमर दुनू पुत्र आब छेँटगर भऽ गेल छैथ। अहाँ कहि रहल छी तँ एक कथा आ तीन कविता आरो सुनबै छी।” नन्‍दिता पुन: कविताक पाठ करए लगली। नहुँ-नहुँ मुदा स्‍वर स्‍पष्‍ट आ नजाकतसँ भरल पाठ। हरेक कविताक पाठक उपरान्‍त राघव ओइ कवितापर किछु प्रश्‍नआ जिज्ञासा करैत रहलखिन। आ नन्‍दिता ओइ जिज्ञासाक उत्तर दैत रहली। अन्‍तमे नन्‍दिता एक लघु कथा अपन नाटकीय अन्‍दाजमे सुनेलैन। कथा राघवकेँ बड्ड नीक लगलैन। कथोसँ नीक नन्‍दिताक उपस्‍थिति राघवकेँ नीक लागि रहल छेलैन। आब अढ़ाइ बाजि चुकल छल। नन्‍दिता किताबकेँ सेरियबैत उठली। कहलखिन- “राघवजी, आब सूतए जा रहल छी। शुभ रात्री।” ‘शुभ रात्री’ कहैत नन्‍दिता राघव दिस अपन हाथ बढ़ा देलैन। राघव कनी सह देला परन्‍तु हाथ नन्‍दिता दिस बढ़ि गेलैन। हैण्‍डसेक केलैन। हैण्‍डसेक करैत राघव नन्‍दिताकेँ ‘शुभ रात्री’ कहैत बाहर धरि छोड़ए एला। नन्‍दिता अपन कक्ष दिस चलि गेली। राघव नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे एक घण्‍टा धरि सोचैत रहला। अन्‍तत: साढ़े तीन बजेमे सूति रहला। दोसर दिन भोरे राघव स्‍नान-धियान केला बाद चूरा-दहीक जलपान कऽ सीतामढ़ीक हेतु प्रस्‍थान केलैन। प्रस्‍थान करै काल नन्‍दिता दक्षिणी आ लौंग लेने ठाढ़ि छेलैन। राघव बिना किछु कहने आँखिक भाषा बुझैथ, नन्‍दिताक हाथसँ सभटा लौंग-दक्षिणी लऽ लेलैन। नन्‍दिताक आँखिसँ ई लागि रहल छेलैन जे नीक रहितैक जे राघव आइ केतौ जेबे नहि करितैथ। बिना नन्‍दिताकेँ कहने राघव हुनकर आँखिक भाषा बूझि गेला। आँखियेक इशारासँ कहलखिन- “शोधक कार्य अछि, तँए दिन भरि लेल अवलोकन हेतु जेनाइ आवश्‍यक।” राघव चलि पड़ला। जाबे धरि नजैरसँ ओझल नहि भेलैन ताबे धरि नन्‍दिता दिस राघव घूमि-घूमि तकैत रहला। नन्‍दितो एकटक भेल गेलरीमे ठाढ़ भऽ राघवकेँ जाइत देखैत रहली। राघव भरि रस्‍ता केवल आ केवल नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे सोचैत रहला। प्रेम, आकर्षण, सेक्‍स आ पाप सबहक बोध राघवकेँ एके संग हुअ लगलैन। नन्‍दिताक देहक बनाबटसँ राघव आकर्षित छला। नन्‍दिताक लेखनी सेहो अपने ढंगसँ राघवकेँ प्रभावित कऽ रहल छेलैन। नन्‍दिताक वस्‍त्र पहिरक अन्‍दाज आ सौन्‍दर्य विलास राघवकेँ कामूक बना रहल छेलैन। हुनकर मनक आ तकन कामदेव जाग्रत भऽ रहल छेलैन। मर्यादा आ अन्‍य चीज जेना विद्रोह करबाक हेतु उफान मारैत हो। भाँड़मे गेल मर्यादा आ विचारक लक्ष्‍मण-रेखा। नन्‍दिता सिनेहमणि आ कामदेवी छैथ। हुनका शायद हमरा सन युवकक आवश्‍यकता मनक आ तनक सामंजस्‍य आ अदान-प्रदानक हेतु जरूरी छैन तँ ओइमे मर्यादाक हनन केहेन? किछु एहने भावना राघवकेँ भऽ रहल छेलैन। फेर ई भाव कनी राघवकेँ चिन्‍तित आ ग्‍लानि-भावसँ भरि दैत रहैन जे अन्‍तत: नन्‍दिता छैथ तँ गुरुक पत्नी। अगर मर्यादा भंग भेल तँ गुरुजीक संग विश्वासघात भेल। गुरुकी सोचता! कहीं शापित कऽ देता तखन तँ..? फेर आधुनिक विचार कहैन- जे हेतै ओ देखल जेतइ। नन्‍दिता किछु उलझनकेँ आइ राति जरूर बतेती। फेर अन्‍तिम निर्णए लेब जे की करब। पूरा दिन कार्य करैमे चित्त नै भवैत रहैन, राघवकेँ। जेना नन्‍दिता हुनकर मनोवृतिकेँ एरेस्‍ट कऽ नेने होनि। मुदा कार्यक सम्‍पादन करब हुनकर शैक्षणिक आ प्रोफेशनल जबाव-देही छेलैन। तँए कार्यकेँ सम्‍पादन केला। कनी जल्‍दी समाप्‍त कऽ दरिभंगाक लेल विदा भेला। शनि दिन रहइ। रस्‍तामे जीबैत कबइ माछ भेटलैन। लगभग दू किलोक कुड़ी। राघव हुण्‍डे कीन लेला। मलाहिनसँ कुनो मोल-भाव नहि केला। हाथमे माछ नेने राघव तीव्र गतिसँ प्रो. सुधाकर केर मकानक प्रांगणमे प्रवेश केला। आशाक विपरित नन्‍दिता नहि छेली। नन्‍दिताक जेठ बालक अमरेशसँ पता चललैन जे नन्‍दिता रेडियो स्‍टेशनपर अपन एक लघु कथाक प्रसारण हेतु गेल छैथ। राघव माछक झोरा अमरेशकेँ दऽ देलखिन। बेबी इन्‍होर पानि देलकैन। राघव पानि पीलाक बाद मुँह-हाथ धोलैन। बाहर एला तँ बेबी नेबोबला चाह दऽ गेलैन। राघव चाह पीबैत रहला आ नन्‍दिताकेँ एबाक इन्‍तजार करैत रहला। लगभग अदहा घण्‍टामे नन्‍दिता एली। ऐबते राघवसँ पुछलखिन- “कखन एलौं राघवजी?” राघव- “अदहा घण्‍टा भेल।” नन्‍दिता- “चाह इत्‍यादि भेटल की नइ?” राघव- “हँ-हँ। सभ किछ भेटल। गर्म पानि आ चाह दुनू। आइ कनी जल्‍दी आबि गेलौं। अमरेश कहलैन जे अहाँ दरिभंगा रेडियो स्‍टेशन कुनो कथाक प्रसारण हेतु गेल रही।” नन्‍दिता- “हँ। प्रति मास दरिभंगा रेडियो स्‍टेशनसँ हमर एक कथा प्रसारित होइत अछि। अही बहाने रचना करैमे आ साहित्‍य सर्जनामे नीक लगैत अछि।” ई कहैत नन्‍दिता अपन कक्ष दिस विदा होइत बजली- “राघवजी, कनी हम दस मिनटमे अबै छी। फेर बैस कऽ निश्चिन्‍त भऽ गप करब।” राघव गरदेन हिला ‘हँ’ कहि देलखिन। दस मिनटक भीतर नन्‍दिता फ्रेश भऽ राघव लग आबि एक कुर्सीपर बैस गेली। राघवकेँ कहलखिन- “जीबैत कबइ माछ केतए भेट गेल राघवजी?” राघव- “रस्‍तामे एक मलाहिन बेचैत छलि। सोचल कीन लइ छी।” कनी कालक बाद नन्‍दिता अपनेसँ भीतर जा चाह बना कऽ अनलैन। राघवकेँ आगूमे चाहक ट्रे दैत बजली- “लीअ राघवजी, एक बेर पुन: चाह पीबू। हमरो चाह पीबाक इच्‍छा भऽ रहल अछि।” चाह संगे किछु नमकीन सेहो परोसल गेल रहइ। राघवकेँ सेहो चाह पीबाक इच्‍छा भेलैन। दुनू गोरे चाह संगे पीला। रात्रिक भोजनक पश्चात नन्‍दिता पुन: राघव लग आबि साहित्‍य चर्चामे लगि गेली। आइ नन्‍दिता कारी रंगक नुआँ पहीरिने छेली। नुआँक खोंछि नाभिसँ निच्‍चेँ। नाभी स्‍पस्‍ट देखाइत रहैन। नुआाँ पहीरबाक एहेन स्‍टाइल जे पूरा पेटक संग नाभीक सौन्‍दर्य प्रस्‍फुटित भऽ रहल छेलैन। दुधिया गोराइ चाम नन्‍दिताकेँ काम सुन्‍दरी बना रहल छेलैन। राघव ओइ सौन्‍दर्यमे डूमि गेला। मन बहकए लगलैन। पहिल बेर राघवकेँ ई एहसास भेलैन जे नारीक शरीरक सभसँ उत्तेजक आ कामुक अंग नाभि होइ छै। सुडौल पेट, तरीकासँ नुआँ धारण करबाक अन्‍दाज ओकरा आरो उत्तेजक बना दइ छै। बहुतो स्‍त्रीगणकेँ बच्‍चा भेला बाद पेटक नाभि फाटि जाइ छै आ पेट,नाभि आ नाभिसँ निच्‍चाँबला प्रदेशकेँ छितीर-बितीर कऽ ओकर सौन्‍दर्यकेँ स्‍वाहा कऽ दइ छै। नन्‍दिता यद्यपि भागवन्‍त छेली। हुनकर पेट आ नाभि प्रदेशमे एकौटा दागक लेश नहि छेलैन। नाभि तक पेट देखाइत रहैन। के कहैत अछि जे नुआँ कामोत्तेजक नइ होइत अछि। राघव जखन नन्‍दिताक सौन्‍दर्यक सर्वेक्षक नुआँमे केलैन तँ लगलैन जेना नारी सभसँ सुन्नरि, चहटगरि, कामोत्तेजक नूएँमे लागि सकैत अछि। नुआाँकेँ नाभिसँ निच्‍चाँ पहीरक अन्‍दाज नन्‍दिताकेँ यक्षीबला प्रतिमासँ कनीकबो कम सुन्नर नहि बना रहल छेलैन। ईहो सम्‍भव भऽ सकैत अछि जे राघव नन्‍दिताक प्रति आकर्षित छला तँए हुनका नन्‍दितामे दोदारगंज यक्षीक सौन्‍दर्य तकै छला। अन्‍तत: सौन्‍दर्यक तँ बखान करएबला पर निर्भर करैत अछि जे गुण विद्यमान छै। खैर, अखनुक मोटा-मोटी स्‍थिति ई छल जे राघवकेँ नन्‍दिता बड्ड सोहनगर-रमनगर आ कामुक नारी लगै छथिन। नन्‍दिता सेहो कुनो कम पारखी थोड़बे ने छेली। मने-मन आँकि लेलैन, राघवक मनोदशाकेँ। बुझना गेलैन जे ओ स्‍वयं कुनो बड्ड सुन्‍दर आ सुगन्‍धमयी फूलल फूल तँ राघाव ओइ फूलक मकरन्‍दकेँ चुसएबला भमरा छला। यद्यपि नन्‍दिताकेँ राघव रूपी भमराकेँ चुसए देमएमे कुनो आपैत नहि छेलैन। हँ, कनी एक-आध दिन आरो परैख लेमए चाहै छेली। नन्‍दिता राघवकेँ ड्रीम-वर्ल्‍डसँ जगबैत पुछलखिन- “की राघवजी, आइ हम अपन कवितासँ प्रारम्‍भ करी अथबा गद्यसँ?” राघवकेँ ने गद्यसँ मतलब छेलैन आ ने पद्येसँ। हुनका मतलब छेलैन तँ सिर्फ आ सिर्फ नन्‍दितासँ। झट-दे उत्तर देलखिन- “नन्‍दिता भाभी, हमरा वएह पसन्‍द अछि जे अहाँ सुनाबी। अहीं कहू की सुनबए चाहै छी?” नन्‍दिता बजली- “एक बात कही?” राघव- “हँ-हँ कहू! की कहए चाहै छी?” नन्‍दिता- “हमर इच्‍छा अछि जे आइ सर्वप्रथम हम अहाँकेँ अपन लघु हिन्‍दी उपन्‍यास ‘मधुमय आकाश’क किछु-किछु प्रेरक आ महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाबी।कुनो हर्जा तँ ने?” राघव- “हर्जा किएक? अबस्‍स सुनाउ।” आब नन्‍दिता अपन हिन्‍दी उपन्‍यास ‘मधुमय आकाश’क पन्ना पलटए लगली। पन्नो सभमे अनेक कथनीय पाँतिकेँ अण्‍डरलाइन पेन्‍शिलसँ केने छेली। पेन्‍शिलसँ रेंखांकित पंक्तिक एक-एक शब्‍दकेँ पढ़ए लगली। उतार-चढ़ाव नीक जकाँ मेन्‍टेन करैत रहलैन। कखनो प्रत्‍यंचा चढ़ैत कखनो प्रेमाधिक्‍यक आवेगमे प्रस्‍फुटित चेहरा आरो सौन्‍दर्यकेँ बिखेरब प्रारम्‍भ कऽ दैन। राघव भाव-विह्वल होइत नन्‍दिताक उपन्‍यासक अंश नन्‍दिताक मुहसँ भाव-विभोर होइत सुनैत रहला। बीच-बीचमे कखनो गरदेन हिला, कखनो मुखाकृतिकेँ गम्‍भीर कऽ तँ कखनो जिज्ञासा प्रवृतिसँ प्रश्‍न कऽ तँ कखनो मुक्‍त-कण्‍ठसँ प्रशंसाक शब्‍दाडम्‍बरसँ नन्‍दिताकेँ उत्‍साहित करैत रहलैन। उपन्‍यास कम प्रेरक नहि रहइ। एक एहेन किशोरीक कथा जे भावावेशमे आबि अपन जेठ बहिनक देबरसँ प्रेम-विवाह कऽ लैत अछि। बादमे प्रतारना, शोषण,अत्‍याचार, भावनात्‍मक दोहनक शिकार भऽ आत्‍म-ग्‍लानि आ अपन निर्णएपर पश्चाताप करैत ओ किशोरी आत्‍म-हत्‍या करबा लेल विवश भऽ जाइत अछि। आत्‍म-हत्‍या कैयो लैत अछि। उपन्‍यासक उतार-चढ़ाव भावनाक प्रबलता आदि नीक जकाँ प्रदर्शित केने छेली। नन्‍दिता समस्‍त चीज एकीकृत भाव आ स्‍वरूपमे राघवकेँ नीक लगलैन। बीच-बीचमे राघव कनखी दोगे नन्‍दिताक नाभि आ खुजल पेटक दर्शन करैत रहला। नन्‍दिता कखनो नाभि लग हाथ राखि लथि तँ कखनो फुजल छोड़ि दैत छेलखिन। राघवक दृष्‍टि यदाकदा नन्‍दिताक समुन्नत वक्ष दिस सेहो जानि। राघवकेँ होनि- ठीके नन्‍दिता भाभी बानरक हाथमे नारिकेल जकाँ छैथ। प्रोफेसर सुधाकर हिनकर सौन्‍दर्यकेँ भला की बूझि सकै छैथ? नन्‍दिता अपन उपन्‍यासमे से एक घण्‍टा धरि उद्धधरण पढ़ैत रहली। राघव सुनैत रहला। अन्‍तमे उपन्‍यासक अन्‍तिम तीन पन्ना नन्‍दिता भाव-विभोर भऽ पढ़लैन। आब राघव दिस गम्‍भीर होइत बजली- “कहू राघवजी, उपन्‍यास पसिन आएल?” राघव- “हँ-हँ, खूब पसिन आएल।पते नहि चलल जे समए केना निकैल गेल। भावमय, भावनामय सभ तरहेँ नीक रचना। एकरा एन्‍थोपोलोजी ऑफ इमोशन कही तँ कुनो अतिशियोक्‍ति नहि। अहाँ तही मनोदशाक चित्रण अपन खॉंटी अन्‍दाजमे करैत छी। अहाँ परिवेश, बिम्‍ब इत्‍यादिक विधन अपना तरहेँ करै छी। नारी विशेष रूपे मिथिलाक मैथिल ब्राह्मणक तथाकथित सभ्रान्‍त नारीक मनोदशा आ पुरुखक नारीक प्रति विचार-संस्‍कार आ बेवहारक वर्णन आ विवेचनमे अहाँ बेजोड़ छी। अहाँक शैली आ अहॉंक रचनाक प्रचार हेबाक नितान्‍त आवश्‍यकता अछि। अहाँक जिह्वापर ओ सरस्‍वती बैसल छैथ जे सत्‍यकेँ बिना कुनो भय आ धोखें-निर्भिक रूपे लीखै छैथ। ओ सरस्‍वती बैसल छैथ जे पागधारीक, कुकृत्‍यकेँ ताल ठोकि कहै छैथ। ओ सरस्‍वती बैसल छैथ जे तथाकथित इलीट या सम्‍य समाजक अधार कऽ पुरुख समाजक भीतरक निर्लज्‍जता आ स्‍वांगसँ संसारकेँ परिचित करबै छैथ।” राघवसँ अपना बारेमे ऐ तरहक बात सुनि नन्‍दिता गद्-गद् भऽ गेली। कनी भावनात्‍मक सेहो भेली। राघव दिस गम्‍भीर होइत नन्‍दिता बजली- “एक बात कही, हमर परिस्‍थिति हमरा लेखिका बना देलक राघवजी। की सोचने रही आ की भऽ गेल! देखैत-देखैत जीवनक तमाम अरमानमे जेना अगराही लागि गेल! आब जीवनमे कुनो इच्‍छा नहि अछि। एकेटा इच्‍छा अछि जे अपना संग घटल आ अपना आँखिक समक्ष घटल सभ परिस्‍थिति-परिवेश आ घटनाकेँ बेलाग लिख पाठकक समक्ष लऽ आबी। आइ ने काल्हि कियोक तँ पढ़तै आ सत्‍यक अन्‍वेषण हेतइ? वो सुबह कभी तो आएगी?” राघव गम्‍भीर भेला। जिज्ञासा बढ़लैन। मन भेलैन नन्‍दिताक वेदना आ इतिहासकेँ कुरेदी। मन भेलैन कनी साहित्‍यसँ खिसकी आ सत्‍यक अन्‍वेषण करी। बिना किछु कहने जिज्ञासाक मूद्रामे नन्‍दिता दिस तकला राघव। नन्‍दिता बूझि गेली राघवक मनोदशा आ बातकेँ आगाँ बढ़ौलैन। गम्‍भीर होइत बजली नन्‍दिता- “राघवजी, अहाँकेँ लागल हएत जे हम प्रोफेसर सुधाकरकेँ किएक नहि सम्‍मान करैत छिऐन?” राघव- “एहेन बात नहि छै नन्‍दिता भाभी। कनी ऐ बातक आभास हमरा अबस्‍स भेल जे अहाँ आ प्रोफेसर साहैबमे किछु मत-भिन्नता अछि। विचार द्वन्‍द्व तँ सभ पति-पत्नीमे होइत छै। हमरो सहजन्‍याक संग अछि। मुदा हमरा लोकैनमे सामंजस्‍य अछि। मतभिन्नता बहुत नाजी अछि। प्रखर तखने रहैत अछि जखन केवल हमहीं दुनू गोरे रहैत छी। एकर विपरीत अहाँ आ भाइ साहैब केर मतभिन्नता जेना केकरो लग दृष्‍टिगोचर भऽ जाइत अछि? आ आब अहाँक साहित्‍यक श्रवण केलासँ ई स्‍पष्‍ट भऽ गेल जे ई मत-भिन्नता आ अहाँक वैचारिक विद्रोह अकारण नहि भऽ सकैत अछि।” राघवक ई बात सुनिते जेना नन्‍दिता भावावेशमे आबि गेली। आँखिसँ नोर मोती जकाँ झहरए लगलैन। आब राघवोकेँ नइ रहल गेलैन। उठला आ नन्‍दिताक माथकेँ अपना एक हाथसँ पकैड़ दोसर हाथसँ रूमाल निकालि हुनकर नोर पोछए लगला। नन्‍दिता आरो भावुक भऽ गेली। नोर आरो तीव्र गतिसँ बहए लगलैन। कुहेस फाटए लगलैन। राघव नोर पोछैत रहला आ नन्‍दिता नोर चुआबैत रहली। ओना नन्‍दिताक आँखि आ गालक स्‍पर्शसँ राघवक मन दोसरे रंगक हुअ लगलैन। लाल-लाल कोमल गाल। क्रीम इत्‍यादि लगलाक कारणे चिक्कन। फूलल-फूलल गाल। नोर पोछबाक क्रमे समस्‍त गाल आ गरदेनक स्‍पर्श अनेको बेर राघवकेँ भेलैन। नन्‍दिता सेहो नहि रोकलखिन। शनै: शनै: राघव नन्‍दिताक गालकेँ सहलबए लगला। नन्‍दिता चुप रहली। राघवकेँ मोन भेलैन जे नन्‍दिताकेँ चुमि ली। मुदा मनकेँ थीर केला। हलाँकि एक आँगुर नन्‍दिताक ठोर लग लऽ गेला। आँगुर कॉंपैत रहलैन। कॉंपैत आँगुरकेँ एकाएक पाछू लऽ गेला। कनियेँ कालक बाद फेर हिम्‍मत केलैन। ऐबेर ठुड्डी तक आँगुरकेँ लऽ गेला। हाथ अखनो काँपि रहल छेलैन। कनी कालक बाद हाथकेँ संयमित केला आ ठुड्डीकेँ सहलबए लगला। तीन मिनट धरि सहलबैत रहला। आब राघव धीरे-धीरे नन्‍दिताक कुर्सीक पाछाँ जा ठाढ़ भऽ गेला। फेरो अपन आँगुरक हरकतकेँ बढ़बए लगला। आँगुर आब नन्‍दिताक रसगर-रमनगर ठोर दिस यात्रा प्रारम्‍भ केलकैन। पूरा शरी घामसँ अनेरे भीज गेलैन। राघवकेँ हाथ फेरो काँपए लगलैन। हाथ फेर ठुड्डी दिस लऽ एला। बीच-बीचमे रूमालसँ नन्‍दिताक नोर सेहो पोछैत रहला। आब अन्‍तिम प्रयास केलैन आ आँगुरकेँ नन्‍दिताक ठोरपर राखि देलखिन। नन्‍दिता जेना स्‍वप्‍नसँ जगली तहिना तुरन्‍त अपन हाथसँ राघवक आँगुरकेँ हटा देलखिन। मुदा राघवक आँगुर फेर हरकतमे आबि गेलैन आ नन्‍दिताक ठोरपर आबि थमि गेलैन। आब हिलनाइ कम भऽ गेल छेलैन। ऐबेर नन्‍दिता सेहो प्रतिकार नहि केलखिन। राघव नन्‍दिताक निच्‍चाँ-ऊपरक ठोर सहलबैत रहलाह। नन्‍दिता आ राघव दुनू गोरे चुप छला। राघव केर हाथ आ नन्‍दिताक ठोर अपन हरकतमे व्‍यस्‍त छल। आकर्षण आ मनोभावक मिलन। आब राघव दोसर हाथसँ नन्‍दिताक गालकेँ सहलबए लगला। ई क्रम पाँच मिनट धरि चलल। राघवक हिम्‍मत बढ़ैत गेलैन। आब हाथ नहि काँपि रहल छेलैन। राघव आब कनी हिम्‍मत करैत नन्‍दिताक केसकेँ माथ लग चुमि लेला। नन्‍दिताक फेरो कुनो प्रतिकार नहि केलखिन। मुदा राघव कनी सोचमे जेना पड़ला। अन्‍तत: नन्‍दिताक संग हुनकर ई बेवहार केतेक उचित छेलैन? मुदा एकै क्षणमे राघव जाग्रत भेला आ सोचलैन- ऐमे पाप केहेन? नन्‍दिता भाभी तँ सिनेहक पियासल छैथ। पियासलकेँ पानि पीयाबएमे कुन पाप? ई सोचि राघव नन्‍दिताकेँ जोरसँ पकड़ैत हुनकर ओंठपर अपन ओठ पाछाँ देने लऽ एला। नन्‍दिता आँखि झाँपि लेली। राघव चुम्‍बनक प्रहार-पर-प्रहार करए लगला। फेर अपना मुहमे नन्‍दिताक ओंठ लऽ चूसऽ लगला। नन्‍दिता सेहो राघवक संग देमए लगली। दुनू नैसर्गिक लोकमे विचरण करए लगला। वातावरण सरमणीय चिन्‍ता मुक्‍त, भय मुक्‍त भऽ चुकल छल। हँ, राघव आ नन्‍दिता जोर-जोरसँ आ जल्‍दी-जल्‍दी साँस लैत छला। राघवकेँ इच्‍छा भेलैन जे नन्‍दिताकेँ वक्ष अपन छातीसँ सटा ली। अपन वाहपासमे समेट ली। हाथ एक क्षणक हेतु वक्ष दिस बढ़लैन मुदा कहि नहि किएक हाथ आपस खींच लेलैन। राघव नन्‍दिताकेँ छोड़ि पुन: अपन स्‍थानपर आबि गेला। नन्‍दिता पाँच मिनट धरि पाथरक मूर्ति जकाँ बैसल रहली। फेर उठली। अपनाकेँ ठीक केलैन। राघव दिस देखैत बजली- “हम पाँच मिनटमे वापस अबै छी।” दस मिनटमे नन्‍दिता राघव दिस आबि गेली। राघवक सामने बैसैत कहलखिन- “राघवजी, अगर अहाँ लग समए हो तँ हम अपन जीवनक वृतान्‍तक किछु विशेष घटनाक यर्थाथ अहाँ संगे बाँटए चाहै छी?” राघव तँ ऐ बातक इन्‍तजारे करै छला। झट-दे कहलखिन- “हँ-हँ किएक नइ। अबस्‍स सुनाउ।” नन्‍दिता- “भऽ सकैत अछि सभटा वृतान्‍त कहैत-कहैत भोर भऽ जाए। ऐ स्‍थितिमे अहाँ की करब? फेर भोरे-भोर अहाँ केतौ केना जाएब? अरामो करब तँ आवश्‍यक ने?” राघव- “अहाँ चिन्‍ता नहि करू। जेतेक समए लेबाक अछि लीअ। हमरा एतेक दिनक बहुत रास बात सभकेँ लिखबाक अछि। काल्‍हि केतौ ने जाएब। अहाँसँ वार्तालापक पश्चात तीन-चारि घण्‍टा सूतब तत्‍पश्चात लिखनाइ प्रारम्‍भ करब।” राघवक बातसँ नन्‍दिता आश्वस्‍त होइत बजली- “निश्चिन्‍तसँ पलथी मारि कऽ बैस जेबाक इच्‍छा अछि। ऐसँ कथा निधोख कहि सकब।” राघव उठला आ नन्‍दिताकेँ हाथ पकड़ैत कहलखिन- “ठीक छै तखन पलंगपर पलथी मारि बैस जाउ। मच्‍छरदानीक भीतर बैसब तँ मच्‍छरो ने काटत।” नन्‍दिता राघवकेँ आग्रहक सम्‍मान करैत पलंगपर मच्‍छरदानीक भीतर बैस रहली आ कथा प्रारम्‍भ केली। नन्‍दिताक दुनू पुत्र अलग कक्षमे निनभेर छला। राघव केबाड़ीकेँ सटा अपनो मच्‍छरदानीमे आबि गेला आ नन्‍दिताकेँ पकैड़ हुनका माथकेँ अपन पलथीपर राखि लेलैन। नन्‍दिता कुनो प्रतिकार नहि केली। राघव नन्‍दिताक केस सहलबए लगला आ कथा प्रारम्‍भ करबाक इसारा केलैन। नन्‍दिता कथा कहब आरम्‍भ केली- “हमर पिता एक सभ्रान्‍त अभियन्‍ता छला आ बिहार सरकारमे पैघ ओहदापर छला। हम सभ दू बहिन आ एक भॉंइ छेलौं। सभसँ पैघ हम। हमरासँ तीन बर्खक छोट हम्‍मर बहिन। आ छह बर्खक छोट भाए। हम्‍मर माता-पिता हमरा सभ संग कुनो विभेद नहि केलैन। हम तीनू भाए-बहिन कन्‍वेन्‍ट स्‍कूलमे पढ़लौं। हमरा लड़का सभसँ मित्रता छल आ ओइ लेल कुनो परिवारसँ कुनो पावन्‍दी नहि। जखन पॉंचमी कक्षामे गेलौं तँ बाबूजी साईकिल कीन देलैन। एक मासक भीतर साईकिल चलाएब सीख गेलौं। स्‍कूल आ बजार इत्‍यादिमे साईकिलसँ जाए-आबए लगलौं। चूकि हमर बाबूजी आ माँ लम्‍बा छला। तँए हमहूँ तीनू भाए-बहिन कद-काठीमे छरहरगर आ गोर-नार रही। जखन हम दस बर्खक भेलौं तँ लोककेँ बूझि पड़िऐ जे चौदह बर्खक छी। सुन्नैर तँ रहबे करी। पिताजीक आमदनी अगाध रहैन तँए कुनो तरहक दिक्कत नहि छल। जखन कखनो कुनो चीज, खेलौना, वस्‍त्र, भोज्‍य पदार्थ आदिक जरूरत भेल, हमर माता-पिता तुरन्‍ते आनि दइ छला। ऊपरसँ जेठ सन्‍तान हेबाक फायदा अलग छल। हम अपन माता-पिताक प्रथम सन्‍तान रही। आ हमर माथ हमर नाना-नानीक कपार...।” इम्‍हर राघव, नन्‍दिताक कखनो केस तँ कखनो ओठकेँ सहलबैत रहैन। कखनो काल राघवक हाथ नन्‍दिताक गरदेन धरि चलि जाइन। मुदा राघव अपना-आपकेँ गरदेन धरि सीमित रखला। हँ, बीच-बीचमे ठोर, आँखि आ कपारपर चुम्‍बन करैत रहला। नन्‍दिता प्रतिकार नहि करथिन। ओइसँ आरो हरियर होइत उर्जावान भऽ अपन कथाक बखान करैत रहली नन्‍दिता। नन्‍दिता- “हमर पिताक एक संगी पटना विश्वविद्यालयमे इतिहासक प्रोफेसर छेलखिन। जखन हम मैट्रिकक परीक्षा दऽ देलौं, तहिया पनरह बर्खक रही। पिताक प्रोफेसर मित्र हमरा ओतए एला। हमर माता-पिता हुनकर नीक आव-भगत केलखिन। हम हुनकर पएर छूबि कऽ प्रणाम केलिऐन। ओ हमरा पुछला, की करै छी बुच्‍ची? हम जबाव देलिऐन- हम ऐबेर मैट्रिकक परीक्षा देलौं अछि। ओ प्रसन्न भेला। ओही बातक क्रममे हमर बाबूजी प्रोफेसर साहैब लग निवेदन केलखिन, कनी बुच्‍ची लेल योग्‍य बर देखू ने प्रोफेसर साहैब? प्रोफेसर साहैब बजला- कनी समए देल जाउ, हम अबस्‍स नीक बर तकबाक प्रयास करब। हमर पिताजी हुनकर आश्वासन सुनि गद्-गद् भऽ गेला। हमर बाल-सुलभ मनकेँ ई प्रपोजल नीक नहि लागल।” नन्‍दिता बजैत रहली आ राघव सुनैत रहला। एककेँ कथा सुनेबाक आतुरता तँ दोसरकेँ कथा सुनबाक जिज्ञासा। दुनूक मनमे एक-दोसराक मानसिक आ शारीरिक प्रेमकेँ प्राप्‍त करबाक उत्‍कट अभिलाषा आ इच्‍छा। मुदा ऐ इच्‍छाकेँ केवल कामेक्षा कहनाइ उचित नहि। राघवक हाथ आब कनी मर्यादाकेँ भंग करैत गरदेन आ बाँहि लग आबि गेलैन। हाथ पुन: काँपए लगलैन। मुदा हिम्‍मत नहि हारला। धीरे-धीरे राघवक हाथ नन्‍दिताक वक्षकेँ स्‍पर्श करए लागल। पहिने एक आँगुर, फेर दोसर ऑंगुर आ बादमे सम्‍स्‍त हाथ...। नन्‍दिता आनन्‍दित भेली। मुदा कथाक्रमक प्रवाहकेँ रोकलैन नहि। कथा चलिते रहल। ..नन्‍दिता- “जखन प्रोफेसर साहैब चलि गेला तँ हम अपन माएसँ लड़ए लगलौं, जे अखन नहि करक अछि विवाह। पहिने पढ़ब। एम.ए. करब। कुनो कौलेजमे नौकरी करब। फेर देखल जेतइ। माँ अहाँ पिताजीकेँ कहि दियौन जे अखन हम्‍मर विवाहक सम्‍बन्‍धमे नहि सोचैथ आ ने केकरोसँ जिक्र करैथ।” “..मुदा माए छेली बुझनुक आ परम्‍परासँ बान्‍हल। झट-दे बजली, अहाँ चुप रहू ने बुची। कुनो आइये लड़का तका गेल? जहाँ धरि पढ़बाक बात छै तँ पढ़ैवाली लड़की बिआहक बादो पढ़ि सकैए। अहाँक काज अछि पढ़ब आ घरक काजमे दक्षता प्राप्‍त करब। बिआहक निर्णए बाबूजीपर छोड़ि दियौन। जहाँ धरि प्रोफेसर साहैबक बात छैन तँ ओ बड्ड नीक लोक छैथ। केतेको नीक कन्‍यादान आ बरदान करा चुकल छैथ। ऊपरसँ अहाँक बाबूजीक बालसखा सेहो छैथ, जे करता से नीके करता।’ “माइक मनमे प्रोफेसर साहैबक प्रति अटूट बिसवास देख हमहूँ कनी निश्चिन्‍त भेलौं। आ एकबेर पुन: मस्‍तीक जिनगी जीबाक प्रयास करए लगलौं। मुदा मस्‍तीबला दिनमे जेना ग्रहण लागि गेल हमरा! तीन मासक भीतर, रबि दिन प्रोफेसर साहैब बिनु बजाएल आ नौतल पाहुन जकाँ हमर आवासपर एक आरो मित्रक संग पहुँचला। संजोगसँ पिताजी घरेपर छला। प्रोफेसर साहैबकेँ नीक जकाँ आव-भगत आ स्‍वागत-सत्‍कार कएल गेल...।” “..चाह इत्‍यादि ग्रहण करला बाद प्रोफेसर साहैब अपन अटैची खोलला आ एकटा पोस्‍टकार्ड साइजक ब्‍लेक एण्‍ड व्‍हाइट फोटो निकालि पिताजीकेँ देखबैत कहलकैन जे ई लड़का बड़ संस्‍कारी छैथ। बी.ए. आ एम.ए. दुनूमे गोल्‍ड मेडल भेटल छैन। पी.एच-डी.क थीसीस तैयार छैन। एक मासक भीतर जमा भऽ जेतैन आ छह मासक अभियन्‍तरे पी.एच-डी.सँ अवार्डेड भऽ जेता। थोड़बे दिनमे लेक्‍चरर भऽ जेता। हँ, उमेरमे करीब चौदह-पनरह बर्खक अन्‍तर अबस्‍स छैन।” “..हमर बाबूजी गम्‍भीर होइत फोटो देखए लगला। जखन लड़काक सम्‍बन्‍धमे सभ जानकारी भेटलैन तँ ‘हँ’ कहि देलखिन। पंजिकार लग अधिकार मालाक परिक्षण भेल आ विवाह तँइ भऽ गेल। भेलै जे एक मासक भीतर विवाह हेतइ। हम चिन्‍तामे मग्‍न भऽ गेलौं। आब की करूँ, की नहि? हमर आयु पनरह बर्खक आ हमर होमएबला पतिक आयु तीस बर्खक!!” “..एकेटा आस लागल जे माए लग जाइ आ हुनकेसँ बात करी। माए लग गेलौं। कहलयैन- ‘ई की भऽ रहल अछि? तैपर माए बजली- ‘देखू बुच्‍ची जे हेतै से नीके हेतइ। अहाँक पिता अहाँ लेल कुनो गलत निर्णए थोड़े ने लेता। लड़का विद्वान छै। एकर फायदा अहाँकेँ भेटत। अहाँ असानीसँ एम.ए; पी.एच-डी. इत्‍यादि कऽ सकब। ई लड़का अहाँकेँ ऐ दिशामे उत्‍साहित करता आ सभ तरहक मदैत देता। तँए, अहाँ चिन्‍ता जुनि करू। हमहूँ तँ अहाँ बाबूजी सँ तेरह बर्खक छोट छी। कुन समस्‍या अछि हमरा? कहू ने?” “..आब हम मानि लेलौं जे हमर समस्‍याक कुनो निदान नहि अछि। आत्‍म समर्पन मात्र बॉंचल छल। एक मासक भीतर हमर विवाह भऽ गेल। विवाहक रातिमे वीध-बेवहार करैत-करैत चारि बाजि गेल। हमरा ईहो नहि बुझल छल जे विवाहक पश्चात वर-कनियाँ आपसमे बात करै छै। अगर दुनूमे सामंजस्‍य हौउ तँ शारीरिक सम्‍बन्‍ध सेहो स्‍थापित कऽ सकैत अछि। हम विधकरीक बगलमे विवाह भेलोपरान्‍त भेर नीनमे सुति रहलौं। शायद सुधाकरकेँ ई बात नीक नहि लगलैन। भिनसरमे करीब साढ़े दस बजे, कोहबर घरमे हमरा असगरमे बजा पुछलैन- बुच्‍ची, रातिमे अहाँ हमरा लग किए ने एलौं? तैपर हम कहने रहिऐन- नीन आबि गेल छल। सुति रहलौं। तखन ओ कहने छला- ठीक छै आइ दिनमे हमरा लोकैन गप करब। कहलयैन- ठीक छै।” “..मुदा कहि नहि किए हम अपन सहेली सभ संग बात-चीतमे लागि गेलौं। सुधाकर लग नहि जा सकलौं। पाँच बजे साँझमे सुधाकर हमरा बजेला। हम सहज भावसँ हुनका लगमे गेलौं। ओ तामसे घोर छला। हमरा घरमे प्रवेश करिते-मातर कहलैन, अहाँ किए ने ऐलौं आइ दिनमे?” हम कहलयैन- “बिसरा गेल। सखी-बहिनपा संगे बैसल रही।” सुधाकर- “बुच्‍ची अहाँ बीस बेर कान पकैड़ कऽ उठू-बैसू। ई हमर आदेश अछि।” “हम कहलयैन- किएक? हम नै उठब-बैसब। नहि आबि सकलौं तँ ऐ लेल कान पकैड़ कऽ उठ-बैस करबाक की प्रयोजन?” “..हमर ई जबाव सुनि सुधाकर चप्‍पल लऽ हमरा दिस बढ़ला। हमरा भेल ई आब हमरापर प्रहार करता। एकर प्रतिकार करी। जँ नहि करब तँ जिनगी पर्यन्‍त हिनकर कोपभाजन बनए पड़त। ई सोचि हमहूँ अपन पेन्‍सिल हिलबला सैण्‍डल हाथमे उठेलौं आ चिचियाइत बजलौं, खबरदार जे हमरा मारलौं। अगर हमरा मारब तँ हमहूँ चप्‍पलसँ अहाँकेँ कपार फोड़ि देब।” “सुधाकर बूझि गेला जे हम हुनका केवल गीदर भभकी नहि देखा रहल छेलिऐन अपितु अगर ओ हमरा लग एला तँ हमर पेन्‍सिल हिलबला चप्‍पलसँ...। सुधाकर ठमैक गेला। हाथसँ चप्‍पल निच्‍चाँ राखि देलैन। हमहूँ अपन पेन्‍सिल हिल सैण्‍डलकेँ निच्‍चाँ राखि देलौं। आब सुधाकर किछु अभद्र गारिक प्रयोग करए लगला। हम फेरो शेरनी जकाँ चिचिएलौं, खबरदार जे अभद्र भाषाक प्रयोग केलौं आ गारि पढ़लौं हमरा! अहाँ एकटा गारि पढ़ब तँ हम दसटा गारि पढ़ब। एहेन बेवहार हमरा लग नहि चलत।” “..सुधाकर अपन मन मसोसि कऽ रहि गेला। केवल एतबे बजला जे रातिमे गप करब, अखन अहाँ जाउ..।” “..हम चोटे कोहबर घरसँ बाहर भऽ गेलौं। ओना ई निश्चित भऽ गेल जे ई आदमी विद्वान कम आ राक्षस बेसी अछि। एकरा पत्नी नहि एक सेविका अथबा दासी चाही। मुदा हम दासी थोड़े ने रही?” “..रातिमे सभ वीध-बेवहारक बाद पाँचटा गीतहारि विद्यापतिक गीत- ‘सुन्‍दरि चलली पहुँ घर ना चहु दिस सखी सब कर धरा ना रे घरबा मे जाइते परम डर ना रे जइसे रहु डर शशी कापे ना रे...।” “..गबैत हमरा कोहबर दिस लऽ गेली। हमर स्‍थिति ‘जैसे रहू डर शशी कांपे ना रे’ बला छल। पनरह बर्खक जीवनमे पहिल बेर डरक अनुभूति भेल छल। खैर!भीतर प्रवेश केलौं। ओछाइनपर चम्‍पा फूल छिड़ियाएल। इत्रसँ समुच्‍चा कोठली सुगन्‍धित। सुधाकर चुपचाप एक मोट पोथी पढ़बामे तल्‍लीन छला। हम जखन भीतर गेलौं तँ कहलैन- आउ बैसू बुच्‍ची। हम बैस रहलौं। सुधाकर ठाढ़ भेला। घरक केबाड़ भीतरसँ बन्‍द केला। आ हमरा लग आबि कहलैन- ‘बुच्‍ची, आइसँ हम आ अहाँ पति-पत्नी छी। ऐ बातक एहसास अहाँकेँ अछि ने?” “..हम चुपचाप रही। सुधाकर बजैत रहला- ‘अहाँकेँ बुझल अछि जे आब हमर शरीरपर अहाँक अधिकार अछि आ अहाँक शरीरपर हमर। आइसँ हम सभ एक-दोसरक, शरीरक स्‍पर्श आ प्रयोग करब। ई कहैत सुधाकर हमरा लग आबि हमर गालकेँ चुमि लेला। हुनकर मुखसँ जर्दा पानक गंध अबैत छल, जे हमरा नीक नहि लागल। ऐसँ पूर्व स्‍त्री-पुरुखक बीच यौन सम्‍बन्‍धक नाम अबस्‍स सुनने रहिऐक मुदा केना होइ छै, की सभ होइ छै, की प्रक्रिया छै, तइमे स्‍त्री केर भूमिका की होइ छइ आ पुरुखक भूमिका की होइ छइ, तइ सब बातक ने तँ कुनो जानकारी छल आ ने कुनो अनुभवे। हम एही गुण-धुनमे रही। मुदा सुधाकर निर्लज्‍ज बनि अपन वस्‍त्र हमरा समक्ष खोलए लगला। कनी काल तँ हम चुप रहलौं मुदा जखन ओ लगभग निर्वस्‍त्र भऽ गेला तँ बाजि उठलौं- ‘ई की कऽ रहल छी अहाँ? निर्लज्‍जताक पाराकाष्‍ठा पार कऽ रहल छी। ई नीक बात नहि। उघारे देहे ओ थेथर जकाँ दाँत निपोरैत हमरा दिस बढ़ला। हुनकर भावना हमरा विध्‍वंसक लागि रहल छल। हम पलंगपर सँ उठि कऽ बाहर भगबाक निरर्थक प्रयत्न केलौं। मुदा बेकार। पाछाँसँ हमर झोंट पकैड़ सुधाकर हमरा ओछाइनपर अनला आ सीधे हमर वक्ष पकैड़ लेलैन। हम हाथ छोड़ेबाक यत्न करए लगलौं। मुदा बेकार। हमहूँ जल्‍दी हारि मनबाक लेल तैयार नहि। सुधाकरक दहिना हाथक आँगुरकेँ दाँतसँ हम काटए लगलौं। आब सुधाकर तामसे प्रचण्‍ड भऽ एक घूसा हमरा मुँहपर मारलैन। लागल जेना आँखिक आगू अन्‍हार पसैर गेल। हम लाचार भऽ गेलौं। बलिष्‍ठ राक्षस लग एक पनरह बर्खक बच्‍ची भला की टीक सकै छलि। सुधाकरकेँ तामस कम नहि भेलैन। हमरा ओ तीन चमेटा आरो मारलैन। फेरो हमर समस्‍त कपड़ाकेँ खोलि निर्वस्‍त्र कऽ दरिंदा जकाँ हमर अंगक संग खेलए लगला। हब्‍सी जकाँ हमर वक्ष, दरदेन, पीठ, नितम्‍ब आदिपर दाँत कटलैन। आ हमरा संगे बलात्‍कार केला। एक ओहन बलात्‍कार जेकरा सामाजिक मान्‍यता प्राप्‍त छै। एक ओहेन बलात्‍कार जइमे बलात्‍कारीकेँ लड़कीबला सभ भगवानक दर्जा दइ छइ आ प्रति दिन बलात्‍कार करबा लेल अवसर प्रदान कऽ अपना-आपकेँ धन्‍य बुझैत अछि। एहेन बलात्‍कार जइमे लड़कीकेँ माए, बहिन, भाऊज, सखी एवं अन्‍य महिला सभ सजा कऽ, संवारि कऽ उत्‍सवक माहौल बना गीत-नाद गबैत श्रृगार कए बलात्‍कारीक कक्षमे असगरे छोड़ि अबैत छै। ओइ अभागिनक वेदना, दर्दकेँ के बुझत? नारीक जनम नहि दिअए विधाता..!” ‘विधाता’ कहि नन्‍दिता थोड़े कालक लेल जेना ठमैक गेली। मुदा ओ पुन: ओही क्रममे आबि बाजए लगली- “..हमरा बीचमे दाँती लगि गेल। हमर कानबक अवाज नहि छिड़िअए तइले एक हाथसँ हमर मुँहकेँ दबने रहला सुधाकर। जखन दाँती लागलतँ पानिक छींच्चा मारि दाँती छोड़ाबैथ। हम आब अपना-आपकेँ सरेण्‍डर कऽ देलौं। भरि राति चील आ नढ़िया जकाँ सुधाकर हमर मांस नोचैत रहला। तीन बेर बलात्‍कार केलैन। भोरे साढ़े पाँच बजे कहलैन जे आब बाहर जाउ। हमर पएर डगमगा रहल छल। आँखि झँपा रहल छल। समुच्‍चा शरीर गुड़-घा जकाँ दर्द करैत रहए। गुप्‍तांगक दर्दक की चर्चा करी। नहि बाजी सएह नीक। पहिल बेर ई अनुभूति भेल जे बेटी बनि कऽ रहनाइ केतेक कष्‍टमय छै। बरामदाक कातमे अखरे चौकीपर बेहोशीक हालतमे पड़ि रहलौं।” “..थोड़बे कालक बाद हमर भाभी एली आ पुछलैन- बुच्‍ची पाहुन पसिन एला? हम तामसे धोर होइत जबाव देलिऐन- भाभी एखन जाउ! हमरा असगर सुतए दिअ।” “..पछाइत माए एली। हमर माथ सहलबैत पुछलैन- बुच्‍ची, मुँह-हाथ नहि धोब? मौहकक बेर भऽ गेल अछि। पाहुन इन्‍तजार कऽ रहला छैथ। हमर कुहेस फाटि गेल। हम माएकेँ भरि पाँज पँजिया पकैड़ भोकासि पाड़ि कानए लगलौं। संयोगसँ ओतए कियो नहि छल। तैयो माए दोसर घरक भीतर लऽ गेली। हम कानि कऽ सभ बात कहलयैन। हम कनैत रहलौं आ माए हमरा अपन करेजसँ सटेने रहली। भेल सभ दिन अहिना माइक छातीसँ सटल रही।” “..माए गम्‍भीर होइत बजली- बुच्‍ची की करबै एकरे कहै छै नारी जीवन! समझौता सबतरि सभ परिस्‍थितिमे स्‍त्रीगणेकेँ करए पड़ै छै। अहाँकेँ नहि बुझल अछि जे हम अहाँक पिताक संग केतेक समझौता केलौं अछि। अहाँ पाहुन संगे मिल कऽ रहू। दुनू गोरेमे समझौता भऽ जाएत तँ जीवन स्‍वर्ग भऽ जाएत। प्रारम्‍भमे कनी दिक्कत सभकेँ होइ छै। अहाँ चिन्‍ता जुनि करब।” “..भेल जेना माय सेहो हमर दर्दकेँ नहि बूझि सकली। नीक ई रहैत जे ऐ नृशंसकारी दुगुना उमेरक कारी भुजुंग डेढ़ आँखिक विद्वानक बदला हमरा सिनेह करएबला, हम-वयस्‍क कमे पढ़ल आ सुन्‍दर युवक हमर पति रहैत। मुदा बाबूजीक पागक रक्षाक लेल आ सगा-सम्‍बन्‍धी लग अपन शेखी बघारबा लेल बाबूजी हमरा राक्षक संग बान्‍हि देला। ई चण्‍डाल हमरा लेल कसाइ अछि।” “..जीवनक यएह नियति छै, ई हमरा ज्ञात भऽ गेल छल। लेकिन हम ऐबातक निर्णए अबस्‍स लऽ नेने छेलौं जे कुनो परिस्‍थितिमे सुधाकरकेँ अपनापर आक्रमण नहि करए देबैन। आब अगर हमरा ओ मारता तँ चोरा कऽ माहुर खुआ जान मारि देबैन।” “..ऐ दृढ़ प्रतिज्ञा आ आत्‍म विश्वासक संग माइक संग हम पएर-हाथ धो मौहक करए हेतु चलि गेलौं।” “..दोसर रातिमे हमर रूप रनचण्‍डीबला छल। हम घरमे प्रवेश करिते सुधाकरकेँ कहि देलिऐन, देखू! हम अहाँक पत्नी छी। वेश्‍या नहि। हमरासँ शारीरिक सम्‍बन्‍ध चाहैत छी। राखू। मुदा हमरा संगे भविसमे मारि-पीट नहि करू। अगर ई स्‍थिति भेल तँ हमरासँ खराप कियो ने हएत। केतेक मारब घरमे अहाँ। बाहर निकलैत देरी हम चप्‍पल, ईंटा कुनो वस्‍तुसँ सबहक समक्ष प्रहार कऽ देब। तैयो नहि मानब तँ थाना जा एफ.आई.आर. दर्ज करा देब। अगर अहाँ सम्‍मान करब तँ हमहूँ सम्‍मान करब आ चुप रहब।” “..हमर ऐधमकीसँ सुधाकर काँपि गेला। भेलैन इज्‍जत मटिया-मेट भऽ जाएत। ऐबेर ओ किछुनहि बजला। यद्यपि ओ ओइ रातिमे तीन बेर हमरा संगे यौन सम्‍बन्‍ध स्‍थापित केलैन- बलात् आ हमरा इच्‍छात विपरीत। हम सोचि लेलौं जे ई मनुख हमर तनक भूखल अछि। मनक भूखल नहि अछि। हमहूँ एकरा संग मनसँ प्रेम आ स्‍नेहालिंगन तँ नहि कऽ सकैत छी। फेर कऽ लीअ जेतेक हमर शरीरक उपयोग करत। हम जड़ बनल रहब...।” “विवाहक पाँच बर्खक पश्चात हमर प्रथम पुत्र अमरेश जीक जन्‍म भेलैन। तीन बर्खक बाद बिमल भेला। तेकर बाद कुनो बच्‍चा नहि होमए देलिऐ। जड़वत जीवन चलैत रहल। सुधाकर आ हम दू विपरीत बाटक बटोही। हम सुधाकर संगे केतौ सभा, कार्यक्रम, विवाह-दान इत्‍यादिमे नहि जाइ छी। विवाहक दोसरे दिनसँ बाबूजीकेँ टोकनाइ तक छोड़ि देल। अबैत छैथ तँ यंत्र जकाँ प्रणाम कऽ लइ छिऐन। एकर अतिरिक्त किछु नहि।” “विवाहक तीन बर्खक वाद एक घटना घटल,जे हमर परिवारकेँ झँककोरि देलक।” राघव- “से की?” नन्‍दिता- “हमर छोट बहिन रागिनी हमरा ओतए आएल छलि। करीब पाँच मास एतए रहल। कहि नहि केना ओकरा सुधाकर केर छोट भाए प्रभाकरसँ प्रेम भऽ गेलइ। एक मासक बाद हमरा रागिनी ऐ बातक जानकारी देलक। हम मना केलऐ मुदा दुनू एक-दोसरक प्रेममे पागल। एक-दोसरक संग मरबा आ जीबाक सप्‍पत खेबाबला। यद्यपि सुधाकर सेहो ऐ प्रेम-प्रसंगसँ प्रसन्न नहि छला। हम्‍मर माता-पिता सेहो दुनूकेँ बुझेलखिन। मुदा बेकार। एक दिन दुनू अपन हाथक नस काटि लेलक। जखन पता चललै तँ डाक्‍टरकेँ बजाएल गेल। दुनू परिवार रागिनी आ प्रभाकरकेँ प्रेम लग झूकि गेल। विधिवत् विवाह भऽ गेलइ। रागिनी विवाहक पश्चात् जमशेदपुर चलि गेली। जमशेदपुरमे प्रभाकर अंग्रेजीक लेक्‍चरर छला।” “तीन बर्ख धरि तँ बड्ड नीक रहलै, एकटा बेटा सेहो जन्‍म लेलकै मुदा बेटाक जन्‍म होइते-मातर दुनूमे खट-पट प्ररम्‍भ भऽ गेलइ। मारि-पीट प्रारम्‍भ भऽ गेलइ। स्‍थिति बद्-सँ-बदतर होइत रहलै। एकबेर तँ रागिनी तलाक तक लेबाक लेल मन बना लेलैन। मुदा हमर बाबूजी, सुधाकर, हमर ससुर कहियो चाहे रागिणीक ससुर,सभ मिल कऽ रागिणीकेँ सम्‍बन्‍ध विच्‍छेद नहि करए देलखिन प्रभाकरसँ। किछु दिनक बाद रागिणी पुन: जमशेदपुर गेली। छह मास धरि ठीक रहलैन। सातम माससँ वएह रामा वएह खटोला। फेर मतभेद-मनभेद प्रारम्‍भ। फेर मारि-पीटक सिलसिला। रागिणी जखन तंग भऽ जाथि तँ हमरा फोनपर गप करए लगैथ। हम तँ अपने लाचार छेलौं। की कऽ सकै छेलिऐन। खाली एतेक कहि दइ छेलिऐन जे हम तँ मना केने रही ने रागिणी? ई सभ तँ राक्षसक परिवार अछि। ई सभ शेरक खालमे नढ़िया अछि। रागिणी किछु नहि बाजैथ। केवल हिचुकि-हिचुकि कऽ कानैथ। फेर कहैथ- बहिनदाइ! हमर दिने खराप छल। ई राक्षस दारू पीब जरैत सिगरेटसँ हमर जाँघ आ कनपट्टी जरबैत रहैए। कामातुर भऽ विपरीत तरहक सेक्‍स लेल हमरा बाध्‍य करैत अछि। एकर शरीरसँ विचित्र तरहक गन्‍ध अबै छै। एकरा की कएल जाए?” “रागिनीक प्रश्‍न छोट मुदा हमरा लेल यक्ष प्रश्‍न छल- अनुतरित।” “आ अन्‍तमे जीबनक कष्‍ट आ प्रभाकर केर शारीरिक आऔर मानसिक यातनासँ तंग आबि कऽ रागिणी असगरेमे अपन दहिना हाथक नश काटि लेली। घरमे कियो ने रहइ। जखन रातिमे साढ़े दस बजे प्रभाकर एला तँ देखै छैथ जे शोनितक धार बहैत आ रागिणी बेसुधि भेल पड़ल। प्रभाकरकेँ किछु ने फुरलैन। उठा-पुठा कऽ नर्शिंग होम लऽ गेला। डाक्‍टर कहलखिन सभ किछु समाप्‍त भऽ गेल। रागिणी आब जीबैत नहि छैथ। आ ऐ तरहेँ एक जीवनक दुखद अन्‍त भऽ गेल। रागिणीक आत्‍महत्‍याक पश्चात हमर बाबूजी केँ दिमाग खुजलैन। आब ओ बुझलखिन जे समाजिक मर्यादा, लोकाचार आ सोतियानाक नामपर केना महिलाकेँ शोषण आ दोहन कएल जाइत अछि। देखू रक्षसबा प्रभाकरकेँ? आब ओ अनेरे नोर चुअबैत रहैए। असगरेमे मध्‍य–रात्रिमे रागिणी अहाँ केतए चलि गेलौं? आदि-आदि चिचिआइत रहैए। लेकिन आब की। चिचिएने की हएत? रागिणी तँ उड़ि गेली पिजरासँ। अजाद भऽ गेली। नीके भेलइ। सभ दिनका झंझट, शोषण, मार-पीटसँ नीक वेचारी दुनियाँ छोड़ि चलि गेल।” रागिणीक कथा कहलाक बाद नन्‍दिता जोर-जोरसँ साँस लेमए लगली। छातीक धड़कन बढ़ि गेलैन। मनमे अकुलाहट उठए लगलैन। राघव सेहो द्रवित भऽ गेला। प्रोफेसर सुधाकर प्रभाकर एवं सुधाकरक प्रति घृणा आ आक्रोश भरि गेलैन। नन्‍दिताक प्रति सिनेह आ संवेदना बढ़ि गेलैन। नन्‍दिताक आँखिमे नोर छेलैन। गालपर सेहो नोरक टघार आबि गेल रहैन। राघव अपन रूमालसँ नन्‍दिताक नोर पोछलैन। नन्‍दिता राघवक पलथीपर सँ माथ हटबैत बैसली। अपन कक्ष दिस विदा भेली। राघव चुप छला। दस मिनटक भीतर नन्‍दिता तरोताजा भऽ मुँह-कान धो, क्रीम इत्‍यादि लगा पुन: राघव केर कक्षमे प्रवेश केलैन। राघवक मन हर्षित भेलैन। नन्‍दिता राघव लग आबि बिना किछु कहने पुन: राघवक पलथीपर माथ राखि लेट गेली। राघवक हाथ अनायास नन्‍दिताक माथपर चलि गेलैन। आ राघव नन्‍दिताक रेशमी केशकेँ सहलबए लगला। नन्‍दिता कथाकेँ आगू बढ़ेनाइ शुरू केलैन- “राघवजी, आब कहू ई सभ सम्‍मानक पात्र छैथ?” राघव- “नहि नन्‍दिता भाभी नहि। ई सभ तँ कसाइ छैथ। हिनका लोकैनकेँ अपन डिग्री आ शिक्षाक तमाम कागजातकेँ आगिमे जरा कऽ सुड्डाह कऽ लेबाक चाही। एहेन शिक्षाक की प्रयोजन जे मनुखकेँ जानवर बना दिए?” नन्‍दिता- “देखू राघवजी, अखन डेढ़ राति भऽ गेल अछि। अगर काल्‍हि अहाँ केतौ बाहर नहि जाइ तँ हम चारि-साढ़े-चारि धरि अपन जिनगीक वृतान्‍त अक्षरसह सुनबए चाहै छी। अगर बाहर जेबाक विचार अछि तँ ऐतै विराम दइ छी?” राघव- “आगू अपन वृतान्‍त पूरा करू। हम काल्‍हि केतौ ने जाएब। आगूक वृतान्‍तसँ सेहो हम बहुत किछु सीखब। समाजक एहेन चीजकेँ जानि रहल छी जेकरा सम्‍बन्‍धमे कल्‍पना तक नहि केने रही।” राघवक ऐ आश्वासनसँ नन्‍दिता निश्चिन्‍त भऽ गेली। राघवकेँ हाथ पकैड़ अपन वक्ष लग लऽ जा बजली- “राघवजी, आइ पहिलबेर विवाहक बाद कुनो पुरुखक प्रति सिनेह उत्‍पन्न भेल अछि हमरा। हम तँ सुधाकर आ प्रभाकरक किरदानी देख ई मानि नेने रही जे सभ पुरुख घटिया आ स्‍त्रीगणक चामक भूखल अछि। हमरा होइत छल जे पुरुखकेँ केवल अपन दंभ, लोक-लाज, समाजिक मर्यादासँ मतलब रहै छै। स्‍त्रीगणक मान, मर्यादा स्‍वाभिमान, भावना भॉंड़मे गेल, तइसँ पुरुखकेँ की प्रयोजन? लेकिन अहाँक विचार हमर मान्‍यताकेँ बदैल रहल अछि। जइ तरहेँ प्रति दिन अहाँ अपन पत्नी सहजन्‍यासँ फोनपर बात करै छी। हरेक निर्णएमे हुनकर भागीदारीकेँ सम्‍मान करै छी, तइसँ ई स्‍पष्‍ट अछि जे अहाँ स्‍त्रीकेँ सही अर्थमे सहचरी मानै छी।” राघव- “अहाँ ठीके कहै छी नन्‍दिता भाभी। ओना, एक बात स्‍पष्‍ट कऽ दी जे जइ परिवारमे हमर जन्‍म भेल अछि तइमे महिलाक स्‍थान सर्वोपरि छै। हमर पिता बिना हमरा माएकेँ पुछने कुनो कार्य नहि करै छैथ। परिवारक संचालनक तमाम जिम्‍मेवारी माइक छैन। पिताजीक कार्य केवल अर्थोपार्जन छैन। केतेक निर्णए हमर माए असगरे लैत छैथ। हमर पिता कखनो ओइ निर्णएपर अथबा माइक निर्णए क्षमतापर प्रश्‍न नहि करैत छैथ। यएह स्‍थिति हमरो अछि। बजारक खरीददारी, गृहकार्यक निर्णए, नौत-हकार, कुटुम-परिवार सम्‍बन्‍धी तमाम निर्णए सहजन्‍य अपने हिसावे करै छैथ। वेतनउठा हम हुनका दऽ दइ छिऐन। बाँकी कुनो चीजसँ हमरा लेना-देना नइ अछि। आइ धरि हम कहियो सहजन्‍यासँ कुनो तरहक हिसाव नहि लेलिऐन। हुनकर आलमारी आ लॉकर खुजले रहै छैन, मुदा कहियो हम ओकरा नहि छुबै छी। यएह शायद हमरा दुनूक बीच असली प्रेमक गाँठ अछि। सहजन्‍याक माता-पिताकेँ हम अपन माता-पिता जकाँ सम्‍मान करै छिऐन। एकर फायदा हमरा ई भेटैए जे सहजन्‍या सेहो हमर माता-पिताकेँ बड्ड सम्‍मान आ सेवा करै छैथ। हमरा हमर सासुरक लोक सभ कहै छैथ जे अहाँ अलग-तरहक लोक छी। अन्‍यथा पत्नीकेँ माता-पिताक प्रति केकर धियान जाइ छै- मिथिलामे।” राघवक बात सुनि नन्‍दिता भावुक भऽ गेली। राघवक प्रति प्रेममे हुनका आरो बृद्धि भऽ गेलैन। राघवक हाथकेँ जोरसँ पकैड़ अपना छाती लग सटेलैन। राघवक हाथक पृष्‍ठ भाग आब नन्‍दिताक वक्षक अनुभव कऽ रहल छल। राघव ऐ अनुभवमे मग्‍न छला। धीरे-धीरे हिम्‍मत कऽ राघव अपन हाथकेँ सोझ केला आ आब अपन दुनू हाथ सोझे-सोझ नन्‍दिताक वक्षपर रखि ओकर आङीक ऊपरसँ दबाबए लगला। नन्‍दिता चुप रहली। कुनो प्रतिकार नहि..। थोड़बे कालक पछाइत राघवक हाथ नन्‍दिताक आङीक भीतर प्रवेश कऽ अपन आनन्‍दक हरकतमे संलग्‍न भऽ गेल। आनन्‍दित नन्‍दितो। पहिल बेर नन्‍दिता स्‍त्री आ पुरुखक सामंजस्‍यक प्रेमक अनुभूति जे कऽ रहल छेली। आब जखन प्रोफेसर सुधाकरक यर्थाथक ज्ञान भऽ गेलैन तँ राघवक मनक अपराधबोध सेहो खतम भऽ गेलैन। नन्‍दिताकेँ शारीरिक आ मानसिक सहयोग देनाइ निश्चित रूपे राघवकेँ परमार्थक कार्य अथबा ई कहू जे मानबाधिकारक रक्षा करब बुझना गेलैन। नन्‍दिता आनन्‍दित होइत बिना राघवकेँ हाथ हटेने अपन वृतान्‍तकेँ आगू बढ़बैत जारी रखली- “आ तही दिनसँ हम यन्‍त्रवत रहए लगलौं। जीवनक उत्‍साह खतम भऽ गेल। बचपनेमे अपना-आपकेँ बूढ़ बुझए लगलौं! जखन दुनू बच्‍चा कनी नमहर भऽ गेला आ स्‍कूल जाए-अबए लगला तँ पढ़नाइ प्रारम्‍भ केलौं। हलाँकी खेनाइ बनाएब, घरक काज सम्‍हारब इत्‍यादि ऐ सभमे हम कहियो रूचि नहि रखलौं। सुधाकर चेरी इत्‍यादिक बेवस्‍था केलैन। आर्थिक सहयोग सुधाकरसँ नहि भेटल।पिता हमर माइक माध्‍यमसँ किछु टका इत्‍यादि हमरा लेल भेज दइ छला। बादमे हमरा भेल जे स्‍वयंसिद्धा बनी। पढ़ाइ प्रारम्‍भ केलौं। बी.ए; एम.ए. केलौं आ आब पी.एच-डी. केर थीसीस जमा होबएबला अछि। आशाक प्रतिकूल सुधाकर शिक्षाक क्षेत्रमे अपन प्रभुत्तवक कारणे हमरा एम.ए. आ पी.एच-डी.मे नीक मदैत केलैन। फेर कथा लिखनाइ प्रारम्‍भ कएल। प्रारम्‍भमे मैथिलीमे आ बादमे हिन्‍दीमे सेहो। आब दुनू भाषामे एक प्रवाह, प्रभाव एवं अधिकारक संग लिखै छी। जखन एक आध रचना छपल तँ लिखैमे आरो मन लागए लगल। हमर साहित्‍य सही अर्थमे हमर जीवनक आगू-पाछू घुमैत रहैत अछि।” नन्‍दिता बजैत रहली। राघव सुनैत रहला। बीच-बीचमे राघवक हाथ नन्‍दिताक आङीक भीतर किछु अलग तरहक क्रीड़ामे व्‍यस्‍त छल। नन्‍दिता हाथक क्रीड़ासँ आनन्‍दित होइत रहली। राघव नन्‍दिताक वृतान्‍त सुनबामे मस्‍त आ नन्‍दिताक संग क्रीड़ा करबामे मस्‍त। नन्‍दिता राघवकेँ अपन वृतान्‍त सुनबैमे आ राघवक हाथक चहलकदमीकेँ अपन आङीक भीतर आन्‍नद लेमएमे व्‍यस्‍त आ प्रसन्न...। नन्‍दिता- “एकटा बात तँ हम रागिनीक सम्‍बन्‍धमे नहि बतेलौं। सहज मनक रागिनी आत्‍महत्यासँ पहिने प्रभाकर हेतु एक कविताक निर्माण हिन्‍दीमे केली। हुनकर लाश लग एक पन्नामे मोचरल किछु शोणितक बुनक छिट्टासँ भरल ओ कविता लोककेँ भेटलै। ओ कविता हमरा दुइये बेर पढ़ला बाद कंठस्‍थ भऽ गेल अछि। राघवजी, अगर अहाँ कही तँ हम ओइ कविताकेँ सुनाऊ?” राघव- “हँ-हँ। अबस्‍स सुनाउ नन्‍दिता भाभी। हमहूँ तँ बुझी जे आत्‍महत्यासँ ठीक पहिने रागिनीक मनोदशा की छेलैन आ प्रभाकरजीक प्रति हुनकर सोच की छेलैन।” आब नन्‍दिता आँखि मुनि कऽ रागिनीक अन्‍तिम कविताक पाठ करए लगली- “तुम्‍हारा दिया धोखा मैंने उठाकर वहीं रख दिया है जहाँ बहुत संभाल के रखती थी तुम्‍हारा प्‍यार..! तुम्‍हारी सूरत में कहाँ छिपी थी ये फ़रेब की लत और ये दिलों से खेलने की फ़ितरत अन्‍दाज तुम्‍हारा अभी तो सदमा है गहरी नीन्‍द से मानो किसी ने जबरदस्‍ती उठा दिया हो झिंझोड़ कर ये भी टूटेगा ठीक वैसे ही जैसे तोड़ दिया तुमने यकीन और अधबने मिट्टी के धरौंदे दिल भी हमरा कभी जो सोचू तो एक लहर सी उठती है बहुत तेज दर्द की, जैसे खंजर ही तुमने दे मारा डूबने से पहले एक झलक सी दिखी थी तुम्‍हारी शहद सी आँखों की और राज तुम्‍हारा अब तो यूं है के होश आया है जैसे मीलों चले गहरी बेहोशी में ये कदम आवारा अब तो न मैं हूँ तुम्‍हारो साथ न मेरी जिद न जजबात बस एक निशानी बाँकी जो अब है तुम्‍हारा चली मैं दूर गगन की ओर न मेरा कोई ओर न ही छोर सम्‍हालना बेसक लोक लाज के भय से हमको यही अन्‍तिम परिणाम हमारा।” थोड़े कालक पछाइत नन्‍दिता पुन: बाजए लगली- “राघवजी बीचमे ई प्रसंग बाँकी रहि गेल छल। एकाएक स्‍मरण आबि गेल तँ सोचलौं जे अहाँकेँ सुना दी। रागिनीक ई पत्र अपना-आपमे बहुत बात कहैत अछि।” रागिनीक कवितासँ राघव सेहो भावुक भऽ गेला। अपन नोर नहि रोकि सकला। कनी कालक बाद नन्‍दिता एकबेर पुन: अपन जीवन वृतान्‍तकेँ सुनाएब प्रारभ केलैन। नन्‍दिता गम्‍भीर भेली आ बाजए लगली- “राघवजी, कहि नहि किए हमरा अपना-आपकेँ श्रोतीय ब्राह्मण परिवारमे जन्‍म लऽ एना बुझना जा रहल अछि! बुझना जा रहल अछि जेना पूर्वजन्‍ममे सहस्‍त्रो गाइक बध केने रही। आ तेकरे फल भोगि रहल छी। ओना तँ अपना-आपकेँ श्रोतीय सभ सर्वश्रेष्‍ठ मानैत अछि मुदा जहाँधरि महिलाक स्‍थिति छइ तँ महिलाकेँ अमानवीय ढंगसँ शोषण ई समाज कऽ रहल अछि। कथा हमरा आ रागिनीक जीवन आ शोषणसँ अन्‍त नहि होइत अछि। असंख्‍य रागिनी आ नन्‍दिता ऐ तथाकथित सर्वश्रेष्‍ठ ब्राह्मणक वितंडावाद आ कर्मकाण्‍डक नाओंपर कुल, जाति, मूल आ परोपट्टाक नाओंपर अभिशप्‍त भऽ तप्‍त नोर झहरबैत अपन जिनगीकेँ बिता रहल छैथ। केतेक रागिनी या तँ विवश भऽ आत्‍महत्‍या कऽ लइ छैथ, चाहे मारि देल जाइ छैथ। की कहलैन यात्रीजी- ‘अगराही लगौ बरू बज्र खसौ एहेन जातिपर बरू धसना धँसौ भूमिकम्‍प हौ या फटौ धरती माँ मिथिला रहिये कऽ की करती?’ ..हम मानि लेलौं जे किछु नहि बाजब। हँ, सुधाकरकेँ ई भान अबस्‍स करा देलिऐन जे जँ ओ हमरा शरीरपर प्रहार करता तँ हमहूँ नहि छोड़बैन। सुधाकर ऐ बातकेँ बूझि गेला। हम कुनो सभा, संस्‍कार, गोष्‍ठी, उत्‍सव आदिमे सुधाकरक संग नहि जाइ छी। सुधाकरकेँ एतेक अबस्‍स बता देलिऐन जे हमरा संसर्गसँ पूर्व ओ नीक जकाँ साबुन तेल आदि लगा स्‍नान ध्‍यान कऽ लेथि। अन्‍यथा हमरा लग नहि आबथु। सुधाकर ऐ बातकेँ स्‍वीकारि लेलैन। हमर यातना, हमर विद्रोह, हमर अरमानक टुटब, रागिनीक प्रेम-विवाह, विवाहेत्तर शोषण आत्‍महत्‍या सभ हमरा लेल साहित्‍य सृजनक आधार आ सामग्री बनि गेल। हम लिखैत रहलौं। तीन विधामे- कविता, कहानी आ उपन्‍यास। दुनू भाषामे- मैथिली आ हिन्‍दी। जखन किछु कविता आ गल्‍प छपए लागल तँ आरो उत्‍साहित भेलौं। बादमे रेडियोसँ सेहो हमर कथा आ कविताक प्रसारण नीज वाणीमे हुअए लगल। ..जनै छी राघवजी! हमरा सभसँ संतुष्‍टि ऐ बातसँ होइए जे लोक आ समाजआब नहु-नहु हमरा अपन साहित्‍य लेखनक कारणे जनैत अछि। हम प्रो. सुधाकरक पत्नी या चीफ इन्‍जीनियर केर बेटीक रूपमे अपन परिचय समाजमे नहि जानबए जाहै छी। मनक आर सभ अरमान तँ ध्‍वस्‍त भऽ गेल मुदा अपना कृतिक कारणे आइ अबस्‍स जानल जाइ छी। पैछला मासमे हमर एक कथा ‘सरिता’ आ एक कथा ‘हंस’मे छपबा लेल स्‍वीकृत भऽ गेल अछि। एक छोट कविता ‘कादम्‍बनी’क नव अंकमे छपल अछि। ऐ सभसँ हमरा आत्‍मिक संतुष्‍टि भेटैत अछि।” “आब अहाँसँ भेँट भेलापर हम पुरुषक प्रति अपन नजरिया बदलबाक प्रयास करब। जनै छी, जखन हम किशोर वयमे एलौं तँ मनक अनन्‍त अरमान छल। अपन सम-कक्ष तथा सिनियरो लड़का सभ हमरा बड़ गौरसँ देखैत छल। कतेक लड़का सभ हमरा सुना-सुना कऽ कहैत छल- ‘की चीज अछि नन्‍दिता! जेकर कनियाँ हेतै ओ बड्ड भाग्‍यशाली हएत। एकर घरबला तँ एक साल धरि एकरा छोड़ि केतौ निकलबे ने करत।’ आदि-आदि। ई बात सभ सुनि हम बड्ड आनन्‍दित होइत रही। परीक देशमे विचरन करए लगी। भेल जे दुनियाँक सभसँ सुन्‍दर, सिनेही आ रमनगर लड़का हमर जीवन-साथी बनत। मुदा हाय रे भाग्‍य..! ‘हे देव तूँ ई की केलह? हमर भाग्‍यमे की लिख देलह? कारी वर्ण, डेढ़ आँखि, हमरा उमेरसँ पनरह बर्खक अधिक आयुक वर! ओहो निरंकुश, मिथ्‍याभिमानी, नारीक शोषक, संस्‍कारहीन, आ मचण्‍ड! एहेन राक्षस जे सोलह-सतरह बर्खक लड़कीक भावनाकेँ नहि बूझि सकै छल! भॉंड़मे जाए ओकर शिक्षा आ समाजशास्‍त्रक ज्ञान। भाँड़मे जाए मर्यादा आ लोक-लाजक दीवार। दुर्भाग्‍य हमर ई छल जे हमरा सासुओक सुख नहि भेटल! जखन सुधाकर इण्‍टरमिडिएटमे पढ़ै छला, तखने माए मरि गेलखिन। कियो हमर भावनाकेँ बुझिनिहार नै।” नन्‍दिता राघव दिस देखैत बजली- “राघवजी, आब तीन बजि गेल। अहाँकेँ निन्‍द आबि गेल हएत। दिन भरिक थाकल छी। अहाँ अराम करू, हम जाइ छी।” राघव- “कुनो एहेन बात नइ छै नन्‍दिता भाभी। अहाँकेँ संगति हमरा नीक लगैए। किछु आरो बात करू। काल्‍हि तँ आब केतौ नहियेँ जाएब।” ई कहि राघव नन्‍दिताकेँ पूरा अपना-आपसँ सटा लेलैन। राघव नन्‍दिताक आङीकेँ लगभग खोलि देलखिन। हाथ नाभीसँ निच्‍चाँ जा चहलकदमी करए लगलैन। प्रारम्‍भमे नन्‍दिता राघवक हाथकेँ रोकलखिन। राघव नहि मानला। नन्‍दितो छोड़ि देलखिन। दुनू एक दोसरक देहक अनुभूति आ विलक्ष्ण आन्‍नदमे मग्न भऽ गेला। दू शरीर एक आत्मा बनि गेल। ई क्रिया करीब बीस मिनट धरि चलल। नन्‍दिताक गौर वर्ण आ राघवक श्‍यामल शरीर एक अलग रंग-रभसक संजोग बना रहल छल। नन्‍दिताकेँ आइ एना बुझा रहल छेलैन जेना ओ राघव संगेअपन हनीमून मना रहल होथि। आब नन्‍दिताकेँ एहसास भेलैन जे सुहागराति की होइ छै। आब ओ बुझली जे शारीरिक सुख अगर स्‍त्री-पुरुखक मिलाप आ आपसी सहयोगसँ होइ तँ ओ सुख सर्वाधिक सुन्‍दर सुख छी। राघव पागल जकाँ नन्‍दिताक प्रत्‍येक अंगकेँ अपना वसमे केने जा रहल छला। नन्‍दिताकेँ अपनामे समेटने जाइत छला आ नन्‍दिता राघवक प्रेममे मिश्री जकाँ घुलल जा रहल छेली। सभ मर्यादा खतम भऽ गेल छल। दुनू एक-दोसराक प्रत्‍येक अंगकेँ प्राकृतिक रूपे दर्शन केलैन, भोगलैन आ तिरपित-तिरपित भऽ गेला। ने धोख ने लाज। केवल आ केवल शारीरिक आ मानसिक प्रेम आ समर्पण। दुनू ब्‍याहल मुदा दुनूक प्रेमकेँ निश्‍छल आ प्रथम प्रेमक अनुभूति कहल जा सकैत छल। अन्‍तमे कामोत्तेजनाक अधिक आवेशसँ राघव आ नन्‍दिता घामसँ तरबतर भऽ गेला। राघव हाफए लगला। नन्‍दिता झट-दनि अपन वस्‍त्र सम्‍हारए लगली। राघव सेहो अपन वस्‍त्र आ ओछाइनकेँ सेरियाबए लगला। नन्‍दिता ठाढ़ होइत बजली- “आब तीन बाजि कऽ पच्‍चास मिनट भोर भऽ गेल। बीस मिनटमे बच्‍चा सभ उठि कऽ पढ़ब शुरू करता। आब अहाँ सुतू। हमहूँ जाइ छी।” राघव एकबेर पुन: नन्‍दिताक हाथ पकैड़ हुनका अपन हृदयसँ सटेलखिन आ अनेको बेर अनेको स्‍थानपर चुमि लेलखिन। नन्‍दिता राघवक ऐनूतन प्रयोगसँ गद्-गद् भऽ गेली। आब नन्‍दिता अपन कक्षमे प्रविष्‍ट भऽ गेली। राघव नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे सोचए लगला। एकबेर भेलैन जे की ओ अपन अपन पत्नी- सहजन्‍याक संग धोखा तँ ने कऽ रहला अछि? एक मन ईहो भेलैन जे कदाचित राघव अपन ऐ कृत्‍यसँ प्रोफेसर सुधाकर-संगे बिसवाघात तँ ने कऽ रहला अछि? फेर भेलैन जे नहि नन्‍दिताक समस्‍त वृतान्‍त बुझला बाद शायद राघव आ नन्‍दिताक बीच जे किछु भेल ओ निश्चित रूपेण सर्वथा धर्मक कार्य छी। यएह बात सभ सोचैत-सोचैत राघव नीनभेर भऽ गेला। प्रात: नियत समैपर राघव उठि गेला। आश्चर्यक बात ई जे नन्‍दिता सेहो चहकैत उठली। हुनकर सौन्‍दर्यमे आइ एक नैसर्गिक रोहानी झलकैत छल। समुच्‍चा शरीरक पोर-पोर जेना प्रेम-प्रसंगक अनुभूतिसँ खिल रहल छेलैन। नन्‍दिता बेबीक आबैक प्रतिक्षा नहि केली। सीधे रसोइ कक्षमे गेली। सर्व प्रथम राघव लेल इन्‍होर पानि, तत्‍पश्चात नेबोबला चाह लऽ कऽ आबि गेली। नन्‍दिता आ राघव संगे-संग चाह पीलैन। राघव स्‍नान-धियान केला बाद घर बन्‍द कऽ दू घण्‍टा सुति रहला। तकर बाद दू घण्‍टा धरि अपन फिल्‍ड डायरी लिखलैन। आब भोजन तैयार छल। राघव आ नन्‍दिता संगे भोजन केला। भोजनक बाद नन्‍दिता बेबीकेँ दस टका आ गहुम दैत कहलखिन- “बेबी, जो गहुम पीसेने आ। आइ-काल्‍हि मीलबला दोसर चीज मिला दइ छै, तँए अपना सामनेमे गहुम पीसा कऽ चिक्कस नेने आ।” बेबी नन्‍दिताक आज्ञाक पालन करैत गहुम पीसबैले विदा भेल। आब समए दू बजि कऽ पच्‍चीस मिनट भऽ रहल अछि। नन्‍दिता राघवक कक्षमे प्रवेश करैत बजली- “राघवजी, आब ऐ घरमे मात्रहम आ अहाँ छी। हमर दुनू बालक साढ़े चारि बजे साँझमे स्‍कूलसँ विदा हएत।” राघव नन्‍दिताक इसारा बूझि गेला आ झट-दनि घर बन्न कऽ लेलैन। आब नन्‍दिता आ राघव भयमुक्‍त वातावरण पाबि कामदेवक आगोशमे मग्न भऽ गेला। करीब एक घण्‍टा धरि दुनू एक-दोसरामे पूर्ण रूपेण समर्पित भऽ गेला। हरेक दैहिक सुखक बाद दुनू आर उत्‍साही आ स्‍फूर्तिवान भऽ जाइत रहैथ। दुनूक चेहरापर एक फराक चमक झलैक रहल छेलैन। लगभग चालिस मिनटक पछाइत नन्‍दिता राघवकेँ कहलखिन- “राघवजी, आब घरक केबाड़ खोलि दियौ। बेबी कुनो क्षण आबि जाएत। बेबी आ हमर दुनू बालक सुधाकरक गुप्‍तचर अछि। हिंगसँ हरैद तक सभ बात सुधाकरकेँ बतबैत रहै छैन। एकरा सभ लग एक बातक धेयान अबस्‍स रहए जे हमरा लोकैन कुनो ओहन हरकत नहि करी जइसँ एकरा सभकेँ कुनो आभाष लगइ।” राघव गरदेन हिला नन्‍दिताक बातकेँ समर्थन केलैन। आब सभ राति नन्‍दिता अपन नव रचनाक डायरीमे आबि राघवक कोरामे माथ रखि अपन साहित्‍यक चर्चाक संग-संग प्रेम-प्रसंग आ देहक संसर्ग सेहो चलैत रहलैन। आब दुनूक मध्‍य मानसिक, साहित्‍यिक आ शारीरिक समन्‍वय परिपक्‍व भऽ रहल छेलैन। दुनू एक-दोसरक प्रति समर्पित एना जेना राघव अठारह बर्खक होथि आ नन्‍दिता सतरह बर्खक। आ उमहर ऐ सभ घटनासँ बेखबर प्रोफेसर सुधाकर बनारसमे कॉपी जँचबामे मग्न...। जखन राघवकेँ दिल्‍ली जेबाक पाँच दिन शेष रहि गेलैन तहिया प्रो. सुधाकर आबि गेला। दोसर दिन बिहार बन्‍द रहइ। कारण बसबला आ टैक्‍सीबला बन्‍दक आह्वान केने रहै, तँए राघव फिल्डवर्क लेल केतौ ने गेला। इमहर प्रो. सुधाकरकेँ चलि एबाक कारणो रातुक साहित्‍य श्रवण आ रंग-रभस सेहो समाप्‍त भऽ गेलैन। दिनेमे दस-पनरह मिनट लेल नन्‍दिता प्रो. सुधाकर केर समक्षमे राघवसँ किछु पुछि लइ छेली। आब स्‍वतंत्रता समाप्‍त भऽ चुकल छेलैन। दोसर दिन हड़तालक कारणे राघव केतौ नहि गेला। नन्‍दिता प्रसन्न छेली। ओना राघव आ नन्‍दिताक प्रसन्नता कइयेक गुणा बढ़ि गेलैन जखन प्रो. सुधाकर राघवसँ कहलखिन- “राघवजी! आइ हम विश्वविद्यालय जा रहल छी। विभागमे रिसर्च कमिटिक मिटिंग तीन बजेसँ अछि। ओइसँ पहिने हमरा लोकैनकेँ किछु दस्‍तावेज इत्‍यादि ठीक करक अछि। हम पाँच बजे साँझ धरि फ्री हएब। जखन आएब तँ निश्चिन्‍तसँ गप करब।” ई कहि आधा घण्‍टाक भीतर प्रो. सुधाकर घरसँ बाहर निकैल गेला। कनियेँ कालक बाद नन्‍दिता स्‍नान-धियान करक बास्‍ते विदा भेली। बारह बजैत-बजैत राघव आ नन्‍दिता संगे भोजन केला। भोजनक तुरंत बाद बेबी सेहो खेलक। नन्‍दिता बेबीकेँ कहलखिन- “जो बेबी अपन माएसँ भेँट केने आ। पाँच बजे धरि चलि अबिहेँ।” बेबी नन्‍दिताक कृपा बूझि गद-गद भऽ गेलि। पाँच मिनटक भीतर कैम्‍पससँ बाहर भऽ गेलि। आब नन्‍दिता आ राघव सबा चारि बजे धरि स्‍वतंत्र...। नन्‍दिता अपन साहित्‍यक डायरी लऽ राघवक कक्षमे प्रवेश केली। राघव गद्-गद् भऽ गेला। नन्‍दिता अपन साहित्‍य-चर्चा प्रारम्‍भ केलैन। आधा घण्‍टाक बाद राघव उठला आ नन्‍दिता सहज भावसँ बिहुसैत आ मने-मन गदगदाइत राघवक कोरामे बैस गेली। आब एक दिस नन्‍दिता अपन साहित्‍य सुना रहल छेली आ दोसर दिस राघव नन्‍दिताक संग छेड़खानीमे व्‍यस्‍त आ मस्‍त छला। ई क्रम चलैत रहलैन। एकाएक करीब पौने दू बजेमे प्रो. सुधाकर किछु कार्यसँ घर आबि गेला। नन्‍दिता झट-दनि राघवक कोरासँ निच्‍चाँ उतैर गेली। बिना सुधाकरकेँ देखने नन्‍दिता अपन घर दिस विदा भेली। प्रो. सुधाकरक आँखि क्रोधे आगि उगैल रहल छेलैन। हलाँकी सुधाकर ने तँ राघवकेँ किछु कहलखिन आ ने नन्‍दितेकेँ। आधा घण्‍टाक पछाइत सुधाकर किछु फाइल लऽ पुन: विश्वविद्यालय दिस विदा भेला। जाइ काल राघवकेँ कहलखिन- “राघवजी, अहाँ अपन समान लऽ ग्राउण्‍ड फ्लोरमे एकटा छोटका रूम अछि तइमे रखि लिअ आ हमरे संगे विश्वविद्यालय चलू।” राघव समान लऽ निच्‍चाँ चलि एला। घरमे ताला लगेला आ सुधाकर संगे विश्वविद्यालय दिस विदा भेला। भरि रस्‍ता सुधाकर राघवकेँ किछु नहि कहलखिन। राघवो सहमल छला। भेलैन अगर सुधाकर अपमानित करितैथ तँ की होइत..? खैर, राघवकेँ पुस्‍तकालयमे बैसा प्रो. सुधाकर अपन विभागमे चलि गेला। राघव पुस्‍तकालयमे तीन चारि गोट पोथी लऽ एकठाम बैस पढ़ए लगला। यद्यपि पढ़ैमे मन नै लगलैन। हलाँकी राघवकेँ अपन कृत्‍यपर कुनो पश्चाताप नहि छेलैन। आब हुनकर मनमे प्रो. सुधाकरक प्रति कुनो सम्‍मान नहि रहि गेल छेलैन। नन्‍दिताक कथा सुनला बाद सुधाकरमे ओ एक निहायत राक्षसकेँ देखए लगला। मुदा राघवकेँ अपनासँ बेसी नन्‍दिताक चिन्‍ता छेलैन। प्रोफेसर सुधाकर छह बजेमे राघव लग पुस्‍तकालय एला आ दुनू गोरे संगे विदा भेला। सुधाकर रस्‍तामे राघवसँ कहलखिन- “राघवजी, अहाँ नन्‍दिताक बातमे समए बरबाद नहि कऽ अपन कार्यपर धियान केन्‍द्रित करू। हुनका कथा लिखबा आ सुनेबाक अतिरिक्‍त कुनो काज नहि छैन। हमरा अहाँ सबहक बात बेवहार नीक नहि लागल। तँए निच्‍चाँ लऽ एलौं अहाँकेँ। निच्‍चोमे सभ बेवस्‍था छै। हमहूँ अहीं लग बातचित करबा लेल चलि आएब। केवल भोजन लेल ऊपर हमर निवासपर जेबाक अछि।” राघव गरदेन हिला प्रो. सुधाकरकेँ अपन स्‍वीकृति दऽ देलखिन। दुनू गोरे गन्‍तव्‍यपर पहुँचला। राघव ऊपर नहि गेला। निचला कमरा बहुत छोट आ तीतर-बीतर रहइ। मकराक झोलसँ भरल। किछु किताब अबस्‍स राखल रहइ। राघवकेँ भेलैन जे एतए रहनाइ सम्‍भव नहि अछि। मुदा राति भऽ गेल रहइ। सोचलैन राति भरि कहुना रहि जाइ छी। साढ़े आठ बजे दिवाकर आबि कऽ कहलकैन- “भोजन तैयार अछि चचाजी। चलू करबा लेल। पापा आ मम्‍मी दुनू अहाँक इन्‍तजार कऽ रहल छैथ।” राघव आधा मनसँ विदा भेला। प्रो. सुधाकर आ नन्‍दिता डायनिंग टेबुलपर बैसल छला। प्रो. सुधाकर राघवकेँ अपना लग बैसक इशारा केलखिन। राघव हुनकर आज्ञाकेँ सम्‍मान करैत हुनके लग बैस गेला। नन्‍दिता कनी परेशान अबस्‍स छेली। मुदा ओतबो नइ जेतेक राघव सोचै छला। खैर, सभ गोरे भोजन केला। नन्‍दिता राघवकेँ लौंग आ इलायची तथा प्रो. सुधाकरकेँ पान बना देलखिन। नन्‍दिता सेहो स्‍वयं इलायची खेली। पान छोड़ला आइ छठम दिन छेलैन नन्‍दिताकेँ। आब प्रो. सुधाकर आ राघव निच्‍चाँ दिस विदा भेला। राघवक मनमे रातिक वार्तालाप नहि होमाक कचोट तँ बहुत छेलैन मुदा की कऽ सकै छला। राघवक कक्षमे आबि प्रो. सुधाकर हुनकासँ परियोजना सम्‍बन्‍धी बात बहुत काल धरि करैत रहला। लगभग एगारह बजे रातिमे प्रो. सुधाकर सुतैले गेला। ऐ घरमे राघवकेँ भरि राति नीन नइ भेलैन। ऐगला दिन भोरे राघव कुनो गाम लेल प्रस्‍थान केलैन। बहुत देर धरि कार्य केला बाद आपसीमे दरिभंगाक नै आबि अपन गाम चलि गेला। दू दिन अपने गामसँ अलग-अगल स्‍थान जाथि। दोसर दिन भोरे-भोर प्रो. सुधाकर फोन केलखिन तँ राघव कहि देलखिन जे ओ अपन वृद्ध माता-पितासँ भेँट करक हेतु अपन गाम चलि एला। राघव ईहो कहलखिन जे दिल्‍ली जाइसँ एक दिन पूर्व ओ दरिभंगा जेता आ विस्‍तारसँ चर्च करता। नन्‍दितासँ सेहो राघवकेँ फोनपर बात होइ छेलैन। कार्यक समाप्‍तिक बाद राघव दरिभंगा गेला। तखन प्रो. सुधाकर घरपर नहि छला। नन्‍दिता निच्‍चाँ एली आ कहलखिन जे प्रो. सुधाकर लहेरियासराय कुनो मित्रकेँ कुनो नर्सिंग होममे देखबा लेल तुरंते गेल छैथ। राघव हाथ-पएर धोलैन। तैबीच नन्‍दिता स्‍वयं चाह बना लऽ अनली। राघव चाह पीबैत बजला- “नन्‍दिता भाभी, हमरा कारणे अहाँकेँ बहुत दिक्कत भऽ गेल?” नन्‍दिता- “अरे! बेकार अहाँ किए चिन्‍ता करै छी राघवजी? सुधाकर अपने-आप ठीक भऽ जेता। हिनका हमर कुनो पुरुखसँ बातचित आ आत्‍मियता नहि पसिन छैन। हमरा दुख केवल ऐ बातक अछि जे अहाँकेँ निच्‍चाँ आबए पड़ल!” राघव- “नहि! ऐसँ हम परेशान नइ छी। हमरा केवल अहाँक चिन्‍ता भऽ रहल छल। कहीं भाइ साहैब मारि-पीटपर ने उतरल होथि?” नन्‍दिता- “ओते हिम्‍मत नहि छैन। हमरापर जहिया हाथ उठा देता तहिया हमहूँ औकात देखा देबैन।” ई कहैत नन्‍दिता राघव दिस बढ़ली आ राघवजीक कपार चूमि लेली। राघव पुन: उत्‍साहित भेला। कक्ष बन्‍द केलैन आ दुनू गोरे आनन्‍दलोकक अनुभव करैत रभसमे लागि गेला। एना लगैत छल जेना नन्‍दिता सिर्फ आ सिर्फ राघव लेल बनल होथि। राघव नन्‍दिताक शारीरिक सानिघ्‍य पाबि तृप्‍त छला। नन्‍दितो तहिना छेली। करीब चालिस मिनटक पछाइत दुनू अपन-आपकेँ ठीक केलैन आ घरक दरबज्‍जा नन्‍दिता खोलली। फेर गप करए लगला। थोड़े कालक बाद नन्‍दिता ऊपर जाए लगली। राघव एकबेर फेर भरि पाँज-के पकैड़ नन्‍दिताकेँ चुमए लगला। नन्‍दिता सेहो प्रत्‍युत्तरमे सएह केलखिन। आब राघव अपन डायरीमे छुटल बात सभ लिखए लगला। कैमराक चीप निकालि फोटो सभकेँ लैप-टॉपमे डाउनलोड केलैन। फेर थीमक अनुसारे ओकर अलग-अलग फोल्‍डर बना ओइमे रखला। ताबे प्रो. सुधाकर आबि गेलखिन। दुनू गोरेमे बहुत देर धरि गप भेलैन। नन्‍दिता बीचमे बेबीकेँ भेजलखिन। बेबी आबि कऽ बाजलि- “चाह लाबी की?” प्रो. सुधाकर जबाव देलखिन- “हँ-हँ, चाह बना। कनी चूरा सेहो भूज। हम सभ ऊपरे आबि रहल छी।” आब राघव आ प्रो. सुधाकर ऊपर एला। बेबी चूरा भुजए लगल। सुधाकर अपन पुत्र दिवाकरकेँ दोकानसँ पकौड़ा लाबए कहलखिन। सभ गोरे भूजल चूरा आ गरम-गरम पकौड़ा खेलैन। नन्‍दिता सेहो संगे बैसल छेली। राघव आ प्रो. सुधाकर फेर निच्‍चॉं आबि गेला आ सभ डाटापर चर्च प्रारम्‍भ केलैन। साढ़े दस बजे रातिमे कार्यक समाप्‍तिक बाद सभ गोरे भोजन केला। राघव अपन कक्षमे आबि किछु आरो बचल बात सभ लिखलैन आ सूति रहला। दोसर दिन राघव स्‍नान-धियान केलैन आ छह बजे भोरे प्रो. सुधाकर स्‍वयं हुनका ऊपर लऽ गेलखिन। चूरा-दही-चीनी परोसल छेलैन। नन्‍दिता कीचनमे व्‍यस्‍त छेली। जखन राघव जलखै कऽ लेला तखन नन्‍दिता कीचनसँ बाहर एली। एकटा टीफीन राघव लेल तैयार छेलैन। राघवकेँ दैत कहलखिन- “राघवजी, अहाँक पत्नी सहजन्‍या सुधाकरकेँ कहने छेलखिन जे अहाँ बाहरक वस्‍तु यात्राक अवधिमे नइ खाइ छी। तँए थोड़ेक पुरी, पड़ोरक दू फँक्का आ थोड़ेक खजुरिया बना देलौं अछि। एकरा खाइत जाएब भरि रस्‍ता...।” राघव लग कृतज्ञताक कुनो शब्‍द नहि छेलैन। राघव आब प्रो. सुधाकरकेँ चरण स्‍पर्श केला। सुधाकर पीठ ठोकि असिरवाद देलखिन आ हृदयसँ लगेलखिन। आब राघव नन्‍दिताक चरण छुला। नन्‍दिता अपन हाथ राघवक पीठपर देलखिन। नन्‍दिताक हाथक स्‍पर्शसँ राघव धन्‍य भऽ गेला। नन्‍दिता आ हुनकर दुनू बालक राघवकेँ निच्‍चाँ धरि छोड़ि एलैन। राघवक संगे प्रो. सुधाकर सेहो रेलबे स्‍टेशन धरि विदा भेला। स्‍टेशनपर गाड़ी आबि गेल रहइ। राघव गाड़ीक प्रथम ए.सी. कोंचमे बैस गेला। प्रो. सुधाकर सेहो कोच धरि गेलखिन। आब ट्रेन पाँच मिनटमे खुजत। ई जानि राघव पुन: प्रो. सुधाकरकेँ चरण स्‍पर्श करैत कहलखिन- “श्रीमान, आब अहाँ उतैर जाउ।” प्रो. सुधाकर गाड़ीसँ निच्‍चाँ उतैर गेला। ट्रेन खुजि गेल। राघव एकबेर पुन: नन्‍दिताक सम्‍बन्‍धमे सोचए लगला। मनमे एलैन, केना परिस्‍थिति मनुखकेँ की की बना दइ छै। नन्‍दिताक परिस्‍थिति हुनका लेखिका बना देलकैन- परिस्‍थिति लेखिका। सुग्गा आ श्रृंगार: मैथिली लोकगीतक परिदृश्य मे भारतीय लोक आ शाश्त्र दूनू परंपरा में सुग्गा अपन विशिष्ट स्थान आदि काल स रखने अछि। सुग्गा सिनेह, प्रेम, ज्ञान आ श्रृंगार के प्रतीक मानल जैत अछि। अनेक कथा समस्त भारतवर्ष में भेटत जतए सुग्गा अपन बुद्धिमानी स अलग कीर्तिमान स्थापित केलक। जायसीक महाकाव्य पद्मावत में हीरामन सुग्गाक भूमिका के नहि जनैत अछि। कोना हिरामन राजकुमारी पद्मावती अथवा पद्मिनी संग अपन समय बीतबैत छल; कोना पद्मिनी अपन प्रेमक बात आ विवाह नहि होबाक टीस ओकरा संग बाटैत छली; आ कोना हीरामन सुग्गा सिंहलद्वीप के राजकुमारी पद्मावती आ चित्तोडगढक राजा रत्नसेन केर प्रेम में सुत्रधारक भूमिका के निर्वहन करैत अछि, के बारे में सबके बुझल अछि। बात मैथिली लोकगीत में सुग्गाक स्थान पर क रहल छी ताहि पद्मावत के प्रसंग पर विस्तार सं नहि जा रहल छी। अगर लोक व्यव्हार के बात करी त मिथिला समाज में सुग्गा आ आनो चिरै-चुनमुन एवं जानवर सबहक अपन भूमिका अछि। ओकरा मानवीकरण कए ओकर भाव के देखल जैत छैक। लोक अपन बच्चा, प्रिय लोक, जमाय के सुग्गा कहि संबोधित करैत छथि। ओ बच्चा जकर स्मरण शक्ति तीक्ष्ण होइत छैक तकरा सुग्गा कहि संबोधित कैल जैत छैक।माय, पितियाईन, नानी, दाई इत्यादि अपन बच्चा के सुग्गा कौर, मेना कौर कहि क भोजन खुअबैत छथि। नायक अथवा नायिका के नाक अगर बड्ड सुन्दर छैक त ओकरा सुग्गाक ठोर या चोंच स उपमा देल जैत छैक। मधुर बोली के सुग्गा सनहक बोली कहल जैत छैक। स्त्रीगन सब फ्रेम में कुरुश स सुग्गा मेना बनबैत छली. मिथिला चित्रकला में आ कोहबर घर में स्त्री आ पुरुष सुग्गा के स्नेहालिंगन अवस्था में बॉर्डर पर चित्रित कैल जैत छैक। स्नेहालिंगन के ठेठ मैथिली में लटपटायल अवस्था कहल जैत छैक। मिथिला चित्रकला में बॉर्डर पर वैह लटपटिया सुग्गा आपस में एक दोसर के पकड़ने चोंच में चोंच सटेने अंकित रहैत छैक। कोबरघर में एहि चित्रांकन केर उकेरबाक तात्पर्य ई रहैत छैक कि जेना सुग्गा के पति-पत्नीक जोड़ी में प्रेम रहैत छैक तेहने प्रेम, सिनेह आ आकर्षण एहि वरआ कनिया में बनल रहैक। दुनु एक दोसर स कहियो अलग नहि हो। दुलहिन स्त्री सुग्गा आ दुलहा पुरुष सुग्गा बनि जैत छैक। सुग्गा स्नेहक संग-संग सौन्दर्य आ रंगक प्रतिबिम्ब सेहो बनि जैत छैक। अगर बड्ड सुन्दर हरियर रंग केर सारी अथवा नुआ छैक त ओ सुगबा रंग अथवा सुगापंखी रंग कहेतै। लाल रंग केर मान्यता तखन स्थापित हेतैक जखन ओकर तुलना सुग्गाक ओठ स कैल जेतैक। सुग्गा स सिनेह अतेक जे ओकरा सोनाक पिंजरा में रखबाक कल्पना कैल जैत छैक। मैथिली लोकपरम्परा में सुग्गा बड्ड महत्त्व रखैत अछि। दुटा एहेन दन्तकथा मिथिला भूमि में व्याप्त अछि जाहि में सुग्गाक भूमिका के बेर-बेर स्मरण गर्व स कैल जैत अछि।पहिला कथा सीता सं सम्बंधित अछि आ दोसर कथा आदि गुरु शंकराचार्य के महापण्डित मंडन मिश्रक गामक यात्रा सं। एहि आलेख के आगा बढ़ाबी ओहि स पहिने ई दुनु दन्तकथा के बुझब जरुरी। प्रारंभ सीताक प्रसंग सं करैत छी। मिथिला में सुग्गा आ सीता के लऽ कऽ एकटा दन्तकथा प्रचलित अछि। बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी में भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से काम। झुला लागल प्रेमक डाली। झुलथि सीता प्यारी ना।। सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर में गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान में मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ में प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली। सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल में आनि पिंजरा में राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत! राजमहल में अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी में सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ीमनुखक आवाज़ में मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी में स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"। सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी में स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा में बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा में देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली। ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरुहमर पत्नी के बदला में अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा में बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक। अपन पत्नी के प्रेम में मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल में आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन! बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट में हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!" कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना में मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल में कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी।आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था में घर स निकालि देता”। आव सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन। आब दोसर दन्तकथा दिस बढ़ी। दोसर दन्तकथा शकाराचार्य आ महापण्डित मंडन सं जुड़ल अछि। मिथिला में अगाध पण्डित आ विद्वान सब भारतवर्ष केर सब कोनस अबैत छलाह। अतए अर्थात मिथिला में परम्परानुसार एक बेर में अनेक दिन धरि चलए बला शास्त्राथ में जीवन-जगत सं संबंधित विषय एवं उप-विषय पर वाद-विवाद चलैत छल। जे विद्वान शास्त्रार्थ में जितैत छला हुनकर विशेष सम्मान होइत छल। मान्यता ई अछि जे शंकराचार्य मिथिला के परम विद्वान आ कुमारिल भट्ट केर शिष्यमहापण्डित मंडन मिश्रक प्रसिद्धि सं प्रभावित भ स्वयं हुनका सं भेट करक हेतु आ शाश्त्रार्थ करबाक हेतु भ्रमण करैत मंडन केर गाम पहुचला। गामक इनार पर पनिहारिन सब पानि भरैत आपस में संस्कृत में वार्तालाप क रहल छलि। शंकराचार्य पनिहारिन सबके पुछलथिन: “महापण्डित मंडन मिश्रककुन घर छनि?”पनिहारिन में स एक महिला आगा अबैत बजली: “आगा बढ़ल जाऊ। जाहिदरबज्जा पर सुग्गो आपस में शास्त्रार्थ करैत हो, वैह घर महापण्डित मंडन मिश्रकहेतनि”। शंकराचार्य अपन शिष्य मण्डलीक संग आगू बढ़लनि। कलम, पोखरि, बसबट्टी, फुलक कियारी, लहलहातइत हरियर धानक खेत होइत थोरेक काल में महिषी गांव पहुंचला। महापण्डित मंडन मिश्रक घर ताक में कुनों दिक्कत नहि भेलनि। एक घर के दरबज्जा पर पिंजडा में सुग्गा आपस में शास्त्रार्थ क रहल छल। शंकराचार्य के भांगठ नहि रह्लनि जे यैह घर महापण्डित मंडन मिश्रक छनि। आब लोकगीत केर आंगन में प्रवेश करी आ देखी जे सुग्गा अपन कहेन स्थान बनेने अछि। एक नायिका के दर्द देखू. बेचारी के पति परदेस गेल छैक। बहुत दिन भ गेलैक परदेस स गाम एला। अखाढ़ मास समाप्त होम पर छैक लोक खरही काटि घर लग जमा करैत अछि। कथी लेल? जे घर के छारत। मनुखक त बाते छोडि देल जाओ चिरै-चुनमुन सब एक-एक खर के चुनि अपन खोता अथवा नीड़ के निर्माण क रहल अछि। सब आब मधुमास अर्थात बरसात में अपन-अपन जोड़ी संग रहत। मधुमसक मिलन यामिनीक सुख भोगत। देह आ नेह एक बनतैक। मुदा हाय रे दुर्भाग्य! बेचारीक कंत त एखनो परदेसे में छैक।लगैत अछि जे नायिका अही वियोग स शरीर ने त्यागि दे! अखाढहि मास अखाढी रोप कि नब खरही सब काटए लोक चिडै चुनमुनी सब खोता लगाएल कि हमरो कंत रहल घर छोडि कि हम मरि जइहें।। छठि माता के प्रसन्न करबाक हेतु महिला सब रंग-विरंगक गीत गबैत घाट दिस जैत छथि। हरेक गीत में प्रसाद सामग्री के वर्णन, विधक विधान, माता के गुणगान, आ सुचिताक ध्यानक वर्णन रहैत छैक। एक गीतक दू पांति देखू जे केना ओहि में सुगा के वर्णन अछि। कांच बांस के आधार बना केराक दू घौर के बीचो बीच फसा देल गेल छैक। दुनु कात घौर में हत्थाक हत्था पाकल-पाकल पीयर-पीयर केरा लुबझल छैक। केरा के आकर्षण देखि झुण्डक झुण्ड सुग्गा ओहि पर लुधकि रहल छैक। पबनौतिन मनुख जकां सुग्गा के बुझबैत छथिन के हे सुग्गा ई केराक घौर छठि महरानी के निमित्त छैक। एहि पर तों चोंच मारि एकरा अपित्र नहि कर। जखन पूजा पूरा भ जेतैक त तोरा तोहर हिस्सा भेट जेतौक।सम्बाद एहेन जेना सुगा एक एक शब्द के बुझैत हो आ आज्ञा के मानबक हेतु तत्पर। ई भेल लोक परमपरा में मनुख आ चिरै के बीच तारतम्य आ सामंजस्य। कांचहि बांस के बगहिया बह्गी लचकत जाए केरा फरल घौर स ओहि पर सुगा मंडराय छठि महरानी के दोसर गीत में कनि पबनौतिन तमसा जैत छथि कियैक त सुग्गा कनि लुबधि-लुबधि क आवश्यकता स अधिक परेशान क देने छनि। अहि बेर गीत में ओकरा सावधान भ जएबाक लेल कहैत छथिन: “देख सुग्गा! बड्ड भ गेल. लाख बुझेलाक बादो तों समरह के नाम नहि ल रहल छै। कहि देल्युक ने जे ई केराक घौर छठि महारानी के निमित्त छैक! मुदा तों आजिज क देलै। आब किछु नहि कहबौ। बौआ के पिताजी आबि रहल छथिन बन्दुक हुनका संगे छनि। गोली मारि देथुन। फेर हमरा नहि कहिहैं जे सावधान नहि केलयौक?” ई भेल लोकक चिरै आ चुनमुन के प्राति सिनेह। जेना माय अपना बच्चा के डरबैत छथि तहिना ओही सिनेह आ अनुराग स पबनौतिन सुग्गा के डरा रहल छथि। गोली मरबाक बात होइत छैक। मारल नहि जैत छैक। एहन अवस्था में जौ प्रकृति आ संस्कृति में समन्वय नहि बनत त कोना बनत? जखन वर बरियाती संगे कन्या के घर पर प्रवेश करैत अछि त बरक सुन्दर छवि देखि सासु गदगद भ जैत छथि। बरक मनमोहक छवि के तुलना सुग्गा सं कैल जैत अछि। महाकवि विद्यापति सेहो अपन पदावली में एक गीत में वरक सुन्दरता सुग्गा स करैत छथि।जमाए केर तुलना सोभनगर सुग्गा सं करैत सासु आ बूढ पुरान महिला सब प्रसन्न भ रहल छथि. धिया के भाग्य पर गुमान भ रहल छनि। गीत गाबि-गाबि सोचैत छथि जे ई जे अतेक निक सुग्गा रूपी जमाए छथि से कत स आबि क नेह लगेने छथि? ई सबहक मनमोहना कत बसेरा बनेने छथि? ई सोभनगर सुग्गा अपन गाँव स आबि सासुर में बसेर केने छथि आ सासुरक लोक सभ सं नेह लगेने छथि। हुनकर ससुर पिंजरा बना ओहि में एहि बर रूपी सुग्गा के बझा रखने छथि। पिजरा शब्द दुलहिन लेल कैल गेल छैक. सुग्गा जखन पिजरा में रहत त ओकरा आहार चाही। से आहार देबाक जिम्मेदारी सासु के देल गेल छनि। एहेन आहार देथु जाहि स सुग्गा के उचाट नहि लागै। संगहि सासु के इहो डर भ रहल छनि जे सुग्गा के जखन पाँखि झमटगर आ मजबूत भ जेतैक त भागि ने जाय? ताहि सासु एहो कहैत छथि जे एहेन सुग्गा के पोसने की लाभ।थोरेकबे दिनक बाद ई अपन घर चलि जायेत। आखिर जमाए रूपी सुग्गा कतेक दिन सासुर रूपी पिजरा में सासु हाथक चारा अर्थात व्यन्जन खा रहत? विद्यापति कहैत छथि जे ई गौरी रूपी दुलहिन के भाग्य छनि जे साक्षात् महादेब रूपी मनमोहक वर भेट गेल छनि। हे दाइ-माइ हुलसित भ गीत नाद गाऊ आ विध-बेभार करू। कहमाँसँ सुगा आयल, नेह लायल। कहमा लेल बसेरा सुगा मन मोहल। फल्लां ठासँ सुग्गा आयल, नेह लायल। फल्लां गाम लेल बसेरा, सुग्गा मन मोहल। फल्लां ससुर पिजुरा गढ़ाओल, सुग्गा बझाओल। हे फल्लां सासु देथु आहर सुग्गा मन मोहब। एहन सुग्गा नहि पोसब जे पोस ने मानत। हे सुगबा होयत उड़ाँत, अपन गृह जायत। एहन सुग्गा हम पोसब जे पोस मानत। हे सुगबा होयत बुधियार, पलटि फेर आओत। भनहि विद्यापति गाओल, फल पाओल। हे गौरी केँ बढ़नु अहिबात, सुन्दर बर पाओल।। विवाह के समय में जखन बरिआत के संग वर अपन सासुर विवाह करक हेतु प्रस्थान करैत अछि त दरबज्जा परदाई-माई सब बरिआती लेल रंग विरंगक गीत समवेत आ उच्च स्वर में गबैत छथि। वर्णन होइत अछि बरिआतिक साज के, श्रृंगार के, उत्साह के, तैय्यारी के, वस्त्र विन्यास के। बरक पितामह एक चीज़क व्यवस्था त पितामह के भाई दोसर चीज केर व्यवस्था में लागल छथि।कियो बाजा-गाजा के व्यवस्था में त कियोकआन चीजक। एक आदमी हरियर सुग्गा के पिजरा के सजा रहल छथि कारण विवाह में सुग्गा नहि जैत से कोना? गीत इहो बतबैत अछि जे बरिआती दल के सदस्य के कत-कत ठहराएल जैत। सुग्गा सेहो ओना थोरे ने जैत? पूरा बनि ठनि क जैत।चिरै रूपी सुग्गा वरक ससुर के पोखरिक भीड़ पर चानन गाछ के ठारि पर बैसत आ वर रूपी सुग्गा अपन सासु के बनाओल कोहबर घर में दुलहिन संगे बैसता।सुगा के फल भोजन करक लेल देल जेतैक आ रहबाक लेल सोनाक पिजरा। बरिआत सब दरबज्जा पर विश्राम करता। आंगन केर सोझा में आजन-बाजन राखल जैत। बरिआती सब के लाल पीयर धोती पहिरक हेतु देल जएतैक। सुग्गा, सुग्गा संग सोनाक पिजरा आ फल भोजन जेना अनिवार्य होइक? बरिआतक लोक सब धोती पाबि प्रसन्न भ जेता आ जमाए बेटी देख खुश भ जेता। कोने बाबा साजल आजन बाजन कोने बाबा साजु बरिआत हे। कोने बाबा सजथु हरियर सुगबा सुगा लय जायब बरिआत हे। बड़का बाबा साजल आजन बाजन मझिला बाबा साजु बरिआत हे। छोटका बाबा साजथु हरियर सुग सुगा लय जायब बरिआत हे। कहमा बैसायब आजन-बाजन कहमा बैसायब बरिआत हे। कहमा बैसाएब हरियर सुगा सुगा लय जायब बरिआत हे। पोखरि बैसायब आजन-बाजन दुअरे बैसायब बरिआत हे। पिजड़े बैसायब हरियर सुगा सुगा लए जायब बरिआत हे। कथी लए जायब बरिआत हे। कथी लय बुझायब बरिआत हे। कथी लए बुझायब हरियर सुगा सुगा कथी लए बुझायब जमाइ हे। टारा लए बुझायब आजन-बाजन धोती लए बुझायब बरिआत हे। फल लए बुझायब हरियर सुगा बेटी लए बुझाएब जमाइ हे। एहेन जमइया कतहु ने देखल सुगा लए आयल बरिआत हे। दोसर बरिआत गीत में एहेन कल्पना कैल जैत अछि जे दुलहा घुमबाक हेतु तथा खेलबाक हेतु बहुत दूर हरियर क्षेत्र दिस चलि जैत छथि। रस्ता में अनेक तरहक गाछ-बृक्ष, पोखरि, फुलवारी भेटैत छनि।जैत-जैत एक गाछ पर सोहनगर हरियर कचोर सुग्गा भेटैत छनि जकरा पकडि क ल अबैत छथि। सुग्गा मांझ आंगन में बैस जैत अछि आ रुसि रहैत अछि जे ओकरा सेहो बरिआती जएबाक छैक। मुदा बरिआती में ओना थोरे ने जैत सुग्गा। सुग्गा के ओहि लेल अँगिया आ टोपी चाही। ओ सजि क सुन्दर बनि क बरिआत में जाए चाहैत अछि। सुग्गाक अतेक मानवीकरण केवल लोकगीत में भ सकैत अछि। आगा- आगा देखैत जाऊ सुग्गा के नखरा। सब बरिआतिक सदस्य दरबज्जा पर स्थान ग्रहण केलक। अतए सुग्गा के एकाएक चिरै छी ताहि बातक अनुभूति भेलैक। ताहि बरिआती के कन्या पक्ष के ओतए पहुचला उत्तर सुग्गा एक आमक गाछक ठारि पर चढि गेल आ ओतए स सब विध व्यवहार देखि पुलकित होइत रहल। सुग्गा के ठोर बड्ड रमनगर। जेहने सुग्गा के ठोर तेहने वरक ठोर। सासु आनंदे बताहि। प्रेमाधिक्य में मातलि कखनो सुग्गा के ठोर निहारथि त कखनो जमाय के ठोर आ नैन नक्श। सासुरानी के फेरो इहो डर बीच-बीच में भ रहल छनि जे कियोक दाई-माई कुनो करामात ने क देथि! की पता नजरि लागि जैक सुग्गा के, जमेईया के, या दुनु के? इहो सोचैत छथि जे सुग्गा त वनक प्राणी अछि ताहि अंतत वन में वापस चलि जैत मुदा बेटी आ जमाए त कम-स-कम थिर भ क रहत ने! हमरो दुलहा के फलां दुलहा खेल जेता बड़ी दुर हे। ओत स जे लएला दुलरुआ हरियर सुगबा सुगबा बइसल माँझे ठाम हे। सभ केओ साजल जाइ बरिअतिया सुगा लेल अंगुरी पसारि हे। हमहु त लेब बाबा अँगिया टोपिया हमहु त जायब बरिआत हे। सभ बरिअतिया अटकल दरबज्जा सुगबा अटकल आमक ठारि हे। सभ केयो निरेखथि जाइत बरिअतिया सासु निरेखि सुगा ठोर हे। आइ हे माइ पर हे पड़ोसिन सुगा जुनि नजरि लगाउ हे। वनहि के सुगबा बनहि उडि जायत रहि जायत धीअहि जमाई हे। झरनी जे मिथिलाक मुसलमान महिला सब आ ओकरा संगे कतौं-कतौं हिन्दू सब सेहो दहा संगे चलैत रहैत अछि आ गबैत रहैत अछि। यद्यपि झरनी उदासी के तर्ज पर आ तेज़ी स चलैत बटगबनी जकां गैल जैत छैक जाहि में मक्का मदीना आ हसन हुसैन के सहादत केर गुणगान तथा हुनकर सौन्दर्य एवं सौर्य केर गाथा गैल जैत छैक। माहोल उदास मुदा जोश आ ओज सं भरल।लोक अही बहाने हसन आ हुसैन के कुर्बानी के याद करैत अछि। हसन आ हुसैन मोहम्मद साहेब केर नाति छला। इस्लाम, न्याय आ शांति के रक्षा के लेल अपन जान गमा लेला मुदा सत्य केर रस्ता सं नहि भटकलनि। हुनकर सहादत केर गाथा कतौं अज़ादारी त मिथिला में झरनी के रूप में गैल जैत अछि। केवल चरित्र अरब के होइत छैक मुदा चित्रण स्थानीय भावक अनुकूल। उपमा आ अलंकार वैह जे मिथिलाक लोक उदासी में अथवा आर कुनो कारुणिक गीत में प्रयुक्त करैत छथि। गीत गेबा में सेहो हिन्दू महिला जकां मुसलमान महिलाक प्राबल्य। एक झरनी में छाती पिटैत महिला सब गबैत छथि हाय अल्ला सुन्दर आ सोहनगर लाल सुग्गा के जन्म कोन ठाम भेल आ कोन ठाम ई दुनु भाई अर्थात हसन आ हुसैन जन्म लेलाह? फेर उत्तर में बजैत छथि जे पर्वत पर हरियर गाछ पर ललका सुग्गा जन्म लेलक आ अरब के मक्का शहर में हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के जन्म भेलैक। हे दाई- माई, कथी खुआक क लाल सुग्गा के हम पोसब आ कथी खुआ क दुनु बच्चा के? चारा अथवा आहार खुआ क सुग्गा के पोसब आ दूध पिया क हसन आ हुसैन दुनु बच्चा के प्राण बचायेब। सोना के पिजरा में सुग्गा के बाजब सिखायेब आ इसकुल में भेज क दुनु बच्चा के पढ़ेएब। अगिला अंश में उदासी प्रबल भ जैत छैक। गीतक बोल कहैत छैक जे लाल सुग्गा उड़ात भेला पर कत उडि जैत आ बच्चा नमहर भेला पर कत चलि जैत? प्रश्न आ उत्तर के तर्ज पर झरनी गैल जैत अछि। एहि प्रश्न के उत्तर में कहल जैत छैक की उड़ात भेला पर सुग्गा फेरो पर्वत पर उडि जैत आ दुनु बच्चा नमहर भेलाक बाद मक्का चलि जेतैक कारण ओकरा धर्म केर रक्षा करबाक छैक। एहि झरनी के गंभीरता स देखला आ मनन केला सं ई अनुभूति होइत छैक जे उदासी आ झरनी में कतेक समानता छैक। जमाए के जखन सुग्गा स तुलना हिन्दू महिला सब अपन गीत में करैत छथि त कहैत छथि: “वनक सुग्गा वने उडि जायत”, “सुगबा हैत ओड़ियात अपन घर जायत” आदि। अतए पहार स सुग्गा अबैत छैक आ पहार में वापस चलि जैत छैक। हाय-हाय कहमा जलम लेल लाल एक सुगबा कहमा जलम दुनू बचबे हाय। हाय-हाय परबत जलम लेल लाल एक सुगबा मक्का जलम दुनू बचबे हाय। हाय-हाय कथिये खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा कथिये खिअयबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय आहरा खिअयबइ हमें लाल एक सुगबा दुधबा पिलयबइ दुनु बचबे हाय। हाय-हाय कथिये पढ़ेबइ हम लाल एक सुगबा कथिये पढ़ेबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय पिजड़े पढ़ेबइ हमें लाल एक सुगबा इसकुल पढेबइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय कहाँ उडि जेतइ लाल एक सुगबा कहाँ चलि जेतइ दुनू बचबे हाय। हाय-हाय परबत उडि जेतइ लाल एक सुगबा मक्का चलि जेतइ दुनू बचबे हाय।। मुसलमान महिला में हरियर रंग के सारी अथवा आनो वस्त्र के क्रेज रहैत छैक। हरियर के झरनी में सुगबा रंग कहल जैत छैक। एक अन्य झरनी में महिला सब अपन उत्सव आ सिंगारक चर्च करैत छथि। अते स्थान, उपमा, अलंकार, विधान सब खांटी देसी भ जैत छैक।झरनी के प्रकृति प्रश्न आ उत्तर सं छैक। एहि गीत में गीत गाईन सब अपने में चर्च करैत प्रश्न करैत छथि जे हाजीपुर, पटना आ बेतिया शहर के जा रहल छैक? फेर उत्तर दैत कहैत छथि, पिताजी हाजीपुर, भैया पटना आ पतिदेब बेतिया शहर जा रहल छथि। कथी लेल? पिताजी सुग्गा रंगक सारी लेबाक लेल, भैया कंगना लेबाक लेल आ पतिदेब माथक सिन्दुर लेबाक लेल। देखू कोना स्थानीय परंपरा में रंगा जैत छथि मुसलमान स्त्रीगन मिथिला में। सिन्दुर आ सोहाग के महत्त्व एकाएक प्रबल भ जैत अछि। धर्म अपन स्थान पर मुदा स्थानीयता कुनो कम थोरे? अगर सिन्दुर हिन्दू स्त्रीक श्रृंगारअइहबहोबाक प्रमाण त मुसलमानस्त्रीगन केलेल कियैक नहि। फेर गीत लिखनिहार आ गेनीहारिके के रोकि सकैत अछि? हाय-हाय के जयतै हाजीपुर के जयतै पटना के जयतै बेतिया शहरबे हाय। हाय-हाय बाबा जयतै हाजीपुर भैया जयतै पटना स्वामी जयतै बेतिया शहरबे हाय। हाय-हाय के लयतै सारी सुगबा के लयतै कंगना के लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय बाबा लयतै सारी सुगबा भैया लयतै कंगना स्वामी लयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय के पहनतै सारी सुगबा के पहनतै कंगना के पहनतै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय अम्मा पहनतै सारी सुगबा भऊजो पहनतै कंगना हमें पहनबै सिर के सिन्दुरबे हाय। हाय-हाय फाटि जयतै सारी सुगबा टूटी जयतै कंगना रहि जयतै सिर के सिन्दुरबे हाय। अपन एक छोट कविता फूलडालीक कनेर में कवि कृष्णमोहन झा लिखैत छथि जिलेबीक काँट जकाँ हम अहाँक धानक लाबा सन तरबा मे गड़ि जायब आ किछु दिन धरि बिसबिसायब। चतुर्थीक औंठी आ बरसाइतक मेहदी जकाँ हम अहाँक विकल संसर्ग मे आयब आ असंख्य सुग्गा बनि अहाँक मोन मे उड़ियाएब। कवि नायिका के अंतःकरण के बुझैत छथि। ह्रदय में प्रवेश करबाक हिम्मत रखैत छथि। कहैत छथिन जे झुण्डक झुण्ड सुग्गा जकां नायिका के स्मृति में बेर-बेर आबि अपन होबाक प्रमाण देता. नायिका टीस में पतिक अथवा प्रेमीक अनुभूति करैत रहती। भगबान केर भजन, प्राति, उदासी आदि में मनुख त मनुखे भगबानो के सिनेहवससुग्गा बना क हुनकर सौन्दर्य, वात्सल्य, मनोहर स्वरुप के लोक स्मरण करैत अछि। कृष्ण लेल सुग्गा मनमोहन त जन-जन के कंठ में जेना रचल बसल हो।भगबान कृष्ण केर मथुरा सं द्वारका केर यात्रा लोक के अतेक दुखी क दैत छैक जे सखी बहिनपा सब अपन जीवन के उद्देश्यहीन बुझैत छथि। पूरा नगर उदास अछि। कखनो मोन होइत छनि जे यमुना के कारी, तीव्र गति सं चलैत अथाह पानि में डूबि क आत्महत्या क लेथि त कखनो होइत छनि जे जहर-माहुर खा प्राण के समाप्त क ली। हे निर्मोही कृष्ण कोना अहाँ मथुरा छोरि सबके ह्रदय दुखा सुग्गा जकां पिजरा सं बाहर निकलिते द्वारका चलि गेलौं? कनिकबोदरेग नहि भेल? अहि तरहे लोक अपन व्यवहार, संस्कार, संस्कृति सं सुग्गा आ अन्य चिरै-चुनमुन संग प्रेम आ सामंजस्य स्थापित केने अछि। हलांकि तथाकथित आधुनिकता, विज्ञान, विज्ञानक प्रयोग आ मनुष्य केर नित नूतन खोज एहि तरहक परम्परा के शनै शनै कमजोर केने जा रहल अछि। लोक सब अहि तरहक समंजस्य के बिसरल जा रहल अछि। ई कुनो अर्थ में निक बात नहि। सुग्गा आ मैनाक कथा ग्राम्य जीवन स समाप्त भेल जा रहल अछि आ किताब में सिमटल जा रहल अछि। खेत खरिहान, जंगल, पर्वत, पोखरि, गाछ सब खत्म भेल जा रहल अछि। सुग्गे नहि आरो चिरै-चुनमुन धीरे-धीरे अतितक वस्तु बनल जा रहल अछि।अगर संस्कृति के ओ स्वरुप जे सब के संगे चलबाक सामर्थ्य रखैत अछि समाप्त भ जैत त किछु नहि बचत।सब के एहि विषय पर गंभीरता स सोचबाक चाही आ संतुलन के सिद्धांत के मनबाक चाही। मैथिली लोकगीतमे कौआ सम्बाहक मैथिली लोकगीतक संसार अपूर्व संसार आ गीतक महासागर अछि। एहि महासागर केर हरेक गीत बेसकिमती सीपी जकां अछि जकर मूंह स्वातिक बूंद पेबा लेल खुजल छैक जाहि स ओ मोती बनि सकै। फेर ओ मोती समुद्रक कछेर में बालु आ अन्य वस्तुक ढेर में ओंघराएल अछि कुनो जौहरीक ताक में जे ओकरा गढि सकए तरासि सकए। मैथिली लोकगीत गंगा के अनेक आयाम छैक। सब आयाम के अपन महत्त्व। जखन लोकगीतक विस्तृत आ विशाल संख्या के देखैत छी त अनेक बिंदु दिस ध्यान जैत अछि। एहिना ध्यान एक गीतक अनुवाद करैत लोकगीत में कौआ के प्रयोग आ ओकर उपयोगिता दिस चलि गेल। लोकगीत में कौआ के मानवीकरण क नायिका के द्वारा कौआ के विभिन्न तरह स प्रयोग कैल गेल अछि। प्रचलित व्यवहार में कौआ के प्रति लोकक विश्वास पर गेल। अदौं सं लोकधारा में कौआ मनुखक खाश क महिला एवं बच्चा सबहक पल-पल केर मित्र बनल अछि। डॉ. कैलाश कुमार मिश्र इथनोग्राफर छथि, आ तंए पाब्लो नेरुदाक ई पद्य हुनका पसिन्न छन्हि/ ऐ आलेखक बीच ऐ पद्यक आनन्द आर बढ़ि जाएत/ Pablo Neruda "You start dying slowly" You start dying slowly; if you do not travel, if you do not read, If you do not listen to the sounds of life, If you do not appreciate yourself. You start dying slowly: When you kill your self-esteem, When you do not let others help you. You start dying slowly; If you become a slave of your habits, Walking everyday on the same paths… If you do not change your routine, If you do not wear different colours Or you do not speak to those you don’t know. You start dying slowly: If you avoid to feel passion And their turbulent emotions; Those which make your eyes glisten And your heart beat fast. You start dying slowly: If you do not risk what is safe for the uncertain, If you do not go after a dream, If you do not allow yourself, At least once in your lifetime, To run away..... You start dying Slowly!!! Love your life Love yourself...``` अपना स सिनेह करू, अपना के सम्मान करू सदिखन पाब्लो नेरुदा मैथिली अनुवाद : डॉ. कैलाश कुमार मिश्र पाब्लो नेरुदा स्पेन के कवि छथि। साहित्य में योगदान हेतु हिनका नोबेल पुरस्कार भेटल छनि। अहाँ नहु-नहु मरै छी यदि अहाँ यात्रा नहि करै छी अहाँ अध्ययन नहि करै छी अहाँ जीवनक स्वर के नहि सुनै छी यदि अहाँ अपना गुणक स्वयं ग्राहक नहि छी अहाँ नहु-नहु मरै छी... जाहि घडी अहाँ आत्म-विश्वास के खून क दैत छी जखन अहाँ ककरो स मदतिकेर आशा नहि रखैत छी अहाँ नहु-नहु मरै छी.... एकहि रस्ता पर प्रतिदिन चलैत ..... जखन अहाँ अपन आदति के दास भ जैत छी यदि अहाँ अपन दैनन्दिनी के नहि बदलै छी बिभिन्न रंगक परिधान नहि पहिरैत छी किम्बा अहाँ कुनो अनजान मनुख स बातचीत नहि करैत छी अहाँ नहु-नहु मरै छी.... यदि अहाँ जीवन में उत्साह आ त्वरित आवेग दिस उदास भ रहल छी जे अहाँक आंखि के दिव्य आ झलकैत आ ह्रदय गति के तीव्र बनबैत अछि अहाँ नहु-नहु मरै छी.... अगर अहाँ जीवन में कम स कम एक बेर अनिश्चित के सुरक्षित करबाक हेतु जोखिम के स्वीकार नहि करैत छी सपना के साकार करवाक प्रयास नहि करैत छी सब जिम्मेवारी स भगबाक हेतु ..... अहाँ नहु-नहु मरै छी.... अपन जीवन स सिनेह करू अपना आप सं सिनेह करू...... विभिन्न प्रकारक जानवर आ चिरै-चुनमुन केर अति प्राचीन समय सं मनुखक जीवन स नाता रहल छैक। मैथिली लोकगीत में चिड़ई-चुनमुन के प्रति प्रेमक अद्भुत वर्णन आ प्रेमाधिक्य देखल जा सकैत छैक। चिरै-चुनमुन कुन क्षण मनुखक जीवनक अभिन्न अंग बनि जैत अछि पते नहि चलैत छैक। भोजन बनबैत काल चिरै-चुनमुन आ जानवर लेल पहिल कौर माय राखि दैत छली। सामूहिक अवसर के निमित्त भोज-भात में भोजन बनबए स पूर्व चिरई-चुनमुन लेल पहिल कौर एखनो निकालि देल जैत अछि। काक़ भुशुंडी त कौआ छला जे पक्षीराज गरुड़ के रामकथा पहिने सुना देने छलथिन। अहि बातक वर्णन बाल्मीकी के रामायण आ तुलसीदास केर रामचरितमानस में भेटैत अछि। भगवान शिव पार्वती सँ कहैत छथिन: "कि हम जे सुंदर कथा अहाँ के सुनेलौ अछि ओहि कथा के काक़ भुशुंडी गरुड़ के सुना चुकल छथि। नारद केर ज्ञान सँ भगवान राम के नागपाश सँ मुक्त कए गरुड़ ज़खन अपन धाम घुरैत रहथि त एकाएक हुनकर मोन में एक शंका उत्पन्न होईत छनि कि केहेन भगवान छथि राम जे एक तुच्छ राक्षस द्वारा फ़ेकल नागपाश में बन्हा गेला? गरुड़ एहि शंका केर समाधान ऋषि नारद सँ पुछला। नारद अहि शंका के समाधान बतेबा में असमर्थ छथि। नारद गरुड़ के ब्रह्मा लग भेज दैत छथिन। ब्रह्मा जी सेहो अहि शंका के समाधान बतेबा में असमर्थ छला। आब ब्रह्माजी गरुड़ के महादेव लग पठा देलथिन। महादेव कहलथिन: "भगवानक माया बतेनाइ असम्भव अछि। एक चिरै दोसर चिरै के ठीक सँ बुझा सकैत छैक ताहि अहाँ काक़ भुशुंडी लग जाऊ। वैह अहाँ के सब बात नीक स बुझा देता। आ अंतत जखन गरुड़ काक़ भुशुंडी लग गेलाह त काक़ भुशुंडी अपन अद्भुत वैदुश्य के परिचय दैत गरुड़ के पूरा रामायण के कथा समझा देलथिन। ई कथा कौआ के बुद्धिमान प्रमाणित करैत अछि संगहि मानव मोन में चिरै-चुनमुन संगे गूढ़ बात के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार के सेहो प्रमाणित करैत अछि। चिरै-चुनमुन आ कौआ केर मनुखक जीवन में महत्त्व के सब स उत्तम उदाहरण विष्णु शर्मा द्वारा रचित कालजयी रचना पंचतन्त्र अछि। प्राचीन भारत में गुरुकुल जंगल में होइत छल। गुरु अपन शिष्य के प्राकृतिक वातावरण में राखि ओकरा प्रकृति आ प्रकृति के अवयव जे गाछ-बृक्ष, चिरै-चुनमुन, जड़ी-बूटी, नदी-नाला, झरना, पोखरि, पहार, वन्यजीव आदिक जानकारी दैत छलथिन आ ओकरा संग कोना तारतम्य स्थापित हो से गुण सिखायल जैत छलैक। विष्णु शर्मा त चिरै-चुनमुन आ वन्यजीव के मानवीकरण कए पूरा पंचतन्त्र केर निर्माण बच्चा के ज्ञान विकसित करबा लेल क लेला। बात पंचतन्त्र के क रहल छी आ प्रसंग कौआ के अछि त पंचतन्त्र केर एक कथाक उल्लेख करब अनिवार्य बुझना जा रहल अछि जकर सम्बन्ध कौआ स छैक। कथा किछु ऐना छैक: बहुत पहिने एक झमटगर बर कौआ सबहक राजधानी छल। हजारो के संख्या में कौआ ओतए कागराज मेघवर्ण संग रहैत छल। बरक गाछ एक पहाड़ी रहैक जाहि में असंख्य गुफा रहैक। ओहि गुफा सब में उल्लू सब रहैत छल। उल्लुक राजा अरिमर्दन छल। अरिमर्दन पराक्रमी छल। कौआ सब के ओ अपन सबस पैघ दुश्मन बूझैत छल। कौआ स ओक़रा अतेक घृणा रहैक जे बिना कौआ के वध केने ओ भोजन तक नहि करैत छल। ज़खन बहुत संख्या में कौआ मरए लगलैक त मेघवर्ण बड्ड चिंतित भेल। अहि विषय पर विचार करबाक हेतु मेघवर्ण कौआ सभक एक बैसार केलक। मेघवर्ण बाजल: "हमर प्रिय कौआ सब, अहाँ सबके त बुझले अछि जे बेर-बेर उल्लू के आक्रमण केर कारण अपन सभक जीवन असुरक्षित भ गेल अछि। अपन सभक शत्रु शक्तिशाली आ एक नम्बर केर अहंकारी सेहो अछि। अपना सब पर रातिक हमला करैत अछि किएक जे अपने सब रातिक देखि नहि सकैत छी। हमर सभक विवसता ई अछि जे हमरालोकनि दिन में जवाबी आक्रमण नहि क सकैत छी कारण जे उल्लू सब गूप्प अनहार गुफ़ा में सुरक्षित बैसल रहैत अछि। ई कहि मेघवर्ण चतुर आ ज्ञानी कौआ सब स अपन-अपन सुझाव देबाक़ निवेदन केलक। एक डरपोक कौआ बाजि उठल: "हमरा सबके उल्लू सँ समझौता क लेबाक चाही। ओ सब जे कुनो शर्त रखैत छथि ओक़रा स्वीकार क लेबा में अपन सभक हित अछि। अपना स चफ़्फ़र शत्रु सँ बेर-बेर पराजित हेबा में कुन फ़ायदा?" अहि बात के काँव-काँव कए बहुत कौआ सब विरोध केलक। एक कौआ चिचियाएल: "हमरा सबके अहि दुष्ट सब स किन्नहुँ बात नहि करक चाही। सब गोटे उठु आ चढ़ाई करु।" एक निराशावादी कौआ बाजल: "शत्रु शक्तिशाली अछि। हमरासबके ई स्थान छोड़ि कतौ आर चलि जेबाक चाही।" एक बुझनुक़ कौआ बाजल: “अपन घर छोड़नाई ठीक नहि रहत। अगर हम सब अतए सँ चलि गेलौ त कतहुँ के नहि रहब। बिलकुल टुटि जाएब। अपना सब के एतहि रहि आरों चिरै सब सँ मदति लेबाक चाही जाहि सँ एकर समाधान भ सकय”। स्थिरजीवी ओहि कौआ सभ में सब सँ चतुर आ बुद्धिमान छल जे चुप चाप बैसल सभक तर्क ध्यानमग्न भ सुनि रहल छल। राजा मेघवर्ण ओक़रा दिस मुखाकृति भेला आ कहलथिन, "परमज्ञानी स्थिरजीवी, अहाँ चुप छी? हम अपनेक विचार जानए चाहैत छी।" स्थिरजीवी बाजल: “महाराज, हमर सोचब अछि जे शत्रु अधिक बलशाली हो त छलनीति के सहारा लेबाक चाही”। "केहेन छलनीति? कनि स्पष्ट करु, श्रीमंत स्थिरजीवी।" कागराज बजला। स्थिरजीवी: "अहाँ हमरा ऊँच-नीच कहु आ हमरा पर जानलेवा हमला करू।" मेघवर्ण अकचकेला, "ई अहाँ की बाजि रहल छी स्थिरजीवी?" स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण बला ठाढि पर गेला आ कान में कहलथिन, "छलनीतिक हेतु हमरा ई नाटक कर पड़त। अपना सबके अग़ल-बग़ल के गाछ सब पर उल्लू जासूस अपन सबहक़ सभाक सब क्रिया-कलाप के देख रहल अछि। ओक़रा सबके देखाक अपना सबके आपसी फूट आ फ़सादक नाटक करए पड़त। ओक़र बाद अहाँ सब कौआ के लक' ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँच हमर प्रतीक्षा करु। हम उल्लूक दल में शामिल भ ओकर सबहक़ विनाश केर समान एकत्रित करब। घरक भेदी बनि लंका डाहि देबाक़ व्योंत करब।" फेर की छल। नाटक शुरू भेल। स्थिरजीवी चिकरैत बाजल: “हम जेना कहैत छी तेना कर राजा, राजा केर बच्चा। किएक हमरा सब के मारबाब' पर तुलल छैं?” मेघवर्ण गरजल: "ग़द्दार, राजा सँ एहेन बदतमीजी बला भाषा में आ सहो ज़ोर सँ तोरा बज़बाक हिम्मत केना भेलौक?" अनेक कौआ एकहि संगे चिचियैत बाजल: "अहि ग़द्दार के जान सँ मारि देल जाओ महाराज।" आब राजा मेघवर्ण अपन पंख सँ स्थिरजीवी के कनपट्टी में धेले चमेंटा मारैत ठाढि सँ नीचा खसा देलथिन आ तुरंत घोषणा केला की "हम ऐ ग़द्दार स्थिरजीवी के तुरंत के प्रभाव स कौआ समाज सँ बहिष्कृत क रहल छी। आब एखन सँ कुनो कौआ अहि अधम सँ कुनो तरहक़ नाता नहि राखत। ई हमर आज्ञा अछि।" अग़ल-बग़ल के गाछ पर नुकाक बैसल उल्लू जासूस के आँख़ि ख़ुशी स चमकि उठल। जासूस सब तुरंत उल्लू के राजा के संवाद देलक जे कौआ सबमें फूट पड़ि गेल अछि। मारि-पीटक संग-संग गारि-गरौअल भ रहल छैक। अतेक बात सुनितहि उल्लूक सेनापति राजा के सम्बोधित करैत बाजल: "महाराज, यैह मौक़ा अछि कौआ सब पर आक्रमण करबाक हेतु। अहि समय में हम सब ओक़रा सबके आसानी सँ हरा देबैक़।" उल्लू सम्राट अरिमर्दन के अपन सेनापति के बात नीक लगलैक। ओ तुरंत आक्रमण केर आदेश द देलक़ैक़। फेर की छल हज़ारों केर संख्या में उल्लूक सेना बरक गाछ पर आक्रमण करक हेतु विदा भेल। यद्यपि ओतए एकौ टा कौआ नहि भेंटलैक। भेटबो कोना करितै? योजनाक अनुसार मेघवर्ण सब कौआ के ल क ऋष्यमूक पर्वत दिस कूच क गेल छल। खाली गाछ देखि उल्लूक राजा थूक फेकैत बाजल: “हम्मर सबहक सामना त की डरे कौआ सब भागि गेल। एहेन काएर पर एक हज़ार बेर थू-थू।” सब उल्लू जीतक मद में मातल ‘हू-हू’ के आवाज निकालि अपन जीतक घोषणा करए लागल। नीचा में जमीन पर झाड़ झंखाड़ में खसल स्थिरजीवी कौआ ई सब ध्यानपूर्वक देख रहल छल। स्थिरजीवी कांव-कांव केर आवाज़ निकाललक। ओकरा देखते मातर जासूस बाजि उठल: “अरे, ई त वैह कौआ अछि जकरा एकर राजा धक्का दए माटि पर खसा देने रहैक आ अपमानित करैत रहैक।” उल्लूक राजा सेहो ओतय आबि गेलैक ओ पूछलकैक: “तोहर एहेन दुर्दशा केना भेलह?” स्थिरजीवी बाजल “हम राजा मेघवर्णक नीतिमंत्री छलहु। हम ओकरा एक नेक सलाह देलयैक जे आई-काल्हि उल्लू सबहक नेतृत्व एक अति पराक्रमी राजा क रहल छथि। हमरालोकनि के उल्लू सबहक अधीनता स्वीकार क लेबाक चाही। हमर बात सुनि राजा मेघवर्ण तामसे लाल भ गेल आ फटकारलक, दूतकारलक, एवं अपमानित कए कौआ समाज सं निष्कासित क देलक। हे महाराज, हमरा अपन शरण में ल लीय।” उल्लूराज अरिमर्दन आब गहन सोच में पडि गेल। ओकर नीति सलाहकार कान में कहलकै “राजन, शत्रुक बात पर कखनो भरोसा नहि करक चाही। ई अपन सबहक़ शत्रु थिक। एकरा जान स मारि देल जाए।” एक चापलूस मंत्री बाजल “नहि राजन! एकरा नहि मारल जाए। एहि कौआ के बल्कि अपना दल में राखि लेबा में अपना सबके फायदा अछि. ई कौआ सबहक घरक भेद समय-समय पर बतबैत रहत।” राजा के सेहो भेलैक जे स्थिरजीवी के उल्लू सबहक साथ मिला लेबा में लाभे-लाभ अछि. ई सोचि उल्लूक झुण्ड स्थिरजीवी कौआ के अपने संगे लेने गेल। ओतए अरिमर्दन अपन उल्लू नौकर-चाकर के निर्देश दैत बाजल, “स्थिरजीवी के गुफा के शाही अतिथि कक्ष में रहबाक व्यवस्था कैल जै। हिनका कुनो तरहक कष्ट नहि होबाक चाही।” चतुर स्थिरजीवी कौआ हाथ जोड़ैत बाजल: “महाराज, अपने हमरा शरण देलहु, हमरा लेल ई बड्ड पैघ बात अछि। हमरा अहाँ अपन शाही गुफ़ा के बाहर एक पाथर पर एक सेवक जकां रह देल जाओ। हमर इच्छा अछि जे एतहि बैसक हम अहाँक गुणगान करैत रही।” एहि तरहें स्थिरजीवी शाही गुफ़ा के बाहर डेरा जमा लेलक। गुफ़ा में नीति सलाहकार एकबेर पुनः राजा के सावधान करैत कहलकैक: “महाराज, शत्रु पर कखनो विश्वास नहि करक चाही। शत्रु के अपन घर में शरण देब आत्महत्याक सामान अछि।” घमंडे मातल उल्लू सम्राट अरिमर्दन अपन नीति सलाहकार के दिस आंखि तरेरैत बाजल: “तों हमरा जादे नीति बुझाबए के कोशिश नहि कर। अगर तोरा ई लगैत छौ जे तोरा उचित सम्मान नहि भेट रहल छौक त तों अतए सं जा सकैत छै।” नीति सलाहकार उल्लू हारि मानि आब अपन दू-तीन मित्रक संग ओतय सं ई कहैत विदा भ गेल: “विनाशकाले विपरीत बुद्धि।” किछु दिनक बाद स्थिरजीवी अगल-बगल स लकड़ी अथवा काठी इत्यादि आनि गुफ़ा के द्वार लग एकत्रित करे लागल। कहला पर बाजल: “सरकार सर्दी आबै बला छैक। हम काठ आ झांखर सबहक फुसही मडैया बनबै चाहैत छी ताकि जार सं बचि सकी।” शनैः-शनैः लकड़ीक बड्ड पैघ ढेर जमा भ गेलैक। एक दिन जखन सब उल्लू सुति रहल छल तखन स्थिरजीवी उडिक सोझे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुचल। ओतए योजना के अनुसार मेघवर्ण सब कौआ संग ओकर प्रतीक्षा क रहल छलैक। स्थिरजीवी बाजल: “आब अहाँ लोकनि समीप के जंगल सं जतए आगि लागल छैक एक-एक जरैत लकड़ी अपन-अपन चोंच में उठा हमरा पाछा-पाछा आउ।” समस्त कौआक सेना अपन-अपन चोंच में जरैत लुकाठी लेने स्थिरजीवीक पाछा-पाछा उल्लूक गुफ़ा में आबि गेल। स्थिरजीवी द्वारा एकत्रित कैल लकड़ीक ढेर में आगि लगा देल गेलैक। एक-एक टा उल्लू या त जडि क मरि गेल अथवा दम घोटला सं मरि गेल। कागराज मेघवर्ण स्थिरजीवी के योजना आ चातुर्य सं गद-गद होइत ओकरा कौआ रत्नाक उपाधि सं सम्मानित केलक। पंचतन्त्र केर ई कथा एहि बात के प्रमाणित करैत अछि जे चिड़ई-चुनमुन मनुखक जीवनक अभिन्न अंग जकां थिक। एकरा सब स सीख लेल जा सकैत अछि आ तारतम्य स्थापित क जीनाई निक। अर्थ भेल जे अपन लोक समाज आ व्यवहार ई कहैत अछि जे एकरा सब स प्रकृति में सामंजस्य स्थापित करू। एक दोसरक बिना जीवन अपूर्ण अछि। पशु आ चिरै स तारतम्य स्थापित केने लाभ। हलांकि एखन किछु वर्ष स ई सुनबा में आबि रहल अछि जे कौआ हेंजक-हेंज में मरि रहल अछि। मोन एहि तरहक बात सुनि आहत होइत अछि। कौआ त पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी थिक आ सैह मरि रहल अछि तखन पर्यावरण के की हैत? आब लोकगीत पर अपन ध्यान केन्द्रित करी। माय अपन बच्चा के मुँह में कौर दैत काल भांति-भांति के चिरई सब स सम्बन्ध जोड़ैत कहैत रहैत छथि ले बौआ ई कौर कौआक छौ; ई कौर मैनाक छौ, आदि-आदि। कदाचित एहि तरहे सामाजिक रुपे हमरालोकनि चिरै-चुनमुन स एक मानवीय सम्बन्ध बना लैत छी। चिरै केवल चिरै नहि अपितु, भाई, बहिन, सखा आ सम्बन्धी बनि जैत अछि। एकटा नेनाक गीतक किछु पंक्ति देखु: मेना के बच्चा चिरैया गे दू टा जामुन खसा लाली खसैबए त मारबौ गे दू टा कारी खसा तू छै बहिन तोहर हम भैया जौ ने खसेलें त बुझि ले दैया मारब खुआ तोरा जहर गे दू टा जामुन खसा मेना के बच्चा चिरैया गे दू टा जामुन खसा।। काली कान्त झा “बूच” अपन कविता “दीनक नेना” जे गीत सेहो कहल जा सकैत अछि में कौआ के सम्बाहक जकां प्रयुक्त करैत छथि। एहि गीत में कवि एक गरीब माय जकर पति बाहर कमेबा लेल गेल छैक, घर में ने अन्न ने ढउआ छै। छोट दुधपीबा बच्चा कखनो चाकलेट, कखनो बिस्कुट त कखनो कुनो आरो वस्तु लेल माय स जिद्द करैत छैक आ कनैत छै। लाचार माय एक कौआ के कुचरैत देखैत छैक आ ओकरे सहारा लए अपन कनैत होरिला के गीत सुना बौंसबाक प्रयत्न क रहलि छैक। बौआ देखु-देखु, ई क़ुआ गाबि रहल अछि। ई तोरे कुचरि क सुना रहल छौ रे बाऊ। तों ओसारा के बीच में सुतल छै आ ई कौआ पूब दिस तोरा देखि ख़ुशी स नाचि रहल अछि। अते सुन्नर पुरबा बसात जेना कौआ के नाचब लेल आ तोरा मस्त करक लेल बसातक छनन-छनन लहरि सं बाँसुरी बजा रहल छौक। रे बौआ तोहर जन्म निर्धन घर में भेल छौक ताहि तोरा लेल बिस्कुट आ चाकलेट बनले नहि छौक। बिसरि जो एहि वस्तु सबके। तोहर गोलगर पेट नोन रोटी सं भरि जाऊ त भाग्य! लेकिन, चिंता के कोन बात? बसातक धुन आ कौआक मस्त भ नाचब मधुर बातक स्वरलहरी तोरा लेल तैयार केने छौ। अनका थोरे ने ई भाग्य छैक? तोहर पिता परदेसिया छौ रे बाऊ। कतेक दिन भ गेल मुदा निरमोहिया कुनो चिट्ठियों नहि भेजलक अछि! ई कोनो बात भेलै, कह ने? केना एहि अवस्था में ई कौआ अपन कुचरब सं आ बसातक झोंका अपन मधुर धुन स तोहर नींद स झकमैत माय के टीस जगा रहल छौक! रे नेना! तों की बुझबैं जे गरीबी ककरा कहै छैक? श्रमजीवी के सपनों में सुख नहि लिखल छैक। बेचारा श्रमजीवी अपने त अन्हार घर में डिबिया जरा क राति बीतबैत अछि आ अपन परिश्रम सं समस्त नगर के जगमग करैत अछि। देख ने कोना ई हुलसगर बियनि अपन नहु-नहु मिठगर बसात सं तोरा सुता रहल छौक! निनियारानी, झटकि क बौआ लग आउ ने! बौआ के सुताउ ने! रे सोन, तों बिना वस्तु सब खेने उपासल छै। हम ग्लानि सं मरल जा रहल छी। मुदा हम छी लाचार करू त की करू रे बौआ?” मूल गीतमय कविता कनि देखू: देखहीं रौ बौआ, ई कौआ गवै छौ। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। एम्हर तों सूतल छे माँझे ओसार पर ओम्हर ओ नाँचै पुवरिया मोहार पर पुरबा वसात बाँसुरी बजवै छौ.........। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। तोरा लय बनलौ ने बिस्कुट आ चाकलेट नोनो रोटी सं भरतौ ई गोल पेट बातक मधुर स्वरलहरी अबै छौ .....। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। बापे तोहर बनलौ परदेशी चिट्ठी ने एलौ भेलौ दिन वेशी माँ केर निनायल व्यथा जगबै छौ। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। की बुझबैं ककरा कहै छै गरीबी सपनो में सुख नहि जतऽ श्रमजीवी लुत्ती लगाकऽ नगर बसबै छौ.......। सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। कोरा में तोरा सुताबै छौ बिनियाँ झटकल औ अविहें रौ नूनूक निनिया तोहर उपास हमरा लजबै छौ सुनही रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ।। कौआ मिथिला में दू प्रकारक पैल ज़ैत अछि सामान्य कौआ आ कार कौआ। दुनू के अपन-अपन स्थान मैथिल समाज आ लोक परम्परा में छैक। कार कौआ अशुभ के सूचना दैत अछि । आ सामान्य कौआ शुभक संकेत। दुनू जे बजैत अछि तक़रा लेल अलग-अलग शब्द छैक। कार कौआ "डकै" छै आ सामान्य कौआ "कुचरै" छै। ड़कनाई अशुभ के सूचक आ कुचरनाई शुभक सूचक। किछु लक्षण छैक जाहि स ई पता चलैत छैक जे कौआ के कुन परिस्थिति में बेसब, उठब, कुचरब शुभ आ कोन परिस्थिति में अशुभ केर सूचना दैत अछि। कौआ जखन घरक चार अथवा आंगन में कुनो ऊँच चीज़ पर चढिक कुचरे त कहल जैत छैक जे ई शुभक संकेत अछि; संगहि घर में कियोक पाहून एता कतेको बेर एहि तरहक बात सत्य भ जैत अछि। यदि कौआ घरक छत (अथवा चार) अथवा आंगन में हरियर गाछ पर बैसए त हेरायल वस्तु भेटब निश्चित बुझु। एहन स्थिति में कोर्ट कचहरी में दबदबा बनैत छैक आ मुक़दमा में जीत हासिल होइत छैक एवं धन-धान्य में बृद्धि होइत छैक। कौआ अगर बखारी, अन्नक ढेर आदि पर बैसय त धनक लाभ होइत छैक। गाय केर माथ पर कौआ बैस गेल त प्रियजन सं भेट हेबेटा करत। एहो मान्यता प्रबल अछि अपन मैथिल समाज में कि अगर कौआ सुखैल मांटि किंवा गर्दा में ओंघराए लागल त एकर अर्थ ई भेल जे प्रचुर मात्र में वर्षा हैत। एहि सबहक बिपरीत कौआ जों कुनो सुखैल गाछ पर बैस क कुचरि रहल हो त ई कुनो महामारी फैलबाक पूर्व सूचना थिक। अगर ककरो माथ पर कौआ अपन चोंच स हड्डीक टुकड़ी खसा दैक त ओहि व्यक्ति के मृत्यु निश्चित बुझु। मैथिली लोकगीत महाकवि विद्यापति के बिना अपूर्ण अछि। एक विरही नायिका जकर पति परदेस गेल छैक केर वेदना आ केना ओ कौआ के अपन समदिया बनबैत अछि, केना ओकरा लोभबैत अछि इत्यादिक बहुत सुन्नर वर्णन महाकवि निम्न लोकगीत में करैत छथि: मोरा रे अंगनमा चनन केर गछिया ताहि तर कुरुरै काग रे। सोने चोंच तोहें बांधि देबौ बायस जौं पिया अओता आजु रे। गाबह गाबह सखि लोरी झूमरि मदन अराधन जानु रे। चहुं दिसि चंपा मेहुलि फूललि चंद्र इजोरिया राति रे। कोना कए हम मयन अराधब होयत बड़ी रतिसाति रे। पांक समय कागा केओ ने अपन हित देखल आंखि पसारि रे। विद्यापति कविवर इहो गाबए तोकें अछि गुनक निधान रे। राव भोगीसर सब गुन आगर पदमा देवी रमान रे।। एहि गीतक संक्षेप में अर्थ ई भेल जे हमरा आंगन में चानन केर गाछ अछि आ ओई गाछ के ठाढि पर एगो कौआ बैसल कुचरि रहल अछि। ई निश्चित रुपे शुभ समाचार केर लक्षण थिक। हे कौआ, अगर आई हमर प्रियतम आबि गेला त हम तोहर चोंच सोन स मढ़वा देबौ। आउ हे सखी बहिनपा सब, सब मिलि झूमर गाउ। आई हम प्रेमक आराधना कर जा रहल छी। चारु दिस चंपा आर भालसरी के फूल फुलाएल अछि। मुदा ई पूर्णिमाक राति? कोना हम कामदेवक आराधना क’ पैब। कारण जे एहि मिलनक सबस पैघ उपहार त कामदेवक आराधने हेतनि। सुन कौआ, खराप समय में कियोक अपन नहि होइत छैक। ई बात आंखि खोलि क देखि चुकल छी। कवि विद्यापति कहैत छथि हे सुन्नरी, अहाँक प्रियतम गुणक खान छथि। जेना राजा भोगेश्‍वर छथि आर जे पद्मा देवी के साथ रमण करैत छथि। जाहि समय में आवागमन के सुविधा अतेक उन्नत नहि रहैक ताहि क्षण में कौआ के लोक खाश तौर पर स्त्रिगन आ नेना सब कहौतिया बूझैत छल। नायिका निवेदन करैत छथि जे आउ आ हमर अंगना में कनि कुचरू। अहांके हमर आंगन में स्वागत अछि। हम हम अहाँ के पानि स स्वागत करब, बेसबाक लेल पीढ़ी देब आ अगर अहाँ के कुचरला सं हमर प्रियतम कहीं आबि गेला त ओ जे कोनो सनेश अनता ताहि में पहिल हिस्सा अहींके देब। एतबे नहि, अगर हमर प्रियतम परदेसी आबि गेला त हम अहाँ लेल कंगना सनेश बनाएब। अहाँ चिंता नहि करू। हमर बात पर विश्वास करू। हमर हितग्राहक बनु आ आउ आ हमर अंगना में कुचरू। कनि देखू एहि गीत के: हे रे कौआ कुचरि बैस अंगना में। पानि देबौ पीढ़ी देबौ। पहिलुक सनेश हम तोरे देबौ। जौं प्रियतम परदेसी औता। तोरा सजैब हम कंगना में। हे रे कौआ कुचरि बैस अंगना में। अगर कुनो महिला आ नवकनिया कनि ताम-झाम वाली छैथ आ हुनकर दिमाग सातम असमान पर चढ़ल छनि। हरेक चीज़ भोजन स पहिरन धरि में नखरा छनि तकर अलगे बात! मूह-कान कुनो खाके सन मुदा घमंड ऐना जेना विश्वसुन्दरी होथि। यथार्थ में हुनकर मुह कौआ सनहक छनि। कमेंट हुनका पर छोटगर अछि ओहो गीतक रूप में। कनि देखी: कौआ सनहक़ कारी आ बाकूला सनहक़ ठोर। बैसल-बैसल चाही हिनका दाली भात तिलकोर। हमही सबस सुन्नरि छी आ हमरे सुन्नर दूल्हा। सासु कियैक नहि भानस करती नहि फूकब हम चुलहा।। ग्राम्यांचल में कौआ के कुचरब भोर होमाक सूचक अछि। नायिका के नायक कहैत छथिन जे कौआ बजलक आ भोर भ गेल; भोर भेल त नगर भरि में शोर भ गेल. आब कतेक काल सुतब? यै फलां बौआ के माय उठू ने! ऐना कोना चलत दिन? चलू आब नित्यकर्म में लागि जाई। कौआ जगलै भेलै भोर भेलै भरि नगरी में शोर आबो जागू यै बौआ के माय। माय अपन कनैत बच्चा के कौआके नाम लै सूतक हेतु तैयार करैत छथि। लोरी जकां कौआ के गीत में पात्र बना कनैत नेना के सुतबैत छथि। बौआ सुति रहू देखू-देखू आकाश में केना कौआ उडि रहल अछि। चिंता नहि करू अहाँक पिताजी जखन आबए लगता त पटना स अहाँ लेल ढ़ौआ लेने एता। चुप रहु चुप रहु बौआ आकाश में उड़ई अछि कौआ एयता बाबू पटना स लेने औता ढ़ौआ। चैताबर में नायिका के टीस आ कौआ दुनु के मेल देखल जा सकैत अछि। नायिका के आंगुर में सांप डसि लेने छैक. शायद विरह के डंक? अपन ननदि सं नायिका कहैत अछि जे के ओकरा लेल वैद बजा आनत? के ओकर पीड़ा के समाप्त करत? के ओकरा लेल पलंग के ओछायन तैयार करतै; नायिका के प्रियतमके के बजा अनतै हो राम? नायिका के पिता वैद बजेथिन, और माय पीड़ा मिटेथिन; ननदि पलंग पर ओछायन तैयार करथिन; देबर पिया के बजा अनथिन। नायिका कौआ स निवेदन करैत कहैत छथिन जे रे कौआ तोरा हम दही आ चूडा के भोज खुआ देबौक अगर हमर समाद के हमर प्रियतम तक लेने जयबै। आब कनि कौआ के मानवीकरण देखु, कौआ नायिका के कहैत अछि “ठीक छै हम तोहर समाद तोरा प्रियतम लग ल जेबौक मुदा एकटा समस्या अछि। हम तोहर प्रियतम के नहि जनैत छी फेर कोना तोहर समाद देबैक?” आब नायिका कौआ के अपन प्रियतम के हुलिया बतबैत कहैत अछि: “हमर प्रियतम के पातर-पातर डाँर छनि आ घरक दरबज्जा पर चानन केर गाछ छनि।” आब कौआ सहर्ष नायिका के समाद ल क ओकर प्रियतम लग जएबाक लेल तैयार भ जैत अछि। अंगुरी में डसलक नगिनियाँ हो रामा के मोरा जायत बैद बजाएत के मोरा हरत दरदिया हो रामा। के मोरा जाएत पलंगा ओछाएत के मोरा पिया के बजाएत हो रामा। बाबा मोरा जाएत बैद बजाएत अम्मा मोरा हरत दरदिया हो रामा । ननदि मोरा जाएत पलंगा ओछाएत दिओर मोरा पिया के बजाएत हो रामा देबऊ रे कागा दही-चूड़ा भोजन हमरो समाद नेने ज़ाह हो रामा। तोहरो बलमुजी चीन्हियो ने जानियौ कोना समाद नेने जाएब हो रामा। हमरो बलमुजी के मुठी एक डाँर छनि दुअरे चनन केर गछिया हो रामा।। आब कनि सोहर दिस चली. बिना सोहर के मैथिली लोकगीत कहेन? एक सोहर में नायिका जे गर्भ सं अछि कोना अपन भावना के व्यक्त क रहल अछि। संतान केर कामना में व्याकुल नायिका हरेक आगंतुक के सूचना देमए बला कौआ के चोंच के सोन स मढबाक अश्वासन दैत अछि आ अपन जानि बड्ड सिनेह स कौआ के कहैत अछि कि हे कागा अगर हमर अंगना में तोहर कुचरब शुभ सिद्ध भ गेल – आ यदि हमर परदेसी प्रियतम घर आबि जाथि त हमर बांझपन ख़तम भ जायेत। आ से भ गेल त हम तोहर चोंच के सोन स मढ़ा देबह। जों मोरा कगबा रे पिया अयताह होरिला जनम लेत रे। कगबा सोन में मढएबो दुनू लोल त बोलिया बर सोहाबन रे। चुपे रहू चुपे तिरिया जनिअ करू रोदन हे। तिरिया आजुए आओत घरबइआ बझिनिया पाप छुटत हे।। दोसर सोहर में नायिका के संतान प्राप्ति में आब देर नहि छैक। कखनो ई शुभ सूचना आबि सकैत छै। आब छठिहार में ककरा-ककरा सूचित कैल जाय आ निमंत्रित कैल जाय ताहि पर पति आ पत्नी में बात भ रहल छैक। होरिला के जनम भेल छैक से सूचना त कौआ ने देतैक? सगुन केर नौत त काग ने भाखत। हाँ जी हाँ. नायिका अपन पति के चिढ़बैत कहैत छथि जे दियाद आ लोक आ समाज के नौत त जैत मुदा हे पिया हम अहाँ बहिन के नहि नोतब कारण जे अहाँक भागिन नहि आबि पेता। कौआ के सगुनिया बनेबाक विधान सरिपहु बड्ड सोहनगर लगैत छैक। आरे-आरे कागा सगुनिया सगुन नौत भाख़ब रे कागा रे मोर घर उचित कल्याण कहाँ-कहाँ नौतब रे । दर जे नोतब दिआद लोक आओर समाज लोक रे। पिया हे आहाँक बहिन नहि नोतब कि भागिन कहाँ आओत रे।। एक विरह गीत में नायिका केर बेहाल हालक दारुण व्यथा व्यक्त कैल गेल अछि। तमाम चिड़ई जाहि में कागा सेहो सम्मिलित अछि गाछक डारि बैस गेल अछि। प्रात भ चुकल अछि आ प्रात होइतहि नभ मंडल में सूर्य केर लालिमा छटकि रहल छैक। नायिका अपन सखी के संबोधित करैत कहैत छथि “हे सखी, हमर प्रेमक पियास कोना मेटत? हम त विरह वेदना में तडपि-तडपि क दिन आ राति काटि रहल छी. राति बीत गेल; हम बेर-बेर चारू कात चकुयैल देखैत छी मुदा हे सखी, एखन धरि हमर पिया कहाँ अएला? खग उड़ि बैसल तरुवर डाली भेल गगन में प्रात सुलाली हमर पियास मेटत कोना सजनी तडपि-तडपि बितए दिन-रजनी रैन बितल मोरा पिया नहि आएल रहि-रहि चहुँ दिश ताकल सजनी।। मैथिली लोकगीतक सब सं सुन्दर रूप तखन द्रष्टिगोचर होइत अछि जखन कौआ संग-संग दोसर जंतु के सेहो मानवीकरण कए ओकर श्रृंगार आ प्रेम भाव के गीतक माध्यम सं व्यक्त कैल जैत अछि। एहि तरहक उदाहरण में सब सं सुन्नर उदाहरण विषहरि आ कौआक थिक। एक विषहरिक गीत में एहेन स्थिति अबैत छैक जे विषहरि के अंगूठी कौआ आ सोनक ग्रीमहार चिलहोरि ल क भागि गेलनि। आब विषहरि कानए लगली। लोक सब विषहरि के मनेबाक प्रयास क रहल अछि। सोनरा के बजा सोन देल जैत अछि आ पटबा के रूपा। दुनु के तुरत आदेश देल जैत अछि जे यथाशीघ्र विषहरि मुद्रिका आ ग्रीमहार गढ़ल जाय। कागा ल' गेल मुद्रिका चिलहोरि ग्रीमहार राम ताहि लेल विषहरि रोदना पसार। सोन ले रे सोनरा रूपा ले रे पटबा राम गढि दए सोनरा भैया सोने ग्रीमहार पहिर लीअ विषहरि मैय्या गले ग्रीमहार।। विषहरि के दोसर गीत में एक गहीर पोखरि में घुसि क जकर उचगर भिड छैक विषहरि स्नान क रहल छली। नहेला-सोनेला के बाद अपन नमहर-नमहर केश के थकरेत छली। एकाएक कौआ सोनाक ककबा ल क भागि गेल। आब कनैत-खीजैत विषहरि अपन माय लग आबि कहलथिन जे कोना कागा हुनकर ककबा चोंच में ल क पर उडि गेलनि। माय बौंसति कहलथिन: “हे विषहरि दाई, अहाँ कानू-खिजू नहि हम अहाँ लेल फेर स सोना के ककबा बनबा देब”। आब विषहरि चुप भ गेली। नीची रे पोखरिया के ऊँची रे मोहार राम ताहि पइसि विषहरि करु स्नान। नहाय सोनाय विषहरि थकरथि केश राम सोना के ककहिया आजु काग लए गेल। कनैत खीजैते विषहरि आमा आगु ठाढि राम सोना के ककहिया आजु काग लए गेल। जुनि क़ानु जुनि खोजू विषहरि माय राम सोना के ककहिया हम देब बनबाय ।। तेसर बिषहरि गीत में एहेन कल्पना कैल गेल छैक जे एक छोटछिन जमुना के कछेर में बान्ह पर छोट कदम्बक गाछ छैक। ओहि गाछक छाहरि में बिषहरि जुआ खेल लगली। जुआ खेल काल ततेक बेसुध भ गेली की कखन कौआ उडिक एलई आ झपट्टा मारि बिषहरि के हार ल गेलनि से पते नहि चललनि। जखन होश में एली त कनैत खिजैत कौआ के पाछा-पाछा दौडली। रे कौआ तों जते बैसबैं हम तोरा छोरबौ ने ओतहि तोहर ठोर दागि देबौक। छोटी-मोटी जमुना-दह में छोटी नील गाछ राम ताहि तर विषहरि खेलू जुआसारि। ज़ुअबा खेलइते विषहरि भेली बेसूधि राम ताहि खन काग उड़ि हार लए गेल कनइते-खीजइते विषहरि धयल पछोर राम जहाँ धय बैसबह दागब तोर ठोर।। अहि तरहें मैथिली लोकगीत आ व्यवहार में कौआ आ मनुखक बीच प्रेम अनंत अछि। जतेक भीतर जैब आ जतेक मंथन करब ततेक अमृत भेटत। ओना चर्चा मैथिली लोकगीत आ कौआ पर क रहल छी मुदा कहि नहि कथीलेल यात्रीजीक (नागार्जुनक) “अकाल और उसके बाद” कविता स्मरण आबि रहल अछि। भुखक ज्वाला में एहि कविता में केवल नायिका नहि तड़पि रहल छैक अपितु ओकरा संगे गिरगिट, कुकुर, कौआ, मुस सब ओहि भुखक वेदना के सहयात्री छैक। कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद। बाबा ई कविता हिंदी में लिखला। चूँकि ई लेख हम मैथिली में लिख रहल छी त सोचलौ एक बेर एहि कविता के मैथिली में अनुवाद करबाक प्रयत्न करी। कहेन भेल से नहि बुझल अछि मुदा प्रयत्न त केलहु। कनि देखू कतेक दिन धरि कानल चुलहा जांतो रहल उदास कतेक दिन धरि कनही कुकुर सुतलै ओकरा पास कतेक दिन धरि घरक भीत में गिरगिट केलक गश्त कतेक दिन धरि मुसो के रहलै हालत शिकस्त। दाना आएल घरक भीतर कतेक दिन के बाद देखल धुआं अंगना स ऊपर कतेक दिन के बाद मोन भेलै घर भरि के हरियर कतेक दिन के बाद सुगबुगेलक पाँखि के कौआ कते दिन के बाद।। एकटा बसन्त के गीत में नायिका कागा के सम्बाहक बना कतेक बात बता दैत छैक। बेचारी नायिका, फगुआ नजदीक आबि गेलैक। लोक के देखि ओकरो रंग रभस करक इच्छा भ रहल छैक मुदा रंग खेलत त ककरा संग? पाहून त परदेसिया छथिन. दूर देस में बैसल छथि। हे कागा अहाँ हमर समदिया बनु आ उडि क हमर कंत के हमर समाद द अबियौन। ओ हमरा हीरा मोती आ नग सं सुसज्जित एक चोली पठा देने छला से तार-तार भ गेल। हुनकर बिरह वेदना अलग रहि-रहि हमरा सता रहल अछि. आब रहल नहि जैत अछि। ककरा संग खेलब ऋतु वसन्त। निरायल फागुन दूर बसु कन्त।। उड़ि-उड़ि कागा जाहु बिदेश। हमरो ललाजी के कहब उदेश।। चोलिया एक पहु देल पठाय। चारु दिश हीरा-मोती लाल जड़ाय।। चोलिया फाटल तारम्तार। विरह सताओल बारम्बार।। सूरदास जे गाओल वसन्त। एहि जग बहुरी ने आयल कन्त।। फाटू हे धरती: सीता दाई केर वेदना राम बियाहने कुन फल भेल। सीता जन्म अकारथ गेल। कखनो काल जखन माय तंग भ जैत छलीह त अनायास दोदिल होइएत कहैत छलीह: “फाटू हे धरती” एकर बाद सब बुइझ जैएत छल जे माय आब तामसे घोर छथि। फेर हुनका कियोक किछु नहि कहैत छलनि। मुदा हमर नेनमति देखू हमरा होइएत छल माय फाटू हे धरती कथी लेल कहैत छथि। एक दिन जखन माय केर मोन शांत रहनि त बाल सुलभ जिज्ञासा कैल: “माय, अहाँ फाटू हे धरती कियैक कहैत छियैक?” माय कहली: “की कहु बाऊ, नारीक स्थिति एखनो सीता दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अच्छिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय में राम के अगुआ देत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि: बंदौं राम लखन वैदेही, जो तुलसी के परम सनेही। तुलसीदास अपन रचना रामचरितमानस में १४४३ बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ, दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। लेकिन वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र १४७ पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि ३२५ – १४७ बेर सीता, ६९ बेर जानकी, ५८ बेर बड़भागी आ ५१ बेर बैदेही। अहू में एक राजनीति ऐछ. सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ. ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब वैह सीताक दुःख देखू: लंका में राम रहला १११ दिन आ सीता रहली ४३५ दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन. डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वी क जीवन।” कहि ने की भेल! माय जेना अपन भावना के फोरि-फोरि हमरा कह्य लगली। हम छोट जरुर रही मुदा अतबो छोट ने जे माय के कहक भाव नहि बुइझ पाबी। कनिक क्षण लेल लागल जेना माय केर शरीर में सीताक आत्मा बैस गेल हो! माय कहैत रहली: “देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप में आबथि: माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।। आ राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम में बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि। आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम. जखन समस्त मिथिला में अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ में एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहि माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप में आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल। सबहक मोन में उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने!” सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि में डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स? सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन. यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै” राम चिंता में आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।” सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब” राम बजलाह : हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब। फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि। विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली. रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली। “जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन. कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक? अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ में खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?” खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत,के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।” जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल। मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह. राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।” सीता: “से कोना?” राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।” सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?” राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी।” सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक?” ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ी करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय! धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती में बिलुप्त भ गेलीह।” ई बात कहि माए कनि जोर स सास लेलीह आ कहलनि “ बाऊ ताहि जखन हमरा सबके कोनो कष्ट होइएत अछि त अपना के सीता बुझैत छी आ अनायास मुह स निकलि जैत अछि : “फाटू हे धरती”। ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि। अपमानित होइएत छथि। बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....” ई बात कहैत माय केर नयन नोर स भरि गेलनि. ओहि क्षण त नेना रही आब बुझै छी जे माय के नोर कोना खसलनि!!! मैथिली संस्कृति केर अवयव मैथिली संस्कृति के समग्रता में मिथिलाम कहल जा सकैत अछि। कुनो सांस्कृतिक क्षेत्र अपन किछु विशेष खानपान, विध बेबहार, गीत संगीत आदि के कारणे विशेष स्थान आ पहिचान रखैत अछि। मैथिली संस्कृति अथवा मिथिलाम के सेहो अपन विलक्षण विशेषता छैक। कनिक ओहि विलक्षणता पर विचार करी। मिथिलाम के संक्षिप्त रूप सँ 6 भाग में देखल जा सकैत अछि: क) खानपान, ख) वस्त्र विन्यास, ग) गीत आ संगीत, घ) वाद्ययंत्र, च) भाषा , छ) धार्मिक संप्रदाय आ परंपरा। क. खानपान खानपान कोनो समाज के संस्कृति के मूल होइत अछि। मिथिला में खानपान के दू दृष्टिकोण सँ देखल जा सकैत अछि। भोजन के मुख्य आ स्थानीय तत्त्व आ दोसर भोजनक सचार। जखन बहुत रासक वस्तु सँ भोजनक थारी अथवा थार सजैल जैत अछि त ई भेल सचार। सचार में कोनो जरुरी नहि जे सब वस्तु अथवा भोज्य सामग्री स्थानीय हो। जखन भोज्य सामग्री के बात करैत छी त मिथिलाक मूल भोज्य सामग्री के बुझ पडत। एक फकरा में कहल जैत छैक: तिरहुतीयता के भोजन तीन। कदली कबकब मीन।। आब कनि एकरा देखी: कदली (केरा): केरा गाछक सब चीज़क प्रयोग मिथिला में होइत अछि। थम्ब के भीतर केर तरकारी, कोषा केर तरकारी, कांच केरा केर तरकारी, पाकल केराक विविध रूप में प्रयोग। कोनो भार बिना केरा के पूर्ण नहि अछि। केराक प्रयोग सब बिध, बेबहार, पूजा पाठ, उत्सव, सत्यनारायण कथा आदि में होइत अछि। कांच केराक तरकारी पथ्य के रूप में प्रयुक्त अछि। केरा थम्भ के बहुत शुभ कार्य में प्रयोग होइत अछि। केराक पात पर भोजन करब अदौ सँ अबैत परंपरा अछि। कबकब: कबकब के अंतर्गत भेल ओल, खमहारु , कौआं पात , ओलक पेंपी, कन्ना पात, अरिकंचक लोढ़हा, आदि। ओल शुद्ध आ सुपाच्य वस्तु अछि। सामूहिक भोज में ओलक सन्ना अनिवार्य रहैत अछि। ओलक तरकारी सेहो खूब चाव सँ हमरालोकनि खाइत छी। खमहारु के तरुआ अथवा खमहारुआ मिथिलाक विशेषता अछि। अरिकोंच ओना त सब खाइत छथि मुदा स्त्रीगनक मध्य ई कनि अधिक प्रिय अछि। कबकब भोज्य पदार्थ के बनेबा में कागजी, ज़मीरी नेबो, कांच आम, आ आमिल के प्रयोग होइत अछि। मीन : मीनक अर्थ भेल माछ। माछ त अपना सभक भोजनक मुख्य पदार्थ अछि। अनेक तरहक माछ आ माछक संग संग ओहि प्रजातिक अन्य चीज़ जेना कांकोड, डोका, काछु आदि खेबाक परंपरा मिथिला में अछि। ई त भेल तीन मुख्य तत्त्व। एकरा अतिरिक्त किछु पदार्थ अछि जे मैथिल के बहुत प्रिय छनि। ई सब अछि: दही-चूरा, चीनी: समस्त विश्व में मिथिले एहेन क्षेत्र अछि जत दही-चूरा-चीनी के मुख्य भोजन आ भोज इत्यादि में सामूहिक भोजन के रूप में खैल जैत अछि। आ सब व्यंजन पर भारी पड़ैत अछि अपन मिथिलाक तिलकोरा । सर्वत्र उपलब्ध, ने दाम ने छदाम, आ स्वाद केर की कहब? छोट पैघ सब में अपन स्थान रखने अछि। ई एहेन भोज्य पदार्थ अछि जकरा केवल मैथिल खाइत छथि। मखान: भारतवर्ष में सबसँ अधिक मखान अपन मिथिला में होइत अछि आ सबसँ बेसी एकर उपयोग सेहो हमरे लोकनि करैत छी। अंततः भोजनक पूर्णता मुखशुद्धि सँ होइत अछि आ मुखशुद्धि पान सुपारी संगे। ख. वस्त्र विन्यास परंपरागत वस्त्र मिथिलाक पुरुष लेल धोती, गमछा, या मुरेठा आ स्त्रीगण लेल नुआ, आंगी अछि। किछु विशेष वर्ग केर लोक या त विशेष अवसर पर अथवा ओहुना पाग सेहो धारण करैत छथि। धोती त।मिथिलाक मुसलमान सेहो पहिरैत छला। आब मुस्लमानक बाते छोड़ू हिन्दू सब सेहो धोती सँ बप्पा बैर केने जा रहल छथि। पहिने अपना ओत कोकटा बाँग होइत छल जाकर प्राकृतिक रंग ऑफ वाइट होइत छलैक। ओही बांग केर धोती के कोकटा धोती कहल जैत छलैक। प्राचीन समय में पुरुष गाम गमैत भ्रमण करबा काल धोती, मिर्जई, दुपट्टा, गमछा, आदिक प्रयोग करैत छला। पैर में खराम पहिरबाक प्रथा हाल तक छल। पाहून परख के पैर धोबक हेतु खराम देल जेबाक परंपरा एखनो बहुत ठाम अछि। उच्च वर्ण में खराम पहिरक व्यवस्था उपनयन संग प्रारम्भ भ जाइत छल। किछु लोक खरपा सेहो पहिरैत छला। खरपा के आधार आर्थत तरवा काठ के आ ऊपर में आँगुर लग प्लास्टिक अथवा चाम लागल रहैत छलैक। बाद में लोक गोल गला सेहो पहिरनाइ प्रारम्भ केलनि। मिथिलाक स्त्रीगण सब व्यवहार कैल वस्त्र यथा धोती आ नुआ सँ केथड़ी आ सुजनीक निर्माण सुई ताग सँ करैत छली। केथड़ी मोटगर होइत छैक जकर व्यवहार मोटगर गद्दा जकाँ जारक समय बिछेबक हेतु कैल जाइत छैक। सुजनी कलात्मक होइत छैक। सुजनी में अनेक तरहक ताग के सुन्नर संयोजन सँ बहुत रास डिजाईन , मोटिफ, वोटिफ, पैटर्न आदि बनेबाक प्रथा मिथिला में छलैक। सब वर्ग आ जातिक स्त्रीगण एहि कला में निपुण होइत छली। सुजनीक प्रयोग ओछाइन केर चद्दरि के रूप में होइत छैक। किछु लोक गरीबी में केथड़ी सेहो ओढ़ैत छथि। ग. गीत संगीत मिथिलाक लोकगीत एक महासागर अछि। एकर संख्या कतेक अछि से कहब असंभव। मैथिली लोकगीतक विशेषता एकर समवेत गायन शैली छैक। लगभग 98 प्रतिशत गीत बिना कोनो वाद्ययंत्र और विशेष राग सँ गैल जाइत अछि। मुदा गीतक शब्द, भाव, गबैय्या के उत्साह आ समर्पण, विध बेबहार के प्रति ध्यान , ऋतुक संग स्वभाव, क्रियाकलाप सँ प्रतिबद्धता, काज में लगाव, आपसी प्रेम आ प्रकृति सँ अनुराग बिना कोनो वाद्ययंत्र के सेहो मैथिली लोकगीत के अलग संसार में ल जाइत अछि। विद्यापतिक पदावली, ताहू में उत्सव विशेष केर गीत, सोहर, समदाउन, उदासी, साँझ, प्राती आ शिवक गीत में महेशवानी , नचारी आ कंरथुआ गीत बहुत हर्षित करैत अछि तन के आ मोन के। सीता, राजा सलहेस, कारिख महाराज, दीनाभद्री, आदिक लोकगाथा आ गीत सेहो अपन अलग स्थान रखैत अछि। सब शास्त्रीय गीत मिथिला में बहार सँ आयातित अछि, यद्यपि ध्रुपद मैथिली लोकशैली संगे तारतम्य बना सकल अछि। बटगबनी, तिरहुत, लगनी तीव्रगति सँ चलैत गीत आ मोन लगबे बला गीत अछि। उदासी संत परंपरा, कबीरपंथी परम्परा, सँ प्रभावित भ रचल गेल अछि। मिथिलाक उच्चवर्ग विशेष रूप सँ ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ अपन महिला के पब्लिक स्पेस में गायन, वाद्ययंत्र संगे गायन, नृत्य आदिक स्वतंत्रता नहि देने छथि जाहि सँ एहि वर्ग केर महिला में नृत्य, नृत्यगीत, नृत्यनाटिका आदिक शैली नहि विकशित भ सकल छनि। अन्य जाति सब में डोमकच्छ, जटा-जटिन, झ्झिया, आदिक रूप भेटैत अछि। शामा चकेबा में बहुत साधारण तरहक नृत्य आ उत्साहक स्वतंत्रता देखैत छी। मुस्लमान महिला सब ताजिया के समय झिझिया छाती पीट पीट गाबैत छथि। हुनकर स्वर आ टोन बहुत हद तक उदासी आ समदाउन सँ मेल खाइत छनि। घ. वाद्ययंत्र मिथिलाक मूल वाद्ययंत्र रसनचौकी में प्रयुक्त होइत अछि। दुर्भाग्य सँ एकरा कहियो मिथिलाक तथाकथित विद्वान लोकनि प्रोत्साहित नहि केला। एकरा बारे में कहल जाइत अछि जे जखन सीता कुम्भ सँ बहार भेली त भगवान स्वर्ग सँ प्रसन्न होइत अप्सरा, वाद्ययंत्र आ ओकरा बजबय बला कलाकार सेहो मिथिला पठेला। किछु लोकक कहब छनि जे चूँकि ई वाद्ययंत्र चमार बजबैत छथि ताहि एहि पर विशेष ध्यान नहि देल गेल। च. भाषा: मैथिली भाषा प्राचीन भाषा अछि। एकर अपन लिपि छैक मुदा आब लोक देवनागरी में लिखैत छथि। बंगला लिपि मिथिलाक्षर सँ प्रेरित भ बनल अछि। एहि भाषा में विद्यापति, ज्योतिरेश्वर, चंदा झा, लाल दास, हरिमोहन झा आ यात्री सनहक़ साहित्यकार भेल छथि। आन भाषा जकाँ मैथिली में सेहो स्थान आ लोक ज्ञाने भाषा के बजबाक शैली, शब्द व्यवहार, टोन, आदि में परिवर्तन पैल जाइत अछि। बेगूसराय, बरौनी, मुंगेर आदिक मैथिली दक्षिण प्रभाव सँ ओत प्रोत अछि आ शैली में स्थानीय आनंदक अनुभूति भेटत। यद्यपि दरभंगा, मधुबनी में रहनिहार मैथिल सब अपन बोली के प्रमाणित करबा लेल बेहाल रहैत छथि। तहिना मिथिला केर पश्चिम में प्रयुक्त भाषा में कनि अलग स्थानीय भाव भेटैत अछि। भागलपुर, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज, दुमका, बांका में व्यवहृत मैथिली के अंगिका कहल जैत अछि। वैशाली क्षेत्र के मैथिली के बज्जिका कहल जाइत अछि। उच्च आ निम्न वर्ग ज्ञाने सेहो मैथिली बजबाक शैली में किछु उतार चढ़ाव भेटैत अछि। सब क्षेत्र, समुदाय, के स्थानीय शब्द, शैली, उपमा, अलंकार, पिहानी, फकरा, गीत नाद आदि के आधार मानि एक प्रामाणिक मैथिली भाषा के विकशित करबाक जरुरत अछि जे सबके मान्य हो, सब के सोहनगर लागनि। छ. धर्म आ संप्रदाय मिथिला में सब वर्ण के लोक, सब धर्म के लोक रहैत छथि। अतै केर हिन्दू पंचोपासक छथि। महादेव केर पूजा माटिक महादेव बना अद्भुत ढंग सँ कैल जैत अछि। बुद्ध केर भाषा आ चार्यपद के एखनो मैथिली अपना में आत्मसात केने अछि। तंत्र में बौद्ध तंत्र के स्पष्ट प्रभाव छैक। सिद्ध पीठ आ बज्रयान केर तंत्र स्थल मिथिला में आबि जेना संगम जकाँ एक दिशा में एक भे बहे लगैत अछि। मुस्लमान सब सेहो अपन धर्म केर पालन करैत छथि संगहि किछु लोक परंपरा केर तत्व के अपना में समावेश क लेत छथि। सीता के मिथिलाक स्त्री नायिका के प्रतिनिधि आ राजा सलहेस के पुरुष नायक के प्रतिनिधि कहल जा सकैत अछि। मिथिला चित्रकला मिथिला चित्रकला जकरा मधुबनी चित्रकला सेहो कहल जाइत अछि, अपन स्थान आ नाम कला संसार में नीक जकाँ दर्ज करा लेने अछि। एहि पर बड्ड लिखब अनिवार्य नहि। इंगित भ गेल अतेक पर्याप्त अछि। मैथिली लोक परम्परामे नाथ जोगी राजा भरथरी आ गोपीचंद लोक गाथाक परिवेश हमर नानी लोक-परम्परा केर संरक्षिका छली।शायद अक्षरमालाके ज्ञान हुनका नहि छलनि मुदा लोकज्ञान जेना कंठमें कंप्यूटरके कोनो चिप जकाँ सेट छलनि। जखन हुनका लग जाई ओ किछु नव आ महत्त्वपूर्ण लोकव्यव्हार अथवा कथा अथवा गीतअ थवा फकरा, देव ीदेवता, स्थानक विशेषता आदिकसन्दर्भमें बात करथि। गंभीर बात। एक-एक चीज़क अर्थ स्पष्ट करैत विवरण दैत छली। नानी छली बड़ा कुलीन घरसं। नाना सेहो अपना समय केरजमींदार छला। मुदा बजबाक शैलीमे ंनानी मधु छली। हमरा कखनो “रौ” के त छोडू “हौ” नहि कहलनि। सदरिकाल “यौ” कहि सम्बोधन करथि।बजबाकशैली विलक्षण। भेटथि त कुशल क्षेम पुछबाक अद्भुत अंदाज़। जखन कहियो नानी लग जाई अपन गामक संस्कारके तिलांजलि द दी। बिना डांट-फटकार केनिक संस्कार कोना सिखाबी ई कियो नानीक व्यवहार संग्रहण क सकैत छल। हमर जेठ बहिन केर नाम विद्या आ सरोज छनि। जखन कखनो नानी लगजाईत हुनका सबहक कुशल क्षेम अहि तरहे पुछथि: “विद्या कुमारी कोना छथि? सरोज कुमारी कोना छथि?” ई छलनि नानी के व्यवहार अपन बेटीक बेटीके प्रति; सेहो परोक्षमे। कहि नहि कथी लेल नानी के हमरापर बड्ड विश्वास छलनि। जखन जाई नानी घंटों बात करथि – कखनो घरमे, कखनो चिनबार लग, कखनोदलानपर त कखनो आमक गाछीमे।नानी के शायद ई भान छलनि जे: “कैलाश कहियो ने कहियो मैथिली लोकपरंपरा लेल किछु करताह!” बहुत रास अजगुत गीत सब नानी गबैत छली। कतेको बेर सोचलौं रेकॉर्ड करब आ लिखियो लेब। किछु लिखबो केलों। मुदा देव संयोग ई छलजे नानी बिचहिंमें बैकुंठक रस्ता ध लेली। एक बेर नानी लग दालान पर बैसल गप्प करैत रही ततबे में एक नाथ जोगी हाथ में सारंगी लेने, बढ़ल दाढ़ी आ भगबा वस्त्र में सारंगी के तार के झनकबैत आबि गेलैक। बिना ककरो आज्ञा के इंतजार केने तारक झनकार तेज भ गेलैक। करुण रस झहरए लगलैक। नानी हमरा कहलनि : “कैलाशजी, जोगी जी के कुर्सी दियौन बैसबाक हेतु”। हम तुरत एक कुर्सी के झारि जोगी जी के द देलयनि। जोगी जी सारंगी बजबैत मस्त भेल चुपचाप कुर्सी ग्रहण केलनि आ कनिकाल में सारंगी केर तान संगे उच्च स्वर में गोपीचंद के गीत गाबय लगला। धीरे-धीरे अगल-बगल सं बहुत स्त्रीगन आ नेना सब जमा भ गेल। किछु पुरुख सेहो एला। जोगी महराज गीत गबैत रहला, सारंगी बजबैत रहला आ स्त्रीगन सब कनैत रहली।पूरा वातावरण उदासी के भाव सं ओतप्रोत छल। पूरा त नहि परन्तु आंशिक बात हमहु बुझलियैक आ थोरेक द्रवित सेहो भेलौं। जोगी डेढ़ घंटा धरि सारंगी के तान पर गीत गबैत रहला।जखन समाप्त भ गेलनि त कियोक पाई, कियोक अन्न, कियोक वस्त्र आदि देलकनि। मामी किछु जलखई देलथिन आ चाह सेहो भेटलनि। जलखई समाप्त क जखन जोगी जी चाह पीब लगला ओही क्षण एक आश्चर्यजनक दृश्य उपस्थित भ गेलैक।एक 90 वर्ष केर महिला हाथ में लाठी पकड़ने आबि गेली। जोगी के पकडि कानय लगली: “रे बुधना! हम छियौ तोहर माय! रे हमर बेरा पार लगा दे तखन फेर जोगी बनि जैहें। बाप बुधना बुधना रटैत प्राण त्यागि देल्थुन। अपटी खेत में हुनकर आत्मा भटकैत हेतनि। रे बइमान! रे बाप के तर्पण दे। संस्कार कर। रे वंशक रक्षक कर!” बेचारा जोगी हतप्रभ! बुढ़िया किछु बजबाक अवसर देबाक हेतु तैयार नहि। जोगी कहलकै, “बूढी माँ, मै छपरा जिले का हूँ और जाति से कुम्भकार हूँ।मै चार भाई हूँ और मेरी माँ मर चुकी है। मै आपका पुत्र या कोई बुधना नही हूँ। मेरी नाथ सम्प्रदाय में दीक्षा से पहले मेरा नाम रमेश पण्डित था। दीक्षा के बाद मेरा नाम जोगी मोतीनाथ है।” लेकिन बुढ़िया ओकर तर्क सुनबाक हेतु तैयार नहि। बड़ा बिपत्ति! पुराण लोक सब ऐल। ओकरा चीन्हबाक प्रयत्न केलक। सब कहलकै जे ई बुधना नहि थिक. मुदा पुत्रविछोह सं तरपैत माय के बुझेनाई अतेक सहज कहाँ? अंत में सब कहलकै “ठीक छै, कोनो एक चिन्ह बताऊ जे बुधना के खाश छलैक?” कनिकाल लेल बुढ़िया चुप भ गेल। फेर सोचैत बाजलि: “हमर बुधना के मध्य पीठ पर तीन टा नमहर-नमहर तील छैक।” लोक सब जोगी के पीठ देखेबा लेल कहलकै। जोगी शुरू में पीठ उघारबा लेल तैयार नहि छल। अहि बात सं बुढ़िया के शंका आर प्रबल भ गेलैक। बुढ़िया जोर-जोर सं कानि-कानि लोक के कहए लागलि: “देखू हे माई दाई! ई बुधने अछि। पीठ नहि उघारि रहल अछि. हम दूध पियेने छी एकरा। हमरा आंखि सं कोना अपना आप के बचा लेत?” बुढ़ियाक कानब सं द्रबित होइत लोक सब में एक प्रमुख व्यक्ति जोगी के सम्बोधित करैत बजला: “देखू जोगी जी! एहि 90 वर्ष केर महिला पर दया करू। हिनका पीठ उघारि देखा दियौन। जं तीन तील लगातार एक ठाम मध्य पीठ में नहि हैत त अहाँ के हमरालोकनि छोडि देब अन्यथा अहाँ अतए सं नहि जा सकैत छी।” कनि ना नुकुर केलाक बाद जोगी पीठ उघारबा लेल तैयार भ गेल। सब जिज्ञासा सं जोगी के पीठक निरिक्षण केलक मुदा मध्य पीठ में तीन तीलक त बाते नहि एकौ तील नहि रहैक। बुढ़िया झमा खसलि। जोगी प्रफुल्लित होइत सारंगी उठा सारंगी बजबैत दोसर गाम दिस बिदा भेल। राति में सुते सं पहिने नानी सं हम जोगी आ समस्त चीज़ के सम्बन्ध में जिज्ञासा कैल। नानी कहली: “हमरा ज्ञात छल जे अहाँ ई प्रश्न करब. अगर अहाँ नहि करितों तैयो हम जोगी आ सारंगी के सम्बन्ध में आई चर्चा करितौं.” हमरा नानीक ई कहब बड्ड निक लागल. नानी कहली जे ई सब नाथ सम्प्रदाय जकर आदिगुरु गोरखनाथ छथि केर सदस्य छथि. हिनका सबके अपन मिथिला में जोगी, सारंगीबला जोगी, सिध्ह जोगी, गुदडियाबाबा, घुनाबाबा, गोपीचंद बाबा सेहो कहल जैत छैन। मान्यता छै कि जे रुईसक घर सं भागि जैत छला वो गोरखपुर जा बाबा गोरखनाथ के नाथ सम्प्रदाय केर चेला भ जैत छला। घर-द्वार सं उन्मुक्त। ने उधो को लेना ने माधो को देना। ओ सन्यासी के श्रेणी में आबि जैत छथि। संसारिकता केर मोहजाल सं मुक्त। ओतए हरेक जोगी के एकटा सारंगी देल जैत छनि। वैह सारंगी बजबैत आ गीत शिक्षा में निपुण भेला पर नगर आ ग्राम में घरे-घरे भीख मांगि बारह बर्ष धरि ओ जीवन व्यतीत करैत छथि। बारह बरिख सं पहिने हुनका अपन माए सं भीख लेबा में सफल होबाक छनि। जे सफल भ गेला ओ सिद्ध जोगी आ ओकर बाद ओ आनो के गुरु के रूप में दीक्षा द सकैत छथि। ओहि समय में जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्ति पर जोर दे लिख रहल छी। अहि लोक स्मरण में जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओ नानीक छनि आ जतएकथा इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक। लोक परंपरा में जननायक के रूप में प्रतिष्ठित भर्तृहरि राजा के जीवन वृत्तान्त, नीति आ उपदेश के लोक शैली में भरथरी में नाथ जोगी सब गाबि-गाबि सुनबैत अछि. एहि लोकगाथा के गोरखपंथी साधु अपन सारंगी पर गबैत छथि. सारंगी के कतौ- कतौ चिकारे सेहो कहल जैत छैक। नाथ सम्प्रदाय केर गुरु गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ केर निर्गुण सिद्धांत सं प्रेरित एहि लोकगाथा में सामदेवी रानी आ समस्त विलासिता आ राजभोग के त्यागि भरथरी राजा केना वैराग्य लेलनि आ फेर जोगीक वेश में रह्लनि एकर बहुत करुण विवरण अछि। एहि लोकगाथा के दू पाट में बाटि बुझल जा सकैत अछि। प्रथम भाग में राजा भरथरी के वैराग्य तथा पिंगला द्वारा पूर्व जन्म केर कथा। दोसर भाग में जंगल में गेलाक बाद भरथरी राजा द्वारा कारी मृग के वध करब तथा माता मैनावती के आज्ञा के शिरोधार्य करैत जोगी अथवा वैरागी होबाक कथा छैक। एहि गेय गाथा में योग-भोग केर अंतर्द्वंद तथा करुण विप्रलम्भ केर प्रयोग चरमोत्कर्ष पर भेटैत छैक। कथा ऐना शुरू होइत छैक। राजा भरथरी के एकाएक वैराग्य उत्पन्न होइत छनि।एकर कारण हुनकर जन्म कुण्डली में वैराग्य लिखल छनि. फेर की, भरथरी राजा सामदेवी रानी के छोडि भरल जुआनी में वैराग्य लेल जा रहल छथि। रानी पहिने त मना करैत छथिन लेकिन जखन भरथरी राजा नहि मानैत छथि त पुछैथ छथिन: “ठीक छैक स्वामी! अहाँ जा रहल छी मुदा जएबाक कारण त बता दिय हमरा?” भरथरी राजा कहैत छथिन: “हे रानी, एकर एकमात्र कारण थिक हमर जन्म कुण्डली में वैराग्यक योग।” मुदा सामदेवी रानी एहि जवाब सं संतुष्ट नहि होइत छथि आ भरथरी राजा के बाहर जएबाक अनुमति नहि दैत छथिन। भरथरी मोन मसोसि क रहि जैत छथि।भरथरी राजा एक प्रश्न रानी सं पुछैत छथिन: “हे रानी एक बात के उत्तर हमरा अहाँ दिय! अपन सबहक सोहाग राति में पलंग केर पाटी कुन कारने बिखंडित भ गेल?” भेल ई रहनि जे जखने सोहागराति के समय राजा अपन रानी सं काम क्रिया करबा लेल उद्दत भ रानी के बाहुपास में लेमै लगला एकाएक पलंग केर फट्ठी टूटि गेलैक। रानी आ राजा के एहि बात सं किछु अशुभ केर शंका भेलनि। निर्णय केलनि जे आई राति सोहाग नहि मनेता आ ने कामेक्रिया में लिप्त हेता। एक दिन में कोनो बैकुण्ठ थोरे ने खासि पड़तैक? ओकर बादे राजा भरथरी के मोन में विचित्र तरहक उचाट होबए लगलनि। कखनो रानी लग जएबाक मोने ने करनि। वैह प्रश्न आई राजा अपन रानी सामदेवी सं पुछि देलथिन। रानी सामदेवी बजली: “राजन, एहि बात के हम नहि जनैत छी। हलांकि हम्मर छोट बहिन पिंगला अग्रज्ञानी अछि। ओकरा भुत, वर्तमान आ भविष्य सब चीज़ के अपूर्व ज्ञान छैक। मुदा पिंगला दिल्ली में रहैत अछि।” राजा तुरत अपन सारि पिंगला के चिट्ठी लिख दिल्ली सं मालवा एबाक प्रार्थना केलनि। चिट्ठी पाबि पिंगला झट दनि राजा लग जैत छथि आ कहैत छथिन: “हे राजन! जों हम सत्य कहब त अहाँ स्वीकार नहि क पैब। ताहि पूर्व जन्मक सत्य जनबाक हठ छोडि देल जाओ।” मुदा भरथरी राजा अपन जिद्द पर अटल रहला। कहलथिन: “हे हमर सुन्नरि, दुलारू आ गुनमति सारि पिंगला, अहाँ सत्य कहू। हम चेतन्य आ कठोर ह्रदय केर पुरुख छी।केहनो सत्य के स्वीकार करबाक क्षमता हमरा में अछि। अहाँ निश्चिन्त भ जे सत्य छैक तकर बखान करू।” आब पिंगला गंभीर भेली आ बजली: “ठीक छैक भरथरी राजा, अगर अपने सत्य सुनबा लेल आतुर छी त हम आई एहि क्षण अहाँ के सत्य बता दैत छी। हम्मर बहिन सामदेवी रानी जे अहि जन्म में अहाँक पत्नी छथि पूर्व जन्म में अहाँक माँ छली। ई बात अही लेल हम अहाँके नहि बता रहल छलों। ओना रानी सामदेवी के सेहो पूर्व जन्म के बात ज्ञात छनि मुदा एहि जन्म में त ओ अहाँक पत्नी छथि ताहि नहि बतेली। आब ई अहाँ ऊपर अछि की भोगमय बिलाशिता पूर्वक जीवन जीबी अथवा योगमय कोनो जोगी अथवा संयासिक जीवन।” ई बात सुनि भरथरी राजा उदास भ जैत छथि। माथा टनकए लगैत छनि। संसार आ मानवीय सम्बन्ध सब में मिथ्याभाव लगैत छनि। कनि काल बाद भरथरी राजा अपन नव व्याहित रानी सामदेवी सं आज्ञा लै सिंहलद्वीप केर घनघोर बोन में कारी मृग के शिकार हेतु प्रस्थान करैत छथि। मृग केर पत्नी हरिनी भरथरी राजा के शिकारी के खेमा देखि अनिष्ट केर आशंका सं घबरैत अपन पतिक प्रानक रक्षा में लागि जैत अछि। जखन कोनों व्योंत नहि भेटैत छैक त स्वयं राजा भरथरी लग आबि जैत अछि आ निवेदन करैत छैक: “हे राजा, अहाँ हमर पति केर प्राण केर रक्षा करू। हुनकर शिकार नहि करू। हुनका बदला में हम्मर शिकार क लिय!” लेकिन भरथरी राजा ओकर निवेदन के स्वीकार नहि करैत छथि. हरिणी निराश भ जैत अछि। हरिणी हारि नहि मानैत अछि आ पतिक प्राण केर रक्षा कोनो ने कोनो हालत में कर चाहैत अछि। दौर क कारी हरिण लग जैत अछि आ हाफैत कहैत छैक: “हे प्रिय, भरथरी राजा अपन शिकारी दल के संग बोन में घुसि गेल छथि। ओ अहाँक शिकार करता। अहाँ तुरत एहि बोन के छोडि कोनो आन ठाम चलि जाऊ।” कारी हरिण सोचलक: “आखिर भरथरी राजा अकारण हमरा कथी लेल मरता? हमरा हुनका संग कोनो तरहक वैमनस्य नहि अछि। कथी लेल एहेन सुन्दर बोन के छोड़ी, अनजान बोन में धक्का खेबाक हेतु जाई?” यैह सोचैत ओ हरिणी के सम्बोधित करैत बाजल: “हे हमर दुल्लरि! अहाँ चिंता जुनि करू। हमरा राजा नहि मारता। हम हुनकर कोनो अहित नहि केने छी। केवल वैह प्राणी दोसर प्राणी के मारि सकैत अछि जे ओकरा कोनो तरहक दुःख देने होइक अथवा अहित केने होईक। हमरा कोनो आन बोन में अनेरे नहि जएबाक चाही।” आब हरिणी मोन मसोसि क रहि जैत अछि। इम्हर भरथरी राजा अपन शिकारी दल संगे गहन बोन में बढ़ल जैत छथि। एकाएक कारी मृग के देखैत छथि आ ओकरा वध करबाक हेतु तीर के धनुष के प्रत्यंचा पर चढ़ा लैत छथि। माजल शिकारी जकाँ लगातार सात तीर सं प्रहार करैत छथि। सात में स छ तीर गंगा माता, वनस्पति देवी, गुरु गोरखनाथ, एवं कारी मृग केर सिंघ सं बेकार भ जैत छनि मुदा सातम तीर सं मृग घायल भ जैत अछि। शोनित सं भरल देह, तीरक टीस सं व्यथित मृग वेदना के आधिक्य में भरथरी राजा के श्राप दैत छनि: “हे राजन! अहाँ त नृशंश भ हमरा मारि देलौं! आब हमर नेत्र अहाँ अपन रानी के श्रृंगार करबा लेल द देबनि; हमर सुन्दर कलात्मक सिंघ कोनो राजा के दरबज्जा पर मढबाक हेतु द देबनि; हमर चाम के कोनो साधु के आसन बनेबा लेल द देबनि; आ अन्ततः हमर माउस अहाँ रान्हि बघारि क खा लेब। मुदा एक बात स्मरण राखब, जहिना हम्मर सत्तरि सै रानी कलपि रहल छथि तहिना एक दिन अहुक रानी सब कलपती।” अपन बात के समाप्त करैत कारी मृग जे ओहि बोनक हरिण सबहक राजा छल, अपन प्राण त्यागि देलक। भरथरी राजा द्रवित भ गेला. तुरत हुनका अपना आप सं घृणा होबए लगलनि। कोनो तरहें ओ आब कारी मृग के जानक रक्षा करै चाहैत छथि। व्यथित भ गुरु गोरखनाथ के कुटिया में घुसैत छथि आ अपन गलती के स्वीकार करैत निवेदन करैत छथिन: “हे गुरु गोरखनाथ! हमरा सं बड्ड पैघ पाप भ गेल। अहाँ कोनो तरहें अपन दैवीय शक्ति सं अहि कारी मृगराज के प्राण के पुनः वापस क दियौक!” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “हे राजन! आब एकरा पुनः जीवित केनाई हमरा वशक बात नहि अछि।” भरथरी राजा पागल जकां कर लगैत छथि। माटि में ओहरिया मरैत छथि। कनैत बेहाल भ जैत छथि आ गुरु गोरखनाथ के कहैत छथिन: “अगर अहाँ अहि मृगा के प्राण नहि वापस केलौं त हम अही ठाम अपन प्राण त्यागि लेब!” विवश भ गुरु गोरखनाथ कारी मृगराज के अपन दैवीय शक्ति सं पुनः जीवित क दैत छथिन। मृग उठि क बैस जैत अछि। राजा पर एकबेर फेर दयाभाव देखबैत कारी मृग अपन श्राप वापस ल लैत अछि।समस्त हरिण समुदाय में उत्सव केर वातावरण भ जैत छैक। हरिणराज केर सत्तर सए रानी मस्त भ नाचए लगैत छैक। कस्तूरी केर सुगन्ध सं बोनक वातावरण महो-महो भ जैत छैक। कारी मृग अपन रानी सब लग बिचरन करए चलि जैत अछि। एहि दृश्य के देखि भरथरी राजा आनन्दविभोर भ जैत छथि। इम्हर भरथरी राजा के ह्रदय परिवर्तित भ जैत छनि। संसार क्षद्म लगैत छनि। मोन में सांसारिक सुख सं वैराग्य उत्पन्न भ जैत छनि।गुरु गोरखनाथ के चरण पर बैस जैत छथि। कहैत छथिन: “हे गुरुदेव! हमर उद्धार करू। हमरा अपन शरण में लेल जाओ। अपन शिष्य बना हमरा धन्य करू।” गुरु गोरखनाथ कहैत छथिन: “राजन! हम कोनो स्थिति में अहाँ के अपन शिष्य नहि बना सकैत छी। एकर एकमात्र कारण थिक अहाँक राजसिक वृत्ति। अहाँ राजा थिकहूँ। राजा भला जोगी कोना क बनत?” भरथरी राजा उत्तर में कहैत छथिन: “हे गुरु श्रेष्ठ! हम अहाँक पथ पर अहाँक चेला बनि चलए चाहैत छी। एहि लेल सब किछु भौतिक पदार्थक संग-संग अपन चित्तक चीज़ के सेहो त्याग करक हेतु तैयार छी।” अंतत गुरु गोरखनाथ एहि शर्त पर की भरथरी राजा सन्यासी त बनि जेताह मुदा हुनका अन्तिम दीक्षा गोरखनाथ तखन देथिन जखन भरथरी राजा अपन रानी सामदेवी सं ‘माए’ कहि भीख मंगताह। आब एतहि सं भरथरी राजा नाथ जोगी के रूप धारण क, गेरुआ वस्त्र पहिर, हाथ में सारंगी लेने गामे-घरे होइत राजक द्वार पर अलख जगेने गीत गाबि रहल छथि। रानी साम देवी जखन भरथरी राजा के जोगी के भेष में देखैत छथि त परेशान भ जैत छथि।रानी हुनका कोनो स्थिति में भीख देबाक हेतु तैयार नहि भ रहल छथिन। भरथरी राजा अहि बात पर हुनका कहैत छथिन जे ओ अपन नैहर चलि जाथु। मुदा रानी नैहर नहि जैत छथि आ उलटे भरथरी राजा के राजमहल में कोनो एकांत स्थान में रहि जोगी के भेष में तपस्या करक हेतु कहैत छथिन। भरथरी राजा कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर अहाँ गंगा के निर्मल धार एते ल आबी त हम राजमहल में रहि क तपस्या क लेब।” रानी छली परम सती. तुरत अपन सत सं गंगा के धार के ओतहि ल एली। आब भरथरी राजा हुनका बतबैत छथिन जे कोना एक जोगी के सर्वाधिक पुन्य तीर्थ स्थल केर भ्रमण सं भेटैत छैक। ई सुनि रानी गंगा के धार के वापस चलि जएबाक हेतु कहैत छथि। रानीक बात के सम्मान करैत गंगा केर धारा वापस चलि जैत छैक। एकर बादो रानी सामदेवी भरथरी राजा के भीख देबाक लेल तैयार नहि भेली। भरथरी राजा के भेलनि “अगर रानी भीख नहि देती त साधना बीचहि में अटकि जैत। फेर की हैत? गुरु दीक्षा भेटबे ने करत. फेर बैकुण्ठ कोना प्राप्त हैत?” अंततः गुरु गोरखनाथ स्वयं अबैत छथि. रानी सामदेवी के पूरा बात बुझबैत छथिन। आब रानी मानि जैत छथि आ भरथरी राजा के भीख द दैत छथिन। एकर बाद भरथरी राजा के अपना संगे गुरु गोरखनाथ जोगीक गहन तपस्याक हेतु बोन में लेने जैत छथि। ओही दिन सं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माए सं भीख मंगबा में सफल भ जैत।मिथिला कहियो वैराग्य के स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवन में रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक। ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माए सं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक। नानी कथो कहथि आ बीच-बीच में गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल।नानी सेहो कानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथा में मस्त – एक सुनेबा में मस्त आ दोसर सुनबा में मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैत छलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़ में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्य कलाकार नानी आ एक मात्र श्रोता हम मुदा दुनु के आंखि, ह्रदय, आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथा वाचिका केर गुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतःकरण में कथा के बसेला सं अबैत छैक। हमरा एकाएक स्मरण भेल जे दिन में नाथ जोगी किछु मैनावती आ गोपीचंद केर गीत सेहो गबैत छल। हम नानी के स्मरण दियेलएनि। नानी कहली: “गोपीचंद आ मैनावती केर प्रसंग भरथरी राजा के जोगी बनलाक बाद अबैत छैक। गोपीचंद केर प्रसंग सेहो बड़ा रोचक छैक। बड्ड राति भ गेल। आई सुनब की काल्हि?” हमर जिज्ञासा प्रबल छल। भेल एखने सुनि ली। नानी के कहलिएनि: “हमरा निन नहि लागल अछि। गाथाक अन्तिम भाग जानबाक उत्कंठा सेहो अछि। ताहि निक यैह रहत जे लगले में मैनावती आ गोपीचंद केर कथा सेहो सुना दी अहाँ?” नानी सहज भाव सं हमर निवेदन के स्वीकार करैत कथा कहनाई प्रारंभ केलनि। गोपीचंद एक संस्कारी पुत्र छथि पदामसेन राजा आ मैनावती रानी के।मैनावती भरथरी के बहिन छथिन।गोपीचंद के चंद्रावल नामक एक सहोदर बहिन छथिन। जवान भेला पर गोपीचंद के विवाह होइत छनि। संयोग सं पहिल पत्नी सं हिनका पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लोभ में ब्याकुल रानी पद्मावती अपन असगर पुत्र गोपीचंद के दोसर विवाह कर दैत छथिन। दोसरो पत्नी सं गोपीचंद के पुत्र नहि होइत छनि। पौत्रक लालषा में मैनावती गोपीचंद के तेसर, चारिम, पाचम करैत १६ टा विवाह करा दैत छथिन। विधनाक विधान देखू, गोपीचंद के १६ रानी सं १२ पुत्री त भ जैत छनि मुदा बेटा एकौटा नहि।मैनावती अंत में अपन भाई भरथरी जे नाथ जोगी भ गेल छथि के बजबैत छथि आ अपन रोदना पसारैत छथि। कहैत छथिन: “अगर हिनका पुत्र नहि भेलनि त समस्त राजपाट समाप्त भ जैत। वंशक अंत भ जैत। कियोक पितृ के तर्पण देब लेल नहि रहत। एहेन जीवन जीब सं बढियाँ जे आत्महत्या क ली? किछु उपाय करू हे भाई भरथरी जाहि सं गोपीचंद के एक पुत्र भ जाईन।” जोगी भरथरी कनि ध्यानस्थ होइत छथि। फेर चिंतित भ कहैत छथिन: “बहिन दाई, बड्ड दुखक बात! भागिन गोपीचंद के संतानक योग नहि छनि। हम एहि में किछु करबा में असमर्थ छी।” ई बात सुनि रानी मैनावती बिलाप करै छथि। बड्ड जोर-जोर सं कनैत छथि।कहैत छथिन: “हम किछु नहि जनैत छी। अहाँ कोनो युक्ति निकालू जाहि सं गोपीचंद के पुत्र होनि!” आब आरो गंभीर होइत भरथरी कहैत छथिन: “ठीक छै, अगर भागिन राजमहल त्यागि घनघोर बोन में नाथ जोगी बनि तपस्या करथि त हिनका पुत्र भ सकैत छनि।” ई बात सुनि मैनावती रानी झमा खसैत छथि। मुदा भरथरी के बुझेलाक बाद अपन पुत्र के जोगी बना बिजन बोन में जएबाक लेल कहैत छथिन। गोपीचंद माए केर आज्ञा पाबि सोलहो रानी लग जैत छथि आ भरथरी जी के निर्णय बतबैत छथिन। सोलहो रानी पुत्र आकांक्षा के ध्यान में रखैत छाती के पाथर क लैत छथि आ अपन पति राजा गोपीचंद के जोगी बना बीजन बोन में भेजि दैत छथि। बोन में गेलाक बाद गोपीचंद घोर साधना में लागि जैत छथि। दिनभरि जंगल में साधना आ साँझ पहर भिक्षाटन लेल नगर आ ग्राम केर यात्रा हाथ में सारंगी लेने वैराग्य केर गीत गबैत। यैह हिनकर सब दिनका जीवन भ गेल छनि। एक दिन भिक्षाटन के क्रम में घुमैत-घुमैत गोपीचंद अपन बहिन चंद्रावल के सासुर चैल जैत छथि। जोगी के देखि चन्द्रावल घर सं भीख देबा ले बाहर भेली। देखैत छथि जे ई जोगी कोनो आन नहि अपितु हुनकर सहोदर भाई राजा गोपीचंद छथि।कुहेस फाटि गेलनि। आंखि अन्हार भ गेलनि. धम्म सं धरती पर चित्ते खसली। जखन लोक उठेलकनि त पता चललैक जे प्राण त्यागि देने छथि। गोपीचंद के सहोदर के ममत्व जागि जैत छनि। बफारि मारि-मारि कनैत छथि। मुदा आब की चंद्रावल बहिन त समाप्त भ गेल छथिन! हिम्मत नहि हारेत छथि गोपीचंद। चट्टे गुरु गोरखनाथ लग बहिन के पुनः जियेबाक हेतु जैत छथि. बहुत अनुनय विनय करैत छथिन. कहैत छथिन: “बरु हम्मर प्राण ल लिय मुदा बहिन दाई के जिया दियौन।” गुरु गोरखनाथ द्रवित भ जैत छथि आ गोपीचंद संगे चंद्रावल केर मृत शरीर लग अबैत छथि। हुनकर स्पर्श मात्र सं चंद्रावल जीब जैत छथि आ उठि क बैस जैत छथि। आब चंद्रावल अपन भाए गोपीचंद लेल गुरु गोरखनाथ सं निवेदन करैत छथिन जे हुनका पुत्र होबाक बरदान देथुन।गुरु गोरखनाथ भाए-बहिन के अपूर्व प्रेम देखि बड्ड प्रसन्न होइत गोपीचंद के पुत्र प्राप्त हेबाक आशीर्वाद त दईते छथिन संगहिं अमर होबाक बरदान सेहो दैत छथिन। गोपीचंद ख़ुशी-ख़ुशी अपन राजमहल वापस आबि जैत छथि। एहिकथा गाथा के प्रसंग बहुत निक अछि। एक बात त ई छैक जे राजा भरथरी,रानीसामदेवी,रानीमैनावती, गोपीचंद, चंद्रावल, आ गुरु गोरखनाथ सब कियोक मिथिला के चरित्र नहि छथि। मुदा जोगी परंपरा सं जुड़ने कथा में स्थानीय भाव आबि जैत छैक। लोक जोगी के केवल भीख देबाक हेतु नहि बजबैत छैक। जोगी अपन सारंगी आ सुमधुर कंठ के कारण एक लोक कलाकार सेहो बनि जैत अछि। गाथाक भावनात्मक पक्ष अतेक प्रबल छैक जे मिथिलाक लोक सेहो कथा के अनेक प्रसंग के उदासी, चौमासा, छौमासा, बारहमासा के रूप में लोकगीतक स्वरूप में गबैत छथि।अहि तरहे ई कथावाचना जोगी आ गृहस्त दुनु के द्वारा गैल जैत अछि।एक कला के मात्र कलाप्रशंशक अथवा श्रोताक संग-संग अनेक प्रकारक कलाकार– गीतकरचना करनिहार, गेनिहार/गीतगैन, कथावाचक, कथावाचिका – सेहो भेट जैत छैक।रचना के कारण भाषा सेहो संपन्न होइत छैक। नव शैली, शब्दाबली के प्रयोग होइत छैक। ई मूल कथा मालवा सं बहुत क्षेत्र के भ्रमण करैत भोजपुरी क्षेत्र होइत मिथिलाक माटि में प्रवेश करैत छैक। गोरखपुर भोजपुरी क्षेत्र छैक ताहि कारने नाथ जोगीक भाषा भोजपुरी भ जैत छैक। ओ मूल गीत भोजपुरी के लोक स्वरुप में गबैत छैक।ओहि स्टाइल के कॉपी मिथिला में सेहो लोकगीत (जोगी गीत) में बहुत उत्तम रूप में भेटैत छैक। दुनु भाषा – मैथिली आ भोजपुरी – सहोदरा अर्थात गंगा जमुना जकां एक भय भव्य रूप सं हिलकोरा मारैत कल-कल करैत बहैत रहैत छैक।जखन गरीबी, भावनात्मक टूटन, असफलता, अपमान आदि सं व्यथित भ कुनो युवक नाथ सम्प्रदाय के सदस्य बनि जोगी भ जैत छथि त कथा ओहि व्यक्ति, ओकर माता-पिता, पत्नी-संतान, भाए-बहिन, समाज आ गाम लेल एकभावनात्मक आ जिवंत बात भ जैत छैक।लोक झट दनि अपना आप के चरित्र सं जोड़ लगैत छथि। भरथरी, मैनावती, गोपीचंद एकाएक सब जीब जैत छथि। गीत में नव रक्त प्रबह्मान भ जैत छैक, स्वक्ष आ फ्रेश ऑक्सीजन साँस लेबाक लेल भेट लगैत छैक।मालवाक कथा एकहि क्षण में मिथिला के कथा भ जैत छैक। ओ महिला सब जिनकर पति मिथिला सं बाहर रहैत छथिन काज धंधा के चक्कर में ओ सब अपन परदेसिया अथवा बिदेसिया पति के जोगी के रूप में देखि गीत गबैत छथि। विरहअपन चरम अवस्था में पहुच जैत अछि। एक एक आखर मर्म के आखर भ जैत छैक।एहने एक गीत देखू: कथीलै प्रीति लागौलें रे जोगिया प्रीति छोड़ेने चलि जाय आंगन मोरा लेखे विजुवन रे जोगिया घर लागै दिवस अन्हार लाली पलंगिया सुन्न भेलै रे जोगिया तकिया मोहि ने सोहाए खुजल केश नीड़ भेलै रे जोगिया काजर गेल दहाए एहि गीत में विरहिणी नायिका के अपन पति बिना आंगन एकांत वन; घर दिनों में अन्हरिया राति जकाँ अन्हार, ललका सजल पलंग अनसोहानगर, तकिया मारुक लगैत छैक। खुजल केश बेकार लागि रहल छैक, अंखि सं नोरक धार कम होबाक नामे नहि लैत छैक। नोर केर धार काजर के मेटा देने छैक। ऐना लगैत छैक जेना ओकर पति नाथ जोगी बनि गेल हो। घर सं भागि गेल हो! दोसर गीत में ई प्रदर्शित कैल जा रहल छैक जे राजा भरथरी जंगल में कारी मृग(हरिण) के शिकार करक हेतु गेल छथि। रानी के अपना राजा पर गर्व छनि। बुझल छनि जे बिना शिकार के नहि औताह। रानी रातुक रभस के तैय्यारी क रहल छथि. सोहागिन रानी अपन सौन्दर्य के चानन के लेप सं सुगन्धित, फुलक हार सं सुशोभित, आ माथक सिन्दूर सं मनमोहक केने छथि. मुदा ई की? आंगन केर प्रवेश पर एक जोगी सारंगी लेने गीत गाबि रहल छैक: “हे रानी! हम दूर देस केर जोगी छी. हमरा जल्दी-जल्दी भीख द दिय, हम अहाँक दुआरि छोडि दोसर अंगना भीख लेल चलि जैब।” बेचारी रानी के की बुझल जे ई जोगी आर कियो आन व्यक्ति नहि अपितु हुनके पति राजा भरथरी छथिन। चानन रगड़ी सोहागिन हे गले फूलक हार सिंदुरा से मंगिया भरलअछिहे सुख मास अखार राजा गईले मृग मारन हे वन गईले शिकार जोगी एक ठाढ़ आंगन में हे रानी सुनले मेरी बात दए दीय भिक्षा जोगी के हे ओ त छोड़त दुआर... ओही दिनसं ई प्रथा भ गेलैक जे जे कियोक नाथ जोगी बनत ओकरा अन्तिम दीक्षा गुरु तखन देतैक जखन ओ अपन जन्मदात्री अर्थात माएसं भीखमंगबामें सफल भ जैत। मिथिला कहियो वैराग्यके स्वीकार नहि केलक। अतए हमेशा गृहस्त जीवनमें रहैत सब सिद्धि प्राप्त करबाक सिद्धांत प्रबल रहल छक।ताहि मिथिलाक अगर कोनो युवक कोनो कारने नाथ जोगी बनैत अछि त ओकरा लेल माएसं भीख लेनाई बहुत दुष्कर कार्य भ जैत छैक। नानी कथो कहथि आ बीच-बीचमें गीत नहु-नहु गुनगुनाथि। नानीक कहबाक अंदाज़ अतेक भावुक जे कतेक बेर नैन नोर सं भरि गेल। नानी सेहोकानथि। नानी आ नाति दुनु भरथरी राजा केर कथा गाथामें मस्त – एक सुनेबामें मस्त आ दोसर सुनबामें मस्त। अनुभव भेल जे जखन नानी कथा कहैतछलि त नानी एक संगे अनेक चरित्र केर चित्रण नाटकीय अंदाज़में करैत छली। चरित्र संगे चलैत छली। चलबाक अभिनय अतेक निक जे मात्र एक नाट्यकलाकार नानी आ एकमात्र श्रोता हम मुदा दुनुके आंखि, ह्रदय. आ दिमाग एक क्षण लेल इम्हर-उम्हर नहि होईत छल। ई भेल एक सिद्धस्त कथावाचिका केरगुण। ई गुण समर्पण, त्याग, एवं अंतः करणमें कथाके बसेलासं अबैत छैक। नम्रनिवेदन ओहि समयमें जे नानी कहली तकरा आई अपन स्मरण शक्तिपर जोर द' लिख रहल छी। अहि लोकस्मरणमें जतेक बात निक आ प्रमाणिक भेटत ओनानीक छनि आ जतए इम्हर उम्हर भटकएत ओ हमर स्मरण दोष आ ज्ञान के ग्रहण करबाक दोष थिक। राजस्थान केर मंडोवरमे रावण आ मंदोदरीक विवाह: लोक इतिहास केर मूर्त आ अमूर्त प्रमाण डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती इतिहासक पैघ विद्वान छथि। कला इतिहासमे हिनकर PhD हार्वर्ड विश्विद्यालयसँ ओम्कारेश्वरपर छनि। ओरछा आ अनेको आर्कियोलॉजिकल साइटपर बहुत महत्वपूर्ण काज केने छथि। सफल आई.ए. एस. अधिकारी रहल छथि। भारत सरकारसँ सचिव केर पदसँ रिटायर केने छथि। अपन कला प्रेम आ विद्वताक कारण डॉ. चक्रवर्ती इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय भोपाल केर निदेशक; इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली केर सदस्य सचिव; नेशनल म्यूजियम, दिल्ली केर महानिदेशक आ नेशनल म्यूजियम इंस्टिट्यूट ऑफ़ आर्ट हिस्टीरी, म्युजियोलॉजी ,आ कॉन्सेर्वशन केर वाईस चांसलर ; NEUPA केर वाईस चांसलर; दिल्ली विरासत संसथान, दिल्ली केर चीफ; आ ललित कला अकादमी केर अध्यक्ष पदके सुशोभित क चुकल छथि। डॉ. चक्रवर्ती सौम्य, मृदु आ सहज लोक छथि। ई अपना आपके विद्वान मानैत छथि प्रशासक नहि। गुफा चित्रकलाके वैज्ञानिकता, उद्भव, विकास, खोज, शोध आदिपर बहुत गंभीर आ विस्तृत काज केने छथि। लोक आ जनजातीय कलाके सब पक्षपर काज करबाक प्रबल इच्छा छनि। हमरा हिनका संगे बहुत काज करबाक अवसर भेटल अछि। हिनका संगे नालंदा, छत्तीसगढ़, असम, अरुणाचल, मणिपुर, सिक्किम, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, बंगाल, आदि शोध कारणे रहबाक आ भ्रमण करबाक मौका भेटल अछि। हिनकर जिज्ञासा अनंत छनि। हमेशा अपन डायरीमे जानकारी लेत रहैत छथि। कहैत रहैत छथि जे भाव इतिहास, भाव भूगोल, लोक इतिहासके बिना भारतके नहि बुझल जा सकैत अछि। हिनका संगे कतेक सै सेमिनार, वर्कशॉप आदिके आयोजन केने छी सेहो पूर्ण बौद्धिक स्वतंत्रताके संग। एक बेर एहने प्रयोजनसँ 2001 मे जोधपुर गेल रही। ओत एक एहेन स्थान भेटल आ एहेन जानकारी भेटल जे एक बेर लोकमे कुनो मूर्त संरचनापर कतेक अमूर्त कथा एवं लोकइतिहास केर परत बनि जाइत छैक सेहो विलक्षण ताहिपर सोचबाक लेल बाध्य केलक। अगर हम कही जे हमरा संगे लंकापति रावण केर सासुर आ मंदोदरी केर नैहर चलु, हुनकर विवाहमण्डपके देखु, कुलदेवीके दर्शन कए धन्य होउ त केहेन लागत? दिनमे सपना जकाँ ने? मुदा दृष्टान्त किछु एहने सन अछि। प्रामाणिक आ अप्रमाणिक अलग बात छैक, कनि लोक इतिहास आ आख्यान केर जाल केर निर्माण देखु। एक संगे राम आ कृष्णके एकहि वेदीपर अलग अलग कालखण्डमे विवाह केर कथा आ किम्बदन्ति देखू। हमरा लेखनी संगे अहुँ यात्रा करु। नीक लागत। घुमबाक आ जानकारी विशेषरूपसँ लोक इतिहास केर संकलनके दृष्टिकोणसँ अनेक बेर राजस्थान जाइत रहैत छी। राजस्थान जेबाक अर्थ भेल सांस्कृतिक विरासत केर गर्भमे जेनाइ। एहि धरा केर मूर्त आ अमूर्त दुनू सांस्कृतिक सम्पदा प्रदेश केर गौरवपूर्ण इतिहास केर साक्षी अछि। चप्पा-चप्पा धरती वीर पुत्र आ वीरांगना केर पदचापसँ अभिमंत्रित अछि। राजा आ प्रजाकेर मध्य नीक आ अधलाह अनेक कथा जिवंत अछि। ई मीरा, महाराणा प्रताप, बिक्रम आ नेरा केर धरती अछि। ई ओ धरा अछि जतय केर क्षत्राणी आ अन्य महिला अपन इज्जत आ आन, बान आ शान केर रक्षाक हेतु सै सै केर संख्यामे आत्मदाह अथवा सामूहिक जौहर क लेलथि। अपना आपके जिबैत अग्निमे समर्पित केलि मुदा आक्रांताके अपन शारीर तकके हाथ नहि स्पर्श कर देलनि। राजस्थानके कुनो भागमे जाऊ, किछु ने किछु महत्वपूर्ण इतिहास, परंपरा, केर भान भेटत, गढ़ आ गढ़ैया भेटत, ढ़नमनायल हवेली भेटत, राजाक कथा भेटत: कतौ प्रजावत्सलताके त कतौ निरंकुशताके। मुदा भेटत जरूर। जोधपुरके बागलमे मंडोवर नामक एक बहुत पैघ प्राचीन नगर छलैक। बिखरल खंडहर, प्रस्तर अवशेष एहि बातके साक्षी छैक। अगर स्थानीय लोकक बातके विश्वास करी त 24 कोसमे ई नगर व्याप्त छल। कतेक महल उल्टा लटकल जकाँ लागत। अगर ध्यानसँ देखब त ऐना बुझना जैत जेना कियोक पूराके पूरा नगरके उलटा लटका देने होइक। पहिने प्रवेशमे बुझा जैत जे जरूर बहुत रहस्यसँ भरल नगर छल हैत ई खँडहर। पूरा खण्डहर जेना बहुत पैघ रहस्य अपना गर्तमे नुका क रखने हो? खैर! एक बहुत बुजुर्ग महिलासँ भेट भेल। ओ कहली : "बेटा, कांई फोटू लेवे है , आखी नगरी ही उलटी पड़ी है।" (बेटा, की कोनो फोटो ल रहल छी? ई त समस्त नगरी उलटा छैक"।) बात बहुत बिचित्र रहैक। ऐना मोनमे जिज्ञासा भेल जे जौं कियोक स्थानीय आदमी एहिपर किछु कहैत। एक युवक भेट भेल। ओ कहलक कुनो खास बात नहि छैक। अर्चेयोलॉजिस्ट्स आ प्रागइतिहास एहिपर मौन अछि। शायद कियोक स्थानीय लोक किछु बता पबथि। एतबेमे एक बुजुर्ग एला। करीब 80 वर्षक। पातर देह। गोर धप-धप। जिज्ञासाके देखैत कहला: "हमर पितामह किछु एहि शांत आ ढ़नमनयाल खण्डहरके गूढ़ रहस्य आ इतिहासके बारेमे कहने छला।अगर अहाँ लग समय हो आ सुनबाक धैर्य हो त हम बता सकैत छी।" हमरा ऐना लागल जेना सब किछु भेट गेल। हम झट दनि कहलियनि : "जरूर, अपने कहल जाओ। हम अपने सनहक़ लोकक तलाश करैत रही।" आब बूढ़ा एक पाथरपर बैस कहनाय प्रारम्भ केला: आईसँ सात हज़ार पाँच सै वर्ष पूर्व लंकापति रावण अही स्थानपर आबि मंदोदरीसँ विवाह केला। मन्दोदरीके स्थानीय लोक मंदोधरी कहैत छनि। हिनक पिताक नाम छल निमंदूजी। ओही नामसँ एहि स्थानक नाम मंडोवर पड़लैक। एकटा 10 खंभाके चँवर दिश इशारा करैत ओ बुजुर्ग कहलनि "यैह थिक ओ स्थान जतय रावण आ मंदोदरी केर विवाह मंडप केर वेदी छलैक।" ठीक ओकर बगलमे पाथरक कलात्मक भव्य आ उत्कीर्ण तोरण रहैक जे आब खण्ड-खण्ड भेल छैक। हालाँकि एक बेर एकरा देखलासँ सुधिजन सहजहि अनुमान लगा सकैत छथि जे ई विवाह कतेक शाही ठाठसँ भेल हेतैक आ ऐश्वर्यके प्रतीक छल हेतैक। कतेक कारिगर आ कलाकार राति-दिन एकर निर्माणमे लागल हेतैक। बेजुवान पाथर जेना अपन इतिहास केर गाथा सुनबैत हो। आब हमहु बुजुर्ग व्यक्तिके कहल सब बात के पाथर संगे जोड़ै लगलौं। अद्भुत अनुभव। अद्भुत सिनेह। राजस्थानके इंच इंच धरतीसँ पुनः आत्मिक लगाव होम लागल। आब बुजुर्ग एक ऊंच महलपर ल गेला। कहलनि जे ई ध्वस्त महल 24 खण्ड केर छलैक। दूमहलमे विभक्त, 12 खण्ड ऊपर आ 12 खण्ड निचा। निचा खण्ड केर तलघर एखनो बाँचल छैक आ सुरक्षित छैक। समस्त भवन आ दुनु खण्ड केर हरेक हिस्सामे सुरुज केर धुप इजोतक संग वसातआर्थत क्रॉसवेंटिलेशन केर गजब व्यवस्था छलैक। निचाके तहलखानामे गुप्त स्थानपर खजाना सेहो बनल रहैक। एक तहलखानामे त पूराके पूरा मंदिर दबल रहैक। मंदिर केर देबारपर रंगविरंगक उत्कीर्ण आकृति एखनो मनोहारी लागि रहल छलैक। तत्पश्चात ओहि स्थान लग गेलहुँ जतय राजघराना केर पुरुष रहैत छला, स्त्रीगण रहैत छलि। कुलदेवीकेर डीह केर दर्शन भेल। बिना कुलदेवीके विधिवत पूजा अर्चनाके घरक कोनो स्त्रीगण अथवा पुरुष भोजन नहि करैत छल। मंदोदरी केर महल देखल। बुजुर्ग सब स्थानक एक टूरिस्ट गाइड जकाँ विस्तारसँ जानकारी द रहल छलाह। एक एक शब्द नापल – ने कम ने अधिक। पूरा संतुलित। बुझना ऐना जाइत छल जेना रावण आ मंदोदरीके विवाहक पुजेगड़ी यैह होथि! भवन निर्माण कला उत्तम बुझना गेल। ओहि समयमे आर्किटेक्चर केर सम्बन्धमे ओतेक जानकारी नहि छल ताहि कोनो स्कूल अथवा स्टाइलसँ जोड़बामे असमर्थ रही। फ़ोटो बहुत सुन्नर नहि छल। जे छलो से समाप्त भ गेल। स्मरण शेष अछि। वैह लिख रहल छी। गढ़ल मुदा टूटल आ छत विछत पाथर केर हरेक भाग जेना किछु कहैत छल? पहिल बेर भेल जेना पाथर बजैत हो। मुदा जोरसँ नहि, कानमे नहु-नहु। फेर भेल, जे जकर विखण्डित पाथर केर ढ़ेर अतेक बजैत छैक ओकर साक्षात स्वरुप केहेन हेतैक? मोन त करैत छल जे इतिहासके कान पकड़ि पाछा क ली आ सब बात देख ली, छू ली, बुझि ली, आ लिख ली, एक साक्षात प्रत्यक्षदर्शीके रूपमे! मुदा इहो बुझल अछि जे ई सपनेटामे संभव अछि। बुजुर्ग देखेबो करथि आ विशद वर्णन सेहो केने जाथि। हुनकासँ इहो ज्ञात भेल जे रावण जतेक वलशाली छल ओतबे घमण्डी सेहो। रावण समस्त संसारके अपनामे समेट लेबाक प्रण केने छल। अहंकार ओकर अपन सीमा लाँघि लेलकैक। अतेक जे रावण अपन ससुर मेदूजीके सेहो कहि देलकनि जे ओहो ओकर अधिनस्त भ जाथि। जाति कुलसँ श्रेष्ठ मेदूजी भला एहि प्रस्तावके कोना स्वीकार क सकैत छला? अपन जमाय रावणके सम्मानपूर्वक मना क देलथिन। रावण छल धैर्यहीन। क्रोधसँ काँपे लागल। कुपित भेल तुरंत अपन भाय कुम्भकरण आ पुत्र मेघनादके बजा पूरा नगरके उलटि देलक। ध्वस्त क देलक। ताहिं आई ओई खण्डहर उलटा अछि। चँवरी लग रानीमहल, जनाना महल आदिक जीर्ण अवशेष देखल। किछु घर केर कमरा सब एखनो अनेक तरहक कलाकारी केर बेजोड़ गाथा कहैत छैक। रंग आ रूपविन्यास आईओ ओहिना छैक। संयोग नीक छल। हमर सूचनादाता बुजुर्ग संस्कृत आ इतिहासक नीक ज्ञाता छला। हुनकर ई मानब छलनि जे जनमानसमे प्राचीन इतिहासके सटीक ज्ञान नहि हेबाक कारण बहुत अनर्थ भ रहल अछि। हरेक बातक विवरण इतिहासमे नहि अंकित अछि। कुनो राजकीय सुखसँ संपोषित इतिहासकार मंडोवर केर इतिहास कियैक लिखैत? इतिहासकारके लिखक हेतु के पैसा देतैक? के ओकरा भग्नावशेष केरगर्तमे धसल इतिहासके पोर-पोर खोइंछा छोड़ा क कहतै? ताहिं बहुत रास बात, रहस्य, आदि कालके गालमे अथवा मंडोवर केर विशालकाय चट्टान्नमे धंसि क समाप्त जकाँ भ गेलैक। कतेक दबल अहि आशमे छैक जे उत्खनन कए कियोक तथ्यके उजागर करता। मुदा कहि नहि कहियों ई रहस्यसँ समाज आ विद्वान वर्ग लाभान्वित हैबो करता की नहि??? हमरा लोक निराई-आँगन, सभा मंडप हथिसार, घोड़सार, दासीगृह, आदि सब किछुके अपना आँखि आ बुजुर्ग केर ऐतिहासिक दिव्य आँखिसँ देखल, हुनकर अभूतपूर्व वाणीसँ सुनल। जिज्ञासा भेल जे बुजुर्गसँ रावणके संबंधमे आ लंकाके बारेमे जानकारी प्राप्त करी। पुछलापर कहलनि: "असली लंका त अथाह समुद्रमे डूबल अछि। ओहि लंका केर एक कोण तिरुपति बालाजी छथि। लंकापुरीमे राम 100 योजन केर बान्ह बनने छला। तिरुपति वैह स्थान अछि जतय राम आ विभीषण केर भेट पहिल बेर भेल छलनि। एहि मंडोवरमे निचामे 3 सुरंग छैक। एक अयोध्या, दोसर लंका आ तेसर द्वारका जाइत छैक। बुजुर्ग एक मारक बात कहलथि: "श्रीमान, ककर ध्यान छैक अहि पुरातन धरोहर दिस? सब विनाश केर प्रक्रियामे मग्न अछि। आ ई जे जोधपुर नगर देख रहल छी ओकर बहुत भागक निर्माण एतहि केर अवशेषसँ भेल अछि। नव्निर्माण लेल पुरातनके सब संहार क रहल अछि।" एक बात बुजुर्ग जे कहलनि से थोरेक चिंता आ शंशय दुनुके जन्म द देलक। ओ बात ई रहैक जे बुजुर्गक हिसाबे आईसँ करीब 3000 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण सेहो अतै आबि अपन विवाह केने छला। से कोना? ई विवाह भेल छलनि कृष्ण आ जामवंतीके बीच। दरअसल ई विवाह ओतेक योजनावद्ध तरीकासँ नहि संपन्न भेल रहैक जेना रावण आ मंदोदरीके समयमे भेल रहैक। अर्जुन संग कृष्ण मणि तकैत-तकैत एते आबि गेल छला कारण जे ओ मणि जामवंती लग छलनि। जामवंती मणिके महत्त्वसँ अनजान छली आ ओकरा कैंचा बुझि खेल खेला रहल छली। कृष्ण जामवंतीसँ ओ मणि मांगला। एहि बातपर जामवंती केर पिता गम्भीर होइत कहलथिन: "हे केशव, हम ई मणि अहाँके द देब' चाहैत छी, मुदा एक शर्त अछि? अगर अपने एहि शर्तके स्वीकार क ली त मणि तुरत भेट जैत." कृष्ण कहलथिन: "अहाँ अपन शर्त कहु। हम स्वीकार करब।" कृष्णसँ अस्वासन पाबि जामवंती केर पिता बजला: "मणि त हम तुरत्तेद' देब परंतु मणि सँग अपन पुत्री जामवंती केर हाथ सेहो अहाँके हाथमे सुपुर्द कर चाहैत छी अहाँक अर्धांगिनीके रूपमे।" कृष्ण तुरंत जामवंती केर पिताक निवेदनके स्वीकारि लेलनि आ अहि तरहेँ ओही दिन ओही स्थलपर कृष्ण सङ्गे जामवंती केर विवाह भ गेलनि। अतेक जानकारी प्राप्त करैत-करैत 2 घंटा लागि गेल। पता नहि चलल जे समय कोना बीत गेल। सब जानकारी रुचिकारक आ बहुत हद धरि प्रामाणिक सेहो भेटल। अंतहीन प्रश्न जे मोनके परेशान केने अछि ओ ई थिक जे एहि टूटल पाथर, भवन, अट्टलिका, आ स्थानके रहस्य कोना खुजत???? छागरक बलिप्रदानपर चिन्‍तन : परम्परामे परिवर्तनक औचित्‍य हम सोभाव आ कर्मसँ परम्परावादी छी। परम्पराकेँ मानबो करै छी आ परम्पराक सम्बन्धमे लिखबो करै छी तथा परम्परेमे जीवितो रहलौं अछि। परम्परामे बहुत नीको बात सभ अछि तेकरा बारेमे लोककेँ जाग्रत सेहो करैत रहै छी। परम्परा आ प्रकृतिमे सामंजस्य देखैत छी। मुदा परम्पराक पालन, प्रशंसा आ लेखनमे साकांक्ष सेहो रहै छी। परम्परा जे लोक विरूद्ध नहि हो, परम्परा जे हिंसक नहि हो, परम्परा जे केकरो शोषण अथवा दोहनक पुष्टि नहि करैत हो, वएह परम्परा अनुकरणीय परम्परा अछि...। जखन परम्पराकेँ अमानवीय पक्षपर कियो बात करैत अछि तँ ओकर विरोध होइत छइ। आ एक टटष्ठ शोधार्थी अथवा समाजिक बेकतीकेँ एहि तरहक विरोध सहबाक लेल तैयार रहक चाही। कनी सोचु, अगर राजा राममोहन राय सती-प्रथाकेँ विरोध नहि केने रहितैथ तँ आई की स्थिति रहैत? कोना परम्पराक नामपर जीबैत स्‍त्रीगणकेँ हुनक पतिक संग चितामे बलपूर्वक झोंइक हुनका जरा देल जाइ छल? आ लोकक सतीमाता केर जयकारक नादमे जरैत महिलाक दर्द, पीड़ाकेँ दबा देल जाइत छल। अखनो जखन परम्पराक नामपर मधुश्रावनी पाबैनमे नव विवाहित महिलाक ठेहुनकेँ टेमीसँ दागल जाइत अछि तँ हम इतिहासक गर्तमे चलि जाइ छी। जहिया सती जरैत छेली! मुदा नचार भऽ परम्पराक समक्ष अपने-आपकेँ असहाय बुझैत छी। छोटे स्तरपर किएक नहि, अपन विरोध अवश्य दर्ज करा लैत छी। जखन हमर विवाह भेल तँ अपन मधुश्रावनीमे हम किनको अपन पत्नीक ठेहुन दगबाक अनुमति नहि देलिऐन। थोड़ेक उपहासक पात्र बनलौं। स्‍त्रीगण सभ कियो ‘मौगियाह’ तँ कियो ‘घमण्डी’ कहलैन। सुनि लेलौं, मुदा ‘नइ’ कहि देलिऐन तँ नहियेँ करए देलिऐन। आब अबैत छी छागरक बलिदानक प्रथापर। अपन अनुभवक अधारपर कहि सकैत छी जे ई प्रथा बड्ड नीक परम्परा नहि अछि। छागरक बदला किछु और व्योंत हेबाक चाही जाहिसँ एहि प्रथाक अन्‍त हो। उत्सव, संस्कार विशेष रूपेण दुर्गापूजा, केतौ-केतौ काली पूजा, उपनयनमे घरक कुलदेवी अथवा कुलदेवताक समक्ष किंवा ब्रह्मस्थान आदिमे छागरक बलिदान जेना मनकेँ विचलित कऽ दैत अछि..! एहि बातकेँ अपन जीवनक दू अनुभवसँ जोड़ि कऽ देखै छी। एकमे नेना रही तँए लाचार आ दोसरमे परम्पराक आड़िमे माँ, बहिन, भाय लाचार कऽ देने छला। एक घटना पाबैन– दुर्गापूजासँ सम्‍बन्‍धित तँ दोसर संस्कार– उपनयन-सँ सम्‍बन्‍धित अछि। प्रारम्भ प्रथम घटनासँ करैत छी। नेना रही तँ दुर्गापूजा सँ सात मास पहिनहि एकटा छागर माँ कीनि लेने छेली बलिप्रदान लेल। भगवतीक नामे राखल छागर बान्हल कम आ खुजल बेसी रहै छल। दियाद सबहक बाड़ी-झाड़ीक तीमन तरकारी चरि जाइ तँ भगवतीक नामक कारणे कियो किछु ने बाजैथ। बहुत धियान राखल जाइक। पूरा बलन्‍ठ आ बोतो बनि गेलैक। अन्‍ततः अष्टमी दिन ओकरा हमसभ दुर्गास्थान लऽ गेलौं। पूजा पाठसँ पहिनहि ओ छागर दोसर टोलक छागरसँ लड़ल। सिंघसँ सिंघक युद्ध। हमर सबहक छागर जीत गेल। जयकार मचलइ..! आब ओहि एकरंगी कारी छागरकेँ पोखैरमे नहाएल गेल। गरदैनसँ रस्सी हटा दूटा कबगर समाँग ओकरा अपन कब्जामे लेने रहला। नहेला बाद छागरकेँ भगवती लग लऽ गेला। पण्डितजी खर्गक पूजा कऽ लेने छला। महाभयानक खर्ग। पैघ, धरगर, तेजगर आ प्रलयंकारी! हम रही ता बारह वर्षक नेना। आब भेल जे एते दिनक पोसल छागर बलि चढ़ि जाएत। आइ सभ किछु समाप्त। स्‍त्रीगण सभ गीत गेबामे मग्न। गाममे एक पहलमान छला। लोकक कहब रहै जे हुनकापर साक्षात् भगवती सवार भऽ जाइ छथिन। केहनो जुआएल छागरकेँ एक्केबेर-मे ओ धरसँ गरदैनकेँ अलग कऽ दैत छला। खर्ग उठेबासँ पहिने भगवतीक मुर्ती लग एक पैरपर हाथ जोड़ने एक घन्‍टा ठाढ़ रहैत छला। स्‍नान केलाक बाद लाल धोती आ बिनु सीअल वस्‍त्र पहिरने। जखन बाहर अबैत छला हाथमे खर्ग लेने तँ यमक सहोदर लगैत छला। लोक सभ कण्‍ठ फारि-फारि "दुर्गा महरानी की जय" केर नादसँ हुनका आरो विभत्स बना दैत छल। ओहि जयकारक अवाजमे छागरक अवाज जेना विलुप्त भऽ जाइत छल! खएर! पण्डितजी पूजा केलैन। मंत्र पढ़ला। फूल, अक्षत आ जल लऽ भिजल छागरक ऊपर फेकलथिन। छागर सिहैर उठल। भूल्लाक गरदैन हिलाबए लागल। कान पटकए लागल। सबहक मन खुशीसँ बताह। लोक चिचियाएल- "छागर परीक्षा लऽ लेलक।" समस्त विजयी मुश्कान। एकबेर फेर अवाज भेलै- "दुर्गा महरानी की जय।" आब छागरकेँ मन्‍दिरसँ बाहर लाएल गेल। भेलै ई जे दोसर टोलबला छागरकेँ पहिने बलिदान पड़तै। बलिदान देमए-बला अपन हाथमे खर्ग लेने बाहर आबि गेला। लोक सभ ‘जय-जयकार’ करैत रहल। छागर सभ कटैत रहल। भगवती लग एक माय केर सन्तान दोसर माय केर सन्तानक स्वाद, आयु, उन्नति, विकास लेल कटैत रहल। खूनक धार बहैत रहल। छागरक मेमियेनाइ जय-जयकार आ गीतक ध्वनिमे गौण होइत रहल...। हमर बाल्‍य-मन भरि रास्ता कनैत रहल। दुर्गा लग जा-जा ई पाँति बेर-बेर गबैत रहलौं- "गे माय, तोरा बेटाकेँ खाइत केना नीक लगलौ?” मन बेर-बेर असहाय छागरक काटल मुड़ीसँ बहैत शोनितक स्मरण कऽ रहल छल। लोकक जय-जयकार तेहेन जेना बुझि पड़ए कान फाड़ि देत। मनमे डर घुसि गेल। स्‍त्रीगणक समवेत गान आ दुर्गाक भजन सोहनगर नहि लागि रहल छल। घर एला बाद ओहि छागरक मौस बनल। ओना, ‘मौस’ कहैसँ माँ परहेज केने छेली। कहने छेली ई ‘दुर्गाक प्रसाद’ छी। दियादी परिवारमे प्रसादक बेन बँटाएल। अपनो घरमे रनहाएल। सभ खेलक खूब प्रेमसँ खेलक। परसन-पर-परसन लऽ कऽ खेलक। मुदा हम नहि खेलौं। माँ कहैत-कहैत रहि गेली मुदा हम नइ खेलौं। आब दोसर अनुभव दिस चली। हमर पुत्र शशांक केर उपनयन हएब निसचित भेल। तिथि छल, जून 2014 माने दू-अढ़ाइ साल पूर्व। हमर कनियाँ शाकाहारी छैथ। ओ किएक शाकाहारी छैथ तहूमे एक बलिप्रदानेसँ जुड़ल घटना अछि। हमर पूनम माछ-मौस खूब खाइत छेली। एकबेर–भाइक उपनैनमे–छागरक बलि चढ़लै। ओहो अपना आँखिए देखलखिन। अतेक वीभत्स लगलैन जे ओही दिनसँ माछ-मौस खेनाइ छोड़ि देलैन। तेतबे नहि, हिनकर अनुकरण करैत अपन छोट बहिन सेहो शाकाहारी भऽ गेलैन। ..जखन हमर पुत्र शशांक माँक शाकाहारी प्रवृतिकेँ देखलैन तँ ओहो शाकाहारी भऽ गेला। हमरा एहिसँ कुनो समस्या नहि अछि। जे खाए चाहै छैथ खाथु जे नहि चाहैत छैथ नहि खाथु। मुदा एहिसँ एक चीज तँ स्पष्ट भाइए गेल जे हमर पत्नी, हम आ हमर पुत्र तीनू गोरे छागरक बलिप्रदानक पक्षमे साफे नहि छी। खएर, संस्मरणकेँ आगाँ बढ़बैत छी। हमर गामक एक संस्कृतक विद्वान पण्डित- राघवेन्द्र झा दिल्लीक स्कूलमे शिक्षक छैथ। वएह हमर पुत्रक उपनयनक दिन निर्धारित केलैन। पण्डित राघवेन्द्र झाजी स्वयं वैष्णव छैथ। हम अपन समस्या हुनका समक्ष राखल। ओ कहलैन- “एकर उपचार छै, अहाँ चिन्‍ता नहि करू। जेतेक ओजनक छागर छै तेतेक पसेरी मिठाइ अर्थात् लड्डू भगवतीकेँ आ ब्रह्मस्थानमे सेहो चढ़ा देयौ।” हुनकर एहि व्योंतसँ हम तीनू परानी बड्ड प्रसन्न भेलौं। दोसरे दिन हम गामपर माँ, भैया एवं अन्य सम्बन्धीकेँ उपनयनक दिनक सम्‍बन्‍धमे जानकारी दैत सभ तैयारी करबाक निवेदन कएल। तेसरे दिन माँक फोन आबि गेल जे ओ पाँचटा छागरक बेवस्था कऽ लेलीह। ई सुनिते हमर माथ पकैड़ लेलक। गृहयुद्धक पृष्ठभूमि बनि गेल परिवारमे। माँ अपना आगूमे केकरो टेरती नहि, आ पत्नी छागरक बलि लेल तैयार नहि हेती। पुत्र सेहो अपन माइयेक पक्षमे रहता...। अन्‍तत: हम हिम्मत करैत माँसँ निवेदन केलौं- “मॉं, राघवेन्द्र-गुरुजीक कहब छैन जे जेतेक छागर तेतेक पसेरी लड्डूसँ काज चलि जाएत।” माँ हमर व्योंत सुनिते बिकराल रूप पकैड़ लेली- “की कहैत छी? अहाँ सभ आब देवता-पितर सभकेँ समाप्त करए चाहैत छी? छोटकी काकी[1] मरैसँ पहिने कहलैन ‘कैलाशक माय, सुनु हम आब नहि बाँचब। मुदा अहाँ चिन्‍ता नहि करू। हम भगबान लग जा भगबानसँ लड़ि कऽ कैलाश लेल बेटा भेजब। अहाँ एक काज करब एकरा बदलामे अहाँ एकटा एकवर्ण कारी-छागर अँगनाक भगवतीकेँ आ एकटा एकवर्ण-छागर ब्रह्मबाबाकेँ ओहि बच्चाक उपनयनक समयमे चढ़ा देबैन। छोटकी काकी थोड़बे दिनमे मरि गेली। आ हुनक पहिल बरखीसँ पहिने शशांकक जन्म भऽ गेलैन। बिसैर गेलौं की?” माँ ई कहैत फ़ोन हमर भौजीकेँ दऽ देलथिन। आब भौजी शुरू भेली- “देखू बौआ! अहाँ दुनू परानी जे करब से करू। मुदा शशांक लेल कुनो अशुभ ठाढ़ नहि करू। बुझल अछि, हमर बाबा वैष्णव छैथ मुदा जखन छागर चढ़ै छै तँ बलि-प्रदानक भूमिसँ एक ठोप रक्त भगवतीक प्रसाद मानि अपना जीभसँ अवश्य सटबैत छैथ। माँ ठीके कहैत छैथ। छोटकी दाइ भरि अँगनामे शशांक लेल कबुला-पाती केने छेली। निसचित रूपसँ ओ भगबानसँ लड़ि कऽ शशांक अहाँ सभ लेल भेजलैन अछि। जे परम्‍परा अदौंसँ आबि रहल छै तेकरा अहाँ सभ केना समाप्त कऽ देबइ! अहाँ मर्द बनू आ बेटाक शुभकार्य करू। पूनमकेँ बुझा दियौन जे हुनकर दालि एतए नहि गलतैन। जहाँ तक छागरक दामक प्रश्‍न अछि तँ कुनो बात नहि। शशांक हमर सबहक बेटा पहिने अछि आ अहाँ सबहक बादमे। हम छागरक दाम दऽ दइ छी। एकर अतिरिक्त अहाँ सभ जेतेक मिठाइ, लड्डू आ छप्पन भोग करब से करू। कियो ने मना करत।” अहि तरहेँ माँकेँ तैयार कएल विचारकेँ भौजी ठोस भावनात्मक अधार दऽ देलैन। सभसँ पैघ बात ई जे अपन बात कहि भौजी बिनु हमर बात सुननहि फोन काटि देली। हम चाहियो कऽ अपन पत्नी लग ई बात नहि बजलौं, मुदा रणभूमि युद्ध लेल तैयार भऽ चुकल छल। ओही दिन रातिमे मामाक फोन सेहो आएल। कहलैन- “बौआ, कुनो एहेन काज नहि करू जइसँ बहिनकेँ अहाँक पिताक कमी अनुभव होनि। ई हुनकर अन्तिम पोताक उपनयन छिऐन। अही लेल आइ धरि एकादशी यज्ञक उद्यापन नहि केली। अहाँ सभ जखन अपन पोताकेँ उपनयन करब तँ जेना-जे इच्छा हएत सएह करब। ताबेत धरि ने बहिन रहती आ ने हम। आधा घन्‍टा धरि फोनपर कनैत छेली। हुनका अनिष्ट केर आशंका भऽ रहल छैन। हमरा कहै छेली जे जहियासँ कैलाशक ओहि परिवारमे विवाह केला, तहियासँ सभ संस्कार बिसरने जा रहल छैथ। अगर छागरक बलिप्रदान नहि हएत तँ हम कुनो आर गाम चलि जाएब। घुमि कऽ ऐ नग्रमे प्रवेश नहि करब। मरला उत्तर हम कैलाशक पिताकेँ की कहबैन जे तमाम मर्यादाकेँ सर्वनाश कऽ हम आबि रहल छी! आब मिसर अर्थात अहाँक पिता नहि छैथ ताहि सम्बन्धमे श्रेष्ठ रहबाक कारण हमर ई उत्तरदायित्व होइत अछि जे अहाँ सभकेँ उचित रस्ता देखाबी। अहाँ हमेशा अपन माता-पिताक आज्ञाकारी रहल छी, कैलाश। कम-सँ-कम ऐ उपनयन धरि ई परम्‍पराकेँ कायम राखू। रहल कनियाँक प्रश्‍न तँ अहाँक मामी कहैत छैथ जे ओ अपन पुतोहु अर्थात् शशांक केर मायकेँ समझा-बुझा देथिन।” ऐतेक बात कहि मामा सेहो अपन फोन बिना हमर बात सुननहि काटि देलैन! हमर माथ भारी भऽ गेल। ब्लड-पेसर बढ़ि गेल। माथ घुमय लागल। ऑंखिक आगू पूज्‍य पिताजी आबि गेला। होइत छल जे अगर पिताजी रहितैथ तँ अवश्य हमरा भावनाकेँ बुझितैथ..! मामा आ भैया तँ एक नम्मर-के पुरानपंथी छैथ। पिताजी हमेशा श्राद्धमे सांढ़ दागबकेँ विरोध करै छला, विरोधी छला। मुदा जखन ओ मरला तँ माँ आ मामा जिद्द ठानि देलैन जे ब्रिखोद्सर्ग श्राद्ध आ सांढ़ दागब अनिवार्य। माँ कहली जे हुनका परिवारमे केकरो अइक बिना श्राद्ध नहि होइत छैन। भावनामे बहैत माँ कहली अगर हमरा अछैत अहाँ सभ अपन पिता लेल ई नहि करब तँ हमर की करब? अन्‍तमे माँ आ मामाक जिद्दक आगाँ नतमस्तक होइत हम सांढ़ दगबा लेल तैयार भऽ गेलौं। एहि प्रकरणमे भैया सेहो जूमक-जूम तमाकुल खाइत रहला आ मुड़ी डोला-डोला माँ आ मामाक हँ-मे-हँ मिलबैत रहला। आब भयसँ कण्‍ठ सुखा रहल छल। परम्‍परा हमरा परास्त कऽ रहल छल। सभ शिक्षा, सभ तर्क धराशायी भऽ रहल छल। भावना ज्ञानकेँ ध्वस्त कऽ रहल छल..! भेल कनी पानि पीबी। पानि-दे पत्नीकेँ कहए चाहलयैन कि बिच्‍चेमे भैयाक फोन आबि गेल। नहियोँ चाहैत फोन उठा लेलौं। ‘हेलो भौया!’ कहिते मातर भैया दुर्वाषाक रौर्द रूपमे आबि गेला- “ई की भेल! हम अधा घन्‍टासँ फोन कऽ रहल छी आ अहाँक फोन व्यस्त जा रहल अछि? अहाँ सभ हरेक चीजकेँ मजाक बना देने छी!” हम कनी झल्लाइत मुदा विनम्र भावे भैयाकेँ कहलयैन- “भैया, हम मामासँ गप्प करैत रही। हुनके फोन ऐल छल।” ई बात सुनि भैयाक तामस थोड़ेक शान्‍त भेलैन। फेर शुरू भेला- “बौआ, एकटा बात मोन अछि। जखन पिताजी दरभंगासँ पटना लऽ जएबाक क्रममे रस्तामे अपन अन्तिम साँस लेलैन तँ हम अहाँकेँ की कहने रही?” हम जवाब दितयैन कि ओइसँ पहिनहि ओ स्वयं बाजए लगला- “हम अहाँकेँ कहने रही जे हमर पिता मरला अछि, अहाँक नहि। आईसँ अहाँक पिता हम छी। कहू कहने रही की नहि?” हम बजलौं- “हाँ भैया, अहाँ कहने रही। आ सैह मर्यादाक पालन अहाँ एखन धरि कऽ रहल छी।” भैया दम्माक रोगी छैथ, तँए जोर-जोरसँ हकमबो करैथ बजबो करैथ- “आब अहाँ कहू, जे हमरा रहैत शशांकक उपनयनक दिन ताकए-बला अहाँ के?” भैया भावनामे कनबो करैथ आ बजबो करैथ- “फेरो, केना करक अछि, की करक अछि। केहेन भोज करक अछि, इत्यादिपर अहाँक की निर्णय? ई निर्णय तँ हमरा लेबाक अछि। अहाँ राखू अप्पन पाइ। हम करब शशांकक उपनयन। माँ दिन भरिसँ अन-पानि तियागने छैथ। बुझल अछि अहाँकेँ? सुनू, अहाँ सबहक खटराग नहि चलत। माँ तँ पाँचटा छागर किनली अछि। हम पाँचटा आरो कीनब। देखै छी हमरा के रोकि लैत अछि? कनियाकेँ कहि दियौन जे अपन सभ नियम दिल्लीए-मे राखैथ। एतय हमर नियम चलत। ऐ घरक मुखिया पिताजीक पछाइत हम छी। आर कियो नहि। अहाँ सम्बन्धमे हमर छोट भाए जरुर छी मुदा हम अहाँ के कहियो अपन पुत्रसँ कम नहि मानल अछि।” भैया ई बात सभ कनैत कहैत रहला आ जखन अपन बात कहल भऽ गेलैन तँ फोन राखि देलैन। हम प्रलयमे पड़ि गेलौं। करी तँ की करी? किंकर्तव्यविमूढ़ भेल किछुकाल ठाढ़ रहलौं। मनमे उठल- आब पत्नीकेँ की कहबैन? ओ तँ छागरक बलिप्रदानबला बात लेल किन्नहु तैयार नहि हेती! “दुःख हरहु द्वारकानाथ शरणमे तेरी..।” अही गुनधुनमे पड़ल रही, कि एतबेमे हमर सासु आबि गेली, हमरा सभसँ भेट करबाक हेतु। हमरा लग अबिते बजली- “की मिसरजी, कुनो चिन्‍तामे छैथ की?” हम चुपे रहलौं। फेर ओ हमरा अपना लग बैसा सभ बात पुछए लगली। हम सभ बात बता देलिऐन। ओ कनी गंभीर भेली, कारण हमर पत्नीक उग्र सोभावसँ ओ परिचित रहबे करैथ। फेर निर्णयक मुद्रामे अबैत बजली- “मिसरजी, ओना हमहूँ बलिप्रदानक विरोधीए छी, मुदा हिनकर परिवारक लोक सभकेँ कियो नहि बुझा सकैतैन। ई चिन्‍ता जुनि करौथ, हम पूनमकेँ समझा दइ छिऐ।” हमर सबहक बात चलिए रहल छल कि हमर मामी हमर पत्नीकेँ फोन केलथिन। आब हमर मन घबराए लगल। भेल आब भयंकर कलह हएत घरमे। ईहो डर छल जे पूनम ने कहीं तामसमे हमरा मामीकेँ किछु अन्‍ट-शन्‍ट बात कहि दनि! ..खएर, सासु हमर भावनाकेँ बुझि गेली। ओ पूनम लग जा हाथक इसारासँ कहलथिन जे शान्‍तिसँ गप्प करैथ...। मुदा आशाक विपरीत मामी जनु पूनमे-सन बात बजली। तथापि ई कहलखिन जे हमर नैहरमे बलिदान बन्‍द भऽ गेल अछि। मुदा मामा सभ एहि बातकेँ कखनो मानैले तैयार नहि। तैपर मामी पूनमकेँ बुझबैत कहलथिन- “की करबै कनियाँ, दीदी आब कते दिन रहती। हुनकर बात मानि जाउ। अहीमे बच्चोकेँ आ अहूँ सबहक कल्याण अछि। नहि तँ ओ सभ पाहुन-परक लग यएह बातक चर्चा करैत रहती।” पूनम छेली अन्‍तत: एक माए। ई सोचैत जे बच्चा के उपनयनमे कुनो अवग्रह नहि हो मामीक बात मानि गेली। जखन उपनयन प्रारम्‍भ भेल तँ घरक भगवती लग छागरकेँ जाबे तक परीक्षा भेलै ताबे तक हमर पत्नी, पुत्र आ हम रहलौं। घरक सभसँ पैघ हेबाक कारणे भैया लाल धोती पहिरने भगवती-पूजा लग हमरा संगे बैसल रहला। विजय प्राप्त केलैन आ बलिप्रदान अन्‍ततः भऽ रहल छेलै ऐ बातक आत्मिक संतुष्टि छलैन। आभा मण्‍डल जीतक घमण्‍डमे चमकैत रहैन। शरीरसँ खिन्न भेल माँ सेहो बड़ आह्लादित छेली। भौजी कण्‍ठ फारि-फारि स्‍त्रीगण सबहक-संगे गीत गाबि रहल छेली। माँक संग-संग हमर दुनू बहिन सेहो उत्साहित छेली। माँकेँ आ भैयाकेँ आब हमरासँ कुनो शिकबा-शिकायत नहि छेलैन...। अस्‍तु, एकर विपरीत एकर ‘हम’ हारल, थाकल, लगैत रही। एतेक पैघ उत्सव मुदा आनन्‍द नइ लऽ पबैत रही। खचाखच भरल भीड़मे असगर..! मुदा संतोषक बात ई छल जे सदिखन तामसे घोर रहैबाली हमर ‘पुनम’ आइ एक मातृत्वक सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत एकदम शान्त छेली। सभ विध-बेवहारकेँ ओही तरहेँ पालन कऽ रहल छेली जेना हमर माँ, हमर बहिन आ ऑंगनमे उपस्‍थित बुढ़-पुरान सभ निर्देशित करैत छेलखिन। जेना कि पहिनहि निर्धारित रहै, जखने बलिदानक समय एलै कि हम सभ ओतएसँ हटि गेलौं। दू दिनक बाद माँ कहलैन- “पिपही बजबैत शशांक, शशांक केर माता-पिता आ परिवारक सभ सदस्य ब्रह्मस्थान जाएब। आ ब्रह्मबाबाक पूजा अर्चना हेतैन आ ओत्तो जोड़ा छागर चढ़तै।” हम सभ हुनकर आज्ञाकेँ मानैत विदा भेलौं। पूजा अर्चनाक पछाइत, जखन छागरकेँ बलि चढ़बैक सुरसार भेल, तखने हमर नेन-कालक मित्र-पण्‍डित कहलैन- “कैलाश भाइ, अहाँ ठाढ़ रहू।” हमरा मनमे उठल, जखन सभठाम हारि मानिए लेलौं तँ..। तँए एतौ अपना-आपकेँ समर्पण कऽ देलौं। पहिल छागर तँ एक्केबेर-मे कटि गेलैक मुदा दोसर छागर बेरमे–जइ छागरकेँ रस्सीसँ गरदैन गतानल रहइ–गरदैनक रस्सी टुटि गेलइ। आब अधा गरदैन काटल छागर दौड़ए लगलै। शोनितक धार फुचक्का जकाँ बहए लगलैक। बहुत विभत्स दृश्य भऽ गेलइ। पछाइत लोक हिम्मत केलक। छागरकेँ पकैड़ खर्गसँ ओकर गरदैनकेँ रेति बलि चढ़ौल। बलि देबए-बलाकेँ धोती आ सौंसे देह छागरक रक्तसँ रंगा गेलैक। मुदा ओ एहि बातसँ प्रसन्न छल जे बलिप्रदानक बदलामे ओकरा जोड़ भरि लाल धोती आ 101 टाका नगद भेटलैक। अपन मन घोर भेल छल। अपन कायरतापर मने-मन पश्चाताप होइत रहए। सभ शिक्षा, सभ ज्ञान, सभ सेमिनार आ पब्लिक भीड़मे बजबाक क्षमता सुड्डाह भऽ गेल छल। मनमे ई जरुर अबैत छल जे एतेक विवश केना भऽ गेलौं हम? मनकेँ कुनो कोनमे छिपल दुष्ट जेना बेर-बेर हमर पौरुष आ निर्णय-क्षमतापर अट्टहास कऽ रहल हो..! अस्‍तु, आब बुझैमे आबि रहल अछि जे राजा राममोहन राय सन समाज सुधारक बनब कतेक दुष्कर कार्य अछि। जे समाज हमरा एकटा बलिप्रदान सन प्रथाकेँ, समाज परिवार तँ दूर अपन बेटाक उपनयनमे नहि समाप्त करए देलक, वएह समाज 19म शदीमे केना राजा राममोहन रायकेँ सती-प्रथा सन विशाल प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल जनजागरण करए देने हेतैन? केना परम्‍परा, धर्म, तंत्र आ पुन्यक मोहजालमे पुरुष प्रधान समाजकेँ धियानमे रखैत जीवैत स्‍त्रीगणकेँ मृत पतिक संगे ओही चितामे बैसा, सुन्दर लाल-पीयर बिऔहती नुआ-अंगी-लहठी-गहना पहिरा; लाल सिन्‍दुरसँ मांग भरि अग्निमे जरा दैत छल! ई पूण्य भेल की नृशंसता? ई सोहागिनक सम्मान भेल आकि मातृशक्तिक अपमान? ई सभ्य समाजक कृत्य भेल आकि हत्याराक अपराध? वेचारी स्‍त्री केना जीबैत जरैत छल हेती? आ लोक सभ सती माताक गीतक जय-जयकारमे केना हुनकर क्रंदन आ वेदनाकेँ समाप्त कऽ दैत छल हएत! कहल जाइत अछि जे राजा राममोहन रायक जेठ भौजी हुनका पुत्रतुल्य मानैत छलथिन। जखन हुनका पता चललैन जे ई सती-प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल आन्दोलन कऽ रहल छैथ आ अइक विरुद्ध अंग्रेजसँ मिलि कऽ कानून पास करबा रहल छैथ तँ ओही दिनसँ ओ राममोहन रायसँ बातचीत बन्न कऽ देलथिन। अपन पुत्रवत् देओरकेँ घृणा करै लगलैथ। आ ओहू स्थितिक सामना करैत ई महापुरुष अपन संघर्षमे लागल रहला। सतीप्रथाक अमानवीय रूढ़ अन्‍ततः टुटल, समाप्‍त भेल। अगर ‘सती-प्रथा’ गलत छल तँ ‘छागरक बलिप्रदान-प्रथा’ सेहो गलत अछि। एकरो समाप्त भऽ जएबाक चाही। कतेक लोक ई तर्क दैत छैथ जे मिथिला तंत्रक केन्द्र रहल अछि। एतुक्का लोक शक्तिक उपासक छैथ। की एतए छागरक बलिप्रदान उचित अछि? ओना, कतेक लोकक ईहो तर्क छैन जे दिल्ली, कलकता, मुम्‍बई आदि महानगरमे बुचरखानामे विभत्स दृश्य होइत अछि, छागरकेँ काटि कऽ दोकान सभमे उघारे टाँगि कऽ लोक रखने रहैत अछि। ऐ सभकेँ विरोध किएक नहि होइत अछि। अगर से नहि तँ भगवती घर, ब्रह्मस्थान, मन्‍दिर परिसर आदिमे बलिप्रदानपर विरोध कथी लेल? हमर बहुत मित्र सभ सेहो हमरासँ नाराज छैथ जे हम एहि बातकेँ अनेरे प्रचार कऽ रहल छी। किछु लोक आ मित्र सभ तँ हमरा विधर्मी कहैत छैथ। बहुत लोककेँ नहि बुझल छैन जे परम्‍परा आ हमरा मध्य साँस आ शरीरक सम्बन्ध अछि। हम प्रति दिन पूजा करैत छी, देव तर्पण, ऋषि तर्पण आ पितृतर्पण करैत छी। मुदा हमरा ईहो लगैत अछि जे मन्‍दिर परिसर, भगवती घर आ ब्रह्मस्थान आदि सार्वजनिक स्थान थिक। ओतए कुनो तरहक बलिप्रदान नहि हो। बदलैत समयमे लोक धोती पहिरनाइ छोड़ि देलैथ, बहुत स्‍त्रीगण सभ सेहो आब उत्सव इत्यादिमे मात्र साड़ी पहिरै छैथ, घरही लोक मुर्गाक मौस खाइत अछि, पीयाउज, लहसुन सहरगंजा भऽ गेल, एहि सभ कर्म लेल धर्म अहाँकेँ किछु ने कहैत अछि मुदा छागरक बलिप्रदान छोड़ि देलासँ अहाँक धर्म भ्रष्ट भऽ जाएत! अहाँ पापक रस्ता दिस चलि पड़ब। वाह रे सोच! जेतेक माछ, मौस खेबाक अछि खाउ। के मना करैत अछि। मुदा पवित्र परिसरकेँ रक्तमय नहि बनाउ। भऽ सकैत अछि नर बलि प्रथाकेँ समाप्त करबा लेल छागरक एवं अन्य जीव केर बलिक प्रथा प्रारम्‍भ भेल हो। आब ओकरो बन्‍द करू। छागरक बदला बेल, कुम्हर आदिकेँ प्रतीक रुपे बलि पड़िते अछि। होबए दियौक। ओकरेमे आरो नीक विधि-विधान जोड़ू। नागा जनजातिमे किछु वर्ष पूर्व धरि नर-बलि केर प्रथा छेलइ। नागाक हेड हंटर अथवा सिरकेँ शिकारी कहल जाइत छेलइ। नागा आब अपनामे सुधार केलक आ ऐ प्रथाकेँ समूल समाप्त केलक। नर-बलि प्रथाकेँ आब स्वांग, नृत्य आ नाटकक रूपमे मनबैत अछि। हमरो सभकेँ एहिपर गंभीरता पूर्वक सोचबाक खगता अछि। संतोषक विषय ई अछि जे ‘पण्डित’ आ ‘कर्मकाण्डी’क एक पैघ-वर्ग छागर बलिकेँ समाप्त करए चाहै छैथ। वो सभ एकर बदलामे फल, मिठाई एवं अन्य शास्‍त्र सम्मत विधान बतेबा लेल तत्पर छैथ। केतेको लोक एहि प्रथाकेँ छोड़ियो देने छैथ आ छोड़रो रहल छैथ। एक सर्वसम्मति निर्णय हो। सबहक सहमति हो। सबहक सहभागिता हो। सबहक विचारसँ एकर विकल्प (अल्टरनेटिव) दिस धियान जाए आ ई प्रथा समाप्त हुअए। निर्णय सबहक हो, सहमति सबहक हो, केकरो बीच द्वेष नहि हो आ नव प्रथाक सूत्रपात हो जे सभ लेल कल्याणकारी हो। एहने प्रथाक प्रारम्‍भ हएत से आशा करैत छी। मैथिली लोकगीतमे भोजनक विन्यास मैथिली लोकगीतक संसार स्त्रीगणक संसार थिक। पुरुष पक्षक भूमिका गीत निर्माणक आओर किछु गीतक गायन तक सिमित अछि। मैथिलानी एक बेर अर्जित कयल गेल अमूर्त धरोहर जेनाँकि गीत-नाद, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, व्रत-निष्ठा, कथा-पीहानी; अरिपन काढ़ब,ठांव निपब, कोबर लिखब; केथरी, सुजनी सीयब; सीकीसँ पौती-मौनी बुनब, माटिक महादेब, सामा-चकेबा, खेलोना, कोठी, चूल्हा आदि बनेबाक परंपरा कें अपन माय, पितियाईन, दाई, नानी, सासु आदिसँ सिखैत छथि आओर फेर अपन सभटा लुइरकें अपन बेटी, पूतहु, पोती, नातिन आदिकें अदौसँ एहि कलाकें पीढ़ी दर पीढ़ी नीक जेकाँ सिखेबाक परंपराकें हस्तारंतरित करैत निमाहि रहल छथि। हलांकि आधुनिकता आ उपभोक्तावादक युगमे एहि परंपराक पतन भेल जा रहल अछि परञ्च मूल भावमे थोर बहुत जोड़-तोड़क संग ई परंपरा अपन मिथिला समाजक महिला वर्गमे एखनो शाश्वत अछि। आश्चर्य आ दुःख तखन होइत अछि जखन एहि समाजक स्त्रीगनक चर्चा होइत छैक। आजुक परिवेशमे बहुत स्त्रीगन पुछला पर निधोख कहैत छथि जे “हम किछु नहि करैत छी, निठल्ली छी कियैकतँ हाउसवाइफ/गृहणी छी”। पुरुष पात्र बहुतो एहेन छथि पुछला पर कहता – हमर घरनी किछु नहि करैत छथि घरमे रहैत छथि, हलांकि ओकर बाद कहबाक तात्पर्यकें पूर्ण करैत जरुर करताह – “हमर आँगनसँ सहीमे मात्र गृहणी/हाउसवाइफ छथि"। औजी, कहियो अपन आँगनबालीक भूमिकामे जीवन जीब कS तS देखियौ तखन पता लागत जे आहाँक घरवाली कतेक पैघ जवाबदेहीकें निमाहि रहल छथि ! हुनका नहितँ कहियो छुट्टी, ने कहियो आराम, आने कहियो केओ मदति केनिहार,आओर ताहि जवाबदेहिक मतलब किछु नहि ? ई एकटा बड्ड पैघ प्रश्न अछि। एहि पर विचार जरुर करक चाही। भोजन आ भोजनक विन्यास सभसँ पैघ, त्वरित आ शाश्वत कला अछि। एकटा कहबी छैक – “जे निक खैएत सैह नीक भोजन बनाएत”। इहो कहल जैत छैक जे जखन कुनो महिला सुचिता आ समर्पणकें भावसँ भाँनस करैत छथि तS भोजन सुअदगर आ रुचिगर हेबेटा करत। यैह कारण छैक जे भगबान राम माता कौशल्या, सुमित्रा, कैकेई; सासु सुनयना; गुरुपत्नी अरुंधती, पत्नी सीता सबहक हाथक रान्हल भोजन केलाह, मुदा जे स्वाद हुनका भीलनी सबरी के आंइठ बैरमे लगलनि तेहेन सुआद कत्तहुने लगलनि। ई भेल भोजन बनोनिहारिक आ परोसनिहारिक अनुराग। आजुक समयमे नाना तरहक सुविधा जेनाँकि रसोई गैस आकि आनो तरहक जारैन उपलब्ध अछि जाहिसँ चट्टहि भाँनस भअ जाइत अछि। कल्पना ओहि समयक करू जखन साओन-भादबक मुसलाधार बरखामे खड़हक छप्पर चुबैत घरमे अपन सभक बहुतो गोटेके माय, पितियाईन, दाई कोन धरानी भाँनस करैत छली! जारैनमे भीजल चेरा, गोइठा, करची, झाँखी चुल्हामे घोंसिया कखनो मूंहसँ तS कखनो बियनि होंकि आंच पजारब, धुआंसँ आँखिमे नोर भरल आ तैयो रंग-बिरंगक पकमान आ भोजनक सचार। ताहूमे अगर घरमे केओ पैघ पाहून जेनांकि जमाय, समधि इत्यादि आबि गेलाह तS घोर बिकट, तथापि बिना मोन मलीन केने हुलसित मोनसँ भोजनक विन्यासमे लागि जैत छली। तरकारीक अभावमे बारीक़ साग, कंद, खम्हारु, ओल, लती-फत्तीक पात जेना कन्ना, तिलकोड़क पात; लटकल चारक सजमनि,कदीमा; झाड़क झीमनी, करैल; घर-पछुआरमे लागल गाछक फल जेनाँकि- केरा, कटहर आदिसँ चीज़ जोरिया कS अनेक तरहक तरकारी, तरुआ-बघरुआ, भुजिया-सन्ना-चटनी बनबैत छली तकरा बादो टारासँ नाना तरहक़ अंचार जाहिमे फारा, कुच्चा, खटमिट्ठीबला आदि ब्यंजन परोसि पाहूनक सत्कारमे २०-२५ तरहक सचार लागि जैत छलै। आब जखन पाहून भोजन पर बैसता आ महिला लोकनि गीत नहि गेती से कोना हेतैक तें बिनु थकने विहुँसैत मोनसँ दाई-माई सभकें संगौर कS गीत-नाद शुरू होइत छल। पाहून खाईतो रहैत छलाह आ गीतक आनंद लैत छलाह। जखन कखनो हम कोनो पांच सितारा होटल में भोजन करैत छी आ कोनो गीतगैन के गबैत देखैत छी तS होइत अछि जे एहिसँ बढ़ियाँ कोरसमे गीत हमरा सभक समाजक महिला गबैत छथि। वैह खानसामा, वैह परोसय बाली, वैह गीत गेनिहारि, वैह वस्तुक व्यवस्था केनिहारि। मल्टीटास्किंग कें अहिसँ पैघ उदाहरण भला आर की भS सकैत अछि? पहिनेकें समयमे लोक सभ बियाहसँ पहिने एहि बातक खाँझ-भाँझ करैत छलाह जे जाहि घरमे कन्यादान करबाक अछि ओहि घरक चीनबार कहेन छैक। मतलब कतेक साफ़-सफाई, कोन तरहक द्रव्य केर बरतन-बासन बड़ पक्षक ओहिठाम उपयोग होइत छैक। हिनका लोकनिक खान-पान कहेन छन्हि, घर-परिवारक भोजनक विन्यास, दु:खक भोजन, सुखक भोजन, पाबनि-तिहारक भोजन, यात्रा पर जएबाक काल बाटमे खेबाक जोग भोजन, खाद्य भोजन, अखाद्य भोजन, पथ्य बला भोजन, कोन समयमे की खाई आओर की नञ खाई, इत्यादि नाना तरहक जानकारीकें अगर ठीकसँ ओहि भावकें विवेचना कयल जाय आओर विभिन्न अवसर पर मैथिलानी सभक द्वारा गाओल गीत सभकें देखलासँ एहसास होयत जे ओ गीत सब विधपुरौआ आकि मनोरंजने वला गीत मात्र नहि अछि अपितु ज्ञानक खान अछि। ओहि गीतमे ज्ञान,विज्ञान, संस्कार, सामग्रीक वर्णन आ विवरण सब किछु समाविष्ट अछि। मैथिलीमे अगर अंग्रेजीक शब्द culture कें अनुवाद कयल जाय तँ हमरा बुझने ओ शब्द जे culture कें सभसँ लगमे अछि मैथिलीमे ओकरा “मिथिलाम” कहल जायत आओर इयैह मिथिलाम अछि जे मैथिल सभकें भारते टा नहि अपितु समस्त संसारमे अलग पहचान दैत अछि। मिथिलामक चर्चा बिनु भोजन विन्यास, बिनु महिला सभक भूमिका, बिनु गीत-नाद आकि विध-व्यवहारक संभव नहि अछि। वस्तुतः भोजन विन्यास, गीत-नाद, विध-व्यबहार, जीवन जीबाक अंदाज़, वस्त्र विन्यास, धर्मक आचरण, प्रकृति आ संस्कृति मे समन्वयक नाम भेल मिथिलाम। बात भोजन विन्यासक चलि रहल अछि तें कनेक मिथिलाक इतिहास कें सेहो ध्यान देमय पड़त। ज्योतिरीश्वर अपन कृति वर्णरत्नाकर मे ११म् शताब्दीक मिथिलाक भोजन विन्यास पर प्रकाश देलनि अछि। हिनका अनुसारे मिथिलाक प्रमुख भोजन भात, दालि, तरकारी, चूडा, दही, शक्कर, फल तथा दूध छल। ज्योतिरीश्वर अपन दोसर पोथी प्राकृति-पैँगलम् मे कहैत छथि जे “ओ गृहणी धन्य छथि जे अपन पति केँ केराक पात पर भात आ घी परोसि खोअबैत छथि”। एहि पोथी मे रंग-बिरंगक माँछ रान्हव आ तरकारी बनेवाक विधि सेहो लिखल अछि। वर्णरत्नाकर मे जे मिथिलाक प्राचीन परम्परागत भोजन समिग्रिक सूची प्रस्तुत कयल गेल अछि ताहिमे “चाउर, चूडा, मुंगवा, लडुबी, सरुआरि, माँठ, फ़ेना, मधुकूप्पी, तिलबा, सिरोल, खिरसा, सिरनी, झिल्ली, फरही, भूजा, मोतीचूड़, अमृतकुंड आदिक उल्लेख अछि संगहि भोजनमे दहीक प्रधानता सेहो भेंटल अछि। आब लोकगीत पर अबैत छी, लोकगीतमे फकरा, पीहानी, गीत, लोकवृति आदि सब किछु समाहित अछि। एहिठाम दू गोट फकरा मैथिल समुदायक भोजन विन्यास आ भोजनक प्रति आसक्तिकें बुझबाक हेतु पर्याप्त अछि । पहिल : मिथिलाक भोजन तीन/ कदली, कबकब मीन।। दोसर: तीन तीरहुतीया तेरह पाक। ककरो लेल चुडा दही ककरो लेल भात।। अही दू गोट गीतक आधार बना सब विवरणकें देखल जा सकैत अछि। मिथिलाक भोजन तीन। कदली, कबकब मीन।। एकर अर्थ भेल जे मिथिलाकें लोक सभ लगभग नीकसँ लकS अधलाह तकमे जेनाँकि- उत्सव, काज-राज, संस्कार, पाबनि-तिहार धरिमे केरा, ओल बा ओले परिवारक आन कंद जेनाँकि खम्हरुआ; आओर अंततः नाना प्रकारक माछके प्रयोग भोजनमे अवश्य करैत छथि। विवाह -दान, मुड़न, उपनयन, पाबनि तिहार सबमे केराक प्रयोग हेबेटा करैत अछि। ओहुना लोकसब केराकें पाकल, काँच आ केराक फुलक सेहो खेबाक विन्यासमे प्रयोग करैत छथि। केराक तरुआ, तरकारी, सत्यनारायण भगवानक कथामे घोरुआ प्रसाद आ ओहुना पाकल केराक प्रयोग शाश्वत अछि। कबकबकें बात करैत ई कहब जरुरी अछि जे ओल मिथिलामे बहुत प्रिय अछि। एक फकरामे भादबक ओल केर बारेमे कहल जैत छैक: भादवक ओल की खै राजा आकि चोर मिथिला आ माछ एक दोसरक पूरक अछि। पंचदेवताक एकहि संगे उपासना करे बला मैथिल समाज जाहिमे ब्राह्मण सेहो सम्मिलित छथि कुनो दिन आ कुनो मास माछ खेबासँ परहेज नहि करैत छथि। माछकें जल-पड़ोर, जल-फूल आदि नामसँ बजा कतेक गोटे तँ एकरा मांसाहारी भोजनक श्रेणी तकमे नञ राखय चाहैत छथि। कातिक आ साओन मासमे जखन लोक सामान्यतया मांसाहारी भोजनकें त्यागि दैत छथि, अपन मैथिल अहू मासमे खूब चटकारसँ माँछ खाईत छथि, संगहि एहि मासमे माँछ खाय बलाक हेतु बैकुंठमे जगह बना दैत छथि। कातिक मास जे गैंचा खाय। ससरि-फ़सरि बैकुंठे जाय।। एक बारहमासा गीत एहेन भेटल जाहिमे मिथलाक पानिमे उपलब्ध लगभग सब माछक वर्णन तँ अहिए ओकरा कोना बनाबी कोना खाई, कथीक संगे खाई सब वर्णित अछि। एतबे नहि लगभग ७५% माँछ जे मिथिलाक पानिमे भेटैत अछि तकर वर्णन छैक। कने एहि बरह्मासाकें देखू: मास हे सखि सरस अगहन भूजल चूड़ा संग यो। तरल चेचड़ा माछ कुरमुर लागय मोन भरि संग यो।। पूस हे सखि अन्न नवका संग मांगुर झोर यो। कबइ कुरमुर दाँत दबइत करय जनजन शोर यो।। माघ बदरी जाड़ थरथर काँपय तन बड़ जोर यो। सुख बोआरी खंड लखि कए मन विनोद विभोर यो।। मास फागुन मदक मातल बहय पछबा बसात यो। बढ़ल स्वादक माछ टेंगड़ा रान्हल सानल भात यो।। चैत हे सखि रोग सभदिस रूप नाना देखि यो। तरल भुन्ना पलइ रान्हल खाइत बड़ सुख लेखि यो।। मास हे सखि आबि पहुँचल गरम बड़ बइसाख यो। गेल मन रुचि माछ गामर खंड सभ दिन चाख यो।। जेठ हे सखि हे हेठ बरखा मुंड भाकुर पात यो। पड़तु बिसरतु आबि ससरतु कर नवका भात यो।। मेघ सखि बरसत अखाढ़ जत रसालक डारि यो। तोड़ि काँचे आम आमिल देल सौरा पाल यो।। मास हे सखि आओल साओन भरल अंडा घेंट यो। तरल दही माछ मारा खाथि भरि पेट यो।। माछ इचना भेटल कहुना खाय भरलहुँ कोठि यो। मास आसिन देवपूजा शंख घंटा नाद यो।। रान्हि रहुआ माछ बइसब पूर्ण भेल परसाद यो। मास कातिक बारि मरूआ बऽड़ तरल-अपूर्व यो।। पूरल बारहमास हरिनाथ गाओल सगर्व यो... माँछ खेबाक वर्णन तँ अहिए माछक शिरा खेबाक परंपरा प्रबल सेहो अछि, घरक मुखिया, पाहून, बरियाती आदिकें शिरा परोसल गेल आ बुझू हुनकर उचित सत्कार भेल। निम्नलिखित फकरा एहि कथ्य के प्रमाणित करैत अछि: शिरा खाय से मीरा। पूच्छी खाय गुलाम।। जमाय जखन भोजन करक हेतु बैसति छथि तँ नाना तरहक गीत गाबि हुनका मनोरंजन कयल जाइत अछि। एकटा डहकन जाहिमे देखियौ, ओना तँ गारि देबाक परंपरा अछि मुदा गारिक संग-संग भोजन विन्यासक वर्णन सेहो अछि। खाजा मूंगबा आर पिरिकिया ता पर गरम सोहारी जी। माजी के गारी पिताजी के गारी आ बाबाजी के पढथि गारी जी। पढु हे सारि हमरो के गारी हम लेब देह के पसारी जी।। एहि गीतमे गारि तँ छैहे जे डहकनक मूल प्रकृति अछि, मुदा गारिकें संगे-संगे भोजन सामग्री – खाजा, मूंगबा, पुरुकिया, सोहारी आदिक विवरण सेहो छैक। सामा-चकेबाक एक गीतमे बहिन सब भोजनक बात करैत छथि: साम-चको साम-चको अबिह हे अबिह हे। जोतला खेतमे बैसिह हे बैसिह हे। लाले रंग पूरी पकबिह हे पकबिह हे।। मिथिलामे साग खेबाक परंपरा सेहो अदौसँ अछि। अयाची मिश्रक जीवनवृत्त ककरा नहि बुझल छैक। मात्र ११ कट्ठा खेतमे साग-पात कंद-मूल खाकS जीवन यापन करैत छलाह आ अध्ययन-अध्यापन करैत छलाह। कतेक बेर राजा बजौलखिन मुदा अपन गामक गुरुकुलकें छोडि कत्तहु नहि गेला। स्वयात संप्रभुताकें सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करैत छलाह। माँछक तुलनामे सागक अधिक प्रधानता देबाक प्रथा मिथिलामे सहज अछि। एकटा फकरा एहि बातकें प्रमाणित करैत अछि: माछ-भात पांच हाथ। साग-भात सात हाथ।। विन्यासमे सागक अलावे सागकें आन चीज़ सब जेना अरिकोच, गुजिया, इत्यादि बनबैत छथि, खेसारी, बथुआ, केराव, चना, कर्मी,गेनहारी, पटुआ आदिक साग मिथिला लोक खाईत छथि। अपना ओतय साग तोडल नहि अपितु खोटल जैत अछि। कोनो भोजमे साग एक महत्वपूर्ण तरकारी होइत अछि। मिथिलाक एहि परंपरासँ प्रभावित होइत ठीके कहल गेल अछि: कोकटा धोती पटुआ साग। तीरहुत गीत बड़े अनुराग। भाव भरल तन तरुणी रूप। तैं तँ तिरहुत होइछ अनूप।। अपन माटि सँ गुजरियाकें एतेक सिनेह जे साग-पात खोंटि लेती, साग-भात खा लेती मुदा रहती मिथिलेमे : साग-पात खोंटि- खोंटि दिवसों गेमेबै यौ हम मिथिलेमे रहबै नहि चाही हमरा सुख-आराम यौ हम मिथिलेमे रहबै।। तिलकोर आ कन्ना साग बिना की मिथिलाक पाहुनक सचार लागि सकैत अछि? चाउरक पीठारमे डुबा शुद्ध सरिसबक तेलमे छानल तिलकोर दुरो देसमे रहनिहार मैथिल सबके जीभमे पानि आनि दैत अछि। सजमनि, भाटा इत्यादिमे अदौरी तँ चाहबे करी तखनने भाटा-अदौरिक चहट्गर तरकारी बनत! भाँटाकें तरुआ, भटबर आर की-की नहि बनैत अछि। बारिक भाँटातँ बेर बिपत्तिक समय इज्जत रखैत अछि। भांटाकें भटबर, ठोपेके तेल। खेलक जमैया ठेलम ठेल।। मिथिलाक लोककें खिच्चरिमे सेहो पापर, घी, दही, अचार, चटनी इत्यादि संग खाईत छथि। खिच्चरिमे चारि बस्तु नहितँ केहन खिच्चरि? खिच्चरि के चार यार। घी पापर दही अचार।। ई त भेल पद परन्तु सही अर्थ में खिच्चरि के छौ यार थिक: घी, पापर, दही, अचार, चटनी, तरुआ। एक उचती गीतमे जखन विवाहक बाद वर भोजन करवा लेल बैसैत छथि तS सासु आ आन स्त्रीगन सब अपन गीतमे व्यंजन केर वर्णन करैत छथि: जाहि दिन राम जनकपुर अयला देखहु दुनिया के लोके भाति-भाति के भोज्य लगाओल नयना बिनु परकारे जी केरा नारियल खण्ड सोहारी परबल केर तरकारी जी जीमय बैसला ओ चारू भाई परसथु प्रेम पीयारी जी // दोसर उचती में बर के कृष्ण स्वरुप मानि किछु अहि तरहक विवरण भेटैत अछि: खाजा खुरमा तपत जिलेबी तापर सक्त सुपाड़ी जी। जेमय बैसला कृष्ण-कन्हाई सारि जे पढ़थिन गारि जी।। भगबान कृष्णक बालकालकें एक भक्ति गीतमे भोजनक किछु वर्णन भेटैत अछि: करथि पुकार जशोदा माई मोहन प्रात नाहाई। दही केरा गरम जिलेबी खोआ भोग लगाई।। लोकगीतमे भूख, निर्धनता, कुअन्न आदिक ऐतिहासिक संदर्भक वर्णन लोकगीत लोकविद्या होइत अछि, लोकइतिहास होइत अछि। एहेन इतिहास जे अपन प्रमाणिकता एवं शैली कें कारण जन-जन केर कंठमे लिखा जैत अछि। एहेन लिखान जकरा ने कुनो पानि गला सकैत अछि ने कुनो आगि जरा सकैत अछि आने कुनो कीड़ा खा सकैत अछि। एकबेर जनकंठमे रचि गेल त पीढ़ी-दर-पीढ़ी अबाध गति सँ चलैत रहैत अछि। मधुबनी ज़िलाक शाहपुर गाममे एक जनमान्ध लोक कवि भेला। हुनकर नाम छलनि फतुरी लाल। फतुरी लाल एक बेर मिथिलाक भयानक अकालक सामना केलनि आ अकालक विभीषिकाक ह्रदयविदारक विवरण अपन कवित्तमे केलनि। ओ रचना अकालकवित्त कें नाम सS जानल जैत अछि। अब्राहम ग्रिएर्सन १८८७ ईस्वीमे फतुरी लाल केर अकाल कवित्त हुनके मुहें सुनिकS लिखलनि। एहि कवित्तमे ई विवरण अछि जे भुखमरी केर अवस्थामे लोक प्राणरक्षा हेतु की-की नहि करैत अछि। किछु पंक्ति मात्र देखलासँ दुखक असीम वेदनाक अनुभूति सहजे भS जैत छैक: भेल धनतरि दुई फ़ासिल जग-राहडिऔर मकई। अकाल पडल तिरहुति में भारी-तैं बही गेल हवा। घर-घर मांगन करे नर नारी-फाँकि मकई केर लावा। मालीक आउर महाजन सभ-कै-घर-घर ढेरीक अन्न। लोक बुझओल ओहो तकै छथि मुंह्गा ऋणक शान। सभै देखि बनियान सभ सनकल-डरें लगाओलक टट्टी। सुन्न दोकान शहरमे परि गेल-सुन्न भेल सभ चट्टी। सूखल गात भात भौ लटपट-कतेक बात अब सहना। नर नारी सभ सान तेआगल-बेकारी भेल अब गहना।। बारहमासा एवं अन्य गीतमे गरीबीकें चित्रण करैत कोना कियोक महिला कम भोजन अथवा कुअन्न खा कS दिन खेपैत छथि तकर मर्मस्पर्शी वर्णन कैल गेल अछि। आईसँ करीब ३०-३५ सालक इतिहासमे अगर जा सकी आ अपन मानस पटल पर ओहि स्थिति आ गरीबीकें ऐनाँके रिफ्लेकशन जेकाँ देख पाबी तS सहज रूपमे ई अनुमान लगा सकैत छी। एकटा बारहमासा एहेन भेटल जाहिमे एकटा निर्धन महिला जिनकर पति परदेस गेल छथिन ओ कोन धरानी अपन समय नितांत निर्धनतामे बिता रहल छथि तकर विवरण देल गेल अछि। पूस गोइठा डाहि तापब माघ खेसारिक साग यो फागुन हुनका छिमरि माकरि चैत खेसारीक दालि यो बैशाख टिकुला सोहि राखब जेठ खेरहिक भात यो अखाढ़ गाड़ा गाड़ि खायब साओन कटहर कोब यो भादव हुनको आंठी पखुआ आसिन मडुआक रोटी यो कातिक दुख-सुख संगहि खेपब अगहन दुनू सांझ भात यो उपरोक्त गीतमे कोना एक महिला खेसारीक साग, खेसारीक दालि आमक टिकुला, खेरहिक उसिना, पाकल आमक गाड़ा, कटहरक कोआ,नेढा, आमक पखुआ, मडुआ रोटी, एक मास अनिश्चितता केर स्थिति आ अंततः अगहनमे भात। कहू तS कतेक सत्यकें जे आई लगभग इतिहास भS चुकल अछि तकरा ई अपना मानसमे रखने अछि मिथिलाक गीत-नाद। गरीबीक बिपत्तिसँ मारलि आ असहाय विधवा कंद मूल आ कुअन्न बांसक ओधिसँ अपना टूटल मडैयामे नीक जेकाँ नीपल-पोतल चुलहामे पका रहल अछि। बांसक ओधि धुआंक घर होइत अछि। फटने ने फटैत अछि। जरने नञ जरैत अछि। ओहने विधवाक दुःखसँ द्रवित होइत बाबा “यात्री” लिखैत छथि: बांसक ओधि उपारि करै छी जारनि... हमर दिन की नै घुरतै जगतारिनि // मैथिली लोकगीतमे भोजन विन्यास आ औषधि लोकगीत लोकविद्याकें अंग अछि। लोक विद्याकें अनेक पक्ष वैज्ञानिक होइत अछि। कृषिकार्य एवं अन्य सब कार्यमे डाक बचन कतेक सटीक अछि से हमरा लोकनि बहुत निक जेकाँ बुझैत छी। बहुतो लोकगीत एहेन अछि जे कहेन अन्न अथवा भोज्य सामग्री सेहो कुन दिन, कुन मासमे खेलासँ की भS सकैत अछि तकर बहुत तथ्यपरक जानकारी दैत अछि गीत सुनब अथवा पढ़ब तँ लागत जेना आयुर्वेदक कोनो वैद्यक देल नुस्खा हो। हरेक गाछ आ हरेक भोज्य सामग्रीमे प्राचीन भारतीय परंपराकें अनुसार किछु-ने-किछु औषधिक तत्व छैक। भारतीय परम्परामे औषधि आ भोजन अलग-अलग चीज़ नहि छैक। ताहि अपना सबहक भोजनमे पथ्य आ कुपथ्यकें बात प्रबल मानल जाइत अछि। अपन शोधकार्यकें अवधिमे जखन मिथिलाकें गाम सभसँ गीतक संकलन करैत रही तS एकटा गीत एहेन भेटल जाहिमे ओ ई बतबैत छल जे कोन दिन कथिक प्रयोग भोजनमे करक चाही जाहिसँ तन आ मन दुनु स्वस्थ्य रहत। ई वर्णन ज्योतिष विचार पर सेहो आधारित अछि। रबि के पान सोम के दर्पण मंगल के किछु धनियाँ चर्पण बुध के गुड़ बृहस्पति राई शुक्र कहे मोहे दही सुहाई शनिबार जे अदरख खाई कालौं काल कटति घर जाईं।। ई त भेल कहिया की खेबाक चाही। एक एहेन गीत भेटल जे बारहमासाक रूपमे रचित भेल अछि। ई एकटा वैद्य जेकाँ बहुत वैज्ञानिकताकें आधार पर लिखल अछि। गीत अर्थकें स्वतः प्रमाणित करैत अछि: सावनक साग ने भादबक दही। आसिनक ओस ने ने क़ातिकक मही। अगहनक जीर ने पूसक धनी। माघक मिसरी ने फ़ागुनक चना। चैतक गुड़ ने बैसाखक तेल। ज़ेठक चलब ने अषाढ़क बेल। कहे धनवनतरि अहि स बचे। वैद्यराज काहे पुरिया रचे।। मैथिली लोकगीत अनंत महासागर अछि। अहि महासागरमे सँ भोजनक सम्बन्धमे जे किछु जानकारी छल से समयसीमा कें ध्यानमे राखि पाठकक समक्ष राखल। नीक लागल तS मैथिली लोकगीत परम्परा केर महानता अधलाह लागल तखन हमर ज्ञानक विपन्नता। आभार: हमर लोकविद्या पर लिखल सब काज लोकस लेल अछि। लेकिन एहि लेख के भाषा के मर्यादा के संचालक एवं हमर अनुजतुल्य श्री अमरनाथ मिश्र अंखि फोरि-फोरि ठीक केलाह अछि। एहि काज लेल हुनका धन्यवाद द हुनकर योगदान के छोट नहि कर चाहैत छी मुदा ओ खूब आगा बढ़थि से आशीर्वाद दैत छियनि। सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथमे समानता-(लोक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे) सौराठ मिथिलाक धरोहर-गाम अछि। केतेको सालसँ चलैत सभा हेतु अइ गाम आ सभा-गाछीकेँ के नहि जनैत अछि? कहल जाइत अछि जे सौराठक मूल नाम ‘सौराष्ट्र’ छल। सौराष्ट्रक अर्थ भेल १०० राष्ट्र। लोक कथाकेँ जँ मानी तँ सौराठ रामायण (हमरा हिसाबे सीतायण) सँ जुड़ल स्थान अछि। लोक कथा के मान्यता में कहल जाइत अछि जे सीताक स्वयंवर सौराठमे भेल छल। ओइ स्वयंवरमे १०० राष्ट्रक राजकुमार भाग लेने छला तँए एकर नाम ‘सौराष्ट्र’ भेल जे बादमे अपभ्रंशित भऽ‘सौराठ’ भेल। ऐ बातकेँ थोड़ेक आरो ठोस आधार देबाक लेल चली लोक मान्यता दिस। कहल ईहो जाइत अछि जे सीता-स्वयंवर आ बिआहमे सात लाख लोक आएल छला। ओतेक मनुख रहत केतए? तँए ऐ लेल एकटा पैघ स्थानक निर्माण कएल गेल जे सभ सुविधासँ युक्त छल।  ओ स्थान आब ‘सतलखा’ नामक गामसँ विख्यात अछि। सतलखा सौराठसँ सटले अछि। मात्र तीन किलोमीटरक अन्‍तर छै। आब दोसर उदहारण, भगवान शिवक धनुष जतए राखल गेल छल ओ स्थान आब ‘धनुखी’ नाओंसँ जानल जाइत अछि अर्थात धनुखी गाम। राजा जनकक छोट भाए छलखिन कनक। कनक ऋषि छला। ओ अपन आश्रम बनौने छला। ओइ स्थानपर आब ‘कनैल गाम’ बसल अछि। सीता प्रति दिन भोरे अपन संगी-बहिनपाक संग ‘मंगलबनी’ नामक फुलबाड़ीसँ फूल लोढ़ै छली। मंगलबनी आब अपभ्रंशित भऽ ‘मंगरौनी’ बनि चुकल अछि आ मधुबनीक बगलेमे ई गाम अछि। भऽसकैत अछि जे सौराठक यएह दन्त-कथा ऐ गामकेँ ‘सभा गाछी’ लेल योग्य बनेने हुअए? खैर! सभा गाछी पर चर्चा कहिओ बाद में  करब। विद्यापतिक पौत्र बादमे सौराठमे आबि कऽ बसि गेला। ओ सभ अखनो छैथ। हुनकर संतति सब एखनो अहि गौरव के समेटने छथि । जखन हम सौराठ में रही त अही कुलक एक महिला विद्यापतिक बहुत गीत अपन मधुर कंठ स सुनेली । एक गीत जे मोन के थैहर-थैहर क देलक ओ छल: सुरसरि सेबि मोरा किछुओ ने भेल । पुनमति गंगा भागीरथ लैल। हटबह बनिया हाट बजारे। अही बाटे अबै छथि सुरसरि धारे।। विद्यापति पर सेहो विस्तार स कहिओ आर बात करब. एखन अपन मूल बात के आगा बढ़ाबी। सौराठ अपना-आपमे रामायण, भगवान शिवक तंत्र आ राजा सलहेसक आख्यानसँ जुड़ल अछि। सौराठ हिन्दू आ मुसलमानक बीच आपसी सम्बन्धक अद्भुत उदाहण सेहो अछि। गुजरातमे जे ‘सौराष्ट्र’ अछि जेतुक्का सोमनाथ मन्‍दिर विश्व प्रसिद्ध अछि आ द्वादस ज्योतिर्लिंगमे एक लिंग अछि, जेहो लोकधारामे मिथिलाक सौराठसँ जुड़ल अछि। बता दी जे गुजराती भाषामे सौराष्ट्रकेँ सेहो सौराठे कहल जाइत छै। गुजरातक सौराठ आ मिथिलाक सौराठक मध्य एक कथा ऐतिहासिक अछि। ऐ कथाक इतिहासमे चली। सौराठ गाममे दू गोट ब्राह्मण कुमार भेला- गंगदत्त (गंग देव) आ भागीरथ दत्त (भागिरथ देव)। दुनू सहोदर भाए। नैनेसँ संस्कृतमे उत्कृष्‍ट आ कर्मकाण्‍डमे मग्न। एक बेर दुनू भाँइ निआरलैन जे द्वादस ज्योतिर्लिंगक दर्शन करब। फेर की छल दोसरे दिन निकैल गेला। सभ लिंगक दर्शन करैत सौराष्ट्र[1]क सोमनाथ मन्‍दिरमे पहुँच खूब नियम निष्ठासँ पूजा-अर्चना केलैन। भगवान शिव जेना हुनकर आत्मामे बसि गेलखिन। आब हुनका सोमनाथ छोड़बाक मोने ने होनि! बाह रे भक्त! बाह रे समर्पण! पाँच दिन ओतै रहि गेला। छठम राति सोमनाथ महादेव मन्‍दिरक देख-रेख करैबला मुखियाक सपनामे आबि कहलखिन- “दू संस्कारी आ विद्वान् मैथिल ब्राह्मण कुमार अतए आएल छैथ। ई सभ बहुत नीक लोक छैथ। विद्वान त छथिए एक नंबर केर भक्त सेहो थिकाह । अहाँ सभ हिनका लोकैनकेँ निवेदन करू जे ऐ मन्‍दिरक मुख्य पण्डित केर भार स्वीकार कऽ लेथि।” ..सोमनाथ बाबा ऐ दुनू भाँइक हुलिया सेहो बता देलखिन। जखन मुखिया भोरमे उठल तँ देखलक जे सहीमे दू ब्राह्मण बालक शिवक ध्यानमे मग्न छैथ। हुनका लग गेला। परिचए-पात भेलैन। आ अन्‍ततः निवेदन केलखिन- “हे मिथिलाक पण्डित द्वय! ऐ भूमिपर अपनेक स्वागत अछि। सोमनाथ महादेव केर ई इच्छा छैन जे अहाँ सभ मुख्य पुजारिक भार ग्रहण कए हमरा लोकनि के  चरितार्थ करी?” गंगदत्त आ भागीरथ दत्त ऐ भारकेँ स्वीकारि लेलैन। मुदा ई अबस्‍स कहि देलखिन जे छह मास एकटा भाए सोमनाथमे रहता आ दोसर मिथिलामे आ हरेक छह मासमे पार बदैल जेतैन। दुनू भाँइ आब कर्मकाण्‍डमे आरो लीन भऽ गेला। ओइ समय सोमनाथ भारतक सभसँ सम्‍पन्न मन्‍दिर छल। प्रतिदिन वनारससँ भरल गंगाजलसँ शिव लिंगक स्‍नान आ पूजा होइत छल। कहल जाइत अछि जे वनारससँ सोमनाथ धरि पीत-वस्‍त्र पहीरल भक्तक चेन (श्रृंखला) लागल रहैत छल। सबहक हाथमे स्वर्ण कलश। पहिल बेकती कलशमे गंगाजल भरि लगभग डेढ़ किलोमीटर जा ओ कलश दोसर आदमीकेँ दऽ दइत। दोसर आदमी पहिनहिसँ खाली कलश लेने ठाढ़ रहैत। फेर ओ आदमी भरल कलश हाथमे लऽ डेढ़ दू किलोमीटर चलैत छल आ तेसर आदमीकेँ भरल कलश दैत खाली कलश लैत गंगा दिस आबि जाइ छल। ..अही तरहेँ वनारससँ सोमनाथ धरि मानव श्रृंखलासँ गंगाजल स्वर्ण कलशमे पहुँचै छल। सभकेँ अपन समय बूझल रहइ। वनारससँ सोमनाथक दूरी अछि १७९२ किलोमीटर। एकर अर्थ भेल जे २४०० स्वर्ण कलश गंगाजल लेल प्रयोगमे अबैत छल आ २४०० पीत वस्‍त्रमे लोक ऐ कार्यक सम्‍पादनमे अपन श्रमदान करैत छल। गुजरात प्रान्तक काठियावाड़ क्षेत्रमे सोमनाथ अछि। प्रतिहार वंशक राजा नागभट द्वतीय ८१५ इसवीमे लाल रंगक पाथर (Red sandstone) सँ एक भव्य आ विशाल मन्‍दिरक स्थापना केलैन। ई मन्‍दिर अपन स्थापत्य कला, क्षेत्र गौरव, आ स्वर्ण, चानी, हीरा, एवं अनेक बहुमुल्य पाथर, रत्न, द्रव्य संगे मुद्राक भण्डारण लेल सेहो विश्व विख्यात छल। महमूद गज़नी (९७१-१०३०) जेकरा ‘महमूद जाबुली’ अथवा ‘यामीन-उद-दवला अब्दुल कासिम महमूद इब्न सेबुक्तेगिन’क नाओंसँ सेहो इतिहासमे जानल जाइत अछि–ओ अपन सेना सबहक संगे भारतक–औझुका गुजरात प्रान्त स्थित–प्रसिद्ध सोमनाथ मन्‍दिरपर १०२५ ईस्वीमे आक्रमण केलक। प्रारम्‍भमे मन्‍दिरक रक्षक-प्रहरी-स्थानीय सेना– आ चालुक्य वंशक राजा भीम प्रथम (काठियावाडक राजा) राजक सेना ग़ज़नीक विरोध करैत लड़ल मुदा अन्ततः हारि गेल। निरंकुश आ जीतक मदमे मातल गज़नी अपन सेनाक संग समस्त सोमनाथ मन्‍दिरक परिसरकेँ मटियामेट करए लगल। मन्‍दिरसँ सभ मूर्ति एवं बहुमुल्य वस्तु, हीरा-सोना-चानी-मूंगा-पन्ना-पुखराज-स्फटिक-माणिक्य इत्‍यादि आर ने जानि की की, सभकेँ लूटलक। मन्‍दिरकेँ तोड़ि कऽ ध्वस्त कऽ देलक। आ जे कियो ओतए आएल ओकरा मौतक घाट उतारि देलक। भक्त, सेवादार आ पण्डित सभ या तँ भागि गेला वा जे नहि भागि सकला सेहो सभ अपन प्राणसँ हाथ धोलैन आ निर्मम हत्याक शिकार भेला। किछु सेवादार आ मन्‍दिर संचालन समितिक सदस्‍य सोमनाथ मन्‍दिरक लिंग बँचबैक अन्तिम प्रयास केलैन आ हिम्मत करैत गज़नी लग गेला। हाथ जोड़ी विनम्र भावसँ निवेदन करैत कहलखिन- “श्रीमान! अपने जे ध्वस्त केलौं तइले कुनो बात नहि। आरो अगर हीरा, मोती, द्रव्य जात लेबाक अछि तँ हम सभ आनि दइ छी। जेतेक लिंगमे लागल अछि तेकर ५० गुणा, मुदा लिंगकेँ ध्वस्त नहि कएल जाओ!” ई बात सुनिते गज़नी क्रोधसँ लाल भऽ गेल। चिचियाक बाजल- “अही लेल हम युद्ध जितलौं! हम जखन अपन देश आपस जाएब तँ लोक की कहत? कहत ने ‘गज़नी बुत पूजक काफ़िरक देवताकेँ बिना ध्वस्त केने आबि गेल?’ अल्लाह हमरा कहियो माफ़ नहि करता?” कहैत गज़नी सभकेँ ओतै मारि देलक। रक्त केर धार बहए लगल...। ऐ तरहेँ सोमनाथ मन्‍दिरकेँ लूटैत काल गजनी लगभग ५०,००० ब्राह्मण एवं हिंदू सबहक नृशंस हत्या केलक। एतेक शोणित बहेलाक बादो गज़नीकेँ मोन शांत नहि भेलइ। लिंगक सभ कीमती वस्तुकेँ समैट अपना कब्ज़ामे लेलक। आ स्वयं अपना हाथमे पैघ हथौरा लऽ शिव लिंगपर दानवी प्रहार तेना करए लगल जेना मदमे पागल भेल हो। प्रहारपर प्रहार! निर्दय प्रहार। निरंकुश प्रहार! आस्थावादी आ मूर्ति-पूजक देवतापर मूर्ति भंजक प्रहार! इतिहासपर प्रहार! वर्तमानपर प्रहार! भविष्यपर प्रहार! संस्कृतिपर प्रहार! संस्कारपर प्रहार! हिन्दू धर्मक भावना आ बिश्वासपर प्रहार! मान्यतापर प्रहार! आरो नहि जानि कथी-कथीपर प्रहार! आब गज़नी सैकड़ो संख्यामे गाइक वद्ध कए मन्‍दिरक प्रांगनमे भोजन बना अपन आसुरी सेना आ लूटेरा सभ संगे खाए लगल...। ..किम्बदन्तिक अनुसार सोमनाथ शिव लिंगक प्रस्तरक भग्नावशेषकेँ गज़नी अपना संगे लेने गेल। आ ओ अपन शहरक जमा मस्जिदमे ओइ प्रस्तर अवशेषकेँ सीढ़ी बनबैमे प्रयोग केलक। दुनियाकेँ ई बतेबा लेल जे “देखू हिन्दू धर्मक सभसँ पैघ देवताक ऊपर हम सभ लात-दऽ नित्‍य नमाज पढ़ए जाइ छी।” धन सम्पैतक अतिरिक्त गज़नी अपना संगे हजारक संख्यामे स्‍त्रीगण एवं बच्चा सभकेँ सेहो गुलाम बना कऽ एतएसँ लऽ गेल। आब फेर कनी मिथिलाक सौराठ दिस आबी। लोक मान्यता ई अछि जे सोमनाथ महादेवकेँ पहिनहि भान भऽ गेल रहैन जे गज़नी प्रांगणकेँ ध्वस्त कऽ देत। तँए ओ ऐ घटनासँ एक दिन पहिनहि सोमनाथ मन्‍दिरक पुजारी श्री गंगा उपाध्याय (देव) के रातिमे स्वप्नमे आबि कहलखिन- “आब हम अतएसँ पलायन कऽ रहल छी। अहाँ जँ हमर पूजा करए चाहै छी तँ हमर निर्माल लऽ लिअ आ अहाँ एकरा जेतए राखब हम ओतइ पहुँच जाएब आ अहाँ हमरा पुनः पूजा-अर्चना करब। हँ, ऐ बातक धियान अबस्‍स राखब जे केकरो ऐ बातक भान नहि हुअए।” ई कहि सोमनाथ महादेव अन्‍तर्धयान भऽ गेला। गंगदेव जखन सुति कऽ उठला तँ सपना जेना सत्य बुझमे आबै लगलैन। मन्‍दिरकेँ प्रांगनमे जेना भियौन लागए लगलैन। पूजा–पाठ, स्वाध्याय आदि कुनो कार्यमे मोने ने लगैन..! तखन गंगदेव अपन छोट भाए भागीरथदेवकेँ बजेला आ सपनाबला बात सुनेलखिन। सुनिते भागीरथदेव कहलकैन- “भाय, हमरो बाबा सोमनाथ यएह सपना देला अछि। आब अतए रहनाइक अर्थ भेल अनिष्टकेँ अनेरे निमंत्रण देब।” ई सोचैत दुनू भाँइ समस्त परिवारक संग शिब निर्माल लऽ चुपचाप अपन गाम अर्थात सौराठ विदा भेला। सौराठ आबि–एखन जे सोमनाथ छैथ ताही ठाम–शिव निर्माल राखि पूजा-अर्चना करए लगला। पूजा तँ करैथ मुदा सोमनाथ महादेवक सपनाबला बात केकरो नहि कहलखिन। पछाइत ओइ स्थानपर स्वतः एक लिंग प्रगट भेल। दुनू भाँइ गद-गद भऽ गेला। पूजा पाठमे लीन रहए लगला। सौराठ एलाक उपरान्त दुनू भाँइक जीवन शैलीमे सेहो परिवर्तन भेल। दुनू भाँइ खेतीक तरफ़ सेहो धियान देमय लगला। अहीठाम दुनू भाँइ अपन-अपन बेवस्‍था सेहो अलग कऽ लेला। आ तइ निमित्ते ऐ गामक रकबा जे चौदह साए बीघा अछि तेकर बँटबाराक चर्च उठल। दुनू भाँइ सोचलैन जे जमीनक बँटबारा कऽ ली मुदा दुनू भाँइ एहिमे अपनाकेँ असमर्थ पेला। आब की करी? तखन गंगदेव महादेवक आराधना कए हुनकेसँ प्रार्थना केलैन जे उक्त जमीनक बँटबारा करू। लोक मान्यता कहैत अछि जे तखन कमला राता-राती ऐ गामक रकबा चौदह साए बीघाकेँ बीचो-बीच धारक रूपमे आबि सात-सात साए बीघा कएल। जेठ भाय–गंगदेव–केँ कमलाक पूब आ छोट भाए–भागीरथदेव–केँ कमलाक पच्‍छिम जमीन भेटलैन। जेकर प्रमाण आइयो जिला कार्यालयमे जे उपलब्ध नक्शा अछि, जेकर निर्माण १९०१ इस्‍वीक जनगणनाक संग भेल छल। तइमे चादर नम्‍बर-१ पछवरिया शीटबला नक्शापर सौराठ भागीरथ आ पुवरिया शीटबला नक्शापर चादर नम्‍बर-२ केर सौराठ गंगा अछि। संग-संग दुनूक रकबा सात-सात साए बीघा सेहो अछि। दुनू भाँइ केकरो सोमनाथ केर सम्बन्धमे बिना बतेने मरि गेला। एकर बहुत दिनक बाद शिव निर्मालक पूजा धीरे-धीरे बन्द जकाँ भऽ गेल। आ उक्त धरतीपर खेती-बाड़ी तँ नहि, मुदा चरौर बनि गेल। जैपर गामक चरवाहा सभ अपन-अपन माल-जालकेँ चरबैले जाइ छल। अहिना होइत होइत २०० वर्ष बीति गेल। अही क्रममे फ़कीरचन्‍द नामक एक सूफी (मुसलमान कृषक, जेकर नामसँ फकोरमा नामक खेत अखनो धरि अछि) अपन टेंगारीसँ उक्त स्थानक झाड़  आ घास पातकेँ साफ़ करै छल। एकाएक फ़कीरचन्‍दक टेंगारी सोमनाथ नामक महादेवक लिंगपर लगलैन। टेंगारीक  चोट लगिते लिंगसँ शोणित बहए लगल। स्थितिकेँ देखते फ़कीरचन्‍द घबराइत टेंगारी  ओतै छोड़ि घर आबि गेला। फ़कीरचन्‍द ओना तँ मुसलमान छला मुदा हिन्दू धर्मसँ सेहो हुनका सिनेह कम नहि छेलैन। भोजन कए ओ दिनमे कनीकाल लेल आँखि मुनला तखन हुनका सोमनाथ महादेव स्वप्न देलखिन आ कहलखिन- “अहाँक टेंगारीसँ जइ पत्थरकेँ चोट लागल ओ साधारण पत्थर नहि अपितु शिव लिंग अछि। हम छी सोमनाथ महादेव। गज़नीक आक्रमणक समय ऐ गामक दू गोट ब्राह्मण गंगदेव आ भागीरथदेव हमर आज्ञापर सौराष्ट्रसँ हमरा निर्मालक रूपमे अनलैन। हुनकर मृत्युक पछाइत आब कियो हमर पूजा नहि करैए। ओना, अइले गामक लोकक कुनो दोख नहि। अहाँ दूटा काज करू। पहिल तँ ई जे गामक लोक सभकेँ लऽ कऽ अहाँ ओइ स्थलपर जाउ आ लोक सभकेँ कहियौ जे पीसल भाँग, बेलपत्र, गाइक घी, चन्दन, दही आदिक लेपसँ हमर लिंगकेँ पवित्र करैत। पूजा प्रारम्‍भ करैथ। अहाँकेँ हम असीरवाद दइ छी जे खूब फली-फूली। मुदा अहाँ ऐ गामसँ थोड़ेक दूर अर्थात १४०० बीघा केर सीमानसँ बाहर बास करू। तुर्क लूटेरा गज़नी हमरा बहुत परेशान केलक आ तंग तंग कऽ देने छल।” एतेक बात कहि सोमनाथ अन्‍तर्धान भऽ गेला। फ़कीरचन्‍द अकचका कऽ उठल आ मुँह-हाथ धोइ कऽ गामक लोककेँ बजा सभ बात कहलक। आब गामक समस्त लोक- बच्चा, स्‍त्रीगण, बुढ़, युवा सभ चरौर दिस गेल। देखलक जे लिंगसँ शोणित बहि रहल अछि..! लगले पीसल भाँग, बेलपत्र, चन्दन, गंगाजल, गाए घी, दही, मधु, आदिसँ मालिश कए शिवलिंग के पवित्र कएल गेलैन तखन आब लिंगसँ रक्तस्त्राव बन्‍द भेल। पूरा गाम ऐ चमत्कारसँ नाचए लगल। ढोल, पिपही, शंख, डमरू, झालि बाजए लगल, भजन कीर्तन शुरू भेल। ‘हर-हर बम-बम’ केर उद्घोषसँ वातावरण प्रफुल्लित भेल। लोक फ़कीरचन्‍दक प्रति अपन कृतज्ञता अर्पित करए लगल। फ़कीरचन्‍दक आँखिसँ खुशीक नोर झहरए लगलैन। मनमे उठलैन-  अनेरे किए लोक धर्मक नाओंपर कटै-मरैए? की महमूद गज़नी सोमनाथ मन्‍दिरकेँ ध्वस्त केलाक बाद अमर भऽ गेल? अल्लाहकेँ आँखिमे तँ ओ गुनहगारे ने भेल..? फ़कीरचन्‍दक सभसँ बेसी ई रहै जे हमरे कारण सौराठक सोमनाथ प्रगट भेला। आब जहिया धरि ई शिवलिंग रहत तहिया धरि फ़कीरचन्‍द अमर रहब। ई ने भेल गांगी-जमुनी तहजीब। पुन: फ़कीरचन्‍दकेँ सपनाक दोसर बात मन पड़लैन। मन पड़िते गुनधुनमे पड़ि गेला- बाबा सोमनाथ तँ हमरा ऐ गामक चौहद्दी छोड़ि देमाक लेल कहने छला!आब की करी, केना करी? फ़कीरचन्‍द असमंजसमे पड़ि गेला- जे गाम हमर जीवन छी ओकरा केना छोड़ब? मुदा नहियोँ छोड़ब उचित नहि। तखन हमरामे आ महमूद गज़नीमे अन्तरे कुन? अगर एक मुसलमान सोमनाथ बाबाकेँ ध्वस्त आ तवाह करबा लेल जानल जाइत अछि तँ एक मुसलमान सौराठक सोमनाथकेँ पुनर्स्थापित करबाक लेल जानल जाएत। आ ओ मुसलमान आर कियो नहि फ़कीरचन्‍द हएत..। ..सोचैत-विचारैत फ़कीरचन्‍द दृढ़ मुद्रामे अपन घर जा कनियाँ आ बेटा सभकेँ बैसा कऽ सभ बात कहलखिन। संगे ईहो देलखिन जे ‘देख, ई निर्णय हमर अन्तिम अछि। हम पाँच वक्त सभ दिन नमाज पढ़ै छी। सुच्चा मुसलमान छी, तँए हम तँ ऐ गामसँ बाहर जेबे करब।’ ..किछु काल ना-नुकर केलाक बाद फ़कीरचन्‍दक घरवाली, बेटा सभ मानि गेली। तखन फ़कीरचन्‍द गामक लोककेँ बजेलक आ बाजल- “देखू, बाबा सोमनाथ हमरा ईहो कहलैन जे हम ऐ गामक अर्थात सौराठक चौहद्दीसँ बाहर अपन घर बनाबी। तँए हम ई गाम छोड़ि १०-१५ दिनक भीतर केतौ दोसर ठाम चलि जाएब।” समस्त सौराठक लोक फ़कीरचन्‍दक ऐ तियागसँ मन्‍त्र-मुग्ध भऽ गेल। गामक लोक अपन कृतज्ञता देखबैत फ़कीरचन्‍दकेँ जमीनक बदला दोसर गाममे दुन्ना जमीन कीनि देलकै आ ऐठामक घरसँ पैघ आ बेवस्थित घरो बना देलकै। फ़कीरचन्‍द सेहो गामक लोकक उपकार के जीवन पर्यन्त यादि रखलक आ जाबेत धरि जील ताबेत धरि सौराठ सप्ताहमे एक दिन अबस्‍स अबैत रहल। फ़कीरचन्‍दकेँ गाम छोड़ला बाद कुनो मुसलमान ऐ गाममे बसबाक हेतु नहि आएल। गामक लोकके ई कथन छैन जे अखनो धरि ओइ मोजेमे मुसलमान सम्प्रदायक बासकेँ शुभ नइ मानल जाइत अछि। इमहर आबि कऽ एक-दू गोटे उत्साही मुसलमान युवक सभ सड़कक पच्‍छिम–पोखरौनी टोलपर बसबाक प्रयास केलैन मुदा हुनका सभकेँ एतेक प्राकृतिक उपद्रव भेलैन जे अन्‍ततः बाध्य भऽ सौराठ मौजासँ हटए पड़लैन। आब बात फेर सोमनाथ महादेवक करी। बहुत दिन धरि ओइ रूपमे बाबाक पूजा होइत रहल। बहुत दिनक बाद ऐठाम एक हकरू गोसाईं नामक सिद्ध महात्मा[2] भेला। ओ अहीठाम कुटिया बना रहए लगला आ सोमनाथ मन्‍दिरक समस्त परिसरक विकास कार्य जुटि गेला। सोमनाथ महादेव केर लिंग गर्भ गृहमे बहुत नीचाँ छैन। केतेको बेर गौआँ सबहक बीच विचार भेलैन जे हुनका ऊपर अनैक प्रयास कएल जाए। मुदा तइमे एक बिडम्बना सदिकाल देखल गेल। कोरैत-कोरैत लोक जौं-जौं नीचाँ जाथि तौं-तौं शिव लिंग विशाल होइत गेल। जड़िक अन्ते नहि! सभ गोटे  हारि कऽ अन्तिम निर्णय ई लेलैन जे आब कोरनाइ बन्‍द कऽ दी। सएह भेल, लोक नतमस्तक भऽ भाव-भिभोर होइत ह्रदयसँ शिवक महिमाकेँ स्वीकारलैन। शिव के प्रणाम केलैन। शिव लिंगक सटल उत्तर दिशामे एक जलधरी अछि। ई जलधरी शिव लिंगक संगहि अंकुरित अछि। ऐ जलधरीक स्रोतकेँ समुद्र तलसँ जुड़ल बताएल जाइत अछि। कहियो काल ऐ जलधरीसँ आपरूपी जल निकैल बाबाक मन्‍दिरमे प्रवेश करैत शिव लिंगकेँ पूर्णतया जलमग्‍न कऽ लैत अछि। जल बहुत स्वच्छ आ हरियर कचोर होइत अछि। कियो-कियो ऐ जलक तुलना गंगाजलसँ करै छैथ। ऐ जलक स्वतः प्रस्फुटन होइक कुनो निश्चित तिथि, अवधि अथवा मौसम नहि अछि। कखनो भऽ सकैत अछि। कोनो-कोनो बेर सौन-भादोमे तँ कोनो-कोनो बेर बैशाख-जेठमे सेहो निकलैत अछि। जलक स्वतः प्रस्फुटन केर अवधि दू-सँ-सात दिनक रहैत अछि। ओकर बाद ई स्वतः सुखा जाइत अछि आ जल प्रवाह बन्‍द भऽ जाइ छै। बेसी काल शिव लिंगमे साँपकेँ लटपटाएल सेहो देखल जाइए। सौराठ गाममे अनेकानेक विभूति भेला। जइमे महामहोपाध्याय पण्डित राजनाथ मिश्र उर्फ़ रजे मिश्र छह विषयक अद्भुत ज्ञाता। हुनक लिखल कएकटा पोथी अखनो उपलब्ध अछि। ऐ गाममे हुनक लिखल तांत्रिक पद्धतिसँ निर्मित दुर्गा पोथीसँ अखनो धरि दुर्गा पूजा होइत अछि। महामहोपाध्याय डॉ. गंगानाथ झा हिनक शिष्य छलाह । रजे मिश्र  काशी वास  केलाह आ ओतहि भगबान भोलानाथ के नगरी में गंगा कात में अपन अहि नश्वर काया के त्याग केलनि । ऐ भूमिपर एक विभूति भेला श्री गंगाधर मिश्र जिनकर योगदानक फलस्वरूप चन्‍द्रधारी मिथिला महाविद्यालय केर स्थापना भेल। ऐठाम महान क्रांतिकारी श्री भागीरथ झा भेला,जिनकासँ ब्रिटिश हुकूमत त्राहि-कृष्ण करै छल आ ‘शूट एट साईट’क आदेश सेहो देने छल। जे हिनका जीबैत अथवा मुइल पकड़ैबला अथवा जानकारी दइबलाकेँ लेल इनाम देल जाएत...। ..देशक आज़ादीक पछाइत भागीरथ झा जिवकोपार्जन हेतु महाराष्ट्र गेला आ बादमे सौराठ गामक नामक पताका फहरेला आ महाराष्ट्र विधान-सभाक सदस्य चुनल गेला। सौराठमे एक विभूति छला बाबु अबध विहारी झा। ई अंग्रेजक समयमे डिप्टी भेल छला बादमे विधान पार्षद सेहो भेला। ऐ गामक डॉ. सुरेन्द्रनाथ ठाकुर नामक प्रख्यात चिकित्सक भेला। ई जीवन पर्यन्‍त गाम आ परोपट्टाक लोकक मुफ्त सेवा आ चिकित्सा केलैन। ऐ गामक अन्य विभूतिमे पण्डित फेकू मिश्र, पण्डित हरीशचन्‍द्र झा, पण्डित कृष्णदेव झा, तांत्रिक नारायण मिश्र तथा डॉ. कलिका दत्त झा आदि प्रमुख छैथ। सौराठसँ जखन हम आबए लगलौं तखन एक व्यक्ति हमरा भेँट करए एला। ओ गामक विद्यालयमे शिक्षक छला। सौराठ गामक इतिहास आ एकर गौरवकेँ ओ अपन एक कवितामे बहुत सुन्‍दर वर्णन केने छैथ। ओ कविता हम सुधी पाठक लेल दऽ रहल छी- तपोभूमि जगजननी मिथिला ह्रदयस्थली जकर सौराठ/ श्री शारद नव निधि केर नैहर संग-संग जते सिधहु आठ// पूर्व पवित्र धार जीबछ केर उत्तर लोहा ग्राम/ पश्चिम पोखरौनी दक्षिण धनुखिक मध्य ई धाम// पुन्यस्थल सौराठ सभा मिथिला संस्कृति प्रतिक/ दर्शनीय सुन्दर शिव मन्‍दिर माधवेस्वरक थिक// तुर्क लूटेरा महमूद गज़नी जखन उपद्रव कएल / गुजरातक सौराष्ट्र तेजि शिव पथ सौराठक धैल// ईस्वी एक हज़ार पचीसिक अछि ई गप्प करू विश्वास/ सोमनाथ शिव कमला केर छारनि पर आबि बनोलनि बास// जंगल झार मशान मध्य शिव बसला गामक भेल उद्धार/ पुरना मन्‍दिर बोधकृष्ण सम्प्रति कयलनि अछि जीर्णोद्धार// दतकट कथा सुनब तँ लागत मुदा जुरायेबदेखने नयन/ कार्तिक जेठक विषम ज्वालामे शिव लै छथि अपनहि जलशैन// साधक सिद्ध समाज सुधारक न्यायी न्यायविज्ञ भरमार/ कुशल प्रशासक अभिनेता डॉक्टर प्रबुद्धजन अपरम्पार// बानी केर बरदानी बेटा मिथिला केर संचित अध्याय/ राजनाथ मिथिला केर गौरव विश्रुत महामहोपाध्याय// न्यायविज्ञ पण्डित गंगाधर साधक शिक्षा प्रेमीप्रज्ञ/ सूत्रधार सी. एम. कॉलेजक मिथिलावासी जिनक कृतज्ञ// हरिश्चन्द्र ज्योतिष केर ज्ञाता कृष्णदेव व्याकरणाचार्य/ नाम कतेको गनब अन्‍त नहि छथि नवीन नामी प्राचार्य// पद्मकान्‍त प्रियपात्र समाजक जिनका जन-जन केर आशीष/ सब तरहेँ मिथिला के गौरव सबतरि अपन बढ़ोलनि शीस// विश्वविदित कवि विद्यापति केर बंसज आबि बनोलनि बास/ के नहि जनैछ शिव उगना भए भेलथि विद्यापति केर दास// विद्यापति पुस्तक केर आलय केन्द्र चिकित्सा शिक्षा शोध/ संग्रहालय पत्रालय करैछ विकसित गामक बोध// सोभा सभ्य सुशिक्षित जन-जन मुँह पर चौअनिया मुस्कान/ बाल ब्रिद्ध युवजन मृदुभाषी बुझि परत नहि छथि ई आन// पग-पग पोखरि भव्य शिवालय रम्य बाग़ देखि होइछ हर्ष/ थिक सौराठ गाम सब तरहेँ मिथिला मैथिल केर उत्कर्ष// आभार- हम ऐ लेखक लेल श्री शिव कुमार मिश्र, श्री समरेन्द्र नाथ ठाकुर एवं सौराठ गामक महिला आ पुरुषकेँ धन्यवाद दइ छिऐन, किएक तँ हुनके सबहक देल जानकारीसँ ऐ आलेखक रचना कएल गेल अछि। हम अपन कृतज्ञता स्वर्गीय प्रोफेसर बैद्यनाथ सरस्वती के प्रति अर्पित करैत छी कारण ओ इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय कलाकेन्द्र में unesco चेयर केर प्रोफेसर छलाह आ हम unesco स्कॉलर । unesco –UNDP और इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय कलाकेन्द्र के सम्मिलित प्रयास स भारत केर १०० गामक संस्कृतिक आ संरचना केर अध्ययन करक रहैक. डॉ. कपिला वात्स्यायन आ प्रोफेसर सरस्वती हमरा कहलनि जे अहाँ एकटा एहेन गामक अध्ययन करू जकरा सब स्कॉलर आधार मानि काज करथि आ १०० गामक काज संपन्न हो. हम तुरते सौराठ केर नाम लेलौ आ दुनु गोटे स्वीकार क लेलनि. ◌◌◌ [1] गुजरातक सौराष्‍ट्र [2] बबाजी कुमार गगन ई-पत्र- डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ मे समानता विदेह २०८ अंक मे डॉ कैलाश कुमार मिश्रक आलेख सौराठक सोमनाथ आ सौराष्ट्रक सोमनाथ मे समानता पढ़ल । नीक लागल । मुदा सौराठक विभूतिक नाम सब पढ़ला पर लागल जे सूचि में एकटा महत्वपूर्ण नाम छुटि गेल छनि जेना महात्मा पुरुषोत्तम ठाकुरक नाम नहि देखल । महात्माजी एक पैर पर ठाढ़ भ भोर स साँझ धरि सहस्त्र गायत्रीक जाप करैत साधना करैत छलाह । जीवनभरि एक संध्या फलाहार पर रहैत आध्यात्मिक मार्ग में लीन छलाह । हुनक आश्रम में गायत्री मंदिर स्थापित अछि । सोमनाथ बाबाक मंदिर सँ ई स्थान लगभग 200 मीटरक दुरी पर ओही टोल में अवस्थित अछि । सभागाछी सँ सटले । नहि जानि एहेन महत्वपूर्ण नाम कोना छुटि गेल । कैलाश बाबू अपन रिसर्च में इहो जोड़ि लेथि से आग्रह । विशेष जानकारी पंडित देवोत्तम ठाकुर गायत्री स्थान ,सौराठ सँ भेटि सकैत छनि । भवदीय- कुमार गगन पद्य खण्ड रवि भूषण पाठक बाल कविता- 'क' 'क' सँ कवि मे इएह बेमारी ''हम्‍मर कविता सबसँ भारी'' कहि कहि राहडि़ लिखथि खेसारी 'ग' हरियर कचोर गेनहारी 'घ' सॅं घमर्थन चलै दिन-राति 'ङ ' सँ कोनो नइ किछुओ ने बात बाल कविता - मानसून पहिल बुटम सुरूज भगवान बाबू हौ दादा हौ निकलै प्राण तखने सहकै हवा मचान दोसर बुटम दक्षिण अंडमान रोकि हिमालय ई बलवान कहै नहाबू खेत बथान तेसर बुटम पछुआ विक्षोभ देखै की छें मालदह चोभ चारिम बुटम दछिनहा थान हम ने देखलियै हे भगवान एलनीनो सन बुटम नइ गान भीज -भीजा जुड़ा बहलमान बाल कविता- सुन वौआ सुन ऊ एथुन बस आबै लेल दुनिया के देखाबै लेल सुन वौआ सुन ऊ एथुन  पात बिछाबै लेल खाए ने लेल खुआबै लेल कर वौआ कर ऊ एथुन की खर उठाबै लेल? बातक लकड़ी लगाबै लेल मान वौआ मान बाल कविता- ब्‍लेक होल चाकर छै की गोल छै नाम एकर ब्‍लेक होल छै बड़का दावी ग्रह नक्षत्र केे खोलै सबहक पोल छै नाम एकर ब्‍लेकहोल छै

कहियो रहै ई रंगगर तारा आब ई उजरल टोल छै नाम एकर ब्‍लेक होल छै

बड़ घनत्‍व बड़ बेशी आकर्षण की बूझियै हौ झोल छै नाम एकर ब्‍लेकहोल छै श्री लक्ष्‍मी चौधरी ,करियनक सम्‍मान मे ऊ जे क' देलखिन उठानी मे की तू क' सकबीहीं जवानी मे? कोन जोकरक तोहर चरचा एे ठाम बहुत दम छै हुनकर कहानी मे की भाव की अभाव की परभाव कहियौ बूझि पेबही ऐ जिनगानी मे? हजार-लाख मे एकोटा ने ईमानदार रहै सौ मे सौटा विधायकजीक कोटेदार रहै भीजल चीन्‍नी रहै गहुम बोरापार रहै जेहल मे जीभ पेट थाना मे गिरफ्तार रहै दै मुट्ठी सॅं लै लोपेलोप एहने ई कारोबार रहै ऐ मिलावट –कमतौली क सब हिस्‍सेदार रहै मिलतै छल एक धुर अप्‍प्‍न जमीन सिमरिया सँ बिस्‍फी तक भाषाक कालाबजार रहै डहकन जत्‍ते खोड़बौ ओत्‍ते गड़तौ गरमी मे आगि जाड़ मे बर्फ सन लागतौ नोचतौ नछोरतौ भमोरतौ ने फालतू जत्‍त' जत्‍त' छूतौ ओत' ओत' दागतौ भगेतौ खेहाड़तौ ने जालेे बिछेतौ बिन कत्‍ते दूरे सँ गत्‍तर-गत्‍तर काटतौ खट्टा चूक्‍क दोसरक खु‍शी देखिते हुनकर मोन भ' जाइ छैन खट्टा चूक्‍क दोसर के मुसकियाइत हुनकर दिल मे उठै छैन हुक दोसर के हरियाइत देख हुनकर पानि किएक सुखैत छैक किएक ओ सुखा के कसौंझी भेल जाइत छथिन पूरा टोल गीत गाबैत रहै आ हुनकर दांत कोथ रहै पुरा गाम खुशी सँ हरियर रहै केवल हुनकर मोन पतैली जँका कारी भेल रहै हयौ नीच्‍चे गिरबाक होए त' भरल-पुरल गिरू झूल भ' गिरबै त' किओ छुअत नइ छुअत..... मीत्‍ता एना दोस्‍ती के जुनि गीज मीत्‍ता कखनो दुश्‍मनो पर पसीज मीत्‍ता ढ़ोलहा देने कसम किरिया केहन दम धेनाइयौ कुनो छै चीज मीत्ता एना जे करबै दर्दक विज्ञापन कम कहनैये छै तमीज मीत्‍ता हरियर हरियर खूब हरियर रहै आ लाल खूब टक्‍क लाल मुदा हरियर जे कनेक करियाइत रहै आ लाल जे खूनमाखून होइत रहै सेहो देखि लेलियै ऐ बेर गाम मे तहिना ऊज्‍जर मे खूब टीनोपाल रहै आ सेठबा सब खूब मालामाल रहै मुदा उजरका आब बेदाग नइ बचलै सेहो लिख लेलियै ऐ बेर गाम मे पीयर ने हरिदैल रहै ने बसंती पाकल जे सडि़ गेल रहै से चखि लेलियै ऐ बेर गाम मे..... बहुत किछु विदा भ' गेल रहै आ किछु विदा हेबाक लेल तैयार रहै गेट पर सबसँ पहिने मुंहक मैथिली आ ईसरगत,डरकडोरि ,बद्धी,माला लागैत रहै नइ रहतै देह पर कुनो सूत खरखर सुभाव क' स्‍थान पर बरसैत रहै चाशनी वला मौध आ जे मोन मे रहै से ठोर पर नइ रहै तमाम आदर्श नुका रहलै भगवत्‍ती घरक कुनो ताखा मे सपना सब भकुआयल -भूतिआयल अतृप्‍त ईच्‍छाक धार बहैत रहै पूरा देह व्‍यर्थ प्रलापी व्‍यर्थ प्रलापी घनघोर षड्यंत्रकारी जे लिखै छथिन बड्ड नीक ओ कत' गेलखिन ? सुर आ असुर दूनू के देलासा दए वला कविता ,कहानी ,आलोचना ब्‍लॉग ,पत्रिका ,किताबादि सँ सम्‍पुष्‍ट ओ युवा मनीषि कत' चलि गेलखिन हुनकर अशुभ वाणी अमंगलकारी छाया नइ देखाइछ त' मोन किदनदन कर' लागैत अ‍छि ऊ छथिन चालि चलै लेल आ हमहूं छी हुनकर चालि बिगाड़बाक लेल हे ऊप्‍पर सँ हरियर आ अंदर सँ सोंसि-घडि़यार अहांक फू-फा नइ सुनै छी त' कान नोच्‍च' लागैत अछि अहांक दुष्‍ट सोच अछि तखने हमहूं छी अपने कत्‍त'छी धियान लगेने ? झाबाद झाबाद रहै ,मिश्राबाद रहै यादबाद रहै ,मंडलाबाद रहै आ सिंह सँ पसवान के सुसमाद रहै तखने मिथिला जिंदाबाद रहै तीनटा कविता १ अस्‍सी के लगभगेने  ऊ गाम मे छथिन कानक अस्थि-उपास्थि आ सुनइ वला तंत्रिका तंत्र सब बसिया गेलै आबैत-जाइत ध्‍वनि  सिगनल तोरैत अहां कैह सकै छियै कि जंग लागि गेलै बूरहा के कान मे आ ईहो कि बैटरीक समाप्‍त भ’ गेलै मिझाइत कानक दम कें सकारैत अहां कहि सकै छियै दू आ दू पांच आ ओ किछु नइ कहता अहां कहहबै करियनक पूब मे बागमत्‍ती आ ओ बूझता जे अहां सत्‍ते बाजैत होयब साहस एतबो कि जनक राजा भेला काशी के आ ओ मुसकियेता ऐ आत्‍मविश्‍वासक साथ कि अहां झूठ किएक बाजब मुदा बांचब तखने तक  जखन तक कि बूरहा थाहता नइ आ थाहैत-थाहैत  मुख-भंगिमा के परहैत-परहैत बूरहा यदि बूझि गेला अहांक खेल त’ओ रूकि के अहांक गणित दुरूस्‍त करता साफ करता अहांक दिशासूचक मानचित्र आ खोंखियाइत कंठ सँ कफ निकालैत क्रमबद्ध करता इतिहासक किछु पन्‍ना

२ समै भागि रहलै सत्‍ते  आ सत्‍ते कि भागि रहलै कालक चक्र चक्रक अवाज सब अपना-अपना दम सँ बूझैत गेलै अपना-अपना बूत्‍ता सँ सब चक्रक कोखि मे दैत गेलै मोबिल-तेल मुदा तेल चक्रक घर्षणात्‍मक शक्ति कें कम नइ क’ सकलै चक्र चारू कात बरहैत गेलै चारू कातक जमीन जेजाति पर परैत गेलै निशान अइ निशान के राम राम जेंका आ  रहीम रहीम जेंका परहलकै ३ एखन त’ इहो नइ निर्णय भेलै कि बूरहाक कान देखायल जाए एखन त’ इहो निर्णय नइ भेलै कि डाकडरक देखेला सँ किछू फैदा भ’ सकै छैक एखन त’ इहो नइ निर्णय नइ भेलै कि बूरहा कें कान सँ की फैदा आ ओइ कान सँ घर-परिवार कें की फैदा आ कहीं बूरहा बेशी सुन’ लागलखिन त’  आ कहीं बूरहाक कानक पावर बेशी तेज भ’ गेलै त’ आ एमहर सबहक कनियां के जोर सँ बजबाक आदत भ’ गेल छलै एमहर सबहक कनियां बात-बात पर मारै ठहक्‍का एमहर नइ रहलै कुनो ब्रेकर कुनो आडि़ त’ अइ मशीन सँ ओझरेतइ कि नइ आंगनक समीकरण से बूरहाक कानक मशीन के आनतै बेटा-बेटी या कि पोता-नातिन आ एहने सन बहुत रास प्रश्‍न रहै जेकर उत्‍तर सबके पासे मे रहै फसली पद्य १-७ १.मकइ जिंदाबाद मकइक गाछक सभसँ ऊपर नाम-नाम फूल जेना सिपाहीक कनटोप आ देहपर पसरल हाथ भरिक पात जेना सिपाहीक डाँरपर राखल अस्‍त्र आ बीति‍-डेढ़-बीतक बाइल जेना गस्‍सल-गस्‍सल कारतूस खेतमे सजल लाइनमे गाछ जेना युद्धसँ पहिलेक सिपाही आ हे मिथिले ई सिपाही मिथिलाक दारिद्रय दुख क लेलिऐ के मानत आ यादि करू पूसा यादि राखू मसीना ई थिक मिथिलाक नया खजाना जतए जनमि रहल मिथिलाक नवपूत-सपूत जतए बागु भऽ रहल पलटनक पलटन सेना जे एकदम कटिबद्ध दुर्भिक्ष सबहक विरूद्ध आब देखिऐ ने केते जान कोसीमे रौदी, दाही झौंसीमे जय मिथिला, जय मसीना, जय मकइ आ मेंहि‍क्का चाउरकेँ मुर्दाबाद नै कहितौं जिंदाबाद केना कहिऐ जखनि‍ कि ई हरदम जीएने रहलै बस एक आना मिथिलाकेँ। २. खेसारी नहितन खेसारीक खेती बस सरकारे रोकलकए गाम-समाजमे अखनो बागु-रोपनी खेत-पथारमे अखनो कमौनी आ अखनो छीम्‍मीमे अहिना दाना भरौनी तहिना कटनी आ तहिना दौनी ई निखिद्ध ओहिना थारीमे ओहिना हमर देह आ खूनमे हमर भाषामे ‘बूरि खेसारी नहितन' आ जे असलमे खेसारी रहै सएह दोसरकेँ खेसारी कहए आ असली खेसारी राहड़ि‍क छिलका पहिरि‍ बनल रहए तीमनराज आ करैत संक्रमण पसारैत रोगक प्रोटीन। ३.  भगवान मरूआ आ मिथिला आ भगवानोकेँ पता रहनि‍ जे ऐ देशकेँ मरूए बचा सकत एहेन फसिल जे रौदी आ बरखाकेँ किछु नै गुदानै एहेन जे भेलिऐ बरखा तैयो नीक आ नै भेलिऐ तैयो तहिना एहेन सक्‍कत कि गिरियो कऽ तहिना एहेन चिक्‍कन कि जत्तोकेँ पकड़ि‍मे नै आबै ने लाल ने कारी आ मरूओ विदा भऽ गेलै मिथिलासँ जेना कि बहुतो चीज निपत्‍ता भऽ गेलै जेकर नाम रेड डाटा बुकोमे नै। ४. अल्हुआ कऽ सप्‍पत अल्हुओ खेने रहै सप्‍पत जा तक बरहब नै बाहर नै निकलब जमीनक बाहर पसारने लाल-‍हरिअर लत्‍ती लोककेँ भरमाबैत रहै आ नि‍च्‍चाँमे जमा करैत खूब रास कार्बोहाइड्रेट एत्ते मिठास कि कुसियारोकेँ ईर्ष्‍या होए कखनो-कखनो कीड़ा-मकोड़ा सेहो सटि कऽ चाटनाइ शुरू करए आ धरतीपर आबिते रूपआमे पसेरी भूक्‍खल, अधभूक्‍खल, जोगाड़ी व्रती साधु, सन्‍यासी कांच, उसनल, पकाएल दूध, दही, तीमन संग अल्हुआ तिरपित करए लगै बिना पुछने गाम टोल जाति आ फल्लाँ गामवाली फेर घूमि रहल छथिन नेने दौरी-चंगेरा नेने उधारक आस रूपआमे पसेरी अल्हुआ निराश नै करतै। ५. महि‍क्का धान महिक्का धान घेरि लए भरि बिगहा आ दाना दए मोन भरि तँ एकर सुगंध लऽ कऽ की की करी केत्ते बान्‍ही आ केत्ते जोगा कऽ राखी आ ई उपजए हमरा खेतमे चलि जाए बाबू भैयाक कोठीमे तँ एहेन बुलनहारकेँ केना मनाबी आ हरि‍दम पैंचक फेरा अलग वौकाक माए वौकाक भौजी आबथिन लऽ लऽ कऽ अप्पन गिलास आ कहथिन जे हमरो उपजत तँ घुमा देब आ केना कऽ बि‍सबास दियाबी के हमरा घरमे एक्को कनमा महि‍क्का चाउर नै ई महि‍क्का धान देलक बदनामी सुआदोसँ आ समाजोसँ। ६. कविता आ धान हम बेरि-बेरि चाहलिऐ जे ई महि‍क्का धान हमर कवितामे आबि कऽ गमकए मुदा हम रोपिऐ तुलसीफूल आ दाना बनै खोरा केर हम चाहिऐ जे तुलसीएफूल जकाँ बस एके-दू कविता लिखी हम मुदा लिखए लागिऐ तँ कुम्‍भी अप्‍पन जाल फैलाबए लागै हम सोचिऐ जे एक-दू पाँतिकेँ डेली जोड़ी मुदा कागत-कलम लिऐ तँ ढैचा जकाँ किच्‍छो सम्‍हारेमे नै रहए हम अखनो आश्‍वस्‍त छी जे एकदिन हमरो खेतमे तुलसीफूल उपजत।

७. कनियाँ आ कविता जँए कि मकइ आ खेसारीपर लिखल देखलखिन हुनका पक्का बि‍सवास भऽ गेलनि‍ जे हम धान आ मरूओपर जरूरे लिखब तँए चेतावनी दैत कहलखिन जे पगलाउ जुनि जे ई आलतू-फालतू अगर-मगर सभ लिखै छी जखनि‍ देखी कागत-कलम नेने मुसकिया रहल छी ई पगलपनी केत्ते दिन भोजन बनबी हम कपड़ा-लत्ता साफ करी हम आ अहाँ बस बैसल बौराइत रहब हे देखू हम बिगड़ि‍ कऽ नै कहै छी एक-ने-एक दिन अहाँक दिमाग ब्रष्‍ट कए कऽ रहत जेना कि हम कविते नै सुनलिऐ आ ओ सुनबए लगलखिन दिनकरजी आ आरसी बाबूक कविता जेना कि हम किछु बुझिते नै छी हे यौ हम बैसबै तँ आहूँसँ नीक लिखब आ ई नै बूझियौ जे नीक लोक सभ अहाँक प्रशंसा करैत अछि आ यदि आहीं सन पागल हेतै ऐ धरतीपर तँ आर की कए सकै छै। एहि बेर छठि मे एहि बेर छठि मे पहिले छठि मे सूर्यदेव उगति छलाह या त‘ खुटेरी बाबू क‘ गाछी क‘ पाछू या निसहरा पोखरि क‘ पाछू कोनो-कोनो बेर शशि बाबू क‘ गाछी क‘ बीच सँ आ कोनो बेर मझिला कक्का क‘ बँसबीट्टी क‘ पाछू एहन बात त‘ कहियो नहि भेलए कि ओ टेलीफोन टावर क‘ पाछू सँ उगथि या डाक्टर साहेब क‘ दूमहला क‘ पाछू एहि बेर स्कूल क‘ मोटका हेडमास्टर आश्वस्त छथि मध्याहन भोजन क‘ पहिल क‘र भगवान खाइथ छथि हमरे घर क‘ पाछू किएक ने उगताह ? मुक्खन के जोतखी जी कहने छथिन्ह भगवान अहँा के छोड़ि के कत‘ जेताह ? भुटकुन बाबू आ मुंशी जी डराएल छथि कि भगवान रस्ता बिसरि जेताह ? बच्चा बाबू एकटक लगेने छथि सबसँ पहिले ओ भगवान के देखि के खूब जोर सँ चिकरताह देखियौ देखियौ भगवान त‘ एहि बेर मन्दिर क‘ पाछू सँ निकललाह । जुआएल कुहेसा आ भपाइत पोखरि मे सब भक- चक छथि तखने बटोरन बाजल भगवान त‘ एहि बेर दुसधटोली क‘ पाछू सँ उगि रहल छथि मुक्खन मुखिया,डाक्टर आ मास्टर साहेब दुसधटोली दिसि देखि रहल छथि सूर्यदेव उगए वला छथि दुसधटोली क‘ पाछू आकाश टकाटक लाल छलए........... हमर मैथिली ने बातमे,ने जजात मे पोखरि सँ धार फेर धार सँ नदी जँका हमर मैथिली रूकल,ठमकल,सुखाएल,कदुआएल मैथिली नइ हमर मैथिली बहि रहल अछि ‘बालचंद बिज्जावइ ‘ क गाँव सँ ‘मैला आँचल‘ तक आ दिनकर क सिमरिया सँ जनकपुर धाम तक ओहिना निधोख ओहिना पवित्र मात्र नदी क नाम बदलैत छैक बागमती कखनो कोशी कखनो गंगा कखनो अधवारा भ‘ ओहिना बहि रहल अछि उपर सँ नीचा अहिगर सँ पातर दिश हमर मैथिली मे किताबक फूल कम आ यज्ञाश्व क हिनहिनाहट त एकदम नदारदे बूझू संध्या -धूपदीप क गंध नहि मजूरक पसीना भेटत आ ओहि पसीना मे पंजाबी,बंगाली,संथाली कखनहु पड़ोसी भोजपुरी ,मगही,नेपालीक शब्द ओहिना मिलत जहिना गहुम क कूड़ी मे कखनो कखनो तोरी आ तीसी हयओ सरकार ! हमरा मैथिली मे की संस्कार खोजब? हम छी दछिनबरिया मोटपसम राड़ हमर कटाह बोली क लेल पुरान उपमा भ गेलए कंसार क लावा अहाँ खोजू हमर दुष्ट ,धृष्ट,निकृष्ट मैथिलीरूप क लेल संज्ञा ,विशेषण आ विस्मयाधिबोधक शब्द आ चिह्न !! आ हम लिखइ छी फेर एकटा कविता ओएह कटहा मैथिली मे आ अहाँ बनबू कोमल कान्त पदावली क दुर्ग हम निछन्द,भदेस,भठियार मैथिली क संग बढि रहल आगू हमर संग अछि कोटि कोटि जनक दुखदर्द उत्साह आ आशा आहूँ बढ़ू जाति आ दिशा क संग संग हमरा संग भुवन भास्कर छथि आ उदयनाचार्य ओएह जे नास्तिके नइ भगवानो सँ लड़लथि एक ढ़ुहि हे !!कुलगोत्रक सोइत तमाशा हमरा संग मे अछिए की? डीह क उस्सर खपटैल खेत आ बागमती करेहक रक्तिम नेत्र आँखि खुजिते डूबि जाइछ खेत-पथार,मंदिर,पोखरि सहित जिला जवार आ परोपट्टा साँप कीड़ा क दया मोटका खोरा चाउर आ बी बी सी रेडियो पर जीवैत अपन गामघर आ देवता के हम उघार नइ करब । जहिना बात मे तहिना जजात मे कोनो लैस नइ ताहि दुआरे लीची सठि जाइछ पाँच कोस पहिने आ मखान क गंध तीन कोस बादे मिलत अछि केवल मकइ क ठोस शिष्टाचार आ तमाकू क पूरजोर लट्टमपट कट्ठा दसमोन अल्हुआक मीठ आ गुबगुब भाग्य कत‘पाएब कविवर? द्विविधा नइ चौपाड़ि पर छी फँसल सुमन,आरसी कोस भरि पर आ यात्री दस कोस उत्तर विद्यापति सेहो पन्द्रह कोस पर दिनकर बीस कोस दक्षिण आ पचास कोस पुरब छथि रेणु कखनो कखनो बागमती क धार संग तिरमुहानी मे गंगा सेहो देखैत छी ते निराला प्रसाद सेहो अबूझ नइ ओना गंगा दस कोस पहिले विसूखि भरमाबइ छथि हिंदी आ मैथिली के बीच छोड़ू ई बात यदि कविता मे हो प्रश्न पूछबाक गुंजाइश तखन कहू जे दिनकर आ रेणु के मैथिली मे नइ लिखबा क दोषी के? ओ स्वयं वा अहाँ हे मैथिलीपारिजात के सुमन,किण,अमर । आ तमाम कविगण जनिका कविता मे बान्हल रूप आ छन्द मे थक्का लिखबा क बीमारी छन्हि नबका बात,हवापानि के जे एंटीबायटिक खा के रोकैत छथि आ राजकमल ,यात्री के पानि पीबि के गरियाबइ छथि । अपन असभ्यता के साथ हम पुनःपुनःउपस्थित छी उदयनाचार्य क गौंवा आ राजकमल चौधरी क दियाद । गाँव क एक पलटन लोक तैयार छथि दिल्ली,पंजाब,कलकत्ता क लेल रेलक अनारक्षित डिब्बा क भीड़,गंध,पसीना,टीटी,कुली सँ बचैत रेलक छत,इंजन,शौचालय, डिब्बा क ज्वांइट पर बैसल तमाकुए नइ बोली,टोनक मर्दन करैत ई जनसमुद्र बढ़ि रहल अछि लालकिला दिस । मैथिलीपुत्र घूमि रहल छथि भारत आनि रहल छथि किछु नबका शब्द,गंध,चित्र ,बात उजरल धरती हुलसि रहल अछि कविता आ सपना सँ आगू किछु ठोस आश्वासनक साथ । होली आएल छतीसा क्षण बीतल खन बारहमासा अहिना तहिना गएल पचीसा फूजल भक नहि खुलल गाल नहि नेाचउँ केश देखबउँ बतीसा किछु कविता अधलिखल कहानी बिनु किछ कएने बीतल जवानी बीतल पैंतीस आएल छतीसा धवल केश भभकए चालीसा ग्रंथ छपल नहि पुरः कार नहि बिन गुट गुरू के लगत पार नहि हे अकादमी यूनिवर सिटी ज्ञानपीठ के ध्यान धरै छी नमहर गुरू नमहर सम्माना लिखब लघु गुरू ऐ विधि नाना । ई नामवरबा (हिंदी आलोचकक व्यथा) ई नामवरबा बहुत सताबइ कखनो टीवी कबहुँ रेडियो ब्लॉग , न्यूज पर आबइ । तुरते मम्मट तुरत लोंजाइनस मुक्तिबोध बताबइ की कविता नाटक वृतांत पर अजबे गजब सुनाबइ नागार्जुन अपभ्रंश हजारी सबहक सत्व दिखाबइ । लिख मारलक दू चारि किताब बस बाजि बाजि घोलटाबइ । आब रमत नहि लिखत पढ़त मे बात से बात निकालइ । बाज बाज बौआ दिन तोहर शणियो सुघड़ मंगलबो गाबइ ई नामवरबा बहुत सताबइ । की खाइ छें कोन पानि पीबए छें घाट घाट के बानि बजए छें हमरो दे किछ जंतर मंतर बाजी कम गुण अधिक सुनाबइ ई नामवरबा बहुत सताबइ ! ई नामवरबा बहुत सताबइ ! मरणोपरांत-१-४ मरणोपरांत-१ 1. कामना हुनकर मृत्युक कामना के करैत अछि जखन कि कतेको वृद्ध जवान विदा भऽ गेलाह। बिला गेलइ कतेको सरकार बन्हा गेलइ कतेको बाँध आ मिटा गेलइ बाढ़ि भूकम्पक छोट नमहर निशान । जीवनशतक तरफ अग्रसर ऐ धतालबूढ़ सँ के डराइत अछि कोन पंडित आ के कवि चऽर चांचड़ के सठ लण्ठ कत‘ के ज्योतिष आ कहिया के कहबैका परोपट्टा के पुरनिया आंगन टोल क अज्ञविज्ञ दियाद फरीक जजिमान पुरहित सेवा सँ पूतोहू आ मर्यादा सँ बेटा अपन अपन नौकरी आ बालबच्चा क पोसैत पोता नाती के धखाइत अछि बाभन कि सोलकन डीही कि भगिनमान जिरात कि नाशी गाछी कि मचान ककरा की चाही ? 2. समाचार दलान पर खोखैत रस्ता दिस देखैत छोटका बाबू कतेको गणना के असफल करैत अड़ल रहथिन्ह दोसर के दिन गुणैत जोगीभाई विजय बाबू हारि गेलाह अंदाज लगबैत डाक्टर लोकनि थाकि गेलाह आला लगबैत गौंआ घरूआ बिसरि गेलाह कि केओ वृद्ध मरणासन्न छैक बेटा पोता क सेवा जिज्ञासा क संगे जमल रहलखिन्ह छोटका बाबू । जिजीविषा क आगाँ हारि गेलाह यमराज हृदयाघात क दू-दू प्रयासक बाद पस्त भेलाह । मुदा छोटका बाबू हारि गेलाह उपेक्षा क कल्पना सँ सहि नइ सकलाह अपन रोपल फूलवाड़ी मे वृथा कांट कूश अमरबेलक लत्ती सोहराय जहरफूस । 3.ई ब्रेकिंगन्यूज नइ अछि नब्बेपार बूढ़ क मरला मे कोन आश्चर्य कथी क दुख आ केहन असौकर्य मृत्यु क एकाधिक बेर अफवाह सँ अइ समाचार क सेंसेशन खतम रहए बेटा भतीजा पोता नाती तैयार पहिनहि सँ छुट्टी क जोगाड़ काननए पीटनए आ लोर क दिशा पहिनहि छल भ्रमित । मृतकक औदात्य ओकर मांगलिकता पर नइ भेलइ यथेष्ट चर्चा पता नइ ई कोन किसिमक कंजूसी भेलइ । 4.समाचार मिलला पर ई जत्ते अंतिम संस्कार रहए ततबे अंतिम रूढ़ि छोटका बाबू वरक गाछ जकाँ शताधिक जड़ि के समेटने छलखिन्ह तीन भाइ,पाँच बेटा चौदह जवान नाती पोताक परिवार आ भातिज क अलगे खूट पितियौत क तीनटा बेटा सेहो ततबे नजदीक जमाए भागिन बहिनोइक बात नइ पूछू एकटा महान मध्यविन्दु परिवारक गुरूत्वकेंद्रक समाप्ति पर जे जहिना छल तहिना भागल सिमरिया घाट । 5.सिमरिया घाट पर कवि दिनकर कऽ घर सँ कोस भरि पूरब चैत क्रुद्ध भ जेठ भेलइ दुखी सूर्य झुकि गेलखिन्ह गंगा मे खसब की ? दुपहरिया बालू आगि उगलति छल साबुत माटि कतहु नहि जरल लकड़ी रूइया कपड़ा हड्डी क टुकड़ा बाउल पन्नी घी क डिब्बा आ फूल चकमकिया कपड़ा जिंदगी क सब ऊंच-नीच के धकियाबैत । 6.जड़बए सँ पहिले अनुपात बिसरि गेलखिन्ह घरवारी कत्ते मून लकड़ी कत्ते घी आ कत्ते चंदन चिंता क कोनो बात नइ अस्सी पार जोगी भाइ जे कून हप्ता नइ आनैत छथिन्ह एकटा लहाश सत्तर के लगभगबैत रामाश्रय बाबू आ तहिना मजगूत जगदीश आ संतोष बिना चालीसे के शंभूपंडी जी कंे आदत भ गेलइ जरैया चिरैया गंध लेबाऽक गाँवक शताधिक व्यक्ति भऽ गेलखिन्ह म्ूाकसाक्षी अंतिम दर्शन प्रारम्भ भऽ गेलइ 7.जड़बैत काल कतेको अनुभवी भीड़ि गेलखिन्ह मचान बनऽ लागलइ अपन अपन बाप माए के जारए वला केओ केओ अपन कनिया आ भाए के एक दू टा महा अभागा जे जरेने गाड़ने रहए अपन संतान के सबक ध्यान महादाहक सफलता दिसि जोगी भाइ चेरा बिछबऽ लागलाह रामाश्रय बाबू दोहराबऽ लागलाह उठऽ जगदीश बायाँ सँ मजगूत करह रूकू संतोष पतरका चेरा उपर मे देबइ गणेश भाइ चारू खंभा ठोकऽ लागलाह गंगेश जी कहलखिन्ह मुँह पर चेरा नइ राखियौ मुखाग्नि पड़तए सुरेश जी टोकलखिन्ह मात्र विध छैक केवल सटएबाक काज चंद्रदेव भाए जीपे मे रहलाह यम के डरे वा थाकल हारे घनश्याम जी एगो के डांटि देलखिन्ह खड़ही के हाथ नइ लगाबहक औखन बड्ड काज छैक ओ अलगे रूसल “हमहूँ देखब कोना लहाश जरत!” अंतिम परिक्रमाक बाद मुखाग्नि पड़लए आ अग्नि खींचऽ लागलखिन्ह दिशांतक कोणांतक हवा सूर्यदेव माथ पर आबि गेलाह गंगाक धार प्रशांत भऽ गेलइ परिजन निश्चिंत भेलाह एकटा नवतुरिया खोललक बिस्लेरी टो टापि के शीतल जल बँटऽ लागल मुँहगर सब जुड़बऽ लागला अपन कण्ठ पेट एकाएक दछिनबरिया कोना लचि गेलइ सब एक दोसर पर बाजऽ लागलइ “हम तऽ पहिले कहैत छलियइ दछिनबरिया कोना फलाँ बाबू बनेलखिन्ह हओ बाबू आँचक दिशा बदलऽ लाबऽ पतरका चेरा संठी ढ़ैंचा घी तू ओमहर सँ बाँस भिराबह हे हे उत्तर सँ देह उघार भेलइ देखियौ तऽ हाथ पैर अकड़ि रहल छइ कि ओ आर्शीवादक हाथ छैक ? बूढ़बा अखनो तमसाइल छैक” 8.विदेहक धरती पैकबंद बोतल के फुजिते बदलि गेलइ मौसम जेना कि मृत्यु नइ कोनो जन्म क उत्सव हो विदेहक ई धरती देहक मजाक उड़बऽ लागल रंग रंगक चुटकुला हवा बसात क्षेत्रक वर्गक गामक अलग अलग अनुभव । जगह धुंएने रहए मुदा कठिहारी के यात्री नहबऽ लागला रगडि रगड़ि़ के देहांतक बात बिसरि आ दस मिनट बाद खाए लागलाह चूड़ा-दही जिलेबी पूरी गरम गरम मसाला नमक क चर्चा करैत ओएह पेटक लेल ओएह देहक लेल ऐ विदेहक धरती पर 9.ऐ सिमरिया मे मात्र देहे नइ धर्म आ धनहु क प्रति विरागक लेल तैयार रहू ऐ गंगा क माटि मे एकहि ढ़ांचा क आदमी बंाध सँ घाट तक । घाटक डोम आ पंडित सभ लोकनि एके संख्या कहताह एक हजार एक आ तहिना होटल वला नाम लियऽ अन्नपूर्णा विद्यापति मिथिला वैष्णव शंकर आदि आदि सभ मिला के एके बात एक हजार एक 10.चर्चा क विषय चर्चा क विषय ई नइ छैक कि छोटका बाबू कत्ते परहल लिखल कत्ते बड़का विद्वान ज्योतिषी केाना के पढ़ेलाह धिया पूता के कि ओ चाहैत छलाह कि पओलाह आ कि मूने रहि गेलेन्ह चर्चा ई छैक कि कोना मरलखिन के सेवा केलकए आ के अनठेलकए ककरा कि देलखिन्ह आ के कि चाहैत अछि कोना हेतए श्राद्ध आ कोना कोना भोज के सम्हारतए आ के चौकी बजारतए हरेक गौंआ घरूआ के हाथ मे छैक चित्रगुप्तक धर्मदण्ड ओ नापि तौलि रहल छैक आ आबि रहल छैक निर्णय बदलि बदलि के सब चौकस अछि के एलए के बिसरलए अएबा के कारण आ बिसरबा के बात पर भऽ रहल छैक गोल गोलैसी घिन घिन घोंघाउज । मरणोपरांत-२ की केना मतलब ई जे भोजक कोन व्यवस्था ? गौंआरी वा छगमिया केवल भात कि चूडा या दूनू दिन इस्त्रगने पुरखे वा सबजाना एकजाना क बाते जुनि करू भोज क सब रिकार्ड टूटि जेतइ जकरा घर मे पाँच टा सरकारी मास्टर आधा दरजन इंजीनियर से कि ओहिना मानि जेतइ ओ तऽ गाँववला के पानियो पियेतइ आ पानि पियाए के मानतइ मुदा बात एतबे नइ भात के खायत या नइ एकर निर्णय त अलग अलग खूट लेत ताहि दुआरे हे पंचोभय बुधवारय पगुलवारय आ आनोआन खूटक म्ुाखिया आ ठीकेदार आबू आ निर्णय लिय । 2 जेना जगदीश बाबू कहलथिन्ह “एना त कहियो ने भेलइ घरवारी किछु कहलक आ नौत किछु आर भऽ गेलइ कतेको बेर बात घचपचा गेलइ ताहि दुआरे स्पष्ट कहू ककरा कही आ ककरा छोड़ू सबजाना कि इस्त्रगने पुरखे आ नौत क संगे बिजौ बस हम उतरबाइ टोल क भागी” नौत देला के बाद घामल जगदीश बैसि के धात्री गाछक नीचा कहऽ लागलाह अपन बात “ओ जखने कहलक की कथी क व्यवस्था हम कहलिएन्ह अओ बाबू ओइ घर मे छऽ छऽ टा इंजीनियर चारि टा तरकारी पाँच टा मधुर आ बीस बेशी सौ मन दूधक दही चारि साल पुरनका चाउर राहड़िक दालि बरी सकरौरी घी पापड़ कत्ते खायब उपरो सँ नीचो सँ खुएताह खाउ ने कत्ते खायब ” जगदीश झुठे छाँटैत रहलाह सब बूझैत अछि ओ एत्ते नइ बाजति छथि फेर बिजौ क बात पर कहऽ लागलाह “हम कहि देलिएन्ह आब कून बिजैा आ कोन विनय जेहने खुएनहार तहिना खेनिहार” 3 हे सूर्य हे भास्कर आइ माथ पर नइ आयब बादले मे रहब जोन मजूर खबास भनसीया पनिभरनी सब तपि जेतीह तऽ काज के करत हे पवनदेव आइ मंद मंद बहब खाउ हनूमान सप्पत आइ पूरबे रहब एमहर आयब तऽ तीमन तरकारी भात दालि सब मे माटि बाउल खपटी सना गोजा जायत । हे इंद्रदेव अहाँ क जरूरी आइ खेत मे छैक गाँव मे नहि अहाँ आइ शचीए लग रहू अहाँ आयब ! तखन कोना अओताह गौंआ घरूआ टोल समाज ब््रााहमण महाब्राह्मण । हे देवगण आइ अंतरिक्षे मे व्यस्त रहू आइ लियऽ दियऽ प्रकृति क स्वाद आइ रमऽ दियऽ समाज मे आइ बैसऽ दियऽ जमीन पर आइ माँगऽ दियऽ पानि केरा क पात आइ सूँघऽ दियऽ महकौआ चाउरक भात । 4 जेना मन्नू बाबू कहलखिन्ह तीने बजे पड़ि जाए आलू उसनए लेल चारिए बजे बनऽ लागए चटनी भोरे बनए बरी सकरौरी सात बजे तक जमा भऽ जाए बालटीन डोल गमला करछुल चंगेरा । आठ बजे हुअऽ लागइ तरकारी क सूर सारि दस बजे बीड़ी बनि जाइ बारह बजे तक नौत निमंत्रण एक बजे पत्ता कटा जमा भऽ जाइ दलान पर । दू बजे चढ़ि जाइ भातक पहिल खेप तीने बजे सँ रतरत करए गाँव टोल क नबका बारीक । अइ होटल आ केटरर क जमाना मे अहाँ कोन सामाजिकता क बात करइ छियइ आठ बजे एलियइ आ दूनू बापुत बैसि गेलियइ कोना के निबाहबए गाँव टोल क मरजाद । 5.अशोकक गाछ कामकाज मे पाछू मुदा ललकारए मे आगू ओ नमगर छीटधारी युवक आलोक बाबूक सार छथि । चलबा बाजबा क तरीका सँ स्पष्ट रहए ओ कोनो डीएसपीए के बेटा हेथिन्ह चलाकी पकड़ेला पर ईमानदार भऽ गेलाह “हमरा लोकनि भेलहुँ अशोकक गाछ ने फूल देब ने छाया ने फल बीज ने आरोग्यक चीज। मुदा हम दलान पर बनल रहब हम छी शोभा काटबा हटेबा क वस्तु नइ प्रतिष्ठोऽपकरण ।” मरणोपरांत-३ मरनाहर के यादि करू हे चन्द्रदेव ,राम ,भूषण आ कृष्णमोहन मरनाहर के यादि करू जेेना मंदिरक निरमाल बीतल सम्मेलनक पोस्टर आरती पूजाक बाद शालिग्राम । ई नइ कि ई देलाह आ ई नइ देलाह रोड पर अपने घर बनेलाह आ हमरा बँसबिट्टी देलाह अपने भीठा आ हमरा उसरौठी देलाह भाइ पर कम आ बेटा पर बेशी ध्यान देलाह ई आहक तुकबन्दी बंद करू मरनाहर ककरो सँ किछु नइ लेलक भले ककरो किछु कम देने होए । ताहि दुआरे आबू आ काज मे रमि जाउ जमीन जाल खेत मकान गाछी बाँस रहबे करतइ काल्हि सँ बाँटब आ बाँटिते रहब । हयओ इंजीनियर साहेब बजाबू खुआबू विनय सँ ई धरती हरदम नीचा आ अकाश हरदम ऊपरे रहैत छैक अहाँक पुरूषार्थ सँ अविचलित मूड़ी कनि नीचा आ छाती बिन उतान केने आनू मुँह पर कनि विज्ञापित नकली मुसकान गौंआ घरूआ निमंत्रित छथिन्ह ई नइ छथिन्ह खबास आ जोन ई नइ छथिन्ह पुल बान्हक ठीकेदार बिसरि अपन नाम पद स्वागत करू सब के । चाहे केओ कतबो खगल कपड़ा लत्ता फाटल चीटल झुकि जाउ स्वागत मे सम्मान,मर्यादा क तमघैल कहिया ले राखब खुलि के खर्च करू संचित प्रतिष्ठा के बेन बनाउ आउ ,झुकि जाउ भोज काल पसरि गेलइ सुअन्नक गंध आब‘ लागलाह निमंत्रित घुसक‘ लागलइ बिलाइ कुकुर चौकस कौआ उल्लू बनबिलाइ बैस‘ लागलइ पांति क पांति आब‘ लागलइ जेरि क जेर विदा भेलाह गौंआ दियाद नून तीमन क मीमांसा करैत सुपारी चून लैत कुरता खोलि गरदनि पर राखैत साफ कर‘ लागलइ जोन खबास पांति मे गिरल पत्ता भात दालि दही बरी फाटल पात छिट्टा मे जाइतो जाइत गिरि जाइ किछु भात किछु दही दही क विषेन गंध दालि तरकारी मे मिलि बना देलकए भोजेन !भोजेन ! भोजगंध अलसियाब‘ लागलइ दौड़‘ लागलइ गोला करिया कुकुर हा हा कर‘ लागलाह दामो सुरेश चिकर‘ लागलाह बैजू बाबू गंगेश जी मन्नू बाबू “जल्दी ला रे खर्रा पानि झारू उठाबू अओ पात लाबू भात कहाँ गेलइ तरकारी दालि दूनू तरकारी एक साथ उठाबू आब बरी भ गेलइ बस दही उठाउ ओमहर सँ के उठि रहल अछि बैसू !बैसू !बैसू ! देखब कुकुर पांति मे नइ घुसए हओ एमहर दही छूटि गेलइ चलू आब पातिल राखू भंडार घर बन्द करू ” मरणोपरांत ४ कविता कऽ माने की ? ओइ सांझ मे छोटका बाबू अचानक कविता पर बाज‘ लागलखिन्ह “हओ वौआ कविता कोनो सुस्पष्ट सुनिर्धारित मकान क नाम नइ जेकरा मे दस बाइ बारह क कतेको घर होइत होए आ ने कविता कोनो एहन घर जेकरा बनएबा क लेल ईंटा क लंबाई,चौड़ाई,रंग आ ब्रांड निश्चित होए बात आराम आ आनन्द क छैक तें जेंहने ईंटा तेहने फूसि आ माटि पाथर बात खुलल टटका हवा के छैक तें घर केहनो होए होए खुलल आ हवादार जेहन कि कविता होइत छैक । ओकरा रस कही वा घ्वनि बात त एहने होए कि अंदर तक झनझना जाए । हं हमहूं मानैत छी रंग आ पच्चाकारी के हमरो खीचैत अछि चुम्मक जँका अलंकार हमहूँ भसिया जाइत छी कखनो शब्दक जाल मे मुदा वौआ एहन घर कोन काज के जे बाहर खूब झालदार आ अंदर झोलझाल गेन्हायल गरमी मे गरम आ ठंडी मे बसात बहय एहन घर ल‘ के की करब ” ई कहि छोटका बाबू शांत भऽ गेलखिन्ह । पहिल छाया क दिन आगंतुक पंडितगण बैसि गेला सामने बेलवूक्ष नबका हरियर खिज्जा बेलपात सब ओहने छल ओकरा केओ नइ तोड़ैत छल तहिना मंदिर परक दूबि सब बिना खोंटल बरहल अपन ओकादि भर अरहुल सब फुला फुला गिरि गेल छल नीचा सूखल फूलक ढ़ेरी छलए मंदिर सेहो उदास छलए आ देवी सेहो लोराएल मुदा भैया सब कहऽ लागलखिन्ह देवी क ई नोर बड प्राचीन ई मूर्तिकार क अंतिम कृति छल आ बनाबिते बनाबिते गिरि गेल छलए आ अंतिम मरिया देवी क आँखिक कोर पर लागलइ ई नोर तहिए सँ अछि । ई कहिते कहिते एक भाए झारू लऽ के बहार‘ लागलखिन्ह दोसर भाए पानि लऽ के धोब‘ लागलखिन्ह तेसर फूल तोड़बा क लेल विदा भेला चारिम कोनाक झोल झार‘ लागला पाँचम भैया भगवती क समक्ष नतमस्तक भेला । मंदिर पहिले जँका चकाचक भऽ गेलइ आइ अभ्यागत आबइ वला छथि काल्हि सेहो केओ आर कोना रोकल जाइ विवाह ओना त एक साल तक शोक समारोह चलैत छैक मुदा वौआ क चेन्नई मे खेबा पीबाक बड दिकदारी । बाबूजी खूब प्रसन्न छथि “लोक सब कहैत छल जे अहाँ क बेटा सब बड़ दूर अहाँ क की हाल हेतइ आ हमरा मून मे आबऽ लागल लहास के गेनहाइ क गंध नाक दबैत लोक आ परेशान परिजन मुदा हमर दूनू बेटा हीरा अछि पहिले बड़की काकी फेर बड़का बाबू मझिला कक्का काकी आ छोटका बाबू सबक अंतिम संस्कार मे दूनू पहुँचल हम निराश नइ छी हमरो लहास क नीके गति होयत” भाई जी क व्यवस्था टंच छनि भाइ जी काकी आ छोटका बाबू क श्राद्वक व्यवस्था के आदर्श मानैत छथिन्ह छगमिया भोज दसदिनिया गरूड पुरान आ गाम परोपट्टा क बरबरना भोज एक दिन नइ तीन दिन आ अंतिम संस्कारे सँ वैदिक रीति सँ दान प्रदान ताहि दुआरे बाबूजी क सब पैसा जे रिटायर भेला पर मिललेन्ह जमा छैक नीक रेट पर ताकि बाबूजी क मरला पर पैसाकौड़ी ताकऽ नइ पड़ए सब किछु पहिले सँ व्यवस्थित रहए ओना बाबूजी स्वस्थ छथिन्ह आ ऐ बेर एक बीघा खेत मे हाइब्रिड बासमती क खेती केने छथिन्ह आ बरसा खूब भेला सँ प्रसन्न छथि ओमहर भाइजी खूब प्रसन्न छथिन्ह काल के बान्हल नइ जा सकैत छैक काल के पूजबा क अलावा कोनो रस्ता नइ कोनेा मंतर कोनो जादू टोना नइ बाबूजी क पैसा डेली बढ़ि रहल अछि । बर्फ भोर सूर्यदेव कत' लुप्‍त भेला कोन अंतरिक्ष ,मंदाकिनी मे या जाड़ हुनकेा खेहाड़इ छइ देखियौ ने कुम्‍हरबा मटकूरी नइ बनाबए छइ । बनाओत की मटकूरी घैल चुक्‍का पातिल तौला उगता नइ सूर्यदेव लेब की हम बमभोला । तहिना पसरल अन्‍हार कुहेसा हड्डियो कंपकंपाइ छइ बीलटबा सूतलेसूतल ओछैने पर खाइ छइ । रूकल जीवन स्‍पंदन गाय भैंस कुकुर बकरी डोलबए छए गरदनि डोलबए नांगरि पूछड़ी कानए बिना नोर दांत देखबै छै । बंद भेलै विद्यालय बंद कटनी रोपनी एहन बर्फ भोरो मे नहा के छुन्‍नू पंडित पहिर ओढि़ काजल टीका तीन कोस जजिमनिका साइकिल के गरूड़ बूझि घंटी डोलबैत छइ देश आ गेयर देश सुस्‍ता रहल छइ या पनहा रहल छइ चाही एकरा तेल ग्रीस मोबिल आ तहिना साहित्‍य आ सम्‍बन्‍धो मे पहिले हमरा पढ़ैत देखि मॉ आनइ छली चाय पानि बाबू तमाकू चूनबैत चलि जाइत छलाह अकाश सँ आगू आ कनिया पहिरैत छली चूड़ी ,पायल नि:शब्‍द झनझनाहट सँ भंग नइ हो हमर ध्‍यान हवा बिहाडि़ सेहो बहैत छलए पूछि के । हमरे खोंखी सँ खोंखियाइ पूरा दुनिया हमरे सपना सपनाइत उगैत छलइ चान सूरज । ओ आर जमाना छलए नेता जी यादि अछि अहॉ क एक संकेत पर देश बिछ जाइत छलइ अहॉ मतलब देश आ देश मतलब अहॉ नेताजी आब दोसरे हवा बहि रहल सब अपना विषय मे सोचि रहल स्‍त्री ,सोलकन,जाम्बिया ,भूटान ,लातेहार ,पलामू सबके पता छइ अपन हित अपन बात देश ,सम्‍बन्‍ध ,साहित्‍य चढ़ाई पर चलि रहल चाही बेशी दम गेयर नम्‍बर चारि बेशी गति बेशी तेल पानि या फेर बच्‍चा क वीछियो जँका बढ़ा दियओ लेवेल धूर्तता ,छल ,धोखाक लेवेल बढ़ब' पड़त चाही नया नया मुखौटा मोबिलाइजेशन प्रोपेगंडा पाखंडक अद्यतन संस्‍करण दोसरे हवा बहि रहल छैक देश दुनिया जागि रहल छइ पॉंच केबी इंटरनेटक मंद गति आ सुन्‍नरि तोहर फोटो ससरैत बढ़ैत लहरि जेना स्‍वर्गक परदा खुलैत हो धीरे धीरे सितार पर राग भैरवीक साथ पॉंच केबी मे माथ दस मे कपार पंद्रह मे आंखि पिपनी डिम्‍मा सहित फेर रूकि गेलइ नेट पता नइ आइ देखि सकब आंखिक निचला ढ़लान अरे आंखियो देखा गेलइ आंखियो सँ नीचा सिंधुगंगाक विशाल मैदान कनि नाक त' देखियौ हिमालयक बहिन बनल जाइ देखियौ त' नेटक नरहेरपनी केवल वामे देखाए छए दहिना त' गिलने जाइ छैक की दहिनो ओतबे पवित्र ओहिना गंगाजल । नेटकंपनी क लेल निकृष्‍टतम पंचाक्षरी गारि के घोंटैत बंद करैत हम जाल जंजाल सत झूठ आ खेहारने अनेरे कवि यात्री आध फांक आंखि आ आध फांक नाक दोस महिम कखनो जातिक लसेर लगबैत कखनो कुल गोत्र क सोंगर नेने उपकारक पंजी समेटने बीतल युग पर टीका करैत कोनो चित्र पर सँ जाल मकरी साफ करैत आबि गेलखिन दोस ओ कहथिन आ कहिते र‍हथिन ओ सुनबा ले नइ आयल छथिन हुनका मोल चाही ओ तौल रहल छथिन अतीत के सिनेह के ओ खोजि रहल छथिन सबसँ बड़का अंक जे अचूक होए आ बटखरा के बदला राखि देने छथिन बीतल युगक दोसतियारी २ आब दोस डेली बतियाइ छथिन सामना सामनी नइ त' फोने सँ थाहइ छथिन कोन नस कत्‍त' सँ पकड़ी थाहैत छछारैत मुस्कियाइ छथिन हम दबि रहल छी हुनकर जानकारी सँ कालिदास मैथिली मोहम्‍मद रफी आब हुनको प्रिय विषय अछि पहिले मिलबा सँ बचैत रही आब नइ आबइ छथिन त' कोनादिन लागैत अछि दोस तमाकू जँका ठोर कब्जियेने जाइ छथि आ भांग जँका दिमाग की कही दिमाग त पहिले सँ हफीमियाइल अछि दोस एता ओ कहता आ हम करब यद्यपि नफा नुकसान जनइ छी मुदा दोस शिष्‍ट बना गेला बाजइ भूकइक तरीका नीक जँका सीखा गेला गीत गाबैत श्‍लोक पढ़ैत उद्धरणक बरसा करैत कखनो प्रेरक प्रसंग कखनो वेद पुराण तहिना अर्थराजनीति कखनो भकुआइ अकछी कखनो दोस देवता देखाथिन दया बेचैत ओ छली फरेबी वंचक बहुरूपिया छलइ कखनो कालिदास विद्यापति जपइ छलइ महान ज्ञानी नइ जानकार छलइ फंसा लै छलै कोनो चरचा मे मनबा लै छलै बात भ जाइ छलियइ चित्‍त पटो मे किछु नइ करैत छलियइ ओ कखनो बीमा कखनो कविता कखनो किताब बेचि पड़ा जाइत छल । ओ आब चुप अछि ने दुश्‍मनीक बात ने दोस्‍ती क चर्चा छइ काल्हि फेर आयत कोनो नया डिब्‍बा पेटी किताब मोबाईल स्‍कीम नेने हम फेर चित्‍त हेबइ ओ फेर भूतिया जायत अपन बटुआ सम्‍हारैत । मनोज भाय क चिट्ठी की भाय आबो राजदूत उड़बै छियइ सौ पर की भाय आबो हंसइ छियइ ओहिना हहा के की भाय आबो देखइ छियइ रौद बरखा के ओहिना प्रेम सँ की भाय आबो कचकूह आम देखि पानि आबैत अछि मुंह मे अपन गाछी आ दोसरक आम एखनो नीक लागैत अछि की भाय जालंधरो करियने जँका छैक कोना साधए छियइ उदयनाचार्य आ जालंधरनाथ के एक साथ नव्‍यन्‍याय आ नाथपंथक सूत्र कत' मिलैत अछि या हमरे जँका उलझैत देरी छोडि़छाडि़ निवृत्‍त भ' जाइ छी सही कहलहुँ भाइ विदेहो त' हमरे छथि आ हम पूरा दुनिया मे पसरलाक बादो ओतबे लोकल छी सक्‍कत माटि खींचैत अछि हमरा आ दरिद्रछिम्‍मरि रहितहुं ओतबे सामंतवादी छी संग मे अछिए की ,जे दुनिया छीनत तैयो पकड़ने छी अपन दूबि के बकुट्टा मे छोड़ू ई सब की ओतहु एहिना गामघर गीतनाद धूपदीप यादि आबै छी हम ,गाम आ समाजक लोक बड़ी ,सिंगराही ,नबकी नौला पोखरि बडि़याही ,बलहा घाट ककरहा ,ठकुरनीया ,महिसर बाध कखनो सुनइ छी प्राती ,नचारी ,समदओन चाखै छी नबका चूड़ा पर छलियैल पूष मासक टटका दही हंसए क बात पर हंसइ छी आ कानइ क मौका पर गिरैत अछि नोर या आहूं के मारि देलक समय जेना हमरा मारलक सम्‍हरल डांग सँ बियाह आ मोंछ ओ बियाह नइ ,मोंछक लड़ाई छलई आ सभक अपन अपन प्‍लान रहए बाबू ,मॉ ,दोस ,सासु ससुर संस्‍कार कम ,नाच बजार छलइ । बाबूए पढ़ेने लिखेने रहथिन तें बियाह हुनके पसिन्‍नक जगह ,लड़की आ तिथि के निश्चित छलए भैयाक लेल ई छलए अचूक मौका साबित करबाक लेल बहुत रास चीज तें केवल नवका चमचम गाड़ी क जखीरा रहए आ यदि ऐ साल बियाह नइ हेतइ तखन बाबू क मोंछ आ माथ नीचा भ' जेतेन । यदि हम काजर लगेबा सँ रोकबा क प्रयास करतियइ तखन जनानी सबक नजरि मे मॉ बहुत छोट भ' जेतइ आ ससुर महराज सेहो लगेने रहथिन बाजी ककरो सँ तें दिसम्‍बर पक्‍का रहए आ ने हमर उमेर कम रहए ने हम बेरोजगार रहियइ तें ससुरक ससुर जांच करबा लेल पहुंच गेलखिन बागमती सँ केन कहीं कोनो जनानाक चक्‍कर त' नइ छइ आ बियाह मे जरूरी रहए दारू पीनए आ नाचनए किएक त' वीडियो गड़बड़ा जेतइ आ धियान देने रहए बहुत लोक गिद्धो सँ बेशी हम हुसियइ आ ओ प्रारम्‍भ करए । प्‍लेटो आ हमर कनिया अंतत: प्‍लेटो के योग्‍य शिष्‍या मिलिये गेलेन हे मैथिलीक स्‍वर्गीय कविगण बता देबेन प्‍लेटा के ओ एकटा युवा महिला छथिन्‍ह आ जहिना प्‍लेटो दोड़ैत छलथिन्‍ह कविता दिसि राजदंड ल के तहिना ललकारैत छथिन्‍ह ई एकटा नवोदित कवि के आ पूछैत छथिन्‍ह एकटा अस्‍थापित कवि सँ की हेतओ ऐ कविता ल' के काज रोजगारि छोडि़ किएक बताह भेल छें सजमनि छीलैत आटा सानैत फोड़न दैत छौंकक मेंजन तैयार करैत बच्‍चा के मुंह मे कौर दैत नेटा कांची पोछैत नाना प्रकारक मुखाकृति भाव भंगिमा खुसुर फुसुर खौंझाइत बड़बड़ाइत गारि गीत जँका कखनो गायत्री मंत्र कखनो सप्‍तशती कखनो कोनो अतुकांत वैदिक ऋचा अरबीक अबूझ नेमाज जँका । आ प्‍लेटा जे नइ क' सकला मंत्री पद अछैत बधाई प्‍लेटो । अहॉक योग्‍य शिष्‍य अरस्‍तू वा हमर कनियां । ओ निर्णय निकालि नेने छथि एहिना फिफियाइत रहब हिहियाइत रहब किछु देखने सुनने ऐ दुनिया मे सब केओ अछि आ दुनिया ढ़न्‍नूक लाल सॅ नइ चलैत अछि मुदा ई दुनिया ढ़न्‍नुको लालक छैक । टिप्‍स फ्राम खट्टरकका न्‍यूटनक नियम मे किछु जोडि़ घटा देबहक कोनो दोसर भाषा कोनो आन फांट मे किछु शब्‍द बदलि के क्रम बदलि के तखन की ओ नियम तोहर भ' जेत' नइ ने मुदा साहित्‍य मे ई फ्राड खूब लोकप्रिय अछि टीपू आ छपि जाउ बूझलहो वौआ आ केओ पकडि़ लए तखन कहि दहो हम त' हुनका सँ प्रेरणा लेने छी आ बूडि़भकुआ तैयो नइ मान' तखन जोर सॅ बाजिह' ओकर कान तीरैत कानिह' खीजिह' अपनो मुंह कान नोचैत ओकरो केश टीक तीरने साल दू साल त' बिताए देब' साहित्‍यो विज्ञान होइछ तावत केओ आन कतउ सँ टीपतइ ओ मंच पर आबि जेतइ आ फेर नया सिरा सँ तीरमतीरा प्रारंभ भ' जेतइ बर्फ पानि भाफ देह ओकर बर्फ छलइ मोन ओकर पानि छलइ स्‍वप्‍न ओकर भाफ छलइ देह मोन स्‍वप्‍न ओकर बर्फ पानि भाफ छलइ उमेर ओकर तेहने सन सतरह अठारह छलइ मोनक उन्‍नीस बीस जिनगी केर पैघ छोट जाउ कनि एमहर वा ओमहर लजाति छलइ मुसका बैत मंद मंद आंखि नाक तीर तारि नहू नहू डेग ओकर कखनो बिहाडि़ छलइ इतिहासक घंटी मे गणिते बुझाइत रहइ रामजीक सासुर अयोध्‍या देखाइत रहए । बस तीने दिन लागि रहल पटना दरभंगा तीन दिन लसेर अओ जुटि रहला बड़ बड़ महन्‍थ सेर केओ सवा सेर अओ सुनु सुनु रंगबिरही बाजा वौआ पटना कक्‍का झाझा पाउडर काजर खूब लगेने कविक राग बहेर अओ लस्‍सी पेप्‍सी मुरगा माछक पन्‍नी शीशी हड्डी कांटा लागि रहल अछि ढ़ेर अओ बस तीने दिन जय विद्यापति जय मिथिला के फेर अओ फेर वौआ तहिना दिन रहतइ कानिपीट के भाग पड़ेतइ जगत जानकी सासुर बसतइ बस तीने दिन दिनक फेरा बिसरत सब नरहेर अओ उत्‍थर लोक जेहने हम तेहने हमर ई उत्‍थर शब्‍द करिया माटिक बड़का चेका सुक्‍खल बज्‍जर सन हर बरदक बात छोडू ट्रेक्‍टरोक चक्‍का धसैत छैक आ कखनो भुसभुसिया उस्‍सर पनिसोखिया बलुआही कनियो लैस नइ की चापलूसी कोन कृतज्ञता नोकगर खतरनाक सटला पर घोंपयबाक गारंटी कखनो लाल लाल जेना माटि खूनक दोस्‍ती हो सुल्‍तानगंज भागलपुरक जमीन अलगे उपज जेजात बूझू कोनो ग'रक लोक नइ अहॉ उपकार करब हम हस्‍तक्षेप मानब अकछियाएब अलगे हम छी उत्‍थर लोक परिधि पर रहए वला । चमारक ऋण बहुत नमहर मोट पुरान रजिस्‍टर छैक चमार सभ कें संग मे हँ हँ सभ के संग मे छैक ककरो जिल्‍द रंगगर छैक ककरो सादा तहिना नव पुरान सेहो केओ छंद निछंद सभ्‍यासभ्‍य सभ पर छैक क्रोधक निशान कोनो कोनो मे प्रतिहिंसा क आगि ,लोहा ,पाथर केओ तर्कक साथ ई तर्क तर्कशास्‍त्रक उधार नइ विज्ञानक छैक आ कखनो फूले ,अंबेदकर कखनो कर्पूरीक फोटो सजा गेलइ ई रजिस्‍टर ई केओ चोरा नइ सकैत छैक केओ जरा गला नइ सकैत छैक एकर सभ शब्‍द चमार सभ के ह्रदय पर अंकित छैक पाथरक शब्‍द लोहाक शब्‍द कोनो आर भरिगर वस्‍तु होइ त कहब दीवाली क पहिले दीवाली सँ पहिले कोदारि सँ खूनैत करिया माटि पनि द' छछारैत सानैत मिलबैत कुम्‍हार चाक पर बैसा के गांरि काटैत कुम्‍हार कखनो हवा बसात सँ बचबैत रौद मे सुखबैत कुम्‍हार गोइठा जारन कोयला सँ जरबैत कुम्‍हार लाल लाल दीप देखि मोंछ पिजाबैत कुम्‍हार धनतेरस राति बहुतो रास दूटकिया लॉटरी अखबारक ईनामी कूपन सब दू नम्‍मर सॅं छूटैत डिवीजन तीनू बेर बेटिये बेटी । तैयो साहस करैत घुसलउँ बजार सोना चानी क कोन बात टिनही लेल भेल प्रात डोलैत करौछ छोलनी बेलना सब जेना डरबए लेल नाच करैत छल कठौत टुकुर टुकुर ताकैत रहए जेना हमहीं सनेबए उसनए क नौत दैत छल उ फूलही डेकची अओ बाबू आइ त' भॉगो नइ खेलियइ ई कूकर कथी लेल सीटी मारइ छइ अरे बाप चूल्हियो कहॉ पजारल छइ धुर जो ई की भेलइ हमरा किछु ने किछु त ' खरीदनइ जरूरिए चलू थारी खरीदल जाए छोट छोट बच्‍चा छइ तीन चारि खाना वला थारी नाना विधि व्‍यंजन नइ छप्‍पन भोग नइ नवान्‍नो त हेतइ एकटा मे रसदार एकटा भूजिया एकटा मे अँचार पापर ऑखि नइ लगबू जीय' दिय' हमरा जाइ छी गाम पर आहूं जाउ । हम पुरहितिया इजोत सँ अन्‍हारक अनंत यात्रा हँ हँ पूर्णिमा से अमावस्‍या बूझू पतरा देखैत दिन गुनैत पतिया कटैत सब शुभाशुभ जेना हमरे पाछॉ लागल अछि ठीके चिन्‍हलउॅ हम छी मिथिलाक पुरहितिया बाभन । सुरजो सँ पहिले शहरियो सँ पहिले जोतुआ बड़द बहलमानो सँ पहिले मियॉं जीक मुरगाके बॉगो सँ पहिले सबसँ पहिले उठिके पूज' चाहैत छी अपन कम दोसर के भगवान के बेशी पाप पुण्‍य व्रत विधि सब दोसरे लेल मिलबो करैछ दोसरे कें आ हम नित्‍य नित्‍य घुमि रहल छी कखनो पैदल कखनो साइकिल हमरो दुनिया खूब जमल अछि जजिमनिका क ऐ तीन गाम सँ प्रति सॉझ हम आबइ छी पाव भरि गहूम आसेर मकइ किलो धान क पोटरी ल' के संगहिसंग एक मटकूरी दही लेने पंडिताइन खोलइ छथिन ई पोटरी जेना रानी खोलइ पड़ोसी रानीक भेजल उपहार । वा कुबेरक कनिया जेना देखथि घरवला क कृतकृत्‍य । आ कहियो राति बारहो एक जिन्‍न सबसँ बतियाइत ब्रह्मराक्षस कें चून तमाकूल दैत चुड़ैल सबके धकियाबैत पछुआबैत ब्रह्मडाकिनी के सरियाबैत अपन मटकूरी । आ वौआ बड कठिन छइ जजिमानी बचेनइ कम देबहो तैयो रूसनइ मना छइ बेशी देबहो तैयो प्रशंसा नइ सुनबहक गमि लेबहक तों सब सब बडा बढि़या खूब नीक चलि रहल छइ भगवानक माया छइ । चालीसक बात तेरह साल पहिलेक बात छइ ओ सब ओ सब बात आब त हमहु चालीसक लगभगाएल छी तोहूं जरूर चौंतीस पैंतीसक भ गेल हेबें कहां पूछि सकलियओ तोरा सं कोनो बात आब त प्रश्‍नो सब बिसरि गेलहुं जे यादि केने छलियओ तोरा सं पूछए लेल हवा क साथ दइ वला केश हमर किछु उडि़ गेल किछु पाकिके डरा रहल अछि हंसीक साथ निकलइ वला धवल दांतक पांति किछु टुटि गेल किछु हिल रहल अछि तहिना गोरनार चमरो ई भेल कारी बदरंग तू केहन भ' गेलें कतओ देखबओ त कोना चिन्‍हबओ ई कहनए त बिसरिये गेलियओ हमरा दू टा बच्‍चो अछि तोरा कएक टा छओ आ तों कत' रहैत छें की तूहू हमरे जँका नौकरी करैत बनरा गेलें आबो सुनइ छें राति के रेडियो आ लिखइ छें पोस्‍टकार्ड की तोरो कोनो पता नइ छओ ई निरर्थक गद्य बस तोरे लेल तूही बूझबीही छंदक भयानक दुनिया मे तुकहीन पद मे छुपल एकटा नीरव एकांत अर्थ बामे गाम दहिने गाम १-६ १ बागमती आ करेहक बीच ठाढ़ ई कोन चीजक पहाड़ हयौ कविकुलगुरू ई अहांक धर्मदण्‍ड नइ जे धरती के क्षणेक्षण नापैत हो ई थिक हम्‍मर गाम ताकैत चारूदिस इतिहासक अखण्‍ड आवागमनक साक्षी बनि तौलैत ब्रह्माण्‍डक पानि कखनो झुकि जाइत बागमती दिस कखनो करेह दिस ले ...ले...तू ले जेकरा काज हो जलक ई पानि केवल हाईड्रोजन आ ऑक्‍सीजनक यौगिके नइ मोनक पानि आत्‍माक पानि सेहो केवल मुंहक पानि नइ कालिदास आत्‍माक पानि मरै नइ बस एतबे लेल ठाढ़ ई करियन गाम ई गाम जानै छैक पानिक मोल तीन-चारि सौ फीट नीचा कअल ईनार गाम जेकर कुरसी बनल बाभन,कुरमी,धानुक गुआर दुसाधक हड्डी सँ सूरखी चूना बनि माटि मे मिलैत गेलै आ पहाड़ बरहैत गेलै एत्‍ते ऊंच.... एत्‍ते ऊंच.... कि नेपाल ,तिब्‍बत ,चीन मिलिओ के नइ डूबा पाबैछ करियन गाम २ धनि जिरात धनि जिरात के नापै तोहर ऊर्वरता के जांचै तोहर जोस बस एक बेर सम्‍हरि के उपजि जो खुआ देबै पूरा दुनिया के एक सांझ सोहारी तीमन तरकारी आ बता देबै झिकुटी क’ मोल आ बस एके बेर सम्‍‍हरि के फरि जाइ खुटेरी बाबूक गाछी कलकतिया मालदह फौजली आ बीज्‍जू क’ असंख्‍य वर्णरस आ ई गंध फैलैत चलि जाइ दूर खूब दूर पूब दिस ...पूब दिस सहरसा ,पूर्णिया ,कटिहार आ ओहियो सँ आगू जत’ सँ बाबा आनै छथिन लाल-लाल झूमका ......... ओ गीत ओ सपना ...आ ओ जिनगी जुड़ाइत रहै ...जुड़ाइत रहै ३ उदयनाचार्य तऽ नहिये छथिन मुदा आचार्य लोकनि सँ जक-थक गाम इसकूल मे परहैत परहाबैत आचार्य हअर नेने कनहा पर आडि़ तोड़ैत बालि नोचैत आचार्य जजाति काटैत गारियो दैत बँटैया वला अधहा सँ चौथाई बनबैत आचार्य श्राद्ध मे वियाहक ,वियाह मे श्राद्धक उल्‍टा-पुल्‍टा मंत्र परहैत भोर पुतौह सांझ भाबौह के चुट्टी काटैत सोहराबैत आचार्य कष्‍ट काटैत जोगबैत बनबैत बेटा कें परहाबैत पटना दिल्‍ली नोकरी करत वियाह करब तिजौरी के साफ करैत आचार्य हम हमही बस हमरे टा अछि देखबैत सुनबैत आजुक आचार्य केओ एक-दू श्‍लोक किताबक नाम एक-दू प्रसंग सही गलत दोहराबैत तेहराबैत आचार्य । ४ चन्‍दा चूटकी क’ बाउल सीमेंट चूना सूरखी लेपैत एकटा गोर दक्‍क संगमरमरिया मूर्ति आनि जग जीत लेलकै हम्‍मर गौंआ मूरती क’ मुंह,आंखि बंद करैत बैसल मुद्रा मे मूरती के शुभ क्षण मे स्‍थापित करैत एकदम सक्‍कत सीमेंट सँ ’ हे आचार्य उठब बैसब नइ’ आ दू कुइंटल लोहा क ग्रिल बान्हि ’हे आचार्य निकलब नइ’ आ मूरती क’ हाथ मे एकटा किताब राखि ’ हे आचार्य दोसर पोथी नइ मांगब ‘ आ मूर्तिस्‍थापना क बरखी मनबैत ’ हे आचार्य आन दिन यादि नइ करब’ एक लाख ईंटा सँ बाउंडरी बान्हि ’हे आचार्य एमहर ओमहर बौएनए बंद करू’ ५ हे महाकवि यात्री एक दिन हमरो गाम आबू बैसू एक पहिर रूकू कनेक काल बतियाउ राति भरि वैह बेनीपुर ,बहेड़ी टपैत बरियाही घाट पार करैत दू कोसक चौरस हरियरी मे डूबल मिथिलाक ऐ भूखंड के थाहैत पहुंचू हमर गाम जत’ सूतल हजार बरिख सँ एकटा महावृद्ध । आबिते बात सुनिते अहांके बूढ़बाक हजार बरिस पुरान हड्डी मे फूटि उठतै नवपल्‍लव मिथिलाक भूगोल मे फैलल ओकर छाउर सांद्रित भ’ धनधान्‍य सँ भरि जेतै गामक आम मौह गाब’ लागतै मधुर संगीत मज्‍जर टिकुला ऐंठतै कोयली क’ कान ओहुना विद्यापतिनगर ,चौमथा ,झमोटिया क’ यात्री एक कोस पश्चिमे सँ बदलैत बाट बचैत करियनक झिकुटी सँ बनाबैत सुगम सुविधासंपन्‍न यात्रा मुदा देखिते अहांके बूढ़बा यादि कर’ लागतै ओ महायात्रा आ समाज ,इतिहासक ओ क्षण धर्मदर्शन मे लपटल ओ कालखंड यद्यपि अहांक विचार अलग आ बूढ़बो एकदम अलग तैयो ई भेंट सधारण नइ हेतै सधारण नइ...... ६ भगवान जगन्‍नाथक ऐश्‍वर्य के ललकारैत ई गाम डूबि रहल अपन छोटपन मे संस्‍कृत बूझबा सूझबा बाजबा बतियेबाक अहंकार आ अहंकार क’ कतेको वृत्‍त ठोप चंदने तक रूकल ठमकल किछु वृत्‍त एक-दोसर मे घुसियाइत नोकरी ,कुल ,जमीन ,पैसा आ बुद्धिक वृत्‍त आ सब घर मे एकटा मास्‍टर हेबाक दस सँ पांच तक पढ़ेबा आ नइ पढ़ेबाक ओतबे पुरस्‍कार महीने महीने दरमाहा उठेबा आ एकटा लिमिटेड दुनिया मे रहबाक खतरनाक संस्‍कार तहिना पूजापाठ ,गपशप ,दैनंदिनी नव-नव अहंकार गाम के घेरि रहल के कत्‍त’ कमाए छैक सरकारी आ बिन सरकारी एक नम्‍मर आ दू नम्‍मर बाउग कम काटए क’ बेशी हूनर बैंक मे अस्‍पताल मे ठीकेदारी सँ चोरि छिनरपन सँ...... गामक अहंकार त’ वैह छैक बस ओकर हुलिये बदललै आ वौआ जत’ रहै छें जे करै छें बस कमाइत रह आ अहंकारे संग बढ़बैत रह खोपड़ी सँ खपड़ा एकचरिया पक्‍का दूमहला तीनमहला ,चरिमहला....... छौड़ा अजगुत कंप्‍यूटर छै लौत उदास परखैत पासंग वौआ क्षणेक्षण साइड बदलै छै ! कत्‍ते वाह ! आ कत्‍ते कमाल कहू बस तीन मिनट पहिले बीचोबीच रहै एक मिनट पहिले वाम भेलै मिनटे पंचर जाम भेलै दहिने छौड़ा गाम गेलै मतलब पूरा कलाकारी बीचोबीचक कत्ते जल्दी गुट बदलै छै ! कोना के गुटपिट ? गुट तोड़ै छै छौड़ा अजगुत कंप्यूटर छै गुरुओ संग नोच्चा-नोच्ची कोना-तीत्ती सिंघीपताली खनेखन छौड़ा गुरु बदलै छै ! महाकवि विद्यापति-१-२ महाकवि विद्यापति-१ युवाकवि विद्यापतिक पुरूषपरीक्षा कवि सँ बेशी ओइ जुगक मांग पुरूषार्थ आ ओइ पौरूषक प्रशंसा ओइ दरबार आ बूढ़रसिक समै केर छन्‍द तैयो ओइ कवि के शत्रु साओन बिढ़नी के छत्‍ता केओ किताब चोराबै ,केओ पांड़ुलिपि पोखरि मे फेंकि दै कतेको चेतावनी ,रस्‍तारोकी ,छीनाछोरी विद्यापति जानैत रहथिन कि पुरनका पोथी बिसरले सँ नवपोथीक आगमन पुरूषपरीक्षा लिखै काल हुनकर बैठकी भरल रहै वेद-पुराण ,व्‍याकरण ,न्‍याय-स्‍मृतिक ग्रंथ सँ जयदेव ,वात्‍स्‍यायन आ भामहक भार सँ दाबल पाणिनी आ पिंगलक बान्‍ह सँ पिसाइत कल्‍पैत युवाकवि सबसँ पहिले फेंकलखिन पुराण आ स्‍मृति तखने प्रकट भेलखिन कीर्तिलता आ कीर्तिपताका मुदा एखनो संतोष नइ ऐ कीर्ति के तुच्‍छ बूूझैत बढि़ गेलखिन आगू कवि विद्यापति फेर फेंकलखिन छंद-काव्‍य आ दर्शनक शताधिक पोथी फेकैतो काल प्रणाम करैत ओइ पोथी सभ के महल आ बैठकी कें त्‍यागि आबि गेलखिन जन आ जनपदक मध्‍य जनपदक संगे-साथ चिन्‍ह' लागलखिन जनमन तखने त' दुख‍हि जनम भेल ,दुख‍हि गमाओल ऐ दुख के गमिते उदित भेलखिन महाकवि महाकविक कविता राजा जनकक नइ आरक्षित बस जनजनक लेल जइ कविताक छाती मे धुकधुकाइत रहै मिथिलाक श्‍वास ई अमरक‍विता तुरूकक कागज पर लिखाइ सँ बेशी अमर भ' गेलै कोटिजनक ह्रदय मे, रक्‍त मे, माटि मे महाकवि विद्यापति-२ हयौ साहेब अहां के एखनो एहनेसन लागै कि विद्यापति बाभनक कवि आ विद्यापति कें जियेने रहलेन बाभन सब अपनेने आ माथ पर चरहेने रहलेन बाभन सभ हयौ महराज विद्यापति त' भ' गेलखिन चारू लोक सँ बाहर महराजक दरबार सँ पंडितक चुटपांति सँ शास्‍त्रार्थक झूठ-अखाड़ा सॅ अहॉं नीक-हमहूं नीक सँ मुदा महाकविक कविता जीयत रहलै माथ पर सम्‍हरल बोझक हुंकारी सँ काशी आ नेपालक व्‍यापारी सँ जहिना प्रिय असोम आ बंग मे तहिना अराकान आ अंग मे महाकवि बरहैत गेलखिन महफा उठेने कहारक पदचाप संग मखान तोड़ैत मलाहक अलाप संग महाकवि आगि भ' गेलखिन अगहन-पूसक घूर मे महाकवि पाथर भ' गेलखिन दुसाधक दुख संग महाकवि गामबदर डोम-हलखोरक टोल-टापरि मे अधमरू महाकवि कें आश्रय भेटलेन नारीजनक कंठ मे दुख आ कष्‍टबोधक जांता-गीत बनि मुदु प्रतिशोधक उक्‍खडि़-समाठ छंद मे महादुख पर लेपैत सोहरक लेप मे महाकवि जी गेलखिन विषम-विवाहक व्‍यंग्‍य मे महाकवि जी गेलखिन बूढ़-छिनारक ललैठी धरबा लेल सभ पोथी-पतरा फेकैत पुर्नजीवित महाकवि बस रूकि गेलखिन मैथिलानीक लोर संग यैह लोर शालिग्रामी ,बागमती कें भरैत कोशी ,गंडक कें तोड़ैत सभ साल दहबै-दहाबै छै मिथिला के हाइकू ई खचरहबा खोजि रहल छओ भाग फतिंगा कि भेलए एकरा? रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए एकरा? माँगलियइ रोसड़ा आ दऽ देलकए तेघड़ा रौ बहि ! रौ बहि ! कि भेलए? एकरा पटनाक बात छोड़ू, दिल्लीक बखरा! रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए एकरा? सोचैत रहौं मंत्री बनब, शुरूएमे खतरा रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए? एकरा हरम-महल-अंतःपुर वा छुपल घरघुसरा! रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए? एकरा दस लाखक टिकट छल, केकरासँ बात करी अल्सेसियन आँखि देखबए, दाँत देखबए झबड़ा! रौ बहि! रौ बहि! कि भेलए एकरा? डॉ. कैलाश कुमार मिश्र गामक कचोट बूढ़ी आ बूढ़क भुरुकबा पराती मस्ती करैत पोखरि आ नहरि में हेलब फुलबारी में कनैल, अड़हुल, चम्पा, फूल लोढ़ब हाथ सँ माटिक महादेब- हज़ार, लखराम बनाएब मंदिर, तुलसी चौरा, भगवती घर के निपब आ पूजाक ठाम शालीग्रामक पूजा, भगबतीक पातरि, भगवानक भोग कबड्डी, झिटकी, नुका-चौड़ी, झिझिया खेलायेब अन्हरिया राति में पानिक झट्टक के सङ्गे आम बिछब आम ख़ेसारी साग, अडरनेवा के झखहा कंसार वाली सँ भुजबैत चाउर, गहूम, चुरा, बदाम मड़ुआ के रोटी में पोठी मछरिया बकेन महिसक दूध-दही, छाली नब बियायल महिसक खिड़सा उदासी, सोहर, समदाउन, जोग, खेलोना लोकगीत चैताबर, बसन्त, तिरहुत, बारहमासा, छौमासा सजनी गीत महेशबानी, नचारी, ब्राह्मण, भगबती, विष्णुक भजन हरियर कचोर पोखरिक पानि निर्मल जल इनारक जे करैत छल पियास केर शांत लह-लह करैत बहैत नदिक अछिन्जल जल कादो में भीजल आ कदियाल गृहस्थक देह आ वस्त्र मारकीन के नुआ में प्रकृति सुन्नरि बनल गामक युवती लताम, केरा, कटहर, बरहर, आता, सरिफा, टाभ नेबो मह-मह गमकैत रंग-विरंगक फल झींगा, इचना, बुआरी, रहु, गैंचा, कबइ, पोठी, मारा सिंघी, मांगुर, दरही, छही माछ डोका आ कांकोड के तीमन बाड़ीक पटुआ, झाड़िक तिलकोरा आ कन्ना पातक तरुआ ज़मीरी नेबो देल ओलक सन्ना घुरक पाकल सोन्हगर आलू आ अल्हुआ तरल कदिमाक फूल आ खमहारु माय-पितियैन केर बिना लोभक अशीर्वादक सँग नीक बोल आ ने जानि की की सब समाप्त भ गेल??? शहर में आबि भ गेल मनुख घड़िक सुई पर नचनिया नीक वस्त्र, घर, गाड़ी, A. C. सब सुविधा में रहैत अछि मुदा जीवन मे एना लगैत छैक जेना नाना तरहक मिष्ठान्न परसल हो लेकिन मधुमेह सँ ग्रसित रोगी हो मनुख ? जे सब वस्तुक उपलब्धता के बादो ओकर उपयोग सँ बंचित हो!!! ओह गाम! अप्पन गाम! मिथिलाक गाम!!! 898 || विदेह सदेह:२९ विदेह सदेह:२९|| 899

Tr रह रॉ Unitea Nations E i ions Educational, Scientific || | OFFICE OF THE UNESCO REPRESENTATIVE TO BHUTAN, tog Cottarat Organization —_—>= ASIA - PACIFIC REGIONAL BUREAU FOR COMMUNICATION AND INFORM. ATOM eat TEL. + 94-44-26743000 i ' ™ Use INTERNET + Mtp://uneseodeltsi.nic.in सुराग + Tyee2s 2 fuly 2003 TO WHOM IT MAY CONCERN « Dr. Kailash Kumar Mishra has been known to me as a sincere, bright, hardworking and original scholar since 998. He had prepared an extensive village report of Saurath - a heritage village of Mithila, Bihar under the UNDP-UNESCO-IGNCA Project on VILLAGE INDIA in १999. This report of Dr Mishra was used by several scholars working in this project as 8 model study to arrange the data in the universal pattern. Later, when UNESCO and Indira Gandhi National Centre for the Arts decided to quantify all of 87 village reports of the project in a systematic and statistical style, Dr. Mishra was assigned to develop a universal format of presentation, His format of presentation could be deemed very good. Clear, concise and easy to understand even to a layman, it gives not only the demographic pattern and ethnology, but also explains away the myths related to the village to understand the psyche. | wish him success in his future endeavours and recommend his candidature for any research/academic post for which Dr. Mishra may be applying. R.P.Perera Chief Administration Programme Officer/Culture दी

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